आरंग (रायपुर) में बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, बस्तर, रायगढ़, कालाहंडी जिलों की समस्त शाखाओं ने मिलकर छत्तीसगढ़ प्रदेश की प्राँतीय शाखा का निर्माण किया और ता. 1 जनवरी से 5 जनवरी तक अपने ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति 25 हवन कुण्डों के यज्ञ में की। श्री गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य जी की अध्यक्षता में 2 लाख 55 हजार आहुतियों का महायज्ञ बड़े समारोह से सम्पन्न किया गया। प्रथम दिन श्री गुरुदेव ने यज्ञशाला का उद्घाटन कर अनेक उपासकों का यज्ञोपवीत संस्कार कराया। दूसरे दिन यज्ञ के साथ शाखा सम्मेलन, महिला सम्मेलन, साँस्कृतिक सम्मेलन एवं प्रीतिभोज हुए। श्री गुरुदेव का कस्बे में जुलूस निकाला गया, जहाँ गायत्री सदस्यों ने उनका धूमधाम से स्वागत किया। यज्ञ के अवसर पर स्वामी प्रेमानन्दजी के प्रवचन बराबर होते रहे। पूर्णाहुति के दिन महायज्ञ के संयोजक श्री विद्याप्रसाद मिश्र ने आगामी छः मास में अपने प्राँत में 108 शाखा बना लेने और मथुरा के महायज्ञ में अपना अलग “छत्तीसगढ़ प्राँतीय नगर” बसाने का संकल्प किया है।
गुदनवारा (टीकमगढ़) में दिगौड़ा गायत्री शाखा के मन्त्री श्री बैजनाथप्रसाद सोनकिया एवं बहादुर सिंह क्षत्री पधारे और एक सार्वजनिक सभा की और शाखा की स्थापना की। इसके मन्त्री श्री दोधा सिंह जी बनाये गये। -गुलाबसिंह सोलंकी ढ़ेलवा लबा डोंगरी (पो. झलप जि. रायपुर) में ता. 31 जनवरी से 4 फरवरी तक 21 हवन कुण्डों में सीतेश्वरी गायत्री यज्ञ का आयोजन किया गया है।
-श्री भीष्मपितामह ब्रह्मचारी व
श्री ताराचन्द्र गायत्री प्रचारक।
मंसूरपुर मिल (मुसफरनगर) गायत्री शाखा की तरफ से घासीपुरा में श्री खचेड़ूसिंह चौधरी के यहाँ सवा लाख जप व 12॥ हजार आहुतियों का यज्ञ किया गया। ता. 6 फरवरी को घासीपुरे में ही काले सिंह के यहाँ सवा लाख जप व 15 हजार आहुतियों का यज्ञ होने वाला है।
-बनारसीदत्त शर्मा
अमृता खास (पीलीभीत) में 12 जनवरी को जिले के समस्त गायत्री परिवारों की मीटिंग हुई जिसमें जिले की कार्य कारिणी कमेटी का चुनाव किया गया। श्री गणेश प्रसाद सभापति, श्री केशवदत्त उप सभा., श्री लक्ष्मणसिंह मनराल मन्त्री, श्री सोहन लाल ‘सेवक’ उप मन्त्री, श्री पंच्चमलाल प्रचार मन्त्री और श्री ईश्वरी प्रसाद हितैषी कोषाध्यक्ष चुने गये। जिले में जोर-शोर से मथुरा के महायज्ञ का प्रचार करने की व्यवस्था की गई है।
-मन्त्री, गायत्री परिवार
विलासपुर (म. प्र.) में मकर संक्रांति पर 1500 आहुतियों का हवन मन्त्री श्री महाजनजी के यहाँ हुआ। प्रसाद व हवन में तिल का विशेष भाग रहा जो कि इस पर्व पर महात्म्य की वस्तु माना जाता है।
-शाखा मन्त्री
भैरोंपुर (होशंगाबाद) में रामीबाई पालीवाल ने गायत्री चालीसा के 2592 पाठ किये और इतनी ही आहुतियों का हवन कराया गया। भगवती देवी ने 24 हजार गायत्री जप का लघु अनुष्ठान किया व हवन कराया। 2400 मन्त्र लेखन भी किया।
-भोजराज शर्मा पालीवाल
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प्रो. “अवधूत” (गूढ़ कन्त्र विद्या विशारद)
अभी कुछ महीनों की साधना उपासना के लिए गोरेगाँव (बम्बई) से श्री आचार्य जी के पास तपोभूमि मथुरा में आ गये हैं। इसलिए जो सज्जन उनसे पत्र व्यवहार करे वे अब “गायत्री तपोभूमि, मथुरा” के पतेदार पत्र भेजें।
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वर्ष-19 संपादक- श्रीराम शर्मा, आचार्य अंक-2
(श्री. श्रीकान्त शास्त्री)
मानव उठ जीवन ज्योति जगा।
तू सत्यं शिवं सुन्दरं है, तू है अविनाशी अजर अमर।
तू अविचल, अलख निरंजन है, अमृतमय है तेरा निर्झर॥
फिर आज भटक किस ओर पड़ा, सुध भूल गया कैसे अपनी।
सुनसान, मलीन, अंधेरा-सा, क्यों पड़ा हुआ है तेरा घर॥
अज्ञानमयी दुर्बुद्धि भगा। मानव उठ जीवन-ज्योति जगा॥
चल जगती तल पर सोच समझ, मैला मत कर लेना अंचल।
पग थाह-थाह कर चलना रे, इस मग में है आगे दल-दल॥
असि की धारा पर चलना है, मत इधर उधर को दृष्टि उठा।
अपनी पीड़ा को पी जाना, वह जाय न नयनों में से जल॥
पहचान बिराना और सगा। मानव उठ जीवन ज्योति जगा॥
इस चोर ठगों की नगरी में, मत गाँठ कटा जाना प्यारे।
ऐसे कागज के किले न रच, जो फूँक लगें विनशे सारे॥
‘बड़े भाग मानुष तन पाया’ फिर भी सूझ रही शैतानी।
संभल, गिरा जाता है मूरख, जीती बाजी को मत हारे॥
खेकर यह नौका पार लगा। मानव उठ जीवन ज्योति जगा॥
(स्वामी शिवानन्द सरस्वती)
हजारों मन सिद्धान्तों के ज्ञान से एक छटाँक भर साधनों का आचरण अधिक लाभप्रद है। इसलिये अपने दैनिक जीवन में योग, धर्म एवं दर्शन शास्त्रों में बताए हुए साधनों का अभ्यास कीजिए, जिससे मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य-’आत्मसाक्षात्कार’ की शीघ्र प्राप्ति हो।
इस साधनपट में उपरोक्त साधनों का तत्व एवं सनातन धर्म का विशुद्ध रूप 32 शिक्षाओं द्वारा दिया गया है। उनका अभ्यास वर्तमान काल के अत्यन्त कार्यव्यस्त स्त्री-पुरुषों के लिए भी सुशक्य है। उनके समय और परिमाण में यथानुकूल परिवर्तन कर लीजिये और उनकी मात्रा धीरे धीरे बढ़ाते जाइये। आप अपने चरित्र या स्वभाव में एकाएक परिवर्तन नहीं कर सकेंगे। इसलिए आरम्भ में इनमें थोड़ी ऐसी शिक्षाओं के आचरण का संकल्प कीजिये, जिनसे आपके वर्तमान स्वभाव और चरित्र में थोड़ा निश्चित सुधार हो। क्रमशः इन साधनों का समय और परिणाम बढ़ाते जाइये। यदि किसी दिन बीमारी, साँसारिक कामों की अधिकता या किसी अनिवार्य कारणों से आप निश्चित साधनों को न कर सकें तो उनके बदले पूरे समय या यथासम्भव ईश्वर नाम स्मरण या जप कीजिये, जो चलते-फिरते या अपने साँसारिक कर्म करते हुए भी किया जा सकता है।
आरोग्य साधना
(1) आधा पेट खाइये, हलका और सादा भोजन कीजिये। भोजन में शाक, फल, दूध, दही, अनाज, कन्द, मूल, मेवा आदि सब तत्वों का उचित परिमाण होना चाहिए। भगवान को अर्पण करने के बाद भोजन कीजिये। (2) मिर्च, मसाले, इमली राजसिक पदार्थों का सेवन कम या वर्जित कीजिये। चाय, काफी, लहसुन, प्याज, तम्बाकू, भंग, सिगरेट, पान, माँस, मछली, मदिरा आदि तामसी वस्तुओं का सर्वथा त्याग कीजिये। (3) एकादशी के दिन उपवास कीजिए या केवल दूध, कन्द और थोड़ा फल खाइये। इस दिन अन्न वर्जित है। (4) आसन व्यायाम-योग आसन या शारीरिक व्यायाम प्रतिदिन 15 से 30 मिनट तक कीजिये।
प्राणशक्ति साधना
(5) प्रतिदिन दो घंटा मौन रहिये और उस समय को आत्म विचार, ध्यान, ब्रह्मचिंतन या जप में लगाइये। इस समय टहलना या पढ़ना नहीं चाहिये। रविवार या छुट्टी के दिन मौन का समय चार से आठ घंटे तक बढ़ाइये। (6) अपनी उम्र, परिस्थिति, शक्ति तथा आश्रम के अनुसार ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करिये। शुरू के महीने में एक बार से अधिक ब्रह्मचर्य भंग न करने का संकल्प करिये। धीरे-धीरे उसे घटाकर वर्ष में एक बार तक ले आइये। अन्त में जीवन भर के लिए ब्रह्मचर्य पालन की प्रतिज्ञा करिये।
चरित्र साधना
(7) मन, वचन और कर्म से भी किसी को कष्ट न पहुँचाइये। प्राणीमात्र पर दया भाव रखिये। (8) सत्य, प्रिय, मधुर, हितकर और अल्प भाषण कीजिए। आपके वचनों से किसी को उद्वेग न होना चाहिए। (9) सब लोगों से सरलता, निष्कपटता और खुले दिल से बर्ताव और बातचीत करिये। (10) ईमानदार बनिए। अपने परिश्रम (पसीने) से कमाई कीजिये। अन्याय या अधर्म से मिलने वाला किसी का धन, वस्तु या उपकार मत स्वीकारिये। सज्जनता और चरित्र का विकास करिये। (11) जब आपको क्रोध आ जाय, तब उसे क्षमा, धैर्य शान्ति, दया, प्रेम और सहिष्णुता द्वारा दबा दीजिये। दूसरों का कसूर भूल जाइये और उन्हें क्षमा कर दीजिए। लोगों के स्वभाव और संयोगों के अनुसार बर्ताव कीजिये।
इच्छाशक्ति साधना
(12) मन संयम प्रतिवर्ष एक हफ्ता या एक महीने तक शक्कर या चीनी का और रविवार को नमक का त्याग कीजिए। (13) ताश, नोबेल, सिनेमा और क्लबों का सर्वथा या यथासम्भव त्याग कीजिये। दुर्जनों की संगति से दूर भागिये। नास्तिक या जड़वादी से वाद-विवाद न कीजिये। ईश्वर में जिसकी श्रद्धा न हो या जा आपके साधनों की निन्दा करते हों, ऐसे लोगों से मिलना-जुलना बन्द कर दीजिए। (14) अपनी आवश्यकताओं को कम कर दीजिये। आपके पास जो साँसारिक वस्तु या सम्पत्ति हो, उन्हें भी क्रमशः घटाते जाइये। सादा जीवन और उच्च विचारों का अवलम्बन कीजिए।
हृदय साधना
(15) दूसरों की कुछ भलाई करना यही परम धर्म है। प्रति सप्ताह कुछ घंटे कोई निष्काम सेवा का कार्य करिये, जैसे दरिद्र या रोगी की मदद, मित्रों या सज्जनों में धर्म प्रचार, सामाजिक सेवा, इत्यादि। (16) अपनी आमदनी का दशाँश या कम से कम दो पैसा प्रतिमास दान करिये। आपको कोई भी अच्छी वस्तु मिले, उसको सब स्वजन, मित्र, नौकर आदि में बांटकर उपभोग करिये। सारे संसार के प्राणियों को अपने कुटुम्बी मानिए। (17) विनम्र बनिए। सब प्राणियों को मानसिक नमस्कार करिये। सर्वत्र ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव करिये। मिथ्याभिमान, दम्भ और गर्व का त्याग करिये। (18) गीता, गुरु और गोविन्द (ईश्वर) में अविचल श्रद्धा रखिये। सर्वदा ईश्वर को आत्म समर्पण करते हुए प्रार्थना करिये “हे प्रभो, यह सब कुछ तेरा है, मैं भी तेरा हूँ, जैसी तेरी इच्छा, वैसा ही हो, मैं कुछ नहीं चाहता।” (19) सब प्राणियों में ईश्वर के दर्शन करिए, उनमें अपनी आत्मा के समान प्रेमभाव रखिए। किसी से द्वेष न करिए। (20) नाम स्मरण सर्वदा ईश्वर नाम स्मरण करते रहिए या कम से कम प्रातः काल उठकर, व्यावहारिक कार्यों के बीच में अवकाश मिलने पर और रात में सोने से पूर्व, ईश्वर नाम का स्मरण करिये। एक जपमाला अपनी जेब में या तकिये के नीचे सर्वदा रखिये। जब मौका मिले, तब करते रहिए।
मानसिक साधना
(21) गीता ध्यान- प्रतिदिन गीता का एक अध्याय या 10 से 15 तक श्लोकों का अर्थ सहित अध्ययन करिये। (22) गीता कण्ठस्थ करना- धीरे-धीरे सारी गीता को कंठस्थ कर लीजिये। (23) रामायण, भागवत्, उपनिषद्, योगवशिष्ठ या अन्य दर्शनशास्त्र या धर्मग्रन्थों का कुछ अंश प्रतिदिन अथवा छुट्टी के दिन अवश्य अध्ययन करिए। (24) कथा, कीर्तन, सत्संग, सन्त समागम या धार्मिक व्याख्यान, सभा आदि में प्रत्येक अवसर पर जाकर उससे लाभ उठाइए। रविवार की छुट्टी के दिन ऐसे सम्मेलनों का आयोजन करिए। (25) किसी भी देव मन्दिर या पूजा स्थान में प्रति सप्ताह कम से कम एक दिन जाकर जप-कीर्तन आदि का अनुष्ठान करिए। (23) अवकाश या छुट्टी के दिनों में किसी पवित्र पुण्य स्थान में जाकर एकान्त सेवन करिए और सारा समय साधना व स्वाध्याय में बिताइए। गुरु या कोई सन्त महात्मा के सत्संग में रह कर साधना करिए।
आध्यात्मिक साधना
(27) रात में जल्दी सोकर प्रातःकाल चार बजे उठिए। शौच, दन्तधावन, स्नान आदि से आध घंटे में निवृत्त हो जाइए। (28) पद्मासन या सिद्धासन या सुखासन पर बैठकर 4॥ बजे से 6 बजे तब प्राणायाम, ध्यान, जप, स्तोत्र, प्रार्थना और कीर्तन करिए। एक ही आसन में सारा समय बैठने का धीरे-धीरे अभ्यास करिये। (29) उसके बाद अपनी दैनिक संध्या, गायत्री जप, नित्य कर्म और पूजा करिए। (30) अपने इष्ट मन्त्र या ईश्वर के नाम को 10 से 20 मिनट तक एक पुस्तिका में लिखिए (31) रात्रि में स्वजन, मित्र आदि के साथ बैठ के आधे से एक घंटा तक नाम संकीर्तन, स्त्रोत, प्रार्थना, भजन इत्यादि का गायन करिये। (32) उपरोक्त प्रकार की कुछ साधना करने का निश्चय, व्रत या संकल्प कीजिए और प्रतिवर्ष नया संकल्प करके साधना को बढ़ाते जाइये। नियमितता, दृढ़ता एवं तत्परता से इनका पालन करना आवश्यक है। साधना का समय, परिमाण आदि प्रतिदिन आध्यात्मिक डायरी में लिखिए। प्रतिमास उसकी समालोचना करके अपनी त्रुटियों को सुधारते रहिए।
(‘एक ब्रह्मवादी सन्त’)
यह तो सभी लोग जानते हैं कि मनुष्य के भीतर अनेक प्रकार की गुप्त शक्तियाँ हैं जिनको विशेष साधनों द्वारा विकसित किया जा सकता है। इनमें से जिस साधन द्वारा आत्मिक शक्तियाँ प्राप्त की जा सकती हैं उसका नाम हमारे देश में योगाभ्यास है। पर योग के असली अभिप्राय को आजकल के लोग प्रायः भूल गए हैं और वे शारीरिक, मानसिक, चमत्कार दिखाने वालों को ही योगी समझ लेते हैं। पर वे तो साधारण तमाशे की सी बातें हैं जिन्हें अनेक जादूगर और तन्त्र-मन्त्र वाले भी भली प्रकार दिखला सकते हैं। योग का दर्जा इनसे कही ऊंचा है।
योग का सार तत्व भगवान ने गीता में दिया है। यद्यपि हिन्दू धर्म के अनुयायी ‘योग’ से एक विशेष शास्त्र या दर्शन का ही अभिप्राय लेते हैं, पर वास्तव में वह इस महान शास्त्र का केवल एक भाग है। गीता में योग शास्त्र का वर्णन किया गया है और इसके भिन्न-भिन्न विभागों का परस्पर में सम्बन्ध भी दिखलाया गया है। इस प्रकार गीता के योगशास्त्र के अंतर्गत अठारह प्रकार के विशेष योगों का वर्णन है, जो क्रमशः गीता के अठारह अध्यायों में बतलाये गए हैं। इनके अतिरिक्त और भी अनेक प्रकार के योग हो सकते हैं। साधारणतः हम समझते हैं कि भिन्न-भिन्न प्रकार के योगों में कोई मेल नहीं है। पर गीता में दिखलाया गया है कि वास्तव में उनमें कोई अन्तर नहीं है। चाहे किसी भी रास्ते से मनुष्य चले वह अन्त में एक ही नतीजे पर पहुँचेगा।
इस प्रकार ‘साँख्य’ और ‘योग’ इन दो योगों का मिलान करते समय भगवान कहते हैं :-
साँख्ययोगी पृथग्वालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुयोर्विदन्त फलम्॥ यत्साँख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं साँख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥
(गीता अध्याय 5 श्लोक 4-5)
अर्थात् “साँख्य और योग को बालक पृथक-पृथक समझते हैं, पण्डित लोग नहीं। जो समुचित भाव से एक में स्थित रहता है, वह दोनों के फलों को प्राप्त करता है। साँख्य द्वारा जो स्थान प्राप्त होता है, योग द्वारा भी वही प्राप्त किया जा सकता है।”
जो बात यहाँ साँख्य और योग के विषय में कही गई हैं, वही अन्य प्रकार के योगों के सम्बन्ध में कही जा सकती है। यही कारण है कि चाहे जिस किसी योग के मार्ग से विचार कीजिए, भगवान हमेशा अर्जुन का युद्ध में भाग लेना परम कर्तव्य है। पातंजलि योगसूत्र में योग का लक्षण “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” बतलाया है, पर गीता में यही कहा गया है :-
योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनन्जय। सिद्धयसिद्ध् योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
(अ. 2, श्लोक 48)
अर्थात् “हे धनंजय! योगस्थ होकर “संग” (कामना) का त्याग करो और सिद्धि तथा असिद्धि में समता भाव रखकर कर्म करो, समता को ही योग कहते हैं।”
इस प्रकार समता की भावना अथवा योग स्थापित कर लेने पर विश्व की सारी शक्तियाँ मनुष्य के अधिकार में आ जाती हैं। अपने आपको जानना ही समस्त विश्व की जानने की कुँजी है। इस प्रकार आत्मज्ञान का अनुभव प्राप्त कर लेने से जीवन सम्बन्धी सभी नियम मनुष्य को साक्षात दिखलाई पड़ने लगते हैं। उसकी शक्तियाँ भी उसी परिमाण से बेहद बढ़ जाती हैं।
योग की रीतियों और साधारण वैज्ञानिक प्रक्रियाओं में प्रधान अन्तर यही मिलता है। वास्तव में योग विज्ञान के ही अवलम्ब पर है। धर्म और विज्ञान दोनों एक है। अंतर दोनों में केवल इतना ही है कि वर्तमान विज्ञान का सम्बन्ध स्थूल जगत की ही वस्तुओं अथवा नियमों से हैं, और धर्म का सम्बन्ध स्थूल और सूक्ष्म, दृश्य और अदृश्य विश्व के सभी पदार्थों और नियमों से है। अन्यथा धार्मिक नियमों की जाँच भी उसी प्रकार की जा सकती है जिस प्रकार वैज्ञानिक नियमों की जाँच की जाती है। इन दोनों में इतना अन्तर अवश्य है कि वैज्ञानिक प्रयोगों में बाहरी यंत्रों और अन्य सामग्रियों द्वारा जाँच की जाती है, पर यौगिक प्रक्रियाओं से मनुष्य के भीतर स्थित अत्यन्त पेचीदा यन्त्रों का ही उपयोग किया जाता है। मनुष्य के शरीर और मन की बनावट ऐसी विचित्र और दुरूह है कि उसमें स्थूल से लेकर सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्वों के सार भरे हैं। उनके विकास से मनुष्य इस लोक की कौन बात, आकाश में अति दूर स्थित अन्य लोकों में भी भ्रमण कर सकता है और उनका अनुभव प्राप्त कर सकता है।
ये कोई काल्पनिक बातें नहीं हैं। आज भी हमारे मध्य में ऐसे अनेक मनुष्य वर्तमान हैं जिन्होंने योग साधन द्वारा अपनी अनेक गुप्त शक्तियों को विकसित कर लिया है, और इसके परिणाम स्वरूप बहुत ऊंचे दर्जे पर पहुँच गए हैं। हम में से प्रत्येक व्यक्ति, जो उचित परिश्रम करना चाहें, स्वयं योग साधन द्वारा इन बातों की सचाई या झुठाई का पता लगा सकता है। पर केवल जबानी कहने अथवा मन में ख्याल कर लेने से ही कोई काम नहीं सध सकता। यदि कोई आदमी विद्युत शास्त्र अथवा रसायन शास्त्र के किसी नियम की जाँच करना चाहे तो पहले उसे कुछ वर्षों तक उस विषय का अध्ययन करके उसका ज्ञान प्राप्त करना होता है उसके बाद ही वह किसी वैज्ञानिक द्वारा स्थापित किसी नियम की वास्तविकता की जाँच कर सकता है। उसी प्रकार योग-साधन में भी पहले बहुत कुछ सीखना पड़ता है, विशेष प्रकार से रहना पड़ता है, तब गुप्त शक्तियों का क्रमशः विकास होता है।
योग की कोई प्रक्रिया आरम्भ करने के पहले मनुष्य को भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि योगाभ्यास के असली तत्व सदा गुप्त रखे जाते हैं। उनको गुप्त रखने का कारण भी बहुत गूढ़ नहीं है। योग की कितनी ही रीतियाँ ऐसी हैं जिनके अभ्यास से मनुष्य थोड़े ही समय में अपने कुछ चक्रों को जागृत कर सकता है और इस प्रकार उसके हाथ में कोई असाधारण शक्ति आ सकती है। पर यदि उसके सदुपयोग के लिए पहले ही चरित्र गठन, निस्वार्थता तथा सेवा के सद्गुणों की नींव स्थापित नहीं हो चुकी है, तो वह बहुधा उस शक्ति का दुरुपयोग ही करेगा। और इस दुरुपयोग से केवल उसी को हानि हो सकती है। योग की कुछ विधियाँ ऐसी सुगम हैं कि थोड़े अभ्यास से ही मनुष्य विचित्र ज्योति तथा भाँति-भाँति के रंग और रूपों को देख सकता है। इन्हें देखकर मनुष्य अक्सर धोखे में आ जाता है और इसी को आध्यात्मिक जीवन समझ कर इन्हीं शक्तियों को बढ़ाने की फिक्र में लग जाता है। पर ये शक्तियाँ मनुष्य को कुछ आगे नहीं पहुँचाती हैं, वरन् उसे तरह-तरह के अदृश्य आक्षेपों का केन्द्र बना देती हैं। इसी कारण योगी लोग योग के भेदों को अत्यन्त गुप्त रखते हैं और केवल अधिकारी पुरुषों को ही बतलाते हैं।
केवल पुस्तकों को पढ़कर योगाभ्यास कभी आरम्भ नहीं करना चाहिए। योग की अनेक बातें ऐसी हैं जो कभी पुस्तकों में प्रकाशित नहीं की जा सकतीं। पुस्तकों से योग का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, उसकी जिज्ञासा बढ़ाई जा सकती है, पर योगाभ्यास का मर्म बिना अनुभवी पुरुष की सहायता के समझना असम्भव है। इसके अतिरिक्त पुस्तक में तो केवल साधारण भाव से किसी वस्तु का वर्णन किया जा सकता है। पर योगाभ्यास में उन साधारण बातों के अलावा बहुत सी ऐसी भी बातें हैं जो प्रत्येक अभ्यास करने वाले की शारीरिक अवस्था और व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्ध रखती हैं, पुस्तकों द्वारा उन सबको बतला सकना असम्भव ही है। जो व्यक्ति इन बातों पर ध्यान न देकर मनमाने ढंग से योगाभ्यास शुरू कर देते हैं वे ही प्रायः रोगी या पागल बनकर अपनी भूल का दुष्परिणाम सहन करते हैं और साथ ही योग विद्या को भी बदनाम करने का कारण बनते हैं।
(पं. लक्ष्मण शास्त्री)
धर्म की परीक्षा के सम्बन्ध में मुख्य प्रमाण किस चीज का माना जाय, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सदा से दो मत देखने में आते हैं। एक धर्म वाले कहते हैं कि धर्म का निर्णय करने वाली मनुष्य की बुद्धि ही है। कोई भी धर्म शास्त्र हो, उनका निर्माण मनुष्य के अनुभव और विचार द्वारा ही हुआ है। वेद, अवस्था, बाइबिल, कुरान आदि धर्म ग्रन्थ मनुष्य की बुद्धि के ही प्रसाद हैं। मनुष्य की मानसिक क्रिया से जिस तरह कृषि, वाणिज्य, अल्प, राज्य-व्यवहार, जादू, वैद्यक मन्त्र, तन्त्र उत्पन्न होते हैं, उसी तरह सारे धर्म भी उत्पन्न होते हैं।
इस प्रकार के मत को ‘लौकिक प्रमाणवाद कहते हैं। दूसरा पक्ष ‘अलौकिक प्रमाणवाद’ का है। यह पक्ष कहता है कि धर्म-अधर्म का ज्ञान असाधारण या अलौकिक बौद्धिक या मानसिक शक्ति से होता है। इस अलौकिक साधन को दिव्य चक्षु, दिव्य-दर्शन, अपौरुषेय शब्द, आध्यात्मिक साक्षात्कार अथवा सिद्ध पुरुषों की त्रिकाल-दृष्टि कहते हैं।
