कंटकों को फूल कर दूँ

(श्री विनोद रस्तोगी)


कंटकों को फूल कर दूँ (Kavita)

शान्ति के मादक स्वरों में क्यों न हाहाकार भर दूँ? सृष्टि के स्वर्णिम कलश में प्रलय का संहार भर दूँ?

आग भर दूँ कण्ठ में पिक के पिकी के गान छूटें। सभ्यता के जीर्ण तन पर क्यों न मैं अंगार धर दूँ?

रिक्त कर दूँ सागरों को ध्वंस सारे कूल कर दूँ। धूल को पर्वत बना दूँ, पर्वतों को धूल कर दूँ॥

क्रान्ति के जय घोष से मैं आज इन्द्रासन हिला दूँ। फूल को कंटक बना दूँ, कंटकों को फूल कर दूँ॥

तोड़ लाऊँ तारकों को, दिनकरों को चूर कर दूँ। और बसुधा को सुधाकर की सुधा से पूर कर दूँ॥

नील नभ के दिव्य उन्नत भाल को पल मात्र में ही। युग चरण पर सिर झुकाने के लिए मजबूर कर दूँ॥

नोंक से संगीन की इतिहास के अक्षर बदल दूँ। क्रान्ति के भैरव स्वरों में शान्ति के मृदु स्वर बदल दूँ॥

नियत की गति ही बदल दूँ, चन्द्र बदलूँ, सूर्य बदलूँ। यदि कहो तो विश्व का मैं आज विश्वम्भर बदल दूँ।


अध्यात्म ही एकमात्र सत्य धर्म है।

(स्वामी विवेकानन्दजी)

मैं पूर्व और पश्चिम के अनेक देशों में घूमा हूँ- संसार के सम्बन्ध में मैंने कुछ अनुभव प्राप्त किया है। मैंने देखा है कि सभी जातियों का एक-एक आदर्श है-वही उस जाति का मेरुदण्ड स्वरूप है। किसी-किसी जाति में राजनीति ही की प्रधानता है, कोई जाति सामाजिक उन्नति की ओर झुकी हुई है, और कोई मानसिक उन्नति में लगी है। किसी जाति में जातीय जीवन का आधार इन सबसे भिन्न कुछ और ही है। हमारे देश भारतवर्ष के जातीय जीवन का मूल आधार ‘धर्म’ है- एकमात्र धर्म है। यही हमारे जातीय जीवन का मेरुदण्ड है, इसी पर हमारा जातीय जीवन रूपी प्रासाद खड़ा है।

आज हजारों वर्षों से धर्म ही भारतीय जीवन का आदर्श रहा है। सैकड़ों शताब्दियों से भारत की वायु धर्म के महान् आदर्श से परिपूर्ण है, हम लोग इसी धर्म के आदर्श में पाले-पोसे गये हैं। इस समय यह धर्म भाव हमारे रक्त में मिल गया है, हम लोगों की धमनियों में रक्त के साथ प्रवाहित हो रहा है। वह हमारा स्वभाव-सा बन गया है, हमारे दैनिक जीवन का एक अंग-सा बन गया है। क्या तुम गंगा को उसके उद्गम स्थान हिमालय में वापिस ले जाकर उसे नये प्रवाह में प्रवाहित करने की इच्छा करते हो? अगर यह सम्भव भी हो, तो भी इस देश के लिये धार्मिक जीवन छोड़कर राजनीति अथवा और किसी प्रकार का जीवन अपनाना संभव नहीं। थोड़ी सी बाधा होने पर ही मनुष्य कार्य की ओर प्रेरित होता है- भारत के लिये धर्म ही वह बाधा हैं। इसी धर्म-पथ का अनुसरण करना ही भारत का जीवन है- यही भारत की उन्नति और उसके कल्याण का एकमात्र मार्ग है।

अन्य देशों में तो भिन्न-भिन्न आवश्यक वस्तुओं में से धर्म को भी एक वस्तु मान लिया जाता है। उदाहरणार्थ एक सम्पन्न परिवार के बैठने के कमरे में एक जापानी बर्तन रखना फैशन हो गया है। उसके न रहने से आगन्तुकों को कमरा अच्छा नहीं जान पड़ता। इसी प्रकार हमारे गृहस्थों के अनेक कार्य होते हैं, उनमें एक कार्य ‘धर्म’ भी होना आवश्यक है। इसी कारण उन्हें एकाध कार्य धर्म का भी करना चाहिये। संसार के अधिकाँश लोगों के जीवन का उद्देश्य राजनैतिक व सामाजिक उन्नति करना है। ईश्वर और धर्म भी उनके लिये साँसारिक सुविधायें प्रदान कराने वाली वस्तुएं हैं। तुमने क्या सुना नहीं है कि गत दो सौ वर्ष से अनेक विद्वान् कहलाने वाले-पर दरअसल मूर्ख-भारतवासियों के धर्म के विरुद्ध यही दलील दिया करते हैं कि उसके द्वारा साँसारिक सुख व स्वच्छन्दता प्राप्त करने की सुविधा नहीं होती, उसके द्वारा धन प्राप्ति नहीं होती, उसके द्वारा दूसरे दुर्बल लोगों का शोषण करने का अवसर नहीं मिलता। सचमुच हमारे धर्म में ऐसी सुविधाएँ नहीं हैं। इस धर्म में दूसरी जातियों को लूटने-खसोटने और उनका सर्वनाश करने के लिये भयंकर सेना भेजने की व्यवस्था नहीं है! इसीलिये ये विदेशी कहते हैं कि इस धर्म में क्या रखा है? उससे भविष्य के सुखोपभोग के लिये धन का भंडार संग्रह नहीं किया जा सकता, न उसके द्वारा नाशकारी शक्ति बढ़ाई जा सकती है, इसलिये इस धर्म में क्या रखा है? पर ये पाश्चात्य भावापन्न महानुभाव स्वप्न में भी नहीं सोचते कि इन्हीं के इन तर्कों द्वारा हमारे धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध होती है, क्योंकि हमारे धर्म का उद्देश्य साँसारिक सुविधाएं प्राप्त करना नहीं है, इसलिये एकमात्र वही सत् धर्म है। यह धर्म इस तीन दिन के चंचल इन्द्रिय जगत को ही हमारा चरम लक्ष्य नहीं बतलाता। कुछ हजार मील विस्तृत इस क्षुद्र पृथ्वी में ही हमारे धर्म की दृष्टि आबद्ध नहीं है। हमारा धर्म इस जगत की सीमा के बाहर-दूर, बहुत दूर पर दृष्टि डालता है। वह राज्य अतीन्द्रिय है। हमारा धर्म ही सत्य धर्म है, क्योंकि वह हमको उपदेश देता है- “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या”। हमारा धर्म कहता है कि कंचन लोष्ठवत् व धूल के समान है। संसार में चाहे जितनी क्षमता प्राप्त करो, सभी क्षणिक हैं। यही धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि सबसे ज्यादा यही त्याग की शिक्षा देता है। सैकड़ों युगों से संचित ज्ञान के बल पर दण्डायमान हो वह कल के छोकरों से गम्भीर तथा स्पष्ट भाषा में कहता है- “बच्चों, तुम इन्द्रियों के गुलाम हो, किन्तु इन्द्रियों के भोग अस्थायी हैं, विनाश ही उनका परिणाम है। इसलिये इन्द्रियों के सुख की वासना छोड़ो। यही धर्म प्राप्ति का उपाय है। त्याग ही हमारा चरम लक्ष्य है, वही मुक्ति का सोपान है, इसी कारण हमारा धर्म ही एक-मात्र सत्य धर्म है।

आजकल ‘योग्यतम का उज्जीवन’ (सरवाइवल आफ दी फिटेस्ट) के सिद्धान्त को लेकर अनेक लोग बहुत सी बातें कहते रहते हैं। उनका कहना है कि जिसमें जितनी अधिक शक्ति है वह उतने ही अधिक समय तक बचा रहेगा। अगर इस सिद्धान्त को सत्य मान लें तो प्राचीन काल की जो जातियों लड़ाई-झगड़े में ही समय बिताया करती थीं वह आज भी बड़े गौरव के साथ जीवित रहतीं, और हम लोग-यह कमजोर हिन्दू जाति-(मुझ से एक बार एक अँग्रेज रमणी ने कहा था कि हिन्दुओं ने क्या किया? उन्होंने तो एक भी जाति को कभी नहीं जीता) कभी के पृथ्वी तल से लुप्त हो गये होते। लेकिन जबकि अन्य सभी लड़ाकू जातियों का चिन्ह पृथ्वी तल से मिट चुका है यह हिन्दू जाति तीस करोड़ प्राणियों को लिये जीवित है। और यह कहना भी सत्य नहीं कि इस जाति की सारी शक्ति क्षय हो गई है अथवा इसके सारे अंग शिथिल हो गये हैं। इस जाति में अब भी काफी जीवनी शक्ति है और जब उपयुक्त समय आयेगा, वह जीवनी शक्ति महानदी की तरह प्रवाहित होने लगेगी। पश्चिमी देशों में सभी लोग यह चेष्टा करते है किस प्रकार वे और जातियों से बढ़कर धनवान बन सकते हैं। इसके विपरीत हम लोग सदैव इसी विषय पर विचार करते रहते हैं कि कितनी थोड़ी-सी सामग्री लेकर हम जीवन निर्वाह कर सकते हैं। दोनों जातियों में यही संघर्ष और भेद अब भी कई शताब्दियों तक चलेगा। लेकिन इतिहास में यदि कुछ भी सत्य का अंश हो, यदि वर्तमान चिन्हों को देखकर भविष्य का अनुमान करना जरा भी सम्भव हो, तो हम यह कह सकते हैं कि जो थोड़े-से में जीवन निर्वाह करेंगे और अच्छी तरह से आत्म-संयम का प्रयत्न करेंगे, वही संघर्ष में अन्त में विजयी होंगे। और जो लोग ऐश आराम तथा विलासिता की ओर झुक रहे हैं, वे कुछ देर के लिये भले ही तेजस्वी ओर बलवान जान पड़ें, पर अन्त में वे सर्वथा नष्ट हो जायेंगे।

पाश्चात्य देशों के बड़े से बड़े विद्वान और विचारक अब इस बात को अनुभव करने लगे हैं कि धन-ऐश्वर्य के लिये सिर तोड़ परिश्रम करना बिल्कुल व्यर्थ हैं। वहाँ के अनेक शिक्षित स्त्री-पुरुष अपनी वाणिज्य प्रधान सभ्यता की प्रतियोगिता, संघर्ष और पाशविकता से बड़े विरक्त हो गये हैं। इन लोगों ने समझ लिया है कि सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन चाहे कितना ही क्यों न हों, इससे मनुष्य जाति दुःख और कष्टों से छुटकारा नहीं पा सकती। केवल आत्मा की उन्नति करने से ही सब प्रकार के दुःख और कष्ट दूर हो सकते हैं। चाहे कितना ही बल प्रयोग क्यों न हो, शासन-प्रणाली में कितना ही परिवर्तन क्यों न कर दिया जाय, कानूनों को चाहे कितना ही कड़ा क्यों न बना दिया जाय, पर इनसे किसी जाति की दशा वास्तविक रूप से नहीं सुधर सकती। केवल आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा ही लोगों की कुप्रवृत्तियों को बदल कर उन्हें सन्मार्ग पर ले जायेगी। इसलिये पश्चिम निवासी किसी नये भाव और नये दर्शन के लिये व्यग्र हो रहे हैं। वे लोग जिस धर्म के मानने वाले हैं, उस धर्म-ईसाई मत के सिद्धान्त उदार और सुन्दर होने पर भी वे उसका मर्म भली भाँति नहीं समझते। इतने दिनों से वे ईसाई धर्म को जिस रूप में समझते आये हैं, वह उन्हें अब पर्याप्त नहीं जान पड़ता। पाश्चात्य देशों के ये विचारशील लोग हम लोगों के प्राचीन दर्शनों में, विशेषकर हिन्दुओं के वेदान्त में ही इस प्रकार की आध्यात्मिक सामग्री को पाते हैं। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, क्योंकि ईसाई मुसलमान आदि सभी धर्मों का आधार किसी न किसी व्यक्ति धर्म-प्रचारक पर है, जब कि हिन्दू धर्म का आधार किसी व्यक्ति विशेष पर न होकर केवल जीवन के अनादि और अटल सिद्धान्तों पर ही स्थिर है।


भक्ति का वास्तविक स्वरूप

(डॉ. सम्पूर्णानन्दजी, मुख्यमन्त्री उ. प्र.)

परमार्थ सम्बन्धी किसी विषय की चर्चा करते समय मैं इस बात को आँखों से ओझल नहीं कर सकता, कि अभ्युदय और निःश्रेयस के सम्बन्ध में हमारे लिये श्रुति एकमात्र स्वतः सिद्ध प्रमाण है। अभ्युदय की बात जाने दीजिए, निःश्रेयस के सम्बन्ध में कोई दूसरा ग्रन्थ, किसी महापुरुष का कथन, श्रुति का समकक्ष नहीं माना जा सकता। यदि ‘भक्ति’ श्रेयस्कर है तो उसका पोषण श्रुति से होना चाहिए। यहाँ ‘पोषण’ शब्द से मेरा तात्पर्य स्पष्ट आदेश से है। यदि भक्ति का विवेचन कहीं असंदिग्ध शब्दों में श्रौत वाङ्मय (श्रुति-साहित्य) में मिल जाय तब तो किसी ऊहापोह के लिये जगह ही नहीं रहती। यदि ऐसा न हो तो फिर तर्क के लिये जगह निकलती है।

मैं यह दावा नहीं कर सकता कि मैंने ‘वेद’ शब्द से उपलक्षित सारे वाङ्मय का अध्ययन किया है। पर यह भी कहना यथार्थ न होगा कि मेरे द्वारा इस अलौकिक साहित्य के पन्नों पर दृष्टिपात नहीं हुआ है। पहले मन्त्र भाग को लीजिये। जहाँ तक मैं देख पाया हूँ किसी भी संहिता की किसी भी प्रसिद्ध शाखा में यह (भक्ति) शब्द नहीं मिलता ओर कहीं आ भी गया होगा तो उसका व्यवहार उसी अर्थ में नहीं होगा, जिस अर्थ में हम आजकल उसका प्रयोग करते हैं। अब ‘ब्राह्मण’ ग्रन्थों को लीजिये। उपनिषद् भाग को छोड़ कर ‘ब्राह्मणों’ का शेष अंश तो कर्मकाण्ड परक है। उसमें भक्ति की बात हो नहीं सकती। अब उपनिषद् भाग बच रहता है। इस नाम से सैकड़ों छोटी-बड़ी पुस्तकें पुकारी जाती हैं। इनमें से कुछ तो निश्चय ही अपने-अपने सम्प्रदाय की समर्थक हैं। गोपालतापनी, नृसिंह तापनी, कालिकोपनिषद वृहज्जावालोपनिषद्- जैसे ग्रन्थ इसी कोटि में आते हैं। मैं इस समय इस विषय में कुछ नहीं कहता कि इस प्रकार की पुस्तकों की प्रामाणिकता वस्तुतः कहाँ तक है, परन्तु इस बात से सभी लोग सहमत होंगे कि जिन दस उपनिषदों पर शंकर तथा अन्य आचार्यों ने भाष्य किये हैं, वे निश्चय ही प्रामाणिक रूप से उपनिषद् नाम वाली कृतियाँ हैं। शंकर ने श्वेताश्वेतर पर भी भाष्य किया है, परन्तु इस पुस्तक की गणना भी ‘ईशावास्य’ आदि दश उपनिषदों के बराबर नहीं होती। अब यदि इन दस ग्रन्थों को देखा जाय तो इनमें भी भक्ति का कहीं पता नहीं चलता।

मोक्ष के उपाय सभी उपनिषदों में बताये गये हैं, परन्तु कहीं भी इस प्रसंग में भक्ति की चर्चा नहीं आती। नचिकेता को यम ने-

विद्यामेताँ योगविधिं च कृत्स्नम्।

उस ब्रह्म विद्या और सम्पूर्ण योगविधि की दीक्षा दी, जिससे नचिकेता को मोक्ष की प्राप्ति हुई। वहीं यह भी लिखा है कि जो कोई दूसरा भी इस मार्ग का अवलम्बन करेगा, वह भी मुक्त हो जायगा। छान्दोग्य में कई विद्याओं का उपदेश है, परन्तु उनमें भक्ति की गणना नहीं है। इसका तात्पर्य क्या है? क्या वैदिक काल में कोई मुक्त नहीं हुआ? क्या जिसको वे लोग मुक्ति मानते थे, वह कोई दूसरी चीज थी? क्या वेद मोक्ष के विषय में प्रमाण नहीं हैं? यदि यह बात हो तो फिर हिन्दुओं के पास कोई भी धार्मिक आधार नहीं रह जायगा, क्योंकि श्रुति को छोड़कर एक भी ऐसा ग्रन्थ नहीं जो सर्वमान्य हो।

बहुधा यह कहा जाता है कि कलियुग में मोक्ष का एकमात्र साधन भक्ति ही है। दूसरे युगों के मनुष्य आज की अपेक्षा अधिक समर्थ होते थे, अतः उनका काम दूसरे साधनों से चल जाता था। मैं ऐसा समझता हूँ कि यह कथन निराधार है। यह मानने का कोई आधार नहीं कि प्राचीन काल के लोग आज की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होते थे। किसी-किसी पौराणिक ग्रन्थ में लोगों की उम्र भले ही सहस्रों वर्ष की बताई हो, परन्तु सबसे प्राचीन ग्रन्थ ‘वेद’ पुकार-पुकार कर कहता है “शतयुर्वै पुरुषः”- अर्थात् “पुरुष की आयु सौ वर्ष की है।” वेद आज से कितने वर्ष पहले की बात कहता है, यह भले ही विवादास्पद हो, परन्तु बुद्धदेव के समय के, जिसको 2500 वर्ष हो गये, लिखित प्रमाण तो मिलते ही हैं, उस समय भी पूर्णायु लगभग 100 वर्ष की थी। मिश्र से 5000 वर्ष पूर्व के जो लेख उपलब्ध होते हैं, उनसे भी इससे अधिक आयु का पता नहीं चलता। दीर्घायु ही नहीं, पुराने समय में अल्पायु व्यक्ति भी होते थे। भगवान् शंकराचार्य ने 32 वर्ष की आयु में ही अपनी इहलीला समाप्त कर दी। जो प्रमाण मिलते हैं, उनसे यह भी सिद्ध नहीं होता कि पहले के लोग आज की अपेक्षा अधिक डील-डौल वाले होते थे। जिन ग्रन्थों का निर्माण उन लोगों ने किया है, आज का मनुष्य उनको भी पढ़ता है और उनसे कहीं अधिक जटिल अन्य ग्रन्थों को भी पढ़ता है। उसने भले ही अपनी प्रतिभा का कुछ दिशाओं में दुरुपयोग किया हो, परन्तु प्रतिभा के अस्तित्व में सन्देह नहीं किया जा सकता। अतः आज के मनुष्य को किसी भी पहले समय के मनुष्य की अपेक्षा हीन मानना असिद्ध है। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि जो उपाय प्राचीनकाल के लोगों के लिये सुसाध्य थे, वे आज कल के मनुष्यों के लिये दुःसाध्य हैं फिर इस काल के लिये नये और सरल उपायों की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या सचमुच कोई सरल उपाय निकला है और यदि निकला है तो क्या वह वेदोक्त प्राचीन उपायों से भिन्न है अथवा किसी प्राचीन परिपाटी को ही नया नाम दे दिया गया है शाण्डिल्य सूत्र के अनुसार भक्ति की परिभाषा यह है-

“सा परानुरक्तिरीश्वरे”

यह स्मरण रखना चाहिये कि यजुर्वेद-काल के पहले वेद में ईश्वर शब्द का व्यवहार नहीं किया गया है। शुक्ल यजुर्वेद के अवतरण की कथा स्वयं यह बतलाती हैं कि यह सब के पीछे प्रकट हुआ है। उसमें भी ‘ईश्वर’ शब्द रुद्र के लिये ही आया है। यदि यह माना जाय कि ईश्वर ‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तु समर्थ’ है तो बहुत अन्धेर हो जायगा। पुण्य और अपुण्य के लिये कोई आधार नहीं रह जायगा। ऐसी कल्पना का लोगों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ेगा। ऐसा माना जाने लगा है कि मनुष्य चाहे जितने भी दुष्कर्म करे, भगवान् का नाम स्मरण करने से सब पापों से छूट जाता है। कहाँ तो श्रुति की यह शिक्षा थी-

“नाविरतो दुश्चरितात्”

अर्थात्- “दुश्चरित्र से विरत हुये बिना कोई मोक्ष का अधिकारी नहीं हो सकता।” और कहाँ यह धारणा कि किसी भी प्रकार की पूजा, अर्चना, मोक्ष का द्वार खोल देती है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव यह पड़ा है कि सच्चरित्रता का मोक्ष की प्राप्ति में कोई स्थान ही नहीं रह गया है। लाखों मनुष्य सत्यनारायण की कथा पढ़वाते हैं, जिसमें कहीं भी सत्यनिष्ठा का उपदेश नहीं हैं। भगवान मानो उत्कोच (रिश्वत) के भूखे हैं! ‘भक्तमाल’ प्रसिद्ध भक्त नाभाजी की कृति है, उसमें बहुत से भक्तों की कथाएं हैं। ऐसे भी भक्तों का उल्लेख है, जो चोरी करके मन्दिर बनवाते हैं और भगवान उनसे प्रसन्न होते हैं। तोते को पढ़ाने वाली गणिका और पुत्र को ‘नारायण’ नाम से पुकारने वाला ‘अजामिल’ दोनों गो-लोकगामी होते हैं। कोई भी सिद्धान्त हो, उसके लिए ‘फलेन परिचीयते’ का तर्क लागू होता हैं। जिस किसी सिद्धान्त की शिक्षा मनुष्य में इस प्रकार की प्रवृत्ति उत्पन्न करती हो, वह निश्चय ही दूषित है। भक्ति का स्वरूप कुछ भी हो, किन्तु बार-बार यह कहना कि वह बड़ा सरल मार्ग है, भ्रामक है। मोक्ष का उपाय कदापि सरल नहीं हो सकता, उसके लिए कठोर व्रत की आवश्यकता होगी और उस मार्ग पर चरित्र हीन व्यक्ति के लिए कदापि स्थान नहीं हो सकता। भगवान के नाम पर दम्भ और दुराचार उसी प्रकार अक्षम्य है, जैसे किसी देवी और देवता का नाम देकर जिह्वा के स्वाद के लिए निरीह पशु की बलि देना। प्राचीन काल में मनुष्यों को कर्म पर भरोसा था और वह आत्म-निर्भर होता था। उसके लिए उपनिषद् का यह उपदेश था-

“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः”

परन्तु जब से उसको सरल मार्ग का प्रलोभन मिला और ऐसे ईश्वर का परिचय बताया गया, जो कर्म को अपनी इच्छा से काट सकता है, तब से वह पथ-भ्रष्ट हो गया-

“कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिन हेतु सनेही।” “होइहि सोई जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावहि साखा।” ऐसे उपदेशों का प्रचार निश्चय ही मनुष्य की आत्मनिर्भरता को कम करता है और वह इस बात को भूल जाता है कि-

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया, दुर्ग पथस्तत् कबयो वदन्ति।

अर्थात्- “मोक्ष का मार्ग छुरे की तीखी धारा के समान दुर्गम है, उस पर चलना कठिन है।” इसके बजाय मनुष्य सीधे-सादे रास्तों के भ्रम जाल में पड़ जाता है और यह समझने लगता है कि ईश्वर उसको अवश्य ही भव समुद्र के पार कर देगा।

मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि ‘भक्ति’ नाम का मोक्ष के लिए कोई स्वतन्त्र साधन नहीं हैं। वह या तो योग-सूत्र के रचियता पतञ्जलि के बतलाये ‘ईश्वर प्राणिधान’ का नाम है, या योगाभ्यास की क्रिया का। योगाभ्यास की धारणा के लिए अनेक अवलम्ब हो सकते हैं। वीतराग पुरुष के रूप में साधक अपने उपासक या गुरु को धारणा का सहारा बना सकता है। अथवा उन उपायों से काम ले सकता है जिनकी दीक्षा सुरत शब्द-योग के आचार्यों ने दी है। किसी भी अवलम्बन का सहारा लिया जाय परिणाम एक ही होगा, अनुभूति एक ही होगी। यदि ‘भक्ति’ योगाभ्यास का दूसरा नाम नहीं है और योग-दर्शन में बतलाये ‘ईश्वर प्राणिधान’ का भी अपर नाम नहीं है, तो फिर वह मृग-मरीचिका है। प्राचीन बातों को असाध्य बताने से और आजकल के मनुष्यों को दुर्बलता का पाठ पढ़ाने से कुछ सौ वर्षों से इस देश में पर्यावरण छा गया है। दुर्बल को लकड़ी का सहारा चाहिए ही। मार्ग तो वही प्रशस्त योग-मार्ग है, दूसरा कोई मार्ग नहीं हैं। परन्तु जब लोगों को बार-बार दुर्बल कहा जाता है तो उनसे योग के कठिन मार्ग पर चलने को कैसे कहा जाय। इसलिए ‘भक्ति’ नाम प्रचलित हुआ। इससे जो सच्चे साधक थे उनकी तो कोई क्षति नहीं हुई। नाम भले ही नया हो, किन्तु वस्तु वही पुरानी थी, वही चिर अभ्यस्त सनातन काल से परीक्षित ‘रामबाणवत्’ मूल औषधि थी। उन्होंने उसी को ग्रहण किया और निःश्रेयस पद को प्राप्त किया। परन्तु साधारण साधक धोखे में पड़ा रह गया। उसका अकल्याण हुआ। दुर्बल बताकर सन्मार्ग से तो वह हटा दिया गया और दूसरा और कोई मार्ग नहीं हैं, इसलिए वह भटकता रह गया। योग-मार्ग कुछ हद तक कण्टकाकीर्ण होते हुए भी शक्ति का उद्बोधन करने वाला है और इसलिए उसी का अवलम्बन करना सर्वथा कल्याणकारी है।


मनुष्य देवता बन जायगा

(श्री योगिराज अरविन्द की विचारधारा)

योगिराज श्री अरविन्द ने एक स्थान पर कहा है “कविगण मृत्यु और बाहरी कष्टों का वर्णन बढ़ा-चढ़ा कर करते हैं, पर सच पूछा जाए तो एक मात्र दुःखाँत नाटक हैं अन्तरात्मा की सफलता और एक मात्र महाकाव्य है, देवत्व की ओर मनुष्य का आरोहण” दूसरे शब्दों में मानव में छिपे दिव्य जीवन का प्रकटीकरण ही अन्तरात्मा का संतुलन है और इस संसार नाटक का अन्तिम सुन्दर दृश्य है।

श्री अरविन्द का सन्देश है कि मानव का विकास हो रहा है और उसका तब तक विकास होता रहेगा जब तक कि व्यष्टि एवं समष्टि रूप से वह पूर्ण नहीं हो जाता। वास्तव में मनुष्य का विकास जीवन और जगत के विकास का सबसे महान रहस्य है।

सृष्टि का उद्देश्य

श्री अरविन्द विकास में विश्वास रखते हैं। उनके अनुसार सृष्टि का एक ध्येय है और मानव एक उद्देश्य की ओर प्रगति कर रहा है। विकास की संक्षिप्त कहानी यों कही जा सकती है कि पहले सब जड़ था। एक स्थिति पर जड़ में जीवन आया। जो मृत दीख पड़ता था, वह जीवित हो गया। इस प्रकार वनस्पति जगत की सृष्टि हुई। जड़ जगत् में जीवन या प्राण आया, अथवा यह कहना अधिक उचित होगा कि जड़ में प्राण जागृत हुआ। जड़ जगत में प्राण, मन और आत्मा सुषुप्त अवस्था में रहते हैं।

कुछ काल और सृष्टि के गर्भ में बीता, और एक ‘प्रारम्भिक मन’ की उत्पत्ति हुई। पशु ने जन्म लिया। जब प्रारम्भिक मन का जागरण हुआ तो वनस्पति का पशु रूप हो गया। यहाँ बुद्धि भी है और उच्चकोटि के पशुओं के कुछ-कुछ विचार करने की शक्ति भी है। इन्द्रिय-ज्ञान की प्रवृत्ति ने वास्तविक मन को जन्म दिया अर्थात् मन का विकास हुआ। उसमें विचार और विवेक आया। तब मनुष्य ने जन्म लिया। मन विकसित होने पर पशु परिवर्तित हुआ और मनुष्य प्रकट हुआ। मनुष्य का मन पूर्णतया जाग्रत है और वह अपना विकास स्वयं कर सकता है। यही मानव की विशेषता है। विकास की इसी विशिष्ट स्थिति के कारण मानव कृष्ण, बुद्ध, ईसा जैसे गौरव के पद तक विकसित हुआ है और उसने जीवन का महान वास्तविक तत्त्व खोजा है।

श्री अरविन्द का कहना है कि जिस प्रकार मिट्टी और पत्थर में से पौधा उत्पन्न हुआ है, पौधे में से पशु और पशु में से मनुष्य प्रकट हुआ है, उसी प्रकार मानव में से भी एक दिन दिव्य मानव अवश्य प्रकट होगा। केवल वहीं वस्तु प्रकट हो सकती है, जो कि किसी रूप में पहले थी। केवल स्वरूप का रूपांतर हो जाता है। नास्ति में से कुछ नहीं हो सकता। मिट्टी में पौधा छिपा हुआ है, पौधे में पशु छिपा है और पशु में मनुष्य छिपा है, इसी प्रकार मनुष्य में भी दिव्य मानव छिपा है।

पशु से मानव का विकास होने में लाखों वर्ष लगे होंगे। पशु ने मानव होने के लिए कोई ज्ञानपूर्वक प्रयत्न नहीं किया था। पशु को यह ज्ञात भी नहीं था कि वह मानव होने जा रहा है। उसे अपने इस विकास का ज्ञान नहीं था। उसके अज्ञान में ही यह विकास हो गया। एक दिन आया और पशु ने अपने आप को मानव पाया।

सहस्रों शताब्दियों में वनस्पति में से पशु आया। वनस्पति को इस विकास का ज्ञान नहीं था। वनस्पति ने इस विकास के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया। इसी प्रकार जड़ मिट्टी में से वनस्पति अगणित वर्षों में उत्पन्न हुई। जड़ को इस परिवर्तन का ज्ञान नहीं था। जड़ ने इस परिवर्तन के लिए कोई प्रयत्न भी नहीं किया था।

देवत्व के लिए प्रयत्न

इस प्रकार अब तक परिवर्तन स्वयं हुआ था। प्रकृति ने ही इस परिवर्तन को किया था। उसने जड़ वस्तु, वनस्पति और पशु को इस विकास में सहायता दी थी क्योंकि वे अपना विकास स्वयं करने में असमर्थ थे किन्तु मानव की यह विशेषता है कि वह अपना विकास स्वयं कर सकता है। प्रकृति ने मानव को विकास का सामर्थ्य दिया हैं। अतएव अब विकास मनुष्य के प्रयत्न से होगा। मानव को स्वयं प्रयत्न करके दिव्य मानव बनना है। हाँ, प्रकृति इसमें सहायता अवश्य करेगी। पिछले परिवर्तन और इस परिवर्तन में यह महान अन्तर होगा।

दिव्य जीवन प्राप्त करना ही सृष्टि का उद्देश्य है। वर्तमान मानव और दिव्य मानव में बहुत अन्तर होगा। न्यूनाधिक रूप से उतना ही अन्तर समझा जा सकता है जितना पशु और मनुष्य में है। जिस प्रकार पशु यह अनुमान नहीं कर सकता था कि नवीन विकास अर्थात् मानव कैसा होगा, उसका कैसा ज्ञान होगा, कैसी शक्ति होगी, उसी प्रकार वर्तमान मानव भी दिव्य मानव के ज्ञान, उसकी योग्यता उसकी सामर्थ्य और उसकी शक्ति का उचित अनुमान नहीं कर सकता है। पशु में भी थोड़ा बहुत विचार और विवेक पाया जाता है, पर मानव में और उसमें बड़ा अन्तर है। उसी प्रकार मानव और दिव्य मानव में बड़ा अन्तर होगा।

प्रकृति स्वयं विकास में प्रयत्नशील है। सृष्टि का स्वयं विकास हो रहा है। मानव का भी विकास हो रहा है। विकास ही इस सृष्टि का विषय है, केवल हमें अपने प्रयत्नों द्वारा ईश्वर के उस महान कार्य में सहायता पहुँचानी है ताकि विकास शीघ्र हो जाये। अभी तक विकास पर्दे के भीतर हो रहा था, पर अब ज्ञानपूर्वक एवं प्रकट रूप से होगा। परिणाम यह होगा कि विकास का समय कम हो जायेगा। जो काम पहिले लाखों वर्षों में हुआ था, वह सदियों में ही हो जायेगा। मानव शनैः-शनैः विकास करके दिव्य जीवन की प्राप्ति करेगा। दिव्य-जीवन की प्राप्ति होने पर अज्ञान नष्ट हो जाता है, केवल प्रकाश और ज्ञान ही रहता है। दिव्य मानव प्रकाश में रहता है और प्रकाश से प्रकाश की ओर गति करता है। दिव्य जीवन की प्रगति के पश्चात् मनुष्य की प्रकृति बदल भी जायेगी, उसकी निम्न प्रवृत्तियाँ भी ऊर्ध्व प्रवृत्तियों में परिवर्तित हो जायेंगी। मनुष्य का मन, प्राण, शरीर, सब परिवर्तित हो जाएंगे। रोग व वृद्धावस्था के लिए स्थान न रहेगा, यहाँ तक कि मृत्यु पर भी नियन्त्रण हो जायेगा।

प्रश्न यह है कि हम इस पूर्ण विकास के पथिक बनने के लिए क्या करें। इसके लिए सबसे मुख्य बात तो यह है कि हम पूर्ण अभीप्सा तथा श्रद्धा के साथ दिव्य जीवन की कामना करें। अपनी निम्न प्रवृत्तियों को उच्च प्रवृत्तियों से स्थानान्तरित करने का प्रयास करते हुए भगवान के हाथों में अपने को सौंप दें। वह अवश्य हमें उच्च से उच्चतर स्थिति को ले जाता रहेगा।


मनुष्य-जीवन में अनुशासन और गायत्री-मंत्र

(श्री पूर्णचन्द एडवोकेट, आगरा)

किसी भी शासन के लिए विधान की परम आवश्यकता है। कोई शासन, उस समय तक शासन का रूप धारण नहीं कर सकता, जब तक उसकी रूपरेखा, उसका आधार और उसके क्रियात्मक नियम विधान के रूप में एकत्रित न हों। जब तक विधान नहीं बनता, तब तक शासन के अधिकार भी पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होते।

मानवीय संपर्क और संघर्ष को मर्यादित करने के लिए जहाँ विधान या शासन की आवश्यकता है, वहाँ यह भी आवश्यक है कि शासन की शक्ति ऐसे सबल हाथों में हो जो करोड़ों-लाखों मनुष्यों और प्राणियों के संघर्ष ओर संपर्क को मर्यादित कर सके। शासन की शक्ति का आधार या मूल केन्द्र ऐसे स्थान में होना चाहिए जिसे कोई किसी भी दशा और किसी भी काल में, अकेले रहकर या संगठित होकर, उल्लंघन न कर सके।

शासन और मन्त्र

शासन और मन्त्र का घनिष्ठ सम्बन्ध है। मन्त्र से अभिप्राय विचार से है। विचारों से आचार बनता है। किसी व्यक्ति का वह आचार जो दूसरों से सम्बन्धित है व्यवहार कहलाता है। इसलिए शासन-प्रबन्ध के लिए भिन्न-भिन्न विभागों के मन्त्री नियुक्त होते हैं और ये सब मन्त्री एक मुख्यमंत्री के अधीन रहकर कार्य-सञ्चालन करते हैं। इन मंत्रियों को सफलता से कार्य करने और योग्य बनाने के लिए मन्त्र अथवा विधान की आवश्यकता होती है।

कोई भी शासन सफल नहीं हो सकता, जब तक उस शासन-प्रणाली से सम्बन्धित व्यक्ति अनुशासन की मर्यादा का पालन करने वाले न हों। अनुशासन का पर्यायवाची शब्द अँग्रेजी में ‘डिसिप्लिन’ है, जिसका अर्थ उस भावना से है जो कि ‘डिसिपल’ अथवा शिष्य में होनी आवश्यक है। केवल अनुशासन पर जोर देना, परन्तु यह निश्चित न करना कि गुरु कौन और शिष्य कौन है, गुरु-शिष्य का क्या सम्बन्ध है, ठीक नहीं है। इसलिए हमें अनुशासन के उस मन्त्र या विधान को समझना चाहिए, जिससे अनुशासन मर्यादित हो सके।

अनुशासन और योग का भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। योग दर्शन के रचयिता पतञ्जलि ऋषि ने, योग-दर्शन का आरम्भ जिस ‘योगानुशासनम्’ सूत्र से किया है उसमें ‘अनुशासन’ शब्द का प्रयोग करने से यही विदित होता है कि अनुशासन के लिए योग की भावना आवश्यक है। योग से अभिप्राय उस मानसिक भावना से है, जिसके आधार पर ऐसा स्वभाव बन जाय कि प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों, आचारों और व्यवहार में ईश्वर को अपने समीप दृष्टा और न्यायकर्ता अनुभव करता रहे। योग जब उपासना के अर्थ में आता है तो उसका यह भी अभिप्राय होता है कि मनुष्य अन्य प्राणियों के साथ अपने व्यवहार में ईश्वर को न भूले, ईश्वर आदेशों का ध्यान रखकर ही सबके साथ उचित संपर्क रखे।

योग-दर्शन के 26 वें सूत्र में ईश्वर को आदि गुरु माना गया हैं-

“पूर्व षामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्” आदि में उत्पन्न होने के कारण सबका गुरु ब्रह्मा माना गया है, परन्तु उसका काल से अविच्छेद है। ईश्वर आचार्य भी है और गुरु भी है। ईश्वर आचार्य इसलिए है, क्योंकि यह सत्य आचार का ग्रहण कराने वाला और सब विद्याओं की प्राप्ति का हेतु होता है। ईश्वर गुरु भी इसी आधार पर है कि सब प्रकार के धर्म और विद्या आदि का स्रोत वही है। “यो धर्मान् शब्दान् गुणात्युपदिशति गुरु।” ईश्वर गुरु है और आदिगुरु है। उसका संचालन सारे जगत में चरितार्थ है। इसलिए उस आदि गुरु के मन्त्र या विधान का जानना आवश्यक है, जिससे मनुष्य के हृदय-जगत की, अर्थात् उस केन्द्र की जहाँ से इच्छा और द्वेष उत्पन्न होते हैं, व्यवस्था ठीक हो सके। प्राचीन पद्धति के अनुसार वह गुरु-मन्त्र गायत्री ही है-

ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

यह मन्त्र गुरु-मन्त्र इसलिए कहलाता है कि इसमें परमात्मा की ओर से वह आदेश और उपदेश है, जिससे समस्त जीवन मर्यादित होता है। मनुष्य के लिए उसका ज्ञान और उसकी बुद्धि की सबसे अधिक उपयोगी है। जीवन ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता रखता है पर वह स्वयं भी बिना किसी दूसरे निमित्त के ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। ज्ञान का आदि स्रोत ईश्वर है और वही आदि गुरु है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य के ज्ञान का आधार ईश्वर है और जब मनुष्य अपने ज्ञान, अपनी बुद्धि को ईश्वर के ज्ञान से सम्बन्धित समझता है तो उसके ज्ञान का दुरुपयोग नहीं हो सकता।

इस मन्त्र में ‘ॐ’ से लेकर ‘भूर्भुवः स्वः’ तक, लक्ष्य में रखते हुए, ईश्वर का मुख्य नाम और उसके विशेष गुण हमारे सम्मुख आ जाते हैं। ‘सविता’ से उसके रचियता होने की भावना उत्पन्न होती है और ‘वरेण्यं’ से उसके न्यायकारी होने की।

“भर्गो देवस्य धीमहि” से अभिप्राय है कि हम उस दिव्य गुण युक्त और पापों से दूर करने वाली परमात्मा की बुद्धि को अपनी बुद्धि से संयुक्त करते हैं, अर्थात् उसकी बुद्धि को अपनी बुद्धि का आधार मानते है। यदि बुद्धि उससे जुड़ी हुई न होगी तो हमारा जीवन धार्मिक और सफल न हो सकेगा। यदि बुद्धि हमारे हमारे कर्म से जुड़ी हुई और उसको प्रकाशित करने वाली न होगी, तो भी हमारे कर्म अच्छे न होंगे और हम पापों से न बच सकेंगे। इसलिए मन्त्र के अन्त में “धियो यो नः प्रचोदयात्” से यह दर्शाया गया है कि हमारी बुद्धि केवल ईश्वर से जुड़ी हुई ही न हो, प्रत्युत वही बुद्धि जो ईश्वर के प्रकाश से प्रकाशित है, हमारे कर्म को भी मर्यादित कर सके।

जैसा हम बतला चुके हैं, परमात्मा ज्ञान-स्रोत और परमानन्द का आदि स्रोत है। अगर हम एक बिजली घर की उपमा लें तो परमात्मा को विद्युत का उत्पादक केन्द्र मान सकते हैं। उस अवस्था में गायत्री मन्त्र का जप और उच्चारण उन तारों के समान है, आचरण उस फिटिंग के समान है जिसके कारण हम उत्पादन केन्द्र से लाभ उठा सकते हैं। गायत्री-मन्त्र से उपासना द्वारा सम्बन्ध स्थापित करना और इस प्रकार जो गति तथा प्रकाश प्राप्त हो उससे अपने कर्म, ज्ञान को प्रकाशित करना, क्रियात्मक जीवन बन जाता है। इसलिए हमें तीनों बातें ध्यान में रखनी चाहिए कि ईश्वर उत्पादन केन्द्र है, हमारे ज्ञान का आदि स्रोत है और आनन्द का आधार है। यदि हम चरित्रवान और सदाचारी होकर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं तो अपनी बुद्धि का प्रयोग करते समय ईश्वर के आदि स्रोत या मूल आधार होने का ध्यान रखना अनिवार्य हैं।


सफलता का रहस्य

(श्री. स्वामी शिवानन्द सरस्वती)

जीवन में सच्ची सफलता क्या है? क्या यह भौतिक ऐश्वर्य है? अथवा बच्चों और धन से परिपूरित जीवन संसार में व्यतीत करना? सफलता दो प्रकार की है, साँसारिक सफलता और आध्यात्मिक सफलता। यदि तुम अच्छी परिस्थिति में हो, कुसुमवत् तुम्हारी शय्या है और तुम्हारे पास वे सभी वस्तुएँ है जिन्हें यह संसार दे सकता है, तो यह भौतिक सफलता है। परन्तु यही सब कुछ नहीं है, क्योंकि यह जगत तो अपूर्ण है। तुम्हें साधन-पथ में भी साथ ही साथ, अग्रसर होना और सफल बनना है। तभी तुम पूर्ण सफलता के अधिकारी हो सकोगे।

जीवन में वास्तविक और स्थायी सफलता की प्राप्ति के कौन से उपाय हैं? कथनी से करनी कठिन है। अपने व्याख्यान के बीसवें अंश के समान बनना भी कठिन ही है। सिद्धान्तों के ढेर से लाभ क्या, यदि उसको जीवन में क्रियात्मक रूप न दिया? सिद्धान्तों के मनों से अभ्यास का एक तोला भी अधिक महत्व का है। इस लोक और परलोक के लिए क्रियाशील या कर्मयोगी बनो। तभी भौतिक और आध्यात्मिक सफलतायें तुम्हारी चेरी बनेंगी।

जीवन दो प्रकार का है, भौतिक जीवन और शुद्ध ज्ञान सम्पन्न आध्यात्मिक जीवन। जीवशास्त्री और मनोवैज्ञानिकों का मत है कि सोचना, अनुभव करना, जानना, इच्छा करना, पाचन-क्रिया, रक्त संचार और हृदय संचालन आदि ही जीवन है। ऐसा जीवन स्थिर नहीं है। इसके पीछे है खतरा, पाप, कष्ट, भय, चिन्तायें और शोकाग्नि, जरा-मरण का दुख और व्याधि आदि। इसीलिए ऋषियों, द्रष्टाओं, सन्तों और साधुओं ने, जिन्होंने त्याग और तपस्या से मन-इन्द्रियों को वश में करके, अभ्यास, और त्याग पूर्ण जीवन बिताकर अपनी अन्तरात्मा को पहचान लिया है, यह एक स्वर से, बिना किसी सन्देह किये हुए, घोषित कर दिया है कि एकमात्र आध्यात्मिक जीवन ही शाश्वत शाँति, परमानन्द, अनन्त-संतोष और अमरत्व ला सकता है। उन्होंने साधक की भिन्न-भिन्न व्यक्तिगत रुचि, स्वभाव, शक्ति के अनुसार आत्म-दर्शन के विभिन्न उपाय बताये हैं। जिनका उनके उपदेशों, वेद और गुरु के वाक्यों में अचल श्रद्धा है, वे ही अध्यात्म या सत्य के क्षेत्र में प्रगति करते हैं और मोक्ष, पूर्णत्व या स्वतन्त्रता को प्राप्त करते हैं। मानव जीवन का यही लक्ष्य है। आत्मदर्शन ही तुम्हारा परम कर्तव्य है।

इसका तात्पर्य यह नहीं कि भौतिक क्षेत्रीय जीवन पूर्णतया हेय ही है। यह जड़ जगत प्रभु की लीला के निमित्त उसी की अभिव्यक्ति है। जड़ और चेतन, जीव और अजीव उसी प्रकार अविच्छिन्न और अभेद्य है जिस प्रकार कि गर्मी ओर अग्नि, बर्फ और शीतलता, पुष्प और उसकी गंध। शक्ति और शक्ति का धाता एक ही है। माया और ब्रह्म एक है और अभेद्य है। भौतिक क्षेत्र का जीवन ब्रह्म में शाश्वत जीवन की प्राप्ति के लिए एक पृष्ठभूमि है। यह विश्व ही तुम्हारा सर्वोत्तम गुरु है। पाँच तत्व ही तुम्हारे शिक्षक हैं। प्रकृति ही तुम्हारी माता है और है पथ-निर्देशिका। वह मौन शिक्षक है। यह जगत ही दया, क्षमा, शान्ति, सहन-शीलता, विश्व प्रेम, उदारता, साहस और दृढ़ संकल्प आदि दैवी गुणों के विकास का आश्रय-स्थल है। गीता और योग-वाशिष्ठ की मुख्य शिक्षा यही है कि विश्व में रह कर हमें आत्म-साक्षात्कार करना चाहिए। “संसार में रहो, पर उससे बाहर भी।” जल में कमल पत्रवत् व्यवहार करो। स्वार्थ, काम, क्रोध, लोभ, घृणा और ईर्ष्यादि नीच वृत्तियों का परित्याग करो। दैवी वृत्ति को अपनाओ और मानसिक संन्यास तथा स्वार्थ रहित जीवन व्यतीत करो।

विज्ञान और धर्म, राजनीति और धर्म एक दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते हैं। वे एक दूसरे के परिपूरक हैं। आध्यात्मिक बीज के वपनार्थ राजनीति आधार स्वरूप है। यदि देश में आर्थिक स्वतन्त्रता नहीं; यदि देश पराधीन है और अशान्ति का देश में बोलबाला है तो वहाँ अध्यात्म बीज कैसे बोया जा सकता है? देश के नौनिहालों को ज्ञान की प्रेरणा कैसे दी जा सकती है। जीवन में यदि खाद्य समस्या ही लोगों के समक्ष रहती है, लोगों को पहनने के लिये कपड़े नहीं, रहने के लिये घर नहीं तो भला सन्त जन अपनी उपदेशमयी वाणी का उपयोग ही कहाँ और कैसे कर सकेंगे। सन्तों के उपदेश तभी मन द्वारा गृहीत होते हैं जबकि जीवन चिन्ताओं से मुक्त होता है और वहाँ साधना की सामग्रियाँ उपलब्ध होती हैं।

यदि गृहस्थ अपने वर्णाश्रम धर्मों का पालन करने लग जायँ, तो आज इतने संन्यासियों की बिल्कुल आवश्यकता नहीं हैं। यह आवश्यकता तो परिवार के सदस्यों के मनुस्मृति और शास्त्राज्ञाओं से पतित हो जाने पर आ पड़ी है। गृहस्थों को सद्मार्ग दिखाने के लिये, देश में इतने संन्यासी हुये हैं। सच्चे संन्यासी देश के पथ-प्रदर्शक हैं। महात्मा-जनों के साथ सत्संग करने का यही लाभ है।

