ज्योतियाँ जिससे जलें अनेक, जलाओ ऐसा दीपक एक!
बुझे जो तूफानों में नहीं,
जले अविराम, तिमिर कर दूर।
धरा पर लाये पुण्य-प्रकाश-
स्नेह तुम दो, इतना भरपूर॥
पंथ ज्योतित हो उठें अनेक, जलाओ ऐसा दीपक एक!
प्रलय की झोंको में बुझ गये-
न जाने कितने दीप अजान।
जलादो, गाकर दीपक राग-
बावरे बैजू की बन तान॥
प्रेरणा भर दो ऐसी एक, स्वतः जागृत हो उठे अनेक!
सृजन हो नया, दृष्टि हो नई-
लगन हो नई, नया विश्वास।
हृदय में ले अदम्य उत्साह-
रचें फिर से नूतन इतिहास॥
पीर यदि भर दो ऐसी एक, कंठ से निकले गीत अनेक!
-रामस्वरूप खरे ‘साहित्य रत्न’
(स्वामी समतानन्द सरस्वती)
मानव जीवन को सुखी और सफल बनाने वाले जो अनेक गुण है उनमें प्रेम अन्यतम है। बड़े-बड़े दार्शनिकों और महाकवियों के कथनानुसार तो इस विश्व का भूल ही प्रेम है। यह तो प्रत्यक्ष है कि प्रेम से ही सब प्रकार की उन्नति, प्रगति और आनन्द की प्राप्ति होती है। जहाँ प्रेम का अभाव होता है वहाँ निराशा और पतन ही दिखलाई पड़ता हैं।
किन्हीं दो व्यक्तियों का प्रेम दोनों को ही लाभप्रद सिद्ध होता है इसका कारण यह है कि मनुष्य में एक शक्ति “ग्राहकता” होती है। वह दूसरे में जिस चीज को देखता है और जिसका चिन्तन करता है, वह उसमें भी आ जाती है। प्रेम के प्रभाव से मनुष्य अपने मित्र के गुणों को ही देखता है, उन्हीं की चर्चा और प्रशंसा करता है, इसलिये उसमें भी उनका आविर्भाव हो जाता है। यह बात मनुष्य के कल्याण की दृष्टि से बड़ी महत्वपूर्ण है। प्रेम से मनुष्य का मन शुद्ध और कर्तव्य पर आरुढ़ हो जाता है। बहुत से व्यक्ति बिना प्रेम के केवल कर्तव्य बुद्धि से भी भले काम करते रहें, पर उसमें उनको वह आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता जो प्रेमयुक्त मनोभावना रहने से मिलता है। इसलिये जहाँ एक कार्य उल्लास पूर्ण होता है दूसरा एक भार-स्वरूप हो जाता है।
पर साथ ही यह भी सत्य है कि सच्चे प्रेम उत्पन्न होना भी सहज नहीं है। स्वार्थयुक्त प्रेम को तो प्रेम कहना व्यर्थ है, क्योंकि वह अस्थायी होता है। जब स्वार्थ पूरा हो गया तो प्रेम भी घट गया। अथवा यदि किसी अन्य स्थान पर कोई बड़ा स्वार्थ सिद्ध होता जान पड़ा तो वहाँ प्रेम करने लग गये। इसी प्रकार वासनामय प्रेम भी प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता, वह भी स्वार्थ युक्त प्रेम का ही एक रूप है। जो प्रेम काम-भाव पर आधारित होता है वह आर्थिक स्वार्थ की अपेक्षा कुछ स्थायी होता है तो भी वह अनेक कारणों से परिवर्तनशील ही रहता है। इस कारण मनुष्य को प्रेम, विचारपूर्वक ही करना चाहिये और उसमें से जैसे संभव हो वासना का भाव दूर करते जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में सुपरिचित मनोवैज्ञानिक श्री लाला जी राम शुक्ल ने एक स्थान पर लिखा है -
“प्रेम का विकास धीरे-धीरे होता है। वासनामय प्रेम के स्थान में धीरे-धीरे त्यागमय प्रेम को उत्पन्न किया जा सकता है प्रेम के विकास के लिए गृहस्थ जीवन अच्छा स्थान है। पति-पत्नी का प्रेम आरम्भ में प्रायः वासना पूर्ति के हेतु होता है, परन्तु आगे चलकर एक दूसरे की सहायता और सेवा का रूप धारण कर लेता है। फिर जब सन्तान हो जाती है तो दम्पत्ति का प्रेम बच्चों की सेवा और उनके लाड़-प्यार का रूप ग्रहण करता है। माता-पिता बच्चों को इसलिये नहीं पालते कि वे उनको कमाकर खिलायेंगे, वरन् वे उनको इस कारण पालते हैं कि वे उनके आश्रित हैं और उन्हें प्यार किये बिना माता-पिता सुखी रह ही नहीं सकते। बच्चों का प्रेम माता-पिता की आध्यात्मिक पूर्ति का साधन बन जाता है। जिन लोगों में स्वार्थ बुद्धि अत्यधिक होती है, जो दूसरों के लिये कष्ट उठाना नहीं चाहते, जो अभिमान युक्त हैं, उन्हें या तो संतान होती ही नहीं, अथवा होकर मर जाती है संतान का होना और उसका जीवित रहना मनुष्य की उदारता की मनोवृत्ति पर निर्भर है। बालक के लालन-पालन का कार्य उसी प्रकार का है, जिस प्रकार एक फुलवाड़ी के पौधों की सेवा। जिस प्रकार पौधे को खाद्य, पानी और वायु की आवश्यकता होती है उसी प्रकार बालक को माता-पिता के प्रेम और देख-रेख की आवश्यकता होती है।
“मनुष्य का गृह प्रेम ही विकसित होकर विश्व-प्रेम का रूप धारण कर सकता है। दूसरे लोगों के बालकों के प्रति प्रेम, गरीब लोगों के प्रति प्रेम, रोगियों के प्रति प्रेम-ये सभी प्रकार के प्रेम उसी विकसित प्रेम के रूप हैं। जिस मनुष्य का जीवन जितना विकसित होता है उसका प्रेम उतना ही व्यापक होता है। ऐसा व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को प्रेम अपने किसी लाभ की दृष्टि से नहीं करता, वह उसकी भलाई की दृष्टि से ही प्रेम करता है। मनुष्य की भलाई का मापदण्ड उसकी दूसरों को प्यार करने की सामर्थ्य है। सामान्य पुरुष केवल अच्छे लोगों को ही प्यार कर सकते हैं। संतजन न केवल भले लोगों को प्यार करते हैं वरन् वे अपराधी और विषय लोलुप व्यक्तियों को भी प्यार करते हैं।
“किसी गिरे हुए व्यक्ति को हम प्रेम द्वारा ही उठा सकते हैं। गिरे हुये व्यक्ति में, चाहे वह अपराधी हो या रोगी, प्रेम की कमी होती है। ऐसे व्यक्ति को साधारणतः दुनिया का तिरस्कार मिलता है। इससे उसकी अपराध की मनोवृत्ति अथवा उसका रोग और भी बढ़ता जाता है। जब कोई व्यक्ति ऐसे व्यक्ति को अपना प्यार देता है तो उसके जीवन में कुछ सुधार हो जाता है। मनुष्य के मनोभाव संक्रामक (दूसरों पर असर डालने वाले) होते हैं। क्रोधी, ईर्ष्यालु और स्वार्थी लोग अपने संपर्क में आने वाले अन्य लोगों में भी ऐसे ही बुरे भावों को उत्पन्न करते हैं इसके विपरीत दयालु, परमार्थी और उदार स्वभाव के व्यक्ति अपने संपर्क से दूसरों में अपने ही जैसे भले मनोभावों को जाग्रत करते हैं। संत अपने संपर्क से दूसरों को भी संत बना लेता हैं। वह दूसरों को प्रेम और मानसिक शांति प्रदान करता है और उनकी जीवन धारा को कल्याण की ओर मोड़ देता है।”
प्रेम का वास्तविक स्वरूप यही है कि दूसरों के उपकार, भलाई के लिये जिस प्रकार संभव हो सहायता प्रदान की जाय। जिस व्यक्ति में ऐसी प्रेम भावना विद्यमान होगी, वह स्वयमेव ही अन्य व्यक्तियों के कल्याण के लिए कार्य करेगा। इसके लिये यह आवश्यक नहीं कि हम भौतिक वस्तुओं-धन, सम्पत्ति, भोजन, वस्त्र आदि द्वारा ही किसी की सहायता करें। इनसे भी अधिक सहायता मनुष्य अपने आन्तरिक विचारों और भावनाओं द्वारा कर सकता है। आधुनिक विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि विचारों की अत्यन्त सूक्ष्म तरंगें (लहरें) होती हैं जो बिजली की लहरों के समान निकट और दूरवर्ती व्यक्तियों पर प्रभाव डालती हैं। जब हम बारम्बार किसी के प्रति भले और उदार विचार मन में लाते हैं तो उससे उस व्यक्ति का हित अवश्य होता है। इसी प्रकार खराब विचारों के मन में लाने से बुरा फल निकलता है। अनेक साधु-महात्मा, भक्तजन इसी प्रकार संसार का कल्याण करते रहते हैं और अधिकाँश लोग उनको जानते भी नहीं। उनका कार्य पूर्णतया निःस्वार्थ होता है और वे स्वभावतः ही सबके साथ भलाई की मनोवृत्ति रखते हैं। जिनमें इस प्रकार की प्रेम शक्ति बहुत अधिक मात्रा में होती है और उसके द्वारा वे केवल दस-पाँच परिचितजनों का ही नहीं वरन् सार्वजनिक रूप से लोगों का कल्याण साधन कर जाते हैं तो वे ही महापुरुष के नाम से विख्यात हो जाते हैं।
प्रेम से जिस प्रकार मनुष्य दूसरों की भलाई करता है उसी प्रकार उसका अपना कल्याण भी होता है। भले और बुरे दोनों प्रकार के विचारों का यह नियम है कि जिसके प्रति वे किये जाते हैं उसे प्रभावित करके फिर वापस आकर विचार करने वाले पर भी प्रभाव डालते हैं। इस लिये जो व्यक्ति सदैव दूसरों के लिये प्रेम युक्त और कल्याणकारी विचार करते रहते हैं, वे परोक्ष रूप से अपना भी हित साधन करते हैं। इतना ही नहीं उनके प्रेम का दायरा दिन पर दिन बढ़ता जाता है। उनकी आत्मिक उन्नति होती जाती हैं और वे इसी मार्ग द्वारा उच्चकोटि के भगवत् प्रेम को प्राप्त कर लेते हैं। किसी मुस्लिम संत का उपाख्यान प्रसिद्ध है कि एक रात को उसने एक फरिश्ते को कुछ लिखते देखा। पूछने पर उसने बताया कि मैं भगवान के भक्तों के नाम लिख रहा हूँ। उक्त संत ने पूछा कि क्या मेरा नाम भी भक्तों में है? फरिश्ते ने देखकर कहा कि इस सूची में तो तुम्हारा नाम नहीं है। तब संत ने प्रार्थना की कि अगर इस सूची में नाम नहीं है तो कोई बात नहीं, आप मेरा नाम भगवान के भक्तों और अन्य जीवों से प्रेम करने वालों की सूची में लिख लीजिए। यह सुनकर फरिश्ता अदृश्य हो गया। दूसरे दिन वह फिर दिखाई दिया और आज उसके हाथ में उन लोगों की सूची थी जिनको भगवान स्वयं प्यार करते हैं। जब देखा गया तो उस सूची में सबसे ऊपर उक्त संत का नाम लिखा था।
इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि आध्यात्मिक उन्नति का सबसे पहला साधन प्रेम ही है। जो लोग केवल जप तप का ही आश्रय लेते हैं उनकी स्थिति बहुत संकीर्ण रहती है और वे आत्मज्ञानी बन जाने पर भी मुक्ति का सच्चा आनन्द प्राप्त नहीं कर सकते। वे महापुरुष अवश्य माने जाते हैं पर वे उस ताड़ के वृक्ष के समान होते हैं जो सब पेड़ों से ऊँचा होने पर भी न किसी को छाया देता है और न अन्य प्रकार का आश्रय। इसके विपरीत दूसरे प्रकार के महापुरुष आम के वृक्ष के तुल्य होते हैं जो पत्थर खाकर भी लोगों को फल, पत्ते छाया-सब कुछ देते रहते है। इसलिये सभी लोग उनके गुन गाते हैं और उन्हें प्यार करते हैं। यही सच्चा आध्यात्मिक मार्ग है। समस्त ज्ञान, शक्ति आदि तभी सार्थक है जब कि उसके द्वारा अन्य लोगों का हित साधन किया जाय और यह तभी हो सकता है जब हमारे भीतर प्रेम की सच्ची भावना हो।
(पं. देवेन्द्रकुमार शास्त्री एम.ए.)
प्राचीन काल में हमारे सामाजिक जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए कर्म, व्यवसाय, योग्यता आदि की दृष्टि से वर्ण व्यवस्था की गई थी। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन की दृष्टि से ऐसा करना उचित ही था। हमारे पूर्वज मनीषियों ने दूरदर्शिता से काम लेकर वर्ण-व्यवस्था की जो सुरुचिपूर्ण योजना बनाई, विश्व संस्कृति के लिए महान देन है।
वर्ण-व्यवस्था की सुरुचिपूर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण को समाज में सर्वोपरि स्थान दिया गया। साथ ही साथ समाज की महान् जिम्मेदारियाँ भी ब्राह्मण पर छोड़ी गईं। राष्ट्र एवं समाज के नैतिक स्तर को कायम रखना उन्हें प्रगतिशीलता एवं विकास की ओर अग्रसर करना, जन जागरण एवं अपने त्यागी तपस्वी जीवन में महान् आदर्श उपस्थित कर लोगों को सत्पथ का प्रदर्शन करना ब्राह्मण जीवन का आधार बनाया गया।
ब्राह्मण का जीवन त्याग अथवा बलिदान का जीवन होता है। उसका प्रत्येक कार्य अपने लिए नहीं वरन् समाज के लिए होता है। ब्राह्मण स्वयं के लिए कुछ नहीं करता। इसी कारण उसे समाज में विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगा। अपनी साधारण सी आवश्यकता रख कर ज्ञान-विज्ञान की अनवरत साधना, और उससे समाज को उन्नत एवं स्वस्थ बनाने का परम पुनीत कर्तव्य एवं महान जिम्मेदारी ब्राह्मण पर ही है। किसी भी समाज एवं राष्ट्र का तथा ब्राह्मण का पहला सम्बन्ध होता है। वेद भगवान भी कहते हैं “हरातत् सिच्यते राष्ट्र ब्राह्मणो यत्र जीयते” जिस देश का ब्राह्मण हारता है वह देश खोखला हो जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि राष्ट्र की जागृति, प्रगतिशीलता एवं महानता उसके ब्राह्मणों पर आधारित होती है। ब्राह्मण राष्ट्र निर्माता होता है, मानव हृदयों में जागरण का संगीत सुनाता है, समाज का कर्णधार होता है। देश काल पात्र के अनुसार सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन करता है और नवीन प्रकाश चेतना प्रदान करता है। त्याग और बलिदान ही ब्राह्मणत्व की कसौटी है।
ब्राह्मण का जीवन साधारणतया दो सूत्रों पर आधारित होता है :- स्वयं का आत्म विकास और आदर्शमय जीवन का निर्माण। इसके लिए जीवन पर्यन्त ज्ञान विज्ञान की सतत साधना, तपश्चर्या, खोज आदि। ये जीवन पर्यन्त चलते रहना आवश्यक है।
(2) अपने अनुभवों, सत्य सिद्धान्तों एवं नैष्ठिक जीवन के अनुसार समाज सेवा। जिसके अंतर्गत समाज के बौद्धिक स्तर को उच्च बनाना, अन्धविश्वास, अन्ध परम्पराओं को समाप्त करना, कुरीतियों एवं बुराइयों को मिटाना, समाज का नैतिक एवं कल्याणकारी पथ प्रदर्शन करना उसे विकास एवं प्रगतिशीलता की ओर प्रेरित करना आदि महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ हैं।
ब्राह्मण के दूसरे कर्तव्य के अनुसार समाज की बौद्धिक एवं आध्यात्मिक सेवा का उत्तरदायित्व महान है। भारतीय तत्वदर्शियों ने ज्ञान दान की इस पुनीत योजना के लिए दो मार्ग अपनाये थे। जो प्रत्येक ब्राह्मण के लिए आवश्यक हैं। ज्ञान दान के अंतर्गत अपने विचारों, अनुभवों, सिद्धान्तों एवं सुधारात्मक प्रक्रियाओं को वाणी और लेखनी द्वारा विस्तृत मानव समाज तक क्रियान्वित करना और उनका प्रसार करना आवश्यक कर्तव्य है। वाणी के द्वारा धर्मप्रचार, कथा उपदेश, प्रवचन, सत्संग आदि हैं। अपने विचारों को कहकर समाज को ज्ञान लाभ पहुँचाने के साथ-साथ ही पत्र लिखना, विद्वानों के लिखित ग्रंथों का लिखित विचारों का विस्तार कर यदि सुविधा हो तो स्वयं भी साहित्य निर्माण करना ब्राह्मण के लिए उचित है। सद्विचार, सत्य सिद्धान्त, अनुभवगम्य ज्ञान लेखनबद्ध कर देने पर काफी समय तक ये मानव समाज का हित करते हैं।
हमारे पूर्वज ऋषियों का पवित्र जीवन इन्हीं तत्वों पर आधारित था। उनका आदर्श एवं महान कर्तव्य-परायण जीवन समाज को निरन्तर प्रगति विकास एवं उत्थान की ओर अग्रसर करता रहता था। यही कारण था कि उस समय हमारा देश ज्ञान वान कला कौशल, व्यापार उद्योग-धन्धे, नैतिकता, सच्चरित्रता धार्मिकता आदि में बढ़ा-चढ़ा था। मनुष्यों तक ही नहीं वरन् हमारा सम्बन्ध इतर प्राणियों से भी घनिष्ठता एवं आत्मीयता के सूत्रों में पिरोया हुआ था। ज्ञान वान के अगाध भण्डार स्वरूप नाना शास्त्र, पुराण, उपनिषद्, मीमाँसा, दर्शन कलाओं का विकास आज भी भारत के गौरव को बढ़ा रहा है। आज भी उस समय के ब्राह्मणों का पवित्र एवं मर्यादापूर्ण जीवन हमें प्रकाश की ओर मार्ग प्रदर्शन कर रहा है और भविष्य में करता रहेगा।
खेद है कालान्तर में ब्राह्मणत्व की उन महान् जिम्मेदारियों एवं उत्तरदायित्वपूर्ण कठोर कर्तव्यों को अधिकाँश रूप में भुला दिया गया है। आज केवल जाति अथवा वंश परम्परा के आधार पर ही ब्राह्मण जीवन की इतिश्री मान ली गई है। इतना ही नहीं इस रूढ़िवाद में अधिकाँश रूप में घुसी हुई लोभ, संचय, स्वार्थवृत्ति आदि ने तो ब्राह्मणत्व के महान आदर्श को प्रायः भुला दिया है। बहुत से लोगों ने तो ब्राह्मण जीवन को स्वार्थपूर्ति, धन संचय, ऐश्वर्य, वैभव आदि का ही उद्देश्य बना लिया है। इतना ही नहीं अपने स्वार्थ के लिए भिन्न-भिन्न गलत परम्पराओं, सिद्धान्तों, अन्ध विश्वास आदि का प्रतिपादन किया है। इनसे भोली भावुक एवं श्रद्धालु जनता को गलत निर्देश भी मिला है जो देश और समाज के लिए पतन, अवनति, एवं दुर्भाग्य का सूचक है।
महान जिम्मेदारी एवं कठोर कर्तव्य पालन के अनुसार ब्राह्मण का समाज से जीवन निर्वाह मात्र की सामग्री लेकर ज्ञानदान सत्शिक्षण नैतिक जागृति धर्म प्रसार आदि प्रक्रियाओं को चलाते रहना ही जीवन उद्देश्य होता हैं। किन्तु आज देखा जाता है कि अधिकाँश रूप में ब्राह्मण नाम पर अनधिकृत दान दक्षिणा लेने का पेशा बना लिया गया है। इस प्रकार की धन संचयवृत्ति, स्वार्थ भावना, ब्राह्मणत्व के विपरीत है। ब्राह्मण नाम पर एक कलंक है।
अपनी अवास्तविक एवं गलत स्थिति का सूक्ष्म निरीक्षण कर उसे सुधार लेना ही हितकर होता है। उस पर अड़ना “चोरी और सीनाजोरी” करना ही है। ब्राह्मण नाम की आड़ में होने वाले मर्यादा विरुद्ध अंधपरम्परा युक्त, कर्तव्य विरुद्ध पतन कारी दुष्कर्मों, आडम्बरों, ढोंग, स्वार्थ एवं संचयवृत्ति, आदि इस युग में अधिक नहीं टिकने वाले।
इस समय परिवर्तनों का युग है, जिसमें कई राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक परिवर्तन हो रहे है। इससे देर तक पोल खाता नहीं चल सकता। जिन्हें ब्राह्मणत्व से प्रेम है उनका कर्तव्य है कि उन महान आदर्शों का पालन किया जाय जो इस महान पद के लिए उचित एवं आवश्यक है।
आज कई धर्मसेवी, समाज सेवी व्यक्ति ब्राह्मणत्व की महान् मर्यादाओं का पालन करते हुए देश के नैतिक तथा साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए कठोर श्रम कर रहे हैं। ऐसे ब्राह्मणों को, धर्मसेवकों को इस पवित्र उद्देश्य की ओर बढ़ने में सहयोग देना, देश वासियों का परम कर्तव्य है ताकि राष्ट्र की धार्मिक चेतना पुनः जाग उठे।
आज सूक्ष्म लोक से ऋषियोँ की आत्मायें हमारे अन्तःकरणों में “वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिता” हम ब्राह्मण इस राष्ट्र को जगाये रखें, का दिव्य संदेश झंकृत कर रही है। इस गम्भीर उद्घोष को साकार रूप देने के लिए हमें आज साँस्कृतिक एवं नैतिक पुनरुत्थान के लिए तैयार हो जाना है। ब्राह्मण जीवन की उच्च तथा कठोर मर्यादाओं का पालन करना ही सच्चे धर्म प्रेमियों के लिए इस युग की साधना है, तपश्चर्या है।
(योगीराज श्री 108 स्वामी ईश्वरानन्द सरस्वती)
योग का नाम सुनते ही कितने ही लोग चौंक उठते हैं उनकी निगाह में यह एक ऐसी चीज है जिसे लम्बी जटा वाला और मृग चर्मधारी साधु जंगलों या गुफाओं में किया करते हैं। इसलिये वे सोचते हैं कि ऐसी चीज से हमारा क्या सम्बन्ध? हम उसकी चर्चा ही क्यों करें?
