आत्मालोचन

(श्री जिज्ञासु)


आत्मालोचन (Kavita)

नारी का रति सा यौवन, नर शशि जैसा सुन्दर था। पल भर पीछे एक वृद्ध थी, झुका एक का सर था॥

उस दिन के धन-पति को देखा, भिक्षा पात्र सम्हाले। नीरव मरघट में सोते, देखे सिंहासन वाले॥

चलाचली का मेला था, यह गया और वह गया। सुख का स्वप्न देखने वाला लुढ़क पड़ा चिल्लाया।

जो कहते थे हम स्वामी हैं, धनी गुणी बलशाली। वे अर्थी पर लदे हुए थे, कर थे उनके खाली।

यह सब देखा देख रहा हूँ, फिर भी आंखें मीची। विष के फल जिन पर आते हैं, वही लतायें सींची॥

जान रहा हूँ जान, जान कर भी, अनजान बना हूँ। गंगा के तट पर रहता हूँ फिर भी कीच सना हूँ॥

देखो, मुझे देखने वालो, मैं कैसा बौराया। जाग रहा हूँ, पर सोने वाले का स्वाँग बनाया॥


आध्यात्मवाद और भौतिकवाद

(डॉ. रामचरण महेन्द्र पी. एच. डी.)

आध्यात्मिकता आस्तिकों का मत है जबकि भौतिकवाद नास्तिकों का झमेला है। आध्यात्मवाद संकल्पमयी सूक्ष्म सृष्टि से सम्बन्ध रखता है। यह चर्म चक्षुओं से नहीं दीखता, पर इसका प्रभाव स्थायी और व्यापक होता है। अध्यात्मवादी ईश्वर पर अखण्ड विश्वास करता है। दूसरी ओर भौतिकवादी उस वस्तु की ओर भागता है जो प्रत्यक्ष हो, नेत्रों से दीखती हो, जिससे तुरन्त लाभ हो सके। आज का युग” खूब कमाओ, आवश्यकताएं बढ़ाओ, मजा उड़ाओ” की भ्रान्त धारणा में लगा है और सुख को दुःखमय स्थानों में ढूंढ़ रहा है। उसकी सम्पत्ति बढ़ी है; अमेरिका जैसे देशों में अनन्त सम्पत्ति भरी पड़ी है। धन में सुख नहीं है, अतृप्ति है; मृगतृष्णा है। संसार में शक्ति की कमी नहीं, आराम और विलासिता की नाना वस्तुएं बन चुकी हैं, किन्तु इसमें तनिक भी शान्ति या तृप्ति नहीं।

जब तक कोई मनुष्य या राष्ट्र ईश्वर में विश्वास नहीं रखता, तब तक उसे कोई स्थायी विचार का आधार नहीं मिलता। आध्यात्म हमें एक दृढ़ आधार प्रदान करता है। आध्यात्मवादी जिस कार्य को हाथ में लेता है, वह दैवी शक्ति से स्वयं ही पूर्ण होता है। भौतिकवादी साँसारिक उद्योगों से कार्य पूर्ण करना चाहता है लेकिन ये कार्य पूरे होकर भी शान्ति नहीं देते। भौतिकवादी को तुच्छ लाभ दीखता है वह उसी में मर जाता है। उस बेचारे को इतनी दूरदर्शिता नहीं कि यह जान ले कि ये साँसारिक वस्तुएं एक क्षण में विलुप्त हो सकती हैं।

आज का युग क्यों असन्तुष्ट है? इसका कारण यह है कि उसके सोचने, समझने, रहने और टिके रहने का आधार अस्थायी और क्षणभंगुर है। यदि वह आध्यात्मवाद को अपना ले तो उसे शान्ति और सामर्थ्य मिल सकता है।

जिस व्यक्ति में दैवी सम्पदा के 26 लक्षण पाए जाते हों वह आध्यात्मिक व्यक्ति कहला सकता है। वे गुण हैं आस्तिकता, अभय, अन्तःकरण की शुद्धि, सत असत का विवेक (ज्ञान) दान, जितेन्द्रियता, यज्ञ, स्वाध्याय, स्वधर्म-पालन, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, अनिंदा, दया, अलोभ, नम्रता, लज्जा, अचंचलता, गंभीरता, तेज, क्षमा, धैर्य, शौच, अद्रोह, मान की इच्छा न होना। इन विभूतियों से पूर्ण व्यक्ति को मानव कहते हैं। वह सतोगुण प्रधान होता है।

इसके विपरीत भौतिकवादी व्यक्तियों के आसुरी गुण होते हैं। इन व्यक्तियों में दम्भ होता है। वे कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं। उनका पाखण्ड पग-पग पर हमारे सम्मुख आता है। दुःख है कि आज जो व्यक्ति अपने को आध्यात्मवादी कहते हैं, उनमें उपर्युक्त दैवी सम्पदा के गुण नहीं पाए जाते हैं। उनमें दर्प होता है। वे किसी के सामने सिर नहीं नवाते। अहंकार से परिपूर्ण रहते हैं। तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) के अनुसार अहंकार की भी तीन अवस्थाएं हो सकती हैं। यह सब अभिमान त्याज्य हैं। जिन व्यक्तियों में क्रोध, कठोरता और अज्ञान है आज के युग में इस प्रकार के व्यक्ति प्रायः पाये जाते हैं और वे ही अशान्ति के मूल कारण हैं।

आस्तिकता हमें ईश्वर पर श्रद्धा सिखाती है। हमें चाहिए कि ईश्वर को चार हाथ पाँवों वाला प्राणी न समझे। ईश्वर एक तत्व है, उसी प्रकार जैसे वायु एक तत्व है। वैज्ञानिकों ने वायु के अनेक उपभाग किये हैं ऑक्सीजन, नाइट्रोजन इत्यादि। इसके हर एक भाग को भी स्थूल रूप से वायु ही कहेंगे। इसी प्रकार एक तत्व जो सर्वत्र ओत-प्रोत है जो सब के भीतर है तथा जिसके भीतर सब कुछ है, वह परमेश्वर है। यह तत्व सर्वत्र है, सर्वत्र व्याप्त है। परमेश्वर हमारे ऋषि-मुनियों की सबसे बड़ी खोज है। इस शक्ति के तीन रूप हैं 1-उत्पादन करने वाला 2-पोषण करने वाला 3-नाश करने वाला। भारतीय संस्कृति में ये तीन शक्तियाँ तीन नामों से प्रचलित हैं-ब्रह्म, विष्णु और महेश। ये तीनों प्रत्यक्ष हैं। कोई उन्हें अस्वीकार नहीं कर सकता।

आज हमें अध्यात्म की अतीव आवश्यकता है। विषयों की भोगेच्छा विषयों के भोग से कभी शान्त होने वाली नहीं है, प्रत्युत और भी बढ़ जाने वाली है। त्याग और संयम से ही मन शुद्ध होता है और बुद्धि ज्ञान से। जितेन्द्रिय पुरुष ही मोक्ष प्राप्त कर सकता है, विषयों में फंसा हुआ मनुष्य दुर्गति को प्राप्त होता है।

दूसरों के अनुशासन की अपेक्षा आत्मानुशासन का विशेष महत्व है। हमारी आत्म ध्वनि हमें सत्य के मार्ग की ओर प्रेरित कर सकती है। सत्य मार्ग से ही पृथ्वी स्थिर है, सत्य से ही रवि तप रहा है और सत्य से ही वायु बह रहा है। सत्य से ही सब स्थिर है। सत्य का ग्रहण और पाप का परित्याग करने को हमें सदैव प्रस्तुत रहना चाहिए।

मानव जीवन साँसारिक क्षणिक भोग विलास के लिए नहीं बना है। जीवन का एकमात्र कर्तव्य आत्मा का साक्षात्कार करना है।


मानव सभ्यता का आदि स्रोत-भारतवर्ष

(श्री रघुनन्दन जी शर्मा)

यद्यपि योरोप के अधिकाँश इतिहास लेखकों ने अपनी कल्पना के आधार पर आर्यों को मध्य एशिया का निवासी बतलाया है कि यह भी लिखा है कि वहीं से वे भारतवर्ष में आये। पर भारतीय विद्वान उनके इस कथन से सहमत नहीं, क्योंकि यहाँ के सबसे प्राचीन साहित्य वेदों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता जिससे आर्यों का बाहर से आना प्रकट हो। उनके मतानुसार आर्यों का मूल निवास स्थान हिमालय का प्रदेश ही है जो ऊंचा होने के कारण सबसे पहले मनुष्यों के रहने लायक हुआ था। सन्तान की वृद्धि के कारण वहीं से निकलकर उत्तरी भारत में आये और वहाँ से संसार के अन्य अनेक भागों में जा पहुँचें। आर्यों के विदेश गमन का एक और भी कारण था। जो लोग सामाजिक प्रथा के विरुद्ध कार्य करते थे अथवा जिनका आचार-विचार नीचतापूर्ण जान पड़ता था, उनको समाज से बहिष्कृत करके देश से निकाल दिया जाता था। वे लोग ही जीवन निर्वाह के साधनों की खोज करते हुए दूरवर्ती देशों में जा बसते थे।

भारत से पश्चिम की ओर सबसे प्रथम अफरीदी, काबुली और बलूचियों के देश आते हैं। इन सब में इस्लाम का प्रचार होने के पूर्व आर्य ही निवास करते थे। यही पर गाँधार था, जिसकी गाँधारी- राजा धृतराष्ट्र की रानी थी। गाँधार को इस समय कंधार कहते हैं। इसी के पास राजा गजसिंह का बसाया गजनी शहर अभी तक विद्यमान है। काबुल में जो पठान जाति रहती है वह प्रतिष्ठान (झांसी) की रहने वाली चन्द्रवंशी क्षत्री जाति है। झांसी से आकर पहले यह सरहर पर बसी और वहाँ इसने प्रजा-सत्तात्मक शासन पद्धति स्थापित की। प्रजा सत्तात्मक शासन पद्धति को उस समय गणराज्य कहते हैं। अफरीदी लोग उस समय के गण लोग ही हैं। रायबहादुर चिन्तामणि विनायक वैद्य ने अपने ‘महाभारत मीमाँसा’ नामक ग्रन्थ में लिखा है कि -गणान उत्सवसंकेतान् दत्यून पर्वत वासिनः। अजयन सप्त पाण्डवाः।

अर्थात् “पर्वत निवासी दस्युओं के सप्त गणों को पाण्डवों ने जीत लिया” इन्हीं गणों ने जरा आगे बढ़कर ‘उपगण’ या ‘अफगान’ राज्य स्थापित किया। इसी को इस समय ‘अफगान’ कहते हैं और उनके रहने का देश ‘अफगानिस्तान’ कहलाता है। इसी तरह बलूचिस्तान भी ‘बलोच्च स्थान’ शब्द का अपभ्रंश है। इसमें ‘केलात’ नामक नगर अब तक विद्यमान है। यह ‘केलात’ तब का है जब ‘किरात’ नाम पतित आर्य क्षत्री यहाँ आकर बसे थे। मनुस्मृति में जहाँ अन्य पतित क्षत्रियों के नाम गिनाते हैं वहाँ “किराताः” यवनाः शकाः कहकर किरात भी गिनाये हैं। ये ही किरात नेपाल और भूटान में जाकर मंगोलियन जाति के मूल पुरुष भी बने हैं।

अफगानिस्तान के आगे दर्शन है, जिसको ‘पारग्य देश’ भी कहते हैं। यहाँ पहले वह जाति आबाद थी, जो आजकल हिन्दुस्तान में पारसी के नाम से प्रसिद्ध है। यह जाति अति प्राचीन काल में ही कार्यों से जुदा होकर ईरान में आबाद हुई थी। मैक्समूलर कहते है “यह बात भौगोलिक प्रमाणों से सिद्ध है कि पारसी लोग फारस में आबाद होने से पहले भारत में आबाद थे। उत्तर भारत से जाकर ही पारसियों ने ईरान में उपनिवेश बसाया था। वे अपने साथ वहाँ की नदियों के नाम ले गये। उन्होंने ‘सरस्वती’ के स्थान पर ‘हरहवती’ और सरयू के स्थान पर ‘हरयू’ नाम रखा। वे अपने साथ शहरों के नाम भी ले गये। उन्होंने ‘भरत’ को ‘फरत’ किया और वही ‘फरत’ बाद में ‘यूफरत’ बन गया। ‘ईरान’ भी ‘आर्यन’ से बिगड़ कर बना है।”

ईरान के पास ही अरब है। वैदिक भाषा में ‘अर्वन’ घोड़े को कहते है। जिस प्रकार गाओं के बड़े चारागाह को ‘ब्रज’ और भेड़-बकरी वाले देश को ‘गाँधार’ कहते है, उसी तरह जहाँ अच्छी जाति अरबी घोड़ा सर्वोपरि समझा जाता है। उत्तम घोड़े उत्पन्न होने से ही आर्यों ने इस देश का नाम ‘अर्व’ रखा था। स्मृतियों के पढ़ने वाले जानते हैं कि आर्यों से उत्पन्न एक वर्गाकार जाति को ‘शैख’ कहते हैं। यह संकर जाति ‘ब्राह्मण’ के योग से उत्पन्न होती है। मालूम होता है कि वही ‘शैख’ जाति अरब में बसकर ‘शेख’ हो गई, क्योंकि ‘शेखों’ का अरब में वही मान है जो भारत में ब्राह्मणों का है। यह प्रसिद्ध बात है कि मुसलमान होने के पहिले वहाँ के निवासी अपने को ब्राह्मण ही कहते थे। अरब से ही रामानुज सम्प्रदाय का मूल प्रचारक ‘यवनाचार्य’ सम्भवतः 6 वीं शताब्दी में, भारत आया था। उस समय मद्रास प्रान्त में शूद्र जाति पर महान अत्याचार हो रहे थे। उसी समय अरब देश से यवनाचार्य वहाँ आये और उन्होंने शूद्रों के उद्धार में सहायता पहुँचाई। ‘एशियाटिक रिसर्चेस’ के भाग 10 में, बिलफोर्ड नामक विद्वान का एक लेख छपा है जिसमें लिखा है कि “यवनाचार्य का जन्म अरब देश के एक ब्राह्मण कुल में हुआ था और अलेक्जैंड्रिया के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में उन्होंने शिक्षा पाई थी।

अरब से आगे चलकर मेडिटेरेनियन समुद्र के किनारे मेसोपोटामिया का प्रदेश है। प्राचीन काल में इसके फिनीशिया, बैबिलोनिया, चाल्डिया, असीनिया आदि राज्य इतिहास में प्रसिद्ध हो चुके है और वे ही योरोपियन सभ्यता के आदि गुरु माने जाते हैं। इतिहासकारों ने भली प्रकार सिद्ध कर दिया है कि ‘फिनासिया’ को बसाने वाले आर्य जाति के ‘पणि’ नामक लोग थे, जो मूलतः वैश्य वर्ण के थे, पर बेईमान, ठग और धन लोलुप होने के कारण आर्य सम्प्रदाय से बहिष्कृत कर दिये गये थे। उत्तर भारत से चलकर दक्षिण में इन लोगों ने ‘पाण्डव’ राज्य की स्थापना की। ये लोग जहाज बनाने की कला में भी निपुण थे। उन्हीं जहाजों में बैठकर वे फिनीसिया गए उन्हीं के साथ मद्रासी ‘चोल’ जाति के लोग भी वहाँ पहुँचे और उन्होंने ‘चाल्डिया’ के राज्य के स्थापना की। वहाँ पहुँचकर भी वे बहुत समय तक भारतवर्ष से व्यापार करते रहे, जिससे उन प्रदेशों में आर्य सभ्यता का प्रसार होता गया।

लोकमान्य तिलक ने भी आर्यों के इस विदेश गमन की बात को सत्य बतलाया है और वेद के अनेक शब्दों का मिलान ‘चाल्डिया’ के वेद की भाषा से करके सिद्ध किया है कि वे दोनों एक दूसरे से मिलती-जुलती हैं। उदाहरण देखिये :-

(संस्कृत) (चाल्डियन) (अर्थ)

सिनीवाले सिबुब्बुलि अमावस्या

अप्सु अब्जु पानी

यहृ यहवे महान

ऋतु इतु मौसम

परसु पिलक्क शास्त्र

अलिगी-विलगी विलगी सर्प देव

तैमात तिआमत देवता

उरुगुला उरुगुल देवता

जूडिया, यहूदियों का देश है, इसी में हजरत मूसा और हजरत ईसा जैसे जगत्प्रसिद्ध धर्माचार्य उत्पन्न हुए। इनके सम्बन्ध में पोकाक नामक विद्वान ने ‘इण्डिया इन ग्रीस’ नामक पुस्तक में लिखा है कि ‘युडा (जुडा) जाति भारत की यदु अर्थात् यदुवंशीय क्षत्रिय जाति ही है।” कहा जाता है कि राजा सागर ने इनको’यवन’ बनाकर देश से निकाल दिया, तब ये जूडिया में जाकर बस गये।

असीरिया में भी आर्यों का ही निवास था। ए. बेरीडोल कीथ ने वहाँ के सुबरदत्त और सुबन्धि आदि राजाओं के नाम से सिद्ध किया है कि वे आर्य ही थे। इन देशों के निवासियों को आर्य लोग ‘असुर’ कहा करते थे। इसलिए वे भी अपने नाम के साथ ‘असुर’शब्द का प्रयोग करते थे। इतिहास प्रसिद्ध बादशाह ‘असरु नासिरपाल’ और ‘असुर वंशीलाल’ इस बात के उदाहरण हैं। इनके नाम असुर शब्द के साथ आर्य भाषा के ही हैं।

उत्तर एशिया

जैसा इस लेख में बतलाया जा चुका है किरात लोग आर्य जाति से पतित क्षत्रिय थे। उनका एक दल तो बलूचिस्तान में जाकर बसा और दूसरा हिमाचल की तरफ गया। आजकल भी नेपाल में जितने ब्राह्मण हैं वे सब कान्यकुँज वंश के माने जाते हैं और जितने क्षत्रिय हैं वे सब अपने को सूर्यवंशी बतलाते हैं। कहा जाता है कि इनका सम्बन्ध उदयपुर के महाराणा से भी है किन्तु नेपाल में एक चपटे चेहरे वाली मंगोलियन जाति भी रहती है। यह जाति अति प्राचीन काल में आर्यों की ही एक शाखा थी। यह हजारों वर्ष पूर्व आर्य जाति से अलग होकर हिमालय के उत्तर की ओर वाली गहराई में जिसका नाम ‘चिना’ था बस गई, जिससे उसके आकार रंग भाषा आदि में बहुत अंतर आ गया। इन किरात और चीन जाति वालों के संयोग से ही मंगोलियन जाति की उत्पत्ति हुई है। यही नेपाल निवासी चपटे मुँह वाली जाति है। इस नवीन जाति का रंग बाल्मीकि रामायण में सुवर्ण का सा लिखा है ‘महाभारत मीमाँसा’ में भी प्रमाणित किया गया कि कौरवों व पाँडवों की गौर वर्ण स्त्रियों का रंग तप्त सुवर्ण सा था। इन बातों से मालूम होता है कि ये चपटे चेहरे तथा पीले रंगवाले मंगोलियन आर्य से भिन्न और किसी जाति के नहीं है।

नेपाल से आगे, हिमालय के नीचे रूसी तुर्किस्तान है। वहाँ बहुत पूर्वकाल से आर्यों का निवास रहा है। श्री उमेशचन्द्र विद्यारत्न ने ‘मानवेर आदि जन्मभूमि’ नामक ग्रन्थ में लिखा है कि रूसी तुर्किस्तान अलताई अथवा ‘इलावर्त’ पर आर्य जाति का निवास था। ‘वायु पुराण’ में लिखा है :-

वेद्यर्द्ध दक्षिणे त्रीणि त्रीणि वर्षाणि चोत्ररे। तयोर्मध्ये तु विज्ञेयं मेरुमध्यमिलावृतम॥ तत्र देवगणाः सर्वे गन्धर्वोरगराक्षसाः। शैल राज्ये प्रमोदन्ते शुभाश्चाप्सरसाँगनाः॥

अर्थात् “इलावृतवर्ष के दक्षिण में हरिवर्ष, किम्पुरवर्ष और भारतवर्ष हैं और उत्तर की ओर सम्यकवर्ष, हिरण्यवर्ष और उत्तरकुरुवर्ष है। इनके बीच में इलावृतवर्ष है। इस वर्णन से स्पष्ट है कि मंगोलिया में आर्य लोगों ने ही अपना उपनिवेश बसाया था।

इसी प्रकार इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि भारतीय आर्यों ने ही बर्मा, चीन, जापान, आस्ट्रेलिया आदि देशों और महाद्वीपों में जाकर मानवीय सभ्यता का आरम्भ किया। आस्ट्रेलिया के विषय में तो पुराणों में से विदित होता है कि पुलस्त्य ऋषि ने वहाँ के राजा तृणाबिन्दु की पुत्री से विवाह किया जिससे रावण आदि की उत्पत्ति हुई। एशिया ही नहीं अफ्रीका और योरोप के निवासी भी अपने को आर्यों का वंशज सिद्ध करते हैं। भारतवर्ष के किरात जो एशिया माइनर में जाकर ‘केलात’ बन गये थे, योरोप में पहुँचने पर ‘केल’ जाति के कहलाने लगे। इसी प्रकार मद्रास की ‘भूल’ जाति अफ्रीका में पहुँचकर ‘जूलू’ के नाम से पुकारी जाने लगी। इतिहासकार टेलर ने अपनी ‘ओरिजिन आफ आर्यन्स” नामक पुस्तक में लिखा है कि ‘योरोप निवासी अफ्रीका और मंगोल निवासियों के मिश्रण से उत्पन्न हुए हैं और एशिया की असल आर्य भाषा बोलते हैं।” इतना ही नहीं पिछले कुछ वर्षों की खोज से यहाँ तक सिद्ध कर दिया गया है कि दक्षिण अमरीका की प्राचीन जातियाँ ‘माया’ ‘इन्का’ इत्यादि के रीति-रिवाज और देवी देवता पूर्ण रूप से भारतवर्ष से मिलते-जुलते हैं।

इस समस्त विवेचन से हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मानवीय सभ्यता का आदि स्रोत भारतवर्ष ही है और समस्त संसार की मानव जातियाँ तथा सभ्यताएं उसी की शाखा-प्रशाखाएं हैं। यह बात दूसरी है कि प्रत्येक भूखण्ड के जलवायु ने उनकी सूरत शकल, रंग तथा भाषा में बहुत बड़ा अन्तर डाल दिया जो समय पाकर सर्वथा नवीन रूप में विकसित हो गया, पर खोज करने वाले विद्वानों को उसमें एकता के चिन्ह मिल ही जाते हैं। इस खोज का सबसे बड़ा आधार ‘भाषा’ ही है। जैसे पिता को संस्कृत में ‘पितृ’ कहते हैं तो फारसी में ‘पिदर’ और अंग्रेजी में ‘फादर’ कहते हैं। इसी प्रकार के और भी पचासों शब्द पाये जाते हैं। हजारों कोस के अन्तर पर बसने वाली और आचार-विचार, धर्म में सर्वथा पृथक जातियों की भाषा में यह एकता कहाँ से आई? इस प्रश्न का उत्तर विद्वानों ने केवल यही दिया है कि ये सब एक ही मूल की शाखाएं है। अब तक जितनी भी भाषाएं मिली हैं, उन सब में पुरानी वैदिक संस्कृत ही है और उसी से सब भाषाओं का निकलना सिद्ध होता है।


Quotation

सभ्यता एकान्तिक वस्तु नहीं है। उसका अर्थ हर जगह एक ही नहीं होता। पश्चिम की सभ्यता पूर्व की असभ्यता हो सकती है।

-महात्मा गाँधी

हमारे समाज की जैसी दशा है, उसमें कभी-कभी थोड़ा सा असभ्य हो जाना पड़ता है।

-थैकरे

मानव समाज में कोई न कोई धर्म होगा ही और वह मनुष्य के लिए अत्यन्त महत्व का होगा। वह इस दृष्टि से भारतवर्ष ही मानव सभ्यता का मूल स्रोत सिद्ध होता है। किसी व्यक्ति विशेष के लिए हो या किसी जाति के लिए।

-जूलियन हक्सले

जो मनुष्य अपने को तुच्छ समझता है, वह केवल अपना ही मूल्य नहीं घटाता, किन्तु समस्त जाति को अप्रतिष्ठित करता है। मनुष्य जहाँ महापुरुषों को देखता है वहीं उसे अपने बड़े होने का ज्ञान हो जाता है।

-रवीन्द्रनाथ टैगोर।


जीवन का उद्देश्य और उसकी प्राप्ति

(श्री जे. पी. सिंहल)

मानव जीवन का उद्देश्य क्या है इस सम्बन्ध में लोगों में प्रायः दो प्रकार के मत दिखलाई पड़ते हैं। एक श्रेणी के लोग कहते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी इच्छा सुख प्राप्ति की होती है इसलिये वही हमारे जीवन का उद्देश्य है। दूसरे लोग पवित्र और धर्मात्मा होना जीवन का आदर्श समझते हैं। बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि धर्म साधन भी सुख के उद्देश्य से किया जाता है। पर यह बात पूर्ण रूप से सत्य नहीं, अनेक लोग ऐसे हैं जो धर्म का पालन आदर्श समझ कर करते हैं और सुख आराम की इच्छा को जान बूझकर त्याग देते हैं। इससे उनके चरित्र में एक प्रकार की महानता और दृढ़ता का बोध होता है, उनमें मनुष्यत्व की मात्रा विशेष प्रतीत होती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी प्राणी सुख की इच्छा करते है। परन्तु पशु-पक्षियों से मनुष्य की कल्पना शक्ति बहुत विकसित है। जब तक कल्पना शक्ति विकसित नहीं थी तब तक मनुष्य का शरीर पाकर भी वह पशु के समान ही था परन्तु जैसे-जैसे कल्पना शक्ति बढ़ती गई, वैसे-वैसे मनुष्यत्व की भी वृद्धि होती चली गई है। संसार की अनेक सामग्री, बड़े-बड़े नगर इत्यादि सभी मनुष्य की कल्पना शक्ति के चमत्कार हैं।

