विश्व-रूप भगवान

(श्री सत्यनारायण कविरत्न)


विश्व-रूप भगवान (Kavita)

निरखत जित, तित ही तुम व्यापक।

भुविसों नमलों प्रति पदार्थ तव कार्य-कुशलता-ज्ञापक॥

सन्ध्या प्रात रैन दिन षट ऋतु क्रमसों सब चुपचाप। आवत जात जगत अभिनय-थल अविकल अपने आप॥

गिरि उत्तंग-श्रृंग नभ चुम्बत प्रकृति मनोहर वेश। हिम-मण्डित रविकर-रंजित नित करत उमंग अशेष॥

शस्य श्याम अभिराम शेष बहु सजल सरित जल पावन। मलयज शीतल हीतल सुखप्रद धीर समीर सुहावन॥

सुभग स्वच्छ स्वच्छन्द द्रुमावलि नम्र लता मृदु काया। अचरज सरसावत् हरसावत दुरसावत् तव माया॥

रवि शशि आदि दारु-योषित सम करत स्वकाज निरन्तर। अद्भुत अमित परत नहिं तामें तिल भरहू कौ अन्तर॥

अकथ प्रदर्शन पुण्य पंक्ति में नित-नव नाचनहारे। बिहसत अधर प्रमोद चमत्कृत चंचल चारु सितारे॥

जगमगात प्रतिपल मुख मण्डल अनुपम परम पुनीत। गावत जन अव्यक्त सुध्वनि सों विश्वरूप तव गीत॥


हिंसा का प्रतिकार अहिंसा से ही होगा।

(सन्त बिनोवा भावे)

वर्तमान समय में हिंसा ने जैसा भयंकर रूप धारण किया है वैसा संसार के इतिहास में कभी देखने में नहीं आया। शस्त्रों की शक्ति को बढ़ाते-बढ़ाते मनुष्य ने ऐसी विधियाँ ढूँढ़ निकाली हैं कि उनके द्वारा समस्त संसार का दस-बीस दिन में ही नाश किया जा सकता है। इस महाशक्ति से मतवाले बनकर दुनिया के प्रमुख राष्ट्र एक दूसरे को मटियामेट कर डालने की धमकी दे रहे हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि इसी प्रकार धमकी देते-देते दो चार वर्ष के भीतर वास्तव में ये प्रलय के बादल मनुष्य जाति के ऊपर फट पड़ें। संसार के नामी राजनीतिज्ञ इस परिस्थिति के सुधार का उपाय यही बतला रहे हैं कि शक्ति को बराबर बढ़ाते जाओ तो दुश्मन के साथ-साथ अपने भी नाश के भय से कोई राष्ट्र युद्ध आरम्भ करने का साहस न करेगा। पर यह बिलकुल उलटा और जान-बूझकर आंखें बन्द कर लेने का उपाय है। ऐसा ही ख्याल करते-करते गत पचास वर्षों में दो बार विश्व व्यापी महायुद्ध हो चुके हैं। इसलिए यदि वास्तव में युद्ध की विभीषिका का निराकरण करना है तो उसका उपाय बिलकुल भिन्न प्रकार का होना चाहिए। इस सम्बन्ध में संत बिनोवा ने भारतीय संस्कृति के अनुकूल जो विचार प्रकट किए हैं ये विशेष महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि उन्होंने इस सम्बन्ध में जो विवेचना की है वह भारतीय समस्याओं को दृष्टिगत रखकर ही की है, तो भी उसका प्रयोग अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी सफलतापूर्वक किया जा सकना सम्भव है।

हमारे आन्दोलन और कार्य पद्धति का मूलभूत विचार अहिंसा का ही है। हम सब लोग जानते हैं कि अहिंसा की प्रक्रिया हृदय-परिवर्तन की अपनी एक पद्धति है। मनुष्य कभी-कभी जानता भी नहीं कि उसका हृदय परिवर्तन हो रहा है और कभी-कभी जान भी सकता है। वह प्रक्रिया ऐसी ही है। हमें इसका ध्यान रखना चाहिए कि हमारे विचार, सोचने की पद्धति आदि उसमें बाधक न हों। हमारे देश में भिन्न-भिन्न राजनैतिक पक्ष हैं, भिन्न-भिन्न आर्थिक विचार हैं, चूँकि देश बड़ा है, इसलिए समस्याएं भी बड़ी हैं। अतः अनेक तरह के विचार होते हैं, विचार-भेद उत्पन्न होते हैं। हम जब हृदय-परिवर्तन और विचार परिवर्तन की बात कहते हैं, तो हमेशा हमारे सामने दूसरों के ही विचार-परिवर्तन की बात होती है, ऐसा नहीं है। हृदय-परिवर्तन की यह प्रक्रिया सबके लिए लागू है।

इस प्रक्रिया के बारे में मुझे जो विशेष बातें कहनी हैं, वह यह हैं कि उसमें ‘भ्रम’ का भी स्थान है। यह एक अजीब-सी बात मैं कह रहा हूँ। हमें उपासना करने में इसका हमेशा अनुभव होता है। उपासना में भ्रम का कुछ आधार लेना पड़ता है। आखिर में वह आधार उड़ जाता है। फिर वह उपासना आदत में रहे या छूट जाय, दोनों बातें हो सकती हैं। परन्तु जब तक उसकी जरूरत है, तब तक उसके मूल में जैसे विचार होता है, वैसे भ्रम भी होता है। शुद्ध विचार में उपासना टिकेगी ही नहीं और केवल भ्रम में भी उपासना नहीं टिकेगी। जहाँ विचार और भ्रम दोनों होते हैं, वहीं उपासना होती है। यही दृष्टान्त हृदय-परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए लागू होता है।

भ्रम और सत्य, दोनों की जरूरत

भ्रम और सत्य दोनों का होना हृदय-परिवर्तन की प्रक्रिया की एक अवस्था में जरूरी होता है, ऐसा में देखता हूँ। मनुष्य पहले केवल भ्रम में होता है। वहाँ से उसको केवल सत्य में जाना है। अब, केवल भ्रम से, केवल सत्य में जाने के लिए रास्ते में ऐसी भूमिका आयेगी, जबकि उसके मन में कुछ भ्रम और कुछ सत्य का आभास होगा। तब हम अगर फौरन उसका खण्डन करेंगे, तो उसका चित्त चलित होगा और एक विरोध स्थापित हो जायगा। वह यह समझ करके हमारी तरफ आता है, कि मानों हम ही उसकी तरफ जा रहे हैं। उसके ऐसा मानने में कुछ भ्रम भले ही हो, पर कुछ सत्याँश भी हो सकता है।

इस सम्बन्ध में कम्यूनिस्ट और सर्वोदय विचारधारा वालों का उदाहरण विशेष शिक्षाप्रद है। कम्यूनिस्ट कहते हैं कि “भूदान का जो मूल विचार है, यह हमारा ही विचार है। उसके साथ हम सहमत हैं। मालकियत, बल्कि सभी प्रकार की सम्पत्ति की मालकियत न हो- यह बात बाबा अब कह रहा है।” वे समझते हैं कि इतना परिवर्तन बाबा में हुआ ही है। पर मेरा ख्याल है कि कुछ परिवर्तन हुआ भी है और कुछ नहीं भी हुआ। फिर भी यदि वे समझते हैं कि यह विचार असल में कम्यूनिस्टों का ही विचार है, तो भी मैं इस पर ज्यादा आपत्ति नहीं करता। खास कार्य-कर्त्ताओं को तो जो अन्तर है मैं उसे समझा देता हूँ, पर जनता की सभाओं में यह कह देता हूँ कि “कम्यूनिस्ट जो समझते हैं यह ठीक है, इसलिए उनका पूरा समर्थन हमको मिलना चाहिए।”

चुभने वाले सत्य में अहिंसा की कमी

अब यहाँ यह विषय जरा सूक्ष्म हो रहा है। उपर्युक्त तर्क को जब हम अहिंसा के सिद्धान्त पर लागू करते हैं तो जान पड़ता है कि सत्य के विरुद्ध अहिंसा खड़ी है, ऐसा आभास होता है, लेकिन यह आभास-मात्र ही है। वास्तव में सत्य कभी प्रहार नहीं करता, सत्य चुभता नहीं। अगर वह वास्तव में सत्य हो तो सदा प्राणदायी होगा। जो तत्व प्राणदायी है, वह अहिंसक तो होगा ही, चुभेगा भी नहीं। इसलिए जहाँ सत्य चुभता है, वहाँ उसकी सत्यता में ही कुछ कमी होती है। पर अहिंसा की दृष्टि से ऐसे भ्रम का खण्डन करना उचित नहीं है।

वास्तव में अहिंसा में विचार-परिवर्तन, (हृदय परिवर्तन) की प्रक्रिया ही मुख्य अंश है। वह प्रक्रिया किस तरह से प्रकट होती है और किस तरह से काम करती है, इसकी तरफ ध्यान देकर हमको सत्य पर गलत जोर नहीं देना चाहिए। यह विश्वास रखें कि सत्य को जब हम पहिचानते हैं, तो वह कभी छिपेगा नहीं, वह खुला हुआ ही रहेगा। हम वाणी से किसी को कितना भी समझावें, हम चाहे जो करें, जब तक उसकी बुद्धि नहीं खुलती, तब तक सत्य नहीं खुलेगा। इसलिए सत्य को खोलने की हम चिन्ता न करें। हाँ, सत्य को जरूर समझें। पर उसे उतना ही खोलते रहें, जितना कि सामने वाला ग्रहण करता जाय। मेरा खयाल है कि वह प्रक्रिया अहिंसा के लिए अधिक अनुकूल है।

संसार के प्रमुख राष्ट्रों के कर्णधार, जो एक दूसरे पर आक्षेप कर रहे हैं और शस्त्र द्वारा प्रतिस्पर्धा को तैयार हो रहे हैं, उसका कारण उपर्युक्त मनोभावना का अभाव भी है। वे अपने को सोलह आना सच्चा मानते हैं और विरोधी पक्ष वाले को हर तरह से असत्य अथवा भ्रम में ग्रसित समझते हैं। यही कारण है कि समझने की बात उनके दिमाग में नहीं घुसती और वे हिंसा के मार्ग पर ही अग्रसर होते जाते हैं। यदि वे उपर्युक्त लेखाँश में बतलाये गये उपाय के अनुसार शत्रु की बातों में भी सच्चाई का अनुसंधान करें और अपनी गलती को भी अनुभव करें तो शत्रुता के कारण दूर होकर हिंसा का प्रतिकार किया जा सकता है।


वेदान्त और मनुष्य मात्र की समता का सन्देश

(स्वामी विवेकानन्द)

हम लोगों को संसार के लिए-योरोप और सम्पूर्ण संसार के विचारशील व्यक्तियों को एक बड़े तत्व की शिक्षा देनी होगी। इस महान सनातन तत्व की आवश्यकता उच्च जातियों की अपेक्षा निम्न जातियों को शिक्षितों की अपेक्षा साधारण लोगों को अधिक है। भारतीय वेदान्त ने सिद्ध कर दिया है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एकमात्र आत्मा की विराजमान है, वही एकमात्र सत्ता है सारे ब्रह्माण्ड के मूल में यही एकमात्र तत्व समाया हुआ है। मैं जानता हूँ कि इस महान तत्व को सुनकर बहुत से लोग चौंक पड़ेंगे। अन्य देश वालों की क्या बात, हमारे देश में भी बहुत से लोग इस अद्वैतवाद से भयभीत होंगे। कुछ भी हो मैं आप लोगों से यही कहूँगा कि संसार को जीवन प्रदान करने वाली कोई शिक्षा देनी है, तो वह यही अद्वैतवाद है। भारत की मूक साधारण जनता की उन्नति के लिये इस अद्वैतवाद के प्रचार की आवश्यकता है। इस अद्वैतवाद को कार्य रूप में परिणित किये बिना हमारी इस मातृ-भूमि के उद्धार का और कोई उपाय नहीं है।

पश्चिमी जातियों के युक्तिवादी लोग अपने सभी दर्शनों और नीति-विज्ञान का कोई एक मूल आधार ढूँढ़ रहे हैं। लेकिन कोई व्यक्ति विशेष चाहे वह कितना ही बड़ा, या ईश्वर के समान ही क्यों न हो उसका कोई दर्शन या नीति-विज्ञान प्रमाण-स्वरूप नहीं माना जा सकता। संसार के बड़े-बड़े विचारशील लोगों के सामने उनकी नीति व दर्शन प्रामाणिक नहीं हो सकते। वह लोग किसी मनुष्य के द्वारा अनुमोदित दर्शन को प्रामाणिक न मानकर, सनातन तत्वों के ऊपर आधार रखने वाले दर्शन को ही स्वीकार करना चाहते हैं। यह सनातन आधार इसके सिवा और क्या हो सकता है कि एकमात्र अनन्त सत्य, तुम्हारे, हमारे और अन्य सभी की आत्मा में वर्तमान है। आत्मा की अनन्त एकता ही सब तरह की नीति का मूल कारण है। तुम में और हम में केवल भाई-भाई का ही सम्बन्ध नहीं है, लेकिन वास्तव में हम और तुम ही हैं। भारतीय दर्शनों का यही सिद्धान्त है। सब प्रकार की नीति और धर्म-विज्ञान का मूल आधार यही एकत्व हो सकता है।

हम लोगों के देश की सामाजिक अत्याचारों से पिसी हुई निम्न जातियाँ जिस प्रकार इस सिद्धान्त से लाभ उठा सकती हैं, वैसे ही योरोप, अमरीका आदि के लिये भी इसका प्रयोजन है।

जिस समय मैं अमेरिका में था उस समय मेरे ऊपर कुछ लोगों ने यह आक्षेप किया था कि “मैं केवल अद्वैतवाद का ही प्रचार करता हूँ, द्वैतवाद के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहता।” मैं स्वीकार करता हूँ कि द्वैतवाद के प्रेम, भक्ति, उपासना में अपूर्व परमानन्द प्राप्त होता है, उसकी अपूर्व महिमा से भी मैं भली प्रकार परिचित हूँ। परन्तु भाइयों! इस समय हमको रोने-धोने का समय नहीं है। हम लोग काफी रो धो चुके हैं। अब हम लोगों को कोमल भावों के ग्रहण करने का समय नहीं है। इस तरह की कोमलता की सिद्धि करते-करते हम लोग इस समय मुर्दे सरीखे हो रहे हैं, हम लोग रुई की तरह कोमल हो गये हैं। हमारे देश के लिये इस समय आवश्यकता है- लोहे की तरह माँसपेशी और स्नायुओं से युक्त बनने की इतनी दृढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न होने की कि कोई उसका प्रतिरोध करने में समर्थ न हो! अपने आदर्श की पूर्ति के लिये चाहे समुद्र के तल में जाना पड़े, चाहे मृत्यु का ही आलिंगन क्यों न करना हो, इस तरह की दृढ़ता के भाव हममें अद्वैतवाद के महान तत्व को सामने रखकर ही आ सकते हैं।

विश्वास, विश्वास, विश्वास- अपने ऊपर विश्वास रखना ईश्वर पर विश्वास रखना, यही उन्नति प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है। यदि तुम अपने पुराणों में लिखे तैंतीस करोड़ देवताओं पर विश्वास रखो, साथ ही विदेशियों के जितने देवता हैं, उन सब पर भी विश्वास रखो, पर अगर तुममें आत्मविश्वास न हो, तो तुम्हारी मुक्ति कभी नहीं हो सकती। अपने ऊपर भरोसा रखो, उस विश्वास के बल से अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और वीर्यशाली बनो। इस समय हमारे लिए यही आवश्यक है। हम लोग संख्या में बहुत अधिक होने पर भी अभी तक मुट्ठी भर विदेशियों से दबे रहे, इसका कारण क्या है? कारण यही है कि उनको अपने ऊपर विश्वास है, पर हमको अपने ऊपर विश्वास नहीं। मैंने पश्चिमी देशों में जाकर सीखा है? ईसाई लोग साधारणतया मनुष्य मात्र को पतित, लाचार और पापी समझते हैं। इन व्यर्थ की बातों में न पड़कर मैंने इस पर ध्यान दिया कि इन लोगों की जातीय उन्नति का वास्तविक कारण क्या है? मैंने योरोप और अमेरिका दोनों महाद्वीपों में देखा कि उनके जातीय हृदय के भीतर उनका महान आत्मविश्वास छिपा हुआ है। एक अँग्रेज बालक तुमसे कहेगा कि मैं अंग्रेज हूँ, मैं सब कुछ कर सकता हूँ। अमेरिकन बालक भी यही कहेगा- प्रत्येक योरोपियन बालक यही कहेगा। क्या हमारे बच्चे भी ऐसा कह सकते हैं? बच्चे ही क्यों उनके पिता तक यह कहने का साहस नहीं कर सकते। हम लोगों ने अपने ऊपर विश्वास खो दिया है। इसी कारण से वेदान्त के अद्वैतवाद का प्रचार करना आवश्यक है, जिससे लोगों के हृदय में जागृति पैदा हो, जिससे हम अपनी आत्मा की महिमा को जान सकें। इसी कारण से मैं अद्वैतवाद का प्रचार करता हूँ। मैं इसका प्रचार साम्प्रदायिक भाव से नहीं करता, बल्कि मनुष्य जाति का कल्याण हो, इसी भाव से इसका प्रचार कर रहा हूँ।

इस अद्वैतवाद का इस प्रकार भी प्रचार किया जा सकता है, जिससे द्वैतवादी, विशिष्टाद्वैतवादी को भी किसी तरह की आपत्ति का कारण न रहे, इन सब मतों में सामंजस्य स्थापित कर सकना कोई कठिन बात नहीं है। भारत में ऐसा कोई सम्प्रदाय नहीं जिसमें यह न कहा गया हो कि भगवान सबके भीतर निवास करते हैं। हमारे वेदान्त मत के विभिन्न सम्प्रदाय वाले सभी स्वीकार करते हैं कि जीवात्मा में पहले से ही पूर्ण पवित्रता, वीर्य और पूर्णता छिपी हुई है। तो भी किसी-किसी के मतानुसार यह पूर्णता कभी-कभी संकुचित हो जाती है और कभी विकास को प्राप्त होती है। यह होने पर भी वह पूर्णता हमारे ही भीतर रहती है, इसमें कोई सन्देह नहीं। अद्वैतवाद के अनुसार वह न तो संकुचित होता है और न विकास को ही प्राप्त होता है। केवल समय-समय पर प्रकट और गुप्त रहता है। ऐसा विचारने से कार्यतः द्वैतवाद के साथ वह एक रूप है। कोई एक मत दूसरे की अपेक्षा न्याय संगत और युक्ति संगत हो सकता है, लेकिन कार्य अथवा परिणाम की दृष्टि से दोनों प्रायः एक ही हैं। इस मूल तत्व का प्रचार करना संसार के लिये अत्यावश्यक हो रहा है और हमारी मातृभूमि भारत में इसका जितना अभाव है उतना और किसी देश में नहीं है।

इसमें सन्देह नहीं कि वेदान्त के प्रचार द्वारा इस देश में और अन्यान्य देशों में भी काफी लोकहित कर कार्य हो सकते हैं। मनुष्य जाति की एकता और उन्नति के लिए परमात्मा की सर्वव्यापकता और सर्वत्र समभाव से अवस्थित रहना इन दो तत्वों का प्रचार करना होगा। जहाँ कहीं भी अन्याय दिखलाई पड़ता है, वहीं पर अज्ञान दिखलाई पड़ता है। मैंने अपने अनुभव से यह जाना है और हमारे शास्त्रों में भी लिखा है कि भेद बुद्धि पैदा होने से ही सभी खराबियाँ पैदा होती हैं और अभेद बुद्धि होने पर अर्थात् सभी विभिन्नताओं के रहते हुये भी वास्तव में एक ही सत्ता है इस विश्वास करने पर सब तरह कल्याण होगा। यही वेदान्त का सबसे ऊँचा आदर्श है। गीता में भी भगवान कृष्ण ने इस तत्व को बहुत स्पष्ट शब्दों में प्रकट किया है :-

समं सर्वेषु भूतेष तिष्ठतं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्व विनश्यत्वं यः पश्यति स पश्यति॥ 13-27

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थित मीश्वरं। न हिन्स्त्यात्मनात्मानं ततो यादि पराँ गतिम्॥ 13-28

अर्थात्- “विनाशवान सब प्राणियों में अविनाशी परमेश्वर को जो समभाव से अवस्थित देखते हैं, वही यथार्थ में दर्शन करते हैं। इसका कारण यह है कि ईश्वर को सर्वत्र समभाव से अवस्थित देखकर हम अपनी आत्मा द्वारा आत्मा की हिंसा नहीं करते, इसलिए परम गति को प्राप्त होते हैं।”


हमारे युवकों को कैसी शिक्षा दी जाय?

