गायत्री ज्ञान मन्दिर सैट मँगाकर अपने घर में गायत्री पुस्तकालय की स्थापना कीजिए

गायत्री-ज्ञान का सर्वसाधारण में प्रसार करने के लिए यह 52 पुस्तकें अत्यन्त ही सुन्दर तिरंगे बढ़िया ग्लेज कागज पर छापी गई हैं। गायत्री विद्या का महत्वपूर्ण ज्ञान, विज्ञान, साधना विधान, अर्थ तथा सन्देश इन पुस्तकों में बड़े प्रभावशाली एवं सुबोध रूप से लिखा गया है। यह सस्ता सैट प्रत्येक धर्म-प्रेमी को अपने घर पर रखना चाहिए। स्वयं पढ़ना तथा दूसरों को पढ़ाना चाहिए। यह 52 पुस्तकें घर में गायत्री पुस्तकालय स्थापना का उद्देश्य पूर्ण करती हैं। मूल्य प्रत्येक का चार आना। 52 पुस्तकों का 13 रु. एक साथ लेने पर डाक व्यय माफ।

गायत्री का ज्ञान विज्ञान और साधन

गायत्री महात्म्य।

गायत्री की दिव्य शक्ति।

गायत्री द्वारा आत्मोत्कर्ष।

गायत्री की सिद्धियाँ।

गायत्री से ब्रह्म साक्षात्कार।

गायत्री साधना के चमत्कार।

गायत्री से व्याधि निवारण।

गायत्री द्वारा भौतिक सफलताएं।

गायत्री से संकट निवारण।

सचित्र गायत्री।

मनुष्य जीवन की सार्थकता।

स्त्रियों का गायत्री अधिकार।

गायत्री के जगमगाते हीरे।

गायत्री उपनिषद्।

गोपनीय गायत्री तन्त्र।

गायत्री और यज्ञोपवीत।

अनादि गुरु-मन्त्र गायत्री।

गायत्री की सुलभ साधना।

गायत्री से योग साधना।

गायत्री सहस्रनाम।

गायत्री हवन पद्धति।

गायत्री यज्ञ का महत्व।

यज्ञ और भारतीय संस्कृति।

विश्वव्यापी संकट।

सामूहिक यज्ञ योजना।

साँस्कृतिक पुनरुत्थान।

गायत्री का अर्थ और संदेश

गायत्री की 24 शिक्षाएं।

ईश्वर का विराट् रूप।

ब्रह्मज्ञान का प्रकाश।

शक्ति का सदुपयोग।

धन का सदुपयोग।

आपत्तियों में धैर्य।

नारी की महानता।

गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा।

प्रकृति का अनुसरण।

मानसिक संतुलन।

सहयोग और सहिष्णुता।

इन्द्रिय संयम।

पवित्र जीवन।

परामर्श और स्वार्थ।

सर्वतोमुखी उन्नति।

ईश्वरीय न्याय।

विवेक की कसौटी।

जीवन और मृत्यु।

धर्म की सुदृढ़ धारणा।

प्राण घातक व्यसन।

सावधानी और सुरक्षा।

उदारता और दूरदर्शिता।

स्वाध्याय और स्वतन्त्र।

आत्म कल्याण का मार्ग।

सन्तान के प्रति कर्तव्य।

शिष्टाचार और सहयोग।

16 आदर्श वाक्य कार्डबोर्ड पर तिरंगे छपे

पता- अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा।

वर्ष-19 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-6


मानवता का आदर्श।

(श्री एम. एम. साण्डल,)


मानवता का आदर्श (Kavita)

रज-कणों के रूप मानव! उसी में उत्पत्ति, और समाप्ति जग के भूप मानव!

पंच तत्वों से बनी काया न कंचन-सी रहेगी, सिद्ध होगा साम्य का कटु सत्य जीव अनूप मानव! रज-कणों के रूप मानव!

मोह, माया, लोभ, लिप्सा में गया जीवन का आता, खोल अंतर्चक्षु, मानव! बन न दादुर कूप, मानव! रज-कणों के रूप मानव!

क्या हुआ यदि भाग्य है विपरीत, किसका दोष? अपना! छाँह शीतल कल द्रुमों की, आज मरु की धूप, मानव! रज-कणों के रूप मानव!

क्रोध, निद्रा, काम, चिन्ता में पुरुष! भूला डगर क्यों? वासुदेवमयी धरा है, चर-अचर तद्रूप, मानव! रज-कणों के रूप मानव!

ढूँढ़ता तू चर्च, मस्जिद, मन्दिरों में मूर्ख! किसको? मूक पशुओं, दीन-दुखियों में ‘प्रकाशस्वरूप’ मानव! रज-कणों के रूप मानव!

प्रार्थनाएँ हैं अनाथों की पुकारें श्रवण के हित, झोंपड़े असहाय के हैं वन्दना के स्तूप मानव! रज-कणों के रूप मानव!


सच्ची सभ्यता और इन्द्रिय संयम

(महात्मा गाँधी)

सभ्यता का आचरण वह प्रणाली है जिससे मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन करता है। कर्तव्य-पालन करने का तात्पर्य है नीति का पालन करना और नीति के पालन करने का अर्थ है अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखना। ऐसा करने से हम अपने आपको पहिचानते हैं। यही सभ्यता है और इससे विरुद्ध आचरण करना असभ्यता है।

बहुत से अँग्रेज लेखकों ने लिखा है कि ऊपर दी गई सभ्यता की व्याख्या के अनुसार भारतवर्ष को कुछ भी नहीं सीखना है। यह बात बिलकुल ठीक है। हम देखते हैं कि मनुष्य की वृत्तियाँ चंचल हैं, मन व्यर्थ इधर-उधर भटकता फिरता है। शरीर को हम जितना ज्यादा देते हैं, उतना ही ज्यादा वह माँगता है और ज्यादा लेकर भी वह सुखी नहीं होता। हम जितने ज्यादा भोग भोगते हैं, उतनी ही ज्यादा हमारी भोग की इच्छा बढ़ती जाती है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने उसकी मर्यादा बाँध दी। उन्होंने बहुत विचार करके देख लिया कि सुख-दुख मन के कारण होते हैं। धनवान, धन के कारण सुखी नहीं और न गरीब, गरीबी के कारण दुखी हैं। धनी को दुखी देखा जाता है और गरीब भी सुखी मिलते हैं। करोड़ों लोग तो हमेशा गरीब ही रहने वाले हैं। यह देखकर हमारे पूर्वजों ने हमसे भोग की वासना छुड़वाई। हजारों वर्ष पहले जोतने का जो हल था उसी से हम ने अपना काम चलाया। हजारों वर्ष पहले हमारे जैसे झोंपड़े थे, उन्हीं को हमने कायम रखा। हजारों वर्ष पहले जैसी हमारी शिक्षा थी, वहीं चलती आई। हमने नाशकारी होड़ (कम्पटीशन) की पद्धति को अपने यहाँ स्थान नहीं दिया। सब अपना-अपना धन्धा करते रहे, उसमें उन्होंने दस्तूर के मुताबिक दाम लिए हमें यन्त्रों का आविष्कार करना नहीं आता था, ऐसी बात नहीं। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि यन्त्रों वगैरह की झंझट में लोग फंसेंगे तो गुलाम ही बनेंगे और अपनी नैतिकता छोड़ देंगे। उन्होंने विचारपूर्वक कहा कि हम अपने हाथ-पैरों की मदद से जो कुछ कर सकें वहीं हमें करना चाहिए। हाथ-पैरों का उपयोग करने में ही सच्चा सुख है, उसी में तन्दुरुस्ती है।

उन्होंने सोचा कि बड़े-बड़े शहरों की स्थापना करना बेकार की मुसीबत मोल लेना है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगे। उनमें चोर-डाकुओं के गिरोह पैदा होंगे और व्यभिचार व अनेक तरह की बुराइयाँ फैलेंगी। गरीब लोग धनियों द्वारा लूटे और चूसे जायेंगे। इसलिए उन्होंने छोटे-छोटे गाँवों से ही सन्तोष माना।

उन्होंने देखा कि राजाओं और उनकी तलवारों से नीति-बल ज्यादा बलवान है। इसलिए उन्होंने राजाओं को नीतिमान पुरुषों-ऋषि-मुनियों और साधु-सन्तों के बनिस्बत नीचा स्थान दिया।

जिस राष्ट्र का ऐसा विधान है वह दूसरों को सिखाने लायक है, दूसरों से सीखने लायक नहीं।

हमारे उस राष्ट्र में अदालतें थीं, वकील थे, वैद्य-डॉक्टर थे। लेकिन वे सब नियमों के बन्धन में थे। सब जानते थे कि ये धन्धे कोई बड़े नहीं हैं। इसके अलावा वकील, डॉक्टर, वैद्य वगैरह लोगों के मालिक बनकर नहीं रहते थे। इन्साफ ठीक-ठीक होता था। लोग सामान्यतया अदालतों में जाते ही न थे। लोगों को अदालतों का मोह लगाने वाले स्वार्थी मनुष्य तब नहीं थे। इतनी बुराई भी राजधानियों और उनके आस-पास ही दिखाई देती थी। साधारण लोग तो स्वतन्त्र रहकर अपना खेती का धन्धा करते थे। वे सच्चा स्वराज्य का उपभोग करते थे और जहाँ-जहाँ यह निकम्मी सभ्यता नहीं पहुँची है वहाँ हिन्दुस्तान आज भी इस तरह का देखा जा सकता है। वहाँ के लोगों के सामने आप नये ढंगों की बात करेंगे तो वे इनका मजाक उड़ायेंगे। यह सत्य है कि ऐसे आधुनिक आवागमन के साधनों रेल, मोटर आदि से दूर भू भाग आधुनिक सभ्यता वालों को पिछड़े हुए जान पड़ते हैं, पर सत्य बात यही है कि जिनको देश भक्त या जन-सेवक बनना हो, उनको पहले एक वर्ष ऐसे स्थानों में ही जाकर रहना चाहिए।


वेदान्त की सार्वभौमिकता तथा वैज्ञानिकता

(स्वामी विवेकानन्दजी)

संसार में जितने प्रकार के धर्म हैं उनमें से प्रत्येक की श्रेष्ठता प्रतिपादन करने के लिए, उस धर्म के मानने वाले तरह-तरह की दलीलें पेश करते हैं। अभी थोड़े ही दिन पहले एक ईसाई विद्वान व्यारोज साहब ने इस बात को सिद्ध करने की बड़ी चेष्टा की थी कि “ईसाई धर्म ही एकमात्र सार्वभौम धर्म है।” पर मेरी निश्चित धारणा है कि ‘वेदान्त धर्म ही सार्वभौम धर्म हो सकता है। इस विचार की सचाई सिद्ध करने के लिए मेरी सबसे प्रमुख दलील यह है कि हमारे धर्म के अतिरिक्त संसार के जितने धर्म हैं वे अपने प्रवर्तकों (चलाने वालों) से जुड़े रहते हैं। उन प्रवर्तकों के वाक्य ही उन धर्मावलम्बियों के लिए प्रमाण स्वरूप हैं और उसके जीवन की ऐतिहासिकता पर उस धर्म की सारी बुनियाद होती है। यदि उनकी उक्त ऐतिहासिकता रूपी बुनियाद पर आघात किया जाय और उसे एक बार हिला दिया जाय तो वह धर्म रूपी इमारत बिलकुल ढह पड़ेगी और उसके पुनरुद्धार की जरा भी आशा नहीं रहेगी। सच पूछा जाय तो वर्तमान समय के सभी धर्मों के प्रवर्तकों के सम्बन्ध में ऐसी ही घटना घटित हो रही हैं। उनके जीवन की आधी घटनाओं पर तो लोगों को विश्वास ही नहीं होता और शेष आधी घटनाओं पर भी सन्देह होता है। इस प्रकार हमारे धर्म को छोड़कर संसार के सभी धर्म एक-एक व्यक्ति के जीवन की ऐतिहासिकता के ऊपर निर्भर रहते । पर हमारा धर्म कुछ तत्वों पर प्रतिष्ठित है, कोई पुरुष व स्त्री वेदों का रचयिता होने का दावा नहीं करता। वेदों में सनातन तत्व लिपिबद्ध हैं, ऋषि लोग उनके आविष्कर्ता मात्र हैं। स्थान-स्थान पर उन ऋषियों के नाम लिखे हुए अवश्य हैं, किन्तु नाम मात्र के लिए। वे कौन थे, क्या करते थे, यह भी हम नहीं जानते। कई स्थानों पर यह भी पता नहीं चलता कि उनके पिता कौन थे और इन सभी ऋषियों के जन्म-स्थान और जन्म-काल का तो हमको कुछ भी पता नहीं है। वास्तव में वे ऋषि लोग नाम के भूखे न थे। वे सनातन तत्वों के प्रचारक थे और अपने जीवन में उन तत्वों का प्रयोग करके आदर्श जीवन बिताने का प्रयत्न करते थे।

जिस प्रकार हम लोगों का ईश्वर निर्गुण और सगुण है, उसी प्रकार हम लोगों का धर्म भी बिलकुल निर्गुण है-अर्थात् हमारा धर्म किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर निर्भर नहीं करता और इसमें अनन्त अवतारों और महापुरुषों के लिए स्थान हो सकता है। हमारे धर्म में जितने अवतार, महापुरुष, ऋषि आदि हैं उतने किस धर्म में हैं? केवल यही नहीं, हमारा धर्म कहता है कि वर्तमान काल और भविष्य-काल में और भी अनेक महापुरुषों और अवतारों का अभ्युदय होगा। भागवत में लिखा है- “अवताराह्य-संख्येयाः” (3-26)। इसलिए हमारे धर्म में नये-नये धर्म-प्रवर्तक, अवतार आदि को ग्रहण करने में कोई बाधा नहीं है। इसलिए भारत के इतिहास में जिन-जिन अवतारों और महापुरुषों का वर्णन किया गया है, अगर उनके सम्बन्ध में यह प्रमाणित कर दिया जाय कि वे ऐतिहासिक नहीं हैं, तो इससे हमारे धर्म को जरा भी धक्का नहीं लगेगा। वह पहले की तरह दृढ़ रहेगा, क्योंकि किसी व्यक्ति विशेष सत्य तत्वों के ऊपर ही यह स्थापित है हमारा धर्म व्यक्ति विशेष की बातों की प्रामाणिकता को बिलकुल अस्वीकार करता है।

‘इष्ट-निष्ठा’ के रूप में जो अपूर्व मत हमारे देश में प्रचलित है, उसमें इन सब अवतारों में से जिसे हमारी इच्छा हो आदर्श रूप में स्वीकार-करने की स्वाधीनता दी गई है। तुम किसी भी अवतार को अपने जीवन के लिए आदर्श मानकर विशेष उपासना के लिए ग्रहण कर सकते हो, इतना ही नहीं, तुम उसे सभी अवतारों में श्रेष्ठ स्थान भी दे सकते हो इसमें कोई हानि नहीं, क्योंकि तुम्हारे धर्म-साधन का मूल आधार तो सनातन तत्व समूह ही रहेगा। इस बात पर विशेष विचार करने से जान पड़ेगा कि चाहे कोई अवतार क्यों न हो, वैदिक सनातन तत्वों का जीता-जागता नमूना होने के कारण ही वह हमारे लिए मान्य होता है। श्रीकृष्ण की यही महानता है कि वे इस तत्वात्मक सनातन धर्म के श्रेष्ठ प्रचारक और वेदान्त के सब से बढ़कर व्याख्याता हैं।

संसार के सभी लोगों के लिए वेदान्त की चर्चा करना क्यों उचित है, इसका पहला कारण तो यह है कि वेदान्त ही एक मात्र सार्वभौम धर्म है। दूसरा कारण यह है कि संसार के जितने शास्त्र हैं उनमें से केवल यही एक ऐसा है जिसका वैज्ञानिक अनुसन्धानों के साथ पूर्ण रूप से सामंजस्य हो सकता है। अत्यन्त प्राचीन काल में आकृति, वंश और भाव में बिलकुल मिलती-जुलती दो भिन्न जातियाँ भिन्न-भिन्न मार्गों से संसार के तत्वानुसंधान में प्रवृत्त हुई। मेरा आशय प्राचीन हिन्दू और प्राचीन ग्रीक यूनानी जाति से है इनमें से पहली जाति तो अंतर्जगत का विश्लेषण करते हुए इस दिशा में अग्रसर हुई और दूसरी बाहरी जगत के अनुसन्धान में प्रवृत्त हुई। इन दोनों के इतिहास की आलोचना करने से विदित होता है कि इन विभिन्न प्रकार की विचार प्रणालियों से उस चरम लक्ष्य के सम्बन्ध में एक ही परिणाम निकला है। इससे यह स्पष्ट जान पड़ता है कि आधुनिक जड़ विज्ञान के सिद्धान्तों को वेदान्ती ही- जो अपने को हिन्दू नाम से पुकारते हैं-अपने धर्म के साथ सामंजस्य करके ग्रहण कर सकते हैं। इससे यह भी प्रकट होता है कि वर्तमान जड़वाद (विज्ञान) अपने सिद्धान्तों को बिना छोड़े, वेदांत के सिद्धान्तों को ग्रहण करके आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर हो सकता है। हम लोगों को तथा जिन्होंने इस विषय की अच्छी तरह से आलोचना की है, उनको यह स्पष्ट जान पड़ता है कि आधुनिक विज्ञान जिन सिद्धान्तों को कायम कर रहा है, उन्हें कई शताब्दियों पहले ही वेदान्त स्वीकार कर चुका है, केवल आधुनिक विज्ञान में उनका उल्लेख जड़ शक्ति के रूप में किया गया है।

सभी धर्मों की तुलनात्मक समालोचना करने से दो वैज्ञानिक सिद्धान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से प्रथम यह है कि सभी धर्म सत्य हैं और दूसरा यह कि संसार की सभी वस्तुएँ प्रत्यक्ष में विभिन्न जान पड़ने पर भी एक ही वस्तु का विकास मात्र हैं। प्राचीन युग में बैबिलोनिया और यहूदी जातियों के अनेक देवता थे, पर उन्होंने आपस में संघर्ष करते-करते अन्त में एक ही देवता को मानना आरम्भ कर दिया। भारत में भी इस प्रकार के धार्मिक झगड़े हुये पर यहाँ उनके कारण विदेशों का सा रक्तपात अधिक नहीं हुआ, क्योंकि यहाँ के एक महापुरुष ने अति प्राचीन काल में ही उस सत्य तत्व को प्राप्त करके घोषित कर दिया था- “एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।” अर्थात् जगत में वास्तविक वस्तु एक ही है, विप्र अर्थात् साधु-पुरुष उसे भिन्न-भिन्न रूपों में वर्णन करते हैं। ऐसी चिरस्मरणीय वाणी और कभी उच्चारित नहीं हुई और न ऐसा महान सत्य ही कभी अधिष्कृत हुआ। यह सत्य ही हमारी हिन्दू जाति का मेरुदण्ड होकर रहा। हम लोग इस सत्य को प्राणों से बढ़कर चाहते हैं- इसी से हमारा देश दूसरों से द्वेष रहित होने का दृष्टान्त उपस्थित कर रहा है। यहीं पर--केवल इसी देश में लोग अपने धर्म के कट्टर विद्वेषी धर्मावलम्बियों के लिए देश में मन्दिर, मस्जिद और गिरजाघर आदि बनवा देते हैं। संसार को हम लोगों से इस धर्म द्वेष रहित के गुण को सीखना होगा। ऐसा होने पर ही वे वास्तविक धर्म-तत्व को समझना और स्वीकार आरम्भ कर सकते हैं।


सामाजिक-न्याय के बिना कल्याण नहीं

(प्रो. लालजीराम शुक्ल)

हमारे देश में अनेक प्रकार की विषमतायें हैं। धन की, विद्या की और जाति की विषमतायें मुख्य हैं। एक ओर गरीब लोग हैं और दूसरी ओर अमीर। अमीर लोग गरीबों को अपने जैसा ही न मानकर एक निम्न स्तर का प्राणी मान लेते हैं और उनके प्रति स्नेह न दिखाकर उनका सदा शोषण करते रहते हैं। अमीर लोग मान बैठे हैं कि गरीबों के जीवन का हेतु केवल उनकी सेवा मात्र करना है। यदि वे उनके उपयोग में नहीं आते तो उनका नष्ट हो जाना ही भला है। अमीर गरीबों को समानता का अधिकार देने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

धन की विषमता तो संसार के दूसरे देशों में भी है। संसार के अन्य देश इसे अपने ढँग से ही हल कर रहे हैं। रूस ने इस समस्या को अपने ही ढंग से हल कर डाला है। वहाँ गरीब अमीर का उतना भेद नहीं जितना संसार के अन्य देशों में है। परन्तु इससे समाज में अधिक संतोष बढ़ा यह सन्देहास्पद है। धन की विषमता का स्थान वहाँ अधिकार की विषमताओं ने ले लिया है। देश की सामान्य जनता को स्वतंत्र सोचने का अधिकार ही नहीं है। फिर उस देश में एक ही विचार के लोगों का राज्य है दूसरे विचार का स्थान नहीं है। इंग्लैंड में धन की विषमता होते हुए भी जनता संतोष से जीवन व्यतीत कर रही है। वह राष्ट्र के सभी कामों में अपार सहयोग देती है। इससे यह स्पष्ट है कि यदि समाज में धन की विषमता नियंत्रित रूप से समाज की अवनति न होकर उन्नति की होती है।

भारतवर्ष में आर्थिक विषमता के अतिरिक्त दूसरे प्रकार की विषमतायें ही अधिक जटिल हैं। यह देश शास्त्रवादी है। ऐसे तो सभी देशों के समाज का संचालन वहाँ के धर्म गुरु करते हैं, परन्तु वर्ष में शास्त्रकार बनना पेशा बन गया है। इस कारण हमारे सामाजिक जीवन की प्रत्येक उस विधि से चल रही हैं जैसे वे चार-पाँच हजार वर्ष पहले चलती थीं। परन्तु आज समाज पाँच हजार वर्ष पहले का समाज नहीं है। समय के अनुसार अपने आप में परिवर्तन न कर सकने के कारण हम सदियों विदेशी लोगों के गुलाम रहे और आज भी स्वतन्त्रता प्राप्त करके सभी प्रकार से निकम्मे बने हुए हैं।

भारतवर्ष की जाति-पाँत की प्रथा के कारण ही मुसलमानों द्वारा भारतवर्ष की विजय इतनी हो गई कि यह एक संसार का आश्चर्य बन गया है। सत्रह बार महमूद गजनवी ने भारत को लूटा और ग्यारह बार गौरी ने, मोहम्मद बख्तियार के 15 घुड़सवारों ने बिहार पर कब्जा कर लिया अंडडडडडड ने बंगाल पर। क्या इतिहास की इन बातों से प्रमाणित नहीं होता कि हमारा समाज निकम्मा हो चुका है। जात-पाँत की प्रथा को थोड़ा भी ढीला करने से मुगल राज्य का अन्त हो गया। पंजाब के सिक्ख और दक्षिण के मराठों ने राष्ट्र की स्वतन्त्रता की लड़ाई में जात-पाँत के भेद को अलग कर दिया था। इसी के कारण मुसलमानी राज्य का अन्त हो गया। अँग्रेजों ने भी भारतवर्ष पर 150 वर्ष तक राज्य भारतवर्ष के सामाजिक भेद-भावों के कारण किया। महात्मा गाँधी के आन्दोलन से जात-पाँत की शृंखला ढीली हुई। सभी जाति के लोग राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हुए। अतएव यह आन्दोलन मारकाट से वंचित रहकर भी सफल हो गया। परन्तु आज भी हमारा समाज सुदृढ़ नहीं है। जात-पाँत की विषमता मनुष्य-मनुष्य में भेद डाले हुए है और इसी के कारण भारतवर्ष में पाकिस्तान की उपस्थिति हुई। जात-पाँत के नियमों की अवहेलना करने के कारण जो लोग बहिष्कृत हुए वे मुसलमान बन गये। बहिष्कृत व्यक्ति उस समाज का कभी भी मित्र नहीं होता जो उसका बहिष्कार करता है। अतएव यहाँ के मुसलमान यहाँ की प्रधान जनता के शत्रु हैं और भारतवर्ष को अपना देश भी नहीं मानते। पाकिस्तान और भारत के युद्ध होने पर वे पाकिस्तान की विजय की ही इच्छा करेंगे।

