जियो और जीने दो

(श्री राममिलाप त्रिपाठी शास्त्री)


जियो और जीने दो (Kavita)

मानवता है यही जियो तुम स्वयं- दूसरों को जीवन दो!

आज मनुज के अन्तराल में पड़ी क्षोभ की छाया,

काम क्रोध संयुक्त मोह का संग अहर्निश आया,

द्वेष दम्भ की नव विडम्बना मानव की नित सहचर है-

कण-कण में प्रतिभासित होती प्रकृति नटी की माया,

सावधान हो, बढ़ो, कंटकाकीर्ण मार्ग में बिछा सुमन दो। मानवता है यही...

रहा नहीं अस्तित्व किसी का इस धरती के तल में,

परिवर्तन होता ही आया है जग के अञ्जल में,

अगणित बल-वैभव-सुकृीर्ति-सम्मान धरा पर छाये-

किन्तु सभी फंस रहे आज हैं स्वयं स्वार्थ दल-दल में,

उस अतीत के जीवन में भी अपने जीवन के मृदु कण दो! मानवता है यही...

आज अनुज जा रहा रसातल को,

गिर रहा गगन से, किंचित लाभ नहीं लेता है इस अमूल्य जीवन से,

केवल अमित कामनाएं ही करता रहता मन से,

किन्तु नहीं करता समुचित पुरुषार्थ आलसी तन से,

उठो, आज मुरझाये मानस में तुम-नव सिंचन दो! मानवता है यही...


भारतीय दर्शन और उसकी एकात्मकता

(सर्वपल्ली राधाकृष्णन)

भारतीय दर्शन-शास्त्र को एक विशेष गौरव प्राप्त है और वह यह है कि उसमें सदा से इस संसार से परे एक सूक्ष्म संसार (सच्चे आत्म-लोक) की कल्पना जागृत रही है। जीवन के रहस्य को समझने और पशुता से ऊपर उठकर नैतिक तथा आध्यात्मिक शिखर पर चढ़ने का मनुष्य जिस प्रकार निरन्तर प्रयत्न करता रहा है, उसका सबसे सुन्दर उदाहरण हमको भारतवर्ष में ही मिलता है। इस देश में चार हजार अथवा छः हजार वर्ष से होते आये इस प्रयास का निरीक्षण भली प्रकार किया जा सकता है।

एक समय था जबकि सीधा सादा मनुष्य यह विश्वास करता था कि सूर्य तथा आकाश में बैठे अन्य देवगण संसार का शासन करते हैं और मनुष्यों के कर्मों को देखते रहते हैं। इसके बाद यह विचार उत्पन्न हुआ कि ये सब देवता एक ही ब्रह्म के नाना रूप हैं और यज्ञ के द्वारा उनसे अपनी मनोकामनायें पूर्ण करायी जा सकती हैं। आगे चलकर वे इस तथ्य पर पहुँचे कि निर्विकार तथा नित्य शुद्ध परमात्मा और मनुष्य के हृदय में स्थित जीवात्मा एक ही है। इसके बाद जड़वाद नास्तिक-दर्शन, भाग्यवाद आदि का प्रादुर्भाव हुआ और इसके बाद जैन तथा बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार हुआ, जिनमें बतलाया गया कि चाहे ईश्वर की सत्ता को मानो या न मानो, केवल मनसा-वाचा-कर्मणा शुद्ध रह कर मोक्ष लाभ किया जा सकता है। श्रीमद्भागवत गीता में बतलाया है कि सब प्रकार का ज्ञान तथा पूर्ण नैतिकता ब्रह्म का लक्षण है। इसके बाद न्याय, वैशेषिक, साम्य, योग, मीमाँसा आदि दर्शनकारों और शंकर, रामानुज, माधव, निम्बार्क, वल्लभ आदि-आदि आचार्यों ने सृष्टि रचना तथा परमात्मा और जीवात्मा के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार से विवेचनायें की। ये सब मनुष्य के दार्शनिक विचारों के विकास की उत्कृष्ट सामग्री है। एक मत के बाद दूसरा मत-एक सम्प्रदाय के बाद दूसरा सम्प्रदाय स्वाभाविक रूप से आता गया। भारतीय जीवन निरन्तर गतिशील (चलता हुआ) रहा है। जैसे-जैसे उसका विकास होता गया वह परिस्थितियों के अनुसार बराबर बदलता गया। आरम्भ में इस क्षेत्र में जो कुछ विचार किया गया वह भारतवासियों का सर्वथा मौलिक प्रयास था, क्योंकि उसके पहले संसार के किसी अन्य देश वालों ने इन समस्याओं पर विचार ही नहीं किया था। इससे शुरू में भारतीय विचारकों को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जो आज हमारे सामने नहीं हैं।

संसार के अन्य दर्शनों की तरह भारतीय दर्शन की आलोचना करने में हमको मालूम होता है कि मनुष्य ने विश्व की रहस्यमयता और अनन्तता का ज्ञान प्राप्त करने के लिए कितना प्रयत्न किया है। बहुसंख्यक तत्वदर्शी पण्डितों ने मानव-ज्ञान- मन्दिर के थोड़े या बहुत भाग का निर्माण किया है। यह सत्य है कि इतनी दार्शनिक विवेचना होने पर भी अपने लक्ष्य से हम अभी भी उतने ही दूर हैं जितने युगों पहले थे। फिर भी दार्शनिक मीमाँसा को व्यर्थ नहीं कहा जा सकता। उसकी सहायता से हम अपने बंधनों को महसूस कर सकते हैं, बाँधने वाली जंजीरों की झनकार सुन सकते हैं। उसमें हमें मनुष्य की दुर्बलताओं का बड़ा स्पष्ट ज्ञान हो जाता है और इस नश्वर जीवन की अपूर्णता हर तरह से स्पष्ट हो जाती है। फिर अगर हम संसार के विषय में उतना सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके जितना कि हम चाहते हैं तो इसमें भेद अथवा आश्चर्य की बात ही क्या है? दार्शनिक व्यक्ति ज्ञान का प्रेमी होता है, उसका स्वामी नहीं होता। जब हम यात्रा करने को निकलते हैं तो यात्रा के अन्त का विशेष महत्व नहीं है, यात्रा ही महत्व की चीज है। भ्रमण करने में जो आनन्द है वह सब समाप्त हो जाने पर कहाँ मिल सकता है?

अब आज यह जिज्ञासा कर सकते हैं कि क्या इतिहास के ज्ञान से यह मालूम हो सकता है कि हम विकास-उन्नति की ओर जा रहे हैं अथवा इसके विपरीत पीछे की ओर लौट रहे हैं। इस दृष्टि से भारतवर्ष तो विकास में ही विश्वास रखता है, क्योंकि जैसे पीछे बतलाया जा चुका है- हमारे भिन्न-भिन्न युगों में एक नैसर्गिक सम्बन्ध पाया जाता है। इन युगों में जो एक सूत्र चला आ रहा है, वह कभी टूटा नहीं है। जो महान क्राँतियाँ भूतकाल का नाश करने वाली जान पड़ती हैं, वे भी उसमें फिर से नये प्राणों का संचार करती हैं। जिन्हें हम अवनति के युग कहते हैं, ये वास्तव में पुराने जीवन से नवीन जीवन की ओर आने के परिवर्तन-काल हैं। अवनति तथा उन्नति की दोनों धारायें एक ही में मिल जाती हैं। कभी तो उन्नति की ओर ले जाने वाली शक्तियाँ बड़े वेग के साथ आगे बढ़ती नजर आती हैं, कभी हमारी गति अनिश्चित दिशा में रुकी जान पड़ती है और कभी परावर्तन (पीछे को लौटने वाली) शक्तियाँ विकास की शक्तियों को पराजित करके पीछे की ओर जाती दिखाई पड़ती हैं। पर सब मिलाकर देखने से प्रतीत होता है कि गति आगे की ओर ही हुई है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस तरीके से काम होने में बहुत सा अंश बर्बाद हो जाता है। पर भूतकाल का इतिहास जिस मार्ग पर चला है, अब उस पर शोक करने या बुरा-भला कहने से बढ़कर मूर्खता की बात और नहीं हो सकती। अधिक महत्व की वस्तु तो भविष्य है। हम अपने पूर्वजों से ज्यादा दूर तक देख सकते हैं, क्योंकि हम उनके कन्धों पर चढ़ सकते हैं। पिछले जमाने में जो श्रेष्ठ नींव डाल दी गयी है उसी से हमें संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, वरन् हमें तो उस पर एक सुन्दर महल खड़ा करना चाहिए।

परम्परा की भक्ति और सत्य-प्रेम भारतीय जिनके अब तब के प्रयत्नों में निरन्तर पाये जाते हैं। प्रत्येक दार्शनिक यह समझता है कि उसके पूर्वजों के सिद्धान्त ही, वह सामग्री हैं, जिनसे हमारा आध्यात्मिकता का भवन बनाया गया है, उनकी निन्दा अपनी ही संस्कृति की निन्दा है। कोई भी उन्नतिशील जाति जिसकी संस्कृति भरी पूरी है, उस संस्कृति की उपेक्षा कभी नहीं कर सकती, चाहे उस संस्कृति के कुछ अंग प्रशंसनीय न समझे जाएं। ये दार्शनिक बड़े परिश्रम से प्राचीन सम्प्रदाय को समझने और समझाने का प्रयत्न करते हैं, उसमें लाक्षणिकता खोज निकालते हैं, परिवर्तित तथा संशोधित भी करते हैं, क्योंकि वह भावनाओं का केन्द्र बन चुकी है। बाद में होने वाले भारतीय आचार्यों ने सदैव पहले हो चुके दार्शनिक के सिद्धान्तों का समर्थन ही किया है और उनको भिन्न-भिन्न भाषाओं में सत्य का प्रकट करने वाला बताया है। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि विभिन्न मतों के सम्प्रदायों के सिद्धान्त मनमाने और असम्बद्ध ढंग से निश्चित कर लिये गये हैं। इसके बजाय वे उन सबको उसी एक मस्तिष्क से निकले हुए मानते हैं, जिन्होंने इस महान मन्दिर का निर्माण किया है, यद्यपि इस मन्दिर में अनेक दीवारें और अनेक देहलियाँ, अनेक मार्ग और खम्भे हैं।

आज भारतीय दर्शन के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न आ गया है। उसे यह निश्चय करना है कि भारतीय दर्शन को एक सीमित विस्तार, जीवन की परिस्थितियों से अलग, एक छोटा-सा सम्प्रदाय बना दिया जाय अथवा उसे वास्तविक जीवन से सम्पन्न कर दिया जाय जिससे वह अपने सच्चे स्वरूप को प्राप्त कर सके, भारत के प्राचीन आदर्शों में आधुनिक विश्व का समावेश करके उसे मानव-प्रगति का एक महत्वपूर्ण साधन बना दे। लक्षणों से तो यही प्रतीत होता है कि भविष्य में दूसरा मार्ग ही स्वीकृत होगा।


सच्चे धर्म की पहचान

(स्वामी रामतीर्थ)

किसी धर्म को यह समझकर ग्रहण न करो कि यह सबसे प्राचीन है। प्राचीन होना ही सच्चे मार्ग का प्रमाण नहीं है। कभी-कभी प्राचीन घरों को गिरवा देना और प्राचीन कपड़ों को उतार कर फेंक देना पड़ता है। कोई भी नवीन बात यदि बुद्धि गवाही देती हो, तो उतनी ही सुन्दर है, जितना सुन्दर कि गुलाब का एक नया फूल। पर किसी धर्म को इस कारण भी ग्रहण न करो कि यह सबसे नवीन है। नवीन बातें सर्वदा अच्छी नहीं होतीं, क्योंकि उनकी परीक्षा भली प्रकार नहीं हुई है। किसी धर्म को इसलिए स्वीकार न करो कि से बहुत से लोग मानते हैं। बहुत से लोग भूत-प्रेतों के धर्म को मानते हैं, पर कोई समझदार उसके पक्ष में राय नहीं दे सकता। एक समय था जब कि बहुसंख्यक लोग गुलामी (दास-प्रथा) को अच्छा समझते थे, पर इसका यह अर्थ नहीं कि गुलामी एक उत्तम वस्तु है। किसी धर्म को इस कारण स्वीकार न करो कि इसे चुने हुए लोगों ने स्वीकार किया है, किसी समय चुने हुए लोग अंधेरे में ठोकरें खाते हैं। किसी धर्म को इसलिये ग्रहण न करो कि इसे एक बड़े त्यागी, संन्यासी ने जन्म दिया है। बहुत से ऐसे संन्यासी पड़े हैं जिन्होंने त्याग तो सब दिया है किन्तु जानते कुछ नहीं। उन्हें एक प्रकार से पागल समझना चाहिए। किसी धर्म को इस कारण ग्रहण न करो कि इसे राजाओं ने स्वीकार किया है। राजाओं को आत्मिक ज्ञान प्रायः बहुत न्यून होता है। किसी धर्म को इस कारण ग्रहण न करो कि उसे एक उच्च चरित्र वाले मनुष्य ने प्रचलित किया है। उच्चकोटि के मनुष्य प्रायः सच्चाई को मीमाँसा करने में सफल मनोरथ नहीं हुए।

इसलिए किसी भी धर्म या किसी भी बात को उसके गुण देखकर स्वीकार करो। उस पर खूब विचार करो, बार-बार विवेचना करो। किन्तु अपनी स्वतंत्रता बुद्धदेव, ईसामसीह, मोहम्मद अथवा कृष्ण के हाथ न बेचो। अगर बुद्धदेव, ईसामसीह, मुहम्मद साहब ने धर्म के प्रचार में भिन्न-भिन्न साधनों का अवलम्बन किया, तो इसमें कोई अनुचित बात नहीं, क्योंकि उनके जन्म भिन्न-भिन्न समयों और देशों में हुए थे। उन्होंने अपने सम्मुख उपस्थित समस्याओं को हल कर डाला था और अपनी बुद्धि से काम लिया था। इसी में उनका गौरव था। आप लोग वर्तमान समय में रह रहे हैं। सब बातों की जाँच-पड़ताल आपको स्वयं करनी चाहिए। उठिए, स्वतंत्र बनिये और प्रत्येक बात में स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बुद्धि से काम लीजिए। यदि आपके पूर्वजों ने किसी एक विशेष धर्म का ग्रहण किया था, तो उनका ऐसा करना उचित था, परन्तु आपकी मुक्ति आपके हाथ में है, आपके बाप-दादों के हाथ में नहीं है।

सच्चाई किसी की अपनी सम्पत्ति नहीं है। चाहे ईसा, बुद्ध, मुहम्मद, कृष्ण कोई भी क्यों न हो- केवल एक के नाम से सच्चाई का प्रचार करना ठीक नहीं माना जा सकता। सच्चाई में सबका दावा है। यदि किसी ने पहले सूर्य की धूप ली थी तो तुम भी आज ले सकते हो। यदि कोई सोने का मीठा पानी पीता हो तो तुम भी पी सकते हो। तुम्हारा भाव प्रत्येक धर्म के प्रति इसी प्रकार का होना चाहिए। यदि किसी पुरुष को अपने पड़ोसी का धन मिलता हो तो वह उसे लेने में कुछ भी आनाकानी न करेगा। परन्तु यदि वही पड़ोसी हमें बड़े आग्रह के साथ अपना आध्यात्मिक और धार्मिक कोष सौंप रहा हो, तो हम उसे ग्रहण करने की अपेक्षा उसका खण्डन करने को उद्यत हो जायेंगे। क्या यह आश्चर्यजनक बात नहीं है? इसलिए हम जिन धार्मिक सिद्धान्तों को वेदान्त के रूप में उपस्थित करते हैं, उसका उद्देश्य यह नहीं कि आप अपने को किसी खास धर्म का अनुयायी घोषित करें। हमारा तात्पर्य यही है कि आप उन शिक्षाओं पर ध्यान दें, उनका मनन करें। आप उनको अपना ही बना लें और जिस धर्म को अभी तक मानते आये हैं उसी के नाम से पुकारें। हमको नामों की ज्यादा परवाह नहीं है, क्योंकि हम उस धर्म का समर्थन करते हैं जो प्राचीन धर्म-शास्त्र में पाया जाता है और आधुनिक दार्शनिक तथा वैज्ञानिक ग्रन्थों में भी मिलता है। हमारा मतलब उस धर्म से है जो गली-गली में पाया जाता है, जो पत्तियों में लिखा हुआ है, जिसका गुणानुवाद हवा और झरने करते हैं और जो तुम्हारी रग-रग में जोश मार रहा है। हमारा तात्पर्य उसी धर्म से है जो सचमुच आपका है, जो आपके नित्य प्रति के काम से सम्बन्ध रखता है और जिसके अभ्यास के लिए किसी विशेष मन्दिर, मस्जिद या गिरजाघर में जाने की आवश्यकता नहीं। उसी धर्म का मुख्य आशय सच्चाई है। उस पर एक हिन्दू का उतना ही अधिकार है जितना कि एक ईसाई या मुसलमान का।

इस वेदान्त धर्म का पहला उसूल है लगातार काम में जुटे रहना, क्योंकि अध्यवसाय ही सफलता की कुँजी है। आलसी मनुष्य का साँसारिक झगड़ों के कारण जीवन भार हो जाता है। वह जीवित रह ही नहीं सकता, अवश्य मर जायेगा। अनेक लोग कहा करते हैं कि “लगातार परिश्रम और निर्मल, निराकार परमात्मा में क्या सम्बन्ध है? क्या वेदान्त, त्याग और शान्ति का उपदेश देकर हमको आलसी नहीं बनाता?” यह ख्याल बिल्कुल गलत है। लोगों ने त्याग के अर्थ को ही नहीं समझा। यही कारण है कि वे ऐसी-ऐसी बिना सिर-पैर की शंकायें किया करते हैं। वेदान्त के अनुसार तो काम करना ही आराम है। उसका कहना है कि लगातार काम के द्वारा आप अपने को भूल जायें, शरीर और मस्तिष्क को साथ-साथ काम में ऐसे लगा दें कि परिश्रम बिलकुल मालूम ही न पड़े।

दूसरा साधन प्रेम है। अपने आस-पास के सब मनुष्यों और अपने में एक ही ब्रह्म समझकर सबको एक निगाह से देखने का नाम प्रेम है। यह संसार एक शरीर की तरह है और तुम्हारी देह उसका एक अंग है। जीवन को सफल करने के लिए आवश्यक है कि तुम अपने शरीर को संसार के दूसरे लोगों से भिन्न न समझो। इसी से सच्चे आनन्द की प्राप्ति हो सकती है। जब तुम एक दूसरे को भिन्न समझने लगते हो तभी तुम्हारा आनन्द नष्ट हो जाता है।

तीसरी आवश्यक बात आत्म-त्याग है। मेरा क्या होगा, मेरे काम का फल मुझे क्या मिलेगा इस बात की चिन्ता छोटे चित्त के लोग ही किया करते हैं। आप काम कीजिए किन्तु निष्काम रूप से। काम करना अपना जीवनोद्देश्य बनाइये। इस शिक्षा पर चलने से आपको दुखदायी वासनाओं से छुट्टी मिल जायेगी। इस बात की कुछ परवाह न कीजिए कि हमारे काम का क्या फल होगा, लोग प्रशंसा करेंगे या नहीं, वे हमारे काम से प्रसन्न होंगे या कड़ी आलोचना करेंगे। तुम इन बातों का ख्याल न करो और यह समझो कि तुम्हें बेचैन करने वाली वासनाओं से पिण्ड छुड़ाना है काम से नहीं। सब प्रकार के कष्टप्रद मनोविकार और प्रलोभनों से बचने के लिए काम ही सबसे बढ़िया और गुणकारी औषधि है।

आत्म-विश्वास भी एक महत्वपूर्ण साधन है। वेदान्त का सिद्धान्त है कि अपने को तुच्छ और निकम्मा मत समझो। वरन् यह विश्वास करो कि स्वयं परब्रह्म हो, तुम से बड़ी भक्ति है। यह बड़ा उत्तम उपदेश है। तुम जैसा सोचोगे। वैसा ही बनोगे। यदि तुम सोचते हो कि हम परमात्मा हैं तो तुम्हारे परमात्मा होने में कुछ सन्देह नहीं है। यदि तुम सोचते हो कि हम स्वतंत्र हैं तो तुम्हारे स्वतंत्र होने में कोई रुकावट नहीं पड़ सकती।

संसार को अपनी आत्मा से अधिक महत्वपूर्ण न समझो। ....न बनो, न घमण्ड करो। डॉक्टर जिस प्रकार रोगी को देखता है, पर उसकी बीमारी का उसके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता उसी प्रकार संसार के काम-काज को तुम भी देखो, घमण्ड और आसक्ति का प्रभाव अपने ऊपर न पड़ने दो। सब प्रलोभनों को छोड़ कर स्वतंत्रतापूर्वक काम करो। इसकी कुछ परवाह न करो कि तुम्हारे काम को कोई देखता है या नहीं और उसका पुरस्कार तुम्हें मिलेगा या नहीं। ऐसा करने से तुम्हें अवश्य सफलता प्राप्त होगी।


राष्ट्र का विकास बिना आत्म-बलिदान के नहीं हो सकता

(अरविन्द घोष)

आत्म बलिदान का भाव सब राष्ट्रों और सभी व्यक्तियों में साधारण रूप में नहीं पाया जाता। यह भाव बड़ा दुर्लभ और उच्चकोटि का है। वह मनुष्य जाति की नैतिक उन्नति का पुष्पित रूप है अथवा स्वार्थयुक्त पशु-भाव से स्वार्थ रहित देव-भाव की ओर अग्रसर होना है। जिस मनुष्य में आत्म-बलिदान का सामर्थ्य है उसने पशुत्व को अपने से दूर हटा दिया है, चाहे उसमें अन्य प्रकार के पाप कितने भी क्यों न हों। उसमें भावी और उच्चतर मानवता के निर्माण की सामग्री है। जो राष्ट्र राष्ट्रीय तौर पर आत्म-बलिदान करने का सामर्थ्य रखता है उसका भविष्य सुरक्षित है।

आत्म-बलिदान चाहे इच्छा रहित हो और चाहे स्वार्थयुक्त हो वह हमारे जीवन की एक आवश्यक शर्त है। मानवता में इसकी वृद्धि क्रमशः हुई है। प्रथम बलिदान सदा ही स्वार्थमय होते हैं- उनमें अपनी उन्नति के लिए दूसरों का बलिदान समाविष्ट रहता है। एक माता में, जो अपने बच्चे के लिये अपना जीवन बलिदान करने को तैयार है, पाशविक प्रेम की सहज-प्रवृत्ति पहला कदम आगे बढ़ा लेती है। उसी प्रकार एक पुरुष में जो अपनी स्त्री के लिए अपने जीवन को बलि देने को तैयार है, रक्षा की सहज- प्रवृत्ति पहला कदम आगे बढ़ा लेती है। यह प्रवृत्ति इस बात का सबूत है कि आत्मा के सम्बन्ध में हमारा मानसिक विचार विस्तृत हो गया है। जब तक मनुष्य अपने शरीर और उसकी इच्छाओं को ही अपना ‘मैं’ करके जानता है तब तक जीव की अवस्था पाशविक ही समझनी चाहिये। जब यह ‘मैं’ की परिधि विस्तृत हो कर स्त्री-पुरुष को अपने अंतर्गत कर लेती है, तभी प्रगति संभव हो पाती है। यह मनुष्यता की सबसे पहली अवस्था है। किन्तु इसमें भी पशुत्व की कुछ मात्रा बची रहती है, क्योंकि इसमें स्त्री और बच्चों के सम्बन्ध में कुछ इस प्रकार का विचार रहता है कि ये मनुष्य के लिए अपने सुख, बल, शान, आराम के साधन और सम्पत्ति रूप हैं। पर इस दृष्टि से देखे जाने पर भी परिवार सभ्यता का आधार बनता है, क्योंकि इसी से सामाजिक जीवन सम्भव बनता है। परन्तु मनुष्य में देवत्व का आविर्भाव उसी समय आरम्भ माना जा सकता है जब वह अपने शरीर का ध्यान छोड़कर परिवार के लिए अपने आराम तथा जीवन तक का उत्सर्ग करने को तैयार हो जाय। जब मनुष्य स्त्री के सम्मान अथवा घर को सुरक्षा के लिए जीवन उत्सर्ग करने को तैयार हो जाता है, तो निःसन्देह यह एक ऊँचे दर्जे का काम समझा जायेगा। पर इससे बहुत ऊँचा वह तब उठता है जब वे अपने समाज या संग के हित के लिए आत्म-बलिदान करने को प्रस्तुत हो जाता है। इस बात को भली प्रकार समझ लेना कि मनुष्य पर परिवार के दावे के अपेक्षा समाज या जन-समुदाय का दावा अधिक बड़ा है, सामाजिक प्रगति की प्रथम और अनिवार्य शर्त है।

