(डॉ. महेन्द्र भटनागर)
अग्नि पथ है, प्रज्वलित लपटें गगन में, स्वार्थ, हिंसा, लोभ, शोषण, नाश रण में,
चल रहे हैं पर चरण युग के निरन्तर, साँस में हुँकारते मुठभेड़ के स्वर,
युग-विरोधी शक्तियों को दे चुनौती, हर कदम पर, हम कदम पर, बढ़ रहा दृढ़ जन-समुन्दर।
ये चरण, युग के चरण हैं कब झुकेंगे, ये शहीदों के चरण हैं, कब रुकेंगे,
कौन-सा अवरोध आहत कर सकेगा, पन्थ पर तूफान आहें भर सकेगा,
ये करेंगे विश्व-नव-निर्माण बढ़कर, हर कदम पर, हम कदम पर, बढ़ रहा दृढ़ जन-समुन्दर।
नाश को ललकारती है युग-जवानी, क्राँति का आह्वान करती आज वाणी,
प्राण में उत्साह नूतन ताजगी हैं, युग-युगों की साधना की लौ जगी हैं,
सामने जिसके ठहराना हैं असम्भव, हर कदम पर, हर कदम पर, बढ़ रहा दृढ़ जन-समुन्दर।
(श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी महाराज)
सच्चाई सत्वगुण से उत्पन्न है। योग दर्शन में इसे आर्जव कहते हैं। गीता के तेरहवें और सोलहवें अध्याय में वर्णित सद्गुणों में एक आर्जव भी है। यह ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक है। यह दैवी सम्पत्ति है। यह सत्य का ही रूप है। यह सात्विक अन्तःकरण की वृत्ति हैं।
सच्चा मनुष्य समाज में आदर पाता है। प्रत्येक मनुष्य उसमें विश्वास रखता है। मनुष्य कहता है-’अमुक व्यक्ति बहुत ही सच्चा मनुष्य है। मैंने उसके समान किसी को भी अपने जीवन में नहीं देखा। उसके प्रति मुझमें बहुत ही आदर का भाव है। उसमें मेरी अटूट श्रद्धा है।
झूठा व्यक्ति जीते हुए भी मृतक के समान है। यदि मनुष्य झूठा है तो विश्वविद्यालयों की विद्या तथा उपाधियों से क्या, तपस से क्या, जटा तथा माला धारण करने से क्या, संन्यास तथा समाज में उच्च स्थान प्राप्त करने से क्या, धन तथा सम्पत्ति से क्या? जो आदमी इस सुन्दर गुण से विभूषित है वह अपने सारे प्रयासों में सफलता प्राप्त करता है। वह उत्तरदायित्व पूर्ण कामों के करने से पैर पीछे नहीं खींचता है। वह संलग्न होता है तथा प्रयास करता है। वह बुद्धिमानी पूर्वक काम करता है। वह सतर्क रहता है।
यदि मनुष्य के पास यह एक भी सद्गुण है तो अन्य सभी सद्गुण उसमें आने लगेंगे। सच्चे मनुष्य इस संसार में विरले ही हैं।
अतः ऐ मित्रों! सदा सच्चे बनो। इस सद्गुण को अधिकाधिक अंश में विकसित करो और ब्रह्म-साक्षात्कार करो। ब्रह्म सचाई की ही प्रतिमूर्ति है। अतः सचाई से ब्रह्म को प्राप्त करो।
सच्चा मनुष्य प्रबल प्रेम तथा भक्ति के साथ कठिन काम करता है। वह अपने गुरु अथवा स्वामी के सारे उत्तरदायित्वों को अपने ऊपर ले लेता है। दस मनुष्यों का काम वह स्वतः उत्साह, प्रेम तथा प्रसन्नता के साथ करता है। सच्चाई महती आध्यात्मिक शक्ति है। यह प्रबल शक्ति प्रदान करती है। कूटनीति, कपट व्यवहार, धूर्तता, संकीर्णता, निम्न बुद्धि- ये सब अवगुण उसमें नहीं होते। वह सरल तथा स्पष्टवादी होता है। वह किसी वस्तु को छिपाता नहीं। वह अपने विचारों को नहीं छिपाता। उसके विचार, उसकी वाणी तथा उसके कार्य में एकरसता होती है।
झूठा मनुष्य कभी अपने वादे के अनुसार काम नहीं करता, वह कोई न कोई बहाना कर दिया करता है। लोग उसके शब्दों में विश्वास नहीं करते। उसके शब्दों में प्रभाव नहीं होता। उसमें प्रबल इच्छाशक्ति नहीं होती। वह अपने मित्र को विभिन्न तरीकों से प्रसन्न रख कर सच्चा बनने का उपक्रम करता है। परन्तु वह नहीं जानता कि दूसरे बुद्धिमान जन हैं जो उसके असली रंग को पहचान लेंगे। वह शीघ्र ही पहचान लिया जाता है।
मनुष्य अच्छी तरह जानता है कि असत्य अच्छा नहीं फिर भी वह उसी में आसक्त रहता है। वह अपने दुर्गुणों को नहीं छोड़ सकता। वह अपने दुर्गुणों को नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील नहीं होता। इसका कारण क्या है? अविद्या रहस्यमयी है। बुरे संस्कारों के कार्य रहस्यमय हैं। सत्संग तथा गुरु सेवा के द्वारा इस मोह को नष्ट किया जा सकता है।
हे मित्र! तुम स्वार्थ तथा लोभ के उन्माद में झूठे बन गए हो। तुम नहीं जानते कि तुम वास्तव में क्या कर रहे हो। तुम्हारी बुद्धि आच्छन्न है। एक न एक समय तुम्हारी चेतना तुम्हें कोसेगी। पश्चाताप के कारण तुम्हारा हृदय रक्त रंजित होगा। तभी तुम अपने को शुद्ध बनाओगे। जप करो। भगवान के नाम का कीर्तन करो। एकादशी को उपवास रखो। एक बूँद भी जल न पीओ। अच्छे कर्म करो। गरीबों तथा बीमारी की सेवा करो और इस प्रकार अपने को शुद्ध बनाओ। तुममें सच्चाई आवेगी, सच्चाई से तुम मुक्ति, शाँति तथा पूर्णता प्राप्त करोगे।
विशाल हृदय, सरलता, नम्रता, निर्दोषिता, क्षमा, शुद्धता, स्थिरता, आत्मसंयम, अभय, अक्रोध, मनःशाँति, अलोभ, मधुरता, लज्जा, धैर्य, अद्वेष, निरभिमानता इत्यादि सद्गुण सच्चाई से पूर्णतः सम्बन्धित हैं।
पाखंड, उद्दण्डता, अभिमान, क्रोध, कटुता, अज्ञान, धोखेबाजी, कूटनीति, मिथ्याचरण, धूर्तता, संकीर्णता, क्षुद्रता- ये सब झूठेपन से सम्बन्धित हैं।
एक ऑफीसर ने कुछ रचनात्मक धार्मिक काम करना चाहा। इसके लिए वह संस्था निर्माण करना चाहता था। वह अपनी बचत को इसी उद्देश्य से अपने पुत्र के पास भेज दिया करता था। परन्तु उसके झूठे पुत्र ने सब रुपयों को अपनी स्त्री के नाम से रख लिया तथा इस प्रकार अपने पिता से दगा की। एक गुरु ने अपने शिष्य को प्रचार के लिए भेजा। शिष्य ने स्वतः अपनी संस्था बना डाली और वह स्वयं उसका संस्थापक बन बैठा। परन्तु इस झूठेपन के कारण उसकी उन्नति नहीं हो सकी। उसने कुछ दुष्कर्म किये और पुलिस से बचने के लिए उसे यत्र तत्र छिपना पड़ा। पाप इस संसार में स्वतः अपने लिए दण्ड लाता है। असत्य परायण मनुष्य इस संसार में उन्नति नहीं प्राप्त कर सकते। उन्हें विफलता होगी ही। इस संसार में उनका अपमान होगा तथा परलोक में उन्हें नरक का कष्ट भोगना पड़ेगा।
जब पति मिथ्याचरण करता है तब उसकी स्त्री उस पर शंका करने लगती है; घर में हमेशा झगड़ा तथा वैषम्य रहता है। यदि प्रधान कर्मचारी झूठा है तो आफिस का काम सुचारु रूपेण नहीं हो पाता, आफिस सुपरिटेंडेंट उससे अप्रसन्न हो जाता है और उसे नौकरी से बाहर करता है। यदि मंत्री झूठा है तो वह शीघ्र ही महाराज द्वारा निकाल दिया जाता है। झूठा आदमी किसी भी आध्यात्मिक या सामाजिक संस्था में वैषम्य तथा अशाँति पैदा कर देता है तथा संस्था के काम में बड़ी खलल पड़ती है।
शिष्य जन भी जो अपने गुरुओं से दीक्षा लेते हैं, झूठे, श्रद्धा रहित तथा कृतघ्न बन जाते हैं। एक झूठे शिष्य ने भगवान जीसस को धोखा दिया। भगवान बुद्ध के कुछ शिष्य उनके दुश्मन बन बैठे। उन लोगों ने गुरु को त्याग कर बहुत नुकसान पहुँचाया। आज भी झूठे शिष्यों की कमी नहीं जो अपने गुरु से दगा करते हैं। कितनी लज्जा की बात है। कितनी दुःखद स्थिति है। ऐसे शिष्य दुःखद मृत्यु को प्राप्त करेंगे। वे महा रौरव नरक में दण्डित होंगे। दूसरे जन्म में वे निम्न योनियों में प्रवेश करेंगे तथा असाध्य बीमारियों से पीड़ित होंगे।
पद्मपाद श्रीशंकर के सबसे सच्चे शिष्य थे। गुरु कृपा के कारण वे नदी के ऊपर भी चल सकते थे। हर कदम पर उन्हें कमल मिलता था। इसलिए उनका नाम पद्म-पाद पड़ा। श्री शंकर स्वयं श्री गोविन्द पाद के सच्चे शिष्य थे। उन्होंने पहले गुरु की स्तुति लिखे बिना कोई भी ग्रन्थ नहीं लिखा। सच्चा शिष्य ही आध्यात्मिक मार्ग में उन्नति प्राप्त करेगा। वही जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर अमृतत्व में स्थित होगा।
यह संसार सच्चे व्यक्तियों से पूर्ण हो जो संसार के लिए महान उपयोगी कार्य कर सकें! तुम्हारा हृदय श्रद्धा, भक्ति तथा सच्चाई से पूर्ण हो!
(संत बिनोवा)
मानव को प्रेरणा उसके मन से मिलती है। लेकिन मन केवल व्यक्तिगत और निजी नहीं होता है, बल्कि सारे समाज का भी एक सामूहिक मन होता है। वह सामूहिक मन दिन व दिन बदलता रहता है। यह परिवर्तन हर एक देश में हुआ है। उस-उस जमाने में उस-उस समाज का मन एक तरफ से काम करता था। आज के जैसे आवागमन के साधन उस समय मौजूद नहीं थे। एक देश से दूसरे देश में खबरें पहुँचने में काफी समय लगता था। आज तो हमारे पास बड़े-बड़े साधन मौजूद हैं, खबरें फौरन पहुँच जाती हैं। दुनिया भर के समाचार हम एक गाँव में बैठकर भी नित्य जान सकते हैं। पुराने जमाने में ये साधन नहीं थे, फिर भी सारी पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ मनुष्य बसे हुये थे, करीब-करीब एक ही प्रकार से मानव-समाज का मानसिक विकास होता रहा।
धर्म-संस्थापना की प्रेरणा
अधिक पुराने समय की अस्पष्ट बातें छोड़कर अगर हम ढाई हजार वर्ष पहले के जमाने पर गौर करें तो हमें मालूम होगा कि उस समय भारत में वैदिक, बौद्ध और जैन-धर्म की विचारधारा चलती थी। समाज में खाने, पीने जैसी मामूली बातें तो चलती ही थीं, परन्तु एक ऐसी प्रेरणा भी काम कर रही थी, जिसका मूल रूप भगवान बुद्ध और महावीर बने। उन्होंने धर्म-संस्थापना की। उसी समय चीन में भी लाओत्से, कन्फ्यूशियस आदि ‘ताओ’ के बारे में विचार करते थे, जिससे धर्म-संस्थापना हुई। अर्थात् उस समय वहाँ के लोगों को भी वैसी ही भूख लगी, यद्यपि चीन और हिन्दुस्तान एक दूसरे के विषय में बहुत कम जानते थे। उसी समय ईरान और फिलिस्तीन में हमें उसी प्रकार की प्रेरणा के दर्शन मिलते हैं। हम ईरान में जरथुस्त्र, मिश्र में मूसा और फिलिस्तीन में ईसा को देखते हैं, जिन्होंने पारसी, यहूदी और ईसाई आदि धर्मों की स्थापना की अर्थात् उन दो-तीन सौ या पाँच सौ साल के अन्दर दुनिया के सभी देशों में धर्म-संस्थापना का कार्य होता दिखाई देता है।
यहाँ प्रश्न होता है कि सभी मानवों को धर्म-संस्थापना की यह एक ही प्रेरणा कैसे मिली? इसका जवाब यही हो सकता है कि व्यक्ति के मन की तरह समाज के मन को भी परमेश्वर से प्रेरणा मिलती है। जब मिश्र में मूसा काम कर रहे होंगे तब उन्हें मालूम भी नहीं होगा कि दूसरी तरफ चीन में लाओत्से भी काम कर रहे हैं। उस समय इतनी दूर की खबरों के फैलने और पहुँचने में सैकड़ों वर्ष लग जाते थे। फिर भी एक अव्यक्त हवा सी फैल जाती थी, जिसका कारण एक सर्वान्तर्यामी, सर्व प्रेरक परमेश्वर ही हो सकता है। यदि किसी को ‘परमेश्वर’ शब्द पसन्द न हो तो हम कह सकते हैं कि सब दुनिया की विवेक शक्ति (कॉन्सस) सबको समान प्रेरणा देती है। चाहे हम परमेश्वर कहें या विवेक शक्ति, शब्द दो हैं पर अर्थ एक ही है। ‘परमेश्वर’ शब्द से हम अधिक गहराई में जाते हैं और ‘विवेक शक्ति’ कहने से उतनी गहराई में नहीं जा पाते। इसके सिवा इनमें और कोई भेद नहीं।
एक साथ ध्यान तथा चिन्तन की प्रेरणा
आगे चलकर हम आठ सौ या एक हजार साल पहले का जमाना लें। उस समय मनुष्यों को धर्म संस्थापना की नहीं, बल्कि उपासना की, ध्यान की, चिन्तन की- अर्थात् मन की शक्तियों को एकाग्र करने और उनका विकास करने की प्रेरणा मिली थी। उसे ‘मिस्टिस्ज्मि’ अथवा भक्ति का युग कहा जा सकता है। उस समय कई संत पुरुष पैदा हुए। सिर्फ भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि दुनिया के बहुत से देशों में- जैसे मिश्र और इटली में भी- पैदा हुये। हर जगह उसी तरह का ध्यान, वही चिन्तन, भजन दिखाई देता है। अर्थात् मन के अन्दर जो शक्तियाँ थीं उनका आह्वान कर जिन्दगी को शक्ति शाली बनाना और उसका उपयोग दुनिया की भलाई के लिये करना उनका उद्देश्य था। सर्वत्र यह आध्यात्मिक संशोधन कार्य चल रहा था। भारतवर्ष में तुलसीदास, नानक, चैतन्य, तुकाराम आदि अनेक संत हुये। वैसे ही योरोप में भी हुये, पर हम उन्हें नहीं जानते।
उस जमाने में सभी को वैसे ही मानस-शास्त्र में संशोधन करने की प्रेरणा मिली थी, जैसे ढाई हजार वर्ष पहले समाज की धारणा के मूल तत्व खोजने की इच्छा सब को हुई थी। सबको समान प्रेरणा होना, एक ही इच्छा से सबके मन जागृत होना वास्तव में एक अद्भुत बात है। इधर के संतों को उधर के संतों की कोई खबर नहीं मिलती थी, फिर भी एक समान प्रेरणा ने सबको उठाया- सबको जगाया, सबको हिला दिया।
सामाजिक समता का युग
ऐसा ही दृश्य दुनिया में लगभग सौ डेढ़ सौ साल पहले हमने देखा। अब यातायात की सुविधायें पैदा हो चुकी थीं। सब तरह की खबरें एक दूसरे को बहुत कम समय में मिलने लगीं। दुनिया में समता, न्याय और स्वतंत्रता की आवाज सुनाई पड़ने लगी। हम देखते हैं कि जीवन में समता लानी चाहिये, हर एक को स्वतन्त्रता मिलनी चाहिये, यह उद्देश्य आज सबको प्रेरित कर रहा है। सबसे पहले युग में समाज के मूलभूत तत्वों अर्थात् धर्म की स्थापना हो चुकी, बीच के युग में मन की शक्तियों का उन तत्वों को अमल में लाने के लिये कैसे उपयोग किया जा सकता है, इसका भी संशोधन हो गया। अब ऐसा समय आया, जब अपनी इच्छा से जो धर्म-संस्थापना हो चुकी, और उसके प्रयोग के लिये मानसिक शक्तियों का जो संशोधन हुआ, उसके आधार पर हम उन मूलभूत सिद्धान्तों को समाज रचना के काम में लायें। सब में एक ही आत्मा समान रूप से है, इस आध्यात्मिक तत्व को तो हमने प्राचीन काल से मान ही लिया था, पर अब उस तत्व को जीवन में कार्य रूप से परिणित करने की बात थी।
सबके भीतर एक समान ज्योति है, इसकी खोज तो सारी दुनिया कर चुकी थी और उसके लिये मानसिक वृत्तियों का संशोधन भी हो चुका था। लेकिन अब ऐसा समय आया कि जीवन में वह समता प्रत्यक्ष रूप में लाने की बात थी। हर जगह यही एक सी भूख लगी थी। स्वतन्त्रता, समता और न्याय की बातें दुनिया के हर एक देश में फैली हुई थीं। यदि हम ठीक ढंग से, बारीकी से और तटस्थ होकर देखें, तो हमें मालूम पड़ेगा कि हर एक देश में यह तत्व स्वतन्त्र रूप से फैला। सवेरा होने पर जिस तरह काशी का मुर्गा बाँग लगाता है, उसी प्रकार मुम्बई और मद्रास के मुर्गे भी बाँग लगाते हैं। सूर्योदय के कारण सभी मुर्गों को समान रूप से प्रेरणा मिलती है। इसी प्रकार इस जमाने में समता, स्वतन्त्रता और न्याय की प्रेरणा सबको मिली है। हाँ, आज एक बात नई हो गई है, वह यह कि काल की गति में शीघ्रता आ गई है। इसका मतलब यह है कि जो काम पहले दो सौ वर्ष में होता था, वह अब पाँच वर्ष में होता है।
जैसा कुछ अनजान भाई समझते हैं, सामाजिक न्याय और समता के लिये आज जो संघर्ष दिखलाई पड़ रहा है वह किसी विदेशों के आन्दोलन की नकल नहीं है, और न उसमें कोई ऐसी बात है जो हमारे धर्म या संस्कृति के विरुद्ध हो। उसका जन्म तो ईश्वरीय प्रेरणा के फल से ही हुआ है और नये युग में उसकी पूर्ति सामूहिक रूप में अवश्य होगी।
(श्री गंगाप्रसाद जी उपाध्याय एम.ए.)
