गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग तथा तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है।

गायत्री महा विज्ञान (प्रथम भाग)

गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, प्रत्येक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मंत्रों का साधना विधान आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन।

गायत्री महा विज्ञान (द्वितीय भाग)

गायत्री द्वारा वाम मार्गी ताँत्रिक विधान के अनुसार कारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पंजर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह।

गायत्री महा विज्ञान (तृतीय भाग)

गायत्री महामंत्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का साधना विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुण्डलिनी-योग षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय-कोष, आनन्दमय कोष कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन।

गायत्री यज्ञ विधान (प्रथम भाग)

गायत्री यज्ञ का विज्ञान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्र एवं साइन्स के आधार पर बहुत ही खोज पूर्ण वर्णन।

गायत्री यज्ञ विधान (द्वितीय भाग)

गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया, जल यात्रा, मंडप प्रवेश, वेदी पूजन, कुशकण्डिका, अग्नि स्थापन, आहुति मंत्र, पूर्णाहुति, वसोधारा, घृत अवघ्राण, भस्म धारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि विधान, जिसे समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है।

गायत्री चित्रावली (प्रथम भाग)

विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन।

गायत्री चित्रावली (द्वितीय भाग)

व्याहृति समेत गायत्री 26 अक्षरों में सन्निहित 26 महान आदर्शों को 26 श्लोक, 26 लेख, 26 कविताएं एवं 26 आर्ट पेपर पर छपे तिरंगे चित्रों द्वारा समझाया गया है।

गायत्री का मंत्रार्थ

अनेकों ग्रन्थों में, अनेकों ऋषियों द्वारा गायत्री महामंत्र के अनेकों प्रकार से किये हुए अर्थों को संग्रह राक्षस राज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है।

गायत्री पुस्तकालय सैट (52 पुस्तकें)

अपने घर में गायत्री ज्ञान-मन्दिर (गायत्री पुस्तकालय) स्थापित करना प्रत्येक गायत्री-प्रेमी का कर्त्तव्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए 52 अत्यन्त सुन्दर, सस्ती, बढ़िया ग्लेज कागज पर छपी, तिरंगे सुन्दर टाइटलों की 52 पुस्तकें छापी गई हैं। इनमें से 26 गायत्री साधना एवं विज्ञान संबन्धी और 26 में गायत्री मंत्र के एक एक अक्षर में सन्निहित, नैतिकता, मानवता एवं दिव्य सद्गुणों, सद्भावों, सद्विचारों, सत्य प्रवृत्तियों का प्रतिपादन करने वाली अत्यन्त ही महत्वपूर्ण धर्म शिक्षाओं का दिग्दर्शन कराया गया है।

पता- ‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा।

ब्रह्माणं यत्र हिंसन्ति तद् राष्ट्रं दुच्छुना।

-अथर्व वेद 5/19/8

जहाँ ब्राह्मण की उपेक्षा होती है वह राष्ट्र दुःख पाता है।

सच्चे समाज-सेवियों को सम्मान और समुचित पोषण मिलना चाहिए।

वर्ष-19 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-11


काँटे मत बोओ

(श्री रामेश्वर शुक्ल “अंचल”)

यदि फूल नहीं बो सकते तो काँटे कम से कम मत बोओ॥

है अगम चेतना की घाटी, कमजोर बड़ा मानव का मन, ममता की शीतल छाया में, होता कटुता का स्वयं शमन। बाधायें गलकर रह जातीं, खुल-खुल जाते हैं मुँदे नयन, होकर निर्मलता में प्रमत्त बहता प्राणों का क्षुब्ध पवन।

संकट में यदि मुस्का न सको, भय से कातर हो मत रोओ। यदि फूल नहीं बो सकते तो काँटे कम से कम मत बोओ॥

हर सपने पर विश्वास करो, लो लगा चाँदनी का चन्दन, मत याद करो सोचो ज्वाला में कैसे बीता जीवन। इस दुनिया की है रीत यही, सहता है तन बहता है मन, दुःख की अभिमानी मदिरा में, जो जाग सके वह है चेतन।

तुम इसमें जाग नहीं सकते, तो सेज बिछा कर मत सोओ, यदि फूल नहीं बो सकते तो काँटे कम से कम मत बोओ।

पग-पग पर शोर मचाने से मन में संकल्प नहीं जमता, अनसुना अनचीन्हा करने से, संकट का वेग नहीं कमता। संशय के किसी कुहासे में, विश्वास नहीं पल भर जमता, बादल के घेरे में भी तो जयघोष न मारुत का थमता।

यदि विश्वासों पर बढ़ न सको, साँसों के मुरदे मत ढोओ। यदि फूल नहीं बो सकते तो काँटे कम से कम मत बोओ॥


सब प्रकार की उन्नति का मूलमंत्र-गायत्री

(पं. रघुनाथ शास्त्री कोकजे, लोनावाला (बम्बई)

गायत्री मन्त्र प्राचीन महापुरुषों के कथनानुसार एक सर्वश्रेष्ठ मंत्र है। उसका जप विविध फलों का प्रदाता बताया गया है। परन्तु आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति इसकी उपेक्षा करने लगे हैं। वे पूर्वजों की चलाई वस्तुओं को केवल इसी आधार पर मानना नहीं चाहते क्योंकि वह प्राचीन है। बुद्धिवाद की कसौटी पर जो चीज सच्ची सिद्ध हो सके उसे तो वे मानने को तैयार हो जाते हैं, परन्तु हमारे प्राचीन विद्वान सामान्यतः ऐसे विषयों में तर्क-प्रधान प्रणाली पर चल सकना असम्भव-सा मानते हैं। ऐसे विषय में वे श्रद्धा की दुहाई देना ही योग्य मानते हैं। जिसमें श्रद्धा होगी वही धर्माचार का अधिकारी है, और चिकित्सा या कसौटी का इसमें कोई स्थान नहीं ऐसी उनकी धारणा बन गई है। सम्भवतः इसी कारण नवशिक्षित तथा पुरानी प्रथा के मानने वालों के बीच एक अनुल्लंघनीय पर्वत-सा खड़ा हो गया है। परन्तु वास्तव में यह स्थिति सत्य नहीं है। बुद्धिवाद और श्रद्धा इनमें विरोध मानना एक प्रकार से प्राचीन प्रथा के प्रति अज्ञान प्रकट करना है। प्राचीन प्रथा में भी बुद्धिवाद और तर्क को पूर्ण रूप से स्थान है। इस सिद्धाँत की पुष्टि अनेक उदाहरणों से की जा सकती है, पर इस समय गायत्री-मन्त्र का प्रसंग उपस्थिति होने से हम इसी के आधार पर इस सिद्धाँत को सिद्ध करना चाहते हैं।

गायत्री बिल्कुल छोटा-सा मन्त्र है। उसके तीन पाद या चरण होने से उसे त्रिपदा भी कहते हैं। उसका सीधा सादा अर्थ यह है कि—”भगवान सविता (सूर्य) के श्रेष्ठ तेज का हम ध्यान करते हैं। वह हमारी बुद्धि को प्रेरणा दे।” इस मन्त्र के अंतिम चरण (धियो यो नः प्रचोदयात्) में बुद्धि की माँग है न कि किसी भौतिक साधन, संपत्ति की। अन्न-वस्त्र इत्यादि वस्तुओं की माँग यह एक मामूली चीज है। देवता के पास ऐसी साधारण नित्योपयोगी वस्तुओं की माँग गायत्री मन्त्र में नहीं की गई है। मानव जीवन की महत्ता बुद्धि के उत्कर्ष में है। उस बुद्धि को यदि भगवान सूर्य जैसे तेजस्वी तत्व से प्रेरणा मिल जाय, तो उससे सब प्रकार के साधन संपत्ति प्राप्त हो सकते हैं। केवल साँसारिक ही नहीं किन्तु आध्यात्मिक उन्नति भी बुद्धि को योग्य प्रकार से प्रेरणा मिलने पर ही प्राप्त होती है। स्वर्ग, आत्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म न मानने वाले नास्तिक बुद्धि के आधार पर अपना विवेचन करते हैं, अर्थात् बुद्धि का आदर उनको भी अनिवार्य है। ऐसी सर्वमान्य तथा सबको माननीय ‘बुद्धि’ को प्रेरणा मिले, इस प्रकार की प्रार्थना का प्रतिवाद नास्तिक भी नहीं कर सकते। स्वर्ग, मोक्षादि गूढ़ वस्तुओं में विश्वास न होने के कारण नास्तिक उनका खण्डन कर सकते हैं। स्वर्ग, मोक्षादि का हर एक के अनुभव में आना भी असम्भव है। मानो यही संकट देखकर ऋषि ने गायत्री-मन्त्र में ‘बुद्धि’ की ऐसी माँग रख दी है जिसका विरोध या प्रतिवाद कोई भी नहीं कर सकता।

अनेक प्रकार की बुद्धि

इस मन्त्र में ‘धियः’ अर्थात् बुद्धि का प्रयोग बहुवचन में किया गया है। “अनेक प्रकार की बुद्धि” ऐसा अर्थ उससे निकलता है। हिन्दू संस्कृति केवल आध्यात्मिक का विचार करती है, ऐसा मानकर अनेक व्यक्ति आधिभौतिक की उपेक्षा करना अपना आदर्श बतलाते हैं। परन्तु “धियः” शब्द के प्रयोग से उसका खण्डन हो जाता है। केवल आध्यात्मिक ही नहीं किन्तु भौतिक, आर्थिक, राजकीय—सब प्रकार की बुद्धि बढ़ जाय, यह गायत्री-मन्त्र की प्रार्थना है। भूत विद्या, मनुष्य विद्या, वाकोवाक्य, राशि, क्षात्र विद्या, नक्षत्र विद्या, जनविद्या इत्यादि नाम उपनिषदों में पाये जाते हैं। अर्थात् अनेक प्रकार की बुद्धि—यह अर्थ ‘धियः’ से लिया जाय तो उसमें अनौचित्य का कुछ भी संदेह नहीं होना चाहिये।

नास्तिक-युग में भी बुद्धि की श्रेष्ठता जिस प्रकार निर्विवाद है उसी प्रकार सूर्य देवता की श्रेष्ठता भी त्रिकाल बाधित है। सूर्य को चाहे कोई देवता न माने परन्तु उसका जागतिक जीवन के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध मानना सबको अनिवार्य है। दो दिन बादल घिरे रहें और सूर्य का दर्शन न हो तो वायु दूषित बन जाती है, बीमारियाँ फैलने लगती हैं। अतएव सूर्य का महत्व सुस्पष्ट है। नास्तिक भी इससे इनकार नहीं कर सकता। गायत्री मंत्र का देवता सूर्य है। सूर्य या सविता का प्रभाव निरपवाद होने से इस विषय में भी शंका होना असम्भव है। आदमी जिस चीज का ध्यान करता है उसी प्रकार की उसकी वृत्ति बन जाती है, यह प्राकृतिक सिद्धान्त है। ‘सूर्य भगवान के भास्कर तेज का हम ध्यान करते हैं—ऐसा गायत्री मंत्र के प्रथम चरण का अर्थ है। ऐसे तेजस्वी पदार्थ का ध्यान करने वाले स्वयं तेजस्वी बनेंगे यह मानस-शास्त्र अथवा मनोविज्ञान द्वारा सत्य सिद्ध हो चुका है। किसी से न दबते हुए तेजस्वी रहने की किसकी इच्छा न होगी?

‘प्रव्रवाम शरदः शतम। अदीनः स्याम शरदः शतम।

“सौ वर्ष तक अधिकार पूर्ण वाणी से बोलते रहेंगे। सौ वर्ष तक हम दैन्यरहित जीवन बितायेंगे।” इस प्रकार की आकाँक्षाएँ वेद में (वाजसनेय संहिता 36-24) भी स्पष्ट हैं। सूर्य सर्वश्रेष्ठ तेजस्विता का प्रतीक है। वही गायत्री मंत्र का देवता है। इस सराहनीय सर्वोच्च देवता का ध्यान मानवीय उन्नति का साधन मानने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिये। गायत्री मंत्र का देवता इस प्रकार सबके लिये सराहनीय है।

सामाजिकता

आजकल गायत्री-मन्त्र का पठन गुप्तता से किया जाना आवश्यक बतलाया जाता है। एकान्त में इस मंत्र का जप अकेले-दुकेले किया करते हैं। परन्तु ऊपर दिये हुए मंत्रार्थ पर ध्यान देने से सत्य बात कुछ और ही मालूम पड़ती है। इस मन्त्र में “धीमहि” (हम ध्यान करते हैं) और “नः” (हमारी) ये बहुवचन युक्त प्रयोग इस मंत्र की सामुदायिकता पर प्रकाश डालते हैं। वास्तव में देखा जाय तो गायत्री-मंत्र सामुदायिक प्रार्थना-मंत्र है। अकेले-दुकेले में भी इस मंत्र का जप करना हानिकारक नहीं किन्तु उस समय में भी जप कर्ता को चाहिये कि वह अपने को व्यक्तिगत रूप में न मानकर समाज का एक घटक समझ कर जप करें। इस प्रकार गायत्री-जप जैसे बने वैसे करने की शास्त्राज्ञा है—

यथा कथञ्चिज्जप्तैषा देवी परम पावनी। सर्वकामप्रदा प्रोक्ता विधिना किं पुनर्नप॥

(विष्णु धर्मोत्तरे 1-165-15)

इस श्लोक में मार्कण्डेय ऋषि ने वज्र राजा से निश्चयपूर्वक कहा है कि “गायत्री जप जैसे बने वैसे करने से भी मनुष्य को पवित्र कर उसकी सब कामनाएँ सफल बना देता है, फिर वैध रीति से जपानुष्ठान करने वाले के विषय में कहना ही क्या?” अर्थात् जीवन व्यवसाय में फँसे हुए आदमी को भी इस मंत्र से लाभ उठाना सहज है। बड़ा विधि विधान और आडम्बर करने पर ही गायत्री का फल मिलता हो और जैसे तैसे जप कर लेने से पाप होता हो, सर्व साधारण में फैली हुई यह धारणा गलत है, यह इस श्लोक से प्रकट होता है। बुद्धि सामर्थ्य की आज बड़ी आवश्यकता है, गायत्री मन्त्र उसी सामर्थ्य को बढ़ाने वाला होने के कारण आज के नव-शिक्षितों में भी आदरणीय होना चाहिए।


समता-मूलक समाज की स्थापना कैसे हो?

(संत विनोबा भावे)

मैंने जो भूदान का आन्दोलन उठाया है वह मजदूर आन्दोलन ही है। जो सब से कमजोर है जो बेजमीन और बेजबान है, उनके उद्धार का यह आन्दोलन है। अक्सर मजदूरों के आन्दोलन शहरों में होते हैं। यूरोप में तो किसानों के भी आन्दोलन हुए हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में ज्यादातर शहरों में ही ऐसे आँदोलन हुआ करते हैं। गाँवों के मजदूर अत्यन्त असंगठित हैं, उनमें जागृति नहीं है। उन्हें शिक्षा मिलती नहीं। उनके पास सिवा खेती के दूसरा कोई धंधा भी नहीं है, और जिस खेत पर वे काम करते हैं उसके वे मालिक नहीं हैं। वे तो खेती के मजदूर हैं, जो सबसे नीचे के दर्जे के हैं और समाज की श्रेणियों में सबसे निकृष्ट हैं। उनका सवाल मैंने उठाया है। जो सबसे नीचे के स्तर के होते हैं उनका सवाल उठाना ही ‘सर्वोदय’ का और अहिंसा का तरीका है। क्योंकि जो सबसे अंतिम है उसे ऊपर उठाना चाहिये। फिर उसके बाद बाकी के भी ऊपर उठ जाते हैं। फिर उनसे ऊँचों के लिये स्वतंत्र आन्दोलन करना नहीं पड़ता।

मुझ पर आक्षेप किया जाता है कि मैं सिर्फ नीचे वालों को ऊपर उठाने की बात क्यों करता हूँ? जिस तरह समुद्र-स्नान करने से सब नदियों के स्नान का पुण्य मिल जाता है, फिर नदियों में अलग-अलग स्नान करने की जरूरत नहीं पड़ती, उसी तरह का काम यह भी है। इसमें शर्त यही है कि काम करने का ढंग ऐसा हो जिससे एक को लाभ होने के साथ दूसरे की हानि न हो। अगर हम ऐसा उपाय ग्रहण करते हैं तो सारा का सारा समाज ऊंचा उठता है। सर्वोदय का, अहिंसा का तरीका ऐसा है कि जिससे बाकी के सब लोग स्वयं ऊँचे उठ जाते हैं। किसी ने मुझसे पूछा था कि आप मध्यम श्रेणी वालों या शहर के मजदूरों के लिये क्या कर रहे हैं? उस समय मैंने हँसी में कह दिया था कि दुनिया के सब मसले हल करने का मैंने ठेका नहीं लिया है। लेकिन वह तो एक विनोद की बात थी—”एकहि साधे सब सधै, सब साधे सब जाय”-इस तरह मैं तो एक वातावरण तैयार करना चाहता हूँ जिससे समता, न्याय, भूतदया और सहानुभूति की हवा फैल जाय तथा उससे बाकी के मसले अपने आप हल हो जायें, यदि न भी हों तो केवल जरा-सा आन्दोलन करके हल कर लिये जायें।

मेरे काम को देखने की अनेक दृष्टियाँ हैं। पर यहाँ पर उनमें से एक यही दृष्टिकोण उपस्थित करना चाहता हूँ कि यह आन्दोलन मजदूर-आन्दोलन है। मैं खुद अपने को मजदूर मानता हूँ। मैंने अपने जीवन के-जवानी के-32 वर्ष, जो ‘बेस्ट इयर्स’ (सर्वोत्तम वर्ष) कहे जाते हैं, मजदूरी में बिताये। मैंने तरह-तरह के काम किये हैं, जिन कामों को समाज हीन और दीन मानता है—जिनकी कोई प्रतिष्ठा नहीं है, यद्यपि उनकी आवश्यकता बहुत है— ऐसे काम मैंने किये हैं। जैसे—भंगी काम, बढ़ई काम, खेती आदि। आज गाँधी जी नहीं हैं, इसलिए मैं बाहर निकला हूँ। अगर वे होते, तो मैं बाहर कभी नहीं आता और आप मुझे किसी मजदूरी में मग्न पाते। कर्म से मैं मजदूर हूँ, यद्यपि जन्म से ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मनिष्ठ और अपरिग्रही। ब्रह्मनिष्ठा तो मैं छोड़ नहीं सकता। किसी भी काम को देखने की अपनी अलग-अलग दृष्टि होती है। तुलसीदास जी ने लिखा है कि जहाँ राम खड़े हुये थे, वहाँ उन्हें देखने वाले जिस तरह के लोग थे, उसी तरह से उन्होंने राम की ओर देखा—

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

जो काम व्यापक होते हैं उनके अनेक पहलू होते हैं, इसलिए उनकी ओर कई दृष्टियों से देखा जा सकता है। मेरे काम से भूमि की समस्या हल होती है, अन्न के उत्पादन में वृद्धि हो सकती है, न्याय बढ़ सकता है, ग्रामों का संगठन हो सकता है, राज व्यवस्था पर उसका अच्छा असर हो सकता है, लोगों में धर्म भावना का विकास हो सकता है, लोगों की अविकसित और गुप्त धर्म-भावना को दान और दया करने की वृत्ति को बाहर लाया जा सकता है। इस प्रकार मेरे काम को धार्मिक और भारतीय संस्कृति के अनुकूल कार्य की दृष्टि से भी देखा जा सकता है, और इसे एक बड़ा भारी मजदूर-आन्दोलन भी कहा जा सकता है।

परमेश्वर की प्रेरणा

यह सब मैंने किया नहीं, मुझे करना पड़ा है। हैदराबाद के सर्वोदय-सम्मेलन के बाद मैं एक अहिंसक निरीक्षक के नाते तेलंगाना गया था। वहाँ के आतंक को नष्ट करने के लिए सरकार प्रतिवर्ष पाँच करोड़ रुपया खर्च करती थी, फिर भी वह नष्ट नहीं हुआ था। इसलिए वहाँ अहिंसा कैसे काम कर सकती है, यह देखने के वास्ते मैं नम्र भाव से गया। मैंने वहाँ की परिस्थिति देखी और मुझे मानो सूचना मिली कि किसानों की समस्या हाथ में लेनी होगी। जो लोग खेतों में मजदूरी करते हैं, परन्तु बिना जमीन के हैं, उनका प्रश्न उठाना होगा। मुझमें ताकत नहीं थी, फिर भी मुझे यह काम लेना पड़ा। नहीं तो मैं डरपोक साबित होता, अपने धर्म से पतित मान जाता। मैंने सोचा कि जब परमेश्वर इस काम की प्रेरणा दे रहा है, तब इस काम को पूरा करने की ताकत भी वही देगा। यही मानकर मैंने इस काम को उठाया। ईश्वर पर अर्थात् आप सब पर श्रद्धा रखकर मैंने यह काम किया है। यह अहिंसा का तरीका है।

दुनिया के कई देशों में कृषक-मजदूरों के आन्दोलन चले, लेकिन भारत में किसी ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। सिर्फ कम्यूनिस्टों ने तेलंगाना में उनकी ओर ध्यान दिया। बाकी तो सब शहरों के मजदूर आन्दोलन हैं। दुनिया में हरएक ने अपने-अपने ढंग से इस सवाल को हल किया है। लेकिन उनका तरीका बेढंगा है। उससे न तो कभी दुनिया का भला हुआ और न होगा। भारत के लिए वे तरीके नुकसान पहुँचाने वाले हैं। हम भारतवासियों की एक विशेषता है। हमारा अपना एक विशेष तरीका है। किसी ने मुझसे कहा कि जबर्दस्ती से जल्दी जमीन मिल सकती है। मैंने कहा कि मैं जबर्दस्ती नहीं चाहता। यह काम भले ही धीरे-धीरे चले, पर भारतीय तरीके से होना चाहिए। यदि घी के डब्बे में आग लगाई जाती है, तो भी जल जाता है और वेद मन्त्रों के साथ यज्ञ में उसकी आहुति दी जाय, तो भी वह जलता है। दोनों तरह से घी जलता है, लेकिन एक में भावना जल जाती है और दुनिया खत्म हो जाती है, जबकि दूसरे में भावना पावन हो जाती है। हिंसक तरीके से एक मसला हल करने में दूसरे मसले पैदा हो जाते हैं। हिंसक तरीके से नई-नई तकलीफें पैदा होती हैं। हमने आजादी हासिल करने का जो तरीका उठाया था, वह यहीं निर्माण हो सका, क्योंकि वह भारत की सभ्यता के अनुकूल था। उपनिषदों में कहा गया है—”अग्ने नय सुपथा रायो।” अर्थात् “हे अग्निदेव हमको सुपथ से ले जाओ।” हमें चाहे जिस रास्ते से लक्ष्मी नहीं चाहिए, बल्कि वह सुपथ से चाहिए।

हमें केवल मजदूरों को अन्न-वस्त्र ही नहीं देना है। यह मसला केवल भौतिक ही नहीं है। मेरी दृष्टि से तो कोई भी मसला केवल आर्थिक मसला नहीं हो सकता। यदि हम गहराई में पहुँचें, तो मालूम होगा कि भौतिक मसले आध्यात्मिक और नैतिक भी होते हैं। यदि हम कहें कि गरीब को समता चाहिए, न्याय चाहिए, तो जो हमारे विरुद्ध पक्ष में हैं वे भी हमारी बात मंजूर कर लेते हैं। वे भी विरोध की बात नहीं कर सकते। बल्कि वे कहते हैं कि जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े न होने चाहिए। जहाँ हम समता की बात कहते हैं, वहाँ वे असमता की बात तो नहीं करते, पर क्षमता की बातें खड़ी करते हैं।