इससे अगला कदम है राष्ट्रगत आत्मा की अनुभूति और उसके लिए आत्म - बलिदान। राष्ट्र का विकास एक ऐसी प्रगति है जो आधुनिक अवस्था में मानवता के लिए अत्यन्त आवश्यक है। संसार की वर्तमान स्थिति में मनुष्य को व्यक्तिगत स्वार्थ को, परिवार के स्वार्थ को, जाति या समाज के स्वार्थ को, विशालतर राष्ट्रीय स्वार्थ में विलुप्त कर देना अवश्य सीखना होगा। इसी से मानव-जाति में भगवान का क्रम विकास होगा। इसलिए राष्ट्रवाद इस युग का धर्म है और भारतमाता ही हमारे लिये भगवान का प्रतीक है।

इससे भी अधिक ऊँची एक पूर्णता है, जिसके लिए कुछ व्यक्तियों ने ही अपने को तैयार दिखलाया है। वह है आत्मा का इतना अधिक विस्तार कि जिसमें सारी मानवता का समावेश हो जाय। मानवता के आदर्शों पर अभी तक कुछ व्यक्तियों में निजी स्वार्थ की बलि बढ़ा दी है और इससे इस दिशा में एक कदम बढ़ाया जा चुका है। पर मानवता के हित के नाम पर राष्ट्र के हितों का बलिदान कर देना एक ऐसा कार्य है जिसके लिए मानवता अभी समष्टि रूप से तैयार व समर्थ नहीं हुई है। परमेश्वर तैयारी करता है पर यह फल को उसकी ऋतु से पहले पकाने की जल्दी नहीं करता। एक समय आवेगा जब यह भी सम्भव होगा, परन्तु वह समय अभी नहीं है और न यह बात मानवता के लिए कल्याणकारी है, क्योंकि नीचे की सीढ़ी पर पैर रखना गलत काम है और इसका नतीजा यह होगा कि हम फिर नीचे लुढ़क पड़ेंगे। इसलिये जब तब राष्ट्रीयता का भली प्रकार अभ्यास न हो जाय और उसके निमित्त स्वार्थ त्याग करना हम न सीख लें तब तक मानवता के लिए आत्म-बलिदान की चर्चा निरर्थक ही है।

राष्ट्रहित का यह भी अर्थ हो सकता है कि वह एक प्रकार की सामूहिक स्वार्थपरता ही है। हम देश के लिए धन-दौलत और आराम का बलिदान करने को इसलिए भी तैयार हो सकते हैं, क्योंकि राष्ट्र के शक्तिशाली और समर्थ रहने से ही हमारा घर-बार तथा परिवार सुरक्षित रह सकता है। हम राष्ट्र के लिए इस कारण भी बलिदान कर सकते हैं, क्योंकि उसकी महत्ता, वैभव, ऐश्वर्य का अर्थ होता है हमारे वर्ग या हमारे श्रद्धा के वैभव और ऐश्वर्य की वृद्धि। अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए भी, हम अपने राष्ट्र के बलशाली, मात्राव्यशाली देखने के लिए भी अपनी सभी चीजों का बलिदान करने को तैयार हो सकते हैं। ये सब स्वार्थ के ही रूप हैं, जो मनुष्य का इस विशालतर जीवन में पीछा करते हैं, जिसका उद्देश्य उसे स्वार्थ से मुक्त करना होना चाहिए। पूँजीवाद और साम्राज्यवाद प्रकृति जो महारोग आधुनिक राष्ट्रों को पीड़ित कर रहे हैं, उनका मूल यह दृढ़ स्वार्थपरता ही है। इसी स्वार्थपरता के कारण बड़े राष्ट्रों में अभिमान, मद और अन्याय की भावना उत्पन्न होती है, जिसके वशीभूत होकर वे अन्य राष्ट्रों की सत्ता पर आघात करते हैं। इसके फल से क्रोधावेश होता है और क्रोध से अन्ध-सम्मोह-जो दोषी राष्ट्रों के संहार के लिए ईश्वर का साधन अथवा विधान है। इस बुराई से बचने का एक यही उपाय है कि राष्ट्र को सर्व समाज मानवता की एक आवश्यक इकाई समझा जाय, दूसरों से महान या श्रेष्ठ होने की कल्पना न की जाय।

इस प्रकार व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए आत्म-बलिदान का भाव ही मानवता का सबसे बड़ा आदर्श है और इसी के आधार पर वे साधारण मनुष्यों से उच्चतर या विशालतर स्थिति प्राप्त कर सकते हैं। जब यह बलिदान का भाव निःस्वार्थ रूप ग्रहण कर लेता है तो वह मानवत्व से उठकर देवत्व की श्रेणी में पहुँच जाता है।


रथी सो गया है।

(श्री रामनाथ ‘सुमन’)

उपनिषद् के ऋषि ने आत्मा को रथी कहा है। शरीर रथ है। आत्मा रथी है। रथी ही रथ हाँकता है। आत्मा शरीर का स्वतः पालन करती है। यदि रथी शिथिल है, सुषुप्त है, निद्राग्रस्त है तो रथ ठीक तरह से चल नहीं सकता। ठीक तरह से क्या उसका चलना ही संशयास्पद है। हमारे दर्शन में, धर्म में बार-बार यह सत्य दोहराया गया है।

किन्तु इसके साथ व्यवहार -शास्त्रों में एक और बात भी कही गयी है । रथी जागरुक हो किन्तु युगों की लीक पर चलते-चलते जीर्ण हो गया हो, पहिये घिस गये हों, तीलियाँ टूट गई हों- धुरी विश्रृंखल हो, या फिर मार्ग ही कुछ ऊबड़-खाबड़, वक्र, टूटा, गड्ढों एवं अवरोधों से भरा हो तो भी जीवन के रथ का स्वर पथ को मुखरित करने से रह जायेगा। चल कर भी न चलेगा, रथी होकर भी जैसे संचालन न हो पाये, अपने से उलझा, गतिहीन।

आज के भारत की दशा भी कुछ ऐसी ही है कि जीवन का रथ जीर्ण पड़ गया है। कहीं कील निकली है, कहीं चूल ढीली है, कहीं पथ संकीर्ण या उखड़ा- उखड़ा है, कहीं मार्गावरोध है। रथ स्वस्थ, गतिशील हो, मार्ग-जीवन संकुल हो- प्रशस्त हो, अवरोध मिटे, गति में स्वाभाविकता, सरलता आये, आवश्यक साधन उपलब्ध हों- यही हमारी पंचवर्षीय योजनायें हैं। इन योजनाओं की सफलता में जो बाह्यावरोध आ गये हैं वे मिटेंगे, पथ प्रशस्त होगा, उचित साधनों के अभाव दूर होंगे, रथ सहज ही अचर से चर हो जायेगा। मतलब रथ का पथ सरल हो जायेगा।

रथ तो हुआ। रथ का मार्ग भी बन जायेगा। पर रथ को चलाने वाले का क्या होगा, इस सम्बन्ध में योजना प्रायः मौन है। सम्भव है, यह बात उसकी परिधि में न आती हो। पर यह सत्य कि रथी आज सो गया है। उसके जागे बिना रथ उपलब्ध होकर भी नहीं चल पायेगा। बिनोवा, कदाचित यही कह रहे हैं। राष्ट्र का रथ चलाने के लिए रथी को जगाना होगा। सरकार मार्ग बना रही है, रथ ठीक कर रही है। बिनोवा की वाणी रथी को जगा रही है।

गाँधी जी का नाम तो हम प्रायः लेते हैं पर उनकी दीक्षा का जो विराट रूप है उसे समझने-देखने की शक्ति बहुत कम लोगों में है। पूर्ण दर्शन की तैयारी तो हम में से कदाचित् ही किसी में हो। जिस विराट रूप दर्शन की पुनः पुनः अर्जुन ने माँग की, वही जब सामने आया तो वह सहन नहीं कर सका। विराट का दर्शन ऐसा ही भयंकर होता है। मनुष्य भी विचलित हो जाते हैं। हमारी भी कुछ ऐसी दशा है। गाँधी जी ने भारतीय समाज के पुनः निर्माण का जो विराट स्वप्न देखा था उसमें हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारे धर्म, हमारी जातीय परम्परा सबको एक साथ अभिव्यक्ति प्राप्त हुई थी। उन्होंने पहली बार हृदयंगम किया था कि राष्ट्र की आत्मा हमारे गाँवों में है। भारत ग्रामों में है। (कवि के शब्दों में ‘भारतमाता प्राणवासिनी’।) भारत को अपने नियुक्त जीवन-पथ पर चलने के लिए गाँवों को समझना होगा, देखना होगा, उठाना होगा, चलाना होगा। कैसे चलेंगे ये गाँव। चलेंगे, जब उनका सोया मन उठेगा, जब उनमें आत्मानुभूति जागेगी, तब उनमें यह गहरी निष्ठा आयेगी कि हम हैं भारत के हृदय। शरीर सोये, पर हमें तो निद्रा में भी चलना ही है, हमारा सोना राष्ट्र की मृत्यु है। हृदय छुट्टी नहीं लेता, विश्राम नहीं करता, बातें भी नहीं करता केवल चलता है और चलता है और चूँकि चलता है इसलिए चलाता है। हमारा शरीर -यन्त्र, सम्पूर्ण जीवन -रथ उसी से चलाया जा रहा है।

हमें यह समझना होगा कि गाँवों का हृदय कहाँ है? फिर कहाँ है उस हृदय का स्पन्दन, कहाँ है उसके स्पन्दन के विविध स्रोत, कहाँ हैं उसकी शक्तिमयी वाणी जो चुप रहकर भी बोलती है तो जीवन ही बोलता है। कठिनाई यह है कि गाँवों में काम तो हो रहा है, पर उसकी बागडोर आज भी शहरों के हाथ है। ग्राम की योजनायें गाँव में नहीं बनती, शहर में बनती हैं। इसे जानते हैं, हमारी विवशता है। ग्रामों का हृदय मानो नगरों में बसा है, कुछ हमारी अनुभूति है। नगर द्वारा ग्राम चलाये जा रहे हैं। गाँधीजी की कल्पना उलटी थी कि ग्राम से नगर नियोजित हों। हमारी सभ्यता, समाज- संगठन, राजनीति सबका केन्द्र ग्राम हो, क्योंकि उन्हीं के उठने से राष्ट्र उठेगा, उन्हीं के चलाने से चलेगा।

काम जो हो रहा है, आवश्यक है। बहुत आवश्यक है। अच्छा काम हो रहा है पर मुख्यतः भौतिक स्तर पर शरीर की संवृद्धि के लिए हो रहा है। यह उपयोगी है। यह जीवन की प्रथम आवश्यकता है। रोटी, कपड़ा एवं आवास सबके पास होना ही चाहिए, काम सब के लिए होना ही चाहिये। शिक्षण, जीविका और शरीर- संवृद्धि की सुविधाएं सबके लिए होनी ही चाहिएं पर जीवन में यह सब जिस देवता की पूजा के लिए है उसकी और भी तो ध्यान देना ही है। हमारे जीवन का देवता हमें पुकारते-पुकारते थक कर कपाटों के अन्दर सो गया है। उसकी इन्द्रियाँ सुषुप्त हैं, उसकी वाणी अवरुद्ध है। उसे जगाना होगा।

समस्त योजनायें जिसके लिए और जिसको लेकर हैं वह किसान, वह ग्राम का प्राण, वह ग्राम-देवता, वह मानव आज भी जैसे संशयग्रस्त है, एक मूर्छा सी है, उसके ऊपर। वह देवता तो है कि उसे लिए सब दौड़ रहे हैं, पर देखकर भी बात जैसे अन्तर में समाती नहीं है, प्रतिध्वनि मानो जीवन की बाहरी दीवारों से ही टकराकर लौट आती है।

समाज के स्वप्नदर्शी युवकों को, चिन्तनशील विद्वत्जनों को, वाणी के आराधकों को, सेवाभावी कार्यकर्ताओं को पहिले यही करना होगा जिसके लिए और जिसको लेकर सारी सामाजिक एवं आर्थिक योजनाएं हैं वह भारत का हृदय, यह मानव बहुत करके अब भी मानो अछूता ही रह गया है, शोरगुल में। उसे स्पर्श करना होगा, उसके अन्तर में बैठना होगा, उसे झकझोर कर जगाना होगा कि हे ग्राम-देवता, हे ग्राम- लक्ष्मी जागो। भारत की कोटि-कोटि मानवता के जीवन-स्रोत अँगड़ाई लेकर उठो। रथ तुम्हें पुकार रहा है, पथ तुम्हें पुकार रहा है, आज की संतति का भविष्य तुम्हें पुकार रहा है, आगे आने वाली अनुत्पन्न पीढ़ियाँ तुम्हें पुकार रही हैं, जीवन की अगणित चुनौतियाँ तुम्हें पुकार रही हैं, उनका उत्तर देने के लिए उठो। राष्ट्र का और मानवता का रथ आगे बढ़ाओ।


अशुद्ध (असत्य) व्यवहार की जड़

(श्री कृष्णदास जाजू)

एक मशहूर कहावत है कि केवल चोर को मारने से क्या होगा? चोर की नानी को मार दें तो चोर का जन्म ही न होगा। यहाँ स्वभावतः यह प्रश्न उठता है कि अशुद्ध (असत्य) व्यवहार की नानी कौन है और उसे कैसे मारा जाय? इन प्रश्नों का उत्तर देना बहुत कठिन है। शायद अपनी-अपनी समझ के अनुसार इसके लिए अलग-अलग उत्तर हों। यहाँ हम दो-तीन खास बातों का ही विचार करेंगे। उनमें भी व्यवहारिक पहलू पर ही जोर देना उचित होगा।

अगर मनुष्य स्वभाव में ही ऐसी कोई चीज है कि जिससे अशुद्धि का रहना अवश्यम्भावी है तो उसका सम्पूर्ण नाश करना असम्भव है। अशुद्धि या असत्य व्यवहार की व्यापकता को देखते हुए यह स्वीकार करना होगा कि मनुष्य -स्वभाव में ऐसा कुछ अंश जरूर है, जो अशुद्धि को जन्म देता है। परन्तु चूँकि मनुष्य शुद्धि की ओर भी बढ़ता है, इसलिए यह भी मानना पड़ेगा कि शुद्धि का बीज भी उसमें है।

मनुष्य अपूर्णता में से पूर्णता की ओर जाने का प्रयत्न कर रहा है। पूर्णता के विरुद्ध जो दोष या बाधायें सामने आती हैं, उन्हें भी दूर करने का प्रयत्न किया जाता है। उसमें स्वार्थ वृत्ति की प्रबलता है, पर परमार्थ की वृत्ति भी मौजूद है। उसे समाज में रहना पड़ता है और समाज से ही उसे भरण-पोषण, विद्या, कला, ज्ञान आदि मिलते हैं। अनेक लोगों से उसके अनेक सम्बन्ध आते हैं। अगर वह उन सम्बन्धों में सच्चाई-शुद्धि से व्यवहार नहीं करता तो स्वयं उसको भी दूसरे मनुष्यों द्वारा वैसा ही असत्य व्यवहार सहन करना पड़ेगा। इस प्रकार मनुष्य के लिए शुद्धि और अशुद्धि दोनों तरफ झुकने के कारण मौजूद हैं। इसके अलावा मनुष्य को जिस समाज में रहना पड़ता है, उसमें अगर ऐसी व्यवस्था हो कि भलाई को प्रोत्साहन मिले और बुराई निन्दनीय मानी जाय तो उसके आचरण के सुधारने में काफी मदद मिल सकती है। इस प्रकार व्यक्तिगत और सामुदायिक प्रयास से अशुद्ध व्यवहार में काफी कमी आ सकती है।

हमारी परम्परा में सामुदायिक हित के बजाय व्यक्तिगत लाभ पर अधिक जोर रहा है। हमारे व्यावसायिक और सामाजिक विचारों में ही नहीं धार्मिक विचारों में भी व्यक्तिगत दृष्टि से अधिक विचार किया जाता है। पुरुषार्थ और तपस्या का लक्ष्य भी व्यक्तिगत मोक्ष माना गया है। सम्भव है इन कारणों से सामुदायिक उत्कर्ष के लिए जिन गुणों की विशेष जरूरत है, वे उचित मात्रा में नहीं बढ़ पाये हैं। इसलिये हमारे यहाँ व्यक्ति और समाज के सम्बन्ध की विचारधारा में परिवर्तन होने की आवश्यकता है। व्यक्ति समाज का अंग है और समाज की भलाई में ही उसकी भलाई है। अगर सारे समाज को कष्ट भोगने का कोई अवसर आ गया तो व्यक्ति भी कष्ट से नहीं बच सकता। इस प्रकार की भावनायें हममें बढ़नी चाहिएं।

धन का लोभ

यह तो स्पष्ट है कि अशुद्ध व्यवहार का मूल कारण धन का लोभ होता है परन्तु धन का लोभ इतना क्यों बढ़ा? आप हर क्षेत्र में यह दृश्य देख सकते हैं कि जब किसी संकट से करोड़ों आदमी कष्ट भोगते रहते हैं, सम्पन्न व्यक्ति और चतुर व्यापारी उसी संकट में से अपना स्वार्थ साधने में नहीं हिचकिचाते। सन् 1943 में बंगाल में जो अकाल पड़ा था उसकी घटनायें बड़ी हृदय-विदारक हैं। उसकी जाँच करने के लिए जो कमेटी नियुक्त की गई थी, उसने लिखा था कि ग्राहक, व्यापारी, किसान जो समर्थ थे और जिनको मौका मिला उन्होंने अनाज का खूब संग्रह कर लिया। इससे अनाज के भाव इतने बढ़ गये कि गरीब जनता में अनाज खरीदने की शक्ति ही नहीं रही। उस अकाल में बतलाया जाता है कि तीस लाख व्यक्ति मरे थे और मुनाफाखोरों ने तीस करोड़ की रकम पैदा की थी। अर्थात् हर भूखा मरने वाले व्यक्ति के पीछे व्यापारी को एक हजार रुपया मुनाफा मिला था। कैसा वीभत्स व्यापार है यह। खाने को न मिलने के कारण रोज-रोज यातना भुगतते हुए प्राण कैसे जाते होंगे, इसकी कल्पना, जिनको खाने को मिलता है, वे कर ही नहीं सकते। सप्ताह, दो सप्ताह बिलकुल निराहार रहने वाला थोड़ी कल्पना कर सकता है। वैसे तो देश भर में हर साल किसी न किसी सूबे में कुछ अंशों में अकाल रहता है। अब तो सरकार प्रयत्न करके यथासम्भव अनाज उपलब्ध करा देती है। फिर भी इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि ऐसे संकटकाल में धनिक लोग चीजों के भाव बढ़ाकर मुनाफा कमाने में संकोच नहीं करते। कुछ दानी लोग मदद के लिए जरूर आगे बढ़ते हैं परन्तु इसका महत्व भी इस कारण अधिक नहीं माना जा सकता, क्योंकि वे संकट में से मुनाफा कमाकर उसी में से थोड़ा सा दान कर देते हैं।

धन के लोभ के लिए हमारी प्रचलित आर्थिक व्यवस्था भी जिम्मेदार है। अंग्रेजी राज्य-काल में यहाँ पश्चिमी अर्थशास्त्र और सभ्यता का बोलबाला रहा है। अंग्रेजी को इंग्लैण्ड के हित में भारत से धन ढोकर अपने देश में ले जाना था। जब वे स्वयं इतना लाभ उठाना चाहते थे, तो भारत में भी यहाँ के कुछ लोगों को लाभ उठाने देना जरूरी था। देश के कुछ लोगों को मध्यस्थ (बिचौलिया) बनाये बिना परदेश वाले अपना उद्देश्य सिद्ध नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप देश में आर्थिक विषमता बढ़ने लगी। इससे बहुसंख्य लोग गरीब की होने लगे। इंग्लैण्ड में भी पूँजीवादी अनुचित मार्ग से धन कमाने का उपाय करते हैं पर वहाँ की सरकार गरीबों को कई तरह से मदद देकर हालत को संभाले रहती है। पर भारत के गरीबों की परवाह अंग्रेजी सरकार क्यों करने लगी, उनको अपने भाग्य के भरोसे ही छोड़ दिया गया। इसके फलस्वरूप आर्थिक विषमता ने गम्भीर रूप धारण कर लिया। दुर्भाग्यवश तब भी हमारा ध्यान उधर आकर्षित नहीं हुआ, भाग्यवादी होने के कारण इस दुर्दशा के वास्तविक कारणों को खोजने के बजाय हम उसे दैव प्रदत्त कर्मफल मानकर सन्तोष किये रहे।

आर्थिक विषमता में जब थोड़े से लोग मालदार बनकर मजे उड़ाने लगते हैं, तब दूसरों का दिल भी वैसा ही करने को चाहता है। पर अधिक धन बिना अशुद्धि या बेईमानी के प्राप्त नहीं हो सकता, इसलिये यह भी बढ़ने लगती है। अगर धन का लोभ घटाना है तो आर्थिक विषमता कम करनी होगी। समाज और राजसभा दोनों मिलकर यह कर सकते हैं। अब गरीब जनता आर्थिक विषमता घटाने की बात कर रही है और वह कुछ आतुरता भी प्रकट कर रही है। परन्तु उसमें भी दोष यह है कि वह भी शुद्ध व्यवहार करने वाली नहीं है। राज-सत्ता भी विषमता घटाने की कुछ बात कर रही है। परन्तु वर्तमान खर्चीला शासन चलाने के लिए उसे जो धन चाहिए, वह धनिकों को कायम रखकर उनके टैक्सों द्वारा ही प्राप्त कर सकती है। इसलिए वह आर्थिक विषमता को कहाँ तक घटा सकती है, यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। फिर समता जमाने की माँग है और उसे टाला नहीं जा सकेगा। उसमें आवश्यक सफलता मिलने तक समाज को भी पैसे की महिमा घटाने का उपाय करते रहना चाहिये।

यदि हमें भ्रष्टाचार मिटाना है तो समाज की रचना में बुनियादी परिवर्तन करना होगा। इसके लिए कुछ लोग हिंसा का या कानून का सहारा लेकर पूँजीवादी अर्थ-व्यवस्था के स्थान पर साम्यवादी अर्थ- व्यवस्था लोन का प्रस्ताव किया करते हैं। पर हम इसे इस कारण नहीं मान सकते, क्योंकि केवल भौतिक परिवर्तन होने से लोगों की अशुद्ध मनोवृत्ति नहीं बदल सकती। जीवन की शुद्धि के बिना व्यवहार की शुद्धि नहीं हो सकती। इसलिए हमको केवल कानूनी परिवर्तनों का आश्रय छोड़कर अन्तःकरण की शुद्धि का प्रयत्न करना चाहिए। यही अशुद्ध व्यवहार की जड़ को काटने का वास्तविक मार्ग है।

यह मनोवृत्ति जब सर्वत्र फैल जायेगी, तब ज्यादा से ज्यादा लोग, एक सीमा पर पहुँचकर पैसा पैदा करना छोड़ देंगे। साथ ही अगर हम सामान्य और पूजनीय व्यक्ति का एक नया आदर्श खड़ा करें- जैसे समाज- सेवक, साधु साधारण किसान, मजदूर- तो एक बहुत बड़ा काम हम करेंगे। इससे एक नई जीवन-दृष्टि का विकास होगा और हमारे देश में एक आदर्श गौरवशाली प्रजा का आविर्भाव होगा।


वेदों में सामूहिकतावाद की शिक्षा

(श्री नारायण स्वामी)

हमारे देश के बहुसंख्यक शिक्षित व्यक्तियों का यह विचार है कि समाजवाद अथवा सामूहिकतावाद आदि सिद्धान्तों का आविर्भाव पिछले सौ-दो सौ वर्ष के भीतर योरोप में ही हुआ है। उसके पहले संसार में व्यक्तिवाद का ही बोलबाला था और प्रत्येक मनुष्य केवल निजी भलाई अथवा अपने कल्याण पर ही दृष्टि रखता था। उस समय यदि लोगों में कुछ सामाजिक भावना थी भी तो उसका रूप बहुत संकुचित था। प्रायः वह एक छोटे भूखण्ड या राज्य या किसी जाति विशेष में ही सीमित रहती थी। उस दायरे के बाहर के सभी मनुष्य गैर माने जाते थे, जिनके साथ कैसा भी स्वार्थयुक्त या अन्याय का व्यवहार किया जा सकता था।

हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि उपर्युक्त कथन किसी हद तक सत्य है। पिछले हजार-दो हजार वर्षों का युग अंधकार युग की तरह रहा है और उसमें मनुष्यों की संघर्ष-भावना बहुत बढ़ गयी थी। संसार के मनुष्य देश, जाति और धर्म के नाम पर हजारों हिस्सों में बँट गये थे और एक दूसरे को शत्रु-भाव से देखते थे। पर यह दशा सदा से ऐसी ही नहीं चली आई थी। संसार के सबसे प्राचीन समाज का चित्र वेदों में ही मिलता है और उसके वर्णन तथा उपदेशों से सामूहिकता अथवा समाजवाद की ध्वनि स्पष्ट निकलती है। समाजवाद का वास्तविक तात्पर्य यही है कि समाज में फैली हुई वे हानिकारक विषमताएं, जिनके कारण मनुष्यों में अनुचित प्रतिस्पर्धा तथा संघर्ष की उत्पत्ति होती है, दूर की जानी चाहिएं तथा प्रत्येक मनुष्य को उन्नति करने तथा जीविका-उपार्जन करने का समान रूप से अवसर मिलना चाहिए। इस संबंध में वेदों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है-

“अज्येष्ठासो अकनिष्ठासो एते सभ्रातरो वावृधुः सौभागाय। युवा पिता त्वया रुद्र एषाँ सुदुधा पृथ्वी सुदिना रुदभ्यः॥’

[ऋग्वेद 7।8।7]

अर्थात् “सब मनुष्य (रंग, जाति और नस्ल के भेद के बिना) भाई-भाई हैं, उनमें कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं। वे सब मिलकर सौभाग्य की वृद्धि के लिए उन्नतिशील हों। शक्ति-सम्पन्न, सर्व-रक्षक और सबको मर्यादा में रखने वाला परमेश्वर उनका पिता है और अनेक प्रकार के धन-धान्य देने वाली पृथ्वी उनकी माता है।” इससे प्रकट होता है कि वेदों के आदेशानुसार समस्त पृथ्वी- निवासी एक विशाल परिवार के रूप में हैं, जिनमें न कोई छोटा है और न कोई बड़ा, सब भाई-भाई हैं। इस भ्रातृ-भाव को स्थिर रखने के लिए आवश्यक है कि वे समझें कि हम एक माता और एक पिता के पुत्र हैं। मनुष्यों में समतायुक्त प्रेम का भाव स्थापित करने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण विचार है कि सब मनुष्य अपने को एक पिता की सन्तान समझें। वेदों में यह उच्च भावना जगह-जगह मिलती है। एक और जगह कहा गया है-

करशफस्य विशफस्य द्यौः पिता पृथिवी माता। यथाभिचक्र देषाँस्तथायकणुता पुनः॥

[अथर्व 5।-।4]

अर्थात् “करशफ (निर्बल) और विशफ (प्रबल) दोनों का पिता प्रकाश पुञ्ज (परमात्मा) है। ऐसा समझते हुए विद्वानों ने जैसा चक्र चलाया है, उसे फिर-फिर काम में लाओ।” फिर एक जगह पारस्परिक प्रेम की स्थापना के लिए लिखा है :-

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्व भूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥

(यजुर्वेद 60।8)

अब पाठक समझ सकते हैं कि वेदों ने अब से अनगिनत वर्ष पहले ही समाज में समता, सामूहिकता, भ्रातृभाव, प्रेम- व्यवहार के लिए कितना सच्चा और प्रभावशाली रास्ता बतला दिया था। जब मनुष्य अपने प्यारे पिता को समस्त प्राणियों में व्यापक देखता है तब प्रत्येक प्राणी का शरीर उसके लिए परमात्मा के मन्दिर के सदृश्य पवित्र और पूज्य होता है। फिर ऐसा मूर्ख कौन होगा कि अपने प्रिय और श्रद्धा के स्थान को नष्ट करे या किसी प्रकार की क्षति पहुँचाये। इससे मनुष्यों को स्पष्ट रूप से यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी प्राणी को कष्ट देना परमात्मा का विरोध करना है- महा पाप करना है। इस उद्देश्य और भावना के स्थान पर आजकल की दुनिया ने कितना गलत सिद्धान्त अपनाया है इस पर विचार करते हुए कुछ वर्ष पहले एक अमरीकन विद्वान ने लिखा था-

“आजकल सबसे बड़ी चर्चा यही है कि किस प्रकार शत्रु को कुचल दिया जाय- किस प्रकार बर्लिन (जर्मनी) और टोकियो (जापान) से बिना शर्त आत्म-समर्पण करा लिया जाय। कोई भी सभी पर दया और क्षमा की बात नहीं करता। हम पश्चिम निवासियों में इसका सर्वथा अभाव है। बल, हिंसा बदला लेने की इच्छा, अहंमन्यता, घमण्ड और अधिकार- इन सबसे हम खूब परिचित हैं और हमने इनको रोग की तरह दूसरों में भी फैलाया है। परन्तु दया, अनुकम्पा, प्रेम, नम्रता, आत्मत्याग और शान्ति- इन्हें हम बहुत थोड़ा जानते हैं। सन्तोष की बात है कि अब तराजू का पलड़ा पश्चिम से पूर्व की ओर झुक रहा है। पश्चिमी राष्ट्र अपने पापों, अपनी स्वार्थपरता से नष्ट होंगे और चीन तथा हिन्दुस्तान जैसे देश मनुष्य जाति को उसके वास्तविक लक्ष्य तक पहुँचाने का भार संभालेंगे।”

इसी तरह के उद्गार और भी अनेक विद्वानों ने प्रकट किये हैं। पश्चिम के लोग समाजवाद अथवा सामाजिक न्याय का नाम लेते हुए भी सब मनुष्यों में आन्तरिक एकता के भाव का अनुभव नहीं करते। वहाँ के विचारक इस कमी को समझ रहे हैं और भारतवर्ष की तरफ देख रहे हैं जिसने प्राचीनकाल में इस समस्या को हल करके एक आदर्श समाज की स्थापना की थी। भारतीय ऋषियों ने इसके लिए योरोप के समाजवाद की तरह केवल ऊपरी समानता के सिद्धान्त को नहीं अपनाया, वरन् उन्होंने यह स्वीकार करते हुए कि एक बड़े समाज में अनेक प्रकार के मतभेद और रुचि-भेद होना अनिवार्य है, आत्मिक दृष्टि से सबको एक ही विराट का अंश बतलाया और सबको प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया-

“जनं बिभ्र्रती बहुधा विनाचसे नाना धर्माण पृथिवी यथौ कसम्। सहस्रं धारा द्रविणास्य ये दुहाँ ध्रुवेष धेनुरन यस्फुरन्ती।”

(अथर्ववेद 35।3।64)

अर्थात् “पृथ्वी तभी मनुष्यों की रक्षा करती है जब वे अनेक धर्मों और अनेक भाषाओं के होने पर भी इस प्रकार से मिलकर रहा करते हैं जैसे एक घर में घर वाले मिलकर रहा करते हैं। उस समय पृथ्वी धारा की सहस्रों धारा उसी प्रकार दिया करती है, जैसे गाय निश्चित रीति से दूध की अनेक धारायें दिया करती है।”

इस प्रकार वैदिक ऋषियों ने समाज के कल्याणार्थ जो सिद्धान्त स्थिर किये हैं वे आधुनिक साम्यवाद अथवा समाजवाद से कुछ बातों में भिन्न होते हुए भी सब मनुष्यों की भलाई करने वाले हैं और उनके द्वारा समाज को निश्चित रूप से सुख-शान्ति की उपलब्धि होती है। इसका कारण यही है कि आधुनिक समाजवाद में सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए भी जिन साधनों का आश्रय लिया गया है वे ईर्ष्या-द्वेष से युक्त हैं और उनके कारण समाज में अशाँति तथा हिंसा की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार समाज में उथल-पुथल, हलचल तो अवश्य पैदा हो जाती है, पर सुख किसी भी एक दल या समुह को नहीं मिला पाता। कभी एक को दबना पड़ता है और कभी दूसरे को। एक को दूसरे पर जरा भी विश्वास नहीं होता और दोनों अपने-अपने मौके की ताक में लगे रहते हैं। इसके विपरीत भारतीय संस्कृति में सबकी अलग-अलग मर्यादा और अधिकार निश्चित कर देने पर भी सबमें एक आत्मीयता का भाव अनुभव करने का आदेश दिया गया था और

जो जितना बड़ा बनाया गया उस पर उतना ही अधिक उत्तरदायित्व भी रखा गया था। इसलिए उस समय बिना किसी कानून या बाहरी दबाव के मनुष्य अपना कर्तव्य समझते थे कि समाज में एक भी व्यक्ति भूखा-नंगा न रहे और सबको अपनी योग्यता अनुसार उचित जीवन-निर्वाह की सामग्री प्राप्त होती रहे। उस समय कोई विशेष परिस्थिति- जैसे अकाल आदि उपस्थित होने पर राजा और बड़े आदमी स्वयं अपने भण्डारों को खोल देते थे और अभावग्रस्त लोगों की हर तरह से रक्षा करते थे। हमारी सम्मति में समाजवाद या सामूहिकतावाद का यह स्वरूप वर्तमान समय के रूप से कहीं अधिक कल्याणकारी है।


मन को कैसे वश में किया जाय।

(स्वामी शिवानन्दजी)

साधारण मनुष्यों के मन में साँसारिक विषयों के संकल्प सदैव उठा करते हैं, पर आध्यात्मिक विचारों को ग्रहण करने को वह शीघ्र प्रस्तुत नहीं हो सकता। इसका कारण यही है कि हमारा मन विकारों से भरा रहता है। उसे शुद्ध करना आसान काम नहीं है। निष्काम कर्म, जप, प्राणायाम आदि जैसे साधनों द्वारा उसे विकारों से मुक्त करना पड़ता है तब उसकी प्रवृत्ति स्वभावतः आध्यात्म की ओर जाती है।

मन दर्पण के समान है। यदि दर्पण गन्दा हो तो आप अपना मुँह साफ नहीं देख सकते। जब मन मलीन हो तो उसमें ईश्वर को साफ नहीं देखा जा सकता। जब आध्यात्मिक प्रयत्नों द्वारा उसे शुद्ध बना लिया जाता है तो ईश्वर का साक्षात्कार अवश्य होता है। यदि शुद्ध होकर मनुष्य का मन शास्त्रों के अध्ययन, ज्ञानियों के सत्संग और ध्यान के अभ्यास में निरन्तर लगे तो ज्ञान की वृद्धि होगी और दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जायगी जिससे परब्रह्म का सत्य ज्ञान होना सम्भव होगा। यज्ञ, दान, दया, वेदाध्ययन, सत्यभाषण- ये पांचों मन को शुद्ध करने वाले हैं, छठी तपस्या है। तीर्थ-यात्रा भी मन को शुद्ध करती है इसके द्वारा महात्माओं का सत्संग प्राप्त होता है। जप, निष्काम कर्म, अग्निहोत्र, ब्रह्मचर्य, सन्ध्या, तीर्थ-यात्रा शम, दम, यम, नियम, स्वाध्याय, तप, व्रत, साधु-सेवा ये सभी मन को शुद्ध करने के साधन हैं। निश्चय ही ऐसे शुद्ध हुए मन में पूर्ण आनन्द रहेगा। मन्त्र भी मन को शुद्ध करता है, पर तोते की तरह मंत्र को केवल रटने से बहुत कम फल होता है। मन्त्र को भाव के साथ कहने से उसका आश्चर्यजनक फल होता है। तब तक मंत्र में अपने ही मन की पूर्ण इच्छा-शक्ति नहीं भरी जायेगी तब तक उसका बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं हो सकता। सत्य भाषण और दया का अभ्यास मन को बहुत शुद्ध करने वाले व्यवहार हैं।

हमारी आँखें केवल देख सकती हैं। कान केवल सुन सकते हैं। जीभ केवल स्वाद ले सकती है। त्वचा केवल स्पर्श कर सकती है। नाक केवल सूँघ सकती है। परन्तु मन देख सकता है, सुन सकता है, स्वाद भी ले सकता है, स्पर्श कर सकता है, सूँघ भी सकता है। सब इन्द्रियों की शक्तियाँ मन में निहित हैं। योगाभ्यास से आप मन के द्वारा देख और सुन सकते हैं। मन और इन्द्रियाँ एक हैं। मन का विकास इन्द्रिय है। मन इन्द्रियों का समूह है। मन में खाने की वासना से जिह्वा, दाँत और उदर की प्रवृत्ति होती है। यदि मन को वश में कर लिया जाय तो इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं। जो इन्द्रियों को वश में करता है वह मन को पहले ही वश में कर चुका होता है।

पंच महाभूतों के प्रभाव से उत्पन्न पाँचों इन्द्रियों का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। नासिका और गुदा की उत्पत्ति पृथ्वी तत्व से है। नाक सात्विक भाग से और गुदा राजसिक भाग से। ये दोनों आपस में सम्बन्धित इन्द्रियाँ हैं। ये दोनों सब से कम दुःख देती हैं और इनका संयम भी जल्दी हो जाता है। जिह्वा और उपस्थ (लिंगेन्द्रिय) जल-तत्व से बनी हैं। पहली सात्विक भाग से और दूसरी राजसिक भाग से। इनमें भी आपस में सम्बन्ध है। भोजन से जननेन्द्रिय को शक्ति मिलती है। यदि जिह्वा को वश में कर लिया जाय तो अन्य इन्द्रियाँ सहज ही वश में आ जाती हैं। सबसे ज्यादा चंचल और दुःखदायी जननेन्द्रिय है, उससे कम जिह्वा, उससे कम यावयेन्द्रिय (बोलना), फिर कान और आँख। आँखें तथा पैर अग्नि तत्व से हैं। आँखें सात्विक भाग से और पैर राजसिक भाग से। आँखें देखना पसन्द करती हैं और पैर उसे वहाँ ले जाने को तैयार रहते हैं। त्वचा और हाथ वायु तत्व से बने हैं। वावयेन्द्रिय और कान दोनों आकाश तत्व से हैं।

जिस प्रकार समुद्र नदियों से भरा जाता है, बिना नदियों के समुद्र की स्थिति नहीं है। इसी प्रकार मन इन्द्रियों द्वारा पूर्ण होता है, बिना इंद्रियों के मन का अस्तित्व नहीं रह सकता। आँख, कान और जिह्वा- ये तीनों इन्द्रियाँ मन को बहिर्मुखी कर देती हैं और मनुष्य को साँसारिक विषयों में फँसा देती हैं। इसलिये किसी भी आध्यात्मिक साधना में इन तीनों इंद्रियों को वश में करके ही मन को अन्तर्मुखी बनाया जा सकता है। मन की शान्ति के लिए शम और दम जरूरी है। इन्द्रियाँ यदि प्रबल हों तो अच्छे-अच्छे साधकों के मन भी इस तरह उड़ा ले जाती हैं जैसे तूफान नाव को उड़ा ले जाता है। सब इन्द्रियों का भड़काने वाला मन है। इन्द्रियों और मन के द्वारा माया भी अपना मोह-जाल फैलाती है। इसलिए साधक को हमेशा सचेत रहना चाहिए। वैराग्य और वासना के द्वारा दम का अभ्यास करें। उदाहरणार्थ मिठाई के बाजार में खूब पैसा लेकर जाओ। तरह-तरह की मिठाइयों को खूब ललचाई निगाह से देखो। पर कोई चीज खरीदो मत और घर को वापिस आ जाओ। उस दिन घर पर यदि उत्तम भोजन भी दिये जावें तो उन्हें ग्रहण मत करो। सादा भोजन करो। ऐसा करने से जिह्वा वश में आ सकेगी और आपकी इच्छा शक्ति भी बढ़ेगी। यदि आप चाय छोड़ने का संकल्प कर लें तो आपने जिह्वा को कुछ अंश तक वश में कर लिया। सारे बढ़िया भोजन छोड़ दो और इन्द्रियों के उपभोग के सारे पदार्थ त्याग दो। तीव्र तप का अभ्यास करो। तप से इन्द्रियाँ दुर्बल हो जाती हैं और मन वश में हो जाता है।

कुछ समय तक मौन रहने से वाक् इन्द्रिय का संयम होता है। इससे मन के चंचल रहने का एक बड़ा कारण दूर हो जायेगा और आपको शान्ति का अनुभव होगा। अब दृढ़ निश्चय के साथ ब्रह्म का ध्यान करो। बोलने से पहले अपने शब्दों के चुनने में सतर्क रहो। बोलने से पहले दो-तीन बार सोच लो। विचार करो कि आपके शब्द दूसरे पर क्या असर डालेंगे। धीरे-धीरे मौन का समय बढ़ाते रहो यहाँ तक कि महीनों तक बिना बोले तुम्हारा काम चल जाय। मन का अनुमान सदा बात को बढ़ाया करता है। इससे बचना चाहिये। मन का मौन वाणी के मौन से भी उत्तम है। जबर्दस्ती वाणी का मौन करने से मन के साथ बड़ा झगड़ना पड़ता है, प्रयत्न करना पड़ता है। इसलिये ऐसा अभ्यास करना चाहिये कि मौन स्वाभाविक हो जाय। वह अपने आप भीतर से उत्पन्न होना चाहिये तब ही पूर्ण शान्ति मिल सकती है।

एक प्रसिद्ध कहावत है कि ‘मन जीता तो जगत जीता।’ एक और प्रकृति है दूसरी ओर ब्रह्म है। मन इन दोनों के बीच में पुल का काम करता है। पुल पार करके आप ब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इच्छाओं, संकल्पों और अहंकार के नाश का तात्पर्य मन को पूर्णतः वशीभूत कर लेने से ही है। किले में से निकलते सिपाहियों को एक-एक करके मार दो तो आप किले पर कब्जा कर लोगे। ऐसे ही ज्यों-ज्यों विचार उठते जायें एक-एक करके उनका नाश कर दो। आखिर को मन का भी नाश हो जायेगा। बराबर परमात्मा का विचार करते रहो आप बड़ी सुन्दरता से मन को जीत सकोगे।

जैसे श्वेत वस्त्र पर गुलाबी रंग अच्छा फैलता है इसी प्रकार जब मन शान्त होवे, सारे लोगों की तरफ से उदासीन होवे, सारी इन्द्रियाँ अन्तर्मुखी हो जायें और मन के अज्ञान का नाश हो गया हो, तभी सद्गुरु के उपदेश शिष्य के मन में प्रवेश करके प्रभाव दिखायेंगे। मन का पूर्ण संयम केवल ब्रह्म-विचार द्वारा ही हो सकता है। दूसरे साधन तो सहायक हैं।

यदि मन वश में रहे तो इसमें कुछ भी भेद नहीं होता कि आप महल में रहें या पहाड़ की गुफा में। मन का संयम होने से शरीर का भी संयम हो जाता है। शरीर तो मन की छाया है। मनोनिरोध में कोई वृत्ति या विचार नहीं रहता, परन्तु शून्य वृत्ति रहती है। संस्कारों का नाश नहीं होता। जिसने मन को जीत लिया है वही सदा विजयी और महाराजा है। जिसने इच्छाओं और मन को वश में कर लिया है वही महावीर है।


महानता के बीज

(डॉक्टर रामचरण महेन्द्र, पी.एच.डी.)

(1)

यूनान देश के थ्रेस प्रान्त में अब्डेरा नगर में एक अनाथ बालक लकड़ियाँ काट कर लाता और बाजार में बेचकर अपना पेट भरता था। दिन भर जीविका- उपार्जन में ही उसका समय व्यतीत हो जाता था।

एक दिन एक भला आदमी लकड़ियों के बाजार से होकर निकला। उसने देखा एक बालक अपने सामने लकड़ियों का एक छोटा गट्ठा रखे हुए बेचने का प्रयत्न कर रहा है। एक बात ने उसे विस्मित कर दिया। उसने देखा कि एक गट्ठर अन्यों की अपेक्षा बड़ी सुन्दरता और कलापूर्ण ढंग से बँधा हुआ था। भला आदमी तनिक ठहर गया और लड़के की बुद्धि-परीक्षा लेने के मन्तव्य से उसे पूछा-

“लड़के! इस गट्ठर को तुमने स्वयं बाँधा है?”

“जी हाँ, मैं लकड़ी स्वयं काटता, स्वयं गट्ठर बाँधता और प्रतिदिन इस बाजार में बेचकर जीविका-उपार्जन करता हूँ।”

“क्या तुम इसे खोलकर फिर इसी कलापूर्ण ढंग से बाँध सकते हो?”

“जी हाँ, यह लीजिए अभी बाँधे देता हूँ”

यह कहते-कहते लड़के ने लकड़ी का गट्ठर खोल डाला। लकड़ियाँ इधर-उधर बिखेर दीं। फिर तत्परता और सावधानी से एक बड़ी लकड़ी को आधार बनाकर उसके इधर-उधर छोटी-छोटी लकड़ियाँ सजाई। अन्त में वैसे ही सुन्दरतापूर्ण ढंग से लकड़ियों का गट्ठर बाँध दिया। यह कार्य वह स्फूर्ति और बड़ी लगन से कर गया। उतनी देर के लिए यह भूल गया कि वह किसी व्यक्ति के सम्मुख खड़ा है और कोई उसकी क्रियाओं और आदतों को सूक्ष्मता से देख रहा है।

भले आदमी पर इस कलापूर्ण ढंग का बहुत प्रभाव पड़ा। उन्होंने देखा कि बालक में छोटे काम को भी पूरी दिलचस्पी और कलापूर्ण ढंग से पूरा करने के दुर्लभ संस्कार थे। ऐसे संस्कारों वाले व्यक्ति ही विकसित होकर संसार के महापुरुष बनते हैं। उन्होंने सोचा, “इस लड़के के चरित्र में जो महानता के बीज हैं, उन्हें विकसित होने का अवसर देना चाहिए। हो सकता है कि यह बालक संसार का कुछ लाभ कर सके। वे बोले- “तुम हमारे साथ चलोगे? हम तुम्हें पढ़ाना चाहते हैं। सम्पूर्ण व्यय, भोजन, निवास आदि का भार हमारे ऊपर रहेगा।”

बालक कुछ देर तक सोचता रहा। उसकी तीव्र इच्छा थी कि वह किसी प्रकार पढ़े-लिखे। उसने कुछ विद्याध्ययन किया भी था। जीविका-उपार्जन से जो समय बचता था, उसमें वह कुछ पढ़ा भी करता था। उसने अपनी स्वीकृति दे दी।

भले आदमी ने उस बालक को अपने साथ ले लिया और उसकी सारी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध स्वयं किया। वह उसकी आदतों पर मुग्ध था। स्वयं उसकी शिक्षा की देख-रेख करते-करते वह बालक विद्वान बन गया। बड़ा होने पर वह यूनान का महान् दार्शनिक पैथागोरस कहलाया और भला आदमी जिसने एक दृष्टि में बालक के अन्दर छिपी हुई महानता को पहचाना था, वह था यूनान का विश्व-विख्यात तत्वज्ञानी-डेमाकीटस!

पैथागोरस के बचपन के जिस गुण पर डेमोकीटस मुग्ध हुआ था, (छोटे कार्यों में भी पूरा दिलचस्पी और कलापूर्ण ढंग से महानता का प्रदर्शन) यह देखने में साधारण-सा था, पर वास्तव में महानता का बीज उसी के अन्दर छिपा हुआ था। जो मनुष्य अपने छोटे-छोटे कार्यों तक को पूरी रुचि और कलापूर्ण ढंग से करता है, वह बड़े कार्यों को और भी सावधानी से पूरा करेगा और प्रशंसनीय होगा। जो छोटे-छोटे कामों में भी अपनी महानता की छाप लगा देता है, दुनिया उसी को महत्व प्रदान करती है।

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महानता के गुणों के प्रदर्शन के लिए यह आवश्यक नहीं कि बड़े पैमाने पर ही आपके पास सामान हो, या नाना प्रकार की कला-सामग्री हो, विपुल विस्तार हो। कलाकार की आत्मा में यदि सच्ची कलात्मकता वर्तमान है, तो वह अल्प साधनों से ही अपनी महानता प्रदर्शित कर सकता है।

महात्मा जी ने एक बार एक लेख लिखा था “झाड़ू देने की कला।” भला झाड़ू देने जैसे तुच्छ कार्य में भी क्या कोई सौंदर्य हो सकता है? उन्होंने दिखाया कि इस साधारण से कार्य में भी सावधानी की आवश्यकता है।

आप अपने कार्यों को देखिए। सुबह से शाम तक किये जाने वाले कार्यों की परख कीजिए और फिर स्वयं ही निर्णय कीजिए कि क्या उनमें आपने अपनी छिपी हुई महानता का परिचय दिया है? क्या उससे आपके चरित्र की कलात्मकता, सुरुचि, सुव्यवस्था और संतुलन प्रकट होता है? क्या आपका कार्य आपके चरित्र के गौरव के अनुकूल है? क्या उससे आपकी असाधारण योग्यता, बुद्धि और सूझ-बूझ प्रकट होती है? क्या उसमें आपके व्यक्तित्व की विशेषताएं भरी हुई हैं?

