“संघर्षों में जब मुख मोड़ा”

Akhandjyoti - 1943 - May


संघर्षों में जब मुख मोड़ा (kavita)

संघर्षों में जब मुख मोड़ा जीवन तब अभिशाप बन गया।

बाधायें तो आती हैं हर राह में उनसे डर कर पंथ छोड़ना कायरता है, शूर दिखाता नहीं पीठ रणभूमि में वह तो अंतिम श्वासों तक लड़ता रहता है, मानव जब भी डरा मृत्यु से पौरुष तब अभिताप बन गया ।।1।।

चलने वाले नहीं ढूंढ़ते साथ कभी ठोकर खा-खाकर भी आगे बढ़ते हैं, चढ़ने वाले नहीं मापते ऊँचाई वे प्रतिक्षण धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते हैं, ऊँच-नीच का भेद हुआ जब पुण्य तभी इक पाप बन गया ।।2।।

दुख-सुख, आशा और निराशा इस जग में यह सब तो अपने-अपने मन का भ्रम है, जो आया है वह जायेगा निश्चित ही इस आने जाने में ही सृष्टि का क्रम है, कष्टों में जब मन घबड़ाया तन तब बोझिल आप गया।।3।।


धर्म का प्राचीन और नवीन स्वरूप

(“एक जिज्ञासु”)

‘धर्म’ संसार का सबसे प्राचीन संगठन है। वह एक ऐसी संस्था है जिसने मनुष्य को पाशविक स्थिति से निकाल कर सभ्य और सुसंस्कृत बनाया है और उसको एक असहाय प्राणी के बजाय शक्तिशाली, सामाजिक प्राणी के रूप में बदल दिया है। अति प्राचीन काल से लोग धार्मिक क्रिया काण्डों, देवताओं की पूजा के उत्सवों, पवित्र तीर्थों के स्नान आदि के द्वारा ही परस्पर मिलने जुलने, विचार विनिमय करने और अपने को एक बड़े समुदाय के रूप में संगठित करने का प्रयत्न करते आये हैं। अगर ये सब साधन नहीं होते तो हमारे देश में ही काश्मीर से कन्याकुमारी तक और पेशावर से गौहाटी (आसाम) तक एक हिन्दू-संस्कृति का प्रचलन नहीं देख पाते। हमारा भारतवर्ष एक विशाल जन-संख्या वाला देश है, जो ऐसे सैंकड़ों हिस्सों में बँटा है जिनके लिये आपस में एक भाषा में बातचीत कर सकनी भी सम्भव नहीं है। यह धर्म-संस्था का ही प्रभाव है। जिसने इतने बड़े क्षेत्रफल में फैले हुए 38 करोड़ व्यक्तियों को एकता के सूत्र में बाँधने वाले कई प्रकार के साधन प्रदान किये हैं।

पर अब समय और परिस्थिति में बड़ा परिवर्तन हो गया है और अनेक भारतीय विद्वानों की तरफ से ही यह प्रश्न उठाया जाता है कि वर्तमान-युग में धर्म संस्था का क्या स्थान है? उसे समाज-संचालन का मुख्य आधार बनाया जा सकता है या नहीं? ये विद्वान धार्मिक सिद्धान्तों की सच्चाई- झुठाई पर बहस नहीं करते, वरन् केवल समाज-हित और उपयोगिता की दृष्टि से ही इन विषयों का निर्णय करना उचित समझते हैं। ऐसे ही एक विद्वान श्री लक्ष्मण शास्त्री ने प्राचीन धर्म के स्वरूप के सम्बन्ध में कई एतराज किये हैं। वे कहते हैं :-

“कुछ लोग कहते हैं कि मानव जीवन में ईश्वर का अस्तित्व, आत्मा का अमरत्व और कर्म विपाक की कल्पनाओं का कुछ मूल्य अवश्य है। सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान, सर्व गुण सम्पन्न परम कल्याणमय ईश्वर तर्क से सिद्ध हो या न हों; आत्मा का अमरत्व तर्क से समझ में आवे या न आवे, अथवा किसी व्यक्ति के किये हुए कर्मों का फल कभी उसी व्यक्ति को भोगना पड़ता है। यह बात प्रमाणों से साबित हो या न हो, पर इन वस्तुओं का अस्तित्व माने बिना मनुष्य इस संसार में समाज के प्रति अपना कर्तव्य या अन्य सत्कर्म धीरज से नहीं कर सकता, इसलिये इन वस्तुओं का अस्तित्व मान ही लेना चाहिए। मानव बुद्धि से परे की इन कल्पनाओं को स्वीकार करने से मनुष्य को कर्म की और जीवन की यथार्थता का अनुभव होता है। समाज की व्यवस्था को उत्तम रीति से संचालन करने के निमित्त ईश्वर, स्वर्ग, नर्क, आत्मा, पारलौकिक जीवन आदि वस्तुओं की सत्ता को मानना आवश्यक है।”

“इस कल्पना में अनेक दोष हैं। पहला यह कि संसार में सबसे बड़ी घटनायें ईश्वर-श्रद्धा और अमरत्व-भावना के आधार पर ही नहीं घटी हैं वरन् अन्य भौतिक आधारों पर भी घटी हैं। कला, विद्या, त्याग, शौर्य, पराक्रम आदि मानवी गुणों को पराकाष्ठा तक पहुँचाने में साँसारिक कारणों से ही प्रेरणा प्राप्त हुई है। जिन लोगों ने बड़ी-बड़ी राज्यक्राँतियाँ करके बड़े-बड़े राष्ट्रों को अन्याय- अत्याचार से मुक्त कराया है उनके हृदय में लोकसत्ता, स्वतंत्रता, बंधुत्व आदि आदर्शों की ही शक्ति काम कर रही थी। हमारे भारतवर्ष में भगत सिंह सरीखे लोग राष्ट्रीय स्वतंत्रता के ध्येय के लिये ही खुशी से फाँसी पर लटक गये। जहाँ पर जीवन-मरण का प्रश्न होता है, वहाँ भी अमरत्व और ईश्वर की भावना के बिना ही बड़े-बड़े कार्य अनेक देश और समाज हितैषी कर गये हैं। ईश्वर और आत्मा के अमरत्व पर जिनको श्रद्धा नहीं है, ऐसे अनेक बड़े-बड़े वैज्ञानिक भौतिक शास्त्र की खोज में रात दिन जी तोड़कर परिश्रम करते रहते हैं। वे लोग केवल ज्ञान की लालसा से, उपजीविका का साधन समझ कर, अथवा समाज-प्रीति से प्रेरित होकर ऐसे-ऐसे कार्य करते रहते हैं जिससे उनकी जान सदा जोखिम में रहती है और अनेकों के प्राण भी चले जाते हैं। माता अपने बच्चे के लिये जो कष्ट उठाती है वह स्वर्ग या ईश्वर की प्राप्ति के लिये नहीं होता, वरन् उसका जीव बच्चे के जीव के साथ एकमेक हो जाता है। अपने समूह या जमात के कायदे कानून पारलौकिक डर के बिना पूरी तरह से पालने की प्रवृत्ति जंगली लोगों में भी पायी जाती है। पर धार्मिक ध्येय के लिये प्रयत्न करने वाले व्यक्ति को अपनी पवित्रता की और पारलौकिक जीवन की ही अधिक चिन्ता रहती है। उसकी यह भावना प्रायः अत्यन्त स्वार्थी होती है।

दूसरा दोष यह है कि धर्म को आधार मान कर चलने वाले उन तमाम रीति−रिवाजों, भावनाओं, आचार-विचारों को, जो किसी समय तत्कालीन परिस्थिति के कारण प्रचलित किये गये थे, सदा के लिये अचल और अपरिवर्तनीय मान लेते हैं। ऐसे लोग कहते हैं कि यही परमेश्वरी आदेश या संकेत है, अथवा ऋषियों और महात्माओं का दिखाया महान सत्य यही है। इसका परिणाम यह होता है कि देश-काल और परिस्थिति के बदल जाने पर जब वे रीतिरिवाज या आचार-विचार निकम्मे या अनुपयोगी हो जाते हैं तो भी पारलौकिक विचार वाले व्यक्ति उन्हीं को चिपटे रहते हैं। इस प्रकार वे असामयिक विधि-निषेध समाज की प्रगति के मार्ग में रोड़ा बन जाते हैं। जिन धार्मिक आचार-विचारों को मनुष्य ने ही जन्म दिया और पाला-पोसा वही उसके ऊपर चढ़ बैठते हैं और नीचे गिराने का कारण बन जाते हैं। इसलिये अब ऐसे ध्येय और आदर्श चाहियें जो बुद्धिवाद पर आधारित हों और जो गरज पूरी हो जाने पर बदले जा सकें।

धार्मिक-आधार का तीसरा दोष यह है कि धर्म संस्था पर सत्ताधारी या शासक-वर्ग का प्रभाव पड़ता है और वे उन धार्मिक रीति-रिवाजों या विधि निषेधों का उपयोग जनता को गुलामी या अज्ञान पड़े रखने के लिये करते हैं। सब धर्मों का इतिहास बतलाता है कि ईश्वरवाद, अमरत्व, पाप-पुण्य और कर्म विपाक आदि धार्मिक समझे जाने वाले सिद्धान्तों का उपयोग सत्ता-धारियों ने अपने सामाजिक उच्च पद, भोग-साधन, स्वार्थ-साधन के लिये किया है। जातिभेद के विषत कायदों और अछूतपन की प्रथा को ऐसे ही ‘धर्म-सिद्धान्तों’ ने हजारों वर्षों तक जिन्दा रखा है।”

हम यह तो स्वीकार करते हैं कि धार्मिक आधार पर बनाये गये रीति रिवाज, विधि-निषेध कुछ काल बाद अन्ध श्रद्धा का रूप ग्रहण कर लेते हैं और अधिकाँश लोग उनके लाभ-हानि पर विचार न करके केवल ‘धर्म’ के नाम पर उनका पालन करते रहते हैं। इसका एक परिणाम यह भी होता है कि इस प्रकार आँख मूँद कर पालन करने से उन नियमों की उपयोगिता तो नष्ट हो जाती है और केवल ऊपरी खोल या छिलका शेष रह जाता है। पर इस त्रुटि या आक्षेप के कारण हम धर्म को ही सर्वथा त्याग दें यह विचारणीय है। जैसा लेखक ने कहा है, हम मानते हैं कि इतिहास में बड़ी-बड़ी घटनायें सामाजिक और नैतिक कारणों से घटी हैं और अनेक व्यक्तियों ने बिना पारलौकिक फल का विचार किए ही सार्वजनिक हित के लिये अपना बलिदान कर दिया है। पर हमारे मत से यह नियम समस्त जन-समूह पर लागू नहीं हो सकता। ऐसे उच्च विचारों या आदर्शों के व्यक्ति जो निःस्वार्थ भाव से या सामाजिक हित के नाम पर वास्तव में त्याग और कष्ट सहन कर सकें, समाज में थोड़े ही होते हैं। वर्तमान अवस्था में उनकी संख्या हमारे देश में 100 में से एक भी नहीं निकल सकती। शायद पाँच सौ में से ऐसा एकाध व्यक्ति मिले। तो फिर प्रश्न यह है कि शेष 499 व्यक्तियों के लिये कौन सा मार्ग स्थिर किया जाय। हम यह भी स्वीकार करते हैं कि आज कल मुँह से धार्मिक आदेशों को मानने की बात करते हुए भी अधिकाँश लोग उनका नाम मात्र को ही पालन करते हैं, तो भी अनुमान से यह कहा जा सकता है कि पूरी जनसंख्या नहीं तो उसका आधा भाग धार्मिक आदेशों और विधि निषेधों के कारण अनेक अनुचित और समाज-विरोधी कामों से बचा रहता है। इस लिये वर्तमान स्थिति में तो लेखक के मतानुसार धार्मिक-आधार को छुट्टी दे देना अपने ही लिये घातक होगा। हमको धर्म के ‘नित्य’ सिद्धान्तों का महत्व स्वीकार करके समाज को उन पर चलाना ही पड़ेगा।


सच्ची आध्यात्मिकता का मार्ग

(डॉ. भीकनलाल जी आत्रेय)

भारत के एक प्रसिद्ध चित्रकार श्री कनु देसाई ने महात्मा गाँधी का एक चित्र बनाया है, जिसमें महात्मा जी अन्धेरी रात्रि में एक हाथ में छोटी-सी टिमटिमाती लालटेन और दूसरे हाथ में सहारा देने वाली लाठी को लिये घने जंगल में चले जा रहे हैं। मुझे ऐसा जान पड़ता है कि यह चित्र मानव-जीवन का एक बहुत सुन्दर निदर्शन है। वास्तव में मानव-जीवन एक ऐसे घने, अंधेरे और अपार जंगल में यात्रा कर रहा है , जिसके सम्बन्ध में हमें कुछ भी ज्ञात नहीं है। हम कौन हैं? कहाँ से आये हैं? कहाँ जा रहे हैं? क्यों जा रहे हैं, किधर जाना है, कौन सा मार्ग उचित है- इन सब बातों का ठीक-ठाक पता यात्रियों में से किसी को नहीं है। सब अपने-अपने अनुभव के आधार पर, या दूसरों के कहने सुनने के आधार पर अपनी कल्पना से इन प्रश्नों का उत्तर गढ़ लेते हैं। इस घने जंगल में कोई सड़क नहीं है, जिस पर बिना खटके अन्तिम लक्ष्य-स्थान तक पहुँच जाने के लिये चल सकें। केवल हमसे पहले आने वाले यात्रियों की पगडंडियाँ ही कहीं-कहीं दिखाई पड़ती हैं। इनको देखने के लिये हमारे पास हार्दिक बल की टिमटिमाती लालटेन के सिवा और कुछ नहीं है। वे पगडंडियाँ भी एक दूसरे से मिली हुईं, कटी हुईं और जहाँ-तहाँ टूटी और मिटी हुई हैं, कभी-कभी कुछ दूर जाकर हमको यह मालूम होने लगता है कि हमको दूसरे मार्ग से चलना था तब हम पीछे लौटते हैं या दूसरा मार्ग ग्रहण करते हैं। अनेक यात्री इसी प्रकार इधर-उधर भटकते रहते हैं, और थककर, वृद्ध होकर, या आहत होकर गिर पड़ते हैं।

जीवन की यह दशा होते हुये हमें क्या करना चाहिये, यह कहना बहुत कठिन है। यात्रा को स्थगित करके बैठ जाना तो उचित नहीं जान पड़ता, क्योंकि पीछे से आने वाले यात्रियों के रास्ते में रुकावट होने के कारण हमारे दूसरों द्वारा कुचल दिये जाने की संभावना है। इस लिये अपने छोटे से प्रकाश से, दीपक-प्रकाश से लाभ उठाते हुए, हृदय में जीवन के प्रति श्रद्धा और विश्वास रखते हुए चलते रहना ही उचित है। हाँ, एक बात जो निश्चित है वह यह है कि मेरी ही तरह और भी अनेक यात्री इस घने वन में भटक रहे हैं, मेरा और उनका मार्ग भले ही पृथक हो, पर वे सब हैं तो मेरे ही समान भटकते पथिक। उनके साथ सहानुभूति, प्रेम और सहयोग करना मेरे लिये इस कारण उचित है कि मैं स्वयं भी अपने प्रति उनकी सहानुभूति, प्रेम, सहयोग की आकाँक्षा रखता हूँ। मुझे चाहिये कि जैसा व्यवहार मैं दूसरों से अपने प्रति नहीं चाहता वैसा दूसरों के प्रति भी न करूं। महाभारतकार श्री वेद व्यास जी ने इस बात को ही ‘धर्म सर्वस्व’ या धर्म का सार बताया है-

श्रूयताँ ‘धर्म सर्वस्व’ श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्।। न तत्परस्य कुर्वीत स्यादनिष्टं महात्मनः। यद्यदात्म निचेच्छेत् तत्परस्यापि चिन्तयेत्।।

अर्थात् “धर्म का सार जो है उसको सुनो और सुनकर उसके ऊपर चलो। वह सार यह है- जो व्यवहार तुमको अपने लिये प्रतिकूल जान पड़े वैसा दूसरे के लिये न करो। जो अपने लिये अनिष्ट है उसे दूसरे के लिये न करो, और जिसे अपने लिये इच्छा करते हो दूसरे के लिए भी उसी की इच्छा करो।” जहाँ तक हम विचार सकते हैं इससे बढ़कर शुभ और स्पष्ट शिक्षा और किसी महात्मा ने नहीं दी है। इस पर आचरण करने से मनुष्य का जीवन निस्सन्देह सुखमय और यह जगत स्वर्ग के समान हो सकता है।


राज-धर्म-शास्त्र का अन्तिम रहस्य

(डॉ. भगवान दास जी)

राज्य अथवा शासन का नियन्त्रण किस प्रकार रखा जाय यह एक बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। आज कल प्रजातंत्र शासन में भी इस समस्या का कोई उचित मार्ग नहीं निकल सका है। इस प्रकार के शासनों में भी प्रायः सबसे अधिक योग्य व्यक्तियों का शासन होने के बजाय कुछ चलते-पुर्जे या शक्तिशाली व्यक्तियों के गुट को प्रधानता मिल जाती है और शासन-व्यवस्था करते समय अधिक ध्यान अपने दल वालों का ही रखते हैं। इसके फलस्वरूप न तो जनता में संतोष का भाव उत्पन्न हो पाता है और न सबको न्यायानुसार जीवन-निर्वाह की सुविधायें ही प्राप्त हो सकती हैं।

हिन्दू-शास्त्र कारों ने समाज की न्यायानुकूल व्यवस्था के लिये ही चार वर्णों की स्थापना की थी और उनके कर्तव्यों का इस प्रकार विभाजन किया था कि कोई भी अनीति के मार्ग का अवलम्बन करके समाज में अव्यवस्था और असंतोष उत्पन्न न कर सके। उस काल में भी समय-समय पर कुछ अविचारी अथवा उच्छृंखल प्रकृति के व्यक्ति पैदा हो जाते थे, पर समाज का सजीव-संगठन उनके विपरीत कार्यों का प्रतिरोध करता और उनको उचित रास्ते पर ले आता।

समाज के इस प्रकार के विभाजन की आवश्यकता प्रत्येक देश अथवा राष्ट्र को पड़ती है, क्योंकि इसके बिना अराजकता अथवा अव्यवस्था की स्थिति का उत्पन्न हो जाना अनिवार्य है। पुराने उदाहरणों को छोड़ दीजिये सबसे नवीन सामाजिक व्यवस्था वाले और क्राँतिकारी कहे जाने वाले रूस ने भी अपने संघ-राज्य का नाम ‘दी वर्कर्स’, सोल्जर्स पेजेन्टस सोवियेट ऑफ रशिया’ रखा है। इसका अर्थ होता है, रूस के कर्मकारों, योद्धाओं और किसानों का पंचायती राज्य ‘कर्मकारों या श्रम जीवियों के स्वभावतः दो विभाग होते हैं- एक बुद्धि से काम करने वाले और दूसरे शरीर से। इस प्रकार रूस के कम्यूनिस्ट समाज को भी विवश होकर वे ही चार अंग मानने पड़े और नाम भी उनके पुराने से ही हैं। इस्लाम धर्म की सभ्यता के शब्दों में इनको (1) आलिम (विद्वान) (2) आमिल (कार्यकर्ता) (3) ताजिर व्यापारी (4) मददगार (सहायक) कहते हैं इन विभागों के लिये संस्कृत भाषा में जो ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि नाम रखे गये हैं, उनसे तो हम सुपरिचित हैं। पर काल के प्रवाह में वे इतनी दूर बह गये हैं कि अति प्रसिद्ध होते हुए भी अब उनको निरर्थक ही समझना चाहिये। अब उनकी जगह कुछ नये नाम बनाये जायें तभी काम चल सकता है, जैसे शिक्षक, रक्षक, पोषक, सहायक- अथवा ज्ञानी, शूर, दानी, समर्थक- अथवा शास्त्री, शस्त्री, धनी, अनुचारय आदि। वर्तमान स्थिति में वर्ण व्यवस्था का स्वरूप जो नितान्त अन्धकाराच्छन्न हो गया है, वह इसी प्रकार कोई सार्थक परिवर्तन करने से पुनः प्रकाश में आ सकता है।

कुछ लोग यह शंका उठाते हैं कि प्रजा का यह विभाजन कौन करेगा और कौन इस बात का निर्णय करेगा कि निर्दिष्ट व्यक्ति में उक्त गुण और योग्यता है या नहीं? इस विषय के धर्म का, कानून का प्रवर्तन और आचरण कैसे किया जायेगा? जो लोग अपने कर्तव्य का पालन न करके समाज का अहित करेंगे उनको दण्ड कैसे दिया जायेगा?

इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि इस प्रकार की शंका प्रत्येक नियम या संगठन के विषय में की जा सकती है। और यह सत्य भी है कि किसी भी धर्म या कानून के पूर्ण रूप से पालन किये जाने की गारन्टी कोई नहीं कर सकता। भारतवर्ष के शासकों की आरे से ‘दण्ड-विधान’ (पीनलकोड) का निर्माण बड़े परिश्रम के साथ किया जा चुका हैं और उसकी एक-एक धारा की सूक्ष्म व्याख्या के लिये कानून के पोथे भरे पड़े हैं, पर तो भी पाप (जुर्म) होते ही हैं। चाहे कुछ भी व्याख्या की जाय बहुत सा भरोसा अधिकारियों (सरकारी नौकरों) की सद्बुद्धि और ईमानदारी पर करना ही पड़ता है। कानून का अमल उनकी अकल और नीयत पर निर्भर रहता ही है- उनके विवेक और निर्णय पर छोड़ा ही जाता है। इसलिये समाज संगठन का एक मूल-विधान ‘काँस्टीट्यूशन’ समस्त जनता मिलकर तैयार कर देती है और फिर उसी के आधार पर भिन्न-भिन्न विषयों के नियम बनाकर समाज-व्यवस्था को प्रचलित रखा जाता है। इस सम्बन्ध में भारतीय स्मृतिकारों का मत है-

“स राजा पुरुषो दण्ड........ धर्मस्य प्रतिभूस्मृतः (मनु.)

“माना कि कोई व्यक्ति धर्म के विरुद्ध आचरण करे तो ‘स्वराज-विधान’ के अनुसार नियुक्त अधिकारी उसका नियंत्रण करे। यदि नीचे का अधिकारी उचित कार्य न करे तो उच्च अधिकारी दण्ड-प्रयोग करे। यदि उच्च अधिकारी (राजा या प्रधान या प्रेसीडेण्ट) अन्याय-मार्ग में चले तो ‘धर्म-परिषद’ उसका निग्रह करे।” ‘शुक्रनीति’ (अ. 2 श्लोक 77-79) में कहा गया है-

यत्कोपभीत्या राजाऽपि धर्म नीतिरतो भवेत्। सैवाचार्यः पुरोधाः यः शापानुग्रहयो क्षमः।।

“पुरोहित वही है जो राजा का भी निग्रह और अनुग्रह यथोचित कर सके। जिसके कोप के भय से राजा, धर्मनीति पर ही, कानून की मर्यादा के अनुसार ही चले।” मनु ने भी कहा है-

क्षत्रस्याति प्रवृद्धस्य ब्रह्मणानति वर्त्ततः। ब्रह्मैव संनियंतृस्यात् क्षत्रं हि ब्रह्म संभवमः।।

“यदि कर्म प्रधान अधिकारी वर्ग (क्षत्री) सैनिक शक्ति (मिलिटरिज्म) पर उतारू हो जाय और ज्ञान प्रधान पुरोहित वर्ग की अवहेलना करे- उनका कहना न माने, तो पुरोहित-वर्ग को ही उसका दमन करना होगा, क्योंकि ज्ञान से ही कर्म की उत्पत्ति होती है।” भागवत् (1-18-34) में कहा गया है-

“ब्राह्मणैः क्षत्रबंधुर्हि द्वारपालो नियोजितः।”

“प्रजा के ज्ञानी-वर्ग (ब्राह्मणों) ने राजा आदि कर्मी-वर्ग को प्रजा की रक्षा के लिये चौकीदार (द्वारपाल) मुकर्रर किया है।”

यहाँ तक तो स्मृतियों की व्यवस्था समझ में आती है। पर यदि पुरोहित वर्ग (ज्ञानी-वर्ग) भी काम, क्रोध, मोह, मद, मत्सरादि से अन्ध हो जाय और पथभ्रष्ट, पाखण्डी, दुष्ट बुद्धि होकर ज्ञान को स्वार्थ का दास बना दे- यदि ब्रह्म और क्षेत्र (चर्च और स्टेट) दोनों आपस में मिलकर प्रजा की यम-यातना करने लगें, तब क्या उपाय है? तब कौन दंड का प्रयोग करेगा? पहरेदार पर पहरा कौन देगा? ऐसा न होने पर अन्त में जन-समूह की उसी अव्यक्त शक्ति को- जिसने मूल राष्ट्र-विधान बनाया था- फिर से धर्म संस्थापनार्थ नये रूप में अवतार लेकर- नया विप्लव (रिवोल्युशन) करके ब्रह्म, क्षत्री, वैश्य, शूद्र सबका पुनः संशोधन करना पड़ेगा- समाज और राष्ट्रीय-विधान का जीर्णोद्धार करना पड़ेगा।

