धर्म-प्रचार योजना के लिए उपयोगी साहित्य
सूक्त संहिता
इस पुस्तक में चारों वेदों से ऐसे 40 सूक्त संग्रह किये गये हैं, जिनके पाठ एवं मनन से मनुष्य की 40 भौतिक एवं साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। वैदिक मंत्र विद्या की यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पुस्तक है।
वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ
दैनिक जीवन में उपस्थित होने वाली आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक एवं पारिवारिक समस्याओं पर वेद भगवान के आदेशों का संग्रह। सूक्तियों का अर्थ तथा टिप्पणियाँ भी हैं।
संस्कार पद्धति
जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, अंत्येष्टि आदि संस्कारों का महत्व और शास्त्रोक्त विधान इस पुस्तक में बहुत ही सरल रीति से समझाकर लिखा गया है। प्रत्येक संस्कार के अवसर पर देने योग्य शिक्षाओं का समन्वय एवं संस्कार विधान की सरलता इस ग्रन्थ की विशेषता है।
भारतीय संस्कृति की रूप-रेखा
हिन्दू-धर्म के आदर्शों, सिद्धान्तों, विश्वासों, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और प्रथा-परम्पराओं पर दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं विवेचनात्मक ढंग से प्रकाश डालते हुए उनकी उत्कृष्टता सिद्ध की है। प्रत्येक हिन्दू धर्माभिमानी के लिए पुस्तक अवश्य ही पढ़ने योग्य है।
व्रत और त्यौहार
हिन्दू धर्म के प्रायः सभी व्रत और त्यौहारों का इतिहास, सन्देश, उद्देश्य, कारण और विधान इस पुस्तक में है। हिन्दू जाति अपने व्रत पर्वों को पुस्तक में वर्णित आधार पर मानने लगे तो उसका काया कल्प ही हो सकता है।
संक्षिप्त रामायण
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामायण से शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से पढ़ने वालों के लिए यह पुस्तक है। शिक्षात्मक प्रसंगों को ज्यों का त्यों रखा गया है और कथानकों की केवल संबंध शृंखला बनाये रखी गई है।
प्रेरणाप्रद दृष्टाँत
प्रवचन, व्याख्यान और धर्म शिक्षा के समय बीच-बीच में अच्छे दृष्टाँतों का उपयोग करने से प्रवचन बड़ा ही हृदयग्राही और मनोरंजक बन जाता है। इस पुस्तक में बड़े मार्मिक, शिक्षाप्रद एवं प्रेरणा देने वाले लगभग 400 दृष्टाँत संग्रहीत हैं।
सरल चिकित्सा विज्ञान
100 प्रमुख रोगों का निदान, लक्षण, चिकित्सा, पथ्य आदि का एक अनुभवी चिकित्सक द्वारा बड़ी ही सरल रीति से यह संग्रह किया गया है। इसे पढ़कर आयुर्वेदिक पद्धति से रोग निवारण करने की विद्या हाथ आ जाती है। औषधियों का निर्माण, विशोपचार आदि विषय भी पुस्तक में दिए हैं।
कल्प चिकित्सा
दूध कल्प, छाछ कल्प, फल कल्प, शाक कल्प आदि के द्वारा शरीर में संचित पुराने रोगों की जड़ काट देने वाली चिकित्सा पद्धति का इस ग्रन्थ में बड़ा ही खोजपूर्ण वर्णन है। इस चिकित्सा पद्धति से रोगों का घर बने हुए शरीर पुनः काया-कल्प एवं स्वस्थ जीवन का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
मूल्य में कमी के लिए लिखा-पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। 6 रुपये से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ। 3 रुपये से कम की वी. पी. नहीं भेजी जाती। 3 रुपये से 6 रुपये के बीच के मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च लगभग ढाई रुपये अलग।
पता-’अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
अयुतोऽह मयुतो म आत्मा
-अथर्व वेद 19/51/1
धर्मात्मा में दस हजार मनुष्यों के बराबर बल होता है।
जिसका मार्ग सचाई का है उसे कोई हरा नहीं सकता।
वर्ष-19 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-10
(प्रोफेसर मुन्शीरामजी शर्मा ‘सोम’)
सुत्रामाणं पृडितलीं द्यामनेहस सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्। दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्त्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥ (अथर्व. 7। 6। 3 ऋ. 8। 63। 10 यजु. 21।6)
आओ, छोड़ विकृत जीवन को चलें प्रकृति की ओर सखे!
दिति की दानवता को त्यागें, चलें अदिति की ओर सखे!
यह बनावटी, बहु विकारमय जीवन कितना दुखदायी,
भवसागर में हमें डुबोता इसने पशुता अपनायी;
इससे बचना है तो आओ पकड़ें दैवी नाव सखे!
स्वाभाविक जीवन अपनावें छोड़ें कृत्रिम भाव सखे!
स्वाभाविकता की यह दैवी नौका हमें बचा लेगी;
अपने विस्तृत फैले अंचल में हमको आश्रय देगी;
इससे ज्ञान-प्रकाश बढ़ेगा, कभी न होगी हानि सखे!
यहाँ पहुँचकर खुल जाएगी सुख की मंगल खानि सखे!
यह अखण्ड, परिपूर्ण, सुभग, पावन पथ पर चलने वाली,
सद्गुण के पतवार लिये है, कभी नहीं रिसने वाली॥
हो जाओ निष्पाप, बना लो स्वाभाविक जीवन प्यारे!
चाहो यदि कल्याण जगत में टूटे भव-बन्धन सारे॥
(स्वामी विवेकानन्दजी)
जिस संसार का अनुभव हम अपनी इन्द्रियों द्वारा करते हैं और जिसका बोध हमको युक्ति और बुद्धि के बल से भी होता है, उसके अतिरिक्त यह समस्त विश्व मनुष्य के लिए अनन्त, अज्ञेय और चिर अज्ञात है। इसलिए जो कुछ ज्ञान हमको धर्म के नाम से प्राप्त है उसका तत्व इस जगत में ही ढूँढ़ना होता है। जिन सब विषयों पर विचार करने से धर्म लाभ होता है, वे सब इस जगत की ही घटनाएं हैं। किन्तु धर्म स्वरूपतः अतीन्द्रिय अर्थात् आँख, कान आदि इन्द्रियों से अगोचर भूमि की वस्तु है। धर्म सब प्रकार की युक्तियों से भी बाहर है, इसलिए वह बुद्धि के अधिकार की वस्तु भी नहीं हो सकती। धर्म दिव्य दर्शन स्वरूप है। वह मनुष्य के मन में ईश्वरीय अलौकिक प्रभाव स्वरूप है। धर्म के द्वारा ही हमको अक्षय का ज्ञान होता है। हमारा विश्वास है कि मनुष्य समाज के आरम्भ से ही मनुष्य के मन में इस धर्म-तत्व की ढूँढ़-खोज चल रही है। जगत के इतिहास में ऐसा समय कभी नहीं आया, जब मनुष्य की युक्ति और मनुष्य की बुद्धि ने इस जगत के पार की वस्तु के लिए अनुसन्धान न किया हो—उसके लिए प्राणपण से यत्न न किया हो।
हमारे छोटे से ब्रह्माण्ड में—इस मनुष्य के मन में—हम देख पाते हैं कि एक विचार पैदा हुआ। वह विचार कहाँ से उत्पन्न हुआ, यह हम नहीं जानते और जब वह लुप्त हुआ, तब वह कहाँ गया यह भी हम नहीं जानते। बहिर्जगत और अंतर्जगत मानो एक ही मार्ग पर चल रहे हैं। एक प्रकार की अवस्था के भीतर से दोनों को ही मानो चलना पड़ रहा है, दोनों ही मानो एक ही सुर में बज रहे हैं।
धर्म मनुष्य के भीतर से ही उत्पन्न होता है, वह बाहर की किसी वस्तु से उत्पन्न नहीं होता। हमारा विश्वास है कि धर्म की चिन्ता मनुष्य में प्राकृतिक है, वह मनुष्य के स्वभाव के साथ इस प्रकार मिली हुई है कि जब तक मनुष्य देह, मन को त्याग नहीं देता तब तक वह चिन्ता से भी मुक्त नहीं हो सकता और तब तक उसके लिए धर्म-त्याग असम्भव है। जितने दिन मनुष्य में विचार-शक्ति रहेगी, उतने दिन यह यत्न भी चलेगा और उतने दिन किसी न किसी आकार में वह स्थिर रहेगा ही। इसीलिए हमें जगत में नाना प्रकार के धर्म दिखाई देते हैं। यह सत्य है धर्म की आलोचना करते समय हम अनेक बार भ्रम में पड़ जाते हैं, पर जैसे कुछ लोग इसे एक कल्पनामात्र कहते हैं, वह कथन ठीक नहीं है। धर्म के विभिन्न दिखलाई पड़ने वाले स्वरूपों के भीतर भी एक सामञ्जस्य पाया जाता है।
वर्तमान समय का सबसे प्रधान प्रश्न यह है कि यदि अज्ञेय अज्ञात की बात को ठीक भी मान लिया जाय तो भी उसका तत्व जानने की आवश्यकता ही क्या है? हम जो कुछ जान रहे हैं-देख रहे हैं, उसी से संतुष्ट क्यों न रहें? अगर हम खाना, पीना, सोना ही करें और साथ ही समाज के कल्याण का कुछ कार्य करते रहें और अज्ञात और अज्ञेय को यों ही छोड़ दें, तो इसमें क्या हर्ज है? इस प्रकार का मनोभाव आज सर्वत्र देखने में आता है। बड़े-बड़े विश्व विद्यालयों के आचार्यों से लेकर बिना सिर-पैर की बात करने वाले लड़कों तक के मुँह से ऐसी बातें जानने में आती हैं। जगत का उपकार करो यही धर्म है—जगत से अतीत—जगत से बाहर की सत्ता की समस्या को लेकर अस्थिर होने से कोई लाभ नहीं। यह विचार आजकल इतना अधिक प्रबल हो गया है कि लोगों ने इसे स्वतःसिद्ध सत्य मान लिया है।
पर हम उस जगदतीत सत्ता के विरुद्ध कितना भी विरक्तता का भाव प्रकट क्यों न करें उसके तत्व का अनुसन्धान किए बिना हमारा अस्तित्व ही नहीं रह सकता, हम जीवित भी नहीं रह सकते। इसका कारण यह है कि वर्तमान में जो जगत हमको दिखाई पड़ रहा है वह व्यक्त-जगत उसी अव्यक्त का एक अंश मात्र है। यह पंचेन्द्रिय के द्वारा अनुभूत जगत मानो उसी अनन्त आध्यात्मिक जगत का एक क्षुद्र अंश स्वरूप है, जो हमारी इन्द्रिय अनुभूति की भूमि पर आ पड़ा है। इसलिए उस अतीत जगत को बिना जाने किस प्रकार उसके इस क्षुद्र अंश की व्याख्या हो सकती है, इसे जाना जा सकता है-समझा जा सकता है? कहा जाता है कि सुकरात एक दिन एथेन्स में वक्तृता दे रहे थे, ऐसे समय उनसे एक ब्राह्मण की भेंट हुई, जो भारत से यूनान में पहुँच गए थे। सुकरात ने कहा—”मनुष्य को जानना ही मनुष्य जाति का सर्वोच्च कर्त्तव्य है—मनुष्य ही मनुष्य के लिए सर्वोच्च आलोचना की, विचार करने की वस्तु है।” यह सुनकर ब्राह्मण ने तुरन्त उत्तर दिया-”ईश्वर को जब तक आप नहीं जान लेते हैं, तब तक मनुष्य को किस प्रकार जान सकते हैं?” यही ईश्वर अथवा अनन्त अज्ञात तत्व ही सब प्रकार की समस्याओं का एकमात्र व्याख्या स्वरूप है। चाहे जिस वस्तु की बात लीजिए-सम्पूर्ण भौतिक जगत की बात लीजिए-अथवा भौतिक विषयों में रसायन, पदार्थ विद्या, गणित-ज्योतिष या प्राणी तत्व विद्या की बात लीजिए-उसकी विशेष रूप से आलोचना कीजिए तो आप क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म, अति सूक्ष्म पदार्थों की तरफ अग्रसर होते जायेंगे और अन्त में आप ऐसे स्थान में पहुँचेंगे जहाँ इन भौतिक—जड़ पदार्थों को छोड़कर अभौतिक या अजड़ में आना पड़ेगा। सभी विद्याओं में स्थूल क्रमशः सूक्ष्म में मिल जाता है, विज्ञान की खोज दर्शन-शास्त्र में परिवर्तित हो जाती है।
इस प्रकार मनुष्य को विवश होकर जगदतीत सत्ता की आलोचना में उतरना होता है। यदि हम उसे जान न पायें तो जीवन मरुभूमि बन जायगा, मानव-जीवन वृथा होगा। यह बात केवल कहने में ही अच्छी लगती है कि वर्तमान में जो देख रहे हो वह सब लेकर ही तृप्त रहो। गाय, कुत्ते और अन्यान्य पशुगण इसी प्रकार वर्तमान के द्वारा ही संतुष्ट रहते हैं और इसी कारण वे पशु बने हैं। इसलिए यदि मनुष्य भी केवल वर्तमान (सामने दिखाई पड़ने वाली वस्तुओं)को लेकर ही संतुष्ट रहे और जगदतीत सत्ता का अनुसन्धान करना एक दम छोड़ दे, तो मानव-जाति को फिर से पशु की भूमि में—पशु की स्थिति में आना होगा। धर्म-जगदतीत सत्ता का अनुसन्धान ही—मनुष्य और पशु में अन्तर पैदा करता है।
धर्म बढ़िया खाने पीने में अथवा सुन्दर घरों में रहने में नहीं है। आप अनेक लोगों को यह कहते सुनेंगे—”धर्म के द्वारा क्या उपकार हो सकता है? वह क्या गरीब और भूखे का पेट भर सकता है?” मान लीजिए धर्म किसी की गरीबी या दरिद्रता दूर नहीं कर सकता, तो क्या वह इसी से असत्य सिद्ध हो गया? मान लीजिये आप गणित-ज्योतिष शास्त्र के किसी बड़े सिद्धान्त को प्रमाणित करने का यत्न कर रहे हैं कि एक बालक उसे सुनकर प्रश्न करता है—”इससे क्या मिठाई मिलती है?” आपने उत्तर दिया कि “नहीं, इससे मिठाई नहीं मिलती।” तब बालक कह उठा—”तो यह सिद्धान्त किसी काम का नहीं।” बालक अपनी दृष्टि से—अर्थात् किस वस्तु से कितनी मिठाई मिलती है—इस हिसाब से ही समस्त जगत का निर्णय कर लेते हैं। जो लोग अज्ञान से घिरे होने के कारण बालकों की तरह हैं, उनका विचार भी जगत के सम्बन्ध में बालकों जैसा ही होता है। पर एक छोटी वस्तु की दृष्टि से बड़ी वस्तु का विचार करना कदापि उचित नहीं होता। प्रत्येक विषय का विचार उसकी गुरुता के हिसाब से करना पड़ेगा। अनन्त का विचार अनन्त की गुरुता के हिसाब से करना होगा। धर्म मानव-जीवन का सर्वांश है, केवल वर्तमान नहीं, वह भूत, भविष्यत्, वर्तमान अर्थात् सर्वव्यापी है। अतएव क्षणिक मानव-जीवन के सम्बन्ध में उसके कार्य को देखकर उसका मूल्य स्थिर करना, उसका निर्णय कर देना कदापि न्याय-संगत नहीं है।
अब प्रश्न होता है कि क्या धर्म के द्वारा वास्तव में कोई फल होता है? हाँ होता है, उससे मनुष्य अनन्त जीवन प्राप्त करता है। मनुष्य जो कुछ वर्तमान में है, वह इस धर्म की ही शक्ति से हुआ है और उससे ही वह मनुष्य से देवता बनेगा। धर्म यही करने में समर्थ है। मानव-समाज से धर्म को हटा दीजिए। फिर क्या शेष बचेगा? ऐसा होने पर संसार हिंसक जन्तुओं से घिरा एक घोर जंगल बन जायगा (जैसा आजकल स्पष्ट दिखलाई पड़ रहा है।) इन्द्रिय-सुख, मनुष्य-जीवन का लक्ष्य नहीं है, ज्ञान ही सब प्राणियों का लक्ष्य है। हम देखते हैं कि पशु इन्द्रिय-सुख में जितनी प्रीति, सुख अनुभव करते हैं, मनुष्य अपनी बुद्धि-शक्ति की परिचालना में उसकी अपेक्षा कहीं अधिक उच्चकोटि का सुख अनुभव कर लेता है और हम यह भी देख सकते हैं, कि बुद्धि और विचार-शक्ति की परिचालना की अपेक्षा भी मनुष्य आध्यात्मिक विषयों से और भी गम्भीर सुख बोध कर लेता है। इसलिए अध्यात्मज्ञान को निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान कहना होगा। यह ज्ञान लाभ होने से ही साथ-साथ आनन्द भी प्राप्त होगा। इस जगत की सब वस्तुएं उस प्रकृत ज्ञान और आनन्द की छाया मात्र हैं—उससे तीन-चार दर्जे नीचे की चीजें हैं।
(“एक प्रतिष्ठा त्यागी सन्त”)
गीता में योग को कर्म की कुशलता कहा गया है। जिस उपाय से कर्म (इष्ट) सहज सुन्दर स्वाभाविक रूप से सिद्ध हो सके और साथ ही वह बन्धन का कारण न हो उसी का नाम योग है—”योगः कर्म सुकौशलम्”। प्राचीनकाल में ऋषिकुमार यज्ञ के लिए कुश बटोर कर लाने को जाया करते थे। उसमें तीन श्रेणी के बालक होते थे। एक श्रेणी के बालक उखाड़ भी लाते और उनका हाथ भी न कटता। दूसरी श्रेणी के कुश उखाड़ते समय अपना हाथ काट लेते थे और तीसरी श्रेणी के बालक हाथ कटने के भय से अपने अन्य साथियों से माँगकर काम चला लेते। “कुशं लाति इति कुशलः”—कुश ले भी आते हैं और अपना हाथ भी नहीं काटते अर्थात् जो संसार के सब काम भी करते हैं पर उसकी माया में बद्ध नहीं होते वे ही कुशल हैं। उनके इस भाव को ही कौशल या योग कहते हैं। इस कुश एकत्र करने की प्रणाली को संसार के कर्म-काण्ड के प्रतीक के रूप में लिया जा सकता है। जो लोग संसार में अनासक्त, निर्लिप्त रहकर, फलाकाँक्षा रहित हो, संसार के सब कर्म सम्पादित कर सकते हैं, वे ही योगी हैं। जो लोग संसार में कर्म करते हुए, संसार की चोटों से घायल हो जाते हैं वे संसारी हैं और जो संसार को दुख, कष्ट, बन्धन का कारण समझकर संसार से दूर रहते हैं और दूसरों के कर्मफल के ऊपर निर्भर करते हैं वे भिक्षुक या संन्यासी श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। कहना न होगा कि यहाँ पर गीतोक्त संन्यासी की बात न कहकर साधारण वेशधारी संन्यासियों का ही जिक्र किया गया है।
‘योग‘ शब्द का दुरुपयोग
“कर्म की निपुणता योग है” इस भाव से ‘योग‘ शब्द कितने प्रकार से देश और भाव-राज्य के पतन के साथ नीचे गिर गया है और कितने विकृत अर्थ में इसका प्रयोग होने लगा है, यह भी यहाँ पर विचारणीय है। वर्तमान समय में ऐंद्रजालिक कौशल (जादू आदि) भी योग का अंग समझा जाने लगा है। मारण, उच्चाटन, वशीकरण आदि की ओर ही आजकल के योगियों का विशेष ध्यान रहता है। किसी प्रकार की कोई अस्वाभाविक क्रिया दिखाने वालों को ही आजकल सब लोग योगी समझ लेते हैं, उनकी भक्ति करते हैं और ठगाते हैं। ताबीज, कवच आदि के द्वारा जो लोगों के कर्मफल को खण्डन करने का ढोंग करते हैं, जो बन्ध्या को पुत्र प्राप्ति की दवा देते हैं और रोगियों का रोग बिना चिकित्सा के ही दूर करने की बात करते हैं, वे भी आजकल योगी कहे जाते हैं और पूजित होते हैं। प्राचीनकाल में जिनके हाथ ऊंचे रहकर भगवत्-कार्य करने में ही लगे रहते थे वे ही ऊर्द्धबाहु होते थे। आजकल जो लोग भगवदुद्देश्य की अवहेलना करके, प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करके दोनों हाथों को निरन्तर ऊपर उठाकर सुखा डालते हैं, वे ही ऊर्द्धबाहु योगी माने जाते है! प्राचीन समय में योगी धारणा, ध्यान, समाधि में इतने तन्मय हो जाया करते थे कि शरीर की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता था, उनके बालों की जटाएं बँध जातीं, शरीर पर धूल, मिट्टी आदि आकर जम जाती। आजकल उसकी जगह बड़ के दूध इत्यादि से ताबड़तोड़ जटा बना ली जाती हैं और शरीर में मिट्टी, राख आदि मलकर योगी का स्वाँग बना लिया जाता है और भोले लोग भी यह देखकर वशीभूत हो जाते हैं। बड़े-बड़े शहरों में जब घर के मालिक आफिस या बाजार चले जाते हैं तब जाने कितने पाखण्डी धूर्त योगी की पोशाक गेरुआ वस्त्र, आदि धारणकर, गृहस्थों के घर में जाकर, भोली स्त्रियों पर अपना प्रभाव जमाकर, छल, बल, कौशल से, कितने प्रकार से धन ठगते हैं उस बात का खयाल आने से मर्माहत होना पड़ता है। आजकल ऐसे धूर्त योगियों की संख्या और प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई है कि इनके कारण वास्तविक योगियों ने लोकालय और प्रसिद्ध तीर्थों आदि से दूर जाकर रहना आरम्भ कर दिया है और गृहस्थ नकली योगियों द्वारा ठगे जा रहे हैं। भीतर से भगवत्प्राप्ति जनित ब्रह्मानन्द के नशे में विभोर न होकर आज के बने हुए योगी मदिरा, गाँजा, भाँग आदि नशीली चीजों को साधना का अंग कहकर उनका प्रचार करते है। यहाँ तक कि देवाधिदेव महादेव के हाथों में भी उन्होंने संकोच छोड़कर अब सिद्धियों के बदले भाँग का लोटा और गाँजे की चिलम दे दी है!
