चारों वेदों में तीन विषय, जो ऋषियों ने बतलाये हैं। वे इस गागर गायत्री में, सागर की तरह समाये हैं॥
जो इस गागर को गा-गा कर, सारे जग में गुँजा देगा। उसको भगवान सुगमता से, भव सागर पार लगा देगा॥
इस महामंत्र को जो निशिदिन, नर तन पाकर नहिं ध्याता है। वह ज्ञान हीन होकर जग में, नर पशु की पदवी पाता है॥
यह सारे भव-भय हरणी है, यह सत्य ज्ञान की सरणी है। तर जाओगे जो ध्याओगे, यह भव सागर की तरणी है॥
वेदों की है एक जान यही, योगियों का है यह ध्यान सही। गन्धर्वों का है गान यही, भक्तों की है एक शान यही॥
देवों की है सुर तान यही, ज्ञानियों का है धन मान यही। वह महामलिन मानव होगा, जिस हृदय में इसका स्थान नहीं॥
माँ ने अपने अनन्त ज्ञान से, दिया है एक इनाम यही। नस-नस को इसमें स्नान करा, है सबसे सुन्दर काम यही॥
जो गायत्री माँ के चरणों में, निशिदिन शीश नवाता है। रहती न उसको चाह कोई, वह शहनशाह बन जाता है॥
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसने अन्य जीवों की अपेक्षा जो उन्नति की है उसका प्रधान कारण उसकी सामाजिक सामूहिक मनोवृत्ति है। मिल-जुल कर काम करने और एक दूसरे को सहायता देने के स्वभाव ने ही शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, विज्ञान, शिल्प आदि अनेक दिशाओं में मनुष्य को बढ़ाया है। विवाद, कुटुम्ब, जाति, सम्प्रदाय, राष्ट्र, सभा, सम्मेलन, संगठन आदि इसी मनोवृत्ति के आधार पर बने हैं।
मनुष्य ने यह भली प्रकार जान लिया है कि वह एक दूसरे से अलग-अलग होकर नहीं, मिल- जुल कर एक दूसरे को सहयोग देकर ही आगे बढ़ सकता है। अपनी कठिनाइयों और कमियों को दूर कर सकता है।
इस सामूहिकता की मनोवृत्ति को ‘देव’ तत्व कहते हैं। क्योंकि इस भावना को बढ़ाने में त्याग, संयम, सेवा, प्रेम, उपकार आदि गुणों की आवश्यकता पड़ती है। इसके विपरीत एक और मनोवृत्ति मनुष्य में काम करती है जिसे ‘स्वार्थपरता’ कहना चाहिए। इसकी प्रेरणा दूसरों से अपने लिए अधिकाधिक लाभ लेना, और बदले में कम से कम देने की इच्छा प्रबल होती है। फलस्वरूप बेईमानी, छल, शोषण, अन्याय, संग्रह, विलासिता आदि की वृद्धि होती है। इस मनोवृत्ति को ‘असुर’ तत्व कहते हैं। यह दोनों ही देव, असुर मनोवृत्तियाँ परस्पर निरंतर संघर्ष करती रहती हैं। गीताकार ने तत्वतः इस देवासुर संग्राम का वर्णन किया है और अर्जुन को निमित्त बना कर जन-साधारण को असुरता-स्वार्थपरता को पराजित करने और केवल लोक-हित को विजयी बनाने के लिए आन्तरिक संघर्ष करते रहने का निर्देश किया है।
परिस्थितियों के कारण कभी देवत्व प्रबल हो जाता है तो कभी असुरता की चढ़ बनती है। व्यक्तिगत जीवन की भाँति, सामूहिक जीवन में भी यह उतार चढ़ाव आते रहते हैं। कोई काल सज्जनों की अधिकता का होता है तो किसी में दुर्जनों की भरमार रहती है। सतयुग कलियुग आदि का यही आधार है। बात यह है कि मनुष्य के अन्दर असुरता, पाशविकता, स्वार्थपरता की मात्रा अधिक रहती है। निम्नगामी मनोवृत्तियाँ सरल और प्रबल होती हैं उन्हें बढ़ते देर नहीं लगती। ऊर्ध्वगामी, देवत्व प्रधान प्रवृत्तियाँ कठिन और परिणाम में मन्द, सौम्य एवं साधारण होती है जिनके कारण भौतिक दृष्टि से अधिक लाभ मिलते नहीं दीखते इस लिए उनमें उतना आकर्षण नहीं होता जितना असुरता के सिद्धान्तों में। इसलिए बहुधा मन की प्रवृत्ति व्यक्तिगत स्वार्थ साधन की ओर ही अधिक रहती है। पानी को फैलाया जाए तो वह नीचे की ओर बिना किसी प्रयत्न के बह निकलेगा किन्तु यही पानी को ऊपर चढ़ाना हो तो उसके लिए अनेक प्रकार के साधन जुटाने पड़ते हैं तब कहीं धीरे-धीरे थोड़ी सफलता मिलती है।
आसुरी तत्वों की प्रबलता और देवत्व में सौम्यता के कारण बार-बार ऐसे अवसर आ जाते हैं कि व्यक्तियों में तथा समाज में सामूहिकता की प्रवृत्ति घट जाती है और स्वार्थपरता बढ़ जाती है। उस असंतुलन की स्थिति को संभाल कर संतुलन कायम करने के लिए कोई महापुरुष देवदूत, अवतार आते हैं और बुराइयों को घटाने, अच्छाइयों को बढ़ाने के अपने उद्देश्य को पूरा करके चले जाते हैं। यह तो हुई विशेष परिस्थितियों को, विशेष रूप से समाधान करने वाले विशेष महापुरुषों की बात। को नियंत्रित करने और देवत्व को प्रोत्साहन देने के लिए कुछ आत्माओं को प्रयत्न करते रहना होता है यदि यह प्रयत्न न हों तो भ्रष्टाचार अत्यन्त तीव्र गति से फैलता है और जन-मन की स्थिति असुरता से आच्छन्न हो जाती है।
हर वस्तु से एक मैल निकलता है। समय-समय पर उसकी सफाई न की जावे तो गन्दगी और बीमारी फैलती है। बर्तन, कपड़ा, मकान, शरीर आदि किसी भी वस्तु को लें-उन पर मैल जमने की प्रक्रिया होती रहती है। मिट्टी, साबुन, बुहारी, जल आदि वस्तुओं से उनकी जल्दी-जल्दी सफाई करनी पड़ती है। यदि सफाई की यह क्रिया बन्द कर दी जावे तो यह वस्तुएं मलीनता से भर जाती हैं। मानवीय मन तथा समाज की भी यही स्थिति है। मन में भी एक प्रकार की गन्दगी और मलीनता उत्पन्न होती रहती है जिसे स्वार्थपरता, वासना, तृष्णा आदि नाम दिये जाते हैं। इसकी सफाई जल्दी-जल्दी न की जाती रहे तो मन की यह गन्दगी बहुत बढ़ जाती है और कुछ ही दिनों में वह बढ़ी हुई मानसिक मलीनता वाला व्यक्ति एक प्रकार से विषाक्त रक्त वाले छूत के रोगी की तरह, अपने लिए ही नहीं, निकटवर्ती अन्य लोगों के लिए भी हानिकारक एवं कष्टकारक बन जाता है। उसकी बुरी नीयत, बुरी आदत, बुरी भावना, बुरी विचार धारा, उससे इस प्रकार के कार्य बलात् कराती रहती है जो दूसरों के लिए, समस्त समाज के लिए कष्टकारक होते हैं। अपने भौतिक लाभ की बात सोचते रहने से मनुष्य के स्वभाव में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, असत्य, दंभ, आलस्य, चोरी, अनीति, निष्ठुरता आदि अनेकों बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं और वे बुराइयाँ जब मनः क्षेत्र से बाहर निकल कर वाणी तथा क्रिया में प्रकट होती हैं तो उनका रूप कलह एवं कुकर्म के रूप में ही सामने आता है।
यह प्रवृत्ति एवं प्रक्रिया जब अधिक लोगों में अधिक मात्रा में बढ़ जाती है तब लोगों में प्लेग, हैजा, चेचक आदि महामारियों की तरह “सामाजिक अनाचार” का रोग फैल जाता है और उसके कष्टकारक परिणाम से सभी लोग नाना प्रकार के दुख पाते हैं। चोरी, बेईमानी, अनीति, हत्या, लूट, व्यभिचार, उद्दंडता, आलस्य, शोषण, विलासिता, संघर्ष, द्वेष आदि की अनेकों दुष्प्रवृत्तियाँ अनेक रूपों में फूट पड़ती हैं। जिससे व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सर्वत्र अशान्ति दीख पड़ती है। घर, परिवार, मुहल्ले, ग्राम, देश, राष्ट्र, समाज अनेक छोटी-मोटी घटनाओं एवं परिस्थितियों को लेकर आपस में टकराते, घायल होते, दुख पाते और बर्बाद होते हैं।
यों नदी नालों में होकर असीम मात्रा में पानी बह कर व्यर्थ जाता रहता है। पर यदि उसका सदुपयोग करना होता है तो उस जल को काम में लाने के लिए अनेक व्यवस्थाएँ बनानी पड़ती हैं। घाट, बाँध, नहर, पम्प, नाव, जहाज आदि साधनों की सहायता से वह भयंकर जलधारा जिससे हानि की ही आशा की जाती थी-बदल कर बड़ी उपयोगी एवं लाभदायक बन जाती है। यदि यह उपाय न किए जायं तो नदी नालों से लाभ मिलना तो दूर उलटे वे अनेक प्रकार से बाधक बनेंगे। यही बात मनुष्य की प्रवृत्तियों के संबंध में भी है। उसके भीतर से जो असुरता-स्वार्थपरता-हर घड़ी फूटती रहती है उसे नियंत्रित करने के लिए घाट, बाँध, नहर आदि की तरह धार्मिक-नैतिक-दैवी-भावनाओं के नियंत्रण स्थापित करने पड़ते हैं। यह तंत्र जब तक मजबूत रहता है-लोग एक दूसरे के प्रति अधिक उत्तम व्यवहार करते हैं, एक दूसरे के लिए त्याग और प्रेम का परिचय देते हैं फलस्वरूप सब के मन प्रसन्न रहते हैं, सामाजिक सुव्यवस्था कायम रहती है और साथ ही भौतिक उन्नति के साधन भी बनते हैं। पर जब यह धर्मतंत्र शिथिल होने लगता है तब असुरता की प्रवृत्ति अन्तरात्मा के भीतर सौम्य गति से कार्य करने वाली दैवी वृत्ति को परास्त करके अपनी प्रभुता स्थापित कर लेती है। और इस पृथ्वी पर नरक के दृश्य उपस्थित हो जाते हैं। नर-तनु व्याघ्र ही हाट-बाजारों में, घर-द्वार में, खेत-खलिहानों में, सभा-संस्थाओं, मन्दिर, मस्जिदों में, दफ्तर-राजद्वारों में, घूमते दिखाई पड़ते हैं। अपनी कुटिलता को छिपाने के लिए बातें बढ़-चढ़ कर बनाते हैं पर उनके कार्यों पर बारीक निगाह डालते ही नाक को सड़ा देने वाली गन्दगी उड़ती दिखाई पड़ती है।
जब धर्म तंत्र अधिक अस्त-व्यस्त हो जाता है तब उसकी मरम्मत करने के लिए- बड़े देवदूतों-अवतारों-पैगम्बरों-महापुरुषों के रूप में अत्यन्त प्रभावशाली आत्माएं आती हैं और अपने महान व्यक्तित्व, प्रबल पुरुषार्थ, एवं सद्पुरुषों के सहयोग से उस अव्यवस्था को रोक कर पुनः उस देवत्व की सामूहिकता की भावना को जन-मन में प्रवाहित कर देने में सफलता प्राप्त करती है। पर यह तो उस समय की बात है जब दुर्घटना की घोर विपन्न स्थिति आ जाए। साधारण समय में अवतारों की नहीं, ऋषियों की आवश्यकता रहती है। उन्हें ही ब्राह्मण भी कहते हैं। इस श्रेणी के व्यक्ति अपने आपको तप-त्याग, संयम, ज्ञान, उदारता एवं लोक-हित जैसी प्रवृत्तियों को कूट-कूटकर अपने अन्दर भरते हैं और एक मजबूत बाँध की तरह सुदृढ़ आधार पर खड़े होते हैं। फिर वे एक वज्र शिला की भाँति जन मानस की धारा को उचित दिशा में मोड़ने के लिए दृढ़ता पूर्वक अड़ जाते हैं। अपनी सीमित सामर्थ्य के अनुसार सीमित क्षेत्र वे चुनते हैं पर उसी क्षेत्र में अपने श्रेष्ठ व्यक्तित्व, उच्च आदर्श एवं प्रचण्ड पुरुषार्थ द्वारा सहस्रों मनुष्यों के भीतर असुरता-स्वार्थपरता-को घटाने एवं देवत्व-सामूहिकता को बढ़ाने में सफलता प्राप्त करते हैं। यह ब्राह्मण एवं ऋषि ही किसी जाति की सच्ची सम्पत्ति होते हैं। इनका मूल्य सोने की खानों और रत्न-राशियों से भी असंख्य गुना अधिक होता है। जिस देश में, जिस समाज में, सच्चे ब्राह्मण पैदा करते रहने की प्रसव शक्ति होती है उसकी विजय वैजन्ती सदा दशों दिशाओं में फहराती रहती है।
धर्म तंत्र का कलेवर अत्यंत विस्तृत हैं। वेद, शास्त्र, दर्शन, स्मृति ,पुराण आदि के सहस्रों ग्रन्थ मौजूद हैं। जप, तप, संयम, ध्यान, साधन आदि के अनेक विधान हैं। तीर्थयात्रा, ब्रह्मभोज, दान-पुण्य, कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, त्यौहार, संस्कार आदि अनेक कर्मकाण्ड हैं। इन सब का एकमात्र उद्देश्य यह है कि व्यक्ति अपनी अन्तरात्मा में ऐसे विचार, विश्वास, भाव एवं संस्कार धारण करे जिनके द्वारा उस की व्यक्तिगत स्वार्थपरता घटे और लघुता को महत्ता में-आत्मा को महान आत्मा-परमात्मा में विकसित करने की प्रेरणा मिले। सब के अन्तः करण में निवास करने वाली-प्राणिमात्र की एकता की सच के साथ आत्मभाव स्थापित करने की-विश्व मानव की उपासना ही, ईश्वराधना का तत्व ज्ञान है। इस दार्शनिक तथ्य को अध्याय, सत्संग, साधन, कर्मकाण्ड, दान-पुण्य आदि अनेक प्रकारों के माध्यम से हृदयंगम करने का प्रयत्न किया जाता है। परम्पराओं के अनुसार धर्म तंत्र के यह विधि-विधान तो चलते रहते हैं पर कालान्तर में उनके भीतर छिपे हुए- सिद्धान्तों, आदर्शों और तथ्यों को लोग भूलने लगते हैं। ब्राह्मणों-ऋषियों का कार्य इन उपचारों की सहायता से जन-साधारण की अन्तरात्मा में देवत्त्व की मनोवृत्ति को प्रदीप्त करना होता है। साधारण जनता के उथले मानसिक स्तर को देखते हुए वे अनेक आयोजनों की व्यवस्था करते हैं पर मूल लाभ एक ही रहता है कि मनुष्य अपनी शक्तियों से केवल अपना ही लाभ न सोचे-उसे अपनी क्षमता द्वारा दूसरों का हित करते रहने के महान तथ्य का भी ध्यान रहे-कम से कम दूसरों के अधिकारों का अनीतिपूर्वक हनन तो न करे। मनुष्यों की यह मनोवृत्ति जितनी ही प्रबल होती जाती है उतनी ही सुख-शान्ति की संभावना संसार में बढ़ती जाती है।