पर ऐसे विचार इस विषय में उन्हीं लोगों के होते हैं जिन्होंने कभी इसे सोचने-विचारने का कष्ट नहीं किया। अन्यथा योग जीवन की एक सहज, स्वाभाविक अवस्था है जिसका उद्देश्य समस्त मानवीय इन्द्रियों और शक्तियों का उचित रूप से विकास करना और उनको एक नियम में चलाना है। इसीलिये योग शास्त्र में “चित्त वृत्तियों का निरोध” करना ही योग बतलाया गया है। गीता में ‘कर्म की कुशलता’ का नाम योग है तथा ‘सुख-दुख के विषय में समता की बुद्धि रखने’ को भी योग बतलाया गया है। इसलिये यह समझना कोरा भ्रम है कि समाधि चढ़ाकर, पृथ्वी में गड्ढा खोदकर बैठ जाना ही योग का लक्षण है। योग का उद्देश्य तो वही है जो योग शास्त्र में या गीता में बतलाया गया है। हाँ इस उद्देश्य को पूरा करने की विधियाँ अनेक हैं, उनमें से जिसको जो अपनी प्रकृति और रुचि के अनुकूल जान पड़े वह उसी को अपना सकता है। नीचे हम एक योग विद्या के ज्ञाता के लेख से कुछ ऐसा योगों का वर्णन करते हैं जिनका अभ्यास घर में रहते हुये और सब कामों को पूर्ववत् करते हुये अप्रत्यक्ष रीति से ही किया जा सकता है-
(1) कैवल्य योग-कैवल्य स्थिति को योग शास्त्र में सबसे बड़ा माना गया है। दूसरों का आश्रय छोड़कर पूर्ण रूप से अपने ही आधार पर रहना और प्रत्येक विषय में अपनी शक्ति का अनुभव करना इसका ध्येय हैं। साधारण स्थिति में मनुष्य अपने सभी सुखों के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है। यह एक प्रकार की पराधीनता है और पराधीनता में दुख होना आवश्यक है। इसलिये योगी सब दृष्टियों से पूर्ण स्वतंत्र होने की चेष्टा करते हैं। जो इस आदर्श के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाते हैं वे ही कैवल्य की स्थिति में अथवा मुक्तात्मा समझे जा सकते हैं। पर कुछ अंशों में इसका अभ्यास सब कोई कर सकते हैं और उसके अनुसार स्वाधीनता का सुख भी भोग सकते हैं।
(2) सुषुप्ति योग-निद्रावस्था में भी मनुष्य एक प्रकार की समाधि का अनुभव कर सकता है। जिस समय निद्रा आने लगती है उस समय यदि पाठक अनुभव करने लगेंगे तो एक वर्ष के अभ्यास से उनको आत्मा के अस्तित्व को ज्ञान हो जायेगा। सोते समय जैसा विचार करके सोया जायगा उसका शरीर और मन पर प्रभाव अवश्य पड़ेगा। जिस व्यक्ति को कोई बीमारी रहती है वह यदि सोने के समय पूर्ण आरोग्य का विचार मन में लायेगा और “मैं बीमार नहीं हूँ।” ऐसे श्रेष्ठ संकल्प के साथ सोयेगा तो आगामी दिन से बीमारी दूर होने का अनुभव होने लगेगा। सुषुप्ति योग की एक विधि यह भी है कि निद्रा आने के समय जिसको जागृति और निद्रा संधि समय कहा जाता है, किसी उत्तम मंत्र का जप अर्थ का ध्यान रखते हुए करना और वैसे करते ही सो जाना। तो जब आप जगेंगे तो वह मंत्र आपको अपने मन में उसी प्रकार खड़ा मिलेगा। जब ऐसा होने लगे तब आप यह समझ लीजिये कि आप रात भर जप करते रहें। यह जप बिस्तरे पर सोते-सोते ही करना चाहिये और उस समय अन्य किसी बात को ध्यान मन में नहीं लाना चाहिये।
(3) स्वप्न योग - स्वप्न मनुष्य को सदा ही आया करते हैं, उनमें से कुछ अच्छे होते हैं और कुछ खराब। इसका कारण हमारे शुभ और अशुभ विचार ही होते हैं। इसलिये आप सदैव श्रेष्ठ विचार और कार्य करके तथा सोते समय वैसा ही ध्यान करके उत्तम स्वप्न देख सकते हैं। इसके लिये जैसा आपका उद्देश्य हो वैसा ही विचार भी कर सकते हैं। उदाहरण के लिये यदि आपकी इच्छा ब्रह्मचर्य पालन की हो तो भीष्म पितामह का ध्यान कीजिये, दृढ़ व्रत और सत्य प्रेम होना हो तो श्रीराम चंद्र की कल्पना कीजिये, बलवान बनने का ध्येय हो तो भीमसेन का अथवा हनुमान जी का स्मरण कीजिये। आप सोते समय जिसकी कल्पना और ध्यान करेंगे स्वप्न में आपको उसी विषय का अनुभव होता रहेगा।
(4) बुद्धियोग - तर्क-वितर्क से परे और श्रद्धा-भक्ति से युक्त निश्चयात्मक ज्ञान धारक शक्ति का नाम ही बुद्धि है। ऐसी ही बुद्धि की साधना से योग की विलक्षण सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। यद्यपि अपने को आस्तिक मानने से आप परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं, पर तर्क-युक्त बात ऐसे योग में काम नहीं देती। अपना अस्तित्व आप जिस प्रकार बिना किसी प्रमाण के मानते हैं, इसी प्रकार बिना किसी प्रमाण का ख्याल किये सर्व मंगलमय परमात्मा पर पूरा विश्वास रखने का प्रयत्न और अभ्यास करना चाहिए। जो लोग बुद्धि योग में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं उनको ऐसी ही तर्क रहित श्रद्धा उत्पन्न करनी चाहिए तभी आपको परमात्मा विषयक सच्चा आनन्द प्राप्त हो सकेगा।
(5) चित्त योग-चिन्तन करने वाली शक्ति को चित्त कहते हैं। योग-साधना में जो आपका अभीष्ट है उसकी चिन्ता सदैव करते रहिये। अथवा अभ्यास करने के लिए प्रतिमास कोई अच्छा विचार चुन लीजिये। जैसे “मैं आत्मा हूँ और मैं शरीर से भिन्न हूँ।” इसका सदा ध्यान अथवा चिन्तन करने से आपको धीरे-धीरे अपनी आत्मा और शरीर का भिन्नत्व स्पष्ट प्रतीत होने लगेगा। इस प्रकार अच्छे कल्याणकारी विचारों का चिन्तन करने से बुरे विचारों का आना सर्वथा बन्द हो जायगा और आपको अपना जीवन आनन्दपूर्ण जान पड़ने लगेगा।
(6) इच्छा योग -जिससे मनुष्य किसी बात की प्राप्ति अथवा निवृत्ति की इच्छा करता है उसको इच्छा शक्ति कहते हैं। मनो-विज्ञान की दृष्टि से इच्छा शक्ति का प्रभाव अपार है, जिसके द्वारा सब तरह का महान् कार्य सिद्ध किया जा सकता है। बुराई से बचने का मुख्य साधन इच्छा शक्ति है। आप अपनी प्रबल इच्छाशक्ति द्वारा रोगों के आक्रमण को रोक सकते हैं। मानसिक प्रेरणा देने से बड़ी-बड़ी बीमारियाँ दूर हो सकती हैं। चरित्र सम्बन्धी सब दोषों को भी इच्छा शक्ति द्वारा दूर किया जा सकता है ओर उत्तम आचरण ग्रहण किये जा सकते हैं। यह शक्ति प्रत्येक में होती है, प्रश्न केवल उसे बुराई की तरफ से भलाई की तरफ प्रेरित करने का है।
(7) मानस योग -मन का धर्म अच्छे और बुरे विचार करना है। मन को एकाग्र करने से उसकी शक्ति बहुत बढ़ सकती है और उसे उन्नति तथा कल्याण के कार्यों में लगाया जा सकता है। इसके लिये अभ्यास द्वारा मन को आज्ञाकारी बनाना चाहिये जिससे वह उन्हीं विचारों में लगे जिनको आप उत्तम समझते हैं।
(8) अहंकार-योग -अहंकार शब्द का अर्थ ‘घमंड” भी होता है पर यहाँ उस अर्थ से हमारा तात्पर्य नहीं है। यहाँ पर इसका भाव अपनी अन्तरात्मा से है। अहंकार योग का उद्देश्य यह है कि मनुष्य अपने को भौतिक शरीर से भिन्न समझे और आत्मा के अजर, अमर, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिशाली आदि गुणों का ध्यान करके उनको ग्रहण करने का प्रयत्न करे। जब मनुष्य के भीतर यह विचार जम जाता है तो वह जिस कार्य का या अनुष्ठान का निश्चय कर लेता है, उसे फिर पूरा करके ही रहता है, क्योंकि उसे यह दृढ़ विश्वास होता है कि मैं शक्तिशाली आत्मा का रूप हूँ जिसके लिए कोई कार्य असंभव नहीं।
(9) ज्ञानेन्द्रिय-योग -ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच मानी गई हैं-आँख, कान, नाक, जीभ, चर्म। इनका सम्बन्ध क्रमशः अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल और वायु के साथ होता है। इनमें योग साधन के लिये सबसे प्रमुख इन्द्री आँख को माना गया है। मन की एकाग्रता प्राप्त करने के लिये आँखों की दृष्टि को किसी एक स्थान या केन्द्र पर जमाना होता है। इससे मन की शक्ति बढ़ जाती है और उसका दूसरों पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ने लगता है। इसके द्वारा फिर अन्य इन्द्रियों पर भी कल्याणकारी प्रभाव पड़ने लगता है।
(10) कर्मेन्द्रिय-योग -कर्मेन्द्रियाँ पाँच हैं-वाणी, हाथ, पाँव, गुदा और शिश्न। इनमें सबसे अधिक उपयोग वाणी का ही होता है और वह मानव-जीवन के विकास का सबसे बड़ा साधन है। वाणी द्वारा हम जो शब्द उच्चारण करते हैं उनमें बड़ी शक्ति होती है। योग साधन वाले को वाणी से सदैव उत्तम और हितकारी शब्द ही निकालने चाहिये। इस प्रकार का अभ्यास करने से अंत में आपको वाक्सिद्धि की शक्ति प्राप्त हो सकेगी।
वास्तव में मनुष्य का समस्त जीवन ही एक प्रकार का योग है। मनुष्य के रूप में आकर जीवात्मा, परमात्मा को पहिचान सकता है और उसे प्राप्त कर सकता है। इसलिये हमको अपनी प्रत्येक शक्ति को एक विशेष उद्देश्य और नियम के साथ विकसित करनी चाहिये जिससे वह उन्नत होती चली जाय। अगर मनुष्य इस प्रयत्न में सच्चे मन से बराबर लगा रहेगा तो उसे सब प्रकार की दैवी शक्तियाँ प्राप्त हो जायेंगी और वह परमात्मा के निकट पहुँचता जायगा।
(श्री नारायण प्रसाद बाजपेई, एम.ए.एल.बी.)
भारतवर्ष सदा से धर्मपरायण देश रहा है, जीवन-निर्वाह के लिए भौतिक सम्पत्ति की आवश्यकता पड़ती है, पर यहाँ के लोगों ने उसको कभी सर्वोपरि स्थान नहीं दिया। यहाँ समय-समय पर बराबर ऐसे त्यागी, महात्मा होते आये हैं जिन्होंने धन-सम्पत्ति को तुच्छ समझ कर अपना जीवन परमात्मा के चिन्तन और उसी के ज्ञान का प्रचार करने में लगा दिया। ऐसे महापुरुषों ने परमात्मा और सृष्टि के गूढ़ भेदों को प्रकट करके सर्व साधारण को आध्यात्मिक जीवन का ज्ञान प्रदान किया। इनमें से अनेक संत पुरुष ऐसे भी हुये हैं जिन्होंने कहीं पढ़ने-लिखने की अथवा साहित्यिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, पर उनके उपदेश बड़े प्रभावशाली हैं और उन्होंने बहुत साधारण शब्दों में गूढ़ आध्यात्मिक तत्वों को समझा दिया है। ऐसे संतों में कबीर साहब का स्थान बहुत ऊँचा है। शिक्षा की दृष्टि से यद्यपि वे सर्वथा निरक्षर थे और उन्होंने स्वयं कहा है कि “मसि कागद छुयों नहि कलम गहो नहिं हाथ” अर्थात् “मैंने कभी स्याही और कागज को छुआ भी नहीं और न कभी हाथ से कलम को पकड़ा।” पर उनकी वाणी ऐसी सार-गर्भित है कि लगभग पाँच सौ वर्ष बीत जाने पर भी आज तक निरक्षर और साक्षर सब उनको पढ़कर शिक्षा और आनन्द प्राप्त करते हैं। उनके बहुत से पद ऐसे हैं जो असम्भव जान पड़ने वाली उक्तियों से भरे हैं और जिनकी बातें बिल्कुल उल्टी जान पड़ती हैं, पर जब उन पर बारीकी से विचार किया जाता है तो उनका अर्थ बहुत उपदेशप्रद जान पड़ता है। नीचे हम उनकी रचना के कुछ ऐसे नमूने देते हैं-
“धरती बरसे बादल भीजै, भीट भया पैराऊ। हंस उड़ाने ताल सुखाने, चहले बीधा पाऊ”
इस पद में कबीर साहब कहते हैं कि “यह कैसे आश्चर्य की बात है कि धरती से वर्षा हुई और बादल भीग गया और जो भीट और ऊँचा टीला था वह गहरा होकर पानी की झील बन गया, हंसों के उड़ जाने से ताल सूख गया, पर पैर कीचड़ में ही फँसे रह गये।”
इसका वास्तविक तात्पर्य यह है कि मनुष्य की बुद्धि है वही धरती है, क्योंकि सब प्रकार के मतों और सिद्धान्तों का आधार वही है। उससे जो वाणी रूप पानी बरसता है अर्थात् तरह-तरह के धर्म सम्बन्धी सिद्धान्त प्रकट होते हैं उससे बादल रूप जीव भीग रहा है, अर्थात् जीव उन सिद्धान्तों को ग्रहण कर लेता है। चारों वेद ही ज्ञान के सबसे ऊँचे टीले माने जाते हैं, पर उनकी थाह किसी ने नहीं पाई, इसलिये अथाह तालाब या झील की तरह बन गये । साधारण रूप में तो ताल के सूखने पर हंस उड़ कर चले, पर यहाँ शरीर रूपी तालाब से जब जीव रूपी हंस उड़कर चले जाते हैं और यह शरीर सूख जाता है अर्थात् नष्ट हो जाता है। पर जब चौमासे में जल बरसता है तो फिर जैसे का तैसा हो जाता है। इस प्रकार यह जीव जब दूसरे शरीर में जाता है तो फिर पहले के समान ही वासना रूपी कीचड़ में फँसा रह जाता है।
अब एक और शब्द सुनिये-
हाथ न बाके पाउँ न वाके, रूप न वाके रेखा। बिना हाट हटवाई लावे, करै वयाई लेखा॥
अर्थात् “उसके न हाथ है, न पाँव है न उसकी कोई रूपरेखा है तो भी वह बिना हाट (बाजार) के ही लेन देन करता है और बया (तोलने वाले) की तरह एक की जिन्स दूसरे को देता है।”
इसका तात्पर्य है कि जो समष्टि रूप चैतन्य ब्रह्म है उसके न हाथ है न पैर है और न उसका कोई स्वरूप या आकार है। इस हाट रूपी जगत से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है अर्थात् वह देश, काल और निमित्त से परे है। तो भी वह जीव रूप में माया के वश होकर हटवाई (लेन−देन) करने लगता है। अर्थात् जगत के प्रपंच में फँस जाता है और कर्मों के फल को पाने लगता है।
प्रथमै नगर पहुँचतै, पटिगो शोक सँताय। एक अचम्भो हौं देखो, बेटी ब्याहै बाप॥
साधक जब गुरु के समीप गया तो उन्होंने ईश्वर की उपासना का मार्ग बताया जिससे जीव और ब्रह्म की अभेदता का ज्ञान हृदय में उदय हो। इससे पहले देवता की उपासना का मार्ग छूट गया अर्थात् उससे सम्बन्ध विच्छेद होने से प्रथम ही शोक संताप का अनुभव होने लगा। दूसरा आश्चर्य यह हुआ कि गुरु ने जब यह उपदेश दिया कि तुम ही पूर्ण ब्रह्म हो, तो उस दर्जे पर पहुँचना तो सहज नहीं है, इस उपदेश को सुनकर वह अपने को ब्रह्म मान कर धर्म कर्म छोड़ बैठा और ज्ञान-अज्ञान के द्वंद्व में फँस गया और इस प्रकार जीव को माया ने, (जो जीवात्मा अथवा ब्रह्म से ही उत्पन्न होती है और इस दृष्टि से उसी की बेटी है) साँसारिक बन्धनों में बाँध लिया।
वर नहिं वरै ब्याह नहि करई, पुत्र-जन्म हो निहारी। काटे मूड़े यक नहिं छाँड़ै, अवहुँ आदि कुमारी॥
वर अर्थात् श्रेष्ठ जन वे हैं जो ईश्वर के भक्त हैं, उनको संसार की विद्या-अविद्या स्पर्श नहीं कर सकती है और जो इस विश्व का पति अथवा संचालक ब्रह्म है वह ब्याह नहीं करता अर्थात् माया में नहीं फँस सकता। ऐसी अवस्था में माया पुत्र रूप जगत को ही उत्पन्न करती है वह इस जगत में काटे (चोटी रखने वाले हिन्दू) और मूड़े (सिर मुड़ाने वाले मुसलमान) किसी को नहीं छोड़ती अर्थात् सबको अपने वश में करके रखती है फिर भी वह सर्वदा कुंवारी ही बनी रहती है अर्थात् स्वयं किसी के वश में नहीं होती।
उन्दर राजा टीका बैठै, विषहर करे खवासी।
श्वान वापुरा धरनि ठाकुरा, बिल्ली घर में दासी॥
अर्थात् “उन्दुर अर्थात् चूहा तो राजा बना है विष पर अर्थात् सर्प उसका खवास या सेवक बना है कुत्ता उसके भंडारी का कार्य कर रहा है और बिल्ली दासी बनी हुई है।”
इसका तात्पर्य यह है कि उन्दुर रूपी जीव ने शरीर को अपना मान लिया और इस प्रकार वह उसका राजा बन गया। काल (समय) रूपी सर्प है वह “खवास (खाने वाला) होकर उसकी आयु को खाता जाता है अर्थात् प्रतिदिन कम करता जाता है। श्वान अर्थात् साँसारिक विषयानन्द ने जीव को धरिके (पकड़कर) ढक लिया है। अर्थात् जो षद् दर्शनों की बाते हैं वे घर में दासी हो रही हैं अर्थात् जीव को तरह-तरह के मतों में फँसा कर भगवान की भक्ति रूपी गोरस से वंचित कर देती है।
कागज हार कार कुड आगे, बैल करै पटवारी। कहै कबीर सुनो हो सन्तो, भैसै न्याउ निवारी॥
जो गुरु बनने वाले लोग हैं वे कागज लिखकर अर्थात् पोथी बनाकर रखते हैं, उन पोथियों से गुरु लोगों के चेला जो बैल रूप है वे पटवारगीरी करते हैं अर्थात् इस काया नगरी के बने वाले मन, बुद्धि चित्त, अहंकार, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, दश इन्द्रिय आदि का विचार करते हैं कि कौन किसके अधीन हैं और वे पटवारी ज्ञान रूपी द्रव्य वसूल करके आत्मा रूपी राजा के सुपुर्द करते हैं। पर इस तरह के ऊपरी ज्ञान से किसी का उद्धार नहीं हो सकता। क्योंकि जो गुरु लोग हैं वे स्वयं भैंसा की तरह साँसारिक मोह के कीचड़ में पड़े हैं और अपने चेलों को भी यह उपदेश करके कि तुम्हीं ब्रह्म हो, कीचड़ में फँसाते हैं। कबीर साहब कहते हैं कि जैसे भैंसा यम की सवारी है, वैसे ही ये भैंसा भी तुमको यमपुर ही ले जायेगा।
(जेम्स ऐलन)
मन का भाव सदैव एकरस और मधुर रखना, निर्मल और बुद्धिमानी के विचारों का मनन करना, सब प्रकार की स्थिति में संतोष रखना और ऐसी श्रेष्ठ स्थिति के होते हुये अपना जीवन और व्यवहार ऐसा रखना कि जिससे दूसरों के ऊपर प्रभाव पड़ सके-यही सब मनुष्यों की भावना होनी चाहिये। खास कर जो व्यक्ति साँसारिक दुःखों को कम करना चाहते हैं उनका तो यही एकमात्र मार्ग है। यदि कोई मनुष्य अपने भीतर पाये जाने वाले अविवेक, असंतोष और अन्य दोषों को दूर न कर सका हो, और उनके होते हुये भी ऐसा विचार करता हो कि किसी शास्त्रीय सिद्धान्त या सम्प्रदाय के प्रचार से दुनिया सुखी बन सकेगी तो वह वास्तव में बड़ी भूल करता है। जो मनुष्य सदैव कठोर, कटु शब्द बोलता हो, खराब रास्ते पर चलता हो अथवा असंतोषी हो, तो वह दुनिया के दुःखों को बढ़ाने वाला है। इसके विपरीत जो मनुष्य प्रत्येक समय संतोष रख कर परोपकार का विचार करता रहता है और संतोष के भाव को भली प्रकार स्थिर रखता है वह दुनिया के सुख को बढ़ाया करता है।