इन दोनों प्रकार के मतों में कई तरह के उपभेद हैं। पहले मत में ऐतिहासिक और अनैतिहासिक भाग हैं। ऐतिहासिक पक्ष के अनुसार मनुष्य की आदिम अवस्था से लेकर आधुनिक समय तक समाज में जैसे परिवर्तन हुए हैं वैसे ही धर्मों में भी हुए हैं। कारण यह कि इस सामाजिक विकास के अनुसार ही मनुष्य के मन और बुद्धि की परिणति हुई है, और मानसिक परिणति के अनुसार धर्म में परिणति हुई है, धार्मिक अनुभव मनुष्य के अन्य साधारण अनुभवों का ही एक भेद है। उसमें अलौकिकत्व या दिव्यत्व का जो आरोप बाद में किया गया है, उसमें कोई वास्तविकता नहीं।
हाल ही में इस पक्ष में एक अनैतिहासिक सुधारवादी दल उत्पन्न हुआ है। इसकी सम्मति में धर्म ऊंचे दर्जे की मानव बुद्धि का विषय है। संयमी, मननशील, निःस्वार्थी साधु लोग समाज के हित अथवा मनुष्यों के कल्याण को ध्यान में रखकर समय-समय पर धर्म-संस्थापना किया करते हैं, इन सात्विक बुद्धि के स्थित-प्रज्ञ साधुओं को ही धर्म-निर्णय और धर्म-परिवर्तन का अधिकार है। उनकी शुद्ध, सात्विक बुद्धि द्वारा ही यह निश्चय होता है कि समाज कल्याण कारी और श्रेयस्कर कर्म कौन से हैं। यद्यपि परलोक का स्वरूप निश्चित करना कठिन है, तथापि जो कर्म इहलोक में श्रेयस्कर हैं वही परलोक में भी श्रेयस्कर होंगे।
जैसा हम ऊपर बतला चुके हैं यह लौकिक प्रमाणवाद का पक्ष नया नहीं है। भारत के प्राचीन बुद्धिवादी दार्शनिक बृहस्पति, चार्वाक, उशना आदि ने यही बतलाया है कि कर्म की उत्पत्ति मानव बुद्धि से हुई है। इनके अनेक अनुयायी यह भी कहते हैं कि पारलौकिक और अलौकिक धार्मिक कल्पनाओं का जन्म मनुष्यों की भ्राँति, प्रमाद या लोगों को फंसाने की इच्छा से हुआ है।
महाभारत से मालूम होता है कि प्राचीनकाल में ऐसे अनेक तत्ववेत्ता थे जो नीति को ही धर्म का सार मानते थे, और संयम जन्य श्रेय तथा सर्वभूत सुख को ही मनुष्य का श्रेष्ठ ध्येय समझते थे। उनके मत से धर्म का निर्णय करने के लिए अलौकिक शास्त्र प्रमाण की आवश्यकता न थी। इन तत्ववेत्ताओं का ज्यादा हाल तो मालूम नहीं हो सकता पर परलोकवादी विद्वान कुमारिल भट्ट ने अपने ‘श्लोक वार्तिक’ ग्रन्थ में उनकी खबर ली है। उन तत्व वेत्ताओं के मत का सार यह बतलाया गया है कि वे लोक हितकारक और लोकसुखकारक कर्मों को ही धर्म मानते थे और इसके विपरीत लोक दुःखकारक कर्मों को अधर्म कहते थे। यह रहस्य जो समझ नया उसके लिए शास्त्र व्यर्थ हैं। यह रहस्य जो समझ नया उसके लिए शास्त्र व्यर्थ है। कुप्तारिल भट्ट ने इस पक्ष को अमान्य बतलाया है, क्योंकि यह श्रुति और स्मृतियों के मार्ग के विपरीत था।
महाभारत के समय में ही धर्म निर्णय का दूसरा पक्ष भी था जिसे व्यास पक्ष कहा जाता है, क्योंकि व्यास जी ने महाभारत में अनेक स्थलों पर उसका समर्थन किया है। उसका सार यह है कि दीर्घकाल तक कार्य कारण भाव का अवलोकन और मनन करने से धर्म का निश्चय किया जा सकता है (अनुशासन पर्व 162/7-8) धर्म का ज्ञान होने के तीन साधन हैं-वेद, अनुभव और परम्परागत आचार। पर इन तीनों में वास्तविक दृष्टि से कोई फर्क नहीं है। आचार केवल परम्परा से चले आये हैं, इसलिए प्रमाण नहीं है, उनके भी कारणों की छान-बीन करनी चाहिये (शान्ति. 262।54) धर्म अधर्म का निर्णय करने के लिए बुद्धि का अवलम्बन करना ही आवश्यक हैं (शान्ति. 141।102) बुद्धि से गलत ठहरने वाला शास्त्र वचन निरर्थक है (शान्ति. 141।22) केवल शास्त्र वचनों से और केवल बुद्धि से ज्ञान नहीं होता किन्तु दोनों की परस्पर सहायता लेनी चाहिये। क्योंकि शास्त्र वचनों में भी कोई न कोई युक्तिवाद रहता ही है। (142।12-18) धर्मज्ञान केवल शास्त्र वचनों से होना सम्भव नहीं है। क्योंकि धर्मशास्त्र भिन्न-भिन्न और सम-विषम परिस्थितियों के विविध धर्म कैसे कह सकेगा? भविष्य में आने वाली सारी आपत्तियों का हिसाब शास्त्र कैसे लगा सकेगा? युग मान के अनुसार वेदों का ह्रास होता आया है, इसलिए यह केवल लोगों की धारणा ही है कि ‘वेद’ ही धर्म के प्रमाण हैं, (शाँति. 260।1।10) जीवों को आनंददायक आचरण ही धर्म हैं यही धर्म का लक्षण साधुजनों को मान्य है। हम दूसरों से वैसा व्यवहार न करें जिसकी इच्छा हम अपने प्रति दूसरों से नहीं करते। और दूसरों से हम जिस बर्ताव की इच्छा करते हैं, वैसा ही बर्ताव हम दूसरों के साथ करें, यही धर्म का सार है। (शाँति. 109 और 256) द्रोह और लोभ न करना, इन्द्रिय दमन, अध्ययन, तप, भूत-दया सत्य, सहानुभूति, क्षमा और धैर्य यही सनातन धर्म की निर्विवाद जड़ें हैं। (अनु. 162।176) किसी-किसी अवसर पर नित्य धार्मिक तत्वों में भी अपवाद करना पड़ता है। (शाँति. 109।259)
महाभारत का यह धर्म विवेचनापूर्ण बुद्धिवाद पर आधारित नैतिक धर्म है। ये विचार श्रौत-स्मार्त कर्मकाण्डों को सर्वोपरि महत्व नहीं देते। इससे प्रकट होता है कि महाभारत के समय में विश्व धर्म (यूनीवर्सल रिलीजन) जन्म ले रहा था। इन विचारों को उस समय श्रेष्ठत्व प्राप्त हुआ, जबकि समुदाय और राष्ट्रों के मुकाबले में मनुष्यता का महत्व अधिक ज्ञात होने लगा। मानव जाति के इतिहास में यह एक महान परिवर्तन काल था। इस समय ईश्वर, आत्मा, और पुण्य के पारलौकिक विचार नैतिक धर्म सहायक माने जाने लगे थे, इन धारणाओं के विषय में कोई स्पष्ट प्रमाण महाभारत में नहीं मिलता। यह बात ध्यान में रखने की है कि महाभारत में ईश्वर विरोधी सिद्धान्तों का मिश्रण खूब है। इसी कारण जहाँ उसमें बुद्धिवादी प्रमाणवाद मिलता है वहीं अलौकिक प्रमाणवाद भी पर्याप्त बल के साथ उपस्थित किया है। त्रिकालज्ञ, योग दृष्टि, दिव्य ज्ञान और ईश्वर की दिव्य विभूतियों का उपदेश ऐसे अलौकिक धर्म प्रमाण महाभारत में जगह-जगह आते हैं। गीता तो ऐसे प्रमाणों से ही भरी है। वेद को भी व्यासजी ने स्वयं परमात्मा की अनादि-धनवाणी माना है। महाभारतकार ने यह स्पष्ट कहीं पर नहीं कहा कि मानव बुद्धि ही धर्म के विषय में इसका प्रमाण है।
इस प्रकार वेदों और शास्त्रों के विषय में प्राचीन काल से दोनों मत चले आये है। वेदों के कुछ ऋषियों ने भी अप मन्त्रों को अपनी ही कृति बतलाया है, जब अन्य ऋषियों ने उसे ईश्वरीय प्रेरणा का परिणाम कहा है। निरुक्त के रचियता यास्क का मत है कि अलौकिक शक्ति वाले ऋषियों को धर्म का साक्षात्कार हुआ, उसी ऋषि ने स्वतः प्राप्त किये मन्त्र नीचे दर्जे के लोगों को सिखाए। कणाद के वैशेषिक सूत्रों में भी ऐसा ही मत व्यक्त किया गया है। वे कहते हैं कि वेद बुद्धि से निर्माण हुए हैं, और वह बुद्धि या दिव्य-दृष्टि ऋषियों को अनेक पुण्यों के सामर्थ्य से प्राप्त हुई थी। पाणिनि के समय में विश्वास था कि वेद लोक विलक्षण हैं। पातंजलि के समय में लोग समझते थे कि वेद अनादि-नित्य हैं। पातंजलि ने लोगों के इस मत का यह अर्थ निकाला है कि वेदों का अर्थ तो ‘नित्य’ है परन्तु वेदों के शब्द अनित्य हैं।
(स्वामी रामतीर्थ)
हम यह देखते हैं कि चींटियों जैसे क्षुद्र जीवधारियों की भी इच्छायें पूर्ण होती हैं। तो फिर मनुष्य की इच्छायें ही क्यों मारी जायें? प्रकृति या ईश्वर द्वारा मनुष्य की ही हंसी क्यों उड़ाई जाय? मनुष्य उपहास के ही योग्य नहीं हैं। उसकी इच्छाओं का भी होना भी आवश्यक है। हमारी अधिकाँश इच्छाएं इसी जीवन में फलती-फूलती हैं। इस तरह हम देखते हैं कि हमारी इच्छायें ही हमारे कार्यों में रूपांतरित हो जाती हैं, इच्छायें ही प्रेरक शक्तियाँ हैं। किन्तु जो अनेक इच्छाएं पूर्ण नहीं होती उनकी क्या गति होती हैं? वेदान्त कहता है “ऐ मनुष्य! तू ईश्वर द्वारा हंसे जाने के लिए नहीं बनाया गया है। तुम्हारी भी अपूर्ण ओर अतृप्त इच्छायें अवश्यमेव फलवती होंगी, यदि इस लोक में नहीं, तो दूसरे लोक में।
यहाँ एक प्रश्न और उपस्थित होता है। यदि इससे पूर्व हमारा कोई जीवन था, और यदि मृत्यु के बाद हमें फिर जन्म लेना पड़ता है, तो फिर हमें पिछले जन्मों की याद क्यों नहीं रहती है? वेदान्त पूछता है, स्मृति या स्मरण शक्ति क्या है? उदाहरण के लिये राम अमरीका में एक विदेशी भाषा में बोल रहा है। राम ने भारतवर्ष में कभी अंग्रेजी भाषा में व्याख्यान नहीं दिया। तुम लोगों से अंग्रेजी बोलते समय मातृभाषा का एक भी शब्द राम के चित्त में नहीं आया। किन्तु क्या उसकी भारतीय मातृभाषा कहीं खो गई है? नहीं। वह राम के पास ज्यों की त्यों है। यदि राम चाहे तो उसे तुरन्त ही संस्कृत, हिन्दी और उर्दू फारसी आदि भारतीय भाषायें याद पड़ सकती हैं। अच्छा, तो स्मृति क्या है? तुम्हारा मन एक झील जैसा है। इस समय राम के मानसरोवर में भी भारतीय भाषायें, संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी आदि इस झील की तह में बैठी हैं। बात की बात में हम इस झील को क्षुब्ध कर सकते हैं, बस, यही किसी चीज को याद करना कहलाता है। तुम बहुतेरी बातें जानते हो, परन्तु हर समय तुम्हें सबका चेत नहीं रहता। इसी क्षण तुम अपने मन की झील को हिला डुला कर उनको सचेत कर सकते हो, उन्हें ऊपरी तल पर लाने से वे तुम्हारे चित्त या मस्तिष्क में आ जाती हैं।
इसी तरह वेदान्त कहता है, तुम्हारे सारे जन्म और पूर्व जीवन तुम्हारी चेतना की आन्तरिक झील में, तुम्हारे ज्ञान की आन्तरिक झील में विद्यमान रहते हैं। वे वहाँ रहते हैं। इस समय वे निम्नतम तह पर अवस्थित हैं। वे ऊपरी तल पर नहीं हैं। यदि तुम अपने पिछले जन्मों की याद करना चाहते हो, तो यह कोई कठिन बात नहीं है। अपने ज्ञान सरोवर को खूब निम्नतम तह तक खलमला डालो और आप जो चीज चाहें उसे ऊपरी तल पर ला सकते हैं। यदि आप चाहें तो आप पिछले जन्मों की भी याद कर सकते हैं, किन्तु एक बात है, ऐसा प्रयोग लाभदायक नहीं होता। क्योंकि एक दूसरे नियम-विकासवाद-के अनुसार तुम्हें आगे बढ़ना है, तुम्हें अग्रसर होते रहना है। इसलिए जो गया सो गया, उसकी क्या खबर करना। तुम्हारा उससे कोई सरोकार नहीं तुम्हें तो आगे बढ़ना है।
फिर कर्म का विधान एक बात और बतलाता है जिन चीजों में तुम्हें इतनी दिलचस्पी है, जिन्हें तुम इतना अधिक पसन्द करते हो, जिनसे तुम इतने आकृष्ट होते हो, जिन सबको तुम दुनिया में देखते हो, वेदान्त कहता है, कर्म विधान के अनुसार, तुम इन्हें पसन्द करते हो, तुम्हें इनसे दिलचस्पी है, तुम इन्हें प्यार करते हो, तुम इन्हें पहचानते हो, क्यों? केवल इसी कारण कि किसी समय तुम भी इन सब चीजों में होकर गुजर चुके हो, तुम चट्टान थे, तुम चट्टानों में सो चुके हो, तुम नदियाँ में होकर बहे हो, तुम पौधों में उगे हो, तुम पशुओं में दौड़े हो, तुम अब उन सबको देखते और पहचानते हो। अब हम इसी बात को एक दूसरे तर्क से सिद्ध कर सकते हैं।
संस्मरण क्या हैं? संस्मरण से प्रतीत होता है कि जिस वस्तु को हम अभी याद कर रहे हैं उसे हम पहले ही जानते थे। दृष्टान्त के लिए कल्पना करो कि दो मनुष्य एक साथ इन व्याख्यानों को सुनते आते रहे हैं, कभी न बिछुड़ने वाले जोड़े के रूप में। इस भवन में दिये हुये सात व्याख्यानों में वे साथ-साथ आये किंतु आठवें व्याख्यान में एक अकेला ही आया है दूसरा नहीं आया हैं। बिछुड़े हुए अकेले मनुष्य से मित्रगण स्वभावतः वह प्रश्न करेंगे, तुम्हारा मित्र-तुम्हारा प्रिय मित्र आज कहाँ है? वह कहाँ गया है?” ऐसा प्रश्न क्यों किया जायगा? इसका हेतु है संस्मरण का नियम, जो संग या संयोग का नियम भी कहा जा सकता है। हम दोनों को सदा साथ-साथ देखते आये हैं, दोनों हमारे इतने सुपरिचित हो गये हैं, कि दोनों हमारे चित्त में, मानों एक हो गए हैं, इसलिए बाद को जब हम उनमें से एक को देखते हैं तो वह हमें तुरन्त दूसरे की याद दिलाता है। इसी तरह हमारे मस्तिष्क में संग या संयोग का नियम काम करता हैं, जिससे हमें उसके साथी की याद आईं। इस याद का अर्थ है कि हमें उस वस्तु की पहले से जानकारी थी जिसको हम अभी याद करते हैं।
(श्री. ज्वालाप्रसाद एम. ए.)
आजकल कुछ लोगों में एक विचार यह फैलता जाता है कि मनुष्य के सारे दुख उसके प्राकृतिक अवस्था को छोड़कर सामाजिक और सभ्यता के कृत्रिम अकर्मों के अनुसार जीवन यापन करने से हुये हैं। उदाहरण के लिये वे कहते हैं मनुष्य के सिवा संसार में कोई भी अन्य जीवधारी कपड़े नहीं पहनता और इससे वह मनुष्य की अपेक्षा बहुत अधिक निरोग और स्वस्थ रहता है, इसलिये मनुष्यों को भी नंगा रहना चाहिये। पर यह विचार अधिकाँश में भ्रम मूलक है। ऐसे विचार वाले लोग पशुओं और मनुष्यों के एक बड़े भेद को भूल जाते हैं। मनुष्यों में जो अद्भुत कल्पना शक्ति है उसके प्रभाव से प्राकृतिक अवस्था में रहकर भी वह अपनी स्वार्थ सिद्धि के अधिक मार्ग कल्पित कर लेगा। वह दूसरों के लिए कष्ट अथवा हानि का कारण होगा। उसकी कल्पना या किसी प्रकार की हानिकारक प्रवृत्ति से दूसरों को कष्ट न हो इस कारण उस पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है। ऐसे प्रतिबन्धों का समूह ही कुछ समय बाद सामाजिक संगठन का रूप ग्रहण कर लेता है। इनमें उत्तम और स्थायी सामाजिक संगठन वही माना जा सकता है जिसमें सद्गुणों के विकास के लिये पूर्ण अवस्था हो।
इससे यह स्पष्ट है कि सद्गुणों का पालन ही सब उत्तम सामाजिक नियम है और उसी से सब को सुख व शाँति की प्राप्ति हो सकती है। ऐसे सद्गुणों की सहनशीलता, सहिष्णुता, परस्पर ऐक्य भाव और प्रेम तथा अपने समाज तथा देश के प्रति सच्चा अनुराग परमावश्यक है। बिना सहनशीलता के समाज में अनेक तरह के झगड़े व कष्ट उत्पन्न होते हैं। अपने विचारों व अपने ही धर्म को सर्वोपरि समझना व दूसरे धर्मों को घृणा की दृष्टि से देखना अभिमान है। इसी कट्टरता से ईश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता। भिन्न-भिन्न देशों और समयों में भिन्न-भिन्न धर्मों को प्रकट करना यह सिद्ध करता है कि ईश्वर की इच्छा यही है कि उसके बन्दे भिन्न-भिन्न धर्मों को मानते हुये परस्पर सहानुभूति व मेल से रहना सीखें जिससे उनकी कट्टरता और अभिमान दूर हों और उनमें सद्गुणों का विकास हो। इन सद्गुणों के विकास से ही लोग उस ईश्वर के दर्शन के अधिकारी हो सकते हैं। इस दृष्टि से धार्मिक कट्टरता ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध आचरण करना समझा जायगा। कट्टरता और असहिष्णुता से मनुष्य धर्मात्मा बनने के बदले पशुओं के समान स्वभाव वाला अविचारी बन जाता है।
जब हम इस बात को समझ लेते हैं कि धर्मों तथा सम्प्रदायों में जो भेद प्रतीत होते हैं वे सब भिन्न-भिन्न देश, काल व परिस्थिति में पैदा होने के कारण होते हैं तो हमारा मन उदार हो जाता है और हम सब धर्मों को ईश्वर तक पहुँचने के अनेक रास्ते समझने लगते हैं। जिस प्रकार कोई मनुष्य एक धर्म पर विश्वास करता है उसी प्रकार उसे दूसरों को भी उनके धर्मों पर विश्वास करने का अधिकार देना चाहिये। धर्म-परिवर्तन कराने के लिये धोखा देना या जबर्दस्ती करना तो महापाप है जिसको ईश्वर कभी क्षमा नहीं कर सकता। धर्म परिवर्तन के लिये किसी से विशेष आग्रह करना भी आवश्यक नहीं। आजकल सब धर्मों की पुस्तकें सुलभ हैं जिसकी रुचि हो वह उनका अध्ययन कर सकता है। धार्मिक विचार प्रत्येक मनुष्य का अपना विषय है, उनमें हस्तक्षेप करने का दूसरे को अधिकार नहीं हैं। इस सिद्धान्त को न मानने से धार्मिक संघर्ष पैदा हो जाता है। लड़ाई-झगड़े में धर्म-पालन के बदले अनेक अधर्म से कार्य हो जाते हैं। धर्म के बदले अधर्म की वृद्धि होती है।
इसी प्रकार वैज्ञानिक अनुसन्धानों को धार्मिक कट्टरता से रोक देना मानों समाज की उन्नति को जान-बूझकर बन्द कर देना है। जैसा कि सब कोई मानते हैं धर्म का मुख्य अंग ईश्वर भक्ति और सद्गुणों का पालन करना है। इसमें वैज्ञानिक खोजों से कोई हानि-लाभ नहीं हो सकता। वैज्ञानिक खोज कभी दुर्गुणों को सद्गुण सिद्ध नहीं कर सकती। सम्भव है कि किसी वैज्ञानिक खोज से ईश्वर के स्वरूप सम्बन्ध विचारों में कुछ परिवर्तन हो जाय, जैसा कि दर्शन शास्त्र (फिलॉसफी) से हो जाता है। परन्तु ईश्वर की सत्ता से-संसार की महान शक्ति के केन्द्र की सत्ता में-कोई सन्देह पैदा नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त अन्य रस्म-रिवाज परिवर्तनशील हैं और इन पर वैज्ञानिक प्रकाश पड़ने से अप्रसन्न होना अपनी ही उन्नति में बाधा डालना है। किसी वैज्ञानिक बात पर हम विश्वास करें या न करें यह हमारी इच्छा है, परन्तु उसका सुनना भी अस्वीकार करना कट्टरता है। इसी कट्टरता से संसार में अधिकाँश धार्मिक उत्पात हुये हैं।
समाज में पद-पद पर सहनशीलता की आवश्यकता पड़ती हैं। यदि प्रत्येक मनुष्य यह चाहे कि मनमाने ढंग से स्वतन्त्रता का उपयोग करे तो कोई भी स्वतन्त्र और सुखी न रह सकेगा। प्रत्येक अपने ही स्वार्थ का ध्यान रखेगा और उसकी पूर्ति के लिये दूसरों को कष्ट देगा। परिणाम यह होगा कि जो सबसे बलवान होगा, वह सबको दबा लेगा। परन्तु उसको भी सदैव यह भय लगा रहेगा, कि दूसरे लोग सम्मिलित होकर उसको न दबा लें अथवा कोई दूसरा उससे भी अधिक बलवान न पैदा हो जाय। इसलिए सभी दुखी व चिन्तित रहेंगे। अपनी स्वतन्त्रता का भले प्रकार उपयोग करने के लिये भी यह आवश्यक है कि हम दूसरों को कष्ट न दें। यदि हम किसी को ईंट मारना चाहें और इसको अपना स्वतन्त्र अधिकार मानें तो दूसरा भी हमें पत्थर से मारेगा। अस्तु ऐसी ‘स्वतन्त्रता’ को दबाना होगा। यह दबाना ही सामाजिक संगठन है।
जिस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के कुछ अधिकार होते हैं, उसी प्रकार उसके कुछ कर्तव्य अथवा धर्म भी होते हैं। यदि प्रत्येक मनुष्य अपने अधिकारों का ही अधिक ध्यान रखें और इसी बात की फिक्र करता रहे कि दूसरे लोग उसके अधिकारों का आदर करते हैं या नहीं, तो दूसरों के प्रति उसके जो कर्तव्य या धर्म हैं उनके पालन में वह त्रुटि कर जायगा। परिणाम यह होगा कि दूसरे के अधिकारों की रक्षा न होगी और समाज में एक लड़ाई-झगड़ा सा मचा रहेगा। इसके विपरीत यदि प्रत्येक मनुष्य अपने कर्तव्यों के पालन का ध्यान रखेगा तो उसे सबके अधिकारों की रक्षा स्वयमेव ही होती रहेगी और सब सन्तुष्ट रहेंगे। यही कारण हैं कि प्रत्येक सद्धर्म में अपने धर्म के पालन पर ही जोर दिया गया है। संभव है कि कोई पापी मनुष्य धर्म का ध्यान न रखकर अनुचित मार्ग पर चले। फिर भी धर्मात्मा मनुष्य को अपने धर्म पालन का ध्यान रखना चाहिये। इससे सम्भव है कि पापी भी अपनी गलती को अनुभव करके ठीक मार्ग पर आ जाय। पर यदि पापी के उत्तर में वह भी पाप करने लगेगा तो दूसरों का पाप छुड़ाना दूर रहा, वह स्वयं भी पानी बन जायगा। यदि कहीं आग जलती हो तो उसे पानी से ही बुझाया जा सकता है, दियासलाई दिखाने से नहीं। कहावत है कि “एक चुप सौ को हरावे।” पर इसका अर्थ यह नहीं कि जहाँ किसी आततायी को रोकना हो तो वहाँ हम चुप रहें। जहाँ जैसा धर्म हो वहाँ वैसा ही व्यवहार करना मनुष्य का कर्तव्य है।
इसी प्रकार परस्पर सहायता करना भी सामाजिक जीवन का मूल है। बिना दूसरों की सहायता के हमारी जीवन यात्रा ही असम्भव हो जायेगी। प्रतिक्षण हमारा दूसरों से संसर्ग होता रहता है। यदि हम दूसरों की सहायता करने में त्रुटि करते हैं तो फिर हमको भी दूसरों से सहायता पाने का अधिकार नहीं हो सकता।
(श्री. डी. एस. शर्मा)
संसार में आजकल ऐसे मनुष्यों की संख्या बहुत अधिक है जो प्रायः अपने किसी न किसी दुख का रोना रोया करते हैं। कितने ही लोगों की बातों से तो ऐसा जान पड़ता है कि संसार में उनसे बढ़कर दुखी कोई नहीं हैं। ऐसे लोग वास्तव में अपनी ही अवस्था पर ध्यान दिया करते हैं, दूसरों की हरकत पर कभी विचार नहीं करते। दूसरी बात यह है कि वे भूल तो स्वयं करते हैं पर अपने दुःखों का कारण दूसरों पर डालते हैं। कभी हम दैव को दोष देते हैं कि भगवान ही हम पर अप्रसन्न है और हमीं को तरह-तरह के दुख दे रहे हैं। कभी हम किसी व्यक्ति विशेष को दोषी बतलाते हैं कि वही हमारा विरोध करके हमको हानि पहुँचा रहा है।
पर इस प्रकार के विचार वास्तव में हमारे मन के भ्रम ही होते हैं। यदि हम दरअसल दुःखों से छुटकारा पाना चाहते हैं तो हमको सब से पहले यह विचार अपने मन से निकाल देना चाहिये कि कोई वस्तु या व्यक्ति हमारे दुःख का कारण है। हमको भली प्रकार यह समझ लेना चाहिये कि अपने कर्मों के लिये हमारे स्वयं के सिवा कोई और जवाबदार नहीं है, और हम जो कुछ दुख या सुख पाते हैं वह इन कर्मों का ही परिणाम होता है।
