प्रश्नोत्तर

(श्री ब्रजेन्द्र कुमार ठाकुर)


प्रश्नोत्तर (Kavita)

इस जगती में कौन पुरातन? उत्तर है ‘भगवान’, क्योंकि सदा से पूज रहे हैं, इस जग के इन्सान ॥1॥

किसे कहेंगे सबसे सुन्दर? केवल सृष्टि महान, क्योंकि विधाता की यह रचना, करती जग कल्याण॥2॥

इस दुनिया में क्या प्रधान है? सब कहते हैं स्थान, जिसमें देखो समा रहा है, जल थल नील वितान॥3॥

अचल जगत ने किसको माना? आशा एक प्रमाण, मानव से सब छिन जाने पर, शेष यही वरदान॥4॥

‘श्रेष्ठ’ सृष्टि में किसे कहें हम? ‘सद्गुण’ रहा महान, क्योंकि इसी के ही अभाव में शून्य सभी हैं ज्ञान॥5॥

सबसे ज्यादा द्रुतगामी क्या? बस ‘विचार’ का यान’, क्षण ही भर में यह जाल है, जहाँ रहे भगवान ॥6॥

‘महाबली’ पद कौन पायेगा? ‘आवश्यकता’ जान, जिसके कारण सह लेता है, मानव कष्ट अमान ॥7॥

‘सरल काम’ है क्या इस जग में? तुम भी लो अब जान, मानव केवल समझ रहा है, ‘देना सबको ज्ञान’॥8॥

और ‘कठिन क्या काम’ विश्व में? तज देना अभिमान, सन्त वेद सब यह कहते हैं, ‘अपने को पहिचान’॥9॥


नीति पर चलना ही श्रेष्ठ धर्म है

(महात्मा गाँधी)

हम लोगों के साधारण शास्त्र बतलाते हैं कि दुनिया कैसी है और नीति शास्त्र बतलाता है कि दुनिया कैसी होनी चाहिए। इसी से यह ज्ञान होता है कि मनुष्य को किस प्रकार का आचरण रखना चाहिए। मनुष्य के हृदय में दो खिड़कियाँ हैं। एक में से उसे दिखाई देता है कि वह खुद कैसा है और दूसरी में से दिखाई देता है कि उसे कैसा होना चाहिए।

मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने शरीर, मन और मस्तिष्क की अलग-अलग जाँच करे, पर उसे इतने पर ही ठहर न जाना चाहिए। यदि वह केवल जाँच करके ही रह जाय तो जो कुछ ज्ञान लाभ उसने किया है, उससे वह कुछ लाभ नहीं उठा सकता। उसे जानना चाहिए कि अन्याय, दुष्टता, अभिमान आदि के कैसे परिणाम होते हैं। पर इनको जानकर बैठ जाने से भी कोई लाभ नहीं। तदनुसार आचरण भी करना चाहिए। नीति का विचार मकान के नक्शे की तरह है। नक्शा बतलाता है कि घर किस प्रकार बनाना चाहिए। परन्तु यदि हम नक्शे के अनुसार मकान न बनवाये तो वह व्यर्थ जाता है। इसी प्रकार यदि हमारा आचरण नीति के विचारों के अनुसार न हो तो वे विचार भी व्यर्थ ही हैं। बहुत से मनुष्य नीति के वाक्य याद करते हैं, उन पर भाषण देते हैं और बड़ी बड़ी बाते करते हैं, परन्तु वे उसके अनुसार चलते नहीं और न चलने की इच्छा रखते हैं और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि नीति के विचार इस दुनिया में आचरण करने के लिए नहीं होते, वरन् मरने के बाद जिस दुनिया में हम जाते हैं, उसमें करने के लिए होते हैं। मगर उनका यह कथन प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। एक विचारक ने कहा है-हमें पूर्ण मनुष्य बनना है तो आज ही से चाहे जितना कष्ट आवे नीति के अनुसार आचरण करने लग जाना चाहिए। ऐसे विचारों से हमें भड़कना नहीं चाहिए वरन् अपना उत्तरदायित्व समझ कर उसके अनुसार चलने में प्रसन्नता माननी चाहिये।

ईश्वर सर्वशक्तिमान है, सम्पूर्ण है। उसके स्नेह की, उसकी दया की और उसके न्याय की कोई सीमा नहीं है। यदि ऐसा है तो हम जो उसके बन्दे सेवक गिने जाते हैं, कैसे नीति का मार्ग छोड़ सकते हैं? नीति मार्ग पर चलने वालो को सफलता न भी प्राप्त हो , तो उसमें नीति का कोई दोष नहीं, किन्तु दोष उसी का है जिसने नीति को भंग किया है। नीति मार्ग पर चलकर जो नीति की रक्षा की जाती है वह इसलिए नहीं कि उसका बदला मिले, क्योंकि मनुष्य प्रशंसा पाने के लिए भलाई नहीं करता, बल्कि इसलिए करता है कि वह भलाई किये बिना रह नहीं सकता उसके लिए भोजन और कार्य की तुलना करने पर अच्छा कार्य ही उत्तम प्रकार का भोजन प्रमाणित होता है। उसको यदि कोई दूसरा मनुष्य भलाई करने का मौका देता, तो वह मौका देने वाले का उपकार मानता है, जिस प्रकार कि भूखा मनुष्य भोजन देने वाले को आशीर्वाद देता है।

जिस नीति मार्ग का हमने ऊपर वर्णन किया है वह मार्ग ऐसा नहीं है जिससे दिखावटी सज्जनता प्राप्त की जाय। उसका अर्थ यह भी नहीं है कि विशेष परिश्रमी बनना, विशेष शिक्षा प्राप्त करना, विशेष स्वच्छ रहना आदि। ये सब बातें तो उसमें आ ही जाती हैं। पर इसके सिवा भी इस मार्ग में मनुष्य के करने लायक बहुत सी बाते रह जाती हैं।

सच्ची नीति का नियम ही यह है कि हम जिस मार्ग को जाते हैं उसे ही ग्रहण करके न रह जायें। किन्तु जो मार्ग सच्चा है फिर चाहे हम उससे परिचित हो या न हों हमें उसे ग्रहण करना ही चाहिए। मतलब यह है कि जब हम यह जान जाये कि फलाँ मार्ग सच्चा है तब हमें उस पर जाने के लिए निर्भय होकर जी तोड़ परिश्रम करना चाहिए। जब इस प्रकार नीति का पालन किया जा सके तभी हम आगे बढ़ सकते हैं। इससे हम जान सकते हैं कि नीति, सच्चा सुधार और सच्ची उन्नति ये तीनों बातें हमेशा एक साथ ही देखी जाती है।

नीति के कार्य हमारी आन्तरिक इच्छा से किये जाने चाहिए। जब तक हम मशीन की तरह काम करते हैं तब तक हमारे कार्य में नीति नहीं आती। यह ठीक है कि मनुष्य को मशीन की तरह काम करना चाहिए, क्योंकि इसमें हम अपनी विवेक बुद्धि का व्यवहार करते हैं। पर जो मनुष्य अपनी बुद्धि और मस्तिष्क का उपयोग न करके नदी के बहाव में जैसे लकड़ी बही जाती है वैसे बहे जाता है, वह नीति को कैसे समझ सकता है? इसलिये प्रत्येक मनुष्य को स्वयं विचार करना, उसे प्रकट करना तथा उसके अनुसार काम करना सीखना चाहिये। तभी यह कहा जा सकता है कि हम नीति की सीढ़ी पर पहुँचे हैं। इस प्रकार का कार्य स्वतः अच्छा है, इतना ही समझना बस नहीं है, साथ ही वह कार्य भलाई की इच्छा से किया हुआ होना चाहिए। अर्थात् इस बात का आधार काम करने वाले की नियत पर है कि अमुक काम में नीति की रक्षा हुई या नहीं।

दो मनुष्य एक ही काम को करते हैं, परन्तु उनमें से एक का काम नीति युक्त हो सकता है और दूसरे का नीति रहित। जैसे एक मनुष्य अत्यन्त दयार्द्र होकर गरीबों को भोजन देता है और दूसरा मान, प्रतिष्ठा या बड़ाई के लिए या किसी ऐसे ही अन्य स्वार्थपूर्ण विचार से बड़ा काम करता है दोनों काम एक से होने पर भी एक का काम नीति युक्त है और दूसरे का नीति रहित समझा जाता है। यह भी देखा जाता है कि नीति के कार्य का अच्छा प्रभाव हमेशा दृष्टिगत नहीं होता। इसलिए नीति का विचार करते समय हमको केवल यही विचार करना चाहिए कि जो कार्य किया गया है वह शुभ है और शुद्ध भावों से किया गया है। उसके परिणाम पर हमारा कुछ अधिकार नहीं है। फल देने वाला तो केवल एक ईश्वर ही है। सम्राट सिकन्दर (अलेक्जैंडर) को इतिहासकारों ने महान बतलाया है। वह जहाँ गया वही उसने यूनान के कला कौशल, शिक्षा, उद्योग और रीति-रिवाज चलाये, जिनके फलों का हम आज भी आनन्द से आस्वादन कर रहे हैं। परन्तु इन सब कामों के करने में सिकन्दर का उद्देश्य अधिकतर अपना बड़प्पन दिखलाना और विजयी बनना ही था। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि उसके कामों में नीति भी थी। वह भले ही बड़ा माना गया हो, पर नीतिमान नहीं कहा जा सकता।

इस प्रकार नैतिक नियमों में बड़ा अन्तर है, क्योंकि नीति का काम हमारे हृदय में है। अनीति का आचरण करता हुआ मनुष्य स्वयं भी यह अनुमान करता रहता है कि मैं अनीति कर रहा हूँ। झूँठ कभी सत्य नहीं हो सकता। जहाँ के मनुष्य बहुत दुष्ट होते हैं और जो कभी नीति के नियमों का पालन नहीं करते, वे भी नीतिमान होने का ढोंग रचते हैं। ऐसे मनुष्यों को भी यह स्वीकार करना पड़ता है कि नीति का पालन करना ही श्रेष्ठ है। यह नीति की महिमा है। नीति, रीति-रिवाज या प्रजामत की कभी परवाह नहीं करती। जब तक प्रजामत या रीति रिवाज, नीति के नियमों के अनुसार चलाये जाते हैं तभी तक नीतिमान पुरुष के लिए वे शिरोधार्य हैं। इन नियमों को राजा नहीं बनाते, क्योंकि भिन्न-भिन्न राज्यों में अनेक परस्पर विरोधी नियम देखे जाते हैं। किसी विद्वान ने सत्य कहा है कि “यदि कोई शैतान आकर दुनिया में द्वेष और झूँठ को सिंहासन पर बैठा दे तो भी न्याय, भलाई और सत्य ही ईश्वरीय नियम रहेंगे।” इससे यही सिद्ध होता है कि नीति के नियम ही सर्वोपरि, ईश्वरीय और मानने योग्य हैं।


तीर्थ स्थानों से आध्यात्मिक शक्ति की प्राप्ति

(श्री. बैजनाथ बी. ए.)

विदेशी धर्म प्रचारक हिन्दू धर्म पर प्रायः यह आक्षेप किया करते हैं कि यह एक ईश्वर अथवा परमात्मा के बजाय 33 करोड़ देवताओं को मानने वाला और पशु, पंडों, पत्थरों, नदियों आदि की पूजा करने वाला नीचे दर्जे का धर्म है। पर वास्तव में यह आरोप मिथ्या है। जिसे वे लोग या तो अज्ञान के कारण समझ नहीं पाते अथवा जान-बूझकर झूठा प्रचार करने की चेष्टा करते हैं। अन्य धर्मों की भाँति हिन्दू धर्म को भी मालूम है कि परमात्मा अथवा ईश्वर एक ही हो सकता है, चाहे उसकी शक्ति का आविर्भाव असंख्यों रूपों में क्यों न हुआ हो। सत्य बात यह है कि किसी धर्म वाले चाहे, एकेश्वरवाद की जितनी भी डींग क्यों न मारें निर्गुण परब्रह्म के स्वरूप को समझ सकना अथवा उसकी वास्तविकता को अपनी बुद्धि द्वारा ग्रहण कर सकना बड़े से बड़े विद्वान के लिये भी महा कठिन है। भगवान बुद्ध अपने चेलों से कहा करते थे “कि ऐसी भारी बातों के विषय में उन्हें कुछ विचार न करना चाहिये, क्योंकि इस विषय में किसी भी प्रकार का निर्णय कर सकना असंभव है और उससे कुछ लाभ नहीं निकलेगा।” इसीलिये भारतवर्ष और व्यावहारिक रूप दिया है, जिससे वे क्रमशः आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होते जायें और समय आने पर आत्मा और परमात्मा के सत्य स्वरूप को भी समझने की योग्यता प्राप्त कर सकें। इस सम्बन्ध में एक विदेशी विद्वान् ने जो स्वयं ईसाई धर्म के आचार्य थे और आध्यात्मिक विषयों में बड़ी रुचि रखते थे, हिन्दू मन्दिरों, तीर्थ स्थानों और उनमें प्रतिष्ठित मूर्तियों की वास्तविकता पर बहुत विवेकपूर्ण और तर्क संगत विवेचना की है। नीचे उन्हीं के लेख की कुछ बातें दी जाती हैं।

हिन्दू देवताओं की मूर्तियों में बहुधा ओजस् शक्ति भरी रहती है। उत्सवों के अवसर पर जब इन मूर्तियों को जुलूस के रूप में निकाला जाता है तो दर्शकों पर उनके दर्शन का अच्छा प्रभाव पड़ता है। बहुत से मन्दिरों और तीर्थों से अब भी आध्यात्मिक शक्ति उत्पन्न करने वाली धार्मिक क्रियाएँ हुआ करती हैं और वहाँ जाने से और उनका प्रसाद ग्रहण करने से मनुष्य के हृदय में अवश्य ही श्रेष्ठ भावों की उत्पत्ति होती है।

भारतवर्ष वास्तव में क्रियाकाण्ड और विधियों का देश है। यहाँ का धर्म इनसे भरा हुआ है और अनेकों विधियाँ तो युगों से चली आई हैं। यह भी निश्चय है कि बहुत सी क्रियाएँ पीछे से जोड़ी गई हैं। इनमें से कितनी ही ऐसी क्रियाएँ है, जो जाति के आरम्भ में अति आवश्यक होती हैं, पर आर्य जाति के पूरी तरह से विकसित हो जाने पर अब उनका कोई काम नहीं रहा। बहुत सी क्रियाओं को होते समय उन्हें देखने से स्पष्ट रूप से मालूम हो जाता है कि असल में उनका क्या अर्थ रहा होगा, हालाँकि परिस्थिति के बदल जाने से अब वे अर्थशून्य हो गई हैं और उनसे कोई फल उत्पन्न नहीं होता। ये विधियाँ नये मनुष्यों के लिये तो उपयोगी होती हैं और बहुत को उन से आनन्द तथा लाभ भी मिलता है। पर वास्तव में उन क्रियाओं अथवा विधियों के बिना काम न चल सके ऐसी बात नहीं। उन्नति प्राप्त पुरुष को ये बन्धन नहीं रहते, चाहे वह लोक रीति के कारण उनका पालन करता भी रहे।

पर सबसे बड़ी बात यह है कि आजकल की धर्म क्रियाएँ कराने वाले पुरोहितों में उस शक्ति का अभाव होता जा रहा है जिसके आधार पर पूर्वकाल में ये क्रियाएँ साक्षात फल देने वाली होती थी। इन दिनों ये लोग अपनी इच्छा शक्ति का प्रयोग नहीं करते। वे मंत्र तो पढ़ते है- “ऊँ भूःर्भुवः स्वः” पर इसके उच्चारण से कोई फल उत्पन्न नहीं होता। पूर्व काल में आचार्य लोग इस मन्त्र का उच्चारण करते समय तथा उपस्थित प्रभावग्राही या कोमल प्रकृति वाले लोगों की चेतना मन्त्र उच्चारण करते संयम एक लोक से दूसरे लोक तक पहुँचा देते थे। यह बात ठीक है कि इस प्रकार का अवसर थोड़ी देर के लिए ही रहता था और क्रिया समाप्त हो जाने के बाद उसमें भाग लेने वालों की ऊँचे लोकों की चेतना भी जीती रहती थी। परन्तु उनके लिये यह एक महत्वपूर्ण अनुभव होता था और दूसरी बार जब कभी ऐसी क्रिया की जाती थी तो उनमें ऊँची दर्जे की चेतना जागृत होती थी। इस प्रकार उपासकों की आत्मिक शक्ति का निरन्तर विकास होता रहता था। परन्तु आजकल ऐसा कार्य शायद ही कहीं होता हो। आजकल आचार्य हवन कुण्ड में समिधा रखता है और अग्नि आवाहन के लिए मंत्र पढ़ता है और फिर दियासलाई से अग्नि प्रज्वलित कर देता है। प्राचीन काल में अग्नि के अधिष्ठाता देव यथार्थ में आते थे, जैसा कि पुरानी कथाओं में बतलाया गया है। कारण यही था कि उस समय सब लोग अपनी इच्छा शक्ति का भी प्रयोग साथ-साथ करते थे। अब उन क्रियाओं का बाहरी रूप ही रह गया है, जिससे फल भी नाम मात्र को ही प्राप्त होता है।

तीर्थ यात्रा की प्रथा भी बिल्कुल तर्क और विज्ञान से सिद्ध है। जहाँ किसी पवित्र मनुष्य का आश्रम रहा हो अथवा जहाँ दीक्षा के समान कोई महत्व का कार्य हुआ हो, वहीं पर प्रायः बड़े-बड़े मन्दिर बनाये जाते थे। ये मन्दिर कभी-कभी किसी महापुरुष की अस्थियों पर भी बनाये गये है। इस प्रकार का मन्दिर, चाहे वह किसी भी उद्देश्य से बनाया का गया हो, दृढ़ ओजस् का केन्द्र हो जाता है। जो सैकड़ों हजारों वर्षों तक भी स्थिर रह सकता है। जब कोई प्रभावग्राही या कोमल प्रकृति का व्यक्ति ऐसे स्थान पर पहुँचता है तो उसको इस असर का ज्ञान होता है और इस असर से निस्सन्देह उसको लाभ पहुँचता है। जहाँ कहीं बहुत ऊँचे दर्जे का कम्पन होता है, तो वह अपने क्षेत्र के भीतर आने वाले मनुष्य के कम्पों अथवा चेतना को अपनी ऊँचाई तक उठा लेता है। यदि कोई यात्री ऐसे स्थान पर कोई दिन तक रहे और उस पर वहाँ के ओजस का असर पड़े तो अवश्य ही उसे आत्मिक लाभ होगा। पर यह भिन्न-भिन्न लोगों को अपनी प्रभाव ग्रहण करने की योग्यता या स्वभाव के अनुसार ही कम या ज्यादा मिल सकता है।


भारतीय परम्परा और साहित्य का महत्व

(श्री. रामदास गौड़ा)

सब राष्ट्रों का जन्म और पालन पोषण अपनी-अपनी परम्परा में होता है। सभी प्राचीन राष्ट्रों में सृष्टि की कथा उसी परम्परा के अनुकूल है। धर्मानुकूल आचरण के लिये, सदाचार के लिये, प्रसिद्ध पूर्वजों का जीवन चरित सभी राष्ट्रों में आदर्श माना जाता है। परम्परा की यह विशेषता अँग्रेज जाति में नहीं मिल सकती, क्योंकि उनकी प्राचीन परम्परा नष्ट हो चुकी है और ईसाई धर्म उन्होंने बाद में ग्रहण किया है। मुसलमानों में भी भिन्न-भिन्न देशों और भिन्न भिन्न जातियों के लोग शामिल हैं, जिनकी अपनी प्राचीन परम्परा धर्म परिवर्तन के कारण नष्ट हो गई है। बौद्ध चीन और बौद्ध जापान के धर्म परिवर्तन से भी उनकी प्राचीन परम्परा नष्ट नहीं हुई। जिन राष्ट्रों की परम्परा हाल की है (जैसे अमरीका, योरोप, आस्ट्रेलिया आदि) उनके पास इतिहास को छोड़कर और कुछ नहीं है, जिसमें सत्य की मात्रा कम भी हो सकती है और अधिक भी हो सकती है, पर इसका पूर्ण सत्य होना आवश्यक नहीं है। प्राचीन राष्ट्रों को जैसे अपनी परम्परा और उसका परिचय देने वाले पुराणों का गर्व है, उसी तरह इन नये राष्ट्रों को अपने कल के इतिहास का उससे भी अधिक अभिमान है। वे अपने इतिहास को सच्चा और पुराणों के रूप में लिखे इतिहास को उपेक्षा के योग्य मानते हैं। कुछ भी हो इसमें सन्देह नहीं कि अभी उनकी आयु इतनी नहीं हुई है कि वे अपनी कोई परम्परा बतला सके।

जिस इतिहास से राष्ट्र को लाभ न हो, वह राष्ट्र के लिये निरर्थक है। घटनाएं तो प्रकृति में एक ही प्रकार की बार-बार घटती रहती है, इतिहास बार-बार अपने को दोहराता है। इसलिये जो परिणाम एक प्रकार की एक घटना से निकलता है वही दूसरी से भी निकलेगा। जो परिणाम अनेक घटनाओं से निकलता है और अनुभव सिद्ध हो जाता है, वही नीति अथवा आचार शास्त्र का नियम बन जाता है। सब घटनाओं को बारम्बार दोहराने के बदले एक भारी महत्व की घटना को देकर एक सूत्र या नियम निर्धारित कर देना पर्याप्त है। भारतीय श्रुति, स्मृतियों में ऐसे असंख्य सूत्र हैं। पुराणों, इतिहासों आदि में वही सूत्र कथा के साथ समझाये गये हैं। उनमें उदाहरणों की कमी नहीं होती, सर्ग, प्रति सर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरितों द्वारा प्राचीन परम्परा का संकलन किया गया है यह किसी देश या किसी राज्य का इतिहास नहीं है। यह सारी सृष्टि का इतिहास है, और इतने लम्बे जमाने के इतिहास का निचोड़ है, जिसमें असंख्य राष्ट्रों का जन्म, यौवन, प्रौढ़ता, बुढ़ापा और नाश होता रहा है। यह इतिहास इतने विशाल भू भाग का है जिसमें सैकड़ों बार जल की जगह स्थल और स्थल की जगह जल, बस्ती की जगह जंगल और जंगल की जगह बस्ती, आँशिक सृष्टि और आँशिक प्रलय होते रहे हैं। देश के देश जल में विलीन हो गये और समुद्र सूख कर महाद्वीप बन गये। इतने लम्बे जमाने में और इतने विस्तृत देश में कितने प्रकार के प्राणी, कितनी तरह की वस्तुएँ उत्पन्न हुई और नष्ट हो गई, उनका संक्षिप्त वर्णन है। जितने प्रकार की कलाओं का आरम्भ और विकास हुआ, परम्परा में वह भी शामिल है। ज्ञान-विज्ञान के इस अथाह समुद्र को इस दीर्घकाल के भीतर कितने ही देवासुरों ने मथा, कितने ही रत्न निकाले, यह सब भी परम्परा के अंतर्गत है।

हिन्दू परम्परा में कई विशेषताएं हैं जो अन्य प्राचीन परम्पराओं से बिल्कुल भिन्न हैं। हिन्दू परम्परा की सृष्टि का वर्णन सबसे निराला है। उसमें मन्वन्तर और राजवंशों का वर्णन,जो कुछ है वह भारतवर्ष या आर्यावर्त के भीतर का है। यद्यपि किसी-किसी प्रसंग में नाम अन्य द्वीपों के भी आये हैं। महाभारत के युद्ध में तुर्किस्तान और चीन की सेनाओं के शामिल होने का भी वर्णन है, पाण्डवों और कौरवों की दिग्विजय में भारतवर्ष के बाहर के भी कई देशों के नाम हैं, परन्तु लीला क्षेत्र भारत की पुण्य भूमि ही है। वैदिक साहित्य में भी जो ऐतिहासिक अंश है वह इसी देश से सम्बन्ध रखने वाला है।

हमारी सबसे बड़ी परम्परा देश की सर्वांगीण पवित्रता की भावना है। यहाँ के पहाड़, जंगल, नदी नाले, पेड़, पल्लव, ग्राम, नगर, मैदान, यहाँ तक कि टीले और मिटे भी पवित्र तीर्थ हैं। द्वारका से लेकर काम रूप कामक्षा तक और बद्री केदार से लेकर कन्या कुमारी या धनुष कोटी तक तीर्थ और देव स्थान हैं। यहाँ के जलचर, स्थलचर, गमनचर सबमें पूज्य और पवित्र भावना का अस्तित्व माना गया है। और लोग अपने देश से प्रेम करते हैं, पर हिन्दू अपनी मातृभूमि को पूजता है, चाहे वह मूर्खता से ऐसा करता हो और चाहे समझ बूझकर, पर वह भक्ति भाव से अपने देश के एक-एक अंग और एक एक पदार्थ की पूजा करता है, उसके सामने मस्तक नवाता है। विष्णु पुराण में सत्य ही कहा है।

अत्रापि भारते श्रेष्ठं जम्बूद्वीप महामुने। यतोहि कर्म्मभूरेषा ततोऽन्या भोग भूमयः॥ कदाचिल्लभते जन्तुर्मानुष्यं पुण्य संचयात्।

यहाँ के निवासियों की धारणा थी कि ‘मनुष्य’ तो भारतवर्ष में ही जन्म लेते हैं। इसी कारणवश वे बाहर के लोगों को किन्नर, गंधर्व, नाग, असुर, राक्षस, देवता आदि कहते थे। उनके मत से मनुष्य का जन्म ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि वह कर्म करके मुक्ति को प्राप्त करने की सामर्थ्य रखता है जबकि अन्य लोग केवल कर्मानुसार भोग ही करते रहते हैं। इस दृष्टि से देश का प्रत्येक अंग तीर्थ की तरह सदा से पवित्र समझा जाता है।

इस प्रकार हमारे यहाँ सात बार नौ त्यौहार की कहावत भी सत्य सिद्ध होती दिखलाई पड़ती है। यहाँ की तिथि, दिन, मुहूर्त सभी पवित्र माने जाते हैं। विशेष अवसरों पर सनातन काल से विशेष काम होते आये हैं। यह भी प्राचीन परम्परा है। इनके लिये ज्योतिष शास्त्र का उच्चकोटि का ज्ञान भी हमारे यहाँ के ऋषियों ने दीर्घकालीन परिशीलन द्वारा प्राप्त किया था।

अनेक विद्याओं का लोप हो जाने पर भी साहित्य में यत्र-तत्र उसकी चर्चा मौजूद है, जिससे परम्परा के नष्ट हो जाने पर भी उनके अस्तित्व का पता लगता है। धनुर्वेद इसका अच्छा उदाहरण है, जिसके कई बड़े-बड़े ग्रन्थ हाल ही में विशेष खोज करने पर मिल गये हैं। कभी-कभी परम्परा के नष्ट हो जाने पर आवश्यकतानुसार उसका पुनरारम्भ भी हो जाता है। जैसे कि गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-

एवं परम्परा प्राप्तं इमं राजर्षयो विदः। स काले नेह महता योगो नष्टः परन्तप॥

जो राज योग प्राचीन काल में विद्वान् राजर्षियों को ज्ञात था और काल चक्र के प्रभाव से बीच में जिसकी परम्परा नष्ट हो गई थी, उसका पुनरुद्धार भगवान कृष्ण ने गीता द्वारा फिर से किया और भागवत-धर्म के नाम से उसकी फिर से स्थापना कर दी।

परम्परा से प्राप्त यह अमूल्य धन हिन्दू धर्म के साहित्य में निहित है। ज्ञान, सदाचार, कलाएँ जो कुछ साहित्य के विविध रूपों में विद्यमान है, उनके लिये हम प्राचीन विद्वानों और ऋषि मुनियों के कृतज्ञ हैं। उन्हीं की कृपा से आज हमको श्रुति, स्मृति, वेदाँग, चौसठ महाविद्या और कलाओं के मूल तथ्यों का ज्ञान हो सकता है अथवा कम से कम उनके अस्तित्व का पता लग सकता है। यह समस्त साहित्य देव वाणी अथवा संस्कृत में प्रकट किया गया है। परन्तु ज्ञान की परम्परा में किसी विशेष भाषा या उसके विशेष रूप का बन्धन नहीं है। भगवान बुद्ध और जैन आचार्यों ने पाली, मगधी आदि प्राकृत भाषाओं का आश्रय लिया और उनकी परम्परा भी आज तक चली आ रही है। हिन्दी, बँगला, मराठी, गुजराती, उड़िया तैलंगी, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, पंजाब, आसमी आदि आजकल की प्रचलित प्राकृत भाषाएँ हैं, जिनमें संत, महात्मा, सुधारकों ने सदाचार की शिक्षाएँ देकर अपनी परम्परा को स्थिर रखा है। इन सबकी परम्परागत शिक्षाएँ अधिकाँश में लेखबद्ध हैं। वह सब की सब हिन्दू परम्परा के ही अंग हैं और हिन्दू धर्म तथा हिन्दू संस्कृति की पोषक हैं।


कर्म की गहन गति और कर्मफल

(श्री. सूर्यभानुजी गुप्ता, बी. ए.)