जो मनुष्य विवेकयुक्त, क्षमाशील, प्रेमी और संतोषी बनना नहीं जानता, उसने चाहे पुस्तकीय ज्ञान अथवा धर्म सम्बन्धी ज्ञान कितना भी क्यों न प्राप्त कर लिया हो, पर हम तो यहीं कहेंगे कि वह कुछ भी पढ़ा नहीं है। जीवन का गहन, उपयोगी और स्थायी ज्ञान तो, विवेकशील, निर्दोष और संतोषी होने से ही प्राप्त हो सकता है। हमारे प्रतिपक्षी चाहे कितना भी विरोध का भाव क्यों न प्रकट करें, तो भी यदि हम उनके साथ निरन्तर मधुर व्यवहार ही करते रहें, तो यह मन के ऊपर नियंत्रण रख सकने का दृढ़ प्रमाण है। विवेक ही ज्ञान का सहकारी है।
सबको प्रिय जान पड़े ऐसा संतोषी जीव अनुभव और विवेकयुक्त ज्ञान का परिपक्व फल है और वह संसार को सुधार कर तथा दूसरे लोगों को आनन्द प्रदान करके अपनी कीर्ति रूपी अदृश्य सुगन्ध को देश-देशान्तर में फैला देता है। अगर आप उन गुणों को धारण करना चाहते हैं, जो वास्तव में एक सच्चे पुरुष या सच्ची स्त्री के लिये प्रशंसनीय समझे जाते हैं, तो आपका कर्तव्य है कि आज से ही उनको प्राप्त करने का प्रयत्न आरम्भ कर दें। यह कहते रहना कि परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं हैं, व्यर्थ की बात है। किसी भी मनुष्य की परिस्थितियाँ उसके विरुद्ध नहीं होतीं, वरन् वे तो उसकी सहायक होती हैं। जिन बाहरी घटनाओं को तुम कटु और अशान्ति उत्पन्न करने वाली समझते हो, वे तुम्हारे विकास के लिये आवश्यक है। उन घटनाओं का सामना करके तुम शिक्षा ग्रहण कर सकते हो, अपनी वृत्तियों को उन्नत बना सकते हो और पूर्णतः प्राप्त करके महान पुरुष बन सकते हो। जो दोष तुमको दिखलाई पड़ते हैं, वे सब तुम्हारे अपने ही हैं।
पूर्ण संतोष ही जीवात्मा की सच्ची, सुखी और आनन्दमय स्थिति है, और जो कोई निर्दोष और निस्वार्थ रहकर व्यवहार करेगा वह इस स्थिति को अवश्य प्राप्त कर सकता है। प्राणी मात्र के लिये परोपकार की भावना रखो और अति लोभ, क्रोध और बुरी निगाह को इस प्रकार दबा दो कि तुम्हारा जीवन हवा की सुखद लहरों की तरह सुन्दर बन जाय।
क्या यह कार्य तुमको बहुत कठिन जान पड़ता है? अगर ऐसी बात है तो असंतोष और अशान्ति को तुम दूर नहीं कर सकते। इस कार्य में शीघ्र ही सफलता तभी प्राप्त हो सकती है जब इस बात के लिये तुम्हारे मन में दृढ़ आस्था, अभिलाषा और निश्चय हो।
निराश होना, चिड़चिड़ाना, चिन्ता करना, बड़बड़ाना, दूसरे की निन्दा करना और अपना रोना रोते रहना- ये सब सड़े हुये विचार हैं- मन के रोग हैं। वे हमारे मस्तिष्क की दुर्दशा को प्रकट करते हैं, और जो इस रोग से पीड़ित हों उनको अपने विचार और व्यवहार का सुधार करना आवश्यक है। यह बात ठीक है कि संसार में पाप तथा दुःख की अधिकता है, इसीलिये उसे हमारे पूर्ण प्रेम और दयाभाव की आवश्यकता है। हमारे रोने की किसी को जरूरत नहीं। ऐसा रोना तो सब जगह पहले से ही मौजूद है। इसलिये अगर जरूरत है तो हमारे आनन्दी और संतोषी स्वभाव की है, क्योंकि उनकी सर्वत्र कमी है। हम संसार को अपने स्वभाव और व्यवहार के मिठास से बढ़कर और कोई चीज नहीं दे सकते। इसके अतिरिक्त सब व्यर्थ है। यही सब से अच्छी चीज है, सत्य है, स्थायी है, अविनाशी है और इसी में समस्त सुख और परमानन्द समाया हुआ है।
तुम पर यदि विपत्तियाँ आती हैं-तुमको हानि उठानी पड़ती है, तो उससे निराश मत बनो। दूसरों के पापयुक्त की निन्दा करना और उन व्यक्तियों का विरोध करना बन्द कर दो। दूसरों को हानि पहुँचाने वाले अथवा दुष्टतापूर्ण विचारों को त्याग दो, क्योंकि इसी से तुमको मन की शान्ति, शुद्ध धर्म और सच्चे सुधार की प्राप्ति हो सकेगी। तुम दूसरों को सत्यवादी बनाना चाहते हो तो पहले स्वयं सत्यवादी बनो। पाप और दुःखों से संसार को मुक्त कराना चाहते हो तो पहले स्वयं इन बुराइयों से मुक्त बन जाओ। तुम अपने घर के लोगों और पड़ोसियों को संतोषी देखना चाहते हो तो पहले स्वयं संतोषी हो जाओ। अगर तुम स्वयं बदल जाओगे तो अपने आस-पास की सब वस्तुओं को भी बदल सकोगे।
शोक मत करो, दुःखी मत हो, निराशावादी बनकर अपना आत्मबल मत घटाओ। अगर कोई बात बुरी जान पड़े तो उसकी निन्दा करते मत फिरो, वरन् जो कुछ सत्य और सुन्दर जान पड़े उसी का गुणगान करते रहो।
तुम्हारे भीतर जो सज्जनता का भाव है, उसका अनुभव जैसे-जैसे तुमको होता जायगा, वैसे-वैसे तदनुकूल व्यवहार तुम स्वयं ही करने लगोगे।
(श्री शम्भूसिंह कौशिक)
महर्षियों द्वारा विचरित प्राचीन ग्रंथों में सावित्री अथवा गायत्री को परमब्रह्म की महाशक्ति प्राप्त करने का सर्व सुलभ साधन बतलाया गया है। इस मंत्र में जो ‘सवितु’ शब्द दिया गया है उसका अर्थ भौतिक सूर्य मंडल से नहीं समझना चाहिये, वरन् उसका अर्थ विश्व की प्रेरक शक्ति अर्थात् परमात्मा से ही मानना ठीक है। ‘सविता” और “सावित्री” का रहस्य प्रकट करने वाले वचन भिन्न-भिन्न उपनिषदों में स्थान-स्थान पर मिलते हैं। उनके अर्थ पर सम्मिलित रूप से ध्यान देने पर गायत्री सर्व व्यापकता स्पष्ट प्रकट हो जाती है। इस प्रकार एक उदाहरण यहाँ दिया जाता है-
कः सविता का सावित्री?
अग्नि रेव सविता पृथिवी सावित्री
कः सविता का सावित्री?
बरुण एव सविताऽऽपः सावित्री।
कः सविता का सावित्री?
वायु रेव सविताऽऽकाशः सावित्री
कः सविता का सावित्री?
आदित्य एव सविता द्योः सावित्री।
भावार्थ यह कि सविता और सावित्री कौन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में उपनिषद्कार कहते हैं कि अग्नि, वरुण, वायु, यज्ञ, पर्जन्य, सूर्य, चन्द्र, मन आदि सविता के रूप हैं और इनकी शक्ति स्वरूपा पृथ्वी, जल, आकाश, विद्युत, द्यौः, नक्षत्र, वाक् आदि सावित्री हैं।
अब यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि अगर गायत्री मंत्र निराकार, अचिन्त्य परमात्मा का निर्देश करता है तो फिर उसकी उपासना में सूर्य मंडल को क्यों सम्मिलित किया गया? इसका उत्तर यही है कि यद्यपि हम सबमें गर्मी का अस्तित्व है, पर जो वस्तु या व्यक्ति हमसे अधिक गरम होता है उसे छूने से गरमी का अनुभव होता है। इसी प्रकार ईश्वरीय शक्ति सब वस्तुओं में है, पर जिनमें उसका परिणाम अधिक होता है। उन्हीं में हमको उसका प्रत्यक्ष दर्शन हो सकता है और उन्हीं का उदाहरण देते हैं। इससे अतिरिक्त चीजों का आकार नहीं होता। उनके गुणों को समझाने के लिये कोई भौतिक वस्तु ही बताई जाती है। जैसे हम अगर मीठा या चरपरा स्वाद किसी अनजान व्यक्ति को समझाना चाहें तो उसके लिये गुड़ और मिर्च की सामने रखने से ही काम चल सकता है।
यहाँ जो सूर्य मंडल को प्रतीक माना गया है वह बहुत उपयुक्त है। यह तो सभी जानते हैं कि हमारी पृथ्वी सूर्य का एक छोटा सा अंश (ग्रह) है। साथ ही यह भी विदित है कि पृथ्वी पर समस्त प्राणियों और वनस्पति की उत्पत्ति और पालन बिना सूर्य किरणों के सम्भव ही नहीं है। योरोप के वैज्ञानिकों ने तो अब सन् 1700 के लगभग यह पता लगाया था कि सूर्य की किरणों में सात रंग शामिल है, पर हमारे देश में हजारों वर्ष पहले शास्त्रों में लिख दिया गया था-
भ्राजते दीप्यते यरमाज्जगदन्ते हरत्यापि।
कलाग्नि रूप मास्थाय सप्तार्चि सप्तरश्मिभिः॥
इसमें याज्ञवलक्य जी ने स्पष्ट कह दिया है कि “सूर्य की सात किरणें” हैं। इन्हीं सात किरणों को पुराणों में सूर्य के रथ में जुते हुये सात घोड़े कह दिया गया है। अब अनेक वैज्ञानिक इन रंगों को रंगीन कांचों द्वारा पृथक करके उनसे व्याधियों की चिकित्सा करने लग गये हैं। इधर भारतीय चिकित्सा ग्रंथों में “आरोग्य भास्करादिच्छेत्” आदि वाक्य पहले से ही मौजूद हैं। जिनसे विदित होता है कि इस देश की चिकित्सा प्रणाली में भी सूर्य किरणों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था।
गायत्री की सर्वव्यापकता
कुछ लोग यह शंका करते हैं कि जब गायत्री मंत्र शब्द रूप है और मंत्र में जिस विषय को प्रतिपादित किया गया है वह भर्ग (तेज) स्वरूप है, तो यह दोनों पदार्थ भिन्न-भिन्न प्रकृति के हैं। “भर्ग को तो सर्वव्यापक स्वीकार किया जा सकता है, पर शब्द स्वरूप गायत्री किस प्रकार सर्वव्यापी हो सकती है ?
इस शंका के समाधान के लिये हमें वाक्(वाणी) और अर्थ के सम्बन्ध को भली प्रकार समझना पड़ेगा। दो दालों से बने चना, मूँग आदि पदार्थों को जब उगाया जाता है तो उनके सदैव दो पत्ते ही निकलते हैं। इसी प्रकार जगत में भी पिता और माता का शुक्र शोषित घटित बीज गर्भ में स्थापित होता है और उसी से चैतन्यता युक्त मानव का विकास होता है।
वाक् भी आत्मा की एक अमृत कला है। इसी प्रकार चिद् ब्रह्म की अभिव्यक्ति के दो पहलू हैं एक अर्थानुभूति और दूसरा वाक् स्फुरणा। ये दोनों एक ही हैं। जिस प्रकार मंत्र और देवता में कोई अंतर नहीं है उसी प्रकार वाक् और अर्थ भी एक ही हैं। ये एक ही आत्मा की अभिव्यक्ति है, इन दोनों का तादात्म्य होना स्वाभाविक ही है। इसी प्रकार गायत्री मंत्र और उसका देवता ‘भर्ग’ ये दोनों समान रूप से सर्वत्र व्याप्त हैं।
(श्री ज्ञानकुमार एम.एस.सी.)
यद्यपि भारतीय योग का चरम लक्ष्य आत्मानुभूति और जीवन्मुक्ति की अवस्था को प्राप्त करना है, तो भी योगाभ्यास से साधक की भौतिक शक्तियाँ भी इतनी बढ़ जाती है कि अनेक ऐसे कार्य कर दिखा सकते हैं जो बड़े-बड़े वैज्ञानिक यंत्रों और विधियों से भी सम्भव नहीं है। उदाहरण के लिये एक तत्व को दूसरे तत्व में परिवर्तित करने के लिये आधुनिक वैज्ञानिक बहुत समय से प्रयत्न कर रहे हैं, पर अभी तक उनको इस प्रयोग को सफलता प्राप्त नहीं हुई है। अब अणु शक्ति का ज्ञान होने और उसके प्रयोग की विधि मालूम होने पर उनको आशा होने लगी है कि वे निकट भविष्य में एक तत्व को दूसरे में बदलने में समर्थ हो सकेंगे। उदाहरणार्थ वे लोहे या ताँबे का सोना बना सकेंगे या मिट्टी को चीनी के रूप में परिवर्तित कर सकेंगे।
पर भारतीय योगियों ने इस प्रकार की शक्ति प्राचीन समय से प्राप्त कर ली हैं और समय-समय पर वे इसका परिचय भी देते रहे हैं। हमने ऐसी एक दो नहीं सैकड़ों घटनायें पढ़ी और सुनी है कि सिद्ध महात्माओं ने आवश्यकता पड़ने पर पानी से घी का काम ले लिया, या थोड़े से भोजन को इतना बढ़ा दिया कि दस व्यक्तियों की सामग्री से सौ का काम चल गया है।
आधुनिक समय में इस प्रकार चमत्कार दिखला सकने वालों में काशी के स्वामी विशुद्धानन्द जी का नाम बहुत प्रसिद्ध है। वे बाल्यावस्था में वर्द्धवान के निकट एक गाँव में रहते थे, पर 17 वर्ष की आयु में जब आपको एक पागल कुत्ते ने काट खाया और प्राण नाश की आशंका होने लगी तो एक योगी ने आकर इनको बचाया और फिर योग मार्ग का उपदेश देकर हिमालय में पहुँचा दिया। वहाँ वे “ज्ञान-गंज” नामक योगाश्रम में विभिन्न गुप्त विद्याओं का अध्ययन करते रहे और अनेक वर्षों के बाद एक शक्ति सम्पन्न योगी के रूप में पुनः लोकालय में आये और यहाँ विभिन्न स्थानों में घूम-फिर दीन दुखी जनों का कल्याण साधन करते रहे।
स्वामी जी साधारण लोगों में “गन्ध बाबा” के नाम से विख्यात थे। जितने लोग उनके संपर्क में आते थे उन सबका यही अनुभव था कि उनकी देह से एक विशेष प्रकार की मनोरम गन्ध निकला करती है। वह प्रायः कमल फल (पद्म) की गन्ध से मिलती होती थी, पर वास्तव में वह एक निराली ही चीज थी। स्वामी जी जहाँ उठते-बैठते वहाँ बहुत दूर तक यह सुवास फैली रहती थी।
कुछ समय पहले इंग्लैंड के एक पत्रकार पालब्रंटन भारत भ्रमण के लिये आये। उनका मुख्य उद्देश्य यहाँ के योगियों और महात्माओं की रहस्यपूर्ण शक्तियों की जाँच करना था। अनेक स्थानों में घूमते-फिरते वे बनारस में स्वामी विशुद्धानन्दजी के पास भी पहुँचे थे और उनकी अलौकिक शक्तियों का उन्होंने ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया था। उन्होंने अपनी पुस्तक में इस सम्बन्ध में जो विवरण दिया है उसकी कुछ बातें यहाँ दी जाती हैं-
“जब मैं पहुँचा तो कुछ लोग जमीन पर अर्द्ध वृत्ताकार बैठे हुये थे और कुछ ही दूर पर एक वृद्ध महात्मा विराजमान थे। उनके श्रद्धा उत्पन्न करने वाले रूप को देखकर मैं समझ गया यही योगी जी हैं। उनकी आयु 70 वर्ष से अधिक होगी। किसी विचित्र शक्ति से उनका कमरा परिपूर्ण जान पड़ता था। मेरे पहुँचने के कुछ देर बाद योगी ने बंगला में कहा “कल तीसरे पहर पंडित गोपीनाथ कविराज के साथ आना तभी बातचीत हो सकेगी।”
“दूसरे दिन 4 बजे जब मैं गोपीनाथ जी के साथ आश्रम में पहुँचा तो योगी ने पूछा कि “क्या तुम मेरा कोई चमत्कार देखना चाहते हो?”
ब्रंटन-यदि आपकी ऐसी दया हो तो मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी।
विशुद्धानन्द-अच्छा अपना रुमाल मुझे दो। यदि रेशम का रुमाल होगा तो अच्छा है। जो सुगन्ध तुम चाहो इस रुमाल पर आतिशी शीशे एवं सूर्य किरणों द्वारा मैं पैदा कर सकता हूँ। तुम कौन सी सुगन्ध चाहते हो?
ब्रंटन-चमेली की!
योगी ने बाँये हाथ से ब्रंटन का रुमाल लिया और आतिशी शीशा दाहिने हाथ से उसके ऊपर थोड़ी दूर रखा। दो सैकिण्ड तक एक सूर्य किरण रुमाल पर पड़ी। इसके बाद योगी ने रुमाल ब्रंटन को लौटा दिया। ब्रंटन ने रुमाल नाक से लगाया तो चमेली की खुशबू दिमाग में भर गई।
ब्रंटन ने अच्छी तरह रुमाल की परीक्षा की, पर उसमें कहीं गीलापन न था, न इस बात का कोई चिन्ह था कि उस पर तरल सुगन्ध या इत्र टपकाया गया है। ब्रंटन ने आश्चर्य से वृद्ध योगी की तरफ देखा। योगी ने चमत्कार को फिर से दिखाने का वचन दिया। ब्रंटन ने इस बाल गुलाब का इत्र चुना। वे लिखते हैं कि “इस बार मैं बड़े ध्यान से सब काम देखता रहा। जरा सा हिलने-डुलने पर और योगी के चारों तरफ मेरा ध्यान था। मैंने उनके हाथों की परीक्षा की, उनके दूध से श्वेत वस्त्रों की जाँच करके देख लिया, परन्तु कोई भी सन्देहजनक बात नहीं मिली। योगी ने फिर पहली तरकीब से रुमाल के दूसरे कोने में गुलाब की गहरी सुगन्ध पैदा कर दी।” तीसरी बार ‘वायलेट’ के फल का नाम लिया और योगी ने शीशे के द्वारा वायलेट की खुशबू पैदा कर दी। विशुद्धानन्द अपनी इन सफलताओं से बिल्कुल अनासक्त से हैं। वे सारे प्रदर्शन के प्रति एक साधारण बात की तरह व्यवहार करते थे। उनके चेहरे की गम्भीरता एक क्षण के लिए कम नहीं होती। चौथी बार विशुद्धानन्द ने कहा कि “अच्छा, अब मैं अपनी तरफ से एक ऐसे फूल की खुशबू पैदा करूंगा जिसको तुमने आज तक नहीं सूँघा होगा, क्योंकि वह फल तिब्बत में ही पैदा होता है। यह कह कर उन्होंने आतिशी शीशे का प्रकाश रुमाल के चौथे कोने पर डाला और उसमें से वास्तव में ऐसी खुशबू आने लगी जिसे हम पहिचान नहीं सकते थे।”
“दूसरे दिन हम फिर एक जीवित कबूतर लेकर विशुद्धानंद जी के पास गये। वहाँ उनके कहने से कबूतर का गला घोंटकर मार डाला गया। इसके बाद वह एक घंटे तक सब लोगों के सामने पड़ा रहा कि जिससे लोग देखलें कि वह वास्तव में निर्जीव है उसकी आँखें पथरा गई थी और शरीर कठोर पड़ गया। बहुत गौर करने पर भी उसमें कोई ऐसा लक्षण दिखलाई नहीं पड़ता था जिससे उसे जीवित समझा जा सकता।
“तब योगी ने अपना काँच का गोला उठाया और उसके द्वारा पक्षी की एक आँख में सूर्य किरण का प्रतिबिम्ब केन्द्रित किया। कुछ देर ऐसा करने के बाद वे कोई मंत्र पढ़ने लगे और थोड़ी देर में पक्षी का शरीर हिलने लगा। ऐसा जान पड़ता था कि मृत्यु की वेदना से वह तड़प रहा है। कुछ देर बीतने पर उसने पर फड़फड़ाये और देखते-देखते अपने पैरों पर खड़ा हो गया। कुछ मिनट बीतने पर पक्षी कमरे में उड़कर एक ताक पर बैठ गया। आधे घंटे से ज्यादा समय तक वह एक स्थान से दूसरे स्थान तक उड़ता रहा, फिर निर्जीव होकर गिर पड़ा।”
विशुद्धानन्द जी ने ब्रंटन को बतलाया कि इन चमत्कारों से “योग” का कोई सम्बन्ध नहीं है। वरन् ये सूर्य-विज्ञान द्वारा किये गये हैं और इनकी विधि वैसी ही स्पष्ट है जैसी कि आजकल के अन्य वैज्ञानिक प्रयोगों की होती है। इसके लिये योगाभ्यास की आवश्यकता नहीं। साधारण संसारी व्यक्ति कुछ समय अभ्यास करके इसे कर सकता है। उन्होंने यह भी बतलाया कि इसी प्रकार “चन्द्र विज्ञान” “नक्षत्र विज्ञान” “वायु विज्ञान” “क्षण विज्ञान” “शब्द विज्ञान” “मनोविज्ञान आदि और भी बहुत सी विद्याएं हैं, जिनसे अनेक अभूतपूर्व और असम्भव समझे जाने वाले काम करके दिखाये जा सकते।
(श्री वेदप्रकाश अगवाल बी.काम.)