विज्ञान के प्रयोगों और परीक्षणों के सूक्ष्म अध्ययन भी हमें प्रभु के समीप तक पहुँचा देते हैं। विद्युत में शक्ति कहाँ से आई? वह कौन सी शक्ति है जिसने चार भाग नाइट्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन का सम्मिश्रण किया है? वह कौन सी बुद्धि है जो प्रकृति में गति उत्पन्न करती है? क्या वैज्ञानिक आविष्कार वास्तव में मनुष्य को आनन्द दे सकते हैं? विज्ञान ने हमारे प्रति इस समय क्या किया है? आत्मज्ञान के समक्ष वैज्ञानिक ज्ञान का कोई अस्तित्व नहीं। ब्रह्मविद्या पराविद्या है। आत्म-विद्या पर ही सभी विज्ञान आधारित हैं। विज्ञान का प्रगति के साथ-साथ जैसे-जैसे व्यक्ति की आवश्यकतायें बढ़ती जा रही हैं, वैसे-वैसे वह अशाँति का अनुभव करता जा रहा है।

आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों की बुराइयों से दीन दशा को प्राप्त मानव-समुदाय के उद्धार का यदि कोई उपाय है तो वह प्रकृति की शरण ही है। हमें प्राकृतिक चिन्तन और प्राकृतिक जीवन में लगना होगा। हमें अपने पूर्वजों के “सादा जीवन, उच्च विचार” वाले नियम को अनुगत करना होगा। सादा वस्त्र पहनो। प्रतिदिन भ्रमण करो, सिनेमा और उपन्यास अध्ययन का परित्याग करो। सादा भोजन करो। परिश्रमी जीवन का महत्व समझो और उसे अपनाओ। सदैव सीधे रहो। अपनी इंद्रियों को वश में लाओ। जीवन में सद्गुणों का विकास करो। बुद्धिमानों की संगति करो। ईश्वर को याद करो, कीर्तन करो। उस प्रभु को प्रत्येक स्थान पर विराजमान होता हुआ अनुभव करो। दिव्य जीवन व्यतीत करना सीखो और आत्मभाव से समाज की सेवा करो। तुम्हारी मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय यही है। तुम्हें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता मिलेगी। यह एक ऐसी कुँजी है जिससे परमानन्द का द्वार आसानी से खोला जा सकता है।

सत्य किसी को कष्ट नहीं दे सकता। सत्य की ही विजय होती है। सत्य ही परम सुख ला सकता है। हमें सत्यमय जीवन बिताना चाहिये। सत्य ही हमारा गृह हो और हमारा शरीर तथा मन भी सत्य से ही अभिसिंचित हो। परम सत्य को जानों। मानव शरीर पाना बड़ा दुर्लभ है। नर तन पाकर इस गतिशील समय का एक मिनट भी साधना से रिक्त न जाने दो। अपनी जीवन-चक्रिका को सफल बनाओ और ईश्वरत्व को अभी, इसी क्षण प्राप्त करो। यही हमारी एकमात्र प्रार्थना है। प्रभु तुम्हें ऐश्वर्य और आनन्द से पूर्ण बनावें। अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में शान्ति का लाभ करो।


अवतार और उसके कार्य

(श्री मेहर बाबा)

सचेतन अथवा अचेतन, प्रत्येक जीवित प्राणी केवल एक वस्तु की खोज करता है। नीची श्रेणी के जीवों में तथा कम विकसित मनुष्यों में, यह खोज अचेतन रूप से विकसित होती है और विकसित मनुष्यों में सचेतन रूप से। इस खोज की वस्तु को लोग अनेक नामों से सम्बोधित करते हैं, जैसे सुख, शाँति, स्वतन्त्रता, सत्य, प्रेम, पूर्णता, आत्मदर्शन, ईश्वर-प्राप्ति, ब्रह्म साक्षात्कार इत्यादि। इस खोज में एक विशेषता होती है, कि सभी को सुख के क्षण प्राप्त होते हैं, सत्य की झलक दिखलाई देती है और ईश्वर साक्षात्कार के क्षणिक अनुभव होते हैं। वे इन्हें स्थायी बनाना चाहते हैं। नित्य के परिवर्तन के बजाय एक स्थायी सत्य की स्थापना करना चाहते हैं।

यह एक स्वाभाविक इच्छा है। ईश्वर से प्राणी की जो तात्विक एकता है, उसी की स्मृति के आधार पर यह इच्छा उत्पन्न हुआ करती है। उक्त इच्छा स्वाभाविक इसलिए है, कि प्रत्येक जीव ईश्वर की ही आँशिक अभिव्यक्ति है, जो अपने स्वरूप के न जानने के कारण आबद्ध हो गया है। इसलिये विकास का एकमात्र तात्पर्य ‘अज्ञात ईश्वरत्व’ से ‘ज्ञात ईश्वरत्व’ की ओर अग्रसर होना है। इसमें एक ही नित्य और अविनाशी ईश्वर स्वयं विभिन्न रूपों को धारण करके नाना प्रकार के अनुभव का आस्वादन करता है और अनन्त सीमाओं को पार करके पुनः पूर्णता को प्राप्त करता है। इस विकासक्रम में जीव को अपने सीमित ज्ञान, सीमित शक्ति तथा आनन्द प्राप्त करने की सीमित योग्यता के कारण विश्राम एवं संघर्ष, सुख एवं दुख और प्रेम एवं घृणा का एक के बाद एक अनुभव होता रहता है। अन्त में पूर्ण मनुष्य में ईश्वर इन द्वन्द्वों को समतोल अवस्था में ला देता है जिससे अनित्यता के बीच नित्यता की स्थापना हो जाती है और ईश्वराँश अपनी ईश्वरता को जानने लग जाता है, उसे अपनी नित्यता का बोध हो जाता है और वह आत्म-ज्ञान के सर्वोत्कृष्ट आनन्द का स्थायी रूप से अनुभव करता है। यह ज्ञान जीवन के मध्य में ही प्रकट होना चाहिए और होता भी है, क्योंकि जीवन के मध्य में ही सीमा का अनुभव किया जा सकता है और उसका उल्लंघन भी किया जा सकता है और फलस्वरूप सीमातीत स्थिति या मुक्ति का आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार की मुक्ति तीन रूप धारण करती है। अधिकाँश ईश्वर प्राप्त पुरुष तुरन्त एवं सदा के लिए शरीर त्याग देते हैं और ईश्वर के अनन्त रूप में स्थायी रीति से निमग्न हो जाते हैं। उन्हें केवल मिलन के आनन्द का ज्ञान रहता है। उनके लिए सृष्टि का अस्तित्व नहीं रह जाता तथा उन्हें जन्म-मरण के अविश्राँत चक्कर से छुटकारा मिल जाता है। यह मुक्ति कहलाती है।

कोई ईश्वर प्राप्त पुरुष कुछ समय के लिए शरीर धारण किये रहते हैं, किंतु उनकी चेतना ईश्वर के अव्यक्त स्वरूप में पूर्णतः निमग्न हो जाती है, अतएव न तो उन्हें अपने शरीर का ज्ञान रहता है और न सृष्टि का ही। वे ईश्वर के अनन्त ज्ञान, अनन्त आनन्द एवं अनन्त शक्ति का निरन्तर अनुभव करते हैं, किंतु ज्ञानपूर्वक इनका उपयोग सृष्टि में नहीं कर सकते हैं और न मुक्ति प्राप्त करने में दूसरों की सहायता ही कर सकते हैं, तो भी उनकी उपस्थिति ईश्वर के अनन्त ज्ञान, अनन्त शक्ति एवं अनन्त आनन्द के एकत्रीकरण और प्रसार के लिए, एक केन्द्र बिंदु की भाँति होती है। जो कोई उनके निकट जाते हैं, उनकी, सेवा, पूजा करते हैं, उनका आध्यात्मिक कल्याण होता है। ऐसे आत्मा ‘विदेह’ या ‘मझजूव’ कहे जाते हैं।

तीसरी प्रकार के ईश्वर प्राप्त पुरुष शरीर बनाये रखते हैं, तो भी ईश्वर के व्यक्त और अव्यक्त दोनों स्वरूपों में उनको अपने ईश्वरत्व का ज्ञान रहता है। वे जानते हैं कि वे नित्य दैवी तत्व भी हैं तथा अनन्त विभिन्न रूप भी हैं। वे अपने को, सृष्टि से पृथक ईश्वर अनुभव करते हैं। ऐसा ईश्वर जो समस्त सृष्टि का रचने वाला, पालक और संहारक है। साथ ही साथ वे अपने को ऐसा ईश्वर भी अनुभव करते हैं, जिसने सृष्टि की सीमाओं को स्वीकार किया है। वे ईश्वर का अनन्त ज्ञान, अनन्त आनन्द, अनन्त शाँति एवं अनंत शक्ति का निरन्तर अनुभव करते हैं। वे सृष्टि की दिव्य लीला का पूर्ण आनंद लाभ करते हैं। वे प्रत्येक वस्तु में अपने ईश्वर अनुभव करते हैं, अतः मुक्त आत्मा या सद्गुरु की हैसियत से वे प्रत्येक वस्तु की आध्यात्मिक सहायता कर सकते हैं और अन्य आत्माओं को ईश्वर दर्शन करा सकते हैं।

संसार में हमेशा अनेक सद्गुरु मौजूद रहते हैं। ज्ञान में वे सब एक होते हैं, पर कार्य उनके सदैव भिन्न रहते हैं। अधिकाँश भाग में वे जन साधारण से, लोगों से अलग और अज्ञात रहकर कार्य करते हैं। किन्तु पाँच सद्गुरु जो एक प्रकार से एक संचालक-संघ की भाँति काम करते हैं, सदैव सर्व साधारण के बीच रहकर काम करते हैं। अवतार-युग में, अवतार सर्वश्रेष्ठ सद्गुरु की हैसियत से, इस संघ तथा समस्त आध्यात्मिक परम्परा के रूप में अपना स्थान ग्रहण करता है।

अवतार भिन्न रूपों में, भिन्न नामों से, भिन्न समयों पर, विश्व के भिन्न भागों में प्रकट होता है। उसके आविर्भाव होते ही मनुष्यों की महान आध्यात्मिक प्रगति होने लगती है। अतः उसका जन्म ऐसे ही समय पर होता है, जिसमें मानवता भावी उन्नति अथवा विकास की किसी विशेष सीढ़ी पर चढ़ने के लिए प्रयत्नशील होती है और इसके फल से संसार में संघर्ष की वृद्धि हो जाती है। मनुष्य हमेशा की अपेक्षा अधिक इच्छा का दास हो जाता है, हमेशा से अधिक लोभ-ग्रस्त, भयत्रस्त तथा क्रोध-दग्ध बन जाता है। बलवान दुर्बल पर शासन करते हैं, धनवान निर्धन पर अत्याचार करते हैं, विशाल जन-समुदाय का शोषण उन थोड़े से लोगों के लाभ के लिए किया जाता है, जिनके हाथ में सत्ता होती है। कहीं भी शक्तियां विश्राम न पाकर व्यक्ति उत्तेजना और विलास में डूबकर अपने आपको भूल जाने का यत्न करता है। दुराचार बढ़ता है, अपराधों में वृद्धि होती है तथा धर्म का परिहास किया जाता है।

ऐसे समय में अवतार होता है। मानवीय रूप में ईश्वर की पूर्ण अभिव्यक्ति होने के सबब से, वह एक माप-दण्ड के तुल्य होता है, जिसके, उदाहरण से प्रत्येक व्यक्ति अपने को नाप सकता है। मानवीय उत्कृष्टताओं के आदर्श को वह दिव्य जीवन के दृष्टाँत द्वारा यथार्थ कर दिखाये है।

प्रत्येक वस्तु में उसकी रुचि होती है, पर किसी वस्तु से उसका लगाव नहीं होता। अत्यन्त छोटी दुर्घटना उसकी सहानुभूति प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है, पर महान से महान शोक भी उसे विचलित नहीं कर सकता। दुःख और सुख, इच्छा और सन्तोष, विश्राम और संघर्ष, जीवन और मृत्यु के द्वन्द्वों से वह परे रहता है। उसके लिए ये ऐसे भ्रम हैं जिनसे वह मुक्त हो चुका है। वह जानता है कि मृत्यु से मनुष्य के अस्तित्व का अंत नहीं होता, अतः मृत्यु से उसे कोई मतलब नहीं। वह जानता है कि सृजन के पहले संहार होता है, यंत्रणा के गर्भ से शाँति और आनन्द का जन्म होता है, प्रयत्न के ही द्वारा, कर्म के बन्धनों से छुटकारा मिलता है। इन काम की बातों पर ही उसकी दृष्टि रहती है।

उसका कार्य केवल अपने समय के मनुष्यों के लिए ही नहीं होता, किन्तु भावी मानवता के लिए भी होता है। वह मानव जाति को जागृत कर उसके सच्चे आध्यात्मिक स्वभाव का ज्ञान कराता है। वह उन लोगों को मुक्ति दिलाता है जो उसके लिए तैयार रहते हैं। भावी मानव संसार के लिए वह अपना आदर्श छोड़ जाता है। उसका दिव्य मानवीय दृष्टाँत उसके तिरोहित हो जाने के बाद मानवता का पथ-प्रदर्शन करता है।

पृथ्वी पर दिव्य जीवन सभी मनुष्यों के लिए सम्भव है, वह अपने जीवन के उदाहरण के द्वारा यह सिद्ध कर देता है। इच्छा होने पर साहसी और सच्चे मनुष्य उसका अनुकरण करके मुक्ति-मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं।

ऐसा समय आजकल पृथ्वी पर दिखलाई पड़ रहा है। एक तरफ घोर संघर्ष छिड़ा है, तो दूसरी ओर सद्गुरु आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत कर रहे हैं। जब मनुष्य अपने हृदय की गहराई से, धन की अपेक्षा किसी स्थायी वस्तु की इच्छा करेगा, भौतिकता की अपेक्षा किसी अधिक सत्य वस्तु की चाह करेगा, तब शाँति, आनन्द और प्रकाश का आगमन होगा।


सतगुरु की कृपा से जीवन्मुक्त पद की प्राप्ति

(श्री. जगतनारायण)

साधारणतः हम समझते हैं कि मनुष्य-जीवन का लक्ष्य ईश्वर अथवा ब्रह्म के साथ ऐक्य स्थापित करना है। पर सिद्धान्त रूप से यही लक्ष्य तो प्रत्येक प्राणी का है। क्या मनुष्य, क्या पशु, क्या वनस्पति, क्या अन्य श्रेणी के दृश्य अथवा अदृश्य प्राणी- सभी अनंत में उसी एक परम पद को प्राप्त होंगे। सभी की आदि, उत्पत्ति वहीं से है और अन्त में सभी उसी में जा मिलेंगे। पर तो भी कोई प्राणी एकाएक उस अन्तिम लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता। आदि से लेकर अन्त तक, जहाँ तक ज्ञान उपलब्ध हुआ है, उससे यही प्रतीत हुआ है, कि समस्त जगत के लिए एक ईश्वरीय विधान है, जिसके अनुसार ही सभी प्राणियों का क्रमशः विकास होता है। इस दृष्टि से विचार करने पर जान पड़ता है कि खनिज-वर्ग के जीवन की पूर्णता इसी में है कि वे विकसित होकर वनस्पति-वर्ग में पहुँच जायें। ऐसे ही वनस्पतियों के जीवन का लक्ष्य यह है कि विकास पाकर पशु-वर्ग में प्रवेश कर जायें और पशु-जीवन का लक्ष्य यही है कि वे विकास करके मनुष्य-वर्ग में पहुँच जायें। इस प्रकार देखा जाता है कि यद्यपि सभी प्राणी अन्त में परमब्रह्म परमेश्वर में ही लीन हो जायेंगे तथापि उनको जीवन के भिन्न-भिन्न वर्गों में ही होकर सफर तय करना पड़ता है, अर्थात् अन्तिम लक्ष्य के अलावा प्रत्येक वर्ग का भी एक-एक लक्ष्य है और मनुष्य-वर्ग भी विकास-क्रम के मध्य का एक विभाग है। इसलिए मनुष्य-वर्ग से भी साधारणतः कोई परमब्रह्म के पद को बिना इससे ऊपर वाले वर्गों को पार किये नहीं महात्माओं का वर्ग।

जब मनुष्य प्रवृत्ति मार्ग से निकल कर प्रवृत्ति और निवृत्ति की मध्यावस्था को भी पार करके निवृत्ति-पथ पर दृढ़ हो जाता है, उसी समय उसका सद्गुरु से साक्षात्कार हो सकता है और उन्हीं के दिखलाये मार्ग पर चलकर वह मनुष्य-जीवन की पूर्णता को प्राप्त करके महात्मा-श्रेणी में पहुँच सकता है, यही मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का पवित्र गुप्त मार्ग है। इस मार्ग का अवलम्बन प्रत्येक धर्म में आ जाता है। हाँ, भिन्न-भिन्न धर्मों में इसके प्रकट करने की रीतियों में अन्तर अवश्य है। पर सब का सार निस्वार्थ भाव से मनुष्य-मात्र की सेवा करना ही है। जब तक मनुष्य दूसरों का उपकार करने के बजाय निजी स्वार्थ पर ही दृष्टि रखता है तब तक वह महात्मा-श्रेणी में कदापि दाखिल नहीं हो सकता।

जब मनुष्य में निस्वार्थ सेवा का भाव पूर्ण रूप से दृढ़ हो जाता है और उसके मन तथा हृदय से साधारण कमजोरियाँ दूर हो जाती हैं, तब उसका सीधा सम्बन्ध सद्गुरु की चेतना से हो जाता है। अब मनुष्य के विचारों, भावनाओं, इच्छाओं अथवा वासनाओं का प्रभाव गुरुदेव के मन तथा हृदय पर पहुँचता है। यही कारण है कि मनुष्य के विकास-क्रम में चरित्र-गठन और निस्वार्थ सेवा के सद्गुणों पर इतना अधिक जोर दिया जाता है, तब उसका सीधा सम्बन्ध सद्गुरु की चेतना से हो जाता है। अब मनुष्य के विचारों, भावनाओं, इच्छाओं अथवा वासनाओं का प्रभाव गुरुदेव के मन तथा हृदय पर पहुँचता है। यही कारण है कि मनुष्य के विकासक्रम में चरित्र-गठन और निस्वार्थ सेवा के सद्गुणों पर इतना अधिक जोर दिया जाता है, क्योंकि यदि इस समय भी उसके मन में बुरी वासनायें अथवा तुच्छ विचार उठते हैं तो उनका प्रभाव गुरुदेव के हृदय पर भी पड़ता है और उस प्रभाव को हटाने के लिए गुरुदेव को अपनी आत्मिक शक्ति व्यय करनी पड़ती है। पर वे इस कार्य को इसी आशा से करते रहते हैं कि इस समय जितना ध्यान उनको एक व्यक्ति के ऊपर देना पड़ता है, समय आने पर अर्थात् उसका विकास हो जाने पर, वह उसका कई गुणा अधिक मानव समाज का हित-साधन करेगा।

इस अवस्था में पहुँचने पर मनुष्य एक प्रकार से इस संसार से विलग हो जाता है। पर इसका यह अभिप्राय नहीं कि वह संसार को छोड़कर संन्यास ग्रहण करके जंगल, पहाड़ की गुफा अथवा अन्यत्र कहीं जा बैठता है। यह तो असम्भव है, क्योंकि सद्गुरु उसे जो नई शक्ति प्रदान करते हैं, उसका उद्देश्य तो मानव समाज की अधिक निपुणता के साथ सेवा करना होता है। संसार में तो उसे रहना ही होता है, पर संसार में रहते हुए भी उसे साँसारिक विषयों से पूर्ण रूप से अनासक्त रहना पड़ता है। इतना अवश्य है कि इस प्रकार की शक्ति को पाकर भी कभी-कभी मनुष्य अपने धर्म के कठिन मार्ग से विचलित होकर नीचे गिर जाते हैं, पर उसका यही मतलब है कि कुछ काल के लिए वे अपने विकास को रोक देते हैं। इस अवस्था पर पहुँचे हुए मनुष्य का कभी पूर्ण रूप से पतन नहीं हो सकता। इस प्रकार की अवस्था को शास्त्रों में ‘परिव्राजक’ नाम से पुकारा जाता है, जिसका आशय यह है कि वह आदमी अब इस संसार का नहीं रह जाता। किसी स्थान से उसका विशेष सम्बन्ध नहीं रहता। वह सदा भ्रमण करता रहता है, अर्थात् संसार में उसको अपनी ओर आकर्षित करने की शक्ति अब नहीं रहती है। खेद है कि आज इस ऊँचे पद को बिलकुल नीचे गिरा दिया गया है और चाहे जो अपने को ‘परिव्राजक’ कहने लग जाता है। बौद्ध धर्म वाले इस अवस्था को ‘श्रोतापत्ति’ के नाम से पुकारते हैं। इसका भी अर्थ यही है कि वह मनुष्य संसार से अलग होकर जीवन की असली धारा में प्रवेश कर जाता है, अब वह संसार-चक्र की तरफ मुड़ नहीं सकता। ईसाई धर्म में ईसा-मसीह के जन्म का भी ऐसा ही आशय समझा जाता है। अध्यात्म-ज्ञानी ऐसे ही व्यक्ति को ‘द्विज’ अर्थात् दूसरा जन्म धारण करने वाला कहते हैं।

इसी प्रकार के अनेकों प्रयत्नों और आध्यात्मिक परीक्षाओं जैसे कुटीचक्र, हंस, परमहंस द्वारा मनुष्य संसार के सब बन्धनों को तोड़कर जीवन्मुक्त अवस्था तक पहुँच जाता है। यही मनुष्य के जीवन का अंतिम फल है। यही मनुष्यमात्र के लिए एकमात्र पवित्र पथ है जैसे कि घर पहुँचने के लिए भिन्न-भिन्न धर्म, भिन्न-भिन्न पगडण्डियों की तरह है। शुरू में तो कई प्रकार के अन्तर देखने में आते हैं, पर आगे जाकर सभी पगडंडियाँ इसी एक पथ में मिल जाती हैं। यह पथ बड़ा कल्याणकारी और साथ ही महा कठिन भी है। इसी पथ के लिए कहा गया है कि वह तलवार की धार पर चलने के समान है। पर खेद है कि आजकल अज्ञानी और स्वार्थी मनुष्यों ने इसे हद दर्जे तक नीचे गिरा रखा है और चाहे जो साधारण गेरुआ वस्त्रधारी अपने को इन नामों से विभूषित करते रहते हैं। पर जो वास्तव में आध्यात्मिक उन्नति के ऊँचे सोपान पर पहुँचना चाहते हैं उनको सच्चे सद्गुरु की खोज करके सत्य ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। हमको विश्वास रखना चाहिये कि अत्यंत प्रेम और अगाध दया के साथ सद्गुरु हमारी ओर देख रहे हैं। क्या हम उनकी सहायता से अपना जीवन सफल न बनायेंगे? रास्ता विकट है, पर निस्वार्थ सेवा की भावना को बढ़ाने से इसकी कठिनाइयाँ बहुत कम हो जाती हैं। हम कैसी भी नीची स्थिति में क्यों न हों, पर जीवन के तथ्यों को समझ कर उनके अनुसार चलने से एक दिन अवश्य पूर्णता के उच्चतम शिखर पर पहुँच सकेंगे।


मूर्ति-पूजा का वास्तविक तात्पर्य और महत्व

(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए., पी-एच. डी.)