वे समता के मुकाबले से असमता की बात नहीं कर सकते। प्रकाश के सामने अन्धकार टिक नहीं सकता। राम के विरुद्ध यदि भीष्म का नाम लिया जाय, तो युद्ध हो सकता है। अच्छे शब्द के विरुद्ध अच्छा शब्द लाकर ही युद्ध हो सकेगा। इस कारण समता के सामने क्षमता खड़ी करते हैं, तो युद्ध होना संभव है। क्षमता में विश्वास करने वाले कहते हैं कि क्षमता (जमीन से पूरी मात्रा में पैदावार)के लिए जमीन के बड़े टुकड़े चाहिए। इस पर दूसरे पक्ष वाले नया विचार पेश करते हैं कि हम ऐसी कुशलता से समता लायेंगे कि उसमें क्षमता भी बनी रहेगी। जहाँ क्षमता है वहाँ समता भी आयेगी “यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।” मजदूरों के मसले को एकाँगी ढंग से और हिंसक तरीके से हल करने की कोशिश करने वाले कभी कामयाब नहीं हो सकते।

हमें इस काम में पूँजीवादी तरीके के दोष को ऐसे ढंग से दूर करना चाहिए। समता की रक्षा हो सके, मजदूरों के दुःख दूर हो सकें, पर कार्य की क्षमता और दूसरे गुण भी बने रहें। अगर ध्यान दिया जाय तो आज सारा भारत मजबूर बन गया दिखलाई पड़ता है। भारतवासी बुद्धि का उपयोग करना नहीं जानते। करोड़ों को हमने शिक्षा से वंचित रखा है। ये सब धन, मान और ज्ञान से विहीन हैं। फिर उनमें क्षमता कहाँ से आयेगी? आज गाँव में अच्छा बढ़ई भी नहीं मिलता। यदि चरखे का कोई नया मॉडल बनाना हो, तो गाँव का बढ़ई नहीं बना सकता। हमारा कारीगर-वर्ग ‘अनस्किल्ड’ (अकुशल) मजदूर है, जिसे न ज्ञान है, न प्रतिष्ठा और न ध्येय। पूँजीवादी-समाज में कुछ तो ऐसे होते हैं जो दिमाग का ही काम करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो केवल यंत्र के समान काम करते हैं, जो अपनी अक्ल का उपयोग नहीं कर सकते। किसी को चाकू में छेद करने का काम दिया जाय, तो वह रोज पाँच हजार चाकुओं में छेद कर सकता है और जिन्दगी भर यही काम करता रहता है। पूँजीवादी कहते हैं कि इस तरह काम करने से क्षमता और कुशलता पैदा होती है। वे मनुष्य जीवन को सर्वांगीण बनने ही नहीं देते। पूँजीवादी समाज में कुछ ‘हेड्स’ (मस्तिष्क) बनते हैं और कुछ ‘हैण्ड्स’ (हाथ)। जैसे मिल-हैण्ड्स, हैड मास्टर, हैड क्लर्क आदि। इसका मतलब यह है कि इधर सारे सिर-ही-सिर और उधर सारे हाथ-ही-हाथ! उनका कहना है कि इससे क्षमता आती है। सर्वांग परिपूर्ण मनुष्य उनकी दृष्टि में क्षमता के विपरीत है।

चारों वर्ण के सिद्धाँत को भी कुछ लोगों ने ऐसा ही समझ रखा है, कि ब्राह्मण चमार या भंगी का काम कदापि नहीं कर सकता। पर यह गलत है। चातुर्वर्ण्य का सच्चा अर्थ यही है चारों वर्ण में चारों वर्ण होते हैं, लेकिन एक की प्रधानता होती है, बाकी गौण होते हैं। भगवान कृष्ण युद्ध के समय केवल लड़ते ही न थे, बल्कि घोड़े चलाने का भी काम करते थे। उस समय उन्होंने यह नहीं कहा कि यह तो क्षत्रिय का काम नहीं है। जब अर्जुन का मोह दूर करने की बात आयी तो उन्होंने वह काम भी किया। उन्होंने अर्जुन से यह नहीं कहा कि धर्मोपदेश करना तो ब्राह्मण का काम है, तुम उसी के पास जाओ। कृष्ण भगवान् मौके पर ग्वाल बनते थे, मौके पर ब्राह्मण, मौके पर शूद्र। क्षत्रिय तो वे थे ही, इसलिए लड़ने का काम तो उन्हें करना ही पड़ता था। तो, चातुर्वर्ण्य में हरएक के लिए अपना-अपना काम होता है और वह उसे करना ही पड़ता है। लेकिन बाकी के काम भी वह आवश्यकतानुसार करता रहता है।

हम चाहते हैं कि मालिक और मजदूर का भेद मिट जाय। इसका मतलब यह नहीं कि हम मालिक की अक्ल का उपयोग नहीं करना चाहते। पर जो मालिक होगा वह मजदूर भी होगा, और जो मजदूर होगा, वह मालिक भी। कुछ तो मालिक प्रधान मजदूर रहेंगे, जो हाथ का काम करते हुये भी दिमाग के काम को प्रधानता देंगे, और कुछ मजदूर प्रधान मालिक होंगे, जो दिमाग का काम करते हुये हाथ के काम को प्रधानता देंगे। बुद्धि-प्रधान व्यक्ति शारीरिक श्रम करने वाले भी हों, और श्रम-प्रधान व्यक्ति बुद्धि का भी काम कर सकें, ऐसी व्यवस्था समाज में होनी चाहिये। अगर भगवान यह नहीं चाहता तो वह कुछ को तो हाथ ही हाथ देता और कुछ को केवल बुद्धि ही। राहु और केतु के समान सबको अपूर्ण बनाता, पर उसने सबको परिपूर्ण बनाया है, इसलिए कि सब परिपूर्ण जीवन बिता सकें।


सन्त, तीर्थ और लोक-कल्याण

(संत तुकड़ोजी महाराज)

वर्तमान समय में संत जनों को इस बात पर विशेष रूप से विचार करना आवश्यक है कि देव को देश से अलग करना किसी प्रकार उचित नहीं। लोगों के दिल में देश के प्रति प्रेम, कर्तव्य के प्रति सजगता, तथा उनके जीवन में सामूहिकता बढ़ाना सन्तों का ही कार्य है। लोक कल्याण के लिये ही संत सदैव प्रयत्नशील रहे हैं।

मैं यह स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि सन्तों के पास जाति-पाँति का कोई सवाल ही खड़ा नहीं होता। “जात-पाँत पूछे नहिं कोय। हरि को भजे सो हरि का होय”—यही उनका मुख्य सूत्र रहता है। उनकी नजरों में एक ही जाति रहती है—भागवत की, हरि भक्त की, वैष्णव की। वैष्णव का अर्थ भी ‘विष्णु’ नामक किसी देवता का उपासक नहीं “विष्णुमय जग वैष्णवाँचा धर्म” अर्थात् “विश्व देव का उपासक ही वैष्णव है।” नरसी ने कहा है “वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे।” परपीड़ा को अपनी पीड़ा समझ कर उसे दूर करना, यही सामुदायिक भावना सन्तों ने उस वक्त लोगों के हृदय में जागृत की थी और इसके लिये नाम संकीर्तन की प्रथा शुरू करके उन्होंने सबको आकर्षित कर लिया था।

मेरे कहने का तात्पर्य इतना ही है कि आप केवल नाम कीर्तन करके ही संतुष्ट मत हो जाइये, वरन् ‘परपीड़ा’ के सिद्धान्त को समझ कर अपने गाँव और समाज का निर्माण कीजिये। तभी सन्तों के आदेश का यथार्थ में पालन होगा। श्री ज्ञानेश्वर महाराज ने संकल्प प्रकट किया था—

जे खलाची व्यंकटी साँडी, तया सत्कर्मी रति बाढ़ी। भूताँ परस्परें जड़ी, मंत्र जीवाचें।

अर्थात् “दुर्जनों की बुद्धि का विपरीत स्वभाव दूर हो और सत्कर्म के प्रति उनके दिल में प्रीति बढ़े। सभी प्राणियों में एक दूसरे के प्रति हार्दिक प्रेम भाव मित्रता पैदा हो।” इस संकल्प की पूर्ति में ही विश्व कल्याण है और इसी को आज हमें कार्यान्वित करना चाहिये। देश सेवा इससे कोई अलग चीज नहीं है। ज्ञानेश्वर महाराज ने और भी कहा है—

“आता विश्वात्मकें देवें। येणें वाग्यज्ञें तोषावें॥

अर्थात्—”अब विश्वात्मक भगवान हमारे इस वाणी रूप यज्ञ से—वाँग्मयी सेवा से प्रसन्न हों।” सोचने की बात है कि इसमें इन्होंने ‘हिन्दू देवे’ या ‘ईसाई देवे’ क्यों नहीं कहा? इसका सीधा जवाब यही है कि वे किसी पंथ, धर्म या देश विशेष के देव को ही देव नहीं समझते थे। जो देव सारे विश्व का हो, उसी की वे प्रार्थना करते थे। हम लोग उनके भक्त हैं, पर संदेह है कि हमने अपने भगवान को भी छोटा बना लिया है। हमारे ग्रंथ-पंथ आदि के मूल स्रोत में जो दिखाई देता है, उसे हम अपने व्यवहार में प्रवेश नहीं करने देते और इसी कारण हमारे दुःख, ताप ज्यों के त्यों बने रहते हैं। आज आवश्यकता है उसी विश्वात्मक देव की उसकी भावना समाज के सामने रखने से रामराज्य और विश्व शान्ति के सपने साकार हो सकते हैं। हम अपने ग्रन्थों को व्यवहार में न लायेंगे तो उनका प्रभाव कैसे दिखलाई पड़ सकता है।

हम जानते हैं कि सन्तों ने भाव-भक्ति को सर्वोपरि स्थान दिया है। पर उसके साथ कर्तव्य रूप भक्ति न की जाय तो फल कुछ नहीं हो सकता। वे ही भक्त बड़े बन गये जिन्होंने श्रवण के साथ उसके अनुसार कर्तव्य पालन भी किया। “योगस्थः कुरु कर्माणि” के अनुसार जिन्होंने ईश्वर चिन्तन के साथ-साथ कार्य क्षेत्र भी सँभाला वे ही महापुरुष कहलाये। वे कोई अपूर्व व्यक्ति थे ऐसा मैं नहीं मानता। वे भी जन्म मृत्यु के प्रवाह में से ही आते रहे हैं अन्तर है तो सिर्फ कर्तव्य का। वे अपने यत्न द्वारा सन्त बने, देव बने। सूर्य प्रकाश तो सर्वत्र नजर आता है किन्तु सूर्यकान्त मणि में उसकी झलक विशेषता पूर्ण होती है, इसे नहीं भूलना चाहिये। साथ ही यह भी ध्यान में रहे कि हर एक जीव में वही भगवान निवास करता है। इसलिए जनता जनार्दन की उपासना करते हुये हृदय की धारण शक्ति और भाव-भक्ति को बढ़ाते जाना चाहिये।

तीर्थ अथवा क्षेत्र का अर्थ होता है पवित्र स्थान, जहाँ मनुष्य को सद्बोध द्वारा उद्धार मार्ग बताया जाता हो। क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा के विकास का विचार जहाँ किया जाता हो, वही है क्षेत्र। इस व्याख्या के अनुसार ध्यान, प्रार्थना आदि मानव विकास तथा सेवा के कार्यक्रम जहाँ सदैव चलते हैं वही क्षेत्र है। इस प्रकार हर गाँव तीर्थ बन सकता है, हर मकान क्षेत्र के रूप में परिवर्तित हो सकता है। जिस कुटुम्ब में आत्मा-विकास का प्रयत्न चल रहा हो वह तीर्थ है और जहाँ कुटुम्बीजनों में झगड़े चल रहे तो वह राक्षसों का अड्डा है। यह राक्षसी वृत्ति आजकल बड़े-बड़े तीर्थों में भी घुस बैठी है। इसलिए हमको सदैव यह याद रखना चाहिये कि जो मनुष्य को पावन करे वही तीर्थ है। तीर्थ, क्षेत्र के पावन दृश्य की याद दिलाते हुये उसका महत्व गाँव वालों की आदर्श पवित्रता लाने को प्रवृत्त करना, यही तीर्थ पूजा का महत्व मानना चाहिये।

ईश्वर सभी जगह एक समान है, इसलिये हमें अपना हृदय भी सबके लिये समान बनाना चाहिये। ऐसे सात्विक विचार—ऐसी सद्भावना, यही समस्त तीर्थों से बढ़कर पावन तीर्थ है। इस भावना के बिना बड़े-बड़े तीर्थों में जाकर भी कुछ हाथ नहीं लगेगा।


सामाजिक जीवन में पंचशील का प्रयोग

(श्री यादराम शर्मा ‘रजेश’ एम. ए.)

पिछले दिनों सभा में एक सदस्य के प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रधान मन्त्री पंडित नेहरू ने कहा था कि पंचशील का प्रयोग केवल अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में ही नहीं वरन् राष्ट्रीय और पारिवारिक क्षेत्र में यहाँ तक कि पति-पत्नी के बीच में भी किया जा सकता है। नेहरू जी का कथन हमें यह सोचने को बाध्य करता है कि पंचशील के इन सिद्धान्तों का प्रयोग हम सामाजिक जीवन में शान्ति बनाये रखने के लिये किस प्रकार कर सकते हैं।

सहकार, सहयोग और सह-अस्तित्व की सामूहिक भावना भारतीय संस्कृति के लिये कोई नई चीज नहीं है। बहुत प्राचीन काल में वेद में कहा गया था—

“सहना भवतु सहना भुनक्तु,

सहवीर्य करवा वहै।” अथवा “सर्वे सुखिना सन्तु, सर्वे सन्तु निरामय, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।’

उपरोक्त उद्धरणों से प्रकट है कि हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले ही अनुभव कर लिया था कि साथ-साथ रहने, साथ-साथ उपभोग करने और साथ-साथ पराक्रम करने में ही हमारा कल्याण है। हमारी कामना रही है कि सभी सुखी रहें, सभी निरामय हों और भद्र जीवन व्यतीत करें। तब से लेकर आज तक भारतीय संस्कृति इन्हीं सिद्धान्तों पर आधारित रही है। यद्यपि समय के परिवर्तन से अनेक प्रकार के व्यवधान आने के कारण हमारा सामाजिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। उनका सूक्ष्म रूप आज भी हममें विद्यमान है उसे विकसित करने की आवश्यकता है।

‘पंचशील’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग महात्मा गौतम बुद्ध ने अपने उपदेशों में किया है। बुद्ध अत्यन्त व्यवहारवादी थे। एक ओर जहाँ उन्होंने अष्टाँगिक मार्ग की व्यवस्था करके सामाजिक जीवन में सन्तुलन स्थापित करने का प्रयत्न किया था, वहाँ दूसरी ओर समाज में अनैतिकता का प्रवेश रोकने के लिए ‘पंचशील’ नाम से पाँच नैतिक नियम बताये जो आज भी सामाजिक जीवन की सफलता की कुँजी के रूप में समझे जा सकते हैं। वे नियम इस प्रकार हैं :—

प्राणातिपात विरमण (अहिंसा)

अदिन्नादान-विरमण (चोरी न करना)

काम-मिथ्याचार-विरमण (अव्यभिचार)

मृषावाद-विरमण (झूठ का त्याग)

सुरा-मैरेय-मय-प्रसाद-स्थान-विरमण (नशा-त्याग)

तात्त्विक दृष्टि से देखा जाये तो इन सिद्धान्तों में कोई नई बात नहीं है। बहुत पहले से वैदिक धर्म इन्हीं सिद्धान्तों पर आधारित था और बाद में मनुस्मृति में धर्म के जो दस लक्षण बताये गये हैं उनमें इन सिद्धान्तों का ज्यों के त्यों रूप में समावेश है।

आवश्यकता इस बात की है कि आज जब कि हमारा सामाजिक जीवन अत्यन्त संघर्षमय और अशान्तिपूर्ण हो गया है; जब पद-पद पर हमें अशान्ति, असन्तोष विग्रह विरोध और असहिष्णुता के दर्शन होते हैं तब यह आवश्यक है कि हम पंचशील के आधार पर अपने सामाजिक जीवन के लिए कुछ ऐसे सिद्धान्त निर्धारित करें जिनको अपनाकर हम विभिन्न भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों, रीति-रिवाजों, खान-पानों और रुचियों के अनुयायी होते हुए भी आपस में मिल जुलकर रह सकें। जिस तरह भिन्न-भिन्न देश एक दूसरे से अलग होते हुए भी एक ही संसार के अंग हैं, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न प्रान्त एक देश के भिन्न-भिन्न धर्म एक मानवता के, भिन्न-भिन्न रीति-रिवाज एक सामूहिक संस्कृति के और भिन्न 2 विचार धारायें एक सामूहिक चिन्तन की अंग हैं। यदि हमें संसार को, देश को, मानव-सभ्यता को शान्तिपूर्वक प्रगति की ओर ले जाना है तो कुछ ऐसे सिद्धान्त अपनाने आवश्यक हैं जो हमें एक दूसरे के निकट ले जाते हैं।

राजनैतिक क्षेत्र में पंचशील के जो सिद्धाँत अपनाये गए हैं और जिनका संसार के विभिन्न देशों में अपूर्व स्वागत हुआ है, सरल भाषा में हम उन्हें इस प्रकार समझ सकते हैं :—

1—देशों की सार्वभौमिकता को स्वीकार करना।

2—शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व।

3—अनाक्रमण।

4—आन्तरिक विषयों में अहस्तक्षेप।

5—पारस्परिक लाभ के आधार पर व्यापारिक सम्बन्ध।

इन पाँच सिद्धान्तों को व्यापक बनाकर अथवा इनके रूप में थोड़ा परिवर्तन करके हम इनका उपयोग सामाजिक क्षेत्र में भी कर सकते हैं। जिस प्रकार पहले सिद्धान्त के आधार पर हम प्रत्येक देश की सार्वभौमिकता का स्वीकार करते हैं, उसी प्रकार हमको समाज में शान्ति बनाये रखने के लिए समाज के विभिन्न अंगों, वर्गों और इकाइयों की सार्वभौमिकता अर्थात् अपने क्षेत्र में उनकी एक मात्र सत्ता को स्वीकार कर लेना चाहिए। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि अपने सीमित दायरे में किसी भी वर्ग विशेष को कोई भी उचित काम उठाने का अधिकार है और कोई बाहरी शक्ति इस सम्बन्ध में कभी भी उस सत्ता पर प्रतिबन्ध नहीं लगा सकेगी। संक्षेप में सामाजिक क्षेत्र में हम सार्वभौमिकता का अर्थ लगा सकते हैं—अपनी सीमा के भीतर इच्छानुसार निर्णय करने की स्वतंत्रता।

शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व से हमें यह समझना चाहिए कि हम यह स्वीकार करते हैं कि संसार में भिन्न-भिन्न वाद,विचार, धाराएं, सम्प्रदाय और वर्ग रहते हैं तथा वे एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हो सकते हैं फिर भी हमें सामाजिक शान्ति बनाये रखने के लिए यह मानकर चलना चाहिए कि मुझे इस धरती पर रहने का जितना अधिकार प्राप्त है, मेरे विरोधी को भी उतना ही अधिकार है और हम सिद्धाँत रूप में यह स्वीकार करके चलते हैं कि समाज में दो परस्पर विरोधी विचारधारा के लोगों को बिना किसी उपद्रव के साथ-2 रहने का अधिकार है।

सामाजिक जीवन में अनाक्रमण का अर्थ होगा किसी वर्ग के ऊपर अपनी विचारधारा, भावना या इच्छा को बलपूर्वक लादने का प्रयत्न न करना। आप अपने वर्ग, जाति या धर्म के सिद्धान्तों को कितना ही उचित, आवश्यक या उपयोगी समझते हों किन्तु सामाजिक शान्ति बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि आप उन सिद्धाँतों के प्रचार के लिए केवल बुद्धि और तर्क का ही आश्रय लें और वहाँ भी अपने विचारों को इस प्रकार प्रकट न करें कि किसी दूसरी विचारधारा वाले व्यक्ति को अपने सिद्धान्तों पर आक्रमण-सा करते हुए प्रतीत हों।

आन्तरिक विषयों में अहस्तक्षेप से सामाजिक जीवन में अभिप्राय है कि यदि समाज के किसी अंग का कोई कार्य बाहरी दुनिया को प्रभावित नहीं करता अर्थात् उससे समाज के अन्य अंगों की कोई हानि नहीं है तो केवल इस आधार पर हमें समाज के किसी अंग विशेष के कार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं हैं कि उस वर्ग विशेष का वह कार्य-विशेष हमारी रुचियों के अनुकूल नहीं है। सामाजिक शान्ति बनाये रखने के लिये हमें समाज के विभिन्न अंगों को आन्तरिक मामलों में पूर्ण स्वतन्त्रता देनी पड़ेगी। अपने खान-पान, बोल-चाल, रीति-रिवाज और रहन-सहन के विषय में निर्णय करने का समाज के प्रत्येक वर्ग को पूरा अधिकार है और किसी बाहरी शक्ति को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिये।

अन्तिम सिद्धान्त की व्याख्या हम इस प्रकार कर सकते हैं कि समाज के विभिन्न अंगों को आपस में इस प्रकार के सम्बन्ध रखने चाहिएं जिनमें पारस्परिक लाभ की भावना निहित हो। हमें दूसरे वर्गों की लाभदायक बातों को अपने भीतर लाने का प्रयत्न करना चाहिये। इसके साथ ही साथ हमें कुछ ऐसे सिद्धान्तों का विकास करना चाहिए जो सभी विचारधाराओं के लोगों को मान्य हों तथा हमें एक दूसरे के निकट लाने में सहायक हों। इस प्रकार के सिद्धान्तों का प्रचार करके हम परस्पर लाभान्वित हो सकते हैं और सामाजिक उन्नति में सहायक हो सकते हैं।

संक्षेप में सामाजिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले सिद्धान्तों को थोड़े हेर-फेर के साथ हम इस रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं :—

1-अपने क्षेत्र में प्रत्येक वर्ग की सार्वभौमिकता को मान्यता देना।

2-परस्पर विरोधी विचार धाराओं के वर्गों के एक साथ रहने की सम्भावना को स्वीकार करना।

3-ऐसे प्रचार अथवा मत-प्रदर्शन से बचना जो दूसरे वर्ग या मत के विरुद्ध आक्रामक प्रतीत होता हो।

4-किसी वर्ग, सम्प्रदाय अथवा आदि के आन्तरिक विषयों में हस्तक्षेप न करना।

5-ऐसे विचारों, सिद्धान्तों और तत्वों का प्रसार और प्रचार करना जो सामान्यतया समाज के प्रत्येक वर्ग को मान्य हों तथा सामाजिक एकता स्थापित करने में सहायक हों।

केवल सुझाव के रूप में ये पंचशील के सिद्धाँत उपस्थित किये गये हैं जो सामाजिक जीवन में प्रयोग के आधार बनाये जा सकते हैं। मैं इन्हें अंतिम नहीं मानता। यह केवल प्रस्तावना मात्र है। विद्वान लोग विचार करके यदि आवश्यक समझें तो इनमें उचित हेर फेर कर सकते हैं किंतु सामाजिक जीवन की एकता और प्रगति के प्रचार के लिये इनकी अथवा ऐसे ही किन्हीं सिद्धान्तों के प्रचार की बड़ी आवश्यकता है। आशा है विद्वान लोग इस ओर ध्यान देने की कृपा करेंगे।


मानवता की पुकार

(श्री राम कृष्ण डोंगरे)

आज का युग आडम्बर का है, आवरण कुछ है तो विचार प्रवाह कुछ। करना है कुछ तो बतलाना कुछ, यह है आज की दैनिक-चर्या! इन बातों से ओत-प्रोत रहने पर मनुष्य अपने निजी स्वार्थ की कामना रखता है, संसार की प्रत्येक वस्तु को अपना समझ बैठा है-सिर्फ असत्य अत्याचार व अन्याय के सहारे और अपने को साँसारिक उपलब्ध वस्तुओं का स्वामी मान बैठा है-जबकि गीता अध्याय 9।16 का छंद इसका स्पष्टीकरण करता है कि! यह बपौती तूने किससे पाई तू कौन है क्या वास्तव में तूने अभी तक अपने को नहीं पहिचाना तो सुन, और कान खोलकर सुन?