हमारे देश में जो धार्मिक सुधारक हुए हैं उनमें महात्मा बुद्ध का स्थान बहुत ऊँचा है। इनके उपदेश गिरी हुई आत्माओं को उठाने वाले हैं। नीच प्रकृति के व्यक्ति भी इनके उपदेशों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। मनुष्यों को सदाचार की शिक्षा देने के लिए जिन बातों की आवश्यकता है वे सभी महात्मा बुद्ध के उपदेशों में पाई जाती हैं।
महात्मा बुद्ध के उपदेशों की शैली बड़ी सरल और मनोरंजक है जिसे साधारण मनुष्य भी भली प्रकार समझ लेते हैं। वे अन्य कितने ही दार्शनिकों की तरह मनुष्य को शब्दों की भूल-भुलैया में नहीं डालते। वह छोटे-छोटे उदाहरणों और छोटे वाक्यों में ही बड़े से बड़े सिद्धान्तों को प्रकट कर देते हैं। उनके उपदेशों में सूखापन नहीं रहता। उनकी बात चित्त में गढ़ जाती है।
हमारे इतिहास में एक समय ऐसा आ चुका है जब बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म के अनुयायियों में बड़ा झगड़ा होता था। पर बुद्ध भगवान के उपदेशों में इस विरोध का कोई कारण नहीं मिलता। उनके उपदेश तो इतने सारगर्भित हैं कि किसी भी धर्म का अनुयायी उन पर आक्षेप नहीं कर सकता। ऐसा जान पड़ता है कि महात्मा बुद्ध ने अपने समय में वैदिक धर्मावलम्बियों को तत्वहीन और बाहरी धार्मिक रूढ़ियों में फँसा हुआ देखा। उनमें आडम्बर बहुत बढ़ गया था और सच्चे धार्मिक जीवन के चिह्न कम थे। वेद के नाम पर अनेकों प्रकार की कुप्रथाएं प्रचलित थीं। वेद मन्त्रों को पढ़-पढ़कर अत्याचार किये जा रहे थे। जिन वेद-मन्त्रों में प्राणरक्षा का वर्णन था उन्हीं को पढ़कर पशुओं का बलिदान किया जाता था। जिन वेद-मन्त्रों से उच्च जातियोँ नीच जातियों पर अत्याचार करती थीं। सच्चे ब्राह्मण तथा आत्मज्ञान के उपदेशक नहीं रहे थे, उनका स्थान झूँठे, पाखण्डी और आडम्बर-युक्त मनुष्यों ने ले लिया था। इनमें ब्राह्मणों की विद्या, उनका तप, उनका त्याग तो था नहीं, हाँ स्वार्थ, मतान्धता और अत्याचार अवश्य थे।
यज्ञ अवश्य होते थे, परन्तु ऐसे यज्ञ जिनका वेदों में विधान न था और जिनसे मनुष्य को लाभ के बदले हानि होती थी। वेदों में यज्ञ के तीन लाभ होते बताये हैं- (1) सन्तान की उत्पत्ति, (2) पशुओं की उन्नति, (3) ब्रह्म-विद्या की प्राप्ति। महात्मा बुद्ध ने उस समय होने वाले यज्ञों में इनमें से एक भी बात को न पाया। यज्ञों में पशु-हिंसा देख कर उनका मन पिघल गया। उन्होंने घर-द्वार इसीलिए छोड़ा था कि संसार के प्राणियों को दुःख से छुड़ाने का मार्ग तलाश करें। पर देश भर में धर्म के नाम पर इस प्रकार की प्राणी हिंसा होती देखकर उनका हृदय व्यथित हो गया और उन्होंने इस धार्मिक पाखंड को दूर करने का निश्चय कर लिया और नये धर्म का उपदेश करने लगे। जो उपदेश बुद्ध भगवान ने किया वह प्राचीन वैदिक धर्म के प्रतिकूल न था। जिस सदाचार की ओर वेदों का संकेत था उसी की ओर महात्मा बुद्ध भी संकेत करते थे पर उस समय के आडम्बरी धर्म-धुरन्धरों को यह बात रुचिकर न थी। इससे उनके स्वार्थ साधन में अड़चन पड़ती थी और उनके पाखंड की पोल खुलती थी। अतः वह स्वभावतः बुद्ध भगवान से विरुद्ध हो गये।
महात्मा बुद्ध ने लोगों से कहा कि संसार अनित्य है। वर्तमान काल थोड़ी ही देर बाद भूत काल में परिणित हो जायगा। इसलिये संसार में लिप्त न हो और हमेशा सावधान रहो। महात्मा बुद्ध के उपदेशों ने सहस्रों और लाखों सदाचारी भिक्षु उत्पन्न कर दिये, जिन्होंने अहिंसा, दया, शुद्ध आचार और पवित्र जीवन के सिद्धान्तों का प्रचार लंका, ब्रह्मदेश, चीन, जापान, पश्चिमी एशिया आदि दूर-दूर के देशों तक कर दिया। स्वार्थ त्याग तथा विचारों और जीवन की पवित्रता हर एक भिक्षु का मुख्य उद्देश्य था। इस बात का छोटा सा उदाहरण यह है कि एक बार एक भिक्षु ने भिक्षा माँगते समय एक युवती लड़की को देखा, जो उसे भीख देने को आई थी। लड़की के सौंदर्य ने भिक्षु के मन को विचलित कर दिया। भिक्षु ने इसके प्रायश्चित स्वरूप चाकू से अपनी आँख निकाल ली। यह सदाचार की पराकाष्ठा थी। यह भाव बुद्ध भगवान के उपदेशों ने ही उत्पन्न किये थे।
बुद्ध भगवान के उपदेशों में कुछ शोकवाद की झलक पाई जाती है। संसार की असारता पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया है। जीवन के दुःखों का वर्णन करने में अत्युक्ति से काम लिया गया है। जीवन के सुखों के साथ न्याय नहीं किया गया है। इन सुखों के कारण मनुष्यों की कितने अंशों में उन्नति भी होती है इस पर पूरा विचार नहीं किया गया है। परन्तु सम्भवतः ये सब बातें उस समय आवश्यक थीं। बुद्ध भगवान के अधिकतर उपदेश भिक्षुओं के प्रति थे। भिक्षुओं का मार्ग मुख्य रूप से निवृत्ति का हैं। गृहस्थों को प्रवृत्ति उपदेश करना चाहिए। इसलिए कुछ आश्चर्य नहीं यदि बुद्ध ने निवृत्ति मार्ग पर जोर दिया। सम्भवतः इसी से त्यागी बौद्ध भिक्षुओं का प्रबल दल तैयार हो सका।
महात्मा बुद्ध का उपदेश केवल सुधार करना था। वैदिक सभ्यता के स्थान पर कोई नई सभ्यता के लाना उनका प्रयोजन न था। इसलिये यद्यपि बौद्धों ने वेदों का अप्रमाणिक माना, पर वैदिक संस्कृति या सभ्यता से उन्होंने नाता न तोड़ा। सामाजिक संगठन का ढाँचा बौद्धों के समय में भी ज्यों का त्यों कायम था। बुद्ध के उपदेश ग्रन्थ ‘धम्मपद’ के ‘ब्राह्मण वर्ग’ के पढ़ने से विदित होता है कि जिसको ‘ब्राह्म धर्म’ कहते हैं उसका विरोध करना बुद्ध को अभीष्ट न था। वह उस धर्म की बुराइयों को दूर करना चाहते थे। महात्मा बुद्ध ने यह नहीं कहा कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं। उन्होंने केवल यह बताया है कि ब्राह्मण कौन हैं? प्रतीत होता है कि आजकल की भाँति बुद्ध के जमाने में भी पाखण्डी ब्राह्मणों की प्रबलता हो गई थी। लोग केवल जन्म से ही अपने को ब्राह्मण कहते थे, गुणों पर कुछ ध्यान न था। इसीलिए बुद्ध को कहना पड़ा-
“जटा, गोत्र और जाति से कोई ब्राह्मण नहीं हो सकता। सच्चा ब्राह्मण वह है जिसमें सत्य और धर्म पाये जावें।”
“जो ध्यानी, दोष रहित, कृतकार्य, विषय रहित और ऊंचे उद्देश्यों का पालन करता है उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।”
“जो शरीर, वाणी और मन से बुरा काम नहीं करता उसको मैं ब्राह्मण कहता हूँ।”
“मैं किसी को उसकी योनि अथवा माता के कारण ब्राह्मण नहीं कहता, चाहे लोग उसका सम्मान ही क्यों न करें और चाहे वह धनवान ही क्यों न हों। मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जो निर्धन और बन्धनों से मुक्त है।”
“मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जिसने कुछ अपराध नहीं किया, फिर भी गाली, हानि तथा दण्ड के शक्ति के साथ सह लेता है। जिसमें शान्ति का बल है और सेना के समान शक्ति है।”
“मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जो सुखों में लिप्त नहीं होता जैसे कमल पानी में लिप्त नहीं होता।”
इस प्रकार महात्मा बुद्ध के उपदेश अधिकाँश में वैदिक धर्म ग्रन्थों से मिलते हैं। बहुत से तो महाभारत गीता, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में ज्यों के त्यों पाये जाते हैं।
(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
संसार की समस्त संस्कृतियों में भारत की संस्कृति ही प्राचीनतम है। आध्यात्मिक प्रकाश संसार को भारत की देन है। गीता, उपनिषद्, पुराण इत्यादि श्रेष्ठतम मस्तिष्क की उपज हैं। हमारे जीवन का संचालन आध्यात्मिक आधारभूत तत्वों पर टिका हुआ है भारत में खान-पान, सोना बैठना, शौच स्नान, जन्म-मरण, यात्रा, विवाह, तीज-त्यौहार आदि उत्सवों का निर्माण भी आध्यात्मिक बुनियादों पर है। जीवन का ऐसा कोई भी पहलू नहीं है, जिसमें आध्यात्म का समावेश न हो, या जिस पर पर्याप्त चिन्तन या मनन न हुआ हो।
भारतीय संस्कृति मनुष्य मात्र को क्या, संसार के प्राणीमात्र और अखिल ब्रह्माण्ड तक को भगवान का विराट् रूप मानती है। भगवान इस विराट में आत्म रूप होकर प्रतिष्ठित हैं और विश्व के समस्त जीव-जन्तु, प्राणी, स्थावर जंगम उसमें स्थिर हैं। वे अंग हैं और ये सब अंग जीवन के अन्त तक सब में यह भावना समाविष्ट रहे, एक मात्र इसी के लिए योग्यता, बुद्धि, सामर्थ्य के अनुसार अनेक कर्तव्य निश्चित हैं। कर्तव्यों में विभिन्नता होते हुए भी प्रेरणा में समता है, एक निष्ठा है, यह उद्देश्य है और यह उद्देश्य “आध्यात्म” कहलाता है। एक अध्यात्म लादा नहीं गया है, थोपा नहीं गया है, बल्कि प्राकृतिक होने के कारण स्वाभाविक है।
विराट के दो भाग हैं। एक है अनन्तः चैतन्य और दूसरा है बाह्य अंग। बाह्य अंग के समस्त अवयव अपनी-अपनी कार्य दृष्टि से स्वतन्त्र सत्ता रखते हैं। कर्तव्य भी उनकी उपयोगिता की दृष्टि से प्रत्येक के भिन्न-भिन्न हैं, लेकिन ये सब हैं उस विराट अंग की रक्षा के लिए, उस अन्तः चैतन्य को बनाये रखने के लिए। इस प्रकार अलग होकर और अलग कर्मों में प्रवृत्त होते हुए भी जिस एक चैतन्य के लिए उनकी गति हो रही है, वही हिन्दू संस्कृति का मूलाधार है। गति की यह एकता-समसत्ता विनष्ट न हो इसी के लिये संस्कृति के साथ धर्म जोड़ा गया है। और यह योग ऐसा हुआ है जिसे पृथक नहीं किया जा सकता। यहाँ तक दोनों समानार्थक से दिखाई पड़ते हैं।
“धर्म” शब्द की व्युत्पत्ति से ही विराट की एकतानता का भाव स्पष्ट हो जाता है। जो वास्तविकता है, उसी को धारण रखना धर्म है, वास्तविक है, चैतन्य है। यह नित्य है, अविनश्वर है, शाश्वत है। सभी धर्मों में आत्मा के नित्यत्व को, शाश्वतपन को स्वीकार किया गया है। लेकिन अंग में पृथक दिखाई देते रहने पर भी जो उसमें जो एकत्व हैं, उसको सुरक्षित रखने की ओर ध्यान देने से विविध सम्प्रदायों की सृष्टि हो पड़ी है। हिन्दू धर्म में इस एकता को बनाये रखने, जाग्रत रखने की प्रवृत्ति अभी तक कायम है। यही कारण है कि संसार में नाना सम्प्रदायों-मजहबों की सृष्टि हुई लेकिन आज उनका नाम ही शेष है। पर हिन्दू धर्म अपनी उसी विशालता के साथ जीवित है। हिन्दू धर्म वास्तव में मानव धर्म है। मानव की सत्ता जिसके द्वारा कायम रह सकती है और जिससे वह विश्व चैतन्य के विराट अंग का अंग बना रह सकता है, उसी के लिए इसका आदेश है।
हिन्दू धर्म की विशेषता की सबसे बड़ी देन उसकी अपनी विशिष्ट उपासना पद्धति है। विश्व आत्मा की उपासना के लिए उसके समय विभाग में कोई एक समय निश्चित नहीं है। उपासना देश और काल में विभाजित नहीं है। उसका तो प्रत्येक क्षण उपासनामय है। वे अपने विश्व चैतन्य को एक क्षण के लिए भी भूलना नहीं चाहते, बल्कि गतिविधि का प्रत्येक भाग इन चैतन्यदेव के लिए ही लगाना चाहते हैं।
उपासना की दृष्टि से विराट पुरुष चार भागों में विभक्त हैं और समय भेद से भी उनके चार भाग कर दिये गए हैं। ये दोनों प्रकार के चार भाग हिन्दू संस्कृति में वर्ण एवं आश्रमों के नाम से पुकारे जाते हैं। यों समस्त ब्रह्माण्ड में वर्ण धर्म और आश्रम पाये जाते हैं, लेकिन हिन्दू संस्कृति उन्हें पृथक नहीं रहने देना चाहती। उसकी दृष्टि में उनका अस्तित्व तब तक ही है, जब तक कि विराट पुरुष की रक्षा के लिए उनकी गतिविधि है। दूसरे शब्दों में विश्व चैतन्य की सामंजस्य स्थापना में अपने को लगाये हुए है। अन्य संस्कृतियाँ या धर्मों की गति विधि विराट् के प्रति नहीं है। वे अंग के अंश तक ही सीमित हैं। कोई भी बुद्धि विशिष्ट व्यक्ति इस बात को स्वीकार किये बिना नहीं रह सकता कि समस्त शरीर का ध्यान छोड़कर शरीर के किसी एक ही अंग का ध्यान रखने से शरीर की रक्षा सम्भव ही नहीं हो सकती। अतः जो लोग चैतन्य को भुलाकर, जिसने कि विराट् पुरुष के शरीर को विभिन्न अंगों के द्वारा एक कर रखा है, अलग-अलग अंगों तक ही अपने को सीमित रखते हैं और अपने साथी एवं सहयोगी दूसरे अंगों को न सिर्फ भुला देते हैं, बल्कि उनके साथ प्रतिस्पर्धी बनकर उनकी सत्ता ही खो देना चाहते हैं, वे स्वयं भी अपनी सत्ता कैसे स्थिर रख सकते हैं?
इसलिए हिन्दू संस्कृति में इस स्पर्द्धा से बचने के लिए जीवन के आरम्भ काल में प्रत्येक को स्वरूप ज्ञान करने का आदेश है। चिन्मय सत्ता के साथ विराट के साथ व्यक्ति को जोड़ने वाली इस कड़ी का नाम ब्रह्मचर्याश्रम है।
“ब्रह्मचर्याश्रम” इस नाम से ही ध्वनित होता है कि मानव की वह स्थिति है, जिसमें कि ब्रह्म में विराट् पुरुष में, विश्वात्मा में भ्रमण करना, उसके प्रति अपने को समर्पित करना सिखाया जाता है। ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र नाम से जिन चारों वर्णों को व्यक्त किया जाता है, उनका विभेद उनकी कार्य क्षमता की दृष्टि से ही किया जाता है और फिर इन्हीं चारों में अन्तर्भाव हो जाता है। ब्रह्मचर्याश्रम इन चारों को ही ब्रह्म में वरण करने की विद्या सिखाता है।
शरीर के मुख, बाहु, उरु, पाद का काम अपने लिए नहीं है, समस्त शरीर के लिए है, उसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र का काम अपने लिए नहीं विराट् पुरुष के लिए है। इस दृष्टि को अन्त तक बनाये रखने की शिक्षा ब्रह्मचर्याश्रम में दी जाती है। यह आश्रम कर्म प्रधान है, व्यवहार प्रधान है। जो शिक्षा पाई है, उसे जीवन में उतार लाना। इस शिक्षा का क्रियात्मक रूप गृहस्थाश्रम से आरम्भ होता है, वानप्रस्थ में इसकी वृद्धि होती है और संन्यास में परिपक्वता आती है।
इस प्रकार शरीर में रहकर और शरीर रक्षा के लिए ही अपना रक्षण और अस्तित्व बनाये रखकर शरीर के प्रति आत्मोत्सर्ग कर देना शरीराँगों का काम है। विश्व-आत्मा के लिए उसी प्रकार अपना अस्तित्व रखकर कार्य करते हुए उत्सर्ग कर देना वर्ण धर्म का उद्देश्य है। चैतन्य शक्ति को क्षण भर भी न भुलाने वाली यह हिंदू संस्कृति हमेशा आत्मा की ओर ही अभिमुख रहती है और इस प्रकार अभिमुख रहना ही हिंदू धर्म को बचाये रहने का एक मात्र साधन है।
हिन्दू धर्म आध्यात्म प्रधान रहा है। आध्यात्मिक जीवन उसका प्राण है। अध्यात्म के प्रति उत्सर्ग करना ही सर्वोपरि नहीं है, बल्कि पूर्ण शक्ति का उद्भव और उत्सर्ग दोनों की ही आध्यात्मिक जीवन में आवश्यकता है। कर्म करना और कर्म का चैतन्य के साथ मिला देना ही यज्ञमय जीवन है। यह यज्ञ जिस संस्कृति का आधार होगा, वह संस्कृति और संस्कृति को मानने वाली जाति हमेशा अमर रहेगी।
हिन्दू जाति कभी भी धन के पीछे नहीं पड़ी। ऐश्वर्य, यश, प्रतिष्ठा, धन इत्यादि सब कुछ इन्हें विपुलता से प्राप्त हुआ। यह धन शायद अन्य राष्ट्रों की अपेक्षा कहीं अधिक था, पर भारतीय संस्कृति का आधार अर्थ, लाभ, धन, विलास कभी नहीं रहा है। युगों तक भारत शक्तिशाली बना रहा, पर तो भी शक्ति उसका आदर्श कभी नहीं बना। अपनी शक्ति का कभी उसने दुरुपयोग नहीं किया। साम्राज्य बढ़ाने, दूसरों का दमन करने, हिंसा, मारकाट या पद लोलुपता का भारत कभी शिकार नहीं बना। धन और पाशविक शक्ति कभी भी उसकी प्रेरक शक्तियाँ नहीं बन सकीं।
यही एक ऐसी संस्कृति रही है, जिसने जीवन के ऊपरी स्तर की चिन्ता कभी नहीं की है। बाहरी तड़क-भड़क में उसका कभी भी विश्वास नहीं रहा है। यह साँसारिक जीवन सत्य नहीं है। सत्य तो परमात्मा है, हमारे अन्दर बैठी हुई साक्षात् ईश्वर स्वरूप आत्मा है, वास्तविक उन्नति तो आत्मिक उन्नति है। इसी उन्नति की ओर हमारी प्रवृत्ति बढ़े, इसी में हमारा सुख-दुख हो। यही हमारा लक्ष्य रहा है। अपने हाल के इतिहास में भी भारत ने अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपने ऊंचे आदर्शों को प्रथम स्थान दिया है। हिन्दू का खाना धार्मिक, पीना धार्मिक, उसकी नींद धार्मिक, उसकी वेश-भूषा धार्मिक, उसके विवाह, मृत्यु आदि धार्मिक अर्थात् सर्वत्र ईश्वर, आत्मा और धर्म की प्रेरणा रही है। यही इस देश और जाति की सजीवता का एकमात्र कारण है।
(डॉ. भगवानदास जी एम. ए.)
हिन्दू जाति में धर्म ग्रन्थों की संख्या अत्यधिक है। हम लोग यद्यपि ईसाई, यहूदी, पारसी, मुसलमान आदि धर्मों को हिन्दू धर्म से निम्न कोटि का समझते हैं और यदि आध्यात्मिक और दार्शनिक तत्वों की विवेचना की दृष्टि से देखा जाय तो इस कथन को सर्वथा असत्य भी नहीं कह सकते। तो भी उन धर्मों में एक ही धर्म स्थापना और एक ही धर्म ग्रन्थ को मान्यता प्रदान की जाती है, इस कारण उनके अनुयायियों में धार्मिक नियमों का पालन और आचरण कहीं अधिक परिमाण में देखने में आता है। इसके विपरीत हिन्दू धर्म में उच्चकोटि का आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान होते हुए भी अनेक धर्म संचालकों और अनेक धर्म शास्त्रों के होने के कारण इतनी अधिक मत विभिन्नता और उसके फल से पारस्परिक मतभेद देखने में आता है कि समस्त हिन्दुओं को एक धर्म का अनुयायी कह सकना भी एक समस्या हो जाती है। वैसे विद्वानों ने इन मत को भिन्न भिन्न स्तर (श्रेणी) के मनुष्यों के भेदों, अनुकूल, सरल अथवा कठिन धर्माचरण बतला कर उनका सामंजस्य करने की चेष्टा की है, पर कम से कम व्यवहार में तो इस समय इस परिस्थिति का परिणाम अच्छा नहीं जान पड़ता। इसके कारण नीची श्रेणी के अल्प बुद्धि बनते, वरन् पूर्ण विद्वान कहलाने वाले भी धार्मिक सिद्धान्तों और नियमों का अर्थ एक दूसरे से बिल्कुल उल्टा लगाते हैं। इसके फल से समाज में स्पष्ट रूप से फूट और कलह उत्पन्न होती है और वह विशृंखल और निर्बल बनता है।
हिन्दू जाति के कल्याण के लिए यह परमावश्यक है कि आंखें बन्द करके ‘शास्त्र की दुहाई’ देने की प्रवृत्ति को यथासम्भव कम किया जाय। शास्त्र समय-समय पर बने हैं और उनमें उस समय की परिस्थिति के अनुसार आवश्यकीय परिवर्तन किये गये हैं। इसके अलावा भारतवर्ष स्वयं एक महाद्वीप के तुल्य हैं और इसमें भिन्न-भिन्न प्रांतों के लोगों के रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार और सामाजिक नियमों में बहुत अधिक अन्तर रहा है, पर इन सब लोगों को हिन्दू ही माना जाता है। इसके अतिरिक्त इधर एक हजार वर्षों के विदेशी शासन के प्रभाव और वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण प्राचीन परिस्थिति बहुत अधिक बदल गई है और हम चाहे मुँह से ‘शास्त्र-शास्त्र’ चिल्लाते रहें पर उनके अनेक नियमों का पालन नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए रेल की यात्रा और कारखानों में हजारों मजदूरों के एक साथ काम करने की अवस्था पर विचार कीजिये तो आपको स्पष्ट जान पड़ेगा कि वहाँ पर शास्त्रों में बतलायें चौका-चूल्हे और छुआछूत के नियमों पर चल सकना प्रायः असम्भव होता है। इसलिए यह अनिवार्य है कि हिन्दू विद्वान स्वयं शास्त्रों के वास्तविक तत्व पूर्ण सिद्धान्तों के अनुकूल वर्तमान समय के व्यवहारोपयोगी नियम निर्धारित करें। इस समय हिन्दू-शास्त्र कहाने वाले ग्रन्थों और नियमों में कैसा वैषम्य हो गया है, इसका विवेचन बनारस के शास्त्रीय विषयों के मर्मज्ञ विद्वान बा. भगवानदास जी ने बड़े स्पष्ट रूप में किया है जिससे विदित होता है कि इस प्रवृत्ति से हिन्दू समाज में कैसा अड़ंगा लगा हुआ है।
शास्त्रों के सम्बन्ध में जो तर्क-वितर्क प्रायः हुआ करता है उसका निचोड़ यही है कि हमको अन्त में ‘बुद्धि’ की शरण लेनी चाहिए। यदि ‘शास्त्र’ शब्द ही पकड़ा गया तो फिर उसके साथ चलना कठिन हो जायगा। उदाहरण के लिए शास्त्रों में एक ओर तो अहिंसा को मुक्ति का एक प्रधान साधन माना है, दूसरी ओर अन्य शास्त्रों में बकरा, भैंसा, घोड़ा तथा मनुष्य तक का बलिदान देने का विधान है। “सोत्रामण्याँ सुराँ पिवेत्” यह भी वेद विदित है। फिर इतने पर ही समाप्ति क्यों? शाक्त सम्प्रदाय वाले तंत्र ग्रन्थों को ही सबसे बड़ा ‘शास्त्र’ बतलाते हैं, उनके ‘शास्त्र’ की आज्ञा मानकर पंच मकार का सेवन क्यों न किया जाय? यदि नहीं, तो क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर देने का जब आप प्रयत्न करेंगे तो आपको विदित हो जायगा, कि बुद्धि की शरण लेने के अतिरिक्त आपको कोई दूसरा उपाय नहीं है।
हिन्दुओं की ढाई हजार जाति और उपजातियों में से प्रत्येक का अपना ‘शास्त्र’ अलग है। भोजन के विषय में, विवाह के विषय में, दाय-भाग के विषय में अनन्त भेद हैं, जो सभी ‘शास्त्रीय’ बतलाये हैं। मनु ने आठ प्रकार के विवाह और बारह प्रकार के पुत्र कहे हैं। दाय-भाग के विषय में ‘मिताक्षरा’ कुछ कहती है, ‘जीमूतवाहन’ का मत कुछ और है, ‘दत्तक मीमाँसा’ और ‘अपरार्क’ में भिन्न बातें बतलाई गई हैं। इनमें से आप किसको ठीक मानेंगे, क्योंकि ये सभी माननीय ‘शास्त्र’ स्वीकार किये जाते हैं।
जब किसी शास्त्र सम्मत मानी जाने वाली बात का विरोध किया जाता है तो शास्त्रवादी प्रायः वह दलील पेश करते हैं कि “इस प्रथा या नियम को लाखों, करोड़ों आदमी हमारे पूर्वज इतने पुराने समय से मानते आये हैं, तो वे क्या खूब मूर्ख थे” इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि “करोड़ों आदमी अति प्राचीन काल से शराब पीते आये हैं और शास्त्रों में भी अनेक जगह इसका विधान पाया जाता है, भगवान कृष्ण के बड़े भाई और अंशावतार बलरामजी घड़ों शराब पी जाते थे, तो क्या शराब पीना शास्त्र सम्मत और श्रेष्ठ कार्य मान लिया जाय?” वास्तविक बात तो यह है कि ‘शास्त्र’ या प्राचीन ग्रन्थों में लिखी होने से ही किसी बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उसे बुद्धि के तराजू पर तोलना और उसकी उपयोगिता को समझ लेना भी आवश्यक है। भगवान मनु ने कहा है :-
एकोअपि वेदाविद् धर्म यं व्यवस्येद् द्विजोतमः। स विज्ञेयः परो धर्म्मा, न अज्ञानाँ उदितौ अयुतैः॥
(अ. 12 श्लोक 113)
अर्थात् “एक भी सच्चा तपो विद्या युक्त विद्वान, वेद वेदान्त का मर्म जानने वाला जो निर्णय कर दे, उसको धर्म मानना चाहिये, पर दस हजार अज्ञ (अनजान) भी जो कहें उसे नहीं मानना चाहिए।”