भारतवर्ष के हरिजनों की आर्थिक और सामाजिक दशा लगभग वैसी ही बनी है जैसी आज से चार सौ वर्ष पहले थी। इस वर्ग के पास न तो धन है और न विद्या। अँग्रेजी काल में जिस प्रकार जनता की शिक्षा के लिये सरकार के पास पैसे न थे, वैसे आज भी इस कार्य के लिये सरकार के पास पैसा नहीं है। हमने अपने जनतन्त्रवादी शासनप्रणाली को अमेरिका और इंग्लैंड के आधार पर बना लिया है। हमारा शासन धनी देशों के शासन के समान खर्चीला बन गया है। अतएव शिक्षा के लिये अब पैसा ही नहीं है। क्या यही अच्छा होता कि कुछ सालों के लिये शासन का यह खर्च कम करके जनता की शिक्षा में लगा दिया जाता। क्या जन शिक्षा के बिना जनतन्त्रवाद का कोई अर्थ है। मूर्ख अनपढ़ लोगों में जनतन्त्रवाद सब प्रकार अत्याचार सहित निरंकुश साम्राज्यवाद बन जाता है। राजनैतिक चेतना का जिस जनता में सर्वथा अभाव है उससे अपने चुनाव के लिये वोट लेना जगत को धोखा देना है।

फिर चमार, भंगी, डोम आदि किसी ओर को वोट देकर करेंगे ही क्या, उनसे तो जबरदस्ती वोट लिया जा सकता है। उनके लिये अँग्रेजी राज्य काँग्रेसी राज्य एक ही बात है-

कोउ नृप होय हमें का हानी। चेरि छाँड़ि अब होब कि रानी॥

राष्ट्र के दलित वर्ग सदियों गुलामी करते-करते अपने स्वाभिमान को ही भूल गये हैं। इन लोगों की भारतवर्ष में वही स्थिति है, जो निग्रो जाति के लोगों की स्थिति अमेरिका में है। इन्हें भारतवर्ष की स्वाधीनता से लाभ ही क्या हुआ और यदि भारतवर्ष गुलाम हो जाय तो इससे हानि ही क्या होगी? समाज शिक्षा का एक उद्देश्य इस प्रकार की सामाजिक विषमताओं का अन्त कर देना होगा। मानवता के अधिकार समाज के सभी लोगों को मिलें तभी वे राष्ट्र के उपयोगी नागरिक बन सकते हैं। सभी लोगों को मानवता के न्याययुक्त अधिकार देना समाज शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिये।

आज के भारत में एक वर्ग और दूसरे वर्ग के बीच न केवल धन की और जाति-पाँति की दीवारें हैं, वरन् विद्या की भी दीवारें बन गई हैं। आज का पढ़ा-लिखा युवक अपने आपको समाज का विशेष प्रकार का व्यक्ति मानने लगता है। वह अपने ज्ञान का जनता में अधिक से अधिक प्रसार न कर उसे सीमित संख्या में ही वितरित करना चाहता है। हमारे पढ़े-लिखे लोगों में यह मनोवृत्ति अंग्रेजों के सर्ग से आई। अँग्रेजों ने भारतवर्ष में अपने कुछ नकलची बना लिये। ये लोग अपने मालिक की बोलने-चालने, रहन-सहन में इतनी नकल करने लगे कि अपने आपके छोटे अँग्रेज समझने लगे और जिस प्रकार अँग्रेज भारतवर्ष के लोगों को, यहाँ की चाल ढाल, वेश-भूषा को, यहाँ की भाषा को हेय दृष्टि से देखते थे, पढ़े-लिखे लोग अभी अपने ही अनपढ़ देशवासियों को उसी दृष्टि से देखने लगे हैं। जो ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया है वह अँग्रेजी भाषा में है, यदि इस ज्ञान को हिन्दी भाषा में रख दिया जाय तो वह ज्ञान सभी लोगों के लिये सुलभ हो जाय। परन्तु ऐसा करने से अँग्रेजी पढ़े-लिखे मुट्ठी भर विद्वानों की विद्या के ऊपर से ठेकेदारी चली जायगी। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य की वृद्धि में और उसके विश्वविद्यालय की भाषा होने में इतनी कठिनाई हो रही है।

भारत के पतन का एक कारण हमारे देशी विद्वानों की पंडिताई का अभिमान था। पंडितों ने अपने ज्ञान को खूब छिपाया। उसे संस्कृत के अलंकृत श्लोकों में लिखा सामान्य जनता की भाषा में उत्तम ज्ञान को लिखना गँवारीपन कहा गया। इस प्रकार के प्रयास का दमन और निंदा हुई। इसी के परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर हमारे देश में वाचस्पति मिश्र जैसे विद्वान हुये वहाँ देश की साधारण जनता मूर्ख बनी रही। इसके कारण ही हमारा देश सदियों विदेशियों का गुलाम रहा। आज भी हमारे अँग्रेजी के पंडित वही कर रहे हैं जो प्राचीन काल में संस्कृत के पंडितों ने किया। संसार के सभी ज्ञान को सामान्य जनता के लिये सुलभ बनाना प्रत्येक विद्वान का उद्देश्य होना चाहिये। जब तक विद्वान और अविद्वान के बीच की खाई नहीं मरेगी दूसरे प्रकार की सामाजिक विषमतायें ज्यों की त्यों बनी रहेंगी।

आज का भारतीय विद्वान जितना स्वार्थी अहंकारी और असामाजिक व्यक्ति है उतना देहात का साधारण नागरिक नहीं है। हमारे विद्वान समाज सेवा का पथ प्रदर्शन अशिक्षित जनता में न कर स्वार्थ परायणता का मार्ग दिखा रहें। विद्वानों में सामाजिकता लाने का पहला प्रयास उनके द्वारा साधारण जनता की विचारों द्वारा सेवा कराना होगा। यह सेवा विदेशी भाषा द्वारा नहीं स्वदेशी भाषा द्वारा ही हो सकती है।

जिस प्रकार के समाज की हम कल्पना करते हैं वैसा समाज आज से दो हजार वर्ष पूर्व भारतवर्ष में था। बौद्धकालीन भारतीय समाज मूलतः जनतंत्रवादी, जात पात विहीन और प्रेम के ऊपर आधारित था। भगवान बुद्ध ने अछूतों और स्त्रियों को ज्ञान का उतना ही अधिकारी माना है जितना ब्राह्मण को। भगवान बुद्ध ने अपना ज्ञान संस्कृत भाषा में न रखकर पाली में जो जनता की भाषा थी प्रसारित किया। उनका कथन था कि जो भाषा सबको सुलभ हो उसी भाषा में मनुष्य के कल्याण के योग्य ज्ञान रखना चाहिये। जब तक भगवान बुद्ध की शिक्षा का प्रभाव भारतवर्ष में रहा यह देश धन धान्य से सम्पन्न सुशिक्षित और स्वाधीन रहा। इस धर्म के प्रचार के कारण आज चीन भी दो हजार वर्ष से स्वाधीन है। सभी बौद्ध देश थोड़े ही काल तक विदेशियों के गुलाम बने। जहाँ प्रेम और सद्भावना की वृद्धि होती है और सामाजिक खाइयाँ पट जाती हैं वहीं सब प्रकार की भौतिक सम्पत्ति भी आ जाती है।

हमें केवल मजदूरों को अन्न-वस्त्र नहीं देना है। यह मसला केवल भौतिक मसला नहीं है। मेरी दृष्टि से तो कोई भी मसला केवल आर्थिक मसला हो ही नहीं सकता। यदि हम गहराई में पहुँचें, तो मालूम होता है कि भौतिक मसले वास्तव में आध्यात्मिक और नैतिक ही होते हैं। यदि हम कहें कि गरीब को समता चाहिये, न्याय चाहिये, तो जो हमारे विरुद्ध पक्ष में हैं, उनको भी हमारी बात मान लेनी पड़ती है। वे भी विषमता का समर्थन तो नहीं करते।


शास्त्र झूँठे नहीं हैं- समझने वाले झूँठे हैं।

(श्री वी. एस. शाह, बम्बई)

शास्त्र कहते हैं कि आत्मा पर अनेक जन्मों के कर्म-संस्कार वज्रलेप के समान चिपक गये हैं। इसलिये जब हम दीर्घ काल तक तप-जप व्रत-नियम-ध्यान आदि उपाय करते रहें तो अनेक जन्मों के पश्चात मुक्ति मिल सकती है।

बिल्कुल ठीक बात है। पर हमने उसको उल्टा समझा है। पामर मनुष्यों के हाथ में शास्त्रों के पड़ जाने से वे उल्टा ही समझा सके हैं। जो लोग गृहस्थ आश्रम में रहकर अपना निर्वाह भी नहीं कर सकते थे, जिनमें इसके लायक भी ज्ञान और शक्ति नहीं थी, वे ही एकाएक दुनिया को मुक्ति दिलाने वाले बन बैठे और हम भोले-भाले खच्चर! साधु कौन? वैराग्य क्या चीज? दया क्या? मुक्ति क्या? जिन्दगी क्या? इन बातों पर कुछ भी विचार किये बिना, इस कल्पित वैराग्य वालों की मार्फत कल्पित मोक्ष पाने के लिये दौड़ धूप करने लगे। हम अपने इस जीवन को भी भूल गये, अपनी सामान्य बुद्धि-सीधीसादी समझ-को भी गिरवी रख आये। हम इतने मूर्ख बन गये, कि जिनसे सेका हुआ पापड़ भी न तोड़ा जा सके उनसे पहाड़ तोड़ने की आशा करने लगे और वह भी केवल वैराग्य-मोक्ष-परलोक आदि थोथे शब्दों में फँसकर। और हमारी हम मूर्खता का भरपूर लाभ उठाया भिखारियों और श्रीमन्तों ने। भिखारियों को ऐश आराम से जीवन-निर्वाह की आवश्यकता थी और श्रीमन्तों को अपने लिये हथियार बनने वाले मनुष्यों की जरूरत थी। श्रीमन्तों ने इन भिखारियों को साधु-महात्मा के पद पर स्थापित करके और उनके द्वारा मोक्ष, परलोक, वैराग्य का जाल बिछाकर लोगों की रही-सही इच्छा शक्ति को भी निर्बल कर डाला। यह इसलिये कि श्रीमन्त धर्म-धुरन्धर बनकर साधारण लोगों पर बिना तकलीफ के अपनी सत्ता जमा सकें और सत्ता के साथ-साथ गुचपुच आर्थिक लाभ भी उठाते रहें।

यह गंदा खेल मैंने सूक्ष्मता से देखा है। अगर कोई देवता भी आकर मुझसे कहे कि ‘तेरी शंका झूँठ है’- तो मैं उससे कहूँगा कि ‘शैतान! चला जा। किसी गँवार से जाकर बातें कर। मेरी आँखों से देखा हुआ, मेरी बुद्धि से देखा हुआ, मेरे चित्त से अनुभव किया हुआ- उसे झूँठा बतलाने की जो हिम्मत करेगा उसकी बात सुनने की कल्पना तो दूर रही उसे मैं यों ही चला जाने दूँ यह भी मेरे लिये कमजोरी की बात है। उसको तो मैं दो तमाचा मारे बिना जाने ही न दूँगा।” समस्त पाखण्ड श्रीमन्तों के ही हैं, और भिखारी लोग उनके हथियार हैं। सामान्य जन उनके जाल में फँसने वाली मछलियाँ हैं। ये धूर्त वैराग्य हैं? वैराग्य की जो व्याख्या वे करते हैं उनमें से एक में भी वह मिल सकता है? वैराग्य है क्या चीज? मुझे धर्म गुरुओं और धर्म नायक रूप श्रीमन्तों से विराग उत्पन्न हुआ है और वह सच्चा विराग है। वह कैसे उत्पन्न हुआ? मैंने बहुत वर्षों तक उनका अनुभव किया, उनके अन्तःकरण के एक-एक कोने को काट-कूट कर देखा। मुझे उसमें मल भरा हुआ मिला। मल से किसको घृणा नहीं होती? इसी घृणा से मुझ में विराग उत्पन्न हो गया। इसी प्रकार अगर आप संसार की हर एक चीज को काट-छाँट कर उसकी जाँच करो तो फिर उन पर मोह नहीं रह सकता। पर उस चीज का साथ किये बिना, उसकी काट-छाँट किये बिना, उसकी जाँच करने का अवसर प्राप्त किये बिना उसका मोह कैसे छूटेगा? धन को देखा, सेवन किया, अनुभव किया, इसके बिना धन से विराग कैसे हो सकता हैं? फिर भी, विराग होने पर भी उसका सम्बन्ध बना रह सकता है। मुझे साधुओं और श्रीमन्तों से विराग हो गया, तो क्या अब मैं जीवन भर किसी साधु या श्रीमन्त से मिलूँगा ही नहीं? ऐसा नहीं हो सकता, मेरी इच्छा हो अथवा न हो पर इनमें से किसी न किसी व्यक्ति के साथ अच्छा या बुरा प्रसंग आ ही जायगा। पर अन्तर यह होगा कि अब मैं बदले हुये मन से इस प्रकार के प्रसंग को सहन करूंगा। एक कीड़ा-जहरीले कीड़ा के साथ काम पड़ गया है, ऐसी मनोवृत्ति रखकर उनसे व्यवहार करूंगा। यही विराग है। इन पर मेरा मोह नहीं हो सकता, और उनका स्पष्ट तिरस्कार भी मैं नहीं करूंगा। केवल मेरा मन उनके वास्तविक स्वरूप को जानकर सावधानी से व्यवहार करे, इतनी ही बात है।

इस प्रकार के विराग का अर्थ है मानसिक गुलामी से छुटकारा। साधु लोग जिन्दगी को पाप रूप मानते हैं, पर क्या इस विचार से वे आत्महत्या कर लेते हैं? भोजन को पाप रूप मानने से क्या जीवन भर भूखे रहते हैं? ऐसे अवसर पर वे यही कहते हैं कि जिन्दगी की व्यर्थता को समझ लिया, इससे अब इस पर मोह नहीं हो सकता। आहार के स्वाद की व्यर्थता देख ली, अब खाते तो हैं, पर स्वाद के मोह में फँसे बिना। अगर भोजन हितकर जान पड़ेगा तो खायेंगे, और हानिकारक जान पड़ा तो बिना गाली दिये उसे त्याग देंगे। गाली देना और बात है और किसी चीज के मोह से छूट जाना दूसरी बात है। मोह से छूटने के लिये गालियाँ देने की कोई आवश्यकता नहीं है। और मोह कब छूट सकता है? मोह तभी छूटेगा जब उस वस्तु के गन्देपन को, निकम्मेपन को अनुभव कर लिया जायगा। इन भिखारियों को धन का, जीवन का, सत्ता का अनुभव ही कब हुआ, जिससे उनका मोह छूट सके? और वैराग्य हो सके? इतना ही नहीं वे तो मुफ्त में धन, सत्ता, जीवन का उपभोग करते हैं। दूसरे के श्रम के ऊपर। बिना श्रम का जीवन, और बिना मेहनत की प्राप्ति- यही इस समय भारतीय मानस का भयंकर से भयंकर रोग है। प्रायः हर एक मनुष्य में यह रोग पाया जाता है। एक पुस्तक कैसी भी उत्तम हो, उसके विचार तुमको कैसे भी पसन्द आये हों, उसके लेखक के प्रति तुम्हारी कैसी भी सम्मान की भावना हो, तो भी तुम उस पुस्तक को मुफ्त में प्राप्त करने या कम से कम मुफ्त में पढ़ने की इच्छा तो जरूर करोगे। शेयर, सट्टा आदि का धन्धा बगैर मेहनत के धन पाने की इच्छा नहीं तो और क्या है? इससे क्या प्रकट होता है? भिक्षुक-मानस! भिखारी-पन का स्वभाव!! गुलाम की गुलामी की आदत!!! योरोप में दो सगे भाई भी एक ही समाचारपत्र की दो अलग-अलग प्रतियाँ खरीदते हैं। पुस्तक को मुफ्त में या उधार लेने की बात तो दूर रही, अगर लेखक मित्र हुआ उसने एक प्रति भेंट स्वरूप भेज दी, तो वे ऐसा समझते हैं कि मित्र को दस गुना या सौ गुना लाभ पहुँचाने की जिम्मेदारी मेरे सर पर आ गई। किसी मित्र या स्नेही के यहाँ निमंत्रण खाने जाना पड़े तो उसके बच्चे के लिये कुछ न कुछ भेंट लिये बिना कभी नहीं जायेंगे। बड़े दिन के त्यौहार पर, अपनी जन्मगाँठ के अवसर पर, मित्र की जन्म गाँठ के दिन, कोई न कोई भेंट भेजे बिना नहीं रहेंगे, फिर चाहे वे स्वयं कैसे भी गरीब क्यों न हों। उन लोगों के मन हमारे जैसे ‘भिखारीपन’ के नहीं होते।

जो लोग शास्त्र के वास्तविक तत्व को न पकड़ कर बाहरी उछलकूद और भ्रमों में पड़े रहने का ही आग्रह करते हैं, वे स्वयं धर्म से विमुख रहते हैं और दूसरों को भी वैसा ही बनाते हैं। अगर उनकी यह प्रवृत्ति ऐसे ही चलती रही, तो एक दिन ऐसा आयेगा जब कि समस्त भारतवासी ‘धर्म’ को पूर्णतः त्याग देंगे। क्या ‘धर्मात्मा’ कहलाने वाले इसको पसन्द करेंगे? क्या यह स्थिति अच्छी समझी जा सकती है? यदि नहीं, तो धर्म के बाहरी ढोंग को छोड़कर शास्त्र के वास्तविक आशय पर चलना सीखो।


गायत्री जीवन को सफल बनायेगी

(स्वामी कृष्णानन्दजी, खार, बम्बई)

मंत्र शास्त्र एक सच्चा विज्ञान है। यह शक्तिशाली विज्ञान किसी समय भारतवर्ष में पूर्णतः प्रचलित था और व्यवहार में लाया जाता था। अभाग्यवश अन्य विद्याओं और कलाओं की भाँति यह विज्ञान भी स्वार्थी मनुष्यों के हाथ में पड़ गया और आध्यात्मिक उन्नति के बजाय निकृष्ट श्रेणी के कार्यों को साधने में प्रयुक्त किया जाने लगा। यही कारण है कि आज इसके ठीक-ठीक जानने और मानने वाले बहुत कम दिखलाई पड़ते हैं।

साथ ही ऋषियों ने यह भी आदेश दिया था कि मंत्र-विद्या किसी अनधिकारी व्यक्ति को न सिखलाई जाय। इस कारण यह गुप्त रखी गई और गुरु लोग केवल अपने दो-एक अत्यन्त विश्वसनीय शिष्यों को, अपने पिता अपने किसी एक पुत्र को ही इसका वास्तविक रहस्य बतलाते थे। इस प्रकार क्रमशः यह विज्ञान बहुत ही सीमित संख्या के व्यक्तियों के भीतर ही रहा और समय के प्रभाव से अब उन व्यक्तियों का अस्तित्व नाम मात्र को ही रह गया है। सुयोग्य गुरुओं के अभाव से अब ये मंत्र निरर्थक अक्षरों के समूह मात्र जान पड़ते हैं, और उनके द्वारा किसी देवी-देवता की उपासना करके किसी प्रकार की सिद्धि प्राप्त कर सकना अत्यन्त कठिन हो गया है।

इस परिस्थिति में गायत्री मंत्र ही ऐसा साधन है जिससे अभी तक लोग परिचित हैं और जिसकी साधना अधिकाँश धर्म प्रेमी करते रहे हैं। गायत्री से होने वाले सब लाभों का वर्णन कर सकना असंभव है। सृष्टि के आदि से असंख्यों व्यक्ति इस मंत्र को जपते आये हैं, इसके फलस्वरूप इसकी शक्ति और प्रभाव में अत्यन्त वृद्धि हो गई है और इसकी साधना से प्रत्येक साधक की मनोकामना अवश्य सिद्ध हो सकती है। भगवान मनु ने कहा है कि सब प्रकार के यज्ञों और जपों से गायत्री की साधना सर्वाधिक फलदायिनी है। गायत्री की साधना करने वाले को किसी प्रकार का भय नहीं हो सकता। शास्त्र में कहा गया है-

सहस्त्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्रिकं द्विजः। महतोऽष्येनस्त्रों मासात्त्वचेवहिर्विमुच्यते॥ योऽघीतेऽहन्यहन्येतास्त्रीणी वर्षाण्यतन्द्रितः। स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान॥

“कोई ब्राह्मण जो गायत्री की तीनों व्याहृतियों और ॐ का नदी के तीर पर शान्त और एकान्त स्थान में नित्य प्रति एक हजार जप एक मास तक करता है वह सब पापों से इस प्रकार छूट जाता है जैसे सर्प अपने कैंचुल से और जो कोई बिना आलस्य के लगातार तीन वर्ष तक इसी प्रकार जप करता है वह परब्रह्म में लीन हो जाता है।”

अधिकाँश व्यक्ति गायत्री मंत्र का अनुष्ठान किसी न किसी मनोवाँछा की पूर्ति के लिये किया करते हैं। यह मार्ग वास्तव में बहुत श्रम साध्य है, उसमें बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं और अनेक समय खतरा भी पैदा हो जाता है। इसलिये यदि पुरश्चरण बिना किसी अभिलाषा के अथवा देव दर्शन या सिद्धि का विचार किये बिना निष्काम भाव से किया जाय और उसका उद्देश्य केवल अपना कर्तव्य या धर्म ही समझा जाय, तो इसमें संदेह नहीं कि जप-कर्ता का हर तरह से कल्याण ही होगा।

जिस प्रकार पिता द्वारा छोड़ी हुई सम्पत्ति स्वभावतः उसके पुत्रों को मिल जाती है, इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति अनुष्ठान करके गायत्री का अनुग्रह प्राप्त करता है, तो उसका शुभ परिणाम उसके पुत्रों और पौत्रों तक को मिलता है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि जिस घर में गायत्री माता की उपासना नित्य प्रति की जाती है वह सम्पन्नता की ओर अग्रसर होने लगता है। जिन लोगों ने विदेशी शिक्षा के प्रभाव से इन दिनों गायत्री-उपासना को छोड़ दिया है अगर वे फिर से स्वयं को और अपनी सन्तान को गायत्री-उपासक बना दें, तो उनका हर तरह से कल्याण होगा और हमारा देश भी सब प्रकार उन्नति-शील बनकर अपने प्राचीन वैभव और शक्ति को प्राप्त कर सकेगा।


पशु-प्रवृत्तियों का परिष्कार कीजिये!

(श्री यादराम शर्मा, ‘रजेश’ एम. ए. बी. एड.)

