यज्ञ का महत्व

अग्नि होत्रिणे प्रणुदे सपत्नश्र।

-अथर्व वेद 9/2/6

यज्ञ करने से शत्रु नष्ट हो जाते हैं। शत्रुता को मित्रता में बदल देने का सर्वोत्तम उपाय यज्ञ है।

सम्यंजोऽग्नि सपर्यत।

-अथर्व वेद 3/30/6

सबको मिलकर यज्ञानुष्ठान करना चाहिए। सामूहिक उपासना का महत्व असंख्य गुना अधिक है।

यज्ञं जनयुन्तु सूरयः

-ऋग्वेद 10/66/2

हे विद्वानों, संसार में यज्ञ का प्रचार करो। विश्व-कल्याण करने वाले साधकों में यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है।

ईजानाः स्वर्गं यान्ति लोकम्।

-अथर्व वेद 18/4/2

यज्ञ करने वाले को स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। जिन्हें स्वर्गीय सुख प्राप्त करना अभीष्ट हो, वे यज्ञ किया करें।

प्राचं यज्ञं प्रणतया स्वसाय।

-ऋग्वेद 10/101/2

प्रत्येक शुभ कार्य यज्ञ के साथ आरंभ करो। यज्ञ के साथ आरम्भ किये हुए कार्य सफल और सुखदायक होते हैं।

सर्वेषाँ देवानाँ आत्मा यद् यज्ञः।

-शतपथ 12/3/2/1

सब देवताओं की आत्मा यह यज्ञ है। यज्ञ करने वाले देवताओं की आत्मा तक पहुँचते हैं।

अयज्ञियो हत वर्चो भवति।

-अथर्व वेद

यज्ञ रहित मनुष्य का तेज नष्ट हो जाता है। यदि तेजस्वी रहना है तो यज्ञ करते रहना चाहिए।

भद्रो नो अग्नि राहुतः।

-यजुर्वेद 15/32

यज्ञ में दी हुई आहुतियाँ कल्याणकारक होती है। जो अपना कल्याण चाहते हैं वे यज्ञ किया करें।

मा सुनोतेति सोमम्।

-ऋग्वेद 2/30/7

यज्ञानुष्ठान की महान उपासना बन्द न करो। जहाँ यज्ञ बन्द हो जाते हैं वहाँ से सुख-शाँति चली जाती है।

कस्मैत्व विमुँचति तस्मैत्वं विमुँचति।

-यजुर्वेद

जो यज्ञ को त्यागता है उसे परमात्मा त्याग देता है। जिन्हें परमात्मा का अनुग्रह अभीष्ट हो, वे यज्ञ करना त्यागें।

अस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही

-ऋग्वेद 1/3/8/8

ऐसी वाणी बोलो जिससे सबका हित हो।

किसी को गलत मार्ग पर ले जाने वाली सलाह मत दो।

वर्ष-19 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-12


गायत्री-वन्दना

(श्री यादराम शर्मा ‘रजेश’ एम.ए.)


गायत्री-वन्दना (Kavita)

गायत्री माता, जय, गायत्री माता!

तू है परम पुनीत वेद-ध्वनि, अनुपम, अभिजाता, भक्त समूह समुद युग-युग से तेरे गुण गाता।

तू ही संकट शमन- कारिणी, तू सब की त्राता, तेरे ही प्रताप से बनते बुध, पण्डित, ज्ञाता!

भक्ति-भाव से जो भी तेरे चरणों में आता, माता! तेरी कृपा-कोर से वाञ्छित फल पाता!

तू है रिद्धि-सिद्धि, सुख-वैभव, नव-जीव-दाता, दे ‘रजेश’ को वह दयामयि! जो तेरा भाता!

गायत्री माता! जय, गायत्री माता!!


महायज्ञ का महा-समारोह


हम अब क्या करें?

(श्री शंभूसिंह जी)

माता गायत्री की कृपा से पूज्य आचार्य जी का संकल्पित सहस्रकुँडी महायज्ञ सानन्द पूर्ण हो गया। परन्तु वह साधकों के मनःक्षेत्र में एक विचित्र हलचल छोड़ गया है। 1025 कुँडों में उठी यज्ञाग्नि की लहरें बढ़ बढ़ कर यह प्रेरणा दे रही थीं कि होता गण भी इसी प्रकार तेजस्वी बनकर ऊंचे उठते रहें। हवन काष्ठ जल-जल कर यह कह रहा था कि तुम भी जलकर दूसरों को जलाना। पर साधकों का मन फिर भी हलचल में था। वे जानना चाहते थे कि अब हम क्या करें? अन्त में पूज्य आचार्य जी ने अपने दीक्षान्त भाषण में उनकी जिज्ञासा को यह बतला कर शान्त किया कि “महायज्ञ के बाद आप इस वर्ष में अपने यहाँ भी एक गायत्री यज्ञ करें।”

परन्तु फिर भी अनेक लोग यह जानना चाहते हैं कि यज्ञ कैसे करें? उनको मैं बतलाना चाहता हूँ कि अब वे इस सम्बन्ध में विशेष चिन्ता और आशंका न करें। गायत्री यज्ञों की यह शृंखला देश भर को यज्ञ-भूमि बनाकर रहेगी और फिर से ऋषि और ऋषिकाएँ उत्पन्न करेगी। इसके लिये यज्ञकर्ता शाखाओं को 2-3 मास पूर्व ही निमंत्रण पत्र छपाकर जनता में बाँट देना चाहिये और घर-घर जाकर यह प्रार्थना करनी चाहिये कि—

(1) आप इस यज्ञ के याज्ञिक बनने के लिये 24 हजार जप गायत्री मंत्र का करने का निश्चय करें या चालीसा पाठ अथवा मंत्र लेखन करें।

(2) माताएँ और बहिनें घर-घर घूम कर जल यात्रा के लिये ऐसी महिलाओं को तैयार करें जो यज्ञ तक नित्य स्नान करके 1 माला गायत्री जप, या 1 चालीसा पाठ या 11 मंत्र लिखने का व्रत लें। इस प्रकार के भागीदारों की सूची बनाते जावें।

(3) यज्ञ -तिथि के एक मास पूर्व यज्ञ-शाला का निर्माण आरम्भ कर दें। सब साधक दिन या रात में किसी भी समय इकट्ठे होकर श्रमदान से इस कार्य को सम्पन्न करें। ग्राम निवासियों से घर-घर जाकर प्रार्थना करें कि वे श्रमदान करने आवें। जिस यज्ञ में जितने अधिक व्यक्तियों ने श्रमदान किया होगा वह उतना ही अधिक सफल समझा जायगा। सम्पन्न व्यक्तियों या बड़े पदाधिकारियों से भी एक पत्थर या एक टोकरी मिट्टी अवश्य डालने की प्रार्थना करके उनको भी इस यज्ञ के पुण्य में सम्मिलित करना चाहिये।

(4) जब कुण्ड और यज्ञशाला बन जावें तो गायत्री-उपासिकाओं को गाँव की समस्त माताओं के पास जाकर उसे लेसने, लीपने, पोतने, रंगने के कार्य में श्रमदान करने की प्रार्थना करनी चाहिये।

(5) यज्ञशाला की सजावट स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार श्रम से ही करनी चाहिये।

(6) कुछ समय पहले ही यज्ञ के समस्त आवश्यक सामान की सूची तैयार करके जनता से पैसा नहीं, वस्तुएँ ही माँगें, तथा जिसका सामान हो उसे ही यज्ञ के अवसर पर अपने साथ लाने की प्रेरणा दें। एक व्यक्ति के पैसे से होने वाला यज्ञ गायत्री -यज्ञ नहीं। इसलिये कोई घर ऐसा न बचना चाहिये जो इस पुण्य-कार्य में भाग न ले। इसलिये और कुछ न हो तो घर-घर में फेरी लगाकर उनसे स्वेच्छानुसार थोड़ा बहुत हविष्यान्न ही यज्ञ के लिए लेना चाहिये। एक व्यक्ति से अधिक से अधिक लेने की इच्छा न करके अधिक से अधिक व्यक्तियों से थोड़ा-थोड़ा लेकर कार्य सम्पन्न करना विशेष उत्तम है। इससे सब में यज्ञ के प्रति आत्मीयता की भावना की वृद्धि होगी और पारस्परिक समानता में भाव का भी उदय होगा। यज्ञ में समिधा, सामग्री, सजावट जो कुछ भी हो वह पैसे से कम और पसीने से अधिक हो।

(7) जहाँ यज्ञ हो वहाँ के स्थानीय व्यक्ति यथासम्भव उसमें भोजन न करें। बाहर से आने वाले उपासकों को ही कच्चा भोजन, साग, सत्तू आदि सात्विक आहार देना चाहिये।

(8) पूर्णाहुति का प्रसाद थोड़ा-थोड़ा सभी दर्शकों को बाँटना चाहिये। उसी के साथ चालीसा, चित्र, गायत्री साहित्य का प्रसाद भी जिज्ञासुओं को देना चाहिये।

(9)जो लोग होता बनने की परिस्थिति में न हों उन्हें यज्ञशाला की 108 या 24 परिक्रमाएँ लगाने का पुण्य प्राप्त करने की प्रेरणा करनी चाहिये।

कहने का साराँश यही है कि इन यज्ञों का उद्देश्य जनता में गायत्री व यज्ञ के प्रति श्रद्धा व विश्वास उत्पन्न करना तथा इनसे जो उपदेश मिलते हैं उन पर अपने दैनिक जीवन में आचरण करना होना चाहिये । यह उद्देश्य जिस यज्ञ से जितने अधिक अंशों में पूरा होगा वह उतना ही महान समझा जायगा।

कुण्डों की संख्या हमारे यज्ञों की महानता की कसौटी नहीं है

यज्ञ चाहे थोड़े ही कुण्डों का हो पर उसके द्वारा जितने अधिक उपासक, उपाध्याय बनेंगे वह उतना ही महत्वपूर्ण एवं महान समझा जायेगा।

इस प्रकार सन् 59 में प्रत्येक शाखा को यज्ञ की व्यवस्था करनी चाहिये। उसका बाह्य कलेवर चाहे छोटा हो पर उसकी जड़ें मजबूत बना कर अपने क्षेत्र में गायत्री माता व यज्ञ पिता का स्थायी रूप से प्रचार करना चाहिये। अब महायज्ञ के बाद हमारा कार्यक्रम— कर्तव्य यही है कि हम गायत्री व यज्ञ का संदेश घर-घर में पहुँचा दें।

मथुरा में—


जब जन-समुद्र लहरा उठा

(श्री सत्य प्रकाश शर्मा एम. ए.)

[उत्तर-प्रदेश के दक्षिण खूँट (ललितपुर, झाँसी) में प्रवासी श्री सत्य प्रकाश शर्मा तरुण साहित्यकार पीढ़ी के एक सुलेखक हैं। महायज्ञ में तथा तत्सम्बन्धी व्यवस्था में रत रहते समय जो कुछ आपने देखा उसका मर्मस्पर्शी विवरण इस रचना में दिया गया है।]

ब्रज की सांस्कृतिक केन्द्रस्थली, मथुरा नगरी की छटा अनुपम हो उठी, जब कि देश के कौने-कौने से आगन्तुक, गायत्री-परिवार के लाखों सदस्य एवं दर्शक, सहस्र कुँडी-गायत्री महायज्ञ में सम्मिलित होने आ पहुँचे। नर-नारियों का इतना विशाल सागर लहराया कि जिसकी दैदीप्यमान रमणीयता से नगर की गली-गली और सड़क-सड़क पर जीवन मुस्करा उठा। मथुरा निवासी अनेक वृद्ध महानुभावों की स्मृति में कभी भी इतना विशाल आयोजन नहीं हुआ। स्थानीय दैनिक पत्रों ने इस महोत्सव को “एक ऐतिहासिक घटना” घोषित किया। दैनिक अमर उजाला (दिनाँक 25 नवम्बर) के शब्दों में “मथुरा में इससे पूर्व इतना बृहद् आयोजन नहीं सुना” तो सैनिक के मतानुसार “यह महायज्ञ इस युग की महान घटना है।” निस्सन्देह, बिना किसी अतिशयोक्ति के यह कहा जा सकता है कि यह समारोह अभूतपूर्व ही रहा। “ऐसा विचित्र एवं विराट समारोह मथुरा नगरी में आज से पहले, वर्तमान लोगों की स्मृति में कभी नहीं हुआ”

(नवभारत टाइम्स 28 नवम्बर 58)

वास्तव में, महायज्ञ की तैयारी में हजारों कार्यकर्ता पिछले एक वर्ष से ही व्यस्त थे। देश विदेश में जप, हवन, एवं मन्त्र लेखन के मौन-यज्ञ स्थान-स्थान पर हो रहे थे। कौन जाने कितने करोड़ मन्त्र इस बीच में लिखे गये? कितने ही अरब पाठ हुये होंगे गायत्री मंत्र के, कितने ही मौन तपस्वियों ने वनों में, गिरि कन्दराओं में उद्यानों में, मन्दिरों में, घरों में और अपने घरों के किसी शान्त-नीरव से कोनों में अपनी साधना पूर्ण की। इस महायज्ञ के ‘होता’एवं यजमान का गौरवपद प्राप्त करने के हेतु सवालाख जप और 52 उपवास करने की मूक-तपस्या कितने ही महान आत्माओं ने की। अकेले गायत्री-तपोभूमि पर ही हजारों व्यक्ति समय निकाल कर आते रहे और अपनी तपस्या पूरी की। यह सभी प्रयत्न वर्तमान महायज्ञ की आधार शिला थे। इसी पावन आधार पर महायज्ञ की सफलता अवलम्बित थी।

आदिशक्ति गायत्री माता की प्रेरणा से ‘मानवों ने, मानव द्वारा , मानव के लिये” इस महायज्ञ की आदि से अन्त तक तैयारी करना प्रारम्भ कर दिया था। महीनों पहिले से सैंकड़ों तपस्वी, श्रमदान करके यज्ञस्थली का निर्माण करने में लगे थे। 1024 सुन्दर यज्ञ-कुण्डों का निर्माण करना, कई मील तक वन्य भूमि को साफ सुथरा करके, नवीन नगरों के लिये स्थान निकालना, और लाखों लाख आगन्तुकों के निवास के लिये तम्बू डेरा जमाना आदि वृहत कार्यों का अनुमान करना ही कठिन है। किन्तु यह ‘कठिन” आसान हो गया। श्रमदान का वास्तविक स्वरूप मुस्करा उठा आठ नवीन नगरों के रूप में(1) नारद नगर, (2) व्यास नगर, (3) विश्वामित्र नगर, (4) दधीचि नगर, (5) वशिष्ठ नगर, (6) पातंजलि नगर, (7) याज्ञवलक्य नगर, (8) भारद्वाज नगर। मथुरा से वृन्दावन की सीमा तक तीन मील लम्बे इन नगरों में, जब विद्युत शिखाएं जगमगा उठीं तो ऐसा प्रतीत होता था मानो, तारागण, आकाश से उतर आये हैं इस महायज्ञ की छटा बढ़ाने।

