(पं. गणेशदत्त शर्मा ‘दन्ड’)
प्रलय-वीणा के तार-तार अब झंकृत कर ऐ महाकाल, ले उठा हाथ में डमरू अब बज उठे भयानक रुद्रताल।
मच जाय, विश्व में उथल-पुथल अवनि गगन जल-थल संकुल, हो फिर ताण्डव प्रलयंकर सर्वत्र प्रज्ज्वलित हाथ अनल॥
टूटे पहाड़ हों छार-छार छलकें अम्बुधि ले महानाश, चण्डी ले खप्पर करे नाच फैला कृत्तान्त का मृत्युपाश।
हो त्रस्त-व्यस्त भयभीत ध्वस्त, पददलित प्रताड़ित महाक्रान्त, कर पदाघात से भूप्रकम्य ब्रह्माण्ड काण्ड होवे अशान्त।
टूटे नक्षत्र, ग्रह स्थान भ्रष्ट हो धूमकेत, से व्योम व्याप्त, ये सूर्य चन्द्र हो, चूर्ण-चूर्ण शिशुभार वृत्त भी समाप्त॥
जल उठें दिशाएं धाँय-धाँय दिग्पाल छोड़ दिशि भाग जायं। कूरम फणीश सब छलभलाँय बाराह दन्त-द्वय टूट जायं॥
डगमग हो विश्व होवे विदीर्ण पावे नव जीवन त्याग जीर्ण, मिट जाय प्रताड़न दैन्य अनद हो सत्यं, प्रेम फिर से विस्तीर्ण॥
भातृत्व स्नेह की मन्दाकिनी फिर बहे विश्व में शान्त दान्त, साम्राज्यवाद सम्पत्तिवाद, शोषक समाज का हो महान्त।
जल उठें कोठियाँ धवल-नवल बन जायं झोपड़े नवल महल, हों प्रबल-सबल अतिशय निरबल अब सुप्त हाड़ हो जायं सबल।
फिर हो सतयुग का नवप्रभात अतएव नाश है व्याल माल। इस प्रलय वीणा के तार-तार अब झंकृत कर हे महाकाल॥
परिवर्तन संसार का अटल नियम है। एक साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है कि संसार में कोई वस्तु सदैव एक दशा में स्थिर नहीं रह सकती। जो आज बालक है, कल वह युवा होगा और परसों बूढ़ा होकर यहाँ से चल बसेगा। यही हाल देशों, जातियों, धर्मों, सब तरह की संस्थाओं, सामाजिक प्रथाओं आदि का होता है, यह सत्य है कि इनके जन्म और मरण में अधिक समय लगता है, पर एक दिन अन्त सबका हो जाता है। जब तक यह परिवर्तन धीरे-धीरे होता रहता है तो साधारण मनुष्य की बुद्धि उसे अनुभव नहीं कर सकती, क्योंकि वे अपनी छोटी सी आयु के भीतर इनके निर्माण और नाश का बहुत थोड़ा अंश ही देख सकता है। केवल ऐसे व्यक्ति ही, जो इतिहास और समाज-विज्ञान की जानकारी रखते हैं, इस प्रकार के सूक्ष्म परिवर्तन को समझ पाते हैं।
पर एक समय ऐसा भी आता है जब पुरानी संस्थाओं और प्रणालियों का शीघ्रता पूर्वक नाश होकर नई रचना होने लगती है। तब परिवर्तन की गति बड़ी तेज हो जाती है और साधारण बुद्धि के मनुष्य भी उसके देख और समझ सकते हैं। संयोग वश ऐसा ही युग इस समय हमारे सामने उपस्थित है। इस समय सब तरह की संस्थाओं, प्रणालियों और प्रथाओं का परिवर्तन ऐसी शीघ्रता से और व्यापक रूप में होने लगा है कि जो लोग अपने नेत्र बन्द किये पड़े रहते हैं उनको भी उसके धक्के लग रहे हैं और वे भी आँखें खोलने को विवश हो रहे हैं। आज छोटे और बड़े, मूर्ख और पंडित, गरीब और अमीर मनुष्यों के मुँह से बार-बार यही सुनाई पड़ रहा है कि “जमाना बदल गया है- अनहोनी बातें हो रही हैं- प्रकृति के नियम भी बदल गये- अब परमात्मा की लीला है।”
आज आप दुनिया के राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक किसी विषय पर विचार कीजिए, आपको तुरन्त ज्ञात हो जाएगा कि पुरानी बातें बड़ी जल्दी-जल्दी बदल रही हैं और उनके स्थान में ऐसी बातें प्रचलित होती जाती हैं जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यह सत्य है कि आज भी अधिकाँश व्यक्ति इन परिवर्तनों के वास्तविक रहस्य को नहीं समझ पाते, इसलिए वे उनको देखकर या तो चौंक रहे हैं, घबड़ा रहे हैं, या नाराज होकर कोस रहे हैं। वे यही कहते रहते हैं कि “अब पृथ्वी पर पाप बहुत बढ़ गया है और संसार के बुरे दिन आ गये हैं।” पर काल चक्र ऐसे निर्बल या भोले लोगों की कुछ भी चिन्ता न करके वेग पूर्वक अपना काम किये जा रहा है। यह वर्तमान समय के प्रतिकूल अथवा अनुपयुक्त रीति-रिवाजों और संस्थाओं को निर्दयता पूर्वक कुचलकर फेंक रहा है और दुनिया की मनुष्य-जीवन की काया पलट करता जा रहा है।
राजनीति के क्षेत्र में देखिये तो पिछले 40-50 वर्षों में बड़े-बड़े सम्राटों, शहंशाहों, सुल्तानों, कैसरों जारों, राजा, महाराजाओं का नाम निशान नहीं बचा है। जापान के सम्राट जो अपना वंशक्रम सूर्य से लगाते हैं और जिनका दर्शन कोई मनुष्य नहीं कर सकता था, रूस के जार जो “छोटे ईश्वर” कहलाते थे, चीन के बादशाह जिनका वंश वास्तव में अति प्राचीन काल से करोड़ों व्यक्तियों का भाग्य विधाता बना बैठा था, टर्की के सुल्तान जो संसार भर के मुसलमानों के खलीफा और परम पूजनीय माने जाते थे, हम लोगों के देखते-देखते लोप हो गये और आज उनके महलों में जहाँ सूर्य का प्रकाश और वायु भी कठिनता से घुस पाते थे मजदूरों के स्कूल या अजायबघर खुले हुए हैं। दूर क्यों जायें हमारे ही देश में जो राजा और महाराजा अपने को राम और कृष्ण के वंशज बतलाते थे, इन आठ-दस वर्षों के भीतर ही अपनी-अपनी ऊंची-ऊंची गद्दियों से उतर कर जन साधारण की कतार में आकर खड़े हो गये हैं। इस समय बड़े-बड़े देशों के कर्ता-धर्ता ऐसे ही व्यक्ति बने हुए हैं जो अभी तक बिल्कुल साधारण वंशों के समझे जाते थे। कितने ही देशों में ऐसे लोग शासन के प्रधान हैं जो बचपन में सचमुच मजदूरी करके पेट भरते थे। हमारे यहाँ भी स्कूलों के साधारण मास्टर करोड़ों की जन-संख्या वाले प्रदेशों के प्रधानमन्त्री और राज्यपाल बने हैं। क्या इन बातों में आपको नव-युग की झलक नहीं दिखलाई देती?
धर्म की तो बात ही मत पूछिये। यों तो धर्म के सम्बन्ध में साधारण लोगों में ही नहीं बड़े-बड़े विद्वान और ज्ञानी कहलाने वालों में भी सदा ने बड़ा मतभेद रहा है और धर्म के सिद्धान्त तथा उसकी क्रियाएं और विधियाँ समय-समय पर बदलती रहती हैं, पर आज कल धर्म की जड़ पर ही जैसा आक्रमण हो रहा है, वैसा दृश्य पूर्वकाल में कभी देखने को नहीं आया। इस समय लाखों-करोड़ों व्यक्ति ऐसे पैदा हो गये हैं जो धर्म के परिवर्तन या संशोधन की बात नहीं कहते, पर जो धर्म का नाम लेने के ही विरुद्ध हैं। भारतवर्ष का जो शासन विधान बनाया गया है, वही ‘धर्म-निरपेक्ष’ कहा जाता है, अर्थात् उसका किसी विशेष धर्म या साम्प्रदायिक नियमों से कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा। रूस, चीन आदि साम्यवादी देशों में तो धर्म को जहाँ तक संभव था जनता में से भी निकाल दिया है और अब वहाँ बहुत थोड़े आदमी मन्दिरों या गिरजाघरों में जाने वाले बचे हैं। इन बातों से धर्म के पक्षपातियों में भी खलबली मची है और वे धर्म की रक्षा के उपाय सोचने लगे हैं। नतीजा यह हुआ है कि भारत जैसे धर्म-प्रधान देश में भी धर्म के संस्कार के प्रयत्न हो रहे हैं और अनेकों धार्मिक संगठन तथा धर्म-तत्व के ज्ञाता सन्त और महात्मागण धर्म में घुसी हुई दिखावटी और कृत्रिम बातों को दूर करके वास्तविक धर्म का प्रचार कर रहे हैं।
जहाँ नये युग के प्रभाव से लाखों-करोड़ों व्यक्ति धर्म के विरोधी बन रहे हैं, दूसरी ओर उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप लाखों-करोड़ों लोगों में यह विश्वास भी जम रहा है कि जब वर्तमान स्वार्थ और पाप के जमाने अथवा ‘कलियुग‘ का अन्त होकर शीघ्र ही त्याग और परमार्थ के समय अथवा ‘सतयुग‘ का आविर्भाव होने वाला है। समय-समय पर हिन्दुओं में कल्कि अवतार, मुसलमानों में मेंहदी और ईसाइयों में मसीह के प्रकट होने की चर्चा अनेक लोगों के मुख से सुनने में आया करती है। ईरान के लाखों वहावी, हजारों थियोसोफिस्ट, हजारों बौद्ध धर्मावलम्बी भी किसी नवीन अवतार के होने में विश्वास रखते हैं और अनेक व्यक्ति तो उसके आगमन का जोरों से प्रचार कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में कुछ वर्ष पहले नीचे लिखा मनोरंजक लेखाँश किसी योरोपियन धार्मिक अखबार में छपा था-
“क्या ईसा मसीह ने फिर से जन्म लिया है? इस सम्बन्ध में आजकल योरोप के अध्यात्म विद्या के जानकारों में बड़ी चर्चा हो रही है। कुछ साल पहले मिश्र की प्राचीन गुप्त विद्याओं के जानकार मि. जार्ज बाबेरी ने भविष्यवाणी की थी कि दुनिया में एक नया युग-शुरू होने वाला है। यहूदी लोगों का ख्याल है कि उनके धर्म ग्रंथों में बतलाया गया ‘मुएर गजर’ नाम का युग (अर्थात् सतयुग) जल्दी ही शुरू होगा। ईरान में अली के मानने वालों का भी ऐसा ही विश्वास है। जापानी लोगों का विश्वास है कि कुछ ही समय बाद ‘अवातेरी’ नाम का स्वर्ण युग आरम्भ हो जायगा। इतना ही नहीं अमरीका और इंग्लैण्ड जैसे विज्ञान-प्रधान देशों में भी ऐसे ही विश्वासों का प्रचार करने वाले अनेक लोग पैदा हो गये हैं और हजारों व्यक्ति उनके अनुयायी भी बन गये हैं।”
हमारे कहने का आशय यह कदापि नहीं है कि उपर्युक्त मत मतान्तरों के जो व्यक्ति सतयुग और अवतार की बात कहते हैं वे कोई बड़े विचारक हैं और उन्होंने जाँच-पड़ताल करके ऐसा निश्चय किया है। पर इतना हम अवश्य जानते हैं कि जब-जब संसार में विशेष हलचल का समय आता है और उसके कारण सर्व-साधारण को कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं, तभी वे अपनी रक्षा के लिए किसी उद्धारकर्ता की ओर नजर दौड़ाने लगते हैं और ऐसा युग आने की अभिलाषा करने लगते हैं कि जिसमें वे सुख और शाँति से रह सकें। अगर हिन्दू-धर्म के शब्दों में कहा जाय तो, अब अत्याचार और कष्टों के मारे मनुष्य-मात्र त्राहि-त्राहि करने लगते हैं तभी नया अवतार होता है और तभी नया युग आता है। भगवान कृष्ण का ‘यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः’ वाला श्लोक सभी जानते हैं। इसके अनुसार जब कभी धर्म की बहुत ही हानि हो जाती है अर्थात् जब दुनिया के लोग परोपकार, दया, क्षमा आदि सद्गुणों को छोड़कर घोर स्वार्थी बनकर जोर जुल्म पर उतारू हो जाते हैं, अपना मतलब पूरा करने के लिए कमजोरों का गला काटने लगते हैं, तो भगवान का अवतार या उन्हीं की शक्ति से सम्पन्न किसी महापुरुष का आविर्भाव होता है।
साथ ही यह स्पष्ट है कि इस प्रकार का परिवर्तन बिना किसी बहुत बड़ी नाश लीला के नहीं होता। जो लोग अपने स्वार्थ और लोभ के लिए दूसरों के हक को दबाये बैठे हैं वे सहज में अपनी जगह को नहीं छोड़ सकते। जिन्होंने दुनिया की सम्पत्ति को बटोर कर ताले में बन्द कर रखा है। वे केवल उपदेशों से अपने खजानों की ताली जनता को अर्पण नहीं कर सकते। इसलिये ऐसे महान काया पलट करने वाले परिवर्तन प्रायः बहुत बड़ी मार-काट और संहार के साथ ही होते हैं। उसके लक्षण भी आज की राजनीतिक घटनाओं और युद्ध के नवीन साधनों में प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ रहे हैं। इसलिये हम भी इस बात पर विश्वास करते हैं कि अब संसार का विध्वंस होकर नये के आगमन का समय समीप ही आ पहुँचा है।
(श्री एस॰ केशवन)
दूसरे महासमर में धन और जन का नाश देख कर जनता के छक्के छूट गये। बड़े-बड़े देशों का सर्वनाश हो गया और कई करोड़ कार्यक्षम और शक्ति सम्पन्न व्यक्ति अकाल-मृत्यु को प्राप्त हुये। जितनी सामग्री और सम्पत्ति युद्ध में खर्च और नष्ट हुई उसका तो हिसाब लगाना ही कठिन है। इसलिये लोगों ने स्वभावतः यह विचार किया कि इससे राजनीतिज्ञों की आँखें खुल जायेंगी और अब संसार में से लड़ाई का अन्त हो जायगा। दूसरा कारण यह भी था कि इस बार दूसरे पक्ष के देश जर्मनी, जापान, इटली आदि इस प्रकार सर्वस्व दाँव पर लगाकर लड़े थे कि उनकी कमर पूरी तरह से टूट गई थी और सैकड़ों वर्ष तक उनके खड़े हो सकने की आशा न थी।
पर लड़ाई को समाप्त हुये एक वर्ष भी न हुआ था कि तीसरे महायुद्ध की बातें सुनाई देने लगीं। महायुद्ध में जर्मनी आदि के विरोध में लड़ने वाले मुख्य देश चार थे। अमरीका, रूस, इंग्लैंड और फ्राँस। इनमें से फ्राँस को तो जर्मनी ने पूर्णतया हरा कर कई वर्ष तक अपने अधिकार में रखा था, जिससे उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा बहुत कम हो गई। इंग्लैंड की रक्षा भी स्पष्टतया अमरीका की सहायता से ही सम्भव हो सकी। इसलिए उसे भी अमरीका का आश्रित बन जाना पड़ा। पर रूस की स्थिति तथा नीति सदैव स्वतंत्र रही। वैसे तो अमरीका, इंग्लैंड आदि पूँजीवादी होने के कारण रूस के साम्यवादी शासन के सदा से विरोधी थे, पर इस द्वितीय महायुद्ध के संकटपूर्ण समय में स्वार्थवश उससे मिल गये थे। उनका यह भी ख्याल था कि जर्मनी की प्रबल सैनिक शक्ति रूस का विध्वंस कर देगी और इस प्रकार वे एक ही चाल से अपने दो शत्रुओं का काम तमाम कर सकेंगे। इसमें संदेह नहीं कि जर्मनी का रूस पर आक्रमण बड़ा प्रबल था और उसके फल से उसके बड़े प्रदेश का नाश हो गया, पर रूस की महान शक्ति पर इस सामयिक आक्रमण का प्रभाव अस्थायी ही सिद्ध हुआ और युद्ध के समाप्त होते ही उसने अपनी स्थिति को फिर सुदृढ़ बना लिया। इस प्रकार एक मात्र रूस ही अमरीका का प्रतिद्वन्दी रहा और उसी का मुकाबला करने तथा दबाने के लिए अमरीका की नवीन युद्ध योजना आरम्भ हुई।
अमरीका में युद्ध की तैयारी होने का दूसरा मुख्य कारण यह है कि वह सबसे बड़ा पूँजीवादी देश है और वहाँ का शासन वास्तव में पूँजीपतियों द्वारा चलाया जाता है। वैसे अमरीका की आबादी 16-17 करोड़ है, पर जहाँ की असली शक्ति आठ व्यापारिक संगठनों के हाथ में है। इनमें 5 संगठन तो भिन्न-भिन्न देशों के हैं और तीन विशिष्ट नगरों के स्थानीय संगठन हैं। इनकी सम्पत्ति का अनुमान एक सरकारी रिपोर्ट में निम्नलिखित लगाया गया था।
मौरगन...........................30 अरब डालर
कुहन लौव ......................11 अरब डालर
राकफेलर .......................6 अरब डालर
शिकागो ग्रुप ....................4 अरब डालर
मैलन ..............................3 अरब डालर
ड्यू पौंट ..........................2 अरब डालर
क्वीलैण्ड ग्रुप....................1 अरब डालर
बोस्टन ग्रुप ....................... 1 अरब डालर
ये ही आठ व्यापारिक संगठन अमरीका के सर्व शक्तिशाली व्यवसाय-संघ ‘नेशनल एसोसिएशन ऑफ मैन्युफैक्चरर्स’ (एन.ए.एम.) पर नियन्त्रण रखते हैं। ये ही महाविशाल आर्थिक संगठन अमरीका के असली शासक हैं। वहाँ की दोनों प्रमुख राजनैतिक पार्टियों- रिपब्लिकन और डेमोक्रेट नेता इन्हीं व्यापारिक संघों के चुने हुए लोग ही हैं। शासन-सभा में इन्हीं व्यापारियों के एजेन्ट अपने मालिकों की इच्छानुकूल कार्यवाही किया करते हैं। अगर कोई मामला अन्य प्रतिनिधियों का जोर बढ़ जाने से उनकी इच्छा के विपरीत पास हो जाता है तो उसमें तरह-तरह के अड़ंगा उपस्थित करते हैं और बाद में अपने अनुकूल रूप में बदलवा लेते हैं। अपने यहाँ एक मजदूर विरोधी कानून पास हुआ है जिस पर बारह वर्ष तक विवाद चलता रहा और अन्त में ‘एन.ए.एम.’ ने अपने सब विरोधियों को हराकर पास कराके छोड़ा।
सरकारी कार्यालयों और कमेटियों में पूँजीपतियों के आदमी भरे रहते हैं और जिनमें से कितने ही तो पूँजीपतियों के ही सम्बन्धी अथवा हिस्सेदार होते हैं। पूर्ववर्ती सरकार के कॉमर्स-सेक्रेटरी ए. डब्लू. हरीमैन न्यूयार्क की एक बहुत बड़ी बैंक के हिस्सेदार थे। योरोप को सहायता देने वाली मार्शल प्लैन की कमेटी के प्रथम सहायक अधिकारी राबर्ट लोबेट भी उपर्युक्त बैंक के ही आदमी थे। इसी प्रकार अन्य अनेकों बड़ी-बड़ी कम्पनियों के साझीदार ऊँचे सरकारी पदों और कमेटियों के अधिकारी बना दिये जाते हैं। और तो क्या युद्ध कालीन प्रेसीडेन्ट ट्रुमन स्वयं ‘मिडवेस्ट’ नामकी बड़ी बैंक के हिस्सेदार थे।
इस प्रकार अमरीका के अरबपति ही वह असली शासक हैं और द्वितीय महायुद्ध के अवतरण पर इन्होंने मनमाना नफा कमाया। व्यापारिक मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीका के व्यवसाइयों ने सन् 1940 से 1954 तक पाँच वर्षों में 52 बिलियन डालर (बिलियन= 10 खरब) का लाभ कमाया था। पर यह नफा सब व्यवसाइयों को समान नहीं मिल सका। जो सबसे बड़ी कॉरपोरेशन थी उनको बड़ा हिस्सा मिल गया और छोटी कार्पोरेशनों को साधारण हिस्सा मिला। महायुद्ध का नतीजा यह भी हुआ कि ये कॉरपोरेशन और भी महाकाय और शक्तिशाली हो गये। इसका पता इससे लगता है कि महायुद्ध से पहले 10 हजार या इससे अधिक मजदूरों को नौकर रखने वाले कारखानों की संख्या 49 थी, पर महायुद्ध के अन्त में यह संख्या 344 तक पहुँच गई। पर इसका नतीजा यह भी हुआ कि बीस लाख छोटे-छोटे कारखानों का सफाया हो गया।
पर युद्ध का अन्त हो जाने पर इनके सामने वही कठिनाई आई। युद्ध के फल से इनके साधन तथा कारखानों का आकार तो बहुत बढ़ गया, पर उन कारखानों का बना माल कहाँ बेचा जाय यह समस्या इनके सामने उपस्थित हुई। युद्ध के बाद सभी देश अपने-अपने कारखानों को सँभालने और उनकी वृद्धि करने में लगे, इसलिये विदेशों का बाजार घटने लगा। साथ ही अमरीका के मजदूरों का वेतन भी घटाया जाने लगा जिसके फल से उनकी क्रय-शक्ति भी कम हो गई। पहले जमाने में एशिया के बड़े अच्छे व्यापारिक क्षेत्र थे, पर महायुद्ध के बाद यहाँ भी सर्वत्र राष्ट्रीय जागृति होने लगी और ये देश यथा संभव स्वावलम्बी बनने की चेष्टा करने लगे। इस प्रकार एक ओर तो कारखानों की पैदावार ड्यौढ़ी-दुगुनी बढ़ने लगी और दूसरी ओर आमदनी की कमी से लोगों का खरीदना कम होने लगा। इससे पूँजीपतियों के गोदामों में तैयार माल का ढेर जमा होने लगा अथवा उनको जबर्दस्ती अपने कारखाने कुछ समय के लिए बन्द करने पड़े। दोनों ही दशाओं में उनको हानि होने लगी।
इस अवस्था के सुधार के लिए अमरीका के प्रमुख राजनीतिज्ञों और व्यवसाय पतियों ने मार्शल प्लैन बनाया जिसके अनुसार योरोपियन देशों को लगभग 70 अरब रु. की सहायता देने का निश्चय किया गया। पर यह सहायता विशेषतर सामग्री के रूप में देनी निश्चय की गई, और वह भी ऐसी सामग्री, जिसके देने से अमरीकन कारखानों का लाभ हो और वह चलते रह सकें। उदाहरण के लिए योरोपियन देश खास तौर से मशीनों की माँग करते थे, जिससे युद्ध-काल में नष्ट होने वाले कारखानों को फिर से काम लायक बना सकें। पर अमरीका ने मशीनें तो नाम मात्र को भेजीं, ज्यादातर सामग्री यहीं भेजी जो अमरीका के कारखानों में बची पड़ी थी- जैसे तम्बाकू, फलों का रस, अंडों का सूखा चूर्ण आदि। पेरिस कांफ्रेंस ने 40 करोड़ डालर का स्टील माँगा, पर उसे घटाकर आधा कर दिया गया। इसी प्रकार योरोप के कारखानों के लिए जो कच्चा लोहा और टूटा-फूटा लोहा माँगा गया वह भी घटाकर एक तिहाई कर दिया गया। इसके बदले में अमरीका के कारखानों का बना लोहे का सामान तीन गुना अधिक भेजा गया, इससे स्पष्ट प्रकट हो गया कि अमरीका वाले चाहते हैं कि योरोप के लोहे के कारखाने न चल सकें और उनके स्थान में अमरीकन कारखानों को काम मिलता रहे। इतना ही नहीं इन लोगों ने यह योजना की योरोप को जो माल सहायतार्थ दिया जाय और जिसकी कीमत वह अदा न कर सकें उसके बदले में योरोप के कारखानों को ही खरीद कर उन पर अमरीका के पूँजीपतियों का आधिपत्य कायम कर दिया जाय।
मार्शल प्लैन और एशिया को दी जाने वाली सहायता का दूसरा उद्देश्य साम्यवाद के प्रचार को रोकना और पुरानी साम्राज्यवादी शासनों की यथा शक्ति रक्षा करना है। अमरीका का सबसे बड़ा विरोधी रूस है और संसार में एक नवीन प्रकार की सामाजिक और शासन व्यवस्था का श्रीगणेश कर रहा है। वहीं वहाँ के पूँजीपतियों के मार्ग में एक मात्र सबसे बड़ी बाधा है। इसलिये मार्शल प्लैन और दूसरी योजनाओं का प्रकट उद्देश्य तो जनता और व्यवसाय की दशा को सुधारने का बताया जाता है, पर उनका भीतरी उद्देश्य रूस और उसके साथी देशों के विरुद्ध युद्ध की तैयारी करना और समस्त सहायता पाने वाले देशों को अपना अड्डा बना लेना है। यही कारण है कि अमरीका योरोपियन देशों में सबसे अधिक सहायता पश्चिमी जर्मनी को देता है जो रूस का मुकाबला करने के लिये सबसे प्रमुख स्थान है। इसी प्रकार एशिया में उसकी तरफ से सबसे अधिक सहायता चीन के राष्ट्रवादी दल अर्थात् चियाँग काईशेक को दी जाती है, जिसके द्वारा चीन को दबाया जा सकता है। इसी उद्देश्य से हमारे पड़ोस में पाकिस्तान को भी कई अरब रुपये की सहायता दी जा चुकी है।
अमरीका और उसके साथियों की यही स्वार्थ पूर्ण योजना कि अमरीका के पूँजीपतियों का आधिपत्य कायम हो जाय और कोई ऐसा राष्ट्र शेष न रहे जो उनके मार्ग में बाधक सिद्ध हो, युद्ध का सबसे बड़ा कारण है। खासकर जबसे अणु शक्ति का पता लगा है और अमरीका ने एटब बमों द्वारा जापान जैसे प्रबल देश को एक सप्ताह के भीतर पराजय स्वीकार करने को विवश कर दिया, तबसे इन लोगों के हौसले बहुत बढ़ गये हैं। ये लोग सन् 1947 और 48 से ही इस बात का इरादा कर रहे हैं कि किसी प्रकार रूस से युद्ध छेड़कर उसे सदा के लिए नष्ट भ्रष्ट कर दिया जाय। इस सम्बन्ध में इंग्लैंड के प्रधान मन्त्री और युद्ध-प्रचारक चर्चिल साहब ने सन् 1948 में कहा था-
“हमको इसी समय पूरी शक्ति से काम लेकर मामले को सदा के लिए तय कर देना चाहिए। पश्चिमी देश अगर इसी समय अपनी न्याययुक्त माँगें पेश करें तो सब तरह के झगड़ों का स्थायी फैसला शीघ्र ही हो सकता है, क्योंकि इस समय हम लोगों के पास एटम बम हैं और रूस अभी उनको नहीं बना सका है।”
क्या इसका स्पष्ट अर्थ यह नहीं है कि समस्त साम्राज्यवादी शक्तियाँ सम्मिलित रूप से अपनी माँगें रूस के सामने रखकर, उसे बंधनों से जकड़ दें और वह इनकार करे तो उस पर एटम बमों से आक्रमण कर दिया जाय।”
इससे अधिक बेशर्मी की बात विलियम वुलिट ने कही। यह पहले रूस में अमरीका के राजदूत की हैसियत से काफी समय तक रह चुका था और वहाँ की परिस्थिति को भली प्रकार जानता था। उसने सन् 1946 में ही जब कि रूस, पश्चिमी देशों का युद्ध में सहयोगी माना जाता था, एक पुस्तक ‘दी ग्रेट ग्लोब इटसेल्फ’ लिखी और उसमें स्पष्ट शब्दों में कहा-
“अब केवल एक ही देश ऐसा है कि जिसकी तरफ से हमें भय है कि वह किसी दिन हमारे खिलाफ एटम बम का प्रयोग कर सकेगा- और वह रूस है। इस समय तो एटम बम केवल हमारे ही पास है, पर अफसोस, हम उसका प्रयोग करना नहीं जानते।”
ये तो ऊँची श्रेणी के राजनीतिज्ञ हुये। वैसे अमरीकन पूँजीपतियों के पास रुपये के जोर से सैकड़ों किराये के टट्टू लेखक रहते हैं। जो सदा ही उनका राग गाया करते हैं। ये लोग भी सन् 48 और 49 से ही रूस का भय दिखाकर प्रचार कर रहे हैं। इनमें से एक ऐली कलवर्टसन ने 1947 में लिखा था-
“इस समय संसार के राष्ट्रों में शक्ति की राजनीति का ही नियम काम कर रहा है। दस साल के बाद रूस उद्योग धंधों की दृष्टि से अमरीका के मुकाबले में आ जायगा और फिर उससे भी आगे निकल जायगा। हम लोग अधिक से अधिक तीन वर्ष तक एटम बम के रहस्य के स्वामी रह सकते हैं, बाद में अन्य देश भी उसे जान जायेंगे। इसलिए जब कि केवल एक ही देश के हाथ में सबसे अधिक सैनिक और नैतिक शक्ति भी आ गई हो तो अंतर्राष्ट्रीय समस्यायें बहुत ही सरलता से हल की जा सकती हैं।” अर्थात् संसार पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिये एटम शक्ति का प्रयोग करो।
कलवर्टसन अभी नया रंगरूट है और उसने अमरीकन पूँजीपति-पक्ष की बात भद्दे ढंग से कही है, जिस पर कोई भी बाहरी आदमी आक्षेप कर सकता है। पर वहाँ के चतुर पत्रकार भी दूसरे शब्दों में यही बात कहते हैं। प्रसिद्ध अमरीकन पत्रकार ने सन 1947 के आरंभ में ही पत्र में लिखा था-
अणु-अस्त्रों में जो महा विशाल शक्ति निहित है उससे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हम संसार भर में एक ही शासन तथा एक ही कानून की स्थापना कर सकते हैं।”
इन युद्ध-प्रचारकों की बातें निरर्थक नहीं गई। सन् 1947 से ही अमरीका अपना सैनिक व्यय बढ़ाने लगा। सन् 47 में यह रकम 21 बिलियन डालर थी जो संपूर्ण बजट का 54 प्रतिशत था। सन् 1949 में वह 66.3 प्रतिशत हो गया। उसी समय भाषण करते हुए प्रेसीडेंट ट्रु मन ने कहा था कि हम वास्तव में अपने बजट का 79 प्रतिशत भावी युद्ध को रोकने की चेष्टा में (अथवा नये युद्ध की तैयारी में?) खर्च कर रहे हैं। केवल 21 प्रतिशत ही अन्य सामाजिक और नागरिक उद्देश्यों की पूर्ति में खर्च किया जा रहा है।
अमरीका ने ये सब तैयारियाँ रूस पर आक्रमण करने के लिए की हैं, इस बात को अनेक अमरीका वक्ताओं ने खुले शब्दों में कहा है सन् 1948 में अमरीका की प्रभावशाली मासिक पत्रिका “यूनाइटेड स्टेट्स न्यूज एण्ड वर्ल्ड रिपोर्ट” ने लिखा-
“अमरीका रूस पर विशेषतः वायु द्वारा ही आक्रमण करेगा। भूमध्य सागर और मध्य-पूर्व का क्षेत्र इस दृष्टि से विशेष महत्व का है। इस आक्रमण में उत्तरी समुद्र का महत्व अधिक नहीं है। दक्षिणी इटली, सिसली और टर्की महत्वपूर्ण अड्डों का काम देंगे। केन्द्रीय रूस पर हमला करने में एटमबमों से ही काम लिया जायगा।”
इन साम्राज्यवादियों में रूस और उसके साथी देशों का इतना भय समाया हुआ है कि वे एटम बम से ही सन्तुष्ट नहीं है, वरन् कीटाणु -युद्ध की भी तैयारी करते रहते हैं। अमरीका की सबसे बड़ी दवा बनाने वाली कम्पनी के प्रेसीडेन्ट जार्ज डब्लू मर्क ने कहा था-
