जीवन को सुख-शाँतिमय बनाने वाला साहित्य

सस्ती, सुन्दर, उपयोगी एवं अनुभवपूर्ण अपने ढंग की अनोखी पुस्तकें

बिगड़े स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें

सूर्य चिकित्सा विज्ञान

प्राण चिकित्सा विज्ञान

स्वस्थ बनने की विद्या

भोग में योग

बुद्धि बढ़ाने के उपाय

आसन और प्राणायाम

तुलसी के अमृतोपम गुण

महान जागरण

तुम महान हो

घरेलू चिकित्सा

बिना औषधि के काया कल्प

पंच तत्वों द्वारा सम्पूर्ण रोगों का निवारण

दीर्घ जीवन का रहस्य

नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा

स्वप्न दोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा

दूध की आश्चर्यजनक शक्ति

उन्नति का मूल मंत्र ब्रह्मचर्य

उपवास के चमत्कार

स्त्री रोग चिकित्सा

बाल रोग चिकित्सा

निरोग जीवन का राजमार्ग

कब्ज की सरल चिकित्सा

चिरस्थायी यौवन

सौंदर्य बढ़ाने के ठोस उपाय

मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार

पुत्र-पुत्री उत्पन्न करने की विधि

हमारी पारिवारिक समस्याएं

मनचाही संतान

दांपत्ति जीवन का सुख

हमारे आन्तरिक शत्रु

क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें?

हमारी सभ्यता के कलंक

जीवन में आनंद भर देने वाली पुस्तकें

धनवान बनने के गुप्त रहस्य

मरने के बाद हमारा क्या होता है?

मित्र भाव बढ़ाने की कला

आकृति देखकर मनुष्य की पहचान

अमृत, पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति

हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं।

विचार करने की कला

हम वक्ता कैसे बन सकते हैं?

लेखन कला

सफलता के तीन साधन

जिन्दगी कैसे जिएं

प्रसिद्ध और समृद्धि

हमारी पारिवारिक समस्याएं

ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

क्या धर्म? क्या अधर्म?

शक्ति संचय के पथ पर

ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग

भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञोपवीत

यज्ञोपवीत द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति

हँसी खुशी का जीवन

मैं क्या हूँ?

परकाया प्रवेश

स्वर से दिव्य ज्ञान

जीव-जन्तुओं की मूक भाषा

वशीकरण की सच्ची सिद्धि

ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग

प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि

मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा

हस्त रेखा विज्ञान

गृहस्थ योग

चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग

मधुर सम्बन्धों का रहस्य

अदित्सन्तं दापयतु प्रजानन्

-अथर्व वेद 3/20/8

कंजूसों को दान करने की प्रेरणा करो।

धन जमा करते जाने की नहीं, सदुपयोग करने की वस्तु है।

वर्ष-19 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-9


प्रतिज्ञा

(श्री ‘रजेश’ एम. ए.)


प्रतिज्ञा (Kavita)

क्षण भर इन्द्रिय-चिन्तन का मुझको अवकाश न होगा, दूषित विकार का उर में अब कभी विकास न होगा।

मैं तभी पतित हूँगा जब इस शव में श्वास न होगा, मानव हूँ, पशु न बनूँगा मन का विश्वास न होगा।

बस मेरे व्रत-संयम में कृत्रिमता लेश न होगा, अभिलाषा-दमन करूंगा मन पर अनुशासन होगा।

साधन में युग बीतेंगे फिर भी आभास न होगा, मन से अपमानित होकर मेरा उपहास न होगा।

वासना जगत की पाकर मुझ में उल्लास न होगा, त्यागूँगा सकल प्रलोभन तृष्णा का वास न होगा ।

मानी मानव अब मन का जीवन भर दास न होगा, विघ्नों को सम्मुख पाकर पथ-भ्रष्ट, हताश न होगा।


युग-निर्माण का मंगलाचरण

धर्म, शिक्षा, न्याय, सभ्यता; विज्ञान, कला आदि मानव जीवन की आवश्यक प्रवृत्तियों की जन्मभूमि यह भारत भूमि है। पशु को मनुष्य बनाने वाली जिस सभ्यता और संस्कृति का उद्भव यहाँ हुआ वह किसी देश, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, वर्ग या समाज के लिए नहीं, वरन् समस्त संसार के लिए है। भारतीय सभ्यता-मानवता की, समस्त मनुष्य जाति की अत्यन्त ही विवेक एवं दूरदर्शिता से भरी हुई जीवन पद्धति है। इसे अपनाने पर मनुष्य अगणित प्रकार की असुविधाओं, विकृतियों, और बुराइयों से बच कर सुख, समृद्धि, सफलता और सद्गति का अधिकारी बनता है।

जब भारतीय संस्कृति का लोग महत्व समझते थे, उस पर विश्वास करते थे, उसको आचरण में लाते हुए अपना गौरव समझते थे, तब इस देश में घर-घर महापुरुष उत्पन्न होते थे। भौतिक समृद्धि और सामाजिक सुख शान्ति की कमी न थी। इस संस्कृति के ढांचे में ढले हुए नर रत्न अपने प्रकाश से समस्त संसार में प्रकाश उत्पन्न करते थे और उसी आकर्षण के कारण विश्व की जनता उन्हें जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं भूसुर (पृथ्वी के देवता)मानती थी। यह देश स्वर्ग की अपेक्षा भी श्रेष्ठ समझा जाता था। अतीत का इतिहास इस तथ्य का मुक्त कण्ठ से उद्घोष कर रहा है।

भारतीय संस्कृति के प्रभाव से प्रभावित प्रत्येक परिवार में स्वर्गीय शान्ति एवं सद्भावनाओं का निवास रहता था। पिता और पुत्र के बीच कैसे सम्बन्ध थे इसका उदाहरण देखना हो तो विमाता की आज्ञा से 14 वर्ष के लिये वनवास जाने वाले राम, अन्धे माता पिता को कन्धे पर काँवर में बिठा कर तीर्थ यात्रा कराने वाला श्रवण कुमार, पिता के दान करने पर यमपुर खुशी-खुशी प्रस्थान करने वाले नचिकेता का चरित्र पढ़ लेना चाहिये। भाई का भाई के लिए क्या कर्त्तव्य है इसकी झाँकी राम, लक्ष्मण और भरत का चरित्र पढ़ लेने से सहज ही हो जाती है। कौरवों को जब यक्षों ने बन्दी बना लिया तो युधिष्ठिर ने भ्रातृ प्रेम के वशीभूत होकर उन्हें छुड़वाया। पुष्कर के दुर्व्यवहार को भुला कर नल ने अपने भाई को क्षमा ही कर दिया। ऐसे भ्रातृ प्रेम के उदाहरण पग-पग पर मिलेंगे। सच्चे मित्र कैसे होते हैं यह कृष्ण ने सुदामा और अर्जुन के साथ अपना कर्त्तव्य पालन करके दिखाया था।

पति पत्नी के बीच कैसे सम्बन्ध होने चाहिएं इसके उदाहरण पत्नीव्रती पुरुष और पतिव्रता नारियों ने पग-पग पर उपस्थित किये हैं। सीता, सावित्री, शैव्या, दमयन्ती, गान्धारी, अनुसूया, सुकन्या आदि की कथाएँ घर-घर गाई जाती हैं। परस्त्री को माता एवं पुत्री समझने वाले भी सभी कोई थे। शिवाजी द्वारा यवन कन्या को सुरक्षित रूप से सम्मानपूर्वक राजमहल में पहुँचा देना, अर्जुन का उर्वशी को लौटा देना, कच का रूपगर्विता देवयानी का प्रस्ताव अस्वीकार करना, सूर्पणखा का लक्ष्मण द्वारा उपहास होना जैसे प्रसंगों की कमी नहीं है। भीष्म, हनुमान, जैसे अखण्ड ब्रह्मचारी प्रचुर संख्या में परिलक्षित होते थे।

अतिथि सत्कार के लिये मोरध्वज का अपना पुत्र दे देना, भूखे बहेलिये के लिए कबूतर कबूतरी का अपना शरीर दे देना, दुर्भिक्ष पीड़ित समय में अनेक दिनों से भूखे ब्राह्मण परिवार का अपनी थाली की रोटियाँ चाण्डाल को दे देना आदि अनेकों वृत्तांत महाभारत में देखे जा सकते हैं शरणागत कबूतर की रक्षा के लिये राजा शिवि ने अपना माँस काट-काट कर दे दिया था। कुन्ती ने ब्राह्मण कुमार के बदले अपने पुत्र भीम को राक्षस का आहार बनने के लिये भेजा था।

अपने स्वार्थ, सुख-साधन, धन सम्पदा संग्रह ऐश आराम को लात मार कर अपनी आत्मा का कल्याण करने के निमित्त लोक सेवा और परमार्थ में जीवन व्यतीत करने में यहाँ के लोग अपने जीवन की सफलता मानते रहे हैं। गौतम बुद्ध अपने राज-पाट और सुख सौभाग्य को छोड़कर हिंसा और अज्ञान में डूबे हुये संसार को दया और आत्मज्ञान की शिक्षा देने के लिए निकल पड़े। महावीर ने लालची और विषयासक्त दुनिया को त्याग और संयम का पाठ पढ़ाने के लिए अपना जीवन उत्सर्ग किया। भागीरथ ने राज सुख को छोड़ कर दीर्घ काल तक कठोर तप किया और प्यासी पृथ्वी को तृप्त करने के लिए तरण तारणी गंगा का अवतरण कराने का महान कार्य संपादित किया। नारद जी कुछ घड़ी भी एक स्थान पर न ठहर कर आत्म-ज्ञान का प्रसार करने के लिए हर घड़ी पर्यटन करते रहते थे। व्यास जी ने संसार को धर्म ज्ञान देने के लिये अष्टादश पुराणों की रचना की। आदि कवि बाल्मीक ने रामायण की रचना करके मानव जाति को कर्त्तव्य पथ पर चलने के लिये अग्रसर किया। चरक, सुश्रुत, वागभट्ट, धन्वन्तरि, प्रभृति ऋषियों ने जीवन भर जड़ी बूटियों, धातुओं, विषों आदि का अन्वेषण करके रोगग्रस्त पीड़ितों का बाण करने के लिये सर्वांगपूर्ण चिकित्सा शास्त्र का आविर्भाव किया। ज्योतिष विद्या की महान खोज, आकाशस्थ ग्रह नक्षत्रों की गतिविधियों और उनका मनुष्य जाति पर जो प्रभाव पड़ता है उसकी खोज करने वाले वे ऋषि ही थे। सूर्य सिद्धान्त, मकरन्द, ग्रहलाघव, आदि को देखने से आश्चर्य होता है कि उस समय बिना वैज्ञानिक यन्त्रों के इस प्रकार की शोध करके संसार को महान ज्ञान देने के लिए उन्हें कितना श्रम करना पड़ा होगा।

सदा अपने को तप से तप्त करके अपनी महान सेवाएँ विश्व मानव के उत्कर्ष में लगाने वाले ऋषियों की जीवनियाँ पढ़ने पर मनुष्य की अन्तरात्मा उनके चरणों पर लोट जाने को करती है। विश्वामित्र, वशिष्ठ, जमदग्नि, कश्यप, भारद्वाज, कपिल, कणाद, गौतम, जैमिनी, पाराशर, याज्ञवलक्य, शंख, कात्यायन, गोमिल, पिप्पलाद, शुकदेव, शृंगी, लीमस, धौम्य, जरुत्कार, वैशम्पायन, आदि ऋषियों ने अपने को तिल-तिल जलाकर संसार के लिये वह प्रकाश उत्पन्न किया जिसकी आभा अभी तक बुझ नहीं सकी है। सूत और शौनक निरन्तर प्राचीन काल के महापुरुषों की गाथाएँ, विरुदावलियां, धर्मचर्चाएँ सुना-सुना कर मानव जाति की सुप्त अंतरात्माओं को जगाया करते थे। दधीचि ने असुरत्व से देवत्व की रक्षा के लिए अपनी हड्डियाँ ही दान कर दीं। धर्म की मर्यादा की रक्षा के लिये बन्दा वैरागी खौलते तेल के कढ़ाव में प्रसन्नता-पूर्वक कूद पड़ा। हकीकतराय के कत्ल, गुरु बालकों के जीवित दीवारों में चुने जाने की कथाएँ आज भी धर्म कर्त्तव्य की उपेक्षा करके धन संग्रह और इन्द्रिय भोगों में लगे हुये लोगों पर लानत देती हुई आकाश में विहार कर रही है।

आज अधिकांश पण्डित, पुरोहित, साधू, ब्राह्मण आदि संसार को मिथ्या बताते हुये मुफ्त का माल चरते रहते हैं और आलस्य प्रमाद से चित्त हटा कर संसार का बौद्धिक स्तर ऊँचा उठाने के लिये कुछ भी श्रम नहीं करते। पर भारतीय संस्कृति की परम्परा इससे सर्वथा भिन्न रही है। साधुता और ब्राह्मणत्व का आदर्श दूसरा ही है। शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, सिख धर्म के दस गुरु, दयानन्द, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास, चैतन्य, कबीर, विवेकानन्द, रामतीर्थ, आदि असंख्यों धर्मगुरु लोक हित के लिये जीवन भर घोर परिश्रम प्रयत्न और परिभ्रमण करते रहे। उन्होंने लोक सेवा को एकान्त मुक्ति से अधिक महत्व दिया। भगवान बुद्ध जब अपनी जीवन लीला समाप्त करने लगे तो उनके शिष्यों ने पूछा-”आप तो अब मुक्ति के लिए प्रयाण कर रहे हैं।” बुद्ध ने उत्तर दिया-”जब तक संसार में एक भी प्राणी बन्धन में बँधा हुआ है तब तक मुझे मुक्ति की कोई कामना नहीं है मैं मानवता का उत्कर्ष करने के लिये बार-बार जन्म लेता और मरता रहूँगा।”। स्वामी दयानन्द सरस्वती भी योग साधना करने हिमालय में गये थे, पर उन्हें वहाँ ईश्वरीय प्रेरणा हुई कि “लोक सेवा ही सर्वोत्तम योग साधना है।” स्वामी जी तपस्या से लौट आये और अज्ञानग्रस्त जनता में ज्ञान प्रसार करने को हो अपनी साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष में विष पान करके स्वर्ग सिधारे। गान्धी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही ‘पण्डित’ शब्द का वास्तविक प्रमाण है। गुरु कैसे होते हैं यह जानना हो तो गुरु गोविन्द सिंह आदि सिखों के दश गुरुओं का चरित्र पढ़ना चाहिये। शिष्य भी तब ऐसे ही होते थे। एकलव्य, आरुणि उद्दालक, धोम्य, नचिकेता आदि शिष्यों के चरित्र पढ़ने से अपनी संस्कृति पर सहज ही गर्व होने लगता है।

भारतीय संस्कृति में पले हुए राजा कैसे होते थे इसका उदाहरण राजा जनक के जीवन से मिल सकता है। वे अपने गुजारे के लिए स्वयं खेती करते थे और राज्य कोष से एक पाई भी अपने लिए न लेकर उसे जनता के निमित्त ही खर्च करते थे। जनक को अपना खेत जोतते समय हल की नोक की उचाट से एक कन्या मिली थी। हल की नोक को संस्कृति में सीता कहते है, इसलिए जनक ने अपने खेत में मिली हुई इस कन्या का नाम भी सीता रखा था। महर्षि विश्वामित्र को जब किसी यज्ञीय (लोक हितकारी) कार्य के लिए धन की आवश्यकता पड़ी तो राजा हरिश्चन्द्र ने समस्त राज्य कोष ही दान नहीं कर दिया वरन् अपने तथा स्त्री-बच्चों के शरीर को बेच कर आदर्श उपस्थित किया। छत्रपति शिवाजी का विशाल राज्य था, उसे उन्होंने समर्थ गुरु रामदास के चरणों में अर्पित कर दिया था और स्वयं की आज्ञानुसार एक मुनीम की तरह उसका संचालन करते थे। भरत भी राम की चरण पादुकाओं को शासक मानकर स्वयं एक तुच्छ सेवक की भाँति 24 वर्ष राज्य चलाते रहे। धौलपुर की राजगद्दी के मालिक नृसिंह भगवान और मेवाड़ की राजगद्दी के मालिक भगवान एकलिंग जी माने जाते थे। राजा लोग अपने को उनका संचालक कहते थे। पीछे यद्यपि यह बात दिखावा मात्र रह गई, पर आरम्भ में यह त्याग भी उसी शृंखला का एक प्रतीक अवश्य था। विक्रमादित्य प्रजा की वास्तविक स्थिति जानने के लिए वेष बदले प्रजाजनों के बीच घूमता रहता था। राणा प्रताप राजसुख की परवाह न करके जीवन भर स्वाधीनता संग्राम में धर्म युद्ध लड़ते रहे। महान् राज पुत्र दुर्गादास राठौर को लड़ाई में रोटी भी नसीब नहीं हो पाती थी तो वह घोड़े पर चढ़ा हुआ भाले की नोंक में छेद कर भुट्टे भून खाता था और स्वाधीनता संग्राम लड़ता रहता था। छत्रसाल की गाथा सर्वविदित है। ऐसे होते थे यहाँ के शासक। राज्यों के मन्त्री कैसे होते थे उसका नमूना चाणक्य का जीवन है। यह विश्व का अभूतपूर्व कूटनीतिज्ञ एक फूँस की झोपड़ी में गरीब लोगों की भाँति रहता था और राज्य-कोष से अपने व्यय के लिये कुछ भी नहीं लेता था।

धन सम्पत्ति जिनके पास होती थी वे उसे सात पीढ़ियों के लिए तिजोरी में बन्द नहीं करते थे वरन् तात्कालिक लोक हित के लिए उसे मुक्त हस्त से दान करते रहते थे। राजा कर्ण की दानवीरता प्रसिद्ध है। कहते हैं कि वे सवामन स्वर्ण रोज दान करते थे। कृष्ण ने जब उनकी दानवीरता की परीक्षा कराई है तो उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर कवच कुण्डल दिये हैं। मरते समय भी दाँत तोड़ कर उसमें लगा हुआ स्वर्ण दान करके याचकों को विमुख नहीं लौटने दिया है। मोरध्वज ने अपने पुत्र को दिया है। राजा बलि ने तीनों लोक का राज्य ही नहीं अपना शरीर भी उस समय लोक सेवा के प्रतीक समझे जाने वाले ब्राह्मण-वामन-को दान दिया है। जरूरतमंदों के लिए लोग अपनी परसी थाली तक दे देते थे। भामा शाह ने अपनी करोड़ों की सम्पत्ति तिनके की तरह राणा प्रताप को दे डाली। राजा महेन्द्र प्रताप अपनी जमींदारी राष्ट्रीय शिक्षा के लिये अर्पित करके भारतीय स्वाधीनता के लिए विदेश भागे थे। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी का राज्य प्राप्त करके उसे दान दिया था। सुभाष बोस को बर्मा में भारतीयों ने अपना सर्वस्व स्वाधीनता संग्राम चलाने के लिए दे दिया था। उससे पूर्ण श्री बोस भारत की अपनी लाखों रुपये की सम्पत्ति को राष्ट्र के लिए सौंप कर उसको सार्वजनिक सम्पत्ति घोषित कर गये थे। सी. आर. दास अपनी बैरिस्ट्री में हजारों रुपया कमाते थे, वह सारा का सारा देकर और कई बार कर्ज लेकर भी सार्वजनिक आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे। जमुनालाल बजाज ने अपने को गाँधी जी का पाँचवाँ दत्तक पुत्र घोषित करके अपनी सारी सम्पत्ति महात्मा गाँधी के चरणों में अर्पित कर दी थी।

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, राजा राममोहनराय, गोपाल कृष्णा गोखले, महादेव गोविन्द रानाडे, गणेश शंकर विद्यार्थी, श्रद्धानन्द, सर्वदानंद , दर्शनानंद, लेखराम, हैडगेवार आदि का जीवन जिस प्रकार से व्यतीत हुआ है उसमें भारतीय संस्कृति की झाँकी देखी जा सकती है। भूषण, गंग और चन्दबरदाई आदि चारणों ने अपनी ओजस्वी वाणी और कविता से अनेकों निष्प्राणों को प्राणवान बनाया। गंग इसी अपराध में हाथी के पैर के नीचे कुचलवाये गये, चन्दबरदाई ने गजनी में जो कष्ट सहा वह किसी से छिपा नहीं है। सन् 57 से लेकर स्वाधीनता के हिंसात्मक संग्राम के क्रान्तिकारी वीर सैनिक और सन् 21 से लेकर सन् 47 तक की अहिंसात्मक राज्य कान्ति में अगणित व्यक्तियों ने जो त्याग किये हैं उनकी गाथाएँ पढ़ते-सुनते हुए भुजाएँ फड़कने लगती हैं। पाकिस्तानी बर्बरता के सामने सिर न झुका कर अपने धर्म का अक्षुण्य रखने के लिये पंजाब और बंगाल के लाखों स्त्री-पुरुषों ने जो त्याग किये हैं उनका स्मरण करके चित्तौड़ की रानियों के जौहर और गुरु गोविन्दसिंह के कुछ पुत्रों की स्मृति ताजी हो जाती है।

आस्तिकता की प्रतिष्ठापना के लिये घोर तप करने वाले लोगों की संख्या कम नहीं है। ध्रुव प्रहलाद, सरीखे भक्त प्राचीन काल में हुए हैं और मध्यकाल में सूर, तुलसी, रामकृष्ण परमहंस, रैदास, कबीर, दादू , रामानन्द, रामानुज, षटकोपाचार्य, तिरुवल्लुवर जैसे संतों की संख्या बहुत बड़ी है। अनीति के निवारण के लिए त्रेता में ऋषियों ने अपना खून निकाल-निकाल कर एक घड़ा भरा था और वह रक्त घट अन्त में राक्षसों के विध्वंस कराने के निमित्त-सीता जन्म-का हेतु बना था। इसी मार्ग पर यह आस्तिक सन्त अपनी साधना, भक्ति , ज्ञान, दीक्षा, आदि के द्वारा अनीति निवारण और धर्म विस्तार कार्य करते रहे हैं।

विश्व मानव की सेवा के लिये भारतीय स्त्रियाँ भी पुरुषों से पीछे नहीं रही है। उनका कार्य क्षेत्र पुरुषों के समान विस्तृत क्षेत्र में न रह कर सीमित क्षेत्र में रहा है, इसलिये उन्हें यश उतना ही मिला है केवल कुछ पतिव्रता स्त्रियों के कौतूहलपूर्ण चरित्रों का ही ग्रंथों में विस्तृत वर्णन आया है पर सच बात यह है कि भारतीय नारी ने प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों से अधिक कार्य किया किया है। उन्हीं की प्रेरणा और छत्रछाया से समर्थ होकर पुरुष जाति कुछ कर सकने में सफल हो सकी। इसीलिये उनका नाम पुरुषों से पहले लिया जाता रहा है। सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश, मायाब्रह्म, सावित्री सत्यवान् आदि नामों में पहला नाम नारी का है दूसरा नर का है। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं रहा है जिसमें भारतीय नारी ने महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादन न की हो। वेदों के दृष्टा जिस प्रकार विश्वामित्र आदि ऋषि हुए हैं वैसे ही ऋषिकाएँ-स्त्रियाँ भी हुई हैं। ऋग्वेद 10। 85। 10-134। 10-39। 10-40। 8-91। 10-95। 5-28। 8-91 आदि अनेकों सूत्रों की दृष्टा घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, जुहु, अदिति, सरमा, रोमशा, लोपा मुद्रा, शाश्वती सूर्या, सावित्री आदि ब्रह्मवादिनी स्त्रियाँ ही हैं। मनु की पुत्री इडा, बड़ी प्रकाण्ड याज्ञिका थी। उसने अपने पिता मनु का यज्ञ कराया था। मैत्रेय एक समय की अद्वितीय विद्वान थी। शाण्डिल्य की पुत्री श्री मती ने अत्यन्त कठोर तप किये थे। महाभारत में शान्ति पर्व के अध्याय 30 में सुलभा नामक एक विदुषी का वर्णन है जिसने शास्त्रार्थ में राजा जनक जैसे ब्रह्मज्ञानी के छक्के छुड़ा दिये थे। भागवत में स्वधा की पुत्री वयुना और धारिणी का वर्णन है, वे विज्ञान विद्या में निष्णात् थीं। ब्रह्म वैवर्त पुराण में वर्णित वेदवती को चारों वेद सस्वर कण्ठाग्र थे। भारती देवी नामक महिला ने शंकराचार्य से ऐसा शास्त्रार्थ किया था कि बड़े-बड़े विद्वान भी अचंभित रह गये थे। उसके प्रश्नों से निरुत्तर होकर शंकराचार्य को उत्तर देने के लिये कुछ मास की मोहलत माँगनी पड़ी थी।

युद्ध कला प्रवीण कैकेयी को दशरथ जी लड़ाई में अपने साथ ले गये थे और जब रथ टूटने लगा तो कैकेयी ने ही उसका तात्कालिक उपचार करके पराजय से बचाया था। मदालसा, महामाया के चरित्र भी प्रसिद्ध हैं। चित्तौड़ की रानियाँ, बूँदी की रानी दुर्गावती, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, चाँदबीबी आदि के पराक्रम से दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है। द्रौपदी, गान्धारी, कुन्ती आदि की असाधारण योग्यता को सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती। मीरा ने लोक लाज छोड़ कर राज परिवार त्याग कर जनता जनार्दन के हृदय में भक्ति का दिव्य रस ओत-प्रोत किया था। समाज सुधार और राजनैतिक क्षेत्रों में प्राण-प्राण से संलग्न महिलाएँ इस शताब्दी में भी कम नहीं हुई हैं।

महापुरुषों और महान नारियों के दिव्य चरित्र से भारतीय इतिहास का पन्ना-पन्ना जगमगा रहा है। यहाँ घर-घर में ऐसे नर रत्न-पैदा होते रहे हैं जिनके उज्ज्वल चरित्र प्रकाश स्तम्भों की भाँति आज भी गिरी हुई मनुष्य जाति का पथ-प्रदर्शन करने के लिए जाज्वल्यमान हो रहे हैं। यह क्रम इस देश में केवल इसलिये चलता रहा है कि यहाँ ऋषि प्रणीत संस्कृति के प्रति लोगों की गम्भीर आस्था रही है। इन धर्म शास्त्रों, ऋषि प्रणालियों, आप्त वचनों का अनुगमन करने के लिये लोग श्रद्धापूर्वक हृदय और मस्तिष्क के द्वार खोले रहे हैं। आज भोगवादी भौतिक संस्कृति ने उस हमारी सनातन परम्परा से जनसाधारण को विमुख कर दिया है। फलस्वरूप सर्वत्र घोर अशान्ति, दारिद्र, रोग शोक, भय, उत्पीड़न, तृष्णा और वासना से सभी के हृदय जर्जर हो रहे हैं।

हमारा निश्चित विश्वास है कि भारतीय संस्कृति, ऋषि प्रणीत, रीति नीति-अपना करके ही मनुष्यता का उत्कर्ष हो सकता है, अन्यथा वर्तमान गति विधि उसे सब प्रकार नष्ट करके ही छोड़ेगी। सत्य अमर है, श्रद्धा अमर है, धर्म अमर है, प्रेम अमर है, न्याय अमर है ये कभी मन्द भले ही हो जावें पर मर नहीं सकते। भारतीय संस्कृति भी अमर है, वह आज तमसाच्छन्न हो रही है पर कल अवश्य ही निर्मल होगी। हमारी अन्तरात्मा कहती है कि वह पुनः सजीव होगी और उसकी विजय दुन्दुभी फिर एक बार विश्व में बजेगी।

हम उस भविष्य की प्रतीक्षा करते हैं जिसमें भारत में घर-घर अपने प्राचीन आदर्शों की भावना एवं मान्यता का विकास होगा। लोग आपस में ऐसे व्यवहार रखेंगे जैसे प्राचीन भारत में रखे जाते थे। माँ बाप, भाई बहिन, भाई-भाई, पिता-पुत्र, सास-बहु, स्त्री-पुरुष, स्वजन सम्बंधी, बन्धु-बन्धुओं के बीच ऐसे प्रचुर एवं प्रेमपूर्ण संबंध होंगे जिन्हें देख कर देवता भी ईर्ष्या करें। पुरुष स्त्रियों के प्रति और स्त्रियाँ पुरुषों के प्रति अत्यन्त ही पवित्र भावनाएँ रखा करेंगे। व्यापारी और ग्राहक के बीच उचित मुनाफे पर ठीक वस्तुओं का ईमानदारी के साथ क्रय-विक्रय होगा। मजदूर पूरा काम करने में और मालिक पूरी मजदूरी देने में कसर न रखेंगे। आलस्य को, काम से जी चुराने को मानवी अपराध समझा जायगा और हर आदमी पसीना बहाये बिना रोटी खाना पसन्द न करेगा। मनुष्य परस्पर सहिष्णु, सहनशील, एक दूसरे की स्थिति और कठिनाई को समझने वाले, तथा उदार व्यवहार करने वाले होंगे। छल, चोरी, व्यभिचार,बेईमानी, दगाबाजी, विश्वासघात, अनीति, अन्याय आदि से लोग वैसे ही घृणा करेंगे जैसे अखाद्य और अभक्ष को भूखा रहने पर भी कोई नहीं खाता। संयम, सदाचार और नियमित जीवन के कारण सब लोग निरोग और दीर्घजीवी रहेंगे। सन्तोषी और परिश्रमी होने के कारण उन्हें किसी बात का घाटा न रहेगा। परस्पर स्नेह और सद्भावों के कारण आपसी व्यवहार स्वर्गीय सुख जैसे मधुर हो जावेंगे।