भारतीय संस्कृति में प्रतीकवाद का महत्वपूर्ण स्थान है। सबके लिए सरल सीधी पूजा-पद्धति को आविष्कार करने का श्रेय को ही प्राप्त है। पूजा-पद्धति की उपयोगिता और सरलता की दृष्टि से हिन्दू धर्म की तुलना अन्य सम्प्रदायों से नहीं हो सकती। हिन्दू धर्म में ऐसे वैज्ञानिक मूलभूत सिद्धाँत दिखाई पड़ते हैं, जिनसे हिन्दुओं की कुशाग्र बुद्धि, विवेक और मनोविज्ञान की अपूर्व जानकारी का पता चलता है। मूर्ति-पूजा ऐसी ही प्रतीक पद्धति है।

मूर्ति-पूजा क्या है? पत्थर, मिट्टी, धातु या चित्र इत्यादि की प्रतिमा को मध्यस्थ बनाकर हम सर्वव्यापी अनन्त शक्तियों और गुणों से सम्पन्न परमात्मा को अपने सम्मुख उपस्थित देखते हैं। निराकार ब्रह्म का मानस चित्र निर्माण करना कष्टसाध्य है। बड़े योगी, विचारक, तत्ववेत्ता सम्भव है यह कठिन कार्य कर दिखायें, किन्तु साधारण जन के लिए तो वह निताँत असम्भव-सा है। भावुक भक्तों, विशेषतः नारी उपासकों के लिए तो किसी प्रकार की मूर्ति का आधार रहने से उपासना में बड़ी सहायता मिलती है। मानस चिन्तन और एकाग्रता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रतीक रूप में मूर्ति-पूजा की योजना बनी है। साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान की कोई भी मूर्ति चुन लेता है और साधना करने लगता है। उस मूर्ति को देखकर हमारी अन्तः चेतना ऐसा अनुभव करती है मानो साक्षात् भगवान से हमारा मिलन हो रहा है।

आचार्य श्रीराम शर्मा का यह कथन सत्य है कि यद्यपि इस प्रकार की मूर्ति-पूजा में भावना प्रधान और प्रतिमा गौण है, तो भी प्रतिमा को ही यह श्रेय देना पड़ेगा कि वह भगवान की भावनाओं का उद्रेक और सञ्चार विशेष रूप से हमारे अन्तःकरण में करती है। यों कोई चाहे, तो चाहे जब, चाहे जहाँ भगवान को स्मरण कर सकता है, पर मन्दिर में जाकर प्रभु-प्रतिमा के सम्मुख अनायास ही जो आनन्द प्राप्त होता है, वह बिना मन्दिर में जाये, चाहे जब कठिनता से ही प्राप्त होगा। गंगा-तट पर बैठकर ईश्वरीय शक्तियों का जो चमत्कार मन में उत्पन्न होता है, वह अन्यत्र मुश्किल से ही हो सकता है।

मूर्ति-पूजा के साथ-साथ धर्म-मार्ग में सिद्धाँतमय प्रगति करने के लिए हमारे यहाँ त्याग और संयम पर बड़ा जोर दिया गया है। सोलह संस्कार, नाना प्रकार के धार्मिक कर्मकाण्ड, व्रत, जप, तप, पूजा, अनुष्ठान, तीर्थ-यात्राएं, दान, पुण्य, स्वाध्याय, सत्संग ऐसे ही दिव्य प्रयोजन हैं, जिनसे मनुष्य में संयम और व्यवस्था आती है। मन दृढ़ बनकर दिव्यत्व की ओर बढ़ता है। आध्यात्मिक नियन्त्रण में रहने का अभ्यस्त बनता है।

मूर्ति-पूजा के पक्ष में पं. दीनानाथ शर्मा के विचार बहुमूल्य हैं। शर्मा जी लिखते हैं :-

“जड़ (मूल) ही सबका आधार हुआ करती है। जड़ सेवा के बिना किसी का भी कार्य नहीं चलता। दूसरे की आत्मा की प्रसन्नतार्थ उसके आधार भूत जड़ शरीर एवं उसके अंकों की सेवा करनी पड़ती है। परमात्मा की उपासना के लिए भी उसके आश्रय स्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है। हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, प्रकाश आदि की उपासना से प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्ति-पूजा से क्यों घबड़ाना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्यापक चेतन (सच्चिदानन्द) की पूजा कर रहे होते हैं। आप जिस बुद्धि को या मन को आधारीभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं क्या वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता। तब सिद्ध हुआ कि जड़ और चेतन का परस्पर सम्बन्ध है। तब परमात्मा भी किसी मूर्ति के बिना उपास्य कैसे हो सकता है?

हमारे यहाँ मूर्तियाँ मन्दिरों में स्थापित हैं, जिनमें भावुक जिज्ञासु पूजन, वन्दन, अर्चन के लिए जाते हैं और ईश्वर की मूर्तियों पर चित्त एकाग्र करते हैं। घर में परिवार की नाना चिन्ताओं से भरे रहने के कारण पूजा, अर्चन, ध्यान इत्यादि इतनी अच्छी तरह नहीं हो पाता, जितना मन्दिर के प्रशान्त स्वच्छ वातावरण में हो सकता है। अच्छे वातावरण का प्रभाव हमारी उत्तम वृत्तियों को शक्तिवान् बनाने वाला है। मंदिर के सात्विक वातावरण में कुप्रवृत्तियाँ स्वयं फीकी पड़ जाती हैं। इसलिए हिन्दू संस्कृति में मंदिर की स्थापना को बड़ा महत्व दिया गया है, जो उचित ही है।”

कुछ व्यक्ति कहते हैं कि मन्दिरों में अनाचार होते हैं। उनकी संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। उन पर बहुत व्यय हो रहा है। अतः उन्हें समाप्त कर देना चाहिए।

सम्भव है इनमें से कुछ आक्षेप सत्य हों; किन्तु मन्दिरों को समाप्त कर देने या सरकार द्वारा जब्त कर लेने मात्र से क्या अनाचार दूर हो जाएंगे? यदि किसी अंग में कोई विकार आ जाय, तो क्या उसे जड़मूल से नष्ट कर देना उचित है?

कदापि नहीं। उसमें उचित परिष्कार और सुधार करना चाहिए। इसी बात की आवश्यकता आज हमारे मन्दिरों में है। मन्दिर स्वच्छ नैतिक शिक्षण के केन्द्र रहें। उनमें पढ़े-लिखे निस्पृह पुजारी रखे जायं, जो मित्रि, पूजा कराने के साथ-साथ जनता को धर्मग्रन्थों, आचार, शास्त्रों, नीति, ज्ञान की शिक्षण भी दें और जिनका चरित्र जनता के लिए आदर्श रूप हो।

मूर्ति-पूजा चित्त-शुद्धि का साधन

मनुष्य का यह स्वभाव है कि जब तक वह यह जानता है कि कोई उसके कामों, चरित्र या विविध हाव-भाव विचारों को देख रहा है, तब तक वह बड़ा सावधान रहता है। बाह्य नियन्त्रण हटते ही वह शिथिल-सा होकर पुनः पतन में बहक जाता है। मंदिर में भगवान की मूर्ति के सम्मुख उसे सदैव ऐसा अनुभव होता रहता है कि वह ईश्वर के सम्मुख है, परमात्मा उसके कार्यों, मन्तव्यों और विचारों को सतर्कता से देख रहे हैं, अतः उसे चित्त-शुद्धि में सहायता मिलती है। मूर्ति चित-शुद्धि के लिए प्रत्यक्ष परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करती है। जिन भारतीय ऋषियों ने भगवान की मूर्ति की कल्पना की थी, वे मनोविज्ञान-वेत्ता भी थे। उनके इस उपाय से भोली भावुक जनता की चित्त-शुद्धि हुई। मनुष्य ने अपने सात्विक प्रवृत्तियों, कला और सौंदर्य-वृत्ति का सारा प्रदर्शन मन्दिरों में किया हैं। मूर्ति में भगवान की भावना और अपनी श्रद्धा भरकर उन्होंने आत्मविकास किया।

आचार्य बिनोवा भावे ने लिखा हैं कि मूर्ति न होती तो बगीचे में से फूल तोड़कर मनुष्य केवल उसे अपनी नाक तक ही लगाता, किन्तु सात्विक भावना से भरकर भगवान की मूर्ति पर फूल चढ़ाकर, जो कि फूल के लिए शायद सर्वोच्च स्थान है- मनुष्य ने अपनी गंध वासना संयत और उन्नत की। अपनी वासना को उन्नत, परिष्कृत और संयमित करने के लिये भगवान के समर्पण की युक्ति निकाली।”

रामदास स्वामी ने एक स्थान पर लिखा है, “देवाचें वैभव बाढ़वावें” (भगवान का वैभव बढ़ाओ)

अल्पज्ञ, अशक्त, अज्ञान मनुष्य भला भगवान का वैभव क्या बढ़ावेगा? वह महान है, स्वयं असीम शक्तियों का पुञ्ज है। उधर हम रंक हैं; अशक्त हैं; अपनी शक्तियों में सीमित हैं।

लेकिन इस उक्ति का तात्पर्य यही है कि हम ऐसे कार्य, ऐसी भावना प्रकट करें, जो हमारे माध्यम से हमारे पिता परमेश्वर के महत्व को प्रकट करने वाले हों। परमेश्वर का वैभव बढ़ाने की कोशिश करने में हम स्वयं अपना जीवन उन्नत कर लेते हैं, उसे ईश्वरीय शक्तियों से भर लेते हैं।

मन्दिर में ईश्वर की कोई प्रतिमा स्थापित कर निरन्तर उन्हें अपने कार्यों का दृष्टा मानकर हम जो सदाचरण करते हैं, अपने कर्तव्यों को पूर्ण करते हैं, भजन, पूजन, स्वाध्याय, प्रार्थना करते हैं, वही भगवान का वैभव बढ़ाने वाली बातें हैं। जिन विचारों या कार्यों से हमारा देवत्व प्रकट होता है, वे ही इस दुर्लभ मानव-देह से करने योग्य कार्य हैं। वाणी से भगवान के दिव्य गुणों, अतुल सामर्थ्यों का गुण-गान करें, हाथों से पवित्र कार्य करे, ब्रह्म-चिन्तन भजन-गायन, और अर्चन से बुद्धि को शुद्ध बनाये, यही हमारे अहंकार को दूर कर सकता है और चित्त शुद्ध कर सकता है।

जब मूर्ति में हम भगवान की आस्था, श्रद्धा और विश्वास के साथ स्थापित कर देते हैं, तो वही दिव्य सामर्थ्यों से पूर्ण हो जाती है। उसी पत्थर की प्रतिमा के सामने हमारा सिर अपने आप झुक जाता है। यह मनुष्य की श्रद्धा का चमत्कार है। इस मूर्ति के सामने निरन्तर रहने से चित्त-शुद्धि होती है और आत्मानुशासन प्राप्त हो जाता है। जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिए ईश्वर से तादात्म्य और इसी को मानना चाहिए- परम पुरुषार्थ। मूर्ति-पूजा वह प्रारम्भिक अवस्था है जिसमें मनुष्य दिव्य गुणों के विकास की पहली सीढ़ी पर चढ़ता है। योगसूत्र में भगवान की व्याख्या “रागद्वेषादि रहित पुरुष विशेषः” की है। इस प्रकार मूर्ति-पूजा करते-करते मनुष्य निरहंकार बनता है। जिस मूर्ति में वह जिन देव गुणों का आरोपण का पूजा करने लगता है, कालान्तर में वे ही उसके चरित्र में प्रकट होने लगते हैं। इस प्रकार मूर्ति-पूजा उपयोगी है और आवश्यक भी।


मृत्यु के समय रोना पीटना अनुचित है।

(‘एक तत्वज्ञानी’)

किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय रोना-पीटना हमारे देश में आम तौर से प्रचलित है। जिन मनुष्यों के परिवार में बहुसंख्यक व्यक्ति होते हैं और वे उसके लिये खूब रोना-धोना करते हैं तो उसे लोग बड़ा भाग्यवान मानते हैं। और जिनके कोई नहीं होता उनको अभागा समझ कर कहा जाता है कि ‘उसके लिये कोई रोने वाला भी न था’। वास्तव में यह आश्चर्य की बात ही मानी जायगी कि जो हिन्दू पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर दृढ़ता पूर्वक विश्वास करते हैं और आत्मा की अमरता की सदा दुहाई देते रहते हैं वे तो किसी के मरने पर इस तरह घोर विलाप करना आवश्यक मानते हैं, और इसके विपरीत ईसाई आदि जो पुनर्जन्म को मानते ही नहीं और अधिकाँश में भौतिकवादी माने जाते हैं किसी के मरने पर प्रकट में बहुत ही कम रोते-धोते हैं। उससे भी हम इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि हिन्दुओं का वर्तमान धर्म अपने असली तत्वों से बहुत दूर हट गया है और उनमें दिखावटीपन बहुत अधिक बढ़ गया है।

हिन्दुओं के शास्त्रों में बार-बार जोर के साथ कहा गया है कि मृत्यु का अर्थ शून्य अथवा सर्वथा नष्ट हो जाना नहीं है, वरन् उसका आशय एक शरीर को छोड़ कर दूसरा शरीर धारण करना ही है। इस सम्बन्ध में गीता का यह श्लोक बहुत प्रसिद्ध है-

बाँसाँसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि ग्रह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्, यन्यानि संयाति नवानि देही॥

इसका अर्थ तो यह है कि “जिस प्रकार मनुष्य वस्त्रों के पुराने हो जाने पर उनको त्याग कर नये वस्त्र धारण कर लेता है, उसी प्रकार जीव भी इस देह के पुराना हो जाने पर नवीन शरीरों में प्रवेश करता है।” पर मनुष्य के शरीरों का ज्ञान न होने के कारण लोग इस श्लोक का आशय बहुधा यह समझ लेते हैं कि मनुष्य मरने के बाद तुरन्त ऐसा ही दूसरा मानव शरीर अथवा किसी अन्य प्राणी का शरीर ग्रहण कर लेता है। पर इसमें कुछ भूल है। मनुष्य मरने के बाद सदैव मनुष्य ही रहता है। वह कई वर्ष या कई सौ वर्ष या कई हजार वर्ष अन्य लोकों के सूक्ष्म शरीरों में रह कर पुनः स्थूल मनुष्य शरीर ही धारण करता है। इस बीच में वह एक न एक शरीर धारण किये अदृश्य लोकों में निवास करता रहता है। इसलिये उक्त श्लोक में ‘शरीराणि’ से केवल स्थूल शरीरों को ही नहीं समझना चाहिये। उसका असली अभिप्राय भिन्न-भिन्न लोकों में रहने के लिये मनुष्य के कई प्रकार के स्थूल और सूक्ष्म शरीरों से है।

इसलिये स्थूल भूलोक में मृत्यु होने का मतलब स्थूल शरीर का त्याग करना और छाया शरीर (ईथर तत्व से बना शरीर) का ग्रहण करना है। अर्थात् स्थूल भूलोक में मृत्यु होने का अर्थ है दूसरे ‘ईथर’ लोक में जन्म लेना। इसी प्रकार ‘छाया’-शरीर को त्याग करने का अर्थ है ईथर-लोक में मृत्यु होना और वासना-शरीर धारण करके काम-लोक में जन्म लेना। इसी प्रकार एक लोक से दूसरे लोक में जाने पर स्वभावतः जीवन को पुराना शरीर त्यागना ही पड़ता है, क्योंकि वह अन्य लोकों के लिये बेकार होता है।

इन तमाम बातों से एक बहुत महत्वपूर्ण नतीजा यह निकलता है कि भिन्न-भिन्न लोकों में आना-जाना और वहाँ का कार्य करके चल देना तो जीव रूपी पथिक की यात्रा की स्वाभाविक प्रणाली है। इसलिये मृत्यु का समय वास्तव में दुख के बजाय आनन्द का अवसर है, क्योंकि उस समय जीवन मृत्यु लोक का एक सफर तय करके अपने घर की ओर वापिस जाने का प्रयत्न करता है। जीव जितना ही नीचे के लोकों में उतरता है, उसका तेज, उसकी शक्तियाँ उतनी ही घटती जाती हैं। इस भूलोक में जीव का उतरना वैसा ही है जैसा किसी गहरी अँधेरी खाई में कुछ पता लगाने के लिये किसी मनुष्य का उतरना। वहाँ का काम समाप्त करके मनुष्य खाई से ऊपर उठने लगता है तो पद-पद पर उसे अधिक हवा, अधिक प्रकाश मिलता जाता है। इसी प्रकार इस पृथ्वी लोक में तो प्रत्येक मनुष्य किसी विशेष कार्य से आया हुआ है। इस कार्य को समाप्त करके जब वह अपने असली घर की ओर जाने लगता है तो, पद-पद पर उसे अधिक हवा अधिक प्रकाश मिलता है, अर्थात् उसका जीवन क्रमशः बन्धनों से अधिक मुक्त होता जाता है। इसलिये मृत्यु के समय शोक मनाने का कोई कारण नहीं।

इस प्रकार स्थूल भूलोक की मृत्यु का अर्थ जीव द्वारा स्थूल शरीर को त्याग करना और अन्य कोषों के साथ ‘ईथरिक’ (लिंग शरीर) में इस देह से बाहर निकल जाना होता है। इसलिये जैसे-जैसे ‘छाया शरीर’ स्थूल शरीर से बाहर निकलता जाता है, वैसे-वैसे स्थूल शरीर शिथिल पड़ता जाता है और अन्त में वह सूक्ष्म सूत्र जो ‘छाया’ देह को स्थूल शरीर के साथ बाँधे रहता है, वह भी टूट जाता है, और साधारण बोल-चाल में मनुष्य की मृत्यु हो जाती है।

मृत्यु होने के कुछ पूर्व जीव अपने इस जन्म की सारी कार्यवाहियों का सिंहावलोकन करता है। यह क्रिया ठीक वैसी ही होती है, जैसा प्रत्येक यात्री अपनी एक मंजिल को छोड़कर दूसरी मंजिल के लिये रवाना होते समय करता है। इस समय जीव अपने दो-चार दिनों अथवा दो-चार वर्षों की ही नहीं, वरन् जन्म भर की अच्छी-बुरी कार्यवाहियों पर एक बार चन्द क्षणों के भीतर ही दृष्टि फेर जाता है। ऐसे अवसर पर यही उचित है कि उस मनुष्य को निश्चिन्त छोड़ दिया जाय ताकि वह अपने जीवन भर का लेखा अर्थात् हिसाब-किताब समझ ले। ऐसा न कर हम बहुधा रोने-चिल्लाने लगते हैं। यह बात सहज ही में समझी जा सकती है कि ऐसा करने से उस प्रस्थान करने वाले जीव के चित्त में कितनी उद्विग्नता, कितनी अशान्ति फैलती होगी, जिससे वह अपना लेखा, अपना सिंहावलोकन समुचित रीति से न कर सकता होगा इसलिये ऐसे समय में उस जीव के वास्तविक हित के लिये, जिसके साथ हम इतना प्रेम करते थे, पूर्ण शान्ति, प्रेम तथा आनन्द का ही वातावरण उसके चारों ओर बनाये रखने की हमें हर तरह से कोशिश करनी चाहिये।

एक बात और स्मरण रखनी आवश्यक है कि प्राकृतिक मृत्यु के पश्चात जीव की गति ऊपर के लोकों की तरफ होती है। इसलिये यदि हम वास्तव में ऊपर जाने वाले जीव के साथ प्रेम रखते हों, तो हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी ऊपर की गति में उसे सहायता पहुँचावें। यहाँ रह कर भी ऐसी सहायता पहुँचाई जा सकती है। श्राद्ध कर्म आदि का यही उद्देश्य होता है। खेद है कि इन बातों को हम समझ कर नहीं करते, केवल एक रस्म निबाहने के भाव से कर देते हैं, जिससे उनका प्रभाव बहुत हद तक बेकार हो जाता है। पर कम से कम एक बात पर तो पूरा ध्यान देना चाहिये कि किसी की मृत्यु के समय और उसके बाद भी उसके लिये रोना-पीटना तथा शोक न करना चाहिये। क्योंकि मरने के बाद भी मनुष्य तुरन्त उस स्थान से कहीं बहुत दूर नहीं चला जाता। प्रायः वह अपने रिश्तेदारों और इष्ट मित्रों के ही इर्द-गिर्द घूमा फिरा करता है। उसका प्रेम प्रत्येक के साथ जैसा पहले था वैसा अब भी रहता है। अन्तर सिर्फ इतना ही रहता है कि यहाँ जो सूक्ष्म लोक वर्तमान है, उनमें वह सूक्ष्म शरीर धारण करके रहता है। इसलिये इस शरीर की इन्द्रियों द्वारा हम उसे देख अथवा छू नहीं सकते। पर अपनी अनुभूतियों तथा अपने विचारों द्वारा उसके साथ हमारा सम्बन्ध एक भाव से लगा रहता है। वह तो स्वयं भी अपने प्रेमियों की ओर झुका रहता है, और यदि प्रेमियों ने अपने रोने-पीटने और शोक, विलाप द्वारा उसे अपनी तरफ और अधिक आकृष्ट करे रखा तो उसके आगे जाने के रास्ते में बाधाएँ पड़ती है। इस बात को स्मरण रख कर सच्चे प्रेम का संचार करते रहने से तथा समझ-बूझ कर श्राद्ध, आदि करने से हम उस परलोकगामी जीव को बहुत सहायता पहुँचा सकते हैं। इसलिये यदि हम अधिक न कर सकें, यदि हम विशेष सहायता न पहुँचा सकें, तो कम से कम हमें इतना तो अवश्य करना चाहिये कि उस जीव के रास्ते में हम बाधायें उपस्थित न करें और यह तभी सम्भव हो सकेगा जब हम वृथा रोने-पीटने तथा शोक विलाप करने से परहेज करेंगे।


मनुष्य का उत्तरदायित्व और उसका कर्तव्य

(श्री. अगरचन्दजी नाहटा)

साधना ही सिद्धि का सोपान है। बिना साधना सिद्धि नहीं मिलती। साधना के लिये बहुत बड़े त्याग की आवश्यकता होती है। निवृत्ति-जीवन में वह अधिक सुलभ होती है, क्योंकि अनेक प्रवृत्तियों में जहाँ तक मन, वचन, काया लगी रहती है वहाँ तक साधना के उपयुक्त एकाग्रता प्राप्त नहीं हो सकती और बिना एकाग्रता के साधना बलवती एवं इच्छित फलदात्री नहीं हो सकती। इसीलिये त्यागमय साधु जीवन को साधना के लिये उपयुक्त माना गया है। गृहस्थ जीवन में अनेकों जिम्मेदारियां होती है, अपने परिवार के भरण-पोषण और लोक-व्यवहार एवं सामाजिक नियमों को सुव्यवस्थित संचालित करने के लिये विविध प्रवृत्तियों में व्यस्त रहना पड़ता है। साधु-जीवन में आवश्यकताएँ और बाहरी जिम्मेदारियां बहुत कम हो जाती हैं। इसलिये साधना में पूरा समय, शक्ति लगाई जा सकती है। एक तरह से साधु जीवन साधनामय ही होता है। लक्ष्य को स्थिर करके निरन्तर उस ओर अग्रसर होते रहना साधु जीवन में अधिक सम्भव है।

ऐसे ही एक सन्त की वाणी का परिचय करीब डेढ़ वर्ष पूर्व सिलचर में मिला। इन सन्त पुरुष का नाम हैं स्वामी स्वरूपानन्द परमहंस। बंगाल-आसाम के अतिरिक्त बनारस में भी इनका आश्रम है। वहीं से आपकी वाणी और कार्यों का प्रचार ‘प्रतिध्वनि’ नामक एक मासिक पत्रिका द्वारा हो रहा है। इसके विगत अग्रहायण के अंक में स्वामीजी की वाणी के अस्सी उपदेशों का संकलन प्रकाशित हुआ है, इस संकलन के कुछ चुने हुए वाक्यों का सार प्रस्तुत लेख में उपस्थित किया जा रहा है। जिससे उनकी अनुभूति प्रधान और प्रेरणादायक वाणी का कुछ परिचय पाठकों को मिल जायगा।

1.हमारा ऋण

व्यक्तिगत रूप से मैं अनुभव करता हूँ कि मैं अपने पूर्व पुरुषों का आपादमस्तक ऋणी हूँ। केशाग्र लगाकर पदनखाग्रत के मेरे शरीर के प्रत्येक अंग-प्रत्यंग के प्रत्येक अणु-परमाणु एक न एक महाभाव को वहन कर रहे हैं। ये सब महाभाव मुझे दूसरों से ही प्राप्त हुए हैं। एक महापुरुष ने कहा “झूठ बोलना पाप है।” दूसरे ने कहा ‘परनिन्दा पाप है।’ तीसरे ने ‘पराये धन की ओर दृष्टि देना पाप बताया’ और चौथे ने ‘परानिष्ठ चिन्तन करना बुरा बतलाया’। इस तरह एक-एक व्यक्ति की एक-एक बात ने मेरे कर्म, वाक्य, चिन्तन और जीवन को गठित किया। मैं उन सब शिक्षादाताओं का ऋण कैसे भूल सकता हूँ? साधारणतया रास्ते में खड़े हुये एक दीन मजदूर के साथ भी एक मिनट भी बात की जाती है, उससे भी कोई-कोई अज्ञात बात प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार एक व्यक्ति जो कुछ भी नहीं बोलता हैं, के चेहरे की ओर स्थिर चित्त से दो मिनट भी देखा जाय तो उसके आन्तरिक भावों की उपलब्धि होने लगती है। उससे सम्बन्धित अनेक ज्ञान की किरणों का प्रकाश हमारे हृदय में प्रकट हो जाता है। हमारी इच्छा हो, न हो, पर दसों दिशाओं से हर समय हमें कुछ-न-कुछ नयी जानकारी और अनुभूति मिलती रहती है। इस तरह हम जो कुछ बन पाते हैं, वह दूसरों से प्राप्त अनुभूतियों के द्वारा ही और इस नाते हम असंख्य वस्तुओं और प्राणियों के ऋणी हैं ही। जगत की समस्त वस्तुएं, घटनाएँ और प्राणीगण हमारे लिये एक ‘लोन आफिस’ ही समझिये, जिनके द्वारा अनेक प्रकार की बातें हमें प्रतिपल मिल रही हैं। जिस ओर भी जायं, जहाँ कहीं भी रहें, हम निरन्तर दूसरों से कुछ-न-कुछ पाते ही रहते हैं। प्रत्येक श्वासोच्छवास के साथ हम यह ऋण कर रहे हैं और बढ़ा रहे हैं।