यथार्थ योग के प्रचार की आवश्यकता
देश और लोगों के मनोभाव के पतन के साथ-ही-साथ सभी बातों में कुछ विकृति आ जाती है। वर्तमान समय में उसमें उचित संशोधन की आवश्यकता है। योगादि साधन-प्रणाली के अन्दर जब बहुत से उत्तम तत्व निहित हैं, उसकी सहायता से जब स्वास्थ्य-प्राप्ति, एकाग्रता शाँति, आनन्द-प्राप्ति, उन्नति-प्राप्ति, भगवद्दर्शन, भगवत्-प्राप्ति जीव का कल्याण-साधन आदि कार्य सहज, सुन्दर और स्वाभाविक रूप से साधित होने की सम्भावना है, तब इस योग-साधन-प्रणाली का संशोधन करने, इसकी उन्नति का उपाय करने, इसकी शिक्षा देने तथा सर्वसाधारण के सामने योग के उदार मत और भाव उच्च आदर्श रखने की विशेष आवश्यकता है। यह सर्वसाधारण को समझा देना होगा कि वास्तविक योग क्या है? वह कितने रूपों में विभक्त है? उसकी साधन-प्रणाली क्या है? किस तरह संसार के जीवों के हित-साधन में-उन्हें आनन्द प्रदान करने में इसका प्रयोग किया जा सकता है। कर्मयोगी किस प्रकार कर्म के रहस्य को समझकर अनासक्त , निष्काम, फलाकाँक्षा से रहित होकर केवल भगवत्प्रीति के लिए कर्म किया करते हैं, यह सुन्दर रूप से समझा देना होगा। ज्ञानयोगी इन्द्रियों को संयत करके, चित्त को शुद्ध और शाँत करके स्वरूप प्रतिष्ठ, आत्मभाव में स्थित होकर किस प्रकार समाधि-योग द्वारा परमात्मा में तन्मय हुए रहते हैं, यह भी समझ लेना होगा।
साधन-राज्य के योग-तत्व का अर्थ यही है कि हमारे भीतर भगवान की अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान, अनन्त प्रेम और आनन्द निहित है। हमारी कामना, वासना, आसक्ति, हमारी अज्ञानता, हमारे कुसंस्कार, हमारा स्वार्थ, आत्म-सुख की स्पृहा, अहंकार और प्रतिष्ठा का मोह आदि उस भगवत् शक्ति के विकास में बाधा पहुँचाते हैं। अतएव हम जितना ही इन सब बाधाओं से मुक्त, शुद्ध, शाँत, पवित्र होंगे उतने ही भगवत्-भाव हमारे अन्दर प्रकाशित होंगे और हम साधन राज्य में सफलता प्राप्त करेंगे।
(श्री जगतनारायणलाल)
किसी धर्म के जीवित या निर्जीव होने का, किसी धर्म की गुरुता और लघुता का पता उस धर्म पर चलने वालों के जीवन से चलता है। अगर इस कसौटी पर आज हिन्दू धर्म को कसा जाय तो स्पष्ट रूप से जान पड़ेगा कि आज हमारे धर्म का कैसा घोर पतन हुआ है। एक समय था जब हमारे यहाँ धर्म का सच्चा प्रचार था, जब धर्म ही जीवन था। पर अभी कुछ ही वर्ष पहले ऐसा भी समय आ गया जब पढ़े-लिखे विद्वान् हिन्दू, अपने को हिन्दू कहने में शर्माते थे। विदेशी लोग हिन्दू-धर्म को जंगली, असभ्य लोगों का प्रारम्भिक धर्म बतलाते थे। भगवान की असीम दया से वह समय बदल गया है और अब विदेशियों का भाव हमारे धर्म के सम्बन्ध में बिल्कुल दूसरा हो गया है। आज सारे संसार में इस धर्म की महत्ता, गम्भीरता और सत्यता की चर्चा है। वे ही विदेशी जो एक समय इसकी इतनी निन्दा करते थे। आज इसकी ओर श्रद्धा और भक्ति की दृष्टि से देखते हैं और भारतवर्ष को तीर्थ स्थान समझते हैं। पर हम हिन्दुओं ने क्या किया? ध्यान से देखा जाय तो हम जहाँ थे वहीं पड़े हैं। समय का प्रवाह सारी मनुष्य जाति को आगे की ओर बढ़ाये लिये चला जाता है, पर हिन्दू जाति अभी तक अजगर की तरह निष्क्रिय और बेखबर पड़ी है। हमारे जीवन में धर्म के वास्तविक तत्वों का उपयोग नहीं हो रहा है। हम आँख बन्द किये बिना सोचे समझे केवल लकीर के फकीर बने हुए हैं। धर्म को हमने बच्चों का खेल बना रखा है।
सोचने की बात है कि हमारे धर्म का बड़प्पन किस बात में है? क्या कारण है कि जिसे दूसरे देश और दूसरे धर्म वाले पहले घृणा और अवहेलना की दृष्टि से देखते थे, वे ही पीछे उसे श्रद्धा के भाव से देखने लगे? इसका खास कारण यही है कि जीवन सम्बन्धी प्राकृतिक स्वाभाविक नियमों का जितना खजाना हिन्दू-धर्म की पुस्तकों में आज भी वर्तमान है उतना अन्य धर्म की प्रचलित पुस्तकों में नहीं पाया जाता। इसका यह मतलब नहीं कि अन्य धर्म की पुस्तकों में सत्य अथवा ईश्वरोपासना का मार्ग नहीं है। प्रत्येक धर्म अपनी-अपनी जगह पर ठीक है। प्रत्येक में सत्य है। पर हिन्दू-धर्म में जीवन सम्बन्धी प्राकृतिक नियमों का वर्णन विशेष अंश में और बहुत अधिक विस्तार से किया गया है।
हम प्रायः ऐसी बातें सुन कर फूल जाया करते हैं और समझने लगते हैं कि हमसे बढ़कर कौन है, क्योंकि हमारा धर्म तो सबसे बढ़ कर है! यह हमारी भूल है। धर्म की एक-दूसरे के साथ तुलना करके एक को बड़ा और दूसरे को छोटा बतलाना समझ की गलती है। वास्तव में सभी धर्म अपनी-अपनी जगह और अपनी परिस्थितियों में सही हैं। इसलिए फूलने या घमण्ड करने की कोई बात नहीं है। वास्तव में धर्म तो हमारा वही है जिसको हम जीवन में बर्तते हों। जो सिद्धान्त या जो आदर्श केवल किताबों में लिखे हैं और जिनका हमारे जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं, उन पर गर्व करना व्यर्थ है।
एक बात और देखने की यह भी है कि प्रत्येक प्राकृतिक नियम शक्ति का एक-एक अस्त्र है। यह एक साधारण कहावत है कि ‘ज्ञान शक्ति है’। तो क्या हिन्दू धर्म के महान प्राकृतिक-नियमों के कारण हमारी शक्ति उसी परिणाम में बढ़ी हुई है? नहीं हमारी तरह शक्ति हीन अथवा निःस्वत्व गति संसार में कदाचित् ही दूसरी होगी। इसका प्रधान कारण यही है कि हमने धर्म को अर्थात् प्राकृतिक नियमों को जीवन से अलग हटा रखा है। सत्य, ब्रह्मचर्य, त्याग, परोपकार आदि की महिमा तो हम बराबर सुनते और कहते रहते हैं, पर इनका प्रयोग अपने जीवन में कितने आदमी, कितने परिणाम में करते हैं, यह हमसे छिपा नहीं है।
फिर भी परम्परा से ये नियम हमारे रक्त में समा गये हैं, अंग-अंग में प्रवेश कर गये हैं। किसी साधारण अनपढ़ आदमी के पास चले जाइये, वह भी ईश्वर, पुनर्जन्म, कर्म इत्यादि महान सत्यों की चर्चा साधारण बोलचाल में नित्य करता पाया जायगा। वह इनमें से किसी के महत्व को नहीं जानता, लेकिन यह बातें उसके रक्त -माँस में समा गई हैं। समझे या न समझे, पर वह अपने को इनसे अलग नहीं कर सकता। इनमें से एक-एक नियम का ज्ञान ऐसा शक्ति शाली है कि ठीक से समझ में आ जाने पर वह सारे जीवन को बदल देता है, सारी दुनिया को पलटने की शक्ति रखता है। दूसरे देश वाले इसी बात को देखकर दंग रहते हैं कि भारत का एक साधारण से साधारण आदमी जीवन के इन गहन सिद्धान्तों को कैसे जानता है? इन सिद्धान्तों का थोड़ा भी ज्ञान पाकर वे जीवन में कहाँ से कहाँ पहुँच जाते है और रात-दिन इनमें रहते हुए भी हम जहाँ के तहाँ ही पड़े रहते हैं, वरन् प्रायः नीचे की ओर खिसकते रहते हैं।
वास्तविक बात यह है कि हम जीवन के साथ और जीवन के नियमों के साथ बच्चों की तरह खेल कर रहे हैं। असलियत को खो बैठे हैं और नकल करते जा रहे हैं। लेकिन गौर करने से मालूम होता है कि हमारी रीति-रिवाजों रूपी खिलौने के भीतर प्रकृति के गहन गम्भीर तत्व छिपे पड़े हैं।
हिन्दू धर्म की जो विशेषताएं बतलाई जाती हैं—चाहे वह कर्म का नियम हो, अथवा पुनर्जन्म का, अथवा वर्णाश्रम धर्म का या और कोई-वे सभी प्राकृतिक नियम हैं। इस बात को सुनकर अनेक लोग आश्चर्य करते हैं, क्योंकि हम धर्म अथवा इन नियमों के मूल तत्व को नहीं जानते और उदार भाव से देखने के बदले सभी वस्तुओं को संकीर्ण दृष्टि से देखा करते हैं। हमारे आश्चर्य चकित होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि हम इन्हीं बातों को हिन्दू-धर्म का प्रधान स्तम्भ समझते हैं और इसलिए ऐसा सोचते हैं कि इन्हीं के कारण हिन्दू धर्म अन्य धर्मों से भिन्न और विशिष्ट बना हुआ है। यदि हम इन बातों को प्राकृतिक अथवा स्वाभाविक मान लें तो हमारे धर्म की विशेषता अविलम्ब ही नष्ट हो जायगी। पर हम यह नहीं समझते कि इसी संकीर्णता के कारण हम अपने धर्म के महान सत्यों को समझने से और समझकर उनको व्यवहार में लाने से वंचित रह जाते हैं। इन सत्यों को ठीक से समझने के लिए सबसे पहले हृदय में उदारता और मन में निष्पक्षता के भावों को लाना आवश्यक है। यदि हम ऐसा कर सकें तो आगे चलकर हमको जान पड़ेगा कि हमसे हमारे धर्म की कोई क्षति नहीं हुई वरन् उसका महत्व ही बढ़ता है।
इसलिए हमको निश्चित रूप से यह समझ लेना चाहिए कि जिस प्रकार आकर्षण, विद्युत, चुम्बक आदि के वैज्ञानिक नियम सभी देश वालों में समान रूप से सत्य हैं उसी प्रकार हिन्दू-धर्म के मूल सिद्धाँत भी पूर्णतः व्यापक हैं, अर्थात् देश और काल इनको बाधित नहीं कर सकते। कोई जाने अथवा न जाने-किसी धर्म ग्रन्थ में इनका जिक्र हो या न हो-ये बराबर एक भाव से अपना कार्य करते रहते हैं। जिस प्रकार भिन्न-2 देशों में किसी प्राकृतिक नियम विशेष का वैज्ञानिक आविष्कार आगे-पीछे होता रहता है, उसी प्रकार इन सत्य सनातन नियमों का जिक्र कहीं आगे आता है, कहीं पीछे आता है। दुःख की बात तो यह है कि साधारण प्राकृतिक वस्तुओं जैसे, हवा, पानी, प्रकाश, आकाश आदि को तो हम अपना अथवा दूसरे का नहीं समझते, लेकिन जहाँ जीवन सम्बन्धी अत्यन्त गहन गम्भीर प्राकृतिक नियमों का सवाल आता है, वहाँ उनको अपना और दूसरे का समझने लगते हैं।
वास्तव में अन्धविश्वास बड़ा हानिकार होता है। जो धर्म को नहीं जानता उसका सुधार धर्म का नाम लेकर और ज्ञान कराके किया जा सकता है। पर जो धार्मिक नियमों को उलटा पुलटा समझकर उसी को अपना धर्म बना लेता है, उसका सुधार अत्यन्त कठिन है और हम हिन्दुओं की ऐसी ही दुर्दशा है। हमारी पुस्तकें जीवन के गहन से गहन नियमों से भरी पड़ी हैं, पर उनका यथार्थ ज्ञान हमको नहीं है। उन्हीं का कुछ उलटा-पुलटा अर्थ निकालकर हमने रस्म-रिवाज कायम कर लिए हैं। इन्हीं रस्मों-रूढ़ियों को हम आज हिन्दू-धर्म समझ रहे हैं। अधिकाँश क्या प्रायः सभी धार्मिक झगड़े इन्हीं नासमझियों तथा अन्धविश्वासों के कारण होते हैं। इस प्रकार धर्म ही के नाम पर धर्म का नाश किया जा रहा है।
(श्री राधाकृष्ण बजाज)
गोरक्षा हिन्दू धर्म की मुख्य वस्तु है। गोरक्षा मुझे मनुष्य के सारे विकास-क्रम में सबसे अलौकिक चीज मालूम हुई है। मुझे तो यह भी स्पष्ट दीखता है कि भारत में गाय को ही देवभाव क्यों प्रदान किया गया है। इस देश में गाय ही मनुष्य का सबसे सच्चा साथी, सबसे बड़ा आधार थी। यह भारत की एक कामधेनु थी। यह सिर्फ दूध देने वाली ही न थी, बल्कि सारी खेती का आधार स्तम्भ थी।
गाय दया धर्म की मूतिमंत कविता है। इस गरीब और सीधे पशु में हम केवल दया ही उमड़ती देखते हैं। यह लाखों, करोड़ों भारतवासियों को पालने वाली माता है। इस गाय की रक्षा करना, ईश्वर की समस्त मूक सृष्टि की रक्षा करना है। वर्तमान समय में गोरक्षा का प्रश्न बड़ा विवादग्रस्त बन गया है और जो लोग केवल धर्म-शास्त्रों के वाक्यों पर श्रद्धा रखने को तैयार नहीं, वे परिस्थिति और उपयोगिता की दृष्टि से ही इस प्रश्न पर विचार करना चाहते हैं। इस दृष्टि से इस विषय की आलोचना करने से हमको प्रतीत होता है कि गोरक्षा की मौजूदा प्रणाली में कुछ संशोधन करना अनिवार्य है अन्यथा हम उसकी रक्षा कर सकने में असमर्थ होंगे।
हम यह तो स्वीकार करते हैं कि गोवध-बन्दी सम्पूर्ण होनी चाहिए। उसे आँशिक या उपयोगी गायों तक सीमित रखने से काम नहीं चलेगा। गौरक्षा और सम्पूर्ण गौ-वध बन्दी भारतीय संस्कृति का एक अपरिहार्य अंग है। भारत कभी गौ-वध सह नहीं सकेगा। गौ से मेरा मतलब गाय, बैल, बछड़े-सम्पूर्ण गौ-वंश से है। उपयोगी पशुओं की रक्षा की दृष्टि से भैंस, घोड़े आदि अन्य उपयोगी पशुओं का कत्ल बन्द करने के लिए स्वतन्त्र कानून बनाना पड़े, तो उसमें कोई आपत्ति नहीं। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि वह गौ-वध रोकती है। विश्व शाँति के लिए यह आवश्यक है कि स्वार्थ-परायणता घटे और कृतज्ञता व सेवापरायणता बढ़े। भारतीय संस्कृति ने गौरक्षा द्वारा मानव को इस ओर ले जाने का प्रयत्न किया है। गौ-वध रोकना दूसरे शब्दों में मानवता की रक्षा करना है। जन्म देने वाली माता तो केवल साल भर दूध पिलाती है, लेकिन गौ-माता तो जन्म भर पिलाती है। बिना लोहे व कारखाने के बैल, एक ऐसा इञ्जिन है, जो बिना तेल के स्थानीय घास पर चलता रहता है। गाय ऐसी खाद देती है, जो हजारों वर्षों से हमारी जमीन की उपजाऊ शक्ति कायम रखती आ रही है। ऐसी परोपकारी गाय को हम कम से कम सम्मान दें, तो भी माँ से कम नहीं मान सकते। गाय जीवन भर हमको उत्पादन देती है। जिसने अपने जीवन में हमें हजारों का लाभ दिया, वही बुढ़ापे में साल, दो साल बैठकर अपनी मौत मरना चाहती है। उस समय भी वह खाद तो देती ही रहेगी। फिर भी उस अर्से में सौ दो सौ रुपया खर्च होगा। उसकी कमाई में से होने वाले इस खर्चे को बचाने के लोभ से उसके कत्ल का विचार करना मानवता से गिरना है। मनुष्य केवल अर्थ के बल पर नहीं जीता। भावना का उसके जीवन पर भारी असर होता है। भावना के लिए मनुष्य ही नहीं, राष्ट्र के राष्ट्र मर मिटते हैं। गौ-वध बन्दी के लिए भावना का होना पर्याप्त कारण मानना चाहिए।
भैंस या बकरी का कत्ल रोकने का कानून बनाने की सिफारिश हम इसलिए नहीं करते कि इनके वंश को बचाना हमें संभव नहीं दीखता। उनके नरों से काम नहीं लिया जाता। जिनसे काम नहीं लिया जाता, उनको हमेशा खाना देना मनुष्य के लिये संभव नहीं हो सकता। गाय के नर-मादा दोनों से हम काम लेते हैं। इसलिए उसे बचाना संभव माना गया है। गो दूध, गो घृत मनुष्य के लिये सर्वोत्तम हैं। गोवध-बन्दी के बाद जो समस्याएँ खड़ी होंगी उनको हल करने के लिये हमारे सुझाव इस प्रकार हैं :—
(क) जंगली गाय (ख) आवारा गाय और (ग) कम दूध देने वाली गाय, इन तीनों श्रेणियों के गाय बैलों, दोनों से खेती जोतने का उनकी शक्ति के अनुसार हलका या भारी काम लिया जाय। (घ) बूढ़े गाय-बैलों को जो चल फिर कर खा सकते हैं गो-सदन में भेज दिया जाय (च) अपंग गाय-बैलों को पिंजरा पोलों या गोरक्षण संस्थाओं में भेज दिया जाय। (छ) बेकाम साँड़, जो धार्मिक दृष्टि से छोड़े हों या वैसे ही घूमते हों, पर जो नस्ल सुधारने के लिये उपयोगी न हों, उन्हें बधिया बनाकर काम में ले आना चाहिये। बूढ़े हों तो उनको गोसदन में भेज देना चाहिये।
गाय को जोतने के विषय में लोगों की भावना जागृत करनी होगी। जब लोग देखेंगे कि बिना काम लिये गाय को खाना देना या उसकी जान बचा सकना संभव नहीं, तो वे काम लेने को तैयार हो जायेंगे। आज पुराने जमाने की तरह जन संख्या को ध्यान में रखकर थोड़ी जमीन से ही काम निभाना होगा। मैसूर स्टेट में आज भी गायों से खेत जोतने का काम लिया जाता है।
हिन्दू-धर्म और आज के हम हिन्दू, इनमें फर्क करना होगा। हिन्दू-धर्म की भावना गो रक्षा के लिये अत्यन्त तीव्र है। लेकिन आजकल के जमाने में हमारा नैतिक स्तर ही नीचे गिर गया है। इस कारण सभी बातों में ढिलाई आ गई है। इसका इलाज है पूरे देश के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाना। देश में आज जो भूदान आन्दोलन चल रहा है, वह देश का नैतिक स्तर ऊँचा उठाने में सहायक होगा, ऐसी आशा है।
हम किसी भी तरीके के गो-टैक्स या पशु-सेस को उचित नहीं समझते। आज खुशी से पुरानी गो-शालाओं की जो लाग-बाग चालू है उसी को कानूनी बनाकर सब मंडियों पर लागू करना काफी है अनुत्पादक गाय से उसकी शक्ति के अनुसार काम लेने में कोई हर्ज नहीं मानना चाहिये। आज के जमाने में बिना काम लिये खाना देना संभव नहीं है। अनुत्पादक गाय से काम नहीं लिया जायगा, तो उसको बचा सकना संभव न होगा।
हम देखते हैं कई विद्वान् गाय के हित में ही गोवध जारी रखना ठीक बतलाते हैं। वे समझते हैं कि गोवध चालू रहा तो गाय की हालत अच्छी रहेगी और गोवध बन्द होने से हालत एक दम बिगड़ जायगी। उनकी सद्भावना की हम कदर करते हैं। फिर भी वे सोचें कि आज जब 150 वर्ष से अबाध गोवध जारी है, तो क्या गाय की हालत सुधरी या बिगड़ी? 150 वर्ष तक गोवध कायम रख कर भी जब गाय की हालत बिगड़ती गई, तो अब गोवध बन्द करके देश की भावना को तो संतोष दीजिये। जहाँ इतनी हालत बिगड़ी है वहाँ थोड़ी और बिगड़ जावेगी, इससे ज्यादा क्या होना है? वास्तव में देखा जाय तो गाय की हालत सुधरने या न सुधरने का आधार केवल गोवध या गोवध-बन्दी नहीं है। उसका आधार है गोपालन के विधायक तरीके। देश की भावना की कद्र करके हमें सम्पूर्ण गोवध बन्द करना चाहिए और उससे पैदा हुई सद्भावना को बटोर कर उसके द्वारा विधायक गोपालन से गाय की व भारत की दशा सुधारनी चाहिए।
(श्री विष्णुदत्त खन्ना, दिल्ली)
आजकल यह चर्चा है कि मानवता क्षीण होती जा रही है और स्वार्थ बढ़ रहा है। कोई किसी की नहीं सुनता! ज्ञान का कोई सम्मान नहीं, अज्ञान रूपी अन्धकार बढ़ रहा है। मानव दुख, रोग आदि वृत्तियों के दल-दल में फँसा हुआ है। उससे निकलने की चेष्टा तक भी नहीं करता। चिन्ता ही मानव को प्रिय है और अधोगति की ओर प्रस्थान है।
प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों? इसका कारण हमारी सबसे बड़ी भूल है कि हम इस पंच भौतिक शरीर को ही अपना जीवन समझ बैठे हैं। इसकी पुष्टि के लिये ही सब साधन एकत्रित किये जाते हैं। किन्तु यह शरीर हमारा जीवन नहीं। यह तो एक जड़ वस्तु है जो पाँच भूतों से बनी है। जड़ वस्तु प्रायः निष्प्रभ और अन्धकारमय होती है और जड़ वस्तु को जीवन मानना जड़ ही बनाता है। जड़ बनना अन्धकार की ओर अग्रसर होना है। यही मानव की बड़ी भारी भूल है जिसके कारण वह अनर्थ करता है अत्याचार करता है। स्वार्थ रूपी दल-दल में फँसकर अज्ञान रूपी अन्धकार में भटकता हुआ उस जीवन-ज्योति को जो चिन्मय भगवान की प्रकाशदायिनी हमारे अन्तःकरण में स्थित है-नहीं देख पाता।
विचारणीय बात यह है कि यदि यही पंच भौतिक शरीर में जो अन्तर है वह कदापि न होता। एक शव न अपने लिये कुछ विचार सकता है न कुछ कर्म कर सकता है और न ही दुःख सुख का अनुभव करता है। यदि उसे कुछ दिन के लिये रख दिया जाये तो वह गल सड़ जाता है। शव में न कोई आशा रहती है न निराशा, न उसे भूख लगती है न प्यास। परन्तु वही पंच भौतिक शरीर जब जीवन रूपी ज्योति से सम्पन्न रहता है, तब उसका आवरण मृत शरीर से भिन्न होता है। केवल इतने से ही यदि हम विचार करें तो हमें ज्ञात होता है कि मानव जीवन यह शरीर नहीं किन्तु कुछ और है, जो चिन्मय है, चैतन्य है तथा विवेकपूर्ण है। वह जीवन ही हमारे अन्तःकरण में ज्योति बनकर इस पंच भौतिक शरीर का प्रेरक तथा चालक बना हुआ है। यह शरीर जो कुछ भी करता है उस चिन्मय ज्योति की प्रेरणा से ही करता है। यदि वह ज्योति न हो तो कोई भी कार्य करने में यह शरीर समर्थ नहीं होता।
यह पंच भौतिक शरीर तो केवल एक यन्त्र है जिसका आधार एक सूक्ष्म शरीर है और उस सूक्ष्म शरीर का आधार एक चिन्मय ज्योति है जो भगवान की मानव को एक अद्भुत तथा अनुपम देन है। यदि हम इस छोटे से तत्व को जान लें तथा पहचान लें तो हमारा जीवन काँतिमय बन जाये। अन्धकार प्रकाश में बदल जाये। स्वार्थ रूपी दलदल से हम सहज में ही निकल जायें।
जैसे मिट्टी गारे से बना मकान, उसमें रहने वाला और उसमें जो प्रकाशमय ज्योति, भिन्न-भिन्न हैं वैसे ही यह पंच भौतिक शरीर भी सूक्ष्म शरीर की क्रियाओं का क्षेत्र है और सूक्ष्म शरीर वह यन्त्र है जिससे इस क्षेत्र में क्रिया होती है और क्षेत्रज्ञ भगवान का वह दिव्य प्रकाश है जो मानव की नानाविधि लीलाओं का मूल आधार है।
जब हम इस भौतिक शरीर की पुष्टि के लिये सब साधन करते हैं जिससे कि यह क्षीण न होने पाये, तब हमारे लिये यह तो अत्यावश्यक है कि हम उस सूक्ष्म शरीर, जो इस भौतिक शरीर में काम कर रहा है—की पुष्टि की ओर भी ध्यान दें। यदि हमारा सूक्ष्म शरीर क्षीण हो जाता है तो हमारा भौतिक शरीर भी क्रियाहीन हो जाता है और हम अन्धकार में तथा स्वार्थ रूपी दलदल में फँस जाते हैं। अतः यह हमारे लिए अत्यावश्यक है कि जहाँ हम भौतिक शरीर की पुष्टि के लिए सब साधन एकत्रित करते हैं वहाँ इस सूक्ष्म शरीर की ओर भी विशेष ध्यान देते रहें।
कैसी विचित्र बात है कि हमें भौतिक शरीर के लिए जो साधन एकत्रित करने पड़ते हैं उनकी क्रियाएं अधोतम होती हैं। किन्तु इस सूक्ष्म शरीर की पुष्टि के साधन न तो पाँच भूतों में मिलते हैं और न ही इसके लिए किसी ऐसी क्रिया की आवश्यकता है जिसका सम्बन्ध संसार से हो। यह तो बाह्य जीवन से भिन्न जीवन है। इसका आहार भी सूक्ष्म ही है। आत्मा की पुष्टि तथा सूक्ष्म शरीर की पुष्टि केवल आत्मचिन्तन, विचार-विशुद्धि, भावनाओं की पवित्रता तथा भगवन्नाम के रस से ही होती है। इन साधनों की प्राप्ति के लिए न किसी धन की आवश्यकता है न किसी विशेष कर्म की। यदि आवश्यकता है तो केवल अपने ध्यान को अंतर्गत करने की, आत्म निरीक्षण की और अपने मन में भगवन्नाम की कामना उत्पन्न करने की।
यह उपर्युक्त साधन तभी प्राप्त होते हैं जब उस परम पिता सच्चिदानन्द भगवान् से सद्प्रेरणा मिलती रहे और सद्प्रेरणा को प्राप्त करने का अत्युत्तम और सुगम साधन है भगवान् की प्रेरक शक्ति माँ गायत्री की शरण लेना। हर मानव यदि यह समझ ले कि जितने साधन मैंने इस भौतिक शरीर की पुष्टि के लिये एकत्रित किये हैं यदि एक साधन-अर्थात् गायत्री माता की शरण—अपने आन्तरिक शरीर के लिये भी कर लूँ तो भगवती माँ उस परम पिता परमात्मा की प्रेरणा शक्ति मानव को स्वयमेव अन्धकार से निकाल देती है। निस्वार्थ कर देती है। जिससे आँतरिक जीवन स्वयमेव पुष्टि पाने लगता है और यह भौतिक शरीर तथा बाह्य जीवन (साँसारिक व्यावहारिक) भी पुष्टि पाते हैं।
यदि यह आन्तरिक जीवन क्षीण हो जाये तो बाह्य जीवन की पुष्टि किसी काम नहीं आती, जैसे किसी घर में कोई जीव न रहे तो वह घर टूट-फूट जाता है तथा बेकार हो जाता है। यह हमारी दूसरी भूल है जिसे हमें समझना है और हम भगवान से यही याचना करते हैं कि भगवान् की कृपा से मानव को सुबुद्धि प्राप्त हो और वह अपने आन्तरिक जीवन को पहचानकर उत्तम गति का भागी बने।
(श्री एस. बी. वर्मा)
यद्यपि वेद हिन्दू-धर्म का मूल और उपनिषद् उसके अध्यात्म ज्ञान के भण्डार जाने जाते हैं, पर वास्तव में इस समय देश में हिन्दू धर्म का जो रूप प्रचलित है उसका आधार पुराण ही हैं। वेद मुख्यतया कर्मकाण्ड का प्रतिपादन करते हैं, उपनिषदों ने ज्ञान की गंगा बहाई है और पुराणों ने भक्ति मार्ग को जन्म दिया है। आजकल की जनता कर्मकाण्ड को भूल चुकी है, ज्ञान-मार्ग पर चलना उसके लिये महाकठिन है इसलिए भक्ति का सरल और सुगम मार्ग ही साधारण लोगों के चित्त में समा गया है और वे विष्णु, शिव, गणेश, देवी, सूर्य आदि किसी देवता के साकार रूप की आराधना और नाम कीर्तन द्वारा ही धर्म साधन की चेष्टा किया करते हैं।
