मानवता का अभिनन्दन

(श्री जय)


मानवता का अभिनन्दन (kavita)

प्यार करो जीवन से साथी भय न मरण से मानो।

कर्म-साधना के रहस्य को अंतर में पहचानो॥

जीवन के संकल्प नियम के सदृश अनित्य बनाओ।

बनो नहीं देवता स्वयं को मानव किंतु बनाओ॥

व्यर्थ न जाय किसी तरह भी यह जीवन की थाती।

पथ का अंधकार हरने को जलो स्वयं बन बाती॥

आओ जीवन की कर्मठता को दो नूतन भाषा।

अमृत-घट से भरो मनुजता का मानस चिर प्यासा॥

यह विभेद, विद्वेष, विषमता के सब बंधन तोड़ो।

नहीं चरण को पथ पर, पग की ओर पंथ को मोड़ो॥

लक्ष्य-तीर्थ-पाथेय बने अभिनव अभियान तुम्हारा।

नव सर्जन का भवन बने अब संस्कार की कारा॥

युग के मोहक आमंत्रण को तुमने यदि स्वीकारा।

जन-जन में,कण-कण में जय-जागृति का स्वर गुँजारा॥

अरुण उषा का चेतनता अंतस में स्वयं उतारी।

तब यह मरुस्थल बन जायेगा कुँकम-केसर क्यारी॥

याद रखो जन-जन मिलकर ही अजय राष्ट्र रचते हैं।

जनता में ही राष्ट्र-देवता मोद सहित बसते हैं॥

“पंचायती राज्य”


ऋषि ही धर्म की स्थापना करेंगे

(स्वामी विवेकानन्द जी)

यह एक प्राकृतिक नियम है कि जिस अवसर पर विश्व के जिस भाग को जिस वस्तु की आवश्यकता होती है, उसी समय वह वहाँ पहुँचकर उसे नया जीवन देने का मार्ग ढूँढ़ लेता है। यह नियम भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों प्रकार के क्षेत्रों पर समान रूप से लागू होता है। उदाहरणार्थ संसार के अमुक भाग में आध्यात्मिकता का अभाव है, और दूसरे किसी भाग में उसका प्राचुर्य है, तो यह आध्यात्मिकता अभाव वाले भाग तक पहुँचने का मार्ग निकाल लेगी और इस प्रकार सामञ्जस्य स्थापित हो जायगा। मानव जाति के अब तक के इतिहास में एक दो बार नहीं, अनेकों बार भारतवर्ष को प्रकृति ने यही कार्यभार सुपुर्द किया है कि यह जगत के विभिन्न देशों को आध्यात्मिकता की शिक्षा प्रदान करे। इस प्रकार संसार में ऐसी अनेकों घटनायें मिलती हैं कि किसी विशेष जाति ने सैनिक शक्ति से या व्यापार द्वारा संसार के भिन्न-भिन्न भागों में पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित किया और उसके परिणामस्वरूप दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक दान का भंडार खुल गया, अर्थात् एक जाति को दूसरी जाति के लिये कुछ देने या सिखाने का अवसर आया, तब प्रत्येक जाति ने दूसरी जातियों को, राजनीतिक, सामाजिक या आध्यात्मिक, जिसके पास जिस विषय का ज्ञान था, उसी विषय का ज्ञान दिया। इस लेन-देन में भारत ने सम्पूर्ण मनुष्य जाति के सम्मिलित ज्ञान-भंडार में आध्यात्मिकता और दर्शन का ही दान दिया है। प्राचीन पारस्य (पारसी) साम्राज्य के उदय काल के बहुत पहले ही वह इस प्रकार का दान दे चुका था। फारस साम्राज्य के विकास-काल में भी उसने ऐसा दान दिया और उसके बाद तीसरी बार यूनान के अभ्युदय काल में उसने ऐसा ही दान किया। हाल के ऐतिहासिक काल अंग्रेज युग में भी विधि विधान के अनुसार उसे वही कार्य करना पड़ रहा है। जिस प्रकार इस युग में प्रजातंत्र शासन तथा सभ्यता के बाहरी भाव ने भारत की नस-नस को प्रभावित किया, उसी प्रकार यहाँ की आध्यात्मिकता और दर्शन ने पश्चिमी देशों को सराबोर कर दिया। यह एक ऐसी धारा है जिसकी गति को कोई रोक नहीं सकता। हम भी पश्चिम की जड़वाद प्रधान सभ्यता का पूर्ण प्रतिरोध नहीं कर सकते। सम्भव है इसका कुछ अंश हमारे लिये अच्छा हो और हमारी आध्यात्मिकता का कुछ अंश सम्भव है पश्चिम वालों के लिये कल्याणकारी सिद्ध हो। इसी विधि से सामञ्जस्य की रक्षा हुआ करती है। इसका आशय यह नहीं कि हर एक विषय हमको पश्चिम वालों से सीखना चाहिये अथवा पश्चिम वालों को जो कुछ सीखना है वह हमीं से सीखें। पर इन दोनों भागों का कर्तव्य है कि गत शताब्दियों में संसार की विभिन्न जातियों में सामञ्जस्य की स्थापना करके एक आदर्श संसार के निर्माण का जो स्वप्न उन्होंने देखा है, उसकी पूर्ति के लिये जिसके पास जो कुछ उपयोगी हो उसे भावी संतानों को अर्पण कर दें।

ऐसा आदर्श संसार कभी आयेगा या नहीं-यह मैं नहीं जानता। इतना ही नहीं मुझे तो यह भी सन्देह है कि संसार कभी ऐसी पूर्णता तक पहुँच सकेगा भी या नहीं? परन्तु चाहे ऐसा हो या न हो, हम में से प्रत्येक को इसी विचार को सत्य मानकर काम करना चाहिये, और प्रत्येक मनुष्य को अपने हृदय में ऐसी भावना रखना चाहिये कि यह कार्य मुख्यतः उसी को करना है। हम में से प्रत्येक मनुष्य को ऐसा ही विश्वास को रखना चाहिये कि संसार के अन्य सभी लोगों ने अपना अपना कार्य पूरा कर डाला है, केवल मेरे ही हिस्से का शेष है और जब मैं अपने हिस्से का कार्य भाग पूरा कर दूँगा तभी संसार सम्पूर्ण होगा। अगर हमको अपने सिर पर कोई दायित्व लेना है तो उसे ऐसी ही भावना से ग्रहण करना चाहिये।

भारत में वर्तमान युग में धर्म की एक नवीन धारा प्रवाहित हुई है। इसमें कुछ गौरव भी है और विपत्ति भी है। कारण यह कि धर्मोदय के साथ-साथ अनेक बार उसमें घोर कट्टरता आ जाती है, और कभी-कभी यह इतना बढ़ जाता है कि जिन लोगों द्वारा उसका अभ्युत्थान होता है, कुछ आगे निकल जाने पर वे भी उसे रोकने में असमर्थ होते हैं, उसका नियंत्रण नहीं कर सकते। अतएव इस सम्बन्ध में पहले से ही सावधान रहना चाहिये। हमें बीच के मार्ग से चलना चाहिये। एक ओर तो कुसंस्कारों अथवा अज्ञानता पूर्ण रूढ़ियों से भरा हुआ प्राचीन समाज है दूसरी ओर है जड़वाद, नास्तिकता के और ऐसे ही अन्य संस्कार जो पश्चिमी उन्नति के मूल तक में समाये हैं। इन दोनों से खूब बचकर चलना चाहिये। प्रथम बात तो यह है कि हम पश्चिमी नहीं हो सकते, इसलिये पश्चिम वालों की नकल करना वृथा है। यह निश्चय समझ लीजिये कि आप ज्यों ही पश्चिम वालों की नकल करेंगे आपकी मृत्यु हो जायगी और फिर आप में जीवन का लेश भी न रहेगा। दूसरे ऐसा हो सकना सम्भव भी नहीं है। थोड़ी देर के लिए कल्पना कीजिए कि लाखों वर्षों से एक नदी हिमालय से बहती चली आ रही है, क्या तुम धक्के लगाकर उसको फिर हिमालय की तुषार मण्डित चोटी पर वापस ले जा सकते हो? चाहे एक बार यह संभव भी हो जाय, पर तुम योरोपियन नहीं हो सकते। यदि कुछ शताब्दियों की शिक्षा का संस्कार त्याग सकना योरोपियनों के लिये संभव नहीं तो सैंकड़ों शताब्दियों का संस्कार छोड़ सकना तुम्हारे लिये कैसे सम्भव हो सकता है?

हमें यह भी स्मरण रखना चाहिये कि हम प्रायः जिन बातों को इस समय धर्म मान रहे हैं, वे केवल हमारे गाँव के छोटे-छोटे देवताओं से सम्बन्ध रखने वाली बातें या कुसंस्कारों से पूर्ण देशाचार मात्र हैं। ऐसे देशाचार असंख्य हैं और वे एक दूसरे के विरुद्ध हैं। इनमें से किसको माना जाय और किसको गलत बताया जाय? उदाहरण के लिये यदि एक दाक्षिणात्य ब्राह्मण किसी अन्य ब्राह्मण को माँस का एक ग्रास खाते हुये देखे तो डर के मारे सिकुड़ जाता है। पर आर्यवर्त के अनेक ब्राह्मण महाप्रसाद के बड़े भक्त हैं, पूजा के नाम पर सैंकड़ों बकरों की बलि चढ़ाकर चट कर जाते हैं। अगर एक अपने देशाचर को सम्मुख रखेगा तो दूसरा भी वैसा ही करेगा। तमाम भारत में हजारों तरह के आचार हैं, पर उनकी सीमा अपने-अपने स्थानों तक परिमित है। सब से बड़ी भूल यही है कि अज्ञान ग्रस्त साधारण जनता हमेशा केवल अपने प्रान्त के आचार को ही हमारे धर्म का सार समझ लेती हैं।

दूसरी बात यह है कि धर्म के दो रूप होते हैं। एक की नींव मनुष्य के नित्य स्वरूप पर स्थित है, उसकी विचार परम्परा परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति के सर्वकालिक सम्बन्ध से होती है। दूसरी प्रकार का धर्म किसी देश काल या आस्था विशेष पर टिका हुआ होता है। पहला मुख्यता वेदों या श्रुतियों में संग्रहीत है, दूसरा स्मृतियों और पुराणों में। हमें स्मरण रखना चाहिये कि सब समय वेद ही हमारे चरम लक्ष्य और मुख्य प्रमाण रहे हैं। यदि किसी प्रकार पुराणों का कोई हिस्सा वेदों के अनुकूल न हो तो निःसंकोच उस अंश को त्याग देना चाहिये। इसी प्रकार हम यह भी देखते हैं कि सभी स्मृतियों की शिक्षा पृथक्-पृथक् है। पहिले ऐसे आचार प्रचलित थे जिनको अब हम वीभत्स मानते हैं। जब समय का परिवर्तन होगा तब ये स्मृतियाँ न रहेंगी और उनकी जगह दूसरी स्मृतियों की योजना की जायगी। इसलिये विशेष ध्यान देने योग्य बात यही है कि वेद चिरकालिक सत्य होने के कारण सदा समभाव से विद्यमान रहते हैं किन्तु स्मृतियों की प्रधानता युग परिवर्तन के साथ ही जाती रहती है। समय ज्यों-ज्यों व्यतीत होता जायगा त्यों-त्यों प्राचीन स्मृतियाँ लुप्त होती जायेंगी, ऋषियों का उदय होगा और वे उन्हें बदलकर समाज को समयानुकूल कर्तव्य के उस पथ पर चलायेंगे जिसकी उस समय के लिये आवश्यकता होगी और जिसके बिना समाज का जीना असम्भव समझा जायगा।

मेरे कहने का यह भी आशय नहीं कि हम अपने प्राचीन आचारों और पद्धतियों की निन्दा करें, नहीं ऐसा हर्गिज मत करो। उनमें अत्यन्त हीन जान पड़ने वाले आचार को भी तिरस्कार की दृष्टि से मत देखो, न उसकी निन्दा करो, क्योंकि जो प्रथा आज निन्दनीय जंच रही है वही किसी समय समाजोपयोगी और जातीयता की रक्षक रही होगी। क्योंकि इन प्राचीन पद्धतियों के प्रणेता ऋषि थे जिन्होंने धर्म को प्रत्यक्ष अनुभव से जाना था और निःस्वार्थ भाव से उसी का उपदेश दिया था। यही ऋषित्व है और यह किसी आयु, काल, सम्प्रदाय या जाति की अपेक्षा नहीं रखता। वात्स्यायन ने कहा है “सत्य का साक्षात्कार करना चाहिये और स्मरण रखना चाहिये कि तुम सब को ऋषि होना है” हमें अपने पर विश्वास रखना चाहिये कि हम अवश्य संसार में उथल-पुथल मचा सकते हैं, क्योंकि सब शक्ति हम में विद्यमान है। हमें भी धर्म का प्रत्यक्ष दर्शन करना होगा, इसके सत्य का अनुभव करना होगा, तभी हमारे मुख से जो वाणी निकलेगी वह अव्यर्थ और अमोघ होगी और पाप हमारी दृष्टि से दूर होकर धर्म की स्थापना होगी।


विज्ञान और धर्म परस्पर विरोधी नहीं।

(सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन्)

धर्म के विषय में पूर्व और पश्चिम दोनों की स्थिति बड़ी उलझनपूर्ण है। मनोविज्ञान और समाज विज्ञान, जीव-विज्ञान और मानव-जाति-विज्ञान की खोजों के कारण प्रत्येक प्राचीन धर्म की नींव खोदी जा रही है। विभिन्न मजहबों के भिन्न-भिन्न प्रकार के विवरणों के आधार पर कितने ही लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ईश्वर मनुष्य के हृदय का एक स्वप्न है। इस प्रकार ईश्वर का बहिष्कार करना आजकल एक फैशन हो गया है। ऐसे फैशनेबल लोग, धर्म जीवी लोगों को, जो परलोक की बातें करते हैं, पागलखाने के योग्य बतलाते हैं। प्राचीन काल के सिद्धान्त नये दिमागों में घुसते ही नहीं। वे कहते हैं कि जब हर एक चीज का कारण है तो ईश्वर का भी कारण होना चाहिये। यदि ईश्वर को बिना किसी कारण का अर्थात् स्वयम्भू माना जाय तो जगत को ही उसी न्याय से स्वयम्भू क्यों न मान लिया जाय? यह संसार जैसा त्रुटिपूर्ण दिखलाई पड़ता है वह किसी चतुर और योग्य ईश्वर की कृति नहीं माना जा सकता। हम जो सदैव न्यायपूर्ण संसार की अभिलाषा करते रहते हैं, जिसमें अन्याय का चिन्ह न हो और कोई शोकग्रस्त दिखलाई न पड़े, उससे सिद्ध होता है कि जगत दूषित है। धर्मजीवी या स्वार्थी लोग कुछ भी कहें ऐसी श्रद्धा डूबते हुये मनुष्य के तिनका पकड़ने के तुल्य ही है।

मतमतान्तरों के धर्मग्रंथों में जो किस्से भरे पड़े हैं वे मनुष्यों की नासमझी का लाभ उठाते हैं। उदाहरण के लिये उनमें ईश्वरीय रोष, बदला लेने, शत्रुओं को दण्ड देने, मनुष्यों को अनन्त काल तक असीम कष्ट पहुँचाने, और फिर कभी इन कष्टों के बदले में स्वर्ग, बैकुण्ठ आदि के आनन्द प्रदान करने आदि की जो बातें लिखी हैं उनका मूल्य परियों की कहानियों से बढ़कर नहीं समझा जा सकता। वे उस समय की चीजें हैं जब मनुष्य आदिम अवस्था में था। पुराने जमाने के ग्रंथ वर्तमान समय की समस्याओं को सुलझाने में अधिक सहायक सिद्ध नहीं हो सकते। अगर हम प्राचीन ग्रंथों की ऐसी व्याख्या करें जो आधुनिक अवस्था के अनुकूल हो तो इससे यहीं सिद्ध हो सकता है कि हम उन ग्रंथों का सम्मान करते हैं। पर इसे सचाई या ईमानदारी नहीं कहा जा सकता।

निस्सन्देह हमारे अधिकाँश देश भाई इन विचारों को पढ़कर नाक भौं सिकोड़ेंगे, पर सच बात यही है कि यह कहानी किस्सों का धर्म अब अनपढ़ और अनसमझ लोगों के मतलब की चीज ही रह गया है। विद्वान और विचारक लोग उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखते। अगर हम चाहें कि धर्म को आलोचना से ऊपर रखा जाय तो यह ठीक नहीं। दिमाग की हत्या कर डालना उसका सुधार नहीं कहा जा सकता। मशीन के समान कट्टर धर्म को भविष्य में कोई ठिकाना नहीं मिल सकता।

यह सच है कि मनुष्य की आत्मा को अदृश्य सत्ता के विषय में कुछ जानने की अभिलाषा अनिवार्य रूप से होती है, इसलिये धर्म के किसी न किसी रूप का बना रहना आवश्यक है। जब तक मनुष्य,मनुष्य बना हुआ है, तब तक धर्म के नष्ट हो जाने का खतरा कतई नहीं है। हमारी समस्या केवल धर्म का सुधार करने की है। हम को विश्व के स्वरूप के सम्बन्ध में ऐसे नवीन तथ्य खोज निकालने हैं जो आधुनिक ज्ञान और आलोचना के अनुकूल बैठ सकें।

लोग विज्ञान को धर्म का शत्रु समझते हैं, पर बात ऐसी नहीं है। वरन् जिस अज्ञेय और अनादि सत्ता को खोजने के लिये हम अभी तक अंधकार में टटोल रहे थे उसकी तरफ जाने के लिये ठीक मार्ग दिखलाने का कार्य विज्ञान कर रहा है। जहाँ वह मूल सिद्धान्तों की रक्षा करता है, वहाँ थोथे क्रियाकलापों का खंडन भी करता है। विज्ञान ईश्वर के उन अनेकों स्वरूपों को नष्ट कर देता है जो मनुष्यों ने अपनी सुविधा के लिये बनाये हैं, पर इस विश्व के निर्माण का आधार जो आत्म-तत्व है उस पर जोर देता है। यह कल्पना कि निराकार परमात्मा एक कुम्हार की तरह बैकुण्ठ में प्राणियों को गढ़ता रहता है मूर्खों को समझाने की बात है। इसके विपरीत विज्ञान हमको उस सर्वव्यापी तत्व की ओर प्रेरित करता है जो हममें और प्रत्येक वस्तु में मौजूद है। वह संसार में इस तरह मिला है जैसे समुद्र में नमक या फूल में सुगन्धि। वह सुनिश्चित नियमों के अनुसार कार्य करता है जो किसी भी खास या आम व्यक्ति के लिये बदल नहीं सकते। अगर हम गलती करें तो कोई देवी देवता हमारी रक्षा नहीं कर सकता। कानून तोड़ने वाले के लिये वहाँ हर्गिज क्षमा नहीं है। उसके अनुसार हमारा भूत सुनिश्चित है भविष्य चाहे जैसा स्वतंत्र हो। भविष्य की दुनिया इसी वैज्ञानिक धर्म की ओर जा रही है और जो लोग जबरदस्ती पुराने कट्टरता पूर्ण मतों के लिये लड़ झगड़ रहे हैं वे व्यर्थ में अपनी शक्ति का अपव्यय कर रहे हैं।


साधक इन भ्रान्तियों से बचें!

(श्री स्वामी शिवानन्द जी सरस्वती)

आध्यात्मिक साधक का मार्ग अत्यन्त दुर्गम है, ‘क्षुरस्यधारा’ इसका श्रुति प्रमाण है। यह मार्ग अनेकों बाधाओं,समस्याओं तथा संशयात्मक भीषण अरण्यों से होकर जाता है। इसमें एक विरोधी तत्त्व यह है कि हमारा मन ही हमारा शत्रु है, जिसे हमारा मित्र बनना चाहिए था और सद्परामर्श देना चाहिए था। यदि इस मन का संस्कार किया जाय तो यह हमारा वास्तविक मित्र बन जाता है। परन्तु यह तभी होता देखा गया है, जबकि साधक आध्यात्मिक-साधना में पर्याप्त रूप से अवसर हो जाता है। उस समय मन उसकी सहायता करने लगता है। जब तक यह अवस्था न आवे तब तक हमें अत्यन्त सावधान रहना चाहिये और उसकी कपट-क्रियाओं से सचेत रहना चाहिये। न जाने किस समय वह विद्रोह कर दे। यह अत्यन्त कूटनीतिज्ञ और वाममार्गी है। इसे महात्माओं ने प्रवंचक की संज्ञा भी दी है। मन की कला-कुशलता को जानने के लिये सर्वप्रथम सिद्धान्त यह है कि साधक यह अनुभव करले कि वह मन को अच्छी तरह जानता है, अतः मन उसको धोखा नहीं दे सकता। साधारणतः ऐसा नहीं होता। असावधान साधक यह विश्वास करने लगता है कि मैं मन का स्वामी हूँ। फल यह होता है कि मन उसकी बौद्धिकता को अपहृत कर लेता है और अपना कपटजाल सूक्ष्म-विधान से बिछा देता है।

आपने यह तो सुना होगा कि शैतान भी अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिये धर्म-शास्त्र का उद्धरण दे सकता है। इसी प्रकार मन बुराइयों में लिप्त होने के लिये तत्कथित गुण का प्रयोग करता है। इसमें वाद-विवाद की स्वाभाविक इच्छा होती है, यह भ्रान्ति है। अपने पक्ष में गर्हित-कार्य को न्यायसंगत सिद्ध करने के लिए अच्छे सिद्धान्तों का उपयोग करता है और जब तक इसकी गम्भीर समीक्षा न की जाय, यह कपट नहीं प्रकट होता।

इन वाद-विवादात्मक सिद्धान्तों का (कुछ का ही) वर्णन नीचे किया जाता है। यह वास्तविक साधकों के लिये, जो आपने मन का अध्ययन करना चाहते हैं तथा तत्सम्बन्धी दोषों तथा त्रुटियों का परिहार करना चाहते हैं, उपयोगी सिद्ध होंगे। जो साधक व्यवहार परायण है उनके लिये भी यह सिद्धान्त विशेष लाभदायक सिद्ध होंगे।

(1) विवादात्मक भ्रांति

साधकों से कहा जाता है, जब तुम स्त्रियों में रहो तो देवीभाव अथवा मातृभाव की अनुभूति करो। यह आपकी पवित्रता तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिये महान् सिद्धान्त है। किन्तु इससे यह अर्थ नहीं कि आप स्त्रियों में रहो और इसका यह तात्पर्य भी नहीं कि आप अपने विरोधी लिंग से सीमा को तोड़कर बिना किसी मर्यादा के मिलते जुलते रहो। मन यह प्रश्न करेगा-क्यों नहीं? यदि करूं तो कैसा? उनकी उपस्थिति में अपसरण सर्वथा कायरता है। जब हम देवी-भाव से विचार करते हैं तो भय कैसा? सावधान साधकवृन्द ! इन विचारों से सावधान ! ईश्वरीय भाव इस बात का प्रमाण नहीं है कि साधक के मार्ग की सम्पूर्ण बाधायें दूर हो गयीं। अतः साधकों के लिये स्थायी नियम यही है कि विरोधी लिंग के साथ समस्त संपर्क त्याग दें। हाँ जब कभी ऐसा संपर्क अनिवार्य हो जाय तो देवी-भाव रखना न्यायसंगत है। इसके साथ ही साधकों को स्त्री-विरोधी होने अथवा उनसे घृणा करने से निषेध किया गया है। पूजा करो, जैसा कहा गया है, किन्तु कुछ दूर से। देवी भाव तथा मातृ-भाव के सिद्धान्त से यह विचार नहीं करना कि तुम सदा उन्हीं के साथ रहो। अपने मन की इस विवादात्मक प्रवृत्ति को रोको।

