निर्माण के हम गीत गाएँ


निर्माण के हम गीत गाएँ (kavita)

विश्व के हर पंथ में हम फूल भरे दें।

विघ्न के हर शैल को हम धूल कर दें॥

निर्बलों में बल भरें मिलकर चलें सब,

स्वर्ग का संसार हम भू पर बसाएँ।

आज नव निर्माण के हम गीत गाएँ॥ 1॥

हर रुके राही को हम गतिमान कर दें।

हर बुझे दीपक में हम नव प्राण भर दें॥

विषमता समता बने मेरी धरा पर,

शान्ति शुचिता प्रेम के नव स्वर जगाएँ।

आज नव निर्माण के हम गीत गाएँ ॥ 2॥

अब तिमिर जग में अधिक क्या रह सकेगा।

चेतना का रवि नई रचना रचेगा॥

नव सृजन होगा नई हर बात होगी।

सृष्टि को नव रूप दे हम फिर सजाएँ।

आज नव निर्माण के हम गीत गाएँ ॥ 3॥

—त्रिलोकीनाथ ब्रजवाल


अध्यात्मवाद और हमारी सामाजिक दुर्बलता

(श्री स्वामी विशुद्धानंदजी महाराज)

भारतवर्ष की प्राचीन सभ्यता की श्रेष्ठता सब कोई स्वीकार करते हैं। इससे कोई विद्वान इनकार नहीं करता कि भारतवर्ष के वेद ही संसार के सर्वप्रथम ग्रंथ हैं और उन्हीं से देश विदेशों में ज्ञान रवि का प्रकाश पहुँचा था। उस समय भारत आध्यात्मिक ज्ञान में ही अग्रगण्य नहीं था वरन् विज्ञान में भी उसने उस समय की परिस्थितियों के अनुसार उल्लेखनीय प्रगति की थी। सब प्रकार की कलाओं और विद्याओं का यहाँ प्रचार था। संगीत, चित्रकला, मूर्ति निर्माण, गृह-निर्माण, चिकित्सा-शास्त्री, युद्ध-शास्त्र आदि सभी विषयों में वह उस समय के देशों में बहुत अधिक उन्नत था। अथवा यों कह सकते हैं कि इन सब विद्याओं और ज्ञान का प्रथम आविर्भाव इसी भूमि से हुआ और यहीं से वे संसार के विभिन्न भागों में फैलीं।

पर इन सब बातों के होते हुये कुछ समय पश्चात् यहाँ के समाज में विश्रृंखलता उत्पन्न हुई और उसके फल से उसे अनेक बार विदेशियों द्वारा पद दलित होना पड़ा। भारत का बहुत प्राचीन प्रामाणिक इतिहास तो उपलब्ध नहीं है पर महाभारतकाल के पश्चात् की घटनाओं को हम बहुत अंशों में जानते हैं। महाभारत के समय से कुछ पहले ही देश में पूँजीवाद और साम्राज्यवाद का उदय हो गया था और उस महासमर के मूल में अन्य कारणों के साथ यह मनोवृत्ति विशेष रूप से काम कर रही थी। उस समय की घटनाओं में से कवि कल्पनाओं को दूर कर देने पर स्पष्ट जान पड़ता है कि महाभारत के युद्ध से कुछ ही पूर्व जरासंध और कंस ने अन्य सब छोटे राजाओं को पराजित करके काफी बड़े साम्राज्य स्थापित करने की चेष्टा की थी। अन्त में दुर्योधन भी उसी लक्ष्य को लेकर सामने आया। संभव था कि यह साम्राज्यवाद उस समय अपनी जड़ जमा लेता पर उसका विरोध कृष्ण जैसे महामानव ने किया और जन-पक्ष का समर्थन करने वाली समस्त शक्तियों को संगठित करके उस समय उसकी महत्वाकाँक्षी योजनाओं को चकनाचूर कर दिया।

इस प्रकार महाभारत के युद्ध ने साम्राज्यवाद के नग्न और अत्याचारी स्वरूप को तो रोक दिया, पर उसके बाद भी देश में विभिन्न परस्पर विरोधी हितों के वर्गों का जन्म हो गया। इसके परिणाम स्वरूप लोग सामाजिक ऐक्य के भाव को भूलने लगे और जनता का मूलभूत संगठन नष्ट हो गया। जब इस प्रकार देश की शक्ति का ह्रास हो गया और अन्य जातियों ने उसे निर्बल अवस्था में देखा तो वे उस पर आक्रमण का इरादा करने लगे। सिकन्दर का आक्रमण एक ऐसी ही घटना थी और उसने सबकी आँखें खोलकर दिखला दिया कि अब इस देश की आध्यात्मिक सम्पत्ति नष्ट हो चुकी है और यहाँ के उच्च श्रेणी के व्यक्ति भी आत्मा की बजाय भौतिक शरीर को ही प्रधानता देने लगे हैं। इस अवसर पर भारतीय सीमावर्ती अधिकाँश नरेशों ने न केवल सिकन्दर के सामने स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर दिया वरन् उसे आगे बढ़ने में सब प्रकार की सहायता और सुविधाएँ भी प्रदान की। उसके बाद और भी अनेकों जातियाँ क्रमशः आक्रमणकारी के रूप में आती रहीं और अन्त में मुसलमानों ने देश को स्थायी रूप से गुलामी की बेड़ियाँ पहिना दीं। इन मुसलमान आक्रमणकारियों को जिस प्रकार एक प्रमुख हिन्दू नरेश—जय चन्द से सहायता और प्रोत्साहन मिला उससे तो इसमें संदेह की तिल−भर भी गुंजाइश नहीं रही कि अब हिन्दू प्राचीन ऋषि−मुनियों की आत्मदान की शिक्षा को सर्वथा भुलाकर साँसारिक सुखोपभोग और इन्द्रियों के पूर्ण रूप से गुलाम बन गये हैं क्योंकि जब तक कोई व्यक्ति अपने अन्तर में गुलाम नहीं बन जायगा तब तक उसे कोई बाहरी शक्ति गुलाम नहीं बना सकती।

मुसलमानों के शासनकाल में यहाँ के छोटे बड़े सभी लोगों को ये कष्ट, दुर्गतियाँ और अपमान सहन करने पड़े जो किसी विदेशी शासन के स्वाभाविक परिणाम होते हैं। इससे जनता की चेतना फिर जागृत होने लगी। कबीर, नानक, तुलसीदास आदि संतों और राणाप्रताप, शिवाजी, गुरु गोविन्दसिंह आदि जातीय वीरों ने देश को सही रास्ता दिखलाने का प्रयत्न किया। इसके बाद अंगरेजी राज्य में भी राजा राममोहनराय, स्वामी विवेकानन्द, दयानन्द आदि ने लोगों को भारतीय संस्कृति के सत्यस्वरूप का उपदेश दिया। श्री तिलक, अरविन्द,गाँधी आदि ने जनता की राजनैतिक चेतना को जगाया। इन सब प्रयत्नों के फल से भारतीय राष्ट्र दुर्दशा और गुलामी की भावनाओं के गर्द गुबर को झाड़कर उठ खड़ा हुआ और उठते ही उसने अपना जन्म सिद्ध अधिकार स्वराज्य प्राप्त कर लिया।

पर विदेशी शासन के बन्धनों से मुक्ति मिल जाने पर भी भारत ने अभी अपनी प्राचीन संस्कृति की तरफ ध्यान नहीं दिया है। अभी तक देश के अधिकाँश व्यक्तियों पर वर्तमानकाल की योरोपियन और अमेरिकन सभ्यता का रंग ही चढ़ा हुआ है जिसका चरम लक्ष्य अधिक से अधिक सुख सुविधा के साधन प्राप्त करना है। एक दूसरा वर्ग और है जो सामाजिक न्याय के नाम पर समाजवाद या न्याय के नाम पर समाजवाद या साम्यवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। पर लक्ष्य इसका भी अधिकाँश में भौतिक है और इसका सबसे अधिक जोर समतामूलक अर्थ व्यवस्था पर है। इसमें संदेह नहीं कि इसका आधार पूँजीवाद की अपेक्षा बहुत कुछ न्यायमूलक है, पर अभी इसने मनुष्य के शरीर और मन पर ही ध्यान दिया है, आत्मा के विचार से अभी वह दूर है। पर जब तक आत्मा का विचार नहीं किया जायगा तब तक मनुष्य में विश्व बन्धुत्व की भावना का उदय नहीं हो सकता और उसके बिना वास्तविक सुख शाँति की आशा भी नहीं की जा सकती। इन कारणों से हमारे देश की जैसी अवस्था हो रही है उसका विवेचन करते हुये एक विवेकशील विद्वान ने कहा है :—

“जगदुद्धारक महापुरुष आये और चले गये, समाज सुधारक और तत्वज्ञ बड़े-बड़े ग्रंथ लिख गये, राजतंत्र से लेकर अराजकतावाद तक और सैनिक अधिनायकवाद से लेकर जनतन्त्रात्मक समाजवाद तक बड़े-बड़े प्रयोग किये जा चुके पर संसार का ढर्रा जो कल था वही आज भी है और संभवतः निकट भविष्य में यही बना रहेगा। ऋषि का वचन है-”आत्मा को नीचे मत गिरने दो, अपने आत्मा को अपने द्वारा ही ऊँचा उठाओ। आत्मा आनन्दामृत से सिक्त है, उसे जानो और वही बनो।” पर स्वार्थ सुख की भूख और प्यास से ही मनुष्य का मन जब आकुल है तब आत्मा की इस गंभीर वाणी को कौन सुनता है? यह असंख्य सिर वाली स्वार्थपरता जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समा रही है। वर्णगत, सम्प्रदायगत और जातिगत कुसंस्कार मनुष्य की इसी स्वार्थपरता की सन्तान हैं। एक धर्म सम्प्रदाय दूसरे से द्वेष करता है। क्यों? इसीलिये कि प्रत्येक धर्म यह समझता है कि ईश्वर स्वर्ग और सद्गुणों पर उसी का ठेका है। एक प्रान्त दूसरे प्रान्त से द्वेष करता है। क्यों? इसी लिये कि कोई प्रान्त अन्य प्रान्त के साँस्कृतिक सौंदर्य को देखना नहीं चाहता। एक भाषा दूसरी भाषा का तिरस्कार करती है, क्योंकि उसके गुणों को स्वीकार करने में वह अपनी हेठी समझती है। आध्यात्मिक चेतना से ही इन कुसंस्कारों को हटाया जा सकता है। सामाजिक जीवन में एकता और सुसंगति तभी होती है जब हृदय मिलकर एक हों। यह हृत्तत्व के उद्घाटन और आत्म चैतन्य की अनुभूति से ही हो सकता है। राष्ट्र के जीवन का मानव मात्र में निवास करने वाले भगवान के साथ योग होना चाहिये। मनुष्य, मनुष्य के भीतर के भगवद् तत्व को पहिचाने। इसको आध्यात्मिक समाजवाद कह सकते हैं।”

कहने के लिये अब भी हमारे देश में आध्यात्मिकता का दावा करने वालों की कमी नहीं है। पर उनमें से अधिकाँश तो केवल कानूनी अथवा झूठा घमंड करने वाले हैं। थोड़े से व्यक्तिगत रूप से कुछ आध्यात्मिक नियमों का पालन कर लेते हैं। पर आध्यात्मिकता को समष्टि रूप से अनुभव और पालन करने वाली जनता का यहाँ अभी अभाव है। इसके कारण समाज ऐक्यभाव और शक्ति का प्रादुर्भाव नहीं हो पाता। जिस दिन हम आध्यात्मिकता का वास्तविक आशय समझ कर छोटे-मोटे भेदों की उपेक्षा करना और समाज के सब सदस्यों को एक ही शरीर के विभिन्न अंगों की भाँति समझना आरम्भ कर देंगे उसी दिन हमारी सामाजिक दुर्बलता का अन्त हो जायगा और हम संसार के उद्धार तथा उत्थान में पूरा योग दे सकेंगे।


आत्म-ज्ञान द्वारा सच्चे सुख की प्राप्ति

(श्री विद्याप्रसाद मिश्रा)

सुख की प्राप्ति और दुःख से निवृत्ति सभी जीवनधारियों का ध्येय है। जिसके लिये वे सारे जीवन भर नाना प्रकार की चेष्टायें करते हैं। पशु−पक्षियों में साधारणतया विचार शक्ति का विकास नहीं होता अतः वे केवल अपने शरीरों की तात्कालिक दुःख निवृत्ति और सुख प्राप्ति के लिये ही सतत् उद्यम करते रहते हैं। उस उद्यम से उन्हें किस मात्रा में कितनी सफलता प्राप्त होगी या नहीं या उसका विपरीत परिणाम तो नहीं होगा इत्यादि बातों पर विचार करने की उनमें योग्यता नहीं होती।

मनुष्य में विचार शक्ति का विकास होता है अतः वह अन्य प्राणियों की तरह बिना सोचे समझे अन्धाधुँध कार्य नहीं करता किन्तु विवेक और दूरदर्शिता से काम लेता है। वह केवल अपने शरीर तक ही सीमित न रह मानसिक दुःख निवृत्ति और सुख प्राप्ति के लिये भी प्रयत्न करता है तथा साथ ही साथ अपने इस लोक के भविष्य एवं परलोक पर दृष्टि रखता हुआ सुख-दुःख के परिणाम और मात्रा का भी विचार करता हुआ साथ-साथ अपने अन्य कुटुम्बियों के सुखों के लिये भी प्रयत्नशील रहता है।

मनुष्यों में विचार शक्ति के विकास की न्यूनाधिकता के अनेक दर्जे होते हैं और अपनी-अपनी योग्यतानुसार सुख प्राप्ति और दुःख निवृत्त के लिये सब कोई निरन्तर उद्योग करते रहते हैं। कई लोग तो अपने ही शरीर और मन की, कुछ अपने कुटुम्बियों एवं सम्बन्धियों आदि की तथा कुछ भावुक लोग इहलौकिक सुखों को तुच्छ समझ पारलौकिक सुखों के लिये इस देह के सुखों की अवहेलना कर अनेक प्रकार के शारीरिक-मानसिक कष्ट सहन करते हैं अर्थात् मरने के पश्चात् दूसरे जन्म में भौतिक सुखों की प्राप्ति अथवा सूक्ष्म शरीर द्वारा स्वर्गादि सुख भोगने या मुक्ति प्राप्ति की कामना से अनेक प्रकार से प्रयत्न करते रहते हैं।

जिन मनुष्यों की पुष्टि विशेष विकासित होती है, उन्हें ये उपरोक्त सुख-प्राप्ति और दुःख निवृत्ति के प्रयत्न निरर्थक प्रतीत होते हैं क्योंकि वास्तव में न तो उनसे दुःखों की निवृत्ति ही होती है और न अक्षय सुख की प्राप्ति ही। वे इसे प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं कि शारीरिक एवं मानसिक सुख-दुःखादि के जोड़े सब सापेक्ष एवं अन्योन्य-आश्रित होते हैं। अतः जितने सुख के साधन दिये जाते हैं उतना ही दुःख साथ ही साथ उत्पन्न हो जाता है। प्रथम तो उन सुखों की प्राप्ति के प्रयत्न में ही बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं फिर सुख प्राप्त होने पर उसके नाश होने का भय बना रहता है और साथ ही दूसरों के अधिक सुखों को देख-देखकर ईर्ष्या होने लगती है। सुख भोग के पीछे उसके परिणाम में दुःख अवश्य होता है इसलिये वे सोचते हैं कि जिन स्वर्गादि सुखों की प्राप्ति के साथ निरन्तर दुःख लगा ही रहता है, वे दुःख मिश्रित सुख वास्तविक सुख कैसे हो सकते हैं। मरने के बाद भी जिस शक्ति की प्राप्ति के लिये जीवनकाल में सारी आयु नाना प्रकार के नियमों एवं बन्धनों में बितानी पड़े, वह सच्ची मुक्ति कैसे हो सकती है।

सच्चा सुख और मुक्ति तो वह है जिसके लिये मरने की प्रतिज्ञा न करनी पड़े किन्तु जिसका अनुभव इसी शरीर में तुरन्त हो जाय, अर्थात् जीवन काल में ही सब प्रकार के दुःखों और बन्धनों की निवृत्ति हो जावे। इसलिये वे लोग सुख प्राप्ति और दुःख निवृत्ति में उपरोक्त प्रयत्न निष्फल समझ कर सच्चे एवं अक्षय सुख की प्राप्ति किस तरह हो सकती है, इसका अचूक उपाय खोज निकालने के लिये सुख दुःखादि के यथार्थ स्वरूप, उनके मूल कारण तथा उनके नाना प्रकार के सम्बन्ध एवं प्रभाव आदि के विषय में अन्वेषण करते हैं।

