(श्री नटवरलाल स्नेही)
अविकल जगमग रहे दृगों में देवि, दिव्य स्मृतियाँ,
दिवा-निशा आयें, पर आने पाएँ न दुर्मतियाँ।
विलय घन तम का संशय हो हमारा पथ ज्योतिर्मय हो।
पथ के राग-द्वेष प्रलोभन कण्टक फूल बनें,
जीवन की कल-कल गतियों के विघ्न अमूल बनें।
प्रेम पयोनिधि के परिचय हो। हमारा पथ ज्योतिर्मय हो।
सौ-सौ शरद सुधाँशु हमारे- सुमनों को सीचें,
दबा रहे अविवेक ज्ञान रवि- के पद के नीचे।
स्नेह का दश-दिशि समुदय हो। हमारा पथ ज्योतिर्मय हो।
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(श्री मदन मोहन विद्यासागर)
वैदिक सनातन धर्म की आधार-शिला वेद हैं, जो कि मानव जाति के पुस्तकालय में प्राचीनतम ग्रंथ माने गये हैं। भारत निवासी आर्य जाति इनको ईश्वर प्रदत्त मानती है। उसका विश्वास है कि मनुष्य मात्र के कल्याणार्थ सृष्टि के आरंभ में परमेश्वर ने इनका ज्ञान दिया। बहुत समय तक न केवल भारतवर्ष में, वरन् अन्य अनेक देशों में भी वेदों की शिक्षाओं का प्रचार रहा और आर्य जाति उस समय अभ्युदय और निःश्रेयस की चरम सीमा पर चढ़ी रही। उसकी तूती दुनिया में बजती रही। आर्य जाति से हमारा अभिप्राय उस मानव-समुदाय से है जो उत्तम आचरण को करता है, दुराचरण से दूर रह, परस्पर सहयोग भाव से सदा प्रगतिशील रहता है।
वेदों का सार विद्वानों ने गायत्री मंत्र कहा है। इसीलिए भारतवासी इसके जप से परम कल्याण मानते आये हैं। बहुत दिनों से मैं इस पर विचार कर रहा था कि गायत्री में ऐसी कौन सी विशेषताएं हैं जो इसको वेदों का निचोड़ मानकर इतना गौरव पूर्ण पद दिया गया? न जाने कितने सोच विचार एवं अन्तर्ध्यान के पश्चात इसका रहस्य मेरे सामने एक दिन अचानक खुला।
‘गायत्री-मंत्र’ का अर्थ
यजुर्वेद के प्राचीन भाष्य ‘शतपथ ब्राह्मण’ नामक प्रामाणिक ग्रंथ के अनुसार ‘गय’ शब्द का अर्थ ‘प्राण’ है। ‘जप’ से ही ‘गाय’ बन जाता है। ‘त्राण’ शब्द अर्थ ‘रक्षण’ होता है। यह ‘गायत्री’ शब्द ‘गय’ और ‘त्राण’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है ‘प्राण संरक्षण’ इसीलिये ‘शतपथ’ में स्पष्ट कहा गया है-
‘सा हैषा (गायत्री) गयाँस्तत्रे। प्राणाः वै गयास्तत्प्राणाँस्तत्रे॥ तद्यद् गायाँसतत्रे तस्माद् गायत्री नाम।
(शत. 148। 15। 7)
‘मंत्र’ शब्द का अर्थ होता है- “मनन, विज्ञान (साइंस) विद्या, ज्ञान।” इस शब्दार्थ से विदित हुआ कि ‘गायत्री-मंत्र’ में वह रहस्य वर्णित होना चाहिये जिसमें किसी व्यक्ति, परिवार, मानव समाज अथवा प्राणी मात्र की प्राण रक्षा हो, वे सदा सुखानन्द भोग करते रहें, तथा इतने समर्थ बने रहें कि इस संसार में अपने-अपने स्थान पर ठीक ढंग से स्थिर रहकर अपने योग्य कार्य को उचित रूप से पूरा कर सकें। इस प्रकार ‘गायत्री-मंत्र’ शब्द का अर्थ हुआ ‘प्राण रक्षण विद्या’ अथवा ‘जीवन विज्ञान’ अथवा ‘साइंस आफ लाइफ’। इसी को भारतीय जनता ‘तारक-मंत्र’ के नाम से पुकारती है, और इसके जप से परम पुण्य समझती है, महा कल्याण मानती है। हमें यह भी समझ लेना चाहिये कि यह ‘प्राण-रक्षा’ केवल मानव जाति की ही नहीं, अपितु समस्त जीवित, जागृत प्राणी मात्र की है। जीव चाहे किसी भी योनि में क्यों न हो, उसका रक्षण और पूर्ण विकास आवश्यक है।
परमेश्वर ने जीव को इस जगत में पिछले कर्म फल भोगने और नये कर्म करने के लिये भेजा है। पिछली फसल काटने और नये बीज बोने के लिये जीव मानव देह धारण करता है। यह 84 लाख योनियों में इसीलिये आता और जाता है। यही हमारी जीवन धारा है। जो कुछ भी हम कर रहे हैं, उसके आधार में ‘जीवन-रक्षा’ ‘प्राणों का त्राण’ यही भाव निहित है-
स्वस्वाहार बिहार साधन विधौ सर्वे जनास्तत्पराः। कालिस्तिष्ठति पृष्ठतः कचधरः केनापि नो दृश्यते॥
अर्थात्- ‘मनुष्य अपने आहार-बिहार अथवा इस जीवन में इतना अनुरक्त हो जाता है कि सिर पर मंडराती मौत को भी नहीं देख पाता।’ सबल-निर्बल, धनी-निर्धन, मूर्ख-विद्वान, कोई भी क्यों न हो अपने प्राणों का नाश नहीं चाहता। रोगों से दुखी संतप्त व्यक्ति भी प्राणों के मोह को नहीं छोड़ता। इस जीवन की रक्षा के लिये मनुष्य न जाने कितने भयानक कृत्य करता है, कितने अनुचित उपायों का अवलम्बन करता है। आश्चर्य है कि सहस्रों बार नैतिक मृत्यु हो जाने पर भी अपने जीवन को बचाना चाहता है और ऐसे ही अपने आप को गंवाता है।
यही दशा जातियों की है। व्यक्तियों के समुदाय का नाम समाज है। जब वह बहुत समय तक एक ही स्थान में बसा रहता है तो सबके आचार-विचार एक से हो जाते हैं, सबके मुख से एक सी भाषा निकलती है। तब उसे ‘जाति’ की परिभाषा मिल जाती है। विभिन्न व्यक्तियों का समुदाय जब लगभग एक सा आचार, एक सा अनुष्ठान, एक सी वेशभूषा, एक भाषा को स्वीकार कर लेता है तो उसकी ‘जाति’ संज्ञा हो जाती है।
जब समस्त भूतल पर इस प्रकार की बहुत सी जातियाँ विकसित हो जाती हैं, तब वे भी अपने स्वार्थों से प्रेरित होकर एक दूसरे के भयानक विनाश पर तुल जाती हैं। एक जाति दूसरी जाति के स्वत्वों का अपहरण करने को कटिबद्ध हो जाती है। इसके मूल में भी वस्तुतः जीवन रक्षा का भाव ही प्रेरक हेतु होता है। एक जाति अपने जीवन को चिरस्थायी बनाये रखने के निमित्त ही ऐसा करती है। जब यह भाव पूर्ण स्वार्थमय हो जाता है तब भूतल पर रक्त प्लावन होने लगता है, बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी जाती हैं। यह चक्र चलता ही रहता है। यह सत्य है कि इस संघर्ष में योग्यतम की ही विजय होती है, असमर्थ दुनिया के तख्ते पर से सदा के लिए मिटा दिये जाते हैं।
रक्षा से हमारा अभिप्राय उस बचाव से नहीं है, जिसमें चारों ओर मुसीबत ही मुसीबत दिखलाई पड़े। ‘जीवन रक्षा’ का अभिप्राय है कि मनुष्य अपनी जीवन धारा को निरन्तर गौरव के साथ चलाता रहे। वह निर्भय होकर प्रत्येक दशा में भली प्रकार निर्वाह कर लेने में समर्थ हो। प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ, दीर्घायु बनना चाहता है। हम इस प्रकार जीवित रहने की क्षमता को ही जीवन रक्षा कहते हैं-
‘जीवेम शरदः शतमा अदीनाः स्याम शरदः शतम् (अथर्व वेद)
हमको अपने जीवन में यशस्वी, आयुष्मान्, वर्चस्वी होकर रहना है, इसी में हमारी जीवन-रक्षा है। ऐसी रक्षा के लिए गायत्री-मंत्र हमारा सच्चा मार्ग-प्रदर्शक है। इस मंत्र में ‘भूर्भुवः स्वः’ ही सबसे मुख्य सार रूप है। ‘स्वः’ का अर्थ सुख होता है। यह एक विशेष वैदिक परिभाषा है, जिसका अभिप्राय ‘आनन्द’ अथवा ‘आत्म विभोर’ होना है। इसी से स्वर्ग शब्द बना है जिसका अर्थ सुख की ओर जाने का मार्ग अथवा सुख की स्थिति है। ‘स्वर्लोक’ का अर्थ है ‘वह स्थान व दशा जहाँ पूरी आनन्द की उपलब्धि हो।’ लोक भाषा में ‘स्व’ शब्द का अर्थ ‘अपनापन’ ‘निज’ होता है। तत्वज्ञानियों ने बताया है कि-
‘सर्वमात्मवश सुखं सर्वं परवशं दुखम्’
किसी वस्तु पर अपनापन सुख देता है, दूसरे का अधिकार दुख देता है। अर्थात् ‘स्व-भाव’ सुख है और पर-भाव दुख है। इसी से स्वतंत्रता, स्वाधीनता, स्वराज्य, स्वदेश, स्वशासन आदि शब्द बने हैं। मनुष्य इनकी कामना इसी भावना से करता है, क्योंकि उसे इनसे सुख प्राप्ति की आशा होती है।
‘भू’ शब्द का अर्थ ‘होना’ होता है, क्योंकि वह ‘भू सत्तायाम्’ धातु से बना है। इसका अर्थ भूमि, पृथ्वी आदि भी है। इसमें सब भौतिक तत्व अन्तर्हित हैं। जो भी सत्तावान पदार्थ हैं, उन्हें ‘भू’ वर्ग में रखा जा सकता है। परन्तु ऐसा होता नहीं, यह एक विशेष पारिभाषिक संज्ञा बन गई है जो कि ‘प्रत्यक्ष दृश्यमान भौतिक प्रपञ्च’ के लिये ही प्रयुक्त होती है। ‘भूलोक’ का अर्थ पृथ्वी वत-सम्बंधी पार्थिव पदार्थ है। हम इसे यों भी कह सकते हैं कि ‘पञ्च भूतात्मक सत्तावान पदार्थ समुदाय’ ‘भू-वर्ग में आ जाता है।
‘भूः’ शब्द भुव धातु से बना है जिसका अर्थ ‘अवकल्कनं’ है। ‘अवकल्कनं चिन्तनम्’ चिन्तन शब्द का अर्थ यदि व्यापक तौर पर लें तो तत्वबोध, विद्या, नागरिकता, संस्कृति, सभ्यतादि है। एक व्यक्ति का ‘चिन्तन’ उसका ज्ञान, सोची समझी बात ही हो सकता है। एक जाति का ‘चिन्तन’ उसका साहित्य, उसकी भाषा, धर्म आदि ही हो सकते हैं।
अब इन तीनों शब्दों की परस्पर संगति मिलाने से विदित होता है कि यदि किसी को ‘स्वः’ प्राप्त करना हो तो उसे पहले ‘भू’ और ‘भुवः’ की प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील होना चाहिये। सुख के मूल ये ही दो हैं एक व्यक्ति सुखी है, इसका विश्लेषण यदि करें तो इस रहस्य का पता चल जायेगा। एक पहलवान भौतिक तौर पर, शारीरिक दृष्टि से पर्याप्त स्वस्थ है, परन्तु मानसिक या बौद्धिक विकास में बहुत पीछे है। वह प्रायः धोखा खा जाता है और अनेक बार उसकी दुर्दशा होती है। इसी प्रकार यदि एक व्यक्ति बड़ा भारी पंडित है, पर जीवन भर वैद्य जी की दुकान पर चक्कर लगाता है तो वह भी सबसे पिटता ही रहेगा। स्पष्ट है कि ऐसे पहलवान और पंडित कभी पूर्ण रूप से सुखी नहीं कहे जा सकते। सच्चे अर्थों में वही व्यक्ति सुखी कहा जा सकता है, जो शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से स्वस्थ है। वह पूरा स्वावलंबी होता है, पराश्रित नहीं रहता, पददलित नहीं होता।
अब इसी को वैदिक शब्दों का रूप दें तो गायत्री का भाव अथवा ‘प्राण रक्षण’ का उपाय हमारी समझ में सरलता से आ जायेगा। जिसका ‘भूः’ (शरीर) और ‘भुवः’ (चिन्तन) ठीक है, वही ‘स्व’ का अधिकारी है, उसी की जीवन-रक्षा ठीक ढंग से होती है। जिसका शरीर निरोग है और बुद्धि शुद्ध है, वह कभी भी कष्ट में नहीं फंसता। उसको कोई धोखा नहीं दे सकता, उस पर कोई अत्याचार करने का साहस नहीं करता, सब उसका सम्मान करते हैं। जिसका बदन लगड़ा होता है और अकल ठिकाने पर होती है, वही सच्चे अर्थों में श्रीमान कहाता है।
इसी सिद्धाँत को जब एक व्यक्ति के बजाय एक जाति पर लागू किया जाता है, तो हम कह सकते हैं कि कोई जाति उसी समय तक सुख भाव या स्वतंत्रता को प्राप्त करती है, जब कि उसके पास ‘भू’ उसकी भूमि अर्थात् राजनीतिक अधिकार हों और साथ ही साथ ‘भुवः’ अर्थात् उसकी अपनी सभ्यता, भाषा और धर्मादि हो। एक जाति राजनैतिक दृष्टि से स्वतंत्र हो सकती है, परन्तु यदि उसकी अपनी सभ्यता, भाषा, संस्कृति न हो तो वह भी आधी दास ही है। एक जाति यदि सभ्यता का ऊंचा विकास किये हुये है, पर राजनैतिक अधिकार उसके पास नहीं हो वह पराधीन है ही।
इस प्रकार प्रकट होता है कि व्यक्तिगत, जातिगत और संसार गत सुख तथा शाँति का मूल मंत्र गायत्री ही है। यह सत्य, सनातन और सार्वभौमिक नियम है। यह सूत्र रूप में कहा गया ‘महान सत्य’ है। तीन शब्दों में शाश्वत सुख प्राप्ति का निराला उपाय कह दिया है। यही संसार में जीवन को सफल बनाने का सच्चा मार्ग है।
(श्री नर्मदाशंकर ह. शास्त्री, बम्बई)
अनेक मनुष्य किसी मंत्र की साधना करते हैं और कहते हैं कि इसे किसी को बताया नहीं जा सकता। ऐसे मनुष्य न तो अपनी और न किसी दूसरे की भलाई कर सकते हैं। क्योंकि ऐसा करने से उनमें दूसरों की ईर्ष्या का भाव उत्पन्न होता है और ईर्ष्या होने से मंत्र-सिद्धि का गौरव अपने आप समाप्त हो जाता है। यह सत्य है कि मंत्र अनधिकारी को नहीं दिया जा सकता, पर यदि किसी को अधिकारी समझ कर भी यदि रागद्वेष के कारण मंत्र न सिखाया जाय, तो वह मंत्र उस साधना करने वाले के पास से भी चला जाता है। मंत्र की साधना करने वाला और मंत्र को सीखने वाला दोनों उदारचित्त और अपार श्रद्धा वाले होने चाहियें। व्यक्तिगत रूप से जप करते हुए भी उनको समष्टि के हित का ध्यान रखना चाहिये तभी वे संसार के साथ अपना ही भला कर सकते हैं।
प्राचीन काल में ऋषि और मुनि पर्वतों की गुफाओं और घोर जंगलों में रहकर अनेक प्रकार के जप करते थे और उनका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ न होकर समस्त संसार का कल्याण होता था। विश्व में अनेक प्रकार के उत्पात होकर शमन हो जाते हैं, इसमें बहुत कुछ प्रभाव ऐसे परोपकारी महापुरुषों का ही होता है। जो लोग अपनी तरह-तरह की भली-बुरी कामनाओं की पूर्ति के लिये जप-तप करते हैं उनका कोई महत्व नहीं समझना चाहिये।
गायत्री मंत्र का जप सभी यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति थोड़ा बहुत करते रहे हैं, पर इस मंत्र में क्या बताया गया है, इसका विचार बहुत थोड़े लोग करते हैं। आजकल के गुरु तो जनेऊ के साथ गायत्री मंत्र सुना देते हैं और कह देते हैं कि इसको जपते रहना। दुख की बात तो यह है कि इन गुरुओं में से बहुसंख्यक व्यक्ति तुरंत स्वयं भी इसका अर्थ नहीं जानते इसका परिणाम यह होता है कि नासमझ गुरुओं के हाथ से दीक्षा लेने वाले गायत्री मंत्र का जप केवल एक परम्परा अथवा रूढ़ि के रूप में करते रहते हैं, पर उस वास्तविक महत्व को कुछ भी अनुभव नहीं करते। ऐसे व्यक्ति जनेऊ धारण करते समय सैंकड़ों रुपये खर्च कर डालते हैं, पर बाद में नकली वस्तु तरह उसको भी भूल जाते हैं।
जो लोग इस प्रकार अर्थशून्य जप करते हैं, उसे कदापि वास्तविक जप नहीं कहा जा सकता वह तो संस्कृत भाषा में लिखी एक पंक्ति की तरह है। आज के अर्थ-युग में श्रद्धा शून्य मनुष्य केवल धन के लिये जी जप करते या कराते हैं। वे यही विचार किया करते हैं कि मैं कौन-सा जप करूं जिससे लक्ष्मी जी प्रसन्न होकर मुझे धन सौंप दें। ऐसे लोग इस बात को भूल जाते हैं कि सब प्रकार के जपों का मूल गायत्री जप ही है। किसी भी मंत्र का अनुष्ठान किया जाय, उसके निश्चित में पहले गायत्री मंत्र का जप ही करना है। यह बात प्रकट करती है कि गायत्री का गौरव कितना अधिक है। तो भी कितने खेद की बात है कि आज हम उसी गायत्री की उपेक्षा करके केवल धन के पीछे मतवाले हो रहे हैं और उसके लिए चारों ओर पागल बने दौड़ रहे हैं। चाहे तुमने वेद न सीखे हो, चाहें तुमने शास्त्र और पुराण न पढ़े हों, तो भी यज्ञोपवीत धारण करने के बाद अगर गायत्री में तुम्हारी अटूट श्रद्धा और सच्ची भक्ति होगी तो गायत्री-जप द्वारा तुम्हें सब वस्तुओं की प्राप्ति हो जायेगी। महर्षि व्यास जी ने कहा है-
यथा मधुच पुष्पेभ्यो घृतं दुग्धाद् रसात् पयः। एव हि सर्व वेदानाँ गायत्री सार मुच्यते॥
अर्थात्-’जिस प्रकार फूलों का सार मधु, दूध का सार घी और सब रसों का सार दूध है, उसी प्रकार सब वेदों का सार गायत्री है।’
गायत्री अर्थात् ‘गायन्तं त्रायते यत्मात् इति गायत्री’- इसमें गाने के अर्थ में गौ धातु आया है। इससे भी यही प्रकट होता है कि केवल एक बार उच्चारण करने से नहीं, पर बारम्बार गान करने से जप करने से यह हमारी रक्षा करने वाली बन जाती है।
जप कैसा होना चाहिये?