आध्यात्मिक उन्नति द्वारा किस प्रकार एक साधारण दिखलाई पड़ने वाला मनुष्य संसार की सब विभूतियों और शक्तियों का स्वामी बन जाता है, इसका परिचय हमारे मुँजसर (बड़ोदा) निवासी श्री मुगुटराम महाराज के चरित्र से मिलता है। उनको हुये अभी थोड़ा ही समय हुआ है, उनका जन्म सं0 1930 में हुआ था। उनकी शक्तियों का लाभ उठाने वाले अभी हजारों व्यक्ति उस प्रदेश में मौजूद हैं। वे छोटी अवस्था से ही अपने नाना के पास रहे थे, जो स्वयं एक बहुत बड़े साधक और धार्मिक पुरुष थे। इसके फल से मुगुटरामजी में छोटी अवस्था में ही भक्ति और ज्ञान के अंकुर उत्पन्न हो गये थे, जिन्होंने बड़ी आयु में एक विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लिया और अपनी छाया तथा फलों से अनगिनत नर-नारियों का कल्याण किया।
मुगुटरामजी को वर्तमान समय की तरह स्कूल या कालेज की शिक्षा प्राप्त नहीं हुई थी। वे प्रायः कहा करते थे कि “अरे भाई, मैं तो केवल गुजराती की दो पुस्तकें पढ़ा हुआ हूँ, अगर नौकरी करनी पड़े तो मुझे कोई दस बारह रुपया से ज्यादा तनख्वाह न देगा, पर भगवान के भजन और गायत्री के जप के प्रभाव से ही मुझे सब प्रकार की सफलता प्राप्त हो सकती है। वे बतलाया करते थे कि मैं रात भर नीचे की तरफ माथा और ऊपर पैर करके तथा पैरों को एक खूँटी से बाँधकर शिवजी का भजन करता था और सुबह 3-4 बजे से लेकर 6-10 बजे तक गायत्री का जप करता था। कभी-कभी लगातार बारह घंटा बैठकर जप ही करता रहता था।” इस प्रकार की कठोर तपस्या और साधना का फल यह हुआ कि उनकी आन्तरिक शक्तियाँ पूर्णरूप से विकसित हो गई और वे प्रतिदिन ऐसे कार्य करते रहते थे जिनको लोग चमत्कार ही मानते थे।
(1) जैसा हमने ऊपर लिखा है मुगुटरामजी नाम मात्र को स्कूल की दो पुस्तकें पढ़े थे। पर उनको अपने आप सब भाषाओं का ज्ञान हो गया था। एक दिन बड़ौदा के एक सरकारी अफसर आये तो उनके साथ तैलंगी भाषा में बात करने लगे, फिर दूसरे व्यक्ति के साथ कर्नाटकी भाषा बोलने लगे। एक दिन कोई फकीर आया तो उसके साथ उर्दू में खूब बातचीत की। काम पड़ने पर अंग्रेजी भी बोल लेते थे।
(2) इतनी कम शिक्षा होने पर भी उनको समस्त शास्त्रों का ज्ञान था। उन्होंने कभी ज्योतिष नहीं सीखी थी, पर वे हजारों मनुष्यों की कुँडली देख कर उनका ठीक-ठीक फल बता देते थे। जिनके पास कुँडली न हो उनकी आकृति तथा हाथ देखकर ही कुँडली तैयार कर देते थे। स्वर-शास्त्र के वे पूरे जानकार थे और कहते थे। कि इसके द्वारा विश्व की समस्त बातों का पता लग सकता हैं। उन्होंने बड़ौदा के पुलिस कमिश्नर श्री घाटगे की स्वर-शास्त्र की दो चार बातें बतला दी थी। उसके फल से एक भयंकर डाकू मीरखाँ को पकड़ते समय उनकी अद्भुत रीति से रक्षा हो जाती थी।
(3) योग शास्त्र की उनको पूरी जानकारी थी। वे षटचक्रों का ऐसा वर्णन करते थे कि मानों उनको आँखों से प्रत्यक्ष देख रहे हों। शरीर के किस अंग में कौन सी चीज है इसका वर्णन स्पष्ट रूप से कर देते थे। प्राणायाम, आसन मुद्रा आदि सब विषयों को वह भली प्रकार समझा देते थे।
(4) वे कहते थे नक्षत्रों का तमाम वनस्पतियों के साथ सम्बन्ध है। इस लिये अगर खास नक्षत्र में कोई वनस्पति लाई जाय और रोगी को विशेष विधि पूर्वक दी जाय तो उसका रोग अवश्य दूर हो जायगा। इस वनस्पति का अमुक देवता के लिये अमुक नक्षत्र में हवन करने से भी बड़ा लाभ हो सकता है।
(5) मंत्र शास्त्र के बड़े ज्ञाता थे और किस मंत्र का प्रयोग कहाँ करना यह बहुत अच्छी तरह जानते थे। स्वयं अनेक मंत्रों की रचना अद्भुत रीति से करते थे। दूसरे मंत्रों के स्वरूप और सामर्थ्य को भली प्रकार जानते थे। वे आवश्यक ‘बीज’ अक्षर मंत्र के आरंभ, अंत या मध्य में लगाकर साधन का ऐसा विधान बतला देते थे, कि मंत्र का प्रयोग अवश्य सफल होता था।
(6) वे वेदों के मंत्र बोलकर उनका तात्पर्य अच्छी तरह समझा देते थे। प्रसंग आने पर उपनिषदों की कथायें सुनाते थे। पुराण तो ऐसा लगता था कि उनको कंठस्थ ही है। जो पंडित जिस प्रसंग को लेकर उनके पास आता वे उसी विषय के सब प्रकार के शास्त्रीय प्रमाण उसे सुना देते थे।
(7) अपनी जन्म जात आत्म शक्ति और गायत्री की असाधारण उपासना के बल से उनका वचन सिद्ध हो गया था। जो कुछ मुँह से निकल जाता वही सत्य हो जाता। उदाहरणार्थ ब्राह्मण भोजन करने को बैठे और पानी बरसने लगा, तो आप कहते कि वर्षा तो अभी बन्द हो जायेगी और वैसा ही हो जाता। “ जा, तेरा ज्वर अभी उतर जायगा।” यह कहते ही ज्वर दूर हो जाता। जा, भगवान तुझे पुत्र देगा, तो शीघ्र ही पुत्र का मुख दर्शन होता। जाओ, महादेव पर सवा पाँच सेर दूध चढ़ाना तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा तो, वैसा ही होता। साँप के काटे मनुष्यों से कहते जाओ तुम्हारा जहर उतर जायगा, तो साँप के काटे से लोग बच जाते। इस तरह असंख्य लोगों ने उनके वचन की सिद्धि से लाभ उठाया था।
(8) कभी किसी की रक्षा के लिये आवश्यकता पड़ जाती तो वे दूसरा शरीर धारण कर लेते थे। इसी प्रकार जंगल में नारायण स्वामी की शेर के आक्रमण से रक्षा की थी। पक्षी क्या बोल रहे हैं इसे वे भली प्रकार समझ जाते थे। वे कहते थे कि जब हम परावाणी में प्रवेश कर जाते हैं तो संसार के समस्त प्राणियों की बोलियाँ और भाषायें समझ में आने लग जाती हैं।
(9) तप द्वारा उनको लक्ष्मी की भी सिद्धि हो गई थी। इस लिये बिना किसी से कुछ भी माँगे और पैसा रुपया का स्पर्श न करने पर भी वे राजाओं की तरह खर्च करते रहते थे। अपने जीवन में उन्होंने लाखों मनुष्यों को अन्नदान और दक्षिणा दी थी। राजाओं के से बड़े-बड़े ब्रह्मभोज करते रहते थे, बड़े-बड़े यज्ञ करते थे। अपने नाना और माता के मरने पर पास में पैसा न होते हुये भी उनकी क्रिया कर्म ऐसे धूमधाम से की कि जैसा कोई लखपति भी नहीं कर सकता।
(10) जो कोई अपने किसी मृत सम्बन्धी से बातचीत करना चाहता तो वे उसकी आत्मा को तुरन्त बुला देते और उससे स्पष्ट बातें करते हुये उसकी इच्छा पूछने वाले को बता देते थे। एक बार ईडर रियासत के मुँसिफ श्री चतुर्भुज माणकेश्वर भट्ट उनके पास आये और अपनी मृत पत्नी से बात करने की इच्छा प्रकट की। उन सज्जन को इस बात का पूरा विश्वास हो गया कि वास्तव में उनकी पत्नी की आत्मा ने आकर बातचीत की थी। भविष्य के विषय में वे प्रायः लोगों को पहले से बतला देते थे। दूसरों के मन की बात जानकर बिना कहे ही उसका उत्तर दे देना उनके लिये बिल्कुल साधारण बात थी।
(11) एक बार उनकी बातचीत एक डॉक्टर से हो रही थी, जो पेरिस (फ्राँस) होकर आया था। मुगुटरामजी ने अपने स्थान में बैठे हुये ही दूरदर्शन शक्ति द्वारा उसे पेरिस का सब हाल सुना दिया, जिसे डॉक्टर ने बिल्कुल ठीक बतलाया। इस पर पास में बैठे उच्छवलाल जौहरी को कौतूहल हुआ और उसने परीक्षा के लिये महाराज से कहा कि मेरा कपड़वंज कस्बे में जो मकान है उसका वर्णन बतलाइये। महाराज ने कहा-”यह कौन सी कठिन बात है। तेरे घर की हाल तो ये डॉक्टर साहब ही बतला सकते हैं।” उनके यह कहते ही डॉक्टर साहब सचमुच जौहरी के घर के भीतर का हाल बतलाने लग गये, जिसको उसे सत्य मानना पड़ा। इस प्रकार वे दूसरे लोगों में भी चमत्कारी शक्ति उत्पन्न कर देते थे। अनेक मरते हुये व्यक्तियों को उन्होंने मंत्र पढ़ कर जल पिलाने से बचा दिया था। एक बहुत बढ़े अफसर का हृदय रोग एक फूँक कर दूर कर दिया।
(12) दुनिया में किस जगह कौन-कौन योगी और सिद्ध पुरुष रहते है इसका उनको भली प्रकार पता था। इच्छा होने पर उनके साथ बातचीत करते, उनको अपने पास बुला लेते अथवा सूक्ष्म शरीर से स्वयं उनके पास चले जाते।
(13) अपने पास आने वाले मनुष्यों के पूर्व जन्म का हाल भी वे बतला देते थे। उस जन्म के किस कर्म के पाप से इस जन्म में कष्ट मिल रहा है। इसका पूरा हाल वे जान सकते थे और फिर उसको मिटाने का उपाय बतलाते उसको करने से निश्चय ही वह कष्ट दूर हो जाता था।
(14) उनके यहाँ आने वाले मनुष्यों का कोई हिसाब न था। रसोइया और उनकी पत्नी उनसे पूछ लेते थे कि कितने व्यक्तियों की रसोई बनेगी। फिर भी प्रायः ऐसा होता था कि दस आदमियों का भोजन बना और खाने वाले 25-30 आ गये-पच्चीस का भोजन बनाया गया और खाते समय सौ आदमी आ गये। पर उनके यहाँ कभी भोजन का अभाव नहीं हुआ। सदा हर एक चीज इच्छानुसार मिलती रहती थी। वे कहा करते थे कि मेरे ऊपर अन्नपूर्णा की कृपा है। कभी भंडार में कमी नहीं पड़ सकती।
इस प्रकार महात्मा मुगुटरामजी ने अनेक वर्षों तक अपनी आध्यात्मिक शक्ति से सर्व साधारण का अकथनीय उपकार करके यह दिखला दिया कि यदि मनुष्य सच्चे हृदय से प्रयत्न करे और ईश्वर पर विश्वास रखे तो उसके लिये कुछ भी असंभव नहीं है।
(पं. रामकुमार शर्मा काव्य तीर्थ)
मानव जीवन से श्वाँस का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। साधारण बोल चाल में तो यही कहा जाता है कि “जब तक साँस तब तक आस।” इसका आशय यही हुआ कि साँस ही जीवन है। यद्यपि यह सभी को मालूम है कि हमारी जीवन-धारा का सबसे बड़ा आधार यह श्वास-प्रश्वास ही है, पर इस श्वासोच्छास में कोई विशेष रहस्य है, कोई बड़ी शक्ति निहित है, इसका ज्ञान बहुत थोड़े लोगों को है। पर जिन ज्ञानीजनों ने इस विषय में खोज की है वे इस निर्णय पर पहुँचे हैं कि मानव जीवन की प्रत्येक क्रिया से इस श्वास-प्रश्वास का सम्बन्ध है। सुख-दुःख, स्वास्थ्य, रोग सब प्रकार की आपत्तियाँ और सफलता आदि सभी बातों पर इसका प्रभाव पड़ता है और यदि मनुष्य इस विषय से सम्बन्ध रखने वाले नियमों को जान ले तो वह बहुत कुछ लाभ उठा सकता है। भारतीय साधकों ने इस विषय का बहुत सूक्ष्म रूप से विवेचन करके “स्वरोदय” नाम का एक स्वतंत्र विज्ञान ही रच दिया है।
इस शास्त्र में बतलाया गया है कि मनुष्य के पृष्ठ देश में तीन नाड़ियाँ हैं- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। मनुष्य जो श्वास लेता है वह प्रायः इड़ा और पिंगला अथवा नाक के दाँये या बाँये नथुने से चला करता है। इसका आशय यह है कि अगर हम नाक के एक-एक नथुने को दबाकर साँस लें तो एक में होकर तो वह आसानी से आती जाती मालूम पड़ेगी और दूसरे से कुछ रुकावट जान पड़ेगी। जिस समय तरफ के नथुने से साँस आसानी से चल रही हो उस समय उसी स्वर को चलता हुआ मानना चाहिये। दाँये नथुने से चलने वाली साँस को सूर्य स्वर और बाँये नथुने से चलने वाली को चन्द्र स्वर भी कहते हैं। योगियों के मतानुसार सूर्य स्वर गर्मी उत्पन्न करने वाला और चन्द्र स्वर ठंड का उत्पादक होता है। स्वरोदय शास्त्र के अनुसार इन दोनों स्वरों के प्रभाव और फल भिन्न-भिन्न माने गये हैं और ऐसे कितने ही नियम बतलाये गये हैं, जिनके अनुसार व्यवहार करने से अनेक कार्यों के तौर पर कुछ नियम यहाँ उद्धृत किये जाते हैं-
(1) यदि आप किसी के पास नौकरी, मुकदमा या किसी अन्य कार्य के लिये जा रहे हों, तो चलते समय पहले उसी पैर को उठाइये जिस तरफ का स्वर उस समय चल रहा हो। फिर उस व्यक्ति के पास पहुँच कर भी उसे चलते हुये स्वर की ओर ही रखना चाहिये। इसका उस पर अवश्य प्रभाव पड़ेगा।
(2) जो लोग अपना भाग्योदय चाहते है उनको सदैव सूर्योदय से आधा घंटा पहले उठना चाहिये और जो स्वर चल रहा हो उसी तरह के हाथ को मुख फेर कर बैठना चाहिये। खाट पर से उतरते समय भी उसी तरफ के पैर को पहले जमीन पर रखना चाहिये। नित्य प्रति ऐसा आचरण करने वाला सुखी रहता है।
(3) आग बुझाने में स्वर ज्ञान से बड़ी मदद मिलती है। अगर आग लगी हो या आग लग जाने पर जिस ओर की पवन से अग्नि बढ़ रही हो उस ओर पानी का पात्र लेकर खड़ा हो जाय। फिर जिस नथुने से साँस चल रही हो उससे साँस खींचते हुए थोड़ा सा पानी पियें। फिर उस जल पात्र में से सात रत्ती जल अंजलि में लेकर आग पर छिड़क दें। ऐसा करने से बढ़ती हुई आग कम पड़ कर बुझ जायेगी।
(4) स्वरोदय शास्त्र में स्वरों के चलने और उनमें परिवर्तन होने के जो नियम बतलाये हैं अगर वे ठीक ढंग से चलते रहे तो मनुष्य का स्वास्थ्य प्रायः ठीक रहता है और कोई बीमारी नहीं होती पर यदि किसी कारणवश मनुष्य बीमार हो जाय तो निम्नलिखित नियमों से सहायता मिल सकती है-
(क) जब शरीर में हरारत जान पड़े तो उस समय जो स्वर चल रहा हो उसे बन्द करके दूसरे नथुने से साँस लेनी चाहिये। जब तक पूर्ण रूप से स्वस्थ न हो जाये बराबर उस नथुने को नरम रुई भर कर बन्द रखना चाहिए।
(ख) जिन्हें स्थायी कब्ज या बदहजमी रहती है उन्हें दाँये स्वर के चलते समय भोजन करना चाहिये और संभव हो तो भोजन करने के बाद 15-20 मिनट तक बाँई करवट से लेटना भी चाहिये।
(ग) छाती, कमर, पीठ, पेट आदि कहीं पर एक दम दर्द उठने पर जो स्वर चलता हो उसे सहसापूर्ण बन्द कर देने से कैसा भी दर्द होगा फौरन शान्त हो जायगा।
(घ) जब दमे का दौरा शुरू होने लगे और साँस फूलने लगे, तब जो स्वर चल रहा हो, उसे एक दम बन्द करदे। इससे 10-15 मिनट में ही आराम होता नजर आयेगा। इस रोग को जड़ से नाश करने के लिये लगातार एक मास तक चलते हुए स्वर को बन्द करके दूसरा स्वर चलाने का अभ्यास जितना ज्यादा हो सके उतना करते रहने से दमा नष्ट हो जाता है।
(ड़) परिश्रम से उत्पन्न थकावट दूर करने के लिये या धूप की गरमी को शान्त करने के लिये थोड़ी देर तक दाहिनी करवट से लेटने से थकावट या गरमी दूर हो जाती है।
स्वर शास्त्र बड़ा विस्तृत है और उसमें स्वर के साथ ही तत्वों का विचार रखना भी आवश्यक होता है, तभी पूर्ण सफलता मिलती है। मनुष्य के शरीर में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्व का अवस्थान माना गया है और इनमें से एक समय में कोई एक तत्व उदय होता रहता है। वैसे तो तत्वों का वास्तविक स्थान उनके रंगों से होता है, पर उसके लिये विशेष साधन और अभ्यास की आवश्यकता होती है। इसलिये उसकी पहिचान आकार से करनी चाहिये। एक निर्मल दर्पण पर जो से श्वाँस छोड़ने पर अगर चौकोर आकृति बने तो पृथ्वी तत्व, अर्द्ध चन्द्रकार बने तो जल तत्व, त्रिकोण बने तो अग्नि तत्व, लम्ब गोल आकृति बने तो वायु तत्व और बिन्दु-बिन्दु दिखाई दे तो आकाश तत्व समझना चाहिये।
इसी प्रकार प्रत्येक तत्व के उदय के समय नाक से बाहर निकलने वाली साँस की लम्बाई में भी अन्तर होता है। पृथ्वी तत्व के समय साँस की लम्बाई 12 अंगुल, जल तत्व की 16 अंगुल, अग्नि तत्व की 4 अंगुल, वायु तत्व की 8 अंगुल और आकाश तत्व की 20 अंगुल होती है। बहुत हलकी धुनी हुई रुई या बहुत बारीक धूल नाक के पास ले जाने से जितने फासले पर वह उड़ने लगे उतनी ही साँस की लम्बाई समझनी चाहिये।
आवश्यकता होने पर स्वर को बदलने का सबसे सहज तरीका यह है कि जो स्वर चल रहा हो उससे उलटी करवट लेट जाय। जैसे बायाँ स्वर चल रहा हो तो बाँये हाथ की तरफ करवट लेट जाने से थोड़ी देर में बाँया स्वर बन्द होकर दाहिना चलने लग जायेगा।
(डॉ0 तारादादा मुखर्जी, एम.ए.पी.एच.डी.)
