कंकड़-पत्थर (Kavita)

कंकड़-पत्थर समझ जिन्हें त्यागते सदा आए ज्ञानी जन। रजत-स्वर्ण-खंडों-रत्नों को, भ्रमवश समझ लिया अक्षय धन॥

निशिदिन कामिनियों का चिंतन, मधु-मादक द्रव्यों का सेवन। चपल इंद्रियों की उपासना को ही जाना जीवन साधन॥

भौतिकता के स्वर्णिम बंधन से विमुक्ति का ज्ञान न पाया। ‘सोऽहं’ और ‘तत्वमसि’ पढ़कर, मैं स्वरूप पहचान न पाया॥ 1॥

दिव्य-पुरुष बाहर, मैं सुँदर, पर अतीव काला अंतस्तल। चिर अतृप्ति-ज्वाला में जलता रहा, न हो पाया मैं शीतल॥

झंझा-प्रवाह सा था बहता, भय देता, भीत रहा प्रतिपल। हूँ अनंत की ओर जा रहा, छोड़ सभी वैभव निःसबल॥

रहा खोजता सुख जीवन भर, पर सुख क्या है, जान न पाया। ‘सोऽहं’ और ‘तत्वमसि’ पढ़कर, मैं स्वरूप पहचान न पाया॥ 2॥

दी न किसी भूखे को रोटी, दिया न प्यासे को ही पानी। लेता ही मैं रहा विश्व से, नहीं दान की महिमा जानी॥

रही संकुचित सीमा ‘स्व’ की, बना अंध भोगी अभिमानी। त्याग राग की पराकाष्ठा नहीं त्याग की गरिमा जानी॥

‘ईशावास्यमिदं सर्व’ का, इस मानस में ध्यान न आया । ‘सोऽहं’ और ‘तत्वमसि’ पढ़कर, मैं स्वरूप पहचान न पाया॥ 3॥


धर्म-मय जीवन का तत्वज्ञान

(श्री योगीराज अरविंद)

धर्म मनुष्य के अंदर एक ऐसी प्रेरणा, भावना, प्रवृत्ति और विधि-व्यवस्था है, जिसका लक्ष्य स्पष्ट रूप में भगवान ही है। जबकि मनुष्य की अन्य सभी प्रवृत्तियाँ परोक्ष रूप में ही उन्हें अपना लक्ष्य बनाती प्रतीत होती हैं और जगत की बाह्य एवं अपूर्व प्रतीतियों के पीछे चिरकाल भटक-भटक कर ठोकर खाने के बाद ही कहीं उन तक पहुँच पाती हैं। इस प्रकार आदर्श व्यक्ति तथा आदर्श समाज का विकास करने और मनुष्य जीवन को भगवान में ऊँचा उठा ले जाने का ठीक मार्ग यही प्रतीत होगा कि समस्त जीवन को धर्ममय बनाकर सब काम-काज धार्मिक भावना के अनुसार चलाया जाय।

विद्रोह ने पराकाष्ठा तक पहुँच कर धर्म को बिल्कुल मटियामेट कर देने का यत्न किया, निःसंदेह धर्म के विरोधियों ने यहाँ तक अभिमान किया कि हमने मनुष्य के अंदर की धार्मिक प्रवृत्ति का उन्मूलन कर दिया है। परन्तु जैसा कि हम आज देखते हैं, यह अभिमान थोथा और अज्ञानपूर्ण था, क्योंकि मनुष्य की धार्मिक प्रवृत्ति अन्य सबसे बढ़कर उसकी एकमात्र ऐसी प्रवृत्ति है, जो नष्ट नहीं की जा सकती। भूतकाल में मानव समाज के पथ-प्रदर्शक एवं नियामक होने में धर्म की असमर्थता का सारा मूल कारण इसी बात में निहित है कि मंदिरों, गिरजों और मत-सम्प्रदायों ने दर्शन और विज्ञान के मार्गों में जबर्दस्त रुकावट डाली, एक गिओर्डानो ब्रूनो को जला दिया तथा एक गेलिलियो को बंदी बनाया और इस मामले में इन्होंने इतने सामान्य रूप में दुर्व्यवहार किया कि दर्शन और विज्ञान को अपने उचित विकास का खुला क्षेत्र प्राप्त करने के लिए आत्म-रक्षा के भाव में धर्म पर आक्रमण कर उसे नष्ट-भ्रष्ट कर देना पड़ा, और यह सब इसलिए कि मनुष्यों ने यह निश्चित धारणा बना ली थी कि धर्म, ईश्वर तथा संसार के सम्बंध में कुछ ऐसे स्थिर बौद्धिक विचारों के बंधन से बँधा हुआ है जो कसौटी पर पूरे नहीं उतर सकते। अतएव उस कसौटी को आग तथा तलवार से दबा देना आवश्यक था। धार्मिक भ्राँति के जीवित बने रहने के लिए वैज्ञानिक एवं दार्शनिक सत्य का निषेध करना आवश्यक था। हम यह भी देखते हैं कि अति संकीर्ण धार्मिक भावना असहिष्णु वैराग्यवश जीवन के आनंद और सौंदर्य को कुचल कर उसे ऊसर बनाती रही है। वे नहीं देख सके कि धार्मिक तप, धर्म का मुख्य अंग भले ही हो, पर यह उसका सार-सर्वस्व नहीं, क्योंकि प्रेम, त्याग, सज्जनता, सहिष्णुता, दयालुता भी ईश्वरीय गुण है। इतना ही नहीं, बल्कि ये अधिक दिव्य वस्तुएँ हैं और वे भूल गये या वे कभी जानते ही न थे कि पवित्रता के समान प्रेम और सौंदर्य भी ईश्वर का स्वरूप है।

राजनीति में ऐसे धर्म ने प्रायः ही राजसत्ता का पक्ष-पोषण किया है और अधिक महान राजनीतिक आदर्शों के आविर्भाव में बाधा डाली है। क्योंकि स्वयं इसका स्वरूप राजसत्ता से पोषित धर्म के अंतर को हृदयंगम नहीं कर पाता था अथवा क्योंकि यह झूठे दैवी राज्य का प्रतिनिधि बना हुआ था, यह भूलकर कि सच्चा दैवी-राज्य ईश्वर का राज्य होता है न कि पोप तथा पुरोहित पुजारियों का राज्य। इसी प्रकार इसने प्रायः कठोर तथा घिसी−पिटी समाज-व्यवस्था का समर्थन किया हैं, क्योंकि इसने समझा कि इसका अपना जीवन उन सामाजिक रूपों में बँधा हुआ है, जिनके साथ वह अपने इतिहास के दीर्घ भाग में सम्बद्ध रहा था और इसने गलती से यह परिणाम निकाल लिया कि समाज व्यवस्था में किया गया आवश्यक परिवर्तन भी धर्म का उल्लंघन होगा और इसके अस्तित्व के लिए संकट मानो मनुष्य की धार्मिक भावना जैसी शक्तिशाली आभ्यंतरिक वस्तु सामाजिक रूप के परिवर्तन सरीखी तुच्छ वस्तु या सामाजिक पुनर्व्यवस्था जैसी बाहरी वस्तु से मिटायी जा सकती हो। यह भ्राँति अपने नानारूपों में अतीत के क्रियात्मक धर्म की महान दुर्बलता रही है और साथ ही इसे बुद्धि, सौंदर्य भावना, सामाजिक एवं राजनीतिक आदर्श-यहाँ तक कि मानव की नैतिक भावना को ऐसा अवसर और बहाना मिला है कि वे उस वस्तु के विरुद्ध विद्रोह करें, जो उनकी अपनी सर्वोच्च प्रवृत्ति और नियम नीति होनी चाहिए थी। यह ठीक है कि धर्म जीवन में प्रभावपूर्ण तत्व होना चाहिए। इसे जीवन का प्रकाश और विधि-विधान होना चाहिए, परन्तु यहाँ धर्म से हमारा मतलब धर्म के उस स्वरूप से है, जो कि उसका (वस्तुतः) होना चाहिए और जो उसका अन्तरीय स्वरूप है। उसके अस्तित्व का मूल नियम है-ईश्वर की खोज एवं आध्यात्मिकता का सिद्धाँत। दूसरी ओर यह भी सच है कि धर्म जब अपने आप को किसी मत, सम्प्रदाय या मठ-मंदिर से या रूढ़ विधि-विधानों की पद्धति मात्र से एकाएक कर लेता है, तब वह सहज ही बाधक शक्ति का रूप धारण कर सकता है और मानव आत्मा के लिए यह आवश्यक हो सकता है कि वह जीवन की विविध प्रवृत्तियों पर से इसका प्रभुत्व दूर करे।

जो आध्यात्मिक पुरुष मानव जीवन को इसकी पूर्णता की ओर ले चल सकता है, उसका आदर्श रूप “ऋषि” के प्राचीन भारतीय विचार में निदर्शित है। जिस ऋषि ने मनुष्य का सा जीवन बिताते हुए अतिबौद्धिक, अतिमानसिक, आध्यात्मिक सत्य का दिव्य शब्द श्रवण किया होता है, वह इन शरीर, प्राण, मन की निरंतर सीमाओं से ऊपर उठ चुका होता है। और सभी वस्तुएँ उर्ध्व स्तर से देख सकता है, पर साथ ही उसे उनके प्रयत्न के प्रति सहानुभूति होती है और वह उनके भीतर बैठकर उन्हें भीतर से भी देख सकता है। वह पूर्णज्ञान एवं उच्चतर ज्ञान से युक्त होता है। अतः वह मानव जगत का उसी तरह पथ-प्रदर्शन कर सकता है, जिस तरह ईश्वर दिव्य रीति से इसका पथ-प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि भगवान के समान वह भी जगत के जीवन में रहता हुआ भी उससे ऊपर होता है।


कर्मयोग की उपासना

(श्री आचार्य विनोबा भावे)

आम जनता तो निरंतर कर्म करती ही है। उसके सिवा उत्पादन नहीं होता और जीवन भी नहीं चलता, यह सभी जानते हैं। फिर भी प्रयत्न यह रहा है कि जहाँ तक हो सके, वहाँ तक उस परिश्रम को टालें, फिर या तो किसी दूसरे मार्ग से अधिक संग्रह करके परिश्रम से मुक्त हो जायं या उत्पादन के ऐसे साधन ढूँढ़ निकालें कि जिससे कम से कम परिश्रम करना पड़े। पहला विचार व्यक्तिगत है-बौद्धिक कर्म से खुद के लिए अधिक संग्रह कर परिश्रम से मुक्ति पाना, और दूसरा सामाजिक है-उससे मनुष्य यंत्र के पीछे पड़ गया है। मनुष्य को आराम मिले इतना ही नहीं, बल्कि हो सके तो उसको काम ही न करना पड़े या कम से कम करना पड़े, यह वासना उसमें है। उसमें यह भी कल्पना है कि मनुष्य को संस्कार और जीवन के आनंद के लिए कुछ फुरसत भी चाहिए। मनुष्य का जो भी विकास हुआ है वह फुरसत के कारण हुआ है, यह भी दृष्टि उसमें है।

इन दो विचारों में पहला व्यक्तिगत और स्वार्थी विचार कहा जायेगा, इसलिए उसके सम्बन्ध में खास सोचने का कारण नहीं है, लेकिन दूसरा विचार सारे समाज की ओर ध्यान देता है। उसमें केवल स्वार्थ नहीं है। उसमें दृष्टि यह है कि कर्मयोग में मनुष्य को कम समय देना पड़े तो फुरसत के समय वह जीवन का विकास कर सकता है। साहित्य का, धर्म का या कारीगरी का जितना विकास हुआ है, वह सब फुरसत के कारण ही हुआ है, ऐसा वे लोग कहते हैं। लेकिन इस दृष्टि को आश्रम में हमने स्वीकार नहीं किया है। मनुष्य को फुरसत की जरूरत ही नहीं है, ऐसा तो हमने नहीं माना है; लेकिन वह फुरसत तो कर्मयोग से ही मिलती है, ऐसी कल्पना की है। एक ही काम से मनुष्य के जीवन में एक अंग का विकास होता है, वही काम सारे जन्म में वह करता रहेगा तो जीवन एकाँगी बन जाता है, सर्वांगीण जीवन-विकास के लिए अलग-अलग कर्म-योगों की योजना करते हैं, तो जीवन में आनंद आता है और साथ-साथ ज्ञान भी मिलता है। ज्ञान और आनंद-इन्हें कर्मयोग के प्रतिस्पर्धी मानकर उनके लिए अलग समय निकालने की वृत्ति हम नहीं रखते और इसी में नई तालीम की शोध हुई है।

वैसे यह कोई नई शोध नहीं है बल्कि आश्रम-जीवन का यह स्वाभाविक परिणाम है और सारी गीता उसके बचाव के लिए खड़ी है। ज्ञान, कर्म और आनंद-तीनों के एक रूप हैं, यह गीता का सूत्र है। आनंद का विशुद्ध रूप ही भक्ति है, इसलिए भक्ति शब्द में उसका समावेश गीता ने किया है। इस तरह ज्ञान, भक्ति और कर्म, तीनों के योग का एक ही वस्तु में अनुभव करने को गीता समत्व कहते हैं। वह प्राप्त करने के लिए किस तरह जीवन की रचना करनी चाहिए, यह गीता ने बताया है। केवल संन्यास से यानी अर्वाचीन भाषा में फुरसत से जीवन विकास नहीं होता। मनुष्य को जो भी सिद्धि प्राप्त हुई है, वह चिंतन से हुई है सही, लेकिन चिंतन कर्म में से मुक्ति की अपेक्षा नहीं रखता, बल्कि कर्म में से ही चिंतन उत्पन्न होता है। जो चिंतन कर्म में से मुक्ति की अपेक्षा रखता है वह मनुष्य को सही रास्ते पर नहीं, बल्कि अनुचित रास्ते पर ले जाता है। विकास के बदले विनाश की तरफ ले जाता है। फुरसत के समय का चिंतन भी निकम्मा होता है। जिस चिंतन का आधार प्रत्यक्ष कर्मयोग पर, अनुभव पर नहीं होता है, वह चिंतन हवा में रह जाता है। मनुष्य के शरीर की रचना भी ऐसी है कि उसका मस्तक आकाश में होते हुए भी पाँव जमीन से लगे हुए हैं। मानवमूर्ति, मनुष्य के जीवन की कैसी व्यवस्था होनी चाहिए, इसका सृजन करती है। इसलिए ज्ञान, कर्म और आनंद, जिसको अब मैं भक्ति कहूँगा, तीनों का एक साथ अनुभव करना चाहिए। वैदिक ऋषि बोल रहा है “तवेत् इन्द्र अहं आशसा हस्ते दातुरं च ना दधे” -हे परमेश्वर, तेरी प्राप्ति के लिए हाथ में हँसिया लेकर मैं खेत में काम करता हूँ। संस्कृत ‘दाद्र’ से गुजराती में ‘दातरडु’ शब्द बना है। दाद्र पर से इतना सीधा प्राकृत शब्द सम्भवतः दूसरी किसी भी भाषा में नहीं है। तो वह ऋषि दाद्र को ईश्वर-प्राप्ति का साधन मानता है। उससे उसकी जो दृष्टि है, वह गीता की है। आश्रम-जीवन और नई तालीम के पीछे भी यही दृष्टि है।

यह नई नहीं है, लेकिन उसका अमल बीच के जमाने में नहीं होता था और इस जमाने में भी। यद्यपि चारों ओर काम-काम और काम दिखायी देता है, बड़े-बड़े यंत्र और कारखाने दिखायी देते हैं और बड़े पैमाने पर उत्पादन का विचार किया जाता है, फिर भी सारी प्रवृत्ति कर्म टालने की है। यंत्र अपने आप नहीं घूमता। चेतन की मदद के बिना अखण्ड चलने वाला कोई यंत्र नहीं निकल सकता, जब यह सिद्ध हुआ तब इस निर्णय पर आए कि मनुष्य का हाथ यंत्र को लगाना चाहिए। लेकिन नीयत तो कर्म टालने की ही है।

फिर कर्म से मुक्ति पाने की कल्पना की जाती है और उसके अनुकूल तत्वज्ञान भी खड़े किये जाते हैं। लेकिन देह के होते हुए कर्म से मुक्त होना, यह मुक्ति का अर्थ नहीं है। जिसके कारण देह उत्पन्न हुआ है, उस वासना को काटना, यह मुक्ति का अर्थ है और ऐसी मुक्ति कर्म करने पर ही प्राप्त हो सकती है, क्योंकि वह अंतिम अवस्था है। जो अंतिम अवस्था है, वह ज्ञानारम्भ से ही नहीं प्राप्त की जा सकती। नदी के उस पार जाने से जो आनंद मिलता है, वह इस पार रह कर नहीं मिल सकता। पहाड़ पर चढ़कर उसकी चोटी पर बैठने में जो आनंद मिलता है, वह बिना पहाड़ पर चढ़े, तलहटी पर बैठे रहने से नहीं मिलेगा। अंतिम कर्म मुक्ति में देहमुक्ति की कल्पना है। जब तक देह है तब तक बाह्य कर्म करते हुए मन में कर्म-मुक्त होने की कोशिश अगर हम करते रहेंगे तो अंत में देह उड़ जायेगा और फिर से देह धारण करने की जरूरत नहीं रहेगी। इसी का नाम मुक्ति है।

साराँश एक बाजू से वैज्ञानिक, दूसरी बाजू से तत्वज्ञानी और तीसरी बाजू से आलसी, तीनों मिलकर कर्म से मुक्ति पाने के मार्ग ढूँढ़ते आये हैं, जब कि गीता में और बापूजी ने भी, जिन्होंने आश्रम की रचना की, समझाया कि प्रत्यक्ष उत्पादक कर्म-योग ही मुक्ति पाने का मार्ग है। उत्पादक परिश्रम तो दुनिया भी करती है, लेकिन वह लाचारी से करती है। हमको वह इच्छापूर्वक और ज्ञान प्राप्ति की दृष्टि से करना चाहिए।

कर्ममय उपासना की यह खूबी होती है कि उसमें अगर उपासना की भावना है तो श्रेय होता है और वैसी भावना न रही तो कम से कम उत्पादन तो होता ही है। गीता में धर्मयुद्ध का वैसा ही वर्णन किया गया है। वैसी भावना इस उपासना में है।

हमारे प्राचीन धार्मिक लोग भी उपासना का रूढ़ करने में यशस्वी हुए हैं। आमतौर से धर्म में भेद थे ही। तो हर धर्म वालों ने अपनी-अपनी अलग उपासना रूढ़ की, लेकिन वे उपासनाएँ कर्ममय नहीं थी; वांग्मय थीं। इसलिए दोनों तरफ से लाभ नहीं देती थीं। ध्यानयोग के लिए अगर हम एक साथ बैठ जायं, जैसे कुछ लोग कहते हैं और उस ध्यान में अगर हम यशस्वी होते हैं तो ध्यान का लाभ जरूर मिलता है; लेकिन वैसी ध्यान क्रिया जिनके मन में नहीं चलती, उनके लिए वह आराम की या आलस्य की क्रिया बन जाती है। यानी ध्यान योग की उपासना इकहरी लाभदायी है। मन में ध्यान हुआ तो लाभ और वैसा ध्यान न हुआ तो अलाभ। लेकिन कर्ममय उपासना दोनों तरफ से लाभदायी होती है, इसलिए सामुदायिक दृष्टि से कर्ममय उपासना ही श्रेष्ठ होती है।


वेदों के मूलभूत तथ्य

(श्री सूरजचन्द जी सत्यप्रेमी डाँगी)

प्रातः स्मरणीय गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के निर्माण द्वारा मानव-समाज पर अनुपम उपकार किये हैं। यों तो उनका कहना है कि मैंने यह रघुनाथ-गाथा ‘स्वान्तः-सुखाय’ प्रकट की है। परन्तु उनके ‘स्वान्तः’ को सम्पूर्ण भारतवर्ष का हृदय समझना चाहिए। जब हमारे देश के निवासी वेद के तत्वों को भूल गये थे और घोर कलिकाल के वश में होकर दुराचार परायण हो रहे थे, तब उन्होंने हमको राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का मूर्तिमान् स्वरूप बतलाकर वेदों के चारों तत्वों का संरक्षण किया।

बालकाण्ड में ज्ञानी मुनियों के द्वारा दशरथ जी के प्रति जो वचन कहे गये हैं वे हमारे कथन को प्रमाणित करते हैं।

धरे नाम गुरु हृदय विचारी। वेद-तत्व नृप तव सुत चारी॥

अर्थात् गुरु महाराज वशिष्ठ जी ने मन में अच्छी तरह से विचार करके ही चारों नाम रखे हैं। हे राजन! तुम्हारे चारों ही पुत्र वेदों के चार तत्व मूर्तिमान् स्वरूप धारण करके आये हैं। अब हमें विचार करना है कि ज्ञानी मुनियों के इन वचनों में किस प्रकार परम सत्य भरा हुआ है। ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और कर्म- ये चारों ही वेद तत्व हैं। भगवान् श्रीराम चंद्र ज्ञानस्वरूप हैं, जिनके दिव्य प्रकाश में सब तत्व अपना-अपना कार्य ठीक तरह से कर सकते हैं। क्योंकि वे परमकुशला कौशल्या के सुपुत्र हैं। परम श्रेष्ठ मैत्री की आदर्श रूपिणी नारी महारानी सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न के रूप में भक्तित्व और कर्मतत्व को उत्पन्न किया है। भरत जी वैराग्य के जाज्वल्यमान प्रतीक हैं। आलस्य ही हमारा शत्रु है। जिसका नाश करने वाले कर्मतत्वरूप शत्रुघ्न इन वैराग्य-स्वरूप भरतजी के अनुशासन में ही रहते हैं तथा हमारा भरण-पोषण और संरक्षण होता है। अगर हमारा कर्म वैराग्य के साथ न रहे तो वह शैतान का कर्म है। और वैराग्य में कर्म को अपने साथ नहीं रखा तो वह हैवानों का वैराग्य है। परन्तु भरत-शत्रुघ्न निरंतर साथ हैं। इसलिए वे मानवता स्थापना में सफल हो सके।

लक्ष्मणजी उपासना-भक्ति के आदर्श प्रतीक हैं। यह उपासना-भक्ति ज्ञानस्वरूप भगवान का क्षण भर भी साथ नहीं छोड़ती। इसलिए मानवता का संरक्षण हो सका। ज्ञानहीन भक्ति हैवानियत है और भक्तिहीन ज्ञान शैतानियत है। हमारे राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न इस विश्व के विचित्र चित्रकूट पर जब एक साथ मिलते हैं, तब मानवता अपने सम्पूर्ण रूप में प्रस्फुटित होती है। और वहीं ज्ञान भक्तिरूप राम-लक्ष्मण को अपने हृदय में बसाकर जब भरत जी वैराग्य पूर्ण कर्म की घोषणा करते हैं तभी अयोध्या के राज्य चलाने में समर्थ होते हैं। उसी प्रकार ज्ञान भक्ति स्वरूप राम-लक्ष्मण वैराग्य-कर्मरूप भरत-शत्रुघ्न को अपने दिल में मजबूत कर लेते हैं। तभी वे सफलता पूर्वक राक्षसों का संहार कर सकते हैं। अगर ज्ञान और भक्ति में वैराग्य पूर्ण कर्म का मिश्रण नहीं हो तो मंगल कार्य अधूरा ही रहेगा।

यों तो इन चारों तत्वों को हम अलग-अलग कह सकते हैं, पर सचमुच इन्हें हम अलग-अलग कर नहीं सकते। क्योंकि वे अलग-अलग रह नहीं सकते। मिठाई खायी तो उसके रंग रूप, उसके वजन, उसकी लम्बाई, चौड़ाई और उसकी सुगंध-मधुरता ये सब अलग-अलग कहे जाने पर भी पेट में एक साथ पहुँच जाते हैं। यह कैसे हो सकता है कि मिठाई का रंग−रूप तो खा लिया जाय और उसका वजन अलग रहने दें। उसके सुगंध माधुर्य का तो उपभोग ले लिया जाय और उसकी लम्बाई, चौड़ाई छोड़ दें। इसलिए भगवान ने कहा है कि मैं सूर्यवंश में अपने सम्पूर्ण अंशों के साथ मनुष्यावतार धारण करूंगा। हमने देखा कि ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और कर्म ये वेदों के चारों तत्व ही भारतवर्ष को सगुण साकार रूप में प्राप्त हो गये। जहाँ निर्मल ज्ञान होगा, शुद्ध भक्ति वहाँ अवश्यम्भावी है और उसी प्रकार जहाँ शुद्ध वैराग्य होगा वहाँ शुद्ध कर्म जरूर ही होगा। वैराग्य में कर्म नहीं छूटता। कर्म का राग छूटता है। उसी प्रकार ज्ञान में भक्ति नहीं छूटती, भक्ति का दम्भ छूटता है।

आइये, हम सब वेदों के इन चारों तत्वों को एक साथ जीवन में उतार कर दशरथ जी के चारों पुत्रों की सच्ची आराधना-साधना करें, जिससे कि हमारे देश में सच्चा राम राज्य आ जाये। हम आज नाम तो राम का लेते हैं और काम हराम का करते हैं। आज हमारा शत्रुघ्न, भरत के अनुशासन में नहीं चलता। आज हमारा लक्ष्मण, राम को भूल गया है। इसलिए कहीं पर भी सीता के दर्शन नहीं होते। सीता के समान शाँति हमें तभी मिलेगी जब हमारी भक्ति और कर्म ज्ञान-वैराग्य के अनुशासन में रहेंगे और हमारे ज्ञान-वैराग्य भक्ति-कर्म को अपने साथ बनाये रखेंगे। ईश्वर करे-हम अपने अन्तःकरण चतुष्टय के वेदों के इन चारों तत्वों से परिपूर्ण बना लें, जिससे कि हमारा मन राम की ओर लक्ष्य करके सच्चा लक्ष्मण बने और हमारी बुद्धि तरह-तरह के विकृति प्रलोभनों में न फँसकर भरत के समान वैराग्य की ओर बढ़े। हमारा चित्त राम के प्रकाश से प्रकाशित होकर सच्चा ज्ञान प्राप्त करे और हमारा अहंकार शत्रुघ्न बन कर अपनी सेवाओं को सबके लिए समाज के लिए समर्पित करे। तभी हम सब तरह से स्वस्थ, सुखी और शाँत बन सकेंगे। दुनिया में शाँति स्थापना का सामर्थ्य वेदों के इन चार तत्वों की प्रतिष्ठ में ही सन्निहित है। जिसको हमें प्रयत्न पूर्वक जाग्रत करना पड़ेगा।


दुःख मिलना भी आवश्यक है।

(राय साहब शिवशंकर जी पण्ड्या)