2. ऋण परिशोध न के लिये सेवा

जब तुम समस्त विश्व के आकण्ठ ऋणी हो तो जगत् की सेवा के द्वारा इस ऋण का परिशोध न करते रहना तुम्हारा कर्तव्य हो जाता है। निष्कपट और निरहंकार मन से तुम्हें जगत् की सेवा में अपनी समग्र शक्ति, बुद्धि और प्रतिभा को नियोजित कर देना चाहिये। यदि किसी की सेवा नहीं करते, उपकार नहीं करते, केवल अपना ही स्वार्थ-साधन कर रहे हो तो तुम्हारा ऋण कभी भी नहीं उतरेगा। किसी की सेवा करके तुम उसका उपकार नहीं कर रहे हो, इस बात को कभी न भूलकर जगत् की सेवा में अपने को समर्पित कर दो।

3. पुरुषार्थ

सेवा का मार्ग विकट है। उसके लिये प्रचण्ड उत्साह की आवश्यकता है। भय और कष्टों से हताश होने से काम नहीं चलेगा। अदृष्ट के ऊपर निर्भर न रहकर अपनी शक्ति पर विश्वास रक्खो। अच्छे कार्य करने से भविष्य उज्ज्वल है ही। हमारी भाग्य के निर्माता हम स्वयं हैं। अपने पुरुषार्थ से हम उसे बदल सकते हैं। जैसा चाहें बना सकते हैं, मृत्यु को अमृत में रूपांतरित कर सकते हैं।

4. उपासना-प्रार्थना कामना रहित हो

जब ईश्वर हमारे सुख और दुःख सभी बातों को जानने वाले हैं, तब हमें उनके समक्ष ‘धन-दौलत दो, दुःख दूर करो’ इत्यादि प्रार्थनाएँ करने की आवश्यकता नहीं रहती। हम जिस समय जो प्राप्त करने के अधिकारी हैं, हमें वह निरन्तर मिल ही रहा है। हमें अपनी योग्यता को बढ़ाना चाहिये। जो चाहते हैं, उसके योग्य बन जाने पर वह स्वयं मिल जायगा इसलिये हमें कामना रहित होकर उपासना करनी चाहिये। साधना के बल पर ही हम जो चाहें प्राप्त कर सकेंगे।

5. सेवक की सेवा

जिन व्यक्तियों और वस्तुओं को हम निम्न श्रेणी का मानते हैं, वे भी हमारी अनेक प्रकार की सेवाएँ कर रही हैं। चमड़े को हम अस्पृश्य मानते हैं और उसके द्वारा जूता बनाने वाले चमार को भी अस्पृश्य समझते हैं। पर वह चमड़ा हमारे पैरों की रक्षा करता है, स्वयं क्षत और आघात सहता है पर हमारे पैरों को बचाता है। उस चमड़े को पैरों की रक्षा करने के उपयुक्त बनाने वाला वह चमार भी हमारी कितनी सेवा करता है। हमारे पैर के नाप से चमड़े को इस तरह सिलाई करता है कि जिससे उस चमड़े की सेवा की क्षमता बढ़ जाती है। जो दूसरे की सेवा करता है उसकी सेवा करना भी कम सौभाग्य की बात नहीं है। महापुरुषगण समस्त पृथ्वी के लाखों प्राणियों की सेवा करते हैं, जो साधारण व्यक्ति के लिये सम्भव नहीं, पर वह साधारण व्यक्ति उस महामना पुरुष की सेवा करके उनके सेवा कार्य को सहयोग तो दे ही सकता है। उसकी सेवा के द्वारा महापुरुष की सेवा की क्षमता बढ़ती है। वे जगत का अधिक उपकार कर सकते हैं। इस तरह प्रत्यक्ष रूप में जगत की सेवा न करने पर भी यह साधारणजन परोक्ष रूप में जगत के सेवक की सेवा करके जगत की सेवा का ही भागीदार हो सकता है। अतः सेवा निरत व्यक्ति की सेवा करो, उसे सहयोग दो। यह महान लाभप्रद है।

6. साधना के शत्रु

साधना की प्राथमिक अवस्था का शत्रु है- ‘आलस्य’ और परिणतावस्था का शत्रु है- ‘अहंकार। आलस्य से साधना में प्रवृत्ति ही नहीं होती और अहंकार आगे बढ़ने में रुकावट डालता है। अभिमान के द्वारा उच्च स्थिति से पतन हो जाता है। वह कहाँ जाकर गिरेगा इसका कोई ठिकाना नहीं रहता।

आलस्य के दमन का उपाय है उच्च आकाँक्षा को प्रबल करते रहना। इसी जीवन में चरम उत्कर्ष और परम सत्य प्राप्त करना है, ऐसा दृढ़ संकल्प करने से आलस्य भाग जायगा, क्योंकि आलसी व्यक्ति के लिये उस संकल्प की सिद्धि सम्भव नहीं। निरन्तर पुरुषार्थ करते रहने से ही वह उच्च आकाँक्षा पूर्ण हो सकेगी।

अहंकार के दमन का उपाय है अपने से अधिक उन्नत व्यक्तियों का ध्यान। साधारणतया हम अपने में दूसरों की अपेक्षा अधिक उल्लेखनीय विशेषता देखते हैं, तभी हमारे में अहंकार आता है। जब हम अपने से अधिक गुणी व्यक्तियों के जीवन पर दृष्टि डालेंगे, तभी हमारी अवनत स्थिति का सही भान होगा, अपने दोष और कमजोरियों के सामने आते ही हमारा अभिमान चूर्ण हो जायगा। अभी हमें बहुत आगे बढ़ना है, उन महापुरुषों की तुलना में हम बहुत ही नीचे हैं, अतः हमें उनके आगे का अनुसरण कर अपनी कमजोरियों को हटाना है।

7. सत्संग

वर्तमान युग के ब्रह्मचर्य को स्मरण रखना होगा। एक ओर से भगवान् के साथ योग रखना होगा, दूसरी ओर भगवान् के द्वारा सृष्टि जीव-जगत् के साथ सेव्य-सेवक सम्बन्ध अटूट भाव से रखना होगा। भगवान् की पूजा के साथ पूजक को भगवान् के जीवों को नहीं भूलना चाहिये। उनके दुःखों को दूर करने के लिये सतत प्रयत्नशील रहना चाहिये।

परमात्म परायणता का लक्षण है अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को परमात्मा की ओर आकर्षित किया जाय। सत्संग ही भक्ति मार्ग का सब से बड़ा पाथेय है। सत्पुरुषों की कृपा से परम मंगल होता है।


धर्म बनाम समाजवाद

(श्री. सत्यभक्त)

[धर्म और समाजवाद के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में लोगों में बड़ी भ्राँति देखने में आती है। अनेक धार्मिक विचारों के सज्जन तो समाजवाद को एक ‘धर्म-विमुख’ सिद्धान्त कहते भी नहीं हिचकते और उसे भारतीय आदर्शों के प्रतिकूल बतलाते हैं। पर बात इसके कुछ विपरीत ही है। प्रस्तुत लेख में बतलाया गया है कि धर्म के मूल तत्व और समाजवाद में पूर्ण ऐक्य है और धर्म का सच्चा पालन करने वाला समाजवाद के आदर्श का कदापि विरोध नहीं कर सकता। विशेषतः गायत्री-मंत्र में निहित सामूहिक कल्याण की भावना से तो इस सिद्धाँत का पूर्ण रूप से समर्थन होता है।]

अधिकाँश लोग समाजवाद अथवा साम्यवाद को आधुनिक समय का आन्दोलन समझते हैं और इसकी उत्पत्ति कल-कारखानों से मानते हैं। यह कथन एक सीमा तक माना जा सकता है, पर वास्तव में साम्यवाद का सिद्धान्त और उसका आन्तरिक भाव नवीन नहीं है। उसका जन्म उसी समय हो गया था जब मनुष्य ने जंगली अवस्था से निकलकर गाँव और कस्बों का निर्माण किया था। तभी से कुछ लोग शक्ति, उद्योग, चालाकी अथवा संयोग के फल से संपत्तिशाली बन गये, और बहुत से निर्बलता, साहसहीनता, भोलेपन अथवा प्राकृतिक कोप से दरिद्र हो गये। अमीरों ने गरीबों को सताना, लूटना और गुलाम बनाकर सेवा कराना आरम्भ किया, जिसके फलस्वरूप गरीबों में असन्तोष के भाव पैदा होने लगा।

इस प्रकार यह अमीरों और गरीबों अथवा अधिकार-सम्पन्न और अधिकार-विहीन लोगों का संघर्ष आर्त प्राचीनकाल से होता आया है। इस कलह में जिन लोगों ने गरीबों का पक्ष समर्थन किया, अथवा जिन्होंने इन लड़ाई-झगड़ों का अंत करके समाज में न्याय और शाँति की स्थापना करने की चेष्टा की, वे वास्तव में अपने समय के साम्यवादी ही थे, चाहे उनकी भाषा आज से सर्वथा भिन्न रही हो और चाहे उनका संगठन आर्थिक आधारों के बजाय धार्मिक या आध्यात्मिक सिद्धाँतों पर हुआ हो। पाठकों को शायद यह बात कुछ असंगत सी प्रतीत हो, पर हमारे ख्याल से महावीर, बुद्ध, ईसा, मुहम्मद आदि जितने महान धर्म-प्रचारक हुए हैं वे सब इसी श्रेणी के व्यक्ति थे और उनके जीवन-कार्य का साराँश यही था। यह बात दूसरी है कि उनके पश्चात स्वार्थी और अवसरवादी लोग उनके संगठन में घुस गये और कुछ ही समय में उन्होंने मूल वस्तु की काया-पलट करके दर्शन, धर्म-शास्त्र, स्मृति, पुराण आदि का तूमार खड़ा कर दिया और एक नये मजहब या सम्प्रदाय को जन्म दे डाला, जो उस महापुरुष के कार्यों और जीवन-उद्देश्य से सर्वथा भिन्न था।

ऐतिहासिक काल के पूर्व की अवस्था का विवेचन तो हम स्थानाभाव के कारण कर नहीं सकते। पर यह सर्वविदित है कि वैदिक-युग का भारतीय समाज, समानता और भ्रातृभाव के सिद्धान्तों पर आधारित था। उस समय मनुष्यों की तो क्या बात यहाँ के ऋषि-मुनियों ने प्राणिमात्र से मैत्री-भाव रखने का उपदेश दिया था और “आत्मवत् सर्वभूतेषु” के सिद्धान्त की संसार भर में घोषणा कर दी थी।

ऐतिहासिक युग के महापुरुषों में सम्भवतः महावीर स्वामी का नाम ही सर्व प्रथम आता है, क्योंकि वे भगवान बुद्ध से भी कुछ पूर्व कार्य-क्षेत्र में अवतीर्ण हो चुके थे। उस समय भारत में कर्मकाँडों के धर्म की अति हो चुकी थी और उसका उद्देश्य भी आध्यात्मिक के बजाय खुलेआम लौकिक और भौतिक हो गया था। इससे समाज में स्वार्थ और अन्याय की भरमार हो गई थी और धर्म के नाम पर उच्च वर्ण नीच वर्णों का शोषण कर रहे थे। महावीर स्वामी ने अहिंसा, अपरिग्रह और संयम के रूप में जिस मार्ग का उपदेश दिया वह लोक में फैली हुई असमानता, उत्पीड़न और शोषण के विरुद्ध ही था। उन्होंने स्पष्ट कहा- “किसी का बिना दिया धन नहीं लेना, क्योंकि धन मनुष्य के बाह्य प्राण के समान है, इसलिए किसी का धन हरण करना उसके वध करने के बराबर है।” इसे आश्चर्य और खेद का विषय ही समझना चाहिए कि जिस धर्म का मूल त्याग और अपरिग्रह था वह आज ‘सेठों’ का धर्म बना हुआ है।

भगवान बुद्ध महावीर स्वामी के समकालीन और एक दृष्टि से सहयोगी ही थे। यह कल्पना सर्वथा असम्भव नहीं कि महावीर स्वामी के उदाहरण और उनके द्वारा उत्पन्न वातावरण ने ही गौतम बुद्ध को गृहत्याग के लिए प्रेरित किया था। जिस कार्य को महावीर स्वामी ने उठाया था उसी अहिंसा और त्याग के प्रचार को बुद्ध ने आगे बढ़ाया और उसमें आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त कर दिखाई। उस समय शोषण करने वालों का स्थान ब्राह्मण और क्षत्रियों ने ग्रहण कर रखा था और किसान, बढ़ई, लुहार, सुनार, तेली, चर्मकार आदि उद्योग-धन्धों में लगी जातियाँ शोषित बनी थीं। बुद्ध ने भी यह कहा था कि- “जो अधर्म द्वारा धनवान नहीं होना चाहता, वही धार्मिक है।” इतना ही नहीं उनके संगठन में अधिकाँश वैश्य और शुद्र जातियों के लोग सम्मिलित हुए थे जिन्होंने कुछ समय बाद शोषक वर्ग की सत्ता को सैकड़ों वर्षों के लिए मिटा दिया और शासन की बागडोर शोषितों के हाथ में दे दी। स्वयं सम्राट अशोक भी इन्हीं जातियों में से था।

जब हम विदेशों की तरफ दृष्टि डालते हैं तो दो सबसे बड़े, धर्म-संस्थापकों में से एक महात्मा ईसा को भी इसी पथ का पथिक पाते हैं। उनके समय में पैले-स्टायन में ‘फरीसीज’ नामक पूँजीपतियों का आधिपत्य था, जो साधारण श्रम जीवियों को पददलित रखते थे। ईसा ने गरीबों का पक्ष लिया और कहा कि सुई के नाके में होकर ऊँट भले ही निकल जाय पर किसी धनवान का स्वर्ग के द्वार में प्रवेश कर सकना सम्भव नहीं, साथ ही यह भी कहा- ‘उस सर्वशक्तिमान ने अहंकारियों का दर्प भंग कर दिया। उसने शक्ति सम्पन्नों को अपने आसन से गिरा दिया और दीन-दुखियों को महत्व प्रदान किया।” इस प्रकार की भावनाओं का फैलना शोषक वर्ग को कब पसन्द आ सकता था? अतः वहाँ के शासकों और धर्माधिकारियों ने ईसा पर समाज-द्रोह का आरोप लगाकर सूली पर चढ़ा दिया।

ईसा को प्रचार-कार्य करने का बहुत थोड़ा समय मिला था और जिन लोगों का पक्ष-समर्थन उन्होंने किया था वे बहुत ही शक्तिहीन और पिछड़ हुए थे। इसलिए उनके विचार ज्यादा प्रभाव न दिखा सके, केवल अल्पसंख्यक यहूदी श्रमजीवी छोटी-छोटी स्वतन्त्र समितियाँ बनाकर उनके सिद्धान्तों के अनुसार सामूहिक और समाजवादी जीवन बिताते रहे। वे लोग ‘एबियोनाइट’ कहलाते थे और गरीबी को गौरव का विषय मानते थे। पर शोषकों से यह भी सहन न हुआ और उन्होंने ईसा के नाम पर बहुत-सी चमत्कारपूर्ण कथाएं और बाह्याडम्बर रचकर एक नया मजहब चला दिया। इन धर्माचार्यों में सबसे प्रमुख सेंटपाल था जो स्वयं एक ‘फर्रासीज’ था। सम्भवतः इसी कारण आज ईसाई धर्म पूँजीवाद का सबसे बड़ा आश्रय-स्थल बना हुआ है और उस सच्चे महापुरुष के नाम को बदनाम कर रहा हैं।

दूसरे धर्म इस्लाम के संस्थापक मुहम्मद साहब का उदाहरण भी इससे भिन्न नहीं है। उन्हें भी वहाँ के दुर्दशाग्रस्त जन-समुदाय को उठाने का प्रयत्न किया जिससे कुरैशी लोग (अरब के पूँजीपति) उनको मानने की कोशिश करने लगे, पर वे व्यावहारिक आदमी भी थे और उन्होंने खूँखार कुरैशियों का दमन करके समानता और भ्रातृ-भाव के सिद्धान्तों से युक्त मजहब का प्रचार करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने घोषणा की कि “सूद लेना बहुत बड़ा पाप है। धन को अन्य लोगों के उपकारार्थ खर्च करना ही धर्म है। जिसकी आमदनी अधिक हो उसे टैक्स (जकात) के रूप में अपनी आय का 40 प्रतिशत गरीबों को दान कर देना चाहिए। फिर भी धन इकट्ठा हो जाये तो हज (मक्का की यात्रा) कर आनी चाहिए।” इस प्रकार मुहम्मद साहब ने अपने समाज-संगठन में ऐसे नियमों का समावेश किया जिससे पूँजीवाद के पनपने को मौका न मिल सके। उनके प्रयत्न से कई सौ वर्ष तक इस्लाम समानता का एक बड़ा प्रचारक बना रहा। पर बाद में उसमें भी बादशाहों, नवाबों और अमीरों ने श्रेणी-भेद उत्पन्न कर दिया और मुहम्मद साहब के मूल उद्देश्य को बहुत कुछ बदल डाला।

इस प्रकार साम्यवाद का समाजवाद की भावना हजारों वर्षों से सामाजिक न्याय की स्थापना की प्रयत्न करती आई है। पर कुछ व्यक्तियों की स्वार्थ और अपहरण की प्रवृत्तियों ने सदैव उसको दबाने और अन्याय तथा शोषण की प्रणाली को जारी रखने का प्रयत्न किया है। होते-होते हम वर्तमान समय में आ पहुँचे हैं जबकि पूँजीवाद अपनी चरमसीमा पर पहुँच गया है। और सत्य भी यह है कि जब तक कोई सामाजिक-प्रणाली अपनी चरमसीमा पर नहीं पहुँच जाती तब तक स्वाभाविक रूप से उसका अन्त भी नहीं हो सकता। यही अवस्था अब पूँजीवादी प्रणाली की हो रही है, पर वह अब भी अपनी स्वाभाविक मृत्यु से मरने को तैयार नहीं, वरन् अपने साथ समस्त संसार विनाश करने की धमकी दे रही है।

पूँजीवादी की एकत्रित शक्ति को देखते हुए यह असम्भव नहीं कि वह अपनी धमकी को कार्य-रूप में परिणित करके संसार में प्रलय काण्ड उपस्थित कर दे। पर साथ ही यह भी अटल सत्य हैं कि पूँजीवाद चाहे कितनी भी बड़ी नाश लीला क्यों न कर दिखाये और संसार की प्रगति को सौ-दो-सौ वर्ष के लिए रुद्ध कर दे, पर अब उसका अन्त अवश्यंभावी है और उसका स्थान समाजवादी प्रणाली ही ग्रहण करेगी, क्योंकि यही प्रकृति और मानव-धर्म का निर्देश है।


भारतीय विज्ञान का अपूर्व ग्रन्थ

(प्रो. अवधूत, गोरे गाँव)

आजकल विज्ञान की जो खोजें की जा रही हैं वह वास्तव में आश्चर्यजनक हैं। पर इसमें भी सन्देह नहीं कि प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक भी इनसे कहीं बढ़ी-चढ़ी खोजें कर चुके थे। इन दिनों रूस ने जो उपग्रह आकाश में चलाया है और चन्द्रलोक तक जाने की तैयारी की जा रही है, उससे भी बढ़कर आश्चर्यजनक अनेक खोजें भारत के प्राचीन ऋषि मुनि कर गये हैं। जिनका हाल समय-समय पर प्राचीन ग्रन्थों से मालूम होता रहता है। इन ग्रन्थों में पूरे नगर के बराबर वायुयान बनाकर आकाश में ही निवास करने का वर्णन पाया जाता है। हाल में महर्षि भारद्वाज का ‘यन्त्र सरस्वम’ नामक ग्रन्थ मिला है जो मैसूर की ‘अन्तरदेशीय संस्कृत संशोधन संस्था’ के पास है, इसके 40 वें प्रकरण में वैज्ञानिक आविष्कारों का अति आश्चर्यजनक वर्णन मिलता है। इसमें भूः, भुवः, स्वः, महः आदि दूरवर्ती लोकों तक की यात्रा करने की विधि दी गई है, भिन्न-भिन्न ग्रहों में जाने के लिये अलग-अलग तरह के अद्भुत विमानों के निर्माण का विवरण दिया गया है। ऐसे भी यन्त्र बनाना बतलाया गया है जिससे एक ही मनुष्य पक्षी की तरह आकाश में उड़ सके।

पूर्व और पश्चिम के विद्वानों में जो मुख्य और विलक्षण भेद है वह यही है कि पश्चिम वाले बाहरी जगत में से अपनी कामनाओं की पूर्ति करने का प्रयत्न करते हैं, और पूर्व वाले अपनी आत्मा की असीम शक्ति पर आधार रखते हैं। पश्चिम निवासी इन्द्रिय जनित सुखों को प्राप्त करने के लिये परिश्रम करते हैं, जबकि पूर्व के निवासी पंचेन्द्रिय पर संयम रख कर आत्म चिन्तन द्वारा अपूर्व आनन्द प्राप्त करते हैं। पश्चिम के विद्वान वैज्ञानिक प्रकृति के गुणधर्म को जानकर पदार्थों में रहने वाली गुप्त शक्तियों से कार्य लेते हैं जबकि पूर्व के तपस्वी, अपनी ही आत्मा में जो अमोघ और अपरिमित अन्तर शक्ति पाई जाती है, अधिकाँश उसी शक्ति के द्वारा अपने सब कामों को सिद्ध करते हैं।

महर्षि भारद्वाज रचित “अंशु बोधिनी” ग्रन्थ में सूर्य और नक्षत्रों की किरणों की शक्ति पर विचार किया गया है। इस ग्रन्थ में 64 अधिकरण हैं, जिनको छह भागों में विभाजित किया गया है। इनमें से 54 वाँ अधिकरण “विमानाधिकरण” नाम का है। इसके सिवा इन्हीं ऋषि का एक ग्रन्थ “अक्ष-तन्त्र” नाम का है जिसमें आकाश की परिधि और उसके विभागों का वर्णन किया गया है और बतलाया है कि मनुष्य आकाश में कहाँ तक जा सकता है और उसके बाहर जाने से किस प्रकार वह नष्ट हो सकता है। उसमें विमानों के सम्बन्ध में अनेक ऐसी बातें दी गई हैं जिनको पढ़कर आजकल के मनुष्य आश्चर्य में पड़ जाते हैं। “विमानाधिकरण” में यह सूत्र दिया गया है--

“शक्त्युद्गमोदयष्टौ”

इस सूत्र पर बौधायन ऋषि ने निम्नलिखित व्याख्या की है-

शक्त्युद्गमो भूतवाहो धूमयानश्शिखोद्गमः। अंशुवाहस्तार मुखोमणि वाहो मरुत्सखः॥ इत्यष्टाधिकरणें वर्गाण्युक्तानि शास्त्रातः।

अर्थात् विमान-रचना और उनके आकाश के चलने की गति के आठ भेद हैं :-

शक्त्युद्गम वर्गम- विद्युत शक्ति से चलने वाले विमान।

भूतवाह- पंच महाभूत की शक्ति इकट्ठी करके चलने वाले विमान।

धूमयान- भाप अथवा धुँये से चलने वाले विमान।

शिखोद्गमः- पंचशिखी, शिखरीनी, शिखा वति, कुँदशिखी आदि वनस्पतियों के तेल की मोमबत्ती बनाकर उनसे चलने वाले विमान।

