(श्रीमती विद्यावती मिश्रा)
आओ आगत आओ कब से होती। यही पुकार!
खुला है मंगल मन्दिर द्वार!!
माँ का अनुपम स्नेह पिता का पावन आशीर्वाद,
हर लेता है मन से सारा ही अज्ञान प्रमाद,
यहाँ स्वार्थ ही जाने कैसे बनता पर-उपकार!
खुला है मंगल मन्दिर द्वार!!
यहाँ मनुजता की प्रतिमा है और सत्य-आलोक,
करुणा की शीतलता देता करके छाँह अशोक,
बहुजन हित, जन-जन का हित ही यहाँ सहज व्यवहार!
खुला है मंगल मन्दिर द्वार!!
सेवा निष्ठा, त्याग, क्षमा के यहाँ मिलेंगे भाव,
कल्पवृक्ष सम्मुख फिर कैसे बाकी रहे अभाव,
भेदभाव है नहीं सभी का है स्वागत-सत्कार!
खुला है मंगल मन्दिर द्वार!!
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(स्वामी रामतीर्थ)
यदि सूर्य बम्बई के आम के वृक्षों से कहने लगे कि मैंने अपना जो प्रकाश और उष्णता हिमालय के गन्धतरु और देवदार के वृक्षों को दी है वह मैं तुम्हें नहीं दूँगा और तुम्हें चाहिये कि जो शक्ति और कृपा मैंने उन पहाड़ी वृक्षों पर प्रकट की है उसी से तुम भी फूलते-फलते और बढ़ते रहो, तब तो वे आम के वृक्ष थोड़े ही काल में अन्तर ध्यान हो जायेंगे। वाटिका में उगे हुये सेब के फलों पर पड़े हुये सूर्य-प्रकाश से तालाबों के कमल जीवित नहीं रह सकते। बुद्ध, ईसा अथवा मुहम्मद को आत्मा का जो साक्षात्कार हुआ उससे शेक्सपियर, न्यूटन अथवा स्पेन्सर को शान्ति नहीं मिल सकती थी, इसलिये हमको अपने प्रश्न यथासम्भव स्वयं ही हल करने चाहिये और पुरातन काल के माननीय विद्वानों तथा दार्शनिकों की दृष्टि से देखते रहने की अपेक्षा स्वयं अपनी आँखों से देखना चाहिये।
प्रत्येक स्मृति में यह शब्द मिलते हैं कि “पूर्व काल के ऋषियों का ऐसा मत था, परन्तु उसके विषय में आज तुम्हारा क्या विचार है?” प्रत्येक संस्था एक सिक्का है जिस पर हम अपनी ही मुहर, छाप लगाते हैं? कुछ काल में वह सिक्का घिस जाता है, उसके अंक मिट जाते हैं और वह पहिचाना नहीं जाता। तब उसे पुनः टकसाल में ले जाकर नये सिरे से बनाना आवश्यक होता है। प्रकृति को इस बात में आनन्द आता है कि वह अपने कंकड़ों को (अर्थात् साँसारिक पदार्थों को) बनाती है, बिगाड़ती है और फिर नया आकार देती है। अपरिवर्तनशील परिवर्तन का नियम ही जीवन की मुख्य आवश्यकता है (अर्थात् हेर-फेर ही जीवन की आवश्यक कुँजी है और इस हेर-फेर के नियम में कभी हेर-फेर नहीं होता अर्थात् यह एक अपरिवर्तनशील प्राकृतिक नियम है।)
ऐसे मनुष्य की अवस्था सबसे अधिक करुणा-जनक समझी जानी चाहिये जिसका भविष्यकाल उसके पीछे हो और जिसका भूतकाल सर्वदा उसके सम्मुख रहता हो। महानुभाव शंकराचार्य ने निःसंदेह एक बहुत बड़े प्रकाश (अनुभव) को प्राप्त किया, पर उन्होंने उसे डलिया के नीचे ढाँककर रख दिया। जब उन्हें स्वानुभव से ‘सत्य’ का दर्शन हुआ था तो क्या आवश्यकता थी, कि उन्होंने पुराने प्रमाणों को तोड़-मरोड़ कर उनके द्वारा अपने सत्य-सिद्धान्तों की पुष्टि का प्रयत्न किया? क्या स्वानुभव से बढ़कर विश्वसनीय और कोई प्रमाण हो सकता है? इसका एक हानिकारक परिणाम यह हुआ कि उनके पश्चात् जो अन्य महापुरुष आये (रामानुज, माधव इत्यादि) उन्होंने भी उन्हीं प्राचीन ग्रंथों के शब्दों से अपने मत के अनुकूल अर्थ जबर्दस्ती निकाले। इन सब महापुरुषों का प्रयत्न सदिच्छापूर्ण था, तो भी उससे सत्य की गति प्रबल होने के बदले उलटी शिथिल हो गई। स्पष्ट शब्दों में इसका अर्थ यह है कि भारत के वर्तमान दुःखों का कारण हमारा सृष्टिकर्म विरुद्ध अथवा प्रकृति विरुद्ध) आचरण ही है। हमने जीवित आत्मा को मृत-युग की बातों का दास बना दिया और इसी से हमारी ऐसी बुरी हालत हुई। श्रुति-माता की ऐसी दुर्दशा हुई कि एक पुत्र उसको अपनी बतला कर उसके केशों को अपनी तरफ खींचता है, दूसरा दूसरी तरफ खींचता है, तीसरा उसकी चोटी पकड़कर तीसरी ही ओर खींच रहा है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति या सम्प्रदाय श्रुति के नाम से अपने मनोनुकूल मत का प्रचार करना चाहता है और इस सबका परिणाम यह होता है कि ‘सत्यता’ भ्रष्ट होती है। हे प्राचीन भारत के ऋषियों और आचार्यों! क्या तुम्हारे वंशज इस अधोगति को पहुँच गये हैं कि वे अपनी वर्तमान आवश्यकताओं और आजकल की परिस्थितियों से उत्पन्न प्रश्नों का स्वयं अपनी बुद्धि से निर्णय करने में भी असमर्थ हैं, और उसके लिये उन ग्रंथों का सहारा लेना चाहते हैं जिनकी भाषा को वे भली प्रकार समझ भी नहीं सकते और इस लिये उनके मनमाने तथा परस्पर विरोधी अर्थ निकाल कर आपस में सिर फोड़ते रहते हैं।
प्रियवरो! नियम और संस्थाएं मनुष्य के लिये हैं। मनुष्य नियमों और संस्थाओं के लिये नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भाष्य (टीका और व्याख्या) के जरिये भूत और भविष्य का मिलान होता है। यह विचार निःसन्देह बड़ा उत्तम है और बड़ी उत्तम रीति से वर्णन किया गया है। परन्तु पुरानी गुदड़ी में हम बहुत अधिक थिगड़ी और पैबंद लगा चुके हैं। सत्य को पैबन्दों की जरूरत नहीं है। सम्पूर्ण पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करे, परन्तु सूर्य को पृथ्वी की परिक्रमा करने की आवश्यकता नहीं है। भूत और भविष्य का मेल जोल बनाये रखने के अभिप्राय से तत्त्वज्ञान (दर्शन-शास्त्र) के आधुनिक आविष्कारों को किसी भी धर्म या मजहब के प्राचीन ग्रंथों के साथ लटकाने की क्या आवश्यकता है? ईश्वर प्रणीत धर्म ग्रंथों को स्वतः बोलना चाहिये। जिसे हम सदा परम पिता के नाम से याद करते हैं उस ईश्वर में क्या इतनी सभ्यता और सज्जनता भी नहीं कि अपने आदेशों को हमें स्पष्ट शब्दों में समझाने की कृपा करे। वह कभी यह नहीं चाहेगा कि उसकी बातों को समझने के लिये लोग सहस्रों वर्ष तक भ्रम में गोते खाते रहें, और जब तक कोई स्वयं-मान्य शिष्य (एपाँसिल या टीकाकार) आकर उनका अर्थ न बतावे तब तक समझे ही नहीं। और यह टीकाकार बहुधा ऐसे होते हैं जो पक्षपात रहित होने का दावा करते हैं, पर व्यवहार में दाँव-पेंच से भरे हुये वकील होते हैं। पर क्या किसी प्रमाण से सत्य स्थापित हो सकता है? क्या सूर्य को दिखाने के लिये दीपक की आवश्यकता है? क्या गणित शास्त्र के किसी सिद्धान्त की इससे अधिक पुष्टि हो जाती है कि प्राचीन पैगम्बर या ऋषि-मुनि उसकी साक्षी दें? रसायन शास्त्र के तत्वों का अनुभव हमको प्रत्यक्ष प्रयोगों से होता है। इनका विश्वास मात्र मस्तिष्क में भर देना तो मानो बुद्धि का संहार कर देना है। प्राचीन काल के किसी इतिहास या विशेष वृत्तांत को और त्रिकाल-बाधित सत्य को एक बराबर समझना बड़ी भूल है। किसी विशेष वृत्तांत को हम किसी दूसरे के कहने से अर्थात् ग्रंथ प्रमाण से मान सकते हैं, परन्तु सत्य तो स्वतः अनुभव से मालूम होना चाहिये। क्या वेदान्त के सिद्धान्त को वाद विवाद और प्रमाणों से सिद्ध करने की आवश्यकता है? वेदान्त को योग्य रूप में वर्णन करना ही अखण्डनीय प्रमाण है। सौंदर्य को आकर्षित बनाने के लिये किसी बाहरी सिफारिश (गुण-प्रशंसा) की आवश्यकता नहीं है। (नहिं कस्तूरिका मोदः शपथेन प्रकाश्यते।)
प्रिय भाषण करके, अज्ञान रूपी निद्रा को बनाये रखने के लिये लोरियाँ गाकर, और जन समूह अथवा अज्ञानी मनुष्यों की लल्लो पत्तो करके अगणित अनुयाइयों की मंडली जमा कर लेना कोई कठिन काम नहीं है। परन्तु सत्य ही चिरस्थाई है और शेष जितने चराचर पदार्थ हैं वे मिथ्या हैं। जो मनुष्य केवल दृश्यों को ही देखकर सत्य का संहार करता है उसे धिक्कार है। सत्य को स्वयं अपनी इच्छा से विकसित होने दो। सत्य रूपी सूर्य को यह भलीभाँति विदित है कि उसका उदय किस प्रकार होना चाहिये। घोर निद्रा में सोये हुये लोगों को जगाने के लिये सत्य को घनघोर गर्जना करने दो। मैं सत्य हूँ, मैं देह (रूप) की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये आत्मघात करने को कभी भी तैयार नहीं हूँ।
(श्री स्वामी सदाशिव जी महाराज, प्रज्ञान-मन्दिर, अहमदाबाद)
[आजकल जिस समय में होकर हम गुजर रहे हैं वह मानव जाति के इतिहास में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसे हम निश्चित रूप से ‘युग-परिवर्तन’ के काल की संज्ञा दे सकते हैं। इसमें शाँति या अशाँति-किसी मार्ग से एक “नई दुनिया” की रचना होकर रहेगी, जिसमें काल क्रम से उत्पन्न हो गई विकृतियों को दूर करके समयानुकूल “संविधान” को लागू किया जायगा। यद्यपि इस समय संसार में पश्चिमी देशों की प्रधानता है और वहीं की वैज्ञानिक सभ्यता, जल, थल, आकाश में प्रभुता स्थापित किए हुये है, पर उस अतिशीघ्र आने वाले भावी-युग की सभ्यता की स्थापना वैदिक विज्ञान सम्पन्न भारतीय ही करेंगे। इसी विषय का विवेचन दिव्य विज्ञान के ज्ञाता विद्वान लेखक ने किया है। उन्होंने अपने लेख में दैवी जगत का जो गूढ़ रहस्य प्रकट किया है, वह तो एक साधारण पाठक के लिए अत्यन्त दुरूह और बोधगम्य न होने और साथ ही बहुत लम्बा होने से छोड़ दिया गया है पर गायत्री प्रचार की आवश्यकता के सम्बन्ध में उनके उपयोगी सुझावों को इस लेख में विशेष रूप से स्थान दिया गया है।]
संसार में एक भयंकर और खराब समय आता दिखलाई पड़ रहा है। पर साथ ही दुष्टता की ओर दुष्टों की अवधि भी समीप ही जान पड़ती है। जैसे खेत में बहुत सी बेकार घास पैदा हो जाती है और उसी के बीच-बीच में उपयोगी अन्न का पौधा भी होता है, इसी प्रकार संसार में सर्वत्र भरे पड़े दुष्टों के साथ-साथ थोड़े से सदाचारी सत्पुरुष भी पृथ्वी तल पर फैले हुये हैं। आगामी भयंकर काल में से उन सदाचारी पुरुषों को बचाना आवश्यक है और इसके लिए ऐसे सत्पुरुषों का एक सुदृढ़ महा-संगठन बनना ही हमारा कर्तव्य है।
इस समय अति विकसित भौतिक विज्ञान की कृपा से समग्र विश्व समाज नीति, राजनीति की दृष्टि से शृंखला-बद्ध हो चुका है और इसीलिए आज पृथ्वी का कोना-कोना क्रिया और प्रतिक्रियात्मक आन्दोलन से आन्दोलित हो रहा है। वैज्ञानिक आविष्कारों द्वारा प्रस्तुत सुख-सामग्री, कुछ अपवादों को छोड़कर पृथ्वी के प्रत्येक भाग में पहुँच चुकी है। पूर्वकाल के महासिद्ध पुरुषों ने ही वर्तमान समय में वैज्ञानिकों का रूप धारण करके ‘प्रेयस’ (भोग) सामग्री को मनुष्य मात्र के लिये सुलभ बना दिया है और इस प्रकार समस्त संसार को अपने जाल में घेर लिया है। हम शाश्वत सनातन धर्मावलम्बी ब्राह्मण गण भी इन ‘प्रेयस कामी’ वैज्ञानिकों से उपकृत हुये हैं। अब उस ऋण (अधम ऋण) का बदला महाऋण के रूप में चुकाने का अवसर आ पहुँचा है।
जिस प्रकार कोई मोक्षाभिलाषी धनवान व्यक्ति बाह्य धन सम्पत्ति द्वारा किसी संत की सेवा करके मुक्ति मार्ग का पथिक बन जाता है, उसी प्रकार इन योगभ्रष्ट सिद्ध प्रेयसकामी वैज्ञानिकों ने, भाँति-भाँति की प्रेयस-सामग्री द्वारा भारतीय ऋषियों की सेवा करके, ‘श्रेयस’ का अधिकार प्राप्त कर लिया है। यह सत्य है कि अभी तक केवल ‘श्रेयस’ मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति भारत में ही पाये जाते थे, पर अब जो परिवर्तन का समय आ रहा है उसमें यह एकाधिपत्य भारतवर्ष का ही नहीं रहेगा वरन् अन्य देशों में भी इस ‘श्रेयस’ भाव का प्रचार हो जायगा।
वास्तविक बात यह है कि भारतीय वेद ही ‘श्रेयस’ विद्या है, जिसके तीन विभाग हैं। प्रथम “क्रियाशक्ति प्रधान संहिता-भाग,” द्वितीय “इच्छा शक्ति प्रधान मंत्र भाग,” तीसरा “ज्ञान शक्ति प्रधान उपनिषद् भाग“। पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक हमारे वेद के संहिता भाग से “क्रिया शक्ति” की गवेषणा करके ही भौतिक उन्नति की पराकाष्ठा तक पहुँच गये हैं। इधर कुछ भारतीय विद्वान पश्चिमी देशों में जाकर “ज्ञान शक्ति प्रधान उपनिषद् भाग“ का भी प्रचार कर आये हैं, जिससे वहाँ के वैज्ञानिक हमारे ज्ञान-मार्ग से भी कुछ-कुछ परिचित होते जाते हैं। पर जो वेद की “इच्छा शक्ति प्रधान मन्त्र-विद्या” है उससे अभी तक पाश्चात्य देशवासी वंचित है। वैसे मन्त्र-भाग के ग्रन्थ भी उनके पास हैं, पर उन मन्त्रों में जो “ऋषि देव और छन्द” का विज्ञान है उससे वे लोग अपरिचित हैं। यही कारण है कि अपने ज्ञान और विज्ञान का प्रयोग केवल “प्रेयस” पदार्थों की प्राप्ति में कर रहे हैं और “श्रेयस” मार्ग से दूर रहने के कारण वास्तविक सुख शान्ति के अधिकारी नहीं बन सकते हैं। उन लोगों ने भौतिक विज्ञान से उन्नति करते-करते एटम-बम और हाइड्रोजन बम जैसे भयानक संहारास्त्र बना लिये पर वे इस शक्ति का कल्याणकारी प्रयोग करने में असमर्थ हैं और इसलिए यदुवंश का संहार करने वाले “मूषल” के समान ही उसका प्रयोग पारस्परिक नाश के लिए करने को उद्यत हैं।
करीब पाँच हजार वर्ष से हमारी भारतीय वैदिक संस्कृति धीरे-धीरे विकृत-अति विकृत होती हुई नष्टप्राय होती जा रही है। अब उन अजर-अमर मन्त्र-दृष्टा ऋषियों का कुल भारतवर्ष में कहीं-कहीं अग्नि की चिंगारी की भाँति ही शेष बचा है। पर अनुकूल अवसर की सहायता पाकर यह चिंगारी ही फिर से प्रज्ज्वलित हो उठेगी और समस्त विश्व में वेद-विज्ञान सम्मत श्रेयस-धर्म का प्रचार करके मानव-जाति का हित-साधन करेगी।
वर्तमान समय में वे ही दिव्य देह धारी ऋषि महर्षि अलक्षित रूप से अपने कुल के स्थूल देहधारी सत्पुरुषों का संचालन कर रहे हैं। ऐसे सदाचारी सत्पुरुष अब भी पवित्र भारतभूमि में पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं और किसी प्रकार प्राचीन वैदिक संस्कृति का संरक्षण कर रहे हैं। पर वे भी इस वर्तमान मलिन और विपरीत संस्कार वाली नवीन संस्कृति से सर्वथा मुक्त नहीं हैं। मूलतः दिव्य आत्मा होने पर भी वे माता-पिता के दूषित रज-वीर्य के संस्कार से और आधुनिक समय की भ्रष्ट शिक्षा-दीक्षा के प्रभाव से “अर्ध भ्रष्ट” अवस्था में हैं। इसलिये वे वैदिक संस्कार में रुचि रखने पर भी उसके अनुकूल दिव्य-जीवन गठन में सफल नहीं हो रहें हैं।
आज आधुनिक विज्ञान की कृपा से “ज्ञान” अथवा ‘विद्या’ के नाम से अनेक ऐसी बातों का प्रचार हो रहा है जो मनुष्य की बुद्धि को भ्रमित और हृदय को व्याकुल बना देती हैं। एक ही मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार की विचारधारा निरन्तर क्रियाशील रहने पर, चाहे कैसे भी स्थिर विचार का व्यक्ति क्यों न हो, पागलों की तरह प्रलाप करने लग जाता है। वर्तमान युग के बहुश्रुत विद्वानों की यही दशा है। इसी प्रकार एक ही हृदय में विभिन्न प्रकार की भाव-धारा उद्वेलित होते रहने पर, कैसा ही धैर्यशाली मनुष्य क्यों न हो, उन विपरीत धाराओं को पचाने में असमर्थ होकर व्याकुल एवं अशान्त रहता है। आजकल के बहुपठित धर्मपरायण ज्ञानी, भक्त या साधकों की यही दशा है।
हमारे कथन का आशय यह नहीं है कि प्राचीन भारतवर्ष में “प्रेयसकामी” व्यक्ति थे ही नहीं। हम भली प्रकार जानते हैं कि उस युग में भी जो व्यक्ति केवल वेद के कर्मकाण्ड का अनुसरण करते थे वे “प्रेयसकामी’ थे, उपासना-काण्ड के अनुसरणकारी ‘प्रेयस-श्रेयस’ उभयकामी थे, एवं जो ‘ज्ञान-काण्ड के अनुसरण करने वाले थे वे केवल “श्रेयस कामी” थे। पर उस समय के समाज के नेताओं ने, जो निष्काम कर्म के तत्व को जानने वाले, पूर्ण श्रेयस मार्ग पर चलने वाले ऋषि मुनि थे, सब श्रेणियों के व्यक्तियों का ऐसा समन्वय कर रखा था कि समाज की व्यवस्था ठीक ढंग से कायम रहती थी। पर वर्तमान युग में समाज की बागडोर मुख्यतः “प्रेयस कामी” विद्वान-बुद्धिमान लोगों के हाथ में आ गई है और थोड़े से ‘श्रेयस-प्रेयस उभयकामी’ विद्वान उनकी सहायता करते रहते हैं। ये ही समस्त पृथ्वी के “श्रद्धावान और अश्रद्धावान” लोगों के ऊपर आधिपत्य कर रहे हैं। इसी से आज संसार पर तरह-तरह के दुखों और आपदाओं का प्रहार हो रहा है। जब तक शुद्ध “श्रेयस कामी” व्यक्तियों का इस आधिपत्य में सहयोग न होगा और अन्य लोग उनके बतलाये मार्ग का अनुसरण न करेंगे तब तक पतन और नाश से रक्षा नहीं हो सकती।
भारतीय वेद ही “ज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान’ का भंडार है और उस “प्रज्ञान-मन्दिर” में प्रवेश करने के लिये गायत्री-मंत्र ही “ भारतीय द्विजों” का प्राण है। पर आजकल इसकी विधियुक्त उपासना में अनेक बाधाएँ उपस्थित हो गई हैं। हमारे समाज में एक वर्ग तो ऐसा है जो सर्वथा वैदिक संस्कार रहित होने के कारण, पाश्चात्य वैज्ञानिक मोह से मोहान्वित होने के कारण, विद्या बुद्धि होने पर भी इस महत्वपूर्ण विचारणीय चर्चा से पृथक है, और इसे सर्वथा निरुपयोगी मानकर भारतीय वेद-विद्या की अवहेलना कर रहा है। दूसरा वर्ग उन विद्वानों का है जो कि वेद में श्रद्धा परायण हैं, परन्तु देश, काल और पात्र-सम्बन्धी ज्ञान से अपरिचित होने के कारण न तो परिस्थिति के अनुकूल अनुशासन तैयार कर सकते हैं व न अन्य शुभेच्छापरायण व्यक्तियों को सहयोग देते हैं, अपितु यथाशक्ति और यथामति विरोध करने लगते हैं।
तीसरा छोटा-सा वर्ग केवल “श्रेयस कामी” लोगों का अवश्य मौजूद है और वह वेद विद्या तथा गायत्री का प्रचार भी करता रहता है। पर वर्तमान समय में वैदिक प्रणाली में जो विवादास्पद वातावरण उत्पन्न हो गया है उसके कारण इन लोगों में भी विभिन्न प्रकार की साधन विधियाँ प्रचलित हैं। इससे उनके अनुयाइयों में शंका उत्पन्न हो जाती है कि किस को ठीक मानें। इतना ही नहीं इस वर्ग में विरोधी अन्य वर्ग वाले भी इस विभिन्नता को दिखलाकर उपासकों को बहका देते हैं, जिससे उदासीन होकर वे अश्रद्धावान बन जाते हैं।
बहुत से सज्जन यह प्रश्न उठाया करते हैं कि गायत्री के जप करने का किस को अधिकार है, और किसको नहीं? इस अधिकार, अनाधिकार का निर्णय भी स्वयं गायत्री-मंत्र ही कर रहा है। ‘ऊँ भूः भुवः स्वः’ अर्थात् हम भू लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक निवासी’ ‘तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि’ ब्रह्म से कीट पर्यन्त प्राणी मात्र को उत्पन्न करने में समर्थ, ऐसी महाप्राण रूपी महाशक्ति महामाया, जो चतुर्दश भुवन में “वरण” योग्य है तथा दैदीप्यमान तेजोमयी है, उसका हम सब ‘धीमहि’ ध्यान कर रहे हैं- अर्थात् हमारी जो व्यष्टि, तुच्छ स्वार्थपरायण बुद्धि है, उसे समष्टि, महत स्वार्थ परायण महत तत्व में विलीन कर रहे हैं। क्यों? धियो यो नः प्रचोदयात्” जिससे हम सबकी बुद्धि को ऐसी प्रेरणा प्राप्त हो कि हम अपना और दूसरों का कल्याणकारी “श्रेयस प्रेयस” उपाय निर्णय करने में समर्थ हो सकें।
चाहे कोई भी स्त्री-पुरुष क्यों न हो, जब तक वह व्यक्तिगत तुच्छ स्वार्थ को महत्व देता हुआ, अपनी ही स्वार्थ की सिद्धि में प्रयत्नशील रहता है, तब तक मूर्ख या बालक के समान ही अज्ञानी है। वह उस ‘ब्रह्मवर्चस’ स्वरूपिणी महाशक्ति शाली गायत्री देवी के तेज को सहन नहीं कर सकता, अतः उसे व्यक्तिगत स्वार्थ त्याग रूपी “द्विजत्व-संस्कार” को ग्रहण करके समाज-सेवा की प्रधानता का व्रत धारण करना चाहिये। ऐसे व्रतधारी द्विज ही गायत्री-मंत्र के महातेज का महान कार्यों में उपयोग कर सकते हैं।
इनमें जो प्रथम श्रेणी के द्विज हैं, उन्हें चाहिये कि नित्य गायत्री मंत्र का जप करते हुये ऐसी बुद्धि के लिये प्रार्थना करें जिससे वे अर्थ-शास्त्र में प्रवीण होकर श्रेयस को केन्द्र बनाकर “सामाजिक प्रेयस” के लिये उपाय ढूंढ़ सकें, ऐसे ‘द्विज’ वैदिक सिद्धान्तानुसार ‘वैश्व’ कहे जा सकते हैं।
जो दूसरी श्रेणी के ‘द्विज’ हैं, उनको गायत्री का वैज्ञानिक प्रयोग सहित जप करते हुये ऐसी बुद्धि के लिये प्रार्थना करनी चाहिये जिससे वे राजनीति शास्त्र में प्रवीण होकर श्रेयस भाव में स्थित होकर ही सम्पूर्ण देश या राष्ट्र की उन्नति-साधन में तत्पर रहें। ऐसे व्यक्ति ‘क्षत्रिय’ कहे जा सकते हैं।
जो तृतीय श्रेणी के द्विज हैं उनको ज्ञान-विज्ञान सहित नित्य-निरन्तर गायत्री-मंत्र का जप करते हुये ऐसी बुद्धि की कामना करनी चाहिये जिससे वे समग्र विश्व को-देश, काल, पात्र एवं जाति के अनुरूप-सुशृंखला युक्त धर्म-विधान देने में समर्थ हो सकें। ऐसे व्यक्ति वैदिक-विधान के अनुसार ‘ब्राह्मण’ वर्ण के कहे जायेंगे।
अतः गायत्री का अधिकार उसी को है जो व्यक्तिगत स्वार्थ को विसर्जन कर समाज-हित को महत्ता देता है, और समाज के हित में ही अपने हित का भी समावेश समझता है। इन तीनों श्रेणियों के अतिरिक्त जो व्यक्ति सरासार के विवेक से रहित और अल्प सामर्थ्य वाले हैं और समाज सेवा के लिये द्विजत्व का व्रत ग्रहण कर सकने में अशक्त हैं, वे ही द्विज श्रेणी के बाहर हैं और इसलिये गायत्री-मंत्र के भी अनाधिकारी हैं।
उपरोक्त लक्षणों वाले सज्जन व्यक्ति यद्यपि संख्या में थोड़े ही हैं, परन्तु यदि वे “संघबद्ध” होकर समग्र विश्व के कल्याण को अपना लक्ष्य बना कर क्रियात्मक रूप में मानव-समाज का मार्ग दर्शन करने लगें तो आशा है कि भारतीय वैदिक संस्कृति का उद्धार हो सकेगा और साथ ही समस्त विश्व को भी ‘श्रेयस प्रधान’ सुख शाँति की ओर अग्रसर कराया जा सकेगा।
(डॉ. रामचरण महेन्द्र, पी- एच. डी.)