युग निर्माण के साँस्कृतिक पुनरुत्थान मंगलाचरण एवं शिलान्यास के रूप में ब्रह्मास्त्र का महान धर्मोपचार आरंभ किया गया है। गायत्री और यज्ञ की आध्यात्मिक शक्ति महान् है। इन दोनों के समन्वय से सूक्ष्म आकाश में जो दिव्य-चेतना उत्पन्न होगी उससे राष्ट्र निर्माण के उपयुक्त वातावरण बनेगा। गायत्री और यज्ञ की शक्ति के बारे में आगे के पृष्ठों पर प्रकाश डाला जा रहा है।


गायत्री की गुण गरिमा

गायत्री सनातन एवं अनादि मन्त्र है। पुराणों में कहा गया है कि—”सृष्टि कर्ता ब्रह्मा को आकाश वाणी द्वारा गायत्री मन्त्र प्राप्त हुआ था इसी की साधना का तप करके उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप ही ब्रह्माजी ने चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया। गायत्री को वेदमाता कहते हैं। चारों वेद गायत्री की व्याख्या मात्र हैं।” गायत्री को जानने वाला वेदों को जानने का लाभ प्राप्त करता है।

गायत्री के 24 अक्षर अत्यन्त ही महत्वपूर्ण शिक्षाओं के प्रतीक हैं। वेद, शास्त्र, पुराण, स्मृति, उपनिषद् आदि में जो शिक्षायें मनुष्य जाति को दी गई हैं, उन सबका सार इन 24 अक्षरों में मौजूद है। इन्हें अपना कर मनुष्य प्राणी व्यक्तिगत तथा सामाजिक सुख शान्ति को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकता है।

गायत्री, गीता, गंगा और गौ यह भारतीय संस्कृति की चार आधार शिला हैं, इन सब में गायत्री का स्थान सर्वप्रथम है। जिसने गायत्री के छिपे हुए रहस्यों को जान लिया उसके लिए और कुछ जानना शेष नहीं रहता।

समस्त धर्म ग्रंथों में गायत्री की महिमा एक स्वर से कही गई है। समस्त ऋषि, मुनि मुक्त कण्ठ से गायत्री का गुणगान करते हैं। शास्त्रों में गायत्री की महिमा बताने वाला इतना साहित्य भरा है कि उसका संग्रह किया जाय तो एक बड़ा ग्रन्थ ही बन सकता है। गीता में भगवान ने स्वयं कहा है—

‘गायत्री छन्दसामहम्’

अर्थात्

‘गायत्री मन्त्र मैं स्वयं ही हूँ’

गायत्री उपासना के साथ-साथ अन्य कोई उपासना करते रहने में कोई हानि नहीं। सच तो यह है कि अन्य किसी भी मन्त्र का जप करने में या देवता की उपासना में तभी सफलता मिलती है जब पहले गायत्री द्वारा उस मन्त्र या देवता को जागृत कर लिया जाय। कहा भी है—

यस्य कस्यापि मन्त्रस्य पुरश्चरणामारभेत्। व्याहृति त्रय संयुक्ता गायत्रीच युतं जपेत्॥

नृसिंहार्क वराहणाँ कौला तान्त्रिका तथा। बिना जप्त्वातु गायत्री तत्सर्वनिष्फल भवेत्॥

चाहे किसी भी मन्त्र का साधन किया जाय, उस मन्त्र को व्याहृति समेत गायत्री सहित जपना चाहिए चाहे नृसिंह, सूर्य, वाराह आदि किसी की उपासना हो या कौल एवं ताँत्रिक प्रयोग का जाप, बिना गायत्री के वे सब निष्फल होते हैं। इसलिए गायत्री उपासना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है।

गायत्री सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम मन्त्र है। जो कार्य संसार में किसी अन्य मन्त्र से हो सकता है, गायत्री से भी अवश्य हो सकता है। इस साधना में कोई भूल रहने पर भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल, स्वल्प—श्रम साध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है।

गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में अनेक ज्ञान विज्ञान छिपे हुए हैं। अनेक दिव्य अस्त्र, शस्त्र, सोना आदि बहुमूल्य धातुओं का बनाना, अमूल्य औषधियाँ, रसायनें, दिव्य मन्त्र, अनेक ऋद्धि-सिद्धियाँ, शाप, वरदान के प्रयोग, प्रियजनों के लिए नाना प्रकार के उपचार, पारोत्रा विद्या, अंतर्दृष्टि प्राणविद्या, बेधक प्रक्रिया, शूल शाल्य वाम मार्गी तन्त्र विद्या, कुण्डलिनी चक्र, दश महाविद्या महामातृक जीवन, निर्मोक्ष, रूपांतरण, अज्ञात सेवन, अदृश्य दर्शन, शब्द परव्यूह, सूक्ष्म सम्भाषण आदि अनेक लुप्त-प्रायः महान् विद्याओं के रहस्य बीज और संकेत गायत्री में मौजूद हैं। इन विद्याओं के कारण एक समय हम जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक और स्वर्ण सम्पदाओं के स्वामी बने हुए थे। आज इन विद्याओं को भूल कर हम सब प्रकार से दीन हीन बने हुए हैं। गायत्री में सन्निहित उन विद्याओं का फिर प्रकटीकरण हो जाय तो अपना प्राचीन गौरव प्राप्त कर सकते हैं।

गायत्री की साधना द्वारा आत्मा पर जमे हुए मल विक्षेप हट जाते हैं, तो आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋद्धि सिद्धियाँ परिलक्षित होने लगती हैं। दर्पण माँज देने पर उसका मैल छूट जाता है उसी प्रकार गायत्री साधना से आत्मा निर्मल एवं प्रकाशमान होकर ईश्वरीय शक्तियों गुणों, सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाती है।

आत्मा के कल्याण की अनेक साधनाएँ हैं। सभी का अपना-अपना महत्व है और परिणाम भी अलग अलग है। ‘स्वाध्याय’ से सन्मार्ग की जानकारी होती है। सत्संग से स्वभाव और संस्कार बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएँ जागृत होती हैं। ‘तीर्थ यात्रा से भावाँकुर पुष्ट होते हैं। ‘कीर्तन’ से तन्मयता का अभ्यास होता है। ‘दान पुण्य’ से सुख सौभाग्यों की वृद्धि होती है। पूजा अर्चना से आस्तिकता बढ़ती है। इस प्रकार यह सभी साधन ऋषियों ने बहुत सोच समझ कर प्रचलित किए हैं। पर तप का महत्व इन सबसे अधिक है। तप की अग्नि में पड़कर ही आत्मा के मल विक्षेप और पाप-ताप जलते हैं। तप के द्वारा ही आत्मा में प्रचंड बल पैदा होता है जिसके द्वारा साँसारिक तथा आत्मिक जीवन की समस्याएँ हल हो सकती हैं। तप की सामर्थ्य से ही नाना प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ और दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसीलिए ‘तप’ साधन को सबसे अधिक शक्तिशाली माना गया है। तप के बिना आत्मा में अन्य किसी भी साधन से तेज, प्रकाश, बल एवं पराक्रम उत्पन्न नहीं होता।

गायत्री उपासना प्रत्यक्ष तपश्चर्या है। इससे तुरन्त आत्मबल बढ़ता है। गायत्री साधना एक बहुमूल्य दिव्य सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को इकट्ठी करके साधन उसके बदले में साँसारिक सुख एवं आत्मिक आनन्द भली प्रकार प्राप्त कर सकता है।

गायत्री मन्त्र से आत्मिक कायाकल्प हो जाता है। इस महामन्त्र की उपासना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे आत्मिक क्षेत्र में एक नई हलचल एवं रद्दोबदल आरम्भ हो गई है। सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने से दुर्गुण, कुविचार, दुःस्वभाव एवं दुर्भाव घटने आरम्भ हो जाते हैं और प्रेम, नम्रता, पवित्रता, उत्साह, स्फूर्ति, श्रमशीलता, मधुरता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, उदारता प्रेम, सन्तोष शाँति, सेवा भाव, आत्मीयता, आदि सद्गुणों की मात्रा दिन दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है। फलस्वरूप लोग उसके स्वभाव एवं आचरण से सन्तुष्ट होकर बदले में प्रशंसा, कृतज्ञता, श्रद्धा एवं सम्मान के भाव रखते हैं और समय-समय पर उसकी अनेक प्रकार से सहायता करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त सद्गुण स्वयं इतने मधुर होते हैं कि जिस हृदय में इनका निवास होता है वहीं आत्मसन्तोष की परम शान्तिदायक शीतल निर्झरणी सदा बहती रहती है। ऐसे लोग सदा स्वर्गीय सुख का आस्वादन करते हैं। गायत्री साधना से साधक के मनःक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है। विवेक दूरदर्शिता, तत्वज्ञान और ऋतम्भरा बुद्धि की अभिवृद्धि हो जाने के कारण अनेक अज्ञानजन्य दुखों का निवारण हो जाता है। प्रारब्धवश, अनिवार्य कर्म फल के कारण कष्टसाध्य परिस्थितियाँ हर एक के जीवन में आती रहती हैं। हानि शोक, वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण विरोध, आघात आदि की विभिन्न परिस्थितियों से जहाँ साधारण मनोभूमि के लोग, मृत्यु-तुल्य कष्ट पाते हैं वहाँ आत्मबल सम्पन्न गायत्री साधक अपने विवेक, ज्ञान, वैराग्य, साहस, आशा, धैर्य, सन्तोष संयम और ईश्वर विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हँसते हँसते आसानी से काट लेता है। बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी वह अपने आनन्द का मार्ग ढूंढ़ निकालता है और मस्ती, प्रसन्नता एवं निराकुलता का जीवन बिताता है।

प्राचीन काल में ऋषियों ने बड़ी-बड़ी तपस्याएँ और योग साधनाएँ करके अणिमा, महिमा आदि चरम-सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनके शाप और वरदान सफल होते थे। तथा वे कितनी अद्भुत एवं चमत्कारी सामर्थ्यों से भरे पूरे थे, इसका वर्णन इतिहास पुराणों में भरा पड़ा है। वह तपस्याएँ और योग साधनाएँ गायत्री के आधार पर ही होती थीं। गायत्री महा विद्या से ही 84 प्रकार की महान योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।

गायत्री उपासना एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम है, जिसका परिणाम जीवन और शरीर को पुष्ट बलवान एवं सुव्यवस्थित बनाना है। सकाम कामना के लिए की हुई गायत्री साधना से अभीष्ट परिणाम प्राप्त न भी हों तो भी उसका शुभ परिणाम अन्य मार्ग से अवश्य प्राप्त हो जाता है। कोई बड़ी कुश्ती पछाड़ने के लिए कोई व्यक्ति अखाड़े में आया करे तो उसका शरीर दिनोंदिन अवश्य मजबूत होगा। वह मनोवाँछित कुश्ती पछाड़ने में सफल न भी हो तो यह नहीं सोचना चाहिए कि उसका व्यायाम तथा पौष्टिक आहार व्यर्थ चला गया। कुश्ती वह भले ही हार जाय पर निरोगिता, स्फूर्ति, जीवनशक्ति, दीर्घजीवन, कमाने की क्षमता, बलवान सन्तान, शत्रुओं से निबट लेने की सामर्थ्य आदि अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं, जिन्हें पछाड़ने से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इसी प्रकार गायत्री उपासना कभी भी असफल नहीं होती अटल प्रारब्ध का कोई सुनिश्चय न टल सके तो भी अन्य अनेकों रीतियों से उपासना साधक के लिए शुभ परिणामों का आयोजन करती है।

वशिष्ठ, याज्ञवलक्य, अत्रि, विश्वामित्र, पाराशर, भारद्वाज, गौतम, व्यास, शुकदेव, नारद, दधीचि, बाल्मीकि, च्यवन, शंख, लोमश, तैत्तिरेय, जावालि, शृंगी, उद्दालक, वैशम्पायन, दुर्वासा, परशुराम, पुलस्त्य, दत्तात्रेय, अगस्त्य, सनत्कुमार, कण्व, शौनक आदि ऋषियों के जीवन वृत्तान्त जिन्होंने पढ़े हैं वे जानते हैं कि उनकी महानता, शक्तियाँ एवं सिद्धियाँ जिस आधार शिला पर अवस्थित थीं, वह गायत्री ही है।

प्राचीन काल की भाँति अब भी वही मार्ग है। यद्यपि यवन राज्य के पिछले अज्ञानान्धकार युग में अगणित सम्प्रदाय, मत—मतान्तर उपज पड़े और उनने अपनी-अपनी सूझ-बूझ के अनुसार नाना प्रकार के साधना पन्थ बना लिए फिर भी ऐसी साधना जो पूर्ण सिद्धावस्था तक साधक को पहुँचा सके गायत्री के अतिरिक्त और कोई सिद्ध न हो सकी। जिसने भी पूर्णता एवं परम सिद्धावस्था पाई है, उसने गायत्री माता का आश्रय अवश्य लिया है। मध्यकाल में महाभारत से लेकर अब तक के सभी सिद्ध पुरुष प्रायः इसी राजमार्ग से चले हैं। उनका मत प्रन्थ तथा विशेष साधन चाहे पृथक भले ही रहे हैं पर मूल आश्रय को किसी ने भी नहीं छोड़ा है। वर्तमान काल में भी जिसने आत्मिक दृष्टि से कुछ विकास किया है, उन्हें वेदमाता का पय पान करने का सौभाग्य अवश्य मिला है।

गायत्री भगवान का नारी रूप है। भगवान की माता के रूप में उपासना करने से दर्पण के प्रतिबिम्ब एवं कुएं की आवाज की तरह वे भी हमारे लिए उसी प्रकार प्रत्युत्तर देते हैं। संसार में सबसे अधिक स्नेह- मूर्ति माता होती है। भगवान की माता से रूप में उपासना करने से प्रत्युत्तर में उनका अपार वात्सल्य प्राप्त होता है। मातृ पूजा से नारी जाति के प्रति पवित्रता सदाचार एवं आदर के भाव बढ़ते हैं जिनकी मानव जाति को आज अत्यधिक आवश्यकता है।

श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का अंचल पकड़ने का परिणाम सदा कल्याणकारक ही होता है। गायत्री को ‘ब्रह्मास्त्र’ कहा गया है क्योंकि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। इसका प्रयोग कभी भी व्यर्थ नहीं होता।

गायत्री उपासना से मनुष्य की अनेक कठिनाइयाँ हल होती हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं कि जो लोग आरम्भ में दरिद्रता का अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करते थे, अपने मामूली गुजारे की भी व्यवस्था जिनके पास न थी, कर्ज के बोझ से दबे हुए थे, उपासना की और अर्थ संकट को पार करके ऐसी स्थिति पर पहुँच गए कि जिससे अनेकों को ईर्ष्या होती है। कम पढ़े और छोटी नौकरियों पर काम करने वालों को ऊंचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद हैं। जिनकी बुद्धि बड़ी ही भौंड़ी और मन्द थी वे चतुर तीक्ष्ण बुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए हैं। झगड़ालू, चिड़चिड़े, क्रोधी, व्यसनी, बुरी आदतों में फँसे हुए, आलसी एवं मूढ़मति लोगों के स्वभाव में ऐसा परिवर्तन हुआ है कि लोग दाँतों तले उँगली दबाए रह गए।

गायत्री साधना के चमत्कारी लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रकट होते हैं। जिनके दाम्पत्य जीवन बड़े कर्कश थे, पति- पत्नी में कुत्ता बिल्ली का सा बैर रहता था, वहाँ प्रेम की निर्झरणी बहती देखी गई। भाई-भाई जो एक दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे उनमें भरत मिलाप हुआ। जो कुटुम्ब,परिवार क्लेश और कलह की अग्नि में झुलस रहे थे वहाँ शाँति की वर्षा हुई। फौजदारी ,मुकदमेबाजी ,कत्ल,चोरी, डकैती की आशंका से जहाँ हर घड़ी भय रहता था वहाँ निर्भयता का एकछत्र राज हुआ। शत्रुओं के आक्रमण से जो लोग घिरे हुए थे वे इन आपत्तियों से बाल-बाल बच गए।

बीमारी से तो कितने ही साधकों का पिंड छूटा है। कई तो तपेदिक की मृत्यु शैया पर पड़े-पड़े यमराज से लड़े हैं और उनकी डाढ़ों में से वापिस लौटे हैं। भूतोन्माद, दुःस्वप्न, मूर्च्छा, हृदय की निर्बलता गर्भाशय का विषैला होना आदि रोगों से कितनों ने ही मुक्ति पाई है। कोढ़ी शुद्ध हुए हैं, असंयत जीवन क्रम और कुविचारों से उत्पन्न होने वाले स्वप्नदोष, प्रमेह आदि रोगों का मनः शुद्धि के साथ-साथ तुरन्त ही कम होना प्रारम्भ हो जाता है।

चिन्ताओं के दबाव से जो मस्तिष्क फटते रहते थे उन्हें निश्चिन्तता और सन्तोष की साँस लेते हुए देखा गया है। मृत्यु शोक ,सम्पत्ति का नाश, ऋण-ग्रस्तता, बात बिगड़ जाने का भय, कन्या विवाह का खर्च , प्रियजनों का बिछोह, जीविका का आश्रय टूट जाना, अपमान, असाध्य रोग, दरिद्रता, शत्रुओं का प्रकोप ,बुरे भविष्य की आशंका आदि कारणों से जिन्हें हर घड़ी चिन्ता घेरे रहती थी उन्हें माता की कृपा से कोई निश्चिन्तता प्राप्त हुई है या उन्हें आकस्मिक सहायता मिली है या भीतर से प्रेरणा उद्धार का कोई उपाय सूझ पड़ा है या अन्तःकरण में ऐसा विवेक और आत्मबल प्रकट हुआ है जिससे उस अवश्यम्भावी अटल प्रारब्ध को हँसते-हँसते वीरतापूर्वक सहन कर लिया।

पुरुषों की ही भाँति स्त्रियाँ भी प्रसन्नतापूर्वक गायत्री उपासना कर सकती हैं। विधवाएं आत्म-संयम इन्द्रिय निरोध, मनोनिग्रह, एवं सात्विकता की वृद्धि करने में गायत्री की सहायता से सफल होती हैं। वे घर में रहकर इस तपस्या द्वारा आत्मकल्याण, प्रभु प्राप्ति एवं जीवन मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं। कुमारी कन्याओं की गायत्री साधना उनको अच्छे घर वर तथा अनन्त सौभाग्य प्राप्त करने में सहायक होती है। सधवाएं गायत्री साधना द्वारा दाम्पत्य जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों का कुशलक्षेम प्राप्त करती हैं। गर्भवती स्त्रियाँ वेदमाता की उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी, बुद्धिमान, दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती हैं।

सबसे उत्तम यह है कि निष्काम होकर अटूट श्रद्धा और भक्ति भाव से गायत्री की उपासना की जाय, कोई कामनापूर्ति की शर्त न लगाई जाय क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता जितना घट-घट वासिनी सर्वं शक्तिमान माता समझती है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करती है। प्रारब्धवश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती। वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सबसे बड़ा लाभ आत्म कल्याण है। जो यदि संसार के समस्त दुःखों को अपने ऊपर लेने से प्राप्त होता हो, तो भी प्राप्त करने ही योग्य है।

गायत्री जप एक आवश्यक नित्य कर्त्तव्य है। इस धर्म कर्तव्य की उपेक्षा करने वालों को शास्त्रकारों ने ‘शूद्र’ कहा है। मनुष्य का हाड़ माँस का शरीर माता के गर्भ से उत्पन्न होता है किन्तु आध्यात्मिक जीवन गायत्री माता के द्वारा ही मिलता है। यह दूसरा जन्म होने पर ही कोई व्यक्ति द्विज कहलाता है। जहाँ गायत्री की नियमित साधना होती है वहाँ कल्याण की निरन्तर वर्षा होती रहती है।

इस गायत्री महाशक्ति का युग निर्माण के महान कार्य में उपयोग करने के लिए जप उपासना के साथ-साथ उसे यज्ञ शक्ति से भी समन्वित करना है। गायत्री और यज्ञ की सम्मिलित शक्ति से उत्पन्न सूक्ष्म तरंगें संसार के लिए भारी कल्याण कारक अवसर उत्पन्न करती हैं। यज्ञ की शक्ति का कुछ परिचय आगे के लेख में दिया जा रहा है।


यज्ञ का महान् महत्व

यज्ञों की भौतिक और आध्यात्मिक महत्ता असाधारण है। भौतिक या आध्यात्मिक जिस क्षेत्र पर भी दृष्टि डालें उसी में यज्ञ की महत्वपूर्ण उपयोगिता दृष्टिगोचर होती है। वेद में ज्ञान, कर्म, उपासना तीन विषय हैं। कर्म का अभिप्राय-कर्म -काण्ड से है कर्मकाण्ड यज्ञ को कहते हैं। वेदों का है। यों तो सभी वेदमंत्र ऐसे हैं जिनकी शक्ति को प्रस्फुरित करने के लिए उनका उच्चारण करते हुए यज्ञ करने की आवश्यकता होती है।

जिस प्रकार आजकल यन्त्रों (मशीनों) की सहायता से भौतिक जीवन के अनेकों सुख साधन उत्पन्न किये जाते हैं डडडडड डडडडड को सरल करने का विज्ञान विकसित हुआ था। शब्द-विद्या एक बड़ी विद्या है। किस शब्द के बाद क्या शब्द कितने चढ़ाव उतार से बोला जाय तो उससे किस प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं और उनका सूक्ष्म प्रकृति पर तथा मनुष्य की भीतरी चेतना पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसी रहस्य को जानने में ऋषियों ने हजारों वर्षों तक श्रम किया था और शब्द-विद्या के वैज्ञानिक तथ्यों को जानकर मन्त्र शास्त्र की रचना की थी।

वेद मंत्रों में यों शिक्षाएं भी बड़ी महत्वपूर्ण हैं पर उन अक्षरों में शक्ति के स्त्रोत भी दबे पड़े हैं। जिस प्रकार अमुक स्वर-विन्यास के शब्दों की रचना करने से अनेक राग–रागनियां बजती हैं और उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है, उसी प्रकार मन्त्रोच्चारण से भी एक प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं और उनका भारी प्रभाव विश्वव्यापी प्रकृति पर, सूक्ष्म जगत पर, तथा प्राणियों के स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता है।

भारतीय तत्ववेत्ताओं ने कोयला, भाप, तेल, धातु आदि के आधार पर चलने वाले यन्त्रों को बहुत खर्चीला और जोखिम भरा जान लिया था। इसलिए इस ओर ध्यान न देकर शब्द विज्ञान के आधार पर मन्त्र विद्या का आविष्कार किया था और उनकी शक्ति से इस लोक के जड़ चेतन प्राणियों को ही नहीं, लोक लोकान्तरों के जीवों को सुखी बनाने का प्रयत्न किया था। खेद है कि हम पिछले तमसाच्छन्न युग में अपनी इन महत्वपूर्ण विद्याओं को खो बैठे। मन्त्र शास्त्र और यज्ञ विज्ञान को भली प्रकार समझने के लिए आज न तो अनुभवी विद्वान मौजूद हैं और न यवन काल के हम्माम गरम करने से उस विद्या के ग्रन्थ ही बच पाये हैं। फिर भी जो कुछ बचा है और ज्ञात है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यज्ञों की प्रक्रिया में जो थोड़ा-सा समय और पैसा खर्च होता है उनकी अपेक्षा अनेकों गुना लाभ प्राप्त होता है।

मनुष्य शरीर से निरन्तर निकलती रहने वाली गंदगी के कारण जो वायु मण्डल दूषित होता रहता है, उसकी शुद्धि यज्ञ की सुगन्ध से होती है। हम मनुष्य शरीर धारण करके जितना दुर्गन्ध पैदा करते हैं उतनी ही सुगन्ध भी पैदा करें तो सार्वजनिक वायुतत्त्व को दूषित करने के अपराध से छुटकारा प्राप्त करते हैं।

यज्ञ धूम्र आकाश में जाकर बादलों में मिलता है उससे वर्षा का अभाव दूर होता है। साथ ही यज्ञ धूम्र की शक्ति के कारण बादलों में प्राणशक्ति उसी प्रकार भर जाती है जिस प्रकार इन्जेक्शन की पिचकारी से थोड़ी-सी दवा भी शरीर में प्रवेश करा दी जाय तो उसका प्रभाव सारे शरीर पर पड़ता है। यज्ञ कुण्डों को इन्जेक्शन की पिचकारी, मन्त्रों को सुई और आहुतियों को दवा मानकर आकाश में जो इन्जेक्शन लगाया जाता है उसका फल प्राणप्रद वर्षा के रूप में प्रकट होता है। ऐसी वर्षा से अन्न, घास पात, वनस्पतियाँ, जीव जन्तु सभी बलवान परिपुष्ट एवं शक्ति सम्पन्न बनते हैं।

यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्व वायु मण्डल में फैलाये जाते हैं उनसे हवा में घूमते हुए असंख्यों रोग के कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं। डी. डी. टी., फिनायल आदि छिड़कने, बीमारियों से बचाव करने की दवाएं या सुइयाँ लेने से भी कहीं अधिक कारगर उपाय यज्ञ करना है। साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है।

यज्ञ द्वारा पृथक-पृथक रोगों की भी चिकित्सा हो सकती है। यज्ञ तत्व का ठीक प्रकार उपयोग करके अन्य चिकित्सा पद्धतियों के मुकाबले में अधिक मात्रा में और अधिक शीघ्रतापूर्वक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

यज्ञ द्वारा विश्वव्यापी पंच तत्वों की, तन्मात्राओं की, तथा दिव्य शक्तियों की परिपुष्टि होती हैं। इसके क्षीण हो जाने पर दुखदायी असुरता संसार में बढ़ जाती है और मनुष्यों को नाना प्रकार के आस सहने पड़ते हैं। देवताओं का—सूक्ष्म जगत के उपयोगी देवतत्वों का भोजन यज्ञ है। जब उन्हें अपना आहार समुचित मात्रा में मिलता रहता है तो वे परिपुष्ट रहते हैं और असुरता को, दुख दारिद्र को दबाये रहते हैं। इस रहस्यमय तथ्य को गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं श्रीमुख से उद्घाटन किया है।

यज्ञ में जिन मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है उन की शक्ति असंख्यों गुनी अधिक होकर संसार में फैल जाती है, और उस शक्ति का लाभ सारे विश्व को प्राप्त होता है। रेडियो ब्रॉडकास्ट करते समय वक्ता की वाणी को शक्तिशाली विद्युतधारा से शक्तिवान बना देते हैं तो वह आवाज संसार भर में रेडियो यन्त्रों पर सुनी जाने योग्य हो जाती है। मन्त्रोच्चारण के साथ यज्ञाग्नि की शक्ति बिजली की बैटरी, जनरेटर डायनेमो का काम करती है और मन्त्रशक्ति को प्रचण्ड करके सारे आकाश में फैला देती है। गायत्री मंत्र की सद्बुद्धि शक्ति को यज्ञों के द्वारा जब आकाश में फैलाया जाता है तो उसका प्रभाव समस्त प्राणियों पर पड़ता है और वे सद्बुद्धि से, सद्भावना से, सत्प्रवृत्तियों से अनुप्राणित होते हैं।

यज्ञ की ऊष्मा मनुष्य के अन्तःकरण पर देवत्व की छाप डालती है। जहाँ यज्ञ होते हैं वह भूमि एवं प्रदेश सुसंस्कारों की छाप अपने अन्दर धारण कर लेता है और वहाँ जाने वालों पर भी दीर्घ काल तक प्रभाव डालती रहती है। प्राचीन काल में तीर्थ वहीं बने हैं जहाँ बड़े-बड़े यज्ञ हुए थे। जिन घरों में, जिन स्थानों में यज्ञ होते हैं वह भी एक प्रकार का तीर्थ बन जाता है और वहाँ जिनका आगमन रहता है उनकी मनोभूमि उच्च सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनती है। महिलाएं, छोटे बालक एवं गर्भस्थ बालक विशेष रूप से यज्ञ शक्ति से अनुप्राणित होते हैं। उन्हें सुसंस्कारित बनाने के लिए यज्ञीय वातावरण की समीपता बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है।

कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से युक्त व्यक्तियों की भी मनोभूमि में यज्ञ से भारी सुधार होता है। इसलिए यज्ञ को पाप नाशक कहा गया है। यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मनोभूमि का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्वर्गीय आनन्द से भर देता है, इसलिए यज्ञ को स्वर्ग देने वाला कहा गया है।

यज्ञों की शोध की जाय तो प्राचीन काल की भाँति यज्ञ शक्ति से सम्पन्न आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, सम्मोहनास्त्र, आदि अस्त्र शस्त्र, पुष्पक विमान जैसे यंत्र, बन सकते हैं, अनेकों ऋद्धि सिद्धियों को उपलब्ध किया जा सकता है। लोक लोकान्तरों की यात्रा की जा सकती है। प्रखर बुद्धि सुसंतति, निरोगिता एवं सम्पन्नता प्राप्त की जा सकती है। प्राचीन काल की भाँति यज्ञीय लाभ पुनः प्राप्त हों इसकी शोध के लिए यह आवश्यक है कि जनसाधारण का ध्यान इधर आकर्षित हो और साधारण यज्ञ आयोजनों का प्रचार बढ़े।