अशुवाहः- सूर्य की किरणों की शक्ति से चलने वाले विमान।

तारामुखः- नक्षत्र शास्त्र के अनुसार नक्षत्रों में रस बनकर जो पदार्थ भूमि पर आता है उसके प्रयोग से चलने वाले विमान।

मणि वाहः- हवा में जो उष्णता और बिजली है उसको कुछ यन्त्रों द्वारा पृथक करके उसी शक्ति से चलने वाले विमान।

मरुत्सखाः- हवा में शीत और उष्ण विभाग है उनका आवृत्तिकरण करने से जो शक्ति प्राप्त होती है, उससे चलने वाले विमानों को ‘मरुत्सखा’ कहा जाता था।

सूर्य-किरणों के मुख्य बारह विभाग होते हैं। उनके द्वारा ऋषियों ने जो आश्चर्यजनक कार्य किये थे, उनका विचार कर सकना भी हमारे लिये असम्भव है। सूर्य किरणों की बारह शक्तियों के नाम ये हैं- (1.) प्रकाश, (2.) उष्णता, (3.)अनिल, (4.) जल, (5.) वर्ण, (6.) चालन, (7.) मुग्ध, (8.) विद्युत, (9.) वेग, (10.) जृम्भण, (11.) नलिका, (12.) वारुणि।

सूर्य की इन बारह शक्तियों को पृथक करके 12 मणि तैयार करके और उनके दर्पण बनाकर उनकी शक्ति द्वारा जो विमान चलाया जाता है उसे मणिवाह-विमान कहते हैं। इन बाहर मणियों को तैयार करने में जो द्रव्य काम में लाये जाते हैं, उनका पूरा वर्णन इस ग्रन्थ में है।

“अंशुबोधिनी” के चौथे भाग में कूट-केन्द्र का वर्णन किया गया है, जिसका आशय यह है कि अनेक शक्तियों को एक केन्द्र पर एकत्रित करके उनका प्रयोग करना। सूर्य-राशियों में हमेशा होने वाले परिवर्तन, उनसे बनने वाले ‘कूट’ और उनके परिणामों का भी वर्णन है। ये ‘कूट’ अमुक ‘गोल’ के किस-किस भाग को स्पर्श करते हैं और उनसे तरह-तरह की गति किस प्रकार उत्पन्न होकर कार्य करती है, इसका वर्णन भी आश्चर्यजनक है। इस कूटविद्या को स्पष्ट करने के लिये दण्ड, त्रिकोण, जया, वाण, पाँजरा, वाहा, वर्तुल, ज्वलन, सन्त, घोर, मुग्ध, प्रकाश, ईषत् स्फुरण, उर्द्धगुण, अधोमुख, तिर्यंग मुख, विविध-वर्तुल, चित्र, आन्दोलन आदि अनेक प्रकार की सूर्य-किरणों के परिवर्तनों का जो वर्णन किया गया वह भी बड़े महत्व का है।

सूर्य और सूर्य रश्मियों का ज्ञान मनुष्यों के लिये वास्तव में अति उपयोगी है और इसके लिये भारद्वाज ऋषि का यह ग्रन्थ अलौकिक है। पर इस ग्रन्थ के रहस्य को समझने के लिये ब्रह्मचर्य और वेदाध्ययन द्वारा शुद्ध बुद्धि की आवश्यकता है। इन ऋषि महाराज ने इन्द्र सत्ता (वीर्य बल) प्राप्त करने के लिये तप किया था अर्थात् मानसिक उपाँशु जप करके अजपा गायत्री सिद्ध की थी। तब परब्रह्म की कृपा से दीर्घायु प्राप्त करके वेद का तथ्य जानने के लिये अन्तर्मुख होकर घोर तप किया था। इससे वेद का गुह्य तत्व उन पर प्रकट हो गया और योग शक्ति द्वारा वे सूर्य के समान ही तेजस्वी हो गये। उनको वेदों के ज्ञान के पर्वत पर पर्वत दिखलाई पड़ने लगे। उनकी विशालता से चकित होकर ऋषि परमात्मा की प्रार्थना करने लगे कि इस अपार वेद-ज्ञान के एक अंश को देख सकने की भी शक्ति मुझ में नहीं है तो फिर महान् पर्वतों के तुल्य ज्ञान को मैं कैसे जान सकता हूँ? परब्रह्म ने सन्तुष्ट होकर अनन्त वेद में से तीन अक्षर (ओम्) उनको दिखलाये और बतलाया कि इनमें सब प्रकार की विद्याओं को प्रकाशित करने की सामर्थ्य है। इस प्रणव-शक्ति की सहायता से भारद्वाज ऋषि ने परमात्मा के वेद-स्वरूप अनन्त ज्ञान को समझा और उसमें से मनुष्यों के उपकारार्थ इस और सौर-विद्या के महान् ग्रन्थ की रचना की। परन्तु क्षुद्र बुद्धि के लोग ऋषि-प्रणीत ग्रन्थों का मर्म न जानने के कारण उनका वास्तविक आशय ग्रहण नहीं कर पाते। आजकल के मनुष्य विषयों में फँसकर बहिर्मुख हो गये हैं, इसलिये उनको बाह्य-विज्ञान की बातें ही समझ में आती हैं। यद्यपि ‘अंशु-बोधिनी’ ग्रन्थ भी विज्ञान का है, पर उसके भी आवश्यक है। अगर ऋषि संतान फिर से पुरुषार्थ करेगी और संध्या, देव पूजन आदि कर्मों को सच्ची श्रद्धा के साथ करने लगेगी, तो वह फिर ऋषियों की सी शक्ति प्राप्त कर सकेंगे और बड़े से बड़े वैज्ञानिक कार्यों को सहज में पूरा करके दिखा सकेंगे। इसके लिये गायत्री-उपासना सबसे महत्व की है। क्योंकि गायत्री माता ही शुद्ध बुद्धि की प्रदाता हैं। अगर मनुष्य उसके आदेशानुसार कर्म करे तो उसकी कृपा से ज्ञान-विज्ञान के बड़े से बड़े पद पर अवश्य पहुँच सकता है।


विश्वामित्र ऋषि और गायत्री

(श्री. विष्णुदेव साँकलेश्वर पंडित)

एक दिवस प्रातःकाल विश्वामित्र ऋषि हिमालय के उच्च प्रदेश पर आसन लगाकर बैठे थे। उनकी देह स्थिर और अचल थी। उषाकाल व्यतीत हो चुका था और गगन-मण्डल के एक कोने से सूर्य झाँकने लगा था। उसकी प्रथम किरणों ने हिमालय के शिखर का स्पर्श किया। उसी किरण ने फिर विश्वामित्र के हृदय का स्पर्श किया। देखते-देखते हजारों किरणों को फैलाता हुआ सूर्य ऊपर आ गया। विश्वामित्र को इस सूर्य के दर्शन हुये।

पर यह क्या? विश्वामित्र अकस्मात् बड़े विस्मय में पड़ गये। उनके शरीर के भीतर भी एक सूर्य चमक रहा था। उनके हृदय रूपी आकाश में भी एक सूर्य प्रकाशित हो रहा था। यह बाहर के आकाश का सूर्य समस्त विश्व को प्रकाश देने के कारण समष्टि सूर्य था और विश्वामित्र के हृदयाकाश में-मस्तक से लेकर पैर के नख तक प्रकाशित यह दूसरा सूर्य व्यक्तिगत था। इन दोनों सूर्यों में एकता का भाव उत्पन्न हो रहा था। ये दोनों ही भौतिक पदार्थ थे। बाहर का सूर्य पाँच महाभूतों का बना था और देह के भीतर का सूर्य भी पंच महाभूतों के आधार पर ही प्रकाशित हुआ था। विश्वामित्र विचार करने लगे कि इन पाँच महाभूतों का प्रेरणा देने वाला कौन है, कौन सी शक्ति कार्यक्षम बना रही है?

विश्वामित्र की वेधक दृष्टि जड़ जगत से बाहर जाकर चेतन तत्त्व को खोज रही थी। बाहर की स्थूल जड़ता को तोड़कर वह अन्तरतल में प्रवेश कर रही है। वहीं से तेज का प्रवाह निकल रहा था। वहाँ से नई-नई चेतनाएं और प्रेरणाएँ मिल रही थीं। उन प्रेरणाओं को देने वाला अन्तर्यामी देव सविता नारायण था। वह आधिदैविक रूप में सब देवों का अधिदेव था। उसी की प्रेरणा से आकाश स्थित सूर्य को असंख्यों किरणों द्वारा विश्व को प्रकाशित करने की शक्ति मिली थी और उसी की चेतना इस देह में स्थित सूर्य को प्रकाश प्रदान कर रही थी। जिस प्रकार ‘साँझी’ (बहुत से छेद वाली हाँडी) में रखे हुए देवी के दीपक का प्रकाश प्रत्येक छेद में से झलकता है, उसी प्रकार देह में बैठे अन्तर्यामी का प्रकाश प्रत्येक इन्द्रिय और एक-एक रोमकूप से प्रगट होता रहता है। सच्चे साधु, संतजनों की देह के छिद्र निर्मल, स्वच्छ रहते हैं, इससे उनकी देह में स्थित प्रकाश विशेष रूप से दिखलाई पड़ता है। पर संसारी और पापी जनों के छेद विषय वासना के मैल से भरे रहते हैं, इसलिये भीतर बैठा अन्तर्यामी पुरुष अपना प्रकाश बाहर नहीं फेंक सकता, अथवा बहुत ही मन्द रूप में फेंक सकता है। इसी से साधुजनों के शरीर का प्रकाश (ओरा) सफेद स्वच्छ होता है और पापी संसारी जनों का ‘ओरा’ काला होता है।

विश्वामित्र ऋषि ने अनेक वर्षों तक तप करके अपनी देह के सब छिद्रों को स्वच्छ, निर्मल बना लिया था। उन्होंने अपनी बुद्धि शक्ति को पारदर्शक बनाया था। भीतर का या बाहर का किसी प्रकार का मैल उनमें शेष नहीं रह गया था। विश्वामित्र का देह तपे हुये सुवर्ण के समान प्रकाशमान बना था। अब उनकी देह अपनी नहीं रही थी। वह पंचभूतों का बना देह सर्व भूतों-सब प्राणियों से बने समाज के लिये भेंट कर दिया गया था। वह विश्व के साथ एकता स्थापित कर चुका था। विश्वामित्र के साथ एकता स्थापित कर चुका था। विश्वामित्र ने वास्तविक रूप में विश्व का मित्र बनकर अपना नाम सार्थक कर दिखाया था।

साधना के पक्ष में आगे बढ़ते-बढ़ते विश्वामित्र अपना व्यक्ति-भाव भूल गये थे। विश्व की समस्त विभूतियाँ उनकी अपनी बन चुकी थीं। वे जो कुछ प्रयत्न कर रहे थे वे अपने लिये नहीं, वरन् अन्य अनेकों के लिये-समाज के लिये कर रहे थे। पहले उनको अपने अन्तःकरण से प्रेरणा मिलती थी। पर अब उनको प्रेरणा मिल रही थी। प्रत्यक्ष सविता नारायण से। इसी के प्रभाव से उस स्वर्णमय प्रभात को उनको एक दिव्य-दर्शन हुआ। उस दर्शन में जो प्रकाश था वह सूर्य और सविता का ही था। पर वह केवल प्रकाश ही न था, उसमें ज्योति थी और चेतना भी थी।

विश्वामित्र के अन्तरतल से एक नाद शब्द प्रकट हो रहा था- ‘भर्ग’। यह ‘भर्ग’-परम तेज, परम प्रकाश सविता नारायण का सर्वोत्तम तत्व था। इसी प्रसंग में विश्वामित्र को अपने गुरुदेव का स्मरण आ गया, उनका भी नाम तो ‘भृगु’ ऋषि था। उन्हीं की परम कृपा से उनको यह परम-प्रेरणा यह समाज-कल्याण की भावना-यह विश्व-हित की चेतना प्राप्त हुई थी। इसलिये अपने गुरुदेव तथा अपने को प्राप्त हुये इस परम तेज का नाम ‘भर्ग’ सब प्रकार से उचित ही था।

मुनिवर विश्वामित्र को जब इस परम तत्व का दर्शन हुआ तो उसी समय उनको एक मंत्र की स्फुरणा हुई। उनके अन्तराल पर एक नाद जागृत हुआ, जिससे उनका हृदय नाच उठा। ऐसा जान पड़ता था कि कोई अन्तर्यामी उनके हृदय में प्रवेश करके उनको दिव्य-मन्त्र का उपदेश दे रहा है। परम तपश्चर्या करके और परम तत्व स्वरूप सवितानारायण का दर्शन करके उनको जो परम चेतना और प्रेरणा मिली थी, उसके प्रभाव से उनका मुख मण्डल प्रकाशित हो रहा था। उनके मुख से सवितानारायण की महिमा गाने वाले तीन मन्त्र निकले जिनमें प्रथम यही था-

तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात्।

ऋग्वेद के दस मंडल हैं। उनमें से तीसरे मंडल के 617 मन्त्रों के दृष्टा विश्वामित्र ऋषि हैं। उन सब मंत्रों का दर्शन उनकी अन्तः प्रेरणा में से हुआ है और उन सब मन्त्रों में सब से उत्तम यही मन्त्र माना गया है। तीसरे मंडल में 62 सूक्त हैं। उनमें यह मन्त्र अन्तिम सूक्त का दसवाँ है।

विश्वामित्र ऋषि ने इस मन्त्र का दर्शन करके समाज-कल्याण की सर्वोत्तम भावना को प्रकट किया है। तप-शक्ति के प्रभाव से उनकी बुद्धि को वह प्रेरणा मिली, जो समस्त समाज के कल्याण का मुख्य आधार बनी रहती है। गायत्री छन्द में गाये हुये इस मन्त्र में विश्वामित्र ने ‘सविता’ की परम शक्ति ‘सावित्री’ का अनुपम गान गाया है। विश्वामित्र के मुख में से प्रकट होने वाली इस सरस्वती वाणी को, शब्द, अर्थ और व्यंजना की शक्ति ने, मन्त्र का रूप देकर साधना का सर्वश्रेष्ठ मार्ग प्रकट किया है।


मन की अपार शक्ति और उसका उपयोग

(श्रीमती लिली एलेन)

जब कोई साधक ईश्वर की खोज में आगे बढ़ता है तो सबसे अधिक कठिनाई अपने मन को रोकने में होती है। जो मन को रोकने का अभ्यास कर रहे हैं, वे ही इसका प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। जब हम विचारों का संयम करने बैठते हैं, तो हमें मालूम होता है कि हमारा मन कितना स्वच्छन्द और निरंकुश रहा करता है तथा उसमें सब प्रकारों के विचारों को ग्रहण करने की भी कितनी अपार शक्ति रहती है। हमें यह स्मरण करके बड़ा दुख और आश्चर्य होता है कि हमने इधर-उधर की निरर्थक बातों में अपना कितना अमूल्य समय नष्ट किया है। अगर इसी समय को हम किसी विशेष लक्ष्य की ओर, जीवन ऊपर उठाने वाले विचारों की ओर लगाते तो हमारा चरित्रबल कितना अधिक बढ़ जाता, हमारा हृदय कितना शुद्ध हो जाता, हमारा प्रभाव कितना बढ़ जाता और हमारी आत्मिक-उन्नति कितनी अधिक हो गई होती।

यदि उपरोक्त कथन की सचाई जिस किसी दिन किसी की समझ में आ जाय, तो उस दिन को उसके जीवन का एक बड़ा महत्वपूर्ण दिन समझना चाहिये।

मन पहिले पहल अपने ऊपर हाथ नहीं रखने देता। उसकी अवस्था उस बछड़े की सी होती है जो मुँह में पड़ी लगाम तोड़कर स्वतन्त्र होना चाहता है। वास्तव में यदि हम मन को वश में करना चाहते हैं, तो हमें बड़े धैर्य से काम लेना होगा और उसको इधर-उधर जाने से बार-बार रोकना होगा। सम्भव है निराश होकर हम उसे रोकने का प्रयत्न बन्द कर दें, पर ऐसा करना हमारे लिये बहुत घातक होगा।

मन को रोकने के लिए सबसे पहले धैर्य धारण करने की आवश्यकता है। शीघ्रता करने से सिवाय हानि के लाभ नहीं है। धीरे-धीरे काम करके सफलता प्राप्त करना अच्छा है, किन्तु शीघ्रता करके असफल हो जाना बुरा है, अतएव मन को प्रारम्भ में तंग करने का अधिक प्रयत्न न करो और न उसे एकाग्र करने में अधिक समय लगाओ। सम्भव है, इस प्रकार के व्यवहार में अभ्यस्त न होने के कारण वह थम जाय और अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर सके। सच्चा मनुष्य वही है जो धीरे-धीरे मन को वश में- कर लेता है।

मन को एक स्थान पर लगाने का अभ्यास करो। प्रातःकाल का समय इसके लिये सबसे उत्तम समय है। दस मिनट से प्रारम्भ करो और फिर बीस मिनट कर दो। इस प्रकार धीरे-धीरे मन किसी स्थान पर आपसे आप एकाग्र होने लगेगा।

आत्मा की उन्नति के लिए एक आदर्श की अत्यन्त आवश्यकता है। यह आदर्श तभी फलदायक हो सकता है जब मन उस पर एकाग्र हो जाय। पहले परीक्षा करके अपने आपको जानना चाहिए। मनुष्य का मन बड़ा ही दुर्ज्ञेय है। पर अपने को जानना उतना सुगम नहीं जितना कि जान पड़ता है। तो भी यदि हम मन को वश में करना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने आपको जानना चाहिए। हम अपनी गहरी जाँच-पड़ताल करें, अपनी कामनाओं का विश्लेषण करें, अपनी इच्छाओं को तौलें और फिर यह विचार करें कि हमने अमुक बात क्यों कही थी अथवा हमने अमुक कार्य क्यों किया था। प्रतिदिन हम अपने कामों का निरीक्षण करते रहें और यदि कोई भूल हमसे हुई हो तो उसको मानने में न हिचकें। अपनी अन्तरात्मा से अपने दोष कहने में किसी प्रकार का भय न करो। इससे तुम्हारी आत्मा निरन्तर उन्नति करती जायगी। इस प्रकार उद्योग करते हुए धीरे-धीरे हम अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँच जायेंगे और अन्त में अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल मनोरथ होंगे।


भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए गायत्री ज्ञान मन्दिरों की स्थापना आवश्यक है।

(श्रीराम शर्मा आचार्य)

गत अंक में गायत्री ज्ञान मन्दिरों की स्थापना के सम्बन्ध में कुछ चर्चा की गई थी। इस सम्बन्ध में जितना अधिक कहा जाय उतना ही कम है। नींव जमाकर उसके ऊपर महल खड़े किए जाते हैं। भारतीय संस्कृति की नींव इन देव-मन्दिरों से प्रारम्भ होती है। किसी तन्त्र के संचालन के लिए उसका कोई केन्द्र बिन्दु स्थापित करना जरूरी है। किसी संस्था, व्यापार, उद्योग या प्रवृत्ति को आरम्भ करने से पूर्व उसके लिए कोई स्थान नियुक्त करना पड़ता है। भारतीय संस्कृति के वे प्रकाश दीप जो दूर-दूर तक धर्मप्रेरणा की शुभ्र किरणें फैलाते रहे ये देव मन्दिर ही हो सकते हैं। भगवान को साक्षी रखकर दुष्प्रवृत्तियों से बचाने और सन्मार्ग को अपनाने की प्रेरणा, धर्म-सेवी पुरोहितों के लिए ही नहीं उन धर्म-संस्थानों से सम्बन्ध रखने वाली सामान्य जन समाज के लिए भी पथ-प्रदर्शक होती हैं।

स्वर्ग के नन्दन वन जैसी सुरभित इस भारत भूमि को बनाने के लिए जिन कल्पवृक्षों को उगाने और बढ़ाने की जरूरत है वे इस प्रकार के देव-मंदिर ही हैं। यदि यह व्यवस्था ठीक प्रकार चलने लगे, मन्दिरों में पूजा करने वाले अपने नित्य-नियमित साधना क्रम से अतिरिक्त अपना धर्म प्रचार करने एवं धर्मप्रवृत्तियों के सञ्चालन की जिम्मेदारी का अनुभव करें और उसकी पूर्ति के लिए प्राण पण से जुटे रहें तो हमें उस संख्या से भी तिगुनी संख्या में धर्म सेवक मिल सकते हैं, जितने के बल पर ईसाइयों ने गत डेढ़ सौ वर्षों से समस्त संसार की लगभग आधी जनसंख्या को ईसाई बना लिया। मंदिरों की प्रथा का प्रारम्भ करने वालों के मस्तिष्क में जहाँ आस्तिकता, ईश्वर विश्वास, भगवद्भक्ति, आत्म-कल्याण की साधना, पूजा उपासना के उद्देश्य थे वहाँ यह बात भी पूरी गहराई तक जमी हुई थी कि सारे राष्ट्र को, सारे समाज को धर्म प्रेरणा देते रहने के लिए कुछ ऐसे धर्म-सेवियों की आवश्यकता है जो अपनी आजीविका की ओर से निश्चित रहकर सारा मस्तिष्क और सारा समय निर्धारित लक्ष के लिए ही लगाते रह सकें। भगवान को उत्तम पौष्टिक भोजन का नित्य भोग लगने के पीछे यही प्रवृत्ति काम करती है, ताकि पूजा करने वाले धर्म-सेवी लोग अपनी सहज त्याग बुद्धि के कारण रूखा-सूखा खाकर अपने कीमती शरीर को ही क्षीण न करने लगें। यों भगवान तो विदुर के साग, शबरी के बेर, सुदामा के तंदुल एवं तुलसी-पत्र का भोग लगने से भी पूर्ण तृप्त हो सकते हैं, पर भगवान के बहाने इन धर्म-सेवियों के आहार का समुचित ध्यान रखना था। इसलिए दूध, घी, शक्कर, उत्तम अन्न, शाक आदि की व्यवस्था भोग में रखनी आवश्यक समझी गई। भगवान की प्रतिमा स्थापित करने के लिए हर मन्दिर में एक छोटी कोठरी ही रखी जाती है। शेष इनकी विशाल इमारत इसी लिए बनाई जाती हैं कि उसमें अनेकों धर्म प्रवृत्तियाँ चलती रहें। वाचनालय, पुस्तकालय, चिकित्सालय, व्यायामशाला, पाठशाला, उपासनाक्रम, कथावार्ता, सामूहिक संगीत, भजन कीर्तन, शंका समाधान, पञ्चायत, न्याय-व्यवस्था, प्रायश्चित्य, उपनयन आदि संस्कारों एवं पर्व, उत्सवों के सामूहिक आयोजन, धर्म प्रचारक अतिथियों के स्वागत, विश्राम आदि की अगणित धर्म प्रवृत्तियाँ इन मन्दिरों के द्वारा चलती थीं। नियत समय की पूजा के अतिरिक्त सुयोग्य पूजा अधिकारी अपना सारा समय इन प्रवृत्तियों में लगाकर उस मन्दिर को एक प्रकार का प्रकाश स्तम्भ बनाये रहते थे जहाँ से दूर-दूर तक धर्म-भावनाओं की दिव्य लहरें प्रसारित होती रहें।

आज हमारे सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में सर्वत्र दुर्व्यवस्था व्यापक रूप में फैल गई है। उसका प्रभाव देव मन्दिरों पर भी हुआ है। आज पुजारी लोग केवल यह कोशिश करते हैं कि उन्हें जनता से अधिक से अधिक पैसे प्राप्त होते रहें। इसके लिये वे अन्य मन्दिरों की प्रतिमाओं की अपेक्षा अपने मन्दिर की मूर्ति को अधिक चमत्कारी बताते रहते हैं। जो भक्त इस मूर्ति को जितना अधिक भोग प्रसाद, वस्त्र आभूषण चढ़ायेगा उसे उतनी ही दैवी कृपा प्राप्त होगी, इसी बात पर पूरा जोर दिया जाता है, ताकि पूजा करने वालों के आर्थिक स्वार्थों की पुष्टि होती रहे। वे लोग धर्म सेवा के अपने मूलभूत कर्तव्य को एक प्रकार से त्याग बैठे हैं। और उसके लिये जोर देने वालों को अपना अपमान करने वाला बताते हैं। नौकरी पूरी मिले और ड्यूटी जरा भी न करनी पड़े तो कर्मचारी में अनेक खुराफातें और अनैतिकतायें पैदा होनी स्वाभाविक है। मन्दिरों में आये दिन जिन भ्रष्टाचारों की खबरें आती रहती हैं उनसे जनता में अश्रद्धा भी बढ़ती है। वहाँ कोई धर्म प्रवृत्ति जीवित न रहने से, केवल प्रतिमा को स्नान भोजन करा देने मात्र सीमित कार्यक्रम रहने के कारण अरुचि एवं उपेक्षा तो पहले से लोगों को होने लगी थी।