(लाला हरदयालजी)

हमारे देश में कुछ समय से ‘धार्मिक शिक्षा’ की चर्चा विशेष रूप से होने लगी है। अनेक लोगों का ख्याल है कि देश के शिक्षित युवक और युवतियों में नैतिकता और नियन्त्रण का अभाव दिखलाई पड़ रहा है उसका कारण शिक्षा में ‘धर्म’ का समावेश न होना ही है। इस गूढ़ समस्या पर सुप्रसिद्ध विद्वान लाला हरदयाजी ने कुछ स्पष्ट विचार प्रकट किये थे, जो यद्यपि अब काफी पुराने हो गये हैं तो भी शिक्षा प्रेमियों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे।

सबसे पहला प्रश्न यही है कि ‘धार्मिक शिक्षा’ है क्या? मुझे आज तक मालूम न हो सका कि ‘हिंदुत्व’ किसे कहते हैं? जिस प्रकार ईश्वरवादी लोग मानते हैं कि ईश्वर है लेकिन हम यह न जान सके कि वह कैसा है? ‘हिंदुत्व’ के विषय में भी बहुत से आदमी ऐसा ही मत रखते हैं। यदि हिन्दू धर्म शास्त्रों के समुद्र को मथा जाय तो उसमें ऐसी बहुत थोड़ी मामूली-सी बातें निकल सकती हैं, जिन्हें सब हिन्दू मान सकते हैं। पर मेरी सम्मति में तो 30 करोड़ हिंदुओं को, जिनमें बहुदेववादी, अद्वैतवादी, आस्तिक, नास्तिक सभी शामिल हैं, बजाय ऐसी कुछ मामूली बातों के, हमें सत्य के सर्वमान्य सिद्धान्तों की शिक्षा देनी चाहिए! इस बात की क्या आवश्यकता है कि भारत के भावी नेता केवल पुराने विचारों के ही गीत गाथा करें और स्वयं कुछ सोचने विचारने का साहस न करें। क्या सारी धार्मिक सच्चाइयां और आदर्श प्राचीन ग्रन्थों में ही बन्द हैं? कुछ लोगों का कहना है कि ‘धर्म’ ही एक ऐसी चीज है जिसके द्वारा एक निर्बल जाति में जातीय-एकता उत्पन्न की जा सकती है और साम्प्रदायिक झगड़ों को मिटाया जा सकता है। पर विचार करके देखा जाय तो यह धर्म की बहुत संकुचित व्याख्या और घटिया दर्जे का उपयोग है। यह आश्चर्य की बात है कि भारत का हर एक हितेच्छु इसके बजाय कि वह सारे संसार की एकत्रित सम्पत्ति में हाथ डाले, प्राचीनता के रिक्त-भण्डार के भरोसे ही बैठा रहना चाहता है। वैदिक सूत्रों पर लड़-झगड़कर और दिन में एक दो बार बिना समझे-बुझे कुछ मन्त्रों का उच्चारण करके भारत का उद्धार कर लेना लोगों ने बड़ा ही सहज समझ रखा है। लेकिन वास्तव में सामाजिक समता, आत्म-गौरव, वैज्ञानिक खोज, तर्क सिद्ध मत, परिमित व्यापी स्वाधीनता, सार्वजनिक भाव और सामाजिक उन्नति के भावों का पैदा करना बड़ा कठिन काम है। ‘धार्मिक शिक्षा’ के नाम पर हम अपने युवकों को क्या सिखा जाना चाहते हैं? मैं समझता हूँ कि उन्हें वेदों का सम्मान करना सिखलाया जायगा, जिन्हें वे चाहे पढ़ भी न सकें। उन्हें यह सनातन अन्तर याद कराया जायगा कि श्रुति दैवी हैं और स्मृति मनुष्यकृत, उन्हें चार वर्ण समाज के चार खम्भे बताये जायेंगे और देवताओं व देवियों की उपासना बताई जायगी। मैं उन्नतिशील भारत से सचाई के साथ पूछता हूँ कि क्या यह धार्मिक शिक्षा का, हजारों वर्ष पहले जमाने का ‘शिक्षा-क्रम’ जीर्ण-शीर्ण नहीं हो गया है? हम चाहते हैं कि भारत के भावी निर्माता आधुनिक आचार्यों के ग्रन्थों का अध्ययन करें, वे संसार भर के परम बुद्धिमान लोगों से ज्ञान सीखें, वे धर्म की ओर तर्क सिद्ध मत और व्यक्तित्व के आधुनिक ढंग से बढ़ें और इस तरह अपने लिए दृढ़ तथा मौलिक आधार स्थिर करें। उनके भीतर अवैज्ञानिक विचारों के ठूँसने से फायदा ही क्या? सत्य के स्थान पर उन्हें झूठ और सच की खिचड़ी बेतुकी और परस्पर विरोधी बातें बतलाने में भलाई ही क्या? क्या ऐसे अधकचरे मल्लाह कभी अपनी नाव को पार लगा सकेंगे?

फिर इनके समाज के विषय में क्या विचार होंगे? क्या वे मनु की स्मृति को सब कुछ समझ बैठेंगे और वर्तमान युग में उसी के आधार पर हिंदुत्व की रक्षा करेंगे? जब सारा संसार आधुनिक बुद्धिबल से उत्पन्न पोषक भोजन को पा रहा है, उसी समय हमारे युवक अपने नेताओं के कारण ब्राह्मण, गृह-सूत्र, मनुस्मृति याज्ञवलक्य स्मृति आदि ग्रन्थों में अच्छे पोषक पदार्थ ढूँढ़ते नजर आवें, यह क्या हितकर माना जा सकता है। वे लोग विक्रम की इस बीसवीं शताब्दी में, विक्रम से दस शताब्दी पहले के बचे-खुचे माल पर जीवन निर्वाह करना चाहते हैं। इन प्राचीन ग्रन्थों में से कोई भी हमारे युवकों को यह नहीं बतला सकता कि आज समाज का संगठन किस तरह होना चाहिए? यदि आजकल के उपयोगी, सच्चे, सामाजिक सिद्धान्त प्राचीन ग्रन्थों से सीखे जा सकते हैं, तो फिर काशी के पण्डितों को ही सब से बुद्धिमान समझो और फिर वे ही नवीन भारत के नेता हो सकते हैं। लेकिन कौन ऐसा मूर्ख होगा जो भारत के भविष्य को काशी और नदिया के पण्डितों के हाथ सौंप देगा। हमें पीछे देखने के बजाय आगे देखना चाहिए। नए अवसर, नए कर्तव्यों की शिक्षा देते हैं। समय के परिवर्तन से अनेक प्राचीन बातें अनुपयोगी हो जाती हैं। जो सत्य के साथ सदा रहना चाहते हैं उन्हें सदा आगे बढ़ते रहना चाहिए। फिर केवल धर्म-शिक्षा से ही सब काम नहीं चल सकता। सामाजिक आदर्श भी होना चाहिए। एक आदमी ब्रह्म और पुनर्जन्म पर विश्वास करले, पर उसे राष्ट्रीय प्रश्नों, आर्थिक-व्यवस्था, विवाह, स्त्रियों का पद, जातीयता, समाज के मुकाबले में व्यक्ति के अधिकार आदि बातों के विषय में भी ज्ञान होना जरूरी है। आज एक आदमी के लिए केवल आस्तिक या अद्वैतवादी, वेदान्ती या साँख्य शास्त्र का मानने वाला होना ही काफी नहीं है। उसे राष्ट्र के विषय में भी कुछ मत स्थिर करना होगा कि वह परिमिति राजसत्ता चाहता है या स्वेच्छाचारी राजसत्ता उसे प्रजा सत्तात्मक राज्य पसन्द है या धार्मिक लोगों द्वारा संचालित राष्ट्र इत्यादि। उसे स्त्री तथा उसके सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और पारम्परिक स्वत्वों और कर्त्तव्यों और साथ ही संसार की आर्थिक व्यवस्था पर अपना मत स्थिर करना होगा। आधुनिक सभ्यता में बड़ी गुत्थियाँ हैं। आज बहुत से प्रश्न ऐसे उपस्थित हैं जिनका भूतकाल के हिन्दू शास्त्रकारों ने स्वप्न में भी ख्याल नहीं किया था। अब प्रश्न होता है कि इन समस्याओं पर धार्मिक शिक्षा के प्रचारक क्या शिक्षा देंगे? क्या हिन्दू शास्त्रों के अनुसार मनु की बताई हुई एक सर्वशक्तिशाली राजा और उसके आठ मन्त्रियों की राज्य-सभा का शासन अब भी चल सकता है? क्या हमारे युवक यह सीखेंगे कि स्त्री को कभी स्वतन्त्रता न मिले? (न भजेत स्त्री स्वतन्त्रता-मनु।) क्या वे आधुनिक प्रतिनिधि सत्तात्मक शासन-प्रथा से इसलिए आँखें फेर लेंगे कि हिन्दू काल में तो वह था ही नहीं? शिक्षा से मनुष्य अपने जीवन के कर्तव्यों के पालन करने में समर्थ होता है। वह युवक किस काम का, जिसने अपने धार्मिक और राजनीतिक मत स्थिर नहीं किये। शिक्षा ही उसे संसार के बड़े-बड़े प्रश्नों पर दृढ़ मत स्थिर करने के योग्य बना सकती है। क्या केवल ‘धार्मिक शिक्षा’ पर जोर देने से यह उद्देश्य पूरा हो सकता है।


संसार का सबसे प्राचीन ज्ञान-स्रोत—ऋग्वेद

(श्री रामदास गौड़)

चारों वेदों में ऋग्वेद प्रधान और सबसे प्राचीन माना गया है। जब चारों वेदों का नाम लिया जाता है तो सबसे पहले ऋग्वेद का नाम ही आता है। इसके प्रधानतः दस विभाग हैं जो मण्डल के नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रत्येक मण्डल में सूक्तों का संग्रह है। दसों मण्डलों के सूक्तों की संख्या क्रम से इस प्रकार हैं- 191, 43, 62, 58, 87, 75, 104, 103, 114 और 191। इस प्रकार कुल मिलाकर 1028 सूक्त हैं। इनमें से 11 सूक्तों पर, जिन्हें ‘बालस्त्रिल्य’ कहते हैं, न सायणाचार्य का भाष्य है और न शौनक ऋषि की सूची में इनका उल्लेख मिलता है। प्रत्येक सूक्त में किसी दिव्य ईश्वरीय विभूति की स्तुति है और स्तुति के साथ-साथ घुमा-फिराकर सृष्टि के अनेक रहस्यों का तत्व प्रकट किया है। ये मन्त्र पद्य में हैं। इनके छन्द सभी वैदिक हैं जो संस्कृत तथा प्रचलित भाषाओं के छन्दों से बहुत कम मिलते हैं। आधुनिक पिंगल में सभी छन्द प्रायः चार चरण के होते हैं, परन्तु इन मन्त्रों में तीन-तीन चरणों के छन्दों की बहुतायत है। ऋग्वेद में जिन छन्दों का प्रयोग हुआ है उनके नाम जो प्रचलित पिंगल से भिन्न हैं, जैसे अभिसारिणी, महावृहति, शतोवृहति, पिपीलिका, मध्या, प्रगाथा, विराज, यव मध्या आदि।

प्रत्येक सूक्त किसी विशेष देवता, या देवताओं की स्तुति में लिखा गया है और उनके द्रष्टा, या जिनके द्वारा वह सूक्त प्रकट हुआ है, कोई न कोई ऋषि हैं। जिन ऋषियों की रचनाएं या जिनके द्वारा प्रकट किए हुए सूक्त ऋग्वेद में आये हुए हैं, उनके नाम यह हैं :-

मधुच्छन्द, जेत, मेधातिथि, शुनःशेष, हिरण्यस्तूप, कण्व, प्रकण्व, सव्य नोध, पाराशर, गोतम, कुत्स, कश्यप, ऋज्रस्व, तृताप्त्य, कक्षिवन, भावयव्य, रोमश, परुच्छेप, दीर्घतमस, अगस्त्य, इन्द्र, मरुत, लोपामुद्रा, गृत्समद, सोमहूति, कूर्म, विश्वामित्र ऋषभ, उत्कल, कट, देवश्रवा, देवव्रत, प्रजायति, वामदेव, अदिति, त्रसदस्यु, पुरुभिल्ल, बुध, गविष्टिः, कुमार, ईश, सुतम्भरा, धरुण, पुर, ववृ, द्वित, विश्वसाम, गोपपण, अश्वमेध, अत्रि, विश्ववर, वभ्र, पृथु, बसु, प्रतिभानु, गोपवन, विरुप, कृष्ण, अपाला जमदग्नि, मातरिश्वा, सुपर्ण, असित, देवल, भृगु, वैखानस, रेणु, हरिमन्त, अम्बरीष, नहुष शिखण्डिनी, सप्तर्षि, गौरी, रीति, शिशु, त्रिशिरा, यम, यमी, शंख, दमन, च्यवन, अभितया, घोपा, वैकुण्ठ, गोपायन, सुमित्र, जरत्कारु, विश्वकर्मा, अर्बुद, पुरुरुवा, उर्वशी, देवादि वभ्र, मुद्गल, सरमा, राम, उष्ट्रदंष्ट्र, अग्निपूय, भिक्षु, लव, हिरण्यगर्भ, यज्ञ, सुदास, मान्धाता, ऋष्यश्रृंग, विश्वावसु, द्रोण, श्रद्धा, इन्द्रमाता, प्रचेता, शबर, ऊर्ध्वग्रीवा, अरिष्टनेमि, शिवि, श्येन, सार्पराज्ञि, अघमर्षण, स्वस्ति, भारद्वाज, नर, गर्ग, वशिष्ठ, वाशिष्ठा, देवातिथि, ब्रह्माति, थिवत्स, शशकर्ण, नारद, विश्वमना, वैवस्वत मनु, कश्यप, भर्ग, कलि, मत्स्य आदि।

इन ऋषियों ने जिन देवताओं की स्तुति इन सूक्तों में की है, उनके नाम ये हैं :-

अग्नि, वायु, इन्द्र, वरुण, मित्रावरुण, अश्विनी कुमार, विश्वेदेव, सरस्यप्ति, ऋतु, मरुत, सोम, दक्षिण, इन्द्राणि, द्यौः, पृथ्वी, विष्णु, पूषण, सविता, उषा, आर्यमा, आदित्य, रुद्र, सूर्य वैश्वानर, सिन्धु, वृहस्पति, वाक्, रति, अन्न, वनस्पति, राका, थूप, पर्वत, वाददेव, क्षेत्रपति, सीता, घृत, पर्जन्य, धेन्ड, पिन्ड, मृत्युः, धाता, वैकुण्ठ, आत्मा, ज्ञान औषधयः, श्रद्धा शचि आदि।

ऋग्वेद के सूक्तों में स्तुतियों की ही अधिकता है। स्तुतियों के देवताओं के नाम ऊपर दिए गए हैं। जो लोग देवताओं की अनेकता नहीं मानते वे इन सब नामों का अर्थ परब्रह्म या परमात्मा ही बतलाते हैं। जो लोग अनेक देवता मानते हैं वे भी इन स्तुतियों का लक्ष्य परमात्मा ही मानते हैं, क्योंकि उनके मतानुसार ये सभी देवता और समस्त सृष्टि परमात्मा की विभूति है। इसलिए वह वरुण को जल के देवता, अग्नि के तेजस् के देवता, द्यौः को आकाश के देवता, इत्यादि रूप से परमात्मा की विभिन्न शक्तियों के अधिपति ही मानते हैं। जहाँ पृथ्वी की स्तुति हैं, वहाँ पृथ्वी के ही गुणों का वर्णन है। पृथ्वी परमात्मा की सृष्टि और उसी की विभूति है। इसलिए परमात्मा की विभूति की स्तुति दूसरे शब्दों में परमात्मा की ही स्तुति है। इस प्रकार की स्तुतियों और उनके सम्बन्ध की प्रार्थनाएं उपासना काण्ड के अंतर्गत हैं।

इसके सिवा ऋग्वेद में बहुत से इस प्रकार के मन्त्र भी बीच-बीच में दिए गए हैं जिनसे दुर्दैव मिट सकता है, गर्भ की रक्षा हो सकती है, गौ आदि पशुधन की रक्षा हो सकती है, राजयक्ष्मा रोग मिट सकता है, दुःस्वप्न की बाधा दूर हो सकती है, सपत्नीक अत्याचार से रक्षा हो सकती है, प्रतिस्पर्धी से छुटकारा मिल सकता है, एकता की स्थापना हो सकती है आदि। अनेक सूक्त ऐसे भी हैं जिनमें स्तुति के साथ-साथ सृष्टि-क्रम का विशद और रहस्यमय वर्णन है। सृष्टि और देवता सम्बन्धी इतिहास, पुराण, सभ्यता के विकास की कथाओं की चर्चा भी जहाँ-तहाँ आई है।

इस संहिता में सबसे अधिक स्तोत्र अग्नि, पृथ्वी के देवताओं और मनुष्यों के बीच सम्बन्ध स्थापित रखने वाला देवता है। अग्नि के सहारे ही और देवता बुलाए जाते हैं। इनके बाद इन्द्र के स्तोत्र अधिक हैं। वह अति शक्तिशाली, मेघों को चलाने वाला और वज्र का उपयोग करने वाला है। वर्षा से ही पृथ्वी, अन्न और धन से समृद्ध होती है और वर्षा इन्द्र ही कराते हैं। वृत्रासुर से युद्ध, मेघ-वृष्टि, वज्रपात आदि के वर्णन में अनेक ऋचाएं हैं। ऊषा की कोमल, मधुर, सुनहली किरणों को देखकर ऋषियों के हृदय में जिस कोमल कविता के भाव का संचार हुआ और उसमें डूबकर जो ललित पद्य उन्होंने लिखे ऋग्वेद से उनका यथेष्ट परिचय मिलता है। अन्धकार को मिटाने, प्रकाश देने, हिम को नष्ट करने, जीवन शक्ति देने, अनाज को उत्पन्न करने और बुद्धि को प्रेरणा देने वाले भगवान भास्कर ही हैं और ऊषा उनकी अग्रगामिनी है। सूर्य ही प्राणशक्ति के मूल आधार हैं, इसलिए ऋषियों ने सूर्य का भी बहुत स्तवन किया है। इनके सिवा मित्र, वरुण, अश्विनीकुमार, विश्वेदेव, सरस्वती, सूनृता, मरुद्गण, अदिति, सोम आदि देवताओं के भी स्तोत्र हैं। कृषि-कार्य, मेष-पालन, देश-भ्रमण, वाणिज्य, समुद्रगमन, नदियों का भौगोलिक विवरण, देवताओं की गायें और घोड़े, प्राचीन काल के मनुष्यों की परमाणु, वस्त्र-निर्माण, नाई, शिरस्त्राण, जिरह बख्तर, वाद्य-यन्त्र, अनार्यों के साथ युद्ध, सर्प का उत्पात और सर्प-मन्त्र आदि का भी वर्णन मिलता है। युद्ध के घोड़े, हाथी पर सवार राजा, पत्थर के मकानों के नगर, सरयू के पूर्व में आर्य राज्य का विस्तार आदि विषयों पर भी प्रकाश डाला गया है। भारतवर्ष की नदियों जैसे दृषद्वती, आपया, यमुना, रसा, कुभा, सरस्वती, परुण्णी, अनितमा, सिन्धु, गोमती, शतद्रु, शर्यणावती, जाह्नवी, अर्जीकिया आदि का उल्लेख मिलता है। अनेक मन्त्रों में मुद्रा या सिक्के का प्रचलन, धातु का गलाना, विभिन्न प्रकार के आभरण, युद्धरथ, सुदास नामक राजा का विवरण, कृष्ण नामक अनार्य योद्धा, समुद्र-मन्थन से अमृत लाभ, गरुड़ द्वारा अमृतहरण, अमृतयान से देवगण का अमरत्व आदि विविध विषयों का परिचय मिलता है। इस प्रकार अनेक प्रकार के धार्मिक, वैज्ञानिक, गृहस्थी, सम्बन्धी, ऐतिहासिक विषय कम या अधिक परिमाण में ऋग्वेद में पाये जाते हैं।


दान का उद्देश्य सामाजिक कल्याण होना चाहिए।

(श्री बाड़ीलाल शाह)

दान का अर्थ क्षमा भी है। किसी ने अनजानपन में कोई नुकसान कर दिया हो- शरीर से मन से, वचन से- तो यह उसकी बुद्धि का अपराध नहीं है, ऐसा समझकर उसके प्रति सहज भाव से क्षमादान करना भी दान का ही एक अंग है।

जान-बूझकर कोई शरीर से, मन से, अथवा वचन से नुकसान करे, तो यह उसकी बुद्धि का अपराध है। इस ‘कृत्य’ को अपराध के रूप में समझना चाहिए, पर क्रोध न करना चाहिए। क्रोध करना अपनी बुद्धि की निर्बलता साबित करने के समान है।

अपराधी को यों ही छोड़ देना, इसका अर्थ है मानसिक निर्बलता। पर अपराधी को न छोड़ने का अर्थ यह भी नहीं समझना चाहिए कि कानून को अपने हाथ में ले लिया जाय। अपराधी का फटकारने से वह सुधर जायगा, यह विचार भी भ्रमपूर्ण है। इसलिए उपयुक्त अधिकारी के सामने अपराध को प्रकट कर देना, यही उचित मार्ग है। पर यह कार्य भी बैर या बदले की भावना से नहीं, वरन् इस उद्देश्य से करना चाहिए कि समाज की व्यवस्था में गड़बड़ी न फैले। इस प्रकार का उच्च उद्देश्य ही वास्तविक क्षमा है। ऐसी उदारता से अपने चित्त को भी शाँति मिलती है।

अगर कोई हमारा व्यक्तिगत नुकसान करता है तो उसे क्षमा कर देने का हमको अधिकार है। पर जान-बूझकर समाज अथवा देश का जो नुकसान किया जाय उसे क्षमा करने का अधिकार किसी एक मनुष्य को नहीं है। जो मनुष्य समाज अथवा देश की इच्छापूर्वक की गई हानि को देखकर चुप रह जाते हैं, वे क्षमाशील नहीं हैं, वरन् कायर हैं, संकुचित दृष्टि वाले हैं, स्वार्थी हैं। वे अपने ही घर अथवा कुटुम्ब में समस्त संसार का समावेश मानने वाले होते हैं।

व्यापक बुद्धि का उपयोग करते हुए क्षमा करना ही वास्तविक क्षमा है। छोटी बुद्धि से, अथवा बुद्धि का बिलकुल उपयोग न करके किसी का बुरा काम सहन करना यह क्षमा नहीं है बल्कि अन्तःकरण की कमजोरी है। क्षमा एक वीर का, अन्तःकरण की शक्ति वाले मनुष्य का गुण है। निर्बलों की दिखावटी क्षमा ही जाति और देश का विनाश करने वाली होती है।

दुखी के प्रति मन से करुणा का भाव रखना दान है। किसी का दुःख दूर हो अथवा कम हो सके ऐसी सलाह देना भी दान है। दुःखी को दिलासा मिले, हिम्मत मिले अथवा वह कुछ समय के लिए दुःख को भूल जाय, ऐसा बोलना भी दान है। भूखे-प्यासे को अन्न-जल देना दान है। स्वयं किसी को विद्या देना या दिलवाना भी दान है। मार्ग से भटके हुओं को ठीक रास्ता दिखला देना, लोक हित के सुव्यवस्थित कार्य में द्रव्य से, सिफारिश से, शारीरिक श्रम से मदद करना, बीमार की सेवा-सुश्रूषा करनी या करानी भी दान है। घर, आँगन, मोहल्ला, गाँव को साफ रखना या रखाना सार्वजनिक दान है।

जाति में से हानिकारक रूढ़ियों और अज्ञान दूर हो ऐसा प्रयत्न करना या कराना और ऐसा प्रयत्न करने वालों को यथाशक्ति सहयोग देना दान है। सुखी अथवा ज्ञानी व्यक्ति को देखकर खुशी होना भी दान है। अपने को हर रोज कुछ नया ज्ञान अथवा अनुभव मिले इसका ध्यान रखना यह भी स्वदया अथवा श्रेष्ठ दान है।

दान के लिए सम्पत्तिशाली होने की राह देखनी अनावश्यक है। दान का मूल्य खर्च की गई रकम के आधार पर नहीं समझना चाहिए वरन् इस बात को समझना चाहिए कि कितनी गहरी सहानुभूति से और कितने विवेक से दान किया गया। विवेक का अर्थ है सब अंगों का विचार। ऐसे विवेक के बिना दिया गया दान ‘पाप’ रूप भी हो सकता है। जिस विचार, वाणी अथवा कृत्य से अपने या दूसरों के शरीर, मन, बुद्धि, चित्त अथवा व्यक्तित्व को हानि पहुँचे- किसी प्रकार का पतन हो, वह पाप है। इसके विपरीत जिस विचार, वाणी अथवा कृत्य से अपना या दूसरे का हित हो, निर्मलता प्राप्त हो, उन्नति हो, तो वह पुण्य है।

शक्ति के होते हुए, बुद्धि और हृदय द्वारा दी गई दान की आज्ञा को अनसुना कर देना ‘प्रमाद’ है प्रमाद एक बहुत बड़ा पाप है, क्योंकि उससे व्यक्तित्व दब जाता है। दान-बुद्धि जैसे-जैसे प्रबल होती है, वैसे ही वैसे व्यक्तित्व अधिक विकसित होता जाता है। पूर्ण रूप से विकसित व्यक्तित्व ही देवत्व अथवा दिव्यता कहा जाता है और बिलकुल दबा हुआ व्यक्तित्व ही नरक अथवा पतन का द्योतक है।