यज्ञीय धर्म प्रक्रियाओं में भाग लेने से आत्मा पर चढ़े हुए मल विक्षेप शुद्ध होते हैं। फलस्वरूप तेजी से उसमें ईश्वरीय प्रकाश आने लगता है। यज्ञ से आत्मा में ब्राह्मण तत्व, ऋषितत्व की वृद्धि दिन-दिन होती है और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम-लक्ष बहुत सरल हो जाता है। आत्मा और परमात्मा को जोड़ देने का, बाँध देने का कार्य यज्ञाग्नि द्वारा ऐसे ही होता है जैसे लोहे के दो टूटे हुए टुकड़ों को वैल्डिंग की अग्नि जोड़ देती है। ब्राह्मणत्व यज्ञ के द्वारा ही प्राप्त होता है। इसीलिए ब्राह्मण के कर्तव्यों में यज्ञ, विद्या, दान—इन तीन की प्रधानता है।

यज्ञ त्यागमय जीवन के आदर्श का प्रतीक है। इदन्न मम—(यह मेरा नहीं सम्पूर्ण समाज का है) इन भावनाओं के विकास से ही हमारा सनातन आध्यात्मिक समाजवाद जीवित रह सकता है। अपनी प्रिय वस्तुएं घृत, मिष्ठान्न, मेवा औषधियाँ आदि हवन करके उन्हें सारे समाज के लिये बाँट देकर हम उसी प्राचीन आदर्श को मनोभूमि में प्रतिष्ठापित करते हैं। मनुष्य अपनी योग्यता, शक्ति, विद्या, सम्पत्ति, प्रतिष्ठा, प्रभाव पद आदि का उपयोग अपने सुख के लिये कम से कम करके समाज को उसका अधिकाधिक लाभ दे यही आदर्श यज्ञ में सन्निहित है। यज्ञ की प्रतीक पूजा से उन भावनाओं को सारे समाज को हृदयंगम कराया जाता है।

यज्ञ हमारा सर्वोत्तम शिक्षक है जो अपना आदर्श अपनी क्रिया से स्वयं ही प्रकट करता रहता है। (1)अग्नि का स्वभाव है कि सदा उष्णता और प्रकाश धारण किये रहती है। हम भी उत्साह, श्रमशीलता, स्फूर्ति,आशा एवं विवेकशीलता की गर्मी और रोशनी अपने में धारण किये रहें (2) अग्नि में जो वस्तु पड़ती है उसे वह अपने समान बना लेती है, हम भी अपने निकटवर्ती लोगों को अपने समान सद्गुणी बनावें (3) अग्नि की ज्योति सदा ऊपर को ही उठती है, उलटने पर भी मुँह नीचे को नहीं करती, हम भी विषम परिस्थितियाँ आने पर भी अधोगामी न हों वरन् अपने आदर्श ऊँचे ही रखें। (4) अग्नि कोई वस्तु अपने पास नहीं रखती वरन् जो वस्तु मिली उसे सूक्ष्म बनाकर आकाश में फैला देती है, हम भी उपलब्ध वस्तुओं को अपने लिये ही न रखें वरन् उन्हें समाज के हित में वितरण करते रहे हैं (5) अग्नि को ही यह शरीर भेंट किया जाने वाला है, इसलिये चिता का सदा स्मरण रखें, मृत्यु को समाने देखें, और सत्कर्मों में शीघ्रता करने एवं दुष्कर्मों से बचने को तत्पर रहें। इन भावनाओं के प्रतिनिधि रूप में यज्ञाग्नि की पूजा की जाती है।

अपनी थोड़ी सी वस्तु को सूक्ष्म वायु रूप बना कर उन्हें समस्त जड़ चेतन प्राणियों को बिना किसी अपने पराये, मित्र शत्रु का भेद किये साँस द्वारा इस प्रकार गुप्त दान से रूप में खिला देना कि उन्हें पता भी न चले कि किस दानी ने हमें इतना पौष्टिक तत्व खिला दिया—सचमुच एक श्रेष्ठ ब्रह्मभोज का पुण्य प्राप्त करना है। कम खर्च में बहुत अधिक पुण्य प्राप्त करने का यज्ञ एक सर्वोत्तम उपाय है।

यज्ञ सामूहिकता का प्रतीक है। अन्य उपासनाएं या धर्म प्रक्रियाएं ऐसी हैं जो अकेला कर या करा सकता है। पर यज्ञ ऐसा कार्य है जिसमें अधिक जनता के सहयोग की जरूरत है होली आदि बड़े यज्ञ तो सदा सामूहिक ही होते हैं। यज्ञ आयोजनों में सामूहिकता, सहकारिता और एकता की भावनाएं विकसित होती हैं।

आपत्ति काल में, अनिष्ट निवारण में, कुसमय में, रक्षात्मक शाँति शक्ति के रूप में यज्ञों का बड़ा महत्व है। वर्तमान काल में एटम युद्ध जैसी सत्यानाशी आसुरी संहार लीलाओं की सम्भावनायें बढ़ती जा रही हैं। सन् 62 में एक राशि पर 8 ग्रह आने का कुयोग भी अशुभ सूचक है। ऐसे कुसमय आने पर शाँति आयोजनों के रूप में यज्ञानुष्ठान को शास्त्रकारों ने सर्वोत्तम उपाय माना है। अरबों मनुष्यों और असंख्य जीव जन्तुओं की शाँति और सुरक्षा के लिये यज्ञ आयोजनों की शृंखला बढ़ाने की आवश्यकता है।

हिंदू जाति का प्रत्येक शुभ कार्य, प्रत्येक पर्व, त्यौहार संस्कार यज्ञ के साथ सम्पन्न होता है। यज्ञ भारतीय संस्कृति का पिता है। यज्ञ भारत की सर्वमान्य एवं प्राचीनतम वैदिक उपासना है। बीच के अन्धकार युग में अनेक मतमतान्तर उपज पड़े और विघटनात्मक भारी मतभेद खड़े हो जाने से हिन्दू जाति विशृंखलित हो गई। धार्मिक एकता एवं भावनात्मक एकता को लाने के लिये यज्ञ आयोजनों की सर्वमान्य साधना का आश्रय लेना सब प्रकार दूरदर्शितापूर्ण है।

यज्ञ भारतीय जीवन में ओत-प्रोत हो रहा है। हमारा कोई भी शुभ अशुभ धर्म कृत्य यज्ञ के बिना पूरा नहीं माना जाता। जन्म से लेकर अन्त्येष्टि तक 16 संस्कार होते हैं, इनमें अग्निहोत्र आवश्यक है। नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह आदि सभी कृत्यों में हवन अवश्य होता है। आज कल लोग मृत शरीर को योंही चिता में जला देते हैं पर वस्तुतः शास्त्रों में उसका भी पूरा अन्त्येष्टि यज्ञ विधान है। हिन्दू के शरीर को अन्ततः यज्ञ पिता की गोद में ही आश्रय मिलता है। हमारे प्रत्येक कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, पर्व, त्यौहार, उत्सव, उद्यापन में हवन आवश्यक माना जाता है। हिन्दू के नित्य जीवन से अग्नि को भोजन स्त्रियाँ अब भी पहले अग्नि देव को जिमा लेती हैं तब किसी को भोजन परोसती हैं। सत्य नारायण व्रत कथा, रामायण पारायण, गीतापाठ, भागवत सप्ताह, कीर्तन आदि कोई भी शुभ कार्य क्यों न हो, हवन आवश्यक है। हवन यों अन्य मन्त्रों से भी होता है पर सर्वश्रेष्ठ हवन गायत्री मन्त्री का ही है। यही सबके लिये सुगम और सम्भव भी है।

धर्मग्रन्थों में पग-पग पर यज्ञ की महिमा का गान है। उनमें से कुछ उदाहरण नीचे देखिए :—

सुख शान्ति की इच्छा करने वाला कोई व्यक्ति यज्ञ का परित्याग न करे। यज्ञ को छोड़ने वाले के हाथ से सुख शान्ति भी छूट जाती है।

यजुर्वेद

यज्ञ से ही देवताओं ने स्वर्ग का अधिकार प्राप्त किया और असुरों को हराया। यज्ञ से कष्ट भी सुख में बदल जाते हैं। यज्ञ में समस्त भौतिक और आत्मिक लाभ भरे हुये हैं। इसलिये विद्वज्जन यज्ञ को महान् कहते हैं।

महानारायणोपनिषद्

यज्ञों से सन्तुष्ट होकर देवता संसार का कल्याण करते हैं। यज्ञ द्वारा लोक और परलोक सुधरते हैं। यज्ञ के समान कोई दान नहीं, यज्ञ के समान कोई कर्मकाण्ड नहीं, यज्ञ में ही धर्म का समस्त तत्व समाया हुआ है।

ब्रह्मा जी ने मनुष्यों के साथ ही यज्ञ को भी पैदा किया और उनसे कहा कि इस यज्ञ द्वारा ही तुम्हारी उन्नति होगी। यह यज्ञ तुम्हारी इच्छित कामनाओं और आवश्यकताओं को पूर्ण करेगा। तुम लोग यज्ञ द्वारा देवताओं को पुष्ट करो, देवता तुम्हारी उन्नति करेंगे। यज्ञ द्वारा पुष्ट हुए देवता अनायास ही तुम्हारी सुख शान्ति की वस्तुएं प्रदान करेंगे।

—गीता

यज्ञ से अनेक पापों से छुटकारा मिलता है। अन्तः करण पर जमे हुये जन्म जन्मान्तरों के कुसंस्कार नष्ट होते हैं और अग्नि से तपाये हुए सोने की तरह चित्त शुद्ध हो जाता है।

—हरीत

यज्ञ से पुत्रार्थी को पुत्र, धनार्थी को धन, विवाहार्थी को अनुकूल साथी, रोगी को निरोगिता, महत्वाकाँक्षी को ऐश्वर्य एवं निष्काम भाव से यज्ञानुष्ठान करने वाले को सच्चिदानन्द परमात्मा की प्राप्ति होती है।

—मत्स्य पुराण

यज्ञ करने वाले को ग्रह दिशा, धनक्षय, स्वजन विछोह, पाप, रोग बन्धन, ऋण आदि की पीड़ा नहीं सहनी पड़ती। यज्ञ का फल अनन्त है।

—कोटि होम पद्धति

यज्ञ से संतुलित प्राण-पूर्ण वर्षा होती है, यज्ञ से पुञ्टडडडड अन्त, औषधियाँ वनस्पति एवं पेड़ उत्पन्न होते हैं। यज्ञ से शुद्ध हुई वायु द्वारा मनुष्य का शरीर और मन प्रफुल्लित रहता है।—विष्णु पुराण

राजयक्ष्मा जैसे कठिन रोग यज्ञ द्वारा सहज ही अच्छे हो जाते हैं। रोगों से छुटकारा पाने और उत्तम स्वास्थ्य की इच्छा करने वालों को यज्ञ का आश्रय लेना चाहिए।

—चरक संहिता

व्यापक आपत्तियों और कठिनाइयों का समाधान करने के लिये विशालकाय सामूहिक यज्ञ करने चाहिए।

—स्कन्द पुराण

इस प्रकार के असंख्यों शास्त्र वचन, धर्म ग्रन्थों में पन्ने-पन्ने पर अंकित हो रहे हैं। यज्ञ को “श्रेष्ठतम कर्म” इसी से कहा गया है कि थोड़े-से मूल्य की समिधा, सुगन्धित द्रव्य, हविष्यान्न, घी आदि हवन करके उस मूल्य की अपेक्षा करोड़ों गुने मूल्य का लोकहित होता है। वायु शुद्धि से अस्वस्थता के तत्वों का उन्मूलन, प्राण युक्त वर्षा द्वारा परिपुष्ट अन्न वनस्पतियों की उत्पत्ति, धर्म प्रवृत्ति उत्पन्न करने वाला वातावरण निर्माण, देवताओं की प्रसन्नता से श्रेयस्कर सत्परिणामों की प्राप्ति, यज्ञकर्त्ताओं पर प्रवाह से साधकों की मनोभूमियों में कुसंस्कारों के निवारण एवं सुसंस्कारों की स्थापना, अनिष्ट कारक आपत्तियों से सुरक्षा, विश्व में व्याप्त सद्भावना एवं सुख शाँति की स्थापना आदि अनेकों लाभ यज्ञ के हैं। इन कार्यों को देखते हुए गायत्री यज्ञों में जो थोड़ा सा धन और समय खर्च होता है वह नगण्य ही है। किसान जिस प्रकार खेत में एक दाना बोकर सौ दाने उपजाता है, ठीक वैसा ही परिणाम यज्ञ का भी है। यह किसी प्रकार घाटे का सौदा नहीं है।

यों यज्ञों की सदा ही आवश्यकता रहती है पर इन दिनों उनके व्यापक आयोजन अनेक कारणों से अत्यन्त आवश्यक हैं। महायुद्धों में जो गैस बारूद जलती है उनसे वायु अशुद्ध होती है जो मनुष्य मर जाते हैं उनके चीत्कार आकाश में गूँजते रहते हैं तथा अपघात से मरे हुए जीव अशाँत स्थिति में अन्तरिक्ष में घूमते रहते हैं। इन बातों के समाधान के लिए महायुद्धों के बाद बड़े यज्ञों की जरूरत पड़ती है। राम रावण युद्ध के बाद भगवान राम ने बड़े विशाल अश्वमेध यज्ञ किये थे। महाभारत के बाद भी भगवान कृष्ण ने पाँडवों से बड़े-बड़े यज्ञ कराये थे। पिछले दिनों कई बड़े महायुद्ध हो चुके हैं उनमें हत्या तथा विषैली गैसों का प्रयोग और भी अधिक हुआ है। इससे प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ गया है तथा दूषित विचार धाराओं की प्रेरक तरंगें मनुष्यों के मस्तिष्कों पर बुरा प्रभाव डाल रही हैं। चूँकि क्षेत्र और कार्य बड़ा है इसलिए यज्ञों की विशालता भी उसी अनुपात से होनी चाहिये।

वर्तमान विपन्न परिस्थितियों में गायत्री यज्ञों से बढ़कर कोई उपचार नहीं हो सकता। यों वर्षा का अभाव दूर करने के लिये विष्णु यज्ञ, विलासिता का त्याग और भक्ति भावना बढ़ाने के लिये रुद्र यज्ञ, बीमारियों को रोकने के लिये मृत्युँजय यज्ञ और लड़ाई के समय जनता में जोश एवं वीरता भरने के लिये चण्डी यज्ञ कराये जाते हैं, पर जब मनुष्यों को कुमार्गगामिता से बचाकर सन्मार्ग पर लाने का, विश्वव्यापी अशुभ को रोकने का, प्रयोजन हो तो आज की परिस्थितियों में गायत्री यज्ञ से बढ़कर अधिक उपयुक्त अचूक एवं रामबाण और कोई धर्मानुष्ठान हो नहीं सकता।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इस युग का सबसे बड़ा आध्यात्मिक अभियान है। उसका उद्देश्य भी अत्यन्त विशाल है। तदनुसार पूर्णाहुति भी उतनी ही विशाल रखनी पड़ रही है। जितना बड़ा यज्ञ है उसकी शक्ति का प्रादुर्भाव भी उतना ही बड़ा होगा इस यज्ञ में सम्मिलित होने वाले व्यक्ति वह लाभ प्राप्त कर सकेंगे जो साधारणतः वर्षों तक कठिन साधना करने पर भी उपलब्ध करना कठिन है। शारीरिक विकारों से ग्रस्त; मानसिक अपूर्णता एवं उद्वेगों में ग्रसित, सुसंतति के लिए तरसने वाले, चिन्ता और भय से परेशान, आपत्तिग्रस्त व्यक्ति इस अवसर का भरपूर लाभ उठा सकते हैं। अन्तःकरण पर चढ़े हुए कुसंस्कारों को जलाने के लिये यह अवसर सोने को तपा कर शुद्ध करने जैसा ही है। भीतर के तमोगुण को हटा कर दिव्य सतोगुण की स्थापना ऐसे समय में ही हो सकती है। विश्व शाँति एवं देवत्व की अभिवृद्धि के सार्वभौम लाभ तो होंगे ही साथ ही जो लोग इस यज्ञ में शामिल रहेंगे वे व्यक्तिगत लाभ भी आशाजनक मात्रा में प्राप्त कर सकेंगे।


तप साधना द्वारा दिव्य शक्ति का अवतरण

आसुरी प्रवृत्तियों की जब प्रबलता हो जाती है। धर्म का पलड़ा हलका पड़ जाता है तो संसार में कष्ट बहुत बढ़ जाते हैं। मनुष्य ही नहीं अन्य प्राणी भी दुख पाने लगते हैं। उस विपन्न अवस्था को दूर करने के लिए दैवी शक्तियों का जो प्रादुर्भाव होता है उसे अवतार कहते हैं। अवतार के कार्य प्रत्यक्ष दीखते हैं पर इससे पूर्व उस अवतरण के लिए कोई महान धर्मानुष्ठान नियोजित होते हैं और उन आध्यात्मिक उपचारों के फलस्वरूप ही अवतारों का प्रत्यक्ष कार्य दृष्टिगोचर होना संभव हो पाता है।

संसार के पाप-ताप हरने के लिए स्वर्ग लोक से उतर कर गंगा जी पृथ्वी पर आई। शिवजी ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया यह प्रत्यक्ष प्रक्रिया लोक विदित है। पर इस गंगावतरण के पीछे भागीरथ की तपस्या ही प्रधान है। यदि भागीरथ जी तप करने खड़े न होते तो गंगावतरण का होना तथा उसके द्वारा भूतल के समस्त प्राणियों को सुख पहुँचना संभव न हुआ होता।

दुर्गा का अवतार तथा उनके द्वारा असुरों के संहार की कथा पुराणों में विस्तारपूर्वक कही गई है। पर उसका श्रेय देवताओं की थोड़ी-थोड़ी तपस्या का एक स्थान पर एकीकरण ही है। यदि देवताओं ने वह तप और त्याग न किया होता तो दुर्गाजी कहाँ से आती?

भगवान राम के द्वारा असुरों का शमन हुआ यह ठीक है। पर राम जन्म के पीछे स्वयंभू मनु और शतरूपा रानी का तप, दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ ही प्रधान है। सीता जन्म के संबंध में कथा है कि ऋषियों ने अपना थोड़ा-थोड़ा रक्त एक घड़े में जमा करके भूमि में गाढ़ा और वह रक्त ही कालान्तर में परिपक्व होकर सीता के रूप में जनक को हल जोतते समय प्राप्त हुआ। ऋषियों का रक्त ही सीता बनकर असुरों के विध्वंस का हेतु बना।

इन्द्र ने वज्र जैसा अचूक अस्त्र बनाया और उस वज्र से असुरों का संहार आसानी से कर दिया। पर वह वज्र था क्या? तपस्वी दधीचि की हड्डियाँ ही रूपांतर से वज्र बनी थीं। तप का समावेश हुए बिना संसार की कोई भी धातु या वस्तु इतनी शक्तिवान नहीं थी जिससे इन्द्र ‘वज्र’ बना सका होता। विवशता से ही इन्द्र को ऋषि की हड्डियाँ माँगनी पड़ीं।

भगवान कृष्ण को जन्म देने के लिए वासुदेव देवकी ने कितनी कठोर तपस्या की थी। यह पुराणों में विस्तारपूर्वक बताया गया है।

सिद्धि बुद्धि दाता गणेश मनुष्यों में सद्ज्ञान का, शुभ लाभ का वरदान देते हैं, पर वह गणेश हैं क्या? तपस्विनी पार्वती तथा योगेश्वर शंकर जी की तप साधनाओं का एकीकरण पिण्ड ही गणेश हैं।

धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करने वाली अवतारी आत्माएं यों ही अवतरित नहीं होती। उनके पीछे तपस्वियों की तपस्या एवं साधकों की साधनाएं ही छिपी होती हैं। अनेक बार यह कार्य अमैथुनी प्रक्रिया द्वारा पूर्ण होते हैं जैसे सीता जन्म, गंगावतरण इन्द्र वज्र निर्माण, दुर्गा अवतार आदि। कई बार ऐसी आत्माओं को जन्म देने के लिए माता का पिता का तप साधारण मानवी प्रक्रिया द्वारा नर तन में जन्म धारण करता है। भगवान राम और कृष्ण का जन्म उनके माता पिता की तपस्याओं का ही सत्परिणाम है। इस प्रकार के असंख्य उदाहरण इतिहास पुराणों में उपलब्ध हैं कि साधुता के परित्राण और दुष्कृतों के विनाश के लिए जन्म लेने वाले महापुरुषों या महान् आन्दोलनों के पीछे किन्हीं तपस्वी आत्माओं की तप साधना ही काम करती है। भारत को स्वाधीनता दिलाने वाला स्वाधीनता आन्दोलन महात्मा गाँधी की तपस्या का प्रतीक है। विश्व में अहिंसा की महत्ता की ध्वजा फहराने वाला महान आन्दोलन भगवान बुद्ध के तप को मूर्त रूप कहा जा सकता है।

जिन आन्दोलनों के पीछे तप नहीं होता वह कुछ समय के लिए तूफान भले ही मचा लें पर अन्त में वे असफल हो जाते हैं। जिन आत्माओं के पीछे तपस्या नहीं रहती वे कितनी ही चतुर, चालाक, गुणी,धनी क्यों न हों, महापुरुषों की श्रेणी में नहीं गिनी जा सकतीं। वे मनुष्य, जिन्होंने मानव जाति को ऊँचा उठाया है, संसार की अशान्ति को दूर करके शान्ति की स्थापन की है, अपना नाम अमर किया है, युग प्रवाह को मोड़ा है, वे तप शक्ति से सम्पन्न रहे हैं। यों मनुष्य कई दृष्टियों से पशुओं से भी गया बीता है, पर वह अपने आत्मबल के आधार पर महामानव,ऋषि, देवता, अवतार एवं भगवान भी बन सकता है। मानव प्राणी की छिपी हुई महानता को प्रकट करने और उसके द्वारा अलौकिक कार्य करा लेने की क्षमता तप में ही है।

प्राचीन काल में जब सन्तान की उपयोगिता को लोग समझते थे तब पति-पत्नी दोनों ही तपस्या में लगते थे। जिसे अपने घर में महापुरुष का जन्म अभीष्ट है, उसे तप की प्रतिष्ठापना करनी पड़ेगी। तप शक्ति विहीन नर-नारी बच्चे तो पैदा कर सकते हैं पर उनके द्वारा महापुरुषों का जन्म होना संभव नहीं। राष्ट्र की नई पीढ़ी तेजस्वी हो, महापुरुषों का जन्म घर-घर में हो यदि यह आवश्यक हो तो हमें घर-घर में तप साधना के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करनी पड़ेगी। तप शक्ति से परिपूर्ण मनुष्यों की आत्मशक्ति से ही ऐसे महान कार्य सम्पन्न हो सकते हैं जो भारत भूमि में ही नहीं सारे भूमंडल में सुख शान्ति की स्थापना करें।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इस युग की महान तप साधना है। इतना बड़ा साधनात्मक आयोजन इस युग में आज तक नहीं हुआ। जिस साधना में लगभग 125000 नैष्ठिक साधक संकल्पपूर्वक संलग्न हों और प्रतिदिन 24000000 गायत्री जप 2400000 आहुतियों का हवन, सवा लाख पाठ, सवा लाख मंत्र लेखन हो, वह अभूतपूर्व ही है। 2400000 व्यक्तियों तक गायत्री माता का संदेश पहुँचाने का ब्रह्मभोज उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। इस साधना के फलस्वरूप विश्व शान्ति के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण होना निश्चित है।

इतने अधिक तपस्वियों द्वारा सर्वश्रेष्ठ साधना में संलग्न होना एक ऐतिहासिक घटना है। इस सामूहिक तप की शक्ति किरणें आकाश में वह सूक्ष्म तरंगें पैदा करेंगी जिनसे आकर्षित होकर ब्रह्मलोक से दिव्य आत्माएं भूलोक पर आवें और अवतारों की जिम्मेदारी धर्म स्थापना और अधर्म शमन के कार्य को पूरा करें। जब पुष्प खिलते हैं और उनकी सुगंध चारों ओर फैलती है तो मधु मक्खियाँ तथा भौंरे दूर-दूर से खिंच कर चले आते हैं। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान से प्रादुर्भूत तपश्चर्या की दिव्य गंध में अपने मनोवाँछित तत्व देखकर दैवी शक्तियों के अवतरित होने की परिस्थितियाँ बनेंगी। पूर्व काल में भी अवतारों के आह्वान करने के लिये तप आयोजन करने पड़े हैं। किसी समय के मनुष्य इतनी प्रबल आत्म शक्ति से सम्पन्न थे कि उनके व्यक्तिगत प्रयत्न से ही बहुत कुछ कार्य हो जाता था। आज लोगों की आत्मिक दुर्बलता बढ़ गई है तो सामूहिक प्रयत्न काम देंगे। एक पहलवान तीन मन वजन उठा सकता है। पर यदि वहाँ कोई पहलवान न हो तो आठ कमजोर आदमी मिलकर भी उतना वजन उठा सकते हैं। प्राचीन काल में भागीरथ जैसे एक तपस्वी गंगावतरण कर सकते थे। अब वैसे नैष्ठिक नहीं रहे तो सवालक्ष दुर्बल मानस के साधक मिलकर उस समय के एक साधक भागीरथ जैसा पुरुषार्थ तो कर ही सकते हैं। इतने साधकों का सम्मिलित बल उस ही समय के एक तपस्वी जितना तो हो ही सकता है। भारत भूमि पर सद्बुद्धि की ज्ञान गंगा का अवतरण करने के लिए गायत्री-परिवार रूपी भागीरथ बहुत कुछ सफल हो सकता है। हमें आशा करनी चाहिए कि ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की सामूहिक तपस्या के फलस्वरूप इस देश में युगान्तर उपस्थित करने वाली कोई शक्ति उत्पन्न होगी।


महान पूर्णाहुति के महान लाभ

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इस युग का अभूतपूर्व धर्मानुष्ठान है। प्रतिदिन 24 करोड़ जप,24 लाख हवन, 21 लक्ष पाठ,21 लक्ष मंत्र लेखन की सामूहिक तपस्या एवं साधना इतनी बड़ी है, जिसके विस्तार की कल्पना करने से मनुष्य का मन कौतूहल से भर जाता है। लगभग एक लाख व्यक्ति इस साधन में संलग्न हैं। इतने बड़े जन-समूह द्वारा प्रतिदिन कई-कई घंटे साधना करना और 52 उपवास पूर्ण करना साधारण बात नहीं है। यह असाधारण आयोजन किसी व्यक्ति विशेष का कार्य नहीं वरन् उस महाशक्ति का ही क्रीड़ा कौतुक है जो युग निर्माण के लिए आवश्यक साधन तैयार करने में संलग्न है। उसी की प्रेरणा से इतना बड़ा आयोजन संभव हो सका। अन्यथा इस युग में जब कि धर्म और साधना के नाम से लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं, इस मार्ग पर चलने वालों का उपहास करते हैं, स्वेच्छापूर्वक इतनी बड़ी साधना करने के लिए इतना बड़ा जन-समूह कैसे तैयार हो जाता? जब कि दक्षिणा देने पर भी यजमान द्वारा कराये जाने वाले जप अनुष्ठान को लोग पूरा नहीं करते तो फिर इतना बड़ा धर्मानुष्ठान बिना रत्ती भर भी स्वार्थ सिद्ध हुए इतने लोग इतनी बड़ी साधना करने को क्यों तैयार हो जाते ? निस्संदेह यह मनुष्य कृत नहीं, दिव्य शक्ति का प्रेरित संकल्प है जिसे साधारण प्रचार मात्र से प्रभावित होकर धर्मप्रेमी आत्माओं ने श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य किया है।

यह धर्मानुष्ठान जितना महान है उसकी पूर्णाहुति भी उतनी ही महान है। इसकी महानता कई दृष्टि से है-

(1) एक हजार कुण्डों की यज्ञ शालाओं में एक लाख होताओं द्वारा होने वाला यज्ञ का विस्तार इतना बड़ा है, जिसकी तुलना में इस युग में और दूसरा उदाहरण दृष्टिगोचर नहीं होता।

(2) यों छोटे बड़े यज्ञ जहाँ-तहाँ रहते हैं और उनमें अधिक पढ़े या कम पढ़े पंडित लोग दक्षिणा लेकर जप हवन आदि का कार्य कराते हैं। इन पंडितों में से कई शुद्ध मंत्रोच्चारण करने या नियमित कर्मकाण्ड कराने में प्रवीण होते हैं। पर उनकी व्यक्तिगत साधना एवं तपस्या नहीं के बराबर होती है। वे स्वयं प्रतिदिन निजी रूप से कोई कहने लायक तपस्या नहीं करते, उनमें वह तपोबल नहीं होता, जो यज्ञों की सफलता के लिए नितान्त आवश्यक है। मिष्ठान्न खाने की लालसा और अधिक दक्षिणा मिलने की तृष्णा में ही उनका चित्त पड़ा रहता है। ऐसे लोगों द्वारा सम्पन्न हुए धर्मानुष्ठान कभी उचित सत्परिणाम नहीं दे सकते। राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ राज्यान्नभोजी पूर्ण विद्वान वशिष्ठ जी पूरा नहीं करा सकते थे, इसलिए वह यज्ञ परम तपस्वी शृंगी ऋषि द्वारा सम्पन्न कराया गया था।