डार्विन विकासवाद के अनुसार प्राणी पशुयोनि से विकसित होते-होते मनुष्य की श्रेणी तक पहुँचा है। हम भारतीय डार्विन के इस दार्शनिक सिद्धान्त में भले ही विश्वास न करें, किन्तु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हजारों लाखों सालों से मनुष्य और पशु एक दूसरे के संपर्क में रहते आये हैं। उन्होंने एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा है और परिणाम यह हुआ है कि पशुओं के स्वभाव में बहुत सी ‘मनुष्यता’ की बातें आ गई हैं तथा मनुष्यों ने पशुओं के अनेक दुर्गुणों को अपना लिया है। कुत्ता, घोड़ा इत्यादि पशुओं की स्वामि-भक्ति और आत्म-बलिदान की ऐसी सैकड़ों सच्ची कहानियाँ सुनने में आई हैं जिन पर अनेक मनुष्यों की मनुष्यता को निछावर किया जा सकता है। इसी प्रकार कभी-कभी मनुष्यों की दुष्टता, स्वार्थ-प्रवृत्ति और वासना-वृत्ति को देखकर कहना पड़ता है कि इनसे तो पशु ही सौ गुने अच्छे हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे कारण कोई हो, मानव के मन में ऐसी अनेक पशु-प्रवृत्तियां प्रवेश कर गई हैं जिनका विश्लेषण बड़ा मनोरंजक और जिनका परिष्कार मानव जीवन के उत्थान के लिये बड़ा आवश्यक है। जिस व्यक्ति में जितनी अधिक पशु-प्रवृत्तियों का समावेश होगा, वह उतना ही अधिक मनुष्यता से गिरा हुआ समझा जायेगा और जिसने अपनी इन निम्नगा वृत्तियों का जितना अधिक परिष्कार कर लिया होगा, वह उतना ही महान् होगा। वेदान्त के अनुसार ‘अहं ब्रह्मास्मि’ कहने का अधिकार ऐसे ही महापुरुषों को होता है जो अपनी वृत्तियों का पूर्णतया शमन कर लेते हैं। एक उर्दू कवि ने कहा है :-

“इन्सान, फरिश्ता, खुदा आदमी की हैं हजार किस्में।”

केवल फरिश्ता या परमात्मा बनने के लिये ही पशु-प्रवृत्तियों का परिष्कार आवश्यक नहीं है-वह तो मानवता का चरम विकास है। सच्चा मनुष्य बनने के लिये भी परिष्कार की बड़ी आवश्यकता है। इसलिये आइये, इस बात का विवेचन करें कि कहीं हमारे स्वभाव और संस्कारों में तो पशु-प्रवृत्तियाँ प्रवेश नहीं कर गई हैं। यदि ऐसा हो तो हमें शीघ्र ही उनके परिष्कार का उपाय चाहिये। विलम्ब हो जाने पर अवसर हाथ से निकला जायेगा।

भेड़िया एक हिंसक पशु है। अपनी उदर-पूर्ति के लिये दूसरे जीव की हत्या कर डालना उसका स्वभाव है मनुष्य के रूप में भी अनेक भेड़िये पाये जाते हैं जो अपना पेट भरने के लिये दूसरे की गर्दन पर छुरी चलाने में नहीं हिचकिचाते! आप तो ऐसा नहीं करते हैं।

यदि आप दूसरे मनुष्य को देखकर मुँह सिकोड़ लेते हैं, गुर्राने लगते हैं, आँखें लाल कर लेते हैं। क्रोध में आकर उस पर झपट पड़ते हैं, गालियाँ देते हैं तथा गुत्थमगुत्था करने लगते हैं तो आप में और कुत्ते में कोई अन्तर नहीं है। दो आदमियों और कुत्तों की लड़ाई का चित्र अपनी कल्पना में लाइए। कितना विचित्र साम्य है दोनों की विकृत भावभंगियों और मनोविकारों के प्रदर्शन में!

बिल्ली के बारे में प्रसिद्ध है कि वह सदैव दूसरों को धोखा देने की ताक में रहती है। सोचती रहती है कि देखने वालों की निगाह बचे तो मैं कुछ झपट कर नौ-दो-ग्यारह हो जाऊँ । कहा जाता है कि बिल्ली मनाया करती है कि सामने वाले की आँखें फूट जायें ताकि कोई मुझे देखने वाला न रहे और मैं मनमानी कर सकूँ। अपने मन को कुरेदकर देखिए कहीं आप भी तो बिल्ली नहीं हैं?

किसी खेत के एक सिरे पर चरता हुआ साँड दूसरे सिरे पर किसी दूसरे साँड को देखकर जोर जोर से दहाड़ने लगता है। स्वयं चरना छोड़कर दूसरे को खेत से निकालने की चेष्टा में लग जाता है। कभी-कभी मामला बहुत बढ़ जाने पर दोनों साँड बेदम हो जाते हैं और जान तक से हाथ धो बैठते हैं। दूसरे यात्री को रेल के डिब्बे में चढ़ते देखकर आप तो पैर फैलाकर नहीं लेट जाते? अन्य स्वयं थोड़ा कष्ट उठाकर भी आप अपने सह-यात्रियों को बैठने का स्थान तो दे देते हैं? हाँ आपसे ऐसी ही आशा है क्योंकि आप साँड नहीं हैं, मनुष्य हैं!

चींटी के समान परिश्रम करके परिग्रह करना गृहस्थ जीवन में श्रेयस्कर है, किन्तु मधु-मक्खी के समान स्वयं उपभोग न करके केवल दूसरों के लिये संचय करना किसी दशा में अच्छा नहीं कहा जा सकता। ऐसी सूम-मनोवृत्ति आत्म के विकास के लिये बड़ी घातक है।

घोड़ा, घोड़ी को देखकर हिनहिनाने लगता है, रस्सा तोड़कर भागने का प्रयत्न करता है। उसके ऐसे कामुक स्वभाव की जितनी निन्दा की जाये थोड़ी है। किन्तु वह तो आखिर पशु ही ठहरा। बाजार में किसी महिला को देखकर आप तो आवाजें नहीं कसने लगते? आपका मन तो संयम और विवेक का रस्सा नहीं तुड़ाने लगता? आप तो पशु नहीं हैं?

एक साधु द्वारा बार-बार बिच्छु की रक्षा करने और बिच्छू द्वारा बार-बार डंक मारने की कहानी आपने सुनी होगी। आप साधु जैसा स्वभाव बना सकें तो बड़ी अच्छी बात है लेकिन देखना तो यह है कि कहीं आपका स्वभाव बिच्छू जैसा तो नहीं है?

ऊपर जो थोड़े से उदाहरण दिए गए हैं इन्हीं से मिलते-जुलते और भी बहुत से लक्षण इस ‘रोग‘ के पाए जाते हैं जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष और अभिमान की भावना को व्यक्त करते हैं। मनोविश्लेषण करके देखिए, कहीं आपको तो यह रोग नहीं लग गया है? यदि इसका एक भी लक्षण दिखाई दे तो तुरन्त अपनी मानसिक चिकित्सा कर डालिए अन्यथा आत्मा के दूषित होकर नष्ट हो जाने की सम्भावना है।

हमें दृढ़ विश्वास है कि आप अपने आपको कुत्ता, भेड़िया, घोड़ा, साँड, बिल्ली या बिच्छू नहीं कहलाना चाहते। आप तो मनुष्य हैं सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ प्राणी। अशरफुलमखलूक!! राम, कृष्ण, गौतम, महावीर, ईसा, मुहम्मद और गाँधी के अनुगामी!!! अतः अपने आपको पहचानिये। पशु-प्रवृत्तियों का परिष्कार कीजिये, कल्पना कीजिए आप कितने महान हैं! आप ही जैसे दो हाथ और दो पैर वाले मनुष्यों ने आज संसार को क्या से क्या बना दिया है। आप भी मानवता के निर्माण में अपना योग-दान करने के लिए अपने चरित्र को ऊँचा उठाइए। विश्व के विकास के लिए, मानवता के उत्थान और उद्धार के लिए, अनन्त शक्ति के साथ एकाकार होने के लिए, मिथ्या आवरण को हटाकर आत्मस्वरूप का अनुभव कीजिए। कवि ने कहा है :-

“तू विवेकशील, पापहीन है पवित्र है, धैर्य, वीरता, प्रताप का सजीव चित्र है, तू अनन्त शक्ति है, अजेय है, महान है, क्या तुझे अभी नहीं हुआ स्वरूप ज्ञान?”

इतनी महानता के पात्र होते हुए भी यदि आपके मन में पशु-प्रवृत्तियों का प्रवेश हो गया है तो उसका एक मात्र कारण आपकी असावधानता, आलस्य और प्रमाद हैं। एक बार स्वाभिमानपूर्वक मुक्त आकाश में अपना सिर उठाइए और एक ही बार दृढ़ निश्चय में इन पशु-प्रवृत्तियों का परिष्कार कर डालिए।


‘जो जस करहि सो तस फल चाखा’

(श्री ज्वालाप्रसादजी, एम. ए.)

मनुष्य अपने किये भले अथवा बुरे कर्मों का फल अवश्य पाता है, यह एक ऐसा सिद्धान्त है जिसकी सचाई से संसार का कोई व्यक्ति इनकार न कर सकेगा। आस्तिक जन तो परमात्मा को शुभ और अशुभ कर्मों का फल-प्रदाता मानते ही हैं, पर नास्तिक भी, अगर उसके भीतर विवेक और बुद्धि का अंश है तो, इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि हम जैसा बीज बोयेंगे वैसा ही फल पायेंगे। जैसा आचरण करेंगे वैसा ही नतीजा भी मिलेगा।

इस प्रकार कर्म फल के सम्बन्ध में दो प्रकार के सिद्धान्त प्रचलित हैं। एक तो यह कि मनुष्य के कर्म एक भाग्य की पुस्तक में लिखे जाते हैं। इस्लाम, पारसी व ईसाई मजहब के अनुसार दो फरिश्ते मनुष्य के साथ रहकर उसके कर्म लिखते रहते हैं। दूसरा सिद्धाँत यह है कि मनुष्य के कर्मों का प्रभाव उसके मन के ऊपर पड़ता है और इससे मन में जो परिवर्तन होता है उसी का नाम संस्कार हैं। इस प्रकार मनुष्य का प्रत्येक कार्य ही संस्कार के रूप में अंकित हो जाता है। यह सिद्धान्त जैन, बुद्ध और सिक्ख धर्म में पाया जाता है। हिन्दू धर्म में दोनों प्रकार के सिद्धान्त माननीय हैं। एक के अनुसार कर्म फल देने वाले देवता यानी यमराज के यहाँ भाग्य की पुस्तक में सब मनुष्यों के कर्म लिखे जाते हैं। मृत्यु के बाद जब मनुष्य यमराज के सामने जाता है तो उसी लेखे के अनुसार वे उसका न्याय करते हैं और कर्मानुसार नरक या स्वर्ग देते हैं। परन्तु इससे अधिक मान्य यह सिद्धाँत समझा जाता है कि प्रत्येक कर्म का फल किसी न किसी प्रकार का संस्कार और मनुष्य का अगला जीवन उसी संस्कार के अनुसार होता है।

नर्क और स्वर्ग का सिद्धाँत प्रायः सभी प्राचीन मजहबों में पाया जाता है। इनमें से पहला लोक सुन्दर, लाभदायक, तेजोमय शक्तियों या देवताओं के निवास-स्थान स्वर्ग के रूप में और दूसरा भयानक क्रूर, कष्टदायक शक्तियों के निवास-स्थान नर्क के रूप में माना जाता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि अच्छे या बुरे काम करने वालों को अपने अपने कर्मों का फल भोगने के लिए इन लोकों में जाना पड़ता है। इस जन्म में ही सबको अपने पापों या पुण्यों का फल मिल जाता हो ऐसी बात नहीं। अनेक पापी सुखी जीवन व्यतीत करते दिखलाई देते हैं और अनेक सज्जन पुरुष बड़े-बड़े कष्ट सहते हैं। यदि कर्मों की यह शृंखला यही समाप्त मानली जाय तो यह बड़ा अन्याय होगा। इसलिए विचारकों ने इस जीवन के बाद एक दूसरे जीवन की कल्पना की जिसमें यहाँ की त्रुटियाँ पूरी हो सकें। उस अगले जीवन में मनुष्य अपने कर्म के अनुसार नर्क या स्वर्ग में जाता है।

संस्कार के सिद्धान्त को मानने वालों का कहना है कि स्वर्ग या नर्क लोक कोई दूसरे नहीं हैं, इसी संसार में दुःख और सुख प्राप्त करना ही नर्क और स्वर्ग हैं। संसार में ही अनेक प्रकार के कष्ट हैं और अनेक प्रकार के सुख हैं। यह मनुष्य को पूर्व जन्म के कर्मानुसार मिलते हैं। नर्क का कौन सा ऐसा कष्ट है जो संसार में न हो। लोग आग में जल जाते हैं, शस्त्रों से भी मरते हैं, राध में सड़ते हैं और बड़े-बड़े असह्य कष्ट पाते हैं। इसी प्रकार स्वर्ग के सब प्रकार के सुख संसार में भी उपलब्ध हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में पाप और पुण्य दोनों ही बन जाते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को सुख मिलता हुआ देखते हैं, वह उसके पूर्व जन्म के किसी पुण्य के प्रभाव से होता है, परन्तु उसकी पाप प्रवृत्तियाँ इस जन्म में और भी बलवान होकर अगले जन्म में दुख देंगी। इसी प्रकार जो धर्मात्मा कष्ट सहन करता है वह भी पूर्व जन्म के किसी न किसी पाप का फल भोगता है। पर इस जन्म में धार्मिक वृत्ति पर अचल रहने से वह अगले जन्म में सुख की तैयारी करता है।

इसके साथ यह सिद्धान्त भी माना गया है कि इस समय के पाप और पुण्य से पूर्व जन्म के कर्मों के भोग में भी अन्तर पड़ जाता है। यदि कोई पापी मनुष्य अपने किसी पूर्व कर्म के बल पर धन और सुख को प्राप्त हो तो वह सुख का पूर्ण उपभोग नहीं करता। उसका मन पाप वृत्तियों से सदा चंचल बना रहता है। धन-सम्पत्ति होने पर भी अनेक इच्छाओं के पूरे न होने से दुखी रहता है। वह अभिमान अथवा राग-द्वेष से भी सदा जलता रहता है। इसलिए उसको सुख का पूरा अनुभव भी नहीं होता। जैसे जल्दी में खाने वाले मनुष्य को भोजन का पूरा स्वाद नहीं आता इसी प्रकार पापी मनुष्य को सुख का पूरा रस नहीं मिलता। दूसरी ओर धर्मात्मा मनुष्य को जो थोड़ा सुख भी हो, वह भी उसे सुख तथा शाँति के होने से अधिक मालूम पड़ता है, पापी मनुष्य अपने वर्तमान जीवन के पापों के कारण अनेक शत्रु तथा कठिनाइयाँ पैदा कर लेता है। उसका द्रव्य नाश होने लगता है, वह किसी न किसी झमेले में पड़ा ही रहता है। उसके शरीर को रोग अधिक होते हैं। अनेक कारणों से उसके सुख की मात्रा कम हो जाती है। जितनी रहती भी है उसको वह अपने अभिमान, चंचलता इत्यादि के कारण पूर्ण तरह से भोग नहीं पाता। इसके विपरीत धर्मात्मा का दुख भी उसके सदाचरण से कम हो जाता है और उसका प्रभाव दूसरों पर भी पड़ता है। उनमें भी सहानुभूति पैदा होती है। जो कष्ट होता भी है वह उसके मन की शाँति के कारण सहने योग्य हो जाता है।

इस प्रकार कर्मों के संस्कार के कारण नये-नये जन्म उस समय तक होते रहते हैं, जब तक मन के पूर्णतया शाँत हो जाने से आगे के लिए कर्मों के संस्कार बनने बंद न हो जायें और मनुष्य मुक्ति प्राप्त न कर ले। इस सिद्धाँत के अनुसार किसी कर्मफल देने वाले देवता की आवश्यकता नहीं है। कर्मफल प्राकृतिक नियमों के अनुसार अपने आप होता रहता है। इस अटल न्याय के अनुसार मनुष्य अपने किसी कर्म से बच नहीं सकता उसके छोटे-छोटे कार्यों का प्रभाव भी संस्कार के रूप में हो ही जाता है।

कर्म-फल के सम्बन्ध में सभी धर्मों में क्षमा और पश्चाताप का सिद्धाँत भी है। ईसाई लोग भगवान ईसा पर विश्वास करते हैं तो उनके लिए दैवी कृपा का द्वार खुल जाता है। इस्लाम के अनुसार मुहम्मदसाहब पर विश्वास करने से पाप क्षमा कर दिये जाते हैं। इसी प्रकार बुद्धदेव की शरण में जाने से, तीर्थंकरों के वचनों पर विश्वास करने से, अथवा ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करने से पाप दूर हो जाते हैं। इस सबका रहस्य यही है कि सच्चा पश्चात्ताप होने से, सच्चे मन से शरण में जाने से मन की वृत्ति, अपवित्रता और पाप से फिरकर, धर्म और पवित्रता की ओर मुड़ जाती है और समय पाकर धर्म के अभ्यास से सब पाप दूर हो जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि कहने को तो क्षमा माँगते रहें, पर पाप कर्म करते ही रहें ऐसा होना अर्थात् पाप करते हुए पश्चाताप करना और क्षमा होने की आशा करना, असम्भव है। ऐसी बेईमानी से क्षमा माँगना तो पाप को और बढ़ाता है। किसी अवतार या पैगम्बर पर ईमान लाने या उस पर विश्वास करने का अर्थ तो यही है कि उसके आदेशानुसार सदाचार का पालन किया जाय। यदि ईमान तो लाया जाय, परन्तु सदाचार रूपी धर्म का पालन न किया जाय तो अवश्य नर्क ही मिलेगा।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि किसी धर्म या महापुरुष में केवल विश्वास करने या ईमान लाने से पाप से छुटकारा नहीं मिल सकता। वरन् ईमान लाने से उस महापुरुष के प्रति भक्तिभाव का उदय होता है और उसके उपदेशों पर श्रद्धा होती है। भक्ति से मन शुद्ध होता है। उपदेश किये हुए सदाचार से धर्म की वृत्ति बढ़ती है और पाप वृत्ति शिथिल हो जाती है। यदि कोई मनुष्य सदाचार का पालन करता हो तो वह अवश्य धर्म के फल को प्राप्त करेगा। हिन्दू, जैन, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान सभी धर्मों में यह कहा गया है कि धर्मात्मा होने की सर्वप्रथम शर्त सदाचारी और परोपकारी होना है। जो व्यक्ति केवल बाह्य कर्मकाँड कर लेने, माला फेरने, पूजा-पाठ करने से पुण्य मान लेते हैं और सद्गति की आशा करते हैं वे स्वयं अपने को धोखा देते हैं। इन ऊपरी क्रियाओं से तभी कुछ फल प्राप्त हो सकता है जबकि कुछ मानसिक परिवर्तन हो और हमारा मन खोटे काम से श्रेष्ठ कर्मों की ओर मुड़ गया हो। ऐसा होने से पाप-कर्म स्वयं ही बन्द हो जायेंगे और मनुष्य सदाचारी बनकर शुभ कर्मों की ओर प्रेरित हो जायगा।


योग-मनुष्य के विकास का सर्वोत्तम मार्ग

(डॉ. रामचरण महेंन्द्र, एम. ए. पी. एच. डी.)

भारतीय दर्शन के छः विभागों में योग हिन्दुओं की और भारत की विश्व को एक महान देन है। संसार की और शुष्क विचारधाराओं से यह भिन्न है क्योंकि यह क्रियात्मक या (प्रैक्टिकल) है। योग अपने आप में एक विज्ञान है। इसे हम चाहें तो पूर्वात्य मनोविज्ञान भी कह सकते हैं। भारतीय संस्कृति में रुचि रखने वाले योग को बड़े आदर की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि यह आध्यात्मिक चमत्कारों से परिपूर्ण है। योग का प्रारम्भ महर्षि पतंजलि ने किया था। उनके अनुसार योग वह विद्या है जिससे मनुष्य अपने मन को पूर्ण वश में कर ईश्वरीय आत्मा में अपने आपको लय कर सकता है।

‘योग‘ शब्द का अर्थ है “मिलन” या जुड़ना’। दो बिछड़े हुए व्यक्तियों का मिलन भी कितना सुखद होता है। परस्पर एक दूसरे से जुड़कर हम दृढ़ और मजबूत बनते हैं। आन्तरिक आह्लाद का अनुभव करते हैं। हमारी आत्मा को सुख मिलता है। मनुष्य के अन्तस्थल में जो शुद्ध, बुद्ध, चैतन्य, सत्, चित्त, आनन्द, शिव-सुन्दर, अजर-अमर है, वह आत्मा ही हैं। इस आत्मा का जगत्पिता ईश्वर की आत्मा-विश्वात्मा से घनिष्ठ सम्बन्ध है। योग-साधना द्वारा आत्मा का जब परमात्मा से मिलन होता है, तो बिछुड़ी हुई माता और छोटी स्तनपान करने वाली कन्या के मिलने से मन की जो दशा होती है, वही आनंददायक अनुभूति हमें प्राप्त होती है।

आत्मा से परमात्मा के मिलन की जो अनुभूति होती है, वह सर्वाधिक आनन्द और शाश्वत शाँति देने वाली है। भक्त ईश्वर की आराधना और ततः मिलन के द्वारा जो सुख प्राप्त करते हैं, वह अनिर्वचनीय है। एक उदाहरण लीजिए।

मृत्यु-शय्या पर पड़े हुए बालि से भगवान् राम ने पूछा कि तुम स्वर्ग, मुक्ति या जो सद्गति चाहो मुझसे इसी समय प्राप्त कर-सकते हो तो बालि ने उत्तर दिया-

‘जेहि योनि जन्मों कर्मवश, तँह राम-पद अनुरागऊँ।”

“हे भगवन्! मुझे स्वर्ग या मुक्ति नहीं चाहिए, मुझे तो यह वरदान दीजिए कि कर्मवश जहाँ जिस योनि में मेरा जन्म हो, उस जन्म में मुझे राम के चरणों का अनुराग (या भक्ति) प्राप्त होती रहे। मुझे अपनी अक्षय भक्ति दीजिए।”

यही भावनाएं प्रायः अन्य सभी योगियों को अपनी आत्मा को ईश्वर में लय कर देने से प्राप्त होती हैं। योग वह विद्या है जिसके द्वारा स्वर्ग और मुक्ति का सुख यहीं प्राप्त हो जाता है। अनेक साधक अपनी भौतिक सम्पदाओं में लात मारकर आत्मिक साधनाओं (योगासन, प्राणायाम, ध्यान, यम-नियम) में तल्लीन होते हैं, क्योंकि भौतिक सुख की अपेक्षा आत्मिक सुख को ही वे प्रधानता देते हैं। योगियों ने विश्वात्मा से मिलन के अपने अनुभव लेखबद्ध किए हैं। अतः योग का चमत्कार जानने और अनुभव करने के लिए यह आवश्यक है कि जिज्ञासु स्वाध्याय या आत्मवादियों, योगियों एवं विद्वानों के सत्संग द्वारा योग विद्या को भली प्रकार समझें। आजकल तो केवल आसन और प्राणायाम मात्र ही करना योग हो गया है। ये तो शरीर के स्वास्थ्य के लिए गौण योगिक साधन हैं, प्रधान तो मनोयोग और आत्मयोग हैं। योगशास्त्र के अध्ययन में पर्याप्त उत्साह, सद्गुरु की भक्ति और दीर्घकालीन अभ्यास-ये आवश्यकताएं योग साधना के लिए जरूरी हैं।

योग के कई अंग हैं जैसे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और राजयोग। यम-नियम वे आधार हैं जिनके बिना कोई योग-मार्ग पर प्रवृत्त नहीं हो सकता। योगी श्री अरविंद ने आत्म-समर्पण पर बहुत बल दिया है।

योग साधना क्या है? मानव अन्तस्थल में जो शुद्ध-बुद्ध चैतन्य अमर सत्ता है,वही परमात्मा है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चतुष्टय को जीव कहते हैं। यह जीव आत्मा से भिन्न भी है और अभिन्न भी है। इसे द्वैत भी कह सकते हैं, अद्वैत भी। अग्नि में लकड़ी जलने से धुआँ उत्पन्न होता है। धुएं को अग्नि से अलग कहा जा सकता है। पर अग्नि का ही अंग है, यह अद्वैत है। आत्मा अग्नि है और जीव धुआँ हैं। दोनों अलग भी हैं और एक भी। उपनिषदों में इसे वृक्ष पर बैठे हुए दो पक्षियों की उपमा दी गई है। गीता में इन दोनों का अस्तित्व स्वीकार करते हुए एक को क्षर (नाशवान्) एक को अक्षर (अविनाशी) कहा गया है।

