जीवन को पहचान


जीवन को पहचान (kavita)

जीवन को पहचान, साथी। भजले श्री भगवान, साथी॥

तू कहता यह मिट्टी है तन क्या मिट्टी होती है चेतन? सोच अरे नादान, साथी ॥1॥

तेरे मन मन्दिर में ईश्वर अजर अमर अविनाशी प्रियवर जान सके तो जान, साथी ॥2॥

समय नदी में बहे न जा तू चीर धार बढ़ मंजिल पा तू निज बल का कर ध्यान, साथी ॥3॥

जिसने निज जीवन को जाना उसको कठिन हुआ क्या पाना शाप हुए वरदान, साथी ॥4॥

जो कुछ हुआ सो हो जाने दे अब न व्यर्थ श्वासें जाने दे गति में है भगवान, साथी ॥5॥

—त्रिलोकीनाथ ब्रजवाल


‘ओउम्’ शब्द की प्रचण्ड शक्ति

( प्रो. मोहनलाल वर्मा बी.ए. एल-एल. बी)

हिन्दू मनोवैज्ञानिकों और तत्ववेत्ताओं को स्वर विज्ञान का बड़ा अनुभव और अध्ययन था। उन्होंने एक-एक स्वर की बड़ी खोजबीन की थी। इन अनुसन्धानों का नवरीत वेद के आदि का “ओम्” शब्द है। इस शब्द को बड़े आध्यात्मिक अर्थ गाँभीर्य से बनाया गया है। प्रत्येक हिन्दू किसी न किसी रूप में इस शब्द को दैनिक पूजा आराधना या दैनिक जीवन में प्रयोग में लाता है। कुछ साधक इसके पूर्व ‘हरिः’ शब्द का प्रयोग करते हैं और “हरिः ओम्” उच्चारण किया करते हैं।

“ओम्” शक्ति, सामर्थ्य और ईश्वरीय संपदाओं का रूप है। एक बार असुरों ने इन्द्रपुरी को घेर लिया। इन्द्र को भय हुआ कि यों तो मेरी इन्द्रपुरी ही छिन जायगी। किसी बाह्य दैवी शक्ति से सहायता लेनी चाहिए। अपनी सीमित शक्तियों से तो इन्द्रपुरी की रक्षा होती नहीं दीखती। आसुरी कैसे मारे जाएं? उन्हें “ओम्” मिला!

इन्द्र ने कहा “हे शक्ति रूप! हम आपको प्रमुख बनाकर असुरों को जीतना चाहते हैं। आप ईश्वर की शक्ति और सामर्थ्य के रूप हैं। आपकी सहायता से हम देवताओं में नई शक्ति , नई स्फूर्ति आयेगी। आपके साथ रहने से हम में साहस का प्रादुर्भाव होगा। इस संकट के समय में हमारे नेत्र आप पर लगे हैं। हे देवशक्ति सम्पन्न महात्मन्! हमारी रक्षा कीजिए।”

“ओम्” सोचते रहे। यह निश्चय था कि उनकी अध्यक्षता में देव असुरों को जीत सकते थे। वे सब ऋद्धि सिद्धियों के पुँज थे। देवता उनसे अनुपम विनय कर रहे थे।

ओम् एक शर्त पर सहायता देने को तैयार हो गए।

“ओम्” ने कहा—”मैं इस शर्त पर आपकी सहायता करने को तैयार हूँ “न मामनीरयित्वा ब्राह्मणा ब्रह्म वदेयुः। यदि वदेयुः अब्रह्म तत् स्यादिति (गोपथब्रा. 1। 1। 23) अर्थात् मुझ ‘ओम्’ को पहले पढ़े बिना ब्राह्मण वेदोच्चारण न करें। मेरे नाम का उच्चारण सब से पहले किया जाया करे। यदि कोई ब्राह्मण मेरा नाम लिये बिना वेदपाठ कर दे, तो वह देवताओं द्वारा स्वीकार न किया जाये।”

“ओम्” के बिना असुर जीते नहीं जा सकते थे अतः देवताओं ने यह शर्त मान ली।

“ओम्” ने देवताओं का सैन्य संचालन किया। पूरी देवसेना के सामने वह बोले, “देवताओं! मेरा नाम लेकर आगे बढ़िये। आप सिन्धु की थाह नाम लेंगे। तिमिर दूर होगा और अपनी दिव्य शक्तियों का ज्ञान होगा। शिथिल पदों में अटल विश्वास की शक्ति आयेगी। आज आप अपनी शक्ति को पहचान लीजिए। मेरा नाम उच्चारण कर बढ़िये, विजय आपकी है।”

देवता “ओम्”, ‘ओम्” शब्द का उच्चारण कर युद्ध करते रहे। आश्चर्य! उस शब्द की शक्ति से उनमें नया उत्साह और नव प्रेरणा उत्पन्न हुई। नई ताकत का संचार हुआ। जैसे-जैसे वे “ओम्” का उच्चारण करते थे, वैसे-वैसे थके हारे सैनिकों में खोई हुई ताकत फिर आ जाती थी। उनकी ताकत जैसे अक्षय हो गई थी। इस शब्द का चमत्कार संजीवनी शक्ति के समान था।

“ओम्” की सहायता से असुर हार गये।

तब से “ओम्” अमर हो गया। थके हारे, जीवन में निराश, उत्साहहीन व्यक्तियों को नव जीवन, नई प्रेरणा और शक्ति देने के लिए ओम् का प्रयोग प्रचलित हुआ।

संकट में, विपत्ति में, युग-युग मैंने “ओम्” शब्द के उच्चारण से आत्म-विश्वास प्राप्त किया। नये सिरे से वे जीवन के मोर्चों पर आरुढ़ हुए। हर एक विपत्ति में मनुष्य का साहस देने वाला ओम् है। “ओम्” ब्रह्मबीज है! त्रिविद ओंकार रूपी ब्रह्म का संक्षिप्त रूप है। अतः इसे धारण कर लेने से नई दैवी शक्ति का प्रादुर्भाव होना साधारण सी बात है। प्रत्येक बुद्धिवादी इसे आसानी से समझ सकता है।

गहराई से “ओम्” शब्द को परख लीजिए अ, उ, म् के संयोग से यह शब्द बना हुआ है। “ओम्” परमात्मा का सर्वोत्तम नाम है। वेदादि शास्त्रों में परमात्मा का मुख्य नाम “ओम्” ही बताया गया है।

माण्डूक्योपनिषद् में लिखा है—

“ओमित्येतदक्षरम् इदं सर्व तस्योपाख्यानं भूतं भवद्

भविष्यदिति सर्वमोंकार एव।”

“ओउम्” वह अक्षर है जिसमें सम्पूर्ण भूत, वर्तमान तथा भविष्यत् ओंकार का छोटा सा व्याख्यान है। सभी शक्तियाँ, ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ इस ओंकार में भरी हुई हैं।

छान्दोग्य-उपनिषद् में “ओ3म्” की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा गया है :—

“ओम् इत्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत्, ओम् इति ह्यद्गायति तस्योपाख्यानम् ॥ 1 ॥ एषाँ भूतानाँ पृथिवी

रसः, पृथिव्याः आपो रसः, आपामोषधयो रसः, ओषधीनाँ पुरुषो रसः, पुरुषस्य वाग्रसः, वाचः ऋग रसः, ऋचः साम रसः, साम्नः उद्गीथो रसः ॥ 2॥ स एष रसनाँ रसातमः परमः परार्ध्याऽष्टमोयदुद्गीथः ॥ 3॥ (1-1-1-3)

अर्थात् ‘ओम्’ अक्षर उद्गीथ है। अतः उसकी उपासना करनी चाहिए। सब भूतों का रस सार पृथ्वी है। पृथ्वी का रस जल है। जल का सार औषधियाँ हैं। औषधियों का सार मानव देह है। मानव देह का सार वाणी है। वाणी का ऋचा—वेद है। ऋचा का सार सामवेद द्वारा भगवान् का यशोगान है। सामवेद का सार उद्गीथ है। यह जो उद्गीथ है, वह सब रसों में से रसतम-सारतम, सर्वोत्कृष्ट है।

कठोपनिषद् में यमराज ने नचिकेता को ओंकार की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है—

“सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति, तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति,

तत्ते पदं सं ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥ (1।2।15)

सारे वेद जिस भगवान् का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के लिए साधक करते हैं, जिसकी इच्छा से मुमुक्षु जन ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं संक्षेप में कहता हूँ। ‘ओम्’ यही पद है। और भी कहा गया है—

“एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्। एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥

यही “ओम्” सब का श्रेष्ठ अवलम्बन है। यही सर्वोत्कृष्ट आलम्बन है। इसी शक्ति पूर्ण शब्द का सहारा लेकर ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है।

“ओम्” की शक्ति अपार है। इसके उच्चारण से मनुष्य में शुद्ध सात्विक दैवी भाव उत्पन्न होते हैं क्योंकि ओम् परमब्रह्म का शक्ति दायक नाम है। विराट्, अग्नि, विश्व आदि परमात्मा के नाम ‘अ’ के अंतर्गत हैं, हिरण्यगर्भ, वायु, तेजस आदि ‘उ’ के अंतर्गत हैं तथा ईश्वर, आदित्य और अज्ञादि परमात्मा के नाम मकार से जाने जाते हैं।

जिसके पास ‘ओम्’ है, उसके पास अनन्त दैवी शक्तियाँ हैं। बल है, बुद्धि है, जीवन है। इन्द्रियों का संयम है।

भगवान् श्री कृष्ण ने “ओ3म्” की महिमा का वर्णन करते हुए गीता के आठवें अध्याय में लिखा है-

“ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मानुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमाँ गतिम्॥

अर्थात् जो साधक मन और इन्द्रियों को वश में कर ‘ओम्’ अक्षर ब्रह्म का जप करता है, वह ब्रह्म का स्मरण करता हुआ इस भौतिक देह को त्याग कर परम पद को प्राप्त होता है। इस पद को प्राप्त करने के उपरान्त जीवात्मा जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है।


हमारी अनेक समस्याओं का एक समाधान

मनुष्य का जीवन आज जितना उलझन भरा है, उतना संसार के इतिहास में पहले नहीं रहा। ऐसे अवसर आते रहे हैं जिनमें दुर्भिक्ष एवं राजनैतिक आक्रमणों से जनता में खलबली मची हो पर वह सब कुछ ही दिनों के लिए रहा है और उसका प्रभाव भी शारीरिक कष्टों तक ही सीमित रहा है। मनुष्य का मन निरन्तर उलझन ग्रस्त रहे, चिन्ता और परेशानियों से उसके मनः क्षेत्र में निरन्तर अशान्ति की ज्वाला जलती रहे तथा जीवन का आनन्द रस सूखकर उसके स्थान पर उद्वेगों की भरमार रहे ऐसी व्यापक मानसिक स्थिति का वातावरण अब से पहले कभी नहीं रहा है।

यह परेशानियाँ साधारण शारीरिक कष्टों या अभावों से अधिक त्रासदायक एवं दुष्परिणाम उत्पन्न करने वाली हैं। धन के अभाव में मनुष्य को गरीबी का जीवन व्यतीत करना पड़ता है, पर देखा गया है कि यदि अन्य सद्गुण पास में हों तो वह गरीबी का जीवन कष्टकारक नहीं वरन् सुविधाजनक और शान्तिदायक हो जाता है। ऋषि-मुनि और सन्त महात्मा अपरिग्रही, त्यागमय और कम से कम वस्तुओं से चल सकने वाला जीवन क्रम अपनाते हैं और इससे उन्हें कष्ट होना तो दूर उलटे सुविधा अनुभव होती है। उनके उपदेशों में सादा जीवन उच्च विचार की प्रेरणा रहती है। मितव्ययिता और सादगी पर वे पूरा जोर देते हैं क्योंकि अन्तःकरण के विकास एवं मनः क्षेत्र के परिष्कार का इस सादगी से घनिष्ठ सम्बन्ध है।

इसी प्रकार कुछ अत्यन्त तीव्र वेदना वाले शारीरिक कष्टों को छोड़कर अन्य सामान्य श्रेणी की अस्वस्थता एवं बेचैनी भी उतनी असह्य नहीं होती जितनी कि मानसिक पीड़ा दुःख देती है। भौतिक जगत में दो ही दुःख हैं—दरिद्रता और शारीरिक कष्ट। यह दोनों ही सह्य हैं और यदि सह्य न भी हों तो इनके दुष्परिणाम इस वर्तमान स्थूल शरीर तक ही सीमित हैं। परन्तु मानसिक चिन्ता परेशानी एवं उलझनों के सम्बन्ध में यह बात नहीं है, उनका कष्ट भी अधिक होता है और परिणाम भी दूरवर्ती होते हैं। गोदी सूनी करके नन्हें-मुन्ने हँसते-खेलते बालक के मर जाने पर माता को कितना शोक होता है, किसी कारण समाज में अपमानित हो जाने, प्रतिष्ठा घट जाने से कितनी पीड़ा होती है। शत्रुता बढ़ जाने पर द्वेष की आग कितनी दाहक होती है। निर्धारित कार्यक्रम में असफलता मिलने पर कितनी निराशा होती है, उसका अनुमान भुक्त भोगी ही लगा सकते हैं। अपमान, असफलता, शोक, द्वेष, भय, ईर्ष्या, वियोग, बिछोह, निराशा, चिन्ता आदि मानसिक आघातों का मनुष्य को इतना तीव्र कष्ट होता है कि वह आत्म हत्या तक करने को तैयार हो जाता है। गरीबी या बीमारी के कारण कोई व्यक्ति न तो उतना अशान्त होता है और न आत्म-हत्या करने की स्थिति आने जितना दुखी होता है। तात्पर्य यह है कि मानसिक कष्टों का त्रास ही गहरी अशान्ति का कारण है। आज इसी आपत्ति की अत्यधिक वृद्धि हुई है और जन साधारण का जीवन नरक तुल्य बना जा रहा है।

गरीबी एवं बीमारी का महत्व कम नहीं है—उनके कारण भी असुविधा होती है और प्रगति रुकती है पर मानसिक कष्टों का दुख एवं प्रतिरोध निश्चय ही अत्यधिक है। गरीबी से प्रगति उतनी नहीं रुकती जितनी चिन्ता एवं अंतर्व्यथा से रुकती है। इन मानसिक कष्टों का प्रभाव मनुष्य की सूक्ष्म चेतना पर पड़ता है जिसके कारण उसके उच्चकोटि के सद्गुण नष्ट होते हैं। साहस, शौर्य, धैर्य, उत्साह, पुरुषार्थ, उदारता, आशावादिता, क्षमा, सन्तोष, सद्भाव, आत्मीयता, दया, करुणा, सेवा, आस्तिकता, आत्म विश्वास आदि अनेकों सत्प्रवृत्तियाँ मानसिक अशान्ति के कारण सूखने लगती हैं और तेजी से समाप्त हो जाती हैं। इन विशेषताओं के अभाव में मनुष्य नर पशु बनता चला जाता है। उसके महापुरुष होने की, कोई आदर्श स्थापित करने की संभावना नहीं रहती।

मानसिक अशान्ति से जीवन रस सूखता है। जैसे उदर की ऊष्मा शरीर के रक्त माँस को सुखा कर उसे अस्थि-पिंजर मात्र बना देती है, उसी प्रकार आन्तरिक असन्तोष एवं उद्वेग के ज्वर में सद्गुण, मस्तिष्क की मौलिकता एवं उर्वरा शक्ति भी नष्ट होती है। उलझनों में उलझे हुए मस्तिष्क दिन-दिन विकृत होते जाते हैं, अर्ध विक्षिप्त दशा उनकी रहती है। क्रोधी, तुनक मिज़ाज, सनकी, दुराग्रही, अड़ियल, अविश्वासी, अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग पकाने वाले, क्रूर, कुकर्मी, उद्दण्ड प्रकृति के लोग प्रायः अर्ध विक्षिप्त होते हैं। यह स्थिति थोड़ी और बढ़े तो उनके पागल होने में सन्देह नहीं रहता। मन की शान्ति और कोमलता को यह उलझनें ही नष्ट करती हैं और इन उलझनों का कारण मानवता की मर्यादाओं का उल्लंघन ही है।

लोग यह सोचते हैं कि मानवता, नैतिकता, आस्तिकता, धार्मिकता के बंधनों में अपने आपको बाँधने से हमारी स्वच्छन्दता में अड़चन पड़ती है। अनीतिपूर्वक अधिक धन कमाने और दूसरों को पतन की पीड़ा में धकेलने में हिचक किये बिना मनमाने विलास एवं ऐश्वर्य का उपभोग नहीं हो सकता, इसलिए हम इन धर्म बन्धनों में अपने आप को नहीं बाँधते, आज धर्म की ओर सर्वत्र नाक भौं सकोड़ी जा रही है। इसे मूर्खता माना जाता है। बुद्धिमानी उसी नीति को समझा जाता है जिस पर चलकर मनुष्य अधिक ऐश्वर्य का उपयोग कर सके। जीवन दर्शन में ऐसी आस्था जम जाने से आत्म नियन्त्रण के बन्धन टूट जाने में मनुष्य सत् और असत् का, नीति और अनीति का, कर्म और कुकर्म का भेद भूल जाता है। फलस्वरूप उसके अधिकाँश विचार और कार्य ऐसे होते हैं जो आत्मा के मूलभूत स्वभाव के विपरीत होते हैं। समाज व्यवस्था में बाधक होने के कारण लोक निंदित होते हैं। जिन्हें अपने कार्यों से हानि पहुँचती है उनके अभिशाप आक्रमणकारी आघात के रूप में अपने ऊपर चोट करते हैं। राजदंड, समाज दण्ड एवं उस पीड़ित के प्रतिशोध का भय करता है। वह अनीति उपार्जित धन अनेकों प्रकार से कुमार्ग पर चलने की प्रेरणा करता है। यह कुचक्र तेजी से घूमता है। इस मार्ग में प्राप्त हुई सफलताएँ निरन्तर अधिक कुकर्म करते चलने की प्रेरणा देती हैं। इस सत्यानाश की सड़क पर दौड़ता हुआ मनुष्य अन्य दंडों से छुटकारा पाने का कोई मार्ग न पाकर मानसिक उलझनों में निरन्तर घिरा रहता है। शराब आदि नशे पीकर वह उस अन्तर्द्वन्द्व से छुटकारा पाना चाहता है, पर नशा उतरते ही वह उद्वेग इसे फिर ज्यों का त्यों का त्यों आ घेरता है।

अन्तर्द्वन्द्व के उद्वेगों का स्वास्थ्य पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। इस घुटन से जीवन के मूलभूत सूक्ष्म रसों की समाप्ति होती है। फलस्वरूप ऐसा व्यक्ति भीतर ही भीतर खोखला होता जाता है। बाहर से उसका रंग रूप सुन्दर लगे यह बात दूसरी है पर वह जीवन तत्व जो रोगों में रक्षा कराने, उन्हें मिटाने में प्रधान काम करता है, घट जाने से आये दिन बीमारियाँ घेरे रहती हैं। उसका मूलकारण अन्तःप्रदेश में रहता है इसलिए दवादारु से भी कुछ काम नहीं चलता। देखा गया है कि छोटे-छोटे मर्ज भी कीमती दवाएँ बहुत समय तक सेवन करने पर भी, अच्छे नहीं होते। इसका कारण दवाओं की गुणहीनता नहीं, वरन् व्यक्ति के सूक्ष्म-शरीर में उद्वेगों के कारण उत्पन्न हुई दुर्बलता है। उसी कारण जो रोग उत्पन्न होते हैं वे मूल कारण को दूर किये बिना साधारण दवा दारु से अच्छे नहीं हो सकते। आज रोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। चिकित्सकों और चिकित्सालयों की भारी वृद्धि हो रही है पर इससे जन साधारण के स्वास्थ्य में कुछ भी सुधार होता दिखाई नहीं पड़ता। जन-साधारण का स्वास्थ्य आज जिस बुरी तरह गिर रहा है उतना अतीत काल में आज तक कभी नहीं गिरा। इस गिरावट का कारण गरीबी या खाद्य पदार्थों का अभाव नहीं है। इस सम्बन्ध में तो हम अपनी गत पीढ़ी के पूर्वजों की अपेक्षा कहीं अधिक सुविधाजनक स्थिति में हैं। मूलकारण आन्तरिक उलझनें हैं जिसने स्वास्थ्य की अन्तः भूमिका को ही चौपट कर दिया है।

पीढ़ी दर पीढ़ी हम स्वास्थ्य की दृष्टि से बुरी तरह गिरावट की ओर चल रहे हैं। बच्चे जन्म से ही दुर्बलता और अस्वस्थता साथ लेकर आते हैं। यह उन्हें पैतृक विरासत प्राप्त हुई है। वंशानुक्रम विज्ञान के ज्ञाता जानते हैं कि बालक अपने पिता, पितामह आदि पूर्वजों की शारीरिक ही नहीं मानसिक विरासतें भी अपने साथ लेकर आते हैं। जो त्रुटियाँ और दुर्बलताएँ पूर्वजों ने जीवन भर के कुकर्मों के फलस्वरूप पाईं थीं, वे इन बालकों को जन्म से अनायास ही उपलब्ध रहती हैं। आज बालकों की बहुत बड़ी संख्या शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता में ग्रस्त है। आये दिन लड़कों की उद्दंडता के समाचार हमारी चर्चा का विषय होते हैं। उनके अशिष्ट व्यवहारों एवं अदूरदर्शितापूर्ण कार्यों से सारा परिवार असंतुष्ट रहता है। इस अव्यवस्थिता में बेचारा बालक स्वतः उतना दोषी नहीं है। उसके रक्त के साथ जो कुसंस्कार आये हैं वे अपनी प्रतिक्रिया इस रूप में प्रकट करते हैं। पिता अत्यधिक कंजूस रहा हो तो यह आवश्यक नहीं कि उसका लड़का कंजूस ही हो। वैज्ञानिकों के मतानुसार उसका लड़का कैन्सर या ग्रन्थि रोगों का रोगी हो सकता है। चिन्तातुर या कलह में जलती रहने वाली माता का बालक यदि श्वाँस, प्लूरिसी, अन्त्रदाह रोग पीड़ित हो तो कुछ आश्चर्य की बात नहीं। इसी प्रकार पूर्वजों के अन्य मानसिक विकार कोई अन्य रूप धारण करके बालकों में प्रकट हो सकते हैं। बालकों में जो आज उद्दंडता, अवज्ञा, चोरी, फिजूलखर्ची, विलासिता, कायरता आदि दुर्गुणों का बाहुल्य दीख पड़ता है, वस्तुतः उनके पूर्वजों की किन्हीं नैतिक त्रुटियों के प्रतिफल ही होते हैं।