इस मूल तथ्य का ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति में पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है। इस यज्ञ में आहुतियाँ देने केवल वे ही लोग बैठेंगे जो अपनी साधना और तपस्या की कसौटी पर खरे प्रमाणित हो चुके हैं,सवालक्ष जप की साधना और 52 उपवासों का कठिन व्रत किसी साधक की धर्मनिष्ठा की कड़ी कसौटी है। जो व्यक्ति इतनी गहरी निष्ठा अपनी अन्तरात्मा में धारण किये हुए है उसकी श्रद्धा में सच्चे ब्राह्मणत्व की झाँकी जा सकती है। ऐसे परम निस्वार्थ लोग अत्यन्त विशाल संख्या में जिस पूर्णाहुति में बिना किसी अर्थ लोभ के यज्ञ करेंगे निश्चय ही वह अपने ढंग का अनोखा एवं असाधारण सत्परिणाम उत्पन्न करने वाला महायज्ञ होगा।

(3) अब तक की सार्वजनिक यज्ञों की परम्परा यह रही है कि कोई प्रभावशाली साधु महात्मा इन आयोजनों को करने खड़ा होता है। वह लक्षाधीशों के पास दौड़ा जाता है। दो-चार श्रीमंत लोग आग आ जाते हैं उनके प्रभाव से अन्य श्रीमंत भी बड़ी-बड़ी रकमें देते हैं, कुछ ही सेठ साहूकारों द्वारा भारी धन राशि जमा कर ली जाती है, उससे पंडित लोग बुलाये जाते हैं, उनमें से प्रत्येक को सैंकड़ों, हजारों रुपया दक्षिणा, वस्त्र, पात्र, आभूषण, आदि दिये जाते हैं। आलीशान यज्ञशाला, मण्डप, पंडाल आदि बनाने में, गाजे बाजे में खूब ठाठ-बाठ किया जाता है। सैंकड़ों मन मिठाई, मलाई, खीर पुआ बनते हैं, और लम्बे चौड़े प्रीतिभोज होते हैं। हवन के नाम पर थोड़े से जौ, तिल, चावल जला दिये जाते हैं, सुगंधित रोग नाशक एवं बलवर्धक हवन सामग्री का वहाँ दर्शन भी नहीं होता।

इस प्रचलित परम्परा के प्रतिकूल ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति में किसी भी व्यक्ति से याचना न करने का व्रत लिया हुआ है। गायत्री उपासकों ने अपनी स्वल्प आजीविका में से पेट काटकर जो थोड़ी सी श्रद्धाँजलि निकाली होगी उसी से भारी किफायतशारी से महायज्ञ का काम चलाया जायगा।

(4) महायज्ञ के लिए किसी से कुछ याचना न करने का व्रत इसलिए लिया गया है कि चन्दा माँगने जाने पर लोग संकोच एवं दबाव से कुछ देते हैं। उसमें श्रद्धा का पुट नहीं रहता। यह पूर्णाहुति अत्यधिक पवित्र है, जिसमें अत्यन्त कठोर तपश्चर्या, 52 उपवास और सवाल जप की साधना करने वाले ही यज्ञ कुंडों पर बैठ सकेंगे। ऐसे पवित्र यज्ञ में खर्च होने वाली एक-एक पाई परम पवित्र एवं श्रद्धासिक्त होनी चाहिए। ऐसा ही धन इस कार्य में लगे, इसलिए यह नियम रखा गया है कि किसी से कुछ माँग न जाय। जो व्यक्ति गायत्री की, इस महायज्ञ की महत्ता को भली प्रकार समझते होंगे, वे बिना किसी वाह्य प्रेरणा या दबाव के जो कुछ स्वेच्छापूर्वक देंगे वह निस्संदेह श्रद्धासिक्त ऐसे ही पुनीत धन से संयोजित होने पर इतनी पवित्र पूर्णाहुति सफल हो सकती है। साधकों की श्रद्धा की परीक्षा की कसौटी के रूप में भी यह अयाचना व्रत लिया गया है।

(5) इतने बड़े यज्ञ के लिए किसी धनीमानी, सेठ साहूकार का कुछ भी सहयोग आमन्त्रित न किये जाने का कारण केवल एक ही है कि जहाँ श्रद्धालु गायत्री उपासकों ने कठोर श्रमदान से इतना जप,तप,व्रत उपवास, पाठ, मन्त्र लेखन पूरा कर लिया वे पूर्णाहुति के खर्च को भी अपने कन्धे पर ले सकें और यह महायज्ञ आदि से अन्त तक गायत्री उपासकों का ही यज्ञ रहे। गायत्री-परिवार साधकों तथा उपासकों का संगठन है। ऐसे लोग आमतौर से अपरिग्रही एवं स्वल्प वित्त साधन वाले होते हैं। क्या वे अपने कन्धे पर इतने बड़े आयोजन का भारी बोझ उठा सकते हैं, यह परीक्षा हर उपासक की होनी है। इस दृष्टि से भी यह असाधारण है।

(6) महान यज्ञ की पूर्णाहुति का अधिकाँश कार्य श्रमदान पर निर्भर है। जप,तप की भारी संख्या श्रमदान से-सेवा भाव से पूरी हुई है। 24 लक्ष व्यक्तियों तक गायत्री माता का संदेश पहुँचाने का ब्रह्मभोज भी लोगों ने धर्म फेरी एवं स्वेच्छा श्रद्धा से पूरा किया है। ताजा शुद्ध सुगन्धित हवन सामग्रियों की जड़ी बूटी जंगलों में से गायत्री उपासकों ने ही श्रमदान से इकट्ठी की है। हवन के लिए जंगलों में से लकड़ी काटने का काम भी स्वयं सेवक कर रहे हैं। यज्ञ की अन्यान्य व्यवस्थाओं में भी श्रमदान ही प्रमुख आधार रहेगा।

(7) यज्ञ के दिनों में याज्ञिकों का आहार परम् सात्विक एवं न्यायोपार्जित होना चाहिये। उसे चटोरे मन से, रजोगुणी मिष्ठान पकवान से तथा तमोगुणी मिर्च मसालों से रहित रखा जाना चाहिए। मथुरा के पुरातत्व संग्रहालय में एक शिलालेख सुरक्षित है, जिसमें उल्लेख है कि मथुरा में द्रोवल नाम एक ब्राह्मण ने 40 दिन तक एक विशाल यज्ञ किया जिसमें याज्ञिकों को सत्तू एवं शाक−भाजी मात्र का भोजन कराया गया। यह ऋषि परंपरा है। ऐसे ही भोजन को खाकर यज्ञ करने वालों से तपोबल पैदा होता है। आज तो जिह्वा लोलुप लोग लड्डू कचौड़ी के लिए लालायित रहते हैं पर सच्चे याज्ञिकों को ब्रह्मचर्य की भाँति चटोरे मन पर भी संयम करना पड़ता है। इस महायज्ञ की पूर्णाहुति में सम्मिलित होने वाले लोगों को गत महायज्ञ की भाँति इस बार भी रोटी, दाल, चावल, शाक का प्रबन्ध किया जा रहा है। पर यदि आर्थिक संकोच के कारण यह व्यवस्था भी न बन पड़ी तो याज्ञिकों को सत्तू नमक, उबले चने, खिचड़ी, दलिया आदि से काम चलाना होगा। इस प्रकार का ब्रह्मभोज अमीरों की या चटोरे लोगों की दृष्टि में उपहासास्पद हो सकता है, पर वस्तुतः उसकी सात्विकता एवं पवित्रता इतनी बड़ी होगी जिससे यज्ञ के उद्देश्यों की सफलता में निश्चय ही बड़ी सहायता मिलेगी। “जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन” वाली उक्ति के अनुसार याज्ञिकों को यज्ञ के दिनों में जैसा अन्न खाना चाहिये वैसा ही जुटाने का प्रयत्न किया गया है।

(8) साधारण यज्ञों में जहाँ पंडित, पुरोहित लोग प्रचुर दान दक्षिणा का आर्थिक लाभ और सुस्वाद भोजन के रसास्वादन करने का लोभ पूर्ण होने पर उनकी बहुत प्रशंसा करते हैं और उनमें सम्मिलित होने का अवसर पाने को लालायित रहते हैं और सामान्य जनता यह सोच कर नाराज होती है कि “यज्ञ के नाम पर केवल थोड़े से जौ तिल हवन किये गये शेष धन किन्हीं लोगों की व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति एवं आडम्बरों में खर्च हो गया।” इसके विपरीत इस महायज्ञ की पूर्णाहुति में उलटी बात है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति प्रसन्न है कि इसमें एक-एक पाई का पूर्ण सावधानी, किफायतशारी के साथ विवेक पूर्ण उपयोग किया जा रहा है, असाधारण सादगी बरती जा रही है तथा हवन के साथ-साथ धर्मप्रचार, युग-निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का ठोस कार्य भी किया जा रहा है। दूसरी ओर पंडित, पुरोहित नाराज हैं कि अन्य लोगों के यज्ञों की भाँति उन्हें प्रीतिभोज एवं दक्षिणा लाभ नहीं मिल रहा है। इस नाराजी को वे बेसिर पैर की ओंधी-सीधी निन्दात्मक बातें कह कर प्रकट करते हैं। इस प्रकार अन्य यज्ञों की तुलना में यह निंदा-प्रशंसा की बात भी असाधारण ही है।

(9) प्राचीनकाल में विशाल यज्ञ किसी विशेष उद्देश्य को लेकर होते थे। अश्वमेध यज्ञ सब राजाओं को एक सूत्र में बाँधने के लिये, वाजपेय यज्ञ धर्म संगठनों में एकता लाने के लिए, राजसूय यज्ञ राजनैतिक सुधारों के लिये होते थे। यज्ञों में आमंत्रित भद्रपुरुषों से विचार विनिमय करके कोई ठोस रचनात्मक कार्यक्रम बनाये जाते थे। गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति भी राष्ट्र निर्माण की दिशा में अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्यक्रम को साथ में लेकर की जा रही है। धर्म प्रेमी लोगों का संगठन, उनकी सम्मिलित शक्ति का देवत्व की रक्षा एवं असुरता के विनाश में विनियोग, चरित्र निर्माण, साँस्कृतिक पुनरुत्थान, बौद्धिक एवं सामाजिक क्राँति आदि युग की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को हल करना इस यज्ञ के प्रमुख उद्देश्यों में से हैं। महायज्ञ के साथ-साथ युग निर्माण के उपयुक्त रचनात्मक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की योजना को भी अग्रसर किया जायगा।

(10) महायज्ञ में आने वाले धर्मप्रेमी अपने व्यक्तिगत जीवन को देवत्व की-सुख शाँति की दिशा में अग्रसर करने के लिये आशाजनक प्रकाश प्राप्त करेंगे। जो कार्य बहुत दिनों की एकाकी साधना से भी सम्पन्न नहीं हो पाता वह इस एक बारगी प्रचण्ड योगाग्नि की समीपता से कुछ ही दिनों में प्राप्त होना सम्भव होगा।

(11) गायत्री महायज्ञ संसार में सद्बुद्धि, सद्भावना, सत् प्रकृति बढ़ाने के लिये है। गायत्री सद्बुद्धि की देवी होने के कारण सतोगुण की देवत्व की अभिवृद्धि करती है। इसी तत्व की कमी हो जाने से आज संसार में सर्वत्र अशान्ति और क्लेश की अभिवृद्धि हुई है। यदि लोगों के अन्तःकरण सद्बुद्धि से भर जाएं तो कहीं किसी बात का अभाव एवं कष्ट न रहे। मनुष्य एक दूसरे को सताने की जगह सेवा और सहयोग का मार्ग ग्रहण करें तो यही भूलोक स्वर्ग बन सकता है। इस सम्भावना का मूर्त रूप देखने के लिये साँसारिक प्रयत्न भी आवश्यक हैं, पर इसके लिए आध्यात्मिक उपचारों की भी अतीव आवश्यकता है। गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति इस प्रकार के उपचारों में सर्वोत्तम आयोजन है। विश्व शान्ति का यह श्रेष्ठ कार्यक्रम एक अत्यन्त ही उच्चकोटि का परमार्थ है। इस परमार्थ में भाग लेने वाले उतना बड़ा पुण्य फल प्राप्त करेंगे, जितना अन्य साधारण धर्मोपचार से किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है।

(12) यों समस्त संसार का ही इस महायज्ञ से लाभ है। पर इस धर्मानुष्ठान में संलग्न धर्म प्रेमियों को सद्बुद्धि का, पुण्य फल का लाभ असाधारण रूप से मिलेगा। अग्नि की भट्टी के समीप जो बैठता है उसे गर्मी का लाभ औरों से अधिक मिलता है। इस बनाने वालों को साधारण सुगन्ध के खरीदारों की अपेक्षा कहीं अधिक सुगन्ध लाभ होता है। महायज्ञ की महान् प्रक्रियाएं लाखों धर्म प्रेमियों को उठाकर उनके भौतिक जीवन में अनेक प्रकार की सुख संपदाओं की गुत्थियाँ सुलझाने के अवसर उत्पन्न करती है और आत्मोन्नति के, आध्यात्मिक जीवन को सुविकसित करने के मार्ग खोलती है। इस प्रकार यह पूर्णाहुति असंख्यों लोगों के लिये सुख सौभाग्य के शुभावसर प्रदान करने वाली, असाधारण प्रक्रिया सिद्ध होती है।

(13)गायत्री उपासना के प्रभाव से सुसन्तति निर्माण का महत्वपूर्ण लाभ होता है। प्राचीन काल में अवतारी महापुरुषों के जन्म दाताओं को कठोर तप करने पड़े हैं। भगवान कृष्ण को जन्म देने वाले देवकी वासुदेव ने, भगवान राम को जन्म देने वाले कौशल्या दशरथ ने पूर्व जन्मों में इसी प्रकार के तप किये थे। पाँच पाँडव और छठे कर्ण जैसे असाधारण महापुरुषों को जन्म देने का श्रेय कुन्ती के तप को ही है। हनुमान जी को जन्म देने वाली अंजनी की तपस्या प्रसिद्ध है। इस युग की यह सामूहिक तपस्या भी उस प्रकार के सत्परिणाम उत्पन्न करेगी। इस साधना में संलग्न नर नारी ऐसे महापुरुषों को जन्म देंगे जो युगान्तर उत्पन्न करने वाले अवतारों की भूमिका पूरी कर सकें। शिव पार्वती के तप से उत्पन्न गणेश जी असुरों का विनाश कर सके, इस युग की असुरता को मिटाने के लिए जिन उच्चकोटि की आत्माओं की आवश्यकता है वे इस महान साधना में संलग्न नर नारियों के शरीरों के माध्यम से जन्म लेने के लिये प्रसन्नतापूर्वक तत्पर होंगी। उत्तम बाग लगाने के लिये बढ़िया खेत और बढ़िया माली तैयार करने की आवश्यकता इस महायज्ञ द्वारा पूरी की जा रही है।

(14) लुप्त प्रायः गायत्री उपासना और भूली हुई यज्ञ प्रक्रिया के महान लाभों से प्रत्येक भारतीय को परिचित करा देना और इन मानव जीवन की अत्यंत उपयोगी आवश्यकताओं को घर-घर में प्रचलित करके इस भारतभूमि को पुनः ऋषि भूमि बना देने का स्वप्न साकार करना भी इस पूर्णाहुति का उद्देश्य है।


विश्व संकट का समाधान

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार आगे भी पाँच वर्ष घोर अनिष्ट के दिखाई पड़ रहे हैं। यह भयंकरता कितनी होगी, माप यह है कि मनुष्य जाति के सामूहिक दुष्कर्म जितने अधिक होंगे उतना ही आज संसार को सहना पड़ेगा। यह वर्ष तो उन अशुभ कर्मों के फूट पड़ने का अनुकूल अवसर मात्र है।

सूक्ष्म दृष्टि से, आध्यात्मिक दिव्य दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि आसुरी विचारों एवं कर्मों ने आकाश को बुरी तरह तमसाच्छन्न कर रखा है, इन काली घटाओं को जब भी बरसने का अवसर मिलेगा गजब ही ढा देने की परिस्थिति पैदा कर देंगी। दूरदर्शी तत्ववेत्ता लोग अदृश्य के इन्हीं शुभ-अशुभ जमघटों को देखकर भले-बुरे भविष्य की भविष्यवाणियाँ किया करते हैं। ग्रह दशा को उस भविष्य दर्शन के जानने में एक सहायक दूरबीन माना जा सकता है। उनकी स्थिति का गणित करके वही काम निकाला जाता है जैसा बड़ी दूरबीन लगाकर क्षितिज पर बहुत दूर उड़ती हुई किसी चीज को देखा जा सकता है।

इसमें सन्देह नहीं कि मानव जाति के सामूहिक दुष्कर्म जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उसी तेजी से बढ़ते रहे, उनकी रोक थाम न हुई, तो विश्व संहार की वैसी ही दुर्घटना अगले वर्षों में हो सकती है, जैसी नीचे ही गई है।

बैंगलोर की ज्योतिष सम्बन्धी पत्रिका ‘एसट्रोलाजिकल मैगज़ीन’ के सम्पादन श्री बी. बी. रमन ने लिखा कि सन् 1957 और 58 में काल सर्प योग पड़ रहा है। यह योग अपूर्ण है इस कारण युद्ध की तनातनी पैदा होकर थोड़ी ही हानि होगी। सन् 1959 के अगस्त के अन्त में शनि, मंगल,राहु एक केन्द्र में आ जायेंगे। इससे युद्ध का वातावरण बढ़ेगा और राष्ट्र संघ आवश्यकता के वशीभूत होकर नैतिकता को त्याग देगा। राष्ट्रों के बीच झगड़ों और फूट में वृद्धि होगी और परिस्थिति संकटजनक हो जायगी। पर असली संकट सन् 1962 में ही आने वाला है।

सन् 1962 में 5 फरवरी को केवल सूर्य ग्रहण ही नहीं पड़ेगा वरन् आठ ग्रह एक साथ इकट्ठे हो जायेंगे। यह योग वास्तव में बड़ा शक्तिशाली है और भयंकर फल उत्पन्न करने लायक है। ऐसा जान पड़ता है कि इस अवसर पर रूस और अमरीका दोनों केवल धमकी और शक्ति प्रदर्शन ही से संतुष्ट न रहकर विश्वव्यापी संग्राम के लिये तैयार होकर मैदान में उतरेंगे। पर ग्रहों के प्रभाव से बड़ी शीघ्रता से प्रहार होगा, बड़ी शीघ्रता से नाश होगा और युद्ध का अन्त भी शीघ्र ही आयेगा। निश्चय ही संसार को एक महान संकट का सामना करना पड़ेगा और राज्यों के संचालक मंगल के प्रभाव को रोकने में असमर्थ होंगे।

पं. हरदेव शर्मा त्रिवेदी ने सन् 1957 के अन्त में और जनवरी फरवरी 1958 में युद्ध की परिस्थिति पैदा होने की लिखी है जो शाँतिप्रिय राजनीतिज्ञों के प्रयत्न से संभल जायगी ऐसी आशा है। पर 1962 के योग के लिये आपका भी यही मत है कि उस समय विनाशकारी घटनाएँ होना लगभग निश्चय सा ही है।

ज्योतिषाचार्य पं. कृष्णामुरारी मिश्र ने सामयिक पत्रों में प्रकाशित कराया है कि सन् 1962 की 16 फरवरी तक का काल मानव जाति के लिये अत्यन्त भयंकर होगा जब युद्ध, दैवी आपत्तियाँ तथा अन्य घटनाओं के फलस्वरूप संसार की जनसंख्या का एक चौथाई भाग नष्ट हो जायगा। उस समय सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और केतु एक ही राशि अर्थात् मकर राशि में निवास करेंगे। केवल राहु अत्यन्त्र होगा किन्तु मकर राशि पर उसकी भी पूर्ण दृष्टि होने से मकर में नवों ग्रहों का वास समझना चाहिये महाभारत के समय केवल सात ग्रह एक राशि पर आये थे। इस बार का योग उससे भी अधिक प्रकोप भारत के पूर्वी तथा पश्चिमोत्तर प्रदेशों,पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मलाया, थाईलैण्ड, चीन का उत्तरी भाग, रूस का पश्चिम भाग, ग्रीस, हंगरी, नार्वे, डेनमार्क, ब्रिटेन, आयरलैण्ड, हालैण्ड, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका), ब्राजील और सीरिया पर होगा।

ईसाइयों की ‘बाइबिल’ में भी बहुत सी भविष्यवाणियाँ दी गई हैं और उसमें से अभी तक बहुत सी सत्य सिद्ध हो चुकी हैं। उन्हीं भविष्यवाणियों में एक भविष्यवाणी यह भी है कि सन् 1966 के लगभग में संसार के राष्ट्रों में कलह, फूट और स्वार्थ साधन का भाव बहुत अधिक बढ़ जायगा और उसके फल से युद्ध का वातावरण बड़े भीषण रूप में प्रकट होगा। उसी समय लोग, अकाल, भूकम्प आदि दैवी कोपों से भी मनुष्यों का संहार होगा। अन्त में थोड़े से पुण्यात्मा और परोपकारी व्यक्ति ही बच सकेंगे। बाइबिल में ये सब बातें रूपक और अलंकार युक्त भाषा में लिखी गई हैं।

इसी तरह मुसलमानों की कुरान तथा अन्य धर्म ग्रन्थों में भी इस युग परिवर्तन की बात पाई जाती है। उसके अनुसार इस्लाम की चौदहवीं सदी में कयामत (प्रलय) हो जायगी। मुसलमानों में आमतौर पर विश्वास किया जाता है कि चौदहवीं सदी के अन्तिम भाग में दुनिया में बड़ी-बड़ी भयंकर घटनायें होंगी बहुत सी नाशकारी लड़ाइयाँ होंगी, मुसलमानी धर्म का अन्त हो जायगा और अन्त में एक नया पैगम्बर (अथवा अवतार) पैदा होकर नया धर्म चलायेगा। चार-पाँच सौ वर्ष पहले फ्राँस में ‘नोस्टरडम’ नाम का विद्वान भविष्यवाणियों के सम्बन्ध में एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया है। उसकी अनेक बातें अभी तक पूरी हो चुकी हैं। उसमें लिखा है कि “तीसरा महायुद्ध वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं में से फट पड़ेगा। यह युद्ध मुख्य रूप से ‘गरुड़’ और ‘रीछ’ के मध्य होगा। इस युद्ध में कोई जीत नहीं सकेगा, वरन् दोनों एक दूसरे की शक्ति का नाश कर देंगे। इस युद्ध के बाद दोनों में से एक को भी महान शक्ति यों नहीं गिना जायगा।” (अमरीका का राष्ट्रीय चिन्ह ‘ईगल’ (गरुड़) है और रूस को ‘रशियन वियर’ (रूसी भालू) कहा जाता है।

जर्मनी के एक ज्योतिष-विज्ञान ज्ञाता प्रो. ट्रोइन्सकी ने कहा है कि “ राजनैतिक संघर्ष सन् 1955 से अधिक उग्र होते जायेंगे सन् 1958-59 की साल में संघर्ष भयंकर रूप धारण करते रहेंगे। सन् 1961 से 1963 तक के वर्षों में इससे भी भीषण अवस्था विभिन्न देशों के बीच उत्पन्न हो जायेगी जो सन् 1965 तक जारी रहेगी। इसी वर्ष इन समस्त घटनाओं का कोई निश्चित परिणाम दिखाई देगा।

उपरोक्त भविष्यवाणियाँ तथा संसार की वर्तमान राजनीतिक एवं जन प्रवृत्तियाँ बतलाती हैं कि मानव जाति को निकट भविष्य में भयंकर आपत्तियों का सामना करना पड़ेगा। महायुद्ध,महामारी, दुर्भिक्ष, दुष्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि, अस्थिरता, अव्यवस्था, अराजकता जैसी अनेक विपत्तियाँ संसार के सामने के अनेक रूपों में उपस्थित होंगी, जिसके फलस्वरूप अपार धन जन की हानि होने की सम्भावना है। संसार के एक तिहाई मनुष्य इन विपत्तियों की चक्की में पिस जावें तो कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।

वास्तविक संध्या काल वह होता है जिस समय सूर्य बिलकुल उदय या अस्त हो। यह समय प्रायः 5-5 मिनट का प्रातः संध्या होता है। वास्तविक संध्या काल 5-5 मिनट होने पर भी व्यवहारिक संध्या एक-एक घण्टे की मानी जाती है। चन्द्र, सूर्य ग्रहण के वास्तविक काल से बहुत पहले और बहुत पीछे तक सूतक काल रहता है। उसी प्रकार सन् 62 में जिस महा भयंकर कुयोग की सूचना ज्योतिषियों ने दी है, और जिसके कारण संसार में प्रलयकाल का दृश्य दिखलाई पड़ने की आशंका उत्पन्न हो गई है उसका वास्तविक समय यों 16 जनवरी से 12 फरवरी तक 26 दिन का है, पर इसका पूर्व एवं पर काल 5-5 वर्ष आरम्भ तथा अन्त में रहेगा। सन् 57 से वह अशुभ कुचक्र आरम्भ होता है और उसकी समाप्ति सन् 67 तक चलेगी। इस प्रकार से 10 वर्ष का मानना चाहिये।

समय की इस कठिनाई को पाठक स्वतः अनुभव कर रहे होंगे। इस वर्ष भी संसार कम विपत्तियों में से नहीं गुजर रहा है।

अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने नये प्रकार के शिकंजे और दाव-पेंच तैयार करके पहले से भी भयंकर रूप में प्रकट हो रही हैं। युद्ध की चिनगारियाँ एशिया, योरोप, अफ्रीका के विशाल भूखंडों में अनेकों स्थानों पर सुलग रही हैं, थोड़ा-सा भी अवसर पाने पर वे दावानल का रूप धारण कर सकती हैं। अणुबम, उद्जन बम आदि सर्वसंहारी अस्त्र मानव सभ्यता को मटियामेट कर देने और धरती को प्राणी विहीन बना देने के लिए चुनौती के रूप में खड़े हुए हैं। इन अस्त्रों के परीक्षण मात्र से विश्व का वातावरण भयंकर रूप से विषाक्त होता चला जा रहा है और उसके कारण जगह-जगह इन्फ्लुएंजा आदि बीमारियाँ फैल रही हैं और सर्दी, गर्मी, वर्षा के मौसमों का सन्तुलन बिगड़ रहा है उनके मनः संस्थान क्रोध, द्वेष, अवज्ञा और उच्छृंखलता से भरे हुए आ रहे हैं। यह दुर्भाग्य आगे और भी बुरे रूप में उपस्थित होगा जबकि बालक विकलाँग, अन्धे, गूँगे, बहरे, अपाहिज और पागल जैसी स्थिति में पैदा होकर धरती पर भू-भार की तरह जीवन व्यतीत करेंगे और कैंसर, राजयक्ष्मा, अस्थि शोथ आदि भयंकर रोगों की यातनाओं से तड़प—तड़प कर प्राण देंगे। अणुबमों के परीक्षण से उत्पन्न हुई आकाश-व्यापी रेडियो सक्रियता से इस प्रकार के अनेक उपद्रव खड़े हो रहे हैं और आगे होंगे।

संसार को जला डालने वाली भयंकर दावानल के शोले जो उठ रहे हैं और विकराल सर्वनाश का जो दृश्य उपस्थित करने वाले हैं उन्हें शान्त करने के लिए एक प्रचण्ड वरुणास्त्र की आवश्यकता है। दुनिया हाइड्रोजन बम बनाने में लगी हुई है। पर उससे उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों को शमन करने की शक्ति किसी में नहीं है। यह कार्य इस ऋषियों की भूमि भारतवर्ष में ही हो सकता है। यहाँ से संसार को शाँति प्रदान करने वाली अमृत निर्झरिणी सदा से ही बहाई जाती है। इस समय जिस वरुणास्त्र की इन सम्भावित आपत्तियों को टालने की, इनका प्रतिरोध करने की, इनमें समस्त मानव जाति को बचाने की क्षमता किसी में है तो वह इस ऋषि भूमि भारतवर्ष में ही है। अन्य देश आग्नेयास्त्र बना रहे हैं। वरुणास्त्र, इन अग्नियों को शान्त करने वाला, शान्ति वर्षा के अस्त्र, जिससे करोड़ों प्राणियों के धन-जन की रक्षा हो सके, केवल भारत ही बना सकता है और बना रहा है।

गायत्री तपोभूमि द्वारा आयोजित ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान वस्तुतः एक आध्यात्मिक वरुणास्त्र है। एक-एक हाइड्रोजन बम बनाने में लाखों-करोड़ों रुपये की लागत आती है और भारी श्रम एवं साधन सामग्री जुटानी पड़ती है। इस वरुणास्त्र के बनाने में धन की मशीनों की, वस्तुओं की तो आवश्यकता नहीं है, पर श्रम अवश्य चाहिये और वह श्रम भी अश्रद्धालु लोगों का नहीं, उनका जिनका हृदय धर्म-भावनाओं से परिपूर्ण हो। रावण को मारने के लिए त्रेता में एक घड़े की आकृति का महा-बम बना था, उसमें ऋषियों ने अपने रक्त-बिन्दु भरे थे, उसे खेत में गाढ़ा गया था और उससे सीता-शक्ति का प्रादुर्भाव होकर दशों दिशाओं में विजय दुन्दुभी बजाने वाली असुरता का विनाश हुआ था। त्रेता में जिस प्रकार अपना रक्त-बिन्दु देकर शाँति बम बना रहे थे उसी प्रकार का प्रयत्न गायत्री तपोभूमि द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान, वरुणास्त्र बनाने का किया जा रहा है। यदि यह बन गया तो दैवी प्रकोप की सर्व संहारकारी असुरता की विभीषिका जो किलकारियाँ भर रही हैं वह शान्त हो सकती हैं, समाप्त हो सकती हैं।