‘शास्त्रों’ के नाम पर अंध श्रद्धा के अत्यन्त बढ़ाने का ही फल है कि हिन्दू जाति की दासत्व बुद्धि प्रतिदिन अधिकाधिक बढ़ती गई। उन्होंने कब्रों और दरगाहों पर जाकर भी मस्तक झुकाया। काशी की पंचकोशी यात्रा में एक बार देखा गया कि एक आदमी ने अपने को ‘ब्राह्मण’ कहकर एक मील के पत्थर को ‘महादेव’ बतलाया और अनेक देहातियों ने उस पर फूल, पत्ते, पानी और पैसे चढ़ाये और उन पैसों को लेकर ‘ब्राह्मण’ देवता चल दिये।
इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि जब तक भारतवासी स्वतन्त्र विचार के रहे, तर्क के बल पर चले, तब तक हिन्दू जाति जीवित रही, अर्थात् मूल सिद्धान्त को स्थिर रखते हुए विशेष आचार, धर्म-कर्म, विधि-निषेध समय-समय पर अवस्थानुसार बदलते रहे। अन्य बातों को छोड़कर केवल एक इसी बात पर विचार कीजिये कि जब आरम्भ में समस्त व्यवहारों का निर्णय करने के लिए मनुस्मृति बन ही चुकी थी, तो फिर सत्ताईस अन्य स्मृतियाँ क्यों बनाई गई? इसका कारण यही हो सकता है कि मनु के मूल सिद्धान्तों को अटल रखते हुए थोड़ा बहुत हेर-फेर गौण बातों में समय-समय पर होता रहा है। पर जब से हम अन्ध-विश्वासी बने या बना दिये गये तब से शास्त्रों की प्रगति रुक गई। अब उन प्रगतिशील ऋषियों की हम ऐसी अकर्मण्य सन्तान हैं, कि शास्त्रों की दुहाई देने के सिवाय अपनी विवेक बुद्धि से काम लेना ही नहीं जानते।
इसका आशय यह नहीं कि हम अपने शास्त्रों को त्याग दें या उनकी निन्दा करें। हमको कालक्रम से बिगड़ी हुई परिस्थिति को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए न कि एक दूसरे की कटु आलोचना करके अपनी संगठन शक्ति को और भी निर्बल करना। इसलिए उचित यही है कि प्रमाणित प्राचीन ग्रन्थों को ही मान्यता दी जाय और उनके मूल सिद्धान्तों को संग्रह करके गौण बातों अथवा ‘उपनियमों’ को वर्तमान परिस्थिति के अनुकूल निर्धारित किया जाय। यदि यह कार्य सार्वजनिक रूप से दलबन्दी या प्रतिद्वन्दिता की भावना को दूर रखकर किया जायगा तो निस्सन्देह इससे समाज का कल्याण होगा।
(श्री ज. न. लाल)
हमारे देश में कर्म फल पर साधारणतः सभी लोग विश्वास करते हैं। प्रायः प्रत्येक मनुष्य यह समझता हैं कि जैसी करनी करता है उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। इतना ही नहीं, पुनर्जन्म में भी व्यापक रूप से विश्वास होने के कारण लोग यह भी समझा करते हैं कि एक जन्म की कमाई का फल मनुष्य को दूसरे जन्म में मिलता हैं। कर्म तथा पुनर्जन्म सम्बन्धी यह ज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यदि कोई मनुष्य इसके यथार्थ तत्व को समझ ले तो अत्यन्त तेजी से वह उन्नति कर सकता है और इस प्रकार शीघ्र सिद्धि प्राप्त कर आवागमन से रहित हो सकता है, क्योंकि इन प्राकृतिक तथ्यों के ज्ञान तथा सदुपयोग से मनुष्य की शक्तियाँ अपरिमित बढ़ जाती हैं। पर आज हम किस प्रकार इनका उपयोग कर रहे हैं? जब कभी मनुष्य पर कोई आफत आ पड़ती है, कोई बीमारी अथवा कठिनाई आ जाती है, तो वह प्रायः यह सोचकर अपने चित्त को सान्त्वना दे लेता है, कि उसके पूर्व जन्म की कमाई ऐसी ही थी कि उसे इस जन्म में सुविधाएं नहीं मिल सकतीं। बस, ऐसा सोचकर वह चुपचाप बैठ जाता है, प्रायः निकम्मा हो जाता है। इस प्रकार कर्म सम्बन्धी इन नियमों को शक्ति का साधन बनाने के बदले इनको अकर्मण्यता का बहाना बना लिया गया है। एक साधारण मनुष्य जिसे कर्म तथा पुनर्जन्म की बातें कुछ भी नहीं मालूम हैं, वह ऐसा नहीं करता है। उसके सामने तो जब कोई कठिनाइयाँ आती है, तो वह साहसपूर्वक उनका सामना करने का प्रयत्न करता है। वह पुरुषार्थ को ही अपना कर्तव्य समझता है। कैसे आश्चर्य की बात है! कहाँ तो जीवन के गूढ़ रहस्यों को न जानने पर भी पुरुषार्थ और कहाँ जीवन के सार तत्वों का ज्ञान रखने पर भी अकर्मण्यता। ठीक है, महान नियमों का अर्थ गलत रूप से समझने का ऐसा ही नतीजा होता है। ऐसी ही समझ वालों के लिए गो. तुलसीदास जी लिख गये हैं-
कादर जन कर एक अधारा। राम-राम आलसी पुकारा॥
इसका यह तात्पर्य नहीं निकालना चाहिए कि तुलसीदासजी ने राम नाम की अवहेलना की है। ऐसा तो कभी सम्भव नहीं। इसमें उन्होंने यही भाव दिखलाया है कि आलसी अथवा अकर्मण्य लोग किस प्रकार अपनी अकर्मण्यता को राम नाम अर्थात् किसी महान तत्व की आड़ में छुपाना चाहते हैं।
कर्म से अभिप्राय क्या है? साधारणतः जब हम किसी को धनी, किसी को गरीब, किसी को भाँति-भाँति के ऐश और आराम में और किसी को भूखों मरते, रोगी और अन्य तरह से पीड़ित देखते हैं, तो कहते हैं कि ये सभी लोग अपने-अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के फल भोग रहे हैं। इसलिए कर्म का सम्बन्ध किसी ऐसे न्यायपूर्ण नियम से जान पड़ता है, जो अपना कार्य मनुष्य के अनेक जन्मों में भी पूरा कर लेता है। इससे पता चलता है कि प्रकृति किसी का पक्षपात नहीं करती, न अपनी ओर से किसी को इनाम देती है और न किसी को दण्ड। अपनी ही करनी प्रत्येक मनुष्य के सामने आती है और प्रकृति का यह नियम इतना दृढ़ मालूम होता है कि मनुष्य भले ही अपनी कार्यवाहियों को भूल जाय, पर प्रकृति उसे नहीं भूलती और इसलिए कई जन्मों के बाद भी उसका बदला अवश्य चुकाती है।
वास्तव में कर्म का अर्थ है जो कुछ किया जाय। अस्तु जो किया जाता है, उसमें प्राकृतिक रूप से भूत, वर्तमान और भविष्यत् के भाव मिले रहते हैं। किसी भी कार्य को वर्तमान समय में करने के हेतु कुछ कारणों का होना आवश्यक है। कोई कार्य बिना कारण के नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो कार्य अभी किया जाता है, वह भविष्य में होने वाले किसी कार्य का कारण सम्बन्ध समझा जाता है।
यह क्रिया आपसे आप प्राकृतिक रूप से हुआ करती है। प्रत्येक कार्य के साथ ही उसका प्रति कार्य भी आपसे आप अर्थात् प्राकृतिक रूप से लगा रहता है। कार्य प्रतिकार्य और कार्य कारण वास्तव में एक ही वस्तु है, केवल शब्दों तथा उनके भावों को प्रकट करने की रीति में अन्तर है। इसी कार्य कारण अथवा कार्य प्रतिकार्य के प्राकृतिक सम्बन्ध को कर्म व्यवस्था कहते हैं। कर्म को यदि कार्य कहें तो प्रतिकार्य को कर्म-फल कहेंगे।
यह सत्य हैं कि कर्म का कर्म फल के साथ अविच्छेदनीय सम्बन्ध लगा हुआ हैं। पर इसका यह मतलब नहीं कि प्रत्येक कर्म का फल उसी समय मिल जाता है। कुछ कर्मों के फल तात्कालिक मिलते हैं और कुछ के फल देर से मिलते हैं। कितने ही ऐसे कार्य हैं, जिनके फल इस जन्म में नहीं, अगले जन्म में मिलते हैं और कितने तो ऐसे हैं कि जिनके फल अनेक वर्षों बाद मिलते हैं क्योंकि कर्म व्यवस्था एक अत्यन्त पेचीदी व्यवस्था है। एक-एक फल की पूर्ति के लिए प्रकृति को अनेक प्रकार के साधनों का सामना करना पड़ता है। पर जो हो, चाहे आज हो अथवा एक हजार अथवा एक लाख वर्षों के बाद हो, पर प्रत्येक भले-बुरे कर्मों का फल मनुष्य को भोगना अवश्यम्भावी तथा अनिवार्य है।
इस तथ्य को साधारण लोग व्यावहारिक रूप से प्रायः नहीं जानते हैं। इसीलिए वे बहुधा आज के ही आराम और मौज में मगन रहते हैं। “खाओ पियो और मौज करो” यही उनका सिद्धान्त रहता है। इस प्रकार अपनी मौज, अपने सुख के लिए वे कितनों को दुःख पहुँचाते हैं, इस पर तनिक भी ध्यान नहीं देते। यदि उनका ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया जाय कि ऐसी करनी का बहुत बुरा परिणाम उनको भोगना पड़ेगा, तो वे प्रायः यही उत्तर देते हैं कि “आज तो चैन से गुजरती है, आकबत की खबर खुदा जाने।” हाँ, खुदा अवश्य जानता है। हम भले ही अपने दुष्कर्मों को भूल जायें, पर ‘कर्म’ छोटे से छोटे और बड़े से बड़े अथवा भले से भले और बुरे से बुरे किसी भी कार्य को नहीं भूलता और समय पर उसका फल अवश्य भोगवाता है। इसलिए यदि इस तथ्य को हम समझकर ग्रहण करें तो अनेक बुरे कार्य हम से आप से आप छूट जायेंगे और इस प्रकार जीवन बहुत सुधर जायगा।
हमारे द्वारा किये गये कर्मों के सम्बन्ध में साधारण नियम यह है कि हम इस जन्म में जो भी अच्छे अथवा बुरे कार्य, अर्थात् दूसरों को सहायता अथवा कष्ट पहुंचाने के जो कार्य करेंगे उसके फलस्वरूप दूसरे जन्म में वैसे ही सुख अथवा दुख के साधन मिलेंगे, अर्थात् उसी के अनुकूल परिस्थिति में हमारा जन्म होगा। इस जन्म में अपनी वासनाओं द्वारा जिस हद तक मनुष्य दूसरों की ओर प्रेम और दया अथवा द्वेष और क्रोध के भावों का संचालन करता है, उसी के अनुकूल दूसरे जन्म में उसकी अच्छी अथवा बुरी वृत्तियाँ बनती हैं, अर्थात् वैसी ही भली या बुरी वासनाओं की ओर दूसरे जन्म में उसकी अभिरुचि रहती है।
यहाँ इस बात पर भी कुछ विचार करना चाहिये कि अपनी परिस्थितियों, अभिरुचियों तथा अवसरों की ओर हमारा भाव कैसा होना चाहिये? एक बात तो स्पष्ट है कि ये परिस्थितियाँ हमको पूर्व जन्म की कमाइयों के फलस्वरूप प्राप्त हुई हैं। हमारे अपने ही किये कर्म इन रूपों में हमारे सामने आ उपस्थित हुए हैं। इनके बदलने का हमें क्या, किसी को अख़्तियार नहीं है। कोई भी साधु, फकीर, महात्मा अथवा देवता कर्म की लकीर को नहीं काट सकते। तुलसीदासजी ने कहा हैं- “विधि का लिखा को न मेटनिहारा।” इनसे निपटारा तो इन्हें भोग लेने से ही हो सकता है। पर जिस प्रकार इनको भोगा जायगा, उसी के अनुसार आगे आने वाले जन्म की परिस्थितियाँ बनेंगी। इसलिए दुखदायक परिस्थितियों के आने पर रोना पीटना बेकार है। उन्हें सहर्ष स्वीकार कर आनन्दपूर्वक भोग लेना चाहिए। तभी तो प्रकृति का हिसाब-किताब बराबर हो सकेगा। पर यदि ऐसा न करके हम रोने तड़पने तथा अपने भाग्य को दोष देने लगे, तो ऐसे भावों तथा विचारों द्वारा फिर प्राकृतिक शक्तियों का संतुलन दूषित हो जायगा और आगे चलकर हमको और अधिक दुखों का सामना करना पड़ेगा। हमें जीवन में एक पक्के बहादुर खिलाड़ी की भाँति व्यवहार करना चाहिए। जहाँ हार गये वहाँ हार मान लेनी चाहिए और जहाँ जीत गये वहाँ जीत माननी चाहिए। पर दोनों ही दशाओं में सदैव प्रसन्न चित्त रहना चाहिए। ये बातें तो साधारण रूप से मनुष्य के जीवन में आया-जाया करती ही हैं। इसलिए इनकी वजह से चित्त की शक्ति अथवा समता में कभी उद्विग्नता नहीं आने देना चाहिए। यदि पूर्ण न्याय के साथ हमारा पुराना कर्म अपना फल चुकाने आता है, तो हमें दुःखी क्यों होना चाहिए। वास्तव में यह खुश होने का अवसर हैं, क्योंकि इसके द्वारा कम से कम इस हद तक तो अपनी करनी का बोझ हमारे सिर से उतर जाता है। इसलिए पूर्व कर्म फल के बदले में प्राप्त सुख-दुखों से जरा विचलित न होकर उन्हें सहर्ष स्वीकार कर इस जन्म में हमको अच्छा कार्य करना चाहिए, क्योंकि इसी प्रकार हमारा भविष्य अवश्यम्भावी रूप में उज्ज्वल हो सकेगा।
(श्री. डी. रामचन्द्र मेहता)
मंत्र सिद्धि होने से साधक में जो लक्षण प्रकट होते हैं उनके विषय में शास्त्रकारों ने कहा है-
“हृदये ग्रन्थि भेदश्च सर्व्वाय व वर्द्धनम्। आनन्दा श्रुणि पुलको देहावेशः कुलेश्वरी॥ गद्गदोक्तश्च सहसा जायते नात्र संशयः॥”
(तंत्र सार)
अर्थात्- “जप के समय हृदय ग्रन्थि भेद, समस्त अवयवों की वृद्धि, देहावेश और गदगद कण्ठ भाषण आदि भक्ति के चिन्ह प्रकट होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। और भी अनेक प्रकार के चिन्ह प्रकट होते हैं।”
मंत्र के सिद्ध होने का सबसे मुख्य लक्षण तो यही है कि साधक के मनोरथ की पूर्ति हो जाय। साधक की जिस समय जो अभिलाषा हो वह तुरंत पूर्ण होती दिखलाई दे तो समझ लेना चाहिये कि मंत्र सिद्धि हुई है। मंत्र के सिद्ध होने से मृत्यु भय का निराकरण, देवता दर्शन, देवता के साथ वार्तालाप, मंत्र की भयंकर शब्द सुनाई पड़ना आदि लक्षण भी दिखलाई पड़ते हैं।
“सकृदुच्चरितेऽप्येवं मंत्रे चैतन्य संयुते। दृष्यन्ते प्रत्यया यत्र पारपर्य्य तदुच्यते॥
(तंत्रसार)
“अर्थात्- “चैतन्य को संयुक्त करके मंत्र का एक बार उच्चारण करने से ही ऊपर बतलाये भावों का विकास हो जाता है।”
जिस साधक को मंत्र की सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है वह देवता का दर्शन कर सकता है, मृत्यु का निवारण कर सकता है, परकाया प्रवेश कर सकता है, चाहे जिस स्थान में प्रवेश कर सकता है, आकाश मार्ग में उड़ सकता है, खेचरी देवियों के साथ मिलकर उनकी बातचीत सुन सकता है। ऐसा साधक पृथ्वी के अनेक स्तरों को भेद कर भूमि के नीचे के पदार्थों को देख सकता है। ऐसे महापुरुष की कीर्ति चारों दिशाओं में व्याप्त हो जाती है, उसे वाहन, भूषण आदि समस्त सामग्री प्राप्त होने लगती हैं और वह बहुत समय तक जीवित रह सकता है। वह राजा और अधिकारी वर्ग को प्रभावित कर सकता है और सब तरह के चमत्कारी कार्य करके सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है। ऐसे सत्पुरुष की दृष्टि पड़ते ही अनेक प्रकार की व्याधियाँ और विषों का निवारण हो जाता है। वह सर्व शास्त्रों में पारंगत होकर चार प्रकार का पाण्डित्य प्राप्त करता है। वह विषय भोग के प्रति वैराग्य धारण करके केवल मुक्ति की ही कामना करता है। उसमें सर्व प्रकार की परित्याग की भावना और सबको वश में करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। वह अष्टाँग योग का अभ्यास कर सकता है, विषय भोग की इच्छा से दूर रहता है, सर्व प्राणियों के प्रति दया रखता है और सर्वज्ञता की शक्ति को प्राप्त करता है। सब प्रकार का साँसारिक वैभव, पारिवारिक सुख और लोक में यश उसे मंत्र-सिद्धि की प्रथम अवस्था में ही प्राप्त हो जाते हैं।
तात्पर्य यह है कि योग सिद्धि और मंत्र सिद्धि में कोई भेद नहीं हैं, दोनों प्रकार के साधनों का उद्देश्य एक ही है, केवल साधन मार्ग में अन्तर रहता है। वास्तव में जो साधक जिस किसी विधि से मंत्र की पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लेता है तो उसके प्रभाव से वह स्वयं शिव तुल्य हो जाता है। कहा हैं- “सिद्ध मन्त्रस्तु यः साक्षात् स शिवो नात्र संशय।”
मंत्र साधक को शास्त्र में बतलाई किसी भी पद्धति का अवलम्बन करके मंत्र सिद्धि प्राप्त करनी चाहिये और जीवन्मुक्त होकर शिव सायुज्य अथवा निर्माण मुक्ति प्राप्त करना अपना लक्ष्य रखना चाहिये। युगावतार भगवान रामकृष्ण परमहंस ने ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली थी, उन्होंने अपने अनुभव या अन्य साधकों को बतलाया था-
“कलियुग में मंत्र जप अथवा अपने किसी इष्ट देव का जप करने से सब प्रकार की इच्छायें पूर्ण होती हैं। एकाग्र चित्त, मन और प्राण को एक करके जप करना चाहिये, इष्ट देव के नाम रूपी मंत्र का जप करते-करते समुद्र में डूब जाओ, बस तुम भव सागर से पार हो जाओगे।”
(श्री. श्यामसुन्दर सहाय)
कल्पतरु की कथा भारतीय साहित्य में आदि काल से चली आ रही है। ‘कल्पतरु’ जैसा नाम है, उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कहीं यह ‘कल्पना तरु’ न हो। यदि ‘कल्पना तरु’ भी हो तो कल्पना प्रसूत करने की शक्ति तो इसमें है ही। इस पुरातन वृक्ष की छाया हर युग एवं हर एक में अपनी शीतलता प्रदान करती रही है। इसकी गाथा सुरलोक, नरलोक एवं नागलोक तक प्रचलित है।
वास्तव में यह ‘कल्प-तरु’ है क्या? क्या ‘नदंन कानन’ का एक अपूर्व वृक्ष! इन्द्र का मनोरथ पूर्ण करने वाला पारिजात!! यह भी कहा जाता है कि इन्द्र ने इस ‘कल्प-वृक्ष’ से जो माँगा सो पाया। उसकी मनोकामना पूरी हो गई तो फिर इसे क्यों न प्राप्त किया जाय? सौर आज के युग में- जब कि भौतिक विज्ञान और जगत् में नित्य नये करिश्मे दिखा रहा है! आज का विज्ञान पा तो सकता है इसे, पर इसका कोई निश्चित स्थान हो तब तो! यह सत्य है कि स्थूल जगत् में इसका वास नहीं है। ‘रॉकेट’ या ‘सैटेलाइट’ तो बाहर-बाहर घूमते हैं। ज्ञानियों का कहना है-यह मानव के हृदय कानन का ‘अनुपम शृंगार’ है, अपूर्व पौरुष प्रदान कराने वाला- अरूप के पर्दे से रूप का भास करने वाला! जब ऐसी बात है तो क्यों नहीं दो-चार व्यक्तियों की शल्य क्रिया कर इस मनोरम तरु का भेद लिया जाय; या मानवकृत ‘वनस्पति शाली’ में इसकी फसल पैदा की जाय। नियति की क्रूरता कहिये या मनुष्य की अज्ञानता अथवा शक्तिहीनता, जो अंधेरे में भटकने पर बिजली का आविष्कारक यह मानव, अपने इन दो चक्षुओं को पाकर भी इस ‘प्रकाश-पुँज’ को, इस ज्योतिस्वरूप को ठीक ठीक न देख सका, न ठीक-ठीक समझ सका।
पौराणिक साहित्य में ‘कल्प-वृक्ष’ के बारे में कहा गया है कि ‘समुद्र मन्थन’ के समय जो अनुपम रत्न निकले उसमें एक यह भी है। ‘समुद्र मन्थन’ आध्यात्मिक पक्ष में मनुष्य की दैवी और आसुरी वृत्तियों का संघर्ष है। वैदिक साहित्य में मनुष्य का शरीर घट या कलश कहा गया है। मन उसका दैव अंश है। साथ-साथ सम्पूर्ण मानव को समुद्र की संज्ञा दी गई है। इसी समुद्र का मंथन प्रत्येक मनुष्य के जीवन में चलता रहता है। इसी संघर्ष में उसके विकास का रहस्य छिपा है। संघर्षहीन प्राणी को प्रकृति का जड़ अंश ही समझना चाहिये।
शरीर क्रिया विज्ञान में मनुष्य के केन्द्रीय नाड़ी जाल का वर्णन एक वृक्ष के रूप में किया गया है। पश्चिम के विद्वान् इसे ‘जीवन-वृक्ष’ कहते हैं। नाड़ी की शाखा-प्रशाखादि इस वृक्ष के अंग-प्रत्यंग हैं। मनुष्य का स्वास्थ्य और जीवन इस नाड़ी संस्थापन पर प्रतिष्ठित है। यह वनस्पति ही ‘मनुष्य जीवन’ के केन्द्र में ‘स्थापित यूप’ है। यही वृक्ष साँकेतिक “कल्पतरु” है। वास्तव में यह कल्पतरु मानव ही है। प्रकृति की सर्वोत्तम कृति!..... जो अपने को ‘कल्पवृक्ष’ समझकर भी स्वयं ‘संकल्प’ भूल गया, साथ-साथ खो बैठा अपना स्वस्थ रूप ‘विकल्प’ की घूर्णिचक्र में पड़कर। इसे भी नियति का व्यंग कहिये, “तेरे अंदर सब कुछ है, और तू ढूँढ़ रहा है बाहर।”
‘कल्प’ और ‘कल्पना’ एक ही धातु से बने हैं। ‘कल्प’ दो प्रकार का है- एक ‘संकल्प’ और दूसरा ‘विकल्प’। कल्प में ‘सम्’ और ‘वि’ उपसर्ग जोड़ने से दो शब्द बनते हैं-
सम+कल्प=समाधि।
वि+कल्प=व्याधि।
मन की शक्तियों का रहस्य ‘संकल्प’ या ‘समाधि’ है। नाना विकल्पों से मन व्याधि की ओर जाता है। उसकी शक्ति का क्षय होता है। इस प्रकार का ‘कल्प तरु’ प्रकृति ने प्रत्येक प्राणी के भीतर लगाया है। उसी का फल हम संकल्प मात्र से मनोनुकूल प्राप्त कर सकते हैं, पर उसकी उपलब्धि तरु की छाया तक ही सीमित है। स्रष्टा ने इसे भी अपनी मर्यादा के अंतर्गत ही रखा है। सम्भवतः इस पवित्र वस्तु को मर्यादा हीन होने से बचाया है। यह सच है कि कल्प तरु की छाया से बाहर मन का राज्य समाप्त हो जाता है।
कहीं-कहीं पर इस कल्प तरु को स्वर्ग का वृक्ष कहा गया है। इस साँकेतिक प्रयोग का भी रहस्य है। विचार मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं। मनोरथ की गति का पहिया मस्तिष्क में चक्कर काटता है। मस्तिष्क का अन्य नाम स्वर्ग भी है, जहाँ ज्योतिलोक है। इसी से इस ‘कल्प-तरु’ को स्वर्ग का वासी कहा गया है। अर्थात् स्वर्ग का वृक्ष, जो कि नीचे उगता ही नहीं। इसका एक और प्रचलित नाम है और वह है पारिजात! ‘पारिजात’ की संज्ञा देने का भी विशेष प्रयोजन है। यह जन्म लेते ही प्राणी के साथ उगता है, मृत्यु के संग यह भी सुप्त हो जो जाता है। यह संकल्प या कल्पना दो प्रकार का है- एक शिव और दूसरा अशिव। ‘शिव संकल्प’ मानव कल्याण का हेतु हैं। इसी से पुराणकार ने कल्प वृक्ष के तले ‘शिव संकल्प’ अमृत प्राप्त करने की शिक्षा दी है। अब यह प्राणी पर निर्भर करता है कि वह अपने कानून के ‘पारिजात’ से ‘संकल्प’ या ‘विकल्प’ का पुष्प माँग ले।
(प्रो. अवधूत, गोरेगावं बम्बई)
सन् 1939 के अगस्त मास में एक दिन लाहौर विश्वविद्यालय का सेनेटहाल, विद्यार्थियों, प्रोफेसरों और सरकारी अफसरों से खचाखच भरा था। गवर्नर और डिवीजनल कमिश्नर भी वहाँ उपस्थित थे। प्रोफेसर हबीब ने छठी इन्द्रिय के कुछ चमत्कार दिखलाने की घोषणा की थी। समय हो जाने पर प्रो. हबीब ने कमिश्नर से कहा कि आप अपने मन से कोई भी पुस्तक उठा लीजिए और उसका कोई पन्ना खोल लीजिए, मैं उस पृष्ठ में लिखे मजमून को आपसे बहुत दूरी पर खड़ा रह कर अक्षरशः पढ़कर सुना दूँगा।
कमिश्नर को विश्वास न हुआ। बिना देखे भला किसी पुस्तक को कैसे पढ़ा जा सकता है? और यदि कोई ऐसी पुस्तक उठाई जाय जिसे प्रोफेसर हबीब ने कभी देखा भी न हो तब? उन्होंने सचमुच एक ऐसी ही पुरानी पुस्तक निकाल कर उसका एक अध्याय खोला। प्रो. हबीब ने उसे लगभग 22 फीट की दूरी पर खड़े रहकर उस पुस्तक को इस तरह स्पष्ट रूप में बाँच कर सुना दिया मानो वह उनके सामने ही खुली रखी हो।
उस सभा में एक अंग्रेज ऐसा भी था जिसे हबीब को पुस्तक पढ़ते देखकर भी विश्वास न हुआ। उसने खड़े होकर कहा- “क्या आप बता सकते हैं कि मेरा घर कहाँ है? मेरे घर का दरवाजा किस तरफ है? मेरी स्त्री का नाम क्या है और मेरे कितनी सन्तानें हैं?”
एक ऐसे व्यक्ति के घर और परिवार का हाल बतलाना जो सात समुद्र पार रहता हो वास्तव में असम्भव ही जान पड़ता था। पर आश्चर्य कि प्रो. हबीब ने थोड़ी देर विचार करने के बाद सब बातें बतला दीं और उस अंग्रेज को स्वीकार करना पड़ा कि वे सब बिल्कुल ठीक थी।
भन्ना भील
सिकन्दराबाद (हैदराबाद) के एक गाँव में एक भील रहता है जिसका नाम है भन्ना। वह भी अपनी छठी इन्द्रिय की सहायता से अनेक गुप्त बातों को सरलतापूर्वक बता सकता है। गढ़ा हुआ धन, जमीन में कहाँ पानी है और कितनी गहराई पर है, ये सब बातें वह ऐसे ढंग से बता देता है मानों उसकी आँखें जमीन के भीतर का हाल देख सकने में समर्थ है। आपके घर में अगर चोरी हो गई हो तो भन्ना भील से बात करो, वह तुरन्त आपको बतला देगा कि चोर कौन है और वह इस समय कहाँ होगा? इतना ही नहीं वह यह भी बता सकता है कि अमुक स्त्री के गर्भ से लड़का पैदा होगा या लड़की?