“कीटाणु, जीवाणु, विषैले पदार्थ आदि जीवित पदार्थों से तैयार किये जा सकते हैं और उनके द्वारा असंख्य लोगों का संहार किया जा सकता है। इस तरह के युद्ध की तैयारी दवा बनाने या कीटाणु विज्ञान की खोज करने के नाम पर भली प्रकार छिपाकर की जा सकती है।”
यद्यपि आजकल के समय में जब कि अणु-अस्त्रों का इतना अधिक विकास हो चुका है कि एक बम दस-बीस हजार वर्ग मील भूमि को ऐसा नष्ट-भ्रष्ट कर सकता है कि वहाँ मनुष्यों की तो बात क्या कीड़े-मकोड़े और घास पत्ते का भी चिन्ह नहीं रहता, तो घातक कीटाणुओं या जहरीली गैस आदि का प्रयोग निकम्मा जान पड़ता है। तो भी सैनिक तैयारियों का अर्थ यही समझा जाता है कि भविष्य में सामने आने वाली प्रत्येक परिस्थिति के लिये तैयार रहा जाय। यही कारण है कि बेतार के तार का पूर्ण प्रचार हो जाने पर भी सेना में पत्र ले जाने वाले कबूतर भी सिखाये जाते हैं। इसी दृष्टि से अणु-अस्त्रों के बन जाने पर भी अभी अन्य प्रकार के हथियारों का उपयोग सिखाया जाता है।
इस प्रकार अमरीका के पूँजीपति, जिनका सबसे बड़ा केन्द्र न्यूयार्क नगर की ‘वाल स्ट्रीट’ में है, संसार की शाँति के सबसे बड़े शत्रु सिद्ध हो रहे हैं। वे शाँति स्थापना की अथवा अणु-शक्ति के नियंत्रण की सब प्रकार की चेष्टाओं का गुप्त या प्रकट रूप से विरोध करते रहते हैं। उनको अपना हित इसी में जान पड़ता है कि संसार में बराबर युद्ध होते रहें और उनके फलस्वरूप उनको हथियारों, फौजी मोटरों, हवाई जहाजों और गोला बारूद के लम्बे-लम्बे आर्डर हमेशा मिलते रहें। जो शाँति सम्मत जनता के लिए जीवन -दायक है वही उनको मृत्यु के सदृश भयंकर जान पड़ती है, और उनकी आँतरिक अभिलाषा यही रहती है कि किसी प्रकार संसार में युद्ध की आग जलती रहे। इस दृष्टि से विचार करने पर यही कहना पड़ता है कि संसार में युद्ध की ज्वाला को भड़काने का उत्तरदायित्व अमरीका के पूँजीपतियों पर ही है जो वहाँ की शासन-संस्था पर भी पूरा अधिकार रखते हैं।
(‘भारतीय योगी’)
ईसाइयों की ‘बाइबिल’ एक पुरानी धर्म पुस्तक है। उसका कुछ भाग तो जिसे ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ कहते हैं ईसामसीह से भी छ :-सात सौ वर्ष पहले का है। उसमें खास कर यहूदियों का इतिहास दिया गया है जो उस समय मिश्र, पैलेस्टाइन आदि में निवास कर रहे थे और जिनको निरन्तर शत्रुओं का सामना करना पड़ रहा था। बाइबिल में लिखा है कि “ईश्वर ने यहूदियों को हुक्म दिया था कि अगर वे उसके आदेशानुसार चलेंगे तो सुखी और मालदार बनेंगे। इसके विपरीत अगर वे उलटे रास्ते पर चले तो उनको सख्त सजा दी जायेगी। अगर वे इससे भी न सुधरे तो परमात्मा उनके शहरों को वीरान कर देगा, उनके दुश्मन वहाँ रहने लगेंगे और यहूदियों को बिना घर बार के संसार भर में भटकना पड़ेगा। आखिर में जब भटकते हुए और तकलीफ पाते हैं उनको सात समय (सेविन टाइम्स) हो जायगा तो पर परमात्मा उनकी फिर खबर लेगा और उनको इकट्ठा करके फिर उनके मुल्क में बसायेगा।”
यहूदियों के रहने की पुरानी भूमि पैलस्टाइन का मुल्क है। वहीं पर उनका एक मात्र और परम पवित्र धार्मिक स्थान जरुशलम है। जिस प्रकार संसार भर के मुसलमान एक मात्र मक्का को तीर्थ मानते हैं और दुनिया के कोने-कोने से उनकी यात्रा को जाते हैं, उसी प्रकार यहूदी भी सब प्रकार की कठिनाइयाँ सहकर हजारों कोस से जरुशलम की यात्रा करने आते हैं। यह देश कितने ही समय से टर्की के कब्जे में था और उसमें अरब लोग बस गये थे। सन् 1914 के महायुद्ध के पश्चात यह अंगरेजों के अधिकार में आ गया और मित्र राष्ट्रों की सलाह से वहाँ यहूदियों को बसाने का निश्चय किया गया। यद्यपि अरब लोगों ने इस बात का घोर विरोध किया और वर्षों तक लड़ाई -झगड़े होते रहे तो भी अब तक दस-पन्द्रह लाख यहूदी वहाँ बस चुके हैं। अतः सन् 1949 से पैलेस्टाइन के एक भाग में ‘इसराइल’ के नाम से उनका राष्ट्र भी कायम हो गया है। हाल ही में ‘इसराइल’ ने मिस्र पर हमला किया जिसके फल से विश्वव्यापी महायुद्ध की आशंका उत्पन्न हो गई थी।
वास्तव में पैलेस्टाइन में यहूदियों का फिर बसना और उनका एक राष्ट्र बन जाना एक अनोखी घटना है। क्योंकि बाइबिल में टर्की के साम्राज्य नष्ट होकर यहूदी राष्ट्र की स्थापना का वर्णन का स्पष्ट रूप से किया गया है और पिछले कई सौ वर्ष में सैकड़ों बड़ी-बड़ी पुस्तकें अंग्रेजी में लिखी जा चुकी हैं जिसमें बाइबिल की भविष्यवाणियों में दृढ़ विश्वास प्रकट करते हुए यह कहा गया है कि ‘सात समय’ समाप्त होने पर टर्की का साम्राज्य नष्ट हो जायगा। यहूदी पैलेस्टाइन में अवश्य बसाये जायेंगे। पाठक चाहें ईसाइयों के किसी भी पुस्तकालय में ऐसी पुस्तक स्वयं देख सकते हैं।
‘सात समय के समाप्त होने के अवसर’ पर यहूदियों के पैलेस्टाइन में बसने की भविष्यवाणी के साथ ही बाइबिल में और भी भविष्यवाणियाँ दी गई हैं जिनमें सबसे बड़े संसार व्यापी युद्ध का वर्णन किया गया है, जिसके फल से मानव जाति का एक बड़ा अंश नष्ट हो जायगा। इसी अवसर पर अनेक प्रकार के ईश्वरीय कोप- जैसे प्लेग, अकाल, भूचाल आदि के आने की बात भी लिखी है। अब चूँकि इनमें से टर्की की खिलाफत का अन्त और पैलेस्टाइन में यहूदियों के बसने की बात सामने आ चुकी है। इसलिये शीघ्र ही अन्य बातों के होने की संभावना असंगत नहीं है।
बाइबिल की भविष्यवाणियों की व्याख्या करने वालों ने ‘सात समय’ का अर्थ सात वर्ष बताया है। पर जब भी कहा है कि भविष्यवाणी का एक दिन एक वर्ष के बराबर माना जाता है। इस हिसाब से जिस समय भविष्य वाणी की गयी थी उससे 365&7=2555 वर्ष इन घटनाओं के होने की संभावना है। यहूदियों का दण्ड ईसा से 58 वर्ष पहले आरम्भ हुआ था और इस हिसाब से सन् 1966 में ‘सात समय’ की अवधि पूरी हो जायेगी। कुछ व्याख्याकारों ने ईसाइयों के प्राचीन सन् के 360 दिन का होने से सन् 1931 में ही ‘सात समय’ की म्याद पूरी मानी है। कुछ भी हो एक ढाई हजार वर्ष पुरानी भविष्यवाणी के पूरे होने में 30-35 साल का अन्तर कोई महत्व नहीं रखता। हम तो इसी बात से इस भविष्यवाणी के महत्व को बहुत अधिक समझते हैं कि इतनी पुरानी भविष्यवाणी के अनुसार वर्तमान समय में वास्तव में ऐसे महायुद्ध की संभावना उत्पन्न हो चुकी है जिससे मानवजाति का प्रायः सर्वनाश हो जाना संभव है।
(1) ‘सात समय’ का जमाना जब समाप्त होने को आयेगा उस समय संसार की कैसी दशा होगी इस सम्बन्ध में लिखा है- “उस वक्त चारों तरफ लड़ाइयां होने लगेंगी और लड़ाई की अफवाहें सुनाई देने लगेंगी। एक मुल्क दूसरे मुल्क के खिलाफ खड़ा होगा और एक सल्तनत दूसरी सल्तनत के। उस समय अकाल पड़ेंगे, महामारी फैलेगी और जगह-जगह भूकम्प आयेंगे। यह हालत शुरू में होगी और इसके बाद इससे कहीं ज्यादा कष्ट भोगने पड़ेंगे।”
(2) बाइबिल की भविष्यवाणियों में ‘सात ट्रम्पेट्स’ का वर्णन भी विशेष रूप से महत्व का है। उसके मतानुसार जब पृथ्वी के निवासी घोर पाप करने लगेंगे तो ईश्वर की तरफ से उनको जो दण्ड दिया जायगा उसी का वर्णन इन ‘सात ट्रम्पेट्स’ में किया गया है। इनका वर्णन प्राकृतिक दुर्घटनाओं के रूप में किया गया है, पर कितने ही ईसाई धर्म विद्वानों ने यह भी कहा है कि उनका मतलब राजनैतिक हलचल और नाशकारी घटनाओं से है। जो कुछ भी हो पाठक बाइबिल के मूल शब्दों को देखें-
“जब पहला फरिश्ता अपना ट्रम्पेट (बिगुल) बजायेगा तो पृथ्वी पर बरफ का तूफान आयेगा, और आग और खून की बारिश होगी। इससे पेड़ों का एक तिहाई भाग जल जायगा और तमाम हरी घास जल जायगी।”
‘जब दूसरा फरिश्ता ‘ट्रम्पेट’ बजायेगा तो एक बहुत बड़ा जलता हुआ पहाड़ समुद्र में गिरेगा और इससे समुद्र का एक तिहाई हिस्सा खून हो जायगा। समुद्र में रहने वाले जीवित प्राणियों में से एक तिहाई मर जायेंगे और एक तिहाई जहाज नष्ट हो जायेंगे।’
“जब तीसरा फरिश्ता ‘ट्रम्पेट बजायेगा तो एक बहुत बड़ा तारा गिरेगा, जो दीपक की तरह प्रकाशित होगा। यह नदियों और पानी के स्रोतों के एक तिहाई भाग पर पड़ेगा। इस तारे का नाम ‘वार्मवुड’ होगा। इससे जल स्रोतों का एक तिहाई भाग ‘वार्मवुड’ हो जायेगा। यह पानी जहरीला होगा, जिसके पीने से बहुसंख्यक आदमी मर जायेंगे।”
इसी प्रकार अगले ‘ट्रम्पेट्स’ के बजने पर दुनिया में रहने वालों को दूसरी तरह की तकलीफें सहनी पड़ेंगी। चौथे ट्रम्पेट से सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश घट जायगा। पाँचवें से मनुष्यों को कष्ट पहुँचाने वाले टिड्डियों के आकार के जानवर पृथ्वी के भीतर से निकलेंगे और छठे से आग और धुआँ से मारने वाले सवार उत्पन्न होंगे। जैसा हम ऊपर लिख चुके हैं इन भविष्यवाणियों में अलंकारिक भाषा का प्रयोग किया गया है, जैसा कि प्राचीन काल में प्रायः नियम था। उदाहरण के लिए टिड्डियों के आकार के जानवरों से हवाई जहाजों और आग तथा धुआँ से मारने वाले सवारों से तोपों और मशीनगनों का अर्थ समझ सकते हैं। इसी प्रकार समुद्र और पृथ्वी पर पहाड़ तथा तारा गिरने का अर्थ स्पष्ट ही एटम बम और हाइड्रोजन बम के फेंके जाने से माना जा सकता है जो सचमुच ही पानी तथा खाने पीने की सभी चीजों को जहरीली अथवा मारने वाला बना देते हैं।
(3) बाईबल में अकाल का जैसा भीषण चित्र खींचा गया है, वह भविष्यवाणी को निगाह से ही नहीं, वरन् प्रभावशाली लेखनशैली की दृष्टि से भी ध्यान देने योग्य है। वैसे अकाल हमेशा ही पड़ा करते हैं, पर युद्ध के समय उनका रूप और भी भयंकर हो जाता है। उस समय खेती बारी करने वाले और उपयोगी वस्तुओं के बनाने वाले लाखों मजबूत आदमी फौज में भरती कर लिये जाते हैं, जिससे पैदावार स्वयमेव कम हो जाती है। फिर लड़ने वाली असंख्यों सेना के पीछे हर रोज लाखों मन अनाज और दूसरी खाने पीने की वस्तुओं की आवश्यकता होती है। इनके सिवा दोनों ओर की फौजों में से जो दुश्मन के देश के भीतर घुस जाती है वह खेती-बारी और व्यापार की मण्डियों तथा बाजारों को नष्ट-भ्रष्ट करती चलती है, इससे अकाल और भी भयंकर रूप धारण कर लेता है। फिर आगामी युद्ध में तो इस बात की पूरी सम्भावना है कि एटम बमों के कारण खाने-पीने के समस्त पदार्थों में रेडियो एक्टिविटी का ऐसा घातक प्रभाव पड़ेगा कि जो कोई उनको व्यवहार में लायेगा वह दस बीस दिन में ही देह के भीतरी अंगों के गल जाने से मर जायगा। इसलिये अगर युद्ध के समय लोगों को सबसे अधिक भयंकर अकाल का सामना करना पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। बाइबिल में अकाल का वर्णन करते हुए लिखा है-
‘जब तीसरी मुहर खोली जायगी तो उससे एक काले रंग का घोड़ा निकलेगा और उस पर जो सवार होगा उसके हाथ में एक तराजू होगी। वह घोषणा करेगा कि एक पैमाना गेहूँ का एक सिक्का और तीन पैमाना जौ का एक सिक्का होगा।” फिर आगे चलकर लिखा है- “लोगों के चेहरे कोयले की तरह काले हो जायेंगे। वे गलियों में मारे-मारे फिरेंगे। उनकी खाल हड्डियों से अलग होकर लटक पड़ेगी और शरीर सूख कर लकड़ी की तरह हो जायेगा। जो लोग तलवार से मारे जाते हैं वे उन भूख से मरने वालों की बनिस्बत सुख में रहेंगे।”
बाइबिल के ईसायाह, विभाग में लिखा है- “देखो ईश्वर ने पृथ्वी को उजाड़ बना दिया और वह सुनसान पड़ी है। इस भयंकर अकाल के बाद जो हाल किसानों का होगा वही जमींदार का होगा जो कर्जदार का होगा वही साहूकार का होगा, जो हाल भिखारी का होगा वही हाल दाता का होगा। तमाम खेत सूख जायेंगे और बर्बाद हो जायेंगे। पृथ्वी पर से चैन और आराम उठ जायगा और चारों तरफ रंज ही रंज दिखलाई पड़ेगा। अनगिनत मनुष्य इस भयंकर काल में मरेंगे और पृथ्वी पर थोड़े ही आदमी बचेंगे। बड़े-बड़े शहर उजाड़ हो जायेंगे और घरों में ताले पड़े होंगे। सड़कों पर कोई आदमी फिरता न दिखाई देगा, क्योंकि ईश्वर ने ऐसी आज्ञा दी है। “
(4) इन भयंकर घटनाओं के जमाने में दूसरी बहुत सी आपत्तियों के साथ एक महाभयंकर भूकम्प के आने की बात भी बाइबिल में लिखी है। अनुमान से मालूम होता है कि इसका आशय प्राकृतिक भूकम्प के बजाय राजनीतिक और सामाजिक क्राँति से ही है। भविष्यवाणी के शब्द इस प्रकार हैं-
“जब वह छठी मुहर को खोलेगा तो एक महाभयंकर भूकम्प आयेगा। सूरज बालों से बने कम्बल की तरह दिखाई देने लगेगा। आकाश के तारे टूट कर जमीन पर गिरने लगेंगे। आकाश कागज के गोल पुलिन्दे की तरह फटकर दो हिस्सों में अलग-अलग हो जायगा। तमाम पहाड़ व टापू अपनी जगह से हट जायेंगे। दुनिया के बादशाह, बड़े आदमी, अमीर लोग, बड़े-बड़े सरदार और अधिकारी लोग सब कोई खोहों और पहाड़ की गुफाओं में छिपने लगेंगे। वे उन पहाड़ों और चट्टानों से कहेंगे कि हमारे ऊपर गिर पड़ो और हमको उस न्यायकर्ता परमेश्वर के रोष से बचाओ।”
पाठक अगर विचार करेंगे तो उनको स्पष्ट जान पड़ेगा कि ऐसी घटना राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के समय में हो सकती है। प्राकृतिक भूकम्प के अवसर पर तो अमीर और गरीब सब एक साथ मरते हैं। पर इस भविष्यवाणी में केवल अमीर और बड़े-बड़े लोगों के नष्ट होने का वर्णन है, उससे प्रकट होता है कि यह कोई राजनीतिक और सामाजिक भूकम्प ही हो सकता है। ऐसी अवस्था रूस, पोलैण्ड, रुमानिया आदि में पूँजीवाद का नाश होकर साम्यवाद स्थापित होते समय देखी जा चुकी है।
(5)”जब चौथा फरिश्ता अपना ‘वायल’ सूर्य पर डालेगा तो उसकी गर्मी इतनी बढ़ जायेगी कि वह मनुष्यों को भून डाले। भयंकर गर्मी से व्याकुल होकर लोग परमेश्वर को गालियाँ देने लगेंगे कि उसने कैसी व्याधियाँ उत्पन्न की है।”
इसकी व्याख्या करते हुए एक विद्वान ने लिखा है कि “इस समय मनुष्य जाति की दुर्गति चोटी पर पहुँच जायगी। जल, थल, सूर्य आदि जो जीवन के मुख्य आधार हैं वे ही सब मनुष्यों को उनके पाप कर्मों का फल देने लगेंगे। कुछ दिन पहले जो लोग ऐश-आराम में मस्त पड़े होंगे, वे अब निरन्तर रोते चिल्लाते और शोक करते ही दिखलाई पड़ेंगे। इस समय कितने ही दिन तक सूर्य पृथ्वी के ऊपर इतनी अधिक गर्म और जलाने वाली किरणें डालेगा कि मनुष्यों को अपने घर भट्ठी की तरह जान पड़ने लगेंगे।” तीसरे महायुद्ध में जब एटम और हाइड्रोजन बमों का प्रयोग होगा तब ऐसी हालत प्रत्यक्ष दिखाई पड़ेगी, क्योंकि उनका तेज और गर्मी भी सूर्य के सदृश्य ही होती है और उसके द्वारा मनुष्य और जीवित प्राणी ही नहीं पत्थर और मिट्टी भी जलकर धुँआ के रूप में हो जाते हैं।
(6) भावी महायुद्ध का नीचे लिखा वर्णन भी बड़ा रोमाँचकारी है। भविष्यवाणी के कर्ता को ध्यान की अवस्था में निम्नलिखित दृश्य दिखलाई पड़ा-
“मुझे दिखाई पड़ा कि एक फरिश्ता सूर्य के प्रकाश में खड़ा है और कह रहा है कि आसमान में उड़ने वाले पक्षियों इकट्ठे होकर आओ और ईश्वर के दिये हुए भोज में शामिल हो। इसमें तुमको बड़े-बड़े बादशाहों, राजाओं, कप्तानों, ताकतवर मनुष्यों, घोड़ों और उन पर बैठने वालों और सब प्रकार के बड़े और ऊँचे दर्जे के मनुष्यों का माँस खाने को मिलेगा।
(7) बाइबिल के भविष्य वर्णन का अन्त नीचे लिखी भविष्यवाणी से होता है। भविष्यदर्शी महात्मा जानने ध्यानावस्था में देखा-
“मैंने एक फरिश्ते को आसमान से आते देखा। उसके शैतान को बाँध कर अथाह गड्ढ़े में फेंक दिया और उसे बन्द कर दिया। इसके बाद एक हजार वर्ष तक पृथ्वी पर सतयुग (मिलेनियम) रहेगा।”
इसकी व्याख्या करने वाले एक विद्वान ने लिखा है कि “इन सात वर्षों की महा भयंकर घटनाओं में संसार की पूर्ण रूप से काया पलट हो जायगी। लड़ाई और महामारियों से करोड़ों व्यक्ति खत्म हो जायेंगे और बड़े-बड़े शहर सुनसान दिखाई पड़ेंगे। इसके बाद जब पृथ्वी की शासन-व्यवस्था धार्मिक और नैतिक विचारों संत पुरुष करने लगेंगे तो लोगों की सब तकलीफें मिट जायेंगी। उस समय लोग ईश्वरीय नियमों के अनुसार रहने लगेंगे और पाप तथा स्वार्थ के भावों को छोड़ देंगे। तब फौजी और जहाजी बेड़ों का नाम भी न रहेगा और लोग तलवारों को तोड़कर हल का फार बना लेंगे। एक देश के निवासी दूसरे देश वालों से झगड़ा न करेंगे और युद्ध सदा के लिये बन्द हो जायगा। जंगल के खूँखार जानवर भी शान्त बन जायेंगे। कोई मनुष्य छोटी उम्र में न मरेगा। इस युग में हुकूमत केवल उन्हीं लोगों के हाथ में रहेंगी जिनका चरित्र शुद्ध तथा पवित्र होगा, जो नम्र, विनयशील और गरीबों को पसन्द करने वाले होंगे।”
इस उदाहरण में जैसे राम-राज्य का वर्णन किया गया है, उसी को सच्चा साम्यवाद या समाजवाद भी कहा जा सकता है। हिन्दू-धर्म शास्त्रों में जो सतयुग का वर्णन है वह भी बिल्कुल इससे मिलता जुलता है, केवल शब्दों का हेर-फेर है। अब प्रजातंत्रवाद में समझदार लोगों को बहुत से दोष दिखलाई पड़ने लगे हैं, क्योंकि उसमें वोट खरीदे ओर बेचे जाते हैं तथा चालाकी से प्राप्त किये जाते हैं। इस कारण ज्यादातर चलते-पुरजे लोग ही कौंसिलों और पार्लमेंटो में पहुँचते हैं और अपनी-अपनी पार्टी के लाभ का ही ख्याल रखते हैं। इसी प्रकार आधुनिक ढंग के साम्यवाद में या समाजवाद में भी पार्टीबन्दी का दोष पाया जाता है और आपस में ईर्ष्या द्वेष का भाव भी बढ़ जाता है। इसलिये संसार की दशा का सुधार तब तक असंभव है जब तक समाज की बागडोर त्यागी और निःस्वार्थी व्यक्तियों के हाथ में नहीं जाय। बाइबिल की भविष्यवाणियों से प्रकट होता है कि अब ऐसा ही समय आने वाला है।
मुसलमानी धर्म ग्रन्थ
मुसलमानों के धर्म ग्रंथ कुरान में कई जगह भविष्य में नवीन युग आने और वर्तमान दशा में घोर परिवर्तन की बात कही गई है। ‘सूरत यासीन’ (कुरान का एक अध्याय) में कहा गया है-
“हम जिसको भी आयु देते हैं उसे आखिर में अन्धा कर देते हैं। यह लोग बुद्धि से क्यों नहीं काम लेते? अगर बुद्धि से काम लें तो फौरन समझ में आ जाय कि जिस प्रकार एक व्यक्ति की आयु निश्चित होती है उसी प्रकार एक ‘उम्मत’ (सम्प्रदाय या मजहब) की भी उम्र निश्चित होती है। और बचपन, जवानी तथा बुढ़ापे की सीढ़ियाँ तय करके ‘उम्मत’ मर जाती है। जब खुदा दूसरी नई ‘उम्मत’ पैदा करता है।
‘सूरत आले इमरान’ में लिखा है- “खुदा ने सब पैगम्बरों (धर्म-संस्थापकों) से वचन लिया है कि जब तुम्हें किताब पैगम्बरी दी जाय और तुम्हारे बाद खुदा की तरफ से कोई दूसरा पैगाम लाने वाला (धर्म संस्थापक अवतार) पैदा हो तो उस पर ईमान लाना और उसकी सहायता करना तुम्हारा कर्तव्य है।
मदीने की मशहूर किताब ‘मकसूम बुखारी’ में लिखा है कि “चौदहवीं सदी में कयामत आयेगी और हजरत मेंहदी प्रकट होकर पापियों का अन्त करेंगे।” इसी किताब में आगे चलकर लिखा है कि- “कयामत पास आ गई है। दोजख की आग भड़क उठी है, सारे संसार में अन्धेरा छा गया है। आँखें खोलकर उठो और देखो कि दुनिया नाश के परदे में जाने वाली है। जो कुछ करना है आज ही कर लो।”
और भी कितने मुसलमान विद्वानों ने होनहार घटनाओं के बारे में भविष्यवाणियाँ लिखी हैं जिनकी मुसलमान जनता में प्रायः चर्चा हुआ करती है। इनसे मालूम होता है कि “चौदहवीं सदी के अन्त में एक बड़ा जालिम शासक पैदा होगा जिसका नाम ‘दज्जाल’ होगा। वह बहुत शक्तिशाली होगा और अपने को ईश्वर बतलायेगा। उसका आतंक सारी दुनिया पर छा जायगा। अन्त में कयामत का समय आयेगा और हजरत मेंहदी प्रकट होकर उसे मारेंगे।”
अब मुसलमानों की चौदहवीं सदी को समाप्त होने में बीस पच्चीस वर्ष का समय और शेष रहा है। मुसलमानों में आमतौर पर विश्वास है कि चौदहवीं सदी के समाप्त होने के आस पास दुनिया की हालत बड़ी ही हलचल पूर्ण हो जायेगी, बहुत भयंकर लड़ाइयां होंगी और मुसलमानी धर्म का अन्त होकर कोई नया पैगम्बर पैदा होगा जिससे दुनिया में नये युग की शुरुआत होगी।
(श्री बी.बी. रमन सम्पादक ‘एस्ट्रोलोजिकल मैगजीन’, बंगलौर)
अमरीका की वैदेशिक राजनीति के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बयान- जिसे ‘आइजन होबर सिद्धान्त’ भी कहा जाता है- ता. 5 जनवरी 1947 को अमरीका की शासन सभा के सम्मिलित अधिवेशन के सम्मुख दिया गया था। इसमें स्वेज नहर की घटना से उत्पन्न तनातनी को कम करने तथा मध्य पूर्व की कम्यूनिज्म के प्रभाव से रक्षा करने के सम्बन्ध में प्रस्ताव किये गये थे और काँग्रेस से उन पर विचार करने का आग्रह किया गया था। यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्रेसीडेन्ट की यह योजना राहु शनि योग के बाद ही घोषित की गयी थी, और इसी योग के फल स्वरूप स्वेज का संघर्ष उत्पन्न हुआ था। प्रेसीडेन्ट का उपरोक्त बयान रूस के लिए एक चेतावनी के रूप में था कि वह भ्रम में पड़कर कोई ‘गलती’ न करे। इतिहास अपने को दुहराता रहता है। जिसके परिणाम स्वरूप प्रमुख राष्ट्रों का उत्थान, वृद्धि, विकास होकर वे संसार में प्रमुख स्थान पा जाते हैं और इसके बाद अपने अहंकार और लालच के फलस्वरूप नष्ट-भ्रष्ट होकर सर्वनाश के गर्त में फेंक दिये जाते हैं। इस दृष्टि से अमरीका और रूस इस नियम के अपवाद नहीं माने जा सकते। इस प्रकार की घटनायें आकाश स्थित ग्रहों के योग और उनकी कुदृष्टि के फल से उत्पन्न होती है, और उनका प्रभाव जिस प्रकार व्यक्तियों पर पड़ता है उसी प्रकार राष्ट्रों पर भी पड़ता है। आजकल कुछ बड़े राज-पुरुष सदैव संसार की शाँति को स्थिर रखने की बात किया करते हैं और संघर्षग्रस्त जगत में राम-राज्य की स्थापना करना चाहते हैं। पर वे इस बात को भूल जाते हैं कि बड़े-बड़े युगों में जो समय व्यतीत हुआ है उनमें पृथ्वी पर कभी दो-चार सौ वर्ष पीछे भी शाँति नहीं रही। यह सब घटनाएँ ग्रहों के प्रभाव से होती हैं, जिसको मिटा सकने में राजनीतिज्ञ समर्थ नहीं हो सकते।
अगर हम अमरीका के इतिहास पर ध्यान दें तो हमको ग्रहों की प्रबलता का प्रमाण प्रत्यक्ष रूप से मिल सकता है। सन् 1914 से आरम्भ होने वाले प्रथम योरोपियन महायुद्ध में अमरीका सम्मिलित नहीं हुआ, और 1917 तक उसे भरोसा रहा कि वह निष्पक्ष ही रह सकेगा, पर उसे विवश होकर युद्ध में भाग लेना पड़ा। फिर उसे आशा हुई कि युद्ध में विजय प्राप्त करके वह स्वार्थी और ‘प्रजातंत्र’ के अनुकूल शाँति की स्थापना कर सकेगा। इस उद्देश्य की पूर्ति में विजय तो प्राप्त हुई पर शाँति न हो सकी। प्रथम महायुद्ध के समाप्त होने पर अमरीका ने विश्वास किया कि अगर भविष्य में दूसरा युद्ध हुआ तो वह उससे अलग ही रहेगा। पर जब अवसर आया तो फिर उसका इरादा पूरा न हो सका। द्वितीय महासमर के दरम्यान उसने आशा की कि नाजी और फैसिस्ट दलों की पराजय हो जाने पर संसार में न्याय और स्थायी शाँति का युग आ सकेगा। इस बार भी विजय तो मिल गई पर शाँति के दर्शन न हो सके। दो महायुद्धों में सफलता प्राप्त करके भी विभिन्न राष्ट्र तीसरे महायुद्ध की सम्भावना पर विचार कर रहे हैं। इन राष्ट्रों की नीति का निर्धारण करने वालों ने यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि इस समय जो ‘शीतयुद्ध’ चल रहा है। वह धीरे-धीरे गर्म होकर अंत में उबलने लगेगा। इन बातों से प्रत्येक निष्पक्ष व्यक्ति को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि ये राज-पुरुष नहीं जानते कि किस प्रकार युद्ध को रोका जा सकता है और युद्ध के पश्चात किस प्रकार शाँति की जा सकती है। वे संभवतः एक यही बात जानते हैं कि किस प्रकार कलह को जारी रखा जा सकता है। अगर ऐसा न होता तो क्या कारण है कि ये लोग एक स्थान पर बैठकर कठिनाईयों का हल नहीं निकाल सकते, विशेषतः जब कि वे जानते हैं कि अगर कलह जारी रहेगा तो उसका अवश्यम्भावी परिणाम यही होगा कि तीसरे महायुद्ध की ज्वाला भड़क उठेगी, जो पिछले युद्ध से कहीं अधिक नाशकारी और भयंकर होगी। विभिन्न राष्ट्र युद्धों के ऐसे चक्र में फँसे हैं कि उससे नवीन युद्धों की उत्पत्ति होती रहती है जो पूर्ववर्ती युद्ध की अपेक्षा अधिक बर्बरतापूर्ण होते हैं। ज्योतिष-शास्त्र के रहस्यों को जानने वाले भली प्रकार समझते हैं कि यह युद्धों का चक्र एक विशेष नियमानुसार चलता है,जिसका घनिष्ठ सम्बन्ध ग्रहों के प्रभाव से होता है।