प्रत्येक मनुष्य का जीवन सर्वथा उसके अधीन है जो कुछ दुख या सुख हमें प्राप्त होते हैं उनमें कार्य-कारण का एक विशेष नियम रहता है। दुःखों का कारण हम स्वयं होते हैं। अगर मनुष्य जान बूझकर, बहम, अज्ञान, भूल, अंधकार और दुख की कोठरी में समस्त जीवन बैठा रहे और दुख की शिकायत करता रहे तो क्या उसका दुःख दूर हो जायगा? वास्तव में विचार किया जाय तो सुख के लिये अपने चित्त की शाँति और एकाग्रता की ही आवश्यकता है, दूसरी वस्तुओं का सहारा ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं। एक मनुष्य ऐसा होता हैं कि जहाँ जाता हैं वहाँ उसे आनन्द ही मिलता है। प्रत्येक वस्तु उसे सुख देने वाली प्रतीत होती है। प्रत्येक परिस्थिति उसको अनुकूल मालूम होती है। दूसरा मनुष्य ऐसा होता है जिसे प्रत्येक वस्तु में बुराई ही नजर आती है। प्रत्येक वस्तु या मनुष्य के संपर्क में आकर वह खिन्न हो जाता है। प्रत्येक की शिकायत करता है। उसको कहीं किसी वस्तु में आनन्द प्राप्त नहीं होता। वह जगत को न रहने योग्य स्थान मानता है।
आप भी ऐसे भी अनेक मनुष्य पायेंगे, जिनको सुख के सभी साधन प्राप्त हैं, पर जो अपने स्वभाव के कारण या अपने मन से झूँठे सच्चे कारण उत्पन्न करके अपने को दुःखी रखते हैं। हमने बड़े-बड़े वैभवशालियों को भीतर से ऐसा दुःखी और चिन्ताग्रस्त देखा है कि उनकी अपेक्षा एक दो रुपये की मजदूरी करने वाला गरीब आदमी भी सुखी जान पड़ता है। ऐसे लोगों को किसी पर विश्वास ही नहीं होता। वे अपनी खास स्त्री, पुत्र, सम्बन्धी आदि पर भी विश्वास नहीं कर पाते और इस प्रकार सब कुछ होते हुये भी संसार में एक निस्सहाय व्यक्ति की भाँति जीवन बिताते हैं।
अब विचार कीजिये कि ऐसी अवस्था क्या है? इसका कारण कोई अन्य नहीं वरन् हमारी ही योग्यता या अयोग्यता होती है। संसार में रहकर तरह-तरह के अभाव, विघ्न-बाधा, आधि-व्याधि के आक्रमण से बचना संभव नहीं है पर उस परिस्थिति में भी शाँत और धैर्ययुक्त रहना हमारे हाथ में है। बाहरी वस्तुओं के आधार पर सुख की आशा रखने वाला अवश्य धोखा खाता है। इसलिये सुखी रहना चाहते हो तो अपने आप पर अपने मन पर अधिकार रखना सीखो।
(श्री नेहर बाबा)
अधिकाँश लोगों के लिए आध्यात्मिक साधना का स्वरूप अपने-अपने धर्मों द्वारा निर्दिष्ट क्रिया-कलाप का बाह्य अनुष्ठान ही होता है। प्रारम्भिक अवस्थाओं में इस अनुष्ठान का भी एक महत्व होता है, क्योंकि इससे आत्मशुद्धि और मनोनिग्रह में सहायता मिलती है। पर बाद में साधक को ऊपरी नियमों के पालन की अवस्था से ऊंचा उठकर आध्यात्मिक साधना के गम्भीर स्तरों में प्रवेश करना पड़ता है। जब साधक इस भूमिका में पहुँच जाता है तब धर्म का बाह्य रूप उसके लिए गौण हो जाता है और उसकी रुचि धर्म के उन मूल तत्वों की ओर हो जाती है जो सभी बड़े-बड़े मजहबों में व्यक्त हुए हैं। सच्ची आध्यात्मिकता उस जीवन को कहते हैं जिसके मूल में आध्यात्मिक बोध और उसका व्यवहार रहता है।
जैसा कि अनेक साधारण व्यक्ति समझते हैं, साधना का अर्थ यह नहीं हैं कि मनुष्य कठोर नियमों के बन्धन में बंधा रहे। कोई एक अटल नियम ऐसा नहीं हो सकता जिसको अनिवार्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति पर लागू किया जाय। आध्यात्मिक क्षेत्र में साधना के अनेक भेद हो सकते हैं। प्रत्येक साधक के लिए उसके संस्कारों और मनोवृत्ति के अनुकूल साधना प्रणाली में कुछ अन्तर किया जा सकता है। इस प्रकार सबका साधना-ध्येय एक होने पर भी विशेष साधक का साधन भिन्न हो सकता है।
आध्यात्मिक क्षेत्र की साधना अवश्य ही भौतिक क्षेत्र की साधना से भिन्न प्रकार की होती है, क्योंकि आध्यात्मिक क्षेत्र का ध्येय भी भौतिक क्षेत्र के ध्येय से भिन्न प्रकार का होता है। भौतिक क्षेत्र का ध्येय एक ऐसा पदार्थ है जिसका काल की दृष्टि से आदि और अन्त होता है और जिसका उद्देश्य किसी अन्य वस्तु का प्राप्त करना होता है। किन्तु आध्यात्मिक साधना का ध्येय ऐसी वस्तु की प्राप्ति होता है जो सदा रही है, सदा रहेगी और इस समय भी हमारे ही अन्तर में मौजूद है।
जीवन के आध्यात्मिक ध्येय को जीवन के भीतर ही ढूंढ़ना चाहिए, जीवन के बाहर नहीं। इसलिए आध्यात्मिक क्षेत्र की साधना ऐसी होनी चाहिए कि वह हमारे जीवन को उस जीवन के अधिकाधिक निकट ले जाय जिसे हम आध्यात्मिक समझते हैं। आध्यात्मिक साधना का ध्येय किसी सीमित अभीष्ट की प्राप्ति करना नहीं होता जो कुछ दिन स्थिर रहकर फिर मिट जाय। वरन् उसका उद्देश्य जीवन का ऐसा आमूल परिवर्तन होता है जिससे कि वह सदा के लिए चिरस्थायी महान सत्य को प्राप्त कर सके। कोई साधना तभी सफल समझी जा सकती है जब वह साधक के जीवन को ईश्वरीय उद्देश्य के अनुकूल बनाने में समर्थ होती है और वह उद्देश्य होता है जीव मात्र को ब्रह्म भाव की आनन्दमय अनुभूति कराना। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने साधन को इस ध्येय के स्वरूप के सर्वथा अनुकूल बनावें।
आध्यात्मिक क्षेत्र में साधना के प्रत्येक अंग का ध्येय जीवन के सभी स्तरों में ईश्वरत्व की प्राप्ति होना चाहिए। इस दृष्टि से आध्यात्मिक साधना के विभिन्न स्तर आध्यात्मिक पूर्णता की स्थिति के निकट पहुँचने की भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। साधना उतने ही अंश में पूर्ण होती है जितने अंश में वह इस आध्यात्मिक आदर्श को व्यक्त करती है अर्थात् जितने अंश में वह पूर्ण जीवन के सदृश्य होती है। इस प्रकार साधन और साध्य में जितना ही कम अन्तर होता है, साधना उतनी ही पूर्ण होती है। और जब साधना पूर्ण हो जाती है तब साधना आध्यात्मिक साध्य में जाकर मिल जाती है और इस प्रकार साधना और साध्य का भेद अखण्ड सत्ता की अविकल पूर्णता में लीन हो जाता है।
ज्ञान, कर्म और भक्ति की साधना
साधना के गम्भीर स्तरों में साधना का अर्थ होता है- (1) ज्ञान-मार्ग, (2) कर्म-मार्ग, (3) भक्ति-मार्ग का अनुसरण। ज्ञान के साधन का स्वरूप होता है। (क) यथार्थ बोध से उत्पन्न होने वाले वैराग्य का अभ्यास और (ख) ध्यान की भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएं और अन्तःप्रज्ञा का निरन्तर उपयोग।
1- वैराग्य जीव इस जगत के जाल में फंसकर वह भूल गया है कि वह ईश्वर की ही सत्ता का एक अंश है। यह मूल अज्ञान ही जीव का बन्धन है और इस बन्धन से छुट जाना ही आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य होता है। इस दृष्टि से मोक्ष के साधनों में साँसारिक विषयों के बाहरी त्याग की गणना की जाती है। तथापि वह सर्वथा आवश्यक नहीं है। वास्तव में आवश्यकता है साँसारिक विषयों की स्पृहा या आकाँक्षा के भीतरी त्याग की। जब इस स्पृहा का त्याग हो जाता है, तब इस संसार के पदार्थों का त्याग गौण हो जाता है।
2- ध्यान-ध्यान के सम्बन्ध में ऐसा नहीं समझना चाहिए कि वह पर्वत-कन्दराओं में रहने वाले दुनियोंडडडडड के ही करने की कोई अनोखी क्रिया है। प्रत्येक मनुष्य अपने को किसी न किसी वस्तु का ध्यान करते पाता है। इस प्रकार के स्वाभाविक ध्यान और साधक के ध्यान में अंतर यही है कि साधक का ध्यान क्रमबद्ध और नियमित रूप से होता है और वह ऐसी वस्तुओं का ध्यान करता है जो आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होती हैं। साधन रूप में किया जाने वाला ध्यान किसी आकार या मूर्ति पर भी हो सकता है और निराकार भी।
3- अन्तःप्रज्ञा ज्ञान का साधन तब तक अधूरा रहता है, जब तक साधक निरन्तर विवेक का अभ्यास नहीं करता। ईश्वर का साक्षात्कार उसी साधक को होता हैं जो सत्य एवं नित्य वस्तुओं के सम्बन्ध में अपनी अन्तःप्रज्ञा और विवेक से काम लेता है।
कर्म मार्ग- ज्ञान के साधन की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह प्रत्येक अवस्था में तद्नुकूल कर्म के साथ हो। दैनिक जीवन में विवेक के अनुसार चलना आवश्यक है और उसमें ऊंची से ऊंची अन्तःप्रज्ञा की प्रेरणा होनी चाहिए। बिना किसी भय अथवा शंका के हृदय की सर्वोत्तम प्रेरणाओं के अनुसार आचरण करना ही कर्मयोग अथवा कर्ममार्ग का स्वरूप है। साधन में आचरण की ही प्रधानता है। केवल विचार की नहीं। इस दृष्टि से जो मनुष्य बहुत पढ़ा-लिखा तो नहीं हैं किन्तु जो सच्चे मन से भगवान का नाम लेता है और अपने छोटे से छोटे कर्तव्य का पूरे मन से पालन करता है, वह उस मनुष्य की अपेक्षा भगवान के अधिक समीप हो सकता है, जिसे दुनिया भर का दार्शनिक ज्ञान तो है, परन्तु जिसके विचारों का उसके दैनिक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
साधक क्षेत्र में विचार की अपेक्षा आचरण का कितना अधिक महत्व है, यह बात एक गधे के व्याख्यान से स्पष्ट हो जाती हैं। एक गधे को, जो बड़ी देर से चल रहा था, बड़ी भूख लगी, थोड़ी देर बाद उसे घास की दो ढेरियां दिखलाई पड़ीं, जिनमें से एक रास्ते के दाहिनी ओर दूसरी बायीं ओर थी। गधे ने सोचा कि इन ढेरियों में से किसी एक के पास जाने के पहले यह निश्चय कर लेना उचित है कि दोनों में से कौन सी अधिक उत्तम है। उसने फासले की, छोटी-बड़ी की, घास के घटिया-बढ़िया होने की- अनेक दृष्टियों से विचार किया। पर सब तरह से उसे दोनों ढेरियाँ एक सी ही जान पड़ीं। देर तक इसी उधेड़बुन में पड़ा रहा और अन्त में किसी निश्चय पर न पहुँच सकने के कारण भूखा और थका हुआ ही आगे चला गया। इसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए यह आवश्यक नहीं कि हमारे पास उस मार्ग का पूरा नक्शा ही मौजूद हो। आध्यात्मिक जीवन के रहस्य उन्हीं के सामने प्रकट होते हैं, जो जोखिम उठाकर वीरतापूर्वक अपने को परीक्षा में डालते हैं।
भक्ति मार्ग-ज्ञान अथवा कर्म के साधन की अपेक्षा भक्ति अथवा प्रेम का साधन और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह प्रेम ही के लिए किया जाता हैं। वह स्वतः पूर्ण है और किसी दूसरे सहायक की अपेक्षा नहीं रखता। संसार में बड़े-बड़े सन्त हो गए हैं, जिन्होंने किसी वस्तु की कामना न करके भगवत् प्रेम में ही सन्तोष माना था। वह प्रेम, प्रेम ही नहीं, जो किसी आशा से किया जाता है। भगवत् प्रेम की अधिकता में प्रेमी प्रियतम भगवान के साथ हो जाता है। प्रेम से बढ़कर कोई साधन नहीं हैं, प्रेम से ऊंचा कोई नियम नहीं हैं, प्रेम से परे कोई प्राप्तव्य वस्तु नहीं हैं, क्योंकि भगवत् प्रेम, भगवत् स्वरूप हो जाने पर अनन्त हो जाता है। ईश्वरीय प्रेम और भगवान एक ही वस्तु है। जिसमें ईश्वरीय प्रेम का उदय हो गया, उसे भगवान की प्राप्ति हो चुकी।
प्रेम को साधन और साध्य दोनों का ही अंग माना जा सकता है, परन्तु प्रेम का महत्व इतना अधिक स्पष्ट है कि बहुधा इसे किसी अन्य वस्तु की प्राप्ति का साधन मानना भूल समझा जाता है। प्रेम के मार्ग में भगवान के साथ एकीभाव जितना सुगम और पूर्ण होता हैं, उतना किसी भी साधन में नहीं होता। जहाँ प्रेम ही हमारा पथ-प्रदर्शक होता है, वहाँ सत्य की ओर ले जाने वाला मार्ग सहज और आनन्दमय होता है। साधारणतः साधना में प्रयत्न रहता ही है और कभी-कभी तो घोर प्रयत्न करना पड़ता है- उदाहरणतः उस साधक को जो प्रलोभनों के रहते वैराग्य के लिए चेष्टा करता है। परन्तु प्रेम के प्रयत्नों का भाव नहीं रहता, क्योंकि प्रेम करना नहीं पड़ता, अपने आप होता हैं। स्वाभाविकपन ही सच्ची ईश्वर प्राप्ति का स्वरूप है। ज्ञान की सबसे ऊंची अवस्था को, जिसमें चित्त सर्वथा तत्त्वाकार हो जाता है, सहजावस्था कहते हैं-जिसमें स्वरूप का ज्ञान अबाधित रहता है। आध्यात्मिक साधना में एक विलक्षण बात यह है कि साधक का सारा प्रयत्न सहज सिद्ध अवस्था को प्राप्त करने के लिए होता है। अन्त में वह जान जाता है कि समस्त साधनाओं का एकमात्र लक्ष्य अपने स्वरूप का ज्ञान ही है। ऐसा ज्ञान प्राप्त होने पर वह अपने सीमित व्यष्टि-भाव को त्यागकर यह अनुभव करता है कि वह वास्तव में परमात्मा से अभिन्न है और परमात्मा सभी पदार्थों में विद्यमान है।
(श्री. जगतनारायण)
हमारे देश में साधारण तौर से लोग विश्वास करते हैं कि महात्मा लोग जंगल अथवा पहाड़ों की गुफाओं में रहते हैं और कभी-कभी मनुष्यों के मध्य में भी आ जाते हैं। उनमें अनेक दिव्य शक्तियाँ रहती हैं, जैसे देखते-देखते दृष्टि से लोप हो जाना, आकाश में उड़ जाना, दूसरे के मन की बातों को बिना कहे जान लेना इत्यादि। ऐसे महात्माओं के दर्शन दुर्लभ होते हैं। बहुत से लोग उनके दर्शनों के निमित्त पर्वतों पर जाकर रहते हैं, पर सबको उनका दर्शन नहीं होता। दर्शन उन्हीं को होता हैं। जिनके पूर्व जन्मों के संस्कार इसके योग्य होते हैं। इस सम्बन्ध की पौराणिक कथाओं से यह भी ज्ञान होता है कि कई ऐसे महात्मा हैं जो अमर हैं और जो पृथ्वी के प्रलयकाल तक जीवित रहेंगे। ऐसी बहुत सी सच्ची और झूठी बातें महात्माओं के सम्बन्ध में प्रचलित हैं और साधारण लोग बोलचाल में किसी भी साधु, फक्कड़, नंग-धड़ंग व्यक्ति को महात्मा कहने लग जाते हैं। पर वास्तव में ‘महात्मा’ का दर्जा बहुत ही ऊंचा है। ऐसे लोग बहुत कम देखने में आते हैं, जो वास्तविक महात्माओं के अस्तित्व और उनके कार्यों के विषय में यथार्थ ज्ञान रखते हों।
साधारण भाव से हम देखते हैं कि ऋषि, महात्माओं के वर्णन प्रत्येक जाति की वर्ग-पुस्तकों में पाये जाते हैं। प्रत्येक मजहब के संस्थापक प्रायः ऐसी ही प्राणी के जीव होते हैं। भिन्न-भिन्न देशों के इतिहासों को पढ़ने से भी पता चलता है कि वहाँ कभी ऐसे प्रभावशाली व्यक्ति हुए हैं, जिनको उस समय के साधारण मनुष्यों में नहीं गिन सकते! ऐसे लोग महात्मा या उनके द्वारा भेजे गये विशेष श्रेणी के आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न जीव होते हैं। महात्मा पद पर पहुँचने से मनुष्य जीव रूप से हटकर असली आत्म-स्वरूप में पहुँच जाता है। आत्मा का प्रधान स्थान अनुपादक लोक है। पर महात्मा के पद पर पहुँचते-पहुँचते उसमें ऐसी शक्तियाँ पूर्ण रूप से विकसित हो जाती हैं कि अनुपादक लोक से लेकर नीचे आत्म, बुद्धि, मानसिक, भुवः तथा भू जिस लोक में वह उतरना चाहे, उसी लोक के शरीर का वह अपनी इच्छा शक्ति से निर्माण कर सकता है और कार्य हो जाने पर पुनः शरीर का नाश भी कर सकता है। महात्मा लोग आवागमन के बन्धन से मुक्त रहते हैं अगर वे नीचे के लोकों में उतरते हैं तो उनका यह कार्य बिल्कुल स्वेच्छापूर्वक होता है। पर एक बात यह भी स्मरण रखनी चाहिए कि महात्मा लोग भिन्न-भिन्न लोकों में केवल खेल कूद अथवा तमाशा करने हेतु नहीं चढ़ते अथवा उतरते हैं। सबसे पहले नोट करने की बात तो यह है कि इस दर्जे पर पहुँचने पर ईश्वर की शक्ति के साथ उनका ऐक्य हो जाता है, इसलिए उनका आगे का जीवन केवल ईश्वर की इच्छा अर्थात् उसके विधान के अनुसार चलने के लिए होता है। भगवान की अनन्त लीला के भिन्न-भिन्न भागों को पूरा करने के लिए वे सज्ञान रूप से उस लीला के एक-एक अंग बन जाते हैं और अदृश्य रूप से ईश्वरीय विधान के अनुसार इस समग्र विश्व के विकास और संचालन में लगे रहते हैं।
मुख्य रूप से ये महात्मागण सात प्रकार के कार्यों से सम्बन्ध रखते हैं। इनमें से छः विभाग तो ऊपर के लोगों में अवस्थित हैं, पर सातवें विभाग का सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप से हमारी पृथ्वी से रहता है और उससे सम्बन्ध रखने वाले सभी महात्मा इसी पृथ्वी के किसी भाग में रहकर कार्य करते रहते हैं। ये ही संसार के सच्चे सद्गुरु हैं और वे अधिकारी मनुष्यों को शिष्य रूप में ग्रहण करके योग मार्ग और आवागमन से छूटने की प्रणाली का सदुपदेश करते हैं। पर किसी विशेष व्यक्ति से इनका साँसारिक तात्पर्य नहीं रहता। वे तो मनुष्यमात्र को सहायता देने और उनका उत्थान करने के निमित्त निर्वाण पद के अनन्त आनन्द को त्याग कर पृथ्वी के वातावरण में रहते हैं। इनका समस्त जीवन ही सेवामय होता है।
इन महात्माओं के विषय में एक ओर बात जान लेनी चाहिए कि ये अत्यन्त उदार भाव के होते हैं। हम लोगों की तरह जाति, देश अथवा धर्म का भेद-भाव इनमें नाममात्र को नहीं पाया जाता। ये मनुष्य मात्र के लिए नहीं होते हैं। जिस प्रकार प्रकाश, वायु, जल आदि मनुष्य के लिए एक हैं, वैसे ही यह महात्मा लोग भी मनुष्य मात्र के लिए एक भाव रखते हैं। फिर भी अपने-अपने कार्यों के संचालन की सुविधा के अनुसार वे भिन्न भिन्न स्थानों में आश्रम बनाकर रहते हैं। ऐसे आश्रम जगह-जगह समस्त संसार में वर्तमान हैं। पर भारतवर्ष ऐसे आश्रमों का प्रधान केन्द्र जान पड़ता है। ये बहुधा ऐसे निर्जन, अगम्य स्थानों में, पहाड़ों अथवा तराइयों में आश्रम बनाते हैं, जहाँ साधारण तौर से मनुष्य इनको नहीं पा सकते और इसके महत्वपूर्ण कार्यों में बाधा नहीं पहुँचा सकते। इससे ऐसा नहीं समझना चाहिए कि मनुष्यों के झंझटों को निपटाने के लिए ही तो ये अपने मोक्ष के आनन्द को त्यागकर पृथ्वी के साथ सम्बन्ध कायम रखते हैं। इनका इस प्रकार संसार में रहते हुए भी संसार से अलग रहना ठीक वैसा ही है, जैसा विशेष कार्य करते समय हमें अपने बच्चों को अलग रखना होता है। इस प्रकार अपने को अलग रखने यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम अपने बच्चों से प्रेम नहीं रखते अथवा उनके लिए कार्य करना नहीं चाहते। फिर इन महात्माओं के लिए तो ऐसा विचार और भी लागू नहीं होता। जिन लोगों को इनके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वे सभी एक स्वर से कहते हैं कि ये दया, प्रेम तथा सेवा के पूर्ण अवतार होते हैं।
संसार से अपने को अलग रखने और अपने स्थूल शरीर द्वारा संसार के मध्य में प्रकट न होने का एक प्रधान कारण यह भी हैं कि क्रियाशक्ति द्वारा ये अपने लिए जिन-जिन स्थूल शरीरों का निर्माण करते हैं, वे अत्यन्त पवित्र, कोमल और सूक्ष्म उपतत्वों के बने हुए अत्यन्त प्रभावशील होते हैं। इस संसार के रात-दिन के प्रतिकूल कन्पों से उन शरीरों का शीघ्र ही नाश हो सकता है पर उनका ध्यान केवल अपने स्थूल शरीरों को संभालने और उनकी रक्षा करने में ही नहीं लगा रहता। इसलिए अपने महान कार्यों के संचालन के ख्याल से ही वे अपने स्थूल शरीरों को साधारण साँसारिक वातावरण से बचाकर रखते हैं। फिर भी ऐसी बात नहीं हैं कि वे कभी अपने स्थूल शरीर को संसार में लाते ही न हों। ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जब उन्होंने अपने स्थूल शरीरों को मनुष्यों के मध्य में उतारा है। पर ऐसा कभी-कभी ही होता है। साधारणतः वे वासना देह अथवा मानसिक शरीरों द्वारा ही मनुष्यों से सम्बन्ध रखते हैं। इन्हीं सूक्ष्म शरीरों द्वारा ही वे संसार में जहाँ कहीं आवश्यकता होती है वहीं बात की बात में पहुँच जाया करते हैं। अगर कहीं स्थूल रूप में प्रकट होना आवश्यक हुआ तो यह भी उनके लिए बिलकुल साधारण बात है। वे फौरन वहीं पर एक नया स्थूल शरीर बनाकर प्रकट हो जाते हैं और कार्य समाप्त होने पर उसका वहीं विनाश भी कर देते हैं। इस प्रकार अपने असली स्थूल शरीर को सदा व्यवहार करने की आवश्यकता नहीं रहती। इस भाँति वे अपने स्थूल शरीरों को स्वास्थ्यकर वातावरण में रखकर, उन्हें कई सौ क्या कई हजार वर्षों तक कायम रख सकते हैं।
इन महात्माओं के अस्तित्व, निवास तथा कार्य आदि के सम्बन्ध में इस समय के अनेक जीवित मनुष्यों की साक्षियाँ मौजूद हैं। उनके कई शिष्य आजकल संसार में वर्तमान हैं, जिन्होंने उनसे दीक्षा ग्रहण की हैं और जो उनके आश्रमों में भी हो आये हैं। पर इसका विवरण देने से यह लेख लम्बा हो जायगा। यदि आवश्यकता हुई तो किसी आगामी लेख में इस सम्बन्ध में अन्य बातों पर प्रकाश डाला जायगा, जिससे विदित हो सकेगा कि वास्तव में ऐसे ‘महात्मा’ कौन हैं, कहाँ रहते हैं और उनसे प्रेरणा पाकर वर्तमान महापुरुष किस प्रकार जगत का कल्याण साधन कर रहे हैं।
(श्री नारायण स्वामी)
वर्तमान समय में इस सम्बन्ध में अनेक परस्पर विरोधी मत प्रचलित हो गये हैं कि समाज की शासन व्यवस्था किस प्रकार की रहे। अब से कुछ सौ वर्ष पहले तक तो संसार में एक यही शासन प्रथा प्रचलित थी कि सब प्रकार के अधिकार तथा शक्ति राजा के हाथ में रहे और वही समाज को पूर्ण रूप से अपने नियन्त्रण में रखे। उस समय शासन का अच्छा या बुरा होना राजा के व्यक्तित्व पर निर्भर था। अगर राजा सदाशय तथा योग्य हुआ तो प्रजा सुखी रहती थी और अगर वह अयोग्य और दुष्ट स्वभाव का हुआ तो लोगों की दुर्गति होती थी और राष्ट्र पतन की ओर जाने लगता था। इसलिए विचारशील लोग राजा के विरोधी हो गये और प्रजातन्त्र का समर्थन करने लगे। फिर प्रजातन्त्र में गुटबन्दी और थोड़े से प्रभावशील लोगों का बोलबाला देखकर उसका भी विरोध किया जाने लगा और बकुनिन तथा मार्क्स ऐसे पश्चिमी समाजवादी विचारक सब प्रकार के राज्य अथवा शासन को ही बुरा बतलाने लगे और अनेक देशों में राज्य को जड़-मूल से ही नष्ट करने की कोशिश भी की गई।