इस विश्व का संचालन एक गुप्त शक्ति द्वारा हो रहा है। उत्थान और पतन नियति के एक सुनिश्चित क्रम और दैवी योजना के अनुसार होते हैं। कुछ काल के लिए इस दैवी व्यवस्था में देर हो सकती है, किन्तु अन्धेर नहीं।
देखा जाता है कि बड़े बड़े राज्य, बड़े संगठन, परिवार इत्यादि जब तक नीति और न्याय का पक्ष लेते हैं, सत्य और विवेक का पालन करते हैं, तब तक फलते फूलते रहते हैं। सत्य, न्याय और प्रेम में ऐसी अद्भुत दैवी शक्ति है, जिसके बल पर संस्थाएँ फलती फूलती हैं, अपना चरम विकास करती हैं, प्रजा समृद्धिशाली होती है, ज्ञान विज्ञान कला वाला होता है, नीति और न्याय की अवहेलना होती है, तो दैवी मार पड़ती है। ईश्वर की ओर से सजा मिलती है, जिससे संतुलन फिर पूर्ण हो जाता है। फिर धर्म, नीति, सत्य और विवेक का राज्य हो जाता है।
रावण एक विवेकी, विद्वान ब्राह्मण था। वर्षों तपस्या की, पर दर्प ने उसे पथ-भ्रष्ट कर दिया, इन्द्रियाँ लोलुपता ने उसकी नीति ज्ञान को भुला दिया, वासनाओं के तूफान से वह विचलित हो उठा। स्वार्थ और अंधकार ने उसे अंधा कर दिया। वह मनमानी करता गया यहाँ तक कि दैवी-विधान को हस्तक्षेप करना पड़ा और दैवी-मार के बाद फिर संतुलन स्थापित हो गया। समुद्र की तरह ऊपर संसार में तूफान रह सकता है, पर गहराई में वह अचल, अविचल और निश्चल दैवी नियम अपनी पूरी शक्ति से काम करता रहता है। परमात्मा की शक्ति और प्रेरणा से संसार में जो शुभ और हितकारी है, सत्य पर आधारित है, वही स्थायी है, वही होगा।
इसी प्रकार कंस पर दैवी मार पड़ी थी और असत्य पथगामी हिरण्यकश्यपु को पछताना पड़ा था। जिस परम सत्ता से सारा लोक, हमारा समाज चलता है, शरीर में सत्य और विवेक का राज्य होता है, उसी सर्वज्ञ पूर्ण, व्यवस्थित सर्वव्यापक, सर्वसमर्थ परमात्मा की दैवी मार से जीवन की गतिविधि ठीक हो जाती है। सत्य, न्याय, प्रेम और विवेक अपना कार्य करने लगते हैं।
मनुष्य चाहे समाज की दृष्टि से बचकर चुपचाप कोई पाप कर डाले, जंगल में छिपकर किसी की हत्या कर डाले, रात के घनघोर अंधकार में पाप कर ले, लेकिन सर्वव्यापक परमात्मा की दिन−रात, भीतर बाहर सब ओर देखने वाली असंख्य दृष्टियों से नहीं बच सकता। घर-बार, जंगल, समुद्र, आकाश, व्यवहार, व्यापार सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर है। आपकी अलग कोई सत्ता नहीं है। “आप” स्वयं ही अपने अन्दर परमात्मा को बसाये हुए हैं।
मेरी ही उन्नति हो, दूसरे यों ही पड़े रहें, मुझे अर्थ लाभ हो, दूसरे गरीबी में पड़े सड़ते रहें-यह नीति त्रुटिपूर्ण है। हमें समाज, परिवारः राष्ट्र, सब की उन्नति के लिए सामूहिक रूप से सोचना समझना और मिलकर शुभ चिन्तन करना चाहिए। हम एक होकर एक पवित्र मत से शुभ कार्य को प्रारंभ करें।
हम जो बहुत बार एक मत नहीं हो पाते हैं, उसका कारण यह होता है कि हम दैव्य-मन में सोचना छोड़कर असुर मन से विचारने लगते हैं। आसुरी वृत्ति से अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित होकर एक दूसरे पर अविश्वास करते हुए एक दूसरे को तिरस्कृत करते हुए हम चलेंगे, तो कभी कार्य में सिद्धि नहीं पा सकेंगे। आसुरी मन हमारे शुभ संकल्पों को नष्ट कर देता है। क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या आदि उत्तेजनात्मक प्रवृत्तियाँ दैवी मन को कमजोर करने वाली कुप्रवृत्तियाँ हैं।
हमारे अन्तःकरण में शुद्ध अन्तरात्मा हमें दैवी मार्ग दिखाता रहता है। निःस्वार्थ प्रेम और विवेक से युक्त दैवी मन हमारी बहुमूल्य दैवी सम्पदा है। उसे कदापि न त्यागना चाहिए।
सर्व हितकारी कार्यों में लगने से दैवी शक्ति हमारे साथ रहती है। सर्वव्यापक, सर्व समर्थ, सर्व-बलपूर्ण परमात्मा का साथ रहता है। अतः अपने इस दैवी संपर्क को कभी नहीं त्यागना चाहिए। अथर्ववेद में कहा गया है-
सं जानाम है मनसा संचिकित्वा मा युष्महि मनसा
दैव्येन।
मा घोषा उत्स्थुः बहुले विधिहते, मेषुः पप्तत् इन्द्रस्य
अहन्यागते॥
(अथर्व. 7-52-2)
अर्थात् “हम मन द्वारा मिलकर विचारें” और सोचना समझना मिलकर करें। दैव मन से कभी वियुक्त न होवें, बिछुड़ें नहीं। अंधकार आ जाने पर या विशाल द्यावा पृथ्वी के टूटने पर भी हमारे अन्दर हाहाकार के शब्द न उठें और दिन आ जाने पर, अनुकूल स्थिति पा जाने पर ईश्वरीय मार हम पर न पड़े।”
उक्त शब्दों में हमें जीवन के लिए एक बड़ी उपयोगी बात बताई गई है। भयंकर कठिनाई पड़ने पर भी हमें अपना शुद्ध-बुद्ध दैव्य मन नहीं त्यागना चाहिए। क्षुद्र असफलताएँ समयानुसार स्वयं नष्ट हो जाती हैं। कहा गया है कि यदि महा-दारुण प्रलय की रात्रि भी आ जावे और यह विशाल पृथ्वी नष्ट भी होने लगे, फिर भी हमें दैव्य मन से विचलित नहीं होना चाहिए। ईश्वरीय न्याय देर सबेर अवश्य होगा, यह सदा ध्यान रखना चाहिए। संभव है जल्दी आपको अपने लक्ष्य की सिद्धि प्राप्त न हो, किन्तु अटल निष्ठा से सत्पथ पर लगे रहना चाहिए।
रात्रि के बाद दिन आता है। काले काले भयंकर बादल बरसने के बाद पुनः स्वच्छ नीला आकाश दिखाई देने लगता है। सूर्य की निर्मल किरणें फूटती हैं। इसी प्रकार कठोर स्थिति के बाद सुखद स्थिति आ जाती है उसके साथ ही और अनुकूल अवस्था आ जाती है।
लेकिन जो दैवाज्ञा की अवहेलना कर झूठ, कपट, भ्रष्टाचार, लूटमार, चोरी, डकैती, अनैतिक कर्मों द्वारा भगवान को धोखा देने का प्रयत्न करते हैं, वे बाद में पछताते हैं और अपनी वर्षों की अर्जित पूँजी को भी खो बैठते हैं। दो एक उदाहरण लीजिए।
एक पचास वर्षीय सेठ को विवाह की सूझी। सबने समझाया कि अब तो साँसारिक जीवन से मुक्त होना चाहिए और इन्द्रिय-जन्य सुखों से निवृत्त होना चाहिए, किंतु वे न माने। धन का अटूट भंडार उनके पास था। उसके लोभ में उन्हें एक नारी मिल गयी। कुछ वर्ष बीते, उनके बच्चे उत्पन्न हुए। नारी दुश्चरित्रा निकली। उसकी अपकीर्ति फैलती गई। अन्य व्यक्तियों से होने वाले अनैतिक संबंध प्रकट हो गए। इसी मानसिक दुःख में सेठजी स्वर्गवासी हुए। उस नारी के संसर्ग में धन के लोभ से आने वाले व्यक्तियों ने धीरे-धीरे सारा माल हड़प लिया। आज उस स्त्री के कई पुत्र और कन्याएँ अपना सब कुछ बेच दाने-दाने को मुहताज हो रहें हैं। दैवी मार उस पूरे परिवार पर ऐसी पड़ी कि सब नष्ट हो गया।
एक पुलिस के एस.पी. बहुत रिश्वत लेते थे। चारों ओर अमीरी और शान शौकत थी। ऐश्वर्य का विलास था। सोचते थे जीवन यों ही मस्ती और शान से चलता जायगा। एक बार रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े गये। नौकरी छूटी। समाज में अपमानित और दण्डित भी हुए। पुराना जोड़ा हुआ सब व्यय हो गया।
सदा ईश्वर के नेत्र हमारे अच्छे-बुरे कार्यों और मन्तव्यों को देखते रहते हैं। हमें सदा सत्य, न्याय, ईमानदारी की कमाई का, उचित अनुचित का, विवेक जागरुक रखना चाहिये। विषय भोगों और इन्द्रिय लोलुपता में नहीं पड़ जाना चाहिये। अन्यथा दैवी मार बुरी तरह हम पर पड़ती है। ऐसे ही समय इन्द्र वज्र गिरा करता है। बड़े-बड़े साम्राज्य जो अपने बड़े शत्रुओं के आक्रमणों को सह जाते हैं, ईश्वरीय मार से पस्त होकर मिट्टी में मिल जाते हैं।
आपके अन्दर जो दैवी मन है, जो सत् और असत्, विवेक, अविवेक, का अन्तर बतलाता है, उसे जगाये रखना चाहिए।
(श्री. यादराम शर्मा ‘राजेश’, ए.ए)
मानव-जीवन का चरम लक्ष्य किसी न किसी रूप में महानता को प्राप्त करना है। महानता का अर्थ है कि आप किसी न किसी क्षेत्र में अपनी वृत्तियों को इतना विकसित करलें कि साधारण लोगों के लिए अनुकरणीय बन जायें और आपके मार्ग का अनुकरण करने से लोगों का कल्याण होने की सम्भावना हो। सच्ची महानता को प्राप्त करने के लिए त्याग, उदारता, सहानुभूति, हृदय की निर्मलता और चरित्र की शुद्धता आदि गुणों की आवश्यकता है। ये गुण जहाँ अपने सच्चे अर्थों में उत्पन्न हो जायेंगे, वहाँ संसार की सब विभूतियाँ अपने आप आकर एकत्र हो जायेंगी। अनुभव के दो शब्द सहस्रों ग्रंथों के अर्जित ज्ञान से अधिक मूल्यवान हैं तभी तो महात्मा कबीर ने पूरे आत्म-विश्वास के साथ कहा है :- “पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। एकै आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।”
शुद्ध आचरण द्वारा उपस्थित किये गये एक उत्तम उदाहरण का जितना प्रभाव होता है उतना सहस्रों विद्वानों, वक्ताओं के सुन्दर भाषणों का नहीं होता। जिसका हृदय उत्तम गुणों के सौंदर्य से विभूषित हो गया है, उसकी बाह्य आकृति और वेशभूषा कितनी ही विकृत और साधारण हो, जन-समुदाय उसकी ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रहेगा। इसलिए सच्ची महानता को प्राप्त करने के लिये किसी बड़ी विद्वत्ता, वक्तृत्वकला अथवा विशेष वेशभूषा की आवश्यकता नहीं है। ये सब बाह्याडम्बर मात्र हैं और इनका प्रभाव केवल क्षणिक और अस्थाई होता है।
महानता को प्राप्त करने के मार्ग पर चलने के दो तरीके हैं। पहला तरीका है- एकाएक तीव्रता के साथ सर्वस्व त्यागकर अपने जीवन को लोक-कल्याण और परमार्थ के लिये अर्पित कर देना। कभी-कभी इसमें आशातीत सफलता प्राप्त होती है। आज से ढाई हजार साल पहले कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ ने महात्मा बुद्ध बनने के लिये यही तरीका अपनाया था। और भी अनेक लोग समय पर इस तरीके द्वारा महानता की चरम सीमा पर पहुँचते रहे हैं। किन्तु इसमें कभी-कभी जल्दबाजी का खतरा भी रहता है। जल्दी में निर्णय करने वालों का जोश जब ठंडा हो जाता है तो उसकी बड़ी भयंकर प्रतिक्रिया के कारण कभी-कभी बड़े क्रान्तिकारियों को पुलिस की मुखबिरी करते, महान देश भक्तों को देश-द्रोह करते और वैरागियों को घर बार बसाते अथवा कुमार्ग-गामी होते देखा गया है। इसलिये महानता के मार्ग पर आगे बढ़ने का दूसरा और अधिक व्यावहारिक तरीका यह है कि धीरे-धीरे छोटे छोटे कार्यों द्वारा पहले बड़े कार्यों और त्याग का प्रशिक्षण लिया जाये। धर्म-शास्त्रों में अपनी आय का एक निश्चित भाग सात्विक कार्यों के लिए दान कर देने का विधान इसीलिये किया गया है ताकि लोगों में अनासक्ति-भाव पैदा हो। वैदिक मंत्रों में बराबर ‘इदन्नमम’ की आवृत्ति हमारी प्रवृत्ति को त्याग की ओर अग्रसर करने के लिये ही की गई है। अतः यदि आपमें एक दम सब कुछ त्याग कर उस उदार भावना को अंत तक निभाये जाने का आत्म-बल नहीं है तो आप धीरे धीरे अपनी त्याग-वृत्तियों को विकसित करके महानता की चरम सीमा तक पहुँच सकते हैं। पहले आय और श्रम का थोड़ा भाग सार्वजनिक कार्यों में लगादो और फिर अभ्यास करते-करते एक दिन अपने सम्पूर्ण व्यक्तिगत उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर अपने संपूर्ण साधनों को विश्वात्मा की सेवा के लिए समर्पित कर दीजिये।
आपको किसी भी आयु में यह अनुभव नहीं करना चाहिये कि अब आपके लिये महानता को प्राप्त करने का अवसर जाता रहा है। यह ठीक है कि जितना शीघ्र इस पवित्र मार्ग की ओर अग्रसर हुआ जा सके उतना अच्छा है किन्तु कभी आरम्भ न करने से कभी भी आरंभ कर देना अच्छा है। हमारे पूर्वजों ने जीवन के चार भाग किये थे और वे जीवन के उत्तरार्ध के दो भागों को क्रमशः समाज-सेवा और परमार्थ-साधन का साधन बनाया करते थे। भारतीय परम्परा इस बात की साक्षी है कि पारिवारिक मोह-माया से मुक्त होकर शरीर को सार्वजनिक कार्यों और समाज सेवा का साधन बनाना महानता को प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग है। प्रत्येक युग में हमारे देश में उन्हीं महानुभावों को समादर का पात्र समझा गया है जो व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊँचा उठकर अपने शरीर का उपयोग अपने समाज अथवा मानव-जाति के कल्याण के लिये करते आये हैं।
आपका प्रारम्भिक जीवन कितना ही साधारण अथवा नगण्य रहा हो, निरन्तर अभ्यास के द्वारा आप महानता की उस चरम सीमा तक पहुँच सकते हैं जिसकी इस समय आप कल्पना भी नहीं कर सकते। सच्ची लगन और अध्यवसाय के बल पर लोगों ने संसार में असंभव को संभव कर दिखाया है। इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद ने अपने जीवन के चालीस वर्ष एक व्यापारी के रूप में भ्रमण करने में ही बिताये थे। आदि कवि बाल्मिकि के जीवन का अधिकाँश भाग बहेरिये के रूप में बीता था। संस्कृत के सर्वोत्तम नाटककार कवि-कुल गुरु कालिदास अपनी जवानी तक वज्र-मूर्ख ही रहे थे।
प्रातः स्मरणीय गोस्वामी तुलसीदासजी आरंभ में हमारी आपकी तरह एक साधारण गृहस्थ ही थे और कहा जाता है कि संत-शिरोमणि महात्मा सूरदासजी तो अपनी जवानी के दिनों में साधारण से भी नीचे गिरे हुए थे। मकानों की रंगाई-पुताई करते हुये हिटलर ने यह नहीं सोचा था कि एक दिन वह जर्मनी का भाग्य-विधाता बन जायेगा। लुहार के रूप में जीवन आरंभ करने वाला मुसोलिनी यह नहीं जानता था कि एक दिन समस्त इटली की बागडोर उसके ही हाथों में आने वाली है। इसलिये आप भी यह मत सोचिये कि आपने अपना जीवन किस रूप में आरंभ किया था। आप-आप अपनी छोटी से छोटी स्थिति से प्रयत्न आरंभ कीजिये और आप देखेंगे कि धीरे-धीरे बढ़ते हुये आप कहीं से कहीं पहुँच गये हैं।
आज के युग में इस बात को समझने के लिये गाँधी जी का उदाहरण उपयोगी होगा। गाँधी जी की आत्म-कथा का अध्ययन करने पर पता लगता है कि आरंभ में वे अत्यन्त साधारण आदमी थे। मनुष्य में पाई जानी वाली सभी निर्बलतायें और मनोविकारों की प्रबलता उनमें औसत से अधिक मात्रा में थी। प्रतिभा और बुद्धि की दृष्टि से भी वे कोई अद्वितीय व्यक्ति नहीं थे। परिवार की सहायता के बल पर उन्होंने विलायत जाकर बैरिस्टरी पास की लेकिन वे कोई सफल वकील भी न बन सके। उन्होंने स्वयं लिखा है कि जब वे जहाज में बैठकर पहले पहल विलायत को गये तो अपने जहाज के कमरे से बाहर नहीं निकलते थे क्योंकि उन्हें अँगरेजी में बातें करने का अभ्यास नहीं था और कोई अँगरेज उनसे बातें करता तो वे ठीक-ठीक समझ नहीं पाते थे। बैरिस्टर होने पर भी जब वे अपने पहले मुकदमे, की पैरवी करने खड़े हुये तो उनके पैर काँपने लगे, सिर चक्कर खाने लगा और उन्हें ऐसा मालूम हुआ जैसे सारी अदालत घूम रही है। उनकी जबान बन्द हो गई और वे अपने मुवक्किल की फीस लौटाकर अदालत से उठकर चले गये। जब इतना शर्मीला और दब्बू आदमी भी अपनी इच्छा-शक्ति-मनोबल और दृढ़ चरित्र के बल पर अपने युग का महानतम पुरुष और करोड़ों व्यक्तियों का एक-छत्र हृदय-सम्राट बन सकता है तो फिर कोई कारण नहीं है कि प्रयत्न करने पर आप भी महानता को प्राप्त न कर सकें।
अंग्रेजी की एक सूक्ति का अर्थ है कि “कुछ लोग जन्म से ही महान पैदा होते हैं, कुछ लोगों के ऊपर महानता थोपी जाती है और अधिक लोग उसे सतत परिश्रम करके प्राप्त करते हैं।” प्रयत्नों द्वारा प्राप्त की गई महानता ही सच्ची महानता है क्योंकि ऊपर से लादी गई अथवा मुफ्त में पाई गई वस्तु का उतना महत्व नहीं होता। ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि महानता को प्राप्त करना उतना कठिन नहीं है जितना कि वह समझा जाता है। महानता किसी विशेष व्यक्ति की धरोहर या जागीर नहीं है। प्रयत्न करने पर अत्यंत साधारण व्यक्ति भी महानता को प्राप्त कर सकता है। आप भी महानता को प्राप्त कीजिये।
(श्री सत्यभक्त)