ब्रज की इसी पावन रंगस्थली पर किसी शरद् की मधुर रात्रि में, योगेश्वर भगवान कृष्ण ने महारास रचाया था। उस समय भी ब्रज की धरती इसी भाँति जगमगा उठी होगी। ठीक उसी प्रकार, लाखों तपधारियों के पदार्पण से यह पुनीत धरती प्राणवान हो उठी। गायत्री-परिवार के लगभग समस्त सदस्य, सदस्याएं जब जहाँ 20 नवम्बर की रात्रि तक एकत्रित हो उठीं तो एक अनिर्वचनीय आनन्द की सृष्टि हुई। समुद्र मन्थन करके मानो समस्त भूगर्भा मणियों को किसी एक ही स्थान पर एकत्रित कर दिया गया हो। आत्मीयता, स्नेह एवं मधुरतम भावनाओं के उच्छ्वास से वातावरण सुरभित हो उठा।

सब जानते हैं कि श्री जमुना जी मथुरा नगरी की माला हैं। किन्तु 22 नवम्बर को इस नगरी का अभिषेक हुआ तपस्वियों की उस अपरिमित लंबी प्रभातफेरी से जो वेदमाता गायत्री का जय-जयकार करती हुई, नगर की प्रमुख सड़कों पर रत्माला की भाँति शोभायमान थी। और उसी दिन प्रातः वेला में जब हजारों महिलायें सिर पर मंगलघट रखकर, जमुना जल लेकर, स्वामी घाट से यज्ञ नगर तक मंगल गान करती हुई निकलीं साक्षात् कला एवं संस्कृति ही साकार हो उठीं प्रतीत हो रही थीं। यह घटना भी नगर के इतिहास में बेजोड़ मानी गई।

वैदिक विवाहों की परम्परा का रूप उस समय कितना निखर गया जब तपोभूमि के पावन यज्ञ मंडप में देवोत्थान एकादशी की गोधूलि वेला में आधुनिक अभिशापों (दहेज तथा जेवर) से रहित पाणिग्रहण संस्कार हुये, इसे साँस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रथम सोपान का यदि हम ‘आदि’ कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी।

मथुरा नगरी के ही नहीं वरन् समस्त संसार के सुहावने प्रभात ने योगीराज श्री कृष्णचन्द्र की गोचर भूमि में असंख्य तपोनिष्ठ एवं विश्वकल्याण की भावना से प्रेरित व्यक्तियों द्वारा वेद मन्त्रों का उच्चारण सुना ता. 23 को प्रातःकाल मथुरा वृन्दावन मार्ग पर जाने वाले जन-समूह का कोई अनुमान लगाना मानव शक्ति के परे था। ‘गायत्री माता की जय हो’ ‘विश्व का कल्याण हो’ आदि जयघोषों से नभ मंडल गूँज उठा था। गायत्री तपोभूमि पर जन समुदाय की श्रद्धा का रूप गो. तुलसीदास के केवट तथा निषाद की याद दिलाता था। गायत्री महायज्ञ की मुख्य यज्ञ वेदिका का संचालन करते हुये श्रद्धेय आचार्य जी साक्षात वशिष्ठ जैसे प्रतीत होते थे जो असंख्य दशरथों की पुत्रोत्पत्ति की कामना के समान अपने श्रद्धालु परिवार की शुभेच्छा कर रहे थे। कितना विशाल व्यक्तित्व था, कितने महान संकल्प का श्री गणेश था जो ‘इदं गायत्री इदं नमम’ की शुभ कामना के साथ शुरू हुआ।

मध्याह्न में भोजन की व्यवस्था का रूप देखते ही बनता था, ऐसा प्रतीत होता था माने प्राचीन आर्य कौटुम्बिक पद्धति साक्षात अपने विराट रूप में उतरी हो। पूर्णतया शुद्ध एवं संयमित भोजन को करने के लिये जब सहस्रों पारिवारिक जन बैठते थे तो उसी प्रकार सुख होता था जैसे बड़े नेत्रों को देखकर नेत्रों को सुख होता है। दाल, चावल, रोटी, शाक, चना (उबला हुआ) एवं हलुआ का सम्मिश्रण, शुद्ध, सात्विकता एवं शक्ति का महान योग था। बिना किसी भेद भाव एवं बन्धन के सामूहिक भोजन का रूप तो इस युग में हुआ है और न भविष्य के विषय में कहा ही जा सकता है।

ता. 24 की प्रातः ने उस प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना की, जब गुरु गोविन्द सिंह ने पाँच आत्म दानी अपने महान संस्थान खालसा के लिये माँगे थे, पुनः याद दिला दी। आदरणीय आचार्य जी के आह्वान पर उनको चार पारिवारिक वीरों ने अपने आप को दान दे दिया। क्या यह वही रूप नहीं हैं जो आज एक करोड़ में आपके सामने महान सिख सम्प्रदाय की स्थिति में हैं। निस्संदेह श्रद्धेय आचार्य प्रवर का मिशन सफल होगा, और यह महान त्यागी जिन्होंने अपनी विषम परिस्थितियों के बावजूद महान संकल्प किया है प्रकाश स्तंभों के समान ज्योतिर्मान होंगे।

ता. 25 को यज्ञ वेदिका पर जब उपाध्यायों का दीक्षान्त समारोह हुआ तब प्राचीन गुरुकुल का रूप दैदीप्यमान हो उठा। “हम दृढ़ संकल्प होकर प्रतिज्ञा करते हैं कि सामाजिक कुरीतियों को नष्ट करके एक नवीन युग का निर्माण करेंगे” की प्रतिज्ञा निःसन्देह महान थी।

अन्त में महान ऐतिहासिक दिवस 26 नवम्बर आ पहुँचा, जब जन-समुदाय महान सागर के समान प्रधान यज्ञ वेदिका की ओर उमड़ पड़ा। मथुरा के प्रमुख केन्द्र चौक बाजार से लेकर यज्ञ मण्डप एवं विश्वामित्र नगर तक एक इंच स्थान भी खाली दिखाई नहीं पड़ता था। राजा साहूकारों से लेकर मजदूर तथा किसानों तक की एक ही भावना थी कि इस प्रकार का पुण्य आयोजन कभी नहीं मिल सकता। विशाल यज्ञ वेदी पर यज्ञ करने वालों की संख्या हजारों में थी। अनुमानतः दो लाख व्यक्तियों का जन समुदाय इस आयोजन में भाग ले रहा था।

इस एक समारोह में नाना प्रकार के अनेक उत्सव आयोजित किये गये। मथुरा के विद्वान पंडितों का एक पंडित- सम्मेलन हुआ। ब्रज की रासलीला दिखाई गई। संध्या को शोभायात्रा निकली। आचार्य जी पैदल ही अनेक विद्वानों एवं तपस्वियों के साथ थे। माता जी और उनकी शिष्याओं का समूह भी इस शोभा यात्रा का एक प्रमुख अंग था। स्थान-स्थान पर पुष्प वर्षा हुई तथा आचार्य जी की आरती की गई।

अन्त में, शान्तिपाठ के साथ, यह प्रोग्राम समाप्त हुआ और 26 की रात्रि के पश्चात् लाखों नर-नारियों का प्रवाह क्रमशः नगर से बाहर की ओर होने लगा।


महायज्ञ में सेवा का उच्च आदर्श

(डॉ. चमनलाल)

महात्मा भर्तृहरि ने लिखा है कि संसार में तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं। पहली श्रेणी के श्रेष्ठ पुरुष वह होते हैं जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को तिलाञ्जलि देकर निरन्तर प्राणी मात्र के कल्याण में लगे रहते हैं अर्थात् अपने स्वार्थ को दूसरों के स्वार्थ के साथ मिला देते हैं। दूसरी श्रेणी के पुरुष वह होते हैं जो अपनी व्यक्तिगत पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन जुटाने के साथ-साथ समाज कल्याण के परोपकारी कार्यों में लगे रहते हैं। तीसरी श्रेणी के नीच पुरुष वह होते हैं जो अपने स्वार्थों के लिए दूसरों का गला घोंटते हैं और झूँठ, छल, कपट, बेईमानी, घूस आदि जैसे घृणित से घृणित कार्यों को अपनाने में कोई संकोच नहीं करते। वह दूसरों के हानि लाभ पर कोई ध्यान नहीं देते। अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये वह नीच से नीच कार्य करने पर उतारू हो सकते हैं। विवेक बुद्धि को भट्टी में झोंक कर साँसारिक उन्नति करना उनका जीवन-लक्ष्य होता है। ऐसे मनुष्य पशु श्रेणी में गिने जाते हैं। मनुष्य तो वह है जो मनुष्य के लिये जीता है। जो केवल अपने लिए जीता है, अपने लिये सोचता है, केवल अपने लिए पकाता है, वह पशु है, चोर है, मनुष्य कहलाने योग्य नहीं। पशुता से मनुष्यता व देवत्व की ओर बढ़ने की पहिचान यही है कि उसने कहाँ तक अपने स्वार्थों को समाज के स्वार्थों के साथ मिला दिया है।

मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ दूसरों की उन्नति के लिए जीवन भर प्रयत्न करता रहे। हम तो यहाँ तक कहने को तैयार हैं कि अपनी उन्नति के लिये दूसरों की उन्नति करना आवश्यक है। स्वयं, सुख, शान्ति प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि वह दूसरों की सुख, शान्ति के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहे। इसीलिये परोपकार को हमारे शास्त्रकारों ने सबसे बड़ा धर्म माना है। इस तत्व को भली प्रकार समझ कर अ.भा. गायत्री-परिवार के संचालकों ने प्राणी मात्र में इस परमार्थ बुद्धि को कूट-कूट कर भर देने का निश्चय किया है। गायत्री-परिवार के सदस्यों को यह आदेश मिलते रहते हैं कि उन्हें व्यक्तिगत उपासना के साथ-साथ धर्मफेरी करके जनता में धार्मिक भावनाओं को जागृत करना चाहिये। गायत्री महायज्ञ के एक लाख भागीदार बनाने के लिये हजारों सदस्यों ने दिन-रात एक कर दिया। अपने तन-मन को गायत्री माता व यज्ञ पिता के चरणों में न्यौछावर कर दिया। वह बिना वेतन के महीनों का अवकाश लेकर ग्राम-ग्राम व शहर -शहर की खाक छानते फिरे, असुरता के प्रकोप सहते रहे। यह उनके अथक निःस्वार्थ परिश्रम का ही परिणाम है कि लाखों की संख्या में जनता, होता, यजमान व दर्शक के रूप में आई। समाज सेवा की आदर्श भावना उनकी नस-नस में भर चुकी है। ऐसे धर्म सेवी गृहस्थों को महान आत्मा-महात्मा ही कहना चाहिये। हमारा पूर्ण विश्वास है कि जो साधक अपनी व्यक्तिगत साधना को कम करके भी परोपकार व सेवा के कार्यों में अधिक समय लगाता है,उसकी आत्मिक उन्नति उस साधक से बहुत ही शीघ्र होती है जो केवल अपनी साधना में ही निरन्तर लगा रहता है और धर्म सेवा को आवश्यक नहीं समझता।

महायज्ञ से पहले डेढ़ महीने के शिक्षण शिविर में भाग लेने वालों ने सेवा का उच्च आदर्श उपस्थित किया है। अपनी सामाजिक स्थिति को भूलकर वह महायज्ञ की तैयारी में लगे रहे। वह महायज्ञ के होताओं के निवास स्थानों की सफाई व कुण्डों आदि की खुदाई में निःसंकोच कार्य करते रहे। अपने घरों में जिन व्यक्तियों को कोई शारीरिक कार्य न करना पड़ा हो, उनका फावड़ा व कुदाल उठाकर मिट्टी खोदने आदि के कार्य करने लगना उनकी उच्च पवित्र भावना के द्योतक हैं। कुण्डों की लिपाई पुताई व रंगाई में कुछ स्त्रियों व पुरुषों ने जिस उच्च सेवा भावना को प्रकट किया, उसको गायत्री-परिवार के संचालक कभी भूल नहीं सकते। वह प्रातः काल छः से शाम के छः बजे तक बिना विश्राम के अपने कार्य में लगे रहे। श्रमदान का यह कार्य महायज्ञ की एक स्मृति रहेगी।

गायत्री महायज्ञ में लाखों की संख्या में होता यजमान व दर्शकों ने भाग लिया। महायज्ञ के निवास, भोजन, यज्ञ प्रवचन आदि के कार्य सभी सुव्यवस्थित ढंग से चलते रहे। इतने विशाल आयोजनों को सफल बनाने के लिए हजारों स्वयं सेवकों की आवश्यकता पड़ती है। हजारों तम्बुओं में निवास की व्यवस्था करना, हजारों याज्ञिकों का भोजन प्रबन्ध, 1000 कुँडों में सामग्री, घी, समिधा आदि की यज्ञीय व्यवस्था करना और परिक्रमा करती हुई लाखों की भीड़ को कन्ट्रोल करना कोई हंसी खेल नहीं है। मथुरा निवासियों का यह कहना है कि सैंकड़ों वर्षों से मथुरा में कोई ऐसा बड़ा आयोजन या मेला नहीं हुआ है, जिसमें इतना विशाल जन समूह एकत्रित हुआ हो। मथुरा शहर से यज्ञ-नगर तक की सड़क पर प्रातःकाल छः बजे से रात के 11 बजे तक चलती हुई भीड़ को देख कर आयोजन की विशालता और सफलता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था। इस विशाल आयोजन और अभूतपूर्व यज्ञ की विशेषता व सफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि इसमें एक भी ऐसी कोई दुर्घटना नहीं हुई जिसकी आशंका थी और जो मेलों में प्रायः हुआ करती हैं। यह सब यज्ञ के भागीदारों व व्यवस्था करने वाले प्रबन्धकों की परमार्थ व सेवा-बुद्धि से उत्पन्न हुई सतोगुण शक्ति का ही परिणाम है। जिन साधकों ने साल भर से ब्रह्मचर्य पूर्वक जप, अनुष्ठान, व्रत व धर्म प्रचार किया था, व भोजन, यज्ञ, प्रवचन और तीर्थ यात्रा आदि सभी कार्यों को भूल कर अपने कार्य में जुटे रहते थे। वह यज्ञ में भाग लेने से कर्तव्य पालन व सेवा कार्य को प्रधानता देते। सत्य तो यह है कि यदि जप, अनुष्ठान व यज्ञ करने से ऐसी सेवा बुद्धि नहीं बनती है तो यह समझना चाहिए कि उनकी साधना पूरी तरह से सफल नहीं हो रही है। निःस्वार्थ भाव से सेवा करना उच्चकोटि के साधकों का मुख्य चिन्ह है, यही सच्चा यज्ञ है।

महायज्ञ में हजारों यजमानों को उपाध्याय की उपाधि दी गई। यह उपाध्याय गायत्री ज्ञान मन्दिरों अर्थात् ब्रह्म विद्यालयों के अध्यक्ष व मुख्य शिक्षक रहेंगे। गायत्री तपोभूमि द्वारा प्रकाशित सद्ज्ञान साहित्य का प्रचार करना। इनका उद्देश्य रहेगा। इन लोगों ने संकल्प किया है कि वह अपनी जीविका में से निश्चित धन ज्ञान प्रसार में लगायेंगे और धर्म सेवा को परम पुनीत कर्तव्य मानकर अपने क्षेत्र में धर्मफेरी करके गायत्री व यज्ञ प्रचार करेंगे। गायत्री-परिवार की आगामी योजनाएं इन्हीं उपाध्यायों पर अवलम्बित हैं। इन्हें ही धर्म युद्ध में उतर कर विजय पताका फहरानी है।