पर यह सिद्धान्त भारतीय विचारधारा के अनुकूल नहीं है। यहाँ के सामाजिक विधान में राज्य को तक अनिवार्य संस्था ठहराया गया है। साथ ही यह ही स्पष्ट है कि भारतीय विचारकों ने समाज के नियंत्रण की जो व्यवस्था निश्चित की थी वह योरोप की तरह संघर्ष उत्पन्न करने वाली और क्राँतियों को जन्म ने वाली भी नहीं थी। सन् 1933 में फैसिष्ट इटली में 22, और सोवियत रूस में 46 प्रकार के व्यापार संघ थे। पर भारतीय समाज व्यवस्था में केवल चार प्रकार के संघ ही रखे गये हैं। एक शिक्षा सम्बन्धी अथवा ब्राह्मण, दूसरा प्रबन्ध सम्बन्धी अथवा क्षत्रिय, तीसरा धनोत्पादन सम्बन्धी या वैश्य और चौथा शारीरिक परिश्रम सम्बन्धी या शुद्र। इन चारों श्रेणियों के कार्यों को मर्यादा के भीतर रखने के लिए एक मुख्य व्यवस्थापक सभा होती थी जो चारों संघों या वर्णों के प्रतिनिधियों से बना करती थी। उसका एक मुख्य प्रधान (राजा) निर्वाचित होता था, जो व्यवस्थापक सभा की सहायता से कार्य संचालन करता था। इस पद्धति के अनुसार बने राज्य को मानव राज्य कहा जाता था। जिस प्रकार किसी भी छोटे समूह या समुदाय को नियन्त्रण में रखने के लिए मुखिया की जरूरत होती है, उसी प्रकार देश में उत्तम व्यवस्था बनाये रखने के लिए एक राजा की आवश्यकता होती है, फिर उसे आप चाहे राजा कहें या सभापति कहें। राजा से घृणा तो तब होने लगी जब वे प्रजा के अनुकूल काम न करके स्वेच्छाचारी बन गये और लोगों पर अत्याचार करने लगे। ऐसी दशा में आवश्यकता इस बात की थी कि राजा की इस निरंकुशता को दूर करके फिर राज्य संस्था का सुधार कर लेते। पर इसके बजाय वर्गवादियों ने राज्य संस्था को ही समाप्त करने का नारा बुलन्द कर दिया, जो समाज के लिए किसी दशा में उपयुक्त नहीं कहा जा सकता।
भारतवर्ष में प्राचीन काल में जो शासन या राज्य व्यवस्था थी उसकी प्रशंसा अनेक विदेशी विद्वानों ने भी जो खोलकर की है। सर चार्ल्स मेटकाफ ने लिखा है कि भारतवर्ष में जो पंचायतें थीं, वह छोटे-मोटे प्रजातन्त्रीय राज्यों की ही तरह थी। वे उन सब बातों का प्रबन्ध करती थीं जिनकी गाँवों को जरूरत हुआ करती है। एक दूसरे लेखक सर जार्ज बर्डवुड ने लिखा हैं कि “हिन्दुस्तान में सबसे अधिक धार्मिक और राजनैतिक क्राँतियाँ हुई हैं, पर ग्राम-पंचायतें अपना काम सदैव बिना रुकावट के करती रहीं। सिथियन, यूनानी, अफ़गान, मंगोल आदि अपने पहाड़ी इलाकों से आकर आक्रमण करते रहे, इसी प्रकार पोर्तुगीज, डच, अंग्रेज, फ्राँसीसी अपने-अपने समुद्रों से आये और इस देश के कुछ भागों के शासक बन गये, पर ग्रामों के धार्मिक, और व्यापार संघों पर उनके आने और जाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे एक चट्टान की तरह, ज्वार भाटे के उतार और चढ़ाव से अप्रभावित रहे।
हिन्दू राज्य की आदर्श नीति यह थी कि ग्राम-पंचायतें तथा अन्य राज्य-संस्थाएं, सर्व साधारण के कार्यों में कम से कम हस्तक्षेप करती थी। शासक संस्था का काम जान माल की रक्षा और मालगुजार वसूल करने तक ही सीमित था। राजनैतिक और सामाजिक संस्थाओं की सीमाएं पृथक-पृथक थीं, परन्तु दोनों जनता के लाभजनक कार्यों में एक दूसरे को सहयोग देती थीं। पश्चिमी देशों में इसके विपरीत पहले राज्य, समाज का एजेन्ट होता था और फिर उसका मालिक बन गया। परन्तु हमारे देश में राजा केवल राज्य का सरदार हुआ करता था, समाज संस्था पर उसका शासन नहीं होता था। इंग्लैण्ड आदि देशों में भी स्थानीय संस्थाएं काम करती हैं, वे कुछ अंशों में हमारी पंचायतों की तरह हैं, पर एक तो वे खर्च बहुत ज्यादा करती हैं और दूसरे वे राज्य की ही बनाई होती हैं। परन्तु प्राचीन भारत में पंचायतें स्वतन्त्र थीं और राज्यों का संगठन और विकास उन्हीं के प्रभाव से हुआ करता था। इनका सम्बन्ध अप्रत्यक्ष रूप में केन्द्रीय शासन तक से होता था। एक समय इनके संगठन और प्रभाव से इतना बड़ा साम्राज्य बना था जो अंग्रेजों द्वारा स्थापित किये हुये भारतीय राज्य या इण्डियन एम्पायर से भी बड़ा था, क्योंकि अफगानिस्तान और मैसूर तक उसमें सम्मिलित थे।
यह समझना भूल है कि प्राचीन भारत में जंगल ही जंगल थे। यहाँ प्राचीन काल में खेती के योग्य उत्तम भूमि की इतनी अधिकता थी कि अन्न की कमी कभी नहीं हो पाती थी। तरह-तरह के व्यापार भी देश भर में होते थे और अनेक प्रकार के कला कौशल के काम भी जारी थे। एक जगह के माल को दूसरी जगह पहुँचाने के लिए सड़कें और व्यापार पथ बने थे, जिनके किनारे थोड़े-थोड़े अन्तर पर धर्मशालाएं थी। सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगे थे। अनेक जगह बड़े-बड़े शहर आते थे। सिकन्दर की चढ़ाई के वर्णन में उस समय के लेखकों ने लिखा है कि केवल पंजाब में ही 2000 शहर थे।
यहाँ तक कि मुसलमानी काल में, जो अत्यन्त अशाँति और हलचल का युग माना जाता है, हिन्दू भारत की प्राकृतिक, मानसिक, आचार सम्बन्धी उन्नति में कोई रुकावट नहीं पड़ी। मुसलमान शासकों का शासन राजधानी या बड़े-बड़े नगरों तक ही सीमित रहता था। इस युग में भी हिन्दू संस्कृति बराबर उन्नति करती रही और उसका विस्तार अधिक होता गया। मुसलमानी आक्रमण और शासन के समय में ही भारत में हजारों सन्त, महात्मा, विद्वान, लेखक तथा समाज के संगठनकर्त्ता उत्पन्न हुए जिनका नाम हम आज तक लेते हैं और जिनका वर्तमान समय में हिन्दू समाज पर गहरा प्रभाव है।
उपर्युक्त प्राचीन राज्य व्यवस्था पर दृष्टि डालने से यह बात सिद्ध हो जाती है कि वह बड़ी लाभजनक और प्रभावशाली व्यवस्था थी। प्रत्येक ग्राम और नगर अपने-अपने कार्यों में पूर्ण स्वतन्त्र थे और अपने यहाँ के निवासियों के कल्याण के कार्य किया करते थे। आजकल के वर्गवादी जिस समाज के निर्माण का आदर्श दुनिया के सामने रखते हैं उससे कहीं बढ़कर यह प्राचीन भारतीय समाज था।
(श्री लक्ष्मीनारायण बी. ए.)
किसी लक्ष्य को सामने रखकर विशेष संकल्प के साथ लक्ष्य सिद्धि के अर्थ किये जाने वाली क्रिया विशेष का नाम व्रत है। व्रत प्रकृति और निवृत्ति भेद से दो प्रकार के और नित्य-नैमित्तिक-काम्य भेद से तीन प्रकार के होते हैं।
द्रव्य विशेष भोजन तथा पूजन के द्वारा अन्य व्रत प्रवृत्ति मूलक और केवल उत्पन्न आदि द्वारा साध्य व्रत निवृत्ति मूलक हैं। ये दोनों ही प्रकार के व्रत पुनः लक्ष्य भेद से तीन प्रकार के होते हैं यथा नित्य, नैमित्तिक और काम्य।
एकादशी आदि व्रत जिनके न करने से प्रत्यवाय होता है उन्हें नित्य व्रत कहते हैं।
पापक्षय आदि निमित्त को लेकर अनुष्ठित चान्द्रायण आदि व्रत नैमित्तिक हैं।
किसी विशेष तिथि में अनुष्ठित सावित्री व्रत आदि-ऐसे व्रतों को काम्य व्रत करते हैं।
इस प्रकार धर्म शास्त्रों में व्रत के विभिन्न भेद कहे गये हैं। इसके अतिरिक्त कायिक और मानसिक भेद से भी व्रत के दो भेद होते हैं।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य ये सब मानस व्रत हैं, तथा दिवा रात्रि उपवास या अशक्त पक्ष में रात्रि को भोजन, अयाचित रूप से रहना आदि व्रत कायिक हैं। व्रत, उपवास, नियम तथा शारीरिक तप के द्वारा सभी वर्ण के मनुष्य पापमुक्त होकर पुण्य प्रभाव से उत्तम गति लाभ करते हैं।
शुक्ल पक्ष की विभिन्न तिथियों को चन्द्रमा की विभिन्न कलाओं का प्रभाव पृथ्वी और जीवों पर चन्द्रमंडल द्वारा और कृष्णपक्ष की विभिन्न तिथियों को सूर्य मंडल द्वारा पड़ा करता है। इसके अतिरिक्त नक्षत्र-लोक आदि का भी प्रभाव पड़ा करता है। इसी कारण उपवास द्वारा शरीर को सम्भालना और इष्ट पूजन द्वारा मन को सम्हालना इन व्रत विधाओं का मुख्य रहस्य, उद्देश्य और वैज्ञानिक आधार है।
व्रतों का वर्णन करके, विवेचन करके अब उनकी महिमा तथा उपयोगिता पर विचार किया जाता है।
विधि पूर्वक व्रतानुष्ठान होने पर शरीर मन, बुद्धि तीनों का अथवा आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक त्रिविध कल्याण होता है।
(1) व्रतों से आधिभौतिक लाभ :-
काम, क्रोध, लोभ, मोह की वृत्ति मनुष्यों में स्वाभाविक होने के कारण पाचन शक्ति से अधिक भोजन मनुष्य प्रायः कर लेता है। वही अन्न अपच उपजाता हुआ अनेक प्रकार की व्याधियों का घर बन जाता है।
व्रत के पूर्व दिन, व्रत के बीच में या एकादशी आदि व्रतों में जो उपवास, फलाहार, लघु आहार या आहार संयम की विधियाँ हैं उनसे अनायास ही पाकयन्त्र को विश्राम मिल जाता है तथा अपक्व अन्न पचकर शरीर को स्वस्थ बना देता है।
अनेक भारतीय और विदेशी चिकित्सकों ने भी विभिन्न चिकित्साओं से थककर शारीरिक निरोगिता के लिये उपवास चिकित्सा की ही सबसे अधिक महिमा बताई है।
फिर अनियमित स्वभाव उद्दाम बनकर वे लगभग घोड़े की तरह मनुष्य को विविध प्रकार की विपत्तियों के खड्डे में डाल देता है। व्रत की विधियों में आहार-विहार का ऐसा सुन्दर नियम रख दिया गया है कि उससे उद्दाम प्रवृत्तियाँ स्वयं ही नियन्त्रित हो जाती हैं तथा मनुष्यों को क्रमशः उन्नत बनाकर आध्यात्मिक पथ में सुप्रवृत्त कर देती हैं।
(2) व्रतों से आधिदैविक लाभ :-
नित्य, नैमित्तिक, काम्य सभी प्रकार व्रतों में ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय और मन का संयम तथा विविध प्रकार तपस्याओं का विधान करें। फिर समस्त संयम या तप निष्काम भाव से अनुष्ठित होने पर आत्मोन्नति का कारण बनता है और सकाम भाव से अनुष्ठित होने पर विविध विभूतियों को प्रदान करता है यह सर्वविदित है।
आँखों के संयम करने वाले “दिव्य नेत्र” बनते हैं, वाक्संयमी, वाकसिद्ध या सुवक्ता बनते हैं।
इस तरह संसार में जितनी प्रकार की दैवी विभूतियाँ देखी जाती हैं, सभी तपस्याओं के फल से उपलब्ध हैं।
अनेक प्रकार की दिव्य औषधियाँ, चिकित्सा, विद्या आदि दैवी विभूतियाँ-तपस्या के ही बल से प्राप्त होती हैं। जो कुछ दुस्तर, दुष्प्राप्य, दुर्लभ या दुष्कर हैं- वह सब तपस्या के द्वारा ही सिद्ध होता है।
सुन्दर वस्त्र, अलंकार, विद्या, अधिकार, उत्तम खान-पान सभी कुछ तपोबल से ही प्राप्त होते हैं। नित्य, नैमित्तिक, काम्य तीनों व्रतों में ही दैवी विभूति प्रदानकारी ऐसे अनेक तपों के विधान देखने में आते हैं।
देव पूजा सकाम हो या निष्काम हो, विधिपूर्वक होने से आधिदैविक लाभ बहुत कुछ हो जाता है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं हैं। इष्ट की प्रसन्नता से आधिभौतिक धन-सुखादि प्राप्ति के साथ-साथ आधिदैविक सिद्धियाँ भी बहुत कुछ मिलती हैं। इष्ट में तन्मयता द्वारा उनकी सर्व-शक्तिमत्ता का अंश साधक को अवश्य ही मिल जाता है।
उनके दिव्य गुणों का प्रभाव भी साधक को अति उच्चकोटि का महात्मा बना देता है। भक्त साधक इष्टदेव के शक्ति सागर में अवगाहन स्नान करता हुआ शरीर, मन, प्राण, आत्मा सभी को आप्लावित तथा भरपूर बना लेता है।
यही सब व्रतों से आधिदैविक लाभ हैं।
(3) व्रतों से आध्यात्मिक लाभ :-
हमारे धर्म ग्रन्थों में व्रतोपवास सम्बन्धी जिन अनुष्ठानों का विधान है, उनसे आत्मा का प्रचुर कल्याण होता है यह तो निर्विवाद है।
बाह्येंद्रियों और अन्तरिन्द्रियों का संयम, यम-नियम-ब्रह्मचर्य-सदाचार-सात्विक आहार-विहार यह सब व्रत के प्राण हैं। इनके पालन किये बिना व्रत में सफलता कभी हो नहीं सकती, साथ ही यही सब अनुष्ठान आध्यात्मिक उन्नति के भी मूल-मन्त्र हैं।
जिस प्रकार तपाने पर सोने का मल निकल जाता हैं, उसी प्रकार तपस्या अग्नि के द्वारा शरीर मन को तपाने पर उनका मल दूर होकर वे निरन्तर, निर्मल बन जाते हैं तथा निर्मल अन्तःकरण में ही आत्मिक ज्ञान ठहर सकता है।
नित्य, नैमित्तिक, काम्य तीनों व्रतों में ही प्रायश्चित आदि कितने ही शरीर मन तपाने के विधान हमारे महर्षियों ने किये हैं, जिनके द्वारा अन्तःकरण निर्मल होकर आत्माभास ग्रहण के योग्य हो जाता है।
फिर आहार निवृत्ति से विषय निवृत्ति होती है और विषय निवृत्ति ही मुक्ति का द्वार है।
विषयासक्त मन बन्धन का और विषय शून्य मन मोक्ष का कारण है।
व्रतों में निराहार, स्वल्पाहार का विशेष विधान है। अतः व्रतों में आहार निवृत्ति द्वारा विषय निवृत्ति करके मुक्तिपथ प्रशस्त करने के उपाय बताये गये हैं- यही सिद्ध होता है।
एकाग्र चित से इष्ट ध्यान तथा इष्ट जप करना प्रत्येक व्रत में विशेष रूप से विहित है।
“तत्र प्रत्ययैक तानताः ध्यानम्”, ध्यानात् प्रत्यक्षमात्मनः”
इष्ट में चित्त के एक ज्ञान हो जाने का नाम ध्यान है। उससे आत्मा प्रत्यक्ष हो जाती है।
ध्यान के द्वारा ध्येय में चित्त निविष्ट होता है। अनुराग तथा प्रेम भक्ति पूर्वक निविष्ट चित्त से ध्येय देव का ध्यान करते-करते देवता का दर्शन होता है।
इष्टदेव के दर्शन से समस्त पाप घट जाता है और अन्तःकरण निर्मल होकर स्वरूप में स्थित हो जाता है।
ध्यान के अन्त में ध्याता और ध्येय की एकता होने पर समाधि लग जाती है और समाधि में अन्तःकरण परमात्मा में विलीन हो जाने पर आनन्दमय आत्मा का निरतिशय असीम आनन्द मिलने लगता है।
“सुखमात्यान्तिकं यत्तद् बुद्धि ग्राह्ममतीन्द्रियम्। यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।”
“वह असीम आनन्द इन्द्रियों से अतीत, योग बुद्धि से अनुभव करने योग्य है, इसके पाने से साँसारिक कोई भी वस्तु इससे अधिक उत्तम नहीं मालूम पड़ती है।”
यही मनुष्य जन्म का अन्तिम सर्वोत्तम प्राप्तव्य पदार्थ है। व्रत का आध्यात्मिक लाभ में उपासना परायण व्रती को यही अनोखा लाभ मिलता है। इस प्रकार व्रतानुष्ठान द्वारा आधिभौतिक, आधिदैविक आध्यात्मिक, त्रिविधि कल्याण प्राप्त होते हैं।
ऊपर वर्णित त्रिविधि कल्याण आदि के अतिरिक्त व्रतों से अनेक प्रकार की जीवनोपयोगी-शिक्षा भी प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ :- देवाधिदेव महादेव के भण्डारी-कुबेर और गृहिणी-अन्नपूर्णा हैं। किन्तु फिर भी वे भिक्षा ही माँगते रहते हैं। अन्नपूर्णा का अन्न और कुबेर का धन वे विश्व में ही बाँट देते हैं- इसीलिए वे महान् हैं।
महाशिवरात्रि व्रत का उत्सव करते समय हमारे भीतर भी यही महान् भाव आना चाहिये कि सत्पुरुषों की समस्त सम्पत्ति परोपकार के लिये ही होती है।
यही व्रतोत्सव का अपूर्व, अलौकिक तत्व है।
(डॉ. सतीशचन्द्रदास गुप्त)
मनुष्य के शरीर का पालन पोषण और उसकी वृद्धि भोजन द्वारा ही हो सकती है। पर न तो सब प्रकार के भोजन शरीर को एक समान ही पोषण देते हैं और न सब प्रकृतियाँ के व्यक्तियों के लिए हर एक भोजन लाभकारी ही हो सकता है। इसलिए आहार शास्त्री बहुत वर्षों से मनुष्यों तथा मनुष्य से मिलते अन्य प्राणियों पर विभिन्न खाद्य पदार्थों का प्रयोग करके इस बात का पता लगाते रहते हैं कि किस में क्या विशेषता है और कौन-कौन तत्व पाये जाते हैं। भोजन के पदार्थों में आजकल निम्नलिखित 5 पदार्थ मुख्य रूप से पाये जाते हैं- (1) प्रोटीन, (2) कार्बोहाइड्रेट अथवा श्वेतसार, (3) खनिज लवण, (4) विटामिन, (5) जल।
इन सब के अतिरिक्त चरबी भी एक ऐसा पदार्थ है जिसकी शरीर को बहुत आवश्यकता होती है। पर मानव शरीर के भीतर श्वेतसार से स्वयं ही चर्बी तैयार हो जाती है। वैसे अगर हम वैज्ञानिक प्रयोगशाला में रासायनिक विधि से श्वेतसार को चर्बी के रूप में बदलना चाहें तो यह सम्भव नहीं होता, पर शरीर की सजीव प्रयोगशाला में यह कार्य हो जाता है। शरीर के भीतर खाद्य-पदार्थों में जीवित कोषों या सेलों के प्रभाव से, कई प्रकार के रासायनिक परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों द्वारा अनाज, दाल, तरकारी आदि जो कुछ हम खाते हैं वे देह को बनाने वाली भिन्न-भिन्न वस्तुओं के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इन परिवर्तनों को सामूहिक रूप में आत्मीकरण (मेटाबॉलिज्म) कहते हैं। यह आत्मीकरण चार भागों में बाँटा जा सकता है :-
1- शरीर की रचना या शरीर गठन करने वाली वस्तुओं की रचना के लिए।
2-शरीर की मरम्मत या दुरुस्त रखने के लिए।
3-शरीर की भीतरी क्रियाओं के लिए शक्तिदायक वस्तु पहुँचाने के लिए।
4-शरीर की बाहरी क्रियाओं के लिए शक्तिदायक वस्तु पहुँचाने के लिए।
अगर हम 1, 2, 4 नम्बर के परिवर्तनों या आत्मीकरण को छोड़ दें, अर्थात् यदि हम शरीर की रचना, मरम्मत करना छोड़ दें तो सिर्फ 3 नम्बर वाला परिवर्तन, अर्थात् शरीर की भीतरी क्रियाओं के लिए शक्ति पहुँचाने का काम रह जाता है। सिर्फ शरीर के इस भीतरी कार्य के लिए जितनी शक्ति की जरूरत पड़ती है उसे मूल आत्मीकरण कहते हैं। इस मूल-आत्मीकरण की मात्रा जानने के लिए हमको यह पता लगाना होगा की अनशन या उपवास के समय बिना कोई काम करते हुए सिर्फ जीवित रहने में कितनी शक्ति खर्च होती है। भोजन करने पर आत्मीकरण (शक्ति का व्यय) की मात्रा बढ़ जाती है। इसी प्रकार शारीरिक परिश्रम करने से भी आत्मीकरण बढ़ जाता है। रात भर सोने के बाद जब मनुष्य जगता है और बिछौने पर पड़ा रहता है और कोई विशेष बात नहीं सोचता रहता, तो उस समय आत्मीकरण की मात्रा सबसे कम रहती है इसी को मूल आत्मीकरण कहते हैं।
जो आदमी उपवास करता है वह पहले अपने शरीर में सज्जित शक्कर या श्वेतसार पर जीवित रहने के लिए निर्भर करता है। इस चीनी के खत्म हो जाने पर वह चर्बी पर निर्भर करने लगता है। पर शरीर के इंजिन में केवल शक्कर या चीनी के जलाने से ही काम नहीं चल सकता, जीवन-क्रिया के जारी रहने के लिए कुछ प्रोटीन का जलना भी जरूरी है। इसलिए अनाहार या उपवास के समय श्वेतसार, चर्बी और कुछ प्रोटीन जलती रहती है। चर्बी का भंडार जिस मात्रा में खाली होता जाता है उसी मात्रा में प्रोटीन अधिक खर्च होने लगती है। जब चर्बी बिलकुल खत्म हो जायगी तो शरीर का कार्य केवल प्रोटीन को खर्च करके चलता है, इसका अर्थ है कि उस समय मनुष्य के शरीर का माँस, हड्डी और चमड़ा खर्च होता रहता है। अनशन के समय अंगों का उपयोग या क्षय एक निश्चित प्राकृतिक नियम के अनुसार होता है। पहले कम आवश्यक अंग क्षय होते हैं। उसके बाद उससे कुछ अधिक आवश्यक अंगों के ऊपर हाथ लगता है। सब के अन्त में नितान्त आवश्यक अंग काम में आते हैं इसके बाद जब जीवन के सबसे प्रधान अंगों पर हस्तक्षेप होने लगता है तो मृत्यु हो जाती है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवन के लिए भोजन आवश्यक है और अगर शरीर को बाहर से भोजन नहीं मिलेगा तो वह अपने भीतर के पदार्थों को ही खाद्य रूप में व्यवहार करते हुए जितने दिनों तक चलना उसके लिए संभव होगा उतने दिन तक चलायेगा।
इस प्रकार मूल आत्मीकरण (बैसल मेटाबॉलिज्म) को जान लेने पर हम इस बात का पता लगा सकते हैं कि इस शरीर रूपी इंजिन से अगर जरा भी काम न लेकर यों ही बेकार चलने दिया जाय तो नित्यप्रति इसके लिए कितने ईंधन (ताप उत्पन्न करने वाले खाद्य पदार्थ) की आवश्यकता पड़ती है। अब वैज्ञानिकों के इस तरह खर्च होने वाले ताप और उसके लिए आवश्यक भोजन का एक मोटा हिसाब तैयार कर लिया है। शारीरिक ताप की सबसे छोटी मात्रा का नाम उन्होंने ‘कैलोरी’ रखा है और यह बतलाया है कि करीब एक सेर पानी को एक डिग्री गर्म करने में एक घण्टे में जितना ताप खर्च होता है वह एक कैलोरी है। एक पूरा नौजवान आदमी जिसकी ऊँचाई और मोटाई मध्यम दर्जे की है वजन में लगभग 70 सेर होगा और इस 70 सेर वजन को पूर्ण निष्क्रिय अवस्था में ताप देने के लिए अथवा जीवित रखने के लिए प्रति घण्टे 70 कैलोरी ताप खर्च होगा, जिसका परिणाम 24 घण्टे में 1680 कैलोरी हो जायगा। अगर आदमी नाटा या दुबला पतला होगा तो उसका खर्च इसी हिसाब से कम होगा।
ताप की यह मात्रा तो शरीर की भीतरी क्रियाओं के लिये शक्तिदायक वस्तु पहुँचाने के लिये हुई। अब हम जो काम धंधा करते हैं उसमें जो परिश्रम करना पड़ता है उसके लिये खर्च होने वाला ताप इससे भिन्न है। जाँच करने वालों के कई प्रकार के पेशों को करने वाले व्यक्तियों के परिश्रम की जाँच करके वह निश्चित किया है कि उन पेशों में प्रति घंटा ताप की कितनी मात्रा या कैलोरी खर्च होती है। इनका बतलाया हिसाब इस प्रकार है :-
दर्जी-44, दफ्तरी-51, मोची 90, लोहा घिसने वाला कारीगर 141, पालिश का काम करने वाला 145, बढ़ई 146, लकड़ी चीरने वाला 378।
इस सूची से मालूम हो जाता है कि किस पेशे में कितना परिश्रम पड़ता है और उसके लिये कितनी कैलोरी प्रति घंटे या प्रतिदिन खर्च होती हैं। जैसे अगर एक बढ़ई प्रति दिन आठ घंटा काम करता है तो 1 घंटा में 146 कैलोरी के हिसाब से वह प्रति दिन 146&8=1168 कैलोरी खर्च करेगा। उस आदमी का वजन अगर डेढ़ मन या 60 सेर हो तो 60+24=1440 कैलोरी ताप उसके मूल आत्मीकरण में खर्च होगा। इसके सिवाय चलने, फिरने, बैठने-उठने का काम भी वह कुछ न कुछ अवश्य करेगा और उसमें भी कुछ शक्ति अवश्य खर्च होगी। इस प्रकार सब बातों पर विचार करने से यह अनुमान लगाया जाता है कि एक आदमी को साधारण रूप से जीवित रहने और जीवन निर्वाह का कोई पेशा करने के लिये इतने भोजन की आवश्यकता है जो प्रति दिन 3000 कैलोरी ताप उत्पन्न कर सके।