भारतीय वैदिक साहित्य का एक वचन है “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।” अर्थात् सब लोग सुखी रहें और नीरोग-स्वस्थ रहें।” वर्तमान समय के साधारण शिक्षित व्यक्ति इस कथन को एक कल्पना या शुभाभिलाषा से अधिक कुछ नहीं मानते, उनकी समझ में तो दुःख और क्लेश जीवन की ऐसी साधारण बातें हैं, जो बजाय सुख और आनन्द के बहुत अधिक परिमाण में पाई जाती हैं। जिन अभागों का अधिकाँश जीवन नोंन, तेल, लकड़ी की चिन्ता में ही बीतता है और जिनके लिये, खाना, पहिनना और सोने से बढ़कर संसार में कोई अन्य पुरुषार्थ दिखलाई नहीं देता वे यदि ऐसे विचार रखें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
पर वास्तविक तथ्य उपर्युक्त धारणा से बहुत कुछ भिन्न है। हम स्पष्ट शब्दों में कह सकते हैं कि अगर आज मनुष्य दुखी है, भर पेट भोजन और साबित कपड़ों के लिए भी तरसता है, यदि उसे हाड़तोड़ मेहनत करने पर भी साधारण आराम से रहने लायक सब वस्तुएँ प्राप्त नहीं होती तो यह उसी का दोष है। यह ठीक है कि इस बात में किसी एक खास आदमी का दोष नहीं है वरन् यह सारे समाज का दोष है, और चूँकि हम भी उस समाज के एक सदस्य हैं इसलिए हम भी दोषमुक्त नहीं कहे जा सकते।
समाज-संगठन का एक बहुत सीधा सादा और प्रथम सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक मनुष्य को जीवित रहने का पूर्ण अधिकार है, यदि वह समाज का उपयोगी सदस्य बना रहना चाहता है और उसके लिये अपनी शक्ति और परिस्थिति के अनुसार कार्य करने को प्रस्तुत है। इसमें यह प्रश्न उठाना अनुचित है कि कोई बलवान व्यक्ति अधिक काम करता है और कमजोर ने कम काम किया है, अथवा किसी चतुर व्यक्ति ने किसी मन्द बुद्धि वाले से दुगुना-चौगुना काम कर दिखाया है। अब भी बड़े-बड़े परिवारों में हर योग्यता और विभिन्न प्रकार की बढ़िया-घटिया शक्ति वाले व्यक्ति रहते हैं, पर भोजन कराते समय यह नहीं देखा जाता कि ज्यादा कमाने वाले को ज्यादा भोजन सामग्री दी जाय और कम कमाने वाले को कम। इसी प्रकार यदि हम दस-बीस व्यक्तियों के बजाय अपनी बस्ती के दो-चार हजार मनुष्यों को अपना परिवार मान लें और यह अनुभव करें कि उनमें से किसी के बिना हमारा काम नहीं चल सकता तो यह स्पष्ट हो जायगा कि उन सबको भोजन, वस्त्र, तथा अन्य भौतिक पदार्थों पर समान अधिकार देना सब प्रकार से उचित ही है। यह ख्याल करना कि मेहतर, चमार, लकड़ी, घास करने वाले, मिट्टी खोदने वाले आदि का काम वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, क्लर्क आदि की अपेक्षा घटिया है इसलिए उनको कम या घटिया दर्जे की सामग्री दी जाय, एक निकृष्ट स्वार्थ भावना का परिचायक है, जो स्वार्थी या अन्यायी व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न कर दी गई है। हम थोड़ी देर के लिये मनुष्य मात्र की आध्यात्मिक एकता के प्रश्न को छोड़ भी दें तो क्या हमको यह दिखलाई नहीं देता कि मेहतर, चमार आदि का कार्य एक दृष्टि से वकील डॉक्टर आदि के बड़े समझे जाने वाले कार्यों से कहीं कठिन है और यदि सब मनुष्य शिक्षित, योग्य बन जायें तो उन कामों के बिना समाज का जीवन-निर्वाह बड़ा दुखदायी हो जाय। यह हमारी महान कृतघ्नता है कि यदि हम इन गन्दगी दूर करने के काम करने वालों का अहसान मानने के बजाय, उनको नीच समझें और उनके काम का मेहनताना थोड़े से पैसों में चुकाना चाहें। जिस समय समाज न्याय पथ पर चलने लगेगा और प्रत्येक मानव शरीरधारी को उसका जन्मसिद्ध अधिकार दिया जायेगा, उस समय इस गन्दे अथवा नीच समझे जाने वाले पेशों की काया पलट ही कर देनी पड़ेगी। उस समय इनके करने वाले व्यक्तियों को किसी न किसी रूप में ऐसी विशेष सुविधाएं देनी पड़ेंगी जिनके आकर्षण से कुछ लोग उनको करने को राजी हो सकें। उदाहरण के लिए जहाँ अन्य लोगों को आठ घण्टे श्रम करना आवश्यक हो वहाँ ऐसे काम करने वालों का समय छह घण्टे का ही रखा जाय। अथवा उनके लिए गाड़ी, मशीन आदि की ऐसी व्यवस्था की जाय जिससे वे इन कार्यों को थोड़ी ही मेहनत से दूर रहकर पूरा कर सकें।
हम सामाजिक न्याय के प्रश्न पर विचार करते हुये अपने विषय से कुछ दूर चले आये। सबके लिए पर्याप्त सुख मिलने में सबसे बड़ी बाधा लोगों के ख्याल में यही है कि संसार में इतनी सामग्री ही नहीं कि सब लोगों को आवश्यकतानुसार उचित परिमाण में दी जा सके। यह एक बड़ा विवादग्रस्त विषय है और समाजवाद तथा पूँजीवाद के खंडन-मंडन में जो सैकड़ों ग्रन्थ लिखे गये हैं उनमें मुख्यतः इसी पर बहस की गई है। क्योंकि थोड़े से कट्टर पूँजीवादियों को छोड़कर साधारण मनुष्यों में ऐसे कम ही निकलेंगे जो सामग्री के पर्याप्त होने पर भी उसे समस्त जनता को देने का विरोध करें। इसलिये हम इस लेख में पाठकों को यही बतलाने का प्रयत्न करेंगे कि वर्तमान समय में स्वार्थी लोगों के एक दल ने ही जान-बूझ कर ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर रखी है कि जिससे जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग जीवन निर्वाह की आवश्यक सामग्री में वंचित रहता है और करोड़ों को तो वास्तव में आधा पेट खाकर घोर अभाव की दशा में जीवन बिताना पड़ता है। यदि ये सामाजिक व्यवस्था में बाधा स्वरूप थोड़े से लोग, जिनकी तादाद समस्त जनसंख्या में एक प्रति सैकड़ा भी नहीं है, हस्तक्षेप करने से रोक दिये जायें तो निःसन्देह प्रत्येक व्यक्ति को भर पेट खाना, कपड़ा और अन्य साधारण वस्तुएँ प्राप्त हो सकती हैं और इसके लिये उनको कभी चिन्तित होने का अवसर नहीं आ सकता।
इस सम्बन्ध में विवेचन करने पर पहली बात तो यह दिखलाई पड़ती है कि वर्तमान समाज के मुखिया और संचालक बनने वालों ने उसका संगठन ऐसा दूषित कर रखा है कि देश के करोड़ों व्यक्ति व्यर्थ के कामों में लगा दिये जाते हैं और जीवन निर्वाह के लिये उपयोगी कार्य करने वाले थोड़े ही बचते हैं। उदाहरण के लिये अगर संसार की लगभग सवा दो अरब की आबादी में से कार्य न कर सकने योग्य बच्चे और बूढ़ों को निकाल कर कार्यक्षम लोगों की संख्या डेढ़ अरब मान ली जाय तो इसमें आधे के लगभग ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जो जन-जीवन की दृष्टि से कोई उपयोगी काम नहीं करते वरन् उलटा उसका विनाश करते हैं। बड़े-बड़े पूँजीपतियों के परिवार वाले और उनकी छोटी बड़ी समस्त सेवाओं के लिए सदैव तैयार रहने वाले असंख्य दास दासियों की बात तो प्रत्यक्ष ही है, पर इनके सिवाय अगर कुछ भी गहराई में उतर कर विचार किया जाय तो अनेकों कार्य ऐसे मिलेंगे जिनका जन-जीवन के लिये कोई उपयोग नहीं है पर जिनमें करोड़ों व्यक्ति लगे हुये हैं। इनमें सबसे पहला नाम तो हम सब तरह की सेना का गिना सकते हैं जिसकी संख्या इस ‘शाँति काल’ में भी, सब देशों का हिसाब लगाया जाय तो, दस पाँच करोड़ तो निकलेगी ही। इसी तरह पुलिस के सिपाहियों और गुप्तचर विभाग वालों की संख्या भी संसार भर में कई करोड़ से कम नहीं है। इन दोनों महकमों की आवश्यकता केवल उन्हीं लोगों की है जिन्होंने जबर्दस्ती या चालाकी से लोगों को लूटकर एक बड़ी रकम अपने पास जमा कर रखी है और जो उसे हर एक तरह के छल−बल से बढ़ाने और सुरक्षित रखने के लिए चिंतित रहते हैं। यदि ये दूसरों का स्वत्व अपहरण करने वाले बीच में से हटा दिये जायें और सब लोग परिश्रम करके अपने पसीने की रोटी खाने को राजी हों तो आप ही विचारिये कि इन राइफलों, मशीनगनों, बमवर्षक जहाजों और एटम तथा हाइड्रोजन बमों की मुझे और आपका क्या आवश्यकता है? और इनसे हमारा क्या लाभ है? इन सब का निर्माण तो वे ही लोग कराते हैं जो अपनी वर्तमान सम्पत्ति से सन्तोष न करके दूसरे देशों पर हमला करके उनको गुलाम बनाना चाहते हैं या देश विदेश में अपना व्यापार फैलाकर करोड़ों-अरबों रुपया बटोरने की हविस रखते हैं।
इस प्रकार आप देखें तो मालूम होगा कि इन ‘बड़े डाकुओं’ और ‘लुटेरों’ के कारण अनावश्यक कार्यों में लगे हुये लोगों की सूची बहुत लम्बी है। ऊपर हमने सेना का नाम लिया है, पर सेना के लिये हथियार और अन्य सामग्री तैयार करने वाले कारीगरों और मजदूरों की संख्या भी संभवतः सिपाहियों के बराबर ही होगी। अमरीका आदि की जो रिपोर्ट आती हैं उनसे मालूम होता है कि वहाँ जितने व्यक्ति कारखानों में काम कर रहे हैं उनमें लगभग आधे सेना सम्बंधी कारबारों में संलग्न हैं। फिर आगे चलिये तो संसार की आवागमन सम्बन्धी व्यवस्था में-जैसे रेल, मोटर, लारी, पानी के जहाज, हवाई-जहाज आदि के बनाने और चलाने तथा मरम्मत, सुरक्षा आदि में कितने करोड़ व्यक्ति लगे होंगे? इन सबका दसवाँ भाग तो संभवतः जन साधारण के काम में आता होगा, अन्यथा शेष में भाग बड़े लोगों की शान शौकत, सैर तमाशे और उद्योगपतियों के रुपया कमाने के व्यापार से सम्बन्ध रखता है। इसे भी बिल्कुल सत्य समझ लीजिये कि इस व्यापार का शायद दस प्रतिशत जनता की आवश्यकता के लिये किया जाता हो, नहीं तो उसका एकमात्र उद्देश्य नफा कमाने के लिये इधर के माल को उधर ले जाना, फिर तीसरी और चौथी जगह पहुँचाते रहना ही होता है। इसमें कितने कुली, मजदूर, पैक करने वाले, रेलों पर चढ़ाने-उतारने वाले, गोदामों में रखने और चौकीदारी करने वाले आदि व्यक्ति लगते होंगे उन सबका हिसाब लगाने से दिमाग चकरा जाता है। इतना ही नहीं ये बड़े-बड़े मजबूत और आलीशान महल, चोरों से न टूट सकने वाली फौलादी तिजोरियां, करोड़ों ताले, खजानों पर रात दिन पहरा देने वाले चौकीदार आदि भी इन्हीं ‘बड़े लोगों’ के शरीर और सम्पत्ति की रक्षा के लिये होते हैं और इनमें भी जन-शक्ति का कम अपव्यय नहीं होता।
उपयोगी जनशक्ति के निरर्थक कामों में लगे रहने का यह एक पहलू हुआ। दूसरा बहुत बड़ा पहलू यह भी है कि ये व्यापारी और उद्योगपति अपने ऊँचे नफा को कायम रखने के लिये करोड़ों कार्य करने को प्रस्तुत मजदूरों और पढ़े लिखे लोगों को भी बेकारी की दशा में रखते हैं। क्या आप अखबारों में नहीं पढ़ते कि कितने ही कपड़े के कारखाने इसलिये बन्द पड़े हैं कि उनके गोदामों में कपड़े का बहुत स्टॉक जमा हो गया है। इस उद्देश्य से कितने ही अन्य कारखाने सप्ताह में केवल दो या तीन ही दिन चलाये जाते हैं। यदि यह पूछा जाय कि यह स्टॉक क्यों जमा हो गया तो इसका सच्चा उत्तर यही मिलेगा कि जिस भाव में कारखाने वाले उस कपड़े को बेचना चाहते हैं उतने में खरीदने के लिये लोगों के पास रुपया नहीं है। अन्यथा आप अपने ही घर में या अड़ोस-पड़ोस के लोगों के यहाँ पता लगा लीजिये कि उनको वास्तव में कपड़े की कैसी सख्त जरूरत है और कितने मर्द तथा औरतें आपके सामने ही चिथड़ों से बदन ढके निकलते रहते हैं। यदि इन लोगों को कारखानों का मोटा कपड़ा, मारकीन आदि भी मिल जाय तो क्या वे उसे लेने के लिये खुशी से तैयार न होंगे? यह एक बड़ा अनोखा तमाशा है कि एक ओर कपड़ा तैयार करने वाले मजदूर बैठे हुये हैं और आज्ञा मिलते ही कपड़ा बनाने को राजी हैं-राजी ही नहीं दिल से उत्सुक हैं, लालायित हैं। दूसरी ओर साधारण जनता भी कपड़े की कमी से दुखी है और चाहती है कि अगर मुनासिब दामों में कपड़ा मिल सके तो आज ही काम चलाने लायक दस बीज गज तो प्रत्येक ही खरीद ले। पर इन दोनों के बीच में कुछ दलाल, कारखानों के मालिक आदि ऐसे बाधा स्वरूप व्यक्ति बैठे हैं जो न खुद खा सकें और न दूसरों को खानें दें। इस प्रकार वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में स्वार्थ और अहंकार के कारण कुछ व्यक्ति ही समाज के साथ शत्रुता कर रहे हैं और सर्वसाधारण को वैज्ञानिक साधनों द्वारा प्राप्त होने वाली वृद्धि का लाभ उठने से रोक रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो वर्तमान समय में पैदावार इतनी अधिक बढ़ गई है और सहज में बढ़ाई जा सकती है कि आरम्भ में बतलाये गये वैदिक सूक्त के अनुसार आज कल की बढ़ी हुई समस्त जन-संख्या भी सचमुच जीवन-निर्वाह की सब प्रकार की आवश्यक सामग्री प्राप्त कर सकती है और सुख का जीवन व्यतीत कर सकती है।
अब यह प्रश्न किया जा सकता है कि आजकल दिखलाई पड़ने वाली इस विपरीत और अस्वाभाविक अवस्था को किस प्रकार बदला जाय, जिससे लोग अपने न्यायानुकूल अधिकारों का उपयोग कर सकें? इसका एकमात्र उपाय सामूहिक चेतना ही है। जैसा हम सब अच्छी तरह जानते हैं, आजकल वैज्ञानिक अस्त्र शस्त्रों की ताकत इतनी बढ़ गई है कि शासन पर सत्तारूढ़ बड़े आदमियों का गुट चाहे तो दो चार दिन में करोड़ों आदमियों का सफाया कर सकता है और उनके एक हजार वेतनभोगी सिपाही एक करोड़ व्यक्तियों को काबू में रख सकते हैं। इसलिये अब लाठी डंडे या साधारण हथियारों से लड़ भिड़कर अपने अधिकारों का पा सकना तो संभावना के बाहर की बात है। पर यदि जनता को वास्तविक स्थिति समझाई जाय और वह अन्यायपूर्ण नियमों को न मानने का दृढ़ निश्चय करले तो जिस प्रकार महात्मा गाँधी के सत्याग्रह के सामने बहुत अधिक शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा था, उसी प्रकार आजकल के पूँजीवादी भी झुक सकते हैं। आजकल इसी प्रकार के आन्दोलनों से कितने ही देशों में कुछ अंशों में सफलता मिल चुकी है और रूस तथा चीन जैसे साम्यवादी देशों की बात छोड़ दीजिये, इंग्लैण्ड और अमरीका जैसे पूँजीवादी देशों में भी ऐसी व्यवस्था की जा चुकी है कि सब व्यक्तियों को जीवन निर्वाह के लायक काम दिया जाय और फिर भी जो बेकारी या अशक्तता के कारण काम करने में असमर्थ हों उनके निर्वाह का खर्च सरकार अपने पास से दे। पाठकों को शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि वहाँ पर ये सरकारी खैरात पर रहने वाले लोग भी हमारे यहाँ के अधिकाँश ‘भले आदमियों’ की अपेक्षा ज्यादा आराम से रहते हैं और अधिक अच्छा खाना और कपड़ा पा जाते हैं। अगर उनको खराब चीजें दी जाती हैं तो वे उसके खिलाफ उसी प्रकार आँदोलन करते हैं जैसे कि वेतनभोगी कर्मचारी। पर हमारे यहाँ, जहाँ कि आत्मज्ञानी ऋषियों ने सर्वप्रथम ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का जयनाद किया था और उस युग की परिस्थिति के अनुसार उस पर आचरण करके भी दिखलाया था, आजकल करोड़ों व्यक्तियों को कुत्ते बिल्ली से भी बुरी हालत में रहना पड़ता है और ऐसी घटनाएं भी पाई जाती हैं कि लोग भूख तथा अन्य अभावों से व्याकुल होकर आत्महत्या कर लेते हैं। यह अवस्था निस्संदेह किसी भी जाति या समाज के लिये कलंकपूर्ण है। ऐसी दशा में जब हम आध्यात्मिक ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं-ऋषि सन्तान होने का दावा करते हैं तो हँसी भी आती है और रोना भी। इसलिये हमारा सब से पहला कर्तव्य यही है कि अपने समाज में सामूहिक चेतना उत्पन्न करके सर्व साधारण को संगठित रूप से अन्याय का विरोध करने को तैयार करें। इस बात को अच्छी तरह याद कर लीजिये कि कम से कम वर्तमान समय में तो ‘धर्म-साधन’ भी संगठन द्वारा ही हो सकता है। अन्यथा जब तक आपका कोई भी पड़ोसी रोटी के टुकड़ों के लिये लाचार होकर भले बुरे सब तरह के काम करने को तैयार है तो आपको ‘अध्यात्म’ और ‘धर्म’ का नाम लेने का कोई अधिकार नहीं और न उसका कोई मूल्य समझा जा सकता है। उस समय हमारी वही स्थिति होगी जिसका वर्णन करते हुये “प्रिंस क्रोपाटकिन” ने कहा है-
“जवानी की उम्र में ही हमारे विचार संकुचित हो जाते हैं और प्रौढ़ अवस्था में पिछले विचारों और तरीकों की गुलामी दिमागों में भर जाती है। इस कारण हमारे अन्दर विचार करने का साहस भी नहीं रहता। जब कोई नया विचार हमारे सामने आता है तो हम उस पर अपनी सम्मति प्रकट करने का साहस नहीं कर पाते। जिन कई सौ वर्ष पुरानी पुस्तकों पर धूल जमी हुई है, उन्हीं को हम बार-बार उठाते हैं और यह ढूंढ़ते हैं कि पुराने विद्वानों का इस विषय में क्या मत था!”
क्या हम आशा करें कि सद् बुद्धि को प्रेरणा देने वाली वेदमाता गायत्री के उपासक वास्तविक-प्रज्ञा का परिचय देते हुये देश को सामूहिक चेतना की ओर अग्रसर करेंगे?