परन्तु जिस प्रकार कल्पना शक्ति मनुष्य के सुख का साधन बन सकती है, उसी प्रकार अनेक दुःखों का कारण भी हो सकती है। प्रत्येक मनुष्य दूसरों को दुख देने के नये-नये साधन और विधियों की कल्पना कर सकता है और करता भी है। यदि पशु किसी पर क्रोधित होता है तो अपने स्वाभाविक ढंग से उस पर आक्रमण करता है परन्तु यदि मनुष्य किसी पर क्रोध करेगा तो उसे मारने और दुःख देने की नई-नई विधियाँ निकालेगा, छिपकर पीछे से मारेगा अथवा किसी प्रकार दारुण दुःख देगा। पहले जमाने में दोषी मनुष्यों और अपने विरोधियों को मारने की बड़ी-बड़ी क्रूर और अमानुषिक विधियाँ प्रचलित थीं, जैसे कि अनेक लोग गढ़वाकर, कुत्तों द्वारा या पत्थरों से मार-मार कर मार डाले जाते थे। गर्म तेल के कड़ाह में डाल देना या शेर आदि जानवरों से फड़वा डालना ही प्रचलित था और ऐसे भी मनुष्य थे, जो दूसरे लोगों को इन क्रूरतापूर्ण दण्डों द्वारा मरते देखकर हंसते थे और मनोरंजन करते थे।

मनुष्य कल्पना शक्ति की सहायता से केवल दूसरों को ही दुःख नहीं देता वरन् अपने लिये भी दुःख उत्पन्न कर लेता है। उदाहरणार्थ खाना खाने की साधारण क्रिया को ही लीजिए। पशु भूख लगने पर ही खाता है और उसी पदार्थ को जो उसके लिए स्वाभाविक होता है। परन्तु मनुष्य अनगिनत प्रकार के स्वादिष्ट पदार्थों की कल्पना करता रहता है। जब उसकी भूख शान्त हो गई तब भी किसी वस्तु के स्वाद की कल्पना करके मुख में पानी भर लाता है। और आवश्यकता से अधिक खाकर अजीर्ण रोग से ग्रसित हो जाता हैं। पशु अधिकतर निरोग रहते हैं और मनुष्य बहुधा रोगी होते है, इसका मुख्य कारण यह स्वादिष्ट भोजनों की लालसा ही है।

जिस प्रकार शरीर के रोग हैं उसी प्रकार मन के रोग भी हैं और वे मनुष्य की कल्पना से ही जन्म लेते हैं। जब मन में क्रोध होता है तो किसी से बदला लेने की इच्छा होती है। ईर्ष्या होती है तो मन अशान्त हो जाता है और मन दुखी रहता है। अनेक लोग दूसरों को झूठ-मूठ शत्रु अथवा प्रतियोगी समझ कर दुख पाते हैं। जिस मनुष्य ने अपने जीवन में अनेक अत्याचार किये हैं वह भी मरने के समय उनकी स्मृति से अत्यन्त दुःख को प्राप्त होता है। चुगलखोर के मन में एक प्रकार की खुजलाहट बनी रहती है जो उसके मन को सदैव अशान्त रखती है।

अस्तु मनुष्य की इस कल्पना शक्ति को नियन्त्रित करना अपने और दूसरों के हित के लिए अत्यन्त आवश्यक है। अधिकाँश मनुष्य अपने शरीर के लिए सुख चाहते हैं। उनकी कल्पना शक्ति सदैव नई-नई इच्छाओं की सृष्टि करती रहती है। उन इच्छाओं को पूरा करने के लिए नये-नये रास्ते निकालती रहती है। उन इच्छाओं को पूरा करने में दूसरों को दुःख होगा, इसकी उसे चिन्ता नहीं होती। यह सब उसकी स्वाभाविक क्रिया है। यदि इस क्रिया को अबाधित रूप से चलने दिया जाय तो मनुष्य अत्यन्त क्रूर, स्वार्थी, चालाक और धोखा देने वाला हो जाय। इस प्रकार वह अन्य मनुष्यों के लिए असीम दुखों का कारण हो सकता है।

अस्तु, अपने और पराये सुख के लिए यह अनिवार्य है कि हमारा मन शारीरिक सुख के लिए प्रयत्न करने में भी शाँत और सधा हुआ रहे। मन के सुखी होने से शरीर का सुख भी दुगुना हो जाता है। इस प्रकार कल्पना शक्ति को नियंत्रित करने और मन को शान्त और सधा हुआ रखने वाले गुण ही सद्गुण समझने चाहिएं। यह सब देशों, सब समयों और सब मनुष्यों के लिए आवश्यक हैं इसीलिए अपरिवर्तनशील हैं। जो लोग सुख की प्राप्ति को ही जीवन का उद्देश्य मानते हैं उनके लिए भी ये आवश्यक हैं और जो पवित्रता तथा महानता के इच्छुक हैं उनके लिए भी आवश्यक हैं। इन सद्गुणों द्वारा ही मनुष्य का मन कल्पना शक्ति के चक्कर में फंसने और पाशविकता से नीचे गिरने से बचा रहता है। मन की गति को इस प्रकार रोके रखने की शक्ति ही मनुष्य को महान बना सकती है। पशु का मन तो उसकी शक्तिहीनता के कारण रुका रहता है। परन्तु धार्मिक मनुष्य का मन अपनी सद् इच्छा द्वारा रुकता है और वह भी जब कि उसे कल्पना शक्ति जैसी प्रबल शक्ति को रोकना पड़ता है। यही उसकी महानता है। जो बिजली वस्तुओं को नष्ट करने की शक्ति रखती है, वहीं नियंत्रित होकर मनुष्य को सुख देने वाली हो जाती है। इसी प्रकार महान पुरुष की कल्पनाशक्ति किसी को दुःख देने के बदले संसार के हित में लग जाती है। ऐसे मनुष्य का मन सुख व शान्ति से भरा रहता है और दुष्कल्पना, अनुचित इच्छा, चिन्ता व मानसिक रोगों से पवित्र रहता है। इसलिये धार्मिक पुरुष पवित्र व महान होता है और सुखी भी।

यह भी स्पष्ट ही है कि जो सद्गुण मनुष्य के सच्चे सुख, मनुष्यत्व की महानता, पवित्रता आदि के कारण होते हैं वही समाज के सुख और मुक्ति के भी साधन होते हैं। झूठ बोलने वाले मनुष्य से समाज में सुख व शान्ति की वृद्धि नहीं होती। झूठा लोगों को धोखा देकर उनके धन का, उनके सुख का अपहरण करता है। इसलिये वह समाज में दुःख फैलाता है। उस पर समाज के लोग भरोसा नहीं कर सकते। समाज में जितने सत्यवादी लोग अधिक होंगे उतना ही समाज अधिक सुखी होगा, क्योंकि धोखे से अनिष्ट होने की सम्भावना न होगी। जो समाज के नियम होंगे उनके पालन करने का भरोसा सत्यवादी पर ही किया जा सकता है।

मुक्ति प्राप्त करने के लिए भी इन सद्गुणों का पालन आवश्यक है। वही जीवात्मा ईश्वर में लीन हो सकता है, अथवा ईश्वर के सम्मुख रह सकता है जिसने ईश्वर के समान गुणों का पालन करके पवित्रता प्राप्त कर ली हो। सत्य के पालन से ही पवित्रता और दिव्यता प्राप्त होगी जो मुक्ति का अधिकारी बना दे। इस दृष्टि से जीवनोद्देश्य चाहे सुख प्राप्त करना समझा जाय, चाहे मुक्ति प्राप्त करना सबके लिए सद्गुणों और सदाचार का पालन अनिवार्य है।


आध्यात्मिक-जीवन का मर्म

(प्रो. अवधूत, गोरेगाँव)

आध्यात्मिक जीवन और भौतिक जीवन में लोगों को बड़ा विरोध जान पड़ता है। हमारे देश के धार्मिक कहे जाने वाले व्यक्ति तो भौतिक संसार को माया के नाम से पुकारते हैं और उसे आत्मा के पतन का कारण मानते हैं। इसी कारण उनमें से जो अपने मत के वास्तविक सच्चे होते हैं वे संसार को त्यागकर एकाकी जीवन व्यतीत करने लगते हैं।

पर यह दृष्टिकोण उचित नहीं है और न ऐसे एकाँगी जीवन को आध्यात्मिक जीवन कहा जा सकता है। ऐसा जबर्दस्ती का त्याग आत्मा को उन्नत नहीं बनाता और परीक्षा के समय प्रायः असफल सिद्ध होता है। वास्तविक आध्यात्मिक जीवन उसी को कहते हैं जिसमें कर्मयोग की शिक्षा के अनुसार भौतिक तथा आध्यात्मिक पहलुओं में यथोचित सामंजस्य स्थापित कर लिया जाता है। ऐसे जीवन में आत्मिक चेतना भौतिक पदार्थों से अवरुद्ध नहीं हो जाती किन्तु साथ ही जीवन के दैनिक कर्मों से दूर रहने की भी आवश्यकता नहीं होती।

इससे यह अर्थ भी समझना उचित न होगा कि हमारे जीवन में आध्यात्मिक और भौतिक पहलुओं का समान महत्व रहे। जीवन के मुख्य लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भौतिक पदार्थों की अपेक्षा आत्मा को श्रेष्ठ मानना और प्रधान महत्व देना अनिवार्य है। आशय यह है कि भौतिक वस्तुओं को साध्य न मानकर साधन मात्र मानना चाहिए। भौतिक वस्तुओं का उपयोग आत्म व्यंजन के लिए होना चाहिए। जिस प्रकार एक बाजा तभी तक उपयोगी है जब तक गाने वाले के संगीत में सहायक होता है, यदि वह किसी प्रकार खराब होकर संगीत में योग न दे सके तो एक बेकार या भार स्वरूप ही हो जाता है। इसी प्रकार जब तक भौतिक पदार्थ आत्मिक जीवन प्रवाह को प्रकट करने में सहायक होते हैं तब तक वे उपयोगी हैं, पर जब ये उस जीवन प्रवाह को अवरुद्ध करने लग जाते हैं तब वे एक बाधक बन जाते हैं।

साँसारिक वासनाओं अथवा लिप्साओं में फंसा हुआ मनुष्य भौतिक जगत को ही सर्वप्रधान मानने लगता है। शराबी के लिए शराब ही सार वस्तु है। लोभी मनुष्य के लिए सोने, चाँदी से बढ़कर और कोई चीज नहीं। विषयी मनुष्य के लिए इन्द्रिय सुख ही जीवन का चरम लक्ष्य है। ऐसी परिस्थितियों में भौतिक वस्तु आत्मा पर अधिकार जमाकर अनधिकार चेष्टा करती है। यह अवस्था मनुष्य के लिए पतनकारी है और परिणाम-स्वरूप उसे कष्ट भोगना पड़ता है। पर इस कारण भौतिक जगत का त्याग करना अभीष्ट नहीं है केवल इतना ही आवश्यक नहीं है कि भौतिक जीवन आत्मा के अधिकार को अंगीकृत करे और उन्हें प्रकट करें।

जब आत्मा और वस्तु जगत के बीच सच्ची व्यवस्था की स्थापना हो जाती है जब जीवन के सभी विभागों का उपयोग आत्मा की दिव्यता की अभिव्यक्ति के लिए किया जाता है। प्रतिदिन के जीवन तथा उसकी उलझनों से मुँह मोड़ने और भागने की आवश्यकता नहीं रह जाती। उस समय भौतिक पदार्थ आत्मा के आज्ञानुवर्ती हो जाते हैं और आत्मा से उनका जैसा सम्बन्ध होता है वैसा ही उनका मूल्य आँका जाता है। वे स्वयं न तो भले होते है न बुरे। जब वे आत्मा की अभिव्यक्ति में सहायक होते हैं तो वे भले हैं और जब बाधक होते हैं तो बुरे हैं। योद्धा को संग्राम में लड़ने के लिए घोड़े की आवश्यकता होती है। किन्तु यदि घोड़ा उसके इशारे पर न चले और चाहे जहाँ अड़ जाय तो वह उसके लिए एक रोड़ा सिद्ध होगा। इसी प्रकार यदि वस्तु जगत का आत्मा के वाहन के रूप में उपयोग किया जाय तो उससे आत्मा की शक्तियाँ प्रकट होती हैं और यदि वह आत्मा की अधीनता में रहना स्वीकार न करे तो वह विघ्न स्वरूप बन जाता है। जब मानव शरीर आध्यात्मिक उद्देश्य की सिद्धि में सहायक होता है तब उसे पृथ्वी पर स्थित ईश्वर मन्दिर कहना अनुचित न होगा।

जिस प्रकार आत्मा की अभिव्यक्ति के लिए भौतिक शरीर तथा अन्य वस्तुओं का उपयोग हो सकता है उसी प्रकार संसार की कलापूर्ण वस्तुएं वैज्ञानिक आविष्कार और राजनैतिक सफलताएं भी आध्यात्मिक जीवन में सहायक हो सकती हैं। यह सच है कि वर्तमान समय में कला का प्रयोग अधिकाँश में भोग विलास के लिए जा किया रहा है, वैज्ञानिक आविष्कार मनुष्यों को निर्बल बनाने और नाशकारी युद्धों की वृद्धि करने के काम लाये जा रहे हैं और राजनैतिक सफलताओं का उपयोग अन्तर्राष्ट्रीय अशाँति उत्पन्न करने तथा अपने से भिन्न मनुष्य समुदायों को पराधीन बनाने के निमित्त किया जा सकता है। पर ये सब बातें मनुष्यों की भूल, गलत कार्य प्रणाली के परिणाम हैं। अगर हम सब अपना दृष्टिकोण बदल दें तो ये ही सब बातें पवित्रता आनन्द और ज्ञान के उद्गम स्थल बनाये जा सकते हैं।

आध्यात्मिक ज्ञान आत्मा के जीवन को पूर्णता देने वाला है। आध्यात्मिक ज्ञान तथा साँसारिक बुद्धिमता में पर्याप्त भिन्नता है। साँसारिक बुद्धिमता ही रूढ़ियों का सार है। संसार की आचार विधियों को आँख मूँद कर स्वीकार करने में आध्यात्मिकता की शोभा नहीं है, क्योंकि अधिकाँश अवस्थाओं में साँसारिक आचार विधियाँ संसार में आसक्त मनुष्यों के कार्यों का परिणाम हुआ करती हैं। अतः रूढ़ियों के अंधानुकरण से विवेकयुक्त कार्य नहीं हो सकते और न ही उनका प्रयोग आध्यात्मिकता को बढ़ा सकता है। वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप और मूल्य का ठीक ज्ञान तथा उपयोगिता ही आध्यात्मिक जीवन है।


प्राचीन भारत का सामाजिक जीवन

(श्री बलदेव उपाध्याय)

भारतवर्ष के इतिहास में वैदिककाल आदर्श माना गया है। उस समय एकमात्र भारत ही सभ्यता और संस्कृति में अग्रणी था और यहीं से संसार के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की विद्याओं और ज्ञान का प्रकाश फैला था। हमारे ये वैदिक कालीन पूर्वज, जिन्होंने संसार को सभ्यता का पाठ पढ़ाया, कैसे जीवन यापन करते थे और उनका रहन-सहन कैसा था, यह निस्संदेह एक ज्ञातव्य विषय है। संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में उस समय के सामाजिक और गृहस्थ जीवन की जो झलक मिलती है उसका साराँश नीच दिया जाता है।

वेदकालीन समाज ‘पितृमूलक’ समाज था। पिता ही प्रत्येक घर का नेता तथा पुरस्कर्ता था। पुत्र तथा पुत्री, वधू तथा स्त्री सब लोग उसी की छत्रछाया में अपना जीवन बिताते थे। उस समय केवल पुत्रों को ही शिक्षा नहीं दी जाती थी, वरन् स्त्रियों को भी स्त्रियोचित कलाओं की शिक्षा देकर योग्य गृहिणी बनाया जाता था। उनमें से अधिकाँश तो विवाह होकर गृहस्थी का कार्य करने लगती थी पर कितनी ही आजन्म ब्रह्मचारिणी (या ब्रह्मवादिनी) बनकर विद्या तथा आध्यात्म की उपासना में अपना जीवन यापन करती थी।

ऋग्वेद के युग में वर्ण व्यवस्था चाहे वर्तमान रूप की तरह न पाई जाती हो, पर ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य, तीनों वर्णों का कार्य विभाजित हो गया था और अधिकतर लोग इन कामों को वंशानुक्रम से करने लग गये थे। इस युग में विवाह प्रथा भी सुव्यवस्थित रूप में प्रचलित हो गई थी। वैदिक आर्य प्रायः शत्रुओं के साथ लड़ते-भिड़ते रहते थे और इसलिए उनकी कामना सदैव वीर पुत्रों के लिए होती थी। विवाह के समय के मंत्रों में प्रार्थना की जाती थी कि ‘हे इन्द्र देव, इस स्त्री को दस पुत्र दो जिससे इसका पति ग्यारहवाँ होवे (दशास्या पुत्रानाधेहि पतिमेकादशे कृधि ऋ. 10-85-85) बहुत से लोगों की यह धारणा है कि वेद के युग में कन्या अपने पति का वरण स्वयं कर लेती थी और उसके माता-पिता का इस कार्य में कोई नियन्त्रण नहीं रहता था। पर वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है। स्वयं वरण का प्रसंग वेद में आता है परन्तु वह विशेष रूप से क्षत्रिय कन्याओं के लिए ही होता था। ऋग्वेद में उस पिता की प्रसन्नता का वर्णन किया गया है जो अपनी पुत्री के लिए वर का प्रबन्ध करके अपने मन में सुखी होता है। शतपथ ब्राह्मण में सुकन्या का आख्यान है जिसने कहा था कि मेरे माता-पिता ने मुझे जिस पति के हवाले किया है उसे मैं जीतेजी नहीं छोड़ूंगी। राजा रथवीति के आख्यान से भी इसी बात की पुष्टि होती है। राजा से श्यावाश्व ऋषि ने उसकी कन्या से विवाह का प्रस्ताव किया। राजा ने अपनी विदुषी रानी शशीयसी की सम्मति से ऋषित्व प्राप्त कर लेने पर ही श्वाश्व के साथ अपनी पुत्री का पाणिग्रहण कराया।

विवाह सदा युवक और युवती का हुआ करता था, बाल विवाह का संकेत कहीं भी नहीं मिलता। ऋग्वेद के अनुसार वधू को आशीर्वाद दिया जाता था कि वह श्वसुर, सास, देवर के ऊपर साम्राज्ञी होकर रहे। दुहिता, पत्नी और माता के रूप में वह सर्वथा सम्मान भाजन थी। ‘गृहिणी गुहमुर्च्यत’ अर्थात् स्त्री ही घर है। वह सहधर्मिणी मानी जाती थी, और उसके बिना पुरुष को यज्ञ करने का अधिकार नहीं था। ऋग्वेद के ऋषियों ने बार-बार पत्नी के गुणों, पति प्रेम तथा दैनिक परिचर्या की प्रशंसा की है। वह गृहलक्ष्मी मानी जाती थी और महत्व के अवसरों पर उसकी सम्मति अवश्य ली जाती थी। उनको शिक्षा भी पर्याप्त दी जाती थी और उसी का यह परिणाम है कि ऋग्वेद के अनेक मंत्रों को प्रकट करने वाली महिला ऋषि थी। आर्य नारियों में नैतिकता पूर्ण रूप से विद्यमान थी। वे उत्तम आचरण तथा सदाचार के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध थीं। उस समय की समाज का प्रधान देवता इन्द्र स्वयं धर्म से उत्पन्न और धर्म का रक्षक माना जाता था। इससे ऋग्वेद कालीन समाज में सर्वत्र धर्म का आदर था और स्त्रियों में उसकी विशेषता थी।

वैदिक कालीन समाज विशेषतः गांवों में निवास करता था पर नगरों का भी आस्तित्व उस समय था। खास कर शत्रुओं से आत्म रक्षा के लिए बड़े-बड़े किले बनाये जाते थे और उनमें पर्याप्त संख्या में मनुष्यों का निवास होने से वे स्वयं ही नगर बन जाते थे। इनमें से अनेक किले बहुत बड़े होते थे और पत्थरों की मजबूती दीवाल से घिरे रहते थे। लोहे के बने किलों (अश्वमन्मषी) का भी जिक्र कई जगह आता है जिनको इन्द्र ने नष्ट किया था। आर्यों के शत्रु दस्यु या दास भी बड़े-बड़े किले बनाते थे। जिनको आर्य आक्रमण करके ध्वस्त किया करते थे। एक जगह प्रतापी दास राजा शम्बर के 60 किलों के इन्द्र द्वारा नष्ट किये जाने का वर्णन है। पिछली संहिताओं में किलों का घेरा डालने और आग लगा देने की भी घटनाएं मिलती हैं।

लोगों के रहने के घरों के बनाने के लिए बाँस मिट्टी लकड़ी पत्थर और पकी हुई ईंट प्रधान सामग्री थी। मकानों में लकड़ी के खम्भे प्रायः लगाये जाते थे। वैदिक काल में राजमहलों में हजार खम्भे तक होते थे। घर में प्रायः चार भाग होते थे (1) अग्निशाला (2) हविर्धान (भंडार-ग्रह) (3) पत्नी नाँसदन (अन्तः पुर) (4) सदस (बैठक या दालना) जहाँ पुरुष इकट्ठे होकर बैठते या बातचीत करते थे। इनके सिवाय पशुओं के रहने के स्थान भी अलग होते थे जिनको शाला या मोत्र कहते थे। साधारण लोग सोने बैठने के लिए तरह-तरह की चटाइयाँ बनाकर काम में लाते थे। विवाह के अवसर पर तल्प (पलंग) काम में लाये जाते थे। विवाह से आते समय थक जाने पर स्त्रियाँ ब्रहा (पालकी) में बैठती थी। तरह-तरह की सामग्री रखने के लिए मिट्टी और धातु के कलश, लकड़ी के बने ‘द्रोण’ और चर्म के बने ‘इति’ का प्रयोग प्रत्येक घर में होता था। धनवानों और राजाओं के यहाँ सोने चाँदी के चमक (प्याले) काम में लाये जाते थे। भोजन पकाने के लिए स्थाली (बटलोई) काम में लाई जाती थी। सूप और चलनी का भी व्यवहार किया जाता था। धातु या मिट्टी के बर्तनों में सोने और चाँदी के सिक्के भर कर रखे जाते थे और सुरक्षा के लिए उनको जमीन के नीचे गाड़ा भी जाता था। वैदिक घरों में पूरी तरह से सादगी का भाव था और सुख के साधनों की भी कमी न थी।

भोजन सीधा-सादा स्वास्थ्यवर्द्धक तथा सात्विक होता था और उसमें दूध, घी की प्रचुरता रहती थी। ऋग्वेद के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि भारतवासियों का सब से प्रधान भोजन जौ की रोटी और चावल का भात था। आजकल तर्पण, होम आदि धार्मिक कृत्यों में जौ, चावल और तिल का ही प्रयोग किया जाता है, इससे भी इनकी प्राचीनता सिद्ध होती है। दूध और चावल को साथ पकाकर ‘क्षीरोदन’ (खीर) बनाई जाती थी। जब दही डालकर चावल पकाया जाता था तो उसे ‘दध्योदन’ कहते थे। मूँग की खिचड़ी (मुद्गौदन) उस युग में भी हितकर समझी जाती थी। गेहूँ का नाम बाद के ग्रन्थों में मिलता है ऐसा जान पड़ता है कि वैदिक काल में सप्त सिन्धु प्रदेश अब से बहुत अधिक ठण्डा था, जिससे वहाँ गेहूँ उत्पन्न नहीं होता था। जौ को आग में भूनकर सत्तू (सक्तू) बनाया जाता था, जिसे उस समय प्रायः दूध में मिला कर पीते थे।

वैदिक युग का प्रधान पेय सोमरस था, जिसे वे अपने देवता को अर्पित कर स्वयं भी पीते थे। यज्ञों के अवसर पर सोम रस बनाना और उसे भिन्न-भिन्न देवताओं को समर्पण करना एक विशेष महत्व की क्रिया थी। सोम पर्वतों पर विशेषतः मजबूत पर्वत पर उगता था। वहाँ से यह लाया जाता था और पत्थरों (ग्रावा) से कूटकर इसका रस निकाला जाता था। कभी-कभी इस कार्य में ओखली और मूसल का प्रयोग भी किया जाता था। तब पानी मिलाकर उसे कपड़े से छाना जाता था। सोम रस का रंग (भूरा) और कुछ लाल (अरुण) बतलाया गया है। इसके पीने से शरीर भर में विचित्र उत्साह आ जाता है और मन में एक प्रकार की मोहक मस्ती छा जाती थी, तो भी यह पदार्थ सुरा (मद्य) से भिन्न था, क्योंकि जहाँ सोम रस की प्रशंसा से वैदिक साहित्य भरा हुआ है, सुरा या मद्य की कई स्थानों में बड़ी निन्दा की गई है और उसे मन्यु (क्रोध), विभीदिक (जुआ) और अचिति (अज्ञान) के समान व्यक्ति और समाज के लिए अहितकारी माना गया है।

उपयुक्त विवरण से स्पष्ट जान पड़ता है कि तत्कालीन भारतीयों का जीवन बिल्कुल सीधा-सादा और प्रकृति के अनुकूल था। वे कृत्रिमता से दूर रहते थे और आध्यात्मिकता ही उनका आभूषण था। इसीलिए वे ऐसी धार्मिक और आध्यात्मिक रचनायें कर सके जो आज तक लोगों की मार्गदर्शक होकर सबके लिए कल्याणकारी सिद्ध हो रही हैं।


भारत के तीन वैष्णव सम्प्रदाय

(श्री शिवशंकर मिश्र)

वैष्णव सम्प्रदाय की सर्वप्रधान शाखा जिसका प्रचार उत्तर और दक्षिण के एक बड़े भू-भाग में पाया जाता है। रामानुजाचार्य द्वारा स्थापित विशिष्टाद्वैत सम्प्रदाय है। उसके अतिरिक्त तीन वैष्णव सम्प्रदाय और हैं- मध्वाचारी, निम्बार्क और पुष्टिमार्गी या शुद्धाद्वैत।

