(श्री जगदीश जी झा ‘विलम’)
(1) पिता तू ही है सबका एक-
जगत जपता तेरा ही नाम। सदा रहता है तू सब ठौर- किन्तु है तेरा कहीं न धाम।
(2) विश्व में करके तेरी खोज- खूब होते हैं नर हैरान। पता पाते क्या कोई कभी ढूँढ़कर जल-थल व्योम वितान॥
(3) अजन्मा अज अनन्त अव्यक्त- सृष्टिकर्ता तू ही भगवान। सुदर्शन, गदा पद्म कर शंख- विश्वपालक तू विष्णु महान॥
(4) भयंकर व्याल विभूषित अंग- शूलधर शंकर कठिन कृतान्त। तुम्हारे ही हैं तीनों रूप एक तू ही है पुरुष प्रशान्त॥
(5) सृष्टि का गौरवमय आधार- ज्योर्तिमय जग-जीवों का प्राण। कन्द फल मधुर स्वाद मकरन्द- सुमन में सरस सुवासित घ्राण॥
(6) प्रभाकर में तू प्रभा पसार- विश्व का करता है कल्याण। शान् शीतल शश्किर में घोल- सहर्षित करता सुधा प्रदान॥
(7) अगम वारिधि का तू विस्तार- व्योम का निर्मल श्याम स्वरूप। अग्नि का जगमग दिव्य प्रकाश- वायु-व्यापकता अलख अनूप॥
(8) सुखद शीतलता जल के बीच- जीव पाते जिस से सन्तोष। अन्न में जीवन-शक्ति महान- एक है तू ही अमल अदोष॥
(महात्मा गाँधी)
आजकल संसार में पाखंड बहुत बढ़ गया है। मनुष्य-चाहे वह किसी भी धर्म का हो-धर्म की ऊपरी बातों का ही विचार करता है, और अपने वास्तविक कर्त्तव्य को भूल जाता है। हम इस बात का ध्यान नहीं रखते कि धन की अति लालसा से दूसरों को क्या दुःख होता है या क्या दुःख होगा। योरोप की स्त्रियाँ ऐसे मोजों के पहनने में जरा भी नहीं हिचकिचाती जो अत्यन्त कोमल छोटे-छोटे जानवरों को मार कर उनके रोओं से बनाये जाते हैं। इस प्रकार चारों ओर देखने से विदित होता है कि योरोप और अमेरिका में ऐसे बहुत से मनुष्य हैं जो धर्म विरुद्ध व्यवहार कर रहे हैं। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि यदि संसार में धर्म होता तो आज जो दुराचार बढ़ रहा है वह न बढ़ता। परन्तु उनके ये विचार मिथ्या हैं। प्रायः मनुष्यों की आदत होती है कि वे अपनी भूल न देखकर हथियारों को दोष दिया करते हैं। इसी तरह वे मनुष्य भी अपने दुराचारों का विचार न करके धर्म को बुरा बताते हैं और स्वच्छन्दता से जैसा उनको अच्छा लगता है आचरण करते हैं।
इस तरह की स्वच्छन्द प्रवृत्ति को बढ़ती हुई देखकर कुछ लोग इसके विरुद्ध उठ खड़े हुये हैं। उन्हें भय है कि यदि इस प्रकार सारे धर्म उठ जायेंगे, तो संसार को भारी हानि पहुँचेगी, लोग नीति का सर्वथा त्याग कर देंगे और पशु-तुल्य व्यवहार करने लगेंगे। इसलिये वे भिन्न-भिन्न मार्गों से नीति पर चलाने का प्रयत्न कर रहे हैं। इस उद्देश्य से उन लोगों ने एक ऐसे मंडल की स्थापना की, जिसने जगत के प्रायः सभी धर्मों की जाँच करके यह बतलाया कि संसार के प्रायः सभी धर्म नीति पर चलने की शिक्षा देते हैं। इतना ही नहीं, किन्तु उन धर्मों का आधार बहुत करके नीति के नियमों पर ही रहता है। अतएव कोई मनुष्य किसी धर्म-विशेष का पालन करे या न करे तो भी नीति के नियमों का पालन करना तो उसका धर्म है। और जो लोग नीति के नियमों का पालन नहीं कर सकते, वे इस लोक में या परलोक में अपनी या दूसरों की भलाई भी नहीं कर सकते। इन लोगों ने समस्त धर्मों का सार लेकर उनके आधार पर नीति के नियमों का ही प्रतिपादन किया है। वे किसी धर्म का खंडन नहीं करते, इसलिये उनके मंडल में प्रत्येक धर्म के व्यक्ति शामिल हो सकते हैं। यह मंडल दृढ़ता के साथ इस बात को मानता है कि प्रत्येक मनुष्य को नीति का पालन करना चाहिये। यदि नीति को भंग किया जायगा तो संसार की सब योजनाएँ छिन्न-भिन्न हो जायेंगी और मानव जाति को बड़ी भारी हानि उठानी पड़ेगी।
नीति पर चलने का मुख्य परिणाम यह होता है कि उससे हम अच्छे विचारों को ग्रहण कर लेते हैं। दुनिया के अधिकाँश शास्त्र तो यह बतलाते हैं कि “दुनिया कैसी है?” पर नीति शास्त्र बतलाता है कि “दुनिया कैसी होनी चाहिये?” इससे इस बात की जानकारी होती है कि मनुष्य को किस प्रकार का आचरण करना चाहिये? मनुष्य के हृदय में दो खिड़कियाँ हैं। एक में से उसे दिखाई देता है कि वह खुद कैसा है और दूसरी में से दिखाई देता है कि उसे कैसा होना चाहिये।
मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह शरीर, मन और मस्तिष्क, इन तीनों की अलग-अलग जाँच करे, परन्तु उसे इतने पर ही निर्भर न रह जाना चाहिये। यदि वह केवल जाँच पर ही निर्भर रह जाय तो उसने जो कुछ ज्ञान-लाभ किया है उससे वह कुछ लाभ नहीं उठा सकता। उसे जानना चाहिये कि अन्याय, दुष्टता, अभिमान आदि के कैसे दुष्परिणाम होते हैं। इतना ही नहीं, उसे यह भी जानना चाहिये कि इन तीनों के एकत्र मिल जाने से कैसी खराबियाँ होती हैं। केवल इनको जानकर बैठने से ही कुछ लाभ नहीं है। तदनुसार आचरण भी करना चाहिये। नीति का विचार मकान के नक्शे जैसा है। नक्शा बतलाता है कि घर किस तरह बनाना चाहिये, पर जिस प्रकार नक्शे के अनुसार मकान न चिनवाने पर नक्शा व्यर्थ हो जाता है-उसका कोई उपयोग नहीं होता-उसी भाँति नीति के विचारों के अनुसार जो आचरण न किया गया हो तो नीति के विचार भी व्यर्थ हो जाते हैं। बहुत से मनुष्य नीति के वाक्य याद करते हैं, उन पर भाषण देते हैं और बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, परन्तु वे उसके अनुसार चलते नहीं और चलने की इच्छा भी नहीं रखते। और कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि नीति के विचार इस दुनिया में आचरण करने के लिये नहीं होते, मरने के बाद जिस दुनिया में हम जाते हैं उसमें करने के लिये होते हैं। मगर उनका यह कथन प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। एक विचारक व्यक्ति ने कहा है कि “हमें सम्पूर्ण मनुष्य बनना हो तो आज ही से-चाहे जितना कष्ट उठाकर भी नीति के अनुसार आचरण करने लग जाना चाहिये। ऐसे विचारों से हमें भड़कना नहीं चाहिये, किन्तु अपनी जवाबदारी समझ कर उसके अनुसार चलने में प्रसन्नता माननी चाहिये।
ईश्वर सर्व शक्तिमान है-सम्पूर्ण है। उसके स्नेह की, उसकी दया की और उसके न्याय की कोई सीमा नहीं। यदि ऐसा है तो हम जो उसके बंदे-सेवक गिने जाते हैं, कैसे नीति मार्ग को छोड़ सकते हैं? नीति मार्ग पर चलने वाले को सफलता न हो तो उसमें नीति का कोई दोष नहीं है, किन्तु दोष उसी का है जिसने नीति का भंग किया है। नीति-मार्ग पर चल कर जो नीति की रक्षा की जाती है वह इसलिये नहीं कि उसका बदला मिले। मनुष्य शाबाशी के लिये भलाई नहीं करता है, बल्कि इसलिये करता है कि वह भलाई किये बिना रह नहीं सकता। उसके लिये भोजन और कार्य की तुलना करने पर अच्छा कार्य ही उच्च प्रकार का भोजन प्रमाणित होगा। उसको यदि कोई दूसरा मनुष्य भलाई करने का मौका देता है तो वह उसका उपकार मानता है, जिस प्रकार कि भूखा मनुष्य भोजन देने वाले को आशीर्वाद देता है।
ऊपर जिस नीति-मार्ग के विषय में कहा गया है, वह मार्ग ऐसा नहीं है जिससे दिखाऊ मनुष्यता प्राप्त की जाय। उसका अर्थ यह भी नहीं है कि विशेष परिश्रमी बनना, विशेष शिक्षा प्राप्त करना, विशेष स्वच्छ रहना आदि। ये सब बातें तो उसमें आ ही जाती हैं, इनका आचरण मात्र नीति की सरहद पर पहुँचने के समान है। इसके सिवा भी इस मार्ग में मनुष्य के करने लायक बहुत कुछ रह जाता है, और वह कर्त्तव्य रूप से रहता है इसलिये कि वैसा करना मनुष्य का स्वभाव है। वह उसे यह समझ कर नहीं करता कि उससे उसे कुछ लाभ उठाना है।
(स्वामी रामतीर्थ जी)
हमारे देश में सबसे बड़ी चीज धर्म ही मानी जाती है। विद्वानों और महात्माओं की तो बात ही छोड़ दीजिये, साधारण घास छीलने वाला खेतिहर और बोझ ढोने वाला मजदूर भी ‘धरम’ का बड़ा ध्यान रखते हैं और जो कार्य धर्म-विरुद्ध बतलाया जाय उसे करने को कभी तैयार नहीं होते। पर खेद है कि अज्ञानवश वे धर्म के वास्तविक स्वरूप को भूल गये हैं, इसलिए धर्म द्वारा अपना कल्याण करने के बजाय वे प्रायः हानि ही उठाते रहते हैं, ठगे और लूटे जाते हैं। वे धर्म को अधिकाँश में परलोक में लाभ पहुँचाने वाला कार्य मानते हैं और इस कारण इस लोक में प्रायः उनको कठिनाइयाँ ही सहन करनी पड़ती हैं। वह सब हमारे ही भ्रम का परिणाम है। जिनका अगर हम यह समझ लें कि, धर्म वही है जिसका परिणाम हमारे और दूसरों के लिए इस दुनिया में ही कल्याणकारी दिखलाई पड़े, तो अनेक कठिनाइयों और हानिकारक रूढ़ियों से बच सकते हैं। इस सम्बन्ध में स्वामी रामतीर्थ जी के उपदेश बड़े मार्मिक हुआ करते थे, जिनका कुछ अंश यहाँ दिया जाता है।
एक मनुष्य ने कुछ धन जमीन में गाड़ रखा था। उसके लड़के को मालूम हो गया। लड़के ने जमीन खोदकर धन निकाल लिया और खर्च कर डाला; किन्तु तोलकर उतने ही वजन के पत्थर वहाँ रख छोड़े। कुछ दिन के बाद जब बाप ने जमीन खोदी और रुपया न पाया तो रोने लगा- “हाय। मेरी दौलत कहाँ गई?” लड़के ने कहा-”पिताजी, रोते क्यों हो? आपको उसे काम में तो लाना ही न था और रख छोड़ने के लिए देख लो, उतने ही तोल के पत्थर वहाँ मौजूद हैं।”
धार्मिक वाद-विवाद और झगड़े जो होते हैं, वे उधार धर्म पर होते हैं। नकद धर्म वह है जो मरने के बाद नहीं, किन्तु वर्तमान जीवन से सम्बन्ध रखता है। उधार धर्म अन्ध-विश्वास पर निर्भर होता है। उधार धर्म कहने के लिए है, नकद धर्म करने के लिए। धर्म के उस भाग पर जो नकद है, सब धर्म सहमत हैं। “सत्य बोलना, विद्या अध्ययन करना और उसे आचरण में लाना, स्वार्थ से रहित होना, दूसरे के धन आदि को देख कर अपना चित्त न बिगाड़ना, संसार के लालच और धमकियों के जादू में आकर वास्तविक स्वरूप को न भूलना, दृढ़चित्त और स्थिर स्वभाव होना, इत्यादि” इस नकद धर्म पर कहीं दो मत नहीं हो सकते। उधार के दावे बाद-विवाद करने की प्रीति रखने वाले लोगों को सौंपकर स्वयं वर्तमान कर्त्तव्य, नकद धर्म पर चलने वाले ही उन्नति करते और वैभव को पाते हैं।
भारतवर्ष और अमेरिका में क्या भेद है? यहाँ दिन है तो वहाँ रात है। वहाँ दिन है तो यहाँ रात। जिन दिनों हिन्दुस्तान का सितारा ऊँचा था, अमेरिका को कोई जानता भी नहीं था। आज अमेरिका उन्नति पर है तो भारतवर्ष की कोई पूछ नहीं। हिन्दुस्तान में बाजार आदि में रास्ता बाँई ओर चलते हैं, वहाँ दाँई ओर। पूजा और सत्कार के समय यहाँ जूता उतारते हैं, वहाँ टोपी। यहाँ घरों में राज्य पुरुषों का है, वहाँ स्त्रियों का। इस देश में यह शिकायत है कि विधवा ही विधवा है उस देश में कुमारी ही कुमारी अधिक हैं। हिन्दुस्तान में गधा और उल्लू मूर्खता के चिह्न हैं, उस देश में गधा और उल्लू भलाई और बुद्धिमता के चिह्न हैं। इस देश में जो पुस्तक लिखी जाती है, वह जब तक आधी के लगभग पहले के विद्वानों के प्रमाणों से न भरी हो, उसका कुछ सम्मान नहीं होता, उस देश में पुस्तक की सारी बातें नवीन न हों तो उसकी कोई कद्र ही नहीं। यहाँ किसी को कोई लाभदायक बात मालूम हो जाय तो उसे छिपा कर रखते हैं वहाँ उसे छापेखाने द्वारा प्रदर्शित कर देते हैं। यहाँ अधर्म की रूढ़ियों की उपासना अधिक है, वहाँ नकद धर्म बहुत है। हमारे यहाँ इस बात में बड़ाई है कि औरों से न मिलें, अपने ही हाथ से पका कर खायें और सबसे अलग रहें वहाँ पर जितना औरों से मिलें उतनी ही बड़ाई है। यहाँ पर अन्य देशों की भाषा पढ़ना दोष-पूर्ण समझा जाता है। वहाँ जितना अन्य देशों की भाषा का ज्ञान प्राप्त किया जाता है, उतना ही अधिक सम्मान होता है।
जब राम जापान को जा रहा था तो जहाज पर अमेरिका का एक वयोवृद्ध प्रोफेसर मित्र बन गया। वह रूसी-भाषा पढ़ रहा था। पूछने पर मालूम हुआ कि ग्यारह भाषायें वह पहले से जानता है। उससे पूछा गया-”इस उम्र में यह नवीन भाषा क्यों सीखते हो?” उसने उत्तर दिया “मैं भूगर्भ शास्त्र का प्रोफेसर हूँ। रूसी भाषा में भूगर्भ-शास्त्र की एक अनोखी पुस्तक लिखी गई है। यदि मैं उसका अनुवाद कर सकूँगा तो मेरे देशवासियों को अत्यन्त लाभ पहुँचेगा। इसलिये रूसी भाषा पढ़ता हूँ।” राम ने कहा-”अब तुम मौत के निकट हो। अब क्या पढ़ते हो? ईश्वर-सेवा करो। अनुवाद करने में क्या धरा है?” उसने उत्तर दिया-”लोक सेवा ही ईश्वर सेवा है। इसके साथ यदि यह भी मान लिया जाय कि इस काम को करते-करते मुझे नरक में जाना पड़े तो मैं जाऊँगा इसकी कुछ परवाह नहीं। अगर मुझे घोर नरक के दुःख मिलते हैं तो हजार जान से भी कबूल हैं, यदि भाइयों को सुख और लाभ मिल जाय। इस जीवन में सेवा के आनन्द का अधिकार मैं मौत के उस पार के डर से नहीं छोड़ सकता।”
यही नकद धर्म है। भगवद्गीता में बड़ी सुन्दरता से आज्ञा दी है-कर्म तो करते ही जाओ; परन्तु फल पर दृष्टि मत रखो।
एक मनुष्य बाग लगाता था। किसी ने पूछा “बूढ़े मियाँ, क्या करते हो? तुम क्या इसके फल खाओगे? एक पाँव तो तुम्हारा पहले से ही कब्र में है।”
माली ने उत्तर दिया-”औरों ने बोया था, हमने खाया। हम बोयेंगे, दूसरे खायेंगे।”
इसी प्रकार संसार का काम चलता है। जितने महापुरुष हो गये हैं-राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ईसा, मुहम्मद इत्यादि, क्या इन महापुरुषों ने उन वृक्षों का फल स्वयं खाया था, जिसे वे बो गये थे। कदापि नहीं। इन महापुरुषों ने तो केवल अपने शरीरों को मानो स्वाद बना दिया, फल कहाँ खाये? जिन वृक्षों का फल शताब्दियों के बाद लोग आज खा रहे हैं, वे उन ऋषियों की खाक से उत्पन्न हुए हैं। यह सिद्धान्त ही धर्म का वास्तविक प्राण है।
(श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन)
परम्परा-भक्ति तथा-प्रेम ये दो बातें भारतीय दार्शनिकों के समस्त प्रयत्नों में, किसी न किसी रूप में अवश्य पाई जाती हैं। प्रत्येक दार्शनिक यह समझता है। कि उसके पूर्वजों के सिद्धान्त ही वह शिलायें हैं, जिनसे आध्यात्मिक प्रसाद निर्मित हुआ है; उनकी निन्दा अपनी ही संस्कृति की निन्दा है, उस संस्कृति की अवहेलना कभी नहीं कर सकते, भले ही उस संस्कृति के कुछ अंग ऐसे हों जो श्लाघ्य न कहे जा सकें । ये दार्शनिक बड़े परिश्रम से प्राचीन सम्प्रदाय को समझने का प्रयास करते हैं, उसमें लाक्षणिकता खोज निकालते हैं, उसे परिवर्तित एवं परिशोधित भी करते हैं क्योंकि वह लोक-भावनाओं का केन्द्र बन चुका है। परवर्ती भारतीय आचार्य पूर्वगामी दार्शनिकों के विश्व के सम्बन्ध में निश्चित किये हुये विविध सिद्धान्तों का समर्थन करते हैं और उन सबको ही सत्य का, भिन्न-भिन्न मात्रा में, दिग्दर्शक माने जाते हैं। यह नहीं माना जाता कि विभिन्न सम्प्रदाय यथार्थतः एक अज्ञात प्रदेश में मानव-मस्तिष्क के असम्बद्ध अभियान अथवा दार्शनिक विचित्रताओं का संग्रह हैं। वे सब उस एक ही मस्तिष्क से निकले माने जाते हैं जिसने इस महान मन्दिर का निर्माण किया है यद्यपि उस मन्दिर में अनेक दीवारें, अनेक देहलियाँ, अनेक मार्ग और खम्भे हैं।
न्याय तथा विज्ञान में, दर्शन तथा धर्म में, प्राकृतिक सम्बंध है। विचारों की उन्नति का प्रत्येक नूतन युग न्याय के सुधार से ही प्रारम्भ होता है। पद्धति की समस्या का विशेष मूल्य है क्योंकि इसमें मानव-विचार की प्रकृति का खास ज्ञान सन्निहित है। न्याय-दर्शन हमें यह बताता है कि कोई भी चिरस्थायी दर्शन बिना तर्क-शास्त्र के आधार के नहीं बन सकता। वैशेषिक चेतावनी देता है कि प्रत्येक सफल दर्शन के लिए भौतिक प्रकृति की रचना प्रणाली का ज्ञान नितान्त अपेक्षित है। हम हवाई किला नहीं बना सकते। यद्यपि दर्शन तथा भौतिक विज्ञान दो भिन्न-भिन्न शास्त्र हैं, जो कभी एक नहीं हो सकते, फिर भी दार्शनिक योजना को प्रकृति-विज्ञान के निष्कर्षों से समंजसता रखनी होगी। किन्तु जो बातें भौतिक जगत के सम्बन्ध में सत्य हैं, उन्हें यदि हम अधिक व्यापक मानकर सम्पूर्ण विश्व पर आरोपित कर दें तो हम वैज्ञानिक दर्शन का प्रचार करने के दोषी ठहराये जायेंगे। साँख्य-शास्त्र इस खतरे से बचने के लिये हमें सावधान करता है। प्रकृति की समस्त शक्तियाँ चेतना के उत्पादन में असमर्थ हैं। वैज्ञानिक तथा मनोवैज्ञानिक दार्शनिकों की भाँति प्रकृति अथवा चेतना को हम एक दूसरे के रूप में परिवर्तित नहीं कर सकते। सत्य का दर्शन हमें विज्ञान तथा मानव जीवन में ही नहीं मिलता वरन् धार्मिक अनुभूति में भी मिलता है और यह अनुभूति ही योग-दर्शन का विषय है। पूर्व मीमाँसा और वेदांत आचरण तथा धर्म पर विशेष जोर देते हैं। बाह्य प्रकृति तथा मानव मस्तिष्क का सम्बन्ध-ज्ञान ही वेदाँत-दर्शन का महत्वपूर्ण विषय है। जो कहा गया था कि ऋषि लोग एक दूसरे का विरोध नहीं करते वह दर्शनों के सम्बन्ध में भी सच है। न्याय-वैशेषिक यथार्थवाद साँख्य-योग द्वैतवाद तथा वेदान्त के अद्वैतवाद में सत्य एवं असत्य का नहीं, कम सत्य एवं अधिक सत्य का अन्तर है। वे तो क्रमशः मन्दाधिकारी, मध्यमाधिकारी एवं उत्तमाधिकारी की आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से निर्मित हुए हैं। एक ही मूल पाषाण को काट-छाँट कर विभिन्न सम्प्रदायों का निर्माण किया गया है, सब का मूलाधार एक, भेद रहित, पूर्ण एवं अन्य अपेक्षा रहित है। विश्व-सम्बन्धी कोई भी ज्ञान तब तक पूर्ण नहीं हो सकता जब तक उसमें न्याय तथा भौतिक विज्ञान, मनोविज्ञान तथा नीतिशास्त्र, दर्शन तथा धर्म के विभिन्न पहलू नहीं हैं। जितने दार्शनिक सम्प्रदायों का जन्म भारत में हुआ है, उनमें से प्रत्येक ने अपना स्वतंत्र तत्त्व-मीमाँसा शास्त्र, प्रकृति तथा आत्मा का सम्बन्ध निर्देश एवं नीति तथा धर्म-शास्त्र का विधान किया है। प्राकृतिक विज्ञान की संरक्षता में जगत-सम्बन्धी हमारा ज्ञान बहुत उन्नति कर चुका है और अब हम जीवन के किसी सीमित दृष्टिकोण से ही संतुष्ट नहीं हो सकते। भविष्य में जो दार्शनिक प्रयास किये जायेंगे उनको मनोविज्ञान एवं प्राकृतिक विज्ञान के नवीनतम अनुसन्धानों से सम्बन्ध स्थापित करने की जरूरत होगी।