पिछले पचास वर्षों में होने वाले ग्रहों के मुख्य-मुख्य योगों पर अगर हम ध्यान दें तो मालूम होता है कि उनके प्रभाव से बराबर शाँति में बाधा डालने वाली शक्तियों की उत्पत्ति होती रही है। अभाग्यवश राजनीतिज्ञों ने करोड़ों व्यक्तियों के जीवन और स्वार्थों से सम्बन्ध रखने वाले प्रभावशाली निर्णय ऐसे अवसरों पर किये जब कि ग्रहों का प्रभाव बहुत विपरीत और हानिकारक था। इसी का परिणाम यह हुआ कि हमने इन 50 वर्षों में बड़ी-बड़ी आदर्श और आशापूर्ण योजनाओं को असफल और नष्ट भ्रष्ट होते देखा है। अमरीका के राष्ट्रपति विल्सन की निष्पक्षता की घोषणा, उनके 14 सिद्धान्त, लीग आफ नेशंस का विधान, वाशिंगटन की निशस्त्रीकरण संधि और कीलाग पैक्ट, डावेस प्लान, यंगप्लान हूवर की संसार को पुनर्निर्माण की योजना, स्टिमसन योजना, प्रेसीडेन्ट रुजवेल्ट की ‘क्वारनटाइन स्पीच’ और चार स्वाधीनताओं की घोषणा, हुल के 17 सिद्धान्त, अटलाँटिक चार्टर, याल्टा की घोषणा, राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ.) की स्थापना, ट्रुमन की घोषणा, भारतवर्ष का विभाजन, काश्मीर की समस्या, भारतवर्ष में भाषा के आधार पर प्रान्तों का निर्माण, आइजनहोवर की घोषणा आदि सैकड़ों इसके उदाहरण सामने मौजूद हैं। इन असफलताओं का मुख्य कारण ग्रहों से ही सम्बन्धित है। इनका कारण भौतिक परिस्थितियाँ नहीं हैं, लेकिन हमारे मस्तिष्क स्वभाव और विचार-हैं और इनका आधार कान्फ्रेंसों में निर्णय करने वाले राजनीतिज्ञों के ग्रहों पर होता है। उदाहरण के लिए ‘लीग आफ नेशंस’ की कुण्डली को देखिये। इंग्लैंड के शासक-ग्रह मंगल ने वर्सेलीज की संधि कान्फ्रेंस में उपस्थित समस्त राजनीतिज्ञों पर ऐसा प्रभाव डाला कि उसमें इंग्लैंड की बात को ही सफलता मिली और उसके प्रभाव से ‘लीग आफ नेशंस’ की नीति का विकास ऐसे मार्ग से हुआ जिसका परिणाम द्वितीय विश्वव्यापी महायुद्ध के रूप में प्रकट हुआ। ‘लीग‘ की उत्तराधिकारिणी यू.एन.ओ. की स्थिति भी कुछ अच्छी नहीं है, क्योंकि उसका जन्म भी ग्रहों के ऐसे ही प्रतिकूल प्रभाव में हुआ है।
कुछ ज्योतिषियों ने पत्रों में लिखा है कि तीसरा विश्वव्यापी महासमर अक्टूबर 1957 में आरम्भ हो जायगा। उन लोगों की भविष्यवाणी का आधार यह है कि इस वर्ष के भीतर बृहस्पति तीन राशियों में होकर गुजर रहा है और भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक तथा मार्गशीर्ष के महीनों में 4 और 5 ग्रहों का योग हो रहा है। इसमें सन्देह नहीं कि ज्योतिष के कुछ प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है-
एकस्मिन वत्सरे जीवे राशित्रय मुपागते। तदावसुन्धराकीर्णाकुणपेस्सप्तकोटिभिः॥ चत्वारो राष्ट्रनाशाय हंति पंच जगत्रयम्।
“जिस वर्ष बृहस्पति तीन राशियों में प्रविष्ट होगा उस वर्ष पृथ्वी सात करोड़ शवों से ढ़क जायगी।..... और राष्ट्रों अथवा पृथ्वी का नाश हो जायगा।”
अगर इन श्लोकों के शब्दार्थ पर विचार किया जाय तो उपरोक्त ज्योतिषियों की भविष्यवाणी को ठीक ही मानना पड़ेगा। पर जब विश्वव्यापी महायुद्ध जैसी अत्यन्त महत्व की घटना की भविष्यवाणी करनी पड़े तो और भी कितनी ही बातों पर विचार करना आवश्यक है। 23 सितम्बर 1957 को मंगल, चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक साथ कन्या राशि में होंगे। पर इसमें बृहस्पति की स्थिति ऐसी है कि इस योग से कोई बड़ा कुफल नहीं हो सकता। 23 अक्टूबर को भी सूर्य, चन्द्रमा, बुध और राहु तुला राशि में होंगे। फिर 21 नवम्बर को सूर्य, चन्द्रमा, बुध और शनि का वृश्चिक राशि में योग होगा। सूर्य और शनि तक दूसरे से बहुत दूर हैं और इस कारण उनके योग से विश्वव्यापी युद्ध के समान कोई घटना नहीं हो सकती। बृहस्पति की गति भी इतनी शक्तिशाली नहीं है कि पृथ्वी 7 करोड़ शवों से ढ़क जाय। चार, पाँच या छः ग्रहों के संयोग से बहुत बड़ी उत्तेजना अवश्य उत्पन्न हो सकती है, चाहे वह फिर से स्वेज नहर का झगड़ा उठ खड़े होने से हो और चाहे इसराइल और मध्य पूर्व के किसी देश के झगड़े के फलस्वरूप उत्पन्न हो। इस तरह की घटनायें समुचित मानी जा सकती हैं, क्योंकि ऊपर वर्णित दोनों ग्रह सम्बन्धी घटनाओं के अतिरिक्त मार्च 1958 में ‘काल सर्प-योग‘ भी होने वाला है। इन सबके प्रभाव से युद्ध का भय बढ़ सकता है, और उत्तरदायी राज-पुरुष अपने ढंग पर युद्ध की धमकियाँ भी दे सकते हैं।
यह ‘काल सर्प-योग‘ भी पूरा नहीं है, क्योंकि जहाँ और सब ग्रह राहु और केतु के बीच में यथा स्थान होंगे, बृहस्पति राहु से 3 अंश पीछे होगा। इसलिए इस योग की शक्ति उतनी अधिक नहीं होगी, जितनी कि बृहस्पति के भी इस अर्ध-वृत्त के बीच में रहने से हो सकती थी। शनि और मंगल का योग जनवरी के तीसरे सप्ताह में होगा और इसके फल से भी अमरीका की तरफ से युद्ध जैसी परिस्थिति पैदा होगी। पर रूस दिखाने के रूप में ‘शाँति’ की अभिलाषा ही प्रकट करता रहेगा। इस समय रूस अपने घरेलू राजनैतिक परिवर्तनों से चिन्ताग्रस्त रहेगा। किसी खास रूसी राजनीतिज्ञ की मृत्यु होना भी संभव है। जहाँ तक भारत का सम्बन्ध है, आगामी कुछ वर्षों में ग्रहों की स्थिति से तीव्र आन्दोलन, असंतोष, घरेलू उपद्रव और अन्तर्राष्ट्रीय मामलों से एक प्रकार की पृथकता का उत्पन्न होना ही संभव है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तथा वैदेशिक मामलों पर भी बहुत से झगड़े होते रहेंगे।
यहाँ तक हमने चार ग्रहों के योगों पर विचार किया जो आगामी कुछ महीनों में होंगे। हमारी सम्मति वे ऐसे शक्तिशाली और प्रभाव डालने वाले नहीं हैं जैसा कि कुछ ज्योतिषियों ने प्रगट किया है। ऐसा 4 या 5 ग्रहों का योग, जब तक कि उसमें मंगल का प्रभाव जोरदार न हो, बीमारी, अकाल, उपद्रव और प्राकृतिक दुर्घटनाओं के रूप में ही लोगों को कष्ट पहुँचा सकता है। खासतौर पर चूँकि मंगल और शनि इन ग्रह योगों में नहीं हैं, इस कारण हमको ऐसा जान पड़ता है कि इस अवसर पर विश्वव्यापी महासमर की संभावना नहीं की जा सकती। युद्ध की तनातनी पैदा हो सकती है और अमरीका तथा रूस के सम्बन्ध में भी खिंचाव उत्पन्न हो सकता है। ‘आइजन होबर घोषणा’ के अनुसार स्वेज और कोरिया के आसपास फौजों का भेजना भी सम्भव है।
बड़े राष्ट्रों में युद्ध तभी हो सकते हैं जब कि ग्रहदशा बहुत खास तरह की हो। जब शनि, राहु और मंगल एक से केन्द्र में हो, और जिस राशि या नक्षत्र मंडल में हों, वह भी विशेष रूप से उत्तेजना पैदा करने वाला हो, तब ऐसी घटना सम्भव होती है। अगर प्रथम महायुद्ध के समय की ग्रह दशा पर विचार किया जाय तो मालूम होगा कि उस समय राहु, बृहस्पति और मंगल केतु द्विरद-दशा में थे, शनि और मंगल एक केन्द्र में थे और राहु-शनि एक से त्रिकोण में थे। इसी प्रकार अगर द्वितीय महासमर के समय की ग्रह दशा का निरीक्षण किया जाय तो उस अवसर पर भी ग्रहों की स्थिति बड़े भय की थी। प्रजातंत्र का शक्तिशाली ग्रह शनि मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र में केतु के साथ योग में था, जिस पर मंगल की पूर्ण दृष्टि पड़ रही थी। बृहस्पति और शनि द्विरद-दशा में थे और राहु-बृहस्पति षष्ठाष्टक (एक दूसरे से 6 और 8 अंशों) पर थे। इस प्रकार संसार के प्रसिद्ध युद्ध प्रभावशाली ग्रह दशा में ही लड़े गये हैं। जिस समय शनि धनु राशि में प्रवेश करेगा रूस में बहुत से षडयंत्र और प्रमुख व्यक्तियों की हत्या की चेष्टायें होगी। लौह आवरण के पीछे बहुत से चौंकाने वाले परिवर्तन होंगे जिससे रूस का आन्तरिक संगठन बहुत कुछ बदलेगा। इनके फल से उस देश में अशाँति रहेगी और वह अमरीका से झगड़ा करने की चेष्टा न करेगा।
अगर हम 1959 की ग्रह दशा पर विचार करें तो मालूम पड़ता है कि अगस्त के अन्त में शनि, मंगल और राहु एक केन्द्र की स्थिति में आ जाएंगे। शनि और मंगल की दृष्टि एक दूसरे पर होगी और राहु मंगल के सहयोग में होगा और शनि के साथ उसकी द्विरददशा होगी। इस ग्रह दशा के प्रभाव से संसार के बड़े राष्ट्रों में तनातनी बढ़ेगी। और राष्ट्र संघ आवश्यकता के वशीभूत होकर नैतिकता को त्याग देगा। राष्ट्रों के बीच झगड़ों और फूट में वृद्धि होगी और परिस्थिति संकट जनक हो जायगी। पर असली संकट सन् 1962 में ही आने वाला है।
सन् 1962 की 5 फरवरी को केवल सूर्य ग्रहण ही नहीं पड़ेगा, वरन् आठ ग्रह एक साथ इकट्ठे हो जाएंगे। ये आठ ग्रह हैं- सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि और केतु। यह योग वास्तव में बड़ा शक्तिशाली है और भयंकर फल उत्पन्न करने लायक है। उस दिन प्रातः 5 बजे ग्रहों की स्थिति इस प्रकार होगी कि सूर्य, चन्द्र, बुध, बृहस्पति, शुक्र और केतु- ये सब घनिष्ठा नक्षत्र में स्थित होंगे, जिसका स्वामी मंगल है। यह योग भारतीय स्वतन्त्रता की कुण्डली के 9 वें घर, पाकिस्तान के 10 वें घर, अमरीका के 8 वें घर और रूस के 12 वें घर से सम्बन्धित है। यह 8 ग्रहों का मकर राशि में- जिसका स्वामी शनि है- योग होना बड़ा भयजनक है। हमको जान पड़ता है कि इस अवसर पर रूस अमरीका दोनों केवल धमकी और शक्ति प्रदर्शन ही न करेंगे, वरन् विश्वव्यापी संग्राम के लिए तैयार होकर मैदान में उतरेंगे। इस समय कम्यूनिज्म और पश्चिमी प्रजातन्त्रवाद की शक्ति की परीक्षा होगी। और इसके परिणाम स्वरूप अधिकाँश में ‘आक्रामक कम्यूनिज्म’ का अन्त हो जायगा। संसार में बहुत अधिक जन-संहार होगा। पर चूँकि मकर एक चर राशि है इसलिये यह संघर्ष बहुत लम्बे समय तक नहीं चलेगा। ग्रहों के प्रभाव से बड़ी शीघ्रता से प्रहार होगा, नाश भी शीघ्रता से होगा और युद्ध का अन्त भी शीघ्र आयेगा। निश्चय ही संसार को एक महान संकट का सामना करना पड़ेगा और राज-पुरुष मंगल के प्रभाव को रोकने में सर्वथा असमर्थ सिद्ध होंगे। हाँ, अगर वे अभी से भविष्य को जान कर सावधान हो जायें और राजनैतिक जोश को काबू में रखें तो हानि कम हो सकती है। भारत को अपनी रक्षा की तरफ ज्यादा ध्यान देना चाहिए और और कम्यूनिज्म के खतरे को समझ कर अपनी वैदेशिक नीति का तदनुसार संशोधन करना चाहिए। ज्योतिष की निगाह से इस बात का तो भय नहीं जान पड़ता कि अणु अस्त्रों का प्रयोग होने से समस्त मानव जाति नष्ट हो जायेगी। कुछ राजनीतिज्ञ बहुत ही भयभीत होकर यह ख्याल कर रहे हैं कि हाइड्रोजन बम के कारण संसार नष्ट हो जायगा और इसलिये वे बराबर अहिंसा की महिमा संसार को सुनाते रहते हैं। पर वे यह नहीं समझते कि अगर अहिंसा के ख्याल से बुरे सिद्धान्तों के साथ समझौता कर लिया जाय तो वह अहिंसा भी निकम्मी हो जाती है और उसकी नैतिक शक्ति लोप हो जाती है। तीसरे महायुद्ध के बाद भी मनुष्य जाति का अस्तित्व रहेगा। ऐसे अवसर पर ईश्वर और प्रकृति मनुष्य की गलती से रक्षा का कोई मार्ग निकाल ही देते हैं।
यह आठ ग्रहों का योग रूस और अमरीका के युद्ध का ही कारण नहीं बनेगा वरन् इसके प्रभाव से जनता को और भी अनेकों तरह से कष्ट उठाना पड़ेगा जैसे अस्त्र का अभाव, चोरों और अग्निकाँडों का भय, शासकों का अन्त, अकाल और दैनिक जीवन में अव्यवस्था। बराह मिहिर ने लिखा है :- कि “जब मंगल का संयोग सूर्य ग्रहण से होता है तो दुनिया में तरह-तरह के कष्ट होते हैं।” इसी प्रकार श्री लक्षमण सूरि के ‘दैवज्ञ विलास’ नामक प्राचीन ग्रन्थ में लिखा है कि जब शनि मकर राशि में आता है तो उसके फल से वर्षा की अधिकता महामारी का प्रकोप और भवनों का नाश (दशार्णदेशे यवनाथ नष्टः, आदि घटनायें होती हैं।” इससे कुछ ऐसा अनुमान भी होता है कि युद्ध का आरम्भ मध्य पूर्व की किसी समस्या पर होगा। लक्ष्मण सूरि यह भी कहते हैं कि ‘जब शनि धनु राशि में प्रवेश करते हैं तो पंजाब, कुरु कोसल (यू.पी.) काश्मीर, कलिंग (उड़ीसा) और वंग (बंगाल) में बड़े संकट उत्पन्न होने हैं-
मंदेस्थिते धन्विनि वृष्टिहानि स्वाध्भूपतन्ति कलहेनचार्धम् पाँचाल, काशी, कुरु कोसलाश्च काश्मीर कलिंग बंग॥
भारत की वर्तमान परिस्थिति को देखते हुये यह अनुमान होता है कि राष्ट्रीय हित को इस कारण हानि पहुँचेगी क्योंकि नेतागण देश की भलाई के बजाय व्यक्तिगत प्रतियोगिता और झगड़ों पर ज्यादा ध्यान देंगे। इस आठ ग्रहों के फल उत्पन्न होने वाले भयंकर खतरे का ख्याल करके हमारे नेताओं को राष्ट्र की समस्याओं का ऐसा रचनात्मक हल खोजना चाहिये, जो संसार की वास्तविक परिस्थितियों और हमारी प्राचीन संस्कृति के अनुकूल हो। हमारी कम्यूनिज्म की तरफ झुकी हुई शंकास्पद प्रवृत्तियों पर पुनः विचार करना चाहिए। मकर राशि में एकत्रित होने वाला अभूतपूर्व शक्तियों का योग स्वतः प्रकट करता है कि सन् 1962 ‘भाग्य निर्णायक वर्ष’ होगा। अमरीका रूस की योजनाओं को पहले से ही समझ कर ‘पहली चोट’ करेगा। पर मकर राशि में बृहस्पति के रहने के कारण- यद्यपि उसकी शक्ति क्षीण होगी- संघर्ष का वेग हलका पड़ जायगा और शीघ्र ही शान्ति स्थापित हो जायगी। बराह मिहिर के मतानुसार बृहस्पति का योग किसी भी रूप में क्यों न हो वह शुभ ही होता है, जैसे कि “जलती हुई आग पर पानी डाल दिया जाय।”
सब बातों पर विचार करने से इस में कोई संदेह नहीं जान पड़ता है कि 1960 से 1962 तक का समय संसार के लिए वास्तव में बड़े संकट का है। प्रकृति स्वयं बड़ी-बड़ी दुर्घटनायें उत्पन्न करेगी विशेष रूप से योग होने के अवसर पर, जैसे भूमि का धँस जाना, पृथ्वी में बड़ी दरारें पड़ना, भयंकर भूकम्प, समुद्री लहर और अन्य दुर्घटनायें। उस समय मनुष्य इनको रोकने में सर्वथा असमर्थ होगा। पूर्व और पश्चिम में भयंकर संघर्ष होने लगेगा। ज्योतिष द्वारा ऐसी घटनाओं की पहले से चेतावनी ही दी जा सकती है। यह सत्य है कि घटनाओं का होना रोका नहीं जा सकता, पर उचित उपाय करने से आपत्ति और कष्टों में कमी की जा सकती है।
रूस और पश्चिमी राष्ट्रों में जो प्रतियोगिता का भाव दिखलाई पड़ता है वह मार्क्स, लेनिन या स्टालिन के समय से आरम्भ नहीं हुआ है, और सोवियत शासन का अन्त अथवा पराजय हो जाने पर भी यह प्रतियोगिता मिट नहीं सकती। संसार में संस्कृतियों तथा आदर्शों की भिन्नता अति प्राचीन काल से पाई जाती है। विश्व-राज्य की बात किसी विकृत मस्तिष्क की मिथ्या कल्पना है। पर विश्व-राज्य के स्थान पर शक्तियों का संतुलन रहना चाहिए और उनका प्रभाव क्षेत्र पृथक-पृथक स्वीकार किया जाना चाहिए। सच्ची बात तो यह है कि विभिन्न प्रकार के ग्रहों के प्रभाव के कारण विभिन्न देश एक बन कर नहीं कर सकते।
[उपर्युक्त लेख से प्रकाशित होने के बाद सीरिया ने रूस से हथियार प्राप्त किये जिस पर इंग्लैण्ड और अमरीका में बड़ी हलचल पैदा हो गई और हमारे प्रधानमंत्री नेहरूजी का कहना है यह घटना आगे चलकर युद्ध का कारण बन सकती हैं। इसके बाद रूस ने दूर-मारक ‘राकेट’ में सफलता प्राप्त कर ली, जिसमें अमरीका अभी तक पिछड़ा हुआ है। इससे भी अमरीका में घोर सनसनी उत्पन्न हो गई। इस प्रकार नहीं कहा जा सकता कि कौन दिन किस घटना के कारण संसार को मटियामेट कर देने वाला संघर्ष आरम्भ हो जाय।]
(श्री चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य)
इस समय दुनिया में अणु बम के कारण हलचल मची हुई है। जो लोग उसे जानते हैं वे उनके कारण बड़े चिन्तित रहते हैं, क्योंकि अगर किसी महत्वाकाँक्षी या स्वार्थान्ध व्यक्ति ने इस बारूद में चिंगारी छोड़ दी तो उसका भीषण परिणाम दोनों लड़ने वालों को ही नहीं वरन् सारे संसार को भोगना पड़ेगा। और वह भी केवल हमीं लोगों को भोगना न होगा वरन् हमारे बाल बच्चे और नाती-पोते भी सैकड़ों वर्ष तक उसके कारण हानि उठाते रहेंगे और नीचे दर्जे का जीवन व्यतीत करने को विवश हो जायेंगे। अणु युद्ध की बुराइयां इतनी अधिक है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है और जब तक वे सामने नहीं आतीं तभी तक हमको अपना सौभाग्य समझना चाहिए।
ऐसे अणु-शस्त्रों का जिसने आविष्कार किया और प्रयोग किया वह वास्तव में समस्त मानव जाति का शत्रु है और जब कभी इन अस्त्रों का कुफल जनता को भोगना पड़ेगा तब सब लोग उसको प्राचीन काल के दैत्यों से भी बढ़कर निन्दनीय समझेंगे। इस सम्बन्ध में अमरीका को जलसेना के एडमिरल विलियम डी. लोही ने, जो प्रेसीडेन्ट रुजवेल्ट और ट्रूमन के समय में प्रधान सैनिक सलाहकारों में से थे, अपनी पुस्तक ‘आई वाज दियर’ में सन् 1949 में नीचे लिखे विचार प्रकट किये हैं-
“मेरी यह सम्मति है कि जापान के विरुद्ध इस बर्बरतापूर्ण हथियार का हिरोशिमा तथा नागासाकी पर प्रयोग करना युद्ध की दृष्टि से किसी प्रकार सहायक नहीं था। उस समय जापानी लोग परास्त हो चुके थे और प्रभावशाली समुद्री घेरे तथा हवाई जहाजों द्वारा प्रचलित ढंग की सफल बम वर्षा के कारण आत्म समर्पण करने को तैयार थे। मेरा निजी ख्याल यह है कि चूँकि इस अणु अस्त्र के तैयार करने में जो अरबों रुपया खर्च हुआ उसकी दृष्टि से वैज्ञानिक इसकी जाँच करना चाहते थे। प्रेसीडेन्ट ट्रू मन इस बात को जानते थे, और इस मामले से सम्बन्धित अन्य व्यक्तियों को भी इसका पता था। तो भी, प्रधान कार्यकारिणी युद्ध समिति ने जापान के दो शहरों पर इस बम को डालने का निर्णय किया। इस अस्त्र को ‘बम’ कहना गलत है, क्योंकि वह विस्फोटक पदार्थ नहीं है। यह एक जहरीला पदार्थ है, जिसके विस्फोट से तो थोड़े आदमी मरते हैं, पर उसमें से निकलने वाली घातक रेडियो एक्टिव किरणों से बाद में असंख्य लोगों की जानें जाती हैं। भविष्य के युद्ध में इस अस्त्र की मारक शक्ति बड़े भय की चीज है। मेरी अपनी भावना यह है कि चूँकि इसका सबसे पहले प्रयोग हमने ही किया है, और इस कारण हम प्राचीन काल (डार्क एजेज) की युद्ध करने वाली बर्बर जातियों के दर्जे को पहुँच गये हैं। मुझे जो युद्ध की शिक्षा दी गयी थी वह इस ढंग की नहीं है, और स्त्रियों तथा बालकों का संहार करके युद्ध में विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। मुझे इस बात का पूरा विश्वास जान पड़ता है कि हमारे वास्तविक शत्रु हमें भविष्य में तैयार कर लेंगे और यह कभी हमारे ऊपर ही प्रयोग किया जायेगा। यही कारण है कि एक पेशेवर सैनिक होते हुए और पचास वर्ष तक सरकारी सेवा में नौकरी करने के बाद मुझे अपनी युद्ध कथा के अन्त में ऐसा भय प्रकट करना पड़ा। युद्ध में एटम बम का प्रयोग हमें साधारण जनता के प्रति वैसी ही निर्दयता करने के जमाने में पहुँचा देगा जैसी कि चंगेजखाँ के समय में की जाती थी। इन दोनों में इतना ही अन्तर होगा कि इस समय यह नाश लीला एक राष्ट्र के नाम पर दूसरे राष्ट्र के विरुद्ध की जायगी जब कि पुराने जमाने में कोई एक बादशाह अपने लालच या धर्मान्धता के कारण ऐसा काम करता था। ये असभ्यता पूर्ण युद्ध में काम लाये जाने वाले नये और भयंकर हथियार एक आधुनिक ढंग की बर्बरता के प्रदर्शक है जो किसी ईसाई व्यक्ति के लिए शोभा नहीं दे सकती।”
ये शब्द एक महान अमरीकन सेनापति ने, जिसने गत महासमर में बहुत कुछ काम किया था, सन् 1949 में लिखे थे। शोक है कि आज वे बिल्कुल सत्य होते दिखलाई पड़ रहे हैं, तो भी बड़े राष्ट्र उन से कुछ शिक्षा लेने को तैयार नहीं।
इसी प्रकार संसार के बड़े-बड़े वैज्ञानिक निरन्तर महान राष्ट्रों के कर्णधारों को चेतावनी दे रहे हैं कि अणु शक्ति के नाशकारी प्रयोग से मानवता को बहुत अधिक हानि पहुँचना निश्चय है। इंग्लैंड के प्रोफेसर सी.एफ. पावेल तथा फ्राँस के प्रोफेसर जोलियट फ्यूरी दोनों अणु विज्ञान के प्रसिद्ध ज्ञाता हैं, जिनको वैज्ञानिक आविष्कारों के उपलक्ष में ‘नोबल प्राइज’ मिल चुका है। 30 अप्रैल 1957 को उन दोनों ने एक संयुक्त बयान में कहा है-
“यद्यपि अनेक देशों के प्रमुख वैज्ञानिक निरन्तर गम्भीर चेतावनी दे रहे हैं तो भी अणु-अस्त्रों के परीक्षण जारी है। इसलिए हमको एक बार फिर अपने संघ के सब वैज्ञानिकों के नाम पर, अनिवार्य आवश्यकता समझते हुए यह चेतावनी देनी पड़ती है।
“अब वातावरण तथा पृथ्वी को विषाक्त बनाने का खतरा बहुत स्पष्ट रूप से प्रकट हो गया है, और जो नई सूचनायें प्राप्त हुई हैं उनसे हमारी चिन्ता और भी बढ़ जाती है। एटम और हाइड्रोजन बमों के विस्फोट से उत्पन्न होने वाले रेडियो स्ट्रोन्टियम की मात्रा बराबर बढ़ती जा रही है। यह धीरे-धीरे लगातार पृथ्वी की धूल या वर्षा में सम्मिलित होता जाता है और वहाँ से पौधों में पहुँच जाता है। पिछले अणु बमों के विस्फोट से उत्पन्न ‘रेडियो स्ट्रोन्टियम’ अभी तक पृथ्वी पर आ रहा है और अभी कितने ही वर्ष तक आता रहेगा।
“इन वनस्पतियों में से यह ‘रेडियो स्ट्रोन्टियम’ मनुष्यों और घरेलू पशुओं के शरीरों में पहुँच कर हानि पहुँचाने लगता है। दूध में भी वह पाया जाता है। अगर अब भी अणु-अस्त्रों का परीक्षण बन्द नहीं किया गया तो बड़ी आयु के मनुष्यों तथा बच्चों में इस हानिकारक तत्व का परिमाण बहुत अधिक बढ़ जायगा और उनमें से अनेकों को हड्डी के कैंसर तथा ल्यूकेमिया (श्वेत रक्तता) की बीमारी लग जायगी। अणु-अस्त्रों के इन विस्फोटों से जो ‘रेडियो स्ट्रोन्टियम’ उत्पन्न होगा उससे आगामी पीढ़ियों के लिए बड़ा खतरा है।”
“हम सब वैज्ञानिकों से आग्रह करते हैं कि- वे इस सम्बन्ध में स्पष्ट और ठीक-ठीक सूचनायें सर्वत्र फैला दें जिससे मनुष्य इस खतरे को समझ सकें। हम सब सरकारों से भी आग्रह करते हैं कि- वे आपस में समझौता करके अणु-अस्त्रों के परीक्षण को तुरन्त बन्द कर दें। सुरक्षा के इस अनिवार्य उपाय पर संसार की समस्त सरकारों और मनुष्यों का ध्यान देना अत्यावश्यक है, यह केवल उन्हीं के लिए विचारणीय नहीं है जो कि इस प्रकार के परीक्षण कर रहे हैं।”
इस दृष्टि से अणु-अस्त्रों के परीक्षण का यह भय साधारण जनता द्वारा फैलाई हुई अफवाह नहीं है-वरन् यह संसार के सबसे बड़े वैज्ञानिकों की सम्मतियों पर आधारित है। कुछ राजनीतिज्ञ हम से कहते हैं कि इस आन्दोलन का कारण रूस वालों की धोखेबाजी है। पर हम अच्छी तरह जानते हैं कि हमको कोई धोखा नहीं दे रहा है। स्वयं अमरीका, इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, जो इस विषय का पूर्ण ज्ञान रखते हैं, हम को सत्य बात बतला रहे हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे शरीरों को विषाक्त बनाया जाय और हमारी भावी संतानों को विकार ग्रस्त किया जाय, सिर्फ इस कारण से कि बड़े राष्ट्र एक दूसरे पर संदेह करते हैं और आपस में समझौता करने में असमर्थ हैं।
(श्री. जी. श्रीकण्ठम्)
[भारत के प्रधान मंत्री श्री जवाहरलाल जी नेहरू इस समय संसार के सबसे बड़े शान्ति स्थापन-कर्ताओं में से हैं। कोरिया, इन्डोचीन, मिश्र सब जगह आपने संघर्ष की अग्नि को ठण्डा करके शाँति की धारा बहाई है। वास्तव में कई बार तो जब संसार के बड़े राष्ट्र युद्ध के बिल्कुल निकट पहुँच गये और एटम बम जहाजों में रखकर रवाना कर दिये गये तब नेहरू जी ने उस स्थिति को संभाला है। पर संसार की वर्तमान गतिविधि को देखकर और बड़े राष्ट्रों के राजनीतिज्ञों की मनोवृत्ति की समझ कर नेहरू जी को भी सदैव अणुयुद्ध शुरू हो जाने का खतरा दिखाई पड़ा करता है। नीचे के लेख से पाठक वर्तमान स्थिति के सम्बन्ध में उनकी सम्मति जान सकते हैं। ये विचार उनके विभिन्न भाषणों से एकत्रित किये गये हैं।]
“आज बड़े राष्ट्र युद्ध के निकट जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि आज संसार युद्ध की मनोवृत्ति के ज्वर से ग्रस्त है। यह देखकर मुझे गत महासमर के आरम्भिक महीनों की याद आ जाती है। मुझे विश्वास है कि युद्ध और हिंसा से ये समस्यायें हल नहीं हो सकतीं। तो भी संसार के सामने आज बड़े खतरे मुँह बाये खड़े हैं ओर हो सकता है कि अभी हमने जो छोटी लड़ाइयां देखी हैं वे पहला दौर हो और बड़ी लड़ाई अभी आने वाली हो। खासतौर से शक्तिशाली राष्ट्रों की महत्वाकाँक्षाएँ दुर्बल देशों को खतरे में डालती हैं। आज दुनिया के सामने दो ही विकल्प हैं- उदजन बम या पंचशील।
पारस्परिक भय और संदेह के कारण अमरीका और रूस में आतंक पैदा हो गया और ये दोनों शस्त्रीकरण में होड़ कर रहे हैं। फल यह हुआ है कि अब संसार में सशस्त्र सेनाओं की पगध्वनि और हथियारों की खनखनाहट फिर सुनाई देने लगी है। मेरा ख्याल यह नहीं है कि लड़ाई अभी हो जायगी, किन्तु संसार आज ज्वालामुखी के मुख पर बैठा है। भारत की नीति तो युद्ध से दूर रहने की है किन्तु यदि संसार में सचमुच लड़ाई हो जाती है तो उसकी लपटों की गर्मी हम तक भी जरूर पहुँचेगी। फिर भी हम स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा कर देना चाहते हैं दोनों शक्तिशाली और हथियार बंद गुटों के एक दूसरे के मुकाबले में आगे बढ़ते जाने पर भी भारत अपनी स्वतंत्र नीति पर डटा रहेगा और किसी गुटबन्दी में न पड़कर सब देशों से मित्रता का सम्बन्ध ही रखेगा।”
“इन उदजन बमों से लोगों को भय है कि यदि उनका खुला हुआ इस्तेमाल हुआ तो क्या होगा, मुझे विश्वास है कि दुनिया में आज कोई भी यह नहीं चाहता। कुछ भी हो उसके बारे में सोचने का कोई लाभ नहीं। विगत युगों में भी विनाश काल के समय लोगों ने सोचा था कि दुनिया का अन्त समीप आ रहा है। लेकिन मानव अभी जीवित और आगे बढ़ता जा रहा है।”
हम लोगों ने तो गाँधी जी के विश्वविद्यालय में निडर बनने की शिक्षा पाई है। कभी-कभी लोग उनकी शिक्षा को भूल जाते हैं, किन्तु वह बार-बार उनके काम आती है। हमारे देश के धर्मशास्त्रों में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि मनुष्य को सबसे बड़ा उपहार निडरता का ही मिल सकता है लेकिन दुनिया में आज भय फैला है। जो देश जितना अधिक शक्तिशाली है और उसके भय भी उतने ही बड़े हैं। भय पाप है, क्योंकि घृणा व हिंसा जैसे उसके साथी हैं। हमारे शान्तिपूर्ण संघर्ष का अर्थ है कि बुराई के आगे कभी घुटने नहीं टेकना। उदजन बम को भी उससे बड़ी शक्ति-मानव मस्तिष्क को काबू में किया जा सहता है।
(श्री वन्दावन बिहारीलाल शर्मा, सा.वि.)