कर्म सिद्धान्त हिन्दू धर्म की एक बहुत बड़ी विशेषता है। अन्य देशों के धर्म प्रचारकों और विद्वानों ने अच्छे और बुरे कर्मों के नैतिक महत्व पर तो विचार किया है, पर परलोक अथवा दूसरे जीवन में उनका क्या प्रभाव पड़ता है, इसका जिक्र किसी ने नहीं किया। सच पूछा जाय तो हिन्दू धर्म के सिवा पारलौकिक जीवन को किसी अन्य धर्म ने समझा ही नहीं। ईसाई, मुसलमान, यहूदी आदि धर्मों में मृत्यु के पश्चात जीवन की गति के सम्बन्ध में जो कुछ कहा गया है। वह बिलकुल अपर्याप्त और नाममात्र का वर्णन है। वे केवल इतना ही कहते हैं कि मरने के बाद प्रत्येक मनुष्य की जीवात्मा एक बन्द जगह में आबद्ध कर दी जाती है। अन्त में प्रलय के समय उन सब आत्माओं को पुनर्जीवित करके उनके भले-बुरे कामों का उचित फल दे दिया जायगा। उसके बाद सदैव के लिए पुण्यात्मा स्वर्ग में सुख भोगते रहेंगे और पापात्मा नर्क में दुख उठाया करेंगे। यदि विचार किया जाय तो वह यह वर्णन अनजानपन प्रकट करने के सिवाय कुछ भी महत्व नहीं रखता।

इसके विपरित हिन्दू शास्त्रों में कर्म सिद्धान्त का बड़ा विस्तृत विवेचन किया जाता है और पुण्य और पाप की सूक्ष्म गतियाँ को इतने विस्तार से समझाया गया है कि उसको हजार पृष्ठों के एक पोथे में भी वर्णन कर सकना कठिन है।

इस कर्म व्यवस्था के अनुसार मनुष्य का जीवन इतना ही नहीं माना जाता जितना कि इस पृथ्वी पर जन्म से मृत्यु तक दिखलाई पड़ता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार यह जीवन तो बहुत ही छोटा और महत्वहीन है। वास्तविक जीवन तो मृत्यु के बाद परलोक में ही आरम्भ होता है। इस सम्बन्ध में एक अनुभवी महात्मा का कथन है-

वेदान्ती दो प्रकार का जीवन मानते हैं। एक लौकिक और दूसरा पारलौकिक। इसमें किंचित भी संशय नहीं कि पारलौकिक जीवन ही सत्य है। सत्य इसलिए कि लौकिक जीवन तो सदैव बदलता रहता है और उसकी अवधि भी बहुत अल्प है और यह हमारी इन्द्रियों के बुने इन्द्रजाल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। उच्च लोगों का जीवन ही सत्य मानना चाहिए, क्योंकि इन्हीं लोगों में हमारा अविच्छिन्न, निर्विकार अमर सूत्रात्मा निवास करता है। इसी वास्ते मृत्यु के पीछे की अवस्था को सत्य और लौकिक जीवन और उसके अहम्भाव को असत्य माना जाता है।

इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य का जीवन चार अवस्थाओं में बँटा है- (1) स्थूल मण्डल अर्थात् दृश्य जगत का जीवन, जो मनुष्य को स्थूल देह द्वारा प्राप्त होता है। (2) जगत् मण्डल अर्थात् सूक्ष्म जगत का जीवन, जो मनुष्य को स्थूल देह त्यागने के पश्चात सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करने पर प्राप्त होता है। (3) स्वर्गलोक का जीवन, जो मनुष्य को सूक्ष्म शरीर के त्यागने के पश्चात् कारण शरीर को धारण करने पर प्राप्त होता है। (4) जीवन की वह अवस्था, जो जीवात्मा को स्वर्ग से निकलने के पीछे और भूमण्डल में पुनर्जन्म लेने के पहले भोगनी पड़ती है। प्रत्येक मनुष्य को अपना काल चक्र पूरा करने के लिए इन चारों अवस्थाओं में अवश्य गमन करना पड़ता है। वर्तमान जगत का कोई सामान्य मनुष्य चाहे कितना भी ज्ञान प्राप्त कर ले और उन्नति कर ले, पर इन चारों अवस्थाओं से तब तक बच सकना असम्भव है जब तक वह आध्यात्मिक उन्नति करके एक विशेष पदवी तक नहीं पहुंच जाता। इस बात को भी भली प्रकार जान लेना आवश्यक है कि स्थूल देह को त्यागने के अनन्तर शेष तीनों अवस्थाओं में रहने का समय स्थूल देह के जीवन काल की अपेक्षा बहुत ही अधिक (हजारों या लाखों वर्ष) होता है। इसीलिए अगर हम मृत्यु के अनन्तर की अवस्थाओं में जीवन की गति और उसकी क्रिया को न विचारें तो कर्मों की गहन गति का ज्ञान बहुत ही अधूरा रहेगा।

इस संसार में रहते समय मनुष्य जो भी संकल्प और विचार करता है उनका एक मानसिक चित्र बन जाता है जो अपने उत्पत्ति कर्त्ता की चेतना का अंश बनकर सदैव उसका साथी बना रहता है। साथ ही वह सूक्ष्म प्रकृति अथवा आकाश में स्पन्द रूप सत्ता अर्थात् रूप देवता बन जाता है।

ये मानसिक चित्र दीर्घकाल तक प्रसुप्त अवस्था में भी रहते हैं और अपनी प्रबोधक सामग्री प्राप्त होने पर जागृत हो जाते हैं और निज कार्य करने लगते हैं। इन मानसिक चित्रों का प्रादुर्भाव प्रकृति के नियमानुसार होता है। इन्हीं के संग्रह से मनुष्य का स्वभाव बनता है। जिस प्रकार छोटे-छोटे रन्ध्र (सेल्स) इकट्ठे होकर देह के रग पट्ठे बनाते हैं और बनाते समय बहुत कुछ बदल जाते हैं, इसी प्रकार मानसिक चित्र भी एकत्र होकर मनुष्य स्वभावों को बनाते है और प्रायः इस क्रिया के समय ये भी बदल जाते हैं।

मानसिक चित्रों का स्पन्द (कम्पन) केवल गमन मण्डल के नीचे के भाग में ही गमन नहीं करता वरन् उनका भाव ऊँची लोकों में भी पहुँचता है और जिस प्रकार यह केवल घन प्रकृति में एक स्थूलाकार उत्पन्न करता है, उसी प्रकार उर्ध्व लोकों में आकाश के अन्दर एक ऐसा सूक्ष्म रूप सृजता करना है कि वह हमारी सूक्ष्म इन्द्रियों को भी दिखलाई नहीं पड़ता। आकाश सब चित्रों का भण्डार है, मानो वह सब संकल्पों का निवास स्थान है। ब्रह्माण्ड की रचना के सब संस्कार आकाश में सज्जित रहते हैं। यद्यपि वे अति सूक्ष्म होने के कारण हमारी इन्द्रियों को गोचर नहीं होते, परन्तु योगीजनों को वे ठीक उसी प्रकार देखने में आते हैं, जैसे कि स्थूल पदार्थ मनुष्य मात्र को देखने में आते हैं। ये आकाशिक चित्र कभी नष्ट नहीं होते और सदैव आकाश में गुप्त रीति से स्थित रहते हैं। इसी कारण इन चित्रों का नाम शास्त्रों में चित्रगुप्त कहा गया है। यही धर्मराज अथवा यम के लिपिकारों (मुंशी या क्लर्कों) का बही खाता है। धर्मराज के लिपिकार सब प्राणियों के कार्यों को आकाश रूपी बही में चित्र द्वारा लिखते हैं। जिन पुरुषों का दिव्य नेत्र खुल जाता है, वही इस बही खाते को भली प्रकार पढ़ सकते है। योगीजन संयम द्वारा आकाशिक चित्रों को दिव्य प्रकृति में प्रतिबिम्बित कर सकते हैं और इस उपाय से हमारी भूत भविष्य का हाल बता सकने में समर्थ होते हैं।

संसार के सब वृत्तान्त विस्तारपूर्वक आकाशिक बही खाते में अंकित रहते हैं। योगीजन जब चाहे इस खाते के पन्नों को खोल प्राचीन समय की रचनाओं को अपनी दृष्टि के सामने प्रत्यक्ष कर सकते हैं। ये चित्र दीवार के चित्रों की तरह चेष्टा शून्य नहीं होते, वरन् नाटक या सिनेमा के पात्रों की तरह चेष्टावान होते हैं। यह चेष्टा ठीक प्रकार की देखने में आती है, जैसी पूर्वकाल की घटना हुई थी।

इस संक्षिप्त विवरण से पाठक इस बात का कुछ अनुमान कर सकते हैं कि कर्म मनुष्य से किस तरह नवीन कार्य कराता है। मानसिक चित्र हमारे मन से उत्पन्न होकर उसमें स्थिर रहता है और साथ ही आकाश में भ्रमण करता हुआ अनन्त परिणामों को रचता है। ये सब परिणाम उस मानसिक चित्र के लक्षणों से युक्त होते हैं और इसीलिए यह जाना जा सकता है कि कौन सा परिणाम कौन से दिव्य मानसिक चित्र से उत्पन्न हुआ है और दिव्य मानसिक चित्र, जो हमारे मन में स्थित होता है, ढूँढ़कर निकाला जा सकता है। जिस प्रकार मकड़ी अपना जाला अपनी प्रकृति से ही बनाती है, उसी प्रकार हमारे संकल्प भी इन परिणामों को अपनी ही प्रकृति से निर्माण करते हैं। इसीलिए परिणामों के रंगों का सूक्ष्म भेद देखकर उसका संकल्प रूप पहचाना जा सकता है। ऐसी दशा में हम अपनी क्षुद्र सांसारिक बुद्धि द्वारा इस बात का कुछ अनुमान कर सकते है कि यमराज के दूतों को कैसे प्रत्येक मनुष्य के भिन्न-भिन्न कर्मों का पता किंचितमात्र दृष्टि देने से लग जाता है। उनके प्रत्येक मनुष्य के ऊपर उसके उत्पन्न किए हुए मानसिक चित्रों का पूर्ण भार और उनसे उत्पन्न होने वाले परिणामों का भार तत्काल विदित हो जाता है। यही कारण है कि दैवी न्यायालय में कर्मफल के निर्णय में संकल्प और विचारों को ही प्रधान माना जाता है और उनसे उत्पन्न बाहरी क्रियाओं को अप्रधान समझा जाता है। यह बात हमारे साँसारिक न्यायालयों से बिलकुल उल्टी है जहाँ बाहरी क्रिया या प्रत्यक्ष दुष्कर्म का ही दण्ड दिया जाता है और संकल्प अथवा भीतरी इरादे को बहुत कम महत्व दिया जाता है। संसार में किसी को जन्म से सुखी और किसी को दुखी, पापी को फलते-फलते और धर्मी को निरपराध दण्ड पाते देखकर प्रायः मन में ईश्वर के न्यायकारी होने में सन्देह उठा करता है। यदि कर्म व्यवस्था को उक्त रीति से अच्छी तरह समझ लिया जावे तो यह सन्देह निवृत्त हो जाता है। कौन जानता है कि अमुक पापी अथवा धार्मिक व्यक्ति ने कैसे-कैसे कर्म पूर्व जन्मों में किये हुए हैं और इस जन्म में भी किस प्रकार के कर्म काया, वाणी और मन द्वारा किये हैं। हम तो केवल मनुष्य के थोड़े से कायिक और वाचिक कर्मों को देखकर ही अपनी सम्मति दे दिया करते हैं।


हिन्दू धर्म के लक्षण और तीन विभिन्न स्तर

(पं. लक्ष्मण शास्त्री तर्कतीर्थ)

दूसरे धर्मों की अपेक्षा हिन्दू धर्म में क्या विशेषता है, अर्थात् हिन्दू धर्म का लक्षण क्या है, यह एक बहुत ही विवादग्रस्त प्रश्न है, क्योंकि हिन्दू धर्म में परस्पर विरोध रखने वाले सैकड़ों प्रकार के विभिन्न सिद्धान्त माने जा रहे हैं। हिन्दू धर्म के दो विभाग हैं। खास तरह के सामाजिक रीति रिवाज अथवा समाज रचना के खास नियम और विधियाँ इसका सबसे प्रधान अंग है। दूसरा अंग है परमार्थिक या पारलौकिक जिसके सम्बन्ध में विभिन्न हिन्दू सम्प्रदायों के मत एक दूसरे से बहुत ही भिन्न हैं। इनमें से प्रथम अंग में वर्ण विभाग, जाति विभाग, खास तरह के विवाह संस्कार, देश, जाति, कुल, धर्म, उत्तराधिकार के नियम और सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा आदि का समावेश होता है। सत्य कहा जाय तो ये विशेष प्रकार के सामाजिक नियम और रीति-रिवाज ही इस समय हिन्दू धर्म का मुख्य आधार माने जाते हैं। इनमें सबसे खास बात वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा है। पिछले दो हजार वर्षों से जाति भेद ही हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा लक्षण बन गया है। जो मनुष्य इस खास तरह के जाति धर्म का पालन करता है तो वह ठीक हिन्दू समझा जाता है। इसमें विशेषता इतनी ही है कि समस्त सामाजिक और लौकिक रीति-रिवाजों का सम्बन्ध धर्म शास्त्रों के पारलौकिक जीवन से जोड़ दिया है हिन्दू धर्म के विभिन्न संप्रदायों के पारलौकिक और आध्यात्मिक सिद्धान्त एक दूसरे से अत्यन्त विरुद्ध दिखाई पड़ते हैं। प्राचीन और अर्वाचीन हिन्दू धर्म के संचालकों ने इस भेद भाव को मिटाने का बड़ा प्रयत्न किया है, पर वह मिटाने के बजाय नये-नये सम्प्रदायों और पंथों की उत्पत्ति का कारण बन रहा है। इसी कारण लोकमान्य तिलक ने हिन्दू धर्म का यह लक्षण किया है-

प्रामाण्य बुद्धिर्वेदेषु साधना नाम नेकता। उपास्या नाम नियमः एतर्द्धमस्य लक्षणम्॥

अर्थात् “वेदों का प्रमाण मानना साधनाओं की अनेकता और उपास्य-देवों का अनियम, यह धर्म के लक्षण हैं।”

इस लक्षण से यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि हिन्दु-धर्म की कोई विधायक (पॉजिटिव) व्यवस्थित, संगठित और सुसंगत, पारमार्थिक नींव नहीं है। यद्यपि तिलकजी ने यह कहा है कि वेद सारे हिन्दुओं का प्रमाण ग्रन्थ है, पर हिन्दु समाज में ऐसे लोगों की संख्या 100 में से 70 है, जिनको वेदाधिकार नहीं है और जिनके रीति-रिवाज वैदिक-धर्म पर आश्रित नहीं हैं। जिन लोगों को वेद सुनने तक का अधिकार नहीं, बल्कि सुनने से महापातकी और नर्क का अधिकारी बनना पड़ता है, उन लोगों की वेदों पर श्रद्धा है या वे वेद के अनुयायी हैं, यह कहना ही निरर्थक है। इसी प्रकार साधनाओं की अनेकता और किसी एक उपास्य का अभाव भी यही बतलाता है कि सारे हिन्दुओं का हिन्दु-धर्म कोई विशिष्ट सर्व-साधारण धर्म नहीं है। हिन्दुओं के धर्म अनेक हैं और उनमें एकसूत्रता नहीं पाई जाती।

हिन्दुओं की समाज-संस्था का अगर कोई विशिष्ट लक्षण बतलाया जा सकता है, तो वह यही है कि वे सब जाति-प्रथा को निश्चित रूप से मानते हैं। प्रार्थना-समाज, आर्य-समाज आदि आधुनिक संस्थाओं को छोड़ दिया जाय तो हिन्दुओं का पूरा समुदाय जाति-प्रथा को मानता है। आर्य-समाज और प्रार्थना-समाज में भी जाति को मानकर चलने वाले बहुत से लोग हैं। जैन-धर्म में जाति नहीं मानी गई है, तो भी जैन लोग जाति मानते हैं। हिन्दुस्तान के मुसलमानों और ईसाइयों तक में जाति मानने वालों की भारी संख्या है। हिन्दु-समाज के इस मुख्य लक्षण का असर उनमें भी बाकी रह गया है।

हिन्दु-धर्म का एक सामान्य लक्षण निश्चित करके उसका संकलित रूप निश्चित करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि हिन्दु-धर्म एक सीमाबद्ध, व्यवस्थित रूप की संस्था नहीं है, किन्तु वह विचित्रता और विरोध से युक्त और उलझन वाली रचना है। वह किसी सुनिश्चित पारलौकिक और आध्यात्मिक सिद्धान्तों पर निर्मित विशिष्ट प्रकार की वस्तु नहीं है, वरन् वह विविध आचार-विचारों का एक संग्रह है और उसमें अनेक परस्पर विरोधी आध्यात्मिक और पारलौकिक कल्पनायें भी मिला दी गई हैं। हिन्दु-धर्म सामाजिक रीति-रिवाजों से साँसारिक लाभ होना ही नहीं बतलाता, वरन् वह प्रत्येक सामाजिक संस्कार से पारलौकिक लाभ होने की भी घोषणा करता है। यह बात संसार के अन्य किसी धर्म या समाज में नहीं पाई जाती। जाति-प्रथा हिन्दु-समाज का मुख्य लक्षण है, पर उसके सम्बन्ध में भी पूर्ण निश्चय के साथ कोई बात कह सकना कठिन है। उदाहरण के लिये अधिकाँश जातियाँ ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और उनका पुरोहिताई का अधिकार मानती है, जिनमें पुरोहित स्वजातीय अथवा ब्राह्मणेत्तर होते हैं। अब शूद्र जातियों में से तो अधिकाँश ब्राह्मणों की प्रधानता को अस्वीकार करती जा रही हैं। मुसलमानों और ईसाई धर्म से कोई संपर्क न होने पर भी बहुत से हिन्दु मुसलमानों के पीरों और ईसाइयों के देवताओं की उपासना भी करते हैं। इससे यह जान पड़ता है कि हिन्दु-समाज में देवता की उपासना का उतना अधिक महत्व नहीं है, जितना कि सामाजिक रीति-रिवाजों का। क्योंकि दूसरे के धर्म के देवता की उपासना करने के ऊपर किसी को बुरा-भला नहीं कहा जाता, न कोई दण्ड दिया जाता है, पर सामाजिक रीति-रिवाजों और रूढ़ियों को भंग करने से जाति-बहिष्कार का भयंकर अस्त्र तुरन्त काम में लाया जाता है।

धर्म-विकास के इतिहासों में धार्मिक कल्पनाओं के प्रायः तीन स्तर मिलते हैं और फिर प्रत्येक स्तर में उच्च-नीच उपभेद भी पाये जाते हैं। इन तानों को हम इस प्रकार कह सकते हैं :- (1) जादू, प्रकृति-पूजा, भूत-राक्षस पूजा या पितृ-पूजा, (2) मानव सदृश्य देव-समूह की पूजा और शक्ति पूजा, (3) एकेश्वरवाद, ब्रह्मवाद और तत्ववाद।

(अ) संसार की प्रायः सारी जंगली और सभ्यता में पिछड़ी हुई जातियों में जादू ही धर्म की तरह माना जाता है। जादू दो तरह का होता है, एक देवतावाद के पूर्व का और दूसरा देवता की मान्यता आरम्भ हो जाने के पश्चात् का। हिन्दु-धर्म के प्राचीन रूप में दोनों तरह के जादू का प्रमाण मिलता है। अथर्ववेद और गुह्य-सूत्रों में जादू को भी स्थान दिया गया है कुछ यज्ञ जादू के समान ही हैं और उनको क्रियाओं में प्राचीन जादू का कुछ अंश पाया जाता है। जादू का अर्थ है साधना। अपने किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिये अथवा आने वाली आपत्तियों के निवारण के लिये किसी खास पदार्थ, खास क्रिया या खास मन्त्रों का प्रयोग इस विश्वास से करना कि उनमें कोई खास प्रभाव समाया है, यही साधना का स्वरूप है और यही जादू है। (आ) प्राकृतिक वस्तु पूजा भी हिन्दु-धर्म में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। गंडकी नदी के काले शालिग्राम, नर्मदा के ताम्र वर्ण गोल पत्थर, गंगा, जमुना, कृष्णा, गोदावरी आदि नदियाँ, पीपल, बड़, बेल, तुलसी, आँवला आदि वनस्पतियाँ, गाय, बन्दर, महिष, मछली, हाथी, नाग, गरुड़, मयूर, हंस आदि पशु-पक्षी, सूर्य, चन्द्रमा, मंगल आदि का आकाशस्थ पिण्ड, अग्नि, वायु, वर्षा आदि प्राकृतिक घटनायें आदि सभी का पूजा करने का विधान हिन्दु-धर्म में मौजूद है। नाग और गाय तो स्वतंत्र देव बने हुये हैं। सूर्य, चन्द्र आदि नवग्रहों की आराधना वर्तमान हिन्दु-धर्म में बड़े महत्व की बात मानी गई है। गाय, गोमूत्र, गोबर, गंगोदक, सुवर्णादि धातु, पीपल, तुलसी आदि के स्पर्श से पवित्रता प्राप्त होती है और शूद्र, अन्त्यज, रजस्वला, गधा, कौआ, प्याज, लहसुन, गाजर आदि के स्पर्श से अपवित्रता। इस प्रकार की बातों को धर्म का अंग मानना अति प्राचीन अवस्था के ही धर्म का अवशेष भाग है। इस श्रेणी की कुछ वस्तुयें ऐसी हैं जो पहले स्वतन्त्र रीति से पूज्य मानी जाती थीं, पर बाद में धर्म का विकास होने पर उनकी अन्य देवताओं के साथ जोड़ दिया गया। इसके उदाहरण हैं-गरुण, बैल, बन्दर। पहले ये सब यहाँ की भिन्न-भिन्न जातियों द्वारा पूजे जाते थे, पर बाद में गरुड़ को विष्णु तथा बैल को शिव का वाहन मानकर और बन्दर को राम का दूत समझ कर पूजा जाने लगा।

(इ) भूत-पूजा या पितृ-पूजा तीसरा धर्म है। संघ या फिर्के के बड़े-बूढ़े मनुष्यों के आधीन छोटों का जीवन निर्वाह होता है। जब ये बूढ़े मुखिया मृत्यु के मुंह में पड़ते हैं, तब संघ की बड़ी हानि होती है। इसे संघ का प्रत्येक मनुष्य बड़ी तीव्रता से अनुभव करता है और इस कारण वे उन मुखियों के हमेशा के लिये सम्पूर्ण नाश की कल्पना करना बहुत खराब समझते हैं। इसलिये स्वप्न में एकान्त में उनके अस्तित्व का भास होता रहता है। संघ पर किसी प्रकार का संकट आने पर ऐसा मालूम होने लगता है कि यह बाधा उक्त बड़े-बूढ़े की असन्तुष्ट वासना ने उत्पन्न की है। तब उन पितरों की वासना तृप्त करने या पूजा करने की इच्छा जीवित रहने वाले लोगों को होती है। अनेक सम्प्रदायों का यह भी विश्वास है कि मनुष्य देह में एक सूक्ष्म देह वाला चेतन पुरुष भी रहता है, जो भौतिक देह का नाश हो जाने पर भी बना रहता है। इसी विचार के आधार पर भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल की कल्पनायें की गई हैं। देवता और पुनर्जन्म की कल्पना भी इसी ‘मूर्त-पुरुषवाद’ से उत्पन्न हुई है। पहाड़, नदी, वृक्ष, भूमि, क्षेत्र, गृह आदि में भी एक-एक देवता है, यह कल्पना भी मूर्त-पुरुषवाद का ही एक अंग है। इसी विचार के आधार पर हिन्दु-धर्म में श्राद्ध का बड़ा महत्व है। नित्य तर्पण, दर्श-श्राद्ध, महालय, अन्त्येष्टि, एकोद्दिष्ट, मासिक श्राद्ध, वार्षिक श्राद्ध, तीर्थ श्राद्ध आदि अनेक प्रकार के श्राद्ध बतलाये गये हैं।

इससे आगे चलकर हिन्दू धर्म में जिन स्वर्गस्थ देवताओं की कल्पना की गई है, उनमें अनेक बहुत ऊँचे दर्जे के हैं। वे मूल्य प्राकृतिक शक्तियों के प्रति निधि हैं जैसे इंद्र, सविता, वरुण। दूसरे देवता राम, कृष्ण, हनुमान, शिव, गणपति आदि हैं जिनमें सभी प्रकार के मानव गुण पराकाष्ठा को पहुँचते हैं। देवताओं में ऐसी मनुष्यता या सूक्ष्मता का आरोप करने वाला हिन्दू धर्म श्रुति, स्मृति, पुराणों में मुख्यतः वर्णित है। इन देवताओं में एक या अनेकों की उपासना और भक्ति करने वाले सम्प्रदाय प्राचीनकाल में ही उन्नत दशा को पहुँच चुके थे। उसके साथ-साथ ही गन्ध, माला, वेश आदि खास तरह के सम्प्रदाय व्यवहार के नियम भी अस्तित्व में आये।

(3) हिन्दू-धर्म का सबसे ऊँचा और श्रेष्ठ एक स्तर है। उसमें ब्रह्मवाद, एकेश्वरवाद, तत्ववाद का समावेश होता है। सब देवता एक ही सर्वव्यापी तत्व में समाये हुये हैं, अथवा सब देवता उसी एक तत्व के भाग हैं, पिण्ड और ब्रह्माण्ड एक ही सत-तत्व से उद्भूत होते हैं, इस विचार को ब्रह्मवाद कहते हैं। सर्व जगत् का संचालक और सर्व शक्तिमान अन्तरात्मा ही एक परमेश्वर है, बाकी सब उसके आधीन हैं, इस सिद्धान्त को एकेश्वरवाद कहते हैं। इससे भी आगे बढ़कर महर्षि कपिल आदि ने यहाँ तक माना है कि इस विश्व में तत्वों की ही प्रमुखता है और मनुष्य का आत्मा तत्वों का ज्ञान प्राप्त करके ही मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

इस प्रकार हिन्दू-धर्म में जादू और भूत-पूजा से लेकर तत्ववाद तक का समावेश है और सबके अनुयायी अपने को हिन्दू ही कहते हैं। यह हिन्दू-धर्म की एक बड़ी विशेषता है। अनेक लोग इसी को उसकी दुर्बलता मानते हैं।