धर्मतंत्र की स्थापना एवं व्यवस्था का उद्देश्य यही है। अरबों रुपयों के विशाल भवन, देव-मन्दिर इसी दृष्टि से बने हैं। करोड़ों रुपयों का वार्षिक खर्च सन्त-महंत, पंडे, पुजारी, साधु ब्राह्मण अनेकों माध्यमों से जो कुछ करते हैं उसका उद्देश्य मूल यही है अवतार भी इसी कार्य के लिए होते हैं। साधु-ब्राह्मण भी इसीलिए तप त्याग करते हैं। पर आज तो स्थिति दूसरी हो रही है। धर्म-तंत्र का कलेवर खड़ा है, इमारतें खड़ी हैं, कर्मकाण्ड और विधि-विधान भी होते हैं, साधु ब्राह्मणों की 56 लाख मनुष्यों की एक बड़ी सेना भी मौजूद है, पर उद्देश्य का- आदर्श का लक्ष्य का-पता नहीं। फलस्वरूप जन-मानस के अन्तस्तल में धार्मिकता की आध्यात्मिकता की-श्रद्धा की-भावनाएं दिन-दिन शिथिल होती जाती हैं।
हमें स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य की व्यक्तिगत और संसार की सामूहिक सुख-शान्ति उस की अन्तरात्मा में निवास करने वाली सामूहिक पर, एक दूसरे के लिए त्याग और सहयोग करने की भावना पर ही निर्भर है। पाशविक वृत्ति-स्वार्थपरता पर नियंत्रण स्थापित करना ही असंख्य प्रकार के कष्टों पर विजय प्राप्त करना है। चूँकि यह कार्य भौतिक नहीं आन्तरिक है इसलिए इसे राजदंड आदि किसी बाह्य उपाय से पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो धर्म-तंत्र ही सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया है। इसकी रचना के लिए सत्पुरुष अपना जीवन बलिदान करते हैं और इसी के लिए भगवान तक दौड़े आते हैं। हमें इस धर्म-तंत्र की वर्तमान दुरावस्था पर विचार करना होगा और उसे पुनः सुव्यवस्थित करने के लिए मजबूत कदम उठाना होगा। तभी संसार की सुख-शान्ति को स्थिर रखने वाली मनुष्य की एकमात्र दैवी प्रवृत्ति-सामाजिक एवं सामूहिकता को सुव्यवस्थित रखा जा सकेगा।
हिन्दू धर्म की एक बहुत बड़ी विशेषता “तर्क-प्रेम” है। यहाँ के विद्वानों ने विश्व की समस्याओं का जो समाधान किया है वह किसी एक व्यक्ति के कथन या किसी एक धर्म-पुस्तक के आधार पर नहीं है, वरन् चार-पाँच हजार वर्ष तक लगातार दार्शनिक और धार्मिक समस्याओं पर निष्पक्ष भाव से विचार करके उन्होंने कुछ निष्कर्ष निकाले हैं। इसे ब्राह्मण सभ्यता कहते हैं, क्योंकि इसका संचालन उन ब्राह्मणों के हाथ में था जो किसी बात का निर्णय करते समय मन के किसी विकार या लोभ से विचलित नहीं होते थे और आत्मा के सच्चतम् सिद्धान्तों की खोज करते थे।
जगत की जिस विशेषता ने हिन्दू दार्शनिकों को सत्य के अनुसंधान की ओर आकर्षित किया, वह है इसकी-अनित्यता। उन्होंने देखा कि हम जिस जगत को देखते हैं उसमें बराबर परिवर्तन होता रहता है।
उन्होंने अपने मन में प्रश्न किया कि- “क्या वह अनित्यता ही संसार का वास्तविक सत्य स्वरूप है, अथवा इस परिवर्तन और विनाश की कोई सीमा भी है?” उन्हें उत्तर मिला-”जगत में एक ऐसी वस्तु भी है जो नित्य है, अविनाशी है-वह है परब्रह्म।” हम सब के जीवन में कभी ऐसा समय आ जाता है जब हम इस अनन्त सत्य की अनुभूति करते हैं, जब हमें इस महान रहस्य का किंचित आभास मिलता है। जब हमारे जीवन में कोई बहुत बड़ी शोकपूर्ण घटना होती है और जब हमें ऐसा प्रतीत होने लगता है कि हम बिल्कुल दीन, हीन और सर्वथा अनाथ हैं, उस समय भी हमारे हृदय में स्थित परमात्मा हमें बराबर यह अनुभव कराता है कि ये साँसारिक दुःख, आपत्तियाँ तो उस बड़े नाटकीय क्षुद्र घटनाएं मात्र हैं जिसका अंत शक्ति, सौंदर्य और प्रेम में होगा। उपनिषद् स्पष्ट वाणी में कह रहे हैं कि -”यदि इस विश्व में आनन्द न होता तो यहाँ कोई जीव प्राण धारण ही कैसे करता?” वास्तव में यह दिखलाई पड़ने वाला जगत उसी एक ब्रह्म की तरह-तरह के रूपों में अभिव्यक्ति है, जो समस्त सृष्टि का आधार है।
इस प्रकार अति प्राचीन काल से एकेश्वरवाद ही हिन्दू धर्म का मुख्य आदर्श रहा है। ऋग्वेद में सर्वत्र उस एक ही परमात्मा-”एकम् सत्” का जिक्र आया है जिसका वर्णन पंडित लोग नाना रूपों में करते हैं। उपनिषदों में बताया गया है कि एक ही ब्रह्म अनेक रूपों में प्रकट होने के कारण अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। त्रिमूर्ति-ब्रह्मा, विष्णु, महेश की कल्पना महाकाव्य रचने वालों ने की और पुराणों के लेखकों ने उसे खूब अच्छी तरह पक्का कर दिया। सृष्टि के तीन गुण-सत, रज, तम से ही इन देवताओं की कल्पना की गई। विश्व के रक्षक विष्णु-परमात्मा के सत्व-प्रधान रूप हैं, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा उसी ईश्वर के रजोगुण प्रधान रूप हैं, और सृष्टि संहारक शैव उसी ईश्वर के तमः प्रधान रूप को प्रकट करते हैं। एक ही ईश्वर के तीन विभिन्न गुणों को विकसित करके तीन विभिन्न व्यक्ति बना दिया गये हैं और इनमें से प्रत्येक अपनी ही विशेष शक्ति से काम करता है। इस विचार से रमा, सरस्वती और उमा की भी कल्पना कर ली गई। सच तो यह है कि ये सभी गुण एक ही परमात्मा में इस प्रकार मिले हुये हैं कि हम यह भी नहीं कह सकते कि परमात्मा निर्गुण है। एक ही अज्ञेय, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान ईश्वर भिन्न-भिन्न लोगों को भिन्न-भिन्न प्रकार का प्रतीत होता है। एक प्राचीन शास्त्र का कहना है कि साधकों की सुविधा के लिए ही निराकार परमात्मा को साकार कल्पित कर लिया गया है।
दार्शनिक मनोवृत्ति के व्यक्ति उदार विचारों के होते हैं। उसी की प्रेरणा से विभिन्न श्रेणी के व्यक्तियों की बुद्धि के अनुसार हिन्दू लोग विभिन्न सम्प्रदायों में दोष नहीं समझते। भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न धर्मों या मतों के अनुयायी बनें यह तो बिल्कुल स्वाभाविक ही है। डंडे या तलवार के जोर से किसी का धर्म परिवर्तन कराना हिन्दू-मस्तिष्क को सर्वथा निरर्थक बात जान पड़ती है। जब आर्य लोग इस देश के उन आदि-निवासियों से मिले जो भाँति-भाँति के देवताओं की पूजा करते थे तो उन्होंने एकाएक उनके मतों को दबा देने की बात नहीं सोची क्योंकि उनके मत से आखिर सभी लोग उसी एक परमात्मा की तलाश में हैं। भगवत् गीता का कथन है कि-”यदि कोई उपासक भगवान के श्रेष्ठतम स्वरूप तक नहीं भी पहुँच सका है, तो भी वह उसकी प्रार्थना को अस्वीकार नहीं करते।” हिन्दू दार्शनिक यद्यपि स्वयं बहुत ऊँचे आदर्श का पालन करते थे, पर वे यह भी जानते थे कि साधारण मनुष्य एकाएक उन तक नहीं पहुँच सकते। इसलिये उन्होंने आदि निवासियों पर किसी प्रकार का बर्बरतापूर्ण बल प्रयोग नहीं किया, वरन् बड़ी सावधानी से उनके विचारों का विकास करने लगे। अज्ञान के कारण लोक में जिन नीचे दर्जे के देवताओं की उपासना हो रही थी, उसे भी उन्होंने स्वीकार कर लिया, केवल इतना कहा कि वे सब भी उसी एक परम महान ईश्वर के अधीन हैं-
अष्सु देवा मनुष्याणाँ, दिवी देवा मनीषिणाम्। बातानाँ काष्ट लोष्टषु, बुद्धास्त्वात्मिन देवतः॥
“कुछ लोगों के देवता जल में, कुछ के स्वर्ग में, और कुछ के लकड़ी, पत्थर आदि साँसारिक पदार्थों में पाये जाते हैं, पर विद्वान अपने सच्चे परमात्मा को अपनी आत्मा में ही पाते हैं।” इसी प्रकार के एक अन्य
श्लोक में कहा गया है-
अग्नौ कृत्यवतो देवो, हृदि देवो मनीषणाम्। प्रतिमा स्वोल्पल बुद्धिनाम् ज्ञानिनाँ सर्वतः शिवः॥
“कर्मशील व्यक्ति का ईश्वर अग्नि में, भावुक का भगवान हृदय में, मन्द बुद्धि का मूर्ति में एवं ज्ञानी का परमात्मा सर्वत्र ही निवास करता है।”
हिन्दू धर्म तथा दर्शन में माना जाता है कि समय-समय पर आने वाला सृष्टि और प्रलय का चक्र उस एक ही विश्वात्मा के विकसित तथा संकुचित होने का चिह्न है। वह विश्वात्मा सदा अपरिवर्तनशील भी रहता है, और परिवर्तनशील भी। समस्त संसार उसी ईश्वर का व्यक्त अथवा दिखाई पड़ने वाला रूप है। सायणाचार्य का कहना है कि “परमात्मनःसर्वेऽपि पदार्थाः-आविर्भावोपाधेयाः” अर्थात् संसार में दिखलाई पड़ने वाले समस्त पदार्थ परमात्मा के आविर्भाव के उपाधेय हैं। ये पदार्थ भिन्न-भिन्न दर्जों में बाँट दिये गये हैं। “इनमें से जो साँस लेते हैं वे श्रेष्ठ, उनमें वे श्रेष्ठ हैं जिनके मस्तिष्क या बुद्धि का विकास हुआ है, उनमें वे श्रेष्ठ हैं जो ज्ञान का प्रयोग करते हैं, और सर्वश्रेष्ठ वे हैं- जिन्होंने प्राणिमात्र में ब्रह्म की एकता का अनुभव कर लिया है अर्थात् जो समस्त प्राणियों को ब्रह्म का अंश और इस प्रकार आ भवत् समझते हैं” (मनु.)
मनुष्य के भीतर जो अनन्त की भावना है वह इस ‘सान्त’ (अन्त होने वाले) संसार के नाशवान रूप से संतुष्ट नहीं होती। मनुष्य के दुःखों का वास्तविक कारण यही है कि वह अपने भीतर ईश्वर को नहीं देख पाता। अपने भीतर की अनन्त की भावना को हम जीवन में जितना अधिक व्यवहार में लाकर दिखला सकेंगे, हम उतने ही उच्च समझे जायेंगे। इस प्रकार की अनन्त भावना की बहुत प्रबल अभिव्यक्तियाँ पूर्ण ईश्वर का संसार में प्रकट होना नहीं है। वे तो उसी महान शक्ति की उच्च अभिव्यक्तियाँ। जिनकी सामान्य अभिव्यक्ति मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों में पाई जाती है। गीता का वचन है कि-”यद्यपि ईश्वर सभी पदार्थों में है, पर वह विशेष रूप से उसी पदार्थ में व्यक्त होता है जिसमें महत्ता पायी जाती है।” हिन्दू धर्म किसी ऐसे परमात्मा में विश्वास नहीं करता जो अपने सिंहासन पर बैठा-बैठा प्रत्येक व्यक्ति को जाँचता है और उसके भले बुरे कर्मों का निर्णय किया करता है। हिन्दू धर्म के अनुसार वह ईश्वर मनुष्य में ही है, और वह कर्म करके उन्नति के किसी भी शिखर पर चढ़ सकता है।
संसार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जितने कार्य हो रहे हैं उनमें एक प्राकृतिक नियम काम कर रहा है। यद्यपि एक साधारण मनुष्य को समस्त प्राणियों तथा विभिन्न जातियों और सभ्यताओं के जन्म-मरण अथवा आविर्भाव और नाश में कोई खास तथ्य नहीं जान पड़ता, पर उन पर गम्भीर रूप से विचार करने से यही विदित होता है कि विश्व में जो कुछ भी हो रहा है वह ईश्वरीय-विधान का अंग है। इसको हम भगवान की लीला भी कह सकते हैं।
साधारणतः लोग भगवान की लीला से प्राकृतिक लीला का भाव नहीं लेते। भगवान के भिन्न-वे भगवान की लीला समझते हैं। अवतारों में भगवान रामावतार और कृष्णावतार की लीलाएं ही विशेष प्रसिद्ध हैं। आज भी लोग इन लीलाओं की नकल करते हैं, पर दुःख की बात है कि वे न तो उनके असली मतलब को समझते हैं और न उन अवतारों के दिखाये रास्ते पर चलते हैं। इसके विपरीत वे उन लीलाओं की नकलों को अपनी पतित रुचि के अनुसार ऐसा विकृत कर देते हैं कि वे हमारा कल्याण करने के बजाय अकल्याणकारी बन जाती हैं।
भगवान के अवतार लेने के अनेक गूढ़ कारण होते हैं जिनका पता शास्त्रों का गहन अध्ययन करने से लग सकता है। यदि हम उन सब को न भी हमें यह तो सीखना चाहिये कि हम अपना जीवन किस प्रकार व्यतीत करें। रामलीला और कृष्ण लीला करने का यही असली तात्पर्य है।