(स्वामी सहजानन्द जी)
संसार में इस समय अशान्ति की जैसी बाढ़ आई है वैसी मानव जाति के इतिहास में कभी दिखलाई नहीं दी थी। पहले भी बड़े-बड़े घोर संग्राम हुये हैं, पर उनका क्षेत्र सदैव एक देश या दो चार देशों तक सीमित रहा था। पर आजकल आवागमन के साधनों की वृद्धि से युद्ध का रूप ऐसा सर्वव्यापक और संहारक हो गया है कि यदि हम कहें कि संसार के ऊपर एक महानाश की काली घटा छाई है जो किसी भी क्षण प्रलय दृश्य उपस्थित कर सकती है, तो इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है। कुछ सुहृदय जन इस महानाश के निवारण के लिये सतत प्रयत्नशील हैं, और उनके उदयोग से यह बीच बीच में टल भी जाता है, पर इसकी जड़ बराबर जमी हुई है और इसकी संभावना दिन पर दिन पहले की अपेक्षा भयंकर रूप धारण करती जाती है। यह दुरावस्था कैसे उत्पन्न हुई और इसके निराकरण के लिये जो प्रयत्न किये जाते हैं वे क्यों सफल नहीं हो पाते इसके सम्बन्ध में एक भारतीय विद्वान संन्यासी के विचार हमें बहुत उपयुक्त और मनन योग्य जान पड़े। उन्होंने बड़े स्पष्ट रूप में यह बतलाया है कि वर्तमान दुर्गति का कारण राजनीति से धर्म का, आध्यात्मिकता का बहिष्कार कर देना ही है। उनका कथन है कि-
जिस पदार्थ, धर्म, गुण या विशेषता के सम्बन्ध से संसार के कोई भी पदार्थ वाञ्छनीय या माननीय हों अथवा उनके अस्तित्व को आवश्यक समझा जाय, उसे ही शक्ति कह सकते हैं। इसी के नाम-योग्यता, सामर्थ्य, ‘पॉवर ताकत, आदि भी हो सकते हैं। जो पदार्थ शक्ति या योग्यता से शून्य है, जिसमें कोई विशेषता या चमत्कार नहीं, उसके रहने की जरूरत ही क्या? सृष्टि की रचना करने वाला, फिर वह चाहे कोई या कुछ भी क्यों न हो, व्यर्थ पदार्थों की रचना कर नहीं सकता। इसी लिये यह देखा जाता है कि ज्यों ही कोई वस्तु अशक्त या बेकार हुई कि वह रहने ही नहीं पाती। संसार में जो जीवन-स्पर्धा या जीवन होड़ (स्ट्रगिल फॉर एकजिसटेंस) चल रही है उसका भी रहस्य यही है, और ‘जीवा जीवस्य जीवनम्, ऐसा जो पुराने लोग कह गये हैं, उसका भी यही अभिप्राय है। प्रकृति या सृष्टिकर्ता को कभी भी यह इष्ट नहीं कि दूषित, गलित, या अशक्त पदार्थ जमा होकर उसकी कृति को चौपट करें। इसलिये सतत वह इस प्रयत्न में रहती है कि ऐसा पदार्थ जल्दी से जल्दी खत्म हो जाय, उसका रूपांतर होकर फिर से उपयोगी पदार्थ बन जाय। हम नित्य देखते हैं कि ज्यों ही कोई प्राणी मरा कि सड़ गलकर खाद बना, पशु-पक्षियों का खाद्य बनकर उनका पोषणकर्ता हुआ इस प्रकार उसकी व्यर्थता नष्ट होकर वह उपयोगी बन गया।
साराँश यह कि शक्ति सम्पादन की प्रक्रिया और प्रवृत्ति ईश्वर प्रदत्त है, प्राकृतिक है, स्वाभाविक है, अकृत्रिम है, जिससे प्रत्येक पदार्थ स्वयमेव उस ओर खिंच जाते हैं। अन्यथा वे रह ही नहीं सकते। यह भी नहीं कि वह शक्ति कहीं बाहर से लायी जायी है। शक्ति ऐसी वस्तु नहीं कि बाहर से आवे। वह तो हर पदार्थ में जन्म से ही रहती है, यद्यपि अनेक समय वह अगोचर रहती है। इस बात को यों भी कह सकते हैं कि शक्ति का मादा प्रत्येक वस्तु में स्वयं सिद्ध है और जिसमें वह मादा न रहे वह पदार्थ मृत या विनष्ट हो जाता है। फलतः शक्ति सम्पादन और कुछ नहीं है सिवा अन्तर्निहित प्रसुप्त शक्ति के उद्बोधन के, जिसे विकास कहते हैं। यही कारण है कि ‘श्वेताश्वेतरोपनिषद्’ के षष्ठाध्याय में उसे स्वाभाविकी कहा गया है-
परास्य शक्तिविविधैव श्रूयते।
स्वाभावकी ज्ञानबल क्रिया च ॥(6-8)
शक्ति के अनेक-असंख्य रूप होते हैं। दृष्टान्त के लिये उत्पादन शक्ति और संहार शक्ति को ले सकते हैं। ये दोनों एक हो नहीं सकतीं। उसी प्रकार पाशुविक और आध्यात्मिक आदि शक्तियों की बात है। ये परस्पर विरोधिनी होने के कारण अलग-अलग हैं। पर ये सब एक ही शक्ति के विभिन्न रूप या भेद हैं। उसकी उत्पादकता या संहारकर्ता हमारी मनोवृत्ति पर ही अवलम्बित है। हम चाहे उसी से संहार कर दें या किसी वस्तु का उत्पादन करें। एक ही विद्युत शक्ति से पदार्थ बनाये भी जाते हैं और उनका नाश भी किया जाता है। ट्राम या रेल में लगी बिजली से गाड़ी दौड़ती है और उसमें रोशनी होती है, जिससे लोगों को आने जाने, पढ़ने, देखने में आराम मिलता है। लेकिन दुर्घटना होते समय उसी से गाड़ी जल जाती है, वायुयान नष्ट हो जाते हैं और लोग मर जाते हैं। इसी से नीतिकारों ने कहा है-
विद्या विवादाय धनं मदाय,
शक्ति परेषाँ परपीड़ नाय।
खलस्य साधोविपरीत मेत-
ञ्ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥
“विद्या से विवाद भी उत्पन्न होता है और ज्ञान प्रदान का कार्य भी कर सकते हैं, धन से अभिमान की वृद्धि भी होती है और दान भी दिया जा सकता है, शक्ति से दूसरों को पीड़ा दे सकते हैं और उनकी रक्षा भी की जा सकती है।” इससे यह स्पष्ट प्रकट हो जाता है कि साधु और असाधु के आश्रय भेद में एक ही शक्ति का कैसा विलक्षण रूप हो जाता है। इसीलिये ‘श्वेताश्वेतर’ के वाक्य में शक्ति को विविधा कहा है, जिसका अर्थ है “अनेक प्रकार की।” यही कारण हमारे धर्म शास्त्रकारों ने अर्थशास्त्र या राजनीति को धर्म नीति से हर्बल कहा है। ‘याज्ञवलक्य’ का वचन है-
“अर्थ शास्त्रत्तु बलबर्द्धम शास्त्रमिति स्थितिः”
इस का तात्पर्य यही है कि बलवान और शक्तिशाली होने पर लोग मदान्ध होकर शक्ति का दुरुपयोग कर सकते हैं, जिससे उत्पीड़न बढ़ जायगा। इसलिये राजकीय या पाशविक शक्ति और भौतिक बल के सम्पादन के साथ-साथ उन्होंने उसमें आध्यात्मिकता का पुट देना आवश्यक बताया। वर्तमान समय में पाश्चात्य देश आध्यात्मिकता से विमुख होकर केवल अधिक से अधिक शक्ति-संचय का लक्ष्य अंगीकार करने से किस प्रकार विश्व को विनाश के मुख में ढकेल रहे हैं, वह उपर्युक्त कथन की सचाई का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हमारे उन शास्त्रकारों ने अपने अनुभव और दूरदर्शिता से ऐसे अनर्थ की संभावना पहले ही करली थी। क्योंकि आध्यात्मिकता की लगाम के बिना चरम भौतिकता (मैटेरियलिञ्म) अन्धी होती है और उसका अंतिम परिणाम संहार के सिवाय दूसरा हो ही नहीं सकता।
यह प्रश्न भी किया जा सकता है कि यदि वाञ्छनीयता या माननीयता ही शक्ति की परिभाषा है, जिससे किसी पदार्थ की आवश्यकता ही उसकी शक्ति का परिचायक हो, तो आसुरी शक्ति वाले पदार्थों या लोगों की आवश्यकता कभी भी न होने से उनको तो संसार में एक क्षण भी न रहना चाहिये। लेकिन हुआ है ठीक इसके विपरीत। आसुरी साम्राज्य तो सदा से रहा है- पहले भी था और आज भी है। यह मान कर भी कि आसुरी शक्ति का काम केवल संहार करना ही है लोग उसी ओर बेतहाशा दौड़ लगाते देखे जाते हैं। संसार में बिरले ही माई के लाल अध्यात्मवाद या धर्म पिपासा वाले मिलते हैं। यदि प्रकृति या सृष्टि कर्ता को ऐसा पसन्द नहीं है कि अनावश्यक, प्रत्युत अनर्थकारी पदार्थों का अस्तित्व रहे, तो फिर आसुरी शक्ति का संहार क्यों नहीं स्वयमेव हो जाता? ऐसे शंका का होना निस्सन्देह स्वाभाविक है। पर इसका उत्तर यह है कि गुण दोष का निर्णय अपेक्षा से, मात्रा की न्यूनाधिकता से होता है। ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ का सिद्धान्त शास्त्रों में मौजूद है। इसका अर्थ यही है, कि कोई चीज कितनी ही सुन्दर या भली क्यों न हो, ज्यों−ही मात्रा से अधिक हुई कि बुरी हुई। नमक या मीठा किसी चीज का स्वाद बनाने के लिये मिलाया जाता है, खटाई और मिर्च का प्रयोग भी इसीलिये करते हैं। परन्तु जब इन चीजों की मात्रा ज्यादा हो जाती है तो उनकी प्रशंसा करने के बजाय मुँह से यही निकलता है कि ‘जहर हो गया’ ‘खराब हो गया’। भोजन जीवन-शक्ति का दाता और पोषक माना गया है। पर वही जब मात्रा में अधिक हो जाता है तो बीमारियों का कारण और नाशक हो जाता है। इसी प्रकार जब शक्ति एक नियमित मर्यादा का उल्लंघन कर गई तो उसे शक्ति कहना अनुचित होगा। यह सत्य भलाई-बुराई, गुण और दोष ये दोनों बातें प्रत्येक पदार्थ या व्यक्ति में होती है, इसलिये उसे शक्ति की परिभाषा में शामिल नहीं कर सकते। सृष्टि के नियम अर्थात् निर्माण या रचना के विपरीत होने के कारण वह नष्ट कर देने योग्य होती है और वास्तव में उसका नाश पारस्परिक संघर्ष या दैवी शक्ति से हो जाया करता है। यही अवतारों का रहस्य है।
यही कारण है कि हमारे शास्त्रकारों ने “सर्वेंभि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः”की घोषणा की थी। यदि पूर्वकाल की आसुरी शक्तियों के विवरणों पर दृष्टि डाली जाय तो यही सिद्ध होता है कि उसके कर्ताओं का धर्म के साथ छत्तीस का सम्बन्ध था। उन्होंने धर्म को पाँव तले रौंद कर धता बताया था। इसी प्रकार वर्तमान समय के महासमरों और उनकी तैयारियों की ओर दृष्टि की जाय तो यहाँ भी स्पष्ट प्रतीत होता है कि आध्यात्मिकता और धर्म से विहीन सभ्यता ही इसका कारण है और जब तक इसका अन्त होकर सभी देशों, राष्ट्रों और उनके संचालकों के दृष्टिकोण में धर्ममूलक परिवर्तन नहीं होता तब तक बाहरी शाँति की बातों से इस का संहार-कार्य कभी न रुक सकेगा।
(राष्ट्रसन्त श्री तुकड़ोजी महाराज)
खुद समझ लेना ही दूसरों को समझाने का वास्तविक दावा करना हो सकता है। मगर अपना समझना अधूरा होने के कारण, ‘दूसरा’ यह शद्वहीडडडडडडड सामने नहीं आता, बल्कि अपने लिये ही दुनिया है ऐसा हम मान लेते हैं। सच्ची समझदारी तो वही है जो अपने में ही दुनिया को दिखा दे, हम और दुनिया कभी अलग ही न रहें। वास्तव में अपने में ही दुनिया समाती है, जैसे कि दुनिया में हम हैं। यह व्यवहार के तौर पर समझ में आना, उसका प्रात्यक्षिक रूप में अनुभव पा जाना, इसी को हम अनुभव सिद्ध मानते हैं, जिसकी मानवमात्र में कमी है और जिस कमी के कारण ही आज विश्व में अशान्ति फैल चुकी है। इस कमी को दूर करने का क्रम यही है कि ‘मैं मानवमात्र के लिये हूँ और मेरे लिये मानव समाज है। विश्व के लिये मुझे अपने व्यक्तित्व से ठीक बनना जरूरी है, इसे मैं सबसे पहले समझ लूँ।
पूर्णता की सीढ़ी व्यष्टि, समष्टि और परमेष्ठी यही हो सकती है। उसका पहला पाठ व्यष्टि यानी व्यक्ति की उन्नति से ही आरम्भ होता है। अभी हम उस ओर जाना चाहते हैं, समझना चाहते हैं और समझाना चाहते हैं। हमारे अन्दर जो समझाने की कमी है उसी के कारण हम पूरे नहीं बन सके और न किसी को पूरे बना सके।
हमारे साधन तो आज तक हजारों बने। यज्ञ बने, तप बने, जप बने, तीर्थ और धाम बने, धर्म और सम्प्रदाय बने, जाति और वर्ण बल्कि पक्ष और दल भी बने, मगर आजतक साध्य कभी सिद्ध नहीं हो सका। इसका कारण यही है कि प्रचारक का मार्ग साफ नहीं रहा, समझदारी का रास्ता अपने ही में मुड़ गया-आगे नहीं बढ़ा, और जब कभी सन्तों से खुल भी गया तो उनके सहकारियों साम्प्रदायिकता का जाल फैलाकर उसे बन्द कर दिया।
हम उसी को खोल देना चाहते हैं। हम यह प्रकाश देने की कोशिश करते हैं कि जप तप का रास्ता है संयम रखने का, यज्ञ का रास्ता है त्याग सीखने का, विश्व का रास्ता है मानवता की पूर्णता प्राप्त करने का और गुरु का रास्ता है व्यक्ति को विश्व में ठीक ढंग से चलाने का, जो कहीं किसी से टकराये नहीं। व्यक्ति को सीधा, चरित्रवान, त्याग-ब्रह्मचर्य सम्पन्न बनाकर करोड़ों के समूह से टकराने से बचाये बल्कि उसका मददगार बनाये, इसी रास्ते को हम विश्वशान्ति-प्रचार द्वारा झाड़बुहारकर ठीक करना चाहते हैं, जनजागृति द्वारा खोल देना चाहते हैं। हमारी विशालता-व्यापकता-में कोई कठिनाई नहीं रह सकती, अगर यह योजना ठीक तौर से फैलायी जा सके।
इसका साधन हमने यह निश्चित कर लिया है कि कुछ व्यक्ति ऐसे बनाये जायँ जो खुद की सेवा से खुद तैयार बनें और दूसरों को तैयार करने का निश्चय कर बाहर निकलें तथा चारों ओर फैलकर जनता को उसके खाली समय से लाभ उठाकर जागृत करें। जनता में प्रेम, भक्ति, कर्तव्यपालन तथा समाजशास्त्र का ज्ञान पैदा करें और जनता को तैयार करना ही अपना धन, मन व तन समझें। हर पच्चीस गाँवों में एक व्यक्ति भी ऐसा निश्चय करे तो पाँच लाख देहातों में यह जागृति की लहर फौरन पहुँच सकती है। जनता पर ही पलते रहें और जनता को ही जागृत कर उसे ‘पूर्ण’ बनाने का दावा करें, इस कार्य के लिये ही यह ‘विश्वशान्ति सेवा प्रचार और जन-जागृति’ की योजना बनायी गयी है।
हम चाहते हैं कि आज के मानव को विशाल बनाने की दृष्टि देने वाली पाठशालाएं खुलें, वर्ग बनें। उन्हें इसका प्रात्यक्षिक दिखाया जाय, सक्रिय-पाठ दिया जाय और चारों ओर ऐसे प्रचारकों को भेजते हुए एक नया वायुमण्डल निर्माण किया जाय। पिछड़ों को आगे लाना, संकट में सहयोग देना, मिल जुलकर रहना सीखना ये बातें सबसे पहले आवश्यक हैं। धोखा में न पड़ सकें ऐसी सावधानी का ज्ञान हृदय परिवर्तन द्वारा मानव को देना यही हमारा दृष्टिकोण है। इन सब बातों के जरिये आज हम एक नया आदमी बनाना चाहते हैं, जो किसी की जात−पांत, किसी के धर्म या देश आदि में बाधा न बनते हुए सीधे कर्त्तव्यपथ का पथिक बने। मनुष्य को मनुष्य से टकरा देने वाली जितनी भी बातें हैं उन सबको साफ करते रहना और मनुष्यता बढ़ाने वाली बातों का प्रचार करना-ऐसी बातों को प्रतिष्ठा और प्रोत्साहन देना यह कार्य नई दुनिया की बुनियाद है।
ये सब बातों समझदारी के साथ ही बढ़ती रहेंगी और साथ ही मानव समाज भी अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता जायगा। एक एक व्यक्ति द्वारा अनेक लोग समझदारी के रास्ते पर आगे बढ़ते जायेंगे और एक दिन ऐसा होगा कि जिस वक्त कोई भी अनजान नहीं दिखाई देगा। फिर दण्ड और शासन की ही क्या जरूरत? सत्ता क्यों? और सत्ता ही नहीं तो राजा कहाँ और राज्य कहाँ? जब पूरी आजादी है तब फिर मोक्ष का भी बन्धन क्यों? हम सब पूर्ण हैं, पूर्ण होंगे, पूर्ण ही बनकर रहेंगे। इसका अनुभवपूर्ण प्रचार ही ‘विश्वशान्ति सेवा प्रचार’ का कार्य होगा। एक-एक व्यक्ति से लेकर अखिल विश्व की जागृति ही ‘जनजागृति’ कहलायेगी।
(श्री गोविंद प्रसाद त्रिपाठी ‘अनल’ एम. ए.)