मानवता की ओट में

(श्री स्वामी सदाशिवजी महाराज, अहमदाबाद)

आज विश्वव्यापी अशान्ति, घोर दावानल के रूप में परिणत होती दिखलाई पड़ रही है। ऐसा जान पड़ता है कि वह समस्त विश्व को स्वाहा करने की तैयारी में ही है। ऐसी अवस्था में आवश्यकता है कि संसार को मार्ग दिखलाने वाली महान आत्माएं मानवता के अमृत की वर्षा करके मनुष्यों में फिर ऐसा प्रेम-भाव प्रसारित करें जिससे इस अशान्ति-द्वेष भाव से मनुष्य की रक्षा हो सके।

इसमें सन्देह नहीं कि प्राकृतिक नियम के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति प्रायः अपने परम्परागत विचारों और रूढ़ियों के अनुसार ही अकेला अथवा अपने परिवार सहित जीवन व्यतीत करने के अभ्यस्त होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को अगर अपने संस्कारों अथवा रूढ़ियों के अनुकूल देश, स्त्री, सन्तान, स्वजन, अन्न, वस्त्र आदि प्राप्त न हों तो वे अपने जीवन को व्यर्थ मानते हैं और यदि ये सब चीजें उसको अपनी रुचि के अनुसार मिल जायं तो जीवन को सार्थक समझते हैं। इस विवेचन के अनुसार कोई भी व्यक्ति कुटुम्ब, समाज, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, देश, महादेश की सीमा के बिना नहीं रह सकता, जीवन धारण नहीं कर सकता। जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता। इसलिए स्थूल देहधारी प्राणियों को देह, धर्म निर्वाह और विश्राम के लिए किसी न किसी लघु या विशाल सीमा की आवश्यकता रहती है, पर इसके कारण कूप-मंडूक बन जाना, अथवा यह धारणा बना लेना कि हमारी सीमा के बाहर और किसी का अस्तित्व ही नहीं है, यह घोर अज्ञान अथवा अदूरदर्शिता का चिह्न है। उच्चकोटि के मनुष्यों की दृष्टि से तो यह सर्वथा उपहासास्पद बात है।

इस दृष्टि से विचार किया जाय तो संसार भर के मनुष्यों को चार हिस्सों में बाँटा जा सकता है-लघु मानव, मानव, महामानव और अतिमानव। जिस युग में अपना वैदिक धर्म केवल भारत देश में ही सीमित था , उस काल में अपने वैदिक ऋषियों ने इस गुण-धर्म का अनुशीलन करके भारतीय मनुष्यों को शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण इन चार विभागों में बाँट दिया था। सनातन वैदिक धर्म विज्ञान से अपरिचित अन्य देशवासियों को वे यवन आदि नामों से अभिहित करते थे। पर अब प्राकृतिक क्रम-विकास के स्वाभाविक वेग के फलस्वरूप कुछ अपवादों को छोड़कर संसार के प्रायः सभी मनुष्य बौद्धिक विज्ञानवाद की चरम सीमा तक पहुँच चुके हैं और भौतिक-विज्ञान की वृद्धि के कारण संसार के समस्त देश, महादेश, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, लता, नदी, पर्वत तक एक दूसरे से इस तरह से शृंखलाबद्ध हो गये हैं कि प्रत्येक देश, जाति, धर्म इत्यादि के कार्यों और विचारों का प्रभाव तत्काल अन्य देशों, जातियों और धर्मों पर पड़ता है और उसकी प्रतिक्रिया भी होती है। इसलिये आज भारतीय मनुष्य, भारतीय ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अथवा भारतीय संन्यासी, ब्रह्मचारी आदि अथवा भारतीय हिन्दु, मुसलमान, ईसाई आदि किसी तरह से केवल अपने ही वर्ग का हित-साधन नहीं कर सकते। कहने के लिये वे अपने कार्य को विश्व-सेवा या सार्वजनिक सेवा का नाम देते हैं, पर जो लोग तरह-तरह की सीमाओं में बँधे हैं, अपनी सीमा के बाहर वालों को गैर समझते हैं-अनेक तो उनको मनुष्य भी मानने को तैयार नहीं होते-ऐसे लोग किसी की सच्ची सेवा नहीं कर सकते-”वास्तविक सेवा तो अति गहन हैं।”

विश्व की सेवा वे ही कर सकते हैं, जो अपने को विश्व का अधिवासी समझते हैं। इसके विपरीत जो हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी अथवा भारतीय, योरोपियन, अमरीकन आदि की सीमाओं से आबद्ध है, वे विश्व-सेवा का नाम झूँठ-मूँठ ही लेते हैं। समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड में जितने असंख्य प्रकार के स्थूल, सूक्ष्म और कारण देहधारी प्राणी हैं, उसी प्रकार उनकी सीमायें भी असंख्यों हैं। इन असंख्यों प्राणियों में से जो सारासार कल्पना करने की शक्ति रखते हैं उनको मनुष्य श्रेणी में मानकर नीचे लिखे विभागों में बाँटा जा सकता है :-

लघु-मानव- जिनमें पाशव-धर्म की प्रधानता होती है, पशु जिस प्रकार दूसरे मनुष्यों के सुख-दुख का विचार किये बिना केवल प्रधान रूप से अपनी देह के सुख-दुख और हानि-लाभ का विचार करता है और गौण रूप से अपने स्वार्थ से अविरोधी और अनुकूल व्यवहार करने वाले स्वजनों, मित्रों के सुख-दुख में सहानुभूति रखता है, वैसे ही इस श्रेणी के मनुष्य होते हैं। सच पूछा जाय तो उनमें जो ऐसी सहानुभूति होती है, उसी के कारण वे मनुष्य कहे जाते हैं, अन्यथा उनमें सब बातें पशुता की ही होती हैं। ऐसे लोगों को अपनी वैदिक-संस्कृति में शूद्र कहा गया था। यह लघुता, शूद्रता, क्षुद्रता या पशुता किसी देश, जाति या कुल की विशेषता नहीं है, पर सभी देशों, जातियों और धर्मों के व्यक्तियों में न्यूनाधिक परिमाण में पाई जाती हैं। हम मनुष्य का आदर अवश्य करें पर ऐसी लघुता या शूद्रता को प्रोत्साहन कभी न दें, चाहे वह अपने प्रिय सम्बन्धी या गुरुजन में ही क्यों न हो।

मानव- जिनकी “अभिमान” या अपनत्व की मर्यादा देहमात्र को अतिक्रम करके स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब, अनुचर, पशु, गृह, सम्पत्ति आदि तक प्रसारित हो गई है और जो प्रधानतः अपने स्त्री-पुत्र-कुटुम्बीजनों का और गौणतः मित्र, स्वजन, परिजन आदि अनुकूल व्यवहार करने वालों के सुख-दुख का विचार करते हैं, वे मानव श्रेणी में है। ऐसे लोग उपयुक्त सम्बन्धों के सिवाय अन्य मनुष्यों के साथ मानवता का कर्तव्य पालन करने की परवाह नहीं करते। वे अपनी विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये दूसरों के हक पर अपना अधिकार जमाने के लिये विद्या, बुद्धि और शारीरिक बल का उपयोग सुधरी हुई रीति से करते हैं। ऐसे लोगों में पशुता प्रच्छन्न (ढकी हुई ) होती है और इस दृष्टि से अति भयंकर होती है। ऐसे लोगों को वैदिक संस्कृति में वैश्य का नाम दिया गया था। ऐसे स्व समाज प्रेमी वैश्य सब देशों में दिखलाई पड़ते हैं। अपने समाज के भीतर ऐसे वैश्य भले ही समाज सेवी मानकर आदरणीय हो सकें, पर जहाँ समस्त देशों के अथवा विश्व मानव के हित का विचार किया जाय, वहाँ ये केवल अपनी जाति के ही हितैषी वैश्य निरुपयोगी हैं।

महामानव- जिनकी “अभिमान” (अपनत्व) की मर्यादा शरीर, स्वजन, कुटुम्ब, जाति और स्वसमाज का अतिक्रम करके समग्र देश, देशबन्धु और देशवासियों तक प्रसारित हो जाती है, वे महामानव की कोटी के व्यक्ति हैं। वे प्रकट में चाहे बड़े वैभव सम्पन्न दिखलाई पड़ें पर उनका मुख्य उद्देश्य देशवासियों की हित सेवा के लिये जीवित रहना ही होता है। इस दृष्टि से उनका बाहरी आचरण, उनका ठाठ बाट साधारण मनुष्य के लिए बड़ा दुर्बोध्य होता है। जब तक किसी मानव में राग द्वेष रहित विवेक बुद्धि का उदय नहीं होता, तब तक वह महामानव की श्रेणी में कदापि नहीं समझा जा सकता।

पर जिस पशुता का ऊपर उल्लेख किया गया है, वह बहुत ढके हुये रूप में महामानव में भी शेष रहती है। वे अपने देशवासियों के सिवाय अन्य देशवासियों के साथ विषमता का व्यवहार करते हैं। ऐसे विषम व्यवहार मानवता की दृष्टि से तो अनुचित माना जाता है, पर महामानव, की दृष्टि से उसमें कोई दोष नहीं होता। वही उनका मुख्य धर्म है। वैदिक संस्कृति में ऐसे महामानवों को क्षत्रिय श्रेणी में गिना गया था। संसार की वर्तमान दशा में ऐसे महामानवों की विशेष रूप से आवश्यकता भी है।

अतिमानव- जो अभिमान की परीक्षा में स्वजन, मित्र, परिजन, जाति, धर्म और देश को अतिक्रम करके समग्र मानव जाति को अपना लेते हैं वे अतिमानव हैं वे किसी भी प्राणी को कष्ट दिये बिना मनुष्य मात्र का हित साधन, हित चिन्तन करने में अपना जीवन व्यतीत करते हैं। यद्यपि ऐसे अति मानवों में राग द्वेष का अभाव हो जाने से इच्छा और क्रिया की शक्तियाँ शिथिल पड़ जाती हैं और वे प्रकट में साँसारिक व्यवहारों से यथा संभव कम से कम सम्बन्ध रखते हैं, पर वे मनोवैज्ञानिक रीति से समग्र जाति का मार्गदर्शन का कार्य करके बिना भेद भाव के सबकी महान सेवा करते हैं। वैदिक संस्कृति में ऐसे अतिमानवों को ब्राह्मण की श्रेणी में गिना गया था। अनेक सम्प्रदाय ऐसे ही व्यक्तियों को ईशावतार की श्रेणी में गिनते हैं। ऐसा अति मानवपन अथवा ब्राह्मणत्व सिद्धान्त रूप से सबके लिये खुला है, पर वास्तव में उसका प्राप्त कर सकना अत्यन्त दुःसाध्य है।

इस प्रकार मानवता अत्यन्त उच्चकोटि की स्थिति है, जिसे मनुष्य स्वार्थ को त्याग कर और कर्तव्य का वास्तविक रूप से पालन करके ही प्राप्त कर सकता है। वास्तव में मानवता का निर्णय मनुष्य के निस्वार्थ और निष्काम भाव से ही किया जाना चाहिये।


यदि आप ये गलतियाँ करते हैं, तो जीवन कभी सुख शाँतिमय नहीं हो सकता

(डॉक्टर रामचरण महेन्द्र, पी. एच. डी.

एक विद्वान जब जीवन के अन्तिम काल में पहुँचा, तब अपने समग्र जीवन के निष्कर्षों को संसार को सौंपते हुए उसने कहा था, “अपने सारे जीवन में मैंने सात जीवन सूत्रों को पकड़ा है। मेरा निश्चित मत है कि जो व्यक्ति इन सात गलतियों को नहीं करेगा, वह निश्चय ही सुखी रहेगा। ये जीवन को समस्त खतरों से बचाने वाले वे सिद्धान्त हैं। जो जीवन, समाज और संसार के सार तत्व कहे जा सकते हैं। मैंने सदा इन गलतियों से बचकर जीवन को समुन्नत बनाया है। आप भी इन गलतियों से सावधान रहें और सफलता के सुख लूटें।” आइये देखे ये सात कौन सी गलतियाँ है जिनसे हमें बचते रहना चाहिए।

1- यह भ्रम कि व्यक्तिगत उन्नति दूसरों को कुचलकर, पीछे रखकर की जाती है उत्पात का मूल है। अनेक व्यक्ति समझते हैं कि बाहर के व्यक्ति, उनके अफसर, चुगली करने वाले, या विरोधी षड़यन्त्र करके उन्हें पीछे रखे हुए है और आगे बढ़ने नहीं दे रहे हैं। यह वास्तव में गलत धारणा है। संसार में कोई किसी की उन्नति नहीं रोक सकता। सब मार्ग अलग-अलग हैं। सब की उन्नति के रास्ते खुले हुए हैं। कोई किसी का मार्ग अवरुद्ध नहीं कर सकता। हम किसी दूसरे का हक मारकर या उसे नीचे गिराकर स्वयं स्थान पर नहीं चढ़ सकते। हर एक को अलग-अलग अपना व्यक्तिगत प्रयत्न ही करना होता है, तभी वह समुन्नत होता है। अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जिनमें ऊँचे अफसरों को नीचे गिराकर, चुगली कर या गलत तरीकों से नीचे गिरा कर ऊँचा उठने का उपक्रम किया गया है, पर ये प्रयत्न निष्फल हुए हैं। अतः व्यक्तिगत उन्नति में किसी दूसरे को बाधक न माने, न दूसरों को अनुचित रीति से गिराने का ही प्रयत्न करें। आपका मार्ग अलग ही है और वह आपके लिए सदा खुला हुआ है।

2- जो बातें बदली या सही नहीं की जा सकती, जो अवश्यम्भावी हैं, उनके लिए चिन्तित होना व्यर्थ है। हम अपना बहुत सा समय उन बातों के चिन्तन में लगाकर प्राणशक्ति का क्षय कर लेते हैं, जिन पर वस्तुतः हमारा कोई वश नहीं है, जिन्हें हम बदल ही नहीं सकते और जो हमारी पहुँच के बाहर हैं। व्यर्थ की चिन्ताएँ हमारे मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर देती है और निराधार भयों से परिपूर्ण कर देती है। भय, स्वास्थ्य और शान्ति का भयानक शत्रु है। हर क्षण किसी आने वाली आपत्ति की चिन्ता करना या अनहोनी बेबुनियाद कल्पनाएं करना अपनी शक्तियों का क्षय कर लेना है। मनोवैज्ञानिकों ने परीक्षण करके देखा है कि चिन्ता से मनुष्य इतना सूख जाता है कि उसकी उत्पादक शक्तियाँ विकसित होने से पूर्व ही मारी जाती हैं।

जिन बातों पर आपका कोई वश नहीं चल सकता, उनके लिए चिन्ता करने से आपके हाथ क्या आयेगा? उलटे जो शक्ति किसी दूसरे कार्य में आपकी सहायता करती, वह नष्ट हो जायगी।

3- यह भ्रान्तिपूर्ण धारणा है कि अमुक कार्य असम्भव है, क्योंकि हम स्वयं उसे पूर्ण नहीं कर सकते। “असम्भव”, “असम्भव”- यही बुरे शब्द निरन्तर हमें पस्त हिम्मत करते रहते हैं। कोई काम हम न कर सके हों, यह एक बात है, पर वह असम्भव है या नहीं हो सकती- यह गलत है। हर कार्य जो मनुष्य कर सका है, आप भी बखूबी कर सकते हैं। ऊँचे उठ सकते हैं। शर्त यही है कि हम श्रम, लगन और धैर्यपूर्वक कार्य करते चलें-

मृतास्त एवाय यशो न येषाँ अन्धास्त एव श्रुतिवर्जिता ये। ये दानशीला न नपुँसकास्ते ये कर्मशीला न त एव शोच्याः॥ (विदुर)

“जिन्होने यश पाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया, वे मरे हुए हैं। जिन्होंने विद्या प्राप्त नहीं की, उनके नेत्र बन्द रहते हैं। जो किसी को कुछ नहीं देते, वे नपुँसक है। जो कर्मशील नहीं है, उनकी दशा शोचनीय है।”

4- अशर्फियों की लूट और कोयलों पर कंजूसी, दूसरे शब्दों में हम छोटे-छोटे कार्यों में फँसे रहकर बड़े और महान् कार्य, जो हम वास्तव में कर सकते हैं, नहीं करते। छोटे कार्यों में ही अपना सारा मूल्य वान समय नष्ट कर देते हैं। वह आदमी, जो बड़ी योजना, बड़ी दुकान, बड़ा कारबार, व्यापार या समाज सेवा का काम बखूबी कर सकता है, साधारण कामों में लगकर नष्ट कर देता है। यह कैसी विडम्बना है।

छोटे कार्य प्रायः आसान होते हैं। उनमें मन को कम परिश्रम करना पड़ता है, फालतू समय मजे में बीतता जाता है। इसलिए बहुत से व्यक्ति ताश खेलने, शतरंज की बाजी में मस्त, या खेल कूद, सिनेमा आदि के कुचक्र में पड़े रहते हैं। स्त्रियाँ सारा दिन छोटे-मोटे बेमतलब के कार्य, आलस्य, दिन में सोना, या फालतू पुस्तकें पढ़ने, इधर-उधर मिलने-जुलने में व्यर्थ कर देती हैं। आठ घण्टे भोजन बनाने या बच्चों के छोटे-छोटे कार्यों में नष्ट कर देती हैं, जबकि वही समय ज्यादा ऊँची और स्थायी कार्यों को पूर्ण करने में व्यय किया जा सकता है। ऊँचे दर्जे के काम अपेक्षाकृत कुछ अधिक श्रम और मानसिक देखभाल माँगते हैं। इनमें हमें प्रयत्नपूर्वक लगना पड़ता है। इनमें इच्छाशक्ति और एकाग्रता की अधिक आवश्यकता पड़ती है। स्मरण रखिये, बड़े और महत्वपूर्ण कार्य आप बखूबी पूरे कर सकते हैं। आपमें उनके लिए पर्याप्त आत्मबल है। निरन्तर उनमें लगे रहने से आप में अदम्य बल और उत्साह आ जायेगा। अपने मन की इच्छा शक्ति द्वारा आपमें अपूर्व बल जाग्रत होता है आपको शुद्ध और बलवान बनाने वाली यह इच्छा शक्ति और एकाग्रता ही है। अतः कामनाओं या उत्तेजनाओं के कारण आप जिन कामों में यकायक लग जाते है, उन्हें छोड़कर बड़े और महत्वपूर्ण कार्यों को ही हाथों में लीजिये। आज नहीं तो कल, वे अवश्य ही पूर्ण होकर रहेंगे। छोटे कामों से शक्ति बचाते रहिये या उन्हें दूसरों से कराइये।

5- स्वाध्याय की आदत न डालकर अपने मन के विकास और परिपुष्टि का पूरा-पूरा अवसर न देना एक ऐसी गलती है जिसकी उम्र भर सजा पानी पड़ती है।

स्वाध्याय मनुष्य को अपनी अपेक्षा समुन्नत और परिपक्व मनुष्यों के विचार देने का अमोघ उपाय है। उत्तम ग्रन्थों से ही कम नई योजनाएं, नई कल्पनाएं और उन्नति की नई दिशाएं पाते हैं। अतः जितनी जल्दी हो दैनिक स्वाध्याय की आदत डालनी चाहिए।

प्रतिदिन कुछ न कुछ उच्च साहित्य पढ़िये और अपने मन को पुष्टिकारक साहित्य से भरपूर करते चाहिये।

ज्ञानवान, विवेकवान और विद्वान बनने का साधन पुस्तकावलोकन ही है। पेट से कोई ज्ञानी नहीं होता वरन् परिस्थिति, संगति एवं वातावरण में रह कर तदनुसार मनोभूमि का निर्माण होता है। जिस दिशा में हमें मस्तिष्क उन्नत करना है, उस दिशा में आगे बढ़े हुए विद्वानों का सत्संग उनकी पुस्तकों द्वारा ही हो सकता है। अतः स्वाध्याय की आदत डालिये।

6-दूसरों को अपने मत, अपनी विचारधारा या आदत के अनुसार ढालने या काम करने को बाध्य करना, एक भारी गलती है।

प्रत्येक मनुष्य स्वयं अपना दृष्टिकोण, अपनी आदतें, अपना पृथक ही संसार रखता है। हम उसके सुधार का उद्योग करते हैं, तो उसे एक नये रूप में ढलना पड़ता है। नई आदत डालने में उसे कष्ट होता है। अतः वह विरोध करता है। इस विरोध से शत्रुता उत्पन्न होती है। सुधार के स्थान पर कटुता फैलती जाती है। इसलिए मिल-जुलकर कार्य निकालना ही उचित है। कोई दूसरे को सुधार नहीं सका है, हाँ विरोधियों की संख्या में अवश्य वृद्धि हुई है।

उपयुक्त गलतियों से सदा बचकर जीवन पथ पर अग्रसर होना चाहिए।


पश्चिमी देशों में ईश्वरीय निष्ठा का प्रादुर्भाव

(श्री. परिपूर्णानन्द वर्मा)

पिछले सौ डेढ़ सौ वर्षों से संसार में स्वार्थपरता की वृद्धि के साथ ही ईश्वर से विमुखता का भाव भी जोर पकड़ रहा था। अब कई बार ठोकरें खाने के बाद संसार को, विशेष से सबसे धनी और ऐश्वर्यशाली देशों को फिर से ईश्वर की याद आ रही है। केवल धन से ही सुख तथा शान्ति नहीं मिलती। इसके लिये चित्त की शुद्धता आवश्यक है। चित्त की शुद्धता बिना विवेक के संभव नहीं और विवेक धर्म तथा ईश्वर के ज्ञान से ही उत्पन्न हो सकता है।

द्वितीय महायुद्ध की यातनाओं के बाद धन मद से चूर पश्चिमी समाज पुनः ईश्वर की ओर मुड़ रहा है। पर इसकी प्रतिक्रिया भी हो रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में कई लोग पैगम्बर और ईश्वर के पुत्र बनकर बैठ गये और करोड़ों रुपये उन पर चढ़ाये जा रहे हैं। इसके सिवाय अनेक बुद्धिवादी भी इस लहर की वृद्धि में योग दे रहे हैं। कनाडा के वैंकोवर नगर में अहिंसा प्रचार के लिए एक संस्था का निमार्ण हुआ है, इस संस्था ने अपने चार मौलिक सिद्धान्त बनाये हैं। इनमें पहला सिद्धान्त है, अहिंसा को परम धर्म मानना और दूसरा है विश्व शांति के लिये प्रयत्न करना। साथ ही ये लोग यह भी कहते हैं-

“हम चाहते हैं कि यह स्वीकार किया जाय कि वर्तमान आर्थिक प्रणाली निकम्मी साबित हो गई है।”

“हम चाहते है कि ऐसी सरकार बने जो वर्तमान विधान से उठकर समाज की सेवा तथा जनता की स्वाधीनता की रक्षा करे।”

संस्था का कथन है कि आज संसार संकट इस कारण है कि हम मुनाफाखोरों का मुनाफा गलत ढंग से बाँटते है या बँटने देते हैं। जिनको पीसकर मुनाफा होता है उन्हें कुछ नहीं मिलता। वर्तमान समय में द्रव्य की मर्यादा गलत है, भ्रमपूर्ण है। जब तक धन का महत्व कम न होगा, विश्व संकट बना रहेगा। विज्ञान को भी अपना योग्य स्थान ग्रहण करना होगा। वर्तमान विज्ञान हमें जानकारी हासिल करा सकता है, पर विवेक की प्राप्ति दार्शनिकता से ही होगी। हमको स्वीकार करना पड़ेगा कि हम सब के ऊपर भगवान है।

लोगों की समझ में यह बात आ गई है कि सब बुराइयों की जड़ अपने भीतर की आत्मा को न पहचानना है। उसी का ज्ञान करा देने से अन्य सब विकार दूर हो जायेंगे। इसलिये इंग्लैंड में कई आध्यात्कि चिकित्सा केन्द्र खोले गये हैं। एक केन्द्र का नाम है ‘एवलान हीलिगं सेंटर’ इसका ऑफिस लन्दन के ‘पैडिंगटन’ मौहल्ले में है। दूसरा ‘लारेंस हीलिंग सेंटर’ लन्दन के विम्बलडन मौहल्ले में हैं। पश्चिमी आस्ट्रेलिया के पर्थ नगर में श्री. कालविन अनविन यही काम कर रहे हैं। इन आध्यात्मिक केन्द्रों का उद्देश्य है, सत्य को कार्य रूप में परिणित करना। सत्य क्या है, इसका विश्लेषण करते हुये श्री. डब्यू. बी कारलाक ने कहा है कि यदि जीवन को सार्थक करना चाहते हो तो ईश्वर के अनुशासन का पालन करो। संसार से सैनिक शक्ति को समाप्त कर दो। विनाशक हथियारों को नष्ट कर दो। लोगों को आवश्यकतानुसार जमीन दो, काम दो। पेट भरने के लिए पशु वध बन्द करो। महत्वाकांक्षी तथा पदलोलुपों के हाथ में शासन नहीं रहना चाहिये, केवल सेवा के लिए भावना से काम करने वालो के हाथ में शासन अधिकार रहना चाहिये।

शिकागो (अमेरिका) के लुई लालवाकेक लिखते हैं- “यह नर-तन केवल उस परम पिता का प्रेरणा की ही परिणाम है, उसकी इच्छाओं की अभिव्यक्ति के लिए है। सब धर्मों ने माना है कि परमात्मा सर्वव्यापक है। परम पिता अपना सब काम हमारे तुम्हारे जैसे साँसारिक जनों द्वारा ही कराता है।” इन लोगों का यह भी कहना है कि ईश्वर नहीं चाहता कि पशु वध हो तथा लोग पेट के लिए पशु हत्या किया करें। इसलिए पशु वध निरोधक यानी निरामिषभोजियों की संस्थाएं कायम होती जा रही हैं। ग्रेट ब्रिटेन के सरे नामक नगर में निरामियों की नव संस्थापित संस्था का नाम वेगन सोसाइटी है। लन्दन में वंकिघम स्ट्रीट पर पशु रक्षा समिति का प्रधान कार्यालय है। इसकी शाखाएँ देश भर में खुल रही हैं।

एक अंतर्राष्ट्रीय निरामिषभोजी संघ का भी निर्माण किया गया है, जिसके सभापति प्रो. डब्लू. ए. शिब्लो है। इस संघ की अमरीका शाखा के अध्यक्ष हैं डॉ. जेस समर्सर। इस संस्था की तरफ से एकाध विद्वान विभिन्न देशों में प्रचारार्थ भ्रमण करते रहते हैं। जापान में भी “शिनरी जिक्की काई” नामक आध्यात्मिक संस्था की स्थापना की गई है, जिसकी जन्मदाता श्रीमती “चियोको होजौं” दया, स्नेह, प्रेम, भक्ति, ईश्वर में निष्ठा आत्म चिन्तन तथा सात्विक भोजन पर लेखमाला प्रकाशित कर रही हैं और उनको जनता का काफी समर्थन प्राप्त हो रहा है।

योरोप और अमरीका के देश धन की पूजा करने वाले समझे जाते हैं। पर अब वहाँ के अनेक विचारक धन की लालसा की बुराई को समझने लगे हैं। बैंकोवर (कनाडा)की संस्था ने अपने वक्तव्य में कहा है कि उद्योग धंधों में मिलने वाला मुनाफा असली धन नहीं है। प्रजा के सुख के साधन ही वास्तविक धन है। लोगों ने धन की गलत व्याख्या करके संसार को पीड़ित बना रखा है। धनी का धन एक दिन निर्धन का हो जायगा। अर्जेन्टाइना के भूतपूर्व राष्ट्रपति पीरो ने एक बार कहा था “संसार के अनेक देश भूखे हैं। हमारे पास खाद्य सामग्री है। हम कब तक एक दूसरे का मिल जाना रोक सकेंगे? धन की दलाली करके मालदार बनने वालों ने शब्दों का भ्रष्टाचार करके अपने को बचा रखा है। आजकल मुनाफा, साख, बचत, बीमा, मिल्कियत, मूल्य, संपत्ति, कर, लागत, पूँजी आदि शब्दों का अर्थ जिस प्रकार तोड़-मरोड़ कर किया जा रहा है वही हमारी विपत्ति का कारण है।”