जिस समाज में दान-बुद्धि नहीं होती, उस समाज में संगठन, सुव्यवस्था, समझौता और प्रगति कदापि सम्भव नहीं होती। खाना, पीना, पहिनना और देखना- यह आवश्यक है, इसलिए कि इनके द्वारा रक्षा और विकास होता है। पर जो मनुष्य खाना, पीना, पहिनना और देखना, इनके लिए ही जीवित रहता है, वह मन का गुलाम है, उसकी बुद्धि, चित्त, व्यक्तित्व बिल्कुल दबे हैं। वह जानवर है। ‘जानवर’ से दान नहीं हो सकता, दान तो देव-देवी ही कर सकते हैं।

धन की गुलामी, मौज-शौक की गुलामी, हृदय हीन बुद्धि की गुलामी, ये सब बातें दान नहीं करने देतीं। जिसने दान-गुण का विकास नहीं किया है, उससे शील, तप और भावना हो ही नहीं सकते। सहज से सहज गुण दान-गुण है, समस्त गुणों का आधार दान-गुण पर रहता है।

सावधान! धूर्त अथवा पाखण्डी लोगों को दान करोगे तो इससे समस्त मनुष्य समाज के प्रति द्रोह करने का पाप होगा। सावधान! दान का घमण्ड करोगे तो व्यक्तित्व का नाश कर बैठोगे। लाभ के बजाय उल्टी हानि उठानी पड़ेगी। सावधान! दान अथवा शील, तप आदि कुछ करो वह अपने अन्तःकरण की शुद्धि की दृष्टि से, अपने व्यक्तित्व के विकास के उद्देश्य से करो, उसमें ‘परोपकार’ मत समझो।

लोगों की वाह-वाह घड़ी भर की है, पचास की चोरी करके पाँच का दान करने वालों की भी लोग वाह-वाह करते हैं, किसी महत्व के कार्य के लिए सर्वस्व खर्च कर देने वाले की लोग वाह-वाह के बदले उल्टी हँसी भी करते हैं और आज जिसकी वाह-वाह करते हैं कल उसी की निन्दा भी करते हैं। इसलिए लोगों के स्वभाव को समझकर ‘वाह-वाह’ रूपी बला से दूर ही रहना- यही सच्चे विवेक और स्वदया का लक्षण है।

‘दया करो’-’दया करो’ इसी प्रकार तुम चारों तरफ से सुनते रहोगे। पर अपने दिल को मजबूत बनाओ और लोक प्रवाह में बह जाने से रोको। मैं तुमसे कहता हूँ कि स्वदया करो! स्वदया करो! अपने प्रति सच्चे रहो- इसके द्वारा सबकी तरफ सच्चे रहने का प्रयत्न अपने आप हो जायगा।

मेरा कहना यही है कि अगर बुरी भावना वाले व्यक्ति के हाथों में अपनी पतवार दोगे तो समझ लो कि तुम्हारा जहाज डूब गया। खोटी बुद्धि वाले को संचालक बनाने से तुम एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकोगे। बुद्धि और सहानुभूति की सहायता से ही तुम्हारा जीवन-जहाज सही सलामत यात्रा कर सकेगा।


‘योग‘ का वास्तविक स्वरूप

(महामहोपाध्याय गंगानाथ झा, एम.ए.डी.लिट)

‘योग‘ के विषय को लोगों ने ऐसा जटिल बना रखा है कि इसका नाम ही भयंकर हो गया है। इसका कारण यह है कि इधर कुछ समय से लोग ‘योग‘ शब्द से केवल ‘हठयोग‘- केवल आसन, मुद्रा आदि को समझने लगे हैं। आसन, मुद्रा आदि एक तो स्वयं जटिल विषय हैं, दूसरे इन शारीरिक क्रियाओं से आध्यात्मिक लाभ क्या हैं और कहाँ तक हो सकता है सो भी समझना कठिन है। बात तो यों है कि अभ्यासात्मक योग के सब तत्वों को समझना गुरु के बिना कठिन है। परन्तु थोड़ा-सा विचार करने से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि ‘हठयोग‘ यद्यपि योग का अंग अवश्य है, पर तो भी वह केवल एक अंग है, स्वयं योग नहीं। अर्थात् वह योग का एक साधन मात्र है और सो भी प्रधान नहीं।

ऐसे अंग योग के आठ कहे गए हैं- (1) यम, (2) नियम, (3) आसन, (4) प्राणायाम, (5) प्रत्याहार, (6) धारणा, (7) ध्यान, (8) समाधि। इनमें पाँच योग के बाह्य अंग हैं बाकी तीन अन्तरंग (योगभाष्य 3।1) ये तीन हैं धारणा, ध्यान, समाधि। ये ही तीन प्रधान हैं। कारण यह कि ये ही तीन प्रक्रियाएँ ऐसी हैं जिनका उपयोग सब कार्यों में होता है। जब किसी ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा हो तो उसके लिए जब ये तीनों लगाई जाती हैं तभी वह ज्ञान उचित रूप में प्राप्त होता है। जब तक ज्ञेय पदार्थ पर मन एकाग्र रूपेण नहीं लगाया जाता तब तक उनका ज्ञान असम्भव है। इसलिए प्रथम श्रेणी हुई यही एकाग्रता, जिसे ‘धारणा’ कहा है (सू. 3-1) इसके बाद जब मन बहुत काल तक इसी प्रकार एकाग्र रहे तो यह हुआ ध्यान (सू. 3-2) और जब मन इस ध्यान में इस तरह मग्न हो जाय कि ध्येय पदार्थ में लय हो गया तो यही हुई समाधि। (सू. 3-3) किसी कार्य के सम्पन्न होने में इन तीनों की आवश्यकता होती है। यह केवल आध्यात्मिक अभ्यास या ज्ञान के ही लिए आवश्यक नहीं है, प्रत्येक कार्य के लिए इनका होना अनिवार्य है। कोई भी कार्य हो जब तक उसमें मन नहीं लगाया जाता, कार्य सिद्ध नहीं होता। इसी मन लगाने को धारणा, ध्यान, समाधि कहते हैं।

ये तीनों एक ही प्रक्रिया के अंग हैं। इसी से इन तीनों का एक साधारण नाम ‘संयम’ कहा गया है। (सू.3-4।) इसी ‘संयम’ अर्थात् धारणा, ध्यान, समाधि से ज्ञान की शुद्धि होती है।

योग-सूत्रों में वर्णित इन उपदेशों को जब हम मामूली कामों में लगाते हैं और इनके द्वारा सफलता प्राप्त करते हैं, तब हमको मानना पड़ता है कि ‘योग‘ का सबसे उत्कृष्ट और उपयोगी लक्षण वही है जो भगवान ने कहा है-

‘योगः कर्म सु कौशलम्’

इस ‘योग‘ के अभ्यास के लिए प्रत्येक मनुष्य को सदा तैयार रहना चाहिए। ‘गुरु मिलें तब तो योगाभ्यास करें’ ऐसे आलस्य के विचार निर्मूल हैं। जो कोई कर्त्तव्य सामने आ जाय उसमें ‘संयम’ (अर्थात् धारणा, ध्यान, समाधि) पूर्वक लग जाना ही योग है। इसमें यदि कोई स्वार्थ-कामना हुई तो यह योग अधम श्रेणी का हुआ और यदि निष्काम है- कर्त्तव्य बुद्धि से किया गया है और फल जो कुछ हो ईश्वर को अर्पित है तो यही ‘योग‘ उच्च कोटि का हुआ। जब अपने सभी काम इसी रीति से किये जाते हैं तो वही आदमी ‘जीवन मुक्त’ कहलाता है।

कैसा सुगम मार्ग है। पर लोगों ने दुर्गम बना रखा है। मन की ‘लाग‘ चाहिए-तत्परता, तन्मयता। यह कठिन नहीं है- दूसरे किसी की आवश्यकता नहीं है- अपने हाथ का खेल है। पर श्रद्धा और साहस चाहिए।

इसमें शास्त्रार्थ या तर्क-वितर्क की जरूरत नहीं है। इसको कोई भी आदमी, किसी सामान्य कार्य के प्रति इस प्रक्रिया की परीक्षा करके स्वयं देख सकता है। पर आरम्भ में श्रद्धा और आगे चलकर साहस की आवश्यकता होगी, जिससे प्रक्रिया अपनी चरम कोटि तक पहुँच जाय।


सुखी वृद्धावस्था

(श्री रामखेलावन चौधरी, लखनऊ)

भारतीय परिवारों में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि वृद्धजनों को अनेकानेक कठिनाईयाँ उठानी पड़ती हैं और उनका अन्तिम जीवन बड़े कष्ट से बीतता है। बहुत ही कम ऐसे परिवार हैं जिनमें वृद्धजनों का शासन चलता है अथवा उनका सम्मान होता है। कुछ तो अक्षम और रुग्ण रहकर अपमान और अवज्ञा की कड़ुई घूंट पीते हुए जीवनयापन करते हैं और अंत में बड़ी ही करुणा अवस्था में अपनी इहलीला समाप्त करते हैं और कुछ अपनी सन्तानों के होते हुए असहाय बनकर दर-दर की ठोकरें खाते हैं। सौभाग्य से ही कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अपने यौवन काल में पर्याप्त धन राशि जुटा लेने के कारण अपनी सन्तानों के प्रीति भोजन बने रहते हैं और उनका जीवन संकटापन्न नहीं होता। उनका यह सुख भी असली सुख नहीं है; वास्तव में उनके उत्तराधिकारी लोभवश ही उनका आदर-सम्मान करते हैं परन्तु मन ही मन उनके परलोक सिधारने की कामना करते हैं। ऐसी स्थिति में इनकी वृद्धावस्था को भी सुखी कहना उचित नहीं जान पड़ता।

आमतौर से विचारकों की यह धारणा है कि एक वृद्ध का जीवन केवल इसलिए दुखी होता है कि उनके हाथ में धन नहीं रहता और वह अपनी जीवन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य जनों पर निर्भर हो जाने के कारण परोपजीवी बन जाता है। इसी से उसकी उपस्थिति सबको खलती है। यदि वह आत्मनिर्भर हो जाय तो उसकी विपत्ति दूर हो सकती है। इस दृष्टि को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार अत्यन्त वृद्धजनों को पेंशन देने की योजना बनाने जा रही है और सरकारी नौकरों को अवकाश प्राप्त करने के बाद पेंशन देती भी रही है। क्या ऐसी योजनाओं से वृद्धों की समस्त-समस्याओं का हल हो सकेगा? तनिक भी विचार करने के पश्चात स्पष्ट हो जायगा कि इस प्रकार की सरकारी आर्थिक सहायता से केवल आँशिक लाभ ही वृद्धजनों को होगा। उनकी बहुत सी कठिनाइयाँ मनोवैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबन्धी हैं, जिनके सही ढंग से हल होने पर ही वृद्धावस्था का सुख निर्भर है। इन्हें हल करने के लिए परिवार और समाज का सहयोग अपेक्षित तो है ही साथ ही वृद्धजनों को स्वयं ही विचार करना होगा और अपने दृष्टिकोण में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करना होगा।

वृद्धावस्था का प्रारम्भ 55 से 60 की आयु के बाद माना जाना चाहिए। इस आयु में दो महत्वपूर्ण घटनाएँ घटित होती हैं। एक तो आमतौर से पुरुष सन्तानोत्पत्ति के कार्य में अक्षम सिद्ध होने लगता है। (स्त्रियाँ कुछ पहले से प्रजनन कार्य के लिए असमर्थ हो जाती हैं) दूसरे उसे अपने व्यवसाय से अवकाश ग्रहण करना होता है। जो लोग नौकरी करते हैं, उन्हें मजबूरन अवकाश लेना पड़ता है और जो व्यापार आदि करते हैं, वे भी अपने को अशक्त अनुभव करने लगते हैं। उनका काम केवल दुकान पर बैठने का होता है और परिवार के नवयुवक कहने लगते हैं कि अब आप विश्राम करें, घर बैठें आदि। इन बातों के मनोवैज्ञानिक परिणाम बड़े ही महत्वपूर्ण होते हैं। अतः इस समय को संक्राति-काल कहना उचित होगा।

प्रारंभ में वृद्धावस्था में पदार्पण करते ही मनुष्य के मन में बड़ा भीषण संघर्ष उत्पन्न होता है। अभी तक परिवार में उनकी सत्ता अवधि थी; हर मामले में उसका एकाधिकार था; दस आदमी उसका कहना मानते थे परन्तु अब स्थिति उल्टी हो जाती है। अब उसे दूसरों का संरक्षण चाहिए, उसकी शारीरिक शक्तियाँ निर्बल हो जाती हैं और वह यह समझने लगता है कि बेकार की वस्तु हूँ। एक ओर असमर्थता की भावना दूसरी ओर शक्ति बनाए रखने का मोह- इन दोनों प्रवृत्तियों के संघर्ष पर यदि वृद्ध मनुष्य अपने विवेक द्वारा विजय नहीं प्राप्त कर लेता, तो वह स्वयं ही दुःख का बीज बोता है। परिवारों में पिता या पितामह चाहते हैं कि हमारा कहना चले। यह भावना ही उनके दुख का मूल है। परिवार में नयी शक्तियों के उत्पन्न होने पर जर्जर शक्तियों का चाहे वे पहले कितनी ही उपयोगी रही हों, टिकना संभव नहीं है। यदि वृद्धजनों को सुखी होना है, तो उन्हें उस सत्य को ग्रहण कर लेना चाहिए और शक्ति और सत्ता बनाये रखने की मृगमरीचिका के भुलावे में नहीं पड़ना चाहिए।

यह बात निःसंकोच स्वीकार करनी पड़ती है कि हम भारतीय जनों के पूर्वज आर्य बड़े ही दूरदर्शी थे। उन्होंने इस सत्य को ध्यान में रखते हुए ही मानव जीवन को चार भागों में विभाजित करके चार आश्रमों की परिकल्पना की थी। उन्होंने यौवनकाल और प्रौढ़ावस्था के बाद आसक्ति से दूर रहकर विराग का जीवन अपनाने का जो संदेश किया था, उससे उनकी मनोवैज्ञानिक सूझ का परिचय मिलता था। वृद्धावस्था के प्रारंभ होते ही घर को छोड़ देना और परिवार जनों से आसक्ति का सम्बन्ध विच्छिन्न करके वैराग्य धारण करना उस भयानक मानसिक संघर्ष का अन्त करना था जिससे हमारे अनेक वृद्धजन पीड़ित रहते हैं। यदि जीवन को सुखी बनाना है, तो उसी पुरानी व्यवस्था को कुछ हेर फेर करके अपना लेने से संकोच करना उचित नहीं है। हम भारतीय अपनी प्राचीन संस्कृति की प्रशंसा तो खूब करते हैं परन्तु उसके उपयोगी तत्वों को ग्रहण नहीं करते। यदि जीवन के अंतिम दिनों में तटस्थ होकर वैराग्यपूर्ण जीवन बिताने के लिए मनुष्य कटिबद्ध हो जाय तो उसकी वृद्धावस्था निश्चय ही सुखी होगी।

वृद्धजनों के दुखी और असन्तुष्ट होने का एक कारण और है और वह है उनकी अनुदारता। वे जिस जमाने में पैदा होते हैं, उसी जमाने की परम्पराओं का पालन करते जाते हैं, समय के परिवर्तन और युग धर्म की उपेक्षा करते हुए वे संकुचित मनोवृत्ति अपनाये रहते हैं। बात यह है कि हमारे यहाँ अशिक्षा के कारण वृद्धजन नई विचारधाराओं को ग्रहण नहीं कर पाते। हर्ष का विषय है कि हमारी राष्ट्रीय सरकार प्रौढ़ शिक्षा और सामाजिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था कर रही है। वृद्धजन इस व्यवस्था से लाभ उठाकर अपने विचारों की संकीर्णता दूर कर सकते हैं। यदि वृद्धजन पठन-पाठन की आदत डाल लें, तो उनकी यह कमी दूर हो सकती है।

प्राचीनकाल में वृद्धजनों के लिए धर्माचार और संन्यास आदि का विधान किया गया था। इस भौतिक युग के वातावरण में पला हुआ व्यक्ति अपनी मनोवृत्तियों को वृद्धावस्था में बदलने में असमर्थ होता है। बहुत कम लोग पूजा पाठ और ध्यान की ओर प्रवृत्त हो पाते हैं। ऐसे लोगों के लिए आज सैंकड़ों दूसरे द्वार खुले हुए हैं। प्रजातन्त्र का युग है, चारों ओर राष्ट्र की सेवा और समाज सेवा की चर्चा चल रही है। वृद्धजन अपने समय का सदुपयोग इन रचनात्मक कार्यों में कर सकते हैं। ऐसे अनेक सद्व्यसन हो सकते हैं, जिनके द्वारा वृद्धजनों का मनोरंजन हो सकता है और साथ ही उनके द्वारा समाज को बड़ा लाभ पहुँचा सकते हैं। घरों की सफाई, मरम्मत, बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा, साधारण रोगों के उपचार, अतिथियों का स्वागत-सत्कार, घर की देख-रेख और सुरक्षा आदि अनेक ऐसे कार्य हैं, जिनको रुचिपूर्वक करते हुए वृद्धजन अपने को उपयोगी सिद्ध कर सकते हैं। ऐसे बहुत से कार्य हैं, जिनमें शारीरिक शक्ति की उतनी आवश्यकता नहीं होती, जितनी बुद्धिबल की। अनुभवी वृद्धजन इन्हें करके अपनी प्रतिष्ठा बनाये रख सकते हैं और आत्म-सन्तोष भी प्राप्त कर सकते हैं।


त्याग द्वारा ही शक्ति प्राप्त हो सकती है।

(श्री लालजीराम शुक्ल)

मनुष्य के मन में जितनी शक्ति है उसका न तो उसे कभी ज्ञान हो पाता है और न वह उसका उपयोग कर पाता है। जितनी शक्ति हमारे मन में है, उसका क्षुद्र भाग ही हम जानते हैं और उसी से हम अपना काम चलाते हैं। एक मनुष्य और उस मनुष्य के व्यक्तित्व में और कोई भी भेद नहीं है, भेद केवल अपनी शक्तियों का साक्षात्कार करने का है। हम जितनी शक्ति प्रकृति से माँगते हैं उतनी शक्ति हमें मिलती है और जितनी हम नहीं माँगते उतनी नहीं मिलती। परन्तु प्रकृति हमारी माँग के साथ-साथ यह भी देखती है कि उस शक्ति का उपयोग क्या करेंगे। कहा जाता है कि ‘खुदा गंजे को नाखून नहीं देता’। इसी प्रकार प्रकृति उस व्यक्ति को अलौकिक शक्ति नहीं देती जो उसका सदुपयोग करना नहीं जानता। जो व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ही अपनी सारी मानसिक शक्तियों को काम में लाना चाहता है वह उन शक्तियों का अपने आप में जागरण नहीं कर पाता। जिस व्यक्ति के कार्यों का लक्ष्य जितना महान् होता है; उसके मन में अनायास उतनी ही अधिक शक्ति आ जाती है।

संसार का यह अटल नियम है कि देने और लेने पर पलड़ा सदा बराबर रहता है। जहाँ कुछ खर्च और त्याग नहीं होता वहाँ प्राप्ति भी नहीं होती। जो मनुष्य अपना धन दूसरों की सेवा में खर्च करता है वह लोक सम्मान और लोक ख्याति को प्राप्त करता है। लोक-सेवा लोकप्रियता लाती है। इसी प्रकार संसार के साधारण सुखों का त्याग मनुष्य को अलौकिक मानसिक शक्ति का जागरण करता है। हमारे त्याग से लौकिक सफलता और लौकिक सुख सुलभ हो जाते हैं। परन्तु जो व्यक्ति अपने आपको इन सुखों और सफलता में भुला देता है वह फिर अपनी उस शक्ति को खो देता है जिसके कारण ये सुलभ हुए।

मनुष्य का जितना त्याग होता है उसकी शक्ति भी उतनी ही अधिक होती है। बिना किसी त्याग के किसी प्रकार की मानसिक शक्ति का विकास नहीं होता। विद्या में लगन मनुष्य को विद्वान बनाता है, धन में लगन धनवान, इसी प्रकार आत्मज्ञान में लगन रखने वाले व्यक्ति को आत्म-ज्ञान होता है। सभी बातों की प्राप्ति के लिए त्याग की आवश्यकता होती है। बहुत से लोगों में संकल्प सिद्धि होती है। यह सिद्धि उन्हीं लोगों में पाई जाती है जिन्हें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं रहता। मनुष्य की वैयक्तिक इच्छाएं उसके मन में अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प पैदा करती हैं। इन संकल्प-विकल्पों में उसकी शक्ति नष्ट हो जाती है। जब तक मनुष्य की शक्ति एक ओर केन्द्रित नहीं होती वह कोई भी बड़ा कार्य करने में समर्थ नहीं होता। परन्तु अपनी शक्ति को एक ओर केन्द्रित करने के लिए अपने लक्ष्य को व्यापक और ऊँचा बनाना आवश्यक है।

विचार की शक्ति से मनुष्य अपने अनेक प्रकार के कष्टों से मुक्त हो जाता है। वह अनेक प्रकार के रोगों का अन्त कर सकता है। इसमें वह अपनी स्मरण-शक्ति को अतुलित बना सकता है। वह दूसरे लोगों के विचारों को भी जान सकता है। वह अपने दैनिक जीवन की समस्याओं को सरलता से ही हल कर सकता है। परन्तु इन सब बातों के लिए त्याग की आवश्यकता होती है। जहाँ त्याग नहीं वहाँ किसी प्रकार की प्राप्ति भी नहीं होती। मनुष्य का मन त्याग से बली होता है और ग्रहण से निर्बल होता है। जब मनुष्य का मन भोगासक्त हो जाता है तो उसमें निर्बलता आ जाती है। ऐसे व्यक्ति को अनायास कोई अभद्र विचार आ घेरता। फिर इन विचारों के अनुसार व्यक्ति संसार में यन्त्रणा पाने लगता है। मनुष्य जब अनेक प्रकार के कष्ट भोगता है तो उसमें त्याग की मनोवृत्ति अपने आप ही आ जाती है। इस मनोवृत्ति के आने पर मन का भार उतर जाता है। फिर मन में वह बल आ जाता है जिसके कारण वह शुभ निर्देशों को ग्रहण कर सके। निर्बल मन के व्यक्ति को बुरे ही विचार सूझते हैं और प्रबल मन के व्यक्ति को भले विचार सूझते हैं।