आप भी इस ज्ञान यज्ञ में सम्मिलित हो जाइए।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की अग्नि जलाकर गायत्री-परिवार रूपी दूध को गरम किया जा रहा है। महायज्ञ में सम्मिलित होने वाले व्रतधारी याज्ञिकों को धर्म-प्रचारक, उपाध्याय, बनने की चुनौती देकर यह प्रयत्न किया गया है कि जिनकी अन्तरात्मा में धर्म सेवा, परमार्थ एवं श्रद्धा के बीजाँकुर मौजूद हैं वे केवल अपनी निजी पूजा तक ही सीमित न रहें वरन् धर्म प्रचार के लिए कुछ सक्रिय कार्य भी करने आरम्भ करें। इस चुनौती के कारण कुछ अकर्मण्य लोग तो बगलें झाँक रहे हैं, पर जिनकी अन्तरात्मा में निष्ठा का अंश मौजूद है वे इस दिशा में कुछ मजबूत कदम उठाने की तैयारी कर रहे हैं।

दूध में जो महत्वपूर्ण तत्व घी होता है वह गर्मी पाने पर मलाई के रूप में ऊपर तैर आता है। उसे हर कोई प्रत्यक्ष देख सकता है, उसका स्वाद ले सकता है। पर दूध में जो क्षार और खनिज भाग होता है वह अपने भारीपन के कारण दूध उबालते समय नीचे जाने लगता है, कढ़ाई के पेंदे में बैठ जाता है और काली कलूटी सूरत में जल भुन कर इस योग्य बन जाता है कि उसे पेंदे में से खुरच कर बाहर फेंक दिया जाय। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की अग्नि में जिन व्रतधारी याज्ञिकों की अन्तरात्मा में धर्म निष्ठा है वह मलाई की तरह ऊपर तैरती आ रही है। सत्य का, धर्म का, ज्ञान का, विवेक का, कर्त्तव्य का, मानवता का संदेश घर-घर तक पहुँचाने के लिए कुछ समय और शक्ति लगाने का आह्वान किया गया है तो इस ईश्वरीय वाणी को, युग पुकार को उन्होंने सहर्ष स्वीकार और शिरोधार्य किया है। यही गायत्री-परिवार की मलाई है। समुद्र मंथन में से 14 रत्न निकले थे। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का अग्नि मंथन सहस्रों धर्म प्रचारकों के, उपाध्यायों के अमूल्य नर रत्न निकाल कर संसार के सामने प्रस्तुत करे तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।

दूसरी ओर इस अग्नि मंथन से वे लोग पेंदे में बैठते जाते हैं, झुलसते और काले कलूटे पड़ते जाते हैं जो केवल इस उद्देश्य से गायत्री उपासना की ओर बढ़े थे कि दस-पाँच मिनट औंधा-सीधा जप महीना पन्द्रह दिन करके सारी ऋद्धि-सिद्धियों के सम्पत्ति समृद्धियों के स्वामी बन जायेंगे और अपना मतलब पूरा होते ही उपासना को धता बता देंगे।

इस प्रकार की मनोवृत्ति के लोगों को आत्म कल्याण की कोई चिन्ता नहीं होती, विश्वहित, लोक सेवा, परमार्थ, त्याग, तप आदि का भी कोई महत्व उनकी दृष्टि में नहीं होता, ऐसे लोग आड़े वक्त में काम नहीं आते, परीक्षा के अवसर पर वे तो पूँछ दबाकर भागते ही दीखते हैं। आग पर तपाये जाने पर जैसे नकली सोना काला पड़ जाता है उसी प्रकार ऐसे लोगों की भी छंटनी हो जाती है। इस महायज्ञ के आयोजन से तेजस्वी आत्माओं के सुसंस्कार निखर कर जगमगाने लग रहे हैं वहाँ स्वार्थ साधकों की छंटनी भी हो रही है। दूध पकाया जा रहा है। मलाई को ऊपर तैरते और खराबी को पेंदे में बैठते हर कोई देख सकता है।

पिछले दो लेखों में यह बताया गया है कि इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता ‘धर्म प्रचार’ है। यही सबसे बड़ा पुण्य और परमार्थ है। इसके लिए थोड़ा समय और शक्ति हर धर्म प्रेमी को देना आवश्यक है। ब्रह्मभोज का उद्देश्य ज्ञान प्रसार है, तीर्थ यात्रा का, धर्म फेरी का उद्देश्य ज्ञान प्रसार है। आज रूढ़ि पुज रही है और उद्देश्य को दुत्कार दिया गया है। अब आवश्यकता ऐसे लोगों की है जो रूढ़ि के कूड़े कचरे में से उद्देश्यों के रत्न ढूँढ़ निकालें और उन्हें समुचित सम्मान एवं महत्व प्रदान करे। ज्ञानप्रसार धर्मप्रचार वही रत्न है जिसकी महत्ता अब प्रत्येक धर्म प्रेमी को स्वीकार करना चाहिए और उसके लिए कुछ त्याग करने को तत्पर होना चाहिए।

युग निर्माण की, साँस्कृतिक पुनरुत्थान की महान् प्रक्रिया का प्रमुख आधार यही है कि लोगों के विचार बदल जायं। इस परिवर्तन के बिना मनुष्य के मन में घुसी हुई उन अनेकों दुष्प्रवृत्तियों का शमन न हो सकेगा जो संसार में फैली हुई अनेकों पापों क्लेशों, रोगों, दुखों एवं उलझनों की जननी है। बाह्य उपचारों से, मरहम लगाने से रक्त विकार के यह फोड़े दूर न होंगे इसके लिए तो अन्तः उपचार की, रक्त शोधक दवा पीने की जरूरत पड़ेगी। यह प्रक्रिया विचार परिवर्तन से, भाव परिवर्तन से, हृदय परिवर्तन से ही संभव है। धर्म प्रचार का उद्देश्य इसी परिवर्तन की प्रक्रिया को पूर्ण करना है।

महायज्ञ के याज्ञिकों को धर्मप्रचारक उपाध्याय बनने की प्रेरणा दी है और आशा की है कि महायज्ञ के पूर्ण होने तक इस प्रक्रिया का अभ्यास करें और पीछे इसे अपने जीवन की एक साधना, कार्य पद्धति, तपस्या ही बना लें। महायज्ञ के दिनों में यह कार्य सौंपा गया है कि पूर्णाहुति की सूचना देने के लिए कम से कम 240 व्यक्तियों के पास जाया जाय। उन्हें एक-एक परिपत्र पुस्तिका दें और गायत्री तथा यज्ञ की महत्ता बताते हुए महायज्ञ में भाग लेने के लिए जनता को आमंत्रण देने के लिए धर्मफेरी लगावें, लोगों के घरों पर जावें। यह कार्य हर किसी के लिए सुगम है। इससे धर्म प्रचार का अभ्यास बढ़ेगा। दूसरों के पास जाने में लोग अपनी हेठी, बेइज्जती तौहीन समझते हैं यह मिथ्याभिमान समाप्त होना चाहिए। धर्म कार्य में बाधक अहंकार सचमुच ही एक भारी त्रुटि है, इससे जितनी जल्दी छुटकारा पाया जा सके उतना ही उत्तम है। महायज्ञ के याज्ञिकों को सौंपा हुआ धर्मफेरी का कर्त्तव्य इस कमजोरी को छुटाने में बहुत सहायक होगा।

दूसरा कर्त्तव्य जो उपाध्यायों के लिए रखा गया है वह यह है कि अपने पास कुछ विचार पूर्ण साहित्य रखें और उसे लोगों को पढ़वाने के लिए वैसा ही प्रयत्न करें जैसे बीड़ी बेचने वाले अपने माल को लोक प्रिय बनाने के लिए भरपूर प्रयत्न एवं प्रचार करते हैं। यों सैंकड़ों तरह की धार्मिक पुस्तकें बाजार में मौजूद हैं, उनमें धर्म के नाम पर परस्पर विरोधी, विभिन्न दिशाओं में ले जाने वाली भ्राँतियाँ उत्पन्न करने वाली विचार धाराएं भी भरी रहती हैं। धर्म प्रचार से पूर्व हमें सौ बार कसौटी पर कस कर देखना होगा कि यह विचारधारा युग के अनुरूप तथा मानव समाज को स्वस्थ दिशा में विकास देने में सहायक भी है या नहीं। यदि कोई पुस्तक इस कसौटी पर खरी न उतरे तो वह चाहे किसी त्यागी तपस्वी ही ही लिखी क्यों न हो, युग निर्माण में सहायक न हो सकेगी। गौतम बुद्ध के त्याग का हर हिन्दू इतना भारी आदर करता है कि उन्हें अवतारी भगवान तक मानता है, पर उनके शून्यवादी, अनीश्वरवादी विचारों को कोई हिन्दू कदापि स्वीकार नहीं कर सकता।

गायत्री तपोभूमि द्वारा जनता को स्वस्थ विचार-धारा देने के लिए छोटी-2 किन्तु बड़ी सुन्दर और सस्ती पुस्तकों का जो प्रकाशन आरम्भ किया है, उसमें आर्थिक लाभ ही सर्वथा उपेक्षा करके मूल्य लागत मात्र रखा गया है। अभी हाल में 52 पुस्तकें छापी गई है। इनमें से 26 गायत्री और यज्ञ की महत्ता, वैज्ञानिकता, उपयोगिता एवं साधना बताने वाली हैं तथा शेष 26 में गायत्री के 24 अक्षरों एवं व्याहृतियों का एक-एक करके उद्देश्य एवं संदेश बताया गया है। यह 52 पुस्तकें मानव जीवन की प्रायः सभी समस्याओं पर स्वस्थ प्रकाश डालती हैं। इन 52 पुस्तकों को जो याज्ञिक अपने 10 मित्रों को आद्योपान्त पढ़ा देंगे उन्हें संस्था विधिवत् अपना धर्मप्रचारक स्वीकार करेंगी और महायज्ञ के अवसर पर ‘उपाध्याय’ पद से विशेष सम्मान के साथ विभूषित करेंगी।

आध्यात्मिक जीवन की गायत्री माता, यज्ञ पिता और धर्म गुरु के पोषण करने की भी प्रत्येक धर्मप्रेमी पर वैसी ही जिम्मेदारी है जैसी शरीर से संबंधित माता, पिता, और गुरु के शरीर को सुखी संतुष्ट बनाने के लिये कुछ त्याग करना जरूरी होता है। हर उपाध्याय को दो-चार पैसा रोज इन आध्यात्मिक त्रिदेवों की उपासना के लिए बचाने चाहिएं। यदि दो पैसे रोज भी बचाये जाएं तो एक वर्ष में बारह रुपया होते हैं। इससे प्रति सप्ताह चार आने मूल्य की एक पुस्तक खरीदी जा सकती है। यह ज्ञान प्रसार का ‘ब्रह्म-विद्यालय’ हर धर्मप्रेमी आसानी से चला सकता है। दो पैसा रोज सच्चे ब्रह्मदान के लिए खर्च करते रहना किसी गरीब आदमी के लिए भी मुश्किल बात नहीं है। तीन पैसे या चार पैसे रोज इस कार्य के लिए खर्च करना संभव हो तो शेष पैसों का साहित्य बिना मूल्य वितरण किया जा सकता है। एक घण्टा रोज समय धर्मप्रचार के लिए लगाया जाय तो चार छः आदमियों से रोज मिलना हो सकता है। इस प्रकार एक वर्ष में कई सौ व्यक्तियों से धर्म उद्देश्य के लिए मिलना हो सकता है।

हमारी आकाँक्षा है कि याज्ञिकों में से अधिकाधिक ‘उपाध्याय’ निकले। वे नित्य दो-चार पैसे इस ब्रह्मदान के लिए निकाले और अपने अवकाश का थोड़ा बहुत समय धर्मफेरी के लिए दिया करें। महायज्ञ के होता यजमानों की शर्त को पूरा करने के लिए अनेकों याज्ञिक वितरण साहित्य मंगा चुके हैं। कुछ ने ज्ञान-मन्दिर सैट भी मंगाने आरम्भ किए हैं। यह प्रक्रिया मन्द गति से नहीं तेजी से चलनी चाहिए। उपाध्यायों की संख्या संतोषजनक गणना तक पहुँचनी चाहिए। यों यह कार्य छोटा सा दिखता है, सरल भी है पर इसके परिणाम बहुत ही दूरगामी एवं महत्वपूर्ण होंगे। हम में से प्रत्येक को उपाध्याय का महान सम्मान प्राप्त करने के लिए अग्रसर होना चाहिए। यज्ञ कार्य पूर्ण होने पर भी उन्हें सद्ज्ञान प्रचार का व्रत लेकर इस प्रक्रिया को जीवन भर चलाते रहने का व्रत धारण करना चाहिए।


धर्म प्रचार-सर्वश्रेष्ठ पुण्य-कार्य है।

यह सुनिश्चित तथ्य है कि कोई बात पहले विचार क्षेत्र में आती है, मन में जड़ जमाती है, बुद्धि उस पर जोर देती है तब वह कार्य रूप में परिणित होती है। संयोगवश, घुणाक्षर न्याय से आकस्मिक रीति से हो जानी वाली थोड़ी-सी घटनाओं को छोड़कर शेष सभी कार्य पहले विचार क्षेत्र में आते हैं। जो कार्य आज होते दिखाई पड़ रहे हैं वे किसी समय उनके कर्ताओं के मस्तिष्कों में घूम रहे हैं, वे पूरे या अधूरे रूप में कल कार्य रूप में परिणित होकर रहेंगे। मानव प्राणी का निर्माण इसी आधार पर हुआ है, उसके विचार ही कार्य बन जाते हैं। इसलिए विचारों को भी एक प्रकार से कार्य ही कहते हैं। जिस प्रकार भले बुरे कर्मों का पुण्य-पाप होता है वैसे ही भले बुरे विचारों का भी होता है क्योंकि विचार वस्तुतः सूक्ष्म रूप से कार्य ही हैं। जो बात आज विचार क्षेत्र में घूम रही है, शरीर के कल पुर्जे कल उसे कार्य बना कर उपस्थित कर देंगे।

आप जो कार्य लोगों से कराना चाहते हैं, उसे पहले उनकी भूमिका में प्रवेश कराना होगा। यह विचार जैसे-जैसे प्रबल और परिपुष्ट होते जावेंगे वैसे-वैसे ही यह सम्भावना बढ़ती जायेगी कि अभीष्ट कार्यक्रम प्रत्यक्ष क्रिया रूप में सामने आवें। इसलिए जन प्रवृत्ति को किसी दिशा में मोड़ने के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता प्रचार की होती है। प्रचार का बल तोपों और तलवारों से भी असंख्य गुणा अधिक है। लोग अपने भौतिक व्यापारिक गुण और राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रचार शस्त्र का ही सहारा लेते हैं। दो-दो पैसा लागत मूल्य की बेकार दवाओं के लम्बे-चौड़े विज्ञापन छाप कर दीवारें रंग कर लोगों ने जनता में अरबों-खरबों शीशियाँ बेच दीं और करोड़ों रुपया बटोर लिया। चाय वालों ने, बीड़ी वालों ने अपनी बेकार चीजों को लोगों के मुँह पर ऐसा चढ़ा दिया कि उनके बिना चैन नहीं। सिनेमा वालों के पोस्टर और प्रदर्शन ही जनता को खेल देखने के लिए खींच ले जाते हैं। राजनैतिक पार्टियाँ विशाल जुलूस, रैली-सम्मेलन पत्र, पत्रिकाएं, पर्चे, पोस्टर, भाषण, संगीत आदि द्वारा जनता को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

यह भौतिक उद्देश्यों के लिए प्रचार शस्त्र के उपयोग की बात हुई। पर शुभ उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी इसी प्रकार शस्त्र को काम में लेना पड़ता है। ईसाइयों ने पिछले दिनों बाइबिल का संसार की सभी भाषाओं में अनुवाद किया है और सस्ती पुस्तिकायें, इतनी बड़ी संख्या में छापी हैं कि संसार के हर मनुष्य के हिस्से में 27-27 पुस्तिकाएं आती हैं। उनके लाखों प्रचारक दुनिया में काम करते हैं। फलस्वरूप गत 200 वर्षों के थोड़े से समय में संसार की लगभग आधी आबादी ईसाई हो गई। 200 वर्ष पूर्व जो ईसाई मुश्किल से, कुछ करोड़ थे। वे ही प्रचार के बल से बढ़कर दुनिया की आधी आबादी पर छू गये और दिन-दिन तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। दूसरी ओर प्रचार के अभाव से दुनिया का सबसे बड़ा बुद्धिमत्ता, नीति शास्त्र-आचार संहिता और तत्व-दर्शन वाला हिन्दू धर्म दिन-दिन घटता चला जा रहा है।

प्रचार का महत्व सदा सभी लोगों ने एक सामान स्वीकार किया है। केवल उनकी पद्धतियों में अन्तर होता है। जिस प्रकार आज ईसाई काम करते हैं उसी प्रकार 2000 वर्ष पूर्व बौद्ध धर्म के प्रतिष्ठाताओं ने प्रचार का महत्व समझ कर भेजा था। उस जमाने में यातायात के साधनों के अभाव में दूरवर्ती यात्राएं बड़ी कठिन थीं, पर बौद्ध भिक्षुओं ने इस सर्वश्रेष्ठ पुण्य कार्य के लिए अपने प्राण तक अर्पण करना स्वीकार किया। हजारों भिक्षु प्रचार के लिए दूर देशों को जाने के कठिन मार्ग में रास्ते में ही मर गये, पर हजारों ने अपनी जान पर खेल कर दुनिया के कोने-कोने में प्रचार कार्य और उस परम पवित्र धर्म सेवा को व्यक्तिगत पूजा उपासना से हजारों गुना महत्वपूर्ण समझ कर अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। उसी का फल है कि बौद्ध धर्म आज भी ईसाई धर्म के बाद दूसरे नम्बर पर है, और संसार के एक बड़े भाग की जनता बौद्ध धर्म की अनुयायी है।

ऋषियों की कार्य पद्धति में भी धर्म प्रचार को सर्वप्रधान स्थान दिया गया है। रामायण गीताभागवत, सत्यनारायण व्रत-महात्म्य, आदि में धर्म प्रचार ही एक मात्र उद्देश्य है। कुम्भ आदि पर्वों पर, तीर्थ स्थानों में निर्धारित समय और निर्धारित स्थान पर लाखों जनता एकत्रित होकर वहाँ धर्म प्रचार के उद्देश्य से ही पधारे हुए सन्त महात्माओं के प्रवचनों से लाभ उठाती थी, स्वाध्याय, पाठ, अमुक ग्रन्थों का पाठ करने की प्रक्रियाओं के पीछे भी यही लक्ष है।

साधु ब्राह्मणों का इतना सम्मान इसीलिए था कि वे जन समाज के नैतिक आध्यात्मिक, चरित्रात्मक स्तर स्थिर रखने के लिए निरन्तर प्रचार कार्य में संलग्न रहते थे और अपनी व्यक्तिगत सुविधाओं को तिलाँजलि देकर अपना जीवन इतना उत्कृष्ट बनाते थे कि उनका प्रचार सच्चे अर्थों में प्रभावशाली सिद्ध हो सके। साधु का प्रधान कार्य परिव्राजक बनकर निरन्तर धर्म प्रचार करते रहना है। उनके लिए शास्त्र की आज्ञा यही है कि अनेक घरों से थोड़ी-थोड़ी भिक्षा माँगने जाने के बहाने नित्य ही बराबर धर्मोपदेश करें। जिस दिन धर्मोपदेश नहीं, उस दिन रोटी भी नहीं, यह शर्त लगाकर भिक्षा ही जीविका बनाने का साधु के लिए आदर्श नियत किया गया था। एक स्थान पर न रहकर निरन्तर भ्रमण करते रहने का व्रत भी उन्हें इसीलिए दिया जाता था कि अधिकाधिक दूर का क्षेत्र उनकी सेवा से लाभ उठा सके और एक स्थान पर रहने के कारण मोह एवं परिग्रह की प्रवृत्ति उनमें पैदा न होने पावे। ब्राह्मण गृहस्थ हो सकता है, एक स्थान पर रह सकता है, सीमित क्षेत्र में सेवा कर सकता है, भिक्षाटन की अपेक्षा दक्षिणा ले सकता है इतनी ही उसे सुविधा एवं छूट है शेष कार्य एवं उद्देश्य उसके भी साधुओं जैसे ही हैं। जिस दिन ब्राह्मण स्वाध्याय एवं धर्म प्रचार नहीं करता उस दिन वह अपने कर्तव्य से पतित होकर प्रायश्चित्त का भागी बनता है। धर्म-ग्रन्थों का दान हिन्दू धर्म में सबसे बड़े दान की अपेक्षा हजार गुना अधिक माना गया है। इसका कारण धर्म भावनाओं की अभिवृद्धि के साधनों को महत्व देना ही है।

आज के साधु ब्राह्मण दान दक्षिणा लेने, चेली चेला बनाने और शौक की जिन्दगी बिताने में लगे रहते हैं, पर प्राचीन काल में उनका सारा समय जनता का मानसिक स्तर ऊँचा रखने के लिए धर्म प्रचार के कठिन कार्यक्रमों में दिन रात लगे रहने का होता था। उनके इस कार्य की महानता एवं उपयोगिता को जनता समझती थी इसीलिए उन्हें इतना सम्मान प्रदान करती थी, उनके चरणों पर मस्तक झुकाती थी। पर आज तो जमाना उल्टा होने के साथ-साथ यह साधु ब्राह्मण भी उलटे हो गये हैं। निस्वार्थ धर्म सेवा के स्थान पर ब्राह्मण का लक्ष्य नाना विधि तरकीबें ढूंढ़ कर यजमान से अधिकाधिक पैसे झटकना और साधु का कार्य मुफ्त में जनता से सब कुछ प्राप्त करते रहना और अपनी निज की मुक्ति एवं ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने की स्वार्थ साधना में लगे रहना मात्र बन गया है। समाज का मानसिक स्तर स्थिर रखने की जिम्मेदारी को छोड़ कर अन्य साधारण व्यवसायियों जैसी स्वार्थ बुद्धि जब से अपनाई तब से हमारा सामूहिक अधःपतन आरम्भ हो गया और आज हम इस हीन दशा को पहुँच गये।

गायत्री परिवार ब्राह्मण-संस्था है उसने कन्धे पर सामूहिक रूप से वह जिम्मेदारी ली है जो तथाकथित साधु ब्राह्मणों ने उतार कर फेंक दी है। लोग सत्कर्म करें, सदाचारी रहें, ईमानदार बनें परस्पर सद्व्यवहार करें, संयमी बनें, कर्तव्य का ध्यान रखें इस प्रकार की गतिविधि संसार में उत्पन्न हो ऐसा ही क्रिया कलाप, आचार−व्यवहार चलने लगे, इसके लिए यह आवश्यक है कि इस प्रकार की भावनाएँ लोगों के मस्तिष्कों में ठूँस-ठूँस कर भर दीं जाएं। यदि इस प्रकार के ठोस और मजबूत विचार तर्क, विवेक युक्त एवं प्रभावशाली ढंग से जनता को न दिये गये तो यह आशा नहीं की जा सकती कि जन-समाज में श्रेष्ठ आचरण दृष्टिगोचर होने लगेंगे। कोई बात कार्य रूप में दिखाई दे, इसके लिये यह नितान्त आवश्यक है कि उस विचार धारा का जनता के मन में गहराई तक प्रवेश करा दिया जाय। पर्याप्त विचार बल हुए बिना जो कार्य किसी प्रेरणा विशेष के कारण किये जाने लगें तो वे ठहरेंगे नहीं स्थायी नहीं रहेंगे, अधिक दिन चल न सकेंगे। इसलिए गायत्री परिवार का प्रमुख कार्य जनता के बौद्धिक क्षेत्र में उच्च आदर्शों का गहराई तक प्रतिष्ठापन करना है। इसके लिए उसे धर्म प्रचार की वही आर्य पद्धति अपनानी पड़ेगी जो सनातन काल से ऋषि मुनियों द्वारा साधु ब्राह्मणों द्वारा अपनाई जाती रही है।

जन साधारण को सन्मार्गगामी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि दुष्प्रवृत्तियों की बुराइयाँ और सन्मार्ग की महत्ता को उनके अन्तः प्रदेश में गहराई तक बिठा दिया जाय। यह कार्य धर्म प्रचार के परम पुनीत अस्त्र द्वारा ही संभव है। प्राचीन काल के प्रायः सभी ऋषि मुनि साधु ब्राह्मण इस धर्म सेवा के लिए अधिकाधिक समय लगाते थे। जगद्गुरु शंकराचार्य का सारा जीवन इसी पुनीत कार्य में लगा। महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती इसी प्रक्रिया में संलग्न रहे। मीराबाई अपना राजमहल छोड़कर जगह-जगह भटकने के लिए निकल पड़ीं। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर इसी उद्देश्य के लिए जीवन भर भ्रमण करते रहे। रामतीर्थ, विवेकानन्द,गाँधी आदि महात्माओं ने घर-घर अलख जगाया। देवर्षि नारद को यह अधिकार प्राप्त था कि वे चाहे जब विष्णु भगवान के पास पहुँचते थे। यह अधिकार और किसी भी ऋषि को प्राप्त न था। उनको इतनी बड़ी महत्ता प्राप्त करने का कारण यह था कि उन्होंने धर्म प्रचार को ही अपनी एकमात्र साधना बनाया था, और यह परम निस्वार्थ उपासना भगवान को अन्य सब साधनाओं की अपेक्षा अधिक प्रिय है।

शास्त्रों में लिखा है कि पुण्य या पाप की प्रेरणा देने वाले को इस प्रेरणा के फलस्वरूप होने वाले कार्यों का दसवां भाग पुण्य-पाप प्राप्त होता है। धर्म प्रचार के द्वारा अनेक व्यक्तियों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है, फलस्वरूप उन शुभ कार्यों का दशाँश पुण्य उस प्रचारक को मिल जाता है। जो व्यक्ति सहस्रों व्यक्तिओं को धर्म मार्ग में प्रवृत्त करने की प्रक्रिया में प्रवृत्त है उसे उस जन समूह द्वारा किये हुए सत्कर्मों का दशाँश पुण्य मिलने से वह पुण्य इतना बड़ा हो जाता है कि साधारण जप, तप के द्वारा उतना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं।

युगाचार परिवर्तन की, असुरता को निवारण करके देवत्व की स्थापना की, साँस्कृतिक पुनरुत्थान की जो परम पवित्र योजना गायत्री परिवार द्वारा प्रारम्भ की गई है उसकी सफलता का प्रधान अस्त्र धर्म प्रचार है। संसार में सुख शान्ति स्थापित करने का महान उद्देश्य पूरा करने के लिए हमें इस साधन को पूरी श्रद्धा और तत्परता के साथ हाथ में लेना होगा। इसकी उपेक्षा करके हम कभी भी अपना लक्ष पूरा न कर सकेंगे।

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के याज्ञिकों पर जप और उपवास की जिम्मेदारी डाली गई है। साथ ही यह भी प्रयत्न किया गया है कि इस महान धार्मिक अभियान में भाग लेने वाला व्यक्ति किसी रूप में धर्मप्रचार की परम पवित्र जिम्मेदारी को भी अपने कंधे पर ले। यह धर्म प्रचार ही इस महायज्ञ का ब्रह्मभोज है।

अनुष्ठान के तीन आवश्यक अंग होते हैं। (1) जप (2) हवन (3) ब्रह्मभोज। इन तीनों कार्यों को मिलाकर ही कोई अनुष्ठान पूर्ण होता है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के लिए भी इन तीन आधारों का अनिवार्य रूप से संकल्प किया गया है। यों रूढ़ि के रूप में आज भी ब्राह्मण वंश में उत्पन्न हुए मनुष्यों को लड्डू पुआ खिलाकर लोग यह आत्म सन्तोष कर लेते हैं कि हमने कुछ पुण्य कमा लिया या एक धार्मिक परम्परा को पूरा कर लिया। वस्तुतः ब्रह्मभोज का उद्देश्य उन्हीं ब्राह्मणों को भोजन कराने से पूरा हो सकता है जो अत्यन्त उच्च चरित्र के, ब्रह्म पारायण, अपरिग्रही, विद्वान एवं समाज की धर्म सेवा में निरन्तर संलग्न हैं। ऐसे लोगों को ही भोजन कराने का पुण्य होता है। इन गुणों के अभाव में किसी वंश विशेष में जन्म लेने के कारण न तो किसी को धर्म के नाम पर प्राप्त भोजन करने का अधिकार है और न उन्हें भोजन कराने वाले को कुछ पुण्य मिलता है। आज ब्रह्मभोज के उपयुक्त ब्राह्मण ढूँढ़े नहीं मिलते, ऐसी दशा में हमें विवेक से काम लेना होगा और उसी कार्य को ब्रह्मभोज मानना होगा जिसके द्वारा सद्ज्ञान प्रसार का उद्देश्य पूरा होता हो। इस दृष्टि से सत्साहित्य का वितरण एवं सद्ज्ञान का प्रसार ही विवेक पूर्ण ब्रह्मभोज की कसौटी पर खरा उतरता है। शास्त्रों में अन्न दान की अपेक्षा ज्ञान दान का पुण्य सौ गुना अधिक माना गया है।