लोग अपने बच्चों के लिए बहुत धन, चलता हुआ व्यापार या मकान जायदाद छोड़ जाना चाहते हैं ताकि वे सुखपूर्वक अपना जीवनयापन कर सकें। पर वे यह भूल जाते हैं कि जो दुर्गुण हम उन्हें विरासत में दे रहे हैं वे इतने भयावह हैं कि उनकी अग्नि में वह धन सम्पत्ति कुछ ही दिनों में जलभुन कर भस्म हो जायगी। धन से कोई व्यक्ति तभी लाभ उठा सकता है जब उसे बढ़ाने, सुरक्षित रखने एवं सदुपयोग करने की कला से भली प्रकार विज्ञ हो। यदि ऐसा न हुआ तो वह अनायास प्राप्त धन स्वयं तो नष्ट होता ही है, साथ ही जिसके पास था उसे अनेकों अनाचार एवं उद्वेग भी उपहार में देगा। सचाई यह है कि सन्तान के लिए धन-जायदाद छोड़ने की अपेक्षा, उनके अन्तःप्रदेश में शान्त चित्त और स्वस्थ भावनाओं की स्थापना अधिक महत्वपूर्ण है। पर यह सब संभव तभी है जब माता-पिता आत्म नियन्त्रण स्वीकार करें, सद्विचार एवं सदाचार का अनुकरण करें। बालकों के लिए इस मानसिक सम्पत्ति को यदि कोई माता-पिता छोड़ सके तो यह उन्हें चिरस्थायी स्वास्थ्य, निरोगता, मानसिक सद्गुण, पुरुषार्थ, दूरदर्शिता, उदार हृदय आदि अनेकों दिव्य सम्पत्तियाँ देने का सत्परिणाम उत्पन्न कर सकता है। यह दौलत, साधारण मकान जायदाद छोड़ने की अपेक्षा अधिक मूल्यवान है।

अनैतिकता से उत्पन्न मानसिक उलझनें लोगों के बीच पारस्परिक सद्भावों को नष्ट करती हैं। एक दूसरे के प्रति अविश्वास करता है, सन्देह की दृष्टि से देखता है। सशंकित रहता है और यह भय करता है कि यह मेरे साथ कोई विश्वासघात करेगा! यह अविश्वास प्रधानतः अपनी आन्तरिक दुर्बलता के कारण ही होता है। चूँकि अन्य लोग भी उसी दुर्बलता से ग्रस्त हैं और वे भी ऐसी ही आशंका अपने प्रति करते हैं। कोई छोटी सी बात प्रमाण स्वरूप मिल जाने से एक दूसरे के प्रति और भी अधिक अविश्वास करते हैं। बात बढ़ते-बढ़ते छल, कपट और ईर्ष्या द्वेष तक जा पहुँचती है। एक दूसरे को अपना शत्रु मानने लगता है। शत्रुता का आरम्भ इसी कायरता से होता है। पीछे कोई निमित्त मिलते जाते हैं और आग में लकड़ी पड़ने से अधिक उग्रता से जलने वाली अग्नि की तरह उस शत्रुता का विस्तार होता जाता है।

घर-घर में आज ईर्ष्या द्वेष का, क्रोध कलह का, सन्देह अविश्वास का वातावरण फैला हुआ है। फलस्वरूप कोई अपना मित्र दिखाई नहीं पड़ता, सब शत्रु ही शत्रु, सब दुष्ट ही दुष्ट दिखाई पड़ते हैं। ऐसे वातावरण को ही नरक कहते हैं। आज सर्वत्र नरक के दृश्य उपस्थित हैं। जिस घर में देखिए, जिस ग्राम या समाज में देखिए दुर्भाव का बोलबाला है। राजनीति और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में इसी विभीषिका का नग्न नृत्य हो रहा है। एटमबम, गैस, सारी दुनिया को कुछ छटाँक मात्रा में ही मार डालने वाला विष इसी विभीषिका की उपज है। दुनिया को धीरे-धीरे सामूहिक आत्म-हत्या की ओर यह विभीषिका ही घसीटे लिये जा रही है।

मनुष्य जीवन में सब से मधुर यदि कोई वस्तु है तो वह है—स्नेह, सद्भाव, आत्मीयता। एक दूसरे के प्रति जहाँ इस प्रकार की भावना रखता है वहाँ स्वर्ग का साक्षात्कार होता है। गरीबी और अभावग्रस्त स्थिति में भी मनुष्य इन तत्वों के होने पर भारी सन्तोष और शान्ति अनुभव करता है। इस तत्व को सुरक्षित रखने के लिए ही आध्यात्मिकता, धार्मिकता एवं आस्तिकता का सारा विधान बना हुआ है। दूसरों के प्रति स्नेह-सद्भाव एवं आत्मीयता बनी रहे एवं बढ़ती रहे, इसके लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य दूसरों के शरीर में भी अपनी ही आत्मा को देखे। उनके सुख-दुख को भी अपना ही सुख-दुख माने। जिस प्रकार अपने बाल-बच्चे एवं परिजन “अपने” लगते हैं, वैसे ही और लोग भी अपने लगें तो उनसे सहज ही स्नेह उत्पन्न होगा। जिसके प्रति सच्चा स्नेह होता है, उसके साथ कुछ नेकी-भलाई-उदारता का परिचय देने की इच्छा स्वभावतः ही होती है।

नवजात शिशु के पेट में कोई गड़बड़ी उत्पन्न हो जाय इस भय से माता अपनी जिह्वा इन्द्री पर पूरा काबू रखकर अपना आहार चलाती है। अपने स्वाद की उपेक्षा करके वह बालक के स्वार्थ का ही ध्यान रखती है। यही मातृ बुद्धि जब सारे समाज के प्रति होने लगती है तो मनुष्य स्वभावतः संयमी और संतोषी हो जाता है। माता अपने भोजन, वस्त्र, सुविधा तथा साधनों में कमी करके भी जिस प्रकार अपने प्यारे बालकों के लिए खुशी-खुशी अधिकाधिक साधन सामग्री जुटाती है और उस प्रयत्न में उसे जो त्याग करना पड़ता है, अभाव भोगना पड़ता है उससे खिन्न होना तो दूर—उलटे अधिक प्रसन्नता अनुभव करती है। यह त्याग का-दान का-परमार्थ का-पुण्य का उदारता का-सेवा का सिद्धान्त है। आत्मभाव के विस्तार से ही संयम, त्याग, स्नेह तथा सेवा-भावना की वृद्धि होती है।

एक दूसरे को प्यार करे, एक दूसरे के साथ सद्भाव एवं सहृदयता का व्यवहार करे, न्यायोचित मार्ग से जितनी साधना सामग्री जुट सके, इसी में सन्तोष करे तो उसके लिए इस संसार में मानसिक उलझनों जैसी कोई समस्या शेष नहीं रह जाती। यदि मन प्रसन्न रहे, उद्वेगों से छुटकारा प्राप्त कर सके तो जीवनयापन बहुत ही सरल, सुविधाजनक एवं शान्तिपूर्ण हो सकता है।

आज लोगों के सामने अनेक समस्याएँ मौजूद हैं। उनको सुलझाने के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न किये जाते हैं पर गुत्थी और उलटी उलझती जाती है। स्वास्थ्य की समस्या सामने है। दिन-दिन तन्दुरुस्ती गिरने और बीमारियाँ बढ़ने का प्रश्न सामने है। उसे सुलझाने के लिए चिकित्सक, चिकित्सालय तथा औषधि निर्माण बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है पर मूलकारण असंयम पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। आर्थिक अभाव और तंगी सब लोग अनुभव करते हैं, इसके लिए उद्योगों के विकास का प्रयत्न किया जा रहा है, नौकरियाँ बढ़ाई जा रही हैं पर तंगी दूर नहीं होती। कारण विलासपूर्ण अपव्यय रोकने और उपलब्ध साधनों का श्रेष्ठ सदुपयोग करने की कला की जानकारी नहीं होती।

परस्पर छीना-झपटी और असद्व्यवहार के कारण एक दूसरे को कष्ट देते हैं इसे रोकने के लिए कानून, पुलिस और न्यायालय खुल रहे हैं। पर यह पकड़ इतनी कमजोर है कि पहले तो अधिकाँश छोटे-मोटे अनैतिक कार्य अपराध ही नहीं माने जाते हैं, माने जाते हैं तो उसका दंड विधान इतना कम है कि उसमें अपराधी को कोई पश्चाताप नहीं होता। अपराध कर चुकने पर भी बहुत कम अपराधी पकड़े जाते हैं वे भी कानूनी दाँव-पेंच के कारण दंड से बच जाते हैं। यह कानूनी व्यवस्था अपराधों को नहीं रोक सकती। अपराध तो ईश्वर के भय और धर्म-अधर्म के भले बुरे परिणामों के प्रति निष्ठा रखने से ही बन्द हो सकते हैं। शासन यन्त्र अपराधियों को रोकने में अपनी सारी शक्ति लगा करके भी जो सफलता प्राप्त नहीं कर सकता, वह आस्तिकता एवं धार्मिकता के प्रसार से संभव हो सकती है। पाप और अपराधों को रोकने का यही एक मात्र मार्ग है।

सामाजिक कुरीतियों में समय की, शक्ति की, धन की भारी बर्बादी होती है। दहेज, मृत्यु-भोज, पर्दा, जेवर आदि अनेकों कुरीतियाँ ऐसी हैं जिनकी हानि से सभी परिचित हैं और उनकी निन्दा भी करते हैं। प्रस्ताव पास करके, लेक्चर देकर उनका उन्मूलन करने की बात सोची जाती है। पर जब तक विवेक और साहस को समुचित मात्रा में जागृत न किया जाय तो इस भेड़ियाधसान से ऊपर न उठ सकेंगे। दुःखी रहते हुए भी उसी लकीर को पीटते रहेंगे।

नशेबाजी, जुआ, चोरी आदि अनेकों बुरी आदतों में लोग ग्रसित हैं, अश्लीलता और मानसिक व्यभिचार को गन्दी पुस्तकों, गन्दे चित्रों और सिनेमाओं द्वारा व्यापक रूप में फैलाया जा रहा है। स्त्रियों की फैशनपरस्ती पुरुषों की कुदृष्टि को और भी भड़काती है। इन बुराइयों की निवृत्ति के लिए छुटपुट प्रयत्न भी होते रहते हैं पर जब तक जन मानस में व्यापक रूप में दृष्टिकोण के आधार पर जीवनयापन करने की आवश्यकता अनुभव न कराई जाय तब तक चेचक के रोगी का रक्त शोधक दवा न देकर फुन्सियों पर पट्टी बाँधने या मुरझाये हुए पेड़ की जड़ को सींचने की बजाय पत्तों पर पानी छिड़कने के समान सारे प्रयत्न व्यर्थ ही सिद्ध होंगे।

मानव-जीवन को भगवान ने समस्याओं, चिन्ताओं और उलझनों से मुक्त करके भेजा है। नर तनु धारण का उद्देश्य पूर्णता को प्राप्त करने की प्रक्रिया में सफलता प्राप्त करना है। पर हमारे सामने मानसिक उलझनें इतने विशाल रूप में उपस्थित हैं कि उनके कारण आन्तरिक एवं बाह्य जीवन में क्लेश और कलह का नारकीय दृश्य उपस्थित हो रहा है! मनुष्य के सुखी बनाने के लिए पत्ते सींचने की ओर अनेक प्रयत्न चल रहे हैं पर गुत्थी तब तक न सुलझेगी जब तक जड़ को सींचने की व्यवस्था न की जाय। सारी उलझनों का एक ही कारण है— आस्तिकता, मानवता, धार्मिकता एवं नैतिकता का अभाव। इस अभाव की जितने अंशों में पूर्ति की जायगी उतनी ही मात्रा में इस भूलोक में स्वर्गीय सुख-शान्ति अवतरित होने लगेगी।

मानव जाति के महान् कष्ट मानसिक क्लेश को घटाना—सत्पुरुषों का कर्तव्य है। विश्व-शान्ति की आधारशिला यही है। सबसे बड़ा पुण्य परमार्थ भी यही है। आस्तिकता एवं नैतिकता का प्रसार करके अखण्ड-ज्योति परिवार विश्व मानव की सर्वोत्कृष्ट सेवा कर रहा है।


धर्म ही संसार में सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति है।

(श्री भारतीय योगी)

धर्म के सम्बन्ध में संसार में जितना मतभेद देखने में आता है, उतना शायद ही और किसी विषय के सम्बन्ध में देखा जाता होगा। भिन्न-भिन्न प्राँतों और सम्प्रदायों के मतभेद की बात तो सभी जानते हैं। ऐसे स्वमताभिमानी व्यक्तियों में से प्रत्येक अपने धार्मिक विश्वासों का सोलह आना सत्य मानता है और दूसरों को मिथ्यामार्गी बतलाता है। दुनिया में ऐसे मजहब और मुख्य सम्प्रदायों की संख्या हजारों नहीं तो सैंकड़ों अवश्य है। अब कल्पना कीजिये कि इन सबका धार्मिक मतभेद कितना विस्तृत होगा? इस सम्बन्ध में जो खंडन-मंडन के ग्रंथ लिखे गये हैं उन सबका कोई अध्ययन करना चाहे तो पूरे जीवन भर में भी वह उनको भली प्रकार नहीं पढ़ सकता।

पर मतभेद का एक यही रूप नहीं है। प्रत्येक धर्म जब स्थापित किया जाता है तो समयानुकूल आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उसमें उपयोगी और लाभदायक तत्वों तथा नियमों का समावेश किया जाता है। उस समय जो लोग उसके अनुयायी बनते हैं वे उसकी सचाई और उपयोगिता से प्रभावित होते हैं और अधिकाँश में हृदय से उसके आदेशों का पालन करते हैं। पर धीरे-धीरे सामयिक परिस्थितियों के बदल जाने और लोगों की रुचि तथा स्वभाव में अन्तर आ जाने के कारण धर्म अपने मूल उद्देश्य से अलग होता जाता है और अंत में ऊपरी कर्मकाण्डों में ही उलझकर अन्तरंग सिद्धान्तों को भुला देता है। इसका प्रभाव यह होता है कि उसकी प्रेरणा शक्ति कम पड़ जाती है और अधिकाँश समझदार लोग उस पर श्रद्धा रखनी छोड़ देते हैं तथा केवल दुनिया दिखावे के लिये ऊपरी बातों को मानते रहते हैं। इसके साथ साधारण श्रेणी के अज्ञानी और अशिक्षित व्यक्ति धर्म के स्वरूप को बिलकुल भूल जाते हैं और वे केवल सामाजिक रूढ़ियों और सरकारी कानून द्वारा स्वीकार कर लिये गये नियमों का पालन करने में ही धर्म की इतिश्री समझ लेते हैं इस दृष्टि से भी समाज के विभिन्न वर्गों में धर्म के सम्बन्ध में बहुत सा मतभेद उत्पन्न हो जाता है।

इन दो बातों के सिवाय अब एक तीसरे प्रकार का मतभेद और पैदा हो गया है। जब से संसार में कलाकौशल विज्ञान और उद्योग धंधों की विशेष रूप से वृद्धि हुई है और मनुष्य ने उन अनेक प्राकृतिक शक्तियों पर विजय प्राप्त कर ली है, जिनसे पूर्व समय में वह डरा करता था, तब से शिक्षित और वैभवशाली लोगों का एक ऐसा दल बन गया है जो धर्म को स्वीकार ही नहीं करता। उसका कहना है कि जब मनुष्य अज्ञान, असंयत, असंगठित अवस्था में था उस पर नियंत्रण रखने के लिये “धर्म” जैसी चीज की आवश्यकता थी। उस समय प्राकृतिक शक्तियों के अज्ञात रहस्य और पूर्वजों की आत्मा से भयभीत होकर लोग धर्म के अंकुश में रहते थे और समाज विरोधी आचरणों से दूर रखे जाते थे। इस प्रकार इन “विद्याभिमानी” लोगों का मत है कि धार्मिक-युग वास्तव में अज्ञान का युग था। यह सच है कि अब भी पिछड़े हुये देशों का जन-समुदाय उसी अवस्था में है, पर शिक्षित और सभ्य वर्ग के लोग नवीन विज्ञान-युग के सिद्धान्तों को भली प्रकार जान गये हैं। ऐसे ही एक विज्ञान-धर्मी विद्वान् ने सन् 1901 में पेरिस में व्याख्यान देते हुये कहा था कि “धर्म का जमाना गुजर चुका है। अब धर्म के स्थान पर विज्ञान को बिठा देना चाहिये। प्राचीन काल में मनुष्य जाति को प्रेरित करने वाली दो चीजें थीं—एक शक्ति और दूसरा धर्म। लेकिन अब ये दोनों शक्तियाँ अनावश्यक हो गई हैं, क्योंकि इन दोनों का स्थान विज्ञान ने ले लिया है। इस विज्ञान में एकरूपता है, सजातीयता है और वह ऐसे साधनों का स्वामी है कि उसके निष्कर्ष सदैव पूर्ण रूप से सत्य होते हैं। इस प्रकार के कथन अब से पचास साठ वर्ष पहले आधुनिक शिक्षा प्राप्त लोगों के मुख से प्रायः सुनने में आया करते थे, क्योंकि उस समय उनको अपने कुछ ही समय पूर्व प्राप्त अधकचरे ज्ञान का बड़ा अभिमान था और वे मौके, बे-मौके धर्म तथा अध्यात्म पर इसी प्रकार के आक्षेप करते थे। पर अब विज्ञान के ही नये सिद्धान्तों ने अनेक पुरानी धारणाओं को असत्य अथवा भ्रमपूर्ण सिद्ध कर दिया है और अब विज्ञान के अनेक प्रसिद्ध पंडित भी ईश्वर और आत्मा की सत्ता का अनुमान करने लगे हैं।

वास्तविक बात यह है कि विज्ञान अथवा कला कौशल की चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न हो जाय पर वे धर्म का स्थान ग्रहण नहीं कर सकते। धर्म मनुष्य के अन्तर की वस्तु है और उसके बिना न तो पहले और न अब कोई भी विवेकशील व्यक्ति जिन्दा रह सकता है। “विवेकशील” का प्रयोग इसीलिये किया गया है—क्योंकि पशु सदृश्य जीवन बिताने वाले व्यक्तियों का काम बिना धर्म के भी चल सकता है। वे अपने दैनिक कार्य उसी प्रकार स्वाभाविक बुद्धि से करते रहते हैं, जिस प्रकार शहद की मक्खी बिना भूत-भविष्य का ख्याल किये शहद इकट्ठा करती रहती है, अथवा पक्षी अपना सुन्दर सा घोंसला बना लेते हैं। पर ये इन बातों के सिवाय न तो कोई बात जानते हैं और न जान सकते हैं। विवेकशील मनुष्य प्रत्येक काम में ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ का विचार करता है। इस सम्बन्ध में एक जगत् प्रसिद्ध विद्वान ने लिखा है—

“जिन लोगों में उच्चकोटि की अर्थात् धार्मिक चेतना रही है, उन्होंने धर्म को हमेशा इसी भाँति समझा है। यह उच्चकोटि की चेतना ही मनुष्यों को पशुओं से पृथक करती है। स्वयं धर्म शब्द की उत्पत्ति के मूल में देवताओं की पूजा का भाव सन्निहित है, अथवा जैसा कि साधारणतः समझा जाता है और धर्म का अर्थ अदृश्य शक्तियों के प्रति अपने कर्तव्य का एक बन्धन है। धर्म की अत्यन्त प्राचीन और अभी तक प्रचलित व्याख्या यह है कि “धर्म ईश्वर मनुष्य के बीच सम्बन्ध जोड़ने वाली शृंखला है।” एक अन्य विद्वान का कथन है कि “ईश्वर के प्रति मनुष्य के कर्तव्य का नाम धर्म है।” धर्म का आधार मनुष्य की वह आत्मानुभूति है जिसके द्वारा वह अपने आपको ईश्वर पर निर्भर अनुभव करता है।

“मनुष्य अपने पर जिस अनन्त परमात्मा अथवा आत्माओं की सत्ता अनुभव करता है और उनके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है, वही धर्म का तत्व है। धर्म ही मनुष्य समाज की प्रधान प्रेरक शक्ति है। उसके बिना मनुष्य-जीवन उसी प्रकार असम्भव है जिस प्रकार हृदय के बिना शक्ति का कायम रहना। ईश्वर अथवा देवताओं के साथ मनुष्य के सम्बन्ध को प्रकट करने को अनेक धर्म हो चुके हैं और आज भी प्रचलित हैं। जिस समय से मनुष्य विवेकवान प्राणी बना है तब से मनुष्यों का कोई समाज ऐसा नहीं हुआ, जिसमें मनुष्य धर्म के बिना जीवित रह सके हों या जीवित रहे हों।”

इसमें सन्देह नहीं कि संसार में सब से बड़ी शक्ति धर्म की ही है। जो लोग धन अथवा बल को सब से बड़ा मानते हैं, वे नीची श्रेणी के हैं और मनुष्यत्व की परिभाषा के अनुसार उनमें पाशविकता का अंश ही अधिक है। यह सत्य है कि सामयिक परिस्थितियों के अनुसार धर्म के स्वरूप में भी परिवर्तन होता रहता है और एक समय ऐसा आता है जबकि उसका अन्त होकर दूसरा नवीन धर्म उसके स्थान को ग्रहण कर लेता है। पर यह बात धर्म के कर्मकाण्ड और पूजा उपासना सम्बन्धी नियमों के लिये है। धर्म के नित्य अथवा शाश्वत सिद्धान्तों में विशेष अन्तर नहीं पड़ता। भारतीय ऋषि-मुनियों ने इन सिद्धान्तों की विवेचना हजारों वर्ष पूर्व ऐसे स्पष्ट और पूर्णरूप से की है कि मनुष्य का कितना ही विकास हो जाय वे सदैव उसे प्रेरणा देते रहेंगे। इसीलिये भारतीय धर्म को सनातन धर्म के नाम से भी पुकारा जाता है। ऋषियों ने इस धर्म का चरम निरूपण योग के रूप में किया है, जिस पर चलकर मनुष्य इस जीवन में ही परमात्मा के दर्जे को भी प्राप्त कर सकने में समर्थ हो सकता है। इस दृष्टि से धर्म ही मनुष्य के कल्याण के लिये सर्वप्रथम और अधिक आवश्यक है।


आत्म-चिन्तन नितान्त आवश्यक है।

(प्रो. मोहनलाल वर्मा, बी.एल-एल बी.)