अहं क्रतु रहं यज्ञः स्वधाहमहामौषधम्। मन्मोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥

अर्थात्—क्योंकि क्रतु अर्थात् श्रौत कर्म मैं हूँ, यज्ञ अर्थात् पंच महा यज्ञादि स्मार्त कर्म मैं हूँ, स्वधा अर्थात् पितरों के निमित्त दिया जाने वाला अन्न मैं हूँ, औषधि अर्थात् सब वनस्पतियाँ मैं हूँ, एवं मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवन रूप क्रिया भी मैं ही हूँ।

द्वापर में भगवान् श्री कृष्ण स्वयं शक्ति के अथाह समुद्र थे, वे चाहे जो भी कर सकते थे किन्तु स्वयं अकेले ही सब कुछ संपन्न कर लेने से विश्वास अविश्वास में बदल जाता, और मानवता जागृत नहीं होती, और मानवता का संगठन सहयोग जनबल पर आधारित न रहता। उसी जनबल को लेकर ही गोवर्धन पर्वत को अपने समस्त ग्राम्य-वासियों, गौओं, गोपिकाओं सहित उन्हीं के हाथों व लकड़ियों के सहारे 7 दिवस तक अधपर गिरिराज का रक्खा तथा सबकी रक्षा की, और सभी को यह आश्वासन देते रहे कि यह पर्वत आप लोगों के ही सहारे खड़ा है। तुम्हारे सहयोग से ही इन सब प्राणियों की रक्षा हो रही है। यदि वह चाहते तो एक ही क्या कितने पर्वतों को एक ही क्षण में रसातल भेज देते, केवल नाम मात्र के अपनी अँगुली पर्वत में लगाये थे और ब्रज वासियों की क्या सामर्थ्य थी कि वे गिरिराज को लाठियों के सहारे उठाये रखें तथा इन्द्र के प्रकोप का मुकाबला करें। फिर भी सभी ब्रजवासी कृष्ण और धेनु सहित गिरि की छाया में बैठे अपने-2 पराक्रम की सराहना स्वतंत्र विचारों से कर रहे थे, यह तमाशा स्वर्ग के सभी देवगण विस्मय से देख रहे थे।

भगवान श्री कृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया कि मैं ही बड़े पर्वत को उठा नहीं सकता, इसमें आप सब लोग का बड़ा सहयोग है और इसी सहयोग के बदौलत यह पर्वत स्थिर है—तो आज के युग में किसी खास कर्म काँड का निर्विघ्न सम्पन्न हो जाना किसी एक के काबू के बाहर की बात है। वायु के प्रत्येक कण-कण में आसुरी तत्व इतने बढ़े चढ़े हैं कि यदि आप कोई धार्मिक कार्य सोचें कहे तो वह बात हवा में फैलकर उन तत्वों तक सहज में पहुँच जाती है, और वे आपके कार्यक्रम का ह्रास करते हुये अपने जी जान से उस कार्य को खण्डित करने में अपनी सारी शक्ति लगा देते हैं। इनका प्रथम आक्रमण मनुष्य के मानसिक विचारों को गलत दिशा में मोड़ना या उनमें अनुत्साह पैदा करना, आलस में दबा देना है। बाद में क्रिया पद्धति का प्रश्न आता है? इसलिए मनुष्य को प्रत्येक कार्य करने के पहिले अपने निश्चय को अटल और गुप्त रखना, क्योंकि जीवन मूल्य अपने अटल निश्चय से कम है। अपने आत्मीय अटल विश्वास पर अपने प्रत्येक साधन को जुड़ाकर उसे सफल बनाना अनिवार्य है।

आज के इस युग में मथुरा में चल रहे महान प्रभावशाली, सब शक्तियों से सम्पन्न इस ब्रह्मास्त्र महायज्ञ जैसे धार्मिक कार्य में सबको अपना आर्थिक शारीरिक सहयोग देना मानवता का कर्तव्य है कलियुग में इस महान यज्ञ का होना एक महान आश्चर्य की बात है, और फिर भी कुछ समय में सम्पन्न हो रहा है। और हो जायगा, इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। इसलिए बहती गंगा में हाथ धोना गोवर्धन पर्वत के उठाने के सहयोग से कोई कम नहीं है। इस यज्ञ में किसको क्या सिद्धि मिल जाय, उसके लिए उसका पाने वाला ही अनुभव कर सकता है। मनुष्य की कोई ऐसी शक्ति नहीं कि अकेले इस पर इस महान यज्ञ जैसे कार्य को सफल बनावे, जब कभी किसी घर एक बारात आती है, तो वह उसी के ही इन्तजाम में चकरा जाता है, और जल्दी जल्दी निपटाने की कोशिश कर 24 घण्टे में विदा कर देता है। एक सत्यनारायण की कथा करने में मनुष्य अपनी हैसियत टटोलता है और परेशानी का अनुभव करता है। किन्तु आज ही 1000 कुण्डों की 101 यज्ञशालाओं में 1 लाख व्यक्तियों द्वारा 240 लाख आहुतियों का यज्ञ विभिन्न शक्तियों को संगठित करके संपन्न हो रहा है। वैसे सुनने वालों का कलेजा काँप जायगा, विश्वास होना भी कठिन है। अगर कोई मानेगा भी तो इस यज्ञ का प्रधान कार्यकर्त्ता तो एक ईश्वर ही है क्योंकि ऐसा कठिन कार्य मनुष्य की शक्ति की बात नहीं।

इस आयोजन का मूल सिद्धान्त है कि संसार धर्ममय हो, प्रत्येक घर देवालय बने, कुटुम्ब बने, कुटुम्ब में सुख शाँति रहे, आपसी बैर भाव न हो, मनुष्य अपने अपने कर्त्तव्य को पहिचाने, तथा अपने ऊंच-नीच कर्मों का ध्यान रखे, एवं धर्म की ओट में धार्मिक कार्य ही करें, अपने मन वचन कर्म से पवित्र रहे। साथ ही जनबल के सहयोग व उनके सद्भावों में प्रेरणा देकर उन्हें और अधिक उत्साहित करे। अनुचित आवरणों को हटा कर उन्हें उनके सही स्वरूप में बतलावें। ये बातें सभी को ध्यान में रखना है, एकता की रोटी को मिल बाँटकर खाना सबका उद्देश्य हो। समय तो गुजर रहा है और अत्यधिक तीव्रगति से न मालूम किस अँधेरे गर्त की खोह में जा रहा है। उसकी गति का मुकाबला कोई कर सकता है तो जनबल की आत्मा का सहयोग। भारत में अभी 9 माह से गायत्री तपोभूमि में चल रहे ब्रह्मास्त्र महायज्ञ में यही जन शक्ति सन्निहित है और उसे सफल बनाना आज की मानवता का कर्त्तव्य है। याज्ञवलक्य में लेख है—अनाहूतोऽध्वरं ब्रजेत अर्थात्—बिना बुलाए भी यज्ञ में सम्मिलित होना चाहिये मनुष्य को अपनी पूर्ण श्रद्धा से अपने विश्वास से जो भी कुछ लेकर यज्ञ में आहुति डालना चाहिये, और यह ध्यान रखना चाहिये कि हे यज्ञदेव!

यदग्ने कानि कानि चिदति दारुणि दध्यसि ताजुषस्वय विष्ठव

नहि ये अत्यध्यना न स्वधितिर्वनन्वति

ऋग्वेद। 8। 102, 19, 20

अर्थात्—हे अग्निदेव! मैं केवल छोटी-छोटी समिधायें लाया हूँ इन्हें ही स्वीकार कीजिये, मेरे पास न तो घी उत्पन्न करने वाली गौ है और न पेड़ काटकर बड़ी समिधायें ला सकने लायक कुल्हाड़ी है। इसलिए जो कुछ लाया हूँ उसे ही स्वीकार कीजिये।

जीवन बहुत महंगा है किन्तु मौत सस्ती है। इसलिए इस नश्वर शरीर से इतना मोह क्यों?


परेशानियों की दवा स्वयं आपके पास है।

(डॉ. रामचरण महेन्द्र पी. एच. डी.)

एक महाशय लिखते हैं, “मुझे मिठाई खाने का बेहद शौक है। उसे “शौक” क्या कहूँ। उसे तो “व्यसन” कहना ही अधिक उपयुक्त होगा। कारण यह है कि मैं अपनी मिठाई खाने की आदत को रोक नहीं पाता हूँ। मेरे पास जो भी पैसे जेब में होते हैं, सब मिठाई वाले छीन लेते हैं। जब कभी मिठाई की दुकान के सामने से गुजरता हूँ, तो चुम्बक की तरह बुरी तरह उधर ही खिंचा चला जाता हूँ जैसे चिड़ियाँ अजगर के मुँह में खिंची चली जाती हैं। नकद हुआ तो नकद वर्ना मैं मिठाई उधार लेने में भी नहीं चूकता। सभी मिठाई वालों का कुछ न कुछ कर्ज निकलता है। पत्नी परेशान है कि मैं बड़ा फिजूल खर्च बन गया हूँ। यह सभी तो मैं किसी प्रकार भुगत रहा था। अब डॉक्टर ने बताया है कि मुझे डाइबिटीज (मूत्र में शक्कर आने का रोग) हो गया है और इसी क्रम से चलता रहा तो मौत के मुँह में पहुँच जाऊँगा। कुछ ऐसा उपाय बताइये कि इस परेशानी से मुक्ति मिले। मेरा रोग मानसिक है। इस कृपा के लिए आजन्म ऋणी रहूँगा।”

वास्तव में उपर्युक्त महाशय का रोग मानसिक है। शफाखाने में उसकी कहीं भी दवाई नहीं मिलेगी। दवाइयों की फेहरिस्त में शायद ही कहीं ऐसी बीमारी का उल्लेख हो। किसी हकीम या वैद्य के पास उसका नुस्खा नहीं है। रोगी महाशय ने स्वयं ही इस नई मानसिक व्याधि को जन्म दिया है। इसी प्रकार की नाना व्याधियों को हम स्वयं जन्म दिया करते हैं। अपने मन में विकार उत्पन्न कर लेते हैं। उनकी दवा भी स्वयं हमारे पास है।

हमारा मन कुछ ऐसा लचीला है कि विपरित दिशा में ढीला छोड़ देने पर कोई बहम, कोई चिन्ता कोई मानसिक परेशानी या व्याधि उसमें घर कर लेती है। रोग और विकार के कीटाणु बहुत जल्दी हम पर अधिकार कर लेते हैं। मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि हमारी भावना हमारे विवेक की अपेक्षा अधिक बलवती शक्ति है। भावना का हम पर अखण्ड राज्य रहता है। हम जिस भावना में बहते रहते हैं उसे विवेक नहीं रोक पाता। अनेक बार भावना विवेक को दबा कर हमसे ऐसे कार्य करा लेती है, जिन्हें हमारा विवेक उचित नहीं समझता। होना यह चाहिए कि विवेक का हम पर सदा नियंत्रण रहे। हमारी बुद्धि जिसे उचित कहे, वही हम करें, विवेक जिधर चलाये उधर चलें। भावना और विवेक का सन्तुलन ही मनुष्य को मानसिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ रखता है।

उपर्युक्त रोगी के रोग का कारण भावना का अनियंत्रण ही है। उसका विवेक इतना कमजोर हो गया है कि वह भावना को उचित दिशा में नहीं चला पाता। भावना मनमानी करने पर तुली हुई है। भावना में मिठाई खाने की इच्छा भरी हुई है। यह कभी पूरी नहीं हो पाती। यह अतृप्त इच्छा बचपन में बच्चे को मिठाई न मिलने के कारण गुप्तमन में प्रविष्ट हो कर एक जटिल भावना ग्रन्थि बन गई है। जिन बच्चों को बचपन की गरीबी या असमर्थता के कारण कुछ वस्तुएँ प्राप्त नहीं होतीं, उनकी वे अपूर्ण इच्छाएँ गुप्त मन में बैठ कर शरीर पर अपनी प्रति क्रियाएं करती रहती हैं। ऐसी ही प्रतिक्रिया उपर्युक्त मानसिक रोगी की है।

उसे चाहिए कि अपने विवेक को मजबूत करे। दृढ़ता से मन में यह प्रण करे कि मैं मिठाई नहीं खाऊँगा, क्योंकि यह हानिकर है। बार-बार मिठाई खाने की हानियों पर चिन्तन करने से वह ग्रन्थि समाप्त हो सकेगी।

दूसरा उपाय यह है कि एक दिन खूब मिठाई खाये। भूख लगने पर मिठाई ही मिठाई खाये। इतनी खाये कि कय होने लगे। मिठाई से विरक्ति हो जाय। उधर को फिर मन ही न चले। जिस चीज की एक बार अधिकता हो जाती है, उधर से स्वयं तृप्ति हो जाती है। गुप्त मन की अतृप्ति दूर हो जाती है।

तीसरा उपाय यह है कि आप अपने मन को अन्य उपयोगी, स्वस्थ और दूसरे प्रकार के कार्यों में सदा इतना व्यस्त रखें कि इस ओर सोचने का मौका ही न मिले। खाली मन शैतान का घर है। यदि उसे किसी उपयोगी काम में लगाये रखें, तो वह मिठाई के भ्रम में लिप्त न होगा। बेकार और निठल्ले रहना स्वयं एक प्रकार का मानसिक रोग है। निरन्तर उपयोगी कामों में व्यस्त रहने वाले व्यक्ति पूर्णतः मानसिक दृष्टि से स्वस्थ रहते हैं। अच्छी पुस्तकों का स्वाध्याय कीजिए, आत्मसुधार विषयक पुस्तकें पढ़िये। मन में स्वस्थ विचार रखिए, निरक्षर व्यक्तियों को पढ़ाइये सार्वजनिक कार्यों में अपने समय का सदुपयोग कीजिए। बागवानी या संगीत विद्या सीखिए। बस आप इन मानसिक रोगों को समूल निकाल फेंकेंगे। याद रखिए, आपके मानसिक रोगों का इलाज स्वस्थ चिन्तन और व्यस्तता ही है।


मानवीय विकास और आत्मज्ञान

(प्रोफेसर लालजी राम शुक्ल)

मनुष्य के मानसिक विकास का अर्थ बुद्धि की वृद्धि, क्रिया करने की क्षमता का आना और भावों का विस्तीर्ण होना है। बालक में किसी घटना के विभिन्न पहलुओं पर सोचने की शक्ति नहीं होती, वह आगे पीछे की बात नहीं सोच सकता और उसमें किसी वस्तु के अनेक प्रकार के संबंधों पर सोचने की शक्ति भी नहीं होती। जैसे-जैसे वह आयु में बढ़ता है उसकी विचार शक्ति बढ़ती है। पशु की विचार-शक्ति सीमित होती है और मनुष्य की असीम। विचार की श्रेष्ठता के कारण ही मनुष्य पृथ्वी के अन्य प्राणियों का स्वामी बन जाता है। विचार की सहायता से वह जड़ प्रकृति पर विजय प्राप्त करता है और विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों को अपने काम में लाता है। जिस व्यक्ति की विचार-शक्ति जितनी अधिक होती है उसमें दूसरे लोगों पर प्रभाव जमाने की क्षमता भी उतनी ही अधिक होती है। संसार के विचारवान पुरुष विचार में पिछड़े हुये लोगों पर शासन करते हैं। अतएव विचार की वृद्धि होना मानसिक विकास का द्योतक है।

मानसिक विकास की दूसरी परख मनुष्य में कार्यक्षमता की वृद्धि है। कितने ही लोगों में विद्याध्ययन की और सोच सकने की शक्ति अच्छी होती है, परन्तु उनमें कार्यक्षमता बहुत कम रहती है। भारतवर्ष की आधुनिक शिक्षा-प्रणाली का कोई व्यापक दोष यदि दृष्टिगोचर होता है तो वह हमारे यहाँ के पढ़े लिखे लोगों में कार्य कुशलता के अभाव का। जब देहात के बालक थोड़ा बहुत पढ़ना-लिखना सीख जाते हैं तो वे कुशलतापूर्वक अपने घर का काम न करके नौकरी की खोज में लग जाते हैं। विद्याध्ययन मनुष्य में ऐच्छिक शिथिलता उत्पन्न करता है। दूसरे लोगों के विचार बार-बार मस्तिष्क में जाने से मनुष्य की मौलिक-चिन्तन-शक्ति में कमी हो जाती है। मौलिक-चिन्तन वह है जो दूसरों के विचारों पर आधारित न होकर अपने अनुभव पर आधारित रहता है जिसका उद्देश्य जीवन की किसी विशेष प्रकार की समस्या का हल करना रहता है, विचार के लिये विचार करना मनुष्य को निकम्मा बनाना है। पोथी-पण्डित किसी सिद्धान्त का अभ्यास करने में प्रवीण होते हैं, परन्तु जब उन्हें कोई व्यावहारिक समस्या हल करनी पड़ती है तो वे निकम्मे सिद्ध होते हैं।

जो मनुष्य पुस्तक में लिखे विचारों के बारे में अधिक सोचता है उसे अपनी इच्छा शक्ति को काम में लाने का अवसर नहीं मिलता। इस तरह अनुपयोग से उसकी इच्छा-शक्ति दुर्बल हो जाती है। इच्छा-शक्ति का बल विचार से नहीं बढ़ता है। मनुष्य की प्रत्येक प्रकार की मानसिक-शक्ति का बल उसके उपयोग से बढ़ता है और अनुपयोग से घट जाता है। इच्छा-शक्ति के विषय में भी यही बात सही है।

कई मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य के जीवन का प्रधान तत्व क्रिया है न कि विचार। मनुष्य के जीवन में क्रिया के अधीन विचार रहता है। जो विचार क्रिया में उपयोगी सिद्ध नहीं होता, वह व्यर्थ है। जैसे-जैसे मनुष्य की कार्य-क्षमता विकसित होती है उसकी चिन्तन शक्ति का विकास भी होता है। जब तक मनुष्य के सामने कोई जटिल व्यावहारिक समस्या नहीं आती तब तक उसे गम्भीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता ही नहीं होती। अतएव मनुष्य के विचार का विकास उसकी कार्य क्षमता के साथ-साथ ही होता है।

ऊपर कहे गये दो प्रकार के विकास से मनुष्य बाह्य प्रकृति को जानता है और उसको अपने अधिकार में लाने में सफल होता है। परन्तु इस तरह के विकास से मनुष्य न तो अपने आपको जान पाता है और न अपने स्वत्व को विस्तीर्ण कर पाता है। मनुष्य के मानसिक विकास का अन्तिम लक्ष्य उसका आत्म-ज्ञान बढ़ाना है और उसके स्वत्व को विस्तीर्ण करना है। जिस मनुष्य के भावों का विकास नहीं होता उसकी इच्छायें निम्न-स्तर की रहती हैं। भाव ही आनन्द का स्रोत है। इच्छाओं का जन्म आनन्द की चाह से होता है। जिस व्यक्ति के भाव परिष्कृत नहीं होते उसकी इच्छाएं भी परिष्कृत नहीं होतीं। कितने ही लोग विचार में तो बड़े ही बढ़े चढ़े रहते हैं, परन्तु भावों में वे बच्चे ही बने रहते हैं, अर्थात् उनका आनन्द उन बातों में रहता है जो बच्चे को प्रिय हैं। इस प्रकार के भावात्मक-चिन्तन से मुक्त करना सर्वोत्तम-शिक्षा का उद्देश्य है। विचार और क्रिया मनुष्य के चेतन मन की वस्तु हैं, परन्तु उसके भावों का उद्गम-स्थान उसका अचेतन मन है। इसलिये विचार और क्रियाओं को उन्नत कर लेना भावों की उन्नति करने की अपेक्षा सरल है। परन्तु भाव मनुष्य के गम्भीरतम मन की वस्तु है। वह उसके स्वरूप को जितना प्रदर्शित करता है उतना विचार और क्रिया नहीं प्रकट करते। उपनिषद् में कहा गया है “रसो वैसः” अर्थात् आत्मा का स्वरूप रस है, परमात्मा को सच्चिदानंद कहा गया है। आत्मा की आनंद अर्थात् रस से इतनी घनिष्ठ तादात्म्यता से प्रत्यक्ष है कि मनुष्य का गम्भीर स्वत्व भावमय है। आधुनिक मनोविज्ञान भावों को अचेतन मन की वस्तु बताता है। भाव अन्तर-अनुभूति की वस्तु हैं। मनुष्य के अधिक दुःख विचार की गड़बड़ी के कारण नहीं होते वरन् भावों की गड़बड़ी के कारण होते हैं। जब मनुष्य के भावों और विचारों में विरोध होता है तो मनुष्य पागल बन जाता है। जिस मनुष्य के भाव सुधर जाते हैं, उसकी कल्पनायें अपने आप भली हो जाती हैं और वह सहज में ही भले काम करने लग जाता है। अतएव मानसिक विकास का सर्वोच्च लक्ष्य मनुष्य के भावों को शुद्ध और व्यापक बनाना है।

जिस मनुष्य के भाव विकसित नहीं होते वह सदा दुःखी रहता है, चाहे वह कितना ही विचारवान् और क्रियावान् क्यों न हो। पहले-पहले मनुष्य के भाव अपने आप पर ही केंद्रित रहते हैं। फिर वे अपने मित्रों पर, प्रेयसी पर, परिवार पर और परिवार के हित चिन्तकों पर अवलम्बित होते जाते हैं। जैसे-जैसे मनुष्य के भाव विकसित होते जाते हैं, उसका संसार में पारिवारिक-संबंध बढ़ता जाता है। सच्चा महात्मा संसार के सभी लोगों को उसी प्रकार प्यार करता है जिस प्रकार वह अपने संबंधियों को प्यार करता है—

“अयं निजःपरो वेति गणना लघु चेतषाँ। उदार चरितानाँ तु वसुधैव कुटुम्बकम्।”

संसार के महापुरुषों के लिये संसार का कोई भी प्राणी अपने कुटुम्बी के समान ही है। ऐसा व्यक्ति सभी लोगों को एक ही दृष्टि से देखता है। उसके जीवन का लक्ष्य अपनी किसी भी इच्छा की पूर्ति करना नहीं होता, वरन् दूसरों का कल्याण करना और उनकी इच्छाओं की पूर्ति करना होता है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि तीन लोक में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे प्राप्त करने की मुझे इच्छा हो परन्तु तिस पर भी मैं हर समय काम में लगा रहता हूँ। मेरे काम का उद्देश्य लोक-संग्रह और लोक-कल्याण रहता है। महान् पुरुष इसलिये भी काम करते हैं जिससे कि उनको देखकर दूसरे लोग उसी प्रकार के काम में लग जाएं और इस तरह के काम में लग कर वे आत्म-विकास करें। जो लोग सबके हित में अपना हित देखते हैं और जो लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं उनको किसी प्रकार का मोह अथवा शोक नहीं होता। वे मृत्यु से नहीं डरते वे सदा आनन्द की ही स्थिति में रहते हैं—

यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्नेवाभिजानत, तत्र को मोह-कः शोक एकत्वमनुपश्यति। (ईश)

मानसिक विकास का अन्तिम लक्ष्य अपने आपको उस महान् तत्व से मिलाना है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न हुये हैं, जिसमें वे रहते हैं, और जिस में अन्त में मिल जाते हैं। सभी नदियाँ सागर से अपना जल अर्थात् जीवन प्राप्त करती है, सागर की ही ओर प्रगति करती है और सागर में ही समाप्त हो जाती हैं। जब मनुष्य अपने व्यक्तित्व को समाज रूपी सागर में विलीन करने का लक्ष्य बना लेता है, जब वह समाज के सुख में अपने सुख को देखने लगता है और जब उसके सभी विचार और क्रियाओं का लक्ष्य समाज का हित बढ़ाना होता है, तभी हम उसे सुविकसित व्यक्तित्व का मानव कह सकते हैं। संसार की अच्छी से अच्छी शिक्षा का अन्तिम लक्ष ऐसे ही सुविकसित व्यक्तित्व का निर्माण करना है।


वैदिक-युग की आदर्श नारियाँ

(श्रीमती रामकुमारी शर्मा)