महायज्ञ के होता यजमानों के लिये यह शर्त रखी गई है कि उन्हें सर्वोत्तम पुण्य कार्य ज्ञानदान-ब्रह्मभोज के लिए कुछ पैसा अवश्य खर्च करना चाहिए भले ही वह एक मुट्ठी अन्न या एक पैसा प्रतिदिन ही क्यों न हो। ब्रह्मभोज जैसे महान कार्य के लिए इतना छोटा त्याग-जिसके मन में श्रद्धा का तनिक सा भी बीजाँकुर हो वह गरीब से गरीब होते हुए भी आसानी से कर सकता है।


यज्ञों पर असुरता के दो आक्रमण

समुद्र के गर्भ में छिपे हुए रत्नों को निकालने के लिए जब उसका मंथन किया गया तो सबसे पहले हलाहल विष निकला। वह विष इस बात की परीक्षा लेने बाहर निकला था कि मंथन करने वाले लोग समुद्र में छिपे हुए महत्वपूर्ण रत्नों को प्राप्त करने के अधिकारी हैं या नहीं? यदि ये लोग अधीर अविवेकी, अस्थिर और कायर हैं तो विष की भयंकरता देखकर डर जायेंगे और प्रयत्न छोड़कर उन लाभों से वंचित हो जायेंगे जो सत्पात्रों को ही उपलब्ध होते हैं। विष निकला, सब को बड़ी परेशानी हुई। पर वे विचलित न हुए। रास्ता खोजा गया। खोजने वाले को मार्ग मिल जाता है, जो निष्ठावान है उसकी सहायता के लिए सहायक भी आ जाते हैं। हलाहल विष की तीव्रता से घबराये हुए और भयंकरता से डरे हुए मंथनकर्ताओं ने जब अपना मार्ग न बदलने का फैसला किया तो भगवान प्रसन्न हो गये। शंकर जी आये। हलाहल को कंठ में धारण कर लिया। समुद्र मथने वालों का मार्ग प्रशस्त हो गया और उन्होंने वे 14 अमूल्य रत्न प्राप्त किये, जिनकी महत्ता साधारण नहीं, असाधारण ही कही जा सकती है।

अधिकारी अनधिकारी की परीक्षा आपत्तियों और कठिनाइयों से ही होती है। हीरा असली है या नकली इसकी परीक्षा करने के लिए लोहे के भारी हथौड़े की चोट उस पर लगाई जाती है। यदि चोट सह गया तो असली हीरा माना जाएगा, यदि फूट गया तो उसे कच्चा नकली कह कर कूड़े में फेंक दिया जाता है। हर अच्छे काम में विरोध की, बाधाओं की, कठिनाइयों की स्थिति आती है, यदि इस शुभ संकल्प का संयोजक उनका सामना न कर सका, डर गया अधीर हो गया छोड़ बैठा, तो अपनी अपात्रता के कारण उसे उन महत्त्वों से वंचित होना पड़ता है जो महत्वपूर्ण कार्यों में सदा से आते रहे हैं।

यज्ञानुष्ठान संसार का सबसे बड़ा पुण्य कार्य है उसका महत्व एवं लाभ भी इतना बड़ा है जितना और किसी मार्ग से प्राप्त होना संभव नहीं। विश्वामित्र ऋषि, राजा बलि आदि ने जब यज्ञानुष्ठानों में प्रगति की तो उनसे देवता तक ईर्ष्या करने लगे। बड़े आदमियों का यह सदा से स्वभाव रहा है कि जब उनसे छोटे व्यक्ति उनकी बराबरी में आते हैं-आगे बढ़ना चाहते हैं तो उनका चित्त ईर्ष्या की अग्नि से जलने लगता है। उसे गिराने, नीचा दिखाने, असफल बनाने से ही उनकी ईर्ष्याग्नि शान्त होती है। इसलिए उनसे जो कुछ बन पड़ता है इसे गिराने के लिए करते हैं। इस जमाने में भी इन घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है। यज्ञ संयोजकों के अनेकों विरोधी अकारण ही उठ खड़े होते हैं।

असुरता को नष्ट करने के लिए यज्ञों से बढ़ कर और कोई रामबाण अस्त्र नहीं है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि राजा तथा धर्म प्रेमी लोग समय-समय पर बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन करते रहते थे, ताकि असुरता की शक्ति नष्ट होती रहे। असुरता भी अपनी आत्मा रक्षा के लिए हर संभव उपाय को काम में लाती थी, आत्म रक्षा के लिए वह अपनी जान की बाजी भी लगा देती थी। एक समय विश्वामित्र जी ने उस युग का अत्यन्त विशाल यज्ञ किया था उसकी सफलता से असुर-कुल का नाश होकर धर्म संस्थापना की पूरी संभावना थी। इससे बचने के लिए असुरों ने विश्वामित्र ऋषि का यज्ञ विध्वंस करने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया। ताड़का, मारीच और सुबाहु ने इतने उपद्रव किये कि ऋषि को दशरथ राजा के द्वार पर रक्षा की पुकार करनी पड़ी और राम लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के लिए लाना पड़ा।

यों विश्वामित्र जी भी अपने ब्रह्मतेज से उन असुरों को परास्त कर सकते थे, पर चूँकि तपस्या के समय क्रोध करने या बदला लेने से अपना तप क्षीण होता है इसलिए विश्वामित्र जी स्वयं उन आक्रमणों का प्रतिकार नहीं कर रहे थे। असुरों के लिए यह अलभ्य अवसर था कि वे आक्रमण करें तो उन्हें रोकने वाला कोई न हो, इसी सुविधा का लाभ उठा कर असुरों ने अनेक बार अनेक तपस्वियों की हत्याएं कीं। भगवान राम जब वन में गये तो उन्होंने असुरों द्वारा मारे हुए ऋषियों की हड्डियों का पहाड़ देखा और ‘निशचर हीन मही’ करने की भुजा उठा कर प्रतिज्ञा की थी। वे तपस्वी ऋषि जिनकी अस्थियों का ढेर रामचन्द्रजी ने देखा था, यदि वे चाहते तो अपने तप बल से उन असुरों को नष्ट कर सकते थे, पर उससे उनका तप क्षीण होता, इसलिए तपोबल और शरीर इनमें से किसे खोया जाय, यह समस्या उपस्थित होने पर उन्होंने शरीर नष्ट होने की हानि को ही कम महत्वपूर्ण समझा।

उन्हीं सब तथ्यों की पुनरावृत्ति आज ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान जैसे अभूतपूर्व धर्म आयोजन के समय हो रही है तो इसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है। चिन्ता की बात केवल इतनी ही है कि प्राचीन काल के ऋषि, याज्ञिक और उनके शुभ चिन्तक इन आसुरी आक्रमणों से परिचित थे और उनकी रोक थाम के लिए पहले से ही सोचते थे तथा समय आने पर प्रतिरोध की व्यवस्था कर लेते थे, पर हम लोग सर्वथा बेखबर हैं। सुरक्षा और संरक्षण की ओर ध्यान नहीं देते। इतना ही नहीं, भूल यहाँ तक करते हैं कि आसुरी आक्रमणों को पहचान तक नहीं पाते और उनके द्वारा उपस्थित संकट का वास्तविक कारण समझने की अपेक्षा आपस में ही एक दूसरे को दोष देने लगते हैं। असली कारण पर दृष्टि न डालकर अपने में से ही किसी का दोष ढूँढ़ने लगते हैं। इस भूल और बेखबरी से ही हमें सावधान होने की जरूरत है।

समयानुसार हथियारों में भी हेर फेर होता रहता है। प्राचीन काल में तीर तलवार की लड़ाई थी, पीछे बन्दूकों ने उनका स्थान ले लिया। इसके बाद टैंक और जहाजों की प्रधानता रही। अब वे भी निरर्थक हो गये और हाइड्रोजन बम, परमाणु बमों का बोल-बाला है। आगे इससे भी भिन्न प्रकार के कोई अस्त्र निकल सकते हैं। असुरों के अस्त्र भी समयानुसार बदलते हैं। प्राचीन काल में वे तीर तलवार या अन्य प्रकार की आसुरी माया के द्वारा याज्ञिकों के प्रयत्न असफल बनाते थे, इस युग में वह हथियार पुराने पड़ गये। अब इनकी नीति यह है कि अपने को प्रत्यक्ष में प्रकट न किया जाय वरन् भूतप्रेत जिस प्रकार किसी के शरीर में प्रवेश करके उससे अपनी आवश्यकता पूरी करते हैं उसी प्रकार जिस किसी के मन में थोड़ी अनुकूलता मिले उसी मन में प्रवेश करके उसके द्वारा वह कार्य कराएं जाएं जिससे इस महान धर्मानुष्ठान की सफलता में भारी विघ्न उपस्थित हो जाय। राम वनवास के समय बेचारी कैकेयी की बुद्धि पर कुछ अदृश्य शक्तियों ने ऐसे ही कब्जा कर लिया था और उस सीधी-साधी रानी की मति फेर कर वह करवा लिया, जिस से उनका मनोरथ पूरा हो गया। बेचारी कैकेयी किन्हीं के द्वारा हथियार मात्र की तरह प्रयोग की गई वह निर्दोष थी, पर कलंक का ठीकरा उसी के सिर फूटा वह जीवन भर पश्चाताप की अग्नि में जलती रही और इतिहास में एक बुरा उदाहरण छोड़ने के कारण निन्दा के पात्रों में गिनी गई।

उस जमाने में कमजोर प्रकृति की एक कैकेयी ही मुश्किल से मिली थी, पर आज मानसिक दुर्बलता के युग में ऐसे शिकार ढेरों ढूँढ़ लेना असुरों के लिए तनिक भी कठिन नहीं है। जो शिकार उनके हाथ लग जाता है उसके मस्तिष्क में वे चुपके से प्रवेश कर जाते हैं और उसकी मानसिक मशीनरी में ईर्ष्या, पाखण्ड, दम्भ, द्वेष, भ्रम तथा न जाने क्या-क्या पैदा करके इसके लिए तैयार करते हैं कि यज्ञ का विरोध करे, और उसे असफल बनाने के लिए जो भी बन पड़े उसे प्रकट या गुप्त रूप से उत्साहपूर्वक करे।

यों यज्ञ सर्वमान्य तथा सर्वश्रेष्ठ शुभ कार्य है, उसकी महत्ता से कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसलिए प्रत्यक्ष रूप से खुला विरोध करना तो कठिन है, पर दूसरे रास्ते से वे वह कार्य करते हैं जिससे यज्ञीय कार्यक्रम नष्ट हो जाय। इसके लिए दो हथियार काम में लाये जाते हैं, एक भ्रम फैलाना दूसरा उदासीनता उत्पन्न करना। यह दोनों ही हथियार ऐसे हैं जो तीर तलवार की तरह दीखते तो नहीं पर काम उनसे भी बढ़ कर करते हैं।

इस युग में धर्म कार्यों के लिए लोगों में स्वाभाविक रूप से अनास्था है, धर्म कार्यों की ओर किसी का उत्साह ही नहीं जगता। पूर्व जन्मों के संस्कार बीज विद्यमान हों तथा इस जन्म में विशेष रगड़ लगे तब थोड़ी धर्म प्रवृत्ति पैदा होती है। वह भी बड़े संकोच और झिझक के साथ आगे बढ़ती है। कारण यह कि इस मार्ग के साथी कम और मखौल करने वाले बहुत मिलते हैं। बेचारा साधक उनसे सहम जाता है और अपना मार्ग छोड़ बैठता है। दूसरे इस जमाने में धर्म आयोजन करने वाले, अधिकाँश लोग स्वार्थी या धूर्त होते हैं जो भोली जनता को अपना उल्लू सीधा करने का जरिया बनाते हैं। इनके कुकर्मों की कलई रोज ही खुलती रहती है। उन घटनाओं का स्मरण करके सच्चे लोगों पर भी श्रद्धा मुश्किल से ही जमती है। इन कठिनाइयों के बीच यदि कोई भ्रम फैलाने वाला विरोधी खड़ा हो जाय तो उस दुर्बल श्रद्धा पर आसानी से तुषारपात कर सकता है।

वस्तुतः तपोभूमि द्वारा आयोजित यज्ञ आन्दोलन पूर्ण शुद्ध, सात्विक एवं धर्म अनुमोदित है। पर उसमें भी मीन-मेख निकालना, इसमें भाग लेने वाले लोगों को डराना बेसिर पैर के बुरे मन गढ़ंत लाँछन रचना जैसे कार्य कुछ लोगों द्वारा किये जाते हैं। इस भ्रम फैलाने की प्रक्रिया का परिणाम यह होता है कि अनेक धर्म प्रेमियों की उठती हुई भावना तथा खिलती हुई श्रद्धा की कली मुरझा जाती है। वे डर जाते हैं और उस लाभ से वंचित हो जाते हैं जो इसमें सम्मिलित होने से उन्हें प्राप्त होता। दूसरी ओर कई सहयोग के इच्छुक व्यक्ति जब असहयोग करने लगते हैं तो आयोजन की सफलता में भी बाधा पड़ती ही है। असुरता मन ही मन खूब प्रसन्न होती है कि लोग वास्तविकता को समझ भी न पाये, हमारी चाल पूरी हो गई। बिना तीर तलवार चलाये, यज्ञों को असफल बनाने के लिए असुरों के पास यह भ्रम फैलाने का बड़ा ही उत्तम हथियार है। किसी दुर्बल मनोवृत्ति के व्यक्ति को असुरता अपना वाहन बनाकर उससे यह कुकृत्य आसानी से करा लेती है।

दूसरा हथियार असुरता का यह है कि जिन लोगों में धर्म भावना मौजूद है, जो इन कार्यों में आगे बढ़कर भाग लेना चाहते हैं उनमें आलस्य, अनुत्साह, उदासीनता, लापरवाही, अवसाद, उपेक्षा ढील ढाल जैसी प्रवृत्तियाँ पैदा कर देती है, जिससे वे जो कुछ आसानी से कर सकते थे—वह भी नहीं करते। कोई छोटी-छोटी शारीरिक या पारिवारिक अड़चन ऐसी आ जाती है जो छोटी होते हुए भी उन्हें बहुत बड़ी लगती है और उसी के सहारे फुरसत न मिलने आदि का बहाना बनाकर वे उत्साहपूर्वक सहयोग करने से पीछे हट जाते हैं। विरोधी बढ़ें और सहयोगी पीछे हटें तो पराजय एवं असफलता ही हाथ लग सकती है। असुरता का उद्देश्य इस प्रकार भी सहज ही पूरा हो जाता है।

धर्म वृद्धि के आयोजनों से असुरता नष्ट होती है। नष्ट होने वाला अपनी आत्म रक्षा के लिए आक्रमण करे तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य तो इस बात का है कि बात को जानते हुए भी हम बेखबर रहें। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में भाग लेने वाले और अपने यहाँ गायत्री यज्ञों का आयोजन करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस ओर से सजग रहना चाहिए। जो लोग इन कार्यक्रमों में भाग लें उन्हें यह भली प्रकार जान लेना चाहिए कि किसी न किसी उपद्रवी के शिर पर चढ़कर असुरता भ्रम फैलाने वाली, अश्रद्धा उत्पन्न करने वाली बातें जरूर कहेगी। उनका प्रतिरोध करने के लिए पहले से ही सजग रहा जाय, आक्रमण होने से पूर्व ही उसकी सम्भावना के लिए तैयार रहा जाय तो आक्रमणकारी असुरता की दाल नहीं गलने पाती।

यज्ञ आयोजनों को असफल बनाने वाले असुरता के इन दो आक्रमणों से हमें सावधान रहना चाहिए। निन्दक, फूट फैलाने वाले, मन गढ़ंत झूठी बातें करके अश्रद्धा फैलाने वाले लोगों के मस्तिष्क पर किन शक्तियों ने कब्जा कर रखा यह समझते हुए उनसे सतर्क रहना ही उचित है। जो लोग झूठ, चोरी, बेईमानी, व्यभिचार, जुआ, शराब आदि किसी भी बुराई के खिलाफ कभी जबान नहीं खोलते, उन्हें यज्ञों में ही आधुनिकता सूझ पड़े तो इसे उनकी बुद्धि की विकृति ही समझना चाहिए।

गायत्री-परिवार की शाखाएं या कोई उत्साही गायत्री उपासक जब कभी सामूहिक यज्ञ या गायत्री प्रचार का कोई छोटा मोटा आयोजन करते हैं तो भी उनके अनेकों विरोधी, अनेकों उंगली उठाने वाले, अनेकों रोड़ा अटकाने वाले पैदा हो जाते हैं। इस का अनुभव उनके छोटे प्रयत्नों को भी सफल नहीं होने देना चाहता, फिर यह इतना बड़ा इस युग का महानतम यज्ञ बिना किसी विरोध बिना किसी उपद्रव, बिना किसी आसुरी आक्रमण के सम्पन्न हो जाय यह कभी सम्भव नहीं। यदि कोई विरोध आक्रमण या उपद्रव न हो तो समझना चाहिए कि यह आयोजन उतना शक्तिशाली नहीं था, जिससे डरने या असफल बनाने की आवश्यकता असुरों को पड़ती।

दिसम्बर 57 की अखण्ड-ज्योति में पृष्ठ 35 पर हिमालय निवासी त्रिकालदर्शी परम सिद्ध महात्मा विशुद्धानन्द जी महाराज की एक विशेष सन्देश द्वारा भेजी हुई एक महत्वपूर्ण चेतावनी छपी है, जिसमें उन्होंने गायत्री-परिवार को इस वर्ष अधिक सावधान रहने के लिए कहा है और संकेत किया है कि असुरता अपने नये हथियारों से आक्रमण करेगी। भ्रम, अश्रद्धा, लाँछन, लोकापवाद फैलाना तथा कोई दुर्घटना भी उत्पन्न कर सकता है। आचार्य जी के शरीर को, उनके उज्ज्वल चरित्र को, महायज्ञ के परम पवित्र कार्यक्रम को कलंकित करने के लिए कोई भी षड़यन्त्र रच सकती है। उनकी चेतावनी में बहुत ही गम्भीर सचाई छिपी हुई है। असुरता इस प्रकार के अपने षड़यन्त्रों को सफल बनाने में पूरी तत्परता के साथ लगी हुई है। उसका पूतना और ताड़का जैसा विकराल रूप देखने के लिए हम में से हर एक को तैयार रहना चाहिए।

समुद्र मंथन के समय सबसे पहले विष निकला था, बाद में वारुणी फिर धीरे-धीरे क्रमशः उसमें रत्न निकलते गये। अमृत सबसे पीछे निकला था। गायत्री महायज्ञ के धर्मानुष्ठान में भी पहले विष ही निकल रहा है। ईर्ष्यालु लोग विरोध और विलगता करते हैं, आगे और भी अधिक करेंगे। यह इस बात की परीक्षा के लिए है कि आयोजन के कार्यकर्ताओं में किस की निष्ठा, सच्ची, किस की झूठी है। जो दृढ़ निश्चयी हैं वे ही अन्त तक ठहरें तो उन्हें लाभ मिलेगा। उथले स्वभाव के, बाल बुद्धि वाले सहयोगी यदि हट जावें तो कुछ हर्ज भी नहीं है। इस छाँट का काम निन्दकों द्वारा बड़ी सरलता से पूरा हो जाता है। दुर्बल मनोभूमि वाले लोग तनिक सी सन्देहास्पद बात सुनकर भाग खड़े होते हैं। भीड़ को हटाने की दृष्टि से यह पलायन उचित भी है। एक बार गौतम ऋषि के अनुष्ठान में बहुत शिष्य बढ़ गये। वे पात्र कुपात्र की छाँट करके भीड़ को घटाना चाहते थे। उनने कोढ़ी का रूप बना लिया। दुर्बल श्रद्धा वाले शिष्य कोढ़ को देखते ही घृणा करने लगे और एक-एक करके आश्रम छोड़ने लगे। जो दृढ़ श्रद्धा के शिष्य थे, रह गये। कोढ़ के होते हुए भी गौतम जी से घृणा न करके उनकी अधिक सेवा भावना से परिचर्या करने लगे। ऐसे गिने-चुने ही शिष्य अन्त में बचे, उनकी पात्रता से प्रसन्न होकर गौतम ऋषि ने उन्हें अपनी गुप्त से गुप्त विद्याएं पढ़ा दीं। गायत्री आन्दोलन के प्रभाव से अब साधकों की भीड़ भी बहुत बड़ी हो गई है। इनमें उच्च श्रेणी के सच्चे साधकों की परीक्षा के लिए यह उचित भी है कि झूठे सच्चे लोकापवाद फैलें। विवेकवान लोग इन निन्दाओं का वास्तविक कारण ढूँढ़ेंगे तो सचाई मालूम पड़ जायगी और उनकी श्रद्धा पहले से भी दूनी चौगुनी बढ़ जायगी। पर जो लोग दुर्बल आत्मा के हैं वे तलाश करने के झगड़े में न पड़कर सुनने मात्र से ही भाग खड़े होंगे। इस प्रकार दुर्बल आत्माओं की भीड़ सहज ही छट जायगी। असुरता के आक्रमणों से जहाँ यज्ञों में बड़ी अड़चन पड़ती है वहाँ (1) संयोजकों में दृढ़ता पुरुषार्थ तथा मुकाबला करने की शक्ति की अभिवृद्धि (2) सच्चे धर्मप्रेमियों की सचाई जान लेने पर श्रद्धा का और अधिक विकास (3) दुर्बल आत्माओं की अनावश्यक भीड़ की छँटनी, यह तीन लाभ भी हैं।

जो हो यज्ञीय आयोजनों की सुरक्षा के लिए हमें ध्यान रखना है। हमारी बेखबरी से लाभ उठा कर असुरता कोई ऐसा आघात न पहुँचा दे जिससे पीछे पश्चाताप करना पड़े, इससे सावधान रहना है। असुरता के छद्मवेशी इन आक्रमणों के प्रति हम सब को सजग रहने की बड़ी आवश्यकता है।


महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद-

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का मूल उद्देश्य धर्म भावनाओं की अभिवृद्धि और आध्यात्म तत्वों का विकास करना है। बढ़ी हुई असुरता का समाधान और देवत्व का परिपोषण करके विश्व में सुख शाँति की गंगा का अवतरण करना इस भागीरथ तप का प्रधान हेतु है। ऐसे धर्मानुष्ठानों के कारण जो सूक्ष्म शक्ति उत्पन्न होती है उससे जन-मानस के अन्तराल में सद्भावनाओं का उद्भव होता है जिससे अनेक प्रकार के क्लेशों से छुटकारा प्राप्त करके सारा संसार मंगलमय लक्ष की ओर अग्रसर होता है।

उपरोक्त आध्यात्मिक लक्ष के अतिरिक्त इस विशाल आयोजन का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण की, युग निर्माण की महान प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिये धर्म प्रेमी, जागृत एवं तपोनिष्ठ आत्माओं का आह्वान एवं संगठन करना भी है। लम्बे अज्ञानांधकार को पार करके अब भारत ने पुनः प्रकाश के युग में प्रवेश किया है। अज्ञान और दारिद्र के भारी बन्धनों के बावजूद हमारा राष्ट्र लड़खड़ाते पैरों से आगे बढ़ने का प्रयत्न कर रहा है। इस दिशा में अनेक प्रयत्न चल रहे हैं। सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाएं अपने-अपने ढंग से विकास कार्यों में लगी हुई हैं। यह सब प्रशंसनीय है पर भावना क्षेत्र को विकसित करने का महत्वपूर्ण कार्य सर्वथा उपेक्षित पड़ा है। जिनमें राष्ट्र के भावना क्षेत्र को विकसित करने की क्षमता है वे जन आन्दोलनों को झंझट समझकर उसकी उपेक्षा करते हैं। जिनमें क्षमता नहीं, जो स्वयं अपने को आदर्श एवं अनुकरणीय नहीं बना सके हैं, वे ‘परउपदेश कुशल’ बनकर जब धर्म शिक्षा करने चलते हैं तो उपहास ही नहीं होता उलटी प्रतिक्रिया भी होती है।

भावना क्षेत्र का विकास किये बिना, जनता के मन में सेवा, उदारता, लोकहित, साम्प्रदायिकता, सहिष्णुता, नैतिकता प्रभृति मानवता की प्रवृत्तियों को सुविकसित किये बिना-उन्नति के सारे प्रयत्न दिखावा मात्र रह जावेंगे। जो आर्थिक या सामाजिक उन्नति होगी वह गलत दिशा में प्रयुक्त होने पर लाभदायक सिद्ध होने की बजाय उलटे हानिकर परिणाम उपस्थित करेगी। इसलिए यह नितान्त आवश्यक है कि जनता में शुभ संकल्प और सद्भाव उत्पन्न करने के लिये भी वैसे ही प्रयत्न किये जाएं जैसे अन्य क्षेत्रों के विकास कार्य में किये जा रहे हैं।

यह परम पुनीत कार्य सरकारों का नहीं, धर्म संस्थाओं का है। दुर्भाग्य से भारत की धर्म संस्थाएँ अपनी साम्प्रदायिक मान्यताओं के प्रदर्शन और परिपोषण के लिये तो बहुत शक्ति व्यय करती हैं पर धर्म के मूल तत्वों की ओर कुछ भी ध्यान नहीं देतीं। ऐसी धर्म संस्थाओं की भारी कमी है जो विभिन्न सम्प्रदाओं के बीच सहिष्णुता, समन्वय और एकता स्थापित करने के साथ-साथ जन साधारण में मानवीय सद्गुणों एवं शुभ संकल्पों का विकास करें। इस कमी को पूरा करने के लिए कुछ विशेष प्रयत्न किये जाने आवश्यक हैं। यह गायत्री-महायज्ञ इस अभाव की पूर्ति के लिए शक्ति भर प्रयत्न करेगा।

मूढ़ विश्वासों, रूढ़ियों भ्रमात्मक मान्यताओं एवं अन्ध परम्पराओं ने हिन्दू समाज के मानसिक संस्थान को जर्जर बना दिया है। भारतीय धर्म और तत्वज्ञान की जो भावनाएँ और मान्यताएँ थीं वे उपेक्षा के गर्त में जा गिरी हैं और उनके स्थान पर अविवेकपूर्ण एवं अनैतिक विचारधाराएँ प्रतिष्ठित हो गई हैं। इनमें संशोधन परिमार्जन करना होगा। भारतीय धर्म का मूल आधार तो अत्यन्त ही उत्कृष्ट तत्वज्ञान पर अवलंबित है पर उसका वर्तमान रूप ऐसा विकृत हो गया है कि समझदार लोग उससे नफरत करते हैं। जो उसे छोड़कर अन्य धर्मों में मिलते जा रहे हैं। जो उसे अपनाये हुए हैं वे भी उसकी उपेक्षा करते हैं और अश्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। यह स्थिति देर तक कायम रही तो हिंदू धर्म की नींव ही हिल जाने का खतरा पैदा हो जायगा। इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से बचने के लिए हमें समय रहते सावधान होना होगा और जो अविवेकपूर्ण, अनुपयोगी एवं अनैतिक मान्यताएं जन मानस में प्रवेश कर गई हैं उनकी सफाई करनी होगी।

इस विपन्न मनोदशा में क्राँति करने की निताँत आवश्यकता है। प्रबल तर्कों, उदाहरणों, वैज्ञानिक शोधों, सामाजिक आवश्यकताओं और मनोवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर लोगों को यह समझना पड़ेगा कि मानवता और नैतिकता के, सेवा और संयम के सिद्धाँत ही सच्चे हैं, उन्हीं पर चलकर हम वैयक्तिक तथा सामाजिक सुख शान्ति उपलब्ध कर सकते हैं। इसे समझने के लिए अब पुराने ‘ऋषिवचन’ ही पर्याप्त न होंगे, वरन् युग के अनुरूप अनेक विचारों से दिग्भ्राँत मनुष्य की बुद्धि में प्रवेश कर सकने योग्य तर्क और तथ्य उपस्थित करने होंगे। कार्ल मार्क्स के द्वारा उपस्थित कम्युनिज्म के तर्कों और तथ्यों ने दुनिया की आधी आबादी को प्रभावित कर लिया है। नैतिकता और मानवता के आदर्शों को भी इसी पैमाने पर प्रस्तुत करना पड़ेगा। जन मानस में गहराई तक जमे हुए वासना और तृष्णा के उद्देश्यों को उखाड़ फेंकने के लिए भारी प्रयत्न और संघर्ष करने पड़ेगा यही बौद्धिक क्राँति की योजना है। महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद गायत्री परिवार को इसी बौद्धिक क्राँति का झण्डा खड़ा करना होगा और जन मानस में भरी हुई सड़ी कीचड़ को निकाल कर उसके स्थान पर सद्ज्ञान की, ऋतम्भरा प्रज्ञा की अमृतमयी निर्झरिणी परिलंबित करने के लिए घोर प्रयत्न करने को तत्पर होना होगा।

यह आध्यात्मिक क्राँति, नैतिक क्राँति, भावना क्राँति भारत के लिए निताँत आवश्यक है। राजनैतिक क्राँति हो चुकी, स्वराज्य मिल गया। समय के साथ-साथ आर्थिक उन्नति का भी क्रम चल रहा है। पर सबसे अधिक महत्वपूर्ण भावना क्राँति का क्षेत्र, जो सूना पड़ा हुआ है गायत्री-परिवार को पूरा करना होगा। हममें से प्रत्येक को इसके लिए कटिबद्ध होना पड़ेगा। तभी भारतभूमि में प्राचीन ऋषियों का युग अवतरित करने के हमारे स्वप्न साकार हो सकेंगे। तभी युग की सबसे बड़ी पुकार एवं चुनौती का प्रत्युत्तर देना संभव हो सकेगा।