श्रीकृष्ण के लिये अर्जुन को इतनी तल्लीनता थी कि जब अर्जुन निद्रावश हो जाता था तो भी उसकी साँस से श्रीकृष्ण का ही स्वर बाहर निकलता था। गायत्री का जप भी इसी प्रकार होना चाहिये कि रोम-रोम और श्वाँस-श्वाँस में उसी की रटन लगी रहे। इस प्रकार का श्रद्धापूर्वक किया हुआ जप, जिस प्रकार औषधि से शारीरिक व्याधियाँ दूर होती है, उसी प्रकार समस्त मानसिक और शारीरिक व्याधियों को दूर करने वाला होता है। पर जब तक हमारे भीतर ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो तब तक धैर्यपूर्वक उसके लिये प्रयत्न करते रहना चाहिये।
जप करने वाला व्यक्ति धैर्यवान न होगा तो एकाग्रता नहीं आती, और एकाग्रता नहीं आने से जप जैसा होना चाहिये वैसा नहीं हो पाता। संकटों के दुर्ग में फंसे हुये जगत को यदि इससे बाहर निकलना हो तो उसके छुटकारे का उपाय एकमात्र गायत्री का जप ही है। जब तक हम स्वयं इसका अनुभव न करेंगे तब तक उसका प्रभाव हमारी समझ में नहीं आ सकता। तो भी यदि हम गायत्री के प्रखर उपासक की तरह आगे पैर बढ़ाते जायेंगे तो अवश्य हमको सफलता प्राप्त होगी और दूसरों को भी इस मार्ग पर आरुढ़ करके विश्व-कल्याण में कुछ हिस्सा ले सकेंगे।
विश्व के अभ्युदय की कुँजी
गायत्री मंत्र केवल व्यक्ति का ही नहीं समृष्टि का कल्याण करने वाला है, यह उसी के अर्थ में से प्रकट होता है। इस मंत्र में जो ‘नः’ शब्द है वह ‘अस्मद्’ शब्द का षष्टी बहुवचन है। इस मंत्र में एक वचन का प्रयोग नहीं किया गया है वरन् ‘मेरी बुद्धि’ के स्थान पर ‘हमारी बुद्धि’ कहा गया है। इसका अभिप्राय यही है कि समष्टि में ही व्यष्टि का समावेश हो जाता है, ऐसा समझ कर जो जप किया जाता है, वह केवल व्यक्तिगत हित की दृष्टि से किये गये जप की अपेक्षा बहुत अधिक फलदायक होता है। गायत्री जप का अनुभव प्राप्त करने के बाद यदि हम दूसरे लोगों को भी उसे करने की प्रेरणा करते हैं तो उसमें से भी हम को फल प्राप्त होता ही है। इस प्रकार यदि हम दस मनुष्यों को गायत्री जप करने पर आरुढ़ कर दें तो हमको एक मनुष्य के जप का फल अनायास ही मिल जाता है। अगर यह क्रम जारी रहे तो एक दिन हमको धर्म अभ्युदय की झाँकी अपने जीवन में ही मिल सकती है। यही विश्व-कल्याण की सच्ची कुँजी है। अभ्यथा नाटक और सिनेमा के गीतों का जप तो श्रद्धापूर्वक प्राप्त परिमाण में किया ही जा रहा है। इस अवसर पर किसी महापुरुष का कहा श्लोक याद आता है-
गायत्री तु परित्यज अन्य मंत्रमुपासते। सिद्धान्नं च परित्यज भिक्षामटति दुर्मतिः॥
अर्थात् ‘जो मनुष्य गायत्री मंत्र को छोड़कर अन्य मंत्रों की उपासना करता है वह सिद्ध अन्न को छोड़कर भिक्षा के लिये फिरने वाले व्यक्ति की तरह मूर्ख है।’
दूसरे जपों की अपेक्षा गायत्री मंत्र की महिमा इतनी अधिक है यह समझकर योग्य व्यक्ति के पास से गायत्री मंत्र की दीक्षा लेकर उसके जप को ही अपना लक्ष्य बनाना चाहिये। श्रद्धापूर्वक किया हुआ गायत्री मंत्र का एक बार का जप एक दिन के पापों का नाश करता है। इसी प्रकार दश मंत्र रात-दिन के, सौ मंत्र एक महीने के एक हजार मंत्र एक वर्ष के एक-लाख जप जन्म भर के, दश लाख जप पूर्व जन्म के और करोड़ों जप सब जन्मों के पापों का नाश कर देते हैं।
मनुष्य मात्र से ‘पाप’ होता है यह समझकर जो व्यक्ति प्रायश्चित स्वरूप गायत्री मंत्र का जप करता रहता है वह निष्पाप हो जाता है। महान और श्रेष्ठ होने के लिये किसी व्यक्ति को गायत्री मन्त्र के जप में प्रमाद नहीं करना चाहिये।
(श्री चिरंजीवलाल वानप्रस्थी)
गायत्री-मंत्र का पहला शब्द ॐ ईश्वर का सबसे मुख्य और सबसे महत्वपूर्ण नाम है। यह अ उ म्- इन तीनों अक्षरों से मिलकर बना है जिसके ‘अ’ से विराट, अग्नि तथा विश्व आदि, ‘उ’ से हिरण्यगर्भ, वायु, तेज आदि, म् से ईश्वर, आदित्य तथा प्राज्ञ आदि का बोध होता है। यदि इन शब्दों की सविस्तार व्याख्या की जाय, तो ‘परमेश्वर’ का वाचक कोई शब्द शेष नहीं रह जायेगा। जैसे एक रुपये की दो अठन्नियाँ चार चवन्नियाँ, आठ दुअन्नियाँ, सोलह आने तथा चौंसठ पैसे आदि होते हैं, पर व्यवहार में वे सब रुपये के स्थान पर चलते हैं, कोई उनके लेन-देन से इन्कार नहीं करता इसी तरह ‘ॐ’ के अतिरिक्त जितने भी शब्द हैं वे सब एक इसी शब्द के अंतर्गत आ जाते हैं, क्योंकि सारे गुणों का समावेश इसी के अन्दर हो जाता है।
यहाँ शंका की जा सकती है कि ‘अ’ कार के विराट आदि अर्थ एक ही अक्षर ‘ॐ’ से क्यों न लिये जाये? तथा ॐ शब्द के अन्दर सारी सृष्टि कैसे आ जाती है। इसका सविस्तार वर्णन ‘माण्डूक्य उपनिषद्’ में किया गया है। यहाँ सार रूप में ही कुछ बातें कही जाती हैं।
‘ओम्’ शब्द का स्थूल अर्थ जिसे एक साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है और याद रख सकता है, इस प्रकार है- ‘अ’ से सृष्टि की उत्पत्ति, ‘उ’ से स्थिति (विस्तार) और ‘म्’ ये प्रलय का अर्थ अभिप्रेत है। इस अर्थ का भास ॐ शब्द के उच्चारण मात्र से हो सकता है, जैसे ‘अ’ के कहने से मुँह खुल जाता है, ‘उ’ से उसका विस्तार हो जाता है और ‘म्’ कहने से मुँह बन्द हो जाता है। इस प्रकार ‘ॐ’ शब्द उत्पत्ति, स्थिति और लय करने वाले पदार्थ का नाम स्वयं भासित कर रहा है। परमेश्वर का अन्य कोई भी नाम ऐसा नहीं है जो इन तीन गुणों को एक साथ प्रकट करता हो।
इतना ही नहीं हमारे धर्म के प्राचीन से प्राचीन ग्रंथों में ‘ॐ’ के नाम की महत्ता बतलाई गई है। कुछ उदाहरण नीचे दिये जाते हैं-
1. यजुर्वेद के 40वें अध्याय में ‘ओम् क्रतो स्मर’ मंत्र ॐ के जाप का ही विधान है।
2. कठ उपनिषद् में कहा गया है- ‘सर्वे वेदाः यत्पदमाम नन्ति, तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यम् चरन्ति, तत्ते पदं संग्रहेण व्रवीभ्यामित्येतत्॥
अर्थात् जिस शब्द की महिमा सारे वेद गाते हैं, तपस्वी जिसका बखान करते हैं, ब्रह्मचारी जिसके लिए घोर तपश्चर्या करते हैं, वह शब्द केवल ‘ॐ’ ही है।
3. मुँडकोपनिषद् (खंड 2-2) में कहा है-
अरा इवं रथनाभौ संहता यत्रनाडयः। स ऐषो अन्तश्चरते बहुधा जायमानः॥ ओमि त्येवं ध्यायथ आत्मानं। स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात्॥
अर्थ- रथ की नाभि-धुरे में अरों की भाँति जिस हृदय-देश में सब नाड़ियां आश्रित हैं, यह अनेक प्रकार से प्रकट होने वाला परमात्मा उसी हृदय देश के भीतर विचरता है। उस परमात्मा को ‘ॐ’ इस प्रकार से ध्यान करो। अन्धकार से पार होने के लिये यह ‘ॐ’ का ध्यान तुम्हारे लिये कल्याणकारी हो।
4. स्वामी रामतीर्थ ने एक जगह कहा है-’विज्ञान पर धिक्कार है, यदि वह पवित्र शब्द ॐ के प्रभाव संबंधी सत्य के विरुद्ध जाता है।’
ये सब प्रमाण आस्तिकों के लिए हैं। परन्तु जो लोग ईश्वर की सत्ता के विषय में संशय रखते हैं अथवा उसे नहीं मानते उनके लिये भी गायत्री में बहुत बड़े ईश्वरीय ज्ञान का भण्डार भरा पड़ा है। ऐसे व्यक्तियों को ॐ की महत्ता समझाने के साथ ही ईश्वर की सत्ता समझाने की भी आवश्यकता है।
(1) एक जैसे मैं (आत्मा) शरीर में व्यापक हूँ, वैसे ही वह ईश्वर सब में व्यापक है। परन्तु इस शरीर में व्यापक होते हुए और सब चेष्टायें करते हुए भी मैं (आत्मा) इन चर्म-चक्षुओं से नहीं देखा जाता, पर ज्ञान-चक्षु से उसका अनुभव होता है। वैसे ही परमात्मा भी इन चर्म-चक्षुओं से दिखाई नहीं देता, यद्यपि वह सम्पूर्ण संसार में व्याप्त है, वही सारे संसार को गति दे रहा है और वही संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करता है। उसे ज्ञान चक्षु से ही अनुभव किया जा सकता है। यदि मेरे अपने होने में किसी को सन्देह नहीं तो उस ईश्वर के होने में संशय क्यों होना चाहिए?
(2) जब मेरी (आत्मा) की इच्छा होती है तब मैं बोलता हूँ जब तक इच्छा बनी रहती है तब तक बोलता रहता हूँ और जब मेरी इच्छा बन्द हो जाती है तब मेरा बोलना भी रुक जाता है। पर मेरा बोलना रुक जाने पर भी मेरी बोलने की शक्ति कायम रहती है और जब चाहूँ तब मैं बोल सकता हूँ। वैसे ही ईश्वर अपनी इच्छा मात्र से सृष्टि पैदा करता है, उसकी इच्छा-मात्र से सृष्टि उत्पन्न होती है, जब तक उसकी इच्छा सृष्टि चलाने की रहती है, तब तक सृष्टि की स्थिति रहती है और जब उसकी इच्छा बंद हो जाती है तब प्रलय हो जाती है और सृष्टि अपने तत्वों में विलीन हो जाती है। मनुष्य की बोलने की प्रसुप्त शक्ति के समान परमात्मा की सृष्टि रचने की प्रसुप्त शक्ति के समान परमात्मा की सृष्टि रचने की शक्ति भी बंद नहीं होती। परन्तु परमात्मा का सब कार्य एक निश्चित नियम से होता है अतः उसके सृष्टि, स्थिति और प्रलयकाल नियत हैं। उनमें किसी प्रकार का अनियम नहीं। इसी कारण मनु महाराज ने कहा है कि जितने नियत समय तक सृष्टि रहती है उसे ब्रह्मा का एक दिन कहा गया है और उतने ही प्रलय काल को ब्रह्मा की रात्रि कहते हैं।
गायत्री में जीव और ईश्वर की स्थिति का ज्ञान भी बड़ी उत्तमता से कराया गया है। इस मंत्र में भूः, भुवः तत, सविता, वरेण्यं, भर्गः तथा देव शब्द सब एक वचनान्त है और ॐ के गुणों की स्तुति करने से ॐ के ही विशेषण हैं। परन्तु आगे चलकर इस मंत्र में ‘धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्’ इस खण्ड में ‘नः’ तथा ‘धीमहि’ शब्द बहुवचनान्त हैं, जो कि जीवों के लिये ही प्रयुक्त हो सकते हैं, परमात्मा के लिये नहीं। इस मंत्र में परमात्मा से बुद्धि की याचना करने से भी स्पष्ट प्रतीत होता है कि अल्पज्ञ जीव ही अपनी अल्पज्ञता को दूर करने के लिए ईश्वर से बुद्धि माँगते हैं।
इस प्रकार निरन्तर मनन करने से जिज्ञासु को यह विदित हो सकता है कि सत्य ही इस सृष्टि को रचने वाला कोई महाप्रभु है। इससे वह अपनी अज्ञता और परमात्मा की सर्वज्ञता को अनुभव करने लगेगा। उसे यह भी अनुभव होने लगेगा कि हिमालय के सम्मुख एक मच्छर की हस्ती तो हो सकती है, किन्तु इस महान जगत की तुलना में मेरी कोई हस्ती नहीं हो सकती। इसलिए जैसे दुर्बल किसी बड़ी शक्ति का सहारा ढूँढ़ता है उसी प्रकार हम भी अपनी आत्मिक शक्ति बढ़ाने के लिये उस महती शक्ति के समीप जाने का प्रयत्न करते हैं। परमात्मा की अनन्त शक्ति को दिखाने के लिये, उसके अनन्त गुणों का अनुमान करने के लिए, तथा जीवन में भक्ति तथा श्रद्धा उत्पन्न करके परमात्म तत्व से शक्ति प्राप्त करने के लिये गायत्री एक बहुत बड़ा साधन है। वह ॐ के रूप में हमको परमात्मा के सच्चे स्वरूप का ज्ञान कराती है।
(श्री आनन्द स्वामी)
[श्री आनन्द स्वामी (भूतपूर्व महाशय खुशालचन्द जी सम्पादक ‘मिलाप’) एक प्रसिद्ध विद्वान और सामाजिक नेता हैं। आप गायत्री के परम भक्त हैं और अपनी ‘महामन्त्र’ नामक पुस्तक में आपने गायत्री-उपासना की महिमा पर अनोखा प्रकाश डाला है। आप एक आधुनिक शिक्षा प्राप्त और बुद्धिवादी पुरुष हैं इसलिए आपने गायत्री उपासना के विषय में जो कुछ बतलाया है वह विशेष रूप से बुद्धि-संगत प्रतीत होता है और प्रत्येक विचार का व्यक्ति उस पर विश्वास कर सकता है। अभी हाल में पिलखुआ (मेरठ) में आपने कुछ विद्यार्थियों के प्रश्न करने पर अपने गायत्री संबंधी अनुभव सुनाये थे जो वास्तव में ध्यान देने योग्य हैं। नीचे उन्हीं बातों को पाठकों के लाभार्थ दिया जा रहा है।]
प्रश्न- आपने स्वयं गायत्री माता की भक्ति के द्वारा कुछ चमत्कार देखा है? क्या वास्तव में मंत्र-जप से कार्य सिद्ध हो सकते हैं?
स्वामी जी- देखा है और खूब देखा है। गायत्री माता में और महामृत्युञ्जय के जप में बड़ी विलक्षण शक्ति देखी है। यह मंत्र बड़ी-से-बड़ी घोर विपत्तियों से छुटकारा दिला देता है और फाँसी के तख्ते पर से भी बचा देता है। हमने इसका प्रत्यक्ष प्रमाण अपनी आँखों से देखा है। मेरे पुत्र रणवीर, सम्पादक ‘मिलाप’ को एक बार सेशन कोर्ट से फाँसी की सजा का आदेश हो गया। मैं रणवीर से जेल में मिला और उससे कहा कि तुम माता गायत्री की शरण लो और तुम सवा लाख-
ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यार्मुक्षाय मामृतात्॥
-इस महामृत्युञ्जय-मंत्र का जप करो। तुम अवश्य ही फाँसी की सजा से छूट जाओगे। इधर फाँसी की कोठरी में तुम मंत्र जप करो, उधर हम तुम्हें मृत्यु के पंजे से बचाने के लिये पूरा पुरुषार्थ करेंगे। प्रभु की आराधना और तदनुकूल प्रयत्न दोनों मिलकर कार्य शीघ्र सिद्ध कर देते हैं। उसने मेरे कहने के अनुसार इस मंत्र का जप करना प्रारंभ किया। बड़े-बड़े वकील, बैरिस्टर यह कहते थे कि ‘ये छूटेंगे नहीं’, किन्तु मैं यही कहता था कि हमने यहाँ की अदालत के अतिरिक्त एक बहुत बड़ी अदालत में, जो सबसे बड़ी अदालत है, अपील कर रखी है। उसमें हमारी अवश्य ही सुनवायी होगी। जिस दिन सवा लाख जप पूरा हुआ, ठीक उसी दिन रणवीर साफ छूट गये। इस प्रकार मंत्र ने फाँसी की सजा से रक्षा की। जो मंत्र फाँसी की सजा से बचा सकता है, वह मंत्र क्या रोग को नहीं मिटा सकता? या कोई वस्तु प्राप्त नहीं कर सकता? विश्वास और श्रद्धा के साथ जप करना चाहिये। सब कुछ प्राप्त हो सकता है और रोग शोक सब जा सकता है।
प्रश्न-अपने जीवन की कोई सत्य घटना सुनाइये।
स्वामी जी-सुनिये, सुनाये देता हूँ-
गायत्री माता की बड़ी अद्भुत अलौकिक शक्ति है। गायत्री माता की भक्ति करने से, गायत्री माता के शरण जाने से हमारे लोक-परलोक दोनों ही बन जाते हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। गायत्री माता के जप से, भक्ति से क्या प्राप्त होता है, इसका मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है। इस संबंध का मेरा निजी अनुभव इस प्रकार है-
बाल्यकाल में मेरी बुद्धि सूक्ष्म नहीं थी। मैं उस समय एक स्कूल में पढ़ा करता था, परन्तु मुझे उस समय आता कुछ भी नहीं था। मैं स्कूल के प्रत्येक घंटे में मार ही खाता था अथवा मुझे बेंच पर खड़े होकर स्कूल का समय व्यतीत करना पड़ता था। स्कूल में मुझ से जाते ही पाठ याद न होने के कारण खूब कहा-सुना जाता था और मैं खड़ा हो जाता था। और उधर जब मैं अपने घर पहुँचता था तो घर पर मुझे मेरे पिता जी बड़ी बुरी तरह से धिक्कारते थे तथा मुझे डाँटते हुए कहते थे कि तू इस प्रकार अपना जीवन नष्ट कर लेगा पढ़ता क्यों नहीं है? स्कूल से भी और घर से भी अपमानित हुआ मैं आत्महत्या करने की बात सोचा करता था। एक दिन की बात है- वर्षा ऋतु में जब हमारे ग्राम की बरसाती नदी खूब वेग से बह रही थी, मैंने उसके पुल पर चढ़कर आत्महत्या करने की दृष्टि से नदी में छलाँग लगा दी, परन्तु मैं मर न सका और जल में बहता हुआ किनारे जा लगा। ग्राम के लोगों ने मुझे पहचान लिया और ले जाकर मेरे घर पहुँचा दिया। इस प्रकार मेरी बड़ी बुरी अवस्था थी। परन्तु जब मेरे भाग्य के उदय होने का समय आया, तब अकस्मात विचरते-विचरते हमारी नगरी में एक बड़े ही उच्चकोटि के संत-स्वामी श्री नित्यानन्द जी महाराज पधारे और हमारी ही वाटिका में आकर ठहरे तथा वहीं पर उन्होंने निवास किया। पिताजी ने उन्हें भोजन ले जाने का कार्य मुझे सौंपा। मैं प्रतिदिन स्वामी जी महाराज के लिये भोजन ले जाता। एक दिन की बात है, मैं उस दिन पाठ याद न होने के कारण स्कूल में तथा घर में बुरी तरह से पिटा था और रोते-रोते मेरी आँखें भी सूज गयी थी। दोपहर के समय मैं उस दिन भी नित्य की भाँति स्वामी नित्यानन्द जी महाराज के लिये भोजन ले गया और भोजन की थाली स्वामी जी महाराज के सामने रखकर आप दीवार के साथ लगकर उदास खड़ा हो गया। स्वामी जी महाराज भोजन भी करते जाते थे और बार-बार वे मेरी ओर ताकते भी जाते थे। भोजन करने के पश्चात स्वामी जी ने मुझे नाम लेकर पुकारा और मुझसे पूछा कि ‘कहो’ क्या बात है? आज तुम बड़े ही उदास क्यों खड़े हो? मैंने कहा- ‘महाराज कुछ नहीं है।’ स्वामी जी कहने लगे- ‘नहीं, बात तो कुछ अवश्य है। बताओ, क्या बात है? और तुम्हारी आँखें भी आज रुदन से कुछ सूजी हुईं सी प्रतीत होती हैं। यह सुनते ही मेरे धैर्य का बाँध टूट गया और मैं अब तो फूट-फूटकर रोने लगा। तब स्वामी जी महाराज ने बड़े प्यार से मुझे अपने बिल्कुल ही पास में बिठलाकर कहा-’कहा बेटा, तुम्हें क्या कष्ट है, जो तुम इस प्रकार रो रहे हो?’ तब मैंने निवेदन किया कि ‘महाराज जी! मैं अब जीवित रहना नहीं चाहता, क्योंकि मैं बुद्धि मोटी होने के कारण हर स्थान पर अपमानित होता हूँ, इसलिये मुझे अब मरने का कोई सरल-सीधा सा साधन बताइये। स्वामी जी सुन कर कहने लगे- ‘अरे, तू इतनी-सी बात से अधीर हो गया है। तेरे रोग की औषध हमारे पास है, अब तू चिन्ता मत कर।’
मैंने अब तो आशा भरे नेत्रों से उन्हें देखते हुए उनसे कहा कि ‘मुझे वही बतलाइये।’ स्वामी जी सुनकर कहने लगे कि ‘एक सफेद कागज लाओ।’ मैंने सफेद कागज दिया। उन्होंने कागज पर गायत्री मंत्र लिखकर मुझे आदेश किया कि ‘यह है तुम्हारे रोग का इलाज। प्रातःकाल जब घर के सब लोग सोये पड़े हो, तब तू उठकर और शुद्ध-पवित्र होकर और पवित्र कुशासन पर एक आसन से बैठकर भृकुटी में ध्यान लगाकर इस मंत्र का जप किया कर।’ यह कहकर स्वामी जी ने मुझे आशीर्वाद दिया।