अब प्रश्न होता है कि हम इस बात का निर्णय किस प्रकार करें कि शरीर के भीतर इतना ताप उत्पन्न करने के लिए उसके भीतर कितना भोजन रूपी ईंधन डालना आवश्यक है। वैज्ञानिकों ने बहुत कुछ जाँच पड़ताल करके यह निश्चय कर दिया है कि भोजन के किस पदार्थ के एक छटाँक या एक औंस वजन से कितना कैलोरी ताप उत्पन्न होता है। साथ ही शरीर को जिन प्रोटीन, चर्बी, खनिज लवण, विटामिन आदि विभिन्न पदार्थों की आवश्यकता है, वे भी ठीक हिसाब से मिलते रहें, इसका भी ध्यान रखना आवश्यक है। प्रत्येक पदार्थ में पाये जाने वाले उपर्युक्त पदार्थों और उनसे उत्पन्न होने वाले ताप की एक सूची बना दी गई है जो आहार-शास्त्र की पुस्तकों में देखी जा सकती है।
(श्री अगरचन्द नाहटा, सं. जैन जगत)
विश्व विविधताओं का भंडार है। जगत के सारे व्यवहार सापेक्ष होते हैं, इसलिये बहुत सी बातों के सम्बन्ध में एक ही कार्य के लिए विधि निषेध के वाक्य शास्त्रों में मिलते हैं। एक दृष्टिकोण से एक कार्य ठीक है तो दूसरे व्यक्ति, परिस्थिति और दृष्टि से वह ठीक नहीं मालूम होता। अपितु उसके ठीक विरोधी कार्य की वहाँ उचितता होती है। योगी और भोगियों का मार्ग अलग 2 है। देह और आत्मा भिन्न पदार्थ हैं। भोगी का लक्ष्य बहिर्जगत की ओर होता है, तो योगी का अंतर्जगत की ओर। बहुत सी बातें जो बहिर्मुखी प्राणियों के लिये जरूरी होती हैं, अन्तर्मुखी के लिये वे त्याज्य हैं। सापेक्ष दृष्टि से ही विचार कर उसे विवेकपूर्वक जीवन में स्थान देना चाहिये।
मनुष्यों की रुचि, प्रकृति, आकृति, भाषा, ध्वनि, परिस्थिति भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। अतः सभी बातें सब के लिये एक–सी लागू नहीं की जा सकतीं। तत्वज्ञों ने इसलिए धर्म के भिन्न-भिन्न मार्ग प्राणियों की योग्यता, रुचि व परिस्थितियों को देखते हुए बतलाये हैं। जिनको जिस पथावलम्बन से शान्ति, सुख, आनन्द और अभ्युदय प्राप्त हो उनके लिये वही मार्ग प्रशस्त है। बालक अवस्था में जो बातें उसके लिये उचित हैं वही यौवन और वृद्धावस्था में अनुचित हो जाती हैं। सर्दी के मौसम में मोटा कपड़ा पहिनना आवश्यक है, पर गर्मी में यह प्रतिकूल हो जाता है। इसलिए प्रत्येक पग व डग पर विवेक की आवश्यकता होती है।
साधारणतया लोक व्यवहार को सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिये तीव्र स्मरण शक्ति की आवश्यकता होती है। अच्छा और बुरी बातें और घटनायें दीर्घकाल तक याद रखना आवश्यक हो जाता है। विगत अनुभवों के थपेड़ों से मनुष्य बहुत शिक्षा पाकर आगे बढ़ता है अतः एक दूसरे के सम्बन्ध, व्यवहार, लेन-देन आदि की याददाश्त जरूरी होती है। धार्मिक व्यक्तियों को भी शास्त्रों को याद रखना जरूरी होता है। विस्मरणशील मनुष्य अच्छा नहीं समझा जाता, पर एक स्थिति जीवन में ऐसी भी आती है, जिसमें सब बातों को भूल जाना ही कल्याणकारी माना जाता है।
पूर्वकालीन घटनाओं की स्मृति और प्राणियों के साथ घटित व्यवहारों से राग-द्वेष उत्पन्न होता है। अपने प्रियजनों के व अनुकूल प्रसंगों की स्मृति से राग-भाव बढ़ता है और विरोधी व प्रतिकूल व्यक्ति व घटनाओं की स्मृति से द्वेषभाव जागृत हो जाता है। इसलिए वीतराग वृत्ति के इच्छुक पुरुषों के लिये अनुकूल और प्रतिकूल सभी बातें विस्मरण योग्य हो जाती हैं। जो होना था हो गया, उसे याद कर राग-द्वेष का उदय करना बन्धन का हेतु है। समय-समय पर परिस्थितिवश अनेकों व्यक्तियों से प्रेम और द्वेष हो जाता है, पर जब आध्यात्मिकता की ओर कदम बढ़ाया जाता है तो समस्त जगत के साथ स्नेह और द्वेष के बन्धन समाप्त कर देने आवश्यक हो जाते हैं। महापुरुषों के सन्देशों को स्मरण रखना उपयोगी है। ताकि जीवन में उनसे सतत् प्रेरणा मिले, पर एक स्थिति ऐसी भी होती है, जब चित्त “सम” हो जाता है तो उसे किसी चीज की विचारणा व स्मृति नहीं रह जाती। संकल्प-विकल्प, ऊहापोह, चित्त की चंचलता के द्योतक हैं। उससे ऊपर की स्थिति है “निर्विकल्प समाधि”। वहाँ पूर्ण समता और शान्ति प्राप्त होकर जीवनमुक्त स्थिति की दशा बरतने लगती है, उसके लिये सब को “भूल जाओ” यही सुगम व प्रशस्त पथ है। पहले बुरे को भूले, फिर अच्छे को। यदि स्मरण शक्ति बढ़ाना श्रेष्ठ गुण है तो ‘भूल जाना’ उससे भी ऊँची और श्रेष्ठ स्थिति है।
हमारा जीवन भूतकाल की घटनाओं, परिस्थितियों एवं चेष्टाओं से आच्छादित रहता है। उनके संस्कार अंतर्मन में गहराई तक घुसे रहते हैं। यही संस्कार जन्म-जन्मान्तरों तक राग और द्वेष के कारण बनकर भव बन्धनों में जकड़े रहते हैं और प्राणी बार-बार जन्मता मरता रहता है। अतीत को विस्मृति के गर्त में धकेल कर हम उन संचित स्वभावों और संस्कारों से बहुत हद तक छुटकारा पा सकते हैं। बालकवत सरल बनने के महान् आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करके सरलता पूर्वक आगे बढ़ सकते हैं। जैन धर्म के ग्रन्थों में समभाव वीतरागता पर बहुत जोर दिया गया है। पूज्य संतप्रवर श्रीगणेशप्रसादजी वर्णी इस ‘भूल जाओ’ की शिक्षा पर अधिक बल देते हैं। वस्तुतः आत्मिक प्रगति के लिये यह एक महत्वपूर्ण मार्ग है। “माननीय वर्णीजी ने मेरे पत्र का उत्तर देते हुए चैत्र सुदी 5 के कार्ड में लिखा है कि :-”हमारी तो यह श्रद्धा है जो कल्याणलिप्सु महानुभावों को सबको भूल जाना चाहिये।”
“मेरी तो यह सम्मति है जो कल्याण का मार्ग अपने ही अभ्यन्तर में देखो”-
वर्णीजी के उपरोक्त सारगर्भित शब्दों ने ही मुझे यह लेख लिखने की प्रेरणा दी है।
गुजराती में कहावत है “दुख नो औषद दहाड़।” अर्थात् ज्यों-त्यों शोकादि दुख अधिक दिनों के पुराने होते जाते हैं, त्यों-त्यों उसका असर कम होता जाता है क्योंकि वे बातें आस्ते-2 भुलादी जाती हैं। प्रसंगवश वहाँ जब भी वे बातें याद आती हैं मनुष्य उनकी स्मृति से दुखी होने लगता है। अतः व्यवहार में भी दुखद प्रसंगों, आपसी बैर, विरोधी बातें भुला देने से ही लाभ मिलता है। किसी के साथ कुछ कुछ सम्बन्ध हुआ हो तो क्षमतक्षामय द्वारा उसे भुला देना ही अच्छा है। अन्यथा वह कटुता जरूर फैलती जायगी। इसीलिए कहा जाता है अब आगे की बातें आई-गई कर दो, भुला दो और प्रेम सम्बन्ध में बंध जाओ। “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेय।” संकल्प-विकल्प आत्मोजति की स्थिरता में परम बाधक हैं। विस्मृति से वे समाप्त हो जाते हैं।
(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए., पी. एच. डी.)
पाप प्रायः तीन प्रकार के होते हैं। मन से दूसरे का अहित सोचना, वचन से दूसरे के प्रति कुशब्दों का उच्चारण कर देना तथा शरीर से दूसरे को किसी प्रकार की हानि पहुँचा देना। पाप किसी प्रकार का हो, अपने मन में अशाँति उत्पन्न करता है। मनुष्य अन्दर ही अन्दर घबराता है। मनुष्य अपने पाप को जब तक मन में छिपाये रहता है, तब तक आत्मग्लानि का शिकार रहता है।
मनुष्य में कई व्यक्तित्व हैं। एक उच्च पवित्र व्यक्तित्व है जिसे आध्यात्मिक व्यक्तित्व कह सकते हैं। आध्यात्मिक व्यक्तित्व साँसारिक संकीर्णताओं से परे है। इसका रूप सूक्ष्म और विशाल है, द्वेष, ईर्ष्या रहित है। यह साँसारिक विषय-वासनाओं पर नियन्त्रण करने वाला है। मनुष्य जब पाप करता है, तो उसका यही आध्यात्मिक व्यक्तित्व कचोटता है, बुरा-बुरा कहता है, धिक्कारता है। इसलिए पाप और विकारमय व्यक्तित्व डरता रहता है। मन सदा बेचैन बना रहता है। आध्यात्मिक व्यक्तित्व की सजा मनुष्य अन्दर ही अन्दर भुगतता रहता है। उसके अंकुश की पैनी मार उसे व्यथित किया करती है।
कोलरिज नामक एक अंग्रेजी के कवि ने काव्य में एक अपराधी की कहानी लिखी है। वह एक जहाज पर सफर कर रहा था। उस जहाज पर एक चिड़िया रहती थी। यह चारों ओर उड़कर फिर वापिस जहाज पर आ जाया करती थी। एक दिन उसे न जाने क्या सूझी कि वह अपनी तीर-कमान लाया और उस चिड़िया का वध कर डाला। चिड़िया का मरना था कि उसका मन पाप की अकथित गुप्त वेदना से भर गया। “मैंने पाप किया है। मैंने बड़ा बुरा कर्म किया है। मैं कैसे इससे मुक्त होऊँ।” वह भारी मन किये इधर-उधर उद्विग्न फिरता रहा। उस पाप की भावना ने उस पागल-सा बना दिया। गुप्त पाप की वेदना का भार असह्य हो गया। जब उससे न रहा गया, तो उसने उस जहाज पर यात्रा करते हुए कवि को बरवश रोककर अपने पाप की सारी कहानी कही, पश्चाताप प्रकट किया और पाप प्रकट कर आत्म-ग्लानि से मुक्ति प्राप्त की।
पाप क्या है? पुण्य किसे कह सकते हैं? साधारणतः यह कहा जा सकता है कि जिन कर्मों से मनुष्य नीचे गिरता है, उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, उसे पाप कहते हैं? इसके विपरीत जिन शुभ कर्मों को करने से बुद्धि स्वच्छ, निर्मल होने लगती है और आत्मा सन्तुष्ट रहती है, वे पुण्य हैं। पाप से मन में कुविचार और कुकर्मों के प्रति कुवृत्ति उत्पन्न होती है, पुण्य से अन्तःकरण शुद्ध होता है।
यों तो मनुष्य को पाप करते ही स्वयं मालूम हो जाता है कि मुझसे पाप हो गया है किन्तु फिर भी शास्त्रों के अनुसार ऐसे पाप हैं, जिनसे सदा सर्वदा बचना चाहिए। पाँच महापातक हैं- (1) ब्रह्महत्या अर्थात् वेदज्ञ, तपस्वी, ब्राह्मण की हत्या करना। (2) सुरापान, मद्यपान ऐसा पाप है जिसमें मनुष्य पतन की ओर झुकता है कुविचार और कुकर्म की और प्रवृत्ति होती है। (3) गुरु-पत्नी के साथ अनुचित सम्बन्ध। (4) चोरी करना- इसमें हर प्रकार की चोरी सम्मिलित है। चोरी का माल स्वयं नष्ट हो जाता है और घर में जो धर्म की कमाई होती भी है, उसे नष्ट कर डालता है। (5) महापातकियों के साथ रहना एक पाप है, क्योंकि उनके संसर्ग से कुप्रवृत्ति पैदा होती है। इनके अतिरिक्त अनेक उपपातक, अर्थात् छोटे-छोटे पाप हैं, जिनसे सावधान रहना चाहिए। ये बहुत से हो सकते हैं, पर मुख्य रूप से इस प्रकार हैं- (1) गो-वध, (2) अयोग्य के यहाँ यज्ञ करना, (3) व्यभिचार और पर-स्त्री गमन, (4) अपने को बेच देना, (5) गुरु, माता, पिता की सेवा न करना, (6) वेदाध्ययन का त्याग, (7) अपनी सन्तान का भरण-पोषण न करना, (8) बड़े भाई के अविवाहित होते अपना विवाह करना, (9) कन्या को दूषित करना, (10) सूद पर रुपया लगाना, (11) ब्रह्मचर्य व्रत का अभाव, (12) विद्या को बेचना, (13) निरपराधी जीवों का वध करना। जैसे भोजन के लिए चिड़ियों, मछलियों इत्यादि को मारना, (14) ईंधन के लिए हरे वृक्ष को काट डालना। वृक्ष में जीव है। हरा वृक्ष काट डालना एक प्रकार से हत्या करने के समान ही है। (15) अभक्ष पदार्थों को खाना। माँस, मदिरा, प्याज, लहसुन, अंडा इत्यादि खाने से बुद्धि विकारमय होती है और पाप में प्रवृत्ति होती है। अतः सदा सात्विक आहार ही खाना चाहिए, (16) अग्निहोत्र न करना, (17) अपने ऊपर चढ़ा हुआ कर्ज न चुकाना, (18) गन्दी पुस्तकें पढ़ना। इससे मनुष्य मानसिक व्यभिचार की ओर अग्रसर होता है, खुराफातों से मन भर जाता है। मन के समस्त पाप इस प्रकार के कुचिन्तन से ही प्रारम्भ होते हैं। पर-द्रव्य, पर-स्त्री, पराई वस्तुओं को लेने की इच्छा, व्यर्थ का अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष आदि सब कुचिन्तन के ही पाप हैं। मन में अनिष्ट चिन्तन होने से मनुष्य वाणी से पाप करता है, असत्य भाषण, चुगली, असम्बद्ध प्रलाप और कठोरता की वाणी बोलता है। इसी प्रकार शरीर से होने वाले अनेक पाप हैं जैसे हिंसा, पर दारा सेवन, दूसरे की वस्तुओं पर बलपूर्वक अधिकार आदि। इनमें से प्रत्येक की उत्पत्ति तब होती है, जब मनुष्य के मन में कुविचार का जन्म होता है। बीज में वृक्ष की तरह शरीर में वासनायें छिपी रहती हैं। तनिक-सा प्रोत्साहन पाकर ये उद्दीप्त हो उठती हैं और गन्दगी की ओर प्रेरित करती हैं। मन के गुप्त प्रदेश में छिपी हुई ये गन्दी वासनायें ही हमारे गुप्त शत्रु हैं। वासना बन्धन का, नाश का, पतन और अवनति का प्रधान कारण है। काम-वासनाएं अठारह वर्ष की आयु से उत्पात मचाना प्रारम्भ करती हैं और 45 वर्ष की आयु तक भयंकर द्वन्द्व मचाती रहती हैं, दुष्कर्म की ओर प्रवृत्त करती हैं। विवेकी पुरुष को वासना की भयंकरता से सदा सावधान रहना चाहिए। वासना ही साँसारिक चिन्ताओं को उत्पन्न करने वाली विभीषिका है।
पाप से कैसे बचें?
महत्व इसका है कि उपर्युक्त पापों से छुटकारा कैसे हो? पाप का जन्म मनुष्य के मन में होता है अतः मानस-सुधार ही जड़-मूल है। मन की स्वच्छता से ही पाप से बचाव का कार्य प्रारम्भ होना चाहिए मन को शुद्ध सात्विक विचारों से परिपूर्ण रखना, मौन, मनोनिग्रह, सौम्यता, प्रसन्नता आदि मानसिक साधनायें करते रहना चाहिए। मन में किसी प्रकार के विकार के आते ही सावधान हो जाना चाहिए। श्री दुर्गाशंकर नागर ने एक स्थान पर लिखा है-
“अच्छे या बुरे विचारों की धाराएं मानसिक केन्द्रों से प्रसारित होकर रक्त संचार के साथ विद्युत् धारा के समान आती हैं और अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं काम, क्रोध, लोभ, वासना, घृणा, भय इत्यादि की भावनाएं संकुचित व्यक्तित्व बनाती हैं। हमारा व्यक्तित्व प्रभावहीन और निर्बल पड़ जाता है। उसमें ऐसी मानसिक उलझनें पड़ जाती हैं कि वह जीवन को शान्त और आनन्दमय नहीं बना सकता। मानसिक अशान्ति, उलझन और व्यथा का कारण यह है कि हम अपने भीतर नहीं देखते।” अतः मन के भीतर से विकार को दूर करना चाहिए।
वाणी से पाप न कीजिए। अर्थात् उद्वेग करने वाला कुसत्य मत बोलिये, प्रिय और हितकारक भाषण कीजिए। अच्छी पुस्तकों का स्वाध्याय कीजिए, आत्मा को प्रिय और आत्मा के आदेश के अनुकूल कर्म का अभ्यास करते रहिये।
शरीर के पापों से मुक्ति के लिए पहले स्नान द्वारा शुद्धता प्राप्त कीजिए। स्वच्छ वस्त्र धारण कीजिए। ब्रह्मचर्य का अभ्यास सरलता अर्थात् आडम्बर शून्यता, अहिंसा, देवता, ब्राह्मण गुरु तथा विद्वानों की पूजा शरीर के पापों से मुक्ति के अमोध उपाय हैं। इन सब की प्राप्ति इन्द्रियों के संयम से अनायास ही हो जाती है। कहा भी है :-
यतेन्द्रिय मनो बुद्धि मुनि मोक्ष परायणः। विगतेच्छा भय क्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥
(गीता 5-28)
अर्थात् इन्द्रियों, मन और बुद्धि को संयम में रखने वाला मुनि मोक्ष परायण होता है। इच्छा, मन और क्रोध से, फिर मुक्त होकर वह जीवन मुक्ति की अवस्था में विचरता है।
रव्यापनेनानुतापेन, तपसाअव्ययनेन च। पापकृत्युच्यते पापात्, तथा दानेन चापादि॥
(मनु. 11-227)
पाप करने वाला व्यक्ति यदि चाहे तो 1- दुःखी होकर अपना पाप लोगों में प्रकट करने से, 2- सच्चा पश्चाताप करने से, 3- सद्ग्रन्थों के अध्ययन से, 4- तपश्चर्या से पाप मुक्त हो सकता है। जैसे-जैसे उसका मन पाप की निन्दा करता है और सद्विचार तथा आत्मध्वनि के प्रभाव में आता है, वैसे-वैसे यह पाप से छूटता जाता है। भविष्य में किसी प्रकार का भी पाप न करने का दृढ़ संकल्प और उसका अभ्यास पाप मुक्ति का साधन है।
(श्री. रामकृष्ण डोंगरे, कटनी)
अब मानस उस युग का निर्माण बड़े जोर-शोर से कर रहा है जिसका निष्कर्ष है- संहार अर्थात् प्रलयकाल। वह समय व वे हथियार, मशीनें किस काम की जो सृष्टि को मानव से शून्य कर दें। वह राज्य (सत्ता) किस काम का जहाँ मानव-मानव को ही चुनौती देता हो। अहंभाव ने किसी का साथ नहीं दिया जैसा धान्य वैसा भोजन, जैसी कमाई वैसी बचत, जैसा कर्म वैसा उसका फल। इनमें किसी का क्या दोष। मनुष्य स्वयं की त्रुटि को स्वीकार नहीं करता, इसलिए उसे सभी कुछ अपने विपरीत दिखता है। गीताकार ने कहा है-
सत्वात्संजायते ज्ञानं रजसोलोभ एव च। प्रसादोमोहो रामसो भवतोऽज्ञान मेव च॥
कितना सुस्पष्ट भाव प्रकट कर दिया है। (1) सतोगुण से ज्ञान की उत्पत्ति (2) रजोगुण से लोभ की अधिकता एवं तमोगुण से प्रमाद, मोह उत्पन्न होते हैं। सत्वगुण की अधिकता से मनुष्य स्वर्गादि उच्च लोकों को प्राप्त करते हैं। रजोगुण वाले (राजस पुरुष) मनुष्य लोक में ही रहते हैं तथा तमोगुण दो कारण कीट पतंगों जैसी अधोगति योनियों में निद्रा, प्रमाद, लोभ, वासना, आलम्ब, वेदना के शिकार बनते हैं। इस काल में लक्ष का निर्धारण करना व भविष्य में उसके ही अनुकूल बनने का प्रयास करना यह प्रत्येक के विचार में आने की बात नहीं हैं। अपना भविष्य बिना किसी पथ-प्रदर्शक (गाइड) के उन्नतिशील बनाना असम्भव सा प्रतीत होता है। सुयोग्य दीक्षित की प्राप्ति ही अपने जीवन का प्रथम प्रयास पूर्ण कार्य हैं। वह भटकने के बजाय सुयोग्य, सुनिश्चित स्थान पर भेज सकेगा, ऐसा मेरा भी अनुभव है। जीवन एक अमूल्य निधि है तथा उसको किस दिशा में ले जाना है यह एक साधारण बात नहीं है। यह अत्यन्त गम्भीर हैं। मथुरा में 8 मई के गायत्री सम्मेलन में गायत्री परिवार के कुलपति आचार्य श्री पं. श्रीराम जी शर्मा ने आयोजित प्रतिनिधियों के समक्ष उस प्रभावशाली, मार्मिक, जीवन स्तर को उठाने व उतने ही काल में उनकी कमजोरियाँ एवं अविश्वास, निराशायुक्त सूक्तियाँ एवं कार्य करने से पहिले फल की आशा रखना आदि बातों पर बहुत गम्भीर प्रभाव डाला। अपने पुरुषों और नारियों के समक्ष यह कहने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं की, कि नारियाँ क्या नहीं कर सकती, तथा नारियों ने क्या नहीं किया? इतिहास उठाकर देखें! इनके उच्च गौरवशाली आदर्शों को पहचानो। किन्तु अब नारियों के निकम्मा बनने का कारण पुरुष है- पुरुष! इसमें नारियों का कोई दोष नहीं। नारी अपनी प्राचीन पद्धतियों, रस्म रिवाजों को समझती हैं कि मुझे क्या करना हितकर होगा और अभी क्या अनिवार्य है, कि मेरी बचत हो, हर प्रयास से अपनी सहूलियत की खोज में रहती है। तथा भविष्य में परिस्थितियों के ही अनुकूल बनने को मजबूर हो जाती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि आपको आफिस में डाट पड़ी है या व्यापार में घाटा आया है तो आप अपने घर पर आकर गुस्सा बुझाने का कोई कारण ढूँढ़े तथा उस निर्दोष (सहधर्मिणी) पर अपने गुस्सा का घड़ा फोड़ें। नारी हर समय से पुरुष का साथ देती आई है, देती है, और देती जायगी। किन्तु पुरुष हमेशा अपनी वासना से अतृप्त रहा। उसने कभी भी (विपत्ति काल में) उसकी करुण अवस्था में उसका हाथ पकड़कर उसकी किसी वेदना पर अपनी ही वेदना जैसा अनुभव किया हो? अथवा साँत्वना भी दी हो और नारी ने पुरुष का क्या नहीं किया? नारी अपने वचनों की सच्ची होती है, वह उसका स्वाभाविक गुण है, तथा किसी भी स्थिति में क्यों न हो संतुष्ट रहती है। प्रत्येक लज्जाशील नारी पूज्य है। इनको वेदों ने अपनाया हैं। पुरुष की नारी पूरक है, पर पुरुष नारी को अपनी दासी मानता है।
आचार्य जी ने तपोभूमि में अपने प्रवचन में यह भी कहा और सन्देशा कहा कि- आप लोग अपने आप को स्वयं पहिचानें तथा जाग्रत रहें। आपकी आर्थिक, सामाजिक, कौटुंबिक उत्तरदायित्व की जिम्मेदारी का महत्व कोई साधारण नहीं है, क्योंकि आप प्रतिज्ञाबद्ध हैं एवं अपने कर्मों पर सबको ध्यान रखना चाहिये। जिस तरह से कोई व्यक्ति अग्नि लेकर जाता है और उसकी लापरवाही से उसको अग्नि रास्ते में ही ठंडी हो जाती है। दूसरा कोई बात करते-2 बुझा देता है, तथा तीसरा कोई भोजनोपराँत उस अग्नि को बुझा देता है तथा चौथा व्यक्ति अपना कार्य करने के पश्चात् दूसरे लोगों को बुलाकर प्रेरणा देता है कि यदि आपको आवश्यकता है तो अग्नि यहाँ से लेकर जायं और दूसरों को भी दें। हमें निकम्मे व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं है। हमें सुयोग्य पुरुष चाहियें। भारत के प्रत्येक घर को देवत्व तुल्य बनाना है। घर-2 माता का पूजन व सब संसार धर्ममय हो।
आज प्रत्येक परिवार में अकारण ही कटुता का समावेश है, मित्रभाव में विश्वासघात है, अपने स्वार्थ के पीछे हम क्या नहीं कर डालते। इस परिस्थिति को बदलने के लिए केवल मस्तिष्क के संतुलन का संभालना ही उपयुक्त होता है। सब विकारों को दूर करने में एक नित्य गायत्री साधना ही सरल सुलभ है, प्रत्यक्ष फलदायिनी है। इसका आश्रय लेने वाला कभी निराश व हताश नहीं हुआ। किन्तु लगन की आवश्यकता है। इससे अपनी बुराइयाँ अपने आप विलीन होकर उत्साहवर्धक एवं जनहित कल्याणकारी मार्ग में प्रगति होती है। हमारी भारतीय संस्कृति का एक मात्र आधार हैं? हमारा धर्म जो सदैव ही निष्पक्षता व सत्य उवाच करने को बाध्य करता है। वही दीक्षित है जो सबके प्रति सुदृष्टि रखता है, वही पंडित है जो जितेन्द्रिय है। वही तपस्वी है जो दूसरों के दुःख को दूर करने में तत्पर रहता है वही धार्मिक है जो दूसरों के दिल को नहीं दुखाता।
सत्य विधानुकूल- दूसरे के धर्म व संस्कृति को मसलकर, अपमान पहुँचाकर, आगे बढ़ाने का निष्फल प्रयत्न करने वाले का जीवन किसी भी बड़ी सुख शाँति का अनुभव नहीं कर सकता। यदि अपनी उन्नति करना है तो देश के साथ-साथ आगे बढ़ने में हैं। कोई भी धर्म व संस्कृति हिंसात्मक कार्य करने का आदेश कभी नहीं देती। अपने निजी स्वार्थ के प्रलोभनवश ही मनुष्य अपना स्तर गिरा देता है।
(श्री राजेश्वर प्रसाद जी एम. ए.)