पर इस समय इस अभिप्राय को लोगों ने बहुत कुछ भुला दिया है। इसके बजाय वे यह समझ बैठे हैं कि भगवान की इन लीलाओं की नकल करने से वे हम पर खुश होंगे और हमारे पापों का नाश कर हमको स्वर्ग के सुख देंगे तथा इस लोक में भी हमारा कल्याण करेंगे। इस प्रकार का विचार करने वाले लोगों में से बहुत से बड़े भोले होते हैं और उनके हृदय में भक्ति भाव भी होता है, पर उनको अच्छाई-बुराई का विवेक बहुत कम रहता है। खास कर जो लोग मंडलियाँ बनाकर इन लीलाओं को करते हैं वे तो अर्थ का अनर्थ ही कर डालते हैं। साधारण जनता को अधिक संख्या में आकर्षित करने के उद्देश्य से वे इन लीलाओं के बीच में ऐसी-ऐसी भद्दी नकलें मिला दिया करते हैं कि जो मनुष्यों की पाशविक वृत्तियों को उत्तेजित करने वाली होती हैं। विशेष कर ऐसी बातें कृष्ण भगवान की लीलाओं में और खास कर उनकी रासलीला में पाई जाती हैं। श्री रामचन्द्र जी और श्री कृष्ण भगवान के जीवन-ऐसे पवित्र, आदर्श तथा प्रेमपूर्ण थे कि यदि उन पर थोड़ा भी विचार किया जाय तो मनुष्य के हृदय में अवश्य ही उच्च वृत्तियाँ जागृत हो सकती हैं और उसमें स्वभावतः ऊँचे आदर्शों पर चलने की अभिलाषा उत्पन्न हो सकती है। पर हमारे समाज के मुखियों का ध्यान इधर कम रहता है और साधारण श्रेणी के लोग तो ऊँची शिक्षाओं के बजाय हंसी मजाक की तथा वासनाओं को उत्तेजित करने वाली बातों को ही अधिक पसंद करते हैं। इस लिए आजकल लीलाओं से लाभ के बजाय हानि ही अधिक होने लगी है।
हमारा उद्देश्य लीलाओं का विरोध करना नहीं है। यह तो एक ऐसी अच्छी रीति है जिसके द्वारा साधारण अपढ़ जनता को अच्छी से अच्छी शिक्षा चरित्र पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। पर इनका सदुपयोग करने से जिस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है उसी प्रकार इनका दुरुपयोग करने से मनुष्य का चरित्र सहज में भ्रष्ट भी किया जा सकता है। आजकल इनका दुरुपयोग करके समाज को हानि ही अधिक पहुँचाई जा रही है। सौ-पचास वर्ष पहले जब वर्ष में एकाध बार कृष्ण लीला हुआ करती थी तब लोग भक्ति के साथ जाकर उसका तमाशा देखते थे। पर आजकल इस कार्य को करने वाली जो अनेकों मंडलियाँ बन गई हैं उनकी लीलाओं और तमाशे के प्रभाव से अनेक नवयुवकों तथा नवयुवतियों का चरित्र भ्रष्ट हो जाता है इसमें तनिक भी संदेह नहीं। इस बुराई का अनुभव सभी सज्जन पुरुष करते हैं और समय-समय पर उनके विरुद्ध शिकायतें भी सुनने में आती हैं।
इसलिए हमारा कहना यही है कि आप राम लीला और कृष्ण लीला तो अवश्य कीजिये, पर उनको उचित रीति से, उचित भाव से, उचित श्रद्धा के साथ करना चाहिये। ऐसी महत्वपूर्ण, प्रभावशाली और पवित्र लीलाओं में गन्दे भावों और विचारों के प्रवेश करने का मौका कभी नहीं आने देना चाहिए। इनका उद्देश्य मनुष्य का चरित्र गठन करना है। इसलिए इन लीलाओं को करते समय या देखते समय चरित्र तथा जीवन के सुधार के लक्ष्य को सदैव ध्यान में रखना चाहिए। जो लोग इनको भक्ति के भाव से देखते हैं वे भी अच्छा ही करते हैं, पर भक्ति के असली तत्व पर भी कुछ विचार करना चाहिए। हम अक्सर ऐसा समझा करते हैं कि भाई हम भगवान के नाम को रट लें अथवा भगवान की लीला को देख आयें तो भगवान हमारे सभी पापों का नाश करके हमारे दुखों को दूर करेंगे। इस भाव का नतीजा यह होता है कि जब हम भगवान के नाम पर पूजा, पाठ, जप आदि करते हैं तो हम समझते हैं कि उस समय तक किए पापों का नाश हो गया, और फिर हम जान-बूझ कर उन्हीं पाप के उसका भी कुछ असर मनुष्य के ऊपर पड़ता ही है, पर उसके साथ-साथ अपने चरित्र और जीवन को सुधारने की भी कोशिश करनी चाहिए। ऐसी कोशिश न करके केवल भगवान के भरोसे बैठे रहना कि उनका नाम लेने से ही सब पाप कट जायेंगे, यह अपने आपको धोखा देना है। याद रखिये कि भगवान अन्तर्यामी हैं, उनसे कोई भी बात नहीं छिप सकती, मनुष्यों के हृदय की गुप्त से गुप्त बात को वे जानते हैं, इसलिए उनको धोखे में नहीं डाला जा सकता। भगवान के नजदीक वही मनुष्य सच्चा हो सकता है जिसका हृदय साफ है और भगवान उसी की सहायता करते हैं जो अपनी सहायता को स्वयं उद्यत होता है। इन बातों को ध्यान में न रख कर आज भगवान को हमने अपने पापों तथा अकर्मण्यता को छिपाने की एक आड़ बना रखा है।
गीता में भी भगवान ने भक्ति की बड़ी बड़ाई की है, पर साथ ही उन्होंने यह भी बतलाया है कि सच्ची भक्ति वही है जो ज्ञान युक्त है और कर्म का भी त्याग नहीं करती। भगवान की भक्ति तभी उचित रीति से पालन की जा सकती है जब मनुष्य उनकी लीला के अभिप्राय को समझ कर सर्वांग भाव से उसे पूरा करने में अपने आपको लगा देता है। इसलिये हमारा कर्तव्य है कि इस समय भगवान की लीला का जो दुरुपयोग होने लगा है उसे सुधारने का हम प्रयत्न करें और लीलाओं को उनके वास्तविक रूप में करके उनसे लाभ उठाएं।
(महात्मा टॉलस्टाय)
वर्तमान समय में संसार में जो अनेकों प्रकार के भ्रम फैले हैं उनमें से एक मुख्य भ्रम यह भी है कि मनुष्य अपनी वासनाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं इस वासनामय जीवन को अच्छा समझते हैं, और साथ ही यह भी ख्याल करते रहते हैं कि उनका जीवन उपयोगी, न्याय तथा प्रेम पूर्ण माना जा सकता है। यह बात इतनी आश्चर्यजनक है कि मेरे ख्याल से आने वाली पीढ़ियाँ यह समझ ही न सकेंगी कि ‘उत्तम जीवन’ से हमारे पूर्वजों का तात्पर्य क्या था? जब धनिक वर्ग के ठूँस-ठूँसकर खाने वाले विलासी और कामुक लोगों के लिए यह कहा जाय कि वे उत्तम जीवन बिताते थे, तो फिर यह समझ सकना बड़ा कठिन है कि खराब जीवन किसको कहा जा सकता है? आप धर्म और आध्यात्म के सिद्धान्तों को तो दूर रख दीजिये अगर न्याय और मानवता के साधारण नियमों के अनुसार भी विचार करें तो आप यही कहेंगे कि धनिक वर्ग के इन विलासी लोगों को ‘उत्तम जीवन’ की चर्चा करने का कोई अधिकार नहीं है।
इसलिए हमें यह कहने में तनिक भी शंका नहीं कि जो कोई आदमी उत्तम जीवन बिताने का निश्चय करे उसके लिये यह आवश्यक है कि वह सब से पहले बुरा जीवन व्यतीत करना त्याग दे और उस दुष्ट जीवन के वातावरण का ही नष्ट कर दे, जिससे वह घिरा रहता है। यही हमारा समस्त जीवन सच्चा, न्यायपूर्ण और दयालु हो तभी हमारा कोई काम सत्कार्य माना जा सकता है। यदि हमारा आधा जीवन अच्छा हो और आधा बुरा हो तो हमारे कार्य अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी। पर यदि हम सर्वथा बुरा और गलत जीवन बिता रहे हैं, तो हम जो काम करेंगे वह बुरा ही हो सकता है, अच्छे काम की आशा करना ही व्यर्थ है।
हमारे धनिक वर्ग का जीवन आजकल ऐसा हो गया है कि उसके वातावरण में रह कर मनुष्य से अच्छे कार्यों का हो सकना असम्भव है। हम यह कहना चाहते हैं कि जो मनुष्य भोग विलास में डूबा है वह कभी सत्यतापूर्ण जीवन नहीं बिता सकता। जब तक वह अपने जीवन में परिवर्तन नहीं करता, सत्य की ओर जाने वाली पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रखता, तब तक सद्जीवन के लिए वह वह जो भी प्रयत्न करेगा, सब निष्फल जायेंगे। आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन को नापने का एक ही तरीका है और वह यह कि मनुष्य खुद को कितना प्रेम करता है और दूसरों को कितना? हम खुद को जितना कम प्रेम करेंगे, अपने लिए जितनी कम चिन्ता करेंगे, और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों से जितना ही कम काम कराएंगे उतने ही उत्तम हम हो सकते हैं। दूसरों से जितना अधिक प्रेम करेंगे, हम उनके लिए जितना परिश्रम करेंगे उतना ही हमारा जीवन उत्तम माना जायगा। संसार के सभी सन्त पुरुषों ने अच्छाई का यही अर्थ बतलाया है, सभी सच्चे धार्मिक पुरुष ऐसा ही कहते हैं और आजकल जन-साधारण भी इसी सिद्धाँत को ठीक मानते हैं। मनुष्य जितना ही अधिक दूसरों को देता है और उतना ही वह श्रेष्ठ होता है। इसके विपरीत जितना ही कम वह दूसरों को देता है और अपने लिए जितना ही अधिक चाहता है, उतना ही वह बुरा होता है।
जो मनुष्य दूसरों के लिए अधिक से अधिक प्रेम वासना रखता है और अपनी खुद की ओर से उदासीन रहता है उसके लिये श्रेष्ठ बनना उतना ही सुगम होता है। इसके विपरीत जो मनुष्य अपने को जितना अधिक प्रेम करता है और दूसरों से अपनी, जितनी ही अधिक सेवा कराता है, उतना ही वह दूसरे लोगों की भलाई कम कर सकता है। एक मनुष्य दूसरों को खिलाने के बजाय खुद ही बहुत अधिक लेता है, तो वह अन्य लोगों की दो प्रकार से हानि करता है। एक तो उसके अधिक खाने से दूसरों के भोजन में कमी पड़ जाती है और दूसरे अधिक खा लेने से वह अपनी शक्ति को भी खो बैठता है और दूसरों का हित करने के योग्य नहीं रहता।
बहुत से लोग ऐसा प्रकट करते हैं कि वे दूसरों से प्रेम करते हैं, पर उनका प्रेम केवल शब्दों तक ही सीमित रहता है। हम दूसरों के साथ तभी वास्तविक प्रेम कर सकते हैं जब कि अपने साथ प्रेम करना या अपना अनुचित स्वार्थ छोड़ें। ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं जिनमें हम समझते हैं कि हम दूसरों से प्रेम करते हैं, पर वास्तव में हमारा प्रेम शब्दों तक ही सीमित होता है। दूसरों के लिए भोजन खिलाना या आश्रय देना हम भूल जाते है, पर अपने लिये भोजन तथा आश्रय प्राप्त करना कभी नहीं भूलते। इसलिए दूसरों को सचमुच प्रेम करने के लिए हमको वास्तव में अपने आपको अधिक प्रेम करना छोड़ना होगा।
हम विलासी जीवन बिताने वाले और अपने सुख के ही लिए प्रयत्न करने वाले व्यक्ति के लिए भी कुछ ऊपरी बातों को देख कर अनेक बार कह देते हैं कि “वह श्रेष्ठ जीवन बिता रहा है।” किन्तु ऐसा व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, और चाहे उसमें चरित्रशीलता के कितने ही अच्छे गुण-नम्रता, अच्छा स्वभाव आदि-क्यों न हों, अच्छा आदमी नहीं हो सकता और न अच्छा जीवन बिताने का दावा कर सकता है। जिस प्रकार एक चाकू कैसे भी बढ़िया लोहे का क्यों न बनाया गया हो और उसका बनाने वाला भी कैसा ही कारीगर क्यों न हो, पर जब तक उसमें धार न लगाई जायगी वह तेज और कारगर नहीं हो सकता। अच्छा आदमी बनने और अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य दूसरों से जितना ग्रहण करे, उससे अधिक उन्हें लौटा दे। किन्तु स्व-भोगी (अपने सुख का ध्यान रखने वाला) मनुष्य, जो ऐश आराम की जिन्दगी बिताने का अभ्यासी है ऐसा कर ही नहीं सकता। इसका पहला कारण तो यह होता है कि हमेशा उसको अपने लिये बहुत से पदार्थों की जरूरत रहती है। यह उसकी स्वार्थपरता के कारण नहीं होता वरन् इसलिए भी होता है कि वह भोग विलास का अभ्यस्त होता है और जिन पदार्थों का वह अभ्यस्त होता है, उनसे वंचित रहना उसको कष्टकर जान पड़ता है। दूसरे, वह अन्य लोगों से जो कुछ प्राप्त करता है उस सब का उपयोग स्वयं ही करके अपने आपको कमजोर और काम करने के अयोग्य बना लेता है और इस प्रकार दूसरों की सेवा करने में असमर्थ हो जाता है। एक स्वयं-भोगी मनुष्य, जो देर तक कोमल शैय्या पर सोता है, गरिष्ठ और मीठे पदार्थों का सेवन करता है, हमेशा बढ़िया और फैशनेबल कपड़े पहनता है, कभी मेहनत का काम नहीं करता, वह कभी किसी का उपकार या सेवा करने योग्य नहीं रहता। ऐसा मनुष्य अपने भोग विलासमय जीवन को तिलाँजलि दिये बिना किस प्रकार दूसरों का भला कर सकता है? किस प्रकार सद्जीवन व्यतीत कर सकता है?