इस प्रकार बिना देखी या बिना जानी वस्तुओं के विषय में ठीक-ठीक बतला देने की शक्ति को अंग्रेजी में ‘सिक्सथ सेन्स’ अर्थात् छठी इन्द्रिय कहते हैं। देश और काल की सीमा ही नहीं, इसके द्वारा आप किसी भी व्यक्ति के मन और मस्तिष्क के गुह्य प्रदेश की बातें भी जान सकते हैं। अनेक लोग प्रश्न करेंगे कि क्या वास्तव में ऐसी बात सत्य हो सकती है? ऊपर के उदाहरणों से इसकी सत्यता में सन्देह नहीं किया जा सकता। ऐसे ही और भी अनेक व्यक्तियों के उदाहरण हमारे सुनने में आये हैं।
जयपुर राज्य के चिड़ावा नगर में कुछ वर्ष पहले एक पं. गणेश जी महाराज हो गये हैं। उनमें भी बिना देखी बातों को जानने की दैवी शक्ति स्वाभाविक रूप से प्रकट हो गई थी। एक दिन नगर के बाजार में बैठे बैठे वे अचानक जोर से बोल उठें- ‘अरे रे, वह तो कूद ही पड़ा और मर गया। जाओ! सब मस्तक के बाल मुँडा डालो।” उन दिनों में राजस्थान की रियासतों में यह प्रथा थी कि अगर राजा मर जाय तो छोटे बड़े सब मस्तक मुड़ावें। श्रीगणेश जी महाराज ने जिस समय उपरोक्त शब्द कहे थे उसी समय खेतड़ी के राजा ने ताजमहल की मीनार से कूद कर जान दे दी थी। इसकी खबर चिड़ावा में कई दिन बाद आई, पर गणेश महाराज को वह घटना उसी समय दिखलाई पड़ गई थी।
इस प्रकार की एक नहीं सैकड़ों घटनायें समाचार पत्रों और पुस्तकों में देखने को मिलती हैं। स्विट्जरलैंड की एक स्त्री को अपनी बहिन की मृत्यु का आभास उसी समय हो गया था, यद्यपि उसकी बहिन कई हजार कोस की दूरी पर अमरीका में मरी थी। जावा में भी एक आदमी को अपनी माता की मृत्यु की इसी प्रकार खबर पड़ गई थी, यद्यपि उसकी माँ दक्षिण केरोलिना में थी। इन घटनाओं में जिन व्यक्तियों को दूर की घटनाएं दिखलाई पड़ी, उनमें यह शक्ति सदैव नहीं पाई जाती थी, पर उस समय किसी मानसिक आकर्षण के कारण उनको अपने प्रियजन के देहान्त की सूचना दैवी रीति से मिल गई।
ऐसी छठी इन्द्रिय की शक्ति कुछ पशुओं में भी उत्पन्न हो जाती है। अमरीका के रिकमेंड नगर में रहने वाली श्रीमती सी. डी. फोडानी के पास एक घोड़ी है। जो ऐसी-ऐसी बातों का जवाब दे सकती है कि दर्शक दंग रह जाते हैं। इसी तरह जापान के प्रधान सेनापति जनरल टोजो के पास एक बिल्ली थी जो नक्शा पर पैर रखकर यह बतला देती थी कि युद्ध में जापानी फौज को किस तरफ बढ़ना चाहिये। जनरल टोजो प्रायः उसके संकेत के अनुसार अपनी फौज को धावा करने का हुक्म देते थे और उनको बराबर सफलता मिलती थी, लोगों ने उसका नाम ‘मैप रीडिंग केट’ (नक्शा पढ़ने वाली बिल्ली) रख दिया था।
प्रत्येक मनुष्य में सामान्यतः पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मनुष्य अपनी इन्द्रियों द्वारा ही स्पर्श, स्वाद, गन्ध, श्रवण और देखने का कार्य करता है। पर इनके सिवाय मनुष्य में दो अन्य शक्तियाँ भी होती हैं, जिनका प्रयोग करना अभी वह नहीं सीख सका है। ये शक्तियाँ कम या अधिक मात्रा में प्रत्येक व्यक्ति में पाई जाती हैं, और कभी-कभी संयोगवश किसी में विकसित होकर प्रकट भी हो जाती हैं। चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत इन शक्तियों की ग्रन्थियों को ‘पीनियल’ और ‘पिट्युटरी’ ग्रन्थि कहा जाता है। इन्हीं दोनों के सम्मिश्रण से अन्तर दृष्टि उत्पन्न हो जाती है।
अमरीका के ड्यूक विश्व विद्यालय की प्रयोगशाला में डॉक्टर हाइन छठी इन्द्रिय के विषय में प्रयोग कर रहे हैं। इन प्रयोगों द्वारा वे यह मालूम करना चाहते हैं कि मनुष्य किस प्रकार इस शक्ति को प्राप्त कर सकता है? डॉक्टर हाइन के सिवाय अन्य अनेक वैज्ञानिक भी इस सम्बन्ध में खोज कर रहे हैं। जिस दिन इन लोगों को अपने कार्य में सफलता मिल जायगी उस दिन यन्त्र युग से बढ़कर एक आश्चर्यजनक युग का आरम्भ होगा, जिसकी अद्भुत संभावनाओं की अभी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
यद्यपि अभी पश्चिमी वैज्ञानिक इस विषय की बाहरी सीमा पर भी नहीं पहुँचे हैं, पर भारतवासियों ने इस विज्ञान की बहुत पहले खोज कर ली थी। हमारे देश में जो योग विद्या प्रचलित है, यह उसका एक बहुत छोटा अंग है। पाठको में से अनेकों ने कुण्डलिनी शक्ति का नाम सुना होगा। इसी कुण्डलिनी को जागृत करने से यह दूरदर्शन की शक्ति ही नहीं, वरन् और भी अनेक अद्भुत शक्तियाँ-जैसे परकाया प्रवेश-उत्पन्न हो जाती हैं। योग की इस शक्ति को भारतीय ही स्वीकार नहीं करते, वरन् कलकत्ता हाईकोर्ट के भूतपूर्व जज सर जान वुडरफ जैसे अंग्रेज महापुरुष भी उसका अध्ययन और मनन कर चुके हैं और उन्होंने इस सम्बन्ध में ‘सर्पेण्टाइल पावर’ नाम का बहुत बड़ा ग्रन्थ भी लिखा है जो आज भी सभ्य संसार में आदरणीय स्थान रखता है। हमारे देश के तो बहुसंख्यक व्यक्ति आज भी योगाभ्यास की कितनी ही क्रियाओं को करके लाभ उठाते रहते हैं और वे चाहें तो कुण्डलिनी योग द्वारा अपनी छठी इन्द्रिय को विकसित करके दूरदृष्टि द्वारा कुछ उपकार कर सकते हैं।
(योगी रामचारक)
हमारे देश में स्नान का प्रचार अन्य कई देशों से अधिक है। हिन्दू समाज में तो स्नान को धर्म का एक आवश्यकीय अंग ही बना दिया गया है और हर एक पूजा, पाठ, जप, अनुष्ठान तथा अन्य तमाम धार्मिक और सामाजिक क्रियाओं के पहले स्नान कर लेने का विधान है। फिर हमारा देश गर्म मौसम वाला है इसलिए हमको स्वाभाविक रूप से भी स्नान की आवश्यकता होती है।
पर खेद है कि स्नान का इतना प्रचार होते हुए भी अधिकाँश लोग स्नान ऐसे ढंग से करते हैं कि उससे कोई वास्तविक लाभ नहीं होता। जो लोग धर्म के ख्याल से स्नान करते हैं वे जल में एक या दो बार डुबकी लगा लेने या सर पर दो चार लोटा जल डाल लेने से स्नान की पूर्ति समझ लेते हैं। स्त्रियाँ तो आमतौर पर लज्जा के कारण पूरे वस्त्र पहिन कर स्नान करती हैं और अनेक बार पानी उनके वस्त्रों को ही भिगो पाता है, देह तक बहुत कम पहुँचता है। इस प्रकार हम यद्यपि स्नान का दिखावा कर लेते हैं, पर लाभ की दृष्टि से वह निरर्थक ही होता है। इससे अच्छा स्नान तो उन योरोपियन, अमरीकन आदि लोगों का होता है जो चाहे सप्ताह में एक दफे नहाएं, पर उस समय बदन की इतनी सफाई करते हैं कि मैल का चिन्ह भी शेष नहीं रह सकता। इसी प्रकार मुसलमान भी जब शुक्र के दिन हमाम में स्नान करते हैं शरीर के मैल को भली प्रकार छुड़ाते हैं। हमारे स्नान और इन स्नानों का अन्तर एक इसी बात से जाना जा सकता है कि जहाँ हमारे घर की स्त्रियाँ या भोजन बनाने वाले महाराज दो तीन मिनट से भी कम में स्नान कर लेते हैं इन दूसरे प्रकार के स्नानों में आध घण्टा या एक घण्टा से कम समय नहीं लगता।
हमको स्नान की आवश्यकता क्यों है? इसका एक लाभ शरीर के ऊपर पड़े हुए मैल का दूर करना तो प्रत्यक्ष ही दिखलाई पड़ता है। हमारे शरीर से सदैव बहुत सा मैल पसीने आदि के रूप में रोम कूपों से निकला करता है। ये छिद्र बहुत छोटे होते हैं, यहाँ तक कि एक वर्ग इंच स्थान में उसकी संख्या 3000 हजार होती हैं। जो लोग अपने शरीर को खूब साफ नहीं रखते उनके रोम कूप शरीर के भीतरी मैल को भली प्रकार नहीं निकाल सकते जिससे यह काम शरीर के अन्य अंगों, गुर्दे आदि के द्वारा होता है और शरीर में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है। हमारा चमड़ा भी बराबर बदला करता है। देह का बाहरी चर्म जिन अणुओं से बना होता है वे ज्यादा टिकाऊ नहीं होते। वे केंचुल की भाँति मृत होकर बराबर देह से छूटा करते हैं। अगर हम विधिवत् स्नान द्वारा उनको शरीर से पृथक न कर दें तो शरीर पर उनकी एक तह मैल की तरह जम जाती है। यद्यपि उनका कुछ भाग पहनने के कपड़ों की रगड़ खाकर गिर जाता है तो भी बहुत सा शेष रह जाता है, जिसे स्नान के समय हम खूब रगड़ कर अलग कर सकते हैं।
हमको दिन भर में कम से कम एक बार अवश्य भली प्रकार स्नान करना चाहिए। इसके लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल सोकर उठने के बाद होता है। भोजन के ठीक पहले या पीछे स्नान करना हानिकारक माना जाता है। शाम को स्नान करना भी अच्छी बात है। स्नान करते समय मोटे और खुरदरे कपड़े से शरीर को खूब रगड़ो जिससे मुर्दा चमड़ी छूट जायगी और रुधिर संचार में भी तेजी आयेगी। जब शरीर ठण्डा हो उस समय ठण्डे पानी से हर्गिज स्नान न करो। ठण्डे पानी से स्नान करने से पहले कुछ कसरत करके अपने शरीर को गरम कर लो तब स्नान करो।
ठण्डे पानी से स्नान करने के पश्चात् शरीर को कपड़े के बजाय हाथों से खूब मलें और तब कुछ भीगे ही शरीर से सूखे कपड़े पहिन लें। कुछ लोग समझते हैं कि इस प्रकार शरीर को न पोंछने से जाड़ा लगेगा, पर वास्तव में ऐसा करने से गरमाहट मालूम होती है और यदि उस समय थोड़ी सी हलकी कसरत कर ली जाय तो गरमाहट और भी बढ़ जाती है।
हम अपने पाठकों को शुरू में ही अत्यन्त ठण्डे पानी से स्नान करने में सावधान किये देते हैं। यदि तुम्हारे शरीर में जीवनी शक्ति की कमी हो तब तो हर्गिज ऐसा न करना चाहिए। पहले पानी उतना ही ठण्डा लो जितना प्रसन्नता से सहन कर सको। ज्यों-ज्यों शक्ति बढ़ती जाय त्यों-त्यों अधिक ठण्डे पानी से स्नान कर सकते हो। जितने दर्जे का ठण्डा जल तुमको अच्छा लगे उसको ध्यान देकर समझ लो और तब बराबर उसी का प्रयोग करो। सारांश यही है कि पानी ऐसा हो जिससे स्नान करने में प्रसन्नता जान पड़े। कष्ट सहन या प्रायश्चित की भाँति सी-सी करते हुए स्नान करना लाभदायक नहीं होता। जब एक बार आपको उसका मजा मालूम पड़ जायगा फिर आप स्वयं उसको न छोड़ेंगे। इससे आप दिन भर अच्छी तरह रहेंगे। पहले ठण्डा जल शरीर पर डालते हुए सर्दी मालूम होगी पर थोड़े ही अर्से में उसकी प्रतिक्रिया होती है और गर्माहट मालूम होने लगती है।
सबेरे ठण्डे पानी से स्नान का पूर्ण लाभ प्राप्त करने की अगर आपको अभिलाषा हो तो नीचे लिखी विधि से काम लीजिये।
पहले थोड़ी कसरत कर ली जाय जिससे शरीर में रुधिर संचार भली प्रकार होने लगे। इसके लिए सीधे जंगी स्थिति में खड़े हो, सिर ऊंचा, आँखें सामने, कन्धे पीछे और हाथ बगलों में हों। (2) शरीर को धीरे-धीरे पैरों की अंगुलियों पर उठाओ, साथ ही साथ धीरे-धीरे पूरी साँस खींचते जाओ। (3) साँस को भीतर ही कुछ क्षण तक रोके रखो और शरीर को उतने समय तक उसी स्थिति में आ जाओ और साथ ही साथ नाक द्वारा हवा को भी धीरे-धीरे निकालते जाओ। (5) जरा देर ठहर कर फिर वही व्यायाम करो।
तब ऊपर बतलाई विधि से स्नान करो। यदि आप कपड़े द्वारा स्नान चाहते हो तो एक बर्तन में शीतल जल ले लो (जो बहुत ठण्डा न हो परन्तु सुखकर और उतना ही शीतल हो जो कि प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सके)। एक मोटा कपड़ा या तौलिया लो, उसे पानी में भिगोओ, और तब उसका आधा पानी निचोड़ डालो। पहले छाती और कन्धों से शुरू करके पीठ, पेट, जाँघ, निचली टाँगें और तब पैरों को खूब रगड़ो। शरीर को सब तरफ से रगड़ने में कपड़े को कई बार पानी में डुबो-डुबो कर आधा निचोड़ लिया करो, जिससे समस्त शरीर को ताजा ठण्डा पानी मिल जाया करे। बहुत जल्दी मत करो, किन्तु शान्ति से स्नान करो।
एक साथ बहुत ठंडे पानी से स्नान आरम्भ नहीं करना चाहिये। वरन् पानी की ठण्डक का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।
चाहे शरीर को कपड़े से रगड़ कर स्नान किया जाय और चाहे टब में स्नान करो, पर शरीर को कई बार हाथों से मलना चाहिए। मनुष्य के हाथों में कुछ ऐसी शक्ति है जिसका काम कपड़े से नहीं निकल सकता। एक बार परीक्षा करके देखिए स्नान कर लेने के बाद नीचे लिखी कसरत करने से बहुत लाभ हो सकता है-
(1) सीधे खड़े हो, अपनी भुजाओं को अपने सामने सीधे फैलाओ और उन्हें कन्धों की ऊंचाई पर रखो, मुट्ठियाँ बंधी और एक दूसरे को छूती हो मुट्ठियों को जोर से झोका देकर पीछे बगलों की सीध में या उससे भी तनिक पीछे ले जाओ। इससे छाती का ऊपरी भाग फैलता है। इसे कई बार करके क्षण भर विश्राम कर लो। (2) पहली स्थिति से अन्तिम दशा में आ जाओ, अर्थात् भुजाएं बगलों की ओर कन्धों से सीधी फैली रहें, अब मुट्ठियों को एक वृत (गोलाकार) में घुमाओ। (3) सीधे खड़े हो, हाथों को सिर के ऊपर सीधे ले जाओ, हाथ खुले रहें, अंगूठे एक दूसरे को छूते रहें, तब बिना घुटने को टेढ़ा किये झुककर हाथों की उंगलियों से भूमि को छूने का प्रयत्न करो, यदि न छू सको तो भी जितना सम्भव हो जमीन से उतना पास उंगलियों को ले जाओ, फिर पहली स्थिति में आ जाओ अपने शरीर को पैरों के पंजों के ऊपर उठाओ, ऐसा कई बार करो।
यह कसरत बहुत पेचीदा नहीं है, थोड़े ही प्रयत्न से भली-भाँति होने लगेगी। यह बहुत बल बढ़ाने वाली है और सारे शरीर पर प्रभाव डालती है।
(श्री. राजेन्द्र प्रसाद नारायणसिंह)
हमारे देश में रसायन अर्थात् सोना बनाने की बहुत सी बातें सुनने में आती हैं। सौ पचास वर्ष पहले की बातों को जाने दीजिए आज भी आप तलाश करें तो आपको कोई शहर या कस्बा ऐसा न मिलेगा, जिसमें किसी व्यक्ति के बारे में यह प्रसिद्ध न हो कि वह सोना बनाना जानता है। हमारे ही एक परिचित ने ‘जड़ी-बूटी’ पर एक पुस्तक लिखी, उसमें कम से कम 4 नुस्खे सोना बना सकने के मौजूद हैं। पर साथ ही यह भी सत्य है कि आधुनिक विचारों के लोग इन सभी बातों को गप्प समझते हैं और अखबारों में प्रायः समाचार छपा करते हैं कि ‘सोना बनाने वाले’ कोई साधु महाशय किसी गृहस्थ को सोना बना देने के बजाय उसके भी दस पाँच तोला सोने को लेकर गायब हो गये। इन दोनों तरह के मतों के बीच वास्तविक बात क्या हो सकती है, इसका अनुमान पाठक नीचे लिखे लेख से लगाने की चेष्टा करें। साथ ही हम अपने पाठकों को भी चेतावनी देना चाहते हैं कि वे कभी सोना बनाने का दावा करने वाले ऐरे गैरे लोगों के चक्कर में न फंसें।
‘कीमिया’ अथवा रसायन किसको कहते हैं? सर्व साधारण की मान्यता के अनुसार यह एक ऐसी विद्या है जिसके द्वारा घटिया धातुओं को सोना या चाँदी के रूप में बदला जा सकता है। ‘कीमिया’ अरबी भाषा का शब्द है। एक समय ऐसा था कि अरब में इस विद्या का बड़ा जोर था। पर यह विद्या उनकी निजी न थी। यह उनको उन यूनानियों से मिली थी जो अलैक्जैंड्रिया से हट कर उनके देश में आ बसे थे। अरब से यह चीज पश्चिमी योरोप में पहुँची। अरब के लोगों में ऐसी धारणा थी कि यह विद्या स्वर्ग के कुछ फरिश्तों ने जान-बूझकर मनुष्यों को सिखलाई है, जिससे वे भगवान से अपने झगड़े का बदला ले सकें।
पर स्वर्ग के फरिश्तों की बात को दूर रखें तो भी इसमें सन्देह नहीं कि पूर्व काल में बहुत से मनुष्य इस विद्या को जानने का दावा करते थे और किसी के पूछने पर उसे बताने से इनकार करते थे। बहुत अधिक कोशिश करने या सेवा करने पर ही उनसे इस सम्बन्ध में कोई बात जानी जा सकती थी। हम नीचे एक आंखों देखी घटना लिखते हैं जिससे इस विषय पर कुछ प्रकाश पड़ेगा-
आज से लगभग 40 साल पहले की बात है कि मेरे पिताजी के पास एक बुड्ढा मुसलमान आया करता था। वह हकीम था और बड़े-बड़े मरीजों को सहज में अच्छा कर देता था। कुछ ही दिन पहले वह हमारे पास के एक कस्बे में आकर रहने लगा था। उसका जन्म कहाँ हुआ था, कहाँ का रहने वाला था, कहाँ रहकर पढ़ा था, इन बातों का उत्तर वह कभी नहीं देता था। अगर कोई बहुत ही आग्रह करता तो वह कुछ कहता, पर उसका कहना और भी सन्देहजनक जान पड़ता। कोई उसकी उमर पूछता तो वह एक लम्बी सूची बतलाता कि “मैं अपने जीवन के तीस वर्ष तुर्किस्तान में, चालीस वर्ष मिस्र में, पचास वर्ष तिब्बत में, साठ वर्ष चीन में, दस वर्ष बंगाल में रहा, आदि आदि।” उसके बतलाये सब वर्षों को जोड़ा जाता तो वह 300-350 वर्ष का सिद्ध होता। कुछ भी हो वह शकल से 90-100 वर्ष का तो अवश्य लगता था। लम्बा कद, शरीर पर झुर्रियाँ, देह की नसें एक दम ऊपर उभरी हुई आदि अति वृद्धावस्था की सभी निशानियाँ उसमें पाई जाती थी। उसकी पोशाक भी अजब ढंग की थी। पैरों में कामदार जूते, पेशावरी पायजामा, लम्बा सा कामदार चुगा, गले में तरह-तरह की मालायें और माथे पर विचित्र प्रकार की कामदार पगड़ी। उसकी ऐसी मिली-जुली अद्भुत पोशाक देखकर यह नहीं जाना जा सकता था कि वह किस देश का रहने वाला है। वह अनेक भाषाएं जानता था और कभी-कभी ऐसी भाषा बोलता था जो हमारी समझ में बिलकुल नहीं आती थी। दवाएं भी वह अपने हाथ से बनाता था और वे बड़ी कीमती भी होती थी। एक बार उसने हमारे यहाँ एक दवा तैयार की जिसमें कितने ही महीने लग गये और खर्च भी लगभग तीन हजार रुपये हो गये। उसकी गोलियाँ बनाई गई थी। एक दिन उन गोलियों को धूप में सुखाया गया था कि हमारा पालतु हिरन वहाँ आ गया और उसने कई गोलियाँ खा डालीं। थोड़ी देर बाद वह उनकी गर्मी से ऐसा व्याकुल हुआ कि सामने की बावड़ी में कूद कर जान दे दी। इस घटना से हम सब इतने भयभीत हो गये कि कोई उस दवा को खाने के लिए राजी न हुआ और उस पर सारा खर्च और मेहनत ऐसे ही गई।
यह हकीम कीमिया विद्या का भी बड़ा जानकार था। जब हमको इस बात का पता लगा तो उसके पीछे पड़ गये और वह भी उसका प्रमाण देने को तैयार हो गया। वह स्वयं जंगल में जाकर कितनी ही तरह की जड़ी-बूटी उखाड़ लाया। एक बड़ी भट्टी जलाकर उसके ऊपर एक बड़ी कढ़ाई रख दी गई और उसमें उन जड़ी-बूटियों का रस निकालकर डाल दिया गया, रस में एक लोहे का टुकड़ा भी छोड़ दिया। पूरे दो सप्ताह तक रात-दिन भट्टी जलाई जाती रही। पर इतनी आग लगने पर भी जड़ी-बूटियों का रस सूखा नहीं। अन्त में पन्द्रह दिन बाद वह लोहे का टुकड़ा सोने के रूप में बदल गया। हमने सुनारों को बुलाकर उसकी परीक्षा कराई और उन्होंने हर तरह से जाँच करके उसको ठीक सोना ही बतलाया।
हमने इस नुस्खे को जानने का बड़ा आग्रह किया, पर उसने बतलाया नहीं। बहुत अधिक पीछे पड़ने पर उसने चार लाइन का एक पद्य सुना दिया और कहा कि ‘मेरा समस्त नुस्खा इसी में समाया है।’ पर इन लाइनों का रहस्य उसने नहीं समझाया। वह पद्य नीचे दिया जाता है, शायद कोई पाठक उसका अर्थ निकाल सके :-
तोरस मोरस गन्धक पारा। इनहिं मार इक नाग संवारा॥ नाग मार नागिन को देय। सारा जग कंचन कर लेय॥
यह बुड्ढा दो वर्ष तक रहा। पीछे एक दिन न जाने कहाँ अदृश्य हो गया, उसका कुछ पता ही न लग सका। मैं आज भी विचार करता हूँ कि वह कौन था? क्या वह कोई फरिश्ता था या दैवी हकीम था? वह चाहे जो हो, पर एक रहस्यमय और दैवी पुरुष तो था ही।
अरबी भाषा में इस विद्या पर अनेक ग्रन्थ मिलते हैं, उनमें से कितने ही तो पेरिस के राष्ट्रीय पुस्तकालय में मौजूद हैं। लीडन विश्व विद्यालय की लाइब्रेरी में भी कितने ही ग्रन्थ मिलते हैं। इनमें से कितने ही तो मौलिक हैं और कुछ यूनानी ग्रन्थों के अनुवाद हैं। इस विषय का सबसे पहला मुसलमान लेखक ‘खालिद बिन आजिद’ था जिसकी मृत्यु सन् 708 ई. में हुई थी। वह सीरिया के मेरियानस नाम के पादरी का चेला था। अरबी भाषा की एक पुस्तक ‘किताबें अलफिहरिस्त’ में उसका जीवन-चरित्र दिया हुआ है। यूनानी ग्रन्थों का अनुवाद करने वालों में जबीर नाम का लेखक मुख्य है जो सन् 900 और 1200 के बीच कभी पैदा हुआ था। उसने कीमिया विद्या का बहुत अध्ययन किया था और कहते हैं कि वह सचमुच सोना बना सकता था।
पश्चिमी योरोप की भाषाओं में भी इन अरबी ग्रन्थों के अनुवाद हुए हैं। एड्रियस लिवेमियस (सन् 1616), तुलाबोआ सिलमियस (सन् 1614 से 1672) तथा सर आइजक न्यूटन जैसे विद्वान और वैज्ञानिक भी इन ग्रन्थों की तरफ आकर्षित हुए थे। सच पूछा जाय तो सोना बनाने के लिए तरह-तरह की वस्तुओं का परीक्षण करते-करते ही योरोप वालों ने आधुनिक रसायन शास्त्र का आरम्भिक ज्ञान प्राप्त किया था। अंग्रेजी में कीमिया विद्या को ‘आलकेमी’ कहा जाता है और उसी से रसायन शास्त्र का वर्तमान नाम ‘कैमिस्ट्री’ बना है।
भारतवर्ष में भी यह विद्या कोई नई बात नहीं है। एक जमाना था जब यहाँ इसकी खूब चर्चा थी। हमारे यहाँ विद्या अधिकाँश में साधुओं और फकीरों तक ही सीमित थी। वैसे संस्कृत के अनेक प्राचीन ग्रन्थों इसका उल्लेख मिलता है। सम्भव है इन बातों में कभी कोई वास्तविकता रही हो, पर इस समय तो संसार में इस विद्या का अस्तित्व नहीं जान पड़ता। जादूगर तो आज भी पाये जाते हैं, पर कीमियागरों-नकली अथवा ढोंगी कीमियागरों की तो बात ही करना व्यर्थ है, पर सच्चे कीमियागर कहीं दिखाई नहीं देते। अगर कहीं होंगे भी तो उनके विषय में हमको कोई ज्ञान नहीं है। शायद यही कारण हो कि आजकल सोने का भाव इतना अधिक बढ़ गया है।
