मानव होकर मानवता से तुमने कितना प्यार किया है, इस जीवन में तुमने कितना औरों का उपकार किया है।
सुन पाये हो इन कानों से जग की कितनी करुण कहानी, डाल सके पर-दुख-दावा में तुम कितना आँखों का पानी।
कितनों के अवलम्ब बने हो, कितनों को भर अंक मिलाया, स्वयम् गरल पी-पी कर कितना औरों को पीयूष पिलाया।
बन कर निर्देशक कितनों को तुमने भूली राह बताई, कितनों के तमसावृत मन में तुमने जीवन-ज्योति जगाई।
लोभ, मोह, मद कितना छोड़ा, नाता काम-क्रोध से तोड़ा, विषय-वासनाओं से हट कर कितना प्रेम ईश से जोड़ा।
जीवन का क्या अर्थ यहाँ है, क्यों कञ्चन-सा तन पाया है, क्या इसको कुछ समझ सके हो, क्यों नर भूतल पर आया है।
क्या अपने की परिभाषा में—सीमित है परिवार तुम्हारा, क्यों न सुनी यह अमृतवाणी—है कुटुम्ब संसार तुम्हारा।
कितनी त्याग सके पर-निन्दा, कितना अपना अन्तर देखा, कितना रख पाये हो अब तक, अपने पाप-पुण्य का लेखा।
(स्वामी विवेकानन्द)
यद्यपि हिन्दू धर्म रूप सौध के अनेक भव्य आधार-स्तम्भ, बहुतेरी सुन्दर कमानियाँ और बहुतेरे विचित्रतापूर्ण कोने-कोने, कई सदियों तक जो देश को प्रलयमग्न करने वाली बाढ़ें आयीं, उनमें बह कर नष्ट हो गये, तथापि उसकी नींव पूर्णतः ज्यों की त्यों अटल है---मध्यवर्ती भारवाही संधि शिला सुदृढ़ है, वह आध्यात्मिक भक्ति---जिस पर हिन्दू जाति की ईश्वर भक्ति और भूत दया का अपूर्व कीर्ति-स्तम्भ स्थापित हुआ है, वह किंचित भी विचलित नहीं हुई, वरन् पूर्णवत् सुदृढ़ और सबल बनी है।
भारत की जन्मजात धार्मिक प्रकृति है, जिसके कारण उसकी अन्तरात्मा ईश्वर और उसके सन्देश में, धर्म के उस प्रबल तरंग की प्रथम गूँज का अनुभव कर रही है, जो निकट भविष्य में सारे भारतवर्ष पर अपनी सम्पूर्ण अबाध्य, शक्ति के साथ अवश्यमेव आघात करेगा और अपनी अनन्त शक्ति सम्पन्न बाढ़ द्वारा हर प्रकार की दुर्बलता और सदोषिता को दूर बहा ले जायगा तथा हिन्दू जाति को उठा कर विधि नियोजित उस उच्च आसन पर बिठा देगा जहाँ उस का पहुँचना निश्चित और अनिवार्य है, वहाँ वह भूतकाल की अपेक्षा और भी अधिक वैभवशाली बनेगा, शताब्दियों की नीरव कष्ट सहिष्णुता का उपयुक्त पुरस्कार पायेगा और संसार की समस्त जातियों के मध्य अपने उद्देश्य आध्यात्मिक प्रकृति सम्पन्न मानव जाति के विकास को- पूर्ण करेगा।
आज भारतवर्ष में जो भावमयी स्फूर्तियां काम कर रही हैं उनमें से अधिकाँश का दक्षिण भारत से उद्गम होना पाया जाता है। श्रेष्ठ भाष्यकार गण, युग प्रवर्त्तक आचार्यगण---शंकर, रामानुज और मध्व ने यहीं जन्म लिया है, उन भगवान शंकराचार्य के सामने संसार का प्रत्येक अद्वैतवादी ऋणी मस्तक झुकाता है, उन महात्मा रामानुजाचार्य के स्वर्गीय स्पर्श ने पद दलित परिया लोगों को अलवार बना दिया तथा उत्तर भारत के महापुरुष---श्री कृष्ण चैतन्य, जिनका प्रभाव सारे भारतवर्ष में है, उनके अनुयायियों ने भी उन महाविभूति मध्याचार्य का नेतृत्व स्वीकार किया।
अज्ञ आक्रमणकारियों द्वारा पुनः पुनः प्रतिवाद होते रहने पर भी आज श्रुति ही हिन्दू धर्म की सभी विभिन्न सम्प्रदायों का मेरुदण्ड है।
वेद के संहिता और ब्राह्मण भागों की महिमा, मानव जाति के इतिहास की खोज लगाने वालों के लिये और शब्द शास्त्रियों के लिये चाहे जितनी अधिक हो--पर यह सब तो भोग मार्ग है और किसी ने भी इस के द्वारा मोक्ष प्राप्ति का दावा नहीं किया। इसी कारण ज्ञान काण्ड, जो आरण्यक नामक श्रुति का श्रेष्ठ भाग है और जिसमें आध्यात्मिकता की मोक्ष मार्ग की शिक्षा दी गयी है, उसी का प्रभुत्व भारत में आज तक सदा रहा है और भविष्य में भी रहेगा।
चाहे वह वैशेषिकों का सूक्ष्म विश्लेषण ही हो, जिसके परिणाम में परमाणु हृदणु और त्रसरेणु के विचित्र सिद्धान्त निकाले गये हैं, चाहे वह नैयायिकों का उससे भी विचित्रतर विश्लेषण हो, जो जाति, द्रव्य, गुण, समवाय की चर्चा में दीख पड़ता है, चाहे वह परिणाम वाद के जन्मदाता साँख्यवादियों के गंभीर विचारों की प्रगति ही हो, इन सब संशोधनों के परिणामस्वरूप “व्यास सूत्र रूप” परिपक्व फल ही क्यों न हो- मानवी मन के इन विभिन्न विश्लेषणों और संश्लेषणों में वही “श्रुति” ही एक मात्र आधार है। इतना ही नहीं, वरन् बौद्धों और जैनियों के दार्शनिक ग्रन्थों में भी श्रुति की सहायता का परित्याग नहीं किया गया है और बौद्ध मत के कुछ पन्थों में और जैनियों के अधिकाँश ग्रन्थों में तो श्रुति का प्रामाण्य पूर्णतः स्वीकार किया गया है।
यदि कोई यह पूछे कि वह कौन सा विशिष्ट दर्शन है, जिसकी ओर केन्द्र की तरह प्राचीन और अर्वाचीन समन्त हिन्दू विचार प्रणालियाँ झुकी हुई हैं, यदि कोई हिन्दू धर्म के विभिन्न स्वरूपों के असली मेरुदण्ड को देखना चाहे तो निःसन्देह “व्यास सूत्र” की ही और निर्देश किया जायगा।
चाहे हिमालय के अरण्यों की हृदय स्पंदन को भी स्तब्ध कर देने वाली गम्भीरता में अद्वैत केसरी को, र्स्वनदीडडडडड के गंभीर स्वर में मिले हुए मेघ गर्जन ध्वनि में ‘अस्ति-भाति-प्रिय’ की घोषणा करते हुए सुनो, अथवा वृन्दावन के मनोहारी कुंजों में “प्रिया-प्रीतम” का कूजन सुनो, चाहे काशीपुरी के मठों में साधुओं के साथ गहरे ध्यान में मग्न हो जाओ, या नदिया के अवतार श्री गौराँग महाप्रभु के भक्तों के उन्माद पूर्ण नृत्यों में सम्मिलित हो, बड़केले और तेनकेले आदि अनेक आशायुक्त विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के आचार्य चरणों का आश्रय लो या माध्व सम्प्रदाय के आचार्यों का उपदेश श्रद्धा के साथ श्रवण करो, साँसारिक सिक्खों का ‘वाह गुरु की फतह’ समरनाद ही सुनो या उदासी और निर्मल लोगों के “ग्रन्थ साहब” के उपदेशों को ही सुनो, चाहे कबीर दास के संन्यासी शिष्यों को “सत् साहब” कहकर प्रणाम करो और साखी (भजन) के श्रवण का आनन्द उठाओ, चाहे राजपूताना के, सुधारक दादू के अद्भुत ज्ञान भण्डार को पढ़ो या उन के राज शिष्य सुन्दर दास से लेकर उस विचार सागर के प्रख्यात लेखक निश्चल दास के ग्रन्थों को ही पढ़ो--जिस (विचार-सागर) का प्रभाव भारत में गत तीन शताब्दियों में किसी भी भाषा में लिखे हुए ग्रन्थों से अधिक है, चाहे उत्तर भारत के किसी भंगी-मेहतर से अपने लाल गुरु के उपदेशों का वर्णन करने को कहो-- तो इन सभी उपदेशकों और विभिन्न पन्थों का मूल आधार वही मत दिखाई देगा, जिसका प्रमाण ‘श्रुति है’, ‘गीता’ जिसकी दैवी टीका है, शारीरिक सूत्र जिसका संगठित रूप है और भारत के सभी प्रकार के मत-मतान्तर-परमहँस परिव्राजकों से लेकर लाल गुरु के बेचारे तिरस्कृत मेहतर शिष्यों तक के मत--जिस मत के भिन्न-भिन्न रूप हैं।
तब तो यह “अस्थान त्रयी” ही द्वैत, अद्वैत विशिष्टा द्वैत और अन्य कुछ अप्रसिद्ध व्याख्याओं के साथ हिन्दू धर्म का ‘प्रमाण ग्रन्थ’ है। वेद के संहिता भाग प्राचीन विवरण के आधुनिक स्वरूप पुराण ही इसका उपाख्यान विभाग है और वैदिक ब्राह्मण भाग का आधुनिक स्वरूप तन्त्र ही उसका “कर्म काण्ड” है।
इस प्रकार एक मात्र प्रस्थान त्रयी ही सभी सम्प्रदायों का साधारण प्रमाण ग्रन्थ है, परन्तु प्रत्येक सम्प्रदाय ने पुराणों और तन्त्रों में से अपने लिये एक-एक को अलग-अलग ग्रहण कर लिया है।
मैं ऐसा तो नहीं कह सकता कि सभी हिन्दू अपने धर्म के इस मूल के सम्बन्ध में पूर्णतः परिचित हैं। बहुतेरे लोगों ने तो इन सम्प्रदायों और इन महान प्रणालियों के नाम तक नहीं सुने हैं, परन्तु जानकर या अनजान में वे सब इसी 6 प्रस्थानत्रयी दे में निर्धारित योजना के अनुसार काम करते हैं।
दूसरी ओर देखो तो जहाँ कहीं हिन्दी भाषा बोली जाती है, वहाँ अति नीच वर्गों में भी दक्षिण बंगाल के बहुतेरे उच्चतम वर्गों की अपेक्षा वेदान्त धर्म की अधिक जानकारी है।
श्री चैतन्य का प्रभाव सारे भारतवर्ष में दिखाई देता है। जहाँ कहीं भक्ति मार्ग की जानकारी है, वहाँ उनकी पूजा-- मान्यता तथा उनके सम्बन्ध की चर्चा प्रचलित है। बल्लभाचार्य का सम्पूर्ण सम्प्रदाय श्री चैतन्य महाप्रभु के सम्प्रदाय की एक शाखा मात्र है। उनके शिष्य कहलाने वाले लोग यह नहीं जानते कि उनकी शक्ति सारे भारतवर्ष में किस तरह काम कर रही है? और वे समझें भी कैसे? इनके शिष्यगण तो गद्दी वाले बन गये, पर वे स्वयं तो भारत में नंगे पैर चाण्डाल तक के द्वार-द्वार पर जाकर भगवान के प्रति प्रेम सम्पन्न होने की भीख माँगते फिरे।
हिन्दी भाषी संसार में बड़े प्रभावशाली, प्रतिभावान, त्यागी उपदेशकों की परम्परा ने द्वार-द्वार तक वेदान्त के सिद्धान्तों को पहुँचा दिया है। विशेषकर पञ्जाब केशरी रणजीत सिंह के शासन काल में त्यागियों को प्रोत्साहन दिया गया, उसके कारण नीचातिनीचों को भी वेदान्त दर्शन के उच्चतम उपदेशों को ग्रहण करने का अवसर मिल गया। सात्विक अभिमान के साथ पञ्जाब की कृषक पुत्री कहती है :- “ मेरा सूत कातने का चरखा भी ‘सोऽहम्’ ‘सोऽहम्’ पुकार रहा है।’ मैंने मेहतर त्यागियों को भी हृषीकेश के अरण्यों में संन्यासी वेष धारण किए वेदान्त का अध्ययन कर देखा है और वे ऐसे वैसे नहीं हैं। अनेकों अभिमानी उच्चवर्णीय पुरुष भी उनके चरणों के समीप बैठकर शिक्षा प्राप्त करने में प्रसन्न होंगे।
एक संन्यासी कचू पन्थी या स्वतन्त्र पन्थी (जो अपने को किसी पन्थ में शामिल नहीं करते) ऐसे हैं जिनके द्वारा राजपूताना में सैकड़ों पाठशालाओं और दातव्य आश्रम हुए हैं। उन्होंने जंगलों में अस्पताल खोले हैं और हिमालय के दुर्गम गिरि नदियों को पार करने के लोहे के पुल बनवाये हैं और वे ऐसे पुरुष हैं जो सिक्के को अपने हाथों से छूते तक नहीं। उनके समान और कितने ही हैं। भारत वर्ष में जब तक ऐसे भूदेव पृथ्वी पर जीवित रहेंगे और अपने दैवी आचरण रूपी परकोटे ‘सनातन धर्म’ करते रहेंगे तब तक वह पुराना धर्म क्या कभी मर सकता है?
भारतवर्ष के सभी सम्प्रदाय स्थूल रूप से ज्ञान मार्गों और भक्ति मार्गों-इन दो श्रेणियों में विभक्त किये जा सकते हैं। श्री शंकराचार्य कृत शारीरिक भाष्य भूमिका में ज्ञान की निरपेक्षता के सम्बन्ध में पूर्ण विवेचन मिलेगा, इसमें सिद्धान्त यह निकाला गया है कि ब्रह्म की अनुभूति और मोक्ष की प्राप्ति किसी अनुष्ठान, मत, वर्ण, जाति या सम्प्रदाय पर अवलम्बित नहीं है। कोई भी--साधन चतुष्टय सम्पन्न साधक उसका अधिकारी बन सकता है।
भक्ति मार्ग के विषय में भक्ति के कई आचार्यों ने यह घोषणा की है कि जाति, वंश, लिंग आदि की आवश्यकता मोक्ष के लिये नहीं है। केवल एक आवश्यक वस्तु है भक्ति।
समाज किसी को सामाजिक नियम भंग करने के अपराध में शासित करे, पर अति नीच पतित के लिए भी हिन्दू धर्म में मोक्ष मार्ग कभी बन्द नहीं किया गया।
त्यागी सन्त श्री निश्चलदास ने अपने---” विचार सागर” में स्पष्टतापूर्वक कहा है-- “जो ब्रह्मविद वही ब्रह्मताको वाणी वेद। संस्कृत और भाषा में करत भरम का छेद॥”, “जिसने ब्रह्म को जान लिया वह ब्रह्म बन गया, उसकी वाणी वेद है और उससे अज्ञान का अंधकार दूर हट जायगा, चाहे वह वाणी संस्कृत में हो या आधुनिक भाषा में हो। “
अब हिन्दुओं की मूर्त्ति पूजा कही जाने वाली तथा-कथित प्रथा को लीजिये---प्रथम तो आप जाकर पूजा के विभिन्न प्रकारों को सीखिये और यह निश्चय कीजिये कि वे उपासक यथार्थ में पूजा कहाँ कर रहे हैं-मन्दिर में, प्रतिमा में या अपने देह-मन्दिर में? पहले यह तो निश्चय रूप से जान लीजिये कि वे क्या कर रहे हैं और तब वेदान्त दर्शन की दृष्टि से वह बात अपने आप ही समझ में आ जायगी।
वह भारत जो प्राचीन काल से सभी उदात्तता, नीति और आध्यात्मिकता का जन्म-स्थान रहा है, वह देश जिसमें ऋषिगण विचरण करते रहे हैं, जिस भूमि में देव तुल्य मनुष्य अभी भी जीवित और जागृत हैं, क्या मर जायगा? तब तो संसार से सारी आध्यात्मिकता का समूल नाश हो जायगा। सारे सदाचार पूर्ण आदर्श-जीवन का विनाश हो जायगा। धर्मों के प्रति सारी मधुर सहानुभूति नष्ट हो जायगी और सारी भावुकता का भी लोप हो जायगा और उसके स्थान में काम रूपी देव और विलासिता रूपी देवी राज्य करेगी। धन उसका पुरोहित होगा। प्रतारण, पाशविक बल और प्रतिद्वन्द्विता ये ही उनकी पूजा पद्धति होगी और मानव आत्मा उनकी बलि सामग्री हो जायगी, पर ऐसी दुर्घटना कभी नहीं हो सकती। क्रियाशक्ति की अपेक्षा सहनशक्ति कई गुनी बड़ी होती है। प्रेम का बल, घृणा के बल की अपेक्षा अनन्त गुना अधिक है।
सर्वप्रथम हमें ईर्ष्या रूपी कलंक को धो डालना चाहिए। किसी से ईर्ष्या न करो। भलाई के काम करने वाले प्रत्येक को अपने हाथ का सहारा दो। तीनों लोकों के जीवमात्र के लिए शुभ कामना करो अपने धर्म के उसी एक केन्द्र पर खड़े हो जाओ, जो हिंदू और बौद्ध और जैनियों के लिए पैतृक सम्पत्ति है।
आत्मा की शक्ति का विकास कीजिये और सारे भारतवर्ष के विस्तृत क्षेत्र में उसे ढाल दीजिए और जिस स्थिति की आवश्यकता है, वह आप ही आप प्राप्ति हो जायेगी।
(श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन)
यदि हम हिन्दू धर्म का तत्व जानना चाहें तो हम इतना ही कह सकते हैं कि इसका आधार उस सच्ची आध्यात्मिक अनुभूति पर है, जिसे हमने अपने अन्तस्थल में दृढ़तापूर्वक पकड़ रखा है। जब हम वैदिक काल को अपने धर्म का मूल स्थान कह कर स्मरण करते हैं तो इसका अर्थ यही होता है कि वैदिक ऋषि हमारे पथ प्रदर्शक थे, उन्होंने सबसे पहिले आध्यात्म तत्वों का पता चलाया था। ऋषि शब्द ‘दृश’ धातु से बना है जिसका अर्थ ‘देखना’ होता है। इसके अनुसार धर्म का अर्थ देखा हुआ, दर्शन और अनुभूति होता है। ऋषियों ने जिस सत्य की घोषणा की है वह तर्क या दर्शन-शास्त्र का मनन करने का फल नहीं है वरन् इनकी आध्यात्मिक सूझ का परिणाम है। इसी कारण ऋषियों को वेद में पाये जाने वाले सत्य तत्वों का रचयिता नहीं समझा जाता वरन् वे केवल उनके देखने वाले हैं, जिन्होंने अपनी आत्मा को विश्वात्मा से तादात्म्य करके एक परम सत्यों का दर्शन कर लिया है। उनके वचनों का आधार आवेश पूर्ण सूझ नहीं है वरन् हृदय में स्थित शक्ति और जीवन का अनवरत अनुभव है। वेदों को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण इसीलिए माना जाता है क्योंकि वास्तविकता ही सबसे बड़ी प्रामाणिकता है। ईश्वर हमारा कोई प्रिय आदर्श नहीं है, वह तो उस सत्य नाम है जिसका हम अनुभव करते हैं। आध्यात्मिक अनुभूति का अर्थ हमारा कोई काल्पनिक विचार नहीं होता। वरन् सत्य के निकटतम साहचर्य को ही आध्यात्मिक अनुभूति का नाम दिया जा सकता है।
जिस महात्मा ने भगवान का साहचर्य प्राप्त किया है, उसने केवल उसकी चर्चा सुनकर उसे नहीं जाना है, वरन् उसको अनुभव कर लिया है। उसके लिए शंका अथवा अविश्वास की गुंजाइश ही नहीं रहती और न उसके इस अद्भुत तथा सरल निश्चय को कोई डिगा सकता है। किंतु जिन्होंने धर्म का ज्ञान दूसरों से सुनकर प्राप्त किया है, जो धार्मिक बनने का कष्ट तो नहीं उठाना चाहते पर धर्म से प्राप्त होने वाले संतोष का उपभोग करना चाहते हैं-जो चाहते हैं कि चमत्कारपूर्ण कथाओं और कर्म काण्ड की विधियों से उनको फल मिल जाये- ऐसे साधारण मनुष्यों के लिए इस अनुभूति को चित्रात्मक स्थूल रूप देने की आवश्यकता पड़ती है। इसके सिवाय अपने अनुभव को दूसरे पर प्रकट करने का उसके रहस्यों को विशद रूप से देने का, और विरुद्ध आलोचनाओं से उसकी यथार्थता की रक्षा करने का एक मात्र साधन भाषा और तर्क है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए धर्म शास्त्रों की रचना की गयी है। उन शास्त्रों में ईश्वर की व्याख्या सभी प्रकार की संस्कृति के, या सभी दर्जे के लोगों के समझने के लायक पाई जाती है- बिल्कुल स्थूल भी और परम सूक्ष्म भी।
इस अन्तर्ज्ञान को जानने वाला महापुरुष जब अपने अनुभव को साधारण तर्क की भाषा में प्रकट करना चाहता है तो वह एक प्रबल विश्वास के साथ इस अलौकिक सत्य का प्रतिपादन करता है। वह जानता है कि आत्मा का निकट- सीधा सम्बन्ध एक ऐसे लोक से है जो इन्द्रिय जगत से भिन्न है- जो इन्द्रियों के इस सामान्य लोक से अत्यधिक तेजपूर्ण होकर भी उससे किसी प्रकार कम सत्य नहीं है। तर्क, अन्तर्ज्ञान और आध्यात्मिक अनुभूति सब एक स्वर से उस सत्ता की यथार्थता के साक्षी हैं जो इस सबका आधार है। उसी के सम्बन्ध में कहा गया है कि ‘अमरता और मृत्यु उसकी प्रतिच्छाया है’--(यस्यछाया मृतम् यस्य मृत्यु :--ऋग्वेद 10, 121।) आध्यात्मिक अनुभूति का मुख्य लक्षण यही है कि वह अनिर्वचनीय होती है, अर्थात् उसको शब्दों द्वारा ठीक-ठीक प्रकट नहीं किया जा सकता। जब हम अनुभूत सत्य का वर्णन करना चाहते हैं तब हमें रूपों तथा शब्दों का सहारा लेना पड़ता है, पर साथ में यह भी जान लेना चाहिए कि सत्य को प्रकट करने के लिए बड़े से बड़े शब्द और रूप भी अपर्याप्त हैं।
भगवान बुद्ध ने आध्यात्मिक अनुभूत की यथार्थता को स्वीकार किया है, पर इस अनुभूति द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार हो सकता है, इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न होने के कारण वे इतना ही कह कर संतुष्ट हो जाते हैं कि दिखलाई पड़ने वाले स्थूल जगत में एक सूक्ष्म भाव-जगत भी समाया हुआ है। इसी सम्बन्ध में शंकराचार्य जी का कहना है कि सभी रूपों में मिथ्या का अंश रहता है और सत्य उन रूपों से परे है; इस प्रकार चाहे हम उपनिषदों के सिद्धान्त को मानें, चाहे बुद्ध के मत पर विचार करें और चाहे शंकराचार्य के कथन को स्वीकार करें सब का तात्पर्य यही है कि वह अविभक्त तथा अद्वैत सत्ता इस अनेक रूप वाले अनित्य जगत से परे है, अथवा वह उसी में व्याप्त विशुद्ध तेजपूर्ण आत्मा है जिसे हम एक निर्गुण सखा के रूप में जानते हैं, पर न तो उसका वास्तविक ज्ञान ही सम्भव है और न उसका वर्णन ही किया जा सकता है। इसलिए हम कुछ न जानकर भी यह मान लेते हैं कि ईश्वर की महत्ता अज्ञेय (न जानी जा सकने वाली) है और वह मन तथा वचन की पहुँच के बाहर है। उपनिषदों ने भी कह दिया है---”वह ज्ञात से भिन्न है और अज्ञात से भी श्रेष्ठ है” (केनोपनिषद 1-3) “वहाँ तक दृष्टि नहीं पहुँचती, तथा मन और वाणी भी नहीं पहुँचती” (वृहदारण्यक उपनिषद्, 3-8-8)
यद्यपि इस ईश्वरीय-तत्व की पूर्णात् साँसारिक पदार्थों से भिन्न है, फिर भी वह हम में पाई जाने वाली श्रेष्ठतम वृत्तियों से कुछ मिलती-जुलती है। क्योंकि ब्रह्म का स्वरूप यदि मानव की आत्मा से बिल्कुल भिन्न होता तो उसका अस्पष्ट आभास पा सकना भी हमारे लिये संभव न था। तब हम यह भी न कह सकते कि ब्रह्म सर्वथा भिन्न गुणों वाला है। मनुष्य की आत्मा में, उसके अन्तस्थल में, उनकी बुद्धि के परे भी एक ऐसा तत्व है जो ब्रह्म से मिलता-जुलता है। मनुष्य के हृदय में ही ब्रह्मानुभूति का आधार मौजूद है। ईश्वर और मनुष्य की आत्मा (जीवात्मा) में किसी प्रकार समानता होने से ही आध्यात्मिक भावों की उत्पत्ति हुई है। यह केवल अनुमान का विषय नहीं है आध्यात्मिक अनुभूति में आत्मा तथा परमात्मा का भेद नहीं रहता। ‘तत्वमसि’ (तुम वही हो) इस महा-वाक्य में इसी सत्य का परिचय दिया है। ईश्वर वह अनंत तत्व है जो हमारे भीतर भी है और बाहर भी है। यदि हमारे भीतर परमात्मा न होता तो हमें उसकी आवश्यकता का अनुभव ही न होता और यदि वह हमारे बाहर न होता तो उसकी उपासना की कोई न जरूरत होती। इसलिए हमें यही स्वीकार करना पड़ता है कि परमात्मा मनुष्य की आत्मा का सबसे श्रेष्ठ रूप है।
(श्री शिवदत्त ज्ञानी एम0ए0)