मध्वाचारी सम्प्रदाय-इसके संस्थापक मध्वाचार्य का जन्म दक्षिण भारत के तूलव नामक स्थान में सन् 1239 में हुआ था। उन्होंने छोटी अवस्था में ही वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करके संन्यास की दीक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने रामानुज तथा शंकर प्रभृति धर्माचार्यों के सिद्धान्तों का मनन किया, पर दोनों में से उन्हें कोई ठीक न जान पड़ा। तब उन्होंने संन्यास त्याग दिया और अपना एक नवीन सम्प्रदाय स्थापित किया जिसे ब्रह्मा सम्प्रदाय या पूर्ण यज्ञ के नाम से भी पुकारते हैं। इसमें विष्णु को जगत का नियन्ता बतलाया गया है। समस्त सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न हुई है ओर वे ही जीवों को उनके शुभाशुभ कर्मों का फल देते हैं। परमात्मा तथा जीवात्मा दोनों अनादि हैं, किन्तु दोनों एक नहीं है। इन दोनों में मुख्य अन्तर यह है कि परमात्मा स्वतंत्र और जीवात्मा परतन्त्र है। विष्णु निर्दोष और सद्गुणों स्वरूप है। जीव उनकी समता नहीं कर सकता। जीवात्मा, परमात्मा में लय नहीं होता किन्तु विष्णु के प्रति प्रेम होने से उनकी भक्ति द्वारा वह पुनर्जन्म से छूटकर मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

मध्याचार्य ने प्रारम्भ में तीन शालिग्राम मूर्तियाँ प्राप्त कर उनका सुब्रहागण, उडीपी और मध्यतल नामक मठों में स्थापित किया। बाद में एक कृष्ण मूर्ति भी उडीपी में प्रतिष्ठित की। उन्होंने उडीपी में कई वर्ष तक निवास करके सूत्र भाष्य, ऋग भाष्य, दशोपनिषद भाष्य, भारत तात्पर्य निर्णय, भागवत तात्पर्य, गीता तात्पर्य, कृष्णामत महार्गाव आदि 37 ग्रन्थों की रचना की। इसके बाद उन्होंने दिग्विजय के लिए यात्रा की और जैन तथा अन्य सम्प्रदायों का खण्डन करके अपने मत का प्रचार किया। मध्वाचार्य वास्तव में एक बड़े विद्वान और प्रसिद्ध दार्शनिक थे।

इस सम्प्रदाय के त्यागी आचार्य दण्डी संन्यासियों की भाँति गेरुआ वस्त्र पहनते हैं दण्ड कमण्डल रखते हैं, सिर मुँड़ाते हैं और यज्ञोपवीत छोड़ देते है। उनके लिए क्रमशः सभी आश्रमों का पालन करना आवश्यक नहीं है इच्छा हो तो वे बाल्यावस्था में ही संन्यास ग्रहण कर सकते हैं। मध्याचारियों के उपासना के तीन अंग होते हैं। अंगन, नामकरण और भजन। वे लोग शंख, चक्र आदि की गर्म मुद्राओं से अपना शरीर दाग देते हैं। यही अंकन कहलाता है। अपनी संतानों का नाम विष्णु पर्यायवाची शब्दों पर रखना नामकरण कहा जाता है। भजन का अर्थ कायिक, वाचिक और मानसिक विविध भजनों का अनुष्ठान करना होता है।

निम्बार्क सम्प्रदाय इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक भास्कराचार्य नामक प्रसिद्ध ज्योतिषी थे। इनका जन्म निजाम हैदराबाद राज्य के बेदर नामक स्थान के निकट 1036 शकाब्द में हुआ था। उनके पिता महेश्वर भट्ट भी 03 वेदों के ज्ञाता और बाल्यावस्था से ही महान बुद्धिमान और प्रतिभाशाली थे। पिता के निकट ज्योतिष तथा अन्य शास्त्रों का अध्ययन करके उनका पाँडित्य अगाध हो गया। उन्होंने छोटी अवस्था में ही सिद्धान्त शिरोमणि तथा लीलावती आदि ग्रन्थों की रचना की जो आज तक प्रसिद्ध है।

उन दिनों दक्षिण भारत में जैन धर्म की प्रबलता थी। भास्कराचार्य ने उनका खण्डन कर वैष्णव सम्प्रदाय का प्रचार किया। उन्होंने देवालयों में राधाकृष्ण की मूर्तियाँ स्थापित करके उनकी पूजा का उपदेश किया। संन्यास ग्रहण करने के बाद वे वृन्दावन में आकर रहने लगे और उत्तर भारत में भी अपने सम्प्रदाय का प्रचार किया। उन्होंने संस्कृत में अनेक धर्म ग्रन्थ लिखे तथा कहते हैं कि वेदों का भाष्य भी किया। पर इस समय उनका लिखा एक भी साम्प्रदायिक ग्रन्थ प्राप्त नहीं है। उनके अनुयायियों का कहना है कि जिस समय औरंगजेब ने मथुरा को नष्ट किया था उसी अवसर पर वे सब जला डाले गये।

भास्कराचार्य के अनुयायी उनको सूर्य का अवतार मानते हैं और कहते हैं कि जैन, बौद्ध आदि वेद विरुद्ध मतों को निर्धारित करने के लिए उनका अवतार हुआ था। भक्त माल में उनके सम्बन्ध में एक अलौकिक कथा लिखी है। कहते हैं कि एक दिन कोई जैन साधु उनके पास आये और जैन धर्म के सिद्धान्तों पर बातचीत करने लगे। विचार करते करते जब शाम को गई तो भास्कराचार्य उठे और अपने आश्रम से कुछ खाद्य सामग्री उस अभ्यागत के लिए ले आये। पर जैन धर्म वाले रात्रि में भोजन नहीं करते- इससे उस अभ्यागत ने सूर्यास्त होता देख भोजन करने से इनकार कर दिया। इस पर भास्कराचार्य ने सूर्य भगवान से कुछ देर ठहरने की प्रार्थना की। कहते हैं कि जब तक वह अतिथि भोजन करता रहा जब तक सूर्य का प्रकाश सामने ही लगे हुए एक नीम के पेड़ पर दिखाई पड़ता रहा। उसी दिन से भास्कराचार्य, निम्बार्क अथवा निम्बादित्य कहलाये और उनका सम्प्रदाय भी उसी नाम से प्रसिद्ध हुआ। आजकल इस सम्प्रदाय के अनुयायियों की संख्या अधिक नहीं है तो भी भारत के पश्चिम तथा दक्षिण प्रांतों के सिवाय वे मथुरा के आस-पास तथा बंगाल में पाये जाते हैं। इनकी प्रधान गद्दी मथुरा के पास ध्रुव क्षेत्र में है।

शुद्धादैत अथवा बल्लभ सम्प्रदाय के संस्थापक महात्मा बल्लभाचार्य अन्य वैष्णव आचार्यों की तरह दक्षिण भारत के निवासी थे। पर जब उनके पिता श्री लक्ष्मण भट्ट कुटुम्ब सहित तीर्थाटन करते हुए बनारस पहुँचे तो वहाँ हिन्दू मुसलमानों से उपद्रव हो गया। अपनी रक्षा के लिए लक्ष्मण भट्ट सपरिवार चम्पारन चले गये और वहीं संवत् 1535 के बैशाख में वल्लभचार्य का जन्म हुआ। पाँच वर्ष की आयु में ही उनका उपनयन संस्कार कर दिया गया और वे नारायण भट्ट नामक विद्वान पण्डित के पास विद्याध्ययन के लिए भेज दिये गये। वहाँ उन्होंने वेद, न्याय और पुराण आदि ग्रन्थों की शिक्षा प्राप्त की।

ग्यारह वर्ष की अवस्था में उनके पिता का देहान्त हो गया। पर वे इससे विचलित नहीं हुए और काशी जाकर विद्याध्ययन करने लगे। इसके बाद वे अपनी माता से आज्ञा माँग कर तीर्थाटन को निकल पड़े। जिस समय वे दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में पहुँचे तो वहाँ रामानुज, मध्वाचार्य, निम्बार्क और विष्णुस्वामी- इन चारों वैष्णव सम्प्रदाय के विद्वानों का स्मार्त मत के पण्डितों से बहुत बड़ा शास्त्रार्थ हो रहा था। बल्लभचार्य भी वैष्णव पण्डितों में मिल गये और स्मार्तों को पराजित करने में उन्होंने बहुत बड़ा सहयोग दिया। उसी अवसर पर उनको वैष्णव धर्माचार्य नियुक्त किया गया और विष्णुस्वामी के मठ को जो बहुत समय से उच्छिन्न हो गया था, फिर से प्रतिष्ठित करने का अधिकार दिया गया।

बल्लभचार्य ने विष्णुस्वामी के परम्परागत धर्म सिद्धान्त में अपने भी कुछ सिद्धान्त सम्मिलित करके पुष्टिमार्ग या शुद्धाद्वैत संप्रदाय की स्थापना की और उसकी गद्दी गोकुल (मथुरा) में रक्खी। इससे पूर्व जन साधारण में उनके परिस्थितियों का नाम गोकुलिया गोसाई प्रसिद्ध हो गया।

बल्लभचार्य ने रामानुज, मध्यवार्य आदि अन्य वैष्णव धर्माचार्यों के मत को स्वीकार न करके अद्वैत मत का समर्थन किया। उन्होंने बतलाया कि यह सृष्टि दो प्रकार की है। जीवात्मक और जड़। हम विश्व में जो कुछ देखते हैं व चैतन्य है अथवा जड़ या इन दोनों का सम्मिश्रण। इन तीनों के द्वारा संसार में अनेक दृश्य दिखलाई देते हैं। पर इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि कोई वस्तु नष्ट हो जाती है। ब्रह्माण्ड में जो परमाणु हैं उनका नाश कभी नहीं होता। जिसे लोग नाश होना समझते हैं वह वास्तव में रूपांतर होता है। बल्लभाचार्य ने अपने सिद्धान्त के समर्थन के लिए वेद और उपनिषद् के प्रमाण दिये और वास्तव में उनका सिद्धान्त बहुत ऊंचे दर्जे का और ज्ञानमय है।

पर व्यवहार में उनका सम्प्रदाय बड़ा रसिक और मनोरंजक है। उन्होंने देखा कि धर्म के कठिन नियमों का पालन करते-करते लोग उनसे ऊब गये हैं और धर्म के नाम पर कष्ट उठाना नहीं चाहते। ऐसे संसारी और विषयासक्त लोगों की रुचि धर्म की तरफ लाने के लिए ही सम्भवतः उन्होंने अपने सम्प्रदाय के नियम बहुत सरल और आकर्षक रखे। उन्होंने लोगों को राधाकृष्ण की क्रीड़ा और प्रेमपूर्ण भक्ति का उपदेश दिया। उन्होंने कृष्ण का जो रूप महाभारत तथा भागवत में वर्णन किया गया है उसे प्रधानता न देकर ब्रह्म वैवर्त पुराण में वर्णित कृष्ण के रूप की उपासना बतलाई। उस पुराण में श्रीकृष्ण को पूर्ण ईश्वरत्व मानकर बताया है कि वे ही मायातीत, गुणातीत, निमय और सत्य हैं। वे पूर्ण जीवन सम्पन्न नाना रत्न विभूषित, पीताम्बरधारी और मुरलीधर रूप में सर्वदा गोलोक में निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त उस पुराण में श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का भी अद्भुत और अलौकिक वर्णन किया गया है। बल्लभचार्य जी ने श्रीकृष्ण के इसी रूप की पूजा करने का उपदेश दिया है।

बल्लभचार्य जी ने यह भी कहा है कि शरीर को अनावश्यक कष्ट देने से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती, किन्तु इस जीवन के आनन्दों को भोगते हुए ही उन आनन्दों द्वारा मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए। इसलिए उन्होंने साँसारिक सुख भोग किये और अपने सम्प्रदाय वालों को वैसा ही उपदेश दिया। उनके पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ भी काफी बुद्धिमान और विद्वान थे और उन्होंने अपने सम्प्रदाय का प्रचार बढ़ाकर लोगों को भक्ति का उपदेश देने के लिए अपने मन्दिरों में बाल कृष्ण और राधाकृष्ण की लीला दिखानी आरम्भ की, मन्दिरों की सुन्दरता को खूब बढ़ाया और उनमें गायन-वाद की व्यवस्था की। उनके मन्दिरों में उत्सव भी बहुत होते थे और प्रसाद बहुत अधिक तथा बढ़िया चढ़ाया जाता था। इन सब बातों से साधारण मनुष्य उनके सम्प्रदाय की तरफ काफी आकर्षित हुए और गुजरात, राजपूताना, मथुरा आदि में उनके बहुत से शिष्य हो गये।

इस सम्प्रदाय के आचार्य और शिष्य सभी गृहस्थ होते हैं। और गुरु को ईश्वर मानकर उन्हीं की सेवा करने को मोक्ष का साधन मानते हैं। ये लोग परस्पर में ‘जय श्रीकृष्ण’ ‘जय गोपाल’ आदि कहकर नमस्कार करते हैं। आचार्य लोग अपने शिष्यों को- ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘श्रीकृष्ण शरणं मम’ इन मंत्रों का उपदेश देते हैं और शिष्यगण प्रतिदिन माला पर इनका जप करते रहते हैं। ये सब त्याग की कोई आवश्यकता नहीं समझते, संसार के सभी कर्म श्रीकृष्ण को समर्पण करते जाओ, बस मोक्ष प्राप्त हो जायेगा।


आधुनिक अर्थशास्त्र अनर्थ का मूल है।

(एक तत्ववेत्ता)

आधुनिक समय में योरोप वालों ने जो सम्पत्ति शास्त्र रचा है और जिसका अनुसरण भारत में भी किया जा रहा है उसका साराँश यही है कि मनुष्य को खूब सम्पत्तिशाली होना चाहिए। खूब सम्पत्तिशाली होने का अर्थ है कि मनुष्य के घर में नागरिक जीवन बनाने वाला अर्थात् शृंगार और विलास का सामान व अधिक सामग्री ही सभ्यता का चिन्ह है, इसलिए इन सभ्यता बढ़ाने वाले पदार्थों का खूब संग्रह करने के लिए अधिक से अधिक धन इकट्ठा करना चाहिए। धन पाने का स्रोत व्यापार है, इसलिए व्यापार सम्बन्धी ऐसे पदार्थ तैयार करना चाहिए, जो अन्य देशों के बने सामानों से सस्ते और अच्छे हों। इनकी तैयारी के लिए कम्पनियों द्वारा बड़ी धनराशि इकट्ठी करके बहुत सा कच्चा माल खरीदना चाहिए और यन्त्रों द्वारा पक्का माल बनाना चाहिए। इस माल को अपने राज्य के दबदबे की सहायता से दूसरे देशों में जाकर बेचना चाहिए। वहाँ से कच्चा माल लाकर फिर अपने यहाँ उसका सस्ता पक्का माल बनाना चाहिए। यही वर्तमान व्यापार की सच्ची परिभाषा कही जाती है और यही सम्पत्ति शास्त्र का मूल आधार समझा जाता है।

व्यापार में राज्य की सहायता लेने के कारण प्रायः अन्य देश वालों से प्रतिद्वन्द्विता और युद्ध की संभावना उत्पन्न होती रहती है। तब इस बात का प्रयत्न किया जाता है कि जातीयता का भाव पैदा किया जाय और उन्हें दूसरे देश वालों से लड़ने को तैयार किया जाय। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अधिक से अधिक नाशकारी और दूर की मार करने वाले शस्त्रों का निर्माण किया जाता है। चूँकि देखने सुनने में लड़ाई की तैयारी कुछ असभ्यता की बात जान पड़ती है, इसलिये विज्ञान का सहारा लेकर यह बहाना किया जाता है कि ‘भाई! संसार में भोग करने वालों की संख्या अधिक है और भोग्य सामग्री कम है, साथ ही दुनिया की जनसंख्या बेहिसाब बढ़ रही है, इसलिये एक समय आ जायगा जब कि पृथ्वी पर पैर रखने को भी जगह न मिलेगी। इसलिए अपने देश की भलाई के लिए बहुत सी पृथ्वी पर कब्जा करके उसे अधिक से अधिक धन, सोना, चाँदी, हीरा, मोती और सब प्रकार की भोग्य सामग्री से भर लेना चाहिए और उसकी रक्षा के लिए अपनी सामरिक शक्ति को भी खूब-बढ़ाकर रखना चाहिए। इस प्रकार ये सम्पत्ति शास्त्र वाले जनता की लालसा और वासना को बढ़ाकर महायुद्धों का बीज बोते हैं, जिसका परिणाम समय आने पर अनिवार्य रूप से भीषण नाशलीला के रूप में प्रकट होता है।

सम्पत्ति शास्त्र वाले यह भी बतलाते हैं कि बहुत से लोगों से थोड़ा-थोड़ा सा धन इकट्ठा करके और सबको हानि-लाभ में साझीदार बनाकर व्यापार करने से अमित लाभ हो सकता है क्योंकि इस ढंग से एक तो बहुत बड़ी धनराशि (पूँजी) इकट्ठी हो जाती है जिसके द्वारा विशाल रूप में व्यापार किया जा सकता है। साथ ही दूसरे व्यापारियों का मुकाबला करने में अगर शुरू में कुछ घाटा भी उठाना पड़े तो वह बहुत से साझीदारों पर बंट जाता है, जिससे कम्पनी को धक्का नहीं लगता। थोड़े समय बाद अन्य व्यापारियों का काम बन्द हो जाता है और उन सब का लाभ कम्पनी को ही होने लगता है। इस प्रकार की कुटिल नीति से प्रेरित होकर कम्पनी का संगठन होता है तथा राज्य को बल और जातीयता का उत्तेजना देकर उसके कार्य को सफल बनाया जाता है। ऐसी कम्पनियाँ भोग विलास और शृंगार की वस्तुएं बनाकर दूसरे देश वालों के धन को अपने यहाँ खींच लाना ही अपना लक्ष्य रखती हैं।

आजकल धन का अर्थ सोना-चाँदी माना जाता है पर यह सोना-चाँदी स्वयं किसी काम में आता है-मानव जीवन में कभी-कभी औषधि के अतिरिक्त वह कोई-कोई काम भी देता है यह आज तक किसी ने नहीं बतलाया। प्रथम तो संसार में जितनी कीमत के पदार्थ हैं, उतनी कीमत का सोना-चाँदी संसार में है ही नहीं। फिर आजकल जितने बड़े लेन-देन होते हैं वे सब नोट, चेक, हुण्डी आदि के द्वारा न किये जाये, केवल सोना-चाँदी लेकर ही बेचा जाय, तो व्यापार एक भी दिन न चले। इसके सिवा जो आदमी सोना-चाँदी को मूल्यवान ही न समझता हों, उसके साथ तो इनके द्वारा लेन-देन हो ही नहीं सकता। अब भी ऐसे लोग लाखों की संख्या में वनों और जंगलों में मौजूद हैं जो सोने के एक टुकड़े के बदले आपको कोई खाने-पहनने की चीज नहीं दे सकते। जंगलियों की ही बात नहीं योरोपीय महायुद्ध में एक बार भोजन सामग्री कम पड़ जाने पर सर्बिया के सिपाहियों को भोजन के बदले सोने की गिन्नियाँ दी गई तो उन्होंने उनको फेंक दिया।

इस प्रकार सोना-चाँदी वास्तविक संपत्ति नहीं हैं, पर स्वार्थी व्यापारियों ने उनको अपनी सुविधा के लिए सब प्रकार के खरीदने-बेचने का माध्यम बना रखा है जिससे उनका निकम्मा बिना आवश्यकता का सामान लोग चमक-दमक पर मोहित होकर खरीद लें, इसके लिए आजकल जान-बूझकर जीवन के शृंगार और विलासमय बनाया जाता है तब और कामुकता का प्रचार किया जाता है। जहाँ देखो वहीं तरह-तरह की शराबों, सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू, चाय, सोड़ा लेमनेड आइसक्रीम की दुकानें, सिनेमा, वेश्याओं और जुए (सट्टे) की दुकानें, कामोद्दीपक तथा व्यभिचार को बढ़ाने वाले कपड़ों, यंत्रों और औषधियों की दुकानें सब की आँखों के सामने लगी हैं और हर तरह के भले-बुरे उपायों से खुले आम राह चलते लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच रही हैं। अण्डों और माँस के ढेर बिक रहे हैं। पर उनमें किसी को कोई दोष दिखलाई नहीं पड़ता। इस सब का कारण यही है कि आजकल शासन और व्यापार का उद्देश्य मनुष्य को श्रेष्ठ बनाना और उन्हें भूख से बचाना नहीं है, किन्तु सब को विलासी बनाकर संसार का सोना-चाँदी अपने पास जमा करना है और उसके बल से दूसरों को दबा कर गुलाम बनाना है।

इसके मुकाबले में जब हम अपने प्राचीन संपत्ति शास्त्र पर विचार करते हैं तो जमीन आसमान का अन्तर दिखाई पड़ता है। हमारे यहाँ पहले जो कुछ लेन-देन और व्यापार होता था वह एक पदार्थ के बदले दूसरे पदार्थ को देकर ही किया जाता था। इस सम्बन्ध में सुप्रसिद्ध विद्वान प्रो. राधा कमल मुकर्जी लिखते हैं कि ‘यहाँ के गाँवों का काम अब भी प्रायः गाँवों के भीतर ही चल जाता है। ग्राम अपने आप एक आर्थिक संघ हैं। गाँवों के किसान वहाँ रहने वालों के लिए आवश्यक सब प्रकार के खाद्य पदार्थ उत्पन्न करते हैं। लोहार हलों के लिए फाल तथा अन्य कृषि और घरेलू कार्यों के लिए लोहे की अन्य चीजें तैयार करता है। वह चीजें लोगों को देता है और इनके बदले में उनसे रुपये पैसे नहीं पाता, किन्तु वह उनके बदले में अपने ग्रामवासियों से भिन्न-भिन्न प्रकार के काम लेता है। कुम्हार उसे घड़े देता है, जुलाहा कपड़े देता है, तेली तेल दे जाता है। यही हाल अन्य देशों के करने वालों का है। ये सभी कारीगर किसानों से अन्न का वह भाग पाते हैं जो पीढ़ियों में बंधा हुआ चला आता है। इस तरह से सरकारी निर्वाहन मार्ग पर चलने से गाँव वालों को रुपये पैसे की जरूरत ही नहीं पड़ती।” चूँकि यह पद्धति स्वाभाविक और प्रकृति के अनुकूल है, इसी से हजारों वर्ष बीत जाने पर भी चली आ रही है। पर आधुनिक सम्पत्ति शास्त्र की प्रकृति विरुद्ध नीति का यह परिणाम है कि प्रति बीस वर्ष में एक भयंकर संसार व्यापी युद्ध हो जाता है और अब बढ़ते बढ़ते सर्वनाश की सम्भावना दिखलाई पड़ने लगी है। यह ध्रुव सत्य है कि जब तक इस प्रकार के अनर्थ मूलक आर्थिक सिद्धान्त संसार में प्रचलित रहेंगे मनुष्य कभी सुख-शाँति नहीं पा सकता। इन्हीं परिस्थितियों का निराकरण करने के उद्देश्य से पश्चिमीय देशों में समाजवाद अथवा साम्यवाद का आन्दोलन फैला है, पर उसमें भी अनेक अस्वाभाविक और मानवीय प्रकृति के प्रतिकूल बातें सम्मिलित हो गई हैं। इसलिए जब तक मनुष्य भारतीय आदर्श के अनुसार संग्रह की लालसा को दूर करके त्याग और सेवा की भावना को न अपनायेंगे तब तक उनका कल्याण संभव नहीं।


मातृभूमि का वैदिक गीत

(श्री सातवलेकर जी)

आजकल अनेक पढ़े-लिखे व्यक्तियों की यह धारणा है कि राष्ट्र की भावना अथवा देश भक्ति की भावना पश्चिमीय देशों की वस्तु है। भारतवर्ष प्राचीनकाल में एक राष्ट्र के रूप में कभी नहीं रहा, प्रायः छोटे या बड़े राज्यों में बंटा रहा जो आपस में लड़ते रहते थे, इसलिए यहाँ एक राष्ट्रीयता का भाव उत्पन्न होने की कोई सम्भावना ही नहीं।

इस समय जो ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त है, उससे यह नहीं जाना जा सकता है कि वैदिक काल में राष्ट्र कहलाने लायक कोई राज्य स्थापित हो सका था व न ही उस समय के आर्य मातृभूमि के महत्व को समझते थे और अपने देश की रक्षा की प्रबल भावना उनमें विद्यमान थी, यह अनेक वैदिक मंत्रों से प्रकट होता है। अथर्ववेद में एक पूरा सूक्त (12-1-12) मातृभूमि सूक्त के नाम से दिया गया है और ऋग्वेद आदि में भी ऐसे बहुत से मंत्र पाये जाते हैं। इनसे भली प्रकार सिद्ध हो जाता है कि मातृभूमि की कल्पना सर्वप्रथम वैदिक ऋषियों ने ही की थी। इस मातृभूमि सूक्त के (12-1-12) मंत्र में स्पष्ट कहा गया है- “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या” अर्थात् मेरी माता भूमि है और मैं मातृभूमि का पुत्र हूँ।” हमारी देश भूमि ही हमारी माता है हम सब मातृभूमि के पुत्र हैं। अर्थात् हम सब देशवासी एक ही माता के पुत्र हैं। अतएव हम सब सच्चे देश बन्धु हैं। प्रत्येक देशवासी को यही भाव मन में लाना चाहिए। मातृभूमि के गौरव के विषय में ऋग्वेद का नीचे लिखा मंत्री पढ़ने योग्य है। - “ते अज्येष्ठा अकनिष्ठा स उद्भिदोऽमध्यमासो महासावि वावृधः। सुजातासो जनुषा पृश्निमातरो दिवोमर्त्या आनो अच्छाजिगाति न॥ (5-56-6) ज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय। (5-60-5)