मनुष्य के मन की अलौकिक शक्ति को उसके रोग के उत्पादन और उसके विनाश में देखा जाता है। कितने ही मनुष्य ऐसे रोगों के भय से मर जाते हैं जो उन्हें अन्यथा घातक न होते। प्लेग के भय से जितने लोग मरते थे उतने प्लेग से नहीं मरते थे। फिर कितने ही लोग अपने आपके जीने के दृढ़ निश्चय से घातक रोगों से बच जाते हैं। पर इस प्रकार का दृढ़ निश्चय वैयक्तिक इच्छामात्र से नहीं आता। इसके लिए समष्टि की इच्छा की आवश्यकता होती है जिस व्यक्ति का जीना उससे सम्बन्ध रखने वाले अनेक लोग चाहते हैं वह मृत्यु उससे सम्बन्ध रखने वाले सभी लोग चाहने लगते हैं वह देव लोक चला जाता है। उसका अपना चाहना भी उसी ढंग का हो जाता है जिस प्रकार का दूसरे लोगों का उस विषय में चाहना होता है। यह चाहना कभी-कभी फल का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार मृत्यु का भय भी आन्तरिक मन की इच्छा का प्रतीक है।

मनुष्य अपने अभद्र विचारों से सरलता से मुक्त नहीं होता। इसके लिए भी त्याग की आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति जितना ही अधिक त्याग करता है वह अपने विचारों को उतना ही अधिक सृजनात्मक बना लेता है। जीवन के सभी संकल्पों और इच्छाओं का त्याग कर देना मनुष्य को दैवी शक्ति प्रदान करता है। परोपकार के निमित्त लाये गए विचारों में जो बल होता है वह स्वार्थयुक्त विचारों में नहीं रहता। यही कारण है कि किसी भी सन्त महात्मा के दर्शन का एक लाभ यह होता है कि हममें भी उसी प्रकार के त्याग की शक्ति आ जाती है जो महात्मा में होती है। मनुष्य के जिस प्रकार दुर्गुण संक्रामक होते हैं उसके सद्गुण भी संक्रामक होते हैं। चतुर और चालाक मनुष्य अपने आस-पास के लोगों में चतुराई और चालाकी के विचार फैला जाता है और सरल, चित्त व उदार व्यक्ति अपने आस-पास के लोगों में सरलता और उदारता फैला जाता है।

परन्तु यह बात निश्चित है कि बिना दिए कुछ नहीं मिलता। मानसिक रोगों की चिकित्सा में देखा गया है कि जो लोग मैत्री भावना का अभ्यास करते हैं, वे मानसिक रोगों से सरलता से मुक्त हो जाते हैं। मैत्री भावना का सक्रिय होना आवश्यक है। मैत्री भावना से त्याग करना सरल हो जाता है। इससे रोगी का मन बलवान होता है। फिर जब रोगी का मन बली हो जाता है तो उसे किसी भी प्रकार के सन्निर्देश प्रभावित करते हैं। वे उसके आरोग्य को बढ़ाते हैं। उसके विचारों में उसे आरोग्य प्रदान करने की शक्ति तब आ जाती है जब वह उसके लिए पर्याप्त त्याग करता है। जिस व्यक्ति को मृत्यु का भय सताता हो वह यदि अपने जीवन का उद्देश्य लोक-सेवा बना ले तो उसकी मृत्यु का भय ही नष्ट हो जाय। जिस व्यक्ति को मनुष्य जोर से पकड़े रहता है उसी के विषय में उसे भय होता है। जीवन-मरण के प्रति उदासीनता का भाव मनुष्य को मृत्यु के प्रति निर्भीक बना देता है।

यदि मनुष्य चाहे तो अपने संपर्क से किसी भी व्यक्ति के विचार बदल दे। परन्तु यह तभी होता है जब उसका जीवन तप और त्यागमय होता है। जिस मनुष्य का अपने आपके विचारों पर जितना अधिक अधिकार होता है, उसका दूसरे व्यक्ति के विचारों पर भी उतना ही अधिक अधिकार होता है। अपने विचारों पर अधिकार प्राप्त करने के लिए उन्हें अपनी वासनाओं से मुक्त होना पड़ता है। जब तक मनुष्य का विचार इच्छा से नियन्त्रित रहता है तब तक उसका मन डावाँडोल रहता है, ऐसा व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के मन पर भी कोई प्रभाव नहीं पल पाता। इच्छा का त्याग करने पर अपने विचार परमात्मा के विचार बन जाते हैं। फिर वे अपने आपके संपर्क में आने वाले लाखों को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार भगवान कृष्ण, बुद्ध, कबीर, कृष्ण आदि के विचार आज भी संसार के लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं। वे दूसरे लोगों के हृदय पर इसलिए अधिकार कर लेते हैं क्योंकि उनके विचारों में व्यक्तिगत स्वार्थ की शून्यता है।

कितने ही लोग जप, होम, यज्ञ आदि से विचार की शक्ति का विकास करते हैं। इस प्रकार जो शक्ति बढ़ती है वह क्षणिक होती है। यह एक प्रकार से आत्म-निर्देश से अपनी शक्ति को बढ़ाना है। परन्तु इस शक्ति को स्थायी रखने के लिए सतत त्याग की आवश्यकता है। सच्ची शक्ति तो मनुष्य को आत्मा से ही मिलती है। जो मनुष्य सोचता है कि उसकी आत्मा भली है, उसका लक्ष्य भला है वह महान शक्ति का केन्द्र हो जाता है। इसके प्रतिकूल जो व्यक्ति सोचता है कि उसका कार्य निन्द्य है वह अपनी मानसिक शक्ति को खो देता है। आत्म प्रसाद से बढ़कर शक्ति वृद्धि का दूसरा कोई साधन नहीं और आत्म-भर्त्सना से अधिक घातक शक्ति विनाश का कोई दूसरा अस्त्र नहीं है। आत्म-भर्त्सना एक प्रकार का क्षय रोग है, जो मनुष्य की सभी मानसिक और शारीरिक शक्ति को नष्ट कर डालता है।

मनुष्य की शक्ति उसके आत्म-निर्देश और निश्चय पर निर्भर करती है। तप और त्याग से निश्चय की दृढ़ता आती है और प्रतिदिन के आत्म निर्देश से यह दृढ़ता और भी बढ़ती जाती है। किसी भी कार्य में सफल होने वाले व्यक्ति का निश्चय दृढ़ होता है और उनमें आत्म-निर्देश की शक्ति प्रबल होती है। मनुष्य का पहले निश्चय डावाँडोल होता है, पीछे उसके सभी काम खराब होते हैं। निश्चय का ढीला पड़ जाना स्वार्थपरायणता के कारण होता है। निश्चय की शक्ति मनुष्य के त्याग के ऊपर निर्भर करती है। जब मनुष्य में त्याग की कमी हो जाती है तो उसका आत्म-विश्वास भी कम हो जाता है। इसके साथ-साथ उसके निश्चय की कमी हो जाती है। फिर उसके आत्म-निर्देश रचनात्मक न होकर नकारात्मक होने लगते हैं। इस प्रकार उसकी आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास हो जाता है।

मानसिक शक्ति के बढ़ने के विषय में एक बात सदा ध्यान रखने की यह है कि संसार के लोगों को कोई भी मनुष्य धोखा दे सकता है। परन्तु वह अपने आपको धोखा नहीं दे सकता। मनुष्य को जो अलौकिक शक्ति प्रकृति से प्राप्त होती है वह उसके दैवी स्वत्व की देन है। यह उसकी आत्मा ही है। यह सब कामों की साक्षी है। मनुष्य जितना अपने इस साक्षी स्वत्व को ध्यान में रखकर काम करता है वह अपनी शक्ति को उतना ही अधिक बढ़ा लेता है। जितना ही मनुष्य अपने सच्चे स्वत्व की प्राप्ति की चेष्टा करता है वह उतना ही अधिक शक्ति वान भी होता है। जिस मनुष्य के जीवन के ध्येय व्यापक हैं वह अवश्य ही असाधारण कार्य करने में समर्थ होता है। वह प्रकृति से ऐसी शक्ति भी पा लेता है। परोपकारी व्यक्ति ही बलवान और सुखी होता है; स्वार्थी मनुष्य सदा बलहीन और दुखी रहता है।


गायत्री की अमोघ शक्ति

(सेठ विशनचन्दजी एम.पी., शाहजहाँपुर)

शब्द ब्रह्म है; शब्दों की रचना से शक्ति, विनोद, चिन्ता, कर्तव्य, उदासीनता, तीव्रता आदि प्रभाव नित्य जीवन में सभी को दूर समय देखने को मिलते हैं।

अनेक व्यक्ति यह कहकर जनसाधारण को डरा देना चाहते हैं कि मन की एकाग्रता, बाह्य एवं आन्तरिक शुद्धि आदि महान गुणों के प्राप्त होने पर ही मानव को भगवान की कृपा प्राप्त हो सकती है, अन्यथा नहीं। कुछ अन्य महापुरुष यह भी मानते हैं कि भगवत् कृपा से बुद्धि पवित्र होती है, यही उसका महान लाभ है, अन्य भौतिक लाभ तो कल्पना मात्र अथवा जनसाधारण को प्रभु चरणों में आकर्षित करने के हेतु कहे गये हैं। पर वर्तमान की भौतिकता प्रधान युग में अनेक व्यक्ति इस प्रकार की बातों से संतुष्ट नहीं होते और इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर चाहते हैं।

मेरा विचार है कि भगवत् कृपा पूर्णता सरल है। खेत या बाग में बीज डालकर जो किसान या माली पूरी भावना से कर्त्तव्य पालन करता है, वह प्रत्यक्ष में अधिक लाभ पाता है। पर दृढ़ भावना के अभाव में जो उदासीन होकर भी अपना कार्य करता है उसे भी अपने कर्तव्य के अनुसार प्रत्यक्ष फल मिल ही जाता है। इसमें हमें शिक्षा मिलती है कि यदि अधिक निष्ठा से कार्य किया जाय तो फल भी अधिक प्राप्त हो सकता है। जिस प्रकार उस सर्वशक्तिमान की दासी प्रकृति संसार में श्रद्धा और उदासीनता- दोनों प्रकार के कर्त्तव्यों का उचित फल देती है, तो उस दीनदयाल के दरबार में अन्तर क्यों हो सकता है। वहाँ भी ज्ञानी और इन्द्रिय दमन करने वाले, एकाग्र मन से प्रभु-वन्दना में लीन महान फल के स्वामी होते हैं, तो जो भावकुशन शिवशंकर को केवल एक लोटा जल चढ़ाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर देते हैं, वे भी अपनी भावना के अनुकूल फल अवश्य प्राप्त करते हैं।

मुझे एक उपमा दियासलाई की याद आ गई जिन पदार्थों को मिलाकर उसे बनाया जाता है वे संसार में सर्वत्र बिखरे पड़े थे, पर उनसे कोई लाभ नहीं उठा सकता था। किसी महान कर्तव्यशाली सज्जन ने उन्हें एकत्रित कर, मात्रानुकूल मिलाकर, नियमित रूप में तैयार कर दिया तो वह बड़े काम की बन गई। अब चाहे कोई सन्त उसे रगड़े या कोई बालक रगड़े वह अवश्य जल उठेगी। इसी प्रकार संसार को सन्मार्ग पर लाने के हेतु महान विभूतियों ने अनेक प्रभावशाली उपाय निकाले हैं, जिनसे कल्याण के इच्छुक तरह-तरह के लाभ उठा सकते हैं। इसी उद्देश्य से महापुरुषों ने अक्षरों के शब्द और शब्दों के मन्त्र इस विधि से बनाये, जिनके प्रयोग से प्रत्येक व्यक्ति अपना उद्देश्य पूरा कर सकता है।

जिस प्रकार कोई दियासलाई से प्रकाश बना लेता है; कोई पाकशाला में अग्नि जलाकर स्वादिष्ट भोजन तैयार करता है, कोई अन्य जनों के कष्ट का साधन उत्पन्न कर देता है, कोई यों ही जलाकर बुझा देता है, उसी प्रकार मंत्र की शक्ति से तरह-तरह के कार्य पूरे किये जा सकते हैं। मानव सृष्टि के आरम्भ में सब से पहले वेदों का प्रादुर्भाव हुआ। उसी अलौकिक ब्रह्मवाक्य से मानव ने मानवता सीखी, उसका सार भगवान कृष्ण ने निकाल कर अपने श्रीमुख से परम पवित्र गीता कही। माता गायत्री गीता की अपेक्षा भी सूक्ष्म रूप से वेदों का सार है। माता गायत्री सारे संसार की बीज रूप है। जो कोई गायत्री के परम शक्ति पुँज मंत्र का जप करेगा, उसे किसी भी लाभ के होने में सन्देह नहीं है।


सच्चे और दिखावटी धर्मात्मा

(श्री मेहरबाबा, नासिक)

परमात्मा का सत्य ज्ञान प्राप्त करना अथवा ईश्वरानुभूति सृष्टि के विकास-क्रम की अन्तिम सीढ़ी है। इसके पश्चात् प्रथम तो आत्मा जन्म धारण करता ही नहीं और यदि करता भी है, तो वह अहंकार मूलक मन के रूप में नहीं वरन् समष्टि मन (यूनीवर्सल माईण्ड) के रूप में अवतीर्ण होता है। अहंकार-मूलक मन जन्म कर्म-बन्धन के आधीन होता है, पर ईश्वरानुभूति वाले व्यक्ति अथवा ईश्वर-पुरुष का अवरोहण अपनी अदम्य तृष्णा की प्रेरणा से बाध्य होकर, जन्म लेता है, किन्तु ईश्वर-पुरुष भ्रम तथा बन्धन में फँसे हुए लोगों के प्रति असीम तथा सहज करुणा के कारण संसार में अवतीर्ण होता है।

वे आत्मा जिन्हें ईश्वर की सच्ची अनुभूति प्राप्त नहीं हुई है द्वैत की सीमा के भीतर ही रहते हैं और विभिन्न क्षेत्रों में अनेक पारम्परिक लेन-देन के कार्य के परिणामस्वरूप, वे अपने बन्धनों की सृष्टि करते हैं जिनसे छुटकारा पाने में वे असमर्थ हो जाते हैं, उनके पारस्परिक सम्बन्धों का यह फल होता है कि या तो वे किसी के ऋणी हो जाते हैं या कोई दूसरा उनका ऋणी हो जाता है। किन्तु ईश्वर-पुरुष अद्वैत एकता में निवास करता है, इसलिए उसके कार्य बन्धनकारक किसी भी दशा में नहीं होते, वरन् उन प्रभाव में कर्म-बन्धन में ग्रस्त लोगों को मुक्ति मिलती है। ऐसा एक भी प्राणी नहीं होता जो ईश्वर-पुरुष की सत्ता के अंतर्गत न हो। वह सभी में अपने आपको देखता है और चूँकि उसके सभी कार्य अद्वैत-चेतना से स्फुरित होते हैं, अतः वह स्वतन्त्रतापूर्वक दे सकता है और स्वतन्त्रतापूर्वक ले सकता है। वह किसी को देकर अपना ऋणी नहीं बनाता और न किसी से लेकर वह उसका ऋणी बनता है। उसके कार्य, उसके लिए तथा अन्य मनुष्यों के बन्धनकारक नहीं होते।

ईश्वर-पुरुष सब पर समान रूप से अनुग्रह की वर्षा करता है। यदि कोई व्यक्ति निष्कपट भाव से उसका अनुग्रह स्वीकार करता है, तो वह ईश्वर-पुरुष से ऐसा सम्बन्ध स्थापित करता है जो उसकी ईश्वर-प्राप्ति तक कायम रहता है और यदि कोई पुरुष अपना जीवन और सर्वस्व समर्पित करके ईश्वर-पुरुष की सेवा करता है तो उसे ईश्वर-पुरुष की सहायता प्राप्त होती है और उससे उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है। यदि कोई मनुष्य ईश्वर-पुरुष के कार्य का विरोध करता है, तो भी उसका ऐसा सम्बन्ध स्थापित होता है कि जो अप्रत्यक्ष रूप से उसे ईश्वर की ओर बढ़ाने में सहायक होता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति, जो इच्छा से या अनिच्छा से उसके कार्य-क्षेत्र में प्रवेश करता है, किसी न किसी प्रकार से आध्यात्मिक उन्नति करता है।

धार्मिक- कृत्य कराने वाले पण्डित, पुजारियों और ईश्वरानुभूति वाले पुरुष की कार्यशैली मूल रूप से भिन्न होती है। परम्परागत रूढ़ियों के धर्म को मानने वाले अधिकाँश पुरोहित, लोकाचार तथा विधि निषेधों को आवश्यकता से अधिक महत्व देते हैं। वे स्वयं भी स्वार्थपरता, संकीर्णता तथा अज्ञान से मुक्त नहीं होते, इसलिए वे नरक तथा स्वर्ग की बातें करके दुर्बल चित्त के और विश्वासी लोगों का अनुचित शोषण करते हैं। इसके विपरीत ईश्वर-पुरुष प्रेम, पवित्रता, सार्वलौकिकता तथा ज्ञान के जीवन में सदा के लिए प्रविष्ट हो चुका रहता है, अतः वह केवल आध्यात्मिक महत्व की ही बातों से सम्बन्ध रखता है और अंतर्भूत आत्मा को प्रकट करने के उद्देश्य से ही वह मनुष्यों की सहायता करता है। स्वयं अज्ञान में फँसे रहने वाले मनुष्य आत्मा-भ्राँति या स्वार्थपरता के कारण भले ही ईश्वर-पुरुष की सी भाषा बालें, उसकी सी वेश-भूषा बनालें, उसके समान बाह्य आचरण करें, पर वे ईश्वर-पुरुष के कार्यों की नकल कदापि नहीं कर सकते।

धर्म का केवल बाह्य आचरण करने वाले लोगों में ईश्वर-पुरुषों के दिव्य गुणों का सदैव अभाव रहेगा। किन्तु यदि वे आत्म-भ्राँति या पाखण्ड के कारण नकली वेश बनाकर ईश्वर-पुरुष होने का ढोंग करें तो कभी न कभी उनका भंडाफोड़ अवश्य हो जायगा। आत्म-भ्राँति के कारण यदि कोई मनुष्य किसी भिन्न प्रकार के जीवन-क्रम का आचरण करता है, तो इसका अर्थ यह है कि वह अभागा अपने को वैसा समझता है जैसा वह यथार्थ में नहीं है। कुछ भी न जानने पर वह समझता है, कि वह सब कुछ जानता है। वह भ्रमपूर्ण कार्य करते हुए भी अपने मन में सच्चाई से वैसा करता है। ऐसा भ्राँत मनुष्य निर्दोष माना जाता है, यद्यपि वह कुछ हद तक दूसरों की हानि कर सकता है। पर जो लोग कपट वेश बनाकर, पाखण्ड करके लोगों को ठगने के उद्देश्य से ही ऐसा ढोंग रचते हैं वह अपने लिए निःसन्देह घातक कर्म-बन्धन उत्पन्न करते हैं। यद्यपि वह दुर्बल तथा विश्वासी व्यक्तियों को काफी हानि पहुँचा सकता है, पर वह सदैव लोगों की आँखों में धूल झोंकने में सफल नहीं हो सकता। समय आने पर आप ही आप उसकी पोल खुल जाती है। ईश्वर-पुरुष होने के उसके दावे का भंडाफोड़ हो जाता है, क्योंकि वह उसे सिद्ध नहीं कर सकता।

अपने सार्वलौकिक कार्य को सिद्ध करने के लिए ईश्वर-पुरुष में अनन्त क्षमता पाई जाती है। दूसरों की सहायता करने के लिए वह किसी एक प्रणाली पर आसक्त नहीं रहता, वह परम्परागत विधि निषेधों का अन्धानुकरण नहीं करता। वह स्वयं ही सबसे बड़ा नियम होता है। वह उपस्थित अवसर के अनुसार आचरण कर सकता है तथा परिस्थिति की आवश्यकता के अनुसार, अभिनय कर सकता है। परन्तु वह किसी परिस्थिति से बँधता नहीं है। एक बार एक भक्त ने अपने गुरु से उनके उपवास करने का कारण पूछा। गुरु ने उत्तर दिया कि “मैं पूर्णता की प्राप्ति के लिए उपवास नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि पूर्णता तो मुझे पहले ही प्राप्त हो चुकी है और साधक भी नहीं हूँ। मैं औरों के लिए उपवास करता हूँ।” कोई आध्यात्मिक साधक सिद्ध पुरुष की सिद्धावस्था का अनुकरण करना साधक के लिए असम्भव है। पर सिद्ध पुरुष लोक-कल्याण के लिए साधक के समान आचरण कर सकता है। विश्वविद्यालय की सर्वोच्च परीक्षा जिसने पास कर ली है वह बच्चों के सिखाने के लिए वर्णमाला के अक्षरों को बिना किसी कठिनाई के लिख सकता है। इसी प्रकार ईश्वर-पुरुष दूसरे लोगों को मार्ग दिखलाने के लिए भक्त की भाँति आचरण कर सकता है, यद्यपि उसने ईश्वर के साथ पूर्ण एकता प्राप्त कर ली है। ईश्वरानुभूति के पश्चात भी वह दूसरों को मार्ग दिखलाने के लिए भक्तवत अभिनय करता है। वह किसी एक प्रकार के आचरण से बँधा नहीं रहता। अपनी शिक्षा पद्धति को वह सहायता के इच्छुक व्यक्तियों की आवश्यकतानुसार बदल सकता है। उसे स्वयं अपने लिए कोई वस्तु प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती, अतः जो कुछ भी वह करता है, वह दूसरों की आध्यात्मिक भलाई के लिए ही करता है।

सच्चे ईश्वरानुभूति वाले पुरुष और अपने स्वार्थ के लिए कार्य करने वाले पुरुषों में मुख्य अन्तर यही है कि ईश्वर-पुरुष बिना कुछ कहे दूसरों की सहायता करता रहता है और दिखावटी धर्मात्मा बनने वाले दूसरों के कल्याण और उपकार का ढोंग करते हैं, पर उनका उद्देश्य सदैव अपना ही स्वार्थ साधन रहता है। इसी कसौटी से इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों की परीक्षा सहज में की जा सकती है।


गायत्री के प्रथम मन्त्र-दृष्टा-महर्षि विश्वामित्र

वैदिक साहित्य और परवर्ती हिन्दू धार्मिक तथा दर्शन साहित्य में गायत्री-मन्त्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। गायत्री-मन्त्र का प्रथम दर्शन वैदिक युग के क्राँतिकाल में ऐतिहासिक महर्षि विश्वामित्र द्वारा हुआ है। क्रम के अनुसार यह ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 62 वें सूत्र का 10वाँ मन्त्र है। ऋग्वेद तृतीय मंडल के ऋषि विश्वामित्र हैं अतः गायत्री के महत्व को समझने के लिए यह आवश्यक है कि महर्षि विश्वामित्र के जीवन-परिचय और कार्यकलापों का मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अध्ययन करने का प्रयत्न करें।

पौराणिक वार्त्ताओं और हिन्दू समाज में प्रचलित अनेक कथाओं से सिद्ध होता है कि वैदिक युग में महर्षि विश्वामित्र एक बहुत ही क्राँतिकारी और महान व्यक्तित्व लेकर अवतरित हुए थे। बोधायन सूत्र और अध्यात्म रामायण दोनों के अनुसार सप्त ऋषियों में उनका नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। (1) नई सृष्टि की रचना, त्रिशंकु और सदेह स्वर्ग भेज देना, जीवन रक्षा के लिए कुत्ते के माँस का भक्षण भी उचित समय पर करना, ब्रह्मर्षि और राजर्षि के सैद्धांतिक प्रश्न को लेकर वशिष्ठ से निरन्तर संघर्ष करना, बिना नरमेध यज्ञ किए ही राजा हरिश्चंद्र को रोग मुक्त करना और मेनका द्वारा तपस्या भंग किया जाना आदि अनेक पौराणिक कथाएं इनके नाम के साथ जुड़ी हुई हैं, जो इनके ऐतिहासिक अस्तित्व और महत्व को सिद्ध करती हैं। इन कथाओं और वैदिक सूत्रों के आधार पर इनके जीवन के क्राँतिपूर्ण कार्यों को खोजकर प्रकाश में लाना बहुत मनोरंजक और जिज्ञासु पाठकों के लिए बड़ा लाभकारी सिद्ध होगा।