परमहंस जी एक दिन ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के घर पर उनसे मिले गये। भेंट होने पर कहा-”आज तो मैं सागर से आ मिला। इतने दिन खाई, सोता और अधिक से अधिक हुआ तो नदी देखी थी, पर अब सागर देख रहा हूँ।” विद्यासागर ने कहा-”तो इससे लाभ क्या हुआ, थोड़ा-सा खारा पानी मिल जायेगा।” परमहंस जी बोले “नहीं जी, खारा पानी क्यों? तुम तो अविद्या के नहीं विद्या के सागर हो, तुम क्षीर-समुद्र हो। तुम्हारा कर्म सत्वगुण से दया होती है। दया से जो कर्म किया जाता है वह राजसिक कर्म हो सकता है, पर फिर भी वह सत्वगुण से संबंधित है, इसलिये उसमें कोई दोष नहीं बतला सकता। तुम विद्यादान, अन्नदान कर रहे हो यह भी अच्छा है। यह कर्म निष्काम भाव से करने से ईश्वर लाभ होगा।”
ब्रह्म की चर्चा चलने पर परमहंस जी ने कहा कि “आजकल वेद, पुराण, तंत्र षड्दर्शन सब जूठे हो गये है। क्योंकि वे मुँह से पढ़े जाते हैं, मुँह से उच्चारित होते हैं, इसी से उनको जूठा माना जायगा। पर केवल एक वस्तु जूठी नहीं हुई है-वह वस्तु ब्रह्म है। ब्रह्म क्या है यह बात आज तक कोई मुँह से बोल कर नहीं समझा सका है।”
“एक पिता के दो लड़के थे। ब्रह्म विद्या सीखने के लिये पिता ने उन दोनों को आचार्य को सौंप दिया। कई वर्ष बाद वे गुरु गृह से लौटे और घर आकर पिता को प्रणाम किया। पिता की इच्छा हुई कि देखें इन्हें कैसा ब्रह्मज्ञान हुआ है। बड़े लड़के से उन्होंने पूछा-”बेटा तूने तो सब कुछ पढ़ा है, अब यह बताओ कि ब्रह्म कैसा होता है?” बड़ा लड़का वेदों से बहुत से श्लोकों की आवृत्ति करता हुआ ब्रह्म का स्वरूप समझाने लगा। पिता चुप रहे। फिर उन्होंने छोटे लड़के से वही प्रश्न किया वह सिर झुकाये चुप रहा, मुँह से कोई बात न निकली। तब पिता ने प्रसन्न होकर कहा-”बेटा तुम्हीं ने कुछ समझा है, ब्रह्म क्या है”-यह मुँह से नहीं कहा जा सकता।”
“मनुष्य सोचता है कि हम ईश्वर को जान गये, एक चींटी चीनी के गोदाम में गई। एक दाना खाकर उसका पेट भर गया और दूसरा दाना मुँह में लेकर अपने घर को जाने लगी। जाते समय सोच रही थी कि अबकी बार समूचे गोदाम को ले आऊँगी क्षुद्र जीव भी ब्रह्म के बारे में इसी प्रकार की बातें सोचा करते हैं, वे नहीं जानते कि ब्रह्म वाक्य और मन दानों से परे है।
गीता का अर्थ क्या है? जब चैतन्य देव दक्षिण में तीर्थ-भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक आदमी गीता पढ़ रहा है। एक दूसरा आदमी थोड़ी दूर पर बैठे उसे सुन रहा है और सुनकर रो रहा है-आँखों में आँसू बह रहे हैं। चैतन्यदेव ने पूछा-”क्या तुम यह सब समझ रहे हो?” उसने कहा-”प्रभु! इन श्लोकों का अर्थ तो मैं नहीं समझता हूँ।” चैतन्य ने पूछा-”तो फिर रोते क्यों हो-” भक्त ने जवाब दिया- “मैं देख रहा हूँ कि अर्जुन का रथ है और उसके सामने भगवान और अर्जुन खड़े हुए बात कर रहे हैं। बस यही देखकर मैं रो रहा हूँ।” इसलिए गीता केवल किताब से पढ़ी नहीं जाती, जब मन से आसक्ति दूर हो जाती है तभी उसका सच्चा आशय समझ में आता है।
“ब्रह्म-ज्ञान की चर्चा उठने पर परमहंस जी ने कहा-पहले हृदय मंदिर में उनकी प्रतिष्ठा करो। भाषण, लेक्चर आदि, जी चाहे तो उसके बाद ही करना। खाली ब्रह्म-ब्रह्म? कहने से क्या लाभ यदि हृदय के भीतर विवेक-वैराग्य नहीं है।
“किसी गाँव में पद्मलोचन नाम का एक लड़का था। लोग उसे पदुआ कह कर पुकारते थे। उसी गाँव में एक जीर्ण मंदिर था, पर उसके भीतर इस समय देवता की कोई मूर्ति न थी। मंदिर की दीवारों पर पीपल और तरह-तरह के पेड़ पैदा हो गये थे। मंदिर के भीतर चमगादड़ अड्डा जमाये थे। फर्श पर धूल और चमगादड़ों की विष्ठा पड़ी रहती थी। मंदिर में कोई आता जाता न था।
“एक दिन संध्या के बाद लोगों ने मंदिर की तरफ से शंख बज रहा था। गाँव वालों ने सोचा कि किसी ने मंदिर में देवता की मूर्ति पधरा दी होगी और संध्या के बाद आरती हो रही होगी। लड़के, बूढ़े औरतें, मर्द सब दौड़ते हुए मंदिर की तरफ चले कि देवता के दर्शन करेंगे, आरती देखेंगे। उनमें से एक ने मंदिर का दरवाजा धीरे से खोला तो देखा कि पद्मलोचन एक तरफ खड़ा हुआ भों-भों शंख बजा रहा है। देवता की प्रतिष्ठा नहीं हुई थी, मंदिर में झाड़ू तक नहीं लगाया गया था। चमगादड़ों की विष्ठा भी पड़ी हुई थी। तब उस मनुष्य ने चिल्लाकर कहा-
“तेरे मंदिर में माधव कहाँ है, पदुआ-तूने तो व्यर्थ ही शंख फूँक कर हुल्लड़ मचा दिया।”
“इसी प्रकार यदि हृदय-मंदिर में माधव की प्रतिष्ठा करना हो, यदि ईश्वर का लाभ करना चाहो तो सिर्फ भों-भों शंख फूँकने से क्या होगा। पहले चित्त शुद्ध करना चाहिये। मन शुद्ध हुआ तो भगवान उस पवित्र आसन पर स्वयं आ विराजेंगे।”
भक्तों ने पूछा कि हम ईश्वर को किस उपाय से देख सकते हैं? परमहंस जी ने कहा कि “जब तुम उनके लिये व्याकुल होकर रोना सीख लोगे तो वे अपने आप मिल जायेंगे। जिस प्रकार कोई स्त्री अपने छोटे बच्चे को खिलौनों से बहला कर घर के काम-काज में लगी रहती है पर जब बच्चा खिलौने फेंक कर जोर-जोर से रोने लगता है तो माँ रोटी बनाना बन्द करके दौड़ आती है- बच्चे को गोद में उठा लेती है। उसी प्रकार भक्त जब ईश्वर को सच्चे हृदय से पुकारते हैं तो वे स्वयं उनके पास आज जाते हैं।”
“दूसरे भक्त ने पूछा-”महाराज, ईश्वर के स्वरूप पर इतने भिन्न-भिन्न क्यों हैं। कोई कहता है साकार और कोई कहता निराकार। साकार वादियों में तो अनेकों रूपों की चर्चा सुनाई पड़ती है, यह कैसा गोरखधन्धा है?
परमहंस जी ने कहा-” जो भक्त जिस प्रकार देखता है वह वैसा ही समझता है। वास्तव में गोरखधन्धा कुछ भी नहीं है। यदि कोई ईश्वर को एक बार प्राप्त कर सके तो वे स्वयं समझा देते हैं। जब तुम किसी मुहल्ले में गये ही नहीं तो उसकी खबर कैसे जान सकते हो? इस सम्बन्ध में एक दृष्टान्त है कि एक आदमी शौच के लिये जंगल में गया। उसने देखा कि पेड़ पर एक बड़ा सुन्दर सा कीड़ा बैठा है। लौटकर उसने अपने एक साथी से कहा- “देखो जी आज हमने अमुक पेड़ पर एक बड़ा सुन्दर लाल रंग का कीड़ा देखा था।” दूसरे आदमी ने जवाब दिया कि “जब मैं शौच के लिये गया था तो मैंने भी उसे देखा था। पर उसका रंग लाल नहीं था वरन् हरा था।” तीसरे ने कहा-”उसे तो हमने भी देखा है, पर उसका रंग तो पीला है।” इसी प्रकार कुछ लोग और भी थे जिनमें से किसी ने कीड़े का रंग भूरा किसी ने बैगनी किसी ने आसमानी बतलाया। इस पर सबके सब लड़ने लग गये। तब इसका फैसला करने को सब मिलकर उस पेड़ के पास पहुँचे। वहाँ एक आदमी बैठा था। पूछने पर उसने कहा-”मैं इसी पेड़ के नीचे रहता हूं। इस कीड़े को मैं खूब पहचानता हूँ। तुमने जो कुछ कहा वह सब सत्य है। यह कभी लाल, कभी हरा, कभी पीला, कभी आसमानी न जाने कितने रंग बदलता है। यह बहरूपिया है और कभी मैं देखता हूँ कि इसका कोई रंग ही नहीं है।”
“आशय यह कि जो मनुष्य सर्वदा ईश्वर चिन्तन करता है, वही जान सकता है कि उसका स्वरूप क्या है। वही यह भली प्रकार जानता है कि भगवान तरह-तरह के रूपों में दर्शन देते हैं, अनेक भावों में देख पाते हैं, वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। अर्थात् ईश्वर को कोई किसी खास रंग या रूप में बाँध नहीं सकता।
(श्री डाह्याभाई रामचन्द्र मेहता)
वर्तमान समय में हमारे देश में गुरु द्वारा मंत्र दीक्षा की प्रथा प्रायः बन्द हो गई है। इसके अनेक कारण हैं, पर फिर भी ऐसा होने से लोगों में आध्यात्मिकता की कमी हो गई। गुरु का अर्थ यही है कि वह मनुष्य को दिव्य चक्षु प्रदान करके अज्ञान अंधकार में से ज्ञान रूपी प्रकाश में ले जाये। प्राचीन काल में इस प्रथा का पूर्ण रूप से प्रचार था और उसके कारण लोगों का बड़ा कल्याण होता था। जो गुरु अनेक शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके शिष्यों और भक्तों को ज्ञान-दान करते थे और उनको संसार के माया मोह का रहस्य समझाकर काम, क्रोध, लोभ, मोह के भयंकर जाल में से बचा लेते थे और धर्मनीति के मार्ग पर आरुढ़ कराते थे, वे गुरु आज कहाँ हैं? श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों ने भी अपने गुरु के घर रहकर अध्यात्म ज्ञान प्राप्त किया था और उसके पश्चात ही वे गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट हुये थे, वह स्थिति आज कहाँ दिखलाई पड़ती है? बालक, युवा तथा वृद्ध, अवस्थाओं में इसी प्रकार गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम, संन्यासाश्रम में जो-जो मंत्रानुष्ठान और योगाभ्यास की आवश्यकता होती है, उनकी शिक्षा गुरु शिष्यों को उनके अधिकारानुसार देकर उनको जीवन में सफल होने का मार्ग दिखाते थे, वह स्थिति अब कहाँ है? आज इस गुरु और शिष्य की अति उपयोगी प्रथा का लोप होता हुआ दिखलाई पड़ रहा है, यह समय की बलिहारी है। शंकर भगवान ने कलियुग का महात्म्य श्री पार्वती माता को समझाते हुये कहा था कि कलियुग में ब्राह्मण आध्यात्म विद्या से भ्रष्ट हो जायेंगे और अन्य व्यक्ति गुरु बन जायेंगे, वे ही जन समाज को अध्यात्म, धर्म, नीति आदि का उपदेश देंगे। आज हम आश्चर्य पूर्वक देख रहे हैं कि उनके वाक्य बिल्कुल सत्य होते दिखलाई पड़ रहे हैं।
मनुष्य जब से जन्म लेता है तभी से उसे गुरु की आवश्यकता होती है। उस समय माता-पिता उसके गुरु बन कर उसका पालन-पोषण करते है, उसे बोलना चलना, खाना-पीना सिखाते हैं, उसे नीति, धर्म, ज्ञान, विज्ञान की भी थोड़ी-बहुत शिक्षा देते हैं। जब मनुष्य किसी व्यवसाय में लगता है तब उसका स्वामी उसका गुरु बनता है। अथवा यदि वह कोई नौकरी करता है तो उसके ऊपर वाले अफसर उसके गुरु बनते हैं। इस प्रकार प्रत्येक साँसारिक और व्यवहारिक कामों में मनुष्य का कोई न कोई गुरु होता है। फिर अध्यात्मज्ञान और ब्रह्म विद्या जैसी महान चीजों के लिये तो गुरु का होना स्वाभाविक ही है। पर आज शिष्य को इस प्रकार ज्ञान देकर उसे मोक्ष-मार्ग पर पहुँचा देने वाले गुरु कहाँ हैं? आज तो गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने वाले जीवों को गुरु को आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती। इसी प्रकार उनको अध्यात्म-ज्ञान, धर्मज्ञान की तीव्र इच्छा भी नहीं होती। आज तो आहार-विहार, सम्पत्ति, स्वास्थ्य यही उनके जीवन का ध्येय बन गया है। पर मुक्ति प्रेमी भाइयों! सद्गुरु की आवश्यकता तो संसार की उत्पत्ति के समय से ही होती आई है। सद्गुरु के प्रति शिष्य भगवान की भावना रखे, गुरुदेव के प्रति उसमें अचल भक्ति और श्रद्धा हो, और वह गुरु के वाक्यों को ईश्वर का आदेश समझे, तभी वह अपना समस्त जीवन सुख-शान्तिपूर्वक व्यतीत करके जन्म-मरण से मुक्त हो सकता है।
गुरु की भक्ति कैसी होनी चाहिए। इस संबंध में महाराष्ट्र के महान संत ज्ञानेश्वर महाराज के विचार जानने योग्य हैं। उस समय के ब्राह्मणों ने ज्ञानेश्वर के परिवार को जाति बाहर घोषित कर दिया था, पर आज समस्त महाराष्ट्र और समस्त महा राष्ट्रीय ब्राह्मण उनको एक महान् अवतार के रूप में पूजनीय मानते हैं और नित्य प्रति उनके ग्रंथों का प्रवचन किया जाता है। ज्ञानेश्वर महाराज की वर्णन शैली पुराणों के ढंग पर अत्यन्त प्रभावशाली है-
“हे चतुर श्रेष्ठ, अब मैं तेरे सम्मुख गुरु भक्ति का वर्णन करता हूँ जिसे तू ध्यान से सुन। यह गुरु सेवा सब प्रकार के सौभाग्यों की जन्म भूमि है, क्योंकि वह गृहस्थ आश्रम में संलग्न मनुष्य को भी ब्राह्म स्वरूप बना देती हैं। ऐसी जो गुरु-सेवा है, अब मैं उसके विषय में तुझ से कहता हूं। जिस प्रकार गंगा अपना समस्त जल लेकर समुद्र से मिलती है, अथवा श्रुति जिस प्रकार सर्वज्ञान सहित ब्रह्म पद में प्रविष्ट होती है, अथवा पतिव्रता स्त्री जिस प्रकार अपना जीवन और गुण अवगुण सब कुछ अपने प्रिय पति को अर्पण करती है, उसी प्रकार शिष्य अपना सर्वस्व गुरु कुल को अर्पण करता है। जिस प्रकार विरहिनी पतिव्रता निरंतर पति का ही चिन्तन करती है, उसी प्रकार जिस स्थान में गुरु का निवास हो वहीं पर जिसका मन लगा रहता है, उस दिशा में से आने वाले पवन को भी जो सम्मुख खड़ा होकर नमस्कार करता है, सच्चे प्रेम से पागल बन कर जिस दिशा में गुरु रहते हों, उस दिशा से भी वार्तालाप करता है वही सच्चा शिष्य है। जिस प्रकार बछड़ा अलग खूंटे से बँधा होने के कारण ही गाय से पृथक रहता है, पर उसका ध्यान पूर्णतया अपनी माता की तरफ लगा रहता है, उसी प्रकार सच्चा शिष्य केवल गुरु की आज्ञा के कारण ही दूरवर्ती ग्राम में रहता है, और सदा यही विचार करता है कि कब गुरु की अनुमति मिले और मैं उनसे भेंट करूं। जिसे गुरु से दूर रहने से एक-एक क्षण युग के समान भारी जान पड़ता है, अगर गुरु के ग्राम से कोई आया हो अथवा गुरु ने ही किसी को भेजा हो, तो जो ऐसा प्रसन्न हो जाता है कि मानो जीवन रहित को नवीन आयुष मिल गया हो, अथवा सूखते हुये अंकुर पर अमृत की धार पड़ गई हो, अथवा मछली किसी गड्ढ़े से निकल कर समुद्र में पहुँच गई हो, अथवा किसी कंगाल मनुष्य को धन का खजाना मिल गया हो, अथवा जन्माँध को एक दृष्टि प्राप्त हो गई हो, अथवा भिखारी को इन्द्र पद मिल गया हो। गुरु के प्रति ऐसी प्रीति रखने वाला कोई मनुष्य अगर तुमको मिले तो ऐसा समझ लेना कि उसके मन में गुरु के प्रति सचमुच सेवक की भावना मौजूद है। ऐसा व्यक्ति अन्तःकरण में अत्यन्त प्रेम युक्त होकर गुरु की मूर्ति का ध्यान करता है, अपने शुद्ध हृदय रूपी मंदिर में गुरु की स्थापना करके भावना रूपी मंदिर में गुरु की स्थापना करके भावना रूपी सामग्री से उनकी पूजा करता है, अथवा ज्ञानरूपी किले में आनंदरूपी देवा लय बनाकर उसमें श्री गुरु रूपी शिवलिंग की स्थापना करके उस पर ध्यानरूपी अमृत से अभिषेक करता है।
तनिक उसके प्रेम की अगाधता तो देखो! कभी तो वह बिना आँख और गुरु को पक्षिणी रूपी माता बन कर उसकी चोंच में से स्वयं चारा ग्रहण करता है, अथवा गुरु को तारने वाला मानकर उसका पल्ला पकड़ लेता है। इस प्रकार जैसे समुद्र में ज्वार आने से तरंगों पर तरंगें उत्पन्न होती जाती हैं, उसी प्रकार प्रेम के बल से गुरु के ध्यान के अनेक रूप प्रकट होते हैं। इसी प्रकार गुरु की मूर्ति को अन्दर में धारणा करके वह ध्यान का आनन्द प्राप्त करता है। ...........साराँश यही है कि जिसे इस गुरु भक्ति की इच्छा होगी, और जिसे इस गुरुभक्ति पर प्रेम होगा, उसे गुरु सेवा के सिवाय और कोई चीज कभी प्रिय न लगेगी।”
गुरु से मंत्र की दीक्षा ग्रहण करना क्यों अनिवार्य है, इस विषय में वेद-शास्त्र में लिखा है-
“गुरु से दीक्षा लिये बिना जप, पूजा वगैरह सब निष्फल जाता है, इसलिये साधना में सबसे पहले दीक्षा ही लेनी चाहिये। दीक्षा का अर्थ यह है कि यह मनुष्य को दिव्य ज्ञान प्रदान कर उसके समस्त पाप पुँज का नाश कर देती है।, इसी कारण ऋषि-मुनियों ने इसका नामकरण दीक्षा किया। ब्रह्मचर्य आदि प्रत्येक आश्रम के व्यक्ति के लिये दीक्षा ग्रहण करना आवश्यक है। इस संसार में सब कुछ दीक्षा मूलक है, बिना दीक्षा के जगत का कोई भी सुसम्पन्न नहीं हो सकता। जप, तपस्या आदि सबका आधार इसी पर है। दीक्षा प्राप्त कर लेने पर मनुष्य चाहे जिस आश्रम में रहे, तो भी उसके सब काम सिद्ध हो जाते हैं और दीक्षा प्राप्त किये बिना जो मनुष्य जप, पूजन आदि कार्य करता है वे सब कर्म पत्थर में बोये हुये बीज के समान निष्फल सिद्ध होते हैं। बिना दीक्षा वाले मनुष्य को सिद्ध अथवा सद्गति नहीं मिलती। इससे सब तरह से प्रयत्न करके सद्गुरु देव द्वारा अवश्य मंत्र दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये।”
पर यह भी अवश्य देख लेना चाहिये कि गुरु वास्तव में योग्य और शुद्ध चरित्र वाले हों और वे भी शिष्य को उसी प्रकार प्राणों के समान स्नेह करना अपना कर्तव्य समझते हों। आजकल जैसे ढोंगी और स्वार्थी गुरु बनने वालों की भरमार हो गई है उससे तो बिना गुरु के रहना ही अच्छा है। गुरु की सहायता से शिष्य को अध्यात्म मार्ग में अग्रसर होने में निस्संदेह बड़ी सहायता मिलती है और सब सद्गुरु कम योग्यता और अधिकार वाले शिष्यों को भी अपनी शक्ति द्वारा अग्रसर कराके मुक्ति का पथिक बना देते हैं। इसीलिये शास्त्र में कहा गया है-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्रेव महेश्वरः गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्री गरुवेनमः
(श्री गिरिजा सहाय व्यास)
हिन्दू समाज में “साधु” की पदवी बड़े सम्मान की और पवित्र मानी जाती है। यद्यपि वर्तमान समय में अधिकाँश साधु नाम धारी व्यक्तियों ने अपने वास्तविक कर्तव्य से मुख मोड़ लिया है और एक प्रकार से निकम्मा जीवन व्यतीत करते हैं, तो भी लोगों में उनके प्रति प्रायः श्रद्धा की भावना ही देखने में आती है। कारण यह है कि इस देश के अनेक बड़े साधु भी अपने को इस प्रकार अप्रकट रखते हैं कि अनजान व्यक्तियों को उनकी महानता का पता ही नहीं लग पाता। इसी प्रकार कितने ही साधु परोपकार का कार्य स्थूल शरीर से न करके मन अथवा भावना द्वारा करना ही अधिक श्रेष्ठ मानते हैं, उनको भी थोड़े से निकटवर्ती लोगों के सिवाय और कोई नहीं जानता। गाजीपुर (संयुक्त प्राँत) के पौहारी बाबा इसी श्रेणी के एक महापुरुष थे।
पौहारी बाबा का जन्म आज से 120 वर्ष पहले जौनपुर के प्रेमापुर गाँव में हुआ। उनकी एक आँख शीतला के कारण बाल्यावस्था में ही जाती रही थी, जिससे उनके माता-पिता दुलार में उन्हें शुक्राचार्य कह कर पुकारते थे। उनके एक चाचा लक्ष्मीनारायण थे जो थोड़ी ही उम्र में घरबार त्याग करके कुटी में रहते थे और अपना समस्त समय भगवत् भजन तथा योगाभ्यास में लगाते थे। एक बार बीमारी के कारण लक्ष्मीनारायण के दानों पैर खराब हो गये और आँखें भी जाती रही, तब उन्होंने इन्हीं “शुक्राचार्य को अपनी सेवा के लिये पास में रख लिया। वहाँ रहने से इनको भी भजन और साधना का अभ्यास हो गया और कुछ ही वर्षों में संस्कृत भाषा में भी पंडित हो गये।
जब इनकी अवस्था लगभग 17 वर्ष की हुई और लक्ष्मीनारायण का देहान्त हो जाने से इनकी जिम्मेदारी जाती रही तो आश्रम की देखभाल का काम अन्य शिष्यों को देकर ये तीर्थयात्रा को निकल पड़े। अनेक तीर्थों में भ्रमण करते हुए गिरनार पर्वत पर पहुँचे जहाँ इनकी भेंट एक सिद्ध योगी से हो गई। उसने योग-साधना की गूढ़ विधियाँ बतलाई जिनसे इस विद्या में इनको अच्छा ज्ञान हो गया। तीन वर्ष बाद ये फिर आश्रम में आ गये और एक गुफा खुदवा कर उसी में भजन करने लगे। अपने आहार के सम्बन्ध में भी वे बड़े कड़े नियमों का पालन करते थे। वैसे वे पाक-विद्या में बहुत निपुण थे और आराध्य देव रामचन्द्र जी की मूर्ति को भोग लगाने के लिये उत्तमोत्तम पदार्थ नित्य तैयार करते थे। इस भोग को वे अपने परिचित और दीन−दुःखियों को बाँट देते थे। रात होते तक वे ऐसे ही अभाव ग्रस्त लोगों की सेवा में लगे रहते थे। जब सब लोग सो जाते तो गंगा जी में तैर कर दूसरे तट पर चले जाते और वहीं पर समस्त रात भजन-साधना में बिता देते। प्रातःकाल होने के पहले फिर आश्रम में लौट कर नित्य-कर्म में लग जाते।
ऐसा करते-करते उनका आहार दिन पर दिन कम होने लगा। उनके परिचितों का कहना है कि अंतिम वर्षों में वे केवल एक मुट्ठी नींबू के या बेल के पत्ते अथवा कुछ मिर्च ही खाकर रह जाते थे। इसके बाद उन्होंने गंगाजी के पार जाना छोड़ दिया और अपना अधिक समय गुफा के भीतर योगाभ्यास में ही बिताने लगे। कहते हैं कि वे महीनों तक गुफा में बैठे हुये ही ध्यान करते रहते और बाहर नहीं निकलते थे। यह कोई नहीं जानता कि इतने समय तक वे क्या खाकर रहते थे, इसलिए लोग उनको “पौहारी” (पवन अथवा हवा का आहार करने वाले) के नाम से पुकारने लग गये। एक समय वे गुफा में इतना ज्यादा समय तक रहे कि लोगों ने निश्चय कर लिया कि वे मर गये। जब वे बाहर निकले तो उनको देख कर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। उस अवसर पर उन्होंने हजारों साधु संतों तथा अन्य लोगों का भंडारा किया।
देश पूज्य स्वामी विवेकानन्दजी कुछ समय तक इस योगी के पास रहे थे और उनसे कुछ शिक्षा ग्रहण की थी। स्वामी जी ने उनसे कहा था कि आप अपनी गुफा से बाहर निकल कर किन्हीं लोकोपकारी कार्यों का संचालन क्यों नहीं करते ? पर पौहारी बाबा इतने विनयशील और निरभिमानी थे कि उन्होंने अपने को इसके योग्य ही नहीं समझा और उत्तर में एक दृष्टान्त सुनाया कि “एक व्यक्ति कुछ दुष्कर्म करते पकड़ा गया जिसके दण्ड़ स्वरूप उसकी नाक काट ली गई। बहुत लज्जित होकर वह किसी निर्जन स्थान में साधु का रूप बनाकर और व्याघ्र चर्म बिछा कर उस पर बैठ गया। अनजान लोग उसे एक बड़ा साधु समझकर उसके पास आने लगे। अनेक लोग इस एकान्तवासी मौनी “महात्मा” से कुछ उपदेश सुनने को लालायित हुये।
एक नवयुवक तो उससे दीक्षा लेने को व्याकुल हो उठा। जब उसने देखा कि अब अधिक विलम्ब करने से उसकी प्रतिष्ठा घट जायगी तो एक दिन उसने उस उत्साही युवक से कहा -”बेटा, कल एक तेज धार वाला उस्तरा साथ में लेकर आना।” इस आशा से कि अब उसकी मनोकामना शीघ्र पूरी होगी, वह युवक दूसरे दिन सवेरा होते ही उस्तरा लेकर वहाँ आ पहुंचा। साधु उसे दूर जंगल के एक निर्जन स्थान में ले गया और वहाँ उस्तरे के एक ही आघात से युवक की नाक काट ली और गम्भीर आवाज से बोला-”बेटा, इस सम्प्रदाय में मेरी दीक्षा इसी प्रकार हुई थी और वैसे ही मैंने आज तुम्हें दी। अवसर पाते ही तू भी दूसरों को इसी दीक्षा का दान देना। “ लज्जा के कारण युवक इस “दीक्षा” का रहस्य किसी से कह नहीं सका और अपने गुरु के आदेश का पूर्ण रूप से पालन करने लगा। इस प्रकार होते-होते उस देश में नाक कटे साधुओं का एक पूरा सम्प्रदाय बन गया, तुम्हारी क्या ऐसी इच्छा है कि मैं भी इसी प्रकार के एक सम्प्रदाय की स्थापना करूं?” इसके बाद फिर वही प्रश्न करने पर उन्होंने कहा-”क्या तुम्हारी ऐसी धारणा है कि केवल स्थूल शरीर द्वारा ही दूसरों की सहायता हो सकती है? क्या शरीर के क्रियाशील हुये बिना केवल मन ही के द्वारा दूसरे मनों की सहायता नहीं की जा सकती?”