उनके उपरोक्त अन्वेषण के प्रसंग में जब उन्हें सारा संसार ही अपनी तरह सुख दुःख से ग्रसित प्रतीत होता है, तब उन्हें यह जानने की सहज उत्कंठा होती है कि यह जगत् क्या है, मैं क्या हूँ, जगत् से मेरा क्या सम्बन्ध है? इसका संचालनकर्त्ता कौन है और वह किस प्रकार करता है इत्यादि बातों की सूक्ष्म जिज्ञासा उत्पन्न होती है जिसके तात्विक विवेचन के बिना उसका यथार्थ निर्णय नहीं हो सकता। बुद्धिमान लोग अपने तथा इस जगत् के अस्तित्व और उससे सम्बन्धित विषयों पर जब गूढ़ तात्विक विचार करते हैं तब उसे दर्शन शास्त्र कहते हैं।

प्राचीन काल में हमारे आत्म दृष्टा महर्षियों ने उपरोक्त दार्शनिक विषयों में अनेकानेक अनुसन्धान किये थे और बुद्धि के तारतम्य के अनुसार उन लोगों ने विविध प्रकार के दार्शनिक सिद्धाँत निश्चित किये जिन्हें “दर्शन शास्त्र” कहते हैं। इस विषय पर उत्तरोत्तर उन्नति करते हुए वे लोग इस निश्चय पर पहुँचे कि “नाना भावापन्न प्रतीत होने वाला यह संसार वस्तुतः एक ही सत्य सनातन आत्मा के अनेक रूपों की बनावट अर्थात् एक ही सच्चिदानन्द आत्मा अपनी इच्छा शक्ति से अनेक भावों में व्यक्त होकर जगत् रूप होता है” (कठोपनिषद् बल्ली 5 मंत्र 9-10)। परन्तु उसके नाना रूपों का बनाव निरन्तर परिवर्तनशील तथा उत्पत्ति नाशवान होने के कारण असत याने कल्पित है और उन अनेकानेक बनाव के अन्दर जो एकत्व भाव है वही सच्चिदानन्द सनातन आत्म-तत्व है और वह आत्म-तत्व सर्वव्यापक सदा एक सार एवं स्थायी रहने के कारण “सत्” है। इस भिन्नता के कल्पित बनाव को सच्चा मानने की भूल में पड़कर दूसरों से प्रथक अपने व्यक्तित्व अहंकार युक्त तथा व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के उद्देश्य से राग-द्वेष पूर्वक जगत् के व्यवहार करने से नाना प्रकार के दुःख उत्पन्न होते हैं।

इस अनेकता के बनाव को एक ही सच्चिदानन्द सर्व व्यापक सनातन आत्मा की इच्छा शक्ति (प्रकृति) का प्रतिक्षण परिवर्तनशील खेल समझ कर व्यक्तित्व के अहंकार एवं स्वार्थ को समष्टि के अहंकार एवं स्वार्थ के साथ जोड़ कर व्यवहार करने से दुःख का जरा भी अस्तित्व प्रतीत नहीं होता किन्तु संसार आनन्दमय मान होता है और वह आनन्द सापेक्ष दुःखी परिणाम वाला तथा उत्पत्ति विनाशवान नहीं होता क्योंकि वह आत्म-ज्ञान की समत्व बुद्धि से होता है। आत्मा स्वयं आनन्द स्वरूप है इसलिये आत्म-ज्ञान युक्त व्यवहार करने वाला भी सदा-आनन्द स्वरूप होता है। इस सिद्धान्त को ब्रह्मविद्या कहते हैं।


स्वार्थ-भाव को मिटाने का व्यवहारिक उपाय

आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त करने की सबसे पहली और सर्व प्रधान शर्त यह है कि हम लोक व्यवहार में स्वार्थपरता को छोड़कर निःस्वार्थता को स्थान दें। निस्वार्थता एक ऐसा दैवी गुण है जो अन्य सद्वृत्तियों को स्वयं ही आकर्षित कर लेता है। पर इसके लिये आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वार्थ और निःस्वार्थता के बीच के वास्तविक भेद को पहिचानें। क्योंकि स्वार्थ के अनेक रूप होते हैं और जब हम अपनी समझ में उसके किसी एक रूप को निर्मूल कर भी देते हैं, तो वह उतनी ही प्रबलता से दूसरे रूप में प्रकट हो जाता है। इस विधि से स्वार्थ से छुटकारा पा सकना अधिकाँश व्यक्तियों के लिये असंभव होता है। क्योंकि जब स्वार्थ का एक रूप समाप्त होने पर उसके स्थान पर दूसरा उत्पन्न हो जाय तो उसका निर्मूल हो सकना संभव नहीं जान पड़ता। जिस प्रकार रावण का एक सिर कटने पर दूसरा उत्पन्न हो जाता था और इसलिये श्री राम द्वारा उसका मरण नहीं हो पाता था, वही दशा हमारे हृदय स्थित स्वार्थ-भाव की भी होती है। इसलिये आवश्यकता है कि हम इस उपाय को छोड़ कर किसी अन्य ऐसे उपाय का अवलंबन करें जिससे स्वार्थ की जड़ पर कुठाराघात होता हो।

इस सम्बन्ध में जब हम विशेष मनोयोगपूर्वक विचार करते हैं तो यही जान पड़ता है कि हमारे मन की प्रवृत्ति ही ऐसी होती है कि वह कभी खाली नहीं रह सकता, भले या बुरे कैसे भी विचार और भावनाएँ उसमें उत्पन्न होती ही रहती हैं। इसलिये स्वार्थपरता के विचारों से छुटकारा पाने का मूल मार्ग यही हो सकता है कि हम अपने मन को स्वार्थ के विपरीत निःस्वार्थता और परसेवा की वृत्ति से इतना अधिक भर दें कि हीन विचारों के लिये वहाँ स्थान ही न रह जाय। उदाहरणार्थ भक्ति -मार्ग का एक अमूल्य और सर्वोत्तम लाभ यही है कि मनुष्य का मन प्रति समय अपने आराध्य देव के चिन्तन में तन्मय और उन्हीं की भावना से परिपूर्ण रहता है और इस प्रकार सहज ही में स्वार्थ की निकृष्ट भावनाओं से छुटकारा पा सकता है। विकास की स्वाभाविक विधि यही है कि “जिस प्रकार सूर्य के लिए अपने हृदय द्वार को खोले हुये कुसुम स्वतः ही विकसित होता है उसी प्रकार तुम भी विकास पाओ। जब तक इसके लिये प्रयत्न करने की आवश्यकता रहती है, तब दुर्बलता भी प्रकट होती है। इसलिये जिसके लिये जो कोई भी स्वाभाविक उपाय अनुकूल जान पड़े उसी के द्वारा अपने हृदय को उत्तम बातों की ओर लगा देना चाहिये। इससे आपके अवगुणों को पुष्टि नहीं मिलती और बिना पोषण के वे नष्ट हो जाते हैं। अपने दोषों पर विजय प्राप्त करने का यही सर्वोत्तम उपाय है कि उनका ध्यान ही न किया जाय। क्योंकि उनके विषय में शाँतिपूर्वक सोचने से भी वे पुष्ट होते हैं और उनका बल बढ़ता है।

इसलिये साँसारिक व्यवहारों में संलग्न किसी व्यक्ति के लिये इस लक्ष्य को प्राप्त करने का मार्ग यही है कि अपने को परोपकार की भावनाओं और कार्यों में लीन रक्खे। इसलिये उसे अपने लिये विशेष सोचने का कोई समय या अवसर ही न रहेगा और तभी वह सुखी हो सकेगा। अपने से सम्बन्ध रखने वाली बातों के लिये शोक करना स्वार्थपरायणता है और इससे मनुष्य केवल दुखी ही होता है। तथापि अनेक लोग यही करते हैं; वे बैठ जाते हैं और कहने लगते हैं कि “हाय, कितने दुःख की और कितनी कठोर बात है कि अमुक व्यक्ति मेरी परवाह नहीं करता, मेरी खोज खबर नहीं लेता। मुझे प्रेम नहीं करता इत्यादि। वे इसी प्रकार की अनिश्चित कल्पनाएँ करके अपने को दुखी बनाते रहते हैं।

यह सब स्वार्थपरायणता ही है। आपके दुख और स्वार्थ दोनों की केवल एक ही चिकित्सा है कि तुरन्त ही जाकर किसी दूसरे के लिये काम में लग जाओ। आपके मन में एक ही समय में ये दोनों बातें नहीं समा सकतीं, अतः जिस क्षण आप अपने को भूल जाते हैं, उसी क्षण आप सुखी हो जाते हैं। जब आप यह कहने में समर्थ हो सकेंगे कि “मुझे मेरे साथियों से कुछ भी लेने की इच्छा नहीं है, मैं तो प्रेम करता हूँ, मुझे बदले की आवश्यकता नहीं”-तभी आप सुखी हो सकेंगे। साधारणतया लोग जिसे प्रेम कहते हैं, वह स्वार्थ के अनेक आवरणों के भीतर नाम मात्र का ही प्रेम होता है। प्रेम द्वारा सुख प्राप्त होने का अर्थ ही यह है कि वहाँ स्वार्थ विद्यमान है।

मैं जानती हूँ कि सहृदय और स्नेहशील व्यक्तियों के सीखने के लिये यह एक कठिन शिक्षा है, किन्तु इसे सीखना ही पड़ेगा। सीख लेने के पश्चात् यह सुख और शाँति लाती है। मैं यह बात अपने अनुभव से कह रही हूँ। बदला पाने की इच्छा किये बिना ही सब से प्रेम करना सीखो। ऐसा करने से अनेक लोग आपसे स्नेह करने लगेंगे। किन्तु जब तक आप उससे कुछ प्राप्त करने की चेष्टा करते रहेंगे, तब तक प्राकृतिक नियमों के अनुसार वह आपसे दूर हटता जायगा। यह सत्य है कि अनेक व्यक्तियों को मेरी ये बातें केवल जबानी जमा खर्च जैसी जान पड़ेंगी; क्योंकि व्यवहारिक जीवन इन पर आचरण करना आरम्भ में बड़ा कठिन होता है। किन्तु मैं फिर भी विश्वास दिलाना चाहती हूँ कि एक बार इसे सीख लेने पर वह शाँति प्राप्त होगी जिसे कोई भंग नहीं कर सकता। यहाँ तक कि आपके प्रेमपात्र की आपके प्रति अप्रसन्नता भी उसे भंग नहीं कर सकेगी। क्योंकि आप जानते हैं कि अगर आप उनसे पूर्ववत् प्रेम करते ही रहेंगे तो किसी दिन वह पुनः स्वयमेव प्रसन्न हो जायगा, इसलिये थोड़े दिन तक उसके असन्तुष्ट हो जाने की चिन्ता करना अनावश्यक है। यदि आप कष्ट पा रहे हैं तो भी इसके लिये व्याकुल न होने का निश्चय कर लीजिये और अपने आप से कहिये कि “मेरा निकृष्ट स्वभाव कितना कष्ट पा रहा है, पर इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं।” आखिर यह कष्ट पाने वाला हमारा निम्न व्यक्तित्व (घटिया दर्जे का स्वभाव) ही तो है। तब तक हम उसको कष्ट पाने की अथवा दूसरे से प्रेम-याचना करने की इतनी चिन्ता क्यों करें? अपने दुख के प्रति इस मनोवृत्ति को ग्रहण करके आप दुख पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

हम जिनके संपर्क में आते हैं उन सब पर हमें प्रेम रखना चाहिये। इसका अर्थ यह नहीं कि हम प्रत्येक व्यक्ति से एक बराबर प्रेम रखें। यह आशा एक साधारण मनुष्य से तो क्या बड़े से बड़े महापुरुष से भी नहीं रखी जा सकती। भगवान राम हनुमान जी पर जितना स्नेह रखते थे उतना सुग्रीव, अंगद, जामवन्त आदि पर नहीं। भगवान बुद्ध भी अपने शिष्य आनंद से औरों की अपेक्षा अधिक स्नेह रखते थे। इसलिये किसी मनुष्य शरीरधारी से यह आशा करना तो निरर्थक है कि सब के साथ समान प्रेम रखेगा, यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपने माता-पिता,पत्नी या सन्तान के प्रति जैसी भावना रखते हैं क्रियात्मक रूप से हमें सब के प्रति वैसी ही सदिच्छा और प्रेमभावना रखनी चाहिये। जिस क्षण कोई मनुष्य प्रेम के बदले की माँग पेश करता है, उसी समय मानो वह अपना अधिकार प्रतिपादन करने लगता है और इससे स्वार्थ युक्त इच्छाओं की सृष्टि होती है। प्रेम के निःस्वार्थ हुये बिना मनुष्य ईर्ष्या, स्पर्धा एवं दूसरों अनेक इच्छाओं में उलझ जाता है। इसलिये स्वार्थ की भावना से मुक्त होने के लिये हमको सरल भाव से दूसरी के साथ उपकार करने का स्वभाव बताना चाहिये और उसी में आत्मानन्द लाभ करने की प्रवृत्ति उत्पन्न करनी चाहिये।


गृहस्थ में रहकर ही मुक्ति प्राप्त कीजिये

(श्री.वी. एम. शाह)

अगर दान, शील, तप और सद्भावना का पालन करते हम मुक्ति के समीप नहीं पहुँचते तो समझ लेना चाहिये हमने इन कार्यों का वास्तविक रूप में पालन नहीं किया।

प्रश्न होता है कि हम किसकी मुक्ति चाहते हैं? तुम स्वयं कहते हो कि “मुझे मुक्ति मिलनी चाहिये।” इससे प्रकट होता है कि तुम अपने “मैं या अहम्” की मुक्ति चाहते हो। यह “मैं” ही अपने को सुखी या दुखी मानता है, अपने को बद्ध अथवा मुक्त मानता है। इसलिये मुक्ति की आवश्यकता इसी “मैं” को है।

संसार में सर्वत्र हम देखते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के लिये कानून का बंधन स्वीकार करना पड़ता है। पर यदि कोई व्यक्ति राजा बन जाय तो उसे कानून का बन्धन नहीं रहता। इसी प्रकार तुम अपने “मैं” अथवा व्यक्तित्व को राजा बनाओ—समष्टि रूप बनाओ तो तुम सुख-दुख के कानून रूपी बन्धन से मुक्त हो।

घरबार के जंजाल में फँसे व्यक्ति कहते हैं कि मुक्ति इस लोक में नहीं मिलती, परलोक में मिलती है। यह बात झूठी भी नहीं है। बाह्य इन्द्रियों द्वारा दिखाई पड़ने वाली दुनिया—इहलोक है और अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से जिसका अनुभव होता है वह सब परलोक है। इस लोक में तो मजदूरी और मेहनत का ही भार उठाना पड़ता है। शाँति, मुक्ति , आनन्द ये अनुभव तो अंतःकरण अथवा परलोक के ही हैं।

पर परलोक कोई भविष्य काल की वस्तु नहीं है, इस समय भी वह मौजूद है। तुम आज भी परलोक और इहलोक दोनों में रहते हो और इससे अब भी मुक्ति का अनुभव कर सकते हो। मुक्त पुरुष के व्यवहार और विचार, संस्कारबद्ध व्यक्ति के व्यवहारों और विचारों से भिन्न प्रकार के होते हैं। देहाती लोग भी खाते हैं, नगर निवासी भी खाते हैं और राजा भी खाता है, पर तीनों के खाने के तरीके और पदार्थों में अन्तर होता है। भिखारी को हर्ष-शोक होता है, राजा को भी हर्ष-शोक होता है, साधु को भी हर्ष-शोक होता है—पर तीनों के हर्ष-शोक भिन्न प्रकार के होते हैं।

भविष्य में मुक्ति प्राप्त होने के बन्धनों पर ध्यान मत दो। तुम इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करने का उद्देश्य रखो, कि जिससे मुक्त होकर जीवन रूपी घोड़े पर सवार होने का आनंद प्राप्त कर सको। खच्चर पर लदे हुये मूर्ख की तरह समस्त जीवन व्यतीत कर देने में क्या लाभ है?