यद्यपि इस प्राचीनकाल की घटनाओं का यथातथ्य विवरण देना उतना सरल नहीं है किन्तु उनका वैज्ञानिक आधार पर विश्लेषण करना अनुचित न होगा। ऋग्वेद के मन्त्रों से सिद्ध होता है कि उन दिनों त्वष्टा, पर्जन्य और द्यावा पृथ्वी जैसे देवताओं के स्थान पर इन्द्र, वरुण, अग्नि, सूर्य, और सोम जैसे देवता अधिक लोक-प्रिय हो चले थे। राजनैतिक, सामाजिक और साँस्कृतिक नेतृत्व ऋषियों के हाथ में था जो मन्त्र दृष्टा होने के साथ-साथ अच्छे योद्धा भी होते थे और शस्त्र तथा शास्त्र दोनों के द्वारा समाज की रक्षा करते थे। आर्यों और दस्युओं में पारस्परिक संघर्ष होने के कारण एक दूसरे के विषय में

1- विश्वामित्रोऽथ जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गोतमः। अत्रिर्वशिष्ठः कश्यपः इत्येते सर्प्तषयः।

(बोधायन सूत्र, प्रवर अध्याय)

2- विश्वामित्रोऽसितः कण्वो दुर्वासः भृगुरंगिरा। वशिष्ठो वामदेवोऽभिस्तथा सर्प्तषयोऽमला।

(अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड)

समाज में अनेक अनर्गल बातें प्रचलित थीं। आगे चलकर दोनों सभ्यताओं में समन्वय स्थापित हुआ और दस्युओं के उपास्यदेव शिवलिंग उग्रदेव को आर्यों ने भी अपनाया जो ‘शंकर’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। ऐसी ही सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों में विश्वामित्र का जन्म हुआ।

सप्तसिन्धु में उस समय भरत, तृस्तु, श्रंजय, मरुत, भृगु और पक्थ आदि प्रमुख कुल थे। विश्वामित्र इनमें से प्रसिद्ध भरत वंश में उत्पन्न हुए। वे जन्हु के प्रप्रोत्र, कुशिक के पौत्र, और महाराज गाधि के पुत्र थे। इतिहास प्रसिद्ध भगवान परशुराम के पिता और महर्षि ऋचीक और सत्यवती के पुत्र महर्षि जमदग्नि विश्वामित्र के भानजे थे। जमदग्नि और प्रसिद्ध ऋग्वेद कालीन राजा दिवोदास के पुत्र और सुदास के साथ महर्षि मैत्रावरुण अगस्त्य के आश्रम में इन्होंने शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा ग्रहण की। ऋषि-पत्नी लोपामुद्रा इनकी प्रतिभा, बुद्धि और विद्या पर मोहित थी और इन्हीं गुणों के कारण इन्हें लोपामुद्रा का विशेष स्नेह प्राप्त था। आश्रम में बाण विद्या का अद्भुत कौशल दिखाकर इन्होंने अपने से वरिष्ठ सहपाठियों का भी हृदय जीत लिया था। वे वहाँ बड़े लोकप्रिय थे।

एक बार दस्युराज शम्बर ने आश्रम पर छापा मारा और इनके एक सहपाठी ऋक्ष के साथ इनका अपहरण कर ले गया। शम्बर ने इन्हें अपने लोहे के किले में बन्द कर दिया और अनेक प्रकार की यातनाएं देने लगा। सम्भवतः उन्हीं परिस्थितियों में इन्हें एक बार कुत्ते का माँस खाकर अपनी प्राण-रक्षा करनी पड़ी होगी। अपने कौशल और बुद्धि चातुर्य से वे वहाँ विपत्तियों पर विजय पाने में सफल हुए। उन्होंने शम्बर की पुत्री उग्रा को प्रणय-सूत्र में बाँधकर अपने वश में कर लिया और उसकी सहायता से शम्बर का वध करके वहाँ से निकल भागे।

शम्बर के कारागार से लौटकर विश्वामित्र ने तृस्तु कुल को पौरोहित्य पद स्वीकार कर लिया। तृस्तु कुल का राजा सुदास अत्यन्त पराक्रमी और दबदबे वाला था। इस पौराहित्य को लेकर ही सम्भवतः विश्वामित्र और वशिष्ठ में संघर्ष आरम्भ हुआ। वशिष्ठ और विश्वामित्र के वैमनस्य के अनेक संकेत ऋग्वेद के विश्वामित्र द्वारा रचे गये मन्त्रों में मिलते हैं। राजा सुदास के पुरोहित के पद से उसकी मंगल कामना का संकेत भी ऋग्वेद के मन्त्रों में है (1) इन मन्त्रों से सिद्ध होता है कि वशिष्ठ के साथ विश्वामित्र का सैद्धान्तिक मतभेद था, (2) और एक एक बार संघर्ष में विश्वामित्र को वशिष्ठ के भृत्यों के हाथों बन्दी तक होना पड़ा था (3) इस मतभेद का सूत्रपात विश्वामित्र द्वारा शम्बर पुत्री उग्रा का पाणिग्रहण करने पर ही हो गया था। महर्षि वशिष्ठ आर्यों की रक्त शुद्धि के पक्षपाती थे और वे अनार्यों के साथ आर्यों के संपर्क और वैवाहिक सम्बन्धों को अनुचित

इमे भोजा अंगिरसो विरुपा दिवस्युभासा असुरस्य वीराः।

विश्वमित्राय ददत्तो मद्यानि सहस्त्र सवि प्रतिरन्त आयुः।

-ऋग्वेद मण्डल 3, सूत्र 53, अध्याय 7

इम इन्द्र भरतस्य पुत्रा अपपितवं चिकितुर्न प्रपित्वम्।

हिन्वन्त्यश्व मरणं न नित्यं ज्या वाजं परिणामन्त्याजौ।

-ऋग्वेद मण्डल 3, सूत्र 53, मंत्र 24

न सायकस्य चिकिते जनासो लोधं नयन्ति पशु मन्यमानाः।

ना वाजिनं वाजिना हायन्तिनं गर्गभं पुरो अश्वान्नयन्ति।

-ऋग्वेद, मण्डल 3, सूत्र 53, तन्त्र 23।

और अनियमित ठहराते थे। उसके विपरीत विश्वामित्र कर्म के आधार पर जाति और धर्म की स्थापना करते थे तथा वे शुद्ध करके दस्युओं को भी आर्य बनाने के पक्ष में थे। यही झगड़ा बढ़ते-बढ़ते व्यापक हो गया और इसकी परिणिति आगे चलकर दशराज्ञ (दश राजाओं का युद्ध) में हुई।

उग्रा के पाणिग्रहण के प्रश्न को लेकर स्वयं भरतवंश में विश्वामित्र का विरोध होने लगा। महर्षि अगस्त्य उनके अनुज वशिष्ठ, भरत और तृस्तु कुल के राजवंश और यहाँ तक कि विश्वामित्र की माँ घोषा तक उनके विरोध में हो गई। किन्तु विश्वामित्र ने हिम्मत नहीं हारी। अब वे खुले आम दस्युओं की शुद्धि की व्यवस्था देने लगे। इस ‘अनर्थ’ को देखकर वशिष्ठ तो तृस्तु राज्य-क्षेत्र में स्थापित अपना आश्रम तक त्याग कर चले गये। किन्तु धीरे धीरे लोग विश्वामित्र की बातों को समझने और ग्रहण करने लगे। उनके पराक्रम, विद्वता, शीलता, दानवीरता और त्याग वृत्ति का लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। लोग उनके नये दर्शन, नई विचारधारा और आचार विचारों के सम्बन्ध में नई व्यवस्था को स्वीकार करने लगे। स्वयं राजा सुदास ने अपने पूर्व व्यवहार के लिए उनसे क्षमा-याचना की। उग्रा की मृत्यु को चुकी थी, अब अगस्त्य और लोपामुद्रा ने अपनी पुत्री रोहिणी से विश्वामित्र का पाणिग्रहण करा दिया। इस प्रकार सफलता से उत्साहित होकर विश्वामित्र ने गायत्री-मन्त्र की घोषणा की और कहा कि जो कोई व्यक्ति इन मन्त्र का विधिवत् जप करेगा उसे विशुद्ध आर्य समझा जायेगा चाहे उसका जन्म किसी भी प्रकार के वंश में हुआ हो।

किन्तु सफलता के साथ ही विश्वामित्र के जीवन का संघर्ष आरम्भ हुआ। प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ अपने रूढ़िगत विचारों के कारण खुलकर उनका विरोध करने लगीं। महर्षि वशिष्ठ ने व्यवस्था दी कि विश्वामित्र का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ है अतः वे तपस्या करने पर भी केवल राजर्षि हो सकते हैं, ब्रह्मर्षि कहलाने के अधिकारी वे नहीं है। विश्वामित्र ने इन सब रूढ़ियों का विरोध किया। उनका एक अनुयायी त्रिशंकु वशिष्ठ से निराश होकर उनके पास संदेह स्वर्ग जाने की इच्छा लेकर आया। विश्वामित्र ने नरक और स्वर्ग की व्याख्या करके उसे समझाया कि नरक और स्वर्ग सब इसी जीवन में हैं। यद्यपि आगे चलकर अपने अभिमान के कारण त्रिशंकु का पतन हुआ किन्तु इतिहास जानता है कि एक बार विश्वामित्र की कृपा से शंकाओं से मुक्त होकर वह स्वर्ग का अधिकारी हुआ था।

विश्वामित्र और वशिष्ठ का संघर्ष केवल पुरोहित पद के लिए उनकी प्रतिद्वन्द्विता के आधार पर ही नहीं था बल्कि यह प्रगतिशीलता और प्रतिक्रियावाद के बीच में होने वाला संघर्ष था। निस्संदेह इस संघर्ष में प्रगतिशील तत्वों का नेतृत्व विश्वामित्र करते थे। वे स्वर्ग और नरक दोनों का भोग वर्तमान जीवन में ही मानते थे और इस गहन दर्शन को सर्वसाधारण के लिए सुगम बना देने की क्षमता भी उनमें थी। उनके द्वारा नई सृष्टि की रचना की घटना भी इसी बात की ओर संकेत कर रही है कि तत्कालीन सामाजिक विधान उन्हें अमान्य थे और वे उनमें मौलिक परिवर्तन करना चाहते थे, जिनसे भद्र समाज भयभीत हो गया था। मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग कराने की घटना भी इसी ओर संकेत करती है कि वे तत्कालीन अभिजात वर्ग के लिए एक चुनौती के रूप में थे और किसी प्रकार उन्हें समाज की दृष्टि से पतित सिद्ध कर देना ही उस वर्ग को अभीष्ट था। बिना नरमेध के हरिश्चंद्र को रोग-मुक्त कर देने की घटना बताती है कि वे अन्धविश्वास और मिथ्या कर्मकाण्ड में विश्वास न करके वस्तुओं के वैज्ञानिक विवेचन में विश्वास करते थे।

वशिष्ठ और विश्वामित्र के संघर्ष के फलस्वरूप होने वाले ‘दशराज्ञ’ का स्पष्ट उल्लेख ऋग्वेद में है। कथा सूत्रों और ऋग्वेद के संकेतों से ऐसा लगता है कि यह युद्ध निरा आर्यों और दस्युओं के बीच होने वाला युद्ध न होकर एक सैद्धान्तिक युद्ध था। एक पक्ष का नेतृत्व वशिष्ठ करते थे जो आर्यों की रक्त शुद्धि के पक्षपाती तथा दस्युओं और आर्यों के पारस्परिक सम्बन्धों के प्रबल विरोधी थे; दूसरे पक्ष का नेतृत्व विश्वामित्र के हाथों में था जो कर्म के अनुसार ही आर्य जाति का अस्तित्व मानते थे और जिनका विश्वास था कि आर्य धर्म का पालन और गायत्री का जप करके दस्यु भी आर्य धर्मी हो सकता है। युद्ध में भले ही विश्वामित्र की पराजय हुई किन्तु हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था साक्षी है कि व्यवहार में उनके ही सिद्धान्त की विजय हुई और अन्त में वशिष्ठ ने भी कर्म के अनुसार जाति का अस्तित्व स्वीकार करके उन्हें ‘ब्रह्मर्षि’ कहकर सम्बोधन किया था। उनका यह कर्मवाद का सिद्धाँत आज भी मानव जाति के कल्याण के लिए आदर्श रूप है।


मन्त्र-शक्ति द्वारा मेघ वृष्टि

(श्री अवधूत, गोरेगाँव)

सौराष्ट्र प्रदेश में जामनगर शहर ‘छोटी काशी’ के उपनाम से प्रसिद्ध है, क्योंकि वहाँ महादेव के छोटे-बड़े मंदिर बहुत बड़ी संख्या में हैं। उनमें दो मंदिर- श्री भीड़भंजन और श्री काशी विश्वनाथ अधिक प्रसिद्ध हैं। उनमें बाहर से आने वाले पंडितों, ज्योतिषियों, वेद पारंगत विद्वानों, संन्यासियों आदि अतिथियों के ठहरने और भोजनादि की व्यवस्था राज्य की तरफ से और कितने ही नागरिकों की तरफ से भी की गई है। विशेष रूप से वर्षा ऋतु में ऐसे महात्मा और विद्वान वहाँ प्रायः आते रहते हैं और अपने धर्मोपदेशों द्वारा वैदिक धर्म की प्रभावना करते हैं।

वेद-वेदाँग, उपनिषद् और कर्मकाण्ड में दक्षिण तथा उत्तर भारत जितना आगे बढ़ा हुआ है, उतना भारत का दूसरा कोई भाग नहीं है। इसमें पश्चिमीय प्रदेश तो कर्म-उपासना और मन्त्र शक्ति में काफी पिछड़ा हुआ है। यद्यपि जामनगर, राजकोट, गाँडल, भावनगर, जूनागढ़ आदि कुछ इने गिने शहरों में महान् विद्वान् पंडित पाये जाते हैं, तो भी अन्य स्थानों में उनकी कमी है। पर इसके साथ ही वहाँ की जनता बड़ी धर्म जिज्ञासु और सत्पुरुषों का आदर सत्कार करने वाली है।

द्वारका धाम की यात्रा के उद्देश्य से कितने ही वेदमूर्ति विद्वान राजधानी होने के कारण जामनगर में ठहरा करते हैं। अब से लगभग दस-पन्द्रह वर्ष पहले की बात है कि हैदराबाद (दक्षिण) के दो अथर्ववेदीय ब्राह्मण जामनगर में आकर ठहरे। वे इस देश की तरफ कभी नहीं आये थे इसलिए उनको गुजराती भाषा का ज्ञान तो कहाँ से हो सकता था? वे संस्कृत भाषा में बातचीत कर सकते थे, पर उतनी संस्कृत जानने वाले लोग जामनगर में थोड़े ही थे। वे लोग मराठी भाषा बोल और समझ सकते थे, पर उसके जानने वाले भी वहाँ नाममात्र के ही थे। काशी विश्वनाथ के अतिथि आश्रम में ठहरने को उनको एक कोठरी मिल गई, पर भाषा की कठिनाई के कारण उनको प्रायः गूँगा बनकर ही रहना पड़ता था। ऐसी स्थिति में जनता पर उनका क्या प्रभाव पड़ता? तो भी उनको विश्वास था कि भगवती वाणी, शारदा माता अपना प्रभाव प्रकट करेगी।

भाद्रपद बदी 9 को जामनगर की महारानी श्री गुलाब कुँवरवा का जन्म दिवस था। उस दिन समस्त प्रमुख ब्राह्मणों ने राजमहल में जाकर आशीर्वाद दिया और दान दक्षिणा प्राप्त किया। पर अनजानों को वहाँ कौन जाने देता? वे बेचारे निराश हो गये। पर एक व्यक्ति ने उनको समझाया कि “तुम जहाँ उतरे हो उसके सामने ही दयानन्द ब्रह्मपुरी है। वहाँ शाम को चार बजे सभा होगी और महारानी पधारेंगी। वे बड़ी गुण-गाहक हैं। उसी स्थान पर तुम उनसे भेंट करना।”

शिवभट्ट और विष्णु भट्ट को कुछ आशा हुई और वे सभा में गये। कार्यक्रम शुरू हुआ। कितने ही पंडितों ने गुजराती भाषा में आशीर्वाद की कवितायें पढ़ी। ये दोनों सभा में दूर खड़े खड़े देख रहे थे। आगे स्थान प्राप्त करने में भी आजकल मेल-मुलाहिजा और परिचय की आवश्यकता है, जिसका इन भट्टजी के पास अभाव था। दोनों महारानी की तरफ एक टका लगाये देख रहे थे। महारानी जी बहुत चतुर, आस्तिक और चारों तरफ निगाह रखने वाली थी। जब उनकी दृष्टि इन दोनों पंडितों पर पड़ी तो वे उसी जगह से हाथ उठाकर आशीर्वाद देने लगे। यह देखकर महारानी ने उनको आगे बुला लिया। उन्होंने मेज के पास खड़े होकर तीन-तीन श्लोक पढ़कर आशीर्वाद दिया। उनका तीव्र स्वर, शुद्ध उच्चारण, अलंकारिक भाषा और संस्कृत (देवा-वाणी) की वाक्यावली सुनकर सभा मुग्ध हो गई। दोनों अनजान भट्ट जी ही थे। इससे महारानी बहुत प्रसन्न हुई और बड़ी खुशी के साथ उन्होंने उन दोनों से दूसरे दिन प्रातःकाल अपने बँगले पर आने को कहा और उनको कोई न रोके इसलिये पास भी दे दिया।

विष्णुभट्ट और शिवभट्ट को ऐसा जान पड़ा कि मानों उनकी दृढ़ भावना फलीभूत हो गई। पर फिर भी उनके सामने गुजराती भाषा न समझ सकने की कठिनाई बनी ही रही। इस समस्या को हल करने के लिए सोच विचारकर एक युक्ति निकाली और मराठी तथा गुजराती दोनों भाषा जानने वाले एक व्यक्ति को ढूँढ़ निकाला। उसको साथ लेकर वे ठीक समय पर महारानी के बँगले पर पहुँचे और पास को देखकर नौकर ने उनको मुलाकात के कमरे में पहुँचा दिया। अब महारानी गुजराती भाषा में जो पूछती थीं उसे वह साथी भट्टी जी को मराठी में अनुवाद करके समझा देता था और जो कुछ उत्तर भट्ट जी मराठी भाषा में देते थे उसे गुजराती में महारानी को सुना देता था। इस प्रकार उनमें परस्पर धर्मशास्त्र, मन्त्र विद्या, यज्ञ-विज्ञान के सम्बन्ध में बहुत सी बातें हुई।

सौराष्ट्र में दूसरे, तीसरे वर्ष अकाल पड़ता ही रहता है। मेघराज गुस्सा होकर पानी बरसाना बन्द कर देते हैं। इस वर्ष भी भाद्रपद का महीना बीतने को आया पर वर्षा का एक छींटा भी नहीं गिरा था। इससे जनता बड़ी व्याकुल हो रही थी। भट्टजी ने मन्त्र शक्ति की अपूर्व महिमा की बात कही थी। उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा था कि असम्भव कार्य भी मन्त्र द्वारा सम्भव हो सकता है। इसलिए महारानी ने कहा कि “अगर बात है। इसमें सफलता होने से आपका सम्मान बढ़ेगा और पर्याप्त दक्षिणा भी मिल सकेगी।”

भट्टजी ने कहा- “देवता कैसे प्रसन्न होंगे?” यज्ञ आरम्भ होने के दसवें दिन बरसात होनी ही चाहिये। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने जन्म-जन्म तक तपश्चर्या की थी और देवताओं को प्रसन्न किया था, क्या वे सब मन्त्र निरर्थक ही हैं? क्या वे गपोड़े हैं? नहीं, वे सत्य हैं, और पूर्ण करेंगे और हमारे वैदिक मंत्रों का यश बढ़ेगा।”

वरुण-यज्ञ का आरम्भ

तुरन्त राज कर्मचारियों को आज्ञा दे दी गई। शहर के दक्षिण तरफ जहाँ रंगमती और नागमती नदी का संगम है और जहाँ नाग नाथ महादेव का अति प्राचीन मन्दिर है, वह एकान्त स्थान यज्ञ के लिये पसन्द किया गया मन्दिर के चौक में मंडप बनाया गया, बिजली की बत्तियाँ लगा दी गई। भट्टजी अपने हाथ से भोजन बनाकर एक समय खाते थे। उनके लिये वहाँ की धर्मशाला में तीन कोठरियाँ दे दी गई। सब तरह की आवश्यक सामग्री की व्यवस्था करने के लिये एक राज्य कर्मचारी नियुक्त कर दिया गया। दरवाजे पर और आसपास देखभाल रखने के लिये सिपाहियों का पहरा लगा दिया गया। राज पुरोहित को आदेश दिया गया कि वे नौ योग्य पंडित यज्ञ में आहुतियाँ देने के लिये भेज दें। गणेश, इन्द्र आदि सब देवताओं की यथा स्थान प्रतिष्ठा की गई। वरुण के रूप में शृंगी ऋषि की भव्य मूर्ति भट्ट जी ने स्वयं अपने हाथ से बनाई। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन शुभ मुहूर्त में वरुण यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ हुआ।

अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मणों से भट्ट जी ने कहा- “बन्धुओं, हम लोगों के द्विजत्व की प्रतिष्ठा भंग न हो जाय इसका ध्यान रखना आपका काम है। नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का पालन करके श्रद्धापूर्वक मन्त्रपाठ करते रहना। दुनिया को बता देना कि वेदवाणी कलियुग में भी जागृत है। तुम जरा भी हिम्मत न हारना, यही हमारी विनय है।”

प्रातःकाल पाँच बजे घण्टा बजते ही सब उठकर शौच, कुल्ला, दातुन आदि से निवृत्त होकर अपनी नियत जगह पर बैठकर संध्यावन्दन करते। फिर चाय, काफी या दूध आदि पीकर ठीक आठ बजे अनुष्ठान शुरू कर देते। दोपहर के बारह बजे केला, पेड़ा, बरफी, फलाहरी पूरी, रबड़ी आलू का शाक आदि का फलाहार करके दो घण्टा विश्राम करते। पर उनको अहाते के बाहर जाने की आज्ञा न थी। ढाई का घण्टा बजते ही फिर मन्त्रोच्चारण आरम्भ हो जाता था जो सात बजे पूरा होता था। फिर संध्या वन्दन करके साढ़े सात बजे निराँजन आरती की जाती थी। इसके पश्चात् खा पीकर सब सो जाते थे।