मन्दिरों के संचालक इस दिशा में कोई उत्साह नहीं दिखाना चाहते। वे कुछ भी हेर-फेर करने से देवता या पुजारी के नाराज होने से कोई अनिष्ट हो जाने की बात सोच कर डरते हैं। दूसरे पिछले दिनों धर्म और अध्यात्म का रूप भी ऐसा विकृत रहा है कि उसकी प्रेरणा मनुष्य को एकाकी, असामाजिक, व्यक्तिवादी, स्वार्थरत एवं झंझटों से दूर रहने वाली ही बनाती है। ‘शान्ति’ चाहने की खोज में अनेकों महत्वपूर्ण व्यक्ति एकाकी और असामाजिक जीवन व्यतीत करने लगे। धर्म सेवा, समाज सेवा, जन सेवा भी उन्हें व्यर्थ लगने लगीं। अपना स्वर्ग, अपनी मुक्ति, अपनी शान्ति के लिये वे एकान्त आवश्यक समझते हैं। जबकि सही बात यह है कि प्राणि-मात्र की सेवा एवं जनहित में अपने को उत्सर्ग करने से ही कोई व्यक्ति स्वर्ग मुक्ति एवं शान्ति का अधिकारी बन सकता है।

जहाँ हमने अनेक बुराइयां अपनाई हैं वहाँ हमारे धार्मिक एवं आध्यात्मिक सिद्धान्त भी उलटे हो गये हैं। मन्दिरों के संचालक सेठ साहूकार उन्हीं औंधे विचारों से अनुप्राणित हैं। उन्हें रोज का धर्मोपदेश देने वाले सन्त महन्त भी ऐसी ही शिक्षा देते हैं, जिससे उनकी दक्षिणा, सुविधा, आर्थिक उन्नति सुरक्षित रहे एवं लोक सेवा जैसे किसी झंझट में न पड़ना पड़े। दोनों की जोड़ी एक अन्धा एक कोढ़ी की उक्ति चरितार्थ कर देती है। एक खाँचा इतना फिट बैठ जाता है कि वर्तमान मन्दिरों में से कुछ विचारशील पुजारियों एवं विवेकवान मन्दिर संचालकों के अतिरिक्त इस दिशा में कोई बड़ा परिवर्तन करने की आशा नहीं की जा सकती।

जहाँ सम्भव हो वहाँ वर्तमान पुजारियों को धर्म प्रवृत्तियों में लगाने की, अथवा उनके स्थान पर धर्म सेवकों को नियुक्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। मंदिर संचालकों एवं कमेटियों को भी इसका सुझाव देना चाहिये। प्रयत्न करते रहने में उनमें सुधार होना सम्भव है। यह प्रश्न असाधारण महत्व का है। भारतवर्ष की जनता देव मन्दिरों के लिये अगाध श्रद्धा रखती है, उनके लिये उसने भारी त्याग किया है और अब भी कर रही है।

प्रायः 14500 करोड़ रुपये की इमारतें मन्दिरों की बनी हुई हैं। यह रकम भारतवर्ष में फैली हुई रेलवे की सारी सम्पत्ति से भी अधिक है।

मन्दिरों के जेवर, आभूषण, रत्न, नकदी, जमीन, जायदाद, व्यवसाय आदि के रूप में स्थायी सम्पत्ति का मूल्य भी लगभग 3000 करोड़ रुपया कूता जाता है।

प्रायः 1300 करोड़ रुपया हर साल मन्दिरों पर खर्च होता हैं। यह रकम उससे अधिक है जितना धन सारे देश में शिक्षा पर व्यय होता है।

पूजा पाठ से सम्बन्धित 56 लाख मनुष्यों का जनता निर्वाह भार वहन करती है, यह जन-संख्या भारत की सारी फौज एवं पुलिस को मिला देने पर भी उससे अधिक बैठती है।

स्थायी सम्पत्ति, इमारतें, चालू खर्च, इन कार्यों में लगी हुई जनसंख्या एवं जनता के प्रमुख भावना केन्द्र होने की दृष्टि से मन्दिरों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। जनता सरकार को बड़ी कठिनाई और आनाकानी के साथ जितना टैक्स अदा करती है उससे कुछ कम टैक्स वह बड़ी प्रसन्नता पूर्वक धर्म कार्यों के लिये खर्च करती है। राष्ट्र की गतिविधियों को अमुक दिशा में मोड़ने के लिये आज राजनीति को-राजनैतिक संस्थाओं को प्रमुख माध्यम माना जाता है। पर भारतवर्ष देहातों में फैला होने, शिक्षा की दृष्टि में पिछड़ा होने और राजनीति के तत्वज्ञान से अपरिचित होने के कारण वह राजनीति को न तो समझ पा रहा है और न उसका उपयोग करे अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन को ऊँचा उठा पा रहा है। भारतीय जनता की मानसिक पृष्ठ भूमि एवं परम्परा धार्मिक है। वह इस आधार को काफी हद तक समझती है। यदि सुव्यवस्थित रूप से इस आधार को लेकर चला जाय तो निश्चय ही आज की स्थिति में जनकल्याण का कार्य बहुत हद तक बढ़ाया जा सकता है।

यह ठीक है कि धर्म के नाम पर आज जो धोखा-धड़ी चारों ओर फैली हुई है उससे जनता के विश्वास की नींव हिलने लगी है और इस ओर उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाना आरम्भ हो गया है। पर अभी वह बुराई इस हद तक नहीं बढ़ी है कि धर्म को अनावश्यक एवं घृणा की दृष्टि में देखा जाय। वैसी स्थिति उत्पन्न होने से पूर्व ही यदि संभल जाया जाय तो धर्म ने जो स्थान भारतवर्ष में बना रखा है। भावना की दृष्टि में तथा धन बल और जनबल की दृष्टि से-एक चलती हुई परम्परा एवं व्यवस्था के सदुपयोग की दृष्टि से इस धर्म भावना का सदुपयोग आवश्यक है। यदि इस ओर विचारवान लोगों का ध्यान न गया और आज जो दुर्व्यवस्था चल रही है। वही चलती रही तो न केवल राष्ट्र की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति का दुर्व्यय ही होगा वरन् उस बुराई की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप लोग पथभ्रष्ट होंगे, साथ ही धर्म की उपयोगिता तक संदेहास्पद बन जायगी। इस दिशा में सुधार न करने की हमारी उपेक्षा नास्तिकवाद को तीव्र गति में फैलने का खुला आमन्त्रण देगी।

भारतवर्ष के धर्म तन्त्र का प्रमुख आधार यह देव मन्दिर हैं। इनके द्वारा जनता की वही सेवा होनी चाहिये जो इनकी स्थापना का मूल उद्देश्य है। यदि वह उद्देश्य पूरा न होगा वरन् उसके विपरीत कार्य होंगे तो अति उत्साही सुधारवादी उन्हें निरुपयोगी ही नहीं धर्म विरुद्ध भी बताने की अपनी योजना में सफल हो जाएंगे। आगे चलकर तो नास्तिकवाद का उत्साह साकार पंथी और निराकार पंथी दोनों ही देव-स्थानों का सफाया कर देगा। इसलिये भी हमें समय रहते चेतना होगा और मन्दिरों में लगी हुई राष्ट्र की एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण शक्ति को उपयोगिता की कसौटी पर खरी सिद्ध करना होगा। यह कार्य उपेक्षा बुद्धि से नहीं वरन् इस ओर पूरी सावधानी तथा गंभीरता से ध्यान देने पर ही सम्भव हो सकेगा।

गत अंक में हमने दो सुझाव इस दिशा में रखे थे। (1) वर्तमान मन्दिरों के पुजारी एवं संचालकों को इसके लिये तैयार किया जाय कि वहाँ की प्रक्रिया केवल देव-पूजा तक ही समिति न रहे। धर्म प्रसार एवं धर्म संगठन के ऐसे कार्य वहाँ से संचालित हों जिनके फलस्वरूप हमारी नैतिक सामाजिक एवं बौद्धिक प्रगति होती चले।

इस सुधार का प्रधानतया उन लोगों द्वारा घोर विरोध होगा जिनके आर्थिक स्वार्थ टकराते हैं और जो सार्वजनिक सेवा की भागदौड़ को बेकार का झंझट मानते हैं। इस विरोध पर विजय प्राप्त करने के लिये लोकमत जागृत करना होगा। जनता को वास्तविकता समझानी पड़ेगी ओर उससे इस प्रकार के परिवर्तनों के लिये प्रेरणा देनी होगी।

यह कार्य धीरे-धीरे होगा क्योंकि संचालकगण, पुजारी महोदय तथा कानूनी दाव-पेंच, तीनों ही इस प्रकार के सुधारों में भारी अड़चन पैदा करते हैं। अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न करने के लिए हमें काफी परिश्रम करना पड़ेगा और देर तक ठहरना पड़ेगा। इस आन्तरिक कार्य के लिए दूसरा सुझाव यह है कि (2) कुछ आदर्श देव मन्दिरों की स्थापना की जाय, जिन्हें देखकर लोग यह जान सकें कि मंदिरों का उपयोग धर्म सेवा के लिए किस प्रकार हो सकता है। दो वस्तुएं सामने होने से लोग उनकी तुलना कर सकते हैं और यदि एक में कोई अच्छाई होती है जनता उसे पसन्द करती है तो दूसरे को भी उसका अनुकरण करने को विवश होना पड़ता हैं। इसलिए नमूने के मन्दिर बनाकर जहाँ-तहाँ खड़े किये जायं।

गायत्री तपोभूमि का निर्माण इसी आधार पर हुआ है। यहाँ देव पूजा भी अन्य मन्दिरों की भाँति होती है पर केवल उतना ही करके अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मान ली जाती। जो भी व्यक्ति यहाँ निवास करते हैं, वे निरन्तर धर्म सेवा में लगे रहते हैं। तपोभूमि की इमारत अनेकों धर्मप्रवृत्तियों का केन्द्र बिन्दु बनी रहती है। इस आदर्शवाद के कारण ही गायत्री तपोभूमि के छोटे से संस्थान ने अपने इस छोटे से जीवन में कितने बड़े काम कर लिये और आगे क्या-क्या करने की तैयारी है, उसे देखकर लोग आश्चर्य करते हैं। पर वस्तुतः आश्चर्य की इसमें कोई भी बात नहीं हैं। अधिकाँश देव-मन्दिरों को तपोभूमि की अपेक्षा अधिक साधन उपलब्ध हैं, वे चाहे तो ऐसी ही, वरन् इससे भी अनेक गुनी धर्म सेवा कर सकते हैं यदि ये प्रवृत्तियां सभी देव मन्दिरों में चल पड़ें तो भारतवर्ष के साढ़े 8 लाख देख मन्दिर प्राचीन काल जैसा स्वर्ण युग सहज ही उत्पन्न कर सकते हैं। यदि इनमें थोड़ा उत्साह एवं जीवन आ जाय तो भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान कुछ भी कठिन न रहे। इस तथ्य को प्रत्यक्ष हृदयंगम कराने के लिये ही गायत्री तपोभूमि का निर्माण किया गया था। अब ऐसे ही कुछ और आदर्श देवालय जहाँ-तहाँ और भी बनने की आवश्यकता है, जिनकी उपयोगिता देखकर वर्तमान मन्दिरों को भी उनका अनुकरण करने के लिए विवश होना पड़े।

देव मन्दिरों की स्थापना हिन्दू धर्म में एक बहुत बड़ा पुण्य माना गया है। उपयोगिता एवं धर्म सेवा की दृष्टि से सचमुच ही वे ऐसे ही केन्द्र बिन्दु थे जिनकी स्थापना करने वाला भारी जनहित के सत्परिणामों के कारण सचमुच ही स्वर्ग जाता होगा। हर प्रक्रिया का पुण्य पाप उसकी उपयोगिता अनुपयोगिता के आधार पर होता है। आज जिस प्रकार की गतिविधि आमतौर से मन्दिरों में चल रही है इससे उसके निर्माता उस पुण्य की आशा नहीं कर सकते जो शास्त्रों में लिखा है। वह पुण्य तो उन्हें ही मिलेगा जो मन्दिर की इमारत बनाने एवं उसका चालू खर्चा जुटाने में ही नहीं, वहाँ से धर्म प्रवृत्तियों का संचालन होते रहने के प्रधान कार्य की व्यवस्था बनाने में भी सफल हो सकेंगे। लोग मन्दिरों की कीमती-बड़ी इमारतें बनाने में गर्व अनुभव करते हैं, पर अच्छा यह होता कि मन्दिर चाहे फूँस के झोंपड़े में ही रहते पर वहाँ से वह प्रकाश उत्पन्न होता रहता जिससे अनेक तमसाच्छन्न आत्माएँ प्रकाशमान होकर जगमगातीं। ऐसे ही मन्दिरों की स्थापना पर गत अंकों में जोर दिया गया है।

केवल ‘देवों की पूजा’ तक ही बात समाप्त न हो जानी चाहिये। गायत्री सद्बुद्धि की देवी है। गायत्री मन्दिरों से सद्ज्ञान का प्रसार होते रहना आवश्यक है। इस प्रमुख उद्देश्य को भुला न दिया जाय इसलिए इनका नाम केवल गायत्री मन्दिर न रखकर ‘गायत्री ज्ञान मन्दिर’ रखा जाय। नाम का भी बड़ा महत्व है। तब गायत्री मन्दिर ही कहते थे और यही नाम रहने देने पर जोर देते थे। पर चूँकि नाम के साथ भावना जुड़ी रहती है, इस लिए ‘गायत्री तपोभूमि’ रखा गया जिससे यहाँ निवास करने वाले अपने आप को तपस्वी, तप के उद्देश्य से आया हुआ समझें और तप करें। सचमुच ही इस नाम ने लोगों को बहुत बल दिया है, जो तप करने नहीं आते उन्हें भी तपस्वी बनना पड़ता है, पीछे वह बात उनकी आदत में शामिल हो जाती है। गायत्री ज्ञान मन्दिर नाम रहने के पीछे भी यही लक्ष छिपा है कि वहाँ से सद्ज्ञान का प्रकाश अवश्य उत्पन्न होता रहे। इस ज्ञान का प्रतीक वहाँ अखण्ड घृत दीप न सही तो अखण्ड अग्नि को जलती रखा जा सकता है। इसमें थोड़ी देखभाल तो है पर खर्च बहुत कम है। घी का अखण्ड दीप जैसाकि अखण्ड-ज्योति कार्यालय में जलता है 24 घंटे में प्रायः एक पाव घी खर्च करा देता है। इसमें तीस चालीस रुपया मासिक खर्च पड़ता है। पर अखण्ड अग्नि यज्ञ कुण्ड में जलती रखने में गाय के गोबर के 2-3 मन उपले एक महीने के लिये पर्याप्त होते हैं। इनका मूल्य देहातों में कुछ नहीं और शहरों में दो-तीन रुपया महीना पड़ता है। कम से कम 24 आहुतियों का दैनिक हवन वहाँ होता रहे। साप्ताहिक बड़े हवन हों। जहाँ मूर्ति की नियमित पूजा व्यवस्था में कठिनाई हो, कोई स्थायी कार्यकर्ता नियुक्त न किया जा सके वहाँ गायत्री माता का बड़ा सा चित्र स्थापित करना सुविधाजनक होगा। सारे भारत के तीर्थों का जल रज तपोभूमि से इन ज्ञान मन्दिरों के लिये मंगाया जा सकता है। जहाँ संभव हो अखण्ड अग्नि भी मथुरा से ले जाकर स्थापित की जा सकती है। मन्त्र लेखन उस क्षेत्र के वहीं स्थापित किये जा सकते हैं। सुन्दर चित्रों, आदर्श वाक्य, सुन्दर पर्दे, तथा कपड़े लगाकर उसे सुन्दर बनाने एवं सुसज्जित करने की ओर पूरा-पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। यह मन्दिर कला एवं सजावट की दृष्टि से इतने आकर्षक बनें कि हर किसी का उसे देखने के लिये जी ललचे।

यों धर्म के नाम पर धन को जल प्रवाह की तरह इस देश में बहाया जाता रहता है, उसमें कोई परम्परा एवं रूढ़ि तो रहती है, पर गुण-अवगुण, भला-बुरा परिणाम, पात्र-कुपात्र आदि के भेद करने के लिये विवेक एवं विचार शक्ति का उपयोग नहीं किया जाता। यह अन्ध परम्परा सर्वत्र देखी जा सकती है। फिर भी अभी ऐसे विचारवान एवं विवेकशील धर्म प्रेमियों का सर्वथा अभाव नहीं है जो परम्परा के साथ-साथ जहाँ उपयोगिता का समावेश देखें वहाँ अपनी उदारता प्रकट करने का आदर्श उपस्थित करें। प्रत्येक क्षेत्र में एक-एक गायत्री ज्ञान मन्दिर होने की आज भारी आवश्यकता है। उदार एवं विवेकशील साधन सम्पन्न सज्जन अपनी धर्म कमाई में से यदि 4-6 हजार रुपया भी खर्च कर दें तो बड़ा उपयोगी कार्य करने का पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं। जनता भी थोड़ा-थोड़ा करके इतने पैसे इकट्ठे कर सकती है और क्षेत्रीय मन्दिर बन सकते हैं। इन मन्दिरों में सेवाभावी धर्म प्रचारक एवं सार्वजनिक सेवा संगठनों में पूरा उत्साह रखने वाले पुजारी ही नियुक्त किये जाने चाहिए।

ऐसे गायत्री मन्दिर जगह-जगह स्थापित हों, इसके लिए जहाँ तक हो प्रयत्न आरम्भ किये जाने चाहिये। पर अभी ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति तक गायत्री परिवार के सदस्यों का उस कर्म में लगना कठिन है। क्योंकि यह कार्य भी पहाड़ की तरह भारी है। इसकी ओर से ध्यान हटा लिया जाय और अन्यत्र दिशा में सोच विचार प्रारम्भ कर दिया जाय तो शक्ति बंट जायेगी और यह कार्य अधूरा रहेगा। इसलिये जहाँ कोई धनी व्यक्ति अपने खर्च से मन्दिर बना सकें वहाँ को छोड़कर जहाँ सार्वजनिक धन संग्रह एवं व्यवस्था की जरूरत है वहाँ अभी अस्थायी मन्दिर बना लिये जाये। किसी का माँगा हुआ कमरा न मिले तो किराये पर ले लेना चाहिए। पर यह स्थान ऐसी जगह पर ही होना चाहिए जहाँ अधिकाधिक लोग आ सकें। जिन स्थानों पर जन साधारण को पहुँचने में असुविधा हो ऐसे एकान्त, गाँव से दूर जंगल बगीचों में गायत्री मन्दिर कदापि न बनाने चाहिए। इसमें जनसाधारण की पहुँच न होने से लगाया हुआ पैसा व्यर्थ चला जाता है। गायत्री मन्दिर नगर के मध्य भाग में जहाँ बैठने के स्थान हों, सड़क के किनारे हों, ऐसे ही स्थान पर होने चाहिये। गायत्री परिवारों की शाखायें अपने केन्द्रीय कार्यालय के रूप में ऐसे गायत्री ज्ञान मन्दिर बनाने का प्रयत्न करें’। पीला रंगा हुआ तिकोना ॐ चिन्हाँकित झण्डा उस पर लहरा दें।

ऐसे ज्ञान मन्दिर पूर्णाहुति तक प्रत्येक गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा को बना लेने का प्रयत्न करना चाहिये। संस्था की प्रवृत्तियों का, गोष्ठियों का, सामूहिक आयोजनों का केन्द्र यही स्थान रहे। यों साप्ताहिक सत्संग एवं हवन परिवार के सदस्यों के घरों पर भी बदल-बदल कर होते रहें।

उपरोक्त सामूहिक सार्वजनिक गायत्री ज्ञान मन्दिरों के अतिरिक्त प्रत्येक सदस्य के घर-घर पर एक पारिवारिक गायत्री ज्ञान मन्दिर भी होना चाहिये। शास्त्रों में लिखा है कि ‘जिस घर में देव मन्दिर न हो वह श्मशान तुल्य है।’ घर में देव-स्थान रहने से निश्चय ही घर के लोगों में आस्तिकता एवं धर्म बुद्धि स्थिर रहती है। घर में उपासना का वातावरण बना रहने से सतोगुण बढ़ता है और अनेकों बुराइयों से बचे रहने का अवसर रहता है। जिस घर में माता की सच्ची मन से उपासना हो, उनकी स्थापना हो, वहाँ सुख शान्ति की, समृद्धि की, सफलता सम्पन्नता की कमी नहीं रहती।

पारिवारिक गायत्री ज्ञान मन्दिरों की स्थापना अति सरल है। नीचे बड़ी चौकी, ऊपर छोटी चौकी, रखकर उन्हें पीले वस्त्रों से ढक देना चाहिये। ऊपर गायत्री माता का तथा यज्ञ पिता का चित्र शीशे में मढ़ा हुआ सुसज्जित रहे। नीचे आरती, पंचपात्र, धूपदानी, घंटा, शंख, गंगाजल, माला आदि पूजा उपकरण सुसज्जित रहें। नीचे कुश के आसन बिछे हों जिन पर बैठकर घर के लोग उपासना करें। मन्त्र-लेखन की कापियाँ भी यहाँ रखी रहें। चारों और आदर्श वाक्य एवं महापुरुषों के चित्र टंगे हों। यदि यह कोठरी अलग से स्वतंत्र हो तो अधिक उत्तम है, अन्यथा ऐसे कमरे में यह पूजा स्थान बनाना चाहिये जहाँ कम से कम खटपट या आवागमन रहता हो। इस पूजा गृह को जहाँ तक हो सके अधिक सुन्दर सुसज्जित एवं आकर्षक बनाने में उदार एवं कलात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिये। फूहड़पन, गन्दगी, मलीनता, कंजूसी को इस पूजा गृह में अधिक स्थान न मिलने पावे इसका ध्यान रखें।

जिस प्रकार सामूहिक देवालयों से पूजा उपासना के अतिरिक्त सद्ज्ञान का प्रसार एवं धर्म सेवा कार्यों का चलते रहना नितान्त आवश्यक है। इसी प्रकार इन छोटे पारिवारिक गायत्री ज्ञान मन्दिरों में भी वे दोनों प्रवृत्तियां चलती रहनी चाहियें। परिवार के लोगों की विवेक बुद्धि सुविकसित होती रहे इसके लिये पूजा की तरह स्वाध्याय को भी घर के हर सदस्य के लिये एक आवश्यक धर्म कार्य बना दिया जाय। स्वाध्याय की आवश्यकता अमुक देवता, अमुक अवतार के चरित्र या अमुक प्राचीन ग्रन्थ को रोज-रोज दुहराते रहने से ही काम नहीं चल सकता। मनुष्य के व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में आती रहने वाली अनेक समस्याओं तथा गुत्थियों को तर्क, विवेक एवं कारण, प्रमाण के आधार पर सुलझाने वाला साहित्य ही स्वाध्याय के लिये लाभदायक एवं उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इसलिये गायत्री ज्ञान मन्दिर में इस प्रकार के साहित्य के लिये एक कक्ष अवश्य ही निर्धारित रहना चाहिये इसके बिना ज्ञान मन्दिर का ज्ञान शब्द सार्थक न हो सकेगा। बुद्धि की देवी गायत्री के प्रत्येक उपासक के लिये स्वाध्याय भी उतना ही आवश्यक धर्मकृत्य है जितना जप ध्यान-पाठ स्नान। बिना स्वाध्याय के-बिना ज्ञान की उपासना के बुद्धि पवित्र नहीं हो सकती, मानसिक मलीनता दूर नहीं हो सकती और इस सफाई के बिना माता का सच्चा प्रकाश कोई उपासक अपने अन्तःकरण से अनुभव नहीं कर सकता। जिसे स्वाध्याय से प्रेम नहीं, उसे गायत्री उपासना से प्रेम है यह नहीं माना जा सकता। बुद्धि की देवी गायत्री का सच्चा भोजन स्वाध्याय ही है। ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसलिये गायत्री उपासना के साथ ज्ञान की उपासना भी अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई है।