दर्शन का काम जीवन को व्यवस्थित करना तथा उसे मार्ग प्रदर्शित करना है। दर्शन, जीवन के नेतृत्व को ग्रहण कर, संसार के अनेक परिवर्तनों एवं परिस्थितियों में से होकर रास्ता दिखाता है। जब तक दर्शन जीवित रहता है, वह लोक-जीवन से दूर नहीं जाता। दार्शनिकों के विचार उनकी व्यक्तिगत जीवन-चर्या से ही विकसित होते हैं। हमें उसके प्रति केवल श्रद्धा ही नहीं रखनी है प्रत्युत उस भावना की प्राप्ति भी करनी है। वशिष्ठ तथा विश्वामित्र, याज्ञवलक्य तथा गार्गों, बुद्ध तथा महावीर, गौतक तथा कणाद, कपिल तथा पतंजलि, वादरायण और जैमिनि केवल इतिहासकारों के विषय मात्र नहीं हैं, वे व्यक्तित्त्व के भिन्न-भिन्न प्रकार भी हैं। उनके लिए दर्शन, विचारों तथा अनुभव पर आधारित संसार सम्बन्धी एक दृष्टिकोण है। भलीभाँति मनन किये हुए विचार ही जीवन रूपी सर्वोच्च परीक्षा में व्यवहृत एवं परीक्षित होकर धर्म बन जाते हैं। दर्शन का अभ्यास धर्माचरण की पूर्ति करना भी तो है।
(श्री रामदास गौड़)
महापुराण और अन्य अनेक प्राचीन शास्त्रों में कहा गया है कि त्रेतायुग में केवल एक ही वेद था- यजुर्वेद। ‘यजुर्वेद’ में मुख्य रूप से यज्ञों का विधान है और यही कारण है कि उस काल में सर्वत्र यज्ञों की बात ही सुनने में आती थी और यज्ञ-कर्म की ही प्रधानता थी। हरिशचन्द्र को पुत्र चाहिये तो वे यज्ञ करते हैं, त्रिशंकु स्वर्ग जाना चाहते हैं तो उनको भी यज्ञ का आश्रय लेना पड़ता है, दशरथ को पुत्रों की अभिलाषा है तो वशिष्ठ जी पुत्रेष्टि यज्ञ की व्यवस्था करते हैं। इतना ही नहीं ऋषियों के यज्ञों में विघ्न डालने वाले रावण, मेघनाद जैसे राक्षस भी अपनी विजय के लिये यज्ञ करते थे। राज्याभिषेक यज्ञ से होता था, और रामचन्द्रजी का विवाह भी धनुष यज्ञ से हुआ प्रत्येक प्रतापशाली राजा अश्वमेध यज्ञ करके सार्वभौम का पद पाने की अभिलाषा करता था। इस प्रकार ‘यजुर्वेद’ यज्ञ-कर्म का ही वेद है। ऋग्वेद के मंत्र यज्ञ में काम आते हैं, सामवेद के मंत्रों का यज्ञ में गान होता है, व्यक्तिगत अभिलाषाओं के यज्ञों में अथर्ववेद के मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इस दृष्टि से ‘यजुर्वेद’ का प्रभाव और सर्वग्राह्यता स्पष्ट है।
‘यजुर्वेद’ के दो संस्करण या दो पाठ हैं। एक का नाम ‘शुक्ल यजुर्वेद’ है और दूसरे का नाम ‘कृष्ण यजुर्वेद’ है। शुक्ल यजुर्वेद में 15 शाखाएँ हैं- काणव, माध्यंदिन, जाबाल, बुधेय, शाकेय, तापनीय, कापीस, पौड्रवहा, आवर्तिक, परमावर्तिक, पाराशरीय, वैनेय, बौधेय और गालव। इन समस्त शाखाओं को एकत्रित रूप में वाजसनेयी शाखा भी कहते हैं। शुक्ल यजुर्वेद संहिता में कुल मिलाकर 1990 मंत्र हैं। इस से चार गुना अधिक इसके ‘ब्राह्मण’ ग्रन्थ का परिमाण है।
‘कृष्ण यजुर्वेद’ का दूसरा नाम तैत्तिरीय संहिता है। इसमें काठक, कपिस्थल-कंठ, मैत्रायणी और तैत्तिरीय- ये चार शाखायें हैं। शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद में कहीं-कहीं पाठभेद है, पर मुख्य भेद उच्चारण का है। वेद मंत्रों में उच्चारण की ही प्रधानता होने से गुरुमुख से श्रवण करना अनिवार्य था। इस प्रणाली के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने से कई सौ या हजारों वर्षों में भेद पड़ जाना कुछ आश्चर्य की बात न थी। दोनों पाठों में ऋचाएँ वहीं हैं, गद्य और पद्य दोनों अंश एक से ही हैं परन्तु विषयक्रम और उच्चारण में अन्तर हो जाने से दो अलग-अलग शाखायें बन गई हैं। इस परम्परा-भेद के साथ देश-भेद होना भी अनिवार्य था और भारतवर्ष जैसे विशाल देश में यह बात स्वाभाविक भी थी। आज यह बात प्रसिद्ध है कि बंगाल सामवेदी, मध्यप्रदेश यजुर्वेदी और महाराष्ट्र आदि दक्षिण देश ऋग्वेदी हैं। अर्थात् इन देशों में इन वेदों की प्रधानता है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि और वेदों की परम्पराओं वाले लोग इन देशों में नहीं रहते।
‘शुक्ल यजुर्वेद संहिता’ में चालीस अध्याय हैं, जिनमें से उन्तालीस अध्याओं में तो यज्ञों का वर्णन है और चालीसवें अध्याय में समस्त संहिता का उपसंहार है, जिसे ‘ईशावास्योपनिषद्’ भी कहते हैं। नीचे हम यजुर्वेद के इन उन्तालीस अध्यायों में वर्णित मुख्य-मुख्य विषयों का उल्लेख करते हैं जिससे पाठक को इस संहिता के स्वरूप का सामान्य परिचय मिल जायगा।
(1) पहले अध्याय में ये विषय दिये गये हैं- अमावस और पूर्णिमा के यज्ञों का विधान, वत्सों का लगाना, दूध दुहना, दूध की शुद्धि, त्याग-व्रत, चावलों का पिण्ड अग्नि को, हविष्यान्न, यज्ञ के लिये जल लाना और पवित्र करना, कृष्ण मृग-चर्म को बिछाना, अन्न कूट कर पाक करना, पाषाण का मृगछाला पर रखना, हविष्यान्न का विभाग, असुर अररुका-निवारण, वेदी के तीनों और रेखायें खींचना, प्रेतों-पिशाचों का निवारण, यजमान-पत्नी का ग्रन्थि बंधन।
(2) दूसरे अध्याय में समिधा, वेदी और कुशों का मार्जन, कुशों पर प्रस्तर संनिधान, समिधा को वेदी पर रख कर अग्नि का आरम्भ, असुरों का निवारण, प्रस्तर और युवाओं का रखना, अग्नि को होता नियुक्त करना, यज्ञ रक्षार्थ प्रार्थना, समिधा का अभिषेक और अग्नि निक्षेप, यजमान-पत्नि की ग्रन्थि खोलना, वेदी का जल सिंचन, राक्षसों का भाग, विष्णु-त्रिविक्रम, व्रत समाप्ति, पिण्ड, पितृयज्ञ, प्रेत निवारणार्थ रेखा खींचना, पितरों के लिये सूत, ऊन या केश का वस्त्रार्थ प्रदान, यजमान पत्नी का पुत्रार्थ मंत्रोच्चारण, हविष्यान्न पर जलधारा।
(3) अन्याधान, अग्निहोत्र, प्रातः तथा सायं का गोदोहन, गार्हपत्य अग्निपूजन, गोगुण-गान, गार्हपत्य तथा आह्वनीय अग्नियों का पूजन, अग्नि पुरिष्यका पूजन, पाक्षिक-यज्ञ, यजमान की दीक्षा, पत्नी की दीक्षा यजमान का यज्ञार्थ मुँडन।
(4)सोमयाग, आपसुदीक्षा औदग्रभण, कटिबन्धन, कृष्ण मृगशिर बन्धन, वृतान्नपाक, गोक्रम, सोमस्तुति, सोमक्रम, सोम प्रवेश।
(5) सोमातिथ्य, आह्वान, सोमाध्यापन, सोमवेदी की तैयारी और कुण्ड के चतुष्कोण अभिषेचन, हविर्धान का निर्माण, होत्र्याधान का निर्माण, धिष्णाधिका निर्माण, होत्र्याधन का आवरण, सोमकुण्ड, सोम पत्रादि का रखना, कृष्णसार चर्म पर सोम की स्थापना, पशु-यज्ञ, पूर्व-निर्माण।
(6) यूप (खंभे) को खड़ा करना, बालिपशु का बन्धन तथा बध, माँस वलि, विभक्ताँश का पुनः संयोग, पुनरुज्जीवित पशु का स्वर्ग गमन, सोमयाग।
(7-8) ग्रह, ग्रहण, उपाँशुग्रह, अन्तर्याम ग्रह, मैत्रावरुण प्रह, आश्रित ग्रह, शुद्धग्रह, मन्थन ग्रह, ऋतुग्रह, मरुतीय ग्रह, माहेन्द्रग्रह, दक्षिणा होम, साँय ग्रहण, आदित्यप्रद, सावित्रीग्रह, महाब्रत्याग्रह, रात्रोत्थाना।
(9-10) वाजपेय, सोमग्रह, सुरग्रह, घोड़ों का मार्जन और जोतना, दुन्दुभिवाद, यजमान का राज्याभिषेक, राजसूय, प्रारम्भिक तर्पण, राजाभिवादन, अभिषेक जल-संग्रह, व्याघ्रचर्म प्रसारण, तीनों वाणों का प्रदान, राजागमन यजु, अभिषेचन, गोग्रहण, रथ विमोचनीय।
(11-16) अग्निचयन, मृत्तिका-ग्रहण, खनन, गार्ह्यपत्य निर्माण, भूशोधन, इष्टिकानयन, सीताकरण, जल सिंचन, अग्निस्तवन, कमलखण्ड, हिरण्यस्तवन, इष्टिका, कूर्म, मुसल-ऊखल, अपूर्ण कुण्ड यजन गाहपत्यानि।
(17) वेदी पर अधिकार, वेदी पर आरोहन, अग्नि का आवाहन, मधुपर्क, अग्निस्तवन, इन्द्रस्तवन, श्वेत वत्स वाली श्यामा गौ के दुग्ध से तर्पण घृत प्रशंसा।
(18-21) अश्विनीकुमार, इन्द्र और सरस्वती को दूध, यजमान की शुद्धि, सुरा का परिवर्तन, दक्षिणाग्नि में सुरा का हवन, पितरों का सावन, शताछिद्र सुराधार, यजमान का प्रसादपान, इन्द्र की पुनरुत्पत्ति, यज्ञ में इन्द्र का आवाहन. अश्विनीकुमारों और सरस्वती का स्तवन, वरुण-स्तवन, मित्रावरुण का हवन।
(22 से 29) वें अध्याय तक अश्वमेध यज्ञ का विधान है। 30 और 31 में पुरुषमेध का वर्णन है- फिर उसके लिये उपयुक्त उन स्त्रियों और पुरुषों का वर्णन है जो विविध देवताओं के लिये बलि दिये जा सकते हैं। 32 और 33 में सर्वमेध यज्ञ का विधान है। 34 में साधारण यज्ञों के विधान हैं और 35 में अंत्येष्टि संस्कार के समय होने वाले पितृयज्ञ मंत्र हैं। 36 से 38 तक महावीर की यात्रा. धेन्वावाहन दोहन, महावीराभिषेक, महावीर के रूप में अग्नि स्तवन, देवताओं का महावीर द्वारा प्रतिनिधित्व, सातों मरुतों के नाम, विविध देवताओं की पूजा आदि है।
यजुर्वेद में ऋग्वेद के 1000 मंत्र और अथर्व वेद के बहुत से मंत्र जगह-जगह आये हैं। पश्चिमी विद्वानों का मत है कि यजुर्वेद में ये मंत्र इन दोनों वेदों से ग्रहण किये गये हैं। पर भारतीय विद्वान इसे स्वीकार नहीं करते वे चारों वेदों को एक ही स्त्रोत से उत्पन्न अनादि मानते हैं। मंत्रों का विभाजन बाद के विद्वानों ने सुविधानुसार किया है।
(स्वामी विवेकानन्द)
एक भाव हिन्दू-धर्म में संसार के अन्य धर्मों की अपेक्षा विशेष है। उसके प्रकट करने में ऋषियों ने संस्कृत भाषा के प्रायः समग्र शब्द-समूह को निःशेष कर डाला है। वह भाव यह है कि “मनुष्य को इसी जीवन में ईश्वर की प्राप्ति करनी होगी।” अद्वैत मत के ग्रंथ अत्यंत प्रमाणयुक्त तर्क के साथ इसमें इतनी बात और जोड़ देते हैं कि-”ईश्वर को जानना ईश्वर हो जाना है।”
इस भाव से वह उदार और अत्यन्त प्रभावशाली मत प्रकट होता है- जो न केवल वैदिक ऋषियों द्वारा घोषित हुआ है, जिसे न केवल विदुर और धर्म व्याध आदिकों ने ही कहा है, वरन् अभी कुछ समय पूर्व दादूपंथी सम्प्रदाय के त्यागी संत निश्चलदास ने भी अपने ‘अपने सागर में’ स्पष्टतापूर्वक कहा है-
जो ब्रह्मविद् वही ब्रह्म ताकी वाणी वेद। संस्कृत और भाषा में करत भरम का छेद॥
इस प्रकार द्वैतवादियों के मत के अनुसार ईश्वर का साक्षात्कार करना, या अद्वैतवादियों के कहने के अनुसार ब्रह्म हो जाना-यही वेदों समस्त उपदेशों का एकमात्र लक्ष्य है। उनमें जो अन्यान्य उपदेश दिये गये हैं वे इसी लक्ष्य की ओर प्रगति के लिये सोपान स्वरूप हैं। भाष्यकार भगवान शंकराचार्य की महिमा यही है कि उनकी प्रतिभा ने व्यास के भावों की ऐसी अपूर्व व्याख्या प्रकट की।
निरपेक्ष रूप से केवल ब्रह्म ही सत्य है। सापेक्ष सत्य की दृष्टि से भारतवर्ष और अन्य देशों के सभी विभिन्न मत उसी ब्रह्म के भिन्न-भिन्न रूपों के आधार पर बने होने के कारण सत्य हैं। बात केवल यही है कि कुछ मत, और अन्य मतों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ हैं। और जब वेद ही उस सत्य निर्विशेष ब्रह्म की शिक्षा देने वाले एकमात्र शास्त्र हैं, और ईश्वर संबंधी अन्य सब मत केवल उसी के छोटे मर्यादित दर्शनमात्र हैं, जबकि ‘सर्वलोक हितैषिणी’ श्रुति भगवती धीरे से भक्त का हाथ पकड़ लेती है, और एक श्रेणी से दूसरी में, और क्रमशः अन्य सभी श्रेणियों में से जहाँ-जहाँ से पार होना आवश्यक है वहाँ से ले जाकर उस निर्विशेष ब्रह्म तक पहुँचा देती है, तब यह कहना सर्वथा संगत ही है कि संसार के सभी धर्म, मतमतान्तर उसी नामरहित, सीमारहित, नित्य वैदिक धर्म के अंतर्गत हैं।
सैकड़ों जीवन तक लगातार प्रयत्न कीजिये, युग तक अपने जीवन के अन्तस्तल को खोजिये-तो भी आपको एक भी ऐसा उदार धार्मिक विचार दिखाई नहीं देगा जो कि आध्यात्मिकता की उस अनन्त खान (वैदिक-धर्म) में पहले से ही समाविष्ट न हो।
अब हिन्दुओं की मूर्ति-पूजा कही जाने वाली तथाकथित प्रथा को लीजिये। प्रथम तो आप उसी पूजा के विभिन्न प्रकारों को सीखिये और यह निश्चय कीजिये कि वे उपासक यथार्थ में पूजा कहाँ कर रहे हैं-प्रतिमा में, मंदिर में या अपने देह-मंदिर में? पहले यह तो निश्चय कर लीजिये कि वे क्या कर रहे हैं? (क्योंकि निन्दा करने वालों में से 90 प्रतिशत से अधिक लोग इस बात को नहीं जानते।) तब वेदान्त दर्शन की दृष्टि से यह बात अपने आप समझ में आ जायगी।
फिर भी हम कहेंगे कि ये कर्म अनिवार्य रूप से आवश्यक नहीं है। मनुस्मृतिकार ने प्रत्येक मनुष्य के लिये चतुर्थ आश्रम ग्रहण करने की आज्ञा दी है। चाहे वह वैसा करे या न करे उसे सभी का त्याग तो करना ही चाहिये।
यूरोप और अमरीका में ईसाई पादरियों ने समाज का जो चित्र खींचा है वह अत्यंत ही वीभत्स और डरावना है। वे भारतीय समाज का कुत्सित, पर काल्पनिक चित्र खींचकर वहाँ की जनता से भारत में ईसाई-धर्म का प्रचार करने के लिये चन्दा वसूल करते हैं। पर मैं अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि जैसा पादरी लोग कहते हैं उसके अनुसार न तो हम भारतवासी ‘राक्षस’ हैं और न वे लोग ‘देवता’ ही माने जा सकते हैं। पादरी लोग भारत के नैतिक पतन, बालहत्या, हिन्दू विवाह पद्धति के दोषों के सम्बन्ध में जितना कम बोलें उतना ही उनके लिये भला है। हम कई देशों के ऐसे यथार्थ चित्र खींच सकते हैं, जिनके सामने पादरियों द्वारा खींचे हुये हिन्दू समाज के सभी काल्पनिक चित्र फीके पड़ जायेंगे। परन्तु मेरे जीवन का उद्देश्य वैतनिक धर्म-प्रचारक बनने का नहीं है। हिन्दू-समाज सर्वथा निर्दोष है, ऐसा दावा और कोई करे तो करे, मैं तो कदापि न करूंगा। अपने समाज की त्रुटियों की जानकारी मुझे औरों की अपेक्षा अधिक है। परन्तु तो भी मैं इन विदेशी मित्रों (पादरियों) से कह देना चाहता हूँ कि यदि आप सच्ची सहानुभूति के साथ सहायता देने के लिये आते हैं, तो ईश्वर आप को सफल बनाये। परन्तु यदि आप इस दलित राष्ट्र के मस्तक पर समय-कुसमय सतत गालियों की बौछार करके अपने निज राष्ट्र की नैतिक श्रेष्ठता की घोषणा करना आपका उद्देश्य है, तो मैं आपको साफ-साफ बतला देना चाहता हूँ कि यदि आज भी किंचित न्याय के साथ तुलना की जायगी तो नैतिक आचार में हिन्दू लोग संसार की अन्य जातियों की अपेक्षा अत्यधिक उन्नत पाये जायेंगे।
भारत में धर्म पर प्रतिबन्ध नहीं रखा गया था। किसी भी मनुष्य को अपने इष्टदेव या सम्प्रदाय या गुरु के चुनने में कोई रोक-टोक नहीं की जाती थी। इसी कारण यहाँ धर्म की जैसी वृद्धि हुई वैसी कहीं नहीं हुई थी।
दूसरी ओर यह हुआ कि धर्म के इन असंख्य भेदों में सामंजस्य रखने के लिये एक स्थिर बिन्दु की आवश्यकता हुई और भारतवर्ष में समाज ही एक ऐसा बिन्दु माना गया। परिणामस्वरूप समाज कड़ा और कठोर तथा लगभग अचल बन गया। कारण यह है कि स्वाधीनता ही उन्नति का एकमात्र उपाय है।
इसके विपरीत पश्चिमी देशों में विभिन्न भावों के विकास का क्षेत्र, समाज रखा गया और स्थिर बिन्दु या धर्म। मतैक्य ही योरोपीय धर्म (और इस्लाम आदि का भी) मूलमन्त्र बन गया और अभी भी है। इसलिये प्रत्येक धार्मिक परिवर्तन के फलस्वरूप वहाँ रक्त की नदियाँ बह गई। परिणामस्वरूप वहाँ सामाजिक-संगठन तो अपूर्व है, परन्तु धर्म अत्यन्त स्थूल जड़वाद से आगे नहीं बढ़ सका।
आज पश्चिमीय देश तो अपनी भौतिक आवश्यकताओं के विषय में जागृत हो रहे हैं और पूर्व के आध्यात्मवादियों का मूलमंत्र ‘मनुष्य का सच्चा स्वरूप’ और ‘आत्मा’ हो गया है। भारतीय दर्शन का विद्यार्थी जानता है कि वायु किधर से बह रही है, पर इसमें चिन्ता की कोई बात नहीं। शक्ति कहीं से भी आये, जब तक वह नव-जीवन का संचार करती है, तब तक कोई चिन्ता की बात नहीं।
जिन लोगों ने भारत की इस धर्म-प्रधान भावना को नष्ट करने का प्रयत्न किया या कर रहे हैं, वे हमारे समाज के यथार्थ रहस्य को नहीं समझते थे। उतावली में उन्होंने हमारे समाज के समस्त दोषों का उत्तरदायित्व धर्म के मत्थे मढ़ दिया, पर धर्म की इस अचल-चट्टान से टकरा कर स्वयं उनका ही अस्तित्व समाप्त हो गया।
वह भारत जो प्राचीन काल से सभी उदात्तता, नीति और आध्यात्मिकता का जन्म स्थान रहा है, वह देश जिसमें ऋषिगण विचरण करते रहे हैं, जिस भूमि में देवतुल्य-मनुष्य अभी भी जागृत और जीवित हैं, क्या कभी मर सकता है? यदि ऐसा हो जाय, तब तो संसार से सारी आध्यात्मिकता का समूल नाश हो जायगा। सारे सदाचारपूर्ण आदर्श-जीवन का अस्तित्व मिट जायेगा। धर्मों के प्रति सारी मधुर सहानुभूति नष्ट हो जायेगी और सारी भावुकता का भी लोप हो जायगा, और उसके स्थान पर कामदेव रूपी देव तथा विलासिता रूपी राज्य करेंगे। धन उनका पुरोहित होगा। प्रतारण, पाशविक बल, प्रतिद्वन्दिता, ये ही उनकी पूजा-पद्धति होगी और मानव आत्मा उनकी बलि सामग्री हो जायगी। ऐसी दुर्घटना कभी हो नहीं सकती। क्रियाशक्ति की अपेक्षा सहन-शक्ति कई गुना अधिक बड़ी होती है। प्रेम का बल घृणा के बल की अपेक्षा अनन्त गुना अधिक है। यही कारण है कि जहाँ आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के प्रभाव से पश्चिमी धर्मों के किले टूट-टूट कर धूल में मिल गये, जबकि आधुनिक विज्ञान के हथौड़े की चोटों ने उन मतों को चीनी के बर्तनों की तरह चूर-चूर कर दिया और पश्चिम के अधिकाँश विचारशील लोगों ने ‘चर्च’ से अपना सम्बन्ध तोड़कर स्वतंत्र मतों को अपना लिया, वहाँ वेद रूपी ज्ञान के झरने से जीवनामृत पीने वाले हिन्दू और बौद्ध-धर्म पुनर्जीवित होकर संसार को आध्यात्मिकता और मुक्ति का मार्ग दिखला रहे हैं, और संसार के सभी धर्म-प्रेमी इन्हीं की ओर चले आ रहे हैं।
(श्री बी.आर. अम्बेडकर)
सामाजिक सुधार का मार्ग, कम से कम भारत में, मोक्षमार्ग के सदृश्य, अनेक कठिनाइयों से भरा पड़ा है। भारत में समाज-सुधार के मित्र थोड़े और समालोचक बहुत हैं। एक समय था जब कि सभी विचारशील यह स्वीकार करते थे कि सामाजिक उन्नति के बिना अन्य क्षेत्रों में भी स्थायी प्रगति सम्भव नहीं है। तब लोग यह मानते थे कि कुरीतियों के कारण जो हानि हुई है उसके फलस्वरूप हिन्दू-समाज में दक्षता की कमी हो गई है, इसलिये इन कुरीतियों के मूलोच्छेदन के लिये निरन्तर प्रयत्न होना चाहिये। इसी विचारधारा ने ‘इण्डियन नेशनल काँग्रेस’ के साथ-साथ ‘सोशल-कान्फ्रेंस’ को भी जन्म दिया था। काँग्रेस देश के राजनैतिक-संगठन की कमजोरियाँ दिखलाती थी और सोशल-कान्फ्रेंस हिन्दुओं के सामाजिक संगठन की त्रुटियों को मिटाने का यत्न करती थी। पर इन दोनों में शीघ्र ही मतभेद उत्पन्न हो गया और राजनैतिक नेता कहने लगे कि राजनैतिक सुधारों के लिये सामाजिक -सुधारों का होना अनिवार्य नहीं है। इस विवाद में काँग्रेस की जीत हुई और कुछ वर्षों में सोशल-कान्फ्रेंस का अस्तित्व मिट गया। उस अवसर पर काँग्रेस के एक प्रेसीडेण्ट श्री डब्लू. सी. बनर्जी ने कहा था- “मैं उन लोगों के साथ सहमत नहीं हूँ जो कहते हैं कि जब तक हम अपनी सामाजिक पद्धति का सुधार नहीं करते, तब तक हम राजनीतिक सुधार के योग्य नहीं हो सकते। मुझे इन दोनों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं दिखता।”