संसार के प्रत्येक भाग में और विशेषतः सभ्य देशों में अनेक प्रकार के ‘वाद’ या सिद्धाँत पाये जाते हैं, जैसे राजतंत्रवाद, साम्राज्यवाद, अधिनायकवाद, प्रजातंत्रवाद, समाजवाद आदि। इसी प्रकार धार्मिक क्षेत्र में भी अनेक प्रकार की विचारधारायें प्रचलित हैं जो एक दूसरे से टकराती रहती हैं। इस प्रकार के ‘वादों’ का एक खास लक्षण यह होता है कि वह अपने विचार वालों का तो स्वागत करता है, और दूसरी प्रकार के विचार वालों से घृणा करता है अथवा कम से कम उदासीन रहता है। यह अवस्था मानव-समाज की सुख-शाँति की दृष्टि से वाञ्छनीय नहीं है, क्योंकि इसमें मनुष्यों में पृथकता का भाव उत्पन्न होता है और वे पारस्परिक सहयोग के अमूल्य तत्व से वंचित हो जाते हैं। इसलिये बुद्धिमान मनुष्यों का कर्तव्य है कि वे मतभिन्नता के रहते हुये भी अपने विचारों में समन्वय को स्थान दें और ऊपरी साधारण मतभेदों को महत्व न देते हुए मानव मात्र की एकता के सिद्धाँत को दृष्टिगोचर रखें।
ऐसे समन्वयवाद के दो स्वरूप हो सकते हैं- एक आध्यात्मिक और दूसरा भौतिक। आध्यात्मिक समन्वयवाद आत्मज्ञान के आधार पर ‘महासमन्वय’ (ब्रह्म) और “समन्वित” (जीव व जगत) की तात्विक एकता की बात को स्वीकार करता है। “योगवसिष्ठ” में इसकी व्याख्या करते हुये स्पष्ट रूप से कहा गया है-
इमे समुद्राः गिरयः ब्रह्माँडानि जगंति हि।
मम अन्तकरणस्य एव खंडाः वहिः स्थिताः॥
अर्थात्-”ये समुद्र, पर्वत, ब्रह्माण्ड और जगत मेरे ही अन्तःकरण के खण्ड हैं, जो बाहर स्थित हैं।”
इससे पृथक आध्यात्मिक समन्वय के सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप प्रदान करने में भौतिक समन्वयवाद का विशेष हाथ है। वह मनुष्य समाज के बीच सब प्रकार सामंजस्य की स्थापना द्वारा उसका कल्याण चाहता है और जगत में फैली हुई अनेकता, विविधता एवं भेद दृष्टि को यथासंभव कम करना चाहता है।
इस प्रकार भौतिक समन्वयवाद का रूप एक सामाजिक दर्शन या विज्ञान का सा है। उसका समर्थन तर्क और न्याय के आधार पर भी होता है। मानव-धर्म शास्त्रकार ने कहा है कि “यस्तर्केणानु-संधत्तेस वेद धर्म नेतरः।” अर्थात् धर्म वह है जिसका अनुसंधान तर्क द्वारा होता है। समन्वयवाद का आधार तर्क है अतएव वह सच्चा धर्म है।
सत्कार्य का मूल है-मानव मस्तिष्क का सद्विचार। समन्वय एक सत्कार्य है, अतएव उसकी प्रतिष्ठा के लिये सद्विचार अथवा सद्भावना की बहुत बड़ी आवश्यकता है। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अनेक उपायों द्वारा समाज में समन्वय स्थापन की चेष्टा की जाती है, पर उसमें पूर्ण सफलता नहीं मिलती। इसका एकमात्र कारण मनुष्यों के मन में सद्विचारों का अभाव ही होता है।
दुराग्रह समन्वयवाद के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। मनुष्य की रूढ़िग्रस्त या उग्र-बुद्धि दुराग्रह का मूल कारण होती है। इस प्रकार की बुद्धि में सत् और असत् तथा उचित और अनुचित का निर्णय करने की योग्यता नहीं होती। रूढ़ावस्था में वह अडिग और उग्रता के समय आवश्यकता से अधिक चंचल होती है। ऐसी दशा में समन्वय का कल्याणकारी मार्ग ढूंढ़ सकना असंभव होता है। अतएव समन्वय के लिये दुराग्रह का परिहार और सत्य का आग्रह होना अनिवार्य है।
व्यावहारिकता भी समन्वयवाद का मुख्य आधार है, क्योंकि कार्य-व्यवहार का मार्ग अवरुद्ध होने पर समन्वय का महत्व नहीं माना जा सकता। समन्वय की पूर्ण सिद्धि इसी अवस्था में है जब विश्व के विचारों और कार्यों में अनेकरूपता होते हुए भी व्यष्टि और समष्टि का कार्य-व्यवहार बन्द न हो। इसी प्रकार समत्व का विवेक समन्वयवाद के आधारभूत तत्वों में प्रधान है। इससे मनुष्य के मन में समानता और न्याय की भावना उत्पन्न होती है। जहाँ इस प्रकार का विवेक नहीं है वहाँ वैमनस्य, संघर्ष और अशाँति का होना अवश्यम्भावी है।
भारतीय संस्कृति और साहित्य में समन्वय की भावना अति प्राचीन काल से है। वेदों में तो आप से आप समन्वय की भावना आ गई है। कर्म, उपासना और ज्ञान का जो समन्वित विवेचन उनमें किया गया है, वह इस बात का प्रमाण है। वैदिक काल के उपरान्त जब हम धार्मिक समन्वय से दूर जाने लगे तो बड़ा विरोध फैला, कर्म, उपासना और ज्ञान के पृथक-पृथक समर्थकों ने एक दूसरे की तीव्र आलोचना करना प्रारम्भ कर दिया। यह विरोध केवल विचार-गत ही न था वरन् कार्य और वस्तुगत भी था। “प्लवाह्मेते अदृढ़ा यज्ञ रूपा” आदि उक्तियाँ, जिनमें कर्म के अंतर्गत यज्ञ की आलोचना की गई है, इसी प्रकार की है। शंकराचार्य जी ने ज्ञान का समर्थन करने के लिये ‘कर्म’ का जो स्पष्ट विद्रोह किया उसे सभी विद्वान जानते हैं। उन्होंने कहा-
कर्मणा बध्यते जंतुः विद्यया च विमुच्यते।
तस्मार्त्कम न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः॥
पारस्परिक संघर्ष और विरोध की ये बातें विभिन्न आचार्यों द्वारा बहुत समय तक फैलाई जाती रही। तो भी हिन्दू धर्म के सर्वाधिक प्रचलित महत्व पृथक-पृथक स्वीकार किया गया था, जो समन्वय की भावना का ही द्योतक था।
बौद्ध युग में “समवायो एव साधु” अर्थात् आपस का मेल मिलाप ही अच्छा है-इस समन्वयवाद की भावना का सर्वत्र प्रचार था। इसी के द्वारा बुद्ध ने जातिगत असमानता और वैषम्य को अस्वीकार कर सभी धर्मावलम्बियों के बीच समन्वय की स्थापना की और सबके लिये आत्म-ज्ञान तथा धर्म का मार्ग खोल दिया।
बौद्धों के पतन के बाद ब्राह्मणों में आपसे आप समन्वय की भावना उत्पन्न हुई और उन्होंने बौद्धधर्म के मुख्य-2 सिद्धाँतों के साथ समन्वय स्थापित कर लिया, जिससे उनके और बौद्धों के बीच व्यवहार का मार्ग निकल आया। एक लेखक के मतानुसार वर्तमान हिन्दू धर्म वैदिक धर्म और बौद्धमत का समन्वित रूप ही है।
मुसलमानी काल में हिन्दी के संत और सूफी कवि, जिनमें कबीर और जायसी प्रसिद्ध हैं आध्यात्मिक और भौतिक समन्वय के बड़े पक्के समर्थक थे। सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक और संत-शिरोमणि गो. तुलसीदास ने भी समन्वय-सिद्धाँत का प्रचार किया था। ये सब महापुरुष जाति और धर्म के छोटे-मोटे भेदों को भुलाकर मानवता को ही सर्वप्रधान महत्व देते थे और इस प्रकार उन्होंने धार्मिक जगत में समन्वय का संदेश उच्च स्वर से घोषित किया। गुरु नानक ने अपने ग्रंथ-साहब में कहा है- “अव्वल अलह नूर उपजाया कुदरत के सब बन्दे। एक नुर से सब जग उपजाया कौन भले को मंदे।” इसी प्रकार तुलसीदास जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा-
सब मम प्रिय सब मम उपजाये।
सब ते अधिक मनुज मोहि भाये।
जाति-पाति कुल धर्म बड़ाई।
धन बल परिजन गुन चतुराई।
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।
मानहुँ एक भगति कर नाता ॥
इस प्रकार भारतवर्ष सदा से एक समन्वयवादी देश रहा है और यहाँ सदा ऐसे व्यक्ति उत्पन्न होते रहें हैं जो ऐसे समय या समझौते के समर्थक थे। यही कारण है कि संसार की अनेकों जातियाँ इस देश में आकर यहाँ के समाज में समाविष्ट हो गई और उनके द्वारा यहाँ को संस्कृति में कुछ नये उपयोगी तत्वों का भी समावेश हो गया। इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है। जिस जाति और धर्म के पूर्व पुरुषों ने सब मनुष्य ही नहीं प्राणीमात्र और पंचभूत की एकता का उपदेश दिया है वह तुच्छ मतभेदों को कब महत्व दे सकती थी ! यहाँ के धर्म का तो मूल सिद्धान्त ही समन्वय का सार है-
सर्वभूतेषु चात्मा नं, सर्वभूतानि चात्मनि। समं पश्यति आत्मयाजी, स्वराज्य मधि गच्छति॥
“जो सब प्राणियों में अनेकों और सब प्राणियों को अपने में देखता है वही मोक्ष को प्राप्त करता है।”
(प्रो. ‘अवधूत’ गूढ़ मंत्र विद्या विशारद, गोरे गाँव)
अपने चारों ओर जो विस्तृत विश्व हमको दृष्टि-गोचर हो रहा है उसका मुख्य आधार सूर्य भगवान ही हैं। इस जीवन-प्रदायक सूर्य की उपासना हम गायत्री-मंत्र द्वारा करते हैं और ध्यान भी कर सकते हैं। आत्मा ही सूर्य है, ऐसी भावना रखते हुये गायत्री का जप करने से ज्ञान प्राप्त होता है। इस मंत्र के अंतिम भाग में साधक भगवान से ‘धि’ अर्थात् बुद्धि (ज्ञान) माँगता है। गायत्री की उपासना विश्व के इस सर्वप्रथम प्रकाश की ही प्रार्थना है। रेडियो में कुछ सुनने की इच्छा होने से सबसे पहले उसमें “लाइट” की जाती है, जिससे वह उचित प्रमाण में गरम हो जाता है, फिर उसी तेज में से जो कुछ सुनना हो वही सुना जा सकता है। उसी प्रकार चित्त की अथवा मन की एकाग्रता हृदय की तरफ ठीक-ठीक ढंग से करने पर एक प्रकार के आत्मिक प्रकाश का अनुभव होने लगता है। उस प्रकाश की सहायता से जो कुछ प्राप्त करना हो वही मिल सकता है।
इस अंधकारमय प्रकृति तत्व में परमात्मा की प्रकाशमय सत्ता का प्रवेश होते ही, उसका अत्यन्त सूक्ष्म और शुद्ध भाग, स्थूल और अशुद्ध भाग से पृथक हो जाता है। अशुद्ध और स्थूल भाग में से नीचे के प्रदेश रचे गये हैं और शुद्ध तथा सूक्ष्म अशुद्ध तथा स्थूल भाग में उसकी अशुद्धि तथा स्थूलता के कारण प्रकाश का प्रवेश उचित रीति से नहीं हो पाता, पर दूसरे शुद्ध तथा सूक्ष्म भाग में प्रकाश भली प्रकार अवेश कर सकता है। प्रकाश और अग्नि जिस गुण की सहायता से भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं, वह गुण उष्णता ही है। गायत्री को शास्त्रों में ‘अग्निमुखी’ कहा गया है। उष्णता दो प्रकार के परस्पर विरोधी गुण उत्पन्न करती है। एक तो वह सूक्ष्म जलमय द्रव्य को स्थूल पार्थिव द्रव्य से पृथक करके और भी अधिक सूक्ष्म बनाती है, और पार्थिव द्रव्य को वह और अधिक ठोस बनाती है। उस प्रकार उष्णता विजातीय द्रव्यों का पृथक्करण करके सजातीय का संयोग करती है।
इस प्रकार प्रकाश की न्यूनाधिकता के आधार पर उच्च प्रदेश, मध्य प्रदेश और निम्न प्रदेश इस प्रकार तीन विभाग किये जा सकते हैं। उच्च प्रदेश को केवल विद्यात्मक प्रदेश कहा जाता है। वह चैतन्यमय अजरामर और अविनाशी है और विश्व में वही सबसे शुद्ध प्रदेश है।
मध्य प्रदेश को हम स्वर्गीय प्रदेश का नाम दे सकते हैं। इसका विषय बड़ा गूढ़ और गुप्त है। यह सत्य है कि प्रकृति के नियम बहुत सीधे सादे, और सरल होते हैं और इसलिये उनको समझने में किसी को कठिनाई नहीं होनी चाहिये। पर इस मार्ग से कदाचित ही कोई प्रयाण करता है। और जो थोड़े से भाग्यशाली व्यक्ति इस रास्ते पर होकर जाते हैं, वे इस उद्देश्य से कि कोई अनाधिकारी प्रकृति के गुप्त रहस्यों को जान न सके, अपने पग-चिन्हों को काँटे और झाँखड़ डालकर बड़ी सावधानी से ढ़क देते हैं। इसी कारण बिना मार्गदर्शक गुरु की सहायता के स्वयमेव इस मार्ग पर प्रयाण करने वाले सैकड़ों बार रास्ते से भटक जाते हैं। यह मध्य प्रदेश ‘विद्यात्मक’ भाग से नीचे होता है और जब कि विद्यात्मक प्रदेश में केवल प्रकाश ही होता है, इस मध्य प्रदेश में पार्थिव भाग का भी कुछ अंश रहता है।
सृष्टि के आरम्भ में दो मूल तत्व होते हैं, एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रकाशमय तत्व और दूसरा स्थूल अंधकारमय तत्व। प्रकाश, उष्णता और गति प्रथम तत्व के गुण हैं। प्रथम तत्व प्रकाशक प्रेरक और अपनी क्रिया करने में असमर्थ है-स्त्री रूप या प्रकृति रूप है। हमारी भौतिक सृष्टि में उत्पत्ति का कार्य प्रथम तत्व द्वारा ही सम्पन्न होता है।
उष्णता द्वारा ही पदार्थ सूक्ष्म रूप में परिणित हो सकते हैं। सब तरह की उत्पत्ति, बुद्धि और संयोग इन दोनों तत्वों द्वारा ही होते हैं। सूक्ष्मता होने से उसमें प्रकाश का प्रवेश विशेष रूप से होता है और स्थूलता होने से प्रकाश में कमी आ जाती है। उदाहरण के लिये घी जब स्थूल या जमे हुये रूप में रहता है तो उसमें प्रकाश का प्रवेश नहीं हो सकता और अगर कोई अन्य पदार्थ उसमें पड़ गया हो तो उसका भी पता नहीं चलता। पर जब हम उसे उष्णता द्वारा गरम करके पतला कर देते हैं तो उसकी तली में पड़े तिनके तक को भी देख सकते हैं।
उष्णता और शीतलता के प्रभाव से ही सब प्रकार के पदार्थ तरह-तरह के रूप धारण करते हैं। द्रव्य की अत्यन्त सूक्ष्मता वायु-रूप होती है, उससे कम सूक्ष्मता जल रूप होती है और स्थूलता पृथ्वी रूप होती है। इस विवेचन से समझा जा सकता है कि योगी जन अणिमा, लघिमा, महिमा आदि क्रियाओं द्वार स्थूल और सूक्ष्म रूप में रूपांतर कर लेते हैं। पर जब तक साधक सूक्ष्म तत्त्वों को ग्रहण करने की भूमिका तैयार नहीं कर लेता तब तक उस को समझाना या अनुभव कराना संभव नहीं होता।
समस्त विश्व चैतन्यमय बन जाय इसके लिये प्रकाश उसके बाहरी और भीतरी भाग में प्रविष्ट होता है। विश्व में हम जो कुछ भी उत्पन्न होता देखते हैं उसका कारण प्रकाश ही है। सूर्य को इस प्रकाश प्रभाव स्थान रूप में परमेश्वर ने निश्चित किया है, पर ऐसा होते हुये भी यह नहीं कह सकते कि सूर्य के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी प्रकाश नहीं है।
“सूर्य आत्मा जगतस्त=स्थुषश्च” अर्थात् “भगवान सूर्य स्थावर जंगम विश्व का आत्मा उदित हुआ है”-यह उपासना का मंत्र संध्या समय हम बोलते हैं। सूर्य ही हमारे जगत का आत्मा है। पुरुष बिना स्त्री जिस प्रकार निष्फल रहती है, उसी प्रकार सूर्य बिना पृथ्वी भी बंध्या के समान है। सूर्य की सत्ता से पृथ्वी पर वनस्पतियाँ ही उत्पन्न नहीं होती, वरन् समस्त सचेतन प्राणी भी उसी के द्वारा उत्पन्न और वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
विश्व में मनुष्य ही परमेश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है। परमेश्वर ने मनुष्य को आत्मा, मन और शरीर दिया है। सृष्टि के पदार्थ के अत्यन्त शुद्ध भाग का सार लेकर परमेश्वर ने मनुष्य का स्थूल शरीर बनाया है, प्रकृति के अत्यन्त शुद्ध भाग से उसका मन बनाया है, और अपने निज स्वरूप में से ही उसने मनुष्य की आत्मा बनाई है।
शरीर की बनावट में पार्थिव और जल के अणु विशेष रूप से लगाये गये हैं। इन में 95 प्रति सैकड़ा जल मय अणु ही हैं। आत्मा और शरीर का संबंध मन द्वारा स्थिर है। मन अत्यन्त सूक्ष्म है और इन दोनों के मध्य में रहता है। वह प्रकाश तत्व से निर्मित होने के कारण आत्मा की आज्ञा से शरीर को जीवनमय करता है। वह आत्मा के मंत्रीपद पर स्थित है, तो भी कभी-कभी वह आत्मा का विरोधी बन जाता है और स्वच्छन्द रीति से आचरण करने लगता है। वह आकाशतत्त्व रूप है और जिस द्रव्य का वह बना हुआ है वह पृथ्वी और जल की अपेक्षा अनन्त गुना सूक्ष्म है। आत्मा परमेश्वर का अंश होने से परमेश्वर रूप ही है। मन और शरीर का अस्तित्व आत्मा के आधार पर ही है, उसके बिना वह कुछ भी नहीं कर सकते। खनिज सृष्टि, वनस्पति सृष्टि तथा प्राणी-सृष्टि के शुद्ध तत्व द्वारा शरीर का पोषण होता है। जल तथा पृथ्वी तत्व का बना होने से जल तथा पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले पदार्थों से भी उसका पोषण होता है।
प्रकृति के सर्वोत्तम द्रव्य में से मन बनता है, इस लिये उसी तत्व द्वारा उसका पोषण होता है।
आत्मा परमात्मा का अंश होने से संयम द्वारा परमात्म-ज्ञान और शक्ति को प्राप्त करता है।
मन, प्रकाश, धर्म वाला होने से और वायु में प्रकाश के व्याप्त रहने से श्वाँस की क्रिया द्वारा प्रकाश को अपने भीतर खींचता है और उसी से उसका पोषण होता है। यही कारण है कि शुद्ध हवा में दीर्घ श्वाँस लेने से मन की क्रिया अधिक सतेज होती है।
प्रकाश ही जीवन का हेतु है। प्रकाश का स्वभाव निरंतर बहते रहने का है। प्रकाश का स्थिर करने की कला ही मृत्यु को जीतने की कला है। महान योगीजन इस प्रकाश को स्थिर करके उसे दूसरों की आत्मा में प्रविष्ट करा सकते हैं। अनेक बार जब हम किसी महान पुरुष से मिलते हैं तो उसके आत्म-प्रकाश को अपनी आत्मा में प्रतिबिम्ब रूप में अनुभव कर सकते हैं। उस समय हमको ऐसा अनुभव होता है कि आज हमारी आत्मा में कोई नवीन प्रकाश पड़ा है।
प्रकाश एक प्रकार से परमेश्वर की प्रतिमा है, ऐसा कहना उचित ही है। किरण और प्रकाश में भेद है। किरण, प्रकाश का वाहन है। किरण अपारदर्शी पदार्थों में प्रवेश कर सकती है, इससे अनेक लोग सोचते हैं कि यह पदार्थ तेजस्वी है, पर वह वास्तविक प्रकाश नहीं है। जिन्होंने प्रकाश की विद्या को समझ लिया है और उसके लिये धन, घरबार, स्त्री-पुरुष का मोह त्यागने को भी तैयार हैं उन्हीं की देह में ज्ञान के प्रकाश का आयोजन सम्भव होता है। इस स्थिति को प्राप्त करने का मार्ग प्रार्थना करना और गुरु की कृपा प्राप्त करना ही है।
(श्री. शंभूसिंह)
भारतवर्ष का संसार में सदा ही एक विशिष्ट स्थान रहा है। यहाँ के निवासियों ने अपने उच्च आदर्शवाद, नीतिनिष्ठा, सदाचार, संयम, आस्तिकता, सेवा और परोपकार आदि गुणों के द्वारा मानव जाति की भारी सेवा की है।
पिछले डेढ़ दो-हजार वर्षों के अन्धकार के युग में हमने अनेक निधियों के खोने के साथ-2 अपनी इस आदर्श परम्परा को तथा धर्म और संस्कृति को भी बहुत हद तक खो दिया, भुला दिया। अब हमारा राष्ट्र बाह्य दृष्टि से स्वतंत्र हो चुका है परन्तु इस स्वतन्त्र राष्ट्र के अधिकाँश नागरिक आज भी विषयों एवं वासनाओं के गुलाम बनकर अपने देव दुर्लभ मानव शरीर को व्यर्थ नष्टकर रहे हैं। इस प्रकार के आलसी, भाग्य को कोसते रहने वाले तथा फैशन के शिकार नर-नारियों से देश की समृद्धि एवं संपन्नता की योजनायें सफल भी हो जावें तो नैतिक एवं साँस्कृतिक दृष्टि से हम निर्धन ही बने रहेंगे।
इस भौतिक उन्नति की दौड़ में, जहाँ प्रत्येक नर-नारी धनवान बनने की इच्छा से दिन रात व्यस्त है, यह निताँत आवश्यक हो गया है कि उन्हें समय व धन का सदुपयोग सिखाया जाये जिससे वे सादा जीवन उच्च-विचार वाले बनकर सच्चे अर्थों में ऋषियों एवं महात्माओं की सन्तान कहलाने के अधिकारी बन सकें।
आज इस महत्वपूर्ण आवश्यकता, अर्थात् उत्तम व्यक्ति निर्माण की पूर्ति के लिए गायत्री-तपो-भूमि के तत्वावधान में गायत्री-परिवार के परिजन पिछले कई वर्षों से प्रयत्न कर रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि भगवान की कृपा से अपना यह प्रयास सफल होता जा रहा है। अनेकों सेवा-भावी युवक युवतियाँ कन्धों से कन्धा मिलाकर युग-निर्माण संकल्प की पूर्ति के लिये चलने लगे हैं, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण सहस्र कुँडी यज्ञ की पूर्णाहुति थी, जिसमें लाखों बहिन-भाइयों ने वर्ष भर से जप, तप संयम-पूर्वक जीवन व्यतीत कर संगठित होने का प्रमाण मथुरा आकर दिया है।
हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि सच्चे आन्दोलन बातूनी लोगों से नहीं चलते, इसके लिये असली व्यक्ति चाहिये। सच्चे ब्राह्मणों की माँग कभी अधूरी नहीं रहती है। प्राचीनकाल में तो ब्राह्मण का वेश बना लेने से ही लोग सच्चे धर्म प्रेम वाले, कर्ण, हरिश्चन्द्र, आदि का सर्वस्व त्याग लोकहित के लिये करवा लेते थे, परन्तु इस बीते गये जमाने में, जबकि घर के सदस्य भी एक दूसरे को सन्देह की दृष्टि से देखकर अविश्वास करते हैं, तब भी आचार्य जी की “व्यक्ति की माँग“ अधूरी न रह सकी। जनता जनार्दन के सेवक सच्चे त्यागी और वस्तु का सदुपयोग करने वाली ऋषि आत्मा को लोग पहिचान लेते ही हैं। हमारी भारतीय माताओं ने राष्ट्रीय आँदोलनों में कुर्बान होने के लिये अपने पति, पुत्रों को गाँधी जी के हाथ सौंपा था। वही भारतीय वीरांगनाएं अब आचार्य जी को वे नर रत्न सौंप रही हैं जिनकी हड्डियों का वे वज्र बनाकर फैली हुई असुरता का संहार कर पुनः भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान करेंगे।
सहस्रकुंडी यज्ञ में 4 व्यक्तियों को धर्म सेवा में आत्म दान देते हुये देखकर सैकड़ों वीरों की आत्मा पर चढ़ी काई धुल गई और उनके आत्मदान के पत्र आ रहे हैं। पूज्य आचार्य जी उनको अपना पुत्र स्वीकार कर उन्हें अभी पारिवारिक उत्तरदायित्व को निभाते हुए अपने उदर पोषण और गृह व्यवस्था से बचे समय और धन को इन सद् विचारों के फैलाने में लगाने की आज्ञा देकर उन्हीं के क्षेत्रों में जागृति करवा रहे हैं जिससे उनकी शक्ति का विकास हो तथा अधिकतम व्यक्तियों को इस प्रकार की भौतिक वस्तुओं की कुर्बानी से, आत्मबल की पूँजी संग्रह करने की प्रेरणा मिले।
अब धार्मिक क्राँति की रणभेरी बज चुकी है। अब भारत की सोई आत्माएं गायत्री माता व यज्ञ पिता की पवित्र लोरियाँ सुनकर अंगड़ाई लेने लगी हैं। इसी के परिवार स्वरूप भारत के कोने-कोने से ‘स्वाहा! स्वाहा!! की ध्वनि आ रही है तथा धार्मिक क्राँति के वीर सेनानी अब अपने तुच्छ भोगों, को मखमली गद्दों को और मिष्ठानों को त्यागकर इस पवित्र क्राँति के सैनिक बनने का प्रार्थना पत्र भेज रहे हैं। इस प्रकार के वीरों का पवित्र उद्देश्य वाला संगठन अवश्य ही नवयुग निर्माण करके रहेगा तथा आचार्य जी की “हमें व्यक्ति चाहिए” वाली माँग को साकार करके रहेंगे जिन्हें वे लेकर साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना में लगायेंगे।
इस समय हमारा देश एक बहुत बड़े संघर्ष के युग में होकर गुजर रहा है। एक तरफ स्वार्थी व्यक्तियों की लालसा जोर पकड़ रही है जिससे सर्वत्र भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और दूसरी ओर जन-समुदाय की चेतना जागृत हो गई है जिससे वे अपने न्याय पूर्ण अधिकारों की माँग करने लग गये हैं। ऐसे समय में त्यागी और निःस्वार्थी व्यक्ति ही जनता को मार्गदर्शन करा सकेंगे इसमें संदेह नहीं।
(श्री. शिवशंकर मिश्र, एम. ए.)