मारने वाला स्वयं मर गया
एक गायत्री प्रेमी ग्राम हमीरपुर (जि.शाहजहाँपुर) से लिखते हैं- यहाँ के श्री. बालकरामजी गुप्त वैद्य गायत्री के बड़े भक्त हैं और अनेक वर्षों से उसकी उपासना करते रहते हैं। एक समय वे किसी मरीज की चिकित्सा करने गये तो मालूम हुआ कि मोती नाम का एक स्याना (ओझा) 50 रु. लेकर मरीज को अच्छा करने को कहता है। बालकरामजी ने उसके घर वालों से कहा कि इसे चिकित्सा द्वारा ही आराम हो जायेगा, तुम रुपया मत देना। जब इस बात की खबर मोती को लगी तो वह बहुत बिगड़ा और उसने बालकरामजी पर घात का प्रयोग किया। वैध जी को स्वप्न में ऐसा मालूम हुआ कि एक काला भयंकर पुरुष उन्हें मारने को आ रहा है। यह देखकर बालकराम चिल्ला उठे। इतने में एक कन्या आ गई और उसने उस भयंकर पुरुष को अपने हाथ के त्रिशूल से मार दिया। दूसरे दिन मोती बालकराम के पास आकर बार-बार क्षमा माँगने लगा कि मैंने आपका बड़ा अपराध किया, आप मुझ पर क्रोध न करें। बालकरामजी ने कह दिया कि हम तो कुछ नहीं करते। पर पन्द्रह दिन बाद ही सर्प के काटने से मोती की मृत्यु हो गई।
जहर खा लेने पर भी मृत्यु नहीं हुई
वही गायत्री प्रेमी श्रीबालकरामजी वैद्य के गायत्री संबन्धी अन्य अनुभवों के विषय में लिखते हुये कहते हैं कि वैद्यजी के गुरुदेव की मृत्यु होने पर उनको ऐसा दुख हुआ कि वे भी रात्रि के समय घर से निकल कर सरजू जी के तट पर जा बैठे। वहाँ स्नान करके गायत्री उपासना की और फिर प्राण-त्याग के उद्देश्य से जहर खा लिया। जहर के प्रभाव से वे बेहोश हो गये। उसी दशा में स्वप्न में उनको एक कन्या दिखलाई पड़ी, जो उनसे कह रही थी कि तुम घर जाओ तुम्हारी अभी मृत्यु नहीं है। कुछ देर बाद होश में आने पर वे घर चले आये।
अबोध बालक की रक्षा
श्री बाबूलाल शर्मा, राघोगढ़ (म.प्र.) से लिखते हैं-श्री के.एल. सोनी का 3 वर्ष आयु का पुत्र चि. राजेन्द्र कुमार दो मंजिल की छत से खेलते-खेलते अचानक नीचे गिर गया। पर माता की असीम कृपा से बालक को खरोंच तक नहीं आई। यह चमत्कार देखकर लोग भक्तिभाव से माता का स्मरण करने लगे।
नौकरी पर फिर बहाल कर दिये गये
श्री जगदम्बाप्रसाद जी, छीनेपुर (शाहजहाँपुर) से लिखते हैं- यहाँ के श्री जगदीशप्रसाद जी सक्सेना अपनी पटवारीगीरी की नौकरी से अलग कर दिये गये थे। अपने भाई की प्रेरणा से उन्होंने उसी समय से गायत्री जप शुरू कर दिया। तहसीलदार ने उनसे कह दिया था कि आपका नाम लिस्ट से खारिज हो चुका है। थोड़े ही दिन बाद डिप्टी साहब दौरे पर आये, उन्होंने कहा कि तुम्हारा नाम लिस्ट में है और नौकरी अवश्य मिलनी चाहिये। इस समय वे कुर्रिया में लेखपाल हैं। उन्हें अब माता पर बड़ी श्रद्धा हो गई है।
ज्वर दूर हो गया
श्री.ना.रा.वर्मा, ललितपुर (झाँसी) से लिखते हैं- स्थानीय पोस्टमास्टर श्री शिवप्रसाद गुप्ता की लड़की विमलादेवी को जोर से ज्वर चढ़ आया था और वह उससे बेचैन थी। मुझे समाचार मिलने पर मैंने गायत्री माता से प्रार्थना की और उसी से झाड़ फूँक कर दी। चार ही दिन में खतरनाक ज्वर पूर्ण रूप से जाता रहा और अब वह पूर्ण स्वस्थ है। इसके उपलक्ष्य में माता का प्रसाद वितरण किया गया।
भयंकर राजरोग (टी.बी.) से छुटकारा
श्री लक्ष्मीनारायण द्विवेदी बी.ए. (पूर्व, विज्ञानाध्यापक, बाँदा) क्षय-निवारण आश्रम, गोठिया (नैनीताल) से लिखते है-मैं विगत कई वर्षों से वेदमाता की उपासना करता आ रहा हूँ कुछ समय पहले मुझ पर यक्ष्मा जैसे भयंकर रोग का आक्रमण हुआ। मैंने चिकित्सा के लिये प्रार्थना पत्र भेजा, जिसके फलस्वरूप मुझे हिमालय के अतुलनीय रम्य प्रदेश में बिना किसी प्रकार के व्यय के स्थान प्राप्त हो गया। सैनीटोरियम में भर्ती होने पर मालूम हुआ कि मेरे दायें फेफड़े में तीन कैबिटीज और बाँये में एक बड़ी कैबिटी हो गई है, अर्थात् मेरे दोनों फेफड़े अत्यधिक खराब हो चुके हैं। मैं बिस्तरे पर पड़े-पड़े गायत्री का मानसिक जप बड़ी श्रद्धा से करने लगा। तीन ही महीने में मेरे स्वास्थ्य में बहुत सुधार हो गया और केवल बायें फेफड़े में थोड़ी सी शिकायत शेष रह गई। डॉक्टर ने जब एक्स-रे से मेरी परीक्षा की तो इतने शीघ्र आशातीत लाभ होने पर बड़ा आश्चर्य प्रकट किया और मुझे बहुत बधाई दी। बीमारी की हालत में भी मैं गायत्री जप बराबर करता रहता हूँ और मेरा विश्वास है कि पुनः पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाऊँगा।
नौकरी प्राप्त हुई
श्री. नरेन्द्र गौड बी.ए. कासगंज से लिखते हैं-नौकरी न मिलने के कारण मैं बहुत चिन्तित था परिचित-अपरिचित, सभी व्यक्तियों एवं संबन्धियों की ओर से सहायता के लिये निराश हो चुका था। असफलताओं के कारण मेरे अंतर्मन में अनेक भयानक कुविचारों ने अपना जाल फैला दिया था। भाग्य से एक दिन मुझे ‘गायत्री-ज्ञान-अंक’ प्राप्त हुआ। मैंने कुछ पुस्तकें गायत्री तपोभूमि से मंगाकर और गायत्री माता का चित्र पास में सजाकर नियमित रूप से गायत्री जप, पूजन एवं स्वाध्याय आरम्भ कर दिया। इस प्रकार 5 दिन बीत गये, छठे दिन रविवार था, अतः मैंने उपवास रखकर हवन किया। रात को एक व्यक्ति ने मुझे एक पत्र दिया जिसमें लिखा था- “तुम्हारी नौकरी एटा में लग गई है, तुम सोमवार को आ जाओ।” बात सच निकली और मुझे नौकरी मिल गई। उसी दिन से मैं और मेरी पत्नी नियमित रूप से गायत्री की पूजा करते हैं, क्योंकि वे अपने पुत्र-पुत्रियों की करुणा पुकार अवश्य सुनती हैं।
जमीन वापिस मिल गई
श्री. नारायण सिंह , चीखली (जि. बुलडाना, बरार) से लिखते हैं-मेरी जमीन 10 वर्ष से एक साहूकार के पास गिरवी रखी थी और उसके वापिस मिलने की उम्मीद नहीं थी। पर अब उसमें से तीन एकड़ बेचकर शेष मुझे वापिस मिल गई। यह एक ऐसी बात थी जिसका किसी को भरोसा न था। इसलिये मैं तो यही मानता हूँ कि वह गायत्री माता की कृपा से ही मुझे प्राप्त हुई। मैंने भी उस जमीन की रजिस्ट्री अपने बच्चे के नाम से करादी, जिससे मैं फिर उस पर कर्जा का बोझा न लाद सकूँ। मुझे आशा है कि अब मुझ पर माता की कृपा सदा बनी रहेगी।
परीक्षा में सफलता प्राप्त हुई
पं. ग्यारसीलाल मिश्र, बुचारा (जि. जयपुर) लिखते हैं- मैंने पटवार शिक्षा का फार्म भर दिया था। पर किसी कारणवश बीच में पढ़ाई छोड़ दी और मेरे साथी आगे निकल गये। इससे मेरी सफलता की कोई सम्भावना नहीं रही और मैं उदास रहने लगा। उसी समय किसी महाशय ने मुझ से कहा कि आप गायत्री का जप कर लें तो सफल हो सकते हैं। मैंने उसी समय संकल्प कर लिया और समय आने पर परीक्षा में उत्तीर्ण भी हो गया। यह सब माता की कृपा है।
मन की अभिलाषा पूर्ण हुई
श्री महेशदानजी, नागोर (मारवाद) से लिखते हैं- मुझे एल. डी. सी. बनने की बड़ी अभिलाषा थी। मैं शिक्षा विभाग के दफ्तर में काम तो एल. डी. सी. का करता था, पर वेतन मास्टरों का 66 रु. का पाता था। अचानक कलक्टर के आफिस में पाँच एल. डी. सी. की जगह खाली हुई और कुल 9 उम्मीदवारों में से केवल मैं ही अकेला चुना गया। जिस समय इन्टरव्यू हो रहा था, मैं बराबर गायत्री का मानसिक जप करता रहा। अब मेरा वेतन 66 रु. हो गया है। इसके लिए मैं जीवन भर वेदमाता का अहसान मानता रहूंगा।
गायत्री माता की कृपा
श्री शिवप्रसाद पाठक, मंत्री गायत्री परिवार शाखा खटई (म. प्रा.) से लिखते हैं- गायत्री माता की कृपा से मेरे दो मित्रों की पदोन्नति हो गई और मेरे पिताजी की नौकरी लग गई। मैं भी अपनी परीक्षा में अन्य विद्यार्थियों की अपेक्षा बहुत कम परिश्रम कर सकने पर भी अच्छे नम्बरों से पास हो गया। मेरे आत्मीय मित्र श्री काशीनाथराय भी गायत्री उपासना के फलस्वरूप परीक्षा में सफलता प्राप्त कर चुके हैं और गायत्री द्वारा धर्म प्रचार में संलग्न हैं।
कत्ल के मुकदमे में बरी
एक गायत्री भक्त, भदरी (शाहजहाँपुर) से लिखते हैं- हमारे गाँव में एक कत्ल हो गया था, जिसमें गलती से मुझको भी पकड़ लिया गया। जेल में मैं गायत्री का जप करने लगा, जिसके फल से मुकदमा पेश होने पर ज्यादातर गवाहों ने मेरे माफिक ही गवाही दी और मैं साफ छूट गया। मेरा एक मुकदमा और भी चल रहा था, उसमें भी हमको अच्छे ढंग से डिगरी मिल गई। इससे हम गायत्री माता की बड़ी श्रद्धा से उपासना करने लगे हैं।
निराशा के बादल हट गये
श्री रामबहादुर मिश्र ‘दिनेश’ ग्राम डुबकी जिनकानपुर से लिखते हैं-मैं बहुत दिनों से नौकरी के लिये परेशान था। जहाँ भी जाता था वहीं निराशा के बादल दिखलाई पड़ते थे। किन्तु जब मैंने गायत्री परिवार का सदस्य बनकर माता की शरण ली तो उसके एक मास के बाद ही मुझे नौकरी प्राप्त हो गई। इसके पश्चात् और कई नौकरियों के भी स्वीकृति पत्र आये। इस प्रकार गायत्री माता की दया दृष्टि से मेरा भाग्य पलट गया।
उधार दिया रुपया वसूल हो गया
श्री. किसनाजी व डाबाजली उचाबह (तलवाड़ा, निमाड़) से लिखते हैं- मैंने एक व्यक्ति को कुछ रुपया उधार दिया था। पर माँगने पर वह साफ इनकार कर गया कि तुम्हारा मेरे ऊपर कुछ नहीं निकलता। इससे मैं बड़ा दुखी हुआ और रात्रि में सोते समय माता से प्रार्थना की कि मेरी सहायता करो। रात्रि में मुझे स्वप्न आया कि तीन ब्राह्मण मुझ से दक्षिणा माँगते हैं, मैंने उनसे कहा कि जप करने वाले दक्षिणा नहीं लेते। दूसरे दिन प्रातःकाल वही व्यक्ति स्वयं आकर सब रुपया दे गया। यह दृश्य देखकर मैं माता की महिमा के सम्मुख नतसिर हो गया।
सर्प से रक्षा हुई
श्री रामलाल दर्यावजी प्रधान पाठक तलवाड़ा (जिला धार म. प्र.) लिखते हैं-ता. 20 फरवरी को मैं श्री प्रभाशंकरजी पाठक के यहाँ से दत्त भजन के कार्यक्रम में भाग लेकर रात के 12 बजे स्कूल वापिस आ रहा था। मेरे हाथ में लालटेन थी, पर मैं अपनी धुन में तेजी से चला आ रहा था। रास्ते में एक साँप इकट्ठा होकर पड़ा था और मैं उसे लाँघ कर आगे बढ़ गया। बाद में कुछ शंका होने से मुड़ कर देखा तो साँप चलता हुआ नजर आया, यह देखकर मैं सन्नाटे में आ गया और बार-बार गायत्री माता को धन्यवाद देने लगा।
बालक की निमोनिया के प्रकोप से रक्षा
श्री. छगनलाल माँगीलाल शर्मा, ग्राम सिनगुण (निमाड़) से लिखते हैं- इन दिनों मैं ब्रह्मास्त्र सम्बन्धी पुस्तकें व परिपत्र वितरण कर रहा था कि मेरे 4॥ मास की आयु के पुत्र को निमोनिया हो गया और क्रमशः उसकी हालत यहाँ तक बिगड़ गई कि प्राण छूटने के लक्षण स्पष्ट जान पड़ने लगे। यह देख मैंने बच्चे को गोदी में लेकर गायत्री जप करना आरम्भ किया और मेरे पास बैठे अन्य तीन उपासकों को भी माता की प्रकाशमान मूर्ति का दर्शन हुआ और उसी समय से बालक की दशा सुधर कर वह स्वस्थ हो गया।
सोलह वर्ष पहला रोग दूर हुआ
श्री महेन्द्रकुमार साहनी, कोटबाड़ा (निमाड़ म. प्र.) से लिखते हैं- “मेरी मामी करीब सोलह वर्ष से पेट की बीमारी से पीड़ित थी। मामाजी उसके जीवन की आशा छोड़ चुके थे। मैंने उन्हें हिम्मत देकर आपरेशन के लिए इन्दौर भिजवाया और स्वयं अनुष्ठान करने लगा। आपरेशन होने पर पेट से 1॥-2 सेर का गोला निकला और मामी को नव जीवन मिल गया। (2) मुझे स्वप्न में अत्यन्त सुन्दर दो रमणियाँ दिखाई पड़ा करती हैं। एक कहती है कि तो कुछ माँगना चाहो माँग लो। दूसरी कहती हैं, ये चारों वेद रखे हैं, इन्हें ले लो और आजीवन अभय रहो। कभी स्वप्न में ही संस्कृत के कुछ शब्द स्पष्ट लिखे दृष्टिगोचर होते हैं। मैं उन्हें पढ़ता हूँ और धीरे-धीरे गुनगुनाने लगता हूँ कि आँखें खुल जाती है। जप के प्रभाव से आत्मोन्नति के चिन्ह निरन्तर जान पड़ते हैं।
लंगड़ापन दूर हो गया
श्री शिवराम कौशिक, कोडागाँव (बस्तर, म. प्र.) से लिखते हैं “मेरा लंगड़ा पुत्र जो 10 वर्ष से चूतड़ घसीटते हुये चलता था, उसने जिस दिन से गायत्री साधना आरम्भ की उसके 15 दिन पश्चात् से खड़ा होकर चलने लगा। अब मुझे दृढ़ विश्वास हो गया है और मैं जन्म भर माता की शरण में रहूँगा।
बदमाशों के पंजे से बच्चे की रक्षा
डॉ. शंकरलाल गुप्ता, कुढार (एटा, उ. प्र.) से लिखते हैं कि बदमाशों ने मेरे भतीजे अशोक कुमार को, जिसकी उम्र चार साल की है, उड़ाने की बहुत कोशिश की थी। वह दिन भर उन बदमाशों के दरवाजे पर ही खेलता रहा और गाँव के बाहर स्कूल तक घूम कर चला आया, पर वे लोग उसे अपने हाथ से पकड़ नहीं सके। उन्होंने एक दूसरे लड़के से कहा कि शंकरलाल के भतीजे को पकड़कर मेरे यहाँ पहुँचा दो। उस लड़के ने आकर यह बात मुझसे कह दी। मैंने बदमाशों को बुलाकर फटकारा और धमकाया कि हम पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे। इस पर वे भाग गये। लड़के के गले में गायत्री रक्षा कवच बंधा हुआ था, अतः जगत जननी की कृपा से उसका बाल बाँका नहीं हुआ। इसी प्रकार इस लड़के और इसकी बहिन के बहुत भयंकर चेचक निकली थी। इन दिनों मैं सवा लाख का अनुष्ठान कर रहा था और इसी जप के जल के छींटे दोनों बच्चों को लगा दिए और वही जल पिलाया। बच्चे तीन दिन में बिलकुल निरोग हो गये।”
काले नाग से जान बची
श्री ब्रजमोहन ‘निम्बार्क’, आवर (झालावाड़, राजस्थान) से लिखते हैं- “हाल ही की बात है कि मेरी पत्नी शौच के लिए नदी की तरफ गई थी। हमेशा की तरह जैसे ही वह एक झाड़ियों के झुरमुट में जाने लगी कि पास ही एक विशाल सर्प दिखलाई पड़ा। उसकी भयंकर आकृति को देखते ही मेरी पत्नी के होश उड़ गये और भय के मारे वह जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई। दो चार मिनट बाद सर्प अपने आप दूसरी ओर चला गया। कई आदमियों ने पत्नी से कहा कि यह तुम्हारी नई जिन्दगी हैं। मेरा विश्वास हैं कि उसकी प्राण रक्षा वेदमाता की कृपा से ही हो सकी।”
पत्नी को बीमारी से छुटकारा मिला
श्री वृहस्पतिलाल कौशिक, कोडागाँव (बस्तर) से लिखते हैं ‘मेरी पत्नी एक आकस्मिक रोग से पीड़ित रहा करती थी और इस कारण बड़ी दुखी थी। जब से उसने गायत्री की दस माला प्रतिदिन जपना आरम्भ किया हैं। तब से उसकी बीमारी सर्वथा जाती रही। अब माता की कृपा से मेरे घर में सब प्रकार से आनन्द है।”
(श्री. शम्भूसिंह हाड़ा, कोटा)
संस्कार विहीन मनुष्य प्राणी एक प्रकार का पशु ही है। जहाँ मनुष्य को सुसंस्कृत बनाने की कोई व्यवस्था नहीं, उन वन्य प्रदेशों के निवासी देह से मनुष्य होते हुए भी गुण, कर्म और स्वभाव की दृष्टि से पशु ही होते हैं। इस पशु मनोभूमि को समुन्नत करने, मानवी एवं दैवी भूमिका में परिणित करने का कार्यक्रम, उपचार आध्यात्मिक भाषा में ‘संस्कार’ कहलाता है। भारतीय धर्म में संस्कारों का बड़ा महत्व है। 16 संस्कारों के द्वारा भारतीय तत्व वेत्ताओं ने साधारण मानव प्राणियों को महान पुरुष बनाने का चिरकाल से सफल प्रयत्न किया है।
नाम-करण, जात-कर्म, चूड़ा, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारों में यज्ञोपवीत संस्कार का महत्व सबसे अधिक है क्योंकि इसके द्वारा मनुष्य की मनोभूमि एवं विचारधारा का परिवर्तन होता है। यज्ञोपवीत धारी ‘द्विज’ कहलाते हैं। द्विज वे हैं जिनका जन्म दो बार हो। एक साँसारिक जन्म माता-पिता के रजवीर्य से होता है, जिसकी व्यवस्था ‘दाई’ कराती है। दूसरा आध्यात्मिक जन्म गायत्री माता और यज्ञ पिता के द्वारा होता है, जिसकी उपचार व्यवस्था आचार्य करते हैं।
यज्ञोपवीत यों देखने में एक सूत का धागा मात्र है और उसे मल-मूत्र त्याग के समय कान पर चढ़ा कर यह मान लिया जाता है कि यज्ञोपवीत के नियम की पूर्ति हो गई। कई लोग चौके में बैठे रोटी खाने या कुछ और ऐसे ही विषयों के साथ सम्बन्ध जोड़ लेते हैं, पर वास्तविकता यह है कि जनेऊ के प्रत्येक धागे के साथ अत्यन्त ही महत्वपूर्ण शिक्षाओं और जिम्मेदारियों का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है जिनका स्मरण रखने से मनुष्य सहज ही सन्मार्गगामी बन सकता है और सच्ची सुख शान्ति का अधिकारी बन सकता है।
जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ देने की एक महान प्रक्रिया उपनयन है। इस संस्कार के समय वेद के बड़े ही शक्तिशाली मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। जो कर्मकाण्ड एवं संस्कार विधान उस अवसर पर प्रयुक्त होते हैं उनका एक रहस्य पूर्ण वैज्ञानिक रहस्य है। उस रहस्यपूर्ण प्रक्रिया का असर यज्ञोपवीत धारण करने वाले की मनोभूमि पर पड़ता है जिससे उसके स्वभाव और गुणों के सुधार में ही नहीं, मानसिक शक्तियों के विकास में भी बड़ी सहायता मिलती है। यज्ञोपवीत के समय ही वेदारंभ एवं गुरुदीक्षा का कार्य सम्पन्न होता है जिसमें आचार्य अपने निजी तप, पुण्य, प्राण एवं आत्मबल का एक बड़ा भाग शिष्य की आत्मा गुह्यस्थल में प्रतिष्ठापित करता है। और यही चिंगारी आगे बढ़कर शिष्य के जीवन में ओत-प्रोत हो जाती है।
उपनिषदों में शिष्य की मनोभूमि को क्षेत्र और गुरु के शक्ति प्रयास को बीज बताया गया है। यज्ञोपवीत संस्कार का कर्मकाण्ड एक प्रकार से खेत को भली प्रकार जोत बोकर उसमें छंटा हुआ बढ़िया बीज बोने के समान है। यह आध्यात्मिक बीजारोपण होने के बाद जब शिष्य के संस्कारों की खेती बढ़िया फसल के रूप में पकती है तो उसकी मोहक सुगंधि एवं मधुर मिठास से अन्तरात्मा का रोम-रोम खिल पड़ता है। यदि शिष्य श्रद्धावान और गुरु प्राणवान हो और विधिवत् उपनयन संस्कार किया जाय यों यह तीनों प्रक्रियाएं मिलने का परिणाम वैसा ही होता है जैसा (1) उपजाऊ खेत (2) बढ़िया बीज और (3) आवश्यक खाद पानी प्राप्त होने पर बढ़िया फसल प्राप्त होने का होता है।
गायत्री उपासना में उत्कीलन और शाप मोचन का जो उल्लेख मिलता है उसमें गुरुदीक्षा की आवश्यकता का प्रतिपादन है और कहा गया है कि यदि अधिकारी गुरु द्वारा दीक्षा प्राप्त हो जावे तो साधना सफल होने में कोई सन्देह नहीं रहता। प्राचीन काल में यज्ञोपवीत संस्कार कराने और गुरुदीक्षा देने के लिए अधिकारी आचार्य बड़ी खोज के साथ ढूँढ़े जाते थे। आज तो कोई भी अधिकारी-अनाधिकारी, योग्य-अयोग्य पंडित यज्ञोपवीत संस्कार जैसे उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य को कराने का दुस्साहस कर बैठते हैं, और इस जीवन परिवर्तन करने जैसी महान प्रक्रिया को एक खिलवाड़ जैसा बना देते हैं। देखा जाता है कि यज्ञोपवीत संस्कार या गुरु दीक्षा करने वाले पंडितों को दान-दक्षिणा खूब मिल जाती है और उधर जिनके बच्चे का संस्कार हुआ हैं उनका खर्च भी बहुत पड़ जाता है। इतना होने पर भी जिसने यज्ञोपवीत धारण किया उसके जीवन में कोई परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होता। यदि आवश्यक परिणाम न हो तो यह संस्कार कराना एक प्रकार से चिन्ह पूजा मात्र ही कहा जा सकता है।
यज्ञोपवीत संस्कार यज्ञ के द्वारा ही होता है उपवीत को, जनेऊ को यज्ञ के द्वारा पवित्र एवं संस्कारित किये जाने के कारण ही उसका नाम यज्ञोपवीत पड़ा है। यज्ञोपवीत धारण के समय जितने बड़े यज्ञ का प्रयोजन होता है उतनी ही उसकी महत्ता एवं सत्परिणाम की संभावना बढ़ जाती है। आजकल जनेऊ कराते समय पंडित लोग अपनी दान-दक्षिणा का यज्ञोपवीत धारण करने वाले से भिक्षा मंगवाना जैसे लाभदायक कर्मकाण्डों का तो पूरा ध्यान रख कर देते हैं। जिस प्रकार बहुत थोड़ी अग्नि में पकाया हुआ मिट्टी का बर्तन कच्चा रह जाता है, उसी प्रकार नाम मात्र के यज्ञ के साथ कराया हुआ यज्ञोपवीत भी कच्चा ही माना जाता है। यज्ञोपवीत संस्कार का जो सत्परिणाम शास्त्रों में लिखा हुआ है, यदि उसके प्रत्यक्ष देखना हो तो उपनयन के साथ बड़े यज्ञ की व्यवस्था करना आवश्यक है।
वर्तमान परिस्थितियों में एक तो जनेऊ पहनने जैसे धार्मिक कार्यों की ओर जनता की वैसे भी अभिरुचि नहीं है, इस पर भी यदि आवश्यक सत्परिणाम प्राप्त करने के लिये बड़े यज्ञों की खर्चीली व्यवस्था भी करनी पड़े तो स्वभावतः जनेऊ पहनने वालों का उत्साह ठण्डा पड़ जायेगा। इसलिये गायत्री संस्था द्वारा यह प्रयत्न किया जाता है कि जहाँ भी सामूहिक यज्ञ हो वहाँ यज्ञोपवीत धारण करने की इच्छा करने वालों के संस्कार कराये जायं। हर छोटे-बड़े यज्ञ में अनेकों व्यक्ति यज्ञोपवीत धारणा करते एवं गुरु-दीक्षा लेते हैं। किसी से भी कोई बाधित दान-दक्षिणा या अमुक सामान लाने की शर्त नहीं रहती। यज्ञ के लिये कोई कुछ उस समय देना चाहे तो उसे रोका भी नहीं जाता। यह सरल, बिना खर्च का एवं शक्ति संपन्न विधान सबके लिये सुविधाजनक एवं उत्साहवर्धक है। सहस्रों नर-नारी हर वर्ष गायत्री यज्ञों में इस व्यवस्था से लाभ उठाते रहते हैं।