इस मंत्र को लेकर मुझे ऐसा लगा कि जैसे मुझे कोई एक बहुत बड़ी सम्पत्ति मिल गयी हो। अब तो मैं पूज्य स्वामी जी महाराज के आज्ञानुसार प्रातःकाल साढ़े तीन बजे उठ जाता और स्नान आदि के पश्चात एक आसन पर बैठकर ध्यान जमाकर गायत्री का जप करता। परन्तु बाल्यावस्था के कारण निद्रा आकर घेर लेती और मैं ऊंघने लगता। जब मैं निद्रा दूर होते न देखता तो मैं अपने नेत्रों पर पानी के छींटे देता और इस प्रकार से सावधान होकर फिर से गायत्री का जप करना प्रारंभ कर देता, परन्तु निद्रा फिर भी मुझे आ घेरती। इससे बचने का मुझे एक उपाय सूझा। मेरी चोटी बड़ी लम्बी थी। मैंने एक लम्बी रस्सी लेकर उस रस्सी का एक सिरा तो छत में लगे कुँडे में बाँध दिया और रस्सी का दूसरा सिरा चोटी के साथ बाँधकर बैठ गया। जप करते समय जब मुझे ऊँघ आती और सिर नीचे होता तो चोटी के खिंच जाने से मैं एकदम सावधान हो जाता। इस प्रकार बड़ी श्रद्धा-भक्ति से मैं गायत्री का निरन्तर जप करने लगा। चार-पाँच मास के पश्चात ही मैंने गायत्री माता के जप का यह अद्भुत चमत्कार देखा कि जहाँ पहले मेरी बुद्धि कोई भी विषय नहीं पकड़ती थी, वहाँ कुछ-कुछ गणित, इंग्लिश, हिन्दी, इतिहास इत्यादि स्मरण होने लगे। और जब वार्षिक परीक्षा हुई तब मैं उसमें अच्छे नम्बर से उत्तीर्ण हो गया। मास्टर लोग मुझे उत्तीर्ण होते देखकर आश्चर्यचकित हो गये और कहने लगे कि इसे तो कुछ नहीं आता था, फिर यह पास कैसे हो गया? हो-न-हो इसने दूसरों की नकल की होगी। मैंने कहा कि ‘ऐसी बात तो नहीं है।’ उसके पश्चात जो भी परीक्षा होती, मैं उसी में अब तो अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होता रहा और गायत्री माता की कृपा से मेरी बुद्धि दिनों-दिन निर्मल और तीव्र होने लगी और जब कर्त्तव्य-क्षेत्र में लगा, तब भी निरन्तर उन्नति ही करता चला गया। गायत्री माता की कृपा से वैभव की सारी वस्तुएं प्राप्त होने लगीं। गाय, भैंस, कारें, मोटरें, कोठी, पुत्र-पौत्र जितनी भी लौकिक वैभव की चीजें हैं, सभी प्राप्त होने लगीं। इन सारे ही लौकिक वैभवों को प्राप्त करने के पश्चात यह शक्ति भी गायत्री माता की कृपा से प्राप्त हुई कि मैं इन सब पर लात मार कर विरक्त हो गया और आत्मदर्शन का यन्त्र करने लगा। अब मेरी आयु 75 वर्ष की हो चुकी है और 9 वर्ष की आयु से लेकर अब तक मुझे जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह सब श्री गायत्री माता की ही कृपा से प्राप्त हुआ है। मुझे कोई भी ऐसी रात्रि या दिन स्मरण नहीं कि जब मैंने सारे लम्बे वर्षों में कभी श्री गायत्री माता की गोद में बैठकर अमृत न पिया हो। मेरा अनुभव यह है कि गायत्री माता की आराधना से लोक-परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं। अथर्ववेद के अन्दर भी यही आदेश है कि गायत्री माता के साधक को आयु, स्वास्थ्य, संतान, धन, ऐश्वर्य, कीर्ति, पशु, ब्रह्मवर्चस-दुनिया के ये सब - के सब ऐश्वर्य प्राप्त होते है और ब्रह्मलोक भी प्राप्त हो जाता है। कौन-सी ऐसी चीज है, जो गायत्री माता की कृपा से प्राप्त नहीं हो जाती? इसलिये गायत्री माता का भरोसा और गायत्री माता की भक्ति अवश्य ही करनी चाहिये।
मुझे गायत्री माता ने घोर विपत्ति से कैसे बचाया? इतना ही क्यों, मैं जो आज आपके सामने दिखलायी दे रहा हूँ और जौ मैं आज आपके सामने जीवित हूँ, यह भी एकमात्र गायत्री माता की कृपा से ही है, और किसी कारण से नहीं। मैं कैलाश की यात्रा में था, जो बड़ी भयंकर यात्रा है, जिसमें मेरे पैर की हड्डी टूट गयी थी और मेरे सभी साथियों ने मेरा साथ छोड़ दिया था तथा वे मुझे अकेला छोड़कर आगे चले गये थे। मैंने उस समय अपनी गायत्री माता से प्रार्थना की कि ‘मेरी माता तू मेरी रक्षा कर।’ मैंने देखा कि गायत्री माता ने मेरी प्रार्थना सुनी और मेरे अन्दर ऐसी शक्ति पैदा की कि मैं जो गायत्री का स्मरण कर चलने को खड़ा हुआ तो एकदम टूटी हड्डी का पता नहीं क्या हुआ और मैं पहाड़ों को लाँघकर यहाँ आ पहुँचा। यह मैंने स्वयं अपने जीवन में गायत्री का अद्भुत चमत्कार देखा है। गायत्री माता की भक्ति से मैंने सब कुछ प्राप्त किया है। और भी जो कोई गायत्री माता की भक्ति करेगा, उसे भी सब कुछ प्राप्त होगा- ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है। परन्तु गायत्री जप यम-नियमों का पालन करते हुए और मंत्र के आदेश को जीवन में ढालते हुए ही करना लाभदायक है। बोलो गायत्री माता की जय।
(एक गायत्री भक्त)
भारतीय शास्त्रों में मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति के जो अनेक मार्ग बतलाये हैं, उनमें जप का बड़ा महत्व है। वैसे धर्म और पुण्य के हेतु अनेक प्रकार के साधन पाये जाते हैं, पर उनमें से अधिकाँश ऐसे हैं कि जिनमें द्रव्य की कुछ न कुछ आवश्यकता पड़ती है। बड़े-बड़े यज्ञ, धार्मिक अनुष्ठान, तीर्थ यात्रा, ब्रह्मभोज आदि सभी व्यय-साध्य होते हैं। ऐसे कार्यों में पुण्य के साथ ही मनुष्य के मन में द्रव्य का संयोग होने से कुछ विकार भी उत्पन्न होते हैं। वह स्वभावतः यह विचार करता है कि मैंने इस कार्य में इतना व्यय किया, इतना दान दिया, इतनी अन्य लोगों की भलाई की। इससे अहंकार की उत्पत्ति होनी स्वाभाविक होती है, जिससे कर्मों का बन्धन भी उत्पन्न होता है।
पर जप का मार्ग इससे भिन्न है। उसमें मुख्यता आत्म चिन्तन की ही होती है। उससे चित्त स्थिर और शुद्ध होकर आत्मा में उच्च भाव उत्पन्न होते हैं। यही कारण है कि गीता में भगवान ने स्वयं कहा है-’यज्ञानाँ जपयज्ञोस्मि’ अर्थात् ‘यज्ञों में जप-यज्ञ मैं हूँ।’ इसमें जप-यज्ञ को अन्य यज्ञों से श्रेष्ठ बतलाया है इसका कारण यही है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए जिस चित्त शुद्धि की परम आवश्यकता है वह प्रधानता जप द्वारा ही प्राप्त होती है। इसमें विशेष द्रव्य या श्रम की भी आवश्यकता नहीं पड़ती केवल दृढ़ श्रद्धा और एक निष्ठा से निष्काम उपासना करनी पड़ती है। इसलिये गरीब अमीर, शक्तिशाली और दुर्बल, पंडित और सामान्य बुद्धि वाला सभी इसको कर सकते हैं। जो व्यक्ति सकाम भावना से कोई विशेष उद्देश्य सामने रखकर जप करते हैं उनको वैसे फल की प्राप्ति होती है और जो निष्काम भाव से करते हैं उनकी आत्म-शुद्धि होकर मोक्ष मार्ग में प्रगति होती है।
अब प्रश्न होता है कि यदि जप करना श्रेष्ठ है तो कौन-सा जप किया जाय? अन्य धर्मों की बात छोड़ दें तो हिन्दू शास्त्रों में ही सैकड़ों प्रकार के मंत्रों के जप का विधान बतलाया गया है। इनमें अधिकाँश मंत्र किसी एक देव या देवी से संबंध रखते हैं और उनके द्वारा प्रायः एक ही वस्तु की प्राप्ति होती है ऐसे मंत्रों का जप करने वालों का उद्देश्य प्रायः भौतिक या साँसारिक होता है। पर एक तो समस्त भौतिक पदार्थ नाशवान होते हैं, कुछ समय बाद उनका अन्त हो जाना अवश्यम्भावी है। दूसरे वे एक नियत सीमा के भीतर ही होते हैं। इसलिये अगर माँगने वालों की संख्या अधिक हो तो वे इच्छानुसार परिमाण में मिल सकने भी कठिन होते हैं।
पर मनुष्य का वास्तविक हित तो आत्म-कल्याण में ही है। आत्मा सूक्ष्म है इसलिये उस पर स्थूल पदार्थों के बजाय सूक्ष्म तत्वों का ही विशेष प्रभाव पड़ सकता है। इस बात को समझकर भारतीय ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष तक योगाभ्यास तथा तपश्चर्या द्वारा ऐसी विधि का आविष्कार किया है जिससे साँसारिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। इन विधियों में गायत्री जप सबसे अधिक लाभदायक और प्रभावशाली है। यह मंत्र पूर्ण रूप से सार्थक है और समझदार जप करने वाला इसके अर्थ को ध्यान रखते हुए इच्छानुसार प्रगति कर सकता है। इस संबंध में एक विद्वान ने लिखा है-
‘संसार में पापों के नाश और आत्मोद्धार के लिये गायत्री के जप और पुरश्चरण के सामने अन्य कोई विधि नहीं है। गायत्री का जप, तीर्थ, व्रत, तप और दान से भी बढ़ कर है। इसलिये विशुद्ध और एकान्त स्थान में निवास करते हुए श्रद्धा भक्ति पूर्वक निष्काम भाव से अधिक से अधिक गायत्री का जप करना चाहिये गायत्री का जप यदि मानसिक किया जाय तो वह और भी विशेष लाभप्रद है। श्री मनु महाराज कहते हैं।
विधियज्ञाञ्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः। उपाँशुः स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः॥
अर्थात् ‘दशपौर्ण मासादि विधि यज्ञों से साधारण जपयज्ञ दस गुना श्रेष्ठ है।’
एवं जो केवल भगवत्प्राप्ति के उद्देश्य से श्रद्धा प्रेम और निष्काम भाव पूर्वक किया जाय उसका फल तो अनन्त गुना श्रेष्ठ है, उसकी तो कोई सीमा ही नहीं है। गायत्री मंत्र में परमात्मा की स्तुति, ध्यान और प्रार्थना है। इस प्रकार एक ही मंत्र में उक्त तीनों बातों का समावेश बहुत ही कम मिलता है।’
विज्ञान की दृष्टि से भी गायत्री-जप मनुष्य के लिये बहुत हितकारी सिद्ध हुआ है। अब विज्ञान वेत्ता भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि मनुष्य के दिमाग या बुद्धि का मूल स्रोत प्रकृति के सामूहिक दिमाग या मन में स्थित है जिससे हम ‘इलेक्ट्रॉन’ के रूप में शक्ति प्राप्त करते रहते हैं। सर जेम्स ने इस संबंध में एक स्थान पर कहा है-
‘समय के प्रवाह के साथ ज्ञान का प्रवाह अध्यात्मवाद की तरह मुड़ता जाता है। अब हमको यह ब्रह्माण्ड एक बड़ी भारी मशीन के बजाय एक बड़े भारी विचार (थाट) के रूप में दिखलाई पड़ता है। अब यह कल्पना मिटती जा रही है कि हमारा मन या विचार शक्ति भौतिक पदार्थ में अकस्मात उत्पन्न हो गई है। अब हम यह अनुमान करने लगे हैं कि पदार्थ का बनाने वाला और उसकी व्यवस्था चलाने वाला मन ही होता है। इसका आशय यह नहीं कि मेरा मन या तुम्हारा ‘मन’ इस काय को करता है। वरन् इसका अर्थ यह है कि प्रकृति में ‘मन’ नाम का जो तत्व है उसी के अणुओं से मेरा और तुम्हारा ‘मन’ उत्पन्न होता है।’
इस प्रकृति में रहने वाले ‘मन’ का ही गायत्री मंत्र में ‘भर्ग’ के रूप में वर्णन किया गया और उसी का ध्यान करके सद्बुद्धि की कामना की जाती है। अगर हम इस ध्यान अथवा जप को विधिपूर्वक करें और अपने मन को ‘विश्व-मन के साथ एकाग्र करने का प्रयत्न करें तो निस्सन्देह हम कल्याण-मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं।
(श्री विष्णुदेव साँकणेश्वर पंडित)
गायत्री महामंत्र का आरंभ ॐ से होता है और उसके अन्त में भी ॐ का उच्चारण किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि गायत्री मंत्र ॐ कार स्वरूप है। वह ॐकार में से ही प्रकट होता है और ॐकार में ही समा जाता है। इस लिये ॐकार ही उसका कारण है, ॐकार ही उसकी शोभा है, ॐकार के उच्चारण से उसको बल मिलता है।
भूर, भुवः और स्वः ये तीन महा व्याहृतियाँ हैं। ॐकार पुरुष का प्रतीक है और महा व्याहृतियाँ प्रकृति की प्रतीक हैं। भू से तमोगुण, भुवः से रजोगुण और स्वः से सतोगुण का बोध होता है।
पुरुष ॐकार की तीन मात्रायें हैं, अ, उ, म्। प्रकृति-व्याहृति के तीन गुण हैं। गायत्री मंत्र के तीन चरण हैं। पुरुष और प्रकृति के सम्मिश्रण से गायत्री के 24 अक्षर प्रकट हुये हैं जो चौबीस तत्वों के सूचक हैं। गायत्री के 24 अक्षर वर्णमाला के सर्वोत्तम अक्षर हैं। उनमें से एक-एक के उच्चारण से सरस्वती देवी प्रसन्न होती है। ये चौबीस अक्षर सरस्वती के ही स्वरूप हैं। उनका ध्यान करने से महाविद्या सिद्ध होती है।
इस महामंत्र में सविता नारायण का ध्यान किया गया है। उसके अर्थ का ज्ञान होते ही सविता नारायण की महाशक्ति सावित्री प्रकट होती है। मंत्र के पदों में सरस्वती का निवास है, तो उसके पदार्थ और भावार्थ में सावित्री महामाया का निवास है। उसका ध्यान करने से महामाया के सब तत्व सिद्ध होते हैं। ऐसे साधक के वश में जगत के सर्व तत्व होते हैं।
इस मंत्र में तीन चरण हैं, हर एक चरण में आठ-आठ अक्षर हैं। इस छन्द का नाम गायत्री है। गायत्री छन्द का गान करने से महाशक्ति गायत्री प्रसन्न होती हैं। महाशक्ति को प्रसन्न करने के लिये गायत्री मंत्र का विधिपूर्वक गान करना चाहिये। स्वर के आलाप के साथ गायत्री मंत्र का गान करने से साधक को महाशक्ति के दर्शन होते हैं। गायत्री महाशक्ति उसकी सब कामनाओं को सिद्ध करती है। इस मंत्र की व्याख्या करते हुए शास्त्र में कहा गया है-
मूलाधारात् हुतवहकला मिश्रितं भूर्भुवः स्वः। ब्रह्मस्थानात् परम गहनात् तत्सवितुर्वरेण्यम्॥ भर्गो देवस्य शशिकलनं धीमहि दिव्य रुपम्। धियोयोनः प्रणवममृतं प्रेरयेत् तत्परं यत्॥
अर्थात्-’सबका मूल आधार, अत्यन्त गहन ब्रह्म स्थान से भूर, भुवः स्वः (तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण) वाली त्रिविध प्रकृति में गति और स्फूर्ति आती है। इन त्रिगुण परमाणुओं में संघर्ष होने से अग्नि प्रकट होती है, उससे परमाणुओं का स्वाहाकार होकर द्रव पदार्थ बनता है। उसमें से प्रकाशवान रेखाओं जैसी कला प्रकट होती और उससे प्रणव (ॐकार) प्रकट होता है। यह सृष्टि के आदि में उत्पन्न होने वाला ॐकार ईश्वर की सर्वोत्तम प्रतिमा है।
उस आदि प्रतिमा ॐकार से जिस प्रकार और बहुत से आकार उत्पन्न हुये हैं उसी प्रकार गायत्री महामंत्र भी उसी से प्रकट हुआ है। यही कारण है कि गायत्री में आया हुआ ‘तत्’ शब्द इस ॐकार की तरफ ही संकेत करता है। वह ॐकार ही सविता नारायण देव का परम दिव्य, सर्वश्रेष्ठ और परम अमृत स्वरूप, सर्वोत्तम भर्ग (तेज) है। उसी ॐकार के तेज का हम ध्यान करते हैं कि वह हमारी बुद्धि को सद्प्रेरणा प्रदान करे।
जिस प्रकार गायत्री वेदमाता है उसी प्रकार षट् दर्शन, शास्त्र और पुराणों का ज्ञान भी गायत्री में समाविष्ट है। इस प्रकार सृष्टि के विकास को ही ब्रह्म विद्या कहते हैं। उसको जानने के लिये गायत्री मंत्र का निरन्तर मनन करना और उसके रहस्यों को हृदयंगम करना परम आवश्यक है।
(श्री सत्यव्रत शर्मा, शास्त्री)
यजुर्वेद के अनुसार गायत्री मंत्र का सविता देवता है और विश्वामित्र ऋषि है। प्रचलित कथा के आधार पर विश्वामित्र ऋषि ने ही राम-लक्ष्मण को दो विद्याओं का उपदेश दिया था जिन्हें रामायण में ‘बलाऽतिबला’ कहा गया है। वस्तुतः सविता-सावित्री ही ‘बलाऽतिबला’ विद्या है। विश्वामित्र ऋषि ही इनके उपदेष्टा हो सकते थे। यह सब इति वृत्त सावित्री उपनिषद् के अध्ययन से स्पष्ट है। अतः यह भी सिद्ध है कि इनका संबंध सावित्री से ही था। अतएव ऋषि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को उनके ब्रह्मचर्य काल में इसी सावित्री-गायत्री का रहस्य समझाया था जिसके फलस्वरूप वे दोनों तपस्वी वीर जीवन के प्रत्येक संघर्ष में अप्रतिरथ योद्धा बन सके। महाकवि बाल्मीकि मुनि के अनुसार सावित्री गायत्री सकल ज्ञान-विज्ञान की माता है। ‘ज्ञान विज्ञान मातरौ’।
मनुष्य में सबसे महनीय वस्तु बुद्धि है, वही उसका मननशील भाग है। बुद्धि से ही ज्ञान कर्म की अविच्छिन्न धाराओं का उद्गम होता है। ज्ञान और कर्म का ही समन्वय होने पर मनुष्य नूतन जीवन में प्रवेश पाता है। गायत्री मंत्र मनुष्य की बुद्धि को सुसंस्कृत परिमार्जित बनाकर तपोमय, व्रतशील जीवन के प्रारंभ करने की शिक्षा देता है।
‘मनो वै सविता प्राणाधियः॥
शतपथ 3।6।1।13
मनुष्य में सविता उसका मन है, घी उसके प्राण है। मन के द्वारा प्राणों को पुनरुज्जीवित करना ही प्रत्येक मनुष्य का सच्चा कौशल है।
सविता-सावित्री एक दूसरे के पूरक हैं। इन दोनों के सम्मिलन से ही उत्पत्ति संभव है पुरुष सविता है स्त्री सावित्री है दोनों पृथक रहकर सृष्टि कार्य में प्रवृत्त नहीं हो सकते। दोनों के परस्पर सम्मिलन से ही प्रजायें उत्पन्न होती हैं।
‘यज्ञौवैप्रचोदयति’ स्त्री चैव पुरुषश्च प्रजनयतः॥
जैमिनीय उप. 4।28।3
योषा और वृषा दो तत्वों के मेल से ही सर्वत्र सृष्टि होती है। इस परस्पर सम्मिलन को ही ‘यज्ञ’ कहते हैं। यही अग्नि षोमात्मक यज्ञ कहाता है। अग्नि में सोम की आहुति का नाम ही ‘यज्ञ’ है। यही सविता-सावित्री का पारस्परिक मिलन है।
इस मंत्र के तीन नाम दिए हैं। गुरु, गायत्री, सावित्री। गुरु-मंत्र इसलिए कहते हैं कि जिस समय बालक अपने माता-पिता के समीप 8 वर्ष, 11 वर्ष, 12 वर्ष, का जीवन अपने-अपने वर्ण क्रमानुसार व्यतीत करके ब्रह्मचर्य व्रत की दीक्षा ग्रहण करने के निमित्त आचार्य कुल में अर्थात् गुरुकुल में प्रवेश करता है और यज्ञोपवीत ग्रहण करता है, उस समय वेदारंभ संस्कार के समय गुरु गायत्री मंत्र की दीक्षा देता है। सबसे प्रथम गुरु आचार्य इस मंत्र का ही अध्ययन कराता है। अतः इस मंत्र का नाम गुरु मंत्र है।
गायत्री-छन्द होने से गायत्री नाम है और सविता देवता होने से सावित्री नाम प्रसिद्ध हुआ है। इस प्रकार इन तीनों नामों की सामर्थ्यता है। गोपथ ब्राह्मण में इसको वेदमाता और सावित्री नाम से ही कहा गया है-
‘यश्चैवं विद्वानेवमेतावेदानाँमातरं सावित्री संपद मुपनिषद मुपास्ते इति॥ ब्राह्मणम् कण्डिका 37
गायत्री संज्ञा में और भी रहस्य है।
‘गयाः प्राण उच्यन्ते, गया प्राणा उच्यन्ते गयान् प्राणान् त्रायते सा गायत्री।’
‘गायन्तं त्रायते’ इति वा ‘गायत्री प्रोच्यते तस्मात् गायन्तं त्रायते यतः॥’
जो प्राणों की रक्षा करती है, जिसके सद् अनुष्ठान से जीवन-जीवन बनता है, जो गाने वालों की उसका निरन्तर अभ्यास करने वालों की- त्रिविध ताप से रक्षा करती है, वह गायत्री है। इसी प्रसंग में एक रोचक उपाख्यान ‘युधिष्ठिर मार्कण्डेय संवाद’ गायत्री मंत्र की महिमा को प्रकट करने के लिए पाठकों के मनोरंजनार्थ लिखा जाता है-
मार्कण्डेय ऋषि धर्मराज युधिष्ठिर से प्रश्न करते हैं कि-
‘किन्तच्छौचं भवेद्येन, विप्रः शुद्धः सदा भवेत्। तदिच्छामि महाप्राज्ञ? श्रोतुँ धर्मभृताँवर?॥1॥
हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ! धर्मधुरन्धर? महा-बुद्धिमान युधिष्ठिर महाराज, मैं आपसे यह शौचा-चार सुनना चाहता हूँ- जिसके आचरण से ब्राह्मण सदा शुद्ध हो जाता है। इस प्रश्न का उत्तर दे हुए धर्मराज कहते हैं-
‘सायं प्रातश्च सन्ध्याँ यो ब्राह्मणो ह्युप सेवते। प्रजपन् पावनीं देवीं ‘गायत्री’ वेद मातरम्॥2॥
जो ब्राह्मण विद्वान् सायं प्रातः दोनों समय-वेद माता स्वरूप परम पावनी (पवित्र करने वाली) गायत्री देवी का जप करता हुआ सम्यक् प्रकार से सन्ध्योपासना करता है-
‘स तया पावितो देव्या ब्राह्मणो नष्ट किल्विषः। न सीदेत् प्रतिगृह्व नो महीमपि स सागराम्॥3॥
वह उस गायत्री मंत्र के मानस जप के द्वारा परम पवित्र होकर अपनी पापमयी मनोवृत्तियों को सदा के लिए नष्ट कर देता है और प्रतिग्रह के महादोष से भी मुक्त हो जाता है। मानव धर्म का वर्णन करते हुए मनु भगवान ने ब्राह्मण के कर्त्तव्यों में ‘दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्’ दान देना और दान लेना, दो कर्त्तव्यों का भी उल्लेख किया है। उस संबंध में दान लेने को प्रतिग्रह प्रत्यवरः’ कहकर निकृष्ट कर्म कहा है, किन्तु यदि कोई ब्राह्मण सागर सहित पृथ्वी का भी दान ले लेता है और भगवती गायत्री का जप यथाविधि करता है, ऐसी अवस्था में वह दान लेने रूप निकृष्ट कर्म करने पर भी दुःख अनुभव नहीं करता- इसका तात्पर्य गायत्री जप का महत्त्व प्रदर्शित करना ही है। अन्यथा ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्’ इस सिद्धाँत के अनुसार किया हुआ शुभाशुभ कर्म अवश्य भोगना ही है। उससे मुक्ति प्राप्त करना असंभव है।
‘प्रतिग्रहान्नदोषाच्च पातकादुपपातकात्। गायत्री प्रोच्यते तस्मात् गायन्तं त्रायते यतः॥4॥
इसमें पातक, उप पातक आदि पापों से तथा प्रतिग्रह अन्न दोष से भी गायत्री का जप करने वाला मुक्त हो जाता है। अर्थात् उन उप-पातकों में यह पञ्च महापातकों में अथवा निकृष्ट दान लेने में ऐसे महापुरुष की, भगवद्भक्त की प्रवृत्ति ही नहीं होती भविष्य में पापमयी मनोवृत्तियों को उन पाप कर्मों से पृथक करना ही पापों से छूटना या मुक्त होना है। पापों से मुक्ति का यही तात्पर्य है।
‘ये चास्य दारुणाः केचित् ग्रहा सूर्यादयो दिवि। ते चापि सौम्याः जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा।5।
अर्थात् गायत्री मंत्र का उपासक, उसका सच्ची भावना से अनुष्ठान करने वाला ‘तज्जपस्तदर्थ भावनम्’ इस योग सूत्र के आधार पर जप के साथ अर्थ विचार और उसके अनुकूल आचरण करने वाला व्यक्ति आगत भयंकर दोषों से भी अपने को मुक्त करने का सतत प्रयत्न करता हुआ शाँति प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार गायत्री का महत्व स्थान-स्थान पर प्रकट किया गया है।
(योगेश्वर श्री योग प्रकाश ब्रह्मचारी)
गायत्री-मंत्र में जो अनेक तत्व निहित हैं उनकी जितनी अधिक विवेचना की जाती है उतने ही नये-नये रहस्य प्रकट होते जाते हैं। गायत्री केवल इस पृथ्वी पर ही कल्याण करने वाली नहीं है वरन् इसका प्रभाव सातों लोकों में व्याप्त है और इन लोकों में जितने भी प्रकार के प्राणी रहते हैं उन सबके निमित्त गायत्री का जप व उपासना कल्याणकारी है।
गायत्री के चौबीस अक्षरों में योगियों ने समस्त देवताओं का निवास माना है। ‘योगी याज्ञवलक्य’ नामक ग्रंथ में लिखा है-
कर्म्मेन्द्रेयाणि पंचैव पंच बुद्धीन्द्रियाणि च। पंच पंचेन्द्रियार्थश्च भूतानाम चैव पंचकम॥ मनोबुद्धिस्तथात्याच अव्यक्तंच यदुत्तमम्। चर्तुिव्वंशत्यथैतानि गायत्र्या अक्षराणितु॥ प्रणवं पुरुषं बिद्धि सर्व्वगं पंचविंशकम्॥
अर्थात्-’गायत्री के चौबीस अक्षरों में पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पंचभूत, पाँच विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) और मन, बुद्धि, अहंकार तथा आत्मा- ये चौबीस तत्व अवस्थित हैं। इन चौबीस अक्षरों में से ही जीवात्मा की 24 शक्तियाँ उत्पन्न हुई है। ‘गायत्री हृदय’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि गायत्री के प्रत्येक अक्षर में एक-एक देवता का निवास है, जैसे ‘ग्रथ मग्नियं’ प्रथम अक्षर ‘त’ कार का देवता अग्नि है। ‘द्वितीयं प्रजापत्यं’ द्वितीय अक्षर ‘तू’ का देवता प्रजापति है। ‘तृतियं सोम्यं’ तीसरे अक्षर ‘स’ कार का देवता सोम है। ‘चतुर्थ मैशानं’ चौथे अक्षर ‘वि’ का देवता ईशान। ‘पंचमदित्यं’ पाँचते अक्षर ‘तु’ का देवता अदिति। ‘षष्ठ बार्हस्यत्यं’ छठे अक्षर ‘वि’ का देवता बृहस्पति। ‘सप्तम भग देवताम्’ सातवे अक्षर ‘रु’ का देवता भग। ‘अष्टमं पितृ देवताँ’ आठवे अक्षर ‘ण्यं’ का देवता पितृगण। ‘नवम-मार्षामणं नवम ‘भ’ का देवता अर्ष्यमा। ‘दशमं सावित्रम्’ दसवें ‘र्गो’ का देवता सविता। ‘एकादशं त्वाष्ट्रं’ ग्यारहवें अक्षर ‘दे’ का देवता त्वष्टा। ‘द्वादश प्रौचं’ बारहवें अक्षर ‘ब’ का देवता पूषा। ‘त्रयो दशममैन्द्राग्नं’ ‘तेरहवें’ अक्षर ‘स्य’ का देवता इन्द्र और अग्नि। चतुर्दशं वायव्यं’ चौदहवें अक्षर ‘घी’ का देवता वायु। ‘पंचदशं वाम देवं पंद्रहवें अक्षर ‘म’ का देवता वामदेव। ‘षोडश मैत्रावरुण’ सोलहवें अक्षर ‘हि’ का देवता मित्र और वरुण। ‘सप्तदशं वाभ्रत्र्यम्’ सत्रहवें अक्षर ‘धि’ का देवता वभ्रु। ‘अष्टादश वैश्वदेव्यं’ अठारहवें अक्षर ‘यो’ का देवता विश्व देव। ‘एकोनविंशतिकं वैष्णवं’ उन्नीसवें अक्षर ‘यो’ का देवता विष्णु। ‘विंशतिकं वासवम्’ बीसवें अक्षर ‘नः’ का देवता वसु। ‘एकोविंशतिकं तौषितं इक्कीसवें अक्षर ‘प्र’ का देवता तुषितो। ‘द्वाविंशतिकं कौवरं, बाईसवें अक्षर ‘चो’ का देवता कुबेर। ‘त्रयोविंशतिकंभाँश्विनं’ तेईसवें ‘द’ का देवता अश्विनी कुमार। ‘चतुर्विंशतिकं ब्राह्मम्’ चौबिसवें अक्षर ‘यात्’ का देवता ब्रह्मा है। इन चौबीस अक्षरों की गायत्री प्रणवमय है। प्रणव ही पच्चीसवाँ पुरुष तत्व है।
उपनिषदों में भी गायत्री की महिमा के विषय में बहुत कुछ कहा गया है। ‘छान्दोग्य’ के खण्ड 12, प्रपाठक 3 में लिखा है-
‘अयं वाव स योऽयभन्तहृर्दय आकाशस्तदेतत् पूर्णमप्रवर्तिः पूर्णम प्रवर्तिनी श्रियं लभते य एवं वदे॥
अर्थात्-’जो अंतर्गत हृदयाकाश स्वरूप है वही अपरिवर्तनशील पूर्ण ब्रह्म है। अब समस्त भूत जिस प्रकार विनाश होने वाले हैं उस प्रकार हृदयाकाश नाशवान नहीं है। जो मनुष्य, जो उपासक पूर्वोक्त प्रकार से गायत्री ब्रह्म के आश्रित अपरिवर्तनशील हृदयाकाश रूप पूर्ण ब्रह्म को जान लेता है, वह परम श्री को प्राप्त कर सकता है। वही ब्रह्म के गुण फलस्वरूप स्थायी भाव को प्राप्त होता है।’
अपौरुषेय वेद और उसके श्रुति स्वरूप उपनिषद् आदि के सर्वोच्च सिद्धान्तों के अनुसार गायत्री ही ‘सावित्री’ ‘ब्रह्म विद्या’ ‘वेदमाता’ और ‘शब्द ब्रह्म’ आदि नामों से पुकारी जाती है। गीता में भगवान कृष्ण ने भी कहा है ‘गायत्रीच्छन्द सामहम्’ ‘समस्त छन्दों में मैं ही गायत्री हूँ।’ एक गायत्री में से ही गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुभ और जगति इन सात वैदिक छन्दों की उत्पत्ति हुई है। इसके प्रत्येक चरण में आठ-आठ अक्षर हैं- 3 चरणों में 24 अक्षर हैं। इनमें क्रम-क्रम से 4-4 अक्षर बढ़ाकर उष्णिक आदि छन्द रचे गये हैं। अनन्त महासागर वायु द्वारा कम्पायमान होकर जिस प्रकार तरंगों द्वारा नदी नाला की तरफ प्रवाहित होता है, उसी प्रकार अपार सत्ता वाली अनन्त परब्रह्म सत्ता अपनी ही शक्ति से गतिमान होकर सप्त गत्यात्मक प्रणवाकार धारण करके जीव और जगत के रूप में प्रकट होती है। इस गत्यात्मक कंपन से जो भाव भाषा द्वारा प्रकट होता है वही गायत्री छन्द है। इस प्रकार एक गायत्री छन्द से ही समस्त छन्द, चारों वेद और सब उपनिषद् आदि सत्शास्त्र वर्णित हुये हैं।
गायत्री से प्रणव अभिन्न है। प्रणव यदि सूर्य समान है तो गायत्री उसका ज्योति-मंडल है। किरण अथवा ज्योति की समष्टि को जिस प्रकार सूर्य कहा जाता है उसी प्रकार गायत्री अथवा उसके अक्षर समष्टि भूत होकर दिव्य ज्योतिर्मय प्रणव का आकार धारण करते हैं। कहा है ‘प्रणव मंत्रस्थ ब्रह्म ऋषि गायत्रीच्छान्दः, अग्निर्देवता, सर्व्व कर्मारम्भे विनियोगः।’ तेजोमयी गायत्री के जप-कौशल से अर्थात् छन्द में मन और प्राण स्पन्दित होने से ही प्रणव का उद्धार होता है अथवा वह आकार धारण करता है। अकार, उकार और मकार अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और लय स्वरूपिणी गायत्री प्रणव के रूप में सर्वत्र नित्य प्रतिष्ठित हो रही है। यही गायत्र्यात्मक प्रणव अथवा प्रणवात्मक गायत्री ही परम ब्रह्म श्री भगवान का सर्वोच्च उत्कृष्टतम नाम है अर्थात् इससे बढ़कर और कोई नाम नहीं है। देवर्षि नारद ने कहा है-
‘उमित्येतद् ब्रह्मणो ने दिष्ठं नाम। यस्मादु च्यार्यमाण एव संसारभयात्तारयति एतस्मादुच्यते तार ईति श्रुतेः।’
अर्थात्-’गायत्रात्मक प्रणव ही परम ब्रह्म श्रीभगवान का सर्वोच्च उत्कृष्ट नाम है। इस छन्दमय नाम के गान अथवा जप द्वारा जपकर्ता संसार के भय से त्राण पा जाता है, इसीलिये इसे तारक कहते हैं। यह प्रणव अक्षर ब्रह्म- ‘उभित्येकाक्षर ब्रह्म’ (गीता)-गायत्री परतत्व से निर्मित है। तंत्रशास्त्र में कहा है- ‘तकारात यातकार षर्यन्त शब्द ब्रह्म स्वरूपिणी’ वर्णमाला अथवा किसी भी वस्तु के नाम का उच्चारण जिस प्रकार शब्दों की सहायता से ही होता है प्रणव अथवा श्री भगवान का उच्चारण गायत्री द्वारा ही हो सकता है। श्रीमद्भागवत के छठे स्कंध के सोलहवें अध्याय में लिखा है ‘शब्द ब्रह्म पर ब्रह्ममागेम्याँ शाश्वती तनु’ शब्द ब्रह्म और परब्रह्म ये दोनों श्रीभगवान ने शाश्वत अथवा नित्य चिन्मय तनु (शरीर) हैं। ग्यारहवें स्कंध में उद्धव के प्रश्न करने पर भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है-
शब्द ब्रह्म निर्व्वातेन परे यदि। श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः।
(भागवत 11-11-18)
अर्थात् ‘हे उद्धव! जो व्यक्ति वेद पारंग होकर भी केवल पाँडित्य का अभिमानी बनता है अर्थात् क्रिया का यथार्थ ज्ञान नहीं रखता तो परब्रह्म में सम्यक् निष्ठा के अभाव के कारण उसका श्रम निष्फल जाता है, जिस प्रकार वन्ध्या गौ दूध देने में निरर्थक होता है उसी प्रकार शुष्क वेद पाठन-पठन भी निष्फल होता है। इसलिये शब्द ब्रह्म गायत्री का तत्व अर्थात् उसके जप-कौशल का यथार्थ ज्ञान सम्पादन करना, यह मनुष्य का कर्त्तव्य है। अग्नि-पुराण में अग्निदेव ने कहा है-
एवं सन्ध्या विधि कृत्वा गायत्रींच जयेत् स्मरेत्। गायेचिष्यान् यत स्त्रायेदभार्यां प्राणाँस्तथैव च॥
अर्थात् ‘सन्ध्या विधि परिपूर्ण करने के पश्चात गायत्री का स्मरण और जप करना। गायमान होने से अर्थात् उसकी उपासना-जप करने से वह गुरु, शिष्य, स्त्री और प्राणी सब का उद्धार करती है। वह सविता को प्रसव करती है इससे उसका नाम सावित्री भी कहा जाता है। उसके वाग रूप होने से उसके दूसरा नाम सरस्वती भी है।
जिस ज्ञान शक्ति द्वारा हम जरा मृत्यु-वत संसार के बंधन को काट सकते हैं, अज्ञान तिमिर का ध्वंस करके आत्मज्ञान द्वारा ब्रह्म विद्या का अधिकार प्राप्त कर सकते हैं, अथवा जो महाशक्ति हमको दुष्ट काल के क्षेत्र को अतिक्रम करके सत्वलोक पर अधिकार करने योग्य बनाती है, उसी महान शक्ति का नाम गायत्री है। सर्वज्ञता आदि आत्म-ज्ञान द्वारा ब्रह्म विद्या का यथार्थ परिचय हमको गायत्री-मंत्र से प्राप्त हो सकता है।
(श्री मोक्षाकर)
गायत्री मंत्र के अद्भुत प्रभाव और आश्चर्यजनक चमत्कारों के विषय में प्राचीन ऋषि, मुनियों और साधु-संतों ने तो स्थान-स्थान पर महत्वपूर्ण उद्गार प्रकट किये ही हैं, पर वर्तमान समय के ज्ञानी व्यक्ति भी जिन्होंने उच्चकोटि की पश्चिमीय शिक्षा प्राप्त की हैं मुक्त कंठ से उसकी प्रशंसा करते रहते हैं। थियोसोफिकल सोसाइटी के एक प्रमुख नेता श्रीकृष्णमूर्ति ने गायत्री उपासना के अनुभवों का वर्णन करते हुए लिखा था-
‘विशेष रूप से गायत्री-मंत्र के प्रयोग करके अवलोकन किया गया और उसका परिणाम अद्भुत जान पड़ा। इस मंत्र का उपयोग स्वार्थ के लिये न करके परमार्थ के लिये करना चाहिये। देवता भी जहाँ गायत्री का मंत्रोच्चारण होता हो वहाँ सहायता देते हैं।’
‘गायत्री सूर्य भगवान के आवाहन का मंत्र है और जब उसका उच्चारण किया जाता है तभी जप करने वाले पर प्रकाश की एक बड़ी लपक स्थूल सूर्य में से पड़ती है। प्रार्थना के समय चाहे सूर्य उदय हो रहा हो, चाहे मध्याह्न का समय हो, चाहे संध्या समय अस्त हो रहा हो, चाहे मध्य रात्रि का समय हो, सूर्य की लपक सूक्ष्म रूप से जप करने वाले पर अवश्य पड़ती है। रात्रि के समय तो वह लपक पृथ्वी को भेदकर आती है। यह प्रकाश श्वेतवर्ण का सुनहरापन लिये होता है। जब उसके द्वारा जप करने वाले का हृदय भर उठता है तब उसमें से इन्द्र कैसे सात रंग बाहर निकलते है’ और जो कोई करने वाले के सम्मुख होता है उस पर शुभ प्रभाव डालते हैं। यह प्रभाव जप करने वाले के हृदय से ही बाहर नहीं निकलता, वरन् उसकी प्रभा (ओरा) में से भी अर्द्ध चन्द्राकार में प्रकट होता है। किरण के सामने कोई मनुष्य बैठा हो या आता हो तो वह उसके मस्तक और हृदय को स्पर्श करती है और इन अंगों के दोनों चक्रों को जागृत करती प्रत्येक किरण एक ही नहीं वरन् अनेक मनुष्य प्रभाव डालती है।
अगर साधारण मनुष्य की प्रभा उसके शरीर के बाहर 18 इंच तक निकलती हो तो उसके नीचे के भाग 9 फीट लम्बे और 5 फीट चौड़े क्षेत्र में फैल जाता है। जिस व्यक्ति का साधन द्वारा विशेष विकास हो जाता है उसके शरीर की प्रभा चारों तरफ 50 गज तक फैल सकती है और जब तक उसका आधा भाग वृत्ताकार बनता है तो बहुत दूर-दूर के व्यक्तियों पर उसका शुभ प्रभाव पड़ता है।
मनुष्य की इस प्रकार की प्रभा उसकी वासना और मानसिक प्रकृति की बनी होती है और उसकी समस्त देह में ओत-प्रोत रहती है। यह प्रभा मस्तक से जितनी दूर ऊपर की तरफ जाती है उतनी ही दूर पैरों के नीचे पृथ्वी के भीतर भी पहुँचती है। गायत्री मंत्र का जप करने वाले की प्रभा जितनी विस्तृत होती है उतनी ही प्रभाव डालने वाली भी होती है। अगर एक बड़ा जन समुदाय सामूहिक रूप से मंत्र का उच्चारण करता है तो उसके प्रभाव से प्रकाश की उतनी ही बड़ी लपक उत्पन्न होती है। इससे समस्त मंत्र उच्चारण करने वाले एक रूप बन जाते हैं और उन सबमें से जो सात-सात किरणें निकलती हैं उनका प्रभाव कितने बड़े भू-भाग पर पड़ता होगा इसका अनुमान सहज में किया जा सकता है कितने ही देशों के अध्यात्म विद्या विशारदों ने प्रयोग करके इसकी सत्यता को स्वयं अनुभव करके देखा है।
इन प्रयोगों द्वारा यह भी मालूम पड़ा है कि मंत्रों का प्रभाव किस प्रकार पड़ता है मंत्र का आशय यह है कि उसमें शब्दों को एक विशेष योजना के अनुसार, एक विशेष ध्वनि में उच्चारण किया जाय। उसके प्रत्येक अक्षर में एक विशेष कंपन उत्पन्न करने की शक्ति पाई जाती है अर्थात् मंत्र का प्रत्येक पद स्वर के एक कंपन के सदृश्य होता है। मंत्रों में जिस नियम के अनुसार स्वरों की रचना की जाती है, उसे ठीक प्रकार से उच्चारण करने पर अवश्य ही कंपन एक विशेष गति से उत्पन्न होते हैं और वे कंपन धीरे-धीरे हमारे शरीर के भिन्न-भिन्न कोषों को जागृत करते हैं और उनको शुद्ध बनाते हैं। इन शुद्ध हुये कोषों के उपासक मन्त्रोच्चार करके अपने इष्टदेव को अपनी तरफ आकर्षित करने में समर्थ होता है। इसी क्रिया को देवता का आवाह्न कहते हैं। इस प्रकार मंत्र का उच्चारण जप करने वाले के ऊपर असर करता है और उसकी प्रभावशीलता को बढ़ाता है।’
इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वरों से एक विशेष प्रकार के कंपन या आन्दोलन वातावरण में उत्पन्न होते हैं और उनसे सूक्ष्म सृष्टि में एक खास तरह के आकार बनते हैं। इस प्रकार स्वरों के विभिन्न प्रकार के कंपन अलग-अलग तरह की अनेक आकृतियों को उत्पन्न करते हैं। स्वर विद्या के जानकार, कुछ वैज्ञानिकों ने विशेष यंत्रों द्वारा इस बात को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करके भी दिखला दिया है। इससे यह भी विदित होता है कि मंत्र विद्या में स्वर का महत्व बहुत अधिक है। प्रत्येक स्वर का उच्चारण अपना अलग आकार उत्पन्न करता है और उससे वैसा ही प्रभाव उत्पन्न होता है। केवल साधारण ढंग से मंत्र बोल देने या पढ़ देने से कोई खास परिणाम प्रकट नहीं होता। मन्त्रोच्चारण पूर्ण रूप से शुद्ध होना चाहिये, उसके स्वरों में किसी प्रकार की विकृति नहीं होनी चाहिये।
‘ध्वनि’ के लिये संस्कृत में ‘वर्ण’ शब्द का प्रयोग किया जाता है और ‘वर्ण’ का अर्थ रंग भी होता है। सूक्ष्म सृष्टि में प्रत्येक शब्द के साथ रंग भी उत्पन्न होता है और उससे अलग-अलग रंग के आकार बनते हैं। जिसमें सब रंगों का एकीकरण होता है उसे संस्कृत में ‘रवि’ (सूर्य) कहते हैं। ‘र व’ शब्द का अर्थ ‘ध्वनि’ भी होता है। इसी आधार पर भिन्न-भिन्न देवों के आवाह्न के लिये भिन्न-भिन्न मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। जिस देव की प्रार्थना हम करना चाहते हैं उसके मंत्र का बार-बार शुद्ध रीति से उच्चारण (जप) करने से उच्च भूमिका अर्थात् सूक्ष्म मानसिक सृष्टि के ऊपर उसका आकार पैदा हो जाता है और उस देवता की शुभ शक्तियों को आकर्षित करने का वह केन्द्र बन जाता है। यही कारण है कि आर्ष ग्रंथों में कहा गया है कि मंत्र बिना देवता के हैं ही नहीं!