भारतीय संस्कृति की प्राचीनता को संसार के सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है। चाहे इसे पाँच छः हजार वर्ष पुरानी माना जाय अथवा आठ, दस हजार वर्ष पहले की बतलाया जाये, पर इसमें संदेह नहीं कि भूमंडल में इस समय जितनी सभ्यताएं प्रसिद्ध हैं यह उन सबसे पुरानी और उनकी मूल स्वरूप है। यह जिन सिद्धान्तों पर आधार रखती है वे किसी खास जाति या समय से संबंधित न होकर मानव मात्र का कल्याण करने वाले हैं। प्राचीन भारत के आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक आदि सिद्धाँतों को यदि इस कसौटी पर कसा जाय तो वे अब भी खरे उतरेंगे। इस दृष्टि से यदि इस संस्कृति को मानव-संस्कृति कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं।
मानवता के सिद्धाँतों पर ही स्थित होने के कारण भारतीय संस्कृति इतनी पुरानी होते हुए आज भी वर्तमान है। चाहे समय के प्रभाव से उसका स्वरूप कुछ विकृत भले ही हो गया हो, पर आज भी उसमें यह अग्नि है जिसको यदि देदीप्यमान किया जाये तो उसके प्रचार से समस्त विश्व पुनः जगमगा उठेगा। इसी जीवनी-शक्ति के कारण उसने कितने ही आघातों को सहन किया और अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखा है। आरम्भिक समय में तो यह संस्कृति इतनी शक्तिशाली और जीवनयुक्त थी कि संसार के दूर-दूर तक के भागों पर उसका प्रभाव पड़ा था और वहाँ के निवासियों ने इससे बहुत अधिक प्रेरणा प्राप्त की थी। प्राचीन काल के भारतवासी वेदों का पवित्र सन्देश लेकर संसार के अनेक निकटवर्ती और दूरवर्ती देशों में पहुँचे थे और उन्होंने मानव जाति को इस कल्याणकारी संस्कृति का पाठ पढ़ाया था। कुछ अग्निहोत्री ब्राह्मण ईरान में जाकर बस गये और वहाँ उन्होंने इस संस्कृति का नया प्रकाश फैलाया जो पारसी धर्म के रूप में प्रकट हुआ। इसी साँस्कृतिक प्रकाश से यहूदी, ईसाई, इस्लाम आदि मतों ने प्रेरणा ली अनेक इतिहासकारों का यह भी मत है कि भारत के क्षत्रियों ने ही बैबीलोनिया, सीरिया, मिश्र आदि देशों में पहुँच कर वहाँ राज्यों की स्थापना की और वहाँ के मूल निवासियों को सभ्यता का पाठ पढ़ाया था। यूनान और रोम में आर्य जाति पहले से ही बस चुकी थी, जिसका प्रभाव यूरोप में आज भी दिखाई पड़ता है।
अब से 2100 वर्ष पूर्व भारतीय सम्राट अशोक ने पश्चिमी एशिया, अफ्रीका, यूरोप आदि में प्रचारक भेज कर यहाँ की संस्कृति को और फैलाया। पूर्वीय देशों का भी यही हाल है। भारतीय संस्कृति ने बौद्ध धर्म के रूप में मध्य एशिया तिब्बत, मंगोलिया, चीन, कोरिया, जापान आदि देशों को नवीन ज्ञान प्रदान करके उन्नति का रास्ता दिखलाया। इसके बाद ब्राह्मण प्रचारकों ने यही काम जावा, सुमात्रा, वोर्नियो, बाली आदि द्वीपों पर किया। और तो क्या अमरीका के मेक्सिको में भी आर्य-सभ्यता के अमिट प्रमाण मिल चुके हैं। इस प्रकार प्राचीन भारतीयों ने अपनी संस्कृति को संसार के दूर-दूर के भागों में फैलाकर विश्व कल्याण का कार्य किया था।
ऐतिहासिक काल में इस संस्कृति पर अनेक प्रहार हुए, पर ईसा की 11 वीं शताब्दी तक तो इन प्रहारों का इसके सुदृढ़ संगठन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। इसके विपरीत आक्रमणकारियों को ही इसके चरणों में बैठ कर इसका शिष्यत्व स्वीकार करना पड़ा। यूनान का बादशाह सिकन्दर विजय का उद्देश्य लेकर भारत को जीतने आया। किसी प्रकार व्यास नदी के किनारे तक पहुँच सका। वहाँ जब उसके सिपाहियों ने सुना कि पूर्व में एक बड़ा भारी साम्राज्य (मगध) है, तो उनके छक्के छूट गये। सिकन्दर की महत्वाकांक्षा आगे बढ़ने की थी पर उसे वापिस लौटना पड़ा। भारतीय संस्कृति पर सिकन्दर के आक्रमण का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके पश्चात् यूनानी, पार्थियन, शक आदिवासी, विदेशी जातियाँ भारत के पश्चिमोत्तर भाग (वर्तमान सीमाप्राँत) में बसने लगीं। ये जातियाँ राजनीतिक दृष्टि से भले ही कुछ समय तक विजयी रहीं हों, किन्तु साँस्कृतिक दृष्टि से भारत ने उन्हें पूर्णतया जीत लिया था। वैक्ट्रिया के आक्रमणकारी सिकन्दर ने बौद्ध धर्म के आगे सर झुकाया था। यूनानी राजा एण्टियाक्लीडास का राजदूत विदिशा नरी में पहुँच कर वैष्णव बन गया था और उसने परम भागवत’ की उपाधि स्वीकार करके “गरुणध्वज” की स्थापना की थी। इस प्रकार शक, यूशी आदि जातियाँ भी भारतीय संस्कृति द्वारा पचा ली गई। कनिष्क और वासुदेव यूशी जाति के होते हुए भी साँस्कृतिक दृष्टि से पूर्णतया भारतीय ही थे, और उनकी गणना भारतवर्ष के प्रसिद्ध शासकों में की जाती है। हूणो का भी यही हाल हुआ। परमाण और मिहिरगुल आदि हूणराजा, पक्के भारतीय थे, जैसा उनके द्वारा स्थापित कीर्ति स्तम्भों के लेखों से स्पष्ट होता है। इस प्रकार ग्यारहवीं या बारहवीं शताब्दी तक भारतीय संस्कृति की शक्ति इसी प्रकार कायम रही और वह अन्य जातियों का अपने में सम्मिलित करके अपना एक अंग बनाने में समर्थ रही।
राजनैतिक और साँस्कृतिक दृष्टि से मुस्लिम आक्रमण भारत के लिए अवश्य हानिकारक थे। मुसलमान आक्रमणकारी सभ्यता अथवा संस्कृति की दृष्टि से तो भारतवासियों से काफी पिछड़े थे, उनमें धार्मिक कट्टरता का भाव बहुत अधिक था। पर उनका सामाजिक संगठन भी युद्ध की दृष्टि से बहुत कारगर था, इससे इस देश वालों को हरा कर उन पर अपना राजनीतिक तथा धार्मिक आधिपत्य लादने में वे सफल मनोरथ हो सके। दूसरा कारण यह भी था कि समय के प्रभाव से इस अवसर पर भारतीय समाज में अनेकों त्रुटियाँ पैदा हो चुकी थीं जिससे और भीतरी वैमनस्य से वह काफी कमजोर हो गया था। इसलिए वह इन बर्बरतापूर्ण आक्रमणों से एकबार सहम गया, और यहाँ की जन संख्या का कुछ भाग इस्लाम मत स्वीकार करने को बाध्य हुआ। पर कुछ समय बाद ही इसने अपने होश हवास ठीक कर लिये और कबीर, तुलसी, नरसिंह मेहता, चैतन्य, तुकाराम, बल्लयाचार्य आदि संतों और महात्माओं ने भारतीय संस्कृति को समयानुकूल रूप देकर फिर से शक्ति शाली बनाया।
ईसा की उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ से ही अंगरेजी राज्य की स्थापना के फलस्वरूप हमारी संस्कृति पर पश्चिमीय संस्कृति का आक्रमण हुआ। एक समय तो ऐसा मालूम पड़ने लगा कि यह संस्कृति सदा के लिए संसार से विदा हो जायगी। पर राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी विवेकानन्द आदि दिव्य विभूतियों ने फिर इस संस्कृति में चेतना शक्ति भर दी। भारतीय जाग उठे, वे अपने स्वरूप को समझने लगे और अपने खोये हुये रत्नों को पुनः पहिचानने लगे। इस प्रकार साँस्कृतिक नव जागृति के युग का आगमन हुआ। अन्त में महात्मा गाँधी ने उसे वह बल प्रदान किया, जिससे न केवल भारत में वरन् फिर से समस्त संसार में उसका महत्त्व स्थापित हो गया है। वे विश्व के संघर्षशील राष्ट्रों को यह संदेश दे गये हैं कि मानवता के सिद्धान्तों पर आश्रित भारतीय संस्कृति के द्वारा ही सच्ची शान्ति प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार एक बार फिर भारतीय संस्कृति का उज्ज्वल भविष्य दृष्टिगोचर होने लगा है।
(श्री बुद्ध देव जी)
संसार में मनुष्य को दुःख देने वाले तीन प्रकार के शत्रु हुआ करते हैं। एक आधिदैविक, जैसे अतिवृष्टि, तूफान, भूकम्प आदि। दूसरे आधिभौतिक, जैसे सर्प, बिच्छू, टिड्डी, डाका, युद्ध आदि। तीसरे आध्यात्मिक, जैसे अज्ञान, स्वार्थ, विक्रोश, आलस्य और अभाव। इनमें से आधिदैविक और आधिभौतिक कष्ट बाहर से आते हैं और हम समय सूचकता तथा दूरदर्शिता के सहारे उनसे बहुत कुछ अपनी रक्षा कर सकते हैं। पर हमारे आध्यात्मिक शत्रु हमारे अपने मन या स्वभाव के ही विकार हैं इसलिये उनका प्रतिकार तब तक नहीं किया जा सकता जब तक हम स्वयं अपना सुधार न कर लें।
(1) अज्ञान -श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि “नहिज्ञानेन सदृशम् पवित्रमिह विद्यते।” अर्थात् “ज्ञान के सदृश्य पवित्र वस्तु संसार में दूसरी नहीं है।” इससे स्पष्ट है कि अज्ञान के समान अपवित्र वस्तु भी दूसरी नहीं है। हम अज्ञान को सबसे बड़ा शत्रु इसलिये कहते हैं कि इसके प्रभाव से हमारे हितैषी भी हित के बजाय हमारा अहित कर डालते हैं। जिन मनुष्यों ने सत्य का प्रकाश करने वाले विज्ञानवेत्ताओं के धमकाया, सताया, जीते जी जला तक दिया, वे अपनी समझ से तो संसार का और स्वयं विज्ञानवेत्ताओं का भी हित ही साध रहे थे।
किसी मनुष्य को केवल विचारों के प्रकट करने के लिए दण्ड नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि न जाने जिन विचारों को आज हम सर्वथा सत्य समझते हैं, कल उनमें कुछ परिवर्तन हो जाय। यह विचार-स्वातंत्र्य की भावना कोई गम्भीर तत्व की बात नहीं है। परन्तु इतनी छोटी-सी बात का ज्ञान न होने के कारण न मालूम कितने पूजा के योग्य महापुरुषों का बलिदान कर दिया गया। जब इस विषय पर हम विचार करते हैं तो बड़ा आश्चर्य होता है कि मनुष्य अज्ञान से कैसा अंधा हो जाता है। इसलिये हम चरक महाराज के इस मत को सर्वथा ठीक मानते हैं कि “प्रज्ञापराधो मूलं सर्व रोगाणाम्” अर्थात् “समझ का दोष सब रोगों की जड़ है।”
इस समय मानव जाति के संगठन के सम्बन्ध में जो अज्ञान फैला हुआ है, आज तक सामाजिक उन्नति की साधारण-सी बातों को लोक-व्यवहार में प्रचलित करने में जितना प्रयत्न करना पड़ा है, और जितना अभी शेष है, उसे देखकर तो और भी आश्चर्य होता है। जो साधारण-सी भूलें हम एक छोटे-से परिवार के सम्बन्ध में होना सहन नहीं कर सकते वे ही सारे मानव समाज को दुःख दे रही हैं, यह देख कर किसे विस्मय न होगा? यह सब अज्ञान का ही प्रभाव है और इसमें जरा भी सन्देह नहीं कि हमारे जितने भी कष्ट, आपत्तियों और हानिकारक बातें देखने में आ रही हैं उनमें से तीन चौथाई का कारण हमारा अज्ञान ही है।
(2) स्वार्थ--संसार का दूसरा शत्रु स्वार्थ अथवा तृष्णा है। वैसे तो कुछ महात्माओं को छोड़कर प्रत्येक मनुष्य में स्वार्थ और प्रेम का सम्मिश्रण होना अनिवार्य है, पर कितने ही लोगों में यह स्वार्थ असाधारण मात्रा में पाया जाता है और वह समाज के लिए बड़ा घातक सिद्ध होता है। इस सम्बन्ध में भर्तृहरि जी ने बड़े
सुन्दर ढंग से लिखा है :--
एकेतेपुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थ विनिघ्नन्तिये, सामान्यास्तु परार्थ मुद्यमभृतः स्वार्था विरोधेजये
तेऽर्मा मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निन्नन्तिये
ये मित्रन्ति निरर्थकम् परहितं ते के न जानीमहे॥
अर्थात् “इस संसार में चार प्रकार के मनुष्य होते हैं-एक वे महात्मा जो अपने स्वार्थ को त्याग करके दूसरों का हित करते हैं। दूसरे वे सामान्य लोग जो यदि उनके स्वार्थ को हानि न पहुँचती हो, तो यथाशक्ति परोपकार भी करते हैं। तीसरे वे राक्षस स्वभाव के व्यक्ति जो अपने स्वार्थ के लिये दूसरों के स्वार्थ का नाश करते हैं। चौथे वे लोग जो बिना कारण, बिना किसी प्रकार के अपने लाभ के दूसरों की हानि करने में तत्पर रहते हैं। भर्तृहरि जी कहते हैं, ऐसे लोगों को किस नाम से पुकारा जाय यह समझ में नहीं आता।”
इस प्रकार स्वार्थ का अनुचित भाव मनुष्य को राक्षस बना देता है। यही काम, लोभ, मोह और अभिमान के रूप में प्रकट होता है।
(3) विक्रोश- मनुष्य जाति का तीसरा शत्रु विक्रोश है। यह वह दुर्गुण है जिसके कारण वे मनुष्य उत्पन्न होते हैं, जिन्हें भर्तृहरि जी ने चौथी श्रेणी में रखा है। कुछ मनुष्यों में दूसरों के दुःख में आनन्द लेने की स्वाभाविक दुष्प्रवृत्ति होती है। वह काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि किसी भी कारण से नहीं, किंतु अकारण ही दूसरों को पीड़ा देते हैं। उनके हृदय में जो स्वाभाविक विध्वंसकारिणी प्रवृत्ति होती है उसी को विक्रोश का नाम दिया है। इसे क्रूरता तथा दुष्टता की प्रवृत्ति भी कह सकते हैं।
(4) आलस्य- मानव समाज का चौथा शत्रु आलस्य है। यह दुष्टों और अज्ञानियों में ही नहीं, परमात्मा और भले समझे जाने वाले लोगों में भी पाया जाता है। गीता में कहा है :--
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्व देहिनाम्। प्रसादालस्य निद्राभिस्तन्निवध्नाति भारत॥14। 6
अर्थात् “अज्ञान से तम उत्पन्न होता है जो सब प्राणियों को मूढ़ बना देता है। यह तमोगुण प्राणियों को प्रसाद, आलस्य और निद्रा के बन्धनों से बाँधता है।”
बहुत से मनुष्य ऐसे पाये जाते हैं जो अपने संचित धन में से सहस्रों रुपये दान करते हैं। उनमें पराये दुःख में संवेदना भी पाई जाती है। वे दान भी करते हैं। इस दशा में उनको स्वार्थी कैसे कहा जाय? वे किसी को दुःख भी जहाँ तक बन पड़ता है नहीं देते हैं। परन्तु स्वयं करते कुछ नहीं। इनका दोष आलस्य है। संसार में किसी को ‘दुःख न देना’ इतने मात्र से मानव समाज की उन्नति नहीं हो सकती। प्रत्येक मनुष्य को क्रियात्मक रूप में कुछ न कुछ देना भी चाहिए।
वेद में इस क्रिया को ‘सवन’ के नाम से पुकारा गया है। अर्थात्-प्रत्येक मनुष्य का धर्म है कि वह किसी न किसी पदार्थ में से सार को खींच निकाले। जो ‘सवन’ नहीं करते वे प्रभु के प्यारे नहीं हैं।
वेद का वचन है :--
“यः सुन्वतः सखा तस्मा इन्द्राय गायत”
(ऋग. 1। 4।10)
अर्थात्--”जो सवन करने वालों का सखा है इस इन्द्र के (अथवा परमात्मा व राजा के) गीत गाओ।”
(5) अभाव - पाँचवाँ शत्रु अभाव है। वास्तव में इसका मूल अज्ञान अथवा आलस्य ही है। किंतु अनेक अवस्थाओं में यह उन मनुष्यों से भी पाप कराता है जो स्वभाव से दुष्ट अथवा आलसी नहीं है। किसी ने ठीक ही कहा है-
वुभुक्षितः किन्न करोति पापम् क्षीणा नरा निष्करुणा भवन्ति।
इस प्रकार का अभाव दो कारणों से उत्पन्न होता है।
(1) उपभोक्ताओं (खर्च करने वालों) की अतिवृद्धि से। ज्ञानी पुरुष और समाज के दूरदर्शी नेता पहले से सोचकर इन विपत्तियों का प्रतिकार कर सकते हैं।
(श्री जगतनारायण लाल)
“वसुधैव कुटुम्बकम्” अर्थात्- संसार के सभी मनुष्य हमारे आत्मीय हैं- यह सिद्धाँत हिन्दू धर्म का मुख्य अंग है। पर यह केवल मुख से कहने की ही बात है, इस पर व्यवहार करने वाले व्यक्ति ढूँढ़ने पर भी शायद ही कहीं मिले। संसार भर के प्राणियों अथवा मनुष्यों की बात तो छोड़ दीजिये यहाँ अपने ही देश में अथवा अपने ही नगर में रहने वाले विधर्मियों को भी आत्मीय समझने की उदारता किसी में दिखलाई नहीं पड़ती। फिर क्या हम सब हिन्दुओं को ही आत्मीयता की दृष्टि से देखते हैं? कदापि नहीं-करोड़ों अछूत कहे जाने वाले व्यक्तियों को- जो राम, कृष्ण और शिव की ही उपासना करते हैं- हम घृणित और त्याज्य समझते हैं। इसलिये हमको कहना पड़ता है कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सिद्धाँत अब कथन मात्र को रह गया है।
पर यह आक्षेप केवल हिन्दू धर्म के अनुयायिओं पर ही नहीं है, सभी धर्म वालों में ऐसा ही संकीर्णता का भाव पाया जाता है। मुसलमान तो केवल अपने को ही खुदा का बन्दा और सच्चा दीनदार समझते हैं बाकी सब लोग उनकी निगाह में काफिर हैं। उसमें कोई दोष नहीं। ईसाई भी अपने को ईश्वर के चुने हुए लोगों में समझते हैं शेष सब उनकी निगाह में गुमराह और अधर्मी हैं। इसी प्रकार सभी धर्मवालों में एक ऐसी भावना पाई जाती है कि ईश्वर के पास पहुँचने के लिए उन्हीं का धर्म एक मात्र सच्चा मार्ग है, बाकी सब धर्म झूठे या पाखण्डपूर्ण हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जो धर्म परोपकार और मानव सेवा की दृष्टि से प्रचलित किये गये थे वे ही पारम्परिक लड़ाई, झगड़ों और ईर्ष्या-द्वेष के कारण बन गये हैं। इतिहास के पाठक जानते हैं कि धर्म के नाम पर अक्सर महा-भयंकर लड़ाइयाँ हुई हैं और लाखों निर्दोष व्यक्तियों का खून बहाया गया है।
क्या धर्म का असली अभिप्राय यही है? सभी ज्ञानी लोग जानते हैं कि तमाम धर्मों का मूल एक ही है। जितने धर्म प्रचारक महापुरुष हुये हैं उन सबने मनुष्यों की चारित्रिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिये धार्मिक नियमों और साधनाओं की रचना की है। यह अवश्य है कि जिस देश में, जिस काल में ये महापुरुष हुए हैं उसी समय और स्थान की परिस्थिति के अनुसार उन्होंने उपदेश दिये हैं। पर यदि आप सब धर्मों की विवेचना करके उनका तुलनात्मक अध्ययन करें तो स्पष्ट मालूम हो जायगा कि सबके भीतर सार वस्तु एक ही है। पर अज्ञानी अथवा अहंकारी मनुष्य अक्सर सार वस्तुओं के ऊपर अप्रधान या दिखावटी वस्तुओं को प्रधानता देने लगते हैं और इसी से विभिन्न धर्मों में लड़ाई-झगड़े होने लगते हैं।
भिन्न-भिन्न धर्मों या मजहबों में प्रायः दो प्रकार का अन्तर देखने में आता है। एक तो यह कि किसी में आध्यात्मिक रहस्यों का वर्णन अधिक पाया जाता है और किसी में कम। दूसरा अन्तर यह है कि एक ही धर्म-कार्य को करने की भिन्न-भिन्न मजहबों में भिन्न-भिन्न प्रकार की नीतियाँ बतलाई गई हैं। इसी साधारण से अंतर पर नासमझ लोग एक दूसरे को बड़ा और छोटा अथवा ऊँचा और नीचा बतलाने लगते हैं। अगर वे केवल इसी एक बात को समझ लें कि संसार के सब मनुष्य एक-सी प्रवृत्ति और अवस्था वाले नहीं हैं तो वे सहज में यह अनुमान कर सकते हैं कि भिन्न-भिन्न श्रेणी के लोगों से लिये अलग-अलग तरह के नियमों और साधनों का होना अनिवार्य है। एक सच्चे ज्ञानी की दृष्टि से भिन्न-भिन्न जातियों अथवा देशों के लोग अलग-अलग देशों के विद्यार्थियों की तरह हैं, जिनका पाठ्यक्रम अलग-अलग रखना आवश्यक है। अब अगर वे विद्यार्थी इस बात पर लड़ने लगें कि अमुक दर्जे का कोर्स हमसे घटिया या बढ़िया क्यों रखा गया तो उनको मूर्ख के सिवा और क्या पदवी दी जा सकती है? पर धर्म के सम्बन्ध में हम ऐसा ही व्यवहार करते हैं और इस बात का अभिमान करते हैं कि हमारा धर्म सर्वश्रेष्ठ है तथा हम दूसरे सब लोगों से उत्तम हैं। वे इस बात को नहीं समझ पाते कि जिस देश या जिस जाति में जिस मनुष्य का जन्म हुआ है उसके लिए वहीं का धर्म उत्तम और कल्याणकारी है, क्योंकि वह वहाँ की परिस्थिति के अनुसार रचा गया है। भगवान कृष्ण की “स्वधर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मो भयावहः” वाली उक्ति का वास्तव में यही तात्पर्य है। आवश्यकता यही है कि हमारे धर्म का जो कुछ भी उपदेश है उस पर हम सचाई के साथ आचरण करें।
प्रत्येक धर्म में सत्य के किसी एक विशेष अंग पर जोर दिया गया है। यहाँ पर विभिन्न मजहबों की तुलना करने लायक स्थान नहीं है पर यदि गौर से देखा जाये तो इस बात का पता सहज में लग सकता है। इसलिये अपने धर्म के विशेष तत्व को ग्रहण कर लेने से मनुष्य के उस धर्म में जन्म लेने का अभिप्राय पूरा हो जाता है। कुछ महात्माओं का तो यह भी कहना है कि जीव विभिन्न धर्मावलम्बी जातियों में इसीलिए जन्म लेता है कि वह उस धर्म के प्रधान तत्व को ग्रहण कर ले। इस प्रकार वह कई जन्मों में धर्म के सभी अंगों का ज्ञान प्राप्त करके ऊँचे आध्यात्मिक दर्जे पर पहुँच सकता है। पर खेद है कि मूर्ख व्यक्ति इस तत्व को न समझ कर मजहबों की भिन्नता को झगड़ों का कारण बना लेते हैं और धर्म के द्वारा आत्म-कल्याण करने की बजाय पतन की ओर जाने लगते हैं। वे यह ख्याल नहीं करते कि इस जन्म में हम हिन्दू हैं, दूसरे जन्म में बौद्ध हो सकते हैं, तीसरे धर्म में ईसाई और चौथे में मुसलमान हो सकते हैं। इसलिए अगर हम प्रत्येक जन्म में उस धर्म के सार-तत्व को ग्रहण करते रहें और उसी के सिद्धान्तों के अनुसार विशुद्धता का जीवन बितायें तो यही सबसे अच्छा मार्ग है। ऐसी दृष्टि रखने वाला व्यक्ति अपने धर्म पर आरुढ़ रहता हुआ भी दूसरे धर्मों को सच्चा समझेगा और उनके प्रति आदर-सम्मान का भाव रक्खेगा।