भ्रम से, अज्ञान या माया से अथवा शैतान के जाना प्रलोभनों से दोनों की जीव और (परमात्मा) की एकता पृथकता में बदल जाती है। वहाँ दुख और शोक का कारण है। पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई, सास-बहू में जब तक एकता रहती है, दोनों पक्ष आपस में प्रेम रखते हैं, एक दूसरे का हित चाहते हैं, सामंजस्य रखते हैं, तो घर में सुख रहता है। श्री वृद्धि होती है और सभी स्वर्ग का आनन्द लेते हैं। यही स्थिति मानव-जीवन की भी है। जहाँ मन और आत्मा का एकीकरण होता है, जहाँ जीव की इच्छा, रुचि एवं कार्य प्रणाली विश्वात्मा की इच्छा, रुचि, प्रणाली के अनुसार होती है, वहाँ अपार आनन्द का स्रोत उमड़ता रहता है, पर जहाँ दोनों में विरोध होता है, जहाँ नाना प्रकार के अन्तर्द्वन्द्व चलते रहते हैं, वहाँ आत्मिक शांति के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं।

मन और आत्मा का सम्बन्ध पति-पत्नि और पिता-पुत्र की अपेक्षा अधिक घनिष्ठ है। इसलिए उन दोनों की एकता की और भी आवश्यकता है। दोनों का दृष्टिकोण एक होना चाहिए। दोनों की इच्छा, रुचि एवं कार्यप्रणाली एक होनी चाहिए। तभी जीवन में सच्ची शाँति के दर्शन हो सकते हैं। पर इस स्थिति को विरले ही प्राप्त करते हैं। जिस प्रकार हमारे घर या परिवार में अनैक्य के कारण कलह, क्लेश और सन्तापों की भरमार है, वैसे ही आन्तरिक, आत्मिक एकता न होने से मनुष्य के मन क्षेत्र में घोर अशाँति मची रहती है। इस अव्यवस्था के सन्ताप से उसका अन्तःलोक दावानल की तरह जलता रहता है। मनुष्य के पास भौतिक सुख-साधन कितने ही क्यों न हों, उसके अन्तःकरण को तनिक भी शाँति उपलब्ध नहीं होती। अनेक धन-दौलत के स्वामी सेठ,पूँजीपति भाँति-भाँति की चिन्ताओं, आवेशों, और सन्तापों से घिरे रहते हैं। इससे प्रकट है कि धन-दौलत से कोई भी व्यक्ति जीवन का सच्चा और स्थाई आनन्द या सुख प्राप्त नहीं कर सकता।

इसी प्रकार अनेक ऐसे भी व्यक्ति हैं, जिनके पास रुपया पैसा या अन्य भौतिक सम्पदाएं नहीं हैं, फिर भी वह खूब मस्त रहते हैं। सुख की नींद सोते हैं और अपने चारों ओर आनन्द देखते हैं। इससे प्रकट है कि धन-दौलत के या साधनों के न होने से सच्चे सुख में कोई कमी नहीं आती। अमीरों का भी दुखी रहना और गरीबों का भी सुखी होना इस बात का प्रमाण है कि सुख का वास्तविक स्थान बाहर नहीं है, बाहर की वस्तुओं में नहीं है।

मन और अन्तःकरण की एकता में, दोनों में मिलन में ही सुख है। इसी को योगिक शब्दावलि में आत्मा और परमात्मा का मिलन कह सकते हैं। इस मिलन का ही दूसरा नाम ‘योग‘ है। आत्मा और परमात्मा के मिलन से दोनों के योग से एक ऐसे आनन्द का आविर्भाव होता है, जिसकी तुलना संसार के अन्य किसी भी सुख से नहीं की जा सकती। इसी सुख को परमानन्द, जीवनमुक्ति, ब्रह्म-निर्वाह, आत्मोपलब्धि, प्रभुदर्शन आदि नामों से पुकारा जाता।

मनुष्य के मन का वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं है। वह आत्मा का ही एक उपकरण, औजार या यन्त्र है। आत्मा की कार्य-पद्धति को सुसंचालित करके चरितार्थ कर स्थूल रूप देने के लिए मन का अस्तित्व है। इसका वास्तविक कार्य यह है कि आत्मा की इच्छा एवं रुचि के अनुसार विचारधारा एवं कार्य-प्रणाली को अपनावे। इस उचित एवं स्वाभाविक मार्ग पर यदि मन की यात्रा चलती रहे, तो मानव प्राणी जीवन सच्चे सुख का रसास्वादन करता है। पर दुर्भाग्य की बात है कि आज हममें से अधिकाँश को वह स्थित उपलब्ध नहीं है। आत्मा सत् प्रधान है। उसकी इच्छा एवं रुचि सात्विकता की दिशा में होती है। जीवन की हर घड़ी सात्विकता में सराबोर हो, हर विचार और कार्य सात्विकता से परिपूर्ण हो, यह आत्मा की माँग है।

पर माया या अविद्या के कुचक्र में फँसकर वे दूसरी और चल देते हैं। रज और तम में उसकी प्रवृत्ति दौड़ती है। इस कार्य-विधि को निरन्तर प्रोत्साहन मिलने से वह इतनी प्रबल हो जाती है कि आत्मा की पुकार के स्थान पर मन की तृष्णा ही प्रधानता प्राप्त कर लेती है।

मन और अन्तःकरण के मेल अथवा एकता से ही आनन्द प्राप्त हो सकता है। इस मेल अथवा एकता को एवं उसकी कार्य-पद्धति को योग-साधना कहते हैं। यह योग-साधना प्रत्येक उच्च प्रवृत्तियों वाले साधक के जीवन का नित्य कर्म होना चाहिए। भारतीय संस्कृति के अनुसार सच्ची सुख-शाँति का आधार योग-साधना ही है। योग द्वारा साँसारिक संघर्षों से व्यथित मनुष्य अन्तर्मुखी होकर आत्मा के निकट बैठता है, तो उसे अमित शान्ति का अनुभव होता है।

उपर्युक्त पंक्तियों से भारतीय योग पद्धति की महत्ता पर कुछ प्रकाश पड़ता है योग पूर्वीय दृष्टिकोण का मनोविज्ञान है। इसके अनुसार मनुष्य को अपनी वासना को परमात्मा में लय कर देना और इस प्रकार ऊँचा उठना चाहिए। इसके विपरीत पाश्चात्य मनोविज्ञान यह कहता है कि वासना को खोल देना चाहिए। भारतीय मनोविज्ञान- यह योग पद्धति ही श्रेष्ठ है, क्योंकि इससे मनुष्य की रुचि और प्रवृत्ति ऊँची रहती है। सात्विकता, देवत्व को विकसित होने का प्रचुर अवसर मिलता है। योगसाधना का प्रथम लाभ तो यह होता है कि मन शान्त हो जाता है। अशाँत मन में योग का आधार नहीं हो जाता है। विचारों का तूफान आने पर भी योगी का मन स्थिर और अविचल बना रहता है। दूसरा लाभ एकाग्रता है। निरन्तर ध्यान और चिन्तन करने से एकाग्रता की वृद्धि होती है। आध्यात्मिक शक्तियाँ बढ़ती हैं। आजकल की पाश्चात्य मनोविज्ञान की प्रणालियाँ जैसे साइकोथैरेपी, मैस्मेरिज्म, थाटरीडिंग, क्लेरोंवेन्स आदि सभी योग द्वारा सम्भव हैं।

आज योग-विद्या के सही दृष्टिकोण को निखारने की अतीव आवश्यकता है। आसन और प्राणायाम मात्र ही करना आजकल योग हो गया है। पर वास्तविक महत्व आन्तरिक साधना का ही है। उस समय योगी मृगछाला इसलिए पहनते थे कि वह आसानी से मरे पड़े हुए मृगों से मिल जाती थी। आजकल बन्दूक की गोली से मरे हुए जानवर की खाल होती है, वह निन्दनीय है। अब चिमटे की आवश्यकता नहीं रह गई है। योगिराज अरविन्द, महात्मा गाँधी जी, स्वामी दयानन्दजी, स्वामी शिवानन्दजी आदि की तरह का सीधा साधा जीवन ही उपयुक्त है।


समाजवाद और यन्त्रों का प्रयोग

(श्री सत्यभक्त)

समाजवाद या साम्यवाद का सिद्धान्त अब तक दृष्टि से विश्वव्यापी बन चुका है और कुछ विरोधी पक्ष वालों को छोड़कर सभी न्यायशील व्यक्तियों ने उसकी सामयिकता तथा उपयोगिता को स्वीकार कर लिया है। पर इस बात में लोगों में जरूर मतभेद पाया जाता है कि समाजवाद की स्थापना किस विधि-से की जाय। इसी मतभेद के आधार पर भारतवर्ष में भी साम्यवादी (कम्यूनिस्ट) समाजवादी और प्रजा समाजवादी नाम से तीन पार्टियाँ बनी हुई हैं और अन्य देशों में और भी अनेकों पार्टियाँ पाई जाती हैं। ये मतभेद प्रायः दो विषयों से सम्बन्ध रखते हैं। प्रथम तो यह है कि राजनैतिक सत्ता किस प्रकार प्राप्त की जाय और दूसरा यह कि आर्थिक व्यवस्था का निर्माण किस आधार पर हो। पहली बात के सम्बन्ध में जहाँ कम्यूनिस्ट विशेष रूप से सशस्त्र क्राँति और हिंसात्मक उपायों पर जोर देते हैं, दूसरे दल वाले आन्दोलन, प्रचार कार्य और शिक्षा द्वारा जनमत को इस पक्ष में करना उचित मानते हैं। इसी प्रकार दूसरी बात के सम्बन्ध में जहाँ साम्यवादी और समाजवादी दोनों ही अधिक से अधिक यंत्रीकरण (मशीनों की वृद्धि) के पक्षपाती हैं, वहाँ दूसरे लोग ऐसे भी हैं जो समाजवाद के सिद्धान्त को पूर्ण रूप से स्वीकार करते हुये भी यंत्रों के अधिक प्रयोग को हानिकार मानते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पूर्णतया यंत्रों के बहिष्कार के पक्ष में हैं।

यंत्रों के पक्षपातियों का कहना है कि “यंत्रों द्वारा ही मनुष्य प्रकृति की गुलामी से छूट सका है और आगे चलकर साम्यवादी शासन में जब यंत्रों का अधिकार समाज को मिल जायगा तो मनुष्यों को इन यंत्रों की बदौलत बहुत थोड़े समय काम करने से जीवन निर्वाह के साधन प्राप्त हो जायेंगे और शेष समय को वह अपने बौद्धिक विकास और आमोद-प्रमोद में लगा सकेगा” इतना ही नहीं वे चाहते हैं कि यंत्रों में दिन पर दिन अधिकाधिक ऐसा सुधार किया जाय कि वे वर्तमान समय की अपेक्षा और भी तेजी से काम करने लगें और मनुष्य कम से कम परिश्रम करके उनके द्वारा अधिक माल तैयार कर सके। उनका कहना है कि “हो सकता है ऐसा समय आये जब संसार के सभी काम करने लायक मनुष्यों का एक घण्टे का श्रम ही उनके जीवन की सभी उपयोगी चीजें (जैसे खाना, कपड़ा, मकान, बाग, सड़क, विद्यालय, नाट्य यन्त्र आदि) प्राप्त कराने को पर्याप्त हो। वैसी दशा में आठ घण्टा सोने के लिये रख लेने पर भी बाकी 15 घण्टों में आदमी क्या करेगा? इस समय का उपयोग मनुष्य अपनी-अपनी रुचि के अनुसार साहित्य, संगीत और कला के निर्माण में या उसके रसास्वादन में कर सकेंगे। स्वास्थ्य और साहस के खेल तथा यात्राएँ कर सकेंगे। आकाश, भूमि और समुद्र की यात्राएँ क्या मनुष्य के लिये मनोरंजक और ज्ञान वर्धक न होंगी? मनुष्य, पशु, पक्षी तथा दूसरे छोटे-छोटे जन्तुओं के मनोविज्ञान का अनुसंधान या अध्ययन कर सकता है। दर्शन और विज्ञान सम्बन्धी खोजों में लग सकता है। चिकित्सा सम्बन्धी अभी तक हल न हो सकने वाली कितनी ही समस्याओं को हल कर सकता है। यात्राएँ, क्रीड़ा और नाट्य ऐसी चीजें हैं, जिनमें आदमी चाहे उतना समय दे सकता है।”

पर यह कल्पना बहुत युक्तियुक्त नहीं जान पड़ती। अन्य विचारकों का यह भी ख्याल है कि इस प्रकार जब मनुष्य श्रम से छुट्टी पा जायगा तो कुछ सौ वर्षों के भीतर उसमें अवश्य ही निष्क्रियता और आलस्य का भाव उत्पन्न हो जायगा तथा शारीरिक और मानसिक दृष्टि से उसका ह्रास हो जायगा। कुछ भी हो हमको यह मशीनों की गुलामी अधिक रुचिकर नहीं जान पड़ती और हमारा ख्याल है कि इस हद तक प्रकृति से अलग हो जाने का परिणाम मनुष्य के लिये कल्याणकारी नहीं हो सकता।

मशीनों के पक्षपातियों का यह कहना कि यदि मनुष्य यन्त्रों का प्रयोग छोड़ दे तो वह पुनः अफ्रीका के जंगलों में रहने वाले हब्शियों या आस्ट्रेलिया के जंगलियों की सी हालत में पहुँच जायगा, कोरा शुष्क तर्क है। प्राचीन काल में भी अनेक समाजों ने बिना यन्त्रों के ऊँचे दर्जे की नैतिक, चारित्रिक उन्नति की थी, इसके प्रमाण मौजूद हैं। मिश्र, चीन आदि दूर देशों की बात छोड़ भी दें, तो हमारे ही देश में अशोक, विक्रम, भोज आदि शासकों के काल में बिना यन्त्रों के जिस उच्चकोटि की सभ्यता के प्रमाण हमको मिलते हैं उसकी तुलना हब्शियों या जंगलियों से कोई दुराग्रही ही कर सकता है। हमको तो यह स्पष्ट दिखलाई पड़ रहा है कि वैज्ञानिक आविष्कारों के फल से मनुष्य को उतना लाभ नहीं हो रहा है, जितनी कि हानि। इन आविष्कारों के कारण मनुष्यों के रहन-सहन में नकलीपन बहुत बढ़ गया, जिससे उसका स्वास्थ्य और सहनशक्ति घटती जाती है। जरा-जरा से परिवर्तनों के लिये उसे दवा का सहारा लेना पड़ता है और फिर भी रोगों की बढ़ती ही होती जाती है। कपड़े की मिलों द्वारा बेशुमार कपड़ा बनने का ही यह परिणाम है कि आज करोड़ों व्यक्ति बिना आवश्यकता के ही बनियान, कमीज, बास्कट, कोट, पतलून, टोपी आदि कई-कई वस्त्र सदैव लादे रहते हैं और अपने शरीर को सूर्य के जीवन प्रदायक प्रकाश और शीतल पवन के प्रफुल्लित करने वाले गुण से वंचित रखते हैं। इसी प्रकार चमड़े के कारबार की वृद्धि से मनुष्यों को हर समय जूता पहनने की आदत लग गई है और इसके फल से वे भूमि के स्वास्थ्यप्रद स्पर्श से वंचित रह जाते हैं। आवागमन के यन्त्रों की बहुलता से ही अनेक लोगों को पैदल घूमने-फिरने का अभ्यास नहीं रहा है जिसका उनके स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव होता है।

वे लोग पढ़-लिखकर भी मूर्ख समझे जाने लायक हैं जो यन्त्रों द्वारा मनुष्य को इस प्रकार निर्बल और परावलम्बी बनते देखकर भी केवल राजनैतिक अथवा आर्थिक कारणों से यन्त्रों का समर्थन करते हैं। अगर आज संसार के विभिन्न देशों में शत्रुता बढ़ रही है, अथवा कुछ देश संसार भर पर अपना आर्थिक प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं, तो ये सामयिक बातें हैं। यन्त्रों के विरोधी अगर सतयुग का सा समय लाने की अभिलाषा करते हैं तो उसका आशय यह नहीं कि आज ही तमाम लड़ाई के जहाजों, वायुयानों और रेलों को तोड़-फोड़ कर रख दो। पर इन चीजों का सामयिक आवश्यकता के लिये उपयोग करते हुये भी हम यह कह सकते हैं कि इनका प्रचार जान-बूझकर और अनावश्यक रूप से न बढ़ाया जाय और जनता के सामने आदर्श यही रखा जाय कि जिस कार्य में और जिस स्थान में यन्त्रों के बिना काम चल सके तो वैसा अवश्य किया जाय। उदाहरण के लिये अगर हाथ के करघे द्वारा कपड़ा बनाने से वह मिल के कपड़े की अपेक्षा ड्यौढ़े या दुगने भाव का पड़े, तो इसमें कोई ऐसी बात नहीं जिससे देश पर आपत्ति आती हो। बजाय इसके हाथ द्वारा काम करने से दुगुने-तिगुने लोगों को काम मिल सकेगा, लाखों व्यक्तियों की बेकारी दूर हो सकेगी। यदि यह कहा जाय कि इससे लोगों को कपड़ा महंगा मिलेगा तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि जैसा हम कह चुके हैं आजकल बहुसंख्यक व्यक्ति आधुनिक सभ्यता के नियमों से भ्रम में पड़कर आवश्यकता के अधिक वस्त्र काम में ला रहे हैं। भारत जैसी आबोहवा के देश में इससे बहुत कम वस्त्रों से काम चल सकता है और उस तरह का रहन-सहन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हितकारी है। यही बात और भी बहुत से यन्त्रों के सम्बन्ध में कही जा सकती है।

हमारे कहने का यह भी आशय नहीं कि सब प्रकार के यंत्रों का पूर्ण रूप से त्याग कर दिया जाय यह कहना एक प्रकार की हठधर्मी या विवेकहीनता ही है कि या तो यंत्रों का प्रचार अधिक से अधिक बढ़ाओं या बिल्कुल ही त्याग दो। मनुष्य को अब इतना अनुभव हो चुका है कि वह निर्णय कर सके कि किस हद तक और किन प्रकार के यन्त्रों का प्रयोग मनुष्य के लिये हितकारी है और किस प्रकार का प्रयोग हानिकारक है। सच पूछा जाय तो आज-कल जिन यंत्रों का आविष्कार और प्रचार हो रहा है, उसमें सार्वजनिक हित का कोई ख्याल नहीं रखा जाता। आजकल इसका एकमात्र आधार पूँजीपतियों के नफा के ऊपर है। जिस चीज में उनको अधिक नफा मिलेगा उसी प्रकार के यंत्रों की वे उन्नति करने का प्रयत्न करेंगे, उसके लिये आविष्कार करने वालों को धन और प्रोत्साहन देंगे और पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों द्वारा जनता का ध्यान उस ओर आकर्षित करेंगे। रिस्टवाच, फाउण्टेनपेन, बिजली का टार्च, बाइसिकल आदि कितनी ही चीजें ऐसी गिनाई जा सकती हैं, जिनका प्रचार पिछले पच्चीस-तीस वर्षों में ही अनेक गुना बढ़ गया है। पर कोई यह नहीं कह सकता कि कलाई में अधिक संख्या में घड़ी बाँधने के कारण लोग पहले से अधिक समय के पाबन्द हो गये हैं, अथवा फाउण्टेनपैनों की अधिकता से लोग अधिक विद्या-प्रेमी बनते जाते हैं। इन सब से बढ़कर मिसाल सिनेमा की है। सभी समाज हितैषी इसको विष तुल्य बतलाते हैं और वास्तव में इसके कारण कम उम्र के लड़कों का चारित्रिक पतन हो रहा है, पर यह दिन दूना बढ़ता जाता है। इस सब का आशय यही है कि यन्त्रों की तरक्की और प्रचार में इस समय जनता के हित का कोई प्रश्न नहीं है, उसमें मुख्य उद्देश्य पूँजीपतियों द्वारा धन कमाना ही है।

हमारे कथन का साराँश यही है कि यन्त्रों का प्रचार और उपयोग सर्वसाधारण के लिये विशेष हितकारी-नहीं है और अभी तो उससे लाभ के स्थान में हानि ही अधिक दिखलाई पड़ती है। इसलिये राजनैतिक और सामाजिक नेताओं का कर्तव्य है कि यन्त्रों के उपयोग को सीमित और नियन्त्रित करके मनुष्यों को जहाँ तक संभव हो शारीरिक श्रम और हाथ द्वारा कार्य करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दें। भारतवर्ष जैसे बढ़ी हुई जनसंख्या के देश के लिये तो यन्त्रों का प्रयोग और भी बेकारी बढ़ाने वाला है। इसलिये यहाँ सहकारिता के सिद्धान्तानुसार दस्तकारी का प्रचार अधिक उपयोगी सिद्ध होगा। यदि यह कहा जाय कि जब चीजों के बनाने का कार्य यन्त्रों द्वारा अपेक्षाकृत थोड़े व्यक्तियों से हो सकता है, तो जान-बूझकर मानवीय शक्ति को बर्बाद करना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? क्यों न उतने मनुष्यों को उपार्जन के किसी अन्य काम में लगाया जाय? इसका उत्तर यही है कि अगर हम नये-नये कारखाने खोलकर उन आदमियों से और सामग्री बनवायें तो फिर उसको बेचने के लिये विदेशों में बाजार ढूँढ़ने पड़ेंगे और इसी बात पर आज पश्चिमी राष्ट्र एक दूसरे का गला काटने पर उतारू हैं। फिर हमारी असली आवश्यकता तो अन्न की है सो भारतवर्ष की लगभग सभी काम लायक जमीन में खेती हो रही है। इस दस-पाँच वर्षों में लाखों एकड़ बंजर और ऊसर जमीन को भी तोड़कर खेती शुरू कर दी गई है। फिर भी लोगों की जमीन की भूख इतनी अधिक है कि दस-पाँच गज जमीन के लिये नित्य प्रति सर फूटते और खून होते रहते हैं। ऐसी हालत में मशीनों का अधिकाधिक प्रचार किसी तरह समाज के लिये कल्याणकारी नहीं हो सकता।


बीजमन्त्र ‘क्लीं’ की साधना

(डॉ. भानुशंकर ना. व्यास, बम्बई)

बीजमन्त्र ‘क्लीं’ सब प्रकार की मनोकामनाओं की सिद्धि के लिए बड़ा प्रभावशाली माना गया है। इसे एक सफेद कागज के ऊपर लिखना चाहिए। लगभग 1 फुट व्यास का गोल कागज लेकर पेंसिल से लगभग चार अंगुल ऊँचा अक्षर लिखना चाहिए फिर उस कागज का खाली भाग सिंदूर से लाल रंग डालना चाहिए। तेल मिले हुए सिंदूर का रंग ठीक रहता है, पानी अथवा चाक द्वारा बनाया रंग जल्दी उड़ जाता है।