इस संसार में ऐसा कोई बिरला ही मनुष्य होगा कि जो किसी न किसी प्रकार के दुःख से दुःखी न हो। कोई शारीरिक कष्ट से छटपटाता है तो कोई मानसिक वेदना से व्याकुल होकर लम्बी-लम्बी सांसें भरता है। क्या ज्ञानी क्या अज्ञानी दुःख सभी पर आते हैं, परन्तु दोनों के दुःख सहने के प्रकार भिन्न हुआ करते हैं। कहा है कि- “ज्ञानी भुगते ज्ञान सों, मूरख भुगते रोय!” इसका एकमात्र कारण यह है कि दोनों प्रकार के मनुष्य दुःख को भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से देखते हैं अज्ञानी मनुष्य दैवी प्रकोप को अपने दुःख का कारण समझते हैं और इसलिए यह कहा करता है कि भाई ईश्वर जो दिखाता है वह देखना पड़ता है, मनुष्य का इसमें कोई वश नहीं। परंतु इसके विपरीत मनुष्य समझता है कि इसमें ईश्वर का कोई दोष नहीं; मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। महात्मा तुलसीदास जी ने रामायण में कहा है कि “कर्म प्रधान विश्व करि रखा। जो जस करहि सो तस फल चाखा।” जिस मनुष्य का इस सिद्धाँत पर अटल विश्वास है वह अच्छी तरह समझता है कि मेरे दुःख के द्वारा मेरे पिछले पाप कर्मों का क्षय हो रहा है और इस प्रकार दुख के भीतर छिपे हुए अपने कल्याण की झलक देखता है और इसलिए वह अपने दुःख को धैर्य एवं साहस के साथ सहन करता है। इसके सम्बंध में एक अपराधी का दृष्टांत लीजिए कि जिसको किसी अपराध के कारण कारागार वास का दुःख उठाना पड़ रहा है, उसको कष्ट तो होता है। पर उसके साथ-साथ उसके अपराध का भी क्षय होता जाता है। जो अपराधी इस बात को समझता है वह धैर्यपूर्वक अपने दण्ड की अवधि समाप्त करता है और आगे के लिए सतर्क रहता है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सोना तपाने से शुद्ध होता है उसी प्रकार मनुष्य भी दुःखों के ताप से तप कर पापों से मुक्त होता है।

विचारपूर्वक देखा जाय तो सुख इस संसार की एक बड़ी संचालन शक्ति है, उसी की लालसा से मनुष्य क्रियावान् होता है। सुख और दुःख का जोड़ा है। दुःख के कारण ही सुख का महत्व है। यदि दुःख न होता तो सुख का कोई भी मूल्य न रह जाता और न उसमें संचालन शक्ति ही रहती। परिणाम यह होता कि मनुष्य की सारी क्रियाएं बंद हो जातीं और वह एक जड़ पदार्थ की नाई उद्यमहीन और निःचेष्ट बन जाता और इस प्रकार उसके विकास का मार्ग बिल्कुल बंद हो जाता। इस दृष्टि से भी दुःख की बड़ी उपयोगिता सिद्ध होती है।

मनुष्य का विकास एक दैवी विधान है। जीवात्मा का परमात्म स्वरूप होकर उसमें लीन हो जाना ही विकास का अंतिम लक्ष्य है। वास्तव में जीवात्मा परमात्मा से पृथक नहीं है, वरन् उसी परम ज्योति की एक चिंगारी है। अज्ञान का आवरण पड़ जाने से उसमें पृथकता आ गयी है और वह अपना असली रूप भूलकर अल्प यज्ञ बन गया है। इस सम्बंध में बर्फ और पानी का एक प्राकृतिक दृष्टांत लीजिए। वास्तव में ये दोनों कोई भिन्न पदार्थ नहीं है, केवल रूपांतर के कारण उनमें पृथकता आ गयी है। ज्यों ही बर्फ गलकर पानी का रूप धारण कर लेती है त्यों ही उसकी पृथकता नष्ट हो जाती है। इस प्रकार जीवात्मा अपनी अल्पज्ञता के कारण ज्ञान रूप परमात्मा से पृथक मालूम पड़ता है, परंतु जिस समय वह सर्वज्ञता प्राप्त कर लेगा उस समय उसकी ये पृथकता नष्ट हो जायेगी और वह परमात्मा स्वरूप हो जायेगा। विकास और ज्ञान का घनिष्ठ सम्बंध है, जैसे-जैसे मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है वैसे-वैसे वह विकास की सीढ़ी पर ऊपर उठता जाता है। तात्पर्य ये है कि दुःख ज्ञान संपादन करने में भी सहायक होता है।

दुःख आत्मबल संपादन करने का एक साधन रूप है। ये तो सभी जानते हैं कि दुःख सहने के लिए आत्मबल की आवश्यकता होती है और शारीरिक बल के अनुसार वह बल भी अभ्यास से ही बढ़ता है। जिस मनुष्य में आत्मबल नहीं होता वह मनुष्य दुःख से इतना व्याकुल हो जाता है कि आत्मघात तक कर बैठता है। वह समझता है कि जीवन के अंत के साथ-साथ मेरे दुःखों का अंत भी हो जायेगा। ये उसकी बड़ी भारी भूल है। मनुष्य अपने शरीर को भले ही त्याग दे परंतु उससे वह अपने कर्म के बंधनों से कदापि मुक्त नहीं हो सकता। कहावत है कि “कटे न पाप भुगते बिना।” जो लोग जीवन के इस रहस्य को समझते हैं वे दुःख पड़ने से कभी विचलित नहीं होते। वे जानते हैं कि दुःख से केवल पापों का ही क्षय नहीं होता बल्कि उनका आत्मबल भी बढ़ता है। जो उनको जीवन संग्राम में सहायक होगा और नये-नये पाप करने से बचायेगा। मन की दुर्बलता ही मनुष्य को पाप कर्मों की ओर खींच ले जाती है।

ऊपर जो कहा गया है उसका साराँश यह है कि-

1. दुःख से पाप कर्म का क्षय होता है।

2. दुःख संसार के संचालन में सहायक होता है।

3. दुःख ज्ञान संपादन करने का एक आधार है।

4. दुःख आत्म बल प्राप्त करने के लिए एक साधन है।

वास्तव में दुःख एक सर्जन के चाकू की नाई देखने में कठोर पर परिणाम में हितकर होता है। तब ही तो आशावादी लोग कहा करते हैं कि “जो कुछ होता है वह भले के लिए ही होता है” ये ऐसा जगत व्यापी सिद्धाँत है कि जिससे कठिन से कठिन प्रसंग पड़ने पर भी मनुष्य को बड़ा आश्वासन मिलता है।


महामानवों की महानता

(सर आर्थर हेल्पस्)

जब भी आप महापुरुषों के विषय में सोच रहे हों “महा” के स्थान पर दूसरा शब्द नहीं लगा सकते हैं। मानव प्रयत्नों की किसी भी दिशा में प्रवीण कार्य-कुशलता का नाम भी महानता नहीं है। संसार के महान् ज्योतिषी, महान विद्वान, महान चित्रकार और यहाँ तक कि महान कवि भी होते हैं किंतु ये सब महापुरुषों की श्रेणी में नहीं आते। क्योंकि महानता का मापदण्ड सफलता नहीं है। सफल और असफल दोनों ही व्यक्ति महान हो सकते हैं। ब्रिटेन के विजयी सेनापति मालबरोकी की अपेक्षा पीछे हटता हुआ सम्राट विलियम अधिक महान है और दूसरी ओर सीजर को निरंतर मिलने वाली सफलताएँ उसकी महानता को कम नहीं करतीं। सच बात तो यह है कि परिस्थितियाँ किसी को महान नहीं बनाती अपितु स्वयं व्यक्ति महान् होता है।

प्रश्न यह उपस्थित होता है कि तब इस महानता के दर्शन कहाँ हो सकते हैं? गुण, उद्देश्य और शक्ति के उचित संतुलन में यह सुलभ नहीं है। माना कि इस संतुलन से मनुष्य सुखी और सफल मनुष्य होगा और उसमें जीवन की गहराई होगी। न ही यह महानता दोष हीन जीवन में है। महापुरुषों की किसी भी लिस्ट को देख जाइये और यह बात स्पष्ट हो जायेगी, और न ही यह महानता जीवन शक्ति में है। यद्यपि जीवन शक्ति के साथ इसके दर्शन हो सकते हैं। यथार्थ में महानता का आभास पाने के लिए हमें तेज धारा की शक्ति की अपेक्षा सागर के गाँभीर्य की कल्पना करनी होगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब जीवन-शक्ति उन गुणों को जिन्हें हम एक शब्द में कार्य कुशलता कह सकते हैं, प्रभावित करते हुए किन्हीं स्पष्ट उद्देश्यों की पूर्ति में लगी होती है और इस प्रकार कोई बहुत बड़ा प्रयोजन सिद्ध होता है तब हम कभी-कभी इस जीवन शक्ति को ‘महानता’ का पर्यायवाची मानने की भूल कर सकते हैं। यदि एक मनुष्य स्वयं की उन्नति के लिए जूझ रहा हो तो उसकी बहुत सी मुश्किलें आसान हो जाती हैं। उसे एक शक्ति प्राप्त हो जाती है और उसकी चाल में सुँदरता दिखायी देने लगती है। यही दशा उस समय भी होती है जब मनुष्य किसी एक प्रमुख विचारधारा का पीछा कर रहा हो फिर चाहे वह विचारधारा कितनी भी संकुचित क्यों न हो। सच पूछो तो जीवन की सफलता तो बहुधा उद्देश्य की एकता में ही निहित है। दूसरी ओर यह भी सत्य है कि बहुधा उद्देश्य की एकरूपता में महानता को सफलता नहीं मिलती। किंतु केवल इस कारण से महानता नष्ट भी नहीं हो सकती है।

यदि महानता को किन्हीं गुणों की सीमा में बाँध सकते हैं तो वे गुण हैं- साहस और आत्मिक सहानुभूति एवं मानसिक शक्ति। आरंभ में ये गुण इतने प्रभावशाली नहीं प्रतीत होते किंतु जरा देखिए तो प्रगति की इनमें कितनी सम्भावना है। ग्रहण शील मस्तिष्क वाले व्यक्ति की शिक्षा कभी भी समाप्त नहीं होती है और आत्मिक सहानुभूति वाला मनुष्य उसके संपर्क में आने वाले सब मनुष्यों की आत्मा में प्रवेश कर जाता है, उनकी भावना को पकड़ लेता है, उनके अनुभवों को ग्रहण कर लेता है और इस प्रकार वह स्वयं में ही एक समाज बन जाता है। सहानुभूति तो सम्पूर्ण विश्व को एक सूत्र में जोड़ने वाली औषधि है। इसके बिना कुछ भी नहीं समझा जा सकता इसलिए यह कहना अनुचित नहीं है कि मनुष्य के समझने की शक्ति उसकी सहानुभूति की मात्रा के अनुसार कम या अधिक हो सकती है।

एक प्रश्न और भी कि सहानुभूति के अतिरिक्त और क्या हो सकता है जो स्वार्थ को कुँठित कर दे। स्वार्थ को गहरी सावधानी और आत्म परित्याग द्वारा रोका तो जा सकता है किंतु वह कुँठित केवल उसी परिस्थिति में होगा जब मानव प्रकृति को चारों ओर बढ़ने और दूर-दूर के पेड़ों पर अपने तंतु फेंकने का अवसर दिया जाय।

सहानुभूति से हीन होने में क्या-क्या दोष हैं इसका स्पष्ट भान हमें उन प्रयत्नों की सफलता से मिलता है जो सभी युगों में धार्मिक चरित्र निर्माण के लिए सहानुभूति से दूर रहकर किये गये हैं। प्रयत्नों के परिणामस्वरूप केवल ऐसे पात्रों का निर्माण हो सका है जो आत्म परित्याग के तंग मार्ग पर इधर-उधर घूमते हैं, स्वयं के गुण-दोषों पर विचार करते रहते हैं, अपने मन को सही अर्थ में संसार से नहीं किंतु अपने बंधुओं से अलग रखते हैं और उनको केवल यही चिंता रहती है कि क्या वे अपने पड़ोसी को अपने ही उस तंग मार्ग पर चलने को बाधित करें या फिर उसे सिर के बल धक्का दें। इस प्रकार अनेक सद्गुणों और चरित्र निर्माण के लिए कठिन परिश्रम के बावजूद भी हमें महान हठधर्मी अथवा दूसरों की आलोचना करने वाले हीन व्यक्ति ही निर्मित होते दिखायी देते हैं।

किंतु सहानुभूति में तो उत्साह के साथ-साथ प्रकाश भी है। यह तो सारी सजीव प्रकृति को जोड़ने वाली नैतिक कड़ी है। मानव समुदाय के विचार, भाषा और शिक्षा इत्यादि के अंतर पर से क्षण भर के लिए दृष्टि हटाकर चरित्र की आँतरिक विषमता की ओर हम देखें। जब कभी भी वैज्ञानिक ने प्राणि जगत् में एक नई जाति की खोज की, वे आश्चर्य चकित होकर रह गये, किंतु क्या हरेक मनुष्य प्राणी नहीं है जिसे कि संसार में पहले कभी भी नहीं देखा गया था और तब जरा ध्यान कीजिए कि राजकुमारों से लेकर झाड़-झंखाड़ों और अंधेरी कोठरियों में जन्म लेने वाले बालक तक का कितनी बड़ी संख्या में मानव-समुदाय इस संसार में आता-जाता है। इन मनुष्यों को किस प्रकार समझा जा सकता है, किस प्रकार एक-दूसरे को समझना सिखाया जा सकता है? यह कार्य तो केवल वे ही कर सकते हैं जिनमें सबके प्रति गहरी सहानुभूति है। गहरी सहानुभूति के बिना मनुष्य महान हो ही नहीं सकता है। ऐसे मनुष्य भी हो सकते हैं जो जीवन में सहानुभूति के बिना भी बड़े-बड़े पार्ट अदा करते हैं। जैसे कि स्टेज पर राजा और महापुरुष कभी-कभी प्रवेश करते हैं किंतु वे तो दूसरी श्रेणी के चरित्र होते हैं-दूसरों के जीवन का खेल खेलने वाले महापुरुष। किंतु कल्याण-भावना तो उन्हीं में हो सकती है जो दूसरों के लिए सोचते और कष्ट भोगते हैं और सच्ची शिक्षा भी उन्हीं में है जिनमें गहरी सहानुभूति है।

इस सहानुभूति के साथ साहस और जोड़ दीजिए और तब हमें ऐसा व्यक्ति प्राप्त हो जायेगा जो बुराई के विरोध में स्थिर रह सके और क्षमा, विश्वास और पराक्रम कर सके। संक्षेप में वह ऐसे सब कार्य कर सकता है जो सहानुभूति और पैनी दृष्टि के सहारे उसमें जाग उठते हैं।

मैं नहीं मानता कि राष्ट्र की महानता में व्यक्ति की महानता के इन गुणों के अतिरिक्त और अन्य कोई गुण भी होते हैं। बाहरी परिस्थितियां राष्ट्रों पर भी उतना ही प्रभाव डालती हैं जितना व्यक्तियों पर और व्यक्ति की अपेक्षा राष्ट्र के रूप-निर्माण में इनका अधिक हाथ रहा है। हम स्वभावतः ही ऐसे किसी भी राष्ट्र को जो सीमा, साधन और चरित्र की दृष्टि से उन्नत न हो, महान नहीं मान सकते हैं। किंतु ऐसे दो राष्ट्रों की जिनमें अन्य सब पहलू समान हैं, तुलना करने पर श्रेष्ठता उसी के पल्ले पड़ेगी जो साहस और मानसिक एवं आत्मिक सहानुभूति की दृष्टि से श्रेष्ठ हो।

इसी प्रकार संसार के भिन्न-भिन्न युगों की तुलना करते समय भी हम उन्हीं गुणों का निरीक्षण करेंगे जो कि एक व्यक्ति को तौलने के लिए उपयोग में लाते हैं। उदाहरणार्थ वर्तमान और भूतकाल की तुलना। भूतकाल के विषय में सोचने पर उस समय की आश्चर्यजनक असहिष्णुता और निर्दयता का ज्ञान प्राप्त कर दाँतों-तले अंगुली दबा लेनी पड़ती है। ऐसी निर्दयता जो बार-बार उलटकर निर्दयी पर भी चोट करती और ऐसी असहिष्णुता जो उन्हीं चीजों को बर्बाद करने पर तुली रहती जिन्हें कि उसे पाल-पोसकर बड़ा करना चाहिए। मानव कार्य की इस भट्ठी में समय-समय पर नीति उपदेश डाले गये हैं किंतु ऐसा लगता है कि इससे आँच अधिक ही बढ़ती रही है। मनुष्य अपनी बुद्धि का श्रेष्ठ रूप शायद अपने साथियों को अप्रसन्न करने और दुःख देने में ही बिगाड़ता आया है। भूतकाल में पृथ्वी की उत्पादन शक्ति भी अधिक थी तभी तो मनुष्य निर्दयता के लिए समय बचा सका फिर भी उस समय कठोरतम अकाल भी हुए। ऐसे अकाल जिनका सानी वर्तमान में नहीं मिलता। यही दशा न्यायपद्धति की रही हैं। चाहे आप मुझे वर्तमान का अनुचित प्रशंसक ही मानें, मैं यह कहने के लिए तैयार हूँ कि वर्तमान में हम अधिक महान् हैं। हमारे मस्तिष्क और आत्मा अधिक सहानुभूतिमय है। हमारा दिल और दिमाग खुला हुआ है। हम या हममें से कुछ तो अवश्य ही इस निर्णय पर पहुँच गये हैं कि यदि मनुष्यों के विरोधी मतों में सच्चाई है तो वहाँ कटुता का कोई प्रयोजन नहीं होगा। हमने तो एक दूसरे के प्रति दयावान होना अधिकाधिक सीख लिया है। आज की सहिष्णुता की महानता हमारे पूर्वजों में नहीं थी।

अब हम महानता के दूसरे गुण साहस पर विचार करें। क्या हमारे युग ने इस दिशा में कुछ प्रगति की है? यह प्रश्न भी शंका से पूर्ण है। भय के भूत के रूप युग-युग में इतने बदलते रहते हैं कि उसके सामना करने की भिन्न अवस्थाओं की तुलना कर साहस के अधिक या कम होने का निर्णय देना कठिन है। आज मनुष्य लोकमत से उसी प्रकार से भयभीत रहता है। जिस प्रकार कि भूतकाल में निर्दयी राजाओं से। और हमारी सामाजिक स्थिति और चेहरे ग्रीसवासियों की भाग्यदेवियों के समान हैं, जो पल में बना दे और पल में मिटा दे। वर्तमान और भूतकाल में कितना साहस मौजूद है या था, यह तुलना संभव नहीं है; किंतु मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि नव जागरण के साथ-साथ साहस नहीं बढ़ेगा।

इन तथ्यों को भिन्न-भिन्न स्थितियों में कसौटी पर कसने का कोई अंत नहीं है और इससे क्या परिणाम होंगे इस पर भी मनुष्य के भिन्न मत होंगे। किंतु तथ्य शाश्वत है कि हम सहानुभूति और सहिष्णुता के प्रकाश के प्रति ग्रहणशील रहें और साहस से निरंतर बढ़ते ही जायें।


नारी की महानता को पहचानिए।

(स्वामी श्री विवेकानंद जी)

जबकि वेदाँत की यह घोषणा है कि सभी प्राणियों में वही एक आत्मा विराजमान है, फिर स्त्रियों और पुरुषों के बीच इतना भेद क्यों रखा गया है, समझना कठिन है। स्मृतियाँ आदि को लिखकर कड़े नियमों का बंधन उन पर रखकर पुरुषों ने स्त्रियों को केवल संतानोत्पादक यंत्र बना रखा है। अवनति के युग में जबकि पुरोहित लोगों ने अन्य जातियों को वेदाध्ययन के लिए अयोग्य ठहराया, उसी समय उन्होंने स्त्रियों को अपने अधिकारों से वंचित कर दिया। वैदिक और औपनिषदिक युग में मैत्रेयी, गार्गी आदि पुण्य स्मृति महिलाओं ने ऋषियों का स्थान ले लिया था। सहस्रों वेदज्ञ ब्राह्मणों की सभा में गार्गी, याज्ञवलक्य को ब्रह्म विषय में शास्त्रार्थ के लिए ललकारती है।

सभी उन्नत राष्ट्रों ने स्त्रियों को समुचित सम्मान देकर ही महानता प्राप्त की है। जो देश और राष्ट्र स्त्रियों का आदर नहीं करते, वे कभी बड़े (उन्नत) नहीं हो पाये हैं और न भविष्य में ही कभी उन्नत होंगे।

यथार्थ शक्ति पूजक तो वही है जो जानता है कि ईश्वर विश्व में सर्वव्यापी शक्ति है और उसी शक्ति को वह स्त्रियों में प्रगट देखता है। अमेरिका में पुरुष अपनी महिलाओं को इसी दृष्टि से देखते हैं, और उनके साथ अत्युत्तम बर्ताव करते हैं, इसी कारण वे लोग सुसम्पन्न हैं, विद्वान हैं, इतने स्वतंत्र हैं और शक्तिशाली हैं। हमारा देश अवनत दशा को पहुँच गया है इसका मुख्य कारण शक्ति की इन सजीव प्रतिमाओं के लिए आदर बुद्धि न होना ही है। मनु महाराज का कहना है-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्त फलाः क्रियाः॥

अर्थ- जहाँ स्त्रियों का आदर होता है, वहीं देवता प्रसन्न रहते हैं और जहाँ उनका आदर नहीं होता वहाँ सभी कार्य और प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं।

जहाँ ये स्त्रियाँ उदासी का जीवन व्यतीत करती हैं उस कुटुम्ब या देश की उन्नति की आशा नहीं हो सकती।

स्त्रियों की बहुतेरी कठिन समस्याएं हैं, पर उनमें एक भी ऐसी नहीं है जो उस जादू भरे शब्द “शिक्षा” के द्वारा हल न हो सके।

हमारे मनु महाराज की आज्ञा है? “पुत्रियों का पालन और उनकी शिक्षा पुत्रों के समान ध्यान और सावधानी के साथ होनी चाहिये।” जैसे पुत्रों का विवाह तीस वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य पालन के पश्चात होना चाहिए। उसी प्रकार पुत्रियों को भी बीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। पर हम लोग यथार्थ में कर क्या रहे हैं? उन लोगों को सदैव निःसहाय अवस्था में रहने और दूसरों पर गुलाम के समान अवलम्बित रहने की शिक्षा दी जाती है। इसी कारण किंचित भी दुःख या भय का अवसर आने पर वे आँखों से आँसू बहाने के सिवाय और किसी योग्य नहीं रहतीं। स्त्रियों को ऐसी (परिस्थिति) अवस्था में रखना चाहिए कि वे अपनी समस्याओं को अपने ही तरीके से हल कर सकें। हमारी भारतीय स्त्रियाँ इसके लिए संसार की अन्य स्त्रियों के समान ही योग्य हैं।

स्त्रियों की शिक्षा का प्रसार-धर्म को केन्द्र बनाकर रखना चाहिए। अन्य सभी शिक्षाएं धर्म की अपेक्षणीय हैं। धार्मिक शिक्षा, चरित्र गठन, ब्रह्मचर्य पालन इनकी ओर ध्यान देना चाहिए। हमारी हिंदू स्त्रियाँ सतीत्व का अर्थ आसानी से समझती हैं क्योंकि यह उनका अनुवाँशिक गुण है। सर्वप्रथम तो उनमें यह आदर्श अन्य गुणों की अपेक्षा सुदृढ़ किया जाए जिससे कि उनका चारित्र्य सबल बने और उसी की शक्ति वे अपने जीवन की प्रत्येक अवस्था में चाहे विवाहित या अविवाहित (यदि वे अविवाहित रहना चाहें तो) बिल्कुल निडर होकर पवित्रता से रंच भर भी डिगने की अपेक्षा अपने प्राणों का समर्पण करने के लिए तैयार रहें।

इस युग की वर्तमान आवश्यकताओं का अध्ययन करने पर यह आवश्यक दीखता है कि उनमें से कुछ को वैराग्य के आदर्श की शिक्षा दी जाय, जिससे कि वे युगान्तर से अपने रक्त में संजात ब्रह्मचर्य रूप सद्गुण की शक्ति द्वारा प्रज्वलित होकर आजीवन कुमारीव्रत का पालन करें। हमारी जन्म भूमि को अपनी समुन्नति के लिए अपनी कुछ संतानों को विशुद्धात्मा ब्रह्मचर्य और ब्रह्मचारिणी बनाने की आवश्यकता है। यदि स्त्रियों में से एक भी ब्रह्मज्ञानी हो जाय तो उसके व्यक्तित्व के प्रकाश से सहस्रों स्त्रियाँ स्फूर्ति प्राप्त करेंगी और सत्य के प्रति जाग्रत हो जायेंगी। इससे देश और समाज का बड़ा उपकार होगा।

सुशिक्षित और सच्चरित्र बनी ब्रह्मचारिणी शिक्षा कार्य का भार अपने ऊपर लें। ग्रामों और शहरों में केन्द्र खोलकर स्त्री शिक्षा के प्रसार का प्रयत्न करें। ऐसे सच्चरित्र निष्ठावान उपदेशकों के द्वारा देश में स्त्री शिक्षा का यथार्थ प्रचार होगा। इतिहास और पुराण गृह व्यवस्था और कला कौशल, गृहस्थ जीवन के कर्त्तव्य और चरित्र गठन के सिद्धाँतों की शिक्षा देनी चाहिये और दूसरे-दूसरे विषय सीना-पिरोना, गृह कार्य-नियम, शिशुपालन आदि भी सिखाये जायं। जप, पूजा और ध्यान शिक्षा के आवश्यक अंग हों और दूसरे गुणों के साथ-साथ उन्हें शूरता और वीरता भाव भी प्राप्त करने चाहिए। आधुनिक युग में उनको आत्मरक्षा के उपाय भी सीख लेने की आवश्यकता है। झाँसी की रानी कैसी अपूर्व स्त्री थीं! इस प्रकार हम भारत वर्ष के कार्य के लिए संघमित्रा, लीला, अहिल्याबाई और मीराबाई के आदर्शों को चरितार्थ करने वाली तथा अपनी पवित्रता, निर्भयता और ईश्वर के पाद स्पर्श द्वारा प्राप्त शक्ति के कारण वीर माता बनने योग्य महान निर्भय स्त्रियों को सामने लायेंगे। हमें यह भी करना होगा कि वे समय पर गृह की आदर्श माता बनें। जिन सद्गुणों के कारण हमारी ये मातायें प्रसिद्ध हैं। उनकी संतान इन सद्गुणों की और भी उन्नति करेंगी। शिक्षित और धार्मिक माताओं के ही घर में महापुरुष जन्म लिया करते हैं।