इस विवेचना से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ‘स्वराज्य-विधान’ में धर्म-रक्षक पुरोहित के ऊँचे प्रतिमान (स्टैंडर्ड) का समावेश अवश्य होना चाहिये। अर्थात् उसको ऊँचे दर्जे का परार्थी, अनुभवी और धीमान् भी होना चाहिये,क्योंकि वही समस्त प्रजा के सुख और सुरक्षा का अन्तिम आधार है। ऐसी शर्तों के समावेश करने का कम से कम इतना फल अवश्य होगा कि वह आदर्श निर्वाचकों के सम्मुख सदा उपस्थित रहेगा- उनको अन्धकार में दीपक का काम देगा, चुनने वालों के लिये जो आवश्यक शिक्षा है कि ठीक चुनाव कैसे करना, यह शिक्षा भी उनको निरन्तर देता रहेगा। क्रमशः यह आदर्श उनके हृदयों में प्रवेश करेगा और उनके चुनाव कार्य पर प्रभाव डालेगा। वे स्वभावतः ही-अन्तर्बोध से अच्छे योग्य व्यक्तियों का चुनाव करने लगेंगे। ये व्यक्ति ऐसे होंगे जो समाज के उपरोक्त चार प्रधान विभागों में से किसी न किसी एक विभाग के धर्म-कर्म के अच्छे अनुभवी होंगे। और साथ ही निस्वार्थ और सर्व लोक हितैषी भी होंगे। याद रहे कि प्रत्येक सभ्य और समृद्धिशाली मानव समाज में, राष्ट्र में ये चारों परस्पराश्रित अंग वैसे ही वर्तमान रहते हैं जैसे जीवित शरीर में प्रसिद्ध चारों अंग- सिर (ज्ञानेन्द्रिय), बाँह (कर्मेन्द्रिय), धड़ (अन्न संचय शक्ति) और पैर जो सबका बोझ सँभालते रहते हैं।


योगाभ्यास द्वारा अशुभ कर्मों का नाश

(प्रो. लालजी राम शुक्ला)

भारतीय अध्यात्म-विद्या के जानकारों ने चार प्रकार के योग माने हैं- मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग, राज योग। मन्त्रयोग में किसी मन्त्र के सहारे चित्त को एकाग्र किया जाता है। किसी मन्त्र का उच्चारण करने तथा उसके अर्थ की भावना करने से साधक का मन संसार के विभिन्न विषयों से खिंचकर एक लक्ष्य की ओर लग जाता है। किसी बाहरी मूर्ति का भी इसमें सहारा लिया जा सकता है। मन्त्रयोग आत्मा की परोक्ष अनुभूति कराने का अन्यतम उपाय है। चेतन सत्ता को अपने से पृथक मानकर उसकी आराधना की जाती है। मन्त्रयोग, भक्ति का एक रूप है। जब ध्यान करने वाले और ध्येय में अत्यन्त घनिष्ठता हो जाती है तो उनका ऐक्य हो जाता है। अपने ही स्वरूप को अपने से पृथक कल्पना करके उस तक पहुँचने की चेष्टा मन्त्रयोग द्वारा की जाती है।

दूसरा हठयोग है। मन्त्रयोग में आत्मा के स्वरूप की विस्मृति रहती है। हठयोग में व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक अपने आपको बाहरी विषयों और विचारों से अलग करना चाहता है। आत्मा से पृथक प्रत्येक पदार्थ से विचारों को अलग करने की चेष्टा हठयोग में होती है। जिस-जिस जगह मन जाय, उस-उस स्थान से मन को अलग करते रहने का प्रयास करना हठयोग है। हठयोग के द्वारा आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता की अनुभूति होती है। क्योंकि जब हम अपनी मनोवृत्तियों का सदा नियन्त्रण करते रहते हैं, तो हमें यह ज्ञान हो जाता है कि हम वृत्तियों से पृथक कोई स्वतन्त्र पदार्थ हैं। इस प्रकार का ज्ञान मानसिक झंझटों का अन्त करने के लिये अत्यन्त आवश्यक है। पहले पहल मन जिस विषय से प्रयत्न करने पर भी नहीं हटता, उसी विषय पर से हठयोग का अभ्यास करने से शीघ्रता से हट जाता है।

मान लीजिये, हमारा मन बार-बार किसी प्रकार की खाने की वस्तु में जाता है, हठयोग के द्वारा मन को उस वस्तु के प्रति उदासीन किया जा सकता है। स्वामी रामतीर्थ को सेब से बड़ा प्रेम था। वे जब सेब को देखते तो उनका मन और सब बातें भूलकर उसी का चिन्तन करने लगता था। इस प्रकार मन के चंचल हो जाने से विचार में विक्षेप हो जाता था। इस कमजोरी को दूर करने के लिए उन्होंने एक सेब खरीदा और उसे अपने पढ़ने की मेज के ऊपर सामने ही रख लिया। वे प्रतिदिन उसकी ओर टकटकी लगाकर देखते थे। इस प्रकार आठ दिन तक उन्होंने उसकी ओर देखा। फिर जब वह सूख गया तो उसे उठाकर फेंक दिया। इस प्रकार उन्होंने एक महीने तक अभ्यास किया और कई सेबों को सड़ाकर फेंका। इसके बाद उनके मन में सेब की बात कभी नहीं आती थी। बार-बार वृत्तियों पर विजय प्राप्त करने से वे शिथिल हो जाती हैं और मन वश में हो जाता है।

मनुष्य जिस प्रकार का निर्देश अपने आपको देता है, उसका स्वभाव वैसा ही बन जाता है। उसमें अज्ञात शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं। जब मनुष्य प्रतिदिन यह अभ्यास करता है तो सुन्दर से सुन्दर वस्तु के प्रति आकर्षित नहीं होता। इसका एक उदाहरण ‘साइकोलॉजी एण्ड मोरल्स’ नामक पुस्तक में दिया गया है। एक व्यक्ति को कोकीन खाने की आदत पड़ गयी थी। वह चाहता था कि मैं इस हानिकारक आदत को छोड़ दूँ पर अनेक प्रयत्न करने पर भी वह नहीं छूटती थी। वह अपने पास कोकीन नहीं रखता था, पर जब कभी कोकीन की दुकान के पास से निकलता तो अनायास वहाँ ठहर जाता और कोकीन खरीद कर खा लेता। इस लत को नष्ट करने के लिये उसे ‘मति-निर्देश’ का अभ्यास कराया गया। इस अभ्यास में वह व्यक्ति कल्पना में अपने को उस दुकान के पास से निकलता और उसकी कुछ भी परवा न करता हुआ ध्यान करता था। इस प्रकार के अभ्यास से कुछ समय में उसमें अद्भुत परिवर्तन हो गया। अब उस व्यक्ति को उस दुकान के पास से बार-बार निकल जाने पर भी उसकी याद नहीं आती थी और इससे उसका कोकीन का व्यसन छूट गया।

किसी विचार को मन से भुलाने के लिये किसी भी एक तार होने वाली क्रिया पर ध्यान देना अथवा लययोग का अभ्यास करना उपयोगी होता है। कानों में भीतर से आने वाली ध्वनि पर मन को लगाना, श्वास-प्रश्वास की ध्वनि पर मन को लगाना, ॐ की ध्वनि करना, अथवा किसी बाजे की एकाकार ध्वनि में मन को लगा देना आदि विधियों से भी मन शाँत हो जाता है। आत्म-निर्देश भी मन को शाँत अवस्था में ले जाता है। अपने आपको बार-बार यह सुझाने से कि ‘मैं शान्त हूँ’ मन शान्त हो जाता है।

राज योग में आध्यात्मिक विचार की प्रधानता रहती है। जब मनुष्य को अपने स्वरूप का निश्चय हो जाता है, तब उसे प्रसन्न करने वाले नये-नये विचार उत्पन्न होते हैं। तब वह बाहरी विषयों से उत्तेजित होकर विचार नहीं करता, वरन् भीतर से प्रेरणा होने पर विचार करता है। उसके विचार रचनात्मक होते हैं। जब तक मनुष्य के विचार किसी निश्चय से प्रेरित होकर क्रियमाण नहीं होते, तब तक वे संसार का वास्तविक कल्याण नहीं करते। अपने आपका और संसार का कल्याण करने वाले विचार आत्म-प्रेरणा से तथा निश्चयात्मक मनोवृत्ति से उत्पन्न होते हैं। जब मनुष्य को अपने स्वरूप का निश्चय हो जाता है, तब फिर वह आत्मतत्व को ही सब ओर देखता है और उसे सभी कामों में आत्म-साक्षात्कार होता है-

जहँ-जहँ जाऊं सोइ परिक्रमा, जोइ-जोइ करुँ सो पूजा। सहज समाधि सदा उर राखूँ, भाव मिटाऊँ दूजा।।

राजयोग सभी लोगों के लिये संभव नहीं होता। जब तक मनुष्य अपने आपको परमात्मा का एक यंत्रमात्र नहीं मान लेता और सभी प्रकार के कर्म अहंभाव छोड़कर नहीं करता तभी तक उसके कर्म उसके बंधन के कारण बनते हैं। पर जब कोई काम मनुष्य अपने आपको सर्वात्मा का यंत्रमात्र मानकर करता है, तब उसके कर्म और विचार, पुराने अशुभ कर्मों और विचारों के संस्कारों को नष्ट कर देते हैं। राजयोग और आत्मज्ञान की मनोवृत्ति में कोई भेद नहीं है। राजयोगी या ज्ञानी को मन से संघर्ष नहीं करना पड़ता। वह मन को किसी न किसी प्रकार के व्यवसाय से लगाये रहता है। वह व्यवसाय के करने में आनन्द की अनुभूति करता है और व्यवसाय करना ही उसका स्वतः लक्ष्य बन जाता है। जहाँ दूसरे लोग बाहरी फल के लिये लालायित रहते हैं और फल प्राप्त होने पर अपने-आपको भाग्यशाली मानते हैं, आत्म-ज्ञानी बाह्य को नहीं देखता, वह क्रिया के लिये ही क्रिया करता है। इस प्रकार की क्रिया का बाह्य शुभ परिणाम भी होता है, परन्तु इस परिणाम को प्राप्त करना उसके कार्य का उद्देश्य नहीं रहता। काम करने में जो आनन्द रहता है, उसका वही लक्ष्य रहता है।

जो ज्ञान मनुष्य को आत्म निर्देश अथवा अंतर्दर्शन के रूप में प्राप्त हुआ है और जिससे उसे अलौकिक शान्ति प्राप्त हुई है, उसका दूसरे लोगों में वितरण करना भी बड़ा पुनीत कार्य है। इस कार्य से आत्म साक्षात्कार में सहायता मिलती है। ज्ञान जितना ही अधिक दूसरों को दिया जाता है, उतना ही वह बढ़ता है। बार-बार किसी भावना को मन में लाने से वह भावना दृढ़ होती है। वह मनुष्य के चेतन मन से फिर अचेतन मन में चली जाती है और उसके स्वभाव का अंग बन जाती है।

योगाभ्यास कर्म-संस्कारों का नाशक है। किसी भी भले अथवा बुरे कर्म के फल मनुष्य के मन में रहते हैं। ये हमारे अदृश्य मन में संस्कार रूप में पड़े रहते हैं। ये संस्कार समय आने पर फल देते हैं। हमारी पुरानी अनुभूतियाँ अनेकों प्रकार की वासनायें उत्पन्न करती हैं ये वासनायें फिर बाह्यजगत में प्रकाशित होती हैं। इन पुराने संस्कारों तथा वासनाओं को योगाभ्यास द्वारा नष्ट किया जा सकता है। कोई भी भावना, प्रतिकूल भावना द्वारा नष्ट हो सकती है। कर्मों की जड़ अज्ञान और बहिर्मुखता में है। जब मनुष्य आत्म ज्ञान के लिये यत्न करने लगता है और अन्तर्मुखी होने की चेष्टा करता है, तब उसके अनेक कर्म संस्कार अपने आप नष्ट हो जाते हैं। ज्ञानाग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है। थोड़े समय का योगाभ्यास भी अनेक जन्म के अशुभ कर्मों के फल को नष्ट करने में समर्थ होता है।


बेईमानी एक मूर्खता है।

(श्री रामचरण महेन्द्र)

बुराई सच्चाई की छाया में पलती है। यदि कुछ व्यक्ति धोखे और बेईमानी से सम्पन्न होते हुए दिखाई देते हैं तो स्मरण रखिए यह सब इसलिये है कि लोग उन्हें सच्चा और ईमानदार समझते हैं। उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि अमुक व्यक्ति सच्चा है। यदि बेईमानी में शक्ति होती तो लोग खुले आम बेईमानी की प्रशंसा करते। किन्तु कोई बेईमानी की प्रशंसा नहीं करता। जन-समाज बेईमानी के विरुद्ध इसलिये है कि इसमें शक्ति नहीं, शक्ति का आभास मात्र होता है। बेईमानी की शक्ति थोड़े दिन बाद स्वयं प्रकट हो जाती है।

चोर, डाकू, पाकेटमार, वेश्या इत्यादि दिन-रात रुपया कमाते हैं। यदि ये अपना रुपया एकत्रित करें तो रुपये से घर भर सकते हैं। किन्तु ऐसा नहीं हैं। बेईमानी का धन होने के कारण वह एक ओर से आकर दूसरी ओर निकल जाता है। रिश्वत जैसे आती है, वैसे ही तितर-बितर हो जाती है। ये व्यक्ति जैसे-के-तैसे रह जाते हैं।

मानव भोग खूब भोगना चाहता है। खूब ऐश-आराम, विलासप्रियता, वासना-सुख चाहता है। इस तृष्णा के कारण सर्वत्र अतृप्ति और अशाँति है। मनुष्य जितना ही अपनी आवश्यकताएं बढ़ाता है, उतना ही दुःखी रहता है। वासना भी मोह और अतृप्ति का कारण है। विकार-ग्रस्त व्यक्ति कुछ नहीं कर सकते। ये सदा अपने विकारों की तृप्ति में ही फंसे रहते हैं। वासना में कभी शान्ति नहीं मिलती। शरीर की इच्छायें कुछ भी नहीं दे सकतीं। यह आपके स्वास्थ्य और यश प्रतिष्ठा को नष्ट करने वाली हैं। काम वासना कुछ नहीं, स्वयं अपनी ही हड्डियों का दूध है। आपके जीवन और स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला है। भोगों में लय होना, मानों अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देना है। इसमें कोई सार नहीं है। कोई सुख-शान्ति नहीं है। इसी प्रकार धन-संग्रह भी एक मोहवृत्ति है। व्यर्थ की तृष्णा है। खाने में आप उतना ही खायेंगे अधिक नहीं भर सकते। वस्त्र भी उतना ही पहिन सकते हैं सोने के लिए खाट भी उतनी ही चाहिये। खान-पान, रहन-सहन इत्यादि के लिये आप को मामूली व्यक्ति जैसी वस्तुएं ही चाहिएं। इन्हें आप ईमानदारी से कमा सकते हैं।

भोग और लोभ ये बुराइयों की दो जड़ें हैं। इन्हें रोकने से आप सुखी रहेंगे। एक को ठगेंगे, तो दूसरा आप को ठगेगा, तीसरा उसे ठगेगा। इस प्रकार ठगी और बेईमानी सर्वत्र फैल जायेगी। यदि आप ईमानदारी को अपना ध्येय बनायेंगे, तो वही सर्वत्र फैलेगी। बेईमानी सब प्रकार के विकास को नष्ट करती आ रही है। यह एक सस्ती चीज है, जो मनुष्य की शक्तियों को कुँठित कर देती है। बेईमानी से जब उद्योग धन्धों और व्यापार का नाश होता है। छल-कपट अधिक दिन टिकने वाले नहीं हैं।

बेईमानी के कारण, वास्तविक व्यक्ति जो विश्वासपात्र हैं, उन पर से भी विश्वास उठ गया है। मानव को मानव पर विश्वास करना कठिन हो रहा है। जनता को नेता का, नेता को जनता का, पिता को पुत्र का, पति को पत्नी का, पत्नी को पति का विश्वास नहीं है। समाज के सब संगठन बेईमानी के कारण टूट-फूट गये हैं। रोगी को डॉक्टर पर विश्वास नहीं है। वह समझता है कि जो दवाई उसे दी जा रही है, वह केवल रंगा हुआ जन मात्र हो सकता है। जनता समझती है कि नेता उसे पथभ्रष्ट कर रहे हैं। यदि हम बेईमानी के विरुद्ध कड़ा कदम उठा लें, तो एक ऐसा केन्द्र उपस्थित कर सकते हैं, जहाँ से सत्य, न्याय और प्रेम की किरणें विकेन्द्रित हो सकती हैं। ये ही किरणें सर्वत्र व्याप्त होकर दूषित वातावरण को शुद्ध कर सकती हैं।

बेईमानी आपके जीवन का कोई अंग नहीं बनना चाहिये। बेईमानी अप्राकृतिक है। उसे व्यवहार में लाने से हमें अपनी आत्मा का हनन करना पड़ता है। हम झिझकते रहते हैं कि कहीं हमारे झूठ-फरेब प्रकट न हो जाए, हमारा रहस्य प्रकट न हो जाए, हमें लोग बुरा-भला न कहें। बेईमानी हमारे गुप्त मन में दुराव-छिपाव की भावना-ग्रन्थि उत्पन्न करती है और सदा किसी-न-किसी प्रकार प्रभावित किया करती है।

बेईमानी अंधकार है, तो ईमानदारी शुभ प्रकाश है। ईमानदारी में मनुष्य धन-हीन और अभावग्रस्त रह सकता है, किन्तु उसके मन में शान्ति और संतुलन रहता है। उसका चरित्र-निर्माण दृढ़ पृष्ठभूमि पर रहता है। उसे यह झिझक या शंका नहीं रहती कि कोई किसी दिन आकर उसकी बेईमानी को पकड़ लेगा या उसकी अप्रतिष्ठा होगी। उसकी नौकरी जायेगी या मुकदमे चलेंगे। ईमानदारी से रहना सच्चाई से रहना है। ईमानदारी की सच्चाई दीर्घकाल तक चलने वाली है।


विचारों द्वारा भी संसार का कल्याण किया जा सकता है।

(श्री महावीर प्रसाद जी)

सृष्टि के सभी पदार्थों में विद्युत शक्ति पायी जाती है और वह दो धाराओं में बंटी रहती है जिनको ‘निगेटिव’ (ऋणात्मक) और ‘पॉजिटिव’ (धनात्मक) विद्युत कहते हैं। नारी और नर के शरीर में भिन्न-भिन्न प्रकार की विद्युत धारायें बहा करती हैं। नारी के शरीर में ऋणात्मक और पुरुष के शरीर में धनात्मक विद्युत अधिक मात्रा में होती है। युवावस्था में नवीन रक्त होने के कारण ये धारायें अधिक मात्रा में होती हैं, पर दोनों की एकाँगी ही होती हैं, अर्थात् उस अवस्था में पुरुष धनात्मक और स्त्री में ऋणात्मक विद्युत ही पायी जाती है। इसी का परिणाम है कि उस अवस्था में युवक युवती का आकर्षण एक दूसरे के प्रति बहुत अधिक रहता है, मनुष्यों और पशु-पक्षियों के पारस्परिक प्रेम का यही वैज्ञानिक रहस्य है।

शरीर में विभिन्न रूप से अग्नि रूपी विद्युत निवास करती है, जिसे तेजस कहते हैं। हर एक देश के लोगों ने इसे किसी न किसी रूप में स्वीकार किया है। योरोप के विद्वानों ने इसको ‘पर्सनल मैग्नेटिज्म’ या ‘औरा’ के नाम से पुकारा है, अरबी में इसे ‘नूर’ कहा गया है। हमारे यहाँ इसे ‘ओजस’ का नाम दिया गया है। इसकी कमी होने से मनुष्य का आकर्षण, सौंदर्य, शारीरिक बल, बुद्धि, स्मरण शक्ति या धारणाशक्ति और इन्द्रियों की स्फूर्ति इत्यादि सब नष्ट हो जाती है। शरीर यक्ष्मा, प्रमेह, निर्बलता आदि तरह-तरह के रोगों से क्षीण हो जाता है।

यह तो सब जानते ही हैं कि शरीर की ‘धातुओं’ के पचने से ओजस् उत्पन्न होता है। यह ओज ही प्राणी के शरीर की श्री, कान्ति, प्रतिभा और दीर्घायु का मूल है। शरीरस्थ सप्त धातुओं में से शुक्र या वीर्य ही स्नेह की तरह बलता हुआ शरीर को प्रकाशित करता है। यही ओजस भी होता है, जिसे तेजस कहते हैं। ओजस लौ (दीप शिखा) है और तेजस उसका प्रकाश है। नारी और नर में लौह-चुम्बक का सा स्वाभाविक खिंचाव होने के कारण दोनों साथ-साथ रहना पसन्द करते हैं, वे परस्पर आकर्षण का अनुभव करते हैं तथा साथ-साथ रहना चाहते हैं। चकवा, कबूतर, सारस, बत्तख, तीतर, राजहंस आदि पक्षी एवं सिंह, भेड़िया, हिरन आदि पशु प्रायः जोड़े से ही रहते हैं। जो उपयुक्त जोड़ा चुनना नहीं जानते, वे भी समय-समय पर परस्पर आकर्षित होते रहते हैं। इस आकर्षण को ‘प्रेम’ के नाम से पुकारा जाता है। यही डोर प्राणियों को साथ-साथ रहने के लिये आपस में बाँधे रहती है। परन्तु जो लोग ‘प्रेम’ में काम वासना को सम्मिलित करते हैं, उनको घोर अज्ञानी और कलुषित हृदय समझना चाहिये। प्रेम और वासना अलग-अलग वस्तुएं हैं। मन को चाहे कोई कितना ही धोखा दे, प्रेम, प्रेम है और वासना-वासना ही है। काम रहित प्रेम मनुष्य को ऊँचा उठाता है और काम-वासना वाला सम्बन्ध मनुष्य को नीचे गिराता है। प्रेम में पावनता की प्रतिष्ठा है। अतः जो व्यक्ति निरन्तर प्रेम, उत्साह, उल्लास, उत्कर्ष, आनन्द, दया आदि के विचारों से अपने मन को परिपूर्ण रखता है उसका जीवन सदैव प्रसन्न, उन्नत एवं शक्तिशाली बना रहता है।

सभी पुरुष न तो पशु हैं और न सभी नारी देवियाँ। जो व्यक्ति-चाहे वे पुरुष हों या स्त्री-काम, क्रोध, लोभ तथा मोह आदि विकारों की अग्नि से अपने तेजस को नष्ट कर लेते हैं, वे स्वयं तो जला ही करते हैं, साथ ही इन प्रज्वलित अंगारों को फेंक कर दूसरों को भी जलाते हैं। तरुण व्यक्ति यदि विवाह की इच्छा करे तो यह उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। इसमें हानि कुछ नहीं, लाभ ही है। प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि सपत्नीक रहते थे। आज तो यह भ्रम फैल गया है कि पत्नी के साथ रह कर मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता है। पर यह विचार ठीक नहीं। हाँ, जब हम प्रेम की स्वाभाविक शक्ति और गर्भाधान क्रिया के तात्कालिक आनन्द को काम-वासना के बुरे रूप में परिणित कर देते हैं, तब वह शरीर और मन के लिये बहुत घातक वस्तु बन जाती है। जैसे भूख स्वाभाविक है और मधुर भोजन करना भी ठीक है। परन्तु इस प्राकृतिक क्रिया को विकृत करके जो मनुष्य निरन्तर स्वादिष्ट पदार्थों को पेट में ठूँसते रहना ही अपना ध्येय बना लेता है वह बहुत शीघ्र रोगी और बलहीन बनकर अपना नाश आप कर लेता है। यही बात स्त्री-पुरुष संपर्क में है। जब मनुष्य मूर्खतावश अथवा लालच से मौन-आकर्षण की स्वाभाविक क्रिया को कामाग्नि के रूप में परिणित कर देता है तब तक अग्नि शरीर के सारे पदार्थ को जलाकर भस्म कर देता है।

विचार-प्रवाह

हमारी मानसिक विद्युत में से प्रतिक्षण जो लहरें उठती हैं उन्हें विचार के नाम से पुकारते हैं। विचार केवल एक शब्द नहीं है, वरं एक मूर्तिमान पदार्थ है, जिसे वैज्ञानिक यन्त्रों की सहायता से प्रत्यक्ष देखा जाने लगा है। अमेरिका में ऐसे फोटो खींचने के कैमरे बनाये गये हैं जो विचारों के चित्र स्पष्ट रूप में खींच सकते हैं। आप जिस वस्तु का चिन्तन कर रहे हैं उसी के समान मानस-चित्र भी बनने लगते हैं। इन मन्त्रों की सहायता से ठोस पदार्थों की तरह उन मानस आकृतियों का चित्र खींच जाता है। विचार हर क्षण मस्तिष्क में से निकल कर बाहर की ओर उड़ते रहते हैं। उन उड़ते हुये विचारों का चित्र ठीक वैसे ही आता है जैसी कि मनुष्य की कल्पना होती है।

सच पूछिये तो मनुष्य प्राणी में विचार-शक्ति ही सर्वोच्च है। विचारों के प्रबल प्रवाह का नाम ही तेजस है। विचारों की प्रधानता के साथ-साथ आहार-विहार, दर्शन, स्पर्श और श्रवण आदि विषय भी तेजस्-निर्माण में अपना कार्य करते हैं। व्यक्ति जैसे विषयों का उपभोग करता है उसका तेजस वैसा ही बनता रहता है। पवित्र तथा तीव्र तेजस निर्माण के लिये पवित्र विचार, शुद्ध भावनायें एवं शुद्ध आहार-विहार की आवश्यकता है।

आपने जल में उठती हुई लहरें देखी होंगी। वे किसी स्थान से उठें, पर समाप्त वहीं जाकर होंगी जहाँ जल का अन्त होगा। विचार भी मानसिक विद्युत (तेजस्) की लहरें हैं, जो विश्व भर में व्याप्त आकाश (ईश्वर) तत्व में उठती हैं। ये लहरें विचारों के अनुसार विभिन्न प्रकार की होती हैं। (1) विद्वानों और बुद्धिमानों का तेजस् (विद्युत प्रवाह) पीले रंग का होता है। (2) शुद्ध प्रेम का तेजस् गुलाबी रंग का होता है। (3) परोपकारी का तेजस् उज्ज्वल होता है। (4) धार्मिक या सदाचारी भावनाओं का तेजस् नीले रंग का होता है। (5) आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति का तेजस् हल्के रंग का होता है। (6) काम-आसक्ति वाले का तेजस् किरमिची रंग का होता है। (7) लाभ की कामना वालों के तेजस् का रंग नारंगी होता है। (8) क्रोधी व्यक्ति के तेजस् में गहरे लाल रंग की धारियाँ होती हैं। (9) अपवित्र तथा दुष्ट व्यक्ति के तेजस् का रंग काला होता है। ईर्ष्यालु एवं द्वेषी भावना वाले का तेजस् गहरे मेघ के रंग का होता है।