हमारी मनोवृत्ति का निर्माण हमारे जीवन, हमारे आचरण के अनुरूप ही होता है। हमारे जीवन तथा आचरण का मूल आधार है हमारी शिक्षा। कहा गया है “जैसा खावे अन्न वैसा बने मन।” यहाँ पर अन्न का अर्थ भोजन है, जो शारीरिक और मानसिक दोनों ही प्रकार का होता है। इसलिए यह सिद्ध होता है कि आजकल मानव समाज में जो तरह-तरह के छोटे-बड़े दोष दिखलाई पड़ रहे हैं उनका मूल हमारी शिक्षा ही है।
आजकल हर जगह शिक्षा प्रसार की नई-नई योजनाएं बन रही हैं। हमारी राष्ट्रीय सरकार इस बात की घोषणा कर चुकी है कि वह शीघ्र ही देश से निरक्षरता को मिटा देगी। परन्तु विचार यह करना है कि हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली कैसी है और वह किस प्रकार के जीवन का निर्माण कर रही है तथा हमारी शिक्षा वास्तव में कैसी होनी चाहिए।
हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति को सात आततायी या शत्रु बुरी तरह से जकड़े हुए हैं। मस्तिष्क, दण्ड, परीक्षा, कुरूप भवन, अत्यधिक कार्य, स्वाभिमान रहित अध्यापक तथा संकुचित मनोवृत्ति के माता-पिता। बेचारे विद्यार्थी को इतनी अधिक पुस्तकें पढ़नी पड़ती हैं, इतने प्रकार के विषयों का अध्ययन करना पड़ता है कि उनका दिमाग, शरीर और मन सब कुछ बुरी तरह से पिस जाता है। भाँति-भाँति के दण्ड और हर समय प्रस्तुत परीक्षाओं का भय उसे खाये जाता है। सिवाय पढ़ने और पढ़कर परीक्षा पास करने के वह कुछ और सोच ही नहीं सकता। गन्दे और तंग मकानों में गन्दे टाटों या गन्दी और भद्दी मेज-कुर्सियों पर बैठकर उसे पढ़ना पड़ता है, अतः उसके लिए स्वच्छ वायुमण्डल एक दुर्लभ पदार्थ है। स्कूल में पढ़ाने वाले मास्टर विद्यार्थी को केवल इसलिए पढ़ाते हैं कि उसकी नौकरी बनी रहे, उसके भले-बुरे से उन्हें कोई मतलब नहीं। वे हमेशा अपने ट्यूशन की चिन्ता में लगे रहते हैं और धन कमाने के लालच में अपने स्वाभिमान, गुरुत्व और शिक्षक पदवी के महत्व को गंवा बैठते हैं। विद्यालय के बाहर घर पर भी विद्यार्थी का यही हाल रहता है? घर पर वह जब तक कम से कम चार घण्टे नित्य नियमपूर्वक न पढ़ें, तब तक अध्यापक द्वारा बताया घर पर किया जाने वाला काम पूरा नहीं होता और फिर इन सबके ऊपर है उस पर सवारा नौकरी का भूत। बालक को दिन-रात किताबों से चिपके देखकर माता-पिता को पूरा विश्वास हो जाता है कि उनकी साधना तथा बच्चे की तपस्या दोनों ही सफल है। बड़ा होने पर उसे अवश्य ही कोई अच्छी नौकरी मिल जायेगी। अच्छी नौकरी पाना ही जब सब प्रकार से जीवन का उद्देश्य हो जाय तो मानसिक विकास का प्रश्न ही कहाँ रहा? आजकल तो विद्या और नौकरी पर्यायवाची शब्द बन गये हैं। ऐसी हालत में प्रत्येक मनुष्य स्वार्थ-साधन में तल्लीन रहेगा, इसके सिवाय उससे और किस बात की आशा की जा सकती है? ऐसा व्यक्ति समाज के कल्याण की ओर क्या ध्यान दे सकता है?
आजकल हमारी शिक्षा की व्यवस्था वास्तव में बहुत दोषयुक्त हो गई है। इसको मिटाकर हमें ऐसी शिक्षा-दीक्षा का विधान करना होगा जो हमें स्वयं अपने ऊपर विजय प्राप्त कर सकने में समर्थ बना सके। ज्ञान का अन्तिम लक्ष्य चरित्र निर्माण ही होना चाहिये। इसलिए हमारी शिक्षा को तीन भागों में विभाजित किया जाना चाहिए-शारीरिक शिक्षा, मानसिक शिक्षा और आध्यात्मिक शिक्षा। हम स्वस्थ हों, हमारे स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क हो और हमारा स्वस्थ मन जीवन के स्वास्थ्य पर विचार कर सकने में समर्थ हो। संक्षेप में हमारा आशय यही हैं कि शिक्षा के द्वारा हमारा समाज सचमुच स्वस्थ बने।
1- शारीरिक शिक्षा का ध्येय शरीर की सुव्यवस्था और रक्षा होना चाहिए। इसमें बतलाया जाय कि हम कब कितना खायें, कब कितना सोयें, कब और कितना तथा किस प्रकार अपना मनोरंजन करें, कब कितना और किस प्रकार व्यायाम करें। मनोरंजन तथा व्यायाम की शिक्षा व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों रूपों में दी जानी चाहिए, ताकि हमारे भीतर सहयोग की भावना का विकास हो और हम समाज में मिलकर काम करना सीखें।
2- मानसिक शिक्षा का उद्देश्य है हमारे दिमाग का उचित रीति से विकास होना। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम केवल अपनी पाठ्य पुस्तकों तथा अन्य पुस्तकों को भली प्रकार समझकर याद कर सकें। वरन् इसका उद्देश्य यह है कि हम अपने शरीर-रक्षा की विधि को जानकर तद्नुकूल आचरण करें। हम में सेवा भाव उत्पन्न हो, हमारे हृदय में बन्धुभाव जागृत हो, हम नई बात जानने को उत्सुक हों और निरन्तर अपनी ज्ञान वृद्धि करते रहें। हम में कार्य क्षमता आवे और हम में भले बुरे का विवेक उत्पन्न हो।
3- आध्यात्मिक शिक्षा का उद्देश्य यह है कि हम में सम्मान तथा आदर का भाव उत्पन्न हो, अपने आस-पास वालों के प्रति बन्धुत्व की भावना का उदय हो और दया तथा करुणा के भावों की वृद्धि हो।
मनुष्य में जब तक अपनी राष्ट्रीय, धार्मिक, जातीय, सामाजिक और पारिवारिक मान्यताओं अथवा परम्पराओं के प्रति समान बुद्धि नहीं होगी तब तक व्यक्तिगत अथवा सामूहिक उन्नति की आशा दुराशा मात्र है। मानुषी और दैवी कार्यों की महत्ता के सम्मुख भी हमको नतमस्तक होना चाहिये। वयोवृद्ध जनों का सम्मान तथा दुर्बल और बालकों को अपना वरद्हस्त प्रदान करना हमारा कर्तव्य है। सद्गुणों और सद्व्यवहारों के प्रति भी हमको श्रद्धा का भाव रखना आवश्यक है, क्योंकि ये सब मनुष्यत्व के चिन्ह हैं।
शिक्षा का यह भी प्रभाव होना चाहिये कि हम विश्व के प्रत्येक पदार्थ में अपने स्वरूप आदर्श न पावें तथा उसके प्रति प्रेम भाव रखें। प्रत्येक जाति, प्रत्येक समुदाय, प्रत्येक धर्म तथा प्रत्येक राष्ट्र के लिए हमारे हृदय में प्रेम का भाव हो। हम किसी को न तो बुरे समझें न किसी से घृणा करें। सबको अपने ही समान स्वाभिमानी समझें। हमारी शिक्षा हमें इस योग्य बनावे कि हम प्रत्येक बात को निष्पक्ष भाव से समझ सकें। अपने निजी विचारों के अनुरूप अपनी धारणाएं निर्धारित कर सकें। सिद्धान्त के पीछे मर मिटने को तैयार हो जायें। हमारी आत्मा इतनी शक्तिशाली हो कि हम समाज-द्रोहियों का खुलकर विरोध कर सकें। बुरे को बुरा न कह सकना हमारी नैतिक निर्बलता का परिचायक है। जब तक व्यक्ति की अपेक्षा सिद्धान्त की महत्ता स्वीकार न की जायगी तब तक बन्धुत्व की भावना दूर का स्वप्न है।
आध्यात्मिक शिक्षा का एक परिणाम यह भी होना चाहिए कि हमारे अन्दर संसार के सभी असहाय, निरुपाय, दलित, पीड़ित, शोषित, दुखी, निर्धन व्यक्तियों के प्रति दया एवं करुणा के भाव हों। क्रोध और घृणा के पात्र न समझकर हम उनके प्रति दया रखें। निर्धन और दुखी होना एक दुर्भाग्य है और उसके साथ हमारी उदारता का संयोग होना ही उचित है। इतना ही नहीं हम दीन दुखियों पर दया करके ही रह जायें, वरन् परिस्थिति तथा अपनी शक्ति के अनुसार उनके दुःख दर्द में हाथ बंटाना भी आवश्यक है।
साराँश यही है कि हमारी शिक्षा केवल कामचलाऊ वस्तु न हो, वह केवल परीक्षा पास करने का माध्यम न हो, वरन् हमें भली प्रकार जीना सिखाये। विद्या वही है जो हमें इस दुनिया की चिन्ता से मुक्त करके हमारी जीवन नैया को भवसागर से पार लगाने में समर्थ हो-’स विद्या या विमुक्तये।’
काल सर्प से प्राण बचे
कुँवर शिव सिंह जी चौहान मौजा खेड़ा (चितावल्या) से लिखते हैं “ता. 2-11-57 के दिन मैं स्नान करने को कुएं पर गया। जैसे ही बाल्टी खींच कर बाहर निकाली कि उसके चारों तरफ एक सर्प लिपटा देखा। शोर मच जाने से वह भाग गया। पर रात को आठ नौ बजे के दरम्यान जब मैं गायत्री का जप करके रामायण की कथा आरंभ करना चाहता था कि अचानक दिया बुझ गया और एक बहुत बड़ा सर्प फुसकारता हुआ सामने से आता दिखाई पड़ा। मैंने डण्डा उठाकर मारा और दो चार डण्डा लगने से वह मर गया। रात को स्वप्न में मैंने एक पंद्रह सोलह वर्ष की कन्या फूलों का गजरा पहिने देखी जो मुझ से कह रही थी कि “वह तेरा काल था, परन्तु मेरी आराधना करने वाले को कौन सता सकता है। तुम आनंद से भजन करते रहो।”
चुनाव में सफलता मिली
श्री रामनाथ शर्मा, जयपुर से लिखते हैं-”गायत्री परिवार के एक सदस्य के नाते मैं विगत कई वर्ष से वेदमाता की आराधना करना आ रहा हूँ, पर इस बार मुझे माता की कृपा का जो अनुभव प्राप्त हुआ वह अनोखा ही है। मैं अपने नगर की ‘नगर पालिका’ के चुनाव में काँग्रेस के टिकट पर एक वार्ड से खड़ा हो गया। मेरे मुकाबले में नगर के एक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित महानुभाव थे। मेरी ओर से प्रचार तो किया गया, पर उनके सामने मेरा प्रचार नगण्य ही था। चुनाव के एक दिन पूर्व रात्रि के 3 बजे जब कि लगातार प्रचार कार्य से थक कर व निराशा की भावना लेकर मैं हार-जीत के झूले में झूल रहा था, तो लेटे ही लेटे वेदमाता का स्मरण करने लगा। अकस्मात् मुझे गम्भीर दैवी वाणी सुनाई पड़ी कि “तुम जीत गये।” प्रातःकाल जनता के मतदान का कार्य शुरू होकर यथा समय समाप्त हुआ। वोटों की गणना होने पर मैं बहुमत से विजयी हुआ। माता की इस कृपा को कैसे भुलाया जा सकता है।
भयंकर बीमारी से प्राण रक्षा
श्रीमती आर. आर. मिश्रा, सतना (मध्य प्रदेश) से सूचित करती हैं कि- “गत दस वर्ष से पूज्य गुरुवर आचार्य जी के संरक्षण में हम लोग निष्काम गायत्री साधना में संलग्न रहकर सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। प्रारब्धवश पिछले वर्ष मुझे मृत गर्भ की विपत्ति का सामना करना पड़ा। नागपुर और सतना के श्रेष्ठ डॉक्टर और डॉक्टरनी उसका ठीक निदान न कर पाये और मेरी जान पूरे 9 स्वयं मास संकट में रही। तो भी हम माता पर पूर्ण विश्वास रख कर साधना में लगे रहे। इसके प्रभाव से गर्भ का मृत बालक बिना आपरेशन के बाहर निकल आया और मेरा दूसरा जन्म हुआ। ऐसी माता और गुरुजी को हम जन्म-जन्मान्तर तक न भूलेंगे।”
गये हुये रुपये प्राप्त हो गये
श्री लक्ष्मीनारायण जाट, ग्राम आवसर (चूरु, राजस्थान) से लिखते हैं-”मैं अपनी दुकान का सामान सुजानगढ़ से लाया करता हूँ। माल उधार लाते हैं, कुछ समय बाद रुपया चुका देते हैं। इस बार जब मैं माल लाया, तो पीछे से सेठ ने मुनीम को अलग कर दिया। मुनीम को हमारे माल उधार लाने का हाल मालूम था। वह एक दिन हमारे यहाँ आया और कहा कि सेठ ने रुपये मंगाये हैं। उस समय मेरे भाई व पिताजी खेती में थे। मैंने बिना किसी से पूछे 100 रु. उसको दे दिये। मैंने मुनीम में न तो सेठ का रुक्का माँगा न कोई बात पूछी। तीन दिन बाद किसी आदमी ने सारा हाल बतलाया। तब हम सब बहुत घबड़ाये और मैं मन ही मन गायत्री माता की आराधना करने लगा। जब सब बात सेठजी से कही गई तो उन्होंने उस रुपये को अपने हिसाब में मान लिया। यह सब माता की ही दया है। मेरे घर में सब गायत्री मन्त्र का जप करते हैं।”
मनोकामनायें पूर्ण हुई
श्री श्यामसुन्दरलाल गोयल, बिजनौर (उ.प्र.) से लिखते हैं- “गत मई मास में मैंने आपसे अपनी तीन कठिनाइयों के सम्बन्ध में निवेदन किया था। आपकी कृपा से गायत्री माता ने उन सब में कार्य सिद्ध करा दिया। प्रथम तो मेरे पुत्र अनिलकुमार गोयल के मैट्रिक परीक्षा के दो पर्चे बिगड़ गये थे। पर वह गायत्री माता की उपासना से सैकिंड डिवीजन में पास हो गया। दूसरी बात मेरे छोटे भाई रामेश्वरप्रसाद गुप्ता के डिपार्टमेंटल इम्तहान के सम्बन्ध में थी। वह भी उत्तीर्ण हो गया और वेतन वृद्धि भी हो गई। तीसरी बात मेरे एक मित्र ब्रज पतिनारायण की पुत्री के विवाह के सम्बन्ध में था। यह कार्य भी बहुत अच्छी तरह हो गया और रुपये की व्यवस्था बिना किसी कठिनाई के सहज में हो गई। वास्तव में गायत्री माता की साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती।”
बच्चे के प्राण बच गये
श्री गौरीशंकर ओमर, ग्राम मौदहा (हमीरपुर) से लिखते हैं- “ता. 30 दिसम्बर 57 को मेरा चार मास का शिशु भयानक सर्दी लग जाने से डबल निमोनिया में ग्रस्त हो गया। ता. 31 की शाम को बच्चे की तबियत इतनी खराब हो गई कि मेरी माता व पत्नी निराश होकर अन्तिम अन्नदान कराने लगीं। मैं भी विचलित हो उठा। डॉक्टर का इलाज चल रहा था। माता गायत्री की प्रेरणा हुई और हृदय ने कहा कि इस समय माता का ही अंचल पकड़ना चाहिये। अतः अपने सहयोगी पं. रामेश्वरप्रसादजी शुक्ल व श्री केशवप्रसादजी ओमर को बुलाया और बच्चे के कष्ट निवारणार्थ गायत्री चालीसा के पाठ व जप करने को कहा। वे दोनों फौरन स्नान करके पाठ व जप करने को बैठ गये यह कार्य क्रम संध्या के 6 बजे से रात के साढ़े 11 बजे तक चला। मैं स्वयं मन के अस्थिर रहने से जप कर सका केवल मूक प्रार्थना और अश्रुपात करता रहा। माता ने हमारी पुकार सुन ली और बच्चा थोड़ी ही देर बाद स्वस्थ हो गया और अब सकुशल हैं।”
आश्चर्यजनक परिवर्तन
श्री शिवप्रसाद पाठक, सटई (छतरपुर, मध्य-प्रदेश) से लिखते हैं “मैं एक आस्तिक परिवार का होते हुए भी ऐसी बुरी विचारधाराओं में फंस गया था कि आस्तिकता को त्यागकर नास्तिकता के प्रवाह में बहा चला जा रहा था। परन्तु पूर्व जन्म के पुण्य से श्री छेदीलालजी शर्मा वैद्य का सत्संग प्राप्त हुआ और उन्होंने मुझे सदुपदेश देकर गायत्री का जप करने की प्रेरणा की। फिर मैं ‘अखण्ड-ज्योति’ का ग्राहक बना तथा वहाँ से प्रकाशित पुस्तकें पढ़ने लगा, जिससे मेरी काया पलट हो गई और मैं पूरी तरह से धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति बन गया। इस कार्य में मेरे गुरुदेव श्री रामेश्वरप्रसाद रावत ने भी हर प्रकार से सहायता तथा प्रोत्साहन दिया। मैं वास्तव में अपने इस परिवर्तन को आश्चर्यजनक और वेदमाता का प्रसाद समझता हूँ।”
प्राण दण्ड से बच गया
श्री भगवतीदीन तिवारी बीना (म. प्र.) से लिखते हैं-पिछले नवम्बर मास में मैं छुट्टी लेकर घर गया था। इससे कुछ पहले मेरे साले का पत्र आया था कि आनका तिवारी को कत्ल के मामले में फाँसी का हुक्म हुआ है, इसका कोई उपाय बतलावे। मैंने मातेश्वरी का ध्यान करके जवाब भेजा था कि उसे प्राणदान मिल जायगा, पर सजा अवश्य होगी, क्योंकि उसके ऊपर ईश्वरी कोप है। अब गांव में पहुँचने पर मालूम हुआ कि वास्तव में उस व्यक्ति की फाँसी की सजा बदलकर जन्म कैद की कर दी गई। फिर उसके घर वालों ने मुझे घेरा कि ऐसा उपाय करो कि इस सजा से भी बरी हो जाय। मैंने कहा कि यह सब हो सकता है, पर इसके लिए आप नियम से गायत्री जप और अनुष्ठान करो। इस घटना से गाँव के लोगों में गायत्री माता के प्रति बड़ी श्रद्धा हो गई है।”
धर्म प्रचार में सफलता
श्री जगतराम पस्तोर, अध्यापक गनेशगंज (टीकमगढ़, म. प्र.) से लिखते हैं कि- “जगत जननी गायत्री की प्रेरणा एवं परम पूज्य आचार्य जी के आदेशों से मेरे हृदय में सदैव यह भावना उठा करती थी कि अपने जिले के प्रत्येक गाँव में गायत्री माता व यज्ञ पिता का सन्देश पहुँचाना हमारा कर्तव्य है। इसकी पूर्ति के लिए मैं कई महीनों से प्रयत्नशील था, पर अपनी कमजोरी को समझकर यह इच्छा करता था कि एक साथी और मिल जाय तो उद्देश्य भलीभाँति पूरा हो सके। मैंने अपने विचार को ‘परिवार’ के कई सदस्यों के सम्मुख रखा पर सबने असमर्थता प्रकट कर दी। माता की कृपा से कुछ समय पूर्व झाँसी से श्री गिरजासहायजी खरे यहाँ पधारे। मैंने उनसे अपनी अभिलाषा प्रकट की और वे तुरन्त साथ देने को तैयार हो गये। फिर भी मुझे यह आशा नहीं थी कि अल्प समय में इतना कार्य हो सकेगा क्योंकि अगर मैं कभी साहस करके एक दिन दस मील साइकिल चला भी लेता था, तो दूसरे दिन दो चार मील भी चलना कठिन हो जाता था। पर इस अवसर पर 8 दिन तक 30-30 मील नित्य चलने पर भी शरीर में ऐसी स्फूर्ति रहती थी कि और भी काफी चल सकते थे। साइकिल पर यात्रा करने में मार्ग की जो कठिनाइयाँ आया करती थीं वे कोई भी न जान पड़ीं और हर जगह आवश्यक सुविधा मिलती गई। एक स्थान पर तो हम घनघोर जंगल को पार करके निकले ही थे कि नाले के पार तीन रास्ता दिखाई पड़े, जो विभिन्न स्थानों को जाते थे। हम लोग बीच रास्ते पर चलने लगे, जो वास्तव में गलत था। उसी समय पीछे से एक जीर्ण-शीर्ण बुड्ढे व्यक्ति ने पुकार कर कहा- “आपको बड़ा गाँव जाना हैं तो दूसरे रास्ते से जाइये।” हम बड़े आश्चर्य में पड़ गये कि इसे कैसे मालूम हो गया कि हमको बड़ा गाँव जाना है। मैंने खरे जी से कहा कि यह साक्षात् माता द्वारा भेजी सहायता है।”
कल्प की शिक्षा एवं चिकित्सा की व्यवस्था
धर्म संस्थाओं का प्रधान उद्देश्य मानव अंतःकरणों में संयम, सदाचार, आस्तिकता एवं पूजा उपासना के अतिरिक्त सेवा और दया की सत्प्रवृत्तियों को विकसित कराना भी है। धर्म संस्थाओं के कार्यकर्ता दयालुता और सेवा आनन्द से अपने सद्गुणों को निरन्तर विकसित करते रहें, साथ ही जन साधारण के कष्टों में कमी होती रहे इस दृष्टि से धर्म संस्थाओं में चिकित्सा एवं आरोग्य शिक्षा को भी प्रमुख स्थान दिया जाता रहा है। बौद्ध धर्म के प्रायः सभी ‘विहारों’ में बड़े-बड़े आरोग्याश्रम एवं चिकित्सालय स्थापित थे, जिनमें बौद्ध भिक्षु उपासना के साथ ही पीड़ितों की सेवा करके अपनी साधना को सर्वांग पूर्ण बनाते थे। महर्षि अश्विनीकुमार, चरक, सुश्रुत, वागभट्ट, शार्गंधर, माधव प्रभृति असंख्य ऋषियों ने अपना सम्पूर्ण जीवन ही मानव जाति की आरोग्य सेवा में लगाया था।
ईसाई मिशनों में सर्वत्र चिकित्सालय को भी साथ रखा जाता है। ईसाइयत के प्रसार में इन मिशनों की यह स्वास्थ्य सेवा भी बड़ी सहायक हुई है। सर टामसरो ने तो जहाँगीर की लड़की का इलाज करके ही, ब्रिटिश माल को कर मुक्त कराने का वरदान प्राप्त किया था, जिसके फलस्वरूप इंग्लैंड की इतनी उन्नति हुई। हिन्दू धर्म के दूरदर्शी सन्त स्वामी विवेकानन्दजी द्वारा स्थापित रामकृष्ण परमहंस मिशन के आश्रम जहाँ भी हैं वहाँ सर्वत्र आरोग्याश्रम चलाये जाते हैं। सेवामय आध्यात्मिक जीवन बिताने की आकाँक्षा वाले विचारशील साधु-संन्यासी इस संस्था को अपना जीवन अर्पण करते हैं। महात्मा गाँधी पर जीवन भर राजनैतिक उत्तरदायित्व रहे, फिर भी अपने प्रिय विषय स्वास्थ्य-सेवा को वे भूले नहीं। प्राकृतिक चिकित्सा उन्होंने स्वयं भी की, अनेकों का इलाज स्वयं किया, इस विषय का साहित्य लिखा, प्रचार किया और उस काँचन में एक बड़ा चिकित्सालय कई करोड़ की लागत से स्थापित कराया। यदि वे जीवित रहे होते तो स्वराज्य प्राप्ति के बाद लोक-सेवी कार्यकर्ताओं के सेवा क्रम में आरोग्य सेवा करने का निश्चय ही प्रमुख स्थान कराते। कस्तूरबा स्मारक फण्ड, गाँधी-स्मारक निधि, हरिजन सेवक संघ आदि संस्थाएं इस दिशा में बहुत कुछ करती भी हैं। (1) परमार्थ का पुण्य संचय, (2) परमार्थ प्रेमियों में सेवा भावना एवं दयालुता बढ़ाने, (3) पीड़ितों के कष्ट दूर करने, (4) लोगों का हृदय जीत कर उनको अभीष्ट मार्ग पर चलने को तैयार करने की चारों दृष्टियों से विचारवान धर्म संस्थाएं चिकित्सा कार्यक्रमों को प्रमुख स्थान देती हैं। ऋषिकेश के काली कमली वाले बाबा ने इस क्षेत्र में भारी काम किया था।