(2) विवादात्मक भ्राँति

इसके पश्चात् एक शिक्षा इस प्रकार है—तुम फुफकार सकते हो परन्तु काटना नहीं। अर्थात् तुम दूसरे को उसके सामने धमका सकते हो, उसको अपमानित भी कर सकते हो, किन्तु उसके विनाश के लिए कर्त्तव्यपरायण न होना। फुफकारने का यह सद्परामर्श उस सर्प को दिया गया है, जो अधिक धार्मिक बनने के फेर में ऐसा निरीह और निर्बल बन गया कि कुछ दुष्ट बालकों ने उसे उत्पीड़ित करना प्रारम्भ कर दिया था। जानते हो यह केवलमात्र भीत गृहस्थों को जो अपने व्यावहारिक जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं एक परामर्श मात्र है। यदि इस व्यावहारिक जीवन में अवन्ती के ब्राह्मण की भाँति अत्यधिक मात्रा में विनम्रता का अनुसरण किया जायगा तो सर्वत्र-व्याप्त आसुरिक-तत्वों के बीच जीवन धारण करना असम्भव हो जायगा। अतएव जहाँ तक हो सके तुम्हारी मौलिक-भद्रता तथा भ्राततत्व पर प्रभाव न पड़े, बाहरी निरपेक्षता का प्रदर्शन क्षम्य है, किन्तु साधना तथा निवृत्ति मार्ग पर चलने वाले साधक को यह परामर्श नहीं दिया जा सकता। अवश्यमेव नहीं। साधकों को इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि साधक के लिए दंशन तो दूर रहा फुफकार की भी आज्ञा नहीं है, क्योंकि फुफकारना शीघ्र ही उसके स्वभाव का अंग हो जायगा और समय-असमय तुम हर वस्तु पर, हर बात के लिये हर एक फुफकार छोड़ने लगोगे। इस फुफकार में सब प्रकार की उद्दंडता-प्रचण्ड तर्क वितर्क, चुभते व्यंग्य, कठोर उत्तर, चिल्लाहट तथा कटु शब्द भी सम्मिलित हो जायेंगे। अन्त में शारीरिक-हिंसा तथा मारपीट, प्रत्येक प्रकार की अमानुषिक निर्दयता फुफकार की ही श्रेणी में रख दी जायगी और इससे आध्यात्मिकता का सर्वनाश हो जायगा। मन इसके लिये सदा प्रतीक्षा करता रहता है कि वह आपके अनुग्रह का अनुचित लाभ उठाये। इसकी स्वाभाविक गति अधोमुखी है। अतः न तो दंशन करो और न फुफकार ही। मधुर-स्वभावी, विनम्र तथा सभ्य बनो। यदि फुफकारना ही चाहते हो तो अपने ही मन पर फुफकारो। अहंकार त्याग करते हुए, षड्वैरियों का दमन करो। मन से सावधान रह इस विवादात्मक-प्रवृत्ति के दास मत बनो।

(3)विवादात्मक-भ्राँति

एक परामर्श यह है कि दृढ़ निश्चयी बनो, अपने सिद्धान्तों में दृढ़ रहो, एक अणु भी विचलित न होना। यह सिद्धान्त सत्यशील साधक के लिए सर्वोत्तम परामर्श है, किन्तु अभाग्यवश यह हठवादिता का आदेश बन गया है। यह तामसिक गुण है। किन्तु मन तुम्हें यह निश्चय करा देगा कि तुम आत्म-बल प्रकट कर रहे हो। यह आपको अहंकार के साथ संश्लिष्ट करा देगा। परन्तु सत्यशील साधक सात्विक-निष्ठा तथा हठवादिता में सावधानी के साथ विवेक करता है। आत्मबल ऐसी सस्ती वस्तु नहीं है, जो बिना किसी नियंत्रण तथा साधन के तथा बिना इच्छाशक्ति की पवित्रता के प्राप्त हो सके। इसके लिए समस्त साँसारिकता तथा अपने जीवन का मूल्य त्यागना पड़ता है तथा आत्म बलिदान करना पड़ता है। इन सिद्धान्तों से यही अर्थ निकलता है कि सत्य तथा दृढ़प्रतिज्ञ रहो, परन्तु आत्म-प्रपंचक भावनाओं के प्रति नहीं। सब प्रकार के योगानुष्ठानों से दृढ़ बर्द्धित रहो, किन्तु हठवादिता से बचो। हठवादिता तो भ्रममूलक विवादात्मक प्रवृत्ति है और सत्यानुशीलन तथा सद् निष्ठा आत्म जागृति का साधन है।

(4)विवादात्मक-भ्राँति

सदा सत्य बोलो तथा स्पष्टवादी बनो। यह भी एक उपदेश है। इसका यह अर्थ है कि जब तुम्हें बोलने की आवश्यकता हो तो केवल सत्य बोलो। इसमें यह तात्पर्य नहीं कि किसी स्त्री अथवा किसी पुरुष के सामने तुम्हारा जो विचार हो उसे उसके मुँह पर कहते फिरो। यह तो अनावश्यक व्यवहार है। स्पष्टता के बहाने दूसरों की भावनाओं का विचार किए बिना ही अपनी स्वतन्त्र-सम्मतियों को प्रकट करना आर्जव तथा स्पष्टवादिता नहीं है, वरन् यह एक प्रकार की विचार हीनता और निर्दयता की सीमा है। इससे साधक की प्रशंसा नहीं होती।

जो उपदेशक आपको सत्य एवं स्पष्ट बोलने का आदेश देता है, वही यह भी उपदेश देता है कि मिष्ठ-भाषण और मधुर वचन कहो। मैं तो इस विचार का हूँ कि अरुचिकर सत्य का अकथित रहना ही श्रेयस्कर है। यदि यह अनिवार्य हो जाय तो उसके अभिप्रकाशन की रीति है, वह है नम्र विज्ञप्ति, जिससे दूसरों की भावनाओं पर चोट न लगे। यह भी तो सत्य भाषण है। याद रखो कि सत्यात्मकता तथा अहिंसा साथ-साथ चलनी चाहिए।

(5) विवादात्मक -भ्राँति

यह सत्य है कि वैराग्य एक मानसिक अवस्था एवं अनासक्ति है। मनुष्य का स्वभाव है कि इस परिभाषा का उपयोग इंद्रिय-जीवन की उपयोगिता को सिद्ध करने के लिए करता है। अतः तर्क किया जाता है कि मैं इन सबमें आसक्त नहीं हूँ, मैं एक क्षण में इनसे ऊपर उठ सकता हूँ। मैं तो स्वामी के समान इनका आनन्द लेता हूँ। मान से तो मैं अनासक्त हूँ। साधकों! क्या आपको स्मरण नहीं है कि विषयों के संपर्क से विश्वामित्र के समान तपस्वी भी पतित हो गए। अतः वैराग्य को साधारण भाव से ग्रहण मत करो। श्रमपूर्वक वैराग्य का अर्जन करना पड़ेगा और सावधानी से उसकी रक्षा करनी पड़ेगी।

तपस्या की चरम सीमा तक जाने पर भी यही दशा होती है। मनुष्य की साधारण प्रकृति इन्द्रियजन्य है। मन आनन्द से प्रेम तथा संयम से घृणा करता है। अविवेकी साधक निज विशेषता को सत्वर ही भूल जाता है और सभी तपस्याओं को अप्रियकर ही समझता है। तत्परिणामतः वह भोग में लिप्त हो जाता है और तितिक्षा-शक्ति का त्याग कर देता है तथा सहस्रों आवश्यकताओं का दास बन जाता है। यहाँ मूर्खतापूर्ण अति से सावधान किया गया है किन्तु यह भी साथ-साथ समझना कि साधना की प्रारम्भिक अवस्था में विकास के निमित्त कुछ अंशों तक तितिक्षा अनिवार्य है। मन गीता का उदाहरण भी देगा कि भगवान् ने तामसिक तप की निन्दा की है। उन्होंने शरीर, वाणी तथा मन के सात्विक-संयम की प्रशंसा की है। अतः सावधानी से विचार स्थिर करना चाहिए।

(6) विवादात्मक-भ्राँति

अन्त में सबसे भयंकर धोखा, जो मन देता है वह स्वयं साधना के सम्बन्ध में है। साधक जिस साधन का उपयोग अपने जीवन के उत्थान तथा उस को दिव्यतम बनाने के लिये करता है, वही अहंकार तथा इन्द्रियों का कौतुक बन जाता है। यह जाल ऐसा है, जिसको क्षत-विक्षत करना अत्यन्त दुरूह है। यहाँ तक कि साधक की सालों की साधना का विकास रुक जाता है। उदाहरण के लिए देखिए, कोई साधक मधुर राग तथा संगीत प्रियता के कारण अपनी साधना के लिए कीर्तन चुनता है। कला के प्रशंसक तो मिल ही जाते है। अतः प्रत्येक अवसर पर उसको निमन्त्रण आने लगता है। सत्संगियों को उससे प्रेम भी होने लगता है। अब मन अपना जाल बिछाता है। कीर्तन दिन-पर-दिन मधुरतर होता जाता है, उसमें नित्य नवीन राग और आलाप का संयोग होता जाता है। इस प्रकार साधना दुमुखी हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि साधक जाल में पूरी तरह फँस जाता है और उसकी साधना मोक्ष के स्थान पर बन्धन का कारण बन जाती है।

निष्काम कर्म योग ही लो। बिना किसी प्रतिफल के परोपकार तथा सेवा करना इस संसार में नहीं सुना जाता। अतः निष्काम सेवक असाधारण माने जाते हैं। उनके लिये सभी के द्वार खुले हैं। सभी लोग अपनी कष्ट गाथायें उसे सुनाते हैं, अपना अन्तर खोल देते हैं तथा अपनी व्यक्तिगत गोपनीय समस्यायें भी उसके समक्ष उपस्थित कर देते हैं। क्योंकि उनका विचार रहता है कि निष्काम योग सभी बातों में पवित्र है। यहाँ साधकों को छुरे की धार पर चलना पड़ता है। सेवा के लिए तत्कथित पथ पर अभिन्न हृदयता तथा दम्भ का परिपोषण होता है और साधक भी निष्काम सेवा में अत्यन्त प्रेम रखता हुआ प्रतीत होता है। परन्तु मैं यह बताना चाहता हूँ कि यह अनुराग इन्द्रिय परायणता के कारण ही है न कि सेवा भावना के कारण।

इसी प्रकार से तितिक्षु साधक भी इसमें रत रहता है, क्योंकि उसकी प्रसिद्धि जो हो जाती है। उसकी आप पूजा करने लगते हैं। साधना का लक्ष्य ही बदल जाता है।


Quotation

हमारा भाग्योदय क्यों नहीं होता? इसलिये कि हम यत्न याने उद्यम नहीं करते। करने से तो सब कुछ होता है, अतः पहले उद्योग करना सीखो। यत्न को ही देव समझकर दिल में धारण करो। निर्दोष प्रयत्न ही देव है और प्रमाद दैत्य! यत्न न्यायाधिष्ठित होना चाहिये, क्योंकि न्याय ही भगवान का रूप होता है और अन्याय शैतान का।

—समर्थ रामदास


हम महानता की ओर क्यों न चलें?

(महात्मा जेम्स एलन)

कुछ लोगों ने एक को स्त्री पाप करते हुए पकड़ लिया और उसे अपमानित करने के लिए तैयार हो गये कि ईसा मसीह ने उनसे कहा कि जिस व्यक्ति ने कभी पाप न किया हो वही उस पर पहला पत्थर मारे। सभी चुप हो गये। यद्यपि वह स्वयं पूर्ण पवित्र था फिर भी उसने न तो पत्थर उठाया और न कोई कड़े कहे शब्द बल्कि उस स्त्री से अत्यन्त नम्रता से कहा “मैं तुम पर दोषारोपण नहीं करता। जाओ चली जाओ और फिर पाप न करना।” पवित्र हृदय में ऐसा कोई भी स्थान बाकी नहीं रहता जिसमें स्वार्थ और घृणा भरे विचार समा सके क्योंकि ऐसा व्यक्ति तो नम्रता और प्रेम से भरा हुआ होता है। उसको कोई बुराई दीखती ही नहीं। ज्यों-ज्यों मनुष्य दूसरों में बुराई निकालना छोड़ता जाता है, त्यों-त्यों वह स्वयं पाप, दुख और विपत्तियों से छुटकारा पाता जाता है।

वास्तव में जब मनुष्य क्षमाशीलता का पूरा अभ्यास कर लेता है तो बुराई भलाई की वास्तविकता उस पर खुल जाती है और वह भली प्रकार समझ जाता है कि विचार नित्य किस प्रकार से उत्पन्न होते हैं और कैसे बढ़ते-पलते और कार्य रूप में परिणत होते हैं और क्योंकर सामने आते है। जब मनुष्य इस दशा में पहुँच जाता है तो उस का हृदय प्रकाशित हो जाता है और वह शुद्ध, पवित्र और श्रेष्ठ जीवन का आरम्भ करता है क्योंकि अब वह भली प्रकार समझ लेता है कि उसे दूसरों के व्यवहार से न बुरा मानना चाहिए, न शोक करना चाहिए और न ही क्रोध करना चाहिए भले ही उन का व्यवहार और कार्य कैसा ही हो। अब तक वह मूर्खता और नासमझी के कारण ऐसा करता रहा है। यह उस की सरासर भूल थी। अब वह अपने हृदय से प्रश्न करता है कि बार बार बदला क्यों लिया जाय। दूसरों पर हम इतना क्रोध ही क्यों करें कि जिसके लिए आखिर में पछताना पड़े।

क्या आध्यात्मिक उन्नति का यह अर्थ नहीं है कि मैंने अपने क्रोध को जीत लिया है और बदला लेने के विचारों को छोड़ दिया है। यदि बदला लेना और क्रोध करना जरूरी है तो उसके लिये पश्चात्ताप क्यों करें? यदि किसी व्यक्ति ने मेरे साथ बुराई की है तो मेरा उससे घृणा करना क्या बुरा नहीं? क्या एक गलती दूसरी गलती का सुधार कर सकती है? किसी व्यक्ति ने मेरे साथ लड़ाई करके क्या मुझे कुछ हानि पहुंचाई? वास्तविकता यही है कि मेरी ओर से की गई बुराई से दूसरों को तो कुछ हानि नहीं होती बल्कि मेरी अपनी ही हानि होती है। ऐसी दशा में बदला लेने का विचार क्यों मन में लाऊँ? क्रोध क्यों करूं? मन में दूसरों के प्रति विरोधी भावनाओं को क्यों स्थान दूँ? यदि मैं करता हूँ तो इसका कारण यही है कि मैं दम्भी, स्वार्थी और आत्म प्रदर्शन करने वाला हूँ। मेरी अपनी ही मानवता पर कुठाराघात करने वाली भावनाएं मेरे श्रेष्ठ स्वभाव को दबा देती हैं।

अब मैं भली प्रकार देख चुका हूँ कि दंभ, क्रोध और अपने ही नीच विचार मुझे दूसरों के व्यवहार से उत्तेजित कर देते हैं, ऐसी दशा में क्या यह ठीक नहीं कि अपने ही अन्दर देखकर अपनी गलतियों पर विचार करूं बजाय इसके कि दूसरे की गलतियों को देखता फिरूं। जब मैं जान गया हूँ कि दंभ, क्रोध और नीच विचार ही मुझे उत्तेजित करते हैं और उन को जीत लेने के बाद दूसरों का व्यवहार मुझे भड़का न सकेगा तो मैं हमेशा शान्ति से रहूँगा। मन में ऐसे विचार आने पर मनुष्य नम्र, ईर्ष्या व क्रोध रहित हो जाता है। इस प्रकार धीरे-धीरे उस आनन्द की ओर बढ़ता है जिसमें वह दूसरे मनुष्यों में किसी भी दोष को नहीं देख पाता। नीच विचार ही मुझे उत्तेजित करते हैं और उनको जीत लेने के बाद दूसरे मनुष्यों में किसी भी दोष को नहीं देख पाता और सबके लाभ की बात ही सोचता है।

जो मनुष्य वास्तव में नेक व महान होता है वह किसी को भी बुरा नहीं समझता बल्कि सभी को अच्छा समझता है। वह इस मूर्खता से भरे विचार को छोड़ देता है कि दूसरे भी उसके अनुकूल विचार और कार्य करें। वह समझता है कि लोगों के स्वभाव अलग-अलग होते हैं और सभी व्यक्ति आध्यात्मिक विकास के अर्थों में अलग अलग हैं। इसी विकास के अनुसार वह कार्य करता है-घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, आत्म प्रशंसा, स्वार्थ और कलह को छोड़कर वह बुद्धिमान हो जाता है और भली प्रकार समझ जाता है कि नम्रता, दया, प्रेम, सन्तोष और निःस्वार्थ भावना प्रकाश के और क्रोध आदि अन्धकार तथा मूर्खता के चिन्ह हैं। मूर्खता के कारण जो दुख उठाने पड़ते हैं उनसे अधिक शिक्षा देने वाली कोई वस्तु नहीं है। वह अपना मार्ग आप ही बनाता है-ऐसा मार्ग जो दुख और विपत्ति में से निकल कर ही वह महानता व सुख शान्ति प्राप्त करता है।

दोष रहित मनुष्य महान है। यह भी अपना मार्ग स्वयं ही बनाता है। वह अपने मार्ग को महानता के प्रकाश से प्रकाशित कर देता है और मूर्खता, दुख और विपत्तियों की सीमा को पार करके आनन्द को प्राप्त करता है। वास्तव में जब हम स्वार्थ को छोड़कर किसी और को प्रेम दृष्टि से देखते हैं तो हमें दूसरों में कोई भी बुराई दिखाई नहीं देती। इस प्रकार से उन्हें वैसा ही देखते हैं जैसा वे हैं, परन्तु इस उच्च प्रेम के स्थान पर मनुष्य तभी पहुँचता है जब अपने मन में इन विचारों को पक्का कर लेता है। इस प्रकार से मनुष्य दूसरों की बुराइयों को न देखने का रहस्य तभी समझता है जब वह उसके सम्बन्ध में सोचता है और उसमें अपने स्वार्थ की कोई बू नहीं होती। वह उन लोगों को उनके व्यवहार से ही नापता है। उनके कामों को अपने नहीं बल्कि उन्हीं के दृष्टिकोण से देखता है। लोग बुराई और भलाई के बारे में अपने अलग-अलग दृष्टिकोण बनाते हैं और चाहते हैं कि सभी लोग उस ढंग पर चलें। एक दूसरे में दोष देखने का यही कारण है। प्रत्येक मनुष्य की ठीक नाप तोल तभी की जा सकती है जब हम न तो अपने, न ही तुम्हारे और न किसी और के बल्कि उसी के पैमाने से उसे नापें। उस तरह का व्यवहार करने से हम उनकी परीक्षा नहीं लेते वरन् उनके साथ प्रेम करते हैं।

दूसरों के सम्बन्ध में बुरा कहने वाला मैं कौन हूँ? दूसरों पर बुरा होने का पाप मैं कैसे मढ़ सकता हूँ जब मैं स्वयं पाप से दूर नहीं हूँ। ऐ मेरे मन! दूसरों के दोष निकालने से पहिले अपने को मिलनसार और निरभिमानी बना।” दूसरों के दोष और बुराइयों, को देखने से पूर्व अपनी बुराइयों और दोषों को देखो। कबीर ने बहुत सुन्दर कहा है :—

“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न देखा कोय!

जो खोजा मन आपना, मुझ सा बुरा न कोय।”

पवित्र हृदय वाला व्यक्ति दूसरों में बुराई देखना छोड़ देता है। दूसरों से घृणा करना अपने आप को धोखा देना है। प्रेम करना स्वयं को प्रकाश में लाना है। कोई भी व्यक्ति अपने आप को व दूसरों को ठीक प्रकार से तब तक नहीं समझ सकता जब तक घृणा को त्याग कर प्रेम न करने लगे। घृणा करना सख्त गलती, मूँढता और अन्धापन है तथा इससे उसे ही हानि पहुँचती है। आम तौर पर हम देखते हैं कि मनुष्य अपने से पृथक मन रखने वालों को बुरा और अपने जैसा मन रखने वालों को अच्छा समझते हैं। जो व्यक्ति अपने ही मन को ग्रहण करने योग्य समझता है वह उन्हीं व्यक्तियों से प्रेम करता है जो उसके विचारों के अनुकूल होते हैं। किन्तु जो उसके विचारों के प्रतिकूल चलते हैं उनसे वह घृणा करते हैं। मसीह ने कहा—”जो तुझसे प्रेम करते हैं, यदि तू उन से प्रेम करे तो तू ने कौन सा अलौकिक काम किया है? अपने शत्रुओं से प्रेम कर और उनके साथ भलाई कर जो तुझ से घृणा करते हैं।”

बुराई की वास्तविकता को समझना और श्रेष्ठ जीवन यापन करने का मतलब है दूसरों में बुराई न देखना। जो दूसरों की बुराइयों को छोड़कर अपने हृदय को पवित्र बनाने की चेष्टा करता है, वह धन्य है। उसे एक दिन वह दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है जिससे वह किसी में बुराई को देख ही नहीं पाता।

बुराई की वास्तविकता को जानकर हमें क्या करना चाहिए? यदि कोई मेरे दोष निकालता है तो मैं उसे बुरा नहीं कहूँगा। यदि कोई मुझे गाली दे तो मैं उस के साथ भलाई करने प्रयत्न करूंगा। अपने दोष निकालने वाले की अच्छाइयों का वर्णन करूंगा, जो मुझ से घृणा करता है उस के लिए मैं प्रेम की आवश्यकता समझूँगा। शोकातुर व्यक्तियों से मैं सहानुभूति दिखाऊंगा। लोभी के साथ मैं उदारता का व्यवहार करूंगा। झगड़ालू के साथ नम्रता का बरताव करूंगा। जब मुझे बुराई दिखाई ही न पड़ेगी तो मैं किस से घृणा और किससे शत्रुता कमाऊंगा?

बहनों और भाइयों! अगर लोग तुम्हें दुख देना चाहते हैं या तुमसे शत्रुता, ईर्ष्या रखते हैं तो मुझे बहुत अफसोस होता है। मेरे साथ तो कोई भी ईर्ष्या नहीं करता, शत्रुता नहीं रखता। सभी नम्रता का बरताव करते हैं। मुझे रोना आता ही नहीं। मुझे रोने से क्या मतलब?

जैसे एक ही माता-पिता की संतान, एक ही परिवार के रहने वाले बहन भाई दुख-सुख में मिलकर प्रेम से रहते हैं, एक दूसरे की गलतियों को नहीं देखते बल्कि उन पर पर्दा डालते रहते हैं और प्रेम सूत्र में बन्धे रहते हैं, वैसे ही एक श्रेष्ठ पुरुष सभी लोगों को अपने ही घर का सदस्य मानते हुए, एक ही माता-पिता की सन्तान, एक ही आत्मा से बने हुए और एक ही लक्ष्य रखने वाले मनुष्य समझता है। वह सबको अपना बहन-भाई मान कर किसी को भी भिन्न नहीं मानता। उस के लिए गोरे काले, जाति-पाति आदि का कोई भेदभाव नहीं रह जाता। वह किसी की बुराई को नहीं देखता। सबके साथ सुख शान्ति से रहता है। इस आनन्द के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को धन्य है।

वास्तव में आगे बढ़ने की कला को उसी ने समझा है जिसने अपने हृदय को इस प्रकार से मोड़ लिया है कि वह किसी में भी बुराई को न देख सके।


जीवन संग्राम में विजयी कैसे हों?

(डॉ. रामचरण महेन्द्र, एम. ए. पी. एच. डी.)

जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रविष्ट हूजिए, पर प्रविष्ट होने से पूर्व यह समझ लीजिए कि यह एक यज्ञ है, अर्थात् पवित्र कार्य है। ईश्वरत्व के सब गुणों की सहायता से ही आप उसमें पूरी उन्नति कर विकसित और पूर्ण पक्कास्था में पहुँच सकते हैं। आप जीवन के लिए चाहे कोई भी क्षेत्र क्यों न चुनें, आपको नेतृत्व करना चाहिए। दूसरे शब्दों में सामान्य की अपेक्षा ऊँचा उठना चाहिए। आपके पास वे तत्व अधिक मात्रा में होने चाहिए, जो पथ-प्रदर्शकों में होते आये हैं। देश विदेश के महापुरुषों, नेताओं, समाज-सुधारकों और धार्मिक क्षेत्र में कार्य करने वाले नेताओं के जीवनों का अध्ययन कीजिए। आप पायेंगे कि जीवन-यज्ञ में सफलता लाभ करने वाले वे ही व्यक्ति हैं, जिनमें साधारण की अपेक्षा अधिक ज्ञान था और जिन्होंने सफलता-विज्ञान का विशेष अध्ययन किया था।

हरबर्ट कैसन नामक लेखक ने अपनी पुस्तक “नेतृत्व के लिए उपयोगी सूत्र” नामक एक पुस्तक में लिखा है, “नेतृत्व स्वयं अपने आप में एक शास्त्र है। इसमें सफलता के लिए मनुष्य में साधारण की अपेक्षा अधिक गुण होने चाहिए। इसकी शैली और सिद्धि का तरीका भी अलग है। अन्य कलाओं की तरह जीवन की इस उपयोगी कला को भी सीखा जा सकता है। यह सब कलाओं की सिरमौर कला है।”

उसी पुस्तक में कैसन साहब ने निम्न सूत्र दिये हैं, जिनसे मनुष्य पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकता है। इनमें से प्रत्येक सूत्र अपने आप में पृथक रूप कसे मन्थन करने, खूब सोचने विचारने का विषय है, सब में मानवता के उच्चतम गुणों के विकास और दानवता के विनाश का संकेत है। यह दिखाया गया है कि रजोगुण, तमोगुण और दानवता को दूर कर मनुष्योचित सत्वगुणों की वृद्धि करते रहना चाहिए। सात्विक भावों और सामर्थ्यों के विकास कर जाति, धर्म और देश की साँस्कृतिक परिधि को लाँघकर मानवता की सच्ची सेवा करने वाले वैज्ञानिकों, तत्ववेत्ताओं, समाज-सुधारकों के जीवन की झाँकियाँ भी दी जा रही हैं, जिनमें इन तत्वों का विकास पाया जाता है। दैवी गुणों (जिन्हें गीता में दैवी सम्पदा कहा गया है) का विकास करने से मानवता की वृद्धि होती है और जीवन कृतार्थ बनता है; मनुष्य उन्नति करता है।

संसार में ऐसा कोई नहीं है, जो अँधाधुन्ध आगे बढ़ता रहे। प्रत्येक महान् व्यक्ति ने अपनी सेवा या उन्नति का एक क्षेत्र चुना। यह चुनाव बड़ी समझदारी और भविष्य चिन्तन के पश्चात् हुआ। उसकी अच्छाई बुराई, उजला और धुँधला सब पक्ष देखे गए। अन्त में उसका निर्णय हुआ। होने के पूर्व अपनी शक्तियों को अच्छी तरह तोल लिया गया। ये उद्देश्य नाना प्रकार के थे, व्यक्तिगत उन्नति के साथ इनमें समाज, राष्ट्र और मानवता मात्र की सामूहिक उन्नति का विधान था। कोई कला , विज्ञान, धर्म, राजनीति में महान् बना, तो कोई मानवसेवा, समाजसेवा या भगवत्सेवा में बड़ा बना। किसी ने लोकोपकार के लिए अस्पताल, सेवा-सदन, दानशील संस्थाएँ मनुष्य की सेवा के लिए निर्मित कीं। किसी ने दान किया, कमाया और मुक्त -हस्त से दान दिया। किसी ने कला, साहित्य, संगीत चित्रकारी में उच्चतम स्थिति प्राप्त की। आप भी अपनी इच्छानुसार अपने जीवन का उद्देश्य अवश्य रखिए; उसका अच्छी तरह अध्ययन कीजिए; उस क्षेत्र के व्यक्तियों से मिलिये, अधिक से अधिक परामर्श कीजिए।

यदि आप नेता बनना चाहते हैं, तो जल्दी ही निर्णय करना चाहिए। “अमुक कार्य करूं, अथवा न करूं” ऐसे पशोपेश से बचना चाहिए। यदि आप प्रत्येक व्यक्ति की बात या परामर्श स्वीकार करते जायेंगे, तो कहीं भी न पहुँच पायेंगे। कोई कुछ कहेगा, तो दूसरा विपरीत सलाह देगा। प्रत्येक अपनी अपनी इच्छा, बुद्धि, शक्ति , रुचि और दृष्टिकोण से सलाह देगा। फल यह होगा कि आपकी शक्ति सामर्थ्य से कोई भी मेल न खायेगा। सबके सुझाव पृथक-पृथक होंगे; कोई आपके अनुकूल न बैठेगा। प्रत्येक के निष्कर्ष अलग होते हैं। आपके व्यक्तिगत अनुभवों के बल पर ही अपने निर्णय करने चाहिए। आप अपने यहाँ के नेताओं का अध्ययन करें तो आपको प्रतीत होगा कि उनमें शीघ्र निर्णय करने की अद्भुत क्षमता थी। निर्णय करने में अधिक देरी न होने के कारण उनको बहुत सा समय मिल गया और जबकि दूसरे अंधकार में हाथ पाँव फैलाये रहे, ये अपने क्षेत्र में उन्नति करते गये।

नेता भविष्य दृष्टा होते हैं। अर्थात् स्वतंत्र रूप से बहुत आगे की सोचते हैं। शब्दों, विचारों, योजनाओं, और अपने संकल्पों में वे स्वतन्त्र होते हैं। अपना अलग चिन्तन करते हैं। दूसरों के अनुभवों से लाभ अवश्य उठाते हैं, पर अपना मार्ग स्वयं ही निर्धारित करते हैं। आजकल वह युग नहीं कि आदमी अंधगति से जैसा कहा जाय बिना समझे बुझे वैसा ही करता चला जाय। आजकल स्वयं चिन्तन और नये रूप में सोचने का युग है। नया युग है, नई परिस्थितियाँ हैं, नई समस्याएँ हैं, नए मापदण्ड हैं। इन सबके लिए हमें नए रूप में ही सोचना विचारना है। युग के अनुसार अपने आदर्शों को ढालना है। स्वयं ढलना है।

पुनःपुनः अपने निर्णयों या आदेशों को मत बदलिये। आप जानते हैं आप उसी को नेता मान सकते हैं, जो पौरुषपूर्ण हो; चट्टान की तरह दृढ़ हो और स्पष्ट निर्देश दे; जिसे यह ज्ञान हो कि वह वस्तुतः क्या कह रहा है? क्या करना चाहता है? जो कुछ वह कह रहा है उसका क्या प्रभाव होगा? आप कभी उस व्यक्ति पर विश्वास न करेंगे, जो थोड़ी देर में अपने विचारों को बदला करता है? या विषम स्थिति को देखकर डर जाता है। तनिक से विरोध से भयभीत हो जाता है। नेता प्रायः वे ही हैं जिन्होंने अपने मंत्र को खूब सोचा है और फिर उस पर दृढ़ता से डटे रहे हैं।

क्या आप जानते हैं कि जब एब्राहम लिंकन एक युवक थे, तो वे इलिनोस के चुनाव के लिए खड़े हुए थे। इस चुनाव में वे बुरी तरह हारे थे। उसके बाद उन्होंने सफलता के लिए व्यापार को क्षेत्र चुना किन्तु उसमें भी बुरी तरह असफल हुए। 17 वर्षों तक वे गलत साथी के साथ साझे में कार्य करने से उन पर चढ़े हुए कर्ज को निपटाते रहे। एक सुन्दर युवती से उनका प्रेम सम्बन्ध हो गया। बहुत दिनों तक वे उसी के रंगीन जीवन में लगे रहे। एक दिन वह युवती मृत्यु को प्राप्त हुई। फिर वे राजनीति में प्रविष्ट हुए, काँग्रेस के उम्मीदवारी के लिए खड़े हुए, पर हार गये। उन्होंने अमेरिका के लैण्ड आफिस में नौकरी चाही पर वहाँ भी असफलता ही मिली। अमेरिका सीनेट के लिए उन्होंने प्रयत्न किया, परन्तु बुरी तरह पराजित हुए। इतनी असफलताएं से भी वे कदापि निराश न हुए और अन्त में उन्होंने अपने देश का सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया और अमर कीर्ति के स्वामी बने। ऐसा व्यक्ति ही सफल नेतृत्व के गुणों से सम्पन्न कहा जायगा। प्रायः हमारी असफलताओं योग्यता के नए पहलू दिखलाती हैं। हमें प्रायः यह ज्ञात नहीं रहता कि जीवन के किस क्षेत्र में, समाज के किस पहलू में हम सफलता प्राप्त करेंगे।

जिन व्यक्तियों ने आपको सहयोग, सेवा, सलाह या प्रेम किया है, मार्ग दर्शन से सहायता की है, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट कीजिए। अपने सफल सहयोगियों की दाद दीजिए अर्थात् उनकी सेवाओं के प्रति प्रोत्साहन दीजिए। संगीत, कविता, कला, लेखन अभिनय प्रायः सभी क्षेत्रों के कलाकार (जो हो सकता है आपके सहयोगी भी हों) प्रोत्साहन की आकाँक्षा करते हैं। बड़े नेता सदा ऐसे विकासोन्मुख कलाकारों को सच्चा प्रोत्साहन दिया करते हैं।

एमर्सन को बौद्धिक ब्राह्मण कहा जाता है। वे अपने संकल्पों पर इतने दृढ़ रहा करते थे कि यदि उनका कोई मित्र उनके नैतिक तथा सत्य-सम्बन्धी धरातल पर नहीं होता था तो वे उससे कहा करते थे-”जनाब आप अपने रास्ते जाइये, मैं अपने मार्ग पर जाऊँगा। दंभ करने से कोई लाभ नहीं। यदि हम अपने मतानुसार सत्य मार्ग का अनुसरण करते रहे, तो कभी न कभी आगे चल कर एक हो जायेंगे।” वे न तो किसी मित्र की प्रतिध्वनि बनना चाहते थे और न किसी को अपनी प्रतिध्वनि बनाना चाहते थे। उनका मत था कि हमें लोगों से मिलना जरुर चाहिए, पर अपनी शर्तों पर और क्षुद्र से क्षुद्र कारण पर किसी का प्रवेश या बहिष्कार करने का हमें अधिकार होना चाहिए।

महर्षि इमरसन के ये शब्द लूई पाश्चर के जीवन के निष्कर्ष हैं, “जो मनुष्य सुदृढ़ता से धैर्य का आँचल पकड़ लेते हैं, वे फिर जीवन के ऐसे गड्ढे में नहीं गिर सकते कि जहाँ से वे उठ ही न सकें। मैंने धैर्यवान मनुष्य को प्रायः अपने अभूतपूर्व अभीष्ट पर ही पहुँचते देखा है और वास्तव में मनुष्य में इतना सजीव साहस होना चाहिए कि वह संकटकालीन अवस्था में अपने आप को खड़ा रख सकें।”

मानवता के कष्ट, पीड़ा, वेदना और उत्पीड़न को दूर करने वालों और सुख, समता तथा स्वतन्त्रता से जीवन व्यतीत करने के पक्ष में लगातार संघर्ष करने वालों में अमेरिका के अब्राहम लिंकन का नाम चिरस्मरणीय रहेगा। उनका जन्म एक साधारण कुल में हुआ; गाँवों में इनका लालन पालन हुआ, शान्ति के वातावरण में वे पनपते रहे और जीवन भर उन्होंने शान्ति और न्याय का पाठ पढ़ाया। जीवन में वे न्याय के लिए लड़ते रहे और निराशा व विरोधों से टक्कर लेते रहे। गरीबों के साथ भी समानता का व्यवहार हो, यही उनका जीवन ध्येय था।

सेमुएल स्माइल्स के ये शब्द सुकरात के कुछ सिद्धान्तों को स्पष्ट करते हैं, “आत्मोद्धार अथवा अपनी उन्नति करने में निर्णयशक्ति , दृढ़निश्चय और तत्परता की आवश्यकता है। इन गुणों की वृद्धि तभी हो सकेगी, जब नवयुवकों में स्वावलम्बनशील होने की आदत डाल दी जाय और आरंभ में जिस हद तक हो सके, उसे स्वयं काम करने को स्वतन्त्र किया जाय। अपने ऊपर विश्वास न होने से हमारी उन्नति में बहुत बाधा आ जाती है।”


मैं वैरागी कैसे बना?

(राष्ट्रसन्त तुकड़ोजी महाराज)

मैं बहुत खोजता हूँ कि मुझे त्याग और वैराग की प्रेरणा कब से मिली? मगर मुझे उसका समय भी याद नहीं आता और आज भी मेरे पास उसका पता नहीं है। फल मात्र है निश्चित! जैसा ही मुझे बचपन में होश आया, अन्य लड़कों से मेरा कदम कुछ दूसरी ओर था। जैसे जैसे दिन बीतते गये वैसे ही उनके साथ मेरे विचार भी बढ़ने लगे; काम भी और व्यवहार भी बढ़ते गये। जो चीज पहले मेरी लगती थी वह विचारों के साथ साथ सब की होती रही। मैं जो अपने को अपना मानता था वह बढ़ते बढ़ते सब का मानने लगा-’मैं मानव मात्र का हूँ’ ऐसा स्वाभाविकता से लगने लगा। जो सम्प्रदाय मेरा मालूम होता था, विचार के बढ़ जाने से वह व्याप्त हो गया और सब का सम्प्रदाय मेरा प्रतीत होने लगा। मैं जिनको अपने गुरु, अपने माँ-बाप मानता था, उनकी जगह अब ‘सभी गुरु अपने हैं, सभी माँ-बाप का मैं बेटा हूँ, सभी बेटे मेरे समान हैं’ ऐसा बिना कुछ छोड़े और बिना कुछ पकड़े ही ख्याल होने लगा। यह तो जैसे नैसर्गिक क्रम से होता गया। मैं इसका शास्त्रीय क्रम अभी भी नहीं जानता हूँ कि मैं कैसे बढ़ा और किस साधना से बढ़ा।

हाँ, वह एक साधन मेरे पास जरूर था कि जिस किसी ने मुझसे जो भी कहा उसको बोध मुझे बराबर हुआ और श्रद्धायुक्त भावना से उनका सुनते हुए आगे बढ़ने की मैंने कोशिश की। पर उसमें यही देखते गया कि ये सब साधन उनके हैं- उनके अनुभव के हैं; खुद अपने को कुछ उनसे, और कुछ अपने मन से लेना पड़ेगा। यही धारणा बनती गयी। अभी भी मैंने कुछ त्यागा नहीं। ख्याल में थोड़ा फर्क जरूर है। कपड़ा पहनता हूँ’ मगर कल का कौन सा कपड़ा अपने पास है-कभी ढूँढ़ा ही नहीं। जो मिला सो पहन लिया। खाने-पीने का भी यही तरीका है। जो मिला खा लिया, जहाँ जगह मिली वहीं रहा और जिसने सम्हाला उसी का बना। जब लोग मुझे अपने-अपने घर ले जाने को आपस में झगड़ा करने लगे तब सब, ने तय किया कि तारीख वार दिन दिये जायँ। तारीख सम्हालने वाले भी मिले।

मुझे दी हुई भेंट मैंने कभी पास नहीं रखी। किसी ने जेब में डाल दी तो याद नहीं रही। धोने में सैकड़ों नोटें भीग गयीं, खराब हो गयीं फट गयीं। बाद में पास के आदमियों ने उसे सम्हाला। जो भजन बनते गये वे जहाँ लिखे वहीं रह गये। जब जनता को ठीक लगा तब उन्हीं लोगों ने उसका संग्रह किया और फिर ‘प्रकाशन मंडल’ बने। कुछ बातें अच्छी लगीं तो जनता ने उनका भी संग्रह कर लिया। कुछ लोग प्रेमी बने, उनका एक मंडल बन गया और अब तक हजारों शाखाएँ बन चुकीं। लाखों भेटें मिलीं, लाखों खर्च चले। समय बचा नहीं, अपना कुछ रहा नहीं। पास में खजाना नहीं, पर खर्च करने को कम नहीं। जो मिले सो अपना, जो गाली दे सो भी अपना। यह सब जीवन के साथ बढ़ता ही गया। अनुभव बढ़ा, त्याग बढ़ा, वैराग बढ़ा। मगर बढ़ा कब और शुरू हुआ कब, इसका अंदाज नहीं पाया।

मैं तो यही मानता हूँ कि किसी को कुछ भी त्यागना नहीं है, सिर्फ उसकी मालकियत को व्यक्ति से हटाकर सर्वव्यापी करना है। त्याग-वैराग के लिये कुछ करना नहीं है, बल्कि सब की मालकियत को समझना है। ईश्वर से मिलना नहीं है, बल्कि अपने में उसका अनुभव करना है। मुक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपनी मुक्त आत्मा का ज्ञान भर कर लेना है, समझकर उसी में रहना है। क्योंकि आत्मा का यही रूप है। अनुसंधान में सब कुछ पा जाता है।

हाँ, कुछ स्मरण है कि जब मंदिर में ध्यान करने गया तब मंदिर में ही रममाण होने लगा और वहीं मुझे अपना घर महसूस होने लगा। जब पिता भोजन को ले जाते तब कहीं घर की याद! जब पिता ने छोड़ दिया, तब जो ले जाता उसी का घर घर बन जाता। बेफिक्र था मन! एक दिन भजन की कुछ बहियाँ लिखकर रखदीं और बाहर गया, तब किसी दूसरे ने उसे चुराने की चेष्टा की। तो उनके अतराफ दो साँप उसको दिखे। तब वही मेरे पास कहने आया कि “भाई” क्षमा करो। मेरे दिल में चोरी करने की बुद्धि आयी थी, मगर जब देखा कि बड़े बड़े दो साँप दरवाजे पर लटक रहे हैं तब पश्चात्ताप हुआ।” यह सुनते ही और विश्वास दृढ़ हुआ कि अपना रक्षण करने वाला हमेशा मौजूद है तब तो और भी बेफिक्र बना।

एक मित्र ने कहा कि ‘तुम निकम्मे हो, मुफ्त का खाते हो। तुमसे काम कुछ नहीं बनता।’ दिल को लगा, यह ठीक नहीं है। सिलाई की मशीन का धंधा सीखा तीन माह में। एक मशीन उधार खरीद ली और उस पर काम करके चार महीने में पैसे अदा किये। साथ ही उसी वक्त मशीन को बेच डाला और एक बड़ा सत्यनारायण किया जितने भी पैसे मशीन के आये थे दान में उड़ाये यानी भूखों को रोटी खिलाकर मुक्त हुआ। और उसी रात को भजन करके कहा- “मैं निकम्मा नहीं हूँ। काम कर सकता हूँ। मगर मुझे उसकी जरूरत नहीं है। खाऊँगा कम और काम करूंगा बहुत, जो मेरे और धर्म तथा देश के काम आ जाये।” लोगों को विश्वास हुआ। फिर लोग ही मेरी फिक्र करने लगे। मुझे कुछ छोड़ने और पकड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ी।

मुझे कुछ याद होती है, एक सातली-कोथली कर महाराज मेरे जन्मगाँव में रहते थे। उन्हीं के पास मैं बचपन में रहता था। वे ही मुझे भजन सिखाते थे, सिर्फ मैं उनके पास बैठा करता था बस, एक रोज हाथ में एकतारी ली और गाने लगा। उन्होंने कहा, “अब तुमको भजन ही करना होगा।” बड़े अच्छे महात्मा थे! मुझे वहीं से भजन का चस्का लगा।

जब में गुरु महाराज (श्रीसमर्थ आडकोजी महाराज) के समाजाने के बाद जंगलों में भागा तब मेरी वृत्ति कुछ पागल सी थी। मेरे बदन पर कपड़ा नहीं था, लंगोटी भी नहीं थी। एक नशा सा छाया हुआ था, कि मैं आत्म साक्षात्कार कैसे करूंगा? रोता था, कभी पत्थरों से पूछता था, कभी झाड़ों के साथ बोलता था-तुम तो इसी में व्याप्त हो ना? तब बोलो, मुझे साक्षात्कार कैसे होगा?” कभी बादल से आंखें लगाता था। कभी शेरों की गुफाओं में घुसकर ध्यान करता था कि मेरा डर निकले और मैं अमर आत्मा का अभ्यास करूं, मगर यह सब स्वभाव था। कभी एक चित्त से एक भी साधन मैंने नहीं किया। चिंतन बहुत किया, चिंतन से ज्ञान हुआ, ज्ञान से अनासक्ति बढ़ी और उपासना, भजन से लोक-सेवा बढ़ी। मगर वैराग का पता नहीं लगा कि, मुझे वैराग कब से हुआ?

एक कारण का पता चलता है कि जब मुझे मन्दिर में ध्यान नहीं करने दिया तब माता के कहने से जंगलों में बैठने का, नदियों के किनारे शंकर जी की रेणुमूर्ति बनाकर ध्यान करने का अभ्यास शुरू किया। संसार से उपराम होने का भाव तभी बताया गया-बढ़ता गया। यही सिर्फ याद है; मगर उसे वैराग कैसे कहूँ? वह तो मेरा हठ था, आग्रह था।

जब मैंने बदन के कपड़ों को छोड़ा तब तो मुझे याद ही नहीं आता था कि मैं नंगा नहाया हूँ या कपड़ा पहने हुए हूँ। मेरा तो वह क्षण जैसे देह-विसर्जन का था कि या तो मैं मर जाऊँ या कुछ मिलाऊँ-दर्शन पाऊँ । यह तो लगन थी, इसे वैराग कैसे कहा जाय? तब वैराग की प्रेरणा का दिन या कारण कैसे समझा सकता?

यही समझ लिया है मैंने कि बड़ी चीज के लिए छोटी चीजों की प्रीति छोड़ी, महान प्रकाश के लिये अल्पजीवी प्रलोभन छोड़े और ‘सब मानव मेरे’ ऐसा समझने के लिये जाति, पंथ, पक्ष, धर्म आदि की सीमाएँ छोड़ी। सर्वव्यापी आत्मा के दर्शन के लिये शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि की आसक्ति छोड़ी और अब उसकी पूर्णावस्था में समाने के लिये सारी याद भी छोड़ने की तैयारी में हूँ। मगर वह सेवा के मैदान में ही छूटेगी, कुर्बान हो जायेगी।


ध्यान-योग द्वारा आत्मोत्कर्ष

(स्वामी सत्यानन्दजी महाराज)

संसार के सभी महत्वपूर्ण कार्यों की सफलता के लिये मनोयोग अथवा ध्यान की, एकाग्रता की आवश्यकता है। इसमें भी आध्यात्मिक साधन तो बिना ध्यान के निश्चल हुये हो ही नहीं सकते। ध्यानपूर्वक विचार करने से ही हम किसी वस्तु के मूल स्वरूप और उसकी वास्तविकता को जान सकते हैं। अगर हमारा ध्यान इधर-उधर बँटा रहता है, तो हम किसी विषय का गहराई में पैठकर यथा तथ्य ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।

ध्यान दो प्रकार का होता है—एक स्थूल ध्यान और दूसरा सूक्ष्म ध्यान। दृष्ट अथवा अदृष्ट स्थूल पदार्थों को देखने अथवा समझने के लिये जिस ध्यान की आवश्यकता होती है, उसे स्थूल-ध्यान कहते हैं और सूक्ष्म पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये जो ध्यान किया जाता है वह सूक्ष्म-ध्यान कहा जाता है। किसी भी पदार्थ को जानने या प्रत्यक्ष करने की इच्छा करने पर जिस प्रकार हम उसकी ओर अपने को अग्रसर करते हैं, अथवा दृश्य और दृष्टा के बीच में जो अन्तर है उसे दूर करने का प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार सर्वगामी मन को भी अपने अभिलाषित पदार्थ की ओर गतिमान करने से उन दोनों के बीच का अन्तर जाता रहता है और वह पदार्थ हमको स्पष्ट दिखलाई देने लगता है। अथवा जब हम किसी कार्य के विषय में निर्णय करना चाहते हैं तो हमको उसकी भूत, भविष्यत् और वर्तमान स्थिति पर विचार करना आवश्यक होता है, उसी प्रकार हम यदि किसी पदार्थ का तत्वज्ञान की दृष्टि से ध्यान करना चाहेंगे तो हमको उसके प्रत्येक अंग पर पूर्णरूप से ध्यान करना चाहिये, तभी उसका सत्य स्वरूप हम पर प्रकट हो सकेगा।

स्थूल-ध्यान साधन

पिता, माता, गुरु आदि किसी पूजनीय व्यक्ति की मूर्ति जिसे हम पहले से भली प्रकार देख चुके हैं; अथवा राम, कृष्ण, शिव आदि किसी देवता की मूर्ति जिसमें हमारा हार्दिक अनुराग हो; अथवा नदी, पर्वत, सागर, वन, उपवन, नगर, महल जो हमें सबसे उत्तम रमणीक जान पड़ता है-ऐसी कोई भी मनोनुकूल वस्तु या पदार्थ ध्यान के लिये ग्रहण करना चाहिये। हमको बार-बार उसी पदार्थ का ध्यान, उसकी याद करते रहना चाहिये। ऐसा लगातार करते रहने से हमको स्थूल-ध्यान का अभ्यास हो जायेगा। हमारे अन्नमय शरीर की प्रधान वृत्ति स्मृति शक्ति है। यदि हम किसी पदार्थ के लिए बार-बार स्मृति शक्ति का प्रयोग करते रहेंगे तो वह मूर्ति अथवा पदार्थ हमको स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ेगा। जब हमारा यह अभ्यास पक्का हो जायेगा। तो हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों का निरोध करके अथवा निद्रित होकर उस मूर्ति या व्यक्ति से बात-चीत भी कर सकते हैं। यह एक प्रकार से स्वप्न के मध्य में किये गये भाषण की तरह होता है। कारण यह कि प्राणमय शरीर में अथवा प्राकृतिक प्राणमय क्षेत्र में निद्रावृत्ति को प्रधान माना गया है। साथ ही भाषण आदि भी प्राण के ही कार्य हैं। इसलिए स्वप्न में मूर्ति की बात-चीत सुन सकना अथवा उसके अंग संचालन आदि को देख सकना सम्भव होता है। इसी तथ्य को समझकर साधक गण ध्यान के लिये अपने गुरु अथवा किसी वीतराग पुरुष की मूर्ति को ग्रहण करते हैं। इस प्रकार का स्वप्न या सुषुप्ति अवस्था में साक्षात्कार स्थूल ध्यान से सम्बन्ध रखता है और उसके लिये केवल चित्तवृत्ति के प्रयोग की आवश्यकता होती है। इस प्रकार के ध्यान का अभ्यास करते समय साधक के लिये कई प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं, पर उनकी तरफ से उदासीन रहना ही श्रेयस्कर है। अपने साधन की सफलता के विषय में ऐसी कोई परीक्षा लेना या ऐसी सिद्धियों के विषय में किसी अन्य व्यक्ति से बातचीत करना उचित नहीं है। ऐसा करना अपने प्रगति-मार्ग में काँटे बोना है। ध्यान का अभ्यास करते समय प्रतिदिन ध्यान में अनुभव आये विषयों को ध्येय वस्तु से सामञ्जस्य करके उसका पर्यालोचन करना लाभ-जनक है। जब तक साधन में इस प्रकार का सामञ्जस्य उत्पन्न नहीं होता तब तक उसे पूर्ण नहीं समझना चाहिये और बराबर अपने कार्यक्रम में दत्तचित्त रहना चाहिये। इस कार्य में त्राटक कर्म का अभ्यास बहुत अच्छा समझा जाता है। ध्यानयोग का अभ्यास बढ़ने पर साधक को उन पदार्थों का भी ध्यान करना चाहिये जिनको अभी तक नहीं देखा है, पर भविष्य में जिनके देखने की संभावना है, उनको भी प्रत्यक्ष देखकर वास्तविक वस्तु से उसका मिलान करना चाहिये। इस प्रकार अतीत (भूत), वर्तमान और भविष्यत् पदार्थों का ध्यान करके उनको ध्यान में प्रत्यक्ष देख और समझा जा सकता है इतना हो जाने पर ध्यानयोग का स्थूल साधन सम्पन्न हुआ समझा जा सकता है।