यह प्रसिद्ध है कि पुराण 18 हैं, इनके नाम, श्लोक-संख्या के साथ नीचे दिये जाते हैं—(1)ब्रह्म-पुराण—10000, (2)पद्म-पुराण—55000, (3)विष्णुपुराण—23000, (4)शिवपुराण—24000, (5)श्रीमद्भागवत पुराण—18000, (6)नारद पुराण—25000, (7)मार्कण्डेय पुराण—9000, (8)अग्नि पुराण—10500, (9)भविष्य पुराण—14500, (10)ब्रह्मवैवर्त पुराण—18000, (11)लिंग पुराण—11000, (12)वराह पुराण—24000, (13)स्कन्द पुराण—81000, (14)वामन पुराण—10000, (15)कूर्म पुराण—17000, (16)मत्स्य पुराण—14000, (17)गरुड़ पुराण—19000, (18)ब्रह्माण्ड पुराण—12000—कुल योग 3,95,000 है।
इनके अतिरिक्त 29 उपपुराण भी हैं जिनमें वायु-पुराण, नरसिंह पुराण, ब्रह्माँड पुराण देवी भागवत आदि का नाम प्रसिद्ध है। इनमें से कुछ पुराणों में विष्णु को प्रधान बतलाया गया है और कुछ में शिव को। सौर सम्प्रदाय वाले सूर्य को सर्वोपरि मानते हैं। इसलिए अनेक स्थलों में पुराणों में एक दूसरे का विरोध पाया जाता है और इसका एकमात्र कारण साम्प्रदायिक भेद ही जान पड़ता है।
कुछ विद्वानों का विचार है विष्णु पुराण और वामन पुराण को छोड़कर समस्त पुराणों के कई बार नये-नये संस्करण हुए हैं जिसके परिणामस्वरूप उनका कलेवर बहुत कुछ बदल गया है। इनके मतानुसार पुराणों को निम्नलिखित 6 श्रेणियों में बाँटा जा सकता है—
1—विश्वकोषात्मक पुराण :-
इस समूह में गरुड़, अग्नि और नारद पुराण आते हैं—
1—गरुड़ पुराण— इसमें 287 अध्याय हैं। पूर्व खंड में नाना विद्याओं का विस्तृत विवरण है। रत्नों की परीक्षा की विधि, राजनीति का वर्णन, आयुर्वेद के आवश्यक निदान तथा चिकित्सा, तरह-तरह के रोगों को दूर करने के लिए औषधियाँ, पशु-चिकित्सा, छन्द-शास्त्र, परलोक का वर्णन आदि विषय दिये गये हैं।
2—अग्नि पुराण—इस पुराण को यदि समस्त भारतीय विद्याओं का शब्दकोष कहा जाय तो कुछ अतिशयोक्ति नहीं है। पुराणों का एक उद्देश्य जन-साधारण में ज्ञातव्य विद्याओं का प्रचार करना भी था, इसका प्रमाण इस पुराण से मिल जाता है। मन्दिर-निर्माण, मूर्ति की प्रतिष्ठा और पूजन का विधान, ज्योतिष, धर्मशास्त्र, व्रत, राजनीति, आयुर्वेद आदि शास्त्रों का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। छन्द-शास्त्र, अलंकार शास्त्र, व्याकरण, कोष के विषय को पन्द्रह-बीस अध्यायों में समझाया गया है। योगशास्त्र के यम-नियम तथा अद्वैत वेदान्त का वर्णन खूब समझाकर किया गया है। एक अध्याय में गीता का साराँश भी दे दिया गया है। इसमें पुराण के पाँचों लक्षणों के अतिरिक्त हिन्दू साहित्य और संस्कृति के समस्त विषयों का समावेश है। इससे इस पुराण का यह दावा सत्य प्रतीत होता है कि—आग्नेये हि पुराणोऽस्मिन सर्वा विद्याः प्रदर्शिता।” (383।52)
3—नारद पुराण— इसके पूर्व भाग में वर्ण और आश्रम के आचार, श्राद्ध, प्रायश्चित आदि का वर्णन किया गया है। इसके अनन्तर व्याकरण, निरुक्त , ज्योतिष, छन्द, आदि शास्त्रों का अलग-अलग एक-एक अध्याय है। विष्णु, राम, हनुमान, कृष्ण, काली, महेश के मन्त्रों का विधिवत् निरूपण किया गया है। इसके सिवा अठारहों पुराणों की विस्तृत विषय-सूची दी गई है, जो सभी पुराणों का साराँश जानने के लिए अत्यन्त उपयोगी है।
2—तीर्थ और व्रत विषयक पुराण :-
4—पद्मपुराण— इसकी प्रतिष्ठा वैष्णवों में बहुत है। इसमें पाँच खण्ड हैं—सृष्टि-खंड, भूमिखंड, स्वर्ग-खंड, पाताल खंड और उत्तर खंड। सृष्टिखंड में संसार की उत्पत्ति का सविस्तार वर्णन है। भूमि खंड में बैकुण्ठ लोक-वर्णन, परलोक साधन, परलोक वर्णन, प्रलय लक्षण आदि है। पाताल खंड में रामचरित और कृष्णलीला का वर्णन, शिवलिंगार्चन विधि आदि है। उत्तरखंड में अपवर्ग साधन, मोक्ष-शास्त्र का परिचय है। इसमें अनेक तीर्थों तथा व्रतों की महिमा और गृहस्थाश्रम के धर्म का भी विवेचन है।
5—स्कन्द पुराण— इसमें शिवोपासना विषयक एक अनुपम खंड है। इसके उत्तर भाग में ब्रह्मगीता और सूतगीता दी गई है। दूसरे खंड में तीर्थों के उपाख्यान और पूजन विधि हैं। इसके रेवाखंड में सत्यनारायण की सुप्रसिद्ध कथा है। यह पुराण सब पुराणों से विशालकाय है।
6—भविष्य पुराण— इसमें सब प्रकार के व्रतों के विधान और उनकी कथाएं दी गई हैं। वेद पढ़ने की विधि, गायत्री का माहात्म्य, साँप द्वारा डँसे पुरुष के लक्षण, सर्प का विष हरने वाली मृत संजीवनी गोली, कलियुग के राजाओं की वंशावली आदि हैं।
3—संशोधित तथा परिवर्धित पुराण :-
7—ब्रह्मपुराण— पहले यह पुराण ब्रह्ममहात्म्य सूचक बताया गया है। परन्तु इसके अन्तिम अध्याय में लिखा है कि यह वैष्णव पुराण है। इस पुराण में विष्णु के अवतारों की कथा की विशेषता है। उत्कल प्राँत में स्डितलडडडडड जगन्नाथजी के महात्म्य का विशेष वर्णन है।
8—श्रीमद्भागवत— यह महापुराण संस्कृत- साहित्य का एक अनुपम रत्न है। यह भक्ति-शास्त्र का सर्वस्व है। निम्बार्क, बल्लभ तथा चैतन्य सम्प्रदायों पर इसका बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में श्रीकृष्ण चरित्र है जिसका हिन्दी रूपांतर ‘सुखसागर’ या ‘शुकोक्ति सुधासागर’ के नाम से विख्यात है।
(9)ब्रह्मवैवर्त-पुराण— कृष्ण-चरित्र का विस्तृत वर्णन इस पुराण की विशेषता है। इसके प्रकृति खण्ड में प्रकृति का वर्णन है, जो भगवान कृष्ण के आदेशानुसार दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री तथा राधा के रूप में अपने को समय-समय पर परिणित करती रहती है। इसमें सावित्री तथा तुलसी की कथा बड़े विस्तार के साथ उपलब्ध होती है।
4—ऐतिहासिक पुराण :-
(10)ब्रह्माण्ड-पुराण— इसमें पूरे विश्व का साँगोपाँग वर्णन है। इसके प्रथम खण्ड में विश्व के भूगोल का विस्तृत तथा रोचक वर्णन है। जम्बूद्वीप तथा उसके पर्वतों और नदियों का वर्णन अनेक अध्यायों में से है। नक्षत्रों तथा युगों का भी विशेष विवरण इसमें मिलता है। इसमें प्रसिद्ध क्षत्रिय वंशों का वर्णन इतिहास की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी है।
(11)वायु-पुराण— इसका अधिकाँश अप्राप्य है। पुराणों में इस पुराण की श्लोक संख्या 23000 दी गई है, परन्तु आजकल जो वायु-पुराण मिलता है उसमें 10091 श्लोक ही मिलते हैं। यह भौगोलिक वर्णन के लिये विशेष महत्व का है। प्रजापति-वंश, ऋषि-वंश और ब्राह्मण-वंश का इतिहास जानने के लिये भी बड़ा उपयोगी है। इसमें संगीत का विशद वर्णन उपलब्ध होता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता शिव के चरित्र का विस्तृत वर्णन है, जो साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से दूषित नहीं है।
(12)विष्णु-पुराण— इसमें भूगोल का बड़ा ही साँगोपाँग विवेचन है। चारों आश्रमों के कर्त्तव्यों का विशेष निर्देश है। राजा ययाति तथा वेद की शाखाओं और कृष्ण-चरित्र का विस्तार से वर्णन है। यह वैष्णव धर्म का मूलाधार ग्रन्थ है। नाना प्रकार की धर्म-कथा, व्रत-नियम, वेदान्त, ज्योतिष, वंशाख्यान आदि के वर्णन से यह भरपूर है। साहित्यिक दृष्टि से यह पुराण सबसे अधिक स्मरणीय, सरस तथा उच्चकोटि का माना गया है।
5—साम्प्रदायिक पुराण :-
(13)लिंग-पुराण— इसमें शिव-लिंग की पूजा का विवेचन है। सृष्टि का आविर्भाव भगवान शंकर द्वारा बतलाया गया है। इसमें शंकर के 28 रूप का वर्णन है। इसमें लिंगोपासना की उत्पत्ति भी दिखलाई गई है। शिव-तत्व की मीमाँसा के लिये यह पुराण प्रामाणिक है।
(14)वामन-पुराण— इसमें विष्णु के भिन्न-भिन्न अवतारों की कथाएँ हैं, परन्तु वामन-अवतार का वर्णन विशेष रूप से है। अनेक तीर्थों और वनों का माहात्म्य भी इसमें दिया गया है।
(15)मार्कण्डेय-पुराण— इसमें मरणोत्तर जीवन की कथा है। ब्रह्मवादिनी महिषी मदालसा की कथा बड़े विस्तार के साथ दी गई है। ‘दुर्गा सप्तशती’ इसी पुराण का एक विशिष्ट अंग है। श्राद्ध-कर्म का वर्णन, योग के विघ्न, उनसे बचने के उपाय, प्रणव की महिमा आदि बातें भी हैं।
6—आमूल परिवर्तित पुराण :-
(16)कूर्म-पुराण— डॉ. हरप्रसादजी शास्त्री की सम्मति में इस पुराण में ऐसा संशोधन किया गया है कि उसका कलेवर ही बदल गया है। इसमें सब जगह शिव ही मुख्य देवता के रूप में बतलाये गये हैं। इस ग्रन्थ में शक्ति -पूजा पर भी बड़ा जोर दिया गया है। शक्ति के सहस्र नाम का वर्णन है। उत्तर भाग में ईश्वर-गीता और व्यास-गीता दी गई हैं।
(17)वराह-पुराण— इस पुराण में 24000 श्लोक बतलाये जाते हैं, पर जो संस्करण एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित हुआ है, उसमें 10700 श्लोक ही हैं। इसमें विष्णु से सम्बन्धित अनेक व्रतों का वर्णन है। इसके दो अंश विशेष महत्व के हैं—(1) मथुरा महात्म्य, जिसमें मथुरा के समस्त तीर्थों का बड़ा विस्तृत वर्णन है, (2) नचिकेतो पाख्यान, जिसमें यम और नचिकेता की विस्तृत कथा है जिसमें स्वर्ग-वर्ग का विशेष वर्णन मिलता है।
(18)मत्स्य पुराण— इसमें श्राद्ध विधि का वर्णन सात अध्यायों में है। व्रतों का वर्णन इसकी एक विशेषता है। प्रयाग का भौगोलिक वर्णन तथा वहाँ के तीर्थों की महिमा का कथन है। काशी का माहात्म्य अनेक अध्यायों में दिया गया है। इसके सिवाय इसकी चार बातें विशेष महत्व की हैं—(1) समस्त पुराणों की विषयानुक्रमणिका 53 वें अध्याय में दी गई है। (2) प्रवर ऋषियों के वंश का वर्णन है। (3) राज-धर्म का विशिष्ट वर्णन है। (4) भिन्न-भिन्न देवताओं की प्रतिमाओं की नाप-जोख दी गई है। इससे विदित होता है कि हमारी मूर्ति निर्माण कला तथा स्थापत्य कला वैज्ञानिक पद्धति पर अवलम्बित थी।
पुराणों का आरम्भ ब्रह्म पुराण से और अन्त ब्रह्माण्ड पुराण से होता है तथा मध्य में दसवें पुराण ‘ब्रह्मवैवर्त’ में ब्रह्म की स्मृति करा दी है कि पुराण सृष्टि-विद्या का प्रतिपादन करते हैं, जो ब्रह्म से आरम्भ करके ब्रह्माण्ड तक ज्ञान को पहुँचाती है। वह आदि, मध्य और अन्त में ब्रह्म का कीर्तन करती हुई, ब्रह्म पर हमारे ध्यान को स्थिर कर देती है। इसीलिए यह उक्ति प्रसिद्ध है—
‘आदावन्ते च मध्यं च हरिः सर्वत्र जीयते।’
(श्री कृष्णानन्द)
संसार में मुख्यतः दो प्रकार के धर्म हैं। एक कर्मप्रधान दूसरे विश्वासप्रधान। हिन्दूधर्म कर्म-प्रधान हैं, अहिन्दूधर्म विश्वास-प्रधान हैं। जैन, बौद्ध, सिक्ख ये तीनों हिन्दू धर्म के अंतर्गत हैं। इस्लाम, ईसाई, यहूदी ये तीनों अहिन्दू धर्म के अंतर्गत हैं।
मैंने जहाँ तक विचार किया है हिन्दू-धर्म में सब से बढ़कर यही उदारता है कि सबको निज विश्वासानुसार पूजा और उपासना करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है परन्तु सदाचार व सद्व्यवहार का बन्धन है। हिन्दूधर्म लोगों को निज विश्वासानुसार ईश्वर व देवी-देवताओं को मानने व पूजने की और यदि विश्वास न हो तो न मानने व न पूजने की पूर्ण स्वतन्त्रता देता है। अहिन्दू-धर्म में ऐसी स्वतन्त्रता नहीं है। अहिन्दू-धर्म (पैगम्बरी मजहब) मनु अपने अनुयायियों को किसी विशेष व्यक्ति और विशेष पुस्तक पर विश्वास लाने के लिए बाध्य या विवश करता है। उसे निज विश्वासानुसार देवता को मानने व उपासना करने की स्वतन्त्रता नहीं है।
हमारे कई भाई शंका करेंगे कि हिन्दूधर्म में निज विश्वासानुसार देवताओं को मानने व पूजने की स्वतन्त्रता है, यह कौन सी खूबी है? इससे तो “एक निराकार सर्वव्यापक ईश्वर का मानना” ही उत्तम और हितकर है। इसके उत्तर में निवेदन है कि यह सिद्धान्त अति उत्तम है परन्तु मनुष्यों का मन अद्भुत प्रकार का है। मनोविज्ञान की दृष्टि से “भिन्नरुचिर्हि लोकः” प्रसिद्ध है। पूजा-उपासना के सम्बन्ध में ही यही बात चरितार्थ होती है। आप प्रत्यक्ष देखिये, संसार में सैकड़ों प्रकार के मत या सम्प्रदाय हैं और पूजा व उपासना की पद्धति हजारों प्रकार की प्रचलित हैं। मुख्य-मुख्य सब मतों में बड़े-बड़े विद्वान् मौजूद हैं। परन्तु उनका मन अपनी ही भावना के अनुकूल देवता को मानने व पूजने में सन्तुष्ट रहता है। उनको दूसरे मनुष्य की रुचि के अनुसार पूजा या उपासना करने में तनिक भी तुष्टि या प्रसन्नता नहीं होती। ईश्वर का स्वरूप कैसा है, इस विषय में भिन्न-भिन्न मत के विद्वानों के भिन्न-भिन्न विचार या सिद्धान्त हैं। जब कि ईश्वर को मानने वाले बड़े-बड़े फिलॉसफर भी ईश्वर के विषय में मतभेद रखते हैं तब संसार के सब लोगों से ईश्वर के सम्बन्ध में एक ही सिद्धान्त को मानने की आशा रखना व्यर्थ है और प्रत्यक्ष देखिये बहुत से विद्वान् ईश्वरास्तित्व को अस्वीकार करने में ही अति प्रसन्न और परम सन्तुष्ट रहते हैं। इस प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है कि हिन्दूधर्म जो पूजा व उपासना के विषय में पूर्ण स्वतन्त्रता देता है वह बड़ा ही उत्तम, उदात्त और श्रेयस्कर है। हिन्दूधर्म का यह सिद्धान्त सर्वोपयोगी और सार्वभौम है।
मूल हिन्दूधर्म उपासना भेद के कारण किसी को पापी या नरकगामी नहीं मानता, किन्तु उसी को पापी मानता है जो सदाचार व सद्व्यवहार से रहित हो! इसके विपरित अहिन्दू धर्म (पैगम्बरी मजहब) निज विश्वासानुसार देवी-देवता को मानने या पूजने की स्वतन्त्रता नहीं देता। वह तो व्यक्ति-विशेष व पुस्तक विशेष पर विश्वास लाने को ही धर्म और स्वर्गप्रद मानता है। अहिन्दूधर्म कहता है कि जो मनुष्य अमुक पैगम्बर व अमुक पुस्तक पर ईमान नहीं लावेगा वह ज्ञानी व सदाचारी व परोपकारी होने पर भी पापी और नरकगामी है। मूल हिन्दूधर्म कहता है कि भिन्न देवोपासना या उपासना विधि की भिन्नता के कारण किसी को पापी कहना या मानना अनुचित है। हिन्दूधर्म में धर्मात्मा वही है जो अपने विश्वासानुसार पूजा व उपासना करता हुआ (और यदि ईश्वर या किसी देवता पर विश्वास न रखता हो तो भजन-पूजन न करता हुआ) सदाचार व सद्व्यवहार में स्थिर रहे और पापी वही है जो दुराचार व दुर्व्यवहार में लगा रहे? कोई मनुष्य देवताओं का भजन-पूजन या ईश्वराराधन करता हो परन्तु दुष्कर्मों में लिप्त हो तो हिन्दू धर्म उसे पापी ही कहता और मानता है। हिन्दू धर्म में अद्वैश्वरवादी, बहुदेववादी, मूर्तिपूजक और मूर्ति पूजा न करने वाले इन सबके लिए पूरा स्थान और पूर्ण सम्मान है। ऐसी उदारता किसी भी पैगम्बरी मजहब में नहीं है। जिस दिन ऐसी उदारता उसमें आ जायगी उसी दिन वह मजहब सार्वभौम धर्म के योग्य होगा।
हिन्दू धर्म सदाचार व सद्व्यवहार पर जोर देता है और विश्वास लाने न लाने के सम्बन्ध में बाध्य या विवश नहीं करता। अहिन्दू धर्म सदाचार व सद्व्यवहार पर जोर नहीं देता किन्तु विश्वास लाने के लिए बाध्य या विवश करता है। वह धर्मात्मा और स्वर्गगामी उसी को मानता है जो विशेष व्यक्ति और विशेष पुस्तक पर ईमान रखता हो, फिर वह चाहे कैसा ही कर्म करे। कोई मनुष्य कितना ही ज्ञानी, सदाचारी और परोपकारी हो, यदि वह विशेष व्यक्ति और विशेष पुस्तक पर विश्वास नहीं रखता तो वे लोग उसे पापी व नरकगामी मानते हैं। हिन्दू धर्म और अहिन्दू धर्म के मूल सिद्धान्तों में यही भारी भेद है। यह ऐसी गहरी खाई है जो कभी पट नहीं सकती अर्थात् हिन्दू धर्म और अहिन्दू धर्म दोनों का मेल कभी नहीं हो सकता। ये दोनों धर्म गंगा और यमुना के समान एक कभी नहीं हो सकते। हिन्दू धर्म में उपासना काण्ड में जो स्वतन्त्रता है वह मानों स्वतन्त्र विचार करने का स्पष्ट आदेश है। अहिन्दू धर्म में जो उपासना-कर्म में स्वतंत्रता नहीं है वह मानो स्वतन्त्र विचार करने का निषेध है। साराँश यह कि हिन्दू धर्म स्वतन्त्र विचारों का पक्षपाती और समर्थक है तथा अहिन्दू धर्म स्वतन्त्र विचारों का विरोधी और बाधक है। विद्वान व दूरदर्शी लोग भली भाँति जानते हैं कि साँसारिक उन्नति और आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति के लिए स्वतन्त्र विचारों की कितनी बड़ी आवश्यकता रहती है। इस दृष्टि से देखिये कि संसार के लिए हिन्दू धर्म अधिक उपयोगी है अथवा सेमिटिक (पैगम्बरी) मजहब? इस पर भी ध्यान दीजिए कि संसार में शुभ कर्मों के द्वारा अधिक सुख व शान्ति फैल सकती है अथवा किसी दूत व पुस्तक पर विश्वास लाने मात्र से? भली भाँति विचारने से सिद्ध है कि किसी पर ईमान लाने के बाद भी साँसारिक सुख व शाँति के शुभ कर्मों की आवश्यकता ज्यों की त्यों बनी रहती है। अतः पैगम्बरी मतों के सिद्धान्त की अपेक्षा हिन्दू धर्म के सिद्धान्त की उत्तमता और उपयोगिता में कोई सन्देह नहीं।
(श्री नारायण स्वामी)
(अभ्युदय का अर्थ है लोकोन्नति और निःश्रेयस कहते हैं परलोकोन्नति अथवा मोक्ष या ईश्वर प्राप्ति को। वर्तमान समय में अनेक लोग इन दोनों को परस्पर विरोधी समझते हैं। वे ऐसा ख्याल करते हैं कि जो व्यक्ति साँसारिक दृष्टि से सफल होगा वह पारलौकिक या आध्यात्मिक निगाह से महत्वहीन होगा। और जो व्यक्ति परलोक का ध्यान रखने वाला होगा अर्थात् ईश्वर के निकट पहुँचेगा वह इस संसार के विषयों से दूर रहेगा। इस विचार धारा का ही यह परिणाम हुआ कि देश में एक बड़ी संख्या लँगोटी लगाने वाले साधुओं की उत्पन्न हो गई। ये लोग प्रकट में संसार के प्रपंच और बन्धन से छुटकारा पाने के लिये लौकिकता का त्याग करते हैं, पर वास्तव में संसार के लिये स्वयं भार-स्वरूप बन जाते हैं। ये लोग अपने को धार्मिक समझते हैं और अन्य लोग भी उनको संसार त्यागी महात्मा, विरक्त कहते हैं, पर वास्तव में वे दोनों ओर से निकम्मे हो जाते हैं।)
उपर्युक्त भ्रमपूर्ण विचार अवनति कालीन मध्य काल के कितने ही ज्ञान और भक्ति आदि का वितण्डावाद खड़ा करने वाले सम्प्रदायों ने फैलाये हैं। अन्यथा वैदिक समय में भारतीय समाज में सर्वथा भिन्न प्रकार का आदर्श था। वेद में कहा गया है—
विद्याँ चाविद्याँ च यस्तद्वेदोभयँ सह। अविद्यया मृत्युँ तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥
(यजुर्वेद 40। 14)
अर्थात् विद्या (ज्ञान) और अविद्या (ज्ञानेतरकर्म) दोनों को जो साथ-साथ काम में लाता है, अर्थात् न ज्ञान की उपेक्षा करता है न कर्म की, वह कर्म के द्वारा मृत्यु को पार करके ज्ञान द्वारा अमरता को प्राप्त करता है।”
यहाँ वेद ने स्पष्ट और असंदिग्ध शब्दों में बतलाया है कि मनुष्य को धर्म ज्ञान उपलब्ध करके उसके अनुकूल कर्म करना है। वेद ने इस ज्ञान और कर्म का उद्देश्य मृत्यु के सबसे बड़े बन्धन को पार करना बतलाया है। छोटे-छोटे बन्धनों को पार करना हुआ ही मनुष्य बड़े बन्धनों को पार किया करता है। इसलिए लोक की उन्नति के लिये मनुष्य ज्ञान और कर्म को इस प्रकार काम में लावे जिससे लोक के छोटे-मोटे बन्धन शिथिल होते रहें। ऐसा होने पर ही लोकोन्नति, परलोकोन्नति का साधन बना करती है, और मनुष्य इन छोटे-छोटे बन्धनों को दूर करते हुये इस योग्य हो जाता है कि बड़े से बड़े मौत के बन्धन को भी दूर कर सके। और ऐसा हो जाने पर वह अपने परलोक को भी उन्नत बना लिया करता है। यहाँ एक बात और समझ लेनी चाहिये कि मोक्ष अथवा ईश्वर प्राप्ति मनुष्य को दो बातें प्राप्त कराया करती है—1. मौत के बन्धन से छुटकारा और। 2. आनन्द। इनमें से पहली बात निर्गुण और दूसरी बात सगुण उपासना का फल हुआ करती है। जब मनुष्य ईश्वर अजर है, अमर है, अभय है, इत्यादि, तो इससे उसके भीतर भी निर्गुणता आती है, और वह भी, निमित्त से ही क्यों न हो, अजर, अमर, अभय हो जाया करता है। और जब वह ईश्वर की सगुणता का चिन्तन करता है, कि ईश्वर सच्चिदानन्द है, न्यायकारी है, दयालु है, इत्यादि—तो उसके भीतर नैमित्तिक रीति से ही क्यों न हो, सच्चिदानन्द आदि गुणों का संयोग-सम्बन्धवत समावेश हो जाया करता है। और इस प्रकार मनुष्य को मोक्ष के दोनों पहलू प्राप्त हो जाते हैं। यह तो जीवनोद्देश्य का स्थूल ढाँचा हुआ। यह ढाँचा किन साधनों से बना करता है, अब उस पर कुछ विचार करना चाहिये।
साधना
योग दर्शन में वर्णित “तंजपस्तदर्थ भावनम्” की शिक्षा के अनुसार मनुष्य को ईश्वर के गुणवाचक नामों का जप करके अपने भीतर उनमें से अनेक गुणों का समावेश करना चाहिये, जिससे वह कम से कम इतना शक्ति सम्पन्न अवश्य हो जाय कि अपने अंदर से अहंकार को निकाल सके। अहंकार की उत्पत्ति से जगत में व्यष्टित्व (व्यक्ति वाद) की वृद्धि होती है। मनुष्य के भीतर भी अहंकार आ जाने से मेरे और तेरे मन का भाव (ममता) पैदा हो जाता है। इस ममता की उत्पत्ति का फल यह होता है कि ज्यों ज्यों यह बढ़ती है, मनुष्य ईश्वर से दूर होता जाता है। यह सत्य है कि जगत अहंकार से उत्पन्न होता है और अहंकार से ही उसकी स्थिति भी बनी रहती है। परन्तु जब मनुष्य ईश्वर की ओर चलने का इरादा करता है तो उसके लिये आवश्यक हो जाता है कि अहंकार से अपना पीछा छुड़ावे। अहंकार से पीछा छुड़ाने का उपाय अपने को भुला देने में ही निहित है। अपने को किस प्रकार भुलावे? इसके लिये प्रेम और भक्ति का आश्रय लेने की आवश्यकता है। जब मनुष्य ईश्वर को अपने प्रियतम के रूप में देखकर उसके प्रेम-उत्कृष्ट प्रेम की चरम सीमा में अपने को पहुँचा देता है, तब वह प्रभु-प्रेम में इतना लीन हो जाता है कि उसे अपनी सुध-बुध भी नहीं रहती। इस दरजे पर पहुँच जाने पर अहंकार, ममता या मेरे-तेरे मन के भाव उसे व्यथित नहीं कर सकते। इसी अवस्था के लिये कवियों ने लिखा है—
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँय। प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाय॥
अथवा—
बेखुदी छा जाय ऐसी दिल से मिट जाये खुदी। उनके मिलने का तरीका अपने खो जाने में हैं॥
इस अवस्था पर पहुँच जाने पर यह नहीं हो सकता कि उपासक अथवा प्रेमी की सत्ता न रहती हो। वह रहती अवश्य है, परन्तु प्रियतम में लवलीन हो जाने से उसे हर जगह वही दिखाई देता है—”जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है।” योग-दर्शन की परिभाषा में इसी को चित्त वृत्तियों का निरोध कहा जाता है। तात्पर्य इसका यह है कि चित्त की वृत्तियाँ बहिर्मुखी है, और बाहर सारी माया अहंकार की ही हुआ करती है। इसलिए उन वृत्तियों के निरोध करने का अर्थ यह हुआ कि चित्त का सम्बन्ध अहंकार से शेष न रहा। इस सम्बन्ध के शेष न रहने से आत्मा का सम्बन्ध भी चित्त से टूट-सा जाता है। इस सम्बन्ध के टूट जाने से आत्मा अपने भीतर काम करने लगता है और यही अवस्था है जिसमें आत्म-साक्षात्कार या परमात्म-साक्षात्कार हुआ करता है। यही अवस्था है जिसे स्वाद चखने की अवस्था से उपमा दिया करते हैं। यहाँ जो स्वाद आता है उसे कोई जबान से कह नहीं सकता। उपनिषदों में इसी के लिये कहा गया है—