यदि महिलायें उन्नति प्राप्त कर लें तो उन की संतान अपने उदार कार्यों के द्वारा देश का नाम उज्ज्वल करेंगे, तब तो संस्कृति, ज्ञान, शक्ति और भक्ति देश में जागृत हो ही जायगी।


“पंगु” धर्म को सहारा दीजिए।

(श्रीराम शर्मा आचार्य)

इस युग में धर्म “पंगु” है। इसे सहारा देकर खड़ा कर दिया जाय तो खड़ा रहता है अन्यथा सहारे के अभाव में लड़खड़ा कर गिर पड़ता है। कमजोर पैरों वाला मनुष्य जिस प्रकार खड़े होने, चलने-फिरने के लिए किसी का सहारा ढूँढ़ता रहता है वही स्थिति आज धर्म की है। सहारा न मिले तो वह आगे चलना तो दूर अपने स्थान पर भी सीधा खड़ा नहीं रह पाता।

पूर्व काल में युग प्रभाव से हर मनुष्य के हृदय में धार्मिक प्रवृत्ति, प्रेरणा, आस्था और श्रद्धा पर्याप्त मात्रा में रहती थी। इसलिए वह अपने जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए आवश्यक सत्कर्मों को स्वयं करता था। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का स्रोत उसके अन्तःकरण में से स्वयं फूटता रहता था। फलस्वरूप कर्त्तव्य मार्ग पर उसकी जीवन यात्रा स्वाभाविक रीति से चलती रहती थी। सभी धर्मात्मा होते थे, सभी अपने कर्त्तव्य धर्म को पहचानते थे, सभी को सुरदुर्लभ मानव शरीर की महानता का ज्ञान था, सभी अपने जीवन को सफल बनाने के लिए सत्कर्मों की स्वयं चिंता करते थे। उस पूर्वकाल में यह संसार स्वर्गभूमि बना हुआ था। सभी प्राणी आनंद की क्रीड़ा करते हुए नर तन को अपूर्व सौभाग्य मानते थे। सभी कंठों से एक स्वर में निकलता था- “जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” मनुष्यों का मनः क्षेत्र पारस्परिक सहयोग और सद्भाव से, प्रेम और सेवा की तरंगों से ‘सदा सर्वदा’ तरंगित रहता था। फलस्वरूप भौतिक जगत में भी सुख साधन की वस्तुएं इतनी अधिक मात्रा में उपस्थित रहती थी कि कहीं किसी वस्तु का घाटा ही न दीखता था। अभावग्रस्त, चिंतित, दुःखी पीड़ित, सताये हुए मनुष्य तो कहीं दीख ही न पड़ते थे।

आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। संसार में उपभोग और आवश्यकता की वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में भरी पड़ी हैं, पर थोड़े से आदमी उस पर कब्जा करके बैठ जाते हैं। फलस्वरूप शेष सारी जनता अभाव ग्रस्त, दरिद्र रह जाती है। कोई व्यक्ति जीवन यापन के जितनी वस्तुओं से संतुष्ट नहीं रहना चाहता। हर किसी को अधिक, बहुत अधिक-असीम वस्तुओं के संग्रह और उपभोग की तृष्णा, व्याकुल किए हुए है। गरीब से लेकर अमीर तक, सभी अपने कर्त्तव्य पालन में अधिक से अधिक कंजूसी करना चाहते हैं और अधिकार के लिए बड़ी-बड़ी माँगे उपस्थित कर रहे हैं। कोई किसी को अपनी सच्ची आत्मीयता, सेवा, स्नेह भावना नहीं देना चाहता-अपनी वस्तुओं या अधिकारों का त्याग दूसरों के लिए नहीं करना चाहता वरन् दूसरों से अधिक से अधिक लाभ किस प्रकार उठाया जा सकता है इसी की फिराक में रहता है। इस घुड़दौड़ में वह उचित अनुचित में, पाप पुण्य में, नीति अनीति में, कोई अंतर नहीं रखना चाहता। जैसे भी बने अपना काम बनाने की उसे चिंता है।

इस परिस्थिति में मनुष्य के सामने दो ही समस्याएं उपस्थित रहती है- 1. अधिक शौक, मौज, भोग-विलास, सम्पत्ति संग्रह, स्वामित्व रौब दौब, सत्ता, अधिकार, पद, बड़प्पन के सुख साधनों को किस प्रकार संग्रह किया जाय?

2. इस व्यापक स्वार्थपरता की घुड़दौड़ में जन समाज में जो परस्पर संघर्ष मचा रहता है-शोषित आत्म रक्षा के लिए शोषक आक्रमण के लिए -जो उपद्रव करते हैं उस पर अपनी विजय कैसे हो? स्वार्थपरता की असीम तृप्ति में वस्तु प्राप्ति की कोई मर्यादा नहीं, इसलिए वह कभी तृप्त नहीं होती। अतएव उस दृष्टिकोण के व्यक्ति अपने को सदा दरिद्र, अभाव ग्रस्त, दुखी, अनुभव करते रहते हैं। नीति का मार्ग छोड़कर जब लोग अनीति की सहायता से अपना स्वार्थ पूरा करना चाहते हैं तो निश्चित रूप से विरोध, द्वेष, संघर्ष, कलह उत्पन्न होता है। यह कलह अनेक रूप धारण करके सामने आता है और उससे शाँति एवं सुरक्षा का वातावरण नष्ट हो जाता है। आज यही स्थिति है, इससे हर कोई परेशान है। आत्मरक्षा या आक्रमण के-विलास और संग्रह के ताने बाने बुनने में से किसी के पास विचार एवं समय शेष नहीं रहता। दिन रात के 24 घंटे प्रायः इसी गोरख धंधे में आज साधारण जनता व्यतीत करती है।

फिर धर्म कर्त्तव्यों के लिए समय कहाँ से मिले? धार्मिक भावनाओं का प्रवेश मन में किस प्रकार हो? आत्म चिंतन की प्रेरणा कहाँ से आवे? सभी ओर घोर स्वार्थपरता में डूबे हुए-भौतिक समस्याओं में उलझे हुए-मनुष्य दीखते हैं तो कोई व्यक्ति एकाकी-अपने लिए अलग रास्ता बनाने की इच्छा भी नहीं करता। सब उसी ढांचे में ढलते चले जाते हैं। देखा-देखी से उत्साह प्राप्त करने अनुकरण करने में प्रसन्न होने की मानसिक कमजोरी के कारण लोग उसी दिशा में बहते चले जाते हैं जिसमें अन्य सब लोग बहते हैं। इस प्रक्रिया के कारण आज जन मानस का प्रवाह एक बुरे मार्ग पर चल रहा है। धर्म और परमार्थ के वास्तविक आदर्शों की ओर सच्चे मन से चलने वाले कोई विरले ही मिलते हैं। जहाँ इस प्रकार का कुछ दीखता भी है वहाँ अधिकाँश में गुरुडम, व्यक्ति पूजा, सम्प्रदायवाद अथवा अन्य प्रकार के छल प्रपंचों से परिपूर्ण पाखंड ही देखा जाता है।

इन परिस्थितियों में धर्म का ‘पंगु’ हो जाना स्वाभाविक ही है। मनुष्य में पाशविकता की अधिक और देवत्व की स्वल्प मात्रा होती है। पतनकारी-अधोमुखी प्रवृत्तियाँ बड़ी सरल एवं गतिशील होती हैं। एक बाल्टी पानी फैला दिया जाय तो वह बिना किसी प्रयत्न के नीचे की ओर ढलवां भूमि में अपना रास्ता आसानी से बनाता हुआ बह निकलेगा। किंतु यदि उस पानी को ऊपर की दिशा में चढ़ाना हो तो अनेक साधन, सामग्री, मशीन, मजदूरी आदि की व्यवस्था करनी पड़ेगी। सन्मार्ग की ओर मनोभावनाओं को मोड़ने के लिए बहुत प्रयत्न करने पड़ते हैं। तब कहीं थोड़ी प्रगति होती है। यदि पानी को ऊपर खींचने के साधन न हों तो वह जहाँ का तहाँ पड़ा रहेगा ऊपर न चढ़ सकेगा। जिस प्रकार पानी पंगु है उसी प्रकार धर्म भी पंगु है। बिना सहारा पाये न तो पानी ऊपर चढ़ता है और न धर्म का अभ्युदय होता है। उन दोनों ही कामों के लिए सहारे की, सहारा देने वालों की जरूरत पड़ती है।

जब-जब धर्म को सहारा देने वाले मिल जाते हैं तब वह खड़ा हो जाता है, जब उसे कोई सहारा नहीं देता तो वह लुँज-पुँज होकर एक कोने में बैठ जाता है। अंधे का सहारा उसकी लकड़ी न हो तो अंधे को रास्ता पार करना मुश्किल हो जाय। युग प्रभाव से आज धर्म की भी यही स्थिति है। कुछ धर्म प्रेमी लोग दूसरों को सत्कर्म-पूजा उपासना-सामूहिक सेवा आदि करने के लिए स्वयं कटिबद्ध होते हैं और दूसरों के पीछे पड़कर उनसे इच्छा अनिच्छा के साथ, आग्रह, अनुरोध, मित्रता, खुशामद, नाराजी, प्रार्थना, शिक्षा आदि के आधार पर कुछ कराते रहते हैं तो काम कुछ होता दीखता है। पर जब वह प्रेरणा देने वाले कुछ ढीले पड़ते हैं तभी वे “किसी प्रकार” तैयार किये व्यक्ति कंधा डाल देते हैं। उनका उत्साह ठंडा पड़ जाता है। एक बार छोड़े हुए कार्य को पुनः आरंभ करने में उन्हें कुछ हेठी, झिझक, संकोच की सी स्थिति मालूम पड़ती है। इसलिए वे दुबारा कहने सुनने पर पहले से भी अधिक शिथिल बन जाते हैं।

गायत्री उपासना का जो व्यापक कार्यक्रम देश भर में चलाया जा रहा है यह बात केवल उसी के संबंध में नहीं है, वरन् यह एक व्यापक समस्या है। सभी सत्कार्यों में इन दिनों सर्वत्र यही एक बात भिन्न-भिन्न प्रकारों से चरितार्थ होती है। सभा व्याख्यानों में, सत्संगों में, किन्हीं विशाल आयोजनों में प्रभावित होकर कई व्यक्ति कुछ शुभ काम करने के लिए प्रवृत्त होते हैं। कुछ दिनों उनका वह क्रम चलता भी है। पर थोड़े ही दिनों में शिथिलता आने लगती है और उनके से अनेकों का उत्साह समाप्त हो जाता है। आज की परिस्थिति को देखते हुए संसार में से अशाँति और अभाव को हटाकर सुख शाँति की स्थापना के लिए धार्मिक उपासनाओं तथा व्यवहारिक जीवन में धार्मिक प्रवृत्तियों का बढ़ाया जाना अतीव आवश्यक है। पर मार्ग में एक भारी कठिनाई यह है कि कार्य आसानी से होने वाला नहीं है। लेखनी और वाणी से- पुस्तकों और प्रवचनों से निस्संदेह इस दिशा में बड़ी सहायता मिलती है। पर वह सहायता ‘जमीन तैयार करने’ जितनी ही है। दृढ़ स्थायी और ठोस कार्य जब कभी होगा तो उसके मूल में धर्म को अपने कंधे का सहारा देने, अंधे की लकड़ी का उदाहरण बनने के लिए कुछ व्रतधारी कर्मठ धर्मात्मा लोग कटिबद्ध मिलेंगे। इस युग में धर्म पंगु है। उसे सहारा न मिलेगा तो खड़ा न रह सकेगा। कुछ प्रयत्न किये भी जायं तो वे कुछ समय में उत्साह मंद होने पर स्वयमेव समाप्त हो जायेंगे। यदि प्रेरणा देने वाले नैष्ठिक कार्यकर्ताओं की शक्ति उसके पीछे होगी तो ही वह सत्कार्य खड़ा रहेगा-आगे बढ़ेगा।

प्राचीन काल में सभी के मन में धर्म प्रेरणा पर्याप्त मात्रा में थी। इससे किसी सहायता की शिक्षा की जरूरत बहुत कम पड़ती थी-इसलिए धर्म प्रचार कार्य की विशेष आवश्यकता न होने के कारण अनेकों आध्यात्म प्रेमी व्यक्ति योगाभ्यास आदि एकाँत साधनाओं में लग जाते थे। पर जब कभी परिस्थिति बदली या बिगड़ी है तब-तब सच्चे आध्यात्म प्रेमी सत्पुरुषों ने धर्म को अपने कंधे का सहारा दिया है और उसे लड़खड़ा कर गिर पड़ने से बचाया है। देवर्षि नारद ने तो अपने जीवन की एकमात्र साधन-परिव्रज्या करते हुए निरंतर धर्म प्रचार करते रहना ही बनाया था। शंकराचार्य, दयानंद, नानक, कबीर, मीरा, बुद्ध, महावीर, गाँधी, विनोबा आदि के अगणित उदाहरण ऐसे हैं जिनमें एकांत सेवी, केवल अपना ही भला करने वाली साधनाओं को घटा करके अपना अधिकाँश समय धर्म प्रचार में लगाया। उनका यह कार्य एकाँत सेवी साधना की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि एकाकी साधना से उनको खुद को ही सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलती पर इस प्रचार कार्य ने तो असंख्य प्राणियों को सन्मार्ग से लगाकर सम्पूर्ण विश्व में सुख-शाँति की स्थापना में भारी योग दिया। सत्पुरुष निष्ठुर एवं स्वार्थी नहीं, दयालु और परोपकारी होते हैं वे स्वर्ग मुक्ति की भी परवाह न करके अनेक दुखी आत्माओं को सुखी बनाने के लिए करुण भाव से जनसेवा के सर्वश्रेष्ठ मार्ग-धर्म प्रचार को अपना लेते हैं।

मनुष्य की ही नहीं संसार के समस्त प्राणियों की सुरक्षा, समृद्धि और सुख शाँति इस बात पर निर्भर है कि-मनुष्यों के अन्तःकरणों में निवास करने वाली सद्भावना, सात्विकता, उदारता और संयमशीलता कायम रहे। यह तत्व जितना ही घटे उतना ही दुनिया दुख पायेगी, इसमें जितनी अधिक वृद्धि होगी उतने ही सुख−शांति के साधन जुट जावेंगे। विश्व के इस अत्यंत महत्वपूर्ण मनः क्षेत्र को सुव्यवस्थित रखने के लिए प्राचीन काल में सहस्रों ब्राह्मण अपना पूरा समय, पूरा जीवन खपाये रहते तब वह कार्य पूरा हो पाता था। आज उस मैदान को छोड़कर सभी कोई भाग गये हैं। यों तो कथित, साधु संतों, पंडे पुजारियों की संख्या 5 लाख से अधिक है। पर इनमें संभवतः 5-6 मुश्किल से ऐसे निकलेंगे, जो मुफ्तखोरी, आलस्य, मटरगश्ती या मुक्ति का जो विचित्र रूप रखा है उस खुदगर्जी को छोड़कर विश्व में स्थिर रखने के लिए कुछ विचार या कर्म करते हों। अन्य साधारण परिस्थितियों के लोग राजनीति की ओर दौड़ते हैं। हर कोई एम.एल.ए., एम.पी. मिनिस्टर या कम से कम नेता बनने कि फिराक में है।

निश्चय ही राजनीति एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उसके द्वारा भौतिक विधि व्यवस्था में बहुत योग मिलता है। पर यह भी निश्चय ही है कि मनुष्यों का मनः क्षेत्र यदि अधार्मिक, अनैतिक, पथ भ्रष्ट हो रहा हो तो राजनीति की सारी शक्ति लग कर भी लोगों के असामाजिक, अवाँछनीय, विचारों और कार्यों को रोक नहीं सकती। भ्रष्टाचारी जनता और भ्रष्टाचारी शासन तंत्र, दोनों की जोड़ी ‘एक अंधा एक कोढ़ी’ की उक्ति चरितार्थ करेगी। ऊपर से किये हुए बड़े-बड़े पुरुषार्थ इन छिद्रों में होकर बह जावेंगे। आज यही हो रहा है। करोड़ों रुपयों की कई योजनाएं अपना वास्तविक शुभ परिणाम उपस्थित करने के स्थान पर चंद लोगों की जेबें गरम करने मात्र का निमित्त बन कर असफल होती देखी जाती हैं। भ्रष्टाचार ऐसा ही असुर है जो भारी प्रयत्नों को भी क्षण मात्र में उदरस्थ कर जाता है। राजनीतिक प्रयत्न होने ही चाहिए पर साथ ही सर्वसाधारण जनता तथा शासन तंत्र को ईमानदार और सन्मार्गगामी रखने के एकमात्र साधन उनके धार्मिक विश्वासों को उचित दिशा में प्रवाहित करते रहने के लिए अंतरात्मा में निवास करने वाले उच्च आदर्शों, श्रद्धापूर्ण सिद्धाँतों एवं सद्भावनाओं को भी सुरक्षित रखना और बढ़ाया जाना आवश्यक है। अन्यथा भ्रष्ट जन समाज द्वारा जो अवाँछनीय प्रवृत्तियाँ बढ़ेंगी उन्हें राजदंड की सीमित शक्ति द्वारा रोक सकना किसी भी प्रकार संभव न हो सकेगा।

आज समय की, विवेक की, दूरदर्शिता की, एक ही पुकार है कि- “जनता का धार्मिक-नैतिक-नेतृत्व करने के लिए कुछ हस्तियाँ निकल कर सामने आवें। नारद, बुद्ध, महावीर, दयानंद, शंकराचार्य, गाँधी, नानक, मीरा आदि की तरह ऋषि परम्पराओं को अपनाते हुए गिरती हुई धर्म भावनाओं को नष्ट होने से बचावें।” नैतिक पतन एक भारी खतरा है-राजनैतिक पराधीनता से भी बड़ा खतरा है। इस खतरे से लड़ने के लिए शूरवीर योद्धाओं तथा आत्म ज्ञानियों की जरूरत है। राजनीति के समान सत्ता, यश तथा अन्याय उचित अनुचित लाभ प्राप्त करने का इस क्षेत्र का नेतृत्व करने वाले के लिए अवसर नहीं है, पर जो अवसर है पर इतना महान है कि- किसी राष्ट्र या जाति का जीवन मरण उसी पर निर्भर है।

धार्मिक नेतृत्व कर सकने वाले सुयोग्य व्यक्तियों की आज भारी आवश्यकता है। इतनी भारी जितनी संसार के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई। इस क्षेत्र में आज सुयोग्य और सच्चे व्यक्तियों की आवश्यकता के लिए कुहराम मचा हुआ है। इस अभाव के कारण हाहाकार हो रहा है। पर नेता बनने को कोई तैयार नहीं होता। गायत्री तपोभूमि में एक छोटा सा विनम्र-प्रयत्न, ‘साँस्कृतिक विद्यालय’ के रूप में-धार्मिक नेता तैयार करने के लिए चल रहा है। इस दिशा में काम करने के इच्छुकों को समुचित शिक्षा-दीक्षा देने के साथ ही उनके भोजन, वस्त्र, निर्वाह आदि का भी यथा संभव प्रबंध है, पर उपयुक्त व्यक्ति उस कार्य के लिए भी अग्रसर नहीं होते तो निराशा होती है। यों कई लोग यहाँ कौतूहल वश या अन्य कारणों से सीखने आते-जाते रहते हैं, क्रम किसी प्रकार चलता रहता है। बीस छात्र तो प्रायः सदा ही बने रहते हैं, पर जिस धातु की तलवारें बना करती हैं वह धातु न मिलने से काम की चीज नहीं बन पाती। भावना शील, अटूट श्रद्धावान, लोक हित के लिए मर−खप जाने की साध रखने वाले, घनघोर-परिश्रमी, एवं प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों को धार्मिक नेतृत्व के लिए दशों दिशायें पुकार रही हैं। साधु-ब्राह्मण जिनका यह कर्त्तव्य एवं व्यवसाय था उनकी प्रवृत्तियों को-मनोदिशा को देखकर घोर निराशा होती है। भिक्षान्न को अपना अधिकार मानने वाले और समाज सेवा की बात सुनते ही लड़ने को तैयार होने वाले, यह लोग अंधश्रद्धालु लोगों को मूँड कर अपना उल्लू सीधा भले ही करते रहें-इससे अधिक आशा इन लोगों से करना व्यर्थ है।

ऐसी दशा में अपने साधारण गृहस्थ जीवन में से थोड़ा-थोड़ा समय निकाल सकने वाले परमार्थी प्रेमी व्यक्ति अखण्ड-ज्योति और गायत्री परिवार में से ढूंढ़े जा रहे हैं। उन्हें व्रतधारी धर्म-सेवी के रूप में नियमित रूप से धर्म सेवा के लिए तत्पर किया जा रहा है। उनके शिक्षण शिविर उनके क्षेत्रों में करके धर्म सेवा की क्षमता, प्रवृत्ति एवं व्यवस्था समझायी जाये ऐसा सोचा जा रहा है। इस प्रकार के अनेकों लोग अपने-अपने क्षेत्र में थोड़ा-थोड़ा काम करके भी सब मिला कर बहुत बड़ा काम कर सकेंगे। साथ ही साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए नैतिकता प्रधान-धार्मिकता उत्पन्न करने के लिए ऐसे व्यक्तियों की भी बड़ी आवश्यकता है जो अपना पूरा समय और पूरा जीवन धर्म की हारती बाजी को जिताने में लगा सकें।

कई संस्थाएं लेखनी और वाणी के आधार पर अपने कार्यक्रम बनाती हैं। पुस्तक अखबार आदि छापना और भाषण व्याख्यान देना उनका प्रधान कार्य होता है। यह दोनों बातें भी आवश्यक हैं, पर ‘पंगु’ धर्म को कंधे का सहारा देकर खड़ा कर सकने के लिए कटिबद्ध कार्यकर्ताओं के बिना कोई ठोस काम नहीं हो सकता। जन साधारण का मनः क्षेत्र आज उतना सबल नहीं है कि लेख पढ़ लेने या व्याख्यान सुन लेने के बाद भी वह बहुत समय तक उस प्रेरणा को धारण किये रहे। इसके लिए तो वैसे लोगों की आवश्यकता है जो कोंच-कोंच कर लोगों को एक निश्चित दिशा में चलने की प्रेरणा देते रहें और उनसे वह कार्य बलपूर्वक-अनुरोध पूर्वक-किसी भी प्रकार करा सकें। इस सम्बंध में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को घर-घर जाकर, बुला-बुलाकर लाना और बारबार उनके यहाँ मिलने पहुँच कर अपनी विचारधारा से प्रभावित करने की कार्यशैली-बहुत ही उपयोगी है। इस शैली को अपनाकर ही काँग्रेस बढ़ी। कम्युनिस्टों ने, ईसाइयों ने तथा अन्यान्य सजीव संस्थाओं ने यही गतिविधि अपनाई है। गायत्री परिवार को भी यदि अपने आदर्शों और कार्यक्रमों में श्रद्धा है तो उसे भी यही शैली अपनानी पड़ेगी।

धार्मिकता, नैतिकता, संस्कृति की सुरक्षा और अभिवृद्धि का कार्य बढ़ सकता है। पौधा फल फूल सकता है, पर उसके लिए श्रद्धा और श्रम का खाद पानी आवश्यक है। कुछ लोग अच्छे सिद्धाँतों को स्वयं अपना लेते हैं- यह प्रशंसनीय है, पर जब तक कुछ लोग ऐसे न निकलें कि अपनी पूजा उपासना के समान ही दूसरों को प्रेरणा देने का महत्व समझें-तब तक सामूहिक क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हो सकती। लोगों का मन बहुत दुर्बल होता है। जब तक कोई कोंचते रहने वाला पीछे पड़ने वाला-पीछे पड़ते रहने वाला होता है तब तक उसके लिहाज से श्रद्धा या अश्रद्धापूर्वक कुछ धर्म कार्य करते हैं। जैसे ही वह पीछे पड़ने वाली प्रेरणा ठंडी हुई कि साधारण लोगों के सहयोग से चलने वाले संगठन का ढांचा बिखर जाता है और वह कार्यक्रम समाप्त हो जाता है। धर्म ‘पंगु’ है। सहारे की लकड़ी जैसे ही हटी, कि लड़खड़ा कर गिर पड़ता है।

गायत्री परिवार द्वारा इन दिनों ब्रह्मस्त्र अनुष्ठान की उपासनात्मक तथा अधिकाधिक सहयोगी बढ़ाने की संगठनात्मक प्रवृत्तियाँ चल रही हैं। आगे चलकर जब यह धर्म तंत्र कुछ मजबूत हो जायेगा-भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का व्यापक कार्यक्रम हाथ में लिया जायेगा और यह प्रयत्न किया जायेगा कि जन मानस में से स्वार्थपरता, अनैतिकता, अधार्मिकता हटे। लोग उच्च आदर्शों के अनुसार विचार और कार्य करें। जन साधारण का आन्तरिक एवं बाह्य जीवन इस प्रकार ढले कि उसके फलस्वरूप सर्वत्र प्रेम, सहयोग, सद्भाव, सदाचार, शाँति और समृद्धि का वातावरण बने। हम राजनीति तथा सामाजिक क्षेत्र की उपयोगिता समझते हैं-उन क्षेत्रों के कार्यों और कार्यकर्ताओं का हार्दिक अभिनंदन करते हैं, पर अपना कार्यक्षेत्र मनुष्य के आन्तरिक आसुरी दुर्गुणों को हटाने और उसके स्थान पर दैवी सद्गुणों की स्थापना तक सीमित रखना चाहते हैं। वस्तुतः संस्कृति की यही मर्यादा भी है। इस मर्यादा को छोटा नहीं समझना चाहिए। वस्तुतः यह एक ठोस तथ्य है, जिससे राजनीति की समस्याओं तथा समाज सुधार की आवश्यकताओं की पूर्ति सहज में ही हो सकती है।