वैसे तो इस समय सभी धर्मों का बहुत कुछ पतन हो गया है- लोग सार वस्तु को त्याग कर दिखावटी बातों को ही असली धर्म समझने लगे हैं-- पर यह समझ में नहीं आता कि आध्यात्मिक ज्ञान के पुजारी हिंदू धर्मावलम्बी ऐसे संकुचित विचारों के कैसे हो गये? इस धर्म में तो भगवान ने स्पष्ट शब्दों में गीता में कहा कि “जिन-जिन रास्तों से मनुष्य मेरी ओर आते हैं, उन्हीं रास्तों से में उनका स्वागत करता हूँ। क्योंकि मनुष्यों द्वारा ग्रहण किये सभी रास्ते मेरी ओर आते हैं।” इसके सिवाय यदि हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों को देखा जाये तो मालूम होता है कि शायद मनुष्यों के विचार जितने प्रकार के हो सकते हैं, उन सबके लिये इस धर्म में स्थान है। इसकी सहनशीलता तो यहाँ तक बढ़ी हुई है कि जो ईश्वर को माने वह भी हिन्दू और जो न माने वह भी हिंदू। हिंदू धर्म में ऐसा कोई धार्मिक सिद्धाँत, या कोई खास देवता, या कोई खास पूजा की विधि नहीं है, जिसका पालन करना हर एक व्यक्ति के लिए अनिवार्य हो और जिसके न मानने से मनुष्य को हिन्दू धर्म से अलग समझा जाय। जिस धर्म का क्षेत्र इतना विस्तृत है उसमें संकीर्णता के विचार कैसे घुस पड़े यह वास्तव में आश्चर्य की ही बात है। उसी संकीर्णता का फल है कि आज हमको अनेक अवसरों पर नीचा देखना पड़ता है। अब भी यदि हम अपने प्राचीन आदर्शों के अनुसार आचरण करने की चेष्टा करें तो हमारा देश फिर संसार का आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक बन सकता है।
(श्रीमती कौशल्या देवी कलकत्ता)
मनुष्य का कर्तव्य है कि सत्य और असत्य का भेद पहिचानने का प्रयत्न करता रहे। सत्य आध्यात्मिक जगत का सर्वोत्तम रत्न है और भगवान ने उसे पहिचानने की निश्चित योग्यता भी मनुष्य को दी है पर आधुनिक युग के कुतर्कशील लोगों ने उसका स्वरूप ऐसा गँदला कर दिया है कि उसकी पहिचान करना भी बड़ा कठिन हो जाता है। इसके लिए सबसे पहला उपाय यह है कि हम स्वयं मन, वाणी और कर्म से सदा सत्य का पालन करें। जो व्यक्ति सत्य का पालन करता है वह सत्य और असत्य की पहिचान अपने सहज-ज्ञान से शीघ्र ही कर सकता है।
सत्य और असत्य की पहिचान पर ज्यादा जोर देने की आवश्यकता इसलिये भी है कि संसार में आजकल अनेकों मूर्खतापूर्ण असत्य विचार और अन्धविश्वास भरे पड़े हैं, और जो व्यक्ति इनका दास बना रहता है वह कभी उन्नति नहीं कर सकता।
इसलिये तुम्हें किसी बात को इसलिये ग्रहण नहीं करना चाहिए कि उसे बहुसंख्यक लोग मानते हैं, या वह शताब्दियों से चली आई है, अथवा उन धर्मग्रंथों में लिखी है जिन्हें लोग पवित्र मानते हैं। तुम्हें उस पर स्वयं भी विचार करके उसके सत्य-असत्य और उचित-अनुचित होने का निर्णय करना चाहिए। याद रखो कि एक विषय पर चाहे एक हजार मनुष्यों की अनुमति क्यों न हो किन्तु यदि वे लोग उस विषय में कुछ भी नहीं जानते, तो उनके मत का कुछ भी मूल्य नहीं है। जिसे सत्य मार्ग पर चलना है उसे स्वयं विचार करना सीखना चाहिए, क्योंकि अंधविश्वास संसार की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। यह एक ऐसा बंधन है जिससे पूर्ण रूप से मुक्ति होना चाहिए। दूसरों के विषय में तुम्हारा विचार सदा सत्य होना चाहिए। उनके विषय में जो बात तुम नहीं जानते उस पर विचार मत करो।
यह कल्पना भी मत करो कि लोग सदा तुम्हारे ही विषय में सोचा करते हैं। यदि एक मनुष्य कोई ऐसा कार्य करता है जिससे तुम्हारी समझ में तुम्हारी हानि होगी, अथवा वह कोई बात कहता है जो तुम्हारे विचार पर तुम पर घटती है, तो तत्काल ही यह मत सोचो कि “उसका उद्देश्य मुझे हानि पहुँचाना था। “ बहुत सम्भव है कि उसने तुम्हारे विषय में सोचा ही न हो, क्योंकि प्रत्येक जीव के अपने निज के कष्ट होते हैं और उसके विचारों का केन्द्र मुख्यतः वह स्वयं ही रहता है। यदि कोई मनुष्य तुमसे क्रोधित होकर बात करता है तो यह मत सोचो कि वह तुमसे घृणा करता है अथवा तुम्हें व्यथित करना चाहता है। हो सकता है कि उसे किसी अन्य व्यक्ति ने क्रोधित कर दिया हो, और संयोग से उस समय तुम उसे मिल जाते हो, और तब उसका सारा क्रोध तुम्हीं पर उतरता है। यह ठीक है कि वह मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहा है, क्योंकि क्रोध करना ही मूर्खता है। किंतु तुम्हें उसके विषय में असत्य विचार नहीं करना चाहिये।
लोगों की बहुत सी छोटी-छोटी कठिनाइयाँ इसी प्रकार पैदा हो जाती हैं। किसी व्यक्ति पर यदि परेशानियों का भार बहुत अधिक होता है तो उसके कारण वह लगभग प्रत्येक बात पर क्रोध करने लग जाता है। वास्तव में हम अपने आस-पास रहने वालों के भी सब कष्टों को नहीं जानते, क्योंकि कोई भी समझदार व्यक्ति अपनी कठिनाइयों को घोषित करता नहीं फिरता। साधारण मर्यादा उसे ऐसा करने से रोकती है। किन्तु यदि हम यह याद रखे कि ऐसी कठिनाइयाँ सबके लिये उपस्थित हैं और उनके प्रति उदार भाव से काम लें, तो हम स्वयं क्रोध से अवश्य बच सकेंगे।
जो लोग अभी इतनी मानसिक उन्नति नहीं कर सके हैं कि दूसरों की मूर्खतापूर्ण भूलों को क्षमा कर दें, उनको कम से कम क्रोध और असत्य के बदले तुरंत वैसा ही व्यवहार करने के बजाय कुछ देर ठहर कर समस्त परिस्थिति पर शाँतचित्त से विचार करना चाहिए। ऐसा होने से वे कम से कम वैसी मूर्खता से बच जायेंगे जैसी पहला व्यक्ति कर चुका है।
दूसरों के उद्देश्य के विषय में शंका करना अच्छा कार्य नहीं है। केवल उसकी अन्तरात्मा ही उसके विचारों को जानती है। हो सकता है कि वह कुछ ऐसे उद्देश्यों से प्रेरित होकर कोई कार्य कर रहा हो जो तुम्हारे मस्तिष्क में आ ही नहीं सकते। यदि तुम किसी के विरुद्ध कोई बात सुनते हो, तो तुम इसको दोहराओ मत। संभव है वह सत्य न हो और यदि हो भी, तो उसके विषय में मौन रहना ही अधिक दयालुता होगी।
बोलने से पहले सोच लो अन्याय असत्य भाषण से दोष-भागी बनोगे। कार्यों में भी सत्य का पालन करो, अपना मिथ्या प्रदर्शन मत करो, क्योंकि प्रत्येक दल सत्य के उस स्वच्छ प्रकाश में बाधा है जिसे तुम्हारे द्वारा उसी प्रकार प्रकाशित होना चाहिये जैसे सिर्फ शीशे के द्वारा सूर्य का प्रकाश प्रकाशित होता है।
आचरण और व्यवहार में सत्य का पालन वास्तव में कठिन है, इसका अर्थ यह है कि दूसरों के सामने कोई कार्य इस उद्देश्य से न करना चाहिए कि उसके मन में हमारे लिये उच्च-धारणा बैठ जाये। साथ ही जिस कार्य के करने में दूसरों के सामने लज्जित ना होना पड़े ऐसा कार्य छुपकर भी नहीं करना चाहिए। लोगों को आप अपना सच्चा स्वरूप देखने दीजिये और जो कुछ आप नहीं हैं वैसा बनने का ढोंग मत कीजिये। बहुत लोगों का ऐसा उद्देश्य रहता है कि हमारे प्रति दूसरों की धारणा हमारी रुचि के अनुकूल ही होनी चाहिये। फलतः ऐसी अनेक प्रकार की छोटी बातें होती हैं, जिन्हें हम एकान्त में तो कर लें, परन्तु दूसरों के सामने नहीं करेंगे, क्योंकि हम सोचते हैं कि लोग हम से ऐसी बातों के करने की आशा नहीं करते।
यह बात सत्य है कि हमें कभी अपना झूठा प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। क्योंकि प्रत्येक प्रकार का झूठा प्रदर्शन पतनकारी होता है। परन्तु यह भी ध्यान रखिये कि उस झूठे प्रदर्शन को टालने के लिये कहीं आप उसकी प्रतिकूल पराकाष्ठा तक न पहुँच जायें लोग कभी-कभी ऐसा कहते हैं कि “मैं तो अपने प्राकृतिक रूप में ही लोगों के सामने अपने को प्रकट करना चाहता हूँ।” और ऐसा कहकर वे अपना अत्यन्त निकृष्ट, अशिष्ट और असभ्य रूप लोगों को दिखलाना आरम्भ करते हैं। किन्तु ऐसा करके वे अपना प्राकृतिक स्वरूप जैसा होना चाहिये वह नहीं दिखलाते, वरन् इसके विपरीत अपने हीन, तुच्छ और निकृष्ट रूप का प्रदर्शन करते हैं। क्योंकि मनुष्य में जो कुछ उच्चतम, सर्वोत्तम एवं सर्वश्रेष्ठ गुण हैं, वे ही आत्मा से निकट सम्बन्ध रखते हैं, अतः अपने-आत्मा के प्राकृतिक स्वरूप को प्रकट करने के लिये हमें यथाशक्ति सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करना चाहिए।
धार्मिक पाखण्ड भी असत्य का ही एक रूप है। यदि कोई मनुष्य अपने आपको आध्यात्मज्ञानी प्रकट करता है, साथ ही अपनी उन्नति एवं सिद्धियों का वर्णन करके पाखंडी लोगों की तरह भोले-भाले व्यक्ति यों की प्रशंसा प्राप्त करने का यत्न करता है तो यह समझ लेना चाहिए कि वह सत्य का वास्तविक अनुयायी नहीं है।
(श्री चन्द्रशेखर शास्त्री)
आजकल संस्कृत का ज्ञान रखने वाला धर्म का व्यवस्थापक समझा जाता है। कम से कम वह अपने को ऐसा ही समझता है और चाहता है कि दूसरे भी उसे ऐसा ही समझें। इससे बढ़कर अनधिकार चर्चा दूसरी हो ही नहीं सकती। पंडित होना अर्थात् संस्कृत भाषा का ज्ञान हो जाना धर्म व्यवस्थापक होने का प्रमाण पत्र नहीं हो सकता। यदि ऐसा हो तो सभी संस्कृतज्ञ धर्म के निर्णायक माने जायेंगे। वेदों में एक कथा आई है कि कुछ लोगों ने ऋषियों से पूछा- “महाराज, अभी तो आप लोग धर्म-व्यवस्था देते हैं। क्योंकि आपने धर्म का साक्षात् दर्शन किया है, आप यथार्थ वक्ता हैं, स्पृहाहीन हैं। आपके बाद, जब आपके सामने पुरुष न होंगे तब, धर्म की व्यवस्था कौन देगा? उस समय धार्मिक संदेहों का निराकरण कौन करेगा?”
इस प्रश्न के उत्तर में उन ऋषियों ने कहा- “उन्हीं ऋषियों के उपदेश से धर्म निर्णय होगा। धर्म के सम्बन्ध में ऋषियों ने जो तत्व बतलाये हैं, निर्णय का जो ढंग कहा है, उसी के अनुसार धर्म का निर्णय हो सकेगा।”
इसमें संदेह नहीं कि धर्म निर्णायक वही हो सकता है, जिसमें धर्म का साक्षात् दर्शन किया है, जो त्यागी और तपस्वी है। जिसने अपने स्वभाव को अपने मन को-- जानता की भलाई के लिए अर्पित कर दिया है। उसे अधिकार है कि वह धर्म की व्यवस्था दे। उसे अधिकार है कि वह जनता के लिये कल्याणकारी मार्ग का निर्देश करे। पर जिसने जीवन में कभी त्याग नहीं किया है, न तपस्या से जिसे प्रयोजन है वह भला धर्म की बातें क्या करेगा? क्या उसे यह अधिकार इसलिए मिल सकता है कि वह संस्कृत जानता है-पंडित कहलाता है।
अब इनके संस्कृत ज्ञान की बात भी सुनिये आजकल पठन-पाठन की प्रणाली ऐसी निकृष्ट हो गयी है कि जो बातें पढ़ने की हैं, उधर तो ध्यान नहीं दिया जाता। व्याकरण की 5-6 पुस्तकें, साहित्य की 10-20 पुस्तकें, न्याय की कुछ पुस्तकें पढ़ने वाला ही पंडित समझा जाने लगता है। पर सच्ची बात यह है कि इन ग्रन्थों के साधारण अध्ययन से संस्कृत का ज्ञान कुछ भी नहीं होता। अधिक से अधिक शब्द-शास्त्र की कुछ बारीकियाँ मालुम हो जाती हैं। धर्म शास्त्र, पुराण, मीमाँसा, ब्राह्मण कर्मकाण्ड आदि विषयों का सांगोपांग ज्ञान बहुत कम पंडितों को होता है। पुराण पढ़ना तो इस समय अनावश्यक करार दे दिया गया है। नये खयाल विद्वान पुराणों को निकम्मा समझते हैं। कहते हैं इनमें परस्पर विरोधी बातें हैं। अन्य लोगों की बात छोड़ भी दें तो सनातन धर्म भी, जो पुराणों को प्रामाणिक मानते हैं, उनको क्यों नहीं पढ़ते? पुराणों की महिमा तो गाते हैं, पर जहाँ पुराण कथा होती हो वहाँ कोई बड़ा पंडित नहीं पहुँचता यदि किसी बड़े पंडित से पुराण बाँचने को कहा जाये तो भी वह तैयार नहीं होता। वह इस काम को छोटा समझता है। पर हमारा खयाल है कि संस्कृत-साहित्य का पूरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए पुराणों का पढ़ना आवश्यक है। अधिक नहीं तो महाभारत को पढ़ना तो नितान्त आवश्यक है। तभी भारतीय-समाज के स्वरूप का कुछ पता लग सकता है। व्यवहार में धर्म का क्या रूप होता है, प्राचीन समय में लोगों ने धर्म की व्याख्या अपने आचरणों द्वारा कैसी की, इस बात का पता हम पुराणों से ही पा सकते हैं।
ये पंडित कहते हैं कि हम सनातन धर्मी हैं, प्राचीन पद्धति के अनुयायी हैं। किन्तु इनकी प्राचीन पद्धति, शास्त्रीय पद्धति नहीं, वह है लौकिक व्यवहार, जो प्रणाली चली आती है, जिसका कहीं मूल भी नहीं है, उसे ही ये धर्म समझते हैं। पर मुँह से धर्म का नाम लेते हैं, धर्म की दुहाई देते हैं। ज्ञान का तो यह हाल है कि कुछ समय पहले काशी के बड़े पंडितों की एक सभा हुई थी धर्म-निर्णय के लिये। वहाँ काशी के ही एक प्रसिद्ध पंडित ने कहा था कि “शूद्रों को पुराण पढ़ने का अधिकार नहीं है।” यह सुनकर हम तो चकित रह गये। पश्चाताप हुआ उस पंडित के पाँडित्य पर। दुख हुआ अपनी धार्मिक स्थिति के अरक्षित होने पर। हम लोगों ने तो गुरुओं के मुख से यही सुना था कि स्त्री, शूद्र, तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के भी मूर्ख लोगों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है, क्योंकि वे वेदार्थ समझ ही नहीं सकते। इसमें पवित्रता-अपवित्रता अथवा उच्चता-नीचता की कोई बात नहीं। पर इन पंडित जी को इतना भी मालूम नहीं कि पुराणों की रचना तो स्त्री, शूद्र और कम पढ़े लोगों के लिये ही की गई थी। इन्हीं को पुराणों के पढ़ने का अनधिकारी बतलाया जाय, तो ऐसे ज्ञान को किस नाम से पुकारें?
बातें तो ये वशिष्ठ और बाल्मीकि के जमाने की ही करते हैं पर आप स्वयं नौकरी के लिये क्लर्कों की खुशामद करते फिरते हैं। बनियों के पीछे दौड़ते फिरते हैं। ये वैसे तो सनातन धर्म के बड़े हिमायती बनते हैं, पर व्यवहार में किसी दूसरे ही मार्ग पर चलते हैं। कुछ वर्षों पहले कलकत्ते में एक मन्दिर छोड़ दिया गया। हमने कुछ पंडितों से कहा- “चलिये एक सभा है, उसमें कलकत्ता के मन्दिर के विषय में विचार होगा।” एक बूढ़े पंडित ने कहा कि- “मन्दिर टूट गया, अब क्या विचार होगा।” हमने कहा-उसके पुनर्निर्माण के लिये शायद चन्दा किया जाए। उन्हीं पंडित जी ने उत्तर दिया- “यह तो सेठों का काम है।”
पंडितों की यह स्वार्थमयी प्रवृत्ति धीरे-धीरे लोगों पर प्रकट होती जाती है। उन लोगों की जो थोड़ी भी प्रतिष्ठ बची थी वह भी जाती रही। सब ने समझ लिया कि इनके पास सिवाय ढोंग के और कुछ नहीं। ढोंग को लाग ढोंग समझ लें तो इसमें कोई अनुचित बात नहीं, पर दुख इस बात का है कि इनके प्रति अश्रद्धा होने के साथ ही साथ भारतीय सभ्यता और भारतीय धार्मिक साहित्य पर से भी नई पीढ़ी की श्रद्धा उठती जाती है। चूँकि प्रकट में इन पंडितों ने ही धर्म का ठेका ले रखा है और वे बात-बात में उसकी दुहाई देते रहते हैं। ये बातें तो करते हैं ऋषि-मुनियों के समय की-सी, पर काम करते हैं पूरे कलियुगी। वेद-विक्रय शास्त्रों में बड़ा ही निन्दित कहा गया है। पर ये स्वयं नौकरी करते हैं, विद्या-विक्रय करते हैं। कोई अच्छा विद्वान भी हो, काफी पढ़ा लिखा भी हो, पर वह कहीं नौकर न हो, तो इन पंडितों की दृष्टि में उसकी कोई इज्जत नहीं।
मनु ने कहा है- “दान लेने की शक्ति रखने वालों को भी दान नहीं लेना चाहिये।” पर सदैव मनु की दुहाई देने वाले ये पंडित दान प्राप्त करने के लिये सिफारिशें कराते रहते हैं। पहले ये बातें छिप जाती थीं। उस समय लोगों में ब्राह्मणों पर श्रद्धा अधिक थी, और पढ़ने-लिखने वाले भी बहुत कम थे। इसलिये उस समय ब्राह्मणों के कामों की नुक्ताचीनी करने वाले शायद ही कहीं एकाध दिखलाई पड़ते थे। पर अब हालत बहुत बदल गई है, अनेकों समालोचक पैदा हो गये हैं। अब जनता ने समझ लिया है कि ये पंडितगण झूठी सेवा जमा कर अपना महत्व कायम किये हुए हैं। ब्राह्मणों का और खासकर पंडितों का सबसे बड़ा लक्षण त्यागी और तपस्वी होना है। इसी से पहले जमाने में इनको किसी की परवा नहीं होती थी। जो ठीक समझते थे वही कहते थे। अब भी हिन्दू-समाज के उद्धार के लिये ऐसे ही त्यागी-तपस्वी विद्वानों की आवश्यकता है।
(महात्मा टॉलस्टाय)
एक महान लेखक का कथन है कि मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण बातों की संख्या एक नहीं अनेक है। इनमें अनेक व्यक्ति इस बात का विचार किया करते हैं कि कौन−सी बात बढ़िया है और कौन−सी घटिया। हमारी सम्मति में सोचने का यह तरीका ठीक नहीं है। इसके विपरीत हमको यह विचार करना चाहिये कि संसार में जितनी भी उत्तम और आवश्यक बातें हैं उनमें सबसे पहले करने योग्य किसको समझा जाय? और उसके बाद क्रमानुसार आगे बढ़ते हुये सबसे अन्त में किस को रखा जाय?
इस लेखक के मतानुसार मनुष्यों के जीवन में बुराइयाँ और आपत्तियाँ इसलिए आती हैं क्योंकि उन्होंने बहुत से हानिकार और निरर्थक नियमों को धार्मिक कर्तव्यों का रूप दे रखा है। पर जो सबसे प्रमुख और परमावश्यक कर्तव्य है उसको अपनी आँखों से ओझल कर रखा है। इस कर्तव्य की संक्षेप में यह व्याख्या की जा सकती है कि “मनुष्य को चाहिये कि वह अपना पसीना बहा कर अपना उदर पोषण करे।”
ऊपर से देखने पर तो यह नियम अत्यन्त सरल जान पड़ता है, क्योंकि हम अपने जीवन में इसे प्रायः सुनते आये हैं। ईसाइयों की बाइबिल तथा अन्य धर्मों के ग्रन्थों में भी इसका प्रतिपादन किया गया है। हम विचार करते हैं कि इसमें क्या नवीनता है, अपने पसीने की कमाई तो हम खाते हैं और सब को खाना ही चाहिये। लेकिन सच बात तो यह है इस नियम को स्वीकार करना और इसका पालन करना तो दूर रहा, अधिकाँश व्यक्ति इससे उलटे नियम को मानते हैं और उसी पर आचरण करते हैं। यदि भली प्रकार ध्यान देकर देखा जाये तो हमारे अधिकाँश पापों अर्थात् हमारी भूलों और बुरे कामों की जड़ यही है, कि हम इस नियम की उपेक्षा करते हैं। मनुष्य के लिये जितने कर्तव्य निश्चित किये गये हैं उनमें सर्वप्रधान, सर्वप्रथम और निर्विकल्प (जिसके बदले में दूसरा कोई कर्तव्य बतलाया न जा सकता हो) यही है कि मनुष्य अपने हाथों से अपनी रोटी कमाये। यहाँ रोटी के लिये मजदूरी से मतलब उन तमाम भारी तथा कर्कश कामों से है जो भूख और प्यास से होने वाली मृत्यु से बचने के लिए मनुष्य को करने पड़ते हैं। और ‘रोटी’ शब्द से तात्पर्य अनाज, पानी, पेय पदार्थ, वस्त्र, मकान और ईंधन आदि जीवन धारण करने के समस्त अनिवार्य पदार्थों से है। इस सम्बन्ध में हमको यह बात अपने हृदय में जमा लेनी चाहिये कि “जीवित रहने के लिये मनुष्य को परिश्रम करना आवश्यक है।” इस नियम को हम लोग अब तक जीवन का सिर्फ एक अवश्यम्भावी नियम मानते रहते हैं, लेकिन भविष्य में हमको इसे मनुष्य जीवन का एक लाभदायक नियम मान लेना चाहिये और इसका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिये अनिवार्य बना देना चाहिए। हम यहाँ तक कह सकते हैं कि यह नियम समाज का एक धार्मिक नियम बन जाना चाहिये। अगर हम इस नियम को स्वीकार करके एक वर्ष में दो महीने भी रोटी के लिये मजदूरी कर लें तो, इससे बिना किसी प्रकार की हानि या कठिनाई के अपरिमित लाभ उठा सकते हैं।
आरंभ में यह बात पाठकों को विचित्र अवश्य मालूम होगी कि सब की समझ में आने लायक और इतने सरल साधन के द्वारा, जिसमें किसी प्रकार के कौशल अथवा पाँडित्य की आवश्यकता नहीं हम किस प्रकार मनुष्य जाति को असंख्य बुराइयों से बचा सकते हैं? लेकिन इससे भी विचित्र बात यह है कि हम लोग कितने अनाड़ी हैं कि अपने पास इतने स्पष्ट, सरल और दीर्घ काल से परिचित साधन के होते हुये भी उसकी उपेक्षा कर रहे हैं, और अपनी बुराइयों की दवा नाना प्रकार की जटिलताओं, पाँडित्य और कौशलपूर्ण बातों में खोजते फिरते हैं। समाज में प्रचलित बुराइयों को दूर करने के लिये हम आजकल जिन असंख्य उपायों को काम में ला रहे हैं, वे सब इसी प्रकार के उपाय हैं। हम रोग की जड़ को तो छूते तक नहीं और उसके पत्तों और डालियों के काटने में हमने अपनी सारी शक्ति लगा दी है। क्या इससे रोग का नाश हो सकता है?