यज्ञ में स्थूल वस्तुओं को सूक्ष्म बनाकर उनकी शक्ति को हजारों गुना बढ़ा दिया जाता है उस शक्ति द्वारा जहाँ अनेकों प्रकार के भौतिक लाभ होते हैं वहाँ सूक्ष्म सात्विक एवं पवित्र वातावरण की उत्पत्ति होती है, असुरता का नाश और देवत्व की वृद्धि होती है। तप, त्याग, परमार्थ व सेवा की उच्च भावनाएं जागृत होती हैं। इनका प्रत्यक्ष प्रमाण हमें याज्ञिकों की मनोदशा का अध्ययन करने से मिलता है। पिछले वर्ष में हमें उत्तर प्रदेश के 20 जिलों की शाखाओं का संगठन बनाकर उनमें भ्रमण करने का अवसर मिला है। उनमें से अधिकाँश शाखा मन्त्रियों के निकट संपर्क में रहे हैं। महायज्ञ में जो शाखा मन्त्री भाग लेने आये थे उनके मनों में उत्साह उछल-उछल रहा था। वह नये सदस्य बनाने, शाखाएं स्थापित करने 101,51,25,9 अथवा 5 कुण्डों के यज्ञ अपने क्षेत्रों में करवाने का शक्ति सामर्थ्य अनुसार संकल्प करके गये हैं। अब यह दिखाई दे रहा है कि अगले वर्ष में यज्ञों की बाढ़ सी आ जायेगी और भारत भूमि पुनः यज्ञ भूमि बनकर रहेगी। अगले वर्ष में 23000 कुण्डों के यज्ञ कराने का जो शुभ संकल्प परम पूज्य आचार्य जी ने किया है उसकी पूर्ति के लिए 2000 शाखा मंत्री कटिबद्ध हो रहे हैं ऐसा लगता है कि गायत्री व यज्ञ की ढाल तलवार को लेकर निकले हुए हजारों योद्धा भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान व युग निर्माण के संकल्प की पूर्ति में अवश्य विजयी होंगे। अब गायत्री-परिवार का प्रत्येक सदस्य धर्म सेवा के लिए तत्पर हो रहा है। यदि उन्हें अब धर्म प्रचार में अपने शरीरों की आहुति भी देनी पड़े तो वह संकोच नहीं करेंगे।


महायज्ञ में मैंने क्या देखा

(श्री सीतारामजी राठी, बोरीवली, बम्बई)

[गायत्री-महायज्ञ का मूल उद्देश्य तो देश की जनता की आध्यात्मिक भावनाओं को जागृत करना ही है, पर इस बार उसका बाह्य रूप भी ऐसा विशाल और चित्ताकर्षक हो गया कि उसने सब श्रेणियों के दर्शकों को बड़ा प्रभावित किया। इस सम्बन्ध में अनेक सज्जनों के मुख से यज्ञ की प्रशंसा सुनने में आ रही है। मथुरा में तो आमतौर से यह कहा जा रहा है कि इसके समान समारोह बहुत समय से देखने में नहीं आया। इस लेख के लेखक श्री सीताराम जी राठी ने पाठकों को महायज्ञ की एक ऐसी झाँकी कराने का प्रयत्न किया है जिससे वे दूर बैठकर भी इस महान समारोह का कुछ आनन्द प्राप्त करने में समर्थ होंगे।]

भारतवर्ष में होने वाले बहुत से यज्ञों को देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है, लेकिन यह 1024 कुण्डों का मथुरा का महायज्ञ सब दृष्टियों से अप्रतिम रहा। सर्व प्रथम इसकी विशेषता यह है कि इसमें पहले बड़ी धन राशि इकट्ठा करने का कुछ भी प्रयास नहीं किया गया न किसी बड़े धनिक को सहायक, संरक्षक बनाया गया। यज्ञ में भाग लेने वाले साधारण व्यक्तियों ने स्वेच्छा से जो कुछ इकट्ठा करके अर्पण किया उसी से काम चलाया गया और दूसरे भगवान के भरोसे रहा गया।

याज्ञिकों के ठहराने के लिये जो कई हजार तम्बू लगाये गये थे उनके नाम नारद नगर, व्यास नगर वशिष्ठ नगर, विश्वामित्र नगर आदि ऐसे सुन्दर रखे गये थे कि उनको सुनते ही पूर्वज ऋषियों के जमाने की याद आ जाती थी। ये तीन मील के क्षेत्र में फैले हुये नगर बिजली के प्रकाश में ऐसे सुन्दर दिखलाई पड़ते थे कि इनके क्रिया कुशल संचालकों को धन्यवाद दिये बिना रहा नहीं जाता था। यज्ञ मंडप की सजावट भी अद्वितीय थी। विशालकाय द्वार के अन्दर माता गायत्री का सुन्दर, मनमोहक, कलायुक्त मन्दिर, आचार्य और ब्रह्म के लिये अति सुन्दर सजावट युक्त मंडप परम दर्शनीय था। सामने 1024 कुण्डों की रचना शास्त्रोक्त रीति से पीले वस्त्र युक्त इतनी सुन्दर थी कि देखने वाले अपने सौभाग्य की सराहना करते थे। हवन के समय पीतवस्त्रधारी 3000 तपस्वी याज्ञिकों के समुदाय को एक साथ आहुतियाँ देते देखकर सतयुग की याद आ जाती थी।

“हम लोगों को अपनी पचास पीढ़ियों से ऐसा यज्ञ देखने का अवसर नहीं मिला और आगे देखने को मिलेगा इसकी संभावना कम है”- पं. श्रीराम शर्मा जी का यह कथन सार्थक प्रतीत होता है। लाखों की संख्या में अथाह जन समूह ने हवन कर्ताओं द्वारा यज्ञ करते समय परिक्रमा लगाकर महान पुण्यफल प्राप्त किया। विशेष भावुक जन तो बड़े परिश्रम से साष्टाँग प्रणाम करके परिक्रमा करते भी देखे गये। यज्ञ-स्थल की शोभा जीवन में फिर देखने को मिल सकनी असंभव है।

प्रवचन-पंडाल यज्ञ-मंडप के ठीक सामने ही था जिसमें दोपहर और रात्रि को जनता ने उच्चकोटि के महानुभावों के प्रवचन सुने। पं. बिहारी लाल जी आगरे वाले ने जनता को अपने संगीत से खूब आकर्षित किया। आचार्य श्री रामजी के त्याग का उदाहरण देते हुये उन्होंने बतलाया कि ऐसा व्यक्ति विरोध की चिन्ता क्यों करेगा-

जिनका अंगारों से परिचय, उनको मरने का भय।

रोका किसने दीवानों को, जलने वाले परवानों को। छोड़-छोड़ फूलों को, झेला है शूलों को॥

प्रज्ञाचक्षु महाराज ने मानवता का सुन्दर संदेश सुनाते हुये कहा- “ बड़ी डिग्रियाँ मानवता की कसौटी नहीं हैं। मानव वह है, जो समाज की सेवा करता है और समाज को जिसकी आवश्यकता प्रतीत होती है। आप सबको इस महायज्ञ में यह व्रत लेना चाहिये कि पारस्परिक भेद होने पर भी हम प्रेम पूर्वक एकता का भाव रखेंगे।”

आगरा के श्री पूर्णचन्द जी एडवोकेट ने सदाचार पर सारगर्भित भाषण करते हुये कहा- “बेईमान नहीं, ईमानदार बनो। बेईमान का साथ कोई नहीं चाहता, बेईमान भी ईमानदारों का साथ चाहता है। जो एक जगह बिक्री करता है उसे 100 जगह खरीदार बनना पड़ता है। बिक्रीदार एक जगह बेईमानी कर सकता है, पर जब अन्य 100 जगह उसके साथ भी वैसा ही बर्ताव किया गया तो क्या नतीजा निकलेगा।

श्री तेजपाल जी कवि ने पाँच-सात मिनटों में गायत्री-माता की स्तुति में जो भजन सुनाया उसे जनता ने बहुत पसन्द किया। अन्त में उन्होंने यही कहा—

चार वेद षट शास्त्र में बात मिली हैं दोय। सुख देये सुख होत है, दुख देये दुख होय॥

बहिन सुमन गुप्ता ने आचार्य जी के विरोधियों के छक्के छुड़ाने वाला भाषण करते हुये कहा—

“भगवान बुद्ध के समय में उनका एक भी ऐसा अनुयायी नहीं था जो साथ देता। दूसरी तरफ विरोधी कमर कसे खड़े थे। लेकिन सत्य के प्रभाव ने विरोधियों को परास्त किया और वे ही विरोधी भगवान-बुद्ध के अनुयायी शिष्य बने। इसी प्रकार वह दिन भी जल्दी आ सकता है जब आचार्य जी के विरोधी उन्हीं से दीक्षा लें।” बहिन सुमन गुप्ता कालेज की डबल ग्रेजुएट हैं। फिर भी उसने यही कहा कि “कालेज की शिक्षा अधूरी है। अगर वह पूरी होती तो आज जो शिक्षित बेकार फिर रहे हैं वे तब बेकार न रह सकते ।”

साबरमती के ब्रह्मानन्द जी ने तो समस्त विरोध करने वालों को चैलेंज देकर कहा कि- “भाइयों, गायत्री जपने से जो कुछ पुण्य मिले वह तो आपका, और जिस किसी को यह शंका हो कि स्त्रियों और अन्य वर्णों के गायत्री जपने से पाप लगेगा तो इस सम्पूर्ण पाप का मैं जिम्मेदार हूँ। भगवान को साक्षी रखकर तीन बार कहता हूँ कि अगर इसमें पाप होता हो तो वह मेरे सिर पर रहे। दुनिया में ऐसा कोई रोग नहीं है जो गौ का दूध सेवन करने और गायत्री जप करने से दूर न हो जाय।”

महान गायत्री-प्रचारक श्री शंभुसिंह जी ने आचार्य जी को ईश्वरत्व की भावना से देखते हुये कहा—”अब भगवान राम रावण का नाश करने के लिये धनुष बाण लेकर नहीं आवेंगे। अब भगवान कृष्ण कंस को मारने के लिये छाती पर चढ़ के मुक्के मारने से काम नहीं ले सकते। अब तो भगवान समय के अनुसार लेखनी अथवा एटम बम लेकर आयेगा-विज्ञान वेत्ता बनकर आयेंगे।”

आचार्य श्री राम जी ने अपने 3-4 दिन के सारगर्भित भाषणों में कहा— हमको त्यागी, तपस्वी निःस्वार्थ जन सेवक चाहियें जो जन-जन के मन-मन में सच्ची सेवा और त्याग का महात्म्य बतावें। जब हमारा समाज स्वार्थ में डूबे हुये लाखों साधुओं को रबड़ी मालपुआ खिलाता है तो क्या निःस्वार्थिओं को रोटी भी नहीं मिलेगी? अवश्य मिलेगी, और इसकी जिम्मेदारी हम लेते हैं। जो व्यक्ति कुछ करने की क्षमता रखते हों और जिनका स्वास्थ्य ठीक हो वे धर्म-प्रचार में लगने को तैयार हो जायें, हम उन्हें सिखायेंगे, पढ़ायेंगे, संगीत, भाषण आदि की शिक्षा देकर भारतीय संस्कृति का प्रचारक बनायेंगे। आप हमारे साथ काम करने के लिये अपना समय दें, फिर कार्य करने की व्यवस्था करना हमारा काम है पर हमें ऐसे एक-दो नहीं हजारों, लाखों जन-सेवक चाहियें। देश में धर्म की जागृति का कार्य करना बड़ा जरूरी है देश ऐसे आदर्श बलिदानियों की माँग करता है जो शंकराचार्य की तरह भगंदर का फोड़ा होते हुये भी समस्त भारतवर्ष में एक कोने से दूसरे कोने तक धर्म प्रचार करते हुए भ्रमण करते रहे। हमको ऐसे प्रचारक चाहियें जो ऋषि दयानन्द की तरह समाज में नवीन जागृति का मंत्र फूँक दें। हमको शिवाजी जैसे वीरों की आवश्यकता है जो धर्म रक्षा हेतु सदैव प्राणों को हथेली पर लिये रहें। हम आपका स्वागत करते हैं और यही कहते हैं कि धर्म के लिये कुछ कुर्बानी करो। हमारी यह भूख कुछ आदमियों से तृप्त होने वाली नहीं है— यह ऋषि जमदग्नि की भूख है- लाखों आदमियों के बलिदान की भूख है।”

यज्ञ आरम्भ होने से प्रथम दिन जलयात्रा का जुलूस बड़ा प्रभावशाली था। माता भगवती देवी (आचार्य जी की धर्म पत्नी) सबसे आगे अन्य स्त्रियों के साथ यज्ञ का कुम्भ लिये ऐसी जान पड़ती थीं मानों अमृत बरसाने जा रही हों। अन्य समस्त पीत वस्त्र धारिणी महिलाओं का दृश्य भी ऐसा ही लग रहा था मानो वे जमना मैया से अमृत माँगने जा रही हों।

पूर्णाहुति के बाद जो विशाल जुलूस निकाला गया उसके विषय में तो सभी मथुरा निवासी यह कह रहे थे कि ऐसा जुलूस शायद ही कभी यहाँ निकला हो। जुलूस के आगे नारद, राजा हरिश्चन्द्र, भगवान बुद्ध, महात्मा गाँधी, महर्षि दयानन्द आदि के दर्शनीय चित्र झाँकियाँ सजा कर निकाले गये थे। गायत्री मंत्र से युक्त यज्ञ-भगवान का रथ 10 सफेद अश्वों के साथ जुलूस के मध्य में चल रहा था। उसके पीछे सैंकड़ों शाखाओं के याज्ञिक अपने-अपने झंडे लेकर, जिन पर गायत्री मंत्र लिखा था, चल रहे थे। “गायत्री माता” तथा “यज्ञ भगवान” के जय घोष से आकाश गूँज रहा था। ‘पूज्य आचार्य जी की जय हो’ ‘हमारा युग निर्माण का संकल्प पूरा हो’ ‘विश्व का कल्याण हो’—आदि के नारे लगाये जा रहे थे। आचार्य जी जुलूस के साथ पैदल चल रहे थे। रास्ते के सब मकानों की छतें और सड़कें जुलूस देखने के लिये एकत्रित जन समूह से भरी थीं। जुलूस पर निरन्तर फूलों की वर्षा हो रही थी और थोड़ी-थोड़ी दूर पर आचार्य जी को फूलों के हार पहिनाये जा रहे थे। इस अद्वितीय समारोह के पचासों स्थानों पर फोटो खींचे गये। जब जुलूस घीयामंडी में आचार्य जी के निवास स्थान के सामने होकर निकला तो आचार्य जी की माता तथा बहिनों ने उनकी आरती उतारी, मानो वे अपनी इस अमूल्य निधि को धर्म और जाति की सेवा के लिये अर्पण कर रही हों, इस पुनीत दृश्य को देखकर अनेक लोगों के नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। इस प्रकार जुलूस सम्पूर्ण नगर की 5 मील की परिक्रमा करके रामदास की मंडी होता हुआ रात के 9 बजे यज्ञ नगर में वापस आया। तपोभूमि में वापस आने पर श्री द्रोपदी देवी जी ने आचार्य जी तथा चारों बलिदानी वीरों की आरती उतारी।