एक तरह के विचार दूर-दूर से इकट्ठे होकर घने होते रहते हैं, जैसे अलग-अलग स्थानों की उड़ती हुई भाप एक स्थान पर जमा होते-होते बादल बन जाती है। बिजली में आकर्षण शक्ति भी होती है, इस कारण वे विचार एक दूसरे को खींचते रहते हैं। आप जैसे विचार करते हैं मस्तिष्क में उसी तरह की आकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है और वह आकाश में उड़ने वाले उसी प्रकार के विचारों को पकड़कर अन्दर खींच लेती है। अतएव जो बात आप सोचते हैं, उसके सम्बन्ध में बहुत सी नई-नई बातें आपके दिमाग में आ जाती हैं। इसका कारण यह भी होता है कि उस प्रकार का विचार कभी किन्हीं व्यक्तियों ने किया होगा और उनका अनुभव जो उड़ता फिर रहा था आपको मिल गया। परोपकार और भलाई के विचार करने से वैसे ही विचारों का जमाव होता है। इससे हृदय बड़ी शान्ति और शीतलता का अनुभव करता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, घृणा, मद और कपट के विचारों में तल्लीन रहता है, वह अपने दुर्विचारों के कारण अपने मन को बेचैन बना देता है और संसार का भी अहित करता है। अनेक महापुरुष प्रत्यक्ष में संसार की भलाई का अधिक कार्य करते दिखाई नहीं देते, पर वे अपनी उच्चकोटि की शक्ति शालिनी विचार धारा को संसार में प्रवाहित करके प्राणियों का अकथनीय उपकार करते रहते हैं।


परमात्मा ही प्रकाश है।

(श्री रिचर्ड व्हाइटवेल)

ईसाई धर्म के एक बहुत बड़े महात्मा संत जान्स ने अपने युग के धार्मिकजनों के नाम एक बहुत छोटा-सा सन्देश भेजा था जिसमें कहा गया था कि “परमात्मा ही प्रकाश है और उसमें नाम मात्र को भी अंधकार नहीं है।” इसके बाद हमारे पारस्परिक मानव सम्बन्धों को छूते हुए उसने जो कुछ लिखा है, वह इन्हीं शब्दों की विस्तृत व्याख्या मात्र है। उसका दूसरा महत्व पूर्ण कथन यह है कि “परमात्मा ही प्रेम है और जो प्रेम में वास करता है स्वयं परमात्मा उसमें वास करता है।” उसके ये दोनों कथन एक दूसरे से स्वाभाविक सम्बन्धित हैं।

इस कथन के अनुसार यदि परमात्मा अन्धकार रहित प्रकाश है और द्वन्द्व रहित प्रेम है, तो यह स्पष्ट है कि संसार में जो बुराइयाँ दिखलाई पड़ती हैं वे उसकी इच्छा का परिणाम कदापि नहीं हैं। ऐसी अवस्था में हम अन्य अनेक व्यक्तियों के इस कथन को हर्गिज स्वीकार नहीं कर सकते कि “अच्छाई और बुराई दोनों परमात्मा की ही देन हैं।” हम इस सिद्धान्त से कदापि सहमत नहीं हो सकते, न इसकी सच्चाई को स्वीकार कर सकते हैं। परमात्मा शुद्ध प्रकाश स्वरूप है, अन्धकार उससे भिन्न है।

“परमात्मा ही प्रकाश है- ऐसा प्रकाश जिसके बिना सृष्टि असम्भव है और धर्म ग्रंथों में जिसे जीवन का स्रोत कहा गया है।” इसका क्या आशय है? कुछ समय पूर्व सर आलिवर लाज ने, विज्ञान के नाम पर बोलते हुए यह मान लिया है कि “प्रकाश स्वयं एक सृजनात्मक शक्ति है।” अर्थात् उसकी उत्पत्ति और कहीं से नहीं होती है वरन् वही अन्य वस्तुओं का निर्माण करता है। इसी तथ्य को धर्म-ग्रंथों में इन गम्भीर शब्दों में प्रकट किया है कि “ईश्वर ने आदि में ही कहा ‘प्रकाश हो’ और उसके ऐसा कहते ही दिव्य सृष्टि उत्पन्न हो गई।” यदि परमात्मा ही प्रकाश-स्वरूप-व तेज-स्वरूप है तो इसका अर्थ यही समझना चाहिये कि वह अपनी सृष्टि में प्रवेश कर चुका है और अब भी प्रवेश कर रहा है।

फिर परमात्मा की सृष्टि का क्या रूप है, जो कि उसकी स्वयं की पूर्णता से प्रकट हुई है? क्या वह स्वयं प्रेम जनित होने के कारण सत्य, शिव और सुन्दर रूप नहीं है? उस आदि-स्रोत से अन्य क्या सम्भव हो सकता है? फिर क्या यह वही सत्ता नहीं है जो आदि में थी, वर्तमान में है और अनन्त रूप से भविष्य में भी रहेगी? वह सत्य का ही राज्य है, जिसमें जैसे ही हम प्रविष्ट होकर पूर्णता से वास करेंगे, वैसे ही हमारे जीवन परमात्मा के प्रेम से चमक उठेंगे। भगवान की दुनिया वही है जो सब स्थिर रहेगी और परमात्मा के प्रकाश से जगमगाती रहेगी। इसके अतिरिक्त एक दूसरी भी दुनिया है जिसके विषय में कहा गया है कि “वह अपनी संपूर्ण वासनाओं के साथ नष्ट हो जायेगी।” यह दुनिया मनुष्य के मन की विकृत सृष्टि है, जिसके फलस्वरूप माया की उत्पत्ति होती है और मनुष्य एक बड़े भारी भ्रम में पड़ जाता है।

जब हम परमात्मा को प्रकाश रूप में देखें, तब हमें ऐसे प्रकाश के रूप में नहीं देखना चाहिये जिसे हम साधारण तथा आकाश स्थित ग्रहों का प्रकाश कहते हैं और जिस के निकट ही अन्धकार भी पाया जाता है। हमें तो उसे स्वयं सूर्य पिण्ड से निकलने वाले शक्ति और तेज के प्रकाश पुँज के रूप में ग्रहण करना चाहिये, जिसके निकट अन्धकार फटक ही नहीं सकता।

अब हम सब मिलकर बोलें- “हमारा धर्म प्रेम है, हमारा पथ सेवा है, हमारा अन्तिम लक्ष्य परमात्मा है।”


शुद्ध साधनों से ही श्रेष्ठ कार्य किये जा सकते हैं।

(स्वामी विवेकानन्द)

मनुष्य अपने जीवन में जो अनेक पाठ पढ़ता है, उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ पाठ यह है कि हमें साधनों के विषय में भी उतना ही सावधान रहना चाहिये, जितना कि उसके लक्ष्य के विषय में। सच पूछा जाय तो सब प्रकार की सफलताओं की कुँजी इसी तत्त्व में है- साधनों की ओर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि सिद्धि की ओर।

हमारे जीवन में एक बड़ा दोष यह है कि हम ध्येय पर ही अधिक ध्यान दिया करते हैं। हमारे लिये ध्येय इतना अधिक आकर्षक होता है, ऐसा मोहक होता और हमारे मन पर इतना प्रभाव डालता है कि अन्य सूक्ष्म विषय हमारी नजर से निकल जाते हैं। लेकिन असफलता मिलने पर हम यदि बारीकी से उसकी छानबीन करें तो निन्यानवे प्रतिशत यही पायेंगे कि उसका कारण साधनों की ओर ध्यान न देना ही था। हमें आवश्यकता है अपने साधनों को मजबूत बनाने की और उन्हें पूर्ण रूप से कार्यक्षम बनाने के लिये उनकी ओर अधिक ध्यान देने की। यदि हमारे साधन बिल्कुल ठीक हैं, तो ध्येय की प्राप्ति होगी ही। हमको यह याद रखना चाहिये कि कारण ही कार्य का जन्म दाता है, कार्य आप ही आप पैदा नहीं हो सकता। और जब तक कारण बिलकुल ठीक, योग्य और सूक्ष्म न होंगे, कार्य का उत्पत्ति न होगी। एक बार हमने ध्येय निश्चित कर लिया और उसके साधन पक्के कर लिये, तो फिर हम ध्येय का ख्याल करीब-करीब छोड़ दे सकते हैं, क्योंकि इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि अगर साधन दोषहीन हैं, तो साध्य कहीं नहीं जाता। जब कारण विद्यमान हैं तो कार्य की उत्पत्ति होगी ही, उसके बारे में विशेष चिन्ता की आवश्यकता नहीं। कार्य है ध्येय की सिद्धि और कारण हैं साधन। इसलिये साधन की ओर ध्यान देते रहना जीवन का एक बड़ा रहस्य है। गीता में भी यही कहा गया है कि हमें लगातार भरसक काम करते ही जाना चाहिये, काम चाहे कोई भी हो, अपना पूरा मन उस ओर लगा देना चाहिये, पर साथ ही ध्यान रहे कि हम उसमें आसक्त न हो जायें।

किन्तु होता यह है कि हम कोई बात हाथ में लेते हैं और अपनी पूरी ताकत उसमें लगा देते हैं। कभी-कभी वह बात असफल होती है, पर फिर भी हम उसका त्याग नहीं कर सकते। यह आसक्ति ही हमारे दुःख का सबसे बड़ा कारण है। यदि ऐसा न होता तो हमारा जीवन हरा-भरा रहता। दुख का एक मात्र कारण यही है कि हम आसक्त हैं, हम बंधते चले जा रहे हैं। इसीलिये गीता में कहा है- ‘काम करते रहो, पर उनमें आसक्त न होओ, बन्धन में मत पड़ो।’ ज्ञानी पुरुष अपनी सम्पूर्ण लगन प्रेम की वस्तु पर लगा सकता है और फिर भी अनासक्त रह सकता है। और तभी उसे सच्चे सुख की प्राप्ति हो सकती है।

भिखारी कभी सुखी नहीं होता। उसे केवल भीख ही मिलती है और वह भी दया और तिरस्कार से युक्त। उसके पीछे कम से कम यह कल्पना तो अवश्य होती है कि भिखारी एक निकृष्ट जीव है। जो कुछ वह पाता है उसका सच्चा उपभोग उसे कभी नहीं मिलता। हम सब भिखारी हैं जो कुछ हम करते हैं, उसके बदले में हम कुछ चाह रखते हैं। हम लोग व्यापारी हैं, हम जीवन के व्यापारी हैं, गुणों के व्यापारी हैं, धर्म के व्यापारी हैं। अफसोस! हम प्यार के भी व्यापारी हैं।

किसी वस्तु के लिये प्रार्थना मत करो। बदले में कोई चाह न रखो। तुम्हें जो कुछ देने को हो, दे दो। वह तुम्हारे पास वापस आ जायेगा, लेकिन आज ही उसका विचार मत करो। वह हजार गुना होकर वापस आयेगा, पर तुम अपनी दृष्टि उधर मत रखो। देने की ताकत पैदा करो। दे दो और बस काम खतम हो गया। यह बात जान लो कि सम्पूर्ण जीवन दान-स्वरूप है, प्रकृति तुम्हें देने के लिये बाध्य करेगी। इस लिये स्वेच्छा पूर्वक दो। एक न एक दिन तुम्हें सर्वस्व दे देना ही पड़ेगा। जो व्यक्ति इस नियम के विरुद्ध व्यवहार करने का जितना अधिक प्रयत्न करता है, उतना ही अधिक वह दुखी होता है।

इसलिये भिखारी मत बनो। अनासक्त रहो। जीवन का यही एक अत्यन्त कठिन कार्य है। पर मार्ग की आपत्तियों के सम्बन्ध में वृथा सोचते मत रहो। कल्पना शक्ति द्वारा आपत्तियों का चित्र खड़ा करने से भी तुम्हें उनका सच्चा ज्ञान नहीं होता, जब तक कि तुम उनका प्रत्यक्ष अनुभव न करो। चाहे हमें प्रत्येक कार्य में असफलता मिले, हमारे टुकड़े-टुकड़े हो जायें और खून की धार बहने लगे, फिर भी हमें अपना हृदय थामकर रखना होगा। इन आपत्तियों में ही अपने ईश्वरत्व की हमें घोषणा करनी होगी।

इसमें संदेह नहीं कि ये आपत्तियाँ बड़ी भयानक होती हैं और उनके कारण सौ में से नब्बे तो निराश हो धैर्य खो बैठते हैं। वे प्रायः निराशावादी हो जाते हैं और प्रेम तथा सच्चाई में विश्वास रखना छोड़ देते हैं। जो कुछ दिव्य एवं भव्य है उस पर से भी उनका विश्वास उठ जाता है। इसीलिये हम देखते हैं कि जो मनुष्य जीवन के आरम्भ में क्षमाशील, दयालु, सरल और निष्पाप थे, बुढ़ापे में झूठे और पाखंडी बन जाते हैं। उनके मन जटिलताओं से भर जाते हैं। यह आवश्यक है कि हम ऐसी अवस्था से बचें, पर इनसे बचने के लिये अति दैवी शक्ति की जरूरत है। अतिमानवी शक्ति पर्याप्त नहीं। केवल उसी के बल पर हम इन उलझनों और जटिलताओं से, आपत्तियों की इन बौछारों में से बिना झुलसे पार जा सकते हैं।

यह बहुत कठिन है, पर यह कठिनाई लगातार अभ्यास द्वारा दूर की जा सकती है। हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि जब तक हम अपने आपको दुर्बल न बनायें, तब तक हम पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ सकता। जब तक शरीर रोग के अनुकूल न होगा हमें कोई रोग नहीं हो सकता। रोग होना केवल कीटाणुओं पर ही अवलम्बित नहीं है, पर शरीर की पूर्वानुकूलता पर भी है। हमें वही मिलता है जिसके हम पात्र हैं। आओ, हम अपना अभिमान छोड़ दें और यह समझ लें कि हम पर आयी हुई कोई आपत्ति ऐसी नहीं है, जिसके हम पात्र न थे। ऐसी कोई बुराई नहीं है, जो हमने स्वयं अपने हाथों न बुलाई हो। इसका हमें ज्ञान होना चाहिये। तुम आत्म निरीक्षण करके देखो, तो पाओगे कि ऐसी एक भी चोट तुम्हें नहीं लगी, जो स्वयं तुम्हारी ओर से न की गई हो। आधा काम तुमने किया और आधा बाहरी दुनिया ने, और इस तरह तुम्हें चोट लगी। यह विचार हमें शान्त बना देगा और साथ ही इस निरीक्षण से आशा की आवाज आयेगी कि ‘बाह्य जगत् पर मेरा नियन्त्रण भले न हो, पर जो मेरे अन्दर है, जो मेरे अधिक निकट है, वह मेरा अंतर्जगत मेरे अधिकार में है। यदि इन दोनों के संयोग से ही असफलता होती है, यदि चोट लगने के लिये इन दोनों का इकट्ठा होना जरूरी है, तो मेरे अधिकार में जो दुनिया है उसे मैं न छोड़ूँगा फिर देखूँगा कि कैसे चोट लगती है? यदि मैं स्वयं पर सच्चा प्रभुत्व पा जाऊँ, तो चोट कभी लग ही नहीं सकती।

हेम बचपन से ही सर्वदा अपने से बाहर किसी दूसरी वस्तु पर दोष मढ़ने का प्रयत्न किया करते हैं। हम सदा दूसरों के सुधार में तत्पर रहते हैं, पर अपने सुधार में नहीं। यदि हम दुःखी होते हैं तो चिल्लाते हैं- “यह तो शैतान की दुनिया है।” हम दूसरों को दोष देते हैं और कहते हैं कि “ये कैसे मोह-ग्रस्त पागल हैं।” पर यदि हम सचमुच इतने अच्छे हैं तो हम ऐसी दुनिया में रहते ही क्यों हैं? यदि यह शैतान की दुनिया है, तो हम भी शैतान ही हैं, नहीं तो हम यहाँ क्यों रहते? “ओह! संसार के लोग कितने स्वार्थी हैं”- यह सच है, पर यदि हम उनसे अच्छे हैं तो हमारा उनसे सम्बन्ध कैसे हुआ?

जो हमारे योग्य हैं, वही हम पाते हैं। जब हम कहते हैं कि दुनिया बुरी है और हम अच्छे हैं, तो यह सरासर झूठ है। ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। यह एक भीषण असत्य है, जिससे हम स्वयं अपने को भ्रम में डालते हैं।

हमें स्वयं अपनी ही चिन्ता करनी चाहिये और यही हम कर सकते हैं। हमें कुछ समय तक दूसरों की ओर ध्यान देने का ख्याल छोड़ देना चाहिये। अगर हम अपने साधनों को शुद्ध-पूर्ण बना लेंगे, तो फिर साध्य अपनी चिन्ता स्वयं कर लेगा। क्योंकि दुनिया तभी पवित्र और अच्छी हो सकती है, जब हम स्वयं पवित्र और अच्छे होंगे।


विश्व कल्याण का प्रतीक स्वास्तिक

(श्री रामलाल श्रीवास्तव)

‘स्वास्तिक’ वैदिक-संस्कृति का एक अत्यन्त महत्वशाली प्रतीक है। इसका अर्थ चिरन्तन सत्य, शाश्वत शान्ति और अनन्त सौंदर्य समझा जाता है। इसे धारण करने में आसुरी शक्ति सर्वथा असमर्थ है। सत्य और शान्ति का कोई सन्देश तो कोई भाग्यशाली ही दिया करता है। यह गौरव सदा से भारत को ही प्राप्त है। ‘स्वस्ति’ का उल्लेख सबसे पहले वेदों में ही मिलता है। सत्य, शिव और सुन्दर के रंगमंच पर अवस्थित विवेकी आर्य ही सभ्यता के आदिकाल में कहने का साहस कर सकता था :-

स्वस्ति मात्र उत पित्र नो अस्तु, स्वस्ति गाोम्योजगते पुरुषेभ्यः। विश्वं सुभूतं सुविदत्रं नो अस्तु ज्योगेव द्दशेम सूर्यमा।।

(अथर्व. 1।31।4)

“हमारा माता के लिये कल्याण हो। पिता के लिये कल्याण हो। हमारे गोधन का मंगल हो। विश्व के समस्त प्राणियों का मंगल हो। हमारा यह सम्पूर्ण विश्व उत्तम धन और उत्तम ज्ञान से सम्पन्न हो। हम लोग चिरकाल तक प्रतिदिन सूर्य का दर्शन करते रहें। हम दीर्घजीवी हों”

आर्यों ने ऐसे ही स्वस्ति-वचनों के बल पर समस्त विश्व के लिये सुख और शान्ति के साम्राज्य- स्थापन की घोषणा कर जन-कल्याण की सिद्धि की थी। स्वास्तिक आर्यों का आदि माँगलिक प्रतीक है। स्वास्तिक आयु, प्रकाश, सूर्य और आकाश का मूर्त स्वरूप है। जैन, बौद्ध तथा अन्य भारतीय धर्मग्रन्थों में भी स्वास्तिक के महत्व पर बड़ा प्रकाश डाला गया है। उनमें स्वस्तिक के विभिन्न आकार-प्रकार तथा रूपरेखा की जानकारी मिलती है।

‘स्वस्तिक’ शब्द की ऐतिहासिकता के अध्ययन से पता चलता है कि स्वस्तिक हठयोग का एक आसन है। यह एक प्रकार के यन्त्र का नाम है, जो शरीर में गड़े शल्य आदि को बाहर निकाल लेता है। चतुष्पथ अथवा ‘चौराहा’ के लिये भी इसका प्रयोग होता है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह एक माँगलिक चिन्ह का नाम है, जो बहुत शुभ माना जाता है और गणेश पूजन के पहले माँगलिक द्रव्यों से विशेष उत्सवों और शुभ अवसरों पर अंकित किया जाता है। भगवान श्री रामचन्द्र और श्रीकृष्ण के चरण में इस प्रकार का चिन्ह था। जैनी लोग ‘जिन देवता’ के चौबीस लक्षणों में से एक इस भी मानते हैं। हिन्दू-संस्कृति से तो इसका सम्बन्ध सृष्टि के आदि काल से चला आता है। विश्व की समस्त जातियों में हिन्दू जाति ही प्रतीक उपासना को सर्वाधिक महत्व देती है। जिस विषय को समझने में मस्तिष्क और जिव्हा की सामर्थ्य समाप्त हो जाती है उसके बोध के लिये प्रतीक का हाथ पकड़ा जाता है।

स्वस्तिक की ऐतिहासिकता के सम्बन्ध में हम इतना ही कह सकते हैं कि यह उतना ही पुराना है जितने पुराने वेद हैं। वेदों में प्रकाश, कल्याण, दीर्घायु के अर्थ में अनेक स्थलों पर ‘स्वस्ति’ का प्रयोग मिलता है। कुछ विचारकों का मत है कि कहीं-कहीं इसे भ्रमणशील चक्र के आकार में इस लिये दिखलाया गया है कि उससे सूर्य के प्रतीक होने का बोध होता है। कुछ विद्वानों का मत है कि स्वस्तिक उन दो अरणियों (काठ के डण्डों) का प्रतीक हैं, जिनसे यज्ञ के लिये अग्नि पैदा की जाती है। इसका तात्पर्य यह कि स्वस्तिक प्रकाश का प्रतीक है। दक्षिण भारत में बहुत प्राचीन काल के बने कुछ मिट्टी के बर्तन मिले हैं जिन पर स्वस्तिक अंकित है। गौतम बुद्ध से भी पहले इसका प्रचार पाया गया है। प्राचीन शास्त्रों से यह भली प्रकार सिद्ध किया जा चुका है कि हिन्दू जाति ने ही संसार के अनेक भागों में अपने उपनिवेश बनाकर इस प्रतीक का विश्व व्यापी प्रचार किया था। मोहनजोदड़ो की खुदाई में मुद्राओं और पहियों पर स्वस्तिक अंकित मिलता है। पारसियों के एक प्राचीन मंदिर के द्वार पर सूर्य, चन्द्र और स्वस्तिक के चिन्ह बने हैं। ईस्वी सन् से चार सौ वर्ष पहले के कुछ सिक्के भी ऐसे मिले हैं जिन पर स्वस्तिक का चिन्ह है। इससे प्रकट होता है कि अशोक कालीन भारत में स्वस्तिक का पर्याप्त महत्व था।

वैदिक काल से ही स्वस्तिक की परम्परा अक्षुण्ण चली आयी थी, और महाकाव्य -काल तक स्वस्तिक का अर्थ एक प्रतीक ही नहीं रहा वरन् और भी अनेक वस्तुओं का यही नाम करण हो गया। रामायण में एक ऐसे जहाज का वर्णन मिलता है जिस पर स्वस्तिक का चिन्ह अंकित था। महाभारत के सभा पर्व में जरासन्ध वध का वर्णन करते हुए एक ऐसे नाग का नाम मिलता है जिसका स्वस्तिक था। कुछ समय पहले हस्त लिखित पुस्तकों की समाप्ति स्वस्तिक चिन्ह अंकित कर सूचित की जाती थी। बौद्धों और जैनियों ने भी इस चिन्ह को बड़ा महत्व दिया है। बौद्ध और जैन लेखों से संबंधित प्राचीन गुफाओं में स्वस्तिक का चित्रण मिलता है। अशोक के शिला लेखों में स्वस्तिक चिन्ह का बाहुल्य है। जैनियों के समस्त कर्म-विज्ञान का आधार स्वस्तिक है। जैन दर्शन के अनुसार एक दूसरे को परस्पर काटने वाली स्वस्तिक-रेखाएं आत्मा और पुद्गल (पुरुष और प्रकृति) की प्रतीक हैं। दोनों रेखाओं के एक दूसरे को परस्पर काटने पर चार भाग हो जाते हैं जो प्राकृत जगत के चार क्रम-पूर्ववर्ती सर्ग, वनस्पति सर्ग, मनुष्य सर्ग और देव सर्ग-के द्योतक हैं। मंदिरों में पूजा करते समय जैन स्वस्तिक चिन्ह का उपयोग करते हैं। आशीर्वाद अथवा स्वस्ति-दान में भी वे स्वस्तिक चिन्ह से काम लेते हैं। बौद्ध धर्म में भी यह चिन्ह अत्यन्त पूज्य माना जाता है। बुद्ध भगवान के चरणों के लक्षणों में स्वस्तिक की भी गिनती की जाती है। अमरावती के स्तूप में जो बौद्ध पद पर अंकित है, उसमें स्वस्तिक बना हुआ है। जापान, चीन आदि देशों में बुद्ध भगवान के चरणों की पूजा होने से वहाँ भी स्वस्तिक का प्रचार हो गया। बुद्ध धर्मानुयायी स्वस्तिक को बुद्ध भगवान के वक्ष का भी एक शुभ लक्षण मानते हैं। निस्संदेह भारत ने अपने उपनिवेशों और विदेशों में स्वस्तिक का प्रचार किया। अनेक देशों के सिक्कों में स्वस्तिक का चिन्ह देखने को मिलता है।

आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड में ‘मावरी’ जाति के लोग स्वस्तिक को अपने जीवन के शुभ प्रतीकों में से एक मानते हैं। जापानी स्वास्तिक को ‘मनजी’ के नाम से पुकारते हैं और बुद्ध की प्रतिमाओं में यह विशेष रूप से बनाया जाता है। जापान के परम पवित्र पहाड़ फ्यूजी यामा की चोटी पर जब यात्री पहुँचता है, तब उसे ऐसे घड़ों का जल पीने को दिया जाता है जिन पर स्वस्तिक के चिन्ह बने रहते हैं। यह जल दीर्घायु देने वाला माना जाता है। कोरिया में स्वस्तिक तामझाम और पालकी आदि में चित्रित दीख पड़ता है। चीन में स्वस्तिक असंख्यता का बोधक है, अधिकता का प्रतीक है। चीन निवासी भी इसे हिन्दुओं की तरह कल्याण, दीर्घायु और प्रकाश का प्रतीक मानते हैं। हजार वर्ष पहले भी स्वस्तिक का चिन्ह बनाते थे और उसे सूर्य का प्रतीक मानकर उसकी उपासना करते थे। तिब्बत के लोग अपने शरीर में स्वस्तिक के आकार का गोदना गोदवाते हैं। फारस में पुरोहितों के चोगों पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। अल्जीरिया और मिस्र में भी इसका काफी प्रचार है। मिस्र वालों का विश्वास है कि स्वस्तिक उनके देश में यूनान से आया। यूनान में मिट्टी, पीतल और सोने के बर्तनों पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाया था। साइप्रेस द्वीप में देवताओं की मूर्ति पर स्वस्तिक का चिन्ह मिलता है। इटली में स्वस्तिक का प्रचार है और अन्य योरोपीय देशों में वहीं से इसका प्रचार हुआ है। पुराने ईसाइयों में यह विशेष और अत्यन्त पवित्र प्रतीक के रूप में प्रचलित था। स्काटलैण्ड के एबरडीन कस्बे में चालीस अक्षरों का एक शिलालेख मिला है, जिसके मध्य भाग में स्वस्तिक बना हुआ है। इस शिला लेख की लिपि पढ़ी नहीं जा सकी, जिससे उसका वास्तविक रहस्य जाना जा सकता। अमरीका में योरोपियनों के आगमन से बहुत पूर्व स्वस्तिक का प्रयोग होता था। कुछ टीलों की खुदाई में ऐसे सामान प्राप्त हुये हैं, जिन पर स्वस्तिक अंकित है। अमरीका में भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा भी मिली है, जिस पर स्वस्तिक अंकित है।

स्वस्तिक सर्वथा स्वस्ति अथवा कल्याणकारी है। हिन्दुओं तथा विदेशी जातियों के साँस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक जीवन में स्वस्तिक का उपयोग दिखाई पड़ता है। समस्त संसार ने इसे एक स्वर से माँगलिक प्रतीक स्वीकार कर लिया है। ईसाइयों का क्रास स्वस्तिक का ही एक रूपांतर है। ॐ शब्द की बनावट और वैज्ञानिक आकार की समीक्षा करने पर उसमें और स्वस्तिक में पूरा सादृश्य दिखलाई पड़ता है। ॐ अखण्ड चिदानन्द की सत्ता का प्रतीक है, भगवान का अक्षर-रूप है। इस लिये हम कह सकते हैं कि स्वस्तिक ही ॐ रूप में परमात्मा का प्रतीक है। परम सत्य, शान्ति और स्वस्ति का आश्रय है। इतिहास की पुनरावृत्ति तो होती ही रहती है; इसलिये निस्संकोच कहा जा सकता है कि विश्व एक दिन स्वस्तिक में समाविष्ट आदर्शों को अपना सकता है। उसकी सबसे बड़ी चाह है सत्य की प्राप्ति। उसकी सबसे बड़ी भूख है शान्ति की अनुभूति। उसका लक्ष्य है आत्मराज्य अथवा स्वराज्य। वस्तुतः स्वस्तिक विश्व कल्याण का दूत है।


निष्काम सेवा ही सच्चा यज्ञ है।

(महात्मा गाँधी)

गीता में ‘यज्ञ’ शब्द का व्यवहार बारम्बार किया गया है। हमने भी नित्य का महायज्ञ रचा है। इसलिये ‘यज्ञ’ शब्द पर विचार कर लेना जरूरी है। इस लोक में या परलोक में कुछ भी बदला लिये या चाहे बिना, परार्थ के लिये किये हुए किसी भी कर्म को ‘यज्ञ’ कहेंगे। कर्म कायिक हो या मानसिक, चाहे वाचिक, कर्म का विशाल अर्थ लेना चाहिये। ‘परार्थ’ का मतलब केवल मनुष्य-वर्ग नहीं, बल्कि जीव मात्र से लेना चाहिये। अहिंसा की दृष्टि से भी, मनुष्य जाति की सेवा के लिये भी, दूसरे जीवों का होमना या नाश करना यज्ञ की गिनती में नहीं आ सकता। वेदादि में अश्व, गाय इत्यादि को होमने की जो बात बतलाई जाती है, उसे हमने गलत माना है। वहाँ पशु हिंसा का अर्थ लें तो सत्य और अहिंसा की तराजू पर ऐसे होम नहीं चढ़ सकते। शास्त्रों में जो वचन धर्म के नाम से प्रसिद्ध हैं उनका ऐतिहासिक अर्थ करने में हम नहीं फंसते। हम यह भी स्वीकार करते हैं कि वैसा अन्वेषण करने की हममें योग्यता भी नहीं है। इस प्रकार की योग्यता को हम प्राप्त भी नहीं करना चाहते, क्योंकि ऐतिहासिक अर्थ से जीव हिंसा संगत भी ठहरे तो भी अहिंसा को सर्वोपरि धर्म मानने के कारण हमारे लिये यह त्याज्य है।

इस व्याख्या के अनुसार विचारने पर हम देख सकते हैं कि जिस कर्म में अधिक से अधिक जीवों का, अधिक से अधिक क्षेत्र में कल्याण हो, और जो कर्म अधिक से अधिक मनुष्य अधिक से अधिक सरलता से कर सकें, और जिसमें अधिक से अधिक सेवा होती हो, वही महायज्ञ अथवा अच्छा यज्ञ है। अतः किसी की भी सेवा के निमित्त अन्य किसी का अकल्याण चाहना या करना यज्ञ-कार्य नहीं है और यज्ञ के अलावा किया हुआ कार्य बन्धन रूप है, यह हमें भगवत् गीता सिखलाती है।

ऐसे यज्ञों के बिना यह जग क्षण भर भी नहीं टिक सकता। इसलिये गीताकार ने ज्ञान की कुछ झलक दूसरे अध्याय में दिखाकर तीसरे अध्याय में उसकी प्राप्ति का साधन बतलाया है और साफ शब्दों में कहा है कि हम यज्ञ को जन्म से ही साथ लाये हैं। यहाँ तक कि हमें यह शरीर केवल परमार्थ के लिये मिला है और यज्ञ किये बिना जो खाता है वह चोरी का खाता है, ऐसी सख्त बात गीताकार ने कह डाली है। जो शुद्ध जीवन बिताना चाहता है उसके सब काम यज्ञ रूप होते हैं। हमारे यज्ञ-सहित जन्म लेने का मतलब है हम हर दम ऋणी या देनदार हैं। इसलिये हम जग के सदा सेवक हैं। इसलिये इस जगत् का स्वामी हमसे सेवा कराने के लिए जो अन्न वस्त्रादि देता है वह कृतज्ञतापूर्वक लेना चाहिये। पर यह न समझना चाहिये कि हमको जो मिलता है उस पर हमारा हक है, और वह न मिले तो हम मालिक को दोष लगायेंगे। हमें यह समझना चाहिये कि हमारी देह उसी की है, वह चाहे रखे या न रखे। यह स्थिति दुखद या दयनीय नहीं है, जैसा कुछ लोग ख्याल करते रहेंगे। अपने लिये कोई चिन्ता न करना, सब परमेश्वर को सौंप देना, ऐसा आदेश मैंने तो सब धर्मों में पाया है, और मेरी सम्मति में यह स्थिति सब प्रकार से सुखद और चाहने योग्य है।

पर इन विचारों से किसी को डरना न चाहिये। मन को स्वच्छ रख कर सेवा का आरम्भ करने वाले को, इसकी आवश्यकता दिन पर दिन स्पष्ट होती जाती है और वैसे ही उसकी श्रद्धा बढ़ती जाती है। जो स्वार्थ छोड़ने को तैयार ही नहीं है, अपनी जन्म की स्थिति को पहिचानने को तैयार ही नहीं हैं, उसके लिये तो सेवा के सभी मार्ग मुश्किल हैं। उसकी सेवा में तो स्वार्थ की गंध आती ही रहेगी। पर ऐसे नितान्त स्वार्थी जगत में थोड़े ही होते हैं। कुछ न कुछ निःस्वार्थ सेवा हम सब जाने अनजाने करते ही रहते हैं।

यज्ञ नित्य कर्तव्य है, चौबीस घन्टे आचरण में लाने की वस्तु है, इस विचार से यज्ञ का अर्थ सेवा समझ कर “परोपकाराय सताँ विभूतय” वचन कहा गया है। निष्काम सेवा परोपकार नहीं है, बल्कि अपने निज के ऊपर उपकार है, जैसे कर्ज चुकाना परोपकार नहीं, बल्कि अपनी सेवा है, अपने ऊपर उपकार है, अपने ऊपर से भार उतारना है, अपने धर्म को बचाना है। इसलिये यह समझ लेना चाहिये कि मनुष्य मात्र की पूँजी सेवा के लिये ही है। ऐसा विचार कर लेने से जीवन में भोग का खात्मा हो जाता है- जीवन त्यागमय हो जाता है। या यों कहें कि मनुष्य का त्याग ही उसका भोग है। मनुष्य और पशु के जीवन में यही भेद है।

कुछ लोग कहते हैं कि जीवन का ऐसा अर्थ समझने से जीवन शुष्क बन जायेगा, कला का नाश हो जायेगा। पर ऐसा कहना ‘त्याग’ का अनर्थ करना है। त्याग का अर्थ संसार से भागकर जंगल में जा बसना नहीं है, बल्कि जीवन की प्रत्येक प्रवृत्ति में त्याग की भावना का होना है। गृहस्थ जीवन त्यागी और भोगी दोनों हो सकता है। मोची का जूते सीना, किसान का खेती करना, व्यापारी का व्यापार करना और नाई का हजामत बनाना, त्याग भावना से भी हो सकता है और उसमें भोग की लालसा भी हो सकती है। जो यज्ञार्थ व्यापार करता है, वह करोड़ों के व्यापार में भी लोक-सेवा का ही ख्याल रखेगा, किसी को धोखा नहीं देगा, अनुचित साहस नहीं करेगा, करोड़ों की सम्पत्ति रहते हुए भी सादगी से रहेगा, करोड़ों कमाते हुए भी किसी की हानि नहीं करेगा। किसी की हानि होती होगी तो करोड़ों से हाथ धो लेगा। इन बातों को सुनकर कोई यह न समझे कि ऐसा व्यापारी मेरी कल्पना में ही बसता है। संसार के सौभाग्य से ऐसे व्यापारी पश्चिम और पूर्व दोनों में हैं। वे चाहे अंगुलियों पर गिने जाने की संख्या में ही हों, पर एक भी जीवित उदाहरण रहने पर फिर उसे कल्पना की वस्तु नहीं कह सकते। मैंने इसी सिद्धान्त के अनुसार आचरण करने वाले एक दरजी, एक नाई और एक कपड़ा बुनने वाले को भी देखा है। तलाश करने पर हमें सभी तरह के व्यवसायों में यज्ञार्थ अपना धन्धा करने वाले और उसी लिये जीवन बिताने वाले आदमी मिल सकते हैं।

यह सत्य है कि ऐसे यज्ञार्थ कार्य करने वाले भी अपने धन्धे से ही अपनी जीविका प्राप्त करते हैं। पर वे धन्धा आजीविका के निमित्त नहीं करते, आजीविका उनके लिये उस धन्धे का गौण फल है। भावना बदल जाने से धन्धा ही यज्ञरूप बन जाता है उसमें पवित्रता आ जाती है, और दूसरे के सुख का विचार उत्पन्न हो जाता है। उसी समय ऐसे धंधा करने वाले के जीवन में कला का प्रवेश हो जाता है। सच पूछा जाय तो यज्ञमय जीवन कला की पराकाष्ठा है, सच्चा रस उसी में है, क्योंकि उसमें से रस के नित्य नये झरने प्रकट होते हैं, जिन्हें पीकर मनुष्य अघाता नहीं है और न वे झरने कभी सूखते हैं। यज्ञ यदि भार रूप जान पड़े तो वह न यज्ञ है और न उसमें त्याग है। भोग का अन्त नाश है, त्याग का अन्त अमरता है; रस स्वतंत्र वस्तु नहीं है, रस तो हमारी वृत्ति में मौजूद है। किसी को नाटक के पर्दों में मजा आता है और किसी को आकाश में नित्य प्रकट होने वाले नये-नये दृश्यों में। रस परिशीलन या समझने का विषय है। जो बात रस के रूप में बचपन में सिखाई जाती है, या जिसका रस के नाम से जनता में प्रवेश कराया जाता है, वही रस मान लिया जाता है। हम ऐसे उदाहरण बतला सकते हैं कि जिस बात में एक देश वालों को खूब रस या मजा आता है, दूसरे देश वालों को वह नितान्त रस हीन जान पड़ती है।

यज्ञ करने वाले अनेक ‘सेवक’ ऐसा समझते हैं कि चूँकि हम निष्काम भाव से सेवा करते हैं, इस लिये हमको लोगों से अपनी आवश्यकता के अनुसार अनावश्यक सामग्री भी लेने का अधिकार है। पर जहाँ किसी सेवक के मन में ऐसा विचार आया तो समझ लो कि उसकी ‘सेवकाई’ गई और ‘सरदारी’ आ गई। सेवा में अपनी सुविधा का विचार करने की गुंजाइश ही नहीं है। सेवक की सुविधा तो स्वामी-ईश्वर ही देखता है, उसे देना होगा तो वह दे देगा। यह ख्याल रखते हुए सेवक को चाहिये कि उसके पास जो कुछ आ जाय सबको निजी ही न समझ बैठे। आवश्यकता भर को ही ले, बाकी का त्याग कर दे। अपनी सुविधा में बाधा पड़ने पर भी शान्त रहे, रोष न करें, मन में खिन्नता न लावें। याज्ञिक का बदला, सेवक की मजदूरी -यज्ञ सेवा ही है। उसी में संतोष प्राप्त हो सकती है।


नवीन सामाजिक रचना कैसे हो?

(श्री सत्यभक्त, पूर्व सम्पादक ‘चाँद’)

हमारे देश में स्वराज्य की स्थापना हुए दस वर्ष हो चुके, पर अभी तक यहाँ का राजनीतिक, सामाजिक ढाँचा नहीं बदल सका है। कुछ नाम मात्र के सुधार, परिवर्तन अवश्य हुये हैं, पर अभी तक उस आर्थिक राजनीतिक, सामाजिक क्राँति के लक्षण कहीं दिखलाई नहीं पड़ते जिसकी लोग पहले कल्पना किया करते थे। वही नौकरशाही, वही आतंक से काम लेने वाली पुलिस, वही लोगों को निकम्मा बनाने वाली शिक्षा और बी.ए., एम.ए. की निकम्मी डिग्रियां, वे ही कारखानों में पिसने वाले मजदूर और वे ही अपनी थैलियों को प्रतिदिन बढ़ाते जाने वाले मालिक-सभी कुछ बदस्तूर कायम है। हम इससे इनकार नहीं करते कि प्रत्येक क्षेत्र में सरकार ने सुधार की कोशिश की है और दो-दो, चार-चार तरह के सुधार कर दिखाये हैं, पर इन सबको क्रान्ति या कायापलट के नाम से नहीं पुकारा जा सकता, जिसकी कि आवश्यकता समाज हितैषी एक मुद्दत से अनुभव कर रहे थे। हम सोचा करते थे कि स्वराज्य प्राप्त होने पर गरीबों का शोषण पूर्णतः बन्द हो जायेगा, छोटे बड़े का अन्तर लुप्त होने लगेगा, एक घर में बच्चे रोटी के लिये तरसें और दूसरे में कुत्तों को दूध, मलाई खिलाई जा रही है, ऐसा दृश्य न दिखलायी पड़ेगा और सब लोग वास्तविक अर्थों में न्याययुक्त अधिकार पाकर भाइयों की तरह सौहार्द पूर्वक रहने लगेंगे। पर खेद है कि बहुत कुछ नई बातें देखने सुनने पर, अरबों की लागत के पहाड़ सोद्देश्य बाँधों को तैयार होते देखकर, देश में मोटर, रेलवे, इंजिन, हवाई जहाज जैसी बड़ी चीजों के विशाल कारखाने खड़े होते देख लेने पर भी वह चीज नहीं दिखलाई पड़ रही है जिससे मनुष्यों में घुसी हुई स्वार्थ और अन्याय की भावनायें दूर हो सकतीं और वे नैतिक और आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर होकर एक दूसरे के कल्याण के लिये प्रयत्नशील दिखलाई पड़ते।

इस परिस्थिति को देखकर देश के कितने ही विचारकों को बड़ी निराशा हो रही है और वे कहते हैं कि 15 अगस्त 1947 के दिन को हम ‘स्वतंत्रता-दिवस’ समझें या ‘परतंत्रता-दिवस?’ क्योंकि इसके पहले तो हम अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिये प्रयत्न भी करते थे और सफलता के लिये त्याग तथा बलिदान करने को भी प्रस्तुत रहते थे। पर अब तो लोगों ने प्रत्येक बात की जिम्मेदारी सरकार पर ही छोड़ दी है और स्वयं स्वार्थ-साधन में फंसे हैं। यदि यही दशा बनी रही तो थोड़े समय बाद हम देखेंगे कि देश अग्रसर होने के बजाय पिछड़ता जा रहा है और अपने मानवोचित गुणों से वंचित होकर पूँजीवादी देशों का अनुकरण करते हुए शोषण के नये-नये मार्ग निकाल रहा है। इस सम्बन्ध में विचार करते हुए श्री जयप्रकाश नारायण ने कहा है-

“गाँधी जी के विचार मानने वालों के दो पक्ष हो गये हैं। एक पक्ष राज्य संचालन में लगा और दूसरे पक्ष के लोग अपनी-अपनी रचनात्मक प्रवृत्तियों में लगे रहे। केवल ऊपर से समाज बदलने की कोशिश की जाय तो शक्ति व्यर्थ जाती है और उसमें से नौकरशाही का निर्माण होता है। हमारे देश में कुछ उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ ही है। रेलें, सिन्द्री की खाद का कारखाना, चितरंजन ऐंजिन उद्योग आदि ये सब मुनाफे के लिये नहीं हैं, जनता की सरकार के हाथों में हैं। परन्तु इनकी आन्तरिक व्यवस्था में कोई अन्तर नहीं है। पूँजीपतियों के पास संचालकों का बोर्ड होता है वैसा ही इन कारखानों में सरकारी अफसरों का बोर्ड होता है, जो कारखाने की व्यवस्था करता है। ऊंचे अफसर हैं ऊंची तनख्वाह है, मजदूर हैं, साधारण वेतन पाते हैं। पर यह हमारा भविष्य का नक्शा नहीं था। नक्शा यह था कि हमारे उद्योग मजदूर चलायेंगे, जनता चलाएगी। नीचे के मजदूर को कम तनख्वाह मिलेगी और अफसर को उससे 100 गुना अधिक मिलेगा, यह नहीं सोचा था। वैधानिक भाषा में इसको राज्य- पूँजीवाद या ‘स्टेट-सोशलिज्म’ कह सकते हैं। अब यह सोचना कि यह दोष उन लोगों का है जो इस समय सत्ताधीश बने हैं, तो यह ठीक नहीं। अगर शासन-सत्ता समाजवादी पार्टी के हाथ आ जाय तो भी ऐसी ही विषमता चलेगी। रूस में भी मजदूर और अन्य कई कार्यों के संचालकों के वेतन में 80 गुना अन्तर है।”

इस अवस्था का सुधार तभी संभव है जबकि शासन सत्ता वास्तविक परिश्रम करने वालों के हाथ में आवे और प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ही क्यों न हो परिश्रम करना अनिवार्य हो। ऐसा होने से ही वर्तमान वातावरण का अंत होकर ऐसा नवीन वातावरण तैयार होगा जिसमें मनुष्य अपनी मेहनत का पूरा फल प्राप्त कर सकेगा और उसे अन्न-वस्त्र की चिन्ता न रहेगी। इस सम्बन्ध में संत विनोबा ने लिखा है-

“अन्तिम आदर्श तो यह होना चाहिये कि देश का प्राइम मिनिस्टर तीन या चार घंटे खेती का काम करे और बाकी बचे समय में दूसरा काम करे, जिस का जिम्मा उसने लिया है। इससे देश की पवित्रता बढ़ेगी, आरोग्यता बढ़ेगी। उच्च-नीचता का भाव मिट जायेगा, जमीन को अनेक सेवक मिलेंगे, सब की बुद्धिमत्ता का लाभ मिलेगा। सबको समान धर्म और संस्कृति का लाभ मिलेगा। यह तो अन्याय होगा कि कुछ लोगों से कहा जाता है कि तुम खेती करो और कुछ लोगों से कहा जाय कि तुम अन्य काम करो। हमने अभ्यास के वास्ते आठ घंटे बुनाई, कताई आदि का काम किया था। पर यदि आज कोई मुझे आठ घंटा बुनने को मजबूर करे तो मैं अवश्य इनकार करूंगा। मैं कहूँगा मैं इसके लिये तैयार नहीं हूँ कि एक कमरे में बन्द होकर, जहाँ हवा नहीं है, हाथ को कुछ खास व्यायाम न मिले और कमर भी टूट जाय, इसके लिये मैं तैयार नहीं हूँ। चार घंटा मुझे आकाश सेवन का मौका मिलना चाहिये। यह मेरा हक है। मुझसे तो अगर कोई कहे कि तू प्रोफेसर बनकर छः घंटा काम कर, तुझे पाँच हजार रुपया तनख्वाह मिलेगी, परन्तु खेती पर काम करने का मौका नहीं मिलेगा, तो मैं स्वीकार नहीं करूंगा। मैं कहूँगा कि मुझे चार घंटा खेती में काम करना है और बाकी बचे हुए समय में मैं शिक्षक का काम करूंगा। उसके लिये मुझे पैसा नहीं चाहिये। खेती में काम करके जो मिलेगा उतना ही मैं लूँगा।”

इन नेताओं ने देश को एक नई दिशा में कदम बढ़ाने का संकेत किया है। वास्तव में जब तक श्रम की महिमा बढ़ाई न जायेगी और सिक्के का चलन कम न किया जायेगा। तब तक पूँजीवाद का घट सकना कठिन है। यद्यपि पहले जमाने में भारत में समाजवाद जैसा कोई आन्दोलन न था। पर न तो शोषण के लिये बहुत बड़े कारखाने खोले जाते थे और न सिक्के की ही भरमार थी इसलिये, गरीबों का काम भी सुविधापूर्वक चल जाता था और अमीरों की संख्या भी नाममात्र को ही रहती थी। ज्यादातर व्यक्ति एक ही दर्जे के होते थे। अब भी यदि अधिकाँश व्यक्ति खेती करके अपने खाने का अन्न पैदा कर लें और कपड़ा भी अपने गाँव या मोहल्ले में बनवा लें तो आर्थिक विषमता की समस्या बहुत कुछ हल हो सकती है और उसके हल हो जाने पर राजनीतिक और सामाजिक दशा में भी समुचित परिवर्तन हो सकता है।


उच्च पदवी पाकर आप नम्र और सत्यप्रेमी बनिये

(श्री शंकरलाल गोयल, उदयपुर)

आधुनिक शिक्षा पद्धति विद्यार्थियों में पुस्तकीय शिक्षा के अतिरिक्त एक मनोवैज्ञानिक असर- “झूठी शान” को भी उत्पन्न कर देती है। इससे देश के युवकों में ईर्ष्या-द्वेष, झूठा घमण्ड, परनिन्दा आदि अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं, जो देश की हानि करने के साथ ही स्वयं उनको भी पतन के मार्ग की तरफ ले जाते हैं।

इस दूषित शिक्षा के परिणाम स्वरूप हमारे नवयुवकों में कैसे दोष पैदा हो जाते हैं, इसका पता किसी छोटे बड़े अफसर के रहन-सहन को देखने से भली प्रकार लग सकता है। इनको नौकरी मिलते ही झूठी शान शौकत दिखाने का चस्का सा लग जाता है। वह अपने मित्रों के बीच अपनी पोजीशन ऊंची जाहिर करने के लिये अनेक प्रकार के अवगुणों को अपना लेता है। जरा दूर चलने के लिये ताँगे या किसी अन्य सवारी का सहारा लेता, घर की सफाई व भोजन बनाने को नौकर रखता, साग का थैला उठाने में भी नौकर की आवश्यकता अनुभव करता है। इस तरह वह परिश्रम का महत्व भूलकर झूठे दिखावे की तरफ अग्रसर होता है। इसी प्रकार चाय सिगरेट, बराँडी का एकाध ‘डोज’ भी इन लोगों में आवश्यकीय बातें मानी जाने लगती हैं। आजकल के शिक्षित वर्ग में चाय और सिगरेट की काफी खपत है, और वे इनसे होने वाली हानि को समझकर भी इनसे छूटने का प्रयत्न नहीं करते।

इसी प्रकार उच्च पदवी प्राप्त व्यक्ति मनुष्यता से भी बहुत कुछ वंचित हो जाते हैं। अंगरेज हमारे लिये एक छोटा सा शब्द ‘रेसपेक्ट’ ऐसा छोड़ गये हैं कि उसका असली अर्थ भुला कर हम अपने को देवता सदृश्य पुजवाना चाहते हैं। आपने देखा होगा कि बूढ़ा चपरासी हाथ जोड़कर ‘जय रामजी की’ करता है, पर अफसर साहब उसकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखते। वह सब बात कहने के लिये गिड़गिड़ाता है, पर अफसर उसे सच न मान कर ‘बेईमान, नालायक, हरामखोर’ आदि शब्दों से उसके मन को ठेस पहुँचाते हैं। नौकर से जरा सी गलती होने पर या कार्य में देर होने पर अनेकों अफसरों के मुँह से ऐसी गालियों की बौछार निकलती है जो एक सभ्य मनुष्य के लिये सरासर शर्म की बात है।