‘सखे सप्तपदा भव’ विवाह विधि का यह छोटा-सा मन्त्र हमें आर्य नर और नारी के समस्त जीवन व्यापी सम्बन्ध के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। वैदिक आर्य जीवन के किसी भी अंश की सफल कल्पना नारी को विलग रखकर नहीं की जा सकती। इहलोक में वह गृहिणी है ही परलोक की कल्पना भी नारी के बिना नहीं हो सकती। प्रत्येक देवता के साथ, यदि उसे यज्ञ भाग लेना है, तो उसकी सहचरी का आना आवश्यक है। यह अपवाद नहीं, नियम है। बिना पत्नी के वह यज्ञ नहीं कर सकता (और उस समय के आर्य के लिए यज्ञ के बिना एक पग भी चलना असंभव था) न देवता ही बिना पत्नियों के यज्ञ भाग ग्रहण कर सकते थे। यह तो रही पारलौकिक विषय की बात। जहाँ तक लौकिक जीवन का संबंध है वैदिक कवि नारी से मधुर और उदार दूसरी कल्पना नहीं जानता। गृहस्थ जीवन आरंभ करने वाले दम्पत्ति के लिए उपस्थित गुरुजनों और पुरोहित के पास इससे बड़ा कोई आशीर्वाद नहीं है कि तुम दोनों एक दूसरे का हृदय विजित कर आज से एक हो जाओ। वास्तव में उस दिन से पत्नी सहधर्मचारिणी ही होती थी। वह सुख-दुख में गृहस्वामी का आश्रयस्थल थी।

वेदों में हमें नारी के कन्या, पत्नी, माता और ऋषि रूप में दर्शन होते हैं। कन्या, जो बाद में आर्य परिवार के लिए अभिशाप बना दी गयी, वैदिक परिवार के स्नेह का धन थी—परिवार के कल्याण और सौख्य की अधिष्ठात्री, पिता के दोनों लोकों की आशा, जननी की सहज अनुगता, सहचरी, भाई के पौरुष की मर्यादा, बहिनों की प्रिय सखा और परिवार की ज्योति थी। उसकी शिक्षा-दीक्षा युग के ही समान थी। कन्या और पुत्र दोनों का ही आचार्य प्रधानतः पिता था। उपनयन के बाद भाई बहिन दोनों गार्हपत्य अग्नि के पावन वातावरण में वेद और वेदाँगों की, शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा पाते थे। किन्तु कन्याओं के विषय में कुछ समय बाद एक प्रकार का विभाजन अवश्य हो जाता था—सद्योबध्या (जो जल्दी विवाह करना चाहती हो) और ब्रह्मवादिनी (जो ऋषि बनने की कामना रखती हो)। सद्योबध्या कुछ काल के बाद माता के साथ गृह-कार्य की शिक्षा ग्रहण करने लगती और मनोनुकूल प्रणयी मिलने पर विवाह कर लेती थी। वेदों में हमें बालविवाह का कहीं कोई संकेत नहीं मिलता बल्कि विरोधी प्रमाणों का बाहुल्य है। ब्रह्मवादिनी कन्याओं की शिक्षा काफी लम्बे समय तक चलती रहती थी, यद्यपि बाद में इनके विवाह में भी कोई बाधा नहीं थी। ऋग्वैदिक ऋषि घोषा को हम काफी बड़ी अवस्था में विवाह करते पाते हैं। शिक्षा और विवाह के बीच के दिनों में कन्या के कर्त्तव्य बहुमुखी थे। वह माँ की अभिन्न सहचरी हो कर घर के संचालन में हाथ बंटाती थी। इतना ही नहीं कुछ काम तो उसी के थे जैसे गायों का दोहन, लालन-पालन, दही मक्खन और घी तैयार करना। इसके सिवा कपास-ऊन और रेशम से वस्त्र तैयार करना, उनकी सिलाई-रंगाई और उसके बाद न टूट सकने वाली सुइयों से ऊन पर सोने, चाँदी और रेशम के तारों से कढ़ाई, चटाइयाँ तैयार करना, पानी भरना, अरणियों से आग जलाना, देवताओं को अर्पित करने के लिए सोमरस प्रस्तुत करना आदि उसके अगणित कार्यों में कुछ हैं। यह तो रही कर्तव्यों की बात। किन्तु केवल कर्त्तव्य ही उसके हिस्से में नहीं था। विवाह के समय पैतृक संपत्ति का एक उपयुक्त अंश उसे दहेज में दिया जाता था जिसकी एकमात्र स्वामिनी वही होती थी या उसका पति। अन्य कोई व्यक्ति उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके एक कण का भी उपयोग नहीं कर सकता था। उसका उपभोग या दान उसकी इच्छा पर निर्भर था। अगर दुर्भाग्य से भाई न हो तो परिवार की संपत्ति की एक मात्र उत्तराधिकारिणी वह होती थी। भाई होते हुए भी यदि वह अविवाहित रहने का निश्चय करती तो परिवार से भरण-पोषण प्राप्त करने का उसे अधिकार था।

विवाह :— विवाह और पति का चुनाव उसकी अपनी इच्छा पर था। समनोत्सवों में परिचित हुआ प्रणयी ही बाद में जीवन सहचर बन सकने की आशा कर सकता था। इन समनोत्सवों में विवाह योग्य अलंकृता कन्याएँ और अध्ययन से निवृत्त, जीवन के उल्लास से पूर्ण युवक भाग लेते थे। माता-पिता और अन्य गुरुजन दर्शक मात्र होते थे। अश्वों से खींचे जाने वाले रथों के घोष से समनस्थली गूँज उठती। युवक अपनी-अपनी हृदयेश्वरियों को विजित करने के लिए प्राणों की बाजी लगा देते थे। दौड़ के बाद ही शस्त्रों के प्रयोग-कौशल और भुजाओं के शौर्य का प्रदर्शन होता था। सुस्वादु भोज्य और पेय बीच-बीच में उन्हें ताजगी देते रहते थे। दूसरे प्रहर में समनस्थली एक बार फिर गूँज उठती, पर भिन्न तरह से। इस बार नृत्य, गीत और कविताओं के बोल वनप्रान्त को मुखरित कर देते थे। उत्सव मशालों और उत्सवाग्नियों के प्रकाश में रात-रात भर चलता रहता और संध्या नहीं बल्कि भुवन मोहिनी उषा अपने सारथी अरुण के साथ आकर उन्हें अपने उत्सव से अलस नेत्रों को विश्राम देने के लिए घर लौटाती थी। इस बीच बहुतों के भाग्य रात्रि की मशालों के नीचे जीवन भर के लिए बंध चुके होते थे यद्यपि कुछ के स्वप्न, स्वप्न ही रह जाते थे। विवाह के लिए माता-पिता की स्वीकृति और आशीष अनिवार्य था। परिणय एक सामाजिक संस्कार था जिसके लिए माता-पिता और समाज की अनुमति महत्त्वपूर्ण थी, विशेषतः माता की। इस बारे में श्यावाश्य और शशीयसी के प्रणय का रोचक उदाहरण ऋग्वेद में मिलता है। श्यावाश्व महाराज रथवीति के कुल पुरोहित के पुत्र थे और शशोयसी थी राज कन्या। दोनों ही सुन्दर थे और समान रूप से एक दूसरे के प्रति आकृष्ट। आशा कम होते हुए भी हृदय से विवश श्यावाश्व ने राजा के सामने विवाह का प्रस्ताव रक्खा। राजा को कोई विरोध न था पर राजमहिषी ने, जिनकी अपनी पुत्री के लिए पति की कल्पना एक कवि, योद्धा और समृद्धिवान युवक की थी, इसका घोर विरोध किया और इसकी बात जानकर सबको, शशीयसी और प्रणयी श्यावाश्व को भी, उनकी इच्छा के आगे सिर झुका देना पड़ा।

यदि अनुमति मिल गयी तो प्रणय के बाद परिणय का नंबर आता। विवाहोत्सव विवाह से लगभग एक मास पूर्व प्रारंभ हो जाता और उसकी चरम परिणति सप्तपदी के साथ होती जब वर कन्या से कहता ‘आज से तुम मेरी सहचरी हुई। मैं तुम से विलग हो कर नहीं रह सकता। तुम मुझसे विलग होकर न रहना। सुख-दुख में समान भागी होते हुए हम सदैव साथ रहें।’ इन मन्त्रों का अर्थ समझ कर तदनुकूल आचरण कर सकने वाली पत्नी समशिक्षा, समसंस्कार, समबुद्धि और समज्ञान वाली नारी ही हो सकती थी। विवाह का प्रारंभ प्रणय से होता किन्तु मात्र प्रणय ही उसका लक्ष्य नहीं था। सार्वभौमिक उन्नति के लिए यह एक प्रकार की नर-नारी की साझेदारी थी। अकेला पुरुष उस समाज की दृष्टि में अपूर्ण था। नारी ही उसको पूर्ण कर सकती थी। शिव अकेला शव है शक्ति से ही वे शिव हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि शिव को पार्वती के बिना, नल को दमयन्ती के बिना, सत्यवान को सावित्री के बिना और राम को सीता के बिना भारतीय परम्परा कभी नहीं स्मरण करती।

पतिगृह में प्रथम बार प्रवेश करती हुई वधू को कुलपुरोहित आशीर्वाद देता था। गौरवमयी उदार हृदया, सबके सुख-दुख की समान उत्तरदायी साम्राज्ञी से ही वैदिक वधू की तुलना की जा सकती है। पति के माता-पिता उसके माता-पिता थे अतएव जिसको परिवार का भार दे कर वे निश्चिन्त हो सकते थे। सास बहू की सहज विमनस्कता का एक भी संकेत हमें वेदों में नहीं मिलता।

वधू पतिगृह में प्रवेश करने के बाद घर के संचालन का दायित्व अपने ऊपर लेकर गुरुजनों को निश्चिंत कर देती थी। और कार्यों के अतिरिक्त वधू के विशेष कार्य थे गार्हपत्य अग्नि को निरन्तर प्रज्वलित रखना और यज्ञ कार्यों में पति की सहायता और सहयोग के लिए निरंतर उपस्थित रहना। वास्तव में कर्त्तव्य की आड़ में यह बहुत बड़े अधिकार थे जिनके हाथ से निकल जाने पर उसकी गणना समाज के निम्नवर्ग के साथ होने लगी।

मातृत्व :—पत्नीत्व की चरम सार्थकता मातृत्व में ही थी। जननी से बढ़ कर, आशा, विश्वास, क्षमा और औदार्य का, दूसरा केंद्र वैदिक आर्य के जीवन में नहीं है। पिता को छोड़कर जो उसका समभागी है उसका स्थान उसके लिए सबसे ऊपर है। पर कभी-कभी मातृत्व उसका भी अतिक्रमण कर जाता है। विश्व-जननी की प्रतीक अदिति की वंदना में अपेक्षाकृत हमें सबसे अधिक सूक्त मिलते हैं। बड़े से बड़े अपराध के बाद भी आर्य उसके आँचल के नीचे स्थान पा सकने की आशा करता है। हर समय युद्ध के लिए सन्नद्ध रहने की अनिवार्य आवश्यकता के कारण पुत्रों का महत्व यद्यपि बहुत था फिर भी भावी माँ बनने के लिए कन्या भी वाँछनीय थी। बाद के समय की तरह उनका उत्पन्न होना किसी प्रकार भी दुर्भाग्य की बात नहीं थी। यह बात अवश्य है कि अनिवार्य सामर्थ्य से अधिक दहेज की डरावनी छाया भी उनके साथ ही परिवार पर न छाती थी। उनका पालन-पोषण भी ठीक उसी तरह होता जैसा पुत्रों का क्योंकि आगे चलकर उनसे बराबर के ही योगदान की तो आशा की जाती थी। जहाँ वीणा, मुरज, मृदंग की शिक्षा चलती, वहीं शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा भी अनिवार्य थी। उनसे वीर कन्या, वीर पत्नी और वीर प्रसू होने की आशा पूर्ण करने का एकमात्र उपाय था उनका स्वयं भी वीर होना। इसी का परिणाम था कि जो हाथ प्रधानतः रस वर्षा करते थे वे ही आवश्यकता पड़ने पर प्रचंड शर वर्षा करने लगते, यद्यपि यह साधारणतः नहीं होता। इस सम्बन्ध में विश्यला का एक रोचक उदाहरण ऋग्वेद में मिलता है। महाराज खेल की राजपत्नी विश्यला को हम पौराणिक काल की महारानी कैकयी की ही भाँति पति के साथ युद्धक्षेत्र में पाते हैं, पर मात्र सहायक नहीं योद्धा के रूप में, जिसमें उन्हें पैर में कड़ी चोट आती है।

एक पत्नी व्रत ही वैदिक काल का साधारण नियम था। बहु-विवाह भी होते थे किन्तु वे अपवाद स्वरूप थे। अरब या यहूदियों की तरह बहुपत्नीत्व यहाँ की साधारण परम्परा कभी नहीं रही, पत्नी कभी भी पति की संपत्ति नहीं समझी गयी। उसका स्थान लगभग पति के बराबर का था।

उस समय में विधवाओं की कोई समस्या नहीं थी। सती होने की प्रथा ऋग्वैदिक काल से पूर्व भले ही रही हो पर वेदों में हमें सहमरण का कोई उल्लेख नहीं मिलता। अगर दुर्भाग्य से कोई नारी विधवा हो जाती तो प्रायः बहुत जल्दी ही दुबारा उसका विवाह हो जाता। यदि परिवार में ही उक्त वर सुलभ हो तो अच्छा, नहीं तो अन्यत्र विवाह हो जाता था। पुनर्भूपत्नी का समाज में किसी तरह भी कम मान नहीं था।

अवरोध प्रथा या पर्दे का भी कोई उल्लेख वेदों में नहीं है। मर्यादा के भीतर स्त्रियाँ घूमने-फिरने के लिए स्वतंत्र थीं। अपने जीवन का लक्ष्य उन्हें चुनने का अधिकार था। यदि उन्हें साधारण कर्त्तव्यों के प्रति रुचि नहीं होती तो वे आचार्य, दार्शनिक या ऋषि बन सकती थीं। घोषा, अपाला, मैत्रेयी, गार्गी उस युग की कुछ थोड़ी-सी विदुषियों के नाम हैं।

सभ्यता के उस उषाकाल में जिस गौरवमयी आर्य नारी के दर्शन हुए थे शताब्दियों के बाद आज हमें फिर उसी रूप के कुछ-कुछ दर्शन हो रहे हैं। इतने दिनों की प्रताड़ना उसके अंतस् का तेज कम नहीं कर सकी है। स्वाधीनता-संग्राम के वीरों की अमर सहचरी भारतीय नारी आज सर्वतोमुखी जागृति और उन्नति के लिए कटिबद्ध है।


अनुष्ठान में सात्विक आहार की आवश्यकता

(प्रोफेसर अवधूत)

अनुष्ठान करने वालों को अनेक समय यह दुविधा होती है कि थोड़े समय के अनुष्ठानों में फल, मेवा, दूध, मठा आदि खाकर काम चल जाता है, पर जब लम्बा अनुष्ठान करना हो तो कौन-सा आहार लेना चाहिये? इस प्रकार का प्रश्न सामने आने से लोगों को बड़ी कठिनाई होती है।

अनुष्ठान की दो मुख्य बातें (1)ब्रह्मचर्य और (2)आहार हैं। अनेक साधक ब्रह्मचर्य के पालन में इसी कारण असफल हो जाते हैं, क्योंकि वे खाने-पीने में अ-ब्रह्मचारियों की तरह रहा करते हैं। यह प्रयत्न गर्मी की ऋतु में जाड़े की ऋतु का अनुभव करने की इच्छा के समान ही है। संयमशील और स्वच्छन्दी—भोगी और त्यागी के जीवनों में अन्तर होना ही चाहिये। इन दोनों प्रकार के आचरणों का परिणाम विभिन्न प्रकार का होना अनिवार्य है। आँखों का प्रयोग दोनों करते हैं, पर ब्रह्मचारी देव दर्शन करता है और भोगी नाटक-चेटक में लीन रहता है। दोनों कान का उपयोग करते हैं, पर एक ईश्वर भजन सुनता है और दूसरा विलास के गीतों पर ध्यान देता है। दोनों जागरण करते हैं, पर एक जागृतावस्था में हृदय मंदिर में विराजने वाले राम की विनय करता है, दूसरा नाच रंग की धुन में डूबा रहता है। दोनों भोजन करते हैं—एक शरीर रूपी इंजन को चलाने के लायक कोयला पानी डाल देता है, दूसरा स्वाद की खातिर देह को अनेक प्रकार की वस्तुओं से भर कर दुर्गन्धित कर देता है। इस प्रकार दोनों के आचार विचार में अन्तर रहता है, जो निरन्तर बढ़ता ही जाता है, घटता नहीं।

अनुष्ठान के अवसर पर शास्त्रों में सात्विक और पौष्टिक आहार ग्रहण करने को लिखा है। इसमें अनेक साधकों को लम्बे उपवास के समय आहार निश्चित करने में बड़ी दिक्कत जान पड़ती है। इस सम्बन्ध में अपने निजी अनुभव के आधार पर मैं कुछ बातें बतला सकता हूँ जिससे साधकों को कुछ सहायता मिल सकती है।

अनेक व्यक्ति छोटे अनुष्ठानों के समय छाछ और दूध आदि पर रहते हैं, पर इससे वायु, बादी, दस्त या कब्ज आदि के उपद्रव हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में पेट को ठीक रखने के लिये त्रिफला या तरल पैरैफीन का प्रयोग करना होता है। पैरैफीन से आँतें नरम रह कर निद्रा आने की संभावना कम हो जाती है। खाली दूध बहुत से लोगों को पसन्द नहीं आता। ऐसी हालत में दूध केला और चीनी मिलाकर तथा जायफल, काली मिर्च, आदि मसाले डाल कर काम में लाया जा सकता है। अथवा उसमें उबला हुआ सकरकन्द मिलाकर खाया जा सकता है। इसी प्रकार पक्के आम को भी दूध में मिलाकर खाया जा सकता है। ये सब चीजें गरम दूध में ही डालनी चाहिये। दूध ठंडा होने से वायु और बादी की संभावना रहती है।

दही का प्रयोग भी कई तरह से किया जा सकता है। उसमें केला, चीनी, इलायची, जायफल मिलाकर खाया जा सकता है। अथवा हरी मिर्च, अदरक और हरा धनिया मिलाकर काम में लाया जा सकता है। साबूदाना को धोकर, पाँच-छः घण्टे तक दही में भिगोकर और हरी मिर्च अदरक नींबू आदि मिलाकर खा सकते हैं।

गरमी के दिनों में नींबू का शरबत, हरे फल, मेवा, कच्चे नारियल का पानी, गुड़ तथा इमली का पानी, लस्सी आदि का सेवन अधिक हितकारी और शाँतिदायक होता है। अथवा गाजर, करम-कल्ला (पातगोभी) टमाटर, अनार, जामुन आदि फलों का मिश्रित कचुम्बर बनाकर और उसमें हरा धनिया, मिर्च, अदरक, नींबू, खाँड आदि मिलाकर प्रयोग में ला सकते हैं।

लम्बे अनुष्ठान के समय प्रायः कमजोरी आ जाती है। ऐसी अवस्था में खजूर को धोकर उसका बीज निकाल कर, घी में तल कर खाना चाहिये। अथवा मूँगफली का दाना भूनकर कूटकर उसमें गरम घी, गुड़ और अदरक मिलाकर खाया जा सकता है।

इन चीजों में नमक का मिलाना या न मिलाना अपनी इच्छा पर है। पर नमक का त्याग कर देने से साधक को सूक्ष्म तत्व में प्रवेश करने में सुविधा रहती है। इसके सिवा अन्न का आहार त्याग देने पर नमक की आवश्यकता भी नहीं रहती।

अनेक साधकों को सात्विक भोजन करने पर भी स्वप्नदोष हो जाता है। इसके लिये प्रतिदिन प्रातः काली तुलसी के रस को शहद में मिलाकर खाना चाहिये। इसके सिवा टमाटर का सूप (टमाटर को पानी में उबाल कर उनका रस निकाल कर, काली मिर्च मिला दी जाय) पीने से पेट की बदहजमी और कोष्ठबद्धता दूर होती है और खून भी स्वच्छ होता है। ऐसी अनेक वस्तुओं का उपयोग सर्व साधारण कर सकते हैं, जिनसे सात्विक आहार का अभ्यास हो जायगा।


हमारी खाद्य समस्या और सरकारी नीति

(श्री रामकृष्ण शर्मा)

आज भारत स्वतंत्र है, परन्तु उसकी गरीबी, उसका रोग और दुख दूर नहीं हुआ है। अरबों रुपये विदेशों से महँगे दामों पर अन्न मँगाने में खर्च हो गये, फिर भी समस्या हल होती दीखती नहीं। सरकार का कहना है कि शीघ्र ही वह विदेशी अनाज की आवश्यकता से मुक्त हो जायगी, परन्तु उसी सरकार का यह भी कहना है कि हिन्दुस्तान की आबादी बेलगाम बढ़ती जा रही है—फिर भला कैसे भरोसा हो कि विदेशी अन्न की आवश्यकता से हमको स्थायी रूप से मुक्ति मिल सकेगी। हमारे सामने यह सारे प्रश्नों का एक प्रश्न है, जिसे स्थायी रूप से हल करना है। जब तक हमारे भोजन का सवाल हल नहीं हो जाता, हमें सुख और शाँति मिल ही नहीं सकती।

वस्तुतः यह जीवन का मूल प्रश्न है। जिस देश को, जिस राष्ट्र को, पेट भर भोजन की ही निश्चिन्तता न प्राप्त हो, वहाँ आजादी का मतलब भी क्या हो सकता है? इसके अलावा किसी तरह पेट भर लेना ही तो हमारा अभीष्ट नहीं हो सकता। भोजन हो, पेट भर हो, और फिर वह स्वास्थ्यकर हो, शाँति पूर्वक, स्थायी और स्वावलम्बी रूप से उसके मिलते रहने की व्यवस्था हो—तभी देश सुखी और समृद्ध हो सकेगा, उसका विकास निश्चित गति को प्राप्त हो सकेगा। जहाँ भोजन की समुचित व्यवस्था नहीं, वहाँ हृष्ट-पुष्ट, मेधावी लोगों का अभाव ही रहेगा और स्वत्वहीन राष्ट्र सभ्यता की परम्परा को भी सुरक्षित नहीं रख सकता, सभ्यता की दौड़ में वह टिक नहीं सकता, बहुत दूर जा नहीं सकता, राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा नहीं हो सकता। वह निरीह, दुर्बल प्राणियों का एक झुण्ड मात्र होगा, जिसे जो जहाँ चाहे दबा देने की कोशिश करेगा।

सुख और सभ्यता की दृष्टि से ही नहीं, युद्ध और संघर्ष के लिये भी भोजन का प्रश्न एक निर्णायक महत्व रखता है। जो लोग सदैव भूखों मर रहे हों वे लड़ नहीं सकते। अकाल पीड़ित देश कभी मजबूत सेनायें खड़ी नहीं कर सकता। जहाँ लोगों को पूर्ण और समुचित रूप से स्वास्थ्यकर भोजन प्राप्त नहीं होता वे न तो संघर्षशील योद्धा बन सकते हैं और न विजय श्री का सुख भोग सकते हैं। आज जो लोग पाकिस्तान से युद्ध की माँग कर रहे हैं, उन्हें हिन्दुस्तान की खाद्य समस्याओं को गौर से समझ लेना चाहिये। इंग्लैंड, अमरीका और आस्ट्रेलिया ने हिन्दुस्तान को अन्न देना बन्द कर दिया और पाकिस्तान ने बर्मा का चावल रोक दिया, तो हिन्दुस्तान की क्या दशा होगी?