इस प्रकार आकृति तैयार करने के बाद प्रतिदिन प्रातःकाल, मन की शाँत अवस्था में चित्रपट से लगभग दो फीट दूर बैठना चाहिए। आकृति को सामने की दीवार पर टाँग देना चाहिए अथवा चिपका देना चाहिए। इस आकृति को नित्यप्रति 15 मिनट से आरम्भ करके एक घण्टा तक स्थिर दृष्टि से ताकना चाहिए। यह स्थिर दृष्टि त्राटक की तरह नहीं होती, क्योंकि वैसा करने से आँखों की ज्योति घटने का भय रहता है। यह प्रयोग ध्यान का होता है जबकि त्राटक का उद्देश्य दृष्टि को वेधक बनाना होता है। थोड़ी देर तक खूब ध्यानपूर्वक ‘क्लीं’ को देखकर आँखें बन्द कर लेनी चाहिए और तब इस बीजमन्त्र को आँख खोले बिना ही अपने कपाल पर देखने का प्रयत्न करना चाहिए। अगर तुमने पहले इसे खूब ध्यान से देखा होगा तो आँख बन्द करने पर भी एकाध क्षण के लिए यह तुम्हें अपने कपाल पर अवश्य दिखलाई पड़ेगा। अगर आरम्भ में मानसिक अस्थिरता के कारण कपाल पर यह दिखलाई न दे तो इसमें निराश होने की कोई बात नहीं है। तुम्हें खुली आँखों से ही सब तरह के विचारों को त्यागकर एकाग्रचित्त से बीजमन्त्र को देखते रहना चाहिए। मन में से बाहरी विचारों को हटाने का सरल मार्ग यह है कि बीजमन्त्र को देखते समय मन में “ॐ क्लीं नमः” यह मन्त्र जपते रहना। ऐसा करने से अन्य विचार नहीं आयेंगे और बीजमन्त्र पर मन स्थिर होता चला जायगा। इस तरह स्थिरता का अभ्यास बढ़ता जायगा और तुम स्वयं ‘क्लीं’-मय हो, ऐसा अनुभव होने लगेगा। यहाँ इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि यह अभ्यास कोई दो-चार दिन में नहीं हो जाता, वरन् इसमें छः से बारह महीना तक का समय लग जाता है।

यह अभ्यास करते समय वातावरण शाँत रहना चाहिए और मनोवृत्ति को भी स्थिर रखना आवश्यक है। अगर दिन के समय यह प्रयोग न हो सके तो रात के समय भी किया जा सकता है। पर यदि मानसिक शाँति न हो तो इस प्रयोग का करना ठीक नहीं, क्योंकि उससे मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव पड़ना सम्भव रहता है। प्रातःकाल का छः से सात बजे तक का समय इस प्रयोग के लिए उत्तम है। रात के शाँत वातावरण में एक दिया इस प्रकार रखकर कि जिससे आकृति पर प्रकाश पड़े, अभ्यास किया जा सकता है। शहर में रहने वाले छोटा टार्च जला के भी अभ्यास कर सकते हैं।

जब आँखें बन्द कर लेने पर ‘क्लीं’ देर तक देखा जा सके तब समझना कि ध्यान उचित रीति से हो रहा है। जैसे-जैसे ध्यान का अभ्यास बढ़ता जायगा वैसे-वैसे तुमको अपने में परिवर्तन होता जान पड़ेगा। तुम्हारी आकर्षण शक्ति बढ़ती जायगी और हर एक क्षेत्र में वह काम देगी। विशेष रूप से सेल्समैनों, बीमा-दलालों, प्रोफेसरों, शिक्षकों में ऐसी आकर्षण शक्ति होना आवश्यक है। अन्य रोजगारों में भी उससे लाभ होता है। इसके अतिरिक्त ‘क्लीं’ की सिद्धि से मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। अगर तुम्हारे सामने उपस्थित व्यक्ति पर वशीकरण का असर डालना हो तो उसके हृदय में ‘क्लीं’ का ध्यान करने से तुरन्त उसका प्रभाव पड़ता है। किसी भी मनुष्य के फोटो के ऊपर अथवा उसकी मानसिक आकृति के ऊपर इस बीजमन्त्र का ध्यान करने से, वह चाहे कितनी दूर क्यों न हो, उसे बुलाया जा सकता है।

इसी ‘क्लीं’ बीजमन्त्र का प्रयोग लक्ष्मी प्राप्ति के लिए भी हो सकता है। लक्ष्मी के लिए ‘क्लीं’ की उपासना करनी हो तो आकृति के भीतर लाल के बदले पीला रंग भरना चाहिए और ध्यान के समय “ॐ क्लीं नमः” का जप करते रहना चाहिए। इस अभ्यास के पूरा होने पर लक्ष्मी की प्राप्ति में वृद्धि होती है।

जिस प्रकार लाल रंग के ‘क्लीं’ का ध्यान वशीकरण और आकर्षण के लिए किया जाता है और पीले रंग वाली आकृति धन प्राप्ति कराती है उसी प्रकार बीजमन्त्र में काला रंग भरकर ध्यान करने से उच्चाटन और विद्वेषण का प्रयोग किया जाता है।

जो व्यक्ति लम्बे समय से शारीरिक अथवा मानसिक व्याधि से पीड़ित हों अथवा तरह-तरह की बीमारियों के कारण परेशान हो रहे हों उनको बीजाकृति में हरा रंग भर कर ध्यान करना चाहिए। यह हरा रंग खुलता हुआ अर्थात् तोते का सा होना चाहिए। इस आकृति को प्रातः अथवा रात्रि में सामने रखकर “ॐ क्लीं नमः” का जप करते हुए ध्यान करने से आरोग्यता और शारीरिक सुख प्राप्त होता है। अशक्त व्यक्ति तो लेटे रहकर भी इसका ध्यान कर सकते हैं। जिनकी आँखें कमजोर हों और चश्मा का ऊँचा नम्बर हो गया हो, वे भी इस प्रयोग से अपनी आँखों को सुधार सकते हैं।

इस प्रकार क्लीं की बीजाकृति में भिन्न-भिन्न रंग भरने से भिन्न-भिन्न फल प्राप्त किये जा सकते हैं। इसमें आवश्यकता यही है कि धैर्य और लगन के साथ अभ्यास किया जाय। श्रद्धा रखना भी जरूरी है। जो ये बातें होंगी तो अभ्यास का फल अवश्य प्राप्त होगा। ध्यान का समय हर रोज एक ही रहना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से उस समय मन की चंचलता को दूर करके स्थिरता सहज में प्राप्त की जा सकती है। समय के बन्धन से परेशान न होकर अभ्यास और जप नियमित रूप रखना चाहिए। इससे जैसे-जैसे मानसिक स्थिरता प्राप्त होती जायगी, वैसे-वैसे ही मन्त्र-जप कम होता जायगा। अन्त में ऐसा समय आयेगा कि जप करने की तुमको जरा भी आवश्यकता न रहेगी और तुम स्वयं ‘क्लीं’ मय बन जाओगे। ऐसा होने से ही सब मनोकामनाओं की सिद्धि हो सकती है।


अतिथि-यज्ञ अथवा मानव-सेवा

(मारकंडेसिंह, बनारस)

मनुष्य के आत्म-कल्याण के लिए हमारे ऋषियों ने जो अनेक प्रकार की साधनाएं बनाई हैं उनमें पंचयज्ञ का विशिष्ट स्थान है। इन पाँच यज्ञों के नाम हैं-ब्रह्म-यज्ञ, देव-यज्ञ, पितृ-यज्ञ, भूत-यज्ञ तथा नृयज्ञ अतिथि-यज्ञ। ये पाँचों प्रकार के यज्ञ सदा से भारतीय संस्कृति के गौरव की वस्तु रहे हैं। प्राचीन समय में प्रायः प्रत्येक हिन्दू-परिवार में प्रतिदिन ये यज्ञ किये जाते थे। इनमें भी अतिथि-यज्ञ पर विशेष जोर दिया जाता था और अनेक लोगों का यह नियम रहता था कि वे बिना किसी अतिथि को खिलाये स्वयं भोजन नहीं करते थे। अतिथि यज्ञ से जहाँ हमारी आत्मा के भाव शुद्ध होते हैं वहाँ मानव-समाज में सहानुभूति और सहयोग के भावों का उदय भी होता है और विचारपूर्वक देखा जाय तो इन गुणों के बिना मनुष्य अपने नाम को भी चरितार्थ नहीं कर सकता।

अतिथि-सत्कार एक यज्ञ है। यज्ञ का अर्थ है ऐसा कार्य जिसमें त्याग अथवा बलिदान की भावना निहित हो।

अतिथि यज्ञ द्वारा हमारे भीतर विश्व-कल्याण की भावना उत्पन्न होती है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धान्त पर आचरण करने लगते हैं। इन यज्ञों से हमारे आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक अभावों का निवारण होता है। जो व्यक्ति इनका अपने जीवन में स्थान देते हैं उनका जीवन ही यज्ञमय हो जाता है। अर्थात् उनकी स्वार्थ-भावना नष्ट हो जाती है और वे कुछ भी कर्म करते हैं वह समाज की सेवा करने वाला अथवा परोपकार के निमित्त ही माना जाता है।

हमारे अनेक भाई यह कल्पना करते हैं कि केवल अग्नि में थोड़ी-सी सामग्री और घी डाल देना ही यज्ञ है। बहुत से यह समझते हैं कि किसी देवी-देवता के निमित्त होम करके किसी पशु का बलिदान कर देना ही यज्ञ है। ऐसे व्यक्ति समझते हैं कि इस प्रकार के यज्ञ से उनको स्वर्ग का अधिकार प्राप्त हो जायगा, अथवा वे साँसारिक वैभव पाने के योग्य बन जायेंगे पर यह ख्याल ठीक नहीं है। यज्ञ का वास्तविक अर्थ उसी शुभ कार्य से है जो किसी न किसी रूप में त्याग अथवा बलिदान द्वारा संसार के किसी अन्य प्राणी या दैवी अथवा भौतिक शक्ति के हित के निमित्त किया जाय। अपने स्वार्थ-साधन अथवा ईर्ष्या-द्वेष की भावना से किये जाने वाले काम को कदापि ‘यज्ञ’ नहीं कहा जा सकता।

खेद है कि आजकल हमारे भाई इन यज्ञों के महत्व को भूल गये हैं और इनके नाम पर एकाध काम निर्जीव भाव से कर देते हैं। उदाहरण के लिए अनेक व्यक्ति भोजन करने से पहले थोड़ा-सा भोजन जमीन पर गिरा देते हैं और समझ लेते हैं कि हमने भूत-यज्ञ पूरा कर लिया। पर यह विधि तो भूतों के प्रति अपने कर्तव्य को प्रकट करने का एक संकेत मात्र है। वास्तव में भिन्न-भिन्न भूतों के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन तभी हो सकेगा जब समझ बूझकर उनकी आवश्यकताओं को पूरी करने की कोशिश की जायगी, उदाहरणार्थ, पशुओं का भली भाँति पालन-पोषण करना, उन पर दया तथा प्रेम का भाव दर्शाना, वनस्पतियों के विकास का समुचित प्रयत्न करना, वैसे ही अन्य अदृश्य भूतों के प्रति भी सद्भाव दर्शाना इत्यादि। यही अन्य यज्ञों के विषय में है। हमको उनका वास्तविक आशय समझकर परोपकार की बुद्धि से उनकी पूर्ति करनी चाहिए। इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि अगर हम इन कार्यों को अटल श्रद्धा और दृढ़ विश्वास से करें तो हम देखेंगे कि आज भी भगवान उसी प्रकार हमारी सहायता को आ सकते हैं जिस प्रकार प्रह्लाद की सहायता को खंभा फाड़कर निकल आये थे, पर यह बात तभी होगी जब हमारा मन सच्चा हो जाय और हम प्राणी मात्र के साथ हृदय से प्रेम करने लगें। परमात्मा हमारे शुभ कर्मों से ही प्रसन्न होता है और अतिथि यज्ञ उन कर्मों में एक श्रेष्ठ कर्म है।


योगी बिना खाये पिये किस प्रकार जीवित रहते हैं।

(प्रो. अवधूत, गोरेगाँव, बम्बई)

स्वामी रामकृष्ण जी ने लिखा है कि योगीजनों ने प्रकृति का भली प्रकार निरीक्षण करके बहुत सी विधियों का आविष्कार किया था। जिस प्रकार बहुत सी विद्याओं का अभ्यास प्रकृति को देखकर किया जाता है, उसी प्रकार योग-विद्या भी प्रकृति का अनुसरण करने से प्राप्त हुई है। मेंढक, साँप और कछुआ- इन प्राणियों के शरीर में कुछ स्वाभाविक शक्तियाँ होती हैं, उनका पूर्ण रूप से अवलोकन करके योगियों ने प्राणायाम करने और भोजन बिना जीवित रहने की विधि खोज निकाली थी। उन्होंने देखा कि मेंढक गर्मी के दिनों में कुछ नहीं खाता, साँप प्रायः हवा खाकर ही जीता रहता है और कछुआ आत्म-रक्षा के लिये अपने अवयवों को भीतर खींचकर चाहे जितने समय तक जीवित रहता है। जाड़े में मेंढक का शरीर लगभग मिट्टी में मिल जाता है और उसमें जीवित होने का कोई लक्षण दिखलाई नहीं पड़ता, पर वर्षा ऋतु आरम्भ होते ही वह सजीव हो जाता है। भूख का कष्ट न हो इसलिये योगियों ने मेंढक का अनुकरण किया, कछुआ की तरह अपना मन समस्त विषयों से खींचकर एकाग्र करने की विधि सीखी और इस प्रकार बहुत दिन तक बिना भोजन के रहने का उपाय मिल गया। कछुआ और साँप ये दो प्राणी बहुत धीरे-धीरे अथवा कई-कई घंटे साँस लेते हैं। इससे योगियों ने अपने श्वाँस से कुम्भक करने या प्राणायाम की विधि ढूँढ़ निकाली। उन्होंने यह भी विचार किया कि ये प्राणी थोड़ा खाते हैं, श्वाँस भी बहुत कम लेते हैं और बहुत समय तक जीवित भी रहते हैं, इसलिये उन्होंने उनका अनुकरण किया।

मि. जोशी नाम एक प्राणी शास्त्रवेत्ता था। उसने फूल लगाने वाले गमले में एक मेंढक को रखा। फिर इस गमले को सब तरफ से बन्द करके मिट्टी से लीप दिया और ऐसी व्यवस्था की कि जिससे उसमें हवा न जा सके। तब उस गमले को ऐसे स्थान पर रख दिया कि गरमी या ठण्ड से उस पर किसी प्रकार का असर न पड़े। कई वर्ष बाद उस गमले को खोलने से दिखलाई पड़ा कि वह मेंढक मरा नहीं था, वरन् खूब स्वस्थ दशा में जीवित था।

भारत में ऐसे अनेक योगी अब भी हैं, जो कितने ही वर्ष तक समाधि में रह सकते हैं। यद्यपि ऐसे योगी प्रायः जन-समूह से दूर हिमालय पर्वत के अगम्य स्थानों में रहते हैं, तो भी इस विद्या के जानने वाले अब भी देश में जहाँ-तहाँ मिल जाते हैं और योग का चमत्कार दिखा सकते हैं। इस सम्बन्ध में नीचे लिखा वृत्तान्त बम्बई के ‘किस्मत’ मासिक-पत्र में छपा था-

“स्वामी रामदास जी ने जिनका निवास स्थान बज्रेश्वरी, अनुसुइया कुँड पर है, शनिवार ता0 16 फरवरी, 1957 को संध्या के 6 बजे कालवादेवी रोड पर बने मंमादेवी के विशाल मैदान में अनेक प्रतिष्ठित नगर निवासियों तथा विशाल जन-समुदाय के समाने समाधि ली। समाधि के लिये खोदे गये गड्ढे और लकड़ी की बड़े बक्स का जनता में से कुछ लोगों ने विशेष रूप से निरीक्षण किया कि किसी जगह कोई शंका या चालाकी की बात तो नहीं है। इसके बाद ठीक 6 बजे स्वामी रामदास ने समाधि ली और तुरन्त ही उनको उस बक्स के भीतर रखकर गड्ढे में रख दिया गया और गड्ढे में मिट्टी भरकर ऊपर सीमेंट से पक्की चिनाई कर दी गई।

‘किस्मत’ के प्रतिनिधि ने यह समाधि सीमेंट से बन्द की जाती स्वयं देखी थी। उस समय वहाँ पर भक्तों की भीड़ लगी थी और लोग समाधि पर फूल, पैसा आदि बहुत बड़ी संख्या में चढ़ा रहे थे। समाधि के पास किसी प्रकार की अव्यवस्था या अनुचित कार्य न हो सके इसलिये पुलिस का पहरा भी लगा था।

“सोमवार ता. 18 को दोपहर के तीन बजे स्वामीजी समाधि से उठने वाले थे।” इसकी घोषणा पहले से कर दी गई थी, इसलिये लोगों की बहुत भारी भीड़ जमा हो गई थी। सैंकड़ों प्रतिष्ठित नागरिक और महिलाएँ भी थीं, जिनमें प्राँतीय काँग्रेस समिति के मन्त्री श्री भानुशंकर याज्ञिक तथा अन्य काँग्रेसी नेता भी मौजूद थे।

“नियत समय पर समाधि के ऊपर की पक्की चिनाई तोड़ी गई और गड्ढे की मिट्टी निकाल कर स्वामी जी को बाहर निकाला गया। इस समय लोगों में धक्कम धक्का ऐसे प्रचंड वेग से होने लगा कि उसे सँभालना पुलिस के लिये भी कठिन हो गया। तब स्वामी जी को एक खूब ऊँचे मंच पर बिठा दिया गया, जिससे सब कोई दूर से भी उनको भली प्रकार देख सकें। उस समय डॉक्टर पोपट ने स्वामी जी की नाड़ी देखी तो मालूम हुआ कि वह बराबर ठीक चल रही है। कुछ समय बाद स्वामी जी भली प्रकार स्वस्थ और सावधान हो गये। उनकी यह समाधि 45 घण्टे की थी।”

दूसरा उदाहरण श्री बालयोगी महाराज का है। इनका जन्म महाराष्ट्र के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ध्रुव की तरह से 10 वर्ष की आयु में ही श्री भुवनेश्वरी की प्रेरणा से हिमालय में तप करने चले गये थे। वहाँ इनको एक बहुत बड़े योगी गुरु मिल गये, जिन्होंने 11 वर्ष तक योग की भली प्रकार शिक्षा दी और तत्पश्चात् देश सेवा के लिये पुनः जनता के मध्य भेज दिया। ये बालयोगी जी जमीन में, जल में, अग्नि में समाधि लेकर अपने शरीर को सुरक्षित रख सकते हैं और देश के विभिन्न भागों में इन विद्याओं का प्रयोग करके उन्होंने लाखों व्यक्तियों को चकित कर दिया है। अब उन्होंने श्री भुवनेश्वरी देवी के पास रहकर योग-शास्त्र, तन्त्र-शास्त्र, आयुर्वेद, ज्योतिष, धर्म-शास्त्र सम्बन्धी प्राचीन साहित्य का उद्धार करने के लिये प्रतिज्ञा की है। उनको भुवनेश्वरी विद्यापीठ की तरफ से ‘योग मार्तण्ड’ की उपाधि दी गई है।

आधुनिक समय के वैज्ञानिक, चमत्कारों और सिद्धियों पर किसी के कहने सुनने से विश्वास करने को तैयार नहीं होते। वे उनका विज्ञान सम्मत कारण बतलाने की माँग करते हैं। इस विषय में गहरा विचार करने से जान पड़ता है कि सभी जड़ पदार्थ वास्तव में तो चेतन से ही उत्पन्न हुये हैं, इसलिये यह मानना पड़ता है कि चेतन ही हमारे जीवन को बनाने वाला और रक्षा करने वाला है। हम जो भोजन करते हैं उसमें से खून बनता है और खून में से चेतन बनता है। इसके सिवाय शरीर को पृथ्वी, पानी, तेज, वायु और आकाश से भी स्वतन्त्र रूप से चेतन मिलता रहता है। यही चेतन शरीर का पोषण और रक्षा करता है। अगर भोजन में से चेतन न मिले और ऊपर बताये पाँच तत्वों में से चेतन मिलता रहे, तो शरीर का काम बिना खुराक के भी चल सकता है। रेडियो के ‘एरियल’ की तरह योगी लोग अपने कंठ-चक्र द्वारा सीधे उपर्युक्त पाँच मूल तत्वों से ही चेतन प्राप्त कर लेते हैं, इसी से वे बिना भोजन किये भी बहुत समय तक अपने शरीर को जीवित अवस्था में रख सकते हैं।


संत कबीर की ‘सोऽहम्’ साधना

(डॉ. रामकुमार वर्मा, एम. ए.)

भक्ति-काल की रचनाओं ने दो दिशा ग्रहण कीं। एक निर्गुण और निराकारवादी थी, दूसरी सगुण और साकारवादी। काल-क्रमानुसार निर्गुण प्रथम है। यह काल ईसा की पन्द्रहवीं शताब्दी का था जिसमें सन्त कबीर ने प्राचीन परम्पराओं का संशोधन करते हुए सन्त सम्प्रदाय की प्रतिष्ठा की। लगभग एक शताब्दी बाद सूर, तुलसीदास और मीरा ने वैष्णव भक्ति के आदर्शों को ग्रहण करते हुए सगुण सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया जिसमें राम और कृष्ण की भक्ति शतमुखी होकर जन-जीवन मन्दाकिनी की भाँति प्रवाहित हुई।

निर्गुण सम्प्रदाय की पृष्ठभूमि में नाथ सम्प्रदाय है और समानान्तर दिशाओं में वैष्णव भक्ति का अलंकार धारण किए हुए रामानन्द द्वारा प्रचारित शंकर का अद्वैतवाद तथा अनेक सूफी, सन्तों द्वारा प्रचारित सूफी मत हैं। सन्त कबीर पर रामानन्द की अद्वैत विचारधारा का प्रभाव सबसे अधिक है। कबीर ने साधना के क्षेत्र में योग और प्रेम को जो महत्व दिया है, यह क्रमशः नाथ सम्प्रदाय और सूफी मत का प्रभाव ही माना जा सकता है। यद्यपि प्रेम का महत्व वैष्णव भक्ति से भी समर्थित होता है, परन्तु प्रेम की मादकता जो अनेक प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत की गयी है, वह निश्चय ही सूफी मत से प्राप्त की हुई ज्ञात होती है।

अद्वैतवाद के अनुसार ब्रह्म ही एक सत्य हैं। अविद्या अथवा अज्ञान के कारण ही यह दृश्यमान् जगत सत्य भासित होता है, जिसमें जीवन और मरण के सुख और दुख घटित होते रहते हैं। इस अज्ञान सम्बन्धी ज्ञान की आवश्यकता है, क्योंकि ब्रह्म और आत्मा में कोई अन्तर नहीं है। जो अन्तर दृष्टिगत होता है वह अज्ञान जनित है। आत्मा को जानना ही निज रूप में स्थित होना है और तभी ‘सोऽहम्’ पर विशेष बल दिया है। इस पर कुछ विस्तार से विचार करना आवश्यक है। सन्त कबीर ने सोऽहम् की स्थिति योग और रहस्यवाद द्वारा सम्भव बतलाई है-