पौहारी बाबा को आस-पास के किसानों तथा भक्तों से जो अनाज और अन्य खाद्य सामग्री मिलती थी उसमें उन्होंने एक सदावर्त कायम कर दिया जिसमें कुछ समय बाद बहुसंख्यक साधु, संन्यासी, अभ्यागत आने लगे। एक दिन वहाँ एक पागल सा मनुष्य आया और साथ में पौहारी बाबा को मारने के लिए एक मोटी सी लाठी लाया। वह गालियाँ देता हुआ उनकी गुफा की तरफ चला। उसका ऐसा व्यवहार देखकर अन्य लोगों ने उसे पकड़ कर आश्रम से बाहर निकाल देना चाहा। इस धक्का-मुक्की में पागल जोर से चिल्ला उठा। उसे सुनकर पौहारी बाबा बाहर आ गये और उस व्यक्ति को अपने पास बुलाया। आश्रमवासी उसे पकड़ कर उनके पास लाये जिससे वह उन पर प्रहार न कर बैठे। पौहारी बाबा ने स्थिर दृष्टि से थोड़ी देर तक उन्मत्त पुरुष की तरफ देखा और लोगों से कहा कि “इसे छोड़ दो, यह तो एक बड़ा साधु है।” उसी समय से उसका पागलपन बिल्कुल जाता रहा और वह भले प्रकार सब कार्य करने लगा।
इस घटना के कुछ समय बाद एक संन्यासी वेषधारी पुरुष इनके आश्रम में आया और कहने लगा कि “तुम तो साधु हो, योगी हो फिर यह तमाम माया क्यों संग्रह कर रखी है? इसे त्याग क्यों नहीं सकते? तुम्हारे ठाकुर जी के ऊपर जो सोने के आभूषण हैं, उनकी तुमको क्या जरूरत है? वे सब मुझे दे दो। पौहारी बाबा ने कहा- “बाबा, तुम्हारी इच्छा हो, तो इस सबको खुशी से ले जाओ।”
संन्यासी ने फिर कहा कि इस धन, सामग्री, अन्न से भरपूर आश्रम की माया का त्याग तुमसे क्यों नहीं होता। मैं कहता हूँ कि तुम इसी क्षण यहाँ से चले जाओ।” यह बात सुनकर पौहारी बाबा ने उत्तर दिया “बाबाजी, अगर मैं इसी समय आश्रम छोड़कर चला जाऊँ तो तुम्हारा काम सिद्ध नहीं हो सकेगा। आश्रमवासी सेवक मुझे ऐसा करने से रोक देंगे? इसलिए मेरी सलाह यह है कि रात्रि हो जाने दो, जब मैं चुपचाप चला जाऊँगा।” जब भली प्रकार अन्धकार हो गया और सब लोग सो गये तो पौहारी बाबा ने गुफा के द्वार पर ताला लगा दिया और ताले की चाबी उस संन्यासी को देकर आश्रम छोड़ कर चले गये। दूसरे दिन सवेरा होने पर जब शिष्यों ने कुटी में ताला लगा देखा तो उनको बड़ा आश्चर्य हुआ और यह समझ कर कि हो न हो यह सब इसी संन्यासी की करतूत है वे उसे मारने लगे। आश्रम का मालिक बनने के बजाय जब संन्यासी की वहाँ इस प्रकार “पूजा” होने लगी तो वह जल्दी से नौ दो ग्यारह हुआ। पर पौहारी बाबा बहुत ढूँढ़ने पर भी कहीं न मिल सके। अंत में एक वर्ष के बाद उनके एक भक्त ने उनका पता लगा पाया और बहुत समझा बुझा कर उनको फिर आश्रम में लाया गया।
एक बार कोई चोर उनके आश्रम में चोरी करने को घुसा और जो कुछ मिला उसे गठरी में बाँधकर जाने लगा। इतने में पौहारी बाबा जाग गये। इनको देखकर वह भयभीत होकर गठरी फेंक कर भाग गया। ये भी गठरी उठाकर उसके पीछे दौड़े और चिल्लाकर कहने लगे कि यह गठरी तुम्हारी ही है ले जाओ। बहुत दूर तक दौड़ने पर ये उसके पास पहुँच गये और पोटली को उसके पैरों के पास रखकर विनयपूर्वक कहने लगे- “तुम यह सब सामान ले जाओ, क्योंकि यह तुम्हारी ही है, मेरा नहीं!”
किसी समय काले साँप ने उनको काट लिया, जिससे वे बेहोश हो गये। उनके पास में उपस्थिति लोगों ने तो समझा कि वे मर गये। पर थोड़ी देर बाद होश में आकर उठ बैठे। जब लोगों ने उनसे इस घटना के विषय में पूछा तो तो कहने लगे कि “वह नाग तो हमारे प्रियतम का दूत था।”
अपने जीवन के शेष दस वर्षों में वे लोगों को दिखाई नहीं पड़े। उनके दरवाजे के पीछे कुछ आलू और थोड़ा सा मक्खन रख दिया जाता था और रात को किसी समय जब वे समाधि से उठते थे तथा ऊपर वाले कमरे में आते थे तो इन चीजों को ले लेते थे। पर जब वे गुफा के भीतर चले जाते थे, तब उन्हें इन चीजों की भी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। उन दिनों में अगर वे किसी से बात भी करते थे तो बीच में दरवाजा बन्द करके भीतर बैठे-बैठे ही बात कर लेते थे।
एक दिन अँधेरी रात्रि में पौहारी बाबा गंगा स्नान करके नदी तट पर कुछ योग क्रिया कर रहे थे। दैव योग से उनकी क्रिया में कोई विघ्न पड़ गया। इससे उनकी तबियत बिगड़ गई और उन्होंने इस शरीर के अन्त करने का निश्चय कर लिया। सन् 1896 की गर्मी की ऋतु में एक दिन आश्रमवासियों ने देखा कि पौहारी बाबा की कुटी से सफेद रंग का धुआँ बहुत अधिक निकल रहा है और उसमें से माँस के जलन की गंध आ रही है। उन्होंने दरवाजा तोड़ डाला और कुटी के भीतर घुसकर देखा कि पौहारी बाबा का देह हवन कुण्ड में जल रहा है। इस प्रकार उस महायोगी ने स्वयं को ही पूर्णाहुति के रूप में होमाग्नि को अर्पण कर दिया। कुछ ही देर में उनके प्राण ब्रह्म रन्ध्र को भेद कर अन्य लोक को चले गये।
(डॉ. चमन लाल गौतम)
इस पुण्य भारतभूमि में गौ माता को सदा से पूजनीय एवं संरक्षणीय माना जाता रहा है। गाय के रोम रोम में सात्विकता के सूक्ष्म तत्व भरे हुये हैं जिनके सान्निध्य से मनुष्य अपने अन्दर सात्विक सद्गुणों की अभिवृद्धि कर सकता है। प्रत्येक जड़ चेतन पदार्थ में जिस प्रकार एक स्थूल शक्ति होती है उसी प्रकार उसमें एक सूक्ष्मशक्ति भी रहती है। चूँकि स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म तत्व का महत्व हजारों गुना अधिक होता है, इसलिए इस देश के तत्वदर्शी ऋषियों ने प्रत्येक आदर्श एवं सिद्धान्त को निर्धारित करते समय उस सूक्ष्म तत्व की स्थिति का पूरा-पूरा ध्यान रखा है।
आहार विज्ञान को ही लीजिए। यों साधारण रीति से लहसुन और प्याज निर्दोष ही नहीं शरीर के लिए लाभदायक भी हैं। पर उनके अन्दर जो तमोगुणी तत्व अधिक मात्रा में रहते हैं उन्हें देखते हुए अखाद्य घोषित किया गया। क्योंकि इनके खाने से थोड़ा शारीरिक लाभ हो भी जाय तो भी उनमें संव्याप्त तमोगुणी तत्वों की अधिकता से मनः क्षेत्र में तमोगुण बढ़ने पर जो हानि होती है उसकी तुलना में वह शारीरिक लाभ तुच्छ हैं। वही बात वृक्ष और वनस्पतियों के बारे में है। पीपल बरगद आदि को पवित्र इसीलिए माना गया है कि उनकी वायु, छाया, लकड़ी, फूल सभी में सतोगुणी प्रभाव की समीपता प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी उन्हीं गुणों से प्रभावित होता है। तुलसी के पौधे में चिकित्साशास्त्र की दृष्टि से जो गुण है वे करंजवा आदि अन्य कई पौधे में भी मौजूद हैं, पर उन अन्य पौधों की पूजा न होकर केवल तुलसी को ही वह मान इसलिए दिया गया है कि उसमें सूक्ष्म सतोगुणी तत्व अत्यधिक मात्रा में विद्यमान है। जो तुलसी की समीपता प्राप्त करता है, उसकी पूजा करता है उसे वह तत्व अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं।
गाय के बारे में भी यही बात है। यों उसके आर्थिक लाभ भी कम नहीं हैं। बछड़े देकर, दूध गोबर और मूत्र का बहुमूल्य खाद देकर तथा मरने पर चमड़ा हड्डी आदि देकर वह हमारे लिए आर्थिक दृष्टि से बहुत ही लाभकारी सिद्ध होती है, मूल लाभ जो इस आर्थिक लाभ से भी अनेक गुना है यह है कि उसके रोम-रोम से सतोगुण प्रधान प्रभाव बाहुल्य है। जिसके कारण गौ की समीपता से हमारे अन्तः प्रदेश में, मनः क्षेत्र में, दिव्य गुणों की अभिवृद्धि होती है जो मनुष्य को सच्चा मनुष्य बनाने के लिए आवश्यक होते हैं।
धर्म भावना की अभिवृद्धि करने वाले साधनों में गौ का स्थान सर्वोपरि है। गौदान की महिमा प्रसिद्ध है। कन्या का पिता दहेज में और कोई वस्तु दें या न दें पर धर्म व्यवस्था के अनुसार उसे गौदान देना आवश्यक है। यज्ञों में गौ घृत को महत्व दिया गया है। भगवान का प्रसाद पंचामृत के रूप में दिया जाता है। पंचामृत में गाय का दूध, दही,घी ही प्रधान है। प्रायश्चित कर्मों में आत्मशुद्धि के लिए पंचगव्य पिलाया जाता है जिससे दूध, दही, घी के अतिरिक्त गोबर और गोमूत्र भी शामिल है। गाय के गोबर से लिपी हुई भूमि धर्मकार्यों के लिए शुभ मानी जाती है। गौ पालन गोचरण, गोसेवा को भी अन्य धर्म कार्यों के समान ही पुण्य माना गया है।
गौ सेवा के द्वारा अनेक पुण्य फलों के प्राप्ति का वर्णन धर्म ग्रन्थों में मिलता है। राजा दिलीप के संतान नहीं थी, तो गुरु वशिष्ठ ने उन्हें तथा उनकी रानी को गौ चराने का उपदेश दिया। राजा रानी ने वही किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। इसी प्रकार पद्म पुराण में जाबलि मुनि के उपदेशानुसार गौसेवा करने पर संतान होने से राजा ऋतम्भर को सत्यवान नामक पुत्र प्राप्त होने का वर्णन है।
भगवान राम और कृष्ण के अवतार भी गौरक्षा एवं गौवंश का महत्व प्रतिपादन करने के लिए ही हुआ। रामायण में भगवान राम के अवतार का उद्देश्य व्यक्त करते हुये कहा गया है-
“विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन मनुज अवतार”
भगवान कृष्ण का तो नाम ही गोविन्द और गोपाल पड़ा। उन्होंने बचपन से आरम्भ में ही गौसेवा को अपनी दिनचर्या का प्रधान अंग बनाकर, गौ के महत्व की और जन साधारण का ध्यान आकर्षित किया। महा पुरुष जो कार्य करते हैं जनता के लिए वही आदर्श हो जाता है। गान्धी जी ने चर्खा स्वयं चलाकर देश भर में चरखे का प्रचार किया। इसी प्रकार भगवान कृष्ण ने भी स्वयं गौ सेवा करके सर्व साधारण को इस महत्वपूर्ण कार्य में संलग्न होने की प्रेरणा दी। यदि लोभवश माता पिता बच्चों को दूध घी न दे तो उन्हें उसके लिए आग्रह करना चाहिए, इसके लिए उनने गोरस लूट कर खाने का उदाहरण अन्य बालकों के सामने उपस्थित किया। गोबर को लोग चूल्हें में जलाते थे, उसके विरुद्ध उन्होंने एक भारी आन्दोलन खड़ा किया। उनने बताया कि गोबर जलाने की वस्तु नहीं वरन् धन है। उनकी उंगली के इशारे से गोबर धन उठाने के लिए इकट्ठा करने के लिए गोपगण जुट गये और उससे एक पहाड़ जमाकर लिया। उसकी पूजा हुई। गोबर की खाद के रूप में उपयोग करने की प्रथा चली और यह गोबर ईंधन न रहकर धन बन गया। यही गोबर धन पूरा है। भगवान कृष्ण की लीलाओं में गौ सेवा को बहुत अधिक स्थान मिला है।
इन अवतारी पुरुषों ने जन समाज के आर्थिक एवं शारीरिक लाभों के लिए ही गौरक्षा को महत्व दिया था, उसका वास्तविक उद्देश्य गौ में सन्निहित उस आध्यात्मिक तत्व की रक्षा करना था जिसकी सेवा समीपता से लोगों की अन्तः भूमिका में धर्म भावनाओं की स्थिति एवं अभिवृद्धि होती है।
ऋग्वेद 8॥ 101॥ 16 में एक मंत्र आता है
माता रुद्राणाँ दुहिता वसूनाँ स्वसादित्या नाम मृतस्य नाभिः। पुनुवोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदिति वधिष्ठ।
अर्थात् गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदिति पुत्रों की बहिन है। इसके थनों में अमृत है। ऐसी महान गौ की कोई विवेकवान व्यक्ति कष्ट न पहुँचावे।
स्कंद पुराण 10।18।20 में लिखा है
त्वं माता सर्व देवानाँ त्वं च यज्ञस्य कारणम् त्वं तीर्थ सर्वं तीर्थाणाँ नमस्ते स्तुसदानद्यो।
अर्थात् गाय सब देवों की माता है, यज्ञ का कारण है, सब तीर्थों का तीर्थ है। उसे नमस्कार है।
इस प्रकार के अगणित अभिवचन शास्त्रों में मिलते हैं। दूध और घी से शरीर पुष्ट होता है यह सर्वविदित है। बछड़ों के बिना भारतवर्ष की कृषि व्यवस्था नहीं चल सकती यह भी स्पष्ट है। खेतों की पैदावार के लिए गोबर और खाद्य कितना आवश्यक है यह भी किसी से छिपा नहीं है। पर यह बातें उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं जितनी कि गाय में सन्निहित सूक्ष्म शक्ति की उपयोगिता। जिसके बिना हमारी परम्परागत धार्मिक एवं आध्यात्मिक महानता स्थिर रह सकती।
दूध घी के स्थान पर और कोई पौष्टिक पदार्थ ढूँढ़ा जा सकता है। खेती के लिए बछड़ों के स्थान पर मशीनों तथा गोबर की जगह रासायनिक खाद की बात सोची जा सकती है पर गाय के शरीर में जो असाधारण दिव्य तत्व है उसकी पूर्ति अन्य किसी प्रकार नहीं हो सकती। यों डाक्टरों ने अन्य दूध की अपेक्षा गौदुग्ध को स्वास्थ्य के लिए कहीं अधिक उपयोगी तत्वों से युक्त बताया है पर उससे भी बड़ी बात यह है कि गो दुग्ध पीने वाले के स्वभाव में दया का भाव मैत्री, उदारता प्रेम, तितीक्षा संयम शीलता आदि गुणों की अभिवृद्धि होती है।
गाय के घी से किये हुए हवन से देवता अधिक प्रसन्न होते हैं। गोबर से लीपे हुये मकान में निवास करने पर चित्त अधिक शान्त रहता है। पंचामृत या पंचगव्य पीने से दुष्कर्मों के प्रति स्वयं की घृणा भावना उत्पन्न होने लगती है। यह सभी बातें आध्यात्मिक उन्नति में भारी सहायक सिद्ध होती है।
मनुष्य जीवन में शरीर स्वास्थ्य, धन, विद्या आदि का बहुत महत्व है, पर सबसे अधिक महत्व उसकी आन्तरिक स्थिति का है। जिसका अन्तःकरण महान है वही इस पृथ्वी का रत्न है, वही देश का गौरव है, वही इतिहास का उज्ज्वल नक्षत्र है, यह लाभ जिसे प्राप्त हो गया उसका मनुष्य जीवन धन्य हो गया। भारत भूमि का प्रत्येक व्यक्ति किसी समय देव संज्ञा में गिना जाता था, इसका कारण यहाँ के निवासियों की शारीरिक, आर्थिक एवं शिक्षा विशेषता नहीं, वरन् आध्यात्मिक महानता ही थी, उसके अभाव में आज हम दुर्गति की और अग्रसर होते हैं। यदि हमें अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त करना है तो भौतिक उन्नतियों तक ही सीमित न रह कर अपनी आध्यात्मिक उन्नति की और ध्यान देना पड़ेगा।
भारत के प्राचीन आध्यात्मिक उत्कर्ष में गौ का बहुत महत्व रहा है। अब भी उस अवलंबन को पकड़ना उसी प्रकार आवश्यक है जैसा कि प्राचीन काल में था? गाय की रक्षा, गौ सेवा भौतिक दृष्टि से भी आवश्यक है। पर उसकी सबसे अधिक आवश्यकता तो अपनी आत्मिक संपदा की स्थिरता, रक्षा एवं उन्नति की दृष्टि में है।
(पं. शिवशंकरजी शास्त्री)
अष्टा चक्रा नवद्वारादेवानाँ पूरयोध्या। तस्याँ हिरण्ययः कोश स्वर्गोज्योतिषावृतः ॥ अथर्य 31॥
शब्दार्थ- (अष्टाचक्रा) आठ चक्र (नवद्वार) और नौ द्वार वाली (देवानाँ) देवताओं की (पूर) पुरी (अयोध्या) जहाँ युद्ध नहीं होते ऐसी अयोध्या यह है (तस्याँ) इसमें (हिरण्ययःकोषः) अनेक प्रकार के बहुमूल्य एवं आकर्षक चमकीले रत्नों से भरा हुआ भण्डार (स्वर्णां) नाना प्रकार के सुखों से (ज्योतिषाँ) प्रकाश को भी प्रकाशित करने वाला परिमार्जित ज्ञान (प्रावृतः) ढका हुआ उपस्थित है।
भावार्थ-यह अद्भुत मानव शरीर आठ चक्र और नौ द्वारों वाला है। इन आठ चक्रों के नाम तथा स्थान इस प्रकार है। प्रथम मूलाधार चक्र, यह रीढ़ की हड्डी के नीचे पृष्ठ वंस के मूल में होता है (द्वितीय) स्वाधिष्ठान चक्र, ये जननेंद्रिय के पीछे (तृतीय एवं चतुर्थ) मणि पूरक और सूर्य चक्र ये दोनों नाभि स्थान में होते हैं (पंचम) अनाहत चक्र, हृदय में (षष्ठ) विशुद्धि चक्र, गले में (सप्तम) आज्ञा चक्र, भूमध्य में (अष्टम) सहस्रार चक्र मस्तिष्क में होता है। इस प्रकार ये आठ चक्र, अर्थात् नस नाड़ियों के विशेष गुच्छे इस शरीर में मज्जातन्तु के केन्द्र रूप है, इन चक्रों में अनंत शक्तियाँ भरी हैं। इस अद्भुत मानव शरीर के अनेक नाम शास्त्रों में वर्णन किये गये हैं, इसे ब्रह्मपुरी ब्रह्मलोक और अयोध्या भी कहते हैं।
इसमें नौ द्वार हैं, दो आँख, दो कान, दो नाभि का छिद्र, एक मुख इस प्रकार सिर में सात द्वार हुये (आठवाँ) गुद्दा द्वारा और नौवाँ मूत्र द्वार इन प्रसिद्ध नौ द्वारों वाली होने से इस नगरी का द्वारावती द्वार आदि भी नाम है। ये देवताओं या दिव्य गुण युक्त, आत्माओं के ठहरने का स्थान है। इससे रहने वाले समस्त जड़ और चेतन देवता परस्पर एक दूसरे की भलाई के लिये अपने-अपने स्थान पर हर समय सतर्क व जागरुक हैं। यहां अग्निदेव, नेत्र और जठराग्नि के रूप में पवनदेव श्वाँस-प्रश्वाँस व दस प्राणों के रूप में, वरुण देव जिह्वा और रक्त आदि के रूप में रहते हैं। इसी प्रकार अन्य देव भी शरीर के भिन्न-2 स्थानों में निवास करते है।