उस समय ऐसे अनेक लोग थे और अब भी हैं जो इस विषय में राजनीतिज्ञों की जीत देख कर प्रसन्न थे। पर जो लोग सामाजिक-सुधार के महत्त्व में विश्वास रखते हैं, वे पूछा करते हैं, कि क्या मि0 बनर्जी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता? इसके लिये हम अछूतों के प्रति सवर्ण हिन्दुओं के व्यवहार के कुछ उदाहरण देना चाहते हैं जिससे इस विषय को समझने में सहायता मिलेगी।
(1) अब से दो-सौ वर्ष पहले पेशवाओं के शासनकाल में, महाराष्ट्र देश में, यदि कोई सवर्ण हिन्दू सड़क पर चल रहा हो तो अछूत को वह चलने की आज्ञा नहीं होती थी, ताकि कहीं उसकी छाया से वह हिन्दू भ्रष्ट न हो जाय। अछूत को अपनी कलाई पर या गले में निशानी के तौर पर एक काला डोरा बाँधना पड़ता था, ताकि हिन्दू उसे भूल से स्पर्श न कर बैठें। पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूतों के लिये राजाज्ञा थी कि वे कमर में झाड़ू बाँध कर चलें। चलने से भूमि पर उनके पैरों के जो चिन्ह बनें उनको उस झाड़ू से मिटाते जायें, ताकि कोई सवर्ण उन पदचिह्नों पर पैर रखने से अपवित्र न हो जाय। पूना में अछूतों को गले में मिट्टी की हाँड़ी लटकाकर चलना पड़ता था, ताकि उसे थूकना हो तो उसमें थूके, क्योंकि भूमि पर उसके थूकने से यदि उस के थूक पर किसी सवर्ण का पैर पड़ गया तो वह अपवित्र हो जायेगा।
मध्य भारत में बलाई नाम की एक अछूत जाति रहती है। सन् 1928 में इन्दौर के 15 गांवों के सवर्ण हिन्दुओं ने, जिनमें वहाँ के पटेल और पटवारी भी थे, बलाइयों को सूचना दी कि यदि तुम हमारे यहाँ रहना चाहते हो तो तुमको हमारी आज्ञायें माननी होंगी। इन आज्ञाओं में बलाइयों द्वारा सब तरह की निकृष्ट सेवाएँ करने और बदले में हिन्दुओं की मर्जी के मुताबिक नाम मात्र की मजदूरी लेने की बातें थी। जब बलाइयों ने इन्हें न माना तो उनको गाँव के कुओं से पानी भरने और पशु चराने से रोक दिया गया। बलाइयों को हिन्दुओं की भूमि में से जाने से रोक दिया गया। इसलिये बलाइयों के जिन खेतों के इर्द−गिर्द हिन्दुओं के खेत थे उनमें जा सकना असम्भव हो गया। हिन्दुओं ने अपने पशु बलाइयों के खेतों में छोड़ दिये। बलाइयों ने इन अत्याचारों के विरुद्ध इन्दौर-दरबार में आवेदन-पत्र दिये। पर उनको समय पर सहायता न मिल सकी और विवश होकर उन्हें अपने बापदादों की भूमि को छोड़कर आस-पास के अन्य इलाकों में भाग जाना पड़ा।
गुजरात के अंतर्गत कविथा-ग्राम में भी ऐसी ही घटना हुई थी। वहाँ के हिन्दुओं ने अछूतों को आज्ञा दी कि तुम गाँव के सरकारी स्कूल में अपने बच्चों को भेजने का आग्रह मत करो। सवर्ण हिन्दुओं की इच्छा के विरुद्ध अपने नागरिक अधिकारों पर जोर देने का साहस करने पर बेचारे अछूतों को घोर कष्ट सहन करने पड़े। अहमदाबाद जिले के जुनू नामक गाँव में कुछ खाते-पीते अछूत परिवारों की स्त्रियों ने धातु के बासनों में पानी लाना शुरू किया। अछूतों द्वारा धातु के बासनों के उपयोग को सवर्ण हिन्दुओं ने अपना अपमान समझा और अछूत स्त्रियों की ढिठाई के लिये उन पर हल्ला बोल दिया।
जयपुर राज्य के चकवारा गाँव की घटना सबसे विचित्र है। वहाँ के कुछ अछूतों ने तीर्थ यात्रा से लौटकर गाँव के अछूत भाइयों को भोज देने का प्रबन्ध किया। उन्होंने घी के पकवान बनाये। परन्तु जिस समय अछूत लोग भोजन कर ही रहे थे कि हिन्दू लोग लाठियाँ लेकर सैकड़ों की संख्या में आ धमके। उन्होंने उनके भोजन को खराब कर दिया और खाने वालों को पीटा। वे बेचारे जान बचाकर भाग गये। इन निहत्थे अछूतों पर यह घातक आक्रमण क्यों किया गया? इसका उत्तर यह दिया गया कि क्योंकि अछूत लोगों ने घी के पकवान बनाने की ढिठाई की थी। इसमें सन्देह नहीं कि घी केवल धनी लोग ही खा सकते हैं, परन्तु आज तक यह कोई नहीं समझता था कि घी खाना भी कोई बड़ी जाति होने का निशान है। चकवारा के सवर्ण हिन्दुओं ने यह प्रकट कर दिया कि अछूतों को घी खाने का कोई अधिकार नहीं, चाहे वे खरीद भी सकते हों, क्योंकि इससे हिन्दुओं की गुस्ताखी होती है।
इन घटनाओं से स्पष्ट है कि राजनैतिक सुधारों के साथ-साथ सामाजिक सुधार होना भी आवश्यकीय है। इतिहास भी इस बात का समर्थन करता है कि राजनीतिक क्राँतियों से पहले सदा ही सामाजिक और धार्मिक क्राँतियाँ होती रहती हैं। लूथर द्वारा जारी किया हुआ धार्मिक संस्कार योरोपीय लोगों के राजनीतिक उद्धार का पूर्व लक्षण था। इंग्लैंड में भी प्यूरीटिनयम राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थापना का कारण हुआ। प्यूरीटिनिज्म ने नये संसार की नींव रखी और उसी ने अमेरिकन स्वतन्त्रता का युद्ध जीता। यह प्यूरीटिनिज्म एक धार्मिक आन्दोलन ही था। यही बात मुस्लिम साम्राज्य के विषय में भी सत्य है। अरब जाति को राजनैतिक प्रभुता प्राप्त होने के पहले, हजरत मुहम्मद उनमें एक पूर्ण धार्मिक क्राँति उत्पन्न कर चुके थे। भारतीय इतिहास भी इस सिद्धान्त का समर्थन करता है। चन्द्रगुप्त की चलाई हुई राजनीतिक क्राँति से बहुत पहिले भगवान बुद्ध धार्मिक और सामाजिक क्राँति कर चुके थे। महाराष्ट्र के साधु-महात्माओं द्वारा सामाजिक और धार्मिक सुधार के बाद ही शिवाजी राजनीतिक क्राँति ला सके थे। सिक्खों की राजनीतिक क्राँति के, पूर्व गुरुनानक सामाजिक और धार्मिक क्राँति पैदा कर चुके थे। ये उदाहरण यह दिखलाने के लिये पर्याप्त है कि किसी जाति के राजनैतिक अभ्युदय के लिये पहले उसकी आत्मा और बुद्धि का उद्धार होना परम आवश्यक है।
[इतिहास के वास्तविक तत्व को जानने वाला विद्यार्थी भली प्रकार समझता है कि भारत की राजनीतिक पराधीनता का प्रधान कारण भारतीय समाज में उत्पन्न हो गया यह सामाजिक अन्याय ही था। इस समय भी हमने अपने राजनैतिक-संग्राम में जो सफलता प्राप्त की है उसका बहुत कुछ श्रेय पिछले साठ-सत्तर वर्षों के समाज और धर्म क्षेत्र सम्बन्धी सुधार आन्दोलनों को भी है। पर यह आन्दोलन अभी पूर्ण सफल नहीं हुआ है और हिन्दू जाति के एक बड़े भाग पर उसका प्रभाव बहुत थोड़ा पड़ा है। यही कारण है कि राजनीतिक स्वतन्त्रता पा जाने पर भी भारतीय राष्ट्र सफल नहीं हो रहा है और उसकी प्रगति में अनेकों बाधायें आती रहती हैं। इसलिये यदि हम अपना कल्याण चाहते हैं तो धर्म के सत्य सिद्धान्तों का प्रचार करके सामाजिक अन्याय का मूलोच्छेदन करना चाहिये।
(श्री लालजी राम शुक्ल)
मनुष्य का स्वभाव दो तत्वों का बना हुआ है- एक पाशविक और दूसरा दैविक। पाशविक स्वभाव के कारण वह वैसा ही आचरण करता है जिस प्रकार संसार के दूसरे प्राणी आचरण करते हैं। जिस प्रकार संसार के अन्य प्राणियों में अनेक प्रकार की शरीर पोषण और सुख की इच्छायें हैं, उसी प्रकार मनुष्य में भी ये इच्छायें हैं। शरीर की रक्षा और उसके सुख की वृद्धि करने वाली जन्म जात प्रवृत्तियों को मूल प्रवृत्तियाँ कहा जाता है। ये प्रवृत्तियाँ प्रकृति की प्राणी मात्र को देन हैं। इनकी उत्पत्ति जीवन के परंपरागत अभ्यास से होती है। मूल प्रवृत्ति प्राणी मात्र की रक्षा करती और उनकी वृद्धि करती है। इन मूल प्रवृत्तियों का मुख्य ध्येय वैयक्तिक जीवन की वृद्धि है।
नैतिकता का हेतु मनुष्य को अपने व्यापक स्वभाव का ज्ञान कराना है। नैतिकता अपने आपको वैयक्तिक जीवन से ऊपर उठाने का साधन है। नैतिकता का आधार प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ बताई जाती हैं। प्रवृत्तिवादी मानव-आचरण को दूसरे प्राणियों के आचरण से भिन्न नहीं मानते। जिस प्रकार दूसरे प्राणियों के आचरण का मूल स्रोत उन प्राणियों को सुख की चाह और दुःख से बचाव है उसी प्रकार मनुष्य के आचरण का भी मूल प्रेरक सुख की चाह और दुःख से बचाव होता है। पर इस प्रकार मनुष्य के आचरण को समझाना मनुष्य स्वभाव की विशेषता को दृष्टि से ओझल करना है। मनुष्य विवेकयुक्त प्राणी है मनुष्य का विवेक उसके व्यक्तित्व का प्रसार करता है। विवेक के कारण मनुष्य दूसरे व्यक्तियों के सुख में अपना सुख देखने लगता है और वह अपने आपकी पूर्णता को तब तक अनुभव नहीं करता जब तक दूसरे लोगों का उससे लाभ न हो।
पशुओं में अपने आवेश को रोकने की शक्ति नहीं रहती; उसे जिस ओर प्रकृति ले जाती है अर्थात् जिस ओर उसकी मूल प्रवृत्तियाँ प्रेरित करती हैं उसी ओर वह जाने लगता है। मनुष्य अपने आपको रोक सकता है, वह जन्म जात प्रकृति के प्रतिकूल आचरण कर सकता है, वह अपने वैयक्तिक स्वार्थ का त्याग करके परमार्थ के काम में अपने आपको लगा सकता है। नैतिकता का आधार मनुष्य की यही आत्म-नियंत्रण की शक्ति है। मनुष्य में यह शक्ति उसी प्रकार जन्म के साथ आती है जिस प्रकार उसकी मूल प्रवृत्तियाँ उसके जन्म के साथ आती हैं। इसका विकास अनुभव की वृद्धि के साथ अवश्य होता है, पर यह अनुभव से उत्पन्न नहीं होती। बहुत से मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य की अपने आपको रोकने की शक्ति उसी प्रकार प्राकृतिक शक्ति है जिस प्रकार उसकी मूल प्रवृत्तियाँ प्राकृतिक शक्ति हैं। मूल प्रवृत्तियों से ही आत्म-नियंत्रण की शक्ति का विकास होता है और इस विकास का साधन व्यक्ति का अनुभव है। एक मूल प्रवृत्ति दूसरी मूल प्रवृत्ति की सहायता करती है अथवा उसे रोकती है। मूल प्रवृत्तियों को रोकने वाली मूल प्रवृत्तियों से अतिरिक्त कोई सत्ता नहीं।
यदि हम उक्त सिद्धाँत को मान लें तो नैतिकता को एक प्रकार की चतुराई के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानना पड़ेगा। नैतिकता व्यक्ति के प्रसार का हेतु भले ही हो, उसकी सीमा को पार करने का साधन नहीं माना जा सकता। पर नैतिकता को मूल प्रवृत्तियों का परिवर्तित रूप मानना न्याय संगत नहीं। यदि नैतिकता मूल प्रवृत्तियों का परिवर्तित रूप मात्र होती तो वह प्राकृतिक आचरण से भिन्न वस्तु न होती। पर वास्तव में नैतिकता प्राकृतिक आचरण से भिन्न वस्तु है। यह मनुष्य की नैतिकता के लिये अपने आपका बलिदान कर देने से प्रमाणित होता है। नैतिकता चतुराई का नाम नहीं, वरन् आत्मसमर्पण का नाम है।
डॉक्टर फ्रायड और उनके कुछ अनुयायी नैतिकता को कृत्रिम वस्तु मानते हैं। इसका आधार न तो मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ हैं और न कोई दूसरा जन्म जात तत्व। इसका आधार समाज में प्रचलित भावनायें ही हैं। ये भावनायें मनुष्य के प्राकृतिक स्वभाव पर नियंत्रण करती हैं और उसका दमन करती हैं। मनुष्य के व्यक्तित्व में अनेक प्रकार के रोग इसी दमन के कारण उत्पन्न होते हैं। मनुष्य में शम का भाव नैतिकता के कारण ही आता है नैतिकता मानव स्वभाव पर ऊपर से लादी गई वस्तु है। पहले पहले नैतिकता प्रलोभन और दण्ड की सहायता से लादी जाती है पीछे वह स्वभाव का अंग बन जाती है। मनुष्य के मन में मानसिक द्वन्द्व तब तक रहता है, जब तक उसके मन में नैतिकता के भाव प्रबल होते हैं। नैतिक भावना, ही अन्तर्प्रेरणा का रूप धारण कर लेती है और मनुष्य में आत्मभर्त्सना की मनोवृत्ति उत्पन्न करती है। यदि नैतिकता का प्रतिबन्ध मनुष्य के मन से उठा लिया जाय तो उसके मानसिक अन्तर्द्वन्द्व का अन्त हो जाय।
उक्त सिद्धाँत उसी प्रकार विवेचना युक्त बुद्धि से रहित है जैसा प्रकृतिवाद का सिद्धान्त। यदि मनुष्य के स्वभाव में नैतिकता न होती तो वह समाज में कैसे आ जाती है? मानव-समाज व्यक्तियों का ही बना है। अतएव मानव-समाज में उस तत्व की उपस्थिति की सम्भावना नहीं जो समाज के प्रत्येक व्यक्ति में न हो। यह सम्भव है कि हम समाज के किसी विशेष व्यक्ति को बड़ा मानते हों पर बड़े मानने की प्रवृत्ति जब तक हमारे स्वभाव में पहले से ही न हो तब तक हम किसी को बड़ा और छोटा न मानेंगे। वास्तव में अपने आपके भाव ही हम समाज पर आरोपित करते हैं और फिर समाज से हम अपनी ही उधार दी हुई वस्तु वापस लेते हैं। मनुष्य का मन एक भारी भूल-भुलैया है। मनुष्य अपने आपको सीधे प्रकाशित नहीं करता। वह अपने आपको भूला हुआ रहता है, और अपने ही गुण अथवा दोषों को दूसरों पर आरोपित करके उनसे परिचित होता है। सत्य, सौंदर्य और नैतिकता का उदय मनुष्य के मन से ही होता है पर वह यह नहीं जानता है। वह इन्हें किसी बाह्य पदार्थ के ऊपर आरोपित करके पहचानता है। जिस प्रकार मनुष्य अपने चरित्र के दोषों को दूसरों पर आरोपित करता है, इसी प्रकार वह अपनी पूर्णता को भी दूसरों पर आरोपित करता है, और जिस प्रकार अपने में आये दोषों के लिये वह दूसरे व्यक्तियों को कारण मानता है, इसी प्रकार अपने आप में पैदा हुई खूबियों का कारण भी वह किसी बाह्य सत्ता को जान लेता है। धार्मिक लोग ईश्वर को इसका कारण मानते हैं, प्रकृतिवादी प्रकृति को और मनोवैज्ञानिक समाज को कारण मान लेते हैं इस प्रकार की मनोवृत्ति को अध्यास (इन्ट्रोजेक्शन) कहा जाता है। हम अपनी बड़ाई को दूसरे को देकर फिर हम उससे उधार लेते हैं। यह एक विस्मयजनक मानसिक व्यापार है। इस प्रकार का भ्रम अपने आन्तरिक स्वभाव को न जानने के कारण ही होता है।
पर कुछ लोग नैतिकता को भली वस्तु न मान कर उसे बुरी वस्तु ही मानते हैं। इसी कारण समाज में अनेक प्रकार की झंझटें उत्पन्न होती हैं और वैयक्तिक अन्तर्द्वन्द्व होता है। पर यदि उसे बुरा माना जाय तो भी उसे मानव स्वभाव का आवश्यक अंग ही मानना होगा और उसकी जड़ अपने आन्तरिक मन में माननी पड़ेगी। नैतिकता के प्रतिकूल आचरण करने से जो कार्य का भाव अथवा आत्मग्लानि उत्पन्न होती है वह मनोविश्लेषण के विद्वानों के कथनानुसार पिछले दण्ड के संस्कारों के कारण ही होती है। जैसे बचपन में अनुचित काम के लिये पिता दण्ड देता है उसी प्रकार प्रौढ़ावस्था के अनुचित आचरण के लिये हमारी अन्तरात्मा दण्ड देने लगती है, पर नैतिकता का आधार दण्ड का भय, चाहे वह बाहरी भय का दण्ड हो अथवा भीतरी दण्ड का, नैतिकता को वास्तव में निकृष्ट वस्तु बना देता है। भय मनुष्य की इच्छा शक्ति को कमजोर करता है और यदि नैतिकता का आधार भय है तो मनुष्य में किसी भी चरित्र के भले गुण का विकास कैसे हो सकता है? चरित्र के गुणों का आधार भय नहीं वरन् प्रेम है। भय प्रेम का विनाशक है और यदि नैतिकता का आधार भय है तो वह त्याज्य वस्तु है।
हमारा विचार है कि सच्ची नैतिकता का आधार प्रेम ही है। नैतिकता में त्याग की आवश्यकता होती है। यह त्याग बिना प्रेम के सम्भव नहीं। भय वश किया गया स्थायी त्याग नहीं होता, प्रेम वश किया गया त्याग स्थायी त्याग होता है। ठोस चरित्र की नींव भी प्रेम है, प्रेम से इच्छा शक्ति बलवती होती और भय से कमजोर होती है। जिस व्यक्ति की इच्छा शक्ति बलवान नहीं उसका चरित्र ऊँचा कैसे हो सकता है? जहाँ प्रेम है वहीं बल है और वहाँ भय का अभाव होता है, चाहे यह भय समाज का हो, ईश्वर का हो अथवा अन्तरात्मा का, सभी प्रकार के भय बुरे होते हैं।
भय के ऊपर जिन लोगों का सदाचार निर्भर करता है, वे भय के चले जाने पर दुराचारी बन जाते हैं। यही कारण है कि अपने आपको कठोर नियंत्रण में रखने वाले व्यक्तियों के मन में भारी मानसिक अन्तर्द्वन्द्व रहता है जो बाहरी संघर्ष में आरोपण के रूप में प्रकाशित होती है। अपने आप पर अत्याचार करने वाला और अपने आपको डरा कर सदाचारी बनाये रखने वाला व्यक्ति कभी भी आन्तरिक मन में सुखी नहीं रहता। उसे किसी न किसी प्रकार की शारीरिक अथवा मानसिक परेशानी बनी ही रहती है। जब तक मनुष्य के भीतरी और बाहरी मन में एकता का भाव नहीं आ जाता, तब तक उसकी परेशानियों का अन्त नहीं होता। यह एकता का भाव मनुष्य की नैतिक धारणाओं और उसकी सुख की प्रवृत्तियों में सौम्य स्थापित करने से आता है। कठोर तप का जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति के मन में आन्तरिक शान्ति नहीं रहती। इस आन्तरिक अशान्ति को वह किसी प्रकार भुलाने की चेष्टा करता है। जब तपस्वी व्यक्ति की संसार के लोग प्रशंसा करने लगते हैं तो वह मिथ्या आत्म संतोष प्राप्त करता है। फिर जगत की प्रशंसा प्राप्त करने का भाव ही घोर तप का कारण बन जाता है।
सच्ची नैतिकता की नीति प्रेम और आत्म-संतोष है जब किसी भोग का त्याग कोई मनुष्य आन्तरिक अथवा बाह्य भय के कारण नहीं वरन् प्रेम के कारण अथवा प्रेम जनित आत्म-संतोष के कारण करता है तो उसे दूसरे किसी प्रकार के पुरस्कार की अपेक्षा नहीं रहती। प्रेम की भावना ही उस सुख को देती है जो वह भोगेच्छाओं को संतुष्ट न करने के कारण खो देता है। प्रेम पर आधारित नैतिकता में इच्छाओं का दमन नहीं होता, वे प्रेम के प्रवाह से ही तृप्त हो जाती हैं। प्रेम से प्रेरित नैतिकता में किसी प्रकार का दिखावटीपन अथवा अतिक्रम नहीं होता। मनुष्य धीरे-धीरे अपने आप पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा करता है। वास्तव में यह विजय-विजय ही नहीं है। यह तो नैतिक और ऐच्छिक मन में प्रेम व्यवहार है। मनुष्य अपने आपको भुला कर अथवा उसकी अवहेलना करके अपने आप पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता; वह अपने आपको जानकर ही अपने आप पर विजय प्राप्त कर सकता है।
(श्री रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