यद्यपि यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों के लिए सब प्रकार की सुविधायें थी और वे बढ़िया पौष्टिक भोजन करते थे। इसके विपरीत भट्ट जी रात को एक बार भात उबाल कर खाते थे और दोपहर को फलाहार भी नाममात्र को लेते थे, तो भी संकीर्ण मनोवृत्ति के कारण वे भट्टजी से ईर्ष्या करने लगे और चाहने लगे कि कार्य खण्डित होकर इनकी बदनामी हो जाय। उनमें दो-तीन नवयुवक ब्राह्मण आधी रात के समय चोरी से घर चले जाते थे और सुबह चार बजे वापस आ जाते थे।

अनुष्ठान के तीन दिन बीत गये, पर आकाश में किसी तरह का अन्तर न जान पड़ा। दोनों भट्टजी के मन में दुःख हुआ। चौथा दिन- पाँचवाँ दिन इसी तरह तीव्र धूप और गर्मी पड़ते बीत गया। जैसे-जैसे दिन बीतते जाते थे इन दोनों की बड़ी चिन्ता होती जाती थी। आठवें दिन भी जब कोई परिवर्तन न जान पड़ा तो वे अत्यन्त व्याकुल हो गये और उनका खाना और सोना बन्द हो गया। अन्तिम दिन भी जब कुछ न हुआ तो वे रात के बारह बजे मण्डप में गये और अपने इष्टदेव की मूर्ति के सम्मुख अश्रुपात करते हुए विह्वल वाणी से स्तुति करने लगे-

“ॐ तत्वा यामि ब्रह्मणा बन्दमान स्तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेऽभानो वरुणेह बोध्यरु शंस मान आयुः प्रमोषी।”

अर्थात्- “यजमान हविर्भाग देकर यजुर्वेद के मतानुसार इस वेद स्तुति से, मैं आपसे याचना करता हूँ, आप विशाल स्तुति के योग्य हो। ऐसे हे वरुण देव! क्रोध रहित होकर तुम इस यज्ञ में हमारी इच्छाओं को पूर्ण करने का ध्यान रखकर हमको दीर्घायुष्य बनाओ।”

पूर्णाहुति का दिन आ गया। बरसात का कोई भी चिह्न दिखलाई नहीं पड़ता था। दोपहर हो गया। दोनों भट्टजी ढीले हो गये। संध्या के 5 बजे पूर्णाहुति का नारियल महारानी के हाथ से यज्ञ-कुण्ड में होम किये जाने को था। धार्मिक जनता की अपार भीड़ उसे देखने को इकट्ठी हो गई थी। स्वयं जाम साहब अनेक प्रतिष्ठित अधिकारियों और नागरिकों के साथ सामने बैठे थे। महारानी यज्ञकुण्ड के सामने आकर बैठ गई। दोनों भट्ट जी ने अग्नि नारायण का मन्त्र सूक्त आरम्भ किया। यज्ञ-मण्डप पर बैठे लोगों में तरह-तरह की भली-बुरी शंकाएं उत्पन्न हो रही थीं। उपवास से कृश शरीर पर मन्त्रोच्चारण से मस्तक में तेज चमकता हुआ- ऐसे दोनों भट्टजी वास्तविक ऋत्विज् जान पड़ते थे। बाकी ब्राह्मण तो मोटे-ताजे और कई मोटी तोंद निकले हुए भी थे, पर सबका ब्रह्मतेज फीका पड़ा हुआ था। आकाश साफ था, बादलों का कोई चिन्ह न था। खूब धूप पड़ रही थी। महारानी के हाथ में नारियल दिया गया। अग्नि ज्वाला प्रज्ज्वलित हो रही थी। भट्टजी और ब्राह्मणों ने उच्च स्वर से स्वाहा’ का उच्चारण किया महारानी ने नारियल अग्नि में डाल दिया। उसके डालते ही आकाश में भी एक जोर का धड़ाका हुआ और बादल, बिजली होकर थोड़ी ही देर में जोर से वर्षा होने लगी। पाँच दिन तक अच्छी वर्षा होने से अकाल की क्रूर छाया दूर हो गई।

भगवान ने भट्टजी को यश दिया और मन्त्र-शक्ति की विजय दिखलायी। शिव भट्ट और विष्णु भट्ट को महामहोपाध्याय हाथी भाई शास्त्री के हाथ से महाराज और महारानी ने उत्तम वस्त्रालंकार और अच्छी दक्षिणा दी। भट्टजी ने दक्षिणा में से एक चौथाई वहाँ की राजकीय संस्कृत पाठशाला को तथा चौथाई ‘आनन्द बाबा अनाथालय’ को दे दिया। अन्त में उन्होंने यह भी कहा कि “हवन करने वाले ब्राह्मणों में से कई ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं करते थे, इसी से मेघराज ने इतनी देर की और परीक्षा ली। क्योंकि ब्रह्मचर्य कर्मकाण्ड-यज्ञ विज्ञान का मूल आधार है।” इस घटना से उस प्रदेश में यज्ञ की प्रतिष्ठा चारों ओर फैल गई।


अमेरिका भी आध्यात्मिकता को खोज रहा है।

(श्री लीलारानी)

हम भारतीयों का ऐसा विश्वास है कि धार्मिक तथा आध्यात्मिक विषयों की रुचि इस देश के निवासियों में ही विशेष रूप से पाई जाती है। संसार के अन्य देशवासियों को हम बिल्कुल धर्म-शून्य समझते हैं। हमारे यहाँ अधिकाँश लोगों को ख्याल है कि ये लोग नास्तिक हो गये हैं और भगवान के विरोधी हैं। दरअसल इस विषय में हमारा ज्ञान बहुत अधूरा और ऊपरी है। जैसा मानव स्वभाव आजकल हो गया है, हम दूसरों के विषय में उदारतापूर्वक विचार करने के अभ्यासी नहीं हैं। दूसरों के दोषों को हम कई गुना बढ़ाकर दिखाते और गुणों की उपेक्षा करते हैं। पर यह विचार-प्रणाली अज्ञानियों की है इससे हमारा स्वयं का विकास अवरुद्ध हो जाता है। ज्ञानी पुरुष का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक व्यक्ति या समुदाय के विषय में निष्पक्ष भाव से विचार और आलोचना करे और दोषों की तरह उनके गुणों को भी प्रकाश में लावे।

अमरीका का देश इस समय भौतिक उन्नति में सर्वोपरि माना जाता है। मोटर, हवाई जहाज, ग्रामोफोन, सिनेमा आदि सभी खास-खास आविष्कार अमरीका वालों ने ही किये हैं, और धन-सम्पत्ति में भी वे इस समय संसार भर में बढ़े-चढ़े हैं। हम लोग प्रायः यही ख्याल करते हैं कि अमरीका का ध्यान भौतिक विषयों की तरफ ही है, धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों की वहाँ कोई पूछ नहीं। पर अभी अमरीका की शिक्षा कमीशन की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिससे प्रकट होता है कि उस देश में बालकों को आरम्भ से नैतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती है जिससे उनमें अनेक सद्गुणों का विकास होता है और वे साँसारिक सफलता प्राप्त करने में भी अग्रणी रहते हैं। रिपोर्ट के शब्दों में नैतिक और आध्यात्मिक गुणों का विकास सदा से अमरीकी शिक्षा का एक बड़ा लक्ष्य रहा है। समाज इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए अपनी सब संस्थाओं से अनुरोध करता रहता है। घरों और स्कूलों से इस सम्बन्ध में विशेष आशा रखी जाती है, क्योंकि बालकों के पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा में इन दोनों का स्थान प्रमुख होता है।

अमेरिकी जनता अपने देश के स्कूलों से यह आशा करती है कि वे नैतिक और आध्यात्मिक गुणों का भी विकास करेंगे। उनकी यह आशा उचित भी है। स्कूलों ने भी यह उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले रखा है। जो स्त्री-पुरुष इन स्कूलों में पढ़ जाते हैं वे समाज के उत्तरदायी सदस्य होने के नाते इस व्यवस्था का आदर करते हैं। शिक्षक के रूप में वे एक ऐसा पेशा अपना चुके हैं, जो सामाजिक आचार-नियन्त्रण में इन गुणों को प्रथम स्थान प्रदान करता है।

कोई भी समाज सदाचार की व्यवस्था के बिना जीवित नहीं रह सकता। सामाजिक जीवन में नैतिक और आत्मिक गुणों के बिना काम चल नहीं सकता। ज्यों-ज्यों समाज का संगठन अधिकाधिक पेचीदा बनता जाता है और ज्यों-ज्यों सबकी सुख समृद्धि पारस्परिक सहयोग पर निर्भर होती जाती है, त्यों-त्यों सदाचार के सर्वसम्मत सिद्धान्तों की आवश्यकता भी बढ़ती जाती है। विशेषतः जो समाज व्यक्तियों को अधिकतम स्वतन्त्रता देने का पक्षपाती हो, उसमें सबकी मान्यता से निर्धारित सदाचार के नियमों का व्यक्तियों द्वारा पालन और आदर और भी आवश्यक हो जाता है। किसी समाज का संगठन कितनी सूझ-बूझ से क्यों न किया जाय और शासन-व्यवस्था को कितनी ही दूरदर्शिता से क्यों न सँभाला जाय और उसके कानूनों और आदेशों का निर्माण कितने ही उच्च उद्देश्य से क्यों न किया जाय, यदि उसके व्यक्तियों में सचाई, ईमानदारी और निजी अनुशासन का अभाव होगा तो वह सुखी और सुरक्षित नहीं रह सकता।

अमेरिका के सरकारी स्कूलों में धार्मिक

विश्वासों का सम्मान

संयुक्त राज्य अमेरिका के सरकारी स्कूल कानून द्वारा स्थापित और नियन्त्रित हैं। उनका व्यय सरकारी कोष से चलता है। उनकी नीति का निर्धारण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित अधिकारी करते हैं। ये स्कूल शासन और संचालन की दृष्टि से तो सरकारी अर्थात् सार्वजनिक हैं ही, उनमें सबका प्रवेश हो सकने की दृष्टि से भी सार्वजनिक हैं।

सार्वजनिक संस्था होने के कारण सरकारी स्कूलों को धर्म-विशेष से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए। पारलौकिक शक्ति और उससे मनुष्य का सम्बन्ध इस विषय में जो नाना मतमतान्तर अथवा सम्प्रदाएं हैं, उनमें से किसी एक को किसी से मनवाने का कार्य वे नहीं कर सकते।

नैतिक और आत्मिक गुणों के शिक्षण में सरकारी स्कूल अति महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। उनका यह महत्वपूर्ण कार्य कभी-कभी इस कारण तिरोहित अथवा अदृश्य हो जाता है कि उनको धर्म विरोधी बतलाकर उनकी निन्दा करने का प्रयत्न किया जाता है। परन्तु वे धर्म-विरोधी नहीं हैं। प्रत्युत सरकारी स्कूलों की नीति सब धार्मिक मतों पर आदर और किसी से भी पक्षपात न करके चलने की है।

अमेरिका को बसाया ही धर्म-भीरु लोगों ने था। अमेरिका के संविधान “नागरिक अधिकारों के बिल” में धार्मिक आदर्शों की सत्ता स्पष्ट रूप में स्वीकार की गई है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने धार्मिक विश्वासों और आदेशों के अनुसार ईश्वर की आराधना करने की स्वतन्त्रता दी गई है। किसी एक या अनेक धर्मों को राज्य का धर्म न मानने का यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि वह ‘धर्म’ को मानता ही नहीं है। अमेरिका के सरकारी स्कूल भी, अपनी देश की सरकार की भाँति, धार्मिक विचारों की स्वतन्त्रता के दृढ़ पक्षपाती हैं।

अमेरिकन राष्ट्र को बलवान बनाने में धार्मिक विभिन्नता और सहिष्णुता से बहुत सहायता मिली है और सरकारी स्कूलों में भी वे दोनों बातें अपने यथार्थ रूप में दृष्टिगोचर होती हैं और क्योंकि देश में अनेक धार्मिक मत प्रचलित हैं, इस कारण सर्व-साधारण का शिक्षण भी धार्मिक स्वतन्त्रता के विचार से मिलता जुलता होना चाहिए। उसका आधार किसी धर्म-विशेष के सिद्धान्तों का प्रचार नहीं, वरन् सब धर्मों का उचित आदर होना चाहिए। शिक्षण को विविध धार्मिक मतों का पंचमेल बनाने का समावेश होना चाहिए, जिनको सभी धर्म और उनके अनुयायी उत्तम मानते हैं। इस प्रकार के शिक्षण का महत्व भी अधिक होता है।

नैतिक और आत्मिक गुणों का विकास शिक्षण के अन्य सब उद्देश्यों की पूर्ति का आधार है। इन गुणों की उपेक्षा करके चलने वाला शिक्षण लक्ष्यहीन शिक्षण होता है। जिन गुणों का मानव-व्यवहार में उपयोग न हो वे व्यर्थ हैं।

सरकारी स्कूलों की पद्धति साधारणतया इस सत्य को मानकर चलती है कि शिक्षण के सब उद्देश्यों का संगम नैतिक और आत्मिक गुणों में जाकर होता है। शिक्षण के प्रत्येक विभाग में नैतिक और आत्मिक गुणों की दृष्टि से मार्ग निर्देश की आवश्यकता रहती है। कोई नहीं कह सकता कि वर्तमान पीढ़ी के नवयुवकों को आगामी वर्षों में किन समस्याओं का सामना करना पड़ जायगा। हम कितना भी यत्न करें फिर भी भविष्य अनिश्चित ही रहता है। परन्तु नैतिक और आत्मिक गुणों के विकास में एक ऐसा मापदण्ड मिल जाता है जिससे हम किसी भी भावी समस्या का सामना कर सकते हैं।

अमरीका ने आज तक जो अभूतपूर्व उन्नति की है, वही इस बात का प्रमाण है कि वहाँ के मनुष्यों में नैतिकता व आध्यात्मिकता का पर्याप्त अंश है, जिसके प्रभाव से वे साँसारिक सफलताएं प्राप्त करते चले जाते हैं। प्राचीन समय में वहाँ वाशिंगटन, गारफील्ड, अब्राहम लिंकन आदि ऐसे महापुरुष उत्पन्न हो चुके हैं, जिन्होंने लोक कल्याण के लिए अनुपम त्याग किया है। भारत के महान सन्त पुरुष स्वामी रामतीर्थ और स्वामी विवेकानन्द का अमरीका में जैसा भव्य स्वागत-सम्मान किया गया वह भी अभी हमको स्मरण है। पर वर्तमान समय में वह जिस प्रकार धन को ही सर्वोपरि स्थान देने लगा है और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में स्वार्थ-साधन की नीति को प्रधानता दे रहा है, उससे उसका महत्व अध्यात्म प्रेमियों की दृष्टि में घटने लगा है और वह भगवान के बजाय धन का पुजारी ही माना जा रहा है। आशा है अमरीका के आध्यात्मिक नेता अपने देश की इस पतनोन्मुख प्रवृत्ति से रक्षा करेंगे।


भारतीय संस्कृति का आधार- आत्म-संयम

(डॉ. रामचरण महेन्द्र)

भारतीय संस्कृति के अनुसार व्यक्ति का दृष्टिकोण ऊँचा रहना चाहिए। हमारे यहाँ अन्तरात्मा को प्रधानता दी गई है। हिन्दू तत्वदर्शियों ने संसार की व्यवहार वस्तुओं और व्यक्तिगत जीवन यापन के ढंग और मूलभूत सिद्धान्तों में पारमार्थिक दृष्टिकोण से विचार किया है। क्षुद्र साँसारिक सुखोपभोग से ऊँचा उठकर, वासनाजन्य इन्द्रिय सम्बन्धी साधारण सुखों से ऊपर उठ आत्म-भाव विकसित कर परमार्थिक रूप से जीवन-यापन को प्रधानता दी गई है। नैतिकता की रक्षा को दृष्टि में रखकर हमारे यहाँ मान्यताएं निर्धारित की गई हैं।

भारतीय ऋषियों ने खोज की थी कि मनुष्य की चिरन्तन अभिलाषा, सुख-शाँति की उपलब्धि इस बाह्य संसार या प्रकृति की भौतिक सामग्री से वासना या इन्द्रियों के विषयों को तृप्त करने से नहीं हो सकती। पार्थिव संसार हमारी तृष्णाओं को बढ़ाने वाला है। एक के बाद एक नई-नई साँसारिक वस्तुओं की इच्छाएं निरन्तर उत्पन्न होती रहती हैं। एक वासना पूरी नहीं हो पाती कि नई वासना उत्पन्न हो जाती है। मनुष्य अपार धन संग्रह करता है, अनियन्त्रित काम-क्रीड़ा में सुख ढूँढ़ता है, लूट-खसोट और स्वार्थ-साधन से दूसरों को ठगता है। धोखा-धड़ी, छल-प्रपंच, नाना प्रकार के षड़यन्त्र करता है, विलासिता, नशेबाजी, ईर्ष्या-द्वेष में प्रवृत्त होता है, पर स्थायी सुख और आनन्द नहीं पाता। एक प्रकार की मृगतृष्णा मात्र में अपना जीवन नष्ट कर देता है। उलटे उसकी दुष्ट वृत्तियाँ और भी उत्तेजित हो उठती हैं। जितना-जितना मनुष्य सुख को संसार की बाहरी वस्तुओं में मानता है, उतना ही व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन अतृप्त, कण्टकाकीर्ण, दुखी, असन्तुष्ट और उलझन भरा होता है। हिन्दू तत्ववेत्ताओं ने इस त्रुटि को देखकर ही यह निष्कर्ष निकाला था कि स्वार्थपरता और साँसारिक भोग कदापि स्थायी आनन्द नहीं दे सकता। हमारे स्थायी सुखों का केन्द्र भौतिक सुख-सामग्री न होकर आन्तरिक श्रेष्ठता है। आन्तरिक शुद्धि के लिए हमारे यहाँ नाना विधानों का क्रम रखा गया है। त्याग, बलिदान, संयम वे उपाय हैं, जिनमें आन्तरिक शुद्धि में प्रचुर सहायता मिलती है।

भारतीय संस्कृति में अपनी इन्द्रियों के ऊपर कठोर नियन्त्रण का विधान है। जो व्यक्ति अपनी वासनाओं और इन्द्रियों के ऊपर नियन्त्रण कर सकेगा, वही वास्तव में दूसरों के सेवा-कार्य में हाथ बंटा सकता है। जिससे स्वयं अपना शरीर, इच्छाएं, वासनाएं, आदतें ही नहीं सँभलती, वह क्या तो अपना हित और क्या लोकहित करेगा।

“हरन्ति दोषजानानि नरमिन्द्रियकिंकरम्।

(महाभारत अनु. प. 51, 16)

“जो मनुष्य इन्द्रियों (और अपने मनोविकारों) का दास है, उसे दोष अपनी ओर खींच लेते हैं।”

“बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वन्समपि कर्षति।”

(मनु. 2-15)

“इन्द्रियाँ बहुत बलवान हैं। ये विद्वान को भी अपनी ओर बलात् खींच लेती हैं।”

अतः भारतीय संस्कृति ने सदा आने साथ कड़ाई से व्यवहार की स्थापना की है। यदि हम अपनी कुप्रवृत्तियों को नियन्त्रित न करेंगे, तो हमारी समस्त शक्तियों का अपव्यय हो जायेगा। आदर्श भारतीय वह है जो दम, दान एवं यम- इन तीनों का पालन करता है। इन तीनों में भी विशेषतः दम (अर्थात् इन्द्रिय दमन) भारतीय तत्वदर्शी पुरुषों का सनातन धर्म है। इन्द्रिय-दमन, आत्मतेज और पुरुषार्थ को बढ़ाने वाला है। दम तेज को बढ़ाता है। दम परम पवित्र और उत्तम है। अपनी शक्तियाँ बढ़ाकर दम से पुरुष पाप रहित एवं तेजस्वी होता है। संसार में जो कुछ नियम, धर्म, शुभ कार्य अथवा सम्पूर्ण यज्ञों के फल हैं, उनकी अपेक्षा दम का महत्व अधिक है। दम के बिना दान रूपी क्रिया की यथावत् शुद्धि नहीं हो सकती। अतः दम से ही यज्ञ और दम से ही दान की प्रवृत्ति होती है।

जिस व्यक्ति ने इन्द्रिय-दमन और मनोनिग्रह द्वारा अपने को वश में नहीं किया है, उसके वैराग्य धारण कर वन में रहने से क्या लाभ? तथा जिसने मन और इन्द्रियों का भली भाँति दमन किया है, उसको घर छोड़कर किसी जंगल या आश्रम में रहने की क्या जरूरत?