समाज के अन्दर दो प्रकार की बुराइयाँ होती हैं। एक तो हिंसा मूलक-जैसे किसी की हत्या कर डालना, किसी को फाँसी पर लटका देना, कैद में डाल देना, लड़ाई में मार देना आदि। इनमें मनुष्य अपनी हिंसा-प्रवृत्ति की प्रेरणा से पाप करता है। अगर हम इन हिंसा मूलक अपराधों को अलग छोड़ दें और शेष समस्त बुराइयों का वास्तविक कारण ढूँढ़ें तो यही जान पड़ता है कि उन सबकी जड़ भुखमरी, मनुष्य जीवन के लिये आवश्यक सब प्रकार के पदार्थों का अभाव, सामर्थ्य से अधिक परिश्रम करने को विवश होना है। अथवा इसके विपरीत उनका कारण असंयमित तथा आलसी जीवन बिताना है। ऐसी अवस्था में मनुष्य के लिये इससे बढ़कर पवित्र काम और कौन हो सकता है कि वह इस असमानता को मिटाने में मददगार बने। उसे एक ओर तो जन साधारण की गरीबी को मिटाने और दूसरी ओर सम्पत्ति के प्रलोभनों को नाश करने में सहायता करनी चाहिये।
हमारी प्रचलित समाज-व्यवस्था अत्यन्त विचित्र है। हम में से एक आदमी मन्दिर में पूजा करता है, दूसरा आदमी सेना के संगठन में लगा है, तीसरा न्यायाधीश का कार्य करता है, चौथा आदमी पुस्तकों का अध्ययन और रचना करता है, पाँचवाँ लोगों की चिकित्सा करता है, छठा बालकों को शिक्षा देने का कार्य करता है। इन सब लोगों ने उपरोक्त कामों के करने का बहाना बनाकर रोटी के लिये मजदूरी करने के कर्तव्य को त्याग रखा है, और उसे दूसरे लोगों पर लाद दिया है। वे इस बात को भूल जाते हैं कि मन्दिर के पुजारी, सेना के संगठनकर्ता-आदि सब प्रकार के लोगों को सबसे पहले इस बात की आवश्यकता होती है कि उसको रोटी देकर भूखों मरने से बचाया जाये। हम इस बात का जरा भी ख्याल नहीं करते कि मनुष्यों के असंख्यों प्रकार के कर्तव्यों में से कुछ का नम्बर उनके महत्व और उपयोगिता की दृष्टि से सबसे पहले आता है और कुछ का बाद में। हमको चाहिये कि हम प्रारम्भिक कर्तव्य को पूरा किये बगैर अन्तिम कर्तव्य को पालन करने का प्रयत्न कदापि न करें। और वह कर्तव्य यही है कि हम अपनी रोटी को उत्पन्न करने में प्रत्यक्ष रूप से कुछ शारीरिक श्रम करें।
यह कल्पना करना अथवा दलील देना कि ऐसा करने से मानव समाज के लिये होने वाले अनेक महत्वपूर्ण कार्यों में बाधा पड़ जायगी, या दूसरे लोगों के मार्ग में कठिनाइयाँ उत्पन्न होंगी, सर्वथा निराधार है। बल्कि यह नियम लोगों को दरिद्र और दुखी होने से बचायेगा और उनको सम्पत्ति के हानिकारक प्रलोभन में फँसने नहीं देगा। रोटी के लिये मजदूरी करने का सिद्धान्त सब लोगों को एक समान श्रेणी में पहुँचा देता है और भोग विलास के पर काट देता है।
उस अवस्था में जब कि सब मनुष्य थोड़ा-थोड़ा समय जीवन निर्वाह की सामग्री पैदा करने में खर्च करेंगे और अपनी मेहनत से पैदा की हुई चीजों का ही उपयोग करने लगेंगे, तो अनाज और मनुष्य की प्रारम्भिक आवश्यकताओं की दूसरी चीजें, खरीदने और बेचने के पदार्थ नहीं रह जायेंगे। परिणाम यह होगा कि भविष्य में लोग भूखे प्यासे, नंगे और दरिद्र नहीं रहने पायेंगे। अगर किसी दैवी प्रकोप या अन्य दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति के कारण कोई आदमी अपने और अपने परिवार के लिये पर्याप्त अन्न उत्पन्न न कर सका, तो उसका कोई पड़ोसी, जिसने अच्छी परिस्थितियों के कारण अधिक अन्न पैदा कर लिया है, उस आदमी के लिये आवश्यक अन्न की पूर्ति कर देगा। इस प्रकार जो अभाव आज मनुष्यों को अनैतिक उपायों का आश्रय लेने को विवश करता है, वह इस समय दूर हो जायगा।
(‘एक भक्त’)
हिन्दू-धर्म पर अनेक अन्य देशीय लोग अन्धविश्वास का प्रचारक होने का दोषारोपण किया करते हैं। उनके मतानुसार इसकी रीति-रिवाजें, कर्मकाण्ड सम्बन्धी क्रियाएं, उत्सव और तीर्थ आदि अज्ञ पुरुषों के लायक हैं, अर्थात् वे सर्वथा दिखावटी और ऊँची श्रेणी के आध्यात्मिक ज्ञान से रहित हैं इसमें संदेह नहीं कि हिन्दू धर्म में विभिन्न योग्यता वाले व्यक्तियों के लिए अलग-अलग प्रकार की धार्मिक व्यवस्था की गई हैं। ऊँचे दर्जे के आध्यात्मिक वृत्ति वाले व्यक्तियों के लिये वेदों और उपनिषदों के धार्मिक सिद्धान्त प्रस्तुत किये हैं, दार्शनिक प्रवृत्ति वालों के लिये पट दर्शन और अन्य शास्त्र मौजूद हैं, और सामान्य श्रेणी की जनता के लिये पुराण आदि लिखे गये हैं। क्योंकि ये विदेशी लोग इस देश के नगरों और शहरों में घूम कर प्रायः सामान्य लोगों को ही देखते हैं, इसलिये वे हिन्दू मात्र को अंधविश्वासी और दिखावटी रूढ़ियों में फँसा हुआ समझ लेते हैं।
जिन उत्सवों और तीर्थों को, आलोचना करने वाले व्यक्ति लकीर पीटना या अंधविश्वास का चिन्ह समझते हैं, उनमें एक बहुत बड़ा तत्व व्यापक है। सच पूछा जाय तो विदेशियों के प्रबल आक्रमण के समय इन्हीं चीजों ने हिन्दू धर्म की रक्षा की है और विदेशी धर्म तथा संस्कृति के प्रभाव को इन्हीं ने कुँठित किया है। प्रत्येक उत्सव अथवा तीर्थ किसी महान विभूति अथवा किसी महान धार्मिक कार्य की स्मृति में नियत किया गया है। उत्सव व तीर्थों द्वारा, हमारे पूर्वज उन महान व्यक्तियों अथवा उनके कार्यों की स्मृति सदैव नई बनी रहती है और नये लोगों को उनके पद चिन्हों पर चलने के लिये प्रेरणा मिलती है जनता के सम्मुख सदैव एक आदर्श उपस्थित रहता है और उस आदर्श की बराबर याद आते रहने से कल्याण पथ के थके-माँदे पथिकों में फिर से जीवन का संचार हो जाता है। किसी धार्मिक उत्सव में भाग लेने अथवा किसी तीर्थ की यात्रा का निश्चय करने से उसके सम्बन्ध के विचारों की एक शृंखला बन जाती है और हमारा मन कुछ समय के लिये निजी स्वार्थ-साधन के विचारों से हटकर धार्मिक वातावरण में चला जाता है इससे मन में श्रद्धा, भक्ति, व पवित्रता के भावों का उत्थान होता है।
इसके अतिरिक्त ऐसे उत्सवों अथवा तीर्थों में एक ही प्रकार के बहुसंख्यक व्यक्तियों के इकट्ठे होने से धार्मिक चर्चा और विचारों का आदान-प्रदान होता है, जिससे लोगों को धार्मिक कार्य करने की नवीन शक्ति प्राप्त होती है। उत्सव के समय व तीर्थों में जो धार्मिक कृत्य होते हैं उससे धार्मिक पद्धतियों के संबंध में कुछ शिक्षा भी मिल जाती है और भूली हुई बातें फिर से नई हो जाती हैं। इसी सिद्धान्त पर उत्सव व यज्ञ आदि में लोगों को बुला-बुलाकर सम्मिलित किया जाता है। उत्सव में आने वाले विद्वानों तथा आचार्यों के दर्शन और उपदेशों से भी मनुष्य बहुत लाभ उठा सकते हैं और अपनी शंकाओं का समाधान करके आगे का कार्यक्रम निश्चित करने में सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
उत्सव तथा तीर्थों का एक उद्देश्य मनुष्य के जीवन की शुष्कता और नीरसता को दूर करना भी है। धार्मिक आचरण करने के लिये अपनी इच्छाओं पर शासन करना पड़ता है। साधारण मनुष्य का मन इच्छाओं के दमन की कठोरता से अनेक बार ऊब जाता है। परन्तु उत्सव और तीर्थ आदि ऐसी वस्तुएँ हैं कि जो इच्छाओं को धर्म प्रधान रखते हुये भी जीवन को सरस बना दें, और उसकी कठोरता को कम कर दे। मनुष्य का यह स्वभाव है कि दृश्य परिवर्तन से उसका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य सुधरता है। एक ही प्रकार का जीवन व्यतीत करने से मन व शरीर दोनों के थक जाने की संभावना रहती है। इसलिये मनुष्य के जीवन में उत्सव व तीर्थयात्रा नवीन शक्ति का संचार करके उसे संसार के पुनः उपयुक्त बनाने में सहायक होते हैं। तीर्थयात्रा से जलवायु का परिवर्तन हो जाता है और अधिकाँश तीर्थ स्थान ऐसे ही स्वास्थ्यदायक स्थानों पर बनाये गये हैं जहाँ कोई नदी या सरोवर आदि हो और जहाँ का प्राकृतिक दृश्य भी हृदय को प्रफुल्लित करने वाला हो।
सामाजिक संगठन में भी उत्सव और तीर्थों से बड़ी सहायता मिलती है। हिन्दुओं में जात-पाँत, प्राँतीयता और भाषा के इतने भेद होते हुये भी जो एक साँस्कृतिक भाव पाया जाता है उसका बहुत कुछ श्रेय तीर्थों को ही है। दूर-दूर के लोग जब एक तीर्थ में एकत्र होते हैं तो उनमें भ्रातृभाव और सहानुभूति की प्रवृत्ति को कुछ उत्तेजना मिलती ही है। ऐसे अवसरों पर सामाजिक संगठन के अन्य कार्य भी सहज में किये जा सकते हैं। यही कारण है कि कुँभ आदि स्नानों के अवसर पर सब तरह के सभा-सम्मेलनों की धूम मच जाती है। उत्सवों से भी सामाजिक संगठन के एक विशेष प्रयोजन की पूर्ति होती है। बहुधा किसी जातीय उत्सव से सारे जाति की विचार शक्ति किसी विशेष विचार पर केन्द्रित हो जाती है, और वह जाति उस विचार की सफलता के लिये विशेष प्रयत्नशील हो जाती है। उदाहरणार्थ दिवाली के उत्सव को देखिये। इसके पहले धनतेरस और रूप चतुर्दशी होती है। धनतेरस के लिये यह नियम रखा गया है कि प्रत्येक गृहस्थ अपने घर की वस्तुओं में कुछ न कुछ वृद्धि करे, और कुछ नहीं तो एक छोटा सा बर्तन ही खरीद लावे। रूप चतुर्दशी का यह नियम है कि प्रत्येक मनुष्य शरीर को स्वच्छ और सुन्दर बनावे तथा सुन्दर वस्त्र पहने।
इस प्रकार दोनों दिन सारी जाति का ध्यान धर्मानुसार धन प्राप्ति और स्वच्छता तथा सुन्दरता की आवश्यकता की ओर आकर्षित होता है इस प्रकार के उत्सव समाज में विशेष विचारों के प्रचार के लिये बड़े उपयोगी होते हैं और समाज को समृद्धिशाली बनाने में सहायक होते है।
परन्तु ये सब लाभ तभी संभव हैं जब हम उत्सवों तथा तीर्थों का बुद्धिमानी के साथ प्रयोग करें। अन्यथा जिस प्रकार आजकल दिवाली पर हजारों व्यक्ति जुए में बर्बाद हो जाते हैं और होली पर गन्दी गाली गलौज और धूल, कीचड़ के फेंकने से अनेक बार दंगे-फसाद हो जाते हैं, उससे प्रायः सभी उत्सव हानिकारक सिद्ध होने लगते हैं। बहुत से लोग इन उत्सवों की सफलता तभी समझते हैं जब इनकी सजावट, दिखावट, नाच गाना आदि में लाखों रुपया खर्च कर दिया जाय। कई जातियों में रथ यात्रा या अन्य धार्मिक उत्सवों के नाम पर प्रति वर्ष दस-दस बीस-बीस लाख की रकम फूँक दी जाती है। यदि इस धन को किसी भी सार्वजनिक हित के कार्य में खर्च किया जाय तो कितने ही लोगों का भला हो सकता है। उत्सवों और तीर्थों में लोग अस्वास्थ्यकर तरीकों से रहते हैं और अनेक बार उनमें हैजा आदि फैल जाने से सैकड़ों व्यक्ति मर जाते हैं। दूसरा दोष हुल्लड़बाजी का है, हुल्लड़ से नीच प्रकृति के लोगों का मनोरंजन होता है, परन्तु इससे धर्मस्थानों की प्रतिष्ठ बढ़ने के बजाय उनका पतन होने लगता है। तीर्थ यात्रा या धार्मिक उत्सव जीवन के मुख्य उद्देश्य नहीं है। मुख्य उद्देश्य तो सदाचार पालन द्वारा आत्मा का उद्धार करना है। तीर्थ यात्रा केवल एक सहायक साधन है। उस साधन का उपयोग तभी उचित है जबकि परिस्थिति अनुकूल हो। प्रतिकूल परिस्थिति में वह साधन बजाय लाभदायक के हानिकारक सिद्ध हो सकता है।
इतना ही नहीं आजकल अनेक तीर्थों में अधर्म फैल गया है। कितने ही तीर्थों को तो स्पष्टता दुराचार और ठगी के अड्डे कहा जाता है। तीर्थयात्रा के फल से हम धर्म में श्रद्धा बढ़ने की आशा करते हैं। परन्तु बहुत से व्यक्ति जो श्रद्धा का भाव लेकर वहाँ जाते हैं वहाँ के अधर्म को देखकर उल्टा उस श्रद्धा को गँवा बैठते हैं। इसलिए धार्मिक उत्सवों और तीर्थों की प्रणाली को तो हमें कायम रखना चाहिए, पर उनमें जो दोष आ गये हैं, उनका रूप जो विकृत हो गया है, उसका संशोधन अवश्य करना चाहिए।
(श्री ‘भारतीय योगी’)
साधारण मनुष्य का जीवन इस संसार और उसके पदार्थों तक ही सीमित रहता है वह शरीर को ही सब कुछ समझता है और उसके जितने उद्योग और प्रयत्न होते हैं वे सब शरीर के लिये ही होते हैं। शारीरिक भोग से भी ऊँचा दूसरा जीवन है, इस बात को वह नहीं जानता। इसलिये शारीरिक सुख तथा साँसारिक आमोद-प्रमोद ही उसका एक मात्र लक्ष्य होता है। किन्तु जब उसे यह पता चलता है कि शरीर से भी सारयुक्त वस्तु आत्मा है तब वह आत्मा को प्रधान और शरीर को गौण महत्व देने लगता है। अब वह शरीर को साधन मानता है और एक ऊँचे जीवन को प्राप्त करने में उसे सहायक समझकर उसकी रक्षा करता है। उसका जो शरीर अब तक आध्यात्मिक जीवन में विघ्न था अब वह आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होने का साधन बन जाता है। इस स्थिति में पहुँच जाने पर वह शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति आसक्ति की भावना से नहीं करता, वरन् आवश्यकता की की से करता है। जैसे रेल का ड्राइवर इंजिन में इसलिए कोयला और पानी भरता है कि वह चलता रहे, उसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाला साधक शरीर को ठीक दशा में रखने के लिए उसकी प्राकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता रहता है।
साधक के सामने एक खास प्रश्न यह होता है कि उसका अंतिम लक्ष्य क्या है किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह अनजाने ही प्रेम तथा घृणा करता है। किस लक्ष्य के लिये वह तरह-तरह के सुखों और दुःखों का अनुभव करता है। जब साधक के हृदय में इस प्रकार अंतिम लक्ष्य को समझने की भावना जागृत होती है तभी उसकी आध्यात्मिक उन्नति आरम्भ होती है। इस प्रकार भगवान की कृपा से उसका ध्यान जीवन के अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने की तरफ खिंच जाता है और वह यथाशक्ति प्रयत्न करने लगता है। पर सच्चे लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग बड़ा लम्बा होता है और उसमें अनेकों विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है। उसे मानो पर्वत की खड़ी दीवार पर चढ़ना पड़ता है। पग-पग पर उसे गिरने और फिसलने का डर रहता है। सत्य की ऊँची चोटी तक पहुँचने की जो लोग कोशिश करते हैं उन्हें एक ऊँचाई के बाद दूसरी ऊँचाई पार करनी पड़ती है- एक चढ़ाई लाँघ लेने पर दूसरी चढ़ाई लाँघनी पड़ती है। बहुत से साधक काफी ऊँचाई तक पहुँच जाते हैं, तो भी उनके गिरने का डर बना रहता है। जरा सी भूल हो जाने से वह फिर नीचे लुढ़क आते हैं और उसे फिर नये सिरे से चढ़ाई शुरू करनी पड़ती है। इसलिए आध्यात्मिक मार्ग में गुरु की सहायता आवश्यक होती है। गुरु लक्ष्य स्थान को पहुँच चुका होती है, वह अपने अनुभव से रास्ते की सब बाधाओं, कठिनाईयों, चट्टानों, गड्ढों को भली प्रकार जानता है। इससे वह साधक को गिरने और ठोकर खाने से बचा कर लक्ष्य स्थान तक पहुँचा सकता है।
आध्यात्मिक कल्याण का जो अभिलाषी इस प्रकार सच्चे लक्ष्य तक पहुँचने को तैयार होता है, वह अपने साथ पूर्व जन्म में संचित किये संस्कारों को लेकर चलता है। आत्म साक्षात्कार की तीव्र अभिलाषा के कारण इन संस्कारों का बल कम पड़ जाता है। किन्तु मार्ग में चलते-चलते जब-जब आध्यात्मिक प्रयत्न में शिथिलता आती है, तभी वे संस्कार फिर मार्गच्युत करने के लिए सम्मुख प्रबल हो उठते हैं और नवीन शक्ति लेकर साधक को आ घेरते हैं। इस प्रकार साधक की आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग रुक जाता है।
एक नदी के उदाहरण पर ध्यान देने से यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आ जायगी। नदी की प्रबल धारा अपने आरम्भ होने के स्थान तथा किनारों से ढेरों मिट्टी बहा कर लाती है। तब तक नदी की तेज धारा के कारण यह मिट्टी पानी में घुली रहती है तब तक वह नदी के प्रवाह में रुकावट पैदा नहीं करती। किन्तु ज्यों−ही मैदान में या खासकर नदी के गिरने के स्थान के पास धारा का वेग बहुत धीमा हो जाता है, त्यों−ही मिट्टी का ढेर नीचे जमने लग जाता है। इससे वहाँ पर छोटे-बड़े द्वीप और डेल्टा बन जाते हैं। ये द्वीप और डेल्टा केवल नदी के बहाव को रोकते ही नहीं, वरन् उसे अनेकों धाराओं में बाँट कर उसकी दिशा ही बदल देते हैं। इन बाधाओं के कारण नदी की शक्ति बहुत कम पड़ जाती है और उसका पानी लक्ष्य तक पहुँचने के बजाय इधर-उधर बहने लगता है। इस प्रकार अपने ही द्वारा उत्पन्न की हुई रुकावटों के कारण आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग अनेक बार रुक जाता है। ये रुकावटें भी गुरु की सहायता से दूर की जा सकती हैं।
गुरु की सहायता अत्यन्त प्रभावपूर्ण तभी सिद्ध हो सकती है जब साधक अपने अहंकारमय जीवन को त्याग कर गुरु की सहायता से अहंकार-रहित जीवन का मार्ग ग्रहण करता है। इसी का नाम शरणागत धर्म है। पूर्ण शरणागति अथवा अहंकार का वास्तविक त्याग बड़ा कठिन कार्य है। पर इसके बिना आध्यात्मिक उन्नति होना संभव नहीं। बिना शरणागति की भावना के अहंकारमय जीवन का नाश नहीं हो सकता और अहंकार का अंत हुये बिना आत्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता। इसलिये यह बहुत आवश्यक है कि साधक मैं यह करता हूँ, मैं वह करता हूँ ऐसे विचारों से बिल्कुल दूर रहे। इस का अर्थ यह न समझ लेना चाहिये कि अहंभाव बढ़ने के डर से साधक सब प्रकार के कार्यों का करना ही बन्द कर दे। अब उसके सामने यह समस्या पैदा हो जाती है कि अगर वह कोई कार्य नहीं करता तो आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर कैसे हो, और जो कार्य करता है तो अहंभाव उत्पन्न होने का भय रहता है।
एक तरफ अकर्मण्यता से बचने तथा दूसरी ओर कर्म के अभिमान से बचने का उपाय यही है कि साधक पूर्णरूप से गुरु के आधीन रहे। कोई कार्य शुरू करने के पहले वह यह सोच ले कि मैं स्वयं कुछ नहीं करता किन्तु गुरु ही मेरे द्वारा यह कार्य करा रहा है। कार्य के समाप्त हो चुकने पर उसके फल को अपना समझने या उसका उपभोग करने के बजाय वह समस्त फल को गुरु के ही अर्पित करके स्वयं उससे मुक्त रहता है। वह एक प्रकार अस्थायी या काम चलाऊ अहंभाव है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह हानिरहित होता है क्योंकि इसका सारा भार गुरु पर छोड़ दिया जाता है। आगे चल कर आत्मशक्ति पाने पर साधक का अहंभाव स्वयं ही दूर हो जाता है और उसे गुरु की उपरोक्त सहायता की आवश्यकता नहीं रहती।
इस प्रकार का अभ्यास वास्तव में बड़े प्रयत्न से होता है और इसी कारण आध्यात्मिक मार्ग का पथिक धीरे-धीरे ही उन्नति करके लक्ष्य तक पहुँच सकता है। इस कार्य में एक जन्म के बजाय कई जन्म भी लग जाते हैं। कुछ साधक अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक भी उन्नति कर लेते हैं। वे या तो पूर्व जन्म में यथेष्ट उन्नति कर लेने वाले होते हैं या गुरु के विशेष अनुग्रह से ऐसा कर सकते हैं। ऐसे दो चार विशेष व्यक्तियों को छोड़कर अधिकाँश साधकों की उन्नति धीरे-धीरे ही होती है। अहंकार धीरे-धीरे सीमित होता हुआ क्रम से विभिन्न अवस्थाओं में परिवर्तित होता जाता है। इस प्रकार अहंकार के स्थान में नम्रता आती है, उद्योग उत्पन्न करने वाली इच्छाओं के स्थान में संतोष आता है, तथा स्वार्थपरता की जगह निस्वार्थ प्रेम आता है।
इस प्रकार हृदय में बार-बार उठने वाले अहंकार को जीतने का एक मात्र उपाय आत्मसमर्पण और शरणागति ही है। इसी से साधक एक-एक मंजिल पार करके अग्रसर होता है। समर्पण जितना ही पूर्ण होगा गुरु तथा साधक के बीच की एकलयता उतनी ही बढ़ेगी और गुरु का अहंकार-रहित तथा उन्नत जीवन शिष्य में प्रवेश करके उसकी सहायता करेगा अन्त में ऐसी स्थिति आ जाती है जबकि पृथक अहंकार का जीवन पूरी तरह से समर्पित कर दिया जाता है। ऐसा होने से साधक गुरु से युक्त हो जाता है और वह आध्यात्मिक उन्नति के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।
(श्री अगरचन्द नाहटा)
आज विश्व में आवश्यकताएं बहुत बढ़ी हुई नजर आती हैं। पहले के लोग बहुत सीमित कपड़े, खाद्य पदार्थों और धन दौलत घर-मकान आदि में काम चला लेते थे। मोटा पहनना, मोटा खाना एवं थोड़ा कमाना संयमित जीवन बिताना ही उनका आदर्श था। प्राचीन ग्रन्थानुसार उस समय के मनुष्य प्रधानतः दो ही वस्त्र रखते थे। एक अधोवस्त्र धोती जैसा, दूसरा उत्तरीय ऊपर के शरीर को ढ़कने का। पर आज हम देखते हैं कि सात वस्त्र तो मामूली बात है। धोती के भीतर अण्डरवियर या कच्छा और ऊपर में गंजी, उसके ऊपर कमीज फिर कोट, सिर पर टोपी या पगड़ी, पाकेट में रुमाल और चद्दर, शाल, दुशाले आदि, यह साधारण वेश हुआ। विशेष में तो एक धोती के स्थान पर पेंट, सूथना, पाजामा, चूड़ीदार, हाफ पेंट, ब्रिजिस आदि कई प्रकार व अनेक डिजाइन के अधोवस्त्र, जाकिट, चोले, वस्त्रकोट जवाहर जाकेट, कई प्रकार की अँगरखी, सर्दी के मौसम में हाथ और पाँव में मोजे कान पर कनपेंच या कोई और वस्त्र, इसी तरह सिर के भी पगड़ी, साफा आदि अनेक वस्त्र, हमारी आवश्यकता में शुमार हो गये हैं। और इन वस्त्रों में पतले मोटे रेशमी सूती अनेक रंग, अनेक डिजाइन जिसकी गणना भी पूरी नहीं हो सकती। इसी प्रकार खाने वाली पदार्थों की, रहने के मकानों की, वाहनों की यावत् घर बिखरी के सामानों की इतनी अधिक आवश्यकतायें बढ़ गई हैं कि इनको बसाने में बहुत समय और द्रव्य का खर्चा हो जाता है। कहिए जब हमारी इन आवश्यकताओं की पूर्ति होना ही कठिन है। तृष्णा का अन्त ही कहाँ? नित्य नये डिजाइन व नित्य नई वस्तुएँ बनती रहती हैं और जिस को देखते हैं उसी ओर मन ललचा जाता है। आवश्यकता तो सीमित हो सकती है पर तृष्णा की सीमा नहीं होती। पहनने के कपड़ों और गहनों से अलमारियां भरी पड़ी हैं पर कोई नया डिजाइन देखा कि इसे भी ले लें, इस प्रकार की लालसाएं बढ़ती ही चली जा रही हैं।
आवश्यकता आविष्कार की जननी है। मनुष्य का मस्तिष्क विज्ञान का भण्डार है। नित्य नई खोज मानव बुद्धि का चमत्कार है। विचारों का प्रवाह प्रतिपल चलता रहता है। वह रोके नहीं रुकता है, जैसा है उससे संतोष नहीं। और चाहिए, ऐसा चाहिए, इतना चाहिये, इस तरह का चाहिए, ऐसी विचार लहरी दौड़ती है और संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। घर में धान के बोरे भरे पड़े हैं पर मन में होता है यह कितने दिनों का, अरे यह तो थोड़े दिनों में ही समाप्त हो जायगा। और संग्रह कर लिया जाय तो अच्छा हो। सच पूछिये भगवान ने प्राणी को अमर नहीं बनाया तो अच्छा ही किया। नहीं तो न मालूम मनुष्य कितना संग्रह करने लगता। उसका सारा जीवन अतृप्त ही रहता और वह संग्रह के धंधे में ही चक्कर काटता रहता। पर बलिहारी है प्रकृति की, उसने जीवन के साथ मरण का भी गठबन्धन कर दिया। प्रकृति का अटल नियम है कि जो जन्म लेगा वह अवश्य मरेगा, जो उत्पन्न होगा उसका विनाश भी होगा। इस सत्य को जानने पर कि जीवन का कोई भरोसा नहीं कि एक श्वांस आया, दूसरा न आया, प्रकृति के एक हल्के से झोंके से बड़ी से बड़ी चट्टान गिर जाती है, सुदृढ़ मकान भूमिसात् हो जाते हैं, शहर वीरान हो जाते हैं, बस्ती खड़े-खड़े उजड़ जाती हैं। यह सब हम प्रतिपल देख रहे हैं। उत्पादन प्रतिपल होता है तो विनाश भी प्रतिक्षण होता है। हम भी उसी प्रकृति के पुतले हैं। थोड़े दिनों के लिये खेल खेलने के लिये आये और जब भी घण्टा बज गया चल पड़े। यह जानते हुये भी, समझते हुए भी हम बेईमान हैं, यही तमाशा है। मरण सामने दीख रहा है पर हम अपने को अमर से समझ कर प्रवृत्ति कर रहे हैं। थोड़े से जीवन के लिये कितना छल, छिद्र, प्रपंच, अन्याय, हिंसा व द्वेष बुद्धि। हैरान है कि यह सब किसलिए क्यों?