मुक्त पुरुष और मुक्त स्त्रियाँ ही हँसते-खेलते अपने राष्ट्र और समस्त मनुष्य जाति को मुक्त करेंगी।

यदि तुम मुक्ति के लिये योजनापूर्वक और उत्साहपूर्वक प्रयत्न करो और फिर भी इस जीवन में मुक्ति न मिले, तो कम से कम वह पहले की अपेक्षा अधिक समीप तो आ ही जायगी। तब तुम्हारी आगामी पीढ़ी उसके और भी समीप आ जायेगी। इसके परिणामस्वरूप उससे आगामी पीढ़ी तो मुक्ति पर सवार हो ही जाएगी। उसमें आवश्यकता इसी बात की है कि तुम अपनी आगामी सन्तान में मुक्ति के लिये बेचैनी का भाव पैदा कर दो। अगर तुम ऐसा कर सको तो समझ लो कि तुमने मुक्ति प्राप्त कर ही ली और कोई तुम्हें उससे वंचित नहीं कर सकता।

चूँकि मुक्ति और बंधन मन पर निर्भर करता है इसलिए राग द्वेष व आसक्ति रहित फल की आशा न रखकर गृहस्थ कार्यों को कर्तव्य पूर्वक पालन करते हुए कर्म बन्धन से छूट सकते हो।


संसार की वर्तमान परिस्थिति और वेदान्त

(श्री शम्भूसिंह कौशिक)

वर्तमान युग विज्ञान-प्रधान माना गया है। इसमें सबसे बड़ी शक्ति विज्ञान की ही स्वीकार की जा रही है और अपनी उन्नति के लिये सब कोई उसी का आश्रय ग्रहण कर रहे हैं। कारण यह है कि इस समय विज्ञान का सम्बन्ध केवल भौतिक पदार्थों और भौतिक शक्तियों से है और इसलिये उसका परिणाम हर श्रेणी के लोगों को प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ जाता है। विज्ञान के द्वारा लोग तरह तरह के आविष्कार करके अपनी शक्ति बढ़ा रहे हैं, सुख-सुविधा प्राप्त कर रहे हैं, व्यापार-वाणिज्य का विस्तार करके अपनी सम्पत्ति की वृद्धि कर रहे हैं। इन प्रत्यक्ष लाभों को देख कर संसार सब से अधिक महत्व विज्ञान को ही देता है और उसके आगे अन्य सभी विषय फीके पड़ गये हैं।

पर विज्ञान जहाँ सुख सुविधाओं की वृद्धि कर रहा है वहाँ उसने नाशक शक्तियों को भी खूब बढ़ाया है और ये शक्तियाँ परमार्थ ज्ञान से शून्य मनुष्यों के हाथ में आकर बर्बादी का कारण बन रही हैं। शक्ति के मद से अन्धा होकर मनुष्य सत्य और न्याय के नियमों को भूल गया है और चाहता है कि मैं ही सर्वोपरि बन कर संसार भर का कर्ता-धर्ता बन जाऊँ। जब ऐसी शक्ति कई राष्ट्रों के हाथ में आ जाती है और वे संसार पर प्रभुत्व जमाने की प्रतिद्वन्द्विता में शक्ति का प्रदर्शन करने लगते हैं तो स्वभावतः संसार की शाँति और सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है और दुनिया उत्थान के बजाय पतन की ओर अग्रसर होने लगती है। तब विचारशील व्यक्ति कोरे विज्ञान की वृद्धि को हानिकारक मानकर किसी ऐसे मार्ग की खोज करते हैं जिससे विज्ञान की ध्वंसकारी शक्ति नियंत्रण में रहे और मनुष्य उसका उपयोग मानव-सभ्यता पर ही कुठाराघात करने में न करें।

ऐसा मार्ग या साधन जिसे वर्तमान संसार अपने सर्वनाश से भयभीत होकर खोज रहा है, बहुत पहले से ढूँढ़ा जा चुका है और मनुष्य उसे जानते भी हैं। वह साधन धर्म है, जिसका ध्यान रखने से मनुष्य शक्ति पाकर भी संयम नियम में रह सकता है और दूसरों के स्वत्त्वों को अपहरण करना एक जघन्य कार्य मानता है। जब तक मनुष्य इस दृष्टिकोण को सम्मुख करता है तब तक संसार की शाँति को कोई खतरा नहीं रहता। उस समय विशेष शक्ति सम्पन्न व्यक्ति की प्रतिभा और प्रयत्न का उपयोग समाज के अन्य अल्प शक्ति वाले लोगों के हितार्थ होता है और इसके बदले में वह “समाजसेवक” या “समाज के नेता” का गौरव प्राप्त करता है।

पर दुर्भाग्यवश सौ दो सौ वर्ष से यह दृष्टिकोण बदल गया है। यह मुख्य रूप से व्यापार व्यवसाय की प्रधानता का युग है और विज्ञान की बागडोर खास कर उद्योगपतियों के हाथ में ही आ गई है। वे अपने धन-बल के द्वारा वैज्ञानिकों को अपने प्रभाव में रखते हैं और उन्हें विशेष रूप से वही आविष्कार करने को प्रेरित करते हैं जिससे उनका आर्थिक लाभ हो। जब तक संसार में ऐसे उद्योगपतियों की संख्या कम थी और अनेक अविकसित भूभाग उनके विस्तार के लिये पड़े थे, तब तक तो इस व्यवस्था के दोष अधिक भयंकर रूप में सामने नहीं आते थे और लोग प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की प्रसन्नता में विज्ञान के गुण ही गाया करते थे। पर जब एक दूसरे का अनुकरण करके उद्योगपतियों (जो अब संसार के धन कुबेर बन बैठे हैं) की संख्या बढ़ गई और अविकसित क्षेत्रों के कम पड़ जाने से उनके स्वार्थ टकराने लगे, तो परिस्थिति की वास्तविकता प्रकट हुई। इस समय चूँकि शासन की बागडोर इन्हीं धनकुबेरों के हाथों में थी और धर्म से उसका सम्बन्ध विच्छेद कर दिया गया था, इसलिये वे न्याय-अन्याय की अथवा निर्दोष जनता के कष्टों की कुछ भी परवाह न करके एक दूसरे को दबाने का प्रयत्न करने लगे। आजकल हम संसार में इसी संघर्ष का चरम स्वरूप देख रहे हैं और उसके फल से उत्पन्न सर्वनाश की काली छाया सभी विवेकशील लोगों के हृदय को कम्पित और व्याकुल कर रही है।

अब प्रश्न होता है कि ‘धर्म’ किस प्रकार इस समस्या को हल कर सकता है और नाशक-कार्यों में प्रवृत्त शक्ति को जन-कल्याण की दिशा में मोड़ सकता है? यहाँ पर ‘धर्म’ का आशय किसी विशेष मतमतान्तर से नहीं वरन् सत्य और न्याय के शुद्ध व्यवहार से ही है। अगर हम इसका आश्रय लें तो विज्ञान और शासन (राजनीति) में जो दोष व्यापारिक स्वार्थपरता के कारण उत्पन्न हो गये हैं उनका शीघ्र ही परिहार हो सकता है। इस विषय में विवेचन करते हुये भारत के सुप्रसिद्ध तत्वज्ञ और राजनीतिक श्री राजगोपालाचार्य ने अपने एक लेख में कहा है—

“जो वस्तु विज्ञान के नाम से लिखाई जाती है और सत्य के नाम से पूर्णतया स्वीकार कर ली जाती है उसे धर्म में भुला देने की अपेक्षा है। इतना ही नहीं धर्म में जिस श्रद्धा को पवित्र और अनुल्लंघनीय माना जाता है, उसे राजनैतिक कार्यों से अलग रखने और उनमें कोई योग प्रदान न कर देने की अपेक्षा रखी जाती है। इसके लिये हम अनेक प्रकार की आत्म प्रवञ्चना का आश्रय लेते हैं और अपनी सन्तानों के साथ कपट करके उनको भी वही विपरीत बातें समझाते रहते हैं। परस्पर विरोधी विचारों को एक साथ स्वीकार किया जाना—उनको परस्पर मिला देना—कभी कल्याणकारी नहीं हो सकता, चाहे यह कार्य सद्भावना के साथ ही क्यों न किया जाय। असत्य का परिणाम सदैव आध्यात्मिक मृत्यु ही होता है। प्राचीनकाल में इस प्रकार का विरोध भाव इतनी अधिक मात्रा में न था, क्योंकि उस समय विज्ञान की इतनी प्रगति नहीं हुई थी। धर्म और दर्शन के उत्साहपूर्ण अनुसरण से विसंगति (परस्पर विरोधता) उत्पन्न नहीं होती थी, वरन् मनुष्य बड़ी-बड़ी सफलताएँ प्राप्त करते थे। यह इसीलिये हुआ कि उन्होंने परस्पर विरोधी सिद्धान्तों पर विश्वास करने का प्रयत्न नहीं किया। अब विज्ञान का विकास हो गया है और उसे पहले से बहुत बड़े प्रमाण में स्वीकार कर लिया गया है। इसी के फलस्वरूप विसंगति का दोष अधिक गंभीर हो उठा है।”

धर्म का वह रूप जो मतमतान्तर के भेदों और विवादों से मुक्त है तथा लोगों को शुद्ध सत्य और न्याय का व्यवहार करना सिखलाता है “वेदान्त” ही है। इसे कोई सम्प्रदाय मानना भूल है। यह एक और अविच्छेद्य सत्य पर आधार रखता है इसलिये विज्ञान और राजनीति के व्यवहार इसके आधार पर बिना किसी प्रकार की क्षति और त्रुटि के चल सकते हैं। इस मत का प्रतिपादन आधुनिक विचारों के विद्वान ही नहीं करते वरन् शृंगेरी मठ (मद्रास प्राँत) के शंकराचार्य जैसे प्राचीनतावादी ने भी इसका समर्थन करते हुये अपने एक शिष्य को वेदान्त के नीचे लिखे तीन ही मुख्य लक्ष्य बतलाये थे—

(1) वेदान्त भूतमात्र के सुख की साधना करता है (सर्व सत्त्व सुखे हितः)।

(2) वेदान्त कभी किसी दार्शनिक या धार्मिक सम्प्रदाय से विरोध नहीं करता।

(3) वेदान्त-तत्व में दूसरों से विवाद के लिये स्थान ही नहीं है। संसार के किसी भी व्यक्ति या विचार-परम्परा पर विजय प्राप्त करने की यह चेष्टा नहीं करता, क्योंकि समस्त विचारों को यह अपना ही अंग मानता है (यथा स्वहरत पादादिभिः)।

इसलिये वर्तमान विज्ञान और राजनीति की जिन त्रुटियों ने संसार में स्वार्थपरता और अशान्ति की वृद्धि की है और मनुष्य को स्वार्थपरता की ओर प्रेरित कर रखा है, उनके सुधार और सही रास्ते पर आने का उपाय “वेदान्त-धर्म” में ही है। जब मनुष्य विश्व की एकता और हितों की समानता के सिद्धान्त को समझ कर पालन करने लगेगा तो संशय, कलह और संघर्ष का वर्तमान दूषित वातावरण स्वयं ही बदल कर परमार्थ और सहयोगात्मक मनोवृत्ति को जन्म देगा जो सबके लिये कल्याणकारी सिद्ध होगी।


क्या हम फिर जन्म न लेंगे?

(डॉ. चमनलाल गौतम)

मृत्यु और पुनर्जन्म संसार की दो बहुत बड़ी समस्याएँ हैं। वैसे तो साधारण व्यक्ति आजकल कमाने-खाने को ही सब से अधिक महत्व देते हैं, पर उनका यह विचार विशेष बुद्धिमत्ता का नहीं कहा जा सकता। इस संसार का विस्तार और इसकी अवधि जितनी हमको दिखलाई पड़ती है, वह यद्यपि वास्तविकता से बहुत कम होती है तो भी यदि हम अपने जीवन के भोगों की उससे भी तुलना करें तो वे पर्वत के सामने एक राई के बराबर भी नहीं ठहरते। संसार में जो अपार सामग्री भरी पड़ी है, जो नई-नई चीजें निकलती आती हैं उनको देखते हुये एक साधारण व्यक्ति को प्राप्त होने वाली भोग सामग्री कुत्ते के सामने फेंके गये टुकड़े से अधिक महत्व नहीं रखती। इसी प्रकार यह संसार पिछले हजारों लाखों वर्ष से इसी प्रकार धूमधाम से चलता आया है और आगे भी संभावना है। ऐसी दशा में अपने पचास सौ वर्ष के जीवन में हम उसके जितने अंश को जान सकते हैं और उपभोग कर सकते हैं वह भी नगण्य ही है। ऐसी तुच्छ चीजों को सब से अधिक महत्व देने और मृत्यु तथा पुनर्जन्म जैसी अनिवार्य और स्थायी बातों के सम्बन्ध में अज्ञान में पड़े रहने को अगर बुद्धिहीनता के नाम से पुकारा जाय तो इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है क्योंकि यदि हम मृत्यु और पुनर्जन्म के रहस्य को समझ लें और हमको यह विश्वास हो जाय कि हमारा यह जीवन एक पानी का सा बुलबुला नहीं है वरन् भूतकाल और भविष्य काल के अन्य जन्मों से सम्बन्धित एक अविच्छिन्न धारा है, तो हमारे विचारों और जीवन में बड़ा भारी परिवर्तन हो सकता है और हम अपने को शाश्वत सुख का अधिकारी समझ कर तदनुकूल आचरण कर सकते हैं।

परलोक-जीवन की समस्या को समझने के लिये अपने स्वरूप का कुछ ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है क्योंकि मरने के बाद भी हमारा कुछ अंश बचा रहता है, इसलिये साधारणतया लोग अपनी प्रकृति को दो भागों में विभक्त करते हैं—एक वह शरीर जो नाशवान है और दूसरा जीव अथवा आत्मा जिसका नाश नहीं होता। पर ध्यान देकर देखने से प्रतीत होता है कि जीव और आत्मा हमारे दो भिन्न-भिन्न स्वरूपों को प्रकट करते हैं। इसलिये हमें अपनी प्रकृति को तीन भागों में विभक्त करना चाहिये, जिनको हम देह देही और विदेह अथवा आत्मा, जीवात्मा और देहात्मक जीव कह सकते हैं। वास्तव में इस त्रिगुणात्मक भाव पर ही इस समस्त सृष्टि का व्यापार निर्भर है। साक्षात ब्रह्म भी जब सृष्टि के आदि में सगुण रूप धारण करते हैं तो सत् चित् आनन्द, अथवा ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन तीन स्वरूपों में प्रकट होते हैं। इस त्रिगुणात्मक भाव का आभास सृष्टि के प्रत्येक अंग में पाया जा सकता है।

अब तक तो यह शरीर और आत्मा का विभाजन प्राचीन शास्त्रों तथा आध्यात्मिक ग्रन्थों में ही पाया जाता था, पर अब कुछ समय से यह वैज्ञानिक अनुसंधान का भी एक विषय बन गया है। पहले विज्ञान के लिए जड़वाद माना जाता था और उसमें भौतिक पदार्थों और शक्तियों के सिवा अन्य किसी विषय की विवेचना देखने में नहीं आती थी। पर जब वे इस भौतिक क्षेत्र की जाँच समाप्त करके उसके अन्तिम छोर पर पहुँच गये तो उन्हें आगे भी विश्व के अनेक रहस्य जान पड़े जो उनके भौतिक क्षेत्र में नहीं आये थे। कुछ आगे बढ़ने पर उनको मनुष्य के मस्तिष्क में कुछ स्थायी भाव प्रतीत हुआ और वे जाँच करने पर निष्कर्ष पर पहुँचे कि मृत्यु के बाद भी मानव-जीवन का स्वतन्त्र अस्तित्व रहता है। एक बार मृत्यु के बाद जीवन की अमरता स्वीकार कर लेने पर, पुनर्जन्म को तो बाध्य होकर मानना ही पड़ेगा। सत्य के प्रति आँख मूँद कर हठपूर्वक कोई सदा कैसे बैठा रह सकता है?