इस वर्ष इस युग का महानतम गायत्री यज्ञ गायत्री तपोभूमि में हो रहा है। उससे बड़ी प्रचण्ड आध्यात्मिक शक्ति का उद्भव होगा। उस समय यज्ञोपवीत संस्कार कराने एवं गुरु-दीक्षा लेने का भी सुवर्ण सुअवसर रहेगा। जिनके यज्ञोपवीत अभी बिलकुल ही नहीं हुये हैं या तो विधिवत् नहीं हुए हैं, इनके लिये यह यज्ञ एक ऐसा अवसर है जैसा पुनः किसी को मिल सकना कठिन है। गुरु दीक्षा के नाम पर आजकल अनेक पण्डित देव मंत्र की शिक्षा साधना बताते हैं। पर वस्तुतः सच्चा गुरु-मंत्र यह गायत्री-महामन्त्र ही है। अन्य मंत्रों की गुरुदीक्षा लेने पर भी गायत्री-मंत्र की विधिवत् दुबारा भी गुरुदीक्षा ली जा सकती है। दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाये थे, इसी प्रकार एक व्यक्ति कई मंत्र प्राप्त करने के लिये कई बार गुरुदीक्षा ले सकता है और उन सब मंत्रों की साधना उसी प्रकार करता रह सकता है जिस प्रकार एक विद्यार्थी अनेक विषयों को पढ़ने के लिये पृथक-पृथक अध्यापकों की सहायता लेता है और उन सभी अध्यापकों को अपना गुरु मानता है।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति के अवसर पर गायत्री परिवार के सदस्यों को उनके घर वालों को यज्ञोपवीत एवं गुरु-दीक्षा प्राप्त करने का लाभ प्राप्त करना चाहिये। इतने विशाल यज्ञ से उत्पन्न शक्ति का एक महत्वपूर्ण भाग अपनी अन्तरात्मा में धारण करने का यह एक बड़ा ही सरल एवं प्रभावशाली उपाय है। हम लोगों का सौभाग्य ही है कि यह संस्कार कराने के लिये इस युग के महान तपस्वी श्री आचार्यजी मौजूद हैं। उनके रहते, उनकी प्राण शक्ति एवं तपस्या की चिंगारी हम या हमारे स्वजन-संबंधी प्राप्त न कर सके तो इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिये।
महायज्ञ का यह आध्यात्मिक प्रसाद अधिकाधिक लोग उठा सकें उसके लिये हम सबको पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिये। गायत्री परिवार की हर शाखा दूसरी शाखाओं से होड़ लगावे कि देखें किसके यहाँ से अधिक व्यक्ति दीक्षित होने, उपवीत धारण करने, द्विज बनने को तैयार होते हैं। जो शाखायें इस दिशा में अधिक उत्साह प्रदर्शित करें, अधिक सफलता प्राप्त करें उनके लिये मेरा सुझाव है उन्हें गायत्री संस्था विशेष सम्मान महायज्ञ के अवसर पर प्रदान करे। लोग अपने प्रदेश में, अपने गाँव में, अपनी जाति में इस बात की कोशिश करे कि उनका क्षेत्र इस लाभ से अधिक लाभान्वित हो। संस्था के संगठन एवं गायत्री प्रचार की दृष्टि से भी यह प्रयत्न महत्वपूर्ण है क्योंकि दीक्षित व्यक्तियों से संस्था के कार्यक्रमों में सम्मिलित होते रहने, सहयोग देते रहने और सहानुभूति रखने की आशा की जा सकती है। जिस क्षेत्र में इस प्रकार के सहयोगी जितने अधिक होंगे उस क्षेत्र में धर्म-योजनाओं को पल्लवित करने में उतनी ही संभावना अधिक रहेगी।
गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा से तथा सभी परिजनों से मेरी विशेष रूप से प्रार्थना है कि महायज्ञ को सफल बनाने की अन्यान्य तैयारियों के साथ-साथ यह भी प्रयत्न करें कि उस पुनीत अवसर पर अधिकाधिक लोग उपनयन एवं गुरु-दीक्षा के लिये तैयार होकर आ आएं।
इनकी स्थापना और सदुपयोग की ओर ध्यान दिया जाय।
(श्रीराम शर्मा आचार्य)
भारतीय धर्म की मान्यताओं के अनुसार देव मंदिरों की स्थापना को एक बहुत बड़ा पुण्य माना गया है। कारण यह है कि देव मंदिरों में प्रवेश करने से ही नहीं, उनके दर्शन मात्र से आस्तिक मस्तिष्कों में धर्म भावना का विकास होता है। जिन लोगों के जीवन में नियमित पूजा-उपासना का स्थान नहीं है, वे भी देव-मंदिर में जाने का अवसर आने पर भगवान का स्मरण करते हैं, उन्हें मस्तक झुकाते हैं, इस प्रकार इस बहाने उन्हें उपासना का थोड़ा बहुत अवसर मिलता है।
साधारण जनता का आकर्षण सदा दृश्य वस्तुओं पर केन्द्रित रहता है। बुद्धिजीवी और सुविकसित दार्शनिक अभिरुचि के व्यक्ति बहुत थोड़े होते हैं। प्रबुद्ध मानस की जनता निराकार उपासना से ध्यान, मनन, चिन्तन से काम चला सकती है, पर जिनकी वह भूमिका जागृत नहीं है, उस कोटि-कोटि जन समूह के लिये दृश्य आकर्षण युक्त देव-मंदिरों की आवश्यकता रहती है। लोग उन देवस्थानों की शोभा, विशालता, विचित्रता, विशेषता तथा समय-समय पर होते रहने वाले उत्सव आयोजनों को देखने कौतूहलवश जाते हैं, पर अन्ततः धर्म-बुद्धि के विकास का, भगवत् स्मरण का न्यूनाधिक अवसर वहाँ मिल ही जाता है।
आज देव मंदिर कुछ पंडे पुजारियों का पेट पालने मात्र के माध्यम रह गये हैं, पर प्राचीन काल में धर्म-प्रचार एवं सामाजिक संगठन के महत्वपूर्ण केन्द्र थे। जो पुरोहित पुजारी वहाँ रहते थे, उनके भोजन निर्वाह की व्यवस्था भगवान का भोग लगने के नाम पर जनता कर देती थी और वे उपार्जन की चिंता से निवृत्त होकर अपना सारा समय जनता की धर्म बुद्धि जागृत रखने में लगाते थे। लोगों के परस्पर मिलते-जुलते रहने और विद्यालय, चिकित्सालय, व्यायामशाला, सत्संग, पुस्तकालय, न्याय व्यवस्था आदि अनेकों सत्प्रवृत्तियों का वहाँ से संचालन होता था। परिव्राजक संत-महात्मा, धर्म प्रचारक इन देवस्थानों में आश्रय पाते थे और गाँव-गाँव पाये जाने वाले इन मंदिरों में रहने वाले भोजन, ठहरने आदि की व्यवस्था के द्वारा अपना धर्म प्रचार भ्रमण बड़ी आसानी से जारी रखते थे। मंदिरों में अन्न क्षेत्र खुले रहने का यही कारण था।
मंदिरों को आध्यात्मिक एवं धार्मिक सत्प्रवृत्तियों का, नैतिकता एवं भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के केन्द्र बनाया जाना चाहिये। इतनी विशाल इमारतों में अनेक लोकोपयोगी प्रवृत्तियों का संचालन बड़ी आसानी से हो सकता है। भगवान का भोग जो वहाँ लगता है, उससे कई लोक सेवी अपना निर्वाह करके सारा समय रचनात्मक कार्यों में लगा सकते हैं और समाज को सुसंगठित करके प्राचीन काल के ऋषि युग का दृश्य उपस्थित कर सकते हैं। बड़ी-बड़ी जायदादें जो मंदिरों से लगी हुई हैं या जो दैनिक चढ़ावा वहाँ आता है, उस प्रचुर धन का उपयोग यदि मुरझाये हुए हिन्दु धर्म को सींचने में किया जाने लगे तो वह पुनः हरा-भरा हो सकता है, सुगन्धित पुष्पों और मधुर फलों से लद सकता है, उसकी छाया में भारत ही नहीं सारा संसार सुख शाँति प्राप्त कर सकता है। नव-जागरण और पुनर्निर्माण के इस युग में हमें अपने महत्वपूर्ण प्रेरणा केन्द्र देवालयों की ओर समुचित ध्यान देना होगा। उपेक्षा करने से तो यह धर्म शक्ति व्यर्थ ही नहीं जायेगी, अनैतिक और दुष्प्रवृत्तियों का केन्द्र भी बनती चली जायेगी।
देव मन्दिरों की महान उपयोगिता का सदुपयोग करना जितना आवश्यक है उतना ही कठिन भी है, क्योंकि जिन लोगों के व्यक्तिगत आर्थिक स्वार्थ उन सम्पत्तियों तथा आमदनियों से जुड़े हुए हैं वे यह बात सहज ही स्वीकार न करेंगे कि वे अब तक जो मनमानी सुविधा, प्रतिष्ठा एवं आर्थिक लाभ उठाते रहे हैं उसमें किसी प्रकार का घाटा पड़े, मन्दिरों के निर्माता एवं संचालक भी अधिकतर ऐसे ही मिलते हैं जो सेवा एवं लोकहित का महत्व नहीं समझते और देखते हैं कि पुजारीजी को बदला या नाराज किया या अब तक की परम्पराओं में कोई हेर-फेर किया तो देवता उनसे नाराज हो जायेंगे, ऐसी दशा में कार्य काफी जटिल हो जाता है। कानूनी दावपेंच भी इन्हीं लोगों के पक्ष में पड़ते हैं जो मन्दिरों के स्थान तथा धन को अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग करते रहे हैं।
इस दिशा में पहला कदम उठाना होगा कि जन साधारण को देव मन्दिरों के सदुपयोग की बात समझाई जाय। जब तक यह उपयोगिता समझ में न आ जाय तब तक सत्ताधिकारियों का स्वामित्व जमाये हुए लोगों की कुछ हेर-फेर करने के लिए तैयार करना कठिन हैं। जनता का विवेक सर्वथा एवं सर्वदा अन्धविश्वास पर ही आधारित नहीं रहता। यदि समझदारी की बात ढंग से लोगों को लगातार समझाई जाती रहे तो वह वस्तु स्थिति को देर सवेर में समझ भी सकती है।
दूसरा कार्य जो करना है वह यह है कि आदर्श देवालय स्थापित किये जायं। जिनके कार्यकर्त्ताओं और कार्यक्रमों को देखकर हर कोई यह अनुभव करे कि देवस्थानों का वास्तविक आदर्श यही होना चाहिए और इसी प्रक्रिया का सर्वत्र अनुकरण किया जाना चाहिए। एक आदर्श नमूना उपस्थित करा देने से लोग उसकी सार्थकता और उपयोगिता से प्रभावित होते हैं। गायत्री तपोभूमि का निर्माण इसी आधार पर हुआ है। यहाँ गायत्री माता की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा मानवता, पवित्रता, सात्विकता, आस्तिकता, सद्बुद्धि, सेवा, श्रद्धा आदि दैवी सत्प्रवृत्तियों के प्रतिनिधि के रूप में किया गया है। नारी की श्रेष्ठता, मातृभाव की महानता एवं सत्प्रेरणा के रूप में ईश्वर की झाँकी करने के लिए गायत्री माता का प्रतीक सर्वोत्तम है। अन्यान्य देवताओं के गुण, स्वभाव, कार्य एवं चरित्रों के सम्बन्ध में पुराणों में काफी घोटाला मिलता है और उससे साधारण बुद्धि के साधकों में अश्रद्धा भी बढ़ती है। ऐसी परिस्थितियों में मानवी चरित्र दुर्बलता के इतिहास से सर्वथा रहित गायत्री माता की प्रतिमा को सर्वथा निर्दोष एवं साम्प्रदायिक प्रतिद्वंद्विता से रहित एक परम पवित्र माध्यम माना जा सकता है।
गायत्री तपोभूमि में देव प्रतिमा पर बहुत थोड़ा खर्च होता है। सारी इमारत एवं उपलब्ध एक-एक पाई का उपयोग सार्वजनिक धर्म सेवा के लिए होता है। पूजा उपासना के नियत समय के अतिरिक्त यहाँ के निवासियों का पूरा समय जनहित के, धर्म सेवा के कार्यों में लगता है। अनेकों सत्प्रवृत्तियों का संचालन यहाँ से होता रहता है। जो एक बार इस मन्दिर को ध्यानपूर्वक देख लेता है उसे मन्दिरों की उपयोगिता समझने में देर नहीं लगती और वह सोचने को विवश होता हैं कि- “काश, ऐसे ही प्रेरणाप्रद अन्य मन्दिर भी होते।”
गायत्री तपोभूमि के आदर्शों के आधार पर छोटे-बड़े गायत्री मन्दिर जगह-जगह स्थापित होने चाहिए। गरीब लोग भी थोड़े थोड़े पैसे इकट्ठे करके, श्रमदान करके, कच्चे पक्के मन्दिर बना सकते हैं। जहाँ मूर्तियों की सुविधा नहीं वहाँ बड़े चित्र सुन्दर चौंकी पर सुसज्जित रीति से स्थापित कर लिए जाएं। सच पूछा जाय तो मूर्तियों की अपेक्षा चित्र स्थापना अधिक सुविधाजनक है क्योंकि उनमें नियमित भोग, प्रसाद एवं पूजा अर्चा का कठिन प्रतिबन्ध नहीं हैं। जहाँ सम्भव हो वहाँ अखण्ड-ज्योति भी स्थापित करनी चाहिए और नित्य अग्निहोत्र का प्रबन्ध करना चाहिए। ऐसे मन्दिरों से धर्म सेवा की, समाज सेवा की अनेकों सत्प्रवृत्तियाँ संचालित की जा सकती हैं। जहाँ नया मन्दिर बनाना सम्भव न हो वहाँ एक कमरा माँगकर या किराये पर लेकर गायत्री मन्दिर के रूप में सुसज्जित किया जा सकता है।
स्मरण रहे यह गायत्री मन्दिर ऐसे स्थान पर स्थापित किये जायं, जहाँ जनता का आवागमन अधिक संख्या में एवं अधिक सरलता से हो सके। नगर से दूर कहीं जंगल बगीचे में ऐसे मन्दिर बनाना बेकार है। जमीन सस्ती या मुफ्त में मिलने के लोभ में कई बार गाँव से दूर ऐसे स्थान बना लिए जाते हैं तो पीछे उनकी रखवाली भी नहीं हो पाती, चोर सामान उठा ले जाते हैं, आलसी जनता वहाँ पहुँच नहीं पाती, स्त्रियाँ दूर जाने में संकोच करती हैं। ऐसी दशा में वह प्रयत्न बेकार चला जाता है। मन्दिर भले ही माँगे या किराये के कमरे में हों पर होना ऐसे स्थान पर चाहिए जहाँ सबकी निगाह पड़े और जनता को वहाँ पहुँचने में सुविधा हो। ऐसे मन्दिर का एक छोटा नमूना अखण्ड ज्योति प्रेस में स्थापित उपासना गृह देखा जा सकता है। नया मन्दिर बनाने में भी श्रमदान से, मामूली कच्चे मन्दिर बनाये जा सकते हैं जो कम खर्च में बन जाएं। बहुत बड़ी, अत्यन्त विशाल काय इमारत बनाने की अब जरूरत नहीं, वह धन तो धर्म जागृति के कार्यों में व्यय किया जाना चाहिए। धनीमानी लोग अपने पैसे का सदुपयोग इस प्रकार के मन्दिरों की स्थापना में करें तो कम खर्च में अधिक कीर्ति और अधिक पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। गायत्री परिवार की हर शाखा को यह प्रयत्न करना चाहिये कि उसका एक गायत्री मन्दिर भी अवश्य हो।
समाजिक जीवन में आध्यात्मिकता एवं धर्म भावना को प्रवेश कराने के लिये जिस प्रकार सार्वजनिक देव मन्दिरों की आवश्यकता है उसी प्रकार पारिवारिक जीवन में सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों को सुरक्षित रखने तथा बढ़ाने के लिये पारिवारिक देव मन्दिरों की आवश्यकता होती है। भारतीय संस्कृति से प्रेम रखने वाले सद्गृहस्थों के घरों में अभी भी जहाँ-तहाँ छोटी देव पूजा की स्थापना दिखाई देती है। जिन घरों में नियमित पूजा, उपासना होती है, इसके लिये नियत कक्ष बने होते हैं वहाँ अपेक्षाकृत बुराइयां घटती और अच्छाइयाँ बढ़ती जाती हैं। पाप, द्वेष, दुराचार, रोना शोक, दुख दारिद्रय घटते हैं और श्री, समृद्धि, उन्नति, सफलता एवं प्रसन्नता के कारण बढ़ते हैं। उपासना से उत्पन्न होने वाले शक्ति कम्पनों से ऐसा परिणाम होना सहज एवं स्वाभाविक है।
पारिवारिक देव-मन्दिरों की नितान्त आवश्यकता है। यह तो हिन्दू परिवार में होने ही चाहिएं। गायत्री उपासक कहलाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के घर में तो ऐसे देवालय अवश्य ही रहें। जिन घरों की एक स्वच्छ, हवादार कोठरी गायत्री मन्दिर स्थापना के लिए स्वतन्त्र रूप से मिल सके वहाँ उसे बहुत ही नयनाभिराम ढंग से बनाकर उपासना गृह बनाना चाहिए। दीवारों पर आदर्श वाक्य एवं महापुरुषों के चित्र लगे हों। चौकी पर गायत्री माता एवं यज्ञ पिता के चित्र शरीर में मढ़े हुये रखे हों। स्थापना की चौकी, पीले वस्त्र से ढकी हो, उस पर पूजा उपकरण शंख, पंच पात्र, आरती, धूपदानी, गंगाजली आदि सजी हुई हों। कुशाओं के आसन बिछे हों। घर के सभी लोग एक साथ या बारी-बारी अपनी उपासना किया करें। प्रातः सायं दोनों समय आरती हुआ करे, जहाँ अलग स्वतन्त्र कोठरी की व्यवस्था न हो वहाँ ऐसे कमरे की अलमारी में या कोने में उपासना चौकी स्थापित करनी चाहिये जिनमें बहुत सामान न भरा हुआ हो और जहाँ अधिक आवागमन या कोलाहल न होता हो।
उपासना गृहों में स्वाध्याय की व्यवस्था अनिवार्य हैं। गायत्री सद्बुद्धि की देवी हैं। सद्बुद्धि का प्रधान मार्ग स्वाध्याय है। जप, ध्यान, पूजा, वन्दन के अतिरिक्त हर धर्म प्रेमी को नियमित रूप से स्वाध्याय भी करना चाहिये। बुद्धि की देवी केवल रोली, अक्षत, धूप, दीप से प्रसन्न नहीं हो सकती, उसे प्रसन्न करने के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। इसलिये प्रत्येक उपासना गृह के साथ सत्साहित्य की एक अलमारी या सन्दूक भी अवश्य रखनी चाहिए। स्वाध्याय के लिये विचारोत्तेजक एवं जीवन की, समाज की गुत्थियों पर प्रकाश डालने वाला साहित्य होना चाहिये। बुद्धि विकास के लिये यह व्यवस्था आवश्यक है। अमुक महापुरुष, अवतार या देवता के चरित्रों को रोज-रोज पढ़ते रहना ही आजकल स्वाध्याय माना जाता है, पर वस्तुतः सच्चा स्वाध्याय वही माना जायगा जो हमारी व्यक्तिगत एवं सामूहिक गुत्थियों के सुलझाने में सहायक हो सके। इस कसौटी पर खरी उतरने वाली चुनी हुई पुस्तकें ही इन ज्ञान मन्दिरों में रहें, जिनसे बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष सभी उन्नति एवं कठिनाई निवारण में व्यावहारिक सफलता प्राप्त कर सकें।
साधारणतः सभी गायत्री उपासकों को और विशेषतया ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के होता, यजमानों का संकल्प लेने वालों को अपने घरों पर गायत्री ज्ञान मन्दिर की स्थापना करनी है। गायत्री पुस्तकालय और ब्रह्म विद्यालय चलाने हैं। ज्ञान मन्दिर साहित्य की आर्ट पेपर तिरंगे कवर एवं 26 पौण्ड बढ़िया ग्लेज कागज पर छपी हुई सर्वांग सुन्दर चार-चार आना मूल्य की 52 पुस्तकें छप गई हैं तथा ज्ञान मन्दिर की दीवारों पर लगाने के लिये एक-एक आना मूल्य के 16 कार्ड बोर्ड पर छपे आदर्श वाक्य भी तैयार हो गये हैं। इन्हें शीघ्र ही मंगा कर उपासना गृह को सुव्यवस्थित करके अपना ज्ञान मन्दिर स्थापित कर लेना चाहिए। गायत्री जयन्ती जेष्ठ सुदी 10 तक यह कार्य सभी सदस्य पूरा कर लेंगे ऐसी आशा है। 13 रु. की पुस्तक 1 रु. के वाक्य यह 14 रु. का देव मन्दिर किसी सद्गृहस्थ को भार रूप न होना चाहिये। इसके द्वारा उत्पन्न होने वाले सत्परिणाम और प्राप्त होने वाले पुण्य की तुलना में यह खर्च ऐसा नहीं जिसे बहुत भारी माना जाय। जहाँ यह कठिन दिखाई पड़े वहाँ कई व्यक्ति मिलकर एक ज्ञान मन्दिर की स्थापना कर सकते हैं।
ज्ञान मन्दिर संस्थापकों का कर्तव्य है कि इस साहित्य को अपने परिचित लोगों को पढ़ाने के लिए प्रेरणा करना आरम्भ कर दें। उनके घर जाकर यह साहित्य देने और वापिस लाने का कष्ट उठावें। इस बहाने लोगों से संपर्क स्थापित करने का और उन्हें अपने विचारों का बनाने का अवसर मिलेगा। यह धर्म फेरी का श्रमदान ही ‘ब्रह्म विद्यालय’ का संचालन है।
प्रयत्न यह करना चाहिए कि कम से कम 10 व्यक्तियों को यह साहित्य ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान पूर्णाहुति तक पढ़वा दिया जाय। इतना कार्य कर लेने वाले और इस ज्ञान प्रसार सेवा प्रक्रिया को आगे भी जारी रखने का व्रत लेने वाले गायत्री परिवार में ‘धर्म प्रचारक’ उपाध्याय गिने जावेंगे। इन उपाध्यायों को पूर्णाहुति के अवसर पर लाखों जन समूह के सामने उनके सत्प्रयत्न की प्रशंसा एवं प्रतिज्ञा का प्रदर्शन करते हुए ‘उपाध्याय’ की उपाधि से विभूषित किया जायेगा।
जहाँ हजारों रुपये की लागत से बड़े-बड़े मंदिर बनते हैं, वहाँ इस थोड़ी सी लागत से बनने वाले यह छोटे ज्ञान मन्दिर देखने में मामूली से प्रतीत होंगे पर निश्चय ही इनके द्वारा कार्य इतना बड़ा होगा, जितना अनेकों मन्दिर नहीं कर पाते। घर में पूजा उपासना होती रहे इतना ही नहीं, वरन् अपने समीपवर्ती क्षेत्र में यह ज्ञान मन्दिर सद्बुद्धि का प्रकाश भी करते रहेंगे और इन्हीं के आधार पर लाखों करोड़ों जनता को सद्विचारों की, सत्कार्यों की, सत्मार्ग की, आत्म कल्याण की, नैतिकता एवं मानवता की एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान की शिक्षा दे सकना संभव होगा। यह बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक क्रान्ति का महान् आयोजन है। ज्ञान-मंदिर योजना के अंतर्गत हजारों उपाध्याय जब अपने-अपने विद्यालयों को चलाने के लिए समय दान करने लगेंगे तो कोटि-कोटि भारतीयों को धर्म भावनाओं से प्रगति करके प्राचीन काल जैसे गौरवपूर्ण शुभ युग की प्रतिष्ठापना का स्वप्न अवश्य ही सार्थक हो सकेगा।
इन ज्ञान-मन्दिरों और ब्रह्म विद्यालयों की शृंखला आगे भी बराबर चलती रहे, इसके लिए मासिक बजट 2 रु. रखा जा सकता है। जिस प्रकार इस वर्ष 52 पुस्तकें 52 सप्ताहों के हिसाब से 13 रु. मूल्य की छापी गई हैं, उसी प्रकार मानव-जीवन की विभिन्न समस्याओं पर प्रकाश डालने वाली ऐसी ही सर्वांग सुन्दर पुस्तकें हर वर्ष छापी जाती रहेंगी। पुरुष समाज के लिए अखण्ड-ज्योति तथा नारी समाज के कल्याणार्थ शीघ्र ही निकलने वाली ‘गृह लक्ष्मी’ यह दो पत्रिकाएं पहुँचती रहेंगी। आदर्श वाक्य भी 16 इसी प्रकार छपते रहेंगे। 52 पुस्तकों का मूल्य 13 रु. दोनों पत्रिकाओं का मूल्य तीन-तीन रु. व 6 रु. आदर्श वाक्य 1 रु. इस प्रकार कुल मिलाकर 20 रु. हुए, शेष 4 रु. का कोई चित्र, चालीसा आदि वितरण साहित्य मँगाया जा सकता है। इस प्रकार 12 महीने का 24 रु. बजट होता है। यह साहित्य अपने घर में निरन्तर बढ़ता रहेगा और इस ज्ञान कोष अभिवृद्धि को धन सम्पत्ति बढ़ने से किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण न मानना चाहिए।
दो रुपया महीना- एक आना रोज का यह खर्च, किन्हीं अत्यन्त कृपणों को छोड़कर किसी भी सद्गृहस्थ के लिए कठिन न होना चाहिए। एक आने रोज प्रायः बच्चे ले भगते हैं। दो ढाई छटाँक आटा चूहे बिगाड़ देते हैं, एक भिखारी घर में घुसता है तो एक आने कीमत का दो ढाई छटाँक आटा ले जाता है। इतना खर्च एक मन्दिर की विद्यालय की, पुस्तकालय की स्थापना में करते रहना कोई इतना बड़ा भार नहीं है, जो मामूली स्थिति का व्यक्ति भी उठा न सके। हाँ, कार्य की उपयोगिता समझ में न आए या जो बहुत ही छोटा हो तो बात दूसरी है।