यह ठीक है कि राजनीति तथा सामाजिक सार्वजनिक क्षेत्रों में सार्वजनिक कार्य करने से कार्यकर्ता को यश, सत्ता तथा अन्यान्य भौतिक लाभों की अधिक गुंजाइश रहती है। ऐसे ही कारणों से प्रेरित होकर बहुधा लोग उन क्षेत्रों में नेतृत्व प्राप्त करने की आपाधापी भी बहुत करते हैं। पद प्राप्त करने के लिए उचित अनुचित संघर्ष भी करते हैं। धार्मिक क्षेत्र में समय लगाने श्रम करने से वैसे भौतिक लाभों की गुंजाइश नहीं रहती और अपने आप को तप त्याग का उदाहरण भी बनना पड़ता है। इससे उथले लोग इधर कुछ आकर्षण न देखकर दूर ही रहते हैं, पर वस्तुतः यह क्षेत्र अन्य सभी क्षेत्रों से अधिक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। इसलिए विचारशील व्यक्ति आकर्षण विहीन होते हुए भी इस मार्ग को अपनाते हैं और अपनी वास्तविक महानता से प्रेरित होकर बहुत कुछ त्याग और प्रयत्न भी करते हैं। यदि ऐसे व्यक्तियों का सर्वथा अभाव होता तो पृथ्वी टिकी न रहती। वह धर्म के स्तम्भों पर ही टिकी हुई है।

गायत्री परिवार की सदस्यता में केवल कुछ मिनट प्रतिदिन उपासना करने की एक बहुत ही छोटी शर्त है। इस संस्था में धन का चंदा नहीं रखा गया है। उनकी कोई प्रधानता इसमें नहीं है। यहाँ समय की, श्रम की, सहयोग की, श्रद्धा की प्रतिष्ठ है। प्रतिदिन कुछ मिनट स्वयं जप करके सदस्यता की साधारण शर्त पूरी कर देने वालों में से-अब ऐसे कर्मठ व्रतधारी व्यक्ति भी निकलने चाहिए, जो श्रद्धापूर्ण सहयोग के साथ कुछ समय देने को भी तैयार हों। धर्म सेवा के लिए समय देने का व्रत लेने वाले ही व्रतधारी माने जायेंगे। अब गायत्री परिवार को अपने में से अधिकाधिक व्रतधारी कर्मनिष्ठ तैयार करने हैं, जिनके कंधे का सहारा लेकर बेचारा पंगु धर्म खड़ा हो सके, आगे चल सके, प्रगति कर सके। दूसरों को सन्मार्ग पर चलने के लिए कोंचते रहने वाले यह व्रतधारी ही वस्तुतः इस संस्था के प्राण होंगे। उनका समय और श्रमदान ही कुछ आशाजनक परिणाम उपस्थित कर सकने में समर्थ हो सकता है।

गृहस्थ की जिम्मेदारियों में व्यस्त व्यक्ति थोड़ा समय एक दो घंटा रोज छुट्टी का दिन-इन कार्यों के लिए दे सकते हैं। जिनके ऊपर कमाने की जिम्मेदारी नहीं है वे अपने क्षेत्र में अधिकाधिक या पूरा समय देने के लिए तत्पर होने का प्रयत्न करें। तपोभूमि के माध्यम से देश भर में प्रचारात्मक और संगठनात्मक कार्य करने की योग्यता और स्थिति के व्यक्ति मथुरा रह सकते हैं। जिन्हें वेतन की आवश्यकता न पड़े, केवल शरीर निर्वाह तक ही जिनकी आवश्यकता सीमित हो। पूर्ण त्याग केवल उन्हीं व्यक्तियों को करना चाहिए। इस प्रकार अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार हममें से हर एक को धर्म सेवा के लिए समय एवं श्रम का दान करना चाहिए।

राष्ट्र निर्माण के लिए-साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए-अपने अतीत गौरव को वापिस लाने के लिए-हमें कुछ काम करना पड़ेगा। समय और श्रम देना पड़ेगा। आज का भगवान-नर नारायण-चंदन, पुष्प, धूप दीप से संतुष्ट होने वाला नहीं है। उसे भक्त का प्रयत्न, पुरुषार्थ, समय और सहयोग चाहिए। आँसू बहाने वाले भक्त की नहीं- उसे पसीना बहाने वाले भक्त की आवश्यकता है। तीर्थ यात्रा करने वाले से नहीं-धर्म प्रेरणा के लिए लगाई जाने वाली धर्म फेरी से वह संतुष्ट होगा। आइये, हम अपने प्रभु की, राष्ट्र की, धर्म की, आज की इच्छा और आवश्यकता को समझें और उसके अनुसार कुछ करने को कटिबद्ध हों।

गायत्री माता हर वक्त कुछ न कुछ भौतिक लाभ माँगते रहने वाले भिखारियों को नहीं, अपनी आज्ञा में चलने वालों को- प्यार करती है, और उन्हें ही वह आशीर्वाद, वरदान, एवं वात्सल्य प्रदान करती है। जिसे पाकर जीवात्मा धन्य हो जाता है। हमें अपनी इच्छा पर नहीं-माता की इच्छा पर चलना है। उनकी इच्छा इस समय अधिक जप, अधिक ध्यान कराने की नहीं-धर्म क्षेत्र को सुविस्तृत करने में सहयोग लेने करने की है। आइए, वही सब कुछ करने में हम लोग संलग्न हों।


माला में 108 दाने क्यों?

(प्रो. अवधूत गोरेगाँव)

उपासना में जप का स्थान सबसे ऊपर है। राम नाम से लेकर गायत्री मंत्र तक सभी मंत्रों का जप माला पर ही किया जाता है। माला में 108 दाने होते हैं। इसके सम्बंध में सहज ही यह प्रश्न उठता है कि इतने ही दाने क्यों रखे गये? इससे न्यूनाधिक क्यों नहीं रखे गये?

ऋषियों ने प्रत्येक व्यवस्था बहुत विचारपूर्वक की है। माला तथा दानों की संख्या 108 के सम्बंध में निम्न तथ्य विचारणीय हैं-

बिना दर्मैश्र्च यत्कृत्यं यच्चदानं विनोदकम्। असंख्यया तु यजप्तं तर्त्सवं निष्फलं भवेत्॥

-(अंगिरा स्मृति)

अर्थात्- बिना कुशा के जो सतत् धर्मानुष्ठान और बिना जल संस्पर्श के जो दान तथा बिना माला संख्या ही जो जप-वे सब निष्फल होते हैं।

प्रथम तो माला के फेरने से कितना जप हुआ इस बात का ठीक पता चल जाता है।

दूसरे अंगुष्ठ और अंगुली के संघर्ष से एक विलक्षण विद्युत उत्पन्न होती है जो धमनी के तार द्वारा सीधी हृदय-चक्र को प्रभावित कर मन को तुरंत ही निश्चल कर देती है।

सब कार्यों में नित्य कार्य में आने वाली माला एक सौ आठ दाने की होती है, जिसके ऊपरी भाग में सुमेरु पृथक् रहता है। माला के इन 108 दानों का अपना विशुद्ध वैज्ञानिक रहस्य है।

1- प्रकृति-विज्ञान की दृष्टि से विश्व में प्रमुख रूप से कुल 27 नक्षत्रों को मान्यता दी गयी है। तथा प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण ज्योतिष-शास्त्र में प्रसिद्ध हैं। 27 को चार-चरणों से गुणाकार करने पर 108 संख्या होती है।

अतः 108 संख्या समस्त विश्व का प्रतिनिधित्व करने वाली सिद्ध होती है।

ब्रह्मांड में सुमेरु की स्थिति सर्वोपरि मानी गयी है। अतः माला में सुमेरु का स्थान सर्वोपरि ही रखा जाता है तथा उसका उल्लंघन नहीं किया जाता।

2- दिन-रात में मनुष्य-मात्र के श्वासों की संख्या 21 हजार 6 सौ वेद शास्त्रों में निश्चित की गयी है-

षट् शतानि दिवारात्रौ सहस्त्राण्येक विंशतिः। एतत्संख्यात्मकं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा॥

-(चूड़ामणि उपनिषद् 32/33)

इस हिसाब से दिन भर के श्वाँस 10800 हुए तथा रात भर के श्वाँसों की संख्या भी 10800 हुई।

जप प्रमुख रूप से उपाँशु किया जाता है जिसका फल सामान्य रूप से सौ गुना बताया गया है।

अतः प्रातः सायं संध्या में 108-108 जप करने से 108&108= 10800 हुआ।

3- ज्योतिष शास्त्र में समस्त विश्व-ब्रह्मांड को 12-12 भागों में विभाजन किया गया है, जिनको “राशि” की संज्ञा प्रदान की गयी है। तथा प्रमुख रूप से 9 ग्रह माने गये हैं। अतः 12 राशि और 9 ग्रह का गुणनफल 108 होता है।

4- सृष्टि का मूल है ब्रह्म, जो कि निर्गुण, निर्विकार नित्य सत्य एवं सत्व युक्त है। उसके उत्पन्न अव्यक्त में इस गुण के अतिरिक्त आवरण शक्ति का प्राधान्य है जिससे उसका स्वभाव दो प्रकार का हो ही जाता है। इससे आगे महत् है, जिसमें उपरोक्त दो गुणों के अतिरिक्त विक्षेप शक्ति का समावेश भी है।

फलतः वह त्रिगुणात्मक हुआ।

अहंकार ब्रह्म का चतुर्थावकार है, जो तत्वों के आधिक्य और पूर्ववर्ती पदार्थ के तीन गुणों को भी धारण करने से 4 गुणों वाला हुआ।

इस प्रकार आकाशादि सभी पदार्थ अपने एक विशेष गुण के साथ पूर्ववर्ती पदार्थों के गुणों से भी युक्त होते हैं। इस प्रकार जो जितने गुणों को धारण करता है, उतने गुणों वाला कहलाता है।

1-अव्यक्त-2, महत्-3, अहंकार-4, आकाश-5, वायु-6, तेज-7, जल-8, भूमि-9 और नवगुणात्मक जगत् को धारण करने वाली अपरा 10-प्रकृति=54

यह तो सृष्टि क्रिया हुई, अब इसी क्रम में प्रलय प्रक्रिया समझनी चाहिए।

फलतः ‘सुमेरु’ रूप ब्रह्म से आरम्भ करके 54 उपादानों द्वारा जिस सृष्टि का निर्माण हुआ था, वह 54 उपादानों द्वारा ही प्रलय को प्राप्त होकर 108 की संख्या पूर्ण कर सुमेरु पर ही समाप्त हो जाती है।


निःस्वार्थ समाज सेवी-श्री अन्नाजी

(श्री विश्वनाथ कुलश्रेष्ठ)

झाँसी के लक्ष्मी व्यायाम मंदिर के संस्थापक श्री अन्नाजी एक स्वयं-निर्मित व्यक्ति हैं जिन्होंने अनुकूल परिस्थितियाँ न होते हुए भी जन सेवा के लिए विशेष महत्व का रचनात्मक कार्य कर दिखाया है। उनका जन्म अब से 48 वर्ष पहले मंदसौर (ग्वालियर) में हुआ था और बाल्यकाल से ही उनमें निर्माण शक्ति के लक्षण दिखलाई पड़ते थे। उनमें एक ऐसी प्रकृतिदत्त योग्यता थी कि जिस किसी कार्य को दूसरों को करते देखते थे उसे थोड़े से प्रयत्न से ही वे स्वयं करके दिखा देते थे। वे प्रायः कागज के फूल, पत्ती, मोम तथा मिट्टी के खिलौने, काटे हुए चित्र, सिनेमा के चित्र आदि बनाकर अपने साथियों तथा घर वालों का भी मनोरंजन किया करते थे। पढ़ने में भी वे कमजोर नहीं थे और अध्ययन काल में सदैव छात्रवृत्ति पाते रहे।

स्कूल में लड़कों को जिमनास्टिक करते देख उनकी भी हार्दिक इच्छा उसे करने की होती थी। उनकी विशेष रुचि देखकर उम्र में छोटा होने पर भी अध्यापक जी ने उन्हें कुछ सिखाया। एक बार एक साथी ने मलखम्भ पर व्यायाम करने की विधि उनको बतलाई। इन सबको उन्होंने केवल 11-12 वर्ष की अवस्था होते हुए भी शीघ्र समझ लिया और अध्यापक के सामने पहली बार में करके दिखा दिया।

उनकी रचनात्मक प्रवृत्ति और संगठन शक्ति का प्रथम नमूना उस समय मिला जब एक बार की गर्मी की छुट्टियों में वे अपने पिताजी के पास सीहोर गये और उसी दरम्यान कुछ लड़कों को इकट्ठा करके एक अखाड़े और हनुमान मंदिर की स्थापना कर दी। इसका अधिकाँश कार्य उन्होंने अपने ही हाथ से किया था।

इसी समय एक घटना ने इनका ध्यान व्यायाम की तरफ और अधिक आकर्षित किया। इनके भाई ने इनके लिए एक कोट सिलवाया जो बिलकुल फिट था। साथियों में से किसी ने कहा कि लड़कों का कोट कुछ ढीला होना चाहिए। भाई साहब ने उत्तर दिया कि वह तो टी.बी. का मरीज है वह क्या मोटा होगा। वास्तव में अन्ना जी काफी दुबले-पतले थे, इससे भाई के शब्दों ने उनके हृदय पर विशेष चोट पहुँचाई। उन्होंने निश्चय किया कि मैं अवश्य ही अपना स्वास्थ्य सुधारुंगा और भाई की बात का उत्तर शब्दों द्वारा नहीं वरन् कार्य रूप में कुछ करके दूँगा।

इसके बाद वे नौकरी की खोज में झाँसी आ गये और शारीरिक अवस्था सुधारने के लिए एक व्यक्ति से मित्रता कर उसके साथ महाराष्ट्र व्यायाम शाला जाने लगे। इस समय उनकी आयु 18-19 वर्ष की हो चुकी थी और वे हाई स्कूल की परीक्षा पास कर चुके थे। इस व्यायाम शाला में उन्होंने लक्ष्य किया कि सब अपने-अपने काम से मतलब रखते हैं और छोटे बच्चों तथा नये लड़कों की तरफ कोई ध्यान नहीं देता। खासकर बच्चों की दशा पर उनको बहुत तरस आया कि घर में माता-पिता उनके विकास पर उचित ध्यान नहीं देते तथा बाहरी संस्थाओं में भी कार्यकर्ता उनकी उपेक्षा करते हैं। इस पर उनके भीतर से एक आवाज उठी कि मेरा जीवन बिगड़ा सो बिगड़ा अब मैं इन बच्चों की अवस्था सुधारने का प्रयत्न अवश्य करूंगा।

इसी बीच सन् 1929 श्रीगणेश शंकर जी विद्यार्थी के सभापतित्व में झाँसी में एक कमेटी बनाई गयी जिसका उद्देश्य महारानी लक्ष्मीबाई के स्मारक के रूप में उनकी एक वीरवेश की प्रतिमा स्थापित करना तथा व्यायाम और अस्त्र शस्त्र की शिक्षा के लिए एक व्यायामशाला की स्थापना करना था। अन्नाजी के मन में उस समय यह भाव आया कि मैं अपने को पूर्ण रूप से इस कार्य में लगा दूँ। पर यह सोचकर चुप रहे कि इतने बड़े-बड़े सज्जनों के सामने हमारी क्या पूछ होगी। पर जब उन्होंने देखा कि वह कमेटी बिना कुछ ठोस कार्य किये ही समाप्त हो गई तो उन्होंने उक्त योजना को स्वयं अपने हाथ में लिया और अथक परिश्रम करके ‘लक्ष्मी व्यायाम मंदिर’ की स्थापना कर दी। लक्ष्मीबाई की एक भव्य प्रतिमा स्थापित हो गई, बहुत सी जमीन मिल गयी और व्यायाम मंदिर भी अच्छे पैमाने पर चलने लगा। श्री अन्नाजी का ध्यान संस्था में पाई जाने वाली प्रत्येक त्रुटि पर रहता है और वे उसे दूर करने का निरंतर उद्योग करते रहते हैं। उन्होंने बड़ौदा, अमरावती, पूना, जबलपुर, बम्बई, नागपुर, कलकत्ता, बनारस आदि दूर और पास के सभी प्रसिद्ध व्यायाम मंदिरों का ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया है और जहाँ जो भी विशेषता पाई है उसे अपने यहाँ नये रूप में प्रारम्भ किया है।

आपने व्यायाम संबंधी सब विषयों को एकत्रित करके उन्हें क्रम से चुनकर एक नियमित पाठ्यक्रम बना दिया है जो तीन भागों में विभाजित है। जो विद्यार्थी इन तीनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो जाते हैं वे वास्तव में व्यायाम कला में निष्णात कहे जा सकते हैं और अन्नाजी ने इन व्यक्तियों को सभी श्रेणी के स्कूलों में व्यायाम शिक्षक के पद पर नियुक्त किये जाने की सरकार से मंजूरी करा ली। इसमें संदेह नहीं कि अन्ना जी के परिश्रम और निस्वार्थ सेवा के बल से यह संस्था देश की चोटी की व्यायाम संस्थाओं में गिनी जाने लगी है और भविष्य में यह और भी ठोस कार्य कर सकेगी ऐसी आशा है।

यों लोक सेवा भी आज एक फैशन बन गया है। लोग किसी सभा सोसाइटी के पदाधिकारी बन कर अपना नाम छपवा कर, लीडरी का शौक पूरा करते रहते हैं। काम करने, समय देने, त्याग करने से कोसों दूर-पर लीडरी के वक्त बातूनी छप्पर बाँधने के लिए सब से आगे दीखते हैं। नकली घी की तरह नकली नेता भी आज सर्वत्र दिख पड़ते हैं। पर ऐसे लोग जो जन हित के लिए अपने आप को खपा दें, धुला दें, कोई बिरले ही होते हैं। जिनके भीतर लोक सेवा की सच्ची लगन होती है, मानव जाति की श्रेष्ठताओं को बढ़ाने के लिए तड़पन होती है वे अपने आपको तिलतिल जलाकर प्रकाश देने वाले दीपक की भाँति कठिन परिस्थितियों में भी बहुत कुछ कर डालते हैं, जबकि उनकी अपेक्षा अनेक गुनी अच्छी परिस्थितियों के व्यक्ति भी समाज सेवा के मार्ग में अमुक-अमुक कठिनाइयों के कारण रुकावट होने की बात ही सोचते रहते हैं।

अन्नाजी एक आदर्श जन नायक हैं। उनके भाषण नहीं उनकी प्रत्येक क्रिया है। उनके जीवन का प्रत्येक दिन सेवा संहिता का एक पृष्ठ कहा जा सकता है। शारीरिक, आर्थिक, पारिवारिक अनेक कठिनाइयों के बीच गुजरते हुए भी वे जितना महान कार्य कर सके हैं इसे लोक सेवकों के लिए एक प्रत्यक्ष पथ-प्रदर्शन ही कहना चाहिए।


हिन्दू समाज का घुन-दहेज

(श्री कृष्णकुमार बैस, मथुरा)

दहेज की प्रथा ने हिंदू-समाज को जितनी हानि पहुँचाई है, उसकी कल्पना भी कर सकना कठिन है। जरा उस पिता के हृदय की भावनाओं का अनुमान लगाइये कि जिसकी कन्या विवाह योग्य अवस्था को प्राप्त कर चुकी है पर बिना 4-6 हजार के कोई वर नहीं मिलता। उधर घर की यह हालत है कि बाबू जी महीने में जो दो-डेढ़ सौ वेतन लाते हैं उससे घर के 6 प्राणियों के भोजन, वस्त्र, मकान किराया, शिक्षा आदि का खर्च भी उचित प्रकार से नहीं चल पाता। जो लोग जनता के आगे धर्म-निष्ठ तथा कर्तव्य पालन की दुहाई दिया करते हैं वे भी ऐसे अवसरों पर कन्या और कन्या के पिता को दहेज की फाँसी लटका देने से नहीं चूकते। दहेज में कार मिलनी चाहिए-नहीं तो कन्या का बाप उसे विलायत शिक्षा प्राप्त करने को ही भेज दे! इस तरह की माँगे पेश करके 4-6 हजार की रकम को 8-10 हजार तक बढ़ा दिया जाता है।

इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि इस प्रकार जबर्दस्ती दहेज की माँग हर प्रकार से अनीतिपूर्ण और नीचता की द्योतक है। इससे एकमात्र कन्या के पिता की ही हानि नहीं होती, वरन् इसके परिणाम स्वरूप समस्त राष्ट्र पतन के मार्ग में अग्रसर होता है। दहेज के आधार पर जो विवाह होते हैं वे कभी आदर्श नहीं हो सकते, क्योंकि उनमें बजाय वर-कन्या की उपयुक्तता के धन के परिणाम पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इससे अधिकाँश विवाह अनमेल हो जाते हैं। धनवान पिताओं की पुत्रियाँ कम योग्यता वाली अथवा अनेक त्रुटियों से युक्त होने पर भी सुयोग्य वर पा जाती हैं, और गरीबों की गुणवती तथा रूपवती कन्यायें अयोग्य और अनेक बार अपनी आयु से कहीं बड़े व्यक्तियों से विवाही जाकर आजन्म कष्ट सहन करती रहती हैं। ऐसे अनमेल अथवा असुखी दम्पत्तियों की संतान भी कभी उत्तम नहीं हो सकती और इस प्रकार देश की भावी संतान का मानसिक और शारीरिक दृष्टि से पतन होने लगता है।

इसलिए आज इस बात की अत्यंत आवश्यकता है कि दहेज प्रथा का शीघ्र सुधार किया जाय। कन्यादान और चीज है तथा विवाह के पश्चात विदा के समय वर पक्ष वालों को कुछ सौगात तथा भेंट देना भी शिष्टाचार के अंतर्गत माना जा सकता है, पर विवाह का प्रश्न उठते ही सबसे पहले दहेज की रकम की बात उपस्थित कर देना और बिना उसके विवाह का निर्णय असंभव मानना निताँत अस्वाभाविक और समाज को प्रत्यक्ष रूप से हानि पहुँचाने का कार्य है। ऐसे कार्य को देश की सरकार ने भी निंदनीय माना है और व्यवस्थापिका सभाओं में उसको रोकने के लिए कानून बनाने के प्रस्ताव भी किये गये हैं। पर यह एक ऐसा सामाजिक विषय है जिसका सरकारी कानून द्वारा वास्तविक कन्ट्रोल हो सकना संभव नहीं, क्योंकि जो लोग दहेज लेना और देना चाहते हैं वे उसके लिए बीसों प्रकार के अप्रत्यक्ष रास्ते ढूँढ़ लेते हैं।

दहेज की इस राक्षसी प्रथा के परिणाम स्वरूप अब तक सैकड़ों निर्दोष कन्याओं की बलि दी जा चुकी है। हजारों घरों का सत्यानाश हो चुका है और निर्दोष स्त्री पुरुष नाना यातनाएँ सहन कर रहे हैं। हिंदुओं की विवाह प्रथा में यह कुरीति समाज की जड़ पर कुठाराघात कर रही है।

इस दशा को देखकर अपने नेताओं और गुरुजनों से हम यही प्रार्थना करते हैं कि वे इस संबंध में हमारे भाइयों का पथ-प्रदर्शन करें।


सत्संग द्वारा आत्मोन्नति कीजिए।

(श्री. मुन्नी देवी शर्मा, किशोरगढ़)

इस संसार में उन्नति करने-उत्थान के जितने भी साधन हैं ‘सत्संग‘ उन सबमें अधिक फलदायक और सुविधाजनक है। सत्संग का जितना गुणगान किया जाए थोड़ा है। पारस लोहे को सोना बना देता है। रामचंद्र जी के सत्संग से रीछ बानर भी पवित्र हो गये थे। कृष्ण जी के संग रहने से गाँव के गँवार समझे जाने वाले गोप गोपियाँ भक्त शिरोमणि बन गये।

सत्संग मनुष्यों का हो सकता है और पुस्तकों का भी। श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ उठना बैठना, बातचीत करना आदि और उत्तम पुस्तकों का अध्ययन सत्संग कहलाता है। मनुष्यों के सत्संग से जो लाभ होता है, वह पुस्तकों के सत्संग से भी संभव है। अंतर इतना है कि संतजनों के सत्संग का प्रभाव सजीवता के कारण शीघ्र पड़ता है।

आत्म संस्कार के लिये सत्संग से सरल और श्रेष्ठ साधन दूसरा नहीं। बड़े-बड़े दुष्ट, बड़े-बड़े पापी, घोर दुराचारी, सज्जन और सच्चरित्र व्यक्ति के संपर्क में आकर सुधरे बिना नहीं रह सकते। सत्संग अपना ऐसा जादू डालता है कि मनुष्य की आत्मा अपने आप शुद्ध होने लगती है। महात्मा गाँधी के संपर्क में आकर न जाने कितनों का उद्धार हो गया था, कैसे-कैसे विलासी और फैशन-परस्त सच्चे जन सेवक और परोपकारी बन गये थे। पुस्तकों का सत्संग भी आत्म-संस्कार के लिए अच्छा साधन है। इस उद्देश्य के लिए महापुरुषों के जीवन चरित्र विशेष लाभप्रद होते हैं। उनके स्वाध्याय से मनुष्य सत्-कार्यों में प्रवृत्त होता है और जघन्य कार्यों से मुँह मोड़ता है। गोस्वामी जी की रामायण में राम का आदर्श जीवन पढ़कर न जाने कितनों ने कुमार्ग से अपना पैर हटा लिया। महाराणा प्रताप और महाराज शिवाजी की जीवनियों ने लाखों व्यक्तियों को देश सेवा का पाठ पढ़ाया है।

सत्संग मनुष्य के चरित्र निर्माण में बड़ा सहायक होता है। हम प्रायः देखते हैं कि जिन घरों के बच्चे छोटे दर्जे के नौकरों-चाकरों या अशिक्षित पड़ोसियों के संसर्ग में रहते हैं वे भी असभ्य और अशिष्ट बन जाते हैं। उनमें तरह-तरह के दोष उत्पन्न हो जाते हैं और उनमें से कितनों का ही समस्त जीवन बिगड़ जाता है। इसके विपरीत जो लोग अपने बच्चों की भली प्रकार देख-रेख रखते हैं, उनको भले आदमियों के पास ही उठने बैठने देते हैं, स्वयं भी उनसे भद्रोचित ढंग से बातचीत करते हैं उनके बच्चे सभ्य सुशील होते हैं, और उनकी बातचीत से सुनने वाले को प्रसन्नता होती है। इसलिए हमको सत्संग की आवश्यकता बड़ी आयु में ही नहीं है, वरन् आरंभ से ही है हमको इस विषय में सचेत रहना चाहिए और खराब व्यक्तियों का संग कभी नहीं करना चाहिए।

जीवन में सुख प्राप्ति के लिए सत्संग का बड़ा महत्व है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज में रहना चाहता है। जीवन यात्रा के लिए वह कुछ साथी चुन लेता है जिनके साथ रहकर अपने दिन काटता है। अगर उसने गलती से बुरे साथी चुन लिए तो उसका जीवन दुःखी हो जायेगा। या भाग्यवश श्रेष्ठ संगी मिल गये तो उसका जीवन और सुखी हो जायेगा। उनसे उसे सदा सहायता मिलेगी और वे उसे सदा हितकारी सम्मति देंगे।