हिन्दू-धर्म कर्मफल और पुनर्जन्म के सिद्धाँत का सामान्य रूप से सर्वत्र प्रचार है। इन विषयों पर विचार करने वाले लोगों की संख्या तो अधिक नहीं पर एक रूढ़ि के रूप में प्रायः सभी लोग इन सिद्धाँतों को मानते हैं। पर चूँकि धीरे-धीरे उनका विश्वास अत्यन्त ही भ्रमपूर्ण और विकृत हो गया है, इसलिये वे उससे किसी प्रकार का लाभ नहीं उठाते। इस समय यदि जाँच की जाय तो ज्यादातर लोग इन बातों के स्वरूप को कुछ भी न समझ कर इन्हें एक प्रकार के भय के रूप में मानते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि कुछ चालाक लोग उनकी इस भावना का लाभ उठाते हैं और पापों से छूटने की अनेक विधियाँ बतलाकर आप निःस्वार्थ सिद्ध बनते हैं। अनेक लोग हत्या, चोरी, डाका, व्यभिचार, नशाखोरी आदि सब प्रकार के कुकृत्य करते रहते हैं और साथ में थोड़ा बहुत दान-दक्षिणा देकर यह समझ लेते हैं कि हमारे पापों का प्रायश्चित हो गया और अब परलोक में हमको इनका दण्ड नहीं भोगना पड़ेगा। इस तरह के भ्रमपूर्ण विश्वास का न तो कोई महत्त्व होता है और न उससे कोई लाभ उठाया जा सकता है। इस सिद्धान्त की वास्तविकता के विषय में एक विद्वान ने अच्छा प्रकाश डाला है। वह कहता है—

“साधारण तौर से हम समझते हैं कि मरने के बाद मनुष्य कर्मानुसार स्वर्ग तथा नरक में जाता है और फिर कुछ दिनों तक सुख अथवा दुःख भोग कर पृथ्वी पर दूसरे जन्म धारण कर लेता है। पर किस क्रम से वह परलोक जीवन बिताता है इसका हमें कुछ स्पष्ट ज्ञान नहीं होता और न हम यह समझते हैं कि स्वर्ग और नर्क से क्या तात्पर्य है? ये लोक कहाँ है? इसी प्रकार हम इस बात को भी स्पष्ट रूप से नहीं जानते कि मरने के बाद जब यह शरीर छूट जाता है तो किस स्वरूप में मनुष्य कहाँ रहता है?

मरने के बाद के जीवन को समझने के लिये मनुष्यों को नीचे के तीन श्लोकों का कुछ ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। हमारे निवास स्थान—भूलोक के दो विभाग हैं, स्थूल और सूक्ष्म। भुवःलोक के भी तीन विभाग हैं जिनमें एक को नर्क कहते हैं। इस भुवःलोक को कामलोक भी कहते हैं, क्योंकि इसी लोक के तत्वों के जरिये इच्छाओं, वासनाओं अथवा भावनाओं के कार्य होते हैं। स्वलोक के भी स्थूल, सूक्ष्म दो विभाग हैं। इस लोक को मानसिक लोक भी कहते हैं, क्योंकि इसी लोक के द्रव्यों के जरिये विचारों के कार्य होते हैं।

अब एक विषय विचार करने का यह है कि मृत्यु का समय मनुष्य के लिये बड़े महत्व का होता है। भगवान कहते हैं कि मरने के समय जिसका जैसा भाव होता है, वह वैसी ही गति को प्राप्त करता है, यथा—

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। त तमेवेति कौन्तेय सदा सद्भाव भावितः॥

—भगवद्गीता 8-9

अर्थात् “हे अर्जुन! अन्त समय में जो जिसका स्मरण करता हुआ इस शरीर का त्याग करता है, उसी भाव से सदा भावित होने के कारण वह उसके पास पहुँच जाता है।

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावम् याति नास्त्यत्र संशयः॥

“अर्थात् अन्त समय में जो मुझको ही स्मरण करता हुआ अपने शरीर का त्याग करता है, वह मुझको प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है।”

इन महावाक्यों से भली भाँति पता चलता है कि मृत्यु की घड़ी कितने भारी महत्व की होती है? यह ख्याल करना कि हम चाहे जैसा जीवन बितावें अन्त समय में भगवान का खूब नाम लेंगे तो मुक्त हो जायेंगे, बहुत बड़ी गलती है। यदि हमको सदा भगवान का नाम लेने का अभ्यास नहीं रहेगा तो अन्त समय में हमारा ऐसा भगवत् नाम लेने का भाव ही न होगा। इसलिये परलोक तथा पुनर्जन्म के रहस्य को जानना और तदनुकूल सद् आचरण की प्रतिज्ञा लेना ही मनुष्य के लिये कल्याण मार्ग है।


भावनायोग द्वारा दिव्य दृष्टि

(श्री 108 स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी)

संसार में मनुष्य सब से महत्वपूर्ण प्राणी है। यदि विचार किया जाय तो वह ईश्वर का ही प्रतिरूप है जिसका आदि और अन्त उसी में होता है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर सब प्रकार की शक्तियाँ बीज रूप में निहित रहती हैं, जिनके द्वारा अगर दृढ़ निश्चय कर ले तो बड़े से बड़े कार्य को सिद्ध करके दिखा सकता है। पर यह तभी संभव है कि सब से पहले मनुष्य अपनी आत्मा को पहिचाने और उसे साँसारिक विषयों से बचाकर निर्मल तथा शुद्ध बनाने का प्रयत्न करे क्योंकि बिना इसके आत्मा ऊर्ध्वगामी नहीं बन सकती। मनुष्य के भीतर परमात्मा का निवास अवश्य है, पर वह श्रेष्ठ रूप में तभी विकसित हो सकता है जब हम शुद्ध आचार-विचार और निष्कपट आचरण द्वारा उसे प्रभु के आसीन होने योग्य बना लेवें।

जीवन को इस प्रकार के आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करने की अनेक विधियाँ हैं। ज्ञान, भक्ति और कर्म ये तीनों मार्ग तो बहुत प्रसिद्ध हैं और इनके विषय में सभी मतमतान्तरों और सम्प्रदायों के विद्वानों ने छोटे बड़े ग्रन्थ लिखे हैं। पर इनके सिवाय और भी अनेक विधियाँ ऐसी हैं, जिनसे मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति करता हुआ परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है। योग ग्रन्थों में सोलह प्रकार के योग बतलाये गये हैं जिनमें राजयोग और हठयोग के सिवाय ज्ञानयोग, मन्त्रयोग, लययोग, जपयोग आदि अनेक साधन-विधियों का उल्लेख आता है। भावना-योग भी एक ऐसी ही साधन प्रणाली है जिसके अनुसार मनुष्य ईश्वर के परम प्रेमयुक्त नाम को स्मरण करके उसका साक्षात्कार कर सकता है। हिन्दू-धर्म के “नारद भक्ति -सूत्र” “श्रीमद्भागवत्” आदि ग्रन्थों में इस प्रणाली का उल्लेख किया गया है और अन्य धर्मों में भी इसका महत्व स्वीकार किया गया है। अंग्रेजी में इसे “मिस्टिसिज्म” कहा जाता है जिसका हिन्दी पर्यायवाची “रहस्य योग“ या ‘भावना योग‘ होता है। इसमें न तो राजयोग के समान प्राणायाम, धारणा, समाधि आदि जैसे गम्भीर साधन करने पड़ते हैं न हठयोग के समान षट्कर्म, आसन आदि की कठिन क्रियाओं की आवश्यकता पड़ती है। इसका आधार तो प्रभु की अत्यन्त प्रेमपूर्ण प्रार्थना करना और हृदय से उनकी कृपादृष्टि की आकाँक्षा करते रहना ही है। इस दृष्टि से इसे हम अपने भक्ति -योग का एक अंग कह सकते हैं। पर इस समय भक्ति -साधन में जिस प्रकार अपने इष्टदेव की मूर्ति की षोडशोपचार पूजा की प्रणाली विशेष रूप से चल पड़ी है वह “भावना-योग“ में आवश्यक नहीं। इसका आधार तो अपनी शुद्ध और अकृत्रिम भावना ही है, उसे चाहे जिस किसी विधि से काम में लाया जाय। यही कारण है कि “भावना-योग“ का साधन किसी एक धर्म से सम्बन्ध नहीं रखता। हिन्दू-मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि सभी इसे कर सकते हैं और करते हैं। मुसलमानों के सूफी-सन्त अधिकतर भावना योगी ही थे। ईसाइयों में भी इस साधन का विशेष रूप से प्रचार है और कहा जाता है कि ईसाइयों की धर्म-सभाओं में अनेक बार भावना-योग (मिस्टिसिज्म) की सामूहिक साधना के फलस्वरूप कई व्यक्तियों के जीवन स्थाई रूप से परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रणाली के अनुसार प्रभु की प्रार्थना के स्वरूप और महत्त्व का विवेचन करते हुये एक विद्वान ने लिखा है—

“ईश्वर और मनुष्य के बीच पुल बाँधने का कार्य प्रार्थना से होता है। मनुष्य के हृदय के भीतर चाहे दृढ़ निश्चय होवे कि ईश्वर हमको क्षमा प्रदान करेगा, चाहे उसे पूर्ण भरोसा होवे कि प्रभु कृपा हमें प्राप्त होगी, पर इतने निश्चय मात्र से काम न चलेगा। प्रार्थना ही वह जादू का कार्य है, जिससे पुल बँधता है। प्रार्थना के बिना यह चमत्कार नहीं हो सकता। इसलिये भावना-योग में प्रार्थना पर विशेष महत्त्व रखा गया है और मनुष्य की अपात्रता तथा अयोग्यता पर विशेष जोर इसलिये दिया जाता है कि उसमें अति दीनता का भाव उत्पन्न हो। प्रार्थना द्वारा जो जादू का कार्य होता है, इस दीनता-भाव की प्राप्ति से उसका निश्चय हो जाता है।

भावना योग के कुछ साधक अपने पूज्यदेव की नारी रूप में भक्ति करना श्रेष्ठ मानते हैं। जैसे ईसाई धर्म में कुमारी मेरी की, हिन्दू धर्म में काली और राधा आदि की, मिश्र में माँ आइसिस की, ग्रीक-धर्म में पैल्लस अथीनी की पूजा और प्रार्थना विशेष फलप्रद मानी जाती है और बहुसंख्यक लोग उसका अनुसरण करते हैं। ऐसा क्यों होता है यह आत्मा का एक ऐसा गुप्त रहस्य है जिसे केवल वे ही समझ सकते है जो इस भावना-मार्ग को ग्रहण करते हैं। यहाँ हम इतना ही कह सकते हैं कि प्रेम-भावना मार्ग का एक अति सुन्दर और बलवान रूप है जिसमें प्रेमस्वरूप परमात्मा माता, देवी या प्रियतमा के रूप में दीख पड़ता है। ईश्वर या देवी के चरणों में प्रेम और आत्म-समर्पण की धारा के द्वारा अपने हृदय और आत्मा को अर्पण कर देना यही हृदय की एक मात्र अभिलाषा रहती है। इस योग में आत्मा राम-राम करके प्रभु स्वभाव के अनेक रहस्यों को जानती है। इस श्रेणी के साधक प्रार्थना नहीं करते और न कुछ माँगने या कामना करने का कोई भान रखते हैं। फूल की कली सूर्य प्रकाश से कुछ माँगती नहीं है, वह तो खिलती है, पूजा करती है और अपनी सुन्दरता प्रकट करती है। पर उसमें भी पूर्ण प्रबल प्रयत्न की आवश्यकता है! यह पूजा निषेधात्मक प्रयत्नहीनता नहीं है पर इसमें आत्मा का निश्चयात्मक और तेजस्वी समर्पण उपस्थित रहता है।”

भावना योगी का प्रधान लक्षण बाह्य जगत की बातों की अपेक्षा अपने अंतर्जगत को अधिक महत्व देना होता है। उसका जीवन मुख्य रूप से अन्तः प्रवृत्ति पर ही आश्रित रहता है और बाहरी बातों से वह उन्हीं को स्वीकार करता है जो उसकी आन्तरिक भावनाओं के अनुकूल सिद्ध होती हैं। यही कारण है कि अनेक समय धर्मात्मा और भावना योगी में एक विरोध का सा भाव जान पड़ता है। इस विषय का विवेचन करते हुए एक स्थान पर कहा गया है—

“भावना-योगी और धर्मात्मा के अन्तर को हमें भूल न जाना चाहिये। वे दोनों धार्मिक हों और किसी एक ही पंथ या क्रियाकाण्ड में दोनों की एक सी श्रद्धा हो, पर दोनों में एक बड़ा अन्तर स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। धर्मात्मा का प्रमाण उसका पंथ, शास्त्र या उसकी क्रिया ही हैं, पर भावना योगी को ऐसे बाह्य प्रमाणों को अधिक महत्व देना योग्य नहीं जँचता। प्रचलित रूढ़ियों और नियमों के भावना योगी एक काँटा ही बना रहता है क्योंकि बाह्य प्रमाण उसे तब तक ही माननीय रहता है जब तक वह उसकी भावना के अनुकूल होता है। धर्मात्मा मनुष्य अपनी इच्छा को अपने से बड़े की इच्छा के अनुकूल बनाने को तैयार रहता है, पर भावनायोगी अपनी इच्छा का ही पालन करता है। सब प्रकार के भावना-योग मुख्यतः व्यक्तित्व-प्रधान होते हैं,पर सच्चे भावना-योग में ऐसा व्यक्तित्व रहता है जो सारे विश्व को अपने अमर आलिंगन में लिये रहता है।”

इस विवरण से “भावना-योग“ को कोई विशेष पंथ या सम्प्रदाय मान लेना भूल होगी। ये विभिन्न साधन प्रणालियाँ इसी कारण चलाई गई हैं कि उनके द्वारा पृथक-पृथक मनोवृत्तियों और स्वभाव के लोगों को अपने अनुकूल मार्ग छाँट लेने की सुविधा प्राप्त हो सके। “एक ही स्थान को जाने के लिये एक व्यक्ति छह महीने का और दूसरा साल भर का मार्ग पसन्द करता है।” पर इसका यह आशय निकालना कि वे एक दूसरे के विरोधी हैं अथवा इस मत भिन्नता के कारण उनको लड़ना-झगड़ना चाहिये। सब से बड़ी बुद्धिहीनता की निशानी है। वास्तव में शुद्ध आत्मा होने पर सब का लक्ष्य एक ही रहता है और वे मार्ग की भिन्नता को जरा भी महत्व न देकर सबको आत्मस्वरूप मानते हैं। शंकराचार्य जी ने सन्त के लक्षण बतलाते हुये सत्य ही कहा है—

“के संति संतोऽखिल बीतरागाः अपास्तमोहाः शिव तत्व निष्ठाः”।

अर्थात्—”संत कौन है? जिनके सब राग और मोह निकल गये हैं और जो शिवतत्त्व (ईश्वर तत्त्व) के चिन्तन में सदैव लगे रहते हैं वे ही संत हैं।” यह भावना योगी की मान्यता और भावना होती है।


मन की अपार सामर्थ्य

(श्री हेमचन्द्र साहित्य मनीषी)

साधारण लोग शरीर की शक्ति को ही सर्वोपरि मानते हैं। उनकी समझ में जो आदमी जितना अधिक हट्टा-कट्टा, और पुष्ट और मजबूत स्नायुओं वाला होता है, वह उतना ही शक्तिशाली होता है। जो मनुष्य चार-छह मन बोझ को आसानी से एक जगह से उठाकर दूसरी जगह रख सकता है, मोटरगाड़ी को पकड़ कर रोक सकता है, लोहे की मोटी छड़ को मरोड़ सकता है उसे बहुत बड़ा बलवान माना जाता है। एक ऐसा मनुष्य जो बीस सेर बोझा भी नहीं उठा सकता ऐसे शक्तिशाली व्यक्ति को ललकार देता है और उसे अपनी आज्ञानुसार चलने को बाध्य कर देता है। तब हमको अनुभव होता है कि संसार में स्थूल शक्ति से भी बढ़कर कोई सूक्ष्म शक्ति काम कर रही है, और वही वास्तव में समस्त कार्यों का मूल कारण है।