यार्क शायर (इंग्लैंड) के श्री. गिल टामस ने लिखा है जब तक संसार में से धन की सत्ता समाप्त न हो जायगी, तब तक वह सुखी नहीं हो सकता। मुझे भूख लगी है और आपके पास भोजन है, तो मेरी भूख दूर करना आपका धर्म है। संसार के सभी देशों की आवश्यकताओं का एक अनुमान पत्र (तखमीना) बना लेना चाहिये। फिर उनको पूरा करने के लिए हर एक देश के साधनों से काम लेना चाहिए। पूर्वकाल में संसार में एक प्रकार की चीजों का दूसरी प्रकार की चीजों से अदला-बदली किया जाता था। स्वार्थी शासकों ने इस असली मुद्रा को नष्ट करके सोने चाँदी की कृत्रिम मुद्रा चला दी। अब अगर हम शांति चाहते हैं तो पहले मुद्रा नामक पाप को समाप्त कर देना चाहिये। विनिमय के साधन प्राकृतिक होने चाहिये। रुपया, सोना, चाँदी यह सब मनुष्य को गड्ढे में ले जाता है। असली द्रव्य है स्नेह, परस्पर की आवश्यकताओं को वस्तु विनिमय द्वारा पूरा करना। जहाँ विनिमय का साधन स्वर्ण बनाया गया, मानव का पतन आरम्भ हो गया।

दक्षिण अफ्रीका के श्री. राल्फ माँटगोमरी ने भी इसी आशय की बाते कही हैं। मेक्सिको की एक सद्विचारों की महिला लिलिथ लारेन ने “आश्चर्यजनक मदिरा” नाम की पुस्तक लिखी है, जिसमें विज्ञान की सर्वश्रेष्ठता का खण्डन किया गया है। उसका कथन है कि विज्ञान के ऊपर परमात्मा है। वही सब कुछ करता धरता है। विज्ञान से ऊपर बुद्धि है। जिसने बुद्धि से काम नहीं लिया वह विज्ञान से लाभ नहीं उठा सकता। हेनरी जार्ज ने अपने एक लेख में कहा है यदि लोग अपने पराये का भाव भूल जाये तो संसार का बड़ा कल्याण होगा।

नई विचारधारा में शासकवर्ग की भौतिकवादिता के विरुद्ध बड़ा असन्तोष प्रकट किया जाता है। लोग चाहते हैं कि नये शासक हों, नई विचारधारा हो, ईश्वर तथा धर्म की भावना रग रेशे में भरी हो। कैलीफोर्निया के डब्यू. बी. कार्लक महोदय लिखते है-

“जन समूह को अधिकार लोलुप, महत्वाकाँक्षी, धूर्त तथा बेईमान लोगों ने शासन की बागडोर अपने हाथ में करके मूर्ख बना रखा है। ऐसी सरकारी बेईमानी को कायम रखने के लिए मजबूत सेना रखी जाती है। यह सेना अपनी हिंसा द्वारा मानव की स्वाधीनता का अपहरण करती है। मानव को परम दयालु परमात्मा से विमुख करा देती है, जिसने हमें पैदा किया है। भगवान ने मानव को अपनी शक्तियों का सदुपयोग करके जीवन का पूरा सुख भोगने के लिए ही रचा है।”

भारत का सदा से यही उपदेश रहा है और अब भी यही है। पश्चिम अपने धन की चकाचौंध में इसे भूल गया था, अब वह फिर रास्ते पर ही आ रहा है।


हिन्दू संस्कृति में प्रतीकों का महत्व और प्रभाव

(श्री. सुदर्शन )

मनुष्य के लिए सब समय पूरी बात कहना या लिखना सम्भव नहीं होता। हमारे जीवन में बहुत से भाव इस प्रकार सूचित करने आवश्यक होते हैं, जिन्हें दूर से देखकर समझा जा सके। बहुत समय और स्थल ऐसे होते हैं जहाँ अपने और दूसरों के लिए पहिचानने का चिन्ह निश्चित करना पड़ता है। यही चिन्ह उस भाव या वस्तु के प्रतीक कहलाते हैं, जिसके लिए वे निश्चित किये गये हों। जैसे किसी व्यक्ति का नाम उसका प्रतीक होता है, नाम के द्वारा उसका सम्मान और अपमान होता है, वही बात अन्य प्रतीकों के सम्बन्ध में है।

प्राचीन काल के प्रसिद्ध योद्धा अपने-अपने पृथक ध्वज रखते थे। महाभारत में श्रीकृष्ण, भीष्म, द्रोण, कर्ण, युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम आदि के विभिन्न आकृतियों वाले रथ ध्वजों का वर्णन मिलता है। ये ध्वज दूर से ही उस योद्धा को सूचित कर देते थे। बड़े आदमियों के भवनों पर भी अपने पारिवारिक ध्वज लगाये जाते थे। मन्दिरों पर और पण्डों के स्थानों पर अब भी ध्वज लगाने का नियम है, जिनसे उनकी पहिचान हो सकती है। संस्थाओं के ध्वज तथा राष्ट्र ध्वज का जो सम्मान है वह सभी जानते हैं। इनके अपमान के कारण कभी-कभी बड़े संग्राम तक हो जाते हैं।

व्यक्ति या संस्थाओं के अतिरिक्त भावों, क्रियाओं तथा घटनाओं के सूचक प्रतीक भी आज व्यवहृत होते हैं। कुछ प्रतीक हैं जो उस वस्तु के वास्तविक लक्षणों के अनुसार होते हैं और दूसरे कल्पित प्रतीक होते हैं। व्यक्तियों के नाम, राष्ट्र की ध्वजाएं तथा दूसरे चिन्ह कल्पित माने जाते हैं। जबकि राष्ट्र को किसी पदक, सिक्के या ध्वज आदि के लिए कोई प्रतीक निश्चित करना पड़ता है तो उसके विशेषज्ञों की बैठक होती है, क्योंकि ऐसा चिन्ह निश्चित करना जो भाव को ठीक-ठीक सूचित करे और उससे भ्रम न हो, सरल काम नहीं है।

विश्व की सम्पूर्ण मानव जाति नित्य प्रतीकों को एक ही अर्थ के व्यवहार में लाती है। श्वेत ध्वज सब कहीं शान्ति का सूचक है, जैसे किसी अज्ञात शक्ति ने सबको उन प्रतीकों के चिन्ह बतला दिये हैं। यह प्रतीकों की एकता भी सिद्ध करती है कि मनुष्य जाति किसी एक ही देश से विश्व में फैली है और वह देश वही हो सकता है, जहाँ नित्य प्रतीक अब भी अपने भूल और अविकृत रूप में मिल सकें। खोज करने पर मालूम पड़ता है कि भारत के प्राचीन प्रतीक ही विश्वव्यापी हो गए हैं।

भाषा का विवेचन करते समय यह बताया गया है कि किस प्रकार मूल शब्दों का उच्चारण भेद से असावधानी से, रूप बदलता गया है, ठीक वही बात प्रतीकों के सम्बन्ध में है। प्रतीकों की धारणा में भी बराबर कल्पना और लाक्षणिकता आती गई इसके कारण कल्पित प्रतीकों की संख्या बढ़ती गई। उदाहरण के लिए देवता का प्रतीक लीजिए। मनुष्य की आकृति के साथ मुख के चारों और तेजोमण्डल बना देना देवत्व का प्रतीक है। देवताओं के शरीर तेजस तत्व के बने हैं, वे पार्थिव नहीं है, यही बात तेजोमण्डल से प्रकट की जाती है। भारत से बाहर जाने पर जब लोग परिस्थितिवश शिक्षा से दूर होकर असभ्य हो गये तो वे देव शक्ति को ही भूल गये। जब दूसरों के संसर्ग से उन्होंने देवताओं का वर्णन पाया तो देवताओं और उनके वाहनों में भेद न कर सके। इससे देवताओं की आकृति में उनके वाहनों के आकार भी मिल गये। साथ ही देवत्व को सूचित करने के लिए उड़ने के प्रतीक पंख आकृतियों में लगाये गये। विदेशों की परियों और फरिश्तों की धारणा इसी आधार पर उत्पन्न हुई है।

जैसे एक ही शब्द उपयोग भेद से अनेक अर्थ रखता है- ‘राम-राम’ का अर्थ प्रणाम भी होता है और घृणा भी। वैसे ही प्रतीकों से भी अनेक भाव सूचित होते हैं। जब कोई जाति श्रेष्ठ प्रतीक को अपना चिन्ह बनाकर अत्याचार करती है तो वह प्रतीक उसके अत्याचार का द्योतक हो जाता है तो वह अपने नित्य अर्थ में नहीं रहता। जैसे हिटलर के अत्याचार से स्वस्तिक का चिन्ह अत्याचारों का स्मारक बन गया। अग्नि की लपटों के समान लाल रंग का झण्डा वैदिक हिन्दू ध्वज होने पर भी, रूस में लाल पताका के रूप में नास्तिकता तथा जड़ साम्यवाद का प्रतीक हो गया है।

हिन्दू समाज के सर्वज्ञ ऋषियों ने आरम्भ में ध्वज तथा दूसरे प्रतीकों को आजकल की भाँति कल्पित नहीं बनाया था। हमें कोई एक गुण अभीष्ट है इसलिए हम उसी को अपना प्रतीक बना लें ऐसी बात नहीं थी। उस समय के प्रतीक नित्य प्रतीक हैं, जो किसी व्यक्ति या भाव के पूर्णरूप से सूचक होते थे। नित्य प्रतीक का अर्थ क्या है उनमें से कुछ तो विशेषता के कारण निश्चित किये जाते हैं। किस जाति, देश या पदार्थ की वह विशेषता जो दूसरों में हो, उसका प्रतीक हो जाता है। जैसे हाथी का प्रतीक सूँड के रूप में बनाया जा सकता है। इसी प्रकार जिन देशों में कोई विशेष पशु या पदार्थ होते हैं, उन देशों को उन पदार्थों से लक्षित किया जाता है। प्रतीक वे हैं जो भाव जगत से सम्बन्ध रखते हैं कौन सा भाव किस पदार्थ से सम्बन्धित है यह बात वही जान सकता है, जिसने स्थूल के बन्धन से मन को पृथक करके जाग्रत दशा में ही भाव जगत को साक्षात कर लिया हो।

नित्य प्रतीकों का श्रेणी विभाजन करते समय हमको कई प्रकार के प्रतीक मिलते हैं। (1) चिह्न प्रतीक, जैसे अक्षराकृतियाँ, स्वास्तिक, त्रिभुज, चतुर्भुज आदि (2) रंगों के प्रतीक, जैसे श्वेत, लाल आदि रंग भाव सूचक हैं। (3) पदार्थ प्रतीक, जैसे शंख स्वर्ण, पाषाणादि। (4)प्राणी प्रतीक गाय, वृषभ, मयूर, हंस आदि। (5) पुष्प प्रतीक कमल आदि। (6)शस्त्र प्रतीक चक्र, त्रिशूल, गदा आदि। (7) वाद्य प्रतीक शंख डमरू, भेरी, वंशी आदि। (8) वृक्ष प्रतीक आँवला, पीपल, तुलसी आदि (9) वेश प्रतीक शिखा, यज्ञोपवीत, कण्ठी, माला, गेरुआ वस्त्र, दण्ड, तिलक आदि-आदि। (1) संकेत प्रतीक-मुद्राएं।

1- चिह्न प्रतीकों में हिन्दू समाज में ‘स्वास्तिक’ सर्व प्रधान है। जैसे समस्त अक्षर ‘कार’ से उत्पन्न हुए हैं। वैसे ही समस्त रेखाकृतियाँ स्वास्तिक के ही अंतर्गत आ जाती हैं। प्रणव की आकृति नाद रहित होने पर स्वास्तिक ही मानी जाती है। केन्द्र के चारों ओर प्रगति और रक्षा, चारों तरफ उन्मुक्त द्वार यह स्वास्तिक में स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। स्वास्तिक (कल्याण) के लिए यही आवश्यक है। स्वास्तिक प्रथम पूज्य श्री गणेशजी का चिन्ह है। इसका अर्थ है कि स्वास्तिक द्वारा हम गणेशजी की शक्ति का लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रधान मंगल चिन्ह को पारसी धर्म ने उलटा कर लिया और नाम अपस्तिक रखा। इसी प्रकार ईसाइयों का क्रास भी इसी का संक्षिप्त रूप है। प्रणव का यह रूप न लेकर जिन्होंने नाद को प्रतीक माना उनकी परम्परा में वह काल व क्रम से चाँद और तारे के रूप में आ गया, जैसे कि मुसलमानों में। पर खोज करने से इन सबका उद्गम स्वास्तिक ही सिद्ध होता है।

(2) रंग प्रतीक हिन्दू धर्म में पूजा में तो प्रयुक्त किये ही जाते हैं, उनके प्रभाव का सर्वत्र लाभ उठाया गया है। थोड़ी ही भेद से लाल रंग उष्णता, अनुराग या क्रोध का सूचक है। क्रिया से उष्णता और उसका रंग लाल होगा वह स्पष्ट जान पड़ता है। इसी प्रकार कुछ अन्तर से श्वेत रंग सात्विकता, प्रतिभा, यश, शान्ति, सत्य, धर्म का प्रतीक है। अर्थात् रजोगुण के जो विशुद्ध कार्य हैं उन्हें लाल रंग और सत्वगुण के जो विशुद्ध कार्य हैं उन्हें श्वेत रंग सूचित करता है। तमोगुण का सूचक काला रंग है। वह अभाव, अन्धकार, मृत्युँ आदि का सूचक है जो तमोगुण के स्वरूप हैं।

(3) पदार्थ प्रतीकों में शंख मंगल का प्रतीक हैं। शंख में जो शक्ति है वह हम में पवित्रता का संचार करता है। इसी प्रकार स्वर्ग दृढ़ता, बहुमूल्यता और परीक्षण में स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। अस्थि (हड्डी) को अपवित्रता का प्रतीक बताया गया है।

(4) प्राणी प्रतीकों में गौ, पृथ्वी क्षमा का प्रतीक है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। हंस, ज्ञान और निर्णय का प्रतीक है तथा सर्प बल और प्राण का प्रतीक है। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं कि जिनका अर्थ स्पष्ट है जैसे हंस के शुभ्रता, तीव्रगति, नीर-क्षीर विवेक आदि गुण ज्ञान और विवेक को प्रकट करते हैं। इसी प्रकार गाय भी पृथ्वी के समान मनुष्यमात्र की पालक, धारक और क्षमा की मूर्ति है।

(5) पुष्प प्रतीकों में कमल भारतवर्ष का सबसे अधिक सुन्दर पुष्प है जिसकी उपमा आदर्श सौंदर्य वाले नर नारियों के लिए दी जाती है।

(6) शस्त्र प्रतीक में चक्र और त्रिशूल सबसे महत्वपूर्ण हैं जो विष्णु और शिव के मुख्य शस्त्र हैं। इनसे इन देवताओं की शक्ति का बोध होता है।

इस प्रकार वाद्य प्रतीक, वृक्ष प्रतीक, वेश प्रतीक के द्वारा भी अनेक प्रकार के भावों और उद्देश्यों को प्रकट किया जाता है। इनसे प्रकट होता है कि प्राचीन हिन्दू संस्कृति में प्रतीकों का पर्याप्त प्रचार था और उनके द्वारा पठित-अपठित सभी थोड़े से संकेत से ही धार्मिक सिद्धान्तों के मर्म और आदेशों के समझने में समर्थ हो सकते थे।


समाज की न्यायानुकूल व्यवस्था कैसे हो?

(श्री. बुद्धदेवजी विद्यालंकार)

इस समय मानव समाज में जो हलचल और असन्तोष का भाव भयंकर रूप से दिखलाई पड़ रहा है, उसका मुख्य कारण जीवनोपयोगी सामग्री के बँटवारे की विषमता है। आज संसार की यह दशा है कि एक देश में लाखों व्यक्ति दाने-दाने को तरस कर भूखों मर जाते है। और दूसरे में लाखों मन खाद्य पदार्थ सड़कर नष्ट कर डाला जाता है। दो देशों की बात छोड़ दीजिये, बंगाल के दुर्भिक्ष जैसे घोर आपत्तिकाल में उसी प्रदेश के अनेक व्यापारियों तथा सरकार के गोदामों में लाखों मन चावल, गेहूँ पड़ा सड़ता रहा और पास ही लोग भूख से तड़प-तड़प कर मरते रहे, जिनकी संख्या कुछ महीनों में ही 30-40 लाख तक पहुंच गई। इसलिये यह कहना पड़ता है। कि वर्तमान समय में जो अनगिनती मनुष्य अन्न और वस्त्र की कमी से पीड़ित हैं, उसका कारण इन वस्तुओं का अभाव नहीं है वरन् यह है कि शासन और समाज उनके बँटवारे की ठीक-ठीक व्यवस्था नहीं कर सके हैं। इसके परिणामस्वरूप वे वस्तुएँ एक स्थान पर तो आवश्यकता से अधिक इकट्ठी होकर सड़ाँद उत्पन्न करती हैं और दूसरे स्थान पर बहुत कम पहुँचकर लोगों को कुत्ते-बिल्ली की तरह रोटी का टुकड़ा ढूँढ़ते फिरने के लिये विवश करती है।

इसके पहले कि पदार्थों के ठीक बँटवारे के तरीके पर विचार किया जाय, हम यह जान लेना आवश्यक समझते हैं कि हमको किन पदार्थों का बँटवारा करना है। इन पदार्थों को हम दो हिस्सों में बाँट सकते है। (1) आलम्बन पदार्थ, (2) अनुबन्ध पदार्थ। आलम्बन पदार्थ वे हैं, जिनके बिना हमारी जीवन यात्रा असम्भव है। ऐसे पदार्थ मुख्य रूप से चार हैं- (1) ज्ञान, (2) आहार, (3) परिच्छाद (वस्त्र तथा घर) (4) चिकित्सा। ये चारों पदार्थ ऐसे हैं, जिनकी आवश्यकता प्रत्येक मनुष्य को अनिवार्य रूप से है और प्रत्येक मनुष्य को, जो जान बूझकर श्रम करने से इन्कार न करे, ये आवश्यकतानुसार मिलने चाहिये। जो व्यक्ति श्रम करने से इन्कार करे उसे भी कोई न कोई समाजोपयोगी कार्य करने के लिए बाध्य करना चाहिये न कि इन पदार्थों से वंचित करना चाहिये, क्योंकि इन पदार्थों- खास कर अन्य और वस्त्र के बिना किसी का काम नहीं चल सकता और जो लोग इनको सीधी तरह से प्राप्त न कर सकेंगे वे अनुचित उपायों से जैसे चोरी, ठगी आदि से काम चलायेंगे।

‘अनुबन्ध पदार्थ’ वे हैं, जिनके बिना हमारा जीवन निर्वाह हो सकता है, जैसे उच्चकोटि का संगीत, बढ़िया चित्र कला, अति स्वादयुक्त भोजन आदि। यह पदार्थ भी यथा संभव सबको मिल सकें तो अच्छा है। परन्तु इनके बँटवारे में किसी कारणवश कुछ प्रतिबन्धों (रुकावटों) की आवश्यकता हो तो वे लगाये जा सकते हैं। क्योंकि यदि ये सबको प्राप्त न हो, तब भी समाज का काम चल सकता है। दूसरी बात यह भी है कि प्रत्येक व्यक्ति की रुचि इनमें से सब पदार्थों की तरफ होती भी नहीं। उदाहरण कि लिये करोड़ों व्यक्ति ऐसे हैं, जिनके लिये किसी संसार प्रसिद्ध चित्रकार की कला सिवाय निरर्थक लकीरों के और कुछ नहीं जान पड़ती। इसी प्रकार उच्च संगीत के सम्बन्ध में बहुसंख्यक व्यक्तियों का ज्ञान भैंस के आगे बीन बजाने के समान ही होता है। यही बात उच्चकोटि की अन्य कला कृतियों के सम्बन्ध में लागू हो सकती है।

अब हमको एक ऐसी प्रचलित कसौटी मिल गई, जिससे हम किसी समाज में प्रचलित व्यवस्था के भले बुरे होने की जाँच कर सकते हैं। जिस समाज व्यवस्था में आलम्बन पदार्थों से कोई परिश्रमी व्यक्ति वंचित न रहे और जिसमें अनुबन्ध पदार्थ भी यथासंभव सब तक पहुँचाये जा सकते हों, वहाँ व्यवस्था समाज के लिये आदर्श है। वेद में भी ऐसी ही व्यवस्था का आदेश दिया गया है। उसमें परमात्मा के अनेक गुणों को बताते हुये यह भी कहा है।

विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः। सवितारं नृचक्षसम॥यजुः 30।4॥

अर्थात् हम मनुष्यों की ठीक परख कर सकने वाले तथा प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा कर सकने में समर्थ, विविध प्रकार का ज्ञानवर्द्धक धन यथायोग्य सब में बाँटने वाले, सविता (परमात्मा अथवा उसके गुण को धारण करने वाले राजा ) को पुकारते हैं।

अब हम इस समस्या को हल कर सकते हैं कि संसार में वस्तुओं पर किसी मनुष्य का कहाँ तक अधिकार है? जिस बँटवारे का परिणाम ऊपर वर्णन किये वेद के आदेश के अधिक से अधिक समीप पहुँचता हो वही सबसे श्रेष्ठ है। पर आजकल लाखों व्यक्ति श्रम करने की इच्छा रखते हुये भी नौकरी या मजदूरी नहीं पाते और लाखों अधिक परिश्रम करने पर भी पदार्थों की कमी से, उचित भोजन, वस्त्र तक से वंचित रहते हैं। इससे स्पष्ट प्रकट होता है। कि वर्तमान काल में बँटवारे की जो प्रथा प्रचलित है वह दोषयुक्त अथवा त्रुटिपूर्ण है।

इस समय दुनिया में मुख्य रूप से बँटवारे के दो सिद्धान्त प्रचलित हैं। एक को हम जन्माधिकारवाद कह सकते हैं और दूसरे को श्रमाधिकारवाद।

(1) जन्माधिकारवादियों का कहना है कि परमात्मा ने जिस मनुष्य को जिस कुल में जन्म दे दिया है, उसे उस कुल में जन्म लेने के कारण अपने पिता तथा अन्य पूर्वजों की सम्पत्ति का उपभोग करने का जन्म सिद्ध अधिकार है। यही सिद्धान्त संसार के अधिकाँश देशों में प्रचलित है, यद्यपि यह कहा जा सकता है कि भारतवासियों ने इस विचारधारा को पुनर्जन्म तथा भाग्यवाद का संयोग करके पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया है। यहाँ राजा से लेकर मेहतर तक के अधिकार और कर्तव्य अटल और अपरिवर्तनीय हैं।

इस जन्माधिकारवाद के विषय में क्या कहा जाय? इस समय संसार में जो अनेक अन्यायपूर्ण विषमताएं तथा दुःख दिखाई पड़ रहे हैं उनका मूल कारण यही है। मनुष्य को उन्नति को ओर ले जाने वाली दो शक्तियाँ होती हैं एक भय तथा दूसरा उत्साह। इन दोनों का गला घोटने का इससे बढ़कर और कोई मार्ग नहीं हो सकता। विशेषतः भय का तो इसमें लोप ही हो जाता है। जब टाटा और बिड़ला जैसे धन कुबेरों के पुत्रों को इस बात का भय न हो कि किसी अवस्था में उनकी सम्पत्ति छीनी भी जा सकती है, और कल्लू चमार को यह उत्साह न हो कि वह भी समाज में कभी बड़ी पदवी पा सकता है तो उन्नति कैसे हो सकती है? इस व्यवस्था के हानिकार परिणाम इतने स्पष्ट हैं कि उनका विस्तार से वर्णन करना आवश्यक है। आज श्रमजीवी समुदाय की ओर से जो भयंकर क्राँति का झंडा खड़ा किया गया है उसका मूल कारण यही अन्याय है। जो व्यक्ति स्वयं परिश्रम करके अपनी बुद्धिमानी, समय सूचकता, संगठन शक्ति तथा कार्यकर्ताओं के साथ मधुर व्यवहार के ऊँचे पद पर पहुँचा है तथा जिसने अपनी पैदा की हुई सम्पत्ति में से दूसरों की भलाई और समाज के उपकार के लिए लाखों, करोड़ों रुपया दान भी किया है। उसकी सम्पत्ति तो कुछ कट्टर पंथियों को छोड़कर, जनसाधारण को नहीं भी अखरती। पर यह बात अधिकाँश लोगों को अखरती है। अनुचित प्रतीत होती है कि इतनी बड़ी पूँजी बिन योग्यता की परीक्षा के उस पूँजीपति के पुत्र को दी जाय, और वह उसका चाहे जैसा भी दुरुपयोग करता रहे तो भी वह उसी के अधिकार में पड़ी रहे।

इसके उत्तर में बहुत से लोग विधाता का विधान कर्मफल, भाग्य अथवा ईश्वर की आज्ञा का नाम ले देते हैं। सच पूछा जाय तो ईश्वर के सबसे बड़े शत्रु उसके यह भाग्यवादी भक्त ही हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जिस भगवान ने हमको विशेष अवस्थाओं में जन्म दिया है उसी ने हमको अपनी शक्तियों का उचित उपयोग करने का आदेश भी तो दिया है। उसने हमको हाथ, पैर, आँख, नाक, कान और सबसे बढ़कर मस्तिष्क ये जो अमूल्य साधन प्रदान किये हैं इनका अभिप्राय भाग्य के साथ लड़कर उस पर विजय प्राप्त करना ही है। भगवान ने कहा है।

द्वष्या दूषिरसि हेत्या हेतिरसि मेन्या मेनरसि आप्नुहि श्रेयाँसम। अति समम् क्राम॥

अथर्व. 2।11।1

अर्थात् तू शस्त्रों को काटने वाला शस्त्र है, तू दूषणों को दूषित कर देने वाली महाशक्ति है, तू चिन्ताओं का पहले से चिन्तन करने वाला अनागत विधाता है। उठ जो तेरे साथ की पंक्ति में है उन्हें पीछे छोड़ और जो अगली पंक्ति में हैं, उनमें जा मिल।

इतना ही नहीं भगवान ने पुरुषार्थ के लिए और भी स्पष्ट शब्दों में कहा है-

कृतम्मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहितः।

अथर्व. 7।50।8

अर्थात् “हे मनुष्य सदा याद रख कि पुरुषार्थ मेरे दाहिने हाथ में रहता है और विजय बाएँ हाथ में रहती है।”

इस प्रकार भय तथा उत्साह दोनों में बाधक होने के कारण जन्माधिकारवाद धर्म विरुद्ध है। उसके द्वारा संसार सुखी नहीं हो सकता।

दूसरी ओर “श्रमाधिकारवादियों” का कहना है कि जिस किसी ने किसी पदार्थ को उत्पन्न करने में श्रम किया है, उसका उस पर अधिकार है। यह कुछ अंशों में सत्य है, पर अनेक बाते इसमें अपवाद भी हो सकती हैं। जैसे कोई मनुष्य अपनी श्रम की कमाई को स्वयं खर्च न करके किसी विद्वान या परोपकारी व्यक्ति को दे दे। उस अवस्था में उनको वह रुपया बिना परिश्रम के ही मिलेगा। इसी प्रकार अनेक मनुष्य मन्दिरों, पुस्तकालयों, सेवा संस्थाओं के संचालकों को हजारों लाखों रुपया दे डालते हैं। ऐसे धन के विषय में भी यह कहा जा सकता है कि उसके कमाने में परिश्रम तो एक व्यक्ति ने किया और उसका उपभोग सर्वथा अनजान मनुष्यों ने किया। इस प्रकार श्रमाधिकार का सिद्धान्त पूर्ण रूप से तर्क संगत नहीं है।