मैं समझता हूँ कि मेरा बार-बार इन शब्दों का दुहराना अधिकाँश साधन-सम्पन्न श्रीमानों को अच्छा न लगेगा और वे इन शब्दों के प्रति उदासीनता या विरोध-सूचक मौन का ही परिचय देंगे।
पर एक नीतिमान व्यक्ति चाहे वह उच्च-श्रेणी का हो या मध्यम श्रेणी का इस विषय पर विचार करके कभी इस प्रकार की सामाजिक पद्धति का समर्थन नहीं कर सकता। वे जानते हैं कि जिन पदार्थों का वे व्यवहार करते हैं वे बहुसंख्यक पददलित श्रमजीवियों द्वारा तैयार किये जाते हैं। हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये ही इन गरीब लोगों को ऐसी परिस्थिति में रखा जाता है कि उनको न तो स्वास्थ्यकर भोजन मिलता है, न स्वास्थ्य कर मकान, न काफी कपड़े मिलते हैं, न मनोरंजन के उचित साधन ही नसीब होते हैं। वृद्ध, बालक और स्त्रियाँ, जो श्रम, मजदूरी के लिये रात-रात भर जगाने और रोगों आदि से जर्जर हो गये हैं, वे ही हमारे लिये आराम और विलास की ऐसी चीजें तैयार करने में अपना जीवन खपा देते हैं, जो उन्हें कभी नसीब नहीं होतीं, पर जो हमारे लिये जरूरी होती हैं। इसलिये कोई भी मनुष्य तब तक नीतिमान और धार्मिक होने का दावा नहीं कर सकता जब तक मनुष्यता तथा न्याय की रक्षा के लिये वह अपने विलासमय जीवन में परिवर्तन करने को तैयार न हो।
(श्री गोपाल दामोदर तामस्कर)
भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि -”जो-जो वस्तु वैभव या प्रभाव से मुक्त है, वह सब मेरे ही तेज के अंश से पैदा हुई है।” इसका अर्थ यही है कि जहाँ कहीं किसी गुण का अत्यन्त विकास है, उस वस्तु में ईश्वराँश समझ कर उसे पुण्य दृष्टि से देखना चाहिए। उसका सम्मान करना चाहिए।
यह नियम जिस प्रकार अन्य पदार्थों पर लागू है उसी प्रकार महापुरुषों पर भी लागू होता है। यहाँ पुरुष भी तेज, शोभा, प्रभाव या किसी गुण का अत्यन्त विकास होने से ही प्रसिद्ध होते हैं। वह महापुरुष चाहे योद्धा हो, चाहे कवि या तत्ववेत्ता हो, चाहे गृहस्थ हो या राजा हो, वह कोई क्यों न हो, वह हमारे लिये वन्दनीय ही होगा। प्राचीन काल में हम अपने पूर्वजों की, विशेष कर जिन्होंने कोई बड़ा कार्य किया था, उनकी पूजा करते थे। एक दृष्टि से यह कार्य सर्वथा सराहनीय भी है। जहाँ तेज है, प्रभाव है वहाँ हम अवश्य नतमस्तक हुए हैं, और आदर-भाव दर्शाते आये हैं। जग में एक परमेश्वर की सत्ता मानते हुये भी हम तेजस्वी पुरुषों को देवदूत या परमेश्वर का अवतार मानते आये हैं। हमारे हिन्दू-धर्म की यह प्रवृत्ति ही है। पर खेद कि अब से प्रवृत्ति का ह्रास हो रहा है। अब हम महापुरुषों का उतना आदर नहीं करते जितना पहले करते थे। पहले से जो उत्सव प्राचीन महापुरुषों के नाम पर चले आते हैं, उनको हम धर्म का अंग समझ कर उसी प्रकार चला रहे हैं, पर उस प्रकार के नये उत्सव नहीं चलाते। तो भी आदर की यह प्रवृत्ति मनुष्य में स्वाभाविक है और इसे सर्वथा भूल जाना सम्भव नहीं। सभी देशों में महापुरुषों की पूजा किसी किसी रूप में होती ही है।
लाभ की दृष्टि से भी यह प्रवृत्ति बड़े महत्व की बात है। मनुष्य में पुण्य-पाप, सुकर्म-दुष्कर्म, उच्च और नीच प्रवृत्तियाँ स्वभावतः होती हैं। हमें नीच प्रवृत्ति उच्च प्रवृत्ति से हमेशा दबाते रहना चाहिये, अन्यथा हमारे पतन का डर पैदा हो जाता है। इस यथार्थ में महापुरुषों के गुणानुवाद से बड़ी सहायता मिलती है। मनुष्य, प्रकृति से ही अनुकरणशील है। वह जान कर और अनजाने में भी अनेक पदों का अनुकरण करता रहता है। यह उसकी अन्तः प्रवृत्ति का ही काम है। हम यदि अपनी आत्मा को उच्च बनाना चाहते हैं तो हमें चाहिये कि ऊँची आत्माओं के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संसर्ग में रहें। उनमें ऐसी शक्ति होती है कि वे हमें बरबस अति की ओर खींचती जा रही है। उनका दर्शन और भाषण हमारे लिये परम कल्याणजनक है। यदि भाग्यवश किसी को जन्म भर किसी महापुरुष के भाग्य और भाषण का लाभ नहीं मिल सकता तो महापुरुषों के लिखित विचारों के मनन से, उनके वास्तविक दर्शन करने से, उनका नाम लेकर भी हम उसका लाभ उठा सकते हैं। शिवाजी के नाम में जो जोर था वह औरंगजेब की प्रचण्ड सेना में भी न था। यही कारण शिवाजी का स्वर्गवास होने के बाद भी औरंगजेब मराठों को न हरा सका। पर जब मराठे शिवाजी का नाम भूल गये तो उनके शासन की भी इतिश्री हो गई।
सच्चा महापुरुष वही है जिसके संसर्ग से हमारी इन्द्रियाँ शिथिल न होकर नित्य प्रति बलवान बनती जायं। उनके दर्शन होते ही हम में नई शक्तियों का संचार होने लगता है, नई बातें हमें दीखने लगती हैं, हमें विश्वास हो जाता है कि इसमें हमें धोखा न होगा। कुछ भी हो साधारण जनता का कल्याण इसी में है कि वह इन महापुरुषों के चरित्रों का सुने, समझे और उनके अनुसार थोड़े या अधिक अंशों में आचरण करके अपना कल्याण करें। महापुरुषों के सम्मान के लिये नहीं तो अपने ही कल्याण के लिए, इन बातों की तरफ ध्यान देना हमारा कर्तव्य है। हम में जो उच्च प्रवृत्ति है उसका विकास होने से हमारा हर तरह से लाभ ही हो सकता है।
प्रत्येक महापुरुष के जीवन का कोई खास उद्देश्य होता है। वैसे तो प्रत्येक मनुष्य अपना कुछ उद्देश्य बतला सकता है, पर उनके उद्देश्यों में कोई विशेषता नहीं होती, वे जो कुछ दृष्टि के सामने आ जाय या जो कार्य संयोगवश करना पड़े उसी को उद्देश्य समझ लेते हैं। पर महापुरुषों का उद्देश्य समझ बूझकर आन्तरिक स्फूर्ति से निश्चित किया जाता है और वह बहुधा पारलौकिक एवं परोपकारपूर्ण होता है। उसके लिये वे घर-बार, स्त्री-पुत्र, धन-सम्पत्ति सब कुछ त्यागने को तैयार रहते हैं। वे समझते हैं कि हम एक ऊँचे उद्देश्य की पूर्ति के लिये उत्पन्न हुये हैं, और वही उनके लिये सब कुछ होता है। दुनिया के अन्य सब पदार्थ उनकी दृष्टि में उसी उद्देश्य की पूर्ति के साधन मात्र होते हैं। यदि उनका उपयोग साधन के तौर पर नहीं हो सकता तो वे उन्हें सर्वथा त्याग देने को तैयार रहते हैं। भगवान बुद्ध ने जब देखा कि राज्य के धन, वैभव और विलास में रह वे संसार के उद्धार का कार्य नहीं कर सकते तो उन्होंने निस्संकोच-भाव से उनका परित्याग कर दिया। श्री रामचंद्र जी ने मिलते हुये राज्य का क्षण भर में त्याग कर वनवास स्वीकार किया तो वह भी एक बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही किया गया। महापुरुषों के सामने साँसारिक लोभ अपना जोर नहीं दिखला सकते। इतिहास से भी यही सिद्ध होता है कि उनका आविर्भाव या अवतार कोई बड़ी आवश्यकता या समस्या उपस्थित होने पर ही हुआ करता है। ऐसे महापुरुषों ने चाहे जिस क्षेत्र में काम किया हो और चाहे उनके साधन एक दूसरे से कैसे भी भिन्न क्यों न रहें हो, पर उनका उद्देश्य देश और समाज की रक्षा करना और उसके किसी बड़े अभाव की पूर्ति करना ही रहा है और उसके लिये उन्होंने हर तरह का त्याग और सब प्रकार का कष्ट सहना स्वीकार किया है। इस प्रकार के महापुरुष सभी देशों और सभी कालों में उत्पन्न हुये हैं, और उन्हीं के त्याग, तप और बलिदान के प्रभाव से इस समय मानव समाज अनेक प्रकार के संकटों से मुक्त होकर, अपेक्षाकृत सुविधापूर्ण जीवन बिता रहा है। ईसा मसीह के समय में धार्मिक ढोंग बहुत अधिक बढ़ गया था और लोगों को कठोर बंधनों में बंध कर जीवन व्यतीत करना पड़ता था। ईसा मसीह ने उनके विरुद्ध आवाज उठाई और यद्यपि उसे अपने प्राण सूली पर चढ़ कर त्यागने पड़े, पर उसके कारण यूरोप की काया पलट हो गई। अमरीका के प्रेसीडेन्ट अब्राहमलिंकन ने गुलामी के विरुद्ध झण्डा ऊंचा किया और यद्यपि अंत में उसे दुष्ट लोगों की गोली का शिकार बनना पड़ा, पर आज करोड़ों हबशी गुलाम उसी के कारण पशुवत् अवस्था से निकल कर मनुष्यों की तरह रहने का सुयोग पा सके हैं। ज्यादा दूर जाने की क्या आवश्यकता हमारी आँखों के सामने महात्मा गाँधी ने हानिकारक सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों को मिटाने के लिये अपने प्राणों का बलिदान कर दिया, जिसके प्रभाव से हमारा देश पराधीनता के अभिशाप से मुक्त होकर संसार के सम्मुख मस्तक ऊंचा करके खड़ा होने में समर्थ हो सका है।
इन सभी महापुरुषों के चरित्र पढ़ना, उनका मनन करना, और जहाँ तक सम्भव हो सके उनसे शिक्षा ग्रहण करके उन पर अमल करना, साधारण लोगों के लिये उन्नति तथा कल्याण का एक सहज साधन है। जिस देश में ऐसे महापुरुषों का मान नहीं किया जाता उसे मृत प्रायः ही समझना चाहिये। महापुरुषों के चरित्र और कार्य ही हमारे सच्चे पथ प्रदर्शक हैं- “महाजनो येन गतः स ग्रन्थ ।”
(श्री कमलेश्वर प्रसाद, विशारद)
संसार में सबसे बड़ा भय मृत्यु का माना गया है। फाँसी का दण्ड इसीलिये सबसे बड़ा माना जाता है कि उससे डर कर लोग अपराध करने से हिचकें। वैसे भी कहावत है कि “मरता क्या न करता” अर्थात् जब आदमी के सर मृत्यु का भय आ पहुँचता है तो फिर उसके लिये कोई बाधा नहीं रह जाती। मृत्यु के भय से संसार के कितने लोग कर्तव्य पालन से विमुख हो जाते हैं इसकी गिनती कर सकना कठिन है।
भय के संबंध में तत्व की बात तो यह है कि जो सब विषय हम लोगों के इच्छाधीन या शक्ति के भीतर हैं उन्हीं के प्रयोग पर हम लोगों की भलाई या बुराई निर्भर करती है। पर जो विषय हम लोगों के इच्छाधीन या शक्ति के भीतर नहीं है-जो अनिवार्य हैं, जिनसे हम पार नहीं पा सकते- वे हम लोगों के लिये अच्छे भी नहीं और बुरे भी नहीं हैं। इस विवेचन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि- “जो सब विषय हम लोगों के इच्छाधीन नहीं हैं उनके विषय में निडर रहना चाहिये, और जो हम सब लोगों के इच्छाधीन हैं, अर्थात् जिनको हम अपनी मर्जी से करें चाहे न करें-उन्हीं के लिये भय करना चाहिये।” यदि किसी प्रकार की बुरी वासना के कारण हमको बुरा कहा जाता है तो हमको उसी से बच कर रहना चाहिये। पर जो विषय हमारी शक्ति से बाहर है, जो हमारी इच्छा के वश में नहीं हैं उस के संबंध में डरना या भागने की कोशिश करना मूर्खता है।
पर खेद है कि अधिकाँश मनुष्य ऐसी ही विपरीत बुद्धि का परिचय दिया करते हैं। वे हिरन की तरह व्यर्थ में भयभीत होकर आफत में आ फंसते हैं। हिरन को जब भय होता है और वह डर कर भागने की चेष्टा करता है तो वह सुरक्षित समझ कर किस जगह का आश्रय लेता है? वह प्रायः उस जगह जाता है जहाँ शिकारी ने जाल फैला रखा है और वह उसी जाल में फंस कर प्राण गंवा बैठता है। इसका कारण यह है कि वह नहीं जानता कि कहाँ भय करना चाहिये और कहाँ नहीं करना चाहिये। हम लोग भी बिना जाने बूझे साधारणतः ऐसी बातों में भयभीत हुआ करते हैं जो हमारी इच्छा-शक्ति के परे है। और जो विषय हमारी इच्छा के वश में हैं उनसे हम भय नहीं करते। किसी प्रकार के लोभ या मोह में पड़ कर कोई लज्जाजनक या निन्दनीय काम करना वास्तविक भय का विषय है, और चाहें तो इनसे दूर भी रह सकते हैं। पर हम इन्हीं से न डर के खोटे मार्ग पर चलते रहते हैं।
इसके विपरीत मृत्यु, जो अटल है और किसी मनुष्य के वश में नहीं है तथा अन्य दुःख जिनका टालना हमारी शक्ति के बाहर है, उन्हीं से हम लोग डरते हैं और डर कर भागने की कोशिश करते हैं। वास्तव में मृत्यु और दुःख भयंकर नहीं होते वरन् उनका भय ही भयंकर है। इसीलिये किसी कवि ने कहा है-
“मृत्यु से मत भूल कर भी तुम डरो।
कायरों की मृत्यु का ही भय करो॥”
मृत्यु से डरना नासमझी की बात है। हम लोग मृत्यु और कष्टों से भागते हैं पर वे क्या चीज हैं? सुकरात इन विषयों को ‘हौआ’ कहा करते थे। कारण यह कि विकराल चेहरा केवल अबोध बालकों को ही भीषण और डरावना मालूम होता है। यह “हौआ” देख कर छोटे बच्चे जिस प्रकार डर जाते हैं वैसे ही साँसारिक जन भी संसार की किसी-किसी घटना से विह्वल हो जाते हैं। मृत्यु क्या है? एक “हौआ” है। चाहे शीघ्र हो या देर से हो, एक दिन यह शरीर आत्मा से अलग होगा ही-पहले भी हो चुका है। यह काल चक्र का भ्रमण है और इसका चलते रहना ही आवश्यक है।
(श्री चन्द्रशेखर शास्त्री)
मानवीय सभ्यता का आरम्भ धन या सम्पत्ति के संग्रह से हुआ है। सभ्यता की रानी-सम्पत्ति की अटारी में रहती है और धन की गाड़ी पर चलती है। भय उसका सहचर है। धनी निर्भय हो ही नहीं सकता। इस संबंध में गुरु नानक की एक कथा सुनिये-
एक बार गुरु नानक अपने शिष्य मर्दाना के साथ भ्रमण करते एक वन में आये। वहाँ से नगर एक कोस की दूरी पर था। गुरु ने शिष्य से कहा-यह स्थान बड़ा रमणीय है। आज हम लोग यहीं रहें।
शिष्य ने कहा- भला जंगल में भी कोई रहता है। रात में जंगली जानवर निकलते हैं, वे कुछ हानि पहुँचायें तो?