स्वयं अपने विषय में आपके अपने विचार क्या हैं? आप खुद अपने को कैसा समझते हैं? क्या आप अपने को नीच, धोखेबाज दुष्ट या राक्षसी स्वभाव का समझते हैं? अथवा आप अपने को शिष्ट, सौम्य, विद्वान और विश्वासी समझते हैं वस्तुतः वैसे ही आप स्वयं हैं। उससे रत्ती भर भी कम या अधिक नहीं।

शान्त हृदय से कभी-कभी आत्म-निरीक्षण किया करें और अपनी अच्छाइयों तथा ईश्वर प्रदत्त श्रेष्ठताओं को पहचाना करें। आत्म-निरीक्षण कर बुराइयों को त्यागने का अमोघ उपाय यह है कि हम अच्छाइयों और श्रेष्ठ गुणों का ही चिन्तन करें। सद्गुणों के चिन्तन से हम दिव्यताओं की अभिवृद्धि करते हैं। मनुष्य के मन की कुछ ऐसी प्रक्रिया है कि वह जिन गुणों का चिन्तन करता है, गुप्त रूप से वे ही उसके चरित्र में बढ़ते और पनपते रहते हैं। आप यदि ध्यान से आत्म-निरीक्षण करें, तो आपको अपने चरित्र के उज्ज्वल पहलू मिल जायेंगे। ये वे पहलू हैं जो दूसरों में नहीं हैं। केवल आप ही में हैं। चरित्र के ये दिव्य गुण ईश्वर की ओर से विशेष रूप में आप ही को दिये गये हैं। फिर क्यों नहीं आप अपने व्यक्तित्व के इन पहलुओं का चिन्तन द्वारा विकास करते?

अपनी महानताएँ खोलिये, दिव्य सम्पदाओं को मालूम कीजिए। आपकी शुद्धि किस ओर प्रखरता से चलती है? कौन सा कार्य करने में आपको विशेष उत्साह आता है? संसार और समाज आपके किस कार्य की विशेष प्रशंसा करता है? आत्म-निरीक्षण द्वारा यह अमर तत्व आप बखूबी मालूम कर सकते हैं अथवा किसी योग्य मनोवैज्ञानिक चिकित्सक की सलाह ले सकते हैं। अब्राहम लिंकन आजन्म आत्म-निरीक्षण द्वारा उन्नति करता रहा। उसने कभी अपने अवगुणों का ध्यान नहीं किया शुभ गुणों को ही चिन्तन तथा कार्यों द्वारा समुन्नत किया। इसी प्रकार नेपोलियन ने अपने व्यक्तित्व की परीक्षा द्वारा जीवन को ऊँचा उठाया था। पहिले वह समझता था कि वह एक लेखक बने, पर बाद में सैनिक के रूप में उसे अपनी महानता को प्राप्त करने की ईश्वरीय प्रेरणा हुई।

हर व्यक्ति अपने ऊपर अपनी कीमत की मुहर स्वयं लगाता है। अपने लिए हमें वही मूल्य प्राप्त होता है, जिसका हम दावा करते हैं। मनुष्य स्वयं अपना मूल्य-निर्धारण करने से बड़ा या छोटा बनता है।

फिर क्यों न आप अपना नयी दृष्टि से मूल्य निर्धारण करें। क्यों न एक बार नए सिरे से अपनी नई कीमत लगायें। प्रत्येक मनुष्य अपनी इच्छा से अधिक मूल्यवान या कम मूल्यवान बनता है। अपनी ही इच्छा से सुखी और दुःखी बनता है।

बाइबिल में एक स्थान पर लिखा है, “मनुष्य अपने मन में स्वयं को जैसा मान बैठा है, वस्तुतः वह वैसा ही है।”

अपने इष्ट मित्रों और नेताओं के सद्गुणों की प्रशंसा करना सहज स्वाभाविक है, जब आप उनकी अच्छाइयों से अपनी त्रुटियों को मिलाकर देखते हैं। हो सकता है कि किसी नवीन दिशा में आपकी प्रतिभा और बुद्धि दूसरों से बढ़ी चढ़ी हैं। किसी खास लाइन में आप उन सबको पीछे छोड़ रहे हैं। इसी दशा में आपका मूल्य ऊँचा लगता है। इसी महत्व से आप संसार से अपना मूल्य वसूल करेंगे।

आपने टिटियन नामक चित्रकार की कहानी सुनी होगी। वह एक दिन अपनी दुकान में बैठा चित्र बना रहा था। इतने में एक धनी व्यक्ति आया और एक चित्र के दाम पूछे। चित्रकार ने उत्तर दिया, “पचास गिन्नियाँ”। इस पर वह अमीर व्यक्ति चकित रह गया। वह बोला—”एक छोटे से चित्र का इतना बड़ा मूल्य! आपको मुश्किल से इस चित्र को बनाने में एक सप्ताह लगा होगा।” इस पर टिटियन ने उत्तर दिया, “महाशय, आप भूलते हैं। पूरे तीन तीन साल निरन्तर परिश्रम करने के बाद मैं इस लायक बना हूँ कि ऐसे चित्र को चार दिनों में ही बना सकता हूँ।” धनी व्यक्ति ने चित्र का मूल्य चुकाया और चित्र खरीद लिया। यदि चित्रकार अपना मूल्य कम लगाता, तो उसे वही मिलता। पर उसके आत्म-विश्वास की अन्ततः जीत हुई। उसने अपने को जितना मूल्यवान समझा संसार ने उसका उतना ही महत्व स्वीकार किया। उसे उतना ही अपना मूल्य समाज में प्राप्त हुआ।

कभी आप अपने गुणों, अपनी प्रतिभा, अपनी विशेष ईश्वरीय देन के बारे में भी सोचा कीजिए। त्रुटियों को छोड़कर श्रेष्ठताओं की भी सूची बनाया कीजिए। यह अपनी श्रेष्ठताओं को विकसित करने का एक नया मनोवैज्ञानिक मार्ग है। क्या आपने इसका प्रयोग अपनी शक्तियाँ बढ़ाने के लिए किया है?

इसका उपाय यह है। आप अपने प्रिय पात्र को अपनी प्रेमिका को सहानुभूति की स्याही से प्रेम पत्र लिखते हैं जिसमें अपने हृदय की समस्त कोमल भावनायें उड़ेल देते हैं। क्यों न आप स्वयं अपने को ही एक सुन्दर सा प्रेम-पत्र लिखें?

ई. स्टैनले जौन्स महोदय का कथन है कि यदि मनुष्य स्वयं अपने आपको प्रेम नहीं करता, तो वह अपना ध्यान भी न रखेगा, अपने गुप्त मानसिक बौद्धिक और आत्मिक गुणों की भी वृद्धि नहीं करेगा, अपने शरीर को स्वच्छ न रखना चाहेगा।

अपने पूरे स्वास्थ्य में रहना, पूरे सौंदर्य और आकर्षण में सामने आना और अपने व्यक्तित्व को पूरे निखार पर रखना अपने पिता—ईश्वर के गौरव के अनुरूप अग्रसर होना है।

“प्रजापतिः बहुधा विजायते।

(अथर्ववेद 10-8-13)

इस विश्व में परमात्मा ही अनेक रूपों में जन्म ले रहा है। आप स्वयं भी परमात्मा की ही प्रतिमूर्ति हैं। फिर अपने आप को धिक्कारने का आपको क्या अधिकार है?

“शुक्रोऽसि भ्राजोऽसि स्वरसि ज्योतिरसि” (अथर्ववेद) (तू शुद्ध, तेजस्वी, आनन्दमय एवं प्रकाशवान्) है।

अतः अपना तिरस्कार न कीजिए। अपने आपको प्यार कीजिए और उन्नति के उपाय सोचिए। अपनी अच्छाइयों, अपने सद्गुणों अपनी महत्वपूर्ण बातों पर विचार करना आपका एक पुनीत कर्तव्य है। अपने शरीर में परमात्मा का निवास मानकर इसकी श्रेष्ठताओं को विकसित करना चाहिए।

स्वयं अपने आपको एक प्रेमपत्र लिखिये। इसमें वे सभी अच्छी अच्छी योजनाएं स्पष्ट कीजिए जो आप कार्यान्वित कर रही हैं, अपनी वे सभी महत्वाकाँक्षाएँ लिखिये, जिनको आप मन-मंदिर में संजोये हुए हैं। फिर पूरी शक्ति और आत्म-विश्वास से उनको पूर्ण करने पर जुट जाइये।

आपका प्रेम पत्र इस प्रकार हो सकता है—

प्रिय आत्माराम,

मुझे यह देखकर प्रसन्नता है कि तुम अपनी स्वावलम्बी जीवन की योजना पर निरन्तर चले जा रहे हो। सब कुछ अपने ही श्रम से प्राप्त करते हो। बिना स्वयं श्रम किये बीते हुए जीवन को व्यर्थ समझते हो। मुझे तुम्हारी यौवन श्री की स्फूर्ति और ताजगी देखकर संतोष होता है। तुम अपना कार्य स्वयं करने में तनिक भी शर्माते नहीं हो। निज बाहुबल के सामने तुम दुनिया का कोई भी बल नहीं समझते हो। तुम निरन्तर उन्नति करते जा रहे हो, उसका कारण तुम्हारा स्वावलम्बी जीवन ही है। अपने घर परिश्रम के कारण ही तुम वन्दनीय बनोगे।

तुम्हारी पाश्चात्य देशों के लोगों की सी परिश्रम करने की शक्ति, देश को उठाने की भावना, अपना काम स्वयं करने की आदत की तारीफ करते हैं। महान् देश के नागरिक अपना काम अपने हाथों से करने की प्रवृत्ति रखते हैं। सरकारी नौकर होते हुए भी अपना काम अपने हाथों से करना अच्छा समझते हैं। तुम कभी निठल्ले नहीं बैठते। आलसी जीवन को जघन्य पाप समझते हो। अपने जीवन का प्रत्येक क्षण उन्नति में लगाते हो। तुम्हारे ये विचार बहुत मूल्यवान हैं। इनसे तुम अपनी सभी गुप्त शक्तियों का विकास करने जा रहे हो।

तुम संसार में स्वस्थ और कर्मठ रहना चाहते हो। तुम अपने शरीर में निखिल जगत् में व्याप्त ईश्वर का अस्तित्व समझते हो। ईश्वरीय गुप्त बल तुम्हें चैतन्य शक्ति प्रदान करता है। तुम अपने आपको ईश्वर का पुत्र मानते हो, तुम उनके सच्चे प्रतिरूप हो, प्रतिनिधि हो। इसलिए पूर्ण हो।

तुम्हारा सबसे महत्वपूर्ण गुण यह है कि तुम कभी आत्म-भर्त्सना नहीं करते। अपने आपको नहीं कोसते, या धिक्कारते। तुम शरीर को घृणित नहीं समझते, मलमूत्र मवाद का दुर्गन्धिमय पिण्ड न समझकर ईश्वरीय दिव्य सम्पदाओं का तेज पुँज समझते हो। उसके द्वारा दैवी उद्देश्य की सिद्धि समझते हो। यह अनुभव करते हो कि इस देवदुर्लभ शरीर के द्वारा ईश्वरीय कार्य करते हैं। पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना है। निर्बलों को बलवान बनाना है। निर्धनों को समृद्धि की ओर अग्रसर करना है, लाँछित और तिरस्कृतों को गले लगाना है। तुम इस समाज को ईश्वरीय साम्राज्य मानते हो और उस साम्राज्य में अपना पार्ट अदा करते हो।

तुम अपने शरीर के हर अंग से कहते हो कि मेरे अंग प्रत्यंगों तुम पवित्र हो, सुन्दर हो। कल्याणमय हो। मेरे नेत्रों तुम सदा पवित्र दृश्य देखते हो। मेरे हाथों तुमसे कल्याणकारी कार्य ही होते हैं। मेरे मस्तिष्क तुम भव्य विचार ही रखते हो। मेरे पाँवों, तुम पवित्र देव स्थानों पर ही भ्रमण के लिए विचरण करते हो। मेरे मन, बुद्धि और इन्द्रियों! तुम्हारे द्वारा मैं परमात्मा की प्रेरणा और दिव्य विधान पूर्ण करता हूँ। तुम्हारे विचार, वाणी, और व्यवहार में परमात्मा तत्व ओत प्रोत है। तुम अहंभाव न रखकर अपना सब कुछ परमात्म-समर्पण करते हो।

तुम्हारे ये सब विचार भव्य हैं। मुझे खुशी इस बात की है कि तुम कोरा सोचते ही नहीं, अपने इन दिव्य विचारों को दैनिक जीवन में प्रयत्न और अभ्यास से उतार रहे हो। संसार में उपदेश देने वाले बहुत हैं, सुनने वालों की संख्या कम नहीं है, पर तुम जैसे कर्मठ व्यक्ति कम हैं जो ज्ञान और उपदेश को जीवन में उतार रहे हैं। तुम्हारी उन्नति अवश्यम्भावी है।

तुम्हारी भावी प्रगति का आकाँक्षी, मैं

इस प्रकार के पत्रों को लिखते जाइये और इनकी एक फाइल तैयार कर लीजिए। लिखने से आपके भव्य विचार गुप्त मन में गहराई से उतर जायेंगे। आप जिस निश्चित उद्देश्य को सामने रखकर जी रहे हैं, वह आपको समीप आता दिखाई देगा। फिर कभी-कभी इन सब पत्रों को पढ़ा कीजिए। आपके ये भव्य सशक्त विचार निरन्तर अभ्यास और चिन्तन द्वारा समस्त मानसिक केन्द्रों से शरीर भर में रक्त प्रवाह के साथ फैल जायेंगे। ये आपको उन्नति की नई प्रेरणा देंगे।

उद्यानं ते पुरुष नावयानम्।

—अथर्ववेद 8।1। 2

उन्नति करो। विचारों में अवनति न आने दो। गिराने वाले नहीं, उठाने वाले विचार और कार्य ही अपनाओ।


दिन दिन ऊँचे चढ़ो—आगे बढ़ो

(डॉ. चमनलाल गौतम)

डडडड व्या अहमुदन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद्दिवमारुहम्।

डडडड वो नाकस्य पृष्ठात स्वर्ज्योतिरगामहम॥

यजु. 17।67

अर्थात्—पार्थिव बल से ऊंचा उठकर मुझे मनोबल प्राप्त हो, मनोबल से ऊँचा उठकर मुझे आत्मबल प्राप्त हो और आत्मबल से ऊंचा उठकर मुझे आनन्द स्वरूप ज्योति (परमात्मा) के दर्शन हों।

स्थूल और सूक्ष्म दो शक्तियाँ संसार में होती हैं स्थूल में स्वयं क्रियाशीलता नहीं होती बल्कि सूक्ष्म के साथ मिलने से उसमें शक्ति का संचार होता है या यों कहना चाहिए कि स्थूल का आधार सूक्ष्म है। जितनी-जितनी कोई वस्तु स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ती है, उतनी ही उसकी शक्ति बढ़ती जाती है। शरीर से विषय सूक्ष्म होते हैं इसलिए वह अपने बल से उसे अपनी ओर मोड़ ले जाते हैं। विषयों से इन्द्रियाँ सूक्ष्म तथा बलवान होती हैं इसलिए वह उन्हें मनमानी दिशा में खींच ले जाती हैं। इन्द्रियों से मन सूक्ष्म और शक्ति शाली है इसलिए उन्हें अपने काबू में रखने की क्षमता रखता है। मन मनुष्य की एक ऐसी अद्भुत शक्ति है जिस पर उसका सुख, दुःख, शान्ति अशान्ति, उन्नति अवनति निर्भर है। कहा भी है।

मन एव मनुष्याणाँ कारणं बन्धमोक्षयो।

बन्धाय विषयासंगि मोक्षे निर्विषयं स्मतम्॥

(मैत्रुयु 6। 34, अमृतबिन्दु 2, व्रतबिन्दु 2। 3)

“मनुष्य के (कर्म के) बन्धन और मोक्ष का मन ही कारण है। मन के विषयासक्त होने से बन्धन और निष्काम या निर्विषय अर्थात् निसंग होने से मोक्ष होता है।

जैसा मन होता है वैसे ही कार्यों में शरीर प्रवृत्त होता है क्योंकि शरीर जड़ और स्थूल है और मन उससे सूक्ष्म। मन के इशारे पर ही शरीर नाचता है। शरीर से मन की शक्ति अत्यधिक है। मन जिधर भी एकाग्रता से लग जाता है। उधर ही सफलता के दर्शन होते हैं। मनन शक्ति की महत्ता को प्रकट करने वाले यजुर्वेद में कई मन्त्र आते हैं।

“मनन शक्ति से संसार की उत्पत्ति हुई है”(17। 25)

“वह मनन शक्ति हमें पुनः अच्छे कामों के लिए, उत्तम जीवन और ईश्वर दर्शन के लिए प्राप्त हों” (3। 54)। “हे विद्या दान करने वाले विद्वानों! आप दिव्य गुणों से युक्त श्रेष्ठ पुरुष हैं, हमें मनन शक्ति का वरदान दें ताकि अपने जीवन में हम सत्य व्रतों का आचरण कर सकें।”

बृहदारण्यकोपनिषद् में मन को अन्तरिक्ष लोक, यजुर्वेद, पितृगण कहा है। जनक के यज्ञ में याज्ञवलक्य और अश्वल के संवाद में याज्ञवलक्य कहते हैं “ब्रह्म यज्ञ का मन है और यह जो मन है वही यह चन्द्रमा, वही ब्रह्म और वही मुक्ति है और अति मुक्ति है।” इसी संवाद में आगे कहा है “मन ही देवता है, मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं अतः उस मन से यजमान अनन्त लोक को जीत लेता है।” गीता में भगवान ने कहा है “इन्द्रियों में मन मैं हूँ (10/22)” तैत्तिरीयोपनिषद् में भी मन को ब्रह्म कहा है और कहा है कि “मन से ही प्राणी मात्र की उत्पत्ति होती है। उत्पत्ति के पश्चात् मन से ही वह जीते हैं तथा इस लोक को छोड़ते हुए मन में सब मिल जाते हैं।

उपरोक्त वेद व उपनिषद् के वाक्यों से स्पष्ट है कि मन में अपार शक्ति है। यदि अपनी मनन शक्ति को हम जीवन में सत्य व्रतों के धारण करने में लगा दें तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, चिन्ता, कलह, क्लेश, दुःख, ईर्ष्या, द्वेष, राग आदि शत्रुओं से दूर होकर सुख शान्ति को प्राप्त कर सकते हैं। मन चाहे तो हमें देवता बना सकता है, आत्मा का साक्षात्कार करा सकता है, भवसागर से पार उतार सकता है। पृथ्वी लोक से द्यौलोक में पहुँचा सकता है अर्थात् निकृष्ट पशुवत् जीवन से उठाकर श्रेष्ठ मार्ग की ओर मोड़ सकता है। नरक से निकाल कर स्वर्ग का अधिकारी बना सकता है। इस लोक को ब्रह्मलोक में बदल सकता है। वह आदित्य है, अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करके ज्ञान रूपी प्रकाश ला सकता है। वह चन्द्रमा है, दुःखों के धधकते हुए अंगारों को शीतलता प्रदान कर सुख शान्ति का अमृत पिला सकता है।

हमारा पापी या पवित्र, भोगी या संयमी स्वार्थी डाकू या संत, दुःखी या सुखी बनना मन पर ही निर्भर है इसलिए उपरोक्त वेद मन्त्र में प्रार्थना की गई है कि पार्थिव बल से ऊँचा उठाकर मुझे मनोबल प्राप्त हो।

पहिले हम बता चुके हैं कि जितनी कोई वस्तु, सूक्ष्म होती जाती है, उतनी ही वह बलवान होती जाती है। जिस तरह से शरीर से मन सूक्ष्म और बलवान है उसी तरह से मन से आत्मा सूक्ष्म है, इसलिए शक्तिशाली है। आत्मा की शक्ति द्वारा ही सभी मानसिक क्रियाओं का संचालन होता है। यदि शरीर में आत्मा न हो तो मन की शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। उनका कोई मूल्य नहीं रह जाता। मन की शक्तियों की महत्ता आत्मा के कारण है। आत्मा परमात्मा का अंश है। उसमें परमात्मा की सभी शक्तियाँ विद्यमान हैं परन्तु मनुष्य उसकी उपेक्षा करके उन शक्तियों से वंचित रहता है। वह अपनी स्थूल बुद्धि के आधार पर भौतिक शक्तियों से प्रेम करता है। इसलिए उनको प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहता है और अपने सारे समय और शक्ति को उन्हीं की प्राप्ति में लगा देता है। इसके लिए उचित या अनुचित सभी उपायों को अपनाता है, पाप कर्म करता है। इससे जिस तरह अग्नि पर पपड़ी रहने से उसकी शक्ति दबी रहती है, उसी तरह से आत्मा पर मल विक्षेप की पर्तें जमे रहने से उसकी शक्तियाँ सोई रहती हैं। इसके फलस्वरूप मनुष्य अन्धकार में भटकता रहता है और संसार रूपी बीहड़ बन में ठोकरें खाकर दुखी और अशान्त रहता है।

जो श्रेष्ठ पुरुष आत्मा को पहिचान लेते हैं, वे प्राणिमात्र को आत्मवत् देखते हैं, उनको अपने और अपने को उनमें देखते हैं। इस दृष्टिकोण से व्यवहार करने वाला मनुष्य किसी से छल, कपट, बेईमानी, ईर्ष्या, द्वेष और दुर्व्यवहार नहीं कर सकता। वह दूसरों से ऐसा व्यवहार करता है जैसी उनसे आशा करता है। आत्म-बल प्राप्त मनुष्य को दुःख छू नहीं सकता। अन्य लोगों की तरह आपत्तियाँ और कठिनाइयाँ तो उसके जीवन में भी आती हैं, परन्तु वह दुःख उसे दुःख प्रतीत नहीं होते। प्रसन्नता का स्रोत जिसके भीतर उमड़ रहा वहाँ दुःख की थोड़ी सी लहरों का प्रभाव पड़ सकता है? वह पार्थिव शरीर से ऊँचा उठ जाता है, शरीर के कष्ट उसे अनुभव नहीं होते। इसलिए निश्चय ही आत्म-बल मनोबल से श्रेष्ठ है। मनोबल से ऊपर उठ कर आत्म-बल प्राप्त करने की प्रार्थना का यही अभिप्राय है।

आत्म-बल सम्पन्न मनुष्य जिधर भी देखता है, उसे अपना ही स्वरूप बिखरा हुआ दिखाई पड़ता है। वह दूसरों के स्वार्थ को अपना स्वार्थ समझने लगता है। अपने शरीर को समाज और राष्ट्र के हित में घुला देता है। दूसरों के हित के लिए वह अपने को भूल जाता है। अन्य प्राणियों के साथ उसकी भिन्नता नष्ट हो जाती है अर्थात् उनसे वह ऐक्य प्राप्त कर लेता है। एकता का अनुभव करना ही संसार भर की सुख-शान्ति को केन्द्रित करके अपने पास बुलाना है। जब ऐसी स्थिति आ जाती है तो वह संसार में रहता हुआ भी कमल के फूल की तरह इससे अलग रहता है। संसार के सुख दुःख स्पर्श नहीं कर सकते। वह एक अद्भुत मस्ती में रहता है। इसी मस्ती को आनन्द स्वरूप ज्योति (परमात्मा) के दर्शन हुए कहे जाते हैं।