गायत्री तपोभूमि भी बहुत समय से इस आवश्यकता को अनुभव करती है। अब समय आ गया है कि इस संबन्ध में सक्रिय कदम उठाया जाय अब आश्रम में एक “आरोग्याश्रम” स्थापित किया जा रहा है, जिसमें आरम्भ में 10 रोगियों के लिये निवास की व्यवस्था रहेगी।
शरीर में भरे हुए विषों के उफान स्वरूप उत्पन्न हुए रोगों को तीव्र औषधि देकर दबा देने और तुरन्त दवा का असर दिखाने का जादू यहाँ नहीं किया जायेगा। क्योंकि इससे तुरन्त एक रोग को लाभ भले ही होता दिखाई दे जाय पर वह भीतर भरा हुआ विष किसी अन्य मार्ग से फूटेगा ही और रोग का एक लक्षण शाँत होते ही दूसरा उठ खड़ा होने का सिलसिला चलता रहेगा। तपोभूमि के आरोग्याश्रम की नीति रोग के शरीर में व्याप्त विषों को पूरी तरह शरीर से निकालने तथा रोगी को आरोग्य के नियमों पर चलने का अभ्यास बनाकर सदा के लिए निरोग बना देना होगा। चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद शास्त्रोक्त “प्राकृतिक चिकित्सा” होगी। पाश्चात्य प्राकृतिक चिकित्सा का अंधानुकरण तो यहाँ नहीं किया जायगा पर 80 प्रतिशत उपयोग आधार प्राकृतिक चिकित्सा का ही रहेगा। यद्यपि थोड़ा बहुत अन्तर होते हुए भी आयुर्वेद में इस प्राकृतिक चिकित्सा को ही ‘अल्प चिकित्सा’ कहते हैं।
दूध-कल्प, छाछ-कल्प, फल-कल्प, थाक-कल्प आदि विधियों से शरीर के भीतर भरे हुए चिर संचित विषों और मलों की सफाई करने से शरीर निर्मल और रोग-मुक्त हो सकता है। यह कायाकल्प प्रयोग ही तपोभूमि की चिकित्सा प्रणाली का प्रमुख आधार होगा। सूर्य चिकित्सा, यज्ञ चिकित्सा, जल चिकित्सा पद्धतियों का भी इसमें समावेश रहेगा। जड़ी-बूटियों का उपयोग औषधि रूप में भी किया जायगा। रोगियों को प्रतिदिन दो घण्टे रोज आरोग्य शास्त्र की शिक्षा भी लेनी होगी ताकि वह भविष्य में अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के सिद्धान्तों का आवश्यक ज्ञान प्राप्त कर सकें।
कल्प चिकित्सा का एक विद्यालय भी साथ ही चलेगा। जिसमें शरीर रचना, शारीरिक अवयवों की कार्य प्रणाली, स्वास्थ्य रक्षा के नियम, आहार-विज्ञान, रोगी परिचर्या, लगभग 100 अत्यन्त गुणकारक जड़ी-बूटियों का समुचित ज्ञान और उपयोग, रोग निदान, आयुर्वेद अंतर्गत कल्प चिकित्सा, पाश्चात्य प्राकृतिक चिकित्सा, यज्ञ चिकित्सा, आसन और प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, व्यायाम आदि आवश्यक विषयों की शिक्षा दी जायगी। जिन्हें प्राप्त करके कोई भी व्यक्ति अपने निज के तथा दूसरों के स्वास्थ्य को संभालने में प्रवीण हो सकता है।
इस कल्प चिकित्सा शिक्षा का पाठ्यक्रम 6 मास का होगा। वर्ष में दो बार छात्रों की भर्ती हुआ करेगी। अभी यह आरोग्याश्रम जिसके अंतर्गत 10 रोगी और 10 छात्र रहेंगे नवीन भारतीय सम्वत्सर चैत्र से भर्ती करने का विचार है, न रोगी से न विद्यार्थी से किसी प्रकार की कोई फीस ली जायगी। चिकित्सा, निवास, शिक्षा आदि की व्यवस्था पूर्ण निःशुल्क रहेगी। छात्रों और रोगियों को अपने भोजन का खर्च स्वयं बनाना पड़ेगा। भोजन बनाने के लिए रसोइया रख दिया जायगा उनका खर्च तथा खाद्य सामग्री का हिस्सा सब कर बंट जाया करेगा। अनुमानतः बिना घी का भोजन प्रत्येक छात्र पर लगभग 15 रु. मासिक पड़ेगा। रोगी की खुराक भिन्न होगी, जो वह स्वयं खरीदेगा। पकाने का मासिक पारिश्रमिक मात्र उन्हें देना होगा। इस प्रकार अन्यान्य प्राकृतिक चिकित्सालयों में जहाँ लगभग 300 रु. मासिक खर्च पड़ते हैं और केवल धनी लोग ही लाभ उठा पाते हैं? यहाँ बहुत ही कम में काम चल सकता है और गरीब से गरीब व्यक्ति भी लाभ उठा सकते हैं।
अशक्त जो स्वयं अपना काम स्वयं न कर सकते हों, संक्रामक छूत की बीमारियों से पीड़ित, गड़बड़ी करने वाले मानसिक रोगी लेने की अभी व्यवस्था नहीं है। शिक्षार्थी कम से कम हिन्दी मिडिल योग्यता के एवं 18 वर्ष से अधिक आयु के लिये जावेंगे। रोगी तथा विद्यार्थी पत्र व्यवहार करके स्वीकृति प्राप्त कर लें। कार्य आरम्भ होते ही उन्हें बुला लिया जायगा।
‘कल्प चिकित्सा’ प्रणाली, आजकल प्रचलित सभी चिकित्सा पद्धतियों से अधिक उपयोगी एवं लाभदायक सिद्ध होगी। इसलिए आयुर्वेद, होम्योपैथी आदि के चिकित्सक भी इस पद्धति की शिक्षा प्राप्त कराके अपने रोगियों का बहुत हित कर सकते हैं। आजीविका की दृष्टि से भी कल्प चिकित्सा प्रणाली की शिक्षा बड़ी लाभदायक रह सकती है।
(श्रीराम शर्मा आचार्य)
हिन्दू धर्म शास्त्रों के आधार पर पुण्य कार्यों में तीर्थ यात्रा एवं परिक्रमा का प्रमुख स्थान है। आप हर वर्ष लाखों-करोड़ों व्यक्ति किसी न किसी तीर्थ को जाते हैं। प्रत्येक देव मन्दिर के चारों ओर परिक्रमा का स्थान रहता है और उसकी प्रदक्षिणा किये बिना देव दर्शन सफल नहीं माना जाता। यह सोचना भूल है कि “यह एक रूढ़ि मात्र है। भला किसी स्थान विशेष को देखने या घूमने मात्र से पुण्य किस प्रकार हो सकता है।”
वास्तविकता यह है कि तीर्थ यात्रा और प्रदक्षिणा दोनों ही “धर्म प्रचार” के महान् तथ्य के प्रतीक हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि मनुष्य का दुर्बल मन आस-पास के वातावरण से शिक्षा, प्रदर्शन, साहित्य एवं दृश्यों से प्रेरणा प्राप्त करता है। जिस प्रकार बुरी परिस्थितियों से सम्बन्धित होकर मनुष्य कुमार्गगामी एवं पतनोन्मुखी होता है उसी प्रकार सुरुचिपूर्ण एवं धार्मिक वातावरण एवं प्रचार से प्रकाश पाकर मनुष्य सन्मार्गगामी बनता है। जन साधारण को, मानव समाज को, बुराई या भलाई के मार्ग पर चलाने का बहुत कुछ श्रेय भले या बुरे प्रचार पर है। इस शरीर और मन में घुसी हुई असुरता अपना प्रचार कार्य आप करती रहती है। चोरी, ठगी, झूठ, व्यभिचार, जुआ, नशा आदि सिखाने के लिए किसी सभा, संस्था, विद्यालय की जरूरत नहीं हैं। यह प्रवृत्तियाँ अपने आप स्वतः बड़ी तेजी से फैलती हैं। भागीरथ प्रयत्न तो इन्हें रोकने का और मन्द ज्योति से टिमटिमाने वाली सात्विकता को बढ़ाने के लिए करना पड़ता है।
धर्म की रक्षा के लिए, जनता में धर्म भावनाओं को सजीव रखने के लिए सर्व प्रमुख कार्य ‘धर्म प्रचार’ है। ब्राह्मण और साधु का जीवन इन्हीं दो कार्यों के लिये समर्पित होता है। वे निरंतर घूमते रहते हैं और जहाँ जाते हैं वहीं कथा, पुराण, कीर्तन, प्रवचन, सत्संग आदि द्वारा धर्म शिक्षा देते हैं और वह, कीर्तन, संस्कार, पर्व, त्यौहार आदि के सामूहिक उत्सव आयोजन करके धर्मोत्साह पैदा करते हैं। अपनी निज की थोड़ी साधना के अतिरिक्त उनका शेष सारा समय इसी धर्म सेवा में लगता है। यही प्राचीन परम्परा है। संसार की इस अत्यन्त महत्वपूर्ण सुख शान्ति स्थापित करने की सच्ची प्रक्रिया को चलाने के कारण ही सन्त महात्माओं का इतना मान होता है। इसी से उनके चरणों में मस्तक झुकाया जाता है। उनके अमूल्य कार्यक्रम में किसी अभाव के कारण बाधा न पहुँचे, इसी दृष्टि से जनता उन्हें समय-समय पर दान-दक्षिणा देकर अपने को पुण्य फल का अधिकारी मानती है। न घूमने वाले साधु की और धर्म शिक्षा न करने वाले ब्राह्मण की शास्त्रों में निन्दा की गई है।
तीर्थ यात्रा में पैदल जाने का महत्व है, जैसे दौड़ की बाजी में गढ़ी हुई झण्डी को छूने का महत्व है वही महत्व तीर्थ यात्रा के देव दर्शन का हैं। तीर्थ यात्री का कर्तव्य है कि पैदल चलकर गाँव-गाँव धर्मोपदेश करता हुआ, धर्म प्रवृत्ति को जागृत करने वाले कीर्तन आदि आयोजन कराता चले। पुण्य का मूल तथ्य यही धर्म प्रचार है। नियत स्थान पर पहुँचना तो झण्डी छूना है। दौड़ की बाजी जीतने के लिए किसी प्रकार झण्डी छू लेना काफी नहीं है, वरन् दौड़ सकने की शक्ति सिद्ध करना मुख्य है। आज की तीर्थ यात्रा ‘रूढ़ि’ मात्र रह गई है। प्रदक्षिणा, परिक्रमा देव मन्दिर की जाती है वह इस बात की प्रतीक है कि देव कार्यों के लिए दिव्य प्रवृत्तियों के पोषण एवं अभिवर्धन के लिए भ्रमण आवश्यक है। तुलसी की परिक्रमा, पीपल की परिक्रमा, तीर्थ की परिक्रमा, नमदा परिक्रमा, ब्रज परिक्रमा आदि के पीछे यह सत्य काम करता है। यदि यह अदृश्य रूप तथ्य का ध्यान न रहे, केवल लकीर पीटी जाय तो मूल उद्देश्य प्राप्त नहीं होता और न पुण्य फल की ही गुंजाइश बचती है।
गायत्री तपोभूमि सच्ची तीर्थ यात्रा का महत्व हर धर्म प्रेमी के मन में बिठाने के लिए प्रयत्नशील है। ‘धर्म फेरी’ का महत्व संसार के श्रेष्ठ कर्मों में अत्यन्त ऊंचा है। धर्म प्रचार के लिए घूमना आत्म कल्याण और परमार्थ की दृष्टि से महान कार्य है। देवर्षि नारद एक स्थान पर 2॥ घड़ी से अधिक न ठहरने का व्रत लेकर धर्म प्रचार के लिए निरन्तर घूमते रहते थे। उनकी यह साधना, जप, तप, योग, समाधि करने वाले अन्य महात्माओं की अपेक्षा भगवान को अधिक प्यारी लगी और वे भगवान के पास बे रोक-टोक चाहे जब आने-जाने का अधिकार प्राप्त कर सके। पुराणों को पढ़ने से प्रतीत होता है कि यह अधिकार अपनी व्यक्तिगत साधना में लगे हुए अन्य किसी ऋषि को नहीं मिल सका था। नारद जी ही वीणा बजाते हुए चाहे जब विष्णु लोक में जा धमकते थे और भगवान को अपनी शंकाओं का उत्तर देने को विवश कर लेते थे। इतनी बड़ी सफलता का कारण नारद की सर्वश्रेष्ठ धर्म-प्रचार साधना ही थी। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य, भगवान बुद्ध, मीरा, दयानन्द, गाँधी आदि प्रमुख सन्तों का जीवन इसी मार्ग में लगा है। आज भी संत बिनोवा सर्वोदय एवं भूदान के लिए पैदल यात्रा करके सच्ची तीर्थ-यात्रा का उदाहरण उपस्थित कर रहे हैं। तीर्थ यात्रा का पुण्य ऐसी ही उद्देश्य पूर्ण, विवेक पूर्ण धर्म-फेरी से होना संभव हैं। अब वह समय आ गया है जब सच्ची परिक्रमा, सच्ची धर्म-फेरी और सच्ची तीर्थ यात्रा का मर्म समझ लिया जाय और उसी के लिए कटिबद्ध हुआ जाय।
तीर्थों, देव मन्दिरों की भाँति यज्ञों की भी परिक्रमा की जाती है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इस युग का महानतम एवं अभूतपूर्व ब्रह्मयज्ञ है। अपने परिवार के प्रत्येक निष्ठावान साधक को इसके लिए धर्म-फेरी करनी चाहिए। 1000 कुण्डों की 101 यज्ञशालाओं की 240 लाख आहुतियाँ करने के लिए 1 लाख याज्ञिक चाहिए, जो सो भी ऐसे जो सवालक्ष अनुष्ठान एवं 52 उपवास करें। इस प्रकार के, इतने धर्म-प्रेमी ढूँढ़ने के लिए लाखों-करोड़ों आदमियों तक गायत्री यज्ञ का सन्देशा पहुँचाना पड़ेगा। ऐसे कार्यों के लिए सौ से कहने पर मुश्किल से कोई एक तैयार होता है। यह समुद्र मंथन करके रत्न निकालने जैसा कठिन कार्य है। इसके लिए एकमात्र उपाय यही है कि अखण्ड ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने क्षेत्र के घर-घर में गायत्री यज्ञ का सन्देश पहुँचाने के लिए वैसे ही घूमे जैसे वोट माँगने के लिए घूमना पड़ता है। इतने बड़े आयोजन की घोषणा कर देने पर अपने परिवार के ऊपर महायज्ञ की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। इसकी असफलता एक महान् धार्मिक आवश्यकता का अपूर्ण रह जाना, विश्व मानव का एक दुखद दुर्भाग्य तो है ही-साथ ही अपने परिवार की प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है। यह हमारे लिए एक परीक्षा की चुनौती एवं जीवन-स्मरण की कसौटी है।
महायज्ञ की सफलता सदस्यों की धर्म-फेरी पर अवलम्बित है। यदि धर्म-फेरी लगाने में हम लोग अपनी तौहीन, हेठी, बेइज्जती न समझें, इस परम पुनीत कार्य को सच्ची तीर्थ यात्रा समझें, सच्ची परिक्रमा मानें तो एक लाख याज्ञिक तैयार कर सकना सरल है। धर्म-फेरी में कुछ प्रचार साहित्य रहना भी आवश्यक है। इस विषय से सर्वथा अपरिचित लोगों को सारी बात भली प्रकार केवल वाणी से समझा सकना हर किसी के लिए सुगम नहीं है- फिर इसमें वक्त भी ज्यादा लगेगा, इसलिए धर्म-फेरी के लिए जाते हुए कुछ प्रचार साहित्य भी साथ में रहना चाहिए। हममें से हर व्यक्ति अपनी स्थिति के अनुसार निश्चय करे कि इतनी दूरी तक के क्षेत्र को मुझे छान डालना है। दो-दो, चार-चार धर्म प्रेमियों की टोली बनाकर धर्मफेरी के लिए निकलें और जिनसे यज्ञ में सम्मिलित होने की आशा हो उन सभी के घरों में एक परिपत्र या पुस्तिका पहुँचा दें। पोस्टर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकाये जा सकते हैं।
धर्मफेरी के साथ वितरण करने के लिए अत्यन्त सस्ता साहित्य, लागत से भी कहीं कम मूल्य में दिया जा रहा है। 6 रु. में 80 पुस्तिकायें तथा 240 परिपत्र दिये जा रहे हैं। जहाँ तक सम्भव हो यह साहित्य कई व्यक्ति मिलकर कई सैट रेल पार्सल से मंगावें। डाक से बहुत अधिक पोस्टेज इस पर लगता है, यों मजबूरी में डाक से भी भेजते तो हैं ही, पर यह भार है अत्यन्त कष्टसाध्य। जो भी हो, यह धर्म प्रचार और धर्मफेरी का कार्यक्रम अपनाकर हम लोग यज्ञ को सफल बनाने में आवश्यक सहयोग दें।
राजा सगर का अश्वमेध का घोड़ा खो गया था, उसने अपने साठ हजार बेटों को आज्ञा दी कि पृथ्वी का चप्पा-चप्पा ढूँढ़ डालो और यज्ञ का घोड़ा खोज लाओ। आज्ञाकारी बेटों ने वही किया और घोड़े को ढूँढ़ने में सफलता प्राप्त करने के लिए उन सबने अपनी जान दे दी। आज इतिहास में उस घटना की पुनरावृत्ति हो रही है। श्रद्धालु साधक जो इतना जप, अनुष्ठान, उपवास करके याज्ञिक बनें- एक प्रकार के अश्वमेध के घोड़े हैं। वे एक ही नहीं एक लाख चाहिए। ऐसे श्रद्धालुओं की खोज करने के लिए, राजा सगर के साठ हजार बेटों की तरह अपने परिवार के 60 हजार सदस्यों को भी भारत भूमि का चप्पा-चप्पा खोज डालना पड़ेगा। घर-घर अलख जगाना पड़ेगा। गाँव-गाँव, गली, मुहल्ले गायत्री माता और यज्ञ पिता का संदेश पहुँचाना पड़ेगा। सगर पुत्रों ने अपने प्राणों तक का उत्सर्ग किया था। गायत्री पुत्रों को भी कुछ न कुछ त्याग तो करना ही पड़ेगा। कुछ समय का, कुछ श्रम का, कुछ पैसों का। महायज्ञ के अत्यंत विशालकाय आयोजन के लिए धर्म संग्रह की कोई सार्वजनिक याचना नहीं है, पर धर्मफेरी के साथ धर्म प्रचार साहित्य के निमित्त हर परिजन कुछ आर्थिक त्याग करें ही, ऐसी हमारी हार्दिक अभिलाषा है, ऐसे समय में सर्वथा कृपणता दिखाना, एक निराशाजनक बात ही समझी जायगी। प्रतिदिन कम से कम एक पैसा या एक मुट्ठी अन्न इस कार्य के लिए निकाला जाय और कई व्यक्ति मिलकर हर महीने इकट्ठा साहित्य मंगाते और बाँटते रहें तो भी बहुत कार्य हो सकता है।
साधु और ब्राह्मण का कार्य धर्म प्रचार था। आज इन वर्गों की जनसंख्या तो प्राचीनकाल की अपेक्षा अनेक गुनी अधिक है। पर कर्तव्य का सर्वथा लोप होता चला जा रहा है। अपनी निज की मुक्ति कमाने तथा चेली चेले मूंड़ने के खराब धंधे में फंसे हुए साधु और लड्डू रबड़ी उड़ाने वाले, दान-दक्षिणा से लखपती बने हुए ब्राह्मण चारों ओर देखे जा सकते हैं। पर वह ब्रह्म कर्तव्य जिससे जनता का मानसिक स्तर ऊर्ध्वगामी रहता है आज दीख नहीं पड़ता। इस अभाव की पूर्ति हम लोगों को मिल-जुलकर करनी होगी। जैसी टूटी-फूटी योग्यता एवं परिस्थिति है उसी में से कुछ का उत्सर्ग उस लुप्त प्रायः ब्रह्म परम्परा को जीवित रखने के लिए करना होगा। यही धर्मफेरी का उद्देश्य है। यज्ञ किये बिना, दान दिये बिना, गौ को रोटी दिये बिना, भिखारी को भीख दिये बिना गृहस्थ का भोजन पाप भोजन माना गया है। आज कुपात्र भिखारियों को देने की अपेक्षा धर्म प्रचार के लिए-धर्म साहित्य वितरण करके आत्माओं में ज्ञान का प्रकाश देने के लिए नित्य एक दो पैसा या एक दो मुट्ठी अन्न निकालने का व्रत हम में से हर एक को लेना चाहिये। सच्चे तीर्थयात्रा के रूप में धर्मफेरी और सच्चे ब्रह्मभोज के रूप में धर्म मुट्ठी का व्रत हमारे जीवन के दैनिक क्रम में अनन्य रूप में घुल जाना चाहिये।
अन्नदान से ज्ञानदान का पुण्य सौ गुना अधिक बताया गया है। अन्न खाने से थोड़ी देर के लिए भूख बुझती है और कुछ ही देर बाद पेट खाली होकर वह भूख पुनः ज्यों की त्यों जागृत हो जाती है। पर ज्ञान दान से यदि किसी आत्मा में थोड़ी सी भी प्रकाश ज्योति उत्पन्न हो जाय तो उससे जन्म-जन्मान्तरों के दुःख शोक मिट सकते हैं और वह व्यक्ति पशु से देव बन सकता है। इतना बड़ा उपकार ज्ञान दान के अतिरिक्त और किसी अन्न-वस्त्र आदि भौतिक पदार्थों की सहायता से सम्भव नहीं। अन्न, धन आदि का पुण्य फल अगले जन्म में और योनियों में भी मिल सकता है। पर ज्ञान दान का प्रतिफल तो केवल मनुष्य योनि में ही सम्भव है इसलिए ज्ञान दान देने वाले को अगले जन्म में निश्चित रूप से मनुष्य शरीर ही प्राप्त होता है। जिस प्रकार बीमा कम्पनी के एजेन्ट को एक मुश्त एक कमीशन और फिर जब तक बीमा चले तब तक किश्तों पर वार्षिक कमीशन घर बैठे मिलता रहता है, उसी प्रकार धर्म प्रेरणा देने वाले व्यक्ति को उसकी प्रेरणा से धर्म मार्ग में लगने वाले व्यक्तियों के पुण्य का एक भाग कमीशन रूप में मिलता रहता है। पुरोहित को, यजमान को पुण्य दान का दसवां अंश इसीलिए है कि पुरोहित की प्रेरणा से यजमान प्रभावित होता है और प्रेरक का शुभ-अशुभ कार्यों में भागीदार होना वर्तमान सरकारी कानूनों के अनुसार भी और आध्यात्मिक धार्मिक ईश्वरीय नियमों के अनुसार भी निश्चित है।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की सफलता के बहाने यह एक परम पुनीत अवसर है, जिस पर धर्मफेरी और धर्म मुट्ठी का शुभ सत्कर्म आरम्भ करें। पूर्णाहुति के बाद भी यह प्रक्रिया हम लोग चालू रखेंगे और इन्हीं दो साधनों से भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान करने का, मानव को सच्चा मानव बनाने का, विश्व भर में स्थायी रूप से सुख शाँति स्थापित करने का, आसुरी तत्वों के उन्मूलन का महान मिशन सफल बनाकर रहेंगे। इस शुभारम्भ के श्रीगणेश का आज ही उपयुक्त अवसर है। अखण्ड-ज्योति के पाठकों को इसे चूकना नहीं है। तीर्थ यात्रा एवं ब्रह्मभोज आवश्यक धर्मकृत्य हैं, इन्हें हमारे दैनिक जीवन में समुचित और स्थायी स्थान मिलना चाहिए।
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“अग्निऋषिः पवमानः पाँचजन्यः पुरोहितः।”
पुरोहित की पवित्र जिम्मेदारी केवल वे लोग उठावें जिनमें आवश्यक गुण हों।
“वदन् ब्रह्माऽवदतोवनीयाम्।”
ज्ञानवान लोग लोक शिक्षण को अपना कर्तव्य समझें।
“तमेव ऋषिं तमु ब्रह्माणमाहुर्यज्ञन्य सामगा।”
निरन्तर ज्ञान दान करते रहना ब्राह्मण की पवित्र जिम्मेदारी है।
“दिवमारुहत् तपसा तपस्वी।”
तप किये बिना किसी की आत्मोन्नति नहीं हो सकती।
“वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः।”
राष्ट्र को बुराइयों से बचाये रखने का उत्तरदायित्व पुरोहितों का है।
“आ देवानाम भवः केतुरग्ने।”
चरित्रहीन लोगों के हाथों में नेतृत्व न पहुँचने दो।
“परातत्सिच्यते राष्ट्रं ब्राह्मणें यत्र जीयते।”
सच्चरित्र लोक सेवी ही राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति होते हैं।