भारतीय संस्कृति परमार्थ और परोपकार को प्रचुर महत्त्व देती है। जब अपनी सात्त्विक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाय, तो लोक-कल्याण के लिए दूसरों की उन्नति के लिए दान देना चाहिए। प्राचीन काल में ऐसे निस्वार्थी लोक-हित-निरत ऋषि, मुनि, ब्राह्मण, पुरोहित, योगी, संन्यासी होते थे, जो समस्त आयु लोक-हित के लिए दे डालते थे। कुछ विद्यादान, पठन-पाठन में ही आयु व्यतीत करते थे। उपदेश द्वारा जनता की शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, सहयोग, सुख, सुविधा, विवेक, धर्मपरायणता आदि सद्गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न किया करते थे। मानवीय स्वभाव में जो सत तत्व हैं, उसी की वृद्धि में वे अपने अधिकाँश दिन व्यतीत करते थे। ये ज्ञानी उदार महात्मा अपने आप में जीवित-कल्याण की संस्थाएं थे, यज्ञ रूप थे। जब ये जनता की इतनी सेवा करते थे, तो जनता भी अपना कर्त्तव्य समझ कर इनके भोजन, निवास, वस्त्र, सन्तान का पालन-पोषण का प्रबन्ध करती थी। जैसे लोक हितकारी संस्थाएँ आज भी सार्वजनिक चन्दे से चलाई जाती हैं, उसी प्रकार ये ऋषि, मुनि, ब्राह्मण भी दान, पुण्य आदि द्वारा निर्वाह करते थे। प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनियों का व्यक्तित्व इतना उच्च, पवित्र और प्रवृत्ति इतनी सात्त्विक होती थी कि उनके सम्बन्ध में किसी प्रकार के सन्देह की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, क्योंकि उन्हें पैसा देकर जनता उसके सदुपयोग के विषय में निश्चित रहती थी। हिसाब जाँचने की आवश्यकता तक न समझती थी। इस प्रकार हमारे पुरोहित, विद्यादान देने वाले ब्राह्मण, मुनि, ऋषि दान दक्षिणा द्वारा जनता की सर्वतोमुखी उन्नति का प्रबन्ध किया करते थे। दान द्वारा उनके जीवन की आवश्यकताएँ पूरी करने का विधान उचित था। जो परमार्थ और लोक-हित, जनता की सेवा सहायता में इतना तन्मय हो जाय कि अपने व्यक्तिगत लाभ की बात सोच ही न सके, उसके भरण-पोषण की चिंता जनता को करनी ही चाहिए।
इस प्रकार दान देने की परिपाटी चली। कालान्तर में उस व्यक्ति को भी दान दिया जाने लगा जो अपंग, अंधा, लंगड़ा, लूला, अपाहिज या हर प्रकार से लाचार हो, जीविका उपार्जन न कर सके। उन्हें भिक्षा ग्रहण करनी भी चाहिए, क्योंकि जीवन धारण करने के लिए अन्य कोई साधन ही शेष नहीं रहता। इस प्रकार दो रूपों में दूसरों को देने की प्रणाली प्रचलित रही है 1-मुनियों, ब्राह्मणों, पुरोहितों, आचार्यों, संन्यासियों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता का नाम रखा गया दान, 2-अपंग, लँगड़े, लूले, कुछ भी कार्य न कर सकने वाले व्यक्तियों को दी जाने वाली सहायता को भिक्षा कहा गया। दान और भिक्षा दोनों का ही तात्पर्य दूसरे की सहायता करना है। पुण्य, परोपकार, सत्कार्य, लोक-कल्याण, सुख-शान्ति की वृद्धि, सात्त्विकता का उन्नयन तथा समष्टि की, जनता की सेवा के लिए ही इन दोनों का उपयोग होना चाहिए।
दूसरों को देने का क्या तात्पर्य है? भारतीय दान परंपरा और कुछ नहीं, उधार देने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। जो कुछ हम दूसरों को देते हैं, वह हमारी रक्षित पूँजी की तरह जमा हो जाता है। अच्छा दान वह है जो जरूरतमंदों को दिया जाता है बिना जरूरतमंदों को देना कुछ विशेष महत्व नहीं रखता। कुपात्रों को धन देना व्यर्थ है। जिसका पेट भरा हुआ हो, उसे और भोजन कराया जाय, तो वह बीमार पड़ेगा और अपने साथ दाता को भी अधोगति के लिए घसीटेगा। भारतीय संस्कृति के अनुसार दान देना बहुत ही उत्तम धर्म कार्य है। जो, अपनी रोटी दूसरों को बाँट कर खाता है, उसको किसी बात की कमी नहीं रहेगी। जो अपने पैसे को जोड़-जोड़कर जमीन में गाढ़ते हैं, उन पाषाण हृदयों को क्या मालूम होगा कि दान देने में कितना आत्मसंतोष, कितनी मानसिक तृप्ति मिलती है। आत्मा प्रफुल्ल हो जाती है। मृत्यु बड़ी बुरी लगती है, पर मौत से बुरी बात यह है कि कोई व्यक्ति दूसरे को दुःखी देखे, और उसकी किसी प्रकार भी सहायता करने में अपने आपको असमर्थ पावे। हिन्दू शास्त्र एक स्वर से कहते हैं कि मनुष्य जीवन में परोपकार ही सार है। हमें जितना भी संभव हो सदैव परोपकार में रत रहना चाहिए। किन्तु यह दान अभिमान, दम्भ, कीर्ति के लिए नहीं, आत्मकल्याण के लिए ही होना चाहिए। मेरे कारण दूसरों का भला हुआ है, यह सोचना उचित नहीं हैं। दान देने से स्वयं हमारी ही भलाई होती है। हमें संयम का पाठ मिलता है। यदि आप दान न भी दें, तब भी संसार का काम तो चलता ही रहेगा। परमात्मा इतना विपुल भंडार लुटा रहे हैं कि हमारी छोटी-सी सहायता के बिना भी जनता का कार्य चल ही जायेगा। आप यदि न देंगे, तो कोई भिखारी भूखा नहीं मर जायगा। किसी प्रकार उसके भोजन का प्रबन्ध हो ही जायगा। लेकिन आपके हाथ से दूसरों के उपकार को करने का एक अवसर जाता रहेगा। हमारी उपकार भावना कुँठित हो जायगी। दान से जो मानसिक उन्नति होती, आत्मा को जो शक्ति प्राप्त होती, वह दान लेने वाले को नहीं, वरन् देने वाले को प्राप्त होती है। दूसरों का उपकार करना मानो एक प्रकार से अपना ही कल्याण करना है। किसी को थोड़ा-सा पैसा देकर भला हम उसका कितना भला कर सकते हैं। किन्तु उसकी अपेक्षा हम अपना भला हजार गुना कर लेते हैं। हमारी उदारता का विकास हो जाता है। आनन्द-स्त्रोत खुल जाता है।
दान आत्मा का दिव्य गुण है। दानशीलता की सात्त्विक भावना जिस पुरुष के अन्तःकरण में प्रवेश करती है, उसे उदार बना देती है। उसे प्रकाश का पुँज बना देती है। दान रुपये पैसे या रोटी भोजन कपड़े का ही नहीं, श्रम का भी हो सकता है। सच्चा दानी लोक-उपकार को प्रमुखता देता है। वह दधीचि की तरह अपनी हड्डियाँ लोक-उपकार के लिए दान दे देता है। व्यास जी की तरह अपनी आयु सद्ग्रन्थों की रचना में लगा देता है? द्रोणाचार्य की तरह शास्त्र-विद्या का प्रचार करता है। पाणिनी की तरह व्याकरण बनाता है, बुद्ध की तरह प्रेम धर्म का उपदेश देता है। इस प्रकार सच्चा दानी समय और देश की आवश्यकताओं के अनुसार अपनी बुद्धि, योग्यता, कला, प्रतिभा शक्तियों का दान करता रहता है।
यह तो दान देने वाले पक्ष का विवेचन हुआ। अब लेने वाले के पक्ष को देखिए। भिक्षावृत्ति या दान लेना एक बड़ा उत्तरदायित्व है, जिसका भार उठाने का साहस बहुत कम व्यक्तियों में होता है। शास्त्रकारों ने भिक्षा की उपमा अग्नि से दी है। जैसे अग्नि का प्रयोग बड़ी सावधानी से करना चाहिए वह बड़ी हानि और उत्पात कर सकती है; इसी प्रकार भिक्षा या दान लेने से पूर्व खूब सोच-समझ लेना चाहिए। जिससे आप कुछ भी दान लेते हैं, उसको अपने श्रम, या बुद्धि द्वारा दुगुने रूप में लौटाने को प्रस्तुत रहना चाहिए। अपनी आवश्यकताएँ बहुत ही कम रखनी चाहिए। दाता की सेवा, सहायता कठिनाइयाँ हल करने का उद्योग करना चाहिये या सद्भावना और आशीर्वाद के रूप में बहुमूल्य उपदेश देते रहना चाहिए।
आचार्य पं. श्री राम शर्मा ने भिक्षा के दो प्रयोजन बताये हैं- एक तो यह कि दान देने से देने वाले को त्याग का परोपकार का, आत्म-सन्तोष प्राप्त होता है। दूसरा यह कि उन ऋषिकल्प ब्राह्मणों को अपने अभिमान और अहंकार का परिमार्जन करते रहने का अवसर प्राप्त होता है। प्राचीन काल में लोक-सेवक, परोपकारी तथा महात्मा अहंमन्यता उत्पन्न न होने देने के लिए भिक्षुक की तुच्छ स्थिति ग्रहण करते थे। ऐसे भिक्षुकों को दान देते हुए देने वाले अपना मान अनुभव करते थे और लेने वाले निरभिमान बनते थे। उससे उन दोनों के बीच सुदृढ़ सौहार्द बढ़ता था। भिक्षावृत्ति करने वाले की अपेक्षा देने वाले को ही अधिक लाभ रहता था। इस परमार्थ की भावना से ब्रह्मजीवी महात्माओं के लिए भिक्षा का विधान किया गया था। यथार्थ में यह भिक्षा उचित भी थी, शास्त्र सम्मत भी।
आजकल दान-वृत्ति से अनुचित लाभ उठाने वाले अनेक अकर्मण्य भिखमंगे, ठग, दुष्ट व्यक्ति लोगों को ठगते फिरते हैं। वह स्वयं तो परिश्रम करना नहीं चाहते, मुफ्त का माल उड़ाना चाहते हैं। पिछले वर्ष भिखारियों की संख्या 56 लाख के लगभग पहुँच गई थी। इसमें कष्ट पीड़ितों की संख्या तो अल्प है, अधिकतर तो वे ही व्यक्ति हैं, जो दूसरों के श्रम का अनुचित लाभ उठाते हैं; धर्म के नाम पर नाना प्रकार के आडम्बर, घृणित मायाचार और असत्य व्यवहार कर भिक्षावृत्ति करते हैं। इससे समाज में विषैला, अनिष्टकारी वातावरण फैलता है। ऐसा करने से झूठ, पाखण्ड, ढोंग, नशेबाजी फैलती है। अतः हमारा यह कर्त्तव्य है कि धर्म के नाम पर मुफ्त का माल उड़ाने वाले इन लुटेरों से सावधान रहें।
सत्पात्र को, जरूरतमंद को अपंग अपाहिज कुछ काम न कर सकने वाले बीमार को दान करें। जितना संभव हो, जैसे संभव हो सहायता करें। हमारे यहाँ कहा गया है-
“दानशूरो विशिष्यते”
“दानवीर पुरुष ही अन्य सब पुरुषों से विशिष्ट है।”
जिसको छिछले तालाब का स्वच्छ पानी पीना है उसे इसके हाथ से पानी पीना होगा। यदि पानी कुछ भी हिला तो नीचे का मैल ऊपर चला आवेगा और सब पानी गन्दा हो जायगा। उसी प्रकार यदि तुम पवित्र रहना चाहते हो तो दृढ़ विश्वास के साथ भक्ति का अभ्यास क्रमशः बढ़ाते जाओ, व्यर्थ के आध्यात्मिक विवाद में अपने समय को नष्ट न करो, नहीं तो नाना प्रकार की शंकाओं से तुम्हारा मस्तिष्क गन्दा हो जायगा।
सच्चा शूरमा वह है जो प्रलोभनों के बीच रहता हुआ मन को वश में करके पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है।
-रामकृष्ण परमहंस
(श्री विशनचन्द्र सेठ, सदस्य भारतीय लोक सभा)
संसार में मूर्ति पूजा तो सर्वत्र बिखरी पड़ी है, पर आश्चर्य है कि मूर्ति पूजा के नाम पर कुछ समूहों या सज्जनों द्वारा झूठा विरोध क्यों किया जाता है। मानव दैनिक जीवन में जो भी कार्य करता है या विचार करता है सर्वप्रथम उस कार्य या विचार का चित्र प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसके मनः पटल पर अंकित होता है। बिना किसी प्रकार के मानसिक चित्र या कल्पना के मानव संसार में कोई भी कार्य करने में समर्थ नहीं। जब यह स्थिति प्रत्यक्ष थी तभी तो भारत के महान् धार्मिक वैज्ञानिकों ने अलौकिक मूर्ति पूजा का विज्ञान जन साधारण के हितार्थ संसार के समक्ष रक्खा। भाग्यवान मानवों ने उसका स्वागत किया।
इस सत्य से मुख मोड़ा नहीं जा सकता कि मूर्ति पूजा से संसार में कोई भी जीवित व्यक्ति वैराग्य नहीं ले सकता। ईसाई तो प्रत्यक्ष श्री ईसामसीह के चित्र, मूर्ति एवं क्रास, गिरजाघर आदि को पवित्र मानकर उनके समक्ष नतमस्तक होकर अपने को सौभाग्यशाली मानते हैं। इस्लाम धर्म के मानने वाले भी किसी न किसी प्रकार से अपने पैगम्बर के, मस्जिद के तथा ताजिओं आदि के प्रति श्रद्धा प्रगट कर ईश्वर से सम्बन्धित आकारों की पूजा अपने विचारों के अनुसार कर परोक्ष रूप में साकार उपासना का प्रतिपादन करते हैं। मुसलमान अपने किसी भी धार्मिक चिन्ह का अपमान सहन नहीं कर सकता। यदि उनके दिल में आकृति के प्रति श्रद्धा नहीं है तो अपमान के प्रति विरोध भावना कहाँ से प्रगट होती है? किसी धार्मिक कृत्य पर सुगंध करना, स्वच्छ या नवीन वस्त्र पहनना, नियमित रूप से नमाज पढ़ना, रोजे रखना आदि कृत्य सब मूर्ति पूजा के ही तो परोक्ष अंग हैं।
संसार की उत्पत्ति के उपरान्त किन्हीं विभूतियों ने वस्त्र एवं सामाजिक प्रतिष्ठा की मान्यता का विधान बनाया होगा। आज नाना प्रकार के फैशनों में उसके विस्तार को देखकर आश्चर्य होता है। कितने प्रकार के कपड़े मानव ने बना डाले, कितने प्रकार के रंग ढंग देश देशान्तरों में चले और समाप्त हो गये, आज कितने प्रकार के कपड़े चल रहे हैं अथवा पहने जा रहे हैं, कोई उनकी गणना करने में भी समर्थ नहीं है। पर वाह रे सिद्धाँत तू तो अपनी जगह पर अटल खड़ा है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मवाद के आश्रय में बिरले ही मानव भगवान् के चरणों में पहुँचने में समर्थ थे और हैं। अतः साधारणजनों की रक्षार्थ मूर्ति-पूजन के सरल साधन द्वारा मानव को प्रभु चरणों से सम्बन्ध स्थापित करने का विधान बनाकर जिस अटूट सिद्धान्त की रचना की गई, कोई कुछ भी कहे वह अखण्ड-ज्योति की भाँति आज भी सारे संसार को प्रकाश दे रही है। संसार में अन्य देशों अथवा जातियों ने मूर्ति-पूजा का आन्तरिक महत्व नहीं समझा, वरन्, मानवी आवश्यकता के कारण उसे अनजाने ही अपना लिया। अतः उस अपनाने में मूल वस्तु तो रह गई, पर अन्य भौतिक साधन नष्ट हो गये। दूसरी ओर विशाल हिन्दू जाति ने उसके आन्तरिक महत्व और लाभ को समझते हुए उसका अनुसरण किया।
मानव, स्वभाव से अनेक प्रकार की भावनाओं के आश्रित होकर अपनी जीवन यात्रा पूरी करता है। सनातन धर्म ने वनस्पति, जल, जीव, तारागण, चन्द्र, सूर्य सारे चराचर को अपनी पवित्र पूजन पद्धति में स्थान देकर देवी देवताओं आदि की इतनी बाहुल्यता कर दी कि मानव -मात्र अपनी बुद्धि और रुचि के अनुसार पूजन शैली छाँटने में स्वतन्त्र है। भारतीय पूजन विधि में पाँचों इन्द्रियों को तृप्ति देने का सरल साधन है। चारों वर्णों की रचना को सार्थक करने हेतु सभी वर्णों की अनुकूल तृप्ति भी पूजन से बनती है। अन्त में चार अवस्थाएँ हैं। भारतीय पूजन विधि में बालकों के मनोविज्ञान की पूर्ति बाजे एवं प्रसाद पंचामृत से होती है। बड़े होने पर पाठ, शृंगार, कीर्तन आदि से मानव सन्तोष प्राप्त करता है। तृतीय अवस्था आने पर विचार, साधन, प्रवचन आदि सन्तोष के प्रत्यक्ष साधन हैं। संन्यास लेने पर सारे जगत को ब्रह्ममय मानकर मानव सेवा कर जगत को सन्मार्ग पर लगाने की सच्ची मूर्ति-पूजा का विधान है।
इस महान मूर्ति-पूजन की किस भाँति प्रशंसा की जावे। जिन महान् आत्माओं द्वारा संसार में इसका प्रादुर्भाव हुआ, संसार उनका सदैव आभारी रहेगा। मूर्ति पूजन के विज्ञान को विदेशी तो गंभीरता से समझना चाहते हैं, पर खेद है कि जिनकी वह धरोहर है, वे हिन्दू अज्ञानता वश इस अमूल्य धरोहर पर गर्व अनुभव करने की अपेक्षा अनेक प्रकार का विरोध प्रदर्शित कर अपने को गर्त में गिराते हैं। भगवान उन्हें सद्बुद्धि दे यही प्रार्थना है।
(श्री राधाकृष्ण बजाज)
‘गोसेवा’ भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है, गाय का महत्व ‘गौ-सेवा’ शब्द से ही प्रकट होता है क्योंकि सेवा के दो प्रधान कारण हैं, एक तो हम बिना उपयोग किसी की सेवा नहीं करते और दूसरा यदि बिना सेवा किए हुए किसी का उपयोग करेंगे तो वह गुनाह होगा। गाय का उपयोग तो स्वतः प्रकट है, जन्म काल से लेकर मृत्यु पर्यन्त किसी न किसी रूप में मनुष्य गाय के प्रति ऋणी रहता ही है और यह ऋण तभी चुकाया जा सकता है जब हम गो-वंश को विकसित करें, गाय की मजबूत बछड़े देने की शक्ति को बढ़ाएं, उसकी दूध देने की शक्ति में वृद्धि करें। हृष्ट-पुष्ट गायों का दूध भी स्वास्थ्यवर्धक होगा। मजबूत बैल ही हमारे खेत भली प्रकार से जोत सकते हैं। हमारी गौ-सेवा का यह अर्थ नहीं है कि जब तक गौ हमें दूध दे तभी तक हम उसका ध्यान रखें और बूढ़ी हो जाने पर उसे मरने के लिए छोड़ दें। यह तो एक निकृष्ट सेवा है। गाय को उचित समय पर उचित मात्रा में चारा-पानी देना, उसके रहने की अच्छी व्यवस्था करना, काम लेने में ज्यादती न करना, उसके सुख-दुख का ध्यान रखना और बूढ़ी हो जाने पर उसको मरने तक खाना देना, इतनी बातें गौ-सेवा में आती हैं इस प्रकार की नीति के द्वारा हम गो वंश की वृद्धि और गो-वध कतई बन्द करना चाहते हैं प्राचीन संस्कृति को कायम रखने के लिए और मनुष्यत्व की रक्षा के लिए जिस गाय ने जीवन भर मनुष्य मात्र की सेवा की उसका बुढ़ापे में वध करना किसी को मंजूर नहीं हो सकता, गाय से हमारा मतलब गाय, बैल, बछड़े, बछड़ी अर्थात् पूरे गो-वंश से है।
कुछ लोग कहते हैं प्राचीन काल में माँसाहार था और गो-माँस खाया जाता था पर बाद में गौ से हमें अहिंसा की शिक्षा मिली। वह मारी जाने पर भी हमारी सेवा में लगी रही। गाय ने हमें घी, दूध विशेष मात्रा में दिया दूसरी तरफ बैलों ने हमारे खेतों में मेहनत करके अनाज की पैदावार बढ़ा दी, लोगों का ध्यान गाय की इस सेवा की ओर आकर्षित हुआ और ये गौरक्षा के लिए तत्पर हो गए। गौरक्षा के प्रथम आन्दोलनकारी श्रीकृष्ण थे। उन्होंने गो वंश की रक्षा करने में और उन्नति करने में अतुलनीय कार्य किया है। इसके अतिरिक्त बैलों ने कपास की खेती में हमारी मदद करके हमें अच्छे कपड़े दिए और जब कपड़ों के कारण हमारी गर्मी सुरक्षित रहने लगी तब खुराक स्वतः कम हो गई। अन्न और वस्त्र दोनों ही शरीर की गर्मी को बनाए रखते हैं। इस तरह बैल ने अहिंसा के पालन में बड़ी मदद की है। अतः अहिंसा का तकाजा है कि हम गाय और बैल की रक्षा करें।
गाय की सेवा तय होने के बाद यह प्रश्न उठता है कि हमें किस प्रकार की गायों की वृद्धि करनी चाहिए ताकि गो-पालन सुलभ और गो-वध रोका जा सके। इस दृष्टि से विचार करने पर मालूम हुआ कि हमारे पास चारे की कमी है और पशुओं की संख्या कम होनी चाहिए। लेकिन खेती की दृष्टि से बैलों की शक्ति बढ़नी चाहिए और देश की आवश्यकतानुसार दूध का उत्पादन भी आज की अपेक्षा कई गुना अधिक होना चाहिए। यदि किसान दूध के लिए अलग और खेती के लिए अलग नस्लों के पशु को रक्खे तो वह दो जोड़ी को पूरा खाना नहीं दे सकता। उसके दोनों काम एक ही जोड़ी से यानी एक ही नस्ल के गाय-बैलों से पूरे होने चाहिए ताकि पशु संख्या भी कम रहे। ये दोनों काम पूरा करने की शक्ति जिस नस्ल में होती है उसे सर्वांगी कहा जाता है जैसे हरियाना थरपारकर, गीर, काँकरेज आदि।
दूसरी बात यह है कि जो गाय दूध अधिक देती है लेकिन खेती के लायक बैल नहीं देती उनके नरों की पूरी हिफाजत नहीं होती और वे भारस्वरूप जीवित रहते हैं या मार दिये जाते हैं। इसी तरह जो गाएं खेती के लिए बैल अच्छे देती हैं लेकिन दूध कम देती हैं उनकी बछड़ियों की पूरी हिफाजत नहीं होती फलस्वरूप या तो वे भूखी मरती हैं या कत्ल कर दी जाती हैं। इस प्रकार की दुग्ध प्रधान या वत्स प्रधान दोनों एकाँगी नस्लों के एक-एक पशु हिंसा के शिकार होते हैं। इस हिंसा को रोकने का उपाय यही है कि सारी गायों का विकास सर्वांगी रूप से किया जाय। वत्स प्रधान गायों को सिलेक्टिव ब्रीडिंग (चुनाव द्वारा नस्ल का विकास) द्वारा अधिक दूध देने की शक्ति बढ़ाकर सर्वांगी बनाया जा सकता है। उसी तरह दुग्ध प्रधान गायों के बैलों में खेत जोतने की शक्ति पैदा करके उन्हें भी सर्वांगी बनाया जा सकता है। नस्ल सुधार का काम गायों को सर्वांगी बनाने का लक्ष्य रखकर होना चाहिए। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि एक ही नस्ल में दूध देने की शक्ति और अच्छे बैल देने की शक्ति एक साथ नहीं बढ़ाई जा सकती, एक के बढ़ाने से दूसरी कम होती है। यदि यह ठीक भी मान लिया जाय तो भी मध्य स्थिति के पशु पैदा करने में कोई कठिनाई नहीं पड़ सकती। आज हरियाना थरपारकर जैसी गायें मौजूद हैं जिनके बैल खेती में बढ़िया से बढ़िया काम देते और गायें 10 सेर 15 सेर तक रोजाना दूध देती हैं हमारी नस्लें इस हद तक पहुँच जायं तो काफी है। हमें इस बात से खुशी है कि भारत सरकार भी सर्वांगी नस्ल बढ़ाने की तरफ ध्यान दे रही है।