इस मंत्र में ‘पृध्नि मातर”‘ अर्थात् भूमि को माता मानने वाले सत्पुरुषों का वर्णन देखने योग्य है। मातृभूमि के भक्त एक ही विचार वाले रहते हैं। उनमें उच्च-नीच का भाव नहीं होता, न कोई ज्येष्ठा होता है, न कनिष्ठ न मध्यम। वे सब बन्धु ही होते हैं और सब लोग मिलकर मातृभूमि के उद्धारार्थ काम करते हैं। मातृभूमि को अपनी सबकी माता मानने से मनुष्य के विचारों और व्यवहार में जो अन्तर आ जाता है वही इस मंत्र में बताया गया है। वेद यह चाहते हैं कि उनके अनुयायियों में मातृभूमि की भक्ति बढ़े और उसके प्रभाव से वे लोग अपनी उन्नति करें, इसलिए उन्होंने मातृभूमि का महत्व ऐसे स्पष्ट शब्दों में बतलाया है। एक मंत्र और देखिये :-

इला सरस्वती मही तिस्तो देवीर्मयोभुवः वर्हि सीदन्त्वस्रिधः॥ (ऋग्वेद 1-13-9)

अर्थात् “यही (मातृभूमि), सरस्वती (मातृभूमि संस्कृति) और कला (मातृभाषा) ये तीन सुख देने वाली देवियाँ हैं। वे सर्वकाल अन्तःकरण में रहें।

इस मंत्र के तीन देवताओं या देवियों में मातृभूमि को स्थान दिया गया है। इन तीनों देवताओं में परस्पर क्या सम्बन्ध है, यह प्रकट ही है। इससे मालूम होता है कि हमारे धर्मग्रन्थों में मातृभूमि को कितना महत्व और श्रेष्ठत्व दिया गया है। यह मंत्र भी ध्यान देने योग्य है।

‘भूमे मतर्निधेहि मा भद्रया सुप्रतिष्ठितम।

(अथर्ववेद 12-13-3)

“हे मातृभूमि! (मातृभूमे) मुझे कल्याण कर। इसमें ‘भूमे मातः’ शब्द मातृभूमि के लिए बहुत स्पष्ट और महत्व का है। अथर्ववेद के ही एक अन्य मंत्र में मातृभूमि की स्तुति बड़ी श्रद्धा से की गई है :-

“यह हमारी मातृभूमि हमें अपूर्व पेय पदार्थ देवे। यह हमारी भूमि हमें गायें और अन्न देवे। यह हमारी भूमि हमें बहुत दूध देवे। यह हमारी भूमि वृद्धि करें। यह हमारी भूमि हमारे शत्रुओं को दूर करे और मुझे शत्रु रहित बनावे॥”

कुछ लोग यह भी शंका कर सकते हैं कि ‘भूमि’ या ‘हमारी भूमि’ आदि शब्दों से ‘हमारी राष्ट्र भूमि’ यह भावार्थ नहीं निकलता। इससे यह भी अनुमान किया जा सकता है कि जिस प्रकार वेदों में वायु, जल, अग्नि आदि को देवता के रूप में सम्बोधित किया गया है उसी प्रकार भूमि पर पृथ्वी की स्तुति की गई है। यह संदेह निराधार नहीं कहा जा सकता, पर वेदों में राष्ट्र का वर्णन भी है :-

सा नो भूमिस्त्विर्षि बलं राष्ट्रे दघतूत्तमे।

(अथर्व. 12-8)

“वह हमारी मातृभूमि हमारे राष्ट्र में (उत्तमे राष्ट्रे) तेज और बल बढ़ावे।”

इस मंत्र में ‘उत्तमे राष्ट्र’ का अर्थ और ‘हमारी भूमि’ का अर्थ एक ही है। “हमारी मातृभूमि में या हमारे राष्ट्र में तेज और बल की वृद्धि होवे”- इन शब्दों का तात्पर्य यही है कि हम लोगों में या हमारे देशवासियों में तेज और बल बढ़े। ये शब्द मनुष्य की बहुत ऊंची भावना को प्रदर्शित करते हैं। इस मंत्र में जो ‘उत्तमे राष्ट्र’ शब्द प्रयुक्त किया गया है वह भी बड़ा सारगर्भित है। वह बतलाता है कि राष्ट्र किस दिशा में होना चाहिए? इन शब्द से प्रतीत होता है कि राष्ट्रभक्तों की सर्वोपरि आकाँक्षा यही होनी चाहिए। इस इच्छा के प्रेरित होकर सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए। इस इच्छा से उनका कर्तव्य है कि अपने राष्ट्र को अधिक से अधिक उन्नत बनाने का शक्ति भर प्रयत्न करेंगे। वे केवल इसी बात से संतोष न कर लें कि हमारा राष्ट्र स्वाधीन है, किसी का उस पर अधिकार नहीं। वरन् उनका कर्तव्य है कि अपने राष्ट्र को ऐसी स्थिति में पहुंचावे जिससे वह सब में श्रेष्ठ समझा जाने लगे।

हमारे धर्म ग्रन्थों में राष्ट्र के महत्व और राष्ट्रीय भावना का इतना स्पष्ट उपदेश होते हुए भी वर्तमान समय में हमारे देशवासियों में राष्ट्रीय भावना की बहुत कमी है। यह भी हम स्वीकार नहीं करते। पर इनका कारण धर्म का त्रुटिपूर्ण होना नहीं है वरन् यह है कि धर्म की ओर ध्यान न देकर व्यर्थ की बातों को महत्व दे रहा है जिन वेदों में ये सब राष्ट्रीय भावना जागृत करने वाले वचन हैं, उनके प्रति लोगों को जो श्रद्धा या विश्वास है, वह केवल दिखावटी है। लोग आधुनिक ग्रन्थों पर ही अधिक विश्वास करते हैं। इसलिए सच्चा सोना दूर रह गया और मिट्टी हाथ लगी।

हमारे यहाँ धार्मिक बातों की ओर कितना दुर्लक्ष हो रहा है यह कहने की आवश्यकता नहीं। कितने ही नई रोशनी के व्यक्ति कहा करते हैं कि आध्यात्मिक ज्ञान तथा राष्ट्रीय कार्यों में कोई सम्बन्ध नहीं। देखा भी यह जा रहा है कि अध्यात्म विचार करने वाले वेदान्ती और अन्य व्यक्ति प्रायः संसार को त्याग कर किसी एकान्त स्थान में जा बैठना ही अपना आदर्श मानते हैं। पर हम कहना चाहते हैं कि इस समय लोग गलत मार्ग पर चल रहे हैं और वास्तव में आध्यात्म विद्या तथा राष्ट्र भक्ति में घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसके लिए प्राचीन इतिहास में कितने ही उदाहरण मौजूद हैं। अर्जुन महाभारत के युद्ध के लिए तैयार हुआ था और अन्यायियों को नष्ट करके धर्मराज्य स्थापित करने की उसकी अभिलाषा थी। पर जब युद्ध का आरम्भ हुआ तो वह मोह में फंसकर जंगल में जाकर तपस्वी जीवन बिताने की बात कहने लगा। तब भगवान कृष्ण ने उसको वेदों का अध्यात्म ज्ञान समझाया जिसे सुनकर उसका मोह दूर हुआ और उसने पूरी शक्ति से युद्ध करके स्वराज्य प्राप्त किया। इसी प्रकार श्री रामचन्द्र जी जब विद्यारम्भ पूर्ण कर चुके तो उन्हें भ्रम हुआ कि “सब बातें दैवाधीन हैं, तब पुरुषार्थ की आवश्यकता ही क्या है” इस भ्रम के कारण उन्होंने पुरुषार्थ के काम त्याग दिये तब वशिष्ठ जी ने उन्हें अध्यात्म शास्त्र का उपदेश देकर प्रबल पुरुषार्थी बनाया। जिसके प्रभाव से उन्होंने रावण के अधार्मिक राज्य को नष्ट करके आर्य राज्य की स्थापना की। इन सब तथ्यों पर विचार करने से सिद्ध होता है कि वेद का उपदेश राष्ट्रीयता का सब प्रकार से पोषक है।


सच्ची वर्ण व्यवस्था ही हितकारी है।

(श्री बुद्धदेव जी विद्यालंकर)

इस समय संसार में समाज संगठन की जो दो नवीन मुख्य प्रणालियाँ प्रचलित हुई हैं वे हैं पूँजीवाद और साम्यवाद। इन दोनों में घोर विरोध है, जिसके कारण समस्त संसार में भीषण संघर्ष उत्पन्न हो रहा है। पूँजीवाद का उद्देश्य है कि संसार की सम्पत्ति जनसाधारण के पास से निकल कर थोड़े से पूंजीपतियों के पास इकट्ठी हो जाय। उधर साम्यवाद कहता है कि किसी के पास पूँजी जमा न हो और सब में देश की संपत्ति का समान रूप से वितरण किया जाय। इन दोनों के विरोध और दोषों को मिटाने के लिए कितने ही विचारकों ने भारतीय वर्ण व्यवस्था को पेश किया है। जिसका उद्देश्य है कि प्रत्येक मनुष्य से उसकी योग्यतानुसार काम लिया जाय तथा उसकी स्थिति तथा आवश्यकतानुसार भरण पोषण की सामग्री दी जाय। वर्ण व्यवस्था पर विचार करने से तीन मुख्य सिद्धान्तों की सृष्टि होती है। वे सिद्धान्त हैं (1) कौशल, (2) शक्ति-प्रतिमान और (3) यथायोग्य दक्षिणा।

कौशल- हर एक मनुष्य सब प्रकार के कामों में कुशल नहीं हो सकता। विधाता ने हर एक मनुष्य को कोई न कोई समाज के लिए उपयोगी काम करने की शक्ति दी है। यदि मनुष्य सब कुछ जानने का विफल प्रयास करने के बजाय अपनी शक्ति को किसी एक ही दिशा में केन्द्रित करे तो उसे अवश्य ही कम या ज्यादा सफलता मिलेगी और उसके द्वारा समाज का हित साधन होगा। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को सामान्य विषयों का थोड़ा बहुत ज्ञान रखते हुए किसी एक विशेष पेशे में विशेष कौशल प्राप्त करना चाहिए। भारतीय समाज शास्त्रकारों ने यह कार्य तीन भागों में बाँट दिये थे :-

(1) प्राकृत पदार्थों को, शारीरिक श्रम तथा बुद्धिकौशल द्वारा मनुष्य जीवन के लिए उपयोगी बनाकर मानव समाज की दरिद्रता दूर करना। इस दिशा में कौशल प्राप्त करने वाले वैश्य कहलाते हैं।

(2) काम, क्रोध लोभादि मानव कल्याण की दुर्बलताओं के कारण होने वाले अन्यायों को बलपूर्वक दूर करना तथा सद्व्यवहार को प्रचारित करना इस दिशा में कौशल प्राप्त करने वाले क्षत्रिय कहलाते हैं।

(3) मानव समाज के लिए हितकारी सब प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करने तथा अविद्या को दूर करने में जीवन लगाना। इस दिशा में कौशल प्राप्त करने वाले ब्राह्मण कहलाते हैं।

इन तीनों प्रकार के कार्यों के लिए अलग-अलग तरह की योग्यता की आवश्यकता पड़ती है। यह बात तो ठीक है कि आहार, निद्रा आदि में सब लोग समान होते हैं। इसलिए वे किसी भी कार्य को करें उनको आवश्यकतानुसार भोजन, वस्त्र, मकान आदि तो मिलना ही चाहिए। तो भी इन लोगों में से जिसने जैसा सरल अथवा कठिन कार्य भार उठाया है उसके अनुसार मिलना ही चाहिए। इसके बिना समाज का कल्याण नहीं हो सकता। इसलिए वर्ण व्यवस्था में सबसे पहले इसी बात का ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक आदमी का कार्य का भार अपने ऊपर ले जिसे वह सबसे अच्छी तरह कर सकता है। इसके निर्णय चाहे तो वह स्वयं खूब सोच विचार कर करे अथवा अन्य विशेषज्ञों से इस सम्बन्ध में सहायता ले। और जब यह अपना कोई एक विशेष कार्य निश्चित कर ले तो उसमें अधिक से अधिक कौशल प्राप्त करे।

शक्ति प्रतिमान इस प्रकार कौशल प्राप्त करने वाले मनुष्य समाज में रहकर परस्पर किस प्रकार व्यवहार करें इसके लिए नियम बनाये जाने अनिवार्य हैं। जो तीन कार्य ऊपर बतलाये गये हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण कार्य है अज्ञान का दूर करना। क्योंकि अन्याय के विरुद्ध शस्त्र उठाने वाले तथा प्रकृति पदार्थों से सम्पत्ति उत्पन्न करने वाले दोनों ही अपना कार्य बिना ज्ञान के भली प्रकार कदापि नहीं कर सकते। पर ये दोनों ज्ञान को उत्पन्न नहीं कर सकते। इसलिये ज्ञान तथा आत्मसंयम का मेल रखने वाले जितने व्यक्ति राष्ट्र में मिल सकते हैं वे इस पहले वर्ग में आने चाहिए। अगर किसी राष्ट्र के सभी व्यक्ति एक से प्रतिभाशाली और संयमी हैं तब तो बड़ा भाग्यशाली है और वह स्वयमेव उन्नति के शिखर पर पहुंच जायगा। परन्तु जब तक ऐसा समय नहीं आता और मनुष्य आत्मसंयम के अभ्यासी नहीं है तब तक हमको कोई ऐसी व्यवस्था करनी ही होगी जिससे प्रेरित होकर मानव समाज के श्रेष्ठतम मनुष्य इस ओर झुकें। इसके लिए यह आवश्यक है कि इस वर्ग वालों को ज्ञान वृद्धि की सुविधा में और सामाजिक आदर अधिक से अधिक मात्रा में दिया जाय। यह ठीक है कि आत्मसंयम के अभ्यास में आदर की इच्छा का जीतना भी एक आवश्यक अंग है, पर ऐसी स्थिति बाद में आ सकती है। आरम्भ में तो राष्ट्र के सबसे अधिक प्रतिभाशाली और योग्य बालकों को इस कार्य के लिए प्रेरित करने के निमित्त यह आवश्यक है कि इस वर्ग का स्थान सबसे अधिक सम्मान का रखा जाय। चाहे ऐसे श्रेष्ठ स्वभाव वालों को लौकिकमान की भूख न हो, पर राष्ट्र का कर्तव्य है कि जो लोग योग्य होते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा नहीं चाहते। उनकी और भी अधिक प्रतिष्ठा की जाय जिससे हर एक व्यक्ति को इस गुण को धारण करने की प्रेरणा मिल सके।

परन्तु यह भी याद रखना चाहिए कि आत्म संयम की भी सीमा है। जिस प्रकार प्रत्येक कार्य में उच्च कोटि का कौशल प्राप्त करने के लिए व्यक्तियों का वर्गीकरण आवश्यक है और प्रत्येक वर्ग की सफलता के लिए उसके साथ यथोचित व्यवहार किया जाना भी जरूरी है। उसी प्रकार यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी एक वर्ग के हाथ में इतनी शक्ति न दे दी जाय जिससे वह निरंकुश बन कर समाज हित की अवहेलना कर सके। क्योंकि मर्यादा से अधिक शक्ति किसी भी वर्ग के हाथ आ जाने से वह पतित हुए बिना रह नहीं सकता। इस लिए भारतीय समाज शास्त्र वेत्ताओं ने ऐसे नियम बनाये थे कि ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण एक दूसरे को मर्यादा के भीतर रखने में समर्थ हो सके। इसी का नाम शक्ति प्रतिमान है।

यथायोग्य दक्षिणा- संसार में इस समय जितनी सामाजिक व्यवस्थाएं प्रचलित हैं उनमें प्रत्येक व्यक्ति को उसके कार्य के उपलक्ष में पारिश्रमिक अथवा दक्षिणा धन के रूप में ही दी जाती है। योग्यतानुसार धन की मात्रा कम या अधिक देकर हम सन्तुष्ट हो जाते हैं कि हमने यथायोग्य दक्षिणा दे दी। पर वर्ण व्यवस्था के अनुसार हम यह भी विचार करते हैं कि जिस व्यक्ति के लिए जो वस्तुतः उपयोगी है वही उसे दी जाय। इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि धन के द्वारा प्रत्येक पदार्थ और सब तरह की सेवाएं खरीदी जा सकती हैं फिर क्यों न धन को दक्षिणा का माध्यम बनाया जाय? पर ऐसा करने से एक बहुत बड़ा दोष यह पैदा होता है कि धन का गौरव सबसे अधिक बढ़ जाता है और शक्ति प्रतिमान में बाधा पड़ जाती है। इसलिए वर्ण व्यवस्था के सिद्धान्तानुसार ब्राह्मण को ज्ञान वृद्धि के साधन तथा पूजा दी गई। क्षत्रिय को शासनाधिकार दिया गया। वैश्य को साँसारिक वैभव दिया गया। यही उनकी यथायोग्य दक्षिणा है और इसी के द्वारा समाज में सन्तुलन ठीक रह कर सुख और शान्ति का विस्तार हो सकता है।


संस्कृति की उत्पत्ति और महत्व

(पं. लक्ष्मण जी शास्त्री)

किसी भी जाति अथवा राष्ट्र की श्रेष्ठता अथवा हीनता का निर्णय उसकी संस्कृति से किया जाता है। आजकल धन और शक्ति को भी अनेक लोग प्रधानता देते हैं पर वास्तव में उत्थान और पतन उन्नति और अवनति का निर्णय संस्कृति के आधार पर ही होना संभव है।

संस्कृति का तात्पर्य है? बहुत ही संक्षेप में हम कह सकते है कि आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियों को सामाजिक जीवन के उपयुक्त बनाने की कला ही संस्कृति है। स्वयं मनुष्य आध्यात्मिक शक्ति है और उसके चारों ओर का विश्व आधिभौतिक शक्ति है। मनुष्य अपनी इन्द्रियों को कार्यक्षम बनाता है। मनोविकारों पर काबू पाता है। विचारों की अर्थात् ज्ञान की वृद्धि करता है बुद्धि भावना और आकाँक्षाओं को प्रौढ़ तथा सूक्ष्म बनाता है। इसी को आध्यात्मिक संस्कृति कह सकते हैं। नीति, सौंदर्य, सत्य, न्याय, ध्येय, श्रेय आदि शब्दों से जिन गुणों का बोध होता है। उनका इस आध्यात्मिक संस्कृति से सम्बन्ध है। कायदा, कानून, धर्म, साहित्य, शास्त्र, विज्ञान समाज व्यवस्था राज्य पद्धति का भी आध्यात्मिक संस्कृति में ही समाविष्ट होता है। भौतिक संस्कृति का आशय है कि मनुष्य के चारों ओर फैले हुए विश्व का सामाजिक जीवन के अनुकूल रूपांतर। भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, धातु, वृक्ष वनस्पति पशु इत्यादि के रूप में चारों तरफ फैली हुए अनन्त सृष्टि को उपयोगी बनाना, शिकार, जहाजरानी, खेती, पशु पालन धातुओं के हथियार बनाना, भाप और बिजली के यंत्र बनाना आदि क्रियाओं की गिनती भी भौतिक संस्कृति में होती है। भौतिक-संस्कृति और आध्यात्मिक संस्कृति के बीच पृथकता बतलाने वाली रेखा खींच सकना कठिन है। इसका कारण यह है कि ये दोनों एक दूसरे से मिली हुई और परस्परावलम्बित हैं। आधि भौतिक संस्कृति- आध्यात्मिक संस्कृति का आधार है। आस-पास के बाह्य जगत का उपयोग करते-करते ही मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों का विकास होता है। मनुष्य के अत्यन्त गहरे सम्बन्धों का आधार भी भौतिक होता है। पति और पत्नी, माता और पुत्र का सम्बन्ध अत्यन्त स्नेह का होता है परन्तु उनका प्राथमिक कारण भौतिक ही होता है। मनुष्य-मनुष्य के बीच के सारे सम्बन्ध साक्षात् अथवा परम्परा के समाज की भौतिक आवश्यकताओं पर ही आधारित होते हैं। गीता की आसुरी संपत्ति और दैवी संपत्ति मनु के वर्णाश्रम धर्म अथवा असोयादि धर्मों का समाज के भौतिक जीवन की व्यवस्था से सम्बन्ध रहता है। जिस मानव समाज की भौतिक स्थिति जितनी सुधरी हुई होती है। उसकी आध्यात्मिक स्थिति भी उतनी ही उन्नत होती है। इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है और न हो सकता है कि किसी समाज का अध्यात्म तो श्रेष्ठ हो परन्तु भौतिक जीवन घटिया हो।

अमेरिका के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ‘बोआस’ ने संस्कृति के तीन मुख्य हेतु अथवा लक्षण बतलाये हैं-

(1) मनुष्य और प्रकृति के सम्बन्ध तथा प्रकृति पर विजय। (2) मनुष्य-मनुष्य के बीच का सम्बन्ध अथवा सामाजिक व्यवस्था। (3) मनुष्य के अन्तः करण की क्रिया-प्रतिक्रिया।

(1) मनुष्य और प्रकृति के सम्बन्ध के कारण अथवा प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के कारण जो संस्कृति निर्माण होती है उससे अगणित भेद हैं :- जैसे अन्न पैदा करना, उसकी रखवाली करना, गृह पशु, वनस्पति, ऋतु चक्र, वायु-वर्षा इत्यादि से बचने और उन पर अधिकार रखने की पद्धति। मनुष्य-मनुष्य के बीच के सम्बन्ध कुटुम्ब, गुण, वर्ण जाति उच्च-नीच श्रेणी आदि भिन्न-भिन्न सामाजिक गुटों के अंतर्गत और बाहरी सम्बन्ध, स्त्री-पुरुष तरुण-वृद्ध के सम्बन्ध समाज के राजकीय और धार्मिक संगठन, युद्ध और शाँतिकाल के समाज संबंध। (3) मनुष्य के अन्तःकरण की क्रिया-प्रतिक्रिया- इस विभाग में पहले दो तरह के सम्बन्धों के कारण अन्तःकरण पर होने वाली प्रतिक्रिया पर विचार किया जाता है। ज्ञान, विचार, भावना, अपेक्षा, आकाँक्षा, और प्रत्यक्ष प्रयत्न ये ही प्रतिक्रिया के रूप हैं। बुद्धि और भावना के कार्य इसी श्रेणी में आते हैं। शास्त्र, नीति, कला, सौंदर्य और धर्म का इसमें समावेश होता है।

‘बोआस’ ने अपने ग्रन्थ में धर्म की गिनती संस्कृति की तीसरी श्रेणी अर्थात् अन्तःकरण की क्रिया में की है। इसलिए जिस प्रकार संस्कृति में परिवर्तन होता है और उसका इतिहास बनता है वही बात धर्म में भी समझनी चाहिए। धर्म का इतिहास समझने के लिए समाज और सामाजिक संस्थाओं के परिवर्तन का इतिहास समझ लेना आवश्यक है।

संस्कृति कैसे बढ़ती है इस सम्बन्ध में पश्चिमी विद्वानों के दो मत हैं। पहले मत के मानने वाले टायलट और फ्रेजर जैसे विद्वान हैं। जिनका कहना है कि प्रत्येक समाज की संस्कृति सामाजिक आवश्यकताओं से उत्पन्न हुई है। इन आवश्यकताओं में सबसे पहला नम्बर आत्मरक्षण, संतानोत्पादन और संतान पालन का है। ये आवश्यकताएं लगातार बढ़ती ही रहती हैं और इनके साथ-साथ समाज की संस्कृति भी बढ़ती रहती है। यदि किसी कारण यह वृद्धि रुक जाती है तो संस्कृति भी रुक जाती है। दूसरे मत के मानने वाले इलियट, स्मिथ आदि अंग्रेज और कुछ जर्मन तथा आस्ट्रियन विद्वान हैं। इनका कहना है कि कुछ खास-खास राष्ट्र ही ऊंचे दर्जे की संस्कृति उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं। अन्य राष्ट्र या समाज इन विशेष राष्ट्रों की संस्कृति को सीख कर ही सुसंस्कृत बनते हैं इससे संस्कृति का प्रचार बढ़ता है और अनेक देश एक दूसरे की संस्कृति से परिचित हो सकते हैं। स्मिथ के मत से मूल संस्कृति इजिप्ट (मिश्र) में प्रौढ़ावस्था को पहुँची थी। खेती, व्यापार, मकान बनाना, राज्य, धर्म, पुरोहित, संस्था, लिखना, जहाज चलाना, युद्ध कला आदि की वृद्धि पहले इजिप्ट में ही हुई। इस संस्कृति ने सारे जगत पर प्रभाव डाला और पहली बार जगत इसी से सुसंस्कृत हुआ (यह बात योरोप और अमरीका के लिए सही हो सकती है।) जर्मन विद्वान कहते हैं कि आरम्भ में आठ प्रकार की संस्कृतियों का उदय हुआ। आज सारी मानव जाति कम या ज्यादा परिमाण में उन्हीं आठों संस्कृतियों के विनिमय, सम्मिश्रण और संघर्ष से उन्नति करने में समर्थ हुई हैं।

इन दोनों ही मतों में ऐतिहासिक सच्चाई है पर दूसरा दल संकुचित विचारों का है यह कुछ थोड़े से मानव समूहों को ही महान संस्कृति उत्पन्न करने का श्रेय देता है। इसका यही आग्रह है कि थोड़े से राष्ट्र ही उच्च संस्कृति का निर्माण कर सकते हैं। इस दृष्टि से पहले दल का मत अधिक युक्ति संगत जान पड़ता है कि सभी मानव-समूह उचित परिस्थिति मिलने पर महान संस्कृति उत्पन्न कर सकते हैं और अड़चने आने पर पिछड़ जाते हैं। दूसरे दल वालों ने संस्कृति की मीमाँसा मर्यादित और संकुचित दृष्टि से की है। पहले दल के इतिहास के गहरे अवलोकन से संस्कृति की उन्नत वृद्धि की सम्भावना को सिद्ध किया है और बतलाया है कि आगे बढ़ी और पिछड़ी सभी जातियाँ संस्कृति के उच्च लक्ष्य पर पहुँच सकती हैं। दूसरा दल उन राष्ट्रों का समर्थन करता है जो सफलता पा चुके हैं। और जिन्होंने धन तथा सत्ता को प्राप्त कर लिया है। दूसरे दल वालों के सिद्धान्त में से इतनी बात तो मान लेने योग्य है कि संस्कृति की वृद्धि विनिमय, सम्मिश्रण और संघर्ष से हुई है। संस्कृति की मूल प्रेरक सामाजिक आवश्यकता ही है। समाजिक आवश्यकता में कारण ही समाज एक प्रदेश को छोड़ दूसरे स्थान को चले जाते हैं। एक-दूसरे पर आक्रमण करते हैं, एक दूसरे की संस्कृति को मिटा डालते हैं अथवा स्वयं ही एक दूसरे से मिल जाते हैं यही संस्कृतियों के विश्वव्यापी होने का रहस्य है।