जितेन्द्रिय पुरुष जहाँ निवास करता है, उसके लिए वही स्थान वन एवं महान आश्रम है। जो उत्तमशील और आचरण में रत है, जिसने अपनी इन्द्रियों को काबू में कर दिया है तथा जो सरल भाव से रहता है, उसको आश्रमों से क्या प्रयोजन। विषयासक्त मनुष्यों में वन में भी दोष बन जाते हैं तथा घर में रहकर भी पाँचों इन्द्रियों पर नियन्त्रण प्राप्त कर लिया जाय, तो वही तपस्या है।

जो सदा शुभ कर्म में प्रवृत्त होता है, उस वीतराग पुरुष के लिए घर ही तपोवन है। जो एकान्त में रहकर दृढ़तापूर्वक नियमों का पालन करना है, इन्द्रियों की आसक्ति से दूर हटता है अध्यात्म तत्व के चिंतन में लगता है, वही भारतीय संस्कृति का फूल है।

एक ओर जहाँ भारतीय संस्कृति इन्द्रिय संयम का उपदेश देती है, वह दूसरी ओर वह दूसरों के प्रति अधिक से अधिक उदार होने का आग्रह करती है। सच्चे भारतीय की सेवा, सहयोग और सहायता के लिए प्रस्तुत रहना चाहिए।

“सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम। यद्भूतहितमत्यन्तम् एतत सत्यं ब्रधीम्यहम्॥”

(म. भा. छाँ 293.19)

“अर्थात् सबसे बढ़कर कल्याण करने वाला सत्य का कथन है, परन्तु सत्य का ज्ञान तो बहुत ही कठिन है। इसलिए सुगम रूप में उसी को मैं सत्य कहता हूँ जो प्राणियों के लिए अधिकतया हितकर हो।”

आत्मोकर्ष न मार्गेत परेषाँ परिनिन्दया। स्वगुणैरेव मार्गेत विप्रकर्स पृथक् जनात्॥

“दूसरों की निन्दा से अपनी उन्नति को कभी न देखे। अपने सद्गुणों से ही दूसरे मनुष्यों की जो उन्नति चाहे वही सच्चा भारतीय है। भारतीय संस्कृति के उपासक सदा निर्बलों, अपनी शरण में आये हुओं, अतिथियों के सहायक होते हैं।”

भारत में सदा दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार रहा है। जो लोग बाहर से मारने के लिए आये, जिन्होंने विष दिया, जिन्होंने आग में जलाया, जिन्होंने हाथियों से रौंदवाया और जिन्होंने साँपों से डसवाया, उन सबके प्रति भी भारतीय संस्कृति उदार रही है। हमने सबमें भगवान को देखा है। हाथी में विष्णु, सर्प में विष्णु, जल में विष्णु और अग्नि में भी भगवान् विष्णु को देखा है तो फिर पशुओं और मनुष्यों की बहुत ही ऊँची बात है। हम मनुष्य मात्र को प्यार करने वाले उदार जाति के रहे हैं।


धार्मिक क्षेत्र में धूर्तता और ठगी की करतूतें

(श्री चन्द्रशेखर शास्त्री)

धर्म की उपयोगिता मानी हुई है। लोक और परलोक हित उससे होता है। उसकी उपयोगिता सभी स्वीकार करते हैं। कोई उसके बल लौकिक स्वार्थ साधन करते हैं और कोई पारलौकिक कल्याण के लिए उसका अनुष्ठान करते हैं। कहा जाता है कि भारत धार्मिक देश है। “कहा जाता है” इसका प्रयोग में इसलिए करता हूँ कि मेरा मन इस बात पर विश्वास नहीं करता, क्योंकि इस अध्याय में जिन बातों का मैं वर्णन करूंगा उनके अनुष्ठाता तो भारतवासी ही हैं और प्रसिद्ध तथा श्रेष्ठ भारतवासी। पर वैसे आचरण वालों को कोई धर्मात्मा नहीं कह सकता। कम से कम मेरा तो ऐसा ही विश्वास है। अच्छा तो भारत धार्मिक देश है, यहाँ के निवासी धर्मात्मा हैं, धर्म के प्रेमी हैं। धर्म के लिए त्याग भी करते हैं। भारतीय धर्म-पुस्तकों का उपदेश है कि यदि तुम धर्म की रक्षा करोगे तो धर्म भी तुम्हारी रक्षा करेगा। अर्थात् धर्म पर चलने से तुम बलवान बनोगे और तुम्हारी रक्षा होगी। ऐसे विश्वास से लाभ भी हो सकता है और हानि भी।

भारतीयों के धार्मिक विश्वास से धूर्तों ने लाभ उठाया और धार्मिक संस्थाओं को जनता की आँखों से गिराया। भारतवासी धर्म से प्रेम करते हैं। जो धर्माचरण करता है उसकी इज्जत करते हैं, उसको दान देना, उसकी सेवा, सुश्रूषा करना अपना कर्तव्य समझते है। यह देखकर कई धूर्तों ने इन्हें खूब ठगा। कोई संन्यासी बना, कोई बैरागी, कोई शैव बना, कोई वैष्णव। किसी ने राख पोती, किसी ने चन्दन, कोई आग के बीच में बैठा, कोई जल में खड़ा हुआ। यह इसलिए किया गया कि हम उसे धर्मात्मा समझें, महात्मा मानें। उन्हें अपने कल्याण की चिन्ता नहीं, धर्म या धार्मिक क्रियाओं पर उनका विश्वास नहीं उनका उद्देश्य होता है जनता में धर्मात्मा के नाम से प्रसिद्ध होना और उसके द्वारा अपना प्रभाव विस्तार करना। ऐसे धर्म के उपहास करने वाले को हम मतलबी और ठग कह सकते हैं।

इन धूर्तों ने हमारे धार्मिक विश्वास से अनुचित लाभ उठाया। खुद डूबे और हमें भी डुबाया। देश और विदेश के धूर्त हमारी धार्मिकता सुनकर दौड़ पड़े, हमें धर्म सिखाने लगे। कोई अवतार लेकर आया और कोई महायोगी बनकर। किसी ने आध्यात्मिक उन्नति का प्रलोभन ही दिखाया। किसी ने अपने को जीवन्मुक्त कहा। हमारी विश्वासी प्रकृति ने छानबीन नहीं की। हमने सभी चमकीली चीजों को सोना समझ लिया। इसका फल यह हुआ कि आज हम मूर्ख बन गये हैं। हमारा धर्म, हमारा वैज्ञानिक धर्म, हमारे लिए उपहास की सामग्री बन गया है। यह हमारी उन्नतियों का विरोध हो गया है। हमारे धर्म से लाभ उठाते हैं हमारी उन्नति के विरोधी।

साधारण मनुष्य शान−शौकत ज्यादा पसन्द करते हैं। अच्छा भोजन, गाड़ी, घोड़ा, मोटर, बँगले आदि को ये स्वर्ग-सुख समझते हैं। इस स्वर्ग-सुख को पाने के लिए उस प्रकृति के सज्जन उत्सुक रहते हैं। उनका प्रयत्न इसी के लिए होता है। इस उद्देश्य की हम निन्दा नहीं करते। ऐसा तो होना ही चाहिए। बहुत लोग ऐसा करते ही हैं और उनसे समाज को लाभ ही है। उनके कार्यों से समाज के सामने कोई आदर्श भी उत्पन्न नहीं होता। मेरा कहना केवल इतना ही है कि अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए ठगी नहीं करनी चाहिए, समाज को नष्ट करके ऐसा करना अपराध है।

दुःख है हमारे समाज में ऐसे अपराधियों की संख्या बढ़ रही है। बिना रुपये, पैसे के धन पैदा करने का नुस्खा मिल गया है। लोग समझते हैं कि बिना पैसे के काम चल गया, कैसी बुद्धिमानी की हमने! उनकी दृष्टि से ईमान का कुछ मूल्य नहीं होता। यदि वह होता, तो वे इस महंगे सौदे के फेर में न पड़ते। कुछ रुपयों के लिए; साधारण सुख के लिए ईमान बेचा जाय इसे तो साधारण समझ वाला महंगा ही समझेगा। धर्म, समाज और ईश्वर से डरने वाला ऐसे सौदे की बात ही नहीं करेगा। पर कुछ साहसी लोग ईमान बेच रहे हैं। पेट के लिए, पूरी मलाई के लिए, पलंग और गद्दी के लिए विश्वासी हृदयों के विश्वास के कोमल पौधे को जड़-मूल से उखाड़ फेंकते हैं। हाय दुर्भाग्य!

समाज तो रहेगा, उजड़ कर भी रहेगा और फिर इसके दिन भी पलटेंगे, आज नहीं, दस दिन के बाद। व्यक्ति बहुत दिनों तक भूल नहीं कर सकते। एक दिन परिस्थिति उनको मजबूर करेगी अपनी दशा सुधारने के लिए। वह दिन आज भी हो सकता है और दस दिन के बाद भी आ सकता है। अतएव विचार यह है कि उनकी क्या दशा होगी, जो इतना महंगा सौदा खरीदते हैं। दुनियावी चीजों के लिए स्वर्ग का ईमान लुटाते हैं। धर्म के बदले में धन लेते हैं।

आलसी, निकम्मे आदमियों की इन्द्रियाँ प्रबल होती हैं। उनकी लालसा इतनी बढ़ी होती है कि वे उसे रोक नहीं सकते। फिर वे करें तो क्या करें? पैसे आवें कहाँ से? नौकरी तो वैसे निकम्मों से होती नहीं और उन्हें नौकरी देता भी है कौन? व्यापार के लिए पैसे चाहिए। ये चीजें कहाँ मिलें? पैसे ही होते तो चिन्ता किस बात की थी? यदि व्यापार के लिए कुछ पैसे जुटाये भी जायं तो उसमें लाभ ही होगा इसका निश्चय भी नहीं है। ऐसी दशा में वैसी प्रकृति वालों के लिए दो ही उपाय रह जाते हैं, एक तो यह कि वे अपनी आदतें सुधारें, मेहनत-मजदूरी करके रूखा-सूखा जो कुछ मिले, उसी पर सन्तोष करें या दूसरा उपाय यह हो सकता है पैसे का प्रबन्ध करें। जिस तरह से हो, पैसे पैदा करें। ऐसे लोग पहले घर की चीजें बेचते हैं, जमीन, जायदाद, घर आदि बेचकर अपनी इच्छाएं पूर्ण करते हैं। फिर स्त्रियों के गहने बाजार में ले जाते हैं, अन्त में ईमान की बारी आती है।

कुछ ऐसे भी इस दल में देखे गये, जो ईमान ही से शुरू करते हैं। ये कुछ पढ़े-लिखे नहीं होते, धर्माधर्म का भी इन्हें ज्ञान बहुत ही थोड़ा, नाममात्र ही का होता है। पर होते हैं साहसी, दिल के पक्के, अतएव ईमान बेचकर, धर्म की दलाली कर तथा लोगों के साथ विश्वासघात करके पेट पालते हैं, दुनिया में चैन की बंशी बजाते हैं।


हमारी भूल

(श्री विष्णुदत्त खन्ना, दिल्ली)

आज का संसार सुख-शाँति और कल्याण का धाम बनने के स्थान पर दुःख, रोग तथा अशाँति का केन्द्र बना हुआ है। चारों ओर निराशा के बादल सर्वदा छाये रहते हैं। फिर भी मानव यह नहीं सोचता कि ऐसा क्यों? और स्वार्थवश आँखों को मूँदे अन्धकार में बढ़ता चला जा रहा है। जिस शाँति की ढूँढ़ है उससे दूर ही दूर भाग रहा है। यह नहीं सोचता कि संसार में सुख के बदले दुःख क्यों? स्वास्थ्य के बदले रोग क्यों? आशा के स्थान पर निराशा क्यों? निराशावश यही सोचता है कि इस दुःख भरे संसार में न कोई परमात्मा है और न कोई दिव्य शक्ति। इसके साथ ही साथ वह अपने भाग्य को भी कोसता है। प्रत्येक सफलता को वह अपने परिश्रम का फल कहता है और विपरीत परिणाम को विधाता की क्रूरता बताता है। यह सब क्यों? क्या यह अनर्थ नहीं? यह विचारशील प्रश्न है।

इस अवस्था का सर्वप्रथम जो कारण दिखाई देता है वह है मानव की मनोवृत्ति! मानव शब्द ही मन से बना है। “जैसी-जैसी जिसकी मनोवृत्ति होगी वैसा ही उसका जीवन होगा” ऐसा हमारे ऋषि-मुनि कह गये हैं और ऐसा ही वेद उपनिषद् तथा अन्य शास्त्र बताते हैं। इस सर्व सत्य कथन को हम भूलकर संसार में उस अप्राप्य वस्तु को ढूँढ़ रहे हैं जिसे आनन्द-घन भगवान ने हमारे अन्तःकरण में ही रखा हुआ है (अर्थात् पुस्तक बगल में ढिंढोरा शहर में) हम उस सुख, शाँति और कल्याण को बाह्य वस्तुओं में ढूँढ़ते फिरते हैं जो स्वयं नाशवान् है। यह हमारी भूल है।

हम अपने अन्दर नहीं देखते कि भगवान् ने एक कभी समाप्त न होने वाला आनन्दमय कोष हमारे शरीर में ही हमें दे दिया है। हम उस कोष को एक कंजूस की तरह दबाए बैठे हैं और ढूँढ़ते हैं बाह्य वस्तुओं में उस आनन्द को! कैसे मिले वह अमूल्य वस्तु, जिन्हें हम ढूँढ़ते फिरें जंगलों में, पर्वतों में, कंदरों में। कस्तूरी तो मृग की अपनी नाभि में है परन्तु भटकता फिरता है वह उसकी प्राप्ति के लिए इधर से उधर। बाहर ढूँढ़ने से उसे कहाँ मिलेगी? यही अवस्था इस समय मानव की है जो अपने अंतःकरण में छिपे आनन्दमय कोष को बाह्य वस्तुओं में ढूँढ़ता फिरता है।

अब हमें इस अवस्था पर भी विचार करना है कि यह सर्वश्रेष्ठ मानव अपने आँतरिक आनन्दमय कोष को भूलकर बाह्य वस्तुओं में क्यों भटक रहा है? इसका कारण भी मन तथा मनोवृत्ति ही है। मन जल-तत्व होने के कारण अधोगति ही है। जैसे जल प्रायः नीचे की ओर ही जाता है। वह ही जल जब सूर्य की शरण लेता है तो सूर्य अपनी किरणों द्वारा उसे ऊपर की ओर खींचता है। इसी प्रकार मानव भी जब तक तपोबल की शरण नहीं लेता उसकी मनोवृत्ति कभी ऊपर को नहीं उठ सकती और न वह सच्चिदानन्द को ही प्राप्त कर सकता है, जिसकी खोज में वह इधर-उधर भटक रहा है।

उस तपोबल तथा ब्रह्मतेज को प्राप्त करने के लिए भी मानव को सर्वप्रथम अपनी अन्तरात्मा का अन्वेषण करना पड़ता है। जब तक अपना ध्यान बाह्य वस्तुओं से हटाकर अंतःकरण में नहीं लगाता तब तक मानव तपोबल या ब्रह्मतेज को नहीं प्राप्त कर सकता जो कि उसके आनन्द का साधन है जिसकी खोज उसे दिन-रात चिन्तित कर रही है।

वह अखण्ड आनन्द तो तभी प्राप्त होगा जब मनोवृत्ति अधोगति का परित्याग करके तपोबल द्वारा ऊपर की ओर बढ़ेगी। अर्थात् उसके कर्म तथा विचार दोनों ही साथ ही साथ उच्च होंगे। कर्म भी उच्च हो और ज्ञान भी उच्च हो, तो वह आनन्द स्वयमेव अनुभव होने लगता है। जैसे कि ईशावास्योपनिषद् में कहा है :-

विद्याँचाविद्याँच यस्तद्रे दो भयं सह! अविद्यया मृत्युँ तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते!!

अर्थात् कर्म तथा ज्ञान दोनों को जो एक साथ रखता है वह कर्म से तो मृत्यु को जीतता है और ज्ञान से उस अमृत रूपी आनन्द को प्राप्त करता है।

अग्रिम श्लोक में और भी स्पष्ट कर दिया है :-

अंधं तमः प्रविशन्ति ये ऽसम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमोय उ सम्भूत्याँ रताः॥

अर्थात् वह अहंकार में प्रवेश करते हैं जो प्रकृति की उपासना करते हैं और वह उनमें भी घोर अंधकार में जाते हैं जो विकृति की उपासना करते हैं।

जितना ही हम बाह्य वस्तुओं की ओर भागेंगे उतना ही हमें निराशा होगी तथा यह हमारी मृग तृष्णा होगी, क्योंकि रेगिस्तान में मृग दूर कहीं पड़ी हुई रेत को पानी समझकर उधर भागता हुआ जाता है परन्तु वहाँ पहुँचकर निराश होकर पिपासाकुल गिर पड़ता है। ऐसी गति हमारी न हो अतः सर्वप्रथम हमें अपने लक्ष्य को पहचानना चाहिए और फिर अपना भी अन्वेषण करना चाहिए। मानव भूल रहा है और वह विकृति रूपी बालू से आनन्द रूप जल को प्राप्त करने की आशा रखता है परन्तु वह कहाँ?

अतः जिस मानव को सुख, कल्याण और शाँति प्राप्त करने की इच्छा हो उसे अपना तथा अपनी आत्मा का अन्वेषण करना चाहिए। हर मानव को प्रातः और साँय कुछ समय शाँत परिस्थिति में बैठकर आत्म-चिन्तन करना चाहिए कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? कहाँ जाना है? मेरा लक्ष्य क्या है? अपने लक्ष्यपूर्ति के लिए मैंने जो साधन अपनाए हैं क्या वह मेरे लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ हैं? जिससे वह अपने आपको पहचान सके और उसके शरीर के पाँचों कोष खुल जाएं और वह सच्चे सुख और शाँति को प्राप्त कर सके। आनन्दमय और शाँत जीवन द्वारा उस सच्चिदानन्द भगवान में लीन हो जाए जो कि मानव का अन्तिम लक्ष्य है।


प्राणिमात्र से प्रेम करना ही वास्तविक भक्ति है।

(श्री अशर्फीलालजी, बिजनौर)

भक्ति की महिमा सभी ने स्वीकार की है। मुक्ति की प्राप्ति में भक्ति भी उसी प्रकार उपयोगी है जैसे कि ज्ञान। बल्कि भक्ति में यह विशेषता है कि यह ज्ञान से सुलभ है। भक्ति दुःखों का सर्वनाश करने वाली और अक्षय सुखों की देने वाली है, इसमें दो राय नहीं हैं। परन्तु जिस भक्ति में ऐसे गुण हैं वह भक्ति भक्ति क्या है, उसका वास्तविक स्वरूप क्या है इस पर विचार करना चाहिए। एक बार सत्संग में एक महात्मा ने कृपा करके भक्ति का स्वरूप बतलाया था, उसमें से जो भूल-चूक के बाद याद रह गया है वह औरों की जानकारी के लिए नीचे लिखा जाता है।

उन महात्मा ने कहा कि जिन भगवान की हम भक्ति करना चाहते हैं पहले उन्हें समझ लेवें तभी भक्ति होनी सम्भव है। जब तक हम भगवान को न जानें तब तक किसकी और किस प्रकार करेंगे। इसलिए उन्होंने कहा कि हम तुम्हें पहले उस भगवान का पता बताते हैं जिसको भक्ति से तुम्हें प्रसन्न करना है। वास्तविक बात यह है कि ईश्वर और जीव में कुल और जुज (सम्पूर्ण और अंश का सम्बन्ध है और अन्तर कुछ नहीं है। हाथ, पैर, सर, मुँह, कान आदि सभी अंगों के समूह का नाम शरीर है और शरीर कुछ भी नहीं है, वैसे ही समस्त जीवों के समूह का नाम ही भगवान है। जैसे जीव के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर हैं, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था हैं और विश्व, तेजस, आज्ञ उनके अहंभाव की संज्ञा हैं वैसे ही भगवान के भी तीन शरीर, तीन अवस्था और तीन अहंभावों की संज्ञा हैं। प्राणीमात्र के स्थूल शरीरों का समूह भगवान का स्थूल शरीर है जिसके अहंभाव की संज्ञा विराट है। समस्त प्राणियों के सूक्ष्म शरीरों का समूह भगवान का सूक्ष्म शरीर है जिसके अहंभाव की संज्ञा हिरण्यगर्भ है और समस्त जीवों के कारण शरीरों का समूह भगवान का कारण शरीर है जिसके अहंभाव की संज्ञा ईश्वर है। इस प्रकार विराट, हिरण्यगर्भ और ईश्वर, भगवान की क्रमशः जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएं हैं। अर्थात् संसार में जो भी दिखाई देता है वही भगवान का विराट रूप है और जागृत अवस्था है। जैसे माता, पिता और गुरु आदि की भक्ति करने वाले को मातृ भक्त, पितृ भक्त और गुरु भक्त कहते हैं वैसे ही भगवान की भक्ति करने वाले को भगवद्भक्त कहते हैं। जैसे पीछे कोई व्यक्ति जागृत में तो माता, पिता और गुरु की कोई सेवा न करे बल्कि उनकी ओर से उपेक्षा रखे, राग, द्वेष बरते और स्वप्न में तथा सुषुप्ति में उनकी आरती उतारे, रो-रोकर प्रार्थना करे तो उसको कोई भी माता, पिता और गुरु का भक्त नहीं कहेगा, न उसकी ऐसी प्रार्थना आदि से माता-पिता या गुरु प्रसन्न ही हो सकते हैं। वैसे ही जो विराट रूप में भगवान की सेवा, प्रेम और भक्ति नहीं करता अर्थात् प्राणीमात्र से प्रेम नहीं करता वह कदापि भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता। जैसे किसी के शरीर के एक अंग से भी द्वेष रखने वाला उस अंग वाले व्यक्ति को प्रसन्न नहीं कर सकता उसी प्रकार किसी प्राणी से भी द्वेष करने वाला समस्त प्राणियों के समूह रूप भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता। जब प्राणी और भगवान में अंश और अंशी का (जुज और कुल का) व्यष्टि और समष्टि का ही सम्बन्ध है तो भगवान की भक्ति के लिए भगवान को प्रसन्न करने के लिए प्राणीमात्र की सेवा करना अनिवार्य हो जाता है। जो प्राणीमात्र का भक्त नहीं वह ईश्वर भक्त नहीं कहा जा सकता। पूर्ण ईश्वर भक्त बनने के लिए यह आवश्यक है कि तीनों अवस्थाओं में (विराट, हिरण्यगर्भ, ईश्वर) भगवान की भक्ति की जावे। इसके विराट रूप में, प्राणीमात्र की सेवा सबसे पहली और स्थूल भक्ति है। जो ऐसा नहीं करता वह शेष दोनों रूपों में भी भगवान की भक्ति नहीं कर सकता। केवल ढोलक, मंजीरे बजा-बजाकर भगवान नाम की ध्वनि करते-करते बेहोश हो जाने या जबान से राम-राम रटने, माला के दाने घुमाते रहने आदि का नाम भक्ति नहीं है। जो प्राणीमात्र को भगवान का रूप जानकर उनसे प्रेम नहीं करता वह ढोंगी है और उसने भक्ति के असली रूप को नहीं जाना है। जिस भक्ति की इतनी प्रशंसा महापुरुषों ने गाई है वह यही भक्ति है जिसका असली रूप ऊपर बतलाया गया है। प्राणी की सेवा, प्रेम, विराट रूप में भगवान की भक्ति है और प्राकृतिक नियमों का पालन करना अपने अन्दर दैवी गुणों को लाना, हृदय को भगवान का निवास-स्थान बनाने के लिए शास्त्रों में वर्णित गुणों को अपने में लाना, ध्यान लगाना, कीर्तन आदि करना भगवान की हिरण्यगर्भ और ईश्वर रूप की भक्ति है। एकाँगी भक्ति से पूर्ण फल कदापि नहीं मिल सकता। इस प्रकार भक्ति के असली रूप को जानकर भक्ति करनी चाहिए। ऐसी भक्ति की प्रशंसा कौन न करेगा और कौन ऐसी भक्ति का उपहास करने का साहस करेगा।


विश्राम कैसे करना चाहिये।

(श्री ‘शंकर’)

मनुष्य के जीवन धारण करने के लिये विश्राम उसी प्रकार आवश्यक है जैसे अन्न, जल, पवन आदि। इसलिये विश्राम के सम्बन्ध में लोग ज्यादा बतलाने की आवश्यकता नहीं समझते। उनका विचार है कि दिन भर परिश्रम करने के पश्चात् रात को पैर पसार कर सो रहना ही विश्राम है। यह सच है कि विश्राम का मूल अर्थ इतना ही है। पर जब हम उसके गूढ़ार्थ पर विचार करते हैं तो जान पड़ता है कि विश्राम का अर्थ केवल सो जाने या निद्रा आ जाने से ही नहीं है। वरन् नित्य प्रति के जीवन निर्वाह के लिये किये गये परिश्रम के उपरान्त शरीर और मन को उससे पूर्णतया छुट्टी देना ही विश्राम कहा जा सकता है। सेठ-साहूकारों की तरह सुबह 8-9 बजे से शाम से 7-8 बजे तक दुकान करना और उसके बाद भोजन करके 10-11 बजे सो जाना विश्राम नहीं कहलाता। निद्रा तो शरीर का स्वाभाविक धर्म है। उसके बिना मनुष्य का काम एक दो दिन से ज्यादा नहीं चल सकता। पर विश्राम का अर्थ इस समय दैनिक व्यवसाय का काम करने के बाद मनोरंजन या अन्य विधियों से शरीर और मन को पूर्णरूप से ढीला कर देना और दूसरे वातावरण में पहुँचा देना है, जिससे कार्य से उत्पन्न अवसाद जाता रहे।