[हमारे देश में देवी की पूजा का प्रचार सर्वत्र पाया जाता है। यों कहने के लिये आजकल हिन्दू-धर्म में राम, कृष्ण और शिव की पूजा ही मुख्य रूप से प्रचलित है, पर यदि कुछ गहराई में जाकर पता लगाया जाय तो इन सबकी अपेक्षा देवी की उपासना अधिक प्रचलित और व्यापक है। कारण यह कि राम, कृष्ण आदि के मन्दिरों में उपासना करने का अधिकार विशेष रूप से उच्च वर्णों के हिन्दुओं को ही है। नीच जातियों में जिन लोगों की गणना की जाती है उन्हें या तो इन मन्दिरों में जाने का अधिकार ही नहीं है, अथवा वे स्वयं ही वहाँ बहुत कम जाते हैं। ऐसी सभी जातियाँ देवी की उपासना करती हैं। साथ ही उच्च वर्ण के लोग भी अन्य देवताओं के साथ देवी की पूजा भी करते हैं और प्रत्येक वंश की कोई न कोई पूज्य “कुलदेवी” अवश्य होती है। यही कारण है कि राम, कृष्ण और शिव के तीर्थों की अपेक्षा देवी के तीर्थ स्थान बहुत अधिक संख्या में हैं और उनमें जाने वाले उपासकों की सम्मिलित संख्या अन्य तीर्थों के उपासकों से कहीं अधिक होती है।
पर खेद की बात यह है कि अब लोग देवी की पूजा में जो ‘शक्ति-साधन’ का रहस्य निहित है उसे तो भूल गये हैं और केवल ऊपरी पूजा, पाठ में ही देवी की पूजा का सार समझ लेते हैं। इससे बढ़कर एक और बुराई इसमें यह पैदा हो गई है कि देवी की पूजा के अनेक स्थानों में पशुओं की बलि चढ़ाई जाती है। वैसे तो माँस भक्षण ही हिन्दू धर्म के उच्च सिद्धान्तों की दृष्टि से एक निकृष्ट कर्म है जिससे मनुष्य का किसी न किसी अंश में आध्यात्मिक पतन होता है, पर देवी-देवता के नाम पर निर्बल पशुओं को मारकर खाना तो सब प्रकार से जघन्य और अत्यन्त हीनता का परिचायक है। गायत्री तपोभूमि ने इस निन्दनीय और जंगली प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई है और अनेक गायत्री शाखाओं ने अपने-अपने क्षेत्र में इसके विरुद्ध अभियान आरम्भ कर दिये हैं। इस लेख में एक विद्वान् लेखक ने दुर्गा पूजा के शास्त्रीय रूप को दिखलाते हुए बतलाया है कि इसका वास्तविक उद्देश्य मनुष्य में पाये जाने वाले आसुरी तत्वों-बुरी आदतों को दूर करके दैवी तत्वों को ग्रहण करना है। पशुबलि जैसी निकृष्ट प्रथा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं।]
दैत्यों का संहार करने के लिए देवी अम्बिका ने अनेक रूप धारण किये। देवताओं के समान ही अनेकानेक शक्तियाँ प्रकट होकर असुरों से युद्ध करने लगीं। दैवी शक्ति द्वारा आसुरी वृत्तियों का संहार भारतीय शक्ति-साधना, कल्याणी दुर्गा की उपासना, महिमामयी माँ की आराधना के रूप में हमारी संस्कृति में आदिकाल से प्रतिष्ठित है। अनेकानेक कथाएँ इस शक्ति-उपासना के उद्गम को आच्छादित किए हुए हैं। एक कथा के अनुसार उग्रदेव रुद्र की पत्नी रुद्राणी को आद्या शक्ति माना गया। पिता द्वारा किये जाने वाले यज्ञ में अपने पति रुद्र का अपमान न सह सकने के कारण क्रुद्ध रुद्राणी ने आत्मदाह कर लिया। इस समाचार को सुनते ही रुद्र प्रलयकारी रूप धारण कर शक्ति के शव को उठाकर त्रैलोक में घूमने लगे। रुद्र के क्रोध को शमन करने की शक्ति भला किसमें थी। अन्त में भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देकर आद्या शक्ति रुद्राणी के शव को छिन्न-भिन्न करवा डाला।
इससे अधिक प्रचलित कथा माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर-वध की है। शिव की तपस्या करके महिषासुर ने अजेय होने का वरदान प्राप्त किया और उसके बाद इन्द्र तथा अन्य देवताओं को युद्ध में पराजित कर स्वर्ग को छोड़कर पृथ्वी पर उतर आने के लिये बाध्य किया। त्रिदेव ने परिस्थिति की गंभीरता का अनुमान करके शक्ति-मूर्ति माँ दुर्गा को जन्म दिया। देवों ने इन्हें अपने अस्त्र, वाहन आदि अर्पित किये। महिषासुर से इनका युद्ध हुआ। अनेक छल-बल करने के बाद भी दुर्गा के हाथों उसका वध हुआ और तभी से दुर्गा महिषासुर-मर्दनी की उपाधि से विभूषित हुईं।
कल्याणी शक्ति
माँ दुर्गा ने साहित्य, कला, अध्यात्म और दर्शन सभी क्षेत्रों में समान रूप से प्रतिष्ठा प्राप्त की है। देश के विभिन्न भागों में उनकी प्रतिमाएँ और प्रस्तर मूर्तियाँ प्राप्त होती है। इनमें से प्रायः सभी में उन्हें शक्ति के मूर्त रूप में दिखलाया गया है और उनके द्वारा दुष्टों के विनाश की और संकेत किया गया है। आग्नेय एशिया और पल्लव पैनल नामक काव्यों में उनके देवोपम रूप, प्रभाव और वैभव को अंकित किया गया है।
शक्ति पूजा की परम्परा का आदि, प्रमाणिक रूप से ज्ञान न होने के कारण इसे अनादि कहा गया है। इतिहासविद् इसे अनार्यों की देन मानते हैं। आर्यों को इसे परिमार्जित और प्रसारित करने का श्रेय प्रदान करते हैं। भारत के बाहर जावा, कम्बोडिया, हिन्दचीन और हिन्देशिया आदि में भी इस शक्ति उपासना ने प्रसार पाया। आज भी देश के कोने-कोने में भिन्न-भिन्न प्रकार से दुर्गा पूजा प्रचलित है। नवरात्रि में प्रायः सर्वत्र दुर्गा या उनके ही अन्य रूप की पूजा धूम-धाम के साथ की जाती है।
पितृ पक्ष की समाप्ति के साथ यह मान लिया जाता है कि पूर्वजों के प्रति दायित्व पूर्ण हो गये हैं। उसके बाद मानो वर्तमान के प्रति अपने कर्तव्य का स्मरण आता है। अपने इस नवीन अभियान के पूर्व आत्मशुद्धि हेतु उपवास और आत्म-शक्ति प्रदीप्त करने के लिये दुर्गा सप्तशती का पाठ आवश्यक माना जाता है। दुर्गा के प्रति अपनी प्रगाढ़ श्रद्धा व्यक्त करने के भाव से भक्तगण पचास-पचास मील से पुष्पमाला लाकर माँ के चरणों पर चढ़ाते हैं। नेपाल में सप्तमी के दिन फूल-पत्ती द्वारा समारोह का प्रारम्भ, अष्टमी के दिन महामाया दुर्गा की वृहद् उपासना के रूप में उसका मध्य तथा विजयदशमी के उल्लास पर्व में दुर्गा पूजा का उपसंहार होता है। नेपाल में अभी भी इस उत्सव में सैनिक धूमधाम की प्रधानता रहती है। अस्त्र-शस्त्रों की पूजा होती है और विजय यात्रा का उपक्रम होता है। नवयुवक इस अवसर पर विशेष उत्साह प्रदर्शित करते हैं और ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पर्व आकर उन्हें उत्तष्टित् जाग्रत का संदेश दे रहा हो।
अनेक स्थानों पर कुछ समय पूर्व तक महिष-बलि दी जाती थी, पशु-हत्या होती थी। शाक्त लोगों के आयोजनों में भावनाओं को उद्दीप्त करने के लिए माँस-भक्षण तथा मदिरा-पान को भी प्रश्रय मिला। किन्तु दुर्गा पूजा का विशुद्ध रूप इससे सर्वथा मुक्त है। वहाँ तो इस सबके लिए कोई स्थान ही नहीं है। कतिपय जनपदों में प्राप्त भावना इस अवसर पर बकरे के स्थान पर काम, भैंसे के स्थान पर क्रोध और भेड़ के स्थान पर लोभ की बलि देने के पक्ष में है। ये ही तो वे आसुरी वृत्तियाँ हैं जिनके विरुद्ध दैवत्व चिरकाल से संघर्ष करता रहा है। आज संभवतः माँ दुर्गा अपने कोटि-कोटि भावों से इसी बलि की अपेक्षा करती है।
राम ने शक्ति की कृपा से ही रावण के समान विश्व विजयी का संहार किया। जावा में प्रचलित एक लोककथा के अनुसार शक्ति मूर्ति ने राम को विजय-श्री विभूषित करने के पूर्व उनकी परीक्षा ली कि राम रावण का वध लंका प्राप्ति के लिए कर रहे हैं कि मंगला सीता की मुक्ति के लिए। राम के परीक्षा में सफल हो जाने पर उन्होंने रावण के वध का रहस्य बताया और राम को जय से विभूषित किया। जन मंगल की भावना शक्ति की सच्ची सहेली है।
‘उतिष्ठत् जाग्रत प्राप्त बरान्नि बोधत’ वाली उक्त सही रूप में तभी चरितार्थ होती है जब हम पूर्ण रूप से ‘स्व’ का विसर्जन करके लोकहित में अपनी भावनाओं का समर्पण कर दें। रावण पर राम की विजय का यही मूल रहस्य है।
स्वराज्य, सामूहिकता और सहकारिता ही आज की शक्ति है और आज उसी की उपासना का इष्ट है। अतः आज हम इन शब्दों में दुर्गा की उपासना करें-
तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं
बैरोचनीं कर्म फलेषु जुष्टाम्।
दुर्गा दवीं शरण महं प्रपद्ये
सुठरसि तरसे नमः ॥
साथ ही हम ऋग्वेद के इस मंत्र का भी संकल्प रूप में पाठ करें-
यते महि स्वराज्ये, वयं राष्ट्रे जागयाम्, यश श्रीः श्रयताँ मथि।
अर्थात् हम सब भारतवासी स्वराज्य के संरक्षण के लिये सतत प्रयत्नशील और जाग्रत रहें और इस प्रकार यश और लक्ष्मी को प्राप्त करें।
(श्री गिरिजा सहाय, ‘साहित्य भूषण’)
भारतीय संस्कृति का उद्देश्य व्यक्ति को और उसके द्वारा समाज को धर्मपरायण एवं कर्तव्यनिष्ठ बनाना है। ये ही दो बातें किसी भी मनुष्य को सुसंस्कृत कहलाने का अधिकार देती हैं। इसलिये हमारी प्राचीन संस्कृति के सभी आदर्श और विधि-विधान ऐसे रखे गये हैं कि उनके द्वारा मनुष्य की भौतिक उन्नति होने के साथ-साथ मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी उसका उत्थान हो।
हिन्दू-समाज में प्रचलित जात कर्म, यज्ञोपवीत, विवाह आदि से लेकर अंत्येष्टि क्रिया तक जो सोलह संस्कार प्रचलित हैं उनका मुख्य उद्देश्य यही है कि उनके द्वारा संस्कार किये जाने वाले व्यक्ति पर और दर्शकों पर भी कल्याणकारी प्रभाव पड़े। इन संस्कारों में प्रयोग किये जाने वाले वैदिक मंत्रों में एक विशेष प्रकार की सूक्ष्मशक्ति पाई जाती है और शिक्षाएँ भी उच्च कोटि की दी गई हैं। उनसे लोगों पर बहुत उत्तम मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है बशर्ते कि संस्कारों को उनका आशय समझकर उपयुक्त ढंग से किया जाय। जिस समय हमारे समाज में उनका वास्तविक रूप में प्रचार था और ज्ञानी ऋषि मुनियों द्वारा वे शास्त्री विधान से प्रयुक्त किये जाते थे उसी काल में ऐसे व्यक्ति उत्पन्न हुये हैं जिनका नाम व यश सहस्रों वर्ष बीत जाने पर अभी तक स्थिर है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि मनुष्य के चरित्र-निर्माण और मनोभूमि को सुसंस्कृत बनाने के लिये ये संस्कार भारतीय संस्कृति की महान देन हैं।
इन संस्कारों के महत्व और लाभों को देखते हुये हमारा कर्तव्य है कि उनमें समयानुकूल थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके उनका अपने घरों में प्रचार करें। यदि समस्त संस्कारों का करना कठिन जान पड़े तो भी जन्मोत्सव तथा यज्ञोपवीत संस्कार तो अच्छे रूप में मनाना ही चाहिये। इनमें सबसे पहली बात इनको सामूहिक रूप देने की है। यज्ञोपवीत संस्कार को तो यदि बड़े-बड़े यज्ञों के अवसर पर सामूहिक रूप से किया जाय तो समाज का बड़ा उपकार हो सकता है। वर्तमान समय में इस संस्कार को बड़ा खर्चीला बना दिया गया है जिससे अधिकाँश व्यक्तियों ने उसका करना ही बन्द कर दिया है। और बहुत से विवाह के समय ही उसकी रस्म भी नाम मात्र को पूरी कर देते हैं। इसलिये आजकल इस संस्कार को यदि बड़े-बड़े यज्ञों के अवसर पर सामूहिक रूप से किया जाय तो सब तरह लाभ ही है। इन यज्ञों में सब प्रकार की व्यवस्था, योग्य आचार्य, उत्सव की तैयारियाँ पहले से ही होती हैं। उस समय यज्ञोपवीत पूर्णतः शास्त्रानुकूल रीति से हो सकता है और इतने बड़े जन-समुदाय के समक्ष प्रतिष्ठित व्यक्तियों के हाथ से ग्रहण करने के कारण उसका महत्व भी हृदय पर अंकित हो जाता है। यज्ञोपवीत की यह व्यवस्था लाभदायक ही नहीं वरन् वर्तमान परिस्थिति को देखते हुये हम तो इसे अनिवार्य ही मानते हैं। यदि इसे नहीं अपनाया जायगा तो धन तथा श्रद्धा दोनों के अभाव से कुछ समय में इसका चिन्ह भी शेष न रहेगा।
इसी प्रकार जन्म दिन का जन्मोत्सव संस्कार भी कम से कम खर्च में सामूहिक हवन करके या केवल सत्संग करके ही अवश्य करना चाहिये। इसमें मुख्य बात तो वे शिक्षाएँ हैं जो इस अवसर पर विद्वान और अनुभवी जनों से प्राप्त होती है। इन सब अवसरों पर सामूहिकता का ध्यान अवश्य रखना चाहिये, क्योंकि कलियुग में इसी का सर्वाधिक महत्व है। सामूहिक कार्यक्रमों से पारस्परिक प्रेमभाव, आत्मीयता एवं संगठन शक्ति की वृद्धि होती है और अनेकों कठिन समस्याएँ स्वयमेव हल हो जाती हैं।
जिस प्रकार व्यक्तिगत जीवन के उत्थान और निर्माण के लिये संस्कारों की रचना की गई है, उसी प्रकार समस्त समाज को संगठित और सुसंस्कृत बनाने के लिये हमारे पूर्वजों ने विभिन्न त्यौहारों की स्थापना की थी। इनमें से प्रत्येक त्यौहार के भीतर एक विशेष आदर्श निहित है जिससे व्यक्ति को समाज के प्रति अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व की शिक्षा मिलती है। यह एक प्रत्यक्ष बात है कि केवल लिखने-पढ़ने या उपदेश देने से मनुष्य पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है, पर बड़े-बड़े प्रदर्शनों और उत्सवों द्वारा उसे ये उपयोगी शिक्षाएं सहज ही में दी जा सकती हैं। फिर हमारे देश में तो अभी पढ़े लिखे व्यक्तियों की संख्या ही नाममात्र को हैं। खासकर ग्रामीण जनता तो अब भी अधिकाँश में निरन्तर ही है। इस लिये प्राचीन काल के महापुरुषों और सच्ची देवियों के चरित्रों का स्मरण कराने वाले त्यौहारों का आदर्श रूप में मनाना समाज के लिये सब प्रकार से हितकारी है।
पर इसके लिये सबसे पहली बात यह है कि समय के प्रभाव से त्यौहारों के मनाने में जो हानिकारक रूढ़ियां घुस गई हैं और उनका जो विकृत रूप हो गया है उसका सुधार अवश्य करना चाहिये। उदाहरण के लिये होली हमारे यहाँ का सबसे बड़ा सामूहिक त्यौहार है, और समाज के संगठन का उससे बढ़कर दूसरा अवसर मिल नहीं सकता। पर धीरे-धीरे लोगों ने उसको ऐसा बिगाड़ दिया है और इतनी अधिक गन्दगी उसमें भर दी है, कि ज्यादातर भले आदमी तो उसमें भाग लेना तो दूर उस दिन घर से बाहर निकलना भी पसन्द नहीं करते। वह एक प्रकार से हुल्लड़बाजों और आवारा ढंग के लोगों का उत्सव बन गया है। इसी प्रकार दिवाली में भी जुआ खेलने की ऐसी परिपाटी चला दी है कि उससे हजारों व्यक्तियों का सर्वनाश हो जाता है। जो त्यौहार इतने अधिक नहीं बिगड़े हैं, वे भी केवल चिन्ह-पूजा के रूप में रह गये हैं, और उनका उद्देश्य पकवान, मिष्ठान्न बनाकर खा लेना और कोई छोटा-मोटा कर्मकाण्ड कर लेना ही रह गया है। यह स्थिति वास्तव में बड़ी निराशाजनक है। जिस देश या जाति के प्रेरणा-दायक सामाजिक उत्सव और त्यौहार शिथिल और विकृत हो जाते हैं, वहाँ का समाज भी दुर्बल हो जाता है।
यदि हम भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान करना और अपने समाज को सुदृढ़, सुसंगठित और समझ लोगों के सम्मुख खड़े होने लायक बनाना चाहते हैं तो हमको अपने यहाँ व्रत त्यौहारों और उत्सवों की प्राचीन परिपाटी को पुनर्जीवित करना होगा और उनमें समानुकूल नवीन हितकारी बातों का समावेश भी करना होगा। इस कार्य में हमारे गायत्री-परिवार की शाखायें बहुत कुछ भाग ले सकती हैं। इसमें सबसे पहली आवश्यकता तो यह है कि ये त्यौहार समस्त देश में एक ही विधि-विधान से मनाये जाने चाहिये। इसका एकमात्र उपाय यही है कि प्रत्येक त्यौहार के शास्त्रीय रूप को समझकर उसके आधार पर ही उसमें वर्तमान परिस्थिति के अनुकूल हितकारी तत्वों का समावेश करके उसका कार्यक्रम निश्चित करना चाहिए। इसके लिये प्रत्येक स्थान की शाखायें अपने सदस्यों तथा अन्य जनता को भी, जो भाग लेने को राजी हों, एक सार्वजनिक स्थान पर अथवा अपने “गायत्री-ज्ञान-मन्दिर” में एकत्रित करके त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाने की व्यवस्था करें। त्यौहार के धार्मिक और आकर्षक तत्वों की रक्षा करते हुये उसके पीछे जो आदर्श और इतिहास हो उसे प्रवचन, उपदेश, भजन, कीर्तन, नाटक आदि द्वारा जनता के अन्तःकरण में उतारने का प्रयत्न किया जाय। जहाँ अभी “गायत्री-ज्ञान मन्दिर” न हों वहाँ किसी अन्य अच्छे सार्वजनिक मन्दिर में या किसी सदस्य के घर पर ही कार्यक्रम रखा जा सकता है।
इस प्रकार हमारा हर एक संस्कार और त्यौहार व्रतोत्सव, पर्व आदि एक सार्वजनिक सामूहिक सम्मेलन का रूप धारण करके समाज के लिये हितकारी सिद्ध हो सकता है। उसका मुख्य उद्देश्य जनता में नैतिकता और सच्चरित्रता के भावों का उत्पन्न करना ही होना चाहिये। इससे हमारे साँस्कृतिक पुनरुत्थान में भी काफी सहायता मिल सकती है।
(डॉ. चमनलाल)
प्रकृति का नियम है कि निर्बलों को शक्तिवान दबाया करते हैं। चूहे, कबूतर आदि को बिल्ली, बकरी, भेड़ आदि को शेर दबोच कर खा जाते हैं। दरिद्रों पर धनवान, मातहतों पर ऑफीसर, बालकों पर युवक, अशक्तों पर शक्तिवान अपना सिक्का जमाया ही करते हैं। शक्तिशाली देश निर्बल देशों को परास्त करके उन्हें अपना गुलाम बनाया करते हैं। प्रकृति स्वयं सर्दी व गर्मी के प्रभाव से निर्बलों को दण्ड दिया करती है। निर्बल शरीर के व्यक्तियों को रोग घेरे रहते हैं। मानसिक दुर्बलता के कारण मनुष्य दुःख और चिन्ताओं के चंगुल में फंसे रहते हैं। विचारों में दृढ़ता न होने से किसी काम में सफलता नहीं मिलती। बुद्धि ने अभाव में जीवन क्रम डाँवाडोल रहता है। साँसारिक समस्याओं में उलझा रह कर मनुष्य अपने भाग्य को रोता रहता है, सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय के निर्णय करने की शक्ति नहीं रहती। सार यह कि सुखी जीवन व्यतीत करने के लिये शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आत्मिक व सामाजिक सभी प्रकार की शक्तियों की आवश्यकता है। शक्ति ही जीवन और निर्बलता ही मृत्यु है।
सेना का प्रत्येक देश में प्रबन्ध इसीलिए रहता है ताकि दूसरों देशों के आक्रमण करने पर उनका मुकाबला किया जा सके और अपने देश की रक्षा की जा सके। इस शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा रूपी छोटे से देश के लिए भी इन बलों की परम आवश्यकता है ताकि आक्रमणकारी शत्रुओं से रक्षा की जा सके। काम रूपी शत्रु अपने अस्त्र-शस्त्र लिए इसी ताक में रहता है। बाजार में जाते हुए स्त्रियों की तड़क भड़क, बनावटी सौंदर्य और फैशन मन में तूफान खड़े किये बिना नहीं रहता। दीवारों पर चिपके हुए फिल्मों के गन्दे पर्चे हमें काल कोठरी में जाकर शूद्रता का परवाना लेने के लिए प्रेरित करते हैं। वहाँ के अश्लील गाने और अर्ध नग्न नाच, वेशभूषा व कामोत्तेजक वार्तालाप वासनाओं को उद्दीप्त किये बिना नहीं रहते। पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगे हुए उपन्यास व पत्र पत्रिकाओं में निकलने वाले लेख इस ओर प्रेरित देने में कुछ कम काम नहीं कर रहे हैं। मित्रों की बातचीत का विषय भी ऐसा ही होकर हमें इस मार्ग में बढ़ाने में सहायक होता है। मन में दूषित विचार उत्पन्न करने वाले यह गन्दे तरीके हमें कुमार्ग में घसीटने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसके दुष्परिणाम इतने भयंकर हैं कि वह हमारे शरीर, मन, बुद्धि आदि सभी को ले डूबते हैं। इसमें हमें हमेशा होशियार रहना चाहिए और अपनी रक्षा के लिए निरन्तर मानसिक युद्ध करते रहना चाहिए।
क्रोध भी हमेशा अपने हाथ में विष का खाना लिए हुए हमें नशेबाज बनाने की चिन्ता में रहता है। अहं की जाग्रति होने पर ही इसकी उत्पत्ति होती है। सहनशीलता बेचारी इसके डरावने आकार को देखकर रफू चक्कर हो जाती है। विवेक भी आगे बढ़ने का साहस नहीं करता। विष का प्याला पीकर हम पागल से हो जाते हैं। बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। आगा पीछे नहीं देखते। इससे हमारी मानसिक व शारीरिक शक्तियों का अपव्यय होता है। इससे हमें खबरदार रहना पड़ेगा, इससे भी संघर्ष करना पड़ेगा।
लोभ रूपी राक्षस दोनों हाथों में हथियार लिए हुए जीवन के प्रत्येक चौराहे पर खड़ा रहता है। यह कुछ ऐसी मैस्मरेजम जानता है कि प्रायः सभी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। यह अपनी अद्भुत आकर्षण शक्ति द्वारा हजारों लाखों को अपने चंगुल में फँसाकर पथ भ्रष्ट कर देता है। व्यापार, नौकरी आदि सभी क्षेत्रों में इसका फैलाव है। इसकी जड़ों को काटना असम्भव सा दीखता है। फिर भी इसके आक्रमण से बचने के लिए अपने मानसिक बल को बढ़ाकर इससे युद्ध करने को तैयार हो जाना चाहिए। मोह रूपी अज्ञानता हमें निरन्तर दुख देती रहती है। अहंकार रूपी सूक्ष्म शत्रु के हमारे मन में प्रवेश करने से हम अपने आप को भूल जाते हैं, कुछ से कुछ कर बैठते हैं। यही हमें दूसरों से घृणा और नीचता का व्यवहार करने पर बाध्य करता है। थोड़े समय के लिए सम्राट बनाकर हमारे देश की बागडोर अपने हाथ में ले लेता है और अपनी मनमानी करवा लेता है। दूसरों की बढ़ती हुई उन्नति देखकर हमारे मन में ईर्ष्या की अग्नि की ज्वाला धधकने लगती है। अग्नि का गुण जलाना है, वह जलाये बिना नहीं रहती। हमें दीन हीन और दुखी करने के लिए निराशा भी बराबर अपना काम चालू रखती है। परिणामस्वरूप चेहरे पर उदासी और रूखापन दीखने लगता है। गृहस्थ जीवन में चिन्ताओं और समस्याओं की कमी नहीं रहती। अज्ञान, अशक्ति और अभाव भी दुखों की डाली लेकर खड़े रहते हैं। तामसिक व राजसिक आहार भी हमें पतन की ओर ले जाने में कोई कसर उठा नहीं रखते। इसके जाल में मछलियाँ ऐसे फँसती हैं जैसे प्रकाश पर परवाने टूट पड़ते हैं। कुबुद्धि अपना साम्राज्य बढ़ाने में निरन्तर प्रयत्नशील रहती है।
इस प्रकार मनुष्य का यह शरीर, मन, आत्मा रूपी देश निरन्तर बड़े-बड़े शत्रुओं से घिरा रहता है। इनमें से प्रत्येक ऐसा है जो यदि हम पर काबू पा जाय तो हमारे जीवन को नष्ट-भ्रष्ट और दुःखी बना सकता है। पर यदि ये संगठित रूप से हमारे ऊपर हमला करें तब तो हमारा कहीं ठिकाना ही नहीं लग सकता। तब तो हमको इस लोक में क्या परलोक तक में उनके बुरे परिणाम भोगने पड़ेंगे। तब तो शायद हमको मनुष्य योनि से भी गिर कर फिर कीड़े-मकोड़ों की योनि में पहुँच जाना पड़ेगा। इसलिये अगर हम अपना कल्याण चाहते हैं तो हमको हमेशा अपने इन सबसे बड़े शत्रुओं से सावधान रहकर उनके हमले से बचने का ध्यान रखना चाहिये और अपना समय ऐसे कामों में लगाना चाहिये जिससे हमारी बुद्धि “धर्म” की ओर ही अग्रसर होती रहे।
(श्री शिवप्रकाश, बी. काम.)