(यद्यपि संसार में खण्ड प्रलय होने की भविष्यवाणी बहुत समय से की जा रही थी, पर अधिकाँश लोग इस पर विश्वास नहीं कर सकते थे। क्योंकि उनको ऐसा साधन दिखाई नहीं पड़ता था जिससे एक साथ इतनी बड़ी नाशलीला संभव हो सके। पर अब पिछले आठ दस वर्षों में जिन अणु और उदजन (हाइड्रोजन) बमों का आविष्कार हुआ है उनसे यह बात सर्वथा संभव हो गई है कि अगर रूस और अमरीका खुलकर अणु शक्ति का प्रयोग करें तो संसार में से मनुष्यों का पूर्ण रूप से नाश हो सकता है, भले ही इधर-उधर दस बीस हजार या कुछ भाग जंगली और असभ्य जातियों के व्यक्ति भले ही बचे रहें। इस लेख से पाठकों को उसी अणु-बम का इतिहास और उसका वास्तविक रहस्य ज्ञात हो सकेगा)
आदिकाल से मनुष्य दो दिशाओं में खोज करता रहा है। प्रथम प्रकृति पर विजय पाना और दूसरे प्रकृति के शक्ति स्रोतों से अपने प्रयोग में लाना। इस प्रयास में उसने अग्नि का पता लगाया, सूर्य की गरमी का इस्तेमाल किया, हवा व पानी से शक्ति उत्पन्न की, और बिजली का आविष्कार किया। शक्ति के प्रयोग की निगाह से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध को ‘भाफ का युग‘ कह सकते हैं। द्वितीय महासमर के बाद हमने शक्ति के एक नये युग में पैर रखा है, जिसे ‘अणु शक्ति का युग‘ का नाम देना उपयुक्त होगा। इस शक्ति की खोज तीस चालीस साल से की जा रही थी, पर इसका परिचय सर्व साधारण को सन् 1945 में लगा जब उसके द्वारा जापान के दो नगरों को कुछ सेकेंडों में ही पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया गया।
अपने पड़ोसियों से अधिक धनवान बनने की इच्छा से प्राचीनकाल से ही अनेक लोग लोहे, ताँबे को सोना बनाने की तरकीब ढूंढ़ा करते थे। हमारे देश में इसी विचारधारा ने ‘पारस पत्थर’ की कल्पना को फैलाया। आजकल के वैज्ञानिक जानते हैं कि प्राचीन लोगों ने इस कार्य की जितनी विधियाँ निकाली थीं वे सब गलत थीं। पर ये वैज्ञानिक एक नवीन विधि से इस उद्देश्य में सफल हो गये हैं। ये लोग बड़ी तादाद में तो नहीं अपनी प्रयोगशाला में बहुत छोटे परिमाण में एक धातु को दूसरी धातु में बदल सकते हैं। इसी धातु-परिवर्तन की खोज करते-करते लोगों को ‘अणु बम’ का पता लग गया।
उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में टामसन, रैजन आदि वैज्ञानिकों ने विभिन्न पदार्थों के सूक्ष्म अणु और परमाणुओं की जाँच आरम्भ की और यह पता लगाया कि कुछ भारी धातुओं के परमाणुओं में यह शक्ति है कि उनका संयोग जब अन्य धातुओं से होता है तो नये तत्वों की उत्पत्ति होने लगती है। इन भारी धातुओं में सबसे भारी तत्व यूरेनियम ही था। यूरेनियम की ‘रेडियो एक्टिविटी’ से प्रकट होता था कि उसका केन्द्र अस्थायी होता है। इस अस्थायी केन्द्र पर जब हलके परमाणुओं (न्यूट्रानों) को फेंका जाता है तो उसमें विस्फोट होने लगते हैं, जो शीघ्र ही बहुत विशाल रूप ग्रहण कर लेते हैं। इन विस्फोटों से उत्पन्न ताप इतना तीव्र होता है कि वह प्रत्येक वस्तु को क्षणमात्र में जला कर धुँआ के रूप में परिवर्तित कर देता है। साथ ही यह ताप वायुमण्डल को भी जलाने लगता है जिससे उसका प्रभाव बढ़ता चला जाता है और एक बम से दस बीस वर्ग मील या इससे भी अधिक क्षेत्र में कोई भी जीवित वस्तु शेष नहीं रह पाती।
एटम बम का आविष्कार किस देश ने किया, इसके सम्बन्ध में लोग तरह-तरह की बातें कहते रहते हैं। बहुत से लोगों का ख्याल है कि इसे पहले जर्मनी में बनाया गया था और अमरीका वाले वहाँ से ले गये। पर वे सब विज्ञान की जानकारी न रखने वाले लोगों की कल्पना है। विज्ञान के आविष्कार किसी के कहने से दो-चार सप्ताह या महीनों में नहीं हो सकते। इनका पता धीरे-धीरे लगता है और उस में अनेक देशों के अनेक वैज्ञानिक स्वतंत्र रूप से भाग लिया करते हैं। इन खोजों के फल से जब कोई चीज बन जाती है तो चाहे उसके बनाने वाला कोई एक ही वैज्ञानिक क्यों न हो उसका श्रेय सभी खोज करने वालों को होता है। एटम शक्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन तो जर्मनी के विश्वविख्यात प्रोफेसर अलबर्ट आइन्स्टीन ने किया था, पर उससे शक्ति उत्पन्न करने तथा बम तैयार करने का काम दूसरे वैज्ञानिकों का है।
प्रो. आइन्स्टीन यहूदी थे और जर्मनी के रहने वाले थे। पर जब हिटलर ने यहूदी जाति के नाश का बीड़ा उठा लिया तो ये जर्मनी से भाग कर अमरीका चले गये और कुछ वर्ष पश्चात वहीं के नागरिक बन गये। 2 अगस्त 1939 को उन्होंने अमरीका के प्रेसीडेन्ट रुजवेल्ट को एक पत्र लिखा था जिसमें बतलाया गया था कि “हाल की नवीन खोजों से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि यूरेनियम को शक्ति के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है और उससे बहुत अधिक शक्तिशाली बम बनाये जा सकते हैं। ऐसा एक बम अगर किसी बन्दरगाह पर फोड़ दिया जायेगा तो उससे पूरा बन्दरगाह और आसपास का बहुत सा प्रदेश भी नष्ट हो जायगा।” एटम बम का आविष्कार हो जाने के बाद प्रो. आइंस्टीन ने कहा था-
“मैं अपने को एटम शक्ति का पिता नहीं कह सकता। मेरा काम अप्रत्यक्ष था। मैंने सिद्धान्त रूप में उसका होना सिद्ध कर दिया था, पर मैं समझता था कि मेरे जीवनकाल में व्यवहारिक रूप में इसका प्रयोग न हो सकेगा। संयोगवश अनेक घटनाएं हो जाने से ही कार्य रूप में परिवर्तित हो सकी। इसका आविष्कार ‘हैन’ नामक जर्मनी के वैज्ञानिक ने किया था, पर वह अपनी खोज की वास्तविकता स्वयं ही न समझ सका था। उसके रहस्य को लीजमीटनर ने ठीक-ठीक समझा और उसी ने जर्मनी से भागकर ‘नील्स बोहर’ को उसका भेद बताया।”
“एटम बम बनने से कोई नई समस्या पैदा न हुई है। जब तक पृथ्वी पर भिन्न-भिन्न राष्ट्र मौजूद हैं तब तक युद्ध का होना अनिवार्य है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि लड़ाई कब होगी, पर वह होगी अवश्य, क्योंकि जो कारण एटम बम बनने के पहले थे, वे अब भी मौजूद हैं। एटम बम से केवल इतना अवश्य हुआ है कि युद्ध की नाशक शक्ति बहुत अधिक बढ़ गयी है। तो भी मैं यह विश्वास नहीं करता कि एटम बम के युद्ध से मानवीय सभ्यता का नाश हो जायगा। यह हो सकता है कि इसके द्वारा संसार के दो तिहाई या पौन हिस्सा लोग मारे जायें। तो भी कुछ विद्वान व्यक्ति बचे रहेंगे और पुस्तकें भी बच सकेंगी। इनके द्वारा फिर सभ्यता का निर्माण किया जा सकेगा।”
अणु बम तथा उद्जन बम के आविष्कार के सम्बन्ध में हाल ही में एक लेख में बताया गया है कि सन् 1941 से 1945 तक अमरीका में अणु-शक्ति सम्बन्धी प्रयोग बहुत भारी मात्रा में किये गये थे। इसके लिए अमरीका की सरकार ने अनेक वैज्ञानिकों को नियुक्त किया था। इन लोगों को सब तरह का साधन और सुविधायें भी अत्यधिक मात्रा में प्राप्त थी। ये लोग 4 वर्ष तक करोड़ों ही नहीं कई अरब रुपया खर्च करके तरह-तरह के प्रयोग करते रहे, तब कहीं जाकर पहला एटम बम तैयार हो सका। जब उसकी परीक्षा 16 जुलाई 1945 को मेक्सिको के विशाल रेगिस्तान में कर ली गयी तब 6 अगस्त को हिरोशिमा पर और 9 अगस्त को नागासाकी पर दो एटम बम फेंके गये। अणु-बम फोड़ने वाले यंत्र और उसको चलाये जाने का एक फौजी रहस्य है, जिसे सरकारों ने बहुत छुपा रखा है। पर मोटे तौर पर उसका विवरण वैज्ञानिकों को ज्ञात हो चुका है। वह यह है कि रेडियोधर्मी विस्फोटक यूरेनियम के दो टुकड़े अर्द्ध-दृढ़ तरीके से अलग-अलग रखे जाते हैं। जब इन्हें याँत्रिक विधि से एक सीमा से एक दूसरे के अधिक निकट लाया जाता है तो उसका परिणाम टुकड़ों में निहित अणुओं का विस्फोट होता है, जिससे एक विध्वंसात्मक शक्ति-ताप और विस्फोट के रूप में पैदा होती है। यूरेनियम के विस्फोटक भारी अणु के छितराने की क्रिया से अणुबम बनता है। इसके विपरीत हाइड्रोजन बम में हलके तत्वों की विस्फोट क्रिया से एक भारी तत्व बनता है। इस प्रकार एटम बम न्यूकलर विस्फोट की क्रिया का परिणाम है और हाइड्रोजन बम न्यूकलर मिश्रण का। इन दोनों ही क्रियाओं से असाधारण मात्रा में शक्ति पैदा होती है जो करोड़ों मन तेज बारूद से भी अधिक होती है।
हाइड्रोजन (उदजन) बम का आविष्कार
“सम्भवतः सबसे प्रथम उदजन बम का प्रयोग 1 नवम्बर 1951 को पैसफिक महासागर स्थिति ऐनीवेटाक नामक जन शून्य द्वीप में किया गया था। इसके ताप तथा विस्फोट का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सारा द्वीप एक आग के गोले से लिपट सा गया था और बाद में उसके स्थान पर समुद्री जल से भरा एक 175 फीट गहरा गड्ढा बन गया था। वैज्ञानिकों का मत है कि उस परीक्षण से जो विस्फोट हुआ था वह 80 लाख टन टी.एन.टी. (तेज बारूद) के विस्फोट के बराबर या उसके द्वारा पैदा ताप लगभग 10 लाख डिग्री सेंटीग्रेड का था।”
“इस दिशा में और अधिक गहन प्रयत्न किये गये। पहले अधिक गर्मी और विस्फोट पैदा करने के लिए आणविक मिश्रण के तत्वों का भी उपयोग किया गया। लेकिन सभी बमों में कुछ मात्रा में यूरेनियम का प्रयोग भी करना पड़ा, क्योंकि बिना विस्फोटक यूनियम की कुछ मात्रा के उदजन बम चल नहीं सकता था। यह विस्फोटक यूरेनियम यू-235 कहलाता है जब कि मुख्य यूरेनियम तत्व यू-238 कहा जाता है। यद्यपि सन् 51 और 52 में भी उदजन बम के परीक्षण किये गये, पर वह सुविधा पूर्वक युद्ध में काम देने लायक न था। उसमें कई तरह के सुधारों की आवश्यकता थी। इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने कई तरह से सुधार करके नया उदजन बम बनाया और और उसकी परीक्षा 1 मार्च 1954 को पैसफिक सागर के ‘बिकनी’ टापू में की गयी। इस अवसर पर सभी राष्ट्रों के जहाजों को बिकनी से कई सौ मील दूर रहने की चेतावनी दे दी गयी थी। पर किसी तरह भूल से जापानियों का ‘लकी ट्रैगन’ मछली पकड़ने वाला जहाज इस निषिद्ध क्षेत्र के भीतर आ गया। जिस समय बम का परीक्षण हुआ वह बिकनी से 100 मील की दूरी पर था। जैसे ही उदजन बम का विस्फोट हुआ उसकी बहुत सी राख ऊपर की ओर उड़ी और उसी का थोड़ा सा अंश ‘लकी ट्रैगन’ के 23 मल्लाहों पर गिरा। वे मल्लाह बुरी तरह से जल गये और उनके शरीर में यूरेनियम का विष व्याप्त हो गया। बाद में बतलाया गया कि इस बम में साधारण यूरेनियम का एक बड़ा छिलका भी लगाया गया था। इस बड़े उदजन बम के विस्फोट से निकली शक्ति इतनी अधिक थी कि उससे यह यूरेनियम अन्य तत्वों में बदल गया। इनमें से एक ‘स्ट्रोन्टियम 90’ था। यह तत्व बहुत खतरनाक साबित हुआ। जाँच करने से पता चला कि यह तत्व हवा की गति से बहुत दूर-दूर तक फैल गया है। उसके गिरने से केवल मनुष्य का खून और हड्डी ही विषाक्त नहीं हो जाती, वरन् वह छोटे जीवों जैसे मछली आदि और पेड़-पौधों पर भी अपना विषैला असर डाल देता है। जो मनुष्य या अन्य प्राणी इन मछलियों या पेड़ पौधों को काम में लाते हैं उन पर भी उस विष का प्रभाव पड़ जाता है। जापान में ऐसी मछलियों को खाने से अनेक लोग बीमार पड़ चुके हैं।
मानवता के संहार का भय
“इस प्रकार जो वैज्ञानिक व राष्ट्र उदजन बमों का प्रयोग कर रहे हैं वे स्वयं उनसे भयभीत होने लगे हैं। उदजन बम के आविष्कार का उद्देश्य है पहले से लाखों गुना अधिक ताप और विस्फोट पैदा करना। किन्तु अब संयोगवश यह भी प्रकट हो गया है कि उदजन बम एक विशेष स्थान को मटियामेट करने के साथ ही कुछ ऐसे तत्व भी पैदा करता है जो संसार के समस्त वातावरण पर विषैला प्रभाव डालते हैं और सम्पूर्ण मनुष्य जाति को हानि पहुँचाते हैं। यह भी संयोग है कि अमरीका रूस को नष्ट करने के लिए जो हाइड्रोजन बम चलायेगा उनसे उत्पन्न यह विषैला तत्व हवा की गति से अमरीका के ऊपर ही पहुँच जाय और साल-दो साल बाद वहाँ के करोड़ों व्यक्तियों को मारने का कारण बन जाय। इस परिस्थिति को देखकर अब वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ दोनों इस उलझन में फंसे हैं कि यदि उदजन बमों का परीक्षण और प्रयोग बन्द न किया गया तो क्या संसार का विध्वंस न हो जायगा?
इस भय से रक्षा पाने के निमित्त अब अमरीका की सरकार ‘स्वच्छ’ उदजन बम तैयार कराने का प्रयत्न करने लगी है जिससे ताप और शक्ति तो उत्पन्न होगी, पर विषैले तत्व उत्पन्न नहीं होंगे। इस प्रकार इसका प्रभाव विस्फोट स्थान से दूर रहने वाले बेकसूर लोगों पर नहीं पड़ेगा। अब भी अमरीका में ऐसे उदजन बम बनाये जा रहे हैं। जिसका विषैला प्रभाव पहले बमों से 96 प्रतिशत कम है।” इससे यह अनुमान किया जाता है कि अमरीका ने कोई ऐसी विधि निकाल ली है जिससे बिना यूरेनियम को प्रयोग किये ही उदजन बम का विस्फोट किया जा सकता है।
यह सब होने पर भी रूस और अमरीका में खुल कर युद्ध हो गया तो मानवता का बहुत बड़ा नाश अनिवार्य है। क्योंकि संसार के ज्यादातर देश अमरीका या रूस के पक्ष में शामिल हैं और इसलिये उन सब पर अणु बमों का प्रयोग होना संभव है। इसके सिवाय अब तक जो अणुबम बनाये जा चुके हैं और जिनमें बहुत अधिक विषाक्त प्रभाव मौजूद है, जरूरत पड़ने पर भी वे चलाये ही जायेंगे। फिर अमरीका की बात को सच मानकर हम ‘स्वच्छ’ उदजन बम की बात पर विश्वास कर भी लें तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि रूस भी वैसे ही ‘स्वच्छ’ बम बना सकता है। इसलिये जब लड़ाई शुरू होगी तो रूस अपनी रक्षा और मुकाबला करने के लिए उसके पास जैसे बम होंगे उन्हीं से काम लेगा। इसी बात को ध्यान में रखकर इसी 11 अगस्त सन् 1957 को टोकियो (जापान) में होने वाले विश्व सम्मेलन में इंग्लैंड के अणु वैज्ञानिक प्रोफेसर रोटबाल्ट ने कहा है कि “अमरीका और सोवियत रूस के बीच यदि पूरे पैमाने पर युद्ध हुआ तो उसमें कम से कम समय के भीतर ‘स्वच्छ’ और ‘गंदे’ सब तरह के बमों का इस्तेमाल होगा। दस वर्ष में दूरमारक यंत्र इतने शक्तिशाली हो जायेंगे कि उनके द्वारा संसार के किसी भी भाग पर उदजन बम फेंके जा सकेंगे। युद्ध शुरू हो जाने पर दोनों पक्ष ऐसे आयुधों से तुरन्त ही अधिक से अधिक उदजन बम छोड़ेंगे, क्योंकि उस समय वे यह प्रतीक्षा करते नहीं रह सकते कि दूसरा पक्ष कितने बम छोड़ता है। उस समय तक प्रत्येक पक्ष के पास 20 मेगाटन वाले कम से 1000 बम होंगे। गंदे बमों की विध्वंसक शक्ति साफ बम से कम से कम तिगुनी है। उनका विस्फोट जब होगा तो उसका प्रभाव बहुत बड़े क्षेत्र पर पड़ेगा। अमरीका का क्षेत्रफल 30 लाख वर्ग मील है। अगर वहाँ उदजन बमों का विस्फोट हुआ तो लाखों वर्ग मील भूमि तुरंत नष्ट हो जायेगी और करोड़ों आदमी मर जायेंगे। एक हजार बमों से उत्पन्न 25 प्रतिशत ‘विकिरण’ (हानिकारक किरणें) अमरीका पर पड़ेंगी। पर यह हानि केवल अमरीका और रूस तक सीमित नहीं रहेगी, क्योंकि बमों के ‘विकिरण पदार्थ’ समस्त पृथ्वी पर फैल जायेंगे और उन सभी लोगों को नुकसान पहुँचायेंगे। इन दोनों देशों के बाहर के करोड़ों लोग रक्त-श्वेतता (ल्यूकोमिया) हड्डियों के कैंसर तथा प्रजनन शक्ति को क्षति पहुँचाने वाले रोगों से पीड़ित हो जायेंगे।’ इन सब तथ्यों और जानकार लोगों के कथनों पर ध्यान देने से अभी संसार का खतरा जैसे का तैसा मौजूद है और लड़ाई छिड़ने से प्रलयकाल का दृश्य दिखलाई पड़ना अनिवार्य है।
(श्रीमती इन्दुमती पंडित बी.ए.)
रूस में साम्यवाद का जन्म होने के पश्चात लालतारा (हर्षल) का प्रकाश पूर्व और पश्चिम के पड़ोसी देशों पर तेजी से फैलने लगा है। युद्ध के बाद पूर्वीय यूरोप के कितने ही देश साम्यवादी शासन के अंतर्गत आ गये। इसी प्रकार एशिया के कितने ही देशों को भी ‘प्रजासत्तात्मक शासन’ के नीचे से मुक्त करके लाल शासन का अनुयायी बनाया गया। एशिया का सबसे बड़ा देश चीन लालतारा के प्रकाश के पड़ने से उसके नीचे आ गया।
एशिया में लालतारा के प्रकाश में आने वाला सबसे अन्तिम देश उत्तरी वियतनाम है और उस पर बड़े काका ‘होंचीमिन्ह’ का अधिकार है। इस देश की राजधानी हनोई को जब फ्राँस के हाथ से निकालकर उस पर साम्यवादियों का अधिकार हुआ, तो जमीन के सुधार का काम ‘ट्रु आँगचिन्ह’ के सुपुर्द किया गया। इस सम्बन्ध में एक प्रदेश के ईसाई निवासियों ने जब बवा किया तो उनका बड़ी कठोरता से दमन किया गया। परिस्थिति के सुधारने में सहायता देने के निमित्त चीन के प्रधानमंत्री चाऊएनलाई स्वयं हनोई आये और दोनों पक्षों को समझने का प्रयत्न किया। इसके फलस्वरूप दमन के कारण लोगों का जो नुकसान हुआ था उसका हर्जाना दिया गया और उनकी अन्य कितनी ही माँगें भी पूरी की गई। इस उपद्रव में जो 15 हजार व्यक्ति मार डाले गये थे और जिनको गड्ढा खोदकर इकट्ठा गाढ़ दिया गया था, उनको वहाँ से निकाल कर उनकी अच्छी कब्रें बनाई गई। यह घटना उस देश की है, जहाँ के प्रधान ‘होची मिन्ह’ महात्मा गाँधी और नेहरू जी के नाम दूसरे नामों की अपेक्षा अधिक लिया करता है। इससे मालूम पड़ता है कि लाखों आदमियों की जान के लिए अन्य लाखों आदमियों का संहार कर डालना साम्यवादी शासन का स्वाभाविक नियम ही है।
यह नियम किस प्रकार काम करता है और आगामी दिनों में किस प्रकार इसका व्यवहार होगा, इसके सम्बन्ध में हमको खासतौर पर तीन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है- (1) कुँभ-युग में संपातवृत्त का प्रतिकरण, (2) इससे सम्बन्ध रखने वाले प्रमुख ग्रह-योग, (3) हर्षल का भ्रमण और अन्य ग्रहों के साथ उसका योग।
(1) महान खगोलशास्त्र के ज्ञाताओं के मतानुसार कुँभ राशि में संपातवृत्त का प्रतिक्रमण 1762 से आरम्भ हुआ है और तभी से जन-सत्ता और नव-युग का आन्दोलन आरम्भ हुआ है। प्रत्येक राशि की तरह कुँभ राशि भी 30 अंशों की बनी है, कहा जाता है कि ऐसी 30 अंश की एक राशि को अपनी चक्रगति से पार करने में सूर्य को 2150 वर्ष लगते हैं। इसका अर्थ यह हुआ है कि किसी भी राशि का एक अंश पार करने में सूर्य को लगभग 70 वर्ष और 9 महीने का समय लगता है।
इस हिसाब से हम सन् 1903 में मीन राशि से 2 अंश दूर और कुँभ राशि के 28 वें अंश में थे और सन् 1973 में हम 27 वाँ अंश पार कर चुकेंगे। सन् 1960 में हम कुँभ राशि में 27 अंश और 10 कला पर होंगे। इस समय की ग्रह स्थिति पर विचार करने से वह बड़ी गंभीर जान पड़ती है। नीचे हम उसकी खास खास बातें देते हैं-
(1) 1961 की 9 फरवरी को एक सूर्य ग्रहण पड़ेगा और वह कुँभ राशि के 27 अंश पर होगा।
(2) 1961 के सितम्बर में हर्षल का लालतारा सिंह राशि के 27 वें अंश पर पहुँचेगा। और वह कुँभ के संपात के ठीक सामने होगा।
(3) सन् 1962 की 5 फरवरी को एक सूर्य ग्रहण पड़ेगा और उस समय लालतारा हर्षल सिंह राशि के 28 वें अंश पर रहेगा। इसी दिन आठ ग्रह, अर्थात् सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि और केतु कुँभ राशि में होंगे। इसी समय वृश्चिक राशि में पड़े हुए नेपच्यून से इनका केन्द्रयोग होगा।
(4) 1961 की 19 फरवरी को मकर राशि के 25 अंश पर गुरु-शनि युत होने वाली है। इसका प्रभाव भारत पर भी काफी पड़ने की संभावना है।
ऊपर प्रकट किये गये तथ्यों से यह मालूम पड़ता है कि लालतारा ‘हर्षल’ और कुँभ राशि का प्रभाव इतना बढ़ जायेगा कि संसार के राजपुरुषों को उस तरफ ध्यान देना पड़ेगा। इस प्रभाव का समय भी काफी लम्बा है अर्थात् सन् 1960 से 1963 तक पृथ्वी के सभी देशों पर अपनी भौगोलिक स्थिति के अनुसार पड़ेगा। भारत पर भी लालतारा का प्रभाव कुछ अंशों में अवश्य पड़ने वाला है।
पर इस फलादेश को पढ़कर किसी को यह नहीं समझ लेना चाहिए कि साम्यवादी प्रभाव बहुत देशों पर बढ़ जायेगा, अथवा इसके विपरीत साम्यवाद पृथ्वी तल से नष्ट कर दिया जायगा। हमारा कहने का आशय इतना ही है कि इस अवसर पर अन्य समय की अपेक्षा बहुत महत्व की और गम्भीर असाधारण घटनाएँ होंगी। इतना निश्चय समझना चाहिए कि 1960 से 1963 तक का समय बीसवीं सदी के मध्य भाग के इतिहास में सबसे अधिक भयंकर माना जायगा। इन वर्षों में बहुत कुछ राजनीतिक उथल-पुथल होगी, लालतारा का आश्चर्यजनक प्रभाव अनेक देशों पर पड़ेगा। मेरे ज्योतिष सम्बन्धी अध्ययन के आधार पर तीसरा महायुद्ध भी मुझे इसी अवधि में होता जान पड़ता है। इस दृष्टि से मैं तो संपात-चक्र से सम्बन्ध रखने वाले इस योग के बेहद महत्व देती हूँ। आगे चलकर पृथ्वी के मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के जीवन पर इसका कैसा असर पड़ेगा यह तो भावी ही बतलायेगी।
(श्री मृत्युँजय उपाध्याय एम.ए.)