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बिलारी (मुरादाबाद) में अगहन शु. तृतीया को श्री विनोद कुमार गौड़ के यहाँ 2500 आहुतियों का यज्ञ स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी ने सम्पन्न कराया। इसमें तीनों शाखाओं के सदस्य सम्मिलित हुए थे। हकीम जानकी प्रसाद जी का भाषण तथा राजकुमार जी गुप्ता के भजन बड़े सुन्दर हुए। ब्रह्मभोज भी हुआ। रात्रि के समय श्री रामदेवी गौड़ ने महिलाओं का संगीत और गायत्री चालीसा के पाठ कराये। पंचमी को पं. रघुनन्दन प्रसाद जी आसफपुर वालों ने अजुध्या सुगर मिल में एक सामूहिक यज्ञ कराया।
-इच्छापूर्ण गौड़
आवर (झालावाड़) में श्री सीताराम जी भाव सार, शंकरलालजी स्वर्णकार तथा लक्ष्मीनारायण जी, फूलचन्दजी अध्या तथा कन्हैयालालजी वैद्य के यहाँ सामूहिक यज्ञ किये गये। दो हवन संस्था की तरफ से मन्दिर पर हुये। इस प्रकार दिसम्बर के महीने में सात बड़े-बड़े हवन किये गये। जिनमें सैकड़ों दर्शक भाग लेते रहे। जनता में गायत्री माता और यज्ञ भगवान की भक्ति बढ़ रही है।
-ब्रजमोहन ‘निम्बार्क’
सटई (छतरपुर) में गायत्री प्रचार बड़ी लगन और तत्परता से किया जा रहा है और मथुरा में आगामी वर्ष होने वाले गायत्री महायज्ञ के लिये हार्दिक प्रयत्न किया जा रहा है। एक बड़े यज्ञ की तैयारी की जा रही है, जिसमें अन्य अनेक शाखाओं के मन्त्रीगण भाग लेंगे। यहाँ अभी तक 28,800 मन्त्र लेखन हो चुका है।
-शिवप्रसाद पाठक, काशीराम राय
अर्रुआ खास (आगरा) में पं. हजारीलालजी के घर पर सामूहिक हवन किया गया। दूसरा हवन ला. धनीरामजी के घर 5 जनवरी को हुआ जिसमें 101 ब्राह्मणों को भोजन कराया गया।
-रामप्रसाद शर्मा
दिगौड़ा (टीकमगढ़) में गायत्री शाखा द्वारा जगह-जगह प्रचार किया गया। गायत्री चालीस व एक हजार कुण्डों के यज्ञ सम्बन्धी परिपत्र बाँटे गये। 25 दिसम्बर को शाखा सम्मेलन हुआ, जिसमें झाँसी से श्री गिरिजासहायजी खरे पधारे। शीघ्र ही यहाँ 27 नवीन शाखाएं स्थापित की जा रही हैं।
-बैजनाथप्रसाद सोनकिया
लखनऊ में 28 दिसम्बर को मनोहरलाल जी के यहाँ दो हजार आहुतियों का विशाल यज्ञ किया गया जिसमें बहु संख्यक गायत्री प्रेमियों ने भाग लिया। वहाँ स्त्री-सत्संग की भी एक रूपरेखा रखी गई और गायत्री चालीसा बाँटे गये। माताओं और बहिनों को गायत्री मन्त्र जपने की शिक्षा दी गई। बसन्त पंचमी पर 5 कुण्डों तथा 24 हजार आहुतियों का बड़ा यज्ञ किया गया।
-मदनमोहन शुक्ल
राघोगढ़ (जिला गुना) की तरफ से गावरी ग्राम में सामूहिक हवन किया गया और शाखा की स्थापना की गई जिसके मन्त्री जगन्नाथ जी शर्मा सर्वसम्मति से चुने गये।
-बाबूलाल शर्मा
ललितपुर (झाँसी ) में श्री बाबूलाल जी निगम के निवास स्थान पर 31 दिसम्बर को 600 आहुतियों का हवन सम्पन्न हुआ। गायत्री ज्ञान वार्ता हुई और प्रसाद बाँटा गया।
-नाथूराम वर्मा
साकरबाडी (अहमदनगर) में गायत्री परिवार के सब सदस्यों ने मिलकर 2400 आहुतियों को हवन किया।
-रतनशी दामोदर भाटिया
शाजापुर (मध्य प्रदेश) के गायत्री परिवार की प्रेरणा से प्रति रविवार को विभिन्न उपासकों के स्थानों पर गायत्री यज्ञ किया जा रहा है। पिछले दिनों श्री जुगलकिशोर जी वकील, सोनूरावजी आँवले, कैलाश प्रसाद जी श्रीवास्तव, श्री नन्दरामजी मंडलोई, सोमेश्वर जी एकाउन्टेंट, कृष्णादासजी कम्पौण्डर, हरिचन्द्र जी श्रीवास्तव, मदनलाल जी शर्मा, बाबूराब जी भौंसले, बाबूलालजी वर्मा, भेंरुलालजी तुगनावत के स्थानों पर सामूहिक यज्ञ किये गये। इनमें सब मिलाकर 12,942 आहुतियाँ दी गई।
-सी. जी. जोती, मन्त्री
बिजौली (फतेहपुर) में पौष कृ. 11 को गायत्री उपासकों ने श्री विद्याश्वर प्रसाद के स्थान पर एक विशाल गायत्री यज्ञ किया। यज्ञ कार्य पं. मन्नुलाल जी ने कराया। सभी सदस्यों ने अपनी प्रतिज्ञाओं को यज्ञ भगवान के सम्मुख दुहराया। तपोभूमि से आये परिपत्र बाँटे गये और उनके अनुसार धर्मफेरी का कार्यारम्भ किया गया है।
- रामसनेही वर्मा
जाँजगीर (बिलासपुर) में विश्व कल्याण निमित्त पौष सुदी पूर्णिमा को हवन तथा ब्रह्मभोज किया गया। यज्ञ के आचार्य पं. शिवशंकरप्रसाद का उत्साह सराहनीय था।
-रामऔतार तिवारी
मझोला (नैनीताल) में 22 दिसम्बर से नित्य अखण्ड यज्ञ हो रहा है। साथ ही विभिन्न सदस्यों के घरों पर अलग-2 सामूहिक हवन किये जा रहे हैं। उपासकों को मथुरा में होने वाले महायज्ञ का यजमान बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है।
-लक्ष्मणसिंह मनराल
राँची में पौष की पूर्णमासी को एक हजार आहुतियों का सामूहिक हवन किया गया।
-छेदी भगत
काशीपुर (बदायूँ) में श्री उदयप्रकाश जी शास्त्री गुलफामसिंह जी यादव, चन्द्रपाल जी बंसल गायत्री प्रचार करने और महायज्ञ के लिए यजमान और होता बनाने में संलग्न हैं। श्री चमनलालजी सूरी और गायत्रीप्रसाद जी (पुसावली) भी पधारे थे उनकी अध्यक्षता में एक बड़ा गायत्री हवन किया गया।
-ओमप्रकाश मित्तल
सतना (म. प्र.) के रेलवे क्वार्टर्स में ता. 5 जनवरी को गायत्री यज्ञ और गोष्ठी का विशेष आयोजन सानन्द समाप्त हुआ। कुछ बाहरी शाखाओं के सदस्यों ने भी योग दिया। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति को सफल बनाने के लिए प्रयत्न करने का निश्चय किया गया।
-मन्त्री, गायत्री-परिवार
कुन्देरा (हमीरपुर) में गीता जयन्ती के अवसर पर विशेष हवन का आयोजन किया गया, जिसने 12 गांवों के उपासकों ने भाग लिया था। प्रसाद के साथ आचार्य जी का चित्र वितरण किया गया।
-मोहन लाल वैध
पुसावली (बदायूँ) में 29 दिसम्बर को महिलाओं के लिए विशेष हवन किया गया जिसमें 14 उपासिकाओं ने भाग लिया। यहाँ महायज्ञ के लिए 18 यजमान और होता बनाये जा चुके हैं। प्रचार कार्य खूब चल रहा है।
-गायत्रीप्रसाद गुप्ता
छोटी कसराबद (म.प्र.) में महायज्ञ के यजमान बनने वाले सदस्यों ने 5 माला नित्य की साधना प्रारम्भ कर दी है। परिवार के सभी साधकों में बड़ा उत्साह है।
-किशोरसिंह दसोंदी
गरोठ (मंदसौर) की शाखा ने नवम्बर व दिसम्बर 1957 में हर रविवार, पूर्णिमा और अमावस्या को हवन कराये जिनमें 8500 मन्त्रों की आहुतियाँ दी गई। शिवनारायण जी शर्मा उपमन्त्री ने 24 हजार का अनुष्ठान किया। हमारी शाखा की प्रेरणा से ता. 12 जनवरी को कछारिया गांव में श्री कन्हैया लाल धनोत्या के स्थान पर हवन किया गया और शाखा की स्थापना की गई।
-रामविलास चौधरी
सिकन्दराराऊ (अलीगढ़) की गायत्री शाखा के सदस्य श्री गयाप्रसाद जी आस-पास के गाँवों में धर्मफेरी का कार्य कर रहे हैं। उनके प्रयत्न से सूरतपुर गाँव में नवीन शाखा स्थापित की गई है, जिसके मन्त्री श्री गनेशीलाला लवानियाँ चुने गये।
-श्री राधेश्याम ‘आजाद’
कुर्रा (हमीरपुर) में पं. परमेश्वरी दयाल (व्रत धारी) के स्थान पर सामूहिक हवन किया गया। मथुरा के महायज्ञ के लिए सब सदस्यों को उत्साहित किया गया।
-भवानीदीन शर्मा
आप भी इसमें सम्मिलित होकर जीवन सफल कीजिये।
गायत्री को भारतीय संस्कृति की माता और यज्ञ को भारतीय धर्म का पिता माना गया है। इन दोनों की उपासना को ऋषियों ने प्रत्येक भारतीय का आवश्यक धर्म कर्तव्य घोषित किया है। हाड़-माँस का शरीर माता-पिता के रज-वीर्य से बनता है। पर हमारा आध्यात्मिक जीवन, जिसे ‘द्विजत्व’ कहते हैं। गायत्री माता और यज्ञ पिता के संयोग से ही बनता है। गायत्री सनातन एवं अनादि मन्त्र है। ब्रह्माजी ने इस महामन्त्र का जप करके जो शक्ति प्राप्त की उसी के बल से सृष्टि का निर्माण किया और गायत्री के चार चारणों की व्याख्या में चार वेदों की रचना हुई।
समस्त धर्म ग्रंथों में गायत्री की महिमा एक स्वर से कही गई है। अथर्ववेद में गायत्री को आयु, विद्या, सन्तान, कीर्ति, धन और ब्रह्म तेज प्रदान करने वाली कहा गया है। गायत्री को भूलोक की ‘काम-धेनु’ कहा गया है क्योंकि वह आत्मा की समस्त क्षुधा-पिपासाएं शान्त करती है। गायत्री को ‘सुधा’ कहते हैं, क्योंकि जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाकर सच्चा अमृत प्रदान करने की शक्ति से वह परिपूर्ण है। गायत्री को ‘पारस मणि’ कहा गया है क्योंकि उसमें स्पर्श से लोहे के समान कलुषित अन्तःकरणों में शुद्ध स्वर्ण जैसा महत्वपूर्ण परिवर्तन हो जाता है। गायत्री को ‘कल्पवृक्ष’ कहा गया है, क्योंकि उसकी छाया में बैठकर मनुष्य उन सब कामनाओं को पूर्ण कर सकता है जो उसके लिए उचित एवं आवश्यक हैं। श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का आँचल पकड़ने का परिणाम सदा कल्याण कारक ही होता है। गायत्री को ‘ब्रह्मास्त्र’ कहा गया है क्योंकि इसका प्रयोग कभी निष्फल नहीं जाता।
यज्ञ भारतीय धर्म का पिता है। प्राचीन काल में आर्य जाति अग्निहोत्र द्वारा ही ईश्वर पूजा करती थी। यजुर्वेद में लिखा है- जिसे सुख-शान्ति की इच्छा हो वह यज्ञ परित्याग न करे। “महाना-रायणोपनिषद्” में लिखा है- यज्ञ से ही देवताओं ने स्वयं का अधिकार प्राप्त किया और असुरों को हराया। महाभारत में कहा गया है- यज्ञ के समान कोई दान नहीं, यज्ञ के समान कोई कर्मकाण्ड नहीं यज्ञ में ही धर्म का समस्त तत्व समाया हुआ है। गीता में कहा गया है-”तुम यज्ञ से देवताओं को प्रसन्न करो देवता तुम्हारी उन्नति करेंगे।”
शास्त्रों में यज्ञ को “श्रेष्ठतम कर्म” कहा गया है। थोड़े से मूल्य की समिधा, सुगन्धित, सामग्री, घी, हविष्यान्न आदि खर्च करके उसकी अपेक्षा करोड़ों गुने मूल्य का लोकहित होता है। यों यज्ञों की सदा ही आवश्यकता रहती है पर इन दिनों उनके व्यापक आयोजनों की विशेष रूप से आवश्यकता है। महायुद्धों में आग्नेयास्त्र चलने से तथा अनेकों नर हत्याएं होने से वातावरण विषाक्त हो जाता है उसे शुद्ध करने के लिए यज्ञ आवश्यक है। लंका काण्ड के बाद भगवान राम ने और महाभारत के बाद भगवान कृष्ण ने विशाल यज्ञ कराये थे। गत दो महायुद्धों में भारी नर संहार तथा गैस बारूद का प्रयोग हुआ है, उनके कारण विक्षुब्ध आकाश और प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ गया है और नाना प्रकार की प्राकृतिक प्रतिकूलताएं, बीमारियाँ, भूकम्प, तूफान, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि उपद्रव हो रहे हैं। आसुरी तत्वों के बढ़ जाने से एटम युद्ध जैसी सत्यानाशी विभीषिकाएं सामने आ रही हैं। इस बार तो ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सन् 62 में एक राशि पर 8॥ ग्रह एकत्रित होने का एक बड़ा कुयोग आ रहा है। महाभारत काल में एक राशि पर 7॥ ग्रह आये थे उससे महा भयंकर विश्व युद्ध हुआ था इस बार उससे भी बड़ा कुयोग है। ऐसे अशुभ अनिष्टों को टालने के लिए शास्त्रों में विशाल यज्ञों को एक रामबाण उपाय बताया है। यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ यज्ञ, गायत्री-यज्ञ ही है।
गायत्री तपोभूमि द्वारा विश्व शान्ति की स्थापना एवं मानवता की सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिये ‘ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान’ नामक इस युग का महान धर्मानुष्ठान प्रारम्भ किया गया है। इसके अनुसार प्रतिदिन 24 करोड़, गायत्री-जप, 24 लाख हवन, 24 लाख मन्त्र लेखन, 24 लाख पाठ की प्रक्रिया पूरा करने का आयोजन चल रहा है। इसकी पूर्णाहुति आगामी कार्तिक सुदी 12 से 15 सं. 2015 को तदनुसार 23,24,25,26 नवम्बर सन् 58 को 1000 कुण्डों की 101 यज्ञशालाओं में एक लाख होताओं द्वारा होगी। इसमें 240 लाख आहुतियाँ दी जायेंगी और लाखों आगन्तुकों के ठहरने, भोजन आदि की निःशुल्क व्यवस्था की जायगी। यह इस युग का अभूतपूर्व एवं महानतम धर्मानुष्ठान है। इतना बड़ा यज्ञानुष्ठान हममें से अभी तक किसी ने नहीं देखा और शेष जीवन में फिर कोई ऐसा अवसर देखने को मिलेगा इसकी आशा करना कठिन है। इसलिये जिनके मन में इन धार्मिक यज्ञानुष्ठानों के प्रति कोई प्रेम हो उन्हें इस अलभ्य अवसर में सम्मिलित होने का लाभ अवश्य लेना चाहिए।
इस महायज्ञ में आहुतियाँ देने वाले ‘होता’ वे होंगे जो अब से लेकर पूर्णाहुति तक सवा लक्ष जप कर लेंगे। घी होमने वाले ‘यजमान’ वे होंगे जो सवालक्ष जप के अतिरिक्त 52 उपवास भी पूर्णाहुति तक करेंगे और उपवास से बचाये हुए अन्न से गायत्री साहित्य मंगाकर अपने घर में गायत्री ज्ञान मन्दिर स्थापित करेंगे। गायत्री ज्ञान प्रसार के लिए अपने क्षेत्र में भ्रमण करना भी प्रत्येक होता तथा यजमान का कर्तव्य है। यह प्रतिबन्ध इसलिए रखे गये हैं कि श्रद्धालु व्यक्ति ही अपनी श्रद्धा की परीक्षा देकर यज्ञशालाओं में प्रवेश कर सकें। जो होता यजमान न बन सकें, मथुरा भी न आ सकें वे इस यज्ञ की आसुरी अनुष्ठानों से रक्षा के लिए एक माला प्रतिदिन का नियम लेकर संरक्षक बन सकते हैं। अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक के इस यज्ञ में होता, यजमान या संरक्षक किसी भी रूप से सम्मिलित रहने का हमारा विशेष अनुरोध है। इस अंक के अन्तिम पृष्ठों में दो फार्म जुड़े हुए हैं उन्हें भरकर स्वयं भेजें तथा इनकी नकल सादे कागज पर बनाकर और भी साथियों को इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए फार्म भरावें।
जितना बड़ा यह यज्ञ है उसकी शक्ति का प्रादुर्भाव भी उतना ही बड़ा होगा। इस यज्ञ में सम्मिलित होने वाले व्यक्ति वह लाभ प्राप्त कर सकेंगे जो साधारणतः वर्षों तक कठिन साधना करने पर भी उपलब्ध करना कठिन है। शारीरिक विकारों से अस्त, मानसिक अपूर्णता एवं उद्वेगों से ग्रस्त, सुसन्तति के लिए तरसने वाले, चिन्ता और भय से परेशान, आपत्तिग्रस्त व्यक्ति इस अवसर पर भरपूर लाभ उठा सकते हैं। अन्तःकरण पर चढ़े हुए कुसंस्कारों को जलाने के लिए यह अवसर सोने को तपाकर शुद्ध करने जैसा ही है। भीतर के तमोगुण को हटाकर आत्मा में दिव्य सतोगुण की स्थापना ऐसे अवसरों पर ही होती है। विश्व शाँति, साँस्कृतिक पुनरुत्थान एवं देवत्व की अभिवृद्धि के सार्वभौम लाभ तो होंगे ही, साथ ही, जो लोग इस यज्ञ में शामिल रहेंगे, वे व्यक्तिगत सत्परिणाम भी आशाजनक मात्रा में प्राप्त कर सकेंगे।
अलीगढ़ में जिले की शाखाओं का सम्मेलन करके जिले का एक मण्डल स्थापित किया गया और पदाधिकारी चुने गये। इस अवसर पर बरेली से श्री चमनलाल सूरी भी पधारे थे। कुछ सदस्यों ने यजमान बनने के संकल्प लिये हैं।
-श्रीराम पाण्डेय
सिमरधा (झाँसी) में ता. 29 दिसम्बर को समस्त गायत्री उपासकों ने मिलकर धर्म-फेरी लगाई। सर्व श्री बाबूलाल तिवारी, दमरुलाल, ज्वालाप्रसाद ति., काशीराम पाठक, रामाधीन पटैरिया, ज्वालाप्रसाद, दसरथ प्रसाद त्रिपाठी, संतराम पटैरिया, बच्छीलाल यादव और चन्द्रभान शर्मा ने दूसरे गाँवों में धर्म-फेरी लगाने का उत्तरदायित्व लिया।
-शालिगराम तिवारी
मच्छरगाँवाँ बाजार (चम्पारन, बिहार) में साप्ताहिक सत्संग नियमित रूप से होता है और विभिन्न सदस्यों के स्थानों पर हवन किये जाते हैं। महायज्ञ के सम्बन्ध में प्रचार कार्य जारी है।
-सीताराम गुप्त
खूँटी (राँची) में पूर्णिमा के अवसर पर 1200 आहुतियों का हवन किया गया। बाद में कीर्तन और प्रीतिभोज हुआ। गायत्री ज्ञान मन्दिर में तीन दिन तक एक विद्वान स्वामी जी का उपदेश हुआ।
-देवेन्द्रनाथ
बलोला (झाबुआ) में गायत्री पुस्तकालय स्थापित करने का आयोजन किया गया हैं। गाँव की जनता इस कार्य में सहयोग दे रही है।
-दुर्गाप्रसाद त्रिवेदी
टाटा नगर के शिव मन्दिर में ता. 14 दिसम्बर को 1944 आहुतियों का हवन किया गया और 24 घन्टे का अखण्ड कीर्तन किया गया। इसके बाद गरीबों और कीर्तन मंडलियों को भोज दिया गया। इस कार्य में अनेक टेलको निवासियों ने श्रम तथा अर्थ से सहायता प्रदान की।
-नगदनारायण शर्मा
देहली में संक्रान्ति के अवसर पर दो दिन तक महिलाओं का यज्ञ हुआ जिसमें 5 हजार आहुतियाँ दी गई। तीन दिन तक क्रमशः स्वामी ब्रह्मानन्द, पूज्य शाँतिदेवी और ईश्वर देवी जी का उपदेश हुआ। यज्ञ के पीछे यज्ञ-शेष बाँटा गया।
-एक उपासिका
अचलगंज (उन्नाव) में 24 हजार आहुतियों का गायत्री यज्ञ सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। कानपुर से पूज्य स्वा. आत्मदेवाश्रम व पं. विनोदजी ने पधारने की कृपा की थी। पं. इन्द्रपालजी शास्त्री पुराणाचार्य यज्ञ के आचार्य रहे। पीतवस्त्र धारी 17 होता जिस समय यज्ञ मण्डप में पधारते थे उस समय अलौकिक छटा दिखलाई पड़ती थी।
-हरिचरण शुक्ल
डबरा (ग्वालियर, म. प्र.) के गायत्री परिवार की ओर से दिनाँक 10-1-58 से 12-1-58 तक 24 कुण्डों में 1 लाख 37 हजार 300 आहुतियों का विशाल यज्ञ किया गया। सैकड़ों महिलाओं ने भी यज्ञ में भाग लिया। प्रतिदिन लगभग 6 हजार दर्शक भाग लेते रहे। मथुरा से आचार्य श्रीराम शर्मा, स्वामी प्रेमानन्द, राजकवि श्री श्याम शर्मा (पिनाहट), श्री लक्ष्मीनारायण जी बी. ए. एल. एल. बी. आदि विद्वानों ने भाग लिया और महत्वपूर्ण विषयों पर प्रवचन दिये। ता. 9 जनवरी को 51 कलशधारिणी महिलाओं के साथ लगभग 600 महिलाओं का जुलूस निकला। ता. 11 को आचार्य जी का जुलूस फूलों से लदी मोटर में निकला। हजारों दर्शकों की भीड़ ने उनका धूम-धाम से स्वागत किया। आस-पास की अनेक शाखाओं ने यज्ञ में सक्रिय भाग लिया। आचार्य जी ने खुली घोषणा करके नारियों को भी यज्ञ वेदी पर बैठाया। ब्रह्मभोज के स्थान पर गायत्री साहित्य वितरण किया गया और 601 कन्याओं को भोजन कराया गया।
-द्वारिकाप्रसाद बडेरिया
आगरा में रावली तथा छीपीटोला के गायत्री उपासकों ने मकर संक्रान्ति के अवसर एक हजार आहुतियों का हवन किया। श्री व्यासजी व मुकुट बिहारी लाल जी के प्रभावशाली प्रवचन हुये व तपोभूमि से प्राप्त परिपत्रों का प्रचार किया गया।
-मन्त्री, गायत्री शाखा
गायत्री परिवार हमारा।
तन मन वचन कर्म से प्यारा॥
गायत्री की शाखायें हम, गाँव गाँव में फैलावेंगे।
घर घर में माता की महिमा, और सँदेशा पहुँचावेंगे॥
आपस का विद्रोह मिटेगा, समता का ब्यौहार करेंगे।
त्याग दृष्टि से न्याय सहित हम, सब जग का उपकार करेंगे॥
बहे प्रेम की निर्मल धारा।
गायत्री परिवार हमारा॥
कुविचारों अविवेकों से हम, डट करके संग्राम करेंगे।
आत्म ज्ञान का दीप जलाकर, अन्धकार को दूर करेंगे॥
शाश्वत मर्यादा कायम रख, देश जाति की लाज रखेंगे।
धर्म सनातन की नौका को, खे करके उस पार करेंगे॥
यह सच्चा कर्त्तव्य हमारा।
गायत्री परिवार हमारा॥
आज हड्डियाँ राख बनीं, कल राखों में अंगार बनेंगे।
और मातृ मन्दिर की प्रतिमा, के शत् शत् शृंगार बनेंगे॥
शिव दधीच हरिचन्द कर्ण सम, दानी बनकर दान करेंगे।
अपनी धर्म संस्कृति का, हम निश्चय पुनरुत्थान करेंगे॥
मिट जावे भय संकट सारा।
गायत्री परिवार हमारा॥
समय धर्मफेरी में अधिकाधिक, दें ऐसा यत्न करेंगे।
गायत्री उपासकों की, घर-घर जा-जाकर खोज करेंगे॥
समय परीक्षा का आया है, अब तो आगे कदम धरेंगे।
व्रतधारी याज्ञिक बनने का, जन-जन से अनुरोध करेंगे॥
समता सत्य शान्ति का नारा।
गायत्री परिवार हमारा॥
गायत्री परिवार हमारा, नवयुग का निर्माण करेगा।
सच्चे प्रेम धर्म के द्वारा, अखिल विश्व कल्याण करेगा॥
सेवा, त्याग, सचाई, संयम, श्रम, सज्जनता का व्रत लेंगे।
शिव-सा विष पीकर भी हम, जग को नया उजाला देंगे॥
तब हो पूरण लक्ष हमारा।
गायत्री परिवार हमारा॥
*समाप्त*
ले. श्री लालजीप्रसाद मिश्र (सर्वोदयी)