गायत्री मंत्र के विधि विधान और उच्चारण आदि के विषय में अब भी अनेक व्यक्तियों को पर्याप्त ज्ञान है, इसलिये अगर हम प्रयत्न करें तो उससे अनेक प्रकार के लाभ उठा सकते हैं। पर यह तभी संभव है जब उपासक में आन्तरिक श्रद्धा के साथ संकल्प बल भी हो। तीसरा गुण एकाग्रता का भी है। डगमगाती स्थिति में करने से तो साधारण काम भी पूरे नहीं होते, तब सूक्ष्म सृष्टि में रहने वाले देवताओं को आकर्षित करना उससे कैसे संभव हो सकता है? अंत में सबसे आवश्यक बात है देवता में उपासक का भक्ति-भाव अथवा स्वार्पण का भाव। जब इन सब बातों के साथ मंत्र का प्रयोग किया जाता है तो उससे अवश्य ही हमारा और दूसरों का भी कल्याण हो सकता है। इसके विपरीत जो लोग मंत्र को जादू की तरह समझ कर चाहे जैसा अपवित्र जीवन बिताते हुए केवल किसी मंत्र का उच्चारण कर देने से देवताओं को बुलाने या उनसे भले-बुरे सब कार्य सिद्ध कराने की आशा करते हैं वे मंत्र-विद्या से अनजान हैं और ऐसे ही व्यक्ति उसकी बदनामी के कारण होते हैं। मंत्र-विद्या शुभ और कल्याण के कार्यों के लिये ही है और सच्ची श्रद्धा, भक्ति और उपयुक्त विधि से उसमें सफलता मिलती है।
(श्री सदाशिव)
गायत्री को सनातन धर्म में गुरु मंत्र कहा गया है। आज भी देश भर में इसका प्रचार है और प्रायः सभी प्राँतों के पंडित यज्ञोपवीत धारण कराते समय शिष्य को इस मंत्र का उपदेश देते हैं। उनका यह कार्य केवल एक रूढ़ि पूजा के ढंग पर होता है क्योंकि अधिकाँश में न तो वे स्वयं गायत्री की उपासना और साधना करने वाले होते हैं और न शिष्य को उसकी विधिवत शिक्षा देकर उसे साधन-मार्ग में अग्रसर कराने का प्रयत्न करते हैं। यही कारण है कि बहुत समय से लोग गुरु मंत्र का महत्व और उससे लाभ उठाने की विधि को भूल गये हैं। अगर गुरु सच्चे और ज्ञानी हों तो वे इस मंत्र की शिक्षा देकर अपने अनुयाइयों का अपार हित कर सकते हैं। इस विषय में गुरु का महत्व बतलाते हुए अहमदाबाद के ‘प्रज्ञान-मन्दिर’ के संचालक महात्मा सदाशिव जी के निम्न विचार पाठकों को विशेष उपयोगी प्रतीत होंगे।
गुकारस्त्वन्धकारस्यात् रुकारस्तन्निरोधकः। अन्धकार विनाशित्याद गुरुरित्य भिधीयते॥
‘गुकार अर्थात् अन्धकार और रुकार अर्थात् उस अन्धकार को मिटाने वाला प्रकाश, इस प्रकार जो शिष्य में पाये जाने वाले अन्धकार का विनाश करके उसे ज्ञान रूपी प्रकाश देता है वही गुरु कहा जाता है।’
गुरु तीन प्रकार के होते हैं-’क्रियाशक्ति’ प्रधान स्थूल देहधारी लौकिक गुरु-’इच्छाशक्ति’ प्रधान सूक्ष्म देहधारी सिद्धगुरु और ‘ज्ञानशक्ति’ प्रधान कारण देहधारी ज्ञानी गुरु। कितने ही गुरु ऐसे भी हैं जो वंश परम्परा से मंत्र का प्रयोग कर रहे हैं, पर उन्होंने स्वयं साधन द्वारा उसे चैतन्य शक्ति संपन्न नहीं किया वे हैं लोग शक्तिहीन मंत्र का प्रयोग करते रहते हैं जिससे उसका कोई प्रभाव दिखलाई नहीं पड़ता। ऐसे गुरुओं को सूक्ष्म देहधारी-सिद्ध गुरुओं की सहायता नहीं मिलती, जिससे अपना अथवा अन्य लोगों का विशेष उपकार नहीं कर सकते।
साधारण रीति से ‘गुरु’ शब्द का अर्थ ‘भारी’ होता है। उसका विपरीत शब्द ‘लघु’ अर्थात् ‘हलका’ होता है। इस दृष्टि से देखा जाय तो विश्व की समस्त जड़ और चेतन वस्तुएं एक दूसरे के मुकाबले में भारी हलकी सिद्ध होंगी। पर इनमें से किसी भी व्यक्ति या वस्तु के लिये यह नहीं कहा जा सकता कि वह सदैव और प्रत्येक परिस्थिति में गुरु (उपादेय अथवा वन्दनीय) ही है, अथवा कोई व्यक्ति या वस्तु सदैव, प्रत्येक दशा में लघु ही है। इस हिसाब से कोई भी एक व्यक्ति, वह चाहे जितना भी विद्वान, ज्ञानी अथवा बुद्धिमान क्यों न हो, तो भी समस्त जगत का गुरु नहीं बन सकता। इसी प्रकार यदि खास वंश में कोई विशिष्ट पुरुष हो गया हो और बहुत से व्यक्तियों को सत मार्ग दिखलाकर गुरु की वंदनीय पदवी प्राप्त कर गया हो तो उसके आगे वाले शिष्य अथवा पुत्र पौत्रादि भी वंश परम्परा के आधार पर गुरु होने का दावा नहीं कर सकते। जब से हमारे देश में पुत्र-परम्परा अथवा शिष्य-परम्परा से लोग गुरु बनने का दावा करने लगे तभी से उनका आदरमान घटने लग गया और धीरे-धीरे नष्ट प्रायः हो गया। इसके फल से समाज में वास्तविक ज्ञान और ज्ञानी, गुण और गुणी का अभाव होकर भयंकर अंधाधुँधी का साम्राज्य फैल गया।
अगर प्राइमरी स्कूल का कोई शिक्षक अपने शिष्यों से यह दावा करे कि केवल मैं ही गुरु हूँ और तुम लोग मेरे सिवाय और किसी को गुरु मत बनाना तो इसका परिणाम यह होगा कि उसके शिष्य दो-चार दर्जा पढ़कर ही रह जायेंगे, उनमें से कोई बी.ए., एम.ए. न हो सकेगा। इसलिए जो हमको विद्या, बुद्धि प्राप्त करने में जितने अंश तक सहायता दे सके उसे उतने अंशों में गुरु मानना चाहिये। एम.ए. की डिग्री प्राप्त करने तक जितने शिक्षकों और आचार्यों के पास पढ़ा जाय उन सबको ही गुरु के समान मानना चाहिये। जिस प्रकार हमारे माता-पिता एक ही होते हैं और वे ही इस बात का दावा कर सकते हैं, वैसा नियम गुरु के संबंध में काम नहीं दे सकता। हाँ अगर किसी को संयोगवश या भाग्य से कोई दैवी जगत का ज्ञानी गुरु मिल जाय तो उसकी बात दूसरी है, पर जब तक ऐसा अलौकिक गुरु नहीं मिलता तब तक शिष्य को गुरु बदलने का अधिकार भी होता है। शास्त्रों में लिखा है-
आमोदार्थो यथा भृंगो पुष्पातपुष्पादन्तरंग गच्छेत्। विज्ञानार्थो तथा शिरुो गुरु गर्वोन्तरं गच्छेत्॥
अर्थात् ‘जिस प्रकार भौंरा आमोद अर्थात् सुगंधि और मधु के लिए एक फूल से दूसरे, तीसरे फूल में जाता है, उसी प्रकार जब तक शिष्य की जिज्ञासा तृप्त न हो तब तक वह दूसरा, तीसरा गुरु कर सकता है।’ अगर एक ही गुरु से सब प्रकार के ज्ञान की तृप्ति हो जाय तो फिर गुरु बदलने की आवश्यकता नहीं रहती। पर ऐसे उच्च अधिकारी और अलौकिक गुरु कभी भी शिष्य को ढूँढ़ने नहीं जाते, शिष्य ही आकर्षित होकर उनके पास आते हैं। तब भी वे तत्काल शिष्य को स्वीकार नहीं कर लेते, वरन् उनकी जाँच करके ही स्वीकार करते हैं। स्वीकार करने के बाद वे शिष्य के शरीर में शक्तिपात करते हैं जिससे शिष्य में पहले से पाई जाने वाली वासनाएं दूर होने लगती हैं और वह क्रमशः गुरु की इच्छा और आदेश के अनुसार व्यवहार करने लगता है। यह कार्य प्रायः ऐसे ढंग से होता कि शिष्य को खबर भी नहीं पड़ती वह अपने को स्वतंत्र स्वाधीन समझता रहता है, पर मंत्र उस पर निरन्तर प्रभाव डालकर उसे बदलता जाता है। शिष्य की जितनी इच्छायें और प्रवृत्तियाँ गुरु के विपरीत होती हैं, वे तरह-तरह के उपायों से दूर हो जाती हैं और अन्त में वह पूर्णतया गुरु की आज्ञाधीन उनका अनुवर्ती हो जाता है। इसीलिये कहा गया है कि मनुष्य अगर प्रयत्न करे तो कभी-कभी बाघ के मुँह में से भी छुटकारा पा जाता है पर अलौकिक शक्ति सम्पन्न गुरु जिसको एक बार पकड़ लेते हैं, अर्थात् स्वीकार करके शरण में ले लेते हैं, वे शिष्य हजार प्रयत्न करने पर भी उनसे छूटकर अलग नहीं हो सकते, अर्थात् वे गुरु की कल्याणकारी इच्छा के विपरीत अकल्याणकारी मार्ग पर नहीं चल सकते इसके उद्देश्य की पूर्ति के लिये गुरु तरह-तरह विचित्र उपाय भी करते हैं। इसलिये साधारण मनुष्यों के उचित है कि यदि गुरु का कोई व्यवहार उनकी समझ में न आवे अथवा उलटा जान पड़े, तो वे तुरन्त ही उनके विषय में भली-बुरी कल्पना न कर बैठें। जीवतत्व, ईश्वर तत्व भाग्य तत्व की अपेक्षा भी गुरु और गुरुतत्व अधिक गहन, गंभीर है।
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार मंत्र की महिमा बहुत अधिक है और हमारे पूर्वज अति प्राचीन काल से इसका प्रयोग करके आत्म कल्याण और परमार्थ करते रहे हैं। अब भी करोड़ों व्यक्ति नियमित रूप से मंत्र जपते रहते हैं, परंतु मंत्र-रहस्य और मंत्र-विज्ञान से ठीक-ठीक परिचित न होने से यथोचित फल प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिये वे बार-बार मंत्र को बदलते हैं, गुरु को बदलते हैं और अंत में निराश होकर मंत्र को त्याग देते हैं और साथ-साथ मंत्र, शास्त्र तथा मंत्र वेत्ता गुरुओं की मूर्खता पूर्ण निन्दा और चर्चा करने में लग जाते हैं। यह सब इसी कारण होता है कि वे अपने उपयुक्त गुरु प्राप्त करने में सफल नहीं होते। अगर वे सच्चे गुरु द्वारा मंत्र के जप व साधन का ठीक मार्ग जान सकें तो वे भी प्राचीन काल के धर्मात्मा लोगों के समान संसार में सुखपूर्वक रहते हुए भी परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं। हमारे देश के वैदिक काल के ऋषि-मुनि अधिकाँश में गृहस्थी ही थे और लौकिक कार्यों में लगे रहते थे, तो भी वे ‘सत्यं’ और ‘शिवं’ में संलग्न रह कर ‘सुन्दर’ जीवन बनाने का मार्ग बतला गये हैं। अगर अब भी हमारे गुरुओं और शिष्यों द्वारा उस वेद-विज्ञान सम्मत विधि-विधान और अनुशासन को शिरोधार्य करते हुये जीवन निर्माण किया जाये तो इस मायामय संसार और भौतिक पदार्थों का यथावत भोग करते हुए आनन्दमय, कल्याणकारी जीवन को प्राप्त किया जा सकता है।
(प्रोफेसर अवधूत)
गुरुमंत्र गायत्री में सम्पूर्ण जड़-चेतनात्मक जगत का ज्ञान बीजरूप से पाया जाता है। मस्तिष्क के मूल में से जो मुख्य 34 ज्ञान तंतु निकल कर मनुष्य के देह तथा मन का संचालन करते हैं उनका गायत्री के 24 अक्षरों से सूक्ष्म से सूक्ष्म संबंध है। गायत्री के अक्षरों के विधिवत उच्चारण से शरीर के भिन्न-भिन्न स्थानों में पाये जाने वाले सूक्ष्म चक्र, मातृका, ग्रंथियाँ, पीठस्थान आदि जागृत होते हैं। जिस प्रकार टाइपराइटर मशीन पर उंगली रखते ही सामने रखे कागज पर वे ही अक्षर छप जाते हैं, उसी प्रकार मुख, कंठ और तालु में छुपी हुई अनेक ग्रंथियों की चाबियाँ रहती हैं। गायत्री अक्षरों का क्रम से संगठन ऐसा विज्ञानानुकूल है कि उन अक्षरों के उच्चारण से शरीर के उन गुप्त स्थानों पर दबाव पड़ता है और वे जागृत होकर मनुष्य की अनेक सुषुप्त शक्तियों को कार्यशील बना देते हैं।
गायत्री मंत्र के भीतर अनेक प्रकार के ज्ञान विज्ञान छुपे हुये हैं। अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्र शस्त्र, बहुमूल्य धातुएं बनाना, जीवन दात्री औषधियाँ, रसायन तैयार करना, वायुयान जैसे यंत्र बनाना, शाप और वरदान लेना, प्राण-विद्या, कुँडलिनी चक्र, दश महाविद्या, महा मातृका, अनेक प्रकार की योगसिद्धियाँ गायत्री-विज्ञान के अंतर्गत पाई जाती हैं। उन विद्याओं का अभ्यास करके हमारे पूर्वजों ने अनेक प्रकार की सिद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। आज भी हम गायत्री साधना द्वारा उन सब विद्याओं को प्राप्त करके अपने प्राचीन गौरव की पुनर्स्थापना कर सकते हैं।
गायत्री सनातन अनादि काल का मंत्र है। पुराणों में बताया गया है कि ‘सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी को आकाशवाणी द्वारा गायत्री मंत्र की प्राप्ति हुई थी। उसी मंत्र का साधन करके उनको सृष्टि रचने की शक्ति मिली थी। गायत्री के जो चार चरण प्रसिद्ध हैं उन्हीं की व्याख्या स्वरूप ब्रह्माजी को चार वेद मिले हैं और उनके चार मुख हुये थे। इसमें संदेह नहीं कि जिसने गायत्री के मर्म को भली प्रकार जान लिया है उसने चारों वेदों को जान लिया।’
गायत्री साधना करने से हमारे सूक्ष्म शरीर और अन्तःकरण पर जो मल विक्षेप के आवरण जमे होते हैं वे दूर होकर आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है। आत्मा के शुद्ध स्वरूप द्वारा ही सब प्रकार की समृद्धियाँ और सम्पत्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं। दर्पण की तरह आत्मा को शुद्ध बनाने से उसके सब प्रकार के मल दूर हो जाते हैं, और मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल, प्रकाशवान बनकर परमेश्वर की समस्त शक्तियों, समस्त गुणों, सर्व सामर्थ्यों, सब सिद्धियों से परिपूर्ण हो जाता है।
गायत्री के तत्त्वरूप 24 वर्णों में 24 प्रकार की आत्मतत्व रूपता स्थित है। चौबीस तत्व के बाहर और भीतर रहकर उसे अपने अन्तर में स्थित करने से मनुष्य ‘अन्तर्यामी’ बन जाता है। सब ज्ञानों में यह अन्तर्यामी विज्ञान सर्वश्रेष्ठ है, जो गायत्री की साधना द्वारा ही प्राप्त होता है।
जो आत्मा के भीतर है और आत्मा के बाहर भी विद्यमान है, जो आत्मा के भीतर और बाहर रहकर उसका शासन करता है, वही वास्तविक आत्मा है, वही अमृत है, वही अन्तर्यामी है। सर्वांतर्यामी आत्मा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आयतन अर्थात् प्रतिष्ठा है, ऐसा निश्चय होने के पश्चात ब्रह्माण्ड के 24 तत्वों का आकलन करना संभव हो जाता है। इस प्रकार अन्य सब विज्ञान अन्तर्यामी विज्ञान से न्यून श्रेणी के हैं। इस बात की पुष्टि में ‘योगी याज्ञवलक्य’ में कहा गया है कि ‘जो स्वयं अदृष्ट, अश्रुत, अमूर्त, अविज्ञात है वही अन्तर्यामी है, वही अमृत स्वरूप है और इसी कारण वह तुम्हारे मेरे और अन्य सब के आत्माओं का पूज्य है। हे गौतम! इस विज्ञान के अतिरिक्त जो अन्य विज्ञान हैं वे सब दुःखदायी हैं। अन्तर्यामी का विज्ञान ही यथार्थ विज्ञान हैं। गायत्री जिन चौबीस तत्वात्मक विज्ञानों का बोध कराती है वे इस अन्तर्यामी विज्ञान के सहायक होने से ही श्रेष्ठ हैं।
अन्तर्यामी ब्रह्म का तत्वबोध कर लेना कोई साधारण काम नहीं है, क्योंकि यह विषय बहुत ही सूक्ष्म है। स्थूल शक्तियों का विचार करने वालों के लिये उसका यथार्थ बोध हो सकना असंभव ही है। योग के आचरण से बुद्धि को सूक्ष्म बनाकर सविचार और निर्विचार समापत्ति द्वारा (चित्त जिस विषय में संलग्न होता है और स्फटिक मणि जैसा प्रतीत होता है उस तदाकारापत्ति को ही ‘समापत्ति’ कहा जाता है) सूक्ष्म विषयों की प्रतीति की जाती है। सूक्ष्मता की अवधि अलिंग तक होती है, अलिंग ही सर्व प्रधान तत्व है। जिसका किसी में लय हो सके ऐसा कोई तत्व ही जहाँ नहीं हैं, अथवा वह किसी के साथ मिल सके ऐसा भी कुछ जहाँ शेष नहीं रहता, वहीं प्रधान तत्व होता है। समापत्ति के विषय को समझाते हुये योग शास्त्रकार ऋषियों ने कहा है कि ‘स्थूल अर्थों में अविमर्क, और निर्वितर्क और सूक्ष्म अर्थ में सविचार और निर्विचार, इन चार प्रकार की समाधियों की आवश्यकता होती है, और इस समाधि की सूक्ष्मता आलिंग प्रधान तक होती है। इस समापत्ति से 24 तत्व रूपावस्था जानने में आती हैं।
हिरण्य गर्भ जैसा सूक्ष्मतर अथवा अन्तर्यामी तत्व जानना हो तो उस सुख स्वरूप परमात्मा को योगाभ्यास द्वारा प्राप्त करना ही परम पुरुषार्थ है। इसके लिये गायत्री के 24 अक्षरों से प्राप्त अति सूक्ष्म ज्ञान सर्वाधिक श्रेष्ठ है।
(डॉ. चमनलाल)
हमारे पूज्य ऋषि मुनियों का कहना है कि गायत्री से बढ़कर आत्मा को पवित्र करने वाला कोई भी जप, तप, अनुष्ठान एवं हवन नहीं है क्योंकि गायत्री साधना आरम्भ करते ही साधक के मनः क्षेत्र में एक ऐसी अद्भुत हलचल मचाने लगती है कि उसके अन्तःकरण में जमे हुए बुरे विचारों, स्वभावों और भावनाओं की जड़ें उखड़ने लगती है। जहाँ गायत्री रूपी प्रकाश पहुँचा जाता है वहाँ दुर्विचार रूपी अन्धकार का रहना सम्भव नहीं होता। गायत्री सतोगुणी शक्ति है, वह साधक को तमोगुण व रजोगुण से ऊंचा उठाकर सतोगुण की ओर ले जाती है। गायत्री हमारे मन व बुद्धि को पवित्र करती है, आसुरी विचारों व कार्यों से करती है, झूठ, छल, कपट, दम्भ, बेईमानी, घुस, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष आदी राक्षसी वृत्तियों से मुक्त करके सत्य, प्रेम, न्याय, दया, सहानुभूति, ईमानदारी, नम्रता आदी दैवी गुणों के दर्शन कराती है क्योंकि गायत्री साधक के मन में निरन्तर यह विचार उठते रहते है कि उसे कौनसा कार्य करना चाहिए और कौनसा नहीं। वह उचित अनुचित व न्याय अन्याय पर पूरी तरह से विचार करके ही कोई कार्य करता है। अच्छे को ग्रहण करना और बुरे को त्याग करना चाहिए, इस तथ्य को सभी लोग भली प्रकार से जानते हैं परन्तु अपने मनोबल की कमी के कारण उसके अनुसार चलना कठिन प्रतीत होता है। चूँकि गायत्री साधना का प्रभाव सीधे अन्तःकरण पर पड़ता है, इसलिए तमोगुण व रजोगुण के कम होने से, विचारों में पवित्रता व दृढ़ता आने से मानसिक निर्बलताओं का ताना बाना टूट-फूट जाता है। मनोबल से सम्पन्न गायत्री साधक कभी भी अपने मार्ग से विचलित नहीं हो सकता। काँचन और कामिनी उसे डिगा नहीं सकते। पराये धन को वह धूल बराबर समझता है। नारी मात्रा को पवित्र दृष्टि से देखता है। साराँश यह कि विवेक बुद्धि की प्राप्ति होने से वह कोई अनुचित कार्य नहीं कर पाता।
विवेक बुद्धि इतनी बड़ी संपत्ति है कि संसार की बड़ी से बड़ी संपत्तियां उसकी समता में तुच्छ हैं। धनवान अपने धन द्वारा संसार की सभी भौतिक सामग्रियां एकत्रित कर सकता है परन्तु उससे वह सुख-शान्ति नहीं प्राप्त कर सकता। उसे हर समय भय और चिंताएं घेरे रहती है। वह अवगुणों का भण्डार बन जाता है। भोग विलास में पड़कर वह अपनी जीवन नाव में पत्थर डालता रहता है। भोग वासनाएं उसके विचारों को स्थूल व मलिन बनाकर अन्धकार से कूप में पटक देती हैं। इस दीन हीन दशा में पड़ा रहकर बेचारा जिन्दगी के दिन किसी प्रकार से काटता रहता है। उसकी बुद्धि स्थूल हो जाती हैं, वह कोई अच्छी बात सोच नहीं सकती। शरीर को सजाना और अच्छा खाना पीना ही उसके जीवन लक्ष्य रह जाते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वह दूसरों का खून चूसता है, उन पर अत्याचार करता है, तरह-तरह के षड़यन्त्र रचता है, अनुचित व अन्याय पूर्ण उपायों से काम लेने में तनिक भी नहीं हिचकिचाता। “बाप भला न भैया सबसे भला रुपया” यही उसका पूजन किया करता है। वह धन को ही अपना आराध्य देव मानने लगता है। ऐसा पूजन हमें भौतिक पाश्चात्य संस्कृति के मानने वाले स्कूल शरीर को ही सब कुछ समझते हैं, उसी के लिए जीते और उसी के लिए मरते है। उसी की सुख सुविधाओं को बढ़ने में अपनी उन्नती मानते है। भौतिक उन्नती में यह बहुत आगे बढ़ गये है और बढ़ाते जा रहे है परन्तु वास्तविक सुख शान्ति उनसे उतनी ही दूर होती जा रही है।
भारतीय ऋषियों ने इस तथ्य को लाखों वर्ष पहले से ही भली प्रकार समझ लिया था। वह स्थूल से सूक्ष्म वस्तुओं को अधिक महत्व देते थे। उनकी खोजों का आधार भौतिक वस्तुओं वस्तुएं न रहकर सूक्ष्म तथ्य होते थे। यह कहना अनुचित होगा कि उनकी बुद्धि क्षमता आज के आविष्कारकों से कम थीं। वह यदि चाहते तो इनसे भी बढ़कर भौतिक खोजें कर सकते थे (और उस समय के रावण जैसे भौतिक वादियों ने की भी थीं) परन्तु वह भौतिक वस्तुओं में उलझ कर अपने जीवन को अशान्त व निरर्थक नहीं बनाना चाहते थे। वह हमारे लिए हम धन्य हो रहे हैं, वह ऐसे रतन प्रदान कर गये है जिन्हें पाकर हम अपने आपको कुबेर से कम नहीं समझते। ऐसे रत्नों में सर्वश्रेष्ठ गायत्री है जो हमें विवेक बुद्धि की सूक्ष्म अपार धन राशि प्रदान करती हैं। इसकी जगमगाहट से अन्धकार रूपी अवगुण सब भाग जाते है और दैवी गुणों को ही वास्तविक संपत्ति बताया है। इसी संपत्ति को पाकर हम अपने जीवन को सार्थक और सुखी बना सकते है।
आज भौतिक धन के धनी तो बहुत देखने में आते हैं परन्तु दैवी गुणों से सम्पन्न धनवान बिरले ही विश्वामित्र, वशिष्ठ, मनु गौतम, व्यास, अत्रि, शंकराचार्य, दयानन्द, बुद्ध, कबीर, नानक, तुलसीदास, सूरदास जैसे धनवान होते थे, तभी वह जगत में श्रेष्ठ था। आज ऐसे धनवानों की कमी है। भारत दीन-हीन हो गया है। इसकी दीनता दूर करने के लिए ही अ. भा. गायत्री- परिवार ने गायत्री व यज्ञ का आन्दोलन छेड़ा है। भारत के प्रत्येक नर-नारी के मन में सद्बुद्धि रूपी गायत्री और त्याग मय प्रेम रूप यज्ञ को स्थापित करना हमारा उद्देश्य है। गायत्री तपोभूमि ऐसी भट्टी है जहाँ ऐसे धनवान पारसमणि के समान बन जाता ह, वह हजारों को धनवान बनाता है। हजारों गायत्री उपासकों से हमारा व्यक्तिगत संपर्क है। अपने और उनके अनुभवों के आधार पर हम विश्वास पूर्वक कह सकते हैं कि गायत्री माता की दिव्य शक्ति द्वारा साधक भौतिक व आत्मिक सब प्रकार की उन्नती करता हुआ सुख-शान्तिमय जीवन व्यतीत कर सकता है।
(श्री विक्राल बेंकटाचार्य, प्रधानोपाध्यायः वेदान्त संस्कृत पाठशाला, श्री रंगापुरम्)
नमस्तेस्तु मातस्स्मस्तेश्वरेशे,
स्वमस्ते सुमस्तोमवत्तेऽड्घिमूहे।
श्रमस्तान्न में त्वज्जपारौ कृपालो,
भ्रमोपि प्रमा स्यात् प्रमेये दृशाते॥1॥
‘समस्त ईश्वरों की अधीश्वरी हे माता, तुम्हें प्रणाम। मेरे मस्तक पर मैंने आपके पादारविन्द पुष्प के समान धारण किये हैं। हे दयालु, तेरे जपादि स्मरण करते समय मुझे श्रम न जान पड़ना चाहिये। तेरे कृपा कटाक्ष द्वारा मुझसे हुए भूल भी सत्य हो।’
श्रुत्यन्तसंचारि विनोदकारि विसारि धीरे क्षणसद्विलासैः। श्रुत्यम्ब लीला न्तनुषे त्वमेका अमोघ मंत्रा सकल स्वतंत्रा॥ 2॥
‘हे वेदमाता! तू वेदान्त में संचार करने वाली विनोदकारी, व्यापनशील, गंभीर दृष्टि विलासों से, अमोघ मंत्रों से युक्त, सकल स्वातंत्र्य शालिनी आप अकेली ही लीलाएं कर रही हैं।’
यदि भय मभविष्यं दत्र मातः सपदिशिवेट शमयिष्य एवतन्मे।
सुमहसि हृदि मेत्वयि प्रदीप्ते मभवति किन्नु तम स्समीप मेतुम्॥ 3॥
‘हे माता यहाँ मुझे भय यदि प्राप्त हो तो हे मंगलकारिणी तू उससे अवश्य ही हर सकती है। आप मेरे हृदय में रत्नदीप सम जगमगा रही हों फिर अंधकार को सम्मुख आने का क्या साहस होगा?’