देव पूजा और ज्ञान उपासना के उपरोक्त दो कार्यों के अतिरिक्त प्रत्येक ज्ञान मन्दिर को एक तीसरा कार्य भी करना है वह है-धर्म सेवा, लोक सेवा, जन कल्याण। इसके लिये गायत्री परिवार के सदस्यों को अपने समय में से कुछ समय नित्य नियमित रूप से निकालना चाहिये। ज्ञान प्रसार के लिये ‘धर्मफेरी’ का कार्यक्रम इसके लिये सर्वोत्तम है। लोगों को अन्य कोई भी कीमती चीज देकर भी हम उनकी उतनी सेवा नहीं कर सकते जितनी ज्ञान देकर कर सकते हैं। ज्ञान ही वह पारस है जिसे छूकर लोहे जैसे कलुषित मन स्वर्ग जैसे सुहावने बन सकते हैं। आगे चलकर इस श्रमदान, समय-दान के और भी अनेकों उपयोग होंगे पर अभी तात्कालिक कार्यक्रम यही है कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र के कुछ ऐसे लोगों के नाम नोट कर लिये जाएं जिनमें विचारशीलता, सज्जनता एवं धार्मिकता के कुछ बीजाँकुर दिखाई पड़ते हों। इन नोट किये हुये नामों में से प्रतिदिन एक-एक दो-दो व्यक्तियों के यहाँ अकेले ही, या एक दो साथियों को और लेकर धर्मफेरी के लिये जाया जाय। उन्हें अपने गायत्री ज्ञान मन्दिर की पुस्तकें पढ़ने का आग्रह किया जाय, तैयार होने पर उन्हें अपनी पुस्तकें पढ़ने देने के लिये तथा लेने के लिये जाते रहना चाहिये। इस प्रकार पुस्तकों द्वारा ही नहीं, स्वयं बार-बार उनके घर आने-जाने, संपर्क बढ़ाने और अच्छी सलाह शिक्षा द्वारा आदर्श की ओर प्रेरणा देने का द्वार खुलेगा।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के होता यजमानों के लिये यह तीन सूत्री कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण शर्त के रूप में रखा जा चुका है। (1) सवालक्ष जप, मंत्र-लेखन, पाठ आदि के द्वारा स्वयं उपासना करना, (2) ज्ञान मन्दिर साहित्य खरीद कर अपने घर में ज्ञान-मन्दिर स्थापित करना (3) लोगों के घरों पर जाकर धर्मफेरी द्वारा गायत्री का संदेश पहुँचाना। यह त्रिसूत्री कार्यक्रम एक प्रकार से घर-घर में देव मन्दिर स्थापित करने और उनके साथ संलग्न स्वाध्याय (ज्ञान उपासना) एवं लोक सेवा के महान कार्य को आगे बढ़ाता है। यह तीन कार्य बड़े विशाल सामूहिक सार्वजनिक देव मन्दिरों के हैं। इन्हें ही बड़े पैमाने पर अधिक विस्तृत क्षेत्र में पूरा समय लगाने वाले पुजारियों को करना होता है। चूँकि पारिवारिक गायत्री ज्ञान मन्दिर छोटे हैं इसीलिये इनके द्वारा उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति छोटे पैमाने पर की जा सकती है। गायत्री परिवार के सदस्य स्वयं ही इन मन्दिरों के संस्थापक, संचालक का पुजारी की जिम्मेदारी पूरा कर सकते हैं। इन पारिवारिक ज्ञान मन्दिरों के चलाने के लिये दो रुपया मासिक की बचत भी काम चलाऊ हो सकती है। आर्थिक तंगी वाले व्यक्ति सप्ताह में शरीर को एक दिन भूखा रखकर आठ आना सप्ताह बचा सकते हैं। बाल बच्चे वाले अपने एक आना रोज और खर्च करा देने वाले घर में एक बच्चा इस ज्ञान मन्दिर को भी मान सकते हैं। धर्म का महत्व समझने वालों के लिये शरीर खर्च में जहाँ इतना पैसा खर्च होता है वहाँ एक आना रोज आत्मा की शान्ति के लिये खर्च कर देना कुछ मुश्किल नहीं। अपनी जन्मदात्री माता की भाँति गायत्री माता को एक आना रोज का भोजन करा देना कोई इतना बड़ा भार नहीं हैं जो उठ न सके। बाधक केवल मनुष्य की कंजूसी, कृपणता, संकीर्णता एवं अश्रद्धा ही है। यदि इन पर विजय प्राप्त कर ली जाय तो गायत्री मन्दिरों की घर-घर में स्थापना और उनका संचालन आर्थिक दृष्टि से तो किसी के लिये भी भार रूप नहीं हो सकता। इतने महान कार्य एवं इतने बड़े कार्य के लिये इतने थोड़े से त्याग का जहाँ प्रश्न उपस्थित हो वहाँ किसी भी उदार भावना के धर्म प्रेमी को पीछे न हटना चाहिये, अनावश्यक कृपणता एवं संकीर्णता प्रकट न करनी चाहिये।

तात्कालिक कार्यक्रम के रूप में 13) की चार-चार आने वाली 42 पुस्तकें एवं 16 आदर्श वाक्य 2 रु. के, कुल 24 रु. का साहित्य मंगाकर ज्ञान मन्दिर की स्थापना अपने घरों में करना, ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के होता यजमानों का एक पवित्र कर्तव्य है। जिन्होंने अपना यह कर्तव्य अभी पालन न किया हो उन्हें तुरंत ही इसकी व्यवस्था कर लेनी चाहिये और उपासना स्वाध्याय एवं फेरी के जरूरी कार्यक्रमों को पूर्ण करना चाहिये। 10 पड़ोसियों को पूरा गायत्री ही साहित्य पढ़वाने का कार्य धर्मफेरी में सम्मिलित है। इसे पूरा करने वाले धर्म प्रचारक-ब्रह्मविद्यालय के उपाध्याय माने जायेंगे और महायज्ञ के अवसर पर इनका सार्वजनिक सम्मान किया जायेगा।

जन समाज में फैली हुई अनेकों दुष्प्रवृत्तियों, भावनाओं कुरीतियों अन्य परंपरा की रूढ़ियों संकीर्णताओं एवं अनैतिकताओं को हटाना है, उनके स्थान पर सत्य, प्रेम, न्याय, सदाचार, सेवा, उदारता, विवेक एवं सद्गुणों का विकास करना है। असुरता का साम्राज्य हटाकर देवत्व की सत्ता स्थापित करने को ही वह प्राचीन काल का जैसा स्वर्ण युग लाना, युग निर्माण करना, सांस्कृतिक पुनरुत्थान एवं धर्म संस्थापन का कार्य सम्पन्न होगा। इसके लिये सब से पहला कार्य जनता का विचार सुधार ही है।

यह बौद्धिक क्राँति ही गायत्री आन्दोलन का प्रधान उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आधारशिला के रूप में इन ज्ञान मन्दिरों की स्थापना करना निताँत आवश्यक है।

देव मन्दिर भारतीय संस्कृति के प्रधान स्तम्भ हैं। इनकी उपयोगिता असाधारण है। इसका सुचारु और सुव्यवस्थित रूप से जनता के सामने रखा जाना चाहिए। वर्तमान मन्दिरों का सुधार और नये गायत्री मन्दिरों का निर्माण इस क्रिया में दो महत्वपूर्ण कदम हैं। सामूहिक रूप से बड़े पैमाने पर यह कार्य हो इसकी प्रतीक्षा न करके हमें छोटे रूप से अपने घरों पर यह आदर्श तुरन्त ही स्थापित कर देना है। छोटे बीज ही बड़े वृक्ष के रूप में पल्लवित होते हैं। हमारे आज के छोटे पारिवारिक ज्ञान मन्दिर आगे चलकर जगमगाते तारे के रूप में भारत भाग्य निर्माण के आकाश पर चमकेंगे और इनमें से ही कई का दर्शन संसार सूर्य और चन्द्र जैसे महान प्रकाश पिण्डों के रूप में करेगा। आवश्यकता कदम उठाने की है। आइये, शुभ कार्य के लिए अधिक विचार न करें, अपना सुदृढ़, कदम बढ़ाएं।


गायत्री-प्रेमियों को आवश्यक सूचनाएँ

1. ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान कि पूर्णाहुति का समय तेजी से निकट आता चला जा रहा है समय कम और काम अधिक करना शेष है। इसलिए अब हमें अधिक तत्परता के साथ इस महान जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए संलग्न होना है। इस युग का यह अभूतपूर्व एवं महानतम यज्ञानुष्ठान हमारी चेष्टा की कड़ी परीक्षा लेने आ रहा है। असफलता और अनुत्तीर्णता हम सबके लिए एक बड़ी अशोभनीय बात होगी। इसका पूरी तरह स्मरण रखना चाहिए।

2. प्रतिदिन 24 करोड़ जप, 24 लाख हवन, 24 लाख मन्त्र लेखन, 4 लाख पाठ का क्रम अभी पूर्ण नहीं हो सका है। गायत्री परिवार के वर्तमान सदस्य अपनी साधना को इस मास से कम से कम एक चौथाई और बढ़ा दें। अब की अपेक्षा सवाई साधना करने लगें।

3. नये गायत्री उपासक बढ़ाना आवश्यक है। अभी गायत्री परिवार के सदस्य 60 हजार से कुछ ही ऊपर बढ़े हैं। और शाखाओं की संख्या 1600 के करीब हुई हैं। इस संख्या की तेजी से वृद्धि करनी है। पूर्णाहुति से पूर्व सदस्यों की संख्या 21 लाख और शाखाओं की संख्या हो जानी चाहिए। इसके लिए प्रत्येक शाखा को, प्रत्येक सदस्य को प्रयत्न करना चाहिए।

4. गर्मियों में अधिकाँश परिजनों को अवकाश रहेगा। स्कूलों की छुट्टियों हो जाती हैं। अध्यापक और छात्र इन दिनों खाली रहते हैं। किसान अपनी फसल काटकर निवृत्त हो जाते हैं, व्यापार का सीजन भी ढीला पड़ जाता है, इन दिनों साल के अन्य महीनों की अपेक्षा अधिकाँश लोगों को अधिक फुरसत रहती है। दिन भी कुछ लम्बे होते हैं। यह समय गायत्री प्रचार की धर्म-फेरी के लिए लगाया जाय। दो-दो, चार-चार की टोलियाँ बना कर परिजन निकलें और अपने समीपवर्ती क्षेत्र में घर-घर गायत्री माता का सन्देश पहुँचाने का प्रयत्न करें।

5. महायज्ञ के अवसर पर मथुरा आ सकने वाले होता, यजमान एवं संरक्षक बनाने का कार्य पूरे उत्साह के साथ करना चाहिए। जहाँ संभव हो वहाँ गायत्री परिवार की शाखाएं स्थापना करनी चाहिए। धर्म-फेरी करने वाले अपने सामने यह लक्ष रखें। (1) मन्त्र लिखने के लिए प्रेरणा देना, अपने क्षेत्र से 24 हजार, 21 लाख, 24 लक्ष या जितना बन पड़े मन्त्र लेखन कराने की योजना बनाना (2) जिनके यज्ञोपवीत नहीं हुए हैं उन्हें महायज्ञ होने अभूतपूर्व अवसर पर यज्ञोपवीत संस्कार कराने के लिए प्रेरणा देना (3) जो लोग नियमित गायत्री जप कर सकें उनसे जप और जो नियमित न कर सकें उनसे गायत्री चालीसा के पाठ कराना। (4) जिन्हें शुद्ध गायत्री मन्त्र याद न हो उनसे ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ यह पंचाक्षरी गायत्री कराना।

6. जिन गायत्री परिवार की शाखाओं में सत्संगों का क्रम अभी नहीं चलता हैं उन्हें यह कार्य तुरन्त आरम्भ कर देना चाहिए। धर्म भावनाओं को सुरक्षित रखने एवं संगठन को बढ़ाने की दृष्टि से साप्ताहिक सत्संगों की भारी आवश्यकता है। सत्संगों में यदि आर्थिक असुविधा के कारण हवन में कठिनाई हो और कोई पूजा उपकरण उपलब्ध न हो, तो गायत्री माता का प्रतीक जल पूर्ण कलश, और यज्ञपिता का प्रतीक घृत दीप रख कर उसकी पूजा कर लेनी चाहिए और परस्पर विचार विनिमय एवं प्रवचन आदि का क्रम आरम्भ कर देना चाहिए। सत्संगों में इन दिनों ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति की चर्चा अवश्य की जाय।

7. कई शाखायें मथुरा से बहुत दूर है, जाने आने का किराया भाड़ा बहुत लगता है। इन शाखाओं के सदस्य ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के होता यजमान बनने के तो बड़े इच्छुक हैं पर इतनी दूर का किराया खर्च करने में कठिनाई अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह सोचा गया है कि मथुरा न आ सकने वाले होता यजमानों के उनके क्षेत्र में एक सामूहिक यज्ञ की योजना करेंगे और हम स्वयं आकर उनकी पूर्णाहुति उनके समीपवर्ती किसी यज्ञ में करावेंगे। मथुरा का यज्ञ हो जाने के बाद 24 या 101 हवन कुण्डों के क्षेत्रीय यज्ञ कराने का प्रयत्न करेंगे। ये यज्ञ भी ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के ही भाग माने जावेंगे। इस प्रकार मथुरा में 1000 कुण्डों का यज्ञ होने के बाद देश भर में 24 हजार कुण्डों के यज्ञ देश के कोने-कोने में कराने का आयोजन होगा। बहुत दूर क्षेत्र के यज्ञ में शामिल हो सकेंगे। इसलिए दूर आने की कठिनाई का विचार छोड़कर सभी धर्म प्रेमियों को गायत्री के प्रति निष्ठा रखने वालों को होता यजमान बनना चाहिए। ऐसा पुण्य पर्व जीवन में फिर मिल सकना कठिन है। जिनको आत्मा में प्रेरणा एवं उत्साह उठे उन्हें इस धर्म अनुष्ठान में भागीदार अवश्य बन जाना चाहिये।

8. होता और यजमानों के नियम बहुत ही सरल हैं। देखने में ही कठिन मालूम पड़ते हैं। अब से लेकर पूर्णाहुति तक यदि 6 माला की जायँ तो आसानी से सवा लक्ष जप हो सकता है। जो जन न कर सकें वे 1250 चालीसा पाठ या 2400 मन्त्र लेखन कर सकते हैं। प्रति दिन आधा घण्टा समय लगाते रहने से यह साधनायें भी आसानी से हो सकती हैं।

9. एक समय बिना नमक का भोजन वाला उपवास नियम अति सरल है। यदि वह न हो सके या करने में कठिनाई अनुभव होती हो तो वे 42 की अपेक्षा कम उपवास करने का कारण बताकर उससे छूट पाने की प्रार्थना तपोभूमि को कर सकते हैं, उपरोक्त कारण होने पर उपवासों में छूट भी दी जा सकती है। एक तरीका यह भी है कि जितना जप पाठ शेष रह जाए उतना तपोभूमि से उधार ले लिया जाय और उसकी पूर्ति अगले वर्ष कर दी जाय।

10. जितना जप या उपवास कम पड़े उसकी पूर्ति मथुरा में ब्रह्मचारियों द्वारा भी कराई जा सकती है। एक हजार जप करने का चार आना या एक उपवास का आठ आना देने पर जप उपवास की पूर्ति तपोभूमि में हो सकती है।

11. इस वर्ष जहाँ अवसर हो वहाँ बड़े सामूहिक यज्ञ न करके छोटे-छोटे 5-5 कुण्डों के यज्ञ कर लेने चाहिए। 6 कुण्डों के, 24 कुण्डों के, 101 कुण्डों के बड़े यज्ञ अगले वर्ष किये जायें। इस वर्ष सारा ध्यान महायज्ञ की पूर्णाहुति पर केन्द्रित किया जाय। जहाँ छोटे-बड़े यज्ञ किये जाएं वहाँ इसके लिए हमें चलने का आग्रह न किया जाय। कारण कि पूर्णाहुति की बहुत सारी योग्यता और व्यवस्था को छोड़ कर यज्ञों में हमारे जाने से यहाँ के कार्यों में भारी क्षति पहुँची है। भारतीय सामूहिक यज्ञों के लिए तपोभूमि के वक्षकारी सिनेमा समेत भेजे जा सकते हैं जो यज्ञ भी करा दें और सिनेमा दिखाकर आकर्षक ढंग से धर्म प्रवचन भी करा दें।

12. गत कई वर्षों से तपोभूमि में ज्येष्ठ के महीने में शिक्षण शिविर होता था, इस वर्ष वह न होगा। सभी परिजन अपने-अपने क्षेत्रों में काम करें, यहाँ न आवें। तपोभूमि में इन दिनों यज्ञशाला का निर्माण, पीछे की ओर से बरामदा, उसके ऊपर शल्य-चिकित्सालय की इमारत बनने का कार्य चल रहा है, ईंट, चूना, लकड़ी, पत्थर, लोहा, सीमेन्ट में सब जगह घिरी रहती है। शिक्षण शिविर चलाने के लायक जगह भी इन दिनों खाली नहीं है। इस वर्ष शिक्षण शिविर स्थगित रहेगा।

13. इस महीने से गायत्री-परिवार-पत्रिका निकलनी आरम्भ हो गई है। सभी शाखाओं को उसका प्रथम अंक भेज दिया गया है। शाखाओं की गतिविधियाँ, योजनाएँ, रिपोर्ट, समाचार उसी में छपते रहेंगे तथा यहाँ से जो सूचनाएँ हर महीने जाती थी, वे अब अलग से न जाकर इसी में छपा करेंगी। अखण्ड-ज्योति में वह सब समाचार बहुत संक्षेप में छापने पर भी बहुत पृष्ठ घिर जाते थे और विचार सामग्री पाठकों को कम मिलती थी। अब परिवार-पत्रिका निकलने से यह कठिनाई दूर होगी। शाखाओं की गतिविधियाँ भी ठीक तरह छप सकेंगी और अखण्ड-ज्योति में अधिक विचार सामग्री दी जा सकेगी। अब अखण्ड-ज्योति में शाखाओं के समाचार एवं अनुभव न छपा करेंगे। परिवार पत्रिका का ग्राहक होना प्रत्येक शाखा के लिए आवश्यक है। शाखाएँ 2) चन्दा भेज दें। शाखा संचालकों का कर्तव्य है कि उस पत्रिका को सभी सदस्यों तक पहुँचाने एवं पढ़वाने की व्यवस्था करें। सदस्यों को अलग-अलग उसे मँगाना आवश्यक नहीं।

14. कई होता यजमानों ने अभी वितरण साहित्य नहीं मँगाया है। ज्ञान-दान उच्चकोटि का पुण्य है। इसमें कन्जूसी न करनी चाहिए। अपने क्षेत्र में दूर-दूर तक गायत्री माता का सन्देश पहुँचाने के लिए साहित्य वितरण ही एकमात्र उपाय है धर्म-फेरी भी साहित्य वितरण के बिना सफल नहीं है। इसके लिए उपेक्षा न की जानी चाहिए। देश के कोने-कोने में, घर-घर में गायत्री माता का, यज्ञ पिता का सन्देश पहुँचे, इसी दृष्टि से साहित्य वितरण की शर्त तक अत्यन्त आवश्यक शर्त रखी गई है। इसका महत्व कम नहीं समझना चाहिए और न उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। जो होता यजमान इसमें कठिनाई अनुभव करते हों वे 6 रुपये के स्थान पर उसका आधा या चौथाई मूल्य का साहित्य मंगालें पर सर्वथा उपेक्षा न करें। यदि साहित्य वितरण न हुआ तो यज्ञ भले ही हो जाय, घर-घर माता का संदेश पहुँचाने का वह महान् कार्य न हो सकेगा। जो यज्ञ से भी अधिक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। यह वितरण साहित्य काफी घाटा सहकर लागत से लगभग आधे मूल्य में दिया जा रहा है। इनमें संस्था का कोई आर्थिक लाभ नहीं। धर्म-प्रचार ही एक मात्र उद्देश्य है। जो होता यजमान 6 रुपये से कम का साहित्य मंगावें, वे पेशगी पैसा भेजें। 6 रुपये से कम की वी.पी. नहीं भेजी जाती।

15. गायत्री ज्ञान मंदिरों की स्थापना पर भी पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। उपवासों का बचाया हुआ अन्न मथुरा भेजने की जरूरत नहीं है। वह तो शरीर का भोजन बचाकर आत्मा को भोजन देने की एक विशुद्ध निजी प्रक्रिया है। घर में गायत्री सम्बन्धी 52 पुस्तकों का सैट रखना-घर भर के लिए, पास-पड़ौस के लिए, स्वजन सम्बन्धियों के लिए एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक चिरस्थायी भोजन जुटाना है। इस आधार पर घर को एक दिन देव मन्दिर एवं ब्रह्म विद्यालय बनाने का भी अवसर मिलता है। तुलसी, पीपल, बरगद, आदि के वृक्ष लगाने पर पुण्य माना जाता है, यह गायत्री ज्ञान मन्दिर एक उच्चकोटि का धर्म वृक्ष है। जिसके पत्र, पुष्प, पल्लव एवं फलों में अपना समीपवर्ती क्षेत्र सुरक्षित होने लगेगा। ज्ञान मन्दिरों के आधार पर ब्रह्म विद्यालय चलाने एवं धर्म प्रचारक उपाध्याय बनाने का एक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के होता यजमानों को करना ही चाहिए। एक ही घर के कई याज्ञिक हों या आर्थिक अड़चन हो तो कई याज्ञिक मिलकर भी एक ज्ञान मन्दिर सैट मंगा सकते हैं।

16. इन दिनों संस्था पर डाक व्यय का भार बहुत बढ़ गया है। व्यक्तिगत पत्र व्यवहार के लिए जवाबी पत्र भेजने की कृपा करके सदस्यगण इस भार को कम करने में बहुत कुछ सहायक हो सकते हैं।

17. माता भगवती देवी अपनी महिला सेवा संबन्धी योजनाओं की तैयारी में लगी हुई हैं। ‘गृह लक्ष्मी’ पत्रिका की तैयारी भी उनकी चल रही है। जब तैयारी पूर्ण हो जायेगी और कोई सज्जन गृह लक्ष्मी का चन्दा न भेजे। हाँ उसके ग्राहक बनने के लिए नाम नोट करा सकते हैं।

18. गायत्री-परिवार पत्रिका का प्रथम अंक समस्त शाखाओं को बिना चन्दा आये ही भेजा गया है। अगर किसी कारण वश आपको न मिला हो तो पत्र भेजकर तुरन्त मंगा लें।


अरी तृष्णे, अब मुझको त्याग।


अरी तृष्णे, अब मुझको त्याग (Kavita)

(1)

घनाशासे मैंने बहु बार--

हृदय वसुधा का किया विदीर्ण।

गलाई अतुलित गिरि की धातु,

किए गंभीर-सिंधु निस्तीर्ण।

नृपति-सेवा, आराधन-मंत्र--

किया शव-भू में निशि को जाग।

न पाई लघु वराटिका किन्तु,

अरी तृष्णे, अब मुझको त्याग॥

(2)

किया दुर्गम देशों में वास,

कुपथ में घूमा मैं अज्ञान।

किया अंगीकृत सेवा-धर्म,

त्याग कर जाति-वंश अभिमान।

मान-वर्जित-परगृह-आहार--

काकवत् करता रहा सदोष।

पाप रत दुर्मति तृष्णे! किन्तु,

न तुझको फिर भी है सन्तोष॥

(3)

खलों का सहकर भी उपहास,

किया आराधन उनका हाय!

शून्य मन से मैं हुआ प्रसन्न,

रोककर शोक अश्रु-समुदाय।

चित्त भी करके वृत्ति-निरोध,

किया करबद्ध विनय का कृत्य।

अरी आशा संगिनी तू और,

नचाएगी अब कितना नृत्य?॥

(4)

हुई भोगों की तृष्णा शान्त,

रूपगत हुआ, हुए श£थडडडडडडड अंग।

गये समवय साथी सुरधाम,

त्याग करके जीवन का संग।

यष्टि-बल से उठते हैं पैर,

हुए तमसावृत नैन पुनीत।

अहो धिक् फिर भी काया नित्य,

मरण के भय से है भयभीत॥

(5)

उठाते हैं हम क्या आनन्द,

आह! उठ जाते हैं हम आप।

ताप से मिलती है क्या सिद्धि,

और बढ़ जाता है सन्ताप।

समय होता है कहाँ व्यतीत,

हमारा ही होता है अंत।

बलवती तृष्णा हुई न जीर्ण,

हुए हम स्वयं जीर्ण, हा हंत॥

*समाप्त*

(श्री जगदीशशरणसिंहजी, एम. ए.)