अरध उरध मुखि लागो कासु। सुँन मंडल महि करि परगासु॥

उहाँ सूरज नाहीं चन्द। आदि निरञ्जनु करें अनन्द॥

सो ब्रह्मण्डि पिंडि सो जानु। मानसरोवरि करि इसनानु॥

सोहं सो जा कउ है जाप। धाकल लिपत न होई पुन अरु पाप॥

अबरन वरन धाम नहीं छाम। अवरन पाइऔ गुरु का साम॥

टारी न टरै आवै न जाइ। सुन सहज महि रहिओ समाइ॥

मन मधे जानै जे कोइ। जो बोलै सो आपै होइ॥

जोति मन्त्र मनि असथिरु करै। कहि कबीर सो प्रानी तरै॥

इसका सामान्य अर्थ इस प्रकार है-

“जिस शून्य मण्डल के नीचे और ऊपर मुख से प्रकाश लगा हुआ है, उसी में वह (ब्रह्म) प्रकाश कर रहा है। वहाँ न सूर्य है, न चन्द्रमा किन्तु (अपने ही प्रकाश में) वह आदि निरंजन वहाँ आनन्द की (सृष्टि) कर रहा है। उसी शून्य मण्डल को ब्रह्माँड और उसी को पिंड समझो। तुम उसी मानसरोवर में स्नान करो और सोऽहम् का जाप करो। जिस सोऽहम् के जाप में पाप और पुण्य लिप्त नहीं हैं (अर्थात्, सोऽहम् जाप, पाप और पुण्य से परे है) उस शून्य मण्डल में वर्ण (रंग) है और न अ-वर्ण (अ-रंग), न वहाँ धूप है न छाया। वह गुरु के स्नेह के अतिरिक्त और किसी भाँति प्राप्त नहीं किया जा सकता। फिर (मन की सहन शक्ति) न टालने से टल सकती है और न किसी अन्य वस्तु में आ जा सकती है। वह केवल शून्य में लीन होकर रहती है। जो कोई इस शून्य को अपने मन के भीतर जानता है, वह जो कुछ भी उच्चारण करता है, वह आप ही (सच्चे अन्तःकरण) का रूप हो जाता है। इस ज्योति के रहस्य में जो व्यक्ति अपना मन स्थिर करता है, कबीर कहते हैं कि वह प्राणी इस संसार से तर जाता है।”

इस पद में कबीर ने विस्तार से सोऽहम् की स्थिति की वर्णन किया है। जब मैं वह (ब्रह्म) हूँ, जैसी सोऽहम् की अनुभूति होती है, तो ब्रह्म और जीव की सत्ता एक ही हो जाती है। कबीर ने भी सोऽहम् कहकर ब्रह्म और जीव की सत्ता एक ही मानी है, किन्तु उन्होंने इस स्थिति में कुछ संशोधन किया है। कबीर ने दर्शन के प्रत्येक तत्व को संशोधन के साथ ग्रहण किया है, जिससे वह सामान्य जन के लिए भी व्यावहारिक बन जाय। ब्रह्म और जीव का ऐक्य उन्होंने अद्वैतवाद की अपेक्षा रहस्यवाद से ग्रहण किया है जो आत्मा में विश्वात्मा की अनुभूति है। उसमें विश्वात्मा का मौन आस्वादन है। प्रेम के आधार पर वह आत्मा और विश्वात्मा में ऐक्य स्थापित करता है। यह ऐक्य ही है, एकीकरण नहीं। एकीकरण की भावना अद्वैतवाद में और रहस्यवाद में कुछ भिन्नता है। अद्वैतवाद में मिलाप की भावना का ज्ञान भी नहीं रहता, रहस्यवाद में यह मिलाप एक उल्लास की तरंग बनकर आत्मा में जाग्रत रहता है। जब तक जल-बिन्दु अनन्त जलराशि में मिलकर अपना व्यक्तित्व खो देता है तब उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान भी नहीं रहता। यह भावना अद्वैतवाद ही की है। लेकिन रहस्यवाद में अस्तित्व का पूर्ण विनाश नहीं होने पाता। मिलाप की स्थिति में भी यह भावना वर्तमान रहती है कि मैं मिल रहा हूँ। आत्मा विश्वात्मा से मिलकर भी यह कह सकती है कि मैं अपने लाल की लाली, जहाँ देखती हूँ वहीं पाती हूँ। जब मैं उस लाली को देखने जाती हूँ तो मैं भी लाल हो जाती हूँ। यहाँ मैं और लाल में एकता होते हुए भी दोनों का अस्तित्व-ज्ञान अलग-अलग है। व्यक्तित्व का अभिज्ञान रहते हुए इस मिलाप की आनन्दानुभूति ही रहस्यवाद की अभिव्यक्ति है। यदि आत्मा और परमात्मा की स्थिति एक ही हो जाय तो मिलने की आनन्दानुभूति का केन्द्र किस जगह स्थित होगा? आनन्द का अनुभव करने के लिए आत्मा के व्यक्तित्व को ब्रह्म से मिलते हुए भी अलग मानना होगा। रहस्यवाद की यही विशेषता है। इस रहस्यवाद में सोऽहम् की अनुभूति प्राप्त करने पर भी आत्मा आनंदानुभूति से वंचित नहीं होती।

ऐसा मनोभाव प्रेम की चरम परिणति में ही सम्भव है। यह प्रेम निर्गुण और सगुण दोनों प्रकार की भक्ति में प्रतिष्ठित हो सकता है। इस प्रेम की सहानुभूति के लिए व्यक्तित्व का होना परमावश्यक है। सगुणोपासना से तो व्यक्तित्व सहज ही प्राप्त हो सकता है। राम और कृष्ण का रूप और लीलागान किसी भी भक्त को रहस्यवाद के आनन्द-द्वार तक पहुँचा सकता है। सन्त तुलसीदासजी का यह कथन है कि-

प्रभु गुन सुनि मन हरषिहै, नीर नयनन ढरिहै। तुलसिदास भयो राम को, विश्वास प्रेम लखि आनन्द उमगि उर भरि है।

अथवा मीराबाई का यह पद--

जिनके पिया परदेश बसत हैं, लिखि-लिखि भेजें पाती। मेरे पिया मो माँहिं बसत हैं, गूँज करूं दिन-राती॥

रहस्यवाद के आनन्द की सृष्टि करते हैं, किन्तु निर्गुण सम्प्रदाय में जहाँ ब्रह्म निराकार है और उसका व्यक्तित्व या लीला-गान सम्भव नहीं है, वह प्रेम का आश्रय क्या होगा? अनन्य से प्रेम नहीं किया जा सकता। निर्गुण भावना में प्रेम की साधना प्रतिफलित करने के लिए संत कबीर ने अपने ब्रह्म के लिए प्रतीकों का आश्रय ग्रहण किया। उन्होंने अपने ब्रह्म से मानसिक सम्बन्ध जोड़ा और ब्रह्म को अनेक प्रकार से अपने समीप समीप लाने की विधि सोची। उन्होंने ब्रह्म को गुरु, राजा, पिता, माता, स्वामी, मित्र और पति के रूप में मानने की शैली अपनाई। ब्रह्म का गुरु रूप देखिए।

गुरु गोविन्द तो एक है, दूजा यहु आकार। आपा मेटि जीवत मरै, तो पावै करतार॥

जननी रूप--

हरि जननी मैं बालिक तोरा। काहेन औगुन बकसहु मोरा॥

स्वामी रूप--

कबीर प्रेम न चाखिया चखि ना लीया साव। सूने घर का पाहुँगा ज्यूँ आया त्यूँ जाव॥

पति रूप--

हरि मोरा पीव भाई हरि मोरा पीव। हरि बिन रहि न सकै मेरा जीव॥

इन प्रतीकों में पति या प्रियतम का रूप प्रधान है। इसी प्रतीक के माध्यम से कबीर ने रहस्यवाद का चरमोत्कर्ष प्राप्त किया है जिससे उनके सोऽहम् का अनुभव सम्भव हो सका है।


रसायन विद्या और गायत्री-मंत्र

(डॉ. महावीरप्रसाद, पटना )

हमारे देश में जब तक गायत्री-मन्त्र का ठोस रूप से जप, तप, ध्यान, ज्ञान तथा इस मन्त्र के प्रति अध्ययन, स्वाध्याय तथा प्रचार आदि होता रहा तब तक रसायन विद्या का भी अस्तित्व ठोस रूप से बना रहा। जिस प्रकार से आज लोग गायत्रीमन्त्र के महत्व से अनभिज्ञ होकर इसके अनेकानेक रहस्यमय अर्थों को केवल इस मन्त्र के नाममात्र से परिचित रह गये हैं, उसी प्रकार से वे रसायन विद्या को भूलकर केवल इसके नाम से परिचित रह गये हैं।

आज यदि किसी व्यक्ति को रसायन सोना बनाना आ जाये तो आश्चर्य नहीं कि वह अपने शेष कर्तव्य को भी भूलकर केवल रसायन बनाने और मौज उड़ाने में ही तल्लीन हो जायगा। प्रायः मुझे देखने का मौका मिलता रहा है कि जहाँ कोई साधु आ गया और उसके बारे में यह प्रचार हो गया कि वह रसायन बनाना जानता है, बस फिर क्या, चारों ओर से रसायन प्रेमी लोग (आश्चर्य नहीं कि इनमें अधिक संख्या उन आलसियों की रहती है जो परिश्रम से धनोपार्जन कर पेट पालना भी नहीं चाहते)आकर सच्चे भक्त का ढोंग कर ‘सोना’ बनाना सिखलाने के लिए विनय करेंगे। शायद ही कोई भगवान की प्राप्ति का रास्ता पूछता होगा। यह आज के देश की दशा है। रसायन विद्या भगवान के भक्तों की चीज है। भगवान का भक्त कैसा होता हैं? यह सभी जानते हैं। संसार की सारी दौलत भी उसके सामने रख दी जाये तो भी वह उसे मिट्टी समझता है। ऐसा तो वह निर्लोभी होता है। उसे तो ‘भगवान’ चाहिए ‘सोना’ नहीं।

(इस सम्बन्ध में हमको श्री रामकृष्ण परमहंस के योग विद्या के गुरु स्वामी तोता गिरि (नागा साधुओं के महन्त) की बात याद आती है। उन्होंने एक समय बातचीत करते हुए परमहँसजी को बतलाया था कि उनके मठ में (जो पंजाब में था) प्रधान महन्त को सोना बनाने की विद्या आती है जो वह अन्तिम समय अपने प्रधान चेले (यानी महन्त) को बतला देता है। पर इसके द्वारा साधारणतः कभी सोना बनाया नहीं जाता। केवल ऐसा अवसर उपस्थित होने पर कि जब कुम्भ आदि के समय साधुओं का बहुत बड़ा समुदाय इकट्ठा हो और उसके व्यय की व्यवस्था न हो सके, तो इस विधि से सोना बनाकर काम चलाया जा सकता है।

रसायन विद्या की सत्यता का वर्णन करते हुए गायत्री-मन्त्र का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ कि इस गायत्री-मन्त्र का रस-शास्त्र के आधार पर अपना अलग अर्थ भी होता है। जिस पर गायत्री माता की महान कृपा हो जाती है वह इसके रासायनिक सम्बन्धी अर्थ को भी जान सकता है। माता जरूर उसकी बुद्धि को विकसित कर उसे रासायनिक अर्थ को समझने में प्रेरणा देंगी। गायत्री-मन्त्र के 24 अक्षरों में सभी तरह के ज्ञान-विज्ञान छिपे हैं। सोना आदि बहुमूल्य धातुओं का बनाना तो एक साधारण बात है। राक्षसराज रावण गायत्री का सफल उपासक था। दक्षिण मार्गी तथा वाम मार्गी, ताँत्रिक विद्या तथा रस-शास्त्र का तो वह पण्डित था। अपने रस-शास्त्र के ज्ञान के कारण ही उसने सारे लंका को सोने का बना दिया था। वह अपने नाभि में अमृत रखता था। यह कथन एक अलंकारिक अर्थ रखता है। अर्थात् वह अपने समय का एक भारी वैद्य यानी एक दूसरा ‘धन्वन्तरी’ ही था। धन्वन्तरी अपने हाथ में अमृत लेकर समुद्र से निकले थे और वह अपने नाभि में ही अमृत रखता था।

गायत्री-मन्त्र के रासायनिक-अर्थ को समझने के लिए सर्वप्रथम गायत्री माता के असीम प्रेम को प्राप्त करना होगा, तभी कुछ सफलता मिल सकती है, फिर भी माता की कृपा से जो अनुभव मुझे मिला है वह केवल इशारा मात्र है। जिस प्रकार से भगवान अनेक रूप होकर भी ‘एक’ है और एक होकर भी अनेक हो जाते हैं, उसी प्रकार से ‘पारा’ भी अनेक खण्ड होकर भी एक हो जाता है और एक खण्ड से अनेक हो जाता है। रस-शास्त्र के आधार पर ‘पारा’ को साकार परमात्मा मानना होगा। भगवान सर्वशक्तिवान है। ‘पारा’ से भी बढ़कर कोई धातु सर्व शक्तिमान नहीं है। गायत्री-मन्त्र में ‘पारा’ के लिए ‘भर्ग’ शब्द रासायनिक अर्थ रखते हैं। जिस प्रकार भगवान को प्राप्त करने के बाद कोई इच्छा का अभाव नहीं रहता उसी प्रकार ‘पारा’ सिद्ध कर लेने पर किसी भी साँसारिक चीजों का अभाव नहीं रहता।

अब रसायन विद्या की सत्यता पर कुछ समाचार पत्रिकाओं द्वारा प्राप्त किए हुए प्रमाणों को यहाँ पर उल्लेख कर रहा हूँ :-

पहली बार जेठ शुक्ला 1 वि. सं. 1998 ता. 27 मई सन् 1941 बिड़ला हाउस नई दिल्ली में पंजाब निवासी श्री पं0 कृष्णपाल शर्मा ने 1 तोला पारा से 1 तोला ‘सोना’ लोगों के समक्ष बनाकर दिखलाया था। दर्शकों में श्री अमृतराय बी0 ठक्कर, प्रधान मन्त्री अ॰ भा0 हरिजन सेवक संघ, श्री गो0 गनेशदत्तजी, बिड़ला मिल दिल्ली के सेक्रेटरी श्री सीता-रामजी खेमका, चीफ इंजीनियर श्री विल्सन और श्री वियोगी हरि उपस्थित थे।

दूसरी बार चैत्र मास वि. सं. 1999 ऋषिकेश में उक्त शर्मा जी ने ढाई सेर पारद को आधा घण्टे में ‘सोना’ बना डाला था। दर्शकों में उस समय महात्मा गाँधी के मंत्री स्व. श्री महादेव देसाई, श्री गो. गनेशदत्त तथा श्री युगलकिशोर बिड़ला थे। शर्मा जी को यह विद्या एक साधु ने बतलाई थी। किन्तु उनकी दृष्टि में कोई सुपात्र व्यक्ति न मिलने के कारण उन्होंने यह विद्या किसी को नहीं बतलाई।

यद्यपि यह रहस्य इस वर्तमान समय में लुप्त प्रायः सा हो गया है तथापि इस समय भी इस विद्या को जानने वाले भारतवर्ष में कोई-कोई हैं। मेरे पास भी रसायन सम्बन्धी नुस्खे, इधर-उधर से आते रहते हैं। कभी-कभी तो इस सम्बन्ध में पुस्तकें भी पढ़ने को मिल जाती हैं। पर ये नुस्खे साधारण मनुष्यों के लिए उपयोगी नहीं हो सकते, क्योंकि रसायन की धातुओं और जड़ी-बूटियों को ठीक-ठीक आँच लगाकर फूँक सकना बड़ा कठिन कार्य है, जो बिना सीखे अपने आप नहीं आ सकता। फिर पारा एक ऐसी धातु है जो आग लगने पर तुरन्त उड़ जाती है। इसलिए इस सम्बन्ध में जो नुस्खे लिखे जाते हैं या बतलाये जाते हैं वे लोगों का कौतूहल शाँत करने के लिए ही समझने चाहिए और हमारा यही आग्रह है कि ऐसे नुस्खों को पढ़कर कोई व्यक्ति अपने आप ‘रसायन’ सिद्ध करने का विचार न कर बैठे। रसायन खिलवाड़ नहीं है, जो परिश्रम करके वर्षों तक प्रयत्न करेगा वही थोड़ा बहुत इसके मर्म को जान सकता है। वैसे एक औलिया साहब ने हमको एक नुस्खा बतलाया था, जिसके विषय में उनका कहना था कि जो भाग्यशाली इसे बनाने में परिश्रम करेगा और आँच का ठीक-ठीक हिसाब रख सकेगा वह असफल नहीं हो सकता। नुस्खा इस प्रकार है :-

हरताल बरकिया की 2-2 तोला की 4 डेलियाँ ले, उनको नीचे ऊपर आक के चार-चार पत्ते लगाकर लोहे के पतले तार से भली प्रकार बाँधकर या सीकर एक बालिश्त भर लम्बे, चौड़े गड्ढे में रखकर बकरियों की मैंगनी की अग्नि में पकालें। पत्ते जलने के पहले उसे बाहर निकाल लें और हरताल की गरम-गरम डेलियों को नमक के पानी में डाल कर बुझा दें। फिर इन डेलियों को पूर्ववत् आक के पत्तों में सीकर अग्नि में पकावें। इस प्रकार 100 बार अग्नि में पकाने से जो चीज बनेगी उससे ताँबा को सोना बनाने में सहायता मिलेगी।

इस प्रकार और भी अनेक नुस्खे हैं जो रसायन सिद्ध करने वाले बतलाये जाते हैं। पर कार्य में तब तक सफलता मिल सकना सम्भव नहीं जब तक कोई जानकार व्यक्ति ठीक-ठीक विधि करके न दिखला देवे।


साहित्य-सेवा के लिए सदाचार की आवश्यकता

(श्रीमती लीलारानी जैन)

प्रत्येक सार्वजनिक कार्यकर्त्ता के लिए सदाचार की आवश्यकता होती है। वैसे तो सदाचार मनुष्य भाव का भूषण माना जाता है, पर जो व्यक्ति, समाज की सेवा का कोई कार्य करना चाहता है उसे तो सदाचार पर चलना अनिवार्य है अन्यथा जनता की उस पर श्रद्धा न होगी और तब लोग उसकी बातों पर विश्वास भी न कर सकेंगे।

जो बात अन्य सार्वजनिक कार्यों के सम्बन्ध में है वही साहित्य सेवा के लिए भी कही जा सकती है। बहुत से व्यक्ति इसे केवल मनोरंजन या दिमागी कारीगरी का काम समझते हैं। पर ऐसे साहित्य की गिनती निकृष्ट श्रेणी में की जाती है। साहित्य का समाज से बहुत ही प्रगाढ़ सम्बन्ध है और उसकी उत्तमता तथा उपयोगिता का पूरा-पूरा ध्यान रखना परमावश्यक है। उचित तो यह है कि जिन लोगों के हृदय में समाज-कल्याण की वास्तविक भावना नहीं है और जो इस कार्य के अधिकारी नहीं हैं उनको साहित्य क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति ही न दी जाय। इस सम्बन्ध में विचारक का कथन है-

“क्या सदाचार के बिना किसी तरह की सेवा हो सकती हैं? क्या जिस कार्य के मूल में सदाचार न हो अथवा जिसके करने वाले सदाचारी न हों उसे सेवा कह सकते हैं? सेवा का अर्थ है वह काम जिसके द्वारा जन कल्याण हो और सदाचार का अर्थ है ऐसा आचरण जिससे अपना और दूसरों का भला हो। इस दृष्टि से सेवा और सदाचार बहुत भिन्न चीजें नहीं हैं, अर्थात् सदाचार ही सेवा है। जो मनुष्य स्वयं सदाचारी बनने का प्रयत्न करता है वह समाज की सेवा ही करता है। वह अपने को समाज की और भी उच्च सेवा के योग्य बनाता है। इस विवेचन से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि जो साहित्य सेवा सदाचारी होगा वही साहित्य-सेवा कर सकेगा, वही इस कार्य का अधिकारी माना जा सकता है।”

सदाचार के सम्बन्ध में एक विशेष त्रुटि जो आजकल के अनेक साहित्य सेवियों में दिखलाई पड़ रही है वह यह है कि वे व्यक्तिगत सदाचार तथा सामाजिक सदाचार को अलग-अलग चीजें मानने लगे हैं। इस समय ऐसे लेखकों तथा साहित्यकार कहलाने वालों की संख्या कम नहीं है जो लिखने में बड़ी-बड़ी उपदेश पूर्ण बातें लिख डालते हैं, जनता को आदर्श बनने का उपदेश देते हैं, पर स्वयं उल्टे रास्ते पर चलते हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि वह हमारा व्यक्तिगत जीवन है जिससे जनता न तो जानती और न उसका उससे कोई खास संपर्क होता है। पर यह विचार अत्यन्त भ्रमपूर्ण हैं।

यह किसी प्रकार संभव नहीं कि हम दुराचार का जीवन बिताते हुये सदाचार का उपदेश दे सकें और जनता पर उसका प्रभाव पड़ सके। हमेशा आन्तरिक मनोभाव हमारी रचना पर अवश्य ही प्रभाव डालेंगे और यदि हम कृत्रिम ढंग से उपदेश देने का प्रयत्न करेंगे तो वह सारहीन ही रहेगा पाठकों के हृदय पर कदापि असर न डाल सकेगा ऐसे ही उपदेशों को लोग एक कान से सुनकर दूसरा से निकाल देते हैं।

यह संभव है कि कोई बहुत बड़ा प्रतिभाशाली व्यक्ति अपनी विद्या के बल से ऊँचे दर्जे की आकर्षण और ज्ञान प्रदायक रचना कर सके, पर वह वास्तव में सदाचारी न हो। जैसे हम अनेक उच्चकोटि उपन्यासकारों और कवियों के लिये सुनते हैं कि शराबी थे, या व्यभिचार करने वाले थे, बहुत से व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो एक क्षेत्र में सचाई तथा त्याग से कार्य करते हैं, पर दूसरे क्षेत्र में उनका आचरण प्रशंसनीय नहीं होता। ऐसे व्यक्ति कुछ समय के लिये नाम पैदा कर सकते हैं और जनता भी उनका सम्मान कर सकती है, पर उनका काम कभी वैसा स्थायी और मानवीय हृदय पर प्रभाव डालने वाला न होगा जैसा एक सदाचारी विद्वान का हो सकता है। इसलिये जन सेवा की भावना रखने वाले और खासकर साहित्य-सेवा जैसे पवित्र कार्य को अपनाने वाले सज्जनों को अवश्य ही अपना चरित्र ऊँचे दर्जे का और निर्दोष रखना अनिवार्य है।


सद्ज्ञान से ही विश्व का कल्याण होगा।

(श्रीराम शर्मा आचार्य)

संसार में जितना भी दुःख, क्लेश, कलह, रोग, शोक, भय, दैन्य, दारिद्र फैला हुआ है उसका मूल कारण अज्ञान है। मानसिक दुर्बलता से विचारों में ग्रसित होकर मनुष्य दुष्कार्य करने में प्रवृत्त होता है और उसके फलस्वरूप नाना प्रकार के दुःख भोगता है। शारीरिक बीमारियों की जड़ पेट में होती है, पेट खराब रहने से नाना प्रकार के रोग पैदा होते हैं, यदि पेट साफ रहे, हलका रहे तो फिर बीमारी का आक्रमण होने की आशंका नहीं के बराबर रह जाती है। इसी प्रकार सारे मानसिक रोगों की, भावनात्मक व्यवस्थाओं की जड़, मस्तिष्क में रहती है। यदि दिमाग सही हो, सोचने का तरीका सुव्यवस्थित हो तो निश्चय ही मनुष्य की इच्छाएँ, आदतें, अभिरुचि और क्रियाएँ इस प्रकार की होंगी, जिससे वह मनुष्य सदा सुखी रहे और अपने निकटवर्ती लोगों को सुखी बना सके। विचारों में गड़बड़ी पड़ जाने से मनुष्य न सोचने लायक बात सोचता है और न करने लायक काम करता है, फलस्वरूप जीवन की गति लड़खड़ा जाती है, अनेक गुत्थियाँ और उलझनें सामने आ खड़ी होती हैं। दुख और सुख का, शान्ति और अशान्ति का यही रहस्य है।