एक बार एक इन्टरव्यू हो रहा था। इन्टरव्यू करने वाले एक मेज को सामने रखे बैठे थे, सामने उम्मीदवारों के लिए कुर्सियाँ रखी हुई थीं। एक-एक कर उम्मीदवार आते थे और कुर्सी पर बैठकर पूछने वालों के प्रश्नों के उत्तर देते थे। उम्मीदवार एक से एक सुन्दर और आकर्षक वस्त्र, चमचमाते हुए पालिशदार जूते डाले चले जाते थे। एक उम्मीदवार साधारण कपड़े पहिने हुए था। वह जब कमरे में प्रविष्ट हुआ तो उसने देखा कि सामने मार्ग में एक पुस्तक पड़ी हुई है। उसने उस पुस्तक को उठाया और मेज के एक किनारे पर शिष्टतापूर्वक रख दिया। उसकी यह मनोवृत्ति देखकर इन्टरव्यू करने वाले को उसकी सावधानी पर विश्वास हो गया और वह चुन लिया गया। वह एक साधारण-सा कार्य था, पर इसी से उसके चरित्र की महानता प्रकट होती थी।

इसी प्रकार हमारी अनेक आदतों, कार्यों, वस्त्रों, शिष्टाचार व्यवहार आदि से हमारा व्यक्तित्व प्रकट हुआ करता है। जहाँ हमारी ये आदतें महानता दिखाती हैं, वहीं हमारे आने वाले पतन की भी सूचक हैं।

मान लीजिए, बाजार में बढ़िया केले बिक रहे हैं। हमारी तबियत उन पर चल उठती है, पर जेब खाली। आदत हमारे ऊपर चढ़ बैठती है। दुकानदार हमारी जान पहचान का है। उधार दे देगा। आइये, खरीद लें। हम मनोविकार पर नियंत्रण न कर उससे चार केले उधार ले लेते हैं और देखते-देखते खा डालते हैं। केले वाले के चार आने कितनी कम देर में हमारे सिर चढ़ जाते हैं। अब उधार देते हुए हमें मन ही मन कुछ संकोच सा होता है। जब कभी केले वाले के पास से निकलते हैं, कतरा जाते हैं, बचने की कोशिश करते हैं, उधार देना भूल जाते हैं, पैसे देने का मन नहीं करता। इसी प्रकार छोटी-छोटी चीजें लेने से हमारी उधार की आदत बढ़ती जाती है। यही बढ़कर हमारे घरबार, जमीन, जायदाद, इज्जत आदि को नष्ट कर डालती है। ऋण आपका घातक शत्रु है, जो तनिक सी शिथिलता में आपको ले बैठता है।

इसी प्रकार और भी गन्दी आदतें हैं। आपका मित्र सिगरेट पीता है। आपको भी पेश की जाती है। आप अनचाहे मन से दो कश लगाते हैं। उन्हीं मित्रों के साथ आपको यह आदत लग जाती है। सिगरेट के बाद पान, बीड़ी, मद्य इत्यादि एक के बाद एक गन्दी आदत आपको शिथिल करती जाती है। आप प्रतिमास 15-200 रुपये पान-बीड़ी वाले को दे डालते हैं। फिर व्यभिचार आकर सर्वस्व नष्ट कर देता है।

यही बात और मनोविकारों की भी है। किसी ने हमारा कहना न माना कि हम आवेश में आकर गर्म हो उठे। नाराजी से हम घर भर डालते हैं। सब को खरी-खोटी सुनाते हैं। क्रोध का भूत हमारे साथ है। हम दुकानदार हैं, तो यह दुष्ट हमारी जिह्वा को उछाल कर ग्राहकों को बहका देता है। वे दूर ही से भाग जाते हैं। यदि हम अफसर हैं, तो यह हमारे मातहतों को असंतुष्ट रखता है। यदि हम रेलगाड़ी में सफर कर रहे हैं, तो यह दुष्ट हमें चैन से यात्रा नहीं करने देता। ऐसा अड़ियल, उत्तेजित या शक्की मन यह हमारा शत्रु ही है।

इसी प्रकार हमारे चरित्र की असंख्य छोटी-छोटी भूलें हमें नीचे गिराती रहती हैं। इन पर हम कोई ध्यान नहीं देते, पर वास्तव में ये ही हमारे चरित्र के वारे-न्यारे करती रहती हैं।

महानता हमारे चरित्र और स्वभाव में प्रचुरता से भरी पड़ी है। हमें चाहिये कि इसी पक्ष पर मनन चिंतन कर इसे विकसित करें। तमोगुण हमारे अन्तःकरण में मलीनता उत्पन्न करता है जिससे अशुभ विचार आते हैं। अतः अपने शुद्ध, सत्त, चित्त, आनन्द रूप का ही ध्यान करना चाहिए। चित्त में शान्त, पवित्र और उक्त विचारों को ही दृढ़ता से जमाइये। अपनी महत्ता, अपनी शक्ति, अपने दैवी गुणों का चिन्तन करने से मस्तिष्क बलशाली बनता है और हृदय से प्रफुल्लता का झरना प्रवाहित होने लगता है। अपने सत्वगुण पर विचार करने से आत्म-बल की वृद्धि होती है। आपकी सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि आप कितने अंशों में अपनी महत्ता अनुभव करते हैं, अपने प्रति आपका कितना विश्वास है, आप उसको कितना व्यवहार में प्रत्यक्ष करते हैं।

“उच्च्तिष्ट महते सौभगाय” (अथर्व 2-6-2 )

श्रेष्ठ बनना ही महान् सौभाग्य है। जो महानता खोजने और महापुरुष बनने में प्रयत्नशील है, वही वास्तव में धन्य है।

डॉ. दुर्गाशंकर नागर ने महान् बनने के सूत्र इस प्रकार दिये हैं। एक-एक शब्द ध्यान देने योग्य है :-

“क्या तुम संसार में अपना अमर नाम छोड़ना चाहते हो? यदि ऐसा है तो आज ही से महत्ता की, बड़प्पन की कल्पना अपने मन में स्थापित कर दो और भावना करो कि तुम दिन प्रतिदिन उच्च स्थिति में प्रवेश कर रहे हो..... प्रतिक्षण अपनी कल्पना अधिकाधिक पुष्ट करते रहो और निरन्तर दृढ़ प्रयत्न से अवश्य तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा। प्रत्येक सद् संकल्प में आत्मशक्ति ओत-प्रोत रहती है। हमारे महान् बनने का कारण हमारी आत्मा में ही विद्यमान है। बाहर कहीं खोजने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य की महत्ता का लक्षण आत्म-विश्वास है। महान लक्षों का चिन्ह मन में रखने से कल्पना -शक्ति अधिकाधिक दृढ़ होकर विशाल और बलवान होती है। अपनी आत्मा की विशालता का चिन्तन करो। महानता ही तुम्हारा आदर्श है। अतः अपनी कल्पना का मानसिक चित्र अपने विषय में विशाल, महान् एवं सुन्दर बनाओ और दृढ़ प्रयत्न करो।

अपनी महानता के विचार मन में दृढ़ता से जमा देना मनोभूमि में महानता के बीज बो देना है। यही विचार बीज कालाँतर में अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित होते है और आपकी महत्ता की छाप आपके कुटुम्बियों, मित्रों, पड़ोसियों और मिलने-जुलने वालों पर जमा देते हैं। महानता का आन्तरिक विश्वास आपको आगे धकेलने वाली शक्ति है। इसे दृढ़ता से धारण कीजिये। जिस क्षेत्र की महानता इष्ट हो, उसी को सर्वोत्कृष्ट रूप में धारण कीजिए और अपने दैनिक जीवन से प्रत्यक्ष कीजिए।

अपने आपको तुच्छ समझना एक पाप भरा आत्म-पतन है। इसके भागी न बनिये। अपना तिरस्कार करना आत्म-हत्या का ही एक भेद है। खुद को तुच्छ और नीच समझने वाला व्यक्ति खुद चरित्र की सर्वोच्च तथा परमोत्कृष्ट वस्तु की जड़ काट रहा है। आत्म- तिरस्कार सम्बन्धी प्रत्येक विचार व्यक्तित्व की शक्ति एवं उन्नति को नष्ट करने वाला भयानक मानसिक रोग है।


विज्ञान के सर्वनाशी प्रभाव का प्रतिकार धर्म से ही हो सकेगा।

(श्री राजेश्वर प्रसाद जी)

संसार में मनुष्य का जीवन प्रायः अभावपूर्ण होता है और उससे बचने के लिए वह तरह-तरह के प्रयत्न करता रहता है। ये अभाव दो प्रकार के होते हैं- शारीरिक और मानसिक। शारीरिक कष्टों और अभावों के लिए धार्मिक और दार्शनिक विचारों की वृद्धि की गयी। विज्ञान प्रकृति के क्षेत्र में खोज करता है और दर्शन अन्तःकरण के विषय में चिन्तन करता है। व्यावहारिक जीवन में धर्म और विज्ञान का विशेष है। धर्म का आधार विश्वास है और उसकी प्रवृत्ति हृदय से होती है। विज्ञान का सम्बन्ध मस्तिष्क से है और उसके आधार तर्क और विचार है।

शास्त्रों में धर्म की परिभाषा यह बतलाई गई है कि जो अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति कराये, वही धर्म है, अर्थात् मनुष्य के कर्तव्य और अकर्तव्य और पुण्य- शुभ और अशुभ कर्म का सम्बन्ध धर्म से है पाप और पुण्य की स्पष्ट व्याख्या कर सकना अथवा इन दोनों की ठीक-ठीक सीमा बतला सकना बड़ा कठिन कार्य है, क्योंकि इसका निर्णय करने के लिए देश व काल का विचार करना भी परमावश्यक है। ऐसी ये बातें हैं जो हमारे देश में पाप मानी जाती हैं, योरोप और अमरीका के अनेक देशों में उनको नहीं माना जाता और न उनका कोई कुपरिणाम देश में आता है। इस समस्या को सुलझाने के लिए इसके दो रूप मान लिये गये हैं-

एक प्रमाण धर्म व दूसरा व्यवहार धर्म। समय के प्रभाव से इससे हमारे व्यवहार धर्म का स्वरूप बड़ा विवादास्पद हो गया है। मत-मतान्तर, बाह्य आडम्बर आदि की उसमें अधिकता हो गई है। इसी कारण विज्ञान तर्क के इस युग में रहने वाला सामाजिक प्राणी धर्म के विषय में उदासीन होता जाता है। इतना ही नहीं, वह धर्म पर तरह- तरह का आक्षेप भी करने लगा है। लोग कहा करते हैं कि - “पाप-पुण्य क्या है? धर्म तो सदा बदलता रहता है। अपनी -अपनी सुविधा और लाभ की दृष्टि से ही लोग धर्म को मानते हैं, इसलिये कौन धर्म है और कौन अधर्म, इसका निर्णय कोई नहीं कर सकता” आदि। पर ऐसे व्यक्तियों को जानना चाहिए कि धर्म अखण्ड और एक रस है तथा उसकी परीक्षा का एक मात्र उपाय, जो ऋषियों ने बतलाया है, वह यही है कि “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्” अर्थात् “जो बात अपने को बुरी लगती हो वह दूसरे के प्रति मत करो।” इसी के आधार पर गोस्वामी जी ने पाप-पुण्य का यह लक्षण बतलाया है-

पर-हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर-पीड़ा सम नहिं अधिकाई॥

वैज्ञानिकों का स्वभाव होता है कि हर बात में ‘क्यों’ और ‘कैसे’ का प्रश्न करना। इसका नतीजा यह हुआ कि मनुष्य के हृदय से श्रद्धा अथवा विश्वास का भाव घटता जाता है और वह हर एक बात को शंका की दृष्टि से देखने लगा है। वह हर एक वस्तु का विश्लेषण करके उसकी बनावट तथा मूल तथ्यों को जानना अपना परम कर्तव्य समझता है। इसलिये यह मनुष्य शरीर को किसी महान अथवा पवित्र शक्ति का निवास- स्थान न मानकर कैल्शियम, फास्फोरस आदि दावों से बना हुआ एक चलता- फिरता पुतला मात्र मानने लगा है। वह हर बात में अंकों की दुहाई देता है और उनके द्वारा अनेक बार स्वयं ही धोखा खा जाता है। इस सब का आशय यही है कि वर्तमान समय में हृदय की भावनाओं की उपेक्षा करके बुद्धि तथा तर्क को ही सबसे बड़ा और सत्य मानने लगे हैं और हर एक बात को विवाद द्वारा ही तय करना चाहते हैं। इस विवाद का कहीं अन्त नहीं होता और इस कारण हम कभी एक अटल सिद्धान्त पर नहीं पहुँच पाते।

आधुनिक विज्ञान का आरम्भ अरब देश से ‘ऐलकैमी’ के रूप में हुआ। योरोप में उसने कैमिस्ट्री का रूप धारण किया। यहीं से वह भारतवर्ष में भी आया। पर इस विज्ञान के कारण न तो अरब निवासियों ने अपनी मस्जिदों का विरोध किया और न योरोप वालों ने अपने गिरजा घरों को गिरा दिया। पर भारत वर्ष में ऐसे अनेक व्यक्ति मिलते हैं जो ‘विज्ञान’ का अर्थ यही समझ बैठे हैं कि धर्म का विरोध और खण्डन किया जाय। इसका एक मुख्य कारण हमारी सैकड़ों धर्मों की दासता है, जिसने हमें भुलावे में डाल दिया है। अन्यथा धर्म का विचार करने से ही हम यह जानने का उद्योग करते हैं कि इस जीवन के परे भी कुछ है, संसार का प्रत्येक पदार्थ अपने उत्पत्ति स्थान की ओर चला जा रहा है और हमको भी अपने उद्गम की खोज करनी चाहिये।

वैज्ञानिक युग के तीन खास लक्षण माने गये हैं-क- प्रकृति पर विजय, ख- यन्त्रों की अत्यधिक उत्पत्ति और प्रचार, ग- तर्कवाद की प्रबलता। इसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक आदमी किसी के मत को न मानकर अपनी ही राय और सम्मति को प्रधानता देता है और उसके लिए हर तरह के तर्क-वितर्क करता है जिस देखकर गोस्वामीजी का यह कथन याद आता है :-

मारग सोई जा कहं जो भावा। पंडित सोई जो गाल बजावा॥

पर यदि इतिहास पर निगाह डाली जाय तो इसमें विशेष आश्चर्य की कोई बात न जान पड़ेगी। रावण का ही उदाहरण ले लीजिये। उसने वायु, जल, अग्नि आदि पाँचों तत्वों पर अधिकार कर लिया था और मृत्यु तक को पराजित किया था। दूसरे शब्दों में उसने प्रकृति पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली थी और वह वैज्ञानिक आविष्कारों से इच्छानुसार कार्य ले सकता था। पर उसकी बुद्धि पर कुतर्क का ऐसा पर्दा पड़ा कि वह धर्म का कट्टर विरोधी बन गया और सब कुछ देख-सुनकर भी वह भगवान पर विश्वास न कर सका। ऐसी ही दशा आज हो रही है। द्वितीय महासमर में ही महानाशकारी अस्त्र-शस्त्र काम में लाये गये। फिर एटम बम निकाला गया। उसके बाद हाइड्रोजन बम तैयार किया गया। इस प्रकार संसार सर्वनाश के निकट पहुँचता जाता है, पर लोगों की आँखें नहीं खुलतीं और वे यह विश्वास करने को तैयार नहीं होते कि इस विश्व का संचालन करने वाली कोई महान शक्ति है और उसके बिना कोरा तर्क और विज्ञान मनुष्य का कल्याण कदापि नहीं कर सकता।

विज्ञान के इस युग में यह एक फैशन-सा बन गया है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि को बहुत विशाल और युक्तियुक्त समझता है। इसका परिणाम भी स्पष्ट दिखलाई पड़ रहा है कि आज विनय और शील के दर्शन दुर्लभ हो गये हैं। वहाँ तो पहले जमाने में सुकरात जैसे ज्ञानी यह कहा करते थे कि “मुझे मालूम है कि मैं कुछ भी नहीं जानता।” नैतिक आचरण की श्रेष्ठता के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने में लघुत्व का अनुभव करें और इस प्रकार विश्व की संचालक महान शक्ति की ओर अग्रसर होने का प्रयास करें। इस प्रकार की भावना, विश्वास के आधार पर ही उत्पन्न हो सकती है, तर्क-बुद्धि के द्वारा ऐसा होना सम्भव नहीं। भगवान कृष्ण ने अर्जुन से यही कहा था कि “तू अपने समस्त कर्मों को मुझे अर्पण कर, क्योंकि संसार के प्रत्येक पदार्थ और कार्य में मैं उपस्थित हूँ। तू चिन्ता मत कर, मैं समस्त कठिनाइयों से तेरा उद्धार कर दूँगा।”

हमारे शरीर में मस्तिष्क और हृदय दोनों की ही आवश्यकता है। बुद्धि के बिना विश्वास अंधा है और विश्वास के बिना बुद्धि भी लँगड़ी है। इन दोनों का ठीक ढंग से सामंजस्य होने से ही जीवन सफल और सुखी बन सकता है। हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि वर्तमान विज्ञान और उसके सर्वनाशी आविष्कारों से मनुष्य जाति का कल्याण कदापि नहीं हो सकता, वरन् हम दिन पर दिन मृत्यु के मुँह में अग्रसर होते चले जायेंगे। इससे बचने का एक मात्र उपाय यही है कि मनुष्य भगवान में विश्वास करके अपनी रक्षा की प्रार्थना करे। जब तक ऐसा न किया जायेगा तब तक न तो सुवर्ण भण्डारों से सद्भावना की स्थापना होगी और न अणु बम से शत्रुता का भाव दूर हो सकेगा। इसके लिए हमें विश्व- बन्धुत्व की भावना का उदय करना होगा और वह भावना तभी उत्पन्न हो सकेगी। जब हम परमात्मा को अपना माता-पिता मान सब मनुष्यों को उसी की सन्तान और अपना भाई समझने लगें।


दूसरों को मान दीजिए।

(श्री दौलतराम कटरहा, दमोह)

किसी भक्त ने कहा है-

परमेश्वर के भक्त की प्रथम यहै पहिचान। आपु अमानी ह्व रहै, देय और को मान॥

अर्थात् भक्ति वही है जो मान प्राप्त करने की स्वयं कोई इच्छा न रखते हुए दूसरों को मान देवे। जो ऐसा करेगा, निश्चय ही उसका अभिमान गल जायेगा। प्रायः अपनी भौतिक स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए ही मनुष्य मान की इच्छा रखता है, किन्तु जहाँ भौतिक स्थिति को भी सुरक्षित रखने की इच्छा गई और करने की इच्छा आई, वहाँ मान प्राप्त करने की इच्छा भी यद्यपि निःशेष नहीं होती पर पर्याप्त मात्रा में घट जाती है- पर दूसरे को मान देने से तो ‘अहं’ का लोप ही हो जाता है। अगर मैं अपने लूटने वाले को अपनी फजीहत या बेइज्जती करने की इच्छा रखने वाले को भी मन से आदर दे सकूँ तो फिर मेरा ‘अहं’ रहेगा ही कहाँ। धन, धरणी, पद, सम्पदा, प्रिय वस्तु, प्राण, मान और सन्तान पर भी चोट करने वाले के प्रति यदि मेरे मन में विकार न आये, उसके लिए भी मेरे हृदय में आदर का भाव और जबान पर आदरसूचक शब्द हो, उसे भी अगर मैं बड़प्पन का आदर दें सकूँ तो फिर मेरा अहं भाव शेष रहेगा ही कहाँ और फिर अहंकार के गलते ही विश्वात्मा से एकात्मता का अनुभव करने में देर ही क्या लगेगी? अतएव इन्द्र को तो अपना अभिमान मिटाने हेतु औरों को सदैव बड़प्पन ही प्रदान करना चाहिए।

महात्मा तुलसीदासजी ने अपने राम-चरित मानस में अनेक स्थानों पर रामचन्द्र जी से उपदेश करवाया है। उनमें लक्ष्मण, भरत और नारद के प्रति किया गया उपदेश जिसका उल्लेख अरण्यकाण्ड में है, लंका काँड में विभीषण के प्रति किया गया उपदेश तथा उत्तरकाण्ड में वर्णित भरत तथा पुरवासियों के प्रति किया गया भगवान राम का उपदेश ज्ञान की दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट प्रतीत होता है इन उपदेशों में भगवान राम ने मानप्रद होना भक्ति का लक्षण बताया है। भगवान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि ज्ञान होने पर मान आदि की बिल्कुल इच्छा नहीं रहती-

ज्ञान मान जहं एकउ नाहीं। देख ब्रह्म सम्मान जग माहीं॥

नवधा भक्ति का वर्णन करते समय उन्होंने शबरी के प्रति भी यही कहा है कि अमानित्व होना ही तीसरी प्रकार की भक्ति है-

गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।

नारद जी के प्रति रामचन्द्रजी सन्तों के गुणों का वर्णन करते हैं तो कहते हैं कि सन्त सदैव अप्रमत्त रहते हैं तथा स्वयं मानहीन रहते हुए दूसरों को मान दिया करते हैं-

सावधान मानद मद हीना। धीर धर्म गति परम प्रवीना॥

भरत जी से तो भगवान कहते हैं कि हे भरतजी, वे प्राणी तो मेरे लिये प्राणों के समान प्रिय हैं जो दूसरों को मान तो देते हैं, पर स्वयं मान नहीं चाहते-

सबहिं मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी॥

इस प्रकार स्थान-स्थान पर अमानित्व के साथ “मान-

“प्रदता” इस गुण की भी प्रशंसा की गई है। अमानित्व की अपेक्षा में “मान-प्रदता” में अधिक हृदय को पवित्र करने की क्षमता है।

महाकवि शूद्रक ने मृच्छकटिक में आर्य चारुदत्त के लिए अत्यन्त श्रेष्ठ विशेषणों का प्रयोग करते हुए कहा है कि वे सबका सत्कार करने वाले थे और उन्होंने किसी का अपमान नहीं किया- “सत्कर्त्ता बमन्ता पुरुष गुणनिधिर्दक्षिणोदार सत्त्वः” (प्रथम अंक 48 वाँ श्लोक)। अतएव अमानित्व की अपेक्षा मान-प्रदता में अधिक विशेषताएं हैं, ऐसी मेरी मान्यता है।

चैतन्यदेव एक श्लोक में बतलाते हैं कि अपने को तिनके जैसा छोटा समझते हुए और वृक्ष जैसे सहनशील रहते हुए जो काटने पर भी लकड़ी और फल ही देता है तथा मान की अभिलाषा न रख दूसरों को सदा मान देते हुए सदा भगवान का स्मरण करना चाहिए :-

तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुनाः। अमानिना मानदेव कीर्तनीयो सदा हरिः॥

हिन्दू अपने समस्त अवतारों में राम को परम शीलवंत मानते हैं, पर शील का अर्थ क्या? रामचन्द्रजी नम्रता की मूर्ति हैं और गाँधी जी के शब्दों में कहें तो वे नम्रता के सम्राट हैं, वे सबको मान देते हैं, सबसे प्रिय बोलते हैं, पहिले बोलते हैं और पुरुष वचनों का भी उत्तर प्रिय देते हैं। महर्षि बाल्मीकि ने इसी कारण रामचन्द्रजी को स्थान-स्थान पर “स्मित पूर्वाभिभाषी” (2-2-42) “पूर्वभाषी प्रियंवद” (2-1-13) “पूर्वाभिभाषी मधुरः” (2-48-300) आदि कहकर सम्बोधित किया है। भगवान राम के इन पवित्र गुणों का वर्णन हमें बाल्मीकीय रामायण के प्रारम्भ में ही बालकाँड प्रथम सर्ग में तथा अयोध्याकाँड के प्रथम और द्वितीय सर्ग में विस्तारपूर्वक मिलता है, भक्तों के लिए तो यह आनंद का खजाना है, स्थित प्रज्ञत्व की कामना रखने वालों के लिए कदाचित गीता से भी बड़ा अमृतसागर है, और निरन्त आत्म- शोधन करने वालों के लिए अद्वितीय या बेजोड़ रत्न-संग्रह है। सम्भवतः मानवों के लिए उपादेय गुणों का इतने संक्षेप में संग्रह संसार की किसी भी अन्य पुस्तक में नहीं है। राम निरभिमानी हैं, अपने श्रेष्ठ गुणों का उन्हें अभिमान नहीं है, अपने पराक्रम से वे विस्मित नहीं हैं, सदैव दूसरों का वे सत्कार करने वाले हैं। भगवान के ये गुण हमें प्रभावशाली होते हुए भी निर्मंद, वैभवशाली होते हुए भी प्रियवंद, प्रभुत्व सम्पन्न होते हुए भी क्षमाशील और वीर्यशाली होते हुए भी जितेन्द्रिय बनावें।


मनुष्य स्वयं अपना भाग्य है।

(श्री सविता रस्तोगी एम.ए. (प्रीवि.) पिलानी)

मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। भीषण झंझावातों और तूफानों का निर्भयतापूर्वक सामना करने वाले पुरुषार्थी एवं साहसी व्यक्तियों के समक्ष विपरीत परिस्थितियाँ और विपदायें हार मान जाती हैं और उसका प्रशस्त पथ निर्विघ्न हो जाता है, सफलता उनके चरण चूमती है, भाग्य उन पर मुस्कराता है, यश, मान एवं समृद्धि उनके अनुगामी होकर चलते हैं। स्पष्ट है कि ऐसे पुरुषार्थी मनुष्य स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं। संकट उन्हें निर्दिष्ट पथ से डिगा नहीं सकते, असफलताएं उन्हें झुका नहीं सकतीं, वह एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आँधी, तूफानों और बवंडरों को पछाड़ते हुए आगे बढ़ते हैं और हर मंजिल एवं आने वाली सफलता उनकी आशा को द्विगुणित करती जाती है। निश्चय ही ऐसे व्यक्ति जीवन में आनन्द, सफलता और विजय के भागी होते हैं।

दूसरी प्रकार के मनुष्य भाग्यवादी होते है और जरा सी असफलता को भाग्य की क्रूरता एवं दैव की विडम्बना कहकर अपने को भाग्य के भरोसे छोड़ देते हैं। एक ओर पुरुषार्थवादी मनुष्य हैं जो अपने भविष्य का निर्माण अपने बाहुबल और सतत परिश्रम के द्वारा करते हैं। किंतु जिस व्यक्ति को स्वयं पर भरोसा नहीं, जिसका मन उत्साहपूरित नहीं, निराशा ही जिसकी सहचरी है, ऐसे अकर्मण्य व्यक्ति जीवित ही निष्प्राण के समान जीवन का बोझ ढोते रहते हैं। दैत्य उन्हें जकड़ लेता है और भविष्य उन्हें अन्धकारमय एवं अनिश्चित प्रतीत होता है। निराशा जीवन का मरघट है। भाग्यवादिता और पराजय दोनों सहगामी हैं। भाग्य के विषय में भविष्यवाणी करने वाले पेशेवर ज्योतिषियों के कहने में आने वाले अपने को भाग्यहीन समझकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। निराधार एवं अनिश्चित बातों को अमिट भाग्यरेखा मानकर चलने वालों का आत्मविश्वास डगमगा उठता है और ऐसी स्थिति में वह अपनी धर्मनिष्ठा में विश्वास खो देते हैं। जीवन की प्रगति रुक जाती है। जीवन नीरस एवं निष्प्राण हो जाता है।

एक देश एवं राष्ट्र भी तभी तक उन्नति एवं समृद्धि के शिखर पर आरुढ़ है जब तक उसके कर्मवीर पुत्र जी-जान की बाजी लगाकर अथक लगन एवं परिश्रम से अपने ध्येय-पूर्ति में जुट पड़ते हैं। हमारा भविष्य सुनहरा तभी बन सकता है जब हम आत्मविश्वास की रक्षा करते हुए निरन्तर प्रयास में लगे रहे, गंतव्य की ओर हमारा ध्यान हो और काँटों के पथ पर चलते हुए अपना अभीष्ट प्राप्त करें।

संघर्षों एवं कष्टों में निखर कर ही मनुष्य बनता है किन्तु संघर्षों एवं द्वंद्वों से घबराने वाले दुर्बल होकर भाग्याश्रित हो जाते हैं। पुरुषार्थी मनुष्य अपने मार्ग का स्वयं संधान करता है, एक लगन के साथ उत्तरोत्तर बढ़ते हुए वह प्रतिक्षण नवीन प्राणों का अनुभव करता है।

मनुष्य का व्यक्तित्व और बाह्य जगत एक दूसरे के सापेक्ष हैं। जैसा व्यक्तित्व होता है, उसी प्रकार का जगत एवं वातावरण भी बन जाता है। हमारा व्यक्तित्व हमारे विचारों का ही प्रतिबिम्ब है। कर्मठ व्यक्ति अपने चारों ओर आशा, उत्साह एवं सौहार्द का वातावरण बना लेते हैं और परस्पर आशा एवं प्रगति का संदेश देते हैं, वे अपने साथ-साथ दूसरों को भी नवीन ज्योति देते हैं और सच्चे अर्थों में जीवन के पारखी होते हैं। मनुष्य के विचार उसके जीवन-निर्माण में बहुत महत्व रखते हैं। किन्तु निराशावादी स्वयं ही नैराश्य में डूबे रहते हैं, दूसरों को भी वे निरुत्साह एवं गिरी हुई बातें कहकर भाग्य को दोष देते हैं। कार्य करने के पहले ही उसके फलाफल की कल्पना करने वाले, साहस और धैर्य को तिलाञ्जलि दे जीवनपर्यन्त निराशा के सागर में गोते लगाते हैं। आप आशावादी व्यक्ति से मिलिये, उसकी मुस्कराहट में जीवन होता है, उसकी प्रसन्नता की किरणें वातावरण को भी सजीव एवं मुखरित कर देती हैं, जीवन का हर क्षण उनके लिये नया स्पन्दन एवं संदेश लाता है। अखण्ड प्रसन्नता प्रभु का प्रसाद है और इससे अन्तर और बाहर दोनों प्रफुल्लित रहते हैं। जीवन का हर दिन उमंग और आशा का संदेश लिये आता है, प्रकृति उनको मदमाती जान पड़ती है, पवन का हर झोंका सौरभ की सृष्टि करता है। ऐसे व्यक्तियों से मिलकर आप भी नई स्फुरण और उत्साह अनुभव करते हैं और जीवन आपको सुन्दर, सरस और स्वप्निल लगता है।

साधारणतः साँसारिक वैभव एवं ऐश्वर्य को भाग्य का द्योतक समझा जाता है, किन्तु वस्तुतः ऐसे व्यक्ति अभागे ही हैं क्योंकि सभी आवश्यकताओं और इच्छाओं की सरलतापूर्वक पूर्ति हो जाने से उन्हें अपने निर्माण और आत्म-ज्ञान का अवसर ही नहीं मिल पाता। वस्तु जगत की ठोस मान्यताओं से दूर रहने वाले संघर्ष का आनन्द क्या जानें। वास्तव में भाग्यवान वे हैं जो परिस्थितियों का डटकर सामना करने में आनन्द और गौरव का अनुभव करते हैं- वे अपने भाग्य की रेखा को बदल देते हैं। संसार के समस्त वैभव उनके चरणों में लोटते हैं।

कठिन परिश्रम से मनुष्य प्रकृति के सम्पूर्ण रहस्य एवं सृष्टि के समस्त भण्डार प्राप्त कर लेता है। मनुष्य की प्रकृति विजय की कहानी इसी पुरुषार्थ एवं प्रयत्न की कुञ्जी में निहित है। दृढ़ आत्म-विश्वास की तीखी जल-धारा के सम्मुख बाधाओं की चट्टानें टूट-टूट कर बिखर जाती हैं और विजयश्री स्वयं वरण करती है। आज फिर आवश्यकता है कि हम अपनी क्षमता को पहचानें, अपनी भुजाओं के बल को नापें, सारे स्वर्ग का सुख हमें पृथ्वी पर ही मिल जायेगा, संसार हमसे प्रेरणा लेगा और उस प्रकाश में समस्त मानवता त्राण पा सकेगी। गीता में तो स्वयं भगवान कर्तव्य करने को प्रेरित करते हैं । कर्म पर आरुढ़ रहो, उसका फल मत सोचो। जीवन में इसी कर्मशीलता के समावेश से जीवन का चिरन्तन सत्य पा सकोगे, महान बनने का मार्ग कठिन एवं कंटकाकीर्ण होता है, जो उस पर हँसता हुआ, कष्टों को पथ पर झेलता हुआ बढ़ चलता है उसका मार्ग स्वयं खुल जाता है, प्रकाश की किरणें पथ को आलोकित करती हैं, जीवन में आशा के स्रोत फूटते हैं।

अपने जीवन-दीप को क्षुद्र दीपक की भाँति मत जलाओ, जो किंचित वायु-आन्दोलन से कम्पित हो उठे वरन् अपने जीवन-दीप की लौ इतनी दृढ़ कर लो जो भीषण से भीषण प्रलय की आँधी में भी अखण्ड जलती रहे। किन्तु वह दीपमयी ज्योति आपके अन्तःकरण से निकलनी चाहिये, बस आपका भाग्य आपकी मुट्ठी में है, चाहे आप उसको जिधर मोड़ दें।

हमारी महान् संस्कृति निरन्तर कर्म करने का संदेश देती है। हमारे धर्म-ग्रन्थ,उपनिषद्, महान धर्म-प्रणेता बनो, प्रमाद, आलस्य, दुराचार, भोग को त्याग दो, तुम्हारा जीवन प्रतिक्षण लौ की भाँति जलता रहेगा। गीता का केन्द्र-बिन्दु ही कर्मयोग है। जीवन-युद्ध में संग्राम करते हुए विजय प्राप्त करना ही गीता सिखाती है। जो इस संसाररूपी कर्मक्षेत्र के विराट युद्ध में जीत गया वही महाशक्तिशाली है।

निरन्तर कर्तव्यों का पालन करते हुए सफलता के शिखर पर पहुँचना ही जीवन की लक्ष्य-सिद्धि है। सिकन्दर और नैपोलियन जैसे विश्वविजेता असंभव शब्द ही को विश्व-शब्दकोष में से निकालना चाहते थे। निश्चय ही कर्मठ व्यक्तियों के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। बिना प्रयास ही अलाउद्दीन के चिराग की कल्पना करना अकर्मण्यता का द्योतक है। कर्म करते चलो, फल की चिन्ता मत करो, फल अच्छा या बुरा, उसको सहज स्वीकार करो, विचलित मत होओ। परिश्रमी व्यक्तियों की तो प्रभु स्वयं सहायता करते हैं? निरन्तर इस प्रकार बढ़ते रहो- प्रभु स्वयं पथ निर्देश करेंगे। गीता में भगवान स्वयं कहते हैं-जो अनन्य भाव से मुझ में आस्था रखता हुआ कर्म-करता है मैं स्वयं उसका योग क्षेत्र वहन करता हूँ। सौंप दो अपने को उस जगतनियन्ता के अंक में, वह अपने आप हमारी और आपकी रक्षा करेंगे। बस किसी भी लक्ष्य-प्राप्ति के लिए सजग हो, एकनिष्ठ हो, कर्म करने के लिए कटिबद्ध हो जाओ। भाग्य-सूर्य स्वयं मुस्करा उठेगा, जीवन सुन्दर एवं महान बनेगा।


संकट का समय और ग्रहों का प्रभाव

(श्री ‘भारतीय योगी’)

वर्तमान समय में राजनीतिज्ञ और भविष्यवेत्ता दोनों एक स्वर से भावी संकट की सूचना देते रहते हैं । संसार में संघर्ष के कारण दिन पर दिन बढ़ते जाते हैं। कुछ वर्ष पहले कोरिया को लेकर अमरीका और चीन का संघर्ष हुआ था। यह किसी तरह मिटाया गया, तो उसके बाद इण्डोचीन में युद्ध की आग भड़क उठी थी। उसके उत्तरी भाग में साम्यवादी शासन स्थापित होने पर शाँत हो सकी। गत वर्ष मिस्र पर आक्रमण हुआ और महायुद्ध की सम्भावना उत्पन्न हो गई। भारत तथा अन्य शाँतिप्रिय देशों के उद्योग से वह संकट भी किसी प्रकार टाला गया। अब एक महीने से सीरिया के ऊपर आक्रमण की धमकी दी जा रही है। इस प्रकार ये घटनायें स्पष्ट बतला रही हैं कि विश्वव्यापारी संघर्ष की व्याधि निश्चित रूप से जड़ पकड़ चुकी है और एक जगह दबाई जाती है तो कुछ समय बाद दूसरे स्थान पर उमड़ आती है। जहाँ आग पहले भड़की थी, वहाँ भी जो शाँति हुई है, वह अस्थायी ही है। कोरिया, फारमोसा, इण्डो-चीन, ईरान, अल्जीरिया, मिस्र, सीरिया सब देशों में अशाँति की अग्नि ऊपर से भले दब गयी हो, पर भीतर ही भीतर सुलग रही है। इस प्रकार इस समय संसार नाशकारी संग्राम की ओर बराबर बढ़ता जा रहा है और अब उसे रोक सकना मनुष्य की शक्ति से बाहर दिखलाई पड़ता है। परमात्मा की शक्ति कोई उपाय निकाले तो दूसरी बात है।

इस विकट परिस्थिति को देखकर संसार के शाँति-प्रेमी बड़े चिन्तित हो रहे हैं और समय-समय पर अपनी इस भावना को व्यक्त करते रहते हैं। कुछ महीने पूर्व कलकत्ते में देशों के प्रतिनिधियों की एक विशाल सभा हुई थी। उसमें बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों ने प्रस्ताव पास किया कि “संयुक्त-राष्ट्रसंघ” सब प्रकार के अणु-आयुधों का पूर्ण निषेध करने का कदम तुरन्त उठाये, क्योंकि इससे मानव-सभ्यता के विनाश होने की सम्भावना पैदा हो गई है। विभिन्न राष्ट्रों द्वारा अणु-आयुधों के जो भण्डार तैयार किये जा रहे हैं, यह बड़ी चिन्ता का विषय है और इन हथियारों का निर्माण तथा परीक्षण बिना विलम्ब रोका जाना चाहिए। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न देश जो राजनीतिक गुटबन्दी कर रहे हैं वह भी विश्व शाँति के लिए गम्भीर खतरा है। इस प्रकार जो ‘नाटो’-’सीटो’- ‘वारसा’-’बगदाद’ के नाम से सैनिक संधियाँ की गई हैं ये सब भी युद्ध के वातावरण को बढ़ाने वाली हैं और शीघ्र ही समाप्त की जानी चाहिए।”

नेहरू जी बार-बार कह रहे हैं कि “आज बड़े राष्ट्र युद्ध के निकट हैं। पश्चिमी एशिया में तेल के लिये संघर्ष हो रहा है, पर मैं पूछता हूँ कि क्या तेल मानव-जीवन से अधिक मूल्यवान है? इस समय अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति बहुत असन्तोषजनक हो रही है। मुझे उम्मीद है कि पूर्व व पश्चिम की बड़ी शक्तियाँ स्थिरता पर गम्भीरतापूर्वक विचार करेंगी और यह अनुभव करेंगी कि शाँति का मार्ग फौजी गठबन्धन नहीं है। इन गठबन्धनों से भय बढ़ता है और हथियार बढ़ाने की दौड़ बढ़ती है। बड़े राष्ट्र यह समझ लें कि वे हथियारों के बल से छोटे राष्ट्रों पर अपनी इच्छा नहीं लाद सकते।”

इस प्रकार के अनेक कथन और घटनायें आजकल आये दिन अखबारों के पृष्ठों पर दिखाई दिया करते हैं। पर जो देश शक्ति-संचय में लगे हैं, वे उनकी ओर कुछ ध्यान न देकर अपनी कार्यवाहियों में संलग्न हैं। दिन प्रतिदिन नाश के भयंकर से भयंकर साधन तलाश किये जा रहे हैं और एक से बढ़कर एक अणु-आयुध का परीक्षण किया जा रहा है। अमरीका हाइड्रोजन बम का अठारहवाँ या उन्नीसवाँ परीक्षण कर चुका है और रूस दूर-मारक यन्त्र (राकेट) में निश्चित रूप से सफलता पा चुका है। जब से रूस की इस सफलता का समाचार प्रकट हुआ है अमरीका में तहलका मच गया है और वह भी जी-जान से वैसा ही राकेट बनाने में जुटा है जिससे आवश्यकता हो कर संसार के किसी भी भाग तक अपने देश में बैठ कर ही बम वर्षा की जा सके। इंग्लैंड भी अपनी शक्ति के अनुसार इन दोनों देशों की नकल करने की चेष्टा कर रहा है।

इस प्रकार ये तीन देश संसार में अशाँति उत्पन्न करने का कारण बने हुए हैं और ऐसी नाशकारी शक्तियों को जन्म दे रहे हैं जो किसी भी दिन संसार में प्रलय-काल उपस्थित कर सकती हैं। इनमें से अमरीका की तैयारी अपने देश में ही नहीं हो रही है वरन् उसने संसार भर में सर्वत्र अपने अड्डे कायम कर रखे हैं, जैसे जापान, फारमोसा, कोरिया, स्याम, पाकिस्तान, ईरान, जोर्डन, टर्की, पश्चिमी जर्मनी आदि इन सब देशों में उसने अपने भयंकर हथियार और सैनिक- विशेषज्ञ जमा कर रखें हैं, जो निरन्तर इन देशों की आँतरिक व्यवस्था पर प्रभाव डाल कर संसार को सर्वनाश की तरफ खींचते रहते हैं।

जब हम इन घटनाओं पर ज्योतिष-विद्या के जानकारों की सम्मतियों का अवलोकन करते हैं तो ज्ञात होता है कि वर्तमान समय में आकाश में स्थित ग्रहों में ऐसे परिवर्तन हो रहे हैं कि जिनके फल से निःसन्देह दुनिया की कायापलट हो जायेगी। वे हमको बतलाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में दो अत्यन्त शक्तिशाली ग्रहों- शनि और नेपच्यून की युति तीन बार हो चुकी है जिनका फल संसार को सन् 1989 तक सहन करना पड़ेगा। इसी प्रकार ‘हर्षल-नेपच्यून महाकेन्द्र योग‘ भी सन् 1856 में हुआ है जिसके फल से शासक लोग राजनीति के विरुद्ध कार्य करके प्रजा में अशाँति उत्पन्न करते हैं और सामान्य जनता अपने स्तत्वों और अधिकारों के लिये माँग करती है। ऐसी स्थिति में गम्भीर राजनीतिज्ञों के बजाय झगड़े-फसाद पैदा करने वालों का प्रभाव बढ़ जाता है और वे हिंसापूर्ण कार्यवाहियों तथा प्रदर्शन करने के लिये जनता को भड़काते हैं। इससे संसार के अनेक देशों में विप्लव और क्रान्तिकारियों के होने की पूर्ण सम्भावना है।

ता. 24 सितम्बर 1958 के दिन बृहस्पति और नेपच्यून की प्रभावशाली युक्ति होने वाली है। यह युति संसार की राजनीतिक परिस्थिति पर बड़ा प्रभाव डालती है और पिछले समय में जब-जब यह हुई है इसने अनेक देशों के नक्शे को बदल दिया है। यह युति तीसरे महायुद्ध का बीज बोने वाली है यद्यपि उसका फल कुछ समय बाद प्रकट होगा। सूर्य के दक्षिण गोल प्रवेश की कुण्डली में सह युति सातवें स्थान पर है। इसलिये भावी युद्ध में भारत की तटस्थता कायम न रह सकेगी और उसे भी राजनीतिक गुटबन्दी में पड़कर युद्ध के मार्ग पर चलना पड़ेगा। इस विषय में भारत का प्रतिद्वन्दी पाकिस्तान है जो किसी न किसी बहाने उसके विरुद्ध कार्यवाही किया करता है और इंग्लैण्ड, अमरीका को भी भड़काने की चेष्टा में लगा रहता है। यद्यपि ऐसी कार्यवाहियों से अधिक हानि पाकिस्तान को ही उठानी पड़ी है, पर इस प्रकार वह भारत की शाँतिपूर्ण प्रगति में बाधा डाल देता है। तीसरे महायुद्ध के साथ, जिसकी तिथि सन् 1962 में बतलाई गई है, पाकिस्तान की विद्वेष भावना और धूर्तता के कारण भारत वर्ष को भी युद्ध का कोई परिणाम सहन करना पड़ेगा इसमें सन्देह नहीं है।


ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल कैसे बनाया जाय?

(पं. श्रीराम आचार्य)

गत अंक में निकट भविष्य की सम्भावित आपत्तियों के सम्बन्ध में कुछ प्रकाश डाला गया है। अवश्य आकाश में घुमड़ती हुई इन प्रलयंकर घटाओं को बरस पड़ने का यदि अवसर मिला तो निश्चय ही इसके परिणाम बहुत ही चिन्ताजनक होंगे, पर अभी स्थिति उस सीमा तक नहीं पहुँची है कि मानवी प्रयत्न इन्हें रोक सकने में सर्वथा असमर्थ हों। अभी वह अवसर हाथ से निकल नहीं चुका है जबकि एटम बमों, आग्नेयास्त्रों का मुँह मोड़ देने वाला शान्ति का आध्यात्मिक अस्त्र वरुणास्त्र न बन सकता हो। संसार का भौतिक जीवन एवं भौतिक क्रिया कलाप वस्तुतः सूक्ष्म जगत से उसी प्रकार सम्बन्धित रहता है जिस प्रकार कठपुतली के खिलौने कुछ दृष्टि-गोचर होने वाले तारों के द्वारा मदारी की उंगलियों से जुड़े होते हैं। भौतिक जगत के नेतागण अपनी-अपनी समझ के अनुसार अपने- अपने ढंग से शाँति स्थापन के प्रयत्न करते हैं पर उसमें वास्तविक स्थापना तब तक उत्पन्न नहीं हो सकती जब तक कि कठपुतलियों को हिलाने वाले तारों को चलाने वाली अदृश्य उंगलियाँ गतिशील न हो जायें।

मानव संस्कृति की सुरक्षा एवं विश्व-शान्ति के लिए अनेक दिशाओं में प्रयत्न कर रहे हैं यह भी अच्छी बात है पर यदि आध्यात्मिक मोर्चा आज छोड़ दिया गया, उपेक्षा की गई तो निश्चय ही एक इतनी बड़ी भूल होगी कि उसकी क्षति पूर्ति अन्य मोर्चों पर किये जाने वाले सारे प्रयत्न मिलकर भी न कर सकेंगे। जो लोग आध्यात्म शक्ति का महत्व समझते हैं उनकी जिम्मेदारी है कि ऐसे गाढ़े समय में उनका समुचित उपयोग करने के लिये आगे बढ़ें।

गायत्री-परिवार द्वारा संचालित ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान एक ऐसा ही महान आयोजन है। विश्व-शान्ति भरपूर वर्षा कर सकने योग्य शक्ति इस वरुण में मौजूद है। यदि यह सफल होता है तो हम सभी प्राणियों को, विपुल सभ्यता एवं चिर संचित संस्कृति को नष्ट होने से बचा सकते हैं। यदि बचाव किया जा सका तो पाँच हजार वर्ष पूर्व हुए एक महाभारत का आघात लगने से जो मानव संस्कृति अभी तक ठीक प्रकार उठ खड़ी न हो सकी है वह इस आगामी महा प्रहार की ठोकर खाने के बाद कितने समय में उठ खड़ी होने को सक्षम होगी। यह कह सकना बहुत ही कठिन है। ऐसी स्थिति में जिनके अन्दर वस्तुतः कुछ आध्यात्म प्रकाश मौजूद है उनके लिये एक धार्मिक कर्तव्य हो जाता है कि इस गाढ़े समय में जो कुछ उनसे बन पड़े करें।