मनुष्य नित्य नये आविष्कार करता है, उसका मस्तिष्क खाली बैठा नहीं रहता, उसका मस्तिष्क खाली बैठा नहीं रहता, उसके मन में उछल कूद मचती रहती है। उत्पादन और संग्रह इतना बढ़ता जाता है कि उससे अपने जीवन तक ही नहीं, सात पीढ़ियों या पचास पीढ़ियों तक के लोग खाते रहें। पर प्रकृति को यह बर्दाश्त नहीं। वह प्राणी की समस्त आशाओं पर पानी फेर देती है। सात पीढ़ी के लिये संग्रहीत धन और वस्तुएँ चँद क्षणों में ही नाश हो जाती हैं, उन्हें टिकाये रखने की भरपूर चेष्टा की जाती है, पर वे रह नहीं पाती। इस माया, लीला या प्रकृति का विधान कोई जान नहीं पाया, बड़े-बड़े बुद्धिवादी हार गए पर पार नहीं पाया।
आज मानव की संख्या प्रबल वेग से बढ़ रही है। संख्या के अनुपात में उत्पादन की वृद्धि हो, यह नारा लगाया जाना स्वाभाविक ही है। समस्त राष्ट्र इसी होड़ में लगे हैं कि नित्य नये अनुसंधान हों, आविष्कार हों और अधिकाधिक उत्पादन हो। मनुष्य के हाथ मशीनों के आगे बेकार साबित हो रहे हैं। इस मशीन युग ने गजब ढा दिया। सैकड़ों हजारों आदमियों का काम एक ऑटोमेटिक मशीन कर डालती है। चंद व्यक्तियों ने लाखों व्यक्तियों को बेकार बना दिया। लगता तो यह है कि इन कारखानों में इतने व्यक्तियों को काम मिल गया पर जरा सोचने पर विदित होता है कि चंद व्यक्तियों को काम मिला और हजारों बेकार हो गये। उत्पादन बढ़ाया तो उसे खपाने की धुन सवार हुई। क्योंकि कहावत है बेटी और माल चाहे कोई करोड़पति ही क्यों न हो घर में टिक नहीं सकते। एक व्यक्ति के पास लाख रुपया हो तो वह आनन्द से अपना और अपने परिवार का जीवन बिता सकता है पर तृष्णा उसे और भी उत्पादन की ओर ढकेलती है। कोई उन रुपयों को ब्याज में लगाकर बढ़ाता है कोई व्यापार कर। पर रुपया किसी घर में टिकता नहीं। उसे तिजोरी में रहने से बेचैनी हो जाती है। मन में होता है कि इसमें पड़े रहने से क्या लाभ? किसी को ब्याज में दें या व्यापार में दें तो बढ़ेगा ही। खाते-खाते तो कुँए ही सूख जाते हैं। इस तरह उत्पादन की वृद्धि की प्रक्रिया चलती ही रहती है। किसान चंद दानों से सैकड़ों हजारों मन धान के लिए जोतता है, पर खाने योग्य रखकर बेच डालता है। फिर फसल का समय आता है और हल जोतकर उत्पादन की तैयारी कर बैठता है। हर व्यक्ति चाहता है कि कुछ पैदा करे और इसी से सृष्टि चलती है।
उत्पादन करना, बढ़ाते जाना, जीव का धर्म है तो खपाते जाना, विनाश कर डालना भी उसी का या प्रकृति का धर्म है। दोनों का चक्कर चलता रहता है। कभी उत्पादन बढ़ता है तो कभी विनाश। वैसे दोनों साथ भी चलते रहते हैं।
उत्पादन किया जाय, बढ़ाया जाय यह ठीक है क्योंकि निकम्मा रहना अच्छा नहीं। ईश्वर या प्रकृति ने हाथ पाँव दिये हैं तो उन्हें चलाते रहना ही चाहिये दूसरों के उत्पादन पर हमारा जीवन टिका है तो हम भी कुछ ऐसे उत्पादन करें जिससे हमारा व दूसरों का जीवन चल सके। पूर्व काल में आवश्यकताएं कम थीं और संतोष भी रहता था। इसलिए जो थोड़ा उत्पादन करते उसी में मस्त रहते। कुछ प्रकृति भी अनुकूल थी, थोड़े प्रयत्न से अधिक उपजता था। इसलिए उन्होंने अपने बचे हुए समय का सदुपयोग अंतर्जगत की शोध में लगाया। उनके विचार में भौतिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा कराना ही जीवन की सफलता नहीं, ध्येय नहीं। बाहर जो कुछ दिखाई दे रहा है उसके भीतर भी कुछ है। पर भौतिक आवश्यकताओं में लगे रहने के कारण उसे देख नहीं पाते। अन्तर्मुखी होने के लिए बाहर से मुख मोड़ना होगा, साधना करनी होगी। उस साधना के भिन्न-भिन्न पथ, धर्म या आधार के रूप में प्रकटित हुए। बहिर्मुख वृत्ति को छोड़कर अन्तर की शोध की गई। उत्पादन तो वहाँ भी हुआ पर विभिन्न प्रकार का। भौतिक पदार्थों का उत्पादन नहीं, आत्मिक और गुणों और शक्तियों का उत्पादन हुआ। आवश्यकताएं सीमित होनी ही थी क्योंकि बिखरी हुई शक्ति को एकाग्र किये बिना साधना संभव नहीं। आवश्यकताओं की पूर्ति में फंसा हुआ मन चंचल बना हुआ रहता है, एक आवश्यकता की पूर्ति हुई तो दूसरी की इच्छा और प्रकटित हुई। उसी की अधेड़ बुन में लगे रहने से अन्तरात्मा की शोध हो नहीं सकती।
भौतिक उत्पादन को ही लें, वह आज विश्व में खूब बढ़ रहा है क्योंकि उत्पादन के बिना स्थिति संभव नहीं। जनसंख्या बढ़ रही है व आवश्यकताएं बढ़ रही हैं तो उत्पादन बढ़ना ही चाहिये इसके बिना संतुलन ठीक रह ही नहीं सकता। पर इस उत्पादन में एक बड़ी कमी यह आ गई है कि इसका स्तर दिनों दिन गिर रहा है। चीजें सस्ती और लुभावनी बनती हैं पर टिकाऊ नहीं। हमारे कागजों को ही लीजिये, पहले हाथ के बनते थे अब मशीन के देखने में साफ सुथरे हैं और दामों में सस्ते। पहले के कागजों की घुटाई का काम करना पड़ता था तो टिकाऊ भी वे जितने होते थे आज के नहीं हो सकते। करीब 800 वर्ष की कागज की प्रतियाँ तो मैंने स्वयं देखी हैं। उसका कागज और सँभाल के रखे जाने पर स्याही आज भी ऐसी स्थिति में है कि पाँच चार सौ वर्ष और भी न बिगड़े, पर मिल का कागज बढ़िया होते हुए भी थोड़े वर्षों में जीवन शेष होने लगता है। सौ पचास वर्ष पहले की छपी हुई किताबें आज किस स्थिति में है हम सबको अनुभव है। यही हाल स्याही और अन्य रंगों का है। हजार डेढ़ हजार वर्ष पुराने चित्रों का रंग और लिखी प्रतियों की स्याही आज भी चमक रही है। तब आज की स्याही और रंगों की स्थिति से तो हम परिचित ही हैं।
थोड़े वर्षों पहले तक उत्पादकों में यह भावना थी कि चीज अच्छी और टिकाऊ बने। पर आज उस भावना में बहुत अन्तर आ गया है। आज के उत्पादक यही चाहते हैं कि बनी हुई चीजें जल्दी-2 नष्ट हो जाए ताकि लोग नए उत्पादनों को खरीदते रहें दिखने में आकर्षक और सस्ते लगते हों पर वे पड़ते बहुत महंगे हैं। दो चार उदाहरण दूँ-
मेरे देखते-देखते जर्मनी की चीजें बड़ी मजबूत मानी जाती थीं और जापान की सस्ती होतीं पर टिकाऊ नहीं। इसीलिये वह कहावत प्रसिद्ध हुई है। महंगा रोये एक बार सस्ता रोये सौ बार अर्थात् जर्मनी की टिकाऊ चीजों के दाम कुछ अधिक रहने पर भी वे बहुत अधिक दिनों तक काम देंगी, इस दिनों में जापान वाली सस्ती चीजें कई बार टूट-फूट जाएंगी और टूटी हुई चीजों का मूल्य मिलाने से बहुत सस्ता भी सदा महंगा पड़ेगा।
अब घड़ियों को लीजिये। मेरे मकान में “सेंटथोमस” की घड़ी 50 वर्ष पहले की आज तक बराबर चल रही है। दो चार वर्षों में ओइलिंग भले ही करा लो, पर न तो कभी उसका पुर्जा कब्जा टूटा, न कभी खराब और बन्द हुई। पर आज की घड़ियाँ तो रोज बीमार। कभी फंनर टूट गया, कभी और कुछ खराबी हो गई। उनकी नित्य की मरम्मत बड़ी भारी पड़ती है। खैर, दाम तो सभी चीजों के बढ़ गए हैं कोई बात नहीं। पर चीज की क्वालिटी इतनी घट गई यही विचारणीय समस्या है। पहले जापान की सस्ती मानी जाने वाली दीवाल घड़ी जो पाँच 2 रुपये में खरीदी गई थी 20 वर्षों से काम दे रही है। पर अभी मैंने 70-80 रुपए की घड़ी खरीदी वह भी रोज बीमार। यही हाल हाथ घड़ियों का है। दाम तो दस-बीस गुने लगते ही हैं, पर काम दस-बीस गुना कम भी नहीं देतीं। इस तरह की स्थिति सभी चीजों की है। इधर मूल्य बढ़े पर चीजों के स्तर घटते ही घटते जा रहे हैं। लोग कहते हैं आविष्कार बढ़े हैं, उत्पादन बढ़े हैं हम आगे बढ़े हैं। पर मैं मानता हूँ रुपये का मूल्य घटा है और चीजों के दाम बढ़े हैं। अनीति बढ़ी है, नीति घटी हैं। धोखाधड़ी बढ़ी है, सजावट घटी है। दाम बढ़े है पर टिकाऊपन भी घटा है। मोल बढ़ा है पर स्तर ऊँचा नहीं हुआ या नहीं बढ़ा। हमारा दुहरा नुकसान हो रहा है। एक तरफ रुपये अधिक लगते हैं, दूसरी तरफ चीज़ घटिया और बिना टिकाऊ हाथ आती है। यह स्थिति शोभनीय नहीं कही जा सकती।
खिलौने आदि को भी लीजिये। पहले लकड़ी या लोहे के बनते थे तो टिकाऊपन था, पर आज सारी चीजें प्लास्टिक की बनने लगी हैं और उनका उत्पादन बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। बाल संवारने के कंघे 4-6 पैसे में मिलने लगे हैं जरूर, पर टिकते कितने दिन हैं ? यह भी देखिए। आज किया और दस-पन्द्रह दिन में टूट कर निकम्मा हो गया। बच्चों के खिलौने और सजावट के सामान, और घर विखरी की चीजें प्याली, डब्बी आदि हर प्रकार की चीजें प्लास्टिक की खूब बनने लग गई हैं। वे दिखने में सुन्दर, पैसे में सस्ती पर जरा सी ठेस लगी कि खत्म। नित्य नई चीजें व उनके डिजाइन निकलते रहते हैं। लोग उनसे आकर्षित होकर खरीदते रहते हैं। बिक्री बढ़ती है तो उत्पादन भी जोर-शोर से होता है। पर चीजें आज खरीदीं और चन्द दिनों में ही टूट-फूट कर नष्ट हो गई। इससे देश की कितनी बरबादी होती है इसका गंभीरता से विचार कीजिये। ऐसे उत्पादनों को बढ़ाइये मत, रोकिये जो कि देश की तबाही कर रहे हैं।
अब दवाओं को देखिए। इंजेक्शन जब चालू हुए थे, तो इतने अच्छे कामयाब थे कि एक इंजेक्शन लेते ही रोग तुरन्त काबू में आ जाता था पर आज इंजेक्शन पर इंजेक्शन लेते जाइये, थोड़ा ठीक मालूम हुआ पर फिर वही स्थिति। डाक्टरों के पास इंजेक्शन ही एक इलाज रह गया है और इससे आज बड़ी तबाही मच रही है। मध्यम स्थिति के लोग तो इससे बरबाद हो रहे हैं।
भारत में विदेशों के अनुकरण में उत्पादन बढ़ाने का खूब प्रयत्न हो रहा है और इससे देश की बहुत बड़ी उन्नति मानी जाती है पर अभी विदेशों के ही अनुपात से देखिए, हमारी उत्पादन की वस्तुओं का स्तर कितना नीचे है। बाहर की चीजों को लोग अधिकतम दाम देकर खरीदते हैं पर भारत की चीजों को सस्ते में भी खरीदना नहीं चाहते। इसका कारण स्पष्ट है कि वे उतनी कार्यकारी नहीं। हमारे यहाँ के उत्पादक प्रायः अनीति का आश्रय लेते हैं। दिखाते कुछ हैं देते कुछ हैं। बाहर कुछ है भीतर कुछ है, नकल अधिक है असल नहीं। तब कहिये उनका विश्वास हो भी कैसे? धोखा खाते हैं तो रहा-सहा विश्वास भी उठ जाता है। आज एक चीज़ निकली वह चालू नहीं हुई। जमी नहीं, इससे पहले स्टेंडर्ड गिरा दिया। एक ने नहीं किया तो दूसरों ने नकल करके, थोड़ा सस्ता करके उसे नुकसान पहुँचाया। ऐसी अनैतिक स्थिति जो बढ़ती जा रही है देश के लिए बहुत घातक है। भारत के प्राचीन गौरव के तो सर्वथा प्रतिकूल ही है। यह आध्यात्मिक और व्यवहारिक दोनों तरह का घोर पतन है, सोचें और सुधारें।
गायत्री परिवार के सदस्यों से व्रतधारी बनने का अनुरोध
(श्रीराम शर्मा आचार्य)
नियमित रूप से संकल्प लेकर गायत्री उपासना करने वाले- गायत्री परिवार के सदस्यों की संख्या अब इतनी हो चुकी है जिस पर प्रसन्नता प्रकट की जा सकती है। यों प्रत्येक हिन्दू धर्मानुयायी का परम् उपास्थ मंत्र गायत्री उसी प्रकार है जिस प्रकार मुसलमानों का कलमा। वह मुसलमान किस काम का जो कलमा नहीं जानता। वह हिन्दू भी अपने धर्म से दूर है जिसे गायत्री उपासना से अनभिज्ञता या अरुचि है। इसलिए शिखा सूत्र की भाँति जब गायत्री माता भी प्रत्येक हिन्दू की उपासनाओं में स्थान प्राप्त कर लेगी तभी यह कहा जा सकेगा कि भारतीय समाज से एक भारी अभाव की पूर्ति हुई।
गायत्री उपासना के अनेक लाभ हैं। इससे भौतिक जीवन की अनेक कठिनाइयों तथा कमियों की पूर्ति में सहायता मिलती है। आत्मबल का विकास होकर अनेक दुर्गुणों का शमन और अनेक सद्गुणों का विकास होता है बुद्धि में सात्विकता एवं दूरदर्शिता की प्रतिष्ठापना होती है। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ा लाभ भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का है। जो कुछ हिन्दू धर्म में है वह सब गायत्री मंत्र में मौजूद है। यह 24 अक्षरों का हमारा सबसे छोटा-किन्तु सबसे उत्कृष्ट धर्म शास्त्र है। इन 24 अक्षरों में सन्निहित शिक्षाएं मानव जीवन की समस्त समस्याओं को पूरी तरह हल करने में और इस भूतल को स्वर्गीय सुख शान्ति में परिपूर्ण कर देने में समर्थ हो सकती हैं।
अ.भा. गायत्री परिवार की स्थापना से इस दिशा में आशाजनक प्रगति हो रही है। लक्ष की पूर्ति तो तब होगी जब प्रत्येक भारतीय के हृदय में गायत्री माता तथा यश पिता के लिए समुचित सम्मान उत्पन्न हो जायगा। पर संतोष उस समय किया जा सकता है जब कुछ नर-रत्न उद्देश्य की पूर्ति के लिये कुछ त्याग और श्रम करने को कटिबद्ध हो जाय। लक्ष पवित्र एवं सच्चा हो और उसे पूर्ण करने के लिये ईमानदार लगन के, एवं योग्यता सम्पन्न मनुष्य खड़े हो जाएं तो फिर और कोई कठिनाई सफलता के मार्ग में नहीं रह जाती। बड़ी से बड़ी विघ्न बाधाओं को लक्ष की श्रेष्ठता एवं कार्य कर्ताओं की लगन के आधार पर पार किया जा सकता है।
कम से कम एक माला जप करने- आदि पाँच प्रतिज्ञाओं को मान्यता देने वाले, गायत्री परिवार सदस्यों की- संकल्प लेकर नियमित उपासना करने वालों की संख्या अब संतोषजनक हो चली है और लगता है कि यह प्रगति आगे भी चलती रहेगी अब इन दिनों अपने परिवार द्वारा प्रतिदिन 24 लक्ष सामूहिक अनुष्ठान की पूर्ति होती है। जिस दिन नित्य 24 करोड़ जप सामूहिक अनुष्ठान के अंतर्गत होने लगेगा, उसी दिन से भारत की आध्यात्मिक अन्तरात्मा जाग पड़ेगी और ऋषियों के प्राचीन युग का प्रमाण इस भूमि पर प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगेगा। गायत्री संजीवनी विद्या है। उससे मृत जी सकते हैं, निष्प्राण प्राणवान हो सकते हैं। भारतीय भूमि और भारतीय संस्कृति में नव चेतना का प्रादुर्भाव होना भी गायत्री महामंत्र की प्रचण्ड शक्ति द्वारा पूर्णतया संभव है।
कार्य जितना महत्त्वपूर्ण है उतना ही कठिन है। इन दिनों तमोगुण के सूक्ष्म वातावरण की इतनी अभिवृद्धि हो गई है कि धर्म मार्ग में चलने वाले को पग-पग पर मूर्च्छा आती है। थोड़ा उत्साह उत्पन्न होता है पर वह दो कदम चलकर ही ठण्डा पड़ जाता है। विचारवान लोग उपासना की उपयोगिता और आवश्यकताओं को मानते हैं अपने कल्याण के लिये उसे अनिवार्य भी समझते हैं इतने पर भी भीतर से उसकी क्रिया को करने के लिए तीव्र उत्साह नहीं जगता। जो थोड़ी गर्मी आती है सो भी आलस्य और उत्साह के तमसाच्छन्न वातावरण में ठण्डी पड़ जाती है। इस जमाने में तब तक कोई धर्म-चेतना जीवित नहीं रह सकती जब तक उसे सजीव रखने के लिए कुछ विशेष प्रयत्न न किये जावें।
गत मास की अखण्ड-ज्योति में विस्तारपूर्वक बताया जा चुका है कि इस युग में धर्म पंगु है। यदि उसे कंधे का सहारा न दिया जायगा तो उसका चलते रहना तो दूर खड़े रहना भी कठिन हो जायेगा। यह बात गायत्री आन्दोलन के लिए भी पूरी लागू होती है। इस वर्ष सन् 57 में - ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की दैनिक 24 लक्ष जप आदि का पंच सूत्री संकल्प चला है। उत्साहपूर्वक अनेक स्थानों पर सदस्य बने हैं और शाखाएं कायम हुई हैं, पर सत्संगों में जिस उत्साह से लोग आरम्भिक दिनों में आते हैं उससे कुछ ही दिनों बाद शिथिलता आने लगती है। उपस्थिति घटती जाती है। संकल्प लेकर उपासना करने वालों में से केवल एक माला के जप को भी लोग आलस्यवश छोड़ बैठते है। यों कहने को तो सत्संग में न आने, उपासना न करने के लिए कोई न कोई कारण गिनाया जा सकता है पर वस्तुतः एक मात्र कारण अश्रद्धा आलस्य एवं अनुत्साह ही होता है। यह एक व्यापक कठिनाई है। इसका दोष किसी व्यक्ति विशेष को देना व्यर्थ है। इस अवसाद का कारण तो अन्तरिक्ष में व्याप्त हुआ-तमसाच्छन्न अदृश्य वातावरण ही है। इस अन्धकार को चीरने योग्य प्रकाश की व्यवस्था न होगी तो चलने वाला अनुभवहीन नया पथिक देर तक चलता न रह सकेगा। अन्धकार की सघनता उसके मस्तिष्क को, पैरों को, गतिहीन बनाकर ही छोड़ेगी। उसकी यात्रा रुके बिना न रहेगी।
गायत्री संस्थाएं अभी स्थापित हो रही हैं। आरंभिक दिनों में उत्साहपूर्वक चल रही हैं, पर अदृश्य आकाश में जो तमसाच्छन्न वातावरण संव्याप्त है वह देर तक इस गतिविधि को चलने न देगा। ब्रह्मसूत्र अनुष्ठान पूरा होते न होते इनमें से अधिकाँश का उत्साह ठण्डा पड़ेगा और एक आशाजनक शुभारम्भ का दुःखद अंत हो जायगा। इस स्थिति से बचने का यदि कोई उपाय है तो एक ही है कि इन संगठनों के पीछे कुछ प्रेरणा देते रहने वाली- पंगु धर्म को कंधा देते रहने वाली- कुछ आत्मा से अवश्य उठें। इन प्रेरकों का एक ही प्रधान कार्य होगा कि वे ‘धर्म फेरी’ करते रहें। अपनी पोजीशन, बड़प्पन, अहंकार और संकोच को ताक पर उठा कर रख दें और घर-घर जाकर लोगों को धर्म कार्यों में सम्मिलित होने के लिये प्रेरणा करें। साधारण लोगों को एक ‘अशक्त रोगी’ मान कर उन्हें स्ट्रेचर पर लाद कर अस्पताल पहुँचाने की लगन रखने वाले धर्म प्रेरक ही इस युग में अपने धर्म संगठनों को जीवित रख सकेंगे। जहाँ इस वस्तु की कमी होगी वहाँ अन्य सब साधन होते हुए भी संगठन मृतप्राय हो जायगा। इसलिये जहाँ ऐसी इच्छा हो कि यह धर्म संगठन जीवित रखा जाय वहाँ यह भी प्रबन्ध किया जाय कि इसे चलाने के लिये घर-घर जाकर धर्म प्रेरणा देने-लोगों को आग्रहपूर्वक एकत्रित करने या किसी कार्यक्रम में लगाने के लिये धर्म फेरी करने को कौन-कौन तैयार होगा। जहाँ कहीं कुछ लोग ऐसे होंगे और जब तक उनमें उत्साह शेष रहेगा तब तक निश्चित रूप से- छोटे या बड़े रूप में - तीव्र या मंद गति से वह धर्म संगठन भी चलता रहेगा।