न शक्यते वर्णयितुँ गिरा तदा स्वयं तदन्तः करणेन गृत्यते॥
(श्री अम्बालाल पुराणी)
वर्तमान समय में जगत में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आदर्शों का संघर्ष इतना अधिक बढ़ गया है कि उसके फलस्वरूप वातावरण अत्यन्त अशान्त हो गया है और अनेक बार तो मानव समाज का ही नाश होने के लक्षण दिखलाई पड़ने लगते हैं। इस कारण मानव हितैषी विद्वान् इन कठिनाइयों की आलोचना कर रहे हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि और हमको नाश के बजाय प्रकृति के पथ पर चलना है तो मानव-समाज का पुनर्संगठन या नव निर्माण करना अनिवार्य है। जब तक ऐसा न किया जायगा तब तक नई-नई कठिनाइयाँ सामने आती ही जायेंगी। इसलिए आवश्यकता है कि मानव-समाज का विधान जड़ मूल से बदल दिया जाय।
विकास सिद्धान्त की आलोचना से यह विदित होता है कि चैतन्य शक्ति अथवा चेतना जब जीवन के आदि स्वरूपों में होती हुई मानव रूप में प्रकट होती है, तो उसकी अपूर्ण अभिव्यक्ति में भी क्रमशः पूर्णता का आविर्भाव होने की शक्यता बढ़ती जाती है। पर मानव रूप में प्रकट होने से पहिले चेतना अपेक्षाकृत कम विकसित थी। मानव में प्रकट होने के पहले चेतना पाशव (पशु के रूप में) थी और उससे भी पहले यह जड़ता में समायी हुई लगभग अचेतन थी। परंतु जड़ मालूम पड़ने वाले पदार्थों में भी प्राण अप्रकट रूप से विद्यमान रहता है और समय आने पर उसी में से प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार पशुओं में प्राण-शक्ति के साथ मनस्तत्व (मन की शक्ति) विचारने की शक्ति अप्रकट रूप से विद्यमान रहती है और समय आने पर उसी में से आविर्भूत होती है। इस क्रम को देखते हुये उत्क्रान्ति के सिद्धान्तानुसार यह आवश्यक जान पड़ता है कि समय आने पर मनुष्य में पाये जाने वाले मनस्तत्व में से अप्रकट रूप में बसी हुई मानसातीत विज्ञानमय चेतना प्रकट हो। चेतना मानवता में ही बँधे रहने को बाधित नहीं हैं। इसके स्वाभाविक विकास में ही मानवता से ऊपर उठने की संभावना निहित है। इसका अर्थ यह भी है कि इस सृष्टि में मनुष्य को ही सबसे उत्तम और अन्तिम प्राणी नहीं समझ लेना चाहिये, भविष्य में मनुष्य इससे अधिक उन्नति करके उन शक्तियों को प्राप्त कर सकता है, जो अभी उसमें नहीं है और जिनके फलस्वरूप आजकल के मनुष्य और भविष्य के उस प्राणी में उतना ही अंतर होगा जितना आज हम मनुष्य और पशु में देख रहे हैं।
यदि इस प्रकार मानवता से ऊर्ध्वारोहण करने की शक्यता को स्वीकार न किया जाय तो इसका मतलब यह होगा कि मानव शाश्वत काल तक अपूर्ण रहने के लिये बाध्य है। तब तो युग-युगान्तर से पूर्णता और दिव्यता के जो स्वप्न देखे जा रहे हैं, वे शेखचिल्ली के मनसूबे मात्र रह जायेंगे। मनोमय चेतना की साधना द्वारा जितना विकास साधा जा सकता है, उसे आज मानव पूरा कर चुका है। अतः अब उसके आगे कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल चक्कर लगाने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जायगा। पर ऐसी बात प्राकृतिक नियमों के विपरित है।
यह मानसातीत करण केवल कल्पना की बात नहीं है। प्राणियों के विकास-क्रम में देखा जाता है कि जब तक प्राण में से मानसिक शक्ति का विकास आरम्भ नहीं हुआ होता है तभी कहीं-कहीं मानसिक शक्तियों का अस्तित्व दिखाई पड़ने लगता है, मानो वह भविष्य में होने वाले विकास की सूचना देने आया हो। इसी प्रकार मानसिक चेतना के साथ-साथ ही हजारों वर्षों से हमें मानसातीत (मानसिक शक्ति के ऊपर की) शक्ति का कुछ न कुछ परिचय मिलता आया है। पर हाँ, अभी तक उसका कार्य अनियमित, थोड़ा-थोड़ा और एक दृष्टि से अपवाद स्वरूप दिखाई दिया है। मानव जाति के धर्म प्रवर्तकों, ऋषियों, द्रष्टाओं, कवियों, कला विधायकों तथा कर्मवीरों में यह अप्रस्फुटित तत्व समय-समय पर किसी न किसी रूप में कार्य करता दिखाई दे जाता है।
मानव ने अभी तक पूर्णता प्राप्त करने और आध्यात्मिक उन्नति के लिये अनेक प्रकार के प्रयत्न किये हैं। इसी उद्देश्य से बहुत से धर्मों और साधना प्रणालियों को जन्म दिया गया है। परंतु अभी तक सामान्य रूप में मनुष्य बाहरी क्रियाओं द्वारा आन्तरिक प्रगति की चेष्टा करता है। बहुत से देशों में तो धर्म या समाज की ओर से आन्तरिक जीवन के विकास की चेष्टाओं को अवैध ठहराया गया है। परंतु बाह्य जीवन को अनेक प्रकार से जकड़ने वाले भारतवर्ष में इस सम्बन्ध में सदा स्वतंत्रता रही है। इसके फलस्वरूप भारत ने इस राह में असाधारण उन्नति की है। आज यहाँ अनेक प्रकार की साधन-प्रणालियाँ मौजूद हैं और आध्यात्मिक जीवन की हर प्रकार की शक्यताओं को आजमाने के प्रयोग हो रहे हैं। उदाहरणार्थ योग-विज्ञान की खोज करने वालों ने ही ऐसी अनेक साधनायें निकाली हैं जिनसे मनुष्य मनोमय कोश से ऊपर उठकर विज्ञान मय और उससे ऊपर के कोशों तक पहुँच जाता है। पर इन विधियों और साधनाओं को थोड़े ही समय के भीतर बन्धन युक्त, जड़ता की पोषक और रूढ़िवादी बना दिया जाता है, वे प्राणहीन और शुष्क बन जाती हैं। तब केवल थोड़े से संसार से विरागी जन ही उनका अवलम्बन कर पाते हैं और समस्त मानव समाज के लिये वे निरर्थक ही बनी रहती हैं। आवश्यकता है कि यह सत्य सर्वदेशीय और सर्व कालीन हो। यह आवश्यक है कि जो सिद्धान्त एक बार केवल भारतीय चीज समझे जाते थे और जो भारतीय धर्मों द्वारा प्रसारित हुये थे, वे समस्त मानव जाति की वस्तु बन जायें। ऐसा होने पर ही वह मानव संस्कृति के लिये मार्गदर्शक ज्योति का काम दे सकते हैं। इसी लिये इन प्रणालियों को देश-काल की उपाधियों, विधियों तथा रूढ़ियों से मुक्त करने की आवश्यकता है। जरूरत तो इस बात की है कि साधना के भौतिक तत्वों का सर्व सामान्य मानस-शास्त्र अथवा चेतन शास्त्र की दृष्टि से निरूपण किया जाय।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, थियोसोफिकल सोसाइटी आदि ने पर्याप्त प्रयत्न किया है। इन दिनों श्री अरविन्द ने इस सम्बन्ध में विशेष रूप से विवेचन करके योग- साधन की ऐसी प्रणाली निश्चित की है जिसका उद्देश्य थोड़े से साधुओं और विरक्तों को मुक्ति मार्ग दिखलाना नहीं वरन् समस्त मानव समाज की कायापलट कर देना है। इसका एक मुख्य सिद्धान्त यह है आध्यात्मिक तत्व को मनुष्य के समग्र जीवन के नियामक या संचालक के रूप में स्वीकार किया जाय। इस बात में तो कोई सन्देह नहीं कि अब वह समय आ पहुँचा है कि समस्त मानव-संस्कृति का समन्वय किया जाय और आध्यात्मिक तत्वों के आधार पर ही मानव-समाज का संचालन हो, क्योंकि जड़वाद (भौतिकवाद के सर्वनाशकारी परिणाम तो हमारी आँखों के सामने उपस्थित ही हैं। प्रकृति का रूपांतर करना ही जब उद्देश्य हो तो यह बात विशेष महत्व की माननी चाहिये कि अरविन्द की योग-साधना में प्रकृति को स्वीकार किया गया है। आज ऐसी बहुत सी प्रणालियाँ प्रचलित हैं जिनमें प्रकृति को स्वीकार तो किया गया है पर अंतिम उद्देश्य उसका त्याग ही बतलाया गया है। परन्तु श्री अरविन्द की प्रणाली में प्रगति के परिणाम स्वरूप जीवन को स्वीकार करना होगा, हाँ, यह जीवन आज के जीवन से भिन्न होगा, वह आज की अविद्या पर आधारित प्रकृति के बजाय विद्या पर आधारित प्रकृति के अनुकूल जीवन होगा। यह रूपांतर भगवती महाशक्ति की ही कृपा से साधा जा सकता है।
परंतु अविद्या प्रकृति के वशीभूत मानव का विद्या शक्ति अर्थात् परा शक्ति के आविर्भाव में रूपांतरित होना कोई सहज काम नहीं है, जो थोड़ा बहुत हेर-फेर कर लेने से ही पूरा हो जाय। यह काम केवल सर्व धर्म सहिष्णुता प्राप्त कर लेने से अथवा सभी धर्मों में प्रभु का साक्षात्कार कर लेने से भी नहीं चल सकता। इसके लिये तो मनोमय चेतना से ऊपर की ओर अधिक समर्थ नवीन करण को विकसित करना होगा। इस विषय में जगत प्रसिद्ध लेखक बर्नार्ड शा का यह कथन ठीक ही है कि “मनुष्य जैसा इस समय है यदि वैसा ही बना रहे तो वह वर्तमान समय की अपेक्षा अधिक उन्नति नहीं कर सकता।”
श्री अरविन्द की साधना में मनोमय चेतना से परे की चेतना के कार्य को सम्भव बनाने के लिये विज्ञानमय करण को विकसित करना ही मुख्य है। पर यह भी स्पष्ट है कि इस मानसातीत कारण के मानव में व्यवस्थित होने और नियमित रूप से कार्य करने के लिये यह आवश्यक है कि वर्तमान मानस और चित्तंत्र में मौलिक परिवर्तन किये जायें। उदाहरण के लिये जैसे अभी मानव द्वैत भाव प्रधान है, वहाँ द्वैत भाव हटाकर उसे सदैव अद्वैत की अनुभूति होती रहेगी, अभी वह बहिर्मुख है, नवीन करण के होने पर वह अन्तर्मुख होगा और अन्तर के केन्द्र में बैठ कर वहाँ से अपने सामान्य बाह्य जीवन का संचालन करेगा, आज प्राण की कामनाएं और भावनाएं, द्वन्द्वात्मक अनुभूतियाँ, बुद्धि और तर्क के मानसिक आदर्श मानव-जीवन का नियमन कर रहे हैं, परन्तु नवीन करण होने पर ऐसा न होगा, मनुष्य इन चीजों के अधीन न होगा। बुद्धि की तर्कणा उसकी नियामक न रहेगी, वरन् स्वयं बुद्धि उसके वश में आज्ञाकारी करण के रूप में रहेगी। चेतना की इस पुनर्घटना के पश्चात् मानव के कर्म करने का हेतु कामनाओं को संतुष्ट करना न रहेगा।
मनुष्य के इस नवीन विकास में मनुष्य की चेतना उसके अन्तर में एकाग्र होकर रहेगी। इसका अर्थ यह है कि वह अपनी आत्मा में केन्द्रीभूत होकर रहेगी, अपने आपको पूर्णतया भगवान के सुपुर्द कर देने की अभीप्सा रखेगी और प्रभु-प्राप्ति को ही अपने जीवन का परम पुरुषार्थ मानेगी। प्रभु को प्राप्त कर उन्हीं की प्रेरणा से वह जीवन में कार्य करेगी। जिनमें इस विज्ञानमय करण का विकास होगा वे अपनी आत्मा को व्यक्ति रूप में न देखकर विराट रूप में अनुभव करेंगे। वे देश,काल, धर्म, जाति, संस्कार इत्यादि की मर्यादाओं से भी सर्वथा मुक्त होंगे।
अन्त में यह प्रश्न होता है कि ऐसा संघ- जीवन किन तत्वों का आविष्कार करेगा और उसके परिणाम प्रत्यक्ष रूप में क्या होंगे। इस सम्बन्ध में श्री अरविन्द का कथन है कि (1) इसका आधार ऐक्य पर होगा, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति भगवान की चेतना के साथ एकता का अनुभव करेगा और परिणामतः उन्हें परस्पर भी ऐक्य का अनुभव होगा (2) आदान-प्रदान प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग अन्य सबों के लिये करेगा और इस प्रकार जीवन समृद्ध, विशाल और सर्वग्राही बन जायगा। (3) एक ताल, एक स्वर—हर के काम में औरों के काम के साथ संवाद और समवाय होगा, क्योंकि सभी की प्रेरणा का मूल एक ही ऊर्ध्व चेतना में होगा। जैसे संगीत में विविध बाजे और उनके विविध ताल स्वर होने पर भी एकवादिता और संवाद पैदा हो जाता है, उसी प्रकार इस नवजीवन में भी सभी व्यक्तिगत प्रवृत्तियों के परिणाम स्वरूप संवाद पैदा होगा।
यह सत्य है कि पिछले हजारों वर्षों से अनेक योगी, महात्मा और भक्त, मनुष्यों को ऐसा ही परमात्म-भाव रखने का उपदेश देते रहे हैं और स्वयं उन लोगों ने ऐसा जीवन व्यतीत भी किया है, पर उनकी संख्या बहुत ही कम होने और शेष मनुष्यों के अत्यन्त संकुचित और स्वार्थी विचारों का होने के कारण, मानव जाति पर उनका प्रभाव नहीं पड़ सका। पर उनके प्रयत्नों से धीरे-धीरे मनुष्य की चेतना समष्टि की ओर आती जा रही है और आज यह संभव दिखाई पड़ रहा है कि कुछ सौ वर्षों के भीतर ही ऐसा समय आ सकता है जब मनुष्य सामान्यतया उस आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त कर सकें जो आज विरले महात्मा और संत कहे जाने वाले व्यक्तियों में ही पाई जाती है। ऐसा होने पर संसार का वर्तमान रूप भी बदल जायगा और वह एक नया युग होगा।
(श्री शिव प्रकाश शर्मा बी. कॉम.)
भारतवर्ष के मध्यकालीन और वर्तमान समय के इतिहास में जात-पाँत की समस्या बड़ी महत्वपूर्ण है। यह तो कोई नहीं कह सकता कि आजकल भारतवर्ष में जो कई हजार जातियाँ पाई जाती हैं उन सब का अस्तित्व प्राचीन काल से है, तो भी इतना स्वीकार करना पड़ेगा कि चार वर्णों का विभाजन अवश्य ही प्राचीन है। वेदों में यद्यपि चारों वर्णों का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है तो भी ब्राह्मण, राजन्य, पाणि, शूद्र आदि का नामोल्लेख कितने ही स्थानों पर मिलता है। उसके बाद की स्मृतियों में तो चारों वर्णों का पूरा वर्णन ही नहीं किया गया है वरन् उनके संयोग से उत्पन्न अनेक मिश्रित जातियों का भी विवरण दिया गया है। इससे यह कहा जा सकता है कि भारतीय समाज में जात-पाँत की प्रणाली अधिक नहीं तो कई हजार वर्ष पुरानी अवश्य है।
पर जात-पाँत की प्रथा के पुरानी होने पर भी पुराने और नये समय में बहुत बड़ा अन्तर हो गया है। पहला अन्तर तो यह है कि पहले जहाँ चार मुख्य जातियाँ और दस बीस उपजातियाँ थीं, वहाँ अब जातियों और उपजातियों की संख्या कई हजार तक पहुँच गई हैं। इनमें बहुसंख्यक जातियाँ तो दो-चार सौ वर्ष के भीतर ही उत्पन्न हुई हैं। दूसरा प्रधान अन्तर यह है कि आरम्भ में यह विभाजन पूर्णतया कर्म पर आधारित था। इसका अर्थ यह है कि भगवान ने या नियति ने किसी को ब्राह्मण, क्षत्री या शूद्र नहीं बना दिया वरन् जो व्यक्ति या समूह जैसे कार्य करते थे वे वैसे ही माने जाते थे। पर ज्यों-ज्यों समय बीतता गया और लोगों में स्वार्थ तथा संकीर्णता के भाव प्रबल होते गये त्यों-त्यों जातिप्रथा में कठोरता आने लगी और अन्त में ऐसा समय आ पहुँचा जब कि लोगों को जाति और वर्ण का बदल सकना, एक जाति के व्यक्ति का दूसरी जाति में शामिल हो सकना असम्भव जान पड़ने लगा।
जात-पाँत के सम्बन्ध में महाभारत में बहुसंख्यक उद्धरण मिलते हैं, जिनसे विदित होता है कि प्राचीन समय में वर्ण और जाति का आधार मुख्यतया कर्म पर ही माना जाता था और जो व्यक्ति अपने कर्त्तव्य कर्म का त्याग कर देता था उसे अपने वर्ण से च्युत मान लिया जाता था। ‘शाँतिपर्व’ के आरम्भ ही में भीष्म पितामह ने चारों वर्णों के धर्मों का वर्णन करते हुये कहा था—
“अक्रोध, सत्यभाषण, धन को बाँट कर भोगना, क्षमा, अपनी स्त्री से सन्तान उत्पन्न करना, शौच, अद्रोह, सरलता और अपने पालनीय व्यक्तियों का पालन करना—ये नौ धर्म सभी वर्णों के लिये समान हैं। अब ब्राह्मणों का धर्म बताता हूँ। इन्द्रियों का दमन करना यह ब्राह्मणों का पुरातन धर्म है। इसके सिवाय स्वाध्याय का अभ्यास भी उनका प्रधान धर्म है, इसी से उनके सब कर्मों की पूर्ति हो जाती है। यदि अपने धर्म में स्थित, शान्त और ज्ञान-विज्ञान से तृप्त ब्राह्मण को किसी प्रकार के असत् कर्म का आश्रय लिये बिना ही धन प्राप्त हो जाय तो उसे दान या यज्ञ में लगा देना चाहिये। ब्राह्मण केवल स्वाध्याय से ही कृतकृत्य हो जाता है, दूसरे कर्म वह करे या न करे। दया की प्रधानता होने के कारण वह सब जीवों का मित्र कहा जाता है।”
इस से अगले अध्याय में कहा गया है—”जो ब्राह्मण दुश्चरित्र, धर्म हीन, कुलटा का स्वामी, चुगलखोर, नाचने वाला, राज सेवक अथवा कोई और निकृष्ट कर्म करने वाला होता है, वह अत्यन्त अधर्म है, उसे तो शूद्र ही समझो और उसे शूद्रों की पंक्ति में ही बिठाकर भोजन कराना चाहिए। ऐसे ब्राह्मण को देव पूजन आदि कार्यों से दूर रखना चाहिए। जो ब्राह्मण मर्यादाशून्य, अपवित्र, क्रूर स्वभाव वाला, हिंसामय, और अपने धर्म को त्याग कर चलने वाला हो, उसे हव्य, कव्य अथवा दूसरे दान देना न देने के बराबर ही है। ब्राह्मण तो उसी को समझना चाहिए जो जितेन्द्रिय, सोमपान करने वाला, सदाचारी, कृपालु, सहनशील, निरपेक्ष, सरल, मृदु और क्षमावान हो। इसके विपरित जो पाप परायण है उसे क्या ब्राह्मण समझा जाय?” इसी अध्याय में इन्द्र वेषधारी भगवान विष्णु ने राजा मान्धाता को राज-धर्म का उपदेश करते हुये कहा है कि—”यज्ञ-यागादि कराना और जो चारों आश्रम कहे गये हैं, उनके धर्मों का पालन करना ब्राह्मणों का कर्त्तव्य है। ब्राह्मणों का प्रधान धर्म यही है। जो विप्र इसका पालन न करे, उसे शूद्र के समान समझ कर शस्त्र से मार डालना चाहिए। जो ब्राह्मण अधर्म में प्रवृत्त है, वह सम्मान का पात्र नहीं हो सकता, उसका किसी को विश्वास भी नहीं करना चाहिये।” इसी प्रसंग में आगे चलकर राजा मान्धाता ने कहा है कि “दस्यु नीच और दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति तो सभी वर्णों और आश्रमों में पाये जाते हैं। उनके चिन्ह अवश्य भिन्न-भिन्न होते हैं।” इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि कोई व्यक्ति केवल जन्म से ब्राह्मण की उच्च पदवी का अधिकारी नहीं हो सकता, वरन् जो उस तरह के शुभ कर्म और त्याग का आचरण करेगा वही सम्मान और श्रद्धा का पात्र हो सकता है।
मानवीय कर्तव्यों का सर्वोच्च दिग्दर्शन कराने वाली ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है—
शमो दमस्तपः शौचं क्षाँति रार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमस्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वमावगम्॥ 42॥
शौर्यम् तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दीनमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावगम्॥ 43॥
कृषिगोरक्ष्य वाणिज्यम् वैश्य कर्म स्वभावजम्॥ 44॥
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यपि स्वभावजम्॥ 44॥
(गीता, अध्याय 18)
“शम, दम, तप, शुद्धता, सहनशक्ति, सीधापन, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य ये सब स्वभाव ही से उत्पन्न हुये ब्राह्मण का कर्म है। स्वभाव ही से उत्पन्न क्षत्रिय के कर्म हैं, शौर्य, तेज धैर्य, दाक्षिण्य, युद्ध से न भागना दान तथा ईश्वर भाव। स्वभाव से उत्पन्न हुये वैश्य के कर्म हैं खेती, गोरक्षा तथा वाणिज्य। शूद्र का स्वाभाविक कर्म है परिचर्या।”
इस प्रकार गीता में स्वभाव को ही प्रधानता दी गई है। वेदान्त मत के अनुसार यह स्पष्ट बताया गया है कि जिसका जो स्वाभाविक गुण है वही उसका वर्ण है। ब्राह्मण वर्ण जो सबसे श्रेष्ठ है, जन्म से साध्य नहीं, किन्तु परमात्मा के ज्ञान से साध्य है।
इतना ही नहीं अधिकाँश शास्त्रों और पुराणों से यह भी प्रकट होता है कि पहले समय मनुष्य जाति का एक ही वर्ण था, चार वर्ण अथवा भिन्न-भिन्न जातियों की स्थापना बाद में हुई है। श्रीमद्भागवत में कहा है—
एक एव पुरावेदः प्रणवः सर्व वाँगमयः। देवो नारायणो नान्य एकोऽग्निर्वर्ण एव च
॥ 9-14॥
श्रीधर स्वामी ने इसकी टीका करते हुये कहा है—”पहले सर्व वांग्मय प्रणव (ओंकार) ही एक मात्र वेद था। एक मात्र देवता नारायण थे और कोई नहीं। एक मात्र लौकिक अग्नि ही अग्नि थी और एकमात्र हंस ही एक वर्ण था।” इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि प्राचीन समय में चार वर्णों के स्थान में एक ही वर्ण था। यही बात ‘महाभारत’ में कही गई है—
एक वर्ण मिदं पूर्वं विश्वमासीद् युधिष्ठिर।
कर्म क्रिया विभेदेन चातुर्वर्ण्यम् प्रतिष्ठितम्॥
न विशेषोऽस्ति वर्णानाम् सर्व ब्राह्ममिदं जगत्।
ब्रह्मणा पूर्व सृष्टं हि कर्मभिर्वर्णात् गतम्॥
अर्थात्—”हे युधिष्ठिर, इस जगत में पहले एक ही वर्ण था। गुण-कर्म के विभाग से पीछे चार वर्ण स्थापित किये गये।
“वर्णों में कोई भी वर्ण किसी प्रकार की विशेषता नहीं रखता, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्ममय है। पहले सबको ब्रह्मा ने ही उत्पन्न किया है। पीछे कर्मों के भेद से वर्णों की उत्पत्ति हुई।”
“वायु-पुराण” में बतलाया गया है कि भिन्न-भिन्न युगों में मानव-समाज का संगठन विभिन्न प्रकार का था—
अप्रवृत्तिः कृतयुगे कर्मणोः शुभ पाययो। वर्णाश्रम व्यवस्थाश्च तदाऽऽसन्न संकरः॥
त्रेतायुगे त्वविकलः कर्मारम्भ प्रसिध्यति। वर्णानाँ प्रविभागाश्च त्रेतायाँ तु प्रकीर्तितः।
शाँताश्च शुष्मिणश्चैव कर्मिणो दुखनिस्तथा। ततः प्रवर्त्तमानास्ते त्रेतायाँ जज्ञिरे पुनः॥
(वायु पुराण 8, 33, 49, 57)
अर्थात्—”सतयुग में कर्मभेद, वर्णभेद, आश्रमभेद न था। त्रेतायुग में मनुष्यों की प्रकृतियाँ कुछ भिन्न-भिन्न होने लगीं, इससे कर्म-वर्ण आश्रम भेद आरम्भ हुये। तदनुसार शान्त, शुष्मी, कर्मी, और दुखी ऐसे नाम पड़े। द्वापर और कलि में प्रकृति-भेद और भी अभिव्यक्त हुआ, तदनुसार क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र नाम पड़े।”
“भविष्य—पुराण” (अध्याय 4) में लिखा है—
तस्मान्न गोऽश्ववत् किंचिंजातिभेदोस्ति देहिनाम्।
कार्य भेद निमित्तेन संकेतः कृतः॥
अर्थात्—”मनुष्यों में गाय और घोड़े जैसा कोई जाति-भेद नहीं है। यह काम के भेद के लिये बनावटी संकेत किये गये हैं।”
“विष्णु पुराण” में चारों वर्णों की उत्पत्ति शौनक ऋषि द्वारा बतलाई गई हैं—
“गृत्समदस्य शौनकश्चातुर्वर्ण्य प्रवत्तायिताऽभूत्।”
(विष्णु पुराण 4-8-1)
भार्गस्या भार्गभूमिः अतश्चातुर्वर्ण्य प्रवृत्तिः।
(4-8-9)
अर्थात्—”गृत्समद् के पुत्र शौनक ने चातुर्वर्ण्य व्यवस्था स्थापित की।”
“भार्ग से भार्गभूमि उत्पन्न हुये और उनसे चातुर्वर्ण्य प्रवर्तित हुआ।”
“हरिवंश पुराण” में भी इसी मत का समर्थन किया गया है—
पुत्रो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनकाः ब्राह्मणाः। क्षत्रियाश्चैव वैश्याः शूद्रास्तथैव च॥
(29 वाँ अध्याय 15-19-20)
अर्थात्— “गृत्समद के पुत्र शुनक हुये। शुनक से शौनक कहलाने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बहुत से पुत्र हुये।”
“पद्म पुराण” में आरम्भ में केवल ब्राह्मण होने का उल्लेख है—
स सर्ज ब्राह्मणानग्रे सृष्ट्या दौ स चतुर्मुखः। सर्वे वर्णाः पृथक पश्चात् तेषाँ वंशेषु जज्ञिरे॥
अर्थात्— “सृष्टि के आदि में पहले चतुर्मुख ब्रह्मा ने ब्राह्मण ही बनाये। फिर दूसरे वर्ण उन्हीं ब्राह्मणों के वंश में अलग-अलग उत्पन्न हुये।”
अनेक व्यक्ति “ऋग्वेद” के “ब्राह्मणोऽस्व मुखमासीद् बाहू राजन्या कृतः” वाले मन्त्र के आधार पर भगवान के विभिन्न अंगों से अलग-अलग वर्णों की उत्पत्ति बतला कर उनको ऊँचा नीचा सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। पर “भविष्य महापुराण” के ब्रह्मपर्व (अध्याय 42) में इसको भ्रमपूर्ण बतलाते हुये लिखा है—
“यदि एक पिता के चार पुत्र हैं तो उन चारों की एक ही जाति होनी चाहिये। इसी प्रकार सब लोगों का पिता एक परमेश्वर ही है। इसलिए मनुष्य समाज में जातिभेद है ही नहीं। जिस प्रकार गूलर के पेड़ के अगले भाग, मध्य के भाग और जड़ के भाग तीनों में एक ही वर्ण और आकार के फल लगते हैं, उसी प्रकार एक विराट पुरुष, परमेश्वर के मुख, बाहु, पेट और पैर से उत्पन्न हुए मनुष्यों में (स्वाभाविक) जाति भेद कैसे माना जा सकता है?”