हमारे देश में, तथा अन्य देशों में भी समय-समय पर कुछ विशिष्ट महापुरुष ऐसे उत्पन्न हुआ करते हैं जो भविष्य में होने वाली घटनाओं को दिव्य दृष्टि द्वारा सैकड़ों वर्ष पूर्व जान जाते हैं और लोक कल्याण के उद्देश्य से उसे प्रकट भी कर देते हैं। इन भविष्य वाणियों में जो समय दिया जाता है वह प्रायः गुप्त संकेतों के रूप में होता है, जिससे जन-साधारण में व्यर्थ का आतंक न फैले, और केवल गुप्त विद्याओं से अनुराग रखने वाले अथवा उनके खास अनुयायी उनको समझ कर समयानुसार मार्ग-दर्शन का कार्य कर सकें। नीचे हम कुछ ऐसी ही भविष्यवाणियों का संग्रह पाठकों, के विचारार्थ दे रहे हैं-
मालिका की भविष्यवाणी
उड़ीसा प्राँत में जगन्नाथ पुरी के पास कितने ही मठों में ‘मालिका’ नाम की एक प्राचीन पुस्तक मिलती है। वह पाँच सौ वर्ष से अधिक पुरानी है और ताड़ के पत्तों पर लिखी गई है। कहा तो यह जाता है कि उड़ीसा में एक लाख ‘मालिका’ की पुस्तकें हैं, पर इस समय जितनी पुस्तकों की जानकारी लोगों को है उनकी संख्या भी सैकड़ों है। ये सब महन्तों के अधिकार में है। वे इन पुस्तकों को बड़ी कोशिश से खास-खास को ही देखने देते हैं।
मालिका की रचना बंगाल के प्रसिद्ध भगवद् भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के समय में हुई थी। उनके एक मित्र श्री अच्युतानन्द दास थे जिनको उड़ीसा में बहुत बड़ा योगी और महात्मा माना जाता है। लोगों का यह भी विश्वास है कि अच्युतानन्द दास ने अपनी सब पुस्तकें योग शक्ति से लिखी हैं। इन्हीं में से एक ग्रन्थ में सतयुग से लेकर कलियुग तक अच्युतानन्द के अनेक जन्मों का भी वर्णन किया गया है। उड़ीसा में अच्युतानन्द दास की भविष्यवाणियों का बड़ा महत्व है और लोग उनके प्रति बड़ी श्रद्धा और विश्वास रखते हैं। उनकी भविष्यवाणियाँ वैसे तो बड़ी विस्तृत हैं जिनका विवरण एक बड़े ग्रंथ में भी नहीं दिया जा सकता। पर उनका साराँश थोड़े शब्दों में नीचे दिया जाता है।
“बाढ़ और युद्ध, अकाल और महामारी, भूचाल और विस्फोट इस युग की अनिवार्य घटनायें हैं। योरोप की प्रायः समस्त आबादी नष्ट हो जायगी, और कुछ समय बाद अमरीका पानी में डूब जायगा, अन्त में रूस सफलता प्राप्त करेगा। विजयी रूस को आगामी अवतार वश में करेगा। भारतवर्ष में नीलाँचल (जो जगन्नाथ पुरी के नाम से प्रसिद्ध है) समुद्र-गर्भ में विलीन हो जायगा। यह एक नियम सा हो गया है कि प्रत्येक युग के अन्त में भारत का एक हिस्सा डूब जाता है। त्रेता के अंत में लंका डूबी थी, द्वापर के अन्त में द्वारिका समुद्र में विलीन हो गई, और अब कलियुग का अन्त होते समय हिन्दू-धर्म का प्रधान तीर्थ जगन्नाथपुरी लोप हो जायगी।”
‘मालिका की भाषा और भविष्य वाणियों की शैली का एक नमूना भी देखिये :-
ठावे-ठावे अनर्थ जे होई बढ़ि वीर, दिवस आँधार दिशु, थिच अन्धकार॥1॥ महा घोर अनर्थ जे होई व संसार, तेतिकि वेल कुलक्ष रखि थिवु वीर॥2॥ केहि जे काहारि होई न रहिवे मही, अरजीला धन पर नेउ थिवे वो ही ॥3॥ धरे-धरे तातटि बाट पड़िव संसार, दुर्वाद गाउ थिवे जे सुजन संगर॥4॥ असुरान्त माने बड़बड़ बोलाइबे, खट जे खचु आमाने संसारे फेरिवे ॥5॥ श्री हरि महीमा जे अटइ दिव्य रस, निगम बेलकु एका रहिवे मो दास॥6॥ पश्चिम दिगरु अनुकूल हेव जे वे, निश्चय जणिव निकटटि हेवे तेवे ॥7॥
बलराम जी गरुड़ जी को कलियुग का भविष्य बतलाते हैं कि- ‘हे वीर जब कलियुग के अन्त होने का समय होगा, तब जगह-जगह लड़ाई होगी और दिन में अंधेरा दिखलाई पड़ेगा।1। उतने ही समय में संसार में बड़ा भारी अनर्थ होगा, उसी समय को ध्यान में रखो।2। उस समय संसार में कोई किसी का न होगा, लोग दूसरे का धन लूटने को हमेशा तैयार रहेंगे।3। हर एक घर में किवाड़ (टट्टी) लग जावेगा। हर जगह भाग्य को कोसना और खराब बातें सुनाई पड़ेंगी।4। असुर प्रकृति वाले व्यक्ति बड़े आदमी (अमीर) बनकर पूज्य बन जायेंगे और लुटेरे संसार में स्वच्छंद होकर फिरेंगे।5। श्री हरि का चरित्र अमृत है। उसके प्रभाव से अन्त समय में भक्त लोग ही बचेंगे।6। यह लूट-मार जब पश्चिम में शुरू होगी तब समझ लेना कि समय नजदीक आ गया है।7।
इस भविष्यवाणी के अनुसार इस समय पश्चिमी देशों में लूट-मार (अपहरण) का भाव चोटी पर पहुँच चुका है, और असुर प्रकृति वाले संसार के प्रधान बने बैठे हैं। इसलिये हमारा विश्वास है कि यह भविष्यवाणी शीघ्र ही सत्य होती दिखलाई पड़ेगी और वर्तमान युग का अन्त होकर एक श्रेष्ठ युग का आविर्भाव होगा।
शेरो साहिब की भविष्यवाणी
योरोप और अमरीका में हाल के समय में जितने ज्योतिषी हुये हैं उनमें शेरो साहिब का नाम सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। उन्होंने सन् 1925 में भविष्यवाणी की एक बहुत बड़ी पुस्तक लिखी थी जिसमें संसार भर में होने वाले युद्धों, दैवी घटनाओं और नये-नये परिवर्तनों का जिक्र किया गया है। उनके भविष्य कथन का आधार वह सिद्धान्त है कि पृथ्वी की कक्षा या धुरी अपनी जगह से धीरे-धीरे इधर-उधर हटती रहती है। इसके सबब से सूर्य भी हमको अपने स्थान से हटता नजर आता है। यह पृथ्वी का हटना ऐसा होता है कि सूर्य एक-एक करके बारहों राशियों में हो आता है। एक राशि से दूसरी राशि में जाने में उसे 2150 वर्ष और बारहों राशियों में 25800 वर्ष लगते हैं। ईसा के जमाने में सूर्य मीन राशि में था। अब सन् 1762 से कुम्भ राशि में आ गया है। जब सूर्य मीन राशि में आया था तो उसके फल से समुद्री जातियों की उन्नति हुई थी। अब कुम्भ राशि का विशेष प्रभाव रूस, चीन तथा भारत आदि देशों पर है और इस युग में इन्हीं देशों की सबसे ज्यादा तरक्की होगी।
ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार रूस कुम्भ राशि का है और उसका स्वामी शनि माना गया। शनि का यह मानवीय भाग्य की दृष्टि से बड़ा भयंकर माना गया है। यूनान के प्राचीन पुराणों में शनि को ऐसे देवता का रूप दिया गया है जो स्वयं ही अपने बच्चों को खा जाता है। यह लक्षण रूस में बहुत अंशों में पाया जाता है। वह सदा से अपने ही बच्चों को खाता रहा है। पुराने बादशाहों के जमाने में और अभी पचास वर्ष पहले जार के शासन काल में रूस में सदा अनगिनत आदमी षड्यंत्रों और क्रान्तियों में मारे जाते रहे हैं। बोलशेविकों के जमाने में भी विरोधियों की बहुत बड़ी संख्या में हत्याएं की गयी हैं। पर समय आयेगा जब कि रूस वालों का यह खून, जो बहुत समय से पानी की तरह बहाया गया है ‘एक नये स्वर्ग और नई पृथ्वी की रचना करेगा।”
पृथ्वी की कक्षा के बदलने का असर दुनिया की आवहवा पर बहुत अधिक पड़ता है। ध्रुव के स्थान बदल जाने से बड़े-बड़े भूकम्प आते हैं। समुद्रों की गहराई में फर्क पड़ जाता है, जल की जगह थल और थल की जगह जल हो जाता है। इस बार भी पचास वर्ष के भीतर स्वीडेन, नार्वे, डेनमार्क तथा इंग्लैण्ड, फ्राँस, जर्मनी, रूस के उत्तरी भाग ऐसे ठंडे हो जायेंगे कि वहाँ रहना कठिन हो जायगा। इसके बदले में चीन, भारत, मिश्र, पैलेस्टाइन आदि जो अभी तक गर्म समझे जाते हैं, मातदिल आवहवा वाले बन जायेंगे। इससे इन देशों की बड़ी तरक्की होगी और संसार में उनका महत्व बहुत अधिक बढ़ जायगा। अटलाँटिक महासागर के बीच एक नया टापू निकल आने से अफ्रीका का सहारा (रेगिस्तान) फिर से समुद्र बन जायगा, जिससे उस देश की काया पलट जायगी और वह भावी सभ्यता का एक बड़ा केन्द्र बन जायगा।
सूर्य जब तक कुम्भ राशि में रहेगा अर्थात् अब से लगभग दो हजार वर्ष तक, संसार की सामाजिक अवस्था भी बहुत बदली रहेगी। इस युग में स्त्रियों और मजदूरों की प्रधानता होगी। संसार में से और धर्मों का ह्रास होकर ‘साम्यवाद’ का धर्म फैल जायगा। दुनिया में बड़े विचित्र सिद्धान्तों का प्रचार किया जायगा और लोग उनको मान लेंगे। अमीर लोग खुशी से अपनी धन-सम्पत्ति को त्याग देंगे और गरीब बन जायेंगे। बादशाह लोग मजदूरों के साथ बैठकर रोटी खायेंगे और मजदूर अमीरों पर हुक्म चलायेंगे। बड़े-बड़े लोगों के पुत्र-पुत्रियाँ साम्यवादी बन जायेंगे और अपने बाप-दादों की जमीन-जायदाद गरीबों में बाँट देंगे। ईसाई धर्म भी बिल्कुल बदल जायगा और उसमें नये तरह के सिद्धान्त शामिल कर लिये जायेंगे।
(श्री आर.सी. भट्टाचार्य एम.ए.)
इस समय संसार में अणु शक्ति का आविष्कार और प्रचार एक बहुत बड़ी घटना है। जिस प्रकार भाप का इंजन शुरू में एक खिलौने की सी चीज ही जान पड़ता था और ज्यादातर लोग उसे एक तमाशे के रूप में ही देखते थे, उसी प्रकार अभी अधिकाँश लोग अणु शक्ति को केवल एक आश्चर्य जनक चमत्कार के रूप में देख रहे हैं और उसके नाशक रूप की चर्चा कर रहे हैं। पर जिस प्रकार भाप के इंजन का वास्तविक रूप में प्रयोग करने से संसार की काया पटल हो गई और योरोप दुनिया भर का मालिक बन बैठा, उसी प्रकार अणु शक्ति भी विलक्षण प्रभाव रखती है। अगर उसका उचित रूप से उपयोग किया जाय तो उससे उद्योग-धन्धों, खेती, चिकित्सा आदि अनेक क्षेत्रों में काया पलट हो सकती।
इसी उद्देश्य को सामने रखकर भारत में कई वर्ष से अणु-शक्ति के विकास की चेष्टा की जा रही है। भारत के प्रधानमंत्री नेहरू जी ने अणु शक्ति का आविष्कार होते ही उसके महत्व को समझ लिया और उसकी खोज तथा विकास के लिए देश में एक केन्द्र स्थापित कर दिया। वह केन्द्र गत दो-तीन वर्ष से लगातार इस दिशा में प्रयत्न कर रहा है जिसके फलस्वरूप इस वर्ष के आरम्भ में बम्बई में अणु शक्ति उत्पादन करने वाला एक कारखाना काम करने लग गया है। आरम्भ में यह कारखाना बिजली और प्लूटोनियम नामक धातु तैयार करेगा। साथ ही देश के खाद बनाने वाले कारखानों में ‘भारी जल’ भी तैयार किया जा रहा है। यह भी अणु-शक्ति के उत्पादन के लिए आवश्यक पदार्थ है। यह आशा की जा रही है कि द्वितीय पंचवर्षीय योजना की अवधि में देश में अणु शक्ति के कई कारखाने खुल जायेंगे और उसकी जानकारी रखने वाले तथा उसका व्यवहार कर सकने वाले अनेक वैज्ञानिक और कार्यकर्ता तैयार हो जायेंगे।
प्रधान मंत्री नेहरू जी ने इस कारखाने का उद्घाटन करते हुए कहा कि ‘चाहे कुछ भी हो और कैसी भी परिस्थितियाँ सामने आवे हम अणु शक्ति का प्रयोग बुरे उद्देश्य- अर्थात् नाश के लिए नहीं करेंगे। हम इस शक्ति का विकास ऐसे ढंग से ही करना चाहते हैं जिससे संसार का उपकार हो, अपकार नहीं। अणु-शक्ति के विकास में उन्नत देशों में यह अनुभव किया जा रहा है कि अगर इस शक्ति का गलत ढंग से उपयोग किया जायेगा तो वह बहुत भयंकर साबित हो सकती है। अब सभी समझदार आदमी इस बात को जान गये हैं कि अगर अणु शक्ति का प्रयोग युद्ध में किया गया तो वह संसार भर के लिये महा विपत्तिकारी होगा। इसीलिये इस समय सर्वत्र अणु शक्ति के हथियारों के नियंत्रण की चर्चा हो रही है। यद्यपि वर्तमान परिस्थिति में यह बड़ा कठिन कार्य है, तो भी उन देशों की जनता तथा जिनके हाथों में उन राष्ट्रों की बागडोर है वे नेता भी इस स्थिति पर अधिकाधिक विचार करने लगे हैं।
“कुछ भी हो हमें भी इस शक्ति का अपने देश में विकास करना आवश्यकीय है। कुछ लोग कहते हैं कि इस समय तो इसके विकास से जनता का कोई खास हित साधन नहीं हो सकता। पर कुछ भी हो, हम चाहें अणु शक्ति को पसंद करें या न करें, अगर हमें संसार में आगे बढ़ना है तो हमको इस शक्ति का विकास करना ही पड़ेगा। अन्यथा हमें दूसरों के पीछे घिसटना पड़ेगा।
“अगर्चे अभी अणु शक्ति का प्रयत्न आरम्भ हुए दो वर्ष का समय ही हुआ है, तो भी हमारे देश ने अच्छा काम किया है। इसके लिए ‘अणु शक्ति’ आयोग‘ के अध्यक्ष डॉ. होमी जे. भाभा भौतिक प्रयोगशाला के निर्देशक डॉ. के.एस. कृष्णन तथा अनेक युवक वैज्ञानिक प्रशंसा के पात्र हैं। केवल कंक्रीट और सीमेन्ट की इमारतें खड़ी कर देने तथा बड़ी-बड़ी मशीनें लगा देने से ही काम नहीं चल सकता, वरन् भविष्य का वास्तविक निर्माण तो मानवीय मसाले से ही होगा।”
इस प्रकार भारत संसार की एक सबसे बड़ी और आधुनिकतम शक्ति के विषय में स्वावलम्बी बन रहा है और उसके ऊपर अपना नियन्त्रण स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील है। जबकि हमारा पड़ोसी पाकिस्तान, अमरीका से कुछ अणु-हथियार प्राप्त करके इसका घमंड कर रहा है कि हम इनके द्वारा दूसरों का नाश कर सकते हैं, भारत इस शक्ति द्वारा अपना ही नहीं, एशिया और अफ्रीका के अन्य कितने ही देशों का भी उपकार करने की तैयारी कर रहा है। इसका यह अर्थ नहीं कि भारत दूसरे देशों की तरह अणु-हथियार नहीं बना सकता। अभी हाल में एक मन्त्री ने कहा था कि हम चाहें तो एक-दो वर्ष में एटम बम बना सकते हैं, पर हम ऐसा करना हर्गिज नहीं चाहते। हम तो संसार भर में से अणु-युद्ध के भय को मिटाने की अधिक से अधिक चेष्टा कर रहे हैं, जिससे मनुष्य जाति की इस महा भयंकर खतरे से रक्षा हो सके।
(श्री “भारतीय योगी”)
जिस समय रेडियम का आविष्कार हुआ था उसी समय वैज्ञानिक ज्योतिषियों ने कह दिया था कि यह संसार की काया पलट कर देगी। मानों इसी ‘भविष्यवाणी’ को सत्य सिद्ध करने के लिए सन् 1950 में अणु शक्ति का उपयोग आरम्भ हो गया और थोड़े ही समय में उसने भाप और तेल की शक्ति को निकम्मा बना दिया। हर देश में भाप और तेल के बजाय ‘रेडियो-इंजन’ चलने लगे और इसके फलस्वरूप संसार में हलचल मच गयी। क्यों? इसलिये कि जो अन्तर हाथ के काम और भाप के इंजिन में था उतना ही अन्तर भाप के इंजिन और रेडियो इंजिन में था। इस नये इंजिन से एक मोटर के 100 मील जाने में दो-चार आने का मसाला ही खर्च होता था। जो वायुयान पहले एक घन्टे में मुश्किल से 250 मील जा सकते थे वे अब 600 और 700 मील तक जाने लगे। सौ मजदूरों का काम दस मजदूर करने लगे। कोयले और पेट्रोल की जरा भी पूछ नहीं रही। जिन लोगों को भय था कि अब खानों में कोयला व तेल का भण्डार कम होता जाता है उनका डर व्यर्थ सिद्ध हो गया।
पर इस प्रकार की वैज्ञानिक उन्नति से हानि लाभ दोनों ही होते हैं। अणु शक्ति से अधिक काम होने के फलस्वरूप सभी देशों में लाखों करोड़ों मजदूर बेकार हो गये, सब काम मशीनें अपने आप करने लगीं। ऊपर की देख-रेख के लिए केवल दो-चार आदमियों की जरूरत पड़ती थी। इसलिए पहले जिन कारखानों में दस-दस हजार आदमी करते थे, अब उसमें दो-चार सौ की जरूरत रह गई। भूखे मजदूर रोटी के लिए शोर मचाने लगे और उनका पालन करते-करते सरकारों का दिवाला निकलने लगा। जो बात संसार के कल्याण के लिए निकाली गयी थी, जिसका जन्म पृथ्वी को स्वर्ग बना देने के लिये हुआ था, आरम्भ में किसी नियन्त्रण के न होने से उसने दुनिया में प्रलय का दृश्य उपस्थित कर दिया।
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पर यह बेकारी की दशा ज्यादा दिन न रही। क्योंकि जिस प्रकार अणु शक्ति ने मनुष्य की कार्य शक्ति को सैकड़ों गुना बढ़ा दिया था, उसी प्रकार नाश करने की शक्ति भी अत्यधिक हो गई थी। प्रत्येक अस्त्र इस शक्ति के संयोग से सर्वनाशी बन गया। इधर इस नई शक्ति का अभिमान और उधर लाखों बेकार मनुष्यों को किसी काम में लगाने की चिन्ता, बस सब देशों ने पारस्परिक शत्रुता की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर युद्ध का डंका बजा दिया।
युद्ध आरम्भ हुआ, पर वह भी पहले जमाने से भिन्न था। कहीं भी स्थल और जल सेना की हलचल दिखाई नहीं पड़ती थी। उनको तैयारी का हुक्म अवश्य मिल गया था, पर वे सब ऐसे गुप्त स्थानों में छुपी बैठी थीं, या ऐसी गुप्त रीति से भेजी जा रही थीं कि बाहर वालों की क्या बात देश वालों को भी उनका पता नहीं चलता था। जो फौजें हमले के लिए इधर-उधर भेजी गई थीं वे गुप्त रूप से अन्धकार में ही अग्रसर होती थीं। जगह-जगह हवाई मोर्चे लगाये गये थे। जिससे दुश्मन के वायुयानों को अपने देश से दूर ही रोका जा सके।
अब जरा लड़ाई के हैड-क्वार्टर में चलकर विज्ञान का कौशल देखिये। फ्राँस और जर्मनी की सीमा के पास गुप्त स्थान में बने एक बड़े हाल में मित्रराष्ट्रों के सेनापति बैठे हैं। उनके बीच में रखे एक बहुत बड़े टेबल पर युद्ध क्षेत्र का नक्शा फैला हुआ है। दीवारों पर भी बड़े-बड़े नक्शे लटक रहे हैं। जिनमें छोटे-छोटे मुकामों को भी साफ-साफ दिखलाया गया है। टेबल पर फैले नक्शे पर भिन्न-भिन्न फौजों और तोपखानों के चिन्ह स्वरूप लकड़ी के मुहरे रखे हुए हैं। प्रतिक्षण सेना के आगे पीछे हटने के जो समाचार बेतार के तार से आते हैं उनके अनुसार मुहरों का भी स्थान बदल दिया जाता है। इस प्रकार समस्त युद्ध क्षेत्र की वास्तविक स्थिति सदा सेनापतियों के सामने रहती है और वे उस पर गौर करके नई-नई चालें सोचते रहते है।
सेनापति गण बैठे हुए युद्ध क्षेत्र की चालों के बारे में वादविवाद कर रहे थे। इतने में आसमान में बहुत ऊपर एक काली चीजें उड़ती दिखाई दीं। वास्तव में वह दुश्मन का एक बिना चालक का रेडियो शक्ति से उड़ने वाला जहाज था। हेड क्वार्टर के बाहर खड़े लोग उसको भली प्रकार देख भी नहीं पाये थे कि वह ठीक सर पर आ पहुँचा और एकाएक जमीन पर गिर पड़ा। जमीन से कुछ सौ फीट के ऊपर ही वह बड़े भयंकर शब्द के साथ जलने लगा और एक आग के विशाल गोले के रूप में पृथ्वी पर गिरा।
यह गोला कैसा था? यह भी अणुशक्ति की करामात का एक नमूना था। इसमें ‘यूरेनियम’ तथा ‘हाइड्रोजन’ आदि रासायनिक पदार्थ भरे थे जिनसे बढ़कर नाशकारी पदार्थ अभी तक संसार में देखा नहीं गया था। पहले के युद्धों में जो गोले काम आते थे वे दो चार मिनट में ही अपनी नाशलीला समाप्त कर देते थे, जो कुछ हानि होती थी उसी समय हो जाती थी। पर यह ‘यूरेनियम’ अपना कार्य बहुत समय तक जारी रखता था। वह जहाँ गिरता था वहाँ तो दस-बीस मील तक आग ही आग जला देता था, और उसके बाद भी उसका धुँआ और राख जहाँ-जहाँ गिरती जाती थी वहाँ भी नाश के नये केन्द्र बनते जाते थे। जो भी मनुष्य या अन्य प्राणी उसके पास होते वे शीघ्र ही मृत्यु के ग्रास बन जाते।
हाँ तो उस गोले का क्या हुआ। ज्यों ही वह पृथ्वी पर पड़ा एक साथ नीचे चला गया। दूसरे ही क्षण में जब उसकी शक्ति का प्रवाह ऊपर की तरफ हुआ तो ज्वालामुखी का दृश्य देखने में आया। न कहीं उस बड़े हाल का पता था और न उसमें बैठे सेनापतियों का जो पाँच मिनट पहले ही गद्देदार कुर्सियों पर बैठे-बैठे संसार के भाग्य का फैसला कर रहे थे। एटम बम के जोर से कई मील तक की जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े उड़कर आसमान को जा रहे थे। और दसों दिशाओं में सिवाय आग के और कोई चीज दिखलाई नहीं पड़ती थी।
अपने हेडक्वार्टर के नाश की सूचना जब मित्र राष्ट्रों की हवाई छावनी में पहुँची तो वहाँ सन्नाटा छा गया। तुरन्त ही वहाँ का कप्तान दुश्मन से बदला लेने को निकला। उसने भी गुप्त स्थान से तीन शक्तिशाली राकेट निकलवाये और उनके द्वारा तीन महाभयंकर बम दुश्मन की राजधानी और दो अन्य प्रधान नगरों का लक्ष्य करके छोड़ दिये। पन्द्रह मिनट से भी कम समय में वे तीनों विशाल नगर अग्नि कुण्ड के रूप में दिखाई पड़ने लगे और उनमें बने बड़े-बड़े कारखाने, महल, होटल और अन्य इमारतें राख होकर आसमान में उड़ गई।
इस प्रकार अणु युद्ध का श्रीगणेश हो गया और उसके आरम्भ करने में जो प्रारम्भिक भय या संकोच था वह जाता रहा। बस फिर हर एक राष्ट्र अपने प्रतिद्वन्दी पर अणु-अस्त्रों का प्रहार करने लगा और दस-बीस दिन के भीतर ही लंदन, न्यूयार्क, वाशिंगटन, मास्को, बर्लिन, रोम, टोकियो, देहली, कलकत्ता, कराची, लाहौर, कुस्तुनतुनियाँ, जरुशलम, काहिरा आदि संसार की सब राजधानियाँ जल रही थीं। अणु शक्ति के फल से संसार के दो सौ प्रधान नगर ज्वालामुखी भड़कने का सा दृश्य दिखला रहे थे।
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मानव जाति और सभ्यता का ऐसा नाश देख कर लोगों को होश आने लगा। अब तक फौजों और जहाजों की लड़ाई तो नाम मात्र को हुई थी। अकेले अणु बमों से ही करोड़ों मनुष्य मर चुके थे और बाद में भी वातावरण में बिखरी हुई उनकी जहरीली राख के द्वारा मर रह थे। ये बम जहाँ कहीं पड़े थे वहाँ की पृथ्वी चलने-फिरने लायक भी नहीं रही थी। बहुत बड़े-बड़े गड्ढों के सिवाय वहाँ रेडियो एक्टिव किरणें इतनी तीव्रता से निकलती थी कि उनके संसर्ग में आकर कोई मनुष्य जीवित बच नहीं सकता था। इस प्रकार संसार भर में जगह-जगह ऐसे मृत्यु-क्षेत्र बन जाने से स्थल द्वारा याद कर सकना तो असम्भव ही हो गया था। जल में हाइड्रोजन बमों का बढ़ा घातक प्रभाव पड़ा था और असंख्यों मछलियाँ तथा जल जन्तु मर कर तैरते रहते थे। समुद्र में यात्रा करने पर भी मनुष्य पर इस घातक शक्ति का प्रभाव पड़ता था। ऐसी अवस्था में केवल हवाई जहाज ही आने-जाने के साधन थे, पर उनमें भी वे ही लोग यात्रा कर सकते थे जो अब खास तरह के यंत्रों और कपड़ों द्वारा अपने को वायुमण्डल में फैली हुई अणु बमों के राख से बचने का उपाय कर सकते थे।
इस प्रकार वास्तविक युद्ध तो एक-दो महीने ही खत्म हो गया, क्योंकि सब देशों की सैनिक और राजनीतिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गयी थी। और शासनकर्ता या बड़े पदाधिकारी बचे भी थे तो जमीन के बहुत अन्दर बने हुए गुप्त स्थानों में रहकर अपनी रक्षा करते थे। डाक, तार आदि की व्यवस्था पूर्णतया नष्ट हो गयी थी केवल बेतार के यंत्र और रेडियो कुछ काम देते थे, और उन्हीं के द्वारा शासनकर्ता परस्पर में थोड़ा बहुत एक दूसरे समाचार पा सकते थे और जनता को कुछ सूचना भेज सकते थे। खाने-पीने का सब सामान और वस्त्र आदि अणु बमों के जहरीले असर से इतने खराब हो गये कि इन बड़े लोगों को भी जीवन निर्वाह में कठिनाई होती थी। उन्होंने सुरक्षित भूगर्भ स्थित गृहों में जो सामान रख दिया था या काम दे रहा था, पर उसमें भी सब तरह की सामान नहीं मिल सकता था। साधारण जनता तो, जो कुछ मिल सकता था उसी से काम चलाती थी और फलस्वरूप अनगिनत आदमी बिना किसी प्रकार के युद्ध के ही मरते रहते थे।
पर अब रक्षा का उपाय क्या था? संसार में शाँति प्रेमी इसकी चेष्टा बहुत समय से कर रहे थे, पर भिन्न-भिन्न देशों के शासकों के दुराग्रह और अहंकार के कारण उनको सफलता नहीं मिलती थी। अब सब शासक अपनी हीनता समझ गये। तब उनका ध्यान इन शान्ति-प्रचारकों की बातों की तरफ गया और बहुत कुछ प्रयत्न करने के बाद तिब्बत में एक ‘विश्व-शाँति-परिषद’ का आयोजन किया गया। इस समय बहुत से देशों के शासक तो पूर्णतया नष्ट हो गये थे और वहाँ जो कुछ व्यवस्था शेष थी वह वायुयान अधिकारियों के हाथ में थी। इसलिये इस कान्फ्रैन्स में विभिन्न राष्ट्रों के प्रेसीडेन्टों और प्रधानमन्त्रियों के बजाय वायुयान-विभागों के संचालक और इंजीनियरिंग विभागों के अध्यक्ष आदि ही शामिल हुये। ये लोग संसार की स्थिति से भी प्रकार परिचित थे और उन्होंने समझ लिया था कि अगर मानव सभ्यता का अस्तित्व कायम रखना है तो संसार में से विभिन्न शासनों का अन्त करना आवश्यकीय है। किसी भी देश को अलग सेना रखने की आवश्यकता नहीं और न आवागमन, लेन−देन, व्यापार में किसी तरह की रोक लगाना उचित है। प्रत्येक देश वाले अपना भीतरी प्रबन्ध स्वयं करते रहें, पर विदेशी और सैनिक मामलों में संसार भर की व्यवस्था एक ही केन्द्र से होनी चाहिए।