विचार किया जाय तो संसार का आदि स्वरूप सूक्ष्म ही है और उसी से क्रमशः स्थूल का विकास हुआ है। इस प्रकार हम सूक्ष्म को स्थूल का कारण कह सकते हैं और कारण को जान लेने तथा स्वयंवश करे लेने पर कार्य को सफल बना सकना कुछ भी कठिन नहीं रहता। एक समय था जब मनुष्य केवल अपने हाथ पैरों की या हाथी, घोड़े, बैल आदि की शक्ति को ही प्रधान मानता था और उसी से बड़े-बड़े कार्य सिद्ध करता था। उस समय अगर उनको कोई सौ मन की वस्तु अपने स्थान से हटानी पड़ती तो उसमें सौ आदमी ही लग जाते थे अथवा कितने हाथी, बैलों आदि को एक साथ जोत कर इस कार्य को पूरा कराया जाता था। पर कुछ समय पश्चात् जब मनुष्य को भाप जैसी सूक्ष्म वस्तु का ज्ञान हुआ तो उसकी सहायता से अकेला मनुष्य ही हजार-हजार मन वजन की वस्तुओं को हटाने में समर्थ हो गया। इससे आगे चल कर मनुष्य को बिजली की शक्ति का ज्ञान हुआ जो भाप की शक्ति से भी सूक्ष्म थी। इससे मनुष्य को ऐसी शक्ति प्राप्त हुई कि वह सैकड़ों मील दूर बैठ कर ऐसे-ऐसे कार्यों को पूरा करने लगा जिसे पहले दो चार हजार आदमी भी कठिनाई से कर सकते थे। अब वर्तमान समय में मनुष्य अणुशक्ति को हस्तगत कर रहा है जो बिजली से भी अत्यन्त सूक्ष्म है। इसकी सहायता से अब यह आशा की जा रही है कि मनुष्य बड़े-बड़े पर्वतों और सागरों की भी काया पलट कर सकेगा और आकाश स्थित ग्रहों पर भी अधिकार जमा सकेगा।

इतना होने पर भी ये सब भौतिक शक्तियाँ हैं। इन सबका उद्गम भौतिक पदार्थों से होता है और उनका प्रभाव भी भौतिक जगत तक ही सीमित रहता है। हमारा मन इन भौतिक पदार्थों की अपेक्षा कहीं अधिक सूक्ष्म है इसलिये स्वभावतः वह इन सब की अपेक्षा अधिक शक्ति का भंडार है। यह सच है कि लोगों को न तो मन की शक्तियों का ज्ञान है और न वे उससे काम लेने की विधि जानते हैं, पर यदि हम इस विषय में चेष्टा करें तो मन की शक्ति से ऐसे-ऐसे कार्य कर सकते हैं जो उपरोक्त भौतिक शक्तियों से असम्भव हैं। आज कल जो लोग “मैस्मेरिज्म” “हिप्नोटिज्म” ‘विचार-संक्रमण’ (थाट ट्रान्सफरेंस) आदि के चमत्कार दिखलाते हैं, वे मन की शक्ति के साधारण कार्य होते हैं। पर इन्हीं के द्वारा कैसे-कैसे असम्भव समझी जाने वाली बातें कर दिखाई जाती हैं, इनका वर्णन स्वामी विवेकानन्दजी ने एक स्थान पर किया था। वे उन्होंने अपने एक भाषण में बतलाया—

“मैंने एक बार एक ऐसे मनुष्य के बारे में सुना जो किसी के प्रश्न का उत्तर सुनने के पहले ही बता देता था। मुझे यह भी बतलाया गया कि वह भविष्य की बातें बतलाता है। मुझे उत्सुकता हुई और अपने कुछ मित्रों के साथ मैं वहाँ पहुँचा। हम में से प्रत्येक ने पूछने का प्रश्न अपने मन में सोच लिया था और कोई गलती न हो इस ख्याल से उन प्रश्नों को कागज पर लिख कर अपने जेब में भी रख लिया था। ज्यों ही हम में से एक वहाँ पहुँचा उसने हमारे प्रश्न और उनके उत्तर बतलाने शुरू कर दिये। फिर उस मनुष्य ने एक कागज पर कुछ लिखा, उसे मोड़ा और उसके पीछे की तरफ मेरे हस्ताक्षर कराये। तब वह बोला इसे पढ़ो मत, अपने जेब में रख लो जब तक कि मैं इसे न माँगूँ।” उसने ऐसा ही एक-एक कागज सब को दिया और यही बात कही। फिर उसने कहा कि “अब तुम किसी भी भाषा का कोई वाक्य या शब्द अपने मन में सोच लो”! मैंने संस्कृत का एक लम्बा वाक्य सोच लिया। वह मनुष्य संस्कृत बिल्कुल न जानता था। उसने कहा “अब अपने जेब में से उस कागज को निकालो।” कैसा आश्चर्य! वही संस्कृत का वाक्य उस कागज पर लिखा था और नीचे यह भी लिखा था कि “जो कुछ मैंने इस कागज पर लिखा है वही यह मनुष्य सोचेगा।” और यह कागज उसने मुझे एक घंटा पहले लिख कर दे दिया था। हम में से दूसरे को, जिसके पास भी उसी तरह अरबी भाषा का एक फिकरा सोचा। अरबी भाषा जानना उस मनुष्य के लिये और भी असम्भव था। वह फिकरा था “कुरान शरीफ” का। लेकिन मेरा मित्र क्या देखता है कि वह भी उसके जेब में रखे कागज पर पहले से लिखा हुआ रखा है। हम में से तीसरा साथी था डॉक्टर। उसने जर्मन भाषा की किसी डाक्टरी पुस्तक का वाक्य अपने मन में सोचा। उसके जेब के कागज पर वही वाक्य लिखा हुआ निकला।

“यह सोच कर कि मैंने पहले पहल कहीं धोखा न खाया हो, कई दिन बाद मैं फिर दूसरे मित्रों को साथ लेकर वहाँ गया। पर इस बार भी उसने वैसी ही आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करके दिखलाई।”

इस प्रकार के उदाहरणों की कोई कमी नहीं है। उपर्युक्त उदाहरण हमने इसलिये दिया है क्योंकि यह एक ऐसे महापुरुष के मुख से निकला है जिसकी सचाई पर कोई अविश्वास नहीं कर सकता। यह बात वैसे बड़ी आश्चर्यजनक सी लगती है, पर यह दूसरों के दिमाग में उठने वाले विचारों को जान लेने और अपने विचारों को उनके दिमाग में प्रविष्ट करा देने की विद्या के सिवाय कुछ नहीं है। योग शास्त्र के अनुसार यह आध्यात्मिक उन्नति की दूसरी सीढ़ी है जो मनोमय कोष पर कुछ अधिकार होने से प्राप्त हो सकती है। प्रत्येक मनुष्य का मन संसार के समिष्ट मन का अंशमात्र है और इसलिये प्रत्येक मन दूसरे हर एक मन से संलग्न है। मन एक विश्वव्यापी तत्व है। इसी अखण्डता के कारण हम अपने विचारों को एक दम सीधे, बिना किसी माध्यम के, आपस में संक्रमित कर सकते हैं और इसके द्वारा छोटे-मोटे चमत्कार ही नहीं दिखला सकते, वरन् बहुसंख्यक व्यक्तियों के मन को इच्छानुकूल मार्ग की ओर मोड़ सकते हैं। जो महापुरुष किसी राष्ट्र का निर्माण करते हैं, या कोई अद्भुत शक्ति उत्पन्न कर देते हैं, वह लोग इस शक्ति के लिये योगियों या मेस्मराइज करने वालों के समान कोई अभ्यास नहीं करते वरन् यह शक्ति और प्रभाव उनमें प्रकृतिदत्त होते हैं।

मनुष्य इस प्रकार मन की शक्ति को कहाँ तक बढ़ा सकता है इसका कोई अन्त नहीं है। इस प्रकार जब हम अपने मन की बढ़ी शक्ति को किसी एक विषय में लगा देते हैं, तो उसमें आश्चर्यजनक उन्नति करके दिखला सकते हैं। भारतवर्ष के ऋषि महर्षियों ने बिना कालेजों और विश्व विद्यालयों की शिक्षा प्राप्त किये जो अद्भुत आविष्कार किये थे और वैज्ञानिक सिद्धान्तों को खोज निकाला था उसका मूल इसी प्रकार की मानसिक शक्ति में था। गणित, ज्योतिष, चिकित्सा, रसायन शास्त्र, भौतिक विज्ञान आदि अनेक महत्वपूर्ण शास्त्रों की रचना उन लोगों ने अधिकाँश में इसी प्रकार की थी। इतना ही नहीं उनमें से अनेकों ने साधारण धातुओं को सोने के रूप में बदलने, अपने पंचभौतिक शरीर को लगभग अमर बनाने, बिना किसी यंत्र के आकाश में उड़ने आदि जैसे असम्भव माने जाने वाले कार्यों को भी पूरा कर दिखाया था। पर चूँकि इस प्रकार के कार्यों में उनकी मानसिक शक्ति ही प्रधान थीं, वर्तमान समय के अनुसार बाह्य याँत्रिक साधनों का उनमें विशेष संपर्क न था। यही कारण है कि उस समय इन विद्याओं और विधियों का वैसा सार्वजनिक रूप से प्रचार न हो सका जैसा कि हम आज कल देख रहे हैं। पर इससे यह नहीं कहा जा सकता कि वर्तमान युग विज्ञान की दृष्टि से विशेष उन्नति का है। इस समय वैज्ञानिक आविष्कारों की सार्वजनिकता का परिणाम यह हुआ है कि उसमें से अधिकाँश का दुरुपयोग हो रहा है और प्रत्येक आविष्कार रुपया कमाने का—स्वार्थ साधन का जरिया बन रहा है। अन्त में बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक नौबत आ गई है कि स्वार्थी और गैर जिम्मेदार व्यक्ति अणुबम और हाइड्रोजन बम जैसे नाशकारी साधनों के अधिकारी बन गये हैं और संसार के अस्तित्व को खतरे में डाल रहे हैं। यही कारण था कि भारत के प्राचीन विद्वान् और वैज्ञानिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति ऐसे रहस्यों को केवल अधिकारी व्यक्तियों को बतलाते थे और बतलाने के पहले उनकी हर प्रकार से परीक्षा ले लेते थे।

इसमें सन्देह नहीं कि मन की सामर्थ्य अपार है और यदि हम वास्तव में मन की शक्ति बढ़ाकर अपनी और दूसरों की उन्नति के लिये उसका प्रयोग करें तो संसार का बड़ा कल्याण हो सकता है।


Quotation

प्रत्येक पुरुष के भीतर जो एक आदेश देने वाली शक्ति होती है, जिसके शासन से सारे जीवन की लीला नियंत्रित एवं संगठित होती रहती है, वही विवेचना-शक्ति जीवित का देवता है।

—डेलेड्डा


ध्यान और प्रार्थना से आत्म विकास

संसार का अर्थ है गतिशील वस्तु। जगत् निरन्तर चलता रहता है-बदलता रहता है और इस परिवर्तन का भला-बुरा प्रभाव निरन्तर व्यक्ति के ऊपर पड़ा करता है। पर आश्चर्य का विषय है कि ये परिवर्तन किस में हो रहे हैं, इसका हम कभी स्मरण नहीं करते। इसका परिणाम यह होता है कि हम दिशा भूले हुये मुसाफिर की तरह इधर-उधर भटकते रहते हैं।

अगर इन सदैव पड़ने वाले संस्कारों को विवेक युक्त और सार्थक बनाना हो, तो मनुष्य को बार-बार यह विचार करना चाहिये कि ये संस्कार किस पर पड़ रहे हैं इसका बराबर ध्यान करते रहना चाहिये। सब प्राणी जीते है उसी प्रकार हम भी जीते हैं और जैसे सब मरेंगे वैसे ही हम भी मर जायेंगे—यह कथन एक दृष्टि से सत्य ही है, पर इसमें जीवन-रहस्य की कोई बात नहीं है। सब प्राणी जीते हैं यह ठीक है, पर उनका प्रत्यक्ष अनुभव तो हम को नहीं है। जिस प्रकार अन्य व्यक्ति मरते हैं वैसे ही हम भी मर जायेंगे—यह भी ठीक-ठीक कहा जा सकता। मृत्यु का वास्तविक अनुभव तो मरने वाले को ही होता है। साराँश यह है बिना सोचे समझे और नित्य मनन और स्मरण किये बिना हम अपने ऊपर पड़ने वाले संस्कारों का महत्व नहीं समझ सकते और उनका पड़ना या न पड़ना हमारे हित की दृष्टि से व्यर्थ ही रहता है।

इस उद्देश्य की सिद्धि के लिये मुख्य उपाय ध्यान और प्रार्थना ही है। व्यक्ति के जीवन को संकलित करने का कार्य इन्हीं से होता है। प्रार्थना का तात्पर्य यह नहीं कि मनुष्य अपने धर्मात्मा या ईश्वर भक्त होने का अभिमान करे वरन् वह अपने व्यक्तिगत जीवन के विषय में सदा सतर्क और जागृत रहे यह प्रार्थना का उद्देश्य है। हम अपने भीतर की चैतन्य शक्ति को सहज ही में नहीं पहिचान सकते। उसका बारम्बार स्मरण करते रहना जीवन-विकास के लिये आवश्यक है और इसके ध्यान तथा प्रार्थना द्वारा मनुष्य को अपने अन्तर में प्रवेश करना चाहिये। इसका दूसरा उद्देश्य बाहरी वस्तुओं में से आत्म-विकास के लायक तत्व ग्रहण करना भी है। जिस प्रकार वृक्ष अपने बीज के गुण और शक्ति के अनुसार तत्वों को भूमि तथा वातावरण से ग्रहण करके अपना विकास करता है उसी प्रकार आत्मा भी संसार में से अपने उपयुक्त संस्कारों को ग्रहण करके विकसित हो सकती है। ध्यान और प्रार्थना इस कार्य को सरल बनाते हैं। संसार यात्रा में इसके द्वारा बीच-बीच में रुककर आत्मा की प्रगति का निरीक्षण किया जा सकता है।

इस आत्म-तत्व को निर्बल न समझना चाहिये। वैसे तो सूक्ष्म वस्तु स्थूल वस्तु के मुकाबले में अल्प शक्ति वाली जान पड़ती है, पर वास्तव में उसमें बहुत अधिक शक्ति होती है। हमारी वाणी हमारे भीतरी भावों का आधा-पर्धा रूप होती है, पर जब किसी कार्य का अवसर आता है तो हम अपने आन्तरिक भावों के अनुसार ही काम करते हैं। दूसरी तरफ सब से बलवान हमारे हाथ पैर ही होते हैं पर जब वेदना-जनक घटना होती है तो हमारे हाथ-पैर बिल्कुल शिथिल पड़ जाते हैं। इन उदाहरणों से यह मानना ही पड़ता है कि मनुष्य के आत्म-तत्व में कोई ऐसी गूढ़ शक्ति मौजूद है जिसे हम ढूंढ़ सकते हैं, ध्यान के द्वारा मनुष्य को इस बात का अनुभव होता है कि आत्म-तत्व कोई सबसे अलग किसी से सम्बन्ध न रखने वाला पदार्थ नहीं है। यह समस्त विश्व एक चेतना का महासमुद्र है, हमारी व्यक्तिगत चेतना भी उसी का एक अंश है। हमारी चेतना का विश्व चेतना के साथ क्या संबंध है इसका ज्ञान होने से हमारी सामर्थ्य, स्थिरता और ज्ञान की वृद्धि होती है।

परम तत्व की तरफ से अभिमुख या उन्मुख होते ही उसकी शक्ति का व्यक्ति में संचार होता है। कमल जैसे ही उन्मुख होता है वैसे ही सूर्य की किरणों उसके दलों को प्रफुल्लित कर देती हैं। इसी प्रकार ध्यान तथा प्रार्थना द्वारा ईश्वर का स्मरण, प्रार्थना, ध्यान, उपासना करने से उसकी समस्त शक्ति का झुकाव हमारी तरफ हो जाता है। पर्वत का दर्शन जिस प्रकार स्थिरता का भाव उत्पन्न करता है, समुद्र का दर्शन विशालता की भावना उत्पन्न करता है, उसी प्रकार ईश्वर का ध्यान करने से ईश्वर की शक्ति का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है, चाहे उसका परिमाण कितना भी कम क्यों न हो।

आत्मा का परमात्मा के साथ अल्प अंश में संपर्क होना शुभ है, पर इससे मनुष्य कृतकृत्य नहीं हो सकता। इसके लिये ध्यान और प्रार्थना का प्रयत्न निरन्तर जारी रहना चाहिये। तभी व्यक्ति का पूर्ण विकास(मोक्ष) होना संभव है। पर इस प्रयत्न के होते हुये भी मनुष्य का सम्बन्ध संसार से टूट नहीं जाता। पर अब उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। उसके साँसारिक सम्बन्ध अब भी कायम रहते है, पर अब उनके विषय में उसे उत्तम दृष्टि प्राप्त हो जाती है। ईश्वर-प्राप्ति का लक्ष्य मनुष्य की कर्तव्यता अथवा कर्तव्यपरायणता में कमी नहीं करता है, वरन् इसके कारण अनासक्तता और कर्तव्य कुशलता की वृद्धि होती है। जिस प्रकार आकाश, समुद्र, पर्वत वर्षा, बसन्त, वृक्ष, नदी, सरोवर आदि साँसारिक पदार्थों और घटनाओं को आत्म-विकास का पोषक बनाया जाता है, उसी प्रकार साँसारिक सम्बन्धों को भी मनुष्य आत्म-दर्शन का साधन बना सकता है। जो सबके लिये हितकर कार्य है उसका त्याग मुमुक्ष को नहीं करना है, वरन् उस कार्य के द्वारा भी उसे मोझ-मार्ग में अग्रसर होना है। इस कार्य के लिये उसे चेतना और शुद्ध बुद्धि की आवश्यकता होगी जो ध्यान और प्रार्थना द्वारा प्राप्त हो सकेगी।