चिकित्सा का एक सरल साधन-मिट्टी का प्रयोग

(महात्मा गाँधी)

हमारा शरीर पंच तत्वों से बना है। इसका अर्थ यह है कि हमारे शरीर को स्वस्थ और आरोग्य रखने के लिए इन्हीं पाँचों चीजों की आवश्यकता है। स्वच्छ मिट्टी, स्वच्छ जल, स्वच्छ धूप, स्वच्छ वायु और स्वच्छ आकाश (खुला स्थान) का मिलना हमारे शरीर के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इन तत्वों में से एक भी तत्व का न मिलना हमारे अस्वस्थ होने का कारण होता है। जिस तत्व की जिस परिमाण में आवश्यकता है उस तत्व का उस परिमाण में मिलना ही हमारे शरीर का स्वास्थ्य है।

वर्तमान समय में जिस प्रकार जल, वायु, धूप से चिकित्सा करने की विधियाँ प्रचलित की गई हैं उसी प्रकार मिट्टी का उपचार भी बड़ा चमत्कारिक है। हमारे शरीर का अधिक भाग मिट्टी का ही बना है इसलिए उस मिट्टी का असर होना कोई नई बात नहीं है। बहुत लोग मिट्टी को पवित्र मानते हैं। दुर्गंध मिटाने को जमीन पर मिट्टी लीपते हैं। सड़ी चीजों पर मिट्टी डालते हैं। अपवित्र हाथों को मिट्टी से धोकर पवित्र करते हैं। योगी लोग शरीर पर मिट्टी लगाते हैं। हमारे यहाँ के लोग फोड़े फुन्सियों में मिट्टी का उपचार करते हैं। हम पानी को साफ करने के लिए उसे मिट्टी या बालू से होकर छानते हैं। मुर्दे (शव) को जमीन में गाड़ देने से हवा में गन्दगी पैदा नहीं होती। मिट्टी की इस प्रत्यक्ष महिमा से हम अनुमान कर सकते हैं कि उसमें कितने ही विशेष गुण अवश्य हैं।

जिस प्रकार डा. लुईकूने ने जल के सम्बन्ध में खूब विचार करके कितनी ही उपयोगी बातें लिखी हैं वैसे ही जुस्ट नामक एक अन्य जर्मन ने मिट्टी के सम्बन्ध में अनेक लाभदायक बातें बतलाई हैं। उसका कहना है कि “एक बार मेरे पास के किसी गाँव में एक आदमी को साँप ने काट खाया। बहुतों ने उसे मरा समझ लिया। पर वहाँ किसी आदमी ने मुझसे सलाह लेने की बात कही। मैंने उसे मिट्टी में गढ़वा दिया। थोड़ी देर बाद उसे होश आ गया।”

यह कोई अनहोनी बात नहीं है। और कोई कारण नहीं कि जुस्ट झूठ लिखता। यह तो साफ दिखलाई पड़ता है कि मिट्टी में गाड़ देने से बहुत गर्मी निकलती है। हमारे पास यह जानने के साधन नहीं है मिट्टी में मौजूद किन्तु अदृश्य जन्तुओं ने शरीर पर क्या काम किया है। पर यह निर्विवाद है कि मिट्टी में जहर आदि चूस लेने की शक्ति है। इस पर भी जुस्ट ने लिख दिया है कि- मेरा इससे यह मतलब नहीं है कि सभी साँप के काटे मिट्टी के इलाज से जी उठते हैं। पर ऐसे समय में मिट्टी का उपचार करना चाहिए। बर्र और बिच्छू के डंक पर मिट्टी के उपयोग की मैंने खुद भी आज़माइश की है और उससे तुरन्त आराम मालूम हुआ है। मिट्टी को ठण्डे पानी में सानकर उसकी गाढ़ी पुल्टिस सी बनाकर डंसे हुए स्थान पर रखकर कपड़े से बाँध दें। नीचे बतलाये रोगों में मैंने इस उपचार को खुद आजमाया है। पेट में मरोड़ होने वालों के पेडू पर मिट्टी की पुल्टिस बाँधने से दो-तीन दिन में मरोड़ बन्द हो गई है। सिर में दर्द होने से मिट्टी की पुल्टिस रखने से तुरन्त ही आराम हुआ है। आँख उठने पर भी यह पुल्टिस बाँधने से लाभ देखा गया है। चोट में मिट्टी की पुल्टिस बाँधने से सूजन और दर्द दोनों दूर हो जाते हैं।

बहुत दिनों तक मेरी यह दशा थी कि मैं फ्रूट सालृ इत्यादि लिये बिना निरोग नहीं रहता था। 1904 में मिट्टी की उपयोगिता मालूम हुई थी। तब से फ्रूटसालृ आदि चीजें छूट गई। फिर किसी दिन इनको लेने की जरूरत नहीं हुई। कोष्ठबद्धता में पेडू पर मिट्टी की पुल्टिस बाँधने से पेट नरम पड़ जाता है। अतिसार भी मिट्टी के बाँधने से जाता रहता है। तेज बुखार में माथे और पेडू पर मिट्टी बाँधने से एक-दो घण्टे बाद बुखार बहुत कम हो जाता है। फोड़े, फुँसी, दाद और खुजली आदि पर मिट्टी की पुल्टिस प्रायः बहुत अच्छी असर करती है। हाँ ऐसे फोड़ो पर मिट्टी की उपयोगिता कम हो जाती है जो मवाद देते हैं। बवासीर के लिए मिट्टी बहुत लाभदायक है। पाला लग जाने से प्रातः हाथ और पैर लाल होकर सूज जाते हैं। इस पर मिट्टी की पुल्टिस अपना असर दिखाये बिना नहीं रहती। पैरों की उंगलियों में खाज हो जाने पर मिट्टी गुणकारी देखी गई है। दुखते जोड़ों पर मिट्टी लगाने से तुरन्त फायदा होता है। मिट्टी के बहुत से प्रयोग करते हुए मुझे मालूम हुआ है कि घरेलू इलाज के लिए मिट्टी एक बहुमूल्य वस्तु है।

सब प्रकार की मिट्टी समान गुण वाली नहीं होती। सुर्ख मिट्टी अधिक असर करने वाली पाई गई। मिट्टी सदा साफ जगह से खोद कर निकालें। जिस मिट्टी में गोबर इत्यादि का मैल हो उसे काम में नहीं लेना चाहिए। मिट्टी बहुत चिकनी न हो। बलूई मिट्टी अच्छी समझी जाती है। उसमें किसी प्रकार का कूड़ा कचड़ा न हो। मिट्टी सदा ठण्डे पानी में भिगोएं। गूँथे हुए आटे के समान कड़ी मिट्टी रखनी चाहिए। साफ, बिना कलप के झंझरे कपड़े में बाँध कर पुल्टिस की तरह रखें। शरीर पर सूखने के पहले मिट्टी को खोल दें। साधारणतः एक दफे की पुल्टिस दो से तीन घण्टे तक चल सकती है। काम में लाई हुई मिट्टी दोबारा काम में न लाएं। पुल्टिस में बंधा कपड़ा धोकर दुबारा काम में लाया जा सकता है। लेकिन उसमें पीव इत्यादि न लगी हो। पेडू पर पुल्टिस बाँधनी हो तो पहले पुल्टिस पर एक गरम कपड़ा रखे तब उस पर पट्टी चढ़ाएं। हर आदमी को एक डिब्बे में भर कर मिट्टी रखनी चाहिए, जिससे मौके पर ढूंढ़ने न जाना पड़े। बिच्छू आदि के डंक पर जितनी जल्दी मिट्टी लगाई जाती है उतना ही अधिक फायदा होता है। यों तो मिट्टी में अनगिनत गुण हैं पर कुछ खास बातें नीचे दी जाती हैं :-

(1) अन्दर के पुराने मल को उखाड़ती है।

(2) अन्दर के विजातीय द्रव्य (दूषित पदार्थ) को बाहर खींच लेती है।

(3) सूजन, दर्द, फोड़े, फुन्सी आदि में लाभ करती है।

(4) प्रदाह (जलन), टपकन एवं तनाव आदि को दूर करती है।

(5) शरीर की अतिरिक्त गर्मी को खींचती है।

(6) शरीर में आवश्यक ठंडक पहुँचाती है।

(7) शरीर को चुम्बकीय शक्ति मिलती है। जिससे अन्दर स्फूर्ति एवं शक्ति का संचार होता है।

(8) जहरीले अथवा पागल जन्तु के काटने पर लाभकारी है।

मिट्टी त्वचा के रोमकूपों को खोलती है। रक्त को ऊपरी भाग में खींचती है। अन्दर के दर्द एवं रक्त के इकट्ठे होने को दूर करती है। रक्त के संचार को तेज करती है और विजातीय पदार्थों के बाहर निकालने में सहायता करती है। अगर स्वच्छ मिट्टी पर सोया जाय तो वह शरीर के अन्दर की अतिरिक्त गर्मी को शाँत करके कोपों की मरम्मत करती है और अच्छी नींद लाती है। इसी प्रकार नदी नाले पर या घर पर मिट्टी से शरीर को खूब रगड़कर मलने से शरीर का मैल छूटकर त्वचा झलकने लगती है और कोमल भी हो जाती है। इससे रोमकूपों के छिद्र खुल जाते हैं और शरीर को अधिक परिमाण में ‘ओषजन’ प्राप्त होती है। जहाँ साबुन से नहाने से अनेक प्रकार की हानियाँ हैं। वहाँ मिट्टी मलकर स्नान करने से बड़ा लाभ होता है।

कुछ लोग अपनी सुन्दर, सुकोमल त्वचा पर मिट्टी लगाना असभ्यता का चिन्ह समझते हैं। फैशन वाले लोग इसे हंसी की बात समझते हैं। पर उनको समझ लेना चाहिए कि जिस मिट्टी से हमारा शरीर बना है और जिस मिट्टी में पैदा हुआ भोजन नित्यप्रति खाकर हम जीवित रहते हैं उसका उपयोग किसी दशा में लज्जा या संकोच का विषय नहीं माना जा सकता। हमको उसका प्रयोग करके अपने स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए।


अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में रखिए।

(श्री रामप्रकाश गुप्ता ‘मधुप’ बी.ए. कोटा)

हमारा मस्तिष्क ही संसार का समस्त ज्ञान प्राप्त करने का सामर्थ्य रखता है। वास्तव में यह मस्तिष्क एक बड़ी पेचीदा मशीन है जिसके एक-एक कलपुर्जे का ज्ञान हुए बिना हम उसकी कार्य प्रणाली को नहीं समझ सकते।

मस्तिष्क के दो भाग होते हैं- एक चेतन और दूसरा अचेतन। मनुष्य के चेतन मन में सामान्य विचार होते हैं साँसारिक व्यवहार इसी के द्वारा होते हैं। अचेतन मन पुराने अनुभवों के संस्कारों का खजाना होता है। जीवन की अधिकतर महत्वपूर्ण घटनायें हमें याद नहीं रहती लेकिन उनके संस्कार अचेतन मस्तिष्क पर बने रहते हैं। हमारी निद्रा के समय भी अचेतन मस्तिष्क जागता रहता है और एक विशेष ढंग से क्रिया करता रहता है। मस्तिष्क अथवा मन के इन दोनों भागों में पूर्ण सामंजस्य रहने पर ही मनुष्य का स्वास्थ्य ठीक रहना संभव है।

इच्छायें असीमित हैं उन सबकी पूर्ति हो सकना संभव नहीं है अतः अनेक इच्छाओं का दमन किया जाता है। यह दमन की हुई तथा अतृप्त इच्छायें अचेतन मन में अपना घर बनाती हैं तथा मानसिक ग्रन्थि के रूप में कार्य करती हैं। हमारा मानसिक अंतर्द्वंद्व हमारी इन ग्रन्थियों के होने के प्रमाण हैं। दबी हुई मानसिक ग्रन्थियाँ स्वप्न में और जागृत अवस्था में भी मनुष्य के विवेक को नष्ट करके अपनी मनमानी करती हैं।

इसी कारण अनेक मनुष्यों का मस्तिष्क विकृत होकर वे पागल हो जाते हैं। जिस मनुष्य के मन में मानसिक ग्रन्थियों का जितना अधिक दमन होता है उसके स्वप्न भी उतने ही जटिल होते हैं तथा उसके व्यवहारों में भी उतनी ही विलक्षणता पाई जाती है।

आइये अब हम विचार करें कि मानसिक ग्रन्थियाँ किस प्रकार बनती हैं ओर कैसे कार्य करती हैं तथा उनके क्या परिणाम होते हैं? ऐसा होने से ही हम उनका निर्माण रोक सकते हैं तथा उनके दुष्परिणामों से बच सकते हैं।

शोक व भय की मानसिक ग्रन्थियाँ प्रायः सब में पाई जाती हैं। घर की स्त्रियाँ बचपन से ही तरह-तरह से बालक को भयभीत करके उसमें भय की ग्रन्थियाँ उत्पन्न कर देती हैं। बालक रात में सोते-सोते एकाएक चिल्ला उठता है वह भय की ग्रन्थि के कारण ही होता है। जब हम बड़ी आयु में भी भय की ग्रन्थि को निकाल नहीं सकते उस समय असाधारण साहस दिखाकर भय को बचाने की चेष्टा करते हैं। जिस व्यक्ति के आन्तरिक मन में जितना अधिक डर होता है वह उतना ही अधिक निर्भीक और बहादुर दिखलाई पड़ने की चेष्टा करता है।

घृणा की मानसिक ग्रन्थि में मनुष्य दूसरों से प्रेम करता है जब किसी युवती का विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति से हो जाता है तो घृणा की ग्रन्थि बन जाती है इससे उसे अनेक प्रकार की शारीरिक बीमारियाँ भी हो जाती हैं। अपमान व निराशा की घटनाएं भी मानसिक ग्रन्थि उत्पन्न करती हैं। यदि आप बालक के व्यक्तित्व को न समझ कर उसके व्यक्तित्व का अपमान व निरादर करते हैं तो याद रखिए कि बालक भी आपका सम्मान कभी न करेगा तथा उसमें आपके प्रति घृणा की ग्रन्थि बन जायेगी। अपमान की एक सच्ची घटना मुझे स्मरण होती है। एक बार एक सज्जन प्रथम बार जनता के सम्मुख व्याख्यान देने को उपस्थित हुए। व्याख्यान असन्तोष जनक होने के कारण जनता ने तालियाँ बजानी आरम्भ की तथा कुछ समय बाद सब उठ कर चले गये। इस व्यवहार से उक्त बोलने वाले सज्जन में अपमान की भावना घर कर गई। इस ग्रन्थि के विरुद्ध लड़ने की उन्होंने हृदय से कोशिश की। बहुत प्रयत्न व अभ्यास के पश्चात् उन्होंने फिर भाषण दिया। अब की बार वे सफल वक्ता सिद्ध हुए। जनता ने प्रभावित होकर खुशी से तालियाँ बजाकर उनका सम्मान किया। तब उनकी अपमान की ग्रन्थि दूर हो सकी।

आत्म ग्लानि की ग्रन्थि की क्रिया भी बड़ी प्रबल होती है। जब मनुष्य आवेग में आकर अपनी नैतिक भावना के प्रतिकूल काम कर बैठता है जब यह ग्रन्थि उत्पन्न होती है। यहाँ महात्मा गाँधी की आत्म ग्लानि का अनुभव लिखना असंगत न होगा। जब महात्मा गाँधी के पिता मृत्यु शैया पर थे उस समय गाँधी जी अपनी काम वासना को न रोक सके और अपनी स्त्री के पास जा सोये। उसी समय उनके पिता का देहान्त हो गया। उन्हें इसके कारण भारी आत्म ग्लानि हुई इसके कारण उनकी जीवन धारा ही एक विशेष दिशा में प्रवाहित हो गई और वे काम वासना के कट्टर शत्रु हो गये। आत्म ग्लानि की ग्रन्थि के कारण मनुष्य प्रायः ऐसा काम करने का प्रयत्न करता है जिससे वह समाज के समक्ष अपने आपको विशेष व्यक्ति सिद्ध कर सके।

जिस प्रकार नदी का बाँध पक्का होता है तो बाँधा हुआ पानी शीघ्र नहीं निकल पाता। पर जब बाँध कच्चा होता है तो एकत्रित पानी उसे तोड़ कर बाहर निकल जाता है। इसी प्रकार जब मनुष्य की चेतना शक्ति प्रबल होती है तो वह दबाये गये भावों और मानसिक ग्रन्थियों को रोकने में समर्थ होती है पर जब चेतना की शक्ति कमजोर पड़ जाती है तो मानसिक ग्रंथियां विकृत रूप से अपना काम करने लगती हैं। अतः हमको अपनी इच्छाओं को इस प्रकार नियंत्रण में रखना चाहिए जिससे वे उचित रूप से तृप्त होती रहें और मानसिक ग्रन्थियाँ न बनने पायें क्योंकि इससे शारीरिक और मानसिक विकास में बाधा पड़ती है।


छह अवतार और मानवता की छह अवस्थाएं

(श्री जगत नारायण)

इस बात को बहुत लोग नहीं समझते कि भिन्न-2 मनुष्यों की भिन्न मानसिक श्रेणियाँ होती हैं। और इसलिए यदि हम उनकी सहायता करना चाहते हैं। तो हमें उनकी स्थिति के अनुकूल धर्म पर विचार करके उनके साथ व्यवहार करना चाहिए। पर हम ऐसा करने के बजाय अपने से भिन्न धर्म मानने वाले लोगों को धर्महीन या पतित मान कर उनको अपने जैसे ही रास्ते पर चलाना चाहते हैं। यह एक बड़ी भूल है इससे उन लोगों को लाभ के बजाय हानि ही पहुँचती है। उदाहरणार्थ भगवान ने गीता में कहा है कि निष्काम कर्म करना मनुष्य का परम कर्तव्य है। पर जो कोई इसी सिद्धान्त के बल पर सर्व-साधारण में निष्काम कर्म का प्रचार करना चाहें और इस बात की आशा करें कि सब लोग उनके उपदेश पर आचरण करेंगे वे कहाँ तक सफलता प्राप्त कर सकते हैं। भगवान ने स्वयं ही आगे चलकर अर्जुन को अन्य दो प्रकार के धर्मों का भी उपदेश दिया है। और भाँति-भाँति के प्रलोभनों द्वारा कार्य करने को उत्तेजित करने की चेष्टा की है।

मनुष्य जीवन की विभिन्न अवस्थाओं पर विचार करने के लिए अवतारों के चरित्र पर विचार करना विशेष उपयोगी है। क्योंकि हिन्दू शास्त्रों में जिन अवतारों का वर्णन किया गया है वे माननीय विकास के एक-एक युग के प्रतिनिधि हैं। भूतकाल में प्रकट होने वाले नौ अवतारों में से पहले तीन अवतार तो पशु जीवन से संबंध रखते हैं। उस समय पृथ्वी तल पर मनुष्य का आविर्भाव नहीं हुआ था। मानवता से सम्बन्ध रखने वाला सब से पहिला अवतार नृसिंह भगवान का है। यह जीव की उस अवस्था का सूचक है जब मनुष्य पशु जीवन से विकसित होकर मनुष्य श्रेणी में पैर रख रहा है। वह मनुष्य होते हुए भी अर्द्ध पशु होता है। इस अवस्था में जीवन में अधिकाँश पाश्विक वृत्तियाँ ही रहती हैं। यही जंगली अर्थात् आदिम मनुष्यों की अवस्था है। इस पाश्विक अवस्था में मनुष्य दूसरे मनुष्यों को मार कर भी खा जाता है। पर धीरे-धीरे कुछ दबाव और रुकावट उस पर अपने आप आने लगती हैं इससे वह यथासंभव अपनी जाति के लोगों अर्थात् मनुष्यों को छोड़कर और प्राणियों को मार कर अपना निर्वाह करने लगता है। ऐसे जंगली मनुष्यों पर हंसने या घृणा करने की कोई बात नहीं। प्रत्येक मनुष्य को आरम्भ काल में इसी अवस्था में होकर गुजरना पड़ता है। इतना ही नहीं वरन् अनेक जन्म प्रत्येक मनुष्य को इसी अवस्था में लेने पड़ते हैं। इस अवस्था को मनुष्य जीव का शैशवकाल अथवा शूद्रावस्था भी कह सकते हैं।

दूसरा अवतार वामन स्वरूप में हुआ। यह उस अवस्था का परिचायक है, जब जीव जंगली अवस्था से निकल कर आगे बढ़ता है। अर्थात् जब उसमें मनुष्य के कुछ अपूर्ण लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस अवस्था में जीव घोर पाश्विक अवस्था से पृथक होकर समाज के मध्य जीवन व्यतीत करने लगता है और समाज के नियमों से कुछ संबंध रखने लगता है। पर तब भी उसमें स्थूल वस्तुओं को अपने लिए ही ग्रहण करने की ऐसी प्रबल प्रवृत्ति रहती है कि वह चाहता है कि समस्त संसार की सम्पत्ति उसी को मिल जाय। वामन भगवान थे तो नाटे, पर जब दान से प्राप्त तीन डगों से पृथ्वी नापने लगे तो तीन ही डगों में तीनों लोकों को अपना लिया। साँकेतिक रूप से इसे प्रवृत्ति मार्ग का प्रथम अंग कह सकते हैं। इसको जीव की वैश्यावस्था भी कह सकते हैं। इसी के बाद निवृत्ति की भावना का उदय होने लगता है।

तीसरा अवतार परशुराम जी का है। परशुराम जी बड़े क्रोधी तथा शक्ति के उपासक बतलाये गये हैं। इससे जीव की उस अवस्था का भाव प्रकट होता है जब वह स्थूल पदार्थों को जमा करते-करते उनसे थक जाता है, उनमें उसको शांति नहीं मिलती है। इसलिए उनकी ओर से अपनी प्रवृत्ति को फेरता है। त्याग की ओर कुछ ध्यान जाता है। पर फिर भी इस मध्यावस्था में प्रवृत्ति ही अधिकतर उसको अपनी ओर खींच लेती है। वह उत्तम से उत्तम शक्ति को अपने ही भीतर रखना चाहता है। वह नहीं चाहता कि दूसरों को भी शक्ति मिले। इसको जीव की क्षत्रियावस्था का पूर्व भाग कह सकते हैं।

इसके बाद प्रवृत्ति और निवृत्ति की माध्यमिक अवस्था का दूसरा भाग आता है। इसमें भी मनुष्य दो प्रकार की परस्पर विरोधी व्यक्तियों के बीच में पड़ कर डाँवाडोल होता रहता है। इस प्रकार सब अवस्था में सदैव आन्तरिक शक्तियों की खींचातानी होती रहती है। पर अन्त में दैवी भावनायें पाश्विक भावनाओं को दबा देती हैं। श्री रामचन्द्र जी के जीवन को लीजिए। पारिवारिक जीवन हो अथवा राजनैतिक जीवन हो, सर्वत्र उनको दोनों ओर खींचने वाली शक्तियों के बीच में होकर अपना रास्ता निकालना पड़ा है। इसलिए उन्होंने अपने जीवन द्वारा यह प्रकट किया कि मनुष्यों को संसार में अन्य मनुष्यों के साथ अपने भिन्न-भिन्न संबंधों और कर्तव्यों को कैसे निबाहना चाहिए। पर उनके जीवन से एक बात और भी स्पष्ट रूप से प्रकट होती है कि किसी के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध कैसा भी घनिष्ठ क्यों न हो, पर अपने अन्तिम कर्तव्य का निश्चय करते समय सदा व्यक्तिगत भावों के ऊपर सिद्धान्तों को ही प्रधानता दी जानी चाहिए।

इसके बाद कृष्णावतार से जीव की उस अवस्था का अभिप्राय जान पड़ता है जो प्रवृत्ति और निवृत्ति के मध्य भाग के भगड़ोंडडडडड के तय हो जाने पर प्राप्त होती है। इस अवस्था में कोई विशेष संघर्ष नहीं रहता, न किसी से कुछ विशेष अभिप्राय रहता है फिर भी स्वाभाविक रीति से मनुष्य सदा अपने हृदय से समस्त प्राणियों की ओर प्रेम प्रवाहित करता रहता है। वृन्दावन के बालकृष्ण का स्मरण करते ही हृदय प्रेम से गदगद हो जाता है। उनकी प्रेम लीला की ओर ध्यान ले जाइये और देखिए उनकी वंशी की मधुर तान से किस प्रकार स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता, नदी-पर्वत आदि सभी एक भाव से प्रभावित होकर आकर्षित हो जाते थे। निवृत्ति मार्ग पर आरुढ़ पुरुषों से विश्वव्यापी प्रेम के फव्वारे इसी प्रकार अपने व्यक्तित्व को भुलाकर प्रेम स्वरूप हो जाता है और प्राणिमात्र के विकास के लिए स्वाभाविक रीति से उच्च कोटि के प्रभावों को प्रवाहित करता रहता है। इसको जीव की ब्राह्मण अवस्था कह सकते हैं।

इसके बाद बौद्ध अवतार से जीवन की जिस अवस्था का मान होता है उसे ब्राह्मणावस्था का उत्तर भाग कह सकते हैं। इसके पहले की अवस्थाओं में चरित्र गठन सेवा-भाव तथा निःस्वार्थता के पाठों में जीव को प्रवीणता प्राप्त हो गई रहती है। अब उस निःस्वार्थता तथा सेवा के बाद गुप्त आभ्यन्तरिक शक्तियों के विकास का समय आता है। इस जीवन में भी मनुष्य के सामने अनेक प्रकार की बाधायें आती हैं, तरह-तरह के प्रलोभन अत्यन्त मनोहर रूपों को धारण कर सामने खड़े हो जाते हैं। जो जीव इनसे किंचित मात्र विचलित न होकर अपने लक्ष्य में एक चित्त हो लगा रहता है। वह अन्त में अनेक प्रकार के शारीरिक तथा अन्य कष्टों के सहन करने के बाद मानवीय पूर्णता प्राप्त करता है। तब वह मनुष्य की गणना अथवा दर्जे से आगे बढ़ जाता है और सच्चे महात्माओं की श्रेणी में पहुँच जाता है।