इस प्रकार एक संसार-व्यापी जनसभा का निर्माण आरम्भ हुआ। अब संसार की जनसंख्या चौथाई से भी कम रह गयी थी और लोगों को नित्य प्रति संसार की राजनैतिक हलचलों से परिचित कराने का कोई साधन न था। तो भी नवीन शासन ने प्रत्येक समझदार और कार्यक्षम व्यक्ति को मत देने का अधिकार दिया और सबके साथ समानता तथा न्याय का व्यवहार किये जाने का वचन दिया गया। गोरी, काली और पीली जातियों की कलह का अन्त हो गया। इसी प्रकार ईसाई, मुसलमान, हिन्दू, बौद्ध, यहूदी आदि मजहबों का निरर्थक भेदभाव भी समाप्त हो गया। एक दूसरे को हानि पहुँचाने के बजाय एक दूसरे की सेवा और परोपकार को ही सबसे बड़ा धर्म माना गया और इसके अनुसार चलने से कुछ समय बाद पृथ्वी पर सच्ची शाँति और प्रेम का साम्राज्य स्थापित हो गया।
(पं. हरदेव शर्मा त्रिवेदी-ज्योतिषाचार्य)
ज्यों-ज्यों संसार आध्यात्मिक शक्तियों की अवहेलना करते हुए भौतिक साधनों की ओर आगे बढ़कर उन्हें अपनाने की प्राणपण से चेष्टा करता जाता है, त्यों-त्यों प्रकृति भी इससे असहयोग करती जा रही है। प्राचीन समय में प्राकृतिक यज्ञों के प्रभाव से सर्वत्र शस्य श्यामलता रहती थी गहरे हरे वन थे, सर्वत्र शाँति का साम्राज्य था, हव्य-कव्य से दिशाएं धूसरित रहती थीं। तब उचित अवसर पर वर्षा होती थी और धन-धान्य की वृद्धि से लोग सन्तुष्ट रहते थे। मध्य-काल से ज्यों-ज्यों इस आश्रम परक अरण्य-संस्कृति का एवं यज्ञों का ह्रास होने लगा त्यों-त्यों धनधान्य की शून्यता होने लगी। तब से हमने कहीं अधिक भौतिक प्रगति कर ली है, तो भी देश में जीवनोपयोगी पदार्थों का अभाव होता जाता है। हम भौतिक साधनों को जुटाने में इतने तल्लीन हो गये हैं कि दूसरी बात कुछ सोच ही नहीं सकते। दूसरी ओर प्रकृति हमसे असहयोग कर बैठी है। अकालवृष्टि, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, युद्ध, रोग, महामारी से जनता का संहार क्यों हो रहा है? इस का ठीक-ठीक उत्तर, अथवा संसार के इस राजरोग का निदान जानने के लिए हमको भारत के तत्वदर्शी महर्षियों के उपदेशों पर ध्यान देना चाहिए। इन सब का मूल कारण भगवान आत्रेय ने ‘चरक संहिता’ के ‘जनपदो ध्वंसीय विमान’ शीर्षक विभाग में अधर्म बतलाया है। उन्होंने लिखा है कि ऐसे रोगों और उत्पातों का मूल कारण चार वस्तुएँ है- वायु, जल, देश और काल। ये जब बिगड़ खड़े होते हैं तो बड़े-बड़े उत्पात होने लगते हैं। ये क्यों बिगड़ उठते हैं इसके सम्बन्ध में भगवान आत्रेय अपने शिष्य अग्निवेश से कहते हैं-
‘हे अग्निवेश, ऊपर बताये हुए वायु आदि में जो विकार उत्पन्न होते हैं, गड़बड़ मचती है उसका मूल कारण अधर्म है और उस अधर्म का कारण अपने पहले किये हुए कर्म हैं। इन दोनों का मूल कारण है प्रज्ञापराध अर्थात् बुद्धि का बिगड़ जाना।’ साराँश यह कि जब कुशिक्षा से बुद्धि बिगड़ जाती है तब मनुष्य अधर्म पर उतर पड़ते हैं और अधर्म बढ़ने से ये उत्पात होते हैं। इसका विशेष विवरण यह है कि जनता अधिकाँश में प्रधान पुरुषों का अनुसरण करती है, अतः ऐसे लोग जो देश, नगर, हाट-बाजार और देहात के प्रधान होते हैं, जब धर्म का उल्लंघन करके प्रजा को अधर्म में प्रवृत्त करने लगते हैं, तब उनके सहारे चलने वाले सभी छोटे-बड़े कर्मचारी, इतना ही नहीं शहरी और देहाती लोग और व्यापार धन्धे वाले सभी उस अधर्म को बढ़ाने लगते हैं। तब वह अधर्म इतना बढ़ जाता है कि बलात् धर्म को दबा देता है। जब धर्म लुप्त हो जाता है तो उन लोगों को देवता भी छोड़ देते हैं। इस प्रकार जिनका धर्म लुप्त हो जाता है, जिनमें अधर्म प्रधान हो जाता है, और देवता जिनकी सहायता नहीं करते, उनके यहाँ ऋतुएं बिगड़ उठती हैं। परिणाम यह होता है कि वर्षा समयानुसार नहीं होती, वायु अच्छी तरह नहीं चलती, पानी सूख जाता है और औषधियाँ अपना स्वभाव छोड़कर विकारी हो जाती हैं। तब एक दूसरे के संसर्ग से, खान-पान के दोष से देश उजड़ते हैं,” इतना ही नहीं वे आगे कहते हैं।
“शस्त्रों के द्वारा देश उजड़ने (युद्ध -महायुद्ध) का कारण भी अधर्म ही है। जिन लोगों में रोष, मोह और अभिमान बहुत बढ़ जाते हैं, वे दुर्बलों का अपमान करके अपने पराये सबको मारने को शस्त्र चलाते हैं, दूसरों पर चढ़ाई करते हैं। तब वे राक्षसों आदि द्वारा या किसी अन्य प्रकार से नष्ट हो जाते हैं। इसलिये यह निस्सन्देह कहा जा सकता है कि “प्रागपि चाधर्माट्टते नाशुभोत्पत्तिरमूत” और पुराने समय में भी बिना अधर्म के कभी अशुभ उत्पत्ति नहीं हुई।”
इसके बाद महर्षि ने बुद्धि के बिगड़ने के कारण बतला इस परिस्थिति के सुधारने का उपाय भी बतलाया है, क्योंकि एक चिकित्सक की हैसियत उन सभी प्रकार के रोगों का इलाज बतलाना आवश्यक था। महर्षि चरक ने राष्ट्र के उद्धार के ये उपाय बतलाये हैं-
सत्यं, भूतेदया, दानं, बलयो, देवतार्चनम्। सद्वृत्तरयानुवृत्तिश्च प्रशमो गुप्तिरात्मनः॥ हितं जनपदानाँच शिवानामुपसेवनम्। सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम्॥ संकथा धर्मशास्त्राणाँ महर्पोणाँ जितात्मनाम्। धार्मिकैः सात्विकैर्नित्यं सहास्या वृद्धसंमतैः॥ इत्येतद् भेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम्। येषामनियते मृत्युस्तस्मिन् काले सुदारुणे॥
अर्थात्- (1) सत्य, (2) प्राणियों पर दया, (3) दान, (4) देवताओं के लिए भेंट और उनका पूजन, (5) सदाचार की प्रवृत्ति, (6) शाँति, (7) आत्म रक्षा, (8) देशवासियों का भला, (9) उत्तम आचरण विचार तथा पदार्थों का सेवन, (10) ब्रह्मचर्य एवं ब्रह्मचारियों का सेवन, (11) धर्मशास्त्रों तथा मन को विजय करने वाले महर्षियों की कथा, (12) वृद्धों को सम्मानित सात्विक धर्मात्माओं के साथ सदा के साथ सदा बैठना-उठना ये सब बातें ऐसे दारुण समय में (जीवन) की रक्षा करने वाली होती है।
यह सत्य है कि उपरोक्त नियम सात्विक प्रवृत्ति के लोगों के ही अनुकूल हैं। प्रातःकाल के समय बुद्धि वाले तो अधर्म को धर्म मानते हैं और हानिकारक कार्यों से अपना हित समझते हैं। आजकल सर्वत्र प्राकृतिक यज्ञों का संहार हो रहा है। अधिकाँश वन जंगल नष्ट हो चुके हैं। पशु-पक्षियों का भी संहार हो रहा है। युद्ध रोगादि द्वारा जन संहार के छोटे-छोटे दौर तो आरम्भ हो गये हैं। संसार अनार्यता की मोह मदिरा में उन्मत्त होकर राजरोग ग्रस्त हो चला है। उन्माद, श्वाँस आदि के रोगियों को जैसे पहले छोटे-छोटे दौर आते हैं, कभी महीने, दो महीने, कभी 6 महीने व वर्ष बाद भी आते हैं, पर रोग-वृद्धि की दशा में पहले दौर से आगे के दौर अधिक भयानक होते हैं। इसी प्रकार विश्व विनाशक तृतीय महायुद्ध के छोटे दौरे कोरिया और मिश्र में आ चुके हैं। अब आगे का दौर इससे भी भयानक होगा इसमें संदेह नहीं। यदि इस राजरोग को भारतीय चिकित्सा पद्धति से उचित चिकित्सा करके न रोका गया तो विश्व विनाश के मुख में जाने को प्रस्तुत है ही। रूस और अमरीका के पास संसार के राजरोग की औषधि नहीं है। वह केवल भारत के पास है और वह यह है पंचशील का पालन और ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की उदार भावना से प्राकृतिक यज्ञों का प्रचलन।
आत्म साक्षात्कारी महापुरुषों के अनुभूतिपूर्ण ओजस्वी शब्दों में यज्ञ ही एक ऐसा उपाय है जिससे संसार की रक्षा हो सकती है। छोटा यज्ञ छोटी रक्षा और बड़ा यज्ञ बड़ी रक्षा करने में समर्थ होगा। व्यक्तिगत हित का यज्ञ छोटा और समष्टि के हित का यज्ञ बड़ा माना जाता है। समष्टि का सुधार प्राकृतिक यज्ञ से ही सम्भव है। साधारणतः व्यावहारिक अग्नि में लकड़ी, घी आदि पदार्थों को कुछ अक्षरात्मक मंत्र पढ़ आहुति देना यज्ञ समझा जाता है। पर एक यज्ञ और भी है। ज्ञानवान पुरुष जिस वस्तु को जिस स्थान पर हितकर समझते हैं उस वस्तु को वही पहुँचाना यज्ञ है। अन्न और वस्त्र यह प्रत्येक मनुष्य को अत्यधिक आवश्यक माना जाता है। उस अन्न और वस्त्र की सारे मनुष्य समाज के लिए उचित व्यवस्था एक महान प्राकृतिक यज्ञ है। जिस पदार्थ के बिना कोई जो पदार्थ जीवित न रह सके उस पदार्थ को उसके पास पहुँचाना ही यज्ञ है। हम भौतिकवादी युग में संसार के बड़े राष्ट्र छोटे राष्ट्रों को और बड़े व्यक्ति छोटे निर्बल प्राणियों को खा जाने की फिक्र में रहते हैं, यही इस संसार को अशाँति का मुख्य कारण है। इस अवस्था में आदर्श भारतीय आर्य-साम्यवाद और प्राकृतिक यज्ञों के द्वारा ही विश्व शाँति सम्भव है।
पर इस बात की आशा कम ही दिखाई पड़ती है कि बड़े राष्ट्र और बड़े व्यक्ति स्वार्थ भावना को त्याग कर शीघ्र ही न्याय-भावना को स्थान देंगे। इसके परिणामस्वरूप संसार के सभी देशों के निवासियों को कम या अधिक परिमाण में संकट सहन करने पड़ेंगे। ग्रहों के प्रभाव के अनुसार इसी वर्ष (2014 वि.) पौष से फाल्गुन तक वृश्चिक राशि में शनि-मंगल का योग रहेगा। इस अवधि में अनेक अवाँछनीय और अकल्पित घटनायें घटेंगी। कहीं सशस्त्र क्रान्ति और रक्षा-पंक्ति पर सैनिक आक्रमण होगा। अधिभौतिक और आधिदैविक उत्पात भी अधिक होंगे। चोर डाकुओं के उपद्रव और हत्याकाण्ड होंगे। पश्चिमी एशिया में तीसरे महायुद्ध की ज्वाला भड़कती दिखायी देगी। पर यहाँ पंच-ग्रही पर बृहस्पति की मित्र दृष्टि है तथा अन्य ग्रह भी ऐसे हैं कि शान्तिप्रिय उदार राष्ट्रों के सहयोग तथा भारत के अथक प्रयत्न से विश्व विनाश के मुख में जाने से बच जायगा। तृतीय विश्व युद्ध का भयानक योग सं. 2018 (सन् 1962) में आने वाला है। उस समय माघ कृष्ण अमावस्या रविवार को मकर राशि में आठ ग्रह एकत्र होने से विनाशकारी कालकूट योग बनेगा। यही समय सबसे अधिक चिंताकारक होगा, जिसके सम्बन्ध में विस्तृत रूप से फिर कभी आगे चलकर विवेचना की जायेगी।
(प्रो. अवधूत, गूढ़ यंत्र विद्या विशारद, गोरे गाँव-बम्बई)
ज्योतिष को आप मानो चाहे न मानो पर उसका प्रभाव जरूर पड़ता है और आज समस्त संसार उसका अनुभव कर रहा है। आगामी कुछ वर्षों में होने वाली अनेक चमत्कारी और चौंकाने वाली घटनायें यहाँ दी जाती हैं।
आने वाले वर्षों में बृहस्पति, राहु और शनि तीनों ग्रह एक दूसरे से बारहवें होंगे। ये तीनों ग्रह पृथ्वी और ग्रहों की कक्षा के बहिर्वर्तुल में होने से ज्यादा प्रभाव डालते हैं। इससे अनुमान होता है कि आगामी वर्षों में अणु-अस्त्रों पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकेगा और इस प्रश्न पर विवाद बढ़कर विशाल रूप में विनाशक यंत्रों की खोज जारी रहेगी, मिश्र में फिर से अशाँति होगी और स्वेज की नहर में फिर से खतरा उत्पन्न हो जायेगा।
देश में अन्न की परिस्थिति विषम होगी और सरकारी नीति के कारण वह और भी असंतोषजनक होती जायेगी जिसके फलस्वरूप अनेक जगह लोग उपद्रव करने लगेंगे। वे गल्ला संग्रह करने वालों को मार-पीट कर अन्न को लूट कर खायेंगे। बहुत से इस परिस्थिति से बचने के लिए वेश परिवर्तन कर डालेंगे। विश्व विग्रह को रोकने के लिए अनेक प्रयत्न होने पर भी वह सन् 1962 तक फट पड़ेगा। उसमें भयंकर जन-संहार तथा सम्पत्ति नाश होने से समस्त राष्ट्रों पर उसका प्रभाव पड़ेगा।
कितने ही क्षेत्रों में सनसनी उत्पन्न करने वाली घटनायें होंगी। भौतिक विज्ञान के अनेक चमत्कारी आविष्कार-जैसे विश्व-किरण, प्रकाश की लहरें सूर्य के तल पर होने वाले परिवर्तन, रेडियो की लहरों में निष्क्रियता, अन्य ग्रहों की खोज आदि के फल से कायापलट होने लगेगी।
जब शनि धीरे-धीरे धनु में से मकर राशि में संक्रमण करेगा तो काँग्रेस के चुनाव में भी असर पड़ेगा और विनोबा भावे के अनुयायी आगामी चुनाव में विशेष रूप से सफलता प्राप्त करेंगे तथा देश की परिस्थिति में क्राँतिकारी परिवर्तन दिखलाई पड़ेंगे।
सन् 1958-59 में भारत भूमि में से अनेकों खनिज पदार्थों की खानें खोज कर निकाली जायेंगी जिनसे तेल, पेट्रोल, ताँबा, लोहा, कोयला, यूरेनियम आदि अनेक प्रकार के पदार्थ प्राप्त होने लगेंगे। जब सूर्य विषु-वृत्त पर आकर मेष और तुला राशि में प्रवेश करेगा तो एशिया के आग्नेय कोण के देशों पर बहुत असर पड़ेगा। इन वर्षों में भूकम्प, ज्वालामुखी का फूटना, पृथ्वी का फटना, नदियों के प्रवाह में परिवर्तन आदि अनेक प्राकृतिक उपद्रवों का बहुत अधिक भय है और उनका असर अनेक प्रकार की जनता पर बहुत हानिकारक होगा। 22 अक्टूबर 1958 को वृश्चिक राशि में बृहस्पति तथा बुध युति होने से दुनिया के अनेक भागों में -एक-एक कर आस्ट्रेलिया, न्यूगिनी आदि में भूकम्प की संभावना है।
जब नेपच्यून तुला राशि में से वृश्चिक राशि में प्रवेश करेगा तो अक्टूबर से दिसम्बर 1958 तक कच्छ, गुजरात, सौराष्ट्र, पूर्व बंगाल, कश्मीर और नेपाल में भूकम्प के धक्के लगेंगे। जनवरी 59 से मई 1959 तक अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं का बहुत अधिक उथल-पुथल होगी जिसके फल से उस समय के नेता इस्तीफा देंगे, कहीं के मर जायेंगे और कहीं उपद्रव फैल जायेंगे।
सन् 1958 के ग्रहण के फल से विषाक्त-रक्त की बीमारी का जोर बढ़ेगा और छूत के रोगों में भी वृद्धि हो सकती है। इन रोगों पर दवाएं बिल्कुल निष्फल जायेंगी, किसी प्रकार की दवा का असर मनुष्यों पर नहीं हो सकेगा। उस दशा में वायु को शुद्ध करने वाले यज्ञ यागादि का प्रचार बढ़ेगा और विश्व शाँति के लिये बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन किया जायगा। यज्ञों के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ेगी।
यह विवरण हमने ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों के आधार पर लिखा है। वैसे विश्व के कर्ता-धर्ता परमेश्वर की लीला का कोई पार नहीं पा सकता, इसलिये जो कुछ होना है उसकी मरजी से ही होगा। जब कोई कष्ट का समय आवे तो ईश्वर का स्मरण करना ही एकमात्र मार्ग है।
(श्री राज ज्योतिषी अभयानंद काश्यप)
राहु और केतु के बीच में और सब ग्रहों के आ जाने से काल-सर्पयोग बनता है। वह दो प्रकार का होता है, एक पूर्ण बलवान और दूसरा अपूर्ण। ता. 17 दिसम्बर 57 से 14 मई 58 तक वह योग होने वाला है, पर किसी पाप-ग्रह का अंशात्मक सम्बन्ध न होने से पूर्ण जोरदार नहीं है।
इस योग का असर भारत और पाकिस्तान की कुण्डली पर विशेष रूप से दिखाई पड़ता है। इसके फल से सन् 1957 के अन्तिम भाग से सन् 1958 के आरम्भ तक इन दोनों देशों में कितने ही परिवर्तन होंगे। पाकिस्तान पर इसका प्रभाव कितने ही मूलभूत परिवर्तनों के कारण विशेष रूप से अनुभव किया जायेगा। पाकिस्तान के चुनाव परिणाम आश्चर्यजनक सिद्ध होने पर इस्कन्दर मिर्जा या वैसे ही किसी अन्य व्यक्ति के हाथ में शासन की बागडोर पूरी तरह सुपुर्द कर दी जायगी। इस प्रकार की निरंकुश सभा के फल से देश में अन्धेरगर्दी फैल जायगी। और कुछ प्रमुख राजनैतिक व्यक्तियों को खून, कैद या देश निकाले द्वारा हटना पड़ेगा। पर काल-सर्पयोग अपूर्ण होने से पाकिस्तान की दशा बहुत अधिक नहीं बिगड़ेगी। देश का झुकाव मर्यादित प्रजातंत्र की तरफ ही रहेगा। इस योग के साथ पूर्वी पाकिस्तान के अस्तित्व का सम्बन्ध विशेष महत्व का होगा और वहाँ का आन्दोलन उग्र रूप धारण करेगा, जिसका प्रभाव पश्चिमी पाकिस्तान पर भी पड़ेगा। पूर्वी पाकिस्तान के प्राँतीय स्वराज का असर भारत के कुछ प्राँतों और खासकर आसाम पर भी पड़ेगा। इस सम्बन्ध में भारतीय नेताओं को सावधान रहना चाहिए।
भारत में खेती-बाड़ी के कार्यक्रम के प्रति दुर्लक्ष होने से गेहूँ की खेती को नुकसान होगा। इसके फल से अनाज की तंगी होगी और अशाँति उत्पन्न होगी।
सन् 1958 की 24 सितम्बर को गुरु और नेपच्यून की युति होने वाली है। यह युति जब-जब हुई है तब-तब कितने ही देशों की सीमाओं में परिवर्तन हो जाता है। पिछले समय में इस युति के कितने ही युद्ध और महायुद्ध हुए हैं। इसके प्रभाव से युद्ध का बीज बो दिया जाता है, पर उस का फल कुछ समय बाद प्रकट होता है। वर्तमान समय में भी इसके फल से तीसरे विश्वयुद्ध का बीज बो दिया जायगा, पर उसके प्रत्यक्ष होने में कुछ अधिक समय लगेगा। सूर्य के दक्षिण गोत्र -प्रवेश की कुँडली में यह युति सातवें स्थान पर होने से, भविष्य में होने वाले छोटे-बड़े युद्धों में भारत की तटस्थता का कायम रहना कठिन होगा और इसके फल से भारत को किसी राजनैतिक गुटबन्दी में शामिल होना पड़ेगा। सरकार का झुकाव पूर्वीय (रूसी) गुटबंदी की तरफ होने से जनता का एक भाग उसका विरोध करेगा और पश्चिमी देशों की नीति का समर्थन करेगा। लोक-सत्ता की ग्रीष्म की बैठक में इस विरोध का स्पष्ट रूप दिखलाई पड़ेगा।
भारत में समाजवाद की स्थापना तो अवश्य होने वाली है, पर यह समाजवाद किस तरह का होगा इसकी रूपरेखा आगामी दो-तीन वर्ष तक नहीं जान पड़ेगी। तो भी हम कह सकते हैं कि यह समाजवाद रूस और अमरीका के बीच के रास्ते का, गाँधीवादी और मार्क्सवाद का अपूर्व मिश्रण होगा और इससे हमारा देश एक नये ही रास्ते पर चलना आरम्भ करेगा।
भारत में प्राकृतिक उत्पात
पुराने अनुभव से हम जानते हैं कि भारत के उत्तर पूर्व भाग में और अंशतः उत्तर के कुछ भूमि खण्डों पर तुला राशि का आधिपत्य है। इसमें संक्षेपतः बिहार का कुछ भाग, आसाम, पश्चिमी और पूर्वी बंगाल, काश्मीर, नेपाल, तिब्बत, चीन और बर्मा का कुछ भाग और इंडोनेशिया वगैरह का समावेश होता है।
पिछले कुछ वर्षों से नेपच्यून ग्रह शुभाशुभ योग उत्पन्न करता हुआ तुला राशि में भ्रमण कर रहा है। परन्तु अब वह खूब बलवान होकर धीमे-धीमे वृश्चिक राशि में प्रवेश करेगा। सन् 1958 के अन्त तक यह तुला और वृश्चिक राशि की संधि पर होगा। और परिणाम स्वरूप ऊपर लिखे देशों पर उसका बहुत जोरदार प्रभाव पड़ेगा। वृश्चिक राशि का आधिपत्य कच्छ, सौराष्ट्र के कुछ भाग, कराची के आस-पास का प्रवेश और गुजरात के कुछ भागों पर है। प्राकृतिक दृष्टि से विचार करते समय प्रदेशों के राजनीतिक विभागों को ध्यान में नहीं रखा जा सकता, इस तरह की घटनाओं में भौगोलिक दृष्टि से ही विभिन्न भूमि-खण्डों पर विचार किया जाता है।
हमारे कहने का तात्पर्य यही है कि जिन भूमि खण्डों में पिछले कुछ वर्षों में भूचाल आये हैं- जैसे आसाम, पूर्वी पाकिस्तान, कच्छ और नेपाल आदि के कुछ भाग- इन सब में फिर से वैसी ही घटना होने का भय है। इनमें से पश्चिमी प्रदेशों में इन घटनाओं का रूप हलका रहेगा, पर पूर्व दिशा में उग्र रूप होने की संभावना है। इसलिये इन प्रदेशों में विकास तथा निर्माण के बड़े-बड़े कार्य इस समय स्थगित रखे जायें तो इससे बहुत सी सम्पत्ति और श्रम का बचाव हो सकेगा।
आगामी चार वर्षों में आसाम और पूर्वी पाकिस्तान के मध्य भागों की नदियों का प्रवाह कुछ बदल जायगा, जिससे खेती की जमीन और फसलों के स्वरूप में कुछ अन्तर पड़ेगा। इतना ही नहीं नदियों के किनारे पर बसे कितने ही गाँवों और नगरों पर भी इसका असर पड़ेगा। इसलिये विकास के नये कार्यों को नदियों के किनारे से दूर रखना ही समझदारी की बात है। बंगाल और आसाम में कितनी ही जगह ऐसा मालूम पड़ेगा कि नदी का तल ऊंचा होकर नये टापू बन गये हैं और अब उनमें जहाज नहीं चलाये जा सकते। इन परिवर्तनों में कुछ जल्दी और कुछ धीरे-धीरे होंगे, पर उनका होना निश्चित है।
कुछ प्राचीन भविष्यवाणियाँ
अब से कुछ सौ वर्ष पूर्व (पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के लगभग) फ्राँस में ‘नोस्टरडम’ नामक एक ज्योतिष शास्त्र ज्ञाता हुआ है, उसने संसार के भविष्य के विषय में एक बहुत बड़ा ग्रंथ लिखा है। यह ग्रंथ कविता में है, इसलिये अनेक लोग इसकी व्याख्या तरह-तरह के करते हैं। तो भी उसमें स्वेज को खोदा जाना, वैज्ञानिक आविष्कारों की वृद्धि, विश्वव्यापी संग्राम आदि का वर्णन यही अच्छी तरह किया है। यह अपने ग्रंथ में लिख गया है कि “तीसरा महायुद्ध वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं में से फट पड़ेगा। यह युद्ध मुख्य रूप से गरुड़ और रीछ के मध्य में होगा। इस युद्ध में कोई जीत नहीं सकेगा, वरन् दोनों की शक्ति का नाश कर देंगे। इस युद्ध के बाद दोनों में से एक को भी महान शक्तियों में नहीं गिना जायगा।” (अमरीका का राष्ट्रीय चिन्ह ‘ईगल’ अथवा गरुड़ है और रूस को राजनीतिक क्षेत्र में ‘रशियन बीयर’ (रूसी भालू) कहा जाता है।)
अभी हाल में जर्मनी के एक ज्योतिषी प्रो. ट्रोइन्सकी ने ज्योतिष के सम्बन्ध में बहुत सी खोज करके संसार के राजनीतिक भविष्य पर प्रकाश डाला है। उन्होंने सन् 1953 में निम्नलिखित भविष्यवाणी की थी-
“वास्तव में आज हम भयंकर समय में होकर गुजर रहे हैं। राजनैतिक संघर्ष सन् 1955 से अधिक उम्र होते जायेंगे। सन् 1958-1959 की साल में संघर्ष भयंकर रूप धारण कर लेंगे। सन् 1961 से 1963 तक के वर्षों में इससे भी भीषण अवस्था विभिन्न देशों के बीच उत्पन्न हो जायेगी जो सन् 1965 तक जारी रहेगी। इसी वर्ष भावी घटनाओं का कोई निश्चित परिणाम दिखाई पड़ेगा।”
मिश्र का बड़ा पिरामिड संसार भर के विद्वानों की दृष्टि में बड़ा रहस्यपूर्ण अनेक गुप्त तत्वों का भण्डार माना जाता है। स्काटलैण्ड के एक विद्वान प्रोफेसर पियाजी स्मिथ ने अब से 60-70 वर्ष पूर्व उक्त पिरामिड की कई वर्षों तक खोजबीन करके दो तीन पुस्तकें लिखी थीं जिनमें से एक का नाम है ‘पिरामिड स्पीक्स’। इसमें संसार के भविष्य के सम्बन्ध में बहुत सी बातें लिखी हैं, जिनका समय अब पूरा हो चुका है। वर्तमान समय की दृष्टि से उसमें एक ही बात यह कही गयी है कि ‘सन् 1953 से नई दुनिया का निर्माण होने लग जायगा” इससे हम यह अनुमान कर सकते हैं कि सन् 1953 के बाद के दस बीस वर्ष बड़े-बड़े परिवर्तनों और संघर्ष के होंगे। क्योंकि नई दुनिया का निर्माण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि पुरानी दुनिया को तोड़ा-फोड़ा न जाय। यह तोड़ना-फोड़ना ही युद्ध, उपद्रव, संघर्ष आदि के रूप में प्रकट होगा।
संसार व्यापी इन संघर्षों का परिणाम भारतवर्ष पर भी पड़ना अनिवार्य है, विशेष कर इस कारण कि अब उसका अन्तर्राष्ट्रीय महत्व बढ़ता जाता है और उसका विरोधी पाकिस्तान भी उसको सैनिक तैयारी के लिए बाध्य करता रहता है।