याव त्पश्चिमद्ग्विधूः स्ववदने शोणं रवे मण्डिलम् धत्तेचारु विशेषकं व विपुलं काश्मीरजं वर्तुयम्॥ तावत्तेऽम्ब ददेऽर्ध्य मञ्चलि भृतैः स्वच्छैर्मनोहारिभिःस्वर्णाऽम्भोज मरन्द सौरभ युतै स्त्रित्स्वर्धुनीकारिभिः॥4॥
‘जब तक पश्चिम दिशा सुन्दरी रक्तवर्ण सूर्य बिंब को अपने भाल पर सुन्दर, वर्तुलाकार गोल और विशाल कुँकुम तिलक धारण करती है तब हे माता अंजिल में भरे हुए स्वर्गंगा के संबंधित निर्मल मनोहर, स्वर्ण पद्म के मकरंद से सुगंध से युक्त नीर से तीन बार अर्घ्य प्रदान करता हूँ।’
निशा नटय्या पुष्पाञ्जलि रिव विकीर्णो हरिपदे चकास त्तारौधो न विलय मयं याव दयते त्रिरर्घ्यं तावत्तेऽण्जलिभृतमनून्मन्त्रित जलैरर ददेऽम्बाऽऽर्के बिम्बे कृत वसतये सिद्धकृतते॥5॥
‘यह रात एक नर्तकी है। वह अंजिल में धारण किये हुए और विष्णुपाद पर अर्थात् गगन में अर्पित किए हुए पुष्प अर्थात् नक्षत्रों का अस्तमान समय जब तक नहीं होता उस समय सूर्य मण्डल में निवास करने वाली, संकल्पित कार्यों को पूर्ण करने वाली ऐसे तुझको अंजलि में भरे हुए अभिमंत्रित जल से तीन बार अर्घ्य प्रदान करता हूँ॥ 5॥
अम्बाऽर्कबिम्बान्तरुपेयुषि त्वाँ बिम्बोष्ठि कम्बुप्रतिबिंब कंठि। स्तम्बे रमास्यादि सुराभि बन्द्म जाम्बून दालंकरणेऽवलम्बे। 6।
सूर्य बिम्ब में रहने वाली, बिम्ब फल के समान ओष्ठ वाली, शंख के समान कंठ से युक्त, गणेशादि देवताओं से पूजनीय और सुवर्णमय आभूषण धारण करने वाली हे माता, ऐसे तुझको मैं शरणागत हूं॥”
वन्दारुवृन्दारकवृन्दकोटि किरीट माणिक्यमरीचिवीचिः। नीराजयत्यम्ब तवाऽघ्रिपद्मे स्वाराज्य भाग्यश्रियूर्जयन्ती।7।
‘हे माता तेरे पादपद्म जी त्रैलोक्य राज्य लक्ष्मी को अभिवृद्धि करने वाले ऐसे हैं, उसे कोटि देवता जो तुझे नमस्कार करते हैं, उनके किरीटों में लगे हुये माणिक्य कांति परंपरा द्वारा मंगल आरती किए जैसे हैं।’
उपेयिवाँसि सेवार्थं हृन्दी वाऽद्धगनि भेजुषाम्।
पुरो विसृत्वरा भान्ति ययो र्नखमरीचयः॥8॥
‘हे माता! तेरे पादपद्म की नखकान्ति इतनी तेजस्वी है कि जान पड़ता है। सर्व भक्तों के मन तेरे पाद सेवा करने को उसके अग्रभाग में आकर स्थित हैं।’
कान्त्ये वाऽधः कृतं पद्मं हेमपीठ मधिष्ठितम्। अलंकरिष्णू श्रीमत्याः पादौ ते देवि संश्रये॥9॥
हे माता, तेरे चरणों के नीचे रखा सुवर्णापीठ ऐसा जान पड़ता है जैसे कि आपके पादपद्म काँती द्वारा प्रपंच के सर्व पद्मपुष्प हार कर तेरी शरण में आकर, तेरी पाद सेवा करने आकर पादपीठ रूप धारण किए हुए हैं। उसे अलंकृत करने वाले तेरे चरण को मैं नमस्कार करता हूँ।’
सायं प्रातर्जगद्वन्दो चक्षुषो र्विषयोऽसि मे। त्वदंग सुषमा शोणा महती य त्तदेक्ष्यते॥ 10॥
‘प्रतिदिन सायं और प्रातः समय में जगद्वंदनीय ऐसी तू हमें दर्शन देती है। वह कैसे? प्रातः और सायं प्रतिदिन जो आपकी रक्तवर्ण शरीर छाया हमें गोचर होती है वही
तेजः पुञ्जान्तरे भाति दिव्या ते मूर्ति रद्भता। मनोऽनुसंहितं मंत्र मनुद्यन्ती मनोहरा॥11॥
उस तेजः पुँज जैसे काँती के मध्य में आश्चर्यकारी और दिव्य जैसा आपका स्वरूप मुझे आपका मंत्रोच्चार दिल में करते ही हृगोचर होता है।
उपाहिताग्नि सूर्येन्दु मंडले प्रणवासने। सुखासीनाँ सुप्रसन्नाँ त्वाँ मातः सुमुखीं भजे॥ 12॥
‘प्रणव पीठ पर अग्नि मंडल, उस पर सूर्यमंडल और उस पर चन्द्रमंडल जैसे उस पर तू अनुग्रह युक्त, संतोष से, प्रसन्नता से विराजमान है, ऐसे तुझको मैं शरणगत हूँ।
यद्रुपा परिचिन्त्यथेऽम्ब भवती तद्रुपिणी दृश्यते। ने दृक ते निजरुप मेतदिति के प्यावेदितुँ शक्नुयुः॥ तादृकत्व त्करुणा विशेष कलित प्रजाऽऽत्मविद्भिर्यथा। निध्याताकृति रात्मनाऽञ्च्सि तथा लीलाविहारोत्सुका॥ 13॥
‘हे माता! भक्तगण जो जिस रूप को मानकर तुझे भजते हैं वैसे ही तू उन्हें दर्शन, देती है। इससे तेरा स्वरूप यही है, इस प्रकार का है ऐसा कहने के लिये कोई भी समर्थ नहीं है। कोई भी तेरे निज स्वरूप को जानने में समर्थ नहीं है। तेरे कृपा दृष्टि को प्राप्त होकर आत्मज्ञान संपादित करके जो पंडित तुझे भजते हैं और उन्हें तू जिस स्वरूप में दिखाई दी है उसी स्वरूप से तू संसार में बिहार कर रही है।
करैष्य वंद्य निजतत्व रहस्य रूपाँ-नियाद्भुता मृत चिदात्मसुख स्वरूपाम्। दिग्व्यापि निर्मल निराकुल चित्प्रकाशाँ त्वाँ पूर्णिमेन्दुमिवदेवि भेजे सुपूर्णाम्॥ 14॥
‘तेरे निज रूप का कोई भी रहस्य नहीं जान सकता। तेरा स्वरूप नित्य, अद्भुत, अमृत-सा, ज्ञान, रूप, आत्मरूप और सुखरूप है। आपकी काँति चाँदनी जैसी दिग्व्यापि, निर्मल, निराकुल, ज्ञानरूप है ऐसी तुझको मैं सेवा करता हूँ।’
वेदमात रविद्याँमे निवर्तय मनोवृतिम्। येन विद्या समग्रस्सन् विद्यासमखिलं जगत्।15।
‘हे वेदमाता गायत्री तुझे मेरे मन को आच्छादन करने वाली अविद्या को निवारण करना चाहिए जिससे मैं विद्या से परिपूर्ण होकर सब संसार को जान लूँ।’
पुरस्सरीमे पुरुषार्थदात्री, मित्री भवित्री भजता मवित्री। पवित्रयन्ती सुपदक्रमैर्गां सवित्रि वेलार्चिंत् ॐ नमस्ते॥ 16॥
‘मेरे सम्मुख चलने वाली, पुरुषार्थ देने वाली, मित्र होने वाली भक्तों को रक्षण करने वाली, सुन्दर चरणों के विन्यास से भूतल को और सुन्दर वचनों की रचनाओं से वाणी को पवित्र करने वाली, याज्ञिकों से त्रिकाल पूजित हे माता प्रणव स्वरूप तुझको नमस्कार।
ओजश्शक्ति बल प्रभाव सुषमा लेजस्सु वीर्यप्रभा। ज्ञानैर्श्वय महस्सहो जययशस्स्थैर्य प्रतिष्ठा श्रियः विज्ञान प्रतिभा मतिस्मृतिधृति प्रज्ञाप्रथास्सुज्वलाः वर्णेस्त्वन्मानुगै स्त्रिरष्टभि रहो वर्ध्यन्त एवात्र मे॥
‘ओज, शक्ति, बल महिमा, काँति, तेज, पराक्रम, प्रकाश, ज्ञान, ऐश्वर्य, विकास, सहन शक्ति, जय, कीर्ति, स्थिरता, प्रतिष्ठा, लक्ष्मी, विज्ञान, प्रतिभा, मति, स्मृति, तृप्ति, प्रज्ञा, ख्याति, यह चौबीस गुण हे माता तुम्हारी मंत्र में रहने वाले चौबीस वर्णों द्वारा मुझ में अभिवृद्धि पा रहे हैं।’
रत्नस्तम्भ सहस्र केसर परिश्रेणी विराजत्सभा नूत्नाव्जोन्नत कर्णिकायित महासिंहासनाध्यासिनी देवित्वं शरदिनदु सुन्दरमुखी स्मेरेक्षण ज्योत्स्नया भिन्दाना सकलस्य सन्तमससन्तापान् स्वयं राजसे॥
‘हे माता! सभा जो कि पद्म समान है और सभा स्तम्भ रत्नों के हैं। इस सभा में वे हमारों की पंक्ति में हैं यही उस पद्म के केसर है और सभा में सिंहासन अर्थात् पद्म की कर्णिका पर तुम विराजमान हो। शरत्काल पूर्णिमा के चन्द्रमा समान सुन्दर वदन वाली, मंद हासयुक्त प्रसन्न, चाँदनी जैसी दृष्टि से सब लोगों के अज्ञान, कष्ट निवारण करने वाली जैसी तू स्वयं प्रकाशित हो रही है।’
नाना नाम तनु प्रभेद बहुधा विस्तारि लोकाकृतिः माणिक्य प्रतिमेव मंगल तरैः, क्षेमंददाना करैः साक्षाद देवगवी व संश्रित जनस्यो च्चैर्दुहानेप्सिता न्यक्षय्याऽसि शुभश्रियाँनिधि रहो गायत्रि तेजोनिधे॥
हे माता! विविध नामों से, शरीरों से और अभेदों से बहुत विस्तारशाली यह लोक ही तेरी आकृति है, स्वरूप है। माणिक्य प्रतिमा के दिव्य काँती जैसे सुखदायक होती है उसी प्रकार तेरे आश्रितों को तू इष्टार्थ, कामना पूर्ण करती हो। हे गायत्री देवी तुम शुभ संपदा के लिए एक अक्षय तेजोन्धी हो।’
पादौ ते कलयामि तौ कमलभौ कम्रौ कणन्नूपुरौ। देवेन्द्रादि किरीटरत्न रुचिभि नींराजितौ पूजितौ॥ लोकेशीकृत वन्दमान जनता प्रार्थ्यांर्हसेवा क्षणौ। याभ्या मध्युषिताऽब्जरागमयवत् स्फाटिक्यभूत् पीठिका॥ 20॥
हे माता तुम्हारे पाद! कमल के काँती के भाँति सुन्दर ध्वनियुक्त नूपुरों द्वारा सुशोभित और देवेन्द्रादि देवताओं के द्वारा पूजित होते समय उनके किरीट रत्न काँती द्वारा आरती पाने वाले और तेरी कृपा द्वारा लोक प्रभु बने हुए तेरी चरण सेवा करने झुँड बनकर आये हुए हैं। किन्तु उन्हें उचित समय प्राप्त न होने के कारण तेरे पाद सेवाभिलाषी चरण सेवा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे तेरे चरणों को और स्फटिक पादपीठ जिस पर तुम्हारे चरण काँती पड़ने से वह पीठ पद्मराग समान दिखाई देता है ऐसे उन चरणों को मैं वंदना करता हूँ।’
यथैव में त्वं जनयित्री वाञ्छेस्तथा कृषाीष्ठा मुदमेमी तेन।ममाऽविदो वाँछिततोप्यभिज्ञे प्रेयो महीयस्तव वाञ्छितंहि॥ 21॥
हे माता तू जिस प्रकार चाहे उस प्रकार मुझे वरदान दे। उसी से मैं संतुष्ट हो जाऊंगा। क्योंकि मेरे जैसे ना समझ और लोप युक्त वरदान के पक्ष में तू ही समस्त जानने वाली हो। तेरा स्वयं तक दिया हुआ वरदान ही श्रेयस्कर होता है। उसी से मुझे संतोष है।
ज्ञानध्यानजपार्चनास्तुतिमतिप्रीतिप्रपत्यादिभिर्। बाह्यान्तः करण प्रवृत्तविविधोपास्यानुकूलक्रमैः॥ भूयोनामवषुः प्रकल्पित जगाद्विख्यात दिव्याद्भुत। व्यापाराँ भवती भजे भगवतीं गायत्रि ओजोमर्याम्॥
हे माता मैं ज्ञान, ध्यान, जप, पूजा स्रोत, पढ़कर स्मरण मनन करके, प्रेम द्वारा और सर्व भी तेरे लिए त्याग करके इस प्रकार बाह्यन्तःकरण के अनेक उपासना पद्धति द्वारा मैं तुझे पूजता हूँ और तू अनेक नाम धारण कर अनेक शरीर धारण कर प्रपंच में प्रसिद्ध और दिव्य और आश्चर्य कारक अनेक कार्य किये हुए ऐसी चरित्र वाली हे भगवती ओजमयी गायत्री तुझे नमस्कार है।
विश्वस्य भजतोमेऽद्य विश्वश्रेयः प्रदायिनी। आश्वासयान्तरात्मान माश्वाविर्भूयभूयसि॥23॥
हे गायत्री माता मैं तुझ पर विश्वास रखता हुआ तेरा मनन कर रहा हूँ और हे माता सब को सफल सुख प्रदान करने वाली तू मुझे शीघ्र ही प्रत्यक्ष होकर संतृप्ति कर।
सहायोमेऽत्र भूयात्ते सुमहन्मञ्जुलंमहः। वेदमातः प्रमातीतं सर्व कार्य धुरन्धरम्॥24॥
हे माता तेरा अभाव इतना उतना ही नहीं है किन्तु सर्व कार्य को आगे आकर करने वाली ऐसी तेरी शक्ति है। ऐसी तेज शक्ति मुझे इस संसार में हर प्रकार से सहायकारी हो।’
(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम.ए., पी.एच.डी.)