हमारी सनातन प्रार्थना का भाव यही है कि मैं सत्य के दर्शन करूं, मेरी बुद्धि शुद्ध बने और सत्य को प्राप्त करे और सब मनुष्यों के लिये कल्याणकारक पदार्थों में प्रवृत्त रहे। सत्य दर्शन के बिना न तो व्यक्ति का कल्याण हो सकता है और न समष्टि का ।


ईश्वर प्राप्ति के दस वेदोक्त साधन

(श्री पं. सुरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी काव्यतीर्थ)

धर्म का सबसे बड़ा लक्षण ईश्वर-प्राप्ति है। क्योंकि जब तक मनुष्य की रुचि ईश्वर के प्रति आकर्षित नहीं होती तब तक वह सच्चे सुख और शांति से वंचित ही रहता है। इस सम्बन्ध में वैदिक साहित्य में इस प्रकार के साधनों का उल्लेख मिलता है।

(1) उद्गीथ विद्या—मुक्ति का सर्वप्रधान साधन ज्ञान है। इसके बिना मनुष्य को धर्म का स्वरूप और विधि ज्ञात नहीं होती और इसलिये वह परमात्मा को भी प्राप्त नहीं कर सकता। इसका सबसे सीधा उपाय ॐ अथवा प्रणव द्वारा परमात्मा का ध्यान करना है। यही परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ नाम है, इसी से प्रणव को उद्गीथ कहते हैं। प्राचीन ऋषियों ने इस अक्षर को अविनाशी बतलाया है। पृथ्वी सब प्राणियों को धारण करती है, वही प्राणियों का आश्रम है। उसका सार है जल। जल ने ही औषधियों में सार-तत्व उत्पन्न किया है। उसी से मनुष्य परिपुष्ट होते हैं। मनुष्य में सबसे महत्व की वस्तु है वाक् (बोली)। उसमें ऋक् और साम यथार्थ तत्व हैं। उनका सार ॐ है। शक्ति अथवा अर्थ के ध्यान से इसके बढ़कर ईश्वर का दूसरा नाम नहीं है। छान्दोग्य में कहा गया है “सरानाँ रसतमः।” इसके उच्चारण के समय वाक् और प्राण में एकता उत्पन्न होती होते हैं। इसके जप करने वालों के सब मनोरथ पूर्ण होते हैं।

(2) संवर्ग विद्या— इसका अर्थ होता है ग्रहण कर लेना अथवा ग्रास कर लेना। अग्नि बुझाने पर क्या हो जाती है? सूर्य चन्द्रमा अस्त होने पर कहाँ रहते हैं? इसका उत्तर यही है कि ये वायु से ग्रस्त हो जाते हैं, अर्थात् इन पर वायु का आवरण पड़ जाता है। जल भी वायु में लीन हो जाता है। सुषुप्ति के समय वाणी, आँख और कान तथा मन, प्राण में ही व्याप्त रहते हैं। उस समय केवल श्वाँस(प्राण वायु) चलता रहता है। इस क्रिया को प्राण में इन्द्रियों का संवर्ग कहा जाता है। पर प्राण और वायु का संवर्ग कहाँ होता है? इनका संवर्ग परमात्मा है। इस बात का आन्तरिक ज्ञान जिसे हो जाता है वह परमात्मा को प्राप्त करने में समर्थ बनता है। वह परमात्मा कैसा है—”जो सबको खाता है, जिसे कोई नहीं खा सकता, जिसमें सब लीन हो जाते हैं और जो किसी में लीन नहीं होता, वही महामहिमशाली ब्रह्म है।” इसी बात को छान्दोग्य में इस प्रकार कहा गया है—आत्मा देवानाँ हिरण्यदंष्ट्रों वभसोऽन- सूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानः।”

(3) मधुविद्या - माधुर्य प्रत्येक प्राणी को पसन्द होता है। “मधुविद्या” में मधु शब्द मीठेपन का ही द्योतक है। मनुष्य जाति का सर्वश्रेष्ठ खाद्य मीठा दूध है। परमात्मा उससे भी कहीं अधिक माधुर्यशाली है। उसी माधुर्य की प्राप्ति सूर्य के द्वारा हो सकती है, क्योंकि सूर्य खट्टे पदार्थों को पकाकर देता है। इसी आधार पर उपनिषद् में सूर्य को देवताओं का मधु कहा गया है। पृथ्वी पर मधु का छत्ता किसी लकड़ी आदि में लगता है। सबसे ऊपर का द्युलोक इसके लिये आश्रय है। आतरिक्ष छत्ता है और सूर्य रश्मियाँ मधुमक्खियों की पंक्ति । चारों वेदों के अनुसार किए हुए कर्म पुष्प-पराग हैं। उनसे अमृत स्वरूप मोक्ष, जो कि मधु है, उत्पन्न होता है। कर्म प्रवर्तक सूर्य ही मुख्य रूप से मधु है और उसकी उपासना करने से परम मधु की प्राप्ति सहज हो जाती है—”असौ वा आदित्यो देव मधु वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्य मृतानि।”

(4) पंचाग्नि विद्या - शास्त्रों में कहा गया है कि जो लोग उत्तरायण सूर्य में शरीर त्याग करते है वे मुक्त हो जाते हैं और दक्षिणायन में करते है वे संसार में फिर जन्म ग्रहण करते हैं। उत्तरायण का अर्थ ज्ञान-मार्ग है और दक्षिणायन का कर्म मार्ग। ज्ञान-मार्ग की अभिलाषा रखने वाले को पंचाग्नि विद्या का पूर्णापरिचय होना चाहिये। इसका रहस्य उपनिषद् में इस प्रकार बतलाया गया है—

“यह लोक अग्नि है, इसको प्रज्वलित करने के लिये सूर्य लकड़ी है। उसकी किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है। इस अग्नि में देवता लोग श्रद्धा रूपी ‘हवि’ का हवन करते है। इस हवन से सोम की उत्पत्ति होती है। इसमें श्रद्धा जल स्वरूप है। अतएव देवता मेघ (जल)रूप अग्नि में सोम (चन्द्रमा)को, लोक रूप अग्नि में वृष्टि को, और पुरुष रूप अग्नि में वृष्टि से उत्पन्न अन्न को जलाते हैं। इससे वीर्य उत्पन्न होता है जिसका हवन स्त्री रूप में अग्नि में होता है। इस प्रकार मनुष्यों की उत्पत्ति में मेघ, लोक, पुरुष और स्त्री कारण हैं। पुरुष और स्त्री को चिता की अग्नि जला देती है। यही पाँच अग्नियाँ हैं। इन पाँचों में परमात्मा व्याप्त है। इनके द्वारा जो परमात्मा को जानता है वह नित्य मुक्त हो जाता है। कहा गया है कि इस पंचाग्नि विद्या का ज्ञाता पुनरावृत्ति विहीन मुक्ति को प्राप्त होता है—”पुरुषो मानस एत्य ब्रह्म लोकान गमयति ते तेषुः ब्रह्मलाकेषु पराःपरावतो वसन्ति तेषाँ न पुनरावृत्तिः॥ (वृहदारण्यक)

(5) उपकोसल की आत्मविद्या—उपकोसल सत्यकाम जाबालि के पास बहुत समय तक शिष्य भाव से रहा परन्तु महर्षि ने उसे ब्रह्म विद्या का उपदेश नहीं किया। गुरु के बाहर चले जाने पर उपकोसल ने मानसिक व्यथा से पीड़ित हो भोजन और भाषण का परित्याग कर दिया। इस पर सत्यकाम की अग्नियों ने उसे उपदेश दिया “प्राणो ब्रह्म, कं ब्रह्म,खं ब्रह्म।” इस पर यह सन्देह होता है कि प्राणवायु जो अचेतन है, क अर्थात् सुख जो परिमित है और ख अर्थात् आकाश जो शून्य है ये भला ब्रह्म कैसे हो सकते हैं? पर इस वचन का अभिप्राय कुछ गूढ़ है। इसका आशय यह है कि जिस परमात्मा के बल-प्राण अपना कार्य करते हैं, यह आकाश के समान व्यापक और असीम आनन्द स्वरूप है। जो ईश्वर को इस रूप में समझता है उसकी उपासना सफल होती है।

(6) शाण्डिल्य विद्या—महर्षि शाण्डिल्य ने कहा है कि परमात्मा का मुख्य गुण करुणा है-”मुख्य हि तस्य कारुण्यम्” (शाण्डिल्य सूत्र)। उनका मत है कि समस्त ब्रह्माण्ड ब्रह्म है, यही भावना उपासना में रखनी चाहिये। इसका कारण यह है कि परमात्मा ‘तज्जलान्’ है। अर्थात् यह संसार उसी से उत्पन्न होता है उसी में लय होता है और उसी से प्रतिपालित होता है। पुरुष की जैसी भावना होगी वैसी ही उसकी गति होगी। यदि हम परमात्मा की भक्ति करके उसी का आश्रय लें तो अवश्य उसे प्राप्त कर सकते हैं—”सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत“

(7) दहर विद्या— जैसे इस लोक में पुरुषार्थ से पैदा की हुई सम्पत्ति नष्ट हो जाती है, वैसे ही पुण्यबल से उपार्जित पारलौकिक सुख भी नष्ट हो जाता है। जिसे परमात्मा का ज्ञान हो गया है। उसके सुख नित्य होते हैं। वे कभी नष्ट नहीं होते। परमात्मा का ज्ञान उपासना के बिना नहीं होता। उपासना का अर्थ है समीप रहना, पर जिसका कोई पता ठिकाना ही नहीं उसके समीप कोई कैसे रह सकता है? शास्त्र कहते हैं कि “मनुष्य शरीर ही ब्रह्मपुर है, उसका दहर (हृदय कमल) भगवान का निवास स्थान है, उसमें भगवान को खोजो। उसमें रहते हुये भी भगवान शरीर के धर्मों का स्पर्श नहीं करते। जरा, मृत्यु, क्षुधा, पिपासा, उनका स्पर्श नहीं कर सकती। बाहर की अभिलाषाएँ वहाँ पूर्ण रहती हैं। कोई दुख शोक नहीं सताता—”यदिदमस्मि न ब्रह्मपुरे दहरे पुण्रीकं वेश्मदहरोऽस्मिन्नन्तरा काश-स्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्।”

(8) भूमि विद्या—जगत के प्राणी जो कुछ करते हैं, उसका उद्देश्य सुख है। सुख की जानकारी के बिना सुख कहीं हो सकता। सब से महान वस्तु ईश्वर है, वही सुख है। उसका स्वरूप आनन्दमय है—”आनन्दो ब्रह्मणो रूपम्।” यहाँ एक बात विचारने योग्य है कि हम जगत में बहुत कुछ खाते-पीते, देखते-सुनते हैं, परन्तु तृप्ति नहीं होती, इसका कारण क्या है? कारण यही है कि जगत की वस्तुएँ परिमित हैं, अल्प हैं। परमात्मा सब से बड़ा है—असीम है, उसके प्राप्त हो जाने पर दूसरे किसी पदार्थ की इच्छा नहीं रहती, पूर्णता आ जाती है। सब वस्तुएँ विनाशशील हैं, केवल परमात्मा ही अमृत स्वरूप भूमा (अनन्त) है—”यो वै भूमा तत्सुखँ नाल्ये सुख मस्ति भूभैव सुखम्।” (छान्दोग्य)

(9) दीर्घायुष्य विद्या—जो मनुष्य चौबीस, चवालीस अथवा अड़तालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन करके यज्ञादि करते है, वे निरोग रहते हुये सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रहते हैं। जो ब्रह्मज्ञानी उपासक हैं उनकी मृत्यु उनकी इच्छा के अधीन रहती है। छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि महिदास नाम के एक ज्ञानी सोलह सौ वर्ष तक जीवित रहे “एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स ह षोड़श वर्ष शतम जीवत्” इस प्रकार ज्ञानी जन बहुत काल तक जीवित रहकर परमात्मा की उपासना करने में समर्थ होते हैं।

(10) मन्त्र विद्या—सिद्ध अथवा शरणागति प्राप्त हो जाने पर धन की आवश्यकता नहीं रहती। परन्तु साधनावस्था में उसकी आवश्यकता होती है। इसके लिये मन्थाख्य कर्म किया जाता है, जिससे धन प्राप्त होता है। उस कर्म में ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि “हे अग्नि स्वरूप देव भगवन्, सब देवता विपरीत होकर मेरी सफलताओं को नष्ट कर देते हैं। मैं उनकी तृप्ति के लिये आहुति देता हूँ”। किसी अच्छे मुहूर्त में केवल दुग्ध पर रहकर कुशकण्डिका करे तथा औषधियों और फलों से हवन करे। वृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार “ज्येष्ठाय स्वाहा, श्रेष्ठाय स्वाहा” इत्यादि मंत्रों से आहुति देने से मनोरथ पूर्ण होते हैं।

इस प्रकार ये दस प्रकार के साधन-मार्ग साधक को परमात्मा की प्राप्ति में समर्थ बनाते हैं।


क्या सन् 1962 में विश्वयुद्ध की आग भड़केगी

(एक “भारतीय योगी”)

भविष्यवाणियों की कितनी बातें सत्य होती हैं अथवा समाचार पत्रों में प्रायः जो भविष्यवाणियाँ प्रकाशित होती रहती हैं उनमें से कितनी ठीक निकलती हैं, इस वाद विवाद में यहाँ नहीं पड़ना चाहते। पर हमारा कथन यह है कि जब से मानव जाति के इतिहास का पता चलता है तब से सभी देशों और जातियों में भविष्यवक्ता होते आये हैं और उनमें से कितने ही नाम हजारों वर्ष बीत जाने पर आज भी कायम हैं। यहूदी लोगों के इतिहास में तो भविष्यवाणियों का महत्व बहुत अधिक माना जाता है। ईसाइयों की बाइबिल के भविष्य-कथन भी बड़े अद्भुत और महत्वपूर्ण हैं। भारतवर्ष में त्रिकालदर्शी महात्मा सदा से पाये जाते हैं। यहाँ के योगसिद्ध पुरुषों के लिये भविष्य दर्शन एक बहुत मामूली सी बात मानी जाती है। इस प्रकार सिद्ध होता है कि भविष्य को जान सकना कोई असम्भव बात नहीं है। हाँ हर एक ज्योतिषी या साधु बाबा की भविष्यवाणी को ब्रह्मवाक्य समझ कर उसके पीछे आँख बन्द करके चल पड़ना समझदारी की बात नहीं है। हमारा कर्त्तव्य है कि किसी भविष्य पर तभी विश्वास करें जबकि उसके विषय में गम्भीर रूप से विचार कर लें और उसके आगे पीछे की अन्य घटनाओं से मिलाकर उसकी संभावना का अनुमान लगायें।

इस समय संसार में तीसरे महायुद्ध की चर्चा सबसे अधिक सुनाई पड़ रही है। दो-चार महीने के भीतर कहीं न कहीं ऐसी घटना हो ही जाती है जिससे संसार की शाँति भंग होने के लक्षण जान पड़ते हैं और युद्ध सामग्री से लदे जहाज अपने अड्डों को छोड़कर मैदान में निकल आते हैं। फारमोसा, मिश्र, लेबनान, ईराक, पश्चिमी जर्मनी में ऐसी हलचलें दो तीन वर्ष के भीतर ही देखी जा चुकी हैं। हमारा और संसार का सौभाग्य है कि शाँति प्रेमियों के प्रयत्नों से अभी तक के संकट किसी प्रकार टल गये और हम एटम और हाइड्रोजन बमों के रौद्र रूप के दर्शन से बचे रहे।