हमें अपना कर्तव्य पालन करने के लिए कटिबद्ध होना होगा।
(श्रीराम शर्मा आचार्य)
आपत्तियाँ और कठिनाइयाँ एक अध्यापक की तरह आती हैं। लापरवाह और आलसी प्रमादी लड़के अध्यापक से पिटते, अपमानित होते और क्रोध सहते हैं, किन्तु परिश्रमी एवं कर्तव्य परायण विद्यार्थी उसी अध्यापक द्वारा प्रशंसित होते, प्यार प्राप्त करते, ज्ञानवान बनते, पुरस्कृत होते एवं उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। अध्यापक एक ही है पर दो प्रकृति के छात्र उससे दो प्रकार की परस्पर विरोधी अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं। विपत्ति भी ऐसा अध्यापक है जिसका कार्य कठोर है, वह कड़ी परीक्षा लेता है, यह उद्देश्य उसका अशुभ नहीं होता। वह शुभ लक्ष्य की पूर्ति के लिए ही आता है।
व्यक्तिगत जीवन में, सामाजिक जीवन में, सार्वभौम जीवन में, जब कभी विपत्तियाँ आती हैं, वह मनुष्य के व्यक्तिगत, सामाजिक, सार्वभौम अशुभ कर्मों का ही फल देती है। यह अशुभ कर्म जितनी बड़ी मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं विपत्ति भी उतनी ही बड़ी बन जाती है। ग्रह दशा तो एक अनुकूल अवसर मात्र है। वर्षा ऋतु में दाद, खाज, छाजन, फोड़े-फुन्सी, मलेरिया, दस्त, हैजा आदि रोगों की बढ़ोतरी होती है उसका कारण यह नहीं है कि वर्षा में यह रोग बरसते हैं, वरन् यह है कि शरीर के अन्दर जो विष बहुत दिनों से एकत्रित हो रहा था उसके निकलने के लिए- फूट पड़ने के लिए एक अनुकूल अवसर आ गया। जिसके शरीर में संचित विष न हो उसके लिए वर्षा ऋतु में भी बीमार होने का कोई खतरा नहीं रहता। बसंत ऋतु में बहुधा पेड़ पौधे फूलते हैं पर फूलते वे ही हैं तो खाद, पानी पाकर परिपुट हो गये हैं जो पौधे अपना स्वाभाविक विकास नहीं कर सके, खाद, पानी नहीं प्राप्त कर सके, वे बसन्त ऋतु आने पर भी फूलने से वंचित ही रह जाते हैं।
ग्रह दशाओं के सम्बन्ध में भी यह बात है, यह एक अनुकूल अवसर मात्र है। नहर में भरा हुआ पानी कहीं कुलावा लगा देने से उसमें होकर बाहर निकलने लगता और निकलेगा तभी जब नहर में पानी भरा हो। पानी न हो, नहर सूखी पड़ी हो तो कितने कुलावे लगा देने पर भी पानी खेतों में नहीं पहुँचता। एक ही राशि के अनेक व्यक्तियों पर एक ही समय एक ही ग्रह की शुभ अशुभ दशाएँ आती हैं पर सभी को समान रूप से दुख सुख नहीं मिलते। कारण यह है कि उन व्यक्तियों के शुभ अशुभ संचित कर्मों की मात्रा के अन्तर होता है। ग्रह दशा अपनी ओर से अकारण किसी को त्रास या पुरस्कार नहीं देती। यदि ऐसा हुआ होता तो ईश्वर की, ग्रह देवताओं की सदाशयता, श्रेष्ठता, समय दर्शिता एवं न्याय शीलता स्थिर नहीं रहती। तब तो इन ग्रह देवताओं को अकारण दुख देते रहने वाले राक्षस मूर्खतावश बिना पात्र कुपात्र का भेद किये सुख उलीचते फिरने वाले पागल कहा जाता। वस्तुतः ग्रह देवताओं की ऐसी हीन स्थिति नहीं है। उनके लिए सभी प्राणी समान है। सभी पर वे देवता होने के कारण दया ही करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार आगामी पाँच वर्ष घोर अनिष्ट के दिखाई पड़ रहे हैं। यह भयंकरता कितनी होगी, इसका माप यह है कि मनुष्य जाति के सामूहिक दुष्कर्म जितने अधिक होंगे उतना ही त्रास संसार को सहना पड़ेगा। यह वर्ष तो उन अशुभ कर्मों के फूट पड़ने का अनुकूल अवसर मात्र है। इस दृष्टि से हम मनुष्य जाति के वर्तमान कालीन तथा निकट भूतकाल के अशुभ कर्मों पर दृष्टि डालते हैं तो लगता है कि व्यक्तिगत जीवन की पवित्रता संयम शीलता, उदारता, क्षमा, भ्रातृभाव, सेवा एवं त्याग की सत्प्रवृत्तियों को एक कोने में उठा कर रख दिया जाता है और लोगों ने कानूनी तथा गैर कानूनी शोषण, अपहरण, अन्याय, उत्पीड़न, छल, असत्य, स्वार्थ, परिग्रह एवं दुष्टता की अति कर दी है। लोगों के व्यक्तिगत जीवन में स्वार्थ का बोलबाला है। दूसरों के लिए आत्म त्याग करने की बात कोई सोचता तक नहीं- सबकी गरदन काट कर केवल अपना ही पेट बड़ा कर लेने की धुन हर एक पर सवार हो रही है। श्रेष्ठता और सन्मार्ग की ओर नहीं वासना और तृष्णा की ओर हर एक की आँखें लगी हुई हैं।
सूक्ष्म दृष्टि से अध्यात्मिक दिव्य दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि आसुरी विचारों एवं कर्मों में आकाश को बुरी तरह तमसाद्रम कर रखा है, इन काली घटनाओं को अब भी बरसने का अवसर मिलेगा गजब ही ढा देने की परिस्थिति पैदा कर देगी। दूरदर्शी तत्व वेत्ता लोग अदृश्य के इन्हीं शुभ-अशुभ जमघटों को देखकर भले बुरे भविष्य की भविष्यवाणियाँ किया करते हैं। ग्रह दशा को उस भविष्य दर्शन के जानने में एक सहायक दूरबीन माना जा सकता है। उनकी स्थिति का गणित करके यही काम निकाला जाता है जो बढ़िया दूरबीन लगाकर क्षितिज पर बहुत दूर उड़ती हुई किसी चीज को देखा जा सकता है।
पिछले दिनों अशुभ भविष्य की आशंका चर्चा अखण्ड-ज्योति में होती रही है। इस अंक में भी उस सम्बन्ध में बहुत कुछ ऊहापोह किया गया है। हमारा निज का मत है कि मानव जाति के सामूहिक दुष्कर्म जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उसी तेजी से बढ़ते रहे, उनकी रोक थाम न हुई, तो विश्व संहार की वैसी ही दुर्घटना अगले वर्षों में हो सकती है जैसी कि इन भविष्यवाणियों में बताई गई है। साथ ही हमारा निजी अभिमत यह भी है कि यह भयंकरता अभी उस स्थिति को नहीं पहुँची है जिसे शान्त करने में मानवीय प्रयत्न सर्वथा असफल सिद्ध हों। इस महा भयंकर प्रलयंकर विपत्ति को जिसके सम्मुख आ खड़े होने पर करोड़ों मनुष्यों की प्राणि हानि तथा अपार धन सम्पदा की हानि हुए बिना न रहेगी, यदि प्रबल प्रयत्न किये जायें तो अभी भी टाला जा सकता है।
यह प्रबल प्रयत्न यह हों कि मनुष्यों के मस्तिष्क जो आज संग्रह, स्वार्थपरता, अनीति, तृष्णा एवं वासना में बुरी तरह व्यस्त हो रहे हैं, उन्हें अपरिमह त्याग, सेवा, परमार्थ, न्याय, समता, नीति, उदारता, सत्य, प्रेम एवं संयम की ओर मोड़ा जाय। जन साधारण का मनः क्षेत्र जब कुविचारों से छुटकारा पाकर सद्विचारों और सद्भावों की ओर मुड़ता है तो लोगों के जीवन में सत्कर्मों की, आदर्श एवं अनुकरणीय आचरणों की अभिवृद्धि होती है। इस प्रकार की ऐसी दिव्य सुगन्धि भर देता है जिसके फलस्वरूप दैवी आशीर्वाद एवं सुख शान्ति की सतयुगी वर्षा होने लगती है। लोग अनेक आपत्तियों एवं कष्टों से छुटकारा पाकर ईश्वर प्रदत्त सुख सौभाग्यों का अनायास ही प्रचुर सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
मानव मस्तिष्क को सामूहिक रूप से कुमार्ग पर से हटाकर सन्मार्ग पर चलाने की प्रवृत्ति पैदा करने के लिए केवल ‘उपदेश’ करना काफी नहीं है। श्रेष्ठ चरित्र के ऐसे प्रभाव शाली व्यक्तियों की, इसके लिए आवश्यकता है जिनका व्यक्तिगत चरित्र एवं कार्यक्रम एक जीता जागता प्रवचन हो, जो वाणी से ही नहीं अपने उदाहरण से जनता पर प्रभाव डालते हों। भौतिक वाद से आध्यात्मवाद की ओर जन साधारण का मस्तिष्क मोड़ कर आकाश से छाये हुए अनिष्टकारी दूषित वातावरण को हम शान्त कर सकते हैं। पर यह मोड़ कैसे आवे? कैसे आत्मत्यागी लोग जन नेतृत्व के लिए निकलें? कैसे जनता में यह प्रवृत्ति पैदा हो कि धर्म चर्चा को एक कौतुहल मात्र समझने की अपेक्षा जीवन का एक ठोस तथ्य समझे? यह एक विकट समस्या है। इसका हल बाह्य जगत में नहीं अंतर्जगत में है। ऋषि, महर्षियों का लाखों वर्षों तक परीक्षित आध्यात्म विज्ञान ही इन समस्याओं का समाधान करने में समर्थ हो सकता है। इतिहास साक्षी है कि लोक मानस में मोड़ देने के लिए ऋषियों ने समय-समय पर विशाल शक्तिशाली धर्मानुष्ठान किये हैं और उनका सुदूरवर्ती भूखंडों के मानव प्राणियों पर आश्चर्यजनक व्यापक प्रभाव हुआ है। आज उस सबकी भी भारी आवश्यकता है।
आपत्तियाँ आ रही हैं- अति निकट आ पहुँची हैं- वे एक निष्ठुर किन्तु सुयोग्य अध्यापक की तरह सामने उपस्थित हो रही हैं। यदि हम आलसी ओर उद्दंड विद्यार्थी साबित हुए अपनी दुष्प्रवृत्तियों पर ही अड़े रहे तो बुरी तरह पिटना पड़ेगा। जो भविष्य वाणियाँ, चेतावनियाँ, विज्ञ व्यक्ति दे चुके हैं, दे रहे हैं, वे अक्षरशः सत्य होकर रहेगी। परन्तु उस ग्रह दशा रूपी विद्वान अध्यापक से लाभ उठाया गया, उसके शासन का सम्मान करके अपनी मनोदशा मोड़ ली, सत्प्रवृत्तियों की ओर चल पड़े तो न केवल इस भयंकर विपत्ति की घड़ी को टाला जा सकेगा। वरन् एक नये स्वर्ग युग का सूत्रपात भी हो जायेगा। समय की कठोर चेतावनी सामने उपस्थित है, यदि हम उसे सुन समझ सकें तो अपने आपको मोड़ लेंगे, बदल लेंगे और इस भयंकर भविष्य की दुर्घटना से अपने को ही नहीं असंख्यों अन्य निरीह प्राणियों की भी रक्षा कर सकेंगे। यदि उपेक्षा और आलस्य ही हमारे अवलम्बन रहे, वासना और तृष्णा से विरत न हो सके तो गूलर के फल में रहने वाले भुनगों की तरह कराल काल की दाढ़ों से शीघ्र ही चबा लिये जायेंगे। यह समस्या हमारी बुद्धिमता के लिए दूरदर्शिता के लिए एक प्रकार की चुनौती है जिसमें यह सिद्ध हो जायेगा कि हम इतने कुसमय में भी तुच्छ स्वार्थों से लिपटे रह कर अपना तथा सब का सर्वनाश होने देना पसंद करते हैं या जागरुक होकर सामूहिक सुरक्षा के लिए कटिबद्ध होते हैं।
गायत्री तपोभूमि एक जागरुक लौह सत्ता की तरह विश्व शाँति के मोर्चे पर जूझ रही है। जागरुक प्रहर की भाँति यह संस्था इस घनघोर अन्धेरे की घड़ी में मशाल जला कर आकाश में उमड़ती हुई प्रलयंकर घटाओं को दिखा रही है, उसने चेतावनी का बिगुल बजाते रहना जारी कर दिया है ताकि कुँभकर्णी निद्रा में पड़े हुए लोग करवट बदलें, अपना भला बुरा सोचें और वह करें जो बुद्धिमान लोग आपत्ति की घड़ी आने पर किया करते हैं।
शाँति के अन्य मोर्चों पर लोग अपने-अपने ढंग से काम कर रहे हैं, विज्ञान के मोर्चे पर वैज्ञानिक लोग एक ओर अणु बम, उदविजन बम, कीटाणु बम, दूरमारक राकेट आदि बनाने तथा उनसे बचाव के उपाय खोजने में रात दिन एक कर रहे हैं। औद्योगिक मोर्चे पर अर्थशास्त्री तथा धनाधीश लोग विशालकाय उद्योग धंधे लगाने पर जुटे हुए हैं। विकास मोर्चे पर सरकारी द्वितीय पंचवर्षीय योजना द्रुत गति से कार्यान्वित हो रही है। राजनीतिक मोर्चे पर विभिन्न देशों के राज्याधिकारी, अपने-अपने ढंग से विश्व विजय या विश्व शाँति की बात सोचते हुए नाना विधि षड़यंत्रों के जाल बुन रहे हैं। विभिन्न मोर्चों पर विभिन्न कार्यों की हलचल हो रही है, पर इन सब को मिलाकर भी जो मोर्चा भारी पड़ता है उस सद्भावना, मानवता, नैतिकता, सच्चरित्र, उत्कृष्टता, आदर्शवादिता एवं साधना तथा तपस्या पूर्ण धर्मानुष्ठानों के आयोजन का मोर्चा सर्वथा सूना पड़ा है। यह मोर्चा यदि इसी प्रकार सूना पड़ा रहा तो अन्य सब मोर्चों पर लगी हुई भारी जन शक्ति और सम्पदा निरर्थक सिद्ध होगी। भेद की बात है कि जिस आध्यात्मिक मोर्चे की गतिविधि पर वास्तविक सुख शाँति निर्भर है उसकी ओर सामान्य जनता की अभिरुचि नहीं, और जो तथाकथित धर्मध्वजी लोग हैं वे अपना अपना सम्प्रदाय चलाने, अखाड़ा जमाने, पैर पुजाने, चेला मूढ़ने के गोरख धन्धे में लगे हुए हैं। उन्हें इतनी फुर्सत नहीं कि इस आड़े समय में जन कल्याण के लिए कुछ त्याग करने, कष्ट सहने और जनता का धर्म नेतृत्व करने के कठिन कार्य को अपने कंधे पर लेने की तत्परता दिखावें।
इन परिस्थितियों में गायत्री परिवार के सदस्यों को बहुत कुछ करना है। इस आड़े वक्त में “कुछ कर मिटने और मर मिटने” की जिम्मेदारी उनके कन्धों पर आ रही है। निकट भविष्य में उन्हें जन मानस को बदलने के लिए नैतिकता, मानवता, कर्त्तव्य परायणता एवं सद्भावना की स्थापना के लिए एक सुव्यवस्थित योजना-साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के अंतर्गत देश व्यापी कार्य करना होगा। पर अभी तो एक तात्कालिक आवश्यकता के रूप में इन दिनों ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने में लगना है। अनुष्ठान के तीन चरण थे। प्रथम चरण अनुसार प्रतिदिन 24 लाख जप, 24 हजार हवन, 24 हजार मंत्र लेखन तथा पाठ होता था। यह चरण पूरा हो गया, दूसरे चरण में इस संख्या को पाँच गुनी करना था, जप को 24 लाख प्रतिदिन से बढ़ाकर सवा करोड़ और 24 हजार पाठ, लेखन हवन को बढ़ा कर सवा लाख प्रतिदिन करना था। यही प्रयत्न इन दिनों चल रहा है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत एवं व्यापक प्रचार की आवश्यकता है अन्तिम तीसरा चरण वह होगा जिसके अंतर्गत प्रतिदिन 24 करोड़ जप और 24 लाख हवन, पाठ, लेखन का क्रम चलेगा। प्रथम चरण की अपेक्षा सौ गुना और तृतीय चरण की अपेक्षा 20 गुना आयोजन निस्संदेह अब की अपेक्षा कहीं अधिक तत्परता एवं प्रयत्नशीलता की अपेक्षा रखेगा। इसके लिए घनघोर प्रयत्न करने वाले सहस्रों, आत्मत्यागी धर्म सैनिकों की भारी आवश्यकता पड़ेगी।
अखण्ड-ज्योति एवं गायत्री परिवार में ऐसे अनेकों व्यक्ति हैं जिनके मन मानस में धर्म भावनाएं लहरें मारती रहती हैं। जहाँ चाह होती है वहाँ राह निकलती है। समय देने वाले, श्रम देने वाले भावनाशील व्यक्ति यदि कटिबद्ध होकर धर्म प्रचार के लिए खड़े हो जाये तो प्रतिदिन 24 करोड़ जप एवं सवा लाख हवन, पाठ लेखन का संकल्प आसानी से पूरा हो सकता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि लोगों की दृष्टि में इस महान तथ्य की उपयोगिता आ जाय तो वे लोग जिनके ऊपर गृहस्थ नाम मात्र की जिम्मेदारियाँ रह गयी हैं। नाती पोतों का मोह छोड़कर इस कार्य में जुट जायें जो वानप्रस्थ, संन्यास की प्राचीन मर्यादाओं का पालने करने के साथ-साथ सच्चे अर्थों में जीवन को सफल बना सकते हैं। वे सद्गृहस्थ जो अपने दैनिक कामकाज से थोड़ा वक्त बचा सकते हैं अपने निकटवर्ती क्षेत्र में बहुत भारी काम कर सकते हैं। रामगंज मंडी के मास्टर शम्भू सिंह हाडा, बरेली के श्री चिमनलाल सूरी, आरंग के पं. विद्याशंकर मिश्र आदि रोज कमाने रोज खाने की स्थिति वाले लोगों ने गजब के काम करके दिखा दिये तो जिन लोगों के कोई सहारा भी है तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। सन्त महात्माओं, पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त लोगों के लिए तो यह समय बहानेबाजी में काटने का किसी प्रकार भी नहीं है।
“भजन करके मुक्ति प्राप्त करने” में लगे हुए ओर अनुष्ठान करके ऋद्धि-सिद्धि उपलब्ध करने के स्वार्थ पूर्ण दृष्टिकोण को थोड़े समय के लिए बदल दिया जाना चाहिए अब कुछ समय के लिए कम से कम 5 साल के लिए विश्व शाँति के लिए निस्वार्थ धर्म प्रचार ही सब धर्म प्रेमियों का लक्ष होना चाहिए। क्योंकि इन दिनों न किसी को मुक्ति संभव है और ऋद्धि-सिद्धियाँ ही। उसके लिए जो सूक्ष्म वातावरण की अनुकूलता होनी चाहिए वह इन दिनों बिलकुल भी नहीं है; इसलिए उन असफल होने वाले प्रयत्नों में समय गंवाने की अपेक्षा, वह कार्य करना चाहिए जिस पर अपनी, अपने परिवार की, आम नगर की एवं समस्त संसार की सुख शान्ति निर्भर है। 24 करोड़ जप, सवा-सवा लाख हवन, पाठ, लेखन का महा अनुष्ठान पूरा करने के लिए कम से कम एक हजार धर्म प्रचारकों की सेना चाहिए। पाँच साल तक एक हजार धर्म प्रचारक यदि विश्व शाँति के मोर्चे पर अपना आत्म-दान करते हुए कटिबद्ध होकर अड़ जायं तो अणु बमों का मुँह मोड़ सकते हैं। विध्वंसकारी घनघोर घटाओं से इन्द्र वज्र की तरह टकरा कर उन्हें पीछे हटा सकते हैं। प्राचीनकाल में इन्द्र वज्र एक दधीच ऋषि की हड्डियों से बनाया गया था। आज मोर्चा कड़ा है फिर दधीच जैसी हड्डियाँ भी नहीं हैं, आज एक हजार आत्मदानी मिलकर ही उस आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं।
इतने बड़े राष्ट्र में एक हजार धर्म प्रचारक पाँच वर्ष के लिए आत्मदानी बनकर विश्व शाँति के मोर्चे पर अड़ जाने के लिए तैयार न होंगे ऐसा विश्वास नहीं होता। इस आवश्यकता की पूर्ति अखंड ज्योति और गायत्री परिवार द्वारा हो जाय तो यह संख्या अपना सिर ऊंचा उठा सकने, सीना तान कर खड़े होने और एक अत्यन्त भयानक कुसमय को अपनी टक्कर से उलट देने में समर्थ हो सकती है। गायत्री परिवार एक हजार धर्म प्रचारकों की एक सेना खड़ी करके एक सुदृढ़ सहस्रबाहु के रूप में खड़ा हो सकता है, आज समय का तकाजा इसी प्रकार का है। देखें, इसका उत्तर देने के लिए कौन-कौन तैयार होता है।
कुसमय के जगत भेदी नगाड़े बज रहे हैं, सर्वनाश की बेला में, कुत्ते की मौत मरने की अपेक्षा, आइए हम लोग विश्व शाँति के लिए, युग निर्माण के लिए, मानवता की सेवा के लिए, धर्म स्थापना के लिए भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए कुछ कार्य करें। यह करना ही उचित है, इसी में बुद्धिमता, दूरदर्शिता और जीवन की सफलता भी सन्निहित है।
इन्दौर में श्री बेनी प्रसाद जी भार्गव के स्थान पर, 15 अगस्त को सामूहिक यज्ञ उत्साह पूर्वक सम्पन्न हुआ। बेनी प्रसाद जी ने सवा लाख का अनुष्ठान पूरा किया था।
-सत्य नारायण तिवारी
अमृता खास (पीलीभीत) में रक्षा बन्धन के शुभ पर्व पर समस्त उपासकों ने मिलकर एक यज्ञ कन्या पाठशाला में किया। यज्ञ के पश्चात कीर्तन व प्रसाद वितरण हुआ।
-सोहन लाल
इन्द्रनगर (जमशेदपुर) में जन्माष्टमी के अवसर पर लगभग 32 हजार आहुतियों का यज्ञ किया गया। 25-25 के 12 समूहों ने यज्ञ में भाग लिया। पूर्णाहुति के अवसर पर भी करीब सवा सौ व्यक्ति उपस्थित थे। यज्ञ कार्य श्री हरिराम जी, सुप. सेल्स टैक्स के स्थान पर हुआ। इस कार्य में सेल्स टैक्स के बड़े बाबू श्री वासुदेव लाल ने बहुत प्रोत्साहन किया।
- मणि भाई पटेल
राजपुर (निमाड़) में विश्व कल्याण हेतु ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में 12500 आहुतियों का यज्ञ श्री बलवंत राव मटलोई की अध्यक्षता में 1 से 4 अगस्त तक सम्पन्न हुआ। आचार्य इन्दौर के श्री युगल किशोर जी याज्ञिक थे। यज्ञ के आरम्भ से पूर्णाहुति तक सात्विक और आध्यात्मिक आयोजन रखे गये थे। संत श्री गोपाल का नृत्य के साथ हरि कीर्तन, बड़वानी संस्कृत विद्यालय के आचार्य का प्रवचन और श्री मदन मोहन जी शास्त्री की हरिकथा प्रतिदिन होती रही। नगर के बहुसंख्यक नर-नारियों ने यज्ञ में श्रद्धापूर्वक भाग लिया। नगर कीर्तन के जुलूस में अपार जन-समुदाय सम्मिलित था। ब्रह्मभोज के अतिरिक्त द्विजों को यथोचित दक्षिणा दी गयी। 50) से अधिक गायत्री साहित्य वितरण किया गया।
-श्री राम सोलंकी, मन्त्री
गोविन्दपुर (उड़ीसा) में ता. 16 अगस्त संक्रान्ति के अवसर पर सामूहिक जप व हवन कार्यक्रम पर समारोह से सम्पन्न हुआ।
-रविशंकर, शास्वामी
खेसहन (फतेहपुर) में जन्माष्टमी पर शास्त्र मंत्री श्री दुर्गा प्रसाद जी के घर पर यज्ञ कराया गया। सभी लोगों ने सामग्री दी व आहुति डाली।
- प्रेम दयाल गुप्ता
जोधपुर (राजस्थान) में अगस्त मास रविवार को क्रमशः श्री राघवदास जी का. श्री कन्हैया लाल जी मिश्र, श्री धनराज जी व्याल, शिव मन्दिर राठा नाड़ा, पं. कन्हैया लाल जी भटनागर के यहाँ सामूहिक सत्संग व हवन हुआ। शिव मन्दिर के सत्संग में स्वामी जी मढोर गुफा बाबा का प्रवचन तथा देवीदास जी के भजन अत्यन्त सुन्दर रहे।
- मंत्री शाखा संघ।
डबरा (म.प्र.) के गायत्री कार्यालय में एक जनरल कमेटी ता. 22 को बुलाई गई जिसमें यथा संभव शीघ्र एक गायत्री महायज्ञ करने का निश्चय किया गया। उसमें सवा करोड़ जप एवं सवा लाख आहुतियाँ विशाल कुँडों में दी जायेंगी। मथुरा से कुलपति पं. श्री राम जी शर्मा को बुलवाने का भी विचार किया गया। इसकी व्यवस्था के लिए 11 गायत्री उपासकों की एक कमेटी बनाई गई है।
- मंत्री गायत्री शाखा।
ध्राँगध्रा (गुजरात) में सवा लाख आहुतियों का यज्ञ नर्मदेश्वर महादेव के मन्दिर में समारोह पूर्वक सम्पन्न हो गया। कार्यक्रम के तीनों दिन रात को आरती, चालीसा पाठ, सहस्र नाम और भगवद् कीर्तन किया गया। चालीसा और प्रसाद वितरण भी किया गया।
-हीरालाल दलपत राम महेश्वरी।
सरायताल (उ.प्र.) में ता. 21 अगस्त को सामूहिक हवन हुआ शारदा का कार्य संतोषजनक रीति से अग्रसर हो रहा है।
- रामानुज शुक्ला
दिगौरा (बुन्देलखण्ड) के गायत्री परिवार शाखा की प्रेरणा से इस मास में निम्नलिखित सामूहिक आयोजन हुये- ग्राम मऊ बुजुर्ग में भागवत पारायण व गायत्री यज्ञ, नदनपारा में 24 घंटे का अखण्ड कीर्तन व गायत्री यज्ञ, लुहरगवाँ में वाल्मीकीय रामायण, 12 घंटे का अखण्ड कीर्तन व यज्ञ, और घामना में शिव पुराण का पारायण व यज्ञ किया गया। प्रत्येक आयोजन में सैकड़ों व्यक्तियों को भोजन कराये गये और गायत्री माता तथा आचार्य जी के चित्र बाँटे गये। इन आयोजनों से हजारों व्यक्तियों में धार्मिक भावों और गायत्री उपासना का प्रचार हुआ।
- बैजनाथ सौनकिया।
जाँजगीर (बिलासपुर) में ता. 10 अगस्त को गायत्री यज्ञ, जप व कन्याओं को भोजन का आयोजन कुशलपूर्वक हो गया। रक्षा बन्धन भी हुआ।
- रामऔतार तिवारी
भुसावल (बम्बई) में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को दो हजार आहुतियों का हवन हुआ। श्री हेमराज जी मेहता की ओर से प्रीति-भोज भी हुआ। मेहता जी एक नैष्ठिक गायत्री उपासक हैं। इस आयोजन में रामचन्द्र जी बानी का विशेष सहयोग रहा।
-मानिकचन्द मिश्र
सटई (छतरपुर, बुन्देखण्ड) में गायत्री प्रचार का कार्य बड़ी लगन के साथ किया जा रहा है और एक विशाल गायत्री महायज्ञ की तैयारी हो रही है। जिसकी तिथियाँ शीघ्र ही निश्चित की जायेंगी। यहाँ गायत्री का प्रचार इतना हो गया है कि एक पाँच वर्ष के बालक के मुख से भी गायत्री चालीसा व मंत्र भी सुना जा सकता है। इसका बहुत कुछ श्रेय श्री छेदीलाल शर्मा वैद्य का है।
- शिव प्रसाद पाठक
आगरा (मालवा) में 11 जुलाई को बैजनाथ महादेव मन्दिर में अखण्ड-ज्योति की स्थापना की गई। इसके लिये प्रत्येक भाग लेने वाले ने ज्योति के निमित्त 6 छः घी और निगरानी करने वाले को 1 सेर आटे का सीधा दिया। माता की कृपा से यह क्रम 31 दिन तक कुशलता पूर्वक चलता रहा। अन्तिम दिन ता.13 अगस्त को बहुत बड़ा यज्ञ किया गया। दो सौ से अधिक व्यक्तियों को भोजन कराया गया। इस कार्य में भी गोपीलाल जी भावसार, चतुर्भुज जी टेलर, नारायणदास जी गोयल, महन्त चन्दपुरी जी, कालू राम जी, मदन लाल जी प्रभुति सज्जनों का सहयोग प्रशंसनीय रहा।
-मंत्री गायत्री शाखा
आरंग (रामपुर) में एक वर्ष का संकल्पित ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान पौष अमावस्या को पूर्ण होगा। इस अवसर पर इस क्षेत्र (रामपुर, बिलासपुर, दुर्ग, उड़ीसा, भंडारा, नागपुर, सरगुजा, बस्तर) की समस्त शाखाओं में 9 दिन तक 24 हजार जप का एक पुरश्चरण होगा और बाद में आरंग में 5 दिन तक तर्पण, मार्जन, ब्रह्मभोज का आयोजन होगा। इसी अवसर पर प्राँतीय संगठन किया गया।