मनुष्य की शक्ति किसी एक ही दिशा में बह सकती है। यदि उसे चाहें तो साधारण कार्यों या निम्नकोटि की वासनाओं की पूर्ति में व्यय किया जा सकता है। संचित शक्ति का उपयोग नित्य प्रति की साधारण जरूरतों में किया जा सकता है। झूठ बोलना, चोरी करना, निन्दा करना, व्यभिचार करना, हत्या करना, क्रोध और घृणा इत्यादि सब निम्न कोटि की वासनाओं में हमारी संचित उत्पादक शक्ति का व्यय होता है। कुविचार, कुसंस्कार और दुखदायी मानसिक क्लेशों में आपकी ताकत खर्च होती जाती है, यद्यपि हमें उसका पता नहीं चलता। समस्त पाप को भावनाएं शक्ति क्षय करती हैं। संसार में जितने पाप, अकर्म, दुर्व्यवहार मौजूद हैं, तमोगुण के पाप के जो भी चिन्ह है- आलस्य, प्रमोद, अकर्मण्यता, गंदगी, कुरूपता, निराशा, दुर्बलता, जड़ता, अज्ञान, हिंसा, कठोरता, निष्ठुरता पेटूपन इत्यादि- सब में निश्चय ही आपकी उत्पादक शक्ति का व्यय होता रहता है। स्वयं ही हमारी रचनात्मक शक्तियाँ नष्ट होती रहती हैं और हम कोई बड़ा और उपयोगी कार्य नहीं कर पाते।
निम्न कोटि के कार्यों में ही सदा को अपने उलझाये रखना एक प्रकार का अज्ञान है- भारी मूर्खता है। मनुष्य को सदा यह ध्यान रखना चाहिए कि कौन-कौन कर्म ऊंचे हैं? किस किस को करने से उसका और उसके साथियों का अधिक से अधिक लाभ हो सकता है? समाज की अधिक से अधिक सेवा और उत्थान हो सकता है, यही जीवन का सदव्यय है। आज जो समाज में पाप और कष्टों की अधिकता दिखाई देती है, उसका कारण उचित अनुचित का यथेष्ट ज्ञान न होना ही है।
वस्तुतः विद्वान और भाग्यवान वही है जो स्वयं उच्च सामर्थ्यों का विकास करता है, उच्च कार्यों जैसे ज्ञान प्राप्ति, क्रिया शीलता, उत्साह, उपार्जन, निर्माण, सहयोग, सेवा आदि पुण्य, धर्म और सतोगुणी वृत्तियों में अपनी शक्तियों को खर्च करता है। इन सतोगुणी कार्यों में बहने से शक्तियों का स्वयं विकास भी होता है और स्वयं उसे तथा समाज को दुगुना चौगुना लाभ भी होता है।
हम यह नहीं मानते कि अब भी समाज में दुष्कर्म अधिक है। हमारी तो यही मान्यता है कि अब भी सत्य, प्रेम, न्याय और भलाई ही अधिक है। निष्ठुरता से दया अधिक है, स्वार्थ की अपेक्षा सहयोग अधिक है, जड़ता से सतर्कता अधिक है, गंदगी से सफाई अधिक है, कुरूपता से सौंदर्य अधिक है, निराशा से आशा अधिक है, दुर्बलता से सशक्तता अधिक है, अज्ञान से विवेक अधिक है, द्वेष से प्रेम अधिक है और कठोरता से माधुर्य अधिक है। यदि ऐसा न होता तो हमारा समाज आज नष्ट हो जाता। वह तो बड़ी संख्या वाले पुण्यात्मा, और सात्त्विक प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों पर ही टिका हुआ है।
अपनी शक्तियों को निम्न कोटि के कार्यों से सदा रोकना ही उचित है। हो सकता है आपकी प्रकृति में कुछ बुरी प्रवृत्तियाँ छिपी हुई हों, कुछ निम्न वासनाएं और क्षुद्र स्वार्थ हों। जीवन का आपने दुरुपयोग किया हो। जो लोग जीवन को निरर्थक, अनुचित और अनुपयोगी कार्यों में खर्च कर रहे हैं, उन्हें मृत्यु के उस क्षण का तनिक भी पता नहीं है, जब उन्हें अपने प्रत्येक दुष्कृत्य का जवाब देना पड़ेगा। वे लोग मृत्यु से उसी प्रकार डरेंगे, जैसे बकरा कसाई खाने में जाने से भावी पीड़ा की कटु आशंका से डरता रहता है। अतः अभी से सावधान होकर अपनी अन्तः चेतना को अनुपयोगी कार्यों से रोक लेना चाहिए।
इन दूषित प्रवृत्तियों से शक्ति बनाकर श्रेष्ठ और शुभ कार्यों में ही व्यय कीजिए। अच्छी प्रवृत्तियों के विकास में ही शक्तियाँ व्यय कीजिए।
जीवन की प्रेरणा ऊर्ध्वमुखी है। वह सदा उन्नतिशील रहनी चाहिए। नीचे से सदा ऊंचाई की ओर उठना चाहिए। क्या आप नित्य प्रति नहीं देखते कि जानवर पौधों पर अधिकार करते हैं, मनुष्य पशुओं पर तथा पाशविकता पर और देवता सम्पूर्ण मानवता पर। अधिक विकसित मस्तिष्क बुद्धि और शक्ति वाले कम विकसितों पर सदा राज्य करते आये हैं।
सद्गुणों और सद्गुणी शुभ प्रवृत्तियों का मार्ग सहज स्वाभाविक है। सात्विक विचार तथा सद्गुणों की तरंगें सरल और हलकी होती हैं। वे सुख शाँति उत्पन्न करने वाली होती है। ईश्वर की यही इच्छा है कि संसार में सतोगुण निरन्तर बढ़ते रहें। इसीलिए आप स्वयं अनुभव करेंगे कि विकार अस्वाभाविक है। प्रेम सनातन है। सरल है, घृणा क्षणिक और हानिकर है। साहस अनादि और प्राकृतिक है। भय क्षणिक है। दया धर्म है, घृणा के स्थान पर प्रेम लाना चाहिए। क्रोध क्षणिक विकार है। लड़ाई झगड़ा थोड़ी देर रहकर स्वयं नष्ट हो जाता है, क्योंकि यह अस्वाभाविक है। सतत अभ्यास से अपने शुभ भावों और सात्विक विचारों को ही धारण कीजिए। अच्छी प्रवृत्तियों में ही निरन्तर भ्रमण कीजिए।
बुरी वासनाएं अच्छे विचारों से दबाई जा सकती हैं। शुद्ध सात्त्विक भाव और उच्च सामर्थ्यों की वृद्धि करने के दुष्ट वृत्तियाँ स्वतः फीकी पड़ जाती है। अतः अपने भीतर सुख, शाँति, निर्भयता, आनन्द, प्रसन्नता, सेवा और सहयोग के भावों को ही प्रोत्साहन दीजिए। शाँत बैठकर चुपचाप मन में कहिए ‘मैं जितेन्द्रिय हूँ। विषयों के बंधन जाल में नहीं फंसता हूँ। मेरा हृदय निर्मल हो गया है। मन पर मेरा पूरा काबू है। मैं कभी अपनी निम्न वासनाओं के वश में नहीं हो सकता। मेरे विशुद्ध हृदय में अब कोई बुराई नहीं ठहर सकती। मैं दृढ़ता के साथ अपनी इन्द्रियों पर अधिकार रखता हूँ। मैं अपने हृदय में उत्तम भाव और शुभ संकल्प ही धारण करता हूँ। मेरा हृदय पवित्र भावों का सुन्दर उद्यान है जिनसे शुभ फलों की ही उत्पत्ति होती है।’
उत्तम भाव रखने से मनुष्य उन्हीं का चिन्तन करता है। इस ध्यान से सात्विक भावों का उदय होता है। श्रद्धा, प्रेम, दया, क्षमा, शाँति, समता, ज्ञान, वैराग्य, संतोष, आन्तरिक पवित्रता, निष्कामता आदि हृदय के उत्तम भाव हैं, जिनका ध्यान करने से जिन्हें दैनिक जीवन में विकसित करने से उच्च सामर्थ्य का विकास होता है। ये सब शुभ भाव मनुष्य के जीवन में सुख शाँति भर देने वाले हैं जब शुभ विचार और पवित्र क्रिया का परस्पर योग हो जाता है तो मनुष्य का उद्धार हो जाता है।
तुम अपनी निम्न वासनाओं को रोकने में, आत्मानुशासन करने में पूर्ण समर्थ हो। तुम पर उनका कोई जादू नहीं चल सकता। अपने उत्तम गुणों, उत्तम संकल्पों, सद्भावों में विश्वास करो। तुम अपने को तुच्छ और निकम्मा मत समझो। वेदान्त कहता है कि तुम स्वयं ब्रह्म हो। तुममें निम्न वासनाओं को रोकने की बड़ी शक्ति है।
सद्गुणों को धारण करने तथा उनका सतत अभ्यास और प्रयोग करने से योग्यताओं की वृद्धि होती है। भाग्य निर्माण होता है। मनुष्य आगे बढ़ता है। उन्नति करने वाले गुणों को अधिक मात्रा में जमा करने से मनुष्य की गति बढ़ती है। ईश्वर की सहायता सदा सुयोग्य व्यक्तियों को ही मिलती है।
(श्री यादराम शर्मा राजेश एम.ए.)
मानव-सभ्यता के आदि काल से यह प्रश्न विचारकों, मनीषियों और दार्शनिकों को चिन्तित करता रहता है कि मानव-जीवन उद्देश्य क्या है? हम क्यों पैदा हुये हैं? संसार में रह कर हमारा क्या कर्त्तव्य है? अपनी-अपनी बुद्धि, अनुभव और परिस्थितियों के अनुसार विद्वानों, धर्म-प्रवर्तकों और समाज के मार्ग-दर्शकों ने इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयत्न किया है। इन्हीं उत्तरों के अनुसार संसार में अनेक धर्म-सम्प्रदाय और मत-मतान्तर स्थापित हो गये हैं, और होते जा रहे हैं। परिणाम यह हुआ कि यह समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है तथा प्रश्न सुलझने के बजाय कुछ और ज्यादा उलझ गया है। मतमतांतरों, धर्म-वाक्यों और आप्त-पुरुषों के प्रमाणों को तर्क और बुद्धि की कसौटी पर परखने वाले और तटस्थ रूप से सोचने वाले व्यक्तियों के लिये यह पहली आज भी उलझी हुई है अतः आगे की पंक्तियों में उन्हीं के दृष्टिकोण से इस प्रश्न पर विचार करने का प्रयत्न किया जायेगा।
शरीर की भाँति बुद्धि की भी भिन्न-भिन्न अवस्थाएं हुआ करती हैं। शारीरिक अवस्था अर्थात् आयु के अनुसार हम मानवों को शिशु, किशोर, प्रौढ़ और वृद्धि जैसी भिन्न-भिन्न कोटियों में रखते हैं। बुद्धि के अनुसार भी लोग शिशु, किशोर, प्रौढ़ अथवा वृद्ध हुआ करते हैं। किन्तु बुद्धि की इन विभिन्न अवस्थाओं का व्यक्ति की आयु से कोई संबंध नहीं होता। कभी-कभी 20 वर्ष का युवक बुद्धि की दृष्टि से बिल्कुल बच्चे के समान पाया जाता है। जैसे हवाई जहाज में बैठे कर आदमी एक ही दिन में लम्बी यात्रा कर लेता है जितनी पैदल चलने वाला एक वर्ष में भी नहीं कर पाता इसी प्रकार चिन्तनशील और अध्यवसायी नवयुवक अपने परिश्रम के बल पर अशिक्षित अथवा आलसी वृद्धों से बुद्धि और विवेक की दृष्टि से बढ़े-चढ़े होते हैं। ऐसी दशा में केवल आयु को बुजुर्गी का प्रमाण-पत्र मान कर बड़े बूढ़ों के चरण-चिन्हों पर चलकर, लकीर के फकीर बन कर, हम अपने आपको भले ही सम्भ्रम में डालें किन्तु इस मार्ग पर चल कर आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान नहीं पा सकते। उसके लिये तो हमें बुद्धि के प्रकाश में स्वयं परिश्रम करके मार्ग खोजना पड़ेगा।
बुद्धि की अवस्था के ऊपर आध्यात्मिक प्रश्नों के विषय में मन के समाधान की संभावना निर्भर करती है। जिस प्रकार एक छोटे बच्चे को मिट्टी या कंकड़ का टुकड़ा देकर बहला सकते हैं और वह उस टुकड़े को खिलौना समझ कर खेलने लगता है, उसी प्रकार एक बड़े बालक को नहीं बहलाया जा सकता। उसे तो उसकी अवस्था के अनुसार ही कोई सच्चा खिलौना या कोई सुन्दर पुस्तक आदि देकर ही सन्तुष्ट किया जा सकता है। इसी प्रकार बौद्धिक दृष्टि से अविकसित व्यक्ति को जीवन के उद्देश्य के संबंध में कुछ भी समझ कर सन्तुष्ट किया जा सकता है किन्तु बुद्धि की दृष्टि से परिपक्व जिस व्यक्ति का समाधान साधारण बातों से नहीं होता उसके लिये तो कोई व्यवहारिक तर्क पूर्ण और बुद्धिगम्य समाधान खोज कर देना पड़ेगा।
परलोक और पुनर्जन्म की बातें इस वैज्ञानिक युग में विशेष समाधान कारक नहीं है। एक तो इन प्रश्नों के ऊपर मानव जाति इतने परस्पर विरोधी मतों में बंटी हुई है कि यदि किसी एक मत को ठीक मान लिया जाये तो मिथ्या मतावलम्बियों की दुर्दशा के जो चित्र ये मत-मतान्तर उपस्थित करते हैं, उस पर जितना कम सोचा जाये उतना ही अच्छा है। दूसरे इन सब मत-मतान्तरों का सार-तत्व लुप्त हो गया है और केवल लकीर पीटी जा रही है। नाम के लिये तो सारा योरुप ईसा का अनुयायी है लेकिन ईसा की शिक्षा और योरुप के जीवन में 36 के तीन और छह का संबंध है। कौन समझदार आदमी स्वीकार करेगा कि अपने को बौद्ध कहने वाले जापान, चीन, बर्मा और श्याम के निवासी ‘तथागत’ की ही आज्ञाओं का पालन कर रहे हैं। दूर मत जाइये, अपने पड़ौस में पाकिस्तान में ही देखिये मुहम्मद साहब के सपनों को कितनी सुन्दरता के साथ पूरा किया जा रहा है? और अपनी वेद-भूमि के संबंध में तो जितना कहा जाये, थोड़ा ही है। इन मतों के अनुसार इन के मत में विश्वास न रखने वाले का उद्धार असम्भव है चाहे वह कितना ही दूध धोया हुआ क्यों न हो और इनका मत स्वीकार कर लेने पर इन्होंने उद्धार के इतने सस्ते नुस्खे बताये हैं कि पढ़ सुन कर आश्चर्य होता है। इस संबंध में अधिक कहना व्यर्थ है। जब लंका में सभी बावन हाथ के हैं तो किस-किस को दोष दिया जाये। केवल यही कहा जा सकता है कि इन सब बातों को देखकर तर्कवादी विवेकी व्यक्ति की इन सब में अश्रद्धा हो जाना स्वाभाविक है।
गृहस्थ धर्म का पालन करना भी जीवन का एक उद्देश्य समझा जाता है। यह ठीक है कि यदि आप ईमानदारी के साथ द्रव्य उपार्जन करके अपने बाल-बच्चों के भरण-पोषण की कोई समुचित व्यवस्था कर जाते हैं तो यह काफी बड़ी बात है लेकिन आपका यह कर्त्तव्य पालन मध्यम कोटि का ही समझा जायेगा। उत्तम कोटि का कर्त्तव्य-पालन इसे नहीं कह सकते। इसका खोखलापन इसी बात से सिद्ध है कि यदि आप अपने परिवार की दशा सुधार कर इस संसार से विदा होते हैं और अन्य अनेक परिवारों की दशा दुखमय बनी रहती है तो बात कुछ बनती नहीं है। हमारे मरने के बाद हमारे लिये इस बात का कोई महत्व नहीं रहता कि कौन-सा परिवार हमारा है और कौन-सा पराया है? इसलिये किसी एक परिवार की दशा सुधार कर और वह भी कभी-कभी दूसरे परिवारों की दशा बिगाड़ने का साधन बन कर हम कोई बहुत बड़ा कर्त्तव्य पालन कर रहे हैं, ऐसा मानने को जी नहीं चाहता।
जब लोक और परलोक दोनों ही शंकाओं का समाधान करने में असमर्थ हैं तब जीवन का और क्या उद्देश्य है, यह प्रश्न विचारणीय है। यदि सभी शास्त्र प्रमाणों को छोड़ कर केवल तार्किक और भौतिक दृष्टि से ही विचार करें तब भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि भले ही मनुष्य मरणधर्मा है, किन्तु मनुष्यता तो शाश्वत है। व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, परिवार नष्ट हो जाते हैं कभी-कभी जातियाँ भी समाप्त होती देखी गई हैं किन्तु मानव समाज किसी न किसी रूप में अपने आदि काल से आज तक विद्यमान है। ऐसी दशा में हमें यह सोचना चाहिये कि व्यक्तिगत रूप से मैं इस संसार में न रहूँगा। यदि ईसाइयों और मुसलमानों और नास्तिकों के अनुसार यह मान लिया जाये कि पुनर्जन्म नहीं होता) फिर भी समष्टि रूप में मनुष्य जाति तो रहेगी ही, जिसका मैं एक अंश हूँ। इस दृष्टिकोण से हमें मनुष्य जाति और यदि व्यापक रूप से सोचा जाये तो समस्त प्राणि वर्ग के प्रति अपना कर्त्तव्य निर्धारित करना चाहिये।
हम क्यों पैदा हुये हैं, इसका उत्तर शायद हम न दे सकें किन्तु जब पैदा हो गये हैं तो हमें जीवन में क्या करना चाहिये, इस प्रश्न पर अब आसानी से सोचा जा सकता है। जब हम इस समाज के सदस्य हैं तो हमें अपनी सदस्यता का चन्दा देना चाहिये, जो हमारा अनिवार्य कर्त्तव्य है। समाज को यह चन्दा केवल धन के रूप में नहीं दिया जा सकता क्योंकि धन तो स्वयं हमारी पैदा की हुई वह वस्तु है जिसके कारण हम में अनेक विकार पैदा हो गये हैं। इस चन्दे के रूप में तो हमें अपनी प्रतिभा, परिश्रम और त्याग केवल समाज के लिये होनी चाहिये जिससे समस्त समाज का जीवन भविष्य में सुखमय और उन्नतिशील बन सके। कला, विज्ञान अथवा दर्शन के क्षेत्र में कोई ऐसा कारनामा कीजिये जिससे मानव-समाज की समस्याएं सरल हों। समाज में जो विकार की विष-वृक्ष पैदा हो गया है और जिसमें से दुख-क्लेश, विरोध तथा हिंसा के फल उत्पन्न हो रहे हैं, उस विष-वृक्ष को नष्ट करने का प्रयत्न कीजिये। अपने इस अमूल्य जीवन को पीड़ितों, पराधीनों, अज्ञानियों और पतितों के सुधार संगठन, उत्थान और उद्धार में लगा दीजिये। ऐसा करने से आपको इस जन्म में या आगे कभी क्या फल मिलेगा, यह बात तो मैं आपको पूरे विश्वास के साथ नहीं बता सकता किन्तु इतना मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इन सत्कार्यों में नष्ट किये गये अपने समय के लिये आपको कभी पछताना नहीं पड़ेगा।
मृत्यु-शैय्या पर पड़ा हुआ जो भाग्यवान वह आत्म-सन्तोष अनुभव कर सकता है कि उसने धरती पर आकर अपनी सामर्थ्य भर समाज के सुधार और विकास के लिये प्रयत्न कर लिया है, वह धन्य है। अपने समस्त जीवन के कार्यकलापों का सिंहावलोकन करके यदि उसे यह अनुभव होता है कि उसके जीवन से समाज को कोई हानि नहीं हुई लाभ ही हुआ है तो उसका जीवन सार्थक है। यदि किसी भी मृत्यु पर लोग सन्तोष की साँस लेने के बजाय एक ठंडी आह भर कर कहें कि एक अच्छा आदमी चला गया तो समझना चाहिये कि वह अपना कर्त्तव्य पूरा करके गया है। कौन कितना करता है, यह साधनों, सामर्थ्य और परिस्थितियों पर निर्भर है। अपने साधनों और सामर्थ्य के अनुसार किसी रूप में समाज की सेवा करके आप भी अपने समाज से ऋण के उऋण हो लीजिये ताकि अंत समय में आप यह संतोष प्राप्त कर सकें कि आपने अपना कर्त्तव्य पूरा कर लिया है।
(श्री राजाराम व्वारिया, विशारद, खरगापुर)
मनुष्य मात्र के लिये स्वभावतः कुछ बातें परमावश्यक होती हैं। उनमें भोजन, वस्त्र, आवागमन आदि प्रधान है। इन सब कार्यों की पूर्ति हम, अपनी शारीरिक शक्ति द्वारा ही करते हैं और शक्ति का संचालन बुद्धि द्वारा होता है। इसलिये हमारी बुद्धि का सदैव विकास होता रहे और दुर्बुद्धि न बन कर सुबुद्धि ही बनी रहे इसके लिए हमको सदैव सचेष्ट रहना चाहिये। गायत्री की साधना इसके लिये सर्वश्रेष्ठ विधान है।
हर प्राणी को सुख-शाँति का जीवन यापन करने के लिये नित्य-नियमित प्रार्थना करनी अति आवश्यक और वाँछनीय है। वैसे प्रार्थना का एक नियत समय व नियत स्थान होना उत्तम है, उससे साधना का फल शीघ्र और प्रभाव युक्त होता है, पर जिसका हृदय अपने इष्टदेव में पूर्णतः तल्लीन हो गया है वह किसी समय और कहीं भी प्रार्थना कर सकता है जैसा कि स्वयं विष्णु भगवान ने नारद से कहा था-
नाहं बसामि वैकुण्ठे योगिनाम हृदयेन। मद्भक्तः यत्र गायन्ति तत्र निष्ठामि नारदा॥
अर्थात् ‘न मैं बैकुण्ठ में रहता हूँ न योगियों के हृदय में, मेरा वास वहीं है जहाँ मेरे भक्त मेरा गुणगान करते हैं।’
वर्तमान समय के अधिकाँश शिक्षित तो नहीं किन्तु साक्षर व्यक्ति पाश्चात्य सभ्यता के वशीभूत होकर प्रमादी बन गये हैं। वे ‘कालहि, कर्महि, ईश्वरहिं, मिथ्या दोष लगाय’ वाली उक्ति के अनुसार गुण-कीर्तन, प्रार्थना आदि से विमुख रहकर ‘आत्म चिन्तन’ का दावा करते हैं, उनका यह कथन पंगु द्वारा गिरि लाँघने के समान ही हास्यास्पद है। आत्मचिन्तन का लक्ष्य तो सर्वश्रेष्ठ है, पर उसे जबानी जमाचर्च द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। नाम-गुण कीर्तन, प्रार्थना आदि इसी ब्रह्मज्ञान की सीढ़ियों की तरह है। इनके द्वारा ही साधारण मनुष्यों की आत्म शुद्धि हो सकती है और क्रमशः वे आत्मचिन्तन के अधिकारी बन सकते हैं।
आज द्वेष, कलह का सर्वत्र राज्य है। सहोदर भाई, पिता, पुत्र, यहाँ तक कि अनेकों पति-पत्नी तक का संयुक्त जीवन सुखद नहीं जान पड़ता। कारण है अपने-अपने कर्त्तव्य से च्युत होना। वैसे तो इतिहास के सभी युगों में मानव-समाज में कोई न कोई त्रुटियाँ रही हैं, जिनके कारण उनको संकट सहन करने पड़ें हैं पर वर्तमान समय में तो मनुष्यों के स्वार्थ युक्त संघर्ष की अवस्था एक असाध्य रोग की तरह हो गई है। इस विपन्नावस्था से छुटकारा पाने के लिये कोई विशेष औषधि ही काम दे सकती है। और हमारे मतानुसार वह औषधि केवल गायत्री जप ही हो सकता है। उससे मनुष्यों की बुद्धि शुद्ध होकर उनको जीवन-लक्ष्य की सच्ची राह दिखाई पड़ने लगेगी।
सर्व-सिद्धि दात्री, सर्वकष्ट भंजनी, वेद जननी, परम पवित्र गायत्री की गुण-गरिमा का अंकन करना सूर्य को दीपक दिखाना है। गायत्री की महिमा भारतीय समाज में अति प्राचीन युगों से भली प्रकार विदित है। पर आज भौतिकता की बाढ़ ने, आसुरी भावों की बुद्धि ने अधिकाँश लोगों को उससे विमुख कर दिया है। अब अगर हम आत्म कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होकर अपना उत्थान करना चाहते हैं तो हमको नित्य प्रति गायत्री माता का जप और उसके अर्ध का चिन्तन करना-एकमात्र उपाय है। हमको चाहिये कि विश्व-कल्याण के सर्वोच्च लक्ष्य तक न पहुँच सकें तो कम से कम अपने तुच्छ स्वार्थ भाव से मुक्ति पाने के लिये ही कम से कम 108 बार या यथासंभव जितना भी अधिक हो सके अपनी परम हितदात्री माता गायत्री का जप करना अपना परम कर्त्तव्य समझें।