नौकरी पेशा वालों में दूसरे सहयोगियों के प्रति ईर्ष्या-द्वेष की भावना भी प्रायः देखने में आती है। यह एक तरह का छूत का रोग है। जब कोई नया व्यक्ति आफिस में पैर रखता है तो कुछ समय आफिस में रहने के बाद ही यह उसको लग जाता है, और उसके पवित्र मन को कलुषित बना देता है। यह ईर्ष्या की भावना उच्च अधिकारियों में अधिक देखने में आती है। अगर किसी संस्था में दो अधिकारी एक ही प्रकार का काम करते हों और उनके वेतनों में अन्तर हो तो आये दिन मालिकों के पास एक दूसरे की बुराई के कागजात पहुँचते रहते हैं। इस मनोवृत्ति के कारण वे अपना कर्तव्य भी भली प्रकार पूरा नहीं कर सकते।

उच्च-पदवी प्राप्त अधिकारी एक भावना के भावावेश में आकर तुच्छ होता हुआ भी अपने को ‘उच्च’ मानता है। हालाँकि उसके भी ऊपर अधिक वेतन वाले अफसर होते हैं और उनके आगे उसे ‘आज्ञाकारी सेवक’ बनकर सदा झुकना पड़ता है, पर अपने से छोटों के सामने वह ‘देवता’ ही बनना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति बड़ी हानिकर है। उनको सदैव अपने को जनता का एक साधारण सेवक समझकर अपने कर्तव्य पालन करने में तत्पर रहना चाहिये। तभी वे वास्तव में उच्च अधिकारी हो सकेंगे और सब हृदय से उनका सम्मान करेंगे।


सिनेमा और चरित्रहीनता

(एक समाज हितैषी)

सिनेमा आजकल मनोरंजन का सर्वप्रधान साधन है। इसका प्रचार निरन्तर बढ़ रहा है और अब बड़े शहरों से चलकर यह छोटे शहरों और कस्बों तक में पहुँच रहा है। इसका शौक यहाँ तक बढ़ा है कि छोटे स्थानों के निवासी केवल सिनेमा के किसी विशेष तमाशे को देखने के लिये तीस-तीस, चालीस-चालीस मील की यात्रा करके निकटवर्ती शहरों में पहुँच जाते हैं।

सार्वजनिक जीवन से इतना निकट सम्बन्ध रचने वाले इस व्यवसाय में जब हम चरित्रहीनता की वृद्धि की बात सुनते हैं तो बड़ी चिन्ता होने लगती है। हमारे कच्ची मति के बालकों और महिलाओं पर इसका कैसा घातक प्रभाव पड़ेगा और वे किस प्रकार अनेक दोषों के शिकार बन जायेंगे यह सोचकर मन को बड़ी व्यथा होती है। इधर कुछ समय से सिनेमाओं के फिल्मों में नग्नता की वृद्धि हो रही है और घटिया किस्म के विदेशी फिल्मों की नकल करके अश्लील नाचों का प्रदर्शन किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में दिल्ली के साप्ताहिक ‘हिन्दुस्तान’ ने हाल ही में एक मार्मिक सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा है-

“आज कल भारत वर्ष में जितने भी चलचित्र बन रहे हैं उनमें बहुत ही कम ऐसे हैं जिनमें पश्चिमी स्वर-प्रणाली के सस्ते और गन्दे प्रेम के गीत न गाये जाते हों तथा जनता की काम वासना को प्रज्ज्वलित करने वाले, अशिष्टतापूर्ण नग्नप्राय नृत्य न दिखाये जाते हों। दुख की बात तो यह है कि ये सभी चलचित्र हमारी राष्ट्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किये गये सेंसर- अधिकारियों द्वारा प्रदर्शन-योग्य प्रमाणित किये जाते हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि आधुनिकता के प्रवाह में हम इस प्रकार बेबस होकर क्यों बहते जा रहे हैं कि हमें उचित अनुचित तक का ध्यान नहीं रह गया है। जो कुछ पश्चिमी है वही आधुनिक है और जो कुछ भारतीय है वह संकुचित विचारधारा का द्योतक है, ऐसा सोच बैठना ही, हमारी समझ में, हमारे राष्ट्र की साँस्कृतिक अवनति का प्रमुख कारण है।”

वास्तव में इस सम्बन्ध में परिस्थिति बराबर बिगड़ती जाती है। सिनेमा के निर्माता अपना लक्ष्य केवल रुपया कमाना रखते हैं, फिर चाहे उससे जनता का चरित्र बने या बिगड़े इसकी उन्हें परवाह नहीं। आज से बीस वर्ष पहले भी अमरीका के अनेक पादरियों ने अश्लील फिल्मों के बहिष्कार का आन्दोलन आरम्भ किया था। उसी समय हमारे देश के माननीय नेता आचार्य पी.सी. राय ने भी कहा था कि “माँ बाप अपने लड़कों की शिक्षा के लिये अत्यन्त कष्ट से रुपया बचाकर भेजते हैं, पर वे उसे सिनेमाओं में उड़ा देते हैं।” तब से यह व्याधि बहुत बढ़ गई है और अब हमारा देश ही ऐसे फिल्मों के निर्माण का एक बड़ा केन्द्र बन गया है। हम चाहते हैं कि विधान सभाओं और लोक सभा में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों में से कोई सज्जन इस विषय पर वहाँ अपनी आवाज बुलन्द करें। साथ ही प्रभावशाली पत्रों को भी इस सम्बन्ध में जनमत को जागृत करके सरकार पर दबाव डालना चाहिये कि वह इस अश्लीलता के प्रवाह को रोके।


भयंकर भविष्य में सावधान

(श्रीराम शर्मा आचार्य)

गत अंक में सन् 1962 में महाप्रलय की संभावना के सम्बन्ध में एक प्रमुख ज्योतिषी की भविष्यवाणी छपी है। महाभारत के बाद ऐसा विकट समय अब की बार ही आया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक राशि पर अधिक ग्रहों का जमघट अशुभ माना जाता है। महाभारत युद्ध के समय केवल सात ग्रह एक राशि पर आये थे और उसके फलस्वरूप जिस भयंकर महाभारत का सूत्रपात हुआ उसने भारत ही नहीं सारे संसार का रूप बदल दिया। अब की बार वैसा ही नहीं उससे भी अधिक कठिन कुयोग पुनः सामने आ रहा है। सन् 1962 में जनवरी 16 और फरवरी 12 के बीच मकर राशि पर राहु को छोड़कर अन्य आठ ग्रह मकर राशि पर एकत्रित होंगे। राहु भी पूर्ण दृष्टि मकर राशि पर रखेगा इस प्रकार वह भी एक तरह से उसी राशि पर अवस्थित समझा जा सकता। इस तरह एक राशि पर पूरे नौ या साढ़े आठ ग्रह एकत्रित होंगे जिनकी भयंकरता महाभारत काल में एक राशि पर एकत्रित हुए सात ग्रहों की अपेक्षा कहीं अधिक है।

इस अशुभ कुयोग के फलस्वरूप मानव जाति को भयंकर आपत्तियों का सामना करना पड़ेगा। महायुद्ध, महामारी, दुर्भिक्ष, दुष्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि, अस्थिरता, अव्यवस्था, अराजकता जैसी अनेक विपत्तियाँ संसार के सामने अनेक रूपों में उपस्थित होंगी। जिसके फलस्वरूप अपार धन जन की हानि होने की संभावना है। संसार के एक तिहाई मनुष्य इन विपत्तियों की चक्की से पिस जावें तो कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।

वास्तविक संध्या काल वह होता है जिस समय सूर्य बिलकुल उदय या अस्त हो। यह समय प्रायः 5-5 मिनट का प्रातः समय होता है। वास्तविक संध्या काल 5-5 मिनट होने पर भी व्यावहारिक संध्या एक-एक घण्टे की मानी जाती है। चन्द्र, सूर्य ग्रहण के वास्तविक काल से बहुत पहले और बहुत पीछे तक सूतक काल रहता है। इसी प्रकार सन् 62 के कुयोग का वास्तविक समय यों 16 जनवरी से 12 फरवरी तक 26 दिन का है पर इसका पूर्व एवं पर काल 5-5 वर्ष आरम्भ तथा अन्त में रहेगा। सन् 57 से वह अशुभ कुचक्र आरम्भ होता है और उसकी समाप्ति सन् 67 तक चलेगी। इस प्रकार इस कुचक्र को एक प्रकार से 10 वर्ष का मानना चाहिये।

समय की इस कठिनाई को पाठक स्वतः अनुभव कर रहे होंगे। इस वर्ष भी संसार कम विपत्तियों में से नहीं गुजर रहा है। जगह-जगह नदियों की बाढ़ें, कहीं वर्षा का भारी अभाव, रेल दुर्घटनायें, डाकुओं के भयंकर उपद्रव, सर्वत्र बेहिसाब बढ़ती हुई पार्टी बन्दी, व्यापक गुण्डागर्दी, वर्ग संघर्ष, प्रान्तीयता भाषावाद और साम्प्रदायिकता का नग्न नृत्य, मुद्रास्फीति, चोरबाजारी, रिश्वत खोरी, तस्करशाही अन्न की कमी, बढ़ती हुई महंगाई, सरकारी कर्मचारियों की हड़तालें, राजनैतिक पार्टियों की अखाड़ेबाजी, जनता की क्रयशक्ति घटने और सरकारी प्रतिबंध बढ़ने से व्यापार में गतिरोध, व्यापक असंतोष का बोलबाला हो रहा है। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने नये प्रकार के शिकंजे और दांव−पेंच तैयार करके पहले से भी भयंकर रूप में प्रकट हो रही है। युद्ध की चिंगारियां एशिया, योरोप, अफ्रीका के विशाल भूखंडों में अनेकों स्थानों पर सुलग रही है, थोड़ा सा भी अवसर आने पर वे दावानल का रूप धारण कर सकती हैं। अणुबम, उद्जन बम, आदि सर्वसंहारी अस्त्र मानव सभ्यता को मटियामेट कर देने और धरती को प्राणि-विहीन बना देने के लिए चुनौती के रूप में खड़े हुए हैं। इन अस्त्रों के परीक्षण मात्र से विश्व का वातावरण भयंकर रूप से विषाक्त होता चला जा रहा है और उसके कारण जगह-जगह इन्फ्लुएंजा आदि बीमारियाँ फैल रही हैं और सर्दी-गर्मी, वर्षा के मौसमों का संतुलन बिगड़ रहा है। जो बालक इन दिनों उत्पन्न हो रहे हैं उनके मनः संस्थान क्रोध, द्वेष, अवज्ञा और उच्छृंखलता से भरे हुए आ रहे हैं। यह दुर्भाग्य आगे और भी बुरे रूप में उपस्थित होगा। जब बालक विकलाँग, अन्धे, गूँगे, बहरे, अपाहिज और पागल जैसी स्थिति में पैदा होकर धरती पर भूभार की तरह जीवन करेंगे और कैंसर, राजयक्ष्मा, अस्थि शोथ आदि भयंकर रोगों की यातनाओं से तड़प-तड़प कर प्राण देंगे। अणुबमों के परीक्षण से उत्पन्न हुई आकाश व्यापी रेडियो सक्रियता से इस प्रकार के अनेक उपद्रव खड़े हो रहे हैं और आगे होंगे।

जन साधारण के मनः क्षेत्र में एक विचित्र प्रकार का उच्चाटन हो रहा है। किसी ठोस एवं गंभीर कार्य पर किसी का मन नहीं लग रहा है। वासना, तृष्णा, ईर्ष्या, उद्वेग, द्वेष, कलह, प्रतिहिंसा, असहिष्णुता की अग्नि से लोगों के हृदय बेहिसाब जल रहे हैं। इस प्रकार की स्वस्थ मनोभूमि के व्यक्तियों के द्वारा जो क्रियायें हो रही हैं वे भी गड़बड़ी से भरी हुईं, अशाँति उत्पादक एवं दुखदायी ही सिद्ध होती हैं। आज की परिस्थितियों का सही चित्रण यही है। इन विषम परिस्थितियों के बीच हमारे अनेकों सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक सत्प्रयत्न जो जनता को सुखी बनाने एवं शान्ति स्थापना के लिए किये जा रहे हैं एक प्रकार से निष्फल ही हो रहे हैं।

इन विषम परिस्थितियों से हमें निराश एवं भयभीत होने की आवश्यकता नहीं वरन् वस्तु स्थिति की कठिनता को देखते हुए उसके शमन के लिए वीरोचित पुरुषार्थ के साथ कार्य करने के लिए कटिबद्ध होने का है। सूर्यचन्द्र ग्रहण काल के समय जो अशुद्ध वातावरण उत्पन्न होता है उसे जनता धर्म अनुष्ठान के द्वारा शान्त करती है। इसी प्रकार यदि प्रयत्न किया जाय तो वर्तमान काल में उत्पन्न हो रही एवं भविष्य में विकराल रूप धारण करने वाली इस अशान्ति पर काबू प्राप्त किया जा सकता है। तलवार प्रहार करती है पर उससे बचाव ढाल द्वारा हो सकता है। आग्नेयास्त्र से आग लगाई जाती है पर वरुणास्त्र से उसे ठंडा कर दिया जा सकता है। सर्प का विष मारक है पर उस विष का शमन करने वाली औषधियाँ भी हैं। महामारी फैलने के समय रोगों के कीटाणु उसी पर असर करते हैं जिसके शरीर में पहले से ही विषैले एवं रोग कीटाणुओं को सहारा देने वाले दूषित पदार्थ भरे होते हैं, यदि रक्त पूर्ण शुद्ध हो तो वह मनुष्य महामारी फैलने पर भी उस आपत्ति से बच सकता है। ग्रह दशा के कुचक्र से संसार पर आपत्तियों की तलवार का आक्रमण होता है पर यदि उससे प्रतिरोध करने के लिए धार्मिक अनुष्ठानों की ढाल आकाश में छा जाय तो वह अनिष्ट की तलवार उससे टकरा कर निष्प्रभ हो सकती है। इन्द्र ने जब द्वापर में भयंकर वर्षा करके ब्रज को डुबाना चाहा था तो भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की छाया करके उस अनिष्ट से ब्रजवासियों की रक्षा कर ली थी। यह दैवी प्रकोप भी द्वापर के इन्द्र कोप की तरह है। धर्मानुष्ठानों का गोवर्धन उठाने के लिये यदि सभी ग्वाल-बाल अपनी लाठी तानकर खड़े हो जाएं तो अपनी ही नहीं- सारे संसार की रक्षा हो सकती है और यह प्रलयकारी घटायें जो सूक्ष्म दृष्टि वालों को ही भयंकर एवं विकराल रूप से दृष्टिगोचर हो रही हैं- हलकी ही नहीं पड़ जायेंगी वरन् मामूली छींटे डालकर शान्त भी हो सकती हैं।

रुद्र का तीसरा नेत्र खुलने की संभावना है उसे देवता लोग विनयावनत होकर उन सर्वान्तर्यामी की प्रार्थना करके शान्त कर सकते हैं। संसार को जला डालने वाली भयंकर दावानल के जो शोले उठ रहे हैं और विकराल सर्वनाश का जो दृश्य उपस्थित करने वाले हैं उन्हें शान्त करने के लिए एक प्रचण्ड वरुणास्त्र की आवश्यकता है। दुनिया हाइड्रोजन बम बनाने में लगी हुई है। पर उससे उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों को शमन करने की शक्ति किसी में नहीं है। यह कार्य इस ऋषियों की भूमि भारतवर्ष में ही हो सकता है। यहाँ से संसार को शान्ति प्रदान करने वाली अमृत निर्झरिणी सदा से ही बहाई जाती रही है। इस समय जिस वरुणास्त्र की इन संभावित आपत्तियों को टालने की- इनका प्रतिरोध करने की इनसे समस्त मानव जाति को बनाने की क्षमता किसी में है तो वह इस ऋषि भूमि भारतवर्ष में ही है। अन्य देश आग्नेयास्त्र बना रहे हैं। वरुणास्त्र-इन अग्नियों को शान्ति करने वाला शान्ति वर्षा अस्त्र, जिसमें करोड़ों प्राणियों के धन जन की रक्षा हो सके- केवल भारत ही बना सकता है और बना रहा है।

गायत्री तपोभूमि द्वारा आयोजित ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान वस्तुतः एक आध्यात्मिक वरुणास्त्र है। एक-एक हाइड्रोजन बम बनाने में लाखों करोड़ों रुपये की लागत आती है और भारी श्रम एवं साधन सामग्री जुटानी पड़ती है। इस वरुणास्त्र के बनाने में धन की, मशीनों की, वस्तुओं की तो आवश्यकता नहीं पर श्रम अवश्य चाहिये और वह श्रम भी अश्रद्धालु लोगों का नहीं- उनका जिनका हृदय धर्म भावनाओं से परिपूर्ण हो। रावण को मारने के लिए त्रेता में एक घड़े की आकृति का महाबम बना था उसमें ऋषियों ने अपने रक्त बिन्दु भरे थे उसे खेत में गाड़ा गया था और उससे सीता-शक्ति का प्रादुर्भाव होकर दशों दिशाओं में विजय दुन्दुभी बजाने वाली असुरता का विनाश हुआ था। त्रेता में जिस प्रकार अपना रक्त बिन्दु देकर शान्ति बम बना रहे थे उसी प्रकार का प्रयत्न गायत्री तपोभूमि द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान-वरुणास्त्र-बनाने का किया जा रहा है। यदि यह बन गया तो दैवी प्रकोप की- सर्व संहारकारी असुरता की विभीषिका जो किलकारियाँ भर रही हैं वह शान्त हो सकती है- समाप्त हो सकती है।

इन दिनों मनुष्य जाति के सामने कठिनाइयाँ कम नहीं हैं। सहने की आदत बनती जाने से लोग बड़ी से बड़ी कठिनाई को सह लेते हैं। यह सन् 57 का वर्ष जिन कठिनाइयों में होकर गुजर रहा है उसे यदि सहने की आदत से अलग करके देखा जाय तो निस्सन्देह वह एक भारी मुसीबत का समय दिखाई देगा। सन् 1857 में जैसी मारकाट का गदर हुआ था वैसा तो नहीं पर अन्य प्रकार से यह भी एक तरह का गदर ही है। सौ वर्ष पूर्व जितनी धन जन की हानि और अशान्ति 1857 में हुई थी उससे अनेकों गुनी इस समय मौजूद है। भाषावाद, प्रान्तवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, वर्गवाद आधिपत्यवाद के स्वार्थों को लेकर लोग इस दुर्बल राष्ट्र को तबाह कर डालने पर तुले हुए हैं। यह 1857 जैसा गदर तो नहीं है पर एक प्रकार का गदर ही। मुसीबतें जो उस समय लोगों को उठानी पड़ी थीं आज उससे अधिक ही हैं कम नहीं। सन् 62 तक अगले 5 वर्ष ऐसी ही उलझनों से भरे हुए हैं। एक कठिनाई हल होने से पूर्व कई अन्य आपत्तियाँ उठ खड़ी होती हैं। एक गुत्थी सुलझने नहीं पाती कि दूसरी और नई उलझनें सामने आ जाती हैं। व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में- सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में यह अड़चनें जल्दी ही निपट जायेंगी यह आशा नहीं है। अगले पाँच वर्ष पग-पग पर कस-कस कर हमारी परीक्षा लेंगे।

इस वास्तविकता को जान लेने पर हमें निराश होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि संसार में बड़े से बड़े संकट जहाँ मौजूद हैं वहाँ उनके निवारण के उपाय भी उपलब्ध हैं। मनुष्य का पुरुषार्थ सर्वोपरि है, वह विधि के विधान तक को बदल डालने में समर्थ है। ईश्वर का अविनाशी अंश-मनुष्य अपने परम पिता परमात्मा की सभी क्षमताएं एवं शक्तियाँ अपने अन्दर धारण किये हुए हैं। वह अपनी शक्तियों को ईश्वरीय शक्तियों के साथ जोड़ दे तो ईश्वर के समान ही सब कुछ कर सकने वाला बन सकता है। निर्माण को विनाश में और विनाश को निर्माण में बदल सकता है। दुर्दैव का जो कोप सामने उपस्थित है वह संसार के अशुभ कर्मों का वैसा ही परिपाक है जैसे शरीर में संचित मल वर्षा ऋतु में उपयुक्त अवसर पाकर फोड़े, फुँसी, दस्त, दर्द आदि के रूप में प्रकट होते हैं। अनिष्ट कर ग्रह दशा भी वर्षा ऋतु की भाँति एक अनुकूल अवसर है जब कि संसार के संचित दुष्कर्म एक बारगी फटते फूटते हैं। यदि शरीर पहले से ही शुद्ध हो या उन्हीं दिनों भी शुद्ध कर लिया जाय तो वर्षा ऋतु में भी फोड़े, फुँसी या दस्त, दर्द की संभावना नहीं रहती। उसी प्रकार दुर्दैव का समय आने पर भी सत्कर्मों द्वारा यज्ञानुष्ठानों की चिकित्सा द्वारा उसका शमन हो सकता है।

वर्तमान काल की कठिन समस्या को सरल बनाने के लिए ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान एक असाधारण आध्यात्मिक प्रयत्न है। यों भौतिक प्रयत्न सामाजिक संस्थाओं, अर्थ-तंत्रों, सरकारों द्वारा चलते ही हैं और उनसे कुछ न कुछ लाभ भी होता ही है पर अदृश्य जगत में छाये हुये सूक्ष्म कारणों की निवृत्ति के लिये सूक्ष्म विज्ञान से सम्बन्धित आध्यात्मिक प्रयत्नों की भी आवश्यकता है। उनकी उपेक्षा करके केवल भौतिक उपचारों से कठिनाइयों को हल नहीं किया जा सकता। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। इसे सफल बनाने के लिये प्रयत्न करना- सहयोग देना एक ऐसा दूरदर्शिता पूर्ण कार्य है जिससे हम स्वयं अपने आपको ही संभावित आपत्तियों की चक्की में पिसने से नहीं बचाते वरन् अन्य असंख्यों प्राणियों का जीवन दान जैसा उपकार करते हैं। इससे बढ़कर पुण्य और सत्कर्म इस समय और कोई हो नहीं सकता। प्रतिदिन 24 लक्ष जप 24 हजार आहुतियाँ, 24 हजार मन्त्र लेखन, 24 हजार पाठ का जो ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इन दिनों चल रहा है उसे सफल बनाने के लिए हर धर्म प्रेमी का सहयोग आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति के पाठकों में से अनेकों ने इस दिशा में सक्रिय कदम उठाये हैं पर अधिकाँश अभी ऐसे हैं जिन्होंने इधर कुछ ध्यान नहीं दिया है। यह उपेक्षा अखरने और खटकने वाली है। अखण्ड-ज्योति परिवार धर्मनिष्ठ, कर्तव्य परायण एवं जागरुक सत्पुरुषों का संगठन है। इसके हर सदस्य से यह आशा की जाती है कि मानव जाति की सुख, शान्ति एवं सुरक्षा के लिये उन्हें कुछ करना ही चाहिये। थोड़ा समय और श्रम देकर हममें से प्रत्येक गायत्री उपासना का कुछ नियमित संकल्प लेकर ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का भागीदार बन सकता है। चूँकि यह सामूहिक संकल्प है इसलिये इसमें अकेले-अकेले कुछ जप तप कर लेने से काम न चलेगा। अपने निकटवर्ती धर्म प्रवृत्ति के लोगों को इस मार्ग की प्रेरणा देकर उन्हें एक संगठन सूत्र में सम्बद्ध करके ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में लगाया जा सकता है। जहाँ इस प्रकार के थोड़े से भी व्यक्ति सामूहिक रूप से गायत्री उपासना करने को तैयार हों वहाँ गायत्री परिवार की एक शाखा स्थापित कर लेनी चाहिये। और मिल जुल कर अधिकाधिक गायत्री साधन द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने में सहायक होना चाहिये।

विवेकवान् धर्म प्रेमियों से हमारा आग्रह पूर्वक अनुरोध है कि वे समय की भयंकरता को देखते हुए उसके शमन के लिए कुछ धर्म कर्तव्य पालन करने को कटिबद्ध हों। तपोभूमि को ऐसे शिक्षित नर नारियों की भारी आवश्यकता है तो पारिवारिक उत्तर दायित्वों से निवृत्त हो चुके हों, और केवल शरीर निर्वाह की व्यवस्था प्राप्त करके विश्व शान्ति के इस महान आयोजन ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने में योगदान करें। हम चाहते हैं कि कुछ सज्जन आगामी पाँच वर्ष सच्चे मन से परमार्थ के लिये लगा दें। गायत्री उपासना एवं यज्ञानुष्ठानों के प्रचार के लिए सच्चे परिव्राजकों की तरह धर्म फेरी करें। कुछ लोग तपोभूमि में रहकर यहाँ यज्ञानुष्ठान में तत्पर रह कर अपना तथा समस्त संसार का भारी हित साधन कर सकते हैं। आगामी पाँच वर्ष बड़े ही महत्वपूर्ण हैं, इन्हें जो सफल बना सकें उन्हें ही सच्चे भाग्यवान कहा जायेगा। जो लोग इन धर्मानुष्ठानों की उपेक्षा करके व्यक्तिगत लाभ उपार्जन में लगे हुए हैं वे मूर्ख हैं क्योंकि उनकी उपार्जित वस्तुयें दुर्दैव के एक ही थपेड़े में चूर-चूर हो जाने वाली हैं। छप्पर में आग लग जाने पर जो काम धन्धा छोड़कर उसे बुझाने में लग पड़ता है वह बुद्धिमान है और जो बुढ़िया आग को दूर समझ कर अपने काम से काम रखकर चक्की पीसती रहती है वह बुढ़िया अपने आप से ही नहीं अपने शरीर से भी हाथ धो बैठती है। आपकी परिस्थिति ऐसी ही हैं और वे सभी धन प्रेमियों को अपना समय इन सत्कार्यों में लगाने की प्रेरणा करती हैं।