गायत्री शाँति की देवी है। अशान्ति और उद्वेगों की शाँति के लिए मनुष्यों के कुमार्गगामी विकृत मस्तिष्कों को सुव्यवस्थित करने के लिए गायत्री से बढ़कर और कोई रामबाण प्रयोग नहीं है। आज इसी संजीवनी बूटी के उपयोग का बिल्कुल उपयुक्त समय है। अपने परिवार द्वारा यह प्रयोग सुव्यवस्थित रूप से आरम्भ किया गया है। प्रतिदिन 24 लाख जाप, 24 हजार आहुति, 24 हजार पाठ, 24 हजार मन्त्र लेखन का प्रथम चरण पूर्ण हो चुका है। अब ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का दूसरा चरण चल रहा है जिसके अंतर्गत प्रतिदिन सवा करोड़ गायत्री जप, सवा लाख आहुति, सवा लाख मन्त्र-लेखन का प्रयोग चल रहा है। यह भी कुछ ही दिनों में पूरा होने लगेगा।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का तीसरा चरण काफी बड़ा है। उससे वर्तमान कार्य की अपेक्षा 20 गुना आयोजन है। प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री जप, 24 लाख आहुतियाँ, 24 लाख पाठ, 24 लाख मन्त्र- लेखन का विशाल कार्यक्रम इतना बड़ा है कि उसे असंख्य धर्म-प्रेमी मिलकर अपनी सामूहिक शक्ति से ही पूरा कर सकते हैं। यह कार्य धनिकों के बूते का नहीं है। अब तक बड़े यज्ञ केवल चन्द धनिकों के प्रयत्न एवं उन्हीं के लिये जप करने से पूरे होते थे। किसी बड़े नामधारी सन्त-महन्त से प्रभावित कुछ धन-सम्पन्न लोग मिल कर अब तब यज्ञ आदि रचाते रहते हैं और उसमें सौ-पचास बहुपठित पण्डितों को हजार-हजार पाँच- पाँच सौ रुपया दक्षिणा मिलने और दो-चार हजार तथाकथित ब्राह्मणों को पिस्ते और मलाई की मिठाई छकाने की प्रक्रिया चलती थी। सेठजी और महन्तजी का जय-जयकार होकर यज्ञ समाप्त हो जाते थे। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इससे सर्वथा भिन्न प्रकार का यज्ञानुष्ठान है। इसमें धन नहीं, श्रम आधार है। इसकी पूर्ति धन से नहीं, श्रम एवं समय प्राप्त होने से ही हो सकती है। जितने व्यक्ति, जितना सामान, जितना श्रम, जितना स्थान इस कार्य के लिए अपेक्षित है, उसे यदि कुछ धनी लोग अपने पैसे के बल पर करना भी चाहें तो किसी लखपती, करोड़पती की सारी पूँजी एक दिन की व्यवस्था के लिए भी पर्याप्त न होगी।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्ति में इस समय गायत्री- परिवार की एक हजार शाखाओं के लगभग बीस हजार सदस्य लगे हुए हैं। तब मध्यम चरण की पूर्ति की व्यवस्था बन रही है। तीसरा चरण वर्तमान स्थिति की अपेक्षा बीस गुना बड़ा है। उसका कार्य 20 गुना अधिक होगा। उसकी व्यवस्था जुटाने के लिए अब की अपेक्षा बीस गुनी शक्ति चाहिए। इसे जुटाना ही आज सबसे बड़ी समस्या है। गत अंक में हमने अपने परिजनों से इसी सम्बन्ध की अपील की थी कि अब कुछ समय के लिए धर्म-प्रेमी लोग इस विश्व-शान्ति के महान आयोजन के लिए अपना अधिक से अधिक समय देने का प्रयत्न करें। अपने-अपने क्षेत्रों में अपना तप, जप, हवन, पाठ-लेखन आदि करने के लिए पूरी शक्ति से संलग्न हों। इस प्रकार के कार्य के लिये भ्रमण करने, धर्म-फेरी लगाने आदि, घर-घर जाकर धर्म-प्रेरणा देने का कष्ट उठाना आवश्यक होगा। इस कार्य में झूठी झिझक, संकोचीपन, अभिमानता, अपनी हेठी आदि की मानसिक कमजोरी को लात मारकर दूर करना होगा। परमार्थ के लिए धर्म-प्रेरणा के लिए किसी के यहाँ जाना वस्तुतः एक बहुत बड़ा बड़प्पन है। कोई कहना न माने, सफलता न मिले, उलटी- सीधी सुननी पड़े तो इसे एक युग-प्रभाव, सन्निपात के बीमारों का बकवाद एवं आसुरी प्रतिरोध ही समझना चाहिए। ऐसी बाधाएं हर बार पुरुष के मार्ग में उसकी शक्ति की परीक्षा लेने एवं प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाने के लिए आती ही हैं। सस्ती सफलता, जिसमें जरा भी कठिनाई न आवे, वस्तुतः एक निकम्मी चीज है। चूँकि इस महान अनुष्ठान से आसुरी तत्वों का नाश होता है इसलिए वे इस प्रयत्न को असफल करने का नाना प्रकार से प्रयत्न करते हैं। प्राचीन युगों में असुरों के आक्रमण अस्त्र-शस्त्र द्वारा होते थे। वे स्वयं सामने आकर लड़ते थे, इस युग में वे स्वयं सामने नहीं आते। जिसकी बुद्धि में असुरता के ठहरने लायक अज्ञान देखते हैं उनको अपना वाहन बनाकर ऐसे शुभ आयोजनों में विघ्न उत्पन्न करके उसे असफल बनाने का प्रयत्न करते हैं। कई व्यक्ति भारतीय संस्कृति की माता गायत्री और भारतीय धर्म के आदि पिता यज्ञ जैसे सर्वमान्य सत्कर्मों तक को करने से लोगों को रोकते हैं। कई पण्डित इसमें अपनी स्वार्थ-हानि, अर्थ-हानि, मान-हानि देखते हैं और अपने अज्ञान को “शास्त्र-वचन” मानकर गायत्री उपासना एवं यज्ञ आयोजन के परम पुनीत कार्यों में लगे हुए लोगों को सत्कर्म से हटाने में जी तोड़ कोशिश करते हैं। शास्त्र-शिक्षा सर्वत्र होते हुए जुआ, चोरी, व्याभिचार, असत्य, छल, पाखण्ड, नशा आदि बुराइयों के विरुद्ध जिनकी जीत जीवन भर नहीं खुली वे लोग गायत्री जप और यज्ञानुष्ठान न करने देने में अड़ंगे लगाकर ‘शास्त्र-रक्षा’ की बात करते हैं यह संसार का एक अनोखा आश्चर्य है। असुरता अपना छद्मवेश बनाकर अनेक मंथराओं की जीभ पर जा बैठती है और उनसे मारीच, सुबाहु, ताड़का, खरदूषण आदि यज्ञ-विरोधियों का कार्य अनायास ही करा लेती है।

इन सब बातों से परमार्थ मार्ग के पथिकों को जरा भी विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। अपना प्रत्येक कार्यक्रम महान आध्यात्मिक सिद्धान्तों पर- धर्म-मर्यादाओं पर- अत्यन्त उच्चकोटि की आत्मा की प्रेरणा पर निर्धारित है। इसकी उपयुक्तता में किसी को रत्ती भर भी सन्देह करने की आवश्यकता नहीं है। सन्देह उत्पन्न करने की आसुरी प्रवृत्ति से हमें सावधान तो रहना है पर उससे परेशान होने की जरा भी आवश्यकता नहीं है। इतने बड़े इस युग के अभूतपूर्व अनुष्ठान में यदि कोई विघ्न न आवे, कोई विरोध न हो, कोई अड़ंगा न पड़े तो समझना चाहिए यह निष्प्राण है। अन्यथा असुरता अपना नाश होते देखकर चुप बैठी रहे यह सम्भव नहीं, उसे मरते-मरते भी आत्म-रक्षा के लिए कुछ न कुछ उपद्रव करने ही चाहिए।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का तीसरा चरण जिसमें प्रतिदिन 24 करोड़ जप, 24 लाख आहुतियाँ, 24 लाख पाठ, 24 लाख मन्त्र- लेखन होना है। एक बहुत बड़ा कार्य है। इसके लिए धर्म-प्रेमियों की पूरी शक्ति लगनी चाहिए। साधु, संन्यासी, विरक्त, वानप्रस्थों के लिए तो अगले 3-4 वर्ष के लिए यही एक मात्र कार्य होना चाहिए, क्योंकि इन दिनों अत्यधिक उत्तेजित क्षुब्ध वातावरण में किसी को भी चित्त की एकाग्रता, समाधि-ऋद्धि-सिद्धि, आत्म-शाँति प्राप्त होनी संभव नहीं। उस सफलता के लिए जिस प्रकार का सूक्ष्म वातावरण चाहिये वह इन दिनों बिलकुल भी नहीं है, इसलिये इन दिनों उस दिशा में असफल प्रयत्न करने की अपेक्षा विश्व-शान्ति के लिए इन परमार्थिक कार्यों में लगना ही सब दृष्टियों से उचित है। अच्छे साधु, जिनकी आजीविका गृहस्थों के दान पर चलती है, उन पण्डित, पुरोहित, पुजारी, गद्दीधारी, महन्त, मठाधीशों का भी कर्तव्य है कि इन 3-4 वर्षों में उस आजीविका को हलाल करने के लिये जन-सेवा में लग जायें। यदि यह लोग अंतर्दृष्टि से सोचें तो इन्हें आज की स्थिति में यही एक मात्र कर्तव्य दृष्टिगोचर होगा कि विश्व-शान्ति के इस महानतम धर्मानुष्ठान गायत्री यज्ञ आयोजनों में लगा जाय।

56 लाख व्यक्ति भिक्षाजीवी इस भारतवर्ष में हैं, यदि यह 40 मन्त्र भी रोज जपें और आधी आहुति भी रोज करें, प्रतिदिन 5 मिनट रोज का समय भी दें तो यह अनुष्ठान बड़ी आसानी से पूर्ण हो सकता है। पर जो मनोवृत्तियाँ, गतिविधियाँ इन लोगों की हैं, उसे देखते हुए उनसे कुछ भी आशा करना व्यर्थ है। इनमें से कुछ को छोड़कर शेष तो समाज के लिए एक अभिशाप मात्र हैं। इनसे कोई बड़ी आशा रखने की बजाय यह कार्य सद्गृहस्थों को करना पड़ेगा। अपने बाल-वृद्धों का पेट पालने एवं गृहस्थ के आवश्यक कर्तव्यों से एक-दो घण्टा रोज समय उन्हें बचाना होगा और उस समय को अपने पास-पड़ोस में, मित्र- कुटुम्बियों में, स्वजन- सम्बन्धियों में, परिचित -अपरिचितों में ब्रह्मानुष्ठान की महत्ता बताने में, गायत्री महामंत्र की शक्ति एवं महत्ता समझाने में, गायत्री साहित्य पढ़ाने में, गायत्री-उपासना के लिये प्रेरणा देने में लगाना होगा।

जो लोग उपरोक्त कार्यक्रम को भोजन, स्नान, नींद, उपार्जन आदि की भाँति अपने दैनिक जीवन में सम्मिलित कर लें उन्हें व्रतधारी कहा जायेगा। जिस प्रकार इलेक्शन में अपने लिए मेम्बर चुने जाने के लिए वोटरों के पास जा-जाकर हर प्रकार की कोशिश से वोट अपने पक्ष में प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है वैसी ही मनोवृत्ति जिसकी बन जाय उन्हें “व्रतधारी” कहना चाहिये। ब्राह्मण अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए ऐसे एक हजार व्रतधारी चाहिएं। यह व्रतधारी नित्य स्वाध्याय द्वारा अपना गायत्री-ज्ञान बढ़ाने के साथ ही नियमित रूप से धर्म-प्रचार के लिये, धर्म-फेरी के लिए कुछ न कुछ समय भी लगाते रहेंगे। इस युग में ऐसे कार्यों की सफलता “भगवान” पर ही निर्भर रहती है।

तीसरी समस्या एक और है वह है साहित्य प्रचार की। इतनी बड़ी संख्या में जनता को पूरी तरह अपने उद्देश्य एवं कार्यक्रम की शिक्षा देने के लिए बड़ी संख्या में साहित्य देना होगा। ऐसा साहित्य बिकेगा तो क्या उसे वितरण ही करना पड़ेगा। इस ज्ञान दान के लिए पैसा चाहिए। गायत्री तपोभूमि इस दृष्टि से दिवालिया है। वहाँ का दैनिक खर्च बड़ी कठिनाई से पूरा हो पाता है। चन्दा संग्रह करने का अपना कोई कार्यक्रम नहीं है। ऐसी दशा में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए और आगे चलकर साँस्कृतिक पुनरुत्थान कार्यक्रम के अंतर्गत सारे राष्ट्रों को धार्मिकता, नैतिकता एवं मानवता की पुनीत भावनाओं से ओत-प्रोत करने के लिए बड़े परिमाण में सस्ता साहित्य चाहिए। इसका खर्च कहाँ से आये? धर्म-प्रचारकों के हाथों में यह प्रचार-साहित्य ही प्रधान अस्त्र होता है, इसकी आवश्यकता निर्विवाद है। फिर यह प्रस्तुत कैसे हो ?

इस समस्या का एक ही हल अभी सोचा गया है कि व्रतधारी लोग गायत्री माता को भी अपने घर का एक सदस्य मानने और उन्हें झूठ-झूठ का भोग लगाने की अपेक्षा कम से कम एक रोटी खाने को दें। अर्थात् एक रोटी का अनाज या उसकी लागत दो पैसा उठाकर अलग रखते जावें। महीने में इस प्रकार एक रुपया आसानी से हो सकता है। जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही दुर्बल है, एक रोटी रोज भी माता को देने के लिए नहीं बचा सकते वे सप्ताह में एक बार भोजन न किया करें। इस प्रकार महीने में चार बार भोजन न करने में बची हुई चार चपातियों का एक रुपया बचा सकते हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति कुछ ठीक है वे मासिक वेतन में से कुछ पैसे ज्ञान-दान के लिए अलग से उठाकर रख दिया करें। किसान अपने खेत-खलिहान में से यदि चाहें तो कुछ ने कुछ अवश्य बचा सकते हैं। धनी-मानी लोगों के लिए तो यह परीक्षा का समय है। अपनी व्यक्तिगत फिजूल-खर्ची में से या व्यर्थ के धर्म आडम्बरों में से पैसे बचाकर जनता को सन्मार्ग का प्रकाश देने वाला साहित्य वितरण कराने का ऐसा बड़ा पुण्य ले सकते हैं जिसकी तुलना में अन्य प्रकार के दान-पुण्य तुच्छ हैं।

गायत्री माता के सच्चे भक्त के लिए यह मूक कसौटी है। माला जपने के अतिरिक्त उसे कुछ महिमा बढ़ाने के लिये उनकी शक्ति से जन साधारण को अधिकाधिक लाभान्वित बनाने के लिए ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की सफलता के लिए यदि थोड़ा भी-पैसे दो पैसे रोज का भी यदि त्याग न हो सके तो इतनी दुर्बल श्रद्धा वाले लोग दैवी शक्तियों से भी कुछ आशा करने के अधिकारी नहीं हो सकते। देव-शक्तियाँ चापलूसी भरा स्तोत्र पाठ नहीं भावना की गहराई परखती हैं और उसी के अनुसार किसी को प्यार एवं अनुग्रह प्रदान करती हैं। कंजूस, जो सबसे केवल लेना ही चाहते हैं देने को कुछ भी जिनसे नहीं निकलता, वे अन्त तक बहुत बड़े घाटे में रहते हैं। बिना दिये कुछ पाने की आशा करने वालों को बस मूर्ख ही कहना चाहिये।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता है। जो विकट परिस्थितियाँ संसार के सामने आने वाली हैं उन्हें टालने के लिए गायत्री माता को कमान पर यज्ञ-पिता का तीर चढ़ा कर चलाया हुआ यह रामबाण निष्फल नहीं जा सकता। गायत्री परिवार ने सामूहिक संकल्प से ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया है, अब उसे सफल बनाना या असफल हो जाने देना, यह हम लोगों की भावना को परखने की एक कसौटी बन गई है। गायत्री- परिवार इस कसौटी पर कसा जा चुका है। खरा-खोटा सिद्ध होना हम लोगों के उत्साह पर निर्भर है। इस अवसर पर हमारा अनुत्साह न केवल हमारे लिए वरन् समस्त संसार के लिए निराशाजनक ही सिद्ध होगा।


गायत्री उपासना के अनुभव

भयंकर बीमारी से छुटकारा

श्री इन्द्रचन्द्र भोजक (अमदला वालरा) से लिखते हैं कि मेरी बहिन बीमार हो गई थी और उसका रोग डाक्टरों की समझ में नहीं आता था। मैंने उसके लिए 24 हजार का पुरश्चरण शुरू किया और उससे भी एक माला रोज जपने को कहा। - दिन में वह बिलकुल स्वस्थ हो गई। इसी प्रकार मेरी स्त्री का आपरेशन हुआ। अस्पताल से घर आने पर उसकी तबियत एकाएक ऐसी बिगड़ गयी कि जीने की तनिक भी आशा न रही। मैंने गायत्री माता का स्मरण किया और थोड़ी देर बाद उसकी हालत सुधरने लग गई।

ट्रक के नीचे दबकर भी बच गया

शाहबरा (देहली) से श्री राधेश्याम गुप्ता लिखते हैं कि “अभी दो मास पहले मैं हनुमानजी के दर्शन करके वापिस आ रहा था कि ट्रक से मेरी साइकिल की टक्कर हो गयी। ट्रक का पहिया मेरे पैर पर से उतर गया। साइकिल टूट गई पर मुझको कतई चोट नहीं आयी। यह गायत्री उपासना का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसी प्रकार मेरे दस वर्ष से सन्तान नहीं होती थी। अब माता की उपासना और प्रार्थना करने से पुत्र उत्पन्न हुआ। गायत्री जप द्वारा मैंने कितने ही लोगों के बुरे व्यसन छुड़ा दिए।”

श्वास का रोग अच्छा हो गया

श्री भगवती प्रसाद वर्मा, केन कामदार- प्रा विजुआ (खीरी) से लिखते हैं कि “मेरे पिताजी को श्वास का रोग हो गया था, डॉक्टर ने 500/ रुपये का नुस्खा बतलाया और फिर भी यह कहा कि यह रोग जड़ से कभी ठीक नहीं हो सकता। पिताजी ने मालूम क्या-क्या दवायें इस रोग की खा ली थीं अब डाक्टरों के सुझाव से निराश होकर उन्होंने दवा खाना छोड़ दिया और चिन्ता व्याप गई। मैंने और मेरी बहन ने गायत्री माता की शरण ली। धन्य माताजी को कि मेरे पिता बिना दवा खाये ही अच्छे हो गये।”

मोटर दुर्घटना का स्वप्न में संकेत

श्री शिवशंकर मिश्रा, कामठी नागपुर से लिखते हैं कि “कुछ समय पहले की बात है कि मेरे मामा सख्त बीमार हो गये और कई महीने रुग्णावस्था में रहकर स्वर्गवासी हुये। मृत्यु होने के करीब 20 दिन पहिले डॉक्टर ने उनको नागपुर ले जाकर परीक्षण कराने की राय दी। इसके लिए अस्पताल की बीमार ले जाने वाली मोटर का प्रबन्ध एक दिन पहले ही कर लिया गया। मामा ने मुझे बुलाकर कहा कि तुम्हें मेरे साथ चलना है सो देर न लगाना, मोटर सुबह ठीक सात बजे आ जायेगी। मैं चलने को कह कर घर आकर सो गया। मुझे स्वप्न में यह महसूस कि कल मोटर दुर्घटना होगी। परन्तु उस पर ज्यादा ध्यान न देकर मैंने यह समझा कि कहीं से दुर्घटना का समाचार सुनने में आयेगा। मैं सुबह यथासंभव जल्दी उठा और नित्य नियम के अनुसार गायत्री-जप व हवन करने लगा। इतने में मोटर नागपुर से आ गई। दो बार मामा का लड़का बुलाने आया कि मामा और ड्राइवर जल्दी कर रहे हैं। घर के लोग भी नाराज हो रहे थे कि इस समय पूजा लेकर बैठ गये, जाते नहीं। पर मैंने निश्चय किया कि नित्य नियम पूरा करके जाऊँगा। इस कारण मैं कुछ देर में पहुँचा और मामा को मोटर में लिटाकर नागपुर आया और वहाँ उनकी जाँच कराई। लौटते समय अस्पताल से कुछ दूरी पर फल लेने को उतरा। फिर मैं जब बैठने लगा कि मोटर चल दी और मैं धड़ाम से जमीन पर गिरा। यह ऐसी जगह थी कि जहाँ बड़ी तेज चढ़ाई थी। अगर मोटर जरा भी पीछे को सरकती तो मेरी हड्डियाँ चूर-चूर कर देती और अगर आगे निकल जाती तो ऊपर से आते हुए सैकड़ों रिक्शों और ताँगे, मोटर आदि से दबकर मैं चटनी बन जाता। गिरने से मुझे चोट तो काफी लगी, पर लोगों ने उठाकर मोटर में लिटा दिया। घर पहुँच कर भी मुझ से स्वयं चला नहीं गया और लोगों ने ही घर में भीतर पहुँचाया। पन्द्रह-बीस दिन बाद मैं कुछ चलने-फिरने लायक हुआ। गायत्री माता ने मुझे पहले से ही दुर्घटना की सूचना देकर सावधान किया और मेरे असावधानी करने पर भी मेरी प्राण-रक्षा की। यह उनकी अपार कृपा का प्रमाण है।”

चोर घर में न घुस सके

श्री बालमुकुन्द नारायण शर्मा गुजर्रा (जिला धार म.प्र.) से लिखते हैं कि अभी एक दिन हम सब लोग अपने मकान के पीछे के सब दरवाजे बन्द करके, सामने वाले चबूतरे पर सो रहे थे। मकान के पीछे सुनसान जंगल था। रात में कुछ चोर पीछे की तरफ बने कोट में घुसे और यहाँ से ऊपर चढ़कर चौक में कूद पड़े। चौक में जिन कमरों के दरवाजे थे उनमें भीतर से साँकल लगी थी। चोरों ने दरवाजे को खोलना शुरू किया और बहुत-सी ईंटें निकाल डालीं, पर वे दरवाजे को न निकाल सके। इस प्रकार माता गायत्री ने हमारे सर्वस्व की रक्षा की।

शेर के आक्रमण से बच गया

श्री. शेरसिंह जी प्रधानाध्यापक बेसिक स्कूल,

कानारूपजड़ी (अजमेर) से लिखते हैं कि “ता. 16-5-55 को मैं अजमेर रोड पर दो मोटरों के बीच साइकिल समेत दब गया था, पर गायत्री माता की कृपा से मेरी प्राण-रक्षा हो गई। यह घटना मुझे और मेरे अफसरों को अब भी याद है। इसी प्राकर ता. 9-12-56 को एक शेर ने दो अन्य आदमियों को चीर डाला। मैं भी बन्दूक लेकर वहाँ गया, शेर को घायल कर दिया, पर वह जख्मी होकर भी मेरे ऊपर टूट पड़ा। शेर के दोनों अगले पंजे मेरे कन्धों पर थे और मुँह गले पर। मैं जख्मी तो हो गया और मेरा और मेरा गर्म कोट शेर के पंजे से फट गया, पर गायत्री माता ने मेरी प्राण-रक्षा की। मेरे पीछे दो आदमी और खड़े थे वे भी उस समय भाग गये। उस समय का दृश्य सचमुच ही एक चमत्कार था।”

अलौकिक शाँति की प्रगति

श्री सूर्यशरण गुप्त नवाबगंज (गोंडा) से लिखते हैं कि “4 वर्ष पूर्व श्रद्धेय आचार्य जी ने सहस्राँशु यज्ञ का अनुष्ठान प्रारम्भ किया था। सौभाग्यवश मैं भी उसमें सम्मिलित हो सका। उस समय पत्र द्वारा आचार्यजी ने सूचित किया था कि इससे आपको परम शाँति मिलेगी। वास्तव में उस अलौकिक शाँति का अनुभव कुछ ही दिन बाद अपने पिता की मृत्यु के अवसर पर हुआ। मेरे जैसे अनुभव शून्य व्यक्ति के लिये पिता की मृत्यु किस प्रकार दुःखद हो सकती है यह समझ सकना कठिन नहीं है। पर गायत्री माता के प्रभाव से उस घटना का कुछ भी कुप्रभाव मेरे ऊपर नहीं पड़ा और मैं पूर्ण शाँत बना रहा। तत्पश्चात् पत्नी की गर्भावस्था के लिए आचार्यजी ने ‘गर्भ-पोषक रसायन’ दी थी। उसके प्रभाव से मेरी पत्नी के बच्चा 3 घंटे की प्रसव- वेदना के बाद ही हो गया, जो पहले 12 घंटे की वेदना के बाद होता था।”

पाँडु रोग से छुटकारा मिला

वैद्य जयप्रकाश जी गौतम इंचार्ज डि. बोर्ड डिस्पेंसरी खरखौदा (मेरठ) से लिखते हैं कि “मैं बहुत बड़े रोग से ग्रसित था, जब मैं मथुरा पूर्णाहुति करने गया तब भी यह महान पाँडु रोग शरीर में घर किये था। पर बाद में जब मेरी मनोभावना जप करते- करते पूर्ण शुद्ध को गई तब यह भयंकर रोग स्वयं अच्छा हो गया। अन्यथा इसके पहिले 300-400 रु. की डाक्टरी दवा तथा अपनी वैद्यक दवाओं के प्रयोग से भी यह अच्छा न हो सका था।”

मेरे भाई की बीमारी से रक्षा हुई

गाँव लसूलाडिया अमरा (पो. तराना जिला उज्जैन) से श्री सेवादास वैष्णव लिखते हैं कि “मेरा भाई रतनदास तथा उसकी धर्म-पत्नी यहाँ से 18 कोस दूर भड़का गाँव में बीमार हो गये। उनके पास कोई पानी देने वाला भी न था, न वे स्वयं उठ सकते थे। जब मेरे पास यह समाचार आया तो मैंने अपनी उपासना की पूँजी में से दस हजार गायत्री जप का संकल्प करके माता से प्रार्थना की कि मेरे भाई की रक्षा करो। साथ ही अपनी धर्म-पत्नी को भड़का गाँव के लिए रवाना कर दिया। जब वह दूसरे दिन वहाँ पहुँची तो मेरे भाई व उसकी स्त्री को बिलकुल स्वस्थ पाया। माता अपने भक्त की पुकार सब तरह सुनती हैं।”