मनुष्य के हाड़-माँस के शरीर में अन्य वस्तुएँ पशुओं से भी घटिया हैं। उसकी एक ही विशेषता है, और उसी के आधार पर वह विश्व का मुकुटमणि बना हुआ है, वह है-ज्ञान। इसी ज्ञान शक्ति के शुद्ध अशुद्ध होने पर जीवन के भले-बुरे-सुखी-दुखी होने की आधार शिला निर्भर रहती है। स्वर्ग और नरक कोई स्थान विशेष नहीं हैं, वरन् मन की दो वृत्तियाँ हैं। दुर्भाग्य युक्त मस्तिष्क सदा ईर्ष्या, द्वेष, चिन्ता, भय, शोक, दीनता और परेशानी में डूबा रहता है, जब कि सद्भावना को अपने स्वभाव में समुचित स्थान देने वाला व्यक्ति अपने चारों और प्रसन्नता, आत्मीयता, स्नेह, शिष्टाचार, सहयोग, उदारता का वातावरण देखता है और सुखी तथा सन्तुष्ट रहता है। यही स्वर्ग-नरक हैं। कुविचारों के फलस्वरूप कुकर्म और कुकर्म का परिणाम दुख यही नरक का मार्ग है। सद्विचारों के फलस्वरूप सत्कार्य और सत्कर्मों का परिणाम सुख यही स्वर्ग की सोपान है। स्वर्ग और नरक दोनों ही अपनी मुट्ठी में हैं, उन्हें कोई दूसरा देता नहीं वरन् हम स्वयं ही अपने लिए जिसे चाहते हैं चुन लेते हैं।

यह सोचना गलत है कि जिसके पास अधिक धन या सुख-साधन होंगे वह अधिक सुखी रहेगा। धनी लोग मोटर, महल, बढ़िया भोजन वस्त्र या विलासिता की वस्तुएँ तो प्राप्त कर सकते हैं, पर इनसे तो केवल 5 प्रतिशत सुख प्राप्त होता है। 95 प्रतिशत सुख तो मानसिक स्थिति पर निर्भर है। जिनमें आत्मिक विवेक की समुचित मात्रा नहीं है, ऐसे धनी लोग तो गरीब लोगों से भी अधिक चिन्तित और परेशान रहते हैं। मनोभूमि को ऊँची रखने वाले त्यागी लोग वस्तुओं का अभाव होते हुए भी स्वर्गीय शक्ति का रसास्वादन करते हैं। ऋषि−मुनियों का जीवन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

यों शिक्षा तर्क और चतुरता की दृष्टि से आज लोगों के मस्तिष्कों का भारी विकास हुआ है। एक से एक चतुर और बुद्धिमान लोग चारों ओर देखे जा सकते हैं। पर भावना ही दृष्टि से ऊँचा दृष्टिकोण रखकर जीवन नीति का निर्धारण करने वाले कोई विरले ही दीख पड़ेंगे। कौए जैसी चतुरता बेकार है। इससे कमाई तो की जा सकती है पर इससे आन्तरिक एवं सामाजिक शान्ति उपलब्ध नहीं हो सकती। मनुष्य की व्यक्तिगत तथा सामूहिक उन्नति तभी संभव है, जब ऊँची भावनाओं से अन्तःकरण भरा हो। स्वार्थ और क्षुद्रता में डूबे हुए अनुदार एवं संकीर्ण मस्तिष्क न तो स्वयं चैन से रहते हैं और न दूसरों को रहने देते हैं, उन्हें धरती पर अभिशाप और मानवता का कलंक ही कहना चाहिए। जीवन उन्हीं का सफल है जो ऊँचे उदार और दूरगामी दृष्टिकोण से हर समस्या पर विचार करते हैं और उसी के अनुसार अपनी गतिविधियों का निर्माण करते हैं।

आध्यात्म और कुछ नहीं केवल मनुष्य के दृष्टिकोण को ऊँचा एवं उदार रखने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। भारतीय मनोविज्ञान का, योग और धर्म का आधार यही है। इसे अक्षुण्य रखने के लिए ब्राह्मण वर्ग अपना सारा जीवन ही उत्सर्ग करता था, उसका प्रयत्न निरन्तर यही रहता था कि लोग घटिया किस्म से विचार करने की भूल न करने लगें। ऊँचे किस्म के विचार जनता के मनः क्षेत्र में भरने के लिए वे अहिर्निश घोर प्रयत्न करते रहते थे। उनके परिश्रम का फल ही था कि भारतीय जन समाज लाखों वर्षों तक अपनी उत्कृष्टता कायम रख सका और उसे जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं स्वर्ग सम्पदाओं का स्वामी बनने का सौभाग्य प्राप्त होता रहा। आज अनेक सम्पत्तियाँ और क्षमताएं संग्रह की जा रही हैं, पर आन्तरिक उदारता का स्तर दिन-दिन गिरता जा रहा है। उसे उठाने के सभी प्रयत्न ढीले हो गये हैं। यह गिरावट तेजी से बढ़ रही है। यदि हमें मनुष्य जैसी सुख शान्तिमय जीवन प्राप्त करने की इच्छा हो तो सबसे पहले अपने भावना क्षेत्र को, मस्तिष्क को, सही करना पड़ेगा।

सद्ज्ञान ही हमारे मानसिक परिमार्जन का उपचार है। सद्ज्ञान की जितनी ही गहरी स्थापना हमारे मनः क्षेत्र में होती जायगी, उसी अनुपात से हमारी शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक गुत्थियाँ सुलझेंगी। कुविचारी एवं कुकर्मी लोग न बीमारी से छूट सकते हैं न गरीबी से, न उनमें संगठन हो सकता है न प्रेम, न वे अच्छी सरकार चुन सकते हैं और न अधिकारियों को बिना रिश्वत लेने वाला रहने दे सकते हैं। पत्तों को छिड़कने से काम न चलेगा पेड़ को हरा रखना है तो जड़ से पानी देना पड़ेगा। अस्पताल खोलकर, बीमारियों के टीके लगाकर, कानून बनाकर, राजनैतिक परिवर्तन लाकर, समाज सुधार के प्रस्ताव पास कर तथा उद्योग धन्धे बढ़ाकर अनेक समस्याओं के हल सोचे जा रहे हैं, पर ये तब तक निष्फल रहेंगे जब तक जनता में नैतिकता न बढ़े, सदाचार, संयम, कर्तव्य परायणता और सद्गुणों को अपनाने की प्रवृत्ति जब तक लोगों में पैदा न होगी तब तक सारे, प्रयत्न पते छिड़कने की तरह मन बहलाव मात्र ही सिद्ध होंगे।

प्राचीन काल में तत्वदर्शी ऋषियों ने मानवीय सुख शान्ति की जड़ को खोज निकाला था और उन्होंने इस बात पर पूरा-पूरा ध्यान दिया था कि मनुष्यों की अन्तरात्मा में किस प्रकार गहराई तक सद् भावनाओं को प्रतिष्ठापित किया जाय। अध्यात्म का सारा ढाँचा इसी समस्या को हल करने के लिए खड़ा किया गया है। दुर्विचारों के, वासना और तृष्णा के, काम, क्रोध, मोह के बन्धनों से मुक्त होना ही जीवनमुक्ति है। कुविचारों के भवसागर और कुकर्मों की वैतरणी में न डूबने देने के लिए ही बार-बार भगवान को पुकारा जाता है, स्तुति प्रार्थना का, पूजा अर्चना का मूल मन्तव्य यही है।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हम सद्ज्ञान के महत्व को भूलते जा रहे हैं, उसे व्यर्थ समझते हैं और उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं। स्वाध्याय और सत्संग की वास्तविकता एवं महत्ता को विस्मरण सा कर दिया गया है। जहाँ यह होते भी हैं वहाँ एक रूढ़िमात्र पूरी कर दी जाती है। अमुक देवता या अमुक अवतार के चरित्रों की पुस्तक को रोज-रोज पढ़ते रहना और पाठ मात्र से यह मान लेना कि यह कोई बहुत बड़ा पुण्य हो गया यही आज के स्वाध्याय का रूप है। सत्संग में ईश्वर जीव, प्रकृति सृष्टि-रचना, देवता और अवतारों की लीलाओं के ऊहापोह उन्हीं विषयों में बाल की खाल निकालते रहना ही सत्संग बन गया है। व्यक्ति का जीव कैसे ऊँचा उठे, कैसे वह सद्गुणों को धारण कर समाज के लिये अधिक उपयोगी बने इसकी समस्या पर स्वाध्याय और सत्संग में कोई ध्यान नहीं दिया जाता जबकि स्वाध्याय और सत्संग का मूल उद्देश्य यही है।

मानव समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है- सद्ज्ञान। इससे बढ़कर इस विश्व में और कोई विभूति नहीं। गीता में कहा गया है कि- “नहि ज्ञानेन सदृश्य पवित्रमिह विद्यते” अर्थात् इस संसार में ज्ञान से बढ़कर श्रेष्ठ वस्तु और कोई नहीं है यदि मानव जाति को सद्ज्ञान से विभूषित कर दिया जाय तो उसके सुख सौभाग्य की कोई सीमा न रहेगी, इस धरती पर ही स्वर्ग लोक का रसास्वादन किया जा सकेगा। जन मन में सद्ज्ञान की प्रतिष्ठापन करना इतना बड़ा पुण्य कार्य है कि इसमें जो ब्राह्मण लगे रहते थे उन्हें समाज में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था। वह सम्मान अब भी उनके अयोग्य वंशजों तक को प्राप्त होता चला आ रहा है। इससे स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति में सद्ज्ञान को कितनी महत्ता दी गई थी। आज कथा पुराण कहकर धर्म के नाम पर कुछ मनोरंजन तथा झूठा आत्म संतोष कर लिया जाता है पर वह नहीं किया जाता, जिसके बल बूते पर लोगों के अन्तःकरण बदलें और वे उस गति-विधि को अपनावें जो मानवता का गौरव बढ़ाने वाली हो।

गायत्री परिवार का निर्माण मानव समाज की इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिये हुआ है। सद्बुद्धि की देवी गायत्री और सत्कार्यों का पथ प्रदर्शक यज्ञ है। जप और हवन के कर्मकाण्ड के साथ साथ भावना और क्रिया में भी इन दोनों तथ्यों को परिपूर्ण स्थान मिलने का प्रयत्न किया जा रहा है। अनुष्ठानों में जप, हवन की ही भाँति ‘ब्रह्मभोज’ भी एक आवश्यक कर्तव्य है। यह धार्मिक अनुशासन है, गायत्री उपासक उसे छोड़ नहीं सकते। जप हवन पूर्ण कर लें पर ब्रह्मभोज न करे तो अनुष्ठान पूर्ण नहीं कहा जायगा। ब्रह्मभोज का तात्पर्य यहाँ सद्ज्ञान से है। सद्ज्ञान प्रसार के लिये दिन रात लगे रहने वाले उसी पर जीवन उत्सर्ग किये हुए व्यक्ति ब्राह्मण कहलाते हैं, उन्हें भोजन कराना भी ब्रह्मभोजन कहा जा सकता है। पर जो लोग उस कर्तव्य को तो नहीं करते, केवल जाति मात्र से ब्राह्मण हैं, उन्हें मिठाई पूरी खिलाने से ब्रह्मभोज का उद्देश्य किसी भी प्रकार पूरा नहीं हो सकता। भोजन कराना तो एक क्रिया मात्र है, मूल हेतु तो ज्ञान प्रसार है। ज्ञान प्रसार में जिसके द्वारा कोई सहायता न मिले, वह ब्रह्मभोज नहीं हो सकता। अब वह कार्य सत साहित्य के द्वारा हो सकता है। पुराने समय में प्रेस न थे, पुस्तकें तो वर्षों तक श्रम करने पर एक दो लिखी जाती थीं, उस जमाने में ज्ञान प्रसार मौखिक रूप से ही होता था, ब्राह्मण ही निरन्तर भ्रमण करके प्रवचनों द्वारा उस उद्देश्य को पूरा करते थे। इसलिए उन्हें भोजन कराना आवश्यक था। आज उस उद्देश्य की पूर्ति सत् साहित्य से बड़ी सुविधापूर्वक होती है, इसलिये गायत्री परिवार के उपासक अपनी साधना के जप, हवन कृत्यों के साथ ही सद्ज्ञान प्रसार साहित्य द्वारा ब्रह्मभोज करना ही आवश्यक धर्म कृत्य मानते हैं। जहाँ भी ब्रह्मभोज की आवश्यकता हो वहाँ सद् साहित्य प्रसार का कार्य किया जाना चाहिये। लोगों के भावना स्तर को ऊँचा उठाने के लिये यह एक आवश्यक प्रक्रिया है।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के होता यजमानों और संरक्षकों के लिये जहाँ जप हवन की शर्त है वहाँ थोड़ा साहित्य वितरण करने का भी बन्धन है। कई व्यक्ति जो ब्रह्मभोज के सच्चे स्वरूप ज्ञान प्रसार का महत्व नहीं समझते वे इस ओर से आँख चुराते हैं, इसमें कुछ पैसे खर्च करने को भार समझते हैं। यह उचित नहीं। ज्ञान की देवी गायत्री का भोग, लड्डू, पेड़ा से नहीं लग सकता, ये सद्ज्ञान के प्रत्यक्ष प्रतीक सत् साहित्य की श्रद्धाँजलि का भोग लेकर ही तृप्त हो सकती हैं। साहित्य प्रसार हर उपासक को करना चाहिये। आर्थिक कठिनाई या अन्य कारणों से निर्धारित पैसों का साहित्य न बाँटा जा सके तो उससे आधे चौथाई का लेना चाहिये, पर सर्वथा उपेक्षा करने से तो उनका साधन ही अधूरा रह जायगा।

पिछले अंक में गायत्री ज्ञान मन्दिरों की आवश्यकता पर जोर देते हुए यह बताया गया था कि उनकी स्थापना घर-घर में होनी चाहिए। प्रत्येक शाखा का एक सामूहिक ज्ञान मन्दिर अवश्य हो। उसमें जहाँ पूजा उपासना के उपकरण रहें वहाँ गायत्री साहित्य भी अवश्य रहे और वह साहित्य मँगाकर रख ही न लिया जाय वरन् संस्थापकों का कर्तव्य है कि जिस प्रकार बीमा कम्पनी के एजेन्ट अपना ग्राहक बनाने के लिए कई-कई चक्कर लोगों के घरों पर लगाते हैं, और बीमा का महत्व समझाते हैं उसी प्रकार गायत्री साहित्य को पढ़वाने के लिए उसके सम्बन्ध से आवश्यक बातें समझाने के लिए धार्मिक अभिरुचि के लोगों के यहाँ कई-कई बार चक्कर लगाने चाहिएं। जिस प्रकार चुनाव जीतने के लिए वोटरों को घर-घर जाकर समझाना और अपने पक्ष में प्रभावित करना पड़ता है, उसी प्रकार गायत्री परिवार के सदस्यों का भी कर्त्तव्य है कि वे सद्ज्ञान की देवी गायत्री और सत्कर्म के देवता यज्ञ का सन्देश घर-घर पहुँचाने में शक्ति भर प्रयत्न करें, उसमें कोई कमी न रहने दें।

गायत्री ज्ञान मन्दिर सेट छपकर तैयार हो गया है। इसमें कुल 52 पुस्तक हैं। 26 पुस्तकों में गायत्री उपासना, एवं उसके तत्वज्ञान संबंधी सभी बातें आई हैं शेष 26 पुस्तकों में गायत्री की व्याहृतियों समेत एक-एक अक्षर की व्याख्या की गई है और उसमें सन्निहित धार्मिक, नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं का बहुत ही उत्तम विवेचन किया गया है। चार-चार आना मूल्य की यह 52 पुस्तकें ग्लेज कागज पर छपी, आर्ट पेपर पर तिरंगे टाइटल लगने से और भी सुन्दर बन गई हैं। उच्च कोटि का साहित्य, यह भी अच्छा नयनाभिराम एवं अत्यन्त सस्ता होने के कारण उस उद्देश्य की पूर्ति में बहुत सहायक हो सकता है जिनको लेकर गायत्री परिवार की स्थापना की गई है। सद्ज्ञान से मानव समाज की आत्मा में धर्म का प्रकाश उत्पन्न करना एक महान् लोक सेवा है। इस लोक सेवा साधन रूप में यह ज्ञान मन्दिर साहित्य बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।

अखण्ड ज्योति एवं गायत्री परिवार के सदस्य को अपनी कमाई में से कुछ पैसे नित्य ही धर्म प्रचारक के लिए, सद्ज्ञान साहित्य के लिए बचाने चाहिए, यदि एक आना प्रतिदिन इस कार्य के लिए बचाया जा सके तो हर कोई धर्मप्रेमी अपने घर को कुछ ही वर्ष में सरस्वती का केन्द्र सद्ज्ञान का भण्डार बना सकता है। घर के बच्चों के लिए, पड़ौसी रिश्तेदार और दोस्तों के लिए यह साहित्य एक वरदान जैसे सम्पत्ति साबित हो सकती है। घर के जो लोग इसे पढ़ेंगे उनके विचारों और संस्कारों में अच्छे परिवर्तन ही होंगे।

सारे राष्ट्र को सन्मार्ग की ओर प्रेरणा देने के लिए-सद्ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करने के लिए- साहित्य का आश्रय लेना आवश्यक है। गायत्री माता, यज्ञ पिता और भारतीय संस्कृति का संदेश घर-घर पहुँचाने का प्रधान साधन यह सत्साहित्य ही कर सकता है। गायत्री ज्ञान मन्दिरों की स्थापना मानव जाति में सत्प्रवृत्तियाँ उत्पन्न करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भविष्य बन सकता है। अपने समय और श्रम का थोड़ा सा भाग यदि हर परिजन धर्म-सेवा के लिए लगा सके तो उस दीपक का उदाहरण बन सकता है जो स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों को प्रकाश देता है, उस फूल का उदाहरण दे सकता है जो स्वयं खिलकर दूसरों को खिलाता है। अविवेक पूर्वक अनेक रूढ़ियों के लिए हम ढेरों धन बर्बाद करते रहते हैं पर यदि विवेक पूर्वक दो-चार पैसा रोज इस ज्ञान-दान के लिए ब्रह्मभोज के लिए खर्च करने की उदारता अपना लें तो इससे अपमान और दूसरों का भारी हित साधन कर सकते हैं।

सद्ज्ञान की मानव जाति को भारी आवश्यकता है, उसका भविष्य सद्विचारों पर ही निर्भर है। संसार को सुखी बनाने के लिए गायत्री परिवार ज्ञान की मशाल जलाये रखने का संकल्प किया है। परिवार के हर सदस्य को इस दिशा में कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए और भारत भूमि को सद्ज्ञान से प्रकाशित कर देने के संकल्प की पूर्ति में अपना हिस्सा आगे बढ़कर बंटाना चाहिए।


गायत्री-परिवार संगठन का लक्ष

गायत्री परिवार का संगठन इस युग की एक ऐतिहासिक घटना है। कुटुम्ब की शैली, पद्धति और परम्पराओं को सारे समाज में फैलाने का-वसुधैव कुटुम्बकम का, जो महान आदर्श इस प्रकार क्रिया रूप में परिणत करने का एक सुव्यवस्थित ऐसा प्रयत्न निस्संदेह एक युगपरिवर्तन की प्रक्रिया है। पृथकता, व्यक्तिवाद, असुरता, संकीर्णता, स्वार्थपरता एकान्तवाद की घातक प्रवृत्तियों को हटाकर उनके स्थान पर सामूहिकता, सहकारिता, सहयोग, समन्वय, उदारता त्याग एवं सेवा की सद्भावनाओं को बढ़ाना यही कौटुंबिकता का उद्देश्य है। व्यक्तिवाद की, स्वार्थपरता की भावनाएं जिस समाज में, जिस व्यक्ति में बढ़ती हैं वह दिन-दिन पतित होता जाता है। जो समाज एवं व्यक्ति दूसरों की सुख सुविधा का जितनी अधिक ध्यान देता है वह उतना ही फलता फूलता है।

भारतीय संस्कृति के ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के महान् आदर्श को व्यावहारिक क्रियात्मक रूप में लाने का एक आध्यात्मिक प्रयत्न गायत्री परिवार का संगठन है। जिनने इस योजना पर अधिक ध्यान दिया है, अधिक गम्भीरता से विचार किया है वे अनुभव करते हैं कि यह प्रयत्न सफल हुआ तो इस भूतल पर स्वर्ग उतरने की कल्पना सफल हो सकती है।

युग की पुकार ने गायत्री परिवार संगठन को एक अध्याय बनाकर धार्मिक दृष्टिकोण से सारे संसार में आत्मीयता, मानवता, नैतिकता-आस्तिकता एवं सामूहिकता की सत्प्रवृत्तियों को फैलाने का कार्य आरम्भ किया है। विचारवान व्यक्ति अनुभव करते हैं कि राजनैतिक बड़े-बड़े विशाल संगठनों की अपेक्षा यह धर्म संगठन, पीड़ित, मानवता की कहीं अधिक सेवा कर सकता है। नैतिकता का जो अभाव आज सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रहा है, उसे रोकने लिए कानून नहीं, मजबूत सामाजिकता ही कारगर हो सकती है। कानून की उपेक्षा करना सहज है पर सारा समाज जिस बात का विरोध करे, जिस तथ्य से घृणा और असहयोग करे, उस मार्ग को अपनाना किसी दुस्साहसी के लिए भी कठिन है।

युग निर्माण की इस बहुत बड़ी जरूरत को पूरा करने के लिए देश भर के विचारशील धर्मप्रेमी कुछ कार्य कर रहे हैं। गायत्री परिवार का इतनी तेजी से निर्माण और विकास होने का यही कारण है। संस्था का संगठन कार्य आरम्भ हुए पूरे दो वर्ष भी नहीं हो पाये हैं कि दो हजार से ऊपर शाखाएं और साठ हजार से ऊपर सदस्य बन गये हैं।

यह संगठन अभी अपने प्रारम्भिक रूप में है। इस समय तक पहला कार्यक्रम धर्मप्रेमियों को सद्बुद्धि की देवी गायत्री और त्यागमय जीवन के प्रतीक यज्ञ का महत्व समझने वाले लोगों को एक संगठन सूत्र में पिरोने का कार्यक्रम पूरा किया गया है। संगठन ही इस युग की शक्ति है। एक व्यक्ति बड़ी से बड़ी योग्यता होने पर भी कुछ नहीं कर सकता यदि उसके पीछे जन शक्ति न हो। संगठन की शक्ति के बिना धर्मयुग की स्थापना भी असम्भव है। दूसरा कार्यक्रम ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की आध्यात्मिक योजना को पूर्ण करना है। यह अनुष्ठान इस युग का सबसे बड़ा अनुष्ठान कहा जा सकता है। विशाल संगठन की शक्ति को जो लोग समझते नहीं उनके लिए तो इतनी विशाल योजना एक आश्चर्य जैसी लगती है। गायत्री परिवार का तीसरा अगला कार्यक्रम लोगों के विकृत मस्तिष्कों को सही करना है, जीवन की प्रत्येक समस्या एवं गुत्थी पर विवेकपूर्ण मानसिक स्थिति रखने का पाठ जनता को पढ़ाया जायगा। मस्तिष्क के उन केन्द्र बिन्दुओं को सही किया जायगा जिसमें थोड़ी सी गड़बड़ी पड़ने से मानव पथ भ्रष्ट होकर कुकर्म करने पर उतारू हो जाता है और जिस केन्द्र बिन्दु के सही रूप से काम करते रहने से मनुष्य देवत्व की कक्षा में प्रवेश करके स्वर्गीय सुख शान्ति में अवतरण करता है। गायत्री ज्ञान मन्दिर की स्थापना एवं ब्रह्म विद्यालयों का संचालन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रयत्न यह है कि दस हजार ज्ञान मन्दिरों की स्थापना हो। दस हजार धर्म प्रचारक ‘उपाध्याय’ अपना नियमित समय देकर सद्विचारों से लाखों व्यक्तियों के मनःक्षेत्र को हर साल परिपूर्ण करते चलें। यह शृंखला एक से दूसरे को प्रेरणा प्रदान करती हुई आगे बढ़ती चले और कुविचारों से भरे हुए असंख्य मनों में सात्विकता, विवेकशीलता एवं सद्भावनाओं का प्रकाश उत्पन्न करे। यह नैतिक क्रान्ति गायत्री परिवार का तीसरा कदम है जो आरम्भ किया जा रहा है।