इस प्रकार सभी प्राचीन शास्त्रों, पुराणों, इतिहासों के प्रमाणों से यही सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में वर्ण भेद नहीं था और बाद में जब चार वर्णों की व्यवस्था स्थापित भी की गई तो कर्म के अनुसार ही मनुष्यों का वर्ण माना जाता था। जैसे आज मुसलमानों और अंग्रेजों-अमेरिकनों में भी एक प्रकार का जाति-भेद पाया जाता है और उनके सामाजिक सम्बन्ध प्रायः उसी के अनुसार ही होते हैं, तो भी उनमें कट्टरता का भाव नहीं पाया जाता। नीची श्रेणी का कोई भी व्यक्ति विद्या और धन प्राप्त करके ऊँची श्रेणी में सम्मिलित हो जाता है और ऊंची श्रेणी का व्यक्ति अयोग्यता के फलस्वरूप नीची में पहुँच जाता है। इस प्रकार का श्रेणी विभाजन, जो कर्म और योग्यता के आधार पर स्वाभाविक रूप में हो, बुरा नहीं कहा जाता, वरन् उससे समाज की व्यवस्था में सहायता मिलती है। वर्तमान समय में हिन्दू समाज में वर्ण-व्यवस्था तो नष्ट हो चुकी है और उसके स्थान पर बिना जड़ मूल की बिना आधार की जाति-प्रथा उत्पन्न हो गई है। इसको किसी दृष्टि से शास्त्रानुकूल या धर्म सम्मत नहीं कहा जा सकता और इस महा हानिकारक प्रथा को नष्ट किए बिना हिन्दू-समाज की स्थिति कदापि नहीं सुधर सकती।
(श्री धीरेन्द्र मजूमदार)
महात्मा गाँधी के मतानुसार अहिंसा केवल परम धर्म ही नहीं है, वह नित्य धर्म भी है। वास्तव में उनकी अहिंसा साधक के लिये नित्य-धर्म ही नहीं है, वरन् वह व्यक्ति और समाज के लिये विशेष धर्म और आपद धर्म भी है। उदाहरणार्थ अगर कभी समाज को किसी अन्याय के प्रतिकार में विद्रोह भी करना पड़े, या दुनिया में कहीं कभी धर्म-युद्ध अनिवार्य हो जाय, तो वह प्रतिकार और युद्ध भी अहिंसात्मक ही होना चाहिये। उनकी राय में किसी भी हालत में समाज में हिंसा को मान्यता नहीं मिलनी चाहिये। अगर ऐसा अहिंसक समाज बनाना है, तो मानव हृदय से हिंसा का सम्पूर्ण निराकरण आवश्यक है।
अब प्रश्न यह है कि यह कैसे संभव हो सकता है? आज तो मनुष्य के हृदय में नित्य हिंसा उत्पन्न होती रहती है। ऐसी परिस्थिति में समाज से शिक्षा और दीक्षा के द्वारा तथा अहिंसात्मक प्रयोगों द्वारा हिंसा को मिटाने की कितनी भी कोशिश की जाय, पर जनता तदनुकूल आचरण नहीं कर सकती। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि जिन संस्थाओं या पद्धतियों के कारण हिंसा की उत्पत्ति हुआ करती है उन्हीं को मिटा दिया जाय। अब यह बहुत स्पष्ट हो चुका है कि मनुष्य के हृदय में हिंसा का प्रकोप विशेषतः दो कारणों से, अर्थात् शासन और शोषण के कारण ही हुआ करता है। शासन का आधार दंड-शक्ति है। समस्त मानव-समाज की मान्यता उसे प्राप्त होने पर भी शासन की शक्ति हिंसात्मक ही होती है। हिंसा का आघात मनुष्य पर निरन्तर होता है। स्वभावतः आघात से प्रतिघात पैदा होता है। इस प्रकार शासन संस्था के फलस्वरूप मानव-हृदय में हिंसा-प्रतिहिंसा का प्रतिघात अदृश्य रूप से सदा चलता है। इस परिस्थिति के कायम रहते हिंसा का निराकरण कैसे होगा? स्पष्ट है कि अहिंसक-समाज की स्थापना के लिये शासन से मुक्ति पाना अनिवार्य है।
अहिंसात्मक समाज की बात पर कुछ लोग यह एतराज करते हैं कि क्या शासन-मुक्त हो जाने पर सर्व साधारण में उद्दण्डता और उच्छृंखलता नहीं फैलेगी? यह प्रश्न इसलिए उठता है कि लोग समझते हैं कि समाज की परिस्थिति आज जैसी है वैसी ही बनी रहेगी और यह शासन-मुक्त भी हो जायगा। लेकिन ऐसा हो ही नहीं सकता। सर्वोदय-क्राँति सर्जनात्मक क्राँति है। वह केवल शासन पर ही आघात नहीं वरन् शासन की आवश्यकता का ही निराकरण करती है। अहिंसक प्रक्रिया में समाज का संगठन ही इस ढंग से करना होगा, जिससे शासन अनावश्यक हो जाय। पहले योरोप के अराजकतावादी इस बात को नहीं समझते थे, इसलिए वे शासन पर प्रत्यक्ष आघात करने की बात करते थे। आज जब हम शासन-मुक्ति की बात करते हैं तो लोग उन्हीं बातों को याद करके घबरा जाते हैं।
इतिहास के तीन युग
यह घबराहट केवल ‘अराजकता’ शब्द के कारण नहीं, बल्कि आजकल प्रचलित ‘शासनहीन’ शब्द के कारण भी है। अतः यह आवश्यक है कि ‘शासनहीन समाज’ और ‘शासन-मुक्त-समाज’ की भिन्नता को समझ लिया जाय। इसे समझने के लिये मानव-इतिहास के तीन-युगों की कल्पना की जा सकती है—
1-शासन हीनता यानी उच्छृंखलता का युग
2-शासन-युक्त-समाज का युग
3-शासन-मुक्त यानी स्वावलम्बन का युग
सबसे पहले शासन-हीनता का युग आता है। उसमें उच्छृंखलता रहती है। उसके बाद शासन हीन समाज को व्यवस्थित करने के लिये शासन-पद्धति का आविष्कार होता है और उसके संघटन का अर्थात् शासन युक्त समाज का युग आता है।
हम जब शासनहीन समाज की बात करते हैं तब मानव इतिहास के आदिम-युग में लौट जाने की बात करते हैं। लेकिन शासन-मुक्त समाज में हम स्वतन्त्र जनशक्ति का संघटन कर शासन-पद्धति की आवश्यकता को विघटित करना तथा स्वयं प्रेरित स्वावलम्बी समाज का अधिष्ठान करना चाहते हैं।
इसमें स्वतंत्र जनशक्ति की प्रेरणा से एक निश्चित प्रकार के समाज के सृजन की कल्पना है, न कि जो मौजूद है उसके विघटन मात्र की। यही कारण है कि हम यह नहीं कहते हैं कि अमुक प्रकार की परिस्थिति के कारण राज्य अपने आप सूख करके मर जायगा, बल्कि हम यह कहते हैं कि जन-शक्ति अपने संघटन और सक्रिय चेष्टा द्वारा शासन के नागपाश से अपने को मुक्त कर लेगी।
वास्तव में शासन से पूर्णतः मुक्ति की स्थिति तो एक आदर्श है। मनुष्य को उसकी प्राप्ति तभी होगी, जब वह विकास की आदर्श अवस्था को पहुँच जायगा। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति अन्तिम स्थिति होगी। यही कारण है कि गाँधी जी कहते थे कि आदर्श स्थिति रेखागणित की परिभाषा के बिन्दु जैसी है। उसकी कल्पना की जा सकती है, लेकिन आकृति दिखाई नहीं देती। अतः जो प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला समाज होगा, उसका आधार-बिन्दु तो सम्पूर्ण शासन-मुक्ति का आदर्श होगा, फिर भी प्रत्यक्ष आकृति में उसका स्वरूप शासन-निरपेक्ष समाज का होगा। अर्थात् शासन का कुछ अवशेष तो उस समाज में रह जायगा, लेकिन मनुष्य के नित्य जीवन में उसका असर नहीं रहेगा। दैनिक समस्याओं के समाधान, नित्य आवश्यकताओं की पूर्ति तथा आन्तरिक व्यवस्था के लिये शासन की अपेक्षा नहीं रहेगी। समाज के संतुलन के लिये इतना अवशिष्ट शासन आवश्यक भी है। समाज की इकाइयाँ चाहे जितनी स्वयं पूर्ण क्यों न हों, उन्हें एक सूत्र में पिरोने के लिये उस महीन धागे की आवश्यकता रहेगी। अवशिष्ट शासन वह महीन धागा होगा, लेकिन धागे से अधिक उसका काम नहीं होगा। फूलों की वह माला सुन्दर मानी जाती है जिसमें धागा दिखाई नहीं देता। उसी तरह जिस समाज के जीवन में शासन के अस्तित्व का भान नहीं होता, वह शासन-निरपेक्ष समाज है।
शासन मुक्त समाज की भूमिका
ऐसे शासन-मुक्त या शासन-रहित समाज की कल्पना गाँधी जी से पहले अराजकतावादियों और मार्क्सवादियों ने भी की थी। मार्क्स की कल्पना के अनुसार अब भी कम्युनिस्ट लोग शासन-हीन तथा श्रेणी-हीन समाज का नारा बुलन्द करते रहते हैं। यही कारण है कि जब गाँधीवादी और सर्वोदय के अनुयायी शासन-मुक्ति की बात करते हैं तो कितने ही लोगों को यह भ्रम होता है कि कहीं यह कम्युनिस्टों का ही तो विचार नहीं है।
पर बात ठीक इससे उल्टी है। कोई समाज शासन-मुक्त तब तक नहीं हो सकता, जब तक मनुष्य को शासन की आवश्यकता रहेगी। क्योंकि जब तक किसी चीज की आवश्यकता रहती है तब तक मनुष्य उससे मुक्ति पाने की चेष्टा ही नहीं करता। इस आधारभूत सिद्धान्त की दृष्टि से ही कम्यूनिज्म की भूमिका में दोष दिखाई देता है। वे अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये एकाधिकार (डिक्टेटरशिप) की सत्ता हस्तगत करना अनिवार्य मानते हैं, क्योंकि उनकी राय में समाज को किसी नतीजे तक पहुँचाने के लिये शासन की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। इस विचार को देखने से ‘प्रथम ग्रासे माक्षिकापात वाली कहावत याद आती है। अगर शासन-हीन समाज स्थापित करने की क्राँति के लिये प्रथम से ही शासन की अनिवार्यता महसूस होती है, तो शासन के बिना सम्पूर्ण समाज का संचालन हो जायगा ऐसी आशा किस बुनियाद पर की जाती है? समाज की समस्याओं के समाधान के लिये अगर शासन की आवश्यकता है, तो समाज की सुनियन्त्रित व्यवस्था के लिये उसकी आवश्यकता और भी अधिक रहेगी। तो वस्तुतः शासन-हीन समाज तभी हो सकता है, जब स्वतंत्र तथा स्वावलम्बी लोक शक्ति सहकार के आधार पर समाज-व्यवस्था कायम करके समाज से संचालन को ही विघटित कर सके। अर्थात् शासन-संचालित समाज के स्थान पर सहकारी समाज स्थापित हो सके ।
पर कम्युनिस्ट ऐसा करने के बदले प्रतिदिन शासन को अधिकाधिक व्यापक और दृढ़ करते जा रहे हैं। शासितों के हाथ में जब शासन रहेगा तो उसके परिणाम स्वरूप शासन का अन्त हो जायगा। कम्युनिस्ट इसे वैज्ञानिक दृष्टि मानते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि ऐसा वैज्ञानिक या दार्शनिक आदर्श आखिरी मंजिल ही हो सकती है, अर्थात् वह रेखागणित की परिभाषा के बिन्दु के समान है। अतएव अगर इस आशा से कि अंत में जाकर समाज शासन शून्य हो जायगा, हम शासन का लगातार अधिक संगठित करते चलें तो यह आशा कभी पूरी नहीं हो सकती। यह कल्पना वास्तविक नहीं होती, स्वप्नवत् ही रहती है।
यही कारण है कि गाँधी जी साध्य और साधन की एकरूपता पर इतना अधिक जोर देते थे। गहराई से विचार करने पर यह स्पष्ट हो जायगा कि विपरीत साधन द्वारा साध्य की ओर प्रगति असम्भव है। इसलिए शासन-मुक्ति की प्राप्ति के लिये शासन-निरपेक्ष स्वतंत्र जन शक्ति के संगठन द्वारा शासन की आवश्यकता को घटाते जाना ही सर्वोदय का मार्ग है। यही कारण है कि संत विनोबा ने भूमि समस्या का समाधान कानून के द्वारा न करवाके स्वतंत्र लोक शक्ति के भरोसे किया। उनका कहना है कि उनका साधन हिंसा शक्ति का विरोधी, दंड शक्ति से भिन्न, लोक शक्ति है।
इस सर्वोदय की क्राँति की प्रक्रिया से जन-शक्ति संगठन द्वारा शासन-संस्था का विघटन होता जाता है और उसकी प्रगति के साथ-साथ जन-स्वतंत्रता तथा शासन-हीनता की सिद्धि की ओर प्रगति होती रहती है। यह प्रगति जिस हद तक होती है, उस हद तक मानव शासन से मुक्त हो जाता है।
(श्री सत्यभक्त)
वर्तमान समय में संसार के अधिकाँश देशों में पूँजीपतियों की प्रधानता है। वह राजनैतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से राष्ट्र का कर्ता-धर्ता बना हुआ है। संभव है कि भारत का औद्योगिक विकास चरम सीमा तक न पहुँच सकने के कारण हम इस तथ्य की सचाई को अनुभव न कर सकते हों, पर संसार के आधुनिक राष्ट्रों, जैसे इंग्लैंड, अमरीका, जर्मनी, जापान, फ्राँस, इटली आदि में थोड़े बहुत अन्तर के साथ यही अवस्था देखने में आ रही है। इन सब देशों में पूँजीपति वर्ग उद्योग-धंधों का संचालन भी करता है और राष्ट्र पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में शासन भी करता है। अपनी आर्थिक शक्ति द्वारा पूँजीपति राष्ट्र की व्यवस्थापक और कार्यकारिणी सभाओं के सदस्यों को कर्तव्यच्युत कर देते हैं, न्यायालयों में अपनी इच्छानुसार जज नियुक्त कराते हैं, परिषदों और कमेटियों पर प्रभाव डालते हैं और शासन कर्त्ताओं को मनोनीत करते हैं। और इन सबसे बढ़कर उल्लेखनीय बात यह कि वे देश के समाचारपत्रों पर भी अधिकार रखते हैं और उनके द्वारा लोगों के दिमागों में विकृत विचार भर कर उनको प्रचलित प्रणाली का अनुयायी बना लेते हैं। दूसरी ओर व्यावसायिक क्षेत्र में वे श्रमजीवियों को इसलिए दबाकर रख सकते हैं चूँकि वे शासन पर अधिकार रखते हैं, अपने हित के अनुकूल कानूनों को पास कराते हैं और अपने पक्ष के समर्थन के लिये उनकी वैसी ही व्याख्या कराते हैं।
इन सभी राष्ट्रों की सरकारों पर एक श्रेणी विशेष का अधिकार रहता है। यह आवश्यक नहीं कि पूँजीपति स्वयं शासन और व्यवस्थापक सभाओं के सदस्य बनें। वे अपने पक्ष का समर्थन करने वाले राजनीतिज्ञों को ही शासन सभा में भिजवाते हैं और अगर थोड़े बहुत अन्य विचारों के लोग भी चुन लिये गये तो तरह-तरह के आर्थिक दबाव से उनको भी अपने अनुकूल बना लेते हैं। इन्हीं शासन सभाओं की सहायता से पूँजीपति श्रमजीवियों द्वारा उत्पन्न की हुई अरबों-खरबों की सम्पत्ति को हड़प लेते हैं। राजकीय कानून इस भयंकर लूट को न्यायानुसार बतलाते हैं। इसके विपरीत पूँजीपतियों की जायदाद की रक्षा के लिये कोने-कोने में सिपाही खड़ा रहता है। अगर कोई श्रमजीवी जबर्दस्ती या चुरा कर इस अपहरण की हुई सम्पत्ति का एक बहुत छोटा-सा अंश भी लेने की चेष्टा करे तो उसे अपराधी कहा जाता है, उसका पशुओं की भाँति पीछा किया जाता है और उसे पकड़ कर सींखचों के भीतर डाल दिया जाता है।
इससे प्रकट होता है कि जो श्रेणी समाज में प्रधान होगी वह अवश्य ही राष्ट्र के शासन यंत्र पर अपना अधिकार जमायेगी। अगर शासन-सत्ता उसके हाथ से निकल जायगी तो उसका प्रधानत्व भी नष्ट हो जायगा। प्राचीन काल में भी प्रत्येक स्वामी-वर्ग राष्ट्र के शासन को अपने अधिकार में रखकर ही समाज में प्रधान पद प्राप्त कर सका था और उस पद की रक्षा कर सका था। प्रत्येक उठता हुआ क्राँतिकारी वर्ग शासन यंत्र पर अधिकार करके ही पुरानी प्रधान श्रेणी को छिन्न-भिन्न कर सकता है। पूँजीपति वर्ग ने मध्य कालीन सामन्त वर्ग (राजा और जागीरदार आदि) की सत्ता को नष्ट करने के लिये पहले सशस्त्र विद्रोह करके शासन यंत्र पर ही अधिकार किया था।
इसलिए वर्तमान समय का क्राँतिवादी दल भी पूँजीपतियों के हाथ से सत्ता लेकर ही उन पर विजय प्राप्त कर सकता है। प्राचीन काल के क्राँतिकारियों के सम्मुख शासन सत्ता पर अधिकार करने का एक ही तरीका था अर्थात् अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध करना। पर वर्तमान समय का क्राँतिवादी ‘वोट’ द्वारा भी बहुत कुछ सफलता प्राप्त कर सकता है।
पर यह ‘वोट’ का मार्ग पूरी तरह कारगर नहीं माना जा सकता। पूँजीपति अपनी अपार सम्पत्ति के प्रभाव से ‘वोट-प्रथा’ का बहुत कुछ दुरुपयोग कर सकते हैं और करते हैं। वे बहुसंख्यक श्रमजीवियों को ‘वोट’ के अधिकार से ही वंचित करा देते हैं और जो विरोधी पक्ष वाले चुन लिये जायें उन पर मुकदमे चलाकर और तरह-तरह की जालसाजी करके उनको सदस्यता से खारिज करा सकते हैं। इसी प्रकार अनेक तरह के छल-बल से वे शासन सभाओं में अन्यायपूर्वक अपना बहुमत बनाने में समर्थ हो जाते हैं।
इसलिए, श्रमजीवियों की सफलता का मार्ग दूसरा ही है। ये यह तो जानते ही हैं कि शासन-यंत्र पर पूँजीपतियों का अधिकार इसलिए है कि वे आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक शक्तिशाली हैं। इसलिए श्रमजीवी उनको शासन में से हटाना चाहें तो यह तभी संभव होगा जब कि वे आर्थिक दृष्टि से पूँजीपतियों से अधिक शक्ति शाली बन जायें। श्रमजीवी यह भी जानते हैं कि पूँजीपति जो धन कमाते हैं वह मजदूरों को नौकर रखकर ही प्राप्त करते हैं। इसलिए अगर श्रमजीवी अपने को ऐसा संगठित कर लें कि जब चाहे एक साथ पूँजीपतियों का काम बन्द करके उनकी अर्थव्यवस्था को पंगु कर दें तो वे अवश्य ही उनको हरा सकते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ऐसी स्थिति आने पर पूँजीपति अपनी सेना की शक्ति से श्रमजीवियों को दबाकर अपनी शासन-सत्ता स्थिर रख सकेंगे। आजकल के अस्त्र-शस्त्रों की शक्ति को देखते हुये यह असम्भव तो नहीं है, तो भी सरकार के पास इतने सिपाही होना कठिन है जो प्रत्येक फैक्टरी और कारखाने में मौजूद रह कर मजदूरों को काम करने को विवश कर सकें। फिर ऐसा होने से सेना चारों तरफ बिखर जायगी। और उसकी संगठन शक्ति अधिकाँश में खत्म हो जायगी। इस दृष्टि से पूर्ण रूप से संगठित श्रमजीवी वर्ग व्यावसायिक और राजनीतिक क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित कर सके यह असम्भव नहीं है।
जब सेना की शक्ति का इस प्रकार अन्त हो जायगा अथवा वह स्वयं श्रमजीवियों का ही पक्ष ग्रहण कर लेगी तब श्रमजीवियों के चुने हुये प्रतिनिधि शासन-सत्ता की बागडोर अपने हाथ में सँभाल लेंगे और नई औद्योगिक सरकार का कार्य-संचालन करने लगेंगे। पर इस प्रकार के शासन की आवश्यकता भी थोड़े ही समय के लिये होगी। क्योंकि यदि कोई बाहरी शक्ति विघ्न उपस्थित न करे तो कुछ ही वर्षों में समाज स्वयं नवीन उत्पादन प्रणाली के अनुसार चलने लगेगा और सब प्रकार की पैदावार पूँजीपतियों का भण्डार भरने के बजाय समस्त काम करने वाली जनता के उपयोग में आने लगेगी।
पर यह तस्वीर का एक ही पहलू है। मजदूरों के दबाव को कम करने के लिये पूँजीपति स्वयं चालित (ऑटोमेटिक) मशीनों की वृद्धि कर रहे हैं, जिससे थोड़े ही कार्य-कुशल व्यक्ति कारखाने में सामग्री बना सकें। पर समस्या इतने से ही हल नहीं हो सकती। सामान बन जाने पर सबसे बड़ा प्रश्न यह होगा कि उस माल को कहाँ बेचा जाय? पूँजीवादी प्रणाली के अनुसार कारखाने के स्वामी को जो लाभ होता है उसे वह कारखाने को बड़ा करने अथवा किसी अन्य स्थान में, जहाँ आवश्यकता जान पड़े, नया कारखाना खोलने में लगाता है। ऐसा करने से उसका नफा और बढ़ जाता है। अंत में स्वभावतः ऐसा समय आता है कि जब बनने वाले माल का परिमाण इतना बढ़ जाता है कि उसका कहीं पर खप सकना असम्भव होता है। ऐसी परिस्थिति आ जाने पर दो ही मार्ग रह जाते हैं। या तो अतिरिक्त माल को एक बड़ी सेना से रख कर खर्च कर दिया जाय और उसी सेना से क्राँतिकारी श्रमजीवियों को भी दबाकर रखा जाय। अथवा ऐसी सामाजिक प्रणाली की स्थापना की जाय जिसमें समस्त सामग्री को उसे उत्पन्न करने वाले श्रमजीवी ही खर्च कर डालें। इसमें सन्देह नहीं कि संसार के अब तक के विकास-क्रम को देखते हुये यह निश्चय जान पड़ता है कि पूँजीवाद के बाद समाज में श्रमजीवियों की ही प्रधानता और नियंत्रण होगा, पर इस समय जो परिस्थिति हमारे सामने उपस्थिति है उससे यह भी निस्सन्देह है कि पूँजीपति वर्ग शीघ्र ही या सहज में अपने स्थान को न छोड़ेगा। यह भी हो सकता है इस संघर्ष में संसार नाश के किनारे पहुँच जाय और उसके बाद नई दुनिया की रचना हो, जिसमें न पूँजीपति बचें न श्रमजीवी, वरन् समाज स्वयं ही सबके अधिकारों का ध्यान रख कर सामाजिक-न्याय का युग ले आवे।
(“एक समाज हितैषी”)
[वर्ण-भेद हिन्दू-जाति का सबसे बड़ा आधार है। हिन्दुओं में जैसी जात-पात की प्रथा दिखलाई पड़ती है वैसी संसार के किसी अन्य देश के निवासियों में नहीं है। यह जाति-प्रथा किसी भी कारण से कभी उत्पन्न हुई होगी और सम्भवतः उस समय यह समाज के लिये लाभकारी भी रही हो, पर वर्तमान समय में इसका रूप बहुत विकृत हो गया है और यह समाज की प्रगति में एक रोड़ा सिद्ध हो रही है। इस जात-पात की मनोवृत्ति ने हिन्दू समाज को बहुसंख्यक छोटे-बड़े टुकड़ों में बाँट दिया है, जिसके फल से हिन्दू जाति निर्बल बन गई और पारस्परिक फूट का भाव उत्पन्न हो गया। इसी फूट के कारण विदेशियों को भारतवर्ष पर आक्रमण करने और इस देश को दासत्व की शृंखलाओं में बाँधने का अवसर मिल सका था। प्रस्तुत लेख में भारतवर्ष के एक प्रमुख विद्वान ने जाति प्रथा की जो आलोचना की है वह कठोर होने पर भी अधिकाँश में सत्य है। हिन्दू जाति के शुभाकाँक्षियों का कर्तव्य है कि वे इन विचारों पर भलीभाँति मनन करें और इस घातक जाति-प्रथा को, जिसके कारण जन्म से ही किसी व्यक्ति को पतित और अयोग्य मान लिया जाता है, समाप्त करने या इसमें आवश्यकीय परिवर्तन करने को कटिबद्ध हो जायें। अन्यथा इस जाति को अभी और भी बुरे दिन देखने पड़ेंगे।]
हिन्दुओं के आचार शास्त्र पर वर्णभेद का प्रभाव बहुत खेद जनक हुआ है। वर्ण भेद ने सार्वजनिक भाव को मार डाला है। वर्ण भेद ने सार्वजनिक वदान्यता के भाव को भी नष्ट कर दिया है। वर्णभेद ने लोक मत को असम्भव बना दिया है। एक हिन्दू ‘जनता’ का अर्थ अपना वर्ण ही समझता है। उसका उत्तरदायित्व उसके स्वयं के ही वर्ण के प्रति माना जाता है। उसकी भक्ति अपने ही वर्ण तक परिमित है। वर्णभेद ने सद्गुणों को दबा दिया और सदाचार को जकड़ दिया है। सत्पात्र के लिये कोई सहानुभूति नहीं रही। गुणी के गुणों को कोई प्रशंसा नहीं। किसी को कष्ट में देखकर उसकी सहायता का भाव नहीं उत्पन्न होता। दान होता जरूर है, परन्तु वह अपने ही वर्ण से आरम्भ होकर अपने ही वर्ण तक समाप्त हो जाता है। सहानुभूति है, परन्तु दूसरे वर्णों के लोगों के लिये नहीं। क्या कोई हिन्दू वर्ण और जाति का ख्याल छोड़कर किसी बड़े और अच्छे मनुष्य को अपना नेता स्वीकार करेगा और उसके पीछे चलेगा? (महात्मा गाँधी को छोड़ दीजिये!) इसका उत्तर यही है कि हिन्दू उसी नेता के पीछे चलेगा, जो उसकी अपनी जाति का हो। एक ब्राह्मण तभी नेता के पीछे चलेगा जब कि वह ब्राह्मण हो। इसी प्रकार कायस्थ कायस्थ और बनिया बनिये को नेता मानेगा। अपनी जात-पाँत को छोड़ कर मनुष्य के सद्गुणों की कद्र करने की प्रवृत्ति हिन्दू-समाज ने खो दी है। सद्गुण की कद्र होती है, परन्तु केवल उस समय, जब कि गुणी उसका अपना जाति-बन्धु हो। हिन्दुओं की समस्त आचार नीति, जातीय नीति (ट्राइबल मोरेलिटी) हो गई है। मेरा जाति-भाई हो, चाहे वह ठीक कहता हो या गलत, मेरा जाति बन्धु हो चाहे अच्छा हो या बुरा। यह भावना पुण्य का पक्ष लेने या पाप का विरोध करने वाली नहीं कही जा सकती। यहाँ तो सिर्फ जाति का पक्ष लेने की बात है। क्या इस तरह हिन्दुओं ने अपने वर्णों और उपवर्णों के हितार्थ अपने देश के विरुद्ध विश्वासघात नहीं किया है?