भावना क्राँति के साथ-साथ सामाजिक क्राँति का पहिया भी घूमेगा। भारत का तत्व ज्ञान बड़ा पुराना और महान है। समयानुसार हर वस्तु में विकार आते हैं। उसमें विकृतियाँ प्रवेश करती जाती हैं, पुराने मकानों में अपने आप टूट-फूट होती रहती है। यदि उसकी मरम्मत न की जाय तो वह प्राचीन और प्रशंसनीय इमारत भी खँडहर के बुरे रूप में परिणित हो जाती है। जैसे समय-समय पर पुराने मकानों की टूट-फूट को सुधारना और मरम्मत करना आवश्यक होता है वैसे ही प्राचीन संस्कृतियों में आती रहने वाली विकृतियों में भी सामयिक सुधार आवश्यक होते हैं। समय-समय पर ऋषि, महर्षि, देवदूत, सुधारक एवं अवतार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आते हैं। समय-समय पर स्मृतियां बदलती हैं और पुराने अवतारों के स्थान नये अवतार, पुराने ऋषियों के स्थान पर नये ऋषि प्रतिष्ठित होते हैं। कारण यही है कि समय के परिवर्तन के साथ-साथ मान्यताओं और प्रथा परम्पराओं में भी परिवर्तन आवश्यक होता है।

हमारे सामाजिक जीवन में आज अनेकों भयंकर कुरीतियों का समावेश हो गया है और वे लकड़ी के घुन की तरह हमें दिन-दिन काट-काट कर बर्बाद किये दे रही हैं। दहेज का प्रश्न ऐसा ही है। कुछ दिन पहले गरीबी से पीड़ित लोग थे। अब अमीरी में अन्धे हुए लोग लड़के बेचकर अपनी हैसियत बढ़ाने की हविस पूरी करते हैं। लड़की बेचने वाले क्षम्य थे क्योंकि वे गरीबी से मजबूर थे। पर यह लड़के बेचने वाले घृणा, विरोध और दण्ड के अधिकारी हैं क्योंकि अमीरी के उन्माद में इनने मानवता के साधारण सिद्धान्तों को उठाकर ताक पर रख दिया है। दहेज के अभाव में आज सुयोग्य कन्यायें दुखी जीवन बिताने और आत्म हत्या करने को मजबूर हो रही हैं। इस पैशाचिक प्रथा पर कड़ा प्रहार करने की जरूरत है अन्यथा कन्याओं का जन्म एक शोकजनक दुर्घटना ही मानी जाती रहेगी। कन्या और पुत्र के बीच जो असमानता दिखाई देती है उसका मूल कारण यह दहेज ही है।

मृत्यु-भोज हिन्दू समाज की दूसरी घृणित प्रथा है। एक ओर घर में मृत्यु हो चुकी है, एक आदमी उठ गया, घर के लोग शोक विह्वल हैं, दूसरी ओर लड्डू कचौड़ी उड़ाने की तैयारी हो रही है। एक की मृत्यु से वैसे ही घर की आर्थिक स्थिति को धक्का पहुँचता है, उस पर भी मृत्यु-भोज की कुर्की होने से रहा सहा घर खाली हो जाता है। तरस तो उन लोगों की हिम्मत पर आता है जो मृत्यु शोक से आँसू बहाते हुए लोगों के घरों में जाकर दावत उड़ाते हुए मूँछों पर ताव देते हैं और इस प्रकार के अभक्ष भोजन पर जिन्हें आत्म ग्लानि नहीं होती। इस कुरीति की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है। अन्यथा थोड़ी सी कुरीतियाँ हिन्दू परिवारों के आर्थिक ढांचे को तहस नहस करती रहेंगी।

बाल विवाह और वृद्ध विवाह से जन समाज के स्वास्थ्य पर भारी आघात पहुँचता है, यौन रोग बढ़ते हैं, सन्तान दुर्बल, रोगी और अल्पजीवी होती है, मृत्यु संख्या बढ़ती है, व्यभिचार फैलता है, मानसिक दुर्बलता बढ़ती है और रोगों का मुकाबला बुराई को रोकना भी आवश्यक है।

भूत पलीत, चुड़ैल चामड़, दई देवता, टोना टोटका, जादू मंतर के नाम पर जनता व्यर्थ ही ठगी जाती है और परेशान होती है। अज्ञान और अन्धविश्वास ही इसका मूल हेतु है। इन जंजालों की ओर से लोगों को सचेत करना होगा। इन अन्धविश्वासों पर लोग धन और समय ही नहीं गँवाते, वरन् कई बार तो प्राणों तक से हाथ धोना पड़ता है।

देवी देवताओं के नाम पर पशुबलि होना यह हिन्दू धर्म पर एक भारी कलंक है। धर्म शास्त्रों में इन घृणित कुकर्मों के लिए कोई स्थान नहीं है। मध्यकाल के स्वेच्छाकारी माँसाहारी अपने दुष्ट उद्देश्यों के लिए देवी देवताओं को माध्यम बनाकर मद्य माँस सेवन की छूट प्राप्त करते रहे हैं। राज्याश्रयी पंडित ही श्लोक, देवता और विधान गढ़ दिये। बकरीद पर दूसरे धर्म वाले जितने पशु काटते हैं, हिन्दू नवदुर्गाओं में उससे प्रायः 6 गुने पशु काट डालते हैं। अनुमान है कि बंगाल, राजस्थान और पहाड़ी प्रान्तों में करीब 4 लोग माँसाहार करें यह दूसरी बात है पर धर्म जैसे पवित्र तत्व को, देवी देवता जैसे पवित्र नाम को कलंकित किया जाय, वह यह बिलकुल दूसरी बात है। हिन्दू धर्म की महानता इससे कलंकित और नष्ट होती है। इस घृणित प्रथा का अन्त करके हमें अपने धर्म पर लगी हुई एक बड़ी कालोंच को धोना है।

शास्त्रीय वर्णाश्रम धर्म बड़ा ही उत्तम आदर्श था। गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर बनी हुई जातियाँ समाज के स्वस्थ संगठन में बड़ा योग देती रही हैं, पर उनकी उपयोगिता तभी है जब तक कि वे कार्य विभाजन तक ही सीमित रहें। जब वे एक वंश को दूसरे से, एक पेशे को दूसरे पेशे से नीचा बताती हैं, आपस में घृणा फूट और असमानता पैदा करती हैं, तो वे निरुपयोगी ही नहीं हानिकारक भी बन जाती हैं। आज हिन्दू समाज आन्तरिक भेद भाव, फूट और भिन्नता की बीमारी से क्षय रोगी की तरह पीड़ित हो रहा है। विधर्मी इसका भरपूर लाभ उठा रहे हैं। ईसाई और मुसलमानों की संस्था दिन-दिन तेजी से बढ़ती चली जा रही है। ब्राह्मण और अब्राह्मण के मतभेद बढ़ कर उत्तर दक्षिण भारत के बँटने का प्रश्न पैदा हो रहा है। यदि समय रहते हम न चेते तो भारत में एक नहीं अनेकों पाकिस्तान बटेंगे। द्रविणस्तान, सिखस्थान ही नहीं हर जाति एक एक ‘स्थान’ बनाने की माँग करेगी। चुनावों में आजकल जाति-पाँति का सिद्धान्त बहुत काम करता है। अन्य कार्यों में भी जातीय पक्षपात काम करता है। यह विप राष्ट्र के सामाजिक विकास में भारी बाधक है। इस समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके उसका हल खोजना होगा। गायत्री-परिवार इस दिशा में निष्क्रिय न रहेगा।

भारतीय नारी समाज की स्थिति भी दयनीय है। उसे घर की चहार दीवारी में पर्दे में इस प्रकार कैद किया गया है कि वह मानवोचित जीवन बिताना, परिवार की उन्नति में, सुख समृद्धि में सहायक होना तो दूर उलटे परावलम्बी होने के कारण वह अपने और दूसरों के लिए भार रूप होती है। पिता के लिए वह भार रूप, पति उसे बिना दहेज लिये मरी बछिया की तरह स्वीकार करने को तैयार नहीं, विधवा हो जाने के बाद किसी को फूटी आँख से नहीं सुहाती। नारी सब के लिए भार रूप है। कई छोटे बच्चे छोड़ कर जब निर्धन पति मरता है तो उस विधवा की क्या दुर्दशा होती है, उसे देखकर पत्थर के कलेजे भी पिघल पड़ते हैं। इस दयनीय दशा से नारी की स्थिति में कुछ सुधार करना होगा। उसे इतना अवसर जरूर दिलाना होगा, उसमें इतनी योग्यता और शक्ति अवश्य उत्पन्न करनी होगी कि वह किसी के लिए भार रूप न रहे, मुसीबत के वक्त अपने पैरों पर खड़ी हो सके और अपनी क्षमता के आधार पर घर के लिये एक अच्छी सहायक सिद्ध हो सके।

हमारे तीज त्यौहार, पर्व, व्रत, उपवास, तीर्थ, षोडश संस्कार, पंडित पुरोहित, साधू बाबाजी एक ढकोसला मात्र रह गये हैं। इनके पीछे जो आदर्श, सिद्धान्त, कार्यक्रम एवं संदेश छिपे हुए थे वे तो गायब हो गये केवल निर्जीव लाश की तरह इनका ढकोसला जीवित है। भारतीय संस्कृति के महान आदर्शों को जागृत रखने के लिए यह सभी कर्मकाँड, पर्व एवं धर्म सेवी नितान्त आवश्यक हैं। उनको उपयोगी एवं सामाजिक प्रगति में सहायक बनाकर ही प्राचीन काल की भाँति हम सामाजिक सुख शाँति की ओर बढ़ सकते हैं। इस क्षेत्र में समुचित सुधार की ओर बढ़ सकते हैं। हिन्दू धर्म में दान के नाम पर धन का भारी अपव्यय होता है। यदि वह सच्चे धर्म कार्यों में लगे तो यह देश सच्चे अर्थों में धर्मात्मा बन जाय, धर्म की स्थिरता एवं आय वृद्धि में भारी सहायता मिले। कुपात्रों के हाथों में दान जाने से अनेकों अनैतिकताएं, एवं बुराइयाँ पैदा होती हैं, इन्हें रोकने के लिए दान देते समय उसके सदुपयोग दुरुपयोग का, पात्र कुपात्र का, परिणाम का, विवेक जागृत करना होगा। तभी हिन्दू धर्म की उदार दान परम्परा का समुचित सत्परिणाम उत्पन्न हो सकेगा।

इसके अतिरिक्त खाद्य पदार्थों में मिलावट, नकली सस्ती अपूर्ण औषधियों का निर्माण, अभक्ष भोजन, नशेबाजी, व्यभिचार, सिनेमा, गंदी गालियाँ, अशिष्ट व्यवहार, आलस्य, फैशनपरस्ती, विलासिता, शेखी खोरी आदि अनेकों सामाजिक बुराइयाँ ऐसी हैं जिनको दूर करने के लिए पूरा प्रयत्न करना होगा। गौ रक्षा, जीव दया, जैसी कितनी ही समस्याओं को मानवीय दृष्टिकोण से हल करना है।

गरीब और अमीरों के बीच जो बहुत भारी असमानता है वह कम करनी होगी। बेकारी और गरीबी से, अशिक्षा और अविद्या से टक्कर लेनी होगी। राजनीति में जो ढील पोल चल रही है उससे अनैतिकता दिन-दिन बढ़ रही है। अनुशासन, नियन्त्रण और दण्ड का सूत्र निर्बल एवं ढुलमुल होने के कारण समाजद्रोही तत्वों को खुल कर खेलने का अवसर मिल रहा है, इन छेदों को बन्द करना होगा।

युग निर्माण की दिशा में अनेक काम करने को पड़े हैं। उनकी जिम्मेदारियों से इनकार करने से काम न चलेगा वरन् आवश्यक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए हमें तत्पर होना पड़ेगा। भावनात्मक बौद्धिक एवं सामाजिक क्राँति का, समाज में स्वस्थ परिस्थितियाँ आया है उसे पूरा करने के लिए हमें सब प्रकार तत्पर होना होगा।

गायत्री परिवार धर्म संस्था है। राष्ट्र के बौद्धिक और सामाजिक जीवन को धर्ममय बनाने की जिम्मेदारी स्वभावतः उसकी है। महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद हम सब ठोस रचनात्मक कार्यक्रम के आधार पर इसी दिशा में अग्रसर होंगे। इस महा अभियान के लिए हमें अभी से तैयार रहना चाहिए।


ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का ब्रह्म-भोज

ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत पुरश्चरण की शास्त्रोक्त प्रक्रिया के अनुसार जप, पाठ, लेखन, हवन की प्रक्रियायें चल रही हैं। ब्राह्मण, ब्रह्म का, ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान-प्रचार के महान कार्य का सम्पादन करने के कारण ही, अन्य सब मनुष्यों जैसे व्यक्ति को ब्राह्मण कहलाने का गौरव मिलता है। आज यदि ऐसे ब्राह्मण नहीं मिलते, जिन्हें अन्न खिलाना सफल माना जा सके, तो कोई चिन्ता की बात नहीं है। सद्ज्ञान के मूल तत्व को ग्रहण करके इसे फैलाने के कार्य को हाथ में लिया गया है। जितने पैसे का अन्न ब्राह्मण को खिलाया जाता उतने पैसे का साहित्य वितरण किया जा रहा है। इससे ब्रह्म-भोज का मूल लक्ष भली प्रकार पूरा होता है। प्रसन्नता की बात है कि महायज्ञ के होता, यजमानों ने ब्रह्म-भोज की महान प्रक्रिया के रूप में सत्साहित्य वितरण को स्वीकार कर लिया है और इस दिशा में उन्होंने उत्साहपूर्वक कार्य किया है। गायत्री माता और यज्ञ पिता का सन्देश घर-घर पहुँचाने का कार्य इस ब्रह्म-भोज द्वारा ही सम्पन्न किया जा रहा है। 24 लाख व्यक्तियों को गायत्री माता और यज्ञ पिता का महत्व समझाकर उन्हें उपासना तथा आत्म निर्माण के पथ पर अग्रसर करने का संकल्प ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का ब्रह्म-भोज है। इस कार्य-क्रम को महायज्ञ के होता यजमानों ने बड़े उत्साह और साधकोचित श्रद्धा से सम्पन्न किया है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान साहित्य का बड़ी संख्या में वितरण किया जा रहा है तथा ज्ञान मन्दिरों की स्थापना प्रत्येक गायत्री प्रेमी के घर पर की जा रही है। ज्ञान मन्दिर सैट को 10 व्यक्तियों को पढ़ाकर धर्म प्रचारक या उपाध्याय बनने के लिए सभी सच्चे साधक प्रयत्नशील हैं। यही परम्परा आगे भारत भूमि में ऋषि-युग लाने का प्रधान आधार बनेगी।

अन्य दान की अपेक्षा ज्ञान दान का पुण्य सौ गुना अधिक माना गया है। इस साहित्य से प्रभावित होकर थोड़े से व्यक्ति भी यदि सत्मार्गगामी हो सकें तो उसका अक्षय पुण्य उस साहित्य वितरण करने वाले को मिल सकता है। महायज्ञ में इस ब्रह्म भोज को इसलिए और भी महत्व दिया गया है कि आगे वर्षों में लाखों-करोड़ों भारतवासियों के अन्तःकरण में से आसुरी वृत्तियों, व्यक्तिगत बुराइयों तथा सामाजिक कुरीतियों को हटाने का कार्य करना है। उस उखाड़-पछाड़ के लिए खुरपी, कुदाली और फावड़े का कार्य यह सत्साहित्य ही देगा। आगे के लिए गायत्री-परिवार के सक्रिय कार्यकर्ताओं को यह कार्य एक धर्म कर्तव्य की तरह सौंपा जायगा कि वे प्रतिदिन आधी-आधी रोटी दोनों समय कम खायें और एक छटाँक अन्न बचा-कर उसकी कीमत दो पैसा प्रतिदिन ब्रह्मभोज में लगावें। हर व्यक्ति के यहाँ कुछ बच्चे होते हैं, हर बच्चा एक दो पैसा आसानी से बिगाड़ देता है। समझना चाहिए एक बच्चा गायत्री माता भी है, दो पैसा प्रतिदिन उसके लिए भी दिया करेंगे। हर सद्गृहस्थ के घर में एक रोटी गाय के लिए निकलती है। हर गृहस्थी में एक रोटी कुत्ते को भी पड़ती है। इसी प्रकार एक रोटी या एक छटाँक अन्न ब्रह्म-भोज के लिए-ज्ञान दान के लिए निकाला जाना चाहिए। हर साधक प्रतिज्ञा करे कि वह एक छटाँक अन्न या दो पैसा रोज इस परम पुनीत कार्य के लिए जीवन भर निकालता रहेगा। जिन पर मानसिक दुर्बलता, अश्रद्धा या कंजूसी सवार नहीं है, वे साधक आर्थिक कठिनाई होते हुए भी इतना छोटा त्याग बड़ी आसानी से कर सकते हैं।

गत वर्ष प्रचार के उद्देश्य से प्रति पंद्रहवें दिन एक छोटी पुस्तिका प्रकाशित करने की घोषणा की गई थी। प्रत्येक व्रतधारी, गायत्री-परिवार का कार्यकर्ता अपने निकटवर्ती, धर्म रुचि के दस व्यक्तियों के नाम नोट करेगा और प्रत्येक अमावस्या व पूर्णिमा को उस पुस्तिका को उन नियत दस व्यक्तियों को देने जाया करेगा। इस प्रकार प्रतिमास दो पुस्तिका के हिसाब से एक वर्ष में 24 पुस्तिकाएं उन दश व्यक्तियों की भेंट करेगा। उन छोटी पुस्तिकाओं में जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर बड़े ही मार्मिक रूप से विचार रहेंगे, ऐसे विचार कि जिन्हें अपनाने से जीवन की काया-पलट ही हो सके।

प्रतिदिन दो पैसा रोज के हिसाब से एक महीने में एक रुपया हुआ। इतना खर्च करते रहने से एक वर्ष में 10 व्यक्तियों के घर 24-24 बार 24-24 पुस्तिका भेंट करने जाया जाय तो पिछली बार दी गई पुस्तिका के सम्बन्ध में कुछ धर्म-चर्चा करनी चाहिए। इससे उन दसों व्यक्तियों के साथ 24-24 बार धर्म-चर्चा करने का मौका मिलेगा। इतना प्रयत्न करने पर निश्चय ही उन 10 व्यक्तियों में से कुछ पसीजेंगे। जो पसीज जाएं उन्हें भी इसी प्रकार दो पैसा रोज या एक मुट्ठी अन्नदान करके—ब्रह्मभोज करने के लिए तैयार करना चाहिए।

इस प्रकार यह सद्ज्ञान की सेवा-शृंखला-एक से दूसरे में-दूसरे से तीसरे में बढ़ती चलेगी। एक व्रतधारी धर्म-सेवक एक वर्ष तक 10 व्यक्तियों को सत्साहित्य पढ़ायेगा। अगले वर्ष वह दूसरे नये दस पाठक ढूँढ़ेगा और गत वर्ष की भाँति इन नये पाठकों को इन पुस्तिकाओं को पढ़ायेगा। इस प्रकार प्रतिवर्ष दस नये पाठक ढूंढ़ने की प्रक्रिया चालू रखकर, यदि उसका शेष जीवन 20 वर्ष भी रहा तो भी, 200 नये पाठक बना सकेगा। दो पैसा प्रतिदिन या एक मुट्ठी अन्न जैसे अत्यन्त साधारण दान का महत्व तो देखिए। उसके द्वारा एक व्यक्ति अपने जीवन में 200 या उससे भी अधिक व्यक्तियों को लगातार एक वर्ष तक धर्म-शिक्षा देने के महान् पुण्य का भागी बन सकता है। इन बड़ी संख्या के पाठकों में से यदि थोड़े लोगों में भी कुछ सुधार हो सका तो परिणाम निश्चय ही बड़े महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

यह क्रम एक से दूसरे को सीखना है। व्रतधारी धर्म-प्रचारक ने इस वर्ष जिन 10 व्यक्तियों को लगातार साल भर तक पुस्तिकाएं भेंट की हैं उन्हें भी कुछ करने के लिए वह प्रेरित करेगा। इन पढ़ने वालों के जिम्मे आरम्भ में ही यह सेवा सौंपनी चाहिए कि वह प्राप्त हुई इस भेंट पुस्तिका को कम से कम दो व्यक्तियों को पढ़ावें। इस प्रकार वे दस व्यक्ति यदि दो-दो नये पाठकों को उसे पढ़ाये तो बीस व्यक्ति इनके द्वारा भी पढ़ाये जा सकते हैं। दस पाठक और उनके द्वारा बनाये हुए बीस उप पाठक इस प्रकार एक व्रतधारी एक वर्ष में तीस व्यक्तियों के लिए धर्म-शिक्षा की व्यवस्था कर सकता है। जिस स्थान में पढ़े हुए व्यक्ति न हों व कम संख्या में हों वहाँ उनको पुस्तकें पढ़कर सुनाने से भी यह उद्देश्य पूरा हो सकता है।

एक वर्ष जिनके घर 24 बार जाया गया है, जिन्हें 24 पुस्तिकाएं भेंट की गई हैं, जिनसे 24 बार मौखिक धर्म-चर्चा हुई है, उनको इसके लिए भी तैयार किया जाना चाहिये कि वे भी इसी प्रकार दो पैसा प्रतिदिन का ब्रह्मभोज करने और पन्द्रह दिन बाद 10 व्यक्तियों के घर धर्म-चर्चा करने की धर्म फेरी करने जाने के लिए तत्पर हैं। उनके जी में यदि थोड़ी भी श्रद्धा के, परमार्थ के, धर्म-सेवा के बीजाँकुर जमे तो दूसरों से एक वर्ष तक इतनी महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सहायता, स्वाध्याय और सत्संग की सुविधा प्राप्त करने के पश्चात् वे स्वयं भी धर्म प्रचारक व्रतधारी उपाध्याय बन सकते हैं।

यह क्रम गुणनफल के हिसाब से आगे बढ़ेगा। एक व्यक्ति ने दस नये व्यक्तियों को धर्म शिक्षा प्राप्त करने वाला पाठक बनाया। अगले वर्ष वे दस व्यक्ति भी दस-दस ऐसे ही पाठक बनावें तो उनकी संख्या दूसरे वर्ष एक सौ हो जायगी। तीसरे वर्ष वे सौ व्यक्ति दस गुने करके हजार बन जावेंगे। चौथे वर्ष वे हजार दस हजार बनेंगे। पाँचवें वर्ष उनकी संख्या एक लाख हो सकती है।

कुछ पाठक अपना कर्तव्य पालन न करें, केवल एक चौथाई-केवल दो-तीन ही शृंखला चला सके तो भी बीस वर्ष में एक व्यक्ति की चलाई हुई शृंखला एक लाख व्यक्तियों तक पहुँच सकती है। यह एक व्यक्ति के एक वर्ष के प्रयत्न की शृंखला बढ़ने का परिणाम है। वह मूल व्रतधारी एक वर्ष ही धर्म-सेवा करके बन्द होने वाला नहीं है, आगे भी वह अपना क्रम जीवन भर जारी रखेगा। ऐसी दशा में उस एक व्रतधारी का प्रयत्न भी उसके जीवन के अन्त तक लाखों-करोड़ों मनुष्यों को ज्ञान-दान से—ब्रह्मभोज कराने में सफल हो सकता है।

गायत्री महायज्ञ के होता-यजमानों की संख्या बहुत बड़ी है। उनमें से कितने ही अधिक उत्साही हैं। कुछ बड़े यज्ञ का नाम सुनकर जल्दी जल्दी बहुत पुण्य लूट लेने और इसके बाद उस तत्व को भूल जाने वाले होंगे। पर निश्चय ही उनमें से एक बड़ी संख्या विचारशील एवं विवेकवानों की भी होगी,जो युग निर्माण के वास्तविक आधार-स्वाध्याय और सत्संग का—ब्रह्मभोज का-महत्व समझते हैं और इतने आवश्यक एवं महान कार्य के लिए दो पैसा या एक मुट्ठी अन्न प्रतिदिन का दान कर सकते हैं। दस व्यक्तियों के यहाँ जाकर उनसे महीने में दो बार एक-एक घण्टा धर्म-चर्चा करने के लिए बीस घण्टा खर्च कर सकते हैं।[1] प्रतिदिन पौन घण्टे के औसत के हिसाब से समय दान,[2]उन व्यक्तियों के घरों पर जाने का कष्ट सहने का श्रमदान [3]दो पैसा या एक मुट्ठी अन्न का धनदान, यह तीनों ही प्रकार के दान करते रहने से व्रतधारी सच्ची धर्म सेवा करते हुए अपना जीवन सफल बना सकता है। गायत्री उपासना के जप,ध्यान के साथ-साथ यह ब्रह्मभोज भी जिन साधकों के जीवन में चलता है वस्तुतः वो ही सच्चे साधक हैं, उन्हीं की साधना धन्य है, वो ही लोक-परलोक में सच्ची सुख-शान्ति की स्थापना करेंगे।

असुरता और देवत्व का मूल निवास हमारे मानसिक क्षेत्र में ही रहता है। यदि मनुष्य जाति को दैवी गुणों से विभूषित करके इस पृथ्वी पर स्वर्गीय वातावरण की स्थापना करनी हो तो हमें जन-मानस में घुसी हुई असुरता को हटाने के लिए तीव्र संघर्ष एवं कठिन परिश्रम करना होगा। इस संघर्ष में स्वाध्याय और सत्संग, लेखनी और वाणी ही हमारे प्रधान हथियार हो सकते हैं। असुरता को मार भगाने के लिए लेखनी का-स्वाध्याय का-यह उपरोक्त व्यापक कार्यक्रम बड़ा ही उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

सत्संग का कार्यक्रम हमारे साप्ताहिक सत्संगों में और सामूहिक यज्ञों में चलेगा। आर्थिक कठिनाई की दृष्टि से यह यज्ञ छोटे और कम खर्च के बनाये जा सकते हैं कम संख्या में सस्ते हवन-पदार्थों की आहुतियाँ दी जा सकती हैं। पर सत्संगों के लिए-सामूहिक एकीकरण के लिए इन यज्ञों को माध्यम बनाना चाहिये। नवरात्रियों में पर्व त्यौहारों पर, या जब सुविधा हो, सामूहिक यज्ञ आयोजन किये जा सकते हैं और उनमें धर्म प्रचार के कार्यक्रम रखकर जनता को सन्मार्ग पर चलने की, सद्विचारों को ग्रहण करने की, तर्क और विवेक को अपनाने की, प्रेरणा दी जा सकती है। प्रवचन का अवसर अपनी संस्था की वेदी पर केवल उन्हें ही दिया जाय जो युग धर्म को पहचानते हों और धर्म के नाम पर मूढ़ता फैलाने में नहीं, नैतिकता, मानवता एवं विचारशीलता को विकसित करने में विश्वास रखते हों।

गायत्री-परिवार को यह दोनों अस्त्र-शस्त्र सँभालने हैं। ब्राह्मणत्व की महान परम्परा को नष्ट-भ्रष्ट होने से बचाना है, उसे जीवित रखना है तो ब्रह्मभोजों के पुनीत धर्म कृत्य को कुछ निठल्लों को लूट-मार करते रहने का माध्यम नहीं बना रहने दिया जा सकता है। इसमें सुधार करना होगा और जन मानस को पवित्र बनाने के लिए इस ब्रह्मभोज की परम पुनीत धर्म-भावना को लोकोपयोगी बनाना होगा। हम लोग अब दृढ़ता और तत्परतापूर्वक इसी मार्ग पर अग्रसर होंगे।


प्रगति प्रवाह

महायज्ञ में आने वालों को सूचनायें

(1) कोई श्रद्धालु दर्शक आना चाहे तो उनके ठहरने भोजन आदि की भी व्यवस्था की जा सकती है। पर उसकी सूचना एक महीने पहले अवश्य आनी चाहिए। यज्ञ-नगर की सीमा में हुक्का, बीड़ी पीना निषिद्ध होगा। जो दर्शक इस नियम को पालन कर सकें वे ही यज्ञ नगर में ठहराये जा सकेंगे। रोगी, गंदे, झगड़ालू, नशेबाजी, यज्ञ कार्यों से उदासीन, आलसी, अनुशासन व्यवस्था एवं सफाई के नियमों से अपरिचित लोगों को दर्शक रूप में भी यज्ञ-नगर में न ठहरने दिया जायगा। उनके कारण यहाँ की पवित्रता एवं व्यवस्था में गड़बड़ी पड़ती है।

(2) महायज्ञ में सम्मिलित होने के नर-नारियों के अधिकार समान हैं। दोनों ही महायज्ञ में बिना किसी प्रतिबन्ध के समान रूप से सम्मिलित होंगे, पर बहुत छोटे बच्चों वाली महिलाएं बिना समुचित व्यवस्था के न आवें। मथुरा में ठंड अधिक पड़ती है। जमीन पर तम्बुओं में सबको सोना है। स्नान,भोजन आदि भी असुविधाजनक ही रहेगा। इसका प्रभाव छोटे बच्चों पर पड़ सकता है। वे अस्वस्थ हुए तो उनके कारण माताओं को तथा उनके साथ वालों को असुविधाएं बढ़ेंगी। इसलिए जिनके साथ अच्छे सहायक या नौकर हों, बिस्तर आदि की पूरी व्यवस्था हो जिनके बच्चे अधिक स्वस्थ हों वे ही महिलाएं आवें।