तुलसीदास ने ठीक कहा है :-

तुलसी संगति साधु की, हरै और की व्याधि । ओछी गति क्रूर की, आठौ पहर उपाधि॥


हमारी आँतरिक भावनायें

(श्री रामकृष्ण डेंगरे, कटनी)

समय का कार्य अपनी निश्चित गति से व्यतीत होना है- चाहे उसका परिणाम भला हो या बुरा। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। हमारी हृदयात्मा में प्रति सेकेंड अनेकों सार्थक और निरर्थक भाव (माइंड वेव्स) जाग्रत होते हैं। उनका समीकरण ही कर्म के रूप में प्रकट होता है। हमारी विचार धारायें जैसी आदर्श अथवा पतित होंगी, हमारा भविष्य भी उसी के अनुकूल हो जायेगा। भावनाओं पर ही चरित्र का उज्ज्वल अथवा काला होना अवलम्बित है। वर्तमान समय में मनुष्यों की भावनायें अधिकाँश में विकार युक्त हो रही हैं, जिसके कारण मनुष्य-मनुष्य में और राष्ट्र-राष्ट्र में पारस्परिक शत्रुता और वैमनस्य के भाव बढ़ते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। इसी से संसार में आजकल दूषित वातावरण छा रहा है और अशाँति बढ़ती जा रही है।

आज प्रत्येक देश, प्रत्येक परिवार में भी इस पारस्परिक विरोध के चिह्न दिखलाई पड़ते हैं और प्रेम तथा सहयोग का भाव घटता चला जाता है। इसके कारण घर की शाँति भी नष्ट होती जाती है। आत्मा व भावनाओं का उतना ही निकट संबंध है जितना चेतनावस्था और बोधशक्ति में है। मनुष्य अपनी वाणी से मन की बात को छुपा कर दूसरे को भ्रम में डालने का प्रयत्न करता है, पर उसकी आन्तरिक भावनायें दूसरे को उसके हृदय का भेद बतला ही देती हैं।

हमारी भली या बुरी भावनाओं का परिणाम व्यक्तिगत ही नहीं होता, वरन् उनका प्रभाव समाज और राष्ट्र पर भी पड़ता है। भारतवर्ष का जो पतन हुआ उसका कारण हमारी पारस्परिक विरोधी भावनायें ही थीं। यहाँ पर जाति-भेद और समुदाय-भेद का जहर बहुत ही अधिक मात्रा में फैल गया था। प्रत्येक दूसरे को छोटा या किसी दृष्टि से बुरा समझता था। उच्च वर्ण के लोग नीच वर्ण वालों के प्रति मनुष्यता विहीन व्यवहार करना अपना अधिकार समझने लगे थे और छोटे वर्ण वाले ऊँचे वर्ण वालों को अपना भाई या देशवासी समझने के बजाय शोषक और लूटने वाले समझने लगे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि एक धर्म के अनुयायी और एक स्थान के निवासी होने पर भी उनमें सहयोग और प्रेम का पूर्ण रूप से अभाव हो गया और फलस्वरूप समस्त देश का पतन हो गया।

मनुष्य को कर्म करने से पहले उसके विषय में पूर्णतः सोच विचार लेना आवश्यक है। क्योंकि कर्मफल निश्चित रूप से होकर रहेगा, चाहे शुभ हो या अशुभ। कार्य के परिणाम में भावनाओं का संबंध अनिवार्य रूप से होता है। मनुष्य का नश्वर शरीर कीमती नहीं होता वरन् उसकी नीति, चरित्र ही कीर्ति के द्योतक हैं। इसलिए हमारा कर्त्तव्य है कि अपनी भावनाओं को सदैव शुद्ध, पवित्र और उच्च रखें, जिससे हमारे कर्म भी परहितकारी और प्रशंसनीय हों। ये सब गुण मनुष्य जन्म से साथ लेकर नहीं आता। वह अपने उत्तम और उज्ज्वल चरित्र का निर्माण स्वयं ही करता है। उसके अंदर वह अदृश्य शक्ति छिपी है जिसके जागृत होने से आदर्श और सात्विक गुणों का विकास हो सकता है। गीताकार ने सत्य ही कहा कि “मन की प्रसन्नता और शाँतभाव एवं भगवत् चिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण की पवित्रता ही सच्चा तप है।”


यज्ञ का वास्तविक स्वरूप

(श्रीमती एनीबेसेण्ट)

‘यज्ञ’ हिन्दू धर्म का एक सबसे बड़ा सिद्धाँत है। गीता के कथनानुसार यह सृष्टि यज्ञ द्वारा ही उत्पन्न हुई और यज्ञ से ही उसकी स्थिति है। उसके तीसरे अध्याय के 8 वें श्लोक में बताया गया है कि “जिस आदि यज्ञ से भूतमात्र उद्भव होते हैं वही कर्म हैं।” इसी प्रकार 14 वें अध्याय के तीसरे श्लोक में कहा गया है उसका गर्भ देने वाला पिता ईश्वर है। “ईश्वर इस सृष्टि का आरंभ यज्ञ के रूप में ही करता है। ‘पुरुष सूक्त’ में भी कहा गया है कि “यज्ञ अर्थात् स्वार्पण से ही ईश्वर इस जगत की रचना के लिये व्यक्त हुआ इस जगत की स्थिति भी यज्ञ से ही है। यज्ञ से ही मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है।” इसलिये यज्ञ के विस्तृत अर्थ पर विचार करना और उसकी महिमा को हृदयंगम करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।

साधारणतः लोग मानते हैं कि यज्ञ या स्वार्पण दुःखमय है। यह हमारा भ्रम है। ‘यज्ञ’ का साराँश अपनी इच्छा से आनन्दपूर्वक त्याग करना है जिससे कि दूसरे लोगों को भी उसका भाग मिले। मनुष्य के दैवी अंश या उच्च प्रकृति को स्वार्थ त्याग में आनन्द मिलता है। इसके विपरीत मनुष्य की आसुरी या नीच प्रकृति को ग्रहण करने या पकड़ रखने में आनन्द मिलता है। यज्ञ से दुख व अनुभव तभी होता है जब कि यज्ञ कर्ता की उच्च और नीच प्रकृति में विरोध होवे। इस विरोध के कारण ही यज्ञ में दुख का प्रवेश होता है।

सृष्टि उत्पन्न करने के हेतु से ईश्वर ने अपनी इच्छा से अपने अनिन्त जीवन का त्याग कर उस जीवन की मर्यादा बाँध ली जिसमें वह व्यक्त हो सके। यह उसका यज्ञ है। “एकोहं बहुस्याँ प्रजायेयः- (मैं एक हूँ बहुत होऊँ) इस सूत्र में इसी यज्ञ का स्वरूप बताया गया है। प्रकाशमय अनन्त समुद्र में जिसका केन्द्र सर्वत्र है और परिधि कहीं नहीं है मान लो एक दिव्य गोल जीवित ज्योति प्रकट होती है। व्यक्त होने के लिए ईश्वर अपनी मर्यादा बाँधने की इच्छा करता है वह इच्छा इस ज्योति की हद है। यह हद उस की माया है जिसे वह जगत रचने के लिए धारण करता है। इस प्रकार ब्रह्ममय स्थिति के पूर्ण आनन्द का त्याग कर व्यक्त अवस्था में आना-यह ईश्वर का यज्ञ है ऐसा सदैव माना गया है। इससे ईश्वर अपने को बंधन में डाल लेता है, क्योंकि जब तक जगत की यह स्थिति है तब तक यह यज्ञ क्रिया भी जारी रहेगी, क्योंकि ईश्वर ही सब अंशों का आधार है। ईश्वर से जो अखण्ड रूप निकलते हैं उन सब में उसके अंश भरे हैं और वह इन उपाधियों के बंधनों को ग्रहण करता है। वह प्रत्येक उपाधि में प्रवेश करके उसकी अपूर्णता और बन्धन को तब तक सहन करता है जब तक उसमें पूर्णता न आ जावे और जब तक उसका रचा जीव उसके समान दिव्य होकर उसमें मिल न जावे। ईश्वर का समान प्रकार उपाधियों में अपना अंश भरना ऊपर लिखे “आदि- यज्ञ” का भाग है।

इसके विपरीत प्रकृति की असल क्रिया ग्रहण करना है। प्रकृति पर आत्मा की क्रिया होने से प्रकृति के रूप बनते हैं और उसी आत्मा से उनका निर्वाह होता है। उस आत्मा के खिंच जाने से उन रूपों का नाश हो जाता है। इसलिये प्राकृतिक रूप जितना बने अपने लिये ग्रहण करना चाहता हैं और अपने थोड़े अंश का भी त्याग करना उसे बुरा मालूम होता है। उसकी प्रसन्नता-पकड़ रखने अथवा ले लेने में ही है।

यज्ञ या स्वार्पण दुख रूप है यह विचार कैसे उत्पन्न हुआ यह बात उपर्युक्त विवेचन से समझ में आ जायेगी। आत्मा स्वार्पण द्वारा ही आनन्द पाता है। देहधारी अवस्था में भी जीव इस बात की परवाह नहीं करता कि स्वार्पण करने में शरीर का नाश होगा या नहीं, क्योंकि उसे मालूम है कि शरीर हमारा उद्देश्य नहीं हैं वरन् हमारे व्यक्त रूप के विकास का एक साधन मात्र और अल्पकालीन रूप मात्र है। अर्पण काल में देह अपने प्राण रूपी बल को जाते देख दुखी होती है और प्राण को निकलने से रोकने का प्रयत्न करती है। यज्ञ रूप कर्म से वे प्राणबल घट जाते हैं जिन्हें देह अपना समझती थी और स्वार्पण में तो बिल्कुल ही निकल जाते हैं और तब देह का भी नाश हो जाता है। नीचे की श्रेणी वाले नाम और रूपयुक्त लोकों में यज्ञ का यही रहस्य है और देह का प्राण जाने के कारण उसे दुःख प्रतीत होता है। तो फिर इसमें आश्चर्य क्या है कि लोग मायायुक्त होकर और असल रहस्य को न जानकर स्वार्पण काल में देह के दुःख को देखकर यज्ञ को भी दुखमय समझने लगे और उस यज्ञ में आत्मा के आनन्द को न समझ सके। आत्मा ऐसे यज्ञ में यह कहता है कि- हे ईश्वर हम तुम्हारी इच्छा का पालन करते हैं और हमें उसमें संतोष है।

इस प्रकार यज्ञ नियम जगत में आत्मा के विकास का नियम है। विकास रूप नसेनी का प्रत्येक डंडा इस स्वार्पण द्वारा चढ़ा जाता है। आत्मा अपना अर्पण कर ऊँची योनि में जन्म लेती है और उसकी उस अपितु देह का नाश हो जाता है। जो लोग केवल उपाधि-रूप के नाश की ओर निगाह रखते हैं उन्हें सारी सृष्टि-प्रकृति-एक महान कसाईखाने की तरह जान पड़ती है। पर जिन्हें उस बध में यह दिखाई पड़ता है कि आत्मा नीची उपाधि को त्याग कर उच्च उपाधि ग्रहण करने के लिये स्वार्पण करती है उन्हें दुख और बध के बदले विकास द्वारा ऊँची योनि के जन्म का आनन्द ही सुन पड़ता है।

इसमें संदेह नहीं कि मनुष्य, जिसकी बुद्धि हमेशा उन्नति पाती जाती है, युगों के अनुभव से यह बात ढूँढ़ निकालता है कि जीवन का नियम यज्ञ या स्वार्पण ही है। पर इस प्रयत्न में और ऐसे अन्य बहुत से प्रयत्नों में मनुष्य को बाहरी सहायता भी मिली है। मनुष्य जाति की बाल्यावस्था में ऋषि उसको सिखाने और सुमार्ग बताने के लिए आये थे और उन्हीं ने इस नियम का उपदेश दिया। मनुष्य जाति की उदय होती बुद्धि को सहायता देने के लिए उनने जो धर्म रचे उसमें भी इस नियम को बहुत सीधी-सादी रीति से शामिल कर दिया। फिर भी इन आरम्भिक जीवों से यह आशा नहीं कि जा सकती थी कि बिना बदले के ये लोग अपने बहुत प्रिय पदार्थों का त्याग कर सकेंगे, जिन पर उनके शरीर का जीवन ही निर्भर था। इसलिए यह आवश्यक था कि धीरे-धीरे उनको ऐसे मार्ग से ले जावें जिससे अंत में ये अपनी इच्छा से स्वार्पण करें। इसलिए प्रथम यह सिखाया गया कि मनुष्य जाति का संबंध उससे ऊपर और नीचे की योनियों से है और मनुष्य बाकी सब सृष्टि से जुदा नहीं है। उसे यह बताया गया था कि तुम्हारे स्थूल शरीर का पोषण खनिज और वनस्पतियों और दूसरे छोटे जीवों द्वारा होता है और इनके खाने से तुम पर ऋण होता है। जिसको चुकाना तुम्हारा धर्म है। इससे मनुष्य को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि हम पर प्रकृति का ऋण सदैव बना रहता है और उसे सदैव चुकाते रहना चाहिए। इस प्रकार यज्ञ से प्रिय वस्तु के त्याग का अर्थ निकलने लगा और लोग ऋण चुकाने और अपने कल्याण के हेतु से यज्ञ करते थे। आगे की शिक्षा के फल से यज्ञ का फल स्थूल लोक का न होकर सूक्ष्म लोक का हो गया और क्रमशः वह स्वार्पण की सीढ़ी बन गई।


मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ

(श्री भागीरथी गुप्त बहेडी)

विश्व में मनुष्य ही एक ऐसा मननशील प्राणी है जो सोच विचार कर आचरण करता है। यदि वह ऐसा न करे तो उसमें और पशु में कोई अन्तर नहीं समझा जा सकता। बहुधा देखने में आया है कि जिन बच्चों को भेड़िये आदि उठाले जाते हैं और अपनी माँद में पाल लेते हैं वे बड़े होने पर भेड़िये की सी आदतें सीख लेते हैं।

विश्व में सभी आवश्यक वस्तुओं के निर्माण हो जाने के पश्चात् मनुष्य योनि का आविर्भाव हुआ और साथ ही मंगलमय प्रभु ने उन्हें वेदज्ञान रूपी अमूल्य रत्न भी प्रदान किया उसी वेदरूपी ज्ञान के सहारे मानव प्राणी आज तक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होता हुआ प्रकृति का स्वामी बन बैठा है।

इस संसार में मनुष्य को जो कुछ करना है उसे चार भागों में विभाजित किया जा सकता है- धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष।

‘धर्म’

‘धर्म’ का तात्पर्य है धारण करना। मनुष्य मनन एवं विचार पूर्वक जिन सत्कर्मों का करना अपना कर्तव्य समझता है उनकी पूर्ति के लिये जीवन पर्यन्त प्रयत्नशील रहना धर्म कहलाता है। मनुष्य जिस समाज, देश एवं राष्ट्र में जन्म लेता है उस समाज, अथवा देश की सेवा करना, उसकी सर्वांगीण उन्नति में योग देना, उसकी मान-मर्यादा के लिये जीवन को बलिवेदी पर चढ़ा देना भी मनुष्य का सच्चा धर्म है।

समाज एवं राष्ट्र की सामयिक मनोदशा का अध्ययन करके तद्नुकूल आचरण करना युग-धर्म कहलाता है। पर ऐसा आचरण स्थाई नहीं होता, कुछ काल के लिये होता है। जिन परिस्थितियों को देखकर युग धर्म अपनाया जाता है, वह परिस्थितियाँ जब टल जायं तो उसमें परिवर्तन कर लेना उचित है।

अर्थ

आज सम्पूर्ण विश्व अर्थ के पीछे बुरी तरह पागल हो रहा है। साधारण मनुष्य ही नहीं बल्कि अपने को पूर्ण त्यागी अथवा जनता के सेवक कहने वाले भी अर्थ के दास देखने में आते हैं। वर्तमान युग में अर्थ की ऐसी मान्यता देखने में आ रही है कि किसी कवि का यह कहना सत्य ही जान पड़ता है- “संपूर्ण गुण धन में ही समाये हुए है।” आज समस्त संसार में जो अशान्ति का वातावरण फैला हुआ है और मनुष्य भले-बुरे का विचार त्यागकर स्वार्थ-साधन में लिप्त है उसका कारण यही धन की लालसा है।

हिन्दू संस्कृति के अनुसार ब्रह्मचर्य आश्रम को समाप्त कर जब मनुष्य गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है तो उसे सुखमय बनाने के लिये अर्थ की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि शेष तीन आश्रम इसी गृहस्थ आश्रम के भरोसे रहते हैं और नित्यप्रति पंचयज्ञों का करना भी गृहस्थ का कर्तव्य माना जाता है, इसलिये गृहस्थ को आवश्यक अर्थ की अभिलाषा करना और उसका संग्रह करना बुरा नहीं कहा जा सकता। पर यह धन भी अन्याय अथवा अत्याचार द्वारा उपार्जित न हो, तभी वह समाज के लिये कल्याणकारी होता है।

काम

‘काम’ का अर्थ है कामना युक्त। काम का उदय मन में होता है। इसीलिये काम को ‘मनसिज’ भी कहते हैं। ‘काम’ के मुख्यतः दो भेद हैं। एक वासनाजन्य काम और दूसरा भगवत् प्रेम। वासना-जन्य काम की पूर्ति विवाहित जीवन में होती है और भगवत् प्रेम की पूर्ति ईश्वरोपासना में। पुरुष में पुरुषत्व होता है और नारी में नारीत्व। इन्हीं के द्वारा सृष्टि को स्थिर रखने के कार्य में वे योग दे सकते हैं। पर उनका यह कार्य तभी तक धर्मानुकूल मनाया जायगा जब तक वह मर्यादा के भीतर हो। असंयमित ‘काम’ को व्यभिचार की संज्ञा दी जाती है। इस बात का ध्यान पुरुष और स्त्री दोनों को ही रखना आवश्यक है। वे जितने ही संयम और आत्मिक सहयोग की भावना में गृहस्थ-जीवन का निर्वाह करेंगे उतने ही अनुपात में दाम्पत्य-प्रेम का आनन्द प्राप्त कर सकेंगे। गृहस्थ-जीवन का सुचारु रूप से निर्वाह करने से ही मनुष्य भगवद् भक्ति की ओर अग्रसर हो सकता है और एक समय ऐसा आता है कि वह घर के बन्धन को त्यागकर ईश्वर प्राप्ति में ही संलग्न हो जाता है।

मोक्ष

सभी प्राणी दुख को दूर करने और सुख प्राप्त करने का प्रयत्न करते रहते हैं। और सुख भी ऐसा जिसका कभी नाश न हो। किन्तु दुख का अत्यन्त अभाव किस प्रकार हो यह एक बड़ी जटिल समस्या है। कारण दुख का अत्यन्ताभाव किसी साँसारिक वस्तु या सफलता से नहीं हो सकता। संसार के बड़े से बड़े धनी और चक्रवर्ती सम्राट को भी अनेक प्रकार की चिंताएं देखने में आती हैं और तरह-तरह के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कष्ट भी सहन करने पड़ते हैं। तब शाश्वत सुख कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इसके लिये त्याग और तपस्या की आवश्यकता होती है। यम-नियम का पालन, सत्यानुमोदित कर्मों का आचरण, प्राणिमात्र को आत्मवत् मानना, सेवा-व्रत का धारण करना, सब प्रकार के दुर्व्यसनों का त्याग आदि ऐसे दैवी गुण हैं जिन पर चलकर मनुष्य मोक्ष-मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं।

हमारे पूर्वज ऋषि महर्षियों ने विशेष मननपूर्वक इन चार सूत्रों का आविष्कार किया था। किसी भी मनुष्य के भीतर जितनी भी अभिलाषायें या मनोभावनायें हो सकती हैं उन्हें इन्हीं चार विभागों में बाँटा जा सकता है। इन्हीं चारों तत्वों को अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को पूर्ण सफल बना सकता है। खेद है कि आजकल के मनुष्य केवल दो तत्वों अर्थ और काम को अपना कर वह भी बड़े गलत तरीके से सम्पूर्ण मनोरथों के सिद्ध होने की आशा किया करते हैं। धर्म एवं मोक्ष के प्रति अब किसी में आस्था नहीं रह गई है। अर्थ को प्रथम स्थान मिलने से ही मनुष्य, मनुष्य का शोषण करने लग गया है। और काम की दृष्टि से उसका आचरण पशुओं से घोर निकृष्ट समझा जाने लायक बन गया है। इसलिए जब हमारे बन्धुगण धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों पर उनके सच्चे रूप से आचरण करेंगे तभी वे कल्याण की आशा कर सकते हैं।


भोग और त्याग का समन्वय

(श्री स्वामी अलोकानन्द, जी कलकत्ता)

त्याग और भोग का समन्वय ही वर्तमान युग की घोषणा है। यही इस युग की समस्या है। जगत में कितने ही व्यक्ति भोग करते-करते ही, भोग के भीतर ही जीवन की समाप्ति कर देते हैं। पार्थिव भोग को छोड़कर वे और कुछ नहीं जानते। भोग की लालसा में ही वे रात दिन व्यस्त रहते हैं, अपने भोग के लिए वे दूसरों को हानि करने में भी संकोच नहीं करते। यह भोग-स्पृह उनके मन को, उनके विचारों को उनकी बुद्धि को भौतिक, वस्तुओं से ऊपर उठने ही नहीं देती। छोटी चीज का स्वाद चखते-चखते मनुष्य बड़ी चीज का, उत्तम चीज का स्वाद ही भूल जाता है। उनकी बड़ी चीज का स्वाद ग्रहण करने की आकाँक्षा ही लोप हो जाती है। छोटी चीज के भोग में जो सुख मिलता है वह क्षणस्थायी होता है और बड़ी चीज से प्राप्त होने वाला सुख दीर्घस्थायी होता है। भौतिक पदार्थ के भोग से जो सुख प्राप्त होता है वह मनुष्य की पंचेन्द्रियों का सुख है। किन्तु मनुष्य तो केवल इन्द्रियों का समूह नहीं है, यद्यपि पंचेन्द्रियों द्वारा वह भौतिक जगत से संपर्क स्थापित किये रहता है। किन्तु मनुष्य तो इन्द्रिय युक्त होते हुये भी वास्तव में इन्द्रियातीत होता है। इसी कारण पंचेन्द्रियों द्वारा जगत के भोगों का निरन्तर उपभोग करते रहने पर भी इन्द्रियातीत आत्मा तृप्त नहीं हो पाती। भौतिक पदार्थों के भोग से स्वभावतः ही एक प्रकार की थकावट आती है, इससे मनुष्य एक वस्तु को छोड़कर दूसरी का भोग आरम्भ करता जाता है। इस प्रकार वह भोग के निमित्त आत्मा को बेच डालता है।

यह भोग की स्पृहा मनुष्य के हाड़माँस में समाई हुई है। एक तरफ तो वह भोग-स्पृहा के द्वारा संचालित होकर इन्द्रियों से प्राप्त भौतिक जगत से अपना संबंध कायम रखता है और उसमें विचरण करता है। इस प्रकार जगत रूपी नाट्य शाला में भगवान की लीला चलती रहती है। दूसरी तरफ इस भोग-स्पृहा के मध्य में होकर ही छोटी चीज की तरफ और फिर उससे भी बड़ी चीज की तरफ मनुष्य अग्रसर होता जाता है। इस प्रकार भगवान स्वयं ही भोग में रत रहते हैं। वे स्वयं अपने को ही भोग करते हैं। वे अपनी सृष्टि का आनन्द, अपनी लीला का आनन्द भोग करते हैं। इस कारण भोग की स्पृहा को अस्वीकार करना या उसे नष्ट करने की चेष्टा एक बड़ी भूल है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य एक मात्र भोग में ही निमग्न हो जाए। इसलिये भोग भी ज्ञानपूर्वक करना चाहिये और उसके साथ ऐसी चीज भी रखनी चाहिए जिससे भोग में डूबा न जा सके। वही चीज त्याग है।

मनुष्य भोग करेगा और फिर त्याग भी करेगा। जिस प्रकार बिना भोग किये त्याग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार त्याग के बिना भी भोग संभव नहीं है। त्याग से ही भोग का स्वाद बढ़ जाता है। मनुष्य उसी चीज का वास्तव में भोग कर सकता है जिसका वह त्याग कर सकने को समर्थ हो। जाड़े की ऋतु में अपने शरीर पर से जब एक ऊनी वस्त्र उतार रास्ते में पड़े किसी कंगाल को दे दिया जाता है तभी वह पूर्ण रूप से उसका भोग करता है। इसलिये भोग में संग त्याग का करना आवश्यक है।

इसी प्रकार त्याग के संग भोग न रहने से भी काम नहीं चल सकता। केवल त्याग का आदर्श अर्थहीन है। त्याग के साथ भोग को न रखने से त्याग संभव ही नहीं है। भोग के बन्धन से बचने के लिये जो व्यक्ति कोपीन लगाकर बैठा है, वह कोपीन का ही भोग करता है। जो कोपीन को भी त्याग कर दिगम्बर बन जाता है वह भी शरीर-रक्षा के लिये आहार ग्रहण करता है। कुछ न कुछ उसे भोग करना ही होगा, बिना भोग किये शरीर का अस्तित्व रहना ही असंभव नहीं। वर्षा के समय उसे किसी वृक्ष के नीचे आश्रय लेना पड़ेगा, जाड़े के समय उसे आग जलाकर उष्णता प्राप्त करनी होगी। सब भोग के ही रूप हैं। ऐसे समय अगर दूसरा मनुष्य एक अच्छे कम्बल द्वारा शीत निवारण करता है तो वह भी भोग है। अब यह कहना कि एक मनुष्य ने बहुत छोटी चीज का भोग किया और दूसरे ने उससे उत्कृष्ट वस्तु का तो दोनों में विशेष अन्तर नहीं है। एक को यदि केवल प्राप्त करने का प्रयत्न करना पड़ता तो दूसरे को भी लकड़ी इकट्ठी करके उससे आग जलाने में परिश्रम करना पड़ता है बंधन दोनों में ही है।

इसलिये धर्म तत्व को जानने वाले महापुरुषों का कहना है कि वास्तव में अनासक्ति ही त्याग है और आसक्ति ही भोग है। मनुष्य सब छोड़ देने पर एक मात्र कोपीन में भी आसक्त होकर रह सकता है, या उसके मन में आसक्ति की भावना दमन नहीं हुई है उत्तम वस्त्र धारण करने पर भी मनुष्य अनासक्त रह सकता है यदि भगवान की कृपा से उसे अनासक्ति की भावना प्राप्त हो गई है। बंगाल के श्री चैतन्य महाप्रभु ने सर्वत्यागी संन्यासी छोटा हरिदास को भोगासक्त मानकर अस्वीकार किया था और परम योगी राय रामानन्द को अनासक्त बतलाकर बहुत आदर किया था। गीता में भी भगवान ने “युक्ताहारविहार” की बात ही कही है। इसका आशय योग और भोग का समन्वय ही है।