अब प्रश्न यह है कि जाति-भेद की खराबी को मिटाया कैसे जाय? हिन्दुओं की सामाजिक व्यवस्था का सुधार कैसे हो? यह प्रश्न बड़े ही महत्व का है। कुछ लोगों की सम्मति है कि जातिभेद को मिटाने के लिये पहले उपजातियों को मिटाना चाहिये। जिन लोगों का यह विचार है वे यह समझते हैं कि मुख्य जातियों की अपेक्षा उपजातियों के रीति रिवाज और सामाजिक स्थिति में अधिक समानता है। पर उनका यह विचार संपूर्ण भारत की सामाजिक अवस्था का ज्ञान न होने से उत्पन्न हुआ है और इसलिए अधिकाँश में गलत है। उदाहरण के लिये सामाजिक दृष्टि से उत्तरी और मध्य भारत के ब्राह्मण बम्बई और मद्रास के ब्राह्मणों की अपेक्षा नीचे दर्जे के हैं। सच पूछा जाय तो पूर्वोक्त का अधिकाँश भाग तो रसोई करने वालों और पानी भरने वालों का है। पर दक्षिणी ब्राह्मणों की सामाजिक स्थिति काफी ऊँची होती है। इसके विपरीत उत्तर भारत के वैश्य और कायस्थ दक्षिण भारत के ब्राह्मणों के समान उच्च स्थिति का उपभोग करते हैं।
फिर भोजन के विषय में बम्बई तथा मद्रास के ब्राह्मणों में, जो निरामिषभोजी हैं, और काश्मीर तथा बंगाल के ब्राह्मणों में, जो माँसाहारी हैं, कोई सादृश्य नहीं। इसके विपरीत बम्बई तथा मद्रास के ब्राह्मण भोजन की बातों में गुजराती मारवाड़ी बनिये और जैन आदि निरामिषभोजियों से अधिक मिलते हैं। इस प्रकार सामाजिक स्थिति के आधार पर कुछ उपजातियों का मिश्रण संभव माना जा सकता है, पर इससे कोई बड़ा लाभ नहीं हो सकता। उपजातियों के टूटने से मुख्य जातियों की शक्ति और अधिक बढ़ेगी जिससे वे निर्बलों का अधिक अनिष्ट करने लगेंगे।
जाति-भेद को नष्ट करने के लिये दूसरा उपाय अन्तरवर्णीय सहभोजों का प्रचार बतलाया गया है। पर यह भी विशेष कारगर नहीं, क्योंकि अनेक जाति ऐसी हैं जिनमें सहभोज की प्रथा है, पर इससे उनकी उपजातियों का भेदभाव दूर नहीं हो सका। बदलने का वास्तविक उपाय अन्तरवर्णीय या अन्तर्जातीय विवाह है। केवल रक्त का मिश्रण ही स्वजन और मित्र होने का भाव उत्पन्न कर सकता है। जब तक मित्र होने, भाई बन्धु होने का भाव प्रधान नहीं होता, तब तक जाति-भेद द्वारा उत्पन्न किया हुआ पृथकता का भाव, पराया होने का भाव, कभी दूर न होगा। जहाँ समाज पहले ही दूसरे बन्धनों से आपस में खूब ओत-प्रोत हो, वहाँ विवाह जीवन की साधारण सी घटना होती है। परन्तु जहाँ समाज कट कर टुकड़े-टुकड़े हो रहा हो, वहाँ इकट्ठा करने वाली शक्ति के रूप में विवाह एक अनिवार्य आवश्यकता की बात हो जाती है। इसके सिवा और कोई भी बात जाति-भेद को मिटाने का काम नहीं दे सकती।
कितने ही हिन्दू सुधारकों ने उपर्युक्त सचाई को समझ लिया है, तो भी हिन्दुओं की एक बहुत बड़ी संख्या रोटी-बेटी का सम्बन्ध करने को तैयार नहीं होती। इसका क्या कारण है? इसका एक यही उत्तर हो सकता है कि जात-पाँत तोड़ कर रोटी-बेटी का सम्बन्ध करना हिन्दुओं के उन आन्तरिक विश्वासों तथा सिद्धान्तों के विपरीत है जिन्हें हिन्दू पवित्र समझते हैं।
जिसके एक लाख सदस्य युग-निर्माण के लिए अग्रसर हो रहे हैं।
गायत्री-परिवारों की लगभग दो हजार शाखाएं जैसे-जैसे युग निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के अपने कर्तव्य को अनुभव करती जा रही हैं वैसे ही वैसे उनमें उत्साह स्फूर्ति और कर्तव्य परायणता की भावना जागृत हो रही है। यह जागृति यदि उचित रूप से विकसित होती रही तो उसके सत्परिणाम ऐतिहासिक होंगे। भारत के इतिहासकार गायत्री-परिवार के एक लाख सदस्यों द्वारा किये हुए महान कार्यों को भूल न सकेंगे।
अब तक विचारशील लोगों की दृष्टि में पूजा-पाठ वाले लोगों का स्थान निकम्मे, आलसी, ठग, परावलम्बी, स्वार्थी एवं निराशावादी श्रेणी में गिना जाता रहा है।
गायत्री-परिवार की शाखाओं में धर्म सेवा के लिए भारी उत्साह उत्पन्न हो रहा है। गायत्री उपासना के फलस्वरूप साधकों में जो सद्बुद्धि उत्पन्न हुई है, उसका उपयोग वे परमार्थ मार्ग में कर रहे हैं। स्वार्थी लोग जन्त्र मन्त्र की उधेड़बुन में इसलिए लगते हैं कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से भौतिक लाभ हों, पर जिन पर माता का सच्चा अनुग्रह हो जाता है वे व्यक्तिगत सुख सुविधा पर विशेष ध्यान न देकर परमार्थ में अपना जीवन लगाने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। गायत्री-परिवार के अधिकाँश साधकों को माता की सच्ची कृपा प्राप्त हुई है और वे धर्म सेवा के मार्ग पर एक दूसरे से आगे बढ़कर निकलने की बाजी लगाये हुए हैं।
इस महायज्ञ की सफलता के लिए कई परिजनों ने अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में रहते हुए भी इतना समय, श्रम एवं सद्भाव लगाया है जिसे देखते हुए सतयुग के तपस्वियों की याद आ जाती है। लगता है कि किसी जमाने के ऋषि मुनि इस युग के अनुरूप साधारण शरीरों में जन्म धारण किये हुए हैं, पर उनकी भावनाएं उसी प्राचीन युग जैसी हैं। इस प्रकार की आत्माओं का एक स्वाभाविक संगठन गायत्री परिवार के रूप में बनता जा रहा है।
यों आज अनेकों सभा सोसाइटियाँ मौजूद हैं और वे अपने रंग बिरंगे कार्यक्रम समय-समय पर प्रदर्शित करके जनता को आकर्षित करती रहती हैं। पर उनके भीतर सच्चा जीवट नाम मात्र को ही होता है। गायत्री परिवार देखने में एक संस्था जैसी वस्तु है पर वस्तुतः इसका भीतरी रूप बिलकुल वैसा ही है जैसा किसी कौटुम्बिक, घरेलू सुव्यवस्थित परिवार का होता है। परिवार के परिजन जहाँ युग निर्माण के महान मिशन को पूरा करने के लिए कदम-कदम मिलाकर कूच करने वाले सैनिकों की तरह साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं, साथ ही आपस में आत्मीयता, सुहृदयता, एकता, के तत्वों को विकसित करते हुए इस पृथकता के, व्यक्तिवाद के, स्वार्थपरता के युग में एकता, सामूहिकता एवं निःस्वार्थता के आदर्शों को क्रियान्वित करने के लिए भी आतुर हो रहे हैं।
अखण्ड ज्योति के गत अंक में (1) “युग निर्माण का मंगलाचरण” (2) तप साधना द्वारा दिव्य शक्ति का अवतरण (3) महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद- इन तीन लेखों में यह बताया गया है कि गायत्री-परिवार का आगामी सार्वजनिक कार्यक्रम उद्देश्य लक्ष, विचार तथा अरमान क्या हैं? यह कोरी आकाँक्षाएं तथा अभिलाषाएं ही नहीं है-इन्हें शेखचिल्ली के सपने ही नहीं समझना चाहिए। एक लाख व्रतधारी धर्म सेवकों की अन्तरात्माओं में जो हिलोरें उठ रहीं हैं उन्हें देखते हुए इस लक्ष तक पहुँच सकना कुछ भी कठिन नहीं है। इतना विशाल लक्ष और इतना नया-केवल दो वर्ष का बाल-संगठन-इन दोनों की तुलना करने पर यह सब ऐसा लगता है मानों छोटे मुँह बड़ी बातें की जा रही हों। समय ही बतावेगा कि वस्तुस्थिति ऐसी ही बन चुकी है जिस पर आज नहीं तो कल सुसंस्कृत भारत के भावी नागरिक गर्व अनुभव कर सकेंगे।
जिस संगठनों में स्वार्थपरायण, स्वार्थ बुद्धि से एकत्रित हुए लोगों का जमघट रहता है वह क्षणिक उत्साह में कुछ दिनों चमकते हैं। जब तक उन व्यक्तियों की स्वार्थ सिद्धि होती है, तब तक वे उसमें सम्मिलित रहते हैं पर कुछ ही दिनों में छोटे से कारण उपस्थित हो जाने पर बालू के महल की तरह उसका पतन होते देर नहीं लगती। पर जिन संगठनों की जड़ में पूर्ण सचाई, निःस्वार्थता, ईमानदारी, आत्मीयता एवं एक दूसरे के लिये मर मिटने की साध होती है, वे चाहें छोटे, कम पढ़े, निर्धन लोगों के ही संगठन क्यों नहीं हों, वे फलते-फूलते हैं दिन-दिन मजबूत होते जाते हैं और अपने संगठित प्रयत्न के प्रेम भरे वट वृक्ष की छाया में बैठ कर स्वर्गीय सुख शान्ति का अनुभव करते हैं। ऐसे संगठन आसानी से छिन्न-भिन्न नहीं होते।
गायत्री-परिवार में जिस उच्च श्रेणी की आत्माएं एकत्रित हो रही हैं, उसे देखते हुये इस संगठन के संचालकों तक को भारी आश्चर्य होता है और लगता है कि किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिये भगवान का एक पूर्व आयोजित विधान बना बनाया मौजूद था। केवल उसके विधिवत उद्घाटन करने की व्यवस्था मात्र ही अब की गई है।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति को इस संगठन का एक शंखनाद, मंगलाचरण एवं शिलान्यास कहा जा सकता है। जिस प्रकार प्राचीन काल में अश्वमेध यज्ञों के द्वारा असंगठित स्वेच्छाकारी राज्यों को एक बड़ी केन्द्रीय राज सत्ता के अंतर्गत संगठित किया जाता था, उसी प्रकार इस महायज्ञ का कार्यक्रम देकर धर्म सेवा के लिये उत्कंठित आत्माओं को सारे देश में से ढूँढ़-ढूँढ़ कर एक संगठित सूत्र में पिरो दिया गया है। महायज्ञ का इतना विशाल कार्यक्रम बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के निर्धन साधकों के बलबूते पर सफल बनाने की कड़ी परीक्षा के रूप में उपस्थित किया गया है। प्राचीन काल में कभी-कभी कोई गुरु अपने विशिष्ट शिष्यों की निष्ठा को परखने एवं बढ़ाने के लिये उन्हें गुरु दक्षिणा के रूप में कोई कठिन काम पूरा करने का आदेश देते थे। उस आदेश की पूर्ति के लिये किस शिष्य ने कितना प्रयत्न, कितना त्याग किया, उस आधार पर उनकी पात्रता कुपात्रता का पता लगाया जाता था। यह पात्रता ही अन्त में गुरु-कृपा या भगवान की कृपा के रूप में उन्हें सत्परिणामों के समीप पहुँचाती थी।
आज महायज्ञ की पूर्णाहुति के विशाल कार्यक्रम ने गायत्री-परिवार के परिजनों को कड़ी परीक्षा की कसौटी पर चढ़ा दिया है। प्रसन्नता की बात है कि खोटे सिक्के, नकली गहने, बहुत कम निकले हैं, अधिकाँश ने अपने को खरा सोना साबित किया है। निकट भविष्य में जब इस युग के अभूतपूर्व धर्मानुष्ठान ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का इतिहास लिखा जायगा तब सारा संसार देखेगा कि इतना छोटा लगने वाला संगठन भीतर ही भीतर कितना मजबूत था, उसमें कितनी तीव्र भावना एवं निष्ठा भरी हुई थी, धर्म सेवा के लिये एक दूसरे से आगे बढ़ने की किस प्रकार होड़ लगी, और किसी-2 ने कितनी विषम परिस्थितियों में रहते हुये कितने बड़े-बड़े साहसपूर्ण तप त्याग के उदाहरण उपस्थित किये।
परिवार के लक्ष और संगठन को सफल बनाने के लिये कई आत्माएं ऊँचे पर्दों को, अच्छी आजीविका को, आराम की जिन्दगी को ठोकर मार कर अपने आपको अपने स्त्री बच्चों को राष्ट्र माता के लिये अर्पण करने जा रहे हैं। ये गृहस्थ में रहते हुये भी साधुओं के समान अपरिग्रही रहेंगे और रूखी सूखी रोटी, फटा टूटा कपड़ा पहन कर किसी प्रकार के वेतन आदि की स्वप्न में भी इच्छा किये बिना, राष्ट्र में सद्ज्ञान की ज्योति के लिए अपने को तिल-तिल करके जलाने के लिये तैयार होंगे।
पिछले विशद् गायत्री महायज्ञ में 27 व्यक्तियों ने नरमेध-आत्मदान-किया था। वे सभी ऐसे थे जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं थीं, और किसी व्यापार सर्विस आदि की प्रलोभनमयी परिस्थितियों में नहीं थे। इस बार के दुस्साहस उनसे बढ़ चढ़ कर हैं। अच्छी आमदनी की सम्मान पूर्ण, निश्चित आजीविकाओं को लात मार कर अपना ही नहीं, अपने स्त्री बच्चों को भी साधु जीवन बिताने के लिये, अब की अपेक्षा अनेक गुना परिश्रम करने के लिए तत्पर होना सचमुच ही इस घोर स्वार्थपरता और खुदगर्जी के जमाने में बहुत कठिन है। पर यह असम्भव भी संभव होने जा रहा है। इन्हें देखकर परिवार के वे लोग जो बाल बच्चों की जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके हैं, पर माया मोह की फाँसी से छूट कर सार्वजनिक धर्म सेवा के लिये आगे कदम बढ़ाने का साहस नहीं कर पाते, अवश्य ही प्रेरणा प्राप्त करेंगे। ऐसे साधु बाबा जी जो काम से जी चुराने की मानसिक दुर्बलता के कारण लाल पीले कपड़े में अपनी काहिली को छिपाये इधर से उधर मटर गश्ती करते और रोटी हराम करते फिरते हैं, भी शर्म कर सकते हैं और धर्म की नाव पार करने में कुछ सहारा देने को तैयार हो सकते हैं।
आज ब्राह्मण परम्परा, ऋषि परम्परा का लोप होता जा रहा है। अपने चरित्र और ज्ञान द्वारा जन साधारण का मानसिक स्तर मानवीय गुणों से परिपूर्ण बनाने की जिम्मेदारी अपने कंधे पर उठाए रहने वाले आत्मत्यागी साधु ब्राह्मण आज ढूँढ़े नहीं मिलते। भारत भूमि को देव भूमि बनाने की महान प्रक्रिया का एक मात्र आधार यहाँ की यही विशेषता थी। इस विशेषता का नष्ट हो जाना-भूसुरों का-सच्चे साधु ब्राह्मणों का-अभाव हो जाना हमारी महान आध्यात्मिक सम्पत्ति के नष्ट हो जाने का एक मात्र कारण है। इस अभाव की पूर्ति करने का दृढ़ संकल्प, गायत्री-परिवार के सुसंगठित रूप में उपस्थित हुआ है। लगता यही है कि युग की पुकार पर जैसे हजारों लाखों नर-नारी बौद्ध धर्म के भिक्षु भिक्षुणी बनकर भौतिकता और विलासिता के गर्त में डूबी हुई जनता को उबारने के लिए अपने सुख सौभाग्य को लात मार कर सेवा में संलग्न हुए थे, वैसी ही पुनरावृत्ति अब फिर होने जा रही है। राजनैतिक गुलामी के बन्धनों की बेड़ियाँ काटने के लिए यदि युग की पुकार हजारों लाखों व्यक्तियों को गोली, जेल और तबाही को गले लगाने के लिए प्रस्तुत कर सकती है तो कोई कारण नहीं कि मानवता, नैतिकता, आस्तिकता और साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए युग की पुकार सुनने वाले कुछ आत्म-दानी व्रतधारी आगे कदम बढ़ाने को तैयार न हों। यह युग-यात्रा आरम्भ हो चुकी है, कदम मिलाकर लोग बढ़ रहे हैं और आगे तीव्र गति से सहस्रों धर्म सेवक इस चतुरंगिणी सेना में सम्मिलित होकर रहेंगे। इस प्रकार भारत की अन्तरात्मा की पुकार प्राचीन काल जैसा ऋषि युग अवतरित करने की आकाँक्षा में परिणित होकर रहेगी। लगता है यह सपने साकार होने की घड़ी अब निकट ही आ पहुँची है।
गायत्री परिवार द्वारा लोक हित के, युग निर्माण के अनेक कार्यक्रम हाथ में लिये जा रहे है। इसका परिचय गत अंक में ‘पूर्णाहुति के बाद’ लेख में दिया जा चुका है। साथ ही परिवार की अंतरंग गतिविधियों को अत्यन्त उच्चकोटि के आदर्शों से अभिप्रेत रखने की महत्वपूर्ण व्यवस्था बनाई गई है। इस संस्थान में दो तरह के सदस्य हैं - जो अभी नये ही भर्ती हुये हैं, उन्हें (1) उपासना और (2) स्वाध्याय का चस्का लगाया जा रहा है। वे उपासना और स्वाध्याय के आवश्यक धर्म कर्तव्यों को न छोड़ने पायें इसके लिये विशिष्ट सदस्य बार-बार प्रेरणा देते रहते हैं। दूसरी श्रेणी में वरिष्ठ सक्रिय सदस्य हैं। उनको अपनी नियमित (1) उपासना तथा (2) स्वाध्याय करने के अतिरिक्त जन-सेवा के दो कार्य भी करने होते हैं 1-ब्रह्मदान 2-धर्मफेरी। उनके मस्तिष्क में यह विचार गहराई तक जमाये जाते हैं कि प्रत्येक सच्चे धर्म सेवक का यह एक आवश्यक कर्तव्य है कि भले ही स्वयं एक रोटी खा भूखा सो जावे पर एक मुट्ठी अन्न या एक दो पैसा रोज संसार में सद्ज्ञान फैलाने के लिये—ज्ञान यज्ञ के लिये—दान अवश्य करे। दूसरी बात जो इन वरिष्ठ श्रेणी की अन्तरात्मा में जमाई जाती है वह यह है कि जिस प्रकार नित्य कुछ न कुछ दान ब्रह्मदान के लिये करना आवश्यक है उसी प्रकार थोड़ा बहुत समय भी धर्म प्रचार में लगाया जाना चाहिये। घर बैठे बड़े-बड़े मनसूबे बाँधते रहने से, योजनाएं बनाते रहने से कुछ काम चलने वाला नहीं है। धर्म प्रचार के लिए परिश्रम की, प्रदक्षिणा की, धर्मफेरी की सच्ची तीर्थ यात्रा आवश्यक है। लोगों के घरों पर जाकर उन्हें धर्म प्रेरणा देने में जिसे शर्म, झिझक, हेठी, तौहीन का अनुभव नहीं होता वरन् प्रसन्नता अनुभव होती है। वही सच्चा धर्म सेवक है।
उपासना और स्वाध्याय के अतिरिक्त ब्रह्मदान और धर्मफेरी के कर्तव्य को भी पालन करने वाले वरिष्ठ सक्रिय धर्म सेवकों की अब एक विशेष श्रेणी बनाई जा रही है जो “उपाध्याय” के नाम से पुकारी जायगी। प्राचीन काल में धर्म शिक्षक लोग ही उपाध्याय कहलाते थे। “उपाध्याय” गोत्र इसी श्रेणी के लोगों का प्रतीक है। पर अब तो इस गोत्र वाले भी नाम मात्र के ही उपाध्याय हैं। धर्म प्रचार का कर्तव्य छोड़ बैठे। गायत्री परिवार की यह विशिष्ट श्रेणी सचमुच के ‘उपाध्याय’ के कर्तव्य पालन का व्रत धारण करेगी। हर उपाध्याय के घर पर उसका एक व्यक्तिगत ‘गायत्री ज्ञान मन्दिर’ होगा। इस छोटे से संस्थान का वह स्वयं ही संस्थापक संचालक, संरक्षक, प्रधान, मन्त्री तथा कार्यकर्ता होगा। उसका परम पवित्र कर्त्तव्य होगा कि अपने घर के इस देव मन्दिर के पास ज्ञान की—सत्साहित्य की—अधिकाधिक सम्पत्ति जमा करें। ज्ञान की देवी गायत्री को रेशमी वस्त्रों और सुनहरी आभूषणों से नहीं—सद्ग्रन्थों से, सत्साहित्य से सजाया जाता है। अपना ज्ञान मन्दिर इस दृष्टि से खूब सम्पत्तिवान् एवं सुसज्जित हो इसके लिये हर उपाध्याय अपना पेट काटकर भी कुछ त्याग निरन्तर करता रहेगा। काम इतने से ही पूरा न होगा वरन् उसे यह साहित्य पढ़ाने के लिये—इस ओर से उदासीन लोगों को चस्का लगाने के लिये—उनके घरों पर जाना पड़ेगा। खुशामद करके अपनी पुस्तकें लोगों को पढ़ने देने और उनसे वापिस लाने के लिये जाना होगा। इस कार्य के लिए कुछ समय लगाना—पैदल चलना—एक श्रेष्ठ धर्मफेरी तीर्थ यात्रा वह समझेगा।
इस प्रकार प्रत्येक ज्ञान मन्दिर व्यक्तिगत एवं छोटा संस्थान होते हुये भी ज्ञान प्रसार का—धर्म प्रसार का—एक अत्यन्त महत्वपूर्ण केन्द्र होगा। इस ज्ञान दीप की किरणें अपने आस-पास के क्षेत्र में धार्मिकता का प्रकाश फैलाकर अनेक आत्माओं के अन्तस्तल में जीवन ज्योति प्रकाशित करने का ठोस काम करेंगी। उपाध्यायों और हजारों ज्ञान मन्दिरों के जलाये हुए ज्ञान दीप इस अमावस्या की अंधेरी रात में भी दीपावली की झिलमिल आभा पैदा करेंगे और कोटि-कोटि अन्तःकरणों में—’तमसो मा ज्योतिर्गमय,’ ‘असतोमा सद्गमय,’ ‘मृत्योर्मामृतंगमय’ की दिव्य किरणें बिखर पड़ेंगी।
तीसरी उच्च श्रेणी के आत्मदानी वे लोग होंगे, जो अपने आपको सर्वतोभावेन धर्म सेवा के लिए समर्पित कर देंगे, अपनी व्यक्तिगत वासना और तृष्णाओं को तिलाँजलि देकर शरीर और मन से हर घड़ी धर्म सेवा की बात ही सोचेंगे। व्यक्ति गत महत्वाकाँक्षा चाहे वह धन जमा करने की, विलास करने की हो या सूक्ष्म जगत में ऋद्धि सिद्धि की हो या कारण क्षेत्र में स्वर्ग मुक्ति की हो, तीनों को ही, वासनाओं और कामनाओं को छोड़कर गीता के अनासक्त कर्मयोगी की तरह धर्मसेवा के लिये अपने आपको भगवान के समर्पण करना होगा। ऐसे लोगों के जीवन निर्वाह की जिम्मेदारी जनता वहन करेगी—तपोभूमि उठायेगी।
गत कुछ वर्षों का संस्था को एक बड़ा कटु अनुभव है। वह यह कि कामचोर, हरामखोर, शारीरिक परिश्रम में अपना अपमान समझने वाले, विद्या पढ़ने और मानसिक श्रम से दूर भागने वाले, साथ ही अनुदारता संकीर्णता और जिम्मेदारी लापरवाही आदि दुर्गुणों से भरे हुये साधु बाबाजी प्रकृति के लोग आत्मदानी बनकर मुफ्त की रोटी तोड़ने के लिये आ घुसते हैं। रोटी खाने और समय काटने तक ही उनकी इच्छा नहीं रहती वरन् और भी अनेक प्रकार के नैतिक-अनैतिक स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। इन लोगों को जब रोका जाता है या हटाया जाता है तो इतने दिन के प्राप्त हुए लाभों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करके चुपचाप चले जाना तो दूर उलटे अपने मिशन की जड़ पर कुल्हाड़ा चलाने को ही उतारू हो जाते हैं। ऐसे लोगों के सम्बन्ध में अब आगे बहुत सावधानी बरती जायगी। बहुत सोच समझ कर, बहुत ठोक बजाकर, ही किसी का आत्मदान स्वीकार किया जायगा। कठोर परख रखते हुये भी संस्था को सच्चे आत्मदानी मिलेंगे, भले ही वे थोड़े हों पर जो मिलेंगे वे सच्चे मिलेंगे और ठोस काम करेंगे। इस उच्च श्रेणी के सदस्यों की आज बड़ी कमी है। माता इसे भी पूरा करेगी। जब इतनी कमियाँ पूरी हो गई, होती जा रही हैं तो गायत्री संस्था आत्म दानियों की प्यास के कारण तृषातुर न मरने पावेगी। कोई देवता अपना जीवन अमृत टपका कर युग की इस प्यास को भी तृप्त करने के लिए निकल ही आवेंगे। युग निर्माण की खेती को उपजाने के लिए अपने आपको गला देने के लिए तत्पर आत्मदानियों का बीज चाहिए। इस बीज के बिना यह ऋषि भूमि ऊसर ही पड़ी रहे ऐसी बात नहीं है। दधीचि की आत्मा कहीं आकाश में घूम रही होगी तो किन्हीं जागृत आत्माओं में अपनी प्रेरणा अवश्य भर देगी। 56 लाख स्वर्ग मुक्ति के ठेकेदार भिखमंगों में से भी 56 व्यक्ति धर्म सेवा के लिए निकल सकने की आशा की जा सकती है।
राष्ट्र के अन्तरात्मा का कायाकल्प करना जितना आवश्यक है, उतना कठिन भी है। इससे निहित स्वार्थों को चोट पहुँचती है। जिनकी अनैतिक, अनुचित स्वार्थपरता को चोट पहुँचती है, वे तिलमिलाते हैं और इस महा अभियान को जैसे भी बने वैसे नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। अब कानूनी स्थिति, राजसत्ता का विकास ऐसा हो गया है कि प्राचीन काल के असुरों की तरह अपने बाहुबल के आधार पर किसी का शिर काट लेना तो सरल नहीं रहा है पर दूसरे हथियार उनके लिए मौजूद हैं। वे हैं जनता में मतिभ्रम पैदा करके उस आन्दोलन या संस्था के प्रति लोगों में अश्रद्धा या असहयोग के भाव पैदा कर देना। इस हथियार से किसी भी श्रेष्ठ आन्दोलन को बिना तलवार के भी आसानी से मारा जा सकता है। निहित स्वार्थ वाले लोग इस प्रकार के हथियार इस संस्था के जन्म काल से ही चलाते रहे हैं। पर प्रसन्नता इतनी ही है कि परिवार के हर सदस्य ने यह समझ लिया है कि नैतिक और धार्मिक क्राँति करने वालों को, युग निर्माण की महान् प्रक्रिया पूर्ण करने वालों को, ऐसे विरोधों, और लाँछनों को आघातों को सहना ही होगा। अब यह संगठन इस स्वाभाविक प्रतिक्रिया को समझ गया है और विरोधियों के बुरे से बुरे दुष्प्रचार को विफल कर देने लायक अपना मनोबल संग्रह कर चुका है। जैसे जैसे हमारा अभियान बढ़ेगा वैसे ही वैसे निहित स्वार्थों का विरोध भी तीव्र होगा। इस आँधी तूफान से यह नन्हा-सा आन्दोलन भूमिसात् न हो जाय इसके लिए अन्य प्रयत्नों के साथ हमें इस ओर भी पूरा-पूरा ध्यान रखना होगा।