स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्यों की ये अवस्थाएं सभी लोगों के लिए व्यापक रूप से लागू हैं। हम अवतारों के जीवन से अपने जीवन संबंधी अनेक उपदेशों को निकाल सकते हैं तथा उन्हें ग्रहण करके लाभ उठा सकते हैं। अभी तक हम अधिकतर रामावतार और कृष्णावतार के जीवनों से सरोकार रखते हैं। लेकिन हमको स्मरण रखना चाहिए कि नृसिंहावतार, वामनावतार तथा परशुरामवतार के जीवनों में भी हमारे लिए जानने योग्य अनेक आवश्यक उपदेश छिपे पड़े हैं। उनके भी न जानने से हमारा अपने जीवन संबंधी ज्ञान अपूर्ण ही रहेगा इसलिए हमें उनसे भी ज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन को उन्नत करना चाहिए।

दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि सभी जीवन एक साथ किसी नीची या ऊंची श्रेणी में नहीं पहुँच सकते। आज भी जंगली अवस्था में लेकर महात्मा श्रेणी तक के जीवन मौजूद हैं। इसलिए मनुष्य मात्र के लिए एक से अधिक धार्मिक नियमों की कल्पना करना अज्ञानता का सूचक है। हमको विभिन्न श्रेणी के मनुष्य समुदायों के लिए उनकी योग्यता के अनुसार ही धार्मिक विधान का निर्माण करना उचित है जिससे वे स्वाभाविक रीति से अपना विकास कर सकें।


गायत्री उपासना के अनुभव

मुकदमे में सहायता मिली

श्री अवध बिहारी, सरैयाँ बगडौरा (बलिया) से लिखते हैं- कुछ महीने हुए मैं अपने एक मित्र के साथ उनके पक्ष की बातें सही और शुद्ध रूप में समझाने के लिए निकट के ही एक पुलिस थान में गया था। वहाँ का अधिकारी जो संभवतः किसी स्वार्थवश दूसरे पक्ष के अनुकूल था हमारे साथ अनुचित व्यवहार करने को तत्पर हो गया और उसने हमारे पाँच व्यक्तियों को हिरासत में ले लिया। मैं थाने की कोठरी में बन्द होते ही पालथी मार कर बैठ गया और गायत्री माता का जप करने लगा। बाहर पुलिस कर्मचारी रिपोर्ट लिखने बैठा और चौकीदार से मुकदमे संबंधी नाम पूछने लगा। गायत्री माता के प्रभाव से चौकीदार ने अन्य नामों के साथ एक ऐसे व्यक्ति का नाम भी रिपोर्ट में लिखा दिया जिसे मरे हुए 16-18 वर्ष बीत चुके थे। यह भेद तब खुला जब पुलिस के सिपाही उस व्यक्ति के नाम का सम्मन लेकर गये और वापस लौटकर सब हाल बतलाया। परिणाम यह हुआ कि हम लोगों की हानि कर सकने के बजाय पुलिस कर्मचारी को ही लेने के देने पड़ गये। इस प्रकार अकल्पित ढंग से सहायता मिलती देखकर हम माता को धन्यवाद देने लगे।

चोरी गया माल वापस आ गया

श्री बलराम पारधी आनन्द बिलास मोहल्ला धन्तोली, नागपुर से लिखते हैं- इसी जनवरी की 13 तारीख को रात के समय हमारे कारखाने में कीमती औजारों की चोरी हो गई। दूसरे दिन दोपहर को पता लगने पर हमने पुलिस में रिपोर्ट की और दो जगह तलाशी भी ली गई पर माल का कुछ पता नहीं लगा। मंगलमय प्रभु की लीला अपरंपार है। आज ता. 16 जनवरी को हमने गायत्री परिवार के हवन में भाग लिया और जैसे ही वहाँ से घर वापस आये कि बच्चों ने बतलाया कि घर के पीछे एक कपड़े में लपेटे औजार दिखलाई पड़ रहे हैं। पिछले 6-7 दिन में हमने चारों ओर घूमकर खूब तलाश किया था पर तब कहीं कुछ दिखलाई नहीं दिया। माता की इस कृपा के लिए हमने 24 हजार का अनुष्ठान करने का निश्चय किया है।

निराशा में आशा

श्री जानकी प्रसाद गंगबार, अमृताखास (पीलीभती) से लिखते हैं- मैंने ग्राम सेवक का फार्म भरा था और उस सम्बन्ध में ‘इन्टरव्यू’ के लिए बुलाया गया। मुझे अपना सफल होना नितान्त असम्भव लगता था तो भी माता का भरोसा करके जितनी देर वहाँ रहा गायत्री का मानसिक जप करता रहा। माता की असीम कृपा से मेरा नाम उत्तीर्ण उम्मीदवारों की सूची में आ गया।

सूखा रोग से बच्चे की रक्षा।

श्री शंकरसिंह कुशवाहा, गाँव बाढ़ (मुरैना ग्वालियर) लिखते हैं मेरे पुत्र मातादीन को सूखा रोग हो गया था। उसका बहुत सा इलाज कराया पर कोई लाभ नहीं हुआ। एक दिन पं. शंभूदयाल जी ने मुझसे कहा कि उनका संध्या करने के जल से गायत्री मंत्र पढ़ कर मार्जन करो। मैंने ऐसा ही किया और अब एक महीना के प्रयोग से उसका रोग दूर होकर स्वास्थ्य बहुत सुधर गया है और वह इधर-उधर दौड़ता फिरता है।

चोर भाग गये।

श्री महातम तिवारी ग्राम पकड़ी (बलिया) से लिखते हैं मेरे यहाँ चोरों का बड़ा समूह आधी रात के समय आया। वह कुछ हानि करने ही वाला था कि अपने एक आदमी के चिल्लाने की आवाज आई। मैंने लाठी उठाकर उनको ललकारा जिस पर वे सब भाग गये। वे मुझसे जबर्दस्त थे और मैं किसी हालत में उन सबका मुकाबला नहीं कर सकता था पर गायत्री माता के प्रभाव से हमारी रक्षा हो गई।

तीन महान संकटों से रक्षा हुई।

श्री नायव लाला शुक्ल, ग्राम करनपुर (जिला खौरी) से लिखते हैं- पिछली गर्मियों के मौसम में मैं लखनऊ में था। वहाँ पण्डितों ने मुझे बतलाया कि तुम्हारे कई ग्रह कोपित हैं, आश्विन भर में जो न हो जाय थोड़ा है। इस पर मैं एक माला के बजाय तीन माला जप करने लगा। कुछ ही समय बाद खबर आई कि बड़ी बहू साँघातिक बीमारी के कारण अस्पताल में भेजी गई है और तीसरा पुत्र 30-40 हाथ ऊंचे पेड़ से गिर गया है। मैं भाग कर घर आया। मालूम हुआ कि बहू की दशा सुधर गई है और बच्चे को भी तीन जगह साधारण चोट लगी है। मैं कुछ दिन घर ठहर कर वापस जाने वाला था कि मेरी स्त्री को मस्तक में काले सर्प ने काट खाया। प्रभु की दया से उपचार होने पर वह भी बच गई। लखनऊ के ज्योतिषी पं. प्रताप नारायण ने जो मुझसे अपरिचित थे, मुझे बतलाया कि तुम्हारे गायत्री जप के प्रभाव से ही इन तीनों की जीवन रक्षा हो गई। तब से मेरी श्रद्धा माता में बहुत बढ़ गई है।

प्रेत का भय दूर हुआ।

श्री सिद्धेश्वर लाला, ग्राम हाथीबाड़ी (उड़ीसा) से लिखते हैं मुझे कुछ समय के लिए सपरिवार एक ऐसे मकान में रहना पड़ा जो प्रेत से आक्रान्त जान पड़ता था। कुछ प्रत्यक्ष तो दिखलाई नहीं दिया पर वहाँ लड़को को भय लगना, चौंकना आदि घटनाएं वहाँ अधिक होती थी। पर गायत्री जप करने के बाद नई घटनाओं में बहुत कमी हो गई। वास्तव में माता की शक्ति के आगे सभी नतमस्तक हो जाते हैं।

नौकरी में तरक्की हुई।

श्री चीनाराम पोल्दार, बिलासपुर (म. प्र.) से लिखते हैं हमारे एक सक्रिय सदस्य श्री आनन्द मोहन वर्मा अत्यन्त निष्ठापूर्वक अपनी साधना करते हैं। इसके परिणाम स्वरूप शीघ्र ही इनकी नौकरी में तरक्की हो गई और सहकारी कर्मचारी भी विशेष सम्मान करने लगे। माता की कृपा से इनकी बतलाई बातें प्रायः ठीक ही निकल जाती हैं इससे दफ्तर के कर्मचारी इनको बाबाजी कहने लग गये हैं।

गायत्री माता की कृपा से परीक्षोत्तीर्ण हुआ।

ईश्वर शरण पाण्डेय, ग्राम बालपुर (बिलासपुर) से लिखते हैं कि इसी वर्ष मैंने नागपुर विश्व विद्यालय की एक-एक परीक्षा (संस्कृत प्रथम भाग) प्राइवेट देने का विचार किया था। प्रार्थना पत्र मैंने यथा समय भेज दिया, पर अनेक बार स्मृति पत्र भेजने पर भी विश्वविद्यालय की स्वीकृति बहुत देर से मिली। दूसरी बात यह भी थी कि मेरा स्वास्थ्य जुलाई से ही ऐसा बिगड़ा कि पढ़ाई में मन ही नहीं लगता था, और पूरी पुस्तकें भी मेरे पास न थी। परीक्षा से 10 दिन पहले नागपुर जा पहुँचा। इस आशा से कि विश्वविद्यालय के पुस्तकालय से उन पुस्तकों को प्राप्त कर देख जाऊंगा जो मेरे पास नहीं थी यह आशा पूर्ण हुई और मैंने यथा समय परीक्षा दी। आश्चर्य है कि जिन प्रश्न पत्रों की पुस्तकें मेरे पास थी वे तो कुछ बिगड़ गये और जिनकी पुस्तकें नहीं थी वे बहुत अच्छे बन गये। इस प्रकार अनेक बाधाओं के होते हुए भी गायत्री माता की कृपा से मैं परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया।

शहद की मक्खियों से रक्षा हुई।

श्री सरदार मल गौतम (कोयला कोटा) से लिखते हैं कि गत वर्ष दिवाली के अवसर पर कई स्थानीय गायत्री उपासक देवझरी के स्थान पर ऊपर की तरफ वेदी बनाकर हवन कर रहे थे। कुछ देर पश्चात् शहद की मक्खियाँ काफी तादाद में वहाँ आ गई। वहाँ कुछ व्यक्ति स्नान भी कर रह थे उन सबको मक्खियों ने काफी परेशान किया। उनके काटने से उन व्यक्तियों के शरीर खूब सूज गये। उसी स्थान पर हम सब हवन कर रहे थे, पर मक्खियों ने किसी को नहीं काटा। वैसे सैकड़ों मक्खियाँ हमारे सरों पर उड़ रही थी और बालों पर बैठ भी जाती थी। माता की ऐसी ही विलक्षण शक्ति है।

इच्छानुसार तबादला हो गया।

श्री बालकुन्द तिवारी (जबलपुर) से लिखते हैं- कि रेलवे के प्रशिक्षण से उपरान्त मेरी नियुक्ति हैदराबाद (दक्षिण) में हो गई। वहाँ भाषा की भिन्नता के कारण मैं किसी से बातचीत न कर सकता था इससे फुर्सत के समय में बराबर गायत्री उपासना ही करता रहता और कभी-कभी माता से अपने स्थानान्तर की प्रार्थना भी कर बैठता था। माता ने आदेश दिया कि दो मास में हो जायेगा। भरोसा न होते हुए मैंने अर्जी भेज दी और वास्तव में डेढ़ मास बाद ही मेरा तबादला जबलपुर क्षेत्र में हो गया।

मेरी परिस्थिति सुधर गई

श्री वीरेन्द्र प्रसाद नायक (प्रो. रोसडाघाट दरभंगा) लिखते हैं- कि जब से मैं गायत्री जप करने लगा हूँ मेरी परिस्थिति बराबर सुधरती जाती है। पहले बहुत प्रयत्न करने पर भी नौकरी नहीं मिलती थी जप शुरू करने के थोड़े समय बाद ही मेरा काम लग गया। इसी प्रकार पहले मैं बराबर अस्वस्थ रहा करता था, पर अब तन्दुरुस्ती भी बहुत कुछ सुधर गई है। ध्यान में भी मुझे शिवजी, विष्णु, गायत्री माता, सूर्य भगवान आदि किसी न किसी देवता के दर्शन सदैव प्राप्त हुआ करते हैं।

बाइसिकल पर से बचा

श्री परमात्मा प्रसाद शुक्ल, बसौदी (जिला-बस्ती) से लिखते हैं- ता. 14-7-57 को मैं खलीलाब से बाइसिकल पर आ रहा था और रास्ते में मस्त होकर गायत्री चालीस गा रहा था। ज्यों ही मैं अपने घर पहुँच कर बाइसिकल से उतरा कि अगला पहिया निकल कर दूर चला गया। मेरी रक्षा केवल माता की दया से ही हुई, अन्यथा जिस तेजी से मैं। बाइसिकल चला रहा था। उसमें अगर पहिया निकल जाता तो मेरी हड्डियाँ भी चूर-चूर हो जातीं।

खेत का रुपया प्राप्त हुआ

श्री. स्नेहराम शर्मा (रायपुर) से लिखते हैं कि- हमारी खानदानी खेती की जमीन कुछ रिश्तेदारों ने दबा ली थी और झगड़ा करने को तैयार थे। निराश होकर हमने गायत्री माता की शरण ली। तब फिर पिताजी वहाँ गये तो रिश्तेदारों ने खेत का दाम एक हजार रु. दे दिया। मेरी माता जी को हृदय का रोग हो गया था और उनका जी सदैव घबड़ाया करता था। गायत्री चालीसा का अनुष्ठान करने से बीमारी दूर हो गई।


अग्नि परीक्षा की घड़ी सामने आ गई।

अब पीछे हटना हम लोगों के लिए अशोभनीय होगा।

(श्रीराम शर्मा आचार्य)

दिन तेजी से बीतते जा रहे है और ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति के दिन तीव्र गति से निकट खिंचते चले आ रहे हैं। कार्तिक सुदी 12 के अब मुश्किल से 8 महीने रहे हैं और काम के पहाड़ ज्यों के त्यों सामने पड़े हुए हैं। 1000 कुण्डों की 101 यज्ञशालाओं में 1 लाख होताओं द्वारा 240 लाख आहुतियाँ होने का संकल्प निस्संदेह अत्यन्त विशाल है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत छोटे-छोटे कार्य भी इतने बड़े हैं कि उनको निपटाने के लिए भारी व्यवस्थाएं करनी पड़ेंगी। यज्ञशालाओं का निर्माण उनके सजाने के लिए कपड़ों पर शिक्षाप्रद वाक्य लिखना, झण्डियाँ, झालरें, चित्र, ऊपर की छाया रेल के डिब्बों के डिब्बे भरकर बाँस बल्लियाँ यज्ञ में काम आने वाले यज्ञ पात्र पंच पात्र कलश चौकियाँ यह सरंजाम जुटाना हंसी खेल नहीं है। कुण्डों का निर्माण करने के लिए हजारों मजदूर लगेंगे। एक हजार मन सुगन्धित हवन सामग्री, सैकड़ों टीन घी, हजारों मन समिधाएं यज्ञ के लिए चाहिए। यज्ञशालाओं का एक साथ नियंत्रण करने, एक साथ यज्ञ कार्य चलाने के लिए सैकड़ों यूनिटों वाले लाउडस्पीकर आवश्यक होंगे। यज्ञशालाओं को सजाने एवं प्रकाश करने के लिए भारी मात्रा में बिजली, रोज यज्ञशालाओं का सामान उठाने, रोज रखने, रोज की सफाई आदि के लिए सैकड़ों व्यक्ति रोज लगेंगे तब यह व्यवस्था बन पाया करेगी।

ठहराने और नित्य की आवश्यकताओं को पूर्ण करने का कार्य भी असाधारण रूप से कठिन है। लाखों व्यक्तियों को ठहरने की लिए तम्बू, रावटी, शामियाने, फूँस की झोपड़ी आदि की व्यवस्था मीलों के घेरे में करनी होगी। कई हजार तम्बू, रावटी तथा कुटियों में ही लाखों आदमियों को ठहराया जाना सम्भव होगा। मीलों लम्बी जमीनों की सफाई, हजारों तम्बू खड़े करना, महीनों का काम है। घण्टे भर के अंदर सबेरे और घण्टे भर के अंदर शाम को लाखों आदमियों का शौच जाने की सफाई व्यवस्था करने के लिए मेहतरों की एक फौज भर्ती करनी पड़ेगी। अन्यथा खुले स्थानों में लोग टट्टी करने लगे तो आस-पास का क्षेत्र गन्दगी से इतना भर जायेगा कि यज्ञ की सुगन्धि तो दूर मल मूत्र की दुर्गन्धि से हैजा फैलने के कारण अनेकों व्यक्तियों की मौत तथा बीमारी का कष्ट सहना पड़ेगा। पीने का पानी कैम्पों में पहुँचाना एवं स्नान की व्यवस्था का कार्य भी बहुत बड़ा है। कुओं में पम्प बिठाने पड़ेंगे तथा पानी पहुँचाने के कार्य की एक विशेष व्यवस्था करनी पड़ेगी।

तम्बुओं में नीचे बिछाने के लिए घास की पुआल की या किसी बिछावट की व्यवस्था की जाय यह प्रश्न अभी विचार क्षेत्र में ही चल रहा है। रोशनी के लिए बिजली तथा गैस बत्तियों का भारी संख्या में निवास स्थानों में प्रबन्ध करना होगा। विभिन्न प्राँतों और जिलों के तम्बू ब्लाक अलग-अलग रहेंगे। कौन व्यक्ति कहाँ ठहरा है इसका रजिस्टर रखना पड़ेगा। ताकि उनका कोई पत्र तार आवे या कोई स्वजन सम्बन्धी आवे तो उन तक पहुँचाया जा सके। ठहराने के स्थानों में चोर, उठाईगीरों से रखवाली के लिए हजारों की संख्या में पहरेदार स्वयं सेवक चाहिएं। यज्ञशालाओं में हवन करते समय एवं तपोभूमि में दर्शन को आते समय जूते बाहर उतारे जाते हैं उनको चोरी से बचाने के लिए एक बड़ी संख्या जूते रक्षक नियुक्त करने पड़ेंगे। रोज की सफाई इतने लम्बे-चौड़े क्षेत्र में यथासमय होती रहे इसका प्रबन्ध भी एक बड़ा काम है। आगन्तुकों का सामान उनके ताँगे से उतरते ही यथा स्थान पहुँचाना और जाते समय उनकी सवारी में रखने के लिए मजदूरों की एक बड़ी संख्या रखनी पड़ेगी। ऐसे अवसरों पर ताँगा, रिक्शा आदि सवारी वाले दूने-चौगुने पैसे लेते हैं। उन पर कुछ रोकथाम रखी जा सके इसका प्रबन्ध करना होगा। आगन्तुकों में से कोई अस्वस्थ हो जाय तो उसके लिए चिकित्सा की सुव्यवस्था रखनी होगी। डाक तार का एक स्वतन्त्र प्रबन्ध करने की जरूरत होगी।

भोजन व्यवस्था सभी के लिए निःशुल्क रहेगी। याज्ञिकों के लिए सतोगुणी खाद्य आवश्यक है इसलिए रोटी, दाल, चावल, कढ़ी, शाक, दलिया, खिचड़ी, सत्तू, उबले हुए चने जैसे कच्चे कहे जाने वाले खाद्य पदार्थ ही रहेंगे। पक्का भोजन पूड़ी पकवान रजोगुण और तमोगुणी श्रेणी में आता है फिर आज के युग में उसका उपयोग बहुत खर्चीला जीभ चटोरापन बढ़ाने वाला एवं एक सामाजिक भेद-भाव का कारण भी बन गया है इसलिए तपोभूमि के खाद्य कार्यक्रमों में सदा कच्चा भोजन ही चलता है। कच्चा भोजन कुछ सस्ता पड़ सकता है पर उनके बनाने की व्यवस्था पक्के भोजन की व्यवस्था से अनेकों गुणी कठिन होती है। आगन्तुक, होता, यजमानों, याज्ञिकों एवं अतिथियों के लिए ही नहीं दर्शकों के लिए भी भोजन का प्रबन्ध रहेगा। लाखों व्यक्तियों को सुबह शाम एक-एक घण्टे के अंदर भोजन करा देने के लिए कितने बनाने वाले, कितने परोसरने या कितने सफाई वाले कितनी बिछावट, कितनी सफाई व्यवस्था चाहिए? यह प्रबन्ध काफी कठिनाई का है। खाद्य पदार्थों की कितनी मात्रा में जरूरत पड़ेगी यह हिसाब लगाना बाकी है। हर चीज सैंकड़ों और हजारों मन लगेगी। भोजन बनाने की लकड़ी तथा कोयला कई हजार मन चाहिए। नमक मसाले ही एक सौ मन से ऊपर लगेंगे। भोजन कच्चा अस्वास्थ्यकर न बन जाय अन्न की बरबादी न हो इसका पूरा-पूरा ध्यान रखे बिना काम न चलेगा।

जहाँ जरूरत अधिक हो और वस्तुएं कम हों तो वहाँ हर वस्तु के दाम कुछ महंगे हो जाते हैं। पिछले 108 हवन कुण्डों के यज्ञ में जो लोग मथुरा आये थे उन्हें पता है कि जरूरत को देखकर दुकानदारों ने तीन चार आने का नारियल बारह आने का कर दिया था दस आने सेर का दही डेढ़ रुपये सेर बेचा था। आगन्तुकों के दैनिक काम आने वाली चीजें खराब और महंगी न मिलें इसके लिए दुकानदारों पर निगाह रखनी होगी। साथ ही यज्ञ के लिए आवश्यक वस्तुओं का संग्रह अभी से आरम्भ करना होगा। पत्तलें, मिट्टी के सकोरे, कुल्हड़ उसी समय खरीदे जाय तो दूना-तिगुना मूल्य लगेगा इनका संग्रह अभी से करना है।

इतनी बड़ी भीड़ का नियंत्रण करना हंसी खेल नहीं है। गत इलाहाबाद कुम्भ के मेले में थोड़ी सी गड़बड़ी हो जाने से कई सौ व्यक्ति पैरों के तले कुचल गये थे। यहाँ भी यज्ञशालाओं की परिक्रमा करने वाली भीड़ लाखों की संख्या में होगी। यज्ञकुण्डों पर पालियाँ बदलने एक पालीयाँ बदलने एक पाली उठकर जाने और दूसरी आने के समय की भीड़-भाड़ पूर्णाहुति के समय सभी को अपने नारियल होमने की उत्सुकता में आगे बढ़ने की प्रवृत्ति सभा पाँडाल में एक साथ प्रवेश एवं एक साथ उठने के अनेक अवसर ऐसे होंगे जबकि अनियन्त्रित भीड़ के कारण कोई दुर्घटना हो सकती है। उसे रोकने के लिए मजबूत स्वयं सेवक चाहिएं। जमुना स्नान को लोग प्रातःकाल जाया करेंगे उस समय नावों और डूबने की दुर्घटना न होने देने की पूरी सतर्कता रखनी होगी।

चूँकि यह इस युग का अभूतपूर्व अवसर है। साधना और श्रद्धा की कड़ी परीक्षा देकर आने वाले नैष्ठिक एवं संस्कृति पुनरुत्थान में सजीव दिलचस्पी रखने वालों एवं उस दिशा में कुछ ठोस काम करने के इच्छुक लोगों का यह एक ऐसा सजीव धार्मिक सम्मेलन है जैसा हजारों वर्षों से नहीं हुआ। यों अन्ध श्रद्धा वाली जनता की भीड़ तो हर सोमवती अमावस्या पर गंगा के किनारे इससे भी बड़ी संख्या में देखी जा सकती है। सावन के झूले तमाशे देखने मथुरा वृन्दावन में तथा गोवर्द्धन की परिक्रमा लगाने में इससे भी कहीं अधिक नरमुण्ड देखे जा सकते हैं। पर ऐसे लोग जो गायत्री और यज्ञ के तत्व ज्ञान को गहराई तक समझ चुके हैं और भारत भूमि में धार्मिक भावनाओं की प्रतिष्ठापना करने के लिए दिल में कुछ आग रखते हों कुछ कर मिटने और मर मिटने की चाह रखते हों ऐसे बीन-बीन कर संग्रह किये हुए लोग इतनी बड़ी संख्या में हजारों वर्षों से एक स्थान पर एकत्रित नहीं हुए। ऐसा महत्वपूर्ण एवं सारगर्भित सम्मेलन केवल एक अनुष्ठान पूजा-पाठ का कार्य ही होकर नहीं रह जाना है वरन् इस अवसर पर राष्ट्र को प्रकाश देने वाली ज्योति भी जलानी है। रचनात्मक दिशा में कार्य करने वाली संस्थाओं एवं प्रवृत्तियों के सम्मेलन एवं विचार कक्ष भी तत्परतापूर्वक चलाने हैं, जिनसे आगन्तुक अपने मस्तिष्क में कुछ ठोस प्रेरणाप्रद विचारधारा एवं कार्य प्रणाली अपने साथ लेकर जाये।

हिन्दू धर्म के समस्त सम्प्रदायों का एक सम्मेलन होगा जिसमें विभिन्नता के बीच एकता के बीजों को तलाश किया जायेगा। सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के लिए यह एक ऐसा सम्मेलन होगा जो कोई रचनात्मक कार्यशैली निर्धारित कर सके। नशेबाजी और माँसाहार की हानियों को जनता को समझाने और दुष्प्रवृत्तियों से उसे छुड़ाने का उपाय ढूँढ़ने के लिए अक्षमता विरोधी एक सम्मेलन किया जायेगा। वर्तमान काल की व्यापक अनैतिकता को दूर करने के उपायों पर विचार करने के लिए भी एक सम्मेलन किया जायगा। महिलाओं की जीवन प्रगति पर विचार करने के लिए महिला सम्मेलन की व्यवस्था की जायगी। साधु संत-पंडित पुरोहित कथावाचक अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को समझे इसलिए उनका एक सम्मेलन होगा। स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा एवं संयमी जीवन का प्रसार करने के लिए एक विचार गोष्ठी होगी। इस प्रकार मानव जाति की विभिन्न समस्याओं पर नैतिक एवं धार्मिक दृष्टिकोण से विचार करने उपाय खोजने, वैसा कार्यक्रम बनाने तथा विचारों को कार्यरूप में परिणत करने के लिए व्यवस्थित योजनाओं का संचालन करने के लिए उच्च कोटि के विचारक एवं प्रभावशाली कार्यकर्ता परस्पर मिलजुल कर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयत्न करेंगे।