चैतन्य देवों में आत्मा और परमात्मा का यही निवास स्थान है। ये समस्त देव इस शरीर में सद्भाव और सहयोग से प्रीतिपूर्वक वर्तते हैं। इनमें परस्पर प्रेम की गंगा बहती है, किसी को किसी से द्वेष नहीं, सबके काम बंटे हुये हैं। अपने-अपने कार्यों को सम्पादन करने में सभी सचेष्ट एवं दक्ष हैं। भुजायें सब शरीर की रक्षा के लिये सूचना मिलते ही दौड़ती है। उन्हें ब्राह्मण और शूद्र के बीच भेद मानना ग्राह्य नहीं। सिर पर आई हुई चोट को बचाने में जहाँ उन्हें प्रसन्नता होती है, वहाँ पैरों में लगे हुये काँटों को निकालने में भी उन्हें क्षोभ नहीं होता। अतः यह शरीर परस्पर युद्धों से रहित अयोध्या है।
इस शरीर में 72000 नाड़ियाँ हैं, इनमें इग्ला, पिग्ला और सुषुम्ना तीन नाड़ियाँ विशेष हैं, ये तीन नाड़ियाँ मूलाधार चक्र से प्रारम्भ होकर समस्त शरीर में, अपना जाल सा बनाती हैं। जो पुरुष अपनी केन्द्र शक्तियों को जगाना चाहते हैं उन्हें योग का अभ्यास बढ़ाना चाहिये। योग केवल जंगल में बैठ कर ही नहीं किया जाता, वरन् सब कर्मों में, सर्वत्र आप योग करते हैं। उदाहरण के लिये जब आप पुस्तक पढ़ते हैं, तब आपकी आत्मा और मन का योग पुस्तक से होता है, ऐसा न होने से आप भोजन करते समय भोज्य पदार्थों से आप के मन और आत्मा का योग होना अत्यावश्यक है, ऐसा न करने से भोजन द्वारा प्राप्त होने वाला आनन्द आप को नहीं मिलता।
जिस पुरुष ने जिस शक्ति को जगाया, उसने उसी से मनोवाँछित आनन्द प्राप्त किया। प्राचीन ऋषि, मुनि और देवताओं ने अधिकाँशतया अपनी अध्यात्म शक्तियों को जगाया था, इसीलिये तीनों काल, अर्थात् भूत, भविष्य व वर्तमान की बातों को जान लेना, अपनी इच्छानुसार शरीर बदल लेना, अपनी आयु को इच्छानुसार बढ़ा लेना तथा मोक्षादि सुख प्राप्त कर लेना उन्हें सब सुलभ होता था।
महर्षि वाल्मीकि ने हिंसा को त्याग कर शरीर सुषुप्त अहिंसा को जगाया, कौन जानता था कि घन अज्ञान में फंसे हुये हिंसक वाल्मीकि महर्षि पद प्राप्त करते हुये संस्कृत साहित्य के आदि कवि और धर्मज्ञ बन सकेंगे। ऋषियों के उपदेश ने उनकी सुषुप्त हृदय तन्त्री को इस प्रकार झंकृत किया कि वाल्मिकी दृढ़ विश्वास और साधना से महर्षि पद प्राप्त करते हुये, अनंत सुख को प्राप्त हुये। महर्षि जमदग्नि सहस्रबाहु अर्जुन द्वारा कामधेनु गऊ छीनी जाना व आश्रम भ्रष्ट करने से परशुरामजी की सोई हुयी क्षत्र शक्ति जाग्रत हो गई और प्रतिक्षाबद्ध होकर उन्हें 21 बार पृथिवी को क्षत्रियों से रहित करके ब्राह्मण को पृथिवी का दान दिया। राजा विश्वामित्र व ब्रह्मतेज के समक्ष क्षात्र शक्ति देय प्रतीत हुई अतः राज पाट छोड़ कर ब्रह्मत्व प्राप्ति के लिए कठोर तप करके ब्रह्मत्व प्राप्त किया। जामवन्त के कहने पर हनुमानजी की सोई हुई शक्तियाँ जाग गईं और समुद्र पार करना उन्हें सहज सुलभ हो गया।
संसार में बढ़ती हुई हिंसा प्रवृत्ति को देख कर महात्मा गौतम बुद्ध के हृदय में अहिंसा का उद्घोष हुआ। स्वामी शंकराचार्यजी ने अनेक देवतावाद का विरोध में अपनी आत्मा की आवाज एकेश्वरवाद का जीवन भर प्रचार किया। महर्षि दयानन्द के सच्चे शिव की खोज पर कटिबद्ध करने में जीवन भर आई हुई विघ्न और बाधायें उन्हें अपने दृढ़ निश्चय से डिगा न सकीं। स्वामी रामतीर्थ और श्री विवेकानन्द ने अपनी इच्छित शक्तियों को जगाकर ही करोड़ों मानवों के हृदय में स्थान पाया था। महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक, पंडित मदनमोहन मालवीय, नेता सुभाषचन्द्रबोस, सरदार पटेल आदि महापुरुषों के प्रत्यक्ष उदाहरण आपके सामने उपस्थित हैं। इन सबने ही अपनी अपनी इच्छा के अनुसार अपनी केन्द्र शक्तियों को जगाया था, तभी वे सामान्य पुरुषों से कुछ ऊँचे उठ सके। यदि अपने दृढ़ निश्चय और पुरुषार्थी भावना से, विघ्न बाधाओं को ढकेलते हुये अपनी सोई हुई शक्तियों को जगायेंगे तो महापुरुष, ऋषि और देवता बनना आपको कठिन न होगा। आपके पूर्व पुरुष जो ऋषि, महात्मा और देवता अब तक बन चुके हैं, उनका शरीर भी आपकी तरह ही हाड़-माँस आदि का बना हुआ था।
आप प्रति दिन यह अनुभव करते हैं कि किसी बात, हृदय या घटना से कभी आपको रोना आता है और कभी हँसना, कभी आप चिन्तित होते हैं तो कभी चिन्ता रहित। आपके शरीर में कभी करुणा का बाहुल्य होता है तो कभी क्रोध, कभी दूसरों की भलाई में जीवन बिताने की चाह होती है तो कभी केवल स्वार्थ की भावना। इसी प्रकार कभी भक्ति और वैराग्य जागता है तो कभी मोह और ममता आप में से बहुत कम ऐसे विचारक होंगे, जिन्होंने इस रहस्य पर गहराई से विचार किया हो। यदि आप विचार करेंगे तो आपको यह प्रतीत होगा कि इस मानवीय अद्भुत शरीर में अनेकों केन्द्र हैं। हर बात एक ही केन्द्र से नहीं टकराती, उनके भिन्न-2 स्थान हैं।
कितनी ही शक्तियाँ तो इस शरीर में ऐसी हैं, जिन्हें बहुत से मानव अपनी पूरी आयु के दौरान में भी जगा नहीं पाते। किसी पुरुष को चुप रहने का अधिक अभ्यास होता है तो किसी को धारावाही घन्टों भाषण देने का। कोई श्री हनुमानजी व भीम आदि का अनुसरण करते हुये दिखाई देंगे, तो कोई रावण और कीचक जैसा। कोई राजा नेता और अधिकारी बनने की कोशिश में हैं तो कोई चोर डाकू और भिखारी। अतः इसी प्रकार की अनेक भिन्नता आप संसार में देखते हैं, यह भिन्नता है? क्योंकि उन्होंने अपने शरीरस्थ पृथक प्रथक केन्द्रों को झंकृत किया है। जिस केन्द्र को जिसने जिस धारणावती बुद्धि से उद्बुद्ध किया उसने उससे वैसा ही लाभ पाया। अच्छा ऊँचा और नीचा बनने के लिए केवल आप ही अपने कारण है। आप जैसा बनने की इच्छा करेंगे वैसा ही साधन और सत्संग आपको संसार में मिल जायेगा। जन्तु जिन कर्मों से सुख बढ़ता और मिलता है उन कर्म संबंधी केन्द्रों को जगाने का प्रयत्न करें।
मंत्र के अन्तिम चरण में यह बताया गया है कि इस अद्भुत ब्रह्मा नगरी में प्रकाश को भी प्रकाशित करने वाला जो आवृत्त परिमार्जित ज्ञान है, अर्थात् जिस ज्ञान के द्वारा, सत्य और असत्य, सुख और दुख, कर्तव्य और अकर्तव्य तथा प्रकाश और अन्धकार को यथार्थ रूप से जान कर वेदोक्त कर्मों द्वारा परमात्मा का प्यार बनना होता है उस ज्ञान को सत्संग और अनुष्ठानों की निरन्तर रगड़ से जाग्रत या निरावरण करो। भ्रमित बुद्धि से भूले हुये राही की भाँति केवल भौतिक ‘सुखों की तृष्णा भरी पगडंडियों में जीवन के अमूल्य श्वाँस नष्ट करना उचित नहीं। तुम्हारा साध्य, अनन्त सुख की प्राप्ति है। यह शरीर उस साध्य को प्राप्त करने का साधन है। साधन को साध्य समझ बैठना ही भारी अज्ञान है। ज्ञान को जाग्रत करें, तभी जन्म जन्मान्तरों के सुकृतों द्वारा प्राप्त किये गये, इस अन्नतः शुद्धि युक्त मानव शरीर या द्वारिका व अयोध्या में आपका रहना सार्थक है।
क्रोध कब? और क्यों?
जब कार्य का कारण तुरन्त समझने में देर होती है, तो क्रोध की सृष्टि होती है।
क्रोध एक तामसिक मनोवृत्ति है जो दुराचारी नीरस, रोगी, असहिष्णु, धैर्य शून्य प्राणियों का प्रश्रय लेती है।
क्रोध सुधार के स्थान पर बिगाड़ करता है।
क्रोधी मानव को तरह-2 की हार्दिक एवं मानसिक व्याधियाँ लग जाती हैं। एक ओर से क्रोध आता है, तो दूसरी ओर से विवेक जाता है।
(श्री भगवान सहाय वशिष्ठ)
पिछले पचास-साठ वर्ष के भीतर थियोसोफिकल समाज के कुछ सदस्यों ने, जो अध्यात्म विद्या का अभ्यास करने वाले थे, प्रेत लोक की आत्माओं द्वारा दुःख और कष्ट में पड़े लोगों की सहायता का कार्य आरम्भ किया है। उनका कथन है कि जब हम सो जाते हैं तो हमारी आत्मा स्थूल देह को त्याग कर भुवर्लोक में विचरण करती रहती है। उस समय उस आत्मा में ऐसी शक्ति आ जाती है कि वह भुवर्लोक और भूलोक के निवासियों से संपर्क स्थापित कर सके और उनको कुछ सहायता पहुँचा सके। वे आत्मायें ऐसे अवसर पर जगते हुये मनुष्य के सामने तो प्रकट नहीं हो सकतीं, पर सोते व्यक्ति पर बड़ा हितकारी प्रभाव डाल सकते हैं जिससे उसके दुःख की निवृत्ति हो जाय और उसे शाँति प्राप्त हो सके। जिन लोगों ने विशेष साधन करके सिद्धि प्राप्त कर ली है, वे अपने वासनामय शरीर को स्थूल बना कर प्रकट होकर भी कार्य कर सकते हैं, पर ऐसी शक्ति व्यक्ति को शीघ्र नहीं मिल सकती। पर अप्रत्यक्ष रूप से तुम लोगों को बहुत सी हितकारी सूचनाएं दे सकते हो और उन्हें आने वाली आपत्तियों और संकटों से बचा सकते हो। ऐसी दैवी सहायक अनेक बार भुवर्लोक की आत्माओं से मित्रता करके उनके द्वारा ही इस प्रकार के कार्य करते हैं। यहाँ हम ऐसे दैवी सहायकों द्वारा किये गये कुछ कार्यों का विवरण थियोसॉफी विद्वानों की लिखी पुस्तकों के आधार पर देते हैं-
(1) प्रथम योरोपीय महायुद्ध में एक अंगरेज फौजी अफसर तोप का गोला फटने से मारा गया। उसकी कुछ सम्पत्ति लन्दन में किसी बैंक में जमा थी, उसे वह अपनी स्त्री के नाम लिख जाना चाहता था, जिसके साथ उसने फ्राँस में विवाह कर लिया था और जिसके एक बच्चा होने की भी संभावना थी। चूँकि वह विवाह उसने माता की इच्छा के विपरीत किया था, इस लिये वह चाहता था कि वह अपना वसीयतनामा लिख कर सीधे अपने वकील के पास भेज दे और उसके द्वारा वह सम्पत्ति उस स्त्री को मिल जाए। तोप के गोले से घायल होने पर भी उसमें इतनी शक्ति शेष रही कि उसने एक गर्त में पड़े-पड़े ही वसीयतनामा लिख दिया और पास ही पड़े हुये एक अन्य घायल सिपाही के गवाह के रूप में उस पर दस्तखत करा दिये। मरते-मरते उसने अपने मन में यही आशा की कि जो लोग शवों को गाड़ने आयेंगे वे इस पत्र को पाकर ठीक पते पर भिजवा देंगे। पर उसे यह भी शंका हो रही थी कि प्रथम तो इस दूर के स्थान पर कोई शवों को गाढ़ने वाला आयेगा भी या नहीं, और जो देर से आया भी तो शायद तब तक कहीं वर्षा होकर लिखा हुआ मिट न जावे। तीसरी शंका यह थी कि कहीं उसके सब सामान के साथ इस पत्र को भी माता के पास ही न भेज दिया जाए।
जब अदृश्य सहायकों ने उसकी ऐसी व्याकुलता को देखा तो वे कोई ऐसी तरकीब सोचने लगे जिससे यह पत्र शीघ्र ही ठिकाने पर पहुँचा दिया जाए। उन्होंने पता लगाया कि वहाँ से थोड़ी दूर पर ही उसका एक मित्र रहता है। उन्होंने उसे कई तरह से प्रेरणा दी कि वह उक्त अफसर के शव के पास जाकर वसीयतनामे को ले आवे। पर वह मित्र ऐसे कठोर स्वभाव का निकला कि उस पर किसी प्रेरणा का प्रभाव नहीं पड़ा। इस कारण एक तरुण सहायक को स्थूल रूप धारण कराके उसे सूचना दी गई और तब वह शव के पास जाकर मृत्यु-पत्र को लाया और तभी उसे लन्दन भेज दिया।
(2) फ्राँस के एक गाँव पर जर्मन सिपाहियों ने हमला किया और एक लड़के तथा एक लड़की को छोड़ कर शेष सब को मार दिया। वे दोनों बालक छिप जाने से बच गये। जब सिपाही गाँव को जला कर चले गये तो वे दोनों गाँव से बाहर निकले, पर मार्ग में फौजी सिपाहियों को देख कर फिर एक झाड़ी के भीतर जा छिपे। बड़ी देर तक गोले और गोलियाँ चलाते रहे, पर गड्ढे में रहने से उनकी जान बच गई। अन्त में जर्मन सिपाही वहाँ से हट गये, पर उन बालकों की खबर लेने वाला वहाँ कोई न था। जब “सिरिल” नाम का दैवी सहायक, जो स्वयं एक बालक की प्रेतात्मा था, उनके पास पहुँचा तो वे मरने के करीब थे। उनको दो दिन से भोजन नहीं मिला था और ठण्ड के मारे उनका शरीर अकड़ चला था।
सिरिल ने स्थूल रूप धारण करके बालकों को सान्त्वना देने का प्रयत्न किया, पर वे उसकी बात को न समझ सके। तब उसने अपने बड़े सहायक को बुलाया। उसने उनको फ्राँसीसी भाषा में ही समझाया कि तुम भय मत करो हम तुम्हारी रक्षा करेंगे। सिरिल ने पास ही पड़े एक मृत सिपाही के झोले से कुछ रोटी और चटनी ला दी। पर लड़के ने स्वयं भूखा होने पर भी पहले उसे अपनी छोटी बहिन को दिया। तब सिरिल उसके लिये और रोटी ले आया और उसे खा कर उन दोनों को कुछ चलने की शक्ति आई। तब सिरिल उनको अपने साथ किसी सुरक्षित स्थान को ले गया। पर उसे भी स्वयं मालूम नहीं था किस तरफ खतरा ज्यादा है और किस तरफ कम है। इसलिए सिरिल ने हवा में उठ कर उसका पता लगाया कि दुश्मन कहाँ है। इस प्रकार उनको हिम्मत तथा शक्ति देकर वह उनको युद्ध-क्षेत्र से कुछ दूर तक ले गया। वहाँ दोनों को एक अस्पताल में भरती करा दिया गया और उसके बाद उनको किसी सज्जन ने अपने घर में रख कर पालन-पोषण करने का भार ग्रहण कर लिया।
(3) तीसरी घटना “ईथन” नाम के छोटे बालक की है। उसका बाप जो उसे माता के मर जाने के बाद से बड़े प्रेम से पाल रहा था, लड़ाई में मारा गया। तब उसकी देख-भाल उसके चाचा करने लगे। उनका व्यवहार अच्छा था पर ईथन को पिता की याद नहीं भूलती थी और इससे वह दिन पर दिन दुःखी और बीमार सा होता जाता था। उसके पिता की मृतात्मा उसके चारों और मंडराती रहती थी और रात्री में वह उसे सान्त्वना देकर उत्तम स्वप्न दिखलाती थी जिससे लड़का आनंद में रहता पर जब सुबह होने पर उसकी नींद खुल जाती तो वह रात के स्वप्न की बात भूल जाता और दिन भर दुखी बना रहता।
जब पिता की सहायता करते हुये सिरिल ने “ईथन” की दयनीय दशा देखी तो वह उसकी सहायता को कटिबद्ध हो गया। इसके लिए इस बात की आवश्यकता थी कि “ईथन” को रात के स्वप्नों की याद रहे और वह उनकी सचाई को समझ कर पिता के वियोग के दुःख को भूल जाए। इसके लिये जो प्रयत्न किये गये वे इसलिये निष्फल रहे कि आठ वर्ष के “ईथन” को परलोक संबंधी ऐसे विषय का कोई ज्ञान न था। तब निद्रा के समय सिरिल ने उसकी आत्मा से मित्रता कर ली और जागने पर भी वह स्थूल रूप धारण करके उसके पास मौजूद रहा। तब उसके छोटे लड़के को स्वप्न की बात की याद दिलाई और कहा कि मैं तथा तुम्हारा पिता, यहाँ मौजूद हैं तुम व्यर्थ का दुःख मत किया करो। इस प्रत्यक्ष प्रमाण को देख कर लड़के का दुःख मिट गया और वह प्रसन्न तथा स्वस्थ रहने लगा।
इस प्रकार ये अदृश्य दैवी सहायक सैकड़ों हजारों दुःखी आत्माओं को सहायता पहुँचाते रहते हैं और साथ ही उनको मृत्यु के बाद के जीवन का भी प्रमाण दे देते हैं, जिससे आगे चलकर परलोक में उनको बहुत अधिक परेशानी नहीं उठानी पड़ती।
(भगवती देवी शर्मा, धर्मपत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)
इस अंक के साथ ‘अखण्ड ज्योति’ को 20 वर्ष पूरे होकर 21 वाँ आरम्भ होता है। इस लम्बे समय में कितनी यात्रा की जा चुकी इस पर दृष्टिपात करने से परिवार के प्रत्येक सदस्य का मस्तक गर्व से ऊँचा हो सकता है। अखण्ड ज्योति पत्रिका अब से 20 वर्ष पूर्व आरम्भ की गई थी। तब परमपूज्य आचार्य जी के मस्तिष्क में एक ही आकाँक्षा थी कि इस देवभूमि भारत में पुनः देवत्व की अमृतमयी सुरसरी वैसे ही प्रवाहित हो जैसे प्राचीन काल के ऋषि युग में यहाँ प्रवाहित होती थी और उस अकृत जल से अभिसिंचित होकर इस उद्यान का प्रत्येक प्रफुल्लित पौधा-इस देवलोक का प्रत्येक मानव अपने यज्ञ विचारों की सुगन्ध तथा श्रेष्ठ कार्य के सौंदर्य द्वारा सर्वत्र आनन्द एवं उल्लास बखेरता था।
कर्मनिष्ठ की तरह, एक नैष्ठिक तपस्वी की तरह इस उजड़े उद्यान में आचार्य जी ने अपने स्वेद बिन्दु बहाये-फलस्वरूप आज आशाजनक हरियाली की लहलहाती खेती चारों ओर दिखाई देती है। लेखक कितने ही इस देश में मौजूद हैं। अखबार निकालने वालों और पुस्तकों की रचनाएं करने वालों की भी कमी नहीं है, ‘अखण्ड ज्योति’ की या यहाँ के प्रकाशन की उन लोगों की कृतियों से तुलना की जाए तो अपना पलड़ा हर दृष्टि से हलका ही रहेगा। पर बात कुछ और ही थी। पत्रिका निकाली गई केवल विचारों के विस्तार की सुविधा के लिए। वस्तुतः इसके पीछे एक अत्यन्त महत्वपूर्ण मिशन-एक क्रमबद्ध कार्यक्रम था। पत्रिका उसका एक सहायक अंक मात्र थी। जो करना था, किया जाता था तो उस तरह किया गया जिस तरह भागीरथ ने अपना जीवन गला कर किया था। गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के लिए-तृषित भूभाग के क्रोड़ में, और वनस्पतियों को तृप्त और विकसित करने के लिए जिस तरह भागीरथ चिरकाल तक, एक पाँव से खड़े रहे और अपना लक्ष्य पूर्ण होने तक गंगावतरण होने तक अडिग रूप से अपनी तपस्या में संलग्न रहे उसी का अनुकरण पूज्य आचार्य जी ने किया है। इस लम्बी अवधि में उनकी तपस्या का बहुत कुछ परिणाम दिखाई पड़ने लगा है। यद्यपि यह साधना अभी पूर्ण नहीं हुई। अभी वह और भी तीव्र तत्परतापूर्वक जारी रहेगी और जिस ज्ञान गंगा की अभी फुहारें ही ऊपर से उत्तर सकी हैं उसे अन्ततः देवभूमि में अवतीर्ण होने तक यह महाअभियान जारी रहना ही है।