इस संगठन तत्व को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने समझा है। वे लोग प्रातःकाल ही घर-घर जाकर लड़कों को अपनी शाखा में लिवा कर लाते हैं और अपना कार्यक्रम चलाते हैं जो लोग आना बंद कर देते हैं उनके यहाँ बार-बार जाकर असाधारण प्रेम से समझाते हैं और किसी प्रकार उसे फिर आने के लिए तैयार कर लेते हैं। नये सदस्य बढ़ाने के लिए भी वे घर-घर जाने की प्रक्रिया अपनाते हैं। यदि इस धर्म फेरी के कार्यक्रम को उनकी गतिविधि में से हटा दिया गया होता तो निश्चय ही वह संगठन भी अनेकों अन्य संगठनों की भाँति कब का मृतप्राय हो गया होता। संगठन को सजीव रखने की यह अत्यन्त आवश्यक पद्धति हम सीख सकें, उस पर चल सकें तो ही गायत्री परिवारों और उनकी गतिविधियों को जीवित रखने की कुँजी प्राप्त कर सकें। इस प्रक्रिया के अभाव में इस संगठन का भी दुखद अन्त वैसे ही हो जायगा जैसे अब तक बने अनेकों उपयोगी संगठनों का मरण हो चुका है।
गायत्री परिवार के लोग लगभग 15 हजार सदस्य बन चुके और सात सौ से अधिक शाखाएं बन चुकीं। 24 हजार सदस्य बनाने एवं 1 हजार शाखाएं स्थापित करने की प्रथम वर्षीय योजना आसानी से पूर्ण हो जायेगी। आगे का कार्य बढ़ाने से पूर्व अब हमें एक ही काम करना है कि इन संगठनों को जीवित रखने की व्यवस्था कर ली जाय। अपने घर बैठ कर अपना निज का जप करने वाले साधारण सदस्यों का स्वागत है, उनका कदम सराहनीय है। पर उनको मार्गदर्शन करने एवं प्रेरणा देने के लिए ऐसे इंजनों की आवश्यकता है जो इन डिब्बों के पहियों को अपनी प्रयत्नशीलता एवं शक्ति के द्वारा चलते हुए बनाये रहें। इस कार्य के लिए लोगों के घरों पर जाने और उन्हें प्रेरणा देने की धर्म फेरी के लिए उन्हें कुछ समय नियमित रूप से देना पड़ेगा।
सभी मनुष्यों के पास कुछ न कुछ अवकाश अवश्य रहता है। न रहता हो तो भी अपने प्रिय विषय के लिए कोई न कोई समय निकाला जा सकता है। फुरसत उस काम के लिए नहीं मिलती जो अरुचिकर एवं उपेक्षणीय मालूम देता है। जो गायत्री उपासक-गायत्री माता की महत्ता और प्रसार की आवश्यकता को सच्चे मन से स्वीकार करेगा उसे उस कार्य के लिए समय न मिले यह हो नहीं सकता। अनेकों अत्यधिक कार्यव्यस्त गायत्री परिवार के उत्साही कार्यकर्ताओं ने गायत्री प्रचार के लिए इतना अधिक कार्य कर डाला है कि आश्चर्य होता है। रामगंज मंडी के मास्टर शम्भू सिंह, बरेली के श्री चिममलाल सूरी, बिजनौर की तपस्विनी विद्यावती, नवाबगंज के पं0 रामाभिलाष त्रिपाठी, बारा के पं0 श्रीकृष्ण शर्मा, आरंभ के पं0 विद्य प्रसाद मिश्र आदि बीसियों सज्जन ऐसे हैं जिन्होंने अपने बहुमूल्य समय में धर्म फेरी के लिए समय दिया और अपने क्षेत्रों में कई-कई सौ-कई-कई हजार नैष्ठिक उपासक बनाये तथा छोटे-बड़े अनेक सार्वजनिक यज्ञानुष्ठानों का आयोजन किया। इस सफलता में उनकी योग्यता एवं परिस्थिति नहीं- एक मात्र लगन की ही विशेषता है। जिस किसी में भी थोड़ी लगन हो वह आश्चर्यजनक कार्य करके दिखा सकता है। लगन की महत्ता असाधारण है इस महाशक्ति के द्वारा तुच्छ व्यक्ति भी महान कार्यों का सम्पादन कर सकता है।
अब तक गायत्री परिवार संगठन में (1) ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत अपनी उपासना करने वाले सदस्यगण (2) पत्र व्यवहार एवं व्यवस्था करने वाला एक मंत्री, यह दो ही विभाग थे। अब एक तीसरी श्रेणी ‘व्रतधारी सक्रिय कार्यकर्ताओं’ की और बनाई जा रही है। प्रत्येक शाखा संगठन की कार्यकर्त्ती सेना एवं प्राणवाहिनी धमनी, एवं पथ प्रदर्शक प्रकाश ज्योति की भाँति यह तीसरी श्रेणी ही रहेगी। अपनी निज की उपासना के अतिरिक्त इन व्रतधारी कार्यकर्ताओं के प्रमुख कार्य यह होंगे। (1) गायत्री संस्था की विचारधारा और कार्यशैली पर अधिकाधिक गम्भीर विचार करना और उसकी उपयोगिता पर अपनी आस्था दिन-दिन बढ़ाये जाना। ताकि उस निष्ठ के आधार पर कुछ अधिक कार्य कर सकने की अन्तः प्रेरणा अपने भीतर दिन-दिन तीव्र गति से प्रस्फुटित होती रहे। (2) अपने अवकाश के समय में से ऐसा समय धर्मफेरी के लिए निकालना जो लोगों को भी सुविधाजनक हो। उस समय का लोगों के घरों पर जाना और संगठन, सामूहिक कार्य शैली तथा सच्चरित्रता संच्चत्रित एवं साँस्कृतिक विचार धारा की महत्ता समझाना (3) सप्ताह में कम से कम अपने एक दिन के भोजन के बराबर पैसों का सद्ज्ञान प्रसार के लिए दान करना। इन तीन प्रतिज्ञाओं का पालन करने वाले गायत्री उपासक व्रतधारी कह लावेंगे। उनके प्रतिज्ञा पत्र प्रत्येक शाखा में भेजे जा रहें हैं और आशा की जा रही है कि संस्था संचालक सज्जन अपने सदस्यों में कुछ व्रतधारी तैयार करेंगे। व्रतधारी बनने के लिए जोर पूरा पूरा देना चाहिए पर संकल्प पत्र तभी भराना चाहिए जब वह स्वेच्छा एवं सच्चे मन से कर्तव्य पालन के लिए तैयार हो जाय। कह सुनकर फार्म भरवा लेने की कागजी कार्यवाही इस संबंध में कदापि न करनी चाहिए।
(1) साधारणतया लोग किसी भौतिक लोभ या लाभ की प्रेरणा से कुछ कार्य करते हैं पर पंगु धर्म को कंधा देकर व्रतधारी का कर्तव्य पालन करने में कोई आर्थिक या भौतिक लाभ नहीं है। ऐसी दशा में मनुष्य की साँसारिकता प्रधान बुद्धि उसे इन कार्यों में दूर रहने या उतना ही समय देने जितने में मान बड़ाई मिले की सलाह देती रहती है। फलस्वरूप कार्यकर्ता का मन शिथिल हो जाता है। इस स्थिति से बचने, अपनी आन्तरिक निष्ठ को सुदृढ़ रखने के लिए निरन्तर यह विचार करना चाहिए कि हाथ में लिया हुआ कार्य कितना महत्वपूर्ण है, कितना महान है, उससे हमारा अपना कितना बड़ी आत्म कल्याण है तथा संसार की कितनी बड़ी सेवा है। प्रायः नित्य ही व्रतधारी को इस प्रकार के विचारों का चिन्तन करना, निस्वार्थ भाव से धर्म सेवा करने वाले लोगों के जीवन वृत्तांत पढ़ना, ऐसी ही चर्चायें, करना तथा सुनना आवश्यक है। यदि अपने को उत्साहित करते रहने वाली प्रेरणा प्राप्त न करते रहा जायगा तो व्रतधारी का उत्साह भी ठण्डा पड़ जायगा। इसलिए व्रतधारी का प्रथम कर्तव्य आत्म प्रेरणा प्राप्त करते रहना है।
(2) निद्रा, भोजन, स्नान विश्राम आदि शारीरिक कृत्य और आजीविका उपार्जन के निर्धारित समय के अतिरिक्त का या अन्य कोई न कोई समय प्रत्येक व्यक्ति को मिल सकता है जिससे वह अपने निकटवर्ती लोगों को सन्मार्ग की प्रेरणा देने के लिए लगा सके। नौकरी पेशा वालों को तथा व्यापारियों को सप्ताह में एक दिन छुट्टी मिलती है। त्यौहारों पर भी आम छुट्टी रहती है। इसमें से कुछ न कुछ समय धर्म प्रचार के लिए-धर्म फेरी के लिए देना चाहिये। गर्मी के दिनों में खेती का तथा शिक्षा का कार्य बन्द रहता है, वह तथा ऐसे ही अन्य समयों को सार्वजनिक कार्य के लिए लगाना चाहिए। अपनी ही अभिरुचि के कुछ साथी और भी मिल जाते हैं तो एक डेपूटेशन के रूप में धर्म प्रचार के लिए भ्रमण करना एक बड़ा मनोरंजक कार्य बन जाता है। पुराने समय में पैदल तीर्थ यात्रा का उद्देश्य यही था कि रास्ते में पड़ने वाले गाँवों में धर्म प्रचार करते हुए जावें और नियत तीर्थ में नियत पर्व पर, एकत्रित होने वाले अपने समान विचारधारा के अन्य तीर्थ यात्रियों-धर्म सेवियों से संपर्क बनावें एवं एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करें। अब तीर्थों का, पर्वों का, यात्रियों का दृष्टिकोण बदल गया है और वह सब एक आडम्बर मात्र रह गया है। धर्म फेरी चाहे अपने गाँव तक ही सीमित हो, चाहे लम्बे दौर के रूप में हो तीर्थ यात्रा का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण करती है। पंगुधर्म को कन्धा देकर आगे बढ़ाने के लिए श्रवण कुमार जैसे व्रतधारी चाहिएं जो गायत्री माता और यज्ञ पिता की काँवर अपने कंधे पर रखकर उन्हें सम्पूर्ण भारत की यात्रा करा सकें।
(3) भावना और श्रम के दो उपरोक्त कार्यों के अतिरिक्त धर्म सेवा का तीसरा तत्व दान है। हर धार्मिक व्यक्ति को अपनी कमाई में से कुछ न कुछ दान धर्म सेवा के लिए अवश्य करना चाहिए। आज लोग दान तो करते हैं पर उसका अधिकाँश भाग कुपात्रों और मुफ्तखोरों के पेट में जाता है। ऐसे दान से दाता की, दान लेने वाले की तथा समाज की हानि ही होती है। दान, मनुष्य की धर्म प्रवृत्ति को विकसित करने का सब से आवश्यक अंग है। इसलिए हिन्दू धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य दान के साथ ही सम्पन्न होता है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता मनुष्यों में सद्विचार उत्पन्न करने की है, सद्विचारों की प्रेरणा से ही मनुष्य सत्कर्म करता है। इसलिए ज्ञान दान को, ब्रह्मदान को, सबसे बड़ा दान माना गया है। शास्त्रों में लिखा है कि अन्न दान की अपेक्षा ज्ञान दान का पुण्य सौगुना अधिक है।
आज जनता की मनोवृत्ति को नैतिक एवं साँस्कृतिक स्तर पर निर्माण करने की बड़ी भारी आवश्यकता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए गायत्री तपोभूमि अत्यन्त ही सस्ता-वितरण करने योग्य साहित्य छापना चाहती है। जिसमें मानव जीवन के प्रत्येक पहलू पर प्रेरणाप्रद विचार दिये जाएँ। व्रतधारी कार्यकर्ता प्रति सप्ताह एक दिन का भोजन इस कार्य के लिए दान करें। जिनकी आर्थिक स्थिति अनुकूल है वे साप्ताहिक उपवास में अल्पाहार आदि करते हुए भी कम से कम दिन के भोजन के पैसे और अधिक से अधिक जितनी अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य हो, उतना निकालें। जिनकी सामर्थ्य नहीं है वे सप्ताह में एक दिन दोनों समय का या कम से कम एक समय के भोजन का पैसा बचाकर, उससे सस्ता साँस्कृतिक प्रचार साहित्य खरीदते रहें और उसे अपने क्षेत्र में दूर-दूर तक बराबर पहुँचाते रहने का प्रयत्न किया करें। यह उपवास से बचाया हुआ पैसा इस प्रकार अगणित व्यक्तियों के अन्तःकरणों में ज्ञान सुधा की अमृतमयी बूँदें टपकाने में अत्यन्त ही उपयोगी सिद्ध हो सकता है। एक दीपक से दूसरा दीपक जलाने की भाँति एक व्रतधारी अपने सद्भाव श्रम एवं दान के द्वारा अनेकों आत्माओं को प्रकाशवान बना सकता है।
इस ब्रह्मदान, ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत व्यापक संस्कृति विश्व विद्यालय की योजना भी जुड़ी हुई है गत नवम्बर माह की अखण्ड-ज्योति में प्रति सप्ताह एक पुस्तिका सदस्यों के लिए निकालने की योजना छपी थी, पर उसके छपाने का कागज छपाई खर्च एवं पोस्टेज की कोई व्यवस्था न होने के कारण उसे चालू करना संभव न हो सका। गायत्री परिवार का संगठन करने और शाखाएं बनाने में कागज, छपाई, पोस्टेज आदि में बहुत धन व्यय हुआ है पर संगठन से आय एक पैसे की भी न होने से वह खर्च, ऋण रूप चढ़ा हुआ है। खर्च निरन्तर हो, आय कुछ भी न हो तो कोई योजना चल नहीं सकती। इसलिए व्रतधारी सदस्यों के साप्ताहिक उपवास द्वारा बचाये हुए अन्न पर साँस्कृतिक ज्ञान प्रसार का आधार रखना निश्चय किया गया है।
प्रति सप्ताह एक छोटी सी अत्यन्त सुन्दर और सस्ती पुस्तिका छापी जाय, जिसकी लागत डाक खर्च समेत लगभग तीन आना पड़े। व्रतधारी के पास यह पुस्तक हर हफ्ते पहुँचे। प्रतिदिन एक व्यक्ति के पास जाकर वह उस पुस्तिका को पढ़ने दे और दूसरे दिन उससे वापिस लेकर दूसरे को दें। इस प्रकार छः दिन में दो व्यक्तियों के द्वारा वह पुस्तक पढ़ ली जाय। सातवें दिन साप्ताहिक सत्संग में उस पर विचार विनिमय किया जाय। पुस्तक व्रतधारी के पुस्तकालय में जमा कर दी जाय। अगले सप्ताह फिर एक नई पुस्तक का क्रम उसी हिसाब से चल पड़े। इस प्रकार प्रत्येक व्रतधारी अपने संरक्षण में कम से कम छः व्यक्ति ले और तपोभूमि द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक प्रचार पुस्तिका द्वारा उनका शिक्षण करता रहे। इस प्रकार वह अपने छः छात्रों का एक अध्यापक होगा व्रतधारी यह प्रयत्न करेगा कि इन छः छात्रों में से भी व्रतधारी निकलें और वे भी इसी क्रम से छह-छह अपने छात्र बढ़ावें। इस प्रकार यह शृंखला फैलती हुई लाखों करोड़ों व्यक्तियों के मनः क्षेत्रों का निर्माण करती हुई उन्हें सदाचारी, सज्जन, सेवाभावी बना सकती है। साँस्कृतिक विश्व विद्यालय के व्रतधारी अध्यापकों की बढ़ती हुई संख्या घर-घर में अपने छात्र बनाकर लोक शिक्षा का भारी काम कर सकता है। इसका आर्थिक आधार व उपवास से बचाया हुआ अन्न ही होगा। यह अन्न-धन सत्साहित्य खरीदकर अपनी समीपवर्ती जनता को पुस्तकें पढ़ाने तब पर्चे बैस्लेट जैसी छोटी-छोटी ज्ञानवर्धक वस्तुएं बिना मूल्य वितरण करने में ही होगा। यह थोड़े से पैसे वह काम कर सकते हैं जो बड़े-बड़े धनिकों द्वारा आडंबरपूर्ण कार्यों में खर्च किये गये लाखों करोड़ों रुपये भी नहीं कर सकते।
गायत्री शाखा के संगठन का प्रारम्भिक कार्य गत छः महीने में बहुत कुछ हो चुका। अब आगे कदम बढ़ाने में पूर्व अब तक के किये हुए कार्य को संभाल लेना चाहिए। अब प्रत्येक शाखा संचालन से तथा प्रत्येक सदस्य से अनुरोध किया जा रहा है कि वह अपने संगठन में अधिक से अधिक व्रतधारी उत्पन्न करे। जिस प्रकार अच्छी घड़ियों में ‘जुएलों’ की संख्या उसकी उत्कृष्टता का चिन्ह माना जाता है उसी प्रकार प्रत्येक शाखा की स्थिरता तथा उसके भविष्य की उज्ज्वलता व्रतधारियों की संख्या पर ही निर्भर है। अब अगला कदम उठाने का समय आ गया। प्रत्येक गायत्री उपासक को व्रतधारी सक्रिय कार्यकर्ता एवं संस्कृति विश्वविद्यालय का उपाध्याय बनाने के लिये सादर आमंत्रित किया जा रहा है।
(श्री प्रेमशंकर जैतली, आगरा)
बात आज से लगभग पाँच वर्ष की है। जुलाई का मास था। हमारे कुटुम्ब के डॉक्टर टी0 सिन्हा महोदय और मेरे भाई साहब प्रयाग से आये, आगरे में मेरे यहाँ रुके। वह मथुरा जा रहे थे। बातों-बातों में मथुरा जाने का उनका मन्तव्य पता चला कि कोई महात्मा हैं, उनसे मिलने जा रहे हैं। उन्होंने मुझसे कहा प्रेम जी, आप भी चलें। “मैं चलूँ” मैंने सोचा, हूँ यह लोग भी किस मति के आदमी हैं- अच्छा चलो मथुरा की सैर ही कर लेंगे। कुछ मेरी धर्मपरायण माता जी ने भी अनुरोध किया। मन से या बेमन से चल ही दिये।
हम लोग मथुरा पहुँचे और साँय लगभग छः बजे अखण्ड-ज्योति के कार्यालय में पहुँचे। आचार्य जी से भेंट हुई। डॉक्टर साहब ने आचार्य जी की प्रशंसा की, खैर, मेरे बोलने की बारी आई। कुतर्कवादी बोलता भी क्या मैंने कहा ‘आप तो गायत्री महामंत्र की बड़ी प्रशंसा कर हैं। मुझे तो पर उल्टा अनुभव है’ आदि आदि अनेकों प्रकार से इस महामंत्र की बुराई ही करता गया।
उत्तर में आचार्य जी चुप थे। फिर कुछ देर रुक कर बोले इस समय संध्या हो गई है। इस समय इस विषय पर कुछ न कहूँगा। आप कल प्रातः 9 बजे आने का कष्ट करें।
हम लोग लौट आये।
अगले दिन स्नान आदि से निपट 9 बजे ठीक हम “अखण्ड ज्योति” कार्यालय पर आये। आचार्य जी हमें तैयार ही मिले। वहाँ से हमें वह अपने पूजा के कमरे में ले गये। एक छोटा सा कमरा एक ओर गायत्री जी का बड़ा चित्र रखा, अखण्ड दीपक उसके सामने जल रहा है। दूसरी ओर एक गद्दा उस पर साफ चादर थी। सब मिलकर एक सौम्य और सात्विक वातावरण उत्पन्न कर रहे थे।
सबसे पहले आचार्य जी ने मुझसे कहना प्रारम्भ किया बोले ‘आपका यह कहना कि गायत्री जप से आपको नुकसान हुआ सर्वथा गलत है।’ और वह कुछ आगे कहते पर मैंने विषय बदलते हुए कहा कि गायत्री मंत्र से क्या भौतिक पदार्थ भी मिल सकते हैं।
उत्तर था ‘हाँ’
‘क्या पैसा भी मिल सकता है जाप से’
“पैसा तो गायत्री माता के लिये एक अत्यन्त सामान्य सी बात है” आचार्य जी ने उत्तर दिया। ‘अच्छा जी, तो फिर ठीक है आप कृपा कर ऐसा ही उपाय बता दें जिससे धन की प्राप्ति हो’ मैंने कहा?
आचार्य जी ने एक साधारण सा विधान बताते हुए कहा- दो माला नित्य आप एक वर्ष तक जपें। दो माला में कितना समय लगेगा?