सच तो यह है कि यदि भारत को जीवित और स्वतंत्र रह कर संसार में आगे बढ़ना है, तो सबसे पहले भोजन के प्रश्न को हल करना होगा। यह जनता और सरकार दोनों की पहली जिम्मेदारी है। यह राष्ट्र-निर्माण का श्रेष्ठतम अंग है, व्यावहारिक राजनीति का पहला सवाल है।

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आज संसार में जो समाज व्यवस्था चल रही है, उसमें सरकारों को निर्णायक स्थान प्राप्त है। इसलिए, जब तक उसे बदल कर विकेन्द्रित आधार पर न खड़ा कर दिया जावे, हमारी खाद्य समस्याओं का बहुताँश सरकारी नीति और नियम, सरकार की योजनाओं और कार्यवाहियों पर बहुत कुछ निर्भर रहेगा।

उदाहरणार्थ अन्न के उत्पादन में सिंचाई का बहुत बड़ा स्थान है। हमारी केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारें करोड़ों, अरबों रुपये की लम्बी-लम्बी योजनाओं में फँसी हुई हैं। कल्पना यह है कि एक दिन सारे देश में इनके द्वारा फल-फूल, अनाज के हरे-भरे लहलहाते बाग और खेत दिखलाई पड़ेंगे और दूध,घी,मक्खन के सपनों से वर्तमान पीड़ाओं को दूर करना कहीं अधिक आवश्यक है। इन योजनाओं की आवश्यकता नहीं, ऐसी बात हम नहीं कहते, परन्तु इसके भी पहले गाँवों को सिंचाई के स्थायी कुओं से भर देना चाहिये, ताकि लोग भविष्य की आशा में भूख और रोग के शिकार न हों। इस काम में सरकारों को जनता की पूरी मदद भी मिलेगी। दामोदर बाँध को तो सरकार धीरे-धीरे चलाती ही रहे,परन्तु यह भी आवश्यक है कि छोटे-मोटे नदी नालों को वह जनता की मदद से ही बाँध कर उत्पादन को बढ़ाती रहे। कुँओं और नालों के सम्बन्ध में स्थानीय साधनों का ही प्रमुख आधार रहना चाहिये।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि राष्ट्र के इस गुरुतर प्रश्न पर सरकारी दृष्टि साफ होनी चाहिये। सरकार की नजर साफ न होने के कारण ही आज भारत आजाद होकर भी अनेक विषयों में पतनोन्मुख हो रहा है। आज देश में मिल की चीनी पर बड़ा जोर दिया जा रहा है। सरकार की बहुत बड़ी शक्ति और बहुत बड़ी मदद इन मिलों के पीछे है और नतीजा यह है कि किसानों की एक बड़ी संख्या मिलों के गुलामों के रूप में परिवर्तित हो गई है। लाखों करोड़ों एकड़ जमीन गन्ने की खेती में फँसा दी गई है जिसके कारण देश को गेहूँ के लिये विदेशों का मुँह देखना पड़ रहा है।

इससे भी चिन्तनीय दशा वनस्पति घी की है। वनस्पति घी रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बनाया हुआ मूँगफली का ऐसा तेल है जिससे प्राणी की पाचन और जनन शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सैंकड़ों रोगों की सृष्टि होती है, और मनुष्य नामर्द हो जाता है। इस जहरीले तेल के लिये कुछ वर्ष पूर्व 21 लाख एकड़ भूमि में मूँगफली की खेती हो रही थी और अब तक इस मात्रा में काफी वृद्धि हो चुकी है। इतनी जमीन में 10-12 लाख परिवारों का सहज में भरण पोषण हो सकता है। इस प्रकार वनस्पति की मिलों को कायम रखने के लिये देश को अन्न के लिये मुहताज बनाया जा रहा है। कहा जाता है कि जनता स्वयं मूँगफली पैदा करती है, पर सरकारी दबाव और पूँजीवादी प्रलोभनों को हटाकर जनता को सच्ची सुविधायें देने के बाद ही इस प्रश्न का वास्तविक निर्णय हो सकता है।

आज देश में 73 लाख एकड़ से भी कहीं अधिक भूमि में गन्ना, चाय, तम्बाकू, जूट आदि व्यावसायिक चीजों की उपज की जा रही है। जब तक इसमें कमी करके इसे अन्नोपयोगी नहीं बनाया जाता भारत की खाद्य समस्या अमेरिकी ट्रैक्टरों और रासायनिक खाद्य के भरोसे सुधरने के बजाय बिगड़ती ही जायगी।

वनस्पति घी की मिलों के कारण देश के स्वास्थ्य के अतिरिक्त, आर्थिक दृष्टि से भी भयंकर क्षति हो रही है। आर्थिक क्षति का मतलब ही यह है कि हम दीन और दुर्बल हो रहे हैं अर्थात् हम ऊँचे दर्जे के पौष्टिक भोजन प्राप्त करने से वंचित कर दिये जाते हैं। वनस्पति मिलों के आँकड़ों पर निगाह डालने से ज्ञात होता है कि इन पर 2211 करोड़ रुपये की पूँजी लगी है। 15 हजार मजदूर काम करते हैं। इन मिलों में जो दूषित चीज तैयार होती है यदि चिकनाई मान भी लें तो भी उससे देश की जरूरत पूरी नहीं होती। 2211 करोड़ में कम से कम 9 लाख तेल की घानियाँ चालू की जा सकती हैं और 9 लाख आदमियों तथा इतने ही बैलों को पूरी जीविका मिल सकती है, जब कि मिलों से कुल 15 हजार आदमियों को काम मिलता है और भोजन तो किसी को नहीं। सारे देश को पूरा शुद्ध तेल जितना चाहिये उससे बहुत अधिक इन घानियों से पैदा होगा। तेल की यह अधिकता और घानियों से निकली हुई खली (जो वनस्पति यंत्रों में बर्बाद हो जाती है) हमारे धन की वृद्धि करेगी।

अमेरिका और योरोप की चमक-दमक को देख कर हमारे नेता और शासकों के दिमाग में खब्त सवार हो गया है कि हिन्दुस्तान में भी सब काम कल कारखानों से हो। यहाँ तक कि धान की भूसी भी मिलों में छुड़ाई जाने लगी है। नतीजा यह हुआ कि गाँवों में चावल कूटने की मिलें खड़ी होती जा रही हैं और इसे औद्योगिक प्रगति बताकर सरकारें मदद भी कर रही हैं। परंतु असलियत यह है कि मिलों के चावल का सारा भोजन -तत्व नष्ट हो जाता है।

कहने का मतलब यह है कि हमारे भोजन की समस्याएँ हमारी अपनी ही पैदा की हुई हैं। सरकारी दृष्टिकोण में परिवर्तन होने से ये सरलता पूर्वक हल की जा सकती हैं। सरकारी कार्य पद्धति में तब तक परिवर्तन नहीं हो सकता जब तक जनता को स्वयं इस दिशा में कदम उठाने का मौका न दिया जाय। जब तक दिल्ली की भव्य अट्टालिकाओं से जनता के उठने बैठने का कानून बनता रहेगा जनता कुछ न कर सकेगी। वस्तुतः आवश्यकता इस बात की है कि सबल और समर्थ ग्राम पंचायतों का अधिकार होना चाहिये कि वे स्थानीय साधनों के आधार पर और क्षेत्रीय परिस्थितियों के सामंजस्य में उत्पादन कार्य के लिये पूर्णतः समर्थ हों।


शिखा का महत्व और उपयोगिता

(ब्रह्मचारी योगेन्द्रनाथ)

मनुष्य शरीर को प्रकृति ने यद्यपि इतना सबल बनाया है कि वह बड़े से बड़े आघात चोट आदि को सहन करके भी जीवित रह जाता है किन्तु, फिर भी शरीर में कुछ ऐसे स्थान हैं, जिन पर आघात होने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती है। ऐसे स्थानों को “मर्म” कहा जाता है। आयुर्वेद में कई प्रकार के मर्म स्थानों का वर्णन किया गया है।

शिखा के अधोभाग में भी एक मर्म स्थान होता है जिसके लिये सुश्र तकार ने लिखा है—

मस्तकाऽभ्यन्तरोपरिष्ठान् शिरासंधिसन्निपातो रोमा वर्तोंऽधिपतिस्त्रापि सद्योमरणम्।

—(सुश्रुत 6।71)

अर्थात्—मस्तक के भीतर ऊपर को जहाँ पर बालों का आवर्त (भंवर) होता है वहाँ सम्पूर्ण नाड़ियों और संधियों का सन्निपात है (मेल है) यहाँ पर चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती है।

शिखा इस अत्यन्त ही कोमल तथा सद्योमारक मर्म स्थान के लिये प्रकृति प्रदत्त कवच है जो कि न केवल आकस्मिक आघातों से इस मर्म को बचाती है किन्तु, उग्र-शीत आपातादि से भी इसकी रक्षा करती है।

(2)समस्त मानव शरीर में व्याप्त एक मुख्य नाड़ी है जिसे सुषुम्ना कहते हैं। इसके उत्कृष्ट रन्ध्र भाग शिखा-स्थल के ठीक नीचे खुलते हैं। यही स्थान ब्रह्मरन्ध्र है और बुद्धि-तत्व का केन्द्र है।

साधारण दशा में जब कि हमारे शरीर के अन्य रोम पसीने आदि द्वारा शारीरिक ऊष्मा को बाहर फेंकते हैं सुषुम्ना केन्द्र के बालों द्वारा तेजो निःसरण होता है।

उसी को रोकने के लिये शिखा में ग्रन्थी का विधान है जिससे वह तेज शरीर में ही रुक कर मन शरीर व मस्तिष्क को अधिक उन्नत कर सके।

इसलिये भगवान् मनु ने स्नान,संध्या, जप,होम,स्वाध्याय,दान आदि कार्यों के समय शिखा में ग्रन्थी लगाकर ही इन कार्यों के करने का विधान किया है—

स्नाने दाने जपे होमे, संध्यायाँ देवतार्चने। शिखा ग्रन्थि सदा कुर्यादियेतन्मनुरब्रवीत॥

—(मनु संहिता)

(3)सम्पूर्ण प्रकृति मण्डल में फैली हुई एक दूसरी शक्ति और है जिसे हम सतत चिन्तन या ध्यान शक्ति द्वारा अपने शरीर में प्रविष्ट कर सबल तथा मेधावी बन सकते हैं, इसे ओज शक्ति के नाम से स्मरण किया जाता है।

दुनिया के समस्त सन्त, महात्माओं तथा आध्यात्मिक पुरुषों में निरन्तर ध्यानावस्था में रहने से इसी अदृश्य-शक्ति का प्रादुर्भाव हो जाया करता है,जिसके बल पर वे सहस्रों मनुष्यों के मन पर अपना अद्भुत प्रभाव डालने में समर्थ हो जाते हैं। शिखा बाँधकर पूर्वोक्त का अनुष्ठान करते हुए हम ऐसी दशा में आ जाते हैं कि हमारे शरीर में विद्यमान शक्ति, जो रोगों द्वारा बाहर निकलते हुए क्रमशः क्षीण होती जाती है, क्षीण न हो और हम प्रकृति मण्डल से अन्य शक्ति का आकर्षण सुगमता पूर्वक कर सकें।

(4)बाल एक नियत मर्यादा तक बढ़ते हैं, इसके बाद उनका बढ़ना बन्द हो जाता है। बाल कटने पर केशों की जड़ें अपने निकटवर्ती स्थान से रक्त खींच कर उसके द्वारा बाल बढ़ाती हैं। इस दृष्टि से बाल काटने का यह अर्थ हुआ कि उस स्थान के रक्त का निरर्थक खर्च। यदि बालों को न काटा जाय तो वही रक्त अन्य पाँचों इन्द्रियों की शक्तियों के पोषण में लग जाता है।

(5) शिखा स्थान के बाल कटवाने से मस्तिष्क की जड़ों में एक प्रकार की हलचल सी मचती है, जो एक प्रकार की सूक्ष्म खुजली होती है। यह खुजली मस्तिष्क से सम्बद्ध वासना-तन्तुओं में उतर आती है, फल स्वरूप काम वासना भड़क उठती है। इस अनिष्ट से परिचित होने के कारण ऋषि मुनि पंचकेश रखते थे,जिससे इन्द्रियों पर काबू पाने में बड़ी सहायता मिलती थी।

(6) शक्ति-मार्गी साधकों ने अपने अनुभव से प्रकट किया है कि ब्रह्म-रन्ध्र के शिव-हृदय के ऊपर अवस्थित शिखा कृष्णवर्ण भगवती कालिका की प्रतिनिधि है। चाणक्य ने शिखा हाथ में लेकर अर्थात् दुर्गा को साक्षी बनाकर नन्द वंश के नाश की प्रतिज्ञा की थी और वह पूरी हुई। शिखा-स्पर्श से शक्ति का संचार होता है। शक्ति ग्रंथों में ऐसे वचन मिलते हैं—

चिद्रुपिणि महामाये, दिव्यतेज समन्विते।

तिष्ठदेवि शिखा मध्ये, तेजो वृद्धि कुरुष मे॥

(7) योगी लोग बताते हैं कि आत्मा की अखंड ज्योति का प्रधान स्थान मस्तिष्क केन्द्र (शिखा) में है। इसी स्थान को सहस्रदल कमल और ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं। अनाहत ध्वनि इसी स्थान से उत्पन्न होती है।

(8) अनुष्ठान काल में क्षौर-कर्म वर्जित है। किसी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिये बाल रखाने की प्रथा है। इसके सूक्ष्म कारणों पर विचार करने से विदित होता है कि बाल रखाने से मनोबल की वृद्धि होती है और दृढ़ता आती है। उसके प्रभाव से अनुष्ठान करने वाले साधक अपने कार्यक्रम में दृढ़ रहते हैं और उसे निर्विघ्न पूरा कर लेते हैं।


अपने आप को पहचानो!

(ईरानी संत इमाम गजाली)

[इस लेख में ईरान के प्रसिद्ध संत इमाम गिजाली ने ठीक वैसे ही आध्यात्मिक भाव प्रकट किये हैं जैसे हमको हिन्दू शास्त्रों में मिलते हैं। मनुष्य-जन्म लेकर हमारा क्या कर्त्तव्य है, यही इसमें विशद रूप में बतलाया गया है]

याद रखो, अपने-आपको पहचानना ही श्रीभगवान को पहिचानने की कुँजी है। इसी विषय में किसी महापुरुष ने कहा है कि जिसने अपने को पहिचाना है उसने निःसन्देह अपने प्रभु को भी पहिचान लिया है। तथा प्रभु भी कहते हैं कि मैंने अपने ही लक्षण जीवों के हृदय में प्रकट किये हैं, जिससे कि वे अपने को पहिचान कर फिर मुझे भी पहिचानें। सो, भाई! तेरे आस-पास ऐसा और कोई नहीं है जिसे पहचानना तेरे लिये अपने-आपको पहिचानने से अधिक आवश्यक हो। पहले जब तू अपने को भी नहीं पहचानता तो और किसी को कैसे पहचानेगा? यदि तू कहे कि मैं अपने को तो पहचानता हूँ, तो तेरा यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि जिस रूप में तू अपने को पहचानता है तेरी वह पहिचान श्रीभगवान को पहिचानने की कुँजी नहीं हैं। तू जो अपने को हाथ, पाँव एवं माँस आदि से युक्त स्थूल शरीर समझता है तथा भूख होने पर आहार की इच्छा करने वाला, क्रोधित होने पर लड़ने-झगड़ने वाला और कामातुर होने पर भोगवासना से व्याकुल और उसी संकल्प में डूब जाने वाला जानता है, सो इस प्रकार की पहिचान में तो पशु भी तेरे समान हैं। अतः तुझे यह वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना चाहिये कि मैं क्या वस्तु हूँ, कहाँ से आया हूँ, किस जगह जाऊँगा, किस निमित्त से मैं संसार में आया हूँ, किस कार्य के लिये भगवान ने मुझे उत्पन्न किया है, मेरी भलाई किस में है और क्या मेरा दुर्भाग्य है? इसके अतिरिक्त यह भी देखना चाहिये कि तेरे भीतर जो दैवी और पाशविक वृत्तियों का संघटन हुआ है उनमें किस प्रकार की वृत्तियों की प्रबलता है। तथा साथ ही यह भी पहिचान कि तेरा अपना स्वभाव क्या है और पर-स्वभाव क्या है?

जब तू भली प्रकार इन सब बातों को पहिचान लेगा तो तेरी इनमें श्रद्धा भी होगी, क्योंकि विभिन्न जीवों की भलाई, पूर्णता और आहार भी भिन्न-भिन्न हैं। पशुओं की भलाई और पूर्णता इसी में है कि उन्हें अच्छी तरह सोने और खाने-पीने की सुविधा मिल जाय तथा दूसरे पशुओं को लड़ाई में परास्त करने की शक्ति हो। सो, यदि तू अपने को पशु समझता हो तो दिन-रात उदरपूर्ति और इन्द्रिय पोषण के लिये ही पुरुषार्थ कर। सिंहों की पूर्णता दूसरे जीवों को फाड़ खाने और क्रोधाविष्ट होने में ही है, तथा भूत-प्रेत हैं तो छल-कपट के द्वारा ही अपना आतंक स्थापित करते हैं। सो, यदि तू सिंह या भूत-प्रेत है तो इसी प्रकार के स्वभाव में स्थित रह। ऐसा होने पर ही तेरी पूर्णता सिद्ध होगी। देवताओं की भलाई और पूर्णता तो श्री भगवान का दर्शन प्राप्त करने में है और यही उनका आहार भी है। भोग-वासना और क्रोधादि तो पशुओं के स्वभाव में हैं। ये देवताओं को छू भी नहीं सकते।

इसलिये यदि मानवयोनि में जन्म लेने के कारण तुझे जन्मतः देवभाव का अधिकार प्राप्त हुआ है तो यही पुरुषार्थ कर कि भगवान के दरबार तक पहुँच सके। इसके लिये अपने को भोगवासना और क्रोधादि से दूर रख और इस भेद को याद रख कि भगवान ने तेरे लिये जो पाशविक स्वभाव और वृत्तियों की रचना की है वह इसलिये है कि तेरा उन पर पूर्ण अधिकार हो और तुझे जिस मार्ग द्वारा अपने गन्तव्य स्थान पर जाना है उसमें तू इन्हें अपने अधीन रखकर चले, स्वयं कभी इनके अधीन न हो। अतः जिस प्रकार घोड़े और शस्त्रों पर अधिकार रखकर शिकार खेला जाता है उसी प्रकार इन पाशविक स्वभावों और वृत्तियों पर सवारी गाँठ कर इन्हीं के द्वारा तू देवभाव रूप अपने लक्ष्य को बेध। जितने समय तुझे जीना है इसी कार्य को सिद्ध करने में अपनी आयु लगा दे। इस प्रकार जब तेरी भलाई होगी और तुममें दैवी स्वभाव का आविर्भाव होगा तो तू भगवान को पहिचानने के लिये प्रवृत्त होगा और फिर तुझे मुक्ति मिल जायगी।

अच्छा तो, यह भगवान की पहिचान कैसी है? यही संतजनों के स्थित होने का स्थान है। यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तु है। दूसरे लोग तो स्वर्ग को ही सर्वोत्कृष्ट सुख समझते हैं, किन्तु संतों का सुख तो श्री भगवान की शरण में ही है। जब तू ऐसा समझेगा तभी अपने को थोड़ा पहिचान सकेगा। जो पुरुष इस भेद को नहीं पहचानता उसके लिये धर्म-मार्ग में चलना कठिन है तथा आत्म सुख भी उससे ओझल ही रहता है।

यदि तू अपने को पहचानना चाहता है तो ऐसा निश्चय कर कि भगवान ने तुझे दो तत्त्वों से युक्त उत्पन्न किया है। इनमें एक तो शरीर है जो स्थूल नेत्रों से दिखायी देता है और दूसरा चैतन्य है। वह अत्यन्त सूक्ष्म है। उसी को जीव भी कहते हैं। तथा मन और चित्त भी उसी के नाम हैं। वह स्थूल दृष्टि से परे है उसे बुद्धिरूप नेत्र के द्वारा ही देखा जा सकता है। तेरा निज स्वरूप यह चैतन्यतत्त्व ही है और जितने भी गुण हैं वे इस चैतन्य के ही अधीन हैं, इसी के टहलुए हैं अथवा इसी की सेना के सदृश हैं। मैंने उसी चैतन्य का नाम ‘हृदय’ रखा है। इसमें सन्देह नहीं कि आत्मा, हृदय और मन ये सब उस चैतन्य के ही नाम हैं, अतः जब मैं हृदय का वर्णन करूं तो मेरा प्रयोजन शरीर के अंगभूत हृदय-स्थान से न समझें, क्योंकि यह हृदय-स्थान तो माँस और त्वचा आदि से रचा हुआ है और पंचभूतों का कार्य है; अतः जड़ है। और मनुष्य का जो चैतन्य स्वरूप हृदय (योग हृदय) है वह स्थूल दृष्टि से सर्वथा विलक्षण है। वह तो एक परदेशी की तरह अपने कार्य के लिये इस शरीर में आया है। शरीर में जो स्थूल हृदय-स्थान है वह जीव के घोड़े या शस्त्र की तरह है, इन्द्रियाँ सेना हैं और जीव शरीर का राजा है। अतः भगवान् को पहचानना और उनका दर्शन करना—यह जीव का अधिकार है। इसी से दण्ड और पुरस्कार तथा पाप और पुण्य का अधिकारी भी जीव ही है। तथा भाग्यहीन और भाग्यवान् भी इस जीव को ही कहा जाता है। यह शरीर सर्वदा जीव के अधीन है; अतः उस चैतन्य के स्वरूप को पहचानना और उसके स्वभाव को समझना ही श्रीभगवान् के पहिचानने की कुँजी है।

बस तू यही पुरुषार्थ कर कि इस चैतन्य के स्वरूप को पहचान सके क्योंकि यह चैतन्य रूपी रत्न अत्यन्त दुर्लभ है और देवताओं की तरह नित्य निर्मल है। इस रत्न की खान परब्रह्म है, क्योंकि यह जीव वहीं से आया है और फिर उसी में लीन भी होगा। इस संसार में तो यह परदेशी की तरह है, अपने कार्य के लिये ही यहाँ आया है। अतः तुझे अपना वह कार्य भी अवश्य पहचानना चाहिये। परन्तु उसकी पहचान श्रीभगवान् की कृपा से ही सकती है।

अब मैं आत्मसत्ता के अभ्यास का वर्णन करता हूँ। यह बात निश्चय जानो कि जब तक तुम अपने चैतन्य स्वरूप को नहीं पहचानोगे तब तक हृदय के वास्तविक स्वरूप को भी नहीं जान सकोगे; और इसी से तुम्हें श्रीभगवान् की भी पहिचान नहीं हो सकेगी और न उत्कृष्ट लोकों का ही ज्ञान होगा। यदि एक दृष्टि से देखा जाय तो चैतन्य सत्ता अत्यन्त स्पष्ट है, क्योंकि उसकी स्थिति शरीर के आश्रित नहीं है, अपितु उसके न रहने पर ही शरीर और इन्द्रियाँ निर्जीव हो जाती हैं और मृतक कहा जाता है। इसके सिवा यदि कोई मनुष्य नेत्रादि इन्द्रियों को रोककर चैतन्य का अभ्यास करते हुए अपने शरीर और सम्पूर्ण जगत् को भूल जाय तो उसे निःसन्देह अपने स्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है और वह आत्मा के यथार्थ स्वरूप को जान लेता है। जब इसका अधिक अभ्यास और विचार किया जाता है तो सुगमता से ही परमात्मा का भी दर्शन हो जाता है और यह बात प्रत्यक्ष दिखायी देने लगती है कि जब मनुष्य का शरीर छूटता है तो चैतन्यस्वरूप जीव का नाश नहीं होता, वह अपने स्वरूप में ही स्थित रहता है।