कार्तिक शुक्र 15 को देवताओं की दीपावली मनाई जाती है। उस दिन स्वर्ग में देवताओं ने गाजे बाजे के साथ उत्सव किया होगा। इधर भूमंडल में माता गायत्री ने अपने लाड़ले पुत्र श्री राम शर्मा जी की मंगलमय दिवाली मनवाई और भू (पृथ्वी) को धन्य-धन्य किया।


महा महिमामयी मथुरा-पुरी

(श्री रामनारायण अग्रवाल)

[ऑल इंडिया रेडियो, नई दिल्ली पर ब्रजभाषा के कार्यक्रमों के अधिकारी श्री आर. एन. अग्रवाल लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार व कवि हैं। ‘ब्रज साहित्य मंडल’ के एक मंत्री होने के साथ-साथ आप अत्यन्त महत्व पूर्ण शोध-कार्यों में संलग्न हैं। महायज्ञ में सम्मिलित होने के लिये आप सपत्नीक पधारे थे। उसी अवसर पर आपने यह लेख विशेष रूप से ‘अखण्ड ज्योति’ के लिये प्रकाशनार्थ दिया है।

जिस मथुरा पुरी को इस युग के अभूतपूर्व गायत्री-यज्ञानुष्ठान के लिये चुना गया वह सदा से धर्म-भूमि विभिन्न धार्मिक समुदायों का एक प्रमुख प्रचार-केन्द्र रही है भारतीय धर्म और संस्कृति के इतिहास में उसका बहुत बड़ा सहयोग रहा है, और यज्ञ-यागादिक धर्म-कार्य वहाँ निरन्तर सम्पन्न होते रहे हैं, इन विषयों पर सुयोग्य लेखक ने प्राचीन ऐतिहासिक सामग्री से सप्रमाण प्रकाश डाला है। वर्तमान समय की यह भक्ति -रस प्रधान नगरी आध्यात्म और ज्ञान-मार्ग के भी स्मरणीय दृश्य उपस्थित कर चुकी है, इसकी एक झलक पाठकों को इस लेख में मिलेगी।]

मथुरापुरी भारतवर्ष के प्राचीनतम नगरों में से एक है। इसे भारत की सप्त महापुरियों में स्थान दिया गया है और मोक्षदायिका बतलाया गया है। वैदिक, पौराणिक वासुदेव धर्म तथा बौद्ध और जैन धर्मों के साथ साथ यह नगर वर्तमान वैष्णव धर्म का भी केन्द्र रहा है और इसके वर्णनों से प्राचीन वाङ्मय भरा पड़ा है। राजनीति और इतिहास का भी मथुरा नगर पुराना केन्द्र रहा है। भारत के प्राचीन गणतंत्रों में अग्रगण्य अंधक वृष्णि वंशी नरेशों के शूरसेन जनपद की राजधानी भी यह नगर रहा। क्या नाग, क्या हूण, क्या कुशाण और क्या गुप्त सभी नरेशों की सदा इस पर दृष्टि रही और भारतीय इतिहास के उत्थान-पतन का इतिहास मथुरा नगरी,युगों से अपने अंचल में छिपाये आज भी स्थित है। यही नहीं दर्शन, काव्य कला, पुरातत्व और व्यवसाय का भी यह नगर गढ़ था। मूर्तिकला के विकास में मथुरा का योगदान तो विश्व विख्यात ही है। यही नहीं भारतीय संस्कृति के मूलाधार नटनागर भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि होने के कारण तो इस नगर की महिमा सदा सदा के लिए अक्षुण्ण हो गई है और अपनी वर्त्तमान हीनावस्था में भी यह संपूर्ण देश के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।

कहा जाता है कि मधु नामक एक प्रतापी नरेश ने मथुरा नगर की स्थापना की थी। इस धर्मात्मा नरेश ने वनों को काटकर यह सुन्दर नगर बसाया और इसे अपनी राजधानी बनाया। इसीलिए मथुरा को मधुपुरी या मधुरा भी कहा गया है। वह मधु नरेश किस वर्ग का था इस संबंध में विद्वानों में मतभेद है, कुछ इसे यादव वंशी तथा कुछ दैत्य वंशी मानते हैं, परन्तु मधु एक प्रतापी, प्रजापालक और कुशल शासक था यह सभी स्वीकार करते हैं, परन्तु मधु के उपरान्त उसका पुत्र लवण उसके अनुरूप नहीं रहा, वह एक क्रूर शासक था और उसने यज्ञादि पर प्रतिबन्ध लगा कर अपनी प्रजा विरोधी नीति के कारण यहाँ के ऋषियों और जनता को असन्तुष्ट कर दिया था। ऋषियों ने अयोध्या जाकर लवण के अत्याचारों की कथा भगवान राम को सुनाई थी और लवण से उनका त्राण करने के लिए अनुरोध किया था, जिसके परिणाम स्वरूप इच्छाक वंशी एक विशाल सैन्य दल भगवान राम के अनुज शत्रुघन के नेतृत्व में मथुरा पर चढ़ आया और उसने लवण का वध किया। लवण के वध उपरान्त भगवान राम की इच्छानुसार शत्रुघन मथुराधीश बनाये गये। उन्होंने इस नगर को फिर से बसाया। वाल्मीकि ऋषि की रामायण के उत्तर काण्ड में यह घटना विस्तार से दी गई है। वाल्मीकि जी ने मथुरा की शोभा का बड़ा भव्य वर्णन किया है और यमुना के तट पर बसी इस सुन्दर नगरी को ‘वेद निर्मिताम्’ देवताओं द्वारा बसाई गई नगरी कहा है।

परन्तु इच्छाक वंश का राज्य मथुरा में स्थायी नहीं हुआ, बाद में चन्द्रवंशी नरेशों ने इस पर अधिकार कर लिया और वह भारत के गणतंत्रों में शूरसेन जनपद की राजधानी के रूप में विकसित हुआ। बाद में समय की गति के साथ मथुरा की राजसत्ता में भी परिवर्तन होते गये जिसका ज्ञात और अज्ञात इतिहास स्वयं अपने आप में एक ग्रंथ का विषय है। यहाँ हम केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि मथुरा भारत का एक प्राचीन ऐतिहासिक केन्द्र रहा है और यहाँ की सम्पन्नता पाँडित्य तथा कला, सदा-सदा से संपूर्ण देश को आकर्षित करती रही थी। यही कारण है कि भारत वर्ष में जब भी कोई साँस्कृतिक उत्थान या धार्मिक आन्दोलन आरम्भ हुआ उसे अपनी सर्वमान्यता स्वीकार कराने के लिए मथुरा की ओर देखना ही पड़ा। और मथुरा की उदार संस्कृति परंपरा में देर सबेर, उन सभी को प्रश्रय मिला।

कहा जाता है कि जब भगवान् बुद्ध धर्म प्रचार के लिए पहली बार मथुरा आये तो यहाँ उनका अच्छा स्वागत नहीं हुआ। उस समय मथुरा में यक्षों का बाहुल्य था और यहाँ कुत्ते बहुत थे जिन्होंने भगवान बुद्ध को भी परेशान किया, परन्तु बाद में वैदा नामक प्रसिद्ध यक्षिणी ने उनका धर्म स्वीकार कर लिया और यहाँ बौद्ध विहारों की एक लम्बी शृंखला ही बन गई। भगवान बुद्ध की परम्परा में उपगुप्त तथा नगर नर्तकी वासवदत्ता ने भी बाद में बौद्ध धर्म स्वीकार किया और मथुरा बौद्ध धर्म का प्रधान केन्द्र बना।

यही नहीं जैन धर्म को भी मथुरा में भारी प्रश्रय मिला। जैनों ने भगवान नेमिनाथ को जो भगवान श्री कृष्ण के चचेरे भाई थे अपने 23 वें तीर्थंकर के रूप में स्वीकार किया था और वर्त्तमान कंकाली टीला यहाँ जैनधर्म का प्रधान केन्द्र बना। मथुरा के पुरातत्व संग्रहालय में इस टीले से प्राप्त जैन सामग्री पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हुई है, जिसमें एक विशाल देव निर्मित स्तूप भी है। जैन और बौद्ध धर्म के साथ वासुदेव धर्म का भी मथुरा केन्द्र था। भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि कटरा केशवदेव पर ईसवी शती से पूर्ण ही राजा षोड़ाष के समय ही वहाँ भगवान कृष्ण का मंदिर स्थापित हो चुका था। इस पावन स्थल को, एक अत्यन्त प्राचीन शिला लेख में ‘महास्थल’ नाम से कथन किया गया है। चन्द्रगुप्त मौर्य के राज दरबार में स्थित सिल्युकस के राजदूत मैगस्थनीज ने विश्लोवरा के नाम से इस स्थल का विस्तृत वर्णन किया है और यहाँ के वैभव और संवृद्धि की विस्तार से चर्चा की है। यही कारण है कि महमूद गजनवी ने मथुरा को भी अपनी लालची वृत्ति की पूर्ति का एक साधन बनाया और भगवान श्री कृष्ण के जन्मस्थान को अपने आक्रमण का केन्द्र बनाकर ध्वस्त किया था। यहाँ से वह अपार धन राशि लेकर गजनी लौटा यह सर्वविदित है। क्या मुहम्मदशाह अब्दाली, क्या नादिर शाह और क्या अन्य विजेता गण सभी ने मथुरा के वैभव तथा यहाँ के साहित्य और संस्कृति का सर्वनाश करने में कोई कोर−कसर न रखी और दिल्ली तथा आगरा के मध्य में स्थित होने के कारण मथुरा को हर बार विजेताओं से पददलित होना पड़ा परन्तु मथुरा आज भी जीवित है यही एक संतोष की बात है, यद्यपि उसकी स्थितियाँ आरंभ से लेकर अब तक यमुना के प्रवाह के साथ ही बदलती रही हैं।

इस प्रकार आज का मथुरा अपने अतीत गौरव पर आधारित एक छोटा, किन्तु फिर भी एक महत्वपूर्ण नगर है। इसका वर्त्तमान महत्व वास्तव में 16 वीं शताब्दी में विकसित वैष्णव भक्ति के केन्द्र के रूप में ही है। भारत में मुसलमान शासन स्थापित होने के उपरान्त सगुण भक्ति धारा की जो सबल रसधारा प्रवाहित हुई उसमें मथुरा मंडल ही कृष्ण- भक्ति का केन्द्र बना। आचार्य बल्लभ, रूप सनातन गोस्वामी, नारायण भट्ट, स्वामी हरिदास, हित हरिवंश आदि अनेक महापुरुष एक साथ मथुरा और इसके समीपस्थ स्थलों में बसे और यहाँ से कृष्ण भक्ति की जो मधुर मुरली बजी उसने संपूर्ण देश को विमोहित करके इसे फिर से गौरवान्वित किया, यही मथुरा की देन है।

यद्यपि श्रीमद्भागवतकार ने मथुरा का ब्रज से पृथक कथन किया है, परन्तु भक्ति युग में मथुरा को ब्रज की मधुर भक्ति का साँस्कृतिक केन्द्र इन आचार्य ने स्वीकार किया और पौराणिक आधार पर मथुरा की गौरव गाथा फिर दिग्दिगंत में गूँज गई—

जपोप वासनिय तो मथुरायं षडानन। जन्मस्थानं समासाद्य सर्वपापैः प्रभुच्यते॥

(स्कंद पुराण)

भक्ति युग में मथुरा को फिर कृष्ण जन्मभूमि के गौरवपूर्ण पद की मान्यता प्रदान की गई, यहाँ के प्राचीन स्थलों को पुनः खोजा गया। रास रंगमंच का पुनरुद्धार मथुरा के विश्रामन्तघाट पर ही हुआ और मथुरा जन जन के आकर्षण का केन्द्र बना ही रहा। आज भी मथुरा में यम द्वितीया, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तथा झूला दर्शन के लिए संपूर्ण देश के वैष्णव एकत्रित होते हैं, और यहाँ की रज को मस्तक पर धारण करके अपने को धन्य मानते हैं। यही नहीं कृष्णभक्ति के साथ-साथ मथुरा आज भी भारत की सिद्धपीठ के रूप में मान्य है। अभी अभी ता. 23,24,25,26 नवम्बर को पं. श्री राम शर्मा आचार्य ने प्राचीन वैदिक परंपरा के अनुसार एक सहस्र कुँड स्थापित करके यहीं एक गायत्री महायज्ञ का भव्य आयोजन किया, जिसमें लगभग 2 लाख दर्शनार्थियों ने मथुरा में कुँभ जैसा दृश्य उपस्थित कर दिया और ॐ भूर्भुवः स्वः के स्वर समस्त वातावरण में गूँज उठे। इस प्रकार मथुरा अब भी विभिन्न भारतीय संस्कृतियों के समन्वित रूप का एक सजीव प्रतीक बना हुआ है। ब्रज प्रदेश की साँस्कृतिक राजधानी के रूप में इसका गौरव सदा ही अक्षुण्ण रहेगा।

हरिरपि भजमानेभ्यः प्रायो मुक्त ददातिं न तु भक्तिम्। विदित तदुन्नत सत्राँ मथुरे धन्या नमामि त्वाम्॥


महायज्ञ की दिव्य झाँकियाँ

(श्री मार्कंडेय ‘ऋषि,’ काशी)

महायज्ञ के विषय में लेखनी उठाते ही सब से पहले उस दिन की याद आती है जब-लगभग दस महीने पहले, आचार्य जी ने एक दिन हम सब तपोभूमि वासियों से पूछा था कि “हमारा विचार यहाँ एक हजार कुण्डों का यज्ञ करने का हो रहा है, तुम सब इस विषय में अपनी सम्मति दो। पिछली बार जो 108 कुण्डों का यज्ञ किया गया उसकी गर्मी (प्रेरणा) अब तक रही और फलतः सैंकड़ों स्थानों में यज्ञ किये गये। अब यदि एक हजार कुण्डों का कर सकें तो उसके प्रभाव से यह यज्ञ-परम्परा बहुत अग्रसर हो सकेगी, और हम सन् 1962 के भयंकर समय का थोड़ा बहुत निराकरण करने में समर्थ हो सकेंगे।” हमने कहा-”गुरुजी, इधर आपका स्वास्थ्य कमजोर हो गया है और इतने बड़े महायज्ञ में असीम परिश्रम की आवश्यकता पड़ेगी। साथ ही बहुसंख्यक सुयोग्य, श्रद्धालु, ईमानदार कार्यकर्त्ताओं का सहयोग मिलना भी आवश्यक है। इसलिये इन बातों का ध्यान रखकर ही इस विषय में निश्चय करना चाहिये।” आचार्य जी ने हँसकर उत्तर दिया—”मार्कंडेय जी, आप हमारे स्वास्थ्य की चिन्ता मत कीजिये! जब महायज्ञ करना होगा तो हम भोजन में पौष्टिक पदार्थ खायेंगे और मोटर गाड़ी से आएंगे’ जायेंगे! रह गई सहयोगियों की बात, सो अच्छे कामों में भगवान सहायता करते हैं। तुम सब लोग तैयार हो जाओ तो यह यज्ञ अवश्य हो जायगा और मैं इसी समय इसको पूरा करने का संकल्प करता हूँ।”