घरों में देव-मन्दिर स्थापित करने वाले एक आने रोज का भोग-प्रसाद सहज ही बाँट देते हैं, यह प्रसाद मिठाई के रूप में न होकर ज्ञान के रूप में हो तो अधिक उत्तम है। गायत्री माता निश्चय ही इस प्रकार के विवेक पूर्ण भोग प्रसाद से केवल मिठाई के भोग की अपेक्षा सहस्रों गुनी अधिक प्रसन्न होंगी। नैवेद्य में केवल श्रद्धा है, ज्ञान भोग में श्रद्धा और विवेक दोनों का समन्वय होने से यह ‘सोना सुगंधि’ जैसा सुयोग बनता है।
गायत्री ज्ञान-मन्दिरों की स्थापना ब्रह्म विद्यालयों का संचालन ही वह कार्य है, जिसके आधार पर जन-जन के मन-मन में गायत्री माता और यज्ञ पिता का सन्देश पहुँचाया जाना सम्भव है। राष्ट्र के ठोस साँस्कृतिक पुनर्निर्माण के लिए यह प्रक्रिया अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। इसे सफल बनाने और सुविस्तृत करने के लिए हमें कुछ त्याग और पुरुषार्थ करना ही चाहिए।
चूँकि गायत्री-उपासना केवल उपासना मात्र तक ही सीमित नहीं है। ज्ञान वृद्धि उसका महत्वपूर्ण अंग है, इसलिए गायत्री मन्दिरों को केवल मन्दिर न कहकर इन्हें गायत्री ज्ञान-मन्दिर कहना चाहिए। अब समय आ गया है कि सामूहिक और व्यक्तिगत गायत्री ज्ञान-मन्दिरों की सर्वत्र स्थापना की जाय। गायत्री-परिवार की प्रत्येक शाखा अपनी प्रवृत्तियों का केन्द्र सामूहिक गायत्री ज्ञान-मन्दिर के रूप से स्थापित करें, इसी प्रकार गायत्री-परिवार के प्रत्येक सदस्य के घर में एक घरेलू गायत्री ज्ञान-मन्दिर हो। यह ज्ञान-मन्दिरों के शृंखला सर्वत्र फैले और वर्तमान बड़े मन्दिरों की इमारत तथा साधनों का सदुपयोग हो तो निश्चय ही भारत के साँस्कृतिक पुनरुत्थान में बड़ा योग मिल सकता है।
पूर्णाहुति के अवसर पर इस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति के महायज्ञ में सम्मिलित होने के लिये सम्भवतः परिवार के सभी सदस्य उत्सुक होंगे। बड़े मेले-ठेले देखने की मनुष्यों में वैसे ही साधारण प्रवृत्ति होती है, फिर यह इतना बड़ा आध्यात्मिक मेला है, जिसमें ऐसे प्रचण्ड दिव्य तत्व उत्पन्न होने की सम्भावना है जो वहाँ उपस्थित रहने वालों का विशेष कल्याण करेंगे। ऐसे धर्म आयोजन में सम्मिलित रहना आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन को धन्य बनाना और लौकिक दृष्टि से सुख शान्ति का पथ प्रशस्त करना, अनेक कठिनाइयों को पार करना है। उच्च कोटि के महात्मा और सिद्ध पुरुष इस अवसर पर आकर अपने तपोबल से आगन्तुकों का कल्याण सम्पादन करेंगे। प्रथम श्रेणी के विद्वानों के प्रवचन भी लोगों की भावनाओं को शुद्ध करने में बड़े उपयोगी साबित होंगे। गायत्री-परिवार के लोग अपने आत्म-बन्धुओं, गुरु-भाइयों को एक साथ एकत्रित देखेंगे जिससे निश्चय ही परिजनों की आत्माएं प्रसन्न होंगी।
इस युग के इस परम पुनीत अवसर पर गायत्री-परिवार के सदस्य तथा उनके परिजन स्वभावतः मथुरा आने को उत्सुक होंगे। अनेकों ने यजमान एवं होताओं के फार्म भी भर दिये हैं और वे निश्चय ही मथुरा पधारेंगे, पर कितने ही सज्जन ऐसे हैं जो कुछ कठिनाई अनुभव कर रहे हैं। इन कठिनाइयों में से एक किराया-भाड़ा खर्च करने की आर्थिक और दूसरी कठिन साधना की पूर्ति करने की है। इनमें से सच्ची श्रद्धा रखने वालों के लिये पहली कठिनाई अवश्य हल होकर रहेगी।
दूसरी कठिनाई साधना सम्बन्धी है। साधना के नियम कुछ कठोर रखे गये हैं। सवा लक्ष जप और 52 उपवास करने वाले यजमान, 2। लक्ष जप करने वाले होता, 1 माला रोज जपने वाले संरक्षक बनने की जो साधना है वह वस्तुतः उतनी कठिन नहीं है जितनी नये साधकों को दीखती है। कई धर्म-प्रेमी व्यक्ति इन साधना सम्बन्धी कठिनाइयों से डरते हैं और महायज्ञ में सम्मिलित होने से हतोत्साह हो जाते हैं।
ऐसे सज्जनों के लिये गायत्री मन्त्र लेखन की साधना बहुत ही सरल है। सवा लक्ष जप के स्थान पर 2400 गायत्री मन्त्र लेखन रखा गया है। अभी 8 महीने या 240 दिन पूर्णाहुति के शेष हैं। 10 मिनट प्रतिदिन लगाकर 10 मन्त्र प्रतिदिन लिखने से तब तक यह साधना आसानी से पूरी हो सकती है। मंत्र लेखन में समय का या स्नान आदि का भी प्रतिबन्ध नहीं है। अपने अन्य काम काज करते हुए 10 मिनट फुरसत कभी भी निकाली जा सकती है। इस प्रकार जिनके जी में महायज्ञ में सम्मिलित होने की इच्छा तो है पर साधना की कठिनाई से डरते हैं उनके लिए यह सबसे सरल साधना है।
दो नवरात्रियों में 9-9 दिन के उपवास और शेष महीनों में प्रति सप्ताह एक उपवास करने से 52 उपवास आसानी से पूरे हो सकते हैं। एक बार बिना नमक का भोजन भी उपवास मान लिया गया है, इस प्रकार वह तपस्या भी उतनी कठिन नहीं है जितनी दीखती है। फिर भी जिन्हें उपवास कष्टकर प्रतीत हो वे 1 उपवास के बदले 10 माला अधिक जपने या 40 मन्त्र अधिक लिखने से उसकी पूर्ति कर सकते हैं। अधिक कमजोर तबियत के लोग भी महीने में एक उपवास तो अवश्य ही करें। शेष की पूर्ति जप या मन्त्र लेखन अधिक करके की जा सकती है। इतने पर भी जप, मन्त्र लेखन या उपवास में कोई कमी रह जाय तो उतनी कमी की साधना तपोभूमि से उधार ले ली जाय और उसकी पूर्ति अगले वर्ष कर दी जाय। ऐसा भी हो सकता है कि कोई व्यक्ति अपना जप, मन्त्र लेखन या उपवास तपोभूमि में रहने वाले ब्रह्मचारियों को पारिश्रमिक देकर पूरा करालें। इन विकल्पों के कारण वह कठिनाई हल हो जानी चाहिए जो साधना सम्बन्धी प्रतिबन्धों के कारण लोगों को निराश करती है। 1250 गायत्री चालीसा पाठ भी सवा लक्ष जप के स्थान पर लिया गया है। 3 पाठ प्रतिदिन से वह पूर्णाहुति तक पूरा हो सकता है। अशिक्षित लोग जिन्हें पूरा मन्त्र शुद्ध रूप से नहीं आता ॐ भूर्भुवः स्वः की पंचाक्षरी गायत्री सवा लक्ष जप कर सकते हैं।
गायत्री मन्त्र लेखन का महत्व कम नहीं मानना चाहिए। मन्त्र-जप से उसका महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है।
अन्य साधनाओं में उंगलियों से जप और जिह्वा से उच्चारण होता है। मन को इधर-उधर भागने की काफी गुंजाइश रहती है। पर गायत्री मन्त्र लेखन में लिखते समय हाथ, आँखें, मस्तिष्क तथा समस्त चित्तवृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं क्योंकि लिखने का कार्य एकाग्रता चाहता है। मन को वश में करके एकाग्र भाव की साधना मन्त्र लेखन में भली प्रकार बन पड़ती है। इसलिये उसका महत्व भी बहुत माना गया है। शास्त्रों में गायत्री मन्त्र लेखन के सम्बन्ध में ऐसे वचन मिलते हैं :-
मानवो लभते सिद्धि कारणाद्धि जपस्यवै।
जपतो मन्त्र लेखस्य महत्वं तु विशिष्यते॥
अर्थात्- जप करने से मनुष्य को सिद्धि प्राप्त होती है। परन्तु जप से भी मन्त्र लेखन का महत्व विशेष है।
यज्ञात्प्राणस्थितिर्मन्त्रे, जपान्मन्त्रस्य जागृतिः।
अति प्रकाशवाँश्चैव, मन्त्रो भवति लेखनात्॥
हवन से मन्त्र में प्राण आता है, जप से मन्त्र जागृत होता है और लिखने से मन्त्र की शक्ति आत्मा में प्रकाशित हो जाती है।
सिद्धेर्मार्गो अनेकेस्यु, साधनायास्तु सिद्धये।
मन्त्राणाँ लेखनं चैव तत्र श्रेष्ठं विशेषतः॥
साधना की सिद्धि के लिए अनेक मार्ग हैं। उनमें मन्त्रों का लेखन विशेष श्रेष्ठ है।
श्रद्धया यदि वैशुद्धं क्रियतं मंत्र लेखनम्।
फलं तर्हि भवेत्तस्य जपात् दश गुणाधिकम्॥
श्रद्धापूर्वक यदि शुद्ध मंत्र लिखा जाय तो उसका फल निश्चय ही जप से दश गुना अधिक होता है।
गायत्री मन्त्र लेखस्य विधानाच्छ्रद्धयाऽन्वहम्।
सम्प्रसीदति गायत्री वेद माता हि साधके॥
प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र के लिखने से वेदमाता गायत्री साधक पर अति प्रसन्न होती हैं।
उपरोक्त शास्त्र वचनों के आधार पर गायत्री मंत्र लेखन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण साधना विधि है। इसमें स्त्री, पुरुष, बाल, वृद्ध सभी प्रसन्नतापूर्वक भाग ले सकते हैं। इसमें कोई विशेष प्रतिबन्ध नहीं है। जब भी समय मिले, मंत्र लेखन किया जा सकता है। जप की अपेक्षा मंत्र लेखन का पुण्य दश गुना अधिक माना गया है। इस प्रकार 24 हजार जप के अनुष्ठान की भाँति ही 24 सौ मंत्र लेखन का एक अनुष्ठान माना जाता है।
मंत्र लेखन की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिस स्थान पर यह कापियाँ स्थापित की जाती हैं, जहाँ इनका नित्य पूजन होता है वह स्थान एक विशेष आध्यात्म-शक्ति से सम्पन्न बन जाता है। गायत्री तपोभूमि में 125 करोड़ हस्तलिखित गायत्री मन्त्र रखे हुए हैं, यह हजारों वर्षों तक सुसज्जित रूप से सुरक्षित रखे रहेंगे। इनका नित्य पूजन होता रहेगा। इन मंत्रों को प्रति वर्ष लाखों तीर्थ यात्री देखते और प्रकाश एवं प्रेरणा प्राप्त करते रहेंगे। इन मन्त्र लेखन कापियों के पन्नों में साधकों की आँतरिक श्रद्धा एवं तपस्या लिपटी रहती है। इसलिये वे कागज सूक्ष्म सतोगुणी शक्ति सम्पन्न एवं प्रकाश पुँज बनकर जहाँ उन्हें स्थापित किया जाय, उस स्थान के वातावरण को बड़ा ही प्रभावशाली एवं शुद्ध बनाते हैं। उस स्थापना स्थान में प्रवेश करने वाला, निवास करने वाला व्यक्ति तुरन्त ही एक असाधारण शक्ति उसी प्रकार प्राप्त करता है जैसे गर्मी से सताया हुआ व्यक्ति बर्फखाने में घुसकर और सर्दी से काँपता हुआ व्यक्ति जलती हुई भट्टी के पास बैठकर प्रसन्न होता है।
गायत्री तपोभूमि में जो लोग आये हैं, यहाँ ठहरे हैं, उन्हें यहाँ के सूक्ष्म वातावरण की पवित्रता एवं दिव्य प्रभाव शक्ति का अनुभव निश्चय ही होता है। इसका बहुत कुछ श्रेय 124 करोड़ गायत्री मन्त्र लेखन की स्थापना को है। साधारण जप से भी लाभ है पर मन्त्र लेखन की यह विशेषता सब से बड़ी है कि जहाँ उनकी स्थापना की जाती है, उस स्थान का वातावरण चिरकाल तक आत्म-शक्ति से प्रभावित रहता है और उसका उपयोग अनेकों लोगों की मानसिक स्थिति को सुधारने में होता रहता है।
गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के अवसर पर आने वाले सदस्यों से प्रार्थना है कि वह अपने साथ मन्त्र लेखन की अधिकाधिक श्रद्धाँजलियाँ लाने का प्रयत्न करें। जो लोग मथुरा नहीं आ सकें, वे इस यज्ञ में सहयोग स्वरूप मन्त्र लेखन की कापी श्रद्धाँजलि के रूप में भेजें। जिस प्रकार धन प्रधान कार्यक्रमों में धन संग्रह का महत्व है, उसी प्रकार इस ब्रह्म यज्ञ में साधना-तपस्या संग्रह का महत्व है। मोटे तौर पर यह माना जाना चाहिए कि जिसने जितने मन्त्र लिखकर भेजे उसने उतने रुपये यज्ञ के लिए दिये। 2400 मन्त्रों की श्रद्धाँजलि यहाँ 2400 रुपये दान के बराबर मानी जायगी। यहाँ यज्ञ में मथुरा पधारने वाले लोग अपने साथ मन्त्र लेखन के बड़े-बड़े बस्ते- नोटों के बण्डलों के रूप में साथ लाने का प्रयत्न करें।
इस कार्य के लिए यदि घूमा जाय, याचना की जाय तो अनेकों धर्म-प्रेमी, सहृदय व्यक्ति जो मथुरा नहीं आ सकते अपनी मन्त्र लेखन की श्रद्धाँजलियाँ भेज सकते है। इस बहाने उनको एक महत्वपूर्ण साधना करने का अवसर मिलेगा और वह मन्त्र कापी जहाँ भी रहेगी वहाँ पवित्रता एवं धार्मिकता के तत्वों को बढ़ाती रहेगी। उत्साही व्यक्ति प्रयत्न करें तो अपने क्षेत्र से 21-21 लक्ष, 24-24 लक्ष मन्त्र संग्रह का कार्य आरम्भ कर सकते हैं। यह कार्य यज्ञ के लिए धन देने से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। कौन शाखा कितने अधिक मन्त्र संग्रह करे- इसके लिए एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता, होड़, घुड़-दौड़ आपस में चल पड़नी चाहिए। अधिक साधक बनाने, अधिक गायत्री उपासक उत्पन्न करने, अधिक व्यापक क्षेत्र में गायत्री माता का सन्देश पहुँचाने का यह एक श्रेष्ठ तरीका है।
प्रयत्न यह भी किया जाना चाहिए कि प्रत्येक क्षेत्र में, प्रत्येक गाँव में, एक सामूहिक गायत्री मंदिर हो। जहाँ निज की इमारत बन सके वहाँ सबसे उत्तम है अन्यथा किराये के या माँगे हुए स्थान में भी ऐसे मन्दिर स्थापित किये जा सकते हैं। वहाँ गायत्री तपोभूमि की भाँति उस क्षेत्र का मन्त्र लेखन भी प्रतिष्ठापित रहे और तपोभूमि में जो 2400 तीर्थों का जल रज संग्रह है उसकी भी स्थापना की जाय। ऐसे मन्दिर सच्चे अर्थों में धर्म-प्रचार के केन्द्र एवं सूक्ष्म अध्यात्म शक्ति के प्रेरक बन सकते हैं। जहाँ संभव हो ऐसे मन्दिर स्थापित करने का प्रयत्न किया जाय। उस क्षेत्र से लिखाया हुआ मन्त्र लेखन तपोभूमि उसी मन्दिर के लिए वापिस कर देगी और मथुरा में जो तीर्थों का जल रज एकत्रित है उसमें से भी प्रत्येक मन्दिर को भाग देगी। सस्ती गायत्री मूर्तियाँ एवं बड़े साइज के चित्र बनवाने का भी प्रयत्न किया जा रहा है। यह मन्त्र लेखन आन्दोलन अन्ततः गाँव-गाँव, क्षेत्र-क्षेत्र में गायत्री मन्दिरों की स्थापना के रूप में परिणित होंगे ऐसी संभावना हमें स्पष्ट दिखाई दे रही है।
झालू (बिजनोर) में 14 हजार आहुतियों का यज्ञ तीन दिवस तक किया गया। प्रभात फेरी भी बड़ी धूम धाम से लगाई गई। अनेक स्थानीय सज्जनों ने उत्साह से भाग लिया।
-विश्वम्भरदत्त जोशी
बेरदा (झालावाड़) में भी तेजरामजी के स्थान पर सामूहिक हवन किया गया।
-रामप्रसाद शर्मा
ताराबाड़ी घाट (पूर्णियाँ) में 23 से 25 फरवरी तक विश्व कल्याणार्थ 24 हजार आहुतियों का गायत्री यज्ञ किया गया। इसका विशेष श्रेय बरहकुम्बा शाखा के बाबा लम्बोदरदास को है, जिन्होंने भिक्षाटन करके इस यज्ञ का आयोजन किया। ता. 26 से 28 तक बहादुर गंज (पूर्णिमा) में भी 24 हजार आहुतियों का विशाल यज्ञ हुआ।
-खुशीराम शर्मा
मझोला (नैनीताल) में फरवरी मास में 30 हवन किये गये। मथुरा के बड़े यज्ञ के लिये यजमान व होता बनाये जा रहे हैं। जल्दी ही 5 ज्ञान मंदिर स्थापित होंगे।
-लक्ष्मणसिंह मनराल
बोरीवली (बम्बई) में 24 हजार आहुतियों का यज्ञ बड़े समारोह पूर्वक सम्पन्न हुआ। मथुरा तपोभूमि के सामवेद ज्ञाता श्री. श्रीकण्ठजी ने समस्त यज्ञ कार्य पूर्ण विधि से कराया। श्री शान्त वनजी का प्रभावशाली प्रवचन गुजराती भाषा में हुआ। शाखा के मन्त्री श्री सीताराम राठी ने अपना अनुभव प्रकट करके जनता के विश्वास को बढ़ाया। यज्ञ में नगर के बहुसंख्यक गणमान्य व्यक्तियों, पुलिस सुपरिण्टेन्डेन्ट, पोस्टमास्टर आदि ने भाग लिया।
-सौ. स्नेहलता बाई
पतारी (फतेहपुर) शाखा के सदस्य श्रीराम सनेही, वीरेन्द्रकुमारजी तथा स्वयं मैंने गायत्री परिवार की नई शाखाएं खोलने तथा अखंड ज्योति के ग्राहक बनाने का संकल्प लिया है।
-शंभूप्रसाद
तुरथिका (अछनेरा, आगरा) में होली के अवसर पर श्री उत्तमचन्दजी के स्थान पर सामूहिक हवन किया गया। श्री पन्नालालजी अस्थाना ने उपस्थित जनता को गायत्री व यज्ञ का महत्व समझाया।
-उम्मेदसिंह वर्मा
धामन्दा (सुसनेर, म. प्र.) में एक सामूहिक हवन प्राथमिक शाला में किया गया।
-कैलाशनारायण उपाध्याय
शाखागाँव (फतेहपुर) में हायर सेकेन्डरी स्कूल के हेडमास्टर ठा. राजकुमार सिंह की उपस्थिति में 10 मार्च को सामूहिक यज्ञ हुआ जिसमें जनता काफी तादाद में सम्मिलित हुई। गायत्री चालीसा वितरण किये गये।
-जगमोहनलाल निगम
गुलरियापुर (फर्रुखाबाद) के शाखा मंत्री श्री छोटेलाल वैद्य ने पिलखना में श्री सरजू के यहाँ, मलकपुर में महावीरप्रसाद जी दुबे के यहाँ, हमीरपुर रुरु में पं. मुनीश्वरप्रसादजी तथा रामेश्वरदयालजी गुप्ता के यहाँ, गुलरियापुर में श्रीमती शारदादेवी के यहाँ गायत्री हवन कराये। ये सब स्थान इटावा और फर्रुखाबाद में हैं और यज्ञों में बहुसंख्यक स्थानीय जनता ने भाग लिया।
- एक गायत्री प्रेमी
अहमदाबाद में श्रीनटवर भाई उमेदभाई पटेल, सोमचन्द छगनलालजी पटेल, तथा उमेदभाई सोमाभाई पटेल द्वारा 20 से 23 फरवरी तक 9 कुण्डों की विशाल यज्ञशाला में सवालक्ष आहुतियों का सामूहिक गायत्री महायज्ञ बड़े समारोह से सम्पन्न हुआ। यज्ञ में तपोभूमि (मथुरा) के पं. ज्वालाप्रसादजी शास्त्री के प्रवचन होते थे जिन्हें सभी गायत्री प्रेमी बड़ी श्रद्धा से सुनते थे। धार्मिक सिनेमा भी दिखलाया जाता रहा। यह यज्ञ स्वामी ब्रह्मानन्दजी की अध्यक्षता में पूर्ण शास्त्रोक्त विधि से सम्पन्न हुआ। पूर्णाहुति के अवसर पर गायत्री साहित्य तथा प्रसाद वितरण किया गया।
-एक गायत्री उपासक
जेगराजपुर (शाहजहाँपुर ) में 23 से 28 अप्रैल तक गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया है जिसमें दो लाख 40 हजार आहुतियां दी जायेंगी। अनेक महात्मा यज्ञ में भाग लेंगे, जिनके धर्मोपदेश श्रवण करने का लाभ इस अवसर पर प्राप्त होगा।
-बाबा कोमलदास
अमृताखास (पीलीभीत) में होली के पर्व पर 2400 आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया गया। श्री सोहनलालजी ने अपना प्रचार साहित्य ग्रामीण जनता को बाँटकर महायज्ञ के लिये होता व यजमान बनाये। इस यज्ञ से स्थानीय जनता बहुत प्रभावित हुई।
-शाखा मन्त्री
लखनादौन (म.प्र.) में हनुमानजी के मन्दिर पर सामूहिक हवन किया गया। श्रीशंकरावजी रावत ने एक वर्ष में 24000 मन्त्र लेखन का संकल्प किया है।
-इमरतलाल गोल्हानी
दिगौड़ा (टीकमगढ़) के गायत्री परिवार वालों ने 30 मील चलकर निवाड़ी स्टेशन पर पूज्य आचार्यजी का स्वागत किया। निवाड़ी वालों ने भी स्वागत किया। मैं वहीं से आचार्यजी के साथ चला। महोबा तक प्रत्येक स्टेशन पर हार्दिक स्वागत किया गया। महोबा में तो अवर्णनीय धूम-धाम हुई और वहाँ ऐसा उच्चकोटि का विचार विमर्श हुआ जो मानव को महामानव बनाने की क्षमता रखता है।
-बैजनाथप्रसाद सौनकिया
बापूनगर (अहमदाबाद) में श्री रमेशचन्द्र चिन्तामणि नेवे के यहाँ 25 फरवरी को सामूहिक हवन किया गया। फिर इन्हीं के यहाँ होली के अवसर पर रुद्राभिषेक व सत्यानारायण की कथा का आयोजन हुआ। अन्त में सामूहिक रूप से गायत्री माता की आरती हुई। यज्ञ कार्य पं. ज्वालाप्रसादजी द्वारा विधिवत् सम्पन्न कराया गया।
-प्रत्यक्ष दर्शी
मुराद नगर (मेरठ) में महा शिवरात्रि पर सत्यनारायण मन्दिर पर सामूहिक हवन किया गया और रात को आयुध निर्माणी सनातन धर्म सभा द्वारा अखण्ड कीर्तन किया गया।
-भगवानशंकर मेहता
आरंग (रायपुर) में माघ सुदी 11 को श्री फगुआरामजी साहु तथा फागुन वदी 11 को श्री जैहरिमाधव रामजी के यहाँ सामूहिक गायत्री यज्ञ श्री विद्याप्रसाद जी मिश्र की अध्यक्षता में हुआ। मौहल्ले के लोगों ने यज्ञकुण्ड तथा मंडप के निर्माण में उत्साह से भाग लिया। यह भी निश्चित हुआ कि प्रत्येक एकादशी को इसी प्रकार एक-एक मौहल्ले में आयोजन किया जाय।
- जेठूराम थानूराम साहू
उज्जैन (म.प्र.) के नागा बाबा की तलाई मौहल्ले में गायत्री परिवार की शाखा श्री सालगरमजी सोनी के प्रयत्न से स्थापित की गई। ग्यारह सदस्यों द्वारा 1188 आहुतियों का हवन कराया गया। इसके बाद भैरुंगढ़ शाखा के श्री रामदयाली शर्मा व देवी सिंह जी और गनेश्पुर के गायत्री परिवार के सदस्यों ने मिलकर रात के 11 बजे तक धर्मफेरी की और अनेक याज्ञिक बनाये।
-एक सदस्य
डबरा की अग्रवाल राइस मिल के पुनः उद्घाटन के पूर्व एक सामूहिक यज्ञ किया गया जिसमें करीब 250 व्यक्तियों ने भाग लिया।
-द्वा.प्र. बड़ेरिया
इन्दरनगर (टेलको) में श्री वासदेवसिंह व मंगल दुबे के स्थानों पर सामूहिक यज्ञ किये गये।
-ठाकुरदत्त कपलीश
कानपुर में गायत्री परिवार की ओर से 1822 माला जप और 667 चालीसा भेंट किये गये। अधिकाँश सदस्यों द्वारा होता व यजमान बनाने के लिये धर्मफेरी लगाई गई।
-अयोध्याप्रसाद दीक्षित
सरैयाँ बगडौरा (स्टेशन रसड़ा जि. बलिया उत्तर प्रदेश) में बैसाख सुदी 12-13-14-15 को 9 कुण्डों में 24 लाख जप व 24 हजार आहुतियों के गायत्री यज्ञ का आयोजन किया गया है। आसपास के सभी गायत्री उपासकों को सादर निमंत्रित किया गया है।
-महात्मा तिवारी
सटई (छतरपुर म. प्र.) में गायत्री जयन्ती के अवसर पर 28 मई को 2400 आहुतियों का गायत्री यज्ञ किया जायगा। उसी दिन शाखा मंत्रियों का एक गायत्री सम्मेलन भी होगा। इसके लिये श्री शिवप्रसाद पाठक व छेदीलालजी शर्मा वैद्य काफी परिश्रम कर रहे हैं।
-काशीराम राय