सूक्ष्म ध्यान

सूक्ष्म-ध्यान के लिये पहले सूर्य-मंडल जैसे विषय का ध्यान करना चाहिये। साधक को विचारना चाहिये कि सूर्य में ऐसी कौन सी शक्ति विद्यमान है जिसके द्वारा उसमें ऐसी तेज और जीवनी शक्ति भरी हुई है। ऐसे गूढ़ विषयों का ध्यान करके उनको जानना ही सूक्ष्म ध्यान के अभ्यास की प्रणाली है। बीज से जिस प्रकार वृक्ष का अनुमान किया जाता है, अथवा धुँआ से जैसे अग्नि का अनुमान किया जाता है उसी प्रकार सभी कार्य और कारणों में प्रच्छानु भाव से रहने वाले तथ्य विचारवान व्यक्ति के मन में प्रतिफलित होते रहते हैं। जिस पदार्थ या विषय का आस्तित्व एक बार असंदिग्ध रूप से प्रतिपादित हो चुका है, जिसको सर्वतोभाव असम्भव मान लिया गया, उसके भूत, भविष्यत्, वर्तमान स्वरूप में कैसा भी तारतम्य क्यों न दृष्टिगोचर हो, उसका स्वधर्म (स्वाभाविक गुण, सदैव विद्यमान रहता है। आवरण पड़ जाने से चाहे वह “धर्म” साधारण मनुष्यों से अलक्षित रहे; पर ज्ञानी के ज्ञान-नेत्रों से वह नहीं छुप सकता। योग-साधना का इच्छुक जिस समय मनोमय शरीर में अवस्थान करता हुआ ‘सोहं’ का ध्यान करता है, उस पर विचार करने लगता है, तो वह मनोमय शरीर को अतिक्रम करके विज्ञानमय शरीर में पहुँच जाता है। किसी विशेष पदार्थ का साक्षात्कार करने के निमित्त हम बहुत अधिक प्रयत्न करें, तो भी साक्षात्कार हो जाने पर उसके प्रति एक प्रकार का स्वाभाविक वैराग्य हो जाता है। इसीलिये मनोमय शरीर से अग्रसर होकर विज्ञानमय शरीर में पहुँच जाने पर भी उसके प्रति स्वाभाविक वैराग्य हो जाने से साधक पुनः मनोमय शरीर में ही वापस लौट आता है। इसलिये हमको सूक्ष्म ध्यान द्वारा बार-बार अपने ध्येय स्वरूप का ध्यान करने और वहाँ पर दृढ़ रूप से अधिष्ठित होने का प्रयत्न करना पड़ता है। इसके लिए “सोहं” शब्द का ध्यान—विचार आवश्यक है। इस समय साधक अपने को बहुत उच्च स्थिति पर पहुँच गया अनुभव करता है, और अनेकों वस्तुएं या शक्तियाँ, जो पहले अत्यन्त दुर्लभ जान पड़ती थीं, इस समय अनायास प्राप्त हो जाती हैं। परन्तु, साधक को उन सबके प्रति वैराग्य भाव रखना ही उचित है। ऐसी स्थिति में साधक को अन्य व्यक्तियों के सामने अपने को बिल्कुल साधारण मनुष्य के रूप से ही प्रकट करना कल्याणकारी है। क्योंकि यदि वह अपने को छुपा न सकेगा तो लोग उसके प्रति इतने अधिक आकर्षित हो जायेंगे कि उसकी साधना में विघ्न पड़ जायगा। इसलिये यदि सबसे ऊँची स्थिति के समीप पहुँचकर भी हम बिल्कुल नगण्य-उपेक्षित अवस्था में बने रहें तो इससे हमको साधन करने में विशेष सुविधा ही प्राप्त होगी। सबका साराँश यही है कि ध्यान-योग द्वारा ही मनुष्य मनोमय शरीर का अतिक्रम करके विज्ञानमय में पहुँच कर समाधि-साधन का अधिकारी बन सकता है।


आप भी प्रेस और पत्र-संचालक बन सकते हैं!

(श्री सत्यभक्त जी)

वर्तमान समय आन्दोलन और प्रचार का युग है। जब तक देश में राजाओं या बादशाहों की हुकूमत थी तब तक लोगों को राजनीति, अर्थनीति और धर्म आदि के सार्वजनिक मामलों में किसी तरह का दखल देने का अधिकार न था। इसलिये देश और विदेशों में होने वाली घटनाओं या परिवर्तनों की तरफ ध्यान देने की न कोई जरूरत थी और न उसका कोई महत्व ही जान पड़ता था। पर जब से जन-सत्ता का उदय होने लगा, शासन प्रबन्ध जनता के चुने हुये प्रतिनिधि करने लगे, शासकों को जनता के सामने अपने कामों को कैफियत देने का नियम बनाया गया, तब से परिस्थिति में क्राँतिकारी परिवर्तन होने लगे। अब सिद्धाँत की दृष्टि से सार्वजनिक विषयों में प्रत्येक देशवासी का समान अधिकार माना जाता है और यदि मनुष्य साहस तथा व्यावहारिक बुद्धि से काम ले तो उनकी बात न्यूनाधिक अंशों में सुनी ही जाती है। अब सार्वजनिक कार्यों में भाग लेने से किसी को रोका नहीं जा सकता और अनेक साधारण अथवा निम्न श्रेणी के व्यक्ति भी ऊँचे से ऊँचे दर्जे पर पहुँच जाते हैं। विदेशों में हिटलर, मुसोलिनी और हमारे देश में सरदार पटेल, डॉ. अम्बेडकर आदि इस तथ्य के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि यदि मनुष्य में वास्तविक योग्यता और कार्यक्षमता हो तो उसको उन्नति के उच्च शिखर की तरफ अग्रसर होने से को रोक नहीं सकता।

वर्तमान समय में सार्वजनिक जीवन में प्रविष्ट होने और सफलता प्राप्त करने के मुख्यतः दो ही मार्ग हैं एक वाणी का और दूसरा कलम का। इसका आशय यही है कि आप में ऐसी कोई शक्ति होनी चाहिए कि जिसके द्वारा आप अपने विचारों या मन्तव्यों को जनता के सामने प्रभावशाली रूप में उपस्थित कर सकें और लोगों को उनकी उपयोगिता तथा श्रेष्ठता का विश्वास दिला सकें। एक तीसरा मार्ग अपने कार्यों और कर्तव्यपालन द्वारा लोगों का प्रभावित और आकर्षित करने का भी है और वास्तव में यही सबसे उच्चकोटि का सत्य मार्ग है। पर खेद से कहना पड़ता है कि संसार की वर्तमान परिस्थिति में इस मार्ग का महत्व कम पड़ गया है, क्योंकि जो व्यक्ति चुपचाप काम करता है उसकी तरफ जनता का ध्यान बहुत देर से जाता है और तब तक प्रचार और आँदोलन कार्य में निपुण लोग बाजी मार ले जाते हैं। पर इसका यह अर्थ नहीं कि ठोस सेवा कार्य करना आवश्यक अथवा निरर्थक है। जनहित का निःस्वार्थ भाव से कार्य करना तो सदैव प्रशंसनीय माना ही जायगा, पर उसके साथ प्रचार कार्य का भी संयोग होना चाहिये। वास्तविक बात यह है कि न तो चुपचाप कर्तव्यपालन करने वाले को और न कर्तव्यशून्य कोरे प्रचारक और आन्दोलनकारी का सफलता मिल सकती है। सफलता उसी को प्राप्त होगी जो कर्तव्यपालन और प्रचार का उचित सामञ्जस्य कर सकता है। मुख्य चीज जनसेवा और कर्तव्य पालन ही है पर सार्वजनिक क्षेत्र में सफल होने के लिये उसके साथ प्रचार कार्य भी अनिवार्य है।

प्रचार के उपर्युक्त दोनों साधनों—वाणी और कलम में से प्रथम साधन में प्रकृतिदत्त अंश अधिक माना जाता है। वैसे लगातार अभ्यास और सतत् प्रयत्न से भी मनुष्य काम लायक अच्छा वक्ता बन सकता है पर स्वाभाविक वक्तृत्व-शक्ति कुछ और ही चीज होती है। हम सभा सम्मेलनों में प्रायः देखा करते हैं लोग विद्वानों और शास्त्र के मर्मज्ञों के भाषण से उठकर चले जाते हैं और अनेक साधारण विद्या बुद्धि के वक्ताओं पर जनता लट्टू हो जाती है।

पर दूसरा साधन कलम प्रायः इसके विपरीत है। इसमें प्रकृतिदत्त अंश कम और अभ्यास का महत्व ही विशेष समझना चाहिये। हम बिल्कुल कूढ़मगज लोगों की बात तो नहीं कहते पर जो लोग पढ़ने-लिखने में सामान्यतः सफल हों और जिनकी औसत दर्जे की तीक्ष्ण बुद्धि हो वे इस कार्य में भली प्रकार अग्रसर होकर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इस मार्ग को ग्रहण करने वाले व्यक्तियों में सबसे पहला गुण स्वाध्याय-प्रेम होना आवश्यक है। हम जितना अधिक सद्ग्रन्थों को, विभिन्न विषयों पर विद्वानों की कृतियों को पढ़ेंगे उतना ही अधिक हमारा ज्ञान-भंडार बढ़ेगा और हम अपने लेखों में उपयुक्त सामग्री इकट्ठी कर सकेंगे। दूसरे, इसी प्रकार के स्वतंत्र और पर्याप्त परिमाण में किये गये अध्ययन से हमारा भाषा ज्ञान परिपक्व हो सकेगा और हम विभिन्न शैलियों का अनुशीलन करके अपने लिये भी किस एक शैली का अभ्यास दृढ़ कर सकेंगे। हमारा एक यही अनुमान है कि जिस व्यक्ति को स्कूल या कालेज में कुछ पढ़ने-लिखने का अभ्यास हो चुका है, वह इस कार्य में मन लगाकर उद्योग करने से चार-छह महीने में पत्रकार कला के साधारण नियमों को जान सकता है और धीरे-धीरे थोड़े समय में पत्र संचालन का अनुभव प्राप्त कर सकता है। यदि यह अभ्यास किसी संस्था या योग्य विद्वान की देख-रेख में किया जाय तो शीघ्र ही उन्नति हो सकती है और सीख ने वाला विधिवत् मार्ग से अग्रसर होकर एक-दो वर्ष में ही सफल पत्रकार बन सकता है।

यों तो प्रेस और पत्रकार के कार्य की हमारे देश में पिछले पचास-साठ वर्षों में काफी प्रगति हुई और समाचार पत्रों तथा पाठकों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है, पर जब से देश ने स्वाधीनता की है और शासन की बागडोर पूर्णतया भारतीयों के हाथ में आई है तब से समाचारपत्रों का महत्व बहुत बढ़ गया है और उनके पाठकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। अब से बीस पच्चीस वर्ष पहले जहाँ प्रथम श्रेणी के हिन्दी पत्रों की 8-10 हजार प्रतियाँ बिक जाना बड़े सौभाग्य की बात समझी जाती थी, अब 25-30 हजार प्रतियों वाले कई पत्र निकल रहे हैं। इसका कारण यही है कि स्वाधीन भारत में जहाँ की प्रजा शासन पर थोड़ा बहुत नियंत्रण रखती है, अथवा विरोधी प्रदर्शन करके अपनी माँगों को मनवा सकती है, वहाँ सभी को—चाहे वह नौकर हो, चाहे व्यापारी-चाहे किसान, शासन की गतिविधि और नये-नये सरकारी नियमों की जानकारी रखना आवश्यक समझा जाता है। इसके बिना जन साधारण अपने प्राप्त अधिकारों से कोई लाभ नहीं उठा सकते और न हानिकारक कार्यों को रुकवा सकते हैं।

इन कारणों से आजकल समाचार पत्रों की आवश्यकता बढ़ती जाती है और पिछले दस वर्षों में सैकड़ों नये पत्र निकले भी हैं। पर अभी तक ये बड़े या छोटे शहरों से ही निकले हैं। साथ ही एक बात यह भी है कि छोटे शहरों में समाचारपत्रों का खर्च नहीं निकल पाता, इसलिये समाचारपत्र वालों को पहले जमाने में तो देश हितैषी या समाज हितैषी लोगों की सहायता से काम चलाना पड़ता था और आजकल किसी राजनीतिक पार्टी का सहारा लेना पड़ता है या किन्हीं बड़े आदमियों की खुशामद करके खर्च वसूल करना पड़ता है। पर ये दोनों ही तरीके प्रशंसनीय नहीं कहे जा सकते। हमारी सम्मति में अब देश के अधिकाँश भाग में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गई है कि वहाँ गाँवों में भी छोटे-छोटे समाचार पत्र ईमानदारी के साथ चलाये जा सकते हैं और उनके द्वारा जनता की सेवा करते हुये अपना भी जीवन निर्वाह सुगमतापूर्वक किया जा सकता है।

पर इस प्रकार की योजना तभी सफल हो सकती है कि जब कार्यकर्ता जनता की सेवा को अपना लक्ष्य बना लेवें, झूँठे अहंकार को त्यागकर छोटा और बड़ा सब काम अपने हाथ से करने को तैयार हों, और व्यवहार में सचाई का पूरा ध्यान रखें। ऐसे कार्यकर्ता को प्रेस के कम्पोज और छपाई का अभ्यास स्वयं कर लेना चाहिये और स्वयं ही समाचार इकट्ठे करके लिखने और पत्र-सम्पादन का कार्य सीख लेना चाहिये। इसका कारण यह है कि छोटे स्थानों में समाचारपत्र निकालने में इतनी आमदनी नहीं हो सकती कि उससे कई व्यक्तियों का खर्च चल सके। साथ ही उन पत्रों में इतना काम भी नहीं होता कि उसमें कई व्यक्ति लगे रहें। अमरीका के गाँवों में इस प्रकार के पत्र निकलते हैं जिनकी छपाई और सम्पादन का कार्य एक ही व्यक्ति कर लेता है और स्वयं ही जाकर अपने ग्राहकों को अखबार पहुँचा आता है। ऐसे व्यक्ति कुछ ही समय में अपने छोटे से क्षेत्र के लोक प्रिय कार्यकर्ता (और वास्तविक अर्थों में वहाँ के नेता) बन जाते हैं। स्वामी सत्यदेव जी ने अपनी “अमरीका भ्रमण” नामक पुस्तक में एक ऐसे ही वृद्ध सज्जन का जिक्र किया है जो एक छोटे से गाँव में एक अखबार निकालते थे और उसका समस्त काम स्वयं ही अपने हाथ से कर लेते थे।

अगर दस-बारह छोटे गाँवों का केन्द्र बनाकर एक गाँव में ऐसा प्रेस स्थापित किया जाय तो उसे अखबार के सिवाय समय-समय पर छपाई का भी थोड़ा सा काम मिल सकता है। अब गाँव-गाँव में पंचायतें कायम हो गई हैं और उनको बहुत से महत्वपूर्ण कार्य करने पड़ रहे हैं, विवाह शादी में भी शहरों की देखा देखी अनेक लोग निमंत्रण बधाई आदि छपाने लगे हैं, छोटे स्थानों के व्यवसायी भी अब छोटे बड़े पर्चे छापने लगे हैं। अगर अपने निकट ही कम खर्चे में छपने की व्यवस्था हो तो इस प्रकार की अनेक नई-नई चीजें छापने को मिल सकती हैं और उनसे भी साधारण आमदनी हो सकती है।

इस प्रकार का प्रेस वर्तमान समय में पाँच सौ से लेकर एक हजार रु. में आरम्भ किया जा सकता है। इसमें एक छोटे हैण्डप्रेस से काम चलाना होगा। जहाँ दो तीन मित्र-मिल कर काम करना चाहें और ढाई तीन हजार रु.लगाना चाहें वहाँ पैर से चलने वाली छोटी ट्रेडिल की व्यवस्था हो सकती है। ये दोनों प्रकार की व्यवस्थाएं स्थान की छोटाई-बड़ाई की दृष्टि से और अपने पास की पूँजी के अनुसार पसन्द की जा सकती हैं; पर मुख्य बात अपने क्षेत्र की जनता से संपर्क स्थापित करना, उनके सुख-दुख की, उनके लाभ-हानि की बातों पर ध्यान देना तथा अपने पत्र द्वारा उनकी शिकायतों और असुविधाओं का सुधार करना ही है। इसी से आपका पत्र और स्वयं आप उस क्षेत्र में प्रभाव जमा सकेंगे और वहाँ की जनता से आपको सब प्रकार का आवश्यकीय सहयोग प्राप्त हो सकेगा। हम फिर यह बतला देना चाहते हैं कि सर्वदेशीय समाचार पत्र, जिलों के समाचार पत्र और ग्रामीण समाचार पत्र-ये सब भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से सम्पादित किये जाते हैं। ग्रामीण पत्र तभी सफल हो सकेगा जब उसमें मुख्य रूप से स्थानीय महत्व की तथा वहीं के जनहित की बातों और समस्याओं की चर्चा होगी। देश और विदेश की प्रमुख घटनाओं और मनोरंजक समाचारों के लिये पत्र का अधिक से अधिक चौथाई भाग देना चाहिये। आजकल हमने कितने ही स्थानीय पत्रों में देखा है कि दो-चार स्थानीय विषयों पर साधारण या जोरदार खबरें छाप कर स्थान भरने के लिये चाहे जिस विषय पर लम्बा-सा लेख दे दिया जाता है। ऐसे पत्र यदि न बिकें और केवल किसी की सहायता या चन्दे पर ही चलें तो इसमें आश्चर्य ही क्या? हमारा विश्वास है कि जो व्यक्ति स्वार्थ और पक्षपात पूर्ण दलबन्दी की नीति को त्यागकर बुद्धिमानी-पूर्वक जनता की समस्याओं और अभावों की पूर्ति की दृष्टि से पत्र प्रकाशित करेगा तो वह अवश्य सफल होगा और जीवन-निर्वाह के लायक आमदनी के साथ ही प्रतिष्ठा और सर्वसाधारण के सम्मान का पात्र भी बनता चला जायगा।

छोटे रूप में प्रेस और समाचार पत्र के संचालन के विषय में मोटी-मोटी बातें यहाँ बतलाई गई हैं। जो व्यक्ति वास्तव में इस कार्य का करना चाहें उन्हें कुछ दिन तक किसी पत्र के कार्यालय या इस विषय की शिक्षा देने वाली संस्था में रहकर अनुभव प्राप्त करना आवश्यक है। हो सका तो इस सम्बन्ध में कुछ व्यावहारिक बातें किसी आगामी लेख में पाठकों की सेवा में उपस्थित करने का प्रयत्न करेंगे।


संसार-संकट और हमारा कर्तव्य

(श्री विश्वबन्धु)

इस समय आणविक शस्त्रों के आविष्कार के कारण समस्त संसार पर भय की एक काली घटा छा रही है। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सब एक भीषण भविष्य की कल्पना से व्याकुल हो जाते हैं। जहाँ साधारण विद्या बुद्धि के मनुष्य इस विषय में तरह-तरह की काल्पनिक बातें करते दिखाई देते हैं, वहाँ संसार के सबसे बड़े राजनीतिज्ञ और राष्ट्रों के संचालक भी इस भय से इनकार नहीं करते और समय-समय पर मानव-सभ्यता को सर्वनाश से बचाने के लिये चेतावनी देते रहते हैं।

इस प्रकार के नाशकारी संघर्ष का भय कोई नई बात नहीं है। मनुष्य में प्राचीनकाल से ही स्वार्थपरता का भाव प्रबल रहा है और वह शक्ति प्रयोग द्वारा दूसरों के सत्त्व का अपहरण करना अपना स्वाभाविक अधिकार मानता रहा है। पर आरम्भ में यह संघर्ष व्यक्तिगत होता था, इसलिये इसका स्वरूप प्रायः सीमित रहता था। फिर जब से बड़े-बड़े साम्राज्य स्थापित हुये तब से इस संघर्ष का विस्तार बढ़ने लगा और इधर तीस चालीस वर्षों के भीतर तो आवागमन के साधनों की तीव्र गति के कारण इसने सम्पूर्ण जगत को एक ही सूत्र में आबद्ध कर दिया है।

मानवता के ऊपर इस संकट को देखकर लोक हितैषी महापुरुषों का हृदय द्रवित हो जाता है और वे इसके निवारण के लिये राष्ट्रों को न्यायमार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहते हैं। कुछ समय पूर्व विश्व-बन्धुत्व के सिद्धान्त का प्रचार करने वाले बहाई सम्प्रदाय के एक नेता ने इस विषय में कहा था—

“अपने हृदयों में विचारो कि इस समय संसार कैसे कष्टों और क्लेशों में डूबा हुआ है, किस प्रकार संसार की जातियाँ मानवीय रक्त से लिथड़ी हैं, नहीं-नहीं उनकी मिट्टी तक भी लहू से रँगी हुई है। युद्ध ने ऐसी भीषण अग्नि प्रचण्ड की है कि संसार ने इसके सदृश न तो प्राचीनकाल में और न मध्यकाल में देखी थी। युद्ध रूपी चक्की चली और उसने असंख्य मानुषिक सिरों को पीस डाला, नहीं-नहीं इसकी भेंट चढ़ने वालों की दशा तो इससे भी बुरी हुई। फलते-फूलते देश नष्ट-भ्रष्ट हो गये, नगर के नगर भूमितल से मिला दिये गये, बसते हुये गाँव खंडहर बना दिये गये, पिताओं के पुत्र जाते रहे और पुत्र पिताहीन हो गये, माताएँ अपने जवान पुत्रों के शोक में लहू के आँसू रोई, नन्हे-नन्हे शिशु अनाथ हो गये और विवाहिता युवतियाँ बेठौर ठिकाने हो गईं। साराँश यह कि मनुष्य सर्वप्रकार से पतित हो गया।

“इन सब घटनाओं का वास्तविक कारण जातीय, सामाजिक, साम्प्रदायिक और राजनीतिक पक्षपात है और इस पक्षपात का मूल कारण व दूषित गाथाएँ हैं जो हृदयों में जमी हुई हैं, चाहे वह गाथाएँ साम्प्रदायिक हों या जातीय हों, सामाजिक हों या नैतिक हों। जब तक इन गाथाओं का लेशमात्र भी शेष रहता है मनुष्य रूपी भवन की नींव सुरक्षित नहीं और स्वयं मनुष्य मात्र भी निरन्तर भय में है।”

“अब इस प्रकाशमान युग में जब कि सारी सृष्टि का सार प्रकट कर दिया गया है और सारी रचना का गुप्त भेद स्पष्ट कर दिया गया है, जब सच्चाई के प्रभात ने अंधकार को दूर कर दिया है, क्या यह मानवोचित है कि ऐसा भयानक रक्तपात, जो संसार पर ऐसा नाश लाता है जिसकी पूर्ति नहीं हो सकती, उसे होने दिया जाय?

ईसामसीह ने सारे संसार के लोगों को शान्ति और मेलजोल की शिक्षा दी। उसने पतरस को आज्ञा दी थी कि वह अपनी तलवार को म्यान में रखे। यह ईसा की शिक्षा और उसकी इच्छा भी थी, किन्तु आज तो जो उसके नामलेवा हैं उन्होंने तलवार नंगी की हुई है। इन लोगों के कामों और बाइबिल की स्पष्ट शिक्षा में कितना भेद है!

“हमारा सब से पहला उपदेश सत्य की खोज करने का है। किसी दूसरे का अन्धाधुन्ध अनुकरण मनुष्य की आत्मा को मार देता है, किन्तु सत्य की खोज संसार को पक्षपात के अन्धकार से मुक्त करती है।”

“दूसरी शिक्षा मनुष्य मात्र की एकता की है। ईश्वर प्रत्येक प्राणी पर असीम कृपा रखता है। ईश्वर ने अपनी सृष्टि में कोई भेदभाव नहीं रखा है।”

“धर्म एक बड़ा मजबूत किला है। इसको एकता का प्रेरक होना चाहिये न कि शत्रुता और घृणा का कारण। यदि धर्म से शत्रुता और घृणा उत्पन्न होती हैं तो इसका त्याग कर देना ही श्रेष्ठ है, क्योंकि धर्म एक औषधि के समान है, यदि औषधि से रोग बढ़े तो वह किस काम की?