साधना, उपासना, आस्तिकता, ईश्वर भक्ति, धर्म भावना, आध्यात्मिकता का वातावरण उत्पन्न करना इस यज्ञ का प्रधान उद्देश्य है। जप, तप, व्रत, उपवास करके आने वाले नैष्ठिक याज्ञिकों के द्वारा इतने विशाल परिमाण में गायत्री महामंत्र की आहुतियाँ दी जायेंगी। उनका प्रचण्ड आध्यात्मिक प्रभाव उत्पन्न होगा। यज्ञ में सम्मिलित होने वाले याज्ञिकों भागीदारों को तो उसका विशेष लाभ मिलेगा ही साथ ही विश्वव्यापी धर्म प्रवाह की शक्ति तरंगें भी इसके द्वारा प्रचुर परिमाण में उत्पन्न होंगी। यज्ञ लौकिक और पारलौकिक सुख शान्ति की श्रेष्ठ साधना है। देव तत्वों की तृप्ति और पुष्टि यज्ञ द्वारा होती है। आरोग्यवर्धक वातावरण तैयार करना, सूक्ष्म जगत में सदप्राण की मात्रा बढ़ाना और मानव जाति के मन क्षेत्र में सतोगुणी प्रेरणाएं उत्पन्न करना इस यज्ञ का उद्देश्य है। आध्यात्मिक विज्ञान के महान साधनों का कर्मकाण्डों का उपयोग इस यज्ञ में होगा और उन्हें सम्पन्न करने के लिए अनेकों उच्च कोटि के तपस्वी एवं सिद्ध पुरुष इस साधन को सुसम्पन्न करने के लिए कृपा-पूर्वक पधारने का अनुग्रह करेंगे।

गायत्री परिवार को एक नैतिकता आन्दोलन के लिए सुव्यवस्थित धर्म यन्त्र के रूप में भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान करने वाले सेवा सैनिकों के रूप में सुगठित करने का यह यज्ञ एक उत्तम अवसर है। ज्ञान ज्योति का प्रकाश करने के लिए जनता को धर्म शिक्षा देते रहने के लिए एक छोटे किन्तु महत्वपूर्ण धर्म संस्थान के रूप में पूर्णाहुति से पूर्व कम से कम 2400 गायत्री ज्ञान मन्दिर स्थापित किये जाने हैं। और धर्म प्रचारकों की सेना में कम से कम 2400 उपाध्याय भर्ती करने में यह ज्ञान मंदिर और उनके पुजारी उपाध्याय अपने-अपने क्षेत्र में दूर-दूर तक प्रकाश फैलाने लगें- ऐसी निश्चित योजना बनाई गई है। केवल 240 लाख आहुतियाँ ही यज्ञ में नहीं देनी है। वरन् यह सब काम भी करने हैं। गायत्री परिवार के सदस्यों की संख्या जो अभी 60 हजार के लगभग है- कार्तिक तक कम से कम दूनी सवालक्ष करनी है।

गायत्री तपोभूमि का क्रिया तन्त्र उपरोक्त कार्यों की व्यवस्था करने में लगा हुआ है। कार्य अत्यन्त कठिन और साधन अतीव स्वल्प हैं। ईश्वरीय प्रेरणा एवं प्रकाश किरणें ही इस अत्यन्त विशालकाय कार्य के पीछे एक-मात्र शक्ति है। सहयोगी कार्यकर्ता सभी शाखाओं के संचालक थोड़ा-थोड़ा प्रचार कार्य- होता यजमान बनाने का कार्य कर रहे हैं पर जिनके मन में इस युग के महानतम यज्ञ को सफल बनाने के लिए अटूट श्रद्धा भावना और सक्रियता प्रज्ज्वलित हो उठी हो ऐसे सहयोगियों की संख्या अभी अधिक नहीं है। इतने बड़े कार्य के लिए कितने प्रचुर धन की आवश्यकता पड़ेगी इसका हिसाब जोड़ने वाले लोग भौचक्के रह जाते हैं। जब उन्हें यह बताया जाता है कि अभी तक एक पैसे का भी कोई प्रबन्ध नहीं है और भविष्य में अपील करने की चन्दा माँगने की कोई योजना नहीं है और न किसी धनीमानी व्यक्ति का पीठ पर कोई हाथ ही है तो लोगों को बड़ी निराशा होती है और कई लोग हमारा मस्तिष्क सही होने में सन्देह करते हैं कई व्यक्ति इस योजना का पूरा पड़ना असंभव बताते हैं। पर वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। आर्थिक प्रबन्ध के प्रश्न को हमने ईश्वरीय प्रेरणा के प्रमाण की, अपने विनम्र संकल्प बल की और अपने स्वजनों की अन्तः श्रद्धा की कसौटी बना लिया है। इन तीनों की ही वास्तविकता की अग्नि परीक्षा करने के लिए हजार कुण्डों की यह भट्टी बनाई गई है। तीनों ही पक्षों के खरे खोटे होने की परीक्षा इस यज्ञ में भली प्रकार हो जायगी। हमारा विश्वास है कि तीनों ही पक्ष कसौटी पर खरे उतरेंगे।

तपोभूमि में जो प्रवृत्तियां स्थायी रूप से आगे चलती रहने वाली हैं उसकी सुव्यवस्था करने का कार्य भी संयोगवश इन्हीं दिनों आ पड़ा है अब और उपयोगिता की कमी सभी को खटकती थी अब उसका नये सिरे से पुनःनिर्माण कराया जा रहा है। गायत्री परिवार के अस्वस्थ परिजनों की चिकित्सा एवं स्वास्थ्य की सुव्यवस्था रखने एवं सुधारने की शिक्षा व्यवस्था के लिए जो कल्प चिकित्सालय तपोभूमि में चलाया जाने वाला है उसके लिए स्थान का अभाव था सो मन्दिर के पीछे वाले 6 कमरों को दुमंजिला में बरामदे भी रहेंगे। यह निर्माण कार्य भी इन्हीं दिनों चल रहा है। कल्प चिकित्सा के लिए आवश्यक उपकरण जुटाने एवं सेवाभावी सुयोग्य व्यक्तियों के इस कार्य के लिए ढूँढ़ने का कार्य भी साथ ही हो रहा है।

पूर्णाहुति के बाद धर्म प्रचार तैयार करने वाला संस्कृति विद्यालय तपोभूमि में फिर सुव्यवस्थित रीति से चलने लगे इसकी चिन्ता भुलाये नहीं भूलती। यह इतना महत्वपूर्ण कार्य है कि जिसके बिना राष्ट्र को धार्मिक भावना से ओत-प्रोत करना संभव न हो सकेगा। पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त जिन पर कमाने और बच्चों को खर्च भेजने का बोझ नहीं है। ऐसे सेवाभावी उज्ज्वल चरित्र लोकसेवी धर्म प्रचार का जब तक बड़ी संख्या में प्राप्त न होंगे वह प्रवृत्तियां देश में न फैलेंगी जिन्हें गायत्री माता फैलाना चाहती हैं। इसलिए ऐसी आत्माओं को ढूंढ़ने के लिए वैसी ही प्यास रहती है जैसा पपीहा को स्वाति बूँदों की। गत महायज्ञ में कुछ व्यक्तियों ने आजीवन धर्म प्रचार का व्रत लेकर आत्म दान किया था। इस बड़े यज्ञ की पूर्णाहुति में भी वैसी आत्माएं फिर मिले यह खोजबीन की जा रही है। यों बेकार घर में पड़े-पड़े सड़ने वाले अपमानित और निकम्मे जीवन व्यतीत करने वाले गृहस्थिओं की भारतवर्ष में कमी नहीं। 56 लाख साधु सन्त पंडित पुजारी मुफ्त में स्वर्ग और मुक्ति की लूट मचाने के लिए जगह जगह गिरोह बाँधे घूम रहे हैं पर धर्म एवं अध्यात्म के वास्तविक रूप से स्वयं समझने एवं संसार में विशुद्ध धर्म एवं आध्यात्म का प्रचार करने का कष्टसाध्य उत्तरदायित्व लेने के लिए उनमें से भी कोई तैयार नहीं होता। ऐसी दशा में सच्चे धर्म प्रचारक ढूँढ़ना और उन्हें सुयोग्य बनाना बड़ा आवश्यक साथ ही कठिन कार्य है। पूर्णाहुति की अन्य आवश्यकताओं के साथ-साथ हमारा मस्तिष्क निरन्तर इस भारी आवश्यकता की पूर्ति की ओर लगा रहता है।

हमारी धर्मपत्नी- माता भगवती देवी- बहुत दिनों से अपना कार्य क्षेत्र नारी समाज को बनाना चाहती हैं। जहाँ अन्यान्य प्रवृत्तियां हमारी चलती रहती हैं वह दबी जबान से किन्तु व्यथापूर्वक यह शिकायत करती रहती हैं कि “हमें चौका चूल्हें तक ही काम दिया गया है नारी जाति की सेवा करने के लिए अवसरों से वंचित रखा जा रहा है।” उसकी उत्कट भावनाओं को देखते हुए साथ ही नारी जाति के बौद्धिक उत्कर्ष के भारी महत्व को समझते हुए यह विचार उठता है कि क्यों न उसे भी सेवा क्षेत्र में प्रवेश करने दिया जाय? गृहस्थ सम्बन्धी दांपत्ति जीवन के झंझटों से हम लोग छुटकारा पा चुके फिर क्यों न उसकी शक्ति योग्यता एवं भावना का उपयोग नारी उत्कर्ष में होने दिया जाय? वह चाहती है कि नारी समाज के लिए मासिक पत्रिका निकालें। नारी जीवन की समस्याओं को सुलझाने वाला साहित्य लिखें। परिवार की 10 से 14 वर्ष तक की कन्याओं के लिए एक ऐसा गुरुकुल चलाएं जिसमें पढ़ने के बाद कन्याएं लेडी नहीं गृह लक्ष्मी बनकर निकलें। नारी चिकित्सा का एक केन्द्रीय चिकित्सालय चलाने की भी उसकी बड़ी रुचि है विवाहित महिलाओं के लिए प्रतिवर्ष श्रावण महीने में एक शिक्षण शिविर मथुरा में हुआ करे जिसमें परिवार की लड़कियाँ ससुराल से अपनी माता के घर श्रावण में जाने की जो लोकप्रथा है उसे भी पूरा कर लिया करें। मथुरा वृन्दावन के झूले तथा जन्माष्टमी का मेला भी देख लिया करें साथ ही गृहस्थ जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षा भी प्राप्त कर लिया करें। इसके अतिरिक्त गायत्री परिवारों की शाखाओं में तपोभूमि की धर्म प्रचारिकाएं भेजने और वहाँ नारियों के शिक्षण शिविर चलाने की योजना भी बड़ी उपयुक्त लगती है। ऐसी-ऐसी वह अनेक योजनाएं बनाकर रोज ही सामने रखती हैं। यों हमारे प्रति अपनी असाधारण श्रद्धा एवं पूज्य भावना के कारण वह हमें दबाती तो नहीं कि उसे चौका चूल्हे से कुछ छुट्टी दी जाय- चाहती वह अवश्य है कि उसको भी राष्ट्र माता की कुछ ठोस सेवा का अवसर मिले। उसकी इच्छा पूर्ति के लिए भी कुछ करने, कोई व्यवस्था बनाने का जी करता रहता है। इन दिनों हम सभी में भारी उत्साह और भावना प्रवाह कार्य कर रहा है। रोकते-रोकते उस बेचारी की भावना कली कहीं निराशा से झुलस न जाय इसलिए अधिक नहीं तो कुछ थोड़ा आरम्भ श्रीगणेश तो उसका भी करा देने की बात दिमाग में काम कर रही है।

एक ओर जहाँ धर्म युग लाने के बाद दैवी प्रयत्न पूरी तत्परता से चल रहे हैं। दूसरी ओर आसुरी शक्तियां इन्हें विफल करने के लिए प्राण−पण से जुट गई हैं। इस दिशा में विघ्न और असफलता उत्पन्न करने के लिए इनने कमर कसली है। परिस्थितियों के घटनाक्रम को इस प्रकार उल्टा देना जिससे प्रगति में भारी अड़चन उत्पन्न हो जाय उनका प्रधान कार्य है। जिन्हें इस अवसर पर पूरा सहयोग करना चाहिए था उनके मन में उदासीनता, आलस्य, अकर्मण्यता एवं थोड़ी बहुत कठिनाई उत्पन्न कर देना जिससे वे कुछ अधिक कार्य न कर सकें। इस असुरता का एक जबरदस्त हथियार है। इतने विशालकाय कार्यक्रम की योजना जहाँ सतोगुणी आत्माओं की प्रसन्नता का हेतु है वहाँ असुरता प्रधान लोगों के ईर्ष्या द्वेष जलन-कुढ़न का भारी कारण है वे अपनी ईर्ष्या को वाणी से नहीं निकालते वरन् कार्यक्रम को नष्ट करने के लिए वैसा ही प्रयत्न करते हैं जैसा सुबाहु, मारीच एवं ताड़का ने किया था। त्रेता में विश्वामित्र जी ने इतना ही बड़ा यज्ञ किया था उनमें निज का पराक्रम एवं तपोबल भी बहुत था किन्तु स्थिति लगभग असफलता तक पहुँच गई थी। तब विवश होकर उन्हें दशरथ के द्वार पर संरक्षण व्यवस्था की याचना के लिए जाना पड़ा था। हमारी शक्ति बहुत स्वल्प है त्रेता की अपेक्षा असुरता भी अब बड़ी प्रबल है उस युग से असुर शरीर बनाकर प्रत्यक्ष सामने आते थे, आँखों से दिखाई देने के कारण वे धनुषबाण से मारे जा सकते थे। पर आज तो वे लोगों के मनों में ईर्ष्या, द्वेष, छल, विश्वासघात, षडयन्त्र, विरोध, छिद्रान्वेषण, मिथ्या दोषारोपण आदि के रूप में गुप्त चोरों की भाँति चुपचाप आते हैं और मित्र जैसा रूप बनाकर शत्रु का काम करते हैं। यह आसुरी माया बड़ी प्रबल है। इससे निपटना हंसी खेल नहीं हैं इस प्रकार असुरता के वे सभी हथियार जो धर्म सेवा करने वालों पर भूतकाल में चले हैं। विक्रमादित्य, हरिश्चंद्र, शिवि, मोरध्वज, पूरनमल आदि को सहने पड़े हैं सहने के अवसर आये दिन सामने खड़े रहते हैं। परिश्रम के दबाव से आयु के ढलने से एवं असुरता के आक्रमणों से हारे शरीर का ढाँचा भी लड़खड़ाने लग जाता है और कई बार ऐसा संदेह होने लगता है कि यह कहीं बीच में ही पैर न पसार दे।

यह सब परिस्थितियाँ स्वजनों को भली प्रकार जान लेने की है। समय की पुकार ने, ईश्वरीय प्रेरणा ने यह उत्तरदायित्व हम लोगों के कंधे पर डाला है इस श्रेय को हम लोग अपना सौभाग्य मानें। कठिनाई तो इतने बड़े कार्यों में आनी ही चाहिए। परीक्षा तो ऐसे अवसरों पर होनी ही चाहिए। इसमें डरने, घबराने, चिन्तित या निराश होने जैसी कोई बात तो नहीं है पर सावधानी सतर्कता और तत्परता पूरी-पूरी रखनी है। असुरता के प्रत्यक्ष आक्रमण जो दुख दे सकते हैं, जो संकट उत्पन्न कर सकते हैं उससे कहीं अधिक हानि अप्रत्यक्ष आक्रमणों के द्वारा होगी। वह अप्रत्यक्ष आक्रमण होंगे। आलस्य, उदासीनता, अकर्मण्यता, कृपणता, उपेक्षा एवं असहयोग। हम चाहते हैं कि असुरता के प्रत्यक्ष आक्रमण हो उनकी शक्ति अधिक से अधिक प्राण हानि तक सीमित है पर अप्रत्यक्ष आक्रमण जो हमारे स्वजनों के शरीर में घुसकर करेंगे हमारे लिए चिन्ता का कारण है। युग परिवर्तन के इस अपूर्व अवसर पर हमारे पीठ दिखाने को भगोड़ी सेना के कप्तान की जो दुर्गति होती वही अपनी भी होनी है। ईश्वर की सौंपी हुई और सीना खोलकर स्वीकार की हुई जिम्मेदारी को छोड़कर भागना यह अपने बस की बात नहीं। ईश्वरीय इच्छा की अपेक्षा करके अपनी सुविधा की चिन्ता करना यह हम लोगों के लिए सब प्रकार अशोभनीय होगा। ऐसे अशोभनीय जीवन से तो मरना अच्छा ऐसे अवसर युगों के बाद कभी आते हैं। बार-बार किसके सामने ऐसे अवसर आवेंगे? अब हमारे सामने एकमात्र कर्तव्य यही है कि इस पूर्णाहुति के साथ-साथ धर्म युग लाने की महान प्रक्रिया के पूर्ण करने के लिए अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दें।


आपके करने के 16 आवश्यक कार्य

इन्हें भूलिये मत, नोट कर लीजिए।

मानव जाति की सोई हुई अन्तरात्मा को जगाने के लिए, विश्व में धर्म भावनाओं का मुख्य शान्तिमय वातावरण उत्पन्न करने के लिए, भारतीय संस्कृति की पुनः प्रतिष्ठान के लिए, दैवी तत्वों को परिपुष्ट करने के लिए इस युग के इस अभूतपूर्व एवं महानतम यज्ञ को सुसम्पन्न करना आवश्यक है। यह महा अभियान असफल न रहने पावे इसके लिए हम सबको अपना उत्तरदायित्व समझना होगा और कंधों पर आई हुई जिम्मेदारियों को निबाहना होगा।

जो कार्य आपको करने हैं जिनकी पूर्ति का हर समय ध्यान रखना है, जिनके लिए कुछ समय निरन्तर देते रहना है, वह यह हैं इन्हें नोट कर लीजिए इन्हें विचार क्षेत्र में उतार दीजिए। इन्हें करने में आज से ही जुट जाइए।

1- यदि अभी तक आप ब्रह्माण्ड अनुष्ठान की पूर्णाहुति के यजमान, होता या संरक्षक कुछ भी नहीं बने हैं, तो जिस श्रेणी में आपको सुविधा हो उसमें भर्ती हो जाइये। संकल्प पत्र गत अंक में छपे हुए हैं। उन्हें भरकर तपोभूमि में भेजिए और यज्ञ के नियमित भागीदार बनिये।

2- इस वर्ष गायत्री माता एवं यज्ञ पिता का संदेश घर-घर पहुँचाने का अलख जगाना यज्ञ की पूर्णाहुति इसका एक उत्तम माध्यम है। यज्ञ का समाचार पहुँचाने, होता, यजमान, संरक्षक बनाने मथुरा चलने का निमन्त्रण देने का कार्यक्रम लेकर आप अपने परिचितों के पास अपरिचितों के पास दूर-दूर तक भ्रमण कीजिए। यह धर्म फेरी वस्तुतः सच्ची तीर्थ यात्रा है।

3- धर्म फेरी का कार्य बिना प्रचार साहित्य के सम्भव नहीं। जिसके पास संदेश पहुँचाने जावें उसे इस सम्बन्ध का कुछ छपा साहित्य भी दीजिए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए तपोभूमि से अत्यन्त ही सस्ती लागत से भी कम मूल्य में 80 पुस्तकें तथा 240 परिपत्र 6 में दिये जा रहे हैं। आप इतना प्रचार साहित्य मंगा लें और धर्म प्रचार में लगें। इतने पैसे कठिन मालूम देते हों तो आधा-चौथाई जितना सम्भव हो उतना मंगा लें। कई व्यक्ति मिलकर एक सैट मंगा ले ऐसे भी किया जा सकता है। इस यज्ञ में आप धर्म फेरी तथा ज्ञान दान की दो प्रक्रियाएं किसी न किसी रूप में अवश्य ही कर लें।

4- यदि आपके यहाँ गायत्री परिवार की शाखा अभी तक संगठित नहीं है तो कम से कम 5 सदस्य बनाकर एक मंत्री नियुक्त करके अपने यहाँ शाखा स्थापित कर लें। यह संगठन भले ही छोटे हों तो भी बड़े उपयोगी सिद्ध होते हैं।

5- सामूहिक साप्ताहिक सत्संगों के क्रम अपने यहाँ चालू कीजिए। सामूहिक जप, हवन, पाठ, कीर्तन, प्रवचन आदि कार्यक्रम हर सत्संग में हों। बारी-बारी यह सत्संग सदस्यों के घरों में होते रहें। यहाँ आयोजन कम से कम खर्च में किये जाएं जिससे किसी को अर्थ संकोच के कारण अपने यहाँ सत्संग कराने में कठिनाई न हो।

6- इस बार चैत्र की नवरात्रि में सामूहिक आयोजन सर्वत्र किये जाएं। इस पुनीत पर्व पर ता. 21 से 26 मार्च तक 6 दिन मिलजुल कर सामूहिक जप अनुष्ठान, हवन, मंत्र लेखन, कीर्तन, चालीसा पाठ, प्रवचन, सत्संग आदि के आयोजन रखे जाएं। साहित्य वितरण का ब्रह्मभोजन हर उत्सव के साथ अवश्य किया जाय। जो व्यक्तिगत अनुष्ठान की अपनी साधना की सूचना हमें दे देंगे उनकी साधना में रही त्रुटियों का दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।

7- गायत्री यज्ञों और अनुष्ठानों की पूर्णाहुति के साथ-साथ कन्या भोजन कराने की परम्परा पुनः जारी कीजिए। आज ब्रह्म कर्म में परायण लोक सेवा एवं अपरिग्रही ब्राह्मण ढूंढ़े नहीं मिलते, उस कमी की बहुत कुछ पूर्ति कन्या भोजन से कराई जा सकती है। मातृ जाति के महान गौरव की प्रतिष्ठा कन्या भोज में सन्निहित है। यों बालकों में भगवान का दिव्य सत तत्व अधिक मात्रा में रहता है पर लड़के की अपेक्षा लड़कियों में तो यह दस गुना अधिक माना गया है। शास्त्रकारों ने आध्यात्मिक दृष्टि से पुत्र जन्म की अपेक्षा कन्या का जन्म दस गुणा अधिक सौभाग्यवान बताया है। कन्या भोज से ब्रह्म भोज की बहुत कुछ पूर्ति हो जाती है।

8- गर्मियों में अध्यापकों की, किसानों की छुट्टियां होती हैं। परिवार के सभी अध्यापकों से प्रार्थना है कि वे यह समय अपने क्षेत्र में धर्म-फेरी लगाने एवं सामूहिक यज्ञानुष्ठान करने में लगावें। दूसरे अन्य लोगों को जब भी जो समय मिले वह समय एक संगठित पार्टी बनाकर भ्रमण करें। यों अपने रोज के समय में से तो कुछ समय इस कार्य के लिए देना ही चाहिए पर कुछ दिन तो पूर के पूरे केवल इसी कार्य के लिए लगाने का संकल्प करना चाहिए।

9- पूर्णाहुति पर जब आप मथुरा आवें तब अपने क्षेत्र के उन लोगों से जो मथुरा नहीं आ सकते उनसे मंत्र लेखन की श्रद्धाँजलियाँ साथ लावें। अभी यह प्रयत्न करें कि कम से कम 1000 मंत्रों की कापियाँ अधिक से अधिक लिखाई जाय। उदार सज्जन अपने आप से भी कापियाँ बाँट सकते हैं। प्रयत्न यह किया जाय कि 1-1 हजार मंत्रों की 24 कापियाँ मथुरा आने वाले होता, यजमान इस क्षेत्र से संग्रह कराके लावें। एक व्यक्ति बहुत संख्या में लिखे इसकी अपेक्षा अनेक व्यक्तियों से लिखने का अधिक महत्व माना जायगा।

10- गर्मियों में किसानों का अवकाश रहता है इसलिए उन दिनों बड़े सामूहिक यज्ञों का आयोजन आसानी से किया जा सकता है। पर उनमें हमें बुलाने का आग्रह न किया जाय। क्योंकि जो विशाल योजनाएं पूरी करने को पड़ी हैं उन्हें पूरा करने में बाहर जाने से भारी अड़चन पैदा होती है। मथुरा से प्रचारक लोग, हवन कराने वाले ब्रह्मचारी आदि भेजने की व्यवस्था की जा सकती है। शुद्ध शास्त्रोक्त विधि से बनी हुई बाजार की अपेक्षा कहीं सस्ती हवन सामग्री भी तपोभूमि से मिल सकती है।

11- यों हिन्दू घरों में न जाने किस-किस अगड़म-बगड़म में मसखरे और बहरूपियों को खिलाने में ढेरों पैसा खर्च होता है और उसे धर्म या दान मान कर झूठा मन संतोष कर लिया जाता है। अब यह आदत भी पैदा करनी है कि दान के लिए कुछ भी खर्च करने के साथ-साथ हम यह सोंचे कि यह दान किस कार्य के लिए किया जा रहा है किस व्यक्ति को दिया जा रहा है। वह कार्य या व्यक्ति लोकहित की दृष्टि में उपयोगी है या नहीं? यदि दान सत्परिणाम उत्पन्न करने वाले कार्य के लिए लोकहित के सत्कार्य में प्रवृत्त व्यक्ति के गुजारे के लिए दिया गया है तो ही वह वास्तविक दान है। अन्यथा इन कसौटियों पर खरा न उतरने वाला दान वस्तुतः अपव्यय है। इस मान्यता के साथ-साथ परिवार का हर व्यक्ति अपने जीवन में कुछ दान करते रहने की एक प्रवृत्ति बनावे।