(प्रो. अवधूत गोरेगाँव)
साँसारिक मनुष्यों की प्रीति में सदैव प्रेम के साथ ईर्ष्या का भाव भी मिला रहता है और उसी के कारण संसार के सुख में कमी होकर दुःख का परिमाण बढ़ जाता है। केवल पति-पत्नी अथवा युवक-युवती के प्रेम में ही ईर्ष्या का भाव होता है ऐसी बात नहीं है। सब प्रकार के सम्बन्धों में यह भाव दिखलाई पड़ा करता है। माता-पिता और पुत्र-पुत्रियों, मित्रों और स्नेहियों, भाइयों और बहिनों, पास और दूर के नातेरिश्तेदारों, और आगे बढ़ा जाय तो हम कह सकते हैं कि सामान्य परिचित जनों में भी यह ईर्ष्या का भाव काम करता दृष्टिगोचर होता है। बहुत समय तो यह भी दिखाई देता है कि जहाँ प्रेम का परिमाण अधिक होता है वहाँ ईर्ष्या का अंश भी विशेष रहता है।
यह ईर्ष्या बहुत से दुःखों की जननी है, इसे सब कोई स्वीकार करेंगे। प्रेम की आधारशिला विश्वास माना जाता है, जहाँ प्रेम हो वहाँ विश्वास होना ही चाहिए। ईर्ष्या का भाव प्रकट होते ही यह विश्वास डिग जाता है, आधारशिला मानो गिरने लगती है। ईर्ष्या में से शंका उत्पन्न होती है और ऐसा जान पड़ता है कि जहाँ प्रेम है वहाँ प्रकट अथवा अप्रकट रूप से वहम भी रहता है। यह वहम अगर ज्यादा समय तक स्थिर रहे और जड़ जमा ले तो उसमें से द्वेष अवश्य उत्पन्न होगा। प्रेम और द्वेष ये साथ-साथ कैसे रह सकते हैं? इसलिए प्रेम को द्वेष के लिए स्थान कर देना पड़ता है। हृदय के सिंहासन के ऊपर प्रेम के स्थान पर द्वेष बैठ जाय तो जीवन विष के समान बन जायगा। इसमें कोई शंका ही नहीं।
कुछ लोग कहेंगे इस प्रकार के लगाव को प्रेम नहीं कहा जा सकता, वह तो राग या मोह है। बात तो ठीक है, परन्तु प्रचलित भाषा में उसे प्रेम ही कहा जाता है। प्रेम का स्वभाव त्याग करने का, स्वार्पण का, दूसरे के दुःखों में सम्मिलित हो जाने का होता है। ये तत्व इन प्रेमियों में भी कम या ज्यादा परिमाण में होते हैं, इसलिए उपर्युक्त भावना में प्रेम का सम्पूर्ण अभाव है, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता है। इस भावना को अगर विशुद्ध बनाया जा सके, ईर्ष्या शंका और द्वेष से इसे पूर्णतया मुक्त किया जा सके, तो यह प्रेम का स्वरूप ग्रहण कर सकती है।
अब प्रश्न यह है कि ईर्ष्या, संशय और द्वेष, जो जीवन के सुख को नष्ट कर देने वाले तत्व हैं, वे जीवन के अनिवार्य अंश कैसे बन गये? यह तो नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक में प्रेम का जितना परिमाण होता है उतना ही परिमाण ईर्ष्या का भी होता है। यह भी नहीं देखा जाता कि प्रत्येक व्यक्ति में प्रेम और ईर्ष्या का रूप एक सा ही हो। प्रायः यह देखा जाता है कि हमारा कोई स्वजन अमुक व्यक्ति के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है तो हमको ईर्ष्या नहीं होती, पर जब वही किसी दूसरे के साथ वैसा सम्बन्ध रखता है तो ईर्ष्या का भाव प्रकट हो जाता है। किसी स्थान पर विश्वास और किसी स्थान पर शंका अपने आप उत्पन्न हो जाती है, ऐसा भी अनुभव में आया है।
हम इतना तो मान ही सकते हैं कि यह स्थिति इष्ट नहीं है। जीवन के विकास में और शाश्वत ही नहीं, सामान्य सुख में भी यह बाधा रूप है। इसलिये छुटकारा पाने का प्रयत्न करना हमारा कर्तव्य है। सुख और दुःख केवल हवा की लहरों की तरह ही नहीं होते कि अकस्मात ही आ जायें और चले जाएं। प्रायः वे हमारे प्रकट अथवा अप्रकट प्रयासों के परिणाम होते हैं, अथवा वे हमारे मनोविकारों के फल होते हैं। ईर्ष्या, संशय, द्वेष की भावना की जड़ कहाँ है, इसका पता लगाकर हम उनको दूर भी कर सकते हैं। ऐसा करने से प्रेम की सुगन्ध हमारे जीवन में सदा महकती रहेगी और उसमें से जीवन के विकास की प्रेरणा भी मिलती रहेगी।
हम को जो मुक्ति प्राप्त करनी हो तो बन्धन कहाँ है और कैसा है यह जानना आवश्यक है। प्रेम के साथ ईर्ष्या क्यों सम्मिलित रहती है? प्रेम में ऐसी कौन सी त्रुटि है, कौन सा पोलापन है कि जहाँ ईर्ष्या निवास कर सकती है? इसके लिये बहुत गहरा उतरने की आवश्यकता नहीं है। अपने मन से ही पूछना चाहिये कि क्या हमारे प्रेम के भीतर ऐसी कोई भावना है कि जिसके परिणामस्वरूप हमारा प्रियजन-फिर चाहे वह हमारी पत्नी हो, प्रेमिका हो, पुत्र, पुत्री, भाई, बहिन हो, मित्र हो- उसके दूसरे का बन जाने का हमको डर लगता है? इस प्रकार विचार करने से हमको तुरन्त मालूम हो जायगा कि हमारी प्रीति सच्ची हो, अर्थात् हम अपने प्रियजन के लिये कैसा भी दुःख खुशी से सहने को, महान् त्याग करने को तैयार हों, तो भी उसके भीतर अपनेपन की एक अनिष्ट भावना छुपी रहती है। प्रियजन के लिये हम सब कुछ कर सकें, परन्तु यदि हम मालिकी की भावना को न छोड़ सकें तो वह प्रेम दूषित ही समझना चाहिये। अपने सुख के लिये हम कुछ भी सहन करें, इसमें क्या कोई विशेषता है? क्या इसे त्याग अथवा स्वार्पण कहा जा सकता है? इसी प्रकार अगर हम किसी पर अपने मन में मालिकी का भाव रखें और फिर उसके लिये कष्ट सहन और त्याग करें तो इसमें कोई विशेषता नहीं मानी जायगी।
इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रेम के वास्तविक तत्व को समझें और उसे संकीर्ण रखने के बजाय विस्तृत रूप देने का प्रयत्न करें। सच्चे प्रेमी स्वभाव का व्यक्ति चाहे किसी पुरुष या स्त्री से प्रेम करे, पर वह यह कभी न चाहेगा कि दूसरे लोग उसके प्रेम-पात्र से स्नेह-भाव न रखें- वह सदैव यही अनुभव करेगा कि प्रेम आत्मा का स्वभाव है और वह विधाता की रची सृष्टि के अटल नियमों के अनुसार ही उत्पन्न होता है। यह आवश्यक नहीं कि एक आत्मा केवल एक ही व्यक्ति से प्रेम करे। जिस प्रकार आत्म-तत्व सर्वव्यापी है, उसी प्रकार प्रेम तत्व भी सृष्टि के अणु-अणु में व्याप्त है। अन्तर केवल इतना ही है कि किसी स्थान में वह कम परिमाण में विकसित होता है ओर किसी में अधिक परिमाण में। पर यह अन्तर ऐसा नहीं है जिसके कारण हमको किसी से द्वेष करना आवश्यक हो। इसलिये हमारा कल्याण इसी में है कि हम प्रत्येक अवस्था में प्रेम के आदि स्वरूप को ध्यान में रखकर अपने प्रेम को यथा सम्भव विशुद्ध बनाने का प्रयत्न करें। ऐसा करने से हमारा साँसारिक प्रेम भी हमारी मुक्ति का साधन बन सकता है।
(श्री के.एन. शर्मा)
रंगों का प्रभाव मनुष्य के शरीर और स्वास्थ्य पर पड़ता है यह बात लोगों को प्राचीनकाल से ज्ञात है। यही कारण है कि हमारे यहाँ सदा से शुभ कार्यों में लाल और पीले रंगों का प्रयोग किया जाता है और नीले तथा काले रंगों को अशुभ माना जाता है। पहनने के वस्त्रों में भी देशकाल का ध्यान रखने से स्वास्थ्य रक्षा में सहायता मिलती है। गर्म प्रदेशों में श्वेत रंग का वस्त्र लाभदायक होता है और ठण्डे देशों में लाल या काला अच्छा समझा जाता है। पर श्वेत रंग में एक सब से बड़ी खूबी यह है कि यह सूर्य की धूप में से शक्तिवर्द्धक अंश को ग्रहण करके उससे शरीर को लाभ पहुँचाता है।
जाड़े की ऋतु में अगर भीतर का वस्त्र रंगीन हो तो वह शरीर की गर्मी को शरीर से बाहर निकलने से रोकता है और इस प्रकार शरीर को ठण्ड से बचाता है। ऊपर का कपड़ा अगर कुछ कालापन लिये हो तो वह सूर्य की किरणों को सोख लेगा पर उनको शरीर में प्रवेश न करने देगा। इससे शरीर सूर्य ताप से उत्पन्न होने वाली कई खराबियों से बच जायगा। बहुत गर्म प्रदेशों में सूर्यताप की अधिकता से धूप से कार्बन इतना निकलता है कि लोगों की त्वचा उसे बहुत सोख लेती है, जिससे वह काली पड़ जाती है। इसी कारण अफ्रीका के हब्शी घोर काले रंग के होते हैं। पर इन लोगों को शरीर का रंग काला होने से एक विशेष लाभ भी होता है और वह यह कि काला रंग धूप को पूर्णरूप से शोषण कर लेता है और चमड़ी को इतना कार्यपरायण बना देता है कि वह शरीर के समस्त विकारों को बाहर निकाल देती है। ऐसा न हो तो विकार शरीर के भीतर एकत्रित होकर रोग उत्पन्न कर देते। बहुत गर्म देशों में बिल्कुल काले रंग का कपड़ा व्यवहार में लाना हानिकारक होता है, क्योंकि ऐसा करने से वस्त्र समस्त धूप को सोख लेता है और देह के चर्म पर उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता इससे लोगों को चेचक आदि जैसे चर्मरोग हो जाने का अन्देशा रहता है।
लाल रंग गर्म माना गया है और उसका प्रभाव पैरों पर बहुत लाभदायक होता है। पहनने का भीतरी वस्त्र अगर लाल रंग का हो तो शरीर की सुस्ती दूर करने को काफी फुर्ती दे सकता है। पाँडु वर्ण वाले को भी, अगर वह ‘नरवस’ (घबड़ाने वाला) न हो तो लाल रंग बहुत हितकारी सिद्ध होता है। पर सर पर लाल रंग के वस्त्र का व्यवहार करना कदापि उचित नहीं। इससे दिमाग व आँखों को हानि पहुँचती है। जिन लोगों के स्वस्थ शरीर में लाल रंग खूब भरा है, वे यदि लाल रंग का वस्त्र काम में लायें तो लाभ के बजाय हानि की ही अधिक संभावना है। यदि दिल उत्तेजित हो या दिल धड़कने वगैरह की बीमारी हो तो भी लाल रंग का वस्त्र भीतर पहनने के लिये काम में न लाना चाहिये।
नीला या हलका नीला रंग ठण्डा माना जाता है और पित्त के रोगों में उसका उपयोग बहुत लाभदायक माना गया है। जिनकी त्वचा लाल गर्म होकर उभर आती है तथा गर्म वाले को नीले वस्त्र ओढ़ना तथा पहिनना उत्तम होता है। इसीलिये जब आँखें दुखने आती हैं या सूज जाती हैं तब आसमानी रंग का चश्मा लगाने से आराम मालूम होता है। समुद्र यात्रा में भी नीले रंग का चश्मा हितकारी माना गया है। पीले रंग के कपड़े भीतर पहनने से ‘नरवस’ स्नायु मंडल को लाभ होता है। जिन लोगों को कब्ज रहता है उनको भी पीले वस्त्र भीतर पहिनना उत्तम माना गया है।
यह सदा ध्यान में रखना चाहिये कि सफेद रंग सब रंगों की शान और शक्ति को बढ़ाने वाला है। अब इसी प्रकार काला रंग दूसरे तमाम रंगों की शान व शक्ति को घटा देता है। बच्चों को चमकीले रंगों के वस्त्र पहिनना ठीक है। बैंगनी रंग के वस्त्र त्वचा में पीलापन उत्पन्न करते हैं, अतः जिन लोगों का रंग धूप में रहने से खराब हो गया है उनको नहीं पहनने चाहिये। ऊपर के वस्त्र ग्रीष्म में तो सफेद होना ही उचित है।
यदि किसी रोग के लिये किसी खास रंग के उपयोग की आवश्यकता न हो तो केवल सूर्य के प्रकाश और धूप का सेवन करना ही अनेक रोगों को आश्चर्यजनक रीति से दूर कर देता है। हमारे देश में तो प्रातःकाल सूर्य को जल चढ़ाने और सूर्य नमस्कार आदि के रूप में सूर्य-चिकित्सा प्राचीनकाल से व्यवहार होती आई है। अब योरोप और अमरीका आदि में इसको और धूप सेवन के लिये बड़े-बड़े यन्त्र तथा अन्य उपकरण बनाकर अनेक छोटे-बड़े रोगों की उनके द्वारा सफलतापूर्वक चिकित्सा की जाती है। रोगों के जर्म्स (कीटाणुओं) को नाश करने की जितनी अधिक शक्ति धूप में है उतनी और किसी वस्तु में नहीं है। क्षय के कीटाणु, जो बड़ी कठिनता से मरते हैं, सूर्य के सम्मुख रखने से थोड़ी ही देर में नष्ट हो जाते हैं। सूर्य किरणों से रोगी और स्वस्थ सभी व्यक्तियों को लाभ पहुँचता है। इसलिये जहाँ तक संभव हो उनका सेवन करना हमारा कर्तव्य है।
सूर्य-स्नान में इस बात का ध्यान रखना परमावश्यक है कि सूर्य की किरणें प्रातःकाल के समय ही विशेष लाभदायक होती हैं। दोपहर की तेज धूप गर्मियों में तो सहन की ही नहीं जा सकती, अन्य ऋतुओं में भी उससे प्रातःकालीन सूर्य-किरणों जैसा लाभ नहीं पहुँच सकता। उस अवसर पर एक साधारण लँगोटी के सिवाय सब वस्त्र उतार डालने चाहिये और आध घण्टा से डेढ़ घण्टा तक सूर्य की धूप में बैठना चाहिये। उस समय सिर पर कोई रुमाल आदि डाल लेना चाहिये। अगर केले आदि जैसा कोई चौड़ा पत्ता मिल जाय तो उसको सर पर रख लेना और भी उत्तम है।
बालकों के कई रोगों में रंगीन शीशियों द्वारा तैयार किये गये जल का प्रयोग बहुत लाभदायक होता है। गर्मी की ऋतु में छोटे बालकों को दस्त लग जाते हैं, वे डाक्टरी और वैद्यक इलाज से प्रायः अच्छे नहीं होते। इस अवस्था में हलके नीले रंग की शीशी का पानी तुरन्त लाभ पहुँचाता है। गर्मी के दस्तों में शिशु प्रायः बहुत रोया करता है। आसमानी रंग का पानी बराबर देते रहने से बालकों को अवश्य आराम होता है। दाँत निकलते समय बालक को जो ज्वर और दस्त हो जाते हैं उसमें भी आसमानी रंग का जल अनुपम गुणकारी सिद्ध होता है। अगर शिशु का सर बहुत गर्म न हो तो ललाट और सर पर आसमानी बोतल का जल लगावे और उसे बिना पोंछे हवा से धीरे-धीरे सूखने दे।
पीले रंग की बोतल का पानी उन बालकों के लिये जिनको दस्त न होता हो और प्रायः कब्ज रहता हो बहुत हितकारी है। यह जिगर को सुधारता है और साफ दस्त लाता है। इससे सुस्ती मिटकर चैतन्यता आती है, ‘नर्वस सिस्टम’ पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। जब तक पखाना साफ न हो तब तक एक-एक घण्टे बाद पीली बोतल का जल पिलाना चाहिये।
सूर्य अग्नि तत्व का प्रतीक है और इस पंचतत्वों से निर्मित शरीर के लिये समस्त उष्णता किसी न किसी रूप में उसी से प्राप्त होती है। अतएव जब अग्नि-तत्व की कमी से हमारी देह में कोई विकार उत्पन्न हो तो उसकी चिकित्सा सूर्य की किरणों द्वारा करके कृत्रिम औषधियों के कुप्रभाव से बच सकते हैं।
(ब्रह्मचारी श्री कृपाशंकर त्रिपाठी)
मनुष्य को भगवान की सृष्टि का सर्वोत्तम रूप कहा जाता है। वैसे खनिज पदार्थ, वनस्पति और पशुओं में भी ईश्वरीय शक्ति का विकास दिखलाई पड़ता है, पर उनमें बुद्धि या विवेक का तत्व नहीं पाया जाता और इसलिये उनकी किसी क्रिया को भला या बुरा भी नहीं कह सकते। पर मनुष्य में बुद्धि-तत्व का विकास एक बड़ी सीमा तक हो चुका है और उस मार्ग में चाहे जितना बढ़ सके इसकी सामर्थ्य भी उसे दी गई है। इसलिये मनुष्य अपने कर्मों का उत्तरदायी माना जाता है और उसे पाप पुण्य का भी भागी कहा गया है।
बुद्धि या विवेक शक्ति का सबसे बड़ा फल जो संसार में दिखलाई पड़ रहा है वह मनुष्यों का पारस्परिक सहयोग या संगठन है। दूसरी बात है परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन कर लेने की शक्ति। पूर्वकाल में संसार में बड़े-बड़े दैत्याकार और शक्तिशाली प्राणी हो चुके हैं और अब भी अनेकों जंगली जानवर मनुष्य से सभी प्रकार की भौतिक शक्तियों में बढ़े-चढ़े हैं। पर बुद्धि या विवेक के अभाव से वे न तो सच्चे अर्थ में कभी संगठित हो सके और न प्राकृतिक स्वभाव को छोड़कर परिस्थिति के अनुसार अपने में परिवर्तन कर सके। इन्हीं दोनों गुणों के कारण मनुष्य ने धीरे-धीरे समस्त प्राणियों पर ही नहीं प्राकृतिक शक्तियों पर भी प्रभुत्व प्राप्त कर लिया और आज वह अन्य लोकों तक पहुँचने का प्रयत्न कर रहा है।
मनुष्य ने जो इतनी उन्नति की है उसका मूल आधार पारस्परिक सहयोग ही है। अकेला आदमी तो एक साधारण पशु के समान भी जीवन-निर्वाह कठिनता से कर सकता है। पर जब से मनुष्य अपनी शक्ति-अपने परिश्रम का उपयोग सब लोगों के- समाज के हित की दृष्टि से करने लगा। तभी से उसकी प्रगति तीव्र गति से होने लगी। जब मनुष्य ने केवल अपने स्वार्थ का ध्यान छोड़कर अपने परिश्रम और खोज के फल को समाज के भंडार में प्रदान कर दिया तो वह सामूहिक शक्ति बड़े विशाल रूप को प्राप्त हो गई और उसके द्वारा नये-नये महान् कार्य साध्य होने लगे।
पर इधर कुछ सौ वर्षों से मनुष्य में एक हानिकारक प्रवृत्ति का उदय हो रहा है। जब से उद्योग धन्धों और विशेषकर भाप, बिजली आदि शक्तियों से चलने वाले यंत्रों का प्रचलन बढ़ा है और उनके फल से सम्पत्ति की उत्पत्ति अधिकाधिक होने लगी है, तब से मनुष्यों को धन इकट्ठा करने की और इस दृष्टि से दूसरों से आगे बढ़ जाने की धुन लग गई है। इस धन के फन्दे में फँसकर मनुष्य अपने ही अनुयायियों, सहकारियों का अहित चिन्तक बन जाता है और सदा इसी कोशिश में लगा रहता है कि किसी प्रकार मैं इन सब के हिस्से की सम्पत्ति को हड़प कर लखपती-करोड़पती बन जाऊँ। इस मनोवृत्ति का परिणाम यह हो रहा है कि समाज में एकता, प्रेम और सहयोग के स्थान पर लड़ाई-झगड़ों और ईर्ष्या, द्वेष की वृद्धि हो रही है। मानव समाज पूँजीपति और श्रमजीवी (शोषक और शोषित) ऐसे दो हिस्सों में बँट गया है और संसार भर में फूट, कलह, वैमनस्य की वृद्धि हो रही है।
इस परिस्थिति का मुकाबला जब हम अपनी प्राचीन संस्कृति से करते हैं तो जमीन आसमान का अन्तर मालूम पड़ता है जहाँ हमारे पूर्वजों ने मनुष्यों का आदर्श परोपकार, पर सेवा, दुखियों का परित्राण बतलाया था और स्पष्ट शब्दों में घोषणा की थी-”पर द्रव्येषु लोष्ठ्रवत्” वहाँ आज दूसरे के हिस्से की सम्पत्ति अपने कब्जे में कर लेना बड़ी अच्छी होशियारी, चतुराई, योग्यता की बात मानी जाती है।
भारतीय संस्कृति में सदैव से देवताओं का बड़ा ऊँचा स्थान है। आजकल विष्णु शिव, गणेश, हनुमान आदि देवता पूजे जाते हैं प्राचीनकाल में, इन्द्र, वरुण, यम, अग्नि, सोम, मित्रावरुण आदि देवताओं की उपासना की जाती थी। ये देवता इसी उद्देश्य से पूजे जाते थे कि वे मनुष्यों का कल्याण करें, वे मनुष्यों की उनकी मनोवाँछित वस्तुयें देते थे, उनकी अभिलाषाओं की पूर्ति करते थे, इसी से वे देवता कहलाते थे। इसके विपरीत जो अन्य मनुष्यों के स्वत्वों का, अधिकारों का, सम्पत्ति का अपहरण, शोषण करता था, वह राक्षस माना जाता था। आज की दुनिया ने इस शिक्षा को भुला दिया है और दूसरों को कुछ देने की अपेक्षा उनसे कुछ लेते रहने को ही अपना लक्ष बना लिया है। जब सब कोई, या अधिकाँश भाग ऐसी मनोवृत्ति रखेगा तो सुख, शाँति, सन्तोष की आशा कहाँ से की जा सकती है?