“इसी प्रकार साम्प्रदायिक, जातीय, सामाजिक और राजनैतिक (आर्थिक) पक्षपात मनुष्य मात्र की नींव को खोखला करने वाले हैं। इन सबका परिणाम रक्तपात होता है। यह सब मनुष्य का नाश करते हैं। जब तक यह रहेंगे युद्ध का भय भी लगा रहेगा। इसका एकमात्र उपाय विश्वव्यापी शाँति की स्थापना है। यह तभी होगा जब एक महा न्यायालय (पंचायत) स्थापित हो जाय जिसमें सारे राज्यों और सारी जातियों के प्रतिनिधि हों। सारे जातीय और अन्तर्जातीय झगड़े इसी पंचायत के आगे पेश होंगे और जो कुछ निर्णय वह करेगी उसी को मनवाया जायगा। यदि कोई राज्य उसे मानने से इनकार करेगा तो सारा संसार उनका एक साथ विरोध करेगा।”

भारत के ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले से इस तथ्य की घोषणा कर दी है कि यह समस्त विश्व एक ब्रह्म से ही उद्भूत हुआ है और आत्म-दृष्टि से प्रत्येक मनुष्य एक ही है। यदि वह अपने को भिन्न समझकर लड़ता झगड़ता या दुष्टाचरण करता है तो इसका कारण माया जनित अज्ञान ही है। यह सत्य है कि जब मनुष्य को भूख प्यास के दुःसह कष्ट का सामना करना पड़ता है तो वह ज्ञान की इन बातों को भूल जाता है और हर प्रकार से स्वार्थ साधन का प्रयत्न करने लगता है। पर इससे यह भी ज्ञात होता है कि संसार का अधिकाँश अभी तक अज्ञानान्धकार में पड़ा है और उसके संचालक या नेता अपने यथार्थ कर्तव्य पालन की अपेक्षा स्वार्थ-भाव में डूबे हैं। इससे यह भी पता चलता है कि जो व्यक्ति अध्यात्म, दर्शन, ईश्वर, धर्म आदि की बातें करते हैं वे भी उनमें आन्तरिक विश्वास और श्रद्धा नहीं रखते वरन् ऐसी बातों के द्वारा दूसरे लोगों को बहकाना या भुलावे में रखना ही उनका उद्देश्य होता है।

कुछ भी हो मानव समाज अब बढ़ते-बढ़ते एक ऐसे विकट स्थल पर आ पहुँचा है,जहाँ पारस्परिक समझौते के सिवाय दूसरा मार्ग नहीं है। संसार के सामने अनेकों विकट समस्याएँ और टेढ़े प्रश्न उपस्थित हैं। साधारण जनता में तो न अभी इतना ज्ञान प्रसार हुआ है और न इतनी शक्ति आई है कि वह इस कार्य को पूरा कर सके। उनमें तो अधिकाँश लोगों का विचार क्षेत्र बहुत सीमित रहता है और वे अपने परिवार, जाति, या प्रदेश से आगे की चीज देख सकने में समर्थ नहीं होते। इसलिये यह विभिन्न राष्ट्रों के शासकों और नेताओं का ही कर्तव्य है कि मनुष्य मात्र की एकता और समानता के सिद्धान्त को स्वीकार करके एक विश्वव्यापी संघ-शासन की योजना करे। यह भली प्रकार समझ लेना चाहिये कि इस प्रकार की योजना के कार्यान्वित होने से किसी भी राष्ट्र की हानि नहीं हो सकती वरन् वे आज की अपेक्षा अधिक सुख और सुविधा का ही जीवन व्यतीत कर सकेंगे। जब ऐसा कोई विधान, जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ या अन्याय न होगा, सभी शक्तिशाली राष्ट्रों के सूत्रधारों द्वारा निश्चित करके चलाया जायगा तो उसे संसार के प्रायः सभी देश और व्यक्ति अपने लिये लाभकारी समझ कर मान लेंगे। यदि कुछ इने-गिनें व्यक्ति या एकाध देश अपनी दुष्ट प्रकृति अथवा मूढ़ता के कारण विरोध करेगा तो वह विश्व संघ की सम्मिलित शक्ति द्वारा सहज ही में सीधी राह पर लाया जा सकेगा। इस योजना की पूर्ति में अगर कहीं कुछ खून खराबी हो भी गई तो वह विश्वयुद्ध के हजारवें भाग के बराबर भी नहीं होगी और संसार वास्तव में मनुष्यों के रहने लायक बन जायगा। इसके विपरीत यदि शान्ति और सुलह की दुहाई देते हुये भी बड़े राष्ट्र अपने स्वार्थ और जातीय अहंकार को ही प्रधानता देते रहे तो शाँति-चर्चा होते-होते अचानक ज्वालामुखी फूट पड़ेगा और संसार में ऐसा भयंकर राजनैतिक और सामाजिक भूचाल आयेगा कि साम्राज्यों, राष्ट्रों, देशों, जातियों, मजहबों और व्यक्तियों का कहीं पता भी न लगेगा और यह दुनिया खेतों, बाग, बगीचों, नगरों, कारखानों और बड़े बड़े उद्योग-धन्धों से भरे पूरे जगत की बजाय, बियावान और उजाड़ बन जायगी। आशा है कि विभिन्न राष्ट्रों के सूत्रधारों में समय रहते सुबुद्धि का उदय होगा और मनुष्य अपने को पहचान कर आध्यात्मिक एकता के मार्ग को अपनायेगा।


बन्धन से मुक्ति

(माता आनन्दमयी)

एक था राजा। उसको धन-दौलत की कमी न थी तो भी उसको शाँति प्राप्त नहीं होती थी। किसी व्यक्ति से उसे बतलाया कि गुरु से मंत्र लेकर जप करने से शान्ति मिल सकती है। तब वह अपने कुलगुरु की खोज करने लगा। इतने दिन तक बेचारे गुरु का किसी को पता भी न था और वह बड़ी गरीबी की हालत में दिन बिता रहा था। राजा का बुलावा पाकर उसे बड़ा आनन्द हुआ। उसने भी राजा को विश्वास दिलाया कि मंत्र का जप करने से उसको शान्ति मिलेगी। राजा ने विधिवत् मन्त्र लिया और श्रद्धापूर्वक उसका जप करने लगा। गुरु महाराज को भरपूर दक्षिणा मिली और वे सुख से रहने लगे।

पर जब काफी समय बीत जाने पर भी राजा को शाँति नहीं मिली तब उसने गुरु को बुलाकर कहा कि देखो, आपके कथनानुसार सब कार्य करने पर भी मुझे शाँति नहीं मिलती। अब आपको सात दिन का समय दिया जाता है। इस बीच में या तो मुझे शाँति का सच्चा उपाय बतलाओ वर्ना तुमको कुटुम्ब सहित मरवा दिया जायगा। यह सुन कर गुरु घर चले आये और चिंता से व्याकुल होने लगे। मृत्यु के भय से उनका खाना-सोना भी छूट गया।

गुरु के एक लड़का था जो मूर्ख की तरह इधर उधर जंगल में घूमकर समय व्यतीत करता और केवल भोजन के लिए घर आता था। जब छः दिन बीत गए तो सातवें दिन मृत्यु को निकट आया समझकर उसके माँ-बाप इतने दुःखी हुये कि उस दिन घर में चूल्हा भी न जला। जब वह लड़का भोजन के समय घर आया तो खाने की कोई सामग्री न पाकर लड़ने-झगड़ने लगा। उसके बाप ने उसे तमाम किस्सा बतलाया। लड़के ने कहा इसमें डरने की क्या बात है, तुम कल मुझे राजा के पास ले चलना, मैं उसे शाँति प्राप्त करने का उपाय बतला दूँगा। बस अब तुम चिन्ता त्यागकर भोजन की व्यवस्था करो।

दूसरे दिन बाप और बेटा दोनों राजा के पास गये। राजा के प्रश्न करने पर गुरु ने लड़के की तरफ इशारा किया कि यह आपको शाँति का मार्ग बतलायेगा। राजा के पूछने पर लड़के ने कहा कि अगर राजा उसके कहने के मुताबिक काम करने को राजी हो तो वह अवश्य शान्ति का उपाय बतला सकता है। राजा ने इसे मंजूर कर लिया।

तब लड़के ने दो बड़ी और मजबूत रस्सियाँ मँगाईं और राजा तथा गुरु को अपने साथ जंगल में चलने को कहा। वहाँ एक स्थान पर तीन बड़े-बड़े पेड़ लगे हुये थे। लड़के ने एक पेड़ के साथ राजा को कस कर बाँध दिया और दूसरे से गुरु को बाँध दिया। तब वह स्वयं तीसरे पेड़ पर चढ़कर आनन्द से गाने और उछल-कूद मचाने लगा। कुछ समय बाद बन्धन की यंत्रणा से व्यथित होकर राजा ने लड़के को पुकारा। पर लड़के ने जरा भी ध्यान न दिया। वह अपने गाने, नाचने में मग्न हो रहा था। तब राजा ने गुरु को पुकार कर कहा, “लड़का तो सुनता नहीं आप ही इस बन्धन को खोल दीजिए।” गुरु ने उत्तर दिया—”मैं तो स्वयं ही बँधा हूँ आपके बन्धन को किस प्रकार खोल सकता हूँ!”

बन्धन के कष्ट से चिल्लाते-चिल्लाते अकस्मात् राजा के चित्त में दिव्यज्ञान उत्पन्न हुआ। वह सोचने लगा कि मैं विषय-भोगों के बन्धनों में रहकर शान्ति किस प्रकार पा सकता हूँ और जो गुरु स्वयं साँसारिक बन्धनों में बँधा है वह मुझे बन्धन-मुक्त किस प्रकार कर सकता है? तब उसने गुरु के लड़के को पुकारा कि अब रस्सी को खोल दो मुझे शाँति का मार्ग मालूम हो गया। गुरु-पुत्र ने आकर उसे खोल दिया और वह अपनी राजधानी को लौटने के बजाय वहीं वन में रहकर आत्म-चिंतन करने लगा।


ब्राह्मणत्व का अर्थ है-त्यागमय जीवन

(श्री शिवप्रकाश शर्मा)

समाज में चार वर्णों की स्थापना हिन्दू धर्म की एक बहुत बड़ी विशेषता है। वैसे तो सभी देशों में सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिये समाज में विभिन्न श्रेणियाँ पाई जाती हैं, पर उनकी, हमारी वर्ण व्यवस्था के साथ तुलना करना सर्वथा असंगत है। उन समाजों का श्रेणी-विभाग केवल सामयिक सुविधा की दृष्टि से किया गया होता है और उसमें प्रायः सौ दो सौ वर्ष के भीतर ही अनेक परिवर्तन हो जाते हैं। पर हिन्दू-धर्म की वर्ण व्यवस्था ऐसी स्थायी बनाई गई है कि हजारों वर्षों के पिछले इतिहास में उसका प्रमाण मिलता है और आज भी लोग सिद्धान्त रूप से उसे आदर्श मानते हैं। भारत-वर्ष का कोई भी उल्लेख-योग्य सम्प्रदाय या समुदाय ऐसा नहीं जो वर्ण व्यवस्था की निन्दा करता हो अथवा उसे पूर्णतया हानिकारक बतलाता हो। यदि कुछ लोग उसका विरोध करते हैं तो उसका कारण वर्ण-व्यवस्था में समय के प्रभाव उत्पन्न हो गई अनेक प्रकार की विकृतियाँ ही हैं।

प्राचीन काल में चारों वर्णों में ब्राह्मणों की ही प्रधानता थी और समाज का संचालन करने की शक्ति उन्हीं के हाथ में रहती थी। पर वह शक्ति वर्तमान समय की राजनैतिक शक्ति से सर्वथा भिन्न प्रकार की थी। आजकल तो जिस समुदाय के हाथ में धन, सम्पत्ति, उत्पादन के साधन होते हैं वही प्रायः राजनीतिक सत्ता को भी अपने हाथ में रखता है, और उसके द्वारा सबसे पहला काम यह करता है कि कोई दूसरा समुदाय या व्यक्ति उसके स्वार्थों को हानि न पहुँचावे। इसके परिणाम स्वरूप अन्य समुदायों में स्वभावतः ईर्ष्या और द्वेष की उत्पत्ति होती है और वे सत्तारूढ़ दल को नीचे गिराने की कोशिश करने लगते हैं। वैसे संघर्ष बुरी बात नहीं है और उसी के द्वारा मनुष्य ने इतनी प्रगति की है, पर इस प्रकार तुच्छ स्वार्थभाव का संघर्ष समाज में दोषों की उत्पत्ति का कारण ही बनता है और उससे लोगों में अनैतिकता, संकीर्णता, छल, कपट आदि की प्रवृत्तियों की वृद्धि होती है।

पर वर्ण-व्यवस्था के सिद्धान्तानुसार समाज की संचालन शक्ति जिन ब्राह्मणों के हाथों में रखी गई थी वे धन सम्पत्ति के उत्पादन और स्वामित्व से कोई सम्बन्ध नहीं रखते थे। उन लोगों ने राज्य क्षत्रियों के लिये छोड़ दिया था, वाणिज्य, कृषि आदि वैश्यों के सुपुर्द कर दिये थे, शारीरिक श्रम द्वारा अर्थोपार्जन का कार्य शूद्रों को सौंप दिया था। ब्राह्मणों के लिये केवल त्याग ही त्याग रखा गया था। उनके लिये जीवन निर्वाह के साधन भी बहुत थोड़े और बड़े कठिन रखे गये थे, जिससे भोग विलास में लिप्त हो सकने की संभावना ही नहीं रहती थी। ब्राह्मण अपना उदर पोषण किस प्रकार करे इस सम्बन्ध में “मनुस्मृति” में लिखा है—

ऋतामृताभ्याँ जीवेन्तु मृतेन प्रमृतेन वा।

सत्यानृताव्यामपि व न श्ववृत्या कदाचन॥

ऋतमुच्छशिलं क्षेयममृतं स्यादयाचितम्।

मृतं तु याचितं भक्षं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम्॥

सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते।

सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्ताँ परिवर्जयेत॥

(मनु 4। 4-6)

अर्थात् “ब्राह्मण ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत या सत्यामृत से अपना जीवन बितावें परन्तु श्ववृत्ति अर्थात् सेवावृत्ति (नौकरी) न करे। उच्छ (खेतों में पड़े दाने बीन लाना) और शिल (खेतों में पड़ी हुई बालें बीन लाना) को ऋत जानना चाहिये। बिना माँगे मिला हुआ अमृत कहलाता है। माँगी हुई भिक्षा मृत कही जाती है और खेती को प्रमृत कहते हैं। वाणिज्य को सत्यामृत कहते हैं और विवशता के समय उससे भी जीविका चला सकते हैं। पर सेवा (श्ववृत्ति) का आश्रय कदापि नहीं लेना चाहिये।

इस प्रकार आदर्श और उच्चश्रेणी का ब्राह्मण वही है जो अपने लिये कभी किसी प्रकार की संपत्ति तथा अन्य वस्तुओं का संग्रह न करके कम से कम सामग्री में अपना निर्वाह करता रहे। उसका मुख्य कार्य वेदाध्ययन तथा यज्ञ-कर्म में संलग्न रहना है। यदि कोई आपत्ति काल आ जाय तो वह क्षत्रिय अथवा वैश्य की वृत्ति द्वारा भी जीवन धारण कर सकता है, पर सेवावृत्ति (नौकरी) उसके लिये सर्वथा त्याज्य मानी गई है। कारण यह है कि नौकरी में मनुष्य दूसरे का वशीभूत हो जाता है उसकी स्वतंत्र विचार करने और सम्पत्ति देने की शक्ति कुँठित हो जाती है और तब वह समाज का संचालन करने में अयोग्य हो जाता है।

इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन ग्रंथों और पुराणादि में ब्राह्मण की अत्यंत प्रशंसा लिखी है और उसे लोकोत्तर अधिकार प्रदान किये हैं, पर साथ ही उनमें ब्राह्मणों के लिये ऐसे आदर्श भी बतलाये गये हैं कि जिनका पालन साधारण व्यक्तियों के लिये संभव ही नहीं है। “श्रीमद्भागवत्” में भगवान स्वयं कहते हैं—

धृता तनूरुशती में पुराणी

येनेह सत्वं परमं पवित्रम्॥

शमो दमः सत्यमनु ग्रहश्च

तपस्तितिक्षानुभवश्च यत्र॥

मत्तौऽप्यनन्ता त्पयरत.परस्मा

त्स्वर्गापवर्गा धिपतेर्न किंचित्।

येषाँ किमु स्यादि तेरण तेषा-

मकिञ्चनानाँ मयि भक्तिभाजाम्।

अर्थात्—”उन ब्राह्मणों ने इस लोक में मेरी अति सुन्दर और पुरातन वेद रूपी मूर्ति को अध्ययनादि द्वारा धारण किया है। उन्हीं में परम, पवित्र, सत्त्वगुण, शम, दम, सत्य, अनुग्रह, तप, सहनशीलता और अनुभव आदि पाये जाते हैं। वे ब्राह्मण द्वार-द्वार पर भिक्षा माँगने वाले नहीं होते, साधारण मनुष्य से कुछ माँगना तो दूर रहा, मुझ अनन्त और सर्वेश्वर परमेश्वर से भी वे कुछ नहीं चाहते। वे अकिञ्चन (सर्वत्यागी) महात्मा विप्रगण केवल मेरी भक्ति में ही संतुष्ट रहते हैं।”

अन्य ग्रंथों में भी ऐसे ही वचन स्थान-स्थान पर पाये जाते हैं—

ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं न सुखाय कदाचन।

तपः क्लेशाय धर्माय प्रेत्य मोक्षाय सर्वदा॥

(वृहर्द्धम पुराण 2। 44)

“ब्राह्मण की देह विषय सुख के लिये कदापि नहीं है। वह तो सदा सर्वथा तपस्या का क्लेश सहने, धर्म का पालन करने और अन्त में मुक्ति के लिये ही उत्पन्न होती है।”

सम्मानादि ब्राह्मणो नित्यभुद्विजेत विषादिव।

अमृतस्येव चाकाँक्षे दव मानस्य सर्वदा॥

(मनुस्मृति 2। 162)

“ब्राह्मण को चाहिये कि वह सम्मान से सदा विष के समान डरता रहे और अपमान की अमृत के समान इच्छा करता रहे।”

हम नहीं समझते कि त्याग और तपस्या का इससे बढ़कर और कोई आदर्श हो सकता है। ऐसे ब्राह्मण केवल किसी एक समाज के ही नहीं वरन् मनुष्य मात्र के लिये वन्दनीय समझे जाने चाहिये। यही कारण था कि प्राचीन काल में ऐसे ब्राह्मणों का सम्मान मनुष्य तो क्या देवता तक करते थे। पर आज अवस्था सर्वथा विपरीत हो गई है। विश्वामित्र, वशिष्ठ, पाराशर आदि के वंशज बनने वाले ब्राह्मण चपरासी और सिपाही की छोटी-छोटी नौकरी कर रहे हैं, जूते बनाने तथा धोबी की दुकान में भी काम करते दिखलाई पड़ते हैं और दो चार पैसे के लिये झूठ और बेईमानी करने को तैयार रहते हैं। ऐसे लोगों को किस प्रकार ब्राह्मण माना जाय, किस प्रकार उनको लोकोत्तर सम्मान दिया जाय और किस प्रकार उन्हें समाज का सर्वोच्च संचालक बनाया जाय? यदि कोई समाज ऐसा करेगा तो उसका पतन सुनिश्चित है। इसलिए हमको ब्राह्मण के वास्तविक आदर्शों का ध्यान रखते हुए अधिकाधिक तप व त्याग का उदाहरण उपस्थित करना चाहिए तभी ब्रह्मणत्व की रक्षा हो सकेगी।


हमारे दस प्रत्यक्ष गुरु

(श्री योगेन्द्र जी, ब्रह्मचारी)

एक प्रसिद्ध महात्मा ने एक बार कहा था कि “हम तोते के समान कई बातें बोल जाते हैं, पर उनमें से एक को भी कार्य में नहीं उतारते। केवल मुख से कह देना और आचरण में न लाना—यह हमारा एक स्वभाव ही बन गया है।” वास्तव में यह सत्य भी है। आज मनुष्य में सदाचरण शक्ति का अभाव हो गया है। हम नित्य प्रति रामायण, गीता, महाभारत आदि ग्रन्थों का पाठ करते हैं। उनमें वह महत्वपूर्ण शिक्षाएं भरी हुए हैं जो हमारे जीवन का कायाकल्प कर सकती हैं, हमारे लोक और परलोक दोनों का सुधार कर सकती हैं, परन्तु हम केवल उनके पाठ तक ही सीमित रहते हैं। उनको अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न नहीं करते। यदि युधिष्ठिर की तरह हम एक पाठ को जीवन में उतारे बिना आगे बढ़ने का साहस न करें तो हमारे जीवन में वह निखार उत्पन्न हो सकता है कि हम एक आदर्श मानव बनकर सहस्रों प्राणियों को मानवता की सुगन्धि देते रहें। संसार का हर एक व्यक्ति जानता है कि अच्छाई क्या है और बुराई क्या है? कौन से करने योग्य कर्म हैं और कौन में हानि है और किसमें लाभ? परन्तु करते विरले ही है। उपनिषद् का वचन है कि आत्मा की प्राप्ति शास्त्रों को सुनने या उनका पाठ करने मात्र से नहीं हो जाती। उन पर आचरण करने से ही इसकी प्राप्ति सम्भव है। एक उर्दू कवि का कहना है “अमल से जिन्दगी बनती है जन्नत भी जहन्नुम भी।” प्लेटो का कथन है “किसी देश का इससे अधिक क्या सौभाग्य हो सकता है कि उसमें श्रेष्ठ आचरण करने वाले स्त्री पुरुषों का बाहुल्य हो।” हमारे ग्रन्थों में एक ऐसे महर्षि का वर्णन मिलता है जिनको उपरोक्त शक्ति की सिद्धि थी। उन्होंने प्रकृति से शिक्षा ग्रहण करके अपने जीवन को सुन्दरतम बनाने की चेष्टा की थी। वह हैं महर्षि दत्तात्रेय! नीचे हम उनके प्रत्यक्ष दस गुरुओं का वर्णन करते हैं। यदि हम भी इनको अपनाकर ज्ञान ग्रहण करें तो भगवान दत्तात्रेय की भाँति ब्रह्मवेत्ता बन ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

भगवान दत्तात्रेय कहते हैं—

(1) पहिला गुरु मैंने पृथ्वी को बनाया। उससे मुझे धैर्य और क्षमा की शिक्षा मिलती है। पृथ्वी पर लोग नाना प्रकार के आघात व उत्पात करते रहते हैं परन्तु वह न तो रोती है और न बदला लेती है बल्कि प्रति उत्तर में फल, फूल, अनाज, वनस्पतियाँ और न जाने क्या-क्या देती है। संसार के हर एक प्राणी को कष्ट और आपत्तियों का सामना करना पड़ता है कोई रोकर करते है कोई धीरज से। हमें पृथ्वी की तरह सहनशील होना चाहिए बल्कि परोपकार की शिक्षा ग्रहण करके अपने जीवन को समाज के हित में घुला देना चाहिए।

(2) दूसरा गुरु मेरा वायु है। जैसे शरीर के भीतर रहने वाला केवल आत्मा से ही सन्तुष्ट रहता है वैसे हमें भी इन्द्रियों की तृप्ति में आसक्त न होकर जीवन निर्वाह की वस्तुओं की ही इच्छा करनी चाहिए। शरीर के बाहर रहने वाला भी सब जगह जाता है परन्तु अनासक्त भाव से किसी के गुण दोष को नहीं अपनाता वैसे ही हमें भी विभिन्न प्रकार के भोगों को भोगते हुए अपने लक्ष्य पर स्थिर रहना चाहिए। उनमें राग द्वेष या आसक्त न होना चाहिए। जैसे वायु गन्ध को वहन करती हुई भी उसके संपर्क में नहीं आती वैसे ही हमें भी शरीर की भूख प्यास व पीड़ा आदि को वहन करके, अपने को शरीर नहीं आत्मा मानते हुए उसके गुणों से निर्लिप्त रहना चाहिए।

(3) तीसरे गुरु आकाश से आत्मा की सर्वव्यापकता की शिक्षा मिली है। आग जलती है, पानी बरसता है, अन्न आदि आते व नष्ट होते हैं। बादल आते व जाते हैं परन्तु फिर भी आकाश वैसे का वैसा रहता है, उसे कोई नहीं छू सकता। इसलिए नाम रूपों की सृष्टि व प्रलय के चक्कर में न पड़कर आत्मा को इनके स्पर्श से दूर रखना चाहिए।

(4) चौथे गुरु जल से मैंने यह शिक्षा ली है कि हमें स्वभाव से स्वच्छ, मधुर और पवित्र होना चाहिए। प्राकृतिक जल शुद्ध होता है तो भी पृथ्वी के संपर्क में आकर गन्दा होने पर भी वह पुनः शुद्ध और पवित्र होने के लिए प्रयत्नशील रहता है। यदि हम भी पथ भ्रष्ट हों गये हो तो पुनः सन्मार्ग पर जाने का प्रयत्न करना चाहिए।

(5) मेरा पाँचवाँ गुरु अग्नि है जो मुझे तेजस्विता, प्रकाश, श्रेष्ठता, परमार्थ समता की शिक्षा देती है। अग्नि निरन्तर ऊपर की ओर ही रहती है। जहाँ जलाई जाती है वहाँ गर्मी व प्रकाश उत्पन्न करती है। जो कुछ उसे अर्पण किया जाता है वह अपने पास न रखकर सभी देवताओं को बाँट देती है। मैली वस्तुओं को सीसे जैसा सुन्दर बना देती है। सब कुछ खा पी लेने पर भी अलिप्त रहती है। इसलिए सत्पुरुष को उपरोक्त गुणों को ग्रहण करके माया, मोह, द्वेष, ममता से दूर रहकर समरूप रहना चाहिए।

(6) सूर्य मेरा छठा गुरु है। वह अपनी किरणों से पृथ्वी का जल खींचता है और आवश्यकता पड़ने पर वर्षा के रूप में लौटा भी देता है। समाज ने हमें बनाया है। यदि हम समाज को ऊंचा उठाने की चेष्टा नहीं करते तो हम कृतघ्न हैं। जल के विभिन्न पात्रों में सूर्य पृथक प्रतिबिम्बित होता है परन्तु उसे अनेक नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार से प्रत्येक व्यक्ति में आत्मा अलग अलग दीखती है। परन्तु वह है एक ही। एकात्म भाव को स्थिर करके मनुष्य ब्रह्मज्ञानी हो सकता है। संसार की उच्चतम सुख शान्ति और आनन्द को प्राप्त करके अमर हो सकता है।

(7) सातवाँ गुरु चन्द्रमा यह शिक्षा देता है कि जिस तरह चन्द्रमा न घटता है न बढ़ता है परन्तु उसकी कलाएं घटती बढ़ती हैं और चन्द्रमा को उनसे कोई लगाव नहीं रहता इसी तरह से हमारे शरीर की अवस्थाएं भी बदलती रहती हैं। आत्मा से उनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। हमें उनके प्रभाव में नहीं आना चाहिए।

(8) आठवें गुरु समुद्र से मैंने यह सीखा है कि जिस प्रकार वह सदैव मर्यादा में रहता है, ग्रीष्म ऋतु में सूखना नहीं और वर्षा ऋतु में नदियों व वर्षा के जल को ग्रहण करके कभी अमर्यादित नहीं होता इसी प्रकार हमें भी कष्ट और आपत्तियाँ आने पर दुखी और ऐश्वर्य प्राप्ति पर प्रसन्न नहीं होना चाहिए बल्कि दुख सुख में एक समान रहना चाहिए।

(9) सार ग्रहण की शिक्षा मुझे भ्रमर से मिलती है। जिस प्रकार वह भिन्न प्रकार के पुष्पों पर घूम-घूमकर सार ग्रहण करता है उसी प्रकार से हमें भी छोटे बड़े सभी शास्त्रों का मनन करके, उनके मतभेदों और उलझनों में न पड़कर, उसका रस निचोड़ लेना चाहिए।

(10) बालक मेरा दसवाँ गुरु है जो निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर रहता है, जिसके मन में किसी के प्रति द्वेष और दुर्भावना नहीं होती। हमें भी अपने जीवन को दुर्भावना हीन व द्वेषहीन बनाना चाहिए और निरन्तर आगे बढ़ने की इच्छा रखनी चाहिए। सनत कुमार निरन्तर पाँच वर्ष की आयु के ही रहते थे, यह उनकी बालक जैसी सम स्थिति की ओर ही संकेत है।

हमें पूर्ण विश्वास है कि उपरोक्त दस शिक्षाओं को अपने जीवन में ओतप्रोत करके सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने के अधिकारी हो सकते हैं, अप्राप्त मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकते हैं और पूर्ण विकास की ओर शीघ्रातिशीघ्र बढ़ सकते हैं।


क्या मनुष्य के लिये अमरत्व संभव है?