महासमुन्द (रायपुर) में शिवरात्रि के अवसर पर शाखा की स्थापना की गई और एक नवीन यज्ञ कुण्ड का उद्घाटन श्री विद्याप्रसाद जी मिश्र द्वारा किया गया। आरंग शाखा के सदस्यों ने भी इसमें काफी संख्या में सहयोग दिया।
-दयालजी भाई गुजराती
नागरपुर में ता. 7 से 14 फरवरी तक शिविर कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। सुबह 5॥ से 7।। बजे तक शाम को 6॥ से 8 बजे तक श्री प्रभु आश्रितजी और श्री वानप्रस्थीजी द्वारा बौद्धिक और आध्यात्मिक शिक्षा दी गई।
-बलराम पारधी
रमिया वेहड़ (खीरी, उ. प्र.) में श्री चमनलाल जी सूरी व श्री यशवंत शर्मा ‘वीर’ की अध्यक्षता में 58564 आहुतियों का हवन बड़े समारोह से सम्पन्न हुआ। श्री. श्रीपालजी (चहलुआ) और सूर्यप्रसादजी (रमुबापुर) के यहाँ 12-12 हजार आहुतियों के हवन किये गये। पं. लालजाप्रसाद मिश्रा सर्वोदयी खीरी जिला में मथुरा में होने वाले महायज्ञ तक 12 हजार आहुतियों के 108 यज्ञ कराने का संकल्प कर चुके हैं।
-चतुर्भुज त्रिपाठी
रमिया बेहड़ (खीरी) में श्री चमनलालजी सूरी की अध्यक्षता में गायत्री प्रचारकों की एक मीटिंग हुई जिसमें मथुरा में होने वाले यज्ञ की पूर्ति के लिये निम्नलिखित सज्जनों ने बड़े उत्साह वर्धक संकल्प किये-श्री लालप्रसाद सर्वोदयी 240 होता व यजमान और 108 शाखा; श्री शिव भगवानप्रसाद अग्निहोत्री 108 होता और 24 शाखा; श्री चतुर्भुज त्रिपाठी 24 होता और 5 शाखा; स्वामी सर्वदानन्दजी 108 होता व 5 शाखा; श्री रामरुपजी 10 होता; श्री मुनि प्रसादजी 24 होता। इसी भाँति सभी उपस्थित सदस्यों न कुछ न कुछ संकल्प किये।
-चतुर्भुज त्रिपाठी
बिलासपुर (म. प्र.) में लगभग 40 पुरुष व महिला सदस्यों ने शिवरात्रि के पर्व पर 4 हजार आहुतियों का यज्ञ किया। आगामी नवरात्रि अनुष्ठान उत्साह पूर्वक मनाने के सम्बन्ध में भी विचार विमर्श हुआ।
-सुधाराम महाजन
दैलबारा बानपुर (झाँसी) में मकर संक्रान्ति के अवसर पर 5 कुण्डों की भव्य यज्ञ शाला में बड़े उत्साह से गायत्री यज्ञ सम्पन्न हुआ। आस-पास की जनता और परिवार के व्यक्तियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। मथुरा से पधारे स्वामी प्रेमानन्दजी व ब्रह्मचारियों के प्रभावशाली उपदेश हुये। झाँसी से श्री गिरिजासहायजी खरे पधारे और उन्होंने बड़े परिश्रम से यज्ञ का संचालन किया।
-प्रभुदयाल श्रीवास्तव
दिगारा (झाँसी) में पं. रामनारायण पस्तोर ने पुत्र जन्मोत्सव पर एक गायत्री महायज्ञ 5 कुण्डों की यज्ञशाला में किया। यज्ञ बड़ा सफल रहा और आस-पास के ग्रामों में अत्यधिक प्रचार हुआ। मथुरा से आये ब्रह्मचारियों ने मैजिक लालटैन द्वारा सदुपदेश देकर ग्रामवासियोँ को गायत्री उपासना की ओर आकृष्ट किया।
-बालकृष्ण अग्रवाल
महोबा (झाँसी) में मार्च 14 से 16 तक 9 कुण्डों का विशाल यज्ञ करने का आयोजन किया गया है।
-प्रेमचन्द्र अग्रवाल
झाँसी में 25 से 29 मार्च तक 25 कुण्डों की यज्ञशाला में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया है। सभी गायत्री उपासकों को निमन्त्रित किया गया है।
-बालकृष्ण अग्रवाल
नासिक रोड़ (बम्बई प्रान्त) में श्री गाडे (सुपर वाइजर करेन्सी नोट प्रेस) के यहाँ महाशिवरात्रि के अवसर पर एक बड़ा यज्ञ सम्पन्न हुआ। श्री बेरी, डिप्टी मास्टर सेण्ट्रल स्टाम्प स्टोर, श्रीमती बेरी, श्री संत, श्रीदेश पाँडे, श्रीबेल्दे ने भी यज्ञ में सहयोग दिया। श्री हीरामन, श्री जोशी, श्री नबल पाटिल, श्री गंगाधर और श्री श्रीधर ने बहुत परिश्रम करके यज्ञ को सफल बनाया।
-मानसिंह
साँगोद (कोटा) साँगोद व कनवास तहसीला का द्वितहसीलीय सम्मेलन 15 व 16 फरवरी को सानन्द सम्पन्न हुआ। श्रीशम्भूसिंह जी हावड़ा ने क्षेत्रीय परिजनों को प्रचार हेतु प्रोत्साहित किया।
-बद्रीलाल पंचोली
चिंचड़ा (बेतूल) में सामूहिक हवन सब सदस्यों ने मिलकर बड़े उत्साह से किया। श्री. कुँजीलाल बाईकर, श्रभद्दू भूटर और फुलावाई ने 52 उपवास और सवालाख जप करने का संकल्प किया।
-कुँजीलाल बाईकर
मझिया (हरदोई) में 2400 आहुतियों का बड़ा यज्ञ बखरिया ग्राम के श्री माखन के यहाँ हुआ। जरेली शाखा के मन्त्री श्री यदुनाथसिंह और मझिया के बहुत से सदस्य यज्ञ में सम्मिलित हुये। दूसरे दिन 6-7 सौ व्यक्तियों को भोजन कराया गया। स्थानीय साधक श्री सुरेशपालसिंह ने विशेष सहयोग दिया।
-प्रभुदयाल वैद्य
बिजरपुर (मुरैना, म. प्र.) में वैसाख सुदी 13 से 15 तक 5 कुण्डों की यज्ञशाला में एक बड़ा यज्ञ करने का निश्चय किया गया है।
-रामसेवक शर्मा
छतेपुर (शाहजहाँपुर) में 5 कुण्ड व 24 हजार आहुतियों का एक यज्ञ बैसाख वदी 9, 10, 11 को होने जा रहा है, जिसमें मथुरा से परमपूज्य आचार्य जी ने आने की स्वीकृति दे दी है। इस अवसर पर शाहजहाँपुर जिले की समस्त शाखाओं का सम्मेलन होगा। श्री जगदम्बाप्रसादजी अध्यापक विशेष उत्साह दिखा रहे हैं।
-शाखा मन्त्री
बकानी (झालावाड़) में ग्रामीण जनता में गायत्री का प्रचार बढ़ रहा है। गतवर्ष यज्ञ के प्रभाव से वर्षा ऐसी उत्तम हुई कि पैदावार में आशातीत वृद्धि दिखलाई पड़ी। इससे उत्साहित होकर ग्रामीण जनता इस वर्ष भी गायत्री महायज्ञ करने का विचार कर रही है।
-भंवरलाल शर्मा
शिवराजपुर (फतेहपुर यू. पी.) में अखण्ड रामायण पाठ के साथ गायत्री यज्ञ किया गया और 101 कन्याओं को निमंत्रण देकर भोजन कराया गया।
-बैजनाथ त्रिपाठी
मुँगेली (बिलासपुर) में गायत्री शाखा की स्थापना की गई है। विलासपुर के पाँच गायत्री सदस्यों ने वहाँ जाकर यज्ञ कराया। शाखा मंत्री का काम पं. लखनलाल पाठक को सौंपा गया।
-सुधाराम महाजन
कंकरखेड़ा (मेरठ) में कई गायत्री शाखाओं के सदस्यों ने पाँच हजार आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया जिसके अध्यक्ष हंसूपुर (बिजनौर) निवासी पं. पीताम्बरदत्त ज्योतिषी थे। सदस्यों ने बड़ी श्रद्धा के साथ धर्मफेरी लगाई। यज्ञ को सफल बनाने में पं. गिरिजा शंकर त्रिपाठी, देवीदयालजी, करनसिंह जी, कृष्णप्रकाश जी बसंल आदि ने विशेष परिश्रम किया।
-शाखा मंत्री
हापुड़ (मेरठ )में ता. 21 फरवरी को मेरठ की समस्त शाखाओं की एक मीटिंग हुई जिनमें इन शाखाओं की ओर से अधिक से अधिक होता और यजमान बनाने के लिये एक कार्यकारिणी बनाई गई। हापुड़ की शाखा ने 108, खरखोदा ने 54 और मेरठ ने 108 होता व यजमान ले जाने का भार लिया। श्री रेवतीशरण जी ने गाजियाबाद जाकर शाखा स्थापित की।
बिलारी (मुरादाबाद) में जिले की समस्त शाखाओं की एक मीटिंग हुई जिसमें एक कार्यकारिणी कमेटी समस्त शाखाओं का कार्य सुचारु रूप से चलाने के लिये बनाई गई। बिलारी शाखा ने 108 होता और यजमान बनाने का संकल्प किया। यहाँ के तहसीलदार साहब बड़ी ही धार्मिक प्रवृत्ति के हैं। उन्होंने अपने यहाँ होता व यजमान बनाने में पूर्ण सहायता देने का आश्वासन दिया है।
-शाखा मंत्री
शाहजहाँपुर के ढकियारघा ग्राम में भी धर्मे सिंह जी अध्यापक के प्रयत्न से एक यज्ञ सम्पन्न हुआ। शाम को सत्संग हुआ। इसी प्रकार शाखा हथौड़ा बुजुर्ग में ढाई घाट में एक यज्ञ हुआ। जिसमें श्री प्रेमदास जी राठौर व श्री रामबुझावनदास का उत्साह सराहनीय रहा। मुरादपुर माती में अनेक ग्रामों के सदस्यों की मीटिंग हुई जिसमें 24 शाखा स्थापित करके अपना एक अलग मण्डल स्थापित करने का विचार किया गया।
-शाखा मंत्री ढकियारघ
छिबरामऊ (फर्रुखाबाद) में सवा लक्ष आहुतियों का गायत्री महायज्ञ 16 से 18 फरवरी को सम्पन्न हुआ। इसमें महिलाओं ने अधिक भाग लिया, क्योंकि बहिन कृष्णाकुमारी जी ने इसे सराहनीय बनाने के लिये अथक परिश्रम किया था। पं. रामलाल जी पाण्डेय का उत्साह भी सराहनीय रहा है यज्ञ को सम्पन्न करने के लिये मथुरा से ब्रह्मचारी योगेन्द्र जी व कृपाशंकर जी पधारे थे। स्वामी प्रेरक नन्दजी के तीन दिन तक मार्मिक प्रवचन भी होते रहे। परम पूज्य आचार्य जी ने अनेक स्थानों से एकत्रित सदस्यों को अपनी संस्था का मूल उद्देश्य समझाया और पूर्णाहुति में अधिक से अधिक होता व यजमान आदि आने का विशेष जोर दिया।
-मंत्री गायत्री परिवार
बबराला (शाहजहाँपुर) में श्री गायत्री प्रसाद गुप्ता की प्रेरणा से गायत्री शाखा की स्थापना हुई अनेक सदस्य यज्ञ के भागीदार बने हैं और साप्ताहिक हवन होता है। बसन्त पंचमी के अवसर पर सामूहिक हवन किया गया।
-शाखा मंत्री
मनसूरपुर मिल (मेरठ) के गायत्री परिवार की प्रेरणा से अजमतगढ़ में श्री जानकीप्रसाद के यहाँ 65 हजार जप व 10 हजार आहुतियों का यज्ञ किया गया। दूसरा यज्ञ श्री हरिश्चन्द्र के यहाँ 12 हजार आहुतियों का हुआ।
-बनारसी दत्त शंकर
हड़हा (हरदोई) में 24 हजार आहुतियों का यज्ञ धूमधाम से सम्पन्न हुआ, जिसमें श्री चमन लालजी सूरी, श्री महावीरप्रसाद जी गुप्त और स्वामी केवलानन्दजी भी पधारे थे। 100 चालीसा व अन्य पुस्तकें भी बाँटी गई।
-रामाश्रय त्रिपाठी
ग्राम सिनगुण (जिला निमाड़) में छोटी कसराबद के श्री किशोरसिंह जी दसोंदी की प्रेरणा से गायत्री शाखा की स्थापना की गई। महाशिवरात्रि के अवसर पर 30 सदस्यों द्वारा सामूहिक हवन किया गया।
-परसाई छगनलाल मगनलाल शर्मा
टीकमगढ़ (म. प्र. में) श्री पन्नालाल वकील के स्थान पर 5 हजार आहुतियों का हवन बड़े उत्साह से सम्पन्न हुआ। यह हवन एक नये कारखाने के उद्घाटन के उपलक्ष्य में हुआ था जिसका नाम “गायत्री उद्योग भवन” रखा गया है। मथुरा के यज्ञ सम्बन्धी परिपत्र आस पास के गाँवों में बाँटे गये हैं।
-जगतराम पस्तोर
ग्राम भेसाना (राघोगढ़, म. प्र.) गायत्री शाखा का निर्माण किया गया, जिसके मंत्री पं. मोहनप्रसाद जी चुने गये हैं। ता. 23 फरवरी को इस शाखा के दस सदस्यों को यज्ञोपवीत दिया गया। श्री रामवल्लभ महेश्वरी की कार्य कुशलता सराहनीय रही। ता. 5 मार्च को राघोगढ़ में गायत्री पुस्तकालय का उद्घाटन किया गया जिसके लिये 122।/) का चन्दा एकत्रित किया गया।
-बाबूलाल शर्मा
ग्राम गोविन्दपुर (भागलपुर, बिहार) में सामूहिक प्रभात फेरी और संकीर्तन का कार्यक्रम सन् 1957 की चैत्र नवरात्रि से आरम्भ किया गया था। इसकी पूर्णाहुति सन् 58 की चैत्र नवरात्रि के अवसर पर होगी, जिसमें अखंड कीर्तन, ब्रह्म भोज, ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान साहित्य वितरण आदि की योजना की गई है।
-अर्जुनप्रसाद गोस्वामी
झाँसी (उ. प्र.) के गायत्री परिवार के पाँच व्यक्तियों ने ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति के लिये यजमान और होता तैयार करने के लिये दो-दो तीन-तीन मास की छुट्टी लेकर गांव-गांव में घूमने का व्रत लिया है। ये सब सदस्य रेलवे में नौकरी करते हैं।
-बालकृष्ण अग्रवाल
सकेरा भड़ारन (टीकम गढ़) में शिवरात्रि के अवसर पर 11 हजार आहुतियों का सामूहिक हवन किया गया जिसमें 165 चालीसा पाठ भी हुये। श्री चन्द्रभान त्रिपाठी का प्रभावशाली प्रवचन हुआ। श्री आम्बिकाप्रसाद जी, पं. नाथूराम जी तिवारी ने सहयोग दिया।
-राजाराम तिवारी
बड़गाँव (गोंडा) में गायत्री महायज्ञ 24 से 29 फरवरी तक सम्पन्न हुआ, जिसमें परम पूज्य आचार्यजी, स्वामी विवेक जी, श्रीमती विद्यावतीजी, स्वामी आत्मानन्दजी, श्रीरामभरोसेदासजी आदि महात्मागण पधारे थे। यज्ञ समारोह पूर्वक सम्पन्न हुआ और अन्त में ब्राह्मण भोजन व ज्ञान दान कराया गया।
-रामसेवक त्रिपाठी
चौचौड़ा (गुना) में शिवरात्रि पर भी चम्पालालजी श्रीवास्तव वकील के स्थान पर सामूहिक हवन हुआ, जिसमें वैदिक श्लोक एवं गायन प्रार्थना द्वारा स्तवन होकर प्रसाद वितरण किया गया। यहाँ एक गायत्री पुस्तकालय भी स्थापित किया गया है।
-शाखा मंत्री
सीमेंट फैक्टरी (सवाई माधौपुर) में श्री गौरी सहायजी गुप्ता स्टेशन पोस्ट मास्टर के यहाँ श्री शंभुसिंह जी हाडा की अध्यक्षता में एक सामूहिक हवन किया गया जिसमें श्री द्वारकाप्रसादजी वकील, सहायक स्टेशन मास्टर, टोंक के सेठ जी, स्टेशन गुड्स र्क्लक आदि गायत्री प्रेमियों ने भाग लिया। सवाई माधोपुर के कस्बे में, नई गायत्री शाखा का संगठन किया गया। जिसके मंत्री श्री बृजमोहनसिंह जी चुने गये।
-हंसराज जुनेजा
रानीमूड़ा (कालाहन्डी, उड़ीसा) में 50 सदस्यों ने सामूहिक रूप से सवा लक्ष जप तथा 5 हजार आहुतियों का हवन उत्साहपूर्वक सम्पन्न किया। ता. 1 मार्च को पूर्णाहुति हुई। श्री गोपीनाथ का कार्य बहुत प्रशंसनीय था। हमारे क्षेत्र के पदाधिकारी श्री विनायकप्रसाद जी का भी आगमन हुआ।
-श्री हरिकृष्ण शर्मा
दिगौड़ा (टीकमगढ़) में गायत्री शाखा द्वारा भुवनेश्वर महादेव के स्थान पर पक्की यज्ञशाला बनाने का कार्य आरम्भ हो गया है। इस महीने में यजमान और होता बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। शाखा के मंत्री श्री बैजनाथप्रसाद सौनकिया के पिता का स्वर्गवास हो जाने से विशेष कार्य सम्पन्न न हो सका, तो भी सौनकिया जी शाखा सम्बन्धी महत्वपूर्ण कार्य में लगे हैं।
-गोविन्ददास भार्गव
पयागपुर (बहराइच) में होली के अवसर पर 2400 आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया गया और सब लोगों ने मिलकर प्रेम पूर्वक होली का त्यौहार मनाया। जबकि अभी तक इस अवसर पर गन्दगी और गालियों की अधिकता रहती थी, इस वर्ष होली बड़ी सभ्यता पूर्वक मनाई गई।
-देशराज पाठक
कुढार (एटा) के गायत्री परिवार के मंत्री श्री चुन्नीलाल जी के प्रयत्न से 5 नवीन शाखायें स्थापित की गई हैं-(1) भोयस में ठा. राजवीरसिंह जी (2) मालपुर पो. सहसवान में श्री मिश्रीलालजी (3) सिरसा में श्री नाथूराम गुप्ता (4) विजयगढ़ में पं. किशनलाल शर्मा और (5) फाजिलपुर में श्री सियाराम जी शर्मा को मंत्री चुना गया है।
-शाखा मंत्री
बुढ़ार (एटा) के श्री शंकरलाल जी डॉक्टर ने हाल में 5 कुण्डों का यज्ञ समारोह के साथ किया था। इसमें मथुरा तपोभूमि की ओर से स्वामी ब्रह्मस्वरूप व पं. ज्वालाप्रसाद जी ने विशेष परिश्रम किया। अब डॉ. शंकरलाल जी ने अपनी ही तरफ से 51 कुण्डों के यज्ञ का संकल्प लिया है।
-शाखा मंत्री
मालपुरा (पो. सहसवान, बदायूँ) में 9 कुण्डों की सुरम्य यज्ञशाला में एक विशाल यज्ञ का आयोजन श्री मिश्रीलाल स्वर्णकार द्वारा किया गया है। इनमें सवालक्ष आहुतियाँ दी जायेंगी और अनेक विद्वानों के प्रभावशाली प्रवचन होंगे।
-गायत्री भक्त
इन्दौर (म. प्र.) में श्री हरि पुराणिक (व्यास, फला, जूनी, इन्दौर) श्री परमानन्द जी जोशी (पागनिस पारा, बैराठी कालोनी) तथा श्री बेनीप्रसाद जी भार्गव (मार्तण्ड चौक) के यहाँ तीन विशाल सामूहिक हवन उत्साहपूर्वक सम्पन्न हुये। इनमें श्री बाबूराव जी जमींदार, श्री भार्गव साहब आदि का पूर्ण सहयोग रहा।
-सत्यनारायण तिवारी
बेलिया (मन्दसौर) में नवीन शाखा की स्थापना की गई है, जिसके मंत्री श्री कन्हैयालाल जी देबड़ा सर्वसम्मति से चुने गये। ता. 9 को भावसारन मन्दिर के सामने सामूहिक यज्ञ किया गया जिसमें सभी सदस्यों और अन्य धार्मिक जनों ने भाग लिया।
-नन्दकिशोर अमोटा
बुलन्दशहर जिले की समस्त शाखाओं की एक मीटिंग भूतेश्वरनाथ के मन्दिर में ता. 9 मार्च को हुई जिसमें गायत्री परिवार के उद्देश्यों पर विचार-विनिमय किया गया। स्वामी योगानन्द जी ने 240 यजमान, होता व संरक्षक बनाने का संकल्प किया। इसके अतिरिक्त बुलन्दशहर शाखा ने 108, धरौरा मुस्तफाबाद शाखा ने 54 और गुरावली शाखा ने भी 54 यजमान होता बनाने का संकल्प किया। स्वामी आत्मानन्द जी ने जिले की समस्त शाखाओं में धर्मफेरी का प्रोग्राम बनाया। बुलन्दशहर व गुरावली में शीघ्र ही बड़े यज्ञ होने की आशा है।
-शाखा मंत्री
कानपुर में शिवरात्रि के अवसर पर स्टेट बैंक में 40 व्यक्तियों द्वारा सामूहिक हवन किया गया। दूसरा हवन बलखण्डेवर महादेव (सीसामऊ) में श्री नरेन्द्रकुमार की अध्यक्षता में किया गया; जिसमें मौहल्ले के अनेक व्यक्तियों ने भाग लिया। अन्त में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पुस्तकें व प्रसाद वितरण किया गया।
-अयोध्या प्रसाद दीक्षित
गायत्री परिवार-पत्रिका
अब गायत्री परिवार का संगठन देश व्यापी हो चुका है। भारत का कोई प्राँत गायत्री शाखाओं से शून्य नहीं है। इसके प्रभाव से देश के कोने-कोने में यज्ञानुष्ठानों के आयोजन हो रहे हैं। इस अवस्था में यह आवश्यकता अनुभव हो रही है कि इस प्रवृत्ति का उचित रूप से प्रकाशन और मार्ग प्रदर्शन किया जाय, जिससे प्रत्येक सदस्य को समस्त गायत्री परिवार की गतिविधि का पता चलता रहे और साथ ही अपने कर्तव्य का भी बोध होता रहे। “गायत्री परिवार पत्रिका” इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये निकाली जा रही है। इसमें देश भर में फैली गायत्री शाखाओं की कार्यवाहियाँ, यज्ञों का विवरण और कार्यकर्ताओं के प्रयत्नों का उचित रूप में परिचय दिया जायगा। “अखण्ड-ज्योति” में स्थानाभाव से इन समाचारों को बहुत संक्षिप्त कर देना पड़ता था, अब इस पत्रिका में गायत्री प्रचार का वास्तविक रूप देखने को मिलेगा। प्रत्येक गायत्री शाखा का कर्तव्य है कि तुरन्त ही 2 रु. मनीआर्डर भेजकर ग्राहकों में नाम लिखा लें। प्रथम अंक 15 अप्रैल तक तैयार होकर ग्राहकों को भेज दिया जायगा।
पता- गायत्री परिवार पत्रिका, “अखण्ड-ज्योति प्रेस” मथुरा।
स्वप्न मुरलिका पर बैठे स्वर साध रहे तुम?
जब कि सत्य की अस्मत दुश्मन लूट रहा है,
कि शाँति की राजकुमारी की छाती पर
महायुद्ध का भीषण विषधर टूट रहा है!
क्या है वह तरुणाई, जो विद्रोह न कर दे,
शीश कटे जब कभी किसी के अहंकार का;
कैसा है वह बागबान, खामोश रहे जो
रहा हो कंठ कि जब कोई बहार का!
ई बुज़दिल कह-कह कर छेड़ रहा हो,
है वह खड्ग म्यान का मोह न छोड़े;
कैसा है वह गर्व शोर तो खूब मचाए
आगे बढ़ कर तुरत जुल्म का वक्ष न तोड़े!
कैसा है वह शंख, शिवालय की छाया में,
देव - मूर्ति के आगे गाए खूब आरती;
धारण कर ले मौन, मगर जब सेना कोई
बहुत देर से खड़ी हुई हो मुख निहारती!
कैसी है वह ध्वजा, पवन में खूब उड़े जा,
किन्तु धुएँ का दुर्ग देख कर शीश झुका ले,
इन्द्र-धनुष की तरह गगन में तभी उगे, जब
साथ-साथ चलते हों बादल के रखवाले!
कैसी है वह आग, प्राण में रही धधकती,
लेकिन सीना तोड़ शत्रु की ओर न दौड़ी;
कैसा है वह लहू, गर्म होकर जो सहसा
बाहर आ न सका खुद तोड़ कलाई चौड़ी!
कैसी है वह मुट्ठी, बँध-बँध कर खुल जाए,
और सामने खड़ा शत्रु सव्यंग्य विहँस दे,
कैसी है वह बाँह, जुल्म की कमर न तोड़े
एक बार यदि पूरा जोर लगा कर कस दे!
तट पर बैठे हुए घरौंदे बना रहे तुम?
जब कि समन्दर की छाती में ज्वार तड़पता!
तुम फूलों की सेज सजाकर शयन कर रहे,
जब कि किसी की छाती पर अंगार तड़पता,
कैसा है वह धम, फेरता माला चुप-चुप
जब कि किसी की गंगा पर बारूद बरसता;
कैसा है वह प्यार, हाथ मल कर रह जाए
चूस रहा जब दनुज रूप की सरल सरसता!
कैसा है वह कृषक, देखकर आँख चुरा ले,
नई सुबह की फसल अधपकी मुरझ रही हो,
किसी खेत की हँसती-गाती पगडंडी पर
महा नाश की विषमय बिजली गरज रही हो!
कैसी वह सभ्यता, रहे जो खड़ी देखती,
कोई बरसा ज्वाल किसी का चमन लूट ले,
कैसा है वह देशभक्त, जो तड़प न जाए,
कोई दे धमकियाँ किसी का वतन लूट ले!
या तो यह कह दो, जीवन ही रहा न तुम में,
या यह मानो जीवित हैं, पर, पुरुष नहीं हैं;
परम्परा के भक्त, न आगे बढ़ पायेंगे,
जहाँ रुका था गौतम, अब भी खड़े वहीं हैं।
देखो, लुट न कहीं जाए सिन्दूर सुबह का,
अन्धकार का साम्राज्य फैले न जगत पर,
नई किरण जो उतर रही है आसमान से,
कहीं आत्महत्या कर लेट न जाए पथ पर
नई जिन्दगी का न खून कोई कर डाले,
नई पौध को कोई लगा न जाए फाँसी;
कोई कालिख नहीं पोत दे नई ज्योति पर
लौट न जाए कहीं नई चेतना रुआँसी।
पूरा जोर लगा कर यह जयघोष गुँजा दो,
हाथ मनुजता के ही यह मैदान रहेगा!
सेहरा पुनः बँधेगा केवल शीश सत्य के
और विपथगामी केवल अपमान सहेगा!
यह कि आदमी पशु से बहुत-बहुत ऊँचा है,
बौने हाथ दनुज के उस को छू न सकेंगे,
यह मन्वन्तर मनु से बहुत-बहुत आगे है
छू न सकेंगे, चरण प्रलय के व्यर्थ थकेंगे।
अय मेरे साथियो, उठो, तलवार थाम लो,
शीश रहे या जाय, प्राण का दाव लगा दो,
पाँव बढ़ा दो, नया जागरण बुला रहा है
ज्वाला धधका दो, हर सोई आँख जगा दो।
कोई हाथ न दीखे ऐसा खड्ग-हीन हो,
कोई म्यान न दीखे, जिस की गोद भरी हो,
पहले तुम टूटो, पीछे टूटे वह गर्दन
जो अपना अधिकार बचाने को उभरी हो।
*समाप्त*
श्री बालस्वरूप राही