हमको भली प्रकार यह समझ लेना चाहिये कि हमारा सच्चा कल्याण लोभ और अपहरण की प्रवृत्ति से नहीं हो सकता, वरन् न्याय और उदारता के सिद्धान्त पर चलना ही कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है। पूँजीवाद अर्थात् समाज की सम्पत्ति को उचित स्थान से खींचकर अपनी तिजोरियों में भर रखना सब के लिये कष्टकारी, अतएव महान् पाप है। आज हम धन की मोहिनी माया के फेर में पड़कर इस परम सत्य को भूल गये हैं, अन्यथा जो व्यक्ति इस प्रकार सामाजिक जीवन निर्वाह के लिये आवश्यक सम्पत्ति के स्वाभाविक आवागमन में बाधा डालता है और अपने नीच स्वार्थ के लिये तरह-तरह की तिकड़मों से उसे खींचकर ताले में बन्द कर देता है वह समाज का सबसे बड़ा शत्रु और धिक्कारने योग्य मनुष्य है। ऐसे मनुष्य को समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं। भारतवर्ष में भी पहले कुछ लोग बड़ी-बड़ी सम्पत्तियों के स्वामी हुआ करते थे, पर वे उसका उद्देश्य लोक-सेवा ही मानते थे और समय आने पर बिना हिचकिचाहट के जनता के हित के लिये सम्पत्ति को उत्सर्ग कर देते थे। पर यह भावना अब लोप होती जाती है और दिखावे के लिये कुछ दान-धर्म के करने पर भी पूँजीपतियों का मूल उद्देश्य अपनी सम्पत्ति को निरन्तर बढ़ाते जाना और उस पर ऐसे ताले लगाते जाना हो गया है, जिसमें अभावग्रस्त साधारण व्यक्तियों की उस तक पहुँच न हो सके। जब तक इस मनोवृत्ति में आमूल परिवर्तन न होगा और लोग सामाजिक न्याय के नियमों का पालन करते हुये ‘देवत्व’ की भावना- दूसरों के उपकार के लिये देने, त्याग करने की मनोवृत्ति को न अपनायेंगे तब तक संसार का कल्याण नहीं हो सकता।
(श्री श्रीनिवास)
जिस सृष्टि में हम रहते हैं उसकी रचना कैसे हुई, इसका वर्णन प्रत्येक धर्म में किया गया है। धर्म का एक अंग यह भी माना गया है कि वह आत्मा, परमात्मा और सृष्टि के सम्बन्ध में लोगों की जिज्ञासा को पूरा करें, क्योंकि इन प्रश्नों का समाधानकारक उत्तर पाये बिना मनुष्य की धर्म बुद्धि दृढ़ नहीं हो सकती और वह सच्चा आस्तिक भी नहीं बन सकता।
जैसा सभी जानते हैं सृष्टि रचना के सम्बन्ध में, प्रत्येक धर्म में कुछ न कुछ बतलाया गया है, पर भारतीय धर्मों के सिवा अन्य किसी ने इस पर गम्भीरतापूर्वक और विस्तार से विचार नहीं किया। उदाहरणार्थ ईसाइयों की बाइबिल में लिख दिया है कि ईश्वर ने छः दिन में विश्व की भिन्न-भिन्न वस्तुओं को बनाया और सातवें दिन विश्राम किया, जो कि रविवार का दिन था। ऐसी ही बातें मुसलमानों की कुरान में लिखी हुई हैं। सृष्टि-रचना का सविस्तार और बुद्धि संगत वर्णन हमको हिन्दू वेद-शास्त्रों में ही मिलता है। इनमें विभिन्न स्थलों में लिखे वर्णन में कुछ अन्तर अवश्य है, तो भी वह अधिकाँश में आधुनिक विज्ञान की खोजों से मिलता-जुलता जान पड़ता है। आजकल भी अनेक विद्वानों और अनुभवी अध्यात्मवेत्ताओं ने उसकी व्याख्या करके इस विषय को बोधगम्य बनाने की चेष्टा की है जिसका साराँश हमारे पाठकों को अवश्य रुचिकर होगा।
विश्व की रचना के पहले एक महाशून्य आकाश में एक पीली ज्योति सर्वत्र प्राप्त हो रही थी। यह अनन्त प्रकाश समस्त विश्व में छः रूपों में अभिव्याप्त है और सृष्टि के प्रत्येक कण, उसके अणु-परमाणु, उसके चर-अचर जीवों तथा उसकी समस्त जागृत शक्तियों पर इसकी छाप है। यही अनन्त प्रकाश सृष्टि का आदि हेतु, उसका उद्गम स्थान है। इसी से समस्त शक्तियाँ विकसित होकर सारी सृष्टि और उसके समस्त नक्षत्र मण्डल को एक अटूट शृंखला में बाँध रही है।
इस अनन्त प्रकाश से एक महान स्वर लहरी (शब्द ब्रह्म) फूट पड़ी और उस स्वर लहरी से एक विश्वव्यापी अनन्त संगीत में एक अलौकिक स्वर माधुर्य, दिव्य लयता थी। यह स्वर लहरी चूँकि उस अनन्त प्रकाश से अभिन्न थी, अतएव यह भी समस्त चराचर विश्व में उस अनन्त प्रकार के साथ ही व्याप्त हो गई। दूसरे शब्दों में यों भी कह सकते हैं कि इस अनन्त प्रकाश की समस्त रश्मियाँ तथा उन रश्मियों के प्रत्येक कण संगीतमय हो गए। यह संसार का सबसे सुन्दर, सबसे दिव्य, सबसे मधुर संगीत था और उसमें एक दृढ़ और खोजपूर्ण एकलयता थी। यह संगीत इस संसार तथा सृष्टि का दूसरा उद्गम स्थान था।
उस अनन्त संगीत की स्वर लहरी से एक व्यापक आनन्द की सृष्टि हुई और उस व्यापक आनन्द के द्वारा उस सर्वशक्तिमान अनन्त प्रकाश की निर्माण शक्ति-उसका उत्पादक तेज पुँज जाग उठा। इस उत्पादक तेजपुँज ने अपने पूर्ण विकास में आकर पाँच तत्वों के इस विश्व की रचना की। इसके बाद एक छठे तत्व की भी रचना हुई जिसका ज्ञान आत्मज्ञानी ही प्राप्त कर सकते हैं।
अनन्त अथवा दिव्य प्रकाश की रश्मियाँ स्थिर होती हैं- स्थिर तथा प्रवर्धनशील। इनके रूप भी स्थिर होते हैं। इन्हीं रूप ज्योतियों के द्वारा ये विश्व के भीतर और बाहर परिव्याप्त रहती हैं। इन रूप ज्योतियों को भी अनन्त प्रकाश की स्थिर रश्मियाँ चारों ओर से ढ़क लेती हैं। ढ़कने वाली ये स्थिर रश्मियाँ अत्यन्त महान हैं। इनकी प्रवर्धनशील शक्ति उस महान अनन्त प्रकाश के गर्भ में गिरती है जो आगे चलकर छः अवस्थाओं में विभक्त हो जाती है। इन अवस्थाओं का वर्णन श्रीमद्भगवतगीता में भी पाया जाता है।
सृष्टि की उत्पत्ति में ॐ की भी बड़ी महिमा है। शास्त्रों में ब्रह्मा, शिव और विष्णु का उल्लेख किया गया है। धर्म गुरुओं ने साधारण जनता के समझ सकने के उद्देश्य से इनके मानवीय रूपों का वर्णन किया है पर वास्तव में इनका कोई दैहिक रूप नहीं होता। वास्तव में ये तीनों ॐ की ही तीन धाराएं हैं। पहले अनन्त प्रकाश विश्व में व्याप्त होकर क्रियमाण हुआ। इसके बाद वह और भी विस्तृत होने लगा और आगे चलकर तीन कल्याणकारी धाराओं में विभक्त हो गया। ये तीन धाराएं ॐ के आकार में बदल गई। आदि ज्योति के संगीत में परिणित होने के बाद ॐ की उत्पत्ति हुई।
आदि ज्योति ॐ के रूप में विश्व के शिरा केन्द्र की तीन जिह्वाओं की भाँति फैली। ये तीनों भुजाएं ही ब्रह्म की तीन वृत्तियों की कल्पनाएं बन जाती है, अर्थात् (1) विनाश वृत्ति, (2) उत्पादक वृत्ति, (3) पोषक वृत्ति। इस प्रकार शिव, ब्रह्मा और विष्णु का वास्तविक महत्व ॐ की तीन भुजाओं में प्रकट होता है। हमारे लिए यह गौरव की बात है कि सृष्टि के मूल ॐ का यह वास्तविक तत्व और विशद् वर्णन हिन्दू-शास्त्रों द्वारा ही प्रकट हुआ है।
इस प्रकार अनन्त प्रकाश से निकलने वाला उत्पादक तेजपुँज आगे चलकर संसार में ब्रह्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्म तीन अवस्थाओं में रहता है- चेतन, अचेतन और दिव्य चेतन अचेतन दशा में ब्रह्म अपनी योग्यता के द्वारा व्यक्त, अव्यक्त और दिव्य अवस्थाओं में परिक्रमण करते हुए, जीवधारी और निर्जीव पदार्थों में व्याप्त रहता है। इन्हीं अवस्थाओं के कारण मनुष्य भी उस ब्रह्म का सूक्ष्म प्रतिबिम्ब है।
ब्रह्म के उत्पादक तेजपुँज ने जब महाशून्य से सृष्टि रचने का कार्य आरम्भ किया, उसी समय विष-ज्वाला का एक अनन्त प्रवाह बह चला। उस समय सहस्र प्रकार का दारुण विष उत्पन्न हुआ। जिसे हमारे यहाँ सहस्रनाम [शेषनाग] के नाम से पुकारते हैं। वास्तव में वह सहस्र-विष ही था, जो उत्पन्न होकर स्वयं अपनी प्रतिक्रियाओं से सृष्टि के बाहर और भीतर परिवेष्टित हो गया और जो विश्व के सभी जीवित प्राणी और निर्जीव पदार्थ टकराकर चूर-चूर न हो जावें। इसी प्रकार यह संसार आज अपने इस रूप में इस विश्व के गर्भ में अवस्थित है। साथ ही यह बात स्पष्ट है कि यह विश्व सभी ओर से एक विशाल धूम्रराशि से आच्छादित है।
जिस विश्व का एक भाग हमारी पृथ्वी है उसके प्रादुर्भाव। (प्रकट होने) और लय होने के विषय में मनुष्य का ज्ञान अभी बहुत थोड़ा है। एक ही ईश्वर से उत्पन्न हुए और उसी की शक्ति से पोषण पाये सौर-मण्डल को हम विश्व कहते हैं। हमारी दृष्टि में यह पूर्ण दिखलाई पड़ता है, अर्थात् किसी बाह्य जगत या लोक से इसका सम्बन्ध नहीं रहता। इस प्रकार यह सौर-जगत ही हमारा विश्व है और उसका केन्द्र जो सूर्य है वह ईश्वर की ऐसी स्थूल उपाधि है जिसे हम नेत्रों से देख सकते हैं। वास्तव में तो सृष्टि के प्रत्येक रूप में ईश्वर व्यक्त भाव को प्राप्त है, प्राणदायक पोषण, सर्वव्यापक, सर्वनियामक, सर्वव्यव-संस्थापक केन्द्रस्थ सत्ता की दृष्टि से सूर्य को ही ईश्वर का सबसे नीचा प्रकट रूप कह सकते हैं।
अँधेरी रात्रि में आसमान में अनगिनत सौ ‘लोकों को देखकर चाहे हमें यह निश्चय हो जाय कि वहाँ जगत रूपी महासागर में हमारा सौर जगत हमारा विश्व केवल एक बूँद मात्र है, पर यह बूँद उसमें स्थित हमारे सरीखे मनुष्यों के अनुपात से स्वयं एक महासागर है।
(श्री चतुरसेन शास्त्री)
बुद्ध भगवान ने यद्यपि स्त्रियों को अपने संघ में स्थान दिया था और पुरुषों की भाँति स्त्रियाँ भी भिक्षुणी बन सकती थीं। परन्तु बौद्ध सम्प्रदाय का मूल सिद्धान्त स्त्रियों को पुरुषों से दूर रखना ही था। क्योंकि बौद्ध धर्म में त्याग और वैराग्य का स्थान मुख्य है, भोग का नहीं। बुद्ध ने स्त्रियों की निन्दा तो नहीं की परन्तु बराबर यह सलाह दी कि लोग स्त्रियों के खतरे से बचे रहें। उनके विचारानुसार आदर्श जीवन वह है जो स्त्रियों से अलग रहकर और संभव हो तो किसी भी दशा में उनसे न मिलकर व्यतीत किया जाय। एक बार बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनन्द ने उसने प्रश्न किया-”भगवान, स्त्रियों के सम्बन्ध में हम कैसा व्यवहार करें?”
बुद्ध ने कहा-”उन्हें देखो मत, आनन्द।”
आनन्द ने कहा- “परन्तु उन्हें देखना पड़े तब?”
बुद्ध-”तो बहुत सावधान रहो।”
फिर भी बुद्ध ने अपने साधारण अनुयायियों और गृहस्थों के प्रति यही उपदेश किया था कि जहाँ तक हो सके अपनी स्त्रियों को अपना मित्र समझो और उन पर विश्वास रखो। साधारण भक्तों को उन्होंने यह उपदेश दिया कि माता-पिता की सेवा, पत्नी और बच्चों का सहवास तथा शाँतिपूर्ण उद्योग ही सबसे बड़ा आशीर्वाद है।
बौद्ध धर्म में जहाँ पति-पत्नी के सम्बन्ध और उनके व्यवहार के लिये नियमोपनियमों की चर्चा की गई है, वहाँ पत्नी के लिये पति की आज्ञापालन का कोई जिक्र नहीं है। पतियों के लिये जरूर आदेश है कि वे अपनी पत्नियों के विश्वास पात्र रहें, उनका आदर करें और उन्हें यथोचित वस्त्र आभूषण प्रदान करें। पत्नियों को पतिव्रत धर्मपालन और मितव्ययी बनने की शिक्षा दी है। स्त्रियों से यह भी कहा गया है कि वे अपने घरेलू कामों में बुद्धिमत्ता और परिश्रम से काम लें, यह सब होने पर भी बुद्ध ने अविवाहित जीवन को अधिक श्रेष्ठ माना है, क्योंकि उसमें मनुष्य शुद्ध आचार-विचार और परोपकार का पालन अधिक उत्तमता से कर सकता है। परन्तु गृहस्थियों के लिये भी उन्होंने ऐसे नियम बनाये हैं कि वे परस्पर एक दूसरे को अपना मित्र समझें, परस्पर एक दूसरे का आदर करें और परस्पर एक दूसरे का विश्वास करें।
माता के प्रति बुद्ध भगवान के भाव बहुत उच्च थे। बुद्ध ने अपनी माता और पत्नी के आग्रह से ही स्त्रियों को भी भिक्षुणी बनने का अधिकार दिया था। बौद्ध धर्म के अनुसार स्त्रियों को निर्वाण प्राप्त करने का उतना ही अधिकार है जितना कि पुरुषों को। कहा जाता है कि बुद्ध के जीवनकाल में 73 स्त्रियों और 107 पुरुषों ने निर्वाण प्राप्त करके मानव-जीवन के विकास की चरम सीमा तक पहुँचने का प्रयत्न किया था। जब बौद्ध धर्म का प्रचार किया जा रहा था तब स्त्रियों ने ही सबसे अधिक आर्थिक सहायता की थी। बुद्ध ने बिसाखा आदि स्त्रियों की बहुत प्रशंसा की है। एक स्त्री की प्रशंसा करते हुये बुद्ध ने कहा है-”यह महिला साँसारिक वातावरण में रहती है-और राजरानियों की कृपापात्री है, तो भी इसका हृदय स्थिर और शाँत है। उसकी अवस्था युवा है और वह धन तथा ऐश्वर्य से घिरी है, फिर भी वह कर्तव्य पथ में अविचल और विचारशील है। यह इस संसार में दुर्लभ चीज है।”
जिस काल में बुद्ध ने अपने धर्म का प्रचार किया था, उस काल में स्त्री-जाति की स्थिति बहुत शोचनीय हो गई थी। यह बुद्ध का ही साहस था कि उसने कहा- “निर्वाण की प्राप्ति न केवल ब्राह्मण को ही होती है वरन् मनुष्य मात्र को हो सकती है, और स्त्रियों को भी हो सकती है।” यह वही समय था जब ‘स्त्री शूद्रो नाधीयताम’ की आवाज सर्वत्र गूँज रही थी और स्त्रियों का समाज में कोई स्थान ही न था।
(श्री सुदर्शनदेव शास्त्री ‘उपाध्याय’ गुरुकुल झज्जर)
विश्व में प्राणिमात्र ज्योति से प्रेम करता है। अन्धकार से प्राणी की स्वाभाविक घृणा दृष्टि देखने में आती है। अन्धकारप्रिय प्राणी लोक में असुर पद से व्यवहृत होते हैं। ज्योति को देखकर पतंग भी उस ज्योति में लीन हो जाता है। अवसर पाकर पतंग भी उस ज्योति में गिरकर अपने आपको स्वाहा कर देता है। पतंग की ज्योतिप्रियता अति प्रशंसनीय है। अंधकार में भूला-भटका मानव एक टिमटिमाते दीपक को पाकर ही अपने आपको सौभाग्यशाली समझता है। ज्योति की महिमा अपार है। वास्तव में ज्योति ही जीवन है।
आप लोक में अनेक प्रकार की ज्योतियाँ देख रहे हैं। आज के वैज्ञानिक युग में तो ज्योतिर्गमय पदार्थों की संख्या अपरिसंख्येय है। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि प्राकृतिक ज्योतिर्गमय पदार्थ हैं, जिनकी सत्ता से ही प्राणिमात्र जीवन प्राप्त कर रहा है। यदि एक सूर्य की ज्योति सर्वथा लुप्त हो जाये तो सब लोक व्यवस्था धूल में मिल जाए। अस्तु।
हाँ। तो मैं आपका एक ऐसी ज्योति की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ जो ज्योति अनादिकाल से लेकर चली आ रही है और अनन्त काल तक अपने स्वरूप में विद्यमान रहेगी, जिसको आप अखंड-ज्योति नाम दे सकते हैं।
आज के वैज्ञानिक युग की चकाचौंध उस अखंड ज्योति की एक किरण के तुल्य भी नहीं है। जितने ज्योतिर्मय पदार्थ विश्व में देखने को मिलते हैं वे उसी अखण्ड ज्योति से ही प्रकाशमान हैं। दुर्जन तोष न्याय से उसके अभाव में सकल संसार असार है। प्राणिमात्र में भी जो गति तथा ज्योति दृष्टिगोचर हो रही है वह भी उसी अखण्ड ज्योति से ही बल पाकर सत्तारूढ़ है।
आज का भोला संसार उस अखण्ड ज्योति की सत्ता के सम्बन्ध में पूछने पर ‘नेति’-’नेति’ का उत्तर प्रदान करता है, किन्तु ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ’ जो गम्भीरतापूर्वक सूक्ष्म ईक्षिका से उस अखण्ड ज्योति की खोज करता है वह एक दिन उसे पाकर अथाह आनंद सागर में गोते लगाता है। “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का संकेत उसी अखण्ड ज्योति की ओर है।
आप अवश्य समझ गए होंगे कि वह अखण्ड ज्योति क्या है? उसे मनुष्य ब्रह्म, भगवान् विष्णु, ओऽम्, खुदा, शक्ति, कुदरत आदि-आदि नामों से अपने विश्वास अनुसार पुकारते हैं। एक मात्र सभी का अंगुलि निर्देश उस दिव्य अखण्ड ज्योति भगवान् की ही ओर है। वास्तव में प्राणिमात्र का, विशेषतः मानव समाज का कल्याण एवं मंगल उस अखण्ड ज्योति की प्राप्ति में ही है। अतः वेद भगवान कहता है “ऋतस्यपथा प्रेत” उस अखण्ड ज्योति की ओर चलो।
(एक विचारक)
संतति निग्रह वर्तमान समय की एक बहुत बड़ी समस्या है इसकी आवश्यकता और उपयोगिता तो इतनी स्पष्ट है कि उसका विरोध शायद ही कोई विचारशील व्यक्ति करेगा। आजकल दुनिया में जो अनेकों विपत्तियाँ दिखलाई पड़ रही हैं और स्वार्थ तथा संघर्ष की वृद्धि हो रही है, उसका एक बहुत बड़ा कारण जल-संख्या की अनियन्त्रित वृद्धि ही है। मनुष्यों के पेट भरने के लिए पैदावार बढ़ाने के तरह-तरह के उपाय किये जाते हैं और जब उनसे काम पूरा नहीं पड़ता तब खाद्य पदार्थों में कई तरह की मिलावट की जाती है और नकली पदार्थ बनाये जाते हैं। जन-समूह में तरह-तरह की धूर्तता, छल, कपट और अनैतिकता की वृद्धि का मूल कारण भी यही है। इसलिए लोकमत संतान-निग्रह के पक्ष में आता जाता है और सरकार भी उसके प्रचार में सक्रिय सहयोग देने लगी है।
पर सन्तान निग्रह किस प्रकार किया जाय, इस सम्बन्ध में बहुत मतभेद है। ‘अखण्ड ज्योति’ के किसी पिछले अंक में इस विषय पर काफी प्रकाश डाला गया था। वर्तमान समय में संतति-निग्रह का जो प्रचार किया जा रहा है उसमें प्रधानतः कृत्रिम साधनों का प्रयोग ही बतलाया जा रहा है। पर इसी कारण अनेक व्यक्ति इसके विरोधी भी बन जाते हैं। इस सम्बन्ध में महात्मा गाँधी ने भी कई लेख लिखे थे और संतति-निग्रह के सिद्धान्त को मानते हुए भी उसके लिए प्रयुक्त होने वाले कृत्रिम साधनों की निंदा की थी। महात्माजी के लेख का मुख्य अंश नीचे दिया जाता है।
‘बहुत झिझक और अनिच्छा के साथ मैं इस विषय पर कलम उठा रहा हूँ मैं जबसे दक्षिण अफ्रीका से लौटा तभी से मुझे कितने ही पत्र मिलते रहे हैं, जिनमें जनन-नियमन के कृत्रिम साधनों से काम लेने के बारे में मेरी राय पूछी जाती है। उन पत्रों के उत्तर निजी तौर पर तो मैंने दिए हैं, पर सार्वजनिक रूप में अब तक इस विषय की चर्चा नहीं की थी। इस विषय ने आज से 35 साल पहले, जब मैं विलायत में पढ़ता था, अपनी ओर मेरा ध्यान खींचा था। उन दिनों वहाँ एक संयमवादी और एक डॉक्टर के बीच गहरी बहस चल रही थी। संयमवादी प्राकृतिक उपाय-इन्द्रिय-संयम के सिवा और किसी उपाय को जायज न मानता था और डॉक्टर बनावटी साधनों का प्रबल समर्थक था। उस कच्ची उम्र में कृत्रिम उपायों की ओर थोड़े दिन झुकने के बाद मैं उनका कट्टर विरोधी हो गया। अब मैं देखता हूँ कि कुछ हिन्दी-पत्रों में इन उपायों का वर्णन इतने नग्न रूप में हो रहा है कि उसे देखकर हमारी शिष्टता की भावना को गहरा धक्का लगता है। मैं यह भी देख रहा हूँ कि एक लेखक को कृत्रिम उपायों के समर्थकों में मेरा नाम लेते हुए भी संकोच नहीं हो रहा है। मुझे एक भी अवसर याद नहीं आता जब मैंने इन उपायों के समर्थन में कुछ कहा या लिखा हो। उनके समर्थकों में दो प्रतिष्ठित पुरुषों के नाम लिए जाते भी मैंने देखा है। पर उनकी इजाजत के बिना उनके नाम प्रकट करते मुझे हिचक होती है।
जनन-नियमन की आवश्यकता के विषय में तो दो मत हो ही नहीं सकते। पर युगों से इसका एक ही उपाय हमें बताया गया है और वह है इन्द्रिय-निग्रह या ब्रह्मचर्य। यह अचूक रामबाण उपाय है, जिससे काम लेने वाले की हर तरह भलाई होती है। चिकित्सा-शास्त्र के जानकार गर्भ-निरोध के अप्राकृतिक साधन ढूँढ़ने के बदले अगर मन-इन्द्रियों को काबू में रखने के उपाय ढूंढ़े तो मानव-जाति उनकी चिर-ऋणी होगी। स्त्री पुरुष के समागम का उद्देश्य इन्द्रिय सुख नहीं बल्कि सन्तानोत्पादन है और जहाँ सन्तान की इच्छा न हो वहाँ सम्भोग पाप है।