श्रमाधिकारवाद पर विचार करते हुये साम्यवाद का प्रश्न भी उपस्थित हो जाता है। साम्यवाद के अनुयायी कहते हैं कि सम्पत्ति पर सब लोगों का समान रूप से अधिकार है, इसलिये किसी को कम या ज्यादा सम्पत्ति न मिलनी चाहिए। इस सिद्धान्त के विरुद्ध सबसे मुख्य दलील यह है कि संसार में सब मनुष्यों की क्षमता एक सी नहीं है, इसलिये उनके अधिकार भी एक से नहीं हो सकते। न सब मनुष्यों की भूख एक सी है, न श्रम शक्ति एक सी है, न योग्यता एक सी है। ये चीजें न मात्रा में एक बराबर हैं न श्रेष्ठता की निगाह से एक सी हैं। इस सम्बन्ध में वेद का कथन है।

समौ चिद्धस्तौ न समं विवष्टिः सम्मातरा चिन्न समं दुहाते॥ यमयोश्चिन्न समा वीर्याणि ज्ञाती चित सन्तौ न समं पृणीत्नः।

ऋग. 10।117।9

अर्थात्- “दोनों हाथ एक से दिखते हैं, पर इनकी क्रिया शक्ति एक सी नहीं है, एक माँ से पैदा होने वाली एक सी गौएँ एक समान दूध नहीं देती, दो जुड़वा भाइयों की शक्तियाँ भी एक सी नहीं होती, एक ही वंश के दो व्यक्ति एक समान दान नहीं करते।”

इन विभिन्न सिद्धान्तों पर विचार करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सम्पत्ति का बँटवारा आवश्यकता, रुचि तथा योग्यता के अनुसार होना चाहिए तथा सम्पत्ति पर सबसे अधिक अधिकार उसका रहना चाहिये, जो उसका सदुपयोग करे, उससे अन्य व्यक्तियों का हित साधन करे। जो उसका दुरुपयोग करे उसका अधिकार छीन लेना चाहिये।


संतान निग्रह आन्दोलन पर एक दृष्टि

(श्री. सत्यभक्त, पूर्व सम्पादक चाँद व सतयुग)

किसी पिछले अंक में जनसंख्या की समस्या लेख में हम यह बतला चुके हैं कि प्राकृतिक नियम के अनुसार देश की जनसंख्या निरन्तर बढ़ती रहती है और उसके नियन्त्रण का यदि कोई उपाय न किया जाय तो उसका परिणाम समाज के लिए कष्टदायक होते हैं। अब प्रश्न यह है कि इस कार्य की पूर्ति किस उपाय से की जाय? इसके लिये एक यही उपाय दिखलाई पड़ता है कि सन्तानोत्पत्ति का परिमाण नियमित रहे। यह एक बड़ा ही पेचीदा विषय है। लोगों से इसके लिये कहना या कानूनी व्यवस्था करना उनके व्यक्तिगत जीवन में घोर हस्तक्षेप समझा जाता है। कुछ लोग इस विषय को ऐसा गुह्य और निजी मानते हैं कि इस पर कुछ भी चर्चा करना सभ्यता के विरुद्ध बतलाते हैं।

इस सम्बन्ध में पाठकों को कदाचित इतना मालूम होगा कि योरोप, अमरीका आदि में बहुत वर्षों से सन्तान निग्रह का आन्दोलन चल रहा है। बहुत से व्यक्तिगत सुविधाओं की दृष्टि से और बहुत से समाज कल्याण की दृष्टि से इस विषय में विचार विमर्श और प्रचार करते रहते हैं। हमारे देश की सरकार ने भी पिछले पाँच-सात वर्षों से इस विषय की आवश्यकता को अनुभव किया है और आजकल अधिकाँश सरकारी अस्पतालों में इस विषय पर सम्मति और आवश्यक सूचना देने की व्यवस्था की गई है।

इसमें सन्देह नहीं कि कुछ भी हो यह विषय विवादास्पद है और अभी तक इसके सम्बन्ध में हमारे देश में तो बहुत बड़ा मतभेद देखने में आता है। कुछ लोग तो इसे व्यक्तिगत कष्टों और राष्ट्रीय आपत्तियों के निवारण का एक आवश्यक उपाय मानते हैं। दूसरे लोग इसे अप्राकृतिक, जघन्य, अश्लील और समाज में भ्रष्टता निग्रह के पक्षपातियों की दलीलों को उपस्थित करते हैं।

1-अंतर्राष्ट्रीय विषयों के ज्ञाताओं का कथन है कि युद्धों का जनसंख्या की वृद्धि से घनिष्ठ सम्बंध है। इसका भय विशेष रूप से उन देशों में होता है, जो उद्योग धन्धों की दृष्टि से बढ़े हुये है और जिनमें राष्ट्रीयता का भाव विशेष रूप से होता है। जनसंख्या की वृद्धि से युद्ध की संभावना किस प्रकार उत्पन्न होती है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण जर्मनी है। सन् 1914 वाले योरोपियन महासमर के पूर्व जर्मनी की माताओं में यह भाव फैलाया गया था कि उनका कर्तव्य अधिक से अधिक लड़के उत्पन्न करना है, जो राष्ट्र के लिए सिपाही बनकर युद्ध कर सकें। इस मनोवृत्ति के कारण उस देश की जनसंख्या निरन्तर बढ़ती जाती थी और किसी को इस बात की चिन्ता न थी कि इतनी जनसंख्या को खिलाने-पिलाने के साधन देश में मौजूद हैं या नहीं। इसलिये अन्त में जर्मन शासकों के सम्मुख भयंकर आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई जिनका परिणाम युद्ध के रूप में प्रकट हुआ।

(2) समाज शास्त्र का अध्ययन करने वाले कहते हैं कि जिस समाज में सन्तानोत्पत्ति पर किसी प्रकार का प्राकृतिक बन्धन नहीं रखा जाता वह ज्यादा समय तक तरक्की की हालत में नहीं रह सकता और न उसमें स्थायी सुख शाँति की संभावना हो सकती है, क्योंकि जब सन्तान निग्रह के अभाव से जनसंख्या सीमा से अधिक बढ़ जायगी तो वहाँ बेकारी अवश्य फैलेगी और इससे समाज में तरह-तरह के नैतिक दोष उत्पन्न होंगे। दूसरी बात यह है कि ऐसे समाज में जब जीवन निर्वाह के उपयुक्त पदार्थों की कमी हो जायगी, तो उसमें क्षीणकाय, निर्बल मस्तिष्क वाले तथा अन्य प्रकार के दोषों और दुर्गुणों से युक्त व्यक्तियों की संख्या बढ़ने लगेगी और योग्य, शक्तिशाली और प्रतिभावान लोगों की कमी हो जायगी। इससे कुछ समय बाद समाज में अयोग्य और निकृष्ट श्रेणी के मनुष्यों की संख्या बढ़ जाती है और वह नीचे की तरफ गिरने लगता है।

(3) अधिक सन्तान होने से गरीब घरों की स्त्रियों को बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। पाठक विचार करके देखें कि जो स्त्री प्रायः निर्बल और बीमार रहती है, पौष्टिक भोजन के अभाव से जिसकी देह में रक्त माँस की कमी रहती है, बार-बार सन्तानोत्पत्ति या अन्य मूर्खतापूर्ण कारणों से जिसकी जननेन्द्रिय विकृत हो गई है, जिसे गृहस्थी के पूरे काम के साथ दो-चार छोटे बच्चों का पालन करने के कारण कभी फुर्सत या मनोरंजन के लिए अवकाश नहीं मिलता ऐसी स्त्री को प्रति दूसरे वर्ष बच्चा पैदा होना कितना यंत्रणादायक होता होगा। ऐसे परिवारों में बच्चों के प्रति उपेक्षा या उदासीनता का व्यवहार होना भी स्वाभाविक है। उनमें से अनेक छोटी आयु में ही मर जाते हैं और जो बचते हैं, वे निकृष्ट वातावरण में पलकर नीचे श्रेणी के ही नागरिक बनते हैं।

जब हम सन्तान निग्रह के विरोधियों की दलीलों पर विचार करते है तो उनमें सबसे पहले उन लोगों का नम्बर आता है जो 1- सैनिकवाद में विश्वास रखते हैं और कहते हैं कि अगर किसी देश को दूसरे देशों के मुकाबले में खड़ा रहना है, तो उसके पास सैनिक बनने लायक लोगों की कमी न होनी चाहिये। 2- जिन देशों का क्षेत्रफल अधिक है और जनसंख्या अभी तक कम है, वे सन्तान निग्रह का विरोध इस आधार पर करते हैं कि अगर जनसंख्या न बढ़ेगी, तो देश का आर्थिक और औद्योगिक विकास किस तरह हो सकेगा। आस्ट्रेलिया और कनाडा ऐसे देशों के उदाहरण हैं। 3- जिन देशों में उद्योग धंधों के संचालकों (पूंजीवादियों) की प्रधानता है, वहाँ की सरकार चाहती है कि जनसंख्या इस प्रकार बढ़े कि जिससे कारखानों के लिए मजदूर बिना बाधा के मिलते रहे। इतना ही नहीं, मजदूरों की संख्या इतनी बढ़ी हुई रहे कि उनमें नौकरी पाने के लिये प्रतियोगिता बनी रहे जिससे थोड़ी मजदूरी पर काम कर सकें। 4-कितने ही चिकित्सक सन्तान निग्रह का विरोध इस कारण करते हैं कि इसके कृत्रिम उपायों से स्वास्थ्य को हानि पहुँचती है और तरह-तरह की जननेन्द्रिय सम्बन्धी बीमारियाँ फैलती हैं। 5-जो लोग प्राचीन रूढ़ियों के भक्त होते हैं, वे कहते हैं कि स्त्री पुरुषों के सम्बन्ध में इस प्रकार की चर्चा उठानी ही अश्लील, कुरुचिपूर्ण और घृणायुक्त है। इससे चरित्रहीनता की वृद्धि होती है। 6-कुछ लोग सन्तान निग्रह का विरोध धर्म के नाम पर करते हैं। जैसे जापानियों में पूर्वजों की पूजा धर्म का प्रधान अंग है और वे कहते हैं कि अगर हम काफी संतान पैदा न करेंगे तो वह पूजा कैसे कायम रहेगी। हमारे हिन्दू धर्म के अनुसार तो निस्सन्तान व्यक्ति की सद्गति ही नहीं हो सकती और उसके पूर्वज भी परलोक में बिना तर्पण आदि के घोर कष्ट सहन करते हैं।

इसमें सन्देह नहीं कि उपयुक्त दोनों पक्षों की दलीलों में कुछ सचाई अवश्य है। ठीक है कि अनेक स्त्रियों और पुरुषों में सन्तान निग्रह के कृत्रिम उपायों से विरक्ति का भाव उत्पन्न हो जाता है। यह भी संभव है कि इस प्रकार के भावों का प्रचार होने से कुछ लोगों को चरित्रहीनता के मार्ग पर चलने का प्रोत्साहन मिले। अब भी बड़े घरों की स्त्रियाँ सन्तान निग्रह करती हैं वे इस विचार से नहीं करती कि इससे समाज का कल्याण होगा, वरन् उनका उद्देश्य यह होता है कि सन्तानोत्पत्ति न होने से उनका शरीर सुगठित बना रहेगा और बच्चों की देखभाल के झंझट से बचकर वे अपना सब समय आमोद-प्रमोद में लगा सकेगी।

यह सब होने पर भी हम वस्तु स्थिति की तरफ से आंखें बन्द नहीं कर सकते। खासकर हमारे देश की जनसंख्या जरूरत से ज्यादा बढ़ गई है और उसके कारण लोगों का रहन-सहन गिरता जाता है तथा अनेक प्रकार के नैतिक दोष उत्पन्न होते हैं। मूर्ख लोग इसके विरुद्ध ऊँट-पटाँग दलीलें दे सकते हैं, पर जिनके सिर में आंखें और दिमाग में बुद्धि है, वे इस तथ्य से कभी इनकार नहीं कर सकते। हम यह भी स्वीकार करते हैं कि सन्तान निग्रह के कृत्रिम साधन अनेक अंशों में हानिकारक हैं, इसलिये उनका प्रयोग जहाँ तक संभव हो कम से कम किया जाना चाहिये और इस विषय में संयम तथा इन्द्रिय निग्रह को ही प्रधानता देनी चाहिये। पर कुछ भी हो इस संकट की तरफ से देश और समाज के हितैषियों को अपनी आंखें कदापि बन्द न करनी चाहिये और इसके लिये जो भी उपाय संभव तथा परिस्थिति के अनुकूल सिद्ध हों उनका सरकार और जनता दोनों को अवलम्बन करना चाहिये।


युग भेद से मानव देह का अपकर्ष

(श्री. नीरजाकान्त चौधरी)

यह तो प्रायः सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है कि कालचक्र अनादि है और इसमें प्रत्येक पदार्थ का उत्थान और पतन होता रहता है। पर हिन्दू शास्त्रों में इस परिवर्तन को एक निश्चित योजना पर आधारित बतलाया है और एक-एक काल खण्ड के चार भाग करके उनका नाम सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग कहा है। शास्त्रकारों का मत है कि सत्ययुग में सब पदार्थों और प्राणियों का उत्कर्ष होता है जो धीरे-धीरे पतन के मार्ग पर अग्रसर होता हुआ कलियुग में सबसे निम्न कोटि पर पहुँच जाता है। इस नियम का प्रभाव सब प्रकार के प्राणियों के शरीर पर भी पड़ता है। सत्युग में मानव शरीर आजकल की नाप से इक्कीस हाथ का होता था, त्रेता में चौदह, द्वापर में सात और कलि में साढ़े तीन हाथ का माना गया है।

विष्णु पुराण में लिखा है कि राजा शर्याति के वंशधर कुशस्थली के राजा रैवत बहुत अन्वेषण करने पर भी अपनी कन्या रेवती के योग्य पात्र न पा सके। अन्त में इस विषय में ब्रह्मा से जिज्ञासा करने के लिए वे अपनी कन्या को साथ लेकर ब्रह्मलोक गये। वहाँ वेद गान हो रहा था, अतएव उनको एक-दो घड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ी। तत्पश्चात् ब्रह्मा ने उनको बतलाया कि “जब तक तुम यहाँ प्रतीक्षा में रहे तब तक अनेक मानवीय युग समाप्त हो गये, क्योंकि ब्रह्मा का एक दिन अनेकों कल्प के बराबर होता है अब पृथ्वी पर तुम्हारा समकालीन कोई नहीं है इसलिए अब तुम वहाँ जाकर श्रीकृष्ण के भाई माया मानुष श्री बलदेवजी के साथ इसका विवाह कर दो पृथ्वी पर लौटने पर रेवती अन्य मनुष्यों की अपेक्षा तीन गुनी से भी अधिक लम्बी दिखलाई पड़ने लगी। तब-

उच्चप्रमाणामिति तामवेक्ष्य स्वलाँगलाग्रेणा च तालकेतुः। विनम्रायामास ततश्च सापि वभूव सद्यो वनिता यथान्या॥

(विष्णु पुराण 4।1।38)

“ताल की ध्वजा वाले भगवान बलदेवजी ने उस रेवती को बहुत लम्बे शरीर वाली देखकर अपने हलास्त्र के द्वारा उसे निम्नाकार कर दिया। तब रेवती उस समय की अन्य कन्याओं के समान छोटे आकार वाली हो गई।”

सूर्य वंशी भक्तराज अम्बरीष के भाई और सम्राट मान्धाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द सत्युग में देवताओं के लिए असुरों से युद्ध करते-करते थक गये। देवताओं ने उनको वरदान दिया, जिसके प्रभाव से वे एक गुफा में दीर्घ निद्रा में सो गये। द्वापर में जब श्रीकृष्ण कालयवन को न मार सके तो उसे छल से उसी गुफा में ले गये, जहाँ मुचुकुन्द को ठोकर से मारा, पर उनकी दृष्टि पड़ते ही वह जलकर भस्म हो गया। मुचुकुन्द ने भगवान की स्तुति करके इच्छित वरदान प्राप्त किया। इसके बाद-

इत्युक्तः प्रणि प्रत्येशं जगतामच्युतं नृपः। गुहा मुखाद्विनिष्क्रान्तः स ददर्शाल्पकान नरान्॥ ततः कलियुगं मत्वा प्राप्तं तप्तुँ नृपस्तयः। नर नारायण स्थानं प्रययाँ गन्धमादनम।

(विष्णु पुराण 5।24।4-5)

“राजा मुचुकुन्द ने गुफा से बाहर आकर देखा कि दूसरे मनुष्य उसकी अपेक्षा बहुत छोटे आकार के हैं और समझा कि कलियुग आरम्भ हो गया है।”

महाभारत के वन पर्व में भी हनुमान-भीम संवाद में युग भेद से तेज, शक्ति और आकार के घटते जाने की बात आई है।

अनेक विदेशी विद्वानों ने पूर्व समय में मनुष्य देह की अत्यधिक उच्चता की बड़ी हँसी उड़ाई है। भारतीय शिक्षित वर्ग का भी ऐसा ही विश्वास हो चला है। पर अब अनेक ऐसे प्रमाण मिल रहे हैं, जिनसे उपयुक्त मत की पुष्टि होती है।

भारत में शवदाह की प्रथा सदा से चली आई है, इस कारण यहाँ प्राचीन कंकालों का प्राप्त हो सकना बहुत कठिन है। तथापि बीच-बीच में कहीं कंकाल मिल ही जाते हैं। सप्तम शताब्दी में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्युनसाँग भारत भ्रमण के लिए आया था। उसने कुरुक्षेत्र (धर्मक्षेत्र) का वर्णन करते हुए लिखा है कि “मृतदेह लकड़ी के समान स्तूपाकार हो गये हैं और इस प्राँत में सर्वत्र उनकी हड्डियाँ बिखरी हुई पाई जाती हैं। यह बहुत प्राचीन समय की बात है, क्योंकि हड्डियाँ बहुत बड़ी-बड़ी हैं।”

सन् 1941 ई. में कुरुक्षेत्र के समीप एक विलक्षण मनुष्य की खोपड़ी पाई गई थी, जो अब से बहुत बड़ी थी। लगभग 15 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के सोहागपुर के निकट एक बहुत बड़े आकार का कंकाल पाया गया था सन् 1946 के लगभग अमरीका के कोलोण्डो मरुभूमि की गुफा में अनेकों 9 फीट लम्बे कंकाल पाय गए थे। अनुमान किया जाता है कि वह स्थान लगभग आठ हजार वर्ष पहले किसी प्राचीन जाति के राजवंश का समाधि स्थल था। इसी प्रकार डॉ. लीको ने केनियाँ की मैगजी झील में से कितने ही कंकाल प्राप्त किये थे, वे भी आजकल से बहुत बड़े थे। डॉ. लीको ने बतलाया है कि ये मनुष्य अब से एक लाख पच्चीस हजार वर्ष पहले वहाँ रहते थे। वे कंकाल अब पत्थरों में मिलकर पत्थर ही बन गये हैं। उनका अध्ययन करने से यह सिद्ध होता है कि ये लाखों वर्ष पुराने प्राणी खेती करते थे, वस्त्र पहनते थे और सीधे खड़े होकर चलते थे।

‘फान कोनिग्सवाल्ड’ ने द्वितीय महायुद्ध से पूर्व जावा द्वीप में खुदाई कराके कुछ कंकाल निकाले थे, जो प्राचीन ‘जावामैन’ की अपेक्षा भी बड़े और पूर्ववर्ती काल के थे। इन हड्डियों को लगभग 5 लाख वर्ष पुराना समझा गया था और इनकी खोपड़ी आजकल के मनुष्यों से लगभग दुगुनी थी। इसी समय चीन में प्राचीन समय के तीन दाँत मिले थे, जो आजकल के मनुष्य के दाँतों से दुगुने बड़े थे।

इन सब खोजों पर जब विचार किया जाता है तो हमको डार्विन के विकास-सिद्धान्त पर घोर सन्देह होने लगता है। भारतीय शास्त्रों का मत तो इस विकासवाद के सर्वथा विपरीत है। यद्यपि डार्विन ने भगवान को अस्वीकार नहीं किया, फिर भी उनके नवीन सिद्धाँत के संपर्क में आकर बहुत से लोग ईश्वर की सत्ता में सन्देह करने लगे हैं।

परमेश्वर सर्व शक्तिमान है। वे ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यस्त समस्त विशाल सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते हैं। फिर वे क्या वानर के स्थान में मनुष्य की रचना नहीं कर सकते थे? दो वृक्ष के पत्ते--यही क्यों, घास के दो तिनके, कभी एक-से नहीं रचे गये। एक बूँद जल के बीच भी असंख्य जीव रहते हैं, जो केवल अनुवीक्षण यन्त्र की सहायता से देखे जा सकते हैं।

आर्य-शास्त्रों में मनुष्य का एक विशिष्ट स्थान है, क्योंकि चतुर्दश भुवन में एकमात्र पृथ्वी ही कर्म-क्षेत्र है और मानव-शरीर ही एकमात्र कर्म करने का साधन है। दूसरे सभी लोक भोग भूमियाँ हैं और दूसरे सारे शरीर ( यहाँ तक कि देव शरीर भी ) भोग शरीर है। उनमें तथा उनके द्वारा मुक्ति के उद्देश्य से कोई कर्म नहीं होते। अतएव मनुष्य भगवान की सृष्टि का श्रेष्ठ जीव है, नर-देह अत्यन्त दुर्लभ है। देवताओं को भी मुक्ति के लिए धराधाम में आकर मनुष्य-देह ग्रहण कर जन्म लेना पड़ता है।

आज जो अनुसन्धान हो रहे हैं, उनसे तथा पाश्चात्य अन्वेषकों के मत से भी निःसन्देह सिद्ध हो रहा है कि प्राचीन काल से मानव-देह क्रमशः छोटा होता आ रहा है तथा आज से दस लाख वर्ष पूर्व भी सभ्य मानव का पृथ्वी पर अस्तित्व था। इससे शास्त्रों में जो युग-भेद से क्रमशः सब विषयों में अवनति होने की बात लिखी है, वह सर्वथा सत्य सिद्ध होती है।


देश-व्यापी दुर्दशा का सुधार कैसे हो ?

( श्री. भगवानदासजी केला )

भारतवर्ष को स्वाधीन हुये दस वर्ष हो गये, पर अभी यहाँ के जन-समूह की अवस्था में बहुत कम अन्तर पड़ा है। साधारण लोगों को इस विषय से कुछ भी अनुराग नहीं होता कि राष्ट्रपति के अधिकार क्या हैं-प्रधानमंत्री की सत्ता क्या है-गणराज्य का क्या स्वरूप है-ऐसी बातों में उन्हें कोई आनन्द नहीं आता, क्योंकि उनके सामने रोटी-कपड़े की समस्या सदा भीषण रूप में खड़ी रहती है। अगर हमारा नया शासन इन लोगों को जीवन-निर्वाह की सबसे आवश्यक इन वस्तुओं को नहीं दे सकता, तो वे परिस्थिति के बदलने में कैसे विश्वास कर सकते हैं।

इस समय हमारे देशवासियों का एक बड़ा भाग महँगाई, भुखमरी से परेशान है। समय-समय पर ऐसे लोगों की आत्म-हत्या की घटनाएँ भी सुनने में आती हैं। भारतीय राष्ट्र की इस दुर्दशा के कुछ कारण तो ऐसे हैं, जो विशेष परिस्थितियों से पैदा हुये हैं और उन पर एकदम काबू पा सकना किसी के वश की बात नहीं है। पर कुछ कारण ऐसे भी हैं, जो हमारे देशवासियों ने, अपने आपको भारत-संतान कहलाने वालों ने पैदा किये हैं। हमारे भाई ही मिलावट, चोरबाजारी, मुनाफाखोरी, घूसखोरी करके देश की हालत को खराब बना रहे हैं। जो देश आध्यात्मिकता और धर्ममय संस्कृति का अभिमान करने वाला हो और जहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसा महान आदर्श-वाक्य प्रायः सुनने में आता हो, जहाँ के आदमी पशु-पक्षियों तक पर दया दिखाते हों, वहीं के आदमी इतने लोभी, इतने स्वार्थी बन जायें कि अपने लाभ के लिये अपने भाई-बहिनों की हत्या से भी बढ़कर कुकर्म करें, इससे अधिक शोचनीय बात और क्या होगी।

इस बात को सब कोई समझते हैं कि जो व्यक्ति खाने-पीने की चीजों में मिलावट करते हैं, वे अनेक आदमियों को रोगी बनाते हैं, कितने ही आदमी तो मिलावटी पदार्थ खाकर असाध्य रोगों के शिकार बन जाते हैं और घुल-घुलकर मरते हैं, क्या मिलावट का यह काम हत्या से भी बढ़कर क्रूरता का नहीं है? इसी प्रकार जो लोग चोरबाजारी या मुनाफाखोरी करते हैं, वे लाखों आदमियों को भूखा-नंगा रखने के जिम्मेदार होते हैं। प्रधानमंत्री नेहरू ने कई बार कहा है कि उनका वश चले तो चोरबाजारी करने वालों को खुले आम फाँसी दे दें। पर उनकी सरकार ने अभी तक इस ओर कोई खास कदम नहीं उठाया। बिहार सरकार ने एक बार लाखों गज कपड़ा और हजारों मन अन्न चोरबाजारी वालों के यहाँ से पकड़ कर उन पर मुकदमा चलाया था। पर इस अवसर पर भी सरकारी कर्मचारियों ने अपनी जेबें खूब भरी। कई बड़े-बड़े मुखिया छूट गये और अनेक साधारण व्यक्तियों को पीस डाला गया। आशा है कि सरकार फिर कभी ऐसे चोरबाजारी करने वाले व्यवसाइयों के विरुद्ध कार्यवाही करते समय अपने लोभी-बेईमान कर्मचारियों पर भी पूरी निगाह रखेगी।

अस्तु, मुनाफाखोरी अथवा घूसखोरी के रोकने के लिये सरकार जो भी नियम बनावेगी उससे तो हमारी सहानुभूति है ही, पर हमको यह विचार करना है कि क्या बीमार का ऐसा ऊपरी इलाज करने से उद्देश्य सिद्ध हो सकता है? जैसे फोड़े का आपरेशन या चीरा-फाड़ी और मरहम पट्टी होती है, पर उससे व्याधियों का अन्त नहीं होता। कुछ फोड़े मिटते हैं तो आस-पास में नये निकल आते हैं।

इसलिये जब तक रक्त को स्वच्छ नहीं किया जाता तब तक बीमारी जड़ से अच्छी नहीं होती। इसी प्रकार ‘चोर’ या ‘व्यापारी’ बड़ा चतुर होता है। वह आगे-पीछे की बात सोच-समझ कर काम करता है और सरकारी धमकी से जल्दी अपना पेशा बन्द करने वाला नहीं होता।

जब हम इस परिस्थिति के मूल कारणों पर विचार करते हैं तो विदित होता है कि वर्तमान वातावरण में प्रत्येक आदमी जल्दी से जल्दी और अधिक से अधिक धनवान बन जाना चाहता है। हम कोई भी धन्धा करते हों हमारा लक्ष्य यही रहता है। हाँ, कुछ धन्धों में इसकी गुंजाइश अधिक रहती है और कुछ में कम। इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि तात्कालिक उपायों के साथ-साथ ही बाल्यावस्था से ही लोगों के मन पर अच्छे संस्कार डाले जायें। आजकल घरों में माता-पिता अपनी सन्तानों में ऊँची भावना भरने की और से प्रायः उपेक्षा ही करते हैं। इसलिये आजकल शिक्षा संस्थाओं और शिक्षकों का उत्तरदायित्व बहुत बढ़ गया है। वे ही विद्यार्थी अवस्था में लड़कों की मनोवृत्ति को मोड़ सकते हैं। लड़कों की पूरी शिक्षा-पद्धति पर विचार करना तो बहुत लम्बा विषय होगा। यहाँ हम एक बात का ही उल्लेख करना चाहते हैं कि विद्यार्थियों की नैतिक शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाय और उन्हें जो अर्थ-शास्त्र पढ़ाया जाय वह पूर्णतया नीति के अनुकूल हो।