गुरु जी ने बहुत समझाया, पर शिष्य राजी न हुआ। तब गुरु जी ने कहा- अच्छा संध्या का कृत्य इसी तालाब में कर लो, तब नगर में चलेंगे।
यही सलाह पक्की ठहरी। गुरु जी स्नान और भजन पूजन करके ऊपर चले आये। तब तक शिष्य जल के किनारे सीढ़ी पर बैठा हुआ भजन ही कर रहा था। गुरु जी ने ऊपर आकर शिष्य की झोली खोली। उसमें दो पोटलियाँ निकलीं। एक पोटली, जो कुछ सख्त जान पड़ी, गुरु जी ने खोल डाली। उसमें दो अशर्फियां निकलीं। गुरु जी ने अशर्फियां निकाल लीं और जब शिष्य ऊपर आया, तब वे उसे दिखाकर गहरे पानी में फेंक दीं। शिष्य बेचारा ताकता ही रह गया। करता भी क्या।
थोड़ी देर बाद गुरु जी ने कहा- अच्छा, अब भजन पूजन हो चुका, चलो अब गाँव में चलें।
चेला जला-भुना बैठा ही था। वह झुँझलाकर बोला- अब क्या है, अब यहीं रहें। जिसके लिये मैं गाँव में चलना चाहता था उसे तो आपने तालाब के हवाले कर दिया। अब आप चाहे जहाँ रहें।
कथा इतनी ही है। धन के कारण मनुष्य निर्भय नहीं रह सकता। धनी मनुष्य को रक्षक की आवश्यकता होती है। जब मनुष्यों का साँसारिक पदार्थों से परिचय हुआ, उन वस्तुओं के उपयोग की रीति उन्हें मालूम हुई, उन वस्तुओं से होने वाली इन्द्रिय तृप्ति का जब उन्हें अनुभव हुआ, तब सुख की लालसा उनके हृदयों में बद्धमूल हो गई। वे सुख की सामग्रियाँ इकट्ठी करने लगे। अब परिव्राजक का जीवन उन्हें दुखकर मालूम होने लगा। अब उन्होंने एक साथ समूह बनाकर रहना आवश्यक समझा। उस समय तक जो लोग निर्भय थे, जिनके बच्चे-बच्चे सिंही के साथ खेलते थे, जिनके जंगली आश्रमों में जंगली वस्तुओं का बेरोक-टोक प्रवेश था, अब उन्हें आत्म-रक्षा की चिंता ने आ घेरा। अब आत्म-रक्षा के लिये उन्हें कई आदमियों का मिलकर उपयोग जान पड़ा और फलस्वरूप टोले बाँधे गये, पुरवा बसाये गये जो धीरे-धीरे गाँव, कस्बा और नगरों के रूप में बदले।
इस प्रकार सामूहिक रूप में रहने पर मनुष्यों की कुप्रवृत्तियाँ और सुप्रवृत्तियाँ बलवती हुई। वे कार्य करने के योग्य हुईं। नई-नई इच्छाएं उत्पन्न हुईं और मनुष्य उनको पूरा करने को उत्सुक हुये। इस प्रकार समय के सीधे-साधे और अज्ञान प्राणी दूसरे ही रूप में प्रकट हुए। उन्हें तरह-तरह की आवश्यकताओं का अनुभव होने लगा, और जब वे पूरी न हो सकीं तो वह अपने को दुखी समझने लगे। संभवतः उसी समय मनुष्य जाति को दुख-सुख, क्रोध, साहस, उत्साह आदि अपने गुणों या अवगुणों का ज्ञान हुआ। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वे इन वृत्तियों का ढंग से उपयोग न कर सके और थोड़े ही समय में लोगों में छीना-झपटी शुरू हो गई एक दूसरे को लूटने और सताने लगे। अपनी आवश्यकता पूरी होनी चाहिए, इसके लिए खून भी करना पड़े, तो कोई बात नहीं। कल्पना कीजिये उस समय इस जाति की क्या अवस्था हुई होगी। उस समय लोगों का जीवन कैसा भयानक तथा आतंकपूर्ण हो गया होगा, यह समझना कुछ कठिन नहीं है।
जो दूसरों को सताते हैं, समय बदलने पर वे स्वयं भी सताये जाते हैं। आज जिस बलवान ने अपने से किसी दुर्बल को सताया, आगे चल कर वह भी अपने से अधिक बलवान के द्वारा सताया जाता है। इस प्रकार दलबन्दी बढ़ती जाती है और मनुष्यता की कसौटी वीरता ही मानी जाने लगती है। यही वह काल था जब कन्या को पाने का अधिकारी सबसे बड़ा वीर माना जाता था और इसके लिए तरह-तरह परीक्षायें रखी जाती थी, कहीं लक्ष्य वेध की, कहीं धनुष तोड़ने की ओर कहीं अन्य किसी प्रकार की।
पर इस तरह की चढ़ाऊपरी में कौन कब तक बलवान रहेगा इसका निश्चय कर सकना बड़ा कठिन था। आज का बलवान कल दुर्बल हो सकता था। आज के अत्याचार करने वाले को अत्याचार सहना पड़ता था। कुछ समय बाद लोग इस अवस्था से परेशान होने लगे। किसी के घर में आग लगी, पर उसने बहुतों पर अत्याचार किया था, इसलिये आस-पास के लोगों ने आग बुझाने में मदद न दी। लोगों ने सोचा, अच्छा है जलने दो, हमारा क्या जाता है। इसने कौन सी भलाई की है, जो हम इसकी रक्षा करने जायें। इस प्रकार विचार करके वे सब चुप बैठे रहे। पर जब अग्नि ने भयंकर रूप धारण कर लिया और एक-एक करके गाँव के सारे घरों को जला दिया तब लोगों को अपनी भूल मालूम हुई और पारस्परिक सहयोग के महत्व की बात समझ में आई। लोगों ने समझा कि दूसरों को दुख देने से खुद भी दुःख उठाना पड़ता है, इसलिये किसी को दुख देना अच्छा नहीं। इसी प्रकार की मनोवृत्ति के उत्पन्न होने से लोगों में समाज की स्थापना का विचार फैलने लगा। उनमें से जो लोग कुछ अधिक समझदार और सहनशील प्रकृति के थे उन्होंने पारस्परिक सहयोग के अनुसार पहले चलना आरम्भ किया। उसके बाद उनको सुखी व समृद्ध देखकर दूसरे दल वालों का भी ध्यान उतर गया। इस प्रकार सामाजिक संगठन बढ़ता गया, उसके लिए कुछ आवश्यक नियम भी बनाये गये, कर्तव्य अकर्तव्य का निर्देश किया गया, दण्ड और पुरस्कार की व्यवस्था हुई। इससे लोगों की बुरी वृत्तियाँ दबीं और अच्छी वृत्तियों का विकास हुआ। भय और अरक्षित अवस्था से निकल कर लोगों को अपेक्षाकृत सुरक्षा का अनुभव हुआ। लोगों को ज्ञान-विज्ञान का अनुशीलन करने का सुयोग मिला। लड़के पढ़ने में और बूढ़े आध्यात्मिक चर्चा में समय बिताने लगे। जवानों और प्रौढ़ों ने गृहस्थी के संचालन का भार अपने कन्धों पर रखा। सर्वत्र शाँति और सुख का प्रसार होने लगा तथा समाज सभ्यता तथा उन्नति की ओर वेग पूर्वक अग्रसर होने लगा।
उस समय समाज की स्थापना धर्म पर हुई थी। धर्म का अर्थ नियम या कानून भी है। अतएव प्रौढ़ होने पर भी समाज धार्मिक बना रहा। समाज ने व्यक्तियों को धार्मिक बनाया, उन्हें धर्म पालन की शिक्षा दी। धर्म में कलह नहीं होता, अशाँति नहीं होती। मत्सर, द्वेष आदि तो अधर्म के लक्षण हैं। इसलिये धर्म की छत्रछाया में समाज कल्याण-मार्ग पर अग्रसर हुआ।
(सन्त विनोबा भावे)
इस जमाने में जो राज्य होता है, वह राज्य नहीं, बल्कि पूजा (पूजा का राज्य) है। पहले जमाने में जो लोगों को दबाता था वही राजा होता था। इसका अर्थ यह कि जो जंगल के प्राणियों को खा जाता है, वह जंगल का राजा होता है। इस प्रकार की राज-सत्ता अब नहीं चलेगी। अब आगे राज-सत्ता का अर्थ होगा सेवा की सत्ता।
गाँव-गाँव में जो बुद्धिमान, संपत्तिवान और समझदार लोग हों, वे गाँव के माता-पिता बन जाएँ और गाँव की सेवा करके वहाँ का राज्य चलायें। जो बुद्धिमान पिता होते हैं, वे अपने लड़कों के लिये यही इच्छा करते हैं कि हमारे लड़के हमसे ज्यादा बुद्धिमान बनें। इसलिए गाँव के जो बुद्धिमान लोग होंगे, वे इस तरह काम करेंगे कि वहाँ के सब लोग उन्नति करके उनसे भी अधिक समझदार बन जायें। ऐसा ही ग्राम-राज्य फिर राम राज्य बनेगा।
स्वराज्य का अर्थ है-सारे देश का राज्य। जब दूसरे देश की सत्ता अपने देश पर नहीं रहती है, तो स्वराज्य हो जाता है। लेकिन जब हर एक गाँव में स्वराज्य हो जाता है तो उसको रामराज्य कहा जाता है। गाँव के सब लोग बुद्धिमान बने हैं किसी पर सत्ता चलाने की जरूरत नहीं पड़ती है, तब उसका नाम है ‘रामराज्य’। जब गाँव के झगड़े शहर की अदालत में जाते हैं और शहर के लोग उनका फैसला करते हैं, तो उसका नाम है- गुलामी, दासता या परतंत्रता। गाँव के झगड़े गाँव में ही मिटाने का नाम है स्वतंत्रता पर स्वराज्य। और जब गाँव में झगड़े ही न हों उसका नाम है रामराज्य।
जो राज-सत्ता दिल्ली में इकट्ठी हुई है उसे गाँव-गाँव में बाँटना है। हम तो परमेश्वर के भक्त हैं। इसलिये ईश्वर का ही उदाहरण सामने रखें। ईश्वर ने अगर अपनी सारी बुद्धि बैकुण्ठ में ही रखी होती, और किसी प्राणी को बुद्धि दी ही न होती, तो दुनिया कैसे चलती? फिर तो जब किसी मनुष्य को बुद्धि की जरूरत पड़ती, तो उसे बैकुण्ठ को टेलीग्राम भेज कर बुद्धि मंगानी पड़ती। आज जब बात-बात पर आपके मंत्रियों को विमान से दौड़ना पड़ता है, तो फिर भगवान को कितना दौड़ना पड़ता। लेकिन भगवान ने ऐसी सुन्दर योजना की है कि सबको बुद्धि बाँट दी है।
पहले लंदन में सत्ता थी। वहाँ से पार्सल द्वारा वह दिल्ली आयी है। यह तो बड़ी कृपा हुई। लेकिन वह पार्सल दिल्ली में ही अटक गया है, उसे अब गाँव में पहुँचाना है। हमें लोगों को स्वराज्य की शिक्षा देनी है। इसका रूप होगा ‘शासन-विभाजन’। शासन का आज जो केंद्रीकरण हुआ है, उसके बदले शासन का विभाजन करना होगा और हर गाँव में शासन या सत्ता बाँटनी होगी। फिर जब गाँव के सबके सब लोग राज्य शास्त्र के ज्ञाता हो जायेंगे और गाँव के सब लोग जब झगड़ा करेंगे ही नहीं तो उस हालत में शासन से छुटकारा हो जायेगा और रामराज्य आयेगा।
यह सब काम सरकारी कानून से नहीं होगा। कुछ लोग कहते हैं कि गाँवों के बिना जमीन वाले लोगों को भूदान द्वारा जमीन देने की क्या जरूरत है, सरकार खुद क्यों नहीं जमीन दे देती। पर सरकार जमीन बाँटेगी तो गाँवों का राज्य नहीं होगा, दिल्ली-राज्य होगा। लंदन-राज्य के बदले अब दिल्ली राज्य आया है, पर हम चाहते हैं कि दिल्ली-राज्य के बदले गाँव का राज्य आये। जिस प्रकार अपनी भूख मिटाने के लिए हमको ही खाना पड़ता है, दूसरा कोई हमारे लिए नहीं खा सकता, उसी तरह हमारे गाँव में रामराज्य लाने के लिए हमें ही भूदान करके व्यवस्था ठीक करनी होगी। फिर आज जैसे दिल्ली में बैठकर लोग सोचते हैं कि अपने देश में बाहर से कौन-कौन सी चीजें आनी चाहिए और देश की कौन-कौन सी चीजें बाहर जानी चाहिए, उसी तरह गाँव-गाँव के लोग सोचेंगे कि अपने गाँव में कौन सी चीजें शहरों से आनी चाहिए और कौन-कौन सी बाहर जानी चाहिए। आज तो जिसकी मर्जी में जो आता है उसके अनुसार वह बाहर की चीजें खरीदता जाता है, लेकिन आगे यह नहीं चलेगा। सारे गाँव वाले मिलकर चर्चा करेंगे और निर्णय करेंगे। अगर किसी को गुड़ की जरूरत हुई, तो गाँव वाले सोचेंगे और तय करेंगे कि इस साल गाँव में गुड़ नहीं बन सकता, इसलिये एक साल के लिए बाहर से गुड़ खरीदना होगा। लेकिन गाँव की दुकान से खरीदेंगे। इस तरह गाँव के लोग बाहर का गुड़ गाँव की दुकान से एक साल तक खरीदेंगे फिर अगर साल के लिए गुड़ तैयार कर लेंगे।
इस तरह सारा गाँव एक हृदय से सोचेगा। गाँव में पाँच सौ लोग रहेंगे तो गाँव में एक हजार हाथ होंगे, एक हजार पाँव होंगे, पाँच सौ दिमाग होंगे, लेकिन मन एक होगा।
गीता के एकादश अध्याय में विश्वरूप दर्शन की बात है। विश्वरूप दर्शन में हजारों हाथ हैं, हजारों पाँव हैं, कान हैं, आँखें हैं, लेकिन उसमें आपको यह नहीं मिलेगा कि हृदय एक ही होगा। उसी तरह गाँव का हृदय एक होगा। पाँच सौ दिमाग होंगे। वे सलाह करके बात तय करेंगे। यह योजना सबका हित करने वाली-सर्वोदय की होगी।
अब आप बताइये कि यह सर्वोदय का काम गाँव वाले या आपकी राजधानी वाले और दिल्ली वाले करेंगे? यह ठीक है कि आप लोग अपनी योजना करेंगे, तो इसमें राजधानी वाले और दिल्ली वाले आपको कुछ मदद देंगे। लेकिन योजना तो आपको ही अपने गाँव के लिए करनी होगी। अगर गाँव-गाँव में जाकर यह बात समझा देंगे, तो बुद्धिमान किसानों को यह बात समझने की अक्ल है। फिर तो एक-एक गाँव के लोग आपके सामने आकर कहेंगे कि हमने अपने गाँव के भूमिहीनों का मसला हल कर दिया है। अपने गाँव के भूमिहीनों को और कम भूमि वालों को हमने पूरी जमीन दे दी है। फिर इस तरह सब लोगों के दस्तखत के दानपत्र वे आपकी भूदान-समिति के आफिस के पास पहुँचा देंगे। अब गाँव की सारी जमीन गाँव की बना दीजिये। आज आपके गाँव में भूमिहीन कोई नहीं रहा है। अब भूमि मालिक कोई नहीं रहना चाहिये।
यह ठीक है कि इन सब कामों में समय लगेगा, लेकिन ज्यादा समय की आवश्यकता नहीं। अगर गाँव के लोग समझ लें तो एक साल में ऐसा संगठन कर सकते हैं। आवश्यकता यही है कि हम इसके मूल सिद्धान्त को समझ जायें। इनमें पहली बात है केन्द्रीय स्वराज्य, दूसरी है विभाजित स्वराज्य और तीसरा है रामराज्य।
कुछ लोग इस योजना के विषय में कहते हैं कि यह स्वावलम्बन की योजना है, जबकि इस समय परम्परालंबन की योजना आवश्यक है। हम भी परस्परालंबन चाहते हैं, परन्तु वह दो प्रकार का होता है। एक अंधे और लंगड़े का परस्परालंबन होता है। अंधा देख नहीं सकता, परन्तु चल सकता है और लंगड़ा देख सकता है परन्तु चल नहीं सकता। लंगड़ा अंधे के कंधे पर बैठता है। वह रास्ता दिखलाने का काम करता है और अंधा चलने का। इस तरह क्या आप समाज के कुछ लोगों को अंधा रखना चाहते हैं और कुछ को लंगड़ा रखना चाहते हैं, और फिर दोनों का परस्परालम्बन चाहते हैं? हम ऐसा परस्परालम्बन चाहते हैं कि दोनों आँख वाले हों और फिर हाथ में हाथ मिलाकर दोनों साथ-साथ चलें। हम समर्थों का परस्परालंबन चाहते हैं और वे लोग अपाहिजों का परस्परालम्बन चाहते हैं।
हम जानते हैं कि सारी की सारी चीजें एक गाँव में नहीं बन सकतीं। एक गाँव को दूसरे गाँव के साथ और गाँवों को शहरों के साथ सहयोग करना होता है। लेकिन हम यह नहीं चाहते कि गाँवों में शहरों से चावल कूट कर, आटा पिसवाकर और चीनी बनवाकर लाई जाय। हम चाहते हैं कि ये चीजें गाँव में ही बनें। लेकिन गाँवों में चश्मा, थर्मामीटर, लाउडस्पीकर जैसी चीजों की जरूरत पड़ी, तो वे चीजें शहर से लाई जायं। आज यह होता है कि शहर वाले गाँव वालों के उद्योग खुद करते हैं। गाँव में कच्चा माल होता है और उसका पक्का माल गाँव में ही बन सकता है। लेकिन आज शहरों में यन्त्रों के द्वारा पक्का माल बनाया जाता है और उधर परदेश का माल शहरों में आता है, उसे रोकते नहीं। हम चाहते हैं कि गाँव के उद्योग गाँव में चले, और परदेश से जो माल आता है उसे रोकने के लिए वह माल शहरों में बनाया जाय। अगर गाँवों के उद्योग खत्म होंगे, तो न सिर्फ गाँवों पर संकट आयेगा, बल्कि शहरों पर भी आयेगा। फिर गाँव के बेकार लोगों का शहरों पर हमला होगा और ऊपर से परदेशी माल का हमला तो होता ही रहेगा। इस तरह दोनों हमलों के बीच में शहर वाले पिस जायेंगे। इसलिए यह आवश्यक है कि गाँवों और शहरों के बीच ऐसा सहयोग रहे कि गाँव वाले अपने उद्योग गाँव में चलायें और शहर वाले परदेश से आने वाली चीजें बनायें। इस तरह प्रत्येक गाँव पूर्ण हो जायगा और उनमें पूरा सहयोग होगा।
(आचार्य क्षितिमोहन सेन शास्त्री, एम.ए.)