पिछले बीस वर्षों में ‘अखण्ड ज्योति’ केवल अपने अंक निकालती रही है। पाठकों का मनोरंजन करने वाले लेख ही छापती रही हो ऐसी बात नहीं है। उसने असंख्यों निष्प्राणों में प्राण फूँके हैं और अगणित मनुष्यों का कायाकल्प किया है। ऐसे लोगों की संख्या दसियों हजार हैं जिनके जीवन पहले बहुत ही निम्न श्रेणी के थे- पापों−तापों में, विषय विकारों में, ईर्ष्या तृष्णा में जो निरन्तर जलते रहते थे, पर जब से उनने इस पारस का स्पर्श आरंभ किया तब से उनके शरीर भले ही ज्यों के त्यों ही हो आत्मिक दृष्टि में कायाकल्प ही हों गया। उन्हें गृहस्थ में रहते हुए विरक्त, सादा कपड़े पहनने वाला सन्त कहा जा सकता है। इस आत्मिक कायाकल्प का प्रभाव केवल उन तक सीमित रहा हो सो बात नहीं है, उनके सारे परिवार पर, कुटुम्बी सम्बन्धियों पर भी उसकी छाप पड़ी और उनने भी अपने को पूर्व स्थिति की अपेक्षा सन्मार्ग की दिशा में काफी अग्रसर बना लिया। व्यक्तियों से समाज बनता है। अच्छे व्यक्ति-सन्मार्गगामी व्यक्ति यदि बढ़े तो निश्चय ही हमारा समाज का, राष्ट्र का, धर्म का मस्तक ऊंचा होता है।
समाज सुधार के प्रयत्न दूसरे लोग पत्ते सींचकर कर रहे हैं। अमुक बुराई छोड़ो अमुक कुरीति त्यागो अमुक आदत छोड़ो अमुक काम करो, अमुक मत करो की पुकार चारों ओर से उठ रही है। एक बुराई कम नहीं हो पाती तब तक दूसरी उपज पड़ती है, आदमी से चोरी छुड़ाई जाय तो जब तक चोरी छूटने नहीं पाती कि जुआ खेलना आरम्भ कर देता है। अन्तःकरण गन्दा हो, आत्मलीन हो, भीतर मैल भरा हो तो एक बुराई छोड़ने पर भी वह दूसरी बुराइयों से नहीं बच पाता। इसलिए ऋषियों ने अलग-अलग समस्याओं के अलग-अलग उपाय न बताकर सब समस्याओं का ही एक हल सुझाया था-आस्तिकता, धार्मिकता। इस तत्व को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है धार्मिकता, नैतिकता, मानवता, कर्तव्यपरायणता, सामाजिकता आदि-आदि। वस्तु एक ही है नाम अलग-अलग है। ईश्वर की सर्वव्यापकता, न्यायशीलता, निष्पक्षता पर विश्वास करके जब तक मनुष्य पाप के दुष्परिणामों के कठोर दण्ड और पुण्य के सत्परिणामों के आनन्द पर विश्वास नहीं करता तब तक अन्य रीतियों से उसे सन्मार्ग पर चला पाना कठिन होता है। इस महान तत्वज्ञान को जन साधारण के अन्तःकरणों में प्रविष्ट करने की पूज्य आचार्य जी ने गत बीस वर्षों में प्रयत्न किया और उसका सत्परिणाम आज सबके सामने प्रत्यक्ष है। सत्पथ के हजारों पथिक गत बीस वर्षों से आत्म निर्माण की साधना कर रहे थे, जब उन्हें लोक सेवा के लिए-धर्म प्रसार के लिए आह्वान किया गया तो सोते सिंह की तरह उठकर खड़े हो गये और युग निर्माण की पुनीत प्रक्रिया में जूझ मरने की संघ के साथ प्राणपण से जुटे है। नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का युग निर्माणकारी कार्यक्रम देश भर में चल रहा है उसका बौद्धिक आत्मिक रूप तो आँखों से नहीं देखा जा सकता पर गायत्री यज्ञ आन्दोलन के रूप में लाखों नर-नारी जिस कार्यक्रम को उल्लासपूर्वक अग्रसर करते दिखाई पड़ते हैं उससे यह सहज ही अनुमान हो जाता है कि यह महा अभियान वाह्य प्रक्रियाओं तक ही समिति नहीं है। इसकी गहरी जड़ें के जनसाधारण के अन्तः प्रदेश में भी गहराई तक प्रवेश कर रही है। मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की पशुता को मानवता में परिणत करने का यह पुण्य आयोजन आशाजनक रीति से सफल हो रहा है, आगे इसकी सफलता के लिए हम सब और भी बड़ी आशाएं कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति लकड़हारे के हाथ की कुल्हाड़ी की तरह आचार्य जी के महान मनोरथों को पूरा करने में भारी योगदान करती रही है। उसने एक हृदय में जलती हुई आम को प्रदीप्त ही नहीं किया वरन् उसकी चिंगारियाँ उड़ाकर अनेकों जगह आम की ज्वालाएं जलाई हैं। यह दीपक एक ही जगह जलता नहीं रहा है वरन् असंख्य दीपक इससे जले हैं उसकी क्रमबद्ध पंक्ति आज जगमग करती हुई दीपावली की तरह चारों ओर दीख रही है। गायत्री परिवार के 10 लाख सदस्यों को एक ऐसी ही दीप मालिक कहा जा सकता है।
गत बीस वर्षों का अतीत बहुत ही उज्ज्वल रहा है पर आगे जो और भी उनके गुनी कठिन मंजिल उपस्थित है उसे पूरा करने में अखण्ड ज्योति का योगदान और भी अधिक मात्रा में अपेक्षित है। पर यकायक जो परिवर्तन इस समय हुआ है उसे देखते हुए मेरी ही तरह अनेकों पाठकों का भी जी कमजोर पड़ता है। परम पूज्य आचार्य जी शारीरिक दृष्टि से बहुत दुर्बल हैं पर उनके रोम-रोम में से शक्ति का श्रोत बहता है। वे जिस कार्य में हाथ डालते हैं वह पूरा होता ही चला जाता है उस खुले रहस्य को हममें से हर कोई भली भाँति जानता है। उनके हाथों में अखण्ड ज्योति का भविष्य और भी अधिक उज्ज्वल होने की हर कोई आशा कर सकता है। पर जब वे अपने उत्तरदायित्व को छोड़ रहे हैं और छोड़ कर मेरे दुर्बल कंधे पर डाल रहे हैं तब तो सहज ही अनेकों आशंका मन में उठने लगती हैं और भय होने लगता है कि गत बीस वर्ष का इतिहास कही आगे धुँधला पड़ जाय। इधर से उधर परिवर्तन में कहीं इस दीपक की लौ मन्द न होने लगे, कहीं बुझ जाने का अवसर उपस्थित न हो जाए।
पिछले दो महीनों में हजारों पत्र पाठकों ने ऐसे अनुरोध भरे पत्र भेजे हैं कि जिनमें मुझसे कहा गया है कि आचार्य जी की संभावित यात्रा को रोका जाय, उन्हें अभी न जाने दिया जाए, अखण्ड ज्योति की जिम्मेदारी से उन्हें मुक्त न होने दिया जाए। परिजनों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुये मैंने आचार्यजी से यह अनुरोध किया था। पर उनका जो उत्तर है उसके पीछे जो भारी बल है उसे देखते हुए निरुत्तर ही होना पड़ता है।
उन्होंने मुझसे कहा-तुम्हें केवल अखण्ड ज्योति का व्यवस्थापक मात्र बनाया गया है, जो प्रेरणाशक्ति अब तक उसके द्वारा प्रवाहित होती रही है वह हमारे न रहने पर भी यथावत् जारी रहेगी। जो उच्चकोटि के विचार अब तक दिये जाते रहे हैं, उससे एक दर्जे और भी ऊंचे विचार पाठकों को मिलेंगे। अखण्ड ज्योति का भविष्य अन्धकारमय होने का किसी को कल्पना तक नहीं करनी चाहिए। जो लक्ष अभी सामने पड़ा है उसे पूरा होने तक यह दीपक जलता ही नहीं रहेगा वरन् और भी ऊंची बत्ती से, और भी ऊंची लौ के साथ जलेगा।
आचार्य जी ने अपने कार्यक्रम में थोड़ा अन्तर किया है, उसी के अनुरूप यह सब हलचल हो रही है। उनने अपने 2 महापुरश्चरण किये थे उसी के बल पर युग निर्माण का इतना विशाल आन्दोलन बना और पनप सका। यदि केवल प्रचार के बल पर अन्य सभा सोसाइटियों के ढंग से काम किया गया होता तो जितना हो सका है उसका हजार हिस्सा भी अपने दुर्बल साधनों से संभव न हुआ होता। तब की शक्ति प्रचंड है, उसके बल पर ही अध्यात्म जगत के सारे काम चलते हैं। तप की पूँजी जहाँ जितनी हो वहाँ उतनी ही विजय मिलेगी। तप के बिना केवल बाह्य साधनों से कोई बड़ी सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती।
संसार के सामने आज अनेक दुखद प्रसंग बन रहे हैं, भविष्य में यह कठिनाइयाँ और भी बढ़ने वाली है। इनके शमन और समाधान के लिए जो प्रयत्न किये जाते हैं उनमें तप की पूँजी बड़ी मात्रा में अभीष्ट होगी। आचार्यजी उसे ही उपलब्ध करने के लिए बाहर जाने की तैयारी कर रहे हैं केवल नश्वर मोह बन्धनों के कारण इस महान तैयारी को रोकना किस प्रकार उचित कहा जा सकता है? पाठकों को, परिजनों को उनकी जुदाई का दुख होना स्वाभाविक है-उनका सहज वात्सल्य इतने वर्षों से जिन्हें प्राप्त हुआ है उसके वंचित होने के कल्पना से निश्चय ही वे दुखी होंगे। मुझे भी लम्बे समय से उनके चरणों में बैठने का-पाठकों की अपेक्षा भी अधिक समीपता का सौभाग्य प्राप्त करने का अवसर मिला है। मेरे मन में भी उनके प्रति सामान्य भारतीय नारी की अपेक्षा कुछ अधिक ही श्रद्धा भक्ति है, उनकी जुदाई की मुझे भी कम कसक नहीं है। पर भावना से कर्तव्य ऊंचा है। हम लोग उनके भागीरथ प्रयत्नों में बाधक नहीं बनेंगे, उनके गंगावतरण के जीवन लक्ष को विलम्बित करना हमारे लिए किसी प्रकार उचित न होगा।
वे अज्ञान स्थान को तप−साधना के निमित्त आगामी गायत्री जयन्ती ज्येष्ठ सुदी 10 के बाद चले जावेंगे। अभी उनको इस कार्य में एक वर्ष लगने की बात कही है पर वह अवधि पूर्ण निश्चित नहीं है। और भी अधिक समय लग सकता है। देश भर में धर्म भावनाओं का विस्तार करके सच्ची विश्व शान्ति का जो आयोजन गायत्री परिवार द्वारा चल रहा है। इसमें समुचित बल बनाये रखना उनकी इस तप साधना का उद्देश्य है। इसलिए यह सोचना उचित न होगा कि उनके जाने से हम में से किसी की व्यक्तिगत आत्मिक स्थिति या सामूहिक कार्यक्रमों में कोई कमी आवेगी। उनकी तपस्या का बल पाकर तो इस सब में वृद्धि ही होने वाली है।
अखण्ड ज्योति को उन्होंने तप साधना का माध्यम बनाकर उचित ही किया है। युग निर्माण के सामाजिक कार्यक्रमों को अब गायत्री पत्रिका पूरा करेगी। साधना और तपस्या का मार्ग दर्शन अखण्ड ज्योति के जिम्मे छोड़ दिया गया है। आगे से उसमें इसी साधना के तत्वाधान पर आध्यात्मिक लेख रहा करेंगे। वह साधकों के आध्यात्मिक पथ के पथिकों के काम की चीज ही रह जायेगी। जो लोग केवल मनोरंजन के लिये उसे मंगा लेते हैं और मनोविनोद का चटपटा मसाला न मिलने पर कभी आर्थिक स्थिति खराब, होने का कभी पढ़ने की फुरसत न मिलने का, बहाना बनाकर किसी साल मंगाने किसी साल बन्द करने की उथल-पुथल करते रहते हैं उनमें पत्रिका न मंगाने का स्थायी रूप से बन्द कर देने का आदेश किया गया है। यहाँ से हर महीने पत्रिका दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास भेजी जाती है। फिर भी कई बार बीच में अंक गायब होता हैं। ऐसी दशा में यह व्यवस्था रखी गई है कि सूचना आते ही तुरन्त दूसरी प्रति बिना मूल्य भेज दी जाती है। पर आलसी लोग कई-कई महीने कोई अंक न मिलने की सूचना नहीं देते और महीनों बाद शिकायत करते हैं कि हमें इतने अंक नहीं मिले। इसमें थोड़ी भूल कभी कार्यालय की भी हो सकती है पर समय पर शिकायत भेजकर दूसरी प्रति न मंगाना पाठकों के भी आलस्य का चिन्ह है। केवल इसी बात को लेकर कई पाठक नाराज होते देखे गये हैं। अपना दोष दूसरों पर मढ़ने की यह प्रवृत्ति भी आध्यात्मिक कहलाने वाले लोगों को शोभा नहीं देते। ऐसे लोगों को भी पत्रिका आगे से न मंगाने के लिए आचार्य जी ने कहा है।
वे आगे से कठोर साधना में संलग्न होंगे, साथ ही गंभीर आध्यात्मिक अनुभवों एवं साधना मार्ग के महत्वपूर्ण मर्मों को अधिकारी परिजनों के सामने उपस्थित करेंगे। गत छह वर्षों से संस्था संचालन में उनकी अधिकाँश शक्ति लगती रही इसलिए अध्यात्म विज्ञान के मर्म प्रसंगों को उपस्थित कर सकना उनके लिए संभव न हो सका। अब चूँकि उनका सारा समय ही अध्यात्म साधना में लगेगा इसलिए जून के बाद से योग और आध्यात्म के दक्षिण मार्गों और वाममार्गी साधना के, योग और तंत्र के उन पहलुओं पर स्वयं प्रकाश डालेंगे जो अब तक अज्ञात एवं रहस्यमय ही बने हुए हैं। ऐसे विषयों में केवल अधिकारी लोगों को ही अभिरुचि हो सकती है, इसलिए अगले वर्ष से अखण्ड ज्योति के ग्राहक केवल अधिकारी लोग ही रह जावेंगे।
विषय परिवर्तन की दृष्टि से अगले वर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक घटना उचित है और आवश्यक भी। इस एक कमी के अतिरिक्त अखण्ड ज्योति का भविष्य सब प्रकार उज्ज्वल है ऐसा आश्वासन पूज्य आचार्यजी को प्राप्त हो चुका है। भारत की इस पुण्य भूमि में धर्म भावनाओं का आवश्यक विस्तार होना है, यह होगा, होकर रहेगा। इस पुण्य श्रेय में अखण्ड ज्योति अगले वर्षों में भी योगदान देगी। पिछले बीस वर्ष उसके बहुत शानदार रहे। आगे भी इस शान में कोई कमी आवेगी ऐसी संभावना नहीं है, यह आश्वासन प्राप्त होने के बाद अब अपनी सारी आशंकाएं दूर हो गई हैं। परिजनों को मेरी व्यक्तिगत कमजोरियों को, अयोग्यताओं को ध्यान में रख कर संभव है, अखण्ड ज्योति के भविष्य में बारे में कुछ चिन्ता हुई हो, पर हम लोग तो बाँस की तुच्छ बंशी मात्र हैं। बजाने वाले की कला अमर है उसकी ध्वनि लहरी में कभी-कभी पड़ने वाली नहीं है। अखण्ड ज्योति अपना विनम्र प्रयत्न वैसा ही जारी रखेगी जैसा गत बीस वर्षों में रखती आई है। अब तक वह सर्व साधारण की भी पत्रिका थी अब वह आध्यात्म मार्ग के जिज्ञासुओं एवं साधना पक्ष के पथिकों के मार्ग दर्शन करने के लिए निकलेगी। इसी लक्ष के आधार पर व्यक्ति का तथा विश्व का सच्चा कल्याण सन्निहित भी है।
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग, तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
1. गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग) मूल्य 10॥
प्रथम भाग-गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री संबंधी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों की साधना विधान आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
द्वितीय भाग-गायत्री द्वारा वाममार्गी ताँत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहित, गायत्री पंजर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह। मू0 3॥)
तृतीय भाग-गायत्री महा यन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का साधना विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र-वेधन की साधनाएं तथा असंयमडडडडड कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष, विज्ञानमय-कोष, आनंदमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन। मू0 3॥)
2. गायत्री यज्ञ विधान (दोनों भाग) मू0 4)
प्रथम भाग-गायत्री यज्ञ का विधान, लाभ एवं महत्व तर्क, प्रमाण, शास्त्र एवं साइन्स के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मू0 2)
द्वितीय भाग-गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया, जलयात्रा, मंडप प्रवेश, वेदी पूजन, कुशकंडिका, अग्नि स्थापना, आहुति मन्त्र, पूर्णाहुति वसोधरा, घृत अवघ्राण, भस्म धारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि विधान, जिसे समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मू0 2)
3. गायत्री चित्रावली (दोनों भाग) मू0 3॥)
प्रथम भाग- विविध प्रयोजनों के लिये गायत्री माता का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू0 1॥)
द्वितीय भाग-व्याहृति समेत गायत्री के 26 अक्षरों में सन्निहित 26 महान आदेशों को 26 श्लोक 26 लेख एवं 26 आर्ट पेपर पर छपे तिरंगे चित्रों द्वारा समझाया गया है। मू0 2)
4. गायत्री का मंत्रार्थ मू0 1॥)
अनेकों ग्रन्थों में, अनेकों ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार से किये हुए अर्थों का संग्रह, राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है।
5. गायत्री ज्ञान मंदिर सैट-52 पुस्तकें 13)
अपने घर में छोटा गायत्री पुस्तकालय स्थापित करके अपने सारे परिवार को स्वजन संबंधियों तथा मित्रों को पढ़ाने योग्य चार-चार आना मूल्य की अत्यन्त सुन्दर, सस्ती, बढ़िया ग्लेज कागज पर तिरंगे सुँदर टाइटलों की 52 पुस्तकें छापी गई हैं।
पता - अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा।
*समाप्त*