- विद्या प्रसाद मिश्रा
राजापुर (जि. खीरी लखीमपुर) में पं. मनोहर लाल दीक्षित के पुरुषार्थ से एक वृहत गायत्री यज्ञ सम्पन्न हुआ जिसमें कफारा और रमिया बेहड़ आदि गाँवों के नर-नारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। मथुरा तपोभूमि की तरफ से पं. कृपाशंकर त्रिपाठी ने धार्मिक सिनेमा दिखलाया। इसके बाद बाबू हुकूमचन्द गुप्त कम्पाउण्डर ने अपने स्थान पर छोटा यज्ञ कराया जो व्यवस्थित ढंग से सम्पन्न हुआ।
- एक गायत्री उपासक।
बझेड़ा (बुलन्दशहर) में स्वामी ब्रह्म स्वरूप जी की प्रेरणा से सामूहिक यज्ञ हुआ जिसमें अनेक गायत्री उपासकों को विधिवत यज्ञोपवीत भी दिया गया। इस आयोजन को सफल बनाने में ला. रामचरन जी, कालीचरन जी फौजदार, गोकुलचन्द शर्मा अमीन, फत्तेसिंह जी, श्योदान सिंह जी, अशर्फीलाल जी, राजेन्द्र सिंह आर्य रोशन लाल, नीवत सिंह आदि का प्रयत्न सराहनीय रहा। यह यज्ञ गायत्री तपोभूमि से पधारे पं. ज्वाला प्रसाद शर्मा के आर्चात्व में हुआ। रात्रि के समय तपोभूमि का धर्म प्रचार सिनेमा भी दिखाया गया। इसके पश्चात मुईउद्दीनपुर (बुलन्दशहर) में भी सामूहिक यज्ञ हुआ जिसमें गाँव के बहु-संख्यक नर-नारियों ने भाग लिया।
- एक गायत्री प्रेमी।
कानपुर के अशोकनगर में श्री शिवनाथ जी दूबर के निवास स्थान पर सामूहिक यज्ञ हुआ जिसमें 75 गायत्री उपासकों ने भाग लिया। यज्ञ के अन्त में उत्तम जलपान कराया गया और प्रसाद में गायत्री चालीसा वितरण किया गया। कानपुर की सभी शाखाओं की ओर से 1 सितम्बर से एक ‘गायत्री- पुस्तकालय’ 115 गाँधीनगर में खोल दिया गया है। जिससे सभी नागरिक लाभ उठा सकते हैं।
- अयोध्यादास दीक्षित
अमदाला वालसा (श्रीकाकुलम, द.भा.) में 15 अगस्त को मानिकचंद जी पण्डा के नये गोदाम में सामूहिक गायत्री हवन हुआ जिसमें लगभग 100 सज्जनों ने भाग लिया। 200 गरीबों को भोजन कराया गया।
- इन्दरचन्द भोजक।
रोहतक (पंजाब) के वैदिक भक्ति साधन आश्रम में जो शिविर सितम्बर में लगता था वह स्थगित हो गया है। अब 8 अक्टूबर से 7 नवम्बर तक अखंड यज्ञ होंगे उनमें सब प्रेमी भाग लें।
- आचार्य सत्यभूषण
शीघ्र ही होने वाले यज्ञ
(1) असोज सुदी 10, 11, 12 ता. 3, 4, 5, 6 अक्टूबर को बाढ़, खिरकड़ी (कराहल) में 25 कुण्डों का यज्ञ और सम्मेलन।
(2) व्यावर (अजमेर) में ता. 6-10-57 से 11-10-57 तक यज्ञ।
(3) अजीतगढ़ (सीकर) में ता. 11 सितम्बर से 14 सितम्बर तक यज्ञ।
कोटा (राजस्थान) में एक विशद गायत्री यज्ञ और निकटवर्ती शाखाओं का सम्मेलन ता. 5 से 8 सितम्बर तक हुआ, जिसमें मथुरा से गायत्री परिवार के कुलपति पं. श्री राम शर्मा आचार्य, स्वामी प्रेमानंद जी और सामवेद के आचार्य श्रीकण्ठ जी पधारे थे। प्रातः 8 बजे आचार्य जी का जुलूस निकाला गया और दोपहर को दो बजे जल-यात्रा का जुलूस निकला, जिसमें 200 महिलाएं पीले वस्त्र पहिने और घड़े लिये थीं। 6 ता. को प्रातःकाल यज्ञ हुआ जिसमें पुरुषों और स्त्रियों के तीन-तीन दलों ने पृथक-पृथक आहुतियाँ दी। दोपहर को समस्त प्रतिनिधियों का परिचय आचार्य जी से कराया गया। रात के 8 बजे अपरिजन समुदाय के बीच आचार्य जी, स्वामी प्रेमानन्द जी व शंभू सिंह जी के प्रवचन हुये। ता. 7 को प्रातः 6 बजे से ही यज्ञ आरम्भ हो गया। महिलाएं पीली साड़ियाँ पहिने दौड़ी चली आ रही थीं। दोपहर को आचार्य जी का प्रभावशाली प्रवचन संसार की वर्तमान संकटपूर्ण अवस्था और उसके निवारण के लिए गायत्री यज्ञों के प्रचार के सम्बन्ध में हुआ। इसी प्रकार ता. 8 को बड़ी धूमधाम से पूर्णाहुति की गई। श्रद्धालु जनता की भीड़ इतनी अधिक थी कि धर्मशाला में समा नहीं रही थी। इस विशाल आयोजन को सफल बनाने में सर्व श्री मनोहर सिंह जी सोलंकी, मैनेजर सा. काशी नाथ जी, कृष्ण गोपाल जी, नरवदेश्वर जी, लक्ष्मण जी शर्मा, बालारामजी, विश्राम सिंह जी, वा. रामस्वरूप जी, डॉ. नन्द किशोर जी आदि कोटा शाखा के अनेक सदस्यों ने बड़ा परिश्रम किया।
-ब्रह्मानंद
सतना (बुन्देलखण्ड) में जन्माष्टमी पर सामूहिक जप व हवन हुआ। नवरात्रि पर यज्ञ का विशेष आयोजन किया जा रहा है।
-आर.आर. मिश्रा
भालक (बिसनगर, उत्तर गुजरात) में 31 अगस्त को चौबीस घंटे का अखण्ड कीर्तन हुआ जिसमें 5 गाँवों की मण्डलियों ने भाग लिया। दूसरे दिन सामूहिक हवन व भोजन -समारंभ हुआ।
- हरिप्रसाद रविशंकर जानी
तारापुर (कालाहाँडी, उड़ीसा) में 3 सितम्बर को श्री जगन्नाथ मन्दिर में सामूहिक जप, हवन, चालीसा पाठ, मंत्रलेखन व प्रसाद वितरण हुआ। ब्रह्मभोज का भी आयोजन था।
- गोकुल प्रसाद पण्डा।
मझोला (पीलीभीत) में भादों की अमावस्या व पूर्णिमा को सामूहिक हवन और जप का आयोजन किया गया जिसमें सभी उपासकों ने भाग लिया। चार नई शाखायें शीघ्र ही स्थापित होने वाली हैं।
-लक्ष्मण सिंह मनराल
भाटपारा (म.प्र.) में श्री ठाकुर दत्त के प्रयत्न से गायत्री परिवार की स्थापना हुई। ता. 1 सितम्बर को श्री माता के देवालय में 21 सदस्यों द्वारा 5 हजार आहुतियों का यज्ञ किया गया। भजन कीर्तन का उत्तम आयोजन था। इस समारोह से सब लोगों में गायत्री उपासना का भाव फैला है।
-मंत्री गायत्री परिवार
चाँचौड़ा (म.प्र.) में भाद्रपद की अमावस्या को श्री माँगीलालजी चौधरी के मन्दिर पर श्री गायत्री स्तवन व सामूहिक हवन हुआ। पश्चात वेदमाता की आरती, यज्ञ भगवान का स्तवन व प्रसाद वितरण हुआ।
-श्रीकृष्ण कौशल्य।
कसरानद (निमाड़) में एक सितम्बर को सामूहिक यज्ञ किया गया। शाखा सदस्यों ने निश्चय किया है कि यज्ञ एक ही स्थान पर करने के बजाय क्रम से अलग-अलग मोहल्लों में किया जाय। तदनुसार वह यज्ञ कुलमी मोहल्ले में हुआ जिसमें मोहल्ले के अनेक व्यक्तियों ने पूर्ण उत्साह से योग दिया। श्री शिवलाल जी सराफ ने 60 दिन में सवा लाख का अनुष्ठान करके भादो सुदी 15 को सामूहिक यज्ञ कराया जिसके अन्त में गायत्री साहित्य व चित्र वितरण किये गये।
-संतोष चन्द्र व्यास
वापी (बम्बई प्रान्त) में श्री शाँताराम व यशवंत राय के घर पर सवा लाख जप के अनुष्ठान की पूर्णाहुति 28 अगस्त को बड़े धूमधाम से की गई। 1250 आहुतियाँ दी गई। ब्रह्मदान व ब्रह्मभोज भी किया गया। भाई गफोरदास नारणदास ने गायत्री चालीसा वितरण किये।
-कृष्ण राव हरिभाऊ घोड़े
लश्कर (ग्वालियर) में श्री अमोलचन्द्र जी दीक्षित दौलतगंज) के घर पर सामूहिक यज्ञ करके गायत्री परिवार की स्थापना की गई। उद्घाटन डबरा के गायत्री परिवार के मंत्री श्री द्वारका प्रसाद द्वारा सम्पन्न हुआ। श्री अमोलचन्द्र जी संरक्षक, गुरु प्रसाद जी वर्मा, प्रधानमंत्री, बाबूलाल जी गुप्त उपमंत्री श्री सुरेश चन्द्र सिंह बी.ए. तथा श्री गजानन बाटार कर प्रचार मंत्री सर्व सम्मति से निर्वाचित हुये।
- गुरु प्रसाद।
राठ (हमीरपुर) में चन्दनपुखरिया महावीर जी के स्थान पर गायत्री देवी की स्थापना अगहन के महीने में बड़े समारोह के साथ होने वाली है। इस अवसर पर कई प्रकार के धार्मिक आयोजन रखे गये हैं तथा बाहर से भी अधिकारी विद्वानों को बुलाने की व्यवस्था की जा रही है।
- लेखराज खत्री
टीकमगढ़ (बुन्देलखण्ड) में गायत्री पुस्तकालय की स्थापना 8 सितम्बर 57 को श्री चित्रगुप्त मन्दिर में की गई है जिसमें श्री पन्नालाल जी वकील विशेष सहयोग देने की कृपा की। पुस्तकालय के उद्घाटन टीकमगढ़ के दीवान श्री विन्देश्वरी पाँडे बी.ए. एल.एल.बी. द्वारा सम्पन्न हुआ। अध्यापक पद से पं. पीताम्बर कवि भूषण ने प्रभावशाली भाषण दिया।
- जगतर
पुसावली (बदायूँ) में 8 सितम्बर को श्री मून सिंह जी ने सामूहिक गायत्री यज्ञ कराया। कीर्तन रामायण की कथा भी हुई। ता. 9 को चामुण्डा शाखा की ओर से दो हजार आहुतियों का हवन किया गया जिसमें 20 सदस्यों ने भाग लिया।
-मंत्री गायत्री परिवार
तनोड़िया (शाजापुर) में श्रावण पूर्णिमा पर बैजनाथ महादेव के स्थान पर हवन किया गया। हवन के पूरे समय तक भगवान पर अखण्ड दूध धारा गिरती रही।
- मुन्नालाल ‘कर्मयोगी’
विलखना (इटावा) में अनन्त चतुर्दशी के दिन गायत्री यज्ञ सम्पन्न हो गया। जिसमें विद्यार्थियों ने विशेष उत्साह दिखाया। इसमें अवध बिहारी लाल जी, रामसूरत जी व ब्रजेन्द्र प्रताप सिंह जी चौहान का कार्य विशेष सराहनीय रहा। ता. 3-9-57 को ठा. प्रताप सिंह सरजूपुरा (विधूना) के यहाँ भी सामूहिक यज्ञ किया गया।
- कृष्ण लाल द्विवेदी
चाँपा (विलासपुर) में 7 सितम्बर को श्री विद्या विनोद जी गुप्ता अध्यापक की अध्यक्षता में विद्यालय के छात्रों के सहयोग से नगर समिति उच्च विद्यालय में सामूहिक हवन सम्पन्न हुआ।
-मुकुन्द नारायणचार्य
अजीतगढ़ (जि. सीकर, राजस्थान) में ता. 12 से 14 सितम्बर तक विशद गायत्री महायज्ञ 21 कुण्डों में होगा। अ.भा. गायत्री परिवार के कुलपति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने यज्ञ में पधारने की स्वीकृति दे दी है। समस्त गायत्री प्रेमियों को सादर निमन्त्रित किया जाता है।
- वैद्य पं. जगदीश नारायण मिश्र
बनेठा (जि. टोंक, राजस्थान) में ता. 9 सितम्बर को गायत्री मन्दिर बनाने का निश्चय करके मन्दिर के लान तथा यज्ञशाला के स्थान का पूजन करा दिया गया और ध्वजारोहण भी गाजे बाजे के साथ हो गया।
- महात्मा घासीराम दास
रीजौन (झालागढ़) में श्री किशनलाल जी पटेल व श्री ताराचंद जी के यहाँ सामूहिक हवन किया गया।
- जगदीश चन्द्र शर्मा
खरगोन (निमाड़) में प्रत्येक रविवार को समस्त सदस्य एक स्थान पर सामूहिक जाप करते हैं। ता. 1 सितम्बर को इसका सामूहिक हवन भी किया गया।
-पुष्पदंत स. राणा
बीलमपुर (फर्रुखाबाद) में पूर्णमासी के दिन एक बड़ा सामूहिक हवन हुआ। श्री बाबू सिंह प्रधान ने गायत्री माता का स्थान बनाने के लिए एक बीघा जमीन ग्राम समाज से दिलाई है।
- लाल बहादुर चौबे
करंगामाल (उड़ीसा) में अनन्त चतुर्दशी के दिन जगन्नाथ मन्दिर में सामूहिक हवन का आयोजन किया गया। दोपहर को नरसिंह पुराणा का पाठ व रात में दीपदान हुआ।
-जगदीश प्रसाद जोशी
खानपुर (झालागढ़) में रक्षा बन्धन, जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी पर विशेष सामूहिक हवन किये गये।
- बद्रीलाल गुप्ता
शाहजहाँपुर (उ.प्र.) के गायत्री परिवार की ओर से देहातों में गायत्री प्रचार का कार्यक्रम बनाया गया है। सेहरामऊ व रौजा में शाखायें स्थापित हो चुकी हैं। 5 नवीन शाखायें शीघ्र ही स्थापित होंगी।
-रंगेलाल शुक्ल
पटौद (म.प्र.) में गायत्री चालीसा वितरण करके जनता में प्रचार-कार्य किया गया। पं. हरिहर मिश्र ने प्रत्येक रविवार को एक छोटा हवन किया।
-महतरदास कश्यप
बालावाली (बिजनौर) में गायत्री चालीसा का प्रचार विशेष रूप से किया जा रहा है। एक हजार चालीसा वितरण किये गये। 5 हवन हुए जिनमें 3672 आहुतियाँ दी गई। जन्माष्टमी पर विशेष सत्संग किया गया।
-चन्द्रावती
घरोला (शाजापुर) में हरितालिका के अवसर पर महिला सदस्यों ने जागरण करके कीर्तन व भजन किया।
- सुन्दरलाल त्रिवेदी
गरोठ (म.प्र.) में अगस्त मास में 6 यज्ञ हुए जिनमें पर्याप्त संख्या में सदस्यों ने भाग लिया। देहातों में प्रचार करके नवीन शाखायें स्थापित करने का प्रयत्न किया जा रहा है।
- शंकरलाल चौधरी
डमोडा (बरेठा) में 1 अगस्त को 5 हजार आहुतियों का सामूहिक यज्ञ बड़े समारोह और धूमधाम से किया गया।
- मणिलाल कालोढ़ा
हस्बा (फतेहपुर) में गायत्री की प्रतिमा की स्थापना की गई। उसके उपलक्ष में सामूहिक यज्ञ और रामायण का अखण्ड पाठ व कीर्तन का आयोजन किया गया।
- रामावतार शर्मा
इकतासा (म.प्र.) में भादों वदी अमावस्या को भगवान के मंदिर में सामूहिक जप व हवन का आयोजन किया गया।
-मंत्री गायत्री परिवार
जासलपुर (होशंगाबाद म.प्र.) में जन्माष्टमी पर सामूहिक हवन किया गया। रात्रि को राम मंदिर में भजन व कीर्तन हुये। गायत्री- कुटीर के निर्माण की योजना चालू है।
- पु.आ. साखरे
बरडिया (चित्तौरगढ़, राजस्थान) में भादों कृष्ण अमावस्या को एक बड़ा गायत्री हवन किया गया। गायत्री चालीसा का पाठ किया गया।
-कारुलाल शास्त्री
पतरा (कानपुर) में भादो अमावस्या को 1080 आहुतियों का हवन किया गया और ब्रजरामदास जी की कुटीपर रामायण पाठ किया गया।
-मन बोधन सिंह
रेनोक (सिक्किम, पं. बंगाल) में रक्षा बन्धन को 1800 आहुतियों का यज्ञ बड़े समारोह से हुआ। यहाँ प्रत्येक पूर्णिमा को यज्ञ की योजना बनाई गई है जो सफलतापूर्वक चल रही है।
-वेणी प्रसाद
देवली ब्राह्मनान (कोटा) में रक्षा बन्धन पर अहीरों के मन्दिर पर सामूहिक जप व यज्ञ किया गया। 3 हवन अन्य स्थानों में किये गये।
-रामगोपाल शर्मा
रली आणा (सौराष्ट्र) के गायत्री परिवार के प्रयत्न से 7 सितम्बर को सवा लाख जप व तदनुसार आहुतियों का हवन बड़े समारोह से किया गया।
-दबे रतीलाल
बागोड़ (निमाड़) में हनुमान मन्दिर में सामूहिक जप व हवन के साथ 24 घंटे का अखण्ड रामायण पाठ किया गया। पीपल्या ग्राम में न शाखा स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे हैं। वह अभी कुछ सदस्य बन चुके हैं।
-रतनलाल सक्सेना
लहरा नगला श्याम (बदायूँ) में लाला थानसिंक वैश्य के यहाँ सामूहिक यज्ञ हुआ जिसमें भजन कीर्तन की भी व्यवस्था थी। पुसावली शाखा मंत्री श्री गायत्री प्रसाद गुप्ता ने गायत्री का महत्व समझाया और बहुत सा साहित्य पढ़ने को दिया।
-पूरनचन्द शुक्ल
अमाँपुर (एटा) में 20 अगस्त को एक विशाल यज्ञ का प्रवचन हुआ। नवरात्रि में सवा लाख मंत्र लेखन की योजना बनाई गयी है।
-हरिओम गोयल
बकानी (झालाबाड़) में सितम्बर मास में महाबीर प्रसाद जी अध्यापक कन्हैयालाल जी अध्यापक व द्वारकालाल जी अध्यापक के यहाँ सामूहिक हवन किये गये। जन्माष्टमी को बाजार के मंदिर पर हवन किया गया। इस मास में कुल 274000 जप उपासकों ने किये।
-भँवरलाल शर्मा
महबूबाबाद (हैदराबाद) में अगस्त मास में पाँच गायत्री हवन किये गये। हरिओम कीर्तन बहुत ही आनन्द पूर्वक सम्पन्न हुआ।
-मंत्री, गायत्री परिवार
निगोही (शाहजहाँपुर) की गायत्री शाखा की तरफ से आस-पास के स्थानों में गायत्री- प्रचार करके नई शाखा स्थापित करने का आयोजन किया गया।
-नत्थूलाल (यज्ञदेव) शर्मा
हरनबाड़ा (मुजफ्फरपुर) में एक सामूहिक यज्ञ समारोह पूर्वक किया गया। मंत्र लेखन की योजना भी चालू है।
-छोटनलाल स्वर्णकार
इटौआ धुरा (बरेली) में अगस्त में चार सामूहिक यज्ञ हुए। जनता में प्रचार किया जा रहा है।
-रामबिलास भटनागर
लामटा (बालाघाट) में जन्माष्टमी पर श्री हरदयाल जी के यहाँ सामूहिक हवन बड़े समारोह से हुआ जिसमें 50 उपासकों ने भाग लिया। गायत्री चालीसा व गायत्री माता का चित्र बाँटा गया।
-मंत्री- शाखा सभा
लखना दौन (म.प्र.) में दो हजार आहुतियों का हवन किया गया। सत्संग भी नियमित रूप से होते हैं।
-इमरतलाल
डाँडे (संथाल परगना) में प्रति सप्ताह सत्संग होता है। जिनके द्वारा गायत्री -प्रचार निरन्तर बढ़ रहा है।
-सत्यनारायण ठाकुर
कनगेटी (जि. मन्दसौर) में दो सामूहिक यज्ञ किये गये। 3 महाजनों का यज्ञोपवीत संस्कार किया गया।
-वैद्य गेंदालाल समधिया
देवरान (मंदसौर) में पं. रामचन्द्रजी उपाध्याय के सहयोग से गायत्री परिवार की स्थापना की गई तथा भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को भी उदयरामजी घोड़ा के मकान पर एवं आश्विन कृष्ण प्रतिपदा को श्री सेवारामजी कुलमी के मकान पर सुन्दर यज्ञशालाएँ बनाकर गायत्री यज्ञ का आयोजन किया गया। दोनों स्थानों पर मिलाकर छः हजार आहुतियाँ दी गई।
-वैद्य कन्हैयाला पाण्डेय
व्यावर में कार्तिक वदी 1, 2, 3 को होने वाले 21 कुण्डी यज्ञ की तैयारी जोरों से हो रही है। सभी कार्यकर्ता इसे सफल बनाने में प्राण-प्रण से लगे हुए हैं। मथुरा से आचार्य जी भी उसमें पधारेंगे।
-मोहन लाल शर्मा
सुसनेर में ता.10 अक्टूबर को गायत्री यज्ञ की पूर्णाहुति बड़े समारोह पूर्वक हुई। मथुरा से श्री स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज तथा ब्रह्मचारी श्री कण्ठजी पधारे थे।
-नन्दकिशोर शर्मा
वापी (सूरत) में गायत्री भजन मंडल की स्थापना हुई है। जो भजन कीर्तनों द्वारा गायत्री का प्रचार किया करेगा।
-ठाकोरलाल नारायण राणा
बिजौली (फतेहपुर) में श्री विश्वनाथ सिंह जी के यहाँ अखण्ड रामायण पाठ तथा यज्ञ हुआ। श्री रघुनाथ प्रसाद की प्रेरणा से भाद्रपद शुक्ल 15 को दूसरा सामूहिक यज्ञ हुआ।
-रामसनेही वर्मा
रतलाम में 8 सितम्बर को श्री शिव शक्तिलाल शर्मा के यहाँ गायत्री यज्ञ का आयोजन हुआ। सभी उपासकों ने श्रद्धा पूर्वक भाग लिया।
-मंत्री शाखा
आनन्दा (कोटा) में पं. अमरलाल शर्मा ने 1800 गायत्री मंत्र की आहुतियों का हवन कराया। श्रीमद्भागवत की कथा हुई।
-शंकरलाल शर्मा
केवल अपने लाभ की बात सोचना और अपने से मतलब रखना यह ‘पशु प्रवृत्ति’ है। मनुष्य की विशेषता यह होती है कि वह अपने हित के साथ ही दूसरों की सुविधा और हित का भी ध्यान रखता है। जब मनुष्य में देवत्व विकसित होने लगता है तो वह अपने लाभ का बलिदान करके दूसरों के कल्याणकारी कार्यों में प्रवृत्त होता है।
गृही और विरक्त, व्यापारी और भजनानन्दी दोनों ही प्रकार के लोगों में उपर्युक्त तीनों प्रकार की प्रकृतियाँ पाई जाती हैं। साधारण साँसारिक जीवन बिताने वाले तथा केवल जप-तप-उपासना में लगे- दोनों ही श्रेणी के व्यक्तियों में स्वार्थी और परमार्थी देखे जाते हैं। जिस प्रकार बहुत से स्वार्थी दुकानदार केवल दूसरों से मुनाफा उठाकर रुपया कमाना ही अपना लक्ष्य रखते हैं, उसी प्रकार भजनानन्दियों में भी अनेक ऐसे पाये जाते हैं जो केवल अपने लिये स्वर्ग मुक्ति प्राप्त करने की चेष्टा में तल्लीन रहते हैं। अनेक सन्त-महन्त तो ऐसे भी मौजूद हैं, जो दूसरों के दान पर सुख से रहते हैं पर किसी की सेवा या उपकार नाम मात्र को भी नहीं करते, केवल अपने ही लिए ‘पुण्य’ उपार्जन में लगे रहते हैं। ऐसे लोग देखने में भले ही साधु-संन्यासी लगें, कपड़े भले ही लाल-पीले पहन लें, पर वस्तुतः वे उस स्वार्थी दुकानदार से कम नहीं होते जो मुनाफा तो सबसे उठाता है, पर काम केवल अपने ही मतलब से रखता है। सच पूछा जाय तो भारतीय- समाज, विशेषतः हमारी हिन्दू- जाति के पतन का कारण यही है कि हमारे साधु-संत नामधारियों ने लोक-हित की ओर से मुँह मोड़कर केवल निजी स्वार्थ को ही अपना लक्ष्य बना लिया। हम स्पष्ट शब्दों में यह कह सकते हैं कि जो लोग गृहस्थ-आश्रम में रहते हुये साँसारिक जीवन बिताते हुये भी दूसरों की सेवा और उपकार का यथाशक्ति प्रयत्न करते रहते हैं वे इन कोरे साधु कहलाने वालों से कहीं अधिक ऊँची श्रेणी के भक्त और संत हैं।
गायत्री परिवार एक आध्यात्मिक संगठन है। इसकी शिक्षा यह है कि अपने लाभ से अधिक दूसरों के लाभ की बात सोची जाय, स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ को अधिक महत्व दिया जाय। यह सच है कि अभी बहुत से व्यक्ति अपनी निजी कठिनाइयों को हल करने, अपनी भौतिक तथा आध्यात्मिक सुख−शांति की अभिवृद्धि के लिये उपासना कर रहे हैं। पर कितने ही उपासक ऐसे भी हैं अपने लाभ की अपेक्षा दूसरों को सुख शाँति के मार्ग पर अग्रसर करने के लिये गायत्री परिवार का कार्य में बड़े उत्साह से संलग्न हैं। वस्तुतः ब्रह्मदान और ज्ञान-यज्ञ संसार का सबसे बड़ा परमार्थ है। दूसरों को ज्ञान-दान देने में आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने में- जो परिश्रम किया जाता है, उससे अनेक आत्माओं को प्रकाश मिलता है। इस प्रकाश से उत्पन्न सुख−शांति, धर्म का श्रेय उस प्रेरणा देने वाले व्यक्ति को भी मिलता है। ऐसे व्यक्ति ही सच्चे पुण्यात्मा है।
धर्म-प्रचार एक महान परमार्थ है। वर्तमान समय की आवश्यकताओं को देखते हुए गायत्री प्रचार एक अत्यन्त उच्च कोटि का शुभ कार्य है। यह साधारण जप-तप से कहीं अधिक श्रेष्ठ सत्कर्म है। गायत्री परिवार में ऐसे अनेकों व्यक्ति निकलते हैं जो अपनी शक्ति इस प्रचार-कार्य में लगा रहे हैं। ऐसे लोग सच्चे अर्थों में संत-महात्मा हैं, चाहे वे घर में रहें या वन में, कपड़े सफेद पहने या लाल-पीले।
इस अंक में कुछ सज्जनों के फोटो छापे गये हैं यह सब इसी श्रेणी के सत्पुरुष हैं। क्रमशः नाम, पते, परिचय इस प्रकार हैं :-
1- श्री कन्हैयालाल जी मिश्र जोधपुर
2- श्री गोविन्दर राव सी. पंडित बड़वानी
3- श्री जगदीश नारायण मिश्र वैद्य अजीतगढ़
4- श्री रामकिशन शर्मा जुल्मी (कोटा)
5- श्री इन्द्रचन्द्र भोजक लाडनू
6- श्री रामकुमार त्रिपाठी पन्ना
7- श्री मनोहरलाल मंडाहर दिल्ली
8- श्री सुधाराम महाजन बिलासपुर
9- श्री बाबूराम जमीदार इन्दौर
10- श्री रामसाहय तिवारी झाँसी
11- श्री मानसिंह टाक जोधपुर
12- श्री यमुना प्रसाद पालीवाल वैद्य, सड़क अर्जुन
13- श्री नंदकिशोर उपाध्याय, खंडवा
14- श्री रामदास विष्णु पाटिल, सावदा
15- श्री भरतराम अवस्थी चौरसिया
16- श्री कैलास नारायण उपाध्याय, सुसनेर
संघर्षों की विजयादशमी चढ़ आई है,
तज कर तन्द्रा, आ पंचशील के राम, उठो!
तुम भटक चुके हो नाथ, बहुत दण्डक वन में,
तुम बिलख चुके हो हृदय-विदारक क्रन्दन में,
नीरव आँसू से शैल-शिलाएं पिघलाते-
तुम मौन रहे अत्याचारों के बन्धन में,
मिल गए तुम्हें सह-सत्ता के भालू-बन्दर-
करते जयकारे सद्भावों के नर-किन्नर-
पापों से दबी धरा की उठी दुहाई है-
नर के चोले में नारायण निष्काम, उठो! 1
सर उठा रही डायन-सी विज्ञानी लंका,
डम-डमा रहा संहार-नाश का फिर डंका,
सज रहा टैंक, पनडुब्बी, राकिट के संग-संग-
ऐटम का मेघनाद, असुरों का रणबंका,
है नाथ ‘मिजिल’ का बड़ा भयानक कुम्भकर्ण-
कर देंगे गैसों के शर सब के पीत वर्ण-
मानव के जग पर दानवता घहराई है,
बन एक बार संरक्षण के उपनाम, उठो! 2
ऋषि-मुनियों-से हैं उपनिवेश पीड़ित दिन-दिन,
हैं काट रहे आजाद देश घड़ियाँ गिन-गिन,
है कैद शान्ति की सीता उद्जन के घर में-
हो रही भग्न यह नींव जिन्दगी की छिन-छिन,
बाँधो तटस्थता सेतु, बाढ़ को रोको तुम!
अंगद को आगे भेज युद्ध को टोको तुम!
दुनिया के उपवन पर पतझर मँडराई है,
फूँकते गंध, बन कर वसन्त अभिराम, उठो! 3
अन्यथा धँसेगी धरा, राख होगा अम्बर,
सागर सूखेंगे, जल जाएँगे नद-निर्झर,
टूटेंगे तारे, पवन खड़ा हो जाएगा-
कूकते खेत-खलिहान पड़े होंगे निःस्वर,
मिट जाएँगे पद-चिन्हों से साहित्य-कला,
सभ्यता-संस्कृति का घोटेगा काल गला।
मानव पर हिंसा की नागिन लहराई है,
जीवन के मंत्र, अहिंसा के संग्राम, उठो! 4
*समाप्त*
(श्री कैलाश भारद्वाज)