(श्री शंभूसिंह जी)
वेदमाता गायत्री की उपासना का सबसे बड़ा लाभ अज्ञानता का नाश होकर सद्बुद्धि का उदय होना है और यही मानव-जीवन का प्रधान कार्य है। इसी प्रकाश को प्राप्त करने के लिये यह देव दुर्लभ शरीर हमको दिया गया है। गायत्री तपोभूमि ने अपने प्रचार-कार्य द्वारा इस महालाभ को प्राप्त करने का मार्ग मनुष्य मात्र के लिये प्रशस्त कर दिया है और लाखों सौभाग्यशाली निस्सन्देह उससे अपना हित-साधना कर रहे हैं।
ये उपासना करने वाले भिन्न-भिन्न भावों को लेकर उपासना कर रहे हैं और उसी प्रकार उन्हें सफलता मिल रही है, ऐसा हमको उनके पत्रों, अनुभवों तथा व्यक्तिगत संपर्क से प्रतीत होता है। पर कुछ सज्जन ऐसे भी हैं जो 2-3 वर्ष तक साधना करने के बाद भी निराशा का भाव प्रकट करते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये हम इस लेख में गायत्री साधना के संबंध में कुछ ऐसे संकेत देना चाहते हैं जिनसे साधना की सफलता में सहायता प्राप्त हो सकती है।
साधना का उद्देश्य
प्रत्येक कार्य को करने से पहले उसका उद्देश्य निश्चित कर लेना होता है। बिना उद्देश्य के कार्य करना पागलपन अथवा अज्ञान का चिन्ह है। इसलिये हमारी साधना का कोई उद्देश्य अवश्य होना चाहिये। गायत्री परिवार ने अपने सदस्यों के लिये एक ऐसा उद्देश्य निश्चित किया है जिसे दृष्टिगोचर रख कर साधना करने से निराशा का प्रश्न ही नहीं उठ सकता। यह उद्देश्य यही है कि साधक में इस प्रकार का आत्म-भाव और तप व्याप्त हो कि वह अपने आस-पास के अन्य व्यक्तियों को भी गायत्री उपासक बना सकें। हमें संतोष है कि हमारा यह लक्ष्य अधिकाँश में पूरा हो रहा है और जिस घर या मोहल्ले में एक व्यक्ति उपासना करने लगता है तो कुछ समय में उसकी पत्नी, बच्चा, भाई, बन्धु, पड़ोसी भी क्रमशः इस ओर आकर्षित होते जाते हैं। जिस प्रकार कोई पेड़ समय आने पर फल देने लगता है उसी प्रकार गायत्री उपासना में हार्दिक अनुराग उत्पन्न हो जाने से उसके संसर्ग से अन्य उपासक भी स्वतः तैयार होने लगते हैं। इसलिये जो व्यक्ति इस उद्देश्य को सामने रखकर साधना करेगा तो वह सफलता का अनुभव अवश्य करता रहेगा। इसके साथ-साथ उसके व्यक्तिगत उद्देश्य तो स्वयं पूरे होते रहेंगे। व्यायाम करने का मुख्य उद्देश्य शरीर को मजबूत बनाना होता है, फिर स्फूर्ति, पाचन शक्ति, चेहरे पर तेज आदि बातें तो साथ-साथ स्वतः उत्पन्न हो जाती हैं।
साधना में नियमितता
सफलता प्राप्त करने का दूसरा नियम साधना में नियमितता का ध्यान रखना है। प्रातः सूर्योदय से पहले निश्चित समय पर अपनी साधना के लिये आसन पर बैठ जाना चाहिये तथा संकल्पित माला पूरी करके उठना चाहिये। किसी विशेष कारणवश बीच में उठना पड़े, तो प्रायश्चित की माला अलग फेरना आवश्यक है। कम या अधिक संख्या में अनियमित समय पर जप करने से उसकी उत्तमता नष्ट हो जाती है और वह शीघ्र अपना प्रभाव प्रकट नहीं कर पाता।
गायत्री साधना और स्वाध्याय
कई साधक केवल माला फेरना ही पर्याप्त समझते हैं। उनको चाहिये कि जिस महामंत्र की वे साधना कर रहे हैं उसके महत्व और विशेषताओं को जानने के लिये नियमित रूप से थोड़ा समय स्वाध्याय में भी लगाते रहें। जिस पथ-प्रदर्शक के निरीक्षण में वे साधना कर रहे हैं, उसके द्वारा रचित सभी गायत्री ग्रंथों का पढ़ना व उन पर मनन करना भी नितान्त आवश्यक है। उन्हें संकल्प कर लेना चाहिये कि बिना जप किये भोजन नहीं करेंगे और स्वाध्याय किये बिना शयन नहीं करेंगे। इन ग्रंथों की बातों पर चलते-फिरते उठते-बैठते विचार करना चाहिये और उनको जीवन के व्यावहारिक कार्यों में प्रयोग करने का अभ्यास करना चाहिये।
गायत्री साधना और दान
गायत्री साधना में केवल जप व पारायण करते हुये भी यदि साधक में कोई विशेषता दृष्टिगोचर नहीं होती तो उसका कारण साधना के साथ दान अथवा त्याग का अभाव होता है। प्रकृति का नियम है कि प्राणी के ग्रहण करने के बाद त्याग भी करना चाहिये, अन्यथा उसकी शक्तियाँ मन्द पड़ी रहेंगी। इसलिये गायत्री साधना में सफलता प्राप्त करने के लिये अपने भीतर पाई जाने वाली त्रुटियों, व्यसनों का निरन्तर त्याग करते रहना चाहिये। यह कार्य यदि नित्य प्रति न हो सके तो साप्ताहिक सत्संग, सामूहिक हवन, तीर्थयात्रा, महापुरुषों और महात्माओं से भेंट होने के अवसर पर तो करना ही चाहिये। ऐसा त्याग करने से तुरन्त उस त्याग के बदले का गुण प्राप्त होता रहेगा। जैसे बिना पैसे के बाजार के समान नहीं मिलता वैसे ही बिना व्यसनों और दोषों के त्याग किये साधना के दिव्य गुण प्राप्त नहीं हो सकते। इस त्याग का कुछ अभ्यास भौतिक सम्पत्ति के दान से भी होता है। साधक को साधना से उठते ही अपने जप से गायत्री माता के महत्व को बढ़ाने तथा उसकी प्रतिष्ठा को अन्य लोगों के मनःक्षेत्र तक पहुँचाने के कार्यक्रम में सहयोग देने के निमित्त कम से कम 1 नया पैसा एक अलग डिब्बे में रख देना चाहिये। इसी प्रकार माताएं भी भोजन पकाने से पूर्व कम से कम एक मुट्ठी आटा और जरा सी घी गायत्री प्रचार के कार्य के लिये निकाल कर रख दें। घर के बालकों के हाथ खर्च में भी इसके लिये कभी-कभी एकाध पैसा दान कराके उन्हें दान का महत्व समझाया जा सकता है। घर में एकत्रित इस फण्ड का उपयोग गायत्री चालीसा, माला, चित्र आदि बाँटने अथवा गायत्री ज्ञान-मन्दिर की घर में स्थापना करने के लिये किया जा सकता है।
गायत्री साधना में तप
साधना में उपरोक्त बातों का पालन करने के साथ-साथ यदि तप का योग और कर दिया जाय तो उसमें चार चाँद लग गये ऐसा समझना चाहिए। तप का सही अर्थ है दूसरों के लिये कष्ट सहन करना। गायत्री साधना में तप यही है कि गायत्री माता की प्रतिष्ठा जन-जन के मन में स्थापित करने के लिये अपने तन, मन और धन का कुछ अंश नियमित रूप से लगाना। इस युग-निर्माण की योजना में योग देने के लिये, इस परिवार के संगठन को मजबूत करने के लिए जो जितनी अधिक निन्दा, विरोध को सहन कर रहा है, सर्दी-गर्मी, बरसात की प्रतिकूलताओं का ध्यान न करके गायत्री प्रचार के कार्य में श्रम कर रहा है वही तपस्वी वेदमाता का सपूत श्रवण कुमार कहला सकता है।
इन समस्त नियमों और साधन विधियों का मूल तत्व यही है कि गायत्री भक्त अपने विचारों मनोभावों और दैनिक व्यवहार में स्वार्थ-भाव का त्याग करते हुए परमार्थ को प्रधानता देने की चेष्टा करे। यह सत्य है कि तर्क की दृष्टि से देखा जाय तो श्रेष्ठ से श्रेष्ठ त्याग और तप में भी पुण्य अथवा मुक्ति रूपी स्वार्थ का समावेश जान पड़ता है और अनेक लोग ऐसी बात कहा भी करते हैं। पर सचाई और स्वाभाविकता को तर्क तथा प्रमाणों की आवश्यकता नहीं होती। जो व्यक्ति स्वभावतः निस्वार्थ भाव से धर्म कार्य करेगा और लोक-परलोक में अपने न्याययुक्त अधिकार के सिवा और किसी विशेष लाभ की इच्छा न रखेगा वह निस्सन्देह आत्म सुख और आत्म संतोष को प्राप्त कर सकेगा। वैसे इस प्रकार का कार्य करना कुछ कठिन जान पड़ता है, पर जो व्यक्ति अपनी साधना को सामूहिक रूप से करता है उसके लिए परमार्थ का मार्ग विशेष सुविधाजनक बन जाता है। इसलिए जहाँ आप उपर्युक्त नियमों का पालन करें वहाँ सर्वप्रथम सामूहिकता के भाव को भी अपनावें। किसी व्यक्तिगत उद्देश्य को पूरा करने के लिये कोई खास अनुष्ठान करने से तो स्वार्थ का भाव स्पष्टता सामने रहता है और उस दशा में आत्मोन्नति की अधिक आशा रखना कठिन ही है। उस समय तो जैसी हमारी श्रद्धा, विश्वास तन्मयता होगी वैसा ही फल हम पायेंगे। पर जब हम जप, अनुष्ठान, हवन आदि को सामूहिक रूप से सबके साथ बैठ कर करते हैं, तब हमें अपने विशेष लाभ का ख्याल छोड़ देना पड़ता है और सब के बराबर फल को ही हम प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लेते हैं। जिस प्रकार एक टीम बनाकर खेलने से मैच में जीत होने पर सभी को बराबर पुरस्कार मिलता है, उसी प्रकार अपने व्यक्तिगत सिद्धि के उद्देश्य को त्याग कर सामूहिकता के मार्ग को अपनाने से सब का लाभ ही होता है।
इस प्रकार गायत्री साधना में नियमित जप के साथ नियमित स्वाध्याय, त्याग और तप करने वाला व्यक्ति गायत्री माता से वह शक्ति प्राप्त कर लेता है जिसके द्वारा कठिन से कठिन कार्य भी सिद्ध किया जा सकता है। उपासकगण अगर इन नियमों का पालन करते हुए साधना करेंगे तो कुछ ही समय में उनको साधना की सफलता का अनुभव होने लगेगा।
(पत्रकार, लेखक, वक्ता और गायक बनाने की शिक्षा व्यवस्था)
गायत्री परिवार का प्रधान कार्यक्रम सद्विचारों का प्रचार है। धार्मिक एवं नैतिक क्राँति की आधारशिला यही है। सद्विचारों को फैलाने के लिए लेखनी और वाणी, प्रेस और प्लेटफार्म यही दो प्रधान माध्यम हैं।
भारतवर्ष इतना विशाल देश है कि इसमें सद्विचार फैलाने के लिए बड़ी संख्या में ऐसे धर्मसेवी होने चाहियें जो जन-जन के मन में सत्प्रवृत्तियों को उभारने का कार्य करने की क्षमता से परिपूर्ण हो। ऐसे लोगों की आज भारी आवश्यकता है जो जनता की धार्मिक भावनाओं को रचनात्मक कार्यों की ओर मोड़ सकें। ऐसे जननेता तैयार करने का कार्य हमें हाथ में लेना चाहिए।
लेखनी का प्रचारात्मक रूप साहित्य-निर्माण है। वाणी का प्रचारात्मक रूप वक्ता और गायन, भाषण और भजन है। इन योग्यताओं से सम्पन्न और सुयोग्य व्यक्ति अधिकाधिक संख्या में निकलने चाहिए, जो मानव अन्तरात्मा को अपनी लेखनी और वाणी द्वारा सन्मार्ग, पर प्रवृत्त करने में लगे। हम पत्रकार, साहित्यकारों, लेखक, वक्ता एवं जन गायकों की एक बड़ी सेना तैयार करके ही राष्ट्र की बौद्धिक भूख बुझाने की, उपयुक्त मानसिक भोजन प्रस्तुत करने की योजना में संलग्न हैं।
गायत्री तपोभूमि में एक साँस्कृतिक विद्यालय स्थापित करने की योजना अक्टूबर की गायत्री परिवार पत्रिका में पृष्ठ 31 पर छापी गयी थी। महायज्ञ से निवृत्त होते ही अब उस योजना को कार्यान्वित कर दिया गया है। इस योजना के अनुसार तपोभूमि में एक साँस्कृतिक विद्यालय चालू कर दिया गया है जिसमें लेखक, वक्ता और गायक की शिक्षा देकर देहातों के लिये जन-जागृति पैदा करने वाले छोटे-बड़े जननेता उत्पन्न किये जायेंगे।
लेखनी विभाग
पत्रकार और साहित्यकार बनाने के लिए इन विषयों की क्रियात्मक शिक्षा दी जावेगी। अच्छी हिन्दी जानने वाले मैट्रिक के लगभग शिक्षा प्राप्त व्यक्ति ही इस कक्षा में प्रविष्ट किए जायेंगे। नियमित पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ाई जायेंगी। शिक्षा काल छः महीने रहेगा।
अनुवाद, नये लेख लिखना, दूसरों के लेख सुधारना, सम्पादन, भाषा एवं शैली की उत्कृष्टता, लेख के निर्धारित विषय के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने संबंधी जानकारी लेख को तथ्यपूर्ण बनाने के लिए तर्क एवं प्रमाण की प्रचुरता रखने का तरीका, विभिन्न विषयों का अध्ययन, समालोचना, परस्पर विरोधी विचारों में से उपयोगी तथ्य ढूँढ़ना आदि अनेकों विषयों की शिक्षा दी जायेगी।
छोटे अखबार चलाने के लिये अखबार संबंधी कानूनों का ज्ञान, पत्रकार की नैतिक जिम्मेदारियाँ, समाचारों का सम्पादन, लेखों की काट-छाँट और प्रचार, अखबार का दफ्तर, हिसाब-किताब, ग्राहक रजिस्टर, डाक से अंक भेजने आदि का समुचित ज्ञान कराया जायेगा।
चूँकि साहित्य निर्माण कार्य के लिए प्रेस संबंधी सभी बातों की पूरी जानकारी होना आवश्यक है, इसलिए तपोभूमि में एक बड़ा प्रेस लगाया जा रहा है, जिसमें कई प्रकार की मशीनें तथा अनेकों प्रकार के टाइप रहेंगे। इनको चलाने की पूरी शिक्षा इस लेखन विभाग के शिक्षार्थियों को दी जावेगी। कम्पोजिंग, प्रूफरीडिंग, करेक्शन, छपाई, बाइंडिंग, कटिंग आदि प्रेस संबंधी कुल काम सिखाये जायेंगे, जिससे यदि उस छात्र को अपना स्वतंत्र प्रेस खोलना हो तो वह थोड़ी सी पूँजी लगाकर आसानी से खोलकर अपना स्वतंत्र व्यवसाय चला कर अपनी जीविका आसानी से कमा सकता है। प्रेस में नौकरी तो ऐसा आदमी कभी भी किसी प्रेस में कर सकता है। लेखक बनने के लिये, पत्रकार बनने के लिए यदि अपना निज का प्रेस न चलाना हो तो भी प्रेस संबंधी सभी जानकारियाँ आवश्यक हैं। प्रेस संबंधी शिक्षाएं इस विभाग में दी जायेंगी।
नवीन पत्र का प्रकाशन
गायत्री तपोभूमि से शीघ्र ही ‘जीवनयज्ञ’ नाम का मासिक पत्र निकाला जा रहा है। ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ तथा ‘अखण्ड-ज्योति’ यह दो पत्रिकाएं पुरानी हैं, इस प्रकार तीन अखबारों का प्रकाशन जहाँ होता है वहाँ लेखक एवं पत्रकार बनने के इच्छुक को शिक्षा प्राप्त करने का पर्याप्त अवसर है। इस मार्ग में अभिरुचि रखने वालों के लिए यह स्वर्ण सुयोग है।
वाणी-विभाग
वक्तृत्व कला सम्बंधी विधिवत् शिक्षा देने का प्रबंध किया गया है। निर्धारित विषय संबंधी आवश्यक तथ्यों का संग्रह, व्याख्यान का पूर्ण ढाँचा, वाणी में मधुरता तथा प्रवाह, हाव-भाव, जनता को प्रभावित करने संबंधी आवश्यक तथ्य, थोड़े समय में अधिक बात कहने की शैली, प्रसिद्ध वक्ताओं की भाषण शैली का अन्वेषण कथा-प्रवचन की विशिष्ट शैली, रामायण को आधार मान कर विभिन्न विषयों पर भाषण।
भजन, कीर्तन, संगीत, गायन में जिनकी रुचि हो तथा कंठ काम करता हो उन्हें इसकी भी शिक्षा दी जायेगी। हारमोनियम, तबला, तम्बूरा, करताल, मजीरा आदि बाजों के बजने की साधारण शिक्षा दी जायेगी और गायन करने के उपयुक्त वाणी तथा कंठ से आवश्यक उतार-चढ़ाव पैदा करने की विधि।
निवास की व्यवस्था
शिक्षार्थियों के निवास के लिए तपोभूमि में समुचित व्यवस्था है। नल, बिजली, सोने के लिए तख्त निःशुल्क उपलब्ध है। भोजन खर्च शिक्षार्थी स्वयं करेंगे। सम्मिलित चौका चलाया जायेगा। छात्र इसका प्रबंधन करेंगे। संभवतः 15 रुपये मासिक में भोजन खर्च चल जायेगा।
तपोभूमि द्वारा संचालित इस शिक्षा-व्यवस्था में पहले गायत्री परिवार के सदस्यों को स्थान दिया जायेगा। इसलिये अपने परिवार के सदस्यों में से जो प्रतिभाशाली हों, जननायक बनने की महत्वाकाँक्षा रखते हों, वे अपना पूरा परिचय लिखते हुए आवेदन भेजें। उपयुक्त व्यक्तियों को चुनकर उन्हें आने की स्वीकृति दी जायेगी। विद्यालय की तैयारी जोरों से आरंभ हो गई है। संभवतः अगले महीने में ही शिक्षा आरंभ हो जायेगी। इसलिए इच्छुकों को अपना आवेदन-पत्र शीघ्र ही भेजना चाहिए।
गायत्री परिवार के कार्यकर्ता इस शिक्षा के उपयुक्त शिक्षार्थी ढूँढ़ने और उन्हें इस शिक्षा में सम्मिलित कराने का प्रयत्न करें, क्योंकि यहाँ की शिक्षा प्राप्त किये हुए लोग उस क्षेत्र में संस्था का कार्य बढ़ाने में बहुत उपयोगी साबित होंगे।
गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा सक्रिय रहे। अपने कार्य में शिथिलता एवं उपेक्षा न आने दें। साप्ताहिक सत्संग बराबर चलते रहें। जो सदस्य साप्ताहिक सत्संगों में अपने आप नहीं आते उन्हें घरों से बुलाकर लाने, एक दिन पूर्व सूचना देने का कार्यक्रम रखा जाय। इन सत्संगों में सामूहिक जप, हवन के अतिरिक्त प्रदर्शनों की व्यवस्था संस्था की पत्रिकाओं तथा गायत्री साहित्य की पुस्तकों में से कोई उपयोगी अंश पढ़ें जाने चाहिये। यह सत्संग कार्यक्रम चलते रहना किसी गायत्री परिवार शाखा के सजीव सक्रिय होने का चिन्ह है।
गायत्री परिवार के नए सदस्य बढ़ाने तथा नए स्थानों में शाखाएं स्थापित करने का प्रयत्न किया जाय। प्रत्येक सदस्य कम से कम दो नए सदस्य बनाने तथा प्रत्येक शाखा दो नई शाखा बनाने का प्रयत्न करे।
गायत्री ज्ञान मन्दिर के लिए प्रत्येक शाखा में स्थान नियत कर लिया जाय, जहाँ गायत्री माता का चित्र सुसज्जित चौकी पर प्रतिष्ठित रहे। प्रातः सायं आरती तथा भजन कीर्तन की व्यवस्था रहे। इस प्रत्येक ज्ञान मन्दिर में एक पुस्तकालय रहे। इस पुस्तकालय में केवल मनुष्य के नैतिक उत्कर्ष का ही साहित्य रहे। इस साहित्य का घर पर पढ़ने देने और वापिस लेने का कार्यक्रम चलता रहे।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति का आरंभ मथुरा से हुआ है। जिसमें एक हजार हवन कुण्ड थे। जितनी आहुतियाँ होती हैं उसके अनुसार अभी 23 हजार हवन कुण्डों में आहुतियाँ और होनी है। तब 24 हजार कुण्ड की पूर्णाहुति पूर्ण होगी। इस अधूरे संकल्प को पूरा करने के लिए प्रत्येक शाखा अपने यहाँ छोटा-बड़ा एक सामूहिक जप-अनुष्ठान तथा सामूहिक हवन करने का प्रयत्न करे। इन आयोजनों में भाग लेने वालों से गायत्री परिवार की निर्धारित तीन प्रतिज्ञाएं कराई जायं, तथा उन प्रतिज्ञाओं के विषयों को विस्तारपूर्वक समझने तथा कार्यान्वित करने संबंधी भाषणों की व्यवस्था की जाय।
जहाँ संभव हो वहाँ गायत्री ज्ञान मन्दिर के लिए एक छोटा सा स्वतंत्र स्थान बना लिया जाय। इसमें एक ऐसे सेवाभावी व्यक्ति के निवास की भी व्यवस्था हो जो आस-पास के क्षेत्र में नियमित रूप से धर्म प्रचार करने जाया करे और रात को उसी ज्ञान मन्दिर में लौट आया करे।
अपने गायत्री परिवार का आवश्यक खर्च चलाने के लिए व्रतधारी सक्रिय सदस्य एक मुट्ठी अनाज या एक-दो पैसा नियमित रूप से निकालें। इस प्रकार के व्रतधारी हर शाखा में अधिकाधिक बढ़ने चाहिए, ताकि शाखा और ज्ञान मन्दिर का कार्य अर्थ-संकोच के कारण रुकने न पावे।
दुष्प्रवृत्तियों को छुड़ाने के लिए 1. प्रचारात्मक 2. निषेधात्मक 3. विरोधात्मक आन्दोलन चलायें जायें। इसकी व्यवहारिक रूपरेखा अगले अंक में प्रस्तुत करेंगे।
स्थानीय धार्मिक संगठनों का एकीकरण करने का प्रयत्न किया जाय। मिलजुल कर कार्य चलाने की जहाँ सुविधा हो सके वहाँ रामायण, गीता, कीर्तन आदि की प्रधानता रखने वाली संस्थाओं को साथ ले लिया जाय। अलग-अलग उठते हुए अनेक धार्मिक संगठनों को एक सूत्र में पिरोने का प्रयत्न किया जाय।
पर्व त्यौहार, व्रत उत्सव सामूहिक रूप से मनाये जायं और उनका महत्व तथा संदेश जनसाधारण को बताया जाय, व्यक्तिगत रूप से जन्मदिन मनाये जायं उस दिन शिक्षा-उपदेश, जप हवन के क्रम रखे जायं। यज्ञोपवीत आदि महत्वपूर्ण संस्कार सामूहिक रूप से इस प्रकार किए जायं कि उनके कारण किसी पर आर्थिक दबाव न पड़े। इन संस्कारों के समय आवश्यक शिक्षाएं भली प्रकार दी जायं।
जहाँ संभव हो प्रतियोगिता, पुरस्कार, प्रतिस्पर्धा के सामूहिक आकर्षक आयोजन करके लोगों की सद्वृत्तियों को उभारा जाय।
इन दस कार्यक्रमों के अतिरिक्त स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार और भी ऐसे प्रयत्न किए जायं जिससे गायत्री माता तथा यज्ञ पिता के मूल तथ्य, सद्विचारों तथा सत्कर्मों का प्रसार होता रहे।
*समाप्त*