अब महायज्ञ के आरम्भ होने में केवल दो दिन का समय रह गया है तपोभूमि के सामने से सैंकड़ों शाखाओं के उपासक और उपासिकाएँ गायत्री परिवार के झण्डे लेकर निकल रहे हैं। मथुरा के जंक्शन स्टेशन से लेकर बिड़ला मंदिर तक इन लोगों की चींटियों की -सी कतारें चल रही हैं। इन लोगों के दल के दल तपोभूमि में गायत्री माता के दर्शन करने चले आ रहे हैं और उनके जयकारों से आकाश गूँज रहा है। तपोभूमि से आगे चलते ही ऐसा जान पड़ता है मानो मीलों लम्बा चौड़ा कोई नया नगर जादू के जोर से बसा दिया गया हो। सब दिशाओं में ताँगे, रिक्शे, दुकानें, तम्बू, भोजन शालायें, साधु, संन्यासी, धर्मोपदेशक आदि देखते-देखते दर्शक के मन में एक अनिर्वचनीय भाव का उदय होता है कि “अहा, आचार्य जी के एक क्षण के संकल्प ने किस प्रकार जंगल में मंगल करके दिखा दिया।” हमको तो कई बार हर्ष से रोमाँच हो आया और हृदय आनन्द से परिपूर्ण हो गया।

यह एक हजार कुण्डों की अभूतपूर्व यज्ञशाला है। फाटक के भीतर प्रवेश करते ही नर नारियों की अपार भीड़ के कारण चल सकना कठिन हो जाता है। होता और यजमान अपने-अपने स्थानों पर बैठे हुये हैं। गायत्री-मंत्रों की एक दिव्य ध्वनि सर्वत्र गूँज रही है। एक तरफ ब्रह्मचारी योगेन्द्र अपनी गम्भीर गर्जना से यज्ञ का संचालन कर रहे हैं। पास में कितने ही विद्वान सहयोगार्थ बैठे हैं। पूज्य आचार्य जी और माता भगवती देवी भी वहीं विराजमान हैं। अहा, इन दोनों तपस्वियों के दर्शन के लिये असंख्य भीड़ उमड़ी चली आ रही है। सब चरण स्पर्श करना चाहते हैं, पर इसके लिये पहले ही निषेध कर दिया गया है। तो भी स्वयं-सेवक लोग समस्त भीड़ को रोकने में असमर्थ हो जाते हैं और इक्के दुक्के व्यक्ति आचार्य जी के चरणों तक पहुँच ही जाते हैं। नवरात्रि से ही जौ के सत्तू पर रहने वाले कृशकाय आचार्य जी और माता भगवती देवी अपने संकल्प को पूर्ण होते देख हर्षित हो रहे हैं। यज्ञशाला के मध्य में बने प्रधान यज्ञ कुण्ड के पास खड़े एक लम्बे से संन्यासी वहाँ की देख भाल कर रहे हैं और चारों तरफ पीले वस्त्र पहिने असंख्यों नर नारी पवित्र वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुये आहुतियाँ दे रहे हैं। यज्ञशाला के प्रत्येक प्रवेश द्वार पर यज्ञ-रक्षक खड़े हुये होताओं के अतिरिक्त अन्य लोगों को भीतर जाने से रोक रहे हैं।

अब यज्ञशाला के परिक्रमा मार्ग पर आगे बढ़िये तो असंख्य श्रद्धालु व्यक्ति 24 और 108 परिक्रमाएँ लगाने में संलग्न हैं। कोई-कोई तो लेट-लेट कर ‘दण्डौती’ परिक्रमा दे रहे हैं। अरे, यह देखो भयंकर भीड़ के कारण अनेक लोगों के पैर उन दण्डौती करने वालों की पीठ पर पड़ गये। मैंने इस प्रकार परिक्रमा देने वाली एक स्त्री से कहा— “माताजी,इस समय अपार भीड़ है, आप संध्या के समय शेष परिक्रमा पूरी कर लेना।” पर इस बात को कौन सुनता है। उसे तो परिक्रमा पूरी करनी है, प्राणों की परवाह नहीं!

परिक्रमा-मार्ग में कीर्तन करते, झण्डे लिये, जयघोष करते गायत्री उपासक तथा नजदीक और दूर के स्थानों के दर्शक अपने को परम सौभाग्यवान समझ रहे हैं। अब आगे कुआं है, जहाँ लोगों को पानी पिलाने की व्यवस्था है। दस व्यक्ति पूरी शक्ति से कार्य कर रहे हैं पर प्यासे लोगों की भीड़ इससे भी कहीं अधिक है और बड़ी धक्कमधक्का हो रही है। पास में ही यज्ञ- सामग्री का विशाल भंडार है। जिसमें तपोभूमि के ‘वैद्यजी’ श्री रामलाल अपने सहयोगियों के साथ डटे हुये सामग्री और घी समस्त एक हजार कुण्डों पर पहुँचाने की व्यवस्था कर रहे हैं। यह कार्य इतना विशाल था कि यज्ञ-शाला व्यवस्थापक रामलाल जी कई दिन तक भंडार से बाहर ही नहीं निकले और उनका खाना-पीना, सोना, नित्यकर्म आदि सब बन्द हो गया। एक हजार कुण्डों पर होताओं के नये-नये दलों को सामग्री आदि पहुँचाने में कई सौ स्वयं सेवकों को लगातार दौड़−धूप करनी पड़ती थी और अगले दिन के लिये पहले दिन रात से ही सब तैयारी करके रखनी पड़ती थी। स्वेच्छा सहयोग के लिये आने वाली सामग्री, घी, रुपये पैसों को जमा करने का काम भी बहुत बड़ा था। इन्हीं कामों की देखभाल में व्यवस्थापक जी को लगातार 24 घण्टे व्यस्त रहना पड़ता था।

महायज्ञ की सब बातें इस छोटे से लेख में वर्णन नहीं की जा सकतीं। जिन्होंने उसमें भाग लिया, सहयोग किया, दर्शन किये वे ही उसकी महानता का अनुमान कर सकते हैं। यज्ञ-नगर, प्रवचन-पंडाल यज्ञ- शाला भोजन शाला की अपार भीड़ स्वयं सेवकों का परम उत्साह, होता और याज्ञिकों की हार्दिक भक्ति , ब्रह्म के मंडप और मुख्य यज्ञ-कुँड की दिव्य छटा आदि बातें जीवन भर सदैव याद रहेंगी। अहा,क्या सम्भव है कि हम पुनः इस जीवन में ऐसे महायज्ञ में भूख, नींद त्याग कर तन मन से सेवा कर सकेंगे, अथवा फिर कभी इन नेत्रों से ऐसे दिव्य दृश्य देख सकेंगे।

लोग कहते हैं कि मथुरा के कितने ही लोगों ने महायज्ञ का विरोध किया, उसमें विघ्न डालने की चेष्टा की, पर हमको तो चारों तरफ सहयोग ही सहयोग और आश्चर्य जनक सेवा भावना के दर्शन हो रहे थे। सैंकड़ों नर-नारी इस बात के लिये तड़प रहे थे कि हमको भी इस पुण्य आयोजन में कुछ परिश्रम करने का -सेवा का अवसर मिल जाय तो जीवन धन्य हो जाय। अभी पता लगा है कि मथुरा के ही एक सेठ जी अपनी मिल के सब कर्मचारियों के साथ अपनी ही इच्छा से 4 दिन तक सेवा कार्य में लगे रहे। इस कार्य के लिये उन्होंने न तो आचार्य जी से पूछा और न किसी को कुछ बतलाया। वे हर एक कार्य में, जहाँ भी आवश्यकता हुई अपने कर्मचारियों सहित सहयोग देते रहे और आयोजन समाप्त होने पर चुप-चाप चले गये। थोड़े ही लोग इन की इस निःस्वार्थ सेवा का रहस्य जान पाये। उन सेठजी का कहना है कि यज्ञ से एक दिन पूर्व सुषुप्ति की सी अवस्था में उनके निकट एक कन्या आई और यज्ञ में सहयोग की प्रेरणा देकर अदृश्य हो गई। फिर क्या था, सवेरे ही उन्होंने अपनी मिल का काम स्थगित कर दिया और अपने पचास कर्मचारियों को लेकर सेवा-कार्य में लग गये। इसी प्रकार अन्य सैंकड़ों व्यक्तियों ने, जिनमें अधिकाँश गायत्री परिवार के ही हैं, रात दिन परिश्रम करके और अपने स्थानों पर डटे रह कर इस पुण्य-कार्य में सहयोग दिया और इस प्रकार पूज्य आचार्य जी के दस महीना पूर्व कहे वाक्यों को चरितार्थ कर दिखाया।


ऐसा मेला कभी देखा था?

(श्री बालकृष्ण जी)

वेद माता गायत्री की असीम कृपा से महायज्ञ तो सानन्द सम्पन्न हो गया, पर अपने पीछे ऐसी अनेक परम्परा बनाने वाली घटनायें छोड़ गया जिनमें हम आगे चल कर पर्याप्त लाभ उठा सकेंगे। यज्ञ तो हजारों तपस्वी याज्ञिकों द्वारा पूर्ण हुआ, परन्तु देश के भिन्न-भिन्न स्थानों से जो दर्शक आये थे उनकी भावना भी यज्ञ के तपस्वियों जैसी ही दिखाई पड़ी ।

महायज्ञ के सभी उप-नगरों में तम्बुओं, छोलदारियों शामियानों में ठहरे हुये भिन्न-भिन्न भाषाओं के बोलने वाले व्यक्ति एक ही रंग में रंगे नजर आ रहे थे। भिन्न-भिन्न प्राँतों के होते हुये भी उनका पारस्परिक व्यवहार सौहार्दयुक्त था और वे चिर−परिचित मित्रों की तरह वस्तुओं का आदान-प्रदान करते रहते थे।

सड़क के किनारे लगी दुकानों के मालिक और मुनीम बिना नाम लिखे हुए ही यज्ञ में आये हुये यात्रियों को उधार सामान तो दे ही रहे थे परन्तु साथ-साथ अपने बर्तन भी उन्हें प्रयोग के लिये बिना किसी जमानत के दे देते थे वे केवल एक वस्तु देखते थे-वह थी पीले कपड़े। इन वस्त्रों के दर्शन मात्र से मथुरा के अधिकाँश दुकानदार, जो वैसे बड़े स्याने होते हैं, इन व्यक्तियों को सच्चे ऋषि सन्तान समझ कर उधार दे रहे थे। उनका यह कहना सत्य प्रतीत होता था कि “ यह सर्व प्रथम आदर्श मेला है।” इतनी अपार भीड़ कि जंक्शन स्टेशन से वृन्दावन की सीमा तक वृद्धों और बालकों को ही नहीं, अनेक स्वस्थ पुरुषों को भी चलने में बड़ी कठिनाई प्रतीत होती थी, उसमें दुकानदारों को ग्राहकों की माँग के अनुसार शीघ्र तोलने की भी फुर्सत नहीं रहती थी, और वे बहुत सा सामान को यों ही अनुमान से उठा कर दे देते थे, और वह भी उधार। पर धन्य है पूज्य आचार्य जी की शिक्षाओं द्वारा गढ़े गये इन नीति और चरित्र का महत्व जानने वाले नर श्रेष्ठों को कि सामान के पैसे दुकानदारों के भूल जाने पर भी स्वयं हिसाब करके लौटा रहे थे। दुकानदार कह रहा था— “बाबू साहब, आप मुझसे सामान नहीं ले गये।” पर याज्ञिक कह रहा था “नहीं, ये पैसे तुमसे लिये सामान के हैं, सो तुम्हें लेने होंगे।” धन्य है यज्ञ का प्रभाव और आचार्य जी की कार्य रूप में दी गई शिक्षाओं का सुपरिणाम कि जहाँ मेले ठेलों में ग्राहक और दुकानदार प्रायः एक दूसरे की आँखों में धूल झोंकने की चेष्टा किया करते हैं, यहाँ उससे सर्वथा भिन्न प्रकार का दृश्य ही देख ने में आ रहा था।

साधारण भीड़ भाड़ के मेलों में भी स्त्री-पुरुषों में परस्पर दुर्व्यवहार का होना और गाली गलौज तक हो जाना प्रायः देखा जाता है। परन्तु इस असाधारण मेले में यज्ञ का तप करने वाले तपस्वियों के प्रताप से गंदे विचार वालों की मनोवृत्तियाँ भी बदल गई। हर एक व्यक्ति माताओं को साक्षात गायत्री स्वरूप ही देख रहा था। याज्ञिक और दर्शक सभी महिलाओं को माता और बहिन समझ कर व्यवहार कर रहे थे। गन्दे व्यवहार तो क्या तपोभूमि से यज्ञ शाला तक तो गन्दे विचार भी यज्ञ-धूम के साथ आकाश में उड़ जाते मालूम पड़ते थे। सभी नागरिक इस अद्भुत परिवर्तन पर आश्चर्य कर रहे थे।

इस प्रकार के बड़े आयोजनों में पुलिस का काफी प्रबन्ध रहने पर भी दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। परन्तु इस मेले में प्रत्येक व्यक्ति एक स्वयं सेवक के रूप में एक दूसरे की रक्षा का भार अपने ऊपर समझ कर व्यवहार कर रहा था। यज्ञ नगरों की सुरक्षा तो स्वयं सेवक करते ही थे परन्तु सड़क व दुकानों की सुरक्षा के लिये भी प्रत्येक रास्ता चलने वाला ध्यान रखता था। पुलिस का व्यवहार भी इस मेले में सर्वथा सराहनीय रहा, और जैसी शिकायतें अनेक अवसरों पर सुनने में आती हैं, उनका नाम निशान भी देखने सुनने में नहीं आया। एक बड़े पुलिस अधिकारी ने हमसे कहा था कि “इतनी बड़ी भीड़ का इंतजाम करने के लिये दो हजार पुलिसकर्मियों की आवश्यकता होती है, पर इस मेले की व्यवस्था थोड़े से काँस्टेबलों ने ही अच्छी तरह संभाल ली। यह गायत्री माता का ही प्रभाव मानना चाहिये।” स्वयं नगर कोतवाल सुरक्षा सम्बन्धी प्रबन्ध में पूरा ध्यान दे रहे थे और मध्य रात्रि में कई बार नगर का चक्कर लगाकर पहरे का निरीक्षण करते थे। रात्रि के समय एक ताँगे वाला किसी यात्री का एक बंडल भूल से या किसी प्रकार इधर-उधर ले गया। पुलिस वालों को सूचना देने पर और हुलिया बतलाने पर उन्होंने उसे थोड़ी ही देर में लाकर उपस्थित कर दिया और उस बंडल का पता लगा दिया।

इस प्रकार यह मेला अन्य बड़े-बड़े मेलों से भिन्न प्रकार का और एक प्रकार से विचित्र ही था। जहाँ अभी तक हमको ऐसे अवसरों पर प्रायः धक्कम धक्का, अशिष्टता, ठगने-ठगाने के दृश्य देखने को मिला करते थे यहाँ सब लोगों में सत्य व्यवहार और सेवा-भावना दिखलाई पड़ते थे। इसमें अधिकाँश लोग यही चाह रहे थे कि इस पुण्य आयोजन में हमें भी कुछ सेवा करने का मौका मिले तो मानव-जीवन सफल हो जाये। जन-समूह की मनोवृत्तियों में इस प्रकार का अद्भुत परिवर्तन देखकर अनेक नास्तिक विचारों के व्यक्ति भी ईश्वरीय शक्ति में विश्वास करने लगते थे और बहुत से गायत्री व यज्ञ के भक्त बन गये।