(श्री कृष्णलाल जी बजाज)

अमरत्व को समझने के लिये सर्वप्रथम मृत्यु के स्वरूप पर विचार करना आवश्यक है। साधारण लोगों की दृष्टि में आत्मा का इस स्थूल शरीर से अलग हो जाना ही मृत्यु है। यद्यपि बातचीत में अथवा ज्ञान-चर्चा के अवसर पर आत्मा को अविनाशी कहकर मृत्यु का एक रूपांतर मात्र मान लेते हैं, पर व्यवहार में इससे उल्टी ही बात दिखलाई पड़ती है। वे लोग इस दृश्यमान शरीर को ही सत्य मानते हैं और आत्मा के विलग हो जाने पर जब यह शरीर नष्ट हो जाता है तो उसी को मनुष्य का अन्त समझकर शोक और विलाप करते हैं।

पर शास्त्रों का मत इससे सर्वथा भिन्न है। उपनिषद् में नचिकेता ने यमराज से यह प्रश्न किया था कि ‘जब मनुष्य मर जाता है तब उसकी क्या दशा होती है? कोई कहते हैं कि उसका सर्वथा नाश हो जाता है और दूसरों के मत से उसका नाश नहीं होता है। बताइये उन दोनों में से कौन सा मत सत्य है?” इस प्रश्न का उत्तर देते हुये यमराज ने कहा—

“न साँपराय प्रति भाति बाल प्रमाद्यन्तं वित्तमोहन मूढम्।

अयं लोको नास्ति पर दृतिमानी पुनः पुनर्वशमापद्यते में।”

अर्थात् “अविवेकी मनुष्य के मन में परलोक की कोई कल्पना ही नहीं होती, क्योंकि वह अपने स्वरूप को नहीं जानता और संपत्ति के मद से सदा मूढ़ बना रहता है। ऐसा मनुष्य यह कहता है कि इसी जगत में सब कुछ है, अन्य लोक कोई चीज नहीं। ऐसी अवस्था में वह मनुष्य मेरे अधीन होकर बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्कर में गोते खाता है।”

यदि इस कथन को ध्यान में रखकर आत्मा और देह के यथार्थ स्वरूप पर विचार करें तो यही विदित होता है कि आत्मा नित्य, सत्य, शाश्वत है, तथा देह अनित्य, असत्य, अशाश्वत है। अतएव जो अमरत्व अथवा आत्म-लाभ की इच्छा करेगा वह अशाश्वत वस्तुओं का मोह त्यागकर शाश्वत विषयों की ओर ही ध्यान देगा। बुद्धिमान व्यक्ति कभी इस बात को पसन्द नहीं कर सकता कि संसार की अधिक से अधिक सम्पत्ति के लिये भी आत्मा का नाश किया जाय। यदि कोई यह चाहे कि साँसारिक वस्तुओं को पूर्णतः प्राप्त करके उनमें लिप्त रहते हुये भी मैं आत्म लाभ भी करलूँ तो यह एक असम्भव बात है। इसलिये जो व्यक्ति साँसारिक विषयों की तरफ से ध्यान हटाकर आत्मिक विषयों पर हृदय से ध्यान देगा वही अमरत्व की ओर अग्रसर हो सकता है। इस सम्बन्ध में “कठवल्ली” में लिखा है—

“न जायते मृयते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न वभूव कश्चित। अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।” (कठवल्ली)

अर्थात् “ज्ञान सम्पन्न आत्मा न कभी उत्पन्न होता है न कभी मरता है। न आत्मा किसी से उत्पन्न होता है और न उसी से कोई वस्तु उत्पन्न होती है। आत्मा अज (जन्म रहित), नित्य, शाश्वत और पुराण है। शरीर के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता। यदि कोई वध करने वाला मनुष्य यह कहे कि मैंने इसका वध किया—अथवा जिसको मारा गया वह कहे कि मेरा वध किया गया—तो समझना चाहिये कि दोनों कुछ नहीं जानते। क्योंकि आत्मा न किसी को मारता है और न किसी से मारा जाता है।”

इसी प्रकरण में आगे चल कर जीवात्मा का रूप इस प्रकार बताया है—

ये न रुपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाञ्च मैथुनान्।

एतेनैव विजानाति किमव परिशिष्यते॥

स्वप्नान्तं जागरिन्तान्तं चोभौ ये नानु पश्यति।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरोनु शोचति॥

अर्थात्—”आत्मा उसे कहते हैं जिसके कारण रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श आदि विषयों का और इनके अतिरिक्त जो शेष रहे उन सब का ज्ञान होता है। जो यह जानता है कि जागृत और निद्रा नामक दोनों अवस्थाओं में जिसके कारण सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त होता है वह सर्व व्यापक सूक्ष्म आत्मा मैं ही हूँ वह बुद्धिमान मनुष्य शोक से अलिप्त रहता है।”

इस प्रकार जब मनुष्य आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, तब “अमरत्व” का रहस्य उसे सहज में ज्ञात हो सकता है। इस का मूल आशय यही है कि अंतःदृष्टि तथा अध्यात्म योग द्वारा आत्म रूप वस्तु का साक्षात्कार किया जा सकता है। इसके लिये पहले यह अवश्य समझ लेना चाहिये कि यद्यपि ज्ञान की प्राप्ति इन्द्रियों के द्वारा होती है अर्थात् वे इस कार्य में साधन रूप होती है, पर उनको आत्मा का दर्शन नहीं हो सकता इसके लिये उपनिषद् में स्पष्ट कहा है—

पराश्चिखानि ब्यतृणत्स्वययंमू स्मात्परां पश्यति नान्तरात्मम्। कर्श्चिद्धीरः प्रत्यागात्मानमैक्षुदावृत्त चक्षुरमृतत्व मिच्छान्॥

अर्थात्—”ईश्वर ने इन्द्रियाँ केवल बाह्य विषयों को ग्रहण करने के लिये उत्पन्न की हैं, इसलिये वे सदा बहिर्मुख ही रहती हैं। हजारों में से ऐसा एकाध मनुष्य उत्पन्न होता है जो अमरत्व की इच्छा करके अपनी इन्द्रियों को अन्तर्मुख करने का प्रयत्न करता है और आत्मा के साक्षात्कार का अनुभव प्राप्त करता है।”

इन्द्रियाणाम् पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत्।

पृथगुत्पद्यमाना नाम् मत्त्व धीरो न शोचति॥

अर्थात्—”जब इन्द्रियाँ अंतर्मुख हो जाती हैं तब यह जानने से कि जागृत अवस्था में वे कैसे होती हैं और निद्रावस्था में उनका रूप कैसे हो जाता है” आत्म-स्वरूप से उनकी भिन्नता और विलक्षणता प्रतीत होती है।”

इसलिये जिस मनुष्य को अमरत्व का रहस्य जानना हो उसे अध्यात्म योग का आश्रय लेना चाहिये। इस योग की सिद्धि से संसार-दुख और विषय-सुख की निवृत्ति हो जाती है। आत्मा के बन्धन और मोक्ष का कारण केवल अन्तःकरण है। जब वह विषय में आसक्त हो जाता है तब साँसारिक सुख दुःखादि में बन्ध जाता है। पर जब वह परमात्मा के स्वरूप में रम जाता है तब उसको मोक्ष अर्थात् अमरत्व की प्राप्ति होती है। उसे स्वानुभव द्वारा यह ज्ञात हो जाता है कि जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध छाया और धूप के समान है। जैसे असत्य रूपी छाया से सत्य रूपी धूप का ज्ञान होता है वैसे ही जीवात्मा से परमात्मा का अनुभव किया जाता है और इस बात की प्रतीति होती है कि परमात्मा की तरह उसका अंश हमारा जीवात्मा, भी अमर है।

अमरत्व की इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए अगर कोई शारीरिक क्रिया विशेष रूप से सहायक होती है तो योगशास्त्रानुसार वह शुक्र अथवा वीर्य की पूर्ण रूप से रक्षा है। इस सम्बन्ध में हठयोग प्रदीपिका में कहा है—

चित्तायतं नृणाँ शुक्रं शुक्रायन्तं च जीवितम्

तस्मात् शुक्रं मनश्चैव रक्षणीयं प्रयत्नतः॥

मनःस्थैर्ये स्थिरो वायुस्ततो बिन्दुः स्थिरो।

बिन्दुस्थैर्थे सदा सत्वं रिंडष्धैर्थम् प्रजायेताभिवेत्॥

सुगधो योगिनो देहे जायते विन्दु धारणत्। यावद् विन्दुः स्थिरो देहे तावत्कालं भयंकुतः॥ एवं संरक्षयेद बिन्दुम् मृत्युँ जयति योगवित्। मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दु धारणात्॥

अर्थात्—मनुष्यों का शुक्र (वीर्य) केवल मन के अधीन रहता है, इसलिए हर प्रयत्न से शुक्र और मन की रक्षा करनी चाहिए। मन की स्थिरता से प्राण वायु स्थिर हो जाता है और प्राण वायु की स्थिरता से बिन्दु की स्थिरता हो जाती है। जब बिन्दु स्थिर हो जाता है तो शरीर के अन्दर एक अनुपम शक्ति आ जाती है और मनुष्य को किसी प्रकार का भय नहीं रहता। साराँश यही है कि बिन्दुपात ही मृत्यु है और बिन्दु की स्थिरता ही ‘अमरत्व’ है।


हिन्दू धर्म में पर्व और त्यौहारों की उपयोगिता

(श्री शंभूसिंह)

हिन्दू-धर्म में पर्व और धार्मिक त्यौहारों का इतना बाहुल्य है कि उनके लिये जनता में “सात बार और नौ त्यौहार” की कहावत प्रचलित हो गई है। यदि खोज और विचार करके देखा जाय तो इस कहावत में कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है। हिन्दू-धर्म में वास्तव में प्रत्येक तिथि और बार को पर्व माना गया है और उसे मनाने के लिये विशेष धार्मिक विधान भी बतलाया है। इनके सिवाय देवताओं, अवतारों, महापुरुषों की स्मृति अथवा जयंती के लिये भी त्यौहार नियम किये गये हैं। कुछ अन्य पर्व जैसे संक्राँति, ग्रहण, कुम्भ आदि आकाश स्थित ग्रहों के योग और उनसे पृथ्वी पर पड़ने वाले शुभाशुभ प्रभाव को दृष्टिगोचर रखकर मनाये जाते हैं।

ये पर्व या त्यौहार किसी भी श्रेणी के क्यों न हों, और उनका बाह्यरूप कैसा भी क्यों न हो, उनको स्थापित करने में हमारे पूर्वजों का मुख्य उद्देश्य यही था कि सर्व साधारण में धार्मिकता, सामाजिकता और परोपकार आदि की भावनायें बढ़ें, तथा लोगों की प्रवृत्ति भौतिकता की तरफ से आध्यात्मिकता की ओर हो। भारतीय संस्कृति का एक मुख्य लक्षण अंतर्मुख होना है। बाहरी चीजें चाहे कितनी भी चमक दमक वाली और आकर्षण जान पड़ें पर उनके द्वारा मनुष्य की आत्मा का विकास नहीं हो सकता, उल्टा वे मनुष्य के विचारों को परमार्थ से स्वार्थ की तरफ प्रेरित करने वाली ही होती हैं। इसलिये भारतीय ऋषि मुनियों ने लोगों को यथाशक्ति अधिक से अधिक समय धार्मिक कृत्यों, धर्मोत्सवों, धार्मिक विधि विधानों में लगाने की व्यवस्था की है जिससे वे जीवन के वास्तविक लक्ष्य को याद रखते हुये सन्मार्ग पर स्थिर रहें।

धर्म और आध्यात्मिकता के भावों की वृद्धि के साथ ही धार्मिक और सामाजिक त्यौहारों का एक दूसरा बड़ा उद्देश्य सामूहिकता की वृद्धि करना भी है। मानव जीवन की सफलता के लिये जहाँ व्यक्तिगत उन्नति और सत्प्रवृत्तियों को ग्रहण करने की आवश्यकता है, वहाँ समाज-संगठन का सुदृढ़ बनाना और पारस्परिक सहयोग के द्वारा सामाजिक हित की बड़ी योजनाओं की पूर्ति करना भी अत्यावश्यक है। इसके लिये लोगों में पारस्परिक एकता, भाईचारे की मनोवृत्ति का उत्पन्न होना आवश्यक है। हमारे यहाँ होली, दिवाली, दशहरा और स्नान आदि के जो त्यौहार और पर्व नियत किये गए हैं उनका विशेष उद्देश्य यही है कि लोग परस्पर, प्रेमपूर्वक मिलें और सामूहिकता की भावना को सुदृढ़ बनावें।

जो त्यौहार या उत्सव किसी प्राचीन महापुरुष या अवतार आदि की जयंती के रूप में मनाए जाते हैं उनका एक बहुत बड़ा लाभ यह होता है कि जनता को उनके द्वारा सच्चरित्रता, नैतिकता, सेवा, सद्भावना आदि की शिक्षा मिलती है। इस प्रकार के उत्सव संसार के सभी देशों में मनाये जाते हैं, और इस बात का ध्यान रखा जाता है कि जनसाधारण अपने उन महान पूर्वजों के चरित्रों से उच्च कोटि के सद्गुणों की प्रेरणा प्राप्त करे। वास्तव में जिस जाति के यहाँ ऐसे महापुरुषों का अभाव है, वह उन्नति की आशा नहीं रख सकती, क्योंकि साधारण मनुष्य के लिये बिना किसी मार्गदर्शक अथवा प्रकाशस्तम्भ के संसार-सागर में सफलता पूर्वक अग्रसर हो सकना सम्भव नहीं है। यही कारण है कि उन्नति की कामना रखने वाली जातियाँ अपने पूर्व पुरुषों के चरित्रों और महान कार्यों को बड़े गौरव के साथ याद करती रहती हैं। उदाहरण के लिये हम योरोप में फ्राँस और एशिया में जापान का उल्लेख कर सकते हैं। ये दोनों देश अपेक्षाकृत छोटे होने पर भी वीर-पूजा के गुण के कारण ही संसार की राष्ट्र मंडली में अग्रगण्य बन गये।

उस दृष्टि से जब हम भारतवर्ष की अवस्था पर विचार करते हैं तो यहाँ भी महापुरुषों का कोई अभाव दिखलाई नहीं पड़ता। वरन् सत्य बात तो यह है कि हमारे देश में जितने अधिक आदर्श चरित्र के व्यक्ति हुए हैं, उतने संसार के किसी भी बड़े से बड़े देश में मिल सकना असम्भव है। राम, कृष्ण, बुद्ध आदि ईश्वरीय श्रेणी के महामानवों की बात छोड़ दीजिये, हमारे जितने भी मुनि ऋषि, नरेश, संत आदि हुए वे सभी आदर्श जीवन बिताने वाले महापुरुष थे और उनमें से प्रत्येक का जीवन हमारे लिए अनुकरणीय है। हिन्दुओं के अधिकाँश त्यौहारों का ऐसी ही किसी न किसी दैवी विभूति से सम्बन्ध है और इस कारण वे हमारे लिए हर प्रकार से शिक्षाप्रद और कल्याणकारी मार्ग के प्रदर्शक हैं।

पर खेद का विषय है कि जिस प्रकार हिन्दू-समाज के संगठन में अन्य अनेक प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न हो गई हैं, उसी प्रकार इन पर्वों और त्यौहारों के स्वरूप में भी बड़ा अन्तर पड़ गया है। लोग उनके मूल उद्देश्य और वास्तविक नियमों को तो भूल गए हैं और स्वार्थी अथवा अशिक्षित लोगों द्वारा बीच में पैदा की गई रूढ़ियों की लकीर को ही पीट रहे हैं। इतना ही नहीं कितने ही हीन चरित्र के अथवा दुर्व्यसनी लोगों ने तो इन त्यौहारों में अनेकों हानिकारक और गन्दी बातें शामिल कर दी हैं और उनकी निगाह में वे ही सार रूप होती है। उदाहरण के लिए अनेक जुए बाज दिवाली की राह बड़े शौक से देखते रहते हैं और उसके आने पर एक दिन, घंटे दो घंटे कि लिए नहीं, जितना संभव होता है दस-दस, बीस-बीस दिन तक जुए का बाजार गर्म रखते हैं। इसी प्रकार होली के अवसर पर गुण्डा और बदमाश श्रेणी के लोग तरह-तरह के उपद्रव मचाने और भले आदमियों को तंग करने के मौके ढूँढ़ते रहते हैं। वे जान बूझकर दूसरों की वस्तुओं को नष्ट करते हैं और हर किसी को बेइज्जत करने की कोशिश करते हैं। जहाँ होली सामूहिकता की भावना को बढ़ाने वाला हमारा सब से प्रमुख त्यौहार था, वहाँ ऐसे नीच लोग उसे वैमनस्य और झगड़े फसाद का कारण बना देते हैं।

अब समय बदल रहा है और हिन्दू जाति सावधान होकर अपनी त्रुटियों को दूर करके, अपने संगठन को सुदृढ़ बनाने की कोशिश कर रही है। ऐसे अवसर पर त्यौहारों और पर्वों पर ध्यान देना उसके सर्वप्रथम कर्तव्यों में से एक है। क्योंकि जैसा हम आरम्भ में कह चुके हैं पर्व और त्यौहार जातीय चरित्र को सुधारने तथा साधारण मनुष्यों को सामाजिक कर्तव्यों की शिक्षा देने के सबसे सुगम और स्वाभाविक साधन हैं। अभी तक बहुत बड़े जनसमूह की उन पर आस्था और श्रद्धा है। इसीलिए यदि हम बीच के जमाने में उत्पन्न हो गई हानिकारक रूढ़ियों का निराकरण करके उनको शास्त्रानुकूल लाभजनक ढंग से मनाने लगें तो वे समाज के लिए बड़े हितकारी सिद्ध हो सकते हैं।


धर्म और मानवता

(ठाकुर दयानन्द)

हम लोग एक ही पिता के पुत्र हैं। मानव से मानव का भेद—या सम्प्रदायकत्व—इस प्रकार का कोई मत विरोध नहीं हो सकता जो एक मानव को दूसरे मानव से और एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र से अलग करे।

मानव-जाति एक है। उसमें जाति और वर्ग विभेद नहीं हो सकता। एक ही पिता की सन्तानों की जाति क्या हो सकती है? एक ही जाति—अगर इसे जाति कहा जाय तो आध्यात्मिक प्राप्ति के अनुसार—है, जो जितना ही ईश्वर के निकट जाता है उतनी ही ऊँची जाति का है। लेकिन उसका भी ठोस भेद नहीं होना चाहिये। यह भेद भी केवल आपेक्षिक है, क्योंकि हम सभी परमात्मा की ओर जा रहे हैं और फर्क प्रतिक्षण घटता जा रहा है। पेशे में योग्यता और स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुसार भेद हैं लेकिन कोई भी काम असम्मानित नहीं है। सभी काम सम्मानप्रद हो जाता है जब यह सोचकर किया जाय कि हम सब कुछ परम-पिता के लिये कर रहे हैं, जब हमारे सारे कार्य उनके प्रति हों, जब अपने सारे कार्यों में हम उन्हें प्राप्त करने की कोशिश करें। सामाजिक व्यवस्था तभी सुव्यवस्थित रह सकती है जब उसका प्रत्येक सदस्य अपने खास कर्तव्यों को—उनमें सभी आवश्यक हैं कोई अनावश्यक नहीं है—पूरा करें। उसमें कोई ऊँच-नीच क्यों हों? पेशे का विभेद मानव के बीच की सीमा क्यों बने? पेशा भेद—जो आकस्मिक है—के बाहर और आध्यात्मिक प्राप्ति के रास्ते में—जो आपेक्षिक है—वास्तव में एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में कोई भेद नहीं है। इन विभेदों के बाहर एक मौलिक एकता है। दरअसल सब मनुष्य समान हैं। प्रेम के आधार पर इस नवयुग का निर्माण होना चाहिये। प्रेम का मूल आधार समता है।

चूँकि सब मनुष्य समान हैं इसलिये एक श्रेणी का दूसरी श्रेणी पर या एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र पर आधिपत्य नहीं होना चाहिये। नवयुग मनुष्यों के भ्रातृत्व का युग होगा, मानव-भ्रातृत्व का अर्थ यह है कि सभी राष्ट्र, सभी लोग और सभी व्यक्ति एक दूसरे के साथ पूर्ण एकता से रहें। वह एकता भावना की एकता हो। इसके लिये यह भी आवश्यक है कि इस दुनिया में मानव प्रबन्ध, मानव सम्बन्ध और मानव संस्थाओं में ऐसी कोई वस्तु न हो जिससे इस भावना की एकता को टूटने या आघात लगने का जरा भी मौका हो।

इस दृष्टिकोण से देखने पर चीजों की व्यवस्था-जो अभी भी है पर शीघ्रता से नष्ट हो रही है, जो प्राचीन जंगलीपन की निशानी है, जो आधुनिक सुसंस्कृत और विकसित दिमाग की अपेक्षा प्रारम्भिक दिमाग के अनुकूल है—विरोधाभास पैदा करती है और भावना-एकता की सृष्टि के रास्ते में बहुत बड़ी बाधा है।