बनावटी साधनों का उपयोग तो बुराइयों को बढ़ावा देता है। वे स्त्री-पुरुष को नतीजे की ओर से बिल्कुल लापरवाह बना देते हैं। और इन उपायों को जो प्रतिष्ठा दी जा रही है उसका फल यह होगा कि लोकमत व्यक्ति पर अभी जो थोड़ा दाब-अंकुश रखता है वह जल्दी ही गायब हो जायगा अप्राकृतिक उपायों से काम लेने का निश्चित परिणाम मानसिक दुर्बलता और नाड़ी-मण्डल का शिथिल हो जाना है। दवा मर्ज से महंगी पड़ेगी। अपने कर्म के फल से बचने की कोशिश ना-समझी और पाप है। जरूरत से ज्यादा खा लेने वाले के लिए यही अच्छा है कि उसके पेट में दर्द हो और उसे उपवास करना पड़े। ठूँस-ठूँसकर खाना और फिर चूरन खाकर उसके स्वाभाविक फल से बच जाना उसके लिए बुरा है। काम-वासना की मनमानी तृप्ति करना और उसके नतीजों से बचना तो और भी बुरा है। प्रकृति के हृदय में दया माया नहीं है, जो कोई उसके नियमों को तोड़ेगा उससे वह पूरा बदला लेगी। नीति-संगत फल तो नीति-संगत संयम से ही प्राप्त हो सकते हैं और तरह के प्रतिबन्ध तो जिस बुराई से बचने के लिए लगाए जाते हैं उसको उलटा और बढ़ा देते हैं।
कृत्रिम उपायों के उपयोग के समर्थकों की बुनियादी दलील यह है कि सम्भोग जीवन की आवश्यक क्रिया है। इससे बड़ा भ्रम और कोई हो नहीं सकता। जो लोग चाहते हैं कि जितने बच्चों की हमें जरूरत है उससे ज्यादा बच्चे पैदा न हों, उन्हें चाहिए कि उन नीति-संगत उपायों की खोज करें जो हमारे पूर्व पुरुषों ने ढूंढ़ निकाले थे और उनका चलन फिर कैसे चल सकता है इसका उपाय मालूम करें। उनके सामने बहुत-सा आरम्भिक कार्य करने को पड़ा है। बाल विवाह जन-संख्या की वृद्धि का एक प्रधान कारण है। रहन-सहन का वर्तमान ढंग भी बच्चों की बेरोक बाढ़ में बहुत सहायक होता है। इन कारणों की खोज करके इन्हें दूर करने का उपाय किया जाय तो समाज सदाचार की एक-दो सीढ़ियाँ और चढ़ जायगा और अगर जनन-निरोध के उत्साही समर्थकों ने उनकी उपेक्षा की, कृत्रिम साधनों का चलन आम हो गया तो नतीजा पतन के सिवा और कुछ नहीं हो सकता।
जो समाज विविध कारणों से पहले ही बल-वीर्य रहित हो चुका है वह जन्म-निरोध के कृत्रिम उपायों को अपनाकर अपने आपको और भी निर्बल बना देगा अतः जो लोग बिना सोचे विचारे कृत्रिम साधनों से काम लेने का समर्थन कर रहे हैं उनके लिए इससे अच्छी बात दूसरी नहीं हो सकती कि इस विषय का नये सिरे से अध्ययन करें, अपने हानिकर प्रचार को रोकें और विवाहित-अविवाहित दोनों को ब्रह्मचर्य के रास्ते पर चलाने की कोशिश करें।
महात्माजी के विचार निस्सन्देह मनन करने योग्य हैं। इसमें तो कुछ सन्देह ही नहीं कि कृत्रिम उपाय पूर्ण रूप से निर्दोष नहीं होते और उनसे प्रायः कुछ न कुछ हानि होती ही है। संयम का मार्ग उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ है इसे मानने से भी कोई समझदार व्यक्ति इनकार नहीं कर सकते। फिर भी अगर हम कृत्रिम साधनों को थोड़े या अधिक अंशों में स्वीकार करें तो उसका एक मात्र कारण विवशता ही समझना चाहिए। कृत्रिम उपाय उन्हीं लोगों के लिए किसी हद तक क्षम्य माने जा सकते हैं, जो संयम करने की शक्ति नहीं रखते। फिर भी महात्माजी के इस मत को हम शिरोधार्य करते हैं कि संयम और इन्द्रिय-निग्रह का मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ और प्रशंसनीय है।
(श्री गोविन्दचन्द्र भट्ट पुरोहित)
प्रसन्नता की बात है कि आज गायत्री यज्ञों की लहर सारे भारतवर्ष में फैल रही है। ब्राह्मण होने के नाते मुझे इससे भारी प्रसन्नता होती है और गायत्री परिवार के इस पुण्य प्रयत्न को देखकर मेरी अन्तरात्मा पुलकित हो जाती है। लगता है कि हजारों लाखों वर्षों पर वह युग अब पुनः इस भारत भूमि में अवतरित हो रहा है जिसे ऋषियों का युग कहते थे और जब घर-घर में अग्निहोत्र का यज्ञ धूम्र उठता था, जब घर-घर में वेद मन्त्रों की ध्वनि सुनाई पड़ती थी।
कई गायत्री यज्ञों में मेरा जाना हुआ है। जहाँ सामान्य जनता तथा सभी विचारशील लोग इस पुण्य प्रयत्न की भूरी-भूरि प्रशंसा करते देखे जाते हैं, वहाँ यह भी देखा जाता है कि मेरे स्वजातीय बन्धु पण्डित पुरोहित लोग इस कार्य में सहयोग देना तो दूर उलटे इनमें अड़ंगा लगाते हैं। उनका अड़ंगा जनता के उत्साह और विवेक के सामने सफल तो होता नहीं उलटा इनका मान तथा मूल्य लोगों की दृष्टि में घट जाता है। लोग इन चन्द लोगों की भूलों को देखकर ब्राह्मण वर्ग पर ही आक्षेप करने लगते हैं। इससे मुझे भारी चोट पहुँचती है। मेरी ही भाँति लाखों ब्राह्मण इस यज्ञ कार्य में सच्चे मन से सहयोग देते हैं और प्रसन्नता अनुभव करते हैं। कुछ थोड़े से पण्डित पुरोहित वर्ग के लोग सारी ब्राह्मण जाति का प्रतिनिधित्व नहीं करते, उनकी हरकतों का दोष सारे ब्राह्मण समाज को देना उचित नहीं। सच्चा ब्राह्मण यज्ञों का, विशेषतया गायत्री यज्ञों का सहायक हो सकता है।
गायत्री और यज्ञ रूपी माता-पिता को कन्धे पर रखकर प्राचीन काल के ब्राह्मण श्रवणकुमार की तरह उन्हें सारे देश में पहुँचाते थे। ब्राह्मण के छह कृत्यों में यज्ञ करना और यज्ञ कराना भी एक कर्तव्य है। इसके लिये ब्राह्मण अपने जीवन का एक तिहाई भाग खर्च करते थे। यज्ञ करने और यज्ञ कराने में उनका तिहाई जीवन बीत जाता था।
युग ने पलटा खाया। लोगों के मन धर्म कर्त्तव्यों से हटकर भौतिक स्वार्थ साधना में लगे। अधिकाँश ब्राह्मण भी अपने शास्त्र विहित कर्तव्य कर्मों को परित्याग करके विद्या पढ़ना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, इन छह कर्मों को त्याग कर, दान देने के लिये दान लेने की बात को भूलकर केवल अपने निज के उपयोग के लिये ही निमन्त्रण तथा दक्षिणा लेने तक सीमित हो गये।
विद्या पढ़ने की थोड़ी सी परम्परा अभी पुरोहित वर्ग में जारी है, क्योंकि इसके सिवा उनकी आजीविका के साधन नहीं बनते। विद्या पढ़ाने, ज्ञान देने, धर्मोपदेश करने, जनता का पथ प्रदर्शन करने, राष्ट्र के चरित्र को ऊँचा उठाने की आवश्यक जिम्मेदारी तो उन्हें झंझट जैसी बेकार बात मालूम पड़ती है। दान लेने का तो रिवाज है पर दान देने को नित्य कर्तव्य मानने वाले पुरोहित तो कहीं कोई विरले ही दीख पड़ेंगे। यज्ञ के सम्बन्ध में तो और भी अधिक अन्धकार है। नित्य अग्निहोत्र करने वाले नैष्ठिक ब्राह्मण आज उँगलियों पर गिनने लायक संख्या में मिलेंगे। ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व यज्ञों के ऊपर निर्भर था, मनु भगवान ने कहा है कि ‘महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनु’
अर्थात् यज्ञ और महायज्ञों के द्वारा ही यह शरीर ब्राह्मण बनाये जाते हैं। ब्राह्मण पैदा नहीं होते वरन् यज्ञ और महायज्ञों के द्वारा इनमें ब्राह्मणत्व पैदा किया जाता है। ब्राह्मणत्व को उत्पन्न करने का प्रधान माध्यम यज्ञ को पिछले दिनों एक प्रकार से बेकार बात जैसा समझा जाने लगा था। प्रसन्नता की बात है कि गायत्री तपोभूमि यज्ञों को प्राचीन युग जैसा व्यापक रूप देने का सराहनीय कार्य कर रही है। उससे अब यज्ञों का भारतीय जनता में पुनः प्राचीन काल जैसा महत्व होने लगा है।
गायत्री यज्ञ इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आज चारों ओर कुबुद्धि छाई हुई है, लोग सद्विचार और सत्कर्मों को छोड़कर कुविचार और दुष्कर्मों में प्रवृत्त हो रहे हैं फलस्वरूप रोग, शोक, चिन्ता, भय, ईर्ष्या-द्वेष, अकाल, अभाव, क्लेश एवं कलह के नारकीय दृश्य घर-घर दिखाई पड़ रहे हैं। इनको शमन करने के लिए सद्बुद्धि की देवी गायत्री माता का आह्वान करने का आध्यात्मिक उपचार भी आवश्यक है। केवल लौकिक उपायों से ही इस व्यापक कुबुद्धि का शमन न हो सकेगा। गायत्री की सद्बुद्धि दायिनी शक्ति यज्ञों की ऊष्मा से ही प्रचण्ड बनती है और मानव मस्तिष्कों में प्रवेश करके उन्हें सन्मार्ग की प्रेरणा देती है। आज मानव के दुष्कर्मों और कुविचारों से सूक्ष्म जगत दूषित हो रहा है फलस्वरूप चारों ओर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, तूफान, बीमारी, महामारी, दुर्घटनाएं, हत्याएं एवं युद्ध विभीषिकाएं विश्व की सुख-शान्ति को निगल जाने के लिए मुँह बाएं खड़ी हैं। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार अगले 2-3 वर्षों में एक राशि पर 8॥ ग्रह एकत्रित होने वाले हैं जिनका प्रभाव सारे संसार के लिए बड़ा भयंकर होने की संभावना है। इन विभीषिकाओं की शाँति के लिए गायत्री यज्ञों का आयोजन एक महत्वपूर्ण उपाय है। यों वर्षों का अभाव दूर करने के लिए विष्णु यज्ञ, विलासिता का त्याग और भक्ति भावना बढ़ाने के लिए रुद्र यज्ञ, बीमारियों को रोकने के लिये मृत्युँजय यज्ञ और लड़ाई के समय जनता में जोश एवं वीरता भरने के लिये चण्डी यज्ञ कराये जाते हैं। पर जब मनुष्यों को कुमार्गगामिता से बचाकर सत्मार्ग पर लाने का विश्व-व्यापी अशुभ अनिष्ट को रोकने का प्रयोजन हो तो गायत्री यज्ञ ही आध्यात्मिक अवलम्बनों में एक मात्र धर्मानुष्ठान रह जाता है।
संसार की वर्तमान विषम परिस्थितियों में धर्मसेवा के इस महान् आयोजन, गायत्री यज्ञों में पुरोहित वर्ग को सेवा-भाव से दौड़कर संलग्न होना था। स्वयं उनका संचालन करना था, और दूसरे लोग जो कोई इस कार्य में उत्साहित थे, उनका साहस बढ़ाना था, पर जब यह दिखाई पड़ता है कि वे उलटे अड़ंगे लगाते हैं तब आश्चर्य और दुख की सीमा नहीं रहती।
उनका कथन है कि केवल ब्राह्मणों को ही हवन करना चाहिये। उन्हें ही हवन करने का अधिकार है। उन्हें ही पुष्कल दक्षिणा, वस्त्र, पात्र, मिष्ठान देकर हवन कराया जाना चाहिए। गायत्री-परिवार द्वारा आयोजित यज्ञों में द्विजत्व का व्रत धारण किये धर्म प्रवृत्ति के श्रद्धालु उपासकों को यज्ञ में आहुतियाँ देने के लिए बिठाया जाता है तो इन पुरोहितों को लगता है कि (1) हमारी बराबरी दूसरे लोग करने लगे, (2) हमारी दक्षिणा आजीविका पर आघात लगने लगा। उन्हें लगता है कि जब अन्य लोग हवन कराने लगे तो कुछ दिनों में हमारी कथा वार्ता, पूजा, पोथी भी यही लोग ले लेंगे और फिर जो दान दक्षिणा हमें मिलती है वह बन्द हो जायगी। इसमें उन्हें अपना सामाजिक सम्मान और आर्थिक लाभ गिरता दिखाई पड़ता है। वे आशा करते हैं कि अन्य साधु महात्माओं द्वारा संचालित यज्ञों में जिस प्रकार पंडित पुरोहितों को पुष्कल दक्षिणा मिलती है, घर के चार भाई भतीजे अपने यहाँ के यज्ञों में होता बन गये तो सहज दो चार सौ रुपये घर में पहुँचते हैं, इसी प्रकार का आर्थिक लाभ गायत्री परिवार द्वारा आयोजित यज्ञों से भी उन्हें प्राप्त होना चाहिये। उनकी बात यदि पूरी हो जाय तो उन्हें रत्ती भर भी विरोध नहीं हो सकता। इनमें वे पूरी तत्परता से सहयोग करें और भरपूर प्रशंसा करें।
गायत्री परिवार यदि ऐसी आर्थिक स्थिति में हो तो उसे स्थानीय पंडित पुरोहितों को पुष्कल दक्षिणा देने में प्रसन्नता ही होती। पर अन्य साधु महात्माओं के द्वारा आयोजित यज्ञों में लक्षाधीशों द्वारा पुष्कल धन एकत्रित कर लिया जाता है और वे उसे खर्च भी पूरी फैयाजी से करते हैं। गायत्री-परिवार की स्थिति वैसी नहीं है। उपासक प्रायः गरीब होते हैं। वे अपना पेट काटकर थोड़े-थोड़े पैसे इकट्ठे करते हैं और उन्हीं से यज्ञ भगवान की पूजा करते हैं। जितने धन से एक पंडित को सन्तुष्ट कर सकना कठिन है, उससे कहीं कम में पूरे यज्ञ का आयोजन बनाना पड़ता है। ऐसी दशा में गायत्री परिवारों को खेद और विवशतापूर्वक यह कहना पड़ता है कि वे स्वल्प दक्षिणा दे सकने की ही स्थिति में हैं। उदार ब्राह्मणों का कर्त्तव्य है कि स्थिति को देखकर उतने से ही सन्तुष्ट हो जायं। जिस प्रकार अन्य लोग पैसे देकर यज्ञ की व्यवस्था करते हैं, वे भी धन न सही कुछ घण्टे का समय चन्दे में दे दें। यदि ऐसा हो सका होता तो सारे देश में आज यज्ञों की लहर फैल जाती, संसार का बड़ा कल्याण होता और उन सहयोग कर्त्ता ब्राह्मणों का मान भी घटता नहीं बढ़ता ही।
यज्ञ हिन्दू धर्म का पिता है। किसी हिन्दू का विवाह यज्ञ के बिना नहीं होगा, कोई हिन्दू बिना यज्ञ-चिता के अन्यत्र नहीं जलाया जाता, फिर केवल पंडित ही आहुति दें यह बात कहाँ रह जाती है। विवाह में वर-वधू दोनों ही आहुति देते हैं। बिना स्त्री के तो यज्ञ ही सफल नहीं होता। भगवान राम को सीता जी के न होने पर सोने की सीता बनाकर यज्ञ की आवश्यकता पूरी करनी पड़ी थी। फिर यह कहना कि स्त्रियाँ हवन न करें, ब्राह्मणों के अतिरिक्त और लोग हवन न करें-क्या अर्थ रखता है। यज्ञ शुभ कार्य है, उससे यज्ञ कर्ता का शरीर निरोग होता है, बुद्धि शुद्ध होती है, पाप दूर होते हैं, आत्मा पवित्र होती है यदि लाभ यज्ञ पर बैठने वाले ब्राह्मणोतर लोग या नारियाँ भी उठा लें तो इसमें उन पुरोहित जी की क्या हानि है, यह बात हमारी समझ में तो नहीं आती।
तान्त्रिक मन्त्रों को किसी को बताया नहीं जाता, गुप्त रखा जाता है। उनका जप-हवन भी गुप्त रूप से बिना उच्चारण के होता है। परन्तु वेद मन्त्रों का पाठ गायन एवं हवन उच्चारणपूर्वक होता है। पण्डितजी को यह पता नहीं कि गायत्री मारण मोहन उच्चाटन का वाममार्गी तान्त्रिक मन्त्र है या वेद मन्त्र। यदि उन्हें यह पता होता कि ताँत्रिक मन्त्रों के लिए जो प्रतिबन्ध हैं वह वेद-मन्त्रों के लिए नहीं हैं, तो वे लोगों से ऐसा कहने की भूल न करते कि गायत्री-मन्त्र का हवन जोर से बोलकर न करना चाहिए।
वास्तविक कारण कोई भी ऐसा नहीं है जिससे गायत्री-यज्ञ से कोई अधर्म होता हो, किसी को पाप लगता हो। भगवान सबके हैं, वे घट-घट वासी हैं, कर्त्ताओं की भावना को भली प्रकार जानते हैं। गीता में भगवान ने प्रतिज्ञा की है कि शुभ कार्य का कभी अशुभ परिणाम नहीं होता। गायत्री माता की, यज्ञ पिता की गोद में जो भक्त श्रद्धापूर्वक चढ़ना चाहते हैं उसे उनका स्नेह वात्सल्य ही प्राप्त होता है। पुत्र कपूत हो सकता है पर माता कुमाता नहीं होती। कोई भूल भी रहती हो तो माता अपने भक्त एवं पुत्र की श्रद्धा को समझकर उसकी क्रिया काँड सम्बन्धी छोटी-मोटी भूलों को ध्यान में भी नहीं लाती, वरन् उलटा नाम जपने वाले बाल्मीक की भाँति केवल कल्याण ही करती है। जो लोग डराते हैं वे यह सोचते हैं कि हमारी दलाली के बिना भगवान तक पहुँचना किसी के लिए सम्भव नहीं। यह भ्रम सर्वथा मिथ्या है और केवल अज्ञान का प्रतीक है।
समझदार दूरदर्शी और उदार हृदय पण्डित वर्ग, पुरोहित मण्डल अब भी भारी संख्या में गायत्री-यज्ञ का सहयोगी है। भारी त्याग और तप करके वे गायत्री-यज्ञों द्वारा धर्म की महान सेवा करने में संलग्न हैं। पर ऐसे व्यक्ति जो तिल जैसे क्षुद्र कारण से पहाड़ जैसे अनर्थ करने को तत्पर होते हैं, वे पढ़े-लिखे चाहे कितने ही हों, तिलक छाप चाहे कितनी ही लम्बी-चौड़ी लगाते हों, शास्त्रों की दुहाई चाहे कैसी ही देते हों, पर वस्तुतः उनका कार्य ऐसा है जो किसी भी दृष्टि से सराहनीय नहीं कहा जा सकता।
(श्री सुरेन्द्रनारायण द्विवेदी)
हजारों वर्षों के अज्ञानान्धकार के कारण मतमताँतरों का जो कूड़ा-कचरा जमा होता गया उसके ढेर के नीचे गायत्री और यज्ञ दब गये। उनका स्थान अनेकानेक मन्त्रों एवं कर्मकाँडों ने ले लिया। गायत्री का यों प्रत्यक्ष विरोध करने का तो कोई साहस कैसे करता पर उसे अनावश्यक बताने के लिए इतने प्रतिबन्ध खड़े कर दिये गये कि इसे अपनाने की किसी को हिम्मत ही न पड़े।
गायत्री केवल ब्राह्मण की है, गायत्री को किसी को बताना नहीं चाहिए, गुप्त रखना चाहिए, गायत्री को शाप लग गया है, गायत्री इस युग में सफल नहीं होती आदि न जाने क्या-क्या ऊल-जलूल बातें गढ़ कर लोगों की श्रद्धा इस अनादि वैदिक उपासना पर से हटाने और उसके स्थान पर अपने सम्प्रदाय के मंत्र एवं पूजा विधान पर लोगों की आस्था जमाने का प्रयत्न किया गया। पिछले दो हजार वर्षों में दो हजार से अधिक मत-मताँतर उपजे, हर प्रभावशाली पंडित ने, हर प्रभावशाली साधू ने यह प्रयत्न किया कि उसके नाम का एक सम्प्रदाय चल पड़े और ईश्वर के स्थान पर उसी की पूजा होने लगे। लोकेषणा की इस दुर्बलता ने उनके द्वारा नये-नये सम्प्रदाय उत्पन्न करवाये, सभी ने वेदोक्त सनातन उपासना गायत्री को परोक्ष रूप से व्यर्थ सिद्ध करने की कोशिश की, इसके बिना जनता इस अनादि उपासना को छोड़कर उस नवीन मत को क्यों ग्रहण करती? रामानन्दी, वैष्णव, शैव और शक्त, साधारण चार सम्प्रदाय अधिक पुराने थे। राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को मानकर चलने वाले लोग कुछ अधिक समय से अपने सम्प्रदाय चला रहे थे। पर पिछले समय में तो इन चारों में से भी प्रत्येक में सैकड़ों शाखाएं, उपशाखाएं फूट पड़ी। इतने बवंडर को देखकर जनता दिग्भ्राँत हो गई, खण्ड-खण्ड में बँट गई, एक भावना, एक उपासना का महत्व नष्ट हो गया, अपनी ढपली अपना राग की तूती बोलने लगी। इस दुरवस्था में गायत्री-उपासना की दुर्गति होना स्वाभाविक ही था।
अब वह परिस्थिति बदल रही है। अन्धकार को चीरता हुआ प्रकाश का युग उदय हो रहा है। भारतीय संस्कृति की महान उपासना को भी उसका स्थान प्राप्त कराने का प्रयत्न हो रहा है। पर एक बार जो पिछड़ जाता है उसे पुनः अपना स्थान प्राप्त करने में भारी कठिनाई उठानी पड़ती है। पाण्डवों को 12 वर्ष का वनवास हुआ था। वनवास से लौटने के बाद न्याय से राज्य उन्हें मिलना चाहिए था, पर कौरवों के हाथ में सत्ता आ गई थी, सत्ता का लोभ उनसे छूटता नहीं था, वे सुई के बराबर भी जमीन पाँडवों को देने को तैयार न हुए। अन्त में संघर्ष होकर रहा, तब कहीं न्याय की प्रतिष्ठा रह सकी। समय-समय पर इस घटना की पुनरावृत्ति होती रहती है। दो हजार वर्षों तक अज्ञानान्धकार के युग द्वारा तिरस्कृत गायत्री माता और यज्ञ पिता अब वनवास से पुनः लौटे हैं तो उनका अपना स्वाभाविक स्थान प्राप्त करना दुर्लभ हो रहा है, लोग उन पर दाँत पीसते हैं और लाठी लेकर दौड़ते हैं।