गायत्री उपासना के अनुभव

घर छोड़ने वाला व्यक्ति वापस आया

उरई (यू.पी.) से सु. शिवकान्ती देवी मिश्र लिखती हैं कि मेरे बहनोई श्री माधव प्रसाद मिश्र बिना सूचना दिये कहीं चले गये थे जिससे परिवार के सब लोग अत्यन्त दुखी थे। इस दुख की निवृत्ति के लिए हमने गायत्री जप किया और आचार्य जी से निवेदन किया। उन्होंने उनका चित्र मंगाकर गायत्री माता की कृपा प्राप्त कराई जिससे 7 जून को माधव प्रसाद जी घर वापस आ गये। इस कृपा के लिये मैं पूज्य गुरुदेव को श्रद्धाँजलि अर्पित करती हूँ।

साँप के काटे की प्राण रक्षा

कचनरा मंडी (पो. नवाबगंज, बरेली) से श्री विद्यराम गंगवार लिखते हैं कि, मैं ता. 15.7.57 को फावड़ा लेकर अपने खेत पर बाँध बाँधने गया। एक बाँध बाँध कर दूसरी तरफ जा रहा था कि एक साँप ने पैर में डस लिया। मैंने उसे फावड़े के नीचे दबा दिया और 4 खेत की दूरी पर लाठी लेने गया। वहाँ से लौटा तो साँप को वहीं पाया और लाठी से मार दिया। इसके बाद गायत्री मंत्र से वहाँ चीरा दिया और मंत्र पढ़कर बन्द लगा दिया। उस समय मुझे ठीक होश नहीं था, पर शाम तक माता की दया से मैं बिल्कुल चंगा हो गया।

काल के गाल से वापस

कसही बहरा (रायपुर म.प्रा.) से श्री रामगरीब अग्रवाल लिखते हैं कि मेरे पूज्य पिताजी का स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया था। जब डाक्टरी इलाज से कुछ लाभ नहीं हुआ तो मैं उनके स्वास्थ्य के लिये गायत्री जप करने लगा और उनसे भी आग्रह करके जप कराने लगा। इससे उनको काफी लाभ हुआ। फिर एक-एक कारबार में विशेष घाटा हो जाने से उनको बड़ा धक्का लगा और उन्होंने फिर खाट पकड़ ली। इससे रक्षा पाने को मैंने सवालक्ष अनुष्ठान आरम्भ किया पर सात-आठ दिन बीतने पर ही मुझे माता की तरफ से ऐसा आभास मिला कि तीन मास बाद तुम्हारे परिवार पर महान संकट आयेगा। ठीक तीन मास बाद चैत्र सुदी सप्तमी को पिताजी की हालत एकाएक बिगड़ गई और बचने की कोई आशा नहीं रही। पर उसी समय मेरा जप पूरा हुआ। मैंने कलश का कुछ जल पिताजी पर छिड़का और कुछ पिला दिया। इससे उनकी दशा में आश्चर्यजनक रूप से परिवर्तन हो गया और अब वे स्वस्थ हैं।

मरणासन्न रोग से मुक्ति

श्री रंगलाल मिश्र पछाये गाँव (इटावा) से लिखते हैं कि मेरी भाभी रक्तस्राव से मरणासन्न दशा में थी। चारपाई का सहारा देकर बैठाने में भी बेहोश हो जाती थी। हालत इतनी खराब थी कि इटावा से डॉक्टर बुलाने का भी समय नहीं रह गया था। अतः गायत्री के लघु अनुष्ठान का संकल्प किया तथा उसी अचेतावस्था में ताँगे में रखकर इटावा ले गया। रास्ते में कई बार प्राण निकलते जान पड़े, गायत्री माता की कृपा से इटावा पहुँच कर 4 दिन में निरोग हो गईं।

पारिवारिक कलह शाँति

श्री सीताराम श्रीवास्तव पछायागाँव (इटावा) से लिखते हैं कि मुझे सर्वप्रथम अक्टूबर 1955 को ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ने को मिली। उसके बाद जब मेरे परिवार में कलह हुई तो मैं लेटे ही लेटे मन में मन्त्र जपने लगा फलस्वरूप दो दिन में शाँति हो गई। इसी प्रकार मुझे बीड़ी पीने का दुर्व्यसन था जो छोड़ देने पर शरीर पर बुरा असर पड़ता था। मैंने गायत्री माता से इसके लिये प्रार्थना की। उसके बाद मैंने वह आदत त्याग दी और कोई शारीरिक कष्ट नहीं हुआ।

मसान रोग दूर हो गया

श्री श्यामलाल ‘दीन’ नगला सुम्मेर (जिला अलीगढ़) लिखते हैं कि मेरे गाँव में एक सजातीय भाई पीतम्बर का लड़का मसान रोग से पीड़ित था। वैद्यों और झाड़-फूँक करने वालों ने बहुत उपाय किये पर लाभ न हुआ। जब मुझसे कहा गया तो मैंने गायत्री मंत्र का जल और तपोभूमि की यज्ञ की भस्म दी जिससे बच्चा तुरन्त स्वस्थ हो गया। यह देखकर दर्शक चकित रह गये और गायत्री माता का गुणानुवाद करने लगे।

गायत्री माता की कृपा से यमदूत भाग गये

श्रीमती सावित्री देवी फिलौर (पंजाब) से लिखती हैं कि सन् 1956 की 21 अप्रैल को गायत्री तपोभूमि में जो ‘विशद् गायत्री महायज्ञ’ होने वाला था, उसमें आने का निमंत्रण मुझे आचार्य जी ने भेजा था, और मेरी उसे देखने की बड़ी अभिलाषा थी। अकस्मात् 17 ता. की रात को एक बड़ी दुर्घटना घटी। लगभग दस बजे मैं न जाने कैसे सोती हुई उठकर खड़ी-खड़ी गिर पड़ी और बड़ी देर तक मृत-तुल्य बनी रही। पर न मालूम कौन सी शक्ति ने मेरी प्राण-रक्षा की। मैं बड़ी कमजोर हो गई थी, तो भी 19 अप्रैल को मथुरा के लिये रवाना हो गई। यह गायत्री माता की महिमा ही थी कि मरते-मरते भी मैंने इस महायज्ञ के दर्शन कर लिये। जब मैं गिरी थी तो चोट लगने से सिर से बहुत सा खून निकल गया था और वह इतना कमजोर हो गया कि बरसात के दिनों में जरा भी हवा लगने से वह पत्थर की तरह सुन्न हो जाता था। इस घटना के बाद भी यमदूतों ने मेरे ऊपर बार-बार हमले किये पर गायत्री माता बराबर मेरी रक्षा करती रहीं। कई महीने तक कितने ही डाक्टरों, वैद्यों, हकीमों से मेरी चिकित्सा भी कराई गई, पर उससे प्रायः नुकसान ही हुआ। तब मैंने आचार्य जी को पत्र लिखा कि सात महीने से यमदूतों से मेरी लड़ाई हो रही है और मैंने अब गायत्री माता से कह दिया है कि अब मैं कोई दवाई नहीं खाऊंगी चाहे मौत ही आ जाये। आचार्य जी ने मुझे लिखा कि अब तुम ठीक हो जाओगी और उनके आशीर्वाद से अब मेरा स्वास्थ्य पहले से बहुत कुछ सुधर गया है।

मन की अशान्ति दूर हो गई

श्रीमती मगनदेवी अध्यापिका, बिजनौर (यू.पी.) से लिखती हैं कि पहले मेरा मन प्रायः अशाँत रहा करता था। पर जब से गायत्री जप व हवन का नियम बना लिया है तब से एक अजीब प्रकार की शान्ति का अनुभव हुआ करता है और अब कठिन से कठिन काम या समस्या आ जाने से भी कोई अशान्ति पैदा नहीं हो पाती। माता की कृपा से एक चमत्कार का अनुभव हुआ करता है।

मेरा जीवन ही बदल गया

श्री ताराचन्द अधरिया गाँव सोनासिली (जि. रायपुर) से लिखते हैं कि बचपन से मैं अनेक दुर्व्यसनों में फंस गया था; न मालूम किस आकर्षण से मैं गायत्री तपोभूमि मथुरा की तरफ खिंच गया और वहाँ 39 दिन में सवा-सवा लाख के तीन अनुष्ठान किये। इस बीच में एक दिन रात के आठ बजे गायत्री माता की मूर्ति के सामने बैठे-बैठे मुझे उन्माद सा हो गया और चीख मार कर माता के सामने गिर पड़ा तथा बीस मिनट के लगभग रोता हुआ पड़ा रहा। इस समय में मैं माता की अनोखी वाणी को भी सुनता रहा जिससे मेरी खराब आदतें सदा के लिये दूर हो गईं और मेरी समस्त शंकाओं का समाधान होकर मेरा जीवन ही बदल गया।

मनोकुल वर मिल गया

श्री भालचन्द्र नारायण कवटेकर बड़ौदा (गुजरात) से लिखते हैं कि मेरी लड़की चि. कमल सन् 1954 में मैट्रिक पास हुई थी और उसके लिये सुयोग्य वर ढूंढ़ने को मैं बड़ा चिन्तित रहता था। मैं किसी अमीर व्यक्ति से विवाह करना नहीं चाहता था, पर वह गायत्री माता की उपासना करने वाला हो तो बहुत ठीक है। इसी समय मेरा तबादला भी धोलका को हो गया और मैं अपने कुटुम्ब को छोड़कर वहाँ रहने लगा जिससे लड़की के विवाह की समस्या और भी कठिन हो गई। पर मैं लगातार गायत्री जप और माता जी की उपासना करता रहा जिसके फल से अनायास ही बड़ा सुयोग्य वर मिल गया और मेरा तबादला भी पुनः बड़ौदा को हो गया। इस प्रकार माता की कृपा से मेरी दोनों मनोकामनाएं पूरी हो गईं।

बच्चे की प्राण रक्षा हुई

श्री गोवर्द्धन भट्ट शास्त्री सीवानी मालवा (म.प्र.) से लिखते हैं कि यहाँ आँवली घाट पर अभी एक गायत्री महायज्ञ हुआ था जिसमें यजमान थे स्कूल इन्सपेक्टर श्री बैजनाथ प्रसाद शर्मा और कर्मकाण्ड मैं स्वयं करा रहा था। यज्ञ प्रारम्भ होने के दूसरे दिन साइकिल पर एक शिक्षक आये और इन्सपेक्टर साहब को सूचना दी कि आपका बच्चा बहुत बीमार है, बचने की आशा नहीं है। इन्सपेक्टर साहब ने कहा जो भी हो मैं पूर्णाहुति किये बिना यहाँ से नहीं हट सकता। लोगों ने बहुत समझाया कि जाकर बच्चे को देखिये, पर वे गायत्री माता में विश्वास रख कर अटल रहे। दूसरे दिन अन्य व्यक्ति आये और उनसे मालूम हुआ कि अब बच्चा बिलकुल स्वस्थ है। इस सूचना से यज्ञ में आनन्द छा गया और अन्त तक कार्यक्रम बड़ी ही श्रद्धा से पूर्ण हुआ।

इन्फ्लुएंजा अच्छा हो गया

श्री विश्वनाथ पाण्डेय, दानापुर (पटना) से लिखते हैं कि ता. 7 जून को मैं अपने चाचा के यहाँ पहुँचा। दरवाजे के बाहर से ही मुझे रोने, पीटने का शब्द सुनाई पड़ा। जैसे ही मैं अन्दर पहुँचा वे और भी जोर से विलाप करने लगे। मालूम हुआ कि विजय को इन्फ्लुएंजा हो गया है और उसकी बोली बन्द हो जाती है। डॉक्टर से इलाज कराया, पर लाभ न हुआ। मैंने चाचा से कहा कि किसी कुँए से एक हाथ से जल खींच कर ले आइये। मैंने तुलसीदल जल में डालकर गायत्री से उसे अभिमंत्रित किया तथा उससे विजय का मुख धुलवा दिया शेष पिला दिया। माता की कृपा से वह शाम तक ही चंगा हो गया।

प्रेत भाग गया

दानापुर में ही एक गायत्री उपासक हवन कर रहे थे कि उन पर प्रेत का आवेश हो आया। यह देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि गायत्री के समक्ष प्रेत कैसे आ गया? इससे तो गायत्री का विश्वास ही जाता रहेगा। उसी समय वे महाशय पूर्ववत् स्वस्थ हो गये। मालूम हुआ कि वे द्रव्य लेकर झाड़फूँक का काम किया करते हैं। यज्ञ करते समय उनको कुछ अहंकार हो गया और उसी के फल से प्रेत का आक्रमण हुआ, पर गायत्री उपासना के प्रभाव ने उनकी रक्षा की।

आर्थिक स्थिति सुधर गई

श्री सोहनलाल गाँव नंगी अनता, खास (जि. पीलीभीत) लिखते हैं कि मेरे भाई श्री पंचमलाल ‘सरल’ कहते हैं कि लगभग 3 वर्ष से, जब से मैंने गायत्री माता की शरण ली है, मेरे पास कभी धनाभाव नहीं रहा और मैं निरन्तर उन्नति करता जा रहा हूँ।

हनुमान जी का प्रादुर्भाव

श्री मक्खनलाल जी दीक्षित, “साहित्य रत्न” दिगौड़ा से लिखते हैं कि ता. 20, 21 अप्रैल को गायत्री परिवार, दिगौड़ा की ओर से देवरवा ग्राम में गायत्री-जप व हवन का विशेष आयोजन किया गया था। इस कार्य का संचालन करने के हेतु दादा दुर्गा प्रसाद जी टीकमगढ़ से निमंत्रित किये गये किन्तु किसी कारण वश वे प्रथम दिन न आ सके। उसी दिन रात को सोते समय किसी ने उनको आदेश दिया कि तुम शीघ्र ही आमंत्रित स्थान पर जाओ। दादा जी चौंक पड़े और दूसरे ही दिन प्रातः देवरवा पहुँच गये। देवरवा के मन्दिर में हनुमानजी की प्रतिमा थी वह सपाट पत्थर की तरह थी, उसी पर सिन्दूर चढ़ा दिया जाता था। दादाजी ने हनुमान जी का दर्शन किया और प्रेम विभोर होकर उनको नया सिन्दूर चढ़ाने लगे। अचानक मूर्ति पर वर्षों से चढ़ा अंगराग खसक पड़ा और भीतर से हनुमानजी की ऐसी सुरम्य और विशाल मूर्ति निकल पड़ी कि वैसी बहुत कम मन्दिरों में दिखाई पड़ती है। यह दृश्य देखकर जनता जय-जयकार कर उठी और सबके मुँह से यही निकलने लगा- “प्रेम से प्रकट होंहि भगवाना।”

भूतबाधा दूर हुई

श्री नर्मदाशंकर ब्रह्मचारी राजकोट से लिखते हैं कि “कुछ समय पहले मैं ‘सीतलानु कालापड़’ नामक काठियाबाड़ के एक गाँव में गया था। वहाँ मेरे दो मित्र बल्लभदास और जमनादास नाम के रहते हैं। उन दोनों की स्त्रियों पर अमरेली के किसी पापी ब्राह्मण का आवेश होता था, जिससे घर भर को बड़ा कष्ट था। इसके लिए सैंकड़ों उपाय कराये पर कोई फल न निकला। जमनादास की माता ने मुझे भी सब हाल सुनाया और विलाप करने लगी। मैंने उनको विश्वास दिलाया कि वेद माता गायत्री के प्रयोग से सब प्रकार की बाधा दूर हो सकती है। तब मैंने उनको पंचाक्षर मंत्र का 108 जप नित्य करने को बताया और अपने मन में संकल्प किया मैं इसके निमित्त सवालक्ष जप का अनुष्ठान करूंगा और इस अवसर पर नमक, मिर्च, तेल आदि त्याग कर केवल सात्विक भोजन करूंगा। यह सब करके मैं तो दूसरे दिन की गाड़ी से राजकोट वापस आ गया। वहाँ जब उन स्त्रियों को भूतबाधा हुई तो जमनादास ने गायत्री मंत्र पढ़कर पानी पिला दिया। वह भूत कहने लगा “मैं जाता हूँ”- “मैं जाता हूँ।” तब से वे सब कुशल से रहने लगे।

नदी में डूबने से बचा

श्री बसन्तीलाल श्रीवास्तव, भितरवा (म.प्र.) से लिखते हैं कि “एकबार मैं अपने गाँव की एक पहाड़ी नदी में तैर रहा था। अकस्मात् गहरे पानी में चला गया और पानी के तेज बहाव में बहने लगा। यह देखकर मेरे साथ के अन्य युवक डर कर गाँव को भाग गये। इतने में ऊपर से पानी भी बरसने लगा। मैं 15 मिनट तक बहते-बहते एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ नदी का पानी 175 फीट ऊपर से नीचे की तरफ बड़े वेग से गिरता था। यह देखकर मेरे भीतर शून्यता छा गयी और मेरी जबान बन्द हो गई। मेरे मन में एकाएक यह भाव आया कि गायत्री माता मेरे प्राण ले। मैं इतना ही संकल्प कर पाया कि ठीक उस जगह जा पहुँचा जहाँ से नदी नीचे गिरती थी। आधी मिनट में ही मेरी यह संसार यात्रा समाप्त हो जाने वाली थी। पर अचानक मैं एक बड़े पत्थर से जाकर रुका जो पानी में एक हाथ डूबा हुआ था। वहाँ मैं बड़े आराम से बैठ गया। मैं नहीं कह सकता कि मुझे किस प्रकार यह भान हुआ कि यहाँ चट्टान है और इससे मैं बच जाऊंगा। उस दिन से गायत्री माता की जप ही मेरे जीवन का प्रधान कार्य बना हुआ है।

विवाह की बाधा टल गई

बहराइच से श्री लालताप्रसाद जी पेन्शनर र. कानूनगो लिखते हैं- “मुझे तो यह संसार ही वेद-माता का चमत्कार जान पड़ता है और पग-पग पर उसके अनुभव दिखलाई पड़ते हैं। मुझे मोतियाबिन्द हो गया था समझा कि अब नौकरी से हटना पड़ेगा और इससे बहुत घबड़ाया। पर माता की कृपा से आपरेशन द्वारा दोनों आँखें ठीक हो गईं। इससे आठ साल तक काम करके पेन्शन मिली। अब 11 वर्ष से पेंशन ले रहा हूँ। मेरी भतीजी के विवाह में बड़ी अड़चनें पड़ीं। हमने वरिच्छा तिलक दे दिया पर ब्याह की तिथि पर उन्होंने इनकार कर दिया। अब तो हम लोगों के होश ठिकाने न रहे। तब गायत्री माता की शरण ली जिससे दूसरी जगह सुगमता से ब्याह हो गया और पहले से घर, वर सब अच्छा मिला। मेरी पोती मनोरमा देवी इन्ट्रेन्स क्लास में इंग्लिश में बहुत कमजोर थी पर गायत्री जप करते- करते वह एफ.ए., बी.ए., एम.ए, (प्रीवि.) कर चुकी है और अब एम.ए. (फायनल) की तैयारी कर रही है। मेरे एक रिश्तेदार बा. ज्योतिष स्वरूप जी पर जाल करने का सरकारी मुकदमा चलाया गया। तब तक मुकदमा चलता रहा वे नित्यप्रति 10 माला गायत्री मंत्र की जपते रहे, अवकाश न मिलने पर दूसरों से जप कराया। माता की दया से साफ छूट गये और पूरी तनख्वाह मिली।”


चमत्कार को नमस्कार

(श्री सत्यदेव शर्मा)

अखण्ड ज्योति एवं गायत्री परिवार की विशेषता उसमें सम्मिलित आदर्शवादी सत्पुरुष ही हैं। उनके द्वारा भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का जो महत्वपूर्ण कार्य इस थोड़े समय में हो रहा है उसे देखते हुए भविष्य के सम्बन्ध में सहज ही यह आशा की जा सकती है कि यह संगठन युग निर्माण की भूमिका में महत्वपूर्ण पार्ट अदा करेगा। कुछ परिजनों के परिचय इस अंक में उपस्थित करते हैं। यह परिचय क्रम आगे भी जारी रहेगा।

श्री माधोलाल शर्मा

झालावाड़ शाखा के मन्त्री श्री माधोलाल जी प्रतिज्ञा पर जान की बाजी लड़ा देने वाले, कर्तव्यपरायण धर्मनिष्ठ व्यक्तियों में से हैं। जिस कार्य को हाथ में लेते हैं उसे पूरा किये बिना चैन नहीं लेते। इस कर्तव्य परायणता ने ही उन्हें 8/- मासिक की नौकरी वाले जीवन से ऊपर उठाकर शिक्षा विभाग के वर्तमान प्रतिष्ठित पद तक पहुँचाया है।

श्री माधोलाल जी ने विशद् गायत्री महायज्ञ के समय 46 लक्ष सामूहिक महापुरश्चरण झालावाड़ में कराने का संकल्प किया था। और उसकी पूर्ति तक उपवास, भूमिशयन आदि अनेक कठोर व्रत लिये थे। दैव दुर्विपाक ने माधोलाल जी की परीक्षा लेने के लिए आसुरी संकट उत्पन्न कर दिये। फिर भी वे हताश न हुए, अपने व्रत पर डटे रहे। अनुष्ठान की पूर्णाहुति के समय आर्थिक प्रबन्ध कुछ भी न था पर माता के अनुग्रह का चमत्कार देखिए, दो-चार दिन में ही सब कुछ हो गया। इतने आनन्द और उत्साह के वातावरण में वह सफल हुआ कि देखने वाले अभी तक उसका आश्चर्य मानते हैं।

साधनों का मूल्य तुच्छ है, मनुष्य की लगन ही सब कुछ है। साधनहीन व्यक्ति भी अपनी प्रबल निष्ठा के बल पर क्या कर सकते हैं यह माधोलाल जी की हँसती हुई सूरत किसी को अनायास ही सिखाती रहती है।

श्री सत्यनारायण जी तिवारी

कहते हैं कि- “ज्यों-ज्यों मनुष्य बूढ़ा होता जाता है और मौत के निकट पहुँचता जाता है त्यों-त्यों उसकी ममता और तृष्णा बढ़ती जाती है।” प्राचीन काल में लोग 40 वर्ष के बाद वानप्रस्थ बनाकर लोक सेवा की तैयारी करते थे और 60 वर्ष बाद संन्यास लेकर धर्म प्रचार के लिए परिव्राजक बन जाते थे। पर आज तो बुड्ढों को जितना मोह और तृष्णा देह, धन तथा कुटुम्ब की है उतनी जवानों को भी नहीं होगी। मृत्यु के जो जितना निकट पहुँचता जाता है वह परलोक को उतना ही भूलता जाता है यह हैरत में डालने वाली मनोवृत्ति आज सर्वत्र दीख पड़ती है और कलियुग का प्रभाव बढ़ चला मालूम देता है।

इतने पर भी अपवादों का अभाव नहीं है। इन्दौर के श्री सत्य नारायण जी तिवारी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों को लगभग पूर्ण कर चुके हैं। उनके सभी बच्चे सुशिक्षित और उच्च पदों पर हैं। स्वयं को भी पेन्शन मिलती है अब तिवारी जी ने शेष जीवन उपासना और धर्म सेवा के लिए लगाना निश्चित किया है। प्रतिदिन 10 घन्टे लगाकर अपना 24 लक्ष महापुरश्चरण करने में इन दिनों बड़ी श्रद्धा और तन्मयता के साथ संलग्न हैं।

श्री आनन्दराव मंडलोई

किसान की सीधी सादी पोशाक में कसराबद निवासी श्री. आनन्द राव मंडलोई की विशेषताओं को ढूंढ़ निकालना कठिन है। वे प्रदर्शन और शेखी खोरी से कोसों दूर रहकर जीवन को सुव्यवस्थित बनाने के पक्षपाती रहे हैं। उन्होंने गृहस्थ-योग के आदर्शों को अपना कर अपने परिवार को सम्भ्रान्त और सुशिक्षित बनाने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया है। परिवार के सभी बालक उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं पर साथ ही कृषक परिवार की श्रम शीलता और सादगी को उनमें से किसी ने भी छोड़ा नहीं है। सदाचार सेवा भावना, सात्विकता और सादगी को मंडलोई जी ने अपने तक ही सीमित न रखकर अपने परिवार और नगर में भरपूर मात्रा में फैलाया है। भाषणों की अपेक्षा अपना उदाहरण पेश करने वाले प्रशंसनीय सत्पुरुषों में श्री. आनन्द राव मंडलोई की गणना बड़े गर्व के साथ की जा सकती है।

श्री पातीराम त्रिपाठी

चपुन्ना (इटावा) में किराने की एक छोटी सी दुकान करने वाले पं. पातीराम त्रिपाठी अपने धर्म सहयोगी पं. विशेश्वर दयाल जी द्विवेदी के साथ विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति में मथुरा आये थे। गायत्री और यज्ञ का घर-घर प्रचार करने की आचार्य जी की अपील से प्रभावित होकर आप दोनों ने अपने आस-पास के 24 गाँवों में 24 यज्ञ कराने का संकल्प लिया। आप लोगों ने कठिन परिश्रम करके उस संकल्प को पूरा किया। फिर अन्त में 24 गाँवों का एक सामूहिक बड़ा यज्ञ चपुन्ना में हुआ। जिस खेत में यज्ञ हुआ था वह पक्की सड़क से बिलकुल सटा हुआ श्री पातीराम त्रिपाठी का है। उन्होंने उसे गायत्री माता को अर्पण कर दिया। इस खेत में अब एक सुन्दर बगीचा लग रहा है और जल्दी ही पक्का गायत्री मन्दिर तथा यज्ञशाला बनने वाली है। श्री पातीराम जी त्रिपाठी और विशेश्वर दयाल जी दुबे की युगल जोड़ी ने उस क्षेत्र में 24 गायत्री परिवार की शाखाएं स्थापित करने का संकल्प लिया है आशा है कि वह पूरा होकर रहेगा। जिनके सच्ची लगन हो वे पातीराम जी की तरह बहुत कुछ कर सकते हैं।