परीक्षा में पास हो गया

श्री विष्णु प्रसाद तिवारी गाजगीर (बिलासपुर) लिखते हैं कि “इस साल मेरी पढ़ाई बहुत कम हुई थी, परन्तु माता के ऊपर मेरा पूर्ण विश्वास था कि मैं अवश्य पास हो जाऊंगा। मैंने प्रतिज्ञा की कि पास होने पर दस हजार गायत्री- जप व नवान्ह रामायण-पाठ करूंगा। माताजी की कृपा से में सारी कक्षा में प्रथम उत्तीर्ण हुआ।”

चोरों से कैसे बचे

श्री हरगोविन्द त्रिपाठी बीसापुर (सुल्तानपुर) से लिखते हैं कि “मैं लगातार 3 वर्ष से माता की उपासना कर रहा हूँ। बैसाख सुदी पंचमी सं. 2014 को माताजी का दिन था। हवन के बाद रात्रि में चालीस का पाठ व रामचरित मानस पर प्रवचन हुआ। घर के सभी व्यक्ति हवन-स्थल में ही थे कि घर में चोरों ने सेंध लगाना शुरू किया। हवन से आकर हम सब लोग सो गये और इधर चोरों ने सेंध पूरी करके भीतर घुसने की तैयारी की। उसी समय मेरी माताजी की नींद टूट गयी और चोर भाग गये। यह सब गायत्री माता के प्रभाव से ही हो सका यह हम सबका विश्वास है।”

सन्तानोत्पत्ति का सौभाग्य प्राप्त हुआ

श्री. भुवनेश्वर प्रसाद पोद्दार, मोहदीन नगर (भागलपुर) से लिखते हैं “मैं तो एकलव्य की तरह आपको गुरु मानकर नित्य पूजा करता हूँ। मेरी अवस्था 44 वर्ष की हो चुकी थी, इसलिये सन्तान उत्पन्न होने की आशा जाती रही थी। पर माता की कृपा से अनहोनी बात हो गई और ता. 12 मई को मेरे यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ। अब वह बच्चा चिरंजीव और निरोग रहे, साथ ही माता के चरणों का अनन्य भक्त हो, ऐसा आशीर्वाद आप दें।”

नाग देवता भी हवन देखने आये

सवाई माधोपुर (राजस्थान) से श्री. रामनारायण जी लिखते हैं कि “यहाँ से कुछ ही दूर पर पहाड़ी में ‘महादेवजी की खोह’ नामक रमणीक स्थान है। वहाँ सदैव पानी की छोटी सी धारा शिवजी पर गिरती रहती है। ता. 14 जुलाई को सभी गायत्री सदस्य टीलों और जंगलों को पार करके इसी स्थल में पहुँचे और गायत्री- यज्ञ करने लगे। इतने में दिखाई दिया कि एक नागदेवता पास ही फन फैलाये खड़े हैं। जब तक यज्ञ होता रहा वे वहाँ से जरा भी न हटे। माता की आरती के बाद वे वहीं गायब हो गये।”

प्रत्यक्ष मौत का पैगाम

जवानमल शर्मा जौबला (म.भा.) से लिखते हैं कि “मेरी तन्द्रावस्था में कभी-कभी वायु गोले का दर्द ऐसे भीषण वेग से उठता है कि उससे कष्ट का वर्णन लिखकर नहीं किया जा सकता। कभी तो वह गर्दन को एक तरफ मोड़ देता है और कभी मस्तिष्क तक पहुँचकर वहाँ वायुयान सा चलाने लगता है। इसका कोई नियत समय नहीं, कभी दो-चार दिन में ही और कभी दो-चार महीने में इसका दौरा होता है। ऐसे भयंकर और मरणान्तकारी कष्ट में मैं गायत्री माता की शरण जाता हूँ और वही अब तक मेरी रक्षा करती आई हैं।”

नशे की आदत छूट गई

श्री चतुर्भुज संशा, बिगौड़ा (टीकमगढ़) से लिखते हैं कि “मैंने अपने जीवन को तम्बाकू, गाँजा, भाँग आदि नशीली वस्तुओं में बहुत बर्बाद किया था। पर जब से गायत्री माता का आश्रय लिया है तब से सब बुरी आदतें स्वयमेव छूट गई। एक दिन मेरे बच्चे को गाय ने सींगों पर उठाकर फेंक दिया। मैंने गायत्री आराधना की जिससे यह होश में आकर स्वस्थ हो गया।”

आठ दिन में शादी हो गयी

पला कसेर (बुलन्दशहर) से श्री यादराम शर्मा लिखते हैं कि “यहाँ की गायत्री शाखा की मंत्री श्री श्याम बिहारी शर्मा के विवाह का प्रयत्न कई वर्ष से चल रहा था परन्तु कोई न कोई विघ्न उपस्थित हो जाता था। दस बार ज्येष्ठ के अन्त में यहाँ गायत्री-यज्ञ सम्पन्न हुआ और केवल 8 दिन बाद मंत्री जी की शादी बहुत अच्छे ढंग से हो गई। मेरा यह अनुभव है कि यह गायत्री माता का ही प्रभाव है कि इतनी शीघ्र साधना-फल प्रदान किया।”

पुत्र का विवाह हो गया

श्री गोविन्द दास भार्गव, दिगौड़ा (टीकमगढ़) से लिखते हैं “जब से मैंने गायत्री माता का शरण ली है तब से मेरी कितनी ही मनोकामनाएं पूरी होती जाती हैं। मैंने दिन में सोचा कि पुत्र की शादी इस वर्ष में हो जानी चाहिये सो माता की कृपा से निर्विघ्न पूरी हो गई।”

ओलों से फसल की रक्षा हुई’

श्री ब्रजबल्लभजी, दिगौड़ा से लिखते हैं कि “इस बार जब हमारे गाँव की फसल तैयार हो चुकी थी ऐसे काले बादल उठे कि हम सब का हृदय काँप उठा। क्योंकि ऐसे समय ओला पड़ने की पूरी आशंका रहती है। उस समय हम सब सत्संग में बैठे थे। हमने वहीं माता से प्रार्थना की कि ‘रक्षा करो’। माता ने प्रार्थना सुन ली और थोड़ा सा पानी जरा सा ओले गिरकर आकाश खुल गया। माता कृपा न करती तो सैकड़ों किसानों का सर्वनाश हो जाता।”


देश भर में नवरात्रि में गायत्री-उपासना की धूम

मध्य-प्रदेश

कसराबद (नेमाड़) में नवरात्रि का विशाल आयोजन किया गया। जिसमें 863852 जप, 8355 चालीसा-पाठ हुये और हवन कुण्डों में दस हजार आहुतियाँ दी गयीं। इसमें काछीपुरे के साधकों ने पूर्ण सहयोग दिया। मैंने और पं. रामेश्वरजी उपाध्याय ने धर्म-फेरी लगाकर प्रचार किया तथा श्री शिवलालजी सर्राफ ने गायत्री साहित्य मुक्त हस्त से वितरण किया। यहाँ की बाल-शाखा के सदस्यों में भी माता के प्रति बड़ा उत्साह है। बाल सदस्यों तथा महिलाओं ने 39852 जप व 4735 पाठ किये। बच्चे स्वयं ही आपस में चन्दा करके यज्ञस्थल की व्यवस्था व सजावट कर लेते हैं।

-सन्तोष चन्द्र व्यास

ग्राम गाडरिया (सीवनी मालवा) में ब्रह्मास्त्र योजना के अंतर्गत पटैल श्री हरनारायणजी के स्थान पर नवरात्रि का समारोह बड़े सुन्दर रूप में सम्पन्न हुआ। सात उपासकों ने 24-24 हजार के अनुष्ठान किये और नौमी को रामायण का अखण्ड पारायण किया गया। पूर्णाहुति के अवसर पर जनता उपस्थित थी। इस पुनीत कार्य में श्री बैजनाथ प्रसाद स्कूल इंस्पेक्टर, कृपारामजी, श्री रामगोपाल जी तिवारी का सहयोग सराहनीय है। समस्त पण्डाल मथुरा से आये वेद-मन्त्रों तथा आचार्य जी के चित्र से सजाया गया था।

-गोबर्धन भट्ट शास्त्री

दिगौड़ा (टीकमगढ़) में 27 सदस्यों ने मिलकर सामूहिक जप 287000, चालीसा-पाठ 2016 तथा 4800 आहुतियों का हवन किया। 75 कन्याओं को भोजन कराया गया। यह आयोजन कालकादेवी, किला दिगौड़ा सम्पन्न हुआ जहाँ पर पं. गोविंद दास भार्गव ने नौ दिन का उपवास कर गायत्रीदेवी की प्रतिमा स्थापित की।

-बैजनाथ प्रसाद सोनकिया

भितरबार (ग्वालियर) में ता. 1 अक्टूबर को यज्ञ किया गया जिसमें एक हजार मंत्र लेखन भी हुआ। नौ दिन तक बराबर दुर्गा सप्तशती, रामायण गीता का पाठ होता रहा। इस कार्य में बिहारीलाल जी पाठक व किशनलालजी पाठक ने अकथनीय परिश्रम किया। एक गायत्री पुस्तकालय की स्थापना हुई। उसके लिए मैंने अपना एक स्वतंत्र कमरा सदैव को प्रदान कर दिया) ।

-बसन्तीलाल श्रीवास्तव

कुम्भराव (गुना) में नवरात्रि का आयोजन उत्साहपूर्वक सम्पन्न हुआ। यहाँ के गायत्री- प्रचार का श्रेय श्री हीरालालजी शर्मा वैद्य को है जो अपनी धर्म-पत्नी सहित इस पुण्य कार्य में पूर्ण रूप से संलग्न हैं।

-शम्भूसिंह रघुवंशी व भगवतप्रसाद शर्मा

दमोह में नवरात्रि का अनुष्ठान उत्साहपूर्वक सम्पन्न हुआ। दसवीं को कथा और ग्यारहवीं को कन्या भोजन किया गया। गायत्री-चालीसा व चित्र वितरण किये गये।

-अम्बिकाप्रसाद श्रीवास्तव

बुरहानपुर में नवरात्रि का आयोजन कुशलपूर्वक सम्पन्न हो गया। दशमी को हवन किया गया।

-नगीनदास टी. शह

चाँचौड़ा (गुना) में कई उत्साही सदस्यों ने सवा लाख जप का अनुष्ठान किया। ता. 2 को बगवाजेश्वर तपोभूमि पर यज्ञ भगवान व आचार्यजी के चित्र स्थापित कर सामूहिक हवन किया गया। श्री रमेशकुमार जी ने बड़ी उत्तमता से यज्ञ का संचालन किया।

-श्रीकृष्ण कौशल

रतलाम में नवरात्रि का समारोह कई उत्साही उपासकों द्वारा सम्पन्न हुआ।

-शिवशक्तिलाल शर्मा

सिरगिटी (बिलासपुर) में कई उपासकों ने 24-24 हजार के अनुष्ठान किये। यहाँ की महिलायें भी प्रचार में भाग ले रही हैं।

-राम नारायण लाल गुप्ता

देवरी (ग्वालियर) में अष्टमी को प्रातः 8 बजे से नवमी को प्रातः 8 बजे तक ग्रामवासियों की ओर से खड़े होकर अखण्ड कीर्तन किया गया। 10 बजे से सामूहिक यज्ञ व 2500 व्यक्तियों का भोजन हुआ दशहरे के दिन गायत्री-शाखा की ओर से सामूहिक यज्ञ हुआ। चालीसा वितरण किये गये।

-भानुप्रकाश कुलश्रेष्ठ

खड़ावदा (मन्दसौर) में दो लाख चालीस हजार जप व विजयदशमी को हवन किया गया। पूर्णाहुति के बाद ‘ध्वनि विस्तारक यंत्र द्वारा सामूहिक रूप से गायत्री-चालीसा वितरण किये गये’ और 100 कन्याओं एवं ब्राह्मणों को भोजन कराया गया।

-मन्त्री गायत्री परिवार

इन्दौर में नवरात्रि का अनुष्ठान विधिवत् करके विजयदशमी को हवन किया गया जिसमें श्री बालकृष्ण, कैलाश नारायण व महेन्द्र कुमार ने भाग लिया।

-सीताराम भगवानदासजी पण्डित

रामपुर, पुरानी बस्ती में नवरात्रि का आयोजन निर्विघ्न पूरा हो गया। ब्राह्मण-भोजन कराया गया।

-ब्रजमोहन लाल झा

सालेचौका रोड (होशंगाबाद) में ता. 24 सितम्बर को पं. हीरालालजी के भवन में गायत्री माता की स्थापना की गयी। वहाँ नित्य ही हवन और श्री दुर्गाप्रसाद जी ‘मानस भाव प्रवाही’ के प्रवचन हुआ करते थे। ता. 2 को रामचरित मानस का अखण्ड पाठ हुआ।

-डॉ. रामसरूप जैसवाल

खंडवा में गायत्री महायज्ञ कर्मयोगी श्री नन्दकिशोर जी उपाध्याय की अध्यक्षता में सानन्द सम्पन्न हो गया। नवमी के दिन पूर्णाहुति और भण्डारा हुआ।

-विष्णुदास

चाँपा (बिलासपुर) में 189540 जप व 753 चालीसा पाठ का आयोजन बड़े समारोह से सम्पन्न हुआ। नौ दिन तक अखण्ड -ज्योति जलती रही तथा रामायण का पाठ होता रहा। पूर्णाहुति का हवन बड़ी धूमधाम से हुआ जिसके अन्त में 40 कन्याओं को भोजन कराया गया व ब्रह्म-भोज भी हुआ।

-वैद्य पुनीराम

भरलाय (सीवनी मालवा) में नवरात्रि का कार्यक्रम माताजी की कृपा से सफलतापूर्वक हुआ। सेक्रे. रामप्रसादजी व श्री रामाधारीजी मालवीय की श्रद्धा विशेष सराहनीय है।

-शिवसत्यनारायण

भैरोंपुर (सीवनी मालवा) में नवरात्रि के अवसर पर गायत्री जप व चालीसा पाठ का अनुष्ठान किया गया। नौमी को चालीसा का सामूहिक पाठ किया गया। 3 महीने की अखण्ड -ज्योति रखी गयी है।

-भोजराज शर्मा पालीवाल

शाजापुर में नवरात्रि का अनुष्ठान निर्विघ्न व शाँतिपूर्वक समाप्त हुआ।

-पवनमुरारीलाल माधुर सीनियर एडवोकेट

गणेश गंज (टीकमगढ़) में जप व हवन का कार्यक्रम श्रद्धापूर्वक सम्पन्न हो गया। इसकी व्यवस्था देवीदत्त जी पाण्डेय (काकाजी) द्वारा हुई।

-जगतराम

खेरा पलारी (सिवनी) में नवरात्रि का आयोजन सफलता पूर्वक किया गया। एक लाख गायत्री जप व दशाँश हवन हुआ। ब्राह्मण भोजन कराया गया।

-रामनाथ शुक्ल

चन्द्रनगर (छतरपुर) में ता. 24 सित. से 2 अक्टूबर तक प्रतिदिन बजरंग कीर्तन मंडल द्वारा प्रभातफेरी निकालकर प्रचार किया गया। इसमें ग्राम की समस्त जनता ने पूर्ण सहयोग दिया और ता. 1 को सुबह से अखण्ड ज्योति जलाकर 24 घंटे का कीर्तन व हवन का कार्यक्रम शुरू हुआ। पूर्णाहुति के पश्चात ग्राम की समस्त कन्याओं, ब्राह्मणों और प्रत्येक घर में से एक व्यक्ति- इस प्रकार 2500 व्यक्तियों का सामूहिक भोज किया गया।

-गौरीशंकर शर्मा

तनोड़िया (शाजापुर) में नवरात्रि में कई उपासकों ने 24-24 हजार के अनुष्ठान किये। अन्तिम दिन हवन धूमधाम से हुआ।

-मुन्नीलाल कर्मयोगी

सेगाँव (नेमाड़) में लालबाई फूलबाई माठा के स्थान पर गायत्री जप का आयोजन किया गया जिसमें एक लाख से अधिक की संख्या में जप हुआ। मेरा भी अनुष्ठान नवमी को पूरा हुआ, दसवीं को कन्या-भोजन कराया।

-पढ़रीनाथ चतुर्वेदी

धरमपुरी (धार) में अनेक उपासकों ने श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का अनुष्ठान किया और अन्तिम दिन दशाँश का हवन किया गया।

-बाबूलाल शर्मा

गवरा में नवरात्रि का अनुष्ठान व हवन यथाविधि सम्पन्न हो गया। रामायण का पारायण भी किया गया।

-बद्रीप्रसाद त्रिवेदी

सतना (रीवाँ) की गायत्री शाखा ने 6 लाख जप व 24 हजार आहुतियों का सामूहिक अनुष्ठान समारोह से सम्पन्न किया। पूर्णाहुति का दृश्य देखते ही बनता था। रेलवे के अनेक अधिकारियों और नगर के प्रसिद्ध सज्जनों ने भाग लेकर इसे सफल बनाया।

-राधारमण मिश्रा

जगोबट (झाबुआ) में जप, पाठ और हवन का सामूहिक कार्य सप्ताह आश्विन शुक्ला 10 को पूर्ण हुआ। शाखा कार्यालय में 9000, चित्रभानु सिंह जी के मकान पर 2400, बाबूलालजी एकाउन्टेन्ट के मकान पर 4500 आहुतियों के हवन क्रमशः हुए।

-दत्त प्रसाद शर्मा

हुलुनियाँ ग्राम (रामपुरा) में मंशापूर्ण महादेव के मन्दिर में गायत्री प्रेमियों ने अखण्ड-ज्योति स्थापित की। श्री मोहनपुरा जो महाराज तथा सेठ माँगीलाल ने निराहार रहकर 24-24 हजार का अनुष्ठान किया। पूर्णाहुति के पश्चात 101 ब्राह्मण तथा कन्याओं को भोजन कराया गया।

-माँगीलाल पोरवाल

धारोला (शाजापुर) में 8475 आहुतियों का हवन हनुमान मन्दिर पर किया गया। सब सदस्यों ने इस कार्य में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

-शिवनारायण त्रिवेदी

जीरन (मँदसौर) में नवरात्रि का आयोजन सकुशल हो गया। विश्व-कल्याण के हेतु प्रतिदिन 5 माला का जप किया गया।

-पं. माँगीलाल ओझा

देड़तलाई (बिलासपुर) में गायत्री जप व हवन का अनुष्ठान किया गया।

-ईश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव

लश्कर (ग्वालियर) में 1 लाख जप, 12 हजार आहुतियाँ व 251 चालीसा पाठ का आयोजन किया। जप समाप्ति पर श्री मुकुन्दीलाल सक्सेना तथा हवन समाप्ति पर शाखा की ओर से प्रसाद वितरण हुआ। इस अवसर पर गा.प. के कुलपति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का भी शुभागमन हुआ। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में पुजारी पुरुषोत्तम शास्त्री, पं. चोखेलाल शर्मा तथा श्री नाथूराम पाठक आदि सदस्यों ने उत्साहपूर्वक सहयोग दिया।

-मुरलीघर डण्डौलिया

जावद (मँदसौर) में गायत्री परिवार ने 2 लाख जप व दशमी को 3250 आहुतियों का हवन किया। ता. 6 अक्टूबर को भी 20 सदस्यों ने 2160 आहुतियों का हवन किया। चालीसा की 400 पुस्तकें घर-घर जाकर वितरण की जायेंगी।

-बद्रीलाल नागदा

पेटलाबद (झाबुआ) 39 सदस्यों ने 412500 व 3200 चालीसा पाठ किये। इसके अतिरिक्त सुन्दरकाण्ड के 81 पाठ व भजन, कीर्तन आदि का कार्यक्रम रहा। नवमी को नीलकंठ महादेव की यज्ञशाला में 4000 आहुतियों का हवन करके आरती की गयी और प्रसाद बाँटा गया। विजयदशमी को गायत्री माता व शिवजी का हाथी पर विशाल जुलूस बैण्ड बाजा व लाउडस्पीकर के साथ निकाला गया। पेटलागढ़ से 6 मील दूर करवथा ग्राम में ठाकुर सा. वेणीमाधव सिंह जी ने सवालक्ष गायत्री जप व 1250 आहुतियों का हवन किया। इस कार्य में श्री देवीशंकर जी, हैडमास्टर व पूज्य माधवदासजी महाराज का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ।

-दामोदर प्रसाद नागर

बागोद (निमाढ़) में बाबा ओंकारगिरि की अध्यक्षता में 4500 आहुतियों का यज्ञ सानन्द सम्पन्न हुआ। जनता में माता के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो रही है। जिससे दो-तीन शाखायें शीघ्र ही खुल जायेंगी।

-रतनलाल सक्सेना

सुसनेर (शाजापुर) में गायत्री -परिवार के 19 साधकों ने 24-24 हजार के पुरश्चरण किये। श्री. विष्णुशंकरजी नाजिर ने सवालाख का जप निराहार रहकर तथा अखण्ड दीप जलाकर एक ही स्थान में किया। नवमी को गायत्री परिवार के साधकों का हवन हुआ, जिसमें 3360 आहुतियाँ हुई और विजय दशमी को विष्णुशंकर जी के यहाँ 2500 आहुतियों का हवन हुआ। सार्थकता गायत्री- परिवार का ब्रह्म-भोज हुआ।

-नन्दकिशोर शर्मा

पाडल्या (निमाड़) में कई साधकों ने जप किया और पं. श्यामलालजी के स्थान पर अन्तिम दिन हवन किया गया।

-रामेश्वर पन्ने

उमरिया कैम्प (शहडोल) में नवरात्रि के प्रथम दिन प्रातः काल ही ‘रघुपति राघव राजा राम’ का कीर्तन हुआ धर्मफेरी निकाली गई। यज्ञ भूमि मारुति मन्दिर के मैदान में मिक्स की गयी थी, जिसे आम के पल्लव, झाँकियों व फूलों द्वारा खूब सजाया गया था। विजय दशमी के दिन 2 मन हवन सामग्री से 39966 आहुतियाँ दी गई और 108 कन्याओं के अतिरिक्त अन्य कन्याओं तथा गरीबों को भोजन कराया गया। एक हजार जन समूह को प्रसाद बाँटा गया व 480 गायत्री चालीसा बाँटे गये। इस कार्यक्रम में सेठ जगतप्रसाद का कार्य अत्यन्त सराहनीय रहा।

-देवपाल द्विवेदी

तलवादा (धार) में गंगारामजी पाटोदार व नानुरामजी जीवनराम ने जप व हवन का आयोजन किया। एकादशी को रामायण का अखंड पारायण किया गया।

-रामलाल श्यामजी

भाटपारा (रायपुर) के कई सदस्यों ने 24-24 हजार के अनुष्ठान किये और नवमी को प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से 240 आहुतियाँ दी गई। इस कार्य को सफल बनाने में श्री जे. नरसिंह राव, डॉ. बी.एम. राव, आदित्त नारायण जी अग्रवाल तथा कुन्दन लाल जी शर्मा आदि सज्जनों से विशेष सहयोग प्राप्त हुआ।

-नारायनदास भट्टड़

बीना (सागर) में आचार्यजी के आदेशानुसार अनेक उपासकों ने गायत्री का लघु अनुष्ठान व चालीसा के पाठ किये। दशमी को श्री विश्वनाथ सिंहजी इंस्ट्रक्टर रेलवे स्कूल के निवास स्थान पर गायत्री यज्ञ का आयोजन किया गया। पूर्णाहुति के बाद आरती व प्रसाद वितरण हुआ। महादान के लिये गायत्री साहित्य बाँटा गया। इस कार्य में श्री रमेशप्रसादजी दीक्षित, हरप्रसाद सिंह जी व विशेश्वरसिंहजी का सहयोग प्रशंसनीय था।

-शालिगराम दुबे

सोनासिली (रायपुर) में दस साधकों ने ढाई लाख जप, 1200 चालीस पाठ किये व 480 चालीसा वितरण किया। अन्तिम दिन 3 हजार आहुतियों का हवन किया गया। यहाँ 30 बालकों का एक दल संगठित किया गया है, जो धर्म-फेरी का कार्य बड़े उत्साह और श्रद्धा से करता है। इससे गायत्री का खूब प्रचार हो रहा है।

-ताराचन्द गायत्री-प्रचारक,

छोटी कसराबाद (मंडलेश्वर) में कितने ही उपासकों में चालीसा पाठ व गायत्री जप का अनुष्ठान किया। नौ सौ मंत्र लेखन किया गया। यहाँ अभी कार्य आरम्भ किया गया है, आगे चलकर प्रचार बढ़ेगा।