वर्णाश्रम धर्म भारतीय समाज संगठन का मूलाधार माना जाता है। यद्यपि इस समय ‘चातुर्वर्ण्य’ का केवल नाम ही शेष रह गया है और उनका स्थान अनगिनत जातियों ने ले लिया है तो इन जातियों का निकाय मुख्यतः चारों वर्णों से ही माना जाता है।
इसमें संदेह नहीं कि जब वर्णाश्रम धर्म की स्थापना की गई तो लोक नेताओं के सामने उसका एक बहुत ऊँचा आदर्श रहा होगा। यही कारण है कि उन्होंने ब्राह्मण को पूज्य मानें, और उनके प्रत्येक आदेश को अक्षरशः शिरोधार्य करे वहाँ ब्राह्मण के लिए भी अनिवार्य रूप से यह विधान बना दिया गया कि वे सरल, आडम्बरहीन, जीवन बितावें और अपना लक्ष्य ज्ञान की प्राप्ति और कठोर तपस्या ही रखकर उस का संचालन करें।
पर दुर्भाग्यवश यह ऊँचा बहुत दिन नहीं टिक सका। जब श्रद्धा सम्मान सहज ही मिलने लगा और कठोर तपस्या की आवश्यकता न रही, तो आदर्श से भ्रष्ट होने में कितनी देर लगती है? परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे प्राचीन ऋषियों की तपोभूमियाँ तीर्थों और मठों के रूप में बदल गई और वहाँ के आचार्यों और तपस्वियों के उत्तराधिकारी महन्तों और पण्डों के रूप में प्रकट हुए। जिन लोगों के ऊपर समाज जीवन छोड़कर ऐश आराम की जिन्दगी बिताने लगे।
शास्त्रों में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि ब्राह्मण का आदर्श उच्च और महान होना चाहिये। उस आदर्श से भ्रष्ट होने पर जन्म से ब्राह्मण होने पर भी उसका ब्राह्मणत्व जाता रहता है। ‘स्कन्द पुराण’ में कहा गया है कि “राजद्वार पर वेद बेचने वाला ब्राह्मण पतित है। सदाचारहीन, सूदखोर और दुर्विनीति ब्राह्मण शूद्र है।” ‘पद्म पुराण’ में कहा गया है कि “केवल वेद पढ़ना ही ब्राह्मणत्व के आदर्श के लिये पर्याप्त नहीं है। वेद पढ़कर भी विचारपूर्वक जो उसका तत्व न समझ सके यह ब्राह्मण शूद्र-कल्प अपात्र है।”
इस प्रकार उस समय जो लोग लोक-मत का परिचालन या निर्माण करते थे, उनके हृदय में एक महान आदर्श था, और समाज को उस आदर्श पर अग्रसर करना ही उनका उद्देश्य था। इसीलिए वर्णाश्रम धर्म में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि उससे प्रत्येक मनुष्य समाज का उपयोगी अंग बनकर अपना जीवन सार्थक कर सके। जहाँ आदर्श और उद्देश्य रहते हैं वहाँ मनुष्य की विचार-बुद्धि जाग्रत रहती है। जहाँ कोई भी आदर्श और लक्ष्य नहीं वहाँ विचार किस बात का होगा? इसलिये जब उस समय के नेताओं ने देखा कि वर्णाश्रम धर्म से जो महान उद्देश्य पूरा होना चाहिए वह सफल नहीं हो रहा है तो उन्होंने उपर्युक्त प्रकार के तीव्र विचार प्रकट किये थे। आज एकमात्र धन की सत्ता ने हमारा उद्देश्य और आदर्श लुप्त कर दिया है इसलिए विभिन्न समुदायों के कर्त्तव्यों पर जोर देने का विचार भी जाता रहा। प्राचीन काल की तुलना में आजकल हमारा समाज तामसिकता से भर गया है। फिर भी कभी-कभी कुछ लोगों के मन में विचार बुद्धि जागृत हो जाया करती है। कबीर, रैदास, तुकाराम, नानक, दादू आदि मध्ययुग के महापुरुष बारम्बार इस आदर्श हीनता और अन्याय की तीव्र आलोचन करते रहे हैं, इसके पहले भी अनेक विद्वानों ने इस झूठे जात्यभिमान की निन्दा की है।
महाभारत में ही इस विषय में सैकड़ों श्लोक पाये जाते हैं, जिनमें नाममात्र की जाति के महत्व को अस्वीकार किया गया है। पर इस संबंध में सबसे स्पष्ट विवेचन ‘बज्र सूची-उपनिषद्’ में मिलता है। यह तो अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं लग सका कि इसका रचयिता कौन है, पर सन् 973 में इसका अनुवाद चीनी भाषा में हुआ था, इससे इसकी प्राचीनता का अनुमान किया जा सकता है। इस ग्रंथ में मुख्य रूप से इस संबंध में विचार किया गया है कि ब्राह्मण कौन है। इसके आरम्भ में ही यह प्रश्न किया गया है-
“तत्रचोद्यमस्ति कोवा ब्राह्मणोनाम, किं जीवः किं देहः, कि जातिः, कि ज्ञानम्, कि धार्मिक, इति।”
अर्थात् “प्रश्न यह है कि ब्राह्मण कौन है? जीव, देह, जाति, ज्ञान, धर्म, इनमें ब्राह्मण कौन है?”
“पहले विचार किया जाय कि क्या जीव ब्राह्मण है?” ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि जीव भूतकाल से भिन्न-भिन्न देहों में निवास करता आ रहा है। वह एक रूप है, एक ही जीव को कर्मवश अनेक देह मिलती हैं। इस प्रकार सब देहों के जीव एक ही रूप के हैं और उसकी ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता।”
“तो फिर क्या देह ब्राह्मण है? नहीं, क्योंकि ब्राह्मण से चाण्डाल तक सभी लोगों की पंचभौतिक देह एक ही तरह की है। सब में बुढ़ापा और मृत्यु एक तरह ही आता है। ऐसा तो कोई नियम दिखाई नहीं पड़ता कि ब्राह्मण श्वेतवर्ण का, क्षत्री रक्त वर्ण का, वैश्य पीले वर्ण का और शूद्र काले वर्ण का ही हो। देह अगर ब्राह्मण होती तो पिता की मृत देह का दाह करने पर पुत्र को ब्रह्महत्या का पाप लगता। इस विचार से देह ब्राह्मण नहीं है।”
“तो फिर क्या जाति ब्राह्मण है? नहीं। ऐसा होता तो अन्य प्राणियों में भी अनेक जातियाँ होतीं। मनुष्य जाति के सिवा भी अन्य जाति से अनेक महर्षियों का उत्पन्न होना बतलाया गया है। जैसे शृंगी ऋषि मृगी से, कौशिक ऋषि कुश से, जाम्बुक ऋषि जम्बुक (त्यार) से, व्यास जी मल्लाहिन से, वशिष्ठ जी उर्वशी (स्वर्ग की वेश्या) से, अगस्त जी घड़े से उत्पन्न हुए कहे जाते हैं। जाति के बिना भी अनेक ज्ञान सम्पन्न ऋषि हुए हैं। इससे जाति ब्राह्मण नहीं है।”
“तो फिर क्या ज्ञान ब्राह्मण है? नहीं, शास्त्रों के ज्ञाता और परमार्थदर्शी अनेक क्षत्रिय भी हैं। इसलिए ज्ञान ब्राह्मण नहीं है।”
“तो फिर ब्राह्मण कौन है? वह, जो अद्वितीय, जाति, गुण, क्रियाहीन, सत्य, अनन्त ज्ञान स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार प्रत्यक्ष भाव से करता है। यही स्मृति, श्रुति, पुराण, इतिहास का अभिप्राय है। अन्यथा और किसी प्रकार से ब्राह्मणत्व की सिद्धि नहीं हो सकती।”
इसी प्रकार ‘भविष्य पुराण’ में कहा गया है-
सामग्रय़नुष्ठनगणौः समग्रः शूद्रायतः सन्ति समाद्विजानाम्। तन्माद्विशेषो द्विज शूद्रनाम्नोनाध्यात्मिको बाह्य निमित्त को वा ॥ (41-29)
“क्योंकि सम्मान्य शूद्र और सम्मान्य ब्राह्मण ये दोनों सामग्री और अनुष्ठान में समान ही हैं, इसलिये ब्राह्मण और शूद्र में बाह्य या आध्यात्मिक कोई भेद नहीं है।”
इस प्रकार भारतीय वर्णाश्रम धर्म जहाँ जाति-भेद का उत्पादक है, वहाँ उसमें गुणों और कर्तव्यों पर भी बहुत अधिक जोर दिया गया है। यह बात दूसरी है कि संसार में हीन प्रकृति के लोगों की ही अधिकता रही है और वे प्रत्येक अच्छे से अच्छे नियम में भी अपनी स्वार्थ सिद्धि का छिद्र ढूँढ़ लेते है। यही कारण है कि अनेक लोग ब्राह्मण-वंश में उत्पन्न होने का अनुचित लाभ उठाते रहे हैं, तो भी कुछ लोग अपने कर्तव्य पालन में भी सचेत रहे हैं। इसका एक प्रमाण यही है कि जिन लोगों ने प्राचीन समय से अब तक जातिभेद और ब्राह्मणत्व की त्रुटियों के विरोध में आवाज उठाई है, वे अधिकाँश में उच्चवर्ण के ब्राह्मण ही थे।
(श्री सत्य भक्त, पूर्व सम्पादक ‘सतयुग‘)
मनुष्य यद्यपि एक मामूली, दुर्बल, परिवर्तनशील देह और सीमित इन्द्रिय शक्ति को लेकर ही इस दुनिया में आता है, पर उसके अन्दर कर्मशक्ति की एक ऐसी प्रेरणा रहती है, जिससे वह संसार के प्रत्येक कार्य को करने का साहस रखता है। वह समस्त प्रकृति पर अधिकार जमाने की चेष्टा करता है और चाहता है कि भूमि, जल, पवन, अग्नि सब मेरे वशीभूत रहें। इस उद्देश्य में इस समय मनुष्य ने बहुत कुछ सफलता प्राप्त कर भी ली है, पर उसकी भूख कभी शाँत होने वाली नहीं है। जल, थल, और आकाश में भी अपना अधिकार जमा कर अब वह चंद्रमा, मंगल तथा अन्य ग्रहों में पहुंचने का स्वप्न देख रहा है।
यद्यपि मनुष्य ने नई-नई खोजें करके और एक से एक अद्भुत यंत्र बना कर अपनी शक्ति को बहुत बढ़ा लिया है, पर अभी तक वह उस वस्तु को प्राप्त नहीं कर सका है जिससे वह पूर्ण तृप्ति का अनुभव कर सके, और अपने को हर तरह से सफल मनोरथ समझ सके। इसके विपरीत इस प्रकार की भौतिक उन्नति में संलग्न सभी व्यक्ति महत्वाकाँक्षा के वशीभूत होकर आपस में घोर प्रतिद्वन्द्विता का भाव रखते हैं जिससे संसार में और भी अशाँति तथा असंतोष का भाव बढ़ता है इस प्रकार वह उन्नति अनेक अवसरों पर जन समूह का कल्याण करने के बजाय दुःखदायी और नाशकारी सिद्ध होने लगती है। इसलिये विचारकों के सामने स्वभावतः ही यह समस्या उपस्थित होती है कि मनुष्य की कर्मशक्ति का विकास किस मार्ग से हो कि वह दूसरे के प्रतिकूल सहायक सिद्ध हो। प्रत्येक मनुष्य दूसरे को घटाने का प्रयत्न करने के बजाय अपने ही भीतर “स्वराज्य” या “विश्वराज्य” का अनुभव करे। इस समय संसार के अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में जो घोर प्रतिद्वन्द्विता छिड़ी है और जिसे मिटाकर विश्व शक्ति का प्रयास बड़े-बड़े मनीषी और विशेषकर हमारे भारतीय नेता कर रहे हैं, वह उपरोक्त समस्या का ही स्पष्ट रूप है।
प्रत्येक जीव में भोग की कामना प्राकृतिक रूप से ही पाई जाती है। पर जिस प्रकार अन्य सब प्राणियों की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाने पर उनकी तृप्ति हो जाती है, वैसी बात मनुष्य में नहीं पाई जाती। उसके मस्तिष्क का जो विकास हुआ है वह इस प्रकार का है कि उसके मन में सदा नई-नई भोग वासनायें उत्पन्न होती रहती हैं। किसी मनुष्य को चाहे संसार भर का ऐश्वर्य मिल जाय तो भी उसकी लालसा और भी बढ़ती जाती है। इस संबंध में एक छोटी सी कहानी नीचे दी जाती है-
एक बड़ा गरीब मछुआ था। एक दिन नदी में जाल डालने पर उसे एक ऐसी सुन्दर मछली मिल गई जैसी उसने जन्म भर नहीं देखी थी। मछुआ अब उसे मारने को उद्यत हुआ तो वह बोली कि मैं मछलियों की रानी हूँ, तुम मुझे छोड़ दो और बदले में जो चाहे सो तीन वर माँग लो। मछुआ को उसकी बात पर विश्वास हो गया और उसने बहुत सा रुपया माँग कर उसे जल में छोड़ दिया। मछुये ने सोचा था कि इतने रुपये से मैं और मेरे घर वाले समस्त जीवन सुख से निर्वाह कर सकेंगे। पर जब घर आकर उसने सब हाल अपनी स्त्री को बतलाया तो वह बड़ी नाराज हुई और कहने लगी कि तुम बड़े मूर्ख हो जो ऐसा सुयोग पाकर भी दस-पाँच हजार रुपये से संतुष्ट हो गये। जाओ उस मछली से कहो कि मेरी स्त्री रानी बनना चाहती है, इसलिए उसके लिये महल, फौज, पलटन, खजाना आदि बना दो। मछुआ नदी पर गया और मछली को पुकार कर अपनी स्त्री का संदेश सुना दिया। मछली रानी ने उसे स्वीकार कर लिया और मछुआ के घर पर एक राज्य की पूरी सामग्री तैयार हो गई। पर मछुआ की स्त्री ने देखा कि हमारा राज्य तो मामूली-सा है और संसार में हमसे बड़े-बड़े बहुत से राजा मौजूद हैं, तो वह फिर मछुये को तंग करने लगी कि जाओ और मछली से कहो कि वह मुझे संसार की सबसे बड़ी रानी बना दे। विवश होकर मछुआ फिर नदी पर गया और मछली रानी से स्त्री की बात कही। मछली ने उसे भी स्वीकार कर लिया और उस समय उसका राज्य पृथ्वी भर में सबसे बड़ा और शक्तिशाली हो गया। पर मछुआ की स्त्री को चैन न पड़ा और वह सोचने लगी कि ऐसे राजा, रानी तो पृथ्वी पर बहुत हो चुके हैं, मुझ में कोई सबसे बढ़कर विशेषता होनी चाहिये। उसने मछुआ से कहा कि मछली से कहो कि वह मुझे चंद्रमा और तारों की रानी बना दे। मछुआ झल्लाकर फिर मछली के पास गया और उसे स्त्री की आकाँक्षा की बात बतलाई। मछली ने कहा कि तुम्हारी स्त्री किसी चीज के लायक नहीं है और वह फिर जैसी की तैसी हो जायेगी। उसी समय सारा राज पाट गायब हो गया और वही टूटी-फूटी झोंपड़ी और फटे पुराने कपड़े फिर दिखलाई पड़ने लगे।
बाल मनोरंजन की एक पुस्तक में वर्णित इस कहानी में बहुत बड़ी शिक्षा निहित है। मनुष्य एक के बाद दूसरी सफलता प्राप्त करता जाता है, पर उसकी लालसा तृप्त नहीं होती। इतना ही नहीं मनुष्यों में प्रतिस्पर्धा का भाव भीषण रूप धारण करता जाता है और एक चंद्रमा तक जाने का मंसूबा बाँधता जाता है तो दूसरा मंगल लोक तक की दौड़ लगाने का दावा करता है। इसका परिणाम एक दिन स्वभावतः यह होगा कि वह फिर उसी अर्धनग्न अवस्था में पहुँच जायगा। हिन्दू शास्त्रकारों का यह कथन है कि लोभ से लोभ नहीं मिटना, लालसा से लालसा का अन्त नहीं किया जा सकता, वर्तमान परिस्थिति को देख कर सर्वथा सत्य प्रतीत हो रहा है।
इस अवस्था के सुधार का, इस भयंकर नाश के भँवरजाल में से मनुष्य के उद्धार का एक ही मार्ग है, और वह यह है कि निरी भौतिकता में संलग्न न हो कर आध्यात्मिकता की तरफ भी ध्यान देना। भौतिकता जहाँ मनुष्य को एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी-विरोधी बनाती है, वहाँ आध्यात्मिकता के प्रभाव से एकात्मता या अद्वैत भावना का उदय होता है। वह यह अनुभव करने लगता है कि संसार में एक ही आत्मतत्व व्याप्त है और उसकी दृष्टि से एक मनुष्य दूसरे का विरोधी या शत्रु कदापि नहीं हो सकता। अगर एक मनुष्य ऐसा आचरण करता है तो हमको यही समझना होगा कि उसके ऊपर अज्ञान का आवरण पड़ा है जिससे वह मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहा है। जब एक मनुष्य मूर्खता का कार्य करता है तो दूसरा भी वैसा ही करे तो यह कोई प्रशंसा की बात नहीं है। जो बात व्यक्तियों की है वही राष्ट्रों के लिये भी है। अगर कोई राष्ट्र सम्पत्ति के लालच से पागल होकर संसार भर को नाश करने की तैयारी कर रहा है-समस्त मनुष्य जाति का संहार करने के लिये एटम और हाइड्रोजन बम बना के रखता जाता है-तो इस अवस्था का प्रतिकार इससे नहीं हो सकता कि दूसरे सभी देश भी वैसे ही प्रलयकारी शस्त्र बनाकर उसी प्रकार की आत्मघाती नीति का अवलंबन करते जायें। किन्तु इसके प्रतिकार का सच्चा उपाय वही है जो गौतम-बुद्ध और महावीर से लेकर महात्मा गाँधी तक ने हम लोगों को सिखाया है। प्राचीन काल में भी क्षत्रिय-बल से ब्रह्मबल प्रबल सिद्ध हो चुका है और आज भी हिंसा को अहिंसा द्वारा पराभूत करके दिखाया जा चुका है। यह भौतिक या पाशविक शक्ति पर आत्मिक शक्ति की विजय थी और अब भी अगर संसार का उद्धार किसी प्रकार हो सकता है तो उसका एक-मात्र यही मार्ग है ।
(सुश्री लीलारानी)
विद्वानों और महात्माओं ने धर्म को संसार का सर्वश्रेष्ठ तत्व बतलाया है। उनका कहना है कि संसार की स्थिति धर्म के आधार पर ही है और जिस मनुष्य में धर्म का अभाव है उसकी कोई गिनती ही नहीं। इसमें सन्देह नहीं कि अभी तक संसार के इतिहास में सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति धर्म की ही रही है। इसी के प्रभाव से मनुष्य क्रमशः पशु की सी अवस्था से निकल कर एक सज्ञान और सामाजिक प्राणी की स्थिति तक पहुँच सका है।
इतना होने पर भी धर्म के संबंध में जितना मतभेद पाया जाता है उतना अन्य किसी विषय में देखने में नहीं आता। भिन्न-भिन्न देशों के लिये अलग-अलग धर्म प्रवर्तकों का होना तो समझ में आ सकता है, क्योंकि सब देशों की परिस्थितियाँ एक-सी नहीं होती, और परिस्थितियों का प्रभाव धार्मिक विधियों पर अवश्य पड़ता है। पर एक ही देश में बार-बार नये-नये धर्म क्यों चलाये जाते हैं? क्या धर्म थोड़े ही दिन ठहरने वाली वस्तु है? यदि धर्म इसी प्रकार बदल सकता है, तो धर्म में भी अनिश्चितता है। फिर धर्म की दुहाई देना भी व्यर्थ है। जिसे आज धर्म कहते हैं, वही कल धर्म न रहेगा। ऐसी अवस्था में किसी भी धर्म प्रवर्तक के उपदेश को कैसे स्वीकार किया जाय?