वेद भगवान की शिक्षा है कि हमें शरीर के भोगों में रत रहकर ही अपनी जीवन लीला समाप्त नहीं कर देनी है। इससे ऊँचा उठकर मनोबल प्राप्त करना है और फिर आत्म-बल की ओर बढ़ते हुए परम लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति करना है। यही परम शान्ति का मार्ग है।


मन्त्र-शक्ति का महत्व

(श्री भगवान सहाय वाशिष्ठ)

भारतवर्ष में मंत्र-तंत्र का नाम सर्वाधिक सुनने में आता है। कहने के लिये मुसलमान भी किसी तरह का “अमल” करते हैं और ईसाई “प्रार्थना” आदि से काम लेते हैं पर उनमें ऐसा करने वालों की संख्या बहुत ही कम मिलती है। इन धर्मों के अधिकाँश लोग न तो इन बातों को जानते हैं और न इन पर विश्वास करते हैं। पर हिन्दू-धर्म में एक एक बच्चा भी ‘मंत्र’ के विषय में कुछ न कुछ सुन चुका होता है और उस पर विश्वास रखता है। छोटी अवस्था में ही उसकी यह धारणा हो जाती है कि मंत्र कोई ऐसी अद्भुत शक्ति है जिससे सब तरह के कठिन कार्य और बड़े-बड़े मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। यहाँ पर आठ, दस वर्ष की आयु में ही अनेक बालक किसी मंत्र का जप करने लग जाते हैं। उनके माँ-बाप या गुरु स्वयं उनको इसकी शिक्षा देते हैं और समझते हैं कि इस प्रकार के जप से हर तरह से कल्याण होगा और सभी बातों में सफलता मिलेगी।

इसमें तो सन्देह नहीं कि मंत्र-शास्त्र हमारे यहाँ के धार्मिक साहित्य का अति प्राचीन अंग है। वेदों की रचाएँ भी मंत्र ही कहे जाते हैं और अथर्ववेद में तो स्पष्ट रूप से भिन्न-भिन्न कार्यों को सिद्ध करने वाले मंत्रों का उल्लेख है। अन्य लोगों में मंत्रों के आदि प्रचारक सदाशिव माने गये हैं। इस सम्बन्ध में एक विद्वान ने शास्त्र के मत का उल्लेख करते हुये लिखा है—

“भारत की प्राचीन संस्कृति का इतिहास जानने वालों को यह भली प्रकार ज्ञात है कि इस देश के प्राचीनतम महर्षियों ने अपने तत्व दर्शन के प्रयास में सर्वप्रथम ब्रह्म जी से वेद विद्या उपलब्ध की थी, जिससे वे इहलोकतत्व और परलोकतत्व दोनों ही में सामञ्जस्य स्थापित करने में समर्थ हुये थे। उसी प्रकार तत्कालीन ऋषियों के एक अन्य समूह ने विष्णुदेव से भक्ति विद्या को प्राप्त किया था और उसके द्वारा उन्होंने आत्म तत्व और परम तत्व दोनों में सरस ऐक्य स्थापित किया था। एक तीसरे समूह ने सदाशिव को प्रसन्न करके मंत्र विद्या की प्राप्ति की थी, जिसके द्वारा वे लौकिक जीवन से लेकर पारलौकिक जीवन के परे पहुँच कर मूलतत्व का साक्षात्कार करने में समर्थ हुये थे। ये तीनों ही विद्याएँ भारतीय संस्कृति की आधारशिला के रूप में आज भी विद्यमान हैं, और भारतीय अपने संस्कारों के अनुसार यथा मात्रा में उन्हें प्राप्त किये हुये हैं। इन तीनों विद्याओं में मन्त्रविद्या सदैव रहस्य की बात रही है और इस समय भी वह पहले की भाँति रहस्यपूर्ण है। कलियुग के पहले, जैसा कि प्राचीन पुराणादि ग्रंथों से विदित होता है, इस विद्या की उपलब्धि विशेष अधिकारी व्यक्ति ही कर पाते थे, परन्तु कलियुग में जब वेद-विद्या का प्रचार घट चला और बहुत थोड़े व्यक्तियों तक ही सीमित रह गया तब धर्म में भारी ग्लानि उत्पन्न हुई। ऐसी स्थिति आ जाने पर परम दयामयी जगज्जननी पार्वती जी को क्षोभ हुआ और उन्होंने शिवजी से आग्रह किया कि लोक कल्याण के निमित्त मंत्र-विद्या का उपदेश सर्व साधारण को किया जाय। तब युग धर्म के अनुसार वह विद्या तत्कालीन ऋषियों द्वारा सर्व साधारण में प्रकट की गई।”

निःसन्देह वर्तमानकाल में मन्त्र-जप आध्यात्मिक उन्नति तथा श्रेष्ठ मनोकामनाओं की सिद्धि का सब से सरल और अचूक उपाय है। उसको विधि से करना छोड़ दिया गया है, इसी से विशेष फल देखने में नहीं आता और लोगों की श्रद्धा भी वैसे-वैसे ही कम होती जाती है। इस स्थिति में सुधार होने का मार्ग यह है कि प्रथम तो जिस मंत्र का जप करना हो उसे नियमानुसार दीक्षा लेकर गुरु से ग्रहण किया जाय और तब उन्हीं की बतलाई विधि से उसका अनुष्ठान किया जाय। बीच-बीच में भी गुरु से इस सम्बन्ध में अपना अनुभव बतलाते हुए परामर्श ले लिया जाय। फिर इसको जितना मन लगाकर परिश्रमपूर्वक किया जायगा उतनी ही शीघ्र और अव्यर्थ सिद्धि प्राप्त होगी। इसलिये जो व्यक्ति वास्तव में मन्त्र-जप द्वारा लाभ उठाना चाहते हैं उन्हें इस सम्बन्ध में सब प्रकार के नियमों का पालन करना चाहिये। सब से पहला नियम तो यही है कि मन्त्रानुष्ठान स्वयं किया जाय। किसी दूसरे से कराया अनुष्ठान कदापि उतना अधिक फल नहीं दे सकता। फिर जप के लिये शुद्ध स्थान ढूँढ़े जैसे कोई तीर्थ या सिद्धपीठ आदि। भोजन की पवित्रता का ध्यान रखना परमावश्यक है, क्योंकि शरीर और मन का निर्माण भोजन के तत्वों द्वारा ही होता है और यदि उसमें किसी प्रकार का दोष हुआ तो जप में बाधा पड़ जाना अवश्यम्भावी है। इसके सिवाय और भी बहुत सी छोटी-बड़ी बातें हैं जिनका वर्णन शास्त्रों में इस प्रकार किया है—

“स्त्री-संसर्ग, उनकी चर्चा तथा जहाँ वे रहती हों वह स्थान छोड़ देना चाहिये। स्त्री साधिकाओं के लिये पुरुषों के सम्बन्ध में भी यह नियम समझ लेना चाहिए। क्षौर, उबटन, बिना भोग लगाये भोजन और बिना संकल्प के कर्म नहीं करना चाहिये। केवल आँवले से अथवा पंचगव्य से स्नान करना चाहिये। स्नान, आचमन, भोजन आदि मन्त्रोच्चारण के साथ ही हों। यथाशक्ति तीनों समय, या दो समय, या एक समय स्नान, संध्या और इष्टदेव की पूजा अवश्य करनी चाहिये। जप के समय माला पूरी हुये बिना बातचीत नहीं करनी चाहिये।

“यदि जप करते समय एक शब्द का उच्चारण हो जाय तो एक बार प्रणव का उच्चारण कर लेना चाहिये। यदि कहीं बहुत बात कर ली जाय तो आचमन तथा अंगन्यास करके पुनः माला प्रारम्भ करना चाहिये। छींक और अस्पर्श्य स्थानों का स्पर्श हो जाने पर भी यही विधान है। जप करते समय यदि शौच, लघुशंका आदि का वेग हो तो उसका निरोध नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसी अवस्था में इष्ट और मंत्र का चिन्तन तो होता नहीं, मल-मूत्र का चिन्तन होने लगता है। मलिन वस्त्र, केश और मुख से जप करना शास्त्र विरुद्ध है। जप करते समय इतने कर्म निषिद्ध हैं—आलस्य, जँभाई, नींद, छींक, थूकना, डरना, अपवित्र अंगों का स्पर्श और क्रोध। जप में बहुत जल्दबाजी न करनी चाहिये, न बहुत विलम्ब। गाकर जपना, सिर हिलाना, लिखा हुआ पढ़ना, अर्थ न जानना, बीच-बीच में भूल जाना—ये सब मन्त्रसिद्धि के प्रतिबन्धक हैं। मन्त्र सिद्धि के लिए बारह नियम हैं- (1) भूमि शयन, (2) ब्रह्मचर्य, (3) मौन, (4) गुरु सेवन, (5) त्रिकाल स्नान, (6) पाप कर्म परित्याग, (7) नित्य पूजा, (8) नित्य दान, (9) देवता की स्तुति, (10) नैमित्तिक पूजा, (11) इष्टदेव और गुरु में विश्वास, (12) जप निष्ठा। जो इन नियमों का पालन करता है उसको मंत्र सिद्ध ही समझना चाहिये। किसी भी अनुष्ठान के समय सौगन्ध खाने से सब फल नष्ट हो जाता है। किसी का गाना, बजाना, नाचना, न सुनना चाहिये और न देखना। जूता पहने हुए अथवा पैर फैलाकर जप करना निषिद्ध है। इस प्रकार जप के बहुत से नियम हैं, जिन्हें समझ कर यथाशक्ति उनका पालन करना चाहिये। ये सब नियम नियमित जप के (अनुष्ठान) लिये हैं। मानस-जप के लिये कोई नियम नहीं। उसे आदमी सदैव कर सकता है। शास्त्र में कहा गया है—

अशुचिर्वा शुचिर्वापि गच्छस्तिष्ठत् स्वपन्नपि मन्त्रैक शरणो विद्वान् मनसैव सदाभ्यसेत्। न दोषो मानसो जाप्ये सर्वदेशेऽपि सर्वदा॥

अर्थात् “मन्त्र के रहस्य को जानने वाला जो साधक एक मात्र मन्त्र की ही शरण हो गया है, वह चाहे पवित्र हो या अपवित्र सब समय चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते मन्त्र का अभ्यास कर सकता है। मानस जप में किसी भी समय और स्थान को दोषयुक्त नहीं समझा जाता।”

इस प्रकार शास्त्रों में मंत्र-जप की बड़ी महिमा बतलाई गई है और धार्मिक व्यक्तियों के मतानुसार मंत्रों की शक्ति से अनेक असम्भव कार्यों का संपन्न होना भी संभव है। आधिदैविक जगत के रहस्य को जानने वाले कहते हैं कि स्थूल जगत की प्रत्येक वस्तु का एक-एक अधिष्ठाता देवता होता है जिनको मन्त्र द्वारा जागृत कर लेने पर उस विषय में आश्चर्यजनक परिणाम दिखलाई पड़ सकते हैं। इनकी सहायता से परमार्थ के साथ ही स्वार्थ की भी पूर्ति हो सकती है। सब प्रकार की सम्पत्ति और वैभव, सुसन्तान और अन्य प्रकार के साँसारिक सुख बहुत बड़ी मात्रा में इन देवताओं की कृपा से मिल सकते हैं। इन्हीं बातों को साधारण लोग सिद्धि के नाम से पुकारते हैं। इस समय संसार के नैतिक और सामाजिक वातावरण के बदल जाने तथा आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से यद्यपि ये बातें लोगों को कल्पना मात्र जान पड़ती हैं, पर अब भी समय-समय पर मन्त्र-शक्ति के चमत्कार दिखलाई पड़ा करते हैं। मन्त्र-जप के द्वारा व्यक्तिगत कल्याण की बात तो हजारों लोग स्वयं कहते हैं और उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त तथा बुद्धिमान समझे जाने वाले लोगों में से भी बहु-संख्यक व्यक्ति मन्त्र-शक्ति की सत्यता को स्वीकार करते हैं। यह सत्य है कि केवल किसी मन्त्र के उच्चारण मात्र से अथवा उसका उल्टा-सीधा जप कर लेने से कोई सुपरिणाम दिखलाई नहीं पड़ सकता और ऐसे ही पढ़कर या सुनकर मन्त्र-शक्ति की परीक्षा लेने वाले अर्द्ध-दग्ध व्यक्ति मन्त्रों की बदनामी के कारण बनते हैं। मन्त्रानुष्ठान में सब से पहली बात अपना सत्य-संकल्प है। जो आन्तरिक इच्छा से विधिपूर्वक किसी मंत्र का अनुष्ठान करेगा और श्रद्धापूर्वक उसमें संलग्न रहेगा वह अवश्य अपनी योग्यतानुसार सुपरिणाम प्राप्त कर सकेगा इसमें सन्देह नहीं।


समाज-सेवा की श्रेष्ठता कर्म है।

(श्री शम्भूसिंह कौशिक)

यश्चकार न शासक कर्तुं शश्रे पादमंगुरिम चकार भद्रमस्मभ्यमात्मने तपेनं तु सः।

अथर्व(4—18—6)

अर्थात् “जिसने अपने और दूसरों के लिये सामर्थ्य होने पर भी कल्याण, सुख-सम्पादन का कोई कार्य नहीं किया उसने मानो स्वयं अपने हाथ और पैरों को काट डाला।”

आजकल के समय में लोगों में जो एक बड़ी भ्रमपूर्ण धारणा फैल गई है वह यह है कि बड़ा आदमी अथवा महान् व्यक्ति वह है जिसने अपनी किसी प्रकार की शक्ति द्वारा बड़े परिमाण में साँसारिक सफलता प्राप्त की है। लोगों का ख्याल है कि जो व्यक्ति जितना ही अधिक धनवान, वैभवशाली या शक्ति शाली है वह उतना ही माननीय है और उसका सम्मान करना, उसकी आज्ञा शिरोधार्य करना दूसरों का कर्तव्य है।

इस गलत धारणा का परिणाम यह हुआ है कि आज गुणों की पूजा होने के स्थान पर सम्पत्ति और वैभव की पूजा होने लग गई है। दूसरों के लिये त्याग और तपस्या करने वाले “ब्राह्मणों” के स्थान पर सोना-चाँदी बटोर कर तहखानों में जमा करने वाले “वैश्य” ही बड़े आदमी माने जाते हैं। इससे समाज की बड़ी हानि हो रही है। लोगों में परमार्थ के बजाय स्वार्थ की भावना जोर पकड़ रही है और इसके फलस्वरूप संकीर्णतापूर्ण, हानिकारक संघर्ष की उत्पत्ति हो रही है। धन को अनुचित महत्व प्राप्त हो जाने से प्रत्येक की इच्छा यही होती है कि मैं अधिक से अधिक धन संग्रह कर लूँ, जिससे किसी साँसारिक सुख की प्राप्ति में बाधा न पड़े और सब कोई मेरा आदर करें। पर चूँकि प्रत्येक समाज में धन एक सीमा के भीतर ही रहता है, सभी व्यक्ति लखपती और करोड़पती नहीं बन सकते, इसलिये लोग धन की प्राप्ति के अनुचित उपायों का अवलम्बन करने लगते हैं और इससे, अनैतिकता, चरित्र हीनता, दुष्टता, क्रूरता, आदि जघन्य प्रवृत्तियों की वृद्धि होती है और समस्त समाज का पतन होने लगता है।

वास्तव में देखा जाय तो महान पुरुष या प्रतापशाली व्यक्ति उसे नहीं कहा जा सकता जिसके पास बहुत अधिक धन-ऐश्वर्य हो, महल और कोठियाँ हों, या जिसके पास बहुत से हाथी, घोड़े, सेना, गायें, रथ, मोटरकार आदि हों। उसे भी बड़ा आदमी नहीं कह सकते जिसके बहुत बड़ा परिवार या नौकर चाकर हों। इसी प्रकार जिसने कोई बड़ा पद प्राप्त कर लिया है, बहुत बड़ा सरकारी अधिकारी हो गया है, अथवा नामी वकील, डॉक्टर बन गया है वह भी ऊँचे दर्जे का मनुष्य नहीं माना जा सकता। क्योंकि इन सब बातों के होते हुये भी मनुष्य के कर्म अत्यन्त निकृष्ट हो सकते हैं और वह घोर पापी हो सकता है। और आजकल वास्तव में यही देखा जा रहा है कि बड़े अथवा प्रसिद्ध समझे जाने वाले व्यक्तियों में प्रायः दुर्गुण ही अधिक पाये जाते हैं, पर धन अथवा किसी अनुचित शक्ति के जोर से वे सभ्य समाज में शान के साथ अकड़ कर चलते हैं, नाम भी पैदा कर लेते हैं और कोई उनको नीच अथवा “छोटा” कहने का साहस नहीं कर सकता।

पर वेद भगवान ने उपर्युक्त मंत्र में यही बतलाया है कि जो व्यक्ति प्रतापशाली—सामर्थ्यवान होने पर भी ऐसे कार्यों में संलग्न नहीं होता जिससे कि उसका और दूसरों का हित सम्पादन हो, भलाई हो, कल्याण हो तो उसका धन, वैभव, सामर्थ्य सब व्यर्थ है। उसे तो निकम्मा अथवा बेकार ही समझना चाहिये। क्योंकि मनुष्यता का लक्षण यही है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने से भी पहले अपने समाज का ध्यान रखे। अगर हम अपने समाज के उत्थान का; उसकी प्रगति का ख्याल रखेंगे और उसकी भलाई के लिये तन, मन, धन से प्रयत्नशील रहेंगे तो सबकी भलाई के साथ हमारी भलाई तो अपने आप हो ही जायगी और साथ ही हमको समाज सेवा का सुयश-पुण्य भी प्राप्त होगा। इसलिये जो व्यक्ति साधन, अवसर पाकर भी समाज की भलाई के लिये सच्चे हृदय से उद्योग नहीं करता उसे हाथ पैर कटा हुआ अर्थात् भूमि के लिये भाररूप ही समझना चाहिये।

समाज-सेवा या दूसरों के उपकार के लिये यह कोई आवश्यक बात नहीं कि मनुष्य धन द्वारा ही दूसरों की सहायता करे। धन तो बाहरी साधन है और उसका उपयोग समयानुसार बदला करता है। ऐसे भी अवसर आते हैं जब कि करोड़ों रुपया पास में रखा रहने पर भी मनुष्य एक रोटी अथवा एक गिलास पानी के लिये तरसता रह जाता है। इसलिए सच्ची सेवा और सहायता के उपकरण तो तन और मन ही को मानना चाहिये। ये ही वास्तव में हमारी सम्पत्ति हैं और इनके द्वारा सेवा करने से किसी को कोई कभी नहीं रोक सकता। इसके लिये अगर आवश्यक है तो यही कि हमारे हृदय में दूसरों की सहायता-सेवा करने की सच्ची भावना हो। आज तक जितने बड़े-बड़े महापुरुष हुये हैं जिनका नाम इतिहास में लिखा गया है और अब भी समय समय पर हम गौरव के साथ जिनका स्मरण करते रहते हैं, जिनकी जयन्तियाँ मनाते रहते हैं, इनमें शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने धन द्वारा प्रतिष्ठा अथवा श्रद्धा प्राप्त की हो। महापुरुषों का आम लक्षण यही है कि वे दूसरों के उपकारार्थ के लिए अपने तन मन और प्राणों तक को उत्सर्ग कर देते हैं। अनेक महान पुरुष तो ऐसे भी हो गये हैं जो जनता के सामने भी बहुत कम आये, पर जिन्होंने गुप्त रूप से ही समाज और देश की सेवा में निस्वार्थ भाव से प्राण अर्पण कर दिये। क्या ऐसे महान त्यागियों की सेवा और महानता को हम कभी भुला सकते हैं?

जो व्यक्ति इस ख्याल से निकम्मे बैठे रहते हैं कि हमारे पास जो अपने जीवन-निर्वाह का साधन तो भी नहीं है हम दूसरों का उपकार, सहायता कहाँ से करें, वे वास्तव में बड़े भ्रम में पड़े हैं अथवा अपने निकम्मेपन को इस बहाने से छुपाना चाहते हैं। सच पूछा जाय तो जनता की सेवा और परोपकार का मुख्य आधार हमारे शुद्ध हार्दिक संकल्प पर है। अगर हम अपनी अन्तरात्मा से समाज-सेवा या परोपकार के किसी कार्य का दृढ़ निश्चय कर लें और उसके लिये प्राण तक उत्सर्ग करने को तैयार हो जायें तो संसार में ऐसा कोई काम नहीं जो पूरा करके न दिखाया जा सके। बहुत पहले जमाने की बात तो छोड़ दीजिये वर्तमान समय में ही स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी ने जो महान् कार्य करके दिखलाये हैं, उनमें से किसके पास धन का खजाना था? ये सब अपने आत्मबल को ही लेकर खड़े हुये थे और उसी के द्वारा उन्होंने काया-पलट करके दिखा दी।

इसलिये इस मंत्र में जो आदेश और उपदेश दिया गया है वह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण और समाज के लिये कल्याणकारी है। इसमें स्पष्ट रूप से यह बतला दिया गया है कि समाज में उसी को आदर सम्मान मिलना चाहिये जो उद्योग, परिश्रम और उत्साहपूर्वक अपना और दूसरों का अर्थात् समस्त समाज का हित-साधन करता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति धन, वैभव, शारीरिक शक्ति , विद्या, बुद्धि होने पर भी निकम्मा या आलसी होकर पड़े रहने में या भोग-विलास में ही सुख मानता है, वह कदापि प्रतिष्ठा के योग्य नहीं है वरन् वह समाज के लिये एक हाथ पैर कटे हुये व्यक्ति के सामने भार स्वरूप है!