हमारे देश में कितने ही आध्यात्मवादी सम्प्रदाय प्राचीनकाल से त्याग की ही प्रशंसा करते आये हैं। अधिकाँश साधू भोग को पतन का मार्ग बतलाकर उससे बचने की शिक्षा देते आये हैं। पर वास्तव में ऐसा त्याग समाज के अधिकाँश मनुष्यों के लिये व्यवहारिक नहीं हो सकता। यह मानव प्रकृति के विरुद्ध है। इस प्रकार एकमात्र त्याग का आदर्श जन समाज को देने से वह केवल मात्र आदर्श ही रह जाता है उस पर लोग आचरण नहीं करते। उदाहरण के लिये भारतवर्ष के हिन्दू समाज में 50-60 लाख साधू संन्यासी हैं। यद्यपि ये सब चिमटा और कमण्डल धारी ही नहीं हैं-और बहुत से तो भोग विलास करने वाले भी हैं-तो भी वे सब जनता को त्याग का ही उपदेश देते रहते हैं। पर इसका परिणाम क्या निकला? आदर्श एक तरफ जा रहा है और समाज की जीवनधारा दूसरी तरफ बह रही है। करोड़ों हिन्दू इन साधू-संन्यासियों को दो-चार पैसे देते हैं, हाथ भी जोड़ते हैं, पर कोई उनके उपदेशानुसार त्यागमय जीवन व्यतीत नहीं करता। इस प्रकार का आदर्श जनता के सम्मुख उपस्थित करने का परिणाम यह होता कि उसके आदर्श और आचरण ठीक न होने और आदर्श के अनुकूल आचरण न होने से, समाज का आचरण दूषित माना जाता है।

इसलिये वर्तमान युग का आदर्श त्याग और भोग का समन्वय है। यह ऐसा आदर्श है कि जिस पर चलने से हिन्दू-समाज ही नहीं, संसार भर का कल्याण हो सकता है। न तो मनुष्य भोग में डूब जायेगा, न त्याग का आडम्बर करेगा, वरन् वह त्याग और भोग दोनों के ऊपर स्थित रहेगा। पर मनुष्य वस्तु को भोग नहीं करेगा। वह बड़ी चीज को भोग करेगा, मनुष्य ऐसी सारी वस्तु का भोग करेगा, जिससे थकावट नहीं आती, जो दो दिन में समाप्त नहीं हो जाती। पर वह उपभोग करेगा श्री भगवान की अनन्त लीला में एक सहचर की हैसियत से। यही पूर्ण मानवता का, पूर्ण सामंजस्य का जीवन है। इसी में पूर्व के त्यागमय आदर्श तथा परिश्रम के भोगमय आदर्श का समन्वय है।


सेवा-धर्म से ईश्वर प्राप्ति

(एक ब्रह्मवादी सन्त)

संसार में जितने कार्य पुण्य के या भले माने जाते हैं, सेवा या परोपकार का दर्जा उनमें सब में ऊँचा है। जो लोग आध्यात्मिक जगत में वास्तव में ऊँचा उठना चाहते हैं उनके हृदय सेवा की भावना से इतने परिपूर्ण हो जाने चाहिए कि अपने संपर्क में आने वाले मनुष्यों की ही नहीं वरन् पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों तक की सेवा करने को उत्सुक रहे। ऐसा स्वभाव बना लेने से वे सेवा के बहुत कम अवसरों को गँवा सकेंगे। फौज के सिपाहियों से बरसों तक जो कठिन कवायद व परेड आदि कराई जाती है उसका उद्देश्य केवल यह नहीं होता कि वे सैनिक आज्ञाओं के पालन करने की ठीक-ठीक विधि जान जायें वरन् उसका उद्देश्य यह भी होता है कि वे बातें उनके सहज स्वभाव का अंग बन जायं। आजकल की परिस्थितियाँ तो कुछ बदल गई हैं पर प्राचीन काल में तो एक सैनिक को सर्वथा नवीन वातावरण का सामना करना पड़ता था और वह चाहे जितना ही शूरवीर क्यों न हो उसके साहस की कड़ी परीक्षा हो जाती थी। किंतु ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी वह सैनिक स्वभाव से प्रेरित होकर आज्ञाओं का पालन करता है और अपने कर्तव्य को करने के लिए उद्यत हो जाता है।

जो लोग इस प्रकार जनता की सेवा करना अपना मुख्यकार्य या स्वभाव बना लेते हैं, जनता भी उनका पूरा सम्मान करती है और चाहे वे कैसे भी निराडम्बर ढंग से रहें उनकी महिमा को समझती है। प्राचीन समय में तो जो लोग देश के आध्यात्मिक गुरु होते थे उनका ही यह कर्तव्य माना जाता था कि वे अपना सारा समय यज्ञ, अनुष्ठान, अध्ययन, शिक्षण, परामर्श आदि में लगाएं जिससे कि सम्पूर्ण जाति का कल्याण हो। ऐसे ही लोग ब्राह्मण कहलाते थे। अन्य वर्गों के व्यक्ति जिनका समय सामान्यता निजी कार्यों के करने और धन कमाने में व्यतीत होता था, वे ब्राह्मणों का पालन करते थे। कैथोलिक ईसाइयों में भी साधु-संन्यासियों का जो वर्ग केवल मृतकों के लिये प्रार्थना करने में ही अपना समय व्यतीत करता है, उसे स्थापित करने का मूल सिद्धाँत भी यही था। अतः उन साधु-संन्यासियों की जीविका जनता के दान पर ही निर्भर रहती थी और वे इसके लिये किसी प्रकार भी लज्जित नहीं होते थे एवं उन्हें भिक्षा देने वाले भी इसे अपने लिये गौरव की बात समझते थे। उस समय की धारणा आधुनिक समय की धारणा से सर्वथा भिन्न थी। उस समय वे वास्तव में त्यागमय जीवन बिताते थे और अपना समस्त समय जनता की सेवा में लगा देते थे। इसलिये उस समय भिक्षा पर जीविका चलाना उनके लिये लज्जा की बात नहीं समझी जाती थी। वास्तव में सबसे उच्च आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने वाले लोग ही भिक्षा पर निर्वाह किया करते थे, क्योंकि उन्होंने अपरिग्रह ब्रह्मचर्य और कर्तव्यपरायणता का व्रत लिया था। पर यह बात वर्तमान समय के लिये नहीं कही जा सकती, क्योंकि अब इन से साधु-संन्यासी और ब्राह्मणों ने जनता की ओर का कार्य तो छोड़ दिया है और भीख माँगकर खाना अपना परम्परागत अधिकार समझ लिया है। भिक्षा माँगना अथवा जनता द्वारा प्राप्त दान पर निर्वाह करना उसी दशा में ठीक कार्य समझा जा सकता है जब कि हम जनता से जितना पाते उससे अधिक उसकी सेवा कर दिखायें।

हमारे हिन्दू शास्त्रों में सेवा को ‘गहन धर्म’ कहा गया है। इसके द्वारा मनुष्य सहज में भगवद् प्राप्ति कर सकता है। और सच्चे सेवा भाव वाले की ईश्वर प्राप्ति की आकाँक्षा अपने लिये नहीं होती वरन् इसलिये होती है कि भगवान के प्रसाद से वह एक ऐसा स्रोत बन जाय जिससे अन्य मानव लाभ उठा सकें। इस पथ पर आरुढ़ मनुष्य अपने लिये नहीं वरन् दूसरों के लिये जीवित रहता है। कृष्णा, ईसा आदि इसी श्रेणी के महापुरुष थे और इसीलिए संसार आज तक उनकी पूजा कर रहा है।

हम यह अनुमान कर सकते हैं कि ईश्वर चाहे तो अपनी शक्ति को संपूर्ण सृष्टि में किसी भूमिका पर और किसी भी सीमा में प्रवाहित कर सकता है। किन्तु, वह वास्तव में ऐसा करता है। प्रत्येक भूमिका पर उसकी शक्ति एक निश्चित परिधि होती है और इस प्रकार हम, जो उसी तेज के अँश हैं, कुछ ऐसे कार्यों को कर सकते हैं कि वह महान शक्ति स्वयं नहीं करती वरन् हमसे करवाती है। आप देखते हैं कि शहरों के बिजलीघरों को, जो बिजली उत्पन्न करने वाले स्थानों से सैकड़ों कोस दूर होते हैं, बहुत बड़े परिमाण और बहुत तेज प्रवाह में बिजली भेजी जाती है। शहर के उन बिजली घरों के पास भी मशीनें रहती हैं। विद्युत के तेज प्रवाह को ग्रहण करके उसके वेग को धीमा कर देती हैं और उसे बिजली की अनेक धाराओं में बाँट कर रोशनी आदि कार्यों के उत्तम बना देती है। इसी प्रकार सच्चे जनसेवक जो बड़ा कार्य करके दिखला देते हैं वह ईश्वरीय शक्ति की प्रेरणा रूप ही होता है।

इस प्रकार प्रत्येक महापुरुष आध्यात्मिक शक्ति का एक स्त्रोत ही होता है जिसके द्वारा लोक कल्याण का कार्य साधित होता रहता है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सदैव जीवधारियों को जीवन प्रदान करता रहता है उसी प्रकार ईश्वरीय शक्ति भी प्रति समय हमारे चारों ओर विद्यमान रहती है जिसे ग्रहण करके हम दूसरों का उपकार कर सकते हैं। सेवा करने वाले को कभी यह भाव मन में न लाना चाहिये कि हम दूसरों का उपकार कर रहे हैं और इसके बदले में उन्हें हमारा कृतज्ञ होना चाहिए। उन्हें ऐसा विचार करना चाहिये कि हम ईश्वर के हाथ में एक लेखनी की तरह हैं जिसके द्वारा उसके विचार जगत में प्रकट होते हैं।

वह ज्ञान जो तुम्हें सेवा करने के योग्य बनाता है, वह संकल्प जो तुम्हें ज्ञान की ओर ले जाता है, और वह प्रेम जो तुम्हारे संकल्प को प्रेरणा देता है यही तुम्हारा साधन है। संकल्प, ज्ञान और प्रेम यह ईश्वरीय शक्ति के तीन स्वरूप हैं और जो ईश्वर की सेवा या भक्ति करना चाहते हैं उन्हें इन्हीं तीनों स्वरूपों को जगत के सम्मुख व्यक्त करना चाहिये। यदि हम इस कार्य को निस्वार्थ भाव से पूरा करेंगे तो मानव जाति की सेवा के साथ ही हम ईश्वर के निकट भी पहुँच जायेंगे।


राम-नाम का अक्षय कोष

(महात्मा गाँधी जी)

राम-नाम सिर्फ कुछ खास आदमियों के लिये नहीं है, वह सब के लिये है। जो राम-नाम लेता है, वह अपने लिये भारी खजाना जमा करता जाता है। और यह तो एक ऐसा खजाना है, जो कभी घटता नहीं। जितना इसमें से निकालो, उतना ही बढ़ता जाता है। इसका अन्त ही नहीं। और जैसा कि उपनिषद् कहता है- ‘पूर्ण में से पूर्ण निकालो, तो पूर्ण ही बाकी रह जाता है,’ वैसे ही राम-नाम है। यह तमाम बीमारियों का एक शर्तिया इलाज है, फिर चाहे वे (बीमारियाँ) शारीरिक हों, मानसिक हों या आध्यात्मिक हों। राम-नाम ईश्वर के कई नामों में से एक है ..... आप राम की जगह कृष्ण कहें या ईश्वर के अनगिनत नामों में से कोई और नाम लें, तो उसमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लड़कपन में अँधेरे में मुझे भूत-प्रेत का डर लगा करता था। मेरी आया ने मुझसे कहा था- ‘अगर तुम राम-नाम लोगे तो तमाम भूत-प्रेत भाग जायेंगे।’ मैं तो बच्चा ही था, लेकिन आया की बात पर मेरी श्रद्धा थी। मैंने उसकी सलाह पर पूरा-पूरा अमल किया। इससे मेरा डर भाग गया। अगर एक बच्चे का यह अनुभव है तो सोचिए कि बड़े आदमियों के बुद्धि और श्रद्धा के साथ राम-नाम लेने से उन्हें कितना फायदा हो सकता है? लेकिन शर्त यह है कि राम-नाम दिल से निकले। क्या बुरे विचार आपके मन में आते हैं? क्या काम या लोभ आपको सताते हैं? यदि ऐसा है तो (इन्हें मिटाने के लिये) राम-नाम जैसा कोई जादू नहीं। ......

फर्ज कीजिये कि आपके मन में यह लालच पैदा होता है बिना मेहनत किये, बेईमानी के तरीके से, आप लाखों कमा लें, लेकिन यदि आपको राम-नाम पर श्रद्धा है तो आप सोचेंगे कि बीबी-बच्चों के लिये आप ऐसी दौलत क्यों इकट्ठी करें जिसे वे शायद उड़ा दें? अच्छे आचरण और अच्छी शिक्षा के रूप में उनके लिये आप ऐसी विरासत क्यों न छोड़ जायं जिससे वह ईमानदारी और मेहनत के साथ अपनी रोटी कमा सकें? आप यह सब सोचते तो हैं, परन्तु कर नहीं पाते। मगर राम-नाम का निरन्तर जप चलता रहे तो एक दिन वह आपके कण्ठ से हृदय तक उतर आयेगा और वह रामबाण चीज साबित होगा। वह आपके सब भ्रम मिटा देगा, आपके झूठे मोह और अज्ञान को छुड़ा देगा, तब आप समझ जायेंगे कि आप कितने पागल थे, जो बाल-बच्चों के लिये करोड़ों की इच्छा करते थे, बजाय इसके कि उन्हें राम-नाम का वह खजाना देते, जिसकी कीमत कोई पा नहीं सकता, जो हमें भटकने नहीं देता, जो मुक्तिदाता है।


गायत्री उपासना के अनुभव

सरल साधना

श्री लालमणि शर्मा, हापुड़ (मेरठ) अपना निजी-अनुभव लिखते है :- गायत्री उपासना के पहले मैं मस्तिष्क प्राणायाम किया करता था। उससे स्वेद, कम्प आदि लक्षण प्रगट होने लगे थे। कभी मेरुदण्ड के ऊपर चींटी चलती सी मालूम पड़ती, शरीर सुन्न हो जाता, होश खोया सा लगता। मुझे बड़ा डर लगा और मैंने प्राणायाम छोड़ गायत्री उपासना प्रारम्भ किया। इस उपासना से वे अनुभव अधिक उन्नत हो रहे हैं, पर डर बेहोशी का कहीं पता नहीं है। एक दिन ध्यान में साक्षात् सूर्य मण्डल में ही जैसे मैं प्रविष्ट हो गया।

शत्रुता मित्रता में बदली

श्री मदनलालजी, पोस्टमैन अटरु (कोटा) माता के प्रेम का वर्णन करते हैं :- मेरी जमीन का कुछ हिस्सा दूसरे व्यक्ति के यहाँ रहन था। मैं छह वर्ष से प्रयत्न करता आ रहा था कि वह जमीन छोड़ दे और अपने रहन की रकम ले ले, पर वह किसी भाँति राजी नहीं हुआ। माता की प्रेरणा से मैंने उसके ऊपर मुकदमा चलाया। दो ही पेशी के बाद उस व्यक्ति ने मुझसे समझौता कर लिया और जमीन के साथ रेहन की रकम भी छोड़ दी। इसमें भय-द्वेष नहीं था, स्नेह भरे चित्त से ही उसने इस बर्ताव को पूरा किया। यह माता की कृपा पूर्ण प्रेरणा कही जा सकती है, नहीं तो आघात का प्रति उत्तर प्रायः रोष भरा प्रतिघात ही होता है।

मैं “अन्ता” पोस्ट ऑफिस में काम करता था, जो मेरे घर से दूर पड़ता था। मैंने मन ही मन माता से घर के निकट बदली करा देने की अभिलाषा की और अनायास ही मेरी बदली अटरु अपने गाँव में ही हो गई। बाहर से इसके लिए मैंने जरा भी कोई प्रयत्न नहीं किया था। सच्चे भाव से माता की शरण लेने पर (माता) अपने पुत्रों की शुभ अभिलाषा को सदा ही पूरी करने की चेष्टा करती हैं, ऐसा मेरा अचल विश्वास है।

बुद्धि का प्रकाश

श्री रामचन्द्र शर्मा (प्रयाग) अपना अनुभव लिखते हैं। बचपन में मेरी बुद्धि इतनी बोदी थी कि मैं विद्यालय में मामूली-मामूली बातों में खूब मार खाता था। जीवन भार सा लगता। मर जाने की इच्छा होती। एक बार सनावद अपनी आजी माँ के यहाँ गया। उन्होंने मेरी दशा जान कर गायत्री उपासना की प्रेरणा दी और मैं उपासना करने लगा। मेरे पिता जी इन्कम टैक्स महकमे में थे। मेरी कुछ दिन की उपासना के बाद ही उन्नती करके जबलपुर बदली कर दिये गये। यहाँ के विद्यालय में आते ही मेरी बुद्धि का प्रकाश दिनों दिन बढ़ता ही चला गया। फिर तो कठिन से कठिन विषय मिनटों में समझ लेता था। फिर ऊँचे दर्जे से मैट्रिक पास कर सुसम्पन्न हुआ। तदुपरान्त ही सुशीला कन्या से विवाह सम्पन्न हुआ। तदुपरान्त अध्ययन करते हुए बिना परेशानी के बी.काम., एम.ए. और एल.एल.बी. पास कर ली। आजकल सरकारी महकमे में अच्छे पद पर हूँ और जनता की सेवा करते हुए शान्त-उपासनामय जीवन यापन करता हूँ। मेरे प्रसन्न शान्त स्वभाव से मेरे संपर्क में आने वाले मुझे छोड़ना नहीं चाहते। माता की प्रेरणा से मुझे सभी प्राणियों में ईश्वर की झलक ही दीख पड़ती है और मैं आनंद से उत्फुल्ल रहा करता हूँ।

आर्थिक स्थिति सुधरी

श्री महावीर प्रसाद मास्टर, बेगमपुर-अपने सुखी होने का कारण बतलाते है- “वैश्य को भी गायत्री जपने का अधिकार है” यह जानने के बाद मैं पुरोहित और ब्राह्मणों के लाख मना करने पर भी गायत्री उपासना करता ही रहा। कुछ ही दिनों में मेरी गिरी माली हालत सुधर गयी, मेरा यश भी क्रमशः फैलता गया। भीतर में ओऽम् ध्वनि सुनायी पड़ती है। उस का केन्द्र खोजने के ख्याल में, मैं जप सहित अपने को भूल जाता हूँ। एक बार मेरे पेट में भयंकर दर्द हुआ। अन्ततः गायत्री मन्त्र जपते-जपते ही धीरे-2 सारा दर्द गायब हो गया।

एक बार मेरे दो कुण्ठित बुद्धि के शिष्य परीक्षा पास करने के लिए गायत्री मंत्र लेखन उपासना करने लगे। एक योग्य तेजस्वी छात्र ने यह देख गायत्री उपासना का बड़ा मजाक उड़ाया। आश्चर्य मुझे भी हुआ कि परीक्षा में ये दोनों छात्र उत्तीर्ण और तेजस्वी छात्र ही फेल हो गया।

बघेर के आक्रमण से बचे

सुश्री प्रेमलता गुप्ता, मंसूरी- माता के वात्सल्य का वर्णन करती हुई लिखती हैं- गायत्री उपासक श्री वानप्रस्थी जी मेरे सम्बन्धी है। एकबार उनके यहाँ आने पर उनके पास का गायत्री साहित्य मैंने खूब अध्ययन किया। गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार पढ़ कर गायत्री उपासना की इच्छा प्रबल हो उठी। उन्हीं से उपासना विधि जान कर मैं उपासना करने लग गयी।

हमारे निवास स्थान से जंगल लगा हुआ ही है। मैं जब जप करने बैठती तो एक पड़ोसी का कुत्ता भी आकर बैठ जाता और जप समाप्त होने पर चला जाता। एक दिन छत पर बैठ कर ब्रह्म मुहूर्त में मैं जप कर रही थी। वह कुत्ता भी आकर बैठ गया। उसी जगह बच्चे भी खेल रहे थे। पहाड़ पर जंगल होने से जंगली जानवरों का भय सदा हमें लगा ही रहता है। उस दिन सहसा एक बघेरा आया और कुत्ते पर ताक लगा ही रहा था कि उसके मालिक ने उसे पुकारा और वह तुरन्त भागा चला गया। उस बघेरे की दृष्टि बच्चे और मेरे ऊपर थी। मेरे तो प्राण सूख गये। मैंने माँ से प्रार्थना की-माँ तेरे सिवाय अब इस क्षण में रक्षा का कोई उपाय नहीं। ठीक दूसरे ही क्षण बघेरे ने हम लोगों पर एक बार दृष्टि डाली-कूद कर झाड़ी में छिप गया। ये सिवाय माता की करुणा के हमारे बचने और कोई दूसरा कारण हमें नहीं जान पड़ता। ऐसे माता के चरणों में, मैं न्यौछावर हूँ।

वेतन बढ़ा

श्री पंचमसिंह जी, मानगर-माता की छिपी सहायता की चर्चा करते हैं। दुर्भाग्य से मैं दो बार नौकरी से वंचित होकर बिना जीविका के परिवार सहित भूखों मरने लगा। एक गायत्री उपासक के कहने पर ‘अखण्ड-ज्योति पढ़कर गायत्री उपासना में लग गया। गायत्री महा विज्ञान पढ़कर विधि-पूर्वक अनुष्ठान किया। फलतः बिना किसी प्रयत्न मेरी पत्नी को नौकरी मिल गयी और उसका वेतन थोड़े ही दिनों में दुगना बढ़ गया। फिर मुझे भी रोजगार करने की सुविधा मिल गयी और आज मैं माता को धन्यवाद देता हुआ दिनों दिन उन्नति की ओर जा रहा हूँ।

ऑपरेशन सफल हुआ

श्री के.बी. सुब्बाराव, कटनी मुरवाड़ा, मेरा ऑपरेशन 7-9-55 को अस्पताल में हुआ और कोई 15 दिन तक ठीक होने का कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ा। इसलिए सोलहवें दिन फिर मुझको उपवास में रखकर क्लोरोफार्म से बेहोश करके घाव को ताजा बनाया गया। जिससे मेरी हालत अत्यन्त ही नाजुक हो गयी तथा मेरे सभी सम्बन्धी चिन्तित हो गये।

इस ऑपरेशन से पूर्व मैं नित्य नियमित रूप से गायत्री जप करता था। ऑपरेशन के बाद कुछ दिन तो मैं माता को भूले रहा, किन्तु, शीघ्र ही वेद-माता ने कृपा कर मेरे अन्तर में प्रेरणा की और मैं अस्पताल में ही मानसिक जप करने लगा।

मैं मानसिक जप में इतना खोया रहता था कि आने जाने वालों की भी मुझे सुधि नहीं रहती थी। इस जप का प्रभाव यह हुआ कि दो बार मुझे स्वप्न में पूज्य आचार्य जी के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ। और पूर्ण स्वस्थ हो जाने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। साथ ही एक बार स्वप्न में स्वयं वेद-माता ने मुझे दर्शन देकर कृतार्थ किया। साथ ही स्वप्न में मुझे अपना घाव भरता हुआ दिखाई दिया। इस प्रकार वास्तव में मेरा घाव धीरे-धीरे भरने लगा और सब से बड़ी बात मेरे मन को जो शान्ति मिली उसका मैं शब्दों में ‘वर्णन करने में’ सर्वथा असमर्थ हूँ। वेद माता की कृपा से और सद्गुरु देव के आशीर्वाद से मैं शीघ्र ही रोग मुक्त हो गया।

बिना दहेज के विवाह

श्री. चन्द्रलेखा श्रीवास्तव, यादवपुर बखरी (चम्पारण) अपने अनुभव का वर्णन करती हैं :- मैंने बचपन में ही मातृविहीन होकर गायत्री माता को ही अपनी माता बना लिया। जब मैं सयानी हुई तो पिताजी को शादी की चिन्ता हुई, भला माता मेरे लिए पिताजी को क्यों कठिनाई में डालना पसन्द करे निकट में ही एक सुयोग्य लड़के का पता लगा और दहेज राक्षसी प्रथा के बावजूद भी बिना दहेज और झंझट के मेरा पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हो गया। पतिदेव के परिवार में सभी गायत्री उपासक ही मिले। वहाँ पतिदेव के आदेशानुसार अखण्ड-ज्योति पढ़कर मैंने पूज्य आचार्य जी से विधिवत् दीक्षा ली और निर्देशित विधि से उपासना करने लगी। इससे आर्थिक दशा एवं मेरे कमजोर स्वास्थ्य की पुष्टि का प्रारम्भ हुआ। पूज्य आचार्य जी के आशीर्वाद प्राप्त कर मैं हिस्टीरिया रोग से मुक्त हो गयी और मेरे पूज्य पतिदेव उन्हीं की कृपा से आज समाज शिक्षा के आयेजक पद पर आसीन हो 200) दो सौ रुपये मासिक अर्जन कर रहे हैं। गुरु और माता की कृपा से हमारे जीवन में शान्ति और सुख का स्वाभाविक निवास है।

सन्तोष जनक दान दक्षिणा मिली

श्री कृष्णकुमार जोशी, वाणा गाँव माता की साक्षात् कृपा का वर्णन करते हैं :-

अखण्ड-ज्योति के अध्ययन से मुझ में गायत्री उपासना करने में काफी बल मिला। उस समय महायज्ञ की पूर्णाहुति का निमन्त्रण मिल गया था, पर मेरे चार सन्तान, पत्नी आदि का उदर पोषण ही कठिन था। मेरी बड़ी लालसा थी मैं अपने बच्चों को भोजन दूध दे सकूँ और पूर्णाहुति में जरूर सम्मिलित होऊँ। अचानक एक सज्जन सेठ ने मुझे बुलाया कहा- मेरी उमर बीत चली। यह धेनु गाय मैंने ब्राह्मणों के दान देने के लिये पोस-पाल रखा है। आप इसे दक्षिणा सहित ग्रहण करें। माता की करुणा देख मेरी आंखों में आँसू भर आये। बच्चों को दूध के लिये धेनु गाय तो मिला, पर रुपये में कमी थी इसीलिये मैंने तपोभूमि जाने के लिये गाय बेच दिया सोचा इसी से कुछ रुपये दूध के लिये दे दूँगा। दूसरे ही दिन मुझे एक श्रद्धालु सेठानी ने बुला कर उस से बड़ी और सुपुष्ट धेनु गाय मुझे दान दिया। माता की ममता की याद कर मेरा हृदय भर उठा। खूब प्रेम और हुलास से पूर्णाहुति में मथुरा सम्मिलित हुआ और माता को सहस्र-सहस्र धन्यवाद दिया।