इस प्रकार की अनेक और महान विरोधी चीजें हैं। असमानता, अन्याय और शोषण, मानव पर मानव, श्रेणी पर श्रेणी और राष्ट्र पर राष्ट्र का आधिपत्य और उनके कारण होने वाले अत्याचार और दमन पुरानी व्यावसायिक और पूँजीवादी व्यवस्था वाले समाज की आधारभूत बुराइयाँ हैं। ये सब बुराइयाँ पाशविक शक्ति से नहीं बल्कि प्रेम और आध्यात्मिक शक्ति , श्रेष्ठतम और भद्रतम लक्ष्य के लिये उत्कट प्रयास, विश्वबन्धुत्व, विश्वशान्ति और विश्वप्रेम के लक्ष्य के द्वारा ही दूर की जा सकती हैं। इस प्रकार का लक्ष्य दुनिया के सभी लोगों को एक महान मानव परिवार में परिणत कर देगा जिसमें ईश्वर सबके पिता होंगे और सभी समान अधिकार, समान सुविधा और उस साँसारिक देन को अपनी आवश्यकता के अनुसार उसकी सेवा करते हुये उपभोग करेंगे। इस प्रकार ईश्वर के पितृत्व और मानव के भ्रातृत्व का तर्क-सिद्ध परिणाम मानव-संघ की प्राप्ति होगा।


प्राचीन भारत में गणतन्त्र शासन

आजकल लोग ऐसा समझने लगे हैं कि गणतन्त्र नामक शासन व्यवस्था आज के युग की ही एकमात्र देन है। ऐसा समझना वास्तव में भ्रान्ति मूलक ही है क्योंकि हमारे प्राचीन ग्रन्थों में यत्र तत्र इसका वर्णन मिलता है। “महाभारत” के शाँति पर्व में भीष्म पितामह ने गणराज्यों के विषय में बतलाया था कि—

‘ज्ञानवृद्ध पुरुष गणराज्य के नागरिकों की प्रशंसा करते हैं। संघबद्ध लोगों के मन में आपस में एक दूसरे को ठगने की दुर्भावना नहीं पैदा होती। वे सब एक दूसरे की सेवा करते हुये सुखपूर्वक उन्नति कर सकते हैं।’

‘गणराज्य के श्रेष्ठ नागरिक शास्त्र के अनुसार धर्मानुकूल व्यवहारों की स्थापना करते हैं। वे यथोचित दृष्टि से सबको देखते हुये उन्नति की दिशा में आगे बढ़ते जाते हैं।

‘गणराज्य के श्रेष्ठ पुरुषों और भाइयों को भी यदि वे कुमार्ग पर चलें तो दंड देते हैं। सदा उन्हें उत्तम शिक्षा प्रदान करते हैं। उनके शिक्षित एवं मर्यादित हो जाने पर उन सबको बड़े आदर से अपनाते हैं। इसलिये वे विशेष उन्नति करते हैं।’

‘गणराज्य के नागरिक गुप्तचर या दूत का काम करने, राज्य के हित के लिये गुप्त मंत्रणा करने, विधान बनाने तथा राज्य के लिये कोष संग्रह करने आदि के लिये सदा उद्यत रहते हैं, इसलिये सब ओर से उनकी उन्नति होती है।’

‘संघ राज्य के सदस्य सदा बुद्धिमान, शूरवीर; महान उत्साही और सभी कामों में दृढ़ उत्साह का परिचय देन वाले लोगों का सदा सम्मान करते हुये राज्य की उन्नति के लिए उद्योगशील बने रहते हैं। इसीलिये वे शीघ्र आगे बढ़ जाते हैं।’

‘गणराज्य के सभी नागरिक धनवान, शूरवीर, अस्त्रों-शस्त्रों के ज्ञाता तथा शास्त्रों के पारंगत विद्वान होते हैं। वे कठिन विपत्ति में पड़े लोगों का उद्धार करते रहते हैं।’

‘गण के मुख्य व्यक्तियों को परस्पर मिलकर समस्त गणराज्य के हित का साधन करना चाहिये। अन्यथा यदि संघ में फूट होकर पृथक् पृथक् कई दलों का विस्तार हो जावे तो इनके सभी कार्य बिगड़ जाते हैं और बहुत से अनर्थ पैदा हो जाते हैं।’

‘जाति और कुल में सभी एक समान हो सकते हैं, परन्तु उद्योग, बुद्धि और रूप सम्पत्तियों में सबका एक-सा होना संभव नहीं है। शत्रु लोग गणराज्य के लोगों में भेद बुद्धि पैदा करके तथा उनमें से कुछ लोगों को धन देकर भी समूचे संघ में फूट डाल देते हैं, अतः संघ-बद्ध रहना ही गणराज्य के नागरिकों का महान् आश्रय है।’

—महाभारत


हम व्रत धारण करेंगे-आगे बढ़ेंगे?

अपना परिवार जागृत आत्माओं का संगठन है। जो जितना ही जागृत एवं विवेकशील है उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। पागल और बच्चे कोई बहुत बुरी बात कर बैठें तो भी उनको विशेष दोष नहीं दिया जाता क्योंकि उनका चेतना केन्द्र अविकसित है। पशु और भी गंदे काम करते हैं पर उनकी क्रियाओं की कोई निन्दा नहीं करता। वे जहाँ भोजन करते हैं वही मलमूत्र भी त्यागते रहते हैं, भोजन और मल त्याग की क्रियाएं साथ-साथ चलाते रहते हैं, सब के सामने बिना वंश गोत्र कुटुम्ब का विचार किये काम सेवन में कोई लज्जा या संकोच नहीं करते, गुप्त अंगों को ढकने की भी उन्हें आवश्यकता अनुभव नहीं होती। पशुओं की यह बातें मनुष्यों की आचार संहिता के सर्वथा प्रतिकूल हैं कोई मनुष्य ऐसा ही पशुओं जैसा आचरण करे तो उसकी सर्वत्र निन्दा की जायगी। मनुष्य का विवेक जागृत है इसलिए उससे अनेकों मर्यादाएं पालन करने की आशा की जाती हैं। वह यदि उसमें उपेक्षा बरतता है तो सामाजिक एवं राजकीय दंड और निन्दा का भागी बनता है पर अविवेकी पशु के सामने इस प्रकार की कोई कठिनाई नहीं आती।

विवेकशीलता और आत्मिक जागृति के आधार पर जिम्मेदारी बढ़ती है। ब्राह्मण की नैतिक जिम्मेदारी अन्य वर्णों की अपेक्षा कहीं अधिक मानी गई है। फल की चोरी कर लेने पर साधारण लोगों के लिए बहुत हलके दंड विधान की व्यवस्था है पर महाभारत में शंख और लिखित की कथा जिसने पढ़ी है वे जानते हैं कि सगे भाई के बगीचे से बिना पूछे फल तोड़ लेने के प्रायश्चित में “लिखित ने अपने फल चुराने वाले हाथ कटवाकर प्रायश्चित किया था। सिंह, सुअर आदि हिंसक एवं हानिकारक पशुओं को तथा सर्प बिच्छू आदि कीड़ों को मारने की साधारण लोगों को धार्मिक छूट है, क्षत्री के लिए तो इस प्रकार की हिंसा-प्रजा की रक्षा की दृष्टि से कर्तव्य भी मानी गई है, पर ब्राह्मण की उच्च आध्यात्मिक स्थिति के कारण प्राणिमात्र पर दया करना ही उसका धर्म ठहराया गया है।

एक ऋषि द्वारा नदी में बहते हुए बिच्छू के निकलने और डंक मारने पर भी उसे क्षमा कर देना, इतना ही नहीं बार-बार नदी में बहने लगने पर उसे बार-बार निकालने की कथा प्रसिद्ध है। शाप देकर या युद्ध करके राक्षसों को मार डालने की शक्ति से सम्पन्न होते हुए भी विश्वामित्र ने यह कार्य अपने लिए अनुपयुक्त समझा और यज्ञ रक्षा के लिए राम लक्ष्मण के लिवा कर लाये। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें जागृत आत्माओं की विशेष जिम्मेदारी स्पष्ट होती है। फौजी कप्तान अपने कर्तव्य में जरा भी उपेक्षा करे तो उसे गोली से शूट कर देने का कोर्ट मार्शल किया जाता है पर चुँगी का चपरासी भारी लापरवाही करने पर भी एक दो रुपया जुर्माने की सजा पाकर छूट जाता है। जागृत आत्माओं की जिम्मेदारी निश्चय ही बहुत अधिक है। उनके लिए उस जिम्मेदारी की उपेक्षा उतनी ही बुरी है जितनी साधारण लोगों के लिए चोरी, डकैती आदि बुराइयाँ।

अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य—अपनी विवेकशीलता और उच्च आध्यात्मिक स्थिति के कारण भारतीय तत्व ज्ञान के आधार पर ब्राह्मण संज्ञा में ही आते हैं। ब्राह्मण की यह परम पवित्र जिम्मेदारी है कि आध्यात्मिक गुणों में अपने आपको साधारण लोगों की उपेक्षा ऊँचा कर ले और दूसरे लोग जिस प्रकार भौतिक सुख साधनों को प्रधानता देते हैं उसी प्रकार वह धर्म एवं समाज की सेवा को अपने कर्तव्य क्षेत्र में प्रधानता दे। जिस प्रकार किसी परिवार के गृह संचालन में बुजुर्ग को अपने कुटुम्ब के प्रत्येक सदस्य पर दृष्टि रखनी पड़ती है उसी प्रकार ब्राह्मण सारे समाज की सुख-शाँति का जिम्मेदार है। कुटुम्ब के लोग कुमार्गगामी, निन्दित, दीन दुःखी फिरें तो उस घर का बुजुर्ग—इसमें अपनी असफलता और निन्दा समझता है तथा उन परिस्थितियों को संभालने की वैसी ही चिन्ता करता है, जैसे कोई साधारण मनोभूमि का व्यक्ति अपने निज के शरीर को सुखी बनाने के बारे में सोचता और करता है।

ब्राह्मण सारे समाज की चिन्ता और सार-सँभाल करने का जिम्मेदार है। विशेषतया समाज के भावना क्षेत्र को सुव्यवस्थित रखने की जिम्मेदारी उसी की है। यदि कोई समाज नैतिक, चारित्रिक, साँस्कृतिक एवं सामाजिक दृष्टि से गिरता है तो समझना चाहिए कि उस राष्ट्र का ब्राह्मण पतित हो गया। जिस समाज में जागरुकता हो, वहाँ सत्पुरुषों की बहुलता रहेगी और वह समाज सब प्रकार सुखी, समृद्ध, समुन्नत एवं अग्रगामी रहेगा।

आज हमारा राष्ट्र शारीरिक, आर्थिक, बौद्धिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि में दुर्बल है पर वह उतनी चिन्ता की बात नहीं, जितनी कि उसकी नैतिक, सामाजिक एवं साँस्कृतिक दुर्बलता। इस दुर्बलता के कारण में प्रधान कारण यहाँ के ब्राह्मण वर्ग की कर्तव्यशीलता से शिथिलता ही हैं। इन पंक्तियों से हमारा मतलब किसी वंश या जाति में उत्पन्न होने वाले लोगों से नहीं है। हम जाति का प्रधान आधार गुण, कर्म, स्वभाव को मानते हैं।

ब्राह्मण वे हैं जिनकी आत्मा जागृत हैं। जिनका विवेक ऊँचा है, जो समाज की उन्नति अवनति में सुख-दुःख अनुभव करते हैं, जिन्हें विलासिता की अपेक्षा तपस्या प्रिय है और जिनमें निज की वासना एवं तृष्णा को पूरा करने में ही लगे रहने की अपेक्षा लोक सेवा एवं परमार्थ प्रवृत्तियों में अधिक अभिरुचि है। ऐसे ब्राह्मण ही किसी राष्ट्र के उज्ज्वल रत्न माने जाते हैं। उन्हीं की न्यूनता बहुलता पर समाज की उन्नति अवनति निर्भर रहती है। वे ही राष्ट्र की सच्ची दौलत माने जाते हैं। अखण्ड-ज्योति-परिवार ऐसे नर रत्नों का भाण्डागार है। इस संगठन को यदि राष्ट्र का एक विशेष सौभाग्य एवं उज्ज्वल भविष्य का आशादीप कहा जाय तो इसमें कुछ अत्युक्ति न होगी। भावी इतिहासकार ही इस श्रेष्ठ संगठन की महत्वपूर्ण सेवाओं का मूल्याँकन कर सकेंगे, आज तो उनकी स्थिति बहुत ही साधारण जैसी दीखती है।

गत बीस वर्षों में अखण्ड-ज्योति-परिवार के कर्म-ब्राह्मण सदस्यों ने अपनी जिम्मेदारी को जिस प्रशंसनीय ढंग से निवाहा है, उस पर हर्षोल्लास न सही, सन्तोष अवश्य प्रकट किया जा सकता है। अखबार पढ़ने के बुद्धि-विलास के लिए कोई इस परिवार का सदस्य नहीं बनता, कलेवर, मनोरंजन, आकर्षण आदि की दृष्टि में अखण्ड-ज्योति को एक घटिया पत्रिका कहा जा सकता है, उसमें बुद्धि विलासी लोगों को कुछ आकर्षण लगे ऐसी कोई बात दिखाई नहीं पड़ती। इस संगठन के सदस्य तो ब्राह्मण अभिरुचि के साथियों को एक सूत्र में आबद्ध होने, अपनी आन्तरिक स्थिति को अधिक अग्रगामी बनाने एवं मिल-जुलकर कुछ ठोस सेवा करने की दृष्टि से ही सम्मिलित होते हैं। अखण्ड-ज्योति पत्रिका तो इस योजना का एक संबंध सूत्र मात्र हैं। उसे अखबार, मासिक पत्र न कहकर एक चेतना, प्रेरणा एवं योजना कहा जाय तो उत्तम है अखण्ड-ज्योति की वास्तविक स्थिति यही है। इसके सदस्यों को अपने कर्तव्य के प्रति जागरुक कर्म ब्राह्मण कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

राष्ट्र के भावना क्षेत्र को सन्मार्ग की ओर अग्रसर करने की दिशा में अब तक इस परिवार ने बहुत कुछ काम किया है। पर आगे जो करना है—जो शेष पड़ा हैं—वह अत्यन्त ही महान, विशाल एवं आवश्यक है। सहस्र कुँडी गायत्री महायज्ञ द्वारा अब इसी शेष कर्तव्य को पूरा करने के लिए सुनिश्चित योजना के अनुसार ठोस कदम आगे बढ़ाने का परिवार ने शपथ पूर्वक संकल्प किया है। अब उसे पूरा करने के लिए हम सबको अग्रसर होना है। इसमें उपेक्षा या ढील करना अब किसी भी प्रकार हमारे लिए शोभनीय न होगा।

महायज्ञ की पूर्णाहुति के समय उपस्थित परिजनों ने विधिवत् तीन प्रतिज्ञाएं लीं थी; पर मौन स्वीकृति के रूप में अपना सारा परिवार ही उन प्रतिज्ञाओं से आबद्ध है। (1) अपने निज के जीवन को अबकी अपेक्षा और भी अधिक आदर्श बनाने (2) सामाजिक जीवन में सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करने (3) फैली हुई बुराइयों को मिटाने के लिए संघर्ष करने, के लिये अपनी प्रतिज्ञाओं के अनुसार हमें कार्य संलग्न होकर अपनी ब्राह्मण जिम्मेदारी को निवाहना है। परिवार के प्रत्येक सदस्य को अब इसके लिए जागरुक ,तत्पर एवं अग्रसर होना है।

हमें अब विधिपूर्वक यह व्रत लेना है कि अपने दैनिक जीवन में—अन्य आवश्यक कार्यों की भाँति धर्म कर्तव्यों को पूरा करने के लिए भी समय निकालना है। त्याग करना है, प्रयत्नशील रहना है। जिस प्रकार भोजन, स्नान, निद्रा, आजीविका, शरीर रक्षा, परिवार व्यवस्था आदि को दैनिक कर्तव्य माना जाता है, उसी प्रकार धर्म सेवा को भी अपना एक आवश्यक कर्तव्य मानेंगे। उसकी भी वैसी ही चिन्ता रखेंगे जैसी स्वास्थ्य, व्यापार या परिवार की रखते हैं। यह व्रत यदि भावना क्षेत्र में सुदृढ़ हो जाय, इस कर्तव्य को निवाहने की सच्ची इच्छा हो जाय तो समझना चाहिए कि ब्राह्मणत्व का, देवत्व का, ईश्वरीय प्रकाश अपनी आत्मा में प्रकाशवान हो गया। अपने परिवार के सदस्य जागृत एवं विवेकशील तो बहुत पहले से हैं, ब्राह्मणत्व के गुण और स्वभाव भी उनमें मौजूद हैं, पर अब तो एक कदम आगे बढ़ाना है। अब ऋषि जीवन में प्रवेश करना है। धर्म सेवा का व्रतधारी बनना है। व्रतधारी का तात्पर्य है दैनिक जीवन में धर्मसेवा के लिये स्थान रखना। विचार जब कार्य रूप में परिणत होते हैं तो वे शक्ति बन जाते हैं। अब लोगों की ब्राह्मण बुद्धि ऋषि प्रक्रिया में धार्मिक शक्ति के रूप में प्रकट होनी चाहिए। अब हमारा अन्तःकरण सद्भावनाओं का केन्द्र बने रहने तक ही सीमित न रहकर उस प्रकाश ज्योति से प्रकाशवान होगा। यह अपनी आत्मा का ही प्रकाश स्वरूप नहीं बनायेगा वरन् समीपवर्ती क्षेत्र को भी आलोकित कर देगा।

व्रतधारी बनने की पुनीत बेला आ पहुँची, युग निर्माण के लिए—नैतिक क्राँति के लिए—धर्म सेवा के लिए—जीवन का लक्ष प्राप्त करने के लिए हमें कदम बढ़ाना है। इस व्रत को जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बनाना है। मानव जीवन के सुरदुर्लभ सौभाग्य को हम मिट्टी के मोल बर्बाद नहीं होने दे सकते, अपने परम पवित्र कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों की उपेक्षा करना अब हमारे लिए सम्भव नहीं। चलिए, आगे चलें—कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ें। ईश्वरीय कर्तव्यों को पूरा करने के उद्देश्य से उपलब्ध इस जीवन यज्ञ में अपनी आहुतियाँ श्रद्धापूर्वक चढ़ाने की बेला में अब हममें से किसी को भी आगा पीछा नहीं सोचना है। संकोच, उपेक्षा या आलस्य को आड़े नहीं आने देना है। हमारे कदम बढ़ेंगे—आज से ही बढ़ेंगे। 


दो पुण्य कर्तव्य—आत्म निर्माण और परमार्थ साधना

युग निर्माण के—नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिये कार्य करने का अपने परिवार ने जो शपथपूर्वक व्रत लिया है उसे क्रियान्वित करने के लिये जो कार्यक्रम बनाया गया है उसकी रूपरेखा इस प्रकार है—

इस योजना को नींव के पत्थर की तरह संस्था के व्रतधारी सदस्य प्रधान आधार बनेंगे। इन्हीं के ऊपर यह सारी योजना निर्भर करेगी। दैनिक जीवन में साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए—धर्मसेवा के लिए-भी आजीविका कमाने, भोजन करने की तरह एक प्रमुख आवश्यकता जितना स्थान देते रहने की प्रतिज्ञा करने सज्जन व व्रतधारी माने जायेंगे। यह प्रतिज्ञा-पत्र इस अंक में संलग्न है। इसे भरकर गायत्री तपोभूमि भेजना चाहिए। यहाँ व्रतधारी धर्म सैनिकों की सेना के आधार पर योजनाएं बना करेंगी। यों अखण्ड-ज्योति के सभी सदस्य धर्मसेवी हैं, नियमित और अनियमित रूप से अब तक बहुत कुछ करते रहे हैं, पर अब समय आ गया है कि उसे सुव्यवस्थित रूप दिया जाय और एक सुसंगठित सेना के सैनिक जिस प्रकार कदम से कदम मिलाकर चलते हैं उसी प्रकार यह व्रतधारी धर्म सेवक भी—साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए—नैतिक क्राँति के लिये योजनाबद्ध कूच करें। इसलिये जिनमें समुचित उत्साह एवं भावनाएँ हैं, उन्हें व्रतधारी का प्रतिज्ञा-पत्र भर ही देना चाहिए। चैत्र से नया सम्वत्सर आरम्भ होता है। परिवार के सक्रिय कार्यकर्ताओं की सेना की हलचलें भी इसी शुभ मुहूर्त में आरम्भ हो जानी चाहिएं।

गायत्री परिवार की शाखाओं में अब तक 1 माला जप की प्रतिज्ञा करने वाले साधारण सदस्य ही बने हैं। अब उनमें से जिनमें जीवन है उन्हें व्रतधारी सक्रिय सदस्य भी बनाया जाना चाहिये। शाखाओं के छह पदाधिकारी होते हैं वे तो अनिवार्य रूप से व्रतधारी बनें। साधारण सदस्यों में से प्रत्येक को इसके लिये समझाया जाय, प्रोत्साहित किया जाय और दबाया जाय। निर्जीव सौ सदस्यों की अपेक्षा-सजीव सक्रिय, लगन और निष्ठा वाले दो सदस्य अधिक काम के सिद्ध होते है। अब अपना सारा परिवार मथ डालना है और उसमें से क्रियाशील व्यक्तियों का एक संगठन बना लेना है। यह कार्य बिना विलम्ब, ढील और संकोच किये अब आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। जिनके पास अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वे इन्हीं पंक्तियों को व्रतधारी बनने का आमंत्रण समझें साथ ही उन स्वजनों तक यह संदेश पहुँचाने एवं उत्साहित करने का जिम्मा लें जिन तक पत्रिका नहीं पहुँचती है। प्रारम्भिक कार्य व्रतधारी धर्म सेवकों का संगठन व्यवस्थित करना है।

व्रत धारण का प्रतिज्ञा-पत्र भर देने का प्रथम कर्तव्य पूरा कर लेने के उपराँत व्रतधारी के लिए योजना के अंतर्गत तीन कार्यक्रम होंगे। (1) आत्म-निर्माण (2) धर्म प्रचार (3) रचनात्मक कार्य। इन तीनों की रूपरेखा यह रहेगी।

(1) आत्म-निर्माण

गायत्री-उपासना प्रत्येक व्रतधारी का आवश्यक कर्तव्य होगा। मन में आस्तिकता की भावनाएं स्थिर रखने, आत्मा की अमरता, पुनर्जन्म एवं कर्मफल के तत्वज्ञान पर विश्वास करना ही नैतिक जीवन का प्रमुख दर्शन शास्त्र एवं तत्वज्ञान है, यह आस्था आस्तिकता के आधार पर ही संभव है। भारतीय समाज की उपासनात्मक एकता का माध्यम वेदमाता गायत्री ही बन सकती है। कोई व्यक्ति अपनी पूजा में अन्य कोई प्रकार, देवता या विधान अपनाता है तो इसमें आपत्ति नहीं पर गायत्री मन्त्र को कम से कम 108 बार (1 माला) जप करना हमारा नित्यकर्म होना चाहिए। यदि किसी दिन जप भूल जाय तो उसकी पूर्ति अगले दिन कर ली जाय। गायत्री जप एक निश्चित धर्म कर्तव्य प्रत्येक व्रतधारी का रहे।

एक डायरी या विवरण पुस्तिका प्रत्येक व्रतधारी अपने पास रखेगा। उसमें तीन बातों का दैनिक लेखा-जोखा रखेगा (1) गुण (2) कर्म (3) स्वभाव।

गुण—के अंतर्गत योग्यता, क्षमता शक्ति सामर्थ्य कला, चतुरता, निपुणता आदि की गणना होती है। सद्गुणों में स्वास्थ्य, शिक्षा आदि भौतिक शक्तियों को बढ़ाने के आंतरिक , आध्यात्मिक गुण सचाई, ईमानदारी, आस्तिकता, संयम, तप, त्याग, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, सेवा भावना, आत्मीयता, करुणा, मैत्री आदि गुण आते हैं। इन्हें बढ़ाया जाना चाहिए।