हमारे देश में अर्थ-शास्त्र का पठन-पाठन बढ़ता जा रहा है। यह स्कूलों और कालेजों की शिक्षा में सम्मिलित है। पहले यह अंग्रेजी में ही पढ़ाया जाता था, पर अब हिन्दी में पढ़ाया जाने लगा है और मैट्रिक तक में पढ़ाया जाता है। हमको इस विषय की पढ़ाई में कोई आपत्ति नहीं, पर हमारा ऐतराज पाठ्य-पुस्तकों के सम्बन्ध में है। आजकल इस विषय की जो पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं, वे अंग्रेजी पुस्तकों के आदर्श पर ही लिखी गई हैं और उनमें इस विषय का विवेचन पूँजीवादी दृष्टिकोण से ही किया है। उसमें यहीं सिखाया जाता है कि हमारी सभी आर्थिक क्रियाओं का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ या मुनाफा है। हम कोई चीज बनावें, पैदा करें, खरीदें, बेचें तो हमें ऐसे तरीके काम में लाने चाहिये कि हमें अधिक लाभ हो। समाज के दूसरे लोगों पर इसका कैसा प्रभाव पड़ेगा, वे बेकार हो जायेंगे या भूखों मरने लगेंगे, इससे हमको कोई सरोकार नहीं रखना चाहिये। हमें अपने रहन-सहन का दर्जा बढ़ाना है, इसके लिये हमारी आवश्यकताएं दिन पर दिन बढ़ती जायें तो कोई चिन्ता की बात नहीं। ज्यों-ज्यों आवश्यकताएं बढ़ेगी, हम अपनी पूर्ति का प्रयत्न करेंगे। हम ईमानदार रहने का उसी सीमा तक विचार करते हैं, जहाँ तक कानून की पकड़ में नहीं आते। मनुष्य में कुछ ऐसी भावनाएं स्वाभाविक रूप से भी होती हैं। फिर जब यह पूँजीवादी अर्थ-शास्त्र उन्हें प्रोत्साहन देता है, समर्थन करता है तो उसका परिणाम व्यापार में अनैतिकता के सिवाय क्या होगा। अतएव हम इस प्रकार की पाठ्य-पुस्तकों को रोककर नैतिक अर्थ-शास्त्र की शिक्षा दें जो महात्मा गाँधी का लक्ष्य था और जिसका प्रचार वे निरन्तर करते रहें। कोई कानूनी प्रतिबन्ध हो या न हो, पर हमें कोई ऐसा काम न करना चाहिए, जिसमें दूसरों को गरीब बनाकर स्वयं धनवान बनाने की बात हो।


मालिकों और मजदूरों में सद्भाव की स्थापना

(श्री. सन्तरामजी )

पश्चिम के मजदूरों और मालिकों के संघर्ष को देखकर तथा समाजवादियों की बातें सुनकर हमारे देश में भी मालिक और मजदूर का, श्रम तथा प्रबन्ध का झगड़ा चल रहा है। इसके कारण प्रायः अशान्ति उत्पन्न होती रहती है। हड़तालें होती हैं, दंगे-फसाद होते हैं, मार-काट की भी नौबत आ जाती है। इस झगड़े और अशान्ति को सबके लिये हितकारी रूप में मिटाना सच्चे जन-सेवकों का काम है।

एक मिल मालिक मजदूरों की माँगों से तंग आकर कह रहा था-”मजदूर को एक इंच जगह हो तो वह एक गज माँगने लगता है।”

उसकी शिकायत सुनकर एक परिचित जन-सेवक ने कहा-”आपने उसे -सवेतन छुट्टी, साफ मकान, शिक्षा, दवादारु सब कुछ दिया, पर आपने उसे अपने आपको नहीं दिया।”

मिल मालिक उछला पड़ा। बोला-”आप कही सनकी तो नहीं है। मैं उसके लिये और क्या करूं? क्या मैं मजदूरों के लिये नर्स बनकर उनके मुँह में दूध टपकाऊँ।” जन-सेवक ने उत्तर दिया-”आपको उनके लिये नर्स बनने की जरूरत नहीं हैं। आपको उनके सम्बन्ध में मनुष्य प्राणी बनने की आवश्यकता है। आप वास्तव में उनको नहीं जानते और वे आपको नहीं जानते। यदि लोगों को व्यक्ति समझकर व्यवहार न किया जाय तो वे बुरा मानते हैं। प्रत्येक मनुष्य प्राणी में गौरव का भाव है और प्रत्येक अपने साथ एक व्यक्ति के रूप में व्यवहार किया जाना पसन्द करता है। यदि आप उन लोगों में, जो आपके लिये काम करते हैं, सच्ची-अकृत्रिम दिलचस्पी लेने लगें तो यह निश्चय है कि आपके और उनके संबंधों में सुधार हो जायेगा।”

मिल मालिक बोला-”मित्रोचित दिलचस्पी-ये शब्द सुनते-सुनते मेरे कान पक गये। हम व्यापार चला रहे हैं, न कि उपदेशक विद्यालय।”

बस, ऐसी ही मनोवृत्ति के कारण मजदूरों और मालिकों के झगड़े खतम नहीं होते। यदि मालिक ऊपर लिखे परामर्श पर चले तो दोनों ओर न्याय के लिये मार्ग खुल जायें। इस उपाय से मजदूरों को जहाँ अच्छा वेतन और काम करने का अच्छा वातावरण मिलेगा, वहाँ दूसरी ओर मालिकों को हार्दिक सम्मान तथा पूरा काम मिलेगा। श्रम तथा पूँजी के वैमनस्य को दूर करने का यही उचित उपाय है। इसके विपरीत जैसा कुछ वर्गवादी कहते हैं, पूँजी और श्रम की समस्या के सुलझाने के लिये सारी सभ्यता को नष्ट कर डालना, कोई प्रशंसनीय समाधान नहीं है। एक वर्गहीन समाज बनाने के उद्देश्य से चारों ओर वर्ग युद्ध और वर्ग घृणा फैला देना, मनुष्य जाति के लिए हितकर बात नहीं है। इस समस्या का हल यही है कि मनुष्यों को हर प्रकार से ऐसी शिक्षा दी जाय कि सभी मनुष्य भगवान् की सन्तान हैं और किसी को एक दूसरे के प्रति घृणा रखना जघन्यता का परिचायक है। ऐसा होने से उनमें भ्रातृभाव का उदय होगा और वे परस्पर में सहानुभूति का व्यवहार करने लगेंगे। अमेरिका के प्रमुख उद्योगपति श्री हेनरी फोर्ड ने एक बार कहा था कि “बड़े-बड़े उद्योग मानवता के लिए एक बहुत बड़ी देन सिद्ध हो सकते हैं, यदि ये अपने मजदूरों पर उतना ही समय तथा ध्यान दें जितना कि वे मशीन, भवन तथा शिल्प पर देते हैं।”

अपनी ही कम्पनी को फटकार बतलाते हुये उन्होंने कहा- “ऐसा जान पड़ता है कि हमने मानवी सम्बन्ध के विकास को जारी नहीं रखा है। हम अपना उत्पादन बढ़ाने के लिये जितना ध्यान वैज्ञानिक साधनों पर देते हैं, उतना मानवी सम्बन्धों पर नहीं दे रहे हैं। जितना रुपया हमने शिल्प विज्ञान की वृद्धि पर खर्च किया है, उतना ही हमें मजदूरों के साथ मानवीय सम्बन्ध को अच्छा बनाने में व्यय करना चाहिए था।”

उनके इस शब्द को सुनकर अमरीका के सभी लोग प्रसन्न हुये थे, क्योंकि एक प्रधान पूँजीपति के मुख से ऐसी बात उन्होंने न कभी सुनी थी और न वे इसकी आशा करते थे। उनका कथन इसी विचार का समर्थन करने वाला था कि सब मनुष्य ईश्वर के पुत्र हैं और इस कारण भाई-भाई हैं। जब फोर्ड कम्पनी के एक मजदूर से पूछा गया तो उसने कहा- “श्री फोर्ड बिल्कुल ठीक कहते हैं। वे सच्चे व्यवस्थापक हैं।” उससे प्रश्न किया गया कि तुम किस आधार पर उनको अच्छा कहते हो? तो वह बोला- “फोर्ड साहब ही एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो दरवाजे से निकलते हुये मुझसे बातें करके जाते हैं। अन्य बड़े अफसरों में से तो अनेक मुझ पर ध्यान ही नहीं देते।” इससे प्रकट होता है कि लोग चाहते हैं कि अन्य लोग उनकी ओर ध्यान दें। वे भिखारी बन कर दान लेना नहीं चाहते। यह ठीक है कि प्रत्येक व्यक्ति आजीविका कमाना और अच्छा वेतन पाना चाहता है। परन्तु वह रुपये से भी बढ़कर कुछ और भी पाना चाहता है, वह अपने साथ इस रीति से व्यवहार किया जाना चाहता है, जिससे वह अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को बनाये रख सके। इस प्रतिष्ठा को प्राप्त करना उसका अधिकार है। इस बात को कहने का दूसरा तरीका है कि उनसे प्रेमपूर्वक व्यवहार किया जाय। एक ओर न्यायप्रिय और धर्माचरण पर विश्वास रखने वाले मजदूर का कर्तव्य है कि वह उन सब इकरारों को ईमानदारी के साथ पूरा करने का उद्योग करे, जो उसके और मालिक के बीच में न्याय-संगत रूप से , बिना किसी दबाव या गड़बड़ के किये गये हैं। मालिक को डराए धमकाये बिना उसे न्याय संगत तथा समुचित पारिश्रमिक स्वीकार कर लेना चाहिए। उसे बहुत अधिक बढ़ाकर पारिश्रमिक की माँग नहीं करनी चाहिये, जिससे कि आगे चलकर वह कारोबार ही संकट में पड़ जाये और स्वामी तथा सेवक सब विपत्ति में फँस जायें। उधर न्यायशील का भी कर्तव्य है कि मजदूरों के साथ सब तरह से स्वतन्त्र मनुष्यों का सा व्यवहार करे और स्वामित्व, लाभ तथा प्रबन्ध में साझेदार समझे। मालिक को चाहिये कि कभी मजदूरों से उनकी शक्ति से अधिक काम न ले और न उनको ऐसे काम में लगाये जो उनकी आयु और शारीरिक दशा के अनुकूल हो। प्रबन्धक या मालिकों के हाथ में चूँकि शक्ति रहती है, इसलिये उनका उत्तरदायित्व भी अधिक है। जिस किसी देश के प्रबन्धकर्त्ता या मालिक लोग श्रमिकों की सुरक्षा नहीं कर सके, वहाँ उन्होंने अपने ही विनाश के लिये खाई खोद ली है। श्रम तथा पूँजी में शाँति तथा सद्भाव बनाये रखने के लिये कुछ सुझाव यहाँ दिये जाते हैं-

(1) गवर्नमेंट, सार्वजनिक कल्याण के रक्षक के रूप में, इस विषय में कम से कम हस्तक्षेप करे।

(2) काम करने वालों को समुचित मजदूरी मिले। उनको उत्तम भोजन, वस्त्र और मकान मिल सकें।

(3) बच्चों से हानिकारक मजदूरी न कराई जाय।

(4) काम करने वालों के स्वास्थ की रक्षा की जाय।

(5) लोगों को न्याय का विश्वास दिलाया जाय। राज्य औद्योगिक टक्करों के कारणों को दूर करे और झगड़ों को नियन्त्रण करे।

(6) काम के घंटे घटा दिये जायें। प्रत्येक मजदूर को कम से कम इतनी मजदूरी दी जाय, जिससे उसका जीवन निर्वाह भली प्रकार हो सके।

(7) उद्योग से जो आमदनी हो उसका बँटवारा न्याय संगत तरीके से हो।

(8) पूँजीपति अपने को सम्पत्ति का मालिक नहीं, रक्षक समझे। वह कारखाने की आय में से अपना व्यय निकाल कर शेष मजदूरों को न्यायानुकूल तरीके से बाँट दे।


गायत्री-उपासना के अनुभव

जप के प्रभाव से परीक्षोत्तीर्ण

श्री मदनमोहन जी सारस्वत जोधपुर (राजस्थान) से लिखते हैं- मेरा पुत्र ओमनारायण इस वर्ष सरदार हाई स्कूल जोधपूर से मैट्रिक की परीक्षा में बैठा। वह सब विषयों में तो पास हो गया पर हिन्दी (अनिवार्य) के पर्चे में उसका नाम फेल होने वालो की सूची में रख दिया गया। वह पहले वर्ष में भी फेल हो चुका था और इस वर्ष पूर्ण परिश्रम करने पर भी ऐसा नतीजा देखकर बड़ा दुखी हुआ और दिन में सूखकर बीमार सा हो गया। उसकी माँ ने कहा कि सवा लक्ष के जप का अनुष्ठान कर लो तो पास हो जाओगे। उसने जप का संकल्प किया। फीस दाखिल करके कापी को दुबारा जाँचने की अर्जी भेज दी 15 दिन बाद ही (ता. 19 जुलाई) उसे द्वितीय श्रेणी में पास घोषित कर दिया गया। अब वह फर्स्ट ईयर में, जसवन्त कालेज जोधपुर में पढ़ रहा है। इससे वह गायत्री माता का दृढ़ उपासक बन गया है।

मृत्यु से बच्चे की रक्षा

पकड़ी (बसन्त) जि. बलिया की गायत्री-शाखा के मन्त्री श्री महातम त्रिपाठी लिखते हैं कि मेरे भाई के जितने बच्चे होते थे सब मर जाते थे। इससे मैंने इस बार गायत्री कवच लिखकर चाँदी के ताबीज में बच्ची के गले में बाँध दिया। अब वह तीन वर्ष की हो चुकी है। बीमार तो कई बार हुई पर गायत्री माता की कृपा से सदैव रक्षा हो जाती है।

भयंकर सर्प दंशन से रक्षा

पं. नत्थूलाल जी निगोही शाहजहाँनपुर से लिखते हैं कि ता. 9 सितम्बर को ग्राम अहमदपुर जि. पीलीभीत के प. सुखलाल जी को एक भयानक विषैले सर्प ने काट लिया। लोगों ने केवल गायत्री मंत्र पढ़कर बन्द लगा दिया और इसी से झाड़-फूँक भी की। सुखलाल पहले तो बेहोश हो गया, पर तीसरे दिन गायत्री के प्रभाव से ही बिलकुल स्वस्थ हो गया। जो कोई चाहे अहमदपुर के किसी भी व्यक्ति से इस घटना की सच्चाई की जाँच कर सकता है।

प्रेत बाधा दूर हुई

श्री रामाश्रय त्रिपाठी हड़हा (हरदोई) से सूचित करते हैं कि श्रीमती मुन्नीदेवी को प्रेत सताया करता था। उन्होंने गायत्री की महिमा सुनकर मन्त्र लेखन का कार्य आरम्भ किया। एक दिन उन्हीं के परिवार के एक प्रेत पूजक व्यक्ति पर प्रेत आया और स्वयं कहने लगा- “मैं इसे सताता था और अब इसके पास ऐसी अमोध शक्ति आ गयी है कि अब मैं इसके पास नहीं जा सकता।” इस आश्चर्यजनक घटना को देखकर अब वे मुन्नीदेवी की भक्ति और भी दृढ़ हो गयी है। अब वह 130 मन्त्र रोज लिखती हैं, शाम को एक माला का जप करती हैं और त्यौहारों पर हवन भी करती हैं।

सम्पत्ति की प्राप्ति

श्री सीताराम शर्मा अध्यापक देवरवा ‘दिगौड़ा’ से लिखते हैं कि हमारे यहाँ गायत्री - शाखा की स्थापना हुई थी और मैं भी उसका सदस्य बनकर नियमित पूजा-पाठ करने लगा। इससे गायत्री माता की मेरे ऊपर कृपा हुई और इसी गाँव के निवासी मेरे एक दूर के सम्बन्धी ने मुझको अपना मकान, जिसमें मैं एक रिश्तेदार की हैसियत से रह रहा था, दे दिया। माता की उपासना करने से निःसंदेह सबका कल्याण ही होता है।

कन्या की प्राण रक्षा हुई

श्री कन्चनलाल, मंत्री गायत्री शाखा, हथौड़ा बुजुर्ग (शाहजहाँपुर) लिखते हैं कि इसी क्वार सुदी 11 को मेरी भतीजी कुसुमकुमारी को काले साँप ने काट लिया। रात को 10 बजे उसकी दशा खराब देखकर मैं उसे शहर की तरफ ले चला, पर उतने समय किसी डॉक्टर के मिलने की सम्भावना न थी। मैंने माता को सहायतार्थ पुकारा। अचानक मुझे अपने फार्म के एक नये बाबू हरीसिंह जी सामने से आते मिल गये। वे मुझे सान्त्वना देकर अपने बंगले में ले गए और दवा दी जिससे एक घण्टा में कन्या होश में आ गई और अब स्वस्थ है।

घायल होने से बचा

श्री जगतराम पस्तोर टीकमगढ़ (म.प्र.) से लिखते हैं-मेरी पाठशाला के समीप एक ट्रक-ड्राइवर मिट्टी डालते थे, उनसे परिचय हो गया। एक दिन वे टीकमगढ़ वापस जा रहे थे कि मुझ से रास्ते में भेंट हो गई। ट्रक को ठहराकर वे कहने लगे कि “चलो, टीकमगढ़ चलते हो” मैं आन्तरिक इच्छा न होते हुए भी ट्रक में बैठ गया। ट्रक के पिछले भाग में 16 बेलदार थे और मेरी बगल में सामने की सीट पर ट्रक-मालिक के एक रिश्तेदार थे। ड्राइवर नशे में था और उसने कई बार ट्रक को गलत चलाने के बाद अन्त में एक बिजली के खम्भे से टकरा ही दिया। जिस समय ट्रक टकराया मैंने माता से रक्षा की प्रार्थना की और आश्चर्य है कि ट्रक में सवार 19 व्यक्तियों में से ही ऐसा था जिसके जरा भी चोट नहीं आई थी।

कुंए में गिर जाने पर भी जान बची

हाँसलपुर गाँव से भूतपूर्व जेल वार्डर श्री पन्चसिंह जी लिखते हैं- डोल ग्यारस के अवसर पर रात के समय ग्राम निवासी रुक्मणी हरण का नाटक कर रहे थे। वहाँ एक कुँए के चबूतरे पर बैठकर 7-8 वर्ष की एक कन्या खेल देख रही थी। वह अचानक कुँए में गिर गई। आठ दस मिनट के बाद जब उसे ऊपर निकाला गया तो वह बेहोश थी। यह देखकर मैंने कहा हे वेदमाता यह कन्या होश में आ जाय तो मैं तेरी 100 माला फेरुँगा। थोड़ी ही देर में उसे होश हो गया और सब लोग वेदमाता की जय-जयकार करने लगे।

भूत भाग गया

चाँपा (विलासपूर) से वैद्य पुनीरामजी लिखते हैं एक सज्जन, जो जाति के सुनार हैं, प्रेत बाधा के कारण बड़ा दुःख पा रहे थे। भूत सब चीजों को अस्त-व्यस्त कर देता था जिससे अनेक बार पति-पत्नी में लड़ाई भी हो जाती थी। उन्होंने किसी से गायत्री मन्त्र का चमत्कारिक गुण सुनकर स्वयं ही जैसे बना तैसे ही गायत्री उपासना आरम्भ कर दी और एक दिन-रात के सात बजे हजार आहुति का हवन करने भी बैठ गये। जिस समय रात के 12 बजे तो सफेद साड़ी पहिने एक काली सी स्त्री खिड़की के पास प्रकट हुई और बोली “मैं जाती हूँ, मुझे स्थान बतलाओ अब यहाँ मैं पल भर भी नहीं ठहर सकती।” पर वे हवन करते ही रहे और नतीजा यह हुआ कि घण्टे भर बाद वह प्रेत छाया अदृश्य हो गई। तब से उस घर में शाँति है।

समय पर सहायता प्राप्त हुई

खेमराजसिंह अध्यापक हिन्दी स्कूल टिटिलागढ़ (उड़ीसा) में लिखते हैं मैंने अपने पिता की अस्थि प्रवाह के लिए 250) रुपये इकट्ठा करके रखा था, पर मेरे एक परम मित्र लड़की की शादी होने से दो सौ रुपये माँग ले गये। मुझे। किसी भी तरह प्रयाग जाकर अस्थि प्रवाह करना था। इसके लिए मैं बड़ा चिन्तित था और गायत्री माता से प्रार्थना कर रहा था। अचानक स्वप्न में मुझसे माता ने कहा “तीन दिन बाद तुझे रुपये अवश्य मिल जाएंगे।” ऐसा ही हुआ। तीसरे दिन मेरी एक मित्र से भेंट हुई जो बहुत दिन बाद आये थे। मैंने उनसे अपनी दशा बतलाई, तो वे हँसकर कहने लगे कि इसमें चिंता की क्या बात है? उसी दिन उनसे मैं रुपया ले आया और अपना कर्तव्य पूरा किया। इसी प्रकार ता. 2 जुलाई 57 को मैं मोटर बस में बैठकर एक गाँव को जा रहा था। रास्ते में मन्त्र जपने लगा। कुसुमपुरी गाँव के पास मोटर का पहिया निकल गया और गाड़ी सड़क के किनारे से पाँच गज आगे निकल गई। मैं दरवाजे के पास ही बैठा था तो भी माता ने मेरी पूर्ण रूप में रक्षा की, अन्यथा आज मैं किसी और ही लोक में पहुँच गया होता।

वेदमाता की कृपा से कार्य सिद्धि

श्री शिवशक्तिलाल जी रतलाम से लिखते हैं मेरे एक मित्र पश्चिमी रेलवे में रिकार्ड कीपर के पद पर सन् 1942 में थे। किसी अज्ञात कारण से उनको देहात के एक छोटे स्टेशन पर भेज दिया गया। वहाँ जाकर उन्होंने सवा लाख गायत्री जप 15 दिन में किया। इसके फल से उसी समय उनको पुराने पद पर भेज दिया गया। तब से उन्होंने वेदमाता की महिमा को समझकर समस्त परिवार को उसी की शरण में अर्पण कर आराधना शुरू की परिणाम आजकल वे रेलवे में एक महत्वपूर्ण पद पर हैं और 400 रु. मासिक वेतन पाते हैं और परिवार की तरफ से भी सुखी हैं। (2) मैंने भी अभी हाल में विशेष अनुष्ठान आरम्भ किया था। मेरे सन् 1952 के कुछ रुपये शासन से मिलने बाकी थे और एक महत्वपूर्ण अपील भी दायर की थी, जिसकी कोई सुनवाई ही न हो रही थी। वेदमाता की कृपा से अनुष्ठान के 4 दिन बाद ही रुपयों के पेमेंट होने की सूचना मिल गई व अपील की सुनवाई भी आरम्भ हो गई। वास्तव में माता अपने भक्तों की पुकार शीघ्र सुनती है।

18 साल बाद पुत्र का जन्म हुआ

श्री धुन्दीसिंह शर्मा (बड़ेसरा, अलीगढ़) से लिखते हैं कि हमारे यहाँ के श्री हुन्डीलाल टेलर मास्टर अखण्ड ज्योति का गायत्री अंक पढ़ने से गायत्री उपासना में संलग्न हुये थे। 1955 चैत्र की नवरात्रियों में आप तपोभूमि मथुरा भी गये थे और वहाँ आचार्य जी से अपनी मनोकामना कह सुनाई। उन्होंने साधना में लगे रहने को कहा। माता की कृपा से इसी 14 अगस्त को इनके घर में 18 वर्ष के बाद पुत्र का जन्म हुआ, जिससे सबको बड़ा आश्चर्य और प्रसन्नता हुई।

कैंसर का भयंकर रोग मिट गया

श्री कन्छोदीलाल यादव (सागर) से लिखते हैं कि मेरी माता के गले में कैंसर हो गया था। तकलीफ के कारण वे छटपटाती थी। सिविल सर्जन और अन्य डॉक्टर रोग को असाध्य बतला चुके थे। लोगों ने दूसरे बड़े शहर में जाकर इलाज कराने की सलाह दी। पर मैंने कहीं न जाकर गायत्री माता की शरण ली और इसके लिए सवालक्ष का पुरश्चरण किया। माता की कृपा से वह भयंकर रोग शीघ्र ही अच्छा हो गया।


मुँह द्वारा साँस लेने की आदत स्वास्थ्य-नाशक है।

(योगी रामचारक जी)

मनुष्य जीवन में श्वास-प्रश्वास का बड़ा महत्व है। संक्षेप में कहा जाय तो श्वास-प्रश्वास ही जीवन है। कितने ही लोगों का मत है कि मनुष्य के श्वास गिने हुये होते हैं, अर्थात् प्रत्येक मनुष्य के जन्म होते ही यह निश्चय रहता है कि यह अपने जीवन भर में कितने करोड़ साँस लेगा। अगर वह अनुचित ढंग से रहकर साँस जल्दी-जल्दी लेगा तो उसकी आयु कम हो जायगी और यदि वह प्राणायाम आदि द्वारा प्रतिदिन ली जाने वाली सांसों की संख्या को घटा सकेगा तो उसकी उम्र बढ़ जायगी।

हम निश्चय रूप से इस तथ्य की सचाई के सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकते। पर इतना निश्चित है कि जीवन और साँस लेने में घनिष्ठ सम्बन्ध है, और अगर हम बेढंगेपन से साँस लेते हैं तो उससे हमारे स्वास्थ्य पर अवश्य बुरा प्रभाव पड़ेगा। श्वास लेने के अवयव शरीर में ऐसे ढंग से बने हैं कि वह नाक और मुँह दोनों द्वारों से साँस ले सकता है। पर एक द्वार से साँस लेने से तो स्वास्थ्य और बल का लाभ होता है और दूसरे द्वार से साँस लेने पर रोग और निर्बलता मिलती है। इसलिये इस बात को भली प्रकार समझ लेना अत्यावश्यक है कि हम वास्तव में किस तरीके से साँस लें।

मनुष्य के लिये साँस लेने का ठीक तरीका नाक द्वारा साँस लेना ही है। इस बात की शिक्षा देना अनावश्यक सा जान पड़ता है, परंतु खेद है कि हमारे अनेक भाई इस सीधी बात में भी मूर्खता प्रदर्शित करते हैं। सभी श्रेणियों के मनुष्यों में हमको ऐसे बहुसंख्यक व्यक्ति मिलते हैं जिनको मुँह से साँस लेने की आदत है, और जो अपने बच्चों को भी मुँह से साँस लेते देखकर उसमें कोई बुराई की बात नहीं समझते।

सभ्य मनुष्यों की बहुत सी बीमारियाँ इसी मुँह से साँस लेने की आदत के कारण उत्पन्न हो जाती है। जिन बच्चों को छोटी अवस्था से इस प्रकार साँस लेने की आदत पड़ जाती है वे क्षीण जीवन और निर्बल शारीरिक संगठन के बन जाते हैं। यौवनावस्था तक पहुँचते-पहुँचते उनका स्वास्थ्य गिर जाता है और उनका शरीर जीर्ण दिखाई पड़ने लगता है। इससे अच्छा नियम तो असभ्य जातियों में दिखलाई पड़ता है, जो स्वाभाविक प्रवृत्ति का अनुसरण करती हैं। इन जातियों में मातायें अपने बच्चों को शैशवावस्था से ही ऐसे ढंग से रखती है जिससे वे अपने होठों को बन्द रखे और नाक द्वारा ही साँस लें। जब बच्चा सो जाता है तो वे उसके सिर को आगे की ओर थोड़ा झुका देती है, जिससे बच्चे का मुँह बन्द हो जाता है और उसे नथुनों से ही साँस लेना आवश्यक हो जाता है।