पर जैसी कहावत है “बकरी की माँ कब तक खैर मनायेगी?”—मूलकारणों के ज्यों का त्यों बने रहने पर ये ऊपरी उपचार कब तक काम देंगे? अमरीका और रूस की तैयारियाँ बराबर चल ही रही हैं और जानकार लोगों का ख्याल है कि ये बादल कभी न कभी बरस कर ही रहेंगे। ज्योतिषी लोग तो बराबर तीसरे महासमर की भविष्यवाणी कर रहे हैं। लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व “अखण्डज्योति” के एक अंक में अनेक विद्वानों की भविष्यवाणियाँ प्रकाशित की गई थीं जिनमें सन् 1962 और उसके आसपास के समय में संसार का नाश करने वाले महासमर की भविष्य वाणी की गई थी। अब 22 अप्रैल 1959 के “दैनिक हिन्दुस्तान” (नई दिल्ली) में फिर एक वैसी ही भविष्यवाणी छपी है जिसका एक अंश यहाँ दिया जाता है—

“फलित ज्योतिष की दृष्टि से नवम्बर 1961 से 1965 तक विश्व का भविष्य संकटमय जान पड़ता है। 1962 में आठ ग्रहों की युक्ति के कारण विश्वयुद्ध हो सकता है। यह युद्ध अमरीका और रूस के मध्य जर्मनी और बर्लिन समस्या को लेकर छिड़ सकता है। संभवतः विश्व युद्ध का आरम्भ 16 जनवरी 1962 को होगा और केवल 6 महीने चलेगा। उससे ब्रिटेन, फ्राँस, तुर्की, पाकिस्तान और ईरान पर अधिक बुरा प्रभाव पड़ने की आशंका है। गुप्त-योग के अनुसार अन्ततः दोनों लड़ने वाले पक्ष भारत से संधि करवाने की प्रार्थना करेंगे। तटस्थ भारत के सद्प्रयत्नों से शीघ्र ही शाँति स्थापित हो जायेगी।”

इस प्रकार सन् 1962 में संसार-संकट उत्पन्न होने की संभावना अनेक लोग प्रकट कर चुके हैं। और तो क्या उत्तर प्रदेश के ज्योतिष प्रेमी प्रधानमंत्री श्री. सम्पूर्णानन्दजी ने भी एक बार इस संभावना का समर्थन किया था।

जैसा हम ऊपर कह चुके हैं कि ऐसी भविष्यवाणियों को उसी दशा में सच माना जा सकता है जब किन्हीं अन्य स्रोतों से भी उनका समर्थन होता हो। संयोग से हमको दो प्रमाण मिले हैं जो अब से बहुत पुराने होने पर ठीक इसी संभावना को प्रकट करते हैं। अब से ठीक 20 वर्ष पहले इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले मासिक पत्र “सतयुग“ के मार्च 1940 के अंक में पृष्ठ 50 पर एक लेख छपा था जिसका शीर्षक है “पृथ्वी का भार हलका होगा” और लेखक हैं स्वामी कृष्णानन्द जी सरस्वती। वह एक लम्बा लेख है, इसलिये हम उसका कुछ अंश ही यहाँ देते हैं। नीचे जो उद्धरण दिया जाता है उसका एक-एक शब्द “सतयुग“ से ज्यों का त्यों दिया जा रहा है—

“सन् 1913 के जून मास का जिक्र है कि मैं अपने मित्र रायबहादुर कप्तान बलवीर सिंह से मिलने के लिये उनके ग्राम रामपुर (पंजाब) गया। वहाँ जाकर मैंने क्या देखा कि एक साधु महात्मा पलंग पर लेटे हुये हैं और राय बलवीर सिंह उनके पास फर्श पर बैठे हुये हैं। उन दिनों मेरा साधु महात्माओं में विश्वास नहीं था और मैं किसी साधु के चरण छूना अपनी हतक समझता था। परन्तु न मालूम मैंने जाते ही उन महापुरुष के चरणों में सिर रख दिया। उन्होंने बड़े स्नेह से मुझे बैठ जाने का इशारा किया मैंने वहाँ बैठकर अनुभव किया कि इस स्थान में शान्ति है, साथ ही चित्त में यह संकल्प उठा कि यह विलक्षण साधु कैसे हैं? शाम को वह महापुरुष उठे और ठंडाई पीकर उपदेश देने लगे। वह बराबर चार घण्टे तक उपदेश देते रहे पर हम लोगों का यह पता न लगा कि कितना काल व्यतीत हो गया है।

दूसरे दिन वह 8 बजे फिर उपदेश देने लगे और उपदेश देते-देते दो बजे गये। आज के उपदेश का सार था कि सतयुग आयेगा। यह शब्द सुनते ही मेरे चित्त में संकल्प उठा कि अभी तो कलियुग की बहुत मियाद बाकी है, अभी से सतयुग कैसे आवेगा? इस संकल्प के उठते ही उन्होंने उसी क्षण इसका इस प्रकार समाधान कर दिया कि—”प्रत्येक युग में दूसरा युग वर्तता है, यह प्रकृति का नियम है। सतयुग में भी कलियुग वर्ता था, इसी प्रकार अब कलियुग में सतयुग वर्तेगा।” इसके बाद उन्होंने फिर फरमाया कि सृष्टि की वर्तमान अवस्था ऐसी हो गई है कि यदि अब सतयुग न आवे तो यह सृष्टि अधिक समय तक स्थिर ही नहीं रह सकती है। कारण, मनुष्यों की शक्तियाँ इतनी हीन होती जा रही हैं कि यदि अब सतयुग न आवे तो यह दो सौ वर्ष में ही नष्ट प्रायः हो सकती है और ऐसा भगवान को दृष्ट नहीं है। इसलिये इस काल चक्र को कायम रखने के लिये भगवान को बीच में सतयुग रूपी टेका (आधार) लगाकर इसका स्थिर रखना आवश्यक है।

साधन

अत्यन्त अशान्ति और घोर कलियुग का कारण जन-संख्या की वृद्धि है इसलिये भगवान संसार की वर्तमान जनसंख्या को घटाकर एक चौथाई या एक तिहाई कर देंगे। फिर रोटी का झगड़ा समाप्त हो जायगा। सबको अपने ही देश में काफी रोटी मिल जायगी। इसलिये दूसरे देशों को विजय की लालसा ही शेष न रहेगी। सबको स्वराज्य प्राप्त हो जायगा। मजहबों के झगड़े खत्म हो जायेंगे। ऊँच नीच का प्रश्न हल हो जावेगा, इसलिये सामाजिक वैमनस्य शान्त हो जावेगा। सबको मनुष्य समझा जायेगा, भ्रातृभाव की स्थापना हो जावेगी। राजनैतिक और आर्थिक गुत्थियाँ ऐसी हल हो जावेंगी कि न तो कोई भूखा रहेगा और न किसी पर अन्याय हो सकेगा। फिर एक बार रामराज्य आ जायगा। परन्तु रामराज्य स्थापना होने से पहले भगवान अपने चार दूत भेजेंगे जो जन-संख्या को कम करेंगे। वह यह हैं—(1)लड़ाई (2) बीमारी (3) अकाल (4) अग्नि का लगना।

जब सन् 1914 का जर्मन का युद्ध छिड़ा, उस समय हम लोगों ने पूछा—क्यों महाराज जी, क्या यही लड़ाई नाश का कारण होगी? उस समय श्री महाराज जी ने फरमाया “नहीं यह लड़ाई तो साधारण है, इसके पीछे एक और लड़ाई होगी जिसमें बड़े भयंकर अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होगा जो अब तक कभी सुना भी नहीं गया है। लड़ाई में तो मनुष्य मरेंगे ही, परन्तु उससे कई गुना अधिक मनुष्य उन विषैली वस्तुओं के प्रयोग से मरेंगे जिनका जहर समस्त संसार में फैल जावेगा और उनसे ऐसी बीमारियाँ हो जायेंगी जिनसे मनुष्यों का बचना बड़ा दुर्लभ हो जायगा

ऐसा कब होगा

यह उपदेश तो हमने सन् 1913 में सुना था। इसके बाद सन् 1934 का जिक्र है कि एक आदमी आश्रम में आया। उस समय श्री महाराज जी ने फिर सतयुग आने का जिक्र किया। वह कुछ साहसी आदमी था। उसने झट प्रश्न कर दिया—”महाराज जी, वह सतयुग कब आवेगा?” महाराज जी ने फरमाया—”तीस वर्ष के भीतर-भीतर सतयुग आ जावेगा।” इससे पाठक अनुमान लगा लेवें कि सतयुग कब आयेगा।”

*****

दूसरा उद्धरण अगस्त 1944 के ‘सतयुग‘ में प्रकाशित श्री पवनकुमार के लेख का है। वे कहते हैं—

“इस समय लोगों को जैसे-जैसे लड़ाई कुछ सुलझती दिखलाई पड़ती है उनका ध्यान भारत के भविष्य की ओर आकर्षित हो रहा है।

वर्तमान महायुद्ध अभी अपूर्ण रहेगा। संवत् 1920 (सन् 1963) में क्षय मास है (अर्थात् 1 वर्ष में 11 महीने ही होंगे)। उस समय तीसरा संसार व्यापी महायुद्ध अवश्य होगा। इन कारणों से हमको अभी सुख शाँति की आशा करना व्यर्थ है।”

*****

हम फिर कह देना चाहते हैं कि हम सब भविष्यवाणियों पर ज्यों का त्यों विश्वास कर लेने के पक्ष में नहीं है। पर हम यह भी नहीं मानते कि भविष्य को जान सकना सर्वथा असम्भव है। मनुष्य में ऐसी शक्तियाँ हैं जिनको विकसित करने से वह होनहार घटनाओं को जान सकता है। जिस प्रकार सब लोग दूसरे व्यक्तियों के मन की बात नहीं जान सकते पर मनोवैज्ञानिक और मैस्मरेजम आदि गुप्त विद्याओं का अभ्यास करने वाले दूसरे के मन में उठने वाले विचारों को जान लेते हैं। उसी प्रकार भविष्य की घटनाओं का ज्ञान भी अभ्यास द्वारा हो सकना संभव है। अब जब कि हम देखते हैं कि वर्तमान राजनीतिक संघर्ष और दावपेचों के फल से सन् 1962 के आस पास युद्ध का छिड़ना कुछ भी असंभव नहीं है और उसी बात को हम एक बीस वर्ष पुराने लेख में देखते हैं जब कि रूस और अमरीका मित्र बनकर जर्मनी से लड़ रहे थे और वर्तमान संघर्ष की किसी को कल्पना न थी, तो हमको कहना पड़ता है कि भाई वर्तमान भविष्य वाणियों के अनुसार अगर 1962 में महा समर आरंभ हो जाय तो इसमें कोई आश्चर्य की बात न होगी।

इस युद्ध के फलस्वरूप संसार में होने वाले महानाश की बात तो वह तो सर्व विदित है। उपर्युक्त उद्धरण में महात्मा जी ने संसार में एक चौथाई या एक तिहाई मनुष्यों के बचने की भी बात कही थी, पर आजकल के वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ तो कहते हैं कि हमारे पास इतने हाइड्रोजन बम हैं कि हम तीन दिन के भीतर दुनिया के एक-एक मनुष्य को मार सकते हैं। इन हथियारों और बमों की वास्तविक शक्ति का वर्णन फिर कभी किया जायगा।


गुरु के द्वारा आध्यात्मिक शक्ति की प्राप्ति

(श्री पं. उमाकान्त शास्त्री)

कि सी भी साधन की सफलता के लिये शिक्षक अथवा गुरु की परम आवश्यकता है। यों तो कितने ही व्यक्ति स्वयं ही इधर-उधर से पूछताछ कर अथवा ग्रन्थों का अवलोकन करके किसी विद्या अथवा कल का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, पर एक तो उनको परिश्रम अधिक करना पड़ता है और फिर भी उनके ज्ञान में अनेकों ऐसी त्रुटियाँ रह जाती हैं जिनके कारण कई अवसरों पर उनको नीचा देखना पड़ता है। आजकल की साधारण स्कूली या कालेज की शिक्षा में भी यह देखा जाता है कि जो छात्र निजी तौर पर पढ़ाई करके परीक्षा पास करते हैं, वे अनेक बातों में स्कूल में नियमित रूप से पढ़ने वाले छात्रों की अपेक्षा कच्चे रह जाते हैं। जब स्थूल विषयों की विषय में ऐसी बात है तो आध्यात्म जैसे सूक्ष्म विषय के सम्बन्ध में तो अधिक कहना अनावश्यक ही है। क्योंकि अध्यात्म की सभी बातें केवल अनुभव से सम्बन्ध रखती हैं, उनका प्रकट रूप कदाचित ही कभी देखने में आता है। इसलिये उनके विषय में हमारा मार्ग दर्शन वही व्यक्ति कर सकता है जो स्वयं उस मार्ग पर चलकर अनुभव प्राप्त कर चुका हो।

यही कारण है कि भारतवर्ष में गुरु की महिमा अपरम्पार बतलाई गई है। अनेक भक्तों ने तो गुरु का दर्जा भगवान से भी बड़ा बतलाया है, क्योंकि उनके मत से गुरु की कृपा से ही भगवत्प्राप्ति संभव होती है, इसलिये गुरु का अहसान सब से अधिक माना जाता है। इसलिये यह भी कहा गया है कि यदि गुरु में कोई दोष भी दिखलाई पड़े तो भी उसके प्रति श्रद्धा भक्ति में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं आनी चाहिये। रामकृष्ण परमहंस जैसे साधक ने कहा था कि “यदि हमारा गुरु वेश्या गृह जाय, तो भी हमारा गुरु भगवत् राय।” यह सत्य है कि वर्तमान समय में गुरु और शिष्य की प्राचीन परम्परा में जमीन आसमान का अन्तर पड़ गया है और अब दोनों में से किसी कौडडडडडड स्वार्थ को छोड़कर अपने कर्त्तव्य का ध्यान नहीं है। ऐसे ही गुरु और शिष्यों के लिये गो. तुलसीदास जी लिख गये हैं—

गुरु शिष बधिर अंध के लेखा।

एक न सुनहिं एक नहिं देखा॥

हरहिं शिष्य धन शोक न हरहीं।

ते गुरु घोर नरक में परहीं॥

तो भी इस गुरु मात्र की निन्दा नहीं की जा सकती। वर्तमान समय में भी श्री रामकृष्ण परमहंस के समान गुरु हो गये हैं जिन्होंने अपनी शक्ति और तपस्या का फल प्रदान करके स्वामी विवेकानन्द की काया पलट कर दी और उनको जगत पूज्य बना दिया। आरम्भ में जब स्वामी जी नरेन्द्र के नाम से कालेज की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे और पश्चिमी विज्ञान और दर्शन के सामने भारतीय अध्यात्मवाद को महत्त्वहीन समझते थे तब परमहंस जी ने ही आग्रह पूर्वक उनको अपने पास बुलाया और कन्धे पर पैर रखकर आध्यात्मिक विद्युत का ऐसा झटका दिया जिससे उनके विचारों का अद्भुत परिवर्तन हो गया और वे पश्चिमी शिक्षा की मृग मरीचिका को त्याग कर भारतीय संस्कृति और ज्ञान के अनुगामी बन गये। फिर जब परमहंस जी का अन्त काल आया तो दो दिन पूर्व उन्होंने स्वामी जी को एकान्त में अपने पास बिठाकर अपनी समस्त शक्ति उनमें भर दी। जिस समय परमहंस जी ने अपने हाथ उन पर रखे तो वे स्तब्ध दशा को प्राप्त हो गये और आध घंटा तक यही अनुभव करते रहे कि जैसे किसी बिजली डाइनेमो से निकल कर विद्युत शक्ति बैटरी में समाती जाती है। अन्त में जब उनको चैतन्य दशा प्राप्त हुई तो उन्होंने परमहंस जी को रोते हुए पाया। परमहंस जी ने कहा आज मैंने अपनी जन्म भर की कमाई (शक्ति) तुमको दे डाली, अब मेरे पास कुछ नहीं रहा। आगे चलकर तुम्हारा यह कर्त्तव्य होगा कि इस शक्ति का लोक-सेवा में उपयोग करो।

यही भारतीय गुरुओं का “शक्तिपात” का सिद्धान्त है। इसका आशय यह है कि केवल अध्यात्म-ज्ञान का उपदेश करने से अथवा मन्त्र दे देने से शिष्य की विशेष उन्नति नहीं हो सकती। इसके साथ ही जब गुरु शिष्य को अपनी शक्ति परिचालित करते हैं तब उनके भीतर आत्म-शक्ति जागृत होती है और वे विशेष कार्य करके दिखला सकते हैं। इस सम्बन्ध में श्री वासुदेवानन्द ने लिखा है—