इस सम्बन्ध में जानकार व्यक्ति योरोप का उदाहरण देते हैं। वहाँ बूढ़े-जवान, धनी-गरीब सभी अपने नित्य प्रति के कामों का समय निर्धारित कर लेते हैं; प्रति दिन आठ घंटा काम करने का, आठ घंटा सोने का और आठ घंटा विश्राम करने का। वे लोग सुबह उठते ही काम में लग जायेंगे और काम का निर्धारित समय पूरा होते ही वे विश्राम में लग जायेंगे। उनके सामने कैसा भी लाभ या हानि का संयोग क्यों न आ जाये, वे अपने इस कार्यक्रम में शायद ही परिवर्तन करते हैं। जिन दिनों लन्दन पर जर्मनी के वायुयानों की बम वर्षा हुआ करती थी, उन दिनों में भी वहाँ के सिनेमा घर, नाच घर और मनोरंजन के अन्य स्थान भीड़ से भरे रहते थे। फुटबाल, घुड़दौड़, क्रिकेट के मैच आदि सब बदस्तूर होते रहते थे।

इस प्रकार नियमित रूप से काम करने का परिणाम यह होगा कि विश्राम के बाद मनुष्य में नई शक्ति उत्पन्न हो जाती है और वह दूने उत्साह से काम करने लगता है। इस तरह काम करने से ज्यादा थकावट नहीं आती और नित्य का काम निर्धारित समय से पहले ही पूरा किया जा सकता है। जापानियों ने भी बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में जो उन्नति की थी और उद्योग-धन्धों में क्राँति करके संसार के बाजार में अपना सिक्का जमा लिया था उसका कारण यही था कि काम और विश्राम के सम्बन्ध में उन्होंने योरोप का अनुकरण किया था।

पर हमारे यहाँ की दशा उल्टी ही है। हमारे देशवासी रात में सात-आठ घण्टा सो लेने को ही विश्राम समझते हैं। यहाँ के बड़े-बड़े शहरों के कारखानों में ‘ओवर टाइम’ की प्रथा भी खूब चालू है और लोग थोड़ी अधिक आमदनी हो जाने के ख्याल से उसे पसन्द भी करते हैं। वे कहा करते हैं कि आजकल कारखाने या दफ्तर में ज्यादा काम आ गया है इसी से ओवरटाइम करना पड़ रहा है। पर वे यह नहीं जानते कि काम का अन्त कभी नहीं होता। इसलिए काम उसी समय समाप्त समझ लेना चाहिये जब हम उसे छोड़कर छुट्टी ले लें। जो लोग इसका ध्यान न करके सदा काम की चिन्ता में ही लगे रहते हैं, उनकी दशा बड़ी बुरी होती है। सोते समय भी वे मन में यही विचारते रहते हैं कि मुझे अभी बहुत काम करना है। अगर रात न हुई तो उसे पूरा कर लेता। ऐसा आदमी भले ही निद्रा लेने की इच्छा करे पर सच्ची नींद उसे नहीं आ सकती क्योंकि दिमाग में तो काम करने का तूफान उठा रहता है। ऐसे आदमी का जीवन थोड़े ही दिनों में भार स्वरूप हो जाता है। वह लोभ में पड़कर काम तो जरूर करना चाहता है पर अधिक समय तक उसकी शक्ति कायम नहीं रहती और वह काम को ठीक ढंग से करने के बजाय बिगाड़ने लगता है। तब मालिक भी उस पर नाखुश रहने लगता है। इस प्रकार उचित विश्राम के अभाव से उसका जीवन असफल हो जाता है और निराशा के फंदे में फँस थोड़ी आयु में ही उसकी इहलीला समाप्त हो जाती है।

बहुत से लोग जो दिन-रात नाना जंजाल में फँसे रहते हैं और कभी फुर्सत नहीं पाते वे उत्साह बढ़ाने या मस्तिष्क ताजा करने के उद्देश्य से बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, चाय, शराब आदि का सेवन करने लगते हैं। शुरू में चाहे इनके कारण इन्हें कुछ स्फूर्ति का अनुभव हो, पर अन्त में बड़ी खराबी होती है। इन नशीली चीजों का व्यसन लग जाने से धन की हानि के साथ-साथ शरीर में भी दोष उत्पन्न होने लगते हैं। ये चीजें हलके जहर (स्लो पाइजन) के नाम से प्रसिद्ध हैं और इनके प्रभाव से मनुष्य शरीर अनेक प्रकार के रोगों का घर बन जाता है। बहुत से लोग तो इनके फंदे में फँसकर अकाल मृत्यु के शिकार ही बन जाते हैं।

हमारा यह आशय नहीं कि लोग विश्राम के लिए सिनेमा और अश्लील नाच-गान का सहारा लें। हमारे देश में भी पहले सायंकाल के बाद गाँवों और कस्बों में रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने, भजन-कीर्तन करने, धार्मिक नाटक आदि देखने की प्रथा थी। अब भी हमको विश्राम के लिए समयोपयोगी और लाभदायक मनोरंजन के मार्ग ढूँढ़ लेने चाहिए।


गायत्री परिवार समाचार

गायत्री परिवार कार्यक्रम सारे भारतवर्ष में बड़े ही उत्साहपूर्वक चल रहा है। अब उसके सारे समाचार, विज्ञप्तियाँ, परिपत्र अनुभव तथा आवश्यक सूचनायें गायत्री परिवार पत्रिका में छपते हैं कुछ आवश्यक बातें ‘अखण्ड ज्योति’ में भी ‘गायत्री-परिवार समाचार’ स्तम्भ के नीचे छपती रहा करेंगी।

1- महायज्ञ की पूर्णाहुति का कार्यक्रम सफल बनाने के लिए तपोभूमि के कार्यकर्त्ता संलग्न हैं। विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों की जिम्मेदारियाँ लोगों को बाँटी जा रही हैं। जिनके जिम्मे जो काम सौंपा गया है वे अपने-अपने कार्यों को पूरा करने के लिए जुट गए हैं। समय थोड़ा और काम बहुत ज्यादा होने से सम्बद्ध कार्यकर्त्ताओं को कड़ा परिश्रम और भारी दौड़-धूप में लगा रहना पड़ रहा है।

2- देश भर में गायत्री महायज्ञ के लिए समुचित उत्साह है। होता और यजमान अपने जप तथा उपवासों की संख्या पूरी करने में श्रद्धापूर्वक लगे हुए हैं। जिन्होंने अभी-अभी नये फार्म भरे हैं वे भी महायज्ञ तक सवा लक्ष जप आसानी से पूरा कर लेंगे ऐसी आशा है। जिनका जप उपवास पूरा न हो सकेगा उन्हें इतनी साधना उधार देदी जायगी जो अगले वर्ष वे पूरा कर सकेंगे। इस प्रकार साधना की जो कठिन शर्त थी वह सरल हो जाने से जिनको इतनी अधिक साधना इतने कम समय में न कर सकने का भय था वह दूर हो रहा है।

3- प्रायः सभी शाखाओं में गायत्री जयंती बड़े उत्साहपूर्वक मनाई गई। गायत्री जयन्ती गायत्री परिवार का त्यौहार है। उस दिन उपासकों ने अपने घर पर दिवाली जैसे दीपक जलाये तथा सामूहिक जप, हवन, प्रवचन, कीर्तन, जुलूस आदि के आयोजन किए। गायत्री-जयन्ती और गंगा दशहरा दोनों मिल जाने से गंगा-यमुना संगम की भाँति एक आध्यात्मिक तीर्थ बन जाता है। यह पर्व आगे भी हर वर्ष पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाता रहना चाहिए।

4- गायत्री परिवार के शाखा-संगठनों तथा सदस्यों का समुचित पथ-प्रदर्शन करने की दृष्टि से गायत्री-परिवार पत्रिका का प्रकाशन बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ है। अप्रैल, मई, जून के अंक ता. 20 को गत महीनों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं और शाखाओं को भेजे गए हैं। प्रत्येक शाखा में पत्रिका का पहुँचाना तथा सभी सदस्यों को उसे पढ़ाया या सुनाया जाना आवश्यक है। इन तीन अंकों में से कोई अंक किसी शाखा को न मिला हो तो उसे डाक की गड़बड़ी समझकर दुबारा भेजने के लिए मथुरा सूचना देनी चाहिए।

5- गायत्री परिवार पत्रिका का सालाना चंदा 2) जिन शाखाओं ने अभी नहीं भेजा है, उन्हें वह शीघ्र ही भेज देना चाहिए।

6- जो शाखाएं मासिक रिपोर्ट नियमित रूप से नहीं भेजतीं, जिनके मन्त्री और सदस्य अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं देते, जिनके यहाँ कोई कार्यालय नहीं चलते, जहाँ से महायज्ञ की पूर्णाहुति में भी कोई नहीं आना चाहते, जो न अखण्ड ज्योति मँगाते हैं, न गायत्री परिवार पत्रिका, ऐसी शाखाओं को तोड़ा जा रहा है। उन शाखाओं से एक परिपत्र द्वारा स्पष्टीकरण माँगा गया है। कर्तव्य की उपेक्षा करने वाली शाखाएं अगले महीने तोड़ दी जायेंगी।

7- सभी होता और यजमानों को उनके 15 आवश्यक कर्तव्यों का स्मरण दिलाने के लिए एक परिपत्र निकाला गया है, जो उनके शाखा-मन्त्रियों के नाम भेज दिया गया है। जिन शाखाओं को होता यजमानों के दिए जाने के लिए 15 आवश्यक कर्तव्यों वाले परिपत्र न पहुँचे हों वे तुरन्त ही मँगा लें।

8- महायज्ञ में आने वाले सज्जन अपने-अपने क्षेत्रों से अधिकाधिक लोगों से गायत्री मन्त्र लेखन की कापियों को चन्दा संग्रह करने की तरह साथ लाने का प्रयत्न करें। आशा है कि यज्ञ में आने वाले प्रत्येक सज्जन अपने धर्म प्रचार के प्रमाण स्वरूप अपने क्षेत्र के कुछ लोगों से मन्त्र लेखन कराके साथ लाने का प्रयत्न करेंगे।

9- गायत्री तपोभूमि में अश्विन सुदी 1 तदनुसार ता. 13 अक्टूबर से महायज्ञ की पूर्णाहुति (26 नवम्बर) तक सेवा शिविर लगेगा प्रारम्भिक 15 दिनों में आये हुए शिक्षार्थी नवरात्रि में साधना करेंगे तथा अपने-अपने क्षेत्रों में अगले वर्ष धर्म प्रचार का कर्म करने की, यज्ञानुष्ठान आयोजनों की तथा समाज सेवा की शिक्षा दी जाएगी। महायज्ञ की पूर्णाहुति के लिए यही शिक्षार्थी स्वयं-सेवकों का कार्य करेंगे। गायत्री-परिवार की प्रत्येक शाखा को अपने यहाँ से कुछ शिक्षार्थी स्वयं-सेवक भेजने का प्रयत्न करना चाहिए।

10- जिनके ऊपर छोटे बच्चों की जिम्मेदारी नहीं है, ऐसी प्रतिभावान घूँघट न करने वाली शिक्षित महिलाओं की भी इन सेवा-कार्यों की आवश्यकता होगी। वे यदि 1॥ मास पूर्व न आ सकें तो एक मास पूर्व आ सकती हैं।

आगन्तुकों में से प्रत्येक नर-नारी को पूरा सेवाभावी, परिश्रमी, कष्ट सहिष्णु, उदार, मधुर भाषी, निर्व्यसनी, सफाई पसन्द तथा निरोग होना आवश्यक है। आलसी, अहंकारी, झगड़ालू, आराम पसंद, कटुभाषी, व्यसनी, बीमार तथा गन्दी प्रकृति के लोग सेवा तथा शिक्षा के अनुपयुक्त माने जायेंगे, वे न आवें।

11- गायत्री तपोभूमि के कुंए में मोटर का पम्प बिठाने की आवश्यकता अनुभव हो रही है। महायज्ञ के समय अधिक पानी की जरूरत पड़ेगी। वैसे भी तपोभूमि में सदा ही स्नान, सफाई, धुलाई, छिड़काव, पौधों में पानी लगाने की आवश्यकता है। प्राकृतिक कल्प चिकित्सालय महायज्ञ के बाद आरम्भ होगा उसमें पानी की जरूरत रहा करेगी। पम्प लग जाने से तपोभूमि के बाहर सड़क पर दो नल लगा देने से मथुरा से वृन्दावन जाने वाले तथा ब्रज की परिक्रमा करने वाले लाखों प्यासे यात्रियों को पानी पीने की चौबीस घण्टे सुविधा देने वाली प्याऊ लग जावेगी। यह सभी कार्य बड़े पुण्य हैं। इस मोटर पम्प के बिठाने में कुल खर्च दो हजार के लगभग होगा कोई साधन सम्पन्न इस पुण्य कार्य का श्रेय स्वयं लेना चाहें तो यह उनके लिए एक असाधारण सौभाग्य की बात होगी।

12- किसी होता और यजमानों को प्रचार साहित्य वितरण तथा ज्ञान मन्दिर स्थापना के लिए सर्वथा विमुख रहना उचित नहीं। जो लोग आर्थिक संकोच अनुभव करते हैं, उन्हें थोड़ा बहुत तो खर्च करना ही चाहिए। कई होता-यजमान मिलकर वितरण साहित्य या ज्ञान मन्दिर सैट मँगा सकते हैं। पर बिलकुल ही चुप्पी साध लेना फार्म में लिखित प्रतिज्ञा का भंग माना जायगा।

13- स्वयं साधना करने तक ही सीमित न रह कर जो परिजन धर्म प्रचार का भी महत्व स्वीकार करते हैं और उसके लिए सक्रिय सहयोग एवं समय भी देते हैं, ऐसे ही धर्मनिष्ठ, कर्त्तव्य परायण लोक सेवी सज्जनों को गायत्री परिवार का आधार स्तम्भ माना जायगा। इन्हीं के कन्धों पर राष्ट्र में धर्म बुद्धि पैदा करने की जिम्मेदारी रहेगी। ऐसे लोगों को लेकर ही देश भर में गायत्री परिवार के मंडल बनाये जाएंगे और उन्हीं के द्वारा अ.भा. गायत्री परिवार का केन्द्रीय मन्त्रि-मण्डल बनेगा।

ऐसे लोगों की छाँट के लिए उपाध्याय वाला कार्यक्रम रखा गया है। अपने घर में ज्ञान मन्दिर स्थापित करके कम से कम 10 पड़ौसियों को वह पूरा साहित्य पढ़ा देने की भाग-दौड़ श्रद्धा परखने की एक कसौटी रखी गई है। किस शाखा में कितने उपाध्याय निकलते हैं इस प्रश्न पर यह बहुत ही उत्सुकता पूर्वक ध्यान किया जा रहा है। उन्हीं की संस्था को ध्यान में रखकर संस्था अपने भावी कार्यक्रम बनावेगी। साधारण होता यजमानों के दूध में से मलाई रूप उपाध्याय निकालने के लिए संस्था का पूरा ध्यान है।

14- इस वर्ष दो श्रावण हैं। यों प्रत्येक अधिक मास अधिक फलदायक माना जाता है पर श्रावण मास का पुण्यफल सबसे अधिक है। इस बार यह सुयोग आया है। गायत्री-परिवार के सदस्यों को अधिक श्रावण मास में अपनी साधना अधिक बढ़ा देनी चाहिए। अगली आश्विन की नवरात्रि में परिवार के कार्यकर्त्ताओं पर महायज्ञ का बहुत भार आ जायगा। प्रतिदिन फुरसत मिलनी कठिन होगी। इसलिए नौ दिन का अनुष्ठान तथा जहाँ सम्भव है वहाँ छोटे-छोटे सामूहिक यज्ञ आयोजनों का कार्यक्रम भी इस अधिक श्रावण मास में ही बना देना चाहिए। ज्ञान मन्दिरों की स्थापना तथा दस व्यक्तियों को गायत्री साहित्य पढ़ा देने का ‘उपाध्याय’ कार्य इस अधिक श्रावण मास में पूरा कर लेना चाहिए।


दधीचि का अस्थि-दान


दधीचि का अस्थि-दान (Kavita)

अस्थि-युग की बात है काफी पुरानी,

एक ऋषि के त्याग की अनुपम कहानी।

तोप, बन्दूकों, बमों की बात ही क्या?

बाण तक का भी नहीं तब पता था।

शस्त्र बन पाये न थे संहारकारी,

अस्थियों से युद्ध करती जाति सारी।

देवता थे, आर्यगण थे, दैत्य-दल थे,

किन्तु उनमें दैत्य ही सबसे प्रबल थे।

दैत्य कुल भूप वृत्रासुर असुर था,

युद्ध विद्या में जो बड़ा ही चतुर था।

निज अपरिमित शक्ति को पहचानता था,

और सर्वोपरि स्वयं को मानता था।

शक्ति के अपने नशे में चूर था वह,

दस्यु, दानव, हिंस्र, बर्बर, क्रूर था वह।

दुष्ट वृत्रासुर खुदी पर आ गया था,

लोक पर आपत्ति बनकर छा गया था।

वह प्रजा पर खून अत्याचार करता,

सज्जनों को त्रास देता, वार करता।

घूमता था सृष्टि का संहार करता,

रक्त पीकर अस्थियों को प्यार करता।

शाँति-प्रिय, निर्बल जनों को भय दिखाता,

हिंसकों को शक्ति देकर बल बढ़ाता।

धर्म के अनुयायियों को लूटता था,

पीड़ितों पर वज्र बनकर टूटता था।

दूसरों की मौत बनकर जी रहा था,

खून जनता का निरंतर पी रहा था।

भूख, बीमारी, गरीबी, ला रहा था,

एक दानव भूमि सारी खा रहा था।

जो किसी का सिर उठा तो वह कुचलता,

राह चलते राहियों को मार चलता।

शाँति सुख से युद्ध उसका ठन चुका था,

वह जगत का घोर संकट बन चुका था।

यत्न उसको जीतने के हो चुके थे,

देव-मानव वीर साहस खो चुके थे।

जो गया वह युद्ध से बच न पाया,

भाग आया, मर गया, बन्दी बनाया।

देख उसको काँपते थे लोक सारे,

देवता तक बच न पाये थे बिचारे।

शोक दानव विश्व विजयी झूमता है,

आज भी उन्मुक्त होकर घूमता है।

शस्त्र हमने घोरतम सारे चलाये,

किन्तु उसका बाल बाँका न कर पाये।

आज जीतेजी हमें वह मार बैठा,

देव कुल पुरुषार्थ सारा हार बैठा।

जबकि सारे देवता थे त्रस्त ऐसे,

इन्द्र ने सोचा कि हो उद्धार कैसे।

देव-संसद की तभी बैठक बुलाई,

विधि वृहस्पति ने यहाँ ऐसी बताई-

यदि कहीं से देव भौतिक शक्ति लावें,

तो किसी विधि से असुर को मार पावें।

भूमि तल के एक गौरव हैं दधीचि,

सामने जिनके हमारी जाति नीची।

विप्र बनकर दान लेने इन्द्र जावें,

और उनकी अस्थियों को माँग लावें।

यदि लड़े उन अस्थियों का वज्र लेकर,

तो मरेगा दैत्य अपने प्राण देकर।

बात यह सबकी समझ में आ गई थी,

किन्तु चेहरों पर उदासी छा गई थी।

आत्म-रक्षा को किसी का प्राण लेना,

यह अनैतिक मानती थी देव-सेना।

किन्तु खुलकर इन्द्र ने यह बात मानी,

छल-कपट की नीति अपनाई पुरानी।

दूसरे दिन ब्राह्मण का वेश धर कर,

वह खड़ा था ऋषि दधीचि की कुटी पर।

पौ फटी थी, सूर्य प्राची में छिपे थे,

ऋषि अभी तक आँख मूँदे ध्यान में थे।

एक ब्राह्मण याचना के हेतु आया,

इन्द्र ने कह शीश चरणों में झुकाया।

शब्द सुनकर शीघ्र ऋषि ने नेत्र खोले,

और उसकी ओर क्षण भर देख बोले।

ब्राह्मण हो ठीक, आओ, बैठ जाओ,

आगमन का अभिप्राय क्या है यह बताओ।

जो बताओ भी नहीं तो जानता हूँ,

वास्तव में मैं तुम्हें पहचानता हूँ।

आ गये तुम, ठीक ही अवसर चुना था,

आगमन अभिप्राय मैंने कल सुना था।

सच कहूँ तो ध्यान ही क्या धर रहा था,

मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था।

मानता हूँ भीत हो तुम मृत्यु-भय से,

चाहते हो आत्म-रक्षा ही हृदय से।

किन्तु सोचो कौन पथ अपना रहे हो?

प्राण लेकर त्राण पाने जा रहे हो।

और फिर उसके लिए यह कपट कैसा?

किस लिए तुमने बनाया वेश ऐसा।

ठीक है, ये प्राण क्षण-भंगुर हमारे,

किन्तु फिर भी हैं सभी को प्राण प्यारे।

मृत्यु का भय तो सभी को दाहता है,

तुम बताओ कौन मरना चाहता है?

किन्तु घबराओ नहीं, मैं प्राण दूँगा,

मृत्यु-भय से तर्क का आश्रय न लूँगा।

स्वार्थ है इसमें तुम्हारा जानता हूँ,

किन्तु यह परमार्थ भी है, मानता हूँ।

यों तुम्हें लज्जित किया, मत मान लेना,

भाव हैं सच्चे हृदय के जान लेना।

सोचता हूँ जन्म का उद्देश्य क्या है?

किस लिए पैदा हुआ हूँ क्या किया है?

बहुत वर्षों साधना की, ज्ञान पाया,

किन्तु लगता व्यर्थ ही जीवन गँवाया।

आज अपने पास देखी मृत्यु छाया,

और सच्चे ज्ञान का आभास पाया।

विश्व, वैभव, मान-यश ले क्या करूंगा?

सब मिलेगा किन्तु फिर भी तो मरूंगा।

इस लिए बलिदान तो क्या जानता हूँ,

मैं इसे कर्त्तव्य-पालन मानता हूँ।

आज तुमसे माँगता क्या मान मेरा?

मृत्यु ही जब बन गई वरदान मेरा।

मैं मरूंगा ताकि बाकी लोग जीवें,

फिर न दानव मानवों का रक्त पीवें।

क्या पता है, मैं कहाँ को जा रहा हूँ,

किन्तु अन्तिम शाँति सचमुच पा रहा हूँ।

लोक के हित को रहा है प्राण-अर्पण,

आज मेरा हो गया है धन्य जीवन।

और को सुख दे रहा हूँ कष्ट सहकर,

हो गए ऋषि शान्त इतनी बात कहकर।

इन्द्र ने अपना अभीप्सित दान पाया,

दैत्य-वध से लोक में आनन्द छाया।

बात बीती पर निशानी रहा गई है,

सीख देने को कहानी रह गई है।

*समाप्त*

(श्री यादराम शर्मा, ‘रजेश’)