चौथा कदम जिसे गायत्री परिवार उठाने वाला है वह है गायत्री परिवार के सदस्यों को एक आदर्श कुटुम्ब बनाकर दिखाना। इसके सदस्य परस्पर इस प्रकार व्यवहार करें कि उसे देखकर दूसरे लोग प्रेरणा प्राप्त करें और उसके सत्परिणामों को देखकर अनुकरण की इच्छा करें। दहेज, मृत्यु, भोज, माँसाहार, नशेबाजी, जुआ, व्यभिचार आदि सामाजिक बुराइयों को छोड़ने की कठोर प्रतिज्ञायें की जायं और इन पर दृढ़ रहा जाये। इस प्रकार गायत्री परिवार के सदस्य अनेकों बुराइयों से अपने आपको मुक्त करें और परस्पर ऐसा सद्व्यवहार करें, एक दूसरे के सुख दुख में ऐसे प्रेम और सहयोग के साथ तत्परता प्रदर्शित करें जिससे कौटुम्बिकता का आदर्श महत्व एवं न्याय लोगों के समझ में आ सकें एवं सदस्यगण परस्पर संगठन से अधिक सुसम्पन्न एवं सुखी बन सकें। आगरा के दयाल बाग का उदाहरण इस दिशा में बहुत हद तक हमारा पथ प्रदर्शन कर सकता है। परिवार के सदस्यों के लिए सामूहिक कार्य एवं सामूहिक उद्योग धंधे खोलना, निवास के लिए सामूहिक ग्राम मुहल्ले, बसाने और बनाने की व्यवस्था, परिवार के बच्चों और बच्चियों की शिक्षा सच्चे अर्थों में बनाने वाले गुरुकुलों की स्थापना, कौटुम्बिक शासन एवं विभाग के अंतर्गत बड़ी संख्या में लोगों को रखकर जीवन की सुविधाओं का परिचय करना आदि अनेकों कार्यक्रम इस योजना में सम्मिलित हैं।

पाँचवाँ कदम सारे समाज में फैली हुई अनेकों बुराइयों को हटाकर उनके स्थान पर स्वस्थ परम्पराओं की स्थापना करने के प्रचारात्मक, निरोधात्मक, असहयोगात्मक, प्रेरणात्मक आयोजन करना। इसमें अमुक बुराइयों को रोकने की लिए शान्त सामाजिक असहयोग एवं सत्याग्रह करना भी शामिल है। जब परिवार का संगठन बढ़ा होगा, उसके पास प्रचार के साधन होंगे और जनमत पक्ष में होगा तो थोड़े से समाज विरोधी और प्रगति विरोधी लोगों को आसानी से नरम किया और झुकाया जा सकेगा। उस स्थिति में सामाजिक दबाव के कारण वे बुराइयाँ आसानी से दूर हो सकेंगी जो आज कानून और राजदण्ड की व्यवस्था की कमजोरी के कारण उद्दण्ड रूप में नंगा नाच कर रही हैं। तब स्वस्थ और सतोयुगी परम्पराओं को स्थापित करके स्वर्गीय एवं सतयुगी समाज का दण्ड आँखों के आगे देखा जा सकेगा।

भारतीय संस्कृति जीवन की वह पद्धति है जिससे मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनता है। यह गुण कर्म और स्वभाव से संबंध रखती है। भारत के महान दार्शनिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक आदर्शों के अनुयायी जन समाज की विचारधारा एवं कार्य पद्धति को बताना ही भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान है। गायत्री परिवार का लक्ष ऐसा ही साँस्कृतिक पुनरुत्थान है। अमुक साम्प्रदायिक प्रथा, परम्पराओं, रीति रिवाजों, तक ही जो लोग संस्कृति को सीमित मानते हैं और नैतिकता के पहलू पर जोर नहीं देते उनकी संस्कृति शब्द की परिभाषा से गायत्री परिवार की परिभाषा भिन्न है। हम मानवता के मूल भूत आदर्शों और सिद्धान्तों को अपनाने पर जोर देते हैं। विभिन्न सम्प्रदायों की मान्यताओं और परम्पराओं से हमारा कोई विरोध नहीं, यदि वे समाज विरोधी न हों।

गायत्री परिवार का संगठन बढ़ना चाहिए और मजबूत होना चाहिए। परिवार के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है कि वसुधैव कुटुम्बकम् के महान आदर्श को क्रियात्मक रूप देने के लिये संगठन की प्रवृत्तियों में शक्ति भर सहयोग देने का अधिकाधिक समय लगाने का प्रयत्न करें। हम सब के सहयोग से सींचा हुआ यह धर्मतरु कुछ ही दिनों में उस ‘कल्प वृक्ष’ की कल्पना को चरितार्थ कर सकता है, जिसके नीचे बैठकर हम सुखी, स्वस्थ, शान्त और समृद्ध समाज के रूप में जीवन यापन कर रहे होंगे।


गायत्री-परिवार की गतिविधियाँ

(1) गायत्री परिवार के संगठन सम्बन्धी समाचार, शाखा संचालकों तथा सदस्यों के लिये आवश्यक सूचनाएं अब ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ में ही छपने लगी हैं। अखण्ड ज्योति विशुद्ध विचार पत्रिका रहेगी, इसमें मानव जीवन को समुचित बनाने वाले विचारात्मक लेख ही रहा करेंगे। प्रचारात्मक सामग्री गायत्री परिवार पत्रिका में रहा करेगी। जिन्हें गायत्री परिवार के कार्यक्रम में रुचि है वे अपनी शाखा से लेकर या स्वयं मँगाकर गायत्री परिवार पत्रिका अवश्य पढ़ा करें। वार्षिक चन्दा 2 रु. है।

(2) गायत्री परिवार पत्रिका का प्रथम अंक 20 अप्रैल को प्रायः सभी शाखाओं के लिये भेजा जा चुका है। दूसरा अंक 20 मई को भेजा गया है। यह दोनों अंक जिन शाखाओं को न मिले हों वे उसे डाक की गड़बड़ी में गुम हुआ समझकर दुबारा मँगालें। शाखाएं पत्रिका का चन्दा जमा करने में विलम्ब न करें।

(3) मथुरा में महायज्ञ की तैयारियाँ जोरों से चल रही हैं। तपोभूमि में यज्ञशाला, पीछे के 9 कमरों के आगे बरामदा तथा ऊपर एक बड़ा हाल, रसोई घर आदि बनने का कार्य लगभग एक महीने में पूरा हो जायगा। मथुरा शहर से बिड़ला-मन्दिर तक दो मील का क्षेत्र यज्ञ कार्य के लिये चुना गया है। एक हजार कुण्डों की एक ही बड़ी यज्ञशाला बनने के लिये कोई उपयुक्त स्थान न मिल सका इसलिये 25-25 कुंडों की 40 यज्ञ-शालाएं बनाने की बात सोची गई है। हर प्रान्त वालों का निवास तथा उनकी यज्ञ शालाओं की सीमाएं अलग-अलग बंट जावेगी इससे व्यवस्था में भी सुविधा रहेगी।

(4) भोजन का प्रबन्ध भी कम से कम 5 स्थानों पर रखना पड़ेगा। 8 ब्लॉकों का भोजन एक स्थान पर रहा करे ऐसा सोचा जा रहा है। ठहरने के लिये तम्बाकू छोलदारी लगवाने के लिये कई ठेकेदारों से बात चल रही है। बिजली लेने के लिये सरकार से लिखा पढ़ी आरम्भ कर दी गई है। यदि उतनी बिजली न मिल सकी तो जनरेटरों का या गैस बत्तियों का प्रबन्ध करना पड़ेगा। स्नान के लिये जमुना जी एक फर्लांग ही है, फिर भी पीने का पानी की एक बड़ी आवश्यकता है। पानी और टट्टी घरों के लिये अनुभवी लोग योजना बना रहे हैं। इतने आदमी जहाँ बैठकर भाषण सुन सकें वैसे सभास्थल के लायक जगह का उस क्षेत्र में न होना एक बड़ी समस्या है, उसका हल सोचा जा रहा है।

(5) रेल के वापिसी टिकट देने तथा स्पेशलें छोड़ने के लिये सरकार से लिखा पढ़ी आरम्भ कर दी गई है। मोटर बसों का अड्डा भी तपोभूमि पर रखने के लिए सरकार को लिखा गया है। टेलीफोन लगाने की अर्जी दे दी गई है। सरकार के स्वास्थ्य विभाग से भी सहयोग माँगा गया है। इस प्रकार लिखा पढ़ी चल रही है।

(6) बाँस, बल्लियाँ, चटाइयाँ, तंबुओं में बिछाने के लिये घास आदि वस्तुओं के भाव मालूम किये जा रहे हैं। धीरे-धीरे यह चीजें जुटाई जायेंगी। हवन सामग्री की औषधियाँ जहाँ-जहाँ ये पैदा होती हैं वहाँ-वहाँ से बड़ी मात्रा में सीधी मँगाई जा रही हैं। घी शुद्ध ही मिले इसके लिये पशु पालकों से शुद्धता की शर्त और प्रतिज्ञा लेकर उन्हें घी के आर्डर दिये जा रहे हैं।

(7) तपोभूमि के कुएं में मोटर पम्प लगाने के लिये बिजली की स्वीकृति मिल गई है। पानी की व्यवस्था हो जाने से तपोभूमि में सदा हरियाली रहने, तथा सड़क पर प्याऊ जैसे दो नल लगे रहने की सुविधा रहेगी। नवरात्रि, गायत्री जयन्ती आदि उत्सवों में जब सैकड़ों व्यक्ति आते हैं तब एक ही कुंए पर स्नान कुल्ला, दातौन करने में भारी अड़चन पड़ती है अब मोटर लगाने से कई नल लग जायेंगे और पानी की सुविधा रहेगी। इस जल व्यवस्था में लगभग दो हजार रुपया खर्च होगा।

(8) इतने बड़े विशालकाय कार्यक्रम के लिये धन संग्रह की कोई अपील अभी तक नहीं की गई है और न यज्ञ के अन्त तक करने का विचार है। अपने पास में तो यज्ञ में खर्च होने वाले धन का हजारवाँ भाग भी नहीं है फिर उतनी बड़ी जोखिम उठाकर कहीं लोग हंसाई न हो जाय यही सन्देह अपने साथी सहयोगियों को खाये जाता है। अपने निकटवर्ती साथी, जब यहाँ की आर्थिक स्थिति और कार्य की विशालता की तुलना करते हैं, और चन्दा जैसा न करने की प्रतिज्ञा की बात को इस स्थिति में मिला कर कल्पना चित्र बनाते हैं तो उन्हें बड़ी निराशा होती है। कई तो हमारे ऊपर झल्ला झल्ला कर पड़ते हैं और कई इसी कारण निराशा और असन्तुष्ट होकर साथ भी छोड़ बैठे हैं। ऐसे साथियों की अल्प श्रद्धा पर हमें हैरानी होती है।

(9) यह यज्ञ इस युग का अभूतपूर्व धर्मानुष्ठान है। इसकी शक्ति और सफलता इस बात पर निर्भर है कि इसमें जो भी साधन लगें वे अत्यन्त ही पवित्र हों। धन एक प्रधान साधन है। यज्ञ में वही पैसा लगना चाहिये जो अत्यन्त पवित्र एवं श्रद्धा परिपूर्ण हो। माँगने से देने वाले पर एक दबाव पड़ता है वह तो लोकलाजवश, अश्रद्धा पूर्वक भी देती हैं। अश्रद्धा के साथ, भार समझकर दिया हुआ धन प्रायः कुधान्य होता है। जो पैसा धर्म कमाई का नहीं है वह धर्म कार्यों में नहीं जाना चाहता, उसकी स्वाभाविक चाल वेश्या, सिनेमा, नशा, वकील, डॉक्टर, राजदण्ड, विलासिता आदि मार्गों में निकलने की होती है। ऐसे धन को किसी पर जोर डालकर हम तो भी लें तो उससे प्रदर्शन तो बड़ा बन जायगा और आसानी भी रहेगी, पर इससे यज्ञ का उद्देश्य पूर्ण न होगा, वह पवित्रता न रहेगी जो इतने महान यज्ञ में रहनी आवश्यक है। इसलिये परिणाम जो भी हो हमारा दृढ़ निश्चय है कि धर्म उपार्जित एवं श्रद्धा से परिपूर्ण पैसे ही इस यज्ञ में लगने देंगे और ऐसे धन की पहचान वही है कि देने वाले के मन में आवश्यक भावना उत्पन्न करके इस और अपना मार्ग खोलेगा। वह बिना माँगे ही मिलेगा। यदि ऐसा पैसा अब दुनिया में नहीं है तो हमारा निश्चय है कि आगंतुकों को 5 दिन तक वृक्षों के नीचे ठहरने एवं सत्तू नमक का भोजन करने को कहेंगे। पवित्रता एवं आदर्श को नष्ट करके विशाल यज्ञ करना हमें किसी भी प्रकार अभीष्ट नहीं है। लोग हंसाई का, जोखिम उठा कर भी हम इस तथ्य पर चट्टान की तरह अटल हैं। वैसी असफलता और लोग हँसाई के बीच भी जो पवित्रता कायम रह सकेगी, उसे ही हम यज्ञ की सफलता मान लेंगे और उतने मात्र से भी इस धर्मानुष्ठान का महान् उद्देश्य पूरा हो जायगा। आदर्शों की रक्षा सफलता की प्रधान कसौटी है। साथी लोग डरें नहीं, घबरावें नहीं, यज्ञ पूर्ण सफल होगा।

(10) एक हजार कुण्डों की पूर्णाहुति मथुरा में होने के बाद सन् 59 में 26 हजार कुण्डों के यज्ञ सारे भारतवर्ष में होंगे। इस प्रकार कुल 24 हजार कुण्डों में महायज्ञ की पूर्णाहुति होगी। मथुरा का यज्ञ तो उस पूर्णाहुति का उद्घाटन मात्र है। महायज्ञ के बाद सभी शाखाएं अपने-अपने यहाँ 25-25 कुण्डों के यज्ञों का आयोजन अभी से करें। इस वर्ष जिन्हें कोई आयोजन करना हो वे छोटा स्थानीय आयोजन कर लें। हमें बुलाने का अब इस वर्ष कहीं आग्रह न किया जाय। हमारे कन्धे पर पहाड़ के बराबर कार्य भार पड़े हुये हैं। अब अगले महीनों में कहीं बाहर जा सकना हमारे लिए संभव न होगा। अगले वर्ष के यज्ञों में ही हम जाने का प्रयत्न करेंगे।

(11) आश्विन सुदी 1 (तारीख 13 अक्टूबर) से लेकर के कार्तिक सुदी 15 तक डेढ़ मास का शिक्षण शिविर तपोभूमि में होगा जिसमें प्रत्येक शाखा को आपने यहाँ से एक या दो प्रतिनिधि भेजने चाहिये। उन्हें यज्ञ करने की, भाषण देने की, यज्ञ व्यवस्था की, सिनेमा दिखाकर प्रवचन करने की, साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना की शिक्षा दी जायगी। साथ ही ये प्रतिनिधि यज्ञ कार्य में स्वयंसेवक का कार्य भी करेंगे। यह प्रतिनिधि स्वत्व, निर्व्यसनी, मधुर भाषी, अनुशासन में रहने वाले एवं प्रतिभा सम्पन्न होने चाहियें। हीन नियति के व्यक्ति हमारे कार्य में सहयोग करना, शिक्षा प्राप्त करना तो दूर उलटे स्वयं एक सिर दर्द बन जाते हैं। ऐसे लोग कदापि न भेजे जायँ। अगले वर्ष 23 हजार कुण्डों की पूर्णाहुति के लिये लगभग 1 हजार स्थानों में जो यज्ञ होंगे उनकी व्यवस्था एवं संचालन का कार्य यही डेढ़ मास में ट्रेंड व्यक्ति करेंगे।

(12) पहले विचार था कि यह शिक्षण शिविर दो मास का किया जाय। 25 मई की गायत्री-परिवार पत्रिका में ऐसी सूचना भी छपी है। पर अनेक शाखाओं से पत्र आये हैं कि “यह समय अधिक है इसे कम किया जाय” और दो मास की जगह अब डेढ़ मास कर दिया गया है। 1 अक्टूबर से आरम्भ होगा। प्रतिनिधियों को 12 अक्टूबर तक आ जाना चाहिये। आने से पूर्व नाम, पूरा पता, आयु, वर्ण, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अब तक का संक्षिप्त जीवन वृत्तान्त लिख भेजना आवश्यक है। स्वीकृति लेकर ही प्रतिनिधि आवें।

(13) ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के होता यजमान साहित्य वितरण के परम पुनीत कार्य के महत्व को समझ नहीं पा रहे हैं, और इस ओर उपेक्षा कर रहे है। यज्ञ में भाग लेने के इच्छुक प्रत्येक भागीदार का कर्तव्य है कि वह जप, हवन के समान ही ब्रह्मभोज साहित्य वितरण को भी अनुष्ठान का एक अँग माने। थोड़ा बहुत खर्च इस कार्य में अवश्य करें। ब्रह्मभोज की, ज्ञान दान की सर्वथा उपेक्षा करने वाले साधकों की साधना पूर्ण न मानी जायगी।

(14) ज्ञान मन्दिर सैट जिनने मँगा लिये हैं, उन्हें चाहिये कि उन 52 पुस्तकों को पूर्णाहुति तक कम से कम 10 व्यक्तियों को पढ़ा दें। लोगों में इसे पढ़ने के लिये रुचि उत्पन्न करें, उनके घरों पर यह साहित्य देने तथा लेने जावें। कुछ पुस्तकें इस भाग दौड़ में खोवें या फटें तो उस जोखिम के लिये भी तैयार रहें। बस व्यक्तियों को पूरी 52 पुस्तकें पढ़ा देने वाले व्यक्ति गायत्री संस्था के धर्म प्रचारक माने जायेंगे। यह पढ़ाने का उनका कार्य एक ब्रह्म प्रचारकों को महायज्ञ के समय विशेष सम्मान के साथ उपाध्याय की पदवी से विभूषित किया जायगा।


कला और सामाजिक कल्याण

(श्री शचीकान्त शर्मा)

मनुष्य जो कार्य करता है इसके दो भेद हैं। एक काम किसी आवश्यकता पूर्ति के लिए अथवा जीवन निर्वाह के लिए अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। दूसरी तरह का काम हम आनन्द प्राप्त करने के लिए करते हैं। उदाहरण के लिए जब एक छात्र परीक्षा में शामिल होने के लिए पुस्तकों का अध्ययन करता है तो वह काम एक प्रयोजन अथवा आवश्यकता की दृष्टि से किया जाता है। पर वही छात्र परीक्षा दे लेने पर छुट्टियों के समय उपन्यास या कहानी की पुस्तकें पढ़ता हैं तो वह पढ़ना भार स्वरूप अथवा थकावट पैदा करने वाले परिश्रम की तरह न होकर चित्त को प्रसन्न करने का साधन होता है।

मनुष्य ने शिकार द्वारा भोजन प्राप्त करने के लिए धनुष-बाण का आविष्कार किया तब वह एक प्रयोजन ही था। पर जब फुरसत के समय वह उसके तरह-तरह के प्रयोग दिखलाकर इष्टमित्रों का मनोरंजन करने लगा तब उसने कला रूप धारण कर लिया। इस प्रकार यह कह सकना बड़ा कठिन है कि वास्तव में प्रयोजन की सीमा कहाँ तक है और कला कहाँ से मानी जा सकती है। इस सम्बन्ध से हम इतना ही कह सकते हैं कि अनेक बातों में प्रयोजन की पूर्ति के साथ ही आनन्द भी प्राप्त होता है। वास्तविक कला उसी समय आरम्भ होती है जब हम आवश्यकता का ध्यान न करके निष्प्रयोजन ही किसी प्रकार की रचना करने लगते हैं।

यहाँ यह प्रश्न स्वभाविक उत्पन्न होता है कि क्या कला के साथ प्रयोजन या आवश्यकता का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। इसके लिए हमको यह निश्चय करना पड़ता है कि किसी कलाकार की रचना के परिणामस्वरूप समाज प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ता है या किसी बुरे भाव को ग्रहण करके पतन के गर्त में गिरता हैं? इसमें सन्देह नहीं कि समाज के कल्याण के सामने और किसी प्रश्न का महत्व नहीं रह सकता। इसलिए कोई कलाकार कैसी भी कुशलता दिखाये अगर उसके द्वारा समाज कल्याण के पथ पर स्थिर नहीं रह सकता तो उस कला से हमारा कोई प्रयोजन नहीं हम उसे प्रोत्साहन नहीं दे सकते।


VigyapanSuchana

धूर्तों से सावधान

राजस्थान की अनेक शाखाओं से सूचना प्राप्त हुई है कि कुछ स्त्रियाँ तथा रंगीन कपड़े पहने हुए लोग गायत्री महायज्ञ मथुरा के लिए चन्दा इकट्ठा करते फिरते हैं। यह अपने को मथुरा का निवासी बताते हैं। दान-पेटी साथ रखते हैं जिन पर गायत्री महायज्ञ लिखा हुआ है।

सर्वसाधारण को सूचित किया जाता हैं कि तपोभूमि से कोई स्त्री-पुरुष कहीं भी चन्दा इकट्ठा करने नहीं भेजे गये, न ऐसा करने की तपोभूमि की कोई नीति ही है। ऐसे लोगों को धूर्त समझना चाहिए और उन्हें तुरन्त पुलिस के सुपुर्द कर देना चाहिए।

इस प्रश्न का एक पहलू और है कि किस कलायुक्त रचना को हम श्रेष्ठ कहें और किसे इसके विपरीत समझें। इसका एकमात्र उत्तर यही हो सकता है कि वह अधिक से अधिक विभिन्न रुचि वाले, नीचे, ऊँचे तथा बहुत ऊँचे दर्जे के व्यक्तियों को आनन्द प्रदान कर सके। निकृष्ट कला थोड़े से ही व्यक्तियों को आनन्द दे सकती है। यह बात भी सत्य है कि रुचि भेद के अनुसार किसी को कुछ पसन्द आता है और किसी को कुछ। श्रेष्ठ कला विभिन्न रुचि वालों को समान नहीं तो कुछ कम-ज्यादा परिभाषा में तृप्ति ही देगी।


मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये!


मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये (Kavita)

ये ठीक बात है कही नहीं प्रचार के लिये।

मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये॥

परोपकार - हीन व्यक्ति भूमि - हेतु भार है,

किसी बड़े विचारवान का बड़ा विचार है-

“कि जो परोपकारलीन है तथा उदार है,

वही महान है, बड़ा वही सभी प्रकार है।”

बड़े बनो, बनो न किन्तु भूमि-भार के लिये।

मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये॥

परोपकार के लिये शरीर त्याग चाव से,

गये अनेक वीर पार सृष्टि के बहाव से,

नदी न पार हो सकी तो क्या लगाव नाव से,

हुआ सदैव सृष्टि का विकास प्रेम-भाव से।

दया, उदारता, सहानुभूति, प्यार के लिये।

मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये॥

अनेक आज भी विहीन ज्ञान के प्रकाश से,

अनेक वस्त्र-भूमि-हीन दीखते हताश से,

अनेक भूख से वित्रस्त हैं अनेक प्यास से,

उठो, इन्हें अभी करो विमुक्त काल-प्रास से।

बनो सदा समर्थ ज्ञान के प्रसार के लिये।

मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये॥

बुरा रहा न शत्रु का, न मित्र का भला रहा,

विकार हीन भाव से गृहस्थ को चला रहा,

परोपकार के लिये स्व-गात जो गला रहा,

कि यज्ञ-भाव से अखण्ड ज्योति जो जला रहा।

समस्त रिद्धि-सिद्धि हैं उसी उदास के लिये।

मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये॥

-रजेश

*समाप्त*