कर्म—के अंतर्गत अपने शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं धार्मिक कर्तव्यों के पालन को गिना जाता है। (1) भगवान ने यह शरीर एक किराये के मकान की तरह दिया है इसे दीर्घजीवी और स्वस्थ रखने के लिए जिस नियमबद्धता की आवश्यकता है उसका पूरा-पूरा ध्यान रखा जाय। आमतौर से आहार विहार का असंयम ही स्वास्थ्य नाश का कारण होता है उससे बचा जाय। (2) मानसिक कर्तव्यों में ज्ञान-यज्ञ के लिए स्वाध्याय और सत्संग आवश्यक है। जीवन की गुत्थियों को सुलझाने में देश, काल, पात्र का ध्यान रखते हुए जीवन की गुत्थियों को, समस्याओं को, सुलझाने में जो साहित्य सहयोगी सिद्ध हो सके वही स्वाध्याय के योग्य है। सत्संग भी वही जो जीवन के सर्वांगीण विकास में व्यावहारिक मार्गदर्शन करे। आज कल पौराणिक कथा ग्रन्थों को रोज-रोज पाठ करते रहना स्वाध्याय माना जाता है और आज से लाखों वर्ष पूर्व की परिस्थितियों के अनुरूप वे बातें जो अब असामयिक हो गई हैं बताते रहने वाले औघड़ बाबाजियों की बातें ‘सत् वचन महाराज’ कहते हुए सुनते रहना सत्संग माना जाता है। स्वाध्याय और सत्संग की इस प्रकार लकीर पीट लेने से नहीं वरन् विचारकता एवं विवेक के आधार पर जीवन निर्माण के मूल आधारों को समझने में सहायता करने वाले स्वाध्याय और सत्संग के अवसर तलाश करना मानसिक विकास के सत्कर्म का प्रधान आधार हो सकता है। (3) पारिवारिक जिम्मेदारी में केवल उदर पोषण की व्यवस्था ही नहीं है वरन् प्रत्येक परिजन के चतुर्मुखी विकास में सहायता करना उसे आवश्यक स्नेह, सुविधा एवं सलाह देना भी आवश्यक है। व्रतधारी अपने परिवार के प्रति सब प्रकार के कर्तव्य रहने का प्रयत्न करेगा। समाज को अधिक सदाचारी, सद्गुणी, समृद्ध, सुशिक्षित एवं सुखी बनाने के लिए प्रयत्न करना, दूसरों के साथ नागरिकता, सज्जनता, शिष्टाचार एवं मानवता के आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करना हमारा सामाजिक सत्कर्म है। (4) धार्मिक कर्तव्यों में आत्म-निर्माण के आधारों को बढ़ाने आत्मा को अधिकाधिक पवित्र बनाते चलना तथा समाज सेवा के लिए लोकहित के लिए, सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने के लिए अपने समय, शक्ति, भावना एवं धन का अनुदान देते रहना यह दो ही बातें आती हैं। ईश्वर उपासना का उद्देश्य इन दो लाभों के लिए ही है। प्रभु की प्रसन्नता उसकी प्रशंसा करते रहने से नहीं इन आध्यात्मिक आधारों को पुष्ट करने से ही उपलब्ध हो सकना संभव है। इन चारों कर्तव्यों को ध्यान में रखकर जीवन की गतिविधि निर्धारित करने से सत्कर्म का प्रयोजन पूरा होता है।

स्वभाव के अंतर्गत—हंसमुख रहना, चित्त को प्रसन्न, निश्चिन्त एवं आशा पूर्ण रखना, दूसरों के साथ स्नेह, मधुरता, उदारता एवं शिष्टाचार पूर्ण व्यवहार करना, परिश्रम को प्यार करना, एक क्षण भी बेकार न गँवाना, नित्य दिनचर्या बनाकर उसे क्रियान्वित करना, खर्च में किफायत शारी, शौकीनी, फैशन परस्ती या यारवासी से घृणा करना, नशे से दूर रहना, नारी मात्र के प्रति माता बहिन की दृष्टि रखना, चटोरेपन का त्याग, उत्तेजित न होकर शान्त चित्त से हर बात पर विचार रखना, सहिष्णुता और एकता का दृष्टिकोण रखना आदि बातें सम्मिलित की जाती हैं।

डायरी रखना—आत्म निरीक्षण रखना—अपने गुण, कर्म, स्वभाव का लेखा लेना, व्रतधारी के लिए आत्म-निर्माण की दृष्टि से आवश्यक माना गया है। कल जो भूलें हुई थीं, वे अगले दिन न होने पावें, या कम हों इस दिशा में डायरी बड़ी सहायक होती है। कल जो उपेक्षा या भूल हुई वह अगले दिन न हो, दिन-दिन गुण, कर्म, स्वभाव में सुधार होता चले लक्ष रखना चाहिए। प्रगति धीरे-धीरे हो तो भी सन्तोष किया जा सकता है पर वह होनी अवश्य चाहिए। चारों कर्तव्यों का कितना पालन हुआ? नहीं हुआ तो क्या कारण था? प्रगति को तेज करने का तरीका क्या है? वर्तमान परिस्थितियों में क्या-क्या परिवर्तन संभव हैं उन्हें करने में ढील क्यों है? आदि प्रश्नों के आधार पर रात को आज के कार्यों का ब्यौरा तथा कल का कार्यक्रम तैयार करना इस डायरी लेखन का मूल उद्देश्य है। यह हर व्रतधारी के लिए आवश्यक है।

2)-परमार्थ साधना -धर्म प्रसार

आत्म-निर्माण के अतिरिक्त व्रतधारी का दूसरा कार्य धर्मप्रचार है। यह बात भली प्रकार समझ लेने की है कि मनुष्य जीवन में जो कुछ चमक, क्रियाशीलता एवं विशेषता दिखाई पड़ती है, वह उसकी भावना, मान्यता एवं आकाँक्षा के आधार पर ही है। जो बात व्यक्ति के ऊपर लागू होती है वही समाज के बारे में भी है। जिस समाज के लोगों के विचार जिस स्तर के होते हैं उसके भले बुरे कार्य भी उसी आधार पर होते रहते हैं। राजदंड या अन्य भौतिक उपायों से लोगों की आन्तरिक भावनाओं में परिवर्तन नहीं हो सकता। समाज सुधार के अन्य प्रयत्न भी रक्त विकार के रोगी की फुन्सियों पर मरहम लगाने के चिकित्सा करने जैसे ही हैं। मानव प्राणी की भावनाओं और मान्यताओं में परिवर्तन करके ही उसे सज्जन एवं श्रेष्ठ पुरुष बनाया जा सकता है। इस प्रकार के व्यक्ति जिस समाज में बढ़ते हैं वही देव समाज बन जाता है और उसके द्वारा ही संसार में स्वर्गीय वातावरण का आविर्भाव होता है।

विचारों की शक्ति प्रचंड है। जिस समय जो विचार प्रबल हो जाते हैं उस समय उसी प्रकार का युग बरतने लगता है। युग-निर्माण का हमारा संकल्प एक ही प्रकार से पूर्ण होगा कि हम जनता के विचार स्तर में परिवर्तन करें, उसकी भावनाओं एवं मान्यताओं में सुधार करें। जिस प्रकार के कार्यों और प्रवृत्तियों का बाहुल्य हम संसार में देखना चाहते हैं उस प्रकार की मान्यताओं के भावना क्षेत्र में प्रविष्ट एवं प्रतिष्ठापित करने का कार्य हमें पूरी शक्ति से करना पड़ेगा। विचार बीज हैं और कार्य उसके फल। किसान की बीज बोने की प्रक्रिया ही कालान्तर में धान्य राशि के रूप में प्रकट होती है। संसार को फलता-फूलता, सुखी और संतुष्ट देखना हो तो उसका एकमात्र उपाय यही है कि जनता को धार्मिक विचार अधिकाधिक मात्रा में दिये जायँ। यह विचार बोने की प्रक्रिया एक चतुर किसान की तरह होनी चाहिए जो एक दिन बीज बोकर ही निश्चिन्त नहीं हो जाता वरन् अपने खेतों में रोज रोज खाद, पानी, निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि की क्रियाएं करता ही रहता है।

व्रतधारी की प्रतिज्ञा है कि वह संसार में धार्मिकता, नैतिकता एवं मानवता की स्थापना करेगा। इस प्रतिज्ञा की पूर्ति का प्रधान उपाय यही है कि अधिकाधिक क्षेत्र में सद्विचारों की खेती करे और सुख-शान्ति की फसल उपजावे।

जन संपर्क स्थापित करके लोगों को अच्छे मार्ग पर चलने की सलाह एवं प्रेरणा देना, धर्म प्रचार है। प्राचीनकाल में धर्मफेरी एवं पैदल तीर्थ-यात्रा इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाती थी। किसी के द्वार पर हम क्यों जावें? बिना पूछें कोई सलाह क्यों दें? किसी से अनुनय विनय करके अपने बड़प्पन को हम क्यों कम करें? जैसे अहंकारपूर्ण प्रतिरोधी भाव लोगों के मन में उठते रहते हैं। कई बड़े दब्बू, डरपोक, संकोची एवं हीन भावनाओं से ग्रस्त होते हैं, वे दूसरों के सामने पड़ने में या किसी के सामने जबान खोलने में झिझकते हैं। यह दोनों ही दुर्बलता व्यर्थ की हैं इन्हें छोड़ना ही उचित है। किसी से जब हम कोई स्वार्थ साधन करने, अपने लिए सहायता माँगने नहीं जा रहे हैं तो सम्मान को आघात कहाँ आता है? कोई उपेक्षा या उपहास करे तो भी दुखी होने की कोई बात नहीं, बीस आदमियों से श्रेष्ठ बात कहने पर यदि दो भी अभिरुचि लेने लगे तो इसमें हानि क्या हुई लाभ ही रहा।

किसी को धर्म मार्ग पर चला देने, सन्मार्ग पर प्रवृत्त कर देने के बढ़कर उसका उपकार और कुछ नहीं हो सकता। कुछ धन या वस्तु देकर किसी का कुछ देर के लिए ही भला हो सकता है, पर जीवन की दिशा मोड़ दी गई तो उसका सर्वतो सुखी कल्याण ही हो गया, उसका कुल तर गया। ऐसा पुण्य ही सच्चा पुण्य है। धर्म-प्रचार को—ज्ञान दान को—संसार का सबसे बड़ा पुण्य माना गया है। व्रतधारी सदस्य के लिए इस पुण्य प्रक्रिया को जीवन भर अपनाये रहना एक परम, पुनीत धर्म कर्तव्य की तरह आवश्यक है।

व्रतधारी का रचनात्मक कार्यक्रम

(1) संगठित शक्ति उत्पन्न करना

इस युग में किसी भी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाने के लिए सर्वोपरि शक्ति संगठन है। इसका मूल्य और महत्व किसी भी प्रकार कम न आँका जाना चाहिए। कोई बड़ा काम इस युग में संगठन शक्ति के बिना सफल नहीं हो सकता। सार्वजनिक प्रवृत्तियों के लिए तो यह नितान्त आवश्यक है। व्रतधारी स्वयं एक संस्था बनकर रहेगा। वह अपने आप से अनेक व्यक्तियों को धर्म-प्रयोजन के उद्देश्य से सम्बन्धित करेगा। उसे चाहिए कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र में बारीकी से यह ढूंढ़े कि धार्मिक अभिरुचि के, थोड़ी सज्जनता और सदाशयता युक्त व्यक्ति कौन-कौन हैं? उनके नाम नोट करने चाहिए और उन्हें साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना में सम्बन्धित करने का प्रयत्न करना चाहिए।

इस कार्य के लिए अपने पास साहित्य होना आवश्यक है। संस्था के अपने तीन पत्र निकलते हैं। ‘जीवन यज्ञ’ महीने की 8 तथा 23 को निकलता है, अखण्ड ज्योति 1 को और गायत्री-परिवार-पत्रिका 15 को इस प्रकार प्रति सप्ताह एक नया पत्र पहुँचता है। अपने संगठन क्षेत्र में आरम्भ में 7 व्यक्ति लेने चाहिए। इन अंकों को एक-एक दिन एक-एक के यहाँ देने और दूसरे दिन लेने जाना चाहिए। इस प्रकार सात व्यक्ति इन तीनों पत्रों को पढ़ लिया करेंगे और अंकों को एक दिन देने और एक दिन लेने के बहाने उनके यहाँ महीने में आठ बार जाने का अवसर मिलेगा। यह मिलन चाहे कुछ मिनटों का ही क्यों न हो पर लगातार निस्वार्थ भाव से किसी के दरवाजे पर जाते रहने और उसे एक अच्छा बौद्धिक भोजन बिना मूल्य पहुँचाते रहने की सेवा निश्चय ही उसे आपकी ओर आकर्षित करेगी और वह आपके व्यक्तिगत सेवा संगठन का सदस्य बन जायगा। इस प्रकार हर व्रतधारी अपने आप में एक शाखा संस्था होगा और उसके कम से कम 7 सदस्य होंगे। आरंभ में इस संगठन का कार्य संस्था के विचारों से, पत्रों से अवगत होना छोटा ही भले लगे पर इसमें युग निर्माण के सारे बीज छिपे हुए हैं।

एक व्रतधारी और सात सदस्य कुल आठ व्यक्ति प्रति सप्ताह एक स्थान पर एकत्रित होते रहेंगे, सामूहिक सत्संग का यह क्रम बारी-बारी एक-एक सदस्य के यहाँ चलता रहेगा। संस्था के प्रसारित विचारों पर परस्पर विचार विनिमय होता रहे और उनको कार्यान्वित करने के लिये कुछ सोच विचार होता रहे तो यह आठ आदमियों का संगठन ही अपने प्रदेश में विचार बीज का ऐसा विस्तार कर सकता है कि वह क्षेत्र सद्विचारों और सत्प्रवृत्तियों की हरी-भरी फसल से लहराने लगे। इन आठों में जो परस्पर प्रेम भाव बढ़ेगा उसमें एक छोटी ही सही पर एक सजीव—चिंगारी जैसी शक्ति सन्निहित रहेगी। यह चिंगारियां आगे चलकर अनाचार के बीहड़ वनों को भस्म कर डालने में समर्थ हो सकती हैं। इस आधार पर सारे समाज को, सारे राष्ट्र को संगठित किया जा सकता है।

2. सामूहिकता को प्रोत्साहन

हमारे देश में एक भारी बुराई पैदा हो गई है कि लोग मिलजुल कर काम करना पसंद नहीं करते। हर आदमी एक दूसरे से अलग रहना चाहता है, अपने अकेले के लाभ हानि की, सुख दुःख की, उन्नति अवनति की बात सोचता है। जो करना चाहता है अकेला करना चाहता है। यह पृथकतावाद राष्ट्र की प्रत्येक प्रवृत्ति के लिये घातक है। हमें ऐसे प्रयत्न करने चाहिये जिससे लोग एक साथ उठने बैठने, काम करते रहने और सारे समाज के हित अनहित की दृष्टि से विचार करना सीखें। इसके लिये सामूहिक उत्सवों एवं आयोजनों की भारी आवश्यकता है। सभा सम्मेलन, जुलूस, प्रदर्शन, रैली, शिविर आदि आयोजनों में यही उद्देश्य प्रधान रहता है। हिन्दू-धर्म में अनेक पर्वों, त्यौहारों, मेलों, तीर्थों, स्नानों, परिक्रमाओं, कथा कीर्तनों, यज्ञों, प्रीतिभोजों, बरातों का आयोजन इसी दृष्टि से है। अब वे विचार शून्यता के कारण रूढ़िमात्र बनकर एक कर्म काण्ड मात्र रह गये हैं। हमारा कर्तव्य है कि इन आयोजनों में विचारकता पैदा करें। इन आयोजनों को सुधरे हुए रूप से मनावें, इनके रहस्यों और उद्देश्यों को समझाने के लिये अच्छे प्रवचनों की व्यवस्था करें।

अब ऐसे वक्ता तैयार किये जाने चाहिये जो हमारे सामाजिक उत्सवों के वास्तविक उद्देश्यों और सन्देशों को उन आयोजनों में सम्मिलित लोगों को समझा सकें। ऐसी शिक्षा गायत्री तपोभूमि में देने की व्यवस्था की जा रही है। यह क्षमता उत्पन्न करने वाला साहित्य भी तैयार किया जा रहा है। व्रतधारी स्वयं यह क्षमता प्राप्त करे और अपने साथियों में जो इसके उपयुक्त जंचे उन्हें इसके लिये तैयार करे। सामूहिक उत्सवों की जहाँ भी गुंजाइश हो—उन्हें सुधरे हुए रूप से मनाया जाय और सही मार्गदर्शन करने वाले प्रवचनों एवं गायनों का अभाव न रहे। इस प्रकार की व्यवस्था बनाते रहने के लिए व्रतधारी को सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये।

अपनी ओर से इस प्रकार की योजना आरम्भ करने के लिये ‘गायत्री यज्ञों’ की छोटी बड़ी व्यवस्था करते रहना सब प्रकार उपयुक्त है। हमारा प्रत्येक धार्मिक सम्मेलन—सभा सम्मेलन न कहा जाय उसे यज्ञ नाम दिया जाय। यज्ञ में जहाँ वायुशुद्धि, स्वास्थ्य रक्षा आदि अनेक लाभ हैं वहाँ यज्ञीय भावनाओं का विस्तार सबसे बड़ा लाभ है। लोक शिक्षण के लिये—जन मानस निर्माण करने के लिये—धर्म प्रवृत्तियाँ पैदा करने के लिये—यज्ञ से बढ़कर और कोई माध्यम नहीं हो सकता। धार्मिक श्रद्धा लेकर आई हुई जनता में नैतिकता के संस्कार डालना जितना संभव है उतना और किसी प्रकार नहीं हो सकता। जब भी बन पड़े सामूहिक जप, अनुष्ठान एवं गायत्री यज्ञ—करते रहने चाहिए। इनके लिये आश्विन और चैत्र की नवरात्रियाँ बहुत ही उपयुक्त अवसर हैं। इन उत्सवों में एक प्रकार से शिक्षण शिविर जैसे कार्यक्रम बना देना चाहिये।

3-रचनात्मक कार्य

इसके निम्न प्रकार हो सकते हैं

(1) निर्माणात्मक कार्य—ज्ञान मन्दिरों की स्थापना, पुस्तकालय, वाचनालय बनाना, विद्यालय या ऐसे ही और कोई उपयोगी संस्थान बनाना, पुराने मन्दिरों तथा घाटों का जीर्णोद्धार करना, इसके लिये जन सहयोग एवं श्रमदान एकत्रित करना।

(2) रात्रि पाठशालाएँ चलाना जिनमें कार्यव्यस्त लोग रात्रि के अवकाश में साक्षर बनें तथा कथा एवं सत्संग के रूप में सद्ज्ञान प्राप्त करें।

(3) सामयिक सेवाएँ—मेला उत्सवों पर स्वयं सेवकों के रूप में जनता की यातायात संबंधी कठिनाइयों को हल करना, जल व्यवस्था, पहरेदारी, बदमाशों से सुरक्षा, खोये बच्चे ढूँढ़ना आदि सहायताएं करना।

(4) जो व्यक्ति या संस्थाएं किन्हीं विकास योजनाओं में या लोकहित के रचनात्मक कार्यों में लगी हों, उनके कार्यों में सम्मिलित होना, योग देना।

(5)व्यायाम शालाएं, प्रतियोगिताएं, चिकित्सालय एवं लोक शिक्षण के लिये वर्तमान गुत्थियों के संबन्ध में मार्ग दर्शन करने वाली व्याख्यान मालाएं एवं शिक्षण शिविरों का आयोजन करना।

(6) स्थानीय परिस्थिति के अनुसार और भी जो उपयोगी कार्य सूझ पड़े उनकी व्यवस्था करना।

4-आन्दोलन प्रक्रियाएं

कुछ छोटे-छोटे आन्दोलन अपने क्षेत्र में खड़े करने चाहिये। इनके रूप आरंभ से सत्याग्रह एवं संघर्ष जैसा न बना दिया जाय क्योंकि आन्दोलनकारी जब तक संगठित, काफी मजबूत न हों और जनमत उसके पक्ष में न हो तब तक संघर्षों के असफल होने का भय रहता है। असफलता की उलटी प्रतिक्रिया होती है। कमजोर तबीयत के साथी एवं कार्यकर्ता हतोत्साह हो जाते हैं। इसलिये आरम्भ में सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध भाषण, सम्मेलन, साहित्य प्रसार एवं प्रदर्शन करके जनमत तैयार करना चाहिये और उन बुरे कार्यों में सम्मिलित न होने का असहयोग आन्दोलन करना चाहिये। इस प्रकार के आन्दोलनों की कुछ चर्चा नीचे की जाती है :—

(1)देवी देवताओं पर चढ़ाई जाने वाली पशुबलि।

(2)मृतक भोज के धार्मिक उद्देश्य के लिये आवश्यक ब्राह्मणों एवं कुटुम्बी रिश्तेदारों को छोड़कर अन्य लोगों को कराये जाने वाले प्रीति-भोज का विरोध।

(3)छोटी उम्र के लड़के लड़कियों के विवाह का विरोध।

(4)अनमेल विवाहों का विरोध।

(5)दहेज का विरोध, वर पक्ष दहेज न माँगें और कन्यापक्ष जेवरों की एवं अपने दरवाजे की शोभा कराने के लिये खर्चीले बाजे, बरात, रोशनी, आतिशबाजी आदि की माँग न करे, इसके लिये वातावरण तैयार करना। विवाह संस्कार बहुत ही सादा हों। सम्भव हो तो आदर्श विवाहों का एक धार्मिक मेला ही किया जाय जिससे एक समय में अनेक विवाह हो जाया करें। गायत्री तपोभूमि में गायत्री जयन्ती जेष्ठ सुदी 10 तथा देवोत्थान कार्तिक सुदी 11 को वर्ष में दो बार ऐसे आदर्श विवाह हुआ करेंगे।

(6) माँसाहार और अण्डे खाने का विरोध।

(7) तमाखू, गाँजा, भाँग, अफीम, शराब आदि नशों का विरोध

(8) जुआ, सट्टा, लाटरी, फीचर, चोरी लूट, रिश्वत आदि बिना श्रम का, बिना अधिकार का धन प्राप्त करने की प्रवृत्ति का विरोध।

(9) अश्लील चित्रों को घरों में टाँगने, अश्लील साहित्य पढ़ने एवं अश्लील सिनेमाओं का विरोध। अश्लील चित्रों एवं पुस्तकों की होली जलाना।

(10) फैशन परस्ती, शौकीनी, फिजूल खर्ची का विरोध।

(11) महिलाओं की ऐसी उत्तेजक वेश-भूषा शृंगार-विन्यास एवं चाल-ढाल का विरोध जिससे अनावश्यक आकर्षण पैदा होता हो। शील और शालीनता की प्रवृत्तियाँ नारी जीवन में सुव्यवस्थित रहें ऐसा प्रयत्न करना।

(12) अपने बुजुर्गों एवं गुरुजनों के नित्य चरण स्पर्श की प्रवृत्ति बढ़ाना।

(13) भूत पलीत, झाड़ फूँक, स्याने दिवाने, पीर मुरीदों के नाम पर प्रचलित अन्ध विश्वासों एवं भ्रष्टाचारों का विरोध।

(14) पशुओं के साथ निर्दयता बरतने, उनकी शक्ति से अधिक काम लेने, घायल अंगों को दुखाकर काम लेने एवं छुट्टा छोड़कर उन्हें पिटवाने का विरोध।

(15) जन्म दिन मनाने के व्यक्तिगत उत्सवों की प्रथा का आरम्भ।

(16) समय-समय पर सामूहिक यज्ञोपवीत धारण के उत्सव आयोजनों की व्यवस्था।

(17) पर्व और त्यौहारों को सुधरे हुये रूप में मनाना। षोडश संस्कारों की प्रथा शिक्षात्मक विधि के साथ प्रचलित करना।

5 -प्रतिज्ञा पत्र आन्दोलन

ऐसी ही अनेकों और भी कुप्रथाएं अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग प्रकार की हो सकती हैं। उनके विरुद्ध आन्दोलन किया जाय। आन्दोलनों में पर्चे बाँटना, इन विषयों की सस्ती पुस्तिकाएं बेचना या बाँटना, भाषणों एवं सम्मेलनों का आयोजन, पोस्टर चिपकाना, दीवारों पर वाक्य लिखना तो प्रधान है ही साथ ही प्रतिज्ञा पत्र भराने का आन्दोलन भी चलाना चाहिए। इन कुरीतियों को न पड़ने या यदि पड़ गई हैं तो छोड़ने के प्रतिज्ञा पत्र लोगों से भराने चाहिए। ऐसे प्रतिज्ञा पत्रों की छपी पुस्तिकाएं लागत से भी कम मूल्य में गायत्री तपोभूमि से उपलब्ध होती हैं। अपने यहाँ जिस कुरीति की बहुलता हो, जिसके विरुद्ध प्रतिज्ञा आन्दोलन चल सके उसके प्रतिज्ञा पत्र मंगा लेने चाहिए। प्रतिज्ञा पत्र भरने वाले को धन्यवाद पत्र दिया जाय। यह धन्यवाद पत्र एवं प्रतिज्ञा पत्रों की जोड़ी तैयार की जा रही है। दहेज के विरोध में स्कूल कालेजों में जाकर लड़के लड़कियों से प्रतिज्ञापत्र भराने चाहिए कि यदि उनके विवाह में दहेज लिया या दिया गया तो वे विवाह करने से ही इनकार कर देंगे। यह प्रतिज्ञापत्र-व्रतधारी के कार्य की महत्ता का प्रमाण माने जावेंगे।

जहाँ यह कुरीतियाँ बरती जायँ ऐसे बड़े आयोजनों या प्रीतिभोजों में सम्मिलित न होने की प्रतिज्ञा करने वाले असहयोगियों का एक बड़ा दल बन जाय तो उनका साधारण विरोध भी इन दुष्प्रवृत्तियों को रोकने में भारी सहायक सिद्ध हो सकता है।

यह कहा जा सकता है कि जब देश के सामने अन्य अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक प्रश्न उपस्थित हैं तो उन्हें हल करने या जोर डालने की अपेक्षा इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने से क्या लाभ? ऐसी शंका करने वाले जनता के मनोविज्ञान को नहीं समझते। हमारे देश का भावना क्षेत्र पिछले सैकड़ों हजारों वर्षों की दुरावस्था ने ऐसा दुर्बल कर दिया है कि उससे किसी बहुत बड़े आन्दोलन को पूरा करने की आशा नहीं जा सकती हैं।

*समाप्त*