मैंने उत्तर दिया लगभग आधा घण्टा।
आपको क्या वेतन मिलता है।
मैंने अपना वेतन बता दिया।
आचार्य जी बोले “अच्छा तो आप एक वर्ष तक आधा घण्टा रोज जप करें। यदि आपको कोई लाभ न हो तो एक वर्ष बाद आधे घण्टे रोज के हिसाब से जो पारिश्रमिक बने, मुझसे ले जाइयेगा।”
मैं यों तो समझिये एक पढ़ा लिखा सभ्य आदमी ठहरा। यह अन्तिम वाक्य कुछ चुभ गये। साधना की सरलता और आडम्बरहीनता भी घर कर गई। निश्चय कर लिया चलो करेंगे ही। घर आकर आचार्य जी की विधि से और उन्हीं द्वारा मुफ्त दी हुई चन्दन की माला पर जाप करना प्रारम्भ कर दिया। दो-एक महीने बाद से ही स्पष्ट प्रभाव दीख पड़ने लगा। मैं उसी क्रम से जाप भी आगे बढ़ाने लगा। मालाएँ दो से चार और चार से छः आदि क्रम से आगे बढ़ने लगीं। वर्षों की बुराइयां निकलने लगीं। असत्य में पर्याप्त कमी होने लगी और धीरे-धीरे आज मेरे जीवन में एक नवीनता है। कठिन से कठिन परिस्थिति भी सामने, झुकती ही जाती है। आर्थिक परेशानी का तो प्रायः नाम भी नहीं है। मैं कह सकता हूँ अपने ढंग से सुखी हूँ। अस्तु।
यहाँ तक तो आपने मेरी कहानी सुनने का कष्ट किया आइये मैं आपका कुछ ऐसे लोगों से परिचय करा दूँ जिन्होंने महामन्त्र की साधना बहुत कुछ मेरी देखा देखी या मेरे अनुरोध से प्रारंभ की ऐसे व्यक्ति भी बहुधा मेरी ही भाँति पहले भौतिक कष्टों को दूर करने के लालच से ही इस ओर बढ़े। प्रायः उनकी कामनापूर्ति हो ही गई और स्वतः उनकी साधना धीरे-धीरे निष्काम रूपिणी होती जा रही है। प्रारंभ में आध्यात्मिक यात्रा की ओर अग्रसर होने या बढ़ते रहने का मार्ग- सम्बल कामना ही थी अतः तिथि क्रम का ध्यान न रखते हुए मैं कामना को ही प्रधानता देकर निम्नलिखित उपशीर्षकों में उनसे आपकी भेंट कराऊँगा।
पिछड़े हुए की वापसी एवं मिलन
(1) मेरी धर्मपत्नी जी की एक सहेली श्रीमती रुक्मणी देवी के पति कुछ रुष्ट होकर कही चले गये थे। ढाई वर्ष से उनका पता न था। मैं कुछ हस्त रेखा सम्बन्धी ज्ञान रखता हूँ अतः जब उनसे भेंट हुई तो उन्होंने उनके लौटने के विषय में पूछा। उन दिनों “गायत्री के चमत्कार” पुस्तक पढ़ रहा था। उसी के एक लेख के आधार पर उनसे कहा, यदि आप 29 दिन तक 11 माला नित्य अमुक विधि से जाप करेंगी तो आपके पति अवश्य लौट आयेंगे। ऐसी आर्त दशा में उन्होंने माता की आराधना विधिपूर्वक शुरू की और 27 वें दिन उनके पति जी उनके घर आकर मिले।
(2) हमारे एक परम मित्र श्री मदन गोपाल बैजल के एक निकट सम्बन्धी का पुत्र घर से भाग गया था। उन्हें भी जाप करने को ऊपर की विधि से कहा गया। जाप मित्र जी की सुपुत्री ने बड़ी श्रद्धा और कष्ट सहते हुए किया। जाप के दो दिन बाद ही लड़के के गन्तव्य स्थान का पता चल गया और 23-24 वें दिन तलाश कर वापस लाया जा सका।
आर्थिक कठिनाईयों से छुटकारा
(3) इसमें यों तो सर्वप्रथम मेरा ही नाम आना चाहिये पर मैं तो अपने विषय में पहिले ही बता चुका हूँ। मेरे भाई पं. दयाशंकर जैतली, (बान गली लखनऊ) पर कुछ कारणों से बड़ी आर्थिक अड़चने आ गई थीं। कुम्भ के मेले में मेरी उनसे इस विषय पर बातचीत हुई। मैंने उन्हें चन्दन की माल पर विधि पूर्व 21 माला नित्य जप करने की प्रार्थना की। उन्होंने जप करना शुरू किया। आर्थिक परेशानियां स्वतः घटने लगीं और एक साथ ही उन्हें एक जगह से कुछ धन की प्राप्ति हुई।
(4) श्री कैलाशनाथ जी माईथान आगरा का भी काम धन्धा सब बन्द था। बड़ी कठिन परिस्थिति में वे बेचारे आये। मेरे पास वह एक नौकरी के लिये सिफारिश के लिये आये थे। मैंने उनसे कहा भाई मेरी बात मान कर जाप शुरू करो तुम्हारा काम चलेगा। उन्होंने एक माला नित्य जाप करना प्रारम्भ कर दिया। वह नौकरी तो नहीं, पर अनायास ही तीन दिन के अन्दर ही उन्हें एक दूसरी नौकरी मिल गई और कार्य व्यवस्था भी ठीक हो गई।
(5) श्री मुकट बिहारी जी शर्मा माईथान आगरा पर भी कोई धनोपार्जन का काम न था। जाप करने से उन्हें भी काम मिल गया।
(6) मित्र श्री मदन गोपाल बैजल माईथान आगरा को भी गायत्री मंत्र से आर्थिक कठिनाई एवं घोर चिन्ताएँ दूर हुईं। उनके यहाँ जब से मैंने देखा था 5-7 व्यक्तियों के परिवार में से सदा कोई बीमार ही रहता था। डाक्टरी बिल में 20-25 रुपए प्रतिमास साधारण बात थी। पर जाप करने से उनको इस 20-25 रुपये के व्यय से भी मुक्ति मिली। तथा आर्थिक समस्याएँ भी हल हो गई।
(7) एक दूसरे मित्र श्री हरीमोहन जी अग्रवाल ने शिक्षा कुछ क्रिश्चियन संस्थाओं में पाई है। वह अपनी देशी पूजा प्रणाली को व्यर्थ का ढकोसला कहते थे। मेरे पास हस्त रेखा दिखाने आये। उनका निकट भविष्य अंधकारमय देखते हुए उन्हें मैंने सतर्क रहने को कहा। पर उन्हें तो विश्वास न था। दो एक महीने बाद ही जब सामने ही भीषण परिस्थितियाँ आ गई तो बोले, अच्छा भाई कोई उपाय है। उन्हें भी गायत्री मंत्र जपने को कहा। परिस्थिति की दारुणता स्वतः कम होती चली गई। आर्थिक कठिनाईयाँ भी एक अलौकिक ढंग से कम होते देख उन्हें जाप की महत्ता एवं देशी पूजा विधि एवं देवताओं में विश्वास हो गया।
(8) मित्रवर, जिनका मैं अभी कुछ ऊपर जिक्र कर चुका हूँ उनके जमाता वकील हैं। उन पर भी आर्थिक कठिनाई आई। रोजगार ठप सा हो गया था। उन्होंने भी जाप करना प्रारंभ किया और विशेष काम हुआ। आर्थिक संकट दूर हुए।
इसी प्रकार अन्य भी माता के कृपापात्र व्यक्ति हैं जिनका उल्लेख हम विस्तार के भय से नहीं कर रहे हैं।
बहिन का सुख पूर्ण विवाह
(9) पं0 दयाशंकर जी शर्मा माईथान आगरा मेरे एक सम्बन्धी हैं। उनकी आर्थिक परिस्थिति अत्यन्त ही सामान्य सी है। इस पर भी उनके एक छोटी बहिन युवा रही जिसकी विवाह करने की उन्हें अत्यन्त चिन्ता थी। पिता जी उनके मस्तिष्क रोग ग्रस्त हैं। विवाह के लिये लड़का तो कुछ लोगों की सहायता से मिल गया पर उस ओर के खर्चे से बेचारों को विशेष परेशानी थी। सूखकर काँटा से हो गये थे। उनसे भी गायत्री माता का पल्ला पकड़ने को कहा और उनका सब कार्य ऐसे ढंग नियम व्यवस्था और सजधज के साथ हुआ कि सामान्य हैसियत वाले न कर पाते। माता वास्तव में माता ही हैं।
कठिन रोगों से छुटकारा
(10) मेरी धर्म पत्नी की एक सहेली को प्रसव में बड़ा भयंकर कष्ट होता था। जब से उन्होंने जाप प्रारम्भ कर दिया है तब से ऐसे कष्ट से उन्हें मुक्ति मिल गई है। ऐसी और भी बहिनें हैं जिन्हें प्रसव पीड़ा में गायत्री अभिमंत्रित जल पिलाने से प्रसव पीड़ा में भारी कमी हुई है।
(11) हमारी एक भतीजी चि0 सौ0 शशिमोहनी का विवाह जौनपुर हुआ है। इधर दो एक साल पहिले उनका स्वास्थ बहुत खराब हो गया। हालत इतनी बिगड़ गई कि उनको हम लोगों को तार देना पड़ा। मेरी भाभी जी गई और वहाँ जाकर उन्होंने सबेरे से लेकर शाम तक जाप करना ही प्रारम्भ कर दिया। डाक्टरी उपचार चल ही रहा था। जवाब देने के बाद भी अपनी अंतिम कोशिश डॉक्टर कर ही रहे थे। पर जाप के प्रभाव से पुनः दशा ठीक होने लगी और तीन चार दिन बाद भाभी जी ने सब कुछ ठीक होता देख पुनः घर की ओर वापिस पदार्पण कर दिया।
(12) एक अन्य संबंधी श्री मुन्नूलाल जैतली प्रयाग निवासी की लड़की श्रीमती प्रेमो जी के एक बच्चे की हालत अत्यन्त खराब हो गई थी। गला फूल गया था। डॉक्टर अपना प्रयत्न कर रहे थे पर सब व्यर्थ। निदान प्रयागवासी पण्डित समुदाय की प्रचलित विचारधारा के प्रतिकूल बच्चे की माता और नाना ने गायत्री माता को पुकारा। रात्रि हो चुकी थी पर जाप और चालीसा का पाठ चलता रहा। सबेरे होते-होते तबियत ठहर गई और साधारण सी चिकित्सा से बिल्कुल ठीक हो गया।
भूत व्याधा से मुक्ति
(13) मेरी एक विधवा भाभी हैं। प्रयाग में दूसरे भाई पं. ताराशंकर जी जैतली के यहाँ आजकल रहती हैं। उनके ऊपर पिछले कुछ वर्षों पूर्व एक प्रेत आत्मा आने लगी। पहले तो हिस्टीरिया समझ उसकी ही विविध चिकित्सा कराई गई पर कोई लाभ न हुआ। बाद में उसके बाद पता चला और अनेक भूतविद्या विशारदों से झड़वाया पर लाभ न हुआ। निदान उन्हें भी गायत्री जप प्रारम्भ करने को कहा गया। जाप के प्रसाद से धीरे धीरे उन्हें इस व्याधा से पूर्ण छुटकारा मिल गया।
(14) एक रिश्ते की चचिया सास को भी इसी प्रकार दौरे आते थे। ऐसे समय उनका बोलना एवं आचरण संदिग्ध होता था। गायत्री जप से उनको भी उपरोक्त व्याधी से छुटकारा मिला।
विविध प्रयोजनों की सिद्धि
(15) हमारे एक अन्य मित्र एक बैंक के उच्च पदाधिकारी हैं, कुछ कारणों से उन्हें विशेष चिन्ताएँ घेरे रहती थीं। जब से उन्होंने जाप प्रारम्भ किया है उन की चिन्ताएं राग दूर हो गए।
(16) एक अन्य मित्र कई बार उच्च पी0सी0 एस॰ एवं आई0ए0एस॰ की परीक्षाओं में बैठ चुके थे। एकबार तो उत्तीर्ण हो गये पर इण्टरव्यू में रह गये। निदान गायत्री माता का आश्रय लेने पर आज वह एक उच्च पदाधिकारी हैं।
(17) एक हमारे रिश्तेदार के निजी सम्बन्धियों ने उनको अत्यन्त परेशान कर रखा था। यहाँ तक कि घर में रहने की भी जगह नहीं दे रखी थी। गायत्री जाप से उनकी कठिनाइयाँ भी हल हो गई।
(18) पूज्य भाई ताराशंकर जी पर भी इन दिनों कुछ काफी घटाएं आई हैं पर गायत्री जाप के प्रभाव से एवं आचार्य जी की कृपा से उनका काम आगे बढ़ रहा है और आशा है पूर्ण विजय होगी।
(19) श्री के0 डी0 शर्मा निवासी विजय नगर, कलौनी, आगरा को भी विविध चिन्ताओं से जाप द्वारा मुक्ति मिली।
(20) श्री काशीनाथ जी भी नित्य जप करते हैं। एकबार रोकड़ खाते में भूल से कागज पर गलत तिथि डालने के कारण उन पर कठिन दोष लग रहा था। माता से प्रार्थना करने पर वह कागज पुनः हाथ आ गया और इस प्रकार कलंक लगने से बचा।
इस स्तम्भ के अंतर्गत अन्य बहुत से महानुभावों के नाम भी आ सकते हैं पर स्थानाभाव के कारण हम उनका उल्लेख नहीं करते।
निष्काम साधना एक उच्च कक्षा है। जो व्यक्ति परिमार्जित दृष्टिकोण के एवं विश्वासी हैं जिन्हें माता के सर्वशक्तिमान होने पर विश्वास ही नहीं वरन् जो जगत की क्षणभंगुरता को भी उसके सही रूप में जानते हैं जो ईश्वर के नाम पर साँसारिक कष्टों को साहस से ही नहीं अपितु निर्लिप्त भाव से सह लेते हैं वह श्रद्धा के पात्र निष्काम साधना से ही दैवी आत्मानुभूति अनुभव कर वास्तविक सुख के अधिकारी हैं। ऐसे लोगों को तो सकाम साधना एक परिहास मात्र लग सकती है। पर मेरी सबसे करबद्ध प्रार्थना है कि जिस कौतूहल से वह अपने छोटे से शिशु को ‘अ’ ‘ब’ सीखते देख उल्लसित होते हैं और उन की छोटी सी जानकारी को भी पीठ थपथपा कर बड़ा बताते हुए आगे बढ़ाते हुए उच्चकोटि की कक्षाओं आदि तक पहुँचा देते हैं, वैसे ही इन छोटे कक्षा वाले सकाम प्रवृत्ति के प्रारम्भिक विद्यार्थियों आध्यात्म विद्या, गायत्री महामंत्र की ओर रुचि उत्पन्न करने में सहायक हों।
(श्री सत्यदेव शर्मा )
अखण्ड-ज्योति में गत अंक से गायत्री परिवार के उन सत्पुरुषों का सचित्र परिचय छापना आरम्भ किया गया है जिन्होंने अपनी आत्मा को पवित्र करने के लिए गायत्री उपासना करने के साथ-साथ लोक हित के लिए समय और शक्ति व्यय करके, प्रयत्न और पुरुषार्थ करने का भी व्रत लिया हुआ है। इस जमाने में अधिकाँश लोग स्वार्थी हैं। हर आदमी अपने मतलब में चौकस है। जिसमें अपना फायदा न हो उसे करने को एक कदम भी नहीं उठाना चाहता। साधु बाबा जी जो विरक्त और त्यागी दिखते हैं वे भी वस्तुतः पक्के स्वार्थी हैं। अपने लिए स्वर्ग और मुक्ति का लाभ कमाने में लगे हैं और अपना जीवन यापन का खर्च मुफ्त में ही जनता से वसूल करते हैं। जनता का अन्न खाने का अधिकार केवल उसे है जो बदले में जनता की सेवा करता है। प्राचीन काल के साधु ब्राह्मण ऐसे ही होते थे, वे दान के अन्न से पेट भरते थे तो बदले में अपना सारा समय लोक शिक्षा में, जन कल्याण में खर्च भी करते थे। आज तो दान पर आजीविका चलाना और बदले में जनता में अनेक नशेबाजी आदि दुष्प्रवृत्तियाँ पैदा करना इनका कार्यक्रम बन रहा है।
मजदूर से लेकर सेठ तक, और चोर से लेकर साधु तक का दृष्टिकोण जिस जमाने में स्वार्थ-लाभ हो, उस जमाने में परमार्थ के लिए- जन सेवा के लिये किये हुए कार्य और उनके करने वाले व्यक्ति निश्चित रूप से एक चमत्कार कहे जायेंगे। वैसे भी परमार्थ-चमत्कारों का पिता रहा है। अष्टसिद्ध नवनिद्ध, श्री, सम्पदा, कीर्ति प्रतिष्ठ, सुख, शान्ति, स्वर्ग मुक्ति आदि लाभों को जिसने पाया है परमार्थ के पुण्यफल के फलस्वरूप ही पाया है। परमार्थ मानवीय शक्ति का मूल उद्गम तथा अनेकों महानताओं का उत्पादक है, इसलिए उसे चमत्कार कहा जाता है। चमत्कार को नमस्कार सदा से ही किया जाता रहा है। अब भी और आगे भी वह परम्परा जारी रहेगी।
गायत्री परिवार के परमार्थ-प्रेमी सत्पुरुषों का इस स्तंभ के अंतर्गत आगे भी सचित्र परिचय छापा जाता रहेगा।
श्री उमाकान्त झा
बानू छपरा (चम्पारन) निवासी श्री0 उमाकान्त झा किसी समय के लब्ध प्रतिष्ठ वकील हैं। पर अब वे घर में रहने वाले सन्त का आदर्श बने हुए हैं। आपकी धर्म पत्नी की भी आपके समान ही उपासना में निष्ठ है। छः घण्टे से कम समय गायत्री उपासना में लगाये बिना इन्हें संतोष नहीं होता। अब झूठे सच्चे मुकदमे वालों की वकालत उन्होंने पूर्णतया छोड़ दी है और गायत्री माता की वकालत आरम्भ कर दी है। जगह-जगह जाकर गायत्री उपासना की महत्ता बताना, दोष दुर्गुणों को छोड़कर सज्जनता एवं सात्विकता अपनाने की शिक्षा देना, इन्हीं दो कार्यों में आपके उपासना से बचे हुए समय का उपयोग होता है। आज चारों आश्रमों का लोप होकर केवल एक गृहस्थाश्रम रह गया है। आज का मनुष्य जब से होश संभालता है और जब तक मरता है तब तक केवल स्वार्थ, संग्रह और भोग विलास में ही अपना मन लगाये रहता है। यह आदर्श भुला दिया गया है कि ढलती आयु में परिवार संचालन को बोझ समझकर लड़कों पर छोड़ शेष आयु आत्म-कल्याण एवं जन सेवा में लगाई जानी चाहिए। श्री उमाकान्त जी वानप्रस्थ आश्रम की जीवित प्रतिमूर्ति हैं। वह अपना नमूना पेश करके उन लोगों को चुनौती देते हैं, जो घर में कुछ भी अपना उपयोग न होने पर भी मोहवश उसी से चिपके रहते हैं, और अपने ज्ञान तथा अनुभव से जनता का कोई हित करने को तैयार नहीं होते। श्री उमाकान्त झा की आयु काफी हो चुकी है पर उनका उत्साह नवयुवकों जैसा है। अश्वमेध के घोड़े की तरह वे बिहारी में घर-घर जाकर गायत्री माता का संदेश पहुँचाने की बात सोच रहे हैं।
श्री बालकृष्ण अग्रवाल
यदि हृदय से किसी कार्य के लिये लगन हो तो मनुष्य अपने दैनिक जीवन की अनेक असुविधाओं से लड़ता हुआ अपने अभीष्ट उद्देश्य के लिये बहुत कुछ कर सकता है। इस प्रत्यक्ष सत्य को झांसी के श्री0 बालकृष्ण अग्रवाल अपना उदाहरण उपस्थिति करते हुए प्रमाणित करते हैं। झाँसी नगर में अब गायत्री उपासना का भारी प्रचार हो चला है। सैकड़ों नहीं हजारों की संख्या में नैष्ठिक गायत्री उपासना बड़ी श्रद्धापूर्वक करते हैं। साप्ताहिक हवन, सत्संग उत्साहपूर्वक होते रहते हैं। कितने ही उत्साही सज्जन उनके सहयोगी हैं, जिनके सहयोग से झाँसी में समय-समय पर बड़े यज्ञानुष्ठान होते रहते हैं। गत वर्ष आषाढ़ में एक बहुत बड़ा यज्ञ हुआ था। अब इसी मास 25 कुण्डों का गायत्री महायज्ञ तथा बुन्देलखण्ड प्रान्तीय गायत्री परिवार सम्मेलन का सफल आयोजन किया है। बालकृष्ण जी श्रद्धा और उत्साह की मूर्ति हैं। ऐसे ही लोगों के पुरुषार्थ, बलबूते पर गायत्री तपोभूमि साँसारिक पुनरुत्थान की बड़ी-बड़ी योजनायें बनाती रहती है।
ब्रह्मचारिणी प्रेमवती
कुछ आत्माएँ इस पृथ्वी पर-साधारण जीवों की तरह आहार निद्रा का सामान्य जीवन व्यतीत करने नहीं वरन् पिछले जन्मों की शेष तपस्या को पूरी करने तथा संचित कर्मों के प्रारब्ध को भोगने मात्र के उद्देश्य से इस पृथ्वी पर आती हैं और उस कार्य को पूरा करने के जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेती हैं। ऐसी आत्माएं आरम्भ से ही अपने विगत जन्मों, संस्कारों एवं प्रेरणाओं से परिपूर्ण होती हैं। उनके विचार इतने दृढ़ होते हैं कि दूसरों के विरोध की परवा न करके वे अपने ही मार्ग पर चलने योग्य साहस अपने अन्दर धारण किये रहती हैं।
श्री प्रेमवती बचपन से ही आध्यात्मिक संस्कार लेकर आई हैं। छोटी देहात में उनका जन्म हुआ जहाँ आध्यात्मिक वातावरण के लिये कोई अवसर न था। फिर भी उसके विचारों में आध्यात्मिक तत्वों की इतनी मात्रा थी कि लोग आश्चर्य करते। सन्त जैसा उनका जीवन देखने में आता। जब विवाह योग्य हुई तो साँस्कारिक जीवन में प्रवेश करने के लिये उन पर भारी दबाव पड़ा और इसके लिये उसे भारी विरोध एवं त्रास का सामना करना पड़ा, पर वह टस से मस न हुई। आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर जीवन लक्ष्य प्राप्त करना ही उसका उद्देश्य रहा। स्वास्थ्य और तपश्चर्या में उसने अपने जीवन का आधे से अधिक भाग व्यतीत कर लिया।
गायत्री तपोभूमि के संपर्क में आते ही प्रेमवती को ऐसा लगा कि यही उसका घर और यही उसके अनुकूल वातावरण है। अब वह माता भगवती देवी के साथ आत्मसाधना तथा भारतीय संस्कृति सेवा पथ पर कदम से कदम मिला कर चलती रहती है। परम निस्वार्थ, बालकों की तरह निष्कपट, नैष्ठिक गायत्री उपासिका, अखंड ब्रह्मचारिणी, परमार्थ में दिन रात एक करने वाली वह प्रेमवती प्राचीन युग की ऋषिकाओं का स्मरण दिलाती है। उसके दर्शन मात्र से मनुष्य का मस्तक श्रद्धा से सहज ही नत हो जाता है।
श्रीमती सावित्री देवी
भारत भूमि का यह दुर्भाग्य ही है कि यहाँ की आधी जनसंख्या जेलखानों में कैद रहती है। स्त्रियों को घरों में पिंजड़ों में बन्द करके सिर से पैर तक कपड़े में लपेट कर इस प्रकार रखा जाता है कि न वे किसी को देख सकें न उन्हें कोई देखे। कैदखाने के कैदी को रोज जितने लोगों से मिलने की, जितनी जमीन पर घूमने की, किसी के अपने मनोभाव प्रकट करने की, शरीर को रोशनी और हवा लगने की जितनी आजादी होती है, उतनी आजादी भारतीय नारी को नहीं मिलती। फलस्वरूप वह योग्यता, क्षमता और मनोबल की दृष्टि में एक प्रकार की अपाहिज हो जाती है। मानवता पर एक कलंक ही कहना चाहिए कि इस देश की आधी जनता इस प्रकार घरौंदों के पिंजड़ों में कैद रहकर अपाहिज जीवन व्यतीत करे। नारी को अपाहिज प्राणी-भार भूत बोझ माना जाता है तभी तो उसका पाणिग्रहण करने तक कीमत में लोग लम्बी रकम दहेज की माँगते हैं नारी की दुर्दशा का यह चित्र देखकर आज बेचारे न्याय और विवेक आठ-आठ आँसू रोते हैं। दूसरी ओर अविवेक का असुर धर्म का चोंगा पहन कर अनीति का समर्थन करता हुआ अट्टहास करता है।
इन परिस्थितियों को चीरती हुई भारतीय नारी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है और गौ की भाँति अत्यन्त नम्र भाव से विश्व मानव के सम्मुख अपनी मानवीय अधिकारों की करुण पुकार पहुँचा रही है। अब तक उसे ढोल गँवार, शूद्र, पशु की श्रेणी में रखकर केवल ताड़ना का ही अधिकारी माना जाता था, अब धीरे-धीरे उसे एक-एक करके मनुष्यता के अधिकार भी दिये जा रहे हैं। यों अभी भी संकीर्णतावादी सामन्ती मस्तिष्क के पंडित उन्हें धर्म कार्यों से उपासना से दूर रखने का प्रयत्न करते हैं पर मानवता के जगते हुये अधिकार की प्रचण्ड शक्ति के आगे उनका बस नहीं चल पा रहा है।
फिल्लोर की श्रीमती सावित्री देवी एक आदर्शवादी वयोवृद्ध महिला हैं। उन्होंने पर्दे के पाशविक प्रतिबंधों को कभी भी स्वीकार नहीं किया और इस बात की सदा से हिमायत करती रही हैं कि नारी की योग्यताओं को विकसित करके उन्हें भी विश्व के एक नागरिक का अधिकार प्राप्त करने दिया जाय एवं उनकी क्षमता को मानव की सुख शान्ति बढ़ाने में योग देने दिया जाय। सावित्री देवी नारी जाति के उत्थान के लिये सदा से शक्ति भर प्रयत्न करती रही हैं। गायत्री मंत्र-लेखन में उसकी अटूट श्रद्धा है। अकेली ने लगभग दो लाख मंत्र अब तक लिख कर तपोभूमि को समर्पित किये हैं तथा अनेकों को इस मार्ग में प्रोत्साहित किया है। सावित्री देवी का वयोवृद्ध शरीर नारी जागरण की एक जलती हुई चिनगारी के रूप में देखा जा सकता है।
श्री सीताराम जी अग्रवाल एडवोकेट
आज वकीलों के हाथ में देश की बागडोर चली गई है। कांग्रेस के नेताओं और मिनिस्टरों में आधे से अधिक वकील हैं। अन्य सभी सोसाइटियों में भी वकील अग्रगण्य पंक्ति में दृष्टिगोचर होते हैं। वस्तुतः बुद्धिजीवी ही सदा से अग्रणी रहे हैं। किसी समय में ब्राह्मण की जो इतनी प्रतिष्ठ थी वह उसके बुद्धि कौशल एवं बौद्धिक सदुपयोग के कारण ही थी। साधारण जनता को सदा बुद्धिजीवी लोगों के पीछे चलना पड़ता है। प्राचीन काल में भी वही बात थी और आज भी वही बात है।