वर्तमान काल को अनेक व्यक्ति “विज्ञान-युग“ के नाम से पुकारते हैं। उनका मत है कि इससे पहले जमाने में संसार में अन्ध विश्वास का ही साम्राज्य था और लोग किसी धर्मगुरु या पंडित पुजारी के कथन मात्र से ही चाहे जैसी सम्भव, असम्भव बात पर विश्वास कर लेते थे। पर यह मत बहुत सोच-विचार कर निश्चित किया हुआ नहीं है। संसार में अंधविश्वासी और ज्ञानी व्यक्ति सदा से रहे हैं और अब भी वैसी ही हालत मौजूद है। इतना माना जा सकता है कि अब शिक्षा का सार्वजनिक रूप से विशेष प्रचार हो गया है और पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बढ़ जाने से ज्ञान-विचार की चर्चा अधिक सुनाई देने लगी है। पर यदि तात्विक रूप से खोज की जाय तो मालूम होगा कि विज्ञान कोई नई चीज नहीं है और आज से कई हजार वर्ष पहले भी लोगों ने विज्ञान की प्रत्येक शाखा में काफी प्रगति की थी और अनेक चमत्कारी आविष्कार भी किये थे।
पर एक बात अवश्य है कि यह प्राचीन वैज्ञानिक उन्नति जिस समय मुख्य रूप से एशिया अथवा पूर्वी देशों में हुई थी, उस काल में यूरोप, अमरीका के आजकल वैज्ञानिक कहलाने वाले देश घोर अंधकार की अवस्था में पड़े हुये थे। इतिहास लिखने वालों ने स्पष्ट रूप से बतलाया है कि अब से दो-तीन हजार वर्ष पहले ही भारत, चीन, मिश्र आदि देशों में कितनी अधिक वैज्ञानिक खोजें हो चुकी थीं और किस प्रकार ये ही देश संसार में प्रधान माने जाते थे। पर इतना अन्तर जरूर था कि उस समय की वैज्ञानिक प्रगति करने वालों में धर्म और अध्यात्म का भाव भी था जिससे उन्होंने उसी प्रकार के और उतने ही आविष्कार किये थे जो मनुष्य मात्र के लिये उपयोगी और कल्याणकारी हों। इसके विपरीत आज कल के भौतिकवादी वैज्ञानिक आत्मा और धर्म से प्रायः नाता तोड़ चुके हैं और उनके आविष्कारों का स्वरूप मुख्यतः व्यापार में “नफा कमाने वाला” अथवा “स्वार्थ सिद्धि” का हो गया है। इसी का परिणाम है कि अब स्वार्थ की ओर बढ़ते-बढ़ते वे पारस्परिक सर्वनाश के आविष्कार करने लग गये हैं और इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण दे रहे हैं कि ‘स्वार्थ अन्धा होता है।’
अब से डेढ़-दो सौ वर्ष पूर्व जब कि पश्चिम में विज्ञान की उन्नति विशेष रूप से आरम्भ हुई थी, तो उसकी चकाचौंध से अनेक लोग इस भ्रम में पड़ गये थे कि यह कोई अभूतपूर्व चीज है, और पहले समस्त संसार जंगली ही था। इसी भ्रमपूर्ण धारणा के वशीभूत होकर अनेक पश्चिमी लेखक भारत, चीन आदि पूर्वीय देशों को “अर्ध-सभ्य” या दकियानूसी कहने लग गये थे। यही वह युग था जब कि कुछ लेखकों ने वेदों को ‘गड़रियों की गीत’ कहकर अपनी “बुद्धिमत्ता” का परिचय दिया था। पर उसी समय अन्य न्याय बुद्धि वाले विद्वानों ने इन देशों के साहित्य की खोज की और इस बात को भली भाँति सिद्ध कर दिया कि भारत आदि देशों के प्राचीन निवासी सब तरह से सुसंस्कृत तथा ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में काफी प्रगतिशील थे। इनमें से एक लेखक ने अपनी पुस्तक में जो फ्राँसीसी भाषा में प्रकाशित हुई थी विज्ञान की प्रत्येक शाखा में भारतवर्ष की प्राचीन प्रगति का पूरा विवरण दिया है। उसका साराँश मात्र यहाँ दिया जाता है-
दर्शन - प्राचीन हिन्दुओं ने आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के दर्शनों में पूर्ण प्रगति की थी। इनमें पहले की शिक्षा वेदान्त-शास्त्र में दी गई है जिसके मूल रचयिता व्यास थे और दूसरी शाखा का परिचय “साँख्य” में मिलता है जिसके आदि प्रचारक कपिल माने जाते हैं।
गणित ज्योतिष- प्राचीन भारतवासी विद्वानों ने ही सर्वप्रथम पंचाँग की रचना की, राशिचक्र का आविष्कार किया, पृथ्वी की धुरी का स्थान निश्चित किया, ग्रहों की गति का पता लगाया और सूर्य चन्द्रमा के ग्रहणों का अध्ययन करके पहले से ही उनका समय बतलाने लगे।
गणित- उन लोगों ने दशमलव प्रणाली, बीज गणित, रेखागणित, त्रिकोणमिति का आविष्कार किया और नाप जोख के ऐसे पैमाने बनाये जो योरोप में अब से दो-ढाई सौ वर्ष पहले ही बनाये गये हैं। प्राचीन ब्राह्मणों ने ही यज्ञकुँडों और यज्ञ-मंडपों का निर्माण करने के लिये त्रिभुज के क्षेत्रफल और वृत्त तथा उसके व्यासार्ध सम्बन्धी नियम मालूम किये।
भौतिक विज्ञान- इस विषय में उन लोगों ने सृष्टि रचना के इस सबसे बड़े सिद्धान्त का पता लगाया कि समस्त विश्व एक ही तत्व से रचा गया और उसके नियमों का अध्ययन और अनुभव द्वारा पता लगाया जा सकता है। उन्होंने इस प्रसिद्ध नियम का पता लगाया कि यदि किसी पदार्थ को पानी में डुबाया जायगा तो उतने ही वजन का पानी उसमें से बाहर निकल जायगा। यूनान के मशहूर गृह निर्माण विशारद आर्किमिडीज ने यह ज्ञान भारतवर्ष से ही प्राप्त किया था। सूर्य सिद्धाँत में जो गणना की गई है उससे यह पूर्णतया स्पष्ट जान पड़ता है कि ये लोग भाप की शक्ति से भी परिचित थे।
रसायन विज्ञान- भारतीय विद्वानों को पानी की बनावट का पता था। वे लोग गन्धक, शोरा, नमक आदि का तेजाब बनाना जानते थे। तांबा, लोहा, सीसा, टीन, जस्ता आदि धातुओं को विभिन्न रूपों में बदलकर भिन्न-2 रासायनिक पदार्थ जैसे तूतिया, सफेदा आदि बनाना जानते थे। पारे के सम्बन्ध में उनको जितनी अधिक जानकारी प्राप्त की थी उतनी आजकल के वैज्ञानिकों को भी नहीं है। वे तरह-तरह की बारूदें बनाना भी जानते थे।
औषधिशास्त्र- इस सम्बन्ध में भारतीय चिकित्सकों का ज्ञान वास्तव में आश्चर्यजनक था। यहाँ चरक और सुश्रुत ने चिकित्सा के वे सिद्धान्त बहुत पहले निश्चित कर दिये थे जिनका ज्ञान बाद में यूनानियों ने प्राप्त किया। सुश्रुत में रोगों को रोकने वाली, कीटाणु नाशक औषधियों का वर्णन विशेष रूप से किया है और शल्य-चिकित्सा (चीर फाड़) का वर्णन भी बहुत विस्तार से पाया जाता है। वे लोग पथरी और मोतियाबिन्द का आपरेशन किया करते थे। अरब के चिकित्सकों ने इस शास्त्र का ज्ञान विशेषतः भारतीय वैद्यों से ही प्राप्त किया था, जिसका उन्होंने अपने ग्रंथों में उल्लेख भी किया है। इन्हीं अरब चिकित्सकों के ग्रंथों से योरोप में औषधिशास्त्र का ज्ञान फैला है।
व्याकरण- उन्होंने संसार भर में सर्वश्रेष्ठ भाषा संस्कृत की रचना की जिससे समस्त पूर्वीय और योरोपियन देशों को भाषा सम्बन्धी प्रयोगों की जानकारी प्राप्त हुई।
काव्य- उन्होंने कविता की विभिन्न प्रणालियों में रचनायें की और सब में पूर्ण सफलता प्राप्त करके दिखलाई। शकुन्तला, उत्तर राम चरित्र, सारंग आदि सैकड़ों ऐसे नाटक वहाँ रचे गये हैं जिनका मुकाबला किसी योरोपियन भाषा के नाटक नहीं कर सकते। उनके काव्य और महाकाव्य भी अद्वितीय हैं। इसके लिये पाठक केवल “मेघ दूत” को पढ़कर ही उनकी श्रेष्ठता का अनुमान कर सकते हैं। संस्कृत साहित्य की कहानियों की नकल संसार की सब भाषाओं में की गई है।
संगीत- इस विषय में इतना ही कहना पर्याप्त है कि गान-विद्या के मूल सात स्वरों का आविष्कार भारतीयों ने ही किया था। उन्होंने बहुसंख्यक राग रागनियों की रचना भी की है।
गृह निर्माण- इस विद्या में उन्होंने इतनी अधिक कला प्रदर्शित की है कि हम उससे अधिक की कल्पना भी नहीं कर सकते। हर तरह के बड़े से बड़े गुम्बज, ऊँचे-ऊँचे शिखर, मीनारें, पर्वताकार विशाल मंदिर, हजारों मन की बड़ी-बड़ी शिलाओं से बने किले, कोट, दुर्ग वहाँ पर सदा से बनते रहे हैं, जिनकी निर्माण करने की चतुराई देखकर आधुनिक इंजीनियर भी दंग रह जाते हैं।
प्राचीन हिन्दू-सभ्यता ने जो उच्च स्थिति प्राप्त की थी यह उसी का एक छोटा सा विवरण है। वर्तमान युग के सभ्यता के ठेकेदार बनने वाले भी रचनात्मक दृष्टि से इससे बढ़कर कृतित्व नहीं दिखला सकते। यह बात दूसरी है कि अपने मुँह से अपनी बड़ाई करते रहें और संकीर्ण मनोभावों के कारण इस प्राचीन जाति की संस्कृति को उचित सम्मान देने में आनाकानी करें। पर सौभाग्यवश अब फिर यह जाति सचेत हो गई है और अपने प्राचीन गौरव का अनुभव करने लगी है, इसलिये यह फिर संसार में अपना उचित स्थान प्राप्त कर लेगी इसमें सन्देह नहीं।
(कुँवर नरेन्द्रसिंह)
पुनर्जन्म का सिद्धान्त हिन्दू-धर्म अथवा भारतीय संस्कृति की एक सबसे बड़ी खोज है। मरने के बाद हमारा क्या होता है, यह एक बड़ा ही टेढ़ा प्रश्न है। श्रद्धा के आधार पर तो आप इसका जैसा चाहें स्वरूप मान सकते हैं, पर जब इस संबंध में किसी तार्किक या प्रत्यक्ष-प्रमाण माँगने वाले से काम पड़ता है तो मृत्यु के बाद के जीवन के सम्बन्ध में कोई निश्चित बात कह सकना बड़ा कठिन होता है। यही कारण है कि संसार के किसी धर्म में इसका भली प्रकार विवेचन नहीं किया गया है और मरने के बाद किसी स्वर्ग या दिव्य-लोक की आकर्षक सी कल्पना करके चुप हो गये हैं। केवल भारतीय दार्शनिकों ने ही अपनी प्रखर बुद्धि, योगशक्ति और तर्क प्रणाली से यह सिद्ध किया है कि आत्मा कभी मरता या जिन्दा नहीं होता। वह एक अविनाशी तत्व है जो दैवी नियमानुसार भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता रहता है।
अब संसार के अन्य देशों के स्वतन्त्र मतवाले विद्वान और वैज्ञानिक भी खोज करते-करते इसी तथ्य के निकट पहुँच रहे हैं। विज्ञान के तत्वों की विवेचना करते हुये उन्होंने मालूम किया है कि स्थूल पदार्थों की भाँति शक्ति भी अक्षय है, उसका नाश नहीं होता, रूपांतर मात्र हो जाता है। कोयला, भाप, तेल, बिजली आदि की जो शक्ति छोटी-बड़ी मशीनों को चलाती है वह अपना काम करने के बाद नष्ट नहीं हो जाती वरन् किसी दूसरे रूप में बनी रहती है। जल कभी बर्फ के रूप में पत्थर की तरह कठोर हो जाता है, कभी भाप बनकर हवा की तरह अदृश्य हो जाता है और कभी अत्यधिक ताप से विभिन्न गैसों के रूप में परिवर्तित हो सकता है, जिनसे फिर सहज में जल नहीं बन सकता। पर इस परिवर्तन से वह नष्ट नहीं होता, न उसके परिमाण में जरा सा भी अन्तर पड़ता है।
इस विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वस्तुओं का जो स्वरूप हमको दिखलाई पड़ता है वह वास्तविक नहीं है। हम लोग किसी भी जीव की उत्पत्ति को जन्म और उसके लय हो जाने को मरण या नाश समझते हैं, वह एक भ्रम है। दरअसल हमारी शक्ति का नाश तो जन्म काल से ही होने लगता है। पर हम उसे अनुभव नहीं करते और जैसे-जैसे आयु बढ़ती है हम उसको जीवन की वृद्धि कहते हैं। पर वास्तव में हमारी जीवन-अवधि दिन पर दिन कम होती जाती है अर्थात् हमारे जीवन का क्षय होता जाता है। जब यह क्षय चरम सीमा पर पहुँच जाता है और एकदम उसका रूपांतर होता जान पड़ता है तब हम उसे ‘मृत्यु’ कह देते हैं।
वैज्ञानिकों ने जाँच करके साबित किया है कि मनुष्य की मृत्यु हो जाने पर भी उसके नाखून और बाल कई दिन तक बढ़ते रहते हैं। इससे विदित होता है कि हमारी मृत्यु भी वास्तविक नहीं है। जिसे लोग नाश समझते हैं वह सिवाय एक बड़े परिवर्तन के और कुछ नहीं है।
जिस प्रकार संसार में दिखलाई पड़ने वाले समस्त ठोस, द्रव (जलीय) और वायु रूप पदार्थों का निर्माण अत्यन्त सूक्ष्म परमाणुओं से हुआ है, वही बात शक्ति के सम्बन्ध में भी है। आधुनिक विज्ञान के सिद्धान्तानुसार प्रत्येक अणु को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। इनमें एकमात्र कोष या ‘सैल’ कहलाता है और दूसरा शक्ति या “फोर्स” इनमें से जब किसी अणु का कोष जीर्ण होकर नष्ट हो जाता है तो उसकी शक्ति दूसरे कोष में प्रविष्ट हो जाती है। इन नवीन कोष को पुराना अणु प्राकृतिक नियमानुसार अपनी जीवित अवस्था में ही तैयार किया करता है। यही उत्पत्ति और रूपांतर का नियम हमारे शरीर और जीवात्मा में भी पाया जाता है। जब किसी शरीर में विजातीय द्रव्य बढ़कर वह जीर्ण शीर्ण हो जाता है तो हमारा जीवात्मा या जीवनी शक्ति (फोर्स आफ लाइफ) उस देह के जीवाणु से अलग होकर दूसरे नवीन जीवाणु में प्रविष्ट हो जाती है। इस बात को हम यों भी कह सकते हैं कि हमारे शरीर में ही नित्य प्रति अणुओं के बनने और बिगड़ने के रूप में असंख्यों जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म होते रहते हैं। अंत में एक दिन ऐसा आता है कि हमारा समस्त शरीर ही एक साथ वैसे ही रूपांतर को प्राप्त हो जाता है। प्रथम प्रकार का परिवर्तन अर्थात् हमारे शरीर के अणुओं का प्रतिदिन बनना बिगड़ना ऐसे सूक्ष्म रूप में होता है कि साधारण मनुष्य उसे आँखों से देखकर अनुभव नहीं कर सकता। पर दूसरे प्रकार का परिवर्तन अर्थात् समस्त शरीर का जन्म-मरण इतना बड़ा होता है कि उसे हम सहज में देख और समझ सकते हैं।
इस प्रकार विचार करने से विदित होता है कि हिन्दू-शास्त्रों में बतलाया हुआ पुनर्जन्म का सिद्धान्त कल्पित अथवा अवैज्ञानिक नहीं है। यह माना जा सकता है कि चूँकि साधारण श्रेणी के व्यक्ति इस सूक्ष्म विषय को भली प्रकार नहीं समझ सकते, यह देखकर पौराणिक ढंग के लेखकों ने उसको कहानी किस्से का सा रूप दे दिया है, जिससे बुद्धिवादी लोग उसे अविश्वास की दृष्टि से देखने लगे हैं। पर इसका मूल सिद्धान्त अकाट्य है जिसका प्रमाण भारतवर्ष में ही नहीं अन्य देशों तथा जातियों में भी समय-समय पर मिलता रहता है। इस प्रकार के उदाहरणों से संसार के अनगिनत ग्रंथ भरे पड़े हैं। अतएव हम दृढ़तापूर्वक यह कह सकते हैं कि आत्म-शक्ति या जीवात्मा भी अन्य शक्तियों की तरह अविनाशी है और वह समय-समय पर एक कोष (देह) से दूसरे कोष में स्थान परिवर्तन करता रहता है।
(श्री. योगिराज अरविन्द)
जड़, प्राकृतिक या अन्य शक्तियों के संघर्ष के द्वारा ही इस जगत की प्रत्येक वस्तु जन्म लेती दिखाई पड़ती है। शक्तियों, प्रवृत्तियों, सिद्धान्तों और प्राणियों के परस्पर संघर्ष से ही यह जगत आगे बढ़ता जान पड़ता है। यह सदा नये पदार्थ उत्पन्न करता है और पुराने को नष्ट करता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है। यह किधर जा रहा है? इसका किसी को ठीक पता नहीं। कोई कहता है कि यह अपना पूर्ण नाश करने की ओर जा रहा है, कोई कहते हैं कि यह व्यर्थ के चक्कर काट रहा है जिनका कोई अन्त नहीं, और कुछ आशावादी कहते हैं कि ये चक्कर प्रगतिशील हैं और हर चक्कर के साथ जगत अधिकाधिक उन्नति को प्राप्त होता है। रास्ते में चाहे जो कष्ट और गड़बड़ देख पड़े, पर वह जा रहा है किसी दिव्य अभीष्ट के अधिकाधिक निकट ही।
जगत में संहार बिना कोई निर्माण कार्य नहीं होता, परस्पर विरोधी शक्तियों का संतुलन किये बिना कोई सामञ्जस्य नहीं होता। केवल इतना ही नहीं, बल्कि जब तक हम निरन्तर अपने आपको ही न खाते रहें और दूसरों के जीवन को न निगलते रहें, तब तक हमारे इस जीवन का अस्तित्व भी संभव नहीं होता। हमारा शारीरिक जीवन भी ऐसा ही है, यह शरीर भी फौजों से घिरे एक नगर के समान है। आक्रमणकारी सेनाएं इस पर आक्रमण करती हैं और संरक्षणकारी सेनाएँ इसका बचाव करती हैं। इन सेनाओं का काम एक दूसरे को खा जाना है-और यही हमारे सारे जीवन का एकमात्र नमूना है। सृष्टि के आरम्भ से ही मानो यह आदेश चला है कि “तू तब तक विजयी नहीं हो सकता जब तक अन्य प्राणियों से और अपनी परिस्थितियों से युद्ध न करेगा। बिना शुद्ध किये, बिना संघर्ष किये और बिना दूसरों को अपने अन्दर हजम किये तू जी भी नहीं सकता। इस जगत का जो पहला नियम मैंने बनाया वह संहार के द्वारा ही सृष्टि रचना और संरक्षण का नियम है।
अति प्राचीन समय में भारतीय उपनिषदों ने इस बात को बहुत स्पष्ट रूप में देखा और बिल्कुल साफ तथा अचूक शब्दों में इसका वर्णन किया कि ‘भूख’ जो मृत्यु है वही इस जगत का स्रष्टा और स्वामी है। जड़ तत्व को उन्होंने अन्न कहा है, क्योंकि वह खाया जाता है और फिर वह प्राणियों को खा जाता है। “भक्षक, भक्षण करके भक्ष्य बनता है,” यही इस जड़ प्राकृतिक जगत का मूल-सूत्र है। इसी तत्व को इस युग के वैज्ञानिक डार्विन ने फिर से अविष्कृत करके कहा कि “जीवन-संग्राम विकसनशील सृष्टि का विधान है।” इस प्रकार आधुनिक साइंस ने उन्हीं तथ्यों को केवल नवीन शब्दों में ढालकर प्रकट किया है जो उपनिषदों में वर्णित रूपकों में बहुत अधिक जोरदार, व्यापक और ठीक-ठीक अर्थ देने वाले सूत्रों में व्यक्त किये जा चुके हैं।
यह तो स्वतः सिद्ध ही है कि मनुष्य का जो वास्तविक जीवन है-फिर चाहे वह बौद्धिक हो सामाजिक, राजनीतिक हो या नैतिक, उसमें हम बिना संघर्ष के एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। अर्थात् जो कुछ इस समय मौजूद है और जो कुछ भविष्य में होने वाला है, इन दोनों के बीच जब तक युद्ध न हो लेगा तब तक हमारी गति रुकी रहेगी। मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में युद्ध इस प्रकार अनिवार्य है।
शान्ति का सच्चा मार्ग-नैतिकता
(महात्मा श्री शम्भूदयाल जी)
आधुनिक वैज्ञानिक समझते हैं कि दुनिया का पार किसी ने नहीं पाया। पर हम उनको बतलाना चाहते हैं कि संसार का पार भारत के ज्ञानियों ने पाया हुआ है। आज के विद्वान कहलाने वाले तो सभ्यता की कसौटी मोटरों, विमानों, पोशाकों, तरह-तरह के बनावटी फैशनों को ही बतलाते हैं। फिर यह बात भला उनकी समझ में किस प्रकार आयेगी कि “जिस सभ्यता की तलाश होनी चाहिये वह अपने खुद के भीतर ही है।”