महायज्ञ की दैवी सफलता

(श्री अवधूत, गुप्त मंत्र विद्या विशारद, गोरे गाँव, बम्बई)

मेरे अनेक साथी मथुरा महायज्ञ के विषय में मेरे साथ यज्ञ-आयोजन की सफलता, असफलता के सम्बन्ध में तरह-तरह की बातें करते थे। वे इस विषय में बहुत से प्रश्न शंका की दृष्टि से पूछते रहते थे। इन सब का उत्तर देने के लिये मुझे बहुत सूक्ष्म विचार करना पड़ता था। जब गायत्री मन्त्र का जप करते-करते मैं अनेक प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ने का प्रयत्न करता तब मुझे गायत्री की दैवी शक्ति द्वारा जो अनुभव होता वही अपने साथियों को बतलाता रहता। कितने ही व्यक्ति यह प्रश्न करते थे कि यह सब कैसे पूर्ण हो सकेगा? 20 ता. हो जाने पर भी पूरी-पूरी तैयारियाँ नहीं हो सकी थीं। हमको ऐसा नहीं जान पड़ता कि यह कार्य निर्विघ्न पूरा हो सकेगा? ऐसे अनेक प्रश्नों का उत्तर मुझे गायत्री माता की दिव्य शक्ति द्वारा यही प्राप्त होता था कि श्री आचार्य जी को उच्च लोगों की आत्माओं की बहुत सहायता मिल रही है और ये आत्माएँ उन व्यक्तियों पर प्रभाव डालकर, जिन्होंने वर्ष भर तक गायत्री जप, मंत्र लेखन, चालीसा पाठ, अनुष्ठान, ब्रह्मचर्य, भूमि शयन आदि द्वारा अपनी देह को पवित्र किया है, इस कार्य को सफल बनायेंगी। इस प्रकार जो संदेश मुझे प्राप्त होते थे उनको मैं अपने साथियों को सुना देता और सुनने के बाद उनको प्रायः आश्चर्य ही हुआ करता था।

पर यह बात इतनी सत्य सिद्ध हुई कि जब मैं इस लेख के लिखने के एक दिन पहले मथुरा के जनरल पोस्ट आफिस में अपना तार मनीआर्डर स्वयं लेने गया, तब वहाँ के मनीआर्डर विभाग के सुपरवाइजर साहब श्री सकुरेन्द्रनाथ जी गुप्ता के साथ महायज्ञ के सम्बन्ध में चर्चा हुई। उस समय उन्होंने मुक्त कंठ से स्वीकार किया कि “ऐसा यज्ञ मथुरा नगरी के वर्तमान व्यक्तियों में से किसी ने कभी नहीं देखा था। मुझे महायज्ञ के 1024 कुण्डों में प्रत्येक गायत्री के रूप में ही दृष्टिगोचर होता था। जलयात्रा में प्रत्येक महिला का स्वरूप मुझे गायत्री माता के समान जान पड़ता था, जिनके ऊपर मथुरा के कमरों से स्थान स्थान पर पुष्प वर्षा की जा रही थी। पूर्णाहुति के बाद निकलने वाले विशाल जुलूस के घोड़े और उसके सभी व्यक्ति मुझे साक्षात गायत्री के रूप में दिखाई पड़ते थे। इसमें कोई दिव्य और अदृश्य शक्ति काम कर रही है, ऐसा मेरे हृदय और आँखों को अनुभव हो रहा था।” इन शब्दों को जब मैंने वहाँ हुये 5-7 व्यक्तियों के समक्ष सुना तो मुझे ऐसा लगा कि श्री आचार्य जी को इस ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की प्रेरणा करने वाला और कोई नहीं,स्वयं गायत्री माता ही हैं।

एक बार श्री आचार्य जी ने भी अपने प्रवचन में बतलाया था कि “इस प्रेरणा का आयोजन मैंने अपने दिमाग से नहीं किया। आयोजन करते समय मेरे चित्त में जो प्रेरणा उत्पन्न हुई उसी से यह कार्य सम्पन्न हुआ है। लोग शायद मुझे पागल कहें, तो भी यह ठीक है। क्योंकि यह कार्य मैंने अपने विचार से नहीं किया है। वरन् मेरे हृदय में न जाने क्यों ऐसी प्रेरणा हुई और उसी से मैंने इस कार्य का संकल्प कर डाला।” इससे समझा जा सकता है कि हृदय का महत्व कितना अधिक है। बुद्धिमान व्यक्ति जिस कार्य को मस्तिष्क-शक्ति से नहीं कर सकता उसे हृदय में रहने वाली शक्ति की प्रेरणा से कर सकता है। गायत्री-पंचाँग में भी हृदय का महत्व अधिक है। गायत्री का जप हृदय से करने से गायत्री देवी का निवास तुरन्त हृदय में हो जाता है। श्री आचार्य जी ने जैसा कि “गायत्री महाविज्ञान” में लिखा है कि “गायत्री का साधक साहस कर सकता है, वह मरुभूमि में भी हरियाली उत्पन्न कर सकता है।” इस बात की सचाई श्री आचार्य जी ने इस ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की सफलता द्वारा प्रत्यक्ष सिद्ध करके दिखा दी है।

जिस आयोजन की सफलता के सम्बन्ध में अनेकों को शंका थी, अनेकों को हँसी मजाक की सी बात जान पड़ती थी, और अनेकों को जिस पर पूर्ण श्रद्धा भी थी, उसकी सफलता असफलता की बहुसंख्य व्यक्ति प्रतीक्षा कर रहे थे। वह आयोजन आज सम्पूर्ण रीति से सफल हो चुका है। इसी शक्ति के आधार पर उनका समस्त भारत में 23 हजार कुण्डों के यज्ञ कराने का आयोजन भी सफल हुये बिना नहीं रहेगा। यह बात ऐसी है जो समय आने पर सब को प्रत्यक्ष दिखलाई दे जायगी। दूसरी बात यह भी है कि सच्चा गायत्री उपासक किसी दूसरे व्यक्ति से धन का दान नहीं माँगता। बिना माँगे जो कोई श्रद्धा पूर्वक जो कुछ भी भेंट करता है उसी को स्वीकार किया जाता है। इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण भी श्री आचार्य जी ने इस आयोजन में दिखला दिया है, और इससे गायत्री-उपासकों को शिक्षा लेनी चाहिये। अभी इसी महीने की बात है कि मैंने स्वाभाविक रीति से आचार्य जी के सम्मुख अपना यह विचार प्रकट किया कि “मैं अपने साथियों द्वारा 24 हजार रु. इकट्ठा करके गायत्री तपोभूमि को भेंट करूं।” पर इसके उत्तर में उन्होंने शुद्ध हृदय से कहा कि “गायत्री तपोभूमि के लिये इस प्रकार धन इकट्ठा करके भेजने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। ईश्वर मेरे हर एक कार्य को अपनी इच्छा से पूरा कर ही देता है। उस धन का उपयोग तुम्हीं अपने प्राँत में गायत्री-ज्ञान प्रचार के निमित्त करते रहो। जहाँ धन इकट्ठा होगा वहाँ झगड़ा भी होगा, इस लिये मुझे इस बात की कुछ भी आवश्यकता नहीं जान पड़ती,” अस्तु।

एक विशेषता यह भी है कि तपोभूमि में जो धन, सामग्री आदि जनता द्वारा दिया जाता है उसे इकट्ठा करके संग्रह नहीं किया जाता। पर इसे शीघ्र से शीघ्र उपयुक्त स्थानों में उपयुक्त व्यक्तियों द्वारा खर्च कर दिया जाता है। इस बात से मेरे हृदय में श्री आचार्य जी के लिये ऐसा अनुमान होता है कि शायद कभी वे वास्तव में संन्यास तो नहीं ले लेंगे? गायत्री तपोभूमि का समस्त भार वे महायज्ञ के आत्मदानियों को देते जाते हैं और स्वयं अपने को पूर्ण रूप से ईश्वरेच्छानुसार जन-सेवा के लिये अर्पित करने चले जा रहे है। जिस प्रकार श्री शंकराचार्य जी अपना सब कार्य अपने चार शिष्यों को सौंपकर निवृत्त हो गये थे, उसी प्रकार श्री आचार्य जी को भी चार आत्मदानी ईश प्रेरणा से प्राप्त हो गये हैं। यद्यपि श्री आचार्य जी के संकल्प बहुत गुप्त होते हैं, पर उनके हृदय को जानने वाले उनको समझ ही लेते हैं, और उनके निश्चय किये हुये संकल्पों को कोई रोक भी नहीं सकता।


महायज्ञ में आतिथ्य के अपूर्व दृश्य

(श्री गिरिजा सहाय जी)

महायज्ञ के दिनों में सारी ब्रज भूमि पर जिधर निकलते उधर ही वायु प्राण प्रद सुगन्ध से भरी हुई मालूम पड़ती थी। लाखों नर-नारी उस सुगन्ध की मस्ती में स्वर्गीय आनन्द का अनुभव कर रहे थे। जगह-जगह गोष्ठियों में यही बात सुनाई पड़ती थी कि “हम भी अपने यहाँ पहुँचते ही एक यज्ञ का आयोजन करेंगे।” इस लाखों की भीड़ में एक बात आश्चर्य की यह भी थी कि यद्यपि यज्ञ के प्रथम दिन ही ठहरने के सब स्थान भर चुके थे और आने वालों का ताँता लगा हुआ था। पर ज्यों−ही वे यज्ञ नगर में अपने लिये निर्धारित कैम्प में पहुँचते थे, वहाँ के पहले से टिके हुये लोग उनको चिर परिचित मित्रों की तरह गले लगाते थे और अपने साथ ही इस प्रकार ठहराते थे मानो वे उनके कोई घनिष्ठ सम्बन्धी ही हों। अनेकों याज्ञिक बराबर अपने कैम्पों में घूमकर अन्य लोगों के कष्ट, अभाव की पूछताछ करते रहते थे और सेवा के लिये हर प्रकार से तैयार रहते थे।

भोजन के समय तो इस अतिथि सत्कार और सेवा का दृश्य देखकर प्रत्येक दर्शक यही अभिलाषा करता था कि भगवान, ऐसा ही दृश्य देश में सर्वत्र दिखलाई पड़े। चौके में बैठकर परस्पर मिलकर एक दूसरे का सत्कार कर रहे थे। विशेषता यह थी कि प्रत्येक एक दूसरे को अपना अतिथि समझ रहा था।

कुछ भाई अपने भोजन की व्यवस्था अपने साथ ही करके लाये थे। तो भी जब वे अपने तम्बुओं में बैठकर भोजन करते थे तो अपने पड़ोसियों से भी उसमें भाग लेने का बड़ा आग्रह करते थे।

याज्ञिक जहाँ स्वयं ऐसा प्रेमयुक्त व्यवहार कर रहे थे वहाँ याज्ञिकों के निर्माता पूज्य आचार्य जी ने अतिथि सत्कार का जो महान आदर्श उपस्थित किया उसे देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबा रहे थे। कई महीनों से सूखे जौ के सत्तू पर रहने वाला रुक्ष कृश तन लेकर हाथ जोड़े हुए जब वे किसी नगर में होकर गुजरते थे तो यही शब्द उनके मुँह से निकलते थे कि “आपको कोई कष्ट हुआ हो तो क्षमा करना। मैं आपकी अच्छी तरह सेवा न कर सका तथा आपको मैंने बड़ा कष्ट दिया।” उस अस्थिपंजर मात्र देह से निकलने वाले इन शब्दों में शब्द भेदी बाण से भी अधिक ताकत थी और जिस किसी भी व्यवस्था की शिकायत करने वाले ने ये शब्द सुने कि उसका हृदय द्रवीभूत हो जाता था और वह आचार्य जी के दिव्य चरणों में लेटकर अपनी भूल का पश्चात्ताप करने लगता था। इसके बाद वह स्वयं दूसरों का सत्कार तथा सेवा करके उनकी शिकायतों को दूर करने में लग जाता था।

यद्यपि ताँगे, रिक्शे, मोटर गाड़ी वाले मुसाफिरों के साथ प्रायः गैर मुनासिब व्यवहार करने के लिये प्रसिद्ध हैं, पर इस अवसर पर वे भी महायज्ञ के यात्रियों से ऐसा मीठा व्यवहार कर रहे थे मानो वे इनके भी अतिथि हों। स्वयं सेवक जो स्वागत के लिये स्टेशन पर पहुँचे थे वे रात-रात भर जाग कर इन याज्ञिकों की सेवा में लगे रहते थे। उनके अतिथि सत्कार की तल्लीनता का एक प्रत्यक्ष उदाहरण यह है कि उनमें से कुछ ने तो यह भी नहीं देखा कि यज्ञ कैसे हो रहा है। भाई विश्वकर्मा तो, जो यहाँ के कैम्प इंचार्ज थे, आगंतुकों की सेवा करने में ही यज्ञ का सारा पुण्य समझकर उसी दिन आये जब कि पूर्णाहुति थी। भाई शम्भूसिंह ने अपने जिम्मे केवल यही काम लिया था कि प्रत्येक नगर में घूम-घूम कर वहाँ ठहरे हुये याज्ञिकों की दुख दर्द में सेवा करें। वे सुबह से रात के 11 बजे तक कैम्पों का चक्कर ही लगाते रहते थे। इस पारस्परिक सद्व्यवहार ही आने वाले दर्शकों तथा स्थानीय नागरिकों के मन पर भी गहरी छाप पड़ी और वे अनुभव करने लगे कि हमें भी बाहर से आने वाली जनता को जनार्दन का रूप समझ कर उनका सत्कार करना चाहिये। यही भगवान की सच्ची पूजा है।


मथुरा में भी सत्य की विजय हुई।

(श्री घनश्याम दासजी, इकौना)

सत्य पर चलना तलवार की धार पर चलने के समान है। कदम-कदम पर विपत्तियों के पहाड़ मार्ग रोके रहते हैं, न जाने कितनी विकट समस्याएं हतोत्साह करने को उत्पन्न हो जाती हैं, न जाने कितने प्रकार की आलोचनाएँ, निन्दा की बौछारें, कितने हृदय विदारक कठोर शब्द छाती पर पत्थर रख कर सहन करने पड़ते हैं। कार्य कुशल, कर्तव्य परायण व्यक्ति भी ऐसी विरोध की, विघ्न-बाधाओं की आँधी से घबरा जाते हैं और अनेक बार पथ से विचलित हो जाते हैं । राजा हरिश्चन्द्र भगवान राम, योगिराज कृष्ण, भगवान बुद्ध महर्षि दयानन्द, महात्मा गाँधी आदि महापुरुषों की जीवनियाँ इस बात की साक्षी हैं कि सत्यव्रती व्यक्तियों को सदैव महान विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पर साथ ही यह भी सच है कि इसी प्रकार के विघ्नों का सामना करने से ही लोग प्रशंसा और श्रद्धा के पात्र बनते हैं। जो जितने अधिक और बड़े विघ्नों, कष्टों को सहन करता है वह उतना ही बड़ा महापुरुष माना जाता है। इसी लिये कर्मयोगी व्यक्ति को समाज की सेवा करने, उसके दोषों को दूर करके उसे कल्याण मार्ग की ओर प्रेरित करने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगानी पड़ती है। यद्यपि कुछ समय तक संसार उनके सत्य सिद्धान्तों की हँसी उड़ता है, किन्तु कालान्तर में दुनिया के यही लोग उसके त्याग और तपस्या की प्रशंसा करके अपने को धन्य मानते हैं। किसी ने बिल्कुल ठीक कहा है—