डॉ. रामनारायण भटनागर

इटौआ धुरा (बरेली) के डॉ. रामनरायन जी भटनागर वहाँ की ग्राम पंचायत के प्रधान तथा एक सेवाभावी होम्योपैथिक डॉक्टर हैं। आपने जीवन भर बड़ी कठोर गायत्री साधना अनेक व्यक्तियों के साथ पूरी की है। घर में रहकर सफेद कपड़े पहनते हुए भी कोई व्यक्ति जिस प्रकार सच्चे संत का जीवन व्यतीत कर सकता है डॉक्टर साहब इस बात के एक प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, वे स्वयं तो नैष्ठिक गायत्री उपासक हैं ही उन्होंने अपने प्रयत्न से उस क्षेत्र में दूर-दूर तक अनेकों गायत्री उपासक बनाये हैं। गायत्री तपोभूमि के सभी प्रवृत्तियों में डॉक्टर साहब सदा अग्रणी रहते हैं।

श्री नन्दकिशोर शर्मा

सुसनेर (मन्दसोर) शाखा के मन्त्री पं. नन्दकिशोर शर्मा बड़ी लगन के कर्मनिष्ठ धर्म प्रेमी हैं। सन् 40 के अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य हैं और गत 17 वर्षों से धर्म प्रचार के कार्य में अपने व्यक्तिगत अन्य कार्यों की तरह ही दिलचस्पी लेते रहे हैं। उस प्रदेश के पिछड़े लोगों के हृदय जीतकर आपने हजारों से मद्य माँस का सेवन छुड़ाया और जनेऊ धारण कराके पवित्र जीवन व्यतीत कराने का व्रत लिवाया है। इस वर्ष ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्ति के लिए आपने 108 छोटे बड़े हवन कराने का संकल्प लिया है जिसमें से अधिक संकल्प पूरा भी हो चुका है। एक वर्ष में शर्माजी द्वारा 108 यज्ञ पूरा होने की पूर्ण सम्भावना है।

श्री कन्हैयालाल श्रीवास्तव

रिसिया (बहरायच) शाखा के मन्त्री श्री कन्हैयालाल जी श्रीवास्तव एम.ए. वहाँ के सरस्वती उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य तथा जिला अध्यापक मंडल के प्रधान हैं। व्यक्तिगत जीवन में उच्च चरित्र एवं अधिकाधिक उपासना पर आप जितना ध्यान देते हैं उतना ही सार्वजनिक सेवा, लोकहित और जन कल्याण का महत्व भी समझते हैं। आपने प्रयत्न से रिसिया शाखा के सदस्यों के एक 24 हजार का सामूहिक अनुष्ठान प्रति दिन पूरे एक वर्ष तक करने का निश्चय किया है। यह संकल्प बड़े आनन्द पूर्वक निभ रहा है। इस संकल्प के एक वर्ष पूरा होने पर एक बड़ा सामूहिक यज्ञ करने तथा रिसिया गायत्री मन्दिर एवं यज्ञशाला बनाने का ठोस कार्यक्रम अभी से बन रहा है। प्रभाव शाली व्यक्ति अपने प्रभाव का उपयोग जनता को सन्मार्ग में प्रवृत्त करने के लिये करें तो वे श्री कन्हैयालाल जी की तरह बहुत उपकार कर सकते हैं।

श्री महादेव प्रसाद माहेश्वरी

स्नातकोत्तर बुनियादी प्रशिक्षण महाविद्यालय भोपाल के लैक्चरार श्री महादेव प्रसाद जी माहेश्वर एम.ए. एल.टी. बी.एड. अपनी शिक्षा समाप्त करने के बाद में स्कूलों के इन्सपैक्टर आदि कई महत्वपूर्ण शिक्षा अधिकारी पदों पर कार्य करते रहे हैं। आपका अनेकों व्यक्तियों से नित्य संपर्क होता है और अनेक प्रकार के विचार विनिमय करने पड़ते हैं। उस विचारों के आदान प्रदान से आप गायत्री की महत्ता की चर्चा भी करते रहते हैं। इस प्रकार आपने अब तक हजारों गायत्री उपासक बनाये। श्री माहेश्वरी जी की भाँति लोग अपने मिलने वालों से यदि गायत्री की महत्ता की चर्चा करते रहने का स्वभाव बना लें तो वे सहस्रों मनुष्यों को सन्मार्ग प्रवृत्त करने का पुण्य लाभ कर सकते हैं।

श्री गिरिजासहाय खरे

श्री गिरिजा सहाय झाँसी जिले के ग्राम बानपुर के रहने वाले तथा रेलवे में डी.एस. आफिस में क्लर्क हैं। गत वर्ष झाँसी में होने वाले नव कुण्डी यज्ञ आयोजन में इनका संपर्क भी बालकृष्ण अग्रवाल से हो गया और उसी समय से ये बालकृष्णजी के अभिन्न साथी बन गये। अपने नौकरी के समय के बाद अक्सर ये बालकृष्ण जी के साथ कार्य करते देखे जाते हैं। उनके कामों में हाथ बटाने लगे और आते ही इस कार्य क्षेत्र में जुट पड़े। झाँसी में अब गायत्री परिवार में लगभग 100 सदस्य हैं जिसमें अधिकाँश इन्हीं से प्रभावित होकर बने हैं। इनके परिवार के सब आदमी बच्चे, बूढ़े, स्त्रियाँ सभी गायत्री उपासक हो गये हैं। इन्होंने संकल्प किया है कि अपने क्षेत्र में गायत्री माता और यज्ञ पिता का संदेश घर-घर और जन-जन में सुनायेंगे। इन्होंने झाँसी के अतिरिक्त बानपुर, टीकमगढ़, नतरा, बुल्हार आदि स्थानों में गायत्री का प्रचार किया।

जब से ये गायत्री माता की शरण में आये हैं इनका जीवन ही बदल गया है। अब ये परम सात्विक एवं सदाचारी जीव हो गये हैं। अब नौकरी के सिवाय सारा समय उपासना और धर्म कार्यों में जाता है। जो कोई भी इनके संपर्क में आता है चाहे मित्र, रिश्तेदार अथवा मिलने वाला हो उससे गायत्री माता और यज्ञ पिता का सन्देश सुनाकर उनको अपनाने की अपील करते रहते हैं।

इन्होंने श्री बालकृष्ण जी अग्रवाल और अन्य गायत्री परिवार के सदस्यों के साथ झाँसी जिले के गाँव-गाँव में गायत्री प्रचार करने का व्रत लिया है।

श्री देवेन्द्रनाथ साहु

खूँटी (राँची) के श्री देवेन्द्र नाथ साहु को राजर्षि कहा जा सकता है। राजनीति के प्रकाण्ड पंडित काँग्रेस के प्रमुख पदाधिकारी, अनेक संस्थाओं के संचालक, उस क्षेत्र के प्रभावशाली जन नेता होते हुए भी आपकी आत्मा उस प्रकार के कार्यों से सन्तुष्ट न हुई। आज की परिस्थिति में उन्होंने चरित्र निर्माण साँस्कृतिक पुनरुत्थान एवं अध्यात्म उपासना को ही मनुष्य जाति की सर्वोपरि आवश्यकता समझा है। आप प्रतिदिन 6-6 घन्टे गायत्री उपासना में तन्मय रहते हैं, हवन आपका नित्य नियम है। उस प्रदेश में दूर-दूर तक गायत्री प्रसार आपने किया हैं। खूँटी में एक बहुत बड़ा गायत्री यज्ञ करा चुके हैं। वहाँ की शाखा आपके प्रयत्न स्वरूप बड़ा कार्य कर रही है।

श्री माँगीलाल वर्मा

संयोग एवं प्रारब्धवश धन अनेकों घटिया मनुष्यों को भी मिल जाता है पर आदर्शवाद की उच्च भावनायें किन्हीं विरले ही भाग्यशाली मनुष्यों को प्राप्त होती हैं। आन्तरिक महानता ही वह तत्व है जिसके उपलब्ध होने से छोटी स्थिति के मनुष्य भी चिरस्मरणीय महापुरुष बन जाते हैं। आज के नवयुवकों में अनेक दिशाओं में अग्रसर होने की महत्वाकाँक्षाएं हिलोरें मारती हैं पर ऐसे तरुण ढूंढ़े नहीं मिलते जो मानव-महामानव बनने की महत्वाकाँक्षा से अनुप्राणित होते हों। कोई राष्ट्र या समाज सच्चे अर्थों में आदर्शवादी नर रत्नों से धनी बनता है।

मोड़क के अध्यापक माँगीलाल वर्मा की आदर्शवादिता उनके हर कार्य से टपकती है। उन्हें जितना समीप से देखा जाय उतना ही उनकी ऊंचाई को समझा जा सकता है। गत वर्षों में उन्होंने जिस तत्परता से गायत्री माता के प्रसार में आत्मदान किया है वह भूरि-भूरि प्रशंसा के योग्य है।

श्री गे.घो. गोखले

सुविधाजनक परिस्थितियों के बीच मनुष्य बड़े -बड़े कार्य आसानी से कर सकता है, उसमें उसकी रुचि ही प्रशंसनीय है। पर उसकी निष्ठा की परीक्षा तब होती है जब अभाव और कठिनाइयों की परीक्षा से गुजर कर अपने खरेपन और श्रद्धा की गहराई की परीक्षा देनी पड़ती है।

नागपुर के वायरलैस आपरेटर श्री गोखले अपनी दुर्बल काया और ऐसी पारिवारिक कठिनाइयों के बीच हंसते रहते हैं जिनमें कोई और होता तो घबड़ा गया होता। गोखले जी उन लोगों में से नहीं हैं जो अमुक सुविधा मिलने पर अमुक सत्कार्य करने की शर्त लगाते हों। वे परिस्थितियों की परवाह किये बिना कर्तव्य करते रहने वाले आदर्शवादी हैं। उसने अपने सहयोगियों की सहायता से नागपुर में अच्छा गायत्री प्रचार किया है।

पं. ब्रह्मानन्द शर्मा

आँवा (कोटा) हाईस्कूल के अध्यापक श्री. ब्रह्मानन्द शर्मा नौकरी के लिए मास्टरी करने वाले कर्मचारी नहीं वरन् सच्चे अर्थों में छात्रों का जीवन निर्माण करने वाले उपाध्याय हैं। ज्ञान प्रसार उनके जीवन का व्रत है। इस पुनीत कार्य को उन्होंने अपना एक धर्म कर्तव्य बना लिया है। स्कूल में छात्रों को वे केवल पाठ्यक्रम ही पूरा नहीं कराते वरन् उच्च चरित्र बनाने का व्यावहारिक मार्ग भी सुझाते हैं। स्कूल से बाहर भी वे घर में बाजार में रिश्तेदारों में, स्वजन सम्बन्धियों में, परिचित अपरिचितों में धर्म प्रसार करते रहते हैं। श्री ब्रह्मानन्द जी की प्रेरणा से अनेकों ने अपने कुविचार और दुष्कर्म छोड़े हैं तथा परमार्थिक उपेक्षा छोड़कर गायत्री उपासना में श्रद्धा स्थापित की है। मनुष्य सच्चे मन से जिस काम में लगता है उसमें सफलता प्राप्त होती ही है। परमार्थिक लक्ष धारण करने वाले लोग अपनी अभीष्ट दिशा में चुपचाप धीरे-धीरे चलते रहकर भी कितने आगे बढ़ सकते हैं इसका एक प्रमाण ब्रह्मानन्द जी हैं।

श्री मकेन्द्रनाथ भार्गव

मथुरा निवासी श्री. महेन्द्रनाथ भार्गव सज्जनता, उदारता और सेवा भावना की प्रतिमा हैं। जीवन भर उन्होंने ऊँचे व्यवसायी के रूप में हजारों लाखों रुपयों का व्यापार किया है तथा प्रतिष्ठित काँग्रेस कार्यकर्ता के रूप में जीवन के आरम्भ से ही राष्ट्रीय कार्य करते रहे हैं। आपके पिताजी बड़े चरित्रवान सरकारी अफसर थे, वे बड़े उत्तरदायित्व पूर्ण पद पर थे पर कभी एक पैसा रिश्वत का छुआ तक नहीं और नौकरी से छुट्टी पाते ही संन्यास लेकर हिमालय में तप करने चले गये। ये सद्गुण श्री महेन्द्रनाथ को भी अपने पिताजी से विरासत में मिले हैं। अनेकों व्यक्ति, अपनी अनेक कठिनाइयों में सहायता प्राप्त करने के लिए श्री भार्गव जी को ढूंढ़ते उनके पीछे लगे फिरते देखे जा सकते हैं। और वे बिना किसी से कोई भौतिक लाभ उठाये परम निस्वार्थ भाव से उनका कार्य कर देने में अपना समय लगाते रहते हैं। गायत्री तपोभूमि को निरन्तर उनके समय, श्रम और सहयोग की वर्षों से महत्वपूर्ण सेवा मिल रही है।

श्री कृष्ण कुमारी जी पाण्डेय

सब प्रकार के मानवीय अधिकारों से वंचित आज की भारतीय नारी ईश्वर उपासना के अधिकार से भी धर्म ध्वजियों द्वारा वंचित कर दी गई है। मुसलमान स्त्री कुरान पढ़ सकती है, ईसाई स्त्री बाइबिल पड़ सकती है पर अभागिनी हिन्दू स्त्री अपने धर्म कर्तव्यों की आकाँक्षा करती है। भारतीय धर्म की मूल गंगोत्री गायत्री की उपासना करना चाहती है तो अनुदार, अविवेकी एवं प्रतिगामी लोग उन्हें रोकने में विरोध करने में ही अपनी शेखी समझते हैं।

प्रसन्नता की बात है कि नारी में विवेक जागृत हुआ है और इन सड़े-गले बन्धनों की परवा न करके मानव जीवन की वास्तविकता तक पहुँचने का साहस पूर्वक प्रयत्न कर रही है। उसने उपासना के ऋषि आदर्शों की ओर भी कदम बढ़ाया है। श्री कृष्णा कुमारी ने 24 लक्ष के कई महापुरश्चरण किये हैं। अगणित उपासिकाएं बनाई हैं। अभी छिबरायज्ञ में एक बड़ा यज्ञ कराया है। कई बार तपोभूमि आई हैं। इनके पतिदेव तथा बच्चे सभी अनन्य गायत्री उपासक हैं।

श्री यादराम शर्मा

आज सर्वत्र पक्षपात, स्वार्थ, पार्टीबन्दी एवं खुदगर्जी का बोलबाला है। जिसका जिससे मतलब निकलता है। वह उसको खुश करने और अपने पक्ष में रखने की कोशिश करता है। इस पार्टीबन्दी ने ग्रामीण क्षेत्र की पंचायतों पर बुरी तरह कब्जा कर लिया है। सच्चे, इन्साफ पसंद, बुराई को रोकने वाले और इन्साफ का समर्थन करने वाले पंच कहीं बड़ी कठिनाई से ही ढूंढ़े मिलते हैं।

पला कसेर (बुलन्द शहर) निवासी श्री यादराम शर्मा, एक आदर्श सरपंच हैं, जिनका अनुकरण देश की पंचायतों के पंच सरपंच कर सकते हैं। पीड़ितों के समर्थन में किसी का बुरा बनना पड़े और उससे अपनी कुछ हानि भी उठानी पड़े तो भी उसकी परवाह न करके सत्य पर दृढ़ रहना मनुष्य के खरेपन का चिन्ह है। गायत्री परिवार को श्री यादरामजी जैसे सच्चे लोगों पर बड़ा गर्व है।


धर्म-प्रेमियों के सराहनीय प्रयत्न

आगरा (मालवा) में श्रावण मास में लघु अनुष्ठान सामूहिक रूप से आरम्भ हो गया है। श्री गोपीलाल जी भावसार तथा श्री चतुर्भुज जी के प्रयत्न से अखण्ड ज्योति श्री बैजनाथ महादेव मंदिर में आषाढ़ी पूर्णिमा से प्रारम्भ हो गई है।

-नन्दकिशोर गर्ग

नरवर (आगरा) के गायत्री प्रेमियों ने अन्य स्थानों के उपासकों के साथ मिलकर 24 करोड़ जप व 24 लक्ष आहुतियों के यज्ञ की योजना बनाई है। यह कार्तिक सुदी से प्रारम्भ होकर एक वर्ष तक जारी रहेगी और यज्ञ संवत् 2015 के कार्तिक में किया जायेगा। इस योजना को सफल बनाने का पूरा प्रयत्न किया जा रहा है।

-रामरतन शर्मा

घुरुट (जालौन) में गुरुपूर्णिमा पर सवा मन सामग्री का हवन कराया गया और श्रीमद्भागवत का पारायण हुआ। इसी दिन ओंता क्षेत्र में नवकुण्डी गायत्री महायज्ञ करने का निश्चय किया गया, जिसके लिये अनेक स्थानीय सज्जनों ने प्रतिज्ञा की है।

-शिवशास्त्री

गोरखमढ़ी (सौराष्ट्र) में 24 लक्ष गायत्री जप का दशाँश हवन बड़े समारोह से सम्पन्न हो गया। 5 दिन तक लगभग 150 मनुष्यों के निवास और भोजन की व्यवस्था बड़े सुन्दर ढंग से की गई। यज्ञ कार्य प्रसिद्ध विद्वानों द्वारा सम्पन्न कराया गया।

-हरिलाल दामोदर

ब्रह्म वाटिका (आकेली) में सवालक्ष गायत्री यज्ञ पं. विद्याधर शास्त्री और ब्र. देवेन्द्रकुमार शास्त्री की देख−रेख में सम्पन्न हुआ। आरती के समय लगभग 300 व्यक्तियों की भीड़ थी। भोग और प्रसाद वितरण भी हुआ।

-मन्त्री, शाखा सभा

व्यावर (राजस्थान) में 24 लक्ष जप व सवा लक्ष आहुति के 11 हवन कुण्डों के यज्ञ का आयोजन किया गया है। यह अनन्त 14 से शरद पूर्णिमा तक चालू रहेगा।

-मोहनलाल शर्मा

राजस्थान तथा समीपवर्ती म.प्र. के गायत्री शाखा सदस्यों का सम्मेलन कोटा में 5 सितम्बर से 8 सितम्बर तक होना निश्चय हुआ है। यज्ञ में सत्संग रचनात्मक कार्य करने की प्रेरणा, प्रवचन आदि का आयोजन किया गया है। -शम्भूसिंह हाड़ा

राजपुर (मालवा) में विश्व कल्याण हेतु गायत्री यज्ञ का सामूहिक आयोजन 1 अगस्त 57 से 4 अगस्त तक किया गया है। विद्वानों के उपदेश और संगीत आदि की व्यवस्था रहेगी।

-बलवन्तराव मंडलोई

ध्राँगध्रा (गुजरात) में ता. 30 जून को 24 हजार जप व 2400 आहुतियों का हवन किया और श्री ईश्वरलाल भट्ट ने ब्रह्मभोज कराया। यही कार्यक्रम 21 जुलाई को भी किया गया। अब श्रावण में सवालक्ष के सामूहिक अनुष्ठान की तैयारी हो रही है।

-हीरालाल दलपतराम महेता

राजापुर (खीरी लखीमपुर) में ता. 10 व 11 जुलाई को गायत्री महायज्ञ समारोह पूर्वक किया गया। स्वामी कृपा शंकर जी (गायत्री तपोभूमि मथुरा के प्रचारक) तथा स्वामी सर्वदानन्द जी के महत्वपूर्ण प्रवचन हुये और गायत्री साहित्य बाँटा गया। अनेक भाइयों ने बीड़ी तम्बाकू आदि दुर्व्यसन छोड़ने का निश्चय किया।

-मनोहरलाल दीक्षित

जावरा (म.प्र.) में गुरुपूर्णिमा पर सामूहिक हवन और आचार्य जी के फोटो का पूजन किया गया। सी.टी. कालेज के वाइस प्रिंसिपल श्री सुरोकिया जी, श्री नौसाकिया जी एम.ए. एल.एल.बी. तथा श्री जोशी जी आदि ने प्रेम पूर्वक भाग लेकर समारोह को सफल बनाया।

-जे.एम. देशमुख

कोटा से होने वाले राजस्थान प्रान्तीय गायत्री सम्मेलन की तिथियाँ 5 से 8 सितम्बर तक निश्चित की गई हैं। ता. 5 को प्रातःकाल ही आचार्य जी का स्वागत किया जायेगा और दिन में दो बजे पीत वस्त्रधारी गायत्री उपासकों का जल-यात्रा समारोह होगा। इसके पश्चात् प्रतिदिन प्रातः 6 से 10.30 बजे तक 5 कुण्डों पर हवन होगा और 2.30 बजे से 5.30 बजे तक आपसी परिचय, विचार-विनिमय तथा आचार्यजी के साँस्कृतिक योजना पर वार्तालाप होंगे। रात्रि में 8 से 10.30 तक विद्वानों, कर्मठ उपासकों तथा आचार्यजी के सामान्य जनता में प्रवचन होंगे। राजस्थान और कोटा के आसपास की मध्य प्रान्तीय समस्त गायत्री शाखाओं से आग्रह है कि अपना एक प्रतिनिधि तो अवश्य भेजें। देर से समाचार मिलने वाली शाखाओं के प्रतिनिधि बिना सूचना दिये भी सम्मेलन में भाग ले सकते हैं, पर उनको अपनी शाखा के मंत्री का परिचय-पत्र साथ में लाना आवश्यक है। सम्मेलन और यज्ञ टिपटा मौहल्ला, गोविन्द देवजी का मंदिर, माणिक्य धर्मशाला, पाटनपोल, कोटा में होगा।

मार्फत- गोविन्द देवजी का मंदिर, टिपटा, कोटा, (राजस्थान)

-शम्भूंसिंह हाड़ा

खूड़ (राजस्थान) में माड़ोता ग्राम के अंतर्गत चन्द्रलालजी के स्थान पर गायत्री-यज्ञ और हरिकीर्तन किया गया। प्रमुख यज्ञकर्ता रामगोपालजी वैद्य थे। गुरुपूर्णिमा को ग्राम हर्ष में कन्हैयालाल वैद्य ने यज्ञ कराया।

-श्यामसुन्दर शर्मा, रामनिवास शर्मा

टाटा नगर में ता. 21 जुलाई को गायत्री उपासकों ने 1844 आहुतियों का सामूहिक हवन किया।

-नगदनारायण शर्मा

बन्हनी बाजार (बिलासपुर) में गुरुपूर्णिमा को गायत्री माता की झाँकी बनाई गई। जिसमें प्रभातफेरी गाजे बाजे के साथ निकाली गई। 9 बे से 5 हजार आहुतियों का यज्ञ किया गया, जिसमें ग्राम के प्रत्येक परिवार ने भाग लिया। मंत्री कन्हाईदास जी वैष्णव का प्रवचन हुआ।

-मोहनलाल गुप्ता

नागपुर में गुरुपूर्णिमा को 4 हजार आहुतियों का सामूहिक हवन बड़े समारोह से हुआ। इसके पहले 34 सदस्यों ने 2 लाख 88 हजार जप का अनुष्ठान किया था।

-मोरेश्वर रामचन्द्र परघी

मझोला (पीलीभीत) में सवालक्ष का अनुष्ठान पूर्ण करके ता. 21 जुलाई को सामूहिक हवन किया गया। इसके बाद ही जोर की वर्षा हुई जिससे समस्त ग्राम निवासी बड़े हर्षित हुये।

-लक्ष्मणसिंह मनराल

अलीगढ़ में गुरुपूर्णिमा पर सुरेशचन्द्र जैसवाल के मकान पर गुरुपूजा की गई। वर्षा के कारण हवन 14 ता. को किया गया जिसमें 5 कुण्डों में 40 उपासकों ने आहुतियाँ दीं। श्री चन्द्रपाल शास्त्री ने आचार्य और महावीरप्रसादजी ज्योतिषी ने ब्रह्मा का कार्य सम्पादन किया।

-श्रीराम पाण्डे

निघासन (लखीमपुर खीरी) में सवालक्ष आहुतियों का गायत्री यज्ञ किया गया जिसके संयोजक श्री शिव भगवान प्रसाद अग्निहोत्री व लालजी प्रसाद मिश्रा थे। आस पास के स्थानों के बहुसंख्यक गायत्री उपासक एकत्रित हुये।

-मन्त्री गायत्री शाखा निघासन

जासलपुर (होशंगाबाद) में गुरुपूर्णिमा को वेद माता व आचार्यजी के चित्रों का पूजन बड़ी श्रद्धा से किया गया। इसके पूर्व ता. 8 जुलाई को पं. वाला रामजी शर्मा का देहान्त हो चुका था इससे अधिक समारोह न किया जा सका।

-पु.आ. सरवरे

सीवनी मालया (म.प्र.) में ता. 21 जुलाई को श्रीकृपारामजी सिद्धाँत शास्त्री के स्थान पर सामूहिक गायत्री यज्ञ हुआ जिसमें 40 उपासकों ने भाग लिया। नगर के अनेक सज्जनों ने भी दर्शन का लाभ उठाया।

-गोवर्द्धन भट्ट शास्त्री

सुसनेर (शाजापुर मध्यप्राँत) में 76 हवन हो चुके हैं। 108वाँ हवन विशाल रूप में करने का आयोजन है। उसमें बाहर के गायत्री उपासकों को भी निमंत्रित किया जायेगा।

-नन्दकिशोर शर्मा

श्रीमती हर होलीनेस माताजी सा. जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य जी महाराज, मठ, भानपुर (जि. मन्दसौर) आजकल मध्य भारत तथा राजस्थान के आगर, मंदसौर, अलोट, बड़ौद, झालरापाटन, भवानी मंडी, शामगढ़, सुसनेर आदि अनेक स्थानों में- भ्रमण करके गायत्री- प्रचार कर रही हैं। वे विशेष रूप से माताओं और बहिनों को ईश्वर उपासना और जप का उपदेश देती हैं जो जनता को बहुत आकर्षित करता है।