(3) प्रत्येक याज्ञिक को महायज्ञ के दिनों में पीले वस्त्र धारण करने चाहिये। धोती तथा कंधे पर दुपट्टा हर याज्ञिक का पीला होना चाहिये। इसकी व्यवस्था घर से ही करके लानी चाहिए। पैन्ट, पाजामा या नेकर पहन कर यज्ञ में बैठना न हो सकेगा।

(4) शाखाएं अपने झण्डे साथ लावें तथा कपड़े पर बने हुए ऐसे बोर्ड बना कर लावें जिन्हें दोनों ओर बाँस लगाकर जुलूस में ले चलें तथा ठहरते समय उसे ब्लॉक के तम्बुओं के आगे लगा दिया जाय। रास्ते में भी इन झण्डों से, कपड़े के बोड़ों से, पीली पोशाक पहन कर चलने से महायज्ञ का प्रचार होता है। गायत्री-परिवार का झण्डा पीला रंगा हो बीच में सूर्य का गोला लाल रंग से बनाया जाय, उसके बीच में ‘ॐ भूर्भुवः स्वः” लिखा रहे।

(5) आते समय रास्ते में बाँटते आने के लिये कुछ पर्चे भी प्रत्येक शाखा को मँगा लेने चाहिएं। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का साहित्य जितना वजन 6) रु. में दिया जाता है, उतने ही वजन के पर्चे पोस्टर भी उतने ही मूल्य में दिये जा सकते हैं। रास्ते में बाँटने के लिए पुस्तकों की अपेक्षा यह पर्चे तथा पोस्टर ही उपयुक्त हैं। इसी उद्देश्य के लिये छोटे साइज का एक पोस्टर तथा पीठ पर विज्ञप्ति का पर्चा छपाया जा रहा है। यह 6) में कई हजार की संख्या में प्राप्त हो सकेगा। जिन लोगों ने अभी ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान साहित्य नहीं मंगाया है, उनके पैसे इकट्ठे करके अब यही “छोटे पर्चे पोस्टर” मंगाने चाहिए और यज्ञ के अन्तिम दिनों में इनका पूरे जोश के साथ गाँव-2 में प्रचार करना चाहिये, ताकि महायज्ञ का सन्देश अधिकतम जनता तक पहुँच सके। छोटे पर्चे पोस्टर, दुकानों तथा मकानों की किवाड़ों पर चिपकाने के काम में भी बड़ी सुन्दरतापूर्वक आ सकते हैं।

(6) गायत्री-परिवार के उत्साही कार्यकर्ताओं का कर्तव्य है कि, महायज्ञ से जितने अधिक दिन पूर्व सम्भव हो सके अपने घरेलू कार्यों से छुट्टी लेकर अपने क्षेत्र में प्रचार कार्य के लिए पूरी शक्ति के साथ जुट जावें। कई साथियों के साथ एक मण्डली के रूप में यह धर्म फेरी और भी शोभनीय तथा प्रभावशाली बन सकती है। अपनी पहुँच जितनी दूर तक के क्षेत्रों में सम्भव हो उतने में दौरा करना चाहिये। दौरे में निम्न कार्यक्रमों का ध्यान रखा जाय :—(1) हर गाँव तथा घर में महायज्ञ का सन्देश पहुँचाने के लिये पर्चे बाँटना तथा पोस्टर चिपकाना (2) इस अलभ्य अवसर पर यज्ञोपवीत संस्कार कराने की एवं गुरु मन्त्र लेने की महत्ता बताकर इस पुण्य संस्कार को कराने के इच्छुकों को अधिक संख्या में प्रोत्साहित करना (3) होता यजमानों का तैयार रहने और चलने का कार्यक्रम बनाने के लिए उनसे मिलना (4) अपने क्षेत्र से अधिक स्वेच्छा-सहयोग एकत्रित करना (5) विशिष्ठ धर्म प्रेमियों को यज्ञ में पधारने के लिए आमंत्रित करना (6) मन्त्र लेखन की कापियाँ अधिकतम लोगों से लिखाकर महायज्ञ के लिए लेखन श्रद्धाँजलियाँ संग्रह करना।

(7) अपने घरों पर सभी लोग सुख सुविधा की जिन्दगी व्यतीत करते हैं। तपोभूमि में आने का उद्देश्य तप करना है। उन दिनों तम्बुओं में ठहरने जमीन पर सोने जमुनाजी के ठंडे पानी से नहाने, घटिया किस्म का भोजन करने की प्रायः सभी को असुविधा रहेगी। यह एक प्रकार का तप है। प्राचीन काल में लोग लम्बे-लम्बे दिनों तक तप करते थे, अब भी उस परम्परा को चार-छह दिन जीवन में लाने से किसी को घबराना न चाहिए। अपने लिए विशेष सुविधा की, कई आराम पसंद लोग प्रार्थना करते हैं। उन्हें यही मान कर चलना चाहिए कि यह तप का समय है। श्रीकृष्ण और सुदामा को एक साथ,एक स्थिति में गुरु आश्रम में रहने, पढ़ने तथा साधना करने की परम्परा का अवसर है। चार दिन यहाँ असुविधा उठाने तथा तप करने जो जा आ सकें उन्हें ही यहाँ आना चाहिए।

(8) जिन होता यजमानों का जप उपवास पूरा नहीं हो सके उन्हें उतना जप, उपवास तपोभूमि से उधार लेकर उसकी पूर्ति अगले वर्ष कर देने की सुविधा दी जा सकती है। यों 2400 मन्त्र लेखन बहुत ही सरल है।

(9) ता.13 अक्टूबर से महायज्ञ की पूर्णाहुति तक 6 सप्ताह का शिक्षण शिविर होगा। इसमें तपोभूमि के मिशन, मूल मन्तव्य तथा आगामी कार्यक्रम सम्बन्धी विविध विषयों पर शिक्षण दिया जायगा। सामूहिक यज्ञ आयोजन की शास्त्रीय एवं व्यवहारिक शिक्षा प्राप्त करने का जितना उत्तम अवसर यह है वैसा फिर मिल सकना कठिन है। इसलिए जिन्हें इन विषयों में अभिरुचि हो वे 1॥ महीने के लिए शिविर में मथुरा आने का प्रयत्न करें।

शिविर में केवल पढ़ते रहने या बैठे-बैठे शिक्षा प्राप्त करते रहने का ही कार्य नहीं है वरन् महायज्ञ की आवश्यकताओं की व्यवस्थाओं में सक्रिय हाथ बंटाने के लिए कटिबद्ध रहना होगा। इसलिए उत्साही निरोग, स्फूर्तिवान, सेवा भावी, अनुशासन में रहने वाले, निर्व्यसनी मधुरभाषी एवं उदार प्रकृति के लोग ही उसमें आवें। बूढ़े, बीमार, अशिक्षित, नशेबाज, अहंकारी, काम से जी चुराने वाले, अनुशासन में न रहने वाले, उद्दण्ड, स्वार्थी प्रकृति के शिक्षार्थी इस शिविर में न आवें। अपने मार्ग व्यय की स्वयं व्यवस्था करनी चाहिए। भोजन तथा ठहरने का प्रबन्ध तपोभूमि में है ही।

सरल और सस्ता वेद भाष्य

हिन्दू धर्म का मूल उद्गम वेद हैं। वेदों में ज्ञान विज्ञान का अजस्र स्रोत भरा हुआ है। प्राचीन काल में प्रत्येक हिन्दू के लिये वेद पढ़ना एक आवश्यक धर्म कर्तव्य था। यज्ञोपवीत धारण करने का संस्कार होने के साथ ही वेदारम्भ संस्कार भी होता था जिसका उद्देश्य प्रत्येक यज्ञोपवीत धारी को वेद ज्ञान की समुचित शिक्षा प्राप्त करना होता था। प्रत्येक वेद का एक-एक मंत्र तो यज्ञोपवीत संस्कार के दिन वेदारम्भ करते समय आज भी बताया जाता है। अब तो यह प्रथा एक चिन्ह पूजा मात्र रह गई है। वेदों का पढ़ना-पढ़ाना अब एक प्रकार से बिल्कुल ही छोड़ दिया गया है।

मुसलमान कुरान पढ़ते हैं सुनते हैं कम से कम मानते तो हैं। ईसाई भी कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो कहे कि हमने बाइबिल को न पढ़ा है, न सुना है, न देखा है। पर हिन्दू लाखों करोड़ों ऐसे मिलेंगे जो यह कह सकते हैं कि वेद को पढ़ना दूर उन्होंने उसे देखा तक नहीं है। यह हमारे लिए सचमुच ही एक बड़े कलंक की बात है।

गायत्री-परिवार भारतीय संस्कृति के प्रमाण आधार गायत्री यज्ञ एवं वेदों का पुनरुत्थान करने के लिए प्रयत्नशील है। उसने निश्चय किया है कि वेदज्ञान को घर-घर पहुँचाने के लिए वैसा ही प्रयत्न किया जाय जैसा ईसाइयों ने सारे संसार की भाषाओं में बाइबिल के अत्यन्त सस्ते संस्करण प्रकाशित एवं प्रचारित करके किया है।

वेद क्लिष्ट संस्कृत में हैं। इनके प्रामाणिक भाष्य संस्कृत भाषा में सायण, महीधर, उव्वट एवं राक्षस राज रावण ने किये हैं, वे भाष्य संस्कृत के विद्वानों के समझने योग्य हैं। हिन्दी भाषा में केवल आर्य समाज ने चारों वेदों के भाष्य किये हैं, इसमें उनके मत के दृष्टिकोण को ही प्रधान रखा गया है। सनातन धर्म के दृष्टिकोण से कहीं-कहीं से एक दो वेदों का हिन्दी अनुवाद छपा है। वह हिन्दी टीका भी ऐसी कठिन है कि साधारण हिन्दी जानने वाला तो पूरा भाष्य पढ़ जाने पर भी कुछ समझने में असमर्थ ही रहता है।

इस एक बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति के लिए अगले वर्ष महायज्ञ के बाद चारों वेदों का सरल सुबोध हिन्दी भाष्य करने का निश्चय किया है। यह मनगढ़न्त अपने निज के दृष्टिकोण के आधार पर नहीं वरन् प्राचीन समय के सायण, उब्बट, महीधर, रावण के सनातन धर्मी भाष्यों के आधार पर होगा और सरल इतना बनाया जायगा कि साधारण किसान,मजदूर, महिलाएं, बच्चे तथा कम पढ़े लोग भी बड़ी आसानी से समझ सकें और वेद की महान शिक्षाओं का लाभ उठा सकें। इन चारों वेदों का मूल्य इतना सस्ता रखा जाएगा कि संसार भर में अब तक छपे कहीं के भी वेद प्रकाशन की अपेक्षा इनका मूल्य अत्यन्त कम रहे। लागत मात्र में यह ग्रन्थ सबको उपलब्ध किए जावेंगे।

कार्य काफी कठिन एवं श्रमसाध्य है। पर जिस माता की प्रेरणा से अन्य कठिन कार्य सरल होते हैं उन्हीं की इच्छा से यह भी पूर्ण होकर रहेगा, ऐसी आशा है।

वेद पारायण यज्ञ

गायत्री तपोभूमि में अन्य दैनिक कृत्यों के साथ-साथ यज्ञ का कार्यक्रम भी नियमित रूप से चलता रहता है। कभी न बुझने दी जाने वाली अग्नि को विधिवत् प्रज्ज्वलित रखा जाता है। नित्य गायत्री यज्ञ के साथ-साथ चारों वेदों का पारायण यज्ञ भी साथ-साथ चलता रहता है।

यजुर्वेद, ऋग्वेद, अथर्ववेद सामवेद इन चारों के सम्पूर्ण मन्त्रों का पारायण की पूर्णाहुति का समय भी प्रतिवर्ष जेष्ठ सुदी 10 गायत्री जयन्ती ही रहा करेगा। इस प्रकार नियमित रूप से चारों वेदों के पारायण यज्ञ की व्यवस्था देश में कहीं विरले ही स्थान पर देख पड़ेगी।

यह परम्परा हम भी शुरू करें

जैन समाज में यह एक बड़ी ही प्रशंसनीय प्रथा आरम्भ हुई है कि वे लोग अपने बड़े-बड़े धर्म-मेलों के अवसर पर अपने विवाह योग्य कन्या-वरों को ले जाकर उन धर्म-स्थानों पर ही विवाह संस्कार करा देते हैं। इससे कई लाभ हैं :—(1)बड़े धर्म-स्थानों पर एवं पुण्य पर्वों पर ब्रह्मनिष्ठ महात्माओं के प्रत्यक्ष आशीर्वाद के साथ सम्पन्न हुए विवाह सब सफल होते हैं। उनमें वर-वधू के सम्बन्ध जीवन भर मधुर रहते हैं और धन, संतान एवं सुहाग की दृष्टि से भी वे सफल होते हैं। 2) घर पर विवाह करने में भारी प्रीति-भोज, बारात, गाजे-बाजे, सामाजिक प्रथा परम्पराओं के व्यर्थ के तथा खर्चीले झंझटों से छुटकारा मिल जाता है। इन धर्म-स्थानों पर अल्पकाल में कन्या और वर पक्ष के दस पाँच आत्मीय सगे-सम्बन्धी ही आपस में मिलकर अत्यन्त प्रेमपूर्वक सब काम कर लेते हैं।

यह प्रथा बहुत ही उत्तम है। इसे गायत्री-परिवार को भी अपनाना चाहिए। सम्भव हो तो यह कार्य गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति से ही आरम्भ किया जाय। जिस प्रकार यहाँ बिना किसी खर्चे के किन्तु पूर्ण विधि -विधान के साथ यज्ञोपवीत संस्कार होते हैं,वैसे ही विवाह संस्कार भी बहुत ही उत्तम रीति से सम्पन्न होंगे। जिनने अपने विवाह सम्बन्ध पक्के कर रखे हों या कर रहे हों, वे महायज्ञ के समय विवाह संस्कार करने की तैयारी करें। ऐसे विवाह जहाँ आर्थिक दृष्टि से खर्च और आडम्बर विहीन होने से बड़े सुविधाजनक रहेंगे वहाँ आध्यात्मिक दृष्टि से भी इनकी सफलता निश्चित है। ऐसे विवाहों का परिणाम सुख, सुहाग,धन, संतान सभी दृष्टियों से उत्तम होगा। जिनके लड़की-लड़के मंगली तथा अशुभ ग्रहों वाले हैं उनके लिए तो अनिष्ट शाँति का यह अवसर स्वर्ण सुयोग के समान है।

पूर्णाहुति के लिए “स्वेच्छा सहयोग“

महायज्ञ की पूर्णाहुति के विशाल कार्यक्रम के लिए किसी से न माँगने का व्रत लिया गया है। इसका उद्देश्य केवल अयाचित, सच्ची-श्रद्धा से प्राप्त धन से ही किसी प्रकार काम चला लेना है। कोई व्यक्ति इस भ्रम में न रहे कि संस्था के पास कोई धन राशि जमा है या किन्हीं धनी लोगों ने इस भार को उठाया है। ऐसी बात बिलकुल भी नहीं है। संस्था के पास कुछ भी जमा नहीं है, न किसी धनी आदमी ने इस कार्य का बोझ अपने ऊपर लिया है। यह गायत्री-परिवार का यज्ञ है, उन्हीं की बूँद-बूँद प्राप्त होने वाली श्रद्धाँजलियों से यह पूरा होगा। माँगा नहीं गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि देने पर कोई प्रतिबन्ध है। कोई देगा तो न लिया जायगा ऐसी बात भी नहीं है।

महायज्ञ के समय आने वाले याज्ञिक अपने अपने श्रद्धालु पास-पड़ौसियों से हवन शाकल्य की वस्तुएं संग्रह करके अपने साथ ला सकते हैं ओर उनकी और से वे वस्तुएं स्वयं अपने हाथों हवन कर सकते हैं। तिल, जौ, चावल,शक्कर हवन सामग्री यहाँ मथुरा में ही शास्त्रोक्त विधि से बनाई जायगी। बाजारू हवन सामग्री का उपयोग इस यज्ञ में न होगा। उसे खरीद कर कोई न भेजे। बिना पिसी हवन औषधियाँ स्वीकार की जा सकती हैं।

घी का प्रश्न काफी पेचीदा है। हवन के लिए पूर्ण शुद्ध घी चाहिए, जिसमें रत्ती भर किसी प्रकार की मिलावट न हो। बाजार में ऐसा घी मिलता नहीं। यदि याज्ञिक अपने घरों से या अन्य उदार सज्जनों के यहाँ से विश्वस्त घी इकट्ठा करके ला सकें तो इससे यज्ञ कार्य में सचमुच बड़ी सहायता मिलेगी, दान का माध्यम बहुत ही उत्तम है। उत्साही सज्जन इसके लिए कुछ विशेष प्रयत्न करें।

हवन में एक सौ आहुतियों के पीछे एक रुपया खर्च आता है। सामग्री, घी, समिधा, पूजा पदार्थ आदि हवन सम्बन्धी कुल खर्च मिलाकर एक रुपये में एक सौ आहुति पूरी हो जाती हैं। कोई सज्जन इस यज्ञ में अपनी ओर से कुछ आहुतियाँ कराना चाहें तो उसका व्यय भर अपने ऊपर ले सकते हैं।

भोजन पर एक आदमी के लिए दोनों समय में करीब नौ आना प्रतिदिन खर्च पड़ने की सम्भावना है। परिवार के कोई सज्जन कुछ याज्ञिकों का भोजन व्यय अपने ऊपर लेना चाहें तो उसकी व्यवस्था अपनी ओर से कर सकते हैं। आटा, चावल, दाल आदि खाद्य सामग्री भेजी जा सकती है। हवन के लिए सुविधाएँ तथा भोजन पकाने की लकड़ी की व्यवस्था हो तो वहाँ से लोग इन चीजों को भेज सकते हैं।

ठहरने के लिए तम्बू लगाने पर हर व्यक्ति पर प्रतिदिन प्रायः पाँच पैसा खर्च पड़ेगा। रोशनी बिजली तीन पैसे प्रतिदिन और पानी खर्च दो पैसा प्रतिदिन, सफाई खर्च एक पैसा प्रतिदिन प्रति व्यक्ति के पीछे पड़ने का अनुमान है। कोई सज्जन कुछ व्यक्तियों का उपरोक्त खर्च उठाना चाहें तो स्वेच्छापूर्वक उठा सकते हैं।

अब उधार चुका दीजिए

कई शाखाओं तथा कितने ही व्यक्तियों के नाम पुस्तकें, हवन सामग्री आदि मँगाने का उधार हिसाब पड़ा हुआ है। अब महायज्ञ के समय संस्था को पैसे की बहुत तंगी है। जिनके नाम उधार पड़ा है, उनके नाम पुनः स्मरण दिलाने वाले पत्रक तथा बिल भेजे जा रहे हैं। सभी से प्रार्थना है कि महायज्ञ में अपना हिसाब पूर्ण चुकता कर लें। उधार की रकमें वसूल हो जाने से यज्ञ खर्च सम्बन्धी कठिनाई में सहायता मिलेगी।

पूर्णाहुति अभी चालू रहेगी

महायज्ञ की पूर्णाहुति मथुरा में एक हजार कुण्डों में होगी। परन्तु ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत जितना जप, पाठ एवं मंत्र लेखन हुआ है उसके हिसाब से इसका हवन 24 हजार कुण्डों में होने से पूरा हो सकता है। फिर जितने होता और यजमानों ने इस अनुष्ठान में भाग लिया है उनमें से दूर प्रदेशों के निवासियों के लिए आर्थिक एवं अन्य कारणों से मथुरा आ सकना भी कठिन है। इसलिए यह निश्चय किया गया है कि सन् 59 में पूरे एक वर्ष तक सभी शाखाओं में छोटे-बड़े यज्ञ हों और शेष 23 हजार कुण्डों के हवन की कमी, विभिन्न शाखाओं में यज्ञ आयोजन करके पूरी की जाय।

गायत्री परिवार की जिन शाखाओं ने महायज्ञ में सहयोग दिया है उन्हें अगले वर्ष के लिए अपने यहाँ यज्ञ कराने की तैयारी करनी चाहिए। कम से कम 9 कुण्डों के आयोजन रखे जाने चाहिएं। इस सम्बन्ध में शाखा-सदस्य आपसी विचार विमर्श करके अपने प्रस्ताव पूर्णाहुति के अवसर पर भेज दें, कि उनके यज्ञों में मथुरा से कोई ब्रह्मचारी या विद्वान भेजे जा सकें।

मथुरा में एक हजार कुण्डों की पूर्णाहुति तो एक आरम्भ मात्र है। यह एक वर्ष में,23 हजार कुण्डों में, भारत के कोने-कोने में साँस्कृतिक पुनरुत्थान का कार्यक्रम पूरा करने के साथ सम्पन्न होगी। इसे अभी समाप्त नहीं समझना चाहिए। पूर्ण पूर्णाहुति तो 24 हजार कुण्डों के हवन हो चुकने के बाद ही होगी।

बहरूपियों से सावधान रहिये

कितनी ही जगह से पत्र आये हैं कि —मथुरा के कुछ ‘धर्म व्यवसायी’ जगह-जगह गायत्री-यज्ञ के लिए चन्दा माँगते या अनाज इकट्ठा करते हैं, यज्ञ की बड़ी प्रशंसा करते हैं,आचार्य जी के नाम की जाली चिट्ठी बना लेते हैं कि उन्हें तपोभूमि से इस कार्य के लिए भेजा गया है। जहाँ उनकी दाल गल जाती है वहाँ से इस प्रकार धन संग्रह करके नौ दो ग्यारह हो जाते हैं।

जहाँ इनकी घात नहीं लगती वहाँ यज्ञ की और तपोभूमि की निंदा करते हैं। कहीं कहते हैं वहाँ चमार भंगी यज्ञ में बैठेंगे, कहीं कुछ कहते हैं, कहीं कुछ । इस प्रकार वहाँ अपना दूसरा रूप बना लेते हैं।

जनता इन बहरूपियों से सावधान रहे। मथुरा से कोई व्यक्ति कहीं भी चन्दा इकट्ठा करने नहीं भेजा गया है। कोई व्यक्ति ऐसा करता पाया जाय तो उसे पुलिस के सुपुर्द कर देना चाहिए। इसी प्रकार अनेक तरह की भ्रमपूर्ण बातें कोई कह रहा हो तो उसे ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित बहरूपिया मानना चाहिये और इन बातों पर तनिक भी विश्वास न करना चाहिए। ऐसी भ्रमपूर्ण बातों का निराकरण तपोभूमि से पत्र लिखकर करा लेना चाहिए।

धर्म प्रचार की शिक्षण व्यवस्था

गायत्री तपोभूमि का लक्ष आस्तिकता की-धर्म परायणता-की भावनाओं को जन साधारण में जागृत करके सद्विचारों और सत्कर्मों में प्रवृत्ति उत्पन्न करना है। ब्राह्मण संस्थाओं का कार्य भी यही है कि उच्च मनोभूमि का निर्माण करने वाले सद्विचारों की जन मानस में स्थापना करने के लिये निरन्तर प्रयत्न करने में जुटी रहें।

अब तक इस दिशा में इस संस्था ने महत्वपूर्ण कार्य किया है अब और भी सुव्यवस्थित रूप से इस ओर कदम उठाये जा रहे हैं। सत्साहित्य प्रसार के लिए योजना पिछले पृष्ठों पर दी जा चुकी है कि एक पैसा प्रतिदिन दान यज्ञ के लिए निकलकर उससे प्रति अमावस्या, पूर्णिमा को 10 व्यक्तियों को जीवन में धार्मिक चेतना उत्पन्न करने वाली पुस्तिकायें वितरण की जाएं, पढ़ाई जाएं, सुनाई जाएं। इस योजना के अनुसार लाखों-करोड़ों व्यक्तियों के जीवन में धार्मिक भावनाओं की स्थापना की जा सकेगी।

इस लेखनी कार्य के अतिरिक्त दूसरा कार्य वाणी का है। ऐसे सैकड़ों-हजारों धर्म प्रचारकों की आवश्यकता है जो वाणी से भी सद्ज्ञान का प्रचार करने में नियमित रूप से कुछ समय लगाते रहें। मानव जाति के सामने उपस्थित समस्याओं का युग के अनुरूप समाधान सुझा सकें ऐसे धर्म प्रचारकों की आज भारी आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए तपोभूमि में महायज्ञ के बाद ही एक धर्म प्रचारक विद्यालय चल पड़ेगा, जिसमें रामायण, गीता एवं अन्य धर्म ग्रन्थों के आधार पर प्रवचन करके जनता की धार्मिक अभिरुचि को सही दिशा में लगाने का बहुत ही ठोस शिक्षाक्रम रखा जायगा। भजन, कीर्तन, रामायण गा सकने योग्य साधारण संगीत की भी शिक्षा दी जायगी और आरोग्य एवं चिकित्सा शास्त्र का भी सामान्य ज्ञान कराया जायगा। धार्मिक नेतृत्व कर सकने योग्य गुण एवं स्वभाव बनाने का ,वक्तृत्व कला का, भारतीय संस्कृति के इस विद्यालय में पूरा प्रबन्ध रहेगा।

18 से 40 वर्ष तक की आयु के शिक्षार्थी लिए जाया करेंगे। पूरा पाठ्यक्रम 2 वर्ष का होगा। पर कार्यव्यस्त व्यक्तियों के लिए छह महीने की एक स्वल्पकालीन शिक्षण व्यवस्था भी रहेगी। छात्रों के भोजन निवास की निःशुल्क व्यवस्था तपोभूमि में ही रहेगी। सत्पात्र, परिश्रमी और लगन के पक्के छात्र ही इसमें प्रवेश पा सकेंगे।

त्याग और बलिदान का इतिहास

महायज्ञ को सफल बनाने के लिए अनेकों परिजन प्राण-प्रण से कार्य में संलग्न हो रहे हैं। उनके त्याग, परिश्रम और सद्भावना देखकर ऐसा लगता है मानो सतयुग की स्थापना अब अधिक दूर नहीं है। इतनी निस्वार्थता, श्रद्धा, सेवा और धर्म परायणता जो इन दिनों अपने परिजनों में देखी जा रही है वह इस स्वार्थपरता के जमाने में आश्चर्यजनक ही लगती है। इस तपस्या और बलिदान का एक स्वतंत्र इतिहास लिखा जायगा। महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद इसे लिखेंगे और प्रकाशित करेंगे। इसमें गायत्री परिवार के सक्रिय कार्यकर्ताओं के फोटो तथा उनके सत्कर्मों के विस्तृत विवरण छपेंगे। यह इतिहास बतायेगा कि गायत्री परिवार कितनी उच्चकोटि की विचारशील, विद्वान, कर्मठ एवं युग निर्माता त्यागी तपस्वियों की संस्था है और इसके द्वारा कितने ठोस कार्य हो चुके तथा आगे कितना युग परिवर्तनकारी कार्यक्रम सम्पन्न होने जा रहा है।

गायत्री परिवार पत्रिका

गायत्री परिवार के समाचार पहले अखंड ज्योति में छपते थे। समाचारों की तथा संस्था की प्रगति सम्बन्धी आवश्यक जानकारी के बहुत अधिक बढ़ जाने से अब परिवार की शाखाओं एवं गायत्री उपासकों के पथ-प्रदर्शन के लिए “गायत्री परिवार” नामक मासिक पत्रिका स्वतंत्र रूप से गत अप्रैल मास से निकल रही है। इसका वार्षिक चंदा 2) है। पत्रिका प्रायः सभी सक्रिय शाखाओं में भेजी जा रही है। सदस्यों को उसे पढ़ते रहना आवश्यक है।


गायत्री परिवार हमारा!


गायत्री परिवार हमारा (Kavita)

सबसे अच्छा सबसे प्यारा।

गायत्री-परिवार हमारा॥

जब तक तन में प्राण रहेंगे।

इसकी हार न होने देंगे॥

प्राणों से भी अधिक दुलारा।

गायत्री-परिवार हमारा॥

तन-मन से इसको अपनावें।

अपना जीवन सफल बनावें॥

मातृ-कृपा का परम अधारा।

गायत्री-परिवार हमारा॥

आपस में सब ही मिल जावें।

भूले भटके गले लगावें॥

बहे प्रेम की निर्मल धारा।

गायत्री-परिवार हमारा॥

घर-घर में हम यज्ञ रचावें।

गायत्री गुणगान सुनावें॥

गूँजे अखण्ड ज्योति का नारा।

गायत्री-परिवार हमारा॥

नगर-नगर और डगर-डगर में।

गायत्री-ध्वज फहरे नभ में॥

तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।

गायत्री-परिवार हमारा॥

सत्य, न्याय शुभ-प्रेम की गंगा।

जग में बहे करे मन चंगा॥

भाव असुरता का हो न्यारा।

गायत्री-परिवार हमारा॥

बोलो मा गायत्री की जय।

यज्ञ-पिता का हो यश अक्षय॥

श्रीराम का हमें सहारा।

गायत्री-परिवार हमारा॥

*समाप्त*

(श्री ब्यंकटेश दयाराम शर्मा, खलघाट, म.प्र.)