है जमाना खराब अक्सर लोग कहा करते हैं। मर्द वह है जो जमाने को बदल देते हैं॥

ऐसे ही व्यक्ति युग-पुरुष और लोक-नायक माने जाते हैं। युग-युगों तक उनकी अमर कीर्ति हमको सद्प्रेरणा देती रहती है। मगर इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वयं तो कोई सत्कार्य कर नहीं सकते, और अन्य लोग जो सत्कार्य करते हैं उनमें भी द्रोह या भ्रमवश अड़ंगा लगाते रहते हैं । वे प्रायः यही विचार करते हैं कि अमुक व्यक्ति ने महान कार्य करके इतनी मान्यता, कीर्ति प्राप्त कर ली है, अब हम उससे पीछे रह जायेंगे, चलो उसकी खूब बदनामी करो। खेद की बात है कि यह दूषित भावना अन्य क्षेत्रों की भाँति धार्मिक क्षेत्र में भी बहुत अधिक घुसी हुई है। अनेक लोगों ने भगवान के नाम पर अंधेरखाता मचा रखा है और धर्म को अपने घर की जायदाद समझ लिया है। वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं कि भगवान सभी के हैं और सब को अपनी रुचि के अनुकूल या सुविधाजनक ढंग से उनकी उपासना भक्ति करने का अधिकार है।

इस मनोवृत्ति का एक निकृष्ट उदाहरण मुझे मथुरा महायज्ञ में देखने को मिला। कई लोग पूज्य आचार्यजी के त्याग और तपस्या की ओर दृष्टिपात न करके स्वयं उनकी निन्दा कर रहे थे और खर्च करके दूसरों से करा रहे थे। वे लोग जात-पाँत के दूषित रूप को कायम रखने के लिये, अपने कोरे नाम की जागीरदारी को सुरक्षित रखने के लिये बड़ी दौड़-धूप कर रहे थे। ऐसे कितने ही लोगों से मेरी बड़ी बहस हुई और मैंने उनकी बातों का जड़मूल से खण्डन कर दिया। पर जिनका ध्येय ही आलोचना करना तथा निन्दा करना हो गया है, जिनके हृदय में ईर्ष्या-द्वेष की अनिष्टकारी भावनाएँ चक्कर काटती रहती हैं वे भला सत्य बातों को कब सुन और मान सकते हैं। मेरे विचार में तो यदि ऐसे व्यक्ति गायत्री मंत्र की थोड़ी सी साधना करलें तो उनकी भावनायें स्वयमेव शुद्ध हो जा सकती हैं।

यह एक शाश्वत नियम है कि सत्कार्य के पूरा होने में भले ही देर लगे, पर यह किसी की मजाल नहीं कि उसका बाल भी बाँका कर सके। इस महायज्ञ में देश के कोने-कोने से आकर लोग शामिल हुये, विरोधियों के मनमाने आक्षेप करने पर भी भारत की जनता यज्ञ-भगवान के दर्शन करने को अकुला उठी, बड़े-बड़े विरोधियों के आसन भी हिल गये और उनके अन्दर श्रद्धा का अंकुर उग आया। न जाने कितने व्यक्ति तो हमारी माताओं और बहिनों के जल-यात्रा के जुलूस को देख कर ही विरोधी के बजाय समर्थक बन गये। उनकी अन्तरात्मा ने यह स्वीकार किया कि आज प्राचीन भारतीय स्त्रियों का जीता जागता साकार रूप हमारी आँखों के सामने मौजूद है। उस समय उनकी आत्मा से यही शब्द निकले कि क्या हम स्त्रियों से भी गये बीते हैं जो बजाय यज्ञ भगवान के दर्शन करने के उनके विरुद्ध गलत प्रचार कर रहे हैं।

बस आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहते हुये संगठन का बल और शक्ति बढ़ाते रहें। हमारे परिवार की जड़ें जमीन में मजबूती से जम चुकी हैं और कोई उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता।


महायज्ञ में जनता की सेवा-भावना

(ब्रह्मचारी योगेन्द्रनाथ)

यज्ञ का अर्थ है त्याग, उदारता। जहाँ नित्य कर्मकाण्ड में हवन को स्थान देकर हम प्राणीमात्र के लिये सेवा और परोपकार की भावनाओं को अपने में धारण करते हैं, वहाँ महायज्ञों में हम अकेले ही नहीं सामूहिक रूप से गुणों को अपनाने की प्रतिज्ञा करते हैं।

अभी दो सप्ताह पहले इन्हीं भावनाओं की बाढ़ जन-समाज में स्पष्ट दिखलाई पड़ रही थी। क्या बच्चे क्या बूढ़े, क्या स्त्री, क्या पुरुष, सभी यह अभिलाषा करते दिखाई देते थे कि महायज्ञ में हम भी कुछ सेवा कर सकें। महायज्ञ से कुछ दिन पूर्व जब हम यज्ञ-सम्बन्धी कुछ वस्तुएँ खरीदने बाजार में जाते थे तो दुकानदार लोगों के मुँह से अन्त में यह बात निकल ही पड़ती थी कि “ब्रह्मचारी जी, क्या यज्ञ में हमें भी सेवा करने का कुछ सुअवसर मिल सकता है? हम किस प्रकार की सेवा कर सकते हैं? इस प्रकार के प्रश्न करने वालों में बड़े-बड़े धनी मानी, सेठ साहूकार, डॉक्टर, वैद्य, पंडित सभी श्रेणी के लोग हुआ करते थे। हमारा एक ही होता था कि “महायज्ञ में सैंकड़ों लोगों के चौबीस घण्टा सहयोग की आवश्यकता है। आप जिस प्रकार चाहें और जो समय निकाल सकें उसी में सेवा कर सकते हैं। “

महायज्ञ से पूर्व नवरात्रि से ही गायत्री-परिवार के जो सदस्य आये थे वे भी प्रबंधकों की आज्ञानुसार धूप और सर्दी-गर्मी की परवाह न करते हुए पूर्ण उत्साह, लगन के साथ श्रमदान में लगे रहते थे। जिस समय वे फावड़ा, कुदाल कंधों पर रख कर “विश्व को बनावें स्वर्ग अपने से यही एक प्रार्थना हमारी भगवान से” का गायन करते हुये चलते थे उस समय एक बार मुर्दा, कायर हृदय भी धर्म-क्षेत्र में कूद पड़ने को तड़फ उठता था।

यही दशा स्वेच्छा सहयोग के सम्बन्ध में थी। लोग बड़ी ही भक्ति और श्रद्धा से अपनी शक्ति के अनुसार थोड़ी बहुत यज्ञ-सामग्री लाते थे और अत्यन्त आग्रह से उसे यज्ञ-भंडार में जमा कराते थे। वे बार बार अपनी वस्तुओं के विशुद्ध होने का विश्वास दिलाते थे और वास्तव में उनमें से कोई झूठ नहीं कह रहा था। आश्चर्य और साथ ही आनन्द का विषय है कि जहाँ लोगों को काफी खर्च करने पर भी विशुद्ध पदार्थ नहीं मिलते, महायज्ञ में लोगों की श्रद्धा भावना ने इस असंभव काम को भी संभव करके दिखला दिया।

आश्चर्य की बात है कि जहाँ दक्षिणा के लोभी हो हल्ला मचा कर इस पुनीत कार्य में बाधक बनने में संकोच नहीं करते थे, वहाँ ये सीधे साधे श्रद्धालु व्यक्ति सच्ची भावना से यज्ञ में किसी प्रकार की सेवा सहयोग करने को उत्सुक हो रहे थे। हमारी तो यही कामना है कि यह भावना राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति में समा जाय। आचार्य जी का संकल्प वास्तविक रूप से तभी पूरा होगा जब लोग यज्ञ के असली अर्थ को समझ जायेंगे। जब जन-जन के मन-मन में परमार्थ की, लेने की नहीं देने की भावना, सहयोग और अपरिग्रह की प्रवृत्ति उत्पन्न होगी तभी हमारा जीवन सुखी बन सकेगा। महायज्ञ का वास्तविक लक्ष्य मानवता का प्रसार, परोपकार की वृत्ति, सबको आत्मवत् समझना ही है। पूज्य आचार्य जी ने महा यज्ञों की जो योजना बनाई है उसके पीछे यही उद्देश्य है।


महायज्ञ के चार अनुपम बलिदान

गायत्री माता और यज्ञ पिता का-सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का सन्देश घर-घर पहुँचाने के लिये गायत्री-परिवार को अधिकाधिक त्याग, बलिदान करने को अग्रसर होना पड़े। कुछ आत्माओं को तो अपना अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित करना होगा। यज्ञ में बलिदान आवश्यक है। बलिदान के बिना यज्ञ पूर्ण नहीं होते। इस दृष्टि से इस महायज्ञ में चार बड़े बलिदान किये गये हैं।

जबकि अधिकाँश साधु-संत भक्ति की पूँजी जमा करने में लगे हैं; पण्डित-पुरोहित, दक्षिणा बटोरने में लगे हैं और उनका प्रधान कार्य धर्म-प्रचार एक प्रकार से रुका पड़ा है, बुड्ढ़े रिटायर्ड लोग नाती-पोतों का मोह छोड़कर घर से बाहर निकलना नहीं चाहते, ऐसी स्थिति में सच्चे गृहस्थों को ही अपने बच्चों के निर्वाह का जोखिम उठा कर भी उस धर्म-प्रचार के महान कार्य में लगना होगा। इस आवश्यकता का अनुभव गायत्री-परिवार की कुछ प्रबुद्ध आत्माओं ने किया है और उनमें से चार साधकों ने अग्रसर होकर भविष्य की सब प्रकार की कठिनाइयों का सामना करने का दुस्साहस ठान लिया है :-

1. श्री शम्भूसिंह जी

ये राजस्थान के कोटा जिले के करवाड़ ग्राम के निवासी इण्टर एस.टी.सी. हैं। रामगंज मंडी हाई स्कूल में सहायक अध्यापक रहकर पिछले सात वर्षों से गायत्री-प्रचार में संलग्न हैं। गत तीन वर्षों से राज्य कार्य से बचा, सभी समय माता गायत्री के प्रचार में लगाते हैं। पिछले महायज्ञ में ही ये अपने को इस कार्य के लिए अर्पण कर चुके थे। उस समय इनका आत्मदान स्वीकार करके 3 वर्ष की अवधि परीक्षार्थ दी थी। इन वर्षों में इन्होंने अपनी तनख्वाह में से परिवार के भोजन-वस्त्र का खर्च लेकर शेष गायत्री-प्रचार के कार्य में ही लगाया है। इनकी धर्म पत्नी लक्ष्मीदेवी ने भी एक पैसे का जेवर न बनवाने का संकल्प करके इन्हें इस मार्ग में बढ़ने का पूर्ण योग देकर प्राचीन क्षत्राणियों का प्रत्यक्ष उदाहरण किया है। इस वर्ष सहस्र कुँडी यज्ञ का कार्य आरम्भ होते ही उन्होंने संकल्प कर लिया था कि जो कुछ भी पहले का बचा जेवर व पैसा है उसे भी यज्ञार्थ व्यय करके पूर्णाहुति के अवसर पर सिवाय अपने शरीर और वस्त्रों के कुछ न रखेंगे। शम्भूसिंह अपने माता-पिता के एक मात्र पुत्र हैं और इनके इस प्रकार के त्याग से परिवार वालों को चिन्ता होना स्वाभाविक ही है। तो भी ये पिछले 6 महीने से छुट्टी लेकर राजस्थान और मध्य-प्रदेश के 14 जिलों में निरन्तर गर्मी वर्षा सहन करते हुये भ्रमण करते रहे हैं। नींद भोजन सबको गौण समझते हुए केवल माता गायत्री और यज्ञ पिता का सन्देश घर-घर पहुँचाना ही इन्होंने अपना एक मात्र ध्येय बना लिया है। इस प्रकार कार्य करते-करते जब इन्हें राज-सेवा का बन्धन असह्य जान पड़ने लगा तो हमने भी इनको सब बन्धनों से मुक्त होकर केवल धर्म प्रचार में लग जाने की अनुमति दे दी। ये अच्छे वक्ता, विचारक और लेखक हैं, जिससे हमारे लगभग सभी परिजन परिचित हैं। इनकी माता ने भी देश-धर्म के लिए अपनी संतान को प्रसन्नता पूर्वक सौंप कर माता सुमित्रा का सा उदाहरण उपस्थित किया है, जो अन्यों के लिये भी अनुकरणीय है। ये अभी 32 वर्ष के युवक ही हैं और भविष्य में गायत्री माता के कार्य की सफलता में इनसे बड़ी-2 आशायें हैं।

2. श्री बालकृष्ण जी

ये झाँसी (यू.पी.) के उच्च परिवार के 32 वर्षीय युवक हैं। इनके सम्पन्न और सम्मिलित कुटुम्ब में अनेक भाई-बहिनें, माता-पिता और अन्य सम्बन्धी जन हैं। आपकी धर्मपत्नी, दो पुत्र तथा तीन पुत्रियाँ हैं। आपके बड़े भाई ‘इंडस्ट्रियल कालेज’ (झाँसी) में उप-प्रधानाध्यापक हैं। ये स्वयं भी अभी तक सेंट्रल रेलवे में सीनियर ड्राँगटमैन के पद पर 250 रु. मासिक की नौकरी करते रहे हैं। आपकी रुचि आरम्भिक जीवन से ही समाज सेवा के कार्यों में रही है। देश की सुप्रसिद्ध व्यायाम संस्था “लक्ष्मी व्यायाम-मन्दिर” के संचालन तथा उन्नति के लिये 15-20 वर्ष से प्रयत्न करते आये हैं और कई वर्ष मन्त्री भी रहे हैं। संस्था के उत्थान के लिये संघर्ष करते हुए आप कारावास के लिए भी प्रस्तुत हो गये। गायत्री-मन्दिर की स्थापना के पूर्व ही आप बड़ी लगन व उत्साह से गायत्री-प्रचार व ‘अखण्ड-ज्योति’ के ग्राहक बनाने में लगे रहे। ज्यों-ज्यों आचार्य जी से संपर्क बढ़ता गया आपकी लगन व उत्साह में तीव्रता से वृद्धि होती रही। वर्तमान महायज्ञ के आरम्भिक दिनों से तो आपके हृदय की तड़पन इतनी बढ़ गई कि वह बिना आत्मदान दिये शाँत न हो सकी। इन्होंने अपने कुटुम्बियों की इच्छा के विरुद्ध भी वह साहस किया जो सामान्य भौतिक उन्नति की कामना रखने वालों के लिए असंभव है। इनकी धर्मपत्नी ने भी इस अवसर पर अपूर्व धर्म-प्रेम और सत्साहस का परिचय दिया। जहाँ अन्य कई स्त्रियों की आँखों में आँसू थे वे इनके कार्य की प्रशंसा करके अपने को धन्य मान रही थीं और अन्य बहिनों को भी साहस बंधा रही थी। पिछले वर्ष इन्होंने झाँसी और बुन्देलखण्ड के क्षेत्र में गायत्री-प्रचार का बड़ा भारी कार्य किया है और सहस्रों की संख्या में गायत्री-उपासक बनाये हैं। भयंकर ग्रीष्म की परवा न करके आपने कई सौ मील बाइसिकल द्वारा दौरा किया और अनेक नई शाखाओं की स्थापना कराई। गत कई महीने से नौकरी से छुट्टी लेकर तपोभूमि में रहकर यज्ञ की व्यवस्था में दिन-रात संलग्न रहे।