12- उपवासों से बचाया हुआ अन्न जमा करके आचार्य जी एवं तपोभूमि को अपने घर का एक सदस्य मानकर उनको एक टुकड़ा रोटी का या एक-दो पैसा रोज देने के ख्याल से कुछ न कुछ नित्य देने की आदत डालनी चाहिए। यह संग्रह न तो मथुरा भेजना है और न किसी व्यक्ति या संस्था को देना है इस पैसे का साहित्य मंगाकर अपने घर में “गायत्री ज्ञान मन्दिर” स्थापित करना चाहिए। उस साहित्य को स्वयं पढ़कर दूसरों को पढ़ाकर ब्रह्म विद्यालय चलाना चाहिए। वितरण के लिए प्रचार साहित्य मंगाना चाहिए। अन्न दान की अपेक्षा ब्रह्म दान का महत्व सौ गुना अधिक है। मानव जाति की भावनाएं विचार भूमिकाएं बदलने का जो महान कार्य करना है उसका मूल आधार यह ब्रह्मदान ही होगा। प्रत्येक सदस्य के घर में उसी दान धर्म के आधार पर नियमित रूप से साहित्य पहुँचता रहेगा। घर में एक अच्छे पुस्तकालय की स्थापना हो उससे घर के पड़ोस के सभी लोग उठावेंगे तथा समय-समय पर जो वितरण साहित्य आया करेगा उससे अगणित लोगों को दिमाग सुधरेंगे। ज्ञान दान की यह नियमित पुनीत प्रक्रिया चलाई ही जानी चाहिए।

13- गायत्री ज्ञान मन्दिर की स्थापना आपके घर में होनी ही चाहिए। गायत्री और यज्ञ का तत्व ज्ञान बताने वाली चार-चार आना मूल्य की 52 पुस्तकें अब छपकर तैयार हैं उनका मूल्य 13 है। अपनी पूजा के स्थान पर यह साहित्य भी स्थापित किया जाय और लोगों के पास जाकर उनमें रुचि उत्पन्न करके यह साहित्य पढ़ाया जाए। ज्ञान मन्दिर के भीतर टाँगने के लिए पुस्तक साइज के 14 आदर्श वाक्य भी गायत्री छपाई के साथ कार्ड बोर्ड पर छापे गये हैं। इनका मूल्य 1 है। गायत्री ज्ञान मन्दिरों की स्थापना इस प्रकार कुल 14 में होती है। यह केवल पूजा मात्र होने वाले देवताओं से अधिक महत्व की है। आप अपने घर में ज्ञान मन्दिर अवश्य स्थापित करें। एक साथ न बन पड़े तो आधा-आधा साहित्य दो बार में मंगा ले। सम्भव हो तो चैत्र की नवरात्रि के पुनीत पर्व पर अपने घर में गायत्री ज्ञान मन्दिर की स्थापना कर लें।

14- इस वर्ष के अपने निज के अत्यन्त आवश्यक कार्यों में ही ब्रह्म अनुष्ठान की पूर्णाहुति को भी आवश्यक कार्य समझें और उसके सम्बन्ध में निरन्तर ध्यान रखें जो कार्य सामने हैं उनमें आप क्या सहयोग कर सकते हैं क्या भार वहन कर सकते हैं यह विचार करें। बन पड़े तो करने लग जावें। यह प्रतीक्षा न करें कि मथुरा से अमुक कार्य करने के लिए कोई खास व्यक्तिगत अनुरोध नहीं आया है तो हम क्यों झंझट में पड़ें। यह पंक्तियाँ ही प्रत्येक परिजन के लिए व्यक्तिगत अनुरोध है।

15- पूर्णाहुति से कुछ पूर्व मथुरा आने और यहाँ की विशाल व्यवस्था में हाथ बंटाने के लिए समय निकालने की अभी से योजना बनाते रहें॥

16- अखण्ड ज्योति इस संस्था की वाणी है। तपोभूमि की कोई भी योजना सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी आवाज अधिक लोगों तक पहुँचे। अधिक लोग उससे सम्बन्धित रहें। यह प्रक्रिया अखण्ड ज्योति की सदस्यता से ही सम्भव है। आप यह प्रयत्न करें कि आपके क्षेत्र में अखण्ड ज्योति के अधिक से अधिक ग्राहक बनें। जिनके यहाँ अखण्ड ज्योति आती है उसे पढ़ने का लाभ अधिकाधिक लोग उठावें। स्मरण रहे अखण्ड ज्योति के प्रसार के बिना- गायत्री प्रचार से लेकर साँस्कृतिक पुनरुत्थान तक कोई भी अपना कार्यक्रम पूरा नहीं हो सकता। इस जड़ को सींचने का ध्यान रहे अन्यथा जड़ सूखने पर अपने कार्यक्रमों में पत्र पल्लव फल प्रभृति के कोई भी सत्परिणाम उपलब्ध न हो सकेंगे।

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अहमदाबाद में ता. 1, 2, 3, 4 फरवरी को पारसी अग्यारी के पीछे मैदान में 24 कुण्डों का विशाल गायत्री महायज्ञ बड़े उत्साह के वातावरण में सम्पन्न हुआ। अहमदाबाद की जनता में इस यज्ञ के लिए अपूर्व उत्साह था। श्रीस्वामी ब्रह्म स्वरूपजी महाराज तथा पं. ज्वालाप्रसाद जी शास्त्री ने यज्ञ कार्य शास्त्रोक्त विधि-विधान के साथ सम्पन्न कराया। मथुरा से श्री आचार्य जी पधारे थे उनका विशाल जुलूस निकाला। गुजरात प्रान्त की शाखाओं का सम्मेलन भी हुआ।

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धर्म प्रेमियों के सत्प्रयत्न

पयागपुर (बहराइच) में बसन्त पंचमी के दिन गायत्री शाखा का तृतीय वार्षिक उत्सव धूमधाम से मनाया गया। इसमें बहराइच रुकनापुर गोंडा बलराम की गायत्री शाखाओं के सदस्यों ने सम्मिलित होकर 2400 आहुतियों का यज्ञ किया। सौ सवा सौ सदस्यों का ब्रह्मभोज हुआ और चालीसा तथा ब्रह्माण्ड अनुष्ठान सम्बन्धी साहित्य बाँटा गया। यज्ञ के तीसरे दिन वर्षा भी हुई जिससे सबको अत्यन्त प्रसन्नता हुई।

देशराज पाठक।

जिला रामपुर (उ. प्र.) में गायत्री प्रचार को व्यापक बनाने के लिए शाखा मिलक में 16 जनवरी को सदस्यों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसमें जिले में 24 शाखाएं और 108 होता महायज्ञ के लिए बनाने का संकल्प किया गया। श्री बाबूलालजी सक्सेना श्री मोहन जी व सुधाकर जी शास्त्री उत्साह से कार्य कर रहे हैं।

-चमनलाल सूरी।

पलस्थ्या (बैतूल म. प्र.) में बसन्त पंचमी के अवसर पर हनुमान जी मन्दिर पर भजन कीर्तन किया गया और पश्चात् उसी स्थान पर 1200 आहुतियों का हवन तथा 100 व्यक्तियों का भोज व कन्या भोज भी हुआ। श्री परमराम डोंगरे तथा श्री मारोतीराव खासदेव पटवारी के गायत्री महिमा पर भाषण हुए।

-पं. रा. डोंगरे।

खेडिया तथा पान्सेमल (निमाड) में बसंत पंचमी पर नवीन गायत्री शाखाएं स्थापित की गई मंत्री भाई शंकरलाल शर्मा व महेशनारायण जी शुक्ल संगठन का कार्य सुचारु रूप से चला रहे हैं।

-राधेश्याम गुप्त।

बम्हनी बाजार (बिलासपुर) में बसंत पंचमी पर कीर्तन मण्डली द्वारा जुलूस निकाला गया और मन्दिर में 2500 आहुतियों का यज्ञ बड़े समारोह से किया गया। श्री केदारनाथ जी शर्मा का रामचरित मानस पर प्रवचन हुआ। इस कार्य में लखनलाल स्वर्णकार ने काफी सहयोग किया।

-मोहनलाल गुप्ता।

लखनऊ में पेशवाग, आर्यनगर व सदर बाजार की तीन शाखाओं ने मिलकर बसंत पंचमी पर सोधी पार्क सदर बाजार में 5 कुण्डों में 24 हजार आहुतियों के हवन किया जिसके आचार्य पं. बनवारीलाल जी शास्त्री थे। शाम को पं. लोकनाथ जी रुद्र एम. ए. व सन्त धर्मनारायण आदि विद्वानों के प्रभावशाली प्रवचन हुए। श्री मदनमोहनजी शुक्ल ने 51, बनवारीलाल जी शास्त्री ने 50, देश राज जी ने 50, लक्ष्मीनारायण जी ने 10 व गिरधारी लाल जी ने 10 महायज्ञ के होता व यजमान बनाने का संकल्प किया है।

-मदनमोहन शुक्ल।

हड्डा (हरदोई) में ता. 25, 26, 27 जनवरी को 5 कुण्डों में 24 हजार आहुतियों का यज्ञ श्री भागीरथी जी सिद्धान्त शास्त्री के आचार्यत्व में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। आस-पास के ग्रामों से सैकड़ों की संख्या में जनता ने भाग लिया। मथुरा के महायज्ञ के लिए 85 सदस्य व 17 होता बने। इस यज्ञ को सफल बनाने में श्री हनुमानशरण जी राम आश्रय जी त्रिपाठी, शांतिस्वरूप जी, भगवान सिंह जी का परिश्रम सराहनीय रहा। अनेक धर्म प्रेमियों ने नवीन शाखाएं व महायज्ञ के होता बनाने का संकल्प किया।

-चमनलाल सूरी

सीसवाली (कोटा) में ता. 18 जनवरी से 20 तक महावीर जी के मेले में गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें शम्भूसिंह जी हाडा का प्रभावशाली प्रवचन हुआ। पं. रामकुमार जी ने गायत्री प्रचार का सिनेमा दिखाकर जनता को प्रभावित किया। यज्ञ में 11, 676 आहुतियाँ दी गई और 101 कन्याओं को भोजन कराया गया।

- रामचन्द्र गुप्ता।

दिगौड़ा (टीकमगढ़) में बसंत पंचमी पर श्री भुवनेश्वर महादेव के स्थान पर 24 हजार आहुतियों का गायत्री महायज्ञ विधिवत सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर मथुरा तपोभूमि से योगेन्द्रनाथ जी ब्रह्मचारी व कृपाशंकरजी पधारे। जिनके बड़े प्रभावशाली आदेश हुए। टीकमगढ के प्रसिद्ध वकील श्री पन्नालालाजी, झाँसी के श्री गिरिजासहाय जी खरे और गनेशगंज के श्री जगतराम पन्तोर ने भी यज्ञ में भाग लिया।

-बैजनाथप्रसाद सोनकिया।

तुकला (कालाहान्डी, उड़ीसा) में ता. 22 जनवरी को श्री विनायप्रसाद जी शर्मा होता का आगमन हुआ। आपकी प्रेरणा से यहाँ एक नवीन शाखा की स्थापना की गई है।

-श्रीमनराखनलालाल साव।

भौरासा (देवास म. प्र.) में भंवरनाथ जी महादेव के मेले में ता. 11 फरवरी को गायत्री महायज्ञ ब्रह्मचारी श्री कृष्णानन्द जी उपाध्याय के आचार्यत्व में हुआ। ता. 17 को जल यात्रा निकाली गई।

-बी. के. जायसवाल।

नदियाल (भालावाड़ राजस्थान) में श्री शम्भूसिंह जी के आगमन पर 5616 आहुतियों का हवन व 101 कन्याओं का भोज कराया गया। ग्राम निवासियों ने पूर्ण सहयोग दिया।

-ताराचन्द शर्मा।

घढोत (भालावाड) में श्री रामवल्लभजी महाराज की अध्यक्षता में 1500 आहुतियों का हवन किया गया। रामगंज मण्डी गायत्री परिवार, लशकर (ग्वालियर) की गायत्री परिवार शाखा की ओर से जनवरी में धूमधाम से वार्षिकोत्सव मनाया गया, जिसमें सामूहिक हवन व चालीसा पाठ की योजना की गई। पं. भीष्म गुरु की अध्यक्षता में एक गायत्री ज्ञान मन्दिर की स्थापना की गई। गायत्री परिवार के एक सदस्य श्री कृष्णगोपाल जी स्वस्थ अवस्था में गायत्री साधना करते-करते स्वर्गलोक सिधार गये। परिवार के सब सदस्यों ने एकत्रित होकर उनकी आत्मा की शाँति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।

- मुरलीधर डंडोतिया।

जतारा (टीकमगढ़) के गायत्री संग की ओर से ता. 14 जनवरी को एक सामूहिक हवन किया गया और कार्यकर्ताओं का निर्वाचन भी हुआ।

-गंधर्वसिंह गौर, मंत्री।

शुकलाहरी (ग्वालियर) में 2 फरवरी को एक सामूहिक यज्ञ का आयोजन डबरा मण्डी की राइस मिल के मैनेजर श्रीलीलापत द्वारा किया गया जिसमें सैकड़ों नर-नारियों ने भाग लिया। ब्रह्माण्ड अनुष्ठान की पुस्तकें, गायत्री चित्र, चालीसा आदि वितरण किये गये। शाखा की स्थापना की गई जिसके मंत्री श्रीरामसुन्द चतुर्वेदी निर्वाचित हुए। इस आयोजन की सफलता में कुँजबिहारीलालजी श्रीवास्तव, कालीचरण शर्मा, वैद्यजी, उपाध्यायजी सिगोरियाजी अध्यापकजी आदि से विशेष सहयोग प्राप्त हुआ

-द्वा. प्र. बडेरिया।

पतरी (फतेहपुर उ. प्र.) में 2400 आहुतियों का हवन बड़े समारोह से हुआ। परिवार के सदस्यों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है।

-शम्भूसिंह शाखा मंत्री।

आटौन (कोटा) में 22 से 25 जनवरी तक विशद गायत्री महायज्ञ सानन्द समाप्त हो गया। ता. 24 को आचार्यजी मथुरा से पधारे जिनका अपार जन समूह ने बाजे गाजे के साथ स्वागत किया। आचार्य जी व स्वामी प्रेमानन्द के महत्वपूर्ण प्रवचन हुए। महिलाओं का विशेष हवन श्री अनसूया देवी जी ने कराया। आचार्य जी ने कई उपासकों को दीक्षा दी। समारोह में लगभग 5 हजार गायत्री प्रेमियों ने भाग लिया 50 का गायत्री साहित्य वितरण किया गया।

-रामचन्द्र विजय अन्ताना।

ग्राम लाटा (बिलासपुर) के गायत्री भक्तों द्वारा नौ दिन तक ‘रामचरितमानस’ का अखण्ड पाठ किया गया। अन्तिम दिन हवन व कीर्तन हुआ।

-गोशिकप्रसाद।

बिजौली (फतेहुपर) के गायत्री उपासकों ने मकर संक्रान्ति के अवसर पर सामूहिक अखण्ड रामायण पारायण किया।

-रामसनेही वर्मा।

खूड (राजस्थान) में 19 से 21 मई तक गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया है। गायत्री पुस्तकालय भी शीघ्र ही स्थापित होने वाला है। सभी सदस्य मनोयोग से गायत्री प्रचार का कार्य कर रहे हैं।

-रामगोपाल वैद्य

फत्यापुर (निमाड) में श्री रूपचन्द की कुटी पर जपानुष्ठान के बाद 3200 आहुतियों का यज्ञ किया गया और सब साधकों को प्रीतिभोज कराया गया। श्री रूपचन्द जी ने प्रति मास ऐसा ही आयोजन करने का संकल्प किया है। आचार्य का कार्य श्री मुकुन्दरामजी पारसाई ने किया। श्री रूपचन्द वाला जी व श्री रामभाऊ मंडलोई ने सराहनीय सहयोग दिया।

- लक्ष्मण चौहान।

बड़ेसरा(अलीगढ़) में 16, 17 ,18 अप्रैल को 25 हवन कुण्डों के यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। समीपवर्ती सभी यज्ञ प्रेमियों से पधारने की प्रार्थना है। बड़ेसरा आने के लिए अतरौली रोड स्टेशन पर उतरना होता है।

-अमर सिंह।

शाजापुर (ग्वालियर) में नित्यानन्द मण्डली की ओर से गायत्री यज्ञ आगामी अक्षय तृतीया को किये जाने का आयोजन किया गया है।

-सी. जी. सोती।

खानपुर में मकर संक्रांति को 5 कुण्डों में 3250 आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया गया तथा 125 चालीसा पाठ किये गये। तपोभूमि से आये परिपत्र सुनाये गये सदस्यों से यजमान व होता बनने की प्रेरणा की गई। श्री बिहारीलाल चतुर्वेदी तथा श्री मूलचन्द जी अध्यापक के गायत्री महिमा पर भाषण हुए।

-नाथूराम शर्मा गौतम।

पगढाल मठ (सिवनी मालवा) में रामायण पारायण व गायत्री हवन सम्पन्न किया गया। श्री बैजनाथ शर्मा ए.डी.आई.एम. श्री कृपाराम सिद्धान्त शास्त्री, श्रीरामगोपला तिवारी ने गायत्री माता की महिमा पर प्रकाश डाला। आगामी मई में 108 होताओं का वृहत यज्ञ करने का निश्चय किया गया है। उपरोक्त आयोजन पं. रामकृष्णजी व्यास व पं. गोवर्धन भट्ट की अध्यक्षता में हुआ।

-मूलचन्द वर्मा।

पटौद में माघ पूर्णिमा को सामूहिक हवन किया गया और काँकेर से गायत्री माता का एक बड़ा चित्र लाकर बस्ती भर में उसका बाजे गाजे के साथ जुलूस निकाला गया। यह चित्र काँकेर हाई स्कूल के ड्राईंग मास्टर श्री जीवनलाल श्रीवास्तव ने बनाकर दान स्वरूप दिया था। वे स्वयं गायत्री माता के बड़े भक्त और उपासक हैं। श्री रामलाल जी ने अपनी तरफ से प्रीति भोज कराया।

-मा.मा. दास कश्यप।

पाली (फाँसी) में नीलकण्ठ महादेव के मंदिर पर सामूहिक हवन किया गया। नवीन सदस्य बनाकर गायत्री शाखा की स्थापना की गई। दूसरा हवन श्री रघुनाथसिंह जी के स्थान पर किया गया। दोनों कार्यक्रमों में श्री प्रभूदया श्रीवास्तव का सहयोग सराहनीय रहा।

-शाखा मंत्री।

उदयपुर के नाहर नगर में महलों में महात्मा भगवानजी की प्रेरणा से एक विशाल गायत्री यज्ञ हुआ जिसका आयोजन वहाँ के हाकिम श्री केशरसिंहजी द्वारा किया गया। यजमान का स्थान जनसेवा नेता श्री भवानीशंकर वैद्य ने ग्रहण किया। इस यज्ञ में बहुसंख्यक जनता सम्मिलित हुई और बहुसंख्या व्यक्तियों ने गायत्री जप का संकल्प किया।

-एक गायत्री उपासक।

जोधपुर की गिरदावलों की गली में गायत्री शाखा की स्थापना की गई है जिसकी ओर से प्रति मास एक हवन किया गया है। मथुरा के महायज्ञ के लिए होता व यजमान भी बनाये जा रहे हैं।

-हंसराज मालपाणी।

राजपुर (निमाड) में बसन्त पंचमी का गायत्री यज्ञ श्रीकृष्ण तारे के गृह पर किया गया। आरती के पश्चात् गायत्री ज्ञान चर्चा हुई और प्रसाद वितरण किया गया।

-मंत्री गायत्री परिवार

ढकियारघा (शाहजहाँपुर) में 2 फरवरी को 5800 आहुतियों का गायत्री यज्ञ श्री चमनलालाजी सूरी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। शाम को आरती, भजन कीर्तन आदि हुए। गायत्री साहित्य व प्रसाद वितरण किया गया। इस कार्य में श्री प्रेमप्रभा देवी का विशेष सहयोग हुआ।

-धमेन्द्रसिंह अध्यापक

बेसंडी (फतेहपुर) में माघ पूर्णिमा को श्री. कृष्णपाल तिवारी के गृह स्थित हनुमान जी के सामने 1720 आहुतियों का हवन हुआ। मथुरा के महायज्ञ को सफल बनाने के लिए सब सदस्यों से आग्रह किया गया।

-सत्यव्रत विद्यारत्न।

नगला मक्कल (फर्रुखाबाद) में श्री छक्कूलालजी के यहाँ 800 आहुतियों का हवन क्रिया गया जिसमें श्री रामप्रकाश बनवारीलाल हेतराम तथा राधेश्यामजी आदि सज्जनों ने उत्साह से भाग लिया। दूसरा यज्ञ में श्री लालाराम के यहाँ हुआ जिसमें श्री जसकरन, जागेश्वर प्रसाद तथा रामशंकर मिश्र आदि ने सराहनीय कार्य किया।

-छोटेलाल मिश्र।

सादुल्लापुर (हरदोई) में माघ पूर्णिमा को 3 हजार आहुतियों का हवन और ब्रह्म भोज किया गया उसी दिन श्री रामकृष्ण अग्निहोत्री के यहाँ भी गायत्री हवन किया गया।

-मदनगोपाल शुक्ल।

छहरटा (अमृतसर) में श्रीमती सुयश जी के घर पर गायत्री हवन का कार्यक्रम बड़े उत्साह से सम्पन्न हुआ।

-विमल

लखनादौन (सिवीन म. प्र.) में ता. 9 फरवरी को गायत्री प्रचार मण्डल द्वारा श्री डालचन्द्र जी गोल्हरनी के घर पर स्थापित शंकरजी के मन्दिर पर 3 हजार आहुतियों का हवन किया गया। यहाँ पर गायत्री मन्दिर स्थापित करने के लिए श्री महादेव प्रसाद जी तिवारी और पं. कन्हैया लाल जी तिवारी प्रयत्न कर रहे हैं।

-इमरत लाल गोल्हानी।

नाँद घाट (दुर्ग म. प्र) में 30 मार्च से 3 अप्रैल तक 24 लाख जप व 24 कुण्डों में दशाँश हवन का आयोजन किया गया है।

-स्वामी देव्यानन्द सरस्वती।

ढेलवा डोंगरी (बिलासपुर) में धर्म मेला के नाम से वृहत यज्ञ ता. 31 जनवरी से ता. 4 फरवरी तक सम्पन्न हुआ। पूर्णाहुति के दिन दूर-दूर के दर्शकों और भक्तों ने सहयोग दिया। अनेक गायत्री भक्तों ने इस धर्म मेले को प्रतिवर्ष करने का परामर्श दिया है।

-ताराचन्द शाखा मंत्री।

हर्दी (बहराइच) में प्रमोद कुँज की गायत्री शाखा के प्रयत्न से अन्नराम मित्र के यहाँ सवा लक्ष का जप होकर सवा सहस्र आहुतियों का हवन हुआ।

-शिवप्रसाद शुक्ल।

पुसावली (बदायूँ) में 16 जनवरी को श्री बेगनदास के यहाँ 26 ता. को श्री रामप्रसाद के यहाँ और 2 फरवरी को श्री उलफतसिंह के यहाँ सामूहिक गायत्री हवन कराये गये।

-गायत्री प्रसाद गुप्त।

श्राघोगढ़ में सुश्री प्रेमवती गोयल के प्रयत्न से महिला शाखा का निर्माण किया गया है जिनकी तरफ से 2 फरवरी को सामूहिक हवन सम्पन्न किया गया।

बाबूलाल गोयल।

शाहजहाँबाद (बदायूँ उ. प्र.) में पुसावली प्रचार का कार्य जोरों से हो रहा है। बसन्त पंचमी पर हवन किया गया जिसमें जनता ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

-गंगाचरन शर्मा।

बोरलाय (निमाड) में श्रीमणिशंकर जी के स्थान पर सामूहिक हवन सब सदस्यों ने मिलकर किया।

-शाखा मंत्री।


अन्तरात्मा की होली


अन्तरात्मा की होली (Kavita)

ये उड़े-उड़े-से रंग कि ये चेहरे उदास,

यह फीकी-सी मुसकान, मलिन अनमने गान।

क्या ऐसे भी त्यौहार मनाया जाता है?

तन डूब रहा सागर में, तट पर खड़े प्राण!

ऐसा भी कोई रंग घेल कर ले आओ;

जो तोड़ देह की दीवारें पहुँचे भीतर,

अन्तर की अनब्याही साधों को नहला दे-

जी उठे प्राण फिर जिसका गीलापन पी कर!

जो तिरे नहीं केवल काया की फिसलन पर,

रम कर शोणित में मुक्त शिराओं में लहरे,

जो पहुँचे आत्मा की अथाह गहराई तक-

जो सतह नहीं, छू सके हृदय के तल गहरे।

रंगों के सागर-बीच हमें जो डुबो रहे,

शायद उन को इस परम सत्य का ज्ञान नहीं,

तन से भी ज्यादा मलिन हमारा अन्तर है-

मैना है आँसू भी, केवल मुसकान नहीं।

रंगों की वह बरसात बाँध कर ले जाओ,

जीवन का सारा रूप नया-सा कर जाए,

उजलाए जिस में सिर्फ घुमैला गात नहीं-

जिस में घुल कर पूरा व्यक्तित्व निखर जाए।

वह रंग, एक-सी शक्ल सभी को जो कर दे,

वह रंग कि सब को एक सरीखा भिगो सके,

जो सूख न जाए नफरत की लपटें छू कर-

बन कर दुलार जीवन का कण-कण डुबो सके।

वह रंग, गुलाबी कर दे हर कुम्हलाया तन,

वह रंग, हृदय के मुरझे अंकुर को जल दे,

वह रंग, शुष्क मुसकानों को कर दे मधुमय-

वह रंग कि फीकी हँसियों पर शोखी मल दे।

अब धुँधले अन्धकारमय घर के द्वार खोल,

सब को प्रकाश में बाहर आना ही होगा,

अपना कालुष्य छिपा कर रख न सकोगे तुम-

यह तो होली है दोस्त, नहाना ही होगा।

*समाप्त*

-: श्री बालस्वरूप ‘राही’ :-