मुँह से साँस लेने की बुरी आदत के कारण बहुत सी छोटी-बड़ी बीमारियाँ हो जाती हैं, इसी कारण से जुकाम और फेफड़े सम्बन्धी बीमारियाँ होती पाई गई हैं। बहुत से मनुष्य जो दिखावट के लिये दिन को मुँह बन्द किये रहते हैं रात को मुँह ही से साँस लेते हैं और इस तरह बहुधा कोई बीमारी पैदा कर लेते हैं। सावधानी के साथ की गई परीक्षाओं द्वारा जाना गया है कि जल सेना के जो सिपाही और जहाज चलाने वाले सोते समय मुँह से साँस लेते है, साम्पर्किक (एक से दूसरे को लगने वाली ) बीमारियों के अधिक शिकार बनते हैं, बनिस्बत उन लोगों के जो नाक से उचित रीति से साँस लेते हैं। एक उदाहरण में यह बतलाया गया था कि एक बार एक जंगी जहाज में, जो विदेश में था, शीतला की बीमारी संक्रामक रूप में फैली। इस बीमारी से जितनी मौतें हुई सब उन्हीं मनुष्यों की हुई जो मुँह से साँस लेने वाले थे, नाक से साँस लेने वाला एक भी मनुष्य न मरा।

नाक में ही प्रकृति ने छन्ना और ऐसे धूल निवारक यन्त्र बनाये हैं जो हवा में मिली गन्दगी को साफ कर देते हैं। इसके विपरीत मुँह से साँस लेने में हवा में मिली धूल और गन्दगी को रोकने का ऐसा कोई साधन नहीं रहता जो फेफड़े में शुद्ध वायु पहुँचाने में सहायक हो और हानिकारक वस्तुओं से श्वास यन्त्र की रक्षा कर सके। इतना ही नहीं इस प्रकार अनुचित तरीके से साँस लेने से बहुत सी सर्द हवा भी फेफड़े तक पहुँच जाती है और उनको हानि पहुँचाती है। श्वास लेने के अवयवों का सूज जाना प्रायः मुँह से ठंडी हवा की साँस लेने से ही होती है। जो मनुष्य रात में मुँह से साँस लेता है वह सबेरे उठते ही मुँह में जलन और गले में सूखेपन का अनुभव करता है। वह प्रकृति के नियमों में से एक प्रधान नियम का उल्लंघन कर रहा है और बीमारी का बीज बो रहा है।

प्रकृति ने नथुनों और नाक के भीतर की नलियों में बड़ी सावधानी के साथ ऐसा इन्तजाम किया है जिससे सर्द हवा, धूल-धक्कड़, कीटाणु आदि फेफड़े तक नहीं पहुँच सकते। नथने बहुत संकीर्ण हुआ करते हैं और घूम-घुमाव के साथ नालियों द्वारा बने हैं। उनके द्वार पर ऐसे खड़े-खड़े बहुत से बाल होते हैं जो हवा के कूड़े-कर्कट को साफ करने के लिए छन्ने और चलनी का काम देते हैं। जब श्वास की हवा बाहर निकलती है तब इस कूड़े-कर्कट को फिर बारह निकाल देती है। नथने केवल इसी काम को नहीं करते, किन्तु वे श्वास में ली गई हवा को गरम कर देने का भी काम करते हैं। लम्बी, तंग और टेढ़ी-मेढ़ी नालियाँ गरम और लसलसी झिल्ली से मढ़ी होती हैं और जब हवा इनमें आती है तो गरम हो जाती है, जिससे वह गले और फेफड़ों के नाजुक अवयवों को हानि न पहुँचावे।

मनुष्य को छोड़कर और कोई जानवर मुँह खोलकर नहीं सोता और न मुँह से साँस लेता है। असल में केवल सभ्य मनुष्यों ने ही प्रकृति के नियमों की अवहेलना की है। असभ्य जातियों के मनुष्य अब भी सदा इसी तरीके से साँस लिया करते हैं। सम्भव है सभ्य कहलाने वाले मनुष्यों ने यह अस्वाभाविक आदत अपने अस्वाभाविक रहन-सहन, निर्बल करने वाले विलास और अधिक उष्णता के कारण प्राप्त की हो।

नथुनों के साफ करने और छानने वाले यन्त्र के कारण हवा गले और फेफड़े के नाजुक अवयवों में जाने योग्य हो जाती है, क्योंकि जब तक वह प्रकृति के साफ करने के यन्त्र द्वारा शुद्ध नहीं की जाती, तब तक वह इन अवयवों में पहुँचने योग्य नहीं समझी जाती। यदि हवा में गन्दगी ज्यादा हो और नाक के छन्ने और चलनी से बचकर कुछ भीतर चली जाय तो प्रकृति छींक पैदा कर देती है, जिसके धक्के से वह खराब पदार्थ बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रकार की शुद्ध हवा और बाहर की हवा में उतना ही अन्तर होता है, जितना भभके द्वारा शुद्ध किये हुए जल तथा किसी हौज में भरे पानी में होता है। जिस प्रकार मुँह स्वयं ही फलों के बीजों या भोजन में मिले कंकड़ आदि को पकड़कर आमाशय में ले जाने से रोक देता है, उसी प्रकार नाक में ऐसी कारीगरी रखी गई है जो हवा में मिले कूड़े कर्कट को रोक सकती है।

मुँह से श्वाँस लेने में एक और दोष यह भी है कि नथुनों की नालियाँ कम व्यवहार में आने के कारण साफ और निष्कंटक नहीं रह सकती। वे मैली होकर बन्द पड़ जाती हैं और उनमें बीमारियों का सूत्रपात हो जाता है। जैसे आवागमन न होने से मार्ग में घास और झाड़ झंखाड़ उग जाते हैं, वैसे ही व्यवहार में न लाये जाने से नथने भी कूड़े करकट से भर जाते हैं।

जिन लोगों को दुर्भाग्यवश मुँह से कम या ज्यादा साँस लेने की आदत पड़ गई है और जो स्वाभाविक और सही तरीके से साँस लेने की इच्छा रखते हैं, सबसे पहले उन्हें नाक के मार्ग को साफ करना चाहिए। इसके लिए एक गिलास या प्याले में एक पाव से दो पाव तक जल भरकर नाक से खींच कर मुँह से निकालने का अभ्यास करना चाहिये। यह विधि ज्यादा कठिन नहीं है और दो चार दिन सुबह मुँह धोते समय प्रयत्न करने से इसका अभ्यास किया जा सकता है। संभव है आरम्भ में नाक से खींचा हुआ पानी मुँह से निकलने के बजाय पेट के अन्दर चला जाय। अगर नाक पहले खूब साफ कर ली जाय तो इसमें कोई खास नुकसान भी नहीं है और बहुत से लोग सुबह नाक द्वारा उषापान किया भी करते हैं। बाद में गले की माँस-पेशियों पर जोर डालकर जल को बाहर निकाला जा सकता है। दूसरी तरकीब यह भी है कि सुबह खिड़की खोलकर उसके सामने बैठकर खूब स्वच्छता से साँस ली जाय। पहले एक नथने को दबाकर दूसरे से हवा भीतर खींचें। इस प्रकार नथुनों को बदलते हुये देर तक गहरी साँस लेते रहें। इससे नाक के भीतरी का मार्ग साफ हो जायगा।


गायत्री भक्तों के सत्प्रयत्न

मझोला (नैनीताल) के गायत्री परिवार ने अपने क्षेत्र में 24 शाखाएं स्थापित करने व 108 यज्ञ कराने का निश्चय किया है। इनमें 10 शाखाएं बन चुकी हैं और 30 यज्ञ भी हो गए हैं। गायत्री उपासकों की श्रद्धा और प्रयत्न प्रशंसनीय हैं।

-लक्ष्मणसिंह मनराल

बोरीबली (बम्बई) में गायत्री शाखा की स्थापना की गई है जिसके सदस्यों ने 1 लाख 70 हजार जप दो हजार आहुतियों का हवन किया।

-सीताराम राठी

जमशेदपुर (बिहार) में गायत्री परिवार शाखा ने 40 हजार जप व तीन हजार आहुतियों के हवन का कार्यक्रम पूर्ण किया।

-पं. हरीराम

पिटौल (अलीगढ़) में चन्द्र ग्रहण के अवसर पर अखण्ड रामायण पाठ व गायत्री जप का प्रोग्राम रखा गया। 2400 आहुतियों का हवन करने के पश्चात् रामायणजी का जुलूस निकाला गया।

-गेंदालाल वर्मा

पुसावली (बदायूँ) की गायत्री शाखा की तरफ से गायत्री प्रचार का कार्य संगठित रूप से किया जा रहा है। सर्व श्री हरगोविन्दसिंह जी, मोहनलालजी, भीष्मदत्तजी, पन्नालालजी तथा राधेश्याम की एक समिति बनाकर आस-पास के क्षेत्र में नई शाखाएं स्थापित करने का कार्य जोरों से किया जा रहा है। ता. 24 नवम्बर को श्री चिमनलालजी सूरी बरेली से पधारे थे उनके स्वागतार्थ एक बड़ा हवन किया गया।

-गायत्रीप्रसाद गुप्ता

झाँसी में 6 लाख 48 हजार जप, 1200 चालीसा पाठ, 1200 मन्त्र लेखन व 7 हजार आहुतियों के हवन का कार्यक्रम समारोह सहित पूर्ण हुआ।

-बालकृष्ण अग्रवाल

हथौड़ा बुजुर्ग (शाहजहाँपुर) में गायत्री शाखा की तरफ से जप व हवन का कार्यक्रम पूर्णमासी के अवसर पर किया गया।

-कंचनलाल

दिगौड़ा (टीकमगढ़) में ता. 20 नवम्बर को गायत्री पुस्तकालय का प्रथम वार्षिकोत्सव बड़े समारोह से मनाया गया। श्री नन्दरामजी आयुर्वेद शास्त्री का प्रवचन बड़ा प्रभावशाली रहा।

-बैजनाथप्रसाद सोनकिया

माकडौन (उज्जैन) में श्री सत्यनारायण जी मोदी के स्थान पर अखण्ड ज्योति जलाई गई और 7 लाख 68 हजार जप व 4320 आहुतियों का कार्यक्रम पूर्ण किया गया। महिला समाज में श्री सीताबाई के स्थान पर भी 4 लाख 32 हजार जप व 3240 आहुतियों का हवन किया गया।

-गोरधनलाल सोनी

जोबट (झबुआ) में जगन्नाथ जी सोनी के पर सवा लक्ष जप व ग्यारह हजार आहुतियों का यज्ञ सानन्द सम्पन्न हुआ।

-बापुलाल

भोपाल (म. प्र.) की गायत्री शाखा में श्री राजकुमार मंडलोई ने 1008 आहुतियों का हवन कराया जिसमें नगर के प्रतिष्ठित धर्म-प्रेमी स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया। श्री रामकृष्ण जी का गायत्री महिमा पर सारगर्भित भाषण हुआ।

-पं. शिवकुमार भारद्वाज

कनवास (कोटा) में 5 हवन कुण्डों की रमणीक यज्ञशाला में एक विशाल गायत्री यज्ञ ता. 24-25 नवम्बर को सम्पन्न हुआ जिसमें मथुरा से परम पूज्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, स्वामी प्रेमानन्द व श्री नत्था सिंह जी ‘आजाद’ पधारे थे। इनके अतिरिक्त अन्य विद्वानों के भी प्रभावशाली भाषण हुए जिनका जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा और अनेक व्यक्ति गायत्री के सदस्य बने

- कन्हैयालाल शर्मा

आवर (झालावाड़) में भँवरलालजी के यहाँ अगहन बदी अमावस्या को 12 हजार जप व 1200 सौ आहुतियों के हवन का कार्य क्रम सानन्द समाप्त हुआ। दूसरा हवन अगहन मुद्दा 3 को श्री राम-प्रतापजी श्रृंगी के यहाँ हुआ। तीसरा श्री सीता-रामजी भावसार के यहाँ हुआ। साप्ताहिक हवन व दैनिक जप नियमपूर्वक चल रहा है।

-ब्रजमोहन ‘निम्बार्क’

पत्र प्रेषकों से निवेदन

अखण्ड-ज्योति में छपने के लिए समाचार भेजने वाले बन्धुओं से प्रार्थना है कि प्रत्येक पत्र में अपना नाम व पता और व्यक्तियों के नाम बहुत स्पष्ट अक्षरों में लिखकर भेजें। इसमें लापरवाही करने के कारण अनेक लोगों और स्थानों के नाम गलत छप जाते हैं और बहुत से सज्जनों का नाम छोड़ भी देना पड़ता है। पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सम्पादक हर समय परिचित सज्जनों के ठीक-ठीक नाम भी स्मरण नहीं रख सकता। इसलिए केवल हस्ताक्षर के भरोसे न रहकर पूरा नाम अवश्य लिखना चाहिए। दूसरी प्रार्थना यह भी है कि जिस आयोजन का समाचार प्रकाशित कराना हो वह यथा-सम्भव उसी समय भेज देना चाहिए। जो समाचार अधिक देर से प्राप्त होते हैं वे प्रायः बेकार हो जाते हैं और उचित रूप से प्रकाशित नहीं किए जा सकते।


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-सम्पादक ‘अखण्ड-ज्योति’

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पुष्कर (अजमेर) में कार्तिक कृष्णा 11 से अगहन कृष्णा 2 तक ढाई लाख आहुतियों का हवन गायत्री-मन्त्र से किया गया। इस कार्य का संचालन सेठ वंशीलाल रामनारायण राठी (भीनासर, बीकानेर) ने किया।

-नारायणशन्कर मास्टर

गंगीरी (अलीगढ़) की गायत्री-शाखा के सदस्य श्री होतीलाल ‘चैतन्य’ और श्री श्यामलाल ‘दीन’ ने 24-24 हजार के अनुष्ठान व हवन विधिपूर्वक किये।

-रामजीबल्लभ पाराशर

गुदरावन (शाजापुर म.प्र.) की गायत्री-शाखा की ओर से लसुड़िया गाँव में ठा. सज्जनसिंह जी व पं. पुरालालजी की मदद से एक सप्ताह तक 50 हजार आहुतियों का यज्ञ बड़े समारोह से किया गया। चार व्यक्तियों को यज्ञोपवीत दिया गया। ता. 15 नवम्बर को भी गायत्री-यज्ञ हुआ।

- दामोदरदास

खूड़ (सीकर) में श्री शम्भूसिंह जी हाड़ा की अध्यक्षता में यज्ञ हुआ जिसमें अनगिनती आहुतियाँ दी गई। रात्रि में हाड़ाजी का प्रभावशाली प्रवचन हुआ। यज्ञ में श्री मुरलीधर वैद्य व श्री परमसुख मिश्रा ने विशेष सहयोग दिया।

- श्यामसुन्दर रामनिवास शर्मा

पलायथा (कोटा) की गायत्री-शाखा के सदस्यों ने बड़गाँव में जाकर श्री वंशीलाल स. अध्यापक के यहाँ सामूहिक हवन किया। आगामी बसन्त पन्चमी को 24 हजार आहुतियों के हवन का आयोजन किया जा रहा है।

-मन्त्री, गायत्री-शाखा

सीमेंट फैक्टरी (सवाई माधोपुर) में ता. 3 नवम्बर को श्री हंसराज जुनेजा के यहाँ 1080 आहुतियों का हवन हुआ। ता. 7 नवम्बर को श्री भेंरुलाल जी के यहाँ अति उत्तम रीति से 3 हजार आहुतियों का हवन व भजन-कीर्तन किया गया।

-रामनारायण वर्मा

छोटी कसराबद (निमाड़) में पौष बदी 2 को सार्वजनिक शिवालय में सामूहिक गायत्री-हवन व अखण्ड रामायण पाठ किया गया। बड़ी कसराबद से श्री सन्तोष चन्द्रव्यास व पं. रामेश्वरजी उपाध्याय ने इसमें सम्मिलित होकर पूजा आदि कराया। श्री शिवलालजी सेठ ने गायत्री चालीसा वितरण किया।

- किशोरसिंह प्यारसिंह दसोंदी

मनसूरपुर(मुजफ्फरनगर) गायत्री-परिवार के द्वारा घासीपुरा में श्री नत्थू के यहाँ ता. 25 नवम्बर को हवन किया गया। इस शाखा के 5 सदस्य ता. 9 दिसम्बर से सवा लक्ष का अनुष्ठान कर रहे हैं जिसकी पूर्णाहुति बड़े समारोह से ता. 9 जनवरी 59 को होगी।

- बनारसीदत्त शर्मा

डबरा मण्डी (म. प्र.) में गायत्री-शाखा द्वारा आयोजित एक सभा में पूज्य ब्रह्मचारी केशवदेव जी का रामायण पर प्रभावशाली प्रवचन हुआ जिसका उपस्थित विशाल जन समूह पर बड़ा प्रभाव पड़ा।

- द्वारिकादास बड़ेरिया

सीसवाली (कोटा) में पं. दीनदयाल जी, पं पूरणमलजी, बा. रघुनाथप्रसाजी, श्री जमुनालाल जी चतुर्वेदी के स्थानों पर साप्ताहिक सत्संग और हवन हुए। शीघ्र ही एक विशाल यज्ञ करने का विचार किया जा रहा है।

- रामचन्द्र गुप्त

- रामचन्द्र गुप्त

डबरा मण्डी में एक विशाल गायत्री महायज्ञ ता. 10-11-12 जनवरी 1859 को होगा। समस्त गायत्री प्रेमियों को उसमें पधारने का सादर निमन्त्रण है।


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- मन्त्री गायत्री-परिवार

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विटकुली (द्रुग, म. प्र.) में श्री रामरिझावन जी तिवारी के यहाँ अगहन शुक्ल पूर्णिमा को सामूहिक हवन और ब्रह्मभोज का आयोजन सफलता पूर्वक हुआ।

- उम्मेदलाल शर्मा

खेसहन (फतेहपुर) में अगहन 15 को शंकरजी के मन्दिर में 1900 आहुतियों का हवन किया गया। रामायण का अखण्ड पाठ व कीर्तन भी किया गया। श्री दुर्गाप्रसादजी ने इसमें विशेष कार्य किया।

-रामऔतार गुप्त

रटलई (झालावाड़) में श्री चतुर्भुज कानूनगो के यहाँ 3 हजार आहुतियों और श्री रामप्रसाद शर्मा के यहाँ 1600 गायत्री मन्त्रों का हवन हुआ। बकानी से भी गायत्री-उपासक गये थे।

- भँवरलाल शर्मा

मंगलाज (राजस्थान) में अगहन बदी 5 को बड़े उत्साह से सामूहिक हवन किया गया जिसमें गायत्री मन्त्र व राम मन्त्र से आहुतियाँ दी गईं।

- नन्दकिशोर व्यास

अजीतगढ़ (राजस्थान) में सवा लाख आहुतियों का विशाल यज्ञ बड़े समारोह से हुआ। जिसमें गायत्री परिवार के कुलपति पं. श्रीराम शर्मा, स्वामी प्रेमानन्द, श्रीशम्भूसिंह हाड़ा आदि के प्रभावशाली प्रवचन हुये। आचार्य जी का जुलूस बड़ी धूम-धाम से निकाला गया। यज्ञशाला की सजावट तथा व्यवस्था दर्शनीय थी।

-वैद्य जगदीश नारायण मिश्र

खूँटी (राँची) में चन्द्रग्रहण के अवसर पर सामूहिक हवन किया गया। रात्रि के समय ‘गायत्री ज्ञान मंदिर’ से लाउडस्पीकर द्वारा रामायण पाठ कीर्तन हुआ जिसे दूर-दूर के लोगों ने भी सुना।

-देवेन्द्रनाथ साहु

बड़गाँव (गोंडा) में 24 हजार आहुतियों का हवन किया गया, जिसमें बाहर से अन्य महात्मागण भी पधारे थे। ब्राह्मणों और कन्याओं को भोजन कराया गया व प्रसाद वितरण किया गया।

- चन्द्रदीपप्रसाद श्रीवास्तव

पछायेगाँव (इटावा) में 3500 आहुतियों सामूहिक हवन हुआ जिसमें पुरुष तथा महिला सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

- रन्गलाल मिश्रा

कसराबद (निमाड़) से 3 मील पर बड़गाँव में एक साधु बाबा की गुफा पर गायत्री हवन किया गया। श्रीशंकररावजी मंडलोई द्वारा सबको भोजन कराया गया व श्री शिवलालजी सराफ द्वारा गायत्री साहित्य मुक्तहस्त से वितरण किया गया। इस कार्य में श्री ठाकुरभाई पाटीदार व श्री पंढरीनाथजी चौबे एवं सभी नागरिकों का पूर्ण सहयोग रहा।

-संतोषचन्द्र व्यास

पछाये गाँव (इटावा) में पुरुषों ने 1620 आहुतियों का और महिलाओं ने 1632 आहुतियों के दो हवन किए।

-रंगलाल मिश्रा

देवरान (मन्दसौर) के गायत्री परिवार द्वारा गीता जयन्ती का उत्सव बड़े समारोह से मनाया गया। संकीर्तन और प्रसाद वितरण भी हुआ। ग्राम की प्रायः 300 जनता ने भाग लिया जिसके सम्मुख श्री पुरिलाल कुलमी का गीता और ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान पर प्रभावशाली प्रवचन हुआ।

-मन्त्री, गायत्री-परिवार

मझोला (नैनीताल) में 5 कुण्डों में 24 हजार आहुतियों का महायज्ञ समाप्त हो गया। चमनलालजी सूरी व रामभिलाषजी त्रिपाठी ने यज्ञ को सफल बनाने में बड़ा सहयोग दिया। पूर्णाहुति के पश्चात् 500 व्यक्तियों का भोज हुआ। इस क्षेत्र में इस आयोजन के द्वारा गायत्री प्रचार का शिलान्यास हुआ है।

-लक्ष्मणसिंह मनराल

इन्दौर में गायत्री परिवार की शाखा स्थापित करके ता. 8 से 12 नवम्बर तक गायत्री महायज्ञ कराया गया। भागवत पुराण की कथा भी कराई गई। ता. 13 को ब्रह्मभोज कराया गया और 14 को एक विशाल जुलूस भी निकाला गया।

-कोमलप्रसाद शर्मा

शाहजहाँपुर (उ. प्र.) में ता. 16 दिसम्बर को श्री हरिश्चन्द जी के स्थान पर एक सामूहिक यज्ञ किया गया। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति की चर्चा की गई और लोगों को अधिक को अधिक जप, पाठ व आर्थिक सहायता करने को उत्साहित किया गया।

-रंगेलाल शुक्ल

सागर (म. प्र. ) में श्री नन्हेमलजी के यहाँ सवा लक्ष जप की पूर्णाहुति 12.50 हजार आहुतियों द्वारा की गई।

-अयोध्याप्रसाद

कानपुर में श्री आर. एस. त्रिपाठी व श्री विश्वनाथजी अवस्थी के यहाँ दो सामूहिक हवन किये गए। गायत्री तथा यज्ञ पर सारगर्भित प्रवचन हुए। तीसरा हवन स्टेट बैंक के खजाँची श्री एल. सी. बग्गा के यहाँ 8 दिसम्बर को आर्य नगर में हुआ। हवन के पश्चात ब्रह्म भोज भी किया गया।

-अयोध्याप्रसाद दीक्षित

कानपुर की गायत्री परिवार शाखा नं. 3 की ओर से गोविन्दनगर (बी ब्लाक) के पार्क में एक सामूहिक कीर्तन किया गया और गायत्री चालीसा वितरण किया गया।

-कौशलकिशोर

पिपरी (सतना) में 5009 आहुतियों का हवन व चालीसा के 5 हजार पाठ किये गए। रामायण का पाठ भी किया गया।

-सतीशकुमार शर्मा

सिकन्दराराऊ (अलीगढ़) में सामूहिक यज्ञ हुआ जिसका जनता पर अच्छा प्रभाव पड़ा और नए सदस्य बने।

-राधेश्याम आजाद

करड़ाबद (झबआ) में 11 हजार आहुतियों का हवन किया गया व माता की सवारी निकाली गई जिसमें भजन व कीर्तन की अच्छी व्यवस्था थी।

-रामलाल त्रिवेदी

पलायथा (कोटा) में ता. 25-26-27 जनवरी 1958 को महायज्ञ का आयोजन किया गया है। ता. 26 को मथुरा में होने वाली ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति के सम्बन्ध में विचार करने के लिए हाडौती प्रदेश की गायत्री शाखाओं का एक विशेष सम्मेलन किया जायगा।

-आत्रेय बंधु

गीधा साँड (उड़ीसा) में बूढ़ा पहाड़ के ऊपर 24 हजार आहुतियों का विशाल सामूहिक हवन किया गया। 1200 चालीसा पाठ भी किये गए।

-विश्वनाथ मिश्रा

नैनपुर (मण्डला, म. प्र. ) में गायत्री मण्डल की स्थापना की गई है जिसकी ओर से गायत्री संबंधी पुस्तिकाएं जनता में बाँटकर प्रचार किया जा रहा है।

-गे. धो. गोखले

देवरान (मन्दसौर) की गायत्री परिवार शाखा के 10 उपासकों ने पं. कंचनलालजी व्यास के संरक्षण में 24-24 हजार के अनुष्ठान व चालीसा के 240 पाठ किए। कन्या भोजन भी हुआ।

-कुँवर नर्मदासिंह

बिजौली (फतेहपुर) में चन्द्रग्रहण के अवसर पर श्री घसीटेलालजी वर्मा के स्थान पर वृहत गायत्री यज्ञ किया गया जो पं. लक्ष्मीनारायणजी द्विवेदी ने पूर्ण विधि से कराया।

-रामसनेही वर्मा

बोरलाय (नेमाड़) में ता. 8 और 9 दिसम्बर को श्री बलवंतराव पटवारी द्वारा सवालक्ष जप व 24 हजार आहुतियों का यज्ञ बड़े उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। इसका प्रचार करने के लिए श्री मणि शंकरजी चतुर्वेदी, प्रधानाध्यापक ने स्थानीय क्षेत्र के प्रत्येक गाँव में भगवती का अलख जगाया और साधकों को व्यक्तिगत निमन्त्रण दिया। उन्होंने आसुरी वृत्तियों और विघ्नों का सामना करते हुए भी यज्ञ को सफल बनाकर दिखाया।

-श्रीहरि पण्ड्या

मुरादपुर माती (शाहजहाँपुर) में 2284 आहुतियों का सामूहिक यज्ञ विश्व कल्याणार्थ किया गया।

-रामसहाय शर्मा

सराय ताल (इटावा) में ता. 29 नवम्बर को देवी जी के चबूतरा पर 2592 आहुतियों का सामूहिक हवन किया गया। 108 बालक-बालिकाओं को भोजन कराया गया। समस्त जनता ने उत्सव में भाग लिया।

-रामानुज शुक्ल


वह कार्य जिसे किये बिना काम न चलेगा?हर परिजन के सामने एक चुनौती के रूप में सामने आ गया।

(श्रीराम शर्मा आचार्य )