गायत्री-परिवार तपस्वी सच्चरित्र, सेवाभावी, आस्तिक, एवं धर्मव्रती लोगों का एक उच्चकोटि का संगठन बनने जा रहा है। सम्मिलित परिवार के रूप में गायत्री-परिवार के सदस्य लोग मिल जुल कर कौटुम्बिक सहकारी समिति जैसे आधार पर बड़े पैमाने पर सम्मिलित आजीविका, सम्मिलित कृषि, सम्मिलित उद्योग धंधे, सम्मिलित विशाल भोजनशाला, सम्मिलित निवास नगर बनाने की, सम्मिलित खेल कूद मनोरंजन, उपासना, हवन, कीर्तन विचार विनिमय, श्रमदान आदि कार्यों की, अपने बच्चों को जीवनोपयोगी शिक्षा देने की, अपने विचार के लोगों में विवाह शादी करने की, योजनाएं बनाई जा रही हैं। हममें से कोई व्यक्ति अपने पीछे अनाथ परिवार छोड़ जाय तो उसके परिवार के भरण पोषण की सम्मिलित जिम्मेदारियाँ रखने का विचार किया जा रहा है। इन आदर्शों और उद्देश्यों पर अनेकों गायत्री-नगर ऋषि-नगर, स्थान-स्थान पर बसें इसकी तैयारियाँ हो रही हैं। यह कार्यक्रम जैसे-2 आगे बढ़ेगा वैसे-2 जन साधारण को एक नया प्रकाश, एक नई प्रेरणा, एक नया वातावरण प्राप्त होगा और उससे प्रभावित होकर लोग अपने व्यक्ति गत जीवन को मानवता के श्रेष्ठ आदर्श से परिपूर्ण बनाने की ओर, आत्म संयम और लोकहित की ओर अग्रसर करेंगे।
युग निर्माण का कार्य कठिन है, पर गायत्री परिवार द्वारा जिस प्रचण्ड शक्ति का उद्भव हो रहा है वह भी दुर्धर्ष है। कठिन कार्य भी मनुष्य ही करते हैं। ऐसे मनुष्य जो कठिन कार्य कर सकें उत्पन्न करना इस संस्था का उद्देश्य है। जिस सर्वशक्तिमान शक्ति की प्रेरणा से यह महान कार्य आरम्भ हुआ है वही इसे सफल भी बनावेंगी यह निश्चित है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान एक ऐतिहासिक आयोजन है। यह देवपूजा की उपासनात्मक प्रक्रिया तक ही सीमित नहीं है वरन् इसके द्वारा युग निर्माण का ऐतिहासिक कार्य सम्पन्न किया जाता है। प्रश्न केवल हमारी पात्रता का है। सत्पात्र ही ईश्वरीय अनुग्रह के सफलता के अधिकारी होते हैं। हम सब अपनी पात्रता बढ़ाने की प्रतिज्ञा करके इस महायज्ञ की पूर्णाहुति में सम्मिलित होने आवें तभी इस यज्ञ की और याज्ञिकों के व्रत की सच्ची सार्थकता है।
इस मार्ग में बढ़ाया हुआ प्रत्येक कदम पुण्य का होगा।
किसी राष्ट्र में उसके जन समाज का नागरिकों का मानसिक स्तर उच्च आदर्शों से प्रेरित हो, यही उसके महान् होने का एक मात्र चिन्ह है। जहाँ के लोग पतित मनोवृत्ति के होते हैं वहाँ घर-घर में दुष्कर्मों की घटनाएं घटती हैं, जन-जन का मन अनैतिकता के आकर्षक प्रलोभनों में फँसता है और बुराइयों की, पापों की, अनाचारों की वहाँ बाढ़ आ जाती है। व्यक्तियों के व्यक्तिगत विचारों और कार्यों का नाम ही राष्ट्रीय चरित्र है। जहाँ बुराइयाँ बढ़ती हैं, बुरे लोग बढ़ते हैं उस राष्ट्र का इतिहास कलंकित हो जाता है। जहाँ सच्चरित्र, परोपकारी, आदर्शवादी व्यक्ति बढ़ते हैं, वहाँ उन महापुरुषों जैसे श्रेष्ठ कार्यों की शृंखला बन जाती है और उसी आधार पर कोई देश संसार में अपना मस्तक ऊँचा करने की स्थिति प्राप्त करता है।
भारतवर्ष सदा से विश्व का मुकुटमणि, एवं जगद्गुरु, विश्व नेता रहा है। इसका कारण वहाँ की आर्थिक समृद्धि, शारीरिक शक्ति , सशस्त्र सेना, विद्या बुद्धि एवं वैज्ञानिक उन्नति नहीं-वरन् “आदर्शवादिता” ही रही है। उच्च आदर्शों से रहित समाज चाहे वह भौतिक उन्नति के कितने ही ऊंचे शिखर पर पहुँच जाय, कितनी ही सुविधा सामग्री जुटाले फिर भी वह न तो प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है न किसी को प्रकाश दे सकता है, न आन्तरिक सुख शाँति कायम रख सकता है। महानता और आदर्शवादिता एक ही तथ्य के दो पहलू हैं। जहाँ की जनता का मानसिक स्तर उच्च आदर्शों से अनुप्रेरित रहेगा वहाँ ही महानता के उदाहरण उपस्थित करने वाली घटनाएं तथा परिस्थितियाँ निरन्तर दृष्टिगोचर होती रहेंगी।
भारत किसी जमाने में देव भूमि कहलाती थी। यहाँ के 33 करोड़ निवासी, तैंतीस कोटि देवता के नाम से संसार में प्रसिद्ध थे और पूजा सम्मान प्राप्त करते थे। भूसुरों की, पृथ्वी के देवताओं की उद्गम स्थली यह भारत भूमि ही थी। समय के कुचक्र ने हमें कहाँ से कहाँ ला पटका। आज तो देव कर्मी भूसुरों, ब्राह्मणों आदर्शवादियों के दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। चारों ओर हीन विचारों और घटिया कार्यों के गंदे उदाहरण ही देखने को मिल रहे हैं।
इस विपन्न स्थिति को बदलने-ऋषि युग को, देव काल को पुनः वापिस लाने के लिए जो प्रयत्न चल रहे हैं, उनमें अखण्ड ज्योति परिवार को आगे बढ़ कर हिस्सा लेना है। युग युगान्तरों से संचित देवता और ऋषियों की थाती आदर्शवादिता को मटियामेट होने से बचाने के लिए हमें कुछ त्याग और बलिदान करना पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना होगा। युग निर्माण की इस महत्वपूर्ण घड़ी में अखण्ड ज्योति परिवार निष्क्रिय दर्शक की तरह बैठा नहीं रह सकता।
राष्ट्र के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए—सबसे पहला जो कार्य करना है वह लोगों की भावनाओं, मान्यताओं, विश्वासों, आकाँक्षाओं को बदलना है। जब तक मनुष्य का आन्तरिक स्तल घटिया किस्म के हीन विचारों से भरा रहेगा, जब तक लोगों की इच्छाएं ऐश करने या धनी बनने तक सीमित रहेंगी तब तक उनके मस्तिष्क तथा शरीर के कल-पुर्जे उन कार्यों को करने में सर्वथा असमर्थ रहेंगे जिन्हें किये बिना महा पुरुष बनना संभव नहीं हो सकता। जो कुछ भी भले बुरे कार्य मनुष्य करता है, उसके अन्तस्तल में जमी हुई भावनाएं ही होती हैं, उन्हीं की प्रेरणा से जीवन का कार्य तंत्र संचलित होता है। इसलिए यदि हम अपने समाज को धर्म और कर्तव्यों का, सद्विचारों और सत्कर्मों का, सुख और शाँति का केन्द्र देखना चाहते हैं तो हमें मनुष्य के अन्तस्तल में जमी हुई मान्यताओं और आकाँक्षाओं में हेरफेर करना होगा। इसके अतिरिक्त युग निर्माण का और कोई मार्ग नहीं है।
बुराइयों को रोकने के लिये कानूनों से, प्रस्तावों से, विरोधों से तभी कुछ सफलता मिलने की आशा की जा सकती है, जब लोगों में इन का महत्व समझने की श्रद्धा उत्पन्न की जाय। यदि मनुष्य बेशर्म, उद्दंड और स्वेच्छाचारी हो जाय तो कानूनों की, विरोधों की परवा न करके भी अपना दुराचार जारी रखने का कोई मार्ग आसानी से निकाल सकता है। बुराइयों से बचने और अच्छाइयों को अपनाने का मर्म स्थल एक ही है—’आन्तरिक सद्भावना’ इसी को आस्तिकता, धार्मिकता, मानवता, नैतिकता या आदर्शवादिता के नाम से पुकारते हैं। युग निर्माण के लिए हमें इसी तत्व को विकसित करना होगा।
गत अंक में (1)आप भी इस ज्ञान यज्ञ में सम्मिलित हूजिए (2)धर्म प्रचार—सर्वश्रेष्ठ पुण्य कार्य है (3)ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का ब्रह्मभोज, शीर्षक तीन लेखों में यह बताया जा चुका है कि सद्भावना प्रसार के महा अभियान को किस प्रकार देशव्यापी बनाया जायगा, किस प्रकार उसे जन आन्दोलन का रूप दिया जायगा। उस योजना के मूल में एक ही तथ्य है कि हममें से प्रत्येक को अपनी परिस्थितियों और सीमाओं में गुजारा करते हुए भी धर्मप्रचार के लिए कुछ समय, श्रम और सहयोग देने के लिए तत्पर होना चाहिए।
हमारे घरों में ‘गायत्री ज्ञान-मन्दिर’ स्थापित होने चाहिएं। अज्ञान और दुर्भाव के असुरों से लड़ने के लिए यह ज्ञान-मन्दिर ही हमारे किले एवं मोर्चे हो सकते हैं। यह मोर्चा हर घर में खड़ा किया जाना चाहिए। यह आर्थिक दृष्टि से कोई इतना कठिन कार्य नहीं है जिसे गरीब से गरीब आदमी भी न कर सके। एक मुट्ठी अन्न या एक दो पैसा रोज, ज्ञान यज्ञ के लिए, ब्रह्मदान के लिए खर्च करते रहना किसी भी सद् गृहस्थ के लिए कोई असहनीय बोझ नहीं है। इतनी हानि तो घर के चूहे रोज कर देते हैं। घर में गायत्री माता का चित्र एक सुन्दर चौकी पर सुसज्जित रूप से स्थापित करके वहाँ घर के लोगों को नित्य थोड़ी बहुत गायत्री उपासना की आदत डालना भले ही एक छोटा कार्य लगे, पर इसका प्रभाव घर के वातावरण पर पड़ कर रहेगा। परिवार के सदस्यों की मनोभूमि को सुसंस्कारी बनाने के लिए यह एक ठोस मनोवैज्ञानिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक उपचार है। जिन घरों में इस बहाने कुछ पूजा प्रक्रिया चल पड़ेगी वहाँ विश्वासपूर्वक समझिए, धार्मिक और नैतिक वातावरण की अवश्य ही वृद्धि होगी। यह उपासना क्रम जहाँ चल पड़ेगा वहाँ इस कार्य के लिए घिरा हुआ स्थान या लगाया हुआ समय कभी भी निष्फल या घाटे का कार्य सिद्ध न होगा। इस तथ्य पर यदि विश्वास न हो तो कुछ दिनों प्रयोग या परीक्षण के रूप में यह क्रम चला कर देखा जा सकता है। यह व्यर्थ सिद्ध हो तो पूजा की चौकी उठा कर रख देने में कोई बड़ा जोखिम नहीं है।
जहाँ यह पूजा गृह स्थापित हों वहाँ भगवान को भोग प्रसाद लगाने के रूप में इस गायत्री ज्ञान-मन्दिर को चलाने के रूप में कुछ थोड़ा-सा खर्च करने में भी किसी आस्तिक भावना के व्यक्ति को अधिक संकोच या अड़चन का अनुभव न होना चाहिए। चौकी पर स्थापित देव पूजा का पूजन रोली, अक्षत, नैवेद्य, धूप, दीप से हो जाता है। यह सब वस्तुएं घर में होती ही हैं। एक खर्च जो इस पूजा गृह के साथ निश्चित रूप से जोड़ा जाना चाहिए वह यह है कि गायत्री मन्दिर का ज्ञान-मन्दिर भी बनाने के लिए वहाँ कम से कम दो पैसे रोज का सत्साहित्य संग्रह किया जाता रहे। इस प्रकार उस पूजा चौकी के समीप ही एक छोटा सा पुस्तकालय का पौधा भी लगाया जाय जो इस दो पैसा के खाद पानी से नित्य सींचा जाय। यह नन्हा सा अंकुर यदि निरन्तर सींचा जाता रहे तो एक दिन यह महा विशाल वट वृक्ष बन सकता है।
इस वर्ष ज्ञान मन्दिर सैट की अत्यन्त ही सुन्दर सुसज्जित, सस्ती 52 पुस्तकें चार-2 आना लागत मूल्य पर तैयार की गई हैं। हर साल इसी प्रकार 52 पुस्तकें इस पुस्तकालय में बढ़ती रहें तो 10-20 साल में इस ज्ञान-मन्दिर में हजारों ऐसी पुस्तकों की सम्पत्ति जमा हो सकती है जो घर के लोगों के तथा पास पड़ोस के अन्य लोगों के जीवन में क्रान्ति उपस्थित कर दे। जिस आदर्शवाद की स्थापना आज आवश्यक है उसी समयोपयोगी विचारधारा से परिपूर्ण यह पुस्तक सीरीज निकलती रहेंगी।
जिन घरों में यह ज्ञान मन्दिर स्थापित हैं, उनका कर्तव्य होगा कि अपने घर के लोगों को ही नहीं पास पड़ोस के 10-20 व्यक्तियों को भी यह पुस्तकें पढ़ने का चस्का लगावें। उनके यहाँ यह पुस्तकें देने जावें, उनमें लिखे हुए विषयों की प्रशंसा करके पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें और फिर वापिस लेने भी उनके घर जावें। इस प्रकार प्रयत्न करने से कुछ ही दिनों में इस सत्साहित्य के पढ़ने का चस्का उन्हें लग जायगा और स्वयं आकर इन पुस्तकों को माँगकर ले और दे जाया करेंगे। यह अभिरुचि बढ़ेगी तो उन पास पड़ोस के जिन लोगों को पढ़ने का चस्का लगाया गया था वे स्वयं भी अपने यहाँ गायत्री ज्ञान-मन्दिर स्थापित करेंगे और यह धर्म-प्रचार की शृंखला इसी क्रम से बढ़ते-बढ़ते देश-व्यापी हो जायगी।
देखने में यह एक बहुत ही मामूली सी योजना मालूम पड़ती है। पर इसके मूल में लोगों के अन्तःकरणों और मानसिक स्तरों को बदल डालने की पूरी-2 सम्भावना छिपी हुई है। जिन व्यक्तियों के द्वारा, जिन भावनाओं से ओत-प्रोत होकर, जिस आत्मिक स्थिति में यह पुस्तकें लिखी जाएंगी। उसके अनुसार उनमें वह आग होगी जिसके संस्पर्श में आने पर पाठकों के अन्तःकरणों में हलचल मचे बिना न रहेगी। युग निर्माण की दिशा में अग्रसर होने के लिए उनके कदम बढ़े बिना रुक न सकेंगे। अब तक गायत्री संस्था के इन विचारों ने जो काम किया है उसे देखते हुए आगे के लिए भी बहुत कुछ आशा की जा सकती है। छोटे से अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों की अन्तरात्माओं के इन विचारों की प्रेरणा से जो स्फूर्ति पैदा हुई है वह देशव्यापी एक प्रचण्ड संगठन के रूप में, जिसकी दो हजार शाखाएं तथा एक लाख सदस्य हैं-उपस्थित हैं। इस संगठन के द्वारा जो कार्य हो रहा है या जो होने जा रहा है उसका मूल्याँकन आज नहीं हो सकता, उसका महत्व तो आगे की पीढ़ियाँ ही समझेंगी। फिर भी यह एक प्रकट रहस्य है कि जलते हुए अन्तःकरण में से निकली हुई आग, जिनमें कुछ भी सजीवता है उन अन्तःकरणों में गर्मी पैदा किये बिना रह नहीं सकती। जनता का आत्मिक स्तर ऊँचा उठाने के लिए यह साहित्य कुछ ठोस काम करेगा। गायत्री ज्ञान मन्दिर एक प्रशंसनीय दीपक की भाँति अपने में इस तेल को भर कर जलाये तो वे स्वयं भी प्रकाशित होंगे और दूसरों को भी प्रकाशवान करेंगे।
स्वाध्याय और सत्संग यह दो कार्य विचार निर्माण के लिए आवश्यक हैं। युग निर्माण के लिए जनता को स्वाध्याय का सामान बड़े परिमाण में उपलब्ध करना पड़ेगा। यह कार्य हम लोग ज्ञान-मन्दिरों के माध्यम से बड़ी सरलता पूर्वक कर सकते हैं। देश में यदि एक लाख ज्ञान-मन्दिर स्थापित हो जायें तो उनके प्रकाश से सारी भारत भूमि आलोकित हो सकती है। अपनी अर्थ व्यवस्था के अनुसार वितरण के परिपत्र भी प्रसाद रूप में यह ज्ञान-मन्दिर हर महीने अपने क्षेत्र में बाँट सकते हैं। विचारोत्तेजक परिपत्र भी बिना मूल्य बाँटने के लिए यह ज्ञान-मन्दिर अपने यहाँ यथा शक्ति मँगाया करेंगे और हजार, दो हजार व्यक्तियों तक उन्हें भी वे पहुँचाया करेंगे। उस स्वाध्याय की देश व्यापी वह व्यवस्था यह ज्ञान-मन्दिर आसानी से कर सकते हैं जिसकी युग निर्माण के लिए आज नितान्त आवश्यकता है।
स्वाध्याय के बाद सत्संग की प्रक्रिया भी चालू रखनी है। गायत्री परिवारों की शाखाएँ यथा सम्भव साप्ताहिक पाक्षिक या मासिक सत्संग चला रही हैं। अब इस ओर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। परस्पर मिल जुलकर वाणी द्वारा जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार विनिमय करे, यह समाज के उत्थान के लिए एक आवश्यक कार्य है। पर्व और त्यौहारों पर जन समूह को इकट्ठा करके उन्हें उन पर्व त्यौहारों में छिपे हुए संदेशों को समझाना एक अच्छा सत्संग हो सकता है। नवरात्रियों में, सामूहिक यज्ञानुष्ठानों में धार्मिक अभिरुचि की जनता खूब भाग लेती है। रामायण गीता पाठ आदि के कार्यक्रमों को इन आयोजनों में जहाँ जोड़ने की आवश्यकता पड़े वहाँ उन्हें भी जोड़ा जा सकता है।
गायत्री जयन्ती (जेष्ठ सुदी 10) हम सबका बड़ा त्यौहार है। उस दिन दीपावली मनाने के साथ-साथ कुछ विशेष शिक्षण सत्संग, भाषण, प्रवचन किये जा सकते हैं। अपनी अपनी सुविधानुसार वार्षिकोत्सवों की परम्परा भी शाखाएँ तथा ज्ञान-मन्दिर चला सकते हैं। उनमें भी प्रवचनों की प्रधानता रहे। क्षेत्रीय या प्राँतीय शिक्षण शिविर किये जा सकते हैं। महिलाओं के लिए, बालकों के लिए किन्हीं विशेष वर्गों के लिए समय-समय पर विशेष शिक्षण शिविर लगाये जाने चाहिएं। इस प्रकार स्वाध्याय के साथ-साथ सत्संगों की शृंखला को भी पूरी तत्परतापूर्वक चलाया जाय।
कार्यक्रम सचमुच ही अत्यन्त ठोस है। अपने आलस्य और अनुत्साह को देखते हुए हम सोच सकते हैं कि यह बहुत कठिन है। कैसे सफल होगा? कौन इसमें सहयोग करेगा? पर वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। जन मानस में युग की पुकार अपना काम स्वयं कर रही है, हमें तो केवल उसकी व्यवस्था मात्र करनी है। कुछ समय पूर्व जनता में राजनैतिक स्वाधीनता की भावना तीव्र संवेदना के साथ जनमानस में काम कर रही थी। काँग्रेस के नेताओं ने उसे संगठित कर देने का कार्य किया और वह भावना स्वाधीनता संग्राम के रूप में फूट पड़ी। वह आग तभी शान्त हुई जब राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली गई। आज दूसरी नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति की सम्भावना ज्वालामुखी पहाड़ में दबी हुई अग्नि की तरह जन मानस में भीतर ही भीतर धधक रही है। हम लोगों को केवल वह रास्ता बनाना है जिसमें होकर उस अग्नि की लपटें बाहर निकलने लगें। आज की बढ़ी हुई अनैतिकता से स्वार्थपरता से, आपा-धापी से, हर कोई दुखी है। आज की सामाजिक स्थिति भारी अनुदारता, संकीर्णता, मूढ़ता और रूढ़ियों से बुरी तरह दूषित हो रही है। हर कोई इसमें परिवर्तन चाहता है। हमें तो केवल बिगुल मात्र बजाना है। जनता की आकाँक्षाओं की प्रचण्ड शक्ति आगे का अपना रास्ता आप बनालेगी। स्वाध्याय और सत्संग द्वारा हम जन जागृति की चण्डी का आह्वान करेंगे तो युग-निर्माण का स्वप्न आज नहीं तो कल पूरा होकर रहेगा।
साँस्कृतिक पुनरुत्थान के हिमालय की पुनीत तीर्थ यात्रा में अपने साथ चलने के लिए हम अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक परिजन को आह्वान करते हैं। इस मार्ग पर बढ़ाया हुआ प्रत्येक कदम पुण्यमय होगा। अनेक कठिनाइयों, व्यस्तताओं से घिरा हुआ व्यक्ति भी इस यात्रा में बहुत दूर तक हमारे साथ-साथ चल सकता है। कम से कम ‘गायत्री-ज्ञान मन्दिरों’ की स्थापना तो हममें से हर एक अपने घर पर कर ही सकता है। इस युग के अभूतपूर्व—जीवन में फिर कभी आने की जिस अवसर की संभावना नहीं—ऐसे गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के अवसर पर प्रत्येक परिजन कुछ श्रद्धाँजलि चढ़ाना चाहेगा। इन श्रद्धाँजलियों में सदा स्मरण रखे जाने योग्य यही बात हो सकती है कि अपने घर पर गायत्री ज्ञान मन्दिर की स्थापना की जाय और उससे संबंधित स्वाध्याय और सत्संग के कार्यक्रमों के लिए यथाशक्ति कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लिया जाय।
उपासना के तत्वज्ञान पर विश्वास रखने वाले धर्मप्रेमियों के लिए नवरात्रि का पुनीत पर्व बहुत ही महत्वपूर्ण है। समय पर बोया हुआ बीज जिस प्रकार भली प्रकार अंकुरित होता है, उसी प्रकार नवरात्रि जैसे पर्वों पर की हुई साधना भी विशेष फलदायक होती है। सूर्य उदय और सूर्य अस्त के समय जिस प्रकार दिन और रात का मिलन काल ‘संध्या समय’ माना जाता है, उस समय की हुई उपासना, दिन रात में अन्य किसी भी समय की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। इसी प्रकार ग्रीष्म और शीत ऋतुओं की मिलन बेला 9-9 दिन के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रि में आती हैं। यह समय साधना के लिए अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। वर्ष के अन्य महीनों में जो साधना बहुत दिन करने पर भी सफल नहीं होती वह इन नवरात्रियों के 9 दिनों में पूर्ण हो जाती है।
साधना प्रेमियों के लिए नवरात्रि का पुनीत पर्व सदा से ही महत्वपूर्ण रहा है। नैष्ठिक साधक इन दिनों अपनी साधना को तीव्र कर देते हैं। साधारण लोग जो साल के अन्य समयों में उपासना के लिए समय नहीं निकाल पाते, वे इन दिनों साँसारिक कामों से अवकाश लेकर साधना रत होते हैं, अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस पर्व पर अपनी सुविधा के अनुरूप कुछ न कुछ समय नवरात्रि में विशेष गायत्री साधना के लिए निकालते हैं। इस बार भी सभी परिजनों को वैसा करना चाहिए।
आश्विन की नवरात्रि ता. 13 अक्टूबर सोमवार से आरम्भ होकर 9 दिन, 21 अक्टूबर मंगलवार तक चलेगी। इन 9 दिनों में निम्न प्रकार के अनुष्ठान आसानी से किये जा सकते हैं।
(1)प्रतिदिन 27 माला के हिसाब से 9 दिन में 24 हजार जप।
(2)प्रतिदिन 266 के हिसाब से 9 दिन में 2400 मन्त्र लेखन।
(3)प्रतिदिन 27 के हिसाब से 9 दिन में 240 गायत्री चालीसा पाठ।
इनमें से जो साधन जिस रुचि के अनुकूल हो वह उसे करना चाहिए। इनमें तीनों में से प्रत्येक साधना में लगभग 3 घण्टे लगते हैं। इतना समय 9 दिन तक, इतनी अधिक सत्परिणाम दायिनी साधना में लगा देना कुछ बहुत बड़ी बात नहीं है।
अन्तिम दिन 240 आहुतियों का हवन करना चाहिए। इस सामूहिक हवन में जितने अधिक व्यक्ति सम्मिलित किये जा सकें उत्तम है। जहाँ कई साधक हों वहाँ सब का सम्मिलित एक स्थान पर ही हवन होना चाहिए। गायत्री-परिवार की शाखाएं सामूहिक अनुष्ठान का प्रयत्न करें। 5 साधक जहाँ हों वहाँ सम्मिलित सवालक्ष का अनुष्ठान हो सकता है। 24 हजार न भी कर सकें तो 5 माला 10 माला के हिसाब से जो जितना करे उससे उतनी प्रतिज्ञा लेकर अधिक से अधिक धर्मप्रेमियों को सम्मिलित अनुष्ठान करने का प्रयत्न करना चाहिये। 1। लाख, 2॥ लाख, 3॥। लाख 5 लाख इसी प्रकार 1। लाख का क्रम बढ़ाते हुए चाहे जितनी संख्या के सम्मिलित अनुष्ठान हो सकते हैं। 1। लाख से कम का सामूहिक अनुष्ठान नहीं होता। हमारा विशेष आग्रह सम्मिलित अनुष्ठानों पर है। व्यक्तिगत साधना की अपेक्षा सामूहिक साधना का महत्व कई गुना अधिक होता है।
हवन भी सब का सम्मिलित किया जाय। जप, पाठ और लेखन के जो अनुष्ठान ऊपर लिखे हैं, उनकी पूर्णाहुति में 240 आहुतियों का हवन प्रत्येक अनुष्ठानकर्ता की ओर से होना चाहिए। हवन में अन्य गायत्री प्रेमियों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। यदि वे हवन सामग्री, घी आदि का सहयोग दें तो वह भी अवश्य लेना चाहिए। प्रयत्न यह होना चाहिए कि पूरा न सही थोड़ा बहुत जप और हवन करने के लिए भी लोगों को उत्साहित किया जाय। धर्म कार्य में किसी प्रकार लोगों की अभिरुचि लगाना एक बड़ा पुण्य है, यह ध्यान में रखकर सामूहिक यज्ञानुष्ठानों में बहुत न सही थोड़ा भी भाग लेने वाले अधिक लोग सम्मिलित करने का प्रयत्न होना चाहिए।
(1) जप और (2) हवन के अतिरिक्त अनुष्ठान का तीसरा महत्वपूर्ण भाग ब्रह्मभोज है। ब्रह्मभोज का अर्थ है—’ज्ञान प्रसार’। इसके लिए सत्संग, प्रवचन, भाषण, विचार विनिमय, उपदेशों के शिक्षाप्रद संगीत भजन की व्यवस्था करनी चाहिए। सत्साहित्य वितरण करना चाहिए। 6 मूल्य के 240 गायत्री चालीसा वितरण किये जा सकते हैं। 6) मूल्य के मथुरा महायज्ञ के निमन्त्रण पत्र मंगाकर वितरण किये जा सकते हैं। इस सामूहिक अनुष्ठान की स्मृति में कम से कम एक नया गायत्री ज्ञान मन्दिर भी स्थापित किया जा सकता है।