गायत्री से ब्राह्मणत्व की प्राप्ति होती है, ब्रह्म-तेज आत्मा में आता है यह सत्य है, पर यह असत्य है कि गायत्री केवल ब्राह्मण की ही जायदाद है। यज्ञोपवीत धारण कराते समय तीनों वर्णों को गायत्री दी जाती है। यज्ञोपवीत सूत की बटी हुई गायत्री की प्रत्यक्ष मूर्ति है, जो यज्ञोपवीत पहनता है वह स्पष्ट ही गायत्री को अपने कन्धे पर धारण किये हुए है। गुप्त रखने के सम्बन्ध में भी बात यह है कि जप करते समय मन ही मन या होंठ चलाते हुए धीरे-धीरे मन्त्र जपा जाता है। यह विधान जप के समय का है यह ठीक है पर यह ठीक नहीं कि गायत्री को कभी बोलना ही नहीं चाहिए। बिना बोले इसका प्रवचन करना, महत्व समझना समझाना, पाठ करना, वेद-ध्वनि करना, यज्ञ करना किस प्रकार सम्भव हो सकता है? फिर यह बात व्यवहारतः पूर्णतया असम्भव भी है। जो मन्त्र पुस्तकों में छप गया, जिसके चित्र छप गये उसे किस प्रकार गुप्त रखा जा सकेगा। जिन पुस्तकों में गायत्री मन्त्र छपा है, जो पुस्तकें बाजार में बिकती हैं उन्हें कोई भी खरीद सकता है। फिर वह गुप्त कैसे रहेगा? जो बात प्रेस में छप चुकी उसके गुप्त रखने की कोई बात नहीं रहती।
शाप लगना एक अलंकार है। जिसमें यह संकेत है कि गायत्री गुरु मन्त्र है, उसे गुरु-मुख से लेकर उपासना करना उचित है। तान्त्रिक साधनाओं में कवच, कीलक, अर्गल का उपयोग करना पड़ता है। जब गायत्री की ताँत्रिक उपासना की जाती है तब कवच, न्यास, शाप, मोचन, कीलक, अर्गल- 24 मुद्राएं करनी होती हैं। यह एक प्रक्रिया विशेष का संकेत है। चारों वेदों की जननी को, ज्ञान विज्ञान की आदि गंगोत्री को कोई ऋषि शाप देगा और वह भी गायत्री के मन्त्र दृष्टा विश्वामित्र द्वारा शाप दिया जायगा यह बातें समझ से बाहर की हैं। संस्कृत की किसी पुस्तक में कोई बात कहीं लिखी मिले तो उसे वेद-वाक्य ही नहीं मान लेना चाहिए। जिस प्रकार आज राष्ट्र भाषा हिन्दी है और हिन्दी में भली-बुरी झूठी-सच्ची सभी तरह की बातें छपी मिलती हैं उसी प्रकार किसी जमाने में संस्कृत राष्ट्र भाषा थी उसमें सभी प्रकार के विचार के लोगों ने सभी तरह की बातें लिखी हैं। उन सभी को सच्चा मानना कठिन है। शाप लगने की बात अलंकारिक तो है, उसमें गुरु-मुख होने की बात का तथा गायत्री की ताँत्रिक उपासना के एक विधान का संकेत तो है, पर यह कहना गलत है कि अब गायत्री को शाप लग चुका और बेकार हो गई। सूर्य और चन्द्रमा की तरह हमारे उपासना आकाश में गायत्री और यज्ञ जो प्रकाशवान एवं प्रधान पिंड है उनकी शाश्वत सत्ता को कोई चुनौती नहीं दे सकता, इनको किसी भी पर्दे में छिपाया नहीं जा सकता। देश काल की परिधि से ये बाहर हैं। सूर्य जो त्रेता में चमकता था वह ही आज भी चमक रहा है, बदला नहीं। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय आदि के जो धर्म-तत्व द्वापर में थे ये ही आज भी हैं। सतयुग में भी लोग मुँह से खाते और मल-छिद्र से शौच जाते थे आज भी वही प्रक्रिया चल रही है। सच्चे शाश्वत तथ्य कभी बदलते नहीं, देश काल का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। गायत्री जैसी उपयोगी सतयुग में थी वैसी आज भी है। इन लाँछनाओं के पीछे किसी वर्ग विशेष की दुरभिसंधि हो सकती है, पर सच्चाई तो रत्ती भर भी नहीं है।
महिलाओं को जब पशुओं की संज्ञा में रखा गया था, गुलामों की भाँति उन्हें खरीदा-बेचा जाता था, एक पुरुष ढेरों औरतें घर में पालता था, उस जमाने में स्त्री का दर्जा पशुओं जैसा रहा होगा और उनकी दीन सामाजिक स्थिति के कारण उन्हें पूजा, उपासना से वंचित रखा गया होगा। उसी जमाने में गायत्री और यज्ञ भी स्त्रियों को रोका गया होगा। पर किसी थोड़े समय का बुरा इतिहास कभी भी सत्य का या आदर्श का स्थान ग्रहण नहीं कर सकता। भारत में नारियों का दर्जा नर से भी ऊँचा रहा है। उसके नाम के आगे देवी शब्द लगाया जाता है। इससे स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति में नारी को देवी तुल्य पूज्य भाव से माना जाता रहा है। लक्ष्मीनारायण, राधेश्याम, सीताराम, गौरीशंकर आदि भगवान के नामों से पहले नारी का, पीछे नर का नम्बर आता है, इससे भी स्पष्ट है कि नारी का दर्जा इस देश में कभी भी नर से नीचा नहीं माना गया। जो अधिकार पुरुष को है वे सभी नारी को भी हैं। जो उपासना पुरुष कर सकता है वह नारी भी कर सकती है। भगवान की दृष्टि में नर और नारी, कन्या और पुत्र दोनों समान हैं। हम लड़के को बढ़िया और लड़की को घटिया मानते हैं तो यह भी सोचते हैं कि ईश्वर भी हमारी ही भाँति लड़कियों को बेकार की चीज समझता होगा और उन्हें अपनी गोदी में चढ़ने का, उपासना करने का अवसर न देता होगा, उसे केवल लड़के ही प्यारे होंगे। पर हमारी यह मान्यता नितान्त अस्वाभाविक है। ईश्वर ने, ऋषियों एवं शास्त्रों ने ऐसा भेद-भाव नहीं किया है, स्त्रियाँ गायत्री न जपें इसके प्रतिबन्ध के पीछे विवेक का एक कण भी नहीं है।
इन भ्राँतियों को पार करने में आज सचमुच बड़ी कठिनाई है। जो बात लोगों ने बहुत समय से होती देखी है, उनकी दृष्टि में वही सत्य है, वही सनातन है। बहुत दिनों से केवल ब्राह्मण ही पूजा पाठ की टण्ट-घंट करते थे। दूसरे लोगों का ध्यान ही इस ओर न था, अब यही बात एक रूढ़ि बन गई कि पूजा केवल ब्राह्मणों को ही करनी चाहिए। यज्ञों की परम्परा बहुत दिनों से लुप्त थी। अब यज्ञ होते दीखते हैं तो उन्हें लगता है कि यह कोई नई बात चली। ऐसे सामूहिक यज्ञ उन्होंने होते देखे नहीं और जो बात उन्होंने नहीं देखी वह सनातन हो नहीं सकती। सनातन नहीं, उनके देखी नहीं, वह या तो व्यर्थ है या धर्म विरुद्ध है, ऐसे-ऐसे तर्क लोगों के मन में उठते रहते हैं और जब कोई उनका समाधान करता है तो इन्हें लगता है कि कोई उनके लालबुझक्कड़पन को चुनौती दे रहा है। ऐसे लोगों की बातों का जवाब न दिया जाय तो भ्रम और फैलता है, जवाब दिया जाय तो वे नाराज होते हैं, अपना अपमान समझते हैं, लड़ने आते हैं। रूढ़िवाद जहाँ सामाजिक कुरीतियों का पोषक एवं अनेक प्रचलित बुराइयों का पृष्ठ पोषण करता है वहाँ वह विशुद्ध वैज्ञानिक एवं अनादि काल की सत्य सनातन गायत्री उपासना जैसे महान सत्य को भी अपने प्रतिबन्ध में रखना चाहता है। इस दुराग्रह के सामने विचारशीलता नतमस्तक हो जाय और सचाई को तिलाँजलि देकर ‘बावा वाक्यं प्रमाणम्’ के आगे आत्म समर्पण कर दे, यह कठिन है।
जो भी हो गायत्री-परिवार यदि सत्य का अवलम्बन करना चाहता है, सच्चाई को फैलाना चाहता है तो उसे विरोध सहने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। भूलों को रास्ते पर लाने के लिए उनके कुतर्कों का दृढ़तापूर्वक समाधान करना होगा और अविचल भाव से सत्य की चट्टान पर दृढ़ रहना होगा। यदि हमारी श्रद्धा इतनी दुर्बल है कि अमुक बाबाजी या पोथी पाँडे उलटी-सीधी बातें करके हमें बहका दें और सत्य मार्ग से विचलित कर दें, डरा दें, हतोत्साह कर दें, तो फिर हमारी श्रद्धा बहुत ही दुर्बल मानी जायगी। उतनी दुर्बल श्रद्धा से न तो हमारा आत्म कल्याण हो सकता है, न माता का अनुग्रह मिल सकता है और न घर-घर गायत्री माता का संदेश पहुँचाने का लक्ष्य ही पूरा हो सकता है। ऐसे दुर्बल मानस के लोग हवा के झोंकों में उड़ते फिरने वाले पत्तों की तरह इधर-उधर लुढ़कते पुड़कते फिरते हैं। इतने कमजोर मनोबल के लोग जिन्हें अपने आदर्शों और सिद्धान्तों पर इतनी भी आस्था नहीं कि बहकाने वाले लोगों की मूर्खता पर हँस सकें, भला किस प्रकार अपने लक्ष तक पहुँचेंगे। तप करती हुई पार्वतीजी का विश्वास आजमाने के लिए सप्तऋषि यह कहने पहुँचे थे कि शिवजी से उनका विवाह कठिन है इस हठ को छोड़ दें। इस आज़माइश के उत्तर में पार्वतीजी ने कहा था-”कोटि जन्म लगि रगर हमारी। बरों शम्भु नतु रहों कुमारी।” इतनी निष्ठा वालों की ही उपासना सफल हो सकती है। जो जरा बहकाने में डर जाएं उन्हें गायत्री से, न किसी अन्य मन्त्र से कभी सिद्धि मिल सकती है। दृढ़ता, निष्ठा और श्रद्धा हम में कितनी है, इस बात की परीक्षा यह बहकाने वाले लोग लेते रहते हैं। इस प्रकार खरे और खोटे की परख माता करती रहती है। जिनका विश्वास इतना दुर्बल है कि किसी भी औंधे-सीधे आदमी के बहकाने से अपना संकल्प छोड़ बैठें, ऐसे लोगों से पीछा छुड़ाने में माता को प्रसन्नता ही हो सकती है।
दृढ़ता से ही हमें आत्म-लाभ होगा और गायत्री परिवार का वह उद्देश्य पूर्ण होगा जिसके अनुसार हमें घर-घर में जन-जन के मन-मन में गायत्री माता और यज्ञ पिता का सन्देश पहुँचाना है। भूले-भटकों को मार्ग पर लाना है। विरोधियों को प्रेम से जीतना है। अन्ततः वे अपनी भूल मानेंगे ही आज नहीं तो कल विजय सत्य की ही होकर रहेगी।
तपोभूमि में नित्य नैमित्तिक साधनाएं नियमित रूप में चलती रहती हैं। अखण्ड अग्नि पर नित्य गायत्री यज्ञ होता रहता है। प्रधान यज्ञशाला अब नये सिरे से बहुत ही सुन्दर बनाई है। उसके फर्श पर संगमरमर जड़ा लाना शेष है। जब तक यह प्रधान यज्ञशाला बनकर पूर्ण न हो जायगी तब तक छोटी दाहिनी यज्ञशाला में दैनिक हवन चलता रहेगा।
गायत्री यज्ञ के साथ वेद पारायण यज्ञ भी नियमित रूप से चलता है। एक वर्ष में चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र की आहुतियाँ पूर्ण की जाती हैं। इस वेद पारायण यज्ञ की पूर्णाहुति जेठ सुदी 10 गायत्री जयन्ती पर रहा करेगी। चारों वेदों का पारायण नियमित रूप से होते रहने की परम्परा अब नष्ट हो चुकी है, तपोभूमि में उसे पुनः जीवित किया गया है।
महायज्ञ की तैयारियाँ तत्परतापूर्वक जारी हैं। भोजन, ठहरने का तम्बू, यज्ञशाला निर्माण, प्रवचन यातायात, जल, रोशनी, हवन-सामग्री तैयार करना,पत्र व्यवहार आदि विभिन्न कार्यों की जिम्मेदारियाँ परिवार के कर्मठ कार्यकर्त्ताओं को सौंप दी गई हैं। सभी अपने-अपने कार्यों को सफल बनाने में जी−जान से जुटे हुए हैं। कार्य बहुत भारी है, सामर्थ्य स्वल्प है, फिर भी निराश या परेशान न होकर शक्ति भर प्रयत्न किया जा रहा है।
इस बार दो श्रावण मास हैं। यों तो अधिक मास सदा हो पुण्य फल दायक होते हैं पर श्रावण का पुण्य फल सबसे अधिक माना गया है। देशभर के सभी धर्म प्रेमियों से प्रार्थना की गई है कि वे इस मास अपनी दैनिक साधना के अतिरिक्त कुछ अधिक साधना करें। 24 हजार का एक लघु अनुष्ठान तो बहुत आसानी से किया जा सकता है। इस मास छोटे-छोटे सामूहिक यज्ञ हर जगह किए जाने चाहिए।
गायत्री ज्ञान मंदिरों की स्थापना हर गायत्री उपासक के घर में इस श्रावण मास में हो जाय ऐसा प्रयत्न करना चाहिए। एक सुन्दर चौकी पर गायत्री माता का सुसज्जित चित्र स्थापित करके वहाँ दैनिक उपासना का नियमित क्रम चालू कर दिया जाय। ज्ञान मन्दिर की 52 पुस्तकों का 14) वाला सैट मँगाकर गायत्री पुस्तकालय स्थापित कर लेना चाहिए, वे पुस्तकें 10 व्यक्तियों को पढ़ाकर ‘उपाध्याय’ पद का सम्मान महायज्ञ के समय प्राप्त करने की हर उपासक को तैयारी करनी चाहिए। जिन्हें ज्ञान मन्दिर सैट मँगाने में असुविधा है वहाँ कई साधक मिलकर एक सैट मंगाएं। इस श्रावण मास में अधिकाधिक गायत्री ज्ञान मन्दिर स्थापित हों, इसका पूरा प्रयत्न करना चाहिए।
गायत्री परिवार की शाखाओं में अब तक केवल एक मन्त्री ही चुना जाता था पर अब यह निश्चय किया गया है कि प्रत्येक शाखा में 4 पदाधिकारी हों, (1) प्रधान, (2) उपप्रधान, (3) मन्त्री, (4) उपमन्त्री, (5) कोषाध्यक्ष, (6) निरीक्षक। प्रत्येक शाखा को चाहिए कि इसी मास सदस्यों की मीटिंग बुलाकर उपरोक्त 6 पदाधिकारी चुन लें और उस चुनाव की सूचना मथुरा भेज दें। अगले मास की गायत्री-परिवार-पत्रिका में चुने हुए पदाधिकारियों के नाम छापे जावेंगे।
निष्क्रिय शाखाएं इस मास के अन्त में तोड़ दी जायेंगी। (1) जो शाखाएं नियमित रूप से अपने कार्यों की मासिक रिपोर्ट नहीं भेजतीं। (2) जिनके यहाँ ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में भाग लेने के लिए कोई होता, यजमान या संरक्षक तैयार नहीं हुए। (3) जिनके यहाँ न ये अखण्ड-ज्योति मँगाई जाती है न गायत्री-परिवार-पत्रिका। इनके बिना उन तक संस्था के विचार या सन्देश पहुँचने का सम्बन्ध सूत्र ही नहीं जुड़ पाता, वे शाखाएं निष्क्रिय मानकर खारिज कर दी जावेंगी। भविष्य में उन स्थानों पर शाखाएं न बनाई जायं जहाँ उपरोक्त तीन कार्य होने की सम्भावना न हो।
कितनी ही जगह से पत्र आये हैं कि मथुरा के कुछ ‘धर्म-व्यवसायी’ जगह-जगह गायत्री यज्ञ के लिए चन्दा माँगते या अनाज इकट्ठा करते हैं। आचार्यजी के हस्ताक्षरों की जाली चिट्ठी बना लेते हैं कि उन्हें तपोभूमि से इस कार्य के लिए भेजा गया है। जहाँ उनकी दाल गल जाती है वहाँ से इस प्रकार धन संग्रह करके नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। जहाँ इनकी घात नहीं लगती वहाँ ये यज्ञ की और तपोभूमि की निन्दा करते हैं और लोगों को यज्ञ में न आने की बात कहते हैं। इस प्रकार वहाँ अपना दूसरा रूप बना लेते हैं। जनता इन बहरूपियों से सावधान रहे। मथुरा से कोई व्यक्ति कहीं भी चन्दा इकट्ठा करने नहीं भेजा गया है।
गायत्री-परिवार की लगभग 2 हजार शाखाएं अपने-अपने क्षेत्र में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की साधना तथा साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के विभिन्न कार्यक्रमों में बड़ी तत्परतापूर्वक संलग्न है। इस उत्साह को देखकर यह निश्चय दिन-दिन दृढ़ होता चला जा रहा है कि नैतिक, चारित्रिक, आत्मिक, धार्मिक, साँस्कृतिक एवं सामाजिक पुनरुत्थान के युग परिवर्तनकारी संकल्प को पूरा करने में यह संगठन महत्वपूर्ण योग दे सकेगा।
गायत्री परिवार के द्वारा जो महत्वपूर्ण कार्य किये जा रहे हैं उनके समाचार अब अखण्ड-ज्योति में न छपकर गायत्री-परिवार-पत्रिका में छपते हैं। शाखाओं सम्बन्धी आदेश, संदेश एवं ज्ञातव्य अब उसी पत्रिका में छपते हैं। पत्रिका के अप्रैल मई, जून, जुलाई के 4 अंक निकल चुके। प्रत्येक गायत्री परिवार शाखा को इसे माँगना अनिवार्य रखा गया है। जिन शाखाओं ने अभी तक अपना चन्दा न भेजा हो वे 2) रुपये तुरन्त भेज दें।
गायत्री-परिवार-पत्रिका के गत 4 अंकों में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान एवं गायत्री संस्था के आगामी कार्य-क्रमों के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण लेख छपे हैं। अखण्ड ज्योति के पाठकों के ऐसे अनेक पत्र आए हैं कि वे उन लेखों के पढ़ने से वंचित रह गए। इसलिए अगले अंक में पत्रिका के आवश्यक लेखों को अखण्ड-ज्योति में छाप रहे हैं। अगला अंक एक प्रकार से ‘गायत्री महायज्ञ अंक’ ही होगा।
अगले वर्ष सारे भारतवर्ष में 23 हजार कुण्डों के सहस्रों यज्ञ होंगे। उनका आयोजन एवं प्रबन्ध करने के लिए, आवश्यक शिक्षा देने के लिए तपोभूमि में एक शिक्षण शिविर अश्विन सुदी 1 से लेकर कार्तिक सुदी 15 तक डेढ़ महीने का होगा। बौद्धिक, लेख-बद्ध एवं प्रवचनात्मक ही नहीं, इतने बड़े यज्ञ आयोजन में सक्रिय कार्य करने की व्यवहारिक शिक्षा भी मिलेगी। जिन्हें धर्म सेवा के लिए उत्साह हो उन्हें इस शिक्षण शिविर में सम्मिलित होना चाहिए। पूर्ण अनुशासन में रह सकने वाले, स्वस्थ, श्रमदान से न डरने वाले, सफाई पसन्द, सेवा भावी और निर्व्यसनी छात्र ही आवें। जिनके साथ छोटे बच्चे नहीं वे महिलाएं भी इस शिविर में सम्मिलित हो सकेंगी। शिविर में आने वालों के लिए भोजन व्यवस्था तपोभूमि में रहेगी। किराया-भाड़ा स्वयं अपना खर्च करना होगा। महायज्ञ में शारीरिक सेवा का भारी पुण्य लाभ तो इन शिक्षार्थियों-स्वयं सेवकों-को सहज ही मिल जायगा।
‘होने वाली है महाप्रलय सन् बासठ में’
ज्योतिषियों ने कर दी है यह भविष्यवाणी,
इस शस्य-श्यामला वसुधा का फिर शोितडडडडडड से;
सिंचन करने को उद्यत होगा हर प्राणी;
कहते हैं, द्वापर में जब हुआ महाभारत,
उस समय सात ग्रह शनि के घर में आये थे
साहित्यकार, वैज्ञानिक, शिल्पी, शूर-वीर
जिनके प्रभाव से एक न बचने पाये थे;
लाशों के सिंहासन पर बैठे युधिष्ठिर ने,
मरघट में अपनी जय का दीप जलाया था
मुँडों की पहिना माल, कफन का ताज बाँध,
तब रैयत ने आहों का शंख बजाया था;
लेकिन अब उससे बढ़कर होने वाला है,
हो रहे नव-ग्रह एकत्रित शनि के घर में
उस बार आग पृथ्वी तक सीमित थी, लेकिन
इस बार पहुँच लेगी सम्भवतः अम्बर में;
तो सचमुच ही उस सन् बासठ के सावन में,
क्या गा पायेगी मेरी बहिन मल्हार नहीं?
क्या सचमुच माँ का प्यार न तब मिल पायेगा,
क्या दे पायेगा कोई पिता दुलार नहीं?
यह ताजमहल, यह लालकिला, जामा मस्जिद,
यह कुतुब, सीकरी, साँची, सुन्दर गुरुद्वारे;
ये गिर्जे, ये मन्दिर, नाँगल, भाखड़ा बाँध,
ऐलोरा और अजन्ता के ये नज्जारे;
ये बन्दरगाह, म्यूजियम, पुल, ये राजमहल,
क्या इन सब पर ऐटम की बिजली बरसेगी?
क्या चन्द्रलोकगामी राकेटों की छाया,
इस उजड़ी दुनिया की हालत पर तरसेगी?
सम्भव है, यह सब हो जाये सन् बासठ में,
विज्ञान मृत्यु को खुला निमन्त्रण देता है;
हर ओर स्वार्थ के आसन पर बैठा पिशाच
फैला निज माया-जाल जमाई लेता है;
दिन-रात ढल रहे हैं उदजन बम, एटमबम,
दिन-रात बढ़ रही है संख्या राकेटों की;
दिन-रात विविध देशों की सीमा, कर्म भूमि-
बनती जाती है इन सबके आखेटों की;
‘हम आज रात सोयेंगे’-शायद सच हो,
पर ‘कल जागेंगे’-इसका कौन ठिकाना है?
बन रहा आदमी स्वयं मृत्यु का कृपा-पात्र,
अपना जीवन उसने कर दिया बिराना है;
इसलिए जवानों! उठो और देर मत करो,
बुड्ढों से राहत तुम्हें नहीं मिल पायेगी;
यदि आज तनिक भी चूक गये इस अवसर पर,
तो भरी जवानी प्यासी ही मिट जायेगी;
है चार वर्ष की अवधि बहुत, तुम चाहो तो-
दो दिन में ही सब कुछ कर दिखला सकते हो
जन्मेजय बन, कर नाग-यज्ञ का आयोजन,
इन सभी भुजंगों को वश में ला सकते हो!
आधुनिक विश्व का वेद व्यास यह कहता है,
मत मुझे महाभारत लिखने का अवसर दो!
तक्षक डंस जाय परीक्षत को-इससे पहले,
जितने भी विषधर हों सब को निर्विष कर दो।
केवल इन नवग्रहों से ही मत बात करो,
जितने भी नभचर हैं, सबको बतला दो तुम
सन् बासठ तो आयेगा चार वर्ष पीछे,
इनको तो आज, इसी क्षण ही जतला दो तुम;-
तैंतीस कोटि सम्पूर्ण खडडडडडड-मण्डल में तुम हो
छत्तीस कोटि हम इस भारत के वासी हैं;
तुम एक सूर्य के सम्मुख सब छिप जाते हो
हम यहाँ सूर्य से शत-शत गुने प्रकाशी हैं?
यदि कभी भूल कर अब पृथ्वी की ओर बढ़े
तो तुम सब का अस्तित्व न रहने पायेगा;
अब तक पृथ्वी पर हमने झण्डा फहराया,
फिर तुम सबके घर-घर में जा फहरायेगा।
“सैनिक” से
*समाप्त*
(श्री राजेश दीक्षित)