आध्यात्मिक प्रतीकों का रहस्य

(श्री हेमचन्द्र साहित्य मनीषी)

धार्मिक साहित्य में अनेक बातें चिन्हों अथवा संकेतों द्वारा प्रकट की जाती हैं। उदाहरणार्थ भगवान विष्णु के चार हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म बतलाये गये हैं। इसका अर्थ यह समझना कि भगवान वास्तव में इन स्थूल पदार्थों को लिये रहते हैं ठीक नहीं। वरन् ये वस्तुएँ उनकी चार प्रकार की शक्तियों की प्रतीक हैं। इनके द्वारा अनेक बड़ी-बड़ी बातों को अति संक्षेप में कहा जा सकता है और साधकों को निराकार शक्ति की अपेक्षा साकार वस्तुओं का ध्यान करने में भी सुगमता रहती है। यह संकेत अथवा प्रतीक शास्त्र बहुत बड़ा है और आर्य जाति के मूल प्रतीक ॐ की व्याख्या ही इतनी विस्तृत है कि उससे एक विशाल ग्रंथ भर जाये। इसी प्रकार गणेश जी की सूँड और चूहे की सवारी, देवी की दस भुजाएँ और सिंह की सवारी, शिवजी का त्रिशूल सर्पों की माला और बैल की सवारी आदि सैंकड़ों प्रतीक हिन्दू धर्म ग्रन्थों में पाये जाते हैं जिनमें बहुत सा धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान भरा हुआ है। इस प्रकार के गूढ़ प्रतीकों की व्याख्या करने का प्रयत्न अनेक विद्वानों ने किया है और उससे हमारी बहुत कुछ ज्ञान-वृद्धि होती है। इस प्रकार की व्याख्या कुछ थियोसॉफी (ब्रह्म विद्या) समाज के कुछ आत्म ज्ञानियों ने की है इन विद्वानों के कथनानुसार संसार की आध्यात्मिक व्यवस्था करने वाला एक गुप्त ऋषिसंघ है, जिसका आश्रम साधारण लोगों के लिये अगम्य स्थान में है। उसमें पाये जाने वाले एक ग्रंथ में से कुछ प्रतीकों का वर्णन इस प्रकार है।

इस ग्रंथ में जिसका नाम “ज्ञान” है पहले पृष्ठ में एक श्वेत वर्तुल या घेरा दिया हुआ है, यह परमात्मा की निराकार (अव्यक्त) अवस्था का सूचक है। दूसरे पृष्ठ में श्वेत-चक्र के मध्य में एक बिन्दु है जो व्यक्त ईश्वर (महेश) का सूचक है। तीसरे पृष्ठ में यह मध्य बिन्दु रेखा के आकार का हो जाता है जिससे उस चक्र के दो समान भाग हो जाते हैं, इससे पुरुष और प्रकृति की भिन्नता का और द्वितीय ईश्वर (विष्णु)का बोध होता है। इसे सदैव द्वैत-भाव युक्त कहते हैं। चौथे पृष्ठ में इस रेखा पर दूसरी खड़ी रेखा लंब रूप में उसे काटती है जिससे वह चार बराबर भागों में बँट जाता है। इससे तीसरे ईश्वर (ब्रह्म) की निश्चेष्ट अवस्था का बोध होता है। आगे के पृष्ठ में परिधि (वृत्त) का लोप हो जाता है और केवल एक दूसरे को समकोण पर काटती हुई दोनों रेखाएँ ही रह जाती हैं। यही हिन्दुओं का ‘स्वास्तिक” और ईसाइयों का “क्रास” चिन्ह है। यह “ब्रह्मा” की उस अवस्था का द्योतक है जब वह सृष्टि रचना के लिये और अपने जगत की प्रकृति में अवतीर्ण होने के लिये तैयार हो जाता है। यह चिन्ह दुनिया के हर एक देश में और हर एक धर्म के सम्बन्ध में पाया जाता है।

जिस “ज्ञान-ग्रंथ” में उपर्युक्त संकेत दिये हैं उसको कई व्यक्ति “महात्माओं” के आश्रम में जाकर देख चुके हैं। उसमें ऐसी ओजस्-शक्ति भरी है कि उसका एक पन्ना हाथ में लेते ही एक विचित्र प्रभाव पड़ता है। लेने वाले की दृष्टि में, उस पन्ने से जिस बात का संकेत होता है, उस बात का चित्र सा खिंच जाता है और जिन वाक्यों में उसका वर्णन होता है वे सुनाई देने लगते हैं। इस अनुभव को शब्दों द्वारा प्रकट कर सकना बड़ा कठिन है। यह ग्रंथ जिसे लोगों ने देखा है मूल-ग्रन्थ नहीं है, वरन् उसकी नकल है जो गुप्त-विद्या सम्बन्धी अजायब घर में रखा है। मूल ग्रंथ तो शम्बाला या शम्बल देश में सिद्ध-संघ के अधिष्ठाता के अधिकार में है और संसार का सबसे पुराना ग्रंथ है। जो सृष्टि के आदि में ही बना था। महात्माओं के पास वाली नकल भी लाखों वर्ष पुरानी है।

दूसरा प्रसिद्ध संकेत “पक्षिराज” अथवा गरुड़ का है। वह ईश्वर के अपने जगत पर मँडराने का, जल रूप में जगत पर छा जाने का, अथवा विकास क्रम से नीची अवस्था में प्रकट होने का बोध कराता है। पक्षिराज के पंखों में विश्राम करने का अर्थ इस प्रकार का ध्यान करना है कि जिससे ध्यान करने वाला ‘ब्रह्म’ में लीन हो जावे।

अब से आठ लाख वर्ष पूर्व ‘एटलान्टिस’ नामक महाद्वीप था, जिसका अधिकाँश भाग उस स्थान में था जहाँ आजकल अटलाँटिक महासागर लहरें मार रहा है। उसके “गोल्डिन गेट” नामक शहर के सब से बड़े मंदिर की सबसे भीतरी वेदी तक पर सोने की संदूक रखी रहती थी जिसका आकार एक बहुत बड़े हृदय की तरह था। उसके खोलने की गुप्त रीति केवल बड़े पुजारी को मालूम थी और उसे संसार का हृदय कहा जाता था। जितनी गुप्त-रहस्य क्रियाएँ उन लोगों को मालूम थी उन सबकी स्त्रोत वही संदूक थी। उसमें वे अपनी सब से अधिक पवित्र वस्तुएँ रखते थे और धार्मिक चिन्हों का सम्बन्ध भी उसी से था । वे जानते थे कि प्रत्येक परमाणु हृदय के समान धड़कता है और समझते थे कि सूर्य में भी इसी प्रकार की गति हुआ करती है। उनके ग्रंथों में कहीं-कहीं ऐसी बातें मिलती थीं जिनसे विदित होता है कि वे भौतिक विद्या (विज्ञान) का हम लोगों से अधिक ज्ञान रखते थे। पर वे उसे पदार्थ-विद्या (साइंस) की दृष्टि से न देख कर कवि की दृष्टि से देखते थे। उदाहरणार्थ वे समझते थे कि पृथ्वी साँस लेती और चलती है। आधुनिक विज्ञान वेत्ताओं ने भी हाल ही में यह पता लगाया है कि पृथ्वी धरातल पर हर रोज नियमित रूप से परिवर्तन हुआ करता है और एक प्रकार से उसे साँस लेना ही कहा जा सकता है।

दूसरा अर्थ-युक्त चिन्ह कमल का है। इससे सूर्य-मंडल या सौरलोक का उसके ईश्वर के साथ का सम्बन्ध सूचित होता है। इस प्रकार की तुलना सृष्टि की कुछ यथार्थ बातों के आधार पर की गई है। सात ग्रहों के अधिपति वास्तव में बड़े विशाल व्यक्ति हैं तथापि वे इसके साथ-साथ सूर्य मंडल के ईश्वर की मूर्ति किवाँ उसके शरीर के चक्र भी हैं। अब इन विशाल ग्रहाधिपतियों में से प्रत्येक में नियमित समय पर कुछ विकार या गति उत्पन्न हुआ करती है। उसकी तुलना भी हृदय के धड़कने या साँस के लेने और छोड़ने से हो सकती है।

ऊँचे लोकों में प्रत्येक पदार्थ ऐसी अवस्था में हैं जिसको हम यहाँ प्रकाशमान कह सकते हैं। एक विशेष लोक के बाद प्रत्येक वस्तु अग्नियुक्त है। पर वह अग्नि ऐसी नहीं होती जैसी कि हमको भूलोक (पृथ्वी मंडल) पर अनुभव में आती है। जिसको हम यहाँ पर अग्नि कहते हैं वह जलते हुये या चमकते हुये पदार्थ के आधार बिना नहीं रह सकती। हमारी यह अग्नि उस ऊँचे लोकों के अग्नि तत्व का आभास या प्रतिबिम्ब है। हमको उस अग्नि तत्व को जानने के लिये एक ऐसी अग्नि का विचार करना चाहिये जो जलती नहीं किन्तु जल के समान द्रव रूप में है। यह बात प्रथम पारसी धर्म के मूल आचार्य “जरदुश्त” को मालूम थी। वे उस अग्नि का उपयोग करते थे जो उनकी वेदी में बिना ईंधन के जलती थी। वह एक पवित्र अग्नि थी जो ईश्वरीय जीवन का संकेत करती थी।

इस दृष्टि से ईश्वर को प्राप्त करने का अग्नि एक संकेत या प्रतीक है। पुराने पारसी लोग इस बात को अच्छी तरह जानते थे और अपनी इतनी आध्यात्मिक उन्नति करते थे कि उन्हें अग्नि के साथ एकत्त्व प्राप्त हो जाता था और उससे ईश्वर प्राप्ति होती थी। यह कार्य एक प्रकार के देवों की सहायता से संभव हो पाता था। परन्तु वर्तमान समय में हम लोगों में जड़ता की इतनी अधिकता है कि इस प्रकार के कार्य की योग्यता बहुत कम लोगों में है। प्रथम जरर्दुश्त के बहुत से ऐसे अनुयायी थे जो इस मार्ग को ग्रहण कर सके। वर्तमान समय में यदि हम इसके लिये प्रयत्न करें तो कदाचित् हमारे नीचे के कोष (अन्नमय) नष्ट हो जायें। परन्तु भविष्य में नई जातियों अथवा दूसरे ग्रहों में जन्म लेने पर हम इस कार्य को साध सकने में समर्थ हो सकेंगे।


Quotation

प्रार्थना से ऐसा बहुत-सी बातें हो जाती हैं, जिनको दुनिया स्वप्न में भी नहीं सोचती। अतः एक झरने के समान रात-दिन अपनी आवाज मेरे लिए ऊपर उठाओ। अन्यथा जो मनुष्य अपने मस्तिष्क के भीतर एक अंधकारमय जीवन व्यतीत करते हैं, वे भेड़ और बकरियों से उत्तम किस प्रकार हो सकते हैं, यदि ईश्वर को जान कर भी वे अपने लिए और अपने मित्रों के हित में प्रार्थना करने को अपने हाथ नहीं उठाते।

—टेनीसन

मेरे विचारों और संकल्पों के मूल स्रोतों की रक्षा करो और मेरी आत्मा को अपने से भर दो।

—विशप केन


ब्रह्मा और उनकी पुत्री का वास्तविक स्वरूप

(श्री गिरिजा सहाय व्यास)

पुराणों में कुछ ऐसी कथाएं देखने में आती हैं जिन पर ऊपरी दृष्टि डालने से पता चलता है कि उनमें कोई वास्तविकता और सार नहीं है बल्कि वह हमारे देवताओं और ऋषियों को भोगी, विलासी, असंयमी और नीच प्रकृति का बतलाती हैं। परन्तु यदि हम उन कथाओं पर गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि हमारे पूर्वजों ने पेचीदा और न समझ में आने वाले तथ्यों को कथाओं के रूप में, अलंकारिक भाषा में एक पहेली के रूप में हमारे बुद्धि कौशल को परखने के लिए व्यक्त किया है। यह उस समय की लेखन शैली थी। बाईबल को देखने से पता चलता है कि उसमें भी इस अलंकारिक शैली का प्रायः प्रयोग किया गया है। कुछ लोग, इन कथाओं की आलोचना करके पुराणों के महत्व को कम करना चाहते हैं परन्तु यदि हम उनको तर्क और विवेक की कसौटी पर परखें तो उनमें कुछ न कुछ सार अवश्य छुपा रहता है।

श्रीमद्भागवत में ब्रह्मा और उनकी पुत्री की कथा आती है कि काम के वशीभूत होकर स्वयम्भू ब्रह्मा ने ‘वाक्’ नाम वाली अपनी पुत्री से रमण की इच्छा की। चूँकि पुत्री के साथ पिता की कामवासना की इच्छा करना एक बहुत ही घृणित कार्य है इसलिए मरीच आदि पुत्रों ने जब देखा कि उनके पिता की बुद्धि धर्म की ओर से हट कर अधर्म की ओर जा रही है और कामेन्द्रिय के बस में होकर उन्होंने अपनी विवेक शक्ति को खो दिया है तो उन्होंने अपने पिता को समझाया कि आपको यह कार्य शोभा नहीं देता। ऐसा काम न आज तक किसी ने किया है और न आगे ही करने की आशा है। जब प्रजापति ब्रह्मा ने अपने पुत्रों से ऐसी बात सुनी तो वह बहुत लज्जित हुए और इसे अपना अपमान समझ कर शरीर त्याग दिया।

यह कथा केवल श्रीमद्भागवत में ही आई हो, ऐसी बात नहीं है। इसका संकेत वेदों और उपनिषदों तथा ब्राह्मण ग्रन्थों तक में मिलता है।

प्रजापतिः स्वाँदुहितरमधिठकन।

(ऋग्वेद 10। 61। 7)

अर्थात्—प्रजापति ने अपनी पुत्री का घर्षण किया।

प्रजापतिर्वै स्वाँ दुहितरमभ्यध्यायद्।

(ऐतरेय 3। 23)

अर्थात्—प्रजापति ने अपनी पुत्री का अनुगमन किया।

प्रजापतिः स्वाँ दुहितरमभिदध्यौ।

(शतपथ 1। 7। 4। 1)

अर्थात्—प्रजापति ने पुत्री को चाहा।

उपरोक्त पौराणिक कथा और वेद के वाक्यों के गूढ़ रहस्य को समझने के लिए प्रजापति शब्द पर विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है। शतपथ और नाराड्य ब्राह्मण में सूर्य को ही प्रजापति कहा है। ब्रह्मा की पुत्री का अभिप्राय है सूर्य से उत्पन्न होने वाली ‘ऊषा’—प्रातः कालीन प्रकाश। प्रति दिन हम देखते हैं कि आगे-2 ऊषा और पीछे-पीछे सूर्य भगवान चलते हैं। इसी को इन ग्रन्थकारों ने पिता का पुत्री के पीछे जाना बताया है।

पुत्रों के समझाने पर जब ब्रह्मा जी ने लज्जित होकर अपना शरीर छोड़ दिया। इस कथा को स्पष्ट करने में इसी कथा के उपसंहार में आया है कि उसे दिशाओं ने ग्रहण कर लिया। हेमंत और शिशिर ऋतु में सूर्य की आकर्षण शक्ति से खिंचा हुआ जल प्रातः काल सूर्य के चारों तरफ भाप रूप में बादलों की तरह छा जाता है जिसे कुहरा का नाम दिया गया है। इस कुहरे के कारण कभी कभी तो घंटों तक यह बादल सूर्य को घेरे रहते हैं। उसी को लज्जित होकर शरीर त्याग करना कहा जाता है।

ब्रह्मा और उनकी पुत्री की कथा का ऊपर आधिभौतिक अर्थ बताया गया है। अब उसके आध्यात्मिक अर्थ पर विचार करना चाहिए। इस आध्यात्मिक व्याख्या का दिग्दर्शन “ब्राह्मवैवर्त पुराण” में कराया गया है जिसमें राधा जी के पूछने पर श्री कृष्ण भगवान कहते हैं कि मन ही ब्रह्मा है। ज्ञान को महादेव और वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को समझना चाहिए। इस तथ्य की पुष्टि उपनिषदों और ब्राह्मण ग्रन्थों में भी की गई है।

मन एव ब्रह्मा (गोपथ ब्राह्मण)

अर्थात् मन को ही ब्रह्मा कहते हैं।

वाक् सरस्वती (शतपथ ब्राह्मण)

अर्थात् वाणी का नाम ही सरस्वती है।

इस कथा का आध्यात्मिक रूप यह है कि मन से ही विचार उत्पन्न होते हैं, जैसे मनुष्य के विचार होते हैं वैसे ही वह अपनी वाणी से बोलता है। इस से मन के होने से ही वाणी की सत्ता सिद्ध होती है। इसी तथ्य को पिता और पुत्री के रूपक में बताया गया है क्योंकि जब तक मन रूपी ब्रह्मा वाणी रूपी पुत्री में वीर्याधान अर्थात् प्रेरणा नहीं करता तब तक वाणी के शब्द रूप पुत्र उत्पन्न नहीं हो सकते।

ब्रह्मवैवर्त पुराण का प्रमाण देते हुए ऊपर हम ने संकेत किया है कि जब पुत्री के पीछे ब्रह्मा भाग रहे थे तो उन के पुत्र महादेव ने उन को बुरे काम से सावधान रहने के लिए कहा। इस का अर्थ यह है कि मन में जो विचार उत्पन्न होते हैं और वह वाणी द्वारा व्यक्त होने लगते हैं तो विवेक उसे उचित व अनुचित की जानकारी करा कर सावधान करता है।

इससे स्पष्ट है कि हमारी पौराणिक कथाओं में गूढ़ तथ्यों का अलंकारिक भाषा में वर्णन किया गया है। इस लिए इस से पहिले कि हम उन गाथाओं को बेसिर पैर की गप्पे कहना शुरू कर दें, हमें उन पर विवेक पूर्वक विचार करना चाहिए।


मानव-देह का सदुपयोग

(पं. रमाशंकर विद्यार्थी)

ऊर्गस्याँगिर स्पूर्णम्रदा ऊर्ज मयि देहि। सोमस्य नीविरासि विष्णोः शर्मासि शर्म यजमानस्येन्द्रस्य योनि रसि सुसस्याः कृषीस्कृधि। उच्छ्रयस्व वनस्पत ऊर्ध्वो मा पाह्यं हस आस्य यज्ञस्योदृचः॥ (य.4। 10)

अर्थात् “हे आँगरासि (मानव देह) तू यद्यपि छुईमुई के समान क्षणभंगुर है, पर जब तक तू स्थित है तब तक मुझ में सत्व और बल-पराक्रम धारण करती रह। तू ऐश्वर्य की मीवि (कमर पट्टा) है। तू विष्णु देव का मंदिर है, तू यजमान की यज्ञशाला है, तू इन्द्र का सदन है इसमें सुधान्यों की खेती कर, तू जीवन वृक्ष है— मेरे जीवन यज्ञ की समाधि तक निरन्तर ऊपर की तरफ उठता रह और मुझे पाप-पतन से बचाता रह।”

मानव-देह को सभी ने क्षणभंगुर- नश्वर माना है, न मालूम कब पलक मारते इसका अंत हो जाय। पर इसी के द्वारा हम हर तरह के सुकर्म करके अपने जीवन को पवित्र, उन्नत और कल्याणप्रद बना सकते हैं। जो लोग इस देह को मल, मूत्र, रक्त , माँस, हड्डी आदि अपवित्र पदार्थों से भरा हुआ कह कर नरक की खान बतलाते हैं, वे या तो महामूढ़ हैं अथवा हद दर्जे के निकम्मे और हीन प्रकृति वाले हैं। वेद भगवान स्पष्ट स्वर में कहते हैं कि यह तो परमात्मा का मन्दिर है। इसके द्वारा साधना, उपासना करके मनुष्य बड़ी से बड़ी उन्नति को प्राप्त कर सकता है—परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है। यह शरीर ही इन्द्रियों के स्वामी (आत्मा) का निवास स्थान है और इसमें निवास करता हुआ वह ऐसे सुकर्म रूपी उत्तम अन्नों की खेती कर सकता है जिससे यह जीवन सुख शाँति से भरपूर हो जाय। यदि मनुष्य इस वेदोपदेश का पालन करेगा। मानव देह को झूठे भोगों में लिप्त न करके, उसके द्वारा उत्तम कार्य करने का ध्यान रखेगा तो अवश्य ही उसका जीवन उच्च स्थिति को प्राप्त होता जायगा और वह साँसारिक पाप-ताप से पृथक रह कर लोक और परलोक में सुख सुयश का भागी बन सकेगा।

हम प्रायः देखा करते हैं कि अनेक मनुष्य अपनी त्रुटियों की ओर ध्यान न देकर अपने दुःख,कष्ट, अभाव आदि का कारण परमात्मा अथवा अन्य सांसारिक शक्तियों को समझा करते हैं और उनका जन्म रोते, झींकते तथा संसार की शिकायत करते ही बीतता है। वे कहा करते हैं कि क्या करें, हमें भगवान ने संसार में अभागा ही उत्पन्न किया है, न तो शरीर हमारा साथ देता है और न भाग्य हमारे अनुकूल है। हमको तो हर कार्य में हानि ही उठानी पड़ती है, और जिसे देखो हमारे साथ शत्रुता ही करता है। हमने तो अपनी तरफ से किसी का कुछ बिगाड़ नहीं किया, जहाँ तक हमारी शक्ति थी सबकी सहायता—सेवा ही की, पर इसका नतीजा हमको सदा उलटा ही मिला। अब हमने खूब समझ लिया कि संसार में सब स्वार्थी हैं अपना काम निकल जाने पर कोई किसी को नहीं पूछता!!

पर यदि आप ऐसा प्रलाप करने वाले लोगों के जीवन और कार्यों पर दृष्टि डालेंगे तो स्पष्ट मालूम पड़ेगा कि वे जो कुछ भोग रहे हैं उसमें अधिकाँश दोष उन्हीं का है। वे उद्योग, परिश्रम, दृढ़ता से दूर रहते हैं और चाहते हैं कि उनका जीवन बिना किसी प्रकार का संकट, कठिनाई उठाये सुख पूर्वक व्यतीत हो जाय। वे दूसरों की सहायता और सेवा क्या करेंगे, स्वयं अपनी भलाई का कार्य कर सकने में भी असमर्थ रहते हैं। भगवान ने मनुष्य को सब प्राणियों से उत्तम, विभिन्न प्रकार के कार्य कर सकने के उपयुक्त शरीर देकर आज्ञा दी कि “ अपने पसीने की रोटी खाओ”— पर ऐसे निकम्मे लोग भगवान के आदेश की भी अवहेलना करते हैं और अपने शरीर का दुरुपयोग करने के पश्चात् यह कहते हैं। अन्यथा कोई कारण नहीं कि जब अन्य मनुष्य दस-दस, बीस-बीस प्राणियों का पालन करते हैं, बड़े-बड़े समाजों, समुदायों, राज्यों का संचालन और रक्षा करते हैं, बड़ी-बड़ी भौतिक और दैवी आपत्तियों से जनता को सुरक्षित रख कर सफलता की ओर अग्रसर करते हैं, तो ये “अभाग्य” का रोना रोने वाले व्यक्ति स्वयं भी भली प्रकार जीवन-निर्वाह न कर सकें। हमारा तो दृढ़ विश्वास है कि जो व्यक्ति उपर्युक्त वेदमंत्र के आदेशानुसार मानव-देह के महत्त्व और उद्देश्य को समझेगा और उसका उचित रीति से उपयोग करेगा वह कभी असफल, दीन, दुखी नहीं रह सकता। इस संसार रूपी कार्य क्षेत्र में जो कमर कस कर उतरेगा और सच्चे मन से अपने कर्तव्य का पालन करेगा उसे किसी उचित बात का अभाव रह ही नहीं सकता। वह अपने उद्योग द्वारा इस लोक की सुख सुविधाओं को ही प्राप्त नहीं करेगा वरन् परलोक का भी सुधार कर लेगा। भगवान ने अधिक नहीं तो इतनी शक्ति प्रत्येक प्राणी को दी है कि वह संसार में स्वावलम्बन पूर्वक जीवन निर्वाह कर सके। यदि कोई इसमें असफल रहता है तो हमको निश्चित रूप से यह समझ लेना चाहिये कि वह मानव देह का उचित उपयोग नहीं कर रहा है, और न अपने कर्तव्य का पालन करने की ओर उसका लक्ष्य है। वह संसार में शारीरिक और मानसिक काम से बच कर दूसरों की मेहनत के सहारे जीवन व्यतीत करना चाहता है। जब इसमें बाधा पड़ती है तो वह संसार भर को कोसता है और अपना समस्त दोष दूसरों के सर पर मढ़ने की चेष्टा करता है।

यह मानव-जीवन एक वृक्ष की तरह है, जिसकी यदि उचित रीति से देख-भाल की जाय और आवश्यक खाद-पानी देकर इसको पुष्ट बनाया जाय तो यह यथा समय सब के लिये उपयोगी छाया और फलों का साधन बन सकता है। किसी कवि ने फलदार वृक्षों की उदारता का वर्णन करते हुए लिखा है कि “धन्य है आम का वृक्ष कि लोग तो उसे पत्थरों से मारते हैं (अथवा उस पर पत्थर फेंकते हैं) और वह बदले में उनको मीठे फल देता है।” पर यदि प्रत्येक मनुष्य इतना उदार न बन सके तो उसे इतनी उन्नति तो करनी ही चाहिये कि समाज के नियमों का पालन करते हुये कम से कम अपने परिवार के जीवन को सुखी बना ले। जब वह ऐसा करेगा तभी यह समझा जायगा कि परमात्मा और प्रकृति ने उसे जो यह अद्भुत मानव-देह प्रदान की उसका उसने सदुपयोग किया और अपने पुरुषार्थ द्वारा भगवान के आदेश का पालन कर दिखाया।


गंगा की महिमा

(श्री रामस्वरूप शास्त्री)

अपने वैदिक धर्म में गायत्री, गीता, गौ के साथ ही गंगा का विशेष स्थान माना जाता है। कुछ समय पूर्व जो देशी व विदेशी लोग हमारी मान्यताओं की खिल्ली उड़ाया करते थे और उनका विश्वास था कि हिन्दू-धर्म मिथ्या रूढ़ियों अन्धविश्वासों पर आधारित है। आज वही व्यक्ति जिन्होंने हमारी मान्यताओं को ज्ञान-विज्ञान की कसौटी पर कसा, आश्चर्यचकित हो हमारी ओर देख रहे हैं। अन्य बातों पर विचार न करके आज केवल गंगा के विषय में कुछ विचार प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनसे पता चलेगा कि हमारी मान्यतायें कितनी दूरदर्शिता व सत्य पर आधारित है?