इस जीव का जो शुद्ध स्वरूप है—इसका जो वास्तविक स्वभाव है उसका धर्मशास्त्रों ने स्पष्ट शब्दों में निरूपण नहीं किया। कहते हैं, कुछ लोगों ने महापुरुष के पास जाकर पूछा था कि जीव का स्वरूप क्या है। इस पर उन्होंने उसका कोई स्पष्ट वर्णन नहीं किया, भगवत्प्रेरणा से केवल इतना कहा कि यह प्रभु की सत्तामात्र है। इसका और अधिक वर्णन करना उन्होंने उचित नहीं समझा। बस, इतना ही उत्तर दिया कि यह सृष्टि दो प्रकार की है—एक स्थूल सृष्टि है और दूसरी इसकी सूक्ष्म सत्ता। जहाँ पदार्थों की मर्यादा, आकार अथवा घटना-बढ़ना देखा जाता है वह स्थूल सृष्टि है और चैतन्य सत्ता सूक्ष्म रूप है। उसकी कोई मर्यादा या आकृति नहीं है, वह अखण्ड है मनुष्य का जो हृदय स्थान है वह तो अखण्ड रूप है इसी से मानव-हृदय में एक ओर विद्या और दूसरी ओर अविद्या रहती है। किन्तु चैतन्य सत्ता में इस प्रकार विद्या-अविद्या का भेद नहीं है। इसी से यह अखण्ड कही जाती है। इसकी कोई मर्यादा या सीमा भी नहीं है। इस प्रकार यद्यपि यह भगवत्स्वरूप ही है, तथापि इसे भगवान ने उत्पन्न किया है, इसलिये यह ‘जीव’ कही जाती है। यह जीव सत्ता ही सूक्ष्म सृष्टि है, क्योंकि इसका कोई स्थूल स्वरूप नहीं है।

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‘जीवं कल्पयते पूर्व ततो भगवान् पृथग्निधान्।’

(माण्डूक्य कारिका 2/16)

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जिन लोगों ने ऐसा निश्चय किया है कि जीव ही ईश्वर है वे भूल में हैं तथा जो इसे परमात्मा का प्रतिबिम्ब मानते हैं वे भी भूले हुए हैं, क्योंकि प्रतिबिम्ब तो स्वयं कोई वस्तु ही नहीं होती। इसी प्रकार जो अनादि होता है उसकी कभी उत्पत्ति नहीं होती, और जीव उत्पन्न किया हुआ है तथा इस शरीर का आश्रय है। अतः इसे अनादि या प्रतिबिम्ब कहना उचित नहीं। जो लोग इस शरीर को ही आत्मा मानते हैं वे भी भूले हुए हैं, क्योंकि यह शरीर तो खण्ड-खण्ड होता है और आत्मा अखण्ड है। इसके सिवा यह ज्ञान स्वरूप है और शरीर जड़ है। अतः शरीर ही आत्मा नहीं हो सकता। आत्मा तो सत्तास्वरूप, चैतन्य और देवताओं के समान प्रकाशमान है। वास्तव में इस जीव का मूल रूप तो किसी की पहिचान में आना अत्यन्त कठिन है। उसका शब्दों द्वारा निरूपण भी नहीं किया जा सकता। तथा साधन काल में जिज्ञासु को इस का निर्णय करने की आवश्यकता भी नहीं रहती। जिज्ञासु को तो धर्म-मार्ग में बढ़ते रहने का प्रयत्न एवं उद्यम करते रहना चाहिये। जब विधिवत् प्रयत्न करते-करते अभ्यास में दृढ़ता आती है तो उसे स्वयं ही स्वरूप का प्रकाश हो जाता है, फिर किसी के कुछ कहने सुनने की अपेक्षा नहीं रहती। इस विषय में भगवान् ने भी कहा है कि जब पुरुष मेरे मार्ग में चित्त लगाता है और अभ्यास करने लगता है तो मैं उसे अपने स्वरूप का ज्ञान करा देता हूँ। जिस पुरुष ने सम्यक् प्रकार से अभ्यास और प्रयत्न न किया हो उसके आगे आत्मा के स्वरूप की चर्चा करनी उचित नहीं। यदि उसके आगे इसकी चर्चा की भी जायगी तो यह बात उसके हृदय में बैठेगी नहीं।

जिन लोगों ने ऐसा निश्चय किया है कि जीव ही ईश्वर है वे भूल में हैं तथा जो इसे परमात्मा का प्रतिबिम्ब मानते हैं वे भी भूले हुए हैं, क्योंकि प्रतिबिम्ब तो स्वयं कोई वस्तु ही नहीं होती। इसी प्रकार जो अनादि होता है उसकी कभी उत्पत्ति नहीं होती, और जीव उत्पन्न किया हुआ है तथा इस शरीर का आश्रय है। अतः इसे अनादि या प्रतिबिम्ब कहना उचित नहीं। जो लोग इस शरीर को ही आत्मा मानते हैं वे भी भूले हुए हैं, क्योंकि यह शरीर तो खण्ड-खण्ड होता है और आत्मा अखण्ड है। इसके सिवा यह ज्ञान स्वरूप है और शरीर जड़ है। अतः शरीर ही आत्मा नहीं हो सकता। आत्मा तो सत्तास्वरूप, चैतन्य और देवताओं के समान प्रकाशमान है। वास्तव में इस जीव का मूल रूप तो किसी की पहिचान में आना अत्यन्त कठिन है। उसका शब्दों द्वारा निरूपण भी नहीं किया जा सकता। तथा साधन काल में जिज्ञासु को इस का निर्णय करने की आवश्यकता भी नहीं रहती। जिज्ञासु को तो धर्म-मार्ग में बढ़ते रहने का प्रयत्न एवं उद्यम करते रहना चाहिये। जब विधिवत् प्रयत्न करते-करते अभ्यास में दृढ़ता आती है तो उसे स्वयं ही स्वरूप का प्रकाश हो जाता है, फिर किसी के कुछ कहने सुनने की अपेक्षा नहीं रहती। इस विषय में भगवान् ने भी कहा है कि जब पुरुष मेरे मार्ग में चित्त लगाता है और अभ्यास करने लगता है तो मैं उसे अपने स्वरूप का ज्ञान करा देता हूँ। जिस पुरुष ने सम्यक् प्रकार से अभ्यास और प्रयत्न न किया हो उसके आगे आत्मा के स्वरूप की चर्चा करनी उचित नहीं। यदि उसके आगे इसकी चर्चा की भी जायगी तो यह बात उसके हृदय में बैठेगी नहीं।

गीता में श्रीभगवान ने भी कहा है—


Quotation

तेषाँ सततयुक्तानाँ भजताँ प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियामा तायेन मामुपयान्ति ते॥ (10।10)

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विवेकमय जीवन ही मानवता का लक्षण है।

(श्री भरतराम, वाणप्रस्थी)

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर से एक यक्ष ने प्रश्न किया था—’किं स्विदेक पदं धर्म्म मा’ अर्थात्-’एक शब्द में धर्म का तात्पर्य है?” प्रश्न वास्तव में बड़ा गहन है, जिसका उत्तर विद्वानों ने सैंकड़ों प्रकार से दिया है पर उनमें से कोई निर्विवाद नहीं माना गया। युधिष्ठिर ने इस प्रश्न का जो उत्तर दिया वह वास्तव में प्रश्न के अनुरूप ही सारगर्भित है। उन्होंने कहा—”दाक्षमेक पदं धर्म्यमा” अर्थात् ‘कुशलता’ ही एक शब्द में धर्माचरण है।”

भगवान कृष्ण में भी गीता में कहा है “योग कर्म सुकौशल्” अर्थात् “कुशलता पूर्वक काम करने का नाम ही योग है।” कुशल व्यक्ति संसार में सच्ची उन्नति कर सकता है। जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य यही है कि मनुष्य प्रत्येक कार्य को विवेक पूर्वक करे। इससे मन निर्बल रहता है, आत्मा सजग हो जाता है,और मस्तिष्क परिष्कृत रहता है। ऐसे विचारशील व्यक्ति को संशय और मोह में ग्रस्त होकर भटकना नहीं पड़ता, वरन् उसके लिये तो—

आकाश में ध्वनि, नीर में रस, वेद में ओंकार है। पौरुष पुरुष में चाँद सूरज में प्रभामय सार है॥

परमात्मा का स्वरूप क्या है, आत्मा का उससे क्या सम्बन्ध है, धर्म-अधर्म का क्या रहस्य है—इन सब प्रश्नों का उत्तर विवेकशील को अपने कर्त्तव्य-कर्म और निष्पाप जीवन से मिल जाता है। उसके लिये मनुष्य का विशुद्ध दर्शन ही परमेश्वर का दर्शन है,मनुष्य का विराट तथा चैतन्य जीवन ही परमेश्वर के अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

मनुष्य-जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं और उस परम प्रकाशमय प्रभु की कृपा का साक्षात अनुभव होता है, जो जीव को पतन के गर्त में गिरने से रोक कर सत्य की ओर ले जाता है।

ईश्वरीय और प्राकृतिक नियम ही सत्य है और चराचर जगत इन्हीं नियमों में स्थित है। इन्हीं नियमों के अनुसार चलने का नाम जीवन और इन से विपरीत चलने का नाम मृत्यु है। देवताओं ने ऋत—सत्य के मार्ग पर चल कर ही अमरत्व प्राप्त किया। जो इसके विपरीत मार्ग पर चलता है वही बार-बार मरता है और मृत्यु के पाश में जकड़ा हुआ दुःख रूप नर्क में गिरता है।

मनुष्य को निश्चित रूप से यह जान लेना चाहिये कि कुटिल-असत्य से भरे जीवन का नाम मृत्यु और सरल-सत्य और विवेक युक्त जीवन का नाम ही अमरत्व है। मनुष्य का जीवन वास्तव में सुख का स्रोत है, पर हमारे अज्ञान से दुःख की उत्पत्ति होती है और उससे यह स्रोत रुक जाता है,जीवन में प्रवाह नहीं रहता। शिथिल, प्रगतिहीन और निस्तेज होकर जीना केवल सिसकते हुये साँस लेना है, उसमें जीवन-तत्व नष्ट हो जाता है।

जिस सत्य से सारा संसार ओत-प्रोत है, जिसके टूटते ही जीव का पतन हो जाता है, उस सत्य को जाने और व्यवहार में लाये बिना जीवन सार्थक नहीं हो सकता है। गीता में जिस कर्म-कौशल का उपदेश दिया है वही परम सत्य है। वह हमें ऐसे मार्ग पर ले जाता है जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है। इस जगत में प्रकाश और अन्धकार, मृत्यु और अमरत्व साथ-साथ ही रहते हैं। विवेकवान-ज्ञानी जन अमृत को ग्रहण करते हैं और अविवेकी अज्ञानी मृत्यु को पकड़ते हैं। भय और अन्धकार में रहने वाले मंगल मार्ग पर पैर नहीं रखते। उनके लिये संसार में सर्वत्र मृत्यु-संकट ही दिखलाई पड़ता है। वे प्रकाश और ज्योति से दूर रहते हैं।

विवेकवान् नर-नारी शब्दों के व्यूह को तोड़ कर अर्थ की गहराई तक पहुँचते हैं। वे शुष्क ज्ञान के भार से दबे नहीं रहते वरन् उसके रहस्य को समझ कर उस पर आचरण करते हैं। इस राजयोग को जान कर मानव को पतन के गर्त में गिरना नहीं पड़ता,वह सहज में संसार-सागर से पार हो जाता है।


कर्म ही कल्प-वृक्ष है।

(श्री मुरलीधर श्रीराम शिरुड़े, खेतिया)

प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि मेरी सब कामनायें पूर्ण हों। यह बात तब ही हो सकती है,जब वह अपने इच्छित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये लगन से काम करता है,प्रयत्नशील और उद्यमी बनता है। उद्यम करने से ही कार्य की सिद्धि होती है, न कि केवल इच्छा करने से। जैसे कि सिंह, पराक्रमी है परन्तु क्या उसके मुख में भी मृग स्वयं चला जाता है?

हाँ आप यदि अपनी प्रत्येक आकांक्षा पूर्ण करना हैं तो आपको कल्पवृक्ष को प्राप्त करना होगा। क्योंकि कल्प वृक्ष मनुष्य की सब कामनाओं को पूरी कर देता है। पर आप इस “कल्प वृक्ष” को कहाँ प्राप्त करोगे? कहा जाता है कि यह वृक्ष स्वर्ग में है। परन्तु स्वर्ग देखा किसने? वहाँ जाने का मार्ग ही अज्ञात है तो वहाँ जाना और उसे प्राप्त करना असम्भव बात है।

मेरे विचार से यह कल्पवृक्ष, मनुष्य है। क्योंकि वृक्ष का नाम ‘कल्प’धातु से बना है। यह ‘कल्प वृक्ष” जो कल्पनामय है, उसे प्राप्त करके मनुष्य अपनी इच्छा कल्पना में ही पूरी कर लेता है। अतः हम इसके ही तुल्य कर्म-वृक्ष निर्माण करें। जिसकी उपासना करने से मनुष्य की प्रत्येक इच्छा पूरी होगी।

आज के मानव ने भौतिक वस्तुओं को भोगना ही सुख समझा है। पर वह अब उन्हें बोझा अनुभव होता है। भौतिक वस्तुओं से मनुष्य में लालसाओं और कामनाओं का प्रवाह बढ़ जाता है। इसलिये उसे शान्ति नहीं मिलती। अतः उसे सुख और शान्ति प्राप्त करने के लिये इन लालसाओं पर विजय पानी होगी। और इसके लिये आत्म संयमी बनना होगा।

प्रेम मय जीवन ही सुख है। सच्चा सुख चाहिये तो प्रत्येक के प्रेमी बनो। प्रेमी बनने से आपका वहाँ आदर होगा। जब आपका आदर होगा तो आप सुख का अनुभव करेंगे। इस प्रकार यदि आप प्रेम का प्रचार करते रहे तो आप महासुख का अनुभव करेंगे। यदि आप ने यह महासुख पा लिया तो आनन्द आप के पास स्वयं चला आवेगा। क्योंकि सुख में ही आनन्द और आनन्द में ही शान्ति है। प्रेम से ही प्रेम बढ़ता है और द्वेष करने से द्वेष बढ़ता है। प्रेम करने से ही एकता है और द्वेष करने से फूट। यही कारण है कि हमारा देश परतंत्र हुआ था।

‘ईश्वर उसकी मदद करता है जो अपनी मदद करता है’। लक्ष्मी उद्योगी पुरुषों को प्राप्त होती है, भाग्य का रोना रोने वालों को नहीं। अतः आप अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये प्रयत्नशील और उद्यमी बनिये। धनवान बनने के लिये मूल तत्व-अपनी योग्यता बढ़ाओ, मितव्ययी बनो, ईमानदारी से दृढ़ नाता जोड़ो। छोटे से छोटा काम करने में न हिचकिचाओ, सुशिक्षित बनो, आलस्य की मस्ती छोड़ो और हृदय में कुछ उमंगें पैदा करो। यही तत्व आप को धनवान बनने में सहयोग दे सकते हैं हमारी दीनता के क्या कारण हैं? इस प्रश्न को भी सोचो और जो भी कारण हो उन्हें नष्ट करने का सदा प्रयत्न करो ।

अकसर संतति हीन व्यक्ति सदा अपने भाग्य पर रोया करते हैं। परन्तु यह उनकी समझ का फेर है। वे नहीं जानते कि यह मेरे पूर्व जन्मों के कर्मों का फल है। जो इस जन्म में आपको उसका प्रायश्चित मिल रहा है। जब तक आप अपने कर्मों का कर्जा नहीं चुका देते, ऋणी बने रहोगे। इस ऋण को आपको चुकाने के लिए क्या करना चाहिए?

आप निराश न होइये,”कर्म वृक्ष” की उपासना कीजिए। यश अवश्य प्राप्त होगा। आपके अपराधों को क्षमा करने वाले केवल भगवान ही हैं। अतः आप उऋणी बनने के लिए, ऋण से मुक्त करने वाली गायत्री माता की आराधना कीजिए। दीनों की मदद करो, अतिथि का सत्कार करो। इससे वे आपके किये पर अच्छी दुआएं देंगे। सन्तों का, माँ-बाप का सम्मान करो। जिससे आपको वे शुभ आशीर्वाद देंगे। इस प्रकार उनकी दुआओं का और इनके शुभ आशीर्वादों का बल आपकी इच्छा की पूर्ति में मदद करेंगे। आप गायत्री माता की, जो सर्व-शक्ति मान हैं उपासना कीजिये, आपकी इच्छा शीघ्र ही पूर्ण होगी।

इसी प्रकार आप अपनी प्रत्येक इच्छा की पूर्ति इस “कर्म वृक्ष” की उपासना करके कर सकते हैं। कर्म करने से क्या नहीं हो सकता? कहा जाता है कि “मनुष्य अगर कर्म करे तो नर का नारायण बन जावे” सर्वस्व कर्म पर ही निर्भर है। यदि आप अच्छे कर्म करोगे तो उसका फल भी आपको अच्छा मिलेगा। भाग्य भी अपने-अपने कर्मों से ही बनता है। अतः कर्म वृक्ष की दृढ़ता से उपासना करो।


ईश्वरानुभूति का वास्तविक मार्ग

(संन्यासी श्री ज्ञानानन्दजी)

[संसार में सबसे बड़ा प्रश्न ईश्वरीय अनुभव का ही है। केवल आस्तिकों और नास्तिकों में ही इस सम्बन्ध में मतभेद दिखलाई नहीं पड़ता,वरन् विभिन्न धर्मों तथा सम्प्रदाओं के ईश्वर—विषयक सिद्धान्तों में भी इतना अधिक अन्तर पाया जाता है कि उनका समन्वय किसी प्रकार संभव नहीं जान पड़ता। यह सब आँखों से देखते हुए भी हमको यह स्वीकार करना ही पड़ता है कि मनुष्य चाहे जिस मार्ग पर चले, अगर उसके हृदय में सचाई होगी और श्रद्धा का अंश भी होगा तो वह एक दिन अवश्य ईश्वरीय शक्ति का अनुभव कर लेगा। नीचे के लेख में एक संन्यासी ने,जो जन्म से अँगरेज है, पर ईश्वर को खोजते-खोजते हिन्दू धर्म को स्वीकार कर चुका है, इस विषय पर बड़े स्पष्ट रूप में प्रकाश डाला है। उसने सिद्ध किया है कि श्रद्धापूर्वक अपने इष्ट का ध्यान और जप करना ही ईश्वरानुभूति का एक मात्र उपाय है।]

भिन्न-भिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने वाले विद्वान ऐतिहासिक प्रमाणों से यह सिद्ध कर सकते हैं कि धर्म विषयक जिज्ञासा और परम्परागत धारणाओं का मूल एक ही है। इसका कारण वे यह बतलाते हैं कि मनुष्य अपने रूप को तथा आस-पास के पदार्थों की वास्तविकता को समझ सकने में असमर्थ रहा है।

ऐसी पंक्तियों को पढ़कर नई रोशनी के युवक इस बात का गर्व करने लग जाते हैं कि अपने पूर्वजों की अपेक्षा हमारे अन्दर बुद्धि का विकास अधिक है। बात यह है कि आधुनिक सभ्यता की चक्की में पिसते रहने के कारण उनका सारा समय अपनी आवश्यकताओं को बढ़ाने तथा उनकी पूर्ति के लिए धन संचय करने में ही व्यतीत हो जाता है। परिणाम यह होता है कि ईश्वर के विषय में विचार करने की न उन्हें फुरसत मिलती है और न वे इसकी आवश्यकता समझते हैं।

परन्तु अफसोस! इस प्रकार के युक्ति वाद से किसी का काम अन्त तक नहीं चलता। उसके जीवन में एक समय आता है जब उसका निरे तर्क से निर्वाह नहीं होता। तब उसे इच्छा होती है कि ईश्वर में विश्वास किया जा सके तो अच्छा हो। जिस मनुष्य की मनोवृत्ति इस प्रकार की हो गई है उसे ईश्वरानुभूति जैसे विषय को समझना अत्यन्त कठिन हो जाता है, क्योंकि इस प्रकार का मनुष्य उन धार्मिक संस्कारों एवं कृत्यों को निरर्थक समझने लगता है, जिनको उसके पूर्वज आदर पूर्वक किया करते थे। इसका कारण ज्ञान के अजीर्ण के सिवा और क्या हो सकता है? आधुनिक वाग्जालों तथा व्याख्याओं से उनके प्रभावों की पूर्ति नहीं हो पाती। आजकल हमारे मन में जितने विचार और भावनायें उठती हैं वे सब हमारी साँसारिक आवश्यकताओं को लेकर ही होती हैं और इसलिए उनका ईश्वरानुभूति जैसे विषय को समझने में कोई उपयोग नहीं होता। इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि ऐसे देवता मन से हमारा विश्वास उठ जाने के कारण, जो मनुष्य के मन की लहरों एवं आचरण से प्रभावित होता है, हमारा मन उससे भी किसी ऊँचे आध्यात्मिक सिद्धान्त को किस प्रकार ग्रहण कर सकता है?

यदि इस सम्बन्ध में कोई मुझसे जिज्ञासा करे तो मैं उसका समाधान उसी युक्ति से करूंगा जिसे मैंने निज के लिये ढूँढ़ निकाला है। ईश्वर के सगुण रूप की सत्ता को ग्रहण करने से ही मनुष्य को लाभ हो सकता है, यही मेरी धारणा है। रेखागणित के सिद्धाँत की भाँति यदि कोई तर्क से ईश्वर को सिद्ध करना अथवा समझना चाहे तो यह उसकी भूल है। तर्क से एक प्रकार से बुद्धि का समाधान भले ही हो जाय, किन्तु अनुभव से हम कोसों दूर रहेंगे। हम तो चाहते हैं कि ईश्वर को हम इस प्रकार जान और समझ सकें जिस प्रकार हम अपने मित्र या किसी साथी को जान समझ लेते हैं। पर यह स्थिति तर्क से प्राप्त नहीं हो सकती।

तब प्रश्न यह होता है कि इस प्रकार का अनुभव हमें किस प्रकार प्राप्त हो? इसके लिए पहले हमें इस बात को समझ लेना चाहिए कि मनुष्य की शक्ति उसकी इन्द्रियों तक ही सीमित है। ईश्वर इन्द्रियों से परे है और इसलिए इन्द्रियों से उसका ज्ञान भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। इससे यह भी सिद्ध है कि सत्य का असली स्वरूप सदा मनुष्य की बुद्धि की पहुँच के बाहर ही रहता है। परन्तु साथ ही मैं यह भी जानता हूँ कि उनमें से अधिकाँश बातों का अनुभव मैं अवश्य कर सकता हूँ जिनके विषय में बाह्य आधार तथा इन्द्रियों की असमर्थता के कारण मैं तर्क नहीं कर सकता। कठिनता केवल यह जानने की है कि इस अनुभव को प्राप्त करने के लिए अपने उस अज्ञात और देखने में असीम अंश को किस तरह से उपयोग में लाया जाय।

मैं अपने भाइयों को सर्वत्र ही कोई न कोई बाह्य आचरण या धार्मिक कृत्य करते हुए पाता हूँ। उनमें कई मित्र मुझे ऐसे भी मिले हैं जिन्हें वह वस्तु प्राप्त हो चुकी है कि जिसकी खोज में था। उनके विचार और साधन बिल्कुल भिन्न थे, किन्तु उन्हें अपनी अभिष्ट वस्तु की प्राप्ति हो गई इससे अधिक और क्या चाहिए? उनके विचार और साधन युक्ति युक्त थे या नहीं, यह प्रश्न गौण है। मुझे तो केवल उनके परिणाम से प्रयोजन था। मेरी अवशिष्ट यात्रा किसी ऐसे साधन अथवा ध्यान की खोज में बीती जो मेरे अनुकूल हो। अब यदि आजकल की रोशनी का नवयुवक मेरी उस प्रक्रिया—साधन-विधि पर सन्देह करे कि जिसके द्वारा मैं जीवन रूपी जलाशय से जल निकालता हूँ, तो इसमें मेरा क्या दोष है? मैं जानता हूँ कि मेरी प्यास बुझ रही है और यही मेरे लिए पर्याप्त है। यदि मैंने तर्क के द्वारा ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करने की चेष्टा छोड़ दी है तो इसीलिए कि मैंने समझ लिया है कि उससे दूर रहना सम्भव नहीं।


मधु (शहद) के अनुपम गुण

(श्री जगन्नाथ प्रभाशंकर, बड़ौदा)

हम नित्य-प्रति जिन खाद्य पदार्थों का प्रयोग करते हैं उनमें दूध और मधु का महत्व बहुत अधिक है। ये दोनों शीघ्र ही पूर्ण रूप से पच जाते हैं और शारीरिक विकास तथा पोषण की दृष्टि से अद्वितीय गुणकारी सिद्ध होते हैं। हमारे देश के प्राचीन साहित्य में जगह-जगह इनकी प्रशंसा की गई है। पुराणों में जो सात समुद्र बतलाये गये हैं उनमें से एक दूध का और दूसरा मधु या शहद का माना गया है। ईसाइयों की बाइबिल में स्वर्ग का जो वर्णन किया गया है उसमें भी दूध और शहद की बहुतायत का जिक्र है। मुसलमानों के बिहिश्त में भी शहद की नहरों का होना बतलाया गया है। साराँश यह कि प्राचीन काल के सभी धर्म वालों ने शहद को एक स्वर्गीय पदार्थ माना है और आज कल भी वैज्ञानिकों ने परीक्षा करके यही निर्णय किया है कि शहद वास्तव में एक देव दुर्लभ और बहुत ही लाभकारी पदार्थ है।

शहद अनेक रोगों में बहुत हितकारी सिद्ध हुआ है। इस विषय का विस्तृत वर्णन तो चिकित्सा ग्रंथों में ही देखना चाहिये संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि पेट के रोग, ज्वर, पित्त आदि में इसके प्रयोग से थोड़े ही समय में आश्चर्यजनक फल दिखलाई पड़ता है। पेट सम्बन्धी रोगों में सबसे पहले अपना भोजन जहाँ तक हो सके सादा करना चाहिये और उसका परिमाण भी कम कर देना चाहिये। तब नित्य प्रति सुबह के समय खाली पेट कुछ गरम पानी में थोड़ा सा शहद मिलाकर पीना चाहिये। इसको एक साथ पीने बजाय धीरे-धीरे घूँट-घूँट करके उसी तरह पीना चाहिये जैसे गरम दूध और चाय को पिया जाता है। एक बार सुबह पी लेने के बाद दिन में भी तीन चार दफे इसी प्रकार कुनकुने पानी के साथ शहद मिलाकर पीना चाहिये। यदि पानी ज्यादा गर्म होगा तो हानि की आशंका है। इसको सदा भोजन से एक या आधा घण्टा पहले पीना चाहिये।

ज्वर में रोगी को किसी खाद्य पदार्थ की रुचि नहीं रहती। ऐसी अवस्था में पहले एनिमा आदि की सहायता से पेट साफ कर लिया जाय और फिर उपरोक्त विधि से घंटे-घंटे भर में कुनकुने पानी में शहद पिया जाय तो उससे बहुत लाभ पहुँचता है। इससे भोजन की रुचि उत्पन्न होती है, भूख लगती है और शरीर के बल का नाश नहीं होने पाता। अजीर्ण अथवा इसी प्रकार के अन्य रोगों के कारण बहुत से लोगों की भोजन पर से रुचि हट जाती है और भूख बन्द हो जाती है। ऐसे लोग पेट साफ करके और दो एक दिन उपवास करके उपरोक्त विधि से शहद पियें तो अवश्य लाभ होगा। यदि शरीर में किसी प्रकार का रोग न भी हो, तो भी सबेरे सन्ध्या जिस प्रकार चाय आदि का व्यवहार किया जाता है उसी प्रकार यदि साधारण गर्म पानी के साथ शहद का सेवन नियमित रूप से किया जाय तो स्वास्थ्य बराबर सुधरता जायगा और कोई शिकायत पैदा न होगी।

यदि किसी का पित्ताशय ठीक तरह से काम न करता हो तो उसके लिए भी शहद का प्रयोग बहुत उत्तम है। पित्ताशय सम्बन्धी तथा ऐसे ही दूसरे रोगों में वैद्य, डॉक्टर आदि चीनी, शक्कर, बतासा आदि खाने की मनाही करते हैं, परन्तु ऐसे रोगों में भी शहद बिना किसी आशंका के दिया जा सकता है।


महायज्ञ में आने से पूर्व

इन आवश्यक बातों को भली प्रकार समझ लीजिए?

गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति का समय अब बिलकुल समीप आ गया। परिजनों के पास महायज्ञ सम्बन्धी कोई सूचनाएं पहुँचाने के लिए यह अन्तिम अंक है। इसलिए जो बातें नीचे की पंक्तियों में दी जा रही हैं। उन्हें बहुत सावधानी से पढ़ना चाहिए।

(1) महायज्ञ का कार्यक्रम बहुत विशाल है। अपने साधन बहुत स्वल्प हैं। यथासंभव आवश्यक व्यवस्थाएं पूरी करने के लिए शक्ति भर प्रयत्न किया जा रहा है। फिर भी स्वल्प साधनों के कारण कुछ ऐसे अभाव रह जाने स्वाभाविक हैं जिनके कारण आगन्तुकों को कुछ असुविधाएं रहें। हर याज्ञिक हो कुछ असुविधाएं सहने के लिए तैयार होकर आना चाहिये। प्राचीन काल में धर्म भावना वाले लोग समय-समय पर कुछ दिनों के लिए तप करने वन, पर्वतों में जाते थे और वहाँ के कष्ट साध्य जीवन का अभ्यास करते थे। दस पाँच दिन के यज्ञ काल को भी हर आगन्तुक को तप, साधना का एक महान् अवसर मानना चाहिए और यहाँ अनेक प्रकार के अभाव तथा असुविधाएं सहन करने के लिए तैयार होकर आना चाहिए।

(2) ठहरने के लिए प्रायः सभी आगन्तुकों हेतु तम्बू छोलदारियों की व्यवस्था पूरी हो गई हैं। तपो-भूमि से आगे बिरला मन्दिर की दिशा में सड़क के किनारे प्रायः सभी खाली जगह जमीनें ठहरने के लिए निश्चित कर ली गई हैं। यज्ञ नगर इसी भूमि पर बसाया जा रहा है। प्रत्येक प्रान्त के ठहरने के अलग-अलग ब्लॉक बनाये गये हैं। गोल घेरे में चारों ओर ठहरने के स्थान और बीच में एक बड़ी यज्ञशाला इस क्रम से यज्ञ नगर बसाया गया है। ताकि हर प्रान्त के लोग अपने समीप यज्ञशाला में आहुतियाँ दे सकें। इसी प्रकार भोजन-शालाएं भी एक न रह कर कई रहेंगी ताकि लोगों को भोजन के लिए बहुत दूर न जाना पड़े।

(3) पहले 10-10 कुण्डों की 101 यज्ञ शालाएं बनाने का विचार था जिससे शाखाएं एक-एक यज्ञ-शाला का प्रबन्ध अपने हाथ में ले सकें, पर अब यज्ञ-समिति ने स्थान संबंधी कठिनाई तथा छोटे-छोटे टुकड़ों से समुचित शोभा न होने तथा 100 लाउडस्पीकर व 100 आचार्य ढूँढ़ने की कठिनाई आदि बातें सोचकर वह विचार बदल दिया है और बड़ी बड़ी विशाल यज्ञ शालाएं बनाने का निश्चय किया है। अब नये नक्शे बनाये जा रहे हैं। जिनमें लगभग 10 यज्ञ शालाओं से ही 1000 कुण्ड पूरे हो जाएंगे।

(4) यज्ञ-नगर के समीप ही यमुना तट तथा बड़ा जंगल है। वहाँ शौच,स्नान की पूर्ण सुविधा है। फिर भी पैखाने, पेशाब घर तथा स्नान-गृह बनाये जा रहे हैं। यों उन दिनों उजाली रातें हैं फिर भी बिजली का सर्वत्र प्रबंध रहेगा। कदाचित बिजली फेल हो जाय तो गैस के हण्डे इतने रहेंगे जिससे प्रकाश का अभाव अनुभव न हो। प्रत्येक टेण्ट में एक-एक घड़ा पानी रखा रहेगा। तम्बुओं में नीचे जमीन पर बिछाने के लिए कोई प्रबंध अभी नहीं हो सका है। चटाइयां खरीदने में खर्च बहुत पड़ेगा, इतनी बड़ी संख्या में फर्श भी मिलने कठिन हैं। फिर भी कोई न कोई उपाय ढूँढ़ा जा रहा है। संभव है कोई व्यवस्था न भी बन पड़े। ऐसी दशा में जमीन पर बिछाने के, ओढ़ने के वस्त्र समुचित मात्रा में ही लेकर आना चाहिए। अपना लोटा भी साथ लाना आवश्यक है। बिस्तर और लोटे के बिना ऐसे अवसरों पर भारी असुविधा उठानी पड़ती है।

(5) यज्ञ करते समय यज्ञशाला पर हर याज्ञिक पीली धोती, पीला कुर्ता तथा पीला दुपट्टा ही पहन कर बैठेगा। इसलिए अपने वस्त्र-धर्म और साधना के प्रतीक पीले रंगे हुए कपड़े हर याज्ञिक को अपने साथ लाने चाहिएं। नेकर, पेंट, पजामा यज्ञ करते समय पहन कर न बैठा जा सकेगा। इसलिए आवश्यक वस्त्रों समेत ही सबको आना चाहिए। यों रास्ते में आते समय तथा यज्ञ के दिनों पूरे समय ही पीले वस्त्र पहने रहना उचित है, पर यदि इसमें किसी को संकोच हो तो कंधे पर पीला दुपट्टा तो यज्ञीय पोशाक की तरह सबको पहनना ही चाहिए।

(6) महिला और पुरुषों का कोई भेद यज्ञ में नहीं है। दोनों का समान स्थान तथा समान अधिकार है। यज्ञ के प्रबन्ध तथा व्यवस्था में भी वे समान रूप से भाग लेंगी। यज्ञ में आने वाली महिलाओं में से जो उत्साही तथा क्रिया कुशल हों वे प्रबन्ध तथा स्वयं सेविकाओं में काम करने के लिए अपना नाम पहले ही भेज दें ताकि उनके जिम्मे के काम पहले ही सोच रखे जावें। जिनके बच्चे बहुत छोटे हों, वे न आवें तो ही ठीक है। यदि आना ही हो तो बच्चों की सुव्यवस्था का समुचित प्रबन्ध करके ही आना चाहिए ताकि उनके निवास आदि का कुछ अतिरिक्त प्रबन्ध सोचा जा सकें। जेवर पहन कर कोई स्त्री, पुरुष न आवे। जेवर पहनना एक तो अर्थ अपव्यय, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक चोरों की ललचाने वाली तथा अहंकार पैदा करने वाली बुराई है। इसे कम से कम यज्ञ समय में तो छोड़ना ही चाहिए। साथ ही ऐसे अवसरों पर उनके खोने तथा चोरी जाने का भी बड़ा भय रहता है।

(7) घर से चल कर मथुरा तक आने में हर याज्ञिक को धर्म प्रचार करते हुए आना चाहिए। कीर्तन, भजन करते आने से दूसरों के कानों में धार्मिक भाव पहुँचते हैं। रास्ते में यज्ञ का प्रचार करते हुए आना चाहिए। रेल में, मोटर, पैदल जिस प्रकार भी आना हो, मार्ग में मिलने वालों को यज्ञ सम्बन्धी साहित्य बाँटते आना चाहिए। इस कार्य के लिए कम से कम एक रुपये के छोटे पर्चे पोस्टर हर याज्ञिक को मँगा लेने चाहिएं। इनमें से आधे तो अपने निवास स्थान के आस-पास क्षेत्र में तथा आधे रास्ते में बाँटते आना चाहिए। कोई याज्ञिक सूनी, गुम-सुम धर्म प्रचार विहीन यह यज्ञ की यात्रा न करे।

(8) जिन्होंने होता यजमान बनाये हैं, उन कार्य-कर्ताओं को यह भी प्रयत्न करना चाहिए कि उन आने वाले की यात्रा कष्टकर न हो। साथ न मिलने से, अकेले लम्बी यात्रा करने में अनेक लोग घबराते हैं। इसलिए सबको साथ लाने, रास्ते में उनकी देख-भाल करने तथा मथुरा में भी सब प्रकार का प्रबन्ध करना चाहिए।

(9) स्थान की कमी और आगन्तुकों की संख्या अधिक होने स यज्ञ-नगर बहुत घना बसाया जा रहा है। तम्बू डेरे आपस में बहुत ही घने लगे होंगे। सामने निकलने की सड़कें भी छोटी होंगी। ऐसी दशा में स्वतन्त्र भोजन बनाने की सुविधा न रहेगी। असावधानी से एक भी आग की चिनगारी सारे तम्बू डेरों को भस्म कर सकती है। फिर भोजन बनाने में जो धुआँ, आग, बर्तन माँजने, आटा, दाल फैलने की गंदगी बढ़ती है वह भी अव्यवस्था फैलायेगी। इसलिए अपना-अपना भोजन बनाने का प्रबन्ध यहाँ न बन सकेगा। सभी आगन्तुकों के लिए यज्ञ प्रसाद के रूप में दोनों समय भोजन की पूर्ण व्यवस्था रहेगी।

(10) आने वाले याज्ञिकों के लिए भोजन की निःशुल्क व्यवस्था की गई है। पर यह भोजन सस्ते मूल्य का और सात्विकता प्रधान होने से कम स्वाद का होगा। जिनको ऐसा भोजन रुचिकर न हो वे भोजन की अपनी स्वतन्त्र व्यवस्था कर सकते हैं। यज्ञ-नगर में पूड़ी, मिठाई आदि की अनेकों दुकानें दुकानदार लोग लगावेंगे।

(11) मथुरा जंक्शन रेलवे स्टेशन पर ही सब आगन्तुकों को उतरना चाहिए। वहाँ से तपोभूमि जाने के लिए बसें, ताँगे, रिक्शे तैयार मिलेंगे। जंक्शन पर ही तपोभूमि के स्वयं-सेवक हर ट्रेन पर उपस्थित रहेंगे, जो आगन्तुकों को यज्ञ-नगर तक पहुँचाने के लिए सवारी का प्रबन्ध करने में सहायता करेंगे। कानपुर की तरफ से छोटी लाइन से आने वालों को यद्यपि मथुरा केन्ट स्टेशन पहले और जंक्शन बाद में आता है। तो भी उन्हें केन्ट पर न उतर कर जंक्शन पर ही उतरना चाहिए। क्योंकि स्वयं सेवकों की और सवारी की सुविधा जंक्शन पर ही रहेगी।

(12) यज्ञ कार्य ता. 23 को प्रातः 7 बजे से शुरू होगा। देव पूजा आदि कार्य ता. 22 को ही पूरे कर लिये जावेंगे। प्रतिदिन प्रातः 7 से 11 तक यज्ञ, 11 से 2 तक भोजन विश्राम, 2 से 5 तक प्रवचन, 5 से 7॥ तक नित्य कर्म भोजन, 7॥ से 10 तक प्रवचन यह कार्य-क्रम रहा करेगा।

(13) यज्ञोपवीत संस्कार तथा मंत्र दीक्षा का कार्यक्रम ता. 23 को प्रातःकाल ही होंगे। ता. 22 की शाम तक मथुरा सभी को पहुँच जाना चाहिये।

(14) यज्ञशाला पर केवल अधिकारी याज्ञिक ही प्रवेश करेंगे बहुत छोटे बच्चों का यज्ञशाला पर चढ़ना निषिद्ध होगा। बच्चे वालों को ऐसी व्यवस्था रखनी होगी कि बालक यज्ञशाला पर चढ़ने के लिए मचलें नहीं। पैर धोकर ही यज्ञशालाओं पर चढ़ना चाहिए इसका सब लोग ध्यान रखें।

(15) व्यवस्था के लिए बड़ी संख्या में प्रबंधकों तथा स्वयं सेवकों की आवश्यकता होगी। जो लोग अपने आपको इन दोनों कार्यों के उपयुक्त समझते हों वे कुछ दिन पहले आने की कृपा करें ताकि यहाँ की स्थिति और आवश्यकता को समझ कर तदनुसार कार्य को समझ सकें। ऐसे सहयोगी तथा सुयोग्य व्यक्ति दिवाली बाद तीज को ही आने का प्रयत्न करें।

(16) उपाध्यायों का दीक्षान्त तथा पदवी दान संस्कार ता. 24 को होगा। उन्हें किन्हीं विशिष्ट व्यक्ति द्वारा सम्मान पत्र, प्रमाण पत्र दिये जावेंगे। जिन्होंने अपने यहाँ ज्ञान-मन्दिर स्थापित कर लिये हैं तथा उन ज्ञान-मन्दिरों को चालू कर देने के प्रमाण स्वरूप दस नहीं तो कम से कम पाँच व्यक्तियों को वह सब साहित्य पढ़ा दिया है, उन उपाध्यायों की शोभा यात्रा (जुलूस) निकाला जायेगा। उनकी पहचान के लिए एक विशेष रंग की पट्टियाँ उनकी भुजा पर बाँधी जावेंगी। कंधे पर उसी रंग का दुपट्टा रहेगा। इन दुपट्टों के रंगों में फर्क न पड़े इसलिए वे सब यहीं रंगे जाएंगे। सभी उपाध्याय अपने साथ बारह गिरह चौड़ा, दो गज लम्बा एक सफेद दुपट्टा साथ लावें। उसे रंग कर उपाध्यायों की पहचान अलग कर दी जावेगी। प्रत्येक शाखा को अपने उपाध्यायों की अन्तिम सूची महायज्ञ से 15 दिन पहले ही भेज देना चाहिए, ताकि उनके लिए छपाये गये सुन्दर प्रमाण पत्रों को तैयार कराने में सुविधा हो।

(17) महायज्ञ की अनेकों व्यवस्थाओं में आचार्य जी को बहुत व्यस्त रहना पड़ेगा। उस समय उनका समय पैर छूने के लिए उन्हें रोकने में नष्ट न किया जाना चाहिये। इस बार प्रत्येक आगन्तुक को पहले ही यह भली प्रकार जान लेना चाहिए। मथुरा आने पर कोई पैर छूने की कोशिश न करे। इससे उनके रुके खड़े रहने से समय की भारी बर्बादी होगी। इस अवसर पर साधारण अभिवादन ही पर्याप्त है।

(18) गायत्री- परिवार के अधिकृत नारे यह हैं (1) गायत्री माता की जय हो (2) यज्ञ भग-वान की जय हो (3) वेद भगवान की जय हो (4) भारत माता की जय हो (5) भारतीय संस्कृति की जय हो (6) गायत्री-परिवार की जय हो (7) नैतिक पुनरुत्थान योजना सफल हो (8) हमारा युग निर्माण संकल्प पूर्ण हो।(9) असुरता का नाश हो (10) अनाचार का नाश हो। इन नारों के अतिरिक्त और कोई नारे न लगाये जाएं गायत्री-परिवार का अधिकृत झण्डा पीले रंग का तिकोना है। उसके बीच में किरणों वाले सूर्य जैसे गोल घेरे के बीच में “ॐ भूर्भुवः स्वः” लिखा होना चाहिए। सभी शाखाएं अपने झण्डे इसी प्रकार के बनाकर लावें। झण्डों की लम्बाई चौड़ाई अपनी सुविधा पर निर्भर है।

(19) भजन मंडलियाँ कीर्तनकार रास्ते में अपने बाजों के साथ भजन कीर्तन करते हुए आवें। मथुरा में भी उन्हें भजन कीर्तन का अवसर मिलेगा। गायक लोग, अपने बाजे भी साथ लावें। यहाँ भाषण के 9 मंच बनाये जायेंगे। जहाँ शाम को 2 से 5 तक रात को 7॥से 10 तक भजन भाषण होते रहेंगे। इतने विशाल जन समुद्र को एक स्थान पर बिठा कर भाषण सुनाने का प्रबन्ध नहीं हो सकता। इसलिए एक प्रमुख व्याख्यान वेदी के अतिरिक्त स्थान-स्थान पर अन्य-2 व्याख्यान मंच भी चालू रहेंगे। और एक ही समय उन सब पर अलग-अलग प्रवचन होते रहेंगे। इसके लिए सैंकड़ों गायकों तथा प्रवचन कर्ताओं की आवश्यकता पड़ेगी। भाषण भजन किसी विवादास्पद विषय पर नहीं वरन् नैतिकता, सदाचार , प्रेम, सहिष्णुता, धार्मिकता आध्यात्मिकता जैसे सर्वमान्य विषयों पर ही होंगे। सुयोग्य व्यक्तियों को प्रवचन करने का इन विभिन्न व्याख्यान वेदियों पर समुचित अवसर रहेगा।

(20) महायज्ञ से उत्पन्न प्रचण्ड आध्यात्मिक शक्ति से भयभीत होकर असुरता इस आयोजन को असफल बनाने के लिए आरम्भ से ही बहुत प्रयत्न कर रही है। हर व्रतधारी को पता है कि उसके कार्य में विभिन्न रूपों में असुरों ने कैसी-कैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न कीं। वह असुरता अब अपनी सारी शक्ति बटोर कर पूर्णाहुति के समय आक्रमण करेगी। इन आक्रमणों का रूप क्या होगा यह तो समय पर ही पता चलेगा पर यह हो सकता है कि यज्ञ की, याज्ञिकों की, तपोभूमि की, आचार्य जी की, हमारे आदर्शों और सिद्धान्तों की निन्दा करते हुए वे लोग पाये जाएं। इनका उद्देश्य याज्ञिकों की मनोभूमि को क्रोध में लाना तथा झगड़ा कराना होगा ताकि शाँतिपूर्ण भावनाओं के साथ लोग अपनी तपस्या की पूर्णाहुति न कर सकें। क्रोध और क्षोभ की स्थिति में की हुई तपस्या एवं साधना निष्फल हो जाती है। आसुरी आक्रमणों के अन्य सब मोर्चों की अपेक्षा यह मोर्चा सबसे कठिन है। इसकी ओर से सभी को सावधान होकर आना है। कोई व्यक्ति कितनी ही निन्दा, कटुता, द्वेष, आक्षेप भरी बातें कह कर क्रोध उत्पन्न कराने का प्रयत्न क्यों न करे, हम सभी को पूर्ण शान्त रहना है। न तो मन में, न वाणी में न व्यवहार में किसी भी प्रकार का आवेश आने दिया जाय। तभी यज्ञ की सफलता सम्भव है। आसुरी आक्रमणों के अन्य मोर्चे, इस मोर्चे से कम महत्व के हैं। उनसे उतनी हानि नहीं हो सकती, जितनी इस मोर्चे पर हार जाने से होगी। हम सब का चित्त पूर्ण शान्त, स्थिर तथा प्रसन्न रहना चाहिए। आवेश क्रोध या अश्रद्धा किसी भी कारण से उत्पन्न न होने पावे तभी हमारी जीत है। इस परीक्षा के लिए हर कोई तैयार होकर आवें।


साँस्कृतिक सेवा की सक्रिय शिक्षा

गायत्री तपोभूमि इस जिस नैतिक साँस्कृतिक एवं धार्मिक लक्ष को लेकर आगे बढ़ रही है उन आदर्शों को पहले जन साधारण के मनः क्षेत्र में गहराई तक स्थापित करना होगा, इसके बाद ही उनका कार्य रूप में परिणत होना सम्भव है। लोग अच्छे कार्य करें इसके लिए यह आवश्यक है कि पहले उनके विचार अच्छे हों। विचारों में जमे हुए कुसंस्कारों को हटाना और उनके स्थान पर सद्भावनाओं की ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रतिष्ठापित करना यही ब्राह्मण परम्परा है। ब्राह्मण जीवन केवल इसी के लिये है कि वह स्वयं उच्च कोटि का सदाचारी एवं आदर्शवादी बनकर दूसरों को भी अपनी वाणी तथा क्रिया द्वारा इसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे।

गायत्री परिवार इसी ब्राह्मण परम्परा को पुनर्जीवित करने का लक्ष सामने रखकर अग्रसर हो रहा है। धर्म प्रचारकों की - व्रतधारी साँस्कृतिक स्वयं-सेवकों की — उपाध्यायों की -एक बड़ी सेवा-सेना का संगठन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये किया गया है। स्वाध्याय और सत्संग की परम पुनीत प्रक्रिया को सजीव रूप देकर नैतिक, धार्मिक एवं सामाजिक क्रान्ति के पथ पर यह संस्था अग्रसर होने जा रही है। दो हजार सुसंगठित शाखाओं तथा एक लाख परिजनों द्वारा इस पथ पर ठोस कदम उठाने का संकल्प शपथ पूर्वक महायज्ञ की पूर्णाहुति के अवसर पर दुहराया जायगा। इस लक्ष की पूर्ति के लिये परिवार पुनः अपने इस पूर्व घोषित लक्ष पर सक्रिय होने की प्रतिज्ञा ग्रहण करेगा। यह प्रतिज्ञा उत्सव गायत्री परिवार के ध्वजारोहण के समय सम्पन्न होगा।