अखण्ड ज्योति के गत अंक में आगामी कार्तिक सुदी 12 से 15 तक होने वाली पूर्णाहुति का वृत्तान्त छप चुका है। 1000 कुण्डों की 101 यज्ञशालाओं में 1 लाख होताओं द्वारा 240 लाख आहुतियाँ होने तथा सभी आगन्तुकों एवं दर्शकों के लिए निःशुल्क भोजन एवं ठहरने की व्यवस्था होने का यह संकल्प इस युग का अभूतपूर्व धर्मानुष्ठान है। इस आयोजन के छोटे-छोटे कार्य भी इतने बड़े हैं कि उनकी पूर्ति एवं व्यवस्था की बात सोचने मात्र से सिर चकराने लगता है। इतने दुर्बल कन्धों पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने की बात सोचने से सचमुच ऐसा लगता है कि इसका सम्पन्न एवं सफल होना असंभव जैसा है, पर जो लोग मानवीय शक्ति की तुच्छता एवं अदृश्य शक्तियों की महत्ता को जानते है, उनके लिए इसमें अचंभे की कुछ बात नहीं है। मनुष्य के लिए सचमुच यह सब कठिन है, पर राई को पर्वत और सुमेरु को तृण बना देने वाली शक्ति के लिए यह सब कुछ भी कठिन नहीं है। उसी सर्व शक्तिमान शक्ति की प्रेरणा एवं पथ-प्रदर्शन में यह संकल्प किया गया है। तपोभूमि में ऐसे ही दुस्साध्य संकल्प समय-समय पर होते रहे हैं। उनके पीछे व्यक्ति विशेष का नहीं, किसी अदृश्य प्रेरक सत्ता का मार्ग-दर्शन रहा है और उसी की शक्ति से वे पूर्ण होते रहे हैं। यह इतना विशाल आयोजन जिसमें अत्यधिक जन-बल, बुद्धि-बल, व्यवस्था-बल, साधन-बल, एवं धन-बल की जरूरत पड़ेगी सामान्य मनुष्य नहीं जुटा सकता। प्रेरक सत्ता सब कुछ करेगी, सफलता सुनिश्चित है। इसके पूर्ण होने में किसी को सन्देह नहीं करना चाहिए।

विश्व-कल्याण की दृष्टि से इस महायज्ञ का लाभ अत्यधिक है। व्यापक असुरता की कुप्रवृत्तियों का समाधान करके उनके स्थान पर दैवी सत्प्रवृत्तियों की स्थापना के लिए यह एक महाअभियान है। विश्व मानव के शरीर में आसुरी अस्वस्था भर गई है, उस विष के फोड़े विभिन्न रंग-रूप के निकल पड़े हैं, अशान्ति और दुःख क्लेशों की अनेक गुत्थियाँ उत्पन्न हो गई हैं। इनके उपचार के लिए भौतिक प्रयत्न ऐसे ही हैं, जैसे फोड़े पर मरहम चुपड़ना। यह आध्यात्मिक उपचार जो गायत्री-परिवार ने आरम्भ किया है ऐसा ही है, जैसा रोगी के रक्त को शुद्ध करने के लिए औषधि-सेवन एवं आपरेशन। इस यज्ञानुष्ठान एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के विशाल कार्यक्रम को विश्व-शान्ति के लिए-विश्व मानव की अधिक आरोग्यता के लिए-औषधि सेवन, आपरेशन एवं कल्प चिकित्सा जैसा आध्यात्मिक उपचार कहा जा सकता है। यह लोक-कल्याण की, मानव जाति की सेवा का उत्कृष्ट माध्यम है। इसकी सफलता में योग देना विश्व मानव की-भगवान की-पूजा का एक विवेकपूर्ण आयोजन है।

जो लोग इसमें सहयोग देंगे वे आध्यात्मिक दृष्टि से, परमार्थिक दृष्टि से एक बहुत बड़ा कार्य करेंगे। इतने विशाल धर्मानुष्ठान से जो शक्ति उत्पन्न होती है, उसे प्राप्त करके अपना आत्म-बल बढ़ावेंगे, अन्तःकरण शुद्ध करेंगे, आत्मोन्नति का द्वार खोलेंगे, साथ ही भौतिक दृष्टि से भी कुछ घाटे में न रहेंगे। पूर्णाहुति के समय उत्पन्न होने वाले प्रचंड शक्तिशाली वातावरण में उन्हें अपने कल्याण का बहुत कुछ तत्व मिलेगा। इस यज्ञ में सम्मिलित होने वाले व्यक्ति वह लाभ प्राप्त कर सकेंगे, जो साधारणतः वर्षों तक कठिन साधना करने पर भी उपलब्ध करना कठिन है। शारीरिक विकारों से त्रस्त, मानसिक अपूर्णता एवं उद्वेगों से ग्रस्त, सुसन्तति के लिए तरसने वाले, चिन्ता और भय से परेशान, आपत्तिग्रस्त व्यक्ति इस अवसर का भरपूर लाभ उठा सकते हैं। अन्तःकरण पर चढ़े हुए कुसंस्कारों को जलाने के लिए यह अवसर सोने को तपाकर शुद्ध करने जैसा ही है। भीतर के तमोगुण को हटाकर आत्मा में दिव्य सतोगुण की स्थापना ऐसे अवसरों पर ही होती है। विश्व-शान्ति, साँस्कृतिक पुनरुत्थान एवं देवत्व की अभिवृद्धि के सार्वभौम लाभ तो होंगे ही, साथ ही इस यज्ञ में सम्मिलित रहने वाले व्यक्तिगत सत्परिणामों को भी आशाजनक मात्रा में प्राप्त कर सकेंगे।

एक बहुत बड़ा लाभ गायत्री-परिवार के संगठन का होगा। वह यह कि-इस संगठन के सदस्यों की संख्या बहुत बढ़ गई है, उसमें खरे की अपेक्षा खोटे सिक्के बहुत भर गये हैं। अब समय आ गया है कि उनकी छाँट, सफाई और परीक्षा कर ली जाय। दूध पीने के लिए लैला के द्वार पर अड़े रहने वाले मजनू कौन हैं? और लैला को खून की जरूरत पड़े तो अपनी नस काट कर कटोरा भर देने वाले कौन हैं। इसकी परीक्षा अगले दस महीनों में हो जायगी? यह अवसर गायत्री-उपासकों के लिए निश्चित रूप से एक चुनौती एवं परीक्षा जैसा है। व्यक्तिगत जीवन में अनेकों कठिनाइयाँ मनुष्यों को रहती हैं। समय की कमी, फुरसत न होना, आर्थिक कठिनाई, अस्वस्थता, घर में अकेला होना, आदि अनेकों कारण गिनाये जा सकते हैं। सभी वास्तविक हैं पर यह भी इतना ही वास्तविक है कि अनेक बाधाओं के रहते हुए भी मनुष्य चाहे तो अनेक कठिनाईयों एवं व्यस्तताओं के बीच भी बहुत कुछ कर सकता है। अनेकों कर रहे हैं। प्रश्न केवल श्रद्धा-अश्रद्धा, रुचि-अरुचि, आलस्य-उत्साह का है। अब इस प्रश्न का उत्तर हम में से हरएक को देकर अपनी स्थिति किस प्रकार की है- यह स्पष्ट करना होगा।

रिवाज है कि जो स्वजन सम्बन्धी विवाह-शादी, मौत, मुसीबत में भी सम्मिलित होने नहीं पाते या सहयोग नहीं करते, उनके बारे में सोच लिया जाता है कि इनसे हमारा रिश्ता टूट गया। लोग बहुत दिन तक इसका बुरा भी मानते हैं कि अमुक सम्बन्धी हमारी लड़की के विवाह में सम्मिलित होने नहीं आया था। इसके विपरीत जो लोग जरूरत के वक्त जितना अधिक सहयोग करते हैं या उत्साह दिखाते हैं, वे उतने ही घनिष्ठ एवं आत्मीय माने जाते हैं। वक्त पर अपने पराये की परीक्षा होती है। आड़े वक्त पर काम आने या न आने की बात से सच्चे झूठे मित्रों की परख सहज ही हो जाती है। गायत्री परिवार के सदस्यों की संख्या बढ़े यह ठीक है, पर साथ ही यह भी आवश्यक है कि इनमें से खरे-खोटों की परख भी होती रहे। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति इस दृष्टि से एक उचित समय है।

गायत्री परिवार के खरे परिजनों के लिए यह आवश्यक है कि वे अगले दस महीनों में पूरी तत्परता एवं जिम्मेदारी के साथ कार्य-संलग्न हों। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति को सफल बनाने के लिए वही लगन रखे, जैसी कोई व्यक्ति अपने घर में विवाह-शादी होने के समय या किसी चुनाव में खड़े होने पर वोट माँगने के लिए प्रयत्न करता है। बात बिगड़ने का अवसर आता है, तो लोग अपना सब कुछ बाजी पर लगा देते हैं। इतना बड़ा आयोजन करने की घोषणा कर देने पर यदि वह असफल रहे तो यह आचार्य जी की, तपोभूमि की, ही बात नहीं बिगड़ेगी वरन् सारे गायत्री परिवार की बात बिगड़ेगी। इतनी बड़ी लोक हँसाई कराके अपनी संस्था किस मुँह से जीवित रहेगी?

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति के लिए 1 लाख होताओं की आवश्यकता है। यह कार्य सबसे बड़ा एवं सबसे कठिन है। होता और यजमान भी परीक्षित रखे गये हैं। जो सवालक्ष अनुष्ठान एवं 52 उपवास करें, ऐसे श्रद्धालु साधक? एक लाख ढूँढ़ निकालना या तैयार करना सचमुच ही बहुत कठिन है। ऐसे व्यक्ति तलाश करने के लिए पहले अधिक संख्या में साधारण गायत्री उपासक गायत्री सदस्य बनाने पड़ेंगे तथा गायत्री माता एवं यज्ञ पिता का महत्व विस्तार पूर्वक अधिकाधिक जनता को समझाना पड़ेगा। इसके लिए धर्म फेरी लगाये बिना काम नहीं चल सकता। चूँकि ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत 24 लाख व्यक्तियों के ब्रह्मभोज कराने आध्यात्मिक शिक्षा देने गायत्री और यज्ञ का महत्व बताने का कार्य भी करना है। इसलिए यह दोनों कार्य एक ही विधि से धर्म-फेरी से पूर्ण होने संभव हैं।

इस वर्ष सन् 58 में 1250 करोड़ जप करना है। 1.25 लाख जप करने वाले 1 लाख याज्ञिकों की आवश्यकता इसी दृष्टि से है। यों 240 लाख आहुतियाँ 1 हजार कुण्डों में 10 हजार व्यक्ति कर सकते हैं। सवाल आहुतियाँ पूरी होने का नहीं वरन् यह है कि 1 लाख गायत्री उपासकों की श्रद्धा शक्ति का एकीकरण केन्द्रीकरण किया जाय और उनके सम्मिलित तप से 1250 करोड़ जप 10 महीने में पूर्ण हो। यह सारी प्रक्रिया एक ही कार्य पर अवलम्बित है कि अधिकाधिक लोगों तक इस वर्ष गायत्री माता का सन्देश पहुँचाया जाय। घर-घर अलख जगाया जाय- किसी व्यक्ति को यह कहने का अवसर न रहे कि हमें गायत्री और यज्ञ की महत्ता मालूम न थी अन्यथा हम भी उन्हें अपनाते। इतने बड़े ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का पता हमें न था हम भी उसमें सम्मिलित होते। यह शिकायत करने का किसी को अवसर न रहे यह प्रयत्न हमें करना है। यों जिन पर प्रभु की विशेष कृपा होगी, जिनका कल्याण होने वाला होगा, उन्हीं की प्रवृत्ति इस ओर झुकेगी, उन्हीं की बुद्धि इसका महत्व समझेगी। सब कोई इसका महत्व नहीं समझेंगे और न इधर ध्यान देंगे, पर उनकी परिस्थिति की चिन्ता न करते हुए हमें तो अपना कर्तव्य पालन करना है। घर-घर में गायत्री माता और यज्ञ पिता के सन्देश पहुँचा देने का यही 10 महीने का अवसर है और इस अवसर का हमें एक क्षण भी गँवाये बिना पूरा-पूरा उपयोग करना है।

दो कार्यक्रम प्रत्येक सदस्य को धर्म फेरी और ज्ञान मन्दिरों की स्थापना के कार्य सौंपे गये हैं। क्योंकि इन्हीं के द्वारा जनता में गायत्री और यज्ञ की महत्ता का व्यापक प्रसार होगा और उसके फलस्वरूप 1 लाख व्रतधारी याज्ञिक प्राप्त हो सकेंगे। अब इसी कार्य में हम सबको लगना है। ज्ञान मन्दिरों की स्थापना के लिए चार-चार आने मूल्य की 52 पुस्तकों का गायत्री साहित्य छपने दे दिया गया है वह 2 महीने में फरवरी के अन्त तक छपकर तैयार हो जायगा। उसे मँगाने और भेजने की प्रक्रिया दो महीने बाद चलेगी। अभी इसी समय से आज से ही जो कार्य करने का है कि वह यह है कि सक्रिय परिजन दो-दो चार-चार की टोली बनाकर गायत्री प्रचार की तीर्थ यात्रा, परिक्रमा, धर्म फेरी करने के लिए समय निकालें। प्रत्येक घर में पूर्णाहुति का सन्देश पहुँचाने वाला कार्यक्रम सामने रहे। बड़ा नगर है तो उसके गली मुहल्ले कई दिनों में और बड़े गांवों छोटे गांवों के घरों की संख्या देखकर एक दिन में एक या एक से अधिक गाँवों की धर्म फेरी का कार्यक्रम रखा जा सकता है।

धर्म-फेरी के लिए वितरण करने योग्य गायत्री साहित्य साथ रहना चाहिए और वह घर-घर में बिना मूल्य दिया जाना चाहिए। परिपत्र और पुस्तिकाएं दोनों तरह का वितरण साहित्य छापा गया है। जहाँ कुछ विशेष आशा न हो उस घर में परिपत्र देना पर्याप्त है। जिन घर में कुछ अधिक धर्म श्रद्धा दिखाई पड़े वहाँ पुस्तक देनी चाहिए। इस प्रकार कई-कई मील के सीमा के घरों तक गायत्री यज्ञ का सन्देश पहुँचाया जाना चाहिए। इस प्रचार से प्रभावित लोगों से पुनः मिलकर उन्हें गायत्री परिवार का सदस्य एवं होता-यजमान बनाया जाना संभव हो सकेगा। अभी कई महीने यही प्रचार कार्य जारी रहना चाहिए। ज्ञान मन्दिरों की स्थापना का कार्य दो महीने बाद हाथ में लेना चाहिये।

धर्मार्थ वितरण योग्य साहित्य की धर्म-फेरी में प्रधान रूप से आवश्यकता होगी। इसलिए उसे बड़ी मात्रा में जुटाया जाना आवश्यक है। यह व्यवस्था परिजनों को ही आपस में मिलकर करनी चाहिए। इसके लिए हर सदस्य कम से कम एक मुट्ठी अन्न या एक पैसा रोज निकाले। एक छोटा धर्म घट कोई बर्तन या डिब्बा रख लेना चाहिए और सोचना चाहिए कि गायत्री माता, यज्ञ पिता, प्रकाशप्रद आचार्य को सम्मिलित भोग लगाने के लिए मुझे कम से कम एक मुट्ठी अन्न या एक पैसा अवश्य देना है। वजन बहुत थोड़ा है। इससे कई गुना खर्च तो घर के चूहे कर देते हैं। पर चूँकि धर्म का भार इस युग के कृपण आदमी से इतना भी उठाये नहीं बनता, यह कौड़ियाँ भी उसे गिन्नियों जितनी भारी लगेंगी, बीसियों दलीलें, बीसियों कठिनाइयाँ, बीसियों कुतर्कें लोग इतने तुच्छ धर्म व्यय में भी करेंगे और अपनी सारी अकल इस बात में खर्च करेंगे कि यह बोझ आपके ऊपर न पड़ने पाये और किसी प्रकार बातों की सफाई से इस झंझट से बाल-बाल बच जायँ। इन कंजूसों को छोड़ ही देना उचित है, क्योंकि इतने कृपणों के पैसे यदि यज्ञ में लगे तो विघ्न ही पड़ेगा। शेष सदस्य- हमारा विश्वास है कि अधिकाँश सदस्य इस धर्म भार को आसानी से उठा लेंगे और एक-एक मुट्ठी अन्न या एक-एक पैसे की अपेक्षा इससे कई-कई गुना अन्न उदारतापूर्वक बड़ी प्रसन्नता के साथ देने को तैयार हो जावेंगे। गायत्री परिवार के सदस्यों में ऐसे मसखरे भी अधिक हैं, जिन्होंने कौतूहलवश सदस्यता फार्म तो भरा दिया है, पर कोई कर्तव्य सामने आते ही अलग जा खड़े होते हैं। ऐसे लोग अब छट जायेंगे और वे ही सामने रहेंगे, जिनमें वस्तुतः श्रद्धा का बीज मौजूद है वे इतनी छोटी माँग से कभी भी इनकार नहीं कर सकते। हमारा पूरा और पक्का विश्वास है कि ऐसे लोग गायत्री परिवार में हैं और बड़ी संख्या में हैं।

अब हर श्रद्धालु सदस्य को पूर्णाहुति की सफलता के लिए यह दैनिक “धर्म मुट्ठी” निकालनी चाहिए। इस अन्न या पैसे को मासिक या साप्ताहिक रूप से इकट्ठा किया जाना चाहिए और इस पैसे से धर्म-फेरी का वितरण साहित्य मथुरा से मंगाते रहना चाहिए। गत अंक में छपा था कि 6 रु. में 108 पुस्तिकाएं मिलेंगी। अब उसमें और भी सुविधा हो गई है पुस्तिकाएं कुछ कम करके परिपत्र बड़ी संख्या में दिये जा रहे है। 6 रु. में 80 पुस्तिकाएं और 240 परिपत्र भेजे जा रहे हैं। जो 108 घरों की अपेक्षा 320 घरों में सन्देश पहुँचाने का कार्य करेंगे। यदि रेल द्वारा अधिक संख्या में यह साहित्य मँगाया जाय तो पोस्टेज की बचत हो सकती है। उपरोक्त साहित्य का मूल्य 5 रु. और पोस्टेज 1 रु. है। यह रेल से कम लगता है और पोस्टेज की बचत होती है। रेल से मँगाने वालों पर थोड़ा रेल भाड़ा तो लगेगा, पर 6 रु. वाला साहित्य 5 रु. में मिलने से अन्त तक बचत होगी। पर यह लाभ उन्हीं को है, जो कम से कम बीस रुपये के साहित्य मँगाये और रेलवे स्टेशन जिनके पास हो।

पूर्णाहुति के लिए धन संग्रह करने की कोई योजना नहीं है। धर्म मुट्ठी का संग्रहीत अन्न या पैसा पूर्णाहुति खर्च के लिए न लिया जायगा। यह तो केवल प्रचार साहित्य वितरण करने के लिए ही होगा। पूर्णाहुति के इतने महत्व के इतने पवित्र कार्य में बहुत उच्च कोटी की श्रद्धा से डूबा हुआ पैसा ही लगेगा और वह माँगने से नहीं बना माँगे ही आवेगा। इसलिए उसके लिए किसी से कोई याचना या अपील नहीं की जायगी। हाँ, धर्म-फेरी के लिए साहित्य वितरण के लिए हर सदस्य पर जोर डाला जा रहा है। वह हर सदस्य को करना ही चाहिए। यह किये बिना धर्म फेरी के लिए समय और साहित्य के लिए धर्म मुट्ठी दिये बिना करोड़ों घरों में गायत्री माता यज्ञ पिता का सन्देश न पहुँचाया जा सकेगा, और यदि यह न हो सकेगा तो ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति का संकल्प भी सफल न हो सकेगा।

परिजनों को अब कुछ करना है। जो करना है वह अभी से किया जाना चाहिए ताकि जो 10 महीने का समय शेष है, उसका सदुपयोग हो सके। जो सक्रिय सदस्य है- शाखा संचालक है, वे अपना निज का काम किसी दूसरे के सुपुर्द करे, नौकरी से कुछ महीने की छुट्टी ले लें, साधु-संन्यासी, आत्मदानी, पारिवारिक जिम्मेदारी से मुक्त, पेंशनर, पूरा समय इस प्रचार कार्य में लगा दें। अपने साथी कुछ और ढूँढ़कर धर्म फेरी के लिए निकलें। धर्म मुट्ठी को व्यापक बनाये और उस पैसे से वितरण साहित्य लेकर सुदूर क्षेत्र में अलख जगाने के लिये संलग्न हो जावें। हमें आशा और विश्वास है कि सच्चे स्वजन इस परीक्षा के अवसर पर बगलें न झांकेंगे, आगे बढ़ेंगे और अपनी कर्तव्य परायणता एवं श्रद्धा का प्रमाण उपस्थित करेंगे।


अपने काम से काम रखो

(श्री. कृष्णमूर्ति)

मनुष्यों में सामान्य रूप से एक प्रवृत्ति यह पाई जाती है कि वे दूसरे के कामों में बहुत जल्दी हस्तक्षेप करने लगते हैं। पर यदि विचार पूर्वक देखा जाय तो अन्य मनुष्य जो कुछ कहता, करता या विश्वास करता है, उससे तुम्हारा कोई सरोकार नहीं, तुम्हें उसकी बात पूर्णतया उसी की इच्छा पर छोड़ देनी चाहिए। उसे अपने विचार, भाषण और कार्यों में स्वतन्त्र रहने का पूर्ण अधिकार है, जब तक कि उनके कारण दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं होता। तुम स्वयं अपने कार्यों में जिस प्रकार की स्वतन्त्रता की इच्छा करते हो वही दूसरों को भी देनी चाहिए।

वास्तव में किसी सज्जन व्यक्ति को कभी पराये कार्यों और विश्वासों में कोई हस्तक्षेप न करना चाहिये, जब तक उनके किन्हीं कार्यों से सर्वसाधारण की प्रत्यक्ष हानि न होती हो। यदि कोई मनुष्य ऐसा व्यवहार करता है, जिससे कि वह अपने पड़ौसियों के लिए दुखदायी बन जाता है, तो उसे उचित सम्मति देना कभी-कभी हमारा कर्तव्य हो जाता है, पर ऐसा मौका आने पर भी बात को बहुत नम्रता और सरलतापूर्वक प्रकट करना चाहिये।

इस सम्बन्ध में छोटे-मोटे देशों की बात छोड़ दीजिये स्वतन्त्रता के परम उपासक इंग्लैंड में लोगों को वास्तविक स्वाधीनता प्राप्त नहीं है। वे लोग भी प्रचलित रिवाजों और बाह्य शिष्टाचार के नियमों से इतने जकड़े रहते हैं कि न तो कोई अपनी रुचि के अनुसार वस्त्र धारण कर सकता है न कही आना जाना ही कर सकता है। उदाहरणार्थ अगर किसी को पुराने जमाने की ग्रीक फैशन की पोशाक अच्छी लगती है और वह उसे पहनकर सड़क पर निकल जाय तो लोगों की भीड़ उसे इस प्रकार घेर लेगी, मानो वह किसी अजायबघर से आया हो और उसका चलना-फिरना कठिन हो जायगा।

यह सच है कि जिस प्रणाली पर देश के सब मनुष्य चलते हैं, हम प्रत्येक को उसी पर चलाना चाहते हैं और इसे एक प्रकार की सामाजिक सेवा या देश की भलाई समझते हैं। पर हम यह विचार नहीं करते कि मनुष्य सहर्ष उतनी ही बात ग्रहण कर सकता है, जितनी बातों का ज्ञान उसके हृदय में भली प्रकार समा चुका है। ऐसे मनुष्य पर अगर हम अपनी मानी हुई उत्तम बाते भी बलात् लादने की चेष्टा करेंगे तो उससे लाभ की अपेक्षा हानि की संभावना ही अधिक है। अन्तःकरण की शक्ति बाहर से उत्पन्न नहीं की जा सकती, यह तो पूर्व अनुभवों के फलस्वरूप प्राप्त होती है। इसलिए अगर कोई मनुष्य आपकी इच्छित समस्त शिक्षा और उपदेश को ग्रहण कर लेता है, तो यह समझना चाहिये कि वह ज्ञान उसके अन्तर में पहले से ही विद्यमान था, इस बाहरी संदेश ने उसे केवल जाग्रत कर दिया। पर यदि कोई व्यक्ति बार-बार शिक्षा देने से भी किसी बात को न सीखे अथवा उसका विरोध करे तो हमको यही मान लेना चाहिये कि अभी उसकी पहुँच वहाँ तक नहीं है अथवा उसका मन दूसरे मार्ग पर जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में मतभेद के आधार पर लड़ना-झगड़ना बुद्धिमानी अथवा सभ्यता का लक्षण नहीं माना जा सकता।

अगर कोई व्यक्ति हमारे विचार से कोई बड़ी भूल कर रहा है तो तुम उसे एकान्त में अवसर ढूँढ़ कर यह बतला सकते हो कि आप ऐसा क्यों करते हैं? संभव है ऐसा करने से वह तुम्हारी बात पर विश्वास कर सके। किन्तु अनेक स्थानों पर तो ऐसा करना भी अनुचित रूप से हस्तक्षेप ही करना होगा। किसी तीसरे व्यक्ति के सामने तो उस बात की चर्चा हर्गिज नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह उसकी निन्दा करना होगा, जो किसी सभ्य व्यक्ति को शोभा नहीं देता।


ईश-स्तवन


ईश-स्तवन

भयानाँ भयं भीषणं भीषणानाँ, गतिः प्राणिनाँ पावनं पावनानाम्।

महोच्चेः पदानाँ नियन्तृ त्वमेकं, परेषाँ परं रक्षणं रक्षगानाम्॥1॥

तमीश्वराणाँ परमं महेश्वरं, तं देवतानाँ परमञ्च दैवतम्।

पतिं पतीनाँ परमं परस्ताद, विदाम देवं भुवनेश मीड्यम्॥2॥

वयं त्वाँ स्मरामो वयं त्वाँ भजामो, वयन्त्वाँ जगत्सक्षिरुपं नमामः।

सदेकं निधानं निरालम्ब मीशं, भवाम्भोधिपोतं शण्यं ब्रजाभः॥3॥

नमस्ते सते ते जगत्कारणाय, नमस्ते चिते सर्व लोकाश्रयाय।

नमोऽद्वैततत्वाय मुक्ति प्रदाय, नमो ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय॥4॥

त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यं, त्वमेकं जगत्पालकं स्वप्रकाशम्।

त्वमेकं जगत्कतृ पातृ प्रहतृ, त्वमेकं परं निञ्चलं निर्विकल्पम्॥5॥

विदुर्यन्न चित्तेन्द्रियाणीन्द्रियेशं, विजानाति यस्तानि नितयं नियन्ता।

जगत्साक्षिणं व्यापकं विश्ववन्द्यं, चिदानन्द रूप तमीशं प्रपद्ये॥6॥

अणोरप्यणीयान्महद्भ्यो महीयान्, रविन्दुर्ग्रहोयोभगोलादि कर्ता।

य ईशोहि सृष्ट्यादि मध्यान्त संस्थश्चदानन्द रुपं तमीशं प्रपद्ये॥7॥

यतो जायते विश्व मेतत्समस्तं, स्थितं यत्रयस्मिर्न्लय याति काले।

अनादि विभुञ्चादि मध्यान्त शून्यञ्चिदानन्द रुपं तमीशं प्रपद्ये॥8॥

वशे यस्य विश्वं समस्तं सदास्ते, यदाभासतो भतियद्वै विचित्रम्।

नजानन्ति यं तत्त्वतो योगिनोऽपि, चिदानन्द रुपं तमीशं प्रपद्ये॥9॥

स्वामिन्नमस्ते नतलोक वन्धो, कारुण्य सिन्धो पतितं भवाब्धौ।

मामुद्धरात्मीय कटाक्ष दृष्ट्या, ऋज्व्यातु कारुण्य सुधाभिवृष्ट्या॥10॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देवः॥11॥

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुखभाग भवेत्॥12॥

*समाप्त*