-द्वारिकादास

खिरखिरी (पो. कराहल जिला मुरैना) में 21 कुण्डों का विशाल महायज्ञ ता. 6-10-57 से 8-10-67 तक होगा जिसमें गायत्री परिवार के कुलपति पं. श्रीरामजी और अनेक संत, महात्मा, नैष्ठिक गायत्री उपासक सम्मिलित होकर अपने अमूल्य उपदेशों से जनता का कल्याण करेंगे। बाहर से आने वाले गायत्री उपासकों के ठहरने तथा भोजन की व्यवस्था निःशुल्क रखी गई है। श्यौपुर से शिवपुरी, लश्कर होकर मुरैना जाने वाली मोटर बसें कराहल होकर ही गुजरती हैं। कराहल में उतर जाने पर गायत्री-परिवार के स्वयंसेवक मिल जायेंगे जो आपको सवारियों द्वारा यज्ञ-स्थल तक पहुँचा देंगे; ठीक पता ज्ञान न होने, व अन्य किसी कारण से जिन शाखाओं को हमारा निमंत्रण न पहुँच सके वे इस विज्ञप्ति को ही निमंत्रण समझ कर अपना प्रतिनिधि अवश्य भेजने की कृपा करें।

-प्रसादलाल शर्मा ‘दिनेश’

डमोडा (गुजरात) में ता. 6 अगस्त को गायत्री परिवार द्वारा 5000 आहुतियों का हवन हुआ। रात्रि को सत्संग एवं प्रवचनों का कार्यक्रम रहा। गायत्री परिवार का कार्य अधिक उत्साह से करने का निश्चय किया गया।

-हरिप्रसाद जानी

चंपा (विलासपुर) में ता. 27 जुलाई को सामूहिक हवन तथा 50 कुँवारी कन्याओं का भोजन समारोह पूर्वक हुआ। अन्य सदस्यों को प्रसाद वितरण किया गया। यह कार्य यहाँ के वैद्यराज पुनीरामजी द्वारा सम्पन्न हुआ। आप गायत्री माता का सहारा लेकर इलाज करते हैं और हमेशा सफल होते हैं। मरीजों के साथ भी आपका बर्ताव बड़ी दया का होता है और जो गरीब आदमी इलाज का पूरा खर्च नहीं दे सकते उनसे जो कुछ वे दे सकते हैं वही ले लेते हैं।

नवाबगंज (बरेली) में गायत्री परिवार की ओर से स्थानीय शिवालय में श्रावण कृष्णा 12-13 को रामायण का अखण्ड पाठ किया गया। कीर्तन और प्रसाद वितरण भी हुआ। पं. बाबूराम शर्मा ने इस में विशेष प्रयत्न किया।

-प्रभा प्रताप शुक्ल

सतना (बुन्देलखण्ड) में नागपंचमी के अवसर पर सामूहिक जप और हवन का आयोजन समारोह पूर्वक सम्पन्न हुआ। हम ने जो 24 लक्ष सामूहिक जप का निश्चय किया है, इस हवन से उसमें प्रगति मिली।

-राधारमण मित्र

मिर्जापुर (कोटा, राजस्थान) में गायत्री परिवार ने तीन हजार आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया। गाँव में प्रसाद बाँटा गया।

-सुदर्शन गुप्ता

मुरादपुर माती (जि. सुल्तानपुर) में स्वामी दाताराम के स्थान पर सामूहिक गायत्री यज्ञ किया गया। श्रावण कृष्णा एकादशी को हरीपुर में उमाशंकर जी गुप्त के यहाँ और श्रावण सुदी 11 को पिपरा में श्री चन्द्रिका प्रसाद जी शर्मा के यहाँ सत्संग हुआ।

-रामसहाय शर्मा

कोयला (राजस्थान) में ता. 18 जुलाई को श्री. शम्भूसिंह हाड़ा, श्रीकृष्णजी शर्मा आदि कई प्रमुख गायत्री प्रचारक पधारे। शम्भूसिंहजी का गायत्री मंत्र के जपने के विषय में बड़ा रोचक व प्रभावशाली भाषण हुआ। रविवार को इन्हीं सज्जनों की उपस्थिति में सामूहिक गायत्री हवन हुआ। यहाँ अगहन सुदी 9 से 11 तक चौबीस लाख जप व चौबीस हजार आहुतियों का महायज्ञ होना निश्चित हुआ है।

-सरदारमल गौतम

चन्दन पुखरिया (हमीरपुर) में अगहन सुदी में मंदिर में गायत्री देवी की प्राण प्रतिष्ठा होगी और 24 हजार आहुतियों का यज्ञ किया जायेगा।

-रघुबर दयार शर्मा

चेचट (कोटा) में मुँशी मोतीलाल जी, गोविन्दलाल जी मास्टर मदनलाल जी, कन्हैयालाल गौतम के यहाँ 4 सामूहिक हवन जुलाई मास में प्रत्येक रविवार को हुये।

-कन्हैयालाल गौतम

कानपुर में बलखंडेश्वर मंदिर के पास गायत्री सामूहिक यज्ञ 40 व्यक्तियों द्वारा बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हुआ। तत्पश्चात् गायत्री तथा यज्ञ के महत्व पर प्रवचन हुआ।

-अयोध्या प्रसाद दीक्षित

महोवा (हमीरपुर) जनवरी 1958 में एक विशाल गायत्री यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है।

-प्रेमचन्द अग्रवाल

हापुड़ (मेरठ) में गुरुपूर्णिमा पर 4 दिन तक विशद् गायत्री महायज्ञ किया गया। यज्ञ के यजमान श्री रघुबीर शरण जी तथा आचार्य ओमप्रकाशजी शास्त्री थे। ब्रह्मभोज हुआ और 9 व्यक्तियों का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ।

-लालमणि शर्मा

बन्धी (जबलपुर) में श्रावण की अमावस्या को गायत्री उपासकों ने 24 घंटे का अखण्ड कीर्तन और जप तथा हवन का आयोजन किया। बाद में 60-70 कन्याओं और 60 लड़कों ने खीर पूरी का भोजन किया। इस कार्य में समस्त ग्राम वासियों ने चन्दा दिया और यज्ञ में दो सौ ग्राम निवासी सम्मिलित हुये।

-सुदर्शन प्रसाद पाण्डे

रायपुरवा (झाबुआ) में गुरुपूर्णिमा को सामूहिक जप व हवन हुआ और 24 घंटे अखंड रामायण पाठ हुआ। 5 पाठ एक साथ हुये।

-बेसाव गोपालदास हरिव्यास

काशीपुर (बदायूँ) में गुरुपूर्णिमा को श्री मुँशीलाल शर्मा द्वारा एक हजार आहुतियों का सामूहिक यज्ञ पूर्ण विधान से सम्पन्न हुआ। दर्शकों की अत्यधिक भीड़ थी। असदपुर नामक ग्राम में श्रीमद्भागवत की कथा सुनी गई। यह कथा 137 वर्ष से लगातार चालू है।

-ओमप्रकाश मित्तल

कराहल (ग्वालियर) में गुरुपूर्णिमा का उत्सव तीन दिन मनाया गया। प्रथम दिन पुरुषों का हवन हुआ, दूसरे दिन महिलाओं और तीसरे दिन सार्वजनिक। पूर्णिमा को 101 ब्राह्मण भोजन कराया गया व चित्र और चालीसा बाँटे गये।

-रामस्वरूप शर्मा

धारोला (शाजापुर) में 5 साधकों ने श्रावण मास में सवा-सवा लक्ष का अनुष्ठान किया।

-मंत्री शाखा सभा

झाँसी में गुरुपूर्णिमा के अवसर पर श्री दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव के स्थान पर 73 हजार गायत्री-जप किया गया और सहस्रों नर-नारियों की उपस्थिति में पूर्णाहुति की गई। यज्ञ भगवान के समक्ष व्रतधारियों ने अपनी प्रतिज्ञा दुहराई एवं सात्विकता से रहने का निश्चय किया।

-गिरिजा सहाय खरे

सुसनेर (जि. शाजापुर) में ता. 8 अगस्त को श्रीरामलाल स्वर्णकार ने एक सामूहिक यज्ञ 1500 आहुतियों का कराया। रक्षाबंधन के दिन श्री विष्णुशंकर जी नाजिर के यहाँ एक हजार आहुतियों का सामूहिक हवन किया गया। ता. 18 को सत्यनारायण जी एम.ए., एल.एल.बी. मैजिस्ट्रेट के यहाँ डेढ़ हजार आहुतियों का यज्ञ हुआ। यह 80 नम्बर का हवन है। 108 हवन की पूर्णाहुति कोटा सम्मेलन के अवसर पर होगी जिसमें आचार्य जी का बुलाने का प्रस्ताव किया गया है।

-नन्दकिशोर शर्मा

सागोजवाड़ी (काला हान्डी) में ता. 4 अगस्त को सभी गायत्री उपासकों ने सामूहिक जप और यज्ञ किया। इसमें 6 महिलाओं ने भी भाग लिया।

-विनायक प्रसाद शर्मा

खाग गाँव (बरार) में रक्षाबंधन के अवसर पर 2400 आहुतियों का हवन बड़े समारोह पूर्वक किया गया।

-मुरलीधर के पाटील

मऊरानीपुर (बाँदा) में गायत्री परिवार के सदस्यों की संख्या 116 तक पहुँच गई है और 750 नर-नारी गायत्री चालीसा का पाठ करते हैं। प्रतिदिन गायत्री-यज्ञ किया जाता है।

-सालिगराम पाण्डेय

छिबरामऊ (फर्रखाबाद) में श्रावणी के दिन एक हजार आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया गया।

-कृष्णा कुमारी

तलवाड़ा (धार) में दो सदस्यों ने 24-24 हजार का अनुष्ठान किया और एक ने सवालक्ष का। तीनों स्थानों पर हवन, कीर्तन आदि किये गये।

-मंत्री गायत्री परिवार

सतना (रींवा) में श्रावणी के अवसर पर संगीत मास्टर श्री रामदास पाण्डे के स्थान पर सवा लक्ष का सामूहिक जप व हवन किया। यह जप जनकल्याण के हेतु ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत किया गया।

-आर.आर. मिश्रा

दिगौड़ा (टीकम गढ़) में श्री रघुनाथ सिंह माते (ग्राम मऊ बुजर्ग) की ओर से स्वतंत्रता दिवस (ता. 15 अगस्त 57) को 24 घण्टे का अखण्ड कीर्तन, 24 हजार जप, 108 गायत्री चालीसा पाठ व 100 आहुतियों का हवन किया गया। अन्त में प्रीतिभोज कराया गया।

-बैजनाथ प्रसाद सौनकिया

पिलखना (इटावा) में श्रावणी पर एक यज्ञ बड़े समारोह पूर्वक महादेव जी के चबूतरे पर सम्पन्न हुआ। इसमें श्री मोहनसिंह ‘नारद’ गुलाब सिंह जी व राजारामभगत ने विशेष सहयोग दिया। इसी अवसर पर विधूना में स्कूल के प्रधानाचार्य श्रीकृष्ण स्वरूप जी सक्सेना के यहाँ गायत्री हवन व रामायण का अखंड पाठ का आयोजन किया गया।

-श्रीकृष्णलाल द्विवेदी ‘विशारद’

धारकपुर (बुलन्दशहर) में श्रावणी के अवसर पर सूर्य प्रसाद जी ने सामूहिक यज्ञ कराया जो दो कुण्डों में दो दिन तक होता रहा। आस-पास की समस्त जनता ने बड़े उत्साह से भाग लिया। रामपुर (बुलन्दशहर) में जन्माष्टमी पर सामूहिक यज्ञ किया गया जिनमें पं. दीपचन्द जी, गंगाधर जी ठेकेदार, बाबूराम जी शर्मा, गोकुलसिंह जी लोधे राजपूत महेन्द्रसिंह जी, कुँवर क्षेत्रपाल सिंह ने विशेष रूप से सहयोग दिया। यज्ञ-कार्य बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हुआ। बझेड़ा (बुलन्दशहर) में ता. 23 अगस्त से 25 अगस्त तक एक विशाल यज्ञ किया गया जिसमें श्री राजेन्द्र सिंह आर्य, श्री रामचरनलाल व अमीन साहब ने विशेष सहयोग दिया और ग्राम की समस्त जनता ने उत्साह पूर्वक भाग लिया।

-स्वामी ब्रह्मस्वरूप

मेहिनी, कोढ़ार (जि. एटा) तथा जिरौली (जि. अलीगढ़) में गायत्री परिवार की शाखायें स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी ने कायम कराई हैं और इन तीनों स्थानों में शीघ्र ही सवा-सवा लक्ष आहुतियों के यज्ञ होने का आयोजन किया गया है।

-एक गायत्री प्रेमी

अख्तयारपुर (बुलन्दशहर) की गायत्री शाखा ने सवालक्ष का एक बड़ा यज्ञ तथा कई छोटे यज्ञ किये हैं। आस-पास के कितने ही स्थानों में गायत्री प्रचार का कार्य किया गया है।

-स्वामी योगानन्द

बमनी बाजार (बिलासपुर) में ता. 4 अगस्त को धर्मफेरी बड़े समारोह से की गई। इसके लिये श्री बलभद्र प्रसाद स्वर्णकार और ध्वजा राम पटेल ने कोने-कोने में डुग्गी पिटवादी, जिससे जनता की खूब भीड़ हो गयी। 28 घन्टे तक अखण्ड कीर्तन किया गया और अखण्ड ज्योति भी जलती रही। मोहनलालजी गुप्ता ने सब कार्यों की देख-रेख में विशेष परिश्रम किया।

-कन्हाईदास जी वैष्ण

आरंग (रायपुर) में श्रावणी को सामूहिक गायत्री जप, हवन व कन्या -भोजन का आयोजन किया गया जिसमें सब सदस्यों ने उत्साह से भाग लिया।

-विद्याप्रसाद मिश्रा

जिटकरी (हमीरपुर) में सामूहिक जप व हवन किया गया। वेत्रवती नदी में स्नान करके संध्याकाल को अपने घर में माता जी का पूजन व आरती की गई। रात्रि में पं. रामबल्लभ जी के मन्दिर में रामायण पाठ किया गया।

-रामकृपालु द्विवेदी

पुसावली (बदायूँ) में आवणी पर सामूहिक हवन, कीर्तन, रामायण पाठ हुआ। हवन में उपस्थित सब लोगों को राखी बाँधी गई। प्रसाद भी वितरण हुआ।

-गायत्री प्रसाद गुप्ता

बालकुवाँ ग्राम (तलवाड़ा जि. धार) में 21 दिन तक मन्त्र लेखन का कार्यक्रम जारी रहा, जिसके उपलक्ष में ता. 4 अगस्त को साढ़े 12 हजार आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया गया। यद्यपि वर्षा बड़े जोर से हो रही थी पर ग्रामवासियों के हार्दिक उत्साह के फलस्वरूप यज्ञ मण्डप, कुँड आदि ऐसे मनोहारी रूप में सजाये गये थे कि देखते ही बनता था। साधकों सहित 300 व्यक्तियों को भोजन कराया गया।

-मन्त्री गायत्री शाखा

खानपुर (जि. झालावाड़) में श्रावणी के अवसर पर शाखा में एक सामूहिक यज्ञ किया। पास के एक-ग्राम मोई कलाँ में गायत्री शाखा की स्थापना की गई।

-बद्रीलाल गुप्ता ‘साहित्य रत्न’

बिलासपुर (म.प्र.) में रक्षाबन्धन के अवसर पर सामूहिक हवन उत्साह पूर्वक सम्पन्न हुआ। कितनी ही महिलाओं ने भी भाग लिया। इसी प्रकार श्री भैयाराम पोद्दार ने सवालक्ष जप की पूर्णाहुति में ता. 11 अगस्त को ढाई हजार आहुतियों का हवन किया।

-सुधाराम महाजन

भोपाल (मध्य भारत) में ता. 19 अगस्त को जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में श्री महेन्द्र कुमार के यहाँ झाँकी बनाई गयी थी और अखण्ड रामायण पाठ हुआ। रात को 1008 आहुतियों का गायत्री हवन किया गया। अन्त में समाधि वाले महात्मा का प्रवचन हुआ। नगर के अनेक गायत्री-प्रेमियों ने भाग लिया।

-शिवकुमार भारद्वाज

महबूबाबाद (हैदराबाद) में रक्षाबन्धन पर 1500 आहुतियों का गायत्री यज्ञ किया गया और जन्माष्टमी पर भी सामूहिक यज्ञ बड़े उत्साह के साथ सम्पन्न हुआ।

-शंकरलाल

बिजौली (फतेहपुर) में, स्वतंत्रता दिवस पर भाई महावीर सिंह के यहाँ 5600 आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया गया। श्री उदय नारायण ने विशेष सहयोग दिया।

-राम सनेही वर्मा


गायत्री परिवार की नई शाखायें

कासगंज (एटा), रतलाम (म.प्र.), वामनपुर (बुलन्द शहर), अमोदा (बिलासपुर), बागीदौरा (बाँसवाड़ा), चनेहटा (बरेली), गुठना (फर्रखाबाद), इसलामपुर (हमींरपुर), नयागाँव (सारन), सादुल्लापुर (हरदोई), झड़स (डूँगरपुर), परतापुर (बाँसवाड़ा), केसली (सागर), कोटपूतली (जयपुर), महरौली (झाँसी), मड़ावरा (झाँसी), कुम्हेड़ी (झाँसी), नैकोरा (झाँसी), नैंनवारा (झाँसी), नुना (टीकमगढ़), धौर्रा (झाँसी), गालिवपुर (बुलन्द शहर), वेहरावल (शाजापुर), मूजडीह (बस्ती), गोसियारी (बस्ती), पूरेवेजी (बस्ती), परीदिपवगढ़ (मेरठ), डेलापटि (बरेली), परगमा (बरेली), गाड़ाडीह (रायपुर), चक्क-रामपुरा (मुरैना), बाढ़ (मुरैना), बड़वाह (निमाड़), असड़िया (इलाहाबाद), पिछोर (झाँसी), वरखन्दा (भोपाल), गुढ़रावन (शाजापुर), झिरिया (द्रुर्ग), नायकपुरा (इटावा), अचलपुर (अमरावती), टोला रावत (हमीरपुर), ओलोना (बुलन्दशहर), खिई (हमीरपुर), डेलची (उज्जैन), हरसन्डा (नागपुर), भेड़ा (जबलपुर), उथनोल (जयपुर), टिकरी-पकरिया (बस्ती), सड़क अर्जुनी (भंडारा), विरिया (बरेली), काँधरपुर (बरेली), उमर्सिया (बरेली), मुडिया (बरेली), वाँवर (बरेली), मोहनी (एटा), कुड़ार (एटा) कोडक्या (राजगढ़), सिमरधा (झाँसी), मुँडारा (पाली), सावरपुर (मेरठ), सेंगर (कानपुर), गौरी राई (बस्ती), जतारा (टीकमगढ़), गुठीना (फरुर्खाबाद), मोई कलाँ (कोटा), इटौजाधुरा (बरेली), ऊँचा गाँव (बरेली), सिठौरा (बरेली), सेहरामऊ (शाहजहाँपुर), आवन (गुना) डेंगरा (सीतापुर), कुल्हेड़ा (हमीरपुर), मूडला (झालावाड़), गुमानपुर (कोटा), मुरादाबाद, परतापपुर (बस्ती), गेंगटा (बस्ती), कंजा (बस्ती), सेचनी (बस्ती), सिजहरी (हमीरपुर), मुकरा (हमीरपुर), भहूँस (बेतूल), राढो (बेतूल), पाढा खेड़ा (बेतूल), उहरगाँव (बेतूल)।


आश्विन की नवरात्रि।

वर्ष की दोनों नवरात्रियाँ गायत्री उपासना के सर्वश्रेष्ठ पर्वकाल हैं। सर्दी और गर्मी की ऋतुओं की यह नौ नौ दिन की संध्यायें साधना के लिए वैसी ही महत्वपूर्ण हैं जैसे प्रतिदिन दिन और रात्रि के मिलन की प्रातः सायं संध्या वेला उपयुक्त होती है। इस वर्ष यह नवरात्रियाँ आश्विन सुदी 1 से लेकर 9 तदनुसार तारीख 24 सितम्बर मंगलवार से आरम्भ होकर तारीख 2 अक्टूबर बुधवार को पूर्ण होती है। इन दिनों 24 हजार जप का अनुष्ठान करने के लिये प्रतिदिन 26 मालायें करनी पड़ती हैं जिसमें लगभग ढाई तीन घण्टे लगते हैं। यदि प्रातःकाल एक बार में इतना समय न मिले तो प्रातः सायं दोनों समय में पूरा किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य आवश्यक है। जिनसे बन पड़े वे उपवास भी करें। 24 हजार जप का शताँश 240 आहुतियों का हवन भी करना चाहिये।

108 या 240 पाठ गायत्री चालीसा के करने से भी एक अनुष्ठान पूरा हो जाता है। यह स्त्रियों तथा बच्चों के लिये बहुत सरल है।

अनुष्ठान करने वाले यदि पूर्व सूचना दे दें तो तपोभूमि में उनकी साधना का संरक्षण तथा त्रुटियों का दोष परिमार्जन होता रह सकता है।

जो अपना हवन न कर सकें उनके बदले का हवन भी तपोभूमि में कर दिया जाता है। जो अपना अनुष्ठान तपोभूमि में करना चाहें उनका कार्य भी वहाँ के निवासी तपस्वी लोग कर देते हैं।

गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा को अपने यहाँ सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, जुलूस, धर्मफेरी आदि की तैयारी अभी से करनी चाहिये।

जप, हवन की भाँति ब्रह्मभोज भी आवश्यक है। सर्व लोकसेवी ब्राह्मण प्रायः आजकल नहीं मिलते इसलिये कन्याओं को भोजन कराना एवं गायत्री चालीसा आदि सत्साहित्य का वितरण करना एक परम पुनीत ब्रह्मभोज है।


क्रान्ति का शंखनाद!

(श्री दयाशंकर मिश्र)


क्रान्ति का शंखनाद (kavita)

आज अवनी मौन होकर देखती है राह मेरी।

आज अम्बर ने किसी के रक्त की लाली बिखेरी।।

त्रस्त मेरे आज भय से वायु भी थर्रा रही है।

मेघ के भी आज उर से चीख बाहर आ रही है।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।1।।

कान में तरु के समीरण ने जरा कुछ कह सुनाया।

वृक्ष ने देखा चतुर्दिक और मुझको सर झुकाया।।

दूर वह देखो क्षितिज में खिंच रही है स्वर्ण-रेखा।

इस तरह से शक्तिहीनों का पलटते भाग्य देखा।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।2।।

छत्र सत्ताधारियों के रौंद डालूँ एक क्षण में।

रत्नमय कितने मुकुट आकर लुढ़कते हैं चरण में।।

दीन हो वैभव बिचारा है दिखाता दाँत आकर।

चूर होता गर्व उसका ठोकरों की चोट खाकर।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।3।।

देखते ही देखते ऊँचे महल श्मशान होते।

ताव देते मूँछ पर जो बैठ सर को पीट रोते।।

मैं भरे घर को उजाडूँ और उजड़े को बसाऊँ।

हाथ ले संहार वीणा भव्य-युग के गीत गाऊँ।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।4।।

स्वप्न ही में सृष्टि के कितने युगों को लौट डालूँ।

उठ पड़ूँ तो सृष्टि में अध्याय नूतन जोड़ दूँ मैं।

और पीड़ा का पका फोड़ा तनिक में फोड़ दूँ मैं।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।5।।

नाच उठता काल मेरी आँख का पाकर इशारा।

जाग उठती है प्रलय मुस्कान का पाते सहारा।।

देखते हैं लोग कितने कब्र से मुँह को निकाले?

भागती है खुद ‘गुलामी’ आप मुँह पर लाज डाले।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।6।।

भूख का उन्मुक्त-हाहाकार जन्म-स्थान मेरा।

आँसुओं के साथ शैशव-काल में करती बसेरा।।

सिसकियों की थपकियाँ सोती हुई मुझको जगातीं।

घोर जन-संहार अरु बलिदान से मैं खाद्य पाती।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।7।।

मोद है शासन उलटना, खेलना-संहार मेरा।

है सदा उन्मत्त स्वेच्छाचारियों के बीच डेरा।।

शक्तियों का ह्रास अरु, उत्थान है करवट बदलता।

अरु कठिन संघर्ष में होता सदा मेरा सम्हलना।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।8।।

ये खड़े वीरान-खँडहर देख गौरव-चित्र मेरे।

फड़फड़ाते गीध अरु, चमगादड़ें हैं मित्र मेरे।।

झनझनाहट शस्त्र की चीत्कार है आह्लाद निर्भय।

क्षुद्र-मानव का रचित इतिहास है संक्षिप्त-परिचय।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।9।।

गेह कारागार मेरा यातनायें हैं सहेली।

खूब अत्याचार से खेलूँ खुशी होकर अकेली।।

देश-निर्वासन किसी का है विजय-प्रस्थान मेरा।

क्रूर-कोड़े और फाँसी में सफल सन्मान मेरा।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।10।।

शक्तियाँ आगे खड़ी हैं सन्धि का उपहार लेकर।

यों भुलाया चाहती हैं निर्बलों का ग्रास देकर।।

चाहती है आज पर्दे में मुझे दुनिया छिपाया।

पर बचाये से बचेगा क्या जिसे मैंने चबाया।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।11।।

हथकड़ी की मोदमय झँकार ने मुझको जगाया।

दुर्बलों की आह ने उन्माद का आसव पिलाया।।

शक्तियों की शक्तिमय-संघर्ष ने यौवन दिया है।

स्फूर्ति दे दी आज स्वेच्छाचार ने जादू किया है।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।12।।

क्षुब्ध-सागर की गरज में मुक्त-स्वागत-गान मेरा।

युद्ध की हुँकार में है आज अभ्युत्थान मेरा।।

विश्व में मेरी विजय की बज रही है आज भेरी।

खूब मानव-सभ्यता मेरी बनी है आज चेरी।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।13।।

ले हथेली पर फिरें सर जो बनें मेरे पुजारी।

प्राण देने में जिन्हें आता सदा आनन्द भारी।।

मैं उन्हीं के तो गले में डालती जयमाल आकर।

वे चलेंगे विश्व में फिर गर्व से सीना उठाकर।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।14।।

क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।14।।

*समाप्त*