श्री पं॰ राज जगन्नाथ जी कहते हैं “ पतन्ती स्वर्लोकादवीन तल शोकापहृतये” कि पवित्र सुरसरि का संसार के शोक शमन करने हेतु पृथ्वी पर अवतरण हुआ है।” कितनी सत्योक्ति है, पं॰ राज की! संसार का कोई दुःख चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो, चाहे आर्थिक हो, गंगा माता की कृपा से अवश्य नाश हो जाता है। साधारण नदी भी दुर्भिक्ष से कुछ न कुछ रक्षा करती है, शुद्ध वायु संचार द्वारा स्वास्थ्य प्रदान करती है, आप विचारें कि गंगा माता जो भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक— भारत वसुधा को हरित, पल्लवित, पुष्पित करती हुई जो शक्ति प्रदान करती है उसकी उपमा क्या कोई है? यहीं तक नहीं अपितु जब रेलों का बाहुल्य अपने यहाँ नहीं था तो नौका द्वारा ही व्यापार कार्य चलता था, नदियों में सब से विशेष हाथ गंगा का है। गंगा उतनी ही पुरानी है जितनी हमारी संस्कृति। आदि कवि बाल्मीकि जी “मातःशैल सुता सपत्नि वसुधा शृंगार हारावलि” का पाठ करते हुये कितना सुन्दर चित्र खींच रहे हैं। हिन्दुओं का यह विश्वास कि गंगा हमारी माता है कितना स्पष्ट सत्य है? जिस प्रकार माता योगक्षेम की चिन्ता करती, अमृत की भाँति पयपान कराती है, क्लेशों को दूर करती है, क्या गंगा माता इन बातों में किसी माता से कम है?

प्राच्य विद्वानों की दृष्टि में —हमारे यहाँ आज से 2000 वर्ष पूर्व महर्षि-चरक ने यह घोषणा कर दी थी कि गंगाजल पथ्य है। “औषधि जाह्नवी तोयं” गंगाजल औषधि है इसकी समता संसार की कोई औषधि नहीं कर सकती। चक्रपाणि दत्त ने 1060 वर्ष पूर्व ही खोज करके बताया था कि गंगाजल स्वास्थ्य वर्धक है। भोजन कुतूहल (भण्डार कर ऑरिएंटल इन्स्टीट्यूट) में गंगाजल श्वेत, स्वादु, स्वच्छ, रुचिकर, पथ्य, भोजन पकाने योग्य पाचक शक्ति वर्द्धक और बुद्धि को बढ़ाने वाला बताया गया है। इन प्राच्य विद्वानों के खोजों के अतिरिक्त आज भी शतशः जीवन से निराश व्यक्ति जिन्हें डाक्टरों वैद्यों ने असाध्य घोषित कर दिया गंगा माता की शरण में गये और स्वस्थ होकर लौटे, पर्वत शिखरों से जड़ी बूटियों का स्पर्श करता हुआ जल यहाँ आते-आते काफी दूषित हो जाता है, फिर भी साधारण जल से कई गुना स्वास्थ्यप्रद होता है अतः गंगा जल एक अनुपम पेय है संसार में कहीं उसकी समता नहीं।

पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में-डा॰ आर॰ सी॰ नेल्सन एम॰ डी॰ का कथन है कि “नालियों का जल, शव, कूड़ा करकट भी गंगा में बहाया जाता है, इस पर भी एक अद्भुत बात है कि कलकत्ते से इंग्लैंड जाने वाले जहाज इसी गंगा के एक मुहाने हुगली नदी का मैला जल लेकर प्रस्थान करते हैं और वह जल इंग्लैंड तक बराबर ताजा बना रहता है। इसके प्रतिकूल जो जहाज इंग्लैंड से भारत आते हैं वह लन्दन से जो जल लेकर चलते हैं वह बम्बई तक ताजा नहीं रहता इन जहाजों को पोर्ट सईद स्वेज व अदन पर फिर ताजा पानी लेना पड़ता है”।

विज्ञानाचार्य श्री हैनवरी हैकिंस जो किसी समय उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के रसायन परीक्षक थे, अपने वैज्ञानिक यन्त्रों द्वारा परीक्षण करके सिद्ध किया है कि गंगाजल में हैजे के कीटाणु नष्ट करने की प्रबल शक्ति विद्यमान है। उन्होंने काशी जाकर गंगा जल की परीक्षा की और देखा कि गन्दे नालों के कीटाणु गंगाजल में मिलने के पश्चात् नष्ट हो गये। इसका समर्थन पैरिस के सुविख्यात डॉक्टर मि॰ डेरेल ने भी किया है। हैजे और आँत से मरे व्यक्तियों के शवों की जो गंगा में फेंक दिये गये थे उक्त डॉक्टर महोदय ने कुछ ही फुट नीचे शवों के पास जहाँ कीटाणुओं की आशा थी-जाँच की एक भी कीटाणु नहीं पाया।

डॉ॰ कहाविरा ने अपने प्रयोग व परीक्षण द्वारा सिद्ध किया कि गंगा जल से सन्निपात ज्वर और संग्रहणी नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार प्रमुख अंगरेजी दैनिक लिखता है कि “गंगा जल में रेडियम के समान वस्तु है, जिसमें दुष्ट व्रण नष्ट करने की अद्भुत शक्ति है।”

फ्रांसीसी यात्री टैवरनियर अपनी यात्रा विवरण में लिखता है “कि गंगा जल में जो विशेषतायें पाई जाती हैं उनके कारण अनादि काल से राजाओं से लेकर निर्धनों तक में इसका प्रयोग होता आया है। मुस्लिम शासन काल में भी बादशाहों के महलों में गंगाजल का ही प्रयोग होता था।”

मुसलमानों की दृष्टि में—इब्नबतूता ने जो चौदहवीं शताब्दी में भारत आया था लिखा है कि सुलतान अहमद तुगलक के लिए गंगाजल बराबर दौलताबाद जाया करता था। अबुल फजल ने “ आईने अकबरी” में लिखा है कि “बादशाह अकबर गंगाजल को अमृत समझते हैं और उसके आने का प्रबन्ध रखने के लिये उन्होंने कई योग्य व्यक्तियों को नियुक्त किया हुआ है, वह घर में या यात्रा में गंगाजल ही पीते हैं। खाना बनाने के लिये वर्षा जल या यमुनाजल जिसमें गंगाजल मिला दिया जाता है काम में लाया जाता है।”

डॉक्टर वर्नियर जो 1759 से 67 तक भारत में रहा, जो शाहजादा दारा शिकोह का चिकित्सक था अपने यात्रा विवरण में लिखा है “बादशाह औरंगजेब के लिये खाने-पीने की सामग्री के साथ गंगाजल भी रहता है, प्रतिदिन नाश्ते के साथ एक सुराही गंगाजल भेजा जाता है।”

कप्तान एडवर्ड मूर ने, जिसने टीपू सुलतान के साथ युद्ध में भाग लिया था लिखा है कि सन्नवर के नवाब केवल गंगाजल ही पीते थे। प्रसिद्ध इतिहास कार श्री गुलाम हुसैन ने बंगाल के इतिहास रियाजुस सलातीन में गंगा जल की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

उपरोक्त प्राच्य पाश्चात्य तथा मुस्लिम विद्वानों की सम्मतियाँ तथा प्रयोगों से यह भली भाँति स्पष्ट हो जाता है कि गंगा जल स्वास्थ्य वर्द्धक तथा रोगनाशक शक्ति में अपूर्व क्षमता रखता है। अब और आगे बढ़कर इस बात पर भी विचार करिये कि अपने यहाँ “गंगा गंगेति यो ब्रूयात् योजनानाँ शतैरपि” कहा गया है, और यह भी कहा है कि गंगा से पापी भी पवित्र हो जाते हैं, इसमें भी कुछ सत्योक्ति है या नहीं? देखिये पाश्चात्य विद्वान इस विषय में क्या कहते हैं? डॉ॰ रिचर्डसन का कहना है कि “गंगा-गंगा कहने और उसके दर्शन करने मात्र से मानव हृदय पर अत्यन्त उत्तम प्रभाव पड़ता है”। प्रसिद्ध संसार यात्री मार्कटुइन ने अपनी संसार यात्रा में लिखा है कि “गंगाजल कीटाणु नाशक तथा शुद्ध पवित्र है यही कारण है इसके पीने और स्नान करने से पापी मनुष्य के विचार भी शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं।”

उपरोक्त उद्धरणों से विशेष कुछ कहने को स्थान ही नहीं रहता, आज संसार धीरे-2 हमारी मूल भूत मान्यताओं को मान कर उन ऋषियों के चरणों में श्रद्धावनत हो रहा है जिनकी तपस्या व खोजों के परिणामस्वरूप हमें यह रत्न मिले हैं। आइये हम सब भी गंगा माता से प्रार्थना कर कुछ ऋण से उऋण हों—

त्वत्तीरे वसतस्त्वदम्बु पिवतस्त्वद्वीचिषुप्रेंखत। स्त्वन्नामस्मरतस्त्वदर्पितदृशः स्यान्मेशरीरव्ययः॥


जन्माष्टमी का उत्सव आदर्शमय हो।

मनुष्य के जैसे विचार होते हैं, वैसे ही उसके कार्य होते हैं। यह उसकी स्वाभाविक वृति है। यदि ऐसा नहीं होता है तो उसके विचारों और कार्यों में असमानता समझनी चाहिए। जीवन को उत्तम बनाने वाले विचार हमें अनेकों धर्म ग्रन्थों और वेद शास्त्रों से उपलब्ध हो जाते हैं। यदि इन सद्विचारों का ज्ञान भण्डार हमारे पास पर्याप्त मात्रा में हो और हम उनको व्यवहार रूप में न ला सकें तो हमारे उस स्वाध्याय का कोई विशेष लाभ न होगा। उन्नति के मार्ग पर तभी हम शीघ्रता से अग्रसर हो सकते हैं जब हम बुरे काम को बुरा समझ कर उसे छोड़ दें और अच्छे कार्य को अच्छा समझ कर उसे ग्रहण करें।

पुराणों की कथाओं का साधारण स्तर के मनुष्यों पर इसलिए अधिक प्रभाव पड़ता है कि उसमें विचारों के साथ-साथ क्रिया भी दिखाई जाती है कि अमुक व्यक्ति ने इस प्रकार का व्यवहार किया। महापुरुषों की आदर्श जीवन घटनाएं इस लिए हमारे मन पर स्थाई छाप छोड़ जाती हैं कि उनमें क्रिया का विशेष अंश होता है। उनको पढ़ने या सुनने से वह चित्र हमारी आँखों के सामने तैरने लगता है और हमें यह भाव होता है कि जिस कार्य को एक मनुष्य ने किया है। उसे दूसरा मनुष्य भी अवश्य कर सकता है। महापुरुषों की जयन्तियाँ इस लिए मनाई जाती हैं कि हम उनके जीवन का मंथन करके आदर्श विचारों और क्रियाओं को अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करें। जिस प्रकार से अपने इष्ट देव के साकार रूप का ध्यान करना सरल होता है। उसी प्रकार से सद्विचारों के साकार रूप घटनाओं को पढ़ सुन मनन करके उन्हें आचरण में लाना सरल होता है।

भगवान श्री कृष्ण, जिनको हम परमात्मा का अवतार मानते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में ऐसे महान् कार्य किये हैं कि उनका अनुकरण करके हम भी क्षुद्रता से महानता की ओर अग्रसर हो सकते हैं। किन्तु धर्म में उनकी इतनी लोक प्रियता है कि लाखों व्यक्ति उनको अपना आदर्श मानकर पूजते हैं। सच्चे अर्थों में उनकी पूजा यही है कि हम भी उनके व्यवहार रूप में बताए हुए मार्ग पर चलें।

जिस समय भगवान कृष्ण ने अवतार लिया था उस समय कंस अपने राज्य में जनता पर बहुत अत्याचार कर रहा था, अन्याय और अधर्म करता था। सन्त, महात्मा और ब्राह्मणों को बहुत कष्ट देता था, यज्ञों को विध्वंस करता था। जनता उससे बहुत दुःखी थी। वह समस्त ग्रामों से दूध और दही मंगवा लिया करता था ताकि लोगों को दूध, दही और घी आदि पौष्टिक पदार्थ न मिले तो उनके शरीर शिथिल ही रहेंगे और उसका मुकाबला न कर पायेंगे। उस समय लोग गौओं के महत्ता को भूल गये थे। भगवान कृष्ण ने गौओं की महत्व को बढ़ाने के लिए उनको स्वयं चराया और उनके दूध दही की ओर प्रेम प्रकट किया। जो ग्वालिनें दूध और दही कंस को देने के लिए जाया करती थीं। उनको वह वहाँ जाने नहीं देते थे और उनका दूध, दही लूट लिया करते थे और कहते थे कि कंस को कहना कि कृष्ण ने उन्हें मना किया था। कंस इतना जालिम था कि बड़े-बड़े राजा भी उसका मुकाबला करने का साहस न कर सकते थे, परन्तु भगवान कृष्ण ने उसके विरोध में जन क्रान्ति खड़ी कर दी और जनता को उसके खिलाफ भड़काया। जनता तो चाहती ही थी कि कोई जन नायक आगे बढ़े और वह उसके पीछे चलकर कंस के राज्य को उलट दें। आतताई तो स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ा मारता है, उसके स्वयं के दुष्कर्म उसे खा जाते हैं। सार यह कि कंस के साथ भी वैसा हुआ जैसा कि संसार में ऐसे व्यक्तियों के साथ होता आया है।

भगवान् कृष्ण के जीवन में “गोवर्धन” के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण घटना आती है। उन्होंने जनता को समझाया था कि गौ का गोबर एक प्रकार का धन है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में इसका एक महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसके द्वारा खेती में उन्नति होती है। खेती में उन्नति धन की उन्नति ही मानी जायगी। पुराणों की एक कथा में बताया गया है कि लक्ष्मी का निवास गोबर है।

जब कंस मारा गया और उसके पिता उग्रसेन को जेल से निकाला गया तो महाराज उग्रसेन (कृष्ण के नाना) ने यह चाहा कि वह अब वृद्ध हो चुके हैं और कृष्ण को ही वह राजगद्दी सौंपना चाहते हैं परन्तु उन्होंने स्पष्ट रूप से इन्कार कर दिया कि यदि मैं राजा बन गया तो मुझ से समाज कल्याण का कार्य छूट जायगा। उन्होंने इतने बड़े राज्य को समाज हित के लिए ठुकरा दिया।

माता रुक्मणी ने एक बार पुत्र की इच्छा प्रकट की थी तो उन्होंने उत्तर दिया “अभी हम सन्तान के योग्य नहीं हैं। हमें 12 वर्ष तक बद्रिका आश्रम में बेर खा कर तपश्चर्या करनी चाहिए तब हम उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के योग्य होंगे।” तब उन दोनों ने 12 वर्ष तक गायत्री माता की आराधना की थी और उन जैसे गुणों का पुत्र प्राप्त हुआ था। भागवत में उनकी दिनचर्या के सम्बन्ध में आता है कि वह नित्य प्रति गायत्री जाप व हवन किया करते थे। हमें भी उनका अनुकरण करना चाहिए।

महान आत्माओं की महानता इसी में होती है कि वह मान और अपमान एक समान समझते हैं और समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण करते हुए भी छोटे से छोटे काम को करने में संकोच नहीं करते। जब उन्होंने अनुभव किया कि जब तक अर्जुन का चतुर सारथी न हो तब तक उसका विजय होना कठिन है और बड़े योद्धाओं में से कोई इस छोटे पद को ग्रहण करने के लिए तैयार न होगा तो उन्होंने स्वयं इस कार्य को करना स्वीकार कर लिया। महाभारत के बाद जब राजसूय यज्ञ हुआ तो उसमें सभी को उच्च पद देकर स्वयं ब्राह्मणों के पैर धोने और उनकी झूठी पत्तलें उठाने का कार्य अपने जिम्मे लिया। निरहंकारिता का इतिहास में ऐसा उज्ज्वल उदाहरण मिलना कठिन है। सुदामा जी जब उनके पास आये थे तो उन्होंने इस नम्रता का व्यवहार किया था कि वह देखकर दंग रह गये। कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगा तेली। कहाँ राजा कृष्ण और कहाँ रंक ब्राह्मण सुदामा। परन्तु फिर भी इस बात का ध्यान न रख कर उन्होंने अपने समान आसन दिया। उनका चरणामृत पिया। उनके कच्चे चावल प्रेम से खाये और गुप्त रूप में धन से सहायता की। इस प्रकार से उन्होंने संसार के सामने एक आदर्श मित्र का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनका जीवन यज्ञमय था। वह निरन्तर परोपकार में लगे रहते थे और दूसरों को भी इसी मार्ग का अनुसरण करने की प्रेरणा देते रहते थे। महाभारत के पश्चात् उन्होंने पाण्डवों से एक बड़ा विश्व कल्याणार्थ यज्ञ कराया था ताकि महाभारत में जो लाखों मनुष्यों की मार काट हुई थी उससे आकाश में व्याप्त आसुरी तत्वों का निवारण हो जाय। कौरव अनीति की राह पर चल रहे थे, ऐसे पापी व अत्याचारियों का नाश करने के लिए पाण्डवों को युद्ध करने की प्रेरणा दी और उनके विजय प्राप्त करने के पश्चात् अपने लिए कुछ भी नहीं चाहा। जरासन्ध ने अनेकों राजाओं को जेल में बन्द करके उनके राज्यों को अपने काबू में कर लिया था। भगवान कृष्ण ने जरासन्ध को भीम से मरवा कर उन राजाओं के राज्य वापिस दिलवा दिये थे।

जब वह पाण्डवों के दूत बनकर दोनों पक्षों में सन्धि कराने के लिए हस्तिनापुर गये थे और जब उन्होंने दुर्योधन का रुख बदला हुआ देखा तो वह महलों में न रह कर विदुर की कुटिया में चले गये। दुर्योधन के अन्याय से कमाये हुए धन के द्वारा बनाए गये पकवानों को छोड़कर उन्होंने विदुर के रूखे सूखे भोजन को स्वीकार किया।

भगवान कृष्ण का गीता का संदेश संसार में अद्वितीय है। इस ग्रन्थ में प्रतिपादित सिद्धान्तों पर चलने वाला मनुष्य कभी दुःखी नहीं रह सकता। जिस अनासक्त कर्मयोग का—फल की इच्छा न करके अपने कर्तव्य कर्मों को करते रहना और साँसारिक कर्मों को करते हुए भी उनमें लिप्त न रहने का उन्होंने गीता में उपदेश दिया है उसे अपना कर हम सब प्रकार की सुख शान्ति को प्राप्त करके पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकते हैं। जो विचार उन्होंने गीता के द्वारा संसार में फैलाये हैं। उनको अपने जीवन में करके दिखाया था।

गीता न केवल महान् आध्यात्मिक ग्रन्थ है बल्कि उच्च कोटि का समाज विज्ञान शास्त्र है। समाज को सुखी बनाने के लिए आज साम्यवाद अथवा समाजवाद की ध्वनि सुनाई दे रही है। परन्तु यह दोनों ही भौतिकवाद के आधार पर केवल भोग पदार्थों के समान बंटवारे पर जोर देते हैं परन्तु गीता का ‘समत्व योग‘ सबकी मौलिक एकता के आध्यात्मिक सिद्धान्त पर आधारित है। स्थान-स्थान पर गीता में “समः सर्वेषु भूतेषु” और पंडिताः समदर्शनः के आदर्श विचार उपस्थित किये गये हैं। भौतिकवादी समाजवाद अस्थिर है परन्तु आध्यात्मिक समाजवाद शाश्वत है।

जन्म अष्टमी का उत्सव, जो भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिवस की स्मृति में इस वर्ष भाद्रपद वदी अष्टमी बुधवार 26 अगस्त को मनाया जा रहा है। गायत्री परिवार शाखाओं को शान से मनाना चाहिएं। हवन तो सभी स्थानों पर होने ही चाहिएं। इसके साथ-साथ सत्संग और सम्मेलन भी करने चाहिएं जिसमें अपने क्षेत्र के अपने अनुकूल विचारों के विद्वानों को निमंत्रित करके उनके प्रवचन करने चाहिए जिसमें भगवान कृष्ण के आदर्श व्यवहार का प्रतिपादन होता हो। जहाँ प्रवचन कर्ताओं का प्रबन्ध न हो सके वहाँ भजन कीर्तन आदि अन्य कार्यक्रम के पश्चात् इस लेख को ही सुना देना चाहिए।