3. श्री चमनलाल जी

ये एक अच्छे धनी मानी पंजाबी परिवार के युवक हैं जिनकी आयु लगभग 30 वर्ष की है और अभी तक बरेली के रेलवे दंगतर में 175) रु. मासिक की नौकरी करते थे। पिछले दो वर्षों से इन दोनों पति-पत्नि का जीवन गायत्री तथा यज्ञ प्रचार में ही लगा रहा है। गायत्री-परिवार से इनका सम्बन्ध दिसम्बर 1954 में हुआ और जनवरी 1955 के अखण्ड-ज्योति के ‘गायत्री ज्ञान अंक’ की हजारों प्रतियाँ इन्होंने बरेली के घर-घर और दुकान-दुकान में पहुँचा कर उल्लेखनीय प्रचार कार्य किया। स्वयं भी ‘गायत्री से समाज-सुधार’ और ‘यज्ञ क्यों करना चाहिए?’ नाम की दो पुस्तकें छपा कर लोगों को वेद माता की उपासना के लिए प्रेरित किया। नित्य-प्रति दंगतर से घर लौटते ही भोजन करने के पश्चात ये और इनकी पत्नी प्रचार कार्य में लग जाते थे। इनका यह संकल्प था कि जब तक कम से कम एक नया गायत्री-उपासक न बना लेंगे तब तक सोयेंगे भी नहीं। इस प्रकार इनको कई बार रात-रात भर जागरण करना पड़ा है। इस प्रकार इन्होंने केवल बरेली शहर में 1300 गायत्री-परिवार के सदस्य बनाये और बीसियों स्थानों पर यज्ञ कराये। जब से महायज्ञ का आयोजन किया गया इन्होंने बरेली, बदायूँ, पीलीभीत, सीतापुर, लखीमपुर, हरदोई, मुरादाबाद, मेरठ, बुलन्दशहर, बिजनौर, लखनऊ, बाराबंकी, गोंडा, बहराइच, रामपुर, शाहजहाँपुर आदि उत्तर-प्रदेश के अनेक जिलों का दौरा करके नवीन शाखाओं की स्थापना कराई और एक उप-केन्द्रीय संगठन बनाया। ये निरन्तर घूमकर शाखाओं को दृढ़ बनाते रहे और इनके द्वारा यज्ञ कराके स्वयं ही उनका संचालन करते रहे। इनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुलोचना देवी मैट्रिक पास हैं और इस वर्ष ट्रेनिंग कालेज में अध्ययन कर रही हैं। ये अपने पति के कार्यों में जिस प्रकार पूर्ण रूप से सहयोग कर रही हैं उसे देखते हुए धर्मपत्नी कहलाने की पूर्ण रूप से अधिकारिणी हैं। गत 6 महीने से ये अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर तपोभूमि के दंगतर के काम को संभाल रहे थे।

4. श्री गिरिजासहाय जी

ये बानपुर (जिला झाँसी) के निवासी हैं और एक पाँच भाइयों के संपन्न परिवार में सबसे छोटे भाई हैं। इनकी आयु इस समय 31 वर्ष की होगी। इनके धर्मपत्नी,3 पुत्र और एक पुत्री है। सेंट्रल रेलवे में एक अच्छी जगह पर गत 12 वर्ष से कार्य कर रहे हैं। आपका प्रारम्भिक जीवन तो बड़ा सात्विक था पर नौकरी में आते ही बड़ा भोग-लिप्सा का और तामसिक प्रवृत्तियों से युक्त हो गया। पर गत 3 वर्ष से, जब से आचार्य जी के संपर्क में आये हैं और गायत्री परिवार के सदस्य बने हैं तब से साधुओं का सा त्यागमय जीवन व्यतीत करने लगे हैं और निरन्तर दिन-रात एक करके गायत्री-प्रचार में लगे रहते हैं। जब कभी इनको देखा गया इसी कार्य में संलग्न पाया। झाँसी में झोला टाँगे सदैव परिवार के कार्यों से घूमते ही दिखलाई पड़ते थे। जहाँ कहीं यज्ञ का समाचार पाया दौड़कर वहाँ पहुँचे और उसके संचालन में सब तरह का योग दिया। छुट्टियों के दिनों में तो सदैव कहीं न कहीं बाहर जाकर यज्ञ कराते रहे और शाखाओं की स्थापना करते रहे। झाँसी नगर के गायत्री-परिवार को संगठित करने और उसे व्यवस्थित रूप से संचालित करने में आपने बड़ा परिश्रम किया है। आप श्री बालकृष्ण जी के अन्यतम सहयोगी हैं और गत ग्रीष्म ऋतु में आपने उनको साथ लेकर बाइसिकलों पर 500 मील का दौरा किया था। इसमें दतिया, झाँसी, टीकम-गढ़, छतरपुर, हमीरपुर, बाँदा, कानपुर एवं इटावा तक जाकर आपने गायत्री और महायज्ञ का संदेश सुनाया जिसका परिणाम महायज्ञ के अवसर पर प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ रहा था। गत 6-7 मास से आप अपनी नौकरी की परवाह न करते हुये लगातार तपोभूमि में रहकर विविध यज्ञ सम्बन्धी पर लेन−देन की बहुत बड़ी जिम्मेदारी के कार्य को रात-दिन परिश्रम करके इस प्रकार संभाला कि कहीं कोई गड़बड़ी न हो सकी। आपकी धर्मपत्नी तथा बच्चे भी इनकी इच्छानुसार चलकर धर्म-कार्य में सहयोग देने वाले हैं।

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इन चार आत्म-दानियों के तप और त्याग को देखते हुए ही हमने इनको अपनी वर्तमान नौकरियों को छोड़कर समस्त जीवन गायत्री और यज्ञ के कार्य में लगाने की अनुमति दी है। ये लोग जीवन भर दान व चन्दा के पैसे को अपने लिए काम में न लायेंगे, वरन् अपने निज के परिश्रम और उद्योग से अपनी आजीविका उपार्जन करते हुए धर्म-प्रचार का कार्य करेंगे। चारों यद्यपि विभिन्न स्थानों में और विभिन्न परिवारों में पैदा हुए हैं, पर अब इन्होंने सहोदर भाइयों के समान आध्यात्मिक समाज बाद के आधार पर अपना एक कुटुम्ब बना लिया है। चारों के पास जेवर, मकान, नकदी या पैतृक सम्पत्ति के रूप में कुल मिलाकर लगभग 20 हजार की सम्पत्ति होगी। इसे इकट्ठी करके ये प्रेस, प्रकाशन गोपालन आदि कोई उद्योग आरम्भ करेंगे। इन चारों में से क्रमशः एक-एक व्यक्ति एक साल तक उस उद्योग की देखभाल करके सब परिवारों के निर्वाह की व्यवस्था करेगा और शेष तीन गायत्री-प्रचार के कार्य में पूर्ण निःस्वार्थ भाव से लगे रहेंगे। इस प्रकार व्यक्तिगत स्वार्थ और संग्रह वृत्ति को त्यागकर अपनी अच्छी आर्थिक सुविधाओं के आधार पर बने हुए सुख साधनों को छोड़कर ये उस धर्म को करेंगे जिससे साधु, संन्यासी, बाबाजी, पंडित, पुरोहित आदि विमुख हो गए हैं।

ऐसे अनुपम उदाहरण सब प्रकार स्तुत्य हैं। जिन घरों में कई व्यक्ति हैं वे यदि अपने परिवार में से एक-एक काम का व्यक्ति दे दें तो युग निर्माण की साँस्कृतिक पुनरुत्थान की महान् आवश्यकता की बहुत अंशों में पूर्ति हो सकती है। जिन नर- नारियों के ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं हैं, जिनके मन में धर्म सेवा की लगन है उनके लिए तो इस आत्मदान का अनुकरण करना ही उचित है।

महायज्ञ में हुए यह चार बलिदान चार प्रकाश स्तम्भों की तरह प्रज्ज्वलित होकर सारे राष्ट्र में सद्-विचार पूर्ण सन्देश पहुँचावेंगे ऐसा विश्वास है। बलिदान की-आत्मदान की-जो पुनीत परम्परा इन चारों ने आरम्भ की है वह इन तक ही सीमित न होगी वरन् सहस्रों नर-नारी इनका अनुकरण करेंगे यह निकट भविष्य में ही स्पष्ट हो जायगा। युग निर्माण के लिए निश्चय ही ऐसे सहस्रों आत्मदानी शिल्पियों की आवश्यकता है यह आवश्यकता माता पूरी करेगी।

हर शाखा अपने यहाँ यज्ञ का

आयोजन करें

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में भाग लेने वाले 1 लाख व्रत धारियों में से मथुरा थोड़े से ही आये थे। शेष की साधना की पूर्णाहुति के लिए उनके क्षेत्रों में ही सामूहिक गायत्री यज्ञों की व्यवस्था होनी चाहिए। मथुरा से जाने के बाद प्रत्येक शाखा के संचालकों को अपने क्षेत्र में एक गायत्री यज्ञ का आयोजन करने में लगना है। उसका संकल्प प्रत्येक शाखा को यहाँ पूर्णाहुति के समय ही करके जाना चाहिए।

बहुत बड़े यज्ञों की व्यवस्था में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ आती हैं। आज का युग असुरता प्रधान है। ईर्ष्या, द्वेष, जलन, अहंकार, आक्रमण की दुर्भावनाओं से भरे हुए लोगों के मन अनायास ही किसी को अच्छा काम करते देखकर जल भुनकर खाक हो जाते है और उसमें तरह-तरह के अड़ंगे लगाते हैं। धर्म व्यवसायी लोग तो इसे अपनी आजीविका का खतरा समझते हैं। पूजा पाठ, जप हवन, दूसरे लोगों को भी करते देखकर उन्हें अपना एकाधिकार नष्ट होता प्रतीत होता है। ऐसे लोग असत्य, भ्रम, पाखण्ड का आधार लेकर इन सत्कार्यों में सहयोग देने वाले लोगों के मनों में बुद्धि-भ्रम ही नहीं पैदा करते पर आक्रमणात्मक कार्य भी करते हैं। जिन्हें प्रचुर दक्षिणा एवं मलाई मिठाई न मिले वे ही दुश्मन बन जाते हैं।

यह कठिनाई महायज्ञ तक ही सीमित नहीं हर शाखा के सामने उपस्थित रहेगी। बहुत आयोजनों की आवश्यकताएं भी बहुत बड़ी होती हैं और उनमें विघ्न भी बहुत आते हैं इसलिये प्रत्येक शाखा छोटे-छोटे यज्ञ आयोजन करे। पाँच या नौ कुण्डों के सामूहिक यज्ञों की व्यवस्था आसानी से हो सकती है। जिस प्रकार मथुरा यज्ञ के लिए एक निश्चित जप उपवास संख्या बनाई गई है, वैसे ही प्रत्येक शाखा 24 लक्ष या सवा करोड़ सामूहिक जप का संकल्प करे। उपासक अधिकाधिक बनाये जाएं जप पाठ या लेखन में जिसे जो प्रिय हो वह उसी उपासना को करे। नियत अवधि में जब साधना पूरी हो जाय तो उन उपासकों या उनके परिवार वालों के द्वारा ही हवन कार्य सम्पन्न किया जाय। 24 लक्ष जप के लिए 24 हजार आहुतियों का और सवा करोड़ साधना के लिए सवा लाख आहुतियों के हवन पर्याप्त है। 24 हजार आहुतियों के लिए 5 कुण्डों का, सवा लाख आहुतियों के लिए 9 कुण्डों का यज्ञ पर्याप्त है। तीन दिन का कार्यक्रम रखा जाय नित्य-प्रातः हवन तथा तीसरे पहर एवं रात के प्रवचनों की व्यवस्था रहे। पूर्णाहुति में नारियल, सुपाड़ी अन्य धर्मप्रेमी भी चढ़ा सकें।

इन यज्ञ आयोजनों की व्यवस्था तथा अन्य आवश्यक बातों के सम्बन्ध में मार्ग दर्शन करने के लिए अगले मास की गायत्री-परिवार-पत्रिका में एक विस्तृत लेख छाप दिया जाएगा।

जिस प्रकार तीर्थ यात्रा से घर लौटने पर ब्राह्मण भोजन करा देने पर वह तीर्थ यात्रा पुण्य मानी जाती है, उसी प्रकार मथुरा महायज्ञ में आने वाले याज्ञिकों का पुण्य तभी पूर्ण माना जायगा जब वे अपने यहाँ जाकर एक सामूहिक यज्ञ की व्यवस्था करें। इस आयोजन का संकल्प हर याज्ञिक को मथुरा महायज्ञ में ही कर लेना चाहिए।


गायत्री परिवार


गायत्री परिवार (Kavita)

किन शब्दों में सुयश बखानूँ गायत्री परिवार का!

यहाँ नहीं भी किसी तरह के भेद भाव का नाम है।

माँ की छाया में क्या बोलो ऊँच-नीच का काम है॥

वातावरण यहाँ पर फैला माँ के अनुपम प्यार का।

किन शब्दों में सुयश बखानूँ गायत्री परिवार का॥

सीधा-सादा जीवन का क्रम आडंबर की बात क्या।

द्वेष-दम्भ छल आये ऐसी उनकी भला विसात क्या॥

अपना हित ही नहीं चाहिये हम को हित संसार का।

किन शब्दों में सुयश बखानूँ गायत्री परिवार का॥

मूल मंत्र सहयोग हमारा सदाचार ही धर्म है।

प्रभु की प्राप्ति प्रेम के द्वारा यही हमारा मर्म है॥

लक्ष्य बनाया हमने पीड़ित जन-जन के उद्धार का।

किन शब्दों में सुयश बखानूँ गायत्री परिवार का॥

आत्म शान्ति ही विश्वशान्ति की नींव और सोपान है।

दोनों में ही मनुज-जगत का संभव चिर कल्याण है॥

दया शान्ति का द्वार लगाया नारा इसी प्रकार का।

किन शब्दों में सुयश बखानूँ गायत्री परिवार का॥

महायज्ञ की आज कर रहा तैयारी परिवार है।

होता बनकर आहुति देने को जन-जन तैयार है॥

ऐसा कौन न मान करेगा जो इस दिव्य पुकार का।

किन शब्दों में सुयश बखानूँ गायत्री परिवार का॥

*समाप्त*

(श्रीमती विद्यावती मिश्र)