देवता, ऋषि, मुनि, स्कालट्र या वैज्ञानिक कुछ हद तक माननीय हैं, पर जब तक निष्काम कर्म योग में संसिद्धि न हो, जब तक ये सब कुँए के मेढ़क ही हैं। पूरी मिसिल को जाने बिना फैसला करने से तो अपने को और दुनिया को भ्रम में ही पटकेंगे। समझदार तो जीवात्मा से प्रेम करते हैं। क्योंकि संसार का बीज और फल आत्मा है। फल की प्राप्ति ही शाँति है। दुनिया के स्वाद में पड़ना तो विकारों को इकट्ठा करना है। जितने ज्यादा विकार हों उतना ही हम दुखी होंगे। इसका उदाहरण इस समय प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ रहा है। संसार में सबसे अधिक धनाढ्य देश ही सबसे ज्यादा भूख-भूख चिल्ला रहे हैं।
इन लोगों को कैसे बतलाया जाय कि “तन-मन-बुद्धि की दुरुस्ती ही शाँति का साधन है।” भारत के वेद, उपनिषद्, पुराण, इतिहास, खंडहरों से निकले समान बता रहे हैं कि न जाने कितनी दफे विज्ञान ने हिरण्यकश्यपु, रावण, दुर्योधन आदि के जमाने में तूफान मचाया था। पर दैवी स्वभाव के अनुसार धर्म संस्थाय-नार्थ पुरुष उतरे थे। इस जमाने में भी लँगोटी वाला गाँधी एक अवतार ही था जो एक तार का चर्खा और एक ‘फार’ का हल पकड़ने को बता गया है। उसने ग्राम-राज्य की ओर इशारा किया यह कभी नहीं कहा कि महल, ‘फैन’, लाइट, रेडियो और फैक्ट्रियों से गावों को न्पूयकि बना दो। वे तो यही चाहते थे कि ‘पालिश’ और ‘पालिसी’ को छोड़कर प्राकृतिक रहन-सहन से नैतिकता की वृद्धि करो। यही वास्तविक शाँति और आत्मोद्धार का मार्ग है।
आत्मोद्धार के विपरीत कार्य वे ही हैं जिनमें अन्तःकरण और हाजमे की उपेक्षा की जाती है। जैसे बढ़िया-बढ़िया भोजनों का ढेर, फैशन, सिनेमा, बड़ाई की फिक्र आदि। प्राचीन समय में जब भारतवर्ष उन्नति पर था तो यहाँ गुरु (नेत) की पदवी ज्ञानियों (विवेकियों) के पास थीं जो त्यागी, निष्काम न्यायी और बहुत थोड़े से में जीवन-निर्वाह करने वाले होते थे। उन दिनों राजा लोग विवेकियों की सलाह लिये बिना कुछ नहीं करते थे। गँवार तो वेदों का भी ऐसा ही अर्थ निकालेगा जैसे अस्पताल में घुसकर कोई मूर्ख आँख की दवा पेट में और पेट की आँख में डाल कर रोता है। उसी प्रकार शाँति के लिये तो निष्कामता की पौध लगानी चाहिये। काफी लोगों से तो चाहे जितनी परिषदें और पार्लीमेंटें बनाली जायँ, जब कामना रूपी बिल्ली ‘म्याऊँ’ करेगी तो सद् विचार रूपी सब चूहे अपने बिलों में घुस जायेंगे।
मुद्दत तक गुलामी में रहने से जो लोग इन बनावटी कामों में बुड्ढे हो चुके हैं उनको तो लचकाया नहीं जा सकता। नई पौध के लिये नैतिक पढ़ाई शुरू होनी चाहिये। ऐसे विद्यार्थी ही 33 करोड़ देवता बनेंगे। ‘कामना’ ही तो सब पाप कराती है। जब खान-पान नियमित होगा तब लोग न तो ज्यादा बीमार होंगे, न लड़ाई-झगड़े होंगे और अस्पताल, पुलिस, कारखानों, दफ्तरों की भरमार भी बहुत कम हो जायगी। जब त्यागी की इज्जत होगी तो सब त्यागी बनने की कोशिश करेंगे। रोटी कपड़ा समता से मिलेगा। सदाचारियों का मान होने से दुराचार अपने आप घटेगा। नैतिक शिक्षा शुरू कर देने से रिश्वत, चोरी, डाकाजनी, व्यभिचार, देशद्रोही, जात पाँत का विद्वेष खत्म हो जायेंगे। कामना बढ़ाना और शाँति चाहना तो असंगत बातें हैं।
नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए एक ठोस प्रयत्न
गत अंक में तपोभूमि में साँस्कृतिक विद्यालय खुलने की चर्चा थी। अब यह शिक्षा कार्यक्रम इसी बसन्त पंचमी से विधिवत् आरम्भ किया जा रहा है। राष्ट्र-निर्माण के लिए जिस प्रकार इंजीनियर, सैनिक, चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिल्पी, कलाकार, अध्यापक, उत्पादक, विशेषज्ञ आदि महत्वपूर्ण व्यक्तियों की भारी संख्या में आवश्यकता होती है उसी प्रकार युग-निर्माण के लिए-जनता का मानसिक एवं नैतिक स्तर ऊँचा रखने के लिए सुयोग्य, सच्चे एवं सेवाभावी जन-नायकों की आवश्यकता होती है। तपोभूमि का यह विद्यालय राष्ट्र की इसी महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा करने के लिए अग्रसर हो रहा है।
छात्रों के व्यक्तिगत गुणों को विकसित करने का प्रयत्न सबसे पहले किया जायगा। सचाई, ईमानदारी, उदारता, परिश्रमशीलता, मधुरता, संयम, शिष्टाचार, सेवा भावना के सद्गुणों का, प्रतिभा का, स्वभाव का, चरित्र का सुव्यवस्थित निर्माण इस प्रकार किया जायगा कि वह अपनी विशेषताओं के कारण समीपवर्ती लोगों का दिल जीत सके और उन पर अपना गहरा प्रभाव स्थापित कर सके।
जन समाज की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक, आदि अनेकों समस्याओं पर अनेक दृष्टिकोणों द्वारा तुलनात्मक अध्ययन कराया जायगा ताकि छात्र समस्याओं के विभिन्न पहलुओं पर विचार करके सुस्थिर धारणा बना सके और जनता की अनेक शंकाओं का समाधान कर सके। रामायण और गीता का विशिष्ट अध्ययन कराया जायगा। वेदों की महत्वपूर्ण शिक्षाओं का सार कैसी अद्भुत शैली के साथ इन दो ग्रन्थों में मौजूद है, इन ग्रन्थों को, उनसे सन्निहित आधारों को युग-निर्माण का माध्यम किस प्रकार बनाया जा सकता है, इस तथ्य को समझने का अच्छा अवसर छात्रों को मिलेगा।
स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए दैनिक खेल-कूद, व्यायाम, आसन, प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, लाठी चलाना आदि का शिक्षा क्रम रहेगा। स्काउटिंग, फस्ट एड, शरीर विज्ञान, आहार शास्त्र, हाइजिन, रोगी परिचर्या, घरेलू सामान्य चिकित्सा आदि की शिक्षा देकर यह प्रयत्न किया जायगा कि छात्र स्वयं स्वस्थ रहें और अपने सम्बन्धियों को निरोग रखे।
सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने योग्य योग्यताओं में लेखनी, वाणी और रचनात्मक संगठनात्मक कार्यप्रणाली यह तीन बातें मुख्य हैं। वाणी की शक्ति तोप तलवारों से अधिक है। जिसने बोलना सीख लिया उसने बहुत कुछ सीख लिया। लेखनी की शक्ति इससे भी अधिक है। उसमें स्थायित्व अधिक है। दूर देशों तक फैले हुए असंख्य जनसमुदाय को चिर काल तक प्रभावित करते रहने की शक्ति लेखनी में ही है। रचनात्मक एवं संगठनात्मक कार्यों द्वारा जनता का उत्साह उभारा जाता है और उसे एक विशेष दिशा में कार्य संलग्न किया जाता है। जन नेतृत्व के लिए इन तीनों की योग्यताएँ प्राप्त करना, इनके आधार पर भूत रहस्यों को समझना आवश्यक है। तपोभूमि विद्यालय में इन तीनों ही बातों का समुचित शिक्षण होगा।
वक्तृत्व कला के अंतर्गत साधारण बातचीत का ढंग, लोगों को प्रभावित करने वाले तथ्यों का ज्ञान, भाषण के समय, भाव-भंगिमा, संक्षिप्त और सारगर्भित बात करना, वार्तालाप में मनोरंजन की मर्यादा, सभाओं में व्याख्यान तथा गोष्ठियों में प्रवचन करने के अन्दर, शंकाओं का समाधान, तर्क प्रमाण और उदाहरणों की प्रचुरता का ध्यान रखना आदि तथ्यों को समझना आवश्यक है। भाषण के समान ही-वरन् उससे भी कुछ अधिक गायन का महत्व है। जिन्हें भगवान ने मधुर कंठ दिया है, वे संगीत और गायन के आधार पर जनता को भाव तरंगित करके किसी विशेष दिशा में आसानी से मोड़ सकते हैं।
विद्यालय में भाषण और गायन की-सामान्य संगीत की-आवश्यक शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है।
लेखनी विभाग के अंतर्गत-निबन्ध रचना, विज्ञप्तियाँ, परिपत्रिकाएँ तथा पुरस्कार लिखना, ग्रन्थ, निर्माण, अनुवाद, पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखना, सम्पादन, पुस्तक प्रकाशन, प्रकाशित साहित्य का विक्रय, विज्ञापन, लेखक की कठिनाइयाँ, पुस्तक प्रकाशन में हानि के कारण, अखबारों को असफल बनाने वाले खतरे आदि वे बातें भी सिखाई जायेंगी, जो वर्षों के अनुभव से ही आती हैं तथा जिनकी शिक्षण व्यवस्था भारत में अन्यत्र कहीं नहीं है।
इस संस्था के तत्वावधान में सैकड़ों पुस्तकों का लेखन प्रकाशन हुआ है। अपना निज का अच्छा प्रेस है। ‘अखण्ड ज्योति’ तथा ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ निकलती है तथा अगले मास में ‘जीवन यज्ञ’ नामक एक उच्च कोटि का पाक्षिक पत्र निकलने जा रहा है। इन पत्रिकाओं के परिवर्तन में सैकड़ों पत्र पत्रिकाएं आते हैं, जिन्हें देखने, पढ़ने और समझने से पत्रकारिता सम्बन्धी अनेक बातें सहज ही समझ में आ सकती हैं।
लेखक, प्रकाशक और पत्रकार बनने की महत्वाकाँक्षा रखने वाले के लिए प्रेस व्यवसाय सम्बन्धी जानकारियाँ प्राप्त करना भी आवश्यक है। प्रेस चलाना एक सम्मानास्पद, थोड़ी पूँजी से चल सकने वाला तथा अच्छे लाभ का व्यवसाय है। इस व्यवसाय की आरम्भ से अन्त तक पूरी सैद्धान्तिक तथा क्रियात्मक शिक्षा विद्यालय में दी जायगी। कम्पोजिंग, करेक्शन, छपाई, प्रूफ रीडिंग, बाइंडिंग, स्टीचिंग, रबड़ की मुहरें बनाना आदि कार्यों को सीखने के बाद अपना प्रेस खोलना सरल है ही। विशेष परिस्थितियों में किसी प्रेस में नौकरी करके भी अपनी आजीविका कमाई जा सकती है।
रचनात्मक एवं संगठनात्मक कार्य, लोक सेवा, समाज में फैली हुई बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष, सार्वजनिक कार्यक्रमों तथा संस्थाओं का संचालन, लोक मानस तैयार करना, शिक्षण शिविर चलाना, सामूहिक श्रमदान, उत्सव आयोजनों का प्रबन्ध एवं व्यवस्था, जनता को एकत्रित करना, उत्साहवर्धक प्रदर्शन आदि लोक सेवाओं के कार्यों की बारीकियाँ समझाई जायेंगी, जिनका जानना साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक है।
विद्यालय में प्रवेश के नियम बड़े सरल हैं। लगभग मैट्रिक योग्यता के 18 से 50 वर्ष के भीतर आयु के निरोग, परिश्रमी, सदाचारी एवं अनुशासन प्रिय छात्र इसमें प्रवेश पा सकेंगे। यों साधारणतः भोजन व्यय का भार जो लगभग 15), 20) मासिक पड़ने की संभावना है, छात्रों से स्वयं ही उठने की आशा की गई है, ऐसा ही नियम भी रखा गया है। पर जो छात्र केवल इसी कठिनाई के कारण शिक्षा से वंचित रह रहे होंगे उनके लिए भोजन प्रबन्ध भी तपोभूमि की ओर से कर दिया जायगा।
यों साधारणतया शिक्षार्थियों तथा उनके अभिभावकों की रुचि इस बात में होती है कि कालेज की डिग्री प्राप्त कर नौकरी करली जाय और गुजारे का प्रश्न हल किया जाय। पर कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो केवल रोटी की बात तक ही सीमित न रहकर मानव जीवन की महानता के अनुरूप गौरवपूर्ण जिन्दगी जीने की बात सोचें। तपोभूमि विद्यालय ऐसे शिक्षार्थियों के लिए उपयुक्त अवसर है। यों इस शिक्षा क्रम को पूरा करने वाला आजीविका की दृष्टि से भी भूखा नंगा नहीं रह सकता। प्रवचन, वक्तृत्व, लेखन, प्रेस व्यवसाय आर्थिक समस्या को भी हल करने को हैं-पर मुख्यतया यह शिक्षा महापुरुष बनने की, लोक नायक बनने की-मानव जीवन के अनुरूप गौरवपूर्ण स्थिति प्राप्त करने की, सेवा मार्ग अपनाकर लोक परलोक सँभालने की शिक्षा है।
युग निर्माण के लिए ऐसे महापुरुषों, धर्म मर्यादा बनाने वाले इंजीनियरों की आज भारी आवश्यकता है। इसी कमी को पूरा करने के लिए यह विद्यालय स्थापित किया गया है। अखण्ड-ज्योति एवं गायत्री परिवार के सदस्य इस योजना को बनाने में सहयोग करें। जो इस प्रकार के जीवन में प्रवेश करने में अभिरुचि रखते हों उनके लिए यह अलभ्य अवसर है। हमें आशा है कि परिवार के अनेक सदस्य इस शिक्षा से लाभ उठाने के लिए आगे आवेंगे।
प्रत्येक पाठक का कर्तव्य है कि विद्यालय के लिए सुयोग्य छात्र तलाश करें। प्रत्येक क्षेत्र में यहाँ के शिक्षित छात्र होंगे तो उधर उनके प्रयत्न से धर्म जागृति का कार्यक्रम उत्साहपूर्वक चलेगा। इसलिए गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा तथा परिवार का प्रत्येक सदस्य यह प्रयत्न करें कि जो इस शिक्षा के उपयुक्त हों उन्हें इस शिक्षा के लिए उत्साह एवं प्रेरणा देकर मथुरा भिजवाने का प्रयत्न करें। यहाँ के शिक्षित हजारों छात्र प्रत्येक क्षेत्र में हों तो ही तपोभूमि का महान् लक्ष्य पूरा होगा। अयोग्य छात्रों की आवश्यकता नहीं सुयोग्य छात्र ही उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकते हैं। विद्यालय में उपयुक्त छात्रों का प्रवेश करना एक आवश्यक कार्य है जिसे पूरा करने में हम सबको शक्तिभर प्रयत्न करना चाहिए। बसन्त पंचमी से आरम्भ होने वाले के लिए जो छात्र तैयार हों उनके आवेदन पत्र जल्दी ही भिजवा देने चाहिएं।
महापुरुषों के उपदेश
आत्म-समर्पण ही मुक्ति का सच्चा मार्ग है। पर जब तक हमारे भीतर अहंकार का कुछ भी अंश शेष रहेगा आत्म-समर्पण सम्भव नहीं हो सकता। बहुत से लोग विचार करते हैं कि हमारा गर्व तो सात्विक है, उसमें कोई हर्ज नहीं। यद्यपि सात्विक अहंकार, राजसिक अथवा तामसिक अहंकार की अपेक्षा श्रेष्ठ दिखाई पड़ता है, पर वास्तव में तो वह अहंकार ही है। सात्विक अहंकार बने रहने से एक दिन राजसिक अथवा तामसिक अहंकार भी उत्पन्न हो सकता है। जहाँ पर सात्विक अहंकार है वहाँ समझ लेना चाहिये कि राजसिक और तामसिक अहंकार भी उसके भीतर सोया हुआ है और वह कभी भी प्रकट होकर विपत्ति उत्पन्न कर सकता है।
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हमारा लक्ष्य एक “आध्यात्मिक मानवता” का ‘देव-जाति’ का उत्पन्न करना है। पर जब तक सब लोग समस्त अहंकार को त्यागकर पूर्ण रूप से विज्ञानमय क्षेत्र में नहीं पहुँच जायेंगे तब तक वह लक्ष्य कभी सम्भव नहीं हो सकता। यह अवस्था भूतकाल में कभी नहीं थी, पर अब उत्पन्न होती जाती है। पर इससे यह मत समझ लेना कि यही विकास का अन्त है। यह जगत अनन्त हैं और इसके विकास की सम्भावना भी अनन्त है। उसमें से कुछ बातें इस युग में पूरी होती दिखलाई पड़ेंगी और अनेक बातें भावी युगों में आयेंगी। “अनन्त” को कोई समाप्त नहीं कर सकता।
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आत्म-समर्पण करना होगा भगवान के पास-मनुष्य के पास नहीं। भगवान ही अनन्त है, मनुष्य तो उसको पाने का एक “बड़ा उपाय” या “साधन” है। साधन को लक्ष्य समझ लेने की भूल कभी नहीं करनी चाहिये।
धर्म-प्रचार योजना के लिए उपयोगी साहित्य
सूक्त संहिता-मू. 1।)
इस पुस्तक में चारों वेदों से ऐसे 40 सूक्त संग्रह किये गये हैं, जिनके पाठ एवं मनन से मनुष्य की 40 भौतिक एवं साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। वैदिक मन्त्र विद्या की यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पुस्तक है।
वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ-मू.।)
दैनिक जीवन में उपस्थित होने वाली आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक एवं पारिवारिक समस्याओं पर वेद भगवान के आदेशों का संग्रह। सूक्तियों का अर्थ तथा टिप्पणियाँ भी हैं।
संस्कार पद्धति-मू. 2॥)
जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, अंत्येष्टि आदि संस्कारों का महत्व और शास्त्रोक्त विधान इस पुस्तक में बहुत ही सरल रीति से समझाकर लिखा गया है। प्रत्येक संस्कार के अवसर पर देने योग्य शिक्षाओं का समन्वय एवं संस्कार-विधान की सरलता इस ग्रन्थ की विशेषता है।
भारतीय संस्कृति की रूपरेखा-मू. 2)
हिन्दू-धर्म के आदर्शों, सिद्धान्तों, विश्वासों, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और प्रथा-परम्पराओं पर दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं विवेचनात्मक ढंग से प्रकाश डालते हुए उनकी उत्कृष्टता सिद्ध की है। प्रत्येक हिन्दू-धर्माभिमानी के लिए पुस्तक अवश्य ही पढ़ने योग्य है।
व्रत और त्यौहार-मू. 1)
हिन्दू-धर्म के प्रायः सभी व्रत और त्यौहारों का इतिहास, सन्देश, उद्देश्य, कारण और विधान इस पुस्तक में है। हिन्दू जाति अपने व्रत पर्वों को पुस्तक में वर्णित आधार पर मानने लगे तो उसका कायाकल्प ही हो सकता है।
संक्षिप्त रामायण-मू. ॥।)
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामायण से शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से पढ़ने वालों के लिए यह पुस्तक है। शिक्षात्मक प्रसंगों को ज्यों का त्यों रखा गया है और कथानकों की केवल सम्बन्ध शृंखला बनाये रखी गई है।
प्रेरणाप्रद दृष्टान्त-मू. 2)
प्रवचन, व्याख्यान और धर्म-शिक्षा के समय बीच-बीच में अच्छे दृष्टान्तों का उपयोग करने से प्रवचन बड़ा ही हृदयग्राही और मनोरक्षक बन जाता है। इस पुस्तक में बड़े मार्मिक, शिक्षाप्रद एवं प्रेरणा देने वाले लगभग 400 दृष्टान्त संग्रहीत हैं।
सरल चिकित्सा विज्ञान-मू. 2)
100 प्रमुख रोगों का निदान, लक्षण, चिकित्सा, पथ्य आदि का एक अनुभवी चिकित्सक द्वारा बड़ी ही सरल रीति से यह संग्रह किया गया है। इसे पढ़कर आयुर्वेदिक पद्धति से रोग-निवारण करने की विद्या हाथ आ जाती है। औषधियों का निर्माण, विषोपचार आदि विषय भी पुस्तक में दिये हैं।
कल्प चिकित्सा-मू. 2)
दूध कल्प, छाछ कल्प, फल कल्प, शाक कल्प आदि के द्वारा शरीर में संचित पुराने रोगों की जड़ काट देने वाली चिकित्सा पद्धति का इस ग्रन्थ से बड़ा ही खोजपूर्ण वर्णन है। इस चिकित्सा पद्धति से रोगी का घर बने हुए शरीर पुनः काया-कल्प एवं स्वस्थ जीवन का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
मूल्य में कमी के लिए लिखा-पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। 6) से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ। 3) से कम की वी. पी. नहीं भेजी जाती। 3) से 6) के बीच के मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च लगभग 1॥) अलग।
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
*समाप्त*