यदि हम अपने त्यौहारों को इस प्रकार से आदर्श रूप में मनाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब कि हमारा समाज उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच कर पहले जैसा गौरव प्राप्त कर सकेगा।


Quotation

ईश्वर संसार का शासन करता है। हमें बुद्धिमता से अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए और इस प्रश्न को उसी के सुपुर्द छोड़ देना चाहिए।

—जान जे

दो मनुष्य ईश्वर को प्रसन्न करते हैं—एक तो वह जो सच्चे हृदय से उसकी सेवा करता है क्योंकि वह उसे जानता है, दूसरा वह जो उसे निष्कपट भाव से ढूंढ़ता है क्योंकि वह उसे नहीं जानता ।

—पाणिन


वृक्षारोपण की पुनीत परम्परा—हरियाली अमावस्या

हमारे पूर्वजों ने जिन सिद्धान्तों, आदर्शों और विधि-विधानों को हमारे लौकिक और पारलौकिक जीवन के लिए लाभकारी समझा, उनको उन्होंने धर्म के अंतर्गत ला दिया। व्यक्ति गत जीवन को ऊंचा उठाने के लिए जिस तरह षोडश संस्कारों की आवश्यकता है, उसी प्रकार से सामूहिक जीवन को सुसंस्कृत बनाने के लिए त्यौहारों की आवश्यकता है। हिन्दू धर्म का प्रत्येक त्यौहार एक प्रेरणा,सिद्धाँत और आदर्श लिए हुए है। इन त्यौहारों की प्रेरणा को समाज के मनः स्थल पर प्रतिष्ठापित करने के लिए उन्हें सामूहिक आयोजनों उत्सवों के रूप में मनाने की पद्धति चली है क्योंकि सामूहिक रूप से जिस उत्सव को मनाया जाता है। उसकी एक छाप उस में भाग लेने वाले के ऊपर पड़ती है।

हरियाली अमावस्या का त्यौहार जो इस वर्ष श्रावण वदी 30 मंगलवार, 4 अगस्त 59 को मनाया जायगा,हमारे भौतिक जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है। हमारे शास्त्रों में किन्हीं क्रियाओं के लाभ इस प्रकार वर्णन किये जाते हैं कि लोग असम्भव से मान लेते हैं परन्तु वास्तविकता यह नहीं है। उन संकेतों में कुछ रहस्य अवश्य छिपा रहता है। हरियाली अमावस्या विशेष प्रकार से वृक्षारोपण का त्यौहार है। वृक्षों की महत्ता को स्वीकार करते हुए अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा है कि “वृक्ष वनस्पति भी मनुष्यों की ही भाँति पृथ्वी के पुत्र हैं।” अग्नि पुराण में कहा है “जो मनुष्य वृक्ष लगाता है,वह अपने तीस हजार पितरों का उद्धार करता है। जो कोई अपने वंश, धन और भावी सुख की वृद्धि चाहता हो तो उसे फल फूल वाले किसी वृक्ष को न काटना चाहिए।” पद्म पुराण में लिखा है कि “जो मनुष्य सड़क के किनारे वृक्ष लगाता है, वह स्वर्ग में उतने ही वर्षों तक सुख भोगता है जितने वर्षों तक वह वृक्ष हरा रहता है।” महाभारत में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए कहा था “वृक्ष लगाने वाले इस लोक में तो यश और कीर्ति प्राप्त करते ही हैं, मरने के बाद भी स्वर्ग लोक को जाते हैं। वृक्ष लगाने वाला अपने पितरों के साथ साथ पीछे आने वाली पीढ़ियों का भी उद्धार करता है।”

पाराशर ऋषि का मत है।

दश कूप समो वापी दशवापी समो हृदः। दश हृद समः पुत्रः दश समो द्रुमः॥

अर्थ—दस कुएं बनाने के समान एक बावड़ी खुदाने का पुण्य होता है। दश बावड़ी खुदाने के बराबर एक तालाब बनाने का पुण्य है। दश तालाब बनाने की बराबर एक पुत्र या शिष्य को धर्म परायण समाज सेवी बनाने का पुण्य है। दश समाजसेवी सन्तानों के बराबर वृक्ष लगाने का पुण्य है। पुण्य कारक शुभ कर्मों में वृक्षारोपण का सर्वोपरि स्थान है।

ऋषियों ने जिन रीति रिवाजों, मान्यताओं, कर्मकाण्डों, का जीवन में उपयोग देखा, उनकी ओर हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए उनके लाभों का अत्यधिक वर्णन किया है। वृक्षों के सम्बन्ध में मनुष्य के लिए उपयोगिता का विवेचन हम नीचे की पंक्तियों में करेंगे।

भारत कृषि प्रधान देश है। इसलिए यहाँ वर्षा की ऋतु का बड़ा महत्व समझा जाता है। वर्षा का बहुत कुछ सम्बन्ध पेड़ों से है। जहाँ पेड़ अधिक होते हैं, वहाँ वर्षा भी अधिक होती है इसलिए जब भारतवर्ष में बन पर्याप्त मात्रा में थे तो यहाँ वर्षा आवश्यकतानुसार हो जाया करती थी। क्योंकि बादल वन जाने पर वृक्ष समूह अपने आकर्षण से वर्षा को खींच लेते हैं। परन्तु जब से वनों को काट कर भूमि को जुताई के उपयुक्त बनाया जाने लगा है तभी से वर्षा का क्रम अनिश्चित सा हो गया है।

पेड़ों का प्रभाव देश की जलवायु पर पड़ता है। गर्म देशों में पेड़ों की पत्तियों से पानी उड़ कर वहाँ के तापक्रम को कम करता है। परन्तु जहाँ पेड़ नहीं होते वहाँ की खुली जमीन पर सूर्य की किरणों के पड़ने से वह गर्म हो जाती है जिस के फलस्वरूप वायु भी गर्म होकर बादलों को ऊपर उठा देती है और वहाँ वर्षा नहीं होती। पेड़ों के होने से इस हानि से बचा जा सकता है।

पेड़ों का मनुष्य के स्वास्थ्य से भी सम्बन्ध है क्योंकि यह कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस को सोख लेते हैं और दिन को ऑक्सीजन गैस छोड़ते हैं। जो शरीर के लिए बहुत आवश्यक है और लाभप्रद वस्तु है। इस से फेफड़ों व खून की सफाई होती है और अनिष्टकर पदार्थों से बचाव होता है। हरी हरी घास पर प्रातः काल नंगे पैर चलने और हरी पत्तियों की ओर देखने से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। फलों की सुगन्धि से मस्तिष्क के अनेकों रोग दूर हो जाते हैं। गुलाब अर्क और गुढ़ैल का शर्बत उष्णजन्य कई रोगों में काम आते है। बहुत से वृक्षों की जड़, छाल लकड़ी, स्वरस, फूल फल और पत्तियों से राम बाण औषधियाँ बनती हैं जो रोग निवारण के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होती हैं।

पेड़ों की जड़ों में कुछ ऐसा प्रभाव होता है कि वह भूमि को कटने से बचा लेते हैं। तालाब और नदियों के किनारों पर पेड़ लगाने का यही प्रयोजन होता हैं। इन से नदियों के पानी का बहाव एक सा बना रहता है। भारत में कुछ वर्षों से काफी बाढ़ें आने लगी हैं। कुछ हद तक इसका कारण भी वनों का तेजी से सफाया होना है। वनों के अभाव में हमारे देश की भूमि धीरे धीरे रेगिस्तान बनती जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्थान का रेगिस्तान उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ रहा है, इसके लिए वनों का लगाना आवश्यक है। इस लिये उत्तर प्रदेश में राजस्थान की सीमा पर अब पेड़ लगाये जा रहे हैं।

वृक्षों से हमारी ईंधन की आवश्यकता पूर्ति होती है। उनका कोयला और चीरन का बुरादा चूल्हों भट्टियों और सिगड़ियों में जलाने के काम आता है। इन से बची हुई राख खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है। वनों से शीशम, सागवान व देवदारु की लकड़ी प्राप्त होती है जो फर्नीचर, रेल के डिब्बों आदि के उपयोग में आती है। इसके अतिरिक्त तरह तरह की वस्तुएं तेल, लाख, गोंद, चन्दन की लकड़ी, कत्था, कागज और रस्सियाँ बनाने के लिए सवाई, भाबर और रबर आदि कितनी ही अन्य उपयोगी वस्तुएं वनों से प्राप्त होती हैं।

जलाने की लकड़ी के अभाव में किसान लोग गोबर को जलाते हैं जो उनके लिए ईंधन से कहीं अधिक मूल्यवान है। यदि ईंधन पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे तो गोबर को खाद के काम में लेकर देश की पैदावार को बढ़ाया जा सकता है।

वनों से किसानों को पशुओं के लिए चारा मिलता है। वह पशुओं के लिए चरागाह के काम आते हैं। भारत के वन विभाग के कुछ भाग चराई के लिए किराये पर उठा दिये जाते हैं। इनसे सरकार को 19-7-48 में 10 करोड़ की आय हुई थी।

वृक्षों की सघन छाया की यह विशेषता है कि गर्मी के दिनों में शीतलता, सर्दी के मौसम में तपश और वर्षा में ऋतु के अनेसार लाभ पहुँचाती है। इनके नीचे साधु सन्त अपनी धुनि रमाते हैं और मुसाफिर विश्राम करते हैं। पक्षी अपने घोंसले बनाते हैं। पक्षियों का भी मनुष्य जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि वह पेड़ पौधों को नष्ट करने वाले कीड़े-मकोड़ों को खाकर फसल की रक्षा करते रहते हैं। गिद्ध मरे हुए पशुओं के माँस को खा जाते हैं। यदि पशुओं का माँस सड़ता रहे तो बीमारी पैदा होने का भय रहता है। पेड़ों के अभाव में पक्षियों का भी अभाव हो जाता है।

इन्हीं लाभों को देखते हुए भारतीय संस्कृति में वृक्षों को देवता के रूप में माना जाता है और कई की तो पूजा भी की जाती है। पीपल को हिन्दू लोग जल चढ़ाते हैं और स्त्रियाँ धागा बाँधती, परिक्रमा व अन्य प्रकार से पूजा करती हैं। पीपल की छाया स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है और उसके फूलों में सन्तानोत्पादन की बड़ी शक्ति है। वैशाख ज्येष्ठ मास में जब फल लगता है तब चिड़ियाँ उस फल को खाकर शीघ्र ही गर्भ धारण कर लेती हैं। पीपल के फल खाने से बन्ध्या को भी पुत्र होता है। इसकी छाल तथा दूध दोनों औषधि के काम में आते हैं। इस वृक्ष से सब से अधिक ‘नाइट्रोजन’ निकलती है जो जीवन के लिए सब से अधिक उपयोगी गैस है। इस गैस के बिना मनुष्य क्षणभर के लिए भी जिन्दा नहीं रह सकता। अशोक की छाल बड़ी संकोचक और गर्भाशय के रक्त स्राव को रोकने की विशेष औषधि है। आँवले में अद्भुत रासायनिक शक्ति है। मस्तिष्क के लिए इसका मुरब्बा बहुत उपयोगी है। नीम की रोग निवारक शक्ति तो जगत् प्रसिद्ध है। आम तो फलों का सिर-मौर है। तुलसी को चिकित्सा जगत् में एक आश्चर्यजनक बूटी के रूप में पाया गया है। यह न केवल चिकित्सा की दृष्टि से वरन् सूक्ष्म आध्यात्मिक तत्वों के कारण भी मानव जाति के लिए परम कल्याणकारी है। गेंदा से जलन और दाह दूर होते हैं। इसी प्रकार से प्रत्येक वृक्ष में कुछ न कुछ उपयोगिता है। वृक्षों से उपरोक्त लाभों को देखते हुए ही हमारे धर्म-शास्त्रों में इसका बहुत पुण्य माना गया है।

पेड़ों की आवश्यकता को अनुभव करते हुए भारत सरकार ने भी इस ओर ध्यान दिया है। इसी उद्देश्य से श्री के.एम. मुँशी ने बन महोत्सव को विशेष प्रोत्साहन दिया था। यह महोत्सव वर्षा ऋतु में एक सप्ताह के लिये मनाया जाता है जिसमें सरकारी कर्मचारी और जनता के व्यक्ति पेड़ लगाते हैं। सरकार ने अधिक वृक्ष लगाने वालों को पुरस्कार भी घोषित किये हैं।

‘राजेन्द्र शील्ड’ वन महोत्सव में सब से अधिक वृक्ष लगाने वाले जिले को दी जाती है। ‘जवाहर शील्ड’ सब से अधिक पेड़ लगाने वाले विश्वविद्यालय को। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस ओर अधिक ध्यान दिया है। उसके द्वारा इटावा और गोवर्धन जि. मथुरा में एक-एक वन लगाया जा चुका है आगरा जिले में कई सौ मील लम्बा बन बनाने की योजना है। अन्य प्रान्तों में भी इस दिशा में काम हो रहा है। परन्तु फिर भी सरकार को इस ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि अनुमान है कि भारत में 281 लाख वर्ग मील में वन हैं। यह देश के क्षेत्रफल का कुल 22.3 प्रतिशत है जहाँ सोवियत रूस में प्रत्येक व्यक्ति के पीछे जंगल का क्षेत्र फल 3.5 हेक्टेयर (1 हेक्टेयर=2. 47 एकड़) और अमरीका में 1.8 हेक्टेयर बैठता है वहाँ भारत में यह केवल 02 हेक्टेयर पड़ता है।

हमारे ऋषियों ने वृक्षों की उपयोगिता को बहुत समझ कर इसे त्यौहार रूप में, सामूहिक रूप में मनाने का आदेश दिया है कि जब वर्षा भली प्रकार आरम्भ हो जाय तो उपयोगी वृक्षों को लगाया जाना चाहिए। आज हमारी पूर्व परम्पराएँ प्रायः समाप्त होती जा रही हैं। उनको हमें फिर में कार्य रूप से लाना है। अ. भा. गायत्री परिवार भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के महान लक्ष्य को लेकर चल रहा है उन्हें त्यौहारों की महत्ता को पुनः जाग्रत करना है गायत्री परिवार शाखाओं को चाहिए कि वह इस दिन सामूहिक रूप से वृक्षारोपण करें। अपने घर में तुलसी के वृक्ष लगा कर अन्य व्यक्तियों को भी इसकी प्रेरणा देनी चाहिए। पीपल बरगद जैसे बड़े पेड़ लगा कर उनकी रक्षा व पानी डालने के कार्य के लिए सामूहिक रूप से भार लेना चाहिए। इस अवसर पर सभी शाखाओं में सत्संग हवन होने चाहिएं और लोगों को इसके लाभों से जानकारी करानी चाहिए। इस विषय पर प्रवचन भी होने चाहिएं। यदि प्रवचन का प्रबन्ध न हो सके तो इस लेख को ही सुना देना चाहिए।


सत्संकल्पों का त्यौहार—श्रावणी

हिन्दु धर्म की मान्यता के अनुसार मनुष्य जीवन पशु, पक्षी, कीट पतंग आदि चौरासी लक्ष योनियों के पश्चात् प्राप्त होता है इसलिए उसमें पशु वृत्तियों का आधिपत्य होता है। इन पशु वृत्तियों को समाप्त करके मनुष्यता की ओर मोड़ने के लिए उसके जीवन को सुसंस्कारित करने की आवश्यकता हुई। जिन लोगों की मनोभूमि, परिपक्व होती है उनको एक बार ही प्रेरणा देने से धार्मिक भावनाएँ जागृत हो जाती हैं और वह अपने कर्तव्य को समझ कर उसके अनुसार कार्य करते हुए मनुष्य जन्म को सफल बना लेते हैं परन्तु ऐसा व्यक्ति हजारों में एक ही होता है। अधिकाँश व्यक्तियों में पिछले हजारों जन्मों की क्षुद्र वासनाओं और कामनाओं के कारण उत्तम धार्मिक ग्रन्थों और सन्त महात्माओं का भी कम प्रभाव पड़ता है। जिन पर पड़ता है, वह भी धीरे-धीरे प्रगति करते है। इसलिए साधारण श्रेणी के मनुष्यों पर बार-बार छाप डालनी पड़ती है तभी उनमें कुछ स्थायित्व की आशा की जा सकती है। कुशल वक्ता और लेखक वही माना जाता है जो श्रोता व पाठक पर एक बात की छाप डालने के लिए उसे बार-बार नये ढंग से प्रस्तुत करता है। कील को बार-बार ठोकने से वह खूब गढ़ जाती है। बार-बार पाठ करने से ही एक पाठ याद किया जा सकता है।

इस तथ्य को हमारे ऋषिगण भली प्रकार जानते थे कि यदि एक बार अपने शिष्यों को कोई शिक्षा देते हैं तो यह आवश्यक नहीं कि वह एक बार की शिक्षा से ही उसे अपने जीवन में उतार लेंगे। इसलिए उन उपयोगी शिक्षाओं को पुनः उचित समय पर दोहराने की आवश्यकता है जिस के माध्यम से पशु को मनुष्य बनाने का संस्कार किया जाता है, उसकी मनोभूमि पर यह छाप जमाई जाती है कि पशुओं की तरह मनुष्यों को शिश्नोदर परायण—रोटी और कामुकता के पीछे ही पागल नहीं बना रहना है वरन् जीवन को आदर्शमय, उद्देश्य और धर्ममय बनाने के लिए नियोजित करना है। यह आयोजना यह व्रत, यह संकल्प, यह प्रतिज्ञा धारण करना ही यज्ञोपवीत पहनना है।

यज्ञोपवीत की तीन तारें बड़े ही महत्वपूर्ण संकेत करती हैं। इनसे तीन ऋणों का बोध होता है। ब्रह्मचर्य से ऋषि ऋण, यज्ञ से देव ऋण और प्रजा पालन से पितृ ऋण चुकाया जाता है। इससे ईश्वर, जीवन प्रकृति की ओर संकेत मिलता है कि माया के चंगुल से छूटने के लिए इनके आपसी सम्बन्धों का आध्यात्म विज्ञान समझना चाहिए। संसार की हर एक वस्तु को उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की तीन अवस्थाओं में से होकर जाना पड़ता है इसलिए इनकी वास्तविकता को भली प्रकार जान कर जन्म मरण की घटनाओं या अन्य प्रकार की हानियों से विचलित न हो जाना चाहिए। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ईश्वरीय नियमों पर चलने का सन्देश देते हैं। सत, रज, तम से हानिकारक को घटाने और लाभदायक को बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। माता, पिता व आचार्य का उचित सम्मान करना चाहिए। भूत काल के अनुभव के आधार पर सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए वर्तमान का कार्यक्रम निर्धारित करना चाहिए। धर्म, अर्थ और काम हमारे मोक्ष में सहायक हों। शुभ काम करते हुए दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से बचना चाहिए। अपने जीवन को सफल बनाने के लिए योग, यज्ञ, और तप को उचित स्थान देना चाहिए। यज्ञोपवीत की नौ लड़ें जीवन विज्ञान को समझने सब प्रकार की शक्ति संचय करने, श्रेष्ठता की ओर बढ़ने, मन को सुन्दर बनाने, दिव्य दृष्टि प्राप्त करने, सद्गुणों को ग्रहण करने, प्रत्येक कार्य को विवेक पूर्वक करने की संयम से जीवन यापन करने पिछड़े हुए लोगों को आगे बढ़ाने की ओर प्रयत्न करने को संकल्प लेने की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है। यज्ञोपवीत धारण कराते समय गुरु शिष्य को इन्हीं शिक्षाओं को विस्तार पूर्वक समझाने का प्रयत्न करता है और उससे व्रत लेता है कि वह नियमित रूप से गायत्री मन्त्र की साधना करेगा जिससे वह उपरोक्त शिक्षाओं को भली प्रकार समझ कर व्यवहार में ला सके। इस पुराने संकल्प की स्मृति पुनः एक वर्ष के पश्चात् श्रावणी के दिन दिलाई जाती है जो इस बार श्रावण सुदी पूर्णिमा मंगलवार 18 अगस्त 59 को होगी।

श्रावणी के दिन नया यज्ञोपवीत बदला जाता है। यूँ कहना चाहिए कि श्रावणी के दिन यज्ञोपवीत की जयन्ती मनाई जाती है। यह सम्भव है कि गृहस्थ में रहते हुए, द्विज पिछले वर्ष की शिक्षाओं को जो उसे यज्ञोपवीत धारण करते समय मिली थीं, भूल गया हो। चूँकि मनुष्य जीवन को सुखी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि यज्ञोपवीत से मिलने वाली उपरोक्त शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारें इसलिए उनकी पुनः याद दिलाई जाती है। इस बीच में यदि कोई व्यक्ति कुमार्ग की ओर चल पड़ा हो या अपना पथ भूल गया हो तो वह सत्पथ पर अग्रसर हो जाये। इस दिन पिछले वर्ष की त्रुटियों पर विचार किया जाता है कि कौन-कौन सी गलतियों से हमें दुःखों, कष्टों और असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। उनका इस दिन प्रायश्चित करना और आगामी वर्ष की रूप रेखा तैयार करना कि अब हमें अपने सुधार के लिए कौन-कौन से नियम अपनाने चाहिएं।

कर्मकाण्ड में दस स्नान किया जाता है। इसके बाद पाप निवारणार्थ हेमाद्रि संकल्प कराया जाता है जिसमें भविष्य में पातकों, उपपातकों और महा पतकों से बचने, पर द्रव्य अपहरण न करने, पर निन्दा व शास्त्र निन्दा न करने, आहार विहार में ध्यान रखने, हिंसा न करने, इन्द्रियों का सदुपयोग करने और सत्य का व्यवहार आदि करने की प्रतिज्ञा लेता है। वेद का कथन है कि—

व्रतेन दीक्षा माप्नोति दीक्षा प्नोति दक्षिणाम। दक्षिण श्रद्धा माप्नोति श्रद्धया सत्य माप्यते॥

अर्थात् व्रत से दीक्षा मिलती है, दीक्षा के समय दक्षिणा दी जाती है। दक्षिणा से श्रद्धा बढ़ती है, श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।

व्रत वह शक्ति है जिसके द्वारा मनुष्य की सोई हुई शक्तियाँ जागृत होती हैं। असम्भव कार्यों को सम्भव होते देख कर उसकी निष्ठा बढ़ती है। ज्यों-ज्यों उसकी निष्ठा की वृद्धि होती जाती है, त्यों-त्यों वह त्याग की भूमिका में पदार्पण करता है। त्याग द्वारा शक्तियों का विकास होकर उसकी श्रद्धा में वृद्धि होती है। श्रद्धा की दृढ़ता से सत्य का मार्ग खुल जाता है। इसलिए हमारे धर्म में व्रतों को एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