जहाँ भोजन कराने का विचार हो वहाँ कुमारी कन्याओं को भोजन कराने की व्यवस्था करनी चाहिए। गायत्री के प्रतीक रूप में कन्या पूजन का महात्म्य है। नारी जाति के सच्चे गौरव को समझने, उसका सम्मान करने, उसे पवित्र एवं पूजनीय तत्व मानने की भावना जागृति करने की दृष्टि से भी कन्या-भोज उत्तम है। इसमें नारी जाति को अपनी प्रतिष्ठा और महत्ता स्वयं अनुभव करने के भी बीज मौजूद हैं।
जो साधक अपनी साधना की सूचना समय पर दे देंगे उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का संरक्षण दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
नवरात्रि के लिए कोई वितरण साहित्य या हवन सामग्री आदि तपोभूमि से मँगानी हो वे 15 दिन पूर्व ही मँगा लें। क्योंकि कई बार डाक या रेल की गड़बड़ी में चीजें समय पर नहीं पहुँच पाती तो कार्यक्रम में असुविधा होती है।
इस बार ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का वर्ष है। परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने यहाँ छोटे बड़े सामूहिक अनुष्ठान का आयोजन इन नवरात्रियों में अपने यहाँ करना चाहिए। 24 हजार न सही पाँच दस माला जपने के लिए कई लोग तैयार होकर 1। लाख जप का एक अनुष्ठान बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इसी प्रकार 1। हजार मन्त्र-लेखन, 1। हजार पाठ के भी अनुष्ठान हो सकते हैं। जहाँ जैसी सुविधा हो सामूहिक अनुष्ठान अवश्य किये जाएं और उन आयोजनों के समाचार ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ में छपने भेजे जाएं।
प्राचीन काल में तीर्थ यात्रा पैदल की जाती थी। शास्त्रों में पैदल तीर्थ-यात्रा का बहुत पुण्य लिखा है। इसका कारण यह है कि तीर्थ यात्री लोग रास्ते में पड़ने वाले ग्रामों में धर्म प्रचार करते हुए जावें। उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में एक धर्म परम्परा यह चलती है कि उत्साही धर्मप्रेमी गंगाजी से दो शीशी गंगाजल की भरकर उन्हें काँवर में कँधे पर रख कर पैदल चलते हुए उस काँवर को अपने समीप के शिव मन्दिर पर चढ़ाते हैं। यह लोग रास्ते में उच्च स्वर से धार्मिक दोहे या भजन गाते जाते हैं ताकि उस रास्ते में धर्म प्रचार होता चले। स्त्रियाँ किसी तीर्थ को जाती हैं तो रास्ते भर धार्मिक भजन गीत गाती जाती हैं। इसका भी यही उद्देश्य है।
आज कल लोग तीर्थ यात्रा को तो चलते हैं पर रास्ते में धर्म प्रचार करते चलने वाली अत्यन्त महत्वपूर्ण, पुण्य की मूल बात को भूल ही जाते हैं। दर्शन या स्नान में ही पुण्य मान लेते हैं जबकि सच्चा पुण्य पैदल यात्रा के कष्ट सहने एवं धर्म प्रचार करने में केन्द्रित है। हमें चिन्ह पूजा तक ही सीमित न रहना चाहिए वरन् तीर्थ यात्रा करते समय धर्म प्रचार की उस सार बात को भी स्मरण रखना चाहिए।
यह गायत्री महायज्ञ सच्चे अर्थों में तीर्थ यात्रा है। वृंदावन, गोकुल, महावन, गोवर्धन, नन्दगाँव, बरसाना आदि स्थानों के दर्शनों के साथ-साथ इतने तपस्वियों का सम्मिलन, इतने कुण्डों द्वारा इतनी प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति के अवतरण का यह अलभ्य अवसर है। ऐसी तीर्थ यात्रा का सुयोग फिर शायद ही लोगों को कभी मिलेगा। इसलिए व्रतधारी साधकों के अतिरिक्त दर्शक भी इस अवसर पर आने की तैयारी कर रहे हैं।
अनेकों शाखाओं से मथुरा के लिए पैदल जत्थे रवाना होने की सूचनाएँ प्राप्त हो रही हैं। पीले वस्त्र पहन कर गायत्री परिवार के झंडे हाथ में लिए हुए, गाँव-गाँव गायत्री प्रचार करते हुए लोग आवें तो सचमुच ही यह पैदल तीर्थ यात्रा अनेक गुनी पुण्य फलदायक होगी। जहाँ सम्भव हो वहाँ से इस प्रकार के पैदल जत्थे रवाना होने चाहिए और रास्ते भर गायत्री माता का, यज्ञ पिता का महत्व बताते हुए महायज्ञ में मथुरा आने का निमन्त्रण देते आना चाहिए।
महायज्ञ में पैदल या सवारी से जिससे जैसे बनेगा आवेंगे। पर एक बात हर किसी आगन्तुक को ध्यान में रखनी चाहिए कि तीर्थ यात्रा के रास्ते में धर्म प्रचार करने की पुण्य परम्परा को अवश्य ध्यान में रखा जाय। रास्ते में चुप न रहा जाय वरन् जिनसे भी बातचीत हो अपने मथुरा जाने का उद्देश्य और महायज्ञ का, गायत्री परिवार का कार्यक्रम बताया जाय। रास्ते में महायज्ञ सम्बन्धी चर्चा का, भजन कीर्तन का आयोजन होता हुआ आना चाहिए। जो उस अवसर पर न आ सकें उन्हें महायज्ञ का निमन्त्रण अपने आस-पास के क्षेत्र में दूर-दूर तक पहुँचाने के लिए इन पर्चे पोस्टरों का उपयोग करना चाहिए। यह पर्चे 4)में एक सेर के हिसाब से दिये जावेंगे। एक सेर में लगभग 1400 ‘छोटे पर्चे पोस्टर’ या 350 बड़े पर्चे पोस्टर आवेंगे। छोटे पर्चे 5&3॥। इंच और बड़े पर्चे 7॥&5 इंच साइज के हैं। यह दीवारों पर, किवाड़ों पर, चिपकाने तथा बाँटने के भली प्रकार काम आ सकते हैं। महायज्ञ में मथुरा आने वाले प्रत्येक तीर्थ यात्री को कुछ दिन पहले ही अपनी सामर्थ्यानुसार यह पर्चे मँगा लेने चाहियें। इनमें से आधे पर्चे तो अपने आस-पास के क्षेत्र में बाँटने या चिपकाने में काम ले लेने चाहिएं। शेष आधे पर्चे घर से निकल कर मथुरा आने तक मिलने वाले यात्रियों में बाँटते हुए आना चाहिए।
अभी तक अधिकाँश होता यजमानों एवं संरक्षकों ने निर्धारित प्रतिज्ञा के अनुसार वितरण साहित्य नहीं मँगाया है। अब उन पर इस ब्रह्मभोज की आवश्यक शर्त के लिए जोर दिया जाना चाहिए। निर्धारित शर्त जितना वितरण साहित्य अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार मँगा लेना चाहिए। जिसने इस पुनीत प्रचार कार्य से सर्वथा मुख मोड़ा हो ऐसा व्रतधारी याज्ञिक एक भी न रहना चाहिए। अब ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पुस्तकें तथा बड़े पर्चे न मँगाकर इन छोटे बड़े पोस्टरों पर अधिक बल देना चाहिए क्योंकि इनके द्वारा गायत्री माता का, यज्ञपिता का सन्देश एवं महायज्ञ का निमन्त्रण पहुँचता है। यह बहुत ही सस्ते में अधिक लोगों तक धर्मप्रचार करने का सरल तरीका है।
यह पर्चे पोस्टर वी.पी. से नहीं भेजे जायेंगे। क्योंकि हर वी.पी. में करीब॥।) अतिरिक्त अधिक पोस्टेज रजिस्ट्री खर्च देना पड़ता है। इनका पैसा पेशगी भेजना चाहिए। शाखा मन्त्री उधार भी मँगा सकते हैं उनका पैसा इकट्ठा करके अपने साथ ला सकते हैं। जहाँ रेलवे स्टेशन पास हो और छोटे बड़े पर्चे पोस्टर बड़ी तादाद में मँगाने हों वहाँ रेल से ही इन्हें मँगाना चाहिए। नवरात्रि के पुनीत पर्व में ही इन पर्चों का वितरण, प्रचार आरम्भ हो जाना चाहिए।
शिक्षण शिविर से आने वाले सज्जन अपना लोटा, कटोरी, बिस्तर तथा पीले रंगे वस्त्र साथ लावें।
महायज्ञ का कार्यक्रम प्रायः श्रमदान पर ही आधारित है। शिक्षण शिविर में 13 अक्टूबर से 26 नवम्बर तक 6 सप्ताह के लिए जो व्यक्ति बुलाये गये हैं वे गायत्री परिवार के महान मिशन को समझने, यज्ञ और गायत्री उपासना के सारे विधि-विधान को जानने, अपने क्षेत्र में गायत्री-प्रचार करने की विधि व्यवस्था को समझने, अपने जीवन को यज्ञ रूप बनाने, युग निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान की योजना को पूर्ण करने के सम्बन्ध में तो शिक्षा प्राप्त करेंगे ही, साथ-साथ उन्हें महायज्ञ का कार्यक्रम भी अपने श्रमदान से करने में कटिबद्ध होना होगा। कुण्ड खोदने, यज्ञशालाएँ निर्माण करने, यज्ञशालाओं का हवन कार्य संचालन करने, भोजन एवं ठहराने की व्यवस्था सँभालने, रात को पहरा लगाने, आस-पास क्षेत्र में यज्ञ का प्रचार करने आदि कार्य भी उन्हें ही अपने शारीरिक और मानसिक श्रम से पूरे करने होंगे।
आर्थिक दृष्टि से अपने यज्ञ की स्थिति बहुत दुर्बल है। अत्यन्त आवश्यक कार्यों के लिए भी पैसे की व्यवस्था जुटाने में भारी कठिनाई दीखती है। सार्वजनिक चन्दा न करके, केवल स्वेच्छा सहयोग पर ही निर्भर रहने की नीति से बहुत ही स्वल्प मात्रा में कुछ मिलने की सम्भावना है। ऐसी दशा में हमें अपने अधिकाँश कार्यों के लिए श्रम पर ही निर्भर रहना होगा।
शिक्षण शिविर में शाखाएं अपने-अपने प्रतिनिधि भेज रही हैं वे सुयोग्य ही होने चाहिएं जो हमारा हाथ बँटा सकें। कूड़ा-कचरा जैसे फालतू आदमी भेज देने से वे कुछ काम तो करेंगे नहीं, उलटे हमारे सिरदर्द बनेंगे, ऐसे लोग भेज देना यज्ञ में सहायता तो क्या उलटी एक बाधा साबित होगी।
पुरुषों की भाँति नारियों का भी इस सम्बन्ध में पूरा उपयोग है। प्रतिभाशाली महिलाएं वही काम कर सकती हैं जो पुरुष करेंगे। जिनके ऊपर छोटे बच्चों की जिम्मेदारी न हो तथा जो बहुत घूँघट-पर्दा न करती हों, जिनके शरीर में स्फूर्ति तथा स्वभाव में उत्साह हो वे महिलाएँ इस श्रमदान में, शिक्षण शिविर में पुरुषों के समान ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है। अध्यापिकाएँ इस कार्य के लिए पूर्ण उपयुक्त हैं। कोई भी वयस्क लड़की यहाँ पूर्ण सुरक्षित एवं पवित्रता के वातावरण में उसी प्रकार रह सकेगी जैसे अपने पिता के घर में रहती है।
यज्ञ के दिनों में भी एक दिन महिला सम्मेलन होगा तथा स्वयं सेविकाओं की आवश्यकता पड़ेगी। जो महिलाएँ इस कार्य के लिए उपयुक्त हों वे 13 अक्टूबर से लगने वाले शिक्षण शिविर में आ सकती हैं। जो इतने दिनों के लिए न आ सकें वे यज्ञ के दिनों में अथवा उससे कुछ दिन पूर्व आ सकती हैं। पुरुष सहयोगियों की तरह नारी सहयोगिनियों का भी समान रूप में स्वागत है। दोनों के ही सहयोग एवं श्रमदान का समान रूप में आह्वान है।
नारी जाति को अपने आत्म-गौरव स्वाभिमान महत्व एवं सामर्थ्य बल का भान ऐसे ही अवसरों पर कार्य करने में होता है। इसलिए प्रयत्न यह करना चाहिए कि गायत्री माता के महायज्ञ के प्रबन्ध में उसकी पुत्रियाँ ही आगे बढ़कर हाथ बँटावें। महायज्ञ में आने वाले याज्ञिक अपने साथ कुछ ऐसी महिलाएं लाने का प्रयत्न करें जो यहाँ के प्रबन्ध की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर उठाने के लिए उत्साहित हों। शिविर में भी ऐसी महिलाएं आनी चाहिएं। चूँकि साधारणतः सभी नर-नारी याज्ञिकों के वस्त्र पीले रंगे हुए होंगे इसलिए इन स्वयं सेविकाओं की धोतियाँ दूसरे रंग से रंगी जाएंगी। यह रंग यहीं निश्चित किया जायगा। इसलिए ये महिला स्वयं सेविकाएं अपनी धोतियाँ सफेद ही लायें, जो रंग निश्चित किया जायगा यहीं रंग दिया जायगा। शिक्षण शिविर में 13 अक्टूबर से आने वाली महिलाएँ पूर्व स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर लें।
जब समुद्र मथा गया था तो उसमें से सबसे पहले विष, फिर वारुणी उसके बाद अन्य रत्न निकले थे। युग निर्माण के लिए, मूर्छित समाज को जागृत करने के लिए भी गायत्री संस्था द्वारा वह अमृत निकालने के लिए समुद्र-मन्थन का कार्य हो रहा है, जिसे पीने से यहाँ के निवासी इस देवभूमि को अमर भूसुरों की निवास-स्थली प्रत्यक्ष रूप में दिखा सकें।
यह समुद्र-मन्थन ठीक प्रकार से चल रहा है या नहीं, इसकी प्रारम्भिक परीक्षा यही है कि इसमें कितना विष निकलता है, यह देखा जाय। जब सड़ी हुई कीचड़ की नाली साफ की जाती है तो उसमें से नाक फाड़ने वाली बदबू उड़ती है। दुर्बुद्धि की, दुर्भावनाओं की स्वार्थपरता और पाखण्ड की कीचड़ बहुत दिनों में हमारे धार्मिक एवं साँस्कृतिक क्षेत्र में पड़ी सड़ रही है, उसे साफ किया जा रहा है तो वे तत्व जिनके स्वार्थों को हानि पहुँचती है, स्वभावतः विरोध करेंगे। असुरता को नष्ट करने वाले जब कभी भी अभियान हुए हैं, उनके प्रतिरोध के लिए असुरों ने पूरी शक्ति से प्रत्याक्रमण किये हैं। त्रेता में इस प्रकार के अभियान में संलग्न ऋषियों को कच्चा चबा-चबा असुरों ने हड्डियों के पहाड़ लगा दिये थे, जिन्हें देखकर रामायण के अनुसार यह दृश्य उपस्थित हुए—
अस्थि समूह देखि रघुराया।
पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥
निसिचर निकर सकल मुनि खाये।
सुनि रघुवीर नयन जल छाये॥
निसिचर हीन करहु महि, भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ-जाइ सुख दीन॥
विश्वामित्र के इस प्रकार के अभियान के विरुद्ध मारीच, सुबाहु, ताड़का की पूरी सेना संघर्ष में रत हुई। वह आक्रमण इतने प्रचण्ड थे कि विश्वामित्र घबरा गए, अपने लक्ष की असफलता का असर अनुभव करने लगे। अन्त में दशरथजी के यहाँ जाकर उनके पराक्रमी पुत्रों को सहायता के लिए माँग कर लाए।
क्रिया की महत्ता प्रतिक्रिया से ही जानी जाती है। बुखार की गर्मी को थर्मामीटर से नापा जाता है। गायत्री-परिवार का समुद्र मन्थन कितना शक्तिशाली एवं प्रभावपूर्ण है इसकी एक ही पहचान है कि विरोधी आसुरी तत्व इससे कितने क्षुब्ध हुए और उनने इसे असफल बनाने का कितना प्रयत्न किया है। जहाँ तक सूचनाएं प्राप्त हुई हैं विरोध, निन्दा, आक्रमण के समाचार जगह-जगह से आ रहे हैं। यह बड़े सन्तोष के समाचार हैं, उन्हीं के आधार पर दो बातों का पता लग सकता है—(1)अपना कार्य कितनी उच्च स्थिति में है, यदि अपना कार्य नगण्य होगा तो उसका विरोध भी नगण्य ही होगा। यदि कार्य में कुछ गहराई है तो उसे असफल बनाने के लिए कार्यकर्त्ताओं की श्रद्धा कितनी सच्ची है। यदि ढीले मन के, अस्थिर विचारों के, अधूरे विश्वास के अपने परिजन हैं तो वे आसानी से बहक जायेंगे। मतिभ्रम में उलझकर इस अलभ्य अवसर से हाथ खींच लेंगे। कोई-कोई तो सहयोग छोड़कर विरोधी भी बन जाएंगे। किन्तु जो सच्चे होंगे वे आड़े वक्त में काम आने वाले सच्चे मित्रों की तरह अन्त तक मोर्चे पर अड़े रहेंगे।
कार्य की महत्ता तथा साथियों की श्रद्धा की परीक्षा, विरोधी आक्रमणों के अतिरिक्त और किसी भी प्रकार नहीं हो सकती। चूँकि सचाई में हजार हाथी के बराबर बल होता है और सत्य रूपी प्रह्लाद की रक्षा भगवान नृसिंह स्वयं करते हैं। नृसिंह—मनुष्यों में जो सिंह स्वरूप वीर पुरुष हैं वे धर्म वृक्ष को गिरने न देने के लिए अपना पूरा योग देते हैं। राम और लक्ष्मण, विश्वामित्र रूपी प्रह्लाद के लिए नृसिंह ही थे। जब कभी भी अधर्म धर्म को नष्ट करने वाले कठोर आक्रमण करता है तब संरक्षक नृसिंह भी सामने आ ही जाते हैं और धर्म की नैया डूबते-डूबते बच जाती है।
गायत्री-परिवार के कार्यक्रमों के पीछे, इस महान, यज्ञानुष्ठान के पीछे सत्य की दैवी शक्ति मौजूद है। इसलिए हममें से किसी को भी विचलित होने की रत्ती भर भी जरूरत नहीं है। फिर भी प्रह्लाद की तरह कठिन परीक्षा देने को तैयार रहना ही होगा। सभी शाखाएं तथा गायत्री उपासक इस मास अपने कार्यों की अन्य सूचनाओं के साथ-साथ यह समाचार पूरे विस्तार से लिखें कि उनके धर्म कार्यों को असफल बनाने के लिए आसुरी तत्वों ने क्या-क्या कार्य किये। चूँकि इस युग में तलवार से सिर काटने का असुरता का हथियार काम में नहीं आता, अब तो इसका प्रचार अस्त्र मतिभ्रम पैदा करना, कोई बेसिर पैर की बातें कहकर कोई बेजड़-मूल के लाँछन लगाकर लोगों के नव अंकुरित धर्मोत्साह को समाप्त कर देना ही है। असुरता का यह अस्त्र कहाँ कितनी तेज से घूम रहा है, इसका पूरा विवरण इस मास प्रत्येक गायत्री उपासना केन्द्र से लिखा हुआ आना चाहिए। साथ ही यह भी उल्लेख रहना चाहिए कि उस आक्रमण से अपनी सेना के कितने साथी घायल हो गये, कितने पीठ दिखाकर भाग गये तथा कितनों ने उनका मुकाबला किया। नृसिंह का कार्य किन-किन वीर पुरुषों ने कितनी सीमा तक पूर्ण किया।
युग निर्माण के लिये आध्यात्मिक अमृत निकालने के प्रयोजन से जो समुद्र मन्थन हो रहा है, उसकी शक्ति अब तक किस सीमा तक पहुँच चुकी है इसकी जाँच इस समय करनी है। सभी परिजन अपने क्षेत्र के आसुरी आक्रमणों, उसके परिणामों तथा उनसे बचा लेने के प्रयत्नों की पूर्ण सूचना दें। आगे भी समय-समय पर इस प्रकार के विवरण माँगे जाते रहेंगे ताकि वस्तु स्थिति का पता चलता रहे। संस्था की धर्म सेवाएं जितनी ही तीव्र होती चलेंगी उतनी ही आसुरी प्रतिक्रियाएं भी प्रबल होंगी। इन संघर्षों का भी एक बड़ा ही मनोरंजक एवं उत्साहवर्धक इतिहास बनेगा। युग निर्माण के प्रत्येक अवसर पर भारी संघर्ष हुए हैं। इस बार भी उसका होना अनिवार्य है। अन्तर केवल अस्त्रों का है। इस संघर्ष में विरोधी पक्ष तलवार के बजाय मतिभ्रम फैलाने वाले गोले दागेगा। आत्म रक्षा के लिए हम में से हर एक को सतर्क रहना चाहिए। आज के धर्म क्षेत्र, कुरुक्षेत्र में इस संघर्षात्मक महाभारत का जो सूत्रपात हो रहा है उसमें अपना कार्य यथा भागमव्यवस्थितः’ रहकर हर परिजन को पूरा करना है।
समुद्र मन्थन का विष निकल रहा है। आगे जैसे जैसे मन्थन तीव्र होगा विष और भी वेग के साथ उफनेगा। इससे साधारण श्रेणी के दुर्बल परिजनों को बचाया जाना चाहिए जो विष को समेटने के लिए अपने आपको खतरों में डाल दें। नृसिंह और राम लक्ष्मण न निकले तो यह प्रह्लाद और विश्वामित्र का प्रतीक आन्दोलन संकटपूर्ण स्थिति को पहुँच सकता है। रचनात्मक कार्यक्रमों के साथ-साथ हमें बचाव के सुरक्षा मोर्चे का भी ध्यान रखना होगा। तभी इस चतुर्मुखी संघर्ष के चक्रव्यूह को पार करना सम्भव हो सकेगा।
महायज्ञ की तैयारी
महायज्ञ की तैयारियाँ उत्साहपूर्वक जारी हैं। कितने ही जिम्मेदार कार्यकर्त्ता आयोजन का कार्य सँभालने आ गये हैं और कुछ शीघ्र आ रहे हैं। इन दिनों वर्षा की अधिकता के कारण कुण्ड निर्माण आदि का कार्य तो नहीं हो रहा है। वह तो एक महीने बाद वर्षा बन्द होने पर ही शुरू होगा, पर अन्य सब तैयारियाँ बराबर चल रही हैं। ठहरने के लिए तम्बू, सफाई, रोशनी, बिजली, पानी, भोजन-व्यवस्था, हवन-सामग्री, शुद्ध घी, यज्ञशाला निर्माण आदि की व्यवस्था में तपोभूमि के वर्तमान कार्यकर्ता दिन-रात लगे रहते हैं। कुछ और सुयोग्य सेवा-भावी कार्य कर्त्ता शीघ्र ही इस कार्य में हाथ बटाने के लिए आने वाले हैं। काम बहुत बड़ा है। सब कार्य आपसी सहयोग और श्रमदान द्वारा ही किये जाने हैं, इसलिए जिन्हें अवकाश है ऐसे क्रिया-कुशल, परिश्रमी, शिक्षित, सद्गुणी, अनुशासन में रहने वाले और सेवाभावी कार्यकर्त्ताओं को जरूर ही मथुरा आने को लिखा गया है। आश्विन की नवरात्रि ता. 13 अक्टूबर से जो यज्ञीय शिक्षण-शिविर होने वाला है उसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्त्ताओं के आ जाने की आशा है।
मानवी गुरु कान में मंत्र फूँकते हैं और दैवी गुरु आत्मा में तेज।
परोपकारी महात्मा लोग ईश्वर के नजदीकी सम्बन्धी हैं और दूसरे संसारी मनुष्य तो उसके केवल उत्पन्न किये प्राणी मात्र हैं।
जिस घर में साँप अधिक हों उस घर में रहने वाला मनुष्य जिस प्रकार बड़ा सावधान रहता है उसी प्रकार संसार में रहने वाले मनुष्यों को विषय वासना और लोभ में पड़ने से सावधान रहना चाहिये।
शान्ति और सद्गुण युक्त जीवन व्यतीत करने के लिये लोगों की प्रशंसा और निन्दा पर ध्यान देना छोड़ दो।
सोने और पीतल को कसौटी पर रगड़ने से मालूम हो जाता है कि कौन सोना है और कौन पीतल है। उसी प्रकार संकट और आपत्ति की कसौटी पर रगड़ने से सच्चे और ढोंगी साधुओं की परीक्षा हो जाती है।
मोती गहरे समुद्र में होते हैं। उनको पाने के लिये गहरी डुबकी लगानी पड़ती है और बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है। इस संसार रूपी सागर में ईश्वर को प्राप्त करने की भी यही विधि है।
दाद को खुजलाने में पहले जितना सुख जान पड़ता है खुजलाने के बाद उतनी ही असह्य पीड़ा भोगनी पड़ती है। उसी प्रकार संसार के भोग पहले बड़े अच्छे लगते हैं परन्तु बाद में उनसे असह्य और अकथनीय दुख मिलता है।
नाव पानी में रह सकती है, परन्तु पानी नाव में नहीं रह सकता। उसी प्रकार मुमुक्षु संसार में रह सकता है, लेकिन संसार को मुमुक्षु में नहीं रहने देना चाहिये।
हवा चन्दन के वृक्ष से भी गुजरती है और सड़े हुये मुरदे पर से भी, लेकिन वह किसी से मिलती नहीं। दोनों प्रकार की गन्ध, अलग रहती है। उसी प्रकार मुक्त पुरुष संसार में रहते हैं लेकिन संसारी मनुष्यों में मिल नहीं जाते।
धर्म क्यों बिगड़ते हैं? मेह का पानी साफ होता है, लेकिन यदि वह गन्दी छतें, गन्दे नल और नालियों से होकर बहे तो वह भी गन्दा हो जाता है।
—रामकृष्ण परमहंस
(श्री शिवसिंह ‘सरोज’)
बन्द करो विस्फोट, अनल का असहनशील दहन है।
प्रलयंकारी प्रयोग, शस्त्र संतप्त त्रस्त त्रिभुवन है॥
अंगारों को उड़ा परखते हो पौरुष प्रति-भट का,
प्रगति पथी, प्रतिशोध तुम्हारा विस्फोट विषघट का!
दान दिया विज्ञानवान ने विषम-विधान विकट का,
शंकाकुल संसार समर, संहार और संकट का॥
धूमकेतुओं का कौतुक यह धरा-ध्वंस की लीला,
शोणित-शोध क्रोध-कुत्सा का अट्टास गर्वीला।
यह रुधिराक्त प्रयोग प्रलय का परमाणविक परीक्षण,
बन्द करो निर्द्वंद्व मन्दगति ज्वलनशील अनुशीलन॥
उड़ा रहे अंगार क्षार-क्षय धुँआधार भ्रम-तम है,
दहती है बारूद दहकती लपटें, घुटता दम है।
पड़ती राख आँख में मुख में सम्मुख रुख आँधी का,
धूलिसात् आदर्श, मलिन मन गौतम का, गाँधी का॥
भंजहु चाप राम! सीता की निष्ठा डोल रही है,
जनक-पुरी आसुरी शक्ति को तप से तोल रही है।
जोड़ो फिर विश्वास, भरोसा भरो भयातुर भव में,
तोड़ो धनुष ध्वंस का, राघव! कौतूहल लाघव में॥
जय हो, जिसने सबसे पहले रोके हाथ रुधिर के,
धरी म्यान में खड़ग शत्रु के शस्त्र-व्यूह से घिर के।
जिसने अपनी चौड़ी छाती दे दी संगीनों को,
जय हो, जिसने रक्त-दान दे दुलराया दीनों को॥
जहाँ मनुज के मानसरोवर से सुर-सरिता छलकी,
जय-जयकार कर रही धरती यह ‘भारत’ भूतल की।
बोधि-वृक्ष की शीतल छाया मुद्रा मौन अभय की,
दुनिया को दे रही दुहाई शाँति-पूर्ण निश्चय की॥
यह वह देश जहाँ यदि कोई शाँति भंग करता है,
नहीं तीर से केवल तीखी चितवन से मरता है।
सौंपी इसको शस्त्र छत्र यह सबके सिर धरता है,
यहाँ सुमन का शर भी शंकर की समाधि हरता है॥
दे दो अस्त्र, ऊर्ध्व मस्तक हो और उदार हृदय हो,
आयुध तजो निरायुध जन का जीवन निःसंशय हो।
अस्त्र-शस्त्र हों शाँत और आक्रान्त व्यक्ति निर्भय हो,
ज्वालामुखी प्रयोग हिमालय में शीतल हो लय हो॥