-किशोरसिंह, प्यारसिंह दसोंदी

अर्जुनी रोड़ (बालाघाट) में नवरात्रि की गायत्री उपासना हनुमान मन्दिर में ता. 24 सि. से शुरू की गई। इस कार्यक्रम में 35 साधकों ने भाग लिया जो प्रातः 4 बजे से रात के 10 बजे तक धर्म कार्यों में संलग्न रहते थे। 60 हजार आहुतियों का हवन हुआ और 240 चालीसा तथा 240 गायत्री चित्र नवमी को बाँटे गये। कुमारी कन्याओं को भोजन कराया गया और 1 मन का प्रसाद बाँटा गया। सर्वश्री सेठ चम्पालाल जी, बनारसीलाल जी अग्रवाल, शीतलप्रसादजी पाण्डे वैद्यराज, कंचन लाल जी अग्रवाल, रामेश्वरजी अग्रवाल, रामस्वरूपजी अग्रवाल, श्री लालसिंह ठाकुर, हरिलालजी अग्रवाल, चन्द्रलाल उजवने ने धन से सहायता देकर कार्य को सफल बनाया।

-मंत्री, गायत्री शाखा परिवार

लखनादौन (छिन्दवाड़ा) में 7 उपासकों ने 24-24 हजार के अनुष्ठान किये और 8 ने 108-108 गायत्री चालीस के जप। अन्तिम दिन हवन किया गया। शरद पूर्णिमा को भी 1300 आहुतियों का हवन किया गया।

-रमरतलाल गोल्हानी

शहडोल में 10 दिन तक गायत्री उपासना का अनुष्ठान किया गया, जिससे परम शाँति का अनुभव हुआ।

-दमजी के. जोशी

राजोद (धार) में नवरात्रि का कार्यक्रम बड़े उत्साह से सम्पन्न हुआ। नवमी को धोलगढ़ ग्राम में सात हजार आहुतियों का हवन किया गया। श्री मोहनलालजी देराश्री ने 240 गायत्री चालीसा प्रचार कार्ड दिये और एक हवन भी कराया। ता. 6 को भी काबरेश्वरनाथ महादेव के मन्दिर में हवन किया गया।

-विनायककराव पाठक

फत्यापुर (निमाड़) में 16 सदस्यों ने 24-24 हजार के अनुष्ठान किये और ता. 2 अक्टूबर को तीन यज्ञ कुण्डों में 39300 आहुतियाँ डाली गईं। पूर्णाहुति के बाद भजन, कीर्तन व प्रसाद वितरण किया गया। सामूहिक ब्रह्मभोज, कन्या-भोज का कार्यक्रम अत्यन्त सुन्दर ढंग से सम्पन्न हुआ।

-मंत्री गायत्री परिवार

कंटनी (जबलपुर) में 5 हवन कुण्डों में 24 हजार आहुतियों का यज्ञ किया गया। सौ. सुशीलादेवी नाग की प्रेरणा से महिलाओं में 240 चालीसा पाठ का कार्यक्रम सम्पन्न किया गया। सभी कार्यकर्ताओं ने उत्साह से भाग लिया जिनमें श्री. रामआसरे शुक्ला का कार्य विशेष सराहनीय रहा।

-रामकृष्ण डोंगरे

हठ्टा (दमोह) में निष्काम भाव से गायत्री चालीसा-पाठ का अनुष्ठान किया गया।

-कु. श्रद्धाबाई,

गरोठ (मन्दसोर) में गायत्री परिवार की ओर से 576500 जप, 6960 मंत्र लेखन, 2389 चालीसा-पाठ का अनुष्ठान किया गया। रात्रि के समय जनता द्वारा रामायण का पारायण किया जाता था। दशमी को ओंकारलालजी शास्त्री द्वारा 5 कुण्डों में लाउडस्पीकर से पूर्णाहुति की गई। एक कुँड महिलाओं के लिये अलग था। प्रसाद वितरण व कन्या-भोज कराया गया। श्रीशंकरलाल चौधरी, वासुदेवजी व रामबिलासजी चौधरी ने विशेष सहयोग दिया।

-शिवनारायण शर्मा

बिलासपुर में 45 सक्रिय सदस्यों के द्वारा दस लाख से अधिक जप और दस हजार आहुतियों का हवन किया गया। अनेक महिला, बाल, वृद्ध सदस्यों ने चालीस पाठ व मन्त्र लेखन किया। पूर्णाहुति के दिन पाँच हवन कुण्डों पर जिस समय आहुति पड़नी आरम्भ हुई, समस्त नगर लाउडस्पीकर द्वारा वेद मंत्रों की ध्वनि से गूँज उठा। सन्ध्या को 5 बजे वेदमाता का जुलूस निकला। स्थान-स्थान पर रथ को रोककर पुष्पमाला व नारियलों से आरती की गई। दशमी को 31 कन्याओं को भोजन कराया गया।

-मीनाराम पोद्दार

पटौद (बस्तर) में उपासकों ने 96000 जप व 285 चालीसा-पाठ का अनुष्ठान किया। दशमी के दिन श्री दयारामजी के निवास स्थान पर पूर्णाहुति का हवन किया गया।

-महभरदास कश्यप

रामपुरा (मन्दसौर) में नवमी के दिन नवरात्रि के अनुष्ठान की पूर्णाहुति की गई। गायत्री- परिवार के अतिरिक्त अन्य सम्माननीय सदस्यों ने भाग लिया।

-रामेश्वरधरप्रसाद

गोलना (उज्जैन) में नवरात्रि के प्रथम दिन से घट स्थापन करके 51 हजार जप किया गया व दशमी को 2100 आहुतियों का यज्ञ किया गया।

-पं. दयाशंकर शर्मा

राघोगढ़ (गुना) में आठ साधकों ने बड़े नियम और तपश्चर्या के साथ गायत्री जप किया। अधिकाँश ने नमक और शक्कर त्याग कर भोजन किया।

-कन्हैयालाल सोनी

राजघाट में 11 साधकों ने नवरात्रि का कार्यक्रम बड़े आनन्द से सम्पन्न किया। नौ दिन तक रामायण पाठ हुआ। पूर्णाहुति के दिन समस्त कार्य लाउडस्पीकर द्वारा हुआ, जिससे चारों ओर उत्साह की लहर दौड़ गयी। इस आयोजन में महंत देववमश्री, गंगाराम भाई, पर्वतसिंहजी, भंडसोई, नाहरसिंह जी, झबरसिंह जी तथा भोलेसिंह जी का प्रयत्न सराहनीय रहा।

-बंकटेश शर्मा

उत्तर-प्रदेश

लखनऊ में सदर और ऐश बाग की शाखाओं ने मिलकर ऐश बाग में ही पाँच हवन कुण्डों का यज्ञ किया। इसका कार्यक्रम 24 सितम्बर से 2 अक्टूबर तक चलता रहा। पूर्णाहुति के दिन उत्तर प्रदेश के न्याय उपमंत्री श्री कश्मीरमण आचार्य और अन्य प्रमुख व्यक्तियों ने भाग लिया था। कुल दस हजार आहुतियों का हवन किया गया। सब कार्य बड़ी सुन्दरता से हुआ और सजावट तथा प्रबन्ध ने लोगों को मोह लिया। जिन लोगों ने दिन रात परिश्रम करके इसे सफल बनाया उनमें श्री हरवंश- लालजी शर्मा, रतनसिंहजी, के.एन. श्रीवास्तव आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

-मनमोहन शुक्ला

शाहजहाँपुर में श्री रामसिंहजी के स्थान पर 2400 आहुतियों का हवन बड़े सुन्दर ढंग से सम्पन्न हो गया। सभी उपासक पीले अंगोछा डाले, माला धारण किये, शुद्ध और सात्विक भाव से हवन कर रहे थे। 13 ता. को दूसरा बड़ा हवन 2400 आहुतियों का किया गया। जिसके लिये लोक-सभा के सदस्य सेठ विशनचन्द्रजी ने 25 रु. और 200 छोटे सैट प्रदान किये। इस कार्य में महावीरप्रसाद गुप्त व रामसिंह जी का परिश्रम सराहनीय है। शान्ति बाबू की निष्काम सेवा-भावना भी प्रशंसनीय थी।

-रंगेलाल शुक्ल, एवं महावीर प्रसाद गुप्त

बाँदा में 24000 का अनुष्ठान सकुशल समाप्त हो गया। गायत्री चालीसा के 240 पाठ और रामायण का नवान्हिक पारायण भी हुआ। ब्राह्मणों एवं कन्याओं को भोजन कराया गया।

-सुखदयाल राम

पुसावली (बदायूँ) में नवरात्रि का कार्यक्रम सामूहिक रूप से बड़े उत्साहपूर्वक सम्पन्न हो गया। प्रातः 3 बजे सबको उठाया जाता था, पश्चात स्नान करके नगर फेरी कीर्तन के साथ की जाती थी आरती, जप-पाठ हवन 8 बजे तक समाप्त होता था। नौमी को पूर्णाहुति का हवन करके ब्राह्मणों और कन्याओं को भोजन कराया गया। जप की संख्या 11884 और आहुतियों की 55600 हुई। गायत्री चालीसा के 2664 पाठ भी किये गये।

-गायत्री प्रसाद गुप्ता

आगरा के गायत्री परिवार की ओर से नवरात्रि का आयोजन छीपीटोला के दाऊजी के मन्दिर में किया गया। नित्य प्रातःकाल 6 से 7 तक सामूहिक जप तथा 7 से 8 तक हवन, चालीसा पाठ, गायत्री माता की आरती एवं प्रसाद वितरण होता रहा। सायंकाल 8 से 10 बजे तक नित्य भारतीय संस्कृति एवं धर्म के विभिन्न अंकों पर स्थानीय विद्वानों के प्रवचन होते रहे। 775600 मंत्रों का जप हुआ तथा 18076 आहुतियाँ दी गयीं। इसी अवसर पर एक कन्या ने दस हजार मंत्र लेखन का अनुष्ठान पूरा किया, जो पहले से चल रहा था।

-भगवानसहाय शुक्ल,

डेरापुर (कानपुर) में नवरात्रि का जप व हवन का कार्यक्रम सानन्द समाप्त हो गया। सात उपासकों ने 24 हजार के अनुष्ठान किये। अन्तिम दिन सभी ने अपने- अपने नारियल चढ़ाकर पूर्णाहुति दी। तत्पश्चात् ग्राम के समस्त बच्चों को प्रसाद वितरण किया गया।

-सतीशनारायण मिश्रा,

शादुल्लापुर (हरदोई) में नवरात्रि का सामूहिक अनुष्ठान बड़े समारोह से सम्पन्न हो गया। अष्टमी के दिन अखण्ड रामायण का पाठ आरम्भ किया गया और नौमी को पूर्णाहुति करके बीस कन्याओं को भोजन कराया गया व ग्रामीणों को प्रसाद बाँटा गया।

-मदनगोपाल शुक्ल,

डिबाई (बुलन्दशहर) में श्री बाँके लाल गुप्ता के यहाँ नवरात्रि का सामूहिक अनुष्ठान किया गया, जिसमें ठेकेदार ओमप्रकाशजी, डॉ. नन्दरामजी तथा अन्य सज्जनों ने भाग लिया।

-गोदावरीदेवी,

मझिया (हरदोई) में नौमी के दिन श्री नजदुनाथसिंह की चौपाल पर एक सामूहिक यज्ञ किया गया। दूसरे दिन विजयदशमी को ग्राम जरेत्री में भी एक बड़ा यज्ञ किया गया, जिसका जनता पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा। प्रसाद में गायत्री चालीसा वितरण किये गये। श्री विजय बहादुर सिंह का कार्य विशेष सराहनीय रहा।

-प्रभुदयाल वैद्य

अर्रुआ (आगरा) में नौमी को समस्त गायत्री परिवार ने मिलकर हवन किया और प्रसाद बाँटा गया। दूसरे दिन पं. जगतप्रसाद के घर पर सामूहिक हवन किया गया।

-रामप्रसाद शर्मा,

बारिगाँव (अलीगढ़) में नवरात्रि का अनुष्ठान सानन्द सम्पन्न हो गया दशमी को शरद ऋतु के अनुकूल सामग्री से हवन समाप्त किया गया। गायत्री चालीसा के पाठ किये गये और प्रीतिभोज तथा कन्या-भोजन कराया गया।

-जंगजीत शर्मा,

नानपारा (बहराइच) ता. 2 को नवरात्रि के उपलक्ष्य में विशेष जप व हवन का आयोजन किया गया।

-श्यामबिहारी

नोदमऊ (फर्रुखाबाद) में यदुनाथ सिंह जी और ता. 3 को मुन्शी सिंह जी के स्थान पर सामूहिक हवन के आयोजन किये गये। कन्या-भोजन कराया गया व चालीसा बाँटे गये। गायत्री प्रचार बढ़ रहा है।

-विश्वनाथ सिंह,

लोचीखेरा (उन्नाव) में नवरात्रि का कार्यक्रम भली प्रकार सम्पन्न हो गया। अन्तिम दिन हवन किया गया और कन्याओं को भोजन कराया गया।

-नर्मदा सिंह

सीतापुर (सुल्तानपुर) में नवरात्रि का सामूहिक सत्संग बड़ी उत्तम रीति से हुआ। नित्यप्रति धर्म फेरी निकलती थी जिसमें ‘शर्मा’ व्रतधारी ने हाथ बँटाया।

-हरगोविन्द त्रिपाठी,

बिजनौर में नवरात्रि के अवसर पर 20 उपासकों ने सवा लाख का और 28 उपासकों ने 24-24 हजार के अनुष्ठान किये। 52 सज्जनों ने चालीसा पाठ किये। 29 सि. से 2 अक्टू. तक गायत्री यज्ञशाला में श्रीमती विद्यावती के संरक्षण में महिलाओं का और पं. जगन्नाथ शर्मा के संरक्षण में पुरुषों का सामूहिक हवन व सत्संग हुए। यह समस्त आयोजन बड़े उत्साहपूर्वक सम्पन्न हुआ। यज्ञशाला की सजावट और उपासकों का उत्साह देखने योग्य था। मंगलवार को सामूहिक कीर्तन होता है। सत्संग दो घण्टे प्रतिदिन चलता है।

-अशरफी लाल

कुर्रा (हमीरपुर) में नवरात्रि के उपलक्ष्य में 3 लाख जप, 2300 चालीसा पाठ व 6 हजार आहुतियों का हवन विधिवत किया गया। नवमी के दिन प्रातः 7 बजे प्रभात-फेरी लगाकर 8 से 11 बजे तक पूर्णाहुति दी गई। फिर कीर्तन करके प्रसाद वितरण किया गया। श्री कालीचरण जी ने 1 वर्ष का अनुष्ठान करके आज ही सम्पूर्ण उपासकों सहित 7 हजार आहुतियों का हवन किया, एक सौ गायत्री- चालीसा वितरण किये गये।

-भगवानदीन शर्मा,

भाऊपुरा (इटावा) में नवरात्रि के अवसर पर 14 हवन हुए जिनमें बाल वृद्ध सभी ने भाग लिया। व्रतधारी पं. रामज्ञान शर्मा व रामअवतार जी शर्मा ने सक्रिय सहयोग दिया। प्रातःकाल शंखध्वनि होते ही सब उपासक नित्य कर्म आरम्भ कर देते थे। आयोजन पूर्ण रूप से सफल हुआ।

-विद्यासागर श्रीवास्तव

इटौआधुरा (बरेली) में ता. 2 अक्टूबर को 2970 आहुतियों का बृहद् यज्ञ हुआ। बहेढ़ी शाखा के मन्त्री भागीरथी ने आचार्य का और श्री बुद्धसेन जी ने ब्रह्म का कार्य सम्पादन किया। ग्रामीण जनता ने बड़ी संख्या में भाग लिया। इस यज्ञ को देखकर ग्रामीण जनता ने शीघ्र ही एक बड़ा यज्ञ कराने का अनुरोध किया है।

-डॉ. रामनारायन भटनागर

मऊरानीपुर (झाँसी) में नवरात्रि के अवसर पर 33 सदस्यों ने 1840 माला का जप व 87 सदस्यों ने 2784 चालीसा पाठ किये।

-मन्त्री गायत्री शाखा सभा,

बिलारी (मुरादाबाद) में पं. किशोरीलाल शर्मा के भवन पर लगभग 2500 आहुतियों का सामूहिक यज्ञ हुआ, जिसमें तीनों शाखाओं के सदस्यों ने भाग लिया था। श्री मक्खनलालजी सक्सेना के भवन पर 36 घण्टे का अखण्ड रामायण पाठ हुआ। मण्डप में अत्यन्त सुन्दर ढंग से बिजली की रोशनी की गई थी। कई महिलाओं और कन्याओं ने अपने-अपने घर पर प्रतिदिन सामूहिक यज्ञ किये। 12 सितम्बर को श्रीकृष्णकुमारजी भटनागर के भवन पर सामूहिक यज्ञ हुआ था। तत्पश्चात कीर्तन भी हुआ जो अपने ढंग का अद्वितीय था। 14 सितम्बर को साहू रामकुमार गुप्ता के यहाँ भी एक सामूहिक यज्ञ किया गया था।

-इच्छापूर्ण गौड़,

ललितपुर (झाँसी) में जप, मन्त्र-लेखन व हवन का आयोजन किया गया। यहाँ गायत्री पुस्तकालय की स्थापना का प्रयत्न किया जा रहा है।

-नाथूराम

गोंडा में नवरात्रि में जप और हवन का आयोजन किया गया। अनेक गायत्री प्रेमियों ने भाग लिया।

-टपेन्द्रनाथ चौबे

बरेली में सप्तमी से नवमी तक कालेश्वर के मंदिर में 7500 आहुतियों का यज्ञ किया गया। अब यहाँ की दोनों शाखायें सम्मिलित होकर कार्य कर रही हैं।

-पं. यशोदानन्दन मुनी

बड़ेसरा (अलीगढ़) में दस उपासकों ने 24-24 हजार का अनुष्ठान किया, जिनमें पाँच कन्यायें थीं। नवमी को सबने मिलकर सामूहिक यज्ञ व गायत्री- चालीसा का पाठ किया। ब्रह्म-भोज के विषय में सबको समझा दिया दिया गया कि कन्याओं को भोजन कराया जाय या गायत्री साहित्य बाँटा जाय।

-फुन्दीराम शर्मा

बेसँडी (फतेहपुर) में नवरात्रि में घर-घर जाकर ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की आवश्यकता समझाते हुये नये सदस्य बनाये गये। नौमी के दिन समस्त सदस्यों द्वारा सामूहिक हवन किया गया। 108 चालीसा वितरण किये गये।

-सत्यव्रत विद्यारत्न

भद्रपुर (फतेहपुर) में अनुष्ठान और नित्य प्रति की साधना के अनन्तर नवमी को सुव्यवस्थित रूप से हवन किया गया। चालीसा और रामचरित मानस का अखण्ड पारायण किया गया। श्रीराम आसरे सिंह जी (इब्राहिमपुर) से विशेष सहयोग मिला।

-रामाश्रय वर्मा एम.ए.

बलरामपुर (गोण्डा) में विश्व-कल्याणार्थ 258876 जप व 3132 आहुतियों को भोजन कराया गया। 240 गायत्री चालीसा बाँटे गये। लाला बनारसीदासजी ने इस कार्य में पूरा हिस्सा लेकर सफल बनाया। श्री जगदम्बाप्रसाद ने 24 हजार का अनुष्ठान बड़े परिश्रम से फलाहार पर किया।

-जगदेवप्रसाद त्रिपाठी,

कानपुर में श्री नारायनदत्तजी की अध्यक्षता में तपेश्वरीदेवी की पुण्य भूमि में 2 अक्टूबर को 40 नर-नारियों द्वारा विशाल गायत्री हवन किया गया। प्रसाद और चालीसा वितरण किये गये। गत 6 अक्टूबर को जगदीशपुर (उन्नाव) में श्री सावित्री देवी के निवास स्थान पर 1400 आहुतियों का गायत्री यज्ञ सम्पन्न किया गया। गाँव की अधिकाँश महिलाओं ने भाग लिया।

-अयोध्या प्रसाद दीक्षित

मझौला (पीलीभीत) में सामूहिक गायत्री साधना में 240 घंटे अखण्ड ज्योति जलाई गई, 34000 जप 24000 आहुतियाँ, 2400 मंत्र लेखन, 1000 गायत्री चालीसा पाठ, 500 गायत्री पुस्तक वितरण किया गया। पूर्णाहुति बड़े समारोह तथा विधिपूर्वक सम्पन्न हुई।

-लक्षमण सिंह मनराल

अलीगढ़ में ता. 2 अक्टूबर को लाख गायत्री जप के उपलक्ष्य में 7500 आहुतियों का हवन किया गया, जो दिन के 10 बजे से 2 बजे तक चलता रहा। श्रीचन्द्रपाल शास्त्री यज्ञाचार्य के पद पर तथा पं. रमेशचन्द्र शर्मा ब्रह्म पद पर आसीन रहे। कन्या-भोजन, ब्राह्मण-भोजन, गायत्री-साहित्य-वितरण के अतिरिक्त 5 रु. गायत्री तपोभूमि को भेंट दिये जाने का संकल्प कराया गया। इस कार्य में श्रीरामप्रकाशजी तथा केदारनाथजी ने विशेष हाथ बँटाया।

-श्रीराम पाण्डेय

बिजौली (फतेहपुर) में नवरात्रि का कार्यक्रम बड़े समारोह से मनाया गया। इस अवसर पर दो सामूहिक यज्ञ किये गये। पहला यज्ञ श्री रामसनेही वर्मा के यहाँ और दूसरा श्री महाबीरसिंह के यहाँ सम्पन्न हुआ। 2200 मन्त्र लेखन किया गया।

-रामसनेही वर्मा

प्रमोद कुँज घुमनी (बहराइच) में सवालाख के दो अनुष्ठान पूरे होकर 8 हजार आहुतियों का विधिवत् हवन किया गया। 240 चालीसा वितरण किये गये। यज्ञशाला का निर्माण, सजावट तथा संचालन में तपोभूमि मथुरा के स्नातक कौशलकिशोर ने अच्छी पटुता का परिचय दिया। यज्ञ की सफलता में शिवप्रसाद शुक्ल (समदा) ने पूरा सहयोग दिया।

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वंशी धर दो, शंख उठाओ!


वंशी धर दो, शंख उठाओ (Kavita)

तोड़ रहा है साँस सबेरा, घोट रहा है कण्ठ अँधेरा,

ओ प्रकाश के पहरेदारों, वंशी धर दो, शंख उठाओ।

तम की परछाँई पर साधें, डगर-डगर पर डोल रही हैं,

परवशता सर्पिणी प्राण में, जहर घुटन को घोल रही है,

सदा-सदा के लिए कहीं आलोक नहीं बिक जाय, देखना-

रात हथेली पर धर दिनकर के मोती को तोल रही है!

यह कुन्दन है बीहड़पन का, चहल-पहल का शोर नहीं है,

और नाम चाहे जो दे लो, दोस्त, मगर यह भोर नहीं है।

धूप तनिक उंगलियाँ छुआ दे और अचानक वह खुल जाए

द्वार कुहासे का फौलादी इतना तो कमजोर नहीं है!

खुल कर खिलें किरण-पंखड़ियाँ, चमक उठें शबनम की लड़ियाँ,

नए प्रात के श्वेत कमल से, लिपट रहा जो पंक हटाओ!

सौ-सौ आवरणों के पीछे, छिपा सबेरे का चेहरा है,

चमक ज्योति की बुझी-बुझी-सी तम का रंग बहुत गहरा है।

बोलो फिर जंजीर काट दे, कौन दिवाकर के चरणों की?

यहाँ दबाव विवशता का है वहाँ अनिच्छा का पहरा है

जिसके पास खड़ग, वह आगे आने को तैयार नहीं है!

जो आगे आया है- उसके हाथों में तलवार नहीं है,

जो समर्थ है, कर सकता विद्रोह-गुलामी का हामी है,

गीत बगावत का गाता जो, उसके पास सितार नहीं है!

यद्यपि वन्दी हाथ तुम्हारे, पर युग-स्वर है साथ तुम्हारे,

तुम विरुद्ध हर कारा के आवाज दोस्त निश्शंक उठाओ!

बहुत बड़ा षड़यन्त्र रचा है रजनी के पहरेदारों ने,

साजिश कर ली है विनाश की जहर-बुझाई तलवारों ने

इधर टूटते सृजन-सितारे, उधर अमन का चाँद डूबता,

फूल-फूल को घेर लिया है, आज सुलगते अंगारों ने!

वक्त नहीं लोरियाँ सुनाने का अब दोस्त, प्रभाती गाओ,

तार तोड़ डालो सितार के नई क्राँति का बिगुल बजाओ,

तुम श्रम के विश्वास नया इतिहास लिखो सृजन-प्रयास का,

ओ धरती के राजदुलारों, सूरज को आवाज लगाओ!

सपनों की दीवार तोड़ दो, कुँठा की तलवार मोड़ दो,

नींद छोड़ कर उठो जागरण के विहंगों से पंख सटाओ!

*समाप्त*

(श्री बालस्वरूप ‘राही’)