श्रावणी वेद का त्यौहार है। प्राचीन काल में ऋषि मुनि इस दिन से वेद पारायण आरम्भ करते थे जिसको उपाकर्म कहा जाता था। वैसे तो वेद का पाठ करना द्विज मात्र का नित्य का कर्तव्य है परन्तु वर्षा ऋतु में उसके लिए विशेष रूप से प्रबन्ध किया जाता था। यहाँ की कृषि प्रधान जनता को श्रावण के अन्त में पर्याप्त समय मिल जाता था। क्षत्रियों और वैश्यों के कार्य भी शिथिल पड़ जाते थे। ऋषि मुनि भी चतुर्मास में शहरों के निकट आ कर वेद की कथा कहा करते थे। इन धार्मिक आयोजनों को आरम्भ करने का समय श्रावण मास की पूर्णिमा था जो अभी तक चला आ रहा है। उस समय लोग वेद पाठ के संकल्प किया करते थे, वेद मन्त्रों को कंठाग्र करने की प्रतिज्ञा लेते थे। इन प्रतिज्ञाओं संकल्पों और परायण करने के आधार पर ही द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी नाम पड़ा है। आज दुर्भाग्य वश हम इस परम्परा को भूल से गये हैं इसलिए वेद जैसे वृहद् ज्ञान के भण्डार से हम वंचित हो रहे हैं। इससे पूरा लाभ उठाने के लिए हमें वेद प्रचार करना चाहिए। वेद प्रचार का संकल्प इसी अवसर पर लिया जाता है।

रक्षा बन्धन का त्यौहार भी इसी दिन मनाया जाता है। यह रक्षा सूत्र है। इनको ब्राह्मण वेद मन्त्रों से अभिमन्त्रित करते थे। तप और त्याग की शक्ति का मिलन वेद मन्त्रों की शक्ति के साथ होने से सोने पर सुहागे का काम करती है। उस समय ब्राह्मण राष्ट्र के नेता होते थे, जनता को सन्मार्ग पर लगाना उनका कर्तव्य था, आसुरी विचारों से रक्षा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी। उस दिन वह भी अपने पुराने संकल्प को स्मरण करते थे कि द्विजातियों को ऊँचा उठाने के लिए उन्हें क्या करना है? यदि एक वर्ष में उनके कार्य में कोई शिथिलता आ गई हो तो जागृत हो जाती थी। परन्तु खेद का विषय है कि आज कल हमने इस पवित्र त्यौहार को केवल अपने धनोपार्जन का साधन बना रखा है और अपने यजमान को सूत्र बाँध कर और एक दो उल्टे-सीधे मन्त्र पढ़ कर पैसा ऐंठने का प्रयत्न करते हैं। जिस देश के पथ प्रदर्शक अपने कर्तव्य को भूल जाते हैं, उसका पतन की ओर जाना अवश्यम्भावी है।

चूँकि ब्राह्मणों का काम धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन और उनका उपदेश करना होता था और वह स्वतन्त्र रूप से जीवन निर्वाह के लिए कोई कारोबार नहीं करते थे, इसलिए शिष्यगण उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन, वस्त्र आदि के रूप में गुरु दक्षिणा दिया करते थे जो आज तक प्रचलित है। श्रावणी के दिन यज्ञोपवीत को बदलते या धारण करते समय शिष्य गुरु को अपनी श्रद्धा के अनुसार भेंट किया करते थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हर वर्ष शिष्य अपने गुरु की भेंट धन के रूप में देते हैं। आज दोनों ओर से शिथिलता आ गई है। इस शिथिलता को दृढ़ता में परिवर्तन करने के लिए ही यह त्यौहार मनाया जाता है।

“गायत्री और यज्ञ भारतीय संस्कृति की जननी व जनक हैं। गायत्री उपासना का संकल्प लेते समय यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। यज्ञ का ही प्रतीक यज्ञोपवीत है। चूँकि गायत्री परिवार ने गायत्री और यज्ञ को जन-जन के मन मानस में स्थापित करने का सत्संकल्प लिया हुआ है इसलिए गायत्री परिवार शाखाओं को श्रावणी का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाना चाहिए। प्रत्येक शाखा में हवन और सत्संग होने चाहिएं। यज्ञोपवीत की महत्ता और उसमें छिपी शिक्षाओं पर प्रवचन होने चाहिएं। इस दिन सदस्यों व कर्मठ कार्यकर्ताओं को गायत्री, यज्ञ, वेद प्रचार व जनता से व्यसन त्याग के नये संकल्प लेने चाहिएं। अपने व्यक्तिगत जीवन में जो पिछले वर्ष त्रुटियाँ हुई हों, उनको दूर करने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। पिछले वर्ष में अपनी शाखा में जो शिथिलता आ गई हो, उस पर विचार करना चाहिए, उसके कारण खोज कर उन्हें दूर करने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। जिन लोगों ने अभी तक यज्ञोपवीत धारण न किये हों, उनका अपने यज्ञ आयोजनों में यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिए। यदि इस प्रकार से इस त्यौहार को हम मनाएँ तो साँस्कृतिक पुनरुत्थान में काफी सहयोग दे सकते हैं और जिन बातों को हम स्वप्नवत देखते हैं, वह साकार हो सकती हैं।


Quotation

क्या तुम्हें खेद होता है? क्या तुम्हें इस बात पर खेद होता है कि देवताओं और ऋषियों के लाखों वंशज आज पशुवत् हो गये है? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञानता सघन मेघों की तरह इस देश पर छा गई है? क्या इससे तुम छटपटाते हो? क्या इससे तुम्हारी नींद उचट जाती है? क्या यह भावना मानो तुम्हारी शिक्षाओं में से बहती हुई तुम्हारे हृदय की धड़कन के साथ एक रूप होती हुई तुम्हारे रक्त में भिंद गई है? क्या इसके तुम्हें लगभग पागल- बना दिया है? सर्वनाश के दुःख की इस भावना से क्या तुम बेचैन हो? और क्या इससे तुम अपने नाम, यश, स्त्री, बच्चे, संपत्ति और यहाँ तक कि अपने शरीर की भी सुध-बुध भूल गये हो? क्या तुम्हें ऐसा हुआ है? देश-भक्त होने की यही है प्रथम सीढ़ी केवल प्रथम सीढ़ी।

—स्वामी विवेकानन्द


दैवी कृपा द्वारा प्राण रक्षा

(पं. रामप्रताप तिवारी)

पुनर्जन्म और परलोक पर विश्वास करने वाले हिन्दू-मात्र का यह विश्वास है कि संसार में जिन पदार्थों और शक्तियों को हम प्रत्यक्ष देखते रहते है, उनके सिवा विश्व में और भी ऐसी अनेकों बहुसंख्यक शक्तियाँ मौजूद हैं जिनका हमको नेत्रों से अथवा अनुमान द्वारा कुछ भी पता नहीं लग सकता। वे अलौकिक अथवा दैवी शक्तियाँ प्रायः हमारे आस-पास ही उपस्थित रहती हैं, पर जब तक कोई उपयुक्त अवसर नहीं आता और हमारे तथा उनके बीच सम्बन्ध होने का कोई उचित कारण उपस्थित नहीं होता तब तक अस्तित्व का ज्ञान होना कठिन होता है।

पाठकों ने समाचार पत्रों में अनेकों बार ऐसी घटनायें पढ़ी होंगी जिनमें किसी व्यक्ति की प्राण रक्षा भयंकर विपत्ति में पड़ जाती है फिर भी आश्चर्य जनक ढंग से हो गई। कई बार ऐसी घटनायें पढ़ने में आई हैं कि जब कोई दुष्ट आततायी किसी निरीह बालक या अबला को मारने पर उतारू हुआ तो अचानक किसी सर्प ने आकर उसे गिरफ्तार कर लिया अथवा किसी अन्य प्रकार से उसके दुष्ट मनोरथ में विघ्न पड़ गया। इसी प्रकार कितने ही पाप कर्मों का भेद स्वप्न द्वारा प्रकट हो गया और अपराधी को उसी के आधार पर दण्ड मिल गया। एक बार हम ने पढ़ा था कि एक देहाती होटल वाले को स्वप्न में दिखलाई पड़ा कि दो व्यक्ति उसके यहाँ चाय पीने को आये। जब वे लोग वहाँ से चले गये तो सुनसान मार्ग में एक ने दूसरे को मार कर उसका रुपया ले लिया और लाश को वहीं झाड़ियों के बीच में गाड़ दिया। दूसरे दिन वास्तव में वैसी ही आकृति के, जैसी स्वप्न में देखी थी, दो व्यक्ति उसके यहाँ आये। इससे उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुन कर उसने उनका पता ठिकाना जान लिया। जब वे लोग होटल से चले गये तो वास्तव में एक ने दूसरे की हत्या करके उसका रुपया ले लिया। दस-पाँच दिन बाद जब एक व्यक्ति के आकस्मिक रूप से गायब हो जाने की बात चारों तरफ फैली और होटल वाले ने भी उसे सुना तो उसे उसे अपने स्वप्न का ध्यान आया और उसने अपना सन्देह एक पुलिस अधिकारी को कह सुनाया। पुलिस द्वारा जाँच करने पर उन्हीं झाड़ियों में लाश मिल गई और हत्याकारी भी पकड़ लिया गया। पहले तो उसने ऐसी स्वप्न की बात को यों ही उड़ा दिया और इसे होटल वाले ही का षड़यंत्र बतलाया, अन्त में उसे सत्य बात स्वीकार करनी पड़ी और फाँसी पर चढ़ना पड़ा।

इसी प्रकार अमरीका की एक युवती प्रथम योरोपीय महायुद्ध के समय “लूसिओनिया” नामक जहाज से इंग्लैंड की यात्रा करने वाली थी। वहाँ उसे अपनी एक सहेली के विवाह में प्रधान सहचरी के रूप में भाग लेना था। उसने बड़े उत्साह के साथ यात्रा की तैयारियाँ कीं। पर उसकी माता इस यात्रा से सहमत न थी और उसने अपनी पुत्री के घर से रवाना होते समय कहा कि “अगर यह लड़की इस जहाज से गई तो हम उसे फिर जिन्दा न देखेंगे।” तो भी वह उसके विरोध की परवाह न करके न्यूयार्क पहुँच गई। दूसरे दिन दोपहर के 12 बजे जहाज रवाना होने वाला था। दिन भर वह घूम-घूम कर न्यूयार्क स्थित मित्रों से मिलती रही। सब ने उसे बधाई व तोहफे दिये पर रात के समय जैसे ही वह सोने को गई उसके कान में एक अदृश्य आवाज सुनाई दी कि “इस जहाज पर सवार होने वाला फिर नहीं लौटेगा।” इससे उसे बड़ी बेचैनी हुई और रात का ज्यादा भाग जागते हुये ही बीता। सुबह होने पर रात के संघर्षमय विचार लुप्त हो गये और फिर उसके मन में साहस का संचार हुआ और वह अपने सामान को यात्रा के लिए ठीक करने लगी। जैसे ही सामान जहाज पर ले जाने को कुली ने दरवाजा खटखटाया कि उसको फिर वही प्रेरणा का स्वर सुनाई दिया—”अब भी समय है, आज के जहाज पर सवार होने वाला नहीं लौटेगा।”

अब उसका साहस जाता रहा और उसने बिना दरवाजा खोले ही कुलियों को लौटा दिया। फिर वह दौड़ी-दौड़ी जहाज पर गई और अधिकारियों से कहा कि मेरा पासपोर्ट नहीं आया है, इस लिये मैं जाने में असमर्थ हूँ। जहाज के अधिकारी उसे उसी समय स्थान देने को तैयार थे कि पासपोर्ट आता रहेगा, पर वह कुछ और बहाना बनाकर चली आई। घर लौटने पर उसके अनेक मित्रों ने उसकी ऐसी अस्थिर बुद्धि पर उलाहना भी दिया। पर एक सप्ताह बाद ही जब सब लोग चाय के टेबल पर बैठे गप शप कर रहे थे, अचानक टेलीफोन की घंटी बज उठी। छोटी बहिन संदेश सुनने को गई और उसे सुनते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया। उनके एक मित्र ने उसे बतलाया कि ‘लूसिटेनिया जहाज आयरलैण्ड के पास जर्मन गोताखोर नाव द्वारा डुबा दिया गया। उसके हजार-बारह सौ व्यक्तियों में से शायद ही कोई बचा हो।” पाठकों को यह बतलाने की आवश्यकता नहीं कि इस यात्री जहाज को डुबाने के ऊपर ही अमरीका ने भी जर्मनी के विरुद्ध घोषणा कर दी थी और वह मित्र दल में सम्मिलित हो गया था।

हमारे देश में भी ऐसी घटनाओं का अभाव नहीं है। पुराने जमाने में तो अनेकों भक्तों की भगवान ने जैसी चमत्कारी रीति से रक्षा की है, उसकी बात तो सभी धर्म प्रेमी जानते है, पर अब भी कभी-कभी दैवी सहायता के ऐसे स्पष्ट उदाहरण सुनने में आते हैं कि अविश्वासियों को भी विवश होकर दैवी सत्ता पर विश्वास करना पड़ता है। हाल ही में ऐसी ही एक घटना अनूपशहर (यू.पी.) के पास खुशालगढ़ में हुई थी जिसका विवरण विलखुना निवासी भक्त रामशरणदास जी ने “ज्योतिष्बही” में प्रकाशित कराया है, नीचे हम उसका साराँश दे रहे हैं—

“अभी उस दिन हमने सुना कि खुशालगढ़ का एक पाँच वर्ष का बालक हैजे से मर कर गंगाजी के हाथी डुबाऊ पानी में डाल दिया गया। वहाँ किसी अदृश्य शक्ति ने उसकी रक्षा की और उसे जीवित करके बाहर निकाल दिया। इस घटना की चर्चा उन दिनों स्थान-स्थान पर हो रही थी और लोग उस बालक के दर्शन करने जा रहे थे। हम भी उसके दर्शन करने के लिये अनूपशहर पहुँचे और रौचेरा गाँव के श्री मनवीरसिंहजी के साथ खुशालगढ़ गये। वहाँ लड़के के पिता ठाकुर महावीर सिंह जी मिले और उन्होंने सब घटना भी सुनाई, पर बालक वहाँ न था। वह अपनी माँ के साथ ननिहाल चला गया था जो सिंगौली ग्राम में है। हम खुशालगढ़ से वापस लौट कर स्वामी स्वतः प्रकाश हरिबाबा के स्थान पर ठहर गये और दूसरे दिन हसनपुर के पं.छज्जूमल जी पुरोहित के साथ सिंगौला जा पहुँचे। वहाँ लड़के के मामा श्री धनपाल सिंह जी बड़े प्रेम से मिले और बचे हुये बालक को बुलाकर हमसे मिलाया। हम अगले दिन शिशुको लेकर हरिबाबा के आश्रम पर आये और हजारों मनुष्यों की विराट सभा के बीच में उसे खड़ा करके सारी घटना को श्राद्योपाँत जनता को सुनाया। इसे सुनकर बड़े-बड़े नास्तिकों को बोलती बन्द हो गई और सब लोग सनातन धर्म की जयजयकार करने लगे। बाद में श्री प्रभावकुमार अग्रवाल ने शिशु का फोटो खींचा। घटना ज्यों की त्यों इस प्रकार है—

यह बालक जिसका नाम कुँवरपाल है, 5 वर्ष 2 महीने की आयु का है। वह अपने पिता ठा. महावीरसिंह के साथ अनूपशहर गया था और वहाँ उसने बाजार से लेकर कई चीजें खाईं और पानी पिया। इससे उसे वमन और दस्त होने लगे और हैजे का रूप धारण कर लिया। पिता बड़े घबराये और उसे डॉक्टर के पास ले गये, जहाँ इंजेक्शन लगाया गया। पर लाभ कुछ भी नहीं हुआ और एक घंटे में बालक मर गया। डॉक्टर ने भली भाँति देख कर मरा हुआ बतलाया। अब तो पिता फूट-फूट कर रोने लगे। अंत में उन्होंने बाजार से कपड़ा खरीदा और उसमें बालक को लपेट कर तथा गाँठें लगाकर गंगाजी के खूब गहरे जल में ले जाकर छोड़ दिया। जब पिता रोते-धोते ग्राम में पहुँचे तो वहाँ भी हाहाकार मच गया। घर वालों के शोक का तो कहना ही क्या था।

“लड़के को संध्या के 4 बजे जल में डाला गया था जहाँ नाव की बल्ली भी नहीं लगती थी। पर भगवान की विचित्र लीला देखिये कि रात के 9 बजे वेस्टरगंज के सदर घाट पर शकोई नामक गाँव के एक पंडितजी भजन करने आये तो उन्होंने एक बालक को जंजीर पकड़े हुये ‘चाचा’ ‘चाचा’ पुकारते सुना। उन्होंने जल में उतर कर उसे बाहर निकाल लिया और अपने घर ले गये। जब शिशु से पूछा गया कि तुम इस गहरे जल में कैसे तैरते रहे तो उसने कहा कि दो सफेद दाढ़ी वाले महात्मा मुझे हाथों पर उठाकर यहाँ तक ले आये और मुझे जंजीर पकड़ कर खड़े रहने को कह कर चले गये।” पंडित जी बच्चे को थाने में भी ले गये और वहाँ भी उसने यही बात कही। दूसरे दिन जब वह उसे लेकर खुशालगढ़ पहुँचे तो सब लोग बड़े शोक की अवस्था में थे और बालक के घर वालों को भोजन करने के लिए समझा बुझा रहे थे। इतने में बालक दौड़ कर अपने माता पिता से लिपट गया। सब लोग आश्चर्य चकित हो गये और गाँव में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। सब लोग “गंगा मैया की जय” कहकर चिल्लाने लगे। अभी तक बालक का नाम कुँवरपाल था, उसे बदलकर अब गंगाप्रसाद रख दिया गया। पंडित जी को खूब दक्षिणा आदि दी गई और अनूपशहर जाकर बड़ी धूमधाम से गंगा रामजी का पूजन किया गया।”

दैवी- सहायता के ऐसे उदाहरणों से निःसन्देह मनुष्य की बुद्धि चकित रह जाती है। वास्तव में यह विचार करना कि हमारे इस जीवन का अन्त होते ही सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है और सब भलाई बुराई यहीं समाप्त हो जाती है, एक बड़ा संकीर्ण विचार है। इस दृश्य जगत के बाद भी बहुत कुछ मौजूद है और उसका परिचय हमें कभी कभी ऐसी ही घटनाओं द्वारा प्राप्त हुआ करता है।


हमारी नई महत्वपूर्ण पुस्तकें

सूक्त संहिता—मू.1॥) इस पुस्तक में चारों वेदों से ऐसे 40 सूक्त संग्रह किये गये हैं, जिनके पाठ एवं मनन से मनुष्य की 40 भौतिक एवं साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं।

संस्कार पद्धति-2॥)—जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, अन्त्येष्टि आदि संस्कारों का महत्व और शास्त्रोक्त विधान।

भारतीय संस्कृति की रूप-रेखा-मू.2) हिन्दू-धर्म के आदर्शों, सिद्धान्तों, विश्वासों, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और प्रथा-परम्पराओं पर दार्शनिक एवं वैज्ञानिक विवेचन।

व्रत और त्यौहार—मू.1) हिन्दू-धर्म के प्रायः सभी व्रत और त्यौहारों का इतिहास, सन्देश, उद्देश्य, कारण और विधान।

प्रेरणाप्रद दृष्टान्त-मू. 2)—प्रवचन, व्याख्या, और धर्म-शिक्षा के समय बीच-बीच में उपयोग करने योग्य बड़े धार्मिक, शिक्षाप्रद एवं प्रेरणा देने वाले लगभग 400 दृष्टान्त।

सरल चिकित्सा विज्ञान-मू.2)—100 प्रमुख रोगों का निदान, लक्षण, चिकित्सा, पथ्य आदि का एक अनुभवी चिकित्सक द्वारा बड़ी ही सरल रीति से यह संग्रह किया गया है।

कल्प चिकित्सा-मू.2)—दूध कल्प, छाल कल्प, फल कल्प, शाक कल्प आदि के द्वारा शरीर में संचित पुराने रोगों की जड़ काट देने वाली चिकित्सा पद्धति का इस ग्रन्थ में बड़ा ही खोजपूर्ण वर्णन है।,

—अखंड ज्योति प्रेस, मथुरा।


जीवन को सुख-शाँतिमय बनाने वाला साहित्य

सस्ती, सुन्दर, उपयोगी एवं अनुभवपूर्ण अपने ढंग की अनोखी पुस्तकें

बिगड़े स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें

1.सूर्य चिकित्सा विज्ञान ।=)

2.भोग में योग।=)

3.तुलसी के अमृतोपम गुण =)

4.महान जागरण ।=)

5.तुम महान हो ।=)

6.घरेलू चिकित्सा ।=)

7.दीर्घ जीवन के रहस्य ।=)

8.नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा।=)

9.स्वप्नदोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा।=)

10.दूध की आश्चर्यजनक शक्ति ।=)

11.उन्नति का मूल मन्त्र ब्रह्मचर्य ।=)

12.उपवास के चमत्कार ।=)

13.स्त्री रोग चिकित्सा ।=)

14.बाल रोग चिकित्सा ।=)

15.निरोग जीवन का राजमार्ग ।=)

16.कब्ज की सरल चिकित्सा ।=)

17.मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार ।=)

18.मनचाही सन्तान ।=)

19.दांपत्ति जीवन का सुख ।=)

20.हमारे आन्तरिक शत्रु ।=)

21.क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें?।=)

22.हमारी सभ्यता के कलंक ।=)

23.अमृत पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति ।=)

24.जिन्दगी कैसे जिएं ।=)

जीवन में आनन्द भर ने वाली पुस्तकें

मरने के बाद हमारा क्या होता है?।=)

मित्र भाव बढ़ाने की कला ।=)

आकृति देखकर मनुष्य की पहिचान ।=)

हमें स्वप्न क्यों दिखते हैं।=)

हम वक्ता कैसे बन सकते हैं?

सफलता के तीन साधन ।=)

प्रसिद्धि और समृद्धि ।=)

हमारी पारिवारिक समस्याएँ ।=

ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?।=)

शक्ति संचय के पथ पर ।=)

ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग ।=)

हँसी खुशी का जीवन ।=)

मैं क्या हूँ?।=)

परकाया प्रवेश ।=)

स्वर से दिव्य ज्ञान ।=

जीव-जन्तुओं की मूक भाषा ।=)

वशीकरण की सच्ची सिद्धि ।=)

ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग ।=)

प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि =)

मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा ।=)

गृहस्थ योग ।=)

चिन्ताओं के छुटकारे का मार्ग।=)

मधुर सम्बन्धों का रहस्य ।=)

मूल्य में कमी के लिए लिखा-पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। 6) से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ। 3) से कम की वी.पी.नहीं भेजी जाती। 3) से 6) के बीच के मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च लगभग 1॥)अलग।

पता—’अखण्ड-ज्योति’ प्रेस,मथुरा।

*समाप्त*