वकील का धर्म कर्तव्य न्याय और औचित्य की रक्षा करना है। आज अन्य सब कार्यों की भाँति इस पेशे में भी विकृतियाँ आ गयी हैं, कहीं-कहीं तो विकृतियाँ बहुत खटकने वाली भी होती हैं। फिर भी यह प्रसन्नता की बात है कि कई बार आदर्श उदाहरण भी मिल जाते हैं। आगरा के श्री सीताराम जी एडवोकेट एक अग्रणी वकील हैं। उनकी प्रतिभा न केवल वकालत में वरन् सार्वजनिक सेवा एवं धर्म मार्ग पर जनसाधारण की मनोवृत्ति के मोड़ में भी गजब का काम करती है। उन्होंने ऐसे अनेकों नास्तिकों को ऐसा नैष्ठिक उपासक बना दिया है जिनकी पिछली गति विधियों को देखकर उनमें कोई ऐसी आशा नहीं रख सकता था। श्री सीताराम जी की प्रेरणा से आगरा में सामूहिक यज्ञानुष्ठानों का, सत्संग सम्मेलनों का बड़ा उत्साहवर्धक कार्यक्रम चलता रहता है। इनका सारा परिवार जहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त है वहाँ परम धार्मिक भी है। दूसरों को सन्मार्ग पर चलाने में केवल भाषण नहीं- व्यक्ति का चरित्र काम करता है। इनका धर्म प्रचार भी इसी आधार पर सफल हुआ है।
यदि श्री सीताराम जी की भाँति अन्य बुद्धिजीवी भी अपनी वाणी प्रतिभा और बुद्धि का कुछ भाग धर्म प्रचार के लिए अर्पित कर सकें तो साधारण प्रचारकों की अपेक्षा वे बहुत अधिक कार्य कर सकते हैं।
श्री प्रेमशंकर जैतली
उपासना की सफलता में श्रद्धा और विश्वास सबसे बड़ा तत्व है। अन्य मनस्कता, उपेक्षा, अंधविश्वास, संदेह के तमसाच्छन्न मन से कई लोग थोड़ी उपासना करते हैं और अत्यन्त शीघ्र, अत्यधिक मात्रा में बड़े-बड़े भौतिक लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, ऐसे लोगों को बहुधा असफलता और निराशा ही हाथ लगती है। किन्तु जिन्हें सच्ची उपासना की शक्ति पर विश्वास है, जो निष्ठापूर्वक श्रद्धा विश्वास के साथ माता का अंचल पकड़ते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष सत्य की भाँति उपासना के भौतिक और आत्मिक सत्परिणाम निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
श्री जैतली ग्रेजुएट हैं, रसायन विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त की है और अच्छा वेतन प्राप्त करते हुए ऊंचे पद पर काम करते हैं। “अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने पर लोग आधे ईसाई हो जाते हैं” इस मान्यता के श्री जैतली जी अपवाद हैं। भारतीय संस्कृति के अनुरूप जीवनयापन करने के साथ ही उनके नित्य नियम में गायत्री उपासना के चमत्कार स्वयं अपने संबंध में देखे हैं और अनेकों को भारी विपत्तियों से माता का सहारा दिलाकर पार कराया है। इस अंक में श्री जैतली का एक लेख छपा है जिसमें उनने अपने निजी के अनुभव का वर्णन किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि गहरी निष्ठ वाले उपासक अपना निज का तथा दूसरों का कितना बड़ा हित साधन कर सकता है जबकि अश्रद्धालु और अंधविश्वासी लोग असफलता का रोना रोते रहते हैं।
श्री भगवती प्रसाद श्रीवास्तव
संसार में अधिकाँश व्यक्ति ऐसे होते हैं जो धर्म कार्यों का प्रदर्शन अधिक और वास्तविक काम कम करते हैं। आमतौर से लोग यश और कीर्ति की कामना से, मान बड़ाई का लाभ प्राप्त करने की दृष्टि से सत्कार्यों में हाथ डालते हैं। यदि मान प्रतिष्ठ मिलती है तो काम करते हैं, नहीं मिलती तो छोड़ देते हैं, और यदि दूसरे को मिली तो उसमें अपनी मान हानि समझकर उस कार्य को ही हानि पहुँचाने पर उतारू हो जाते हैं। पर साथ ही संसार में ऐसे भी सत्पुरुष रहते हैं जो मान बड़ाई से कोसों दूर रह कर, चुपचाप काम करते हैं और इतना काम कर डालते हैं कि उस सफलता पर आश्चर्य होता है।
श्री भगवती प्रसाद जी व्यस्त कार्यभार से दबे हुए सरकारी कर्मचारी हैं। उनने अपने जीवन के आवश्यक अन्य कार्यों में ही लोगों को सन्मार्ग की प्रेरणा देते रहना भी एक कार्य मान लिया है फलस्वरूप बहरापंच में कुछ दिन पहले जहाँ गायत्री उपासना को कोई जानता तक न था अब वहाँ सहस्रों आत्माओं में धर्म प्रेम की हिलोरें उठ रही हैं। जो भी व्यक्ति अपने संपर्क में आये उसके जीवन में कुछ धार्मिकता का समावेश करने की शिक्षा देते रहने का क्रम बना लिया जाय तो कोई भी सत्पुरुष अनेक लोगों की आत्मा को ऊँचा उठाने में समर्थ हो सकता है। श्री भगवती प्रसाद जी अपने विचारों में अटूट श्रद्धा रखने के कारण ही उतनी महत्वपूर्ण धर्म सेवा लम्बे समय से कर रहे हैं। जबकि अन्य लोगों का, देखा देखी का उत्साह कुछ ही दिन में ठण्डा पड़ जाता है।
श्री माँगीलाल दायमा
मालेगाँव, नासिक के श्री गाँगीलाल पुखराज दायमा कपड़े के एक छोटे से व्यापारी हैं। इस युग में मनुष्य के बड़प्पन की तोल उसके धन या पद के आधार पर की जाती है। इस दृष्टि से श्री माँगीलाल जी छोटे आदमी हैं पर उनकी अन्तरात्मा में धर्म प्रचार के लिए जो लगन रहती है उसे श्रेष्ठ धर्मात्मा होने का प्रत्यक्ष प्रमाण माना जा सकता है। जो जितना ही स्वार्थी है वह उतना ही छोटा और जो जितना ही परमार्थी है वह उतना ही बड़ा है- विवेक से अनुमोदित यही कसौटी सच्ची है।
श्री0 माँगीलालजी अपनी दुकान का काम करते हैं। कपड़ा बेचते हैं। साथ ही सद्ज्ञान लुटाते रहते हैं जो भी उनके संपर्क में आता है उससे गायत्री माता और भारतीय संस्कृति के बारे में चर्चा करते हैं। उनके निरन्तर प्रचार का ही फल है कि मालेगाँव तथा उसके समीपवर्ती क्षेत्र में गायत्री उपासना का भारी प्रचार हुआ है। वहाँ हवन और सत्संग पूरे उत्साह से होते हैं। नवरात्रियों में सामूहिक अनुष्ठान बड़ी श्रद्धा के साथ चलते हैं। धार्मिक वातावरण विनिर्मित करने में श्री माँगीलाल जी तथा उनके साथी बड़ी श्रद्धापूर्वक संलग्न हैं।
सत्पुरुषों के सराहनीय सत्प्रयत्न
दिगौड़ा (टीकमगढ़) की गायत्री शाखा द्वारा देवका ग्राम के पास पहाड़ की चोटी पर स्थित हनुमान जी के मन्दिर में 20-21 अप्रैल को 24 घण्टे का अखण्ड कीर्तन किया गया, जिसमें 24 हजार गायत्री जप और 240 चालीसा का पाठ तथा गायत्री यज्ञ किया गया। इस अवसर पर टीकमगढ़ से दादा दुर्गाप्रसाद जी चतुर्वेदी, नारायण दास जी पाराशर, भाई जगत रामजी पधारे। दादा दुर्गाप्रसाद जी ने हनुमान जी का अंगराज किया जिससे सैकड़ों वर्षों से ढंकी हुई हनुमान जी की विशाल मूर्ति निकल आई। गायत्री साहित्य, गायत्री के चित्र व पूज्य आचार्य जी के चित्र वितरण किये गये।
-वै0प्र0 सौनकिया
निगोही (शाहजहाँपुर) की शाखा की तरफ से 28 अप्रैल को डा0 नत्थूलालजी शर्मा पीलीभीत के ग्राम रामपुर में गये। सब सदस्यों ने मिलकर 1 हजार आहुतियों का यज्ञ किया। 29 ता0 को नीलकण्ठ महादेव के मन्दिर तिलहर के मेले में पहुँचे। वहाँ मन्दिर के पास बड़ी गंदगी थी और उसी में सब जनता को ठहरना पड़ता था। डॉक्टर साहब ने इस संबन्ध में जनता व मेले के प्रबंधकों को सफाई रखने की बात समझाई। गायत्री के महत्व पर प्रवचन भी किया। ता0 30 अप्रैल को ग्राम कनयरिया गये। वहाँ गायत्री संस्था का एक सदस्य बना तथा अन्य लोगों ने आगे चलकर सदस्य बनने को कहा। ता0 1 मई को ग्राम कनपुरा गये और 3 सदस्य बनाये। ता0 2 को महमदपुर में प्रचार किया जहाँ 30 व्यक्तियों ने सदस्य बनने को कहा। फार्मों के न होने से उसी समय सदस्य न बन सके। ता0 3 को निगोही में ही 1000 आहुतियों का यज्ञ मु0 श्यामलाल जी अध्यापक के सहयोग से किया। यहाँ अभी तक 65 सदस्य बन चुके हैं। -एक ज्ञानकार
तनौड़िया (शाजापुर) में इस महीने में 4 सामूहिक यज्ञ हुये। इनमें से एक में 22 व्यक्तियों का ब्रह्मभोज किया गया और दूसरा यहाँ से 22 मील दूर घटिया स्टेशन से 2॥ मील पर जलवा गाँव में हुआ। यज्ञ स्थल बहुत सुन्दर सजाया गया था। गाँव की लगभग 100 जनता ने भाग लिया।
- मुन्नालाल कर्मयोगी
मिर्जापुर (कोटा) में बैसाख सुदी 15 व जेष्ठ बदी 1 को 24 हजार आहुतियों का यज्ञ किया गया इससे बारा से पं0 श्री कृष्ण जी व अन्य गायत्री प्रेमी भी आये थे। यज्ञ में स्त्रियों ने भी उत्साह से भाग लिया। स्त्रियों ने कलश का प्रोग्राम भी बड़े सुन्दर ढंग से पूरा किया।
आरंभ (रायपुर) में नवरात्रि के अवसर पर 5 लाख 76 हजार जप, 5 हजार 760 चालीसा के पाठ और 576 मंत्र लेखन का कार्यक्रम पूर्ण किया गया। नवमी के दिन 5 यज्ञ कुण्डों में 24 हजार मंत्रों की पूर्णाहुति की गई और 340 कुमारी कन्याओं को भोजन कराया गया। इसमें राम शरन लाल गुप्त रामेश्वर प्रसाद गुप्त, चन्दन बाई, जनक नन्दनी बाई आदि अनेक सदस्यों का कार्य सराहनीय रहा।
-विद्याप्रसाद मिश्र
जंगहट (मिर्जापुर) में नवरात्रि के अवसर पर गायत्री परिवार के तीन सदस्यों ने एक-एक लघु अनुष्ठान किया। दो सदस्यों ने गायत्री चालीसा के 240-240 पाठ के अनुष्ठान पूर्ण किया। सब लोगों ने मिलकर 9360 आहुतियों का हवन किया। दर्शकों पर इस सामूहिक कार्यक्रम का बड़ा प्रभाव पड़ा।
- श्याम चरण दुबे
सिलहारी (बुलन्दशहर) में 28 अप्रैल को पं0 गंगासरन के यहाँ सामूहिक जप व तदनुसार आहुतियों का अनुष्ठान किया गया। इसमें पं. रामलाल जी, ठा. राजेन्द्र सिंह, हरिओम जी, रामचरन जी, ओम प्रकाश जी ने सराहनीय सहयोग दिया।
- हरीशंकर गौड कसेर
चीचोड़ा (बेतूल) गायत्री यज्ञ पं. भगवत अवध प्रसाद जी द्वारा कराया गया। रेलवे स्टाफ के सब कर्मचारी शामिल हुये। इस कार्य में बेनी प्रसाद जी लोखंडे, मट्टर गैंगमैन, कुञ्जीलाल जी और भट्ट ने विशेष परिश्रम किया?
-एक सदस्य
लश्कर (ग्वालियर) की गायत्री-शाखा के प्रयत्न से श्री मुरली मनोहर कार्यालय देश पाँडे भवन तथा बाजार लश्कर में एक गश्ती पुस्तकालय खोला गया है, जिसके द्वारा अखण्ड-ज्योति कार्यालय की पुस्तकें पढ़ने के लिए घर-घर पहुँचाई जाती हैं। (इसमें 30) श्री0 नीलकण्ड काशीनाथ देश पाँडे ने सहायतार्थ दिया।
-मुरलीधर डेडोर्षितया
नरसिंहपुर (म0प्र0) में 28 व 29 अप्रैल को अखण्ड रामायण व गायत्री हवन उत्साहपूर्वक किया गया। इस कार्यक्रम में बाहर से भी कुछ सज्जन आये थे। इस शुभ कार्य में लगभग 50 कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। ‘गायत्री महाविज्ञान’ ‘गायत्री चालीसा’ का पारायण भी लगातार होता रहा।
- मंत्री, शाखा सभा
चीचोड़ा (बेतूल) में पूर्णिमा के दिन 20 सदस्यों में 9 कुण्डों में हवन किया। हर एक ने आनन्दपूर्वक आहुतियाँ दीं।
- बेनी प्रसाद
लाडनूँ (राजस्थान) में पन्द्रह सदस्यों ने सामूहिक हवन किया। मुझे गायत्री माता की कृपा से बहुत लाभ हुआ और मरने से बच गया।
- इन्दरचन्द भोजक
जसोई (मफ्फरनगर) बैसाख शु0 2 से तक 17 सदस्यों ने सामूहिक रूप से यज्ञ किया, दशमी को सबने मिलकर यज्ञ किया।
- जय भगवान वर्मा
मनसूरनगर (मुजफ्फरनगर) में एक साधक आसाराम के यहाँ 12 मई को एक हजार आहुति का यज्ञ किया गया।
- बनारसीदत्त शर्मा
अर्रुषा खास (आगरा) में बैसाख सुदी 512 तक गायत्री सप्ताह मनाया गया। जिसमें हजार आहुतियों का हवन किया गया। साथ लगभग 600 साधुओं, ब्राह्मणों आदि को भोजन कराया गया। इसमें विशेष सहयोग पं0 जगन्नप्रसाद जी शर्मा, मुँशी प्रयाग नारायण जी ने दिया वह धन्यवाद के पात्र हैं।
- राम प्रसाद शर्मा
चपुन्ना (फर्रुखाबाद) के समीप दो गाँवों में गायत्री यज्ञ समारोहपूर्वक किये गये। इनमें से नागरिया लालशाह में पं0 सालिगराम व पं0 श्याम बिहारी लाल के यहाँ हुआ। दूसरा नगला राजाराम (इटावा) में 24 हजार आहुतियों का हुआ। जिससे जीवन सिंह, मथुरा सिंह तथा बचानसिंह आदि सज्जनों ने विशेष सहयोग दिया।
- पातीराम त्रिपाठी, विशाल
हँसूपुरा (बिजनौर) में गायत्री महायज्ञ कु0 पति पं0 श्रीराम तथा माता विद्यावती जी समुपस्थिति में 3 मई से 6 मई तक सम्पन्न हो गया। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में बा0 बागेश्वर ना जी रईस पं0 किशोरीलाल जी वैद्य, पं. गरीबदास ज्योतिषी पौनाम्बर दत्त जी ज्योतिषी मदन किशोर ज्योतिषी, ओम प्रकाश जी, रामकरन सिंह जी सै ने जी तोड़कर सहयोग किया।
- मंत्री शाखा सभा
फुलसरा (पुर्नियाँ) में 25 मई से 27 मई तक विश्व शाँति के लिए 24 हजार गायत्री मंत्र का बड़ा हवन हुआ। यह यज्ञ सामूहिक था और सर्व श्री0 गिरिजानन्द झा, नवकाँत झा, भानुकर झा ने इसे पूर्ण परिश्रम करके सफल बनाया।
- खुशींनाथ
जूना बिलासपुर (बिलासपुर) में ‘गायत्री ज्ञान यज्ञ कला मंदिर एवं पुस्तकालय’ के पदाधिकारियों का चुनाव ता0 19 अप्रैल को किया गया। अनेक नये सदस्य बन रहे हैं।
- चीनाराम पोद्दार
भोपाल में अक्षय तृतीया के दिन शंकरलाल जी के निवास-स्थान पर 1008 आहुतियों का यज्ञ किया गया। यज्ञ-स्थल खूब सजा व सुवासित था। नगर के सभी गायत्री प्रेमी उपस्थित थे। जिनके सम्मुख गायत्री महिमा के सम्बन्ध में प्रवचन किया गया।
- एम0पी0 महेश्वरी
झाबुआ (मध्य-भारत) के हनुमान मंदिर में गायत्री यज्ञ की पूर्णाहुति 25 अप्रैल को की गई। अनेकों ब्राह्मण कन्याओं को भोजन कराया गया। वहाँ गायत्री परिवार की स्थापना हो चुकी है।
- मनोहर सिंह सिसोदिया
मोरवी (सौराष्ट्र) में एक ही दिन में तीस ब्राह्मणों द्वारा सवा लाख गायत्री का यज्ञ पूर्ण किया गया।
-नारदलाल देव
भद्रपुर (फतेहपुर) में 8 अप्रैल को गायत्री उपासकों की ओर से राम चरित मानस का अखण्ड परायण और 240 आहुतियों का गायत्री-हवन किया गया। इस आयोजन को सफल बनाने का श्रेय श्री0 देवी दयाल वर्मा को है।
- रामाश्रय वर्मा एम0ए0
कैमोर (जवलपुर) में गायत्री उपासकों ने सामूहिक जप व यज्ञ का अनुष्ठान किया। 32 हजार मंत्र लेखन हुआ।
- विश्वनाथ मिश्रा
सेगाँव (निमाड़) में सामूहिक जप व यज्ञ का अनुष्ठान किया गया। 50 हजार जप द्वारा कराया गया।
- विश्वनाथ
जूनी इन्दौर में सामूहिक कार्यक्रम बड़ी धूमधाम से पूरा हुआ। नौंवे दिन ब्राह्मण भोजन हुआ जिसमें मित्र मंडली भी शामिल हुई। इस कार्य में विशेष भाग पं. राम कल्याण शर्मा का रहा जो हमारे यज्ञ के आचार्य थे।
- जटाशंकर कौशिक
सुससेर (म0प्र0) गायत्री-यज्ञ सानंद समाप्त हो गया। मथुरा से अ0भा0 गायत्री परिवार के कुलपति पं0 श्रीराम शर्मा, ने पधारने की कृपा की, उनके साथ में स्वामी प्रेमानंद, नत्था सिंह जी, श्री0 शंभू सिंह आदि विद्वान और उपदेशक भी पधारे थे। ता0 1 मई को गायत्री तपोभूमि द्वारा रंगीन मैजिक लालटैन से धार्मिक चित्रों का प्रदर्शन किया गया। इस यज्ञ की सफलता सर्व में श्री सत्यनारायण जी पंड्या, भालचन्द्र राव जी ठाकुर, गुप्ता जी ओवरसियर, भवानी सिंह जी, रामदेव जी, बिरदी चन्द जी, कैलाश नारायण जी उपाध्याय, वैद्यरामचन्दजी, शिव नारायण जी पाठक, बाबूलाल जी गर्ग आदि का सहयोग विशेष प्रशंसनीय रहा।
-नन्द किशोर शर्मा
मऊरानीपुर (झाँसी) में ज्येष्ठ शुक्ल 11 से आषाढ़ कृष्ण 5 तक गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया है।
- सालिगराम पाण्डेय
तारापुर (कालाहाँडी) में ता0 मर्हडडडडडडडड को सामूहिक जप और हवन हुआ। गायत्री चालीसा का पाठ तथा ब्रह्मभोज भी हुआ।
- गोकुल प्रसाद शर्मा
बम्हानी बाजार (बिलासपुर) के राम जानकी मंदिर में मिती बैशाख सुदी 7 से श्रीमद्भागवत पाठ और गायत्री का सामूहिक जप किया गया। प्रातःकाल 4 बजे से नगर में फिरकर नित्य कीर्तन भी किया जाता है।
- मोहनलाल गुप्त
पेटलाबाद (म0प्र0) में 4 मई से 9 मई तक गायत्री महायज्ञ किया गया। 9 ता0 को पूर्णाहुति के समय हजारों नर-नारियों की भीड़ थी। सैकड़ों आदिवासी भी आये थे। सर्व श्री0 गौरीशंकर, गोपालसिंह जी, हेमराज जी, अम्बालाल जी, लाल शंकर जी, पन्नालाल जी आदि कार्य-संचालकगण विशेष रूप से बधाई के पात्र हैं।
- सोमेश्वर चतुर्वेदी
झालाबाड़ (राजस्थान) में 50 हजार जप और 5 हजार आहुतियों का सामूहिक हवन किया गया। भजन और कीर्तन की उत्तम व्यवस्था थी।
- माधोलाल शर्मा
जासलपुर (होशंगाबाद) में 12, 13 मई को सामूहिक हवन गायत्री सदस्यों और अन्य धार्मिक ग्रामवासियों द्वारा सम्पन्न हुआ, जिसमें चार हजार आहुतियों और ब्रह्मभोज का आयोजन किया गया।
- पु0आ॰ साखरे
नागपुर में ढाई लाख जप का ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान चल रहा है। ता0 23 अप्रैल को एक उपासक के यहाँ सात सौ आहुतियों का हवन किया।
- रजनीकाँत शुक्ल
जूना बिलासपुर (बिलासपुर) में एक गायत्री उपासक श्री बी0सी0 रामचन्दन मुदालियर ने सवा करोड़ जप का संकल्प 18-8-56 से किया है और अभी तक ग्यारह लाख, तीन हजार, सात सौ अस्सी जप हो चुका है।
- चीनाराम पोद्दार
सरायतरीन (मुरादाबाद) में चैत्र शु0 11 से सत्साक पं0 इच्छापूर्ण गौड़ मकान पर गायत्री चालीसा के 4 हजार सामूहिक पाठ किये गये। पूर्णिमा को शिवशंकर लाल शर्मा हलवाई के मकान पर 25 हजार आहुतियों का हवन हुआ। वैसाख कृ0 1 को साहू हरीशंकर मक्खनलाल जी के यहाँ 5000 आहुतियों का हवन हुआ। बैसाख कृ0 2 को साहू अशर्फीलाल जी के यहाँ 5000 आहुतियों का यज्ञ हुआ। शाम को साहू धर्मपाल जी की पुत्री कुमारी वीरबाला ने अपनी सखियों को बुलाकर गायत्री चालीसा के 5000 सामूहिक पाठ किये। बैसाख कृ0 तृत्रिया को पं0 मनीरामजी के यहाँ गायत्री चालीसा के 1000 पाठ किये गये। इस समस्त धर्म-प्रचार का श्रेय श्री0 स्वा0 ब्रह्मस्वरूप जी को है जो जनता में गायत्री के प्रति निरन्तर प्रेम उत्पन्न कर रहे हैं।
- इच्छापूर्ण गौड़
व्यावर (राजस्थान) में गायत्री जप और यज्ञ का अनुष्ठान बड़े उत्साह से किया गया। लाउडस्पीकर, सजावट आदि की सुन्दर व्यवस्था थी। यहाँ के गायत्री-पुस्तकालय में गायत्री-साहित्य की भी अच्छी माँग रहती। नैष्ठिक गायत्री उपासक श्री मंगलराज जी ने जयपुर से गायत्री की बड़ी सुन्दर प्रतिमा मंगवाई है जितनी प्रतिष्ठ उपयुक्त स्थान मिलने पर की जायगी।
- मोहनलाल शर्मा
खूँटी (राँची) में पूर्णिमा को एक हजार आहुतियों का सामूहिक यज्ञ हुआ। गायत्री ज्ञान मंदिर के सामने 24 घंटे का अष्टयाम हरी संकीर्तन भी किया गया, जिसमें नगर के सभी वर्गों के लोगों ने भाग लिया।
- देवेन्द्रनाथ साहु
पुसावली (बदायूँ) में 13 मई को 5 हजार जप तथा 1000 आहुतियों का हवन किया गया। प्रसाद भी वितरण किया गया। इस कार्यक्रम का सब भार पंडित अशर्फीलाल जी ने उठाया।
- गायत्री प्रसाद गुप्ता
गुरुकुल बकानी (झालाबाड़) में 24 हजार आहुतियों का गायत्री महायज्ञ 12 से 14 अप्रैल तक बड़े समारोह से हुआ। इस सुअवसर पर अ0भा0 गायत्री परिवार के कुलपति पं0 श्रीराम जी, दो उद्भट विद्वानों के साथ पधारे थे। 18 पुरुषों व 10 स्त्रियों ने यज्ञोपवीत एवं दीक्षा ग्रहण की। बाहर के उपासक भी अच्छी संख्या में उपस्थित थे।
-भंवरलाल शर्मा
कोटड़ा घटा (झालाबाड़) में गुरुकुल बकानी के गायत्री परिवार के मंत्री द्वारा शाखा की स्थापना की गई। ता0 28 अप्रैल को 800 आहुतियों का हवन ग्राम के मंदिर पर हुआ।
-गोपीलाल
चेचट (कोटा) में 7 अप्रैल को उत्साहपूर्वक सामूहिक यज्ञ हुआ। 9 अप्रैल को मानस पारायण व गायत्री चालीसा पाठ से पूर्णाहुति हुई। 20 अप्रैल को मास्टर शंभूसिंह द्वारा गायत्री की महिमा पर सारगर्भित भाषण हुआ। 21 अप्रैल को मास्टर गोविन्द लाल के यहाँ यज्ञ हुआ और 22 अप्रैल को रामनिवास जी के मकान पर 2400 आहुतियों का हवन किया गया।
- मोतीलाल
सिलहारी (बुलन्दशहर) में श्री0 स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी के सत्प्रयत्नों से 12 मई को सामूहिक यज्ञ किया गया, जिसमें सभी गायत्री प्रेमियों ने भाग लिया। और नये उपासकों का विधिवत् यज्ञोपवीत संस्कार किया गया। ता0 13 को कसेर कलाँ में श्री ओम प्रकाश ने यज्ञ कराया। ता0 14 को पला (कसेर) के श्री बाबूलाल जी ने यज्ञ कराया। ये सभी यज्ञ गायत्री तपोभूमि मथुरा से पधारे शास्त्रज्ञ पं0 ज्वाला प्रसाद शर्मा के आचार्यत्व में सम्पन्न हुये।
-मन्त्री, शाखा सभा
पला कसेर (बुलन्दशहर) में स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी की प्रेरणा से समस्त ग्रामीण जनता ने सवालक्ष आहुतियों का गायत्री महायज्ञ ता0 29 मई से 2 जून तक करना निश्चय किया। इस अवसर पर उच्चकोटि के विद्वान एवं तपस्वी स्वामी देवदर्शनानन्द सरस्वती तथा गायत्री परिवार के आचार्य पं0 श्रीराम शर्मा पधारकर यज्ञ की शोभा बढ़ायेंगे। इसी प्रकार डिबाई (बुलन्दशहर) में ओमप्रकाश गुप्ता ठेकेदार के यहाँ
(श्री रामगोपाल शर्मा ‘दिनेश’ एम.ए.)
आँख खोलो, सामने देखो, सवेरा आ रहा है।
निविड़तम तप पी धरा का, ज्योति में भर प्राण अपने।
साधना का दीप ले जो, कर गया साकार सपने॥
स्वर्ग से भू पर उतर आलोक उसका गा रहा है,
आँख खोलो, सामने देखो, सवेरा आ रहा है।
देश की काली निशा फिर, हँस उठे आ लोक पाकर।
स्नेह का मधु-दान करता, जी सके मानव धरा पर॥
प्रेम का सन्देश अम्बर को जगाने जा रहा है,
आँख खोलो, सामने देखो, सवेरा आ रहा है।
शोध-शालाएँ करो अब, बन्द सब विज्ञान की ये।
बन रही हैं आज ग्राहक, मनुजता के प्राण की ये॥
रक्त की ले प्यास मानव, असुर बनने जा रहा है।
आँख खोलो, सामने देखो, सवेरा आ रहा है।
तुम न अणु बम से सकोगे, जीत मानव के हृदय को।
सो रहे हो, जाग जाओ, क्यों बुलाते हो प्रलय को॥
हो रही है शंख-ध्वनि, युग एक बीता जा रहा है,
आँख खोलो, सामने देखो, सवेरा आ रहा है।
चाहते हो सुमन बनकर, भू-गगन में सुरभि भरना।
झूल जीवन-डाल पर यदि, प्रेम-जग में झूम झरना॥
तो हृदय खोलो, मिलो, मानव अकेला जा रहा है।
आँख खोलो, सामने देखो, सवेरा आ रहा है।
*समाप्त*