शत्रुता ठंडी पड़ गई

श्री ब्रजगोपाल शर्मा, सवाँसा अपने जीवन में सुख-शान्ति पाने के विषय में लिखते हैं :- मैं चारों ओर शत्रुओं से घिरा था। सभी मेरी बुराई करने की ताक में रहते। मुझे चैन नहीं था। प्रशंसा सुन कर ही मैं भी गायत्री तपोभूमि गया था। वहाँ से अनुष्ठान करके लौटने के बाद ही मेरे सारे दुश्मन ठण्डे हो गये। मैं उसी प्राइमरी स्कूल के साधारण अध्यापक से अनायास प्रधानाध्यापक बना दिया गया। आज हम सभी तरह से सुखी हैं और दुश्मन के बदले दोस्तों से घिरे रहते हैं। ऐसी माता के चरणों पर हम सदा न्यौछावर हैं।

श्वेत कुष्ठ अच्छा हुआ

श्री बालाप्रसाद गुप्ता, मालापानी से गायत्री मंत्र की शक्ति का अपना अनुभव लिखते हैं :- मैं सद्गुण से गायत्री मंत्र की दीक्षा लेकर जप किया करता था। एक दिन एक दस वर्ष की श्वेत कुष्ठ रोगिणी कन्या को उस के पिता भँवरलाल जी के यहाँ लिये आये। मैं वहीं था। भँवरलाल जी के कहा आप गायत्री मंत्र 108 बार पढ़ते हुए इसके श्वेत दागों पर हाथ फेर दें- फिर हम लोग गायत्री मंत्र का प्रभाव देख सकेंगे। उसके पिता को कहा गया- आप इसी भाँति प्रति रविवार इसी भाँति लड़की को लिए आया करना। दूसरे रविवार को देखकर मुझे स्वयं ही आश्चर्य हुआ कि पैर से पेट से फैले श्वेत कुष्ठ के दाग में श्वेतता के बदले लाली की आभा आ रही थी। इस भाँति लगातार कई रविवार आते रहने पर उनके दाग शरीर के स्वाभाविक रंग में बदल गये।

दुर्घटना बाल-बाल बची

श्री देवीशंकर शुक्ल श्यौपुर कलाँ लिखते हैं :- अखण्ड-ज्योति से संपर्क जोड़ने के बाद मैं गायत्री उपासना करने लगा था। मैं प्रतिदिन साइकिल पर एक पुल पार करते हुए पढ़ाने जाया करता था। वर्षा का मौसम था। पुल के बगल में लो मुड्डियाँ लगी हुई थीं, वह बरसात में टूट फूट गयी थीं। पुल के नीचे पत्थरों के ढेर थे। एक दिन वेतन लेकर वापस आ रहा था। अचानक पुल पर से साइकिल फिसली और अगला चक्का किनारे पर जाकर नीचे लटक गया। प्राण संकट के अवसर पर मैंने गायत्री माता का स्मरण किया और स्मरण करते ही मेरा एक पैर एक मुण्डी पर स्थिर हो गया उसी क्षण एक हाथ से मैंने साइकिल का पिछला चक्का लिया। इस भाँति साइकिल सहित मेरी रक्षा माता की कृपा से हो गयी, नहीं तो दोनों के चकनाचूर होने में पल मात्र की देरी थी।

माता ने प्रार्थना सुन ली

श्री माधुरी बाई. रायपुर से माता की वात्सल्य कोमल भावना वर्णन करती हुई अपनी बीती लिखती हैं :-

अपनी कक्षा में सबसे कम समझ वाली तथा याद करने में भोंदी मैं ही थी। अध्यापिका जी का प्रश्न सदा मुझे कठिन जान पड़ता और मैंने कभी उसका उत्तर नहीं दिया। परीक्षा के पाँच महीने पहले मैं बीमार पड़ी और चार महीने के बाद स्वस्थ हो पायी। अब परीक्षा के पन्द्रह दिन ही शेष थे। वर्ग में उत्तर नहीं दे सकने के कारण अध्यापिका जी ने मुझे काफी फटकार दी। घर आकर बिना खाये सो गयी।

मैं नित्य थोड़ी-थोड़ी गायत्री उपासना किया करती थी, सो आज उस माता की याद कर बड़ी रोयी-रोते-रोते सो गयी। स्वप्न में देखा-मैं परीक्षा कक्षा में बैठी सवाल को कठिन देख कर रो रही हूँ। सहसा खिड़की की राह से माता आयी और साँत्वना के स्वर में कहा- माधुरी बेटी! रोती क्यों हो-मन लगा कर पढ़ती रहो। परीक्षा में तुम सर्व प्रथम ओर तेरी सहपाठिनी भूला द्वितीय होंगी। परीक्षा हुई और माता की स्वप्न की वाणी साकार हुई। ऐसी माता की सदा जय हो।

अनुत्तीर्णता के स्थान में द्वितीय श्रेणी

मोहनलाल गालब, कोटा लिखते हैं :- रत्तीराम जी कोयला निवासी हैं। उसका लड़का हरिकिशन मिडिल में पढ़ता था। वह वर्ष में आठ महीना बीमार ही रहता था। स्वास्थ्य की भाँति पढ़ाई भी कमजोर थी। वार्षिक परीक्षा देने के समय रत्तीराम जी ने परीक्षा शुल्क देना पैसे की बर्बादी समझ कर अस्वीकार कर दिया। हम लोगों ने गायत्री माता के नाम पर साढ़े सात रुपया शुल्क देने के लिए जोर दिया तो मान गये। जब लड़का परीक्षा दे कर घर आया तो माता-पिता दोनों ने एक स्वर से कहा-हमारे साढ़े सात रुपये निश्चय ही बर्बाद चले गये। सदा ऐसी निराशा भरी वाणी निकालते रहते। जब जून में परीक्षा फल निकला तो हरिकिशन रामजी ने बड़े प्रेम से गायत्री उपासना प्रारम्भ की। उनकी पत्नी भी उनकी अनुगामिनी बनी। कुछ दिनों की उपासना के बाद उसका लड़का भी स्वस्थ रहने लगा और पढ़ने में उसकी बुद्धि विकसित होती चली गयी। अब वे लोग लगातार गायत्री उपासना कर रहे हैं।


ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान अपूर्ण न रहने पावे।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की प्रगति संतोषजनक रीति से चल रही है। सन् 57 भर प्रतिदिन 24 लख जप, 24 हजार मंत्रलेखन, 24 हजार गायत्री चालीसा पाठ, 24 हजार आहुतियाँ प्रतिदिन किये जाने का संकल्प है। यह कार्य 24 हजार व्यक्तियों द्वारा किया जाना है यह संकल्प वस्तुतः बहुत भारी है। यदि कोई व्यक्ति या संस्था वेतन भोगी लोगों द्वारा अपने कंधे पर व्यय व्यवस्था लेकर कार्य करे तो इसमें वस्तुओं का तथा श्रम का जोड़ लगभग एक लाख रुपया मासिक बैठ सकता है। पर गायत्री परिवार के प्रत्येक संकल्प की पूर्ति आत्मदान, श्रमदान, भावदान आदि की सच्ची सम्पदा द्वारा होती है, इसलिए वे कार्य बिना किसी प्रकार की अर्थ व्यवस्था किये ही उच्च आत्मिक सद्भावनाओं के आधार पर चल पड़ते हैं और अनेक अड़चनों बाधाओं को पार करते हुए सफल हो जाते हैं। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान भी इसी प्रकार सफल होना है।

गत तीन मास के प्रयत्न से निर्धारित संकल्प के लगभग आधे भाग की पूर्ति होने लगी है। अभी इतना ही कार्य प्रतिदिन और होने लगे तब संकल्प पूर्ण हो। इसके लिए अभी इतना ही प्रयत्न और करना है जितना गत तीन महीनों में किया गया है। परिवार के सक्रिय सहयोगी, कर्मठ आत्माएं, श्रद्धावान चैतन्य सदस्य, व्रतधारी कर्मनिष्ठ कार्यकर्त्ताओं के परिश्रम और सहयोग के ऊपर ही यह सब निर्भर है। क्योंकि साधारण जनता की एक तो वैसे ही इन कार्यों में रुचि नहीं होती, फिर यदि कोई प्रेरणा करे भी तो कुछ ही दिनों में लोगों का उत्साह ठंडा पड़ जाता है। जिन लोगों ने कुछ उपासना करने की बात स्वीकार कर ली-फार्म भर दिया है- उन्हें बार-बार पूछते रहने, कोंचते रहने, रिपोर्ट देने के बहाने बार-बार मिलते रहने, प्रेरणा देते रहने से ही यह आशा की जा सकती है कि वे किसी प्रकार गिरते पड़ते संकल्प को निभा सकेंगे। नये उपासक पैदा करना भी इस युग में काफी कठिन है। बीमा-कम्पनी का एजेंट जिस परिश्रम और प्रयत्न से किसी व्यक्ति को बीमा कराने के लिए तैयार करता है- अनेकों बार घर पर चक्कर लगाता है। बार-बार उपेक्षा और तिरस्कार सहता है- तब कहीं किसी को बीमा कराने को तैयार करके अपना कमीशन सीधा करता है। ठीक उतना ही कठिन कार्य किसी को धर्म-कर्म में लगाने का है। इस युग में धर्म भावना, श्रद्धा, आस्तिकता का एक प्रकार लोप हो चला है। स्वयं आत्म स्फुरण तो किसी बिरले के ही मन में होती है अन्यथा टूटी मोटर को धकेलने की तरह धर्म-धारणा को भी कोई सत्पुरुष प्रेरणा दे देकर आगे बढ़ाते रहते हैं। आज धर्म पंगु है। वह किसी के सहारे से ही खड़ा हो पाता है। सहारा देने वाले न मिले तो वह बैठ जाता है।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के बारे में भी यही बात है। यद्यपि वह इस युग की एक महान आवश्यक साधना है- उसके साथ समस्त विश्व का ही नहीं- साधक का साँसारिक और आध्यात्मिक लाभ भी जुड़ा हुआ है। फिर भी उतनी दूर तक देखना कोई नहीं चाहता। सब को पास की चीज दिखाई देती है, तुरन्त लाभ देखते हैं। ऐसी स्थिति में साधारण जनता की उपेक्षा पर कुछ भी खेद करना उचित नहीं। यह समय का प्रभाव है। जिम्मेदारी जागृत आत्माओं की है। कर्मवीर पुरुषार्थी लोग-युग पलटते हैं, सोते हुए विश्व को जगाते हैं, अपना रक्तदान देकर सूखते हुए धर्म तरु को सींचते हैं। इस ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के मेरुदण्ड वे व्रतधारी सत्पुरुष ही हैं, जो अपना काम हर्ज करते हुए दर पर धर्म-फेरी लगाते हैं और बदले में उपहास, उपेक्षा, तिरस्कार सहते हुए भी निराश नहीं होते- जो दस बार प्रयत्न करने पर नौ जगह असफलता और एक जगह सफलता मिलने को ही बहुत बड़ी विजय मान लेते हैं।

इस अंक में अन्यत्र धर्म की पंगुता संबंधी लेख छपा है। धर्म की टूटी मोटर को आगे धकेलने के लिए घुटनों-घुटनों कीचड़ में घुस कर अपनी दुर्गति कराने वाले मनस्वी पुरुषों की भाँति जिस में साहस एवं उत्साह है उन्हीं के सहयोग से यह कार्य पूरा होने वाला है। अभी आधा कार्य और होना बाकी है। उपासक बढ़ाने का कार्य करने वाले-धर्म स्तंभ व्रत धारी- अपने उत्साह में तनिक भी कमी न आने दें। अपना प्रयत्न अब से भी अधिक उत्साह के साथ जारी रखें।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान और गायत्री परिवार-संगठन एक ही कार्य है। संगठन से ही इस अनुष्ठान की पूर्ति संभव है। जहाँ संगठन बन चुके हैं वहाँ साप्ताहिक सत्संगों के क्रम पर पूरा जोर दिया जाय। क्योंकि परस्पर मिलते रहने से ही कुछ प्रगति होती है। धर्म फेरी के लिए समय देने वाले कार्यकर्त्ता तैयार किये जायं। जिस संगठन के पास समय देने वाले जितने कार्यकर्ता हैं वह उतना ही सजीव है हर गायत्री परिवार अपने में इस सजीवता एवं जीवनी शक्ति के लिए प्रयत्नशील रहे। ऐसे लोग ढूँढ़ें या उत्पन्न करें जो केवल अपना जप करके ही चुप न बैठे रहें वरन् पंगु धर्म को कंधे का सहारा देने के लिए कुछ समय और श्रम भी धर्म प्रसार के लिए देने को तैयार हों।

‘धर्म फेरी’ गायत्री परिवारों की अनेकों शाखाओं द्वारा बड़े उत्साह से हो रही है। पर कई ने अभी कार्य आरम्भ नहीं किया है जहाँ प्रगति हो रही है वहाँ और भी अधिक उत्साह से कार्य करने की प्रार्थना है और जहाँ अभी फेरी नहीं हो रही है वहाँ अब शीघ्र ही इस पुनीत प्रक्रिया के चालू किये जाने की आशा है। सर्वत्र अधिकाधिक गायत्री उपासक बनाने और गायत्री परिवारों के संगठन बढ़ाने नई शाखाएं स्थापित करने, चलती हुई शाखाओं को सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता है; तभी यह इतना बड़ा संकल्प पूर्ण हो सकेगा। अन्यथा अपूर्ण, अधूरा और असफल हो जाने पर हम लोगों के लिए एक अशोभनीय लज्जा की बात हो जायगी। गायत्री परिवार के हर सच्चे कर्मनिष्ठ सदस्य को इस तथ्य का ध्यान रखना है।

चैत्र की नवरात्रि

नवरात्रि गायत्री उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है। वर्ष में दो बार- आश्विन और चैत्र में शीत और ग्रीष्म की मिलन वेला में- ऋतु संध्याएं नवरात्रियाँ आती हैं। इनमें उपासना करने से वर्ष के अन्य समयों की अपेक्षा अनेक गुना अधिक सत्परिणाम निकलता है। गायत्री परिवार के सदस्य सदा ही नवरात्रियों में अपनी स्थिति के अनुसार साधना अनुष्ठान आदि करते हैं। यह वर्ष अधिक महत्वपूर्ण होने के कारण नवरात्रियों में और भी अधिक सामूहिक उपासना की जानी चाहिए।

चैत्र सुदी 1 चन्द्रवार ता.9 को वह पूर्ण होगी। उसी दिन राम नवमी भी है। इन नौ दिनों में (1) ब्रह्मचर्य (2) अस्वाद व्रत (3) उपवास (4) भूमिशयन (5) दूसरों से अपने शरीर की कम से कम सेवा लेना (6) चर्म निर्मित वस्तुओं का त्याग (7) कुछ समय मौन आदि की जो विशेष तपस्याएँ बन पड़े तो अपनी स्थिति एवं सुविधा के अनुसार करनी चाहिए। 9 दिन में 24 हजार अनुष्ठान करने में प्रतिदिन 26 मालायें करनी पड़ती हैं जिनमें प्रायः 211 घण्टा लगता हैं। प्रातःकाल एक ही समय या सुबह शाम दोनों समय मिलाकर यह जप संख्या पूरी की जा सकती है। शताँश हवन 240 आहुतियों का एक दिन या 26 आहुति नित्य करके पूरा कर लेना चाहिए। जिन्हें असुविधा हो उनके लिए यह हवन तपोभूमि में भी कराया जा सकता है। हवन करने वालों का परिश्रम छोड़ दिया जाय तो हवन सामग्री, घी, समिधा आदि में बहुत खर्च नहीं पड़ता ब्राह्मण भोजन का भी अनुष्ठान में विधान है। पर यह प्रश्न बहुत ही विचारणीय है जिन ब्राह्मणों को खिलाने से वस्तुतः पुण्य होता है वैसे ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्म परायण, अपरिग्रही, लोक सेवी, ब्राह्मण कहीं ढूँढ़े नहीं मिलते। अन्य वर्णों की तरह सामान्य व्यवसाय-प्रधान जीवन व्यतीत करने वाले लोगों को भोजन कराने से लकीर ही भले ही पीट ली जाय वस्तुतः पुण्य कुछ नहीं होता। ऐसी दशा में ब्राह्मण भोजन के स्थान पर “ब्रह्मभोज” ज्ञान दान किया जाय तो उत्तम है। गायत्री संबंधी सस्ती पुस्तकें एवं गायत्री चालीसा, माता के चित्र आदि प्रसाद स्वरूप अनेक व्यक्तियों को देकर सच्चे अर्थों में ‘ब्रह्मभोज’ हो सकता है। अन्न दान से ज्ञान दान का पुण्य वैसे भी सौ गुना अधिक माना गया है।

नवरात्री में जप तो कई लोग कर लेते हैं, हवन को कुछ लोग भूलते हैं, ब्रह्मभोज में कुछ खर्च देख कर तो और भी अधिक लोग चुप हो जाते हैं। अनुष्ठान का यह आवश्यक अंग सर्वथा त्यागा न जाना चाहिए।

इस बार सूक्ष्म आकाश में उद्वेग की मात्रा अत्यधिक होने के कारण पिछले वर्षों की भाँति शाँतिपूर्वक स्थिर चित्त से अनुष्ठान बहुत कम लोगों के हो सकेंगे। चित्त में चंचलता, वासना की तीव्रता आदि के कारण उपजी सफलता जपात्मक अनुष्ठानों में न मिलेगी। जो करते आ रहे हैं वे तो करें ही, मन न लगने पर भी एक उत्तम परम्परा को छोड़ें नहीं पर जिन्हें नया ही अनुष्ठान करना हो या असुविधा हो वे गायत्री चालीसा का अनुष्ठान करें। यह अत्यधिक सरल है। इसमें ब्रह्मचर्य उपवास आदि का कोई प्रतिबंध नहीं है। स्नान करके साधारण रीति से एक बार में या दो बार में-दिन में या रात में- किसी भी समय एक सवा घंटा लगाकर 27 पाठ कर लेने चाहिए। इस प्रकार 9 दिन में 240 पाठ पूरे हो जाते हैं। हवन एवं ब्रह्मभोज के स्थान पर 240 गायत्री चालीसा वितरण कर देने चाहिए। यों 1) प्रति के हिसाब से इतने चालीसा 15)के होते हैं, पर अनुष्ठान प्राप्त करने वाले एवं धर्मार्थ वितरण करने वालों को वे डाक खर्च समेत 6) में दिये जा रहे हैं छोटे बालक या आर्थिक अभाव ग्रस्त व्यक्ति इतना खर्च न कर सकें तो मिल कर 240 चालीसा मँगा ले 16) से कम की वी.पी. नहीं भेजी जाती। शाखायें रेल द्वारा अधिक संख्या में गायत्री चालीसा मँगा लें तो थोड़े-थोड़े वितरण करने वालों को वहाँ से लेने में सुविधा रहेगी।

गायत्री परिवार की शाखाएं प्रयत्न करें कि अलग-अलग उपासना करने की अपेक्षा सदस्यगण एक स्थान पर, एक समय, उपासना, हवन आदि के सामूहिक आयोजन में सम्मिलित हों गायत्री चालीसा का पाठ बाजे आदि पर हो। इसके लिये एक सुसज्जित पंडाल बना लिया जाय, बैठने की, माला पाठ के लिये चालीसा, पंचपात्र, धूपबत्ती, पुष्प, अक्षत चन्दन आदि की व्यवस्था रहे। गायत्री माता के मंत्र लेखन के लिये कापी, दवात, कलम आदि उपलब्ध रहें धार्मिक चित्रों एवं शिक्षाप्रद वाक्यों से नवरात्रि का उपासना स्थान सजाया जाय, जौ बो दिये जायं, कलश एवं माता की प्रतिमा स्थापित रहे। कीर्तन प्रवचन, हवन आदि की व्यवस्था रहे इस प्रकार एक सुन्दर एवं प्रभावशाली कार्यक्रम बन सकता है। गायत्री चालीसा का कीर्तन बाजे पर मधुर स्वर से करने में बड़ा सुँदर मालूम पड़ता है। एक सी वेषभूषा में पीले वस्त्र पहन कर पीले दुपट्टे डाले हुए साधक एक लाइन में बैठे हुए बहुत ही शोभायमान लगते हैं। ऐसे दृश्य देखकर नये व्यक्तियों के मन में भी साधना की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। इसलिए जहाँ बन पड़े वहाँ सामूहिक आयोजनों का पूरा प्रयत्न किया जाय। रामायण पाठ, गीता पाठ आदि के कोई कार्यक्रम साथ-साथ चलते हों तो वह भी उत्तम है। रामायण पाठ वाली संस्थाओं का जहाँ सहयोग प्राप्त होता हो वहाँ गायत्री तथा रामायण का मिला−जुला कार्यक्रम भी बनाया जा सकता है। अपनी स्थानीय स्थिति के अनुसार शाखाओं को अपने यहाँ इस प्रकार के आयोजन के लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए। जहाँ संभव हो वहाँ अन्त में शोभा यात्रा-वेदमाता की सवारी के जुलूस भी निकाले जायं। सच्चे ब्राह्मण गुण कर्म, स्वभाव के ब्राह्मण न मिलने पर कुमारी कन्याओं को भोजन कराने की व्यवस्था की जा सकती है।

24 हजार जप, 240 गायत्री चालीसा पाठ की तरह 2400 मंत्र लिखने का भी अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन 267 मंत्र लिखने से भी एक लेखन अनुष्ठान पूरा हो जाता है। इसमें प्रायः 3 घण्टे लगते हैं। तीनों प्रकार के अनुष्ठानों में से जो भी करना हो या दो या तीनों एक साथ करने हों वे अपनी साधना की सूचना आदि मथुरा दे देंगे तो उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा संरक्षण यहाँ होता रहेगा

अ.भा. गायत्री परिवार सम्मेलन

गायत्री परिवार के सक्रिय कार्यकर्त्ताओं को वर्ष में एक बार गायत्री जयन्ती के अवसर पर गायत्री तपोभूमि मथुरा में बुलाते रहने का निश्चय किया गया है। अब तक नवरात्रियों में गायत्री उपासक मथुरा आया करते थे और अनुष्ठान, हवन, तीर्थयात्रा, प्रवचन आदि का लाभ उठाते थे। अब नवरात्रियाँ सर्वत्र अपने-अपने यहाँ मनाई जायं यह नीति निर्धारित कर दी गई हैं। वर्ष में एक बार जेष्ठ सुदी 10 गायत्री जयन्ती से लेकर पूर्णिमा तक 6 दिन का सम्मेलन करते रहने का निश्चय किया गया है। इस वर्ष इन तिथियों में 7,8,9,10,11,12 जून पड़ेगी।

गत वर्ष चैत्र की पूर्णाहुति के अवसर पर गायत्री परिवार के 6 हजार सदस्य आये थे। उतनी व्यवस्था हर बार बन पड़ना संभव नहीं। इसलिए 250 से लेकर 500 तक की सीमा में ही आने की स्वीकृति दी जा सकेगी। परिवार के कर्मठ व्रतधारी कार्य-कर्त्ताओं को ही इस बार आमंत्रित किया जा रहा है शाखाओं के संचालक एवं प्रमुख कार्यकर्ताओं को ही इसमें आना चाहिए। तीर्थ यात्रा के उद्देश्य से आने वाली भीड़-भाड़ से यहाँ भी असुविधा होती है और उन यात्रियों को भी अड़चन पड़ती है, इसी प्रकार छोटे बच्चों वाली महिलाएं उस जेष्ठ की तपती गर्मी में परेशान होती है। अतएव तीर्थ यात्रियों, छोटे बच्चे वाली महिलाओं को स्वीकृतियाँ नहीं दी जायगी।

सम्मेलन के उद्देश्य यह हैं (1) गायत्री परिवार के कार्यकर्ता एक दूसरे को जान सकें आपस में घनिष्ठ संबंध स्थापित कर सकें। (2) अपनी उपासना संबंधी प्रगति, गतिविधि, शंका, कठिनाई एवं आगामी कदम के सम्बन्ध में आवश्यक परामर्श प्राप्त कर सकें (3) ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की गतिविधि एवं परिस्थिति विचार विनिमय (4) गायत्री परिवार की शाखा संस्थाओं की प्रगति तथा भावी योजनाओं का निर्धारण (5) साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के लिए आगामी वर्ष की रूप रेखा (6) परिजनों के व्यवहारिक जीवन में उपस्थित समस्याओं पर आवश्यक मार्गदर्शन (7) विश्व की, मानव जाति की, वर्तमान स्थिति को समझना आदि।

उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए छहों दिन परिवार के लोग परस्पर गम्भीर विचार विनिमय करके प्रकाश प्राप्त करेंगे। वर्तमान काल के अनेक सभा सम्मेलनों के नाना विधि मनोरंजन करने जैसा “चों चों का मुरब्बा” इस सम्मेलन को नहीं बनाया जायगा। वरन् एक सुव्यवस्थित पार्लमेन्ट की भाँति-देश के कोने-कोने से आये हुए प्रतिनिधिगण विश्व के आध्यात्मिक, मानसिक, बौद्धिक क्षेत्र को विकृतियों से बचाने और श्रेयस्कर दिशा में लगाने का गम्भीर विचार मंथन करेंगे। गायत्री परिवार बातुनी जमा खर्च करने वालों की भीड़ नहीं-राष्ट्र का, युग का निर्माण करने वाली एक संगठित एवं महत्वपूर्ण शक्ति है। उसे अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व का गम्भीरतापूर्वक पालन करना है। इसलिए इस सम्मेलन में सीमित संख्या में ही लोगों को बुलाया जा रहा है।

यह लेख ही निमंत्रण पत्र है। जिन्हें उस अवसर पर आना संभव हो वे अपनी आने की सूचना अभी से देने की कृपा करके स्वीकृति प्राप्त कर लें। स्वीकृति पत्र प्राप्त सज्जनों के लिए ही ठहरने भोजन आदि की व्यवस्था हो सकेगी। सूचना पत्र में आने वालों का (1) पूरा नाम (2) पूरा पता (3) आयु (4)जाति (5) शिक्षा (6) व्यवसाय (7)स्वास्थ्य का विवरण लिखना आवश्यक है यह प्राप्त होने पर स्वीकृति पत्र के साथ-2 आवश्यक नियम, प्रतिबंध, ज्ञातव्य, कार्यक्रम आदि की विवरण पत्रिकाएं भी दी जाएंगी।