यथार्थ में धर्म के दो अंग होते हैं। एक तो नित्य अथवा अपरिवर्तनशील और दूसरा अनित्य अथवा परिवर्तनशील। सदाचार या सद्गुण तो नित्य या अपरिवर्तनशील धर्म। उन सद्गुणों के अनुसार बर्ताव करने, इन गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न करने, और आपस में व्यवहार करने की विधियाँ समय-समय पर बदलती रहती हैं। जैसे-जैसे मनुष्य का मानसिक विकास होता है, ये विधियाँ पहले से अच्छी निकलती आती हैं। नये-नये धर्म प्रवर्तकों का कार्य पहले से अधिक श्रेयस्कर अथवा बदली हुई परिस्थिति के अनुकूल विधियाँ बनाने का होता है ।
उदाहरण के लिये देखिये कि सत्य, दया, न्यायप्रियता, उदारता आदि सद्गुण अपरिवर्तनशील हैं। कोई धर्म इनको कभी बुरा न कहेगा। ये प्रायः सभी धर्मों में पाये जायेंगे। कोई धर्म-प्रवर्तक इनका निषेध न करेगा। इसलिये ये नित्य-धर्म हैं। लेकिन सत्य, दया, उदारता आदि के सूक्ष्म रूप, जैसे-जैसे मनुष्य की बुद्धि तीव्र होती जायेगी वैसे-वैसे प्रकट होंगे। जैसे कोई तो झूँठ बोलने को ही सत्य का उल्लंघन समझे। दूसरा ऐसे सभी कार्यों को भी झूँठ समझे जिनको उसे छिपाना पड़े, या मन में किसी अनुचित इच्छा को लाना भी सत्य का उल्लंघन समझे। यह उस मनुष्य के विचारों की सूक्ष्मता पर निर्भर है। इस प्रकार सत्य-धर्म में तो कोई परिवर्तन नहीं हुआ, पर उसके प्रयोग में विकास अथवा उन्नति अवश्य हुई।
सद्गुणों की वृद्धि करना, अध्ययन, दान, तीर्थाटन आदि भिन्न-भिन्न जातियों, देशों व समयों में भिन्न-भिन्न होता है। यह सब धर्म के अंग होते हुये भी परिवर्तनशील हैं। इनके उद्देश्य से कार्य करने वाले मनुष्यों की कार्य प्रणाली पृथक्-पृथक् होती है। इसी प्रकार जन समुदायों अथवा सम्प्रदायों की धार्मिक शैलियाँ भिन्न हो सकती हैं। और एक ही जाति में महापुरुष नई-नई शैलियों का आविष्कार करते हैं। इसी प्रकार धार्मिक संस्कार पृथक-पृथक और परिवर्तनशील होते हैं तो सभी जातियाँ, सभी देशों, सभी समयों में। मनुष्य जब प्राकृतिक शक्तियों को अपने से बहुत अधिक प्रबल देख कर उन में देवताओं की कल्पना करता है, तो उन शक्तियों को प्रसन्न करने के लिये पूजा करना, उन को भेंट चढ़ाना, बलिदान करना, आवाहन करना स्वाभाविक ही है, जिससे वे प्रसन्न होकर मनुष्यों का अनहित न करें, और उसके लिये सुखकारी सिद्ध हों। यही धार्मिक संस्कारों का मूल है। पर देश-काल के अनुसार हमारी प्रणाली बदलती रही है और आगे भी बदलती रहेगी। उदाहरणार्थ किसी विधि में किसी ठण्डे देश में ऊनी वस्त्र पहिने जाते हैं और फिर यदि वे ही लोग किसी गर्म देश में आ बसें तो ऊनी वस्त्रों के स्थान में सूती वस्त्र पहनने लगेंगे अथवा यदि किसी समय किसी पूजा में मिट्टी की साधारण सी मूर्ति बनाकर रखने की प्रथा हो और फिर वे मूर्तियाँ सुन्दर पत्थर की बनने लगें तो मिट्टी की मूर्ति की जगह पत्थर की मूर्तियों का प्रचलन हो जायगा। लगभग पचास साठ वर्ष पहले ही महाराष्ट्र में गणपति पूजन के अवसर पर शास्त्रानुकूल वेषभूषा की मूर्तियाँ बनती थीं, पर अब हमने देखा कि वे मूर्तियां अंग्रेजी, फौजी, अफसर के भेष में, राष्ट्रीय नेताओं के भेष में, फैशनेबल जैंटिलमैनों के भेष में बनाई जाने लगी हैं।
धार्मिक संस्कारों का मूल चाहे कुछ हो परन्तु उनका प्रभाव विशेष रूप से पड़ता ही है। उस अवसर का महत्व संस्कार करने वाले के मन पर अंकित हो जाता है। संस्कार के साथ जिस क्रिया को मनुष्य करता है उसे बिना सोचे समझे, हँसी-खेल के समान नहीं करता वरन् उसकी समानता उसके हृदय पर जम जाती है। इस प्रकार अनेक धार्मिक संस्कार धार्मिक भावों अथवा सद्गुणों की बढ़ती करने वाले होते हैं।
पर जैसे-जैसे समय बीतता जाता है परिवर्तित परिस्थितियों के प्रभाव से धार्मिक संस्कारों तथा अन्य धार्मिक कर्मकाँडों की विधि कोरा दिखावा या आडम्बर मात्र रह जाती है। जिन सद्गुणों को उनके द्वारा बढ़ाना अभीष्ट होता है उसके विपरीत उनके कारण दुर्गुणों की वृद्धि होने लगती है। लोग उसके सार को भूल कर बाहरी स्वरूप पर ही जोर देने लगते हैं। कभी-कभी वह विधि इतनी पेचीदा और लम्बी चौड़ी होती है कि साधारण मनुष्य न तो उसे समझ सकता है न याद रख सकता है। ऐसी अवस्था में पंडितों या पुजारियों की एक श्रेणी बन जाती है जो उसे कराने के अधिकारी समझे जाते हैं। ये पुजारी जब अपने अधिकार को दृढ़ता के साथ स्थापित देखते हैं तो वे भी उस विधि के पूर्ण अध्ययन की चिंता नहीं करते, वरन् उसके द्वारा अधिक से अधिक धन प्राप्त करने को ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं। परिणाम यह होता है जो धार्मिक कृत्य मानव-कल्याण के लिये प्रचलित किये गये थे वे ही फिर स्वार्थ-साधन, अभिमान, द्वेष आदि के उत्पत्ति करने वाले बन जाते हैं। संसार में धर्म के नाम पर जो अनर्थ हुये हैं, उसका मूल कारण यही हैं।
ऐसी अवस्था देखकर किसी महापुरुष का हृदय सहानुभूति और करुणा से द्रवित हो जाता है। वह ऐसे पुजारियों और ऐसे आडम्बर का विरोध करने लगता है। जब किसी धार्मिक कृत्य से सद्गुणों के बदले दुर्गुण बढ़ने लगे तो वह त्याज्य हो जाता है। इसलिये फिर से सार-धर्म की आवश्यकता होती है। कभी-कभी पुजारियों का गुरुडम मिटाने को धार्मिक कृत्यों की पेचीदा विधियों को दूर करके साधारण व्यक्तियों के समझने और आचरण कर सकने योग्य रास्ता बताना आवश्यक होता है। इस प्रकार धार्मिक व्यवस्था में महान परिवर्तन हो जाता है । परन्तु धर्म का सार रूप, सद्गुणों का आचरण अब भी वैसा ही महत्वपूर्ण रहता है जैसा कि पहले था। अथवा यह कहना चाहिये कि वह पहले से भी अधिक आवश्यक हो जाता है, क्योंकि उसी की रक्षा के लिये बाहरी विधियों और क्रियाओं में परिवर्तन किया जाता है। इस प्रकार नित्य धर्म की रक्षा के लिये ही महापुरुषों द्वारा धर्म के ऊपरी रूप में परिवर्तन किया जाता है जिसे सामान्य व्यक्ति नवीन धर्म अथवा सम्प्रदाय की स्थापना का रूप दे देते हैं।
महूडिया (नीमच) में चैत्रपदी अमावस्या को गायत्री यज्ञ हुआ जिसमें काफी ग्रामवासी जनता ने भाग लिया। संगीत का कार्यक्रम बड़ा मनोरंजक और प्रभावशाली हुआ। यहाँ के गायत्री उपासक सोहन लाल जी ने माता से प्रार्थना की। जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई।
- नन्द लाल शर्मा
हथगाँव (फतेहपुर) में सवा दो लाख जप और आहुतियों का यज्ञ किया गया।
- जगमोहन लाल
मोर्वी (सौराष्ट्र) में गायत्री महायज्ञ सानंदपूर्ण हुआ। जिसमें पौने दो करोड़ जप किया गया। साठ व्यक्तियों ने तीन दिन तक हवन किया और 1500 ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। महाराज लखधीरजी और राजमातुश्री भी उपस्थित थे, उन्होंने यज्ञ के लिये ढाई हजार रु. सहायतार्थ दिया। उन्हीं के हाथों से दक्षिणा दिलाई गई। आचार्य पद पर श्री रमाकान्त कालिदास शुक्ल थे।
-श्री हेमन्त कुमार शंकर लाल दवे
गरोठ (मध्य प्रदेश)में गायत्री महायज्ञ सकुशल समाप्त हो गया । पाँच कुण्डों में पचास उपासकों ने सवालाख आहुतियाँ दीं। 15 सदस्यों को यज्ञोपवीत दिये गये। यज्ञ में सभी वर्ग के सज्जनों का सहयोग रहा और लोग गायत्री परिवार के सदस्य बने। स्वामी प्रेमानंदजी तथा नत्थासिंह जी के उपदेश और भजनों से जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा।
- हरीराम वैद
भगवानपुर (शाहजहाँपुर) में ता. 1 मार्च से 15 मार्च तक स्वामी योगानन्द जी के उपदेश और भाषण होते रहे। 16 मार्च को एक हजार आहुतियों का हवन हुआ। 31 मार्च को सनेता सफीपुर में 900 आहुतियों का हवन और 461 मंत्र लेखन हुआ। भविष्य के लिये यहाँ 9 कुण्डों में सवालाख आहुतियों के यज्ञ की तैयारी हो रही है। अखत्यापुर में नवरात्रि में पाँच सदस्यों ने एक लाख बीस हजार जप किया और हर रोज हवन हुआ तथा अन्तिम दिन 2400 आहुतियों का हवन किया गया।
- रघुराज सिंह सोलंकी
बह्यनी बाजार (बिलासपुर)में गायत्री शाखा स्थापित हो गई है। जिसके सदस्य पशुबलि निषेध के लिये जोरदार आँदोलन कर रहे हैं। भटगाँव से देवी के मंदिर में होने वाली पशु हिंसा को रोकने के लिये एक नोटिस भी वितरण किया गया है।
- मोहनलाल गुप्ता
जमशेदपुर में 24 लाख जप और 24 घण्टे तक आहुतियों का यज्ञ हुआ। गायत्री चालीसा और ज्ञान अंक वितरण किये गये। माता की कृपा से किसी तरह की अशान्ति नहीं हुई ।
-ऋषेश्वरना
पिलखना (इटावा)की शाखा ने प्रति मास एक यज्ञ करने का निश्चय किया है । होली पर बड़े उत्साह से लाउडस्पीकर द्वारा मन्त्रोच्चारण करके यज्ञ अनुष्ठान किया गया।
- कृष्णलाल द्विवेदी
मऊरानीपुर (झाँसी) में यज्ञ में प्रति-दिन 25 ब्राह्मणों द्वारा 2500 गायत्री मन्त्र की आहुतियाँ 11 दिन तक दी गई।
- सालिगराम पाण्डे
जुल्मी शाखा (कोटा)में हवन का कार्यक्रम 1 सप्ताह से बन्द हो गया था । यह देखकर सब को प्रेरणा की गई कि गायत्री का साप्ताहिक हवन बन्द नहीं होना चाहिये। इसके फल से सब सदस्यों ने जिन में दो तीन महिलाएँ भी थी, इकट्ठा होकर हवन किया और हवन के नियम को अब कभी खंडित न करने का निश्चय किया। गाँव बदरखान (चेचट) में न शाखा खोली नई है। खेरुद्धा, अलोद और राजपुरा गाँवों में भी प्रचार किया गया और वहाँ 5-5 कुण्डों के यज्ञों की व्यवस्था हो रही है ।
- रामकिशन शर्मा
खोरासा (सौराष्ट्र) के गायत्री-केन्द्र में माताजी की बहुत बड़ी तस्वीर बनवाकर रखी गई है। 150 धार्मिक पुस्तकें भी पुस्तकालय के लिए एकत्रित की गई हैं। सवालाख गायत्री मंत्र लिखा गया है ‘राम नाम’ भी 8 लाख लिखा है।
- नर्मदाशंकर एम. जोषी
गरोठ (म.प्र.) में श्री कमला प्रसाद जी मास्टर के यहाँ विश्वशाँति हेतु गायत्री यज्ञ हुआ जिसमें ट्रेनिंग स्कूल के मास्टरों और विद्यार्थियों ने भी श्रद्धापूर्वक भाग लिया तथा कन्हैया लाल गुप्ता मास्टर का यज्ञोपवीत संस्कार किया गया ।
- हरी राम वैद
मालेगाँव सिटी (नासिक) में तपोमूर्ति पूज्य गायत्री स्वरूप जी का आगमन स्वर्गाश्रम (हरिद्वार)से हुआ और शाखा-सभा में कई दिन तक उनके सारगर्भित उपदेश होते रहे।
- जगन्नाथ बद्रीनारायण भाँवर
व्यायर में प्रत्येक रविवार को विभिन्न स्थानों पर यज्ञ किये जाते हैं। यह क्रम 1 वर्ष तक चलता रहेगा। सेठ मुकुन्ददास राठी ने गायत्री पुस्तकालय के लिए सम्पूर्ण गायत्री साहित्य के 2 सेट मँगाकर दिए हैं। सेठ दुर्गा प्रसाद जी ने हजार चालीसा बाँटे हैं।
- मोहनलाल शर्मा
ग्राम कुल्हार (विदिशा)झाँसी में गायत्री-यज्ञ बड़े समारोह से हुआ। जिसमें झाँसी के पं. शिव कुमार शास्त्री के प्रभावशाली उपदेश हुए । यज्ञ श्री लक्ष्मण प्रसाद जी ने कराया था जिसमें हजारों ग्राम-वासियों ने भाग लिया। इसमें तीन सौ रुपये व्यय किया गया।
- बालकृष्ण अग्रवाल
कसेरकला (बुलन्दशहर) क्षेत्र में स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी ने गायत्री-प्रचार करके बुलन्दशहर, अनुपशहर, चरौरा, कसेरकलाँ और संभल (मुरादाबाद) में शाखाओं की स्थापना कराई ।
- एक सदस्य
अमलार (शुजालपुर) में श्री प्यारेलाल वकील के यहाँ यज्ञ हुआ । इसमें गायत्री सदस्य श्री नारायण प्रसाद शर्मा ने बहुत सहयोग दिया। हनुमान जयंती पर खेड़पती हनुमान जी के स्थान पर मास्टर लक्ष्मी नारायण जी आदि के सहयोग से हवन किया गया ।
- राधाकिशन तिवारी