इस लक्ष की पूर्ति के लिये जहाँ अनेकानेक अन्य साधनों की आवश्यकता है वहाँ वाणी और लेखनी द्वारा धर्म प्रचार करने के लिये कटिबद्ध होने के लिये सुयोग्य व्यक्तियों की भी भारी आवश्यकता है। लेखनी और वाणी, प्रेस और प्लेटफार्म यह दो प्रधान साधन हैं। हमारे लिये यह नितान्त आवश्यक है कि लेखनी और वाणी के धनी, साहित्यकार, प्रवचनकर्ता और संगीतकार तैयार किये जाएं। इसके बिना जो व्रत संस्था ने लिया है। वह पूरा न हो सकेगा।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये ही अब तपोभूमि का साँस्कृतिक विद्यालय काम करेगा। सुनिश्चित पाठ्यक्रम एवं नियमावली तो महायज्ञ के बाद बनेगी, पर अभी उसका ढांचा स्पष्ट है। यहाँ चुने हुये सुयोग्य शिक्षार्थी लिये जाया करेंगे जिनमें लेखक, पत्रकार, जन गायक एवं वक्तृत्व शक्ति की उपयुक्त योग्यता एवं प्रतिभा हो। हमें धार्मिक नेतृत्व करने के लिए सुयोग्य व्यक्तित्व तैयार करने हैं। इसके लिये यह विद्यालय पूरी तैयारी से काम करेगा।

संस्था के आदर्शों को प्रचारित करने के लिये अनेकों पत्र पत्रिकाएं विभिन्न क्षेत्रों से निकाली जानी आवश्यक हैं। इनमें बड़े संगठित परिवार की बौद्धिक भूख बुझाने के लिये कम से कम 10-20 पत्र-पत्रिकाएं तो लेनी ही चाहियें। हजारों लाखों पुस्तकें तथा पुस्तिकाएँ चाहिएं। जिन लोगों की इस प्रकार के प्रतिभा तथा परिस्थिति हो उन्हें मथुरा आकर केवल लेख लिखना ही नहीं- संपादन करना ही नहीं, पत्रकारिता की अनेकों अत्यन्त आवश्यक तथा व्यावहारिक जानकारियाँ भी सीखनी होंगी, जिनके द्वारा वे अपने कार्य में असफल होने से बच सकें। एक महत्वपूर्ण सेवा के साथ-साथ अपनी सम्मान पूर्ण आजीविका भी चला सकें। प्रेस खोलने, चलाने तथा उनसे समुचित काम लेने की भी व्यावहारिक शिक्षा तपोभूमि में स्थित गायत्री प्रेस द्वारा दी जायगी।पूरा कोर्स संभवतः एक वर्ष का रखना पड़ेगा। बहुत कुशल व्यक्ति छह महीने में भी वह शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। इससे कम समय में इतनी महान् शिक्षा पूरी न हो सकेगी।

संगीत में लोक गायन, धर्मोपदेश लायक चालू गाना बजाना सुगम रीति से सिखाया जायगा! शास्त्रीय संगीत के लम्बे कार्यक्रम से बचकर सीधी और स्वल्प कालीन प्रणाली अपनाई जायगी। इस कार्य के लिये भी कम से कम छः महीने का समय रहना आवश्यक है।

प्रवचनकर्ता केवल भाषण देना ही नहीं सीखेंगे वरन् संस्था के आदर्शों के अनुरूप विचार-धारा का गंभीर अध्ययन करने के लिये सैंकड़ों हजारों ग्रन्थों का पढ़ना भी आवश्यक होगा। प्रधानतया गीता और रामायण के आधार पर प्रवचन की शिक्षा दी जायगी। गीता रामायण के अनेकों भाष्यों को पढ़ाना तथा उनके मार्मिक प्रसंगों को विशेष रूप से समझना आवश्यक है। भाषण शैली की शिक्षा तो प्रधान ही होगी।

लेखक, गायक एवं वक्ता की कला सीखने के अतिरिक्त इन शिक्षार्थियों के चरित्र एवं व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने, आदर्श बनाने का भी पूरा-पूरा व्यावहारिक प्रयत्न किया जायगा ताकि वे सच्चे अर्थों में जन सेवक बन सकें, अपने चरित्र और कार्यों द्वारा जनता को प्रभावित करके उसे अपने आदर्शों के अनुरूप मोड़ने में सफल हो सकें।

धर्म प्रचारकों का यह साँस्कृतिक शिक्षा विद्यालय महायज्ञ के बाद ही चल पड़ेगा। नियमावली आदि भी उसी समय बन जायगी। जो लोग उपरोक्त शिक्षा के उपयुक्त अपने को समझें वे पत्र व्यवहार कर लें। भोजन व्यय उन्हें अपना करना होगा। निवास की तथा शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था है ही।

साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिये— नैतिक युग निर्माण के लक्ष की पूर्ति के लिये लेखकों, गायकों एवं वक्ताओं की भारी आवश्यकता है। हमें इसकी पूर्ति करनी होगी। इस कार्य की पूर्ति इस प्रकार की शिक्षा से ही संभव है। हमारा यह विद्यालय राष्ट्र की महत्वपूर्ण सेवा कर सकेगा ऐसी आशा है।


इस उमड़ते हुए जन-समुद्र को रोका जाय।

अन्यथा व्यवस्था काबू से बाहर हो जायगी?

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के महान आयोजन का उद्देश्य विश्व कल्याण के लिए मानवता, नैतिकता आध्यात्मिकता की—देवत्व की, सतोगुणी सूक्ष्म शक्तियों को प्रबल करना है। इस योजना के अंतर्गत कम से कम 24 लक्ष व्यक्तियों को गायत्री का महत्व समझाना तथा इस महान् उपासना में संलग्न करना भी है। इन उद्देश्यों की पूर्ति में इस एक वर्ष में बहुत भारी काम हुआ है इतना अधिक कार्य— जितना छुटपुट प्रयत्नों से सैंकड़ों वर्षों में भी संभव न था। इस दृष्टि से इस महान् धर्मानुष्ठान को आशाजनक सफलता प्राप्त हुई है।

जिन लोगों ने गायत्री का नाम भी नहीं सुना था और जिन्होंने उपासना की आवश्यकता पर कभी विचार तक नहीं किया था ऐसे लाखों व्यक्ति इस एक कार्य के अन्दर नैष्ठिक साधक बने हैं, तथा अपने विचार दृष्टिकोण, लक्ष, चरित्र, गुण, कर्म स्वभाव में उन्होंने आश्चर्य जनक परिवर्तन किया है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत जो 24 करोड़ जप प्रतिदिन होने का संकल्प था अब ऐसा निश्चय है कि वह संकल्प चिरस्थायी हो गया। इतना जप तो गायत्री परिवार के सदस्यों के द्वारा नियमित रूप से चलता रहेगा। आगे इसमें बराबर वृद्धि भी होती चलेगी। भारी संख्या में जनता का दृष्टिकोण भौतिकता से बदल कर आध्यात्मिकता की ओर जो इस योजना द्वारा मुड़ना आरम्भ हुआ है यह प्रवाह भी दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से बढ़ता रहेगा यह भी निश्चय है इस भारतभूमि में ऋषि-युग की पुनः स्थापना करने का स्वप्न साकार होकर रहे तो इसमें कल आश्चर्य न मानना चाहिये। प्रवाह जिस गति से बढ़ रहा है वह भारत भूमि के प्राचीन गौरव की दृष्टि से सचमुच ही सन्तोषजनक और गर्व करने योग्य है इस संस्था द्वारा जलाई हुई छोटी सी लौ अपना विशाल रूप धारण करके एक महान प्रकाश पुँज के रूप में परिलक्षित होते हुए देखने के लिए अब हम प्रसन्नतापूर्वक तैयार रह सकते हैं।

महायज्ञ के समय मथुरा आते हुए रास्ते में गायत्री प्रचार करते हुए हर याज्ञिक को आना है। चुपचाप चले आने वालों को उतना पुण्य फल प्राप्त नहीं हो सकता जितना कि रास्ते में भजन, कीर्तन करते हुए, गायत्री माता और यज्ञ पिता की जय घोषणा करते हुए, पर्चे पोस्टर बाँटते चिपकाते हुए आने से हो सकता है। हर याज्ञिक इस प्रक्रिया को अवश्य पूरा करेगा ऐसी आशा है। इस प्रकार आने में गायत्री माता का और यज्ञ पिता का सन्देश घर-घर पहुँचाने का भारी कार्य होगा। याज्ञिकों को इधर से वापिस जाते हुए महायज्ञ से प्रसाद स्वरूप गायत्री चालीसा गायत्री, गायत्री मन्त्र माता के चित्र यज्ञ भस्म आदि ले जानी है और उन प्रसाद वस्तुओं को धार्मिक लोगों द्वारा दूर-दूर तक पहुँचाना है।

इस धर्मप्रचार के महान् कार्य को देखते हुए प्रत्येक धर्म प्रेमी के आनन्द और उत्साह का ठिकाना नहीं रहता। जप और हवन के उपरान्त जब सद्बुद्धि रूपी गायत्री और त्याग मय प्रेम रूपी यज्ञ की मानवीय अन्तःकरणों में गहराई तक प्रतिष्ठापना होगी तो सचमुच ही यह भारत भूमि-धर्म भूमि बनेगी। इस महान लक्ष की पूर्ति में गायत्री-परिवार का यह धर्मप्रचार बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

पर एक विचारणीय समस्या भी इस धर्म प्रचार के फलस्वरूप उत्पन्न हो रही है। वह यह कि जितनी संख्या में महायज्ञ के आगन्तुकों के लिए ठहरने और भोजन की व्यवस्था हो सकी है, उसकी अपेक्षा यह पंक्तियाँ लिखने के समय तक कई गुने अधिक लोगों के आने की सूचनाएं आ चुकी हैं। खाद्य संकट और अपनी अर्थ दुर्बलता को ध्यान में रखते हुए तथा तपोभूमि के आस-पास दो मील के घेरे में जितनी खाली जमीनें थीं वे सभी ले लेने के उपरान्त भी बीस पच्चीस हजार से अधिक व्यक्तियों से अधिक की गुँजाइश दिखाई नहीं पड़ती।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के होता यजमान एक लाख से ऊपर हैं। इनमें से अधिकाँश आने ही वाले हैं। दर्शक की संख्या इन से भी कई गुनी हो सकती है। ऐसी दशा में यज्ञ समिति के सामने काफी पेचीदा समस्या उपस्थित हुई है।

इस समस्या का समाधान एक ही है कि अधिक उत्साही, नैष्ठिक एवं श्रद्धालु याज्ञिक ही मथुरा आवें। जिनमें कम श्रद्धा है तथा अन्य प्रकार की कठिनाइयाँ जिनके सामने हैं उन लोगों पर मथुरा चलने के लिए अधिक जोर न दिया जाय। अगले वर्ष सभी क्षेत्रों में बड़े सामूहिक यज्ञों की तैयारी होनी चाहिए और उनमें उन होता यजमानों की उपासना की पूर्णाहुतियाँ हों जो मथुरा न आ सकें। जो होता यजमान मथुरा न आवें उन्हें आश्वासन दिया जाय कि आप दुख न मानें अगले वर्ष हमारे क्षेत्र में एक बड़ा यज्ञ अवश्य होगा और उसमें आचार्य जी स्वयं आकर पूर्णाहुति करावेंगे। इस आश्वासन से उनकी खिन्नता दूर हो सकती है। जो लोग अधिक उत्साही है उन्हें प्रतिबन्ध के रूप में रोका न जाय। ऐसे लोगों के लिए किसी ने किसी प्रकार ठहराने भोजन आदि की व्यवस्था हो ही जायगी। हाँ, अपनी ओर से किसी को बहुत अधिक प्रोत्साहित न किया जाय इतना ही प्रतिबन्ध पर्याप्त है।

साधारण श्रेणी के वे दर्शक जो तीर्थ यात्रा के साथ-साथ यज्ञ के दर्शन करने आ रहे हैं, उन्हें निरुत्साहित करना चाहिए। विशेषतया अशिक्षित, भावना शून्य वे महिलाएं जो केवल मेला ठेला देखने निकलती हैं न आने दी जाएं। क्योंकि पिछले सम्मेलनों का अनुभव यही कहता है कि इन्हीं के द्वारा सबसे अधिक गड़बड़ी पैदा होती है। ना वे नियंत्रण में रहती हैं और न किसी प्रकार के नियम मानती हैं, व्यवस्था बिगाड़ने में एक भारी सिर दर्द बनी रहती हैं। इसलिए जो उपासिका न हों, जिन्हें गायत्री तथा यज्ञ के बारे में अधिक जानकारी तथा निष्ठा न हो उन महिलाओं को दर्शक रूप में भी इस समय न लाया जाय। दर्शकों में भी जो विशेष भावनाशील एवं समझदार हैं वे ही आवें। उनका तो स्वागत है। पर दर्शन झाँकी करने के उद्देश्य से आने वालों के ठहराने और भोजन का प्रबन्ध कर सकना काबू से बाहर की बात होगी ऐसा दिखाई पड़ता है।

इसलिए परिवार के प्रत्येक जिम्मेदार सदस्य को अब इन दो बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना है कि महायज्ञ में मथुरा वे ही आवें जो विशेष श्रद्धालु हों। सामान्य श्रद्धा वालों को अगले वर्ष अपने क्षेत्र में ही होने वाले बड़े यज्ञ में सम्मिलित होने का आश्वासन दिया जाय। दर्शक कम से कम आवें केवल चुने हुए लोग ही आवें। बेकार की भीड़ न आवें यदि आवें तो अपने ठहरने और भोजन की स्वतंत्र व्यवस्था करें। क्योंकि सूचनानुसार कई लाख आदमी आने की जैसी कि संभावना है उसकी उपयुक्त व्यवस्था बन सकना यहाँ कठिन है।

महायज्ञ में भाग लेने के लिए भागीदार बनाने के लिए अधिकाधिक लोगों को तैयार किया जाय। इसके लिए कुछ तरीके यह हो सकते हैं।

कम से कम 10 मन्त्र लिख कर महायज्ञ के लिए श्रद्धाँजलि भेजें। ऐसी श्रद्धाँजलियाँ अपने क्षेत्र के सभी धार्मिक व्यक्तियों से एकत्रित की जाएं। यह श्रद्धाँजलियाँ हर शाखा, हर याज्ञिक, अपने साथ जितनी अधिक संख्या में लावें उतना ही उत्तम है।

पूर्णाहुति के लिए सुपाड़ी या गिरी का गोला अधिकाधिक लोगों से एकत्रित करके लाये जावें। इस प्रकार पूर्णाहुति में मथुरा न आने वाले होता, यजमान एवं संरक्षकों को ही नहीं वरन् साधारण जनता में से भी अधिकाधिक लोगों को भागीदार बनाना चाहिए। सुपाड़ी जहाँ उपलब्ध न हो वहाँ से एक पैसा लेना चाहिए पूर्णाहुति में एक पैसा देकर भी कोई व्यक्ति पुण्य फल का भागीदार बन सकता है।

(3) हवन सामग्री को देने के लिए तिल, शक्कर, घी आदि थोड़ी मात्रा में भी जो लोग दे सकें उनसे चाहे एक मुट्ठी ही वस्तु क्यों न हो ले ली जाय, जौ, चावल जैसी अन्न श्रेणी की वस्तुओं पर तो संभवतः एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में प्रतिबंध है। जहाँ से लाने में प्रतिबन्ध न हो वहीं से हवन सामग्री में मिलाने के लिए एक मुट्ठी जौ तिल भी लिए जा सकते हैं। या वहाँ उन चीजों को बेचकर यहाँ वे ही वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं।

इस प्रकार के तरीकों से अधिकाधिक लोगों का इस महायज्ञ का भागीदार बनाना चाहिए। इन भागीदारों की संख्या 24 लाख होनी चाहिए। इसलिए अधिकाधिक सहयोग एकत्रित करने का तो प्रयत्न किया जाय पर मथुरा चलने के लिए बहुत लोगों को प्रोत्साहित न किया जाय। क्योंकि जो जन संख्या इस महायज्ञ में आने को उत्सुक है उसे रोका न गया तो इतने बड़े जन समूह का कोई प्रबंध हो सकना कठिन है। अब तक जिन लोगों को स्वीकृतियाँ दी जा चुकी हैं उनके सम्बन्ध में भी यज्ञ समिति पुनर्विचार कर रही है और शाखा मंत्रियों की सलाह से कुछ स्वीकृतियाँ हर शाखा से वापिस ली जाएंगी।

प्रचार कार्य पूरी शक्ति से एवं उत्साह से जारी रखा जाय, अधिकाधिक लोगों को उपरोक्त तीन तरीकों से महायज्ञ का भागीदार बनाया जाय, पर मथुरा चलने के लिए हर किसी को न कहा जाय, वरन् जो आने वाले हैं उनमें से भी कुछ को रोकने का प्रयत्न किया जाय अन्यथा व्यवस्था काबू से बाहर हो जाने का भय है। इस तथ्य को प्रत्येक परिजन ध्यान में रखें।


यज्ञ समिति की एक पेचीदा उलझन

इसे सुलझाने के लिए आप भी अपनी सलाह दीजिए।

इस क्षेत्र में इस वर्ष जल प्रलय जैसी वर्षा हुई है, जिसके फलस्वरूप मथुरा जिले के सैकड़ों गाँव तथा उनके खेत पानी में डूब खड़े हैं। इन परिस्थितियों में यहाँ खाद्य संकट असाधारण रूप से विकट हो गया है। बड़े भोजों पर सरकार भी कोई रोक लगाने की तैयारी कर रही है। इन परिस्थितियों पर यज्ञ समिति गंभीरता पूर्वक विचार कर रही है। यह भी एक विचार चल रहा है कि अन्नाहार के स्थान पर फलाहार-शाकाहार की व्यवस्था की जाय। आलू, शकरकन्द, सिंघाड़ा, केला, अमरूद, गाजर, साँवा, रामदाना, मूँगफली, कूटू आदि अनेकों फलाहारी वस्तुएं उपलब्ध रहेंगी। इनको पाक विद्या के चतुर ज्ञाताओं की सहायता से नमक और मीठे के सम्मिश्रण से अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन बन सकते हैं। इतने पवित्र एवं सात्विक यज्ञ के याज्ञिक यदि इस प्रकार के शाकाहार पर रहें तो यह और भी श्रेष्ठ बात है। लागत की दृष्टि से रोटी, शाक, चावल, दाल की पूर्व योजना से इस प्रकार का भोजन कुछ महंगा तो पड़ेगा पर बनाने में सुविधा रहेगी और राष्ट्रीय खाद्य संकट की दृष्टि से फलाहारी भोजन की प्रथा आरम्भ करना एक अच्छा आदर्श रहेगा।

यों यज्ञ समिति के कई सदस्य इसी फलाहार व्यवस्था पर बहुत जोर दे रहे हैं, एक सदस्य का कहना यह भी है कि रोटी में छूत मानने वाले लोगों का भी इस फलाहारी व्यवस्था से समाधान हो जाएगा। पर कुछ सदस्य यह सोचते हैं कि अन्नाहार की अपेक्षा शाकाहार महंगा तो पड़ेगा ही साथ ही खाने वालों को संतोष न होगा, पेट न भरेगा, तृप्ति न होगी। इसलिए किसी भी प्रकार व्यवस्था करके अन्नाहार ही जुटाया जाय। पूड़ी शाक में घी का खर्च इतना अधिक बढ़ जाता है कि अन्य व्यवस्थाएं पूरी करना ही जहाँ कठिन पड़ रहा हो वहाँ पूड़ी में लगने वाले घी की भारी व्यवस्था का भार उठा सकना किस प्रकार संभव हो सकता है?

अन्नाहार का पक्ष लेने वाले यज्ञ समिति के सदस्यों के सामने एक कठिनाई यह भी है कि जितने व्यक्तियों का भोजन बनाना है उससे आधे से भी कम मात्रा में रोटी बनाने वाले रसोइयों का प्रबंध हो सका है। इस क्षेत्र में जितने रसोइए थे वे प्रायः सभी ढूँढ़ लिए गये हैं। शेष आधी मात्रा में रोटी किस प्रकार बनेंगी यह भी एक चिंता की बात है। वे सोचते हैं कि खिचड़ी, मीठा भात, गेहूँ का दलिया मीठा और नमकीन, आलू बेसन की पकौड़ी, उबला कर तला हुआ चना, सरीखी कढ़ाई में पकाई जा सकने वाली वस्तुओं से भी काम चलाया जा सकता है।

एक विचार यह भी चल रहा है कि फलाहारी और अन्नाहारी दोनों व्यवस्थाएं रखी जायँ। कोई व्यक्ति दोनों प्रकार का आधा-आधा भोजन ले सके या दोनों प्रकार के भोजनों में चाहिए जिस प्रकार का चाहिए उसे स्वीकार कर सके ऐसा प्रबंध किया जाय। कई दिन से यज्ञ समिति इस प्रश्न के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है पर अभी कुछ निर्णय नहीं हो सका है। इसलिए यह निश्चय किया है कि गायत्री परिवार की शाखाओं तथा अखण्ड ज्योति परिवार के सुलझे हुए मस्तिष्कों की सलाह से इस प्रश्न का निर्णय किया जाय। यह अंक हाथ में पहुँचते ही समस्या के विभिन्न पहलुओं पर विचार करके सभी वरिष्ठ सदस्य अपनी सम्मति भेजने की कृपा करें, ताकि यज्ञ समिति बहुमत के आधार पर अन्तिम निर्णय कर सके।


मूक-वेदना


मूक-वेदना (Kavita)

मिट्टी का है देह-दीप, जलना मेरा इतिहास है।

किन्तु स्नेह से सनी एक सोने की लौ भी पास है॥

अंग-अंग अंगारों से शृंगार किए फिरता हूँ,

मुझे तृष्णा की जलन नहीं है, आग पिए फिरता हूँ;

मैं अकंप हूँ मुझे मरण की चिन्ता छू न सकेगी-

मैं अपनी बाँहों में अपनी चिता लिए फिरता हूँ;

सघन अमावस कजरारी सोती चरणों के नीचे-

मन में चाँद छिपा है, प्राणों में पूनम का ह्रास है!

जिन दो श्वासों ने काया से जीवन-ज्वाला बाँधी,

मुझे बुझा देगी कल पल में इन श्वाँसों की आँधी;

अस्त हुई संध्या अतीत-सी, निकट भविष्य सवेरा-

क्षण-क्षण,पल-पल,तिल-तिल जलकर बीत गई निशि आँधी;

आएगा प्रभात पतझड़ लेकर मेरे जीवन में-

एक रात के लिए मिला यह मुझे ज्योति-मधुमास है।

पंथ निहारा करता हूँ मैं रातों जग कर जल कर,

किसी रात आए वह छलिया गया मुझे जो छल कर;

लौ मत समझो इसे, प्रतीक्षा की अति व्याकुलता में-

बाहर है आ गया देह से मेरा हृदय निकल कर;

आओ निर्मम, अब आँसू के फूल लगे मुरझाने-

आज शूल-सी गड़ती मेरे उर में मेरी श्वास है।

धूम्र-अक्षरों से लिखता हूँ मैं ये पाँते काली,

मेरे प्राणों की होली को जग कहता दीवाली;

जाग-जाग कर उसे सुलाने को लोरी गाता हूँ-

जिस ने रातों को मेरे नयनों की नींद चुरा ली;

बाती की वंशी पर किसने दीपक राग बजाया,

पहन ज्योति का चीर प्राण में पीर रचाता रास है।

जिस दिन ज्वाला से तुम ने मेरा अभिषेक किया था,

हृदय जला कर प्रभा लुटाने का वरदान दिया था;

और कहा था ज्वालामुखी जले पर आह न करना-

किरण-तार से मैंने निज अधरों को तभी सिया था;

उस दिन से ही इन काजल की काली रेखाओं से-

मूक-वेदना अंकित करने का मुझको अभ्यास है।

*समाप्त*

(श्री मंजुल मयंक)