ऐसा सोचा जा रहा है कि स्थान-स्थान पर क्षेत्रीय सम्मेलन हर वर्ष होते रहे, उनमें मथुरा से भी सब लोग पहुँचे। इस प्रकार जो लोग इतनी दूर खर्च कर के नहीं आ सकते। वे अपने समीप ही एकत्रित हो कर सम्मेलन के उद्देश्यों का सरलतापूर्वक लाभ उठा सकेंगे।

साँस्कृतिक शिक्षण शिविर

साँस्कृतिक विद्यालय की नियमावली अखण्ड-ज्योति में छापी जा चुकी है। उसका पूरा पाठ्यक्रम एक वर्ष का है। विद्यार्थी श्रेणी के लोग तो उतने समय रह सकते हैं और लगभग 20 की संख्या में अभी भी तपोभूमि में रह कर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, पर इतना समय दे सकना कार्य व्यस्त लोगों के लिए संभव नहीं। इसलिए अब ऐसा सोचा गया है कि तीन-तीन महीने की एक अतिरिक्त शिक्षा योजना भी चला करे, जिसमें निर्धारित विषयों को जितना अधिक संभव हो सके सिखा दिया जाय और शिक्षार्थियों को इस योग्य बना दिया जाय कि वे सभी निर्धारित विषयों की काम चलाऊ जानकारी प्राप्त करके धर्म प्रचार के कार्य में सफलतापूर्वक प्रवृत्त हो सकें।

जेष्ठ महीना सभी वर्गों के लिए छुट्टी का रहता है। किसान, व्यापारी, विद्यार्थी, अध्यापक, कचहरियों के कर्मचारी आदि प्रायः इस एक महीने छुट्टी में रहते है। उन्हें संस्कृति विद्यालय के निर्धारित कार्यक्रम में से जितना अधिक से अधिक सीख सकें उतना सीखने तथा व्यक्तिगत जीवन में विकसित होने की महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अवसर देने होने की व्यवस्था की गई है। जो लोग आना चाहें अपना पूरा परिचय लिखते हुए आने की स्वीकृति प्राप्त कर लें। इस मास के शिविर में केवल 50 व्यक्तियों को आने की स्वीकृति दी जाएगी।

संस्कृति विद्यालय का निर्धारित पाठ्यक्रम निम्न विषयों का है। शिक्षार्थी इन में से जिन विषयों को अधिक महत्व देंगे उन्हीं शिक्षाओं की उनके लिए विशेष व्यवस्था रहेगी। विषय-

1. स्वाध्याय- मानव जीवन की अनेक समस्याओं को सुलझाने वाले उच्चकोटि के मनीषियों के लिखे हुए ग्रन्थों का अध्ययन।

2. सत्संग- प्रवचन, परामर्श, विचार विनिमय द्वारा जीवन को सुव्यवस्थित बनाने वाला मार्ग दर्शन।

3. संगीत- कीर्तन, भजन तथा रामायण गा सकने योग्य हारमोनियम, तम्बूरा आदि बजाने का साधारण संगीत ज्ञान।

4. प्रवचन- रामायण, गीता, एवं ऐतिहासिक उपाख्यानों द्वारा नैतिकता एवं सदाचार संबंधी धर्म प्रवचन तथा भाषण कला की विशिष्ट बातें।

5. गायत्री विज्ञान- गायत्री उपासना तथा उसके 24 अक्षरों में सन्निहित शिक्षाओं की जानकारी।

6. यज्ञ विधान-छोटे और बड़े रूप में अनेकों प्रकार के यज्ञ कराने का व्यवहारिक ज्ञान।

7. वैदिक मंत्र विद्या- विविध प्रयोजनों के लिए काम आने वाले शक्ति सम्पन्न वेदमंत्रों का साधनात्मक उपयोग।

8. संस्कार पद्धति- यज्ञोपवीत, विवाह आदि सब संस्कारों को करने तथा अवसरों पर देने योग्य महत्वपूर्ण शिक्षाओं का ज्ञान।

9. आरोग्य शिक्षा- सूर्य नमस्कार, प्राणायाम आदि योगिक व्यायामों की पद्धतियाँ स्वस्थ रहने की सावधानी तथा विधि व्यवस्था, सभी रोगों की सरल चिकित्सा तथा परिचर्या।

10. यज्ञोपवीत निर्माण- स्वयं शुद्ध यज्ञोपवीत बनाकर पहनने तथा इस गृह उद्योग द्वारा कुछ आजीविका कमा लेने का भी मार्ग खोलना।


धर्मात्माओं के सराहनीय सत्प्रयत्न

सतना क्षेत्र के कुरुवंशी क्षत्रियों का एक विराट सम्मेलन ता. 18 फरवरी को पालाग्राम में होगा। ता. 19 को एक लक्ष आहुतियों का हवन तथा गंगा, गीता, गौ, गायत्री का पूजन होगा। इस अवसर पर इन क्षत्रियों को यज्ञोपवीत धारण कराये जायेंगे और जीवन को धार्मिक बनाने की शिक्षा दी जाएगी।

-जगदीश प्रसाद भट्ट

कटनी से 9 मील दूर निवार स्टेशन के पास नदी तट पर 9 कुण्डों में सवालक्ष आहुतियों का हवन ता. 27, 28 फरवरी व 9 मार्च को तीन दिन में सम्पन्न होगा। आयोजनकर्ता बड़े उत्साहपूर्वक तैयारी में लगे हुए हैं।

-राम आसरे शुक्ला

भिवानी (हिसार) में स्थान ला. राम विलास सागरमल ठेकेदार के बगीचे में, ता. 24 फरवरी को गायत्री माता, 9 वें पुरश्चरण की पूर्णाहुति होगी। बाहर से भी कई विद्वान महात्मा पधारेंगे।

-बनवारीलाल ब्रह्मचारी

भगौनापुर (फतेहपुर) में वसंत पंचमी को 2400 आहुतियों का सामूहिक हवन हुआ। श्री. शंभूप्रसाद जी ने अपने पतारी में गायत्री शाखा अपनाने की प्रतिज्ञा की। अब होली पर एक बड़ा यज्ञ होने की तैयारी हो रही है। कई सज्जनों के यज्ञोपवीत संस्कार भी कराये जायेंगे।

-मोहन लाल वर्मा

सिवनी मालवा (होशंगावाद) में 24 लक्ष सामूहिक जप का कार्यक्रम पूर्ण हो जाने पर एक बड़ा यज्ञ होगा। इस क्षेत्र के अनेक क्षत्रिय जो अब तक यज्ञोपवीत धारण नहीं करते थे, यज्ञ के अवसर पर विधिवत यज्ञोपवीत धारण करेंगे।

-कृपाराम आर्य

कसही बहरा (रायपुर) में गतमास 35700 आहुतियों का हवन बड़े श्रद्धापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ।

-रामगरीब अग्रवाल

दिगौड़ा (टीकमगढ़) में गायत्री शाखा द्वारा इस मास गायत्री चालीसा तथा मंत्र लेखन का प्रचार करने के लिए प्रयत्न किया गया।

-वैजनाथ सोनकिया

गायत्री परिवार बिजनौर के सदस्य असाधारण उत्साह से धर्म फेरी के कार्य में वे अपने शरीर की आवश्यक क्रियाओं को भी भूल कर कार्य कर रहे हैं। 478 सदस्य बन चुके हैं। 1000 चालीसा वितरण किये गये। आगामी 17,18,19 मार्च को एक विशाल यज्ञ होने की तैयारी की जा रही है। महिला कार्यकर्ताओं में सर्व श्री0 विद्या देवी, मगन देवी, सरस्वती देवी, शान्तिदेवी, रोशनी देवी, धनदेवी, गोविन्दी देवी, कौशिल्या देवी, रामदेवी आदि का प्रयत्न विशेष रूप से सराहनीय है।

-अशर्फीलाल मुख्तार

मऊ नाथ भंजन (आजमगढ़) में वैश्य सभा के अवसर पर गायत्री यज्ञ हुआ। अनेक महत्वपूर्ण प्रवचन हुए तथा 30 व्यक्तियों का यज्ञोपवीत संस्कार कर गायत्री गुरुमंत्र की दीक्षा दी गई।

-जगन्नाथ शास्त्री ‘ॐ’

गायत्री परिवार ब्रह्मनीबाजार (विलासपुर) के 53 सदस्यों ने प्रतिज्ञा की है कि इस क्षेत्र में देवी के नाम पर की जाने वाली पशुबलि का प्रथा के विरुद्ध सुसंगठित एवं जोरदार आन्दोलन करेंगे। हजारों की संख्या में प्रचार पत्र छपाये जा रहे हैं। और पशुबलि को रोकने के लिए ठोस उपाय सोचे जा रहे हैं।

-मोहनलाल गुप्ता

धौराला (शाजापुर) की शाखा द्वारा चैत्र की नवरात्रि में सामूहिक गायत्री उत्सव करने की तैयारियाँ अभी से आरम्भ कर दी गई हैं। 10 उपासकों ने 5 लाख जप का संकल्प आरम्भ कर दिया है। 24 हजार आहुतियों का हवन गायत्री चालीसा पाठ, प्रवचन आदि के कार्यक्रम भी बन रहे हैं।

-सुन्दर लाल त्रिवेदी

राजपुर (बडवानी) में महावीर जी के मन्दिर पर बसंत पंचमी को गायत्री उपासना के अतिरिक्त अखण्ड रामायण पाठ भी हुआ, बड़ा उत्साह था।

-नाथूराम सोलंकी

गायत्री परिवार तनैडिया (शाजापुर) द्वारा साप्ताहिक सत्संगों का तथा सदस्य बढ़ाने का कार्यक्रम उत्साहपूर्वक चल रहा है। शाखा केन्द्र के अतिरिक्त डॉक्टर साहब के यहाँ, प्रह्लाद चन्द्र जोशी जी के यहाँ भी अच्छे हवन हो चुके हैं। शिवरात्रि पर अखण्ड-ज्योति, अखंड-जप, अखंड-हवन, चालीसा पाठ तथा प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठ आदि के कई कार्यक्रम बनाये गये हैं।

-नन्द किशोर कर्मयोगी

ढ़कियारघा (शाहजहाँपुर) में दुर्गामाता के मन्दिर पर बसन्त पंचमी को आत्मदानी श्री स्वामी केवलानन्द जी महाराज की अध्यक्षता में एक बहुत ही सफल गायत्री यज्ञ हुआ। जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा।

-धर्मेंन्द्र सिंह

(कौलमी) शहडोल में पौष सुदी 15 को गायत्री अनुष्ठान तथा हवन का कार्यक्रम पं0 राम मिलन जी मिश्र की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। आमंत्रितों को गायत्री चालीसा तथा चित्र भेंट किये। जनता सहयोग सराहनीय था।

-रोहिणी प्रसाद शुक्ल

मऊ रानीपुर (झाँसी) में बसन्त पंचमी के दिन 2400 आहुतियों का सामूहिक यज्ञ सुचारु रूप से सम्पन्न हुआ। वेद भाष्यकार पं. रामदेव जी विद्यालंकर भी यज्ञ में पधारे थे।

-सालिगराम पाण्डेय

फलोदी, गायत्री परिवार के प्रयत्न से एक वेद पाठशाला स्थापित हुई है, जिसमें आवश्यक धर्मकृत्य भी सिखाये जाते हैं। विद्यार्थियों की संख्या 50 के लगभग है। सामूहिक जप हवन का कार्यक्रम भली प्रकार चलता रहता है।

-अम्बालाल थानवी

व्यावर, शाखा द्वारा सामूहिक हवन सत्संग बड़े आनंदपूर्वक होता चला आ रहा है। गत परिवार को पं. मंगतराम शर्मा के यहाँ चौबीस सौ आहुतियों का हवन हुआ।

-घीसूलाल वर्मा

विगत पूर्णिमा को सामूहिक गायत्री यज्ञ श्रीमती गंगा देवी प्रधान के घर सानंद सम्पन्न हुआ। बसन्त पंचमी के सामूहिक यज्ञ आयोजन में गायत्री सदस्यों के अतिरिक्त अन्य सज्जनों ने भी श्रद्धापूर्वक भाग लिया।

-वृन्दादेवी प्रधान

श्री. स्वामी योगानंद जी महाराज गायत्री प्रचार में बड़ी लगन से जुटे हुए हैं। भाईपुर (बुलन्दशहर) में उनके आठ दिन प्रवचन हुये तथा एक हजार आहुतियों का हवन एवं 20 कन्याओं का भोजन हुआ। सनेता सफीपुर में 26 जनवरी को 11 सौ आहुतियों का हवन हुआ। ता. 28 भगवानपुर में प्रचार किया।

-छेदालाल अरोड़ा

छिवरामऊ (इटावा) में बसन्त पंचमी अवसर पर बड़ी श्रद्धापूर्वक गायत्री यज्ञ हुआ। अनेक नर-नारी उपस्थित थे।

-कृष्ण कुमारी

हथगाँव (फतेहपुर) में सामूहिक यज्ञ दैनिक रूप से चल रहा है। गायत्री उपासक श्रद्धापूर्वक भाग लेते हैं। पूर्णिमा और अमावस्या को अखण्ड जप चलता है।

-जग मोहनलाल निगम

कोटा में 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन झंडाभिवादन के समय वर्कशॉप की सभाएं पं. बाला राम जी त्रिवेदी का गायत्री माता तथा यज्ञ पिता की महिमा पर बड़ा प्रभावशाली भाषण हुआ। 540 गायत्री चालीसा वितरण किये जा रहे हैं।

-पूरनमल शर्मा

शामगढ़ (मन्दसौर) में श्री स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज उस क्षेत्र की जनता के सहयोग से एक बहुत बड़ा यज्ञ करने की तैयारी में दिन रात संलग्न हैं। यज्ञ समिति का निर्माण हो गया है, जो आयोजन की व्यवस्था बनाने में कार्यरत हैं।

-नरसिंह लाल

हसवा (फतेहपुर) में गणतंत्र दिवस पर गायत्री सदस्यों द्वारा प्रातःकाल 1100 आहुतियों का हवन हुआ। सायंकाल प्रवचन कीर्तन आदि हुए। साप्ताहिक सत्संगों में अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित अन्य शाखाओं के कार्यों को सदस्यगण बड़े चाव से सुनते और उनसे प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

-रामवतार शर्मा

करड़ावद (झाबुआ) निवासी पं. बिहारीलाल जी महाराज गत तीन वर्ष से संयम, नियम एवं एक वर्ष मौन रह कर गायत्री महापुरश्चरण कर रहे थे। उसकी पूर्णाहुति के उपलक्ष में ता. 5, 6, 7, 8, 9 मई को एक विराट् यज्ञ श्री नीलकंठेश्वर महादेव के मन्दिर पर पेटलावद नगर में होगा। भारी संख्या में जनता के उपस्थित होने की आशा है।

-सोमेश्वर चतुर्वेदी

बकानी (झालाबाड़) पं. द्वारिकालाल जी अध्यापक के यहाँ गायत्री जप हवन तथा अखण्ड रामायण पाठ का आयोजन बड़े आनन्द पूर्वक संपन्न हुआ।

-भँवरलाल शर्मा

डभोड़ा (गुजरात) में 1 जनवरी को 24 हजार आहुतियों का गायत्री यज्ञ तथा प्रभावशाली सत्संग हुआ। श्रद्धालु सज्जनों का सहयोग सराहनीय था।

-हरिप्रसाद जानी

आरंग (रायपुर) शाखा के अब तक 107 सदस्य बन चुके हैं। साप्ताहिक सत्संगों में उच्च कोटि के प्रवचनों की व्यवस्था रहती है। नित्य 24 हजार सामूहिक जप तथा शताँश आहुतियों का नियमित क्रम चलता है। पंच कुँडी यज्ञशाला पर टीन डालने की व्यवस्था की जा रही है।

-विद्या प्रसाद मिश्र

वसडीहा (शाहाबाद) शाखा द्वारा इस मास जप, हवन, सत्संग, अखण्ड कीर्तन, धर्म फेरी, दीन दुखियों की सहायता करना आदि अनेक धार्मिक कार्यक्रम चलाये गये। वेद पढ़ाने के लिए एक पंडित बुलाने का विचार किया गया है।

-ब्रजभूषण पाठक

फत्यापुर (निमाड़) के कई सदस्य उचावद यज्ञ में गये थे। वहाँ से प्रभावित होकर यहाँ भी एक बड़ा सामूहिक हवन तथा अनुष्ठान करने की तैयारी हो रही है।

-बना रूपचन्द पटेल

बिजौली (फतेहपुर) में बसन्त पंचमी के अवसर पर 24 हजार आहुतियों का यज्ञ बड़े समारोह पूर्वक सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर प्रवचन करने के लिए बरौली से वेद विद्वान श्री ईश्वरी प्रसाद जी पधारे थे। भगौनापुर वरिगँवा आदि शाखाओं के सदस्य भी इस यज्ञ में भाग लेने आये थे। इस क्षेत्र में धार्मिक जागृति उत्पन्न करने के लिए एक बहुत बड़े यज्ञ की व्यवस्था बनाई जा रही है।

-राम सनेही वर्मा

बहादुर गंज (पूणियाँ) में 8 फरवरी अनुष्ठान की पूर्णाहुति के साथ-साथ सामूहिक हवन तथा कीर्तन हुआ। लगभग 250 व्यक्तियों ने भाग लिया। भाषणों में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान पर प्रकाश डाला गया।

-खुशी नाथ शर्मा

खाम गाँव (वरार) में ता. 11,12,13 फरवरी को 24 हजार आहुतियों का गायत्री यज्ञ 5 कुण्डी यज्ञ शालायें बड़े हर्षोलास के साथ पूर्ण हुआ। यज्ञ मण्डप की शोभा सजावट देखते ही योग्य थी। खामगाँव निवासियों के अतिरिक्त खेर्डा, पहुरजिरा, वडगाँव, तोव्हारा आदि स्थानों से भी गायत्री उपासकों ने आकर यज्ञ में भाग लिया। सर्व श्री पन्नालाल जी व्यास, के. एम. मुँशी, राजा भाऊ जोशी, मुरलीधर पाटिल आदि के भाषण हुये। नरमेध के आत्म दानी पूज्य जय नारायण जी ब्रह्मचारी के द्वारा पूर्णाहुति का कृत्य संपन्न हुआ। लगभग लगभग 800 व्यक्तियों का भोजन हुआ। उपस्थित उपासकों ने ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने की प्रतिज्ञा की।

-मुरलीधर पाटिल

मोरवी (सौराष्ट्र) में गायत्री उपासकों द्वारा डेढ़ करोड़ जप पूर्ण हो चुकने पर उसकी पूर्णाहुति हवन ता. 21, 22, 23 फरवरी को स्थान कुबेरनाथ महादेव मन्दिर पर होना निश्चित हुआ है।

-नारदलाल सदाशिव

धुरट (जालौन) में ता. 10 से 14 फरवरी तक 9 कुण्डी यज्ञ बड़े समारोह पूर्वक सम्पन्न हुआ। रामायण, भागवत, गीता-पाठ तथा प्रवचनों का बड़ा आनन्दवर्द्धक कार्यक्रम था। यज्ञ देखने दूर दूर के लोग आये थे। मथुरा से आचार्य जी भी आये थे।

-शिवचरनलाल शास्त्री

बापी (गुजरात) से 40 मील दूर मधुवनी में गायत्री अनुष्ठान तथा यज्ञ सफलता पूर्वक पूर्ण हुआ। ठाकुरलाल नारायणदास राणा इस प्रदेश में गायत्री प्रचार विशेष उत्साह पूर्वक करने के लिए कटिबद्ध हुए हैं।

-कष्णराय हरिभाव घोंडे

रानी मूँडा (कालाहाँडी) में माघ शुक्ल दशमी को 14 माला आहुतियों का हवन तथा सामूहिक जप बड़े आनंद पूर्वक हुआ। प्रवचन भी हुए, मंत्र लेखन चालू है।

-हरिकृष्ण शर्मा

नवाबगंज (बरेली) में माघ शुक्ल दस का 32 हजार गायत्री जप, 2580 मंत्र लेखन 1200 पाठ गायत्री चालीसा के, हवन, प्रवचन का बड़ा श्रद्धापूर्ण आयोजन हुआ।

-रामभिलाष त्रिपाठी

सुन्दरी (बरेली) में गायत्री यज्ञ आनन्द पूर्वक पूर्ण हुआ। आचार्य त्रिपाठी जी तथा श्री नानकचन्द टण्डन का उसमें विशेष हाथ था। यज्ञ की रात्रि को श्री टण्डन जी को गायत्री माता के स्वप्न में स्पष्ट दर्शन हुए।

-प्र.भा. प्रताप शुल्क

काँकेर (वस्तर) में पेटौद के गायत्री उपासकों को मिला कर शाखा स्थापित की गई। बसंत पंचमी को सामूहिक हवन हुआ। यज्ञोपवीत भी धारण कराये गये।

-म.दा. काश्यप पटवारी

मझिया (हरदोई) में बसंत पंचमी को 11 मालाओं की आहुतियों का बड़ा प्रभावशाली यज्ञ हुआ। आस-पास के अनेक गाँवों से जनता भारी संख्या में आयी थी। चैत में इससे भी बड़े यज्ञ का आयोजन हो रहा है।

-शिवराम दीक्षित

धामपुर (बिजनौर) में 2 यज्ञ 4 हजार आहुतियों के हो चुके हैं। अब एक सामूहिक यज्ञ होली पर होगा। सत्संग नियमित रूप से चलता है। 40 सदस्य बन चुके हैं। 108 सदस्य बनाने के लिए प्रयत्न चल रहा है।

-काँती देवी त्यागी

पयागपुर (बहरायच) में बसंत पंचमी को हुए लगभग 100 उपासकों को भोजन कराया गया। पूर्णाहुति सरयू तट वासी श्री ब्रह्मचारी जी के कर कमलों से हुई। श्री बेद्यनाथराय एवं ब्रह्मदेव गुप्त का सहयोग सराहनीय था।

-देशराज पाठक

सागौन भाडी (कालाहाँडी) कुम्भ संक्रान्ति पर श्री महेश्वर प्रसाद बेहेरा के सहयोग से गायत्री जप, हवन, रामयण पाठ, गीता पाठ, ब्रह्म भोज, प्रवचन का कार्य सम्पन्न हुआ। गोविन्दपुर में एक नई शाखा स्थापित हुई।

-विनायक प्रसाद शर्मा

महोवा (हमीरपुर) में सन् 57 में 11 लक्ष गायत्री जप का कार्यक्रम चल रहा है। साप्ताहिक सत्संग उत्साह पूर्वक होते हैं।

-प्रेमचन्द अग्रवाल

गत अश्विन की नवरात्रि से श्री गुरुप्रसाद जी निगम के यहाँ हर मास पूर्णिमा को 5 हजार आहुतियों का हवन होता आ रहा है। गायत्री का प्रचार इस क्षेत्र में बढ़ रहा है।

-रामाभाई फन्दे

बडवानी में एक सज्जन ने गायत्री मन्दिर बनाने के लिए 5 हजार रुपया तक व्यय करने का आश्वासन दिया है। जमीन लेने सम्बन्धी समस्या हल होते ही यह सत्कार्य प्रारम्भ होने की आशा है।

-गोविन्दराय सी. पंडित

दिगौड़ा (टीकमगढ़) के समीपवर्ती ग्रामों में चन्दा इकट्ठा करके स्वामी श्री सियारामदास जी जेष्ठ में एक बड़ा यज्ञ करा रहे हैं। प्रयत्न जोरों से चल रहा है।

-वृजबल्लभ संज्ञा

पलायथा (राजस्थान) में ता. 4 से 6 फरवरी को 9 कुण्डों को भव्य यज्ञशाला में सवा लक्ष आहुतियों का यज्ञ बड़े ही समारोह पूर्वक हुआ। मथुरा से आचार्य जी, स्वामी प्रेमानन्द जी भी पधारे हरिकीर्तन, यज्ञ, प्रवचन, जल-यात्रा, शोभा-यात्रा, पूर्णाहुति, प्रसाद-वितरण आदि कई कार्य-क्रम बड़े ही मनोहर थे। सर्व श्री रामरत्न शर्मा पंचौली, श्री कृष्ण शर्मा गौतम, गोरघनलाल आचार्य, श्री कृष्ण गुप्त, रघुनाथप्रसाद पटवारी, जगन्नाथ नन्दवाना आदि सज्जनों का सहयोग विशेष सराहनीय रहा। ता. 8 को गोपाललाल जगन्नाथ जी नन्दवाना के यहाँ 15 मालाओं का तथा रामरत्न जी पंचोली के यहाँ 34 मालाओं का, वैद्य रामस्वरूप आत्रेय के यहाँ 6250 आहुतियों का हवन लाइन मिस


दिव्य-प्रेरणा


दिव्य-प्रेरणा (Kavita)

यही आज की दिव्यतम साधना है-

स्वयं जाग जाओ, जगत को जगाओ?

हृदय में प्रबल भावनाएँ उगाओ,

निराशा का आलस्य तन से भगाओ।

बहुत देर अज्ञान की नींद सोये-

न अब व्यर्थ अपना समय तुम गँवाओ।

उठो, चल पड़ो, मत रुको एक क्षण भी,

बढ़ो, लक्ष्य की ओर सबको बढ़ाओ? यही0-

बढ़े राम भी थे स्वयं आत्म-बल से,

मिटाये थे संसार के ताप सारे।

करें अनुकरण हम न क्यों आज उनका,

बनें क्यों न आदर्श उनसे हमारे॥

हो तुम भी उन्हीं की सु-सन्तान, देखो,

सम्हालो, सुदृढ़-तत्त्व जीवन में लाओ? यही0-

तुम्हें प्रण न प्रह्लाद का याद है क्या,

सुनी क्या न तुमने है ध्रुव की कहानी?

अमित कष्ट झेले, अंगारों से खेले,

न विचलित हुए ध्येय से दिव्य-ज्ञानी॥

उसी भाँति कटिबद्ध होकर बढ़ो तुम,

स्वयं आज कर्तव्य अपना दिखाओ? यही.-

बनो पार्थ से कर्मयोगी, सुपथ में-

कभी मत डिगो भीम की शक्ति धारो।

बताये गये जो महावाक्य रण में-

वही दिव्य-सन्देश मन में उतारो॥

न अटको, न भटको, स्वपथ में निरन्तर-

बढ़े ही चलो पग न पीछे हटाओ? यही.-

*समाप्त*

(श्री रामभिलाष त्रिपाठी “चन्द्र” नवागंज, बरेली)