बकानी (भालावाड़) गुरुकुल में ता.12 से 14 अप्रैल तक गायत्री महायज्ञ श्री स्वामी रामेश्वर आश्रम जी महाराज की अध्यक्षता में हुआ। अ.मा. गायत्री परिवार के कुलपति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, मथुरा ने भी इस समारोह में पधारने की कृपा की थी। अन्य विद्वान और उपदेशक भी पधारे थे। इस समारोह का आस-पास की जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा और गायत्री के प्रचार में आशातीत वृद्धि हुई।
- भँवर लाल शर्मा
झाँसी में आगामी 16, 18, 19 मई को सवालाख आहुति और 24 लाख जप का यज्ञ करने का आयोजन किया गया है। इस अवसर पर ‘अ.मा. बुन्देलखंड गायत्री परिवार सम्मेलन करने का भी आयोजन है ।
- बालकृष्ण अग्रवाल
बीना (सागर) में 24 लाख जप तथा 24 हजार आहुतियों के यज्ञ का अनुष्ठान सानन्द पूर्ण हो गया । यज्ञ का स्थान अनेक धर्म प्रेमियों ने तन, मन, धन से सहयोग किया। रात्रि में रामलीला होती रही। पूर्णाहुति के बाद 400 व्यक्तियों का ब्रह्मभोज हुआ।
- शाजिगराम दुबे
मनसूरपुर (मुजफ्फरनगर) में एक गायत्री उपासक के यहाँ सवालाख मंत्र व हवन का अनुष्ठान विधिपूर्वक किया गया। जिसमें गायत्री परिवार के 12 सदस्यों ने भाग लिया।
-बनारसी दत्त शर्मा
तनोड़िया (शाजापुर)में गायत्री आश्रम का आठवाँ सामूहिक हवन डॉक्टर एल.पी.आनन्द के यहाँ हुआ जिसमें 3250 आहुतियाँ दी गई। इस यज्ञ में संस्कृत के विद्वान और गायत्री के अनन्य प्रेमी मद्रास निवासी श्री अनन्तराम शास्त्री ने भी भाग लिया था।
- मुन्नालाल ‘कर्मयोगी’
नरसिंहपुर (म.प्र.)में श्री हरिप्रसाद जी के स्थान पर सवालाख जप व 24 हजार आहुति, सवा हजार गायत्री चालीसा, रामायण, पुराण आदि के परायण का आयोजन किया गया है । यह यज्ञ 28, 29 अप्रैल को होगा।
- मन्त्री शाखा
घोड़ाघाट ग्राम(बहादुरज्ज,पुर्नियाँ)में सामूहिक गायत्री हवन किया गया। साथ में गीतायज्ञ, मानस-यज्ञ, अष्ठयाम संकीर्तन का भी आयोजन था । यह यज्ञ विश्व कल्याणार्थ किया गया था। स्थानों पर गायत्री-परिवार की शाखायें स्थापित करने के लिए 45 प्रतिज्ञा-पत्र दिये गये। श्री चतुरानन्द ने इस यज्ञ में आये 500 सज्जनों के भोजन का प्रबन्ध अपने ऊपर लिया और यज्ञ की सामग्री भी दी । इस तरह का सफल यज्ञ इस इलाके में बहुत समय से नहीं हुआ था।
- खुशीनाथ
आरंग (रायपुर) में गायत्री शाखा की ओर से आपके ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के संकल्प के अनुसार एक वर्ष तक नित्य 24 हजार जप का आयोजन किया गया है।
- विद्याप्रसाद मिश्रा
पेटलावद (स्टेशन वामनिया म.प्र.) में विश्व कल्याणार्थ नीलकंठेश्वर महादेव के मंदिर पर गायत्री महायज्ञ का आयोजन 4 मई से 9 तक के लिये किया गया है। साथ में रुद्रयज्ञ, विद्वानों के भाषण, हरिकथा, ब्राह्मण भोजन, आदि भी होंगे।
- सोमेश्वर चतुर्वेदी
गोविन्दपुर (भागलपुर) में प. द्वारका प्रसाद गोस्वामी के यहाँ यज्ञ हुआ। उस अवसर पर आगन्तुक सज्जनों में प्रचार करने बकिया, कुमादपुर, नयाटोला, पकरा, परभेली के 28 सदस्य बने और चार शाखायें स्थापित हुईं।
- मोती लाल गोस्वामी
भगौनपुर (फतेहपुर)में सदस्यों द्वारा दो कुण्डों में सामूहिक हवन हुआ। 4 सदस्यों ने यज्ञोपवीत धारण किया। सठिगवाँ, पारादान, बिजौली पतारी, सैठी, बबुरिहापुर आदि स्थानों की शाखाओं के सदस्य भी पधारे थे।
- मोहन लाल शर्मा
तूँगा (जयपुर)में जो वेस्टर्न रेलवे बाँदीकुई जंक्शन के पास है , 24 लाख जप व 24 सौ आहुतियों का यज्ञ 5 हवन कुणडों में 100 होताओं द्वारा सम्पन्न होगा। इसकी तिथियाँ गंगादशहरा से आषाढ़ कृष्णपक्ष 5 तक रखी गई हैं। तूँगा के पास के स्टेशन बक्सी है।
- कन्हैयालाल मिश्र
झाँसी की गायत्री शाखा की ओर से श्री गिरिजा सहायजी खरे प्रचारार्थ आये। उनकी प्रेरणा से जतारा में पूर्णमासी के दिन श्री रघुवीर सहाय श्रीवास्तव अ.डि. इन्सपेक्टर आफ स्कूल्स के यहाँ यज्ञ हुआ।
अन्त में यज्ञ और गायत्री के महत्व पर प्रकाश डाला गया। टीकमगढ़ में ला. मनोहर लाल श्रीवास्तव के मकान पर यज्ञ हुआ। नये सदस्य भी बनाये गये। वानपुर में श्री प्रभुदयाल जी श्रीवास्तव के यहाँ यज्ञ किया गया। शाखा के पुराने सदस्यों से ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने के विषय में अनुरोध किया गया।
- बैजनाथ सोनकिया
खेर्डा (खामगाँव) में हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में 6500 आहुतियों का यज्ञ किया गया। यज्ञशाला में 8 कुण्ड थे और उसकी सजावट देखने योग्य थी, श्री मुरलीधर पाटील का यज्ञ-महिमा पर भाषण हुआ। श्री किसन सखाराम जी के हाथ से पूर्णाहुति कराई गई। अन्त 500 गायत्री प्रेमियों का ब्रह्मभोज हुआ। जिसमें आस-पास के दस गाँवों के व्यक्ति हुए।
- किसन सखाराम परलीका
गुदरावन (राजस्थान)में गायत्री महायज्ञ कई दिन तक सुचारु रूप से चलता रहा। स्वामी प्रेमानंद जी के उपदेश और कुँवर नत्थासिंह जी के भजन का बड़ा प्रभाव पड़ा। उत्तराखण्ड निवासी तपसी रामलखन दास जी भी पूर्णाहुति के दिन आ गये और उनका सत्संग भी कल्याणकारी था। उस दिन तीन हजार से अधिक व्यक्ति उपस्थित थे। रामलीला में नित्य प्रति वृद्धि होती थी। सर्व श्री दामोदर जी, जयदेव जी, रामनारायण जी, मथुरालाल जी व भेंरुलाल जी आदि का परिश्रम सराहनीय रहा।
- बाबूलाल शर्मा
गायत्री तपोभूमि में गतमास से बिजनौर के आत्मदानी वकील श्री अशर्फीलाल जी के स्थायी रूप से निवास करने के लिए आ जाने और यहाँ की व्यवस्था अपने हाथ में ले लेने से यहाँ कई महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं। आचार्य जी अनेक कार्यों में व्यस्त रहने के कारण तपोभूमि की व्यवस्था पर पूरी तरह ध्यान न दे पा रहे थे इस कारण यहाँ सुव्यवस्था में जो कमी रहती थी वह अब धीरे-धीरे दूर होती चली जा रही है। आशा है कुछ ही दिनों में तपोभूमि आदर्शों की दृष्टि से ही नहीं व्यवस्था की दृष्टि से भी एक आदर्श आश्रम बनेगी ।
प्रसन्नता की बात है कि देश भर में इस बार नवरात्रि में गायत्री उपासना का आयोजन बड़े विशाल रूप में हुआ। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के निर्धारित जप,पाठ लेखन हवन में अभी कमी है। उपासकों को अभी कुछ और अधिक परिश्रम करना पड़ेगा तभी निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति होगी।
तपोभूमि में तीन मेजिक लालटेन मशीनें रंगीन चित्रपट दिखाकर जनता में साँस्कृतिक प्रचार करने के लिए मंगा ली गई हैं। अब इन्हें दिखाने के लिए प्रचारक शिक्षित किये जा रहे हैं। जो देश भर में समय-समय पर होते रहने वाले यज्ञ आयोजनों में, जा-जा कर इन मशीनों की सहायता से धर्म प्रचार करते रहें, ऐसे सुयोग्य धर्म प्रचारकों की तपोभूमि में अभी बहुत कमी है। धर्म प्रचार के लिए अपने परिवार के कुछ ऐसे उत्साही सज्जन देश भर में भ्रमण करते रहने को कटिबद्ध हो जावें तो निस्संदेह एक बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है।
धर्म सेवा शिक्षण-शिविर
गतमास गायत्री परिवार की शाखाओं से अनुरोध किया गया था कि अपने-अपने यहाँ से कुछ ऐसे व्यक्ति यहाँ शिक्षण के लिए भेजें जो उनके शाखा संचालन कार्य में सहायक सिद्ध हो सकें। इस प्रकार की धर्म सेवा का शिक्षण शिविर ता. 14 मई से 14 जून तक एक महीने चलेगा। जिन छात्रों को स्वीकृति दी जा चुकी है वे 13 की शाम तक आ जावें ताकि ता. 14 से शिक्षण आरम्भ किया जा सके।
अ. भा. गायत्री परिवार सम्मेलन
इस वर्ष गायत्री जयन्ती के अवसर पर अ. मा. गायत्री परिवार सम्मेलन बुलाने का निश्चय किया गया है। इसकी तिथियाँ ज्येष्ठ सुदी 10 (गायत्री जयन्ती) से लेकर ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा तक तदनुसार 7,8,9,10,11,12 जून होंगी।
अब तक नवरात्रियों में गायत्री परिवार के सदस्य मथुरा आया करते थे और अनुष्ठान, हवन, तीर्थ, यात्रा, प्रवचन आदि का लाभ उठाते थे। अब यह नीति निर्धारित कर दी गई कि नवरात्रियों का आयोजन सभी उपासक अपने-अपने यहाँ करें और वर्ष में एक बार परिवार के प्रमुख सदस्य एकत्रित होकर परस्पर मिल-जुल लिया करें। सम्मेलन के उद्देश्य यह हैं :-
गायत्री परिवार के कार्यकर्त्ताओं का एक दूसरे से अधिक परिचय एवं परस्पर घनिष्ठ सम्बन्धों की स्थापना। (2)अपनी उपासना सम्बन्धी प्रगति, शंका, कठिनाई एवं आगामी कदम के सम्बन्ध में परामर्श (3)इस वर्ष के अत्यन्त महत्वपूर्ण ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान पर विचार-विनिमय। (4) गायत्री परिवार की शाखा संस्थाओं की प्रगति एवं भावी योजनाओं का निर्धारण। (5) साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के लिए आगामी वर्ष की रूप रेखा। (6) परिजनों के व्यावहारिक जीवन में उपस्थित समस्याओं पर आवश्यक मार्ग-दर्शन। (7) विश्व की मानव जाति की, वर्तमान स्थिति को समझना और उसे सुलझाने का मार्ग ढूँढ़ना।
इन पंक्तियों को ही निमन्त्रण पत्र मानकर गायत्री प्रेमी इस अवसर पर पधारने की तैयारी करें।
अब हो जाओ तैयार साथियो! देर न हो,
दुश्मन ने फिर बारूदी बिगुल बजाया है,
बेमौसम फिर इस नये चमन में फूलों पर,
सर कफ़न बाँधने वाला मौसम आया है।
फिर बनने वाला है जग मुरदों का पड़ाव,
फिर बिकने वाला है लोहू बाजारों में,
करने वाली है मौत मरघटों का सिगार,
सोने वाली है फिर बहार पतझरों में।
फिर सूरजमुखी सुबह के आनन की लाली,
काली होने वाली है धूम घटाओं से,
भरने वाली है कब्रों-कफ़न-चिताओं से।
जिनके माथे की बेदी मन की हँसी-खुशी,
जिनके कर की मेंहदी घर की उजियाली है,
जिनके पग की पायल आँगन की चहल-पहल,
जिनकी पीली चुनरी होली-दीवाली है।
अपनी उन शोभा सीता, राधा, लक्ष्मी के,
फिर मुझे घूँघटों के खुल जाने का डर है,
अपनी उन हिरनी सी कन्याओं, बहनों पर,
खूँखार भेड़ियों के चढ़ आने का डर है।
सारी थकान की दवा कि जिनकी किलकारी,
सब चिन्ताओं का हल जिनका चंचल पन है,
सारी साधों का सुख जिनका तुतलाता मुख,
सारे बन्धन की मुक्ति जिनकी चितवन है।
अपने आँगन के उन शैतान चिरागों के,
हाथों का दूध खिलौना छिनने वाला है,
अपने दरवाजे के उन सुन्दर फूलों से,
दुश्मन भालों की माला बुनने वाला है।
जिन खेतों में बैठा मुस्काता है भविष्य,
जिन खलिहानों में लिखी जा रही युग गीता,
जिस अमराई में भूल रहा इतिहास नया,
जिन बागों की हर ऋतु रानी है परिणीता।
उन सब पर एक बार फिर असमय अनजाने,
छाने वाली है स्याह-नकाबी खामोशी,
उन सब पर एक बार फिर भरी दुपहरी में,
आने वाली है जहर बुझाई बेहोशी।
उन सब पर बुरी निगाह हुई दुश्मन की,
उन सब पर आग बिछाने का उसका मन,
रह जाये मानवता का नाम न शेष कहीं,
ऐसा सैलाब बुलाने का उसका मन है।
लेकिन घबराने की बात नहीं साथी,
एशिया धधकते हुये पहाड़ों का घर है।
है मद चीन के हाथ उधर हँसिया कुदाल,
इस ओर हिमालय की मुट्ठी में दिनकर है।
यह हँसते खेत रहें मुस्काते बाग रहें,
यह तानें रहें झूलती मेघ-मल्हारों की,
यह सुबह रचाये रहे महावर इसी तरह,
यह रात सजे यूँ ही बारात सितारों की।
ऐसे ही ढोलक बजे, मँजीरा झंकरे,
ऐसे ही हँसें झुनझुने बाजें पैजनियाँ,
ऐसे ही झुमके झुमें, चूमें बाल गाल,
ऐसे ही सोहरें, लोरियाँ, रस बतियाँ।
ऐसी ही बदली छाये, कजली अकुलाने,
ऐसे ही बिरहा-बोल सुनाये साँवरियाँ,
ऐसी ही होली जले दिवाली मुस्काने,
ऐसे ही खिले फले हरियाये हर बगियाँ।
ऐसे ही चूल्हे जलें राख यह रहे गरम,
ऐसे ही भोग लगाते रहें महावीरा,
ऐसे ही उबले दाल, बटोई उफनाये,
ऐसे ही चक्की पर गाये घर की मीरा।
इसलिये शपथ है तुम्हें तुम्हारे सर
जिस दिवस एशिया पर कोई बादल छाया,
वह शीश तुम्हारा ही हो जो सबसे पहले,
दुश्मन के हाथों की तलवार मोड़ आय।
*समाप्त*
(श्री नीरज)