शक्ति पातेन संयुक्ता विद्या वेदान्त वाक्यजा।

यदा यस्य तदा तस्य विमुक्तिर्नात्र संशयः॥

“वेदान्त वाक्य से प्राप्त विद्या जब शक्तिपात के साथ जिसमें संयुक्त होती है, तब उसी क्षण वह मुक्त हो जाता है।

शक्तिपात विहीनोऽपि सत्यवाग् गुरुभक्तिमान। आचार्याच्छ्रु, त वेदान्तः क्रमानुच्यते बन्धतात्॥

“गुरुभक्ति युत शिष्य शक्तिपात रहित होकर भी वेदान्त वाक्य के श्रवण, मनन, निदिध्यासन से प्रतिबन्ध क्षय होने पर क्रमशः बन्धन से मुक्त हो जाता है।”

“सूत्र संहिता” में माया के बन्धन से छूटने का साधन इस प्रकार बतलाया है—

तत्त्वज्ञानेन मायाया बाधो नान्येन कर्मणा। ज्ञानं वेदान्त वाक्योत्थं ब्रह्मात्मैकत्त्व गोचरम्॥ तच्च देव प्रसादेन गुरोः साक्षान्निरीक्षणात्। जायते शक्ति पातेन वाक्यादेवाधिकारिणाम्॥

“तत्त्वज्ञान से माया का निरोध होता है, अन्य किसी कर्म से नहीं होता। यह तत्त्वज्ञान अधिकारी शिष्य को देवप्रसाद के द्वारा शक्तिपात पूर्वक ब्रह्म से ही प्राप्त होता है।”

श्रीमत् शंकराचार्य इस युग के सब से बड़े योगी और ज्ञानी हुये हैं, जिन्होंने थोड़े ही वर्षों में वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना करके धर्म प्रचार का ऐसा संगठन किया जो डेढ़ हजार वर्ष के लगभग हो जाने पर भी आज तक प्रभावशाली बना हुआ है और जिसके द्वारा अब भी आध्यात्मिकता और आत्मज्ञान का प्रचार देश भर में हो रहा है। उन्होंने शक्तिपात पूर्वक ज्ञानदान करने वाले सद्गुरु का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है—

दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवन जठरे

सद्गुरोर्ज्ञान दातुः।

स्पर्शश्चेत्तत्र कल्प्यः स नयति

यदहो स्वर्णतामश्य सारम्॥

न स्पर्श त्वं तथापि श्रितचरणयुगे

सद्गुरुः स्वीय शिष्ये।

स्वीयं सभ्यं विधत्ते भवति

निरुपमस्तेन वा लौकिकोऽपि॥

“इस त्रिभुवन में ज्ञानदाता सद्गुरु के लिये देने योग्य कोई दृष्टान्त ही नहीं दीखता। उन्हें पारसमणि की उपमा दें तो यह भी ठीक नहीं जँचती। कारण, पारस लोहे को सोना बना देता है, पर पारस नहीं बनाता। पर सद्गुरु के चरण युगल का आश्रय लेने वाले शिष्य को सद्गुरु निज साम्य ही दे डालते हैं अर्थात् अपने समान ही बना देते हैं। इसलिये सद्गुरु की कोई उपमा नहीं दी जा सकती।”

ज्ञानेश्वर महाराज महाराष्ट्र के बहुत बड़े संत हुए हैं। जिनकी रचित गीता की ‘ज्ञानेश्वरी टीका’ सैकड़ों वर्ष बीत जाने पर भी अद्वितीय मानी जाती है। उसका जन्म एक समाज-च्युत में पिता के गृह में हुआ था, पर उन्होंने किसी ऐसे ही सद्गुरु की कृपा से बाल्यावस्था में ही अद्भुत शक्ति प्राप्त कर ली थी। उन्होंने गुरुद्वारा शक्तिपात का वर्णन करते हुए लिखा है- “यह दृष्टि जिस पर चमकती है अथवा यह करार विन्द जिसे स्पर्श करता है, वह होने को तो चाहे जीव ही हो, पर बराबरी करता है महेश्वर शंकर की। भक्तराज अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने इसी प्रकार शक्तिपात करके आत्मानुभव कराया था। भगवान ने अपना सुवर्ण कंकण विभूषित दक्षिण बाहु फैल कर शरणागत अर्जुन को हृदय से लगा लिया। हृदय-हृदय एक हो गये। जो इस हृदय में था उसे उस हृदय में दिया। द्वैत का नाता बिना तोड़े अर्जुन को अपने जैसा बना लिया। ऐसे सद्गुरु सच्चे शिष्य को स्वयं ही मिल जाते हैं उनको ढूँढ़ना-खोजना नहीं पड़ता। जब कर्मसाम्य ही अवस्था आती है तब सद्गुरु स्वयं ही आकर मिलते हैं। “

इससे विदित होता है कि ‘शक्तिपात’ निस्संदेह बड़ी महत्वपूर्ण क्रिया है और अनेक संत महात्माओं को ऊँचे दर्जे की आध्यात्मिक स्थिति इसी उपाय से प्राप्त होती है। हम अनेक बार देखते हैं कि अनेक साधारण व्यक्ति छोटी अवस्था में ही बिना किसी विशेष प्रयत्न के आत्म-शक्ति से भर जाते हैं और अद्भुत कार्य करके दिखलाने लगते हैं, यह सब प्रभाव किसी ऐसी ही विशेष शक्ति का होता है। श्री. रामकृष्ण परमहंस गाँव के रहने वाले साधारण अपढ़ बालक थे। पर 15-16 वर्ष की अवस्था में ही वे परम भक्त बन गये और थोड़े ही समय में समस्त बंगाल प्राँत में उनकी ख्याति फैल गई। इसी प्रकार आजकल माता आनन्दमयी साधारण गृह स्त्री थी, जिनके पति छोटी सी क्लर्क की नौकरी करते थे, पर उनके अकस्मात् आत्म-शक्ति के महान् लक्षण दिखलाई पड़ने लगे और आज वे आध्यात्मिक जगत की एक विशेष विभूति मानी जाती है। शास्त्रों में यह भी विदित होता है कि जब किसी अधिकारी व्यक्ति में ऐसा शक्तिपात का प्रयोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हो जाता है, तो फिर उसे साधारण व्यक्तियों की तरह छोटे-छोटे साधन क्रम से नहीं करने पड़ते, वरन् सभी तरह की सरल और कठिन क्रियाएं उससे स्वयं ही होने लगती हैं। उदाहरण के लिए याग-साधना के इच्छुक सभी व्यक्तियों को यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि को साधन करके आगे की मंजिलों की तरफ अग्रसर होना पड़ता है। परन्तु जिस व्यक्ति में कोई महात्मा शक्तिपात कर देते हैं वे इन सब क्रियाओं को बिना किसी के सिखाये स्वयमेव ठीक-ठीक ढंग से करने लगते हैं और दस-पाँच दिन में ही दक्षता प्राप्त कर लेते हैं। इसी प्रकार जो लोग वर्षों तक जप करके किसी मंत्र को सिद्ध नहीं कर सकते थे, वे शक्तिपात के बाद अनायास उसमें सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। इसलिए आध्यात्मिक उन्नति के लिए सद्गुरु द्वारा शक्तिपात का बड़ा महत्व है। पर ऐसा सुयोग्य अधिकारी शिष्य को ही मिलता है। जो पात्र नहीं है उसे इस प्रकार कर शक्तिपात विपरीत परिणाम उत्पन्न करने वाला ही सिद्ध होता है।


Quotation

प्रत्येक पुरुष के भीतर जो एक आदेश देने वाली शक्ति होती है, जिसके शासन से सारे जीवन की लीला नियंत्रित एवं संगठित होती रहती है, वही विवेचना-शक्ति जीवित को देवता है। -डेलेड्डा

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ऐ मेरे हृदय! घर में टिक और आराम कर, पक्षी अपने घोंसले में ही सुरक्षित रहता है। -लाँगफैलो

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पूर्णता प्राप्त करने के लिए हमें, या तो मित्रों की आलोचना से अथवा शत्रुओं के कटु वाक्यों से, अपनी त्रुटियों का ज्ञान हो जाना चाहिए।

-डायोजेनिस


भारतीय योग की अलौकिक सिद्धियाँ

(योगीराज श्री 108 स्वामी सत्यानन्द जी )

भारतवर्ष का योग संसार भर में एक अद्वितीय साधन-प्रणाली माना गया है। शास्त्रों के लेखानुसार तो योग संसार की सबसे बड़ी शक्ति है और इसके द्वारा मनुष्य के लिये कोई भी कार्य असम्भव नहीं रहता। प्रत्यक्ष में भी अनेक योगियों को नाना प्रकार के आश्चर्यजनक चमत्कार करते देखा गया है। अब भी योगी एक-एक महीने तक की समाधि लगाते, दिव्य दृष्टि का परिचय देते, शस्त्र, विष आदि के प्रभाव को व्यर्थ करते देखे गये हैं। उनके आशीर्वाद और शाप का प्रभाव भी कभी-कभी स्पष्ट देखने में आता है। पर ये सब बातें प्राचीन योगियों की शक्ति के सम्मुख नगण्य ही मानी जानी चाहियें। यद्यपि उस समय के अधिकाँश साधक केवल परमात्मा की प्राप्ति के हेतु ही योग साधन करते थे, पर साधनावस्था में स्वभावतः उनको अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती थीं। यह बात सत्य है कि जो वास्तविक मुमुक्ष योगी होते थे, वे इन सिद्धियों की तरफ ध्यान नहीं देते थे और उनका प्रयोग भी कदाचित् ही करते थे। वे इन सिद्धियों के फेर में पड़ना और उनको अधिक विकसित करना मुक्ति -मार्ग में बाधा स्वरूप मानते थे और जहाँ तक संभव होता था उन्हें किसी पर प्रकट नहीं होने देते थे।

पर इस वक्तव्य पर से यह विचार कर लेना कि सिद्धियों की बात सर्वथा कल्पित या असम्भव है ठीक न होगा। किसी उच्चकोटि के साधक का यह कहना ठीक माना जा सकता है कि हमको सिद्धियों की ओर लक्ष्य करके मुक्ति की ओर ही बढ़ते जाना चाहिये। पर हर एक साधारण साधक का, जो योग की विधियों को भी अभी भली प्रकार नहीं जानता, यह कहना कि “सिद्धियाँ विघ्न स्वरूप हैं, इन से बच कर ही रहना चाहिये” कोई अर्थ नहीं रखता। त्याग उसी चीज का किया जाता है जो हमको प्राप्त हो चुकी है या शीघ्र ही मिलने वाली है। पर जो लोग अभी ठीक तरह से प्राणायाम करने में भी समर्थ नहीं है, उनके मुँह सिद्धियों के त्याग की बात निकलना बड़ा बेतुका जान पड़ता है। फिर सब सिद्धियों का आशय वैभव या सम्पत्ति की प्राप्ति से भी नहीं होता। ये सिद्धियाँ वास्तव योग के साधन-काल में स्वभावतः प्राप्त होने वाली तरह-तरह की शक्तियाँ हैं जिनका चाहे तो आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकता है, अथवा नहीं भी किया जाय। पर यह मानना हमें पड़ेगा कि वे हैं बड़ी विलक्षण। विज्ञान बड़ी-बड़ी असम्भव समझी जाने वाली बातों को सत्य सिद्ध कर दिखाया है, पर योग की सिद्धियाँ उनसे भी अधिक विस्मयजनक हैं। क्योंकि विज्ञान द्वारा किये जाने वाले कार्यों में बहुत अधिक यंत्रों और सैकड़ों प्रकार की रासायनिक पदार्थों या मसालों की आवश्यकता पड़ती है, जबकि योगी जो कुछ करते हैं वह सब आत्म-बल और आन्तरिक शक्तियों द्वारा सम्पन्न होता है। योग की ऐसी सिद्धियों की संख्या बहुत अधिक है, नीचे हम एक विद्वान की रचना के आधार पर उनका संक्षिप्त परिचय देते हैं—

(1) यह जगत संस्कारों का परिणाम है और उन संस्कारों के क्रम में अदल-बदल होने से ही तरह-तरह के परिवर्तन होते रहते हैं। योगी इस तत्व को जान कर प्रत्येक वस्तु और घटना के ‘भूत’ तथा भविष्यत् का ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

(2) शब्द, अर्थ और ज्ञान का एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है इनके ‘संयम’ (धारणा, ध्यान और समाधि, इन तीनों साधन क्रियाओं के एकीकरण को ‘संयम’ कहते हैं) से ‘सब प्राणियों की वाणी’ का ज्ञान हो जाता है।

(3) अति सूक्ष्म संस्कारों को प्रत्यक्ष देख सकने के कारण योगी को किसी भी व्यक्ति के पूर्व जन्म का ज्ञान होता है।

(4)ज्ञान में संयम करने पर दूसरों के चित्त का ज्ञान होता है। इसके द्वारा योगी प्रत्येक प्राणी के मन की बात जान सकता है।

(5) कायागत रूप में संयम करने से दूसरों के नेत्रों के प्रकाश का योगी के शरीर के साथ संयोग नहीं होता। इससे योगी का शरीर ‘अन्तर्धान’ हो जाता है। इसी प्रकार उसके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध को भी पास में बैठा हुआ पुरुष नहीं जान सकता।

(6) ’सोपक्रम’ का अभ्यास करने से योगी को मृत्यु का पूर्व ज्ञान हो जाता है।

(7) सातवीं सिद्धि से योगी के आत्म-बल का इतना विकास हो जाता है कि उसके मन पर इन्द्रियों का वश नहीं चलता।

(8) बल में संयम करने से योगी को हाथी, शेर, ग्राह, गरुड़ की शक्ति प्राप्त होती है।

(9) ज्योतिष्मती प्रकृति के प्रकाश को सूक्ष्म वस्तुओं पर न्यास्त करके संयम करने से सूक्ष्म, गुप्त और दूरस्थ पदार्थों का ज्ञान होता है। इससे वह जल या पृथ्वी के भीतर समस्त पदार्थों को देख सकने में समर्थ होता है।

(10) सूर्य नारायण में संयम करने से योगी को क्रमशः स्थूल और सूक्ष्म लोकों का ज्ञान होता है। सात स्वर्ग और सप्त पाताल सूक्ष्म लोक कहे जाते हैं। योगी का अन्यान्य ब्रह्मांडों का भी ज्ञान हो जाता है।

(11) चंद्रमा में संयम करने से समस्त राशियों और नक्षत्रों का ज्ञान होता है।

(12) ध्रुव में संयम करने से समस्त ताराओं की गति का पूर्ण ज्ञान होता है।

(13) नाभि चक्र में संयम करने से योगी को शरीर के भीतरी अंगों का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। वात, पित्त, कफ ये तीन दोष किस रीति से हैं; चर्म, रुधिर, माँस, नख, हाथ, चर्बी और वीर्य ये सात धातुएँ किस प्रकार से हैं; नाड़ी आदि कैसी-कैसी हैं, इन सब का ज्ञान हो जाता है।

(14) कण्ठकूप में संयम करने से भूख और प्यास निवृत्त हो जाती है। मुख के भीतर उदर में वायु और आहार जाने के लिये जो कण्ठछिद्र है उसी का ‘कण्ठ कूप’ कहते हैं। यही पर पाँचवाँ चक्र स्थित है और क्षुधा, पिपासा आदि क्रियाओं का इससे घनिष्ठ सम्बन्ध है।

(15) कूर्म नाड़ी में संयम करने से मन अपनी चंचलता त्याग कर स्थिर बन जाता है।

(16) कपाल की ज्योति में संयम करने से योगी को सिद्धगणों के दर्शन होते हैं। सिद्ध महात्मागण जीव श्रेणी से मुक्त होकर सृष्टि के कल्याणार्थ चौदह भुवन में विराजते हैं।

(17) योग-साधन करते समय ध्यानावस्था में दिखलाई पड़ने वाले ‘प्रातिभ’ नामक तारे में संयम करने से ज्ञान-राज्य की समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

(18) हृदय में संयम करने से चित्त का पूर्ण ज्ञान होता है। वैसे महामाया की माया से कोई चित्त का पूर्ण स्वरूप नहीं जान पाता, पर जब योगी हृत्कमल पर संयम करता है तो अपने चित्त का पूर्ण ज्ञाता बन जाता है।

(19) बुद्धि की चिद्भाव अवस्था में संयम करने से पुरुष के स्वरूप का ज्ञान होता है। इससे योगी को (1) प्रातिभ, (2) श्रावण, (3) वेदन, (4) आदर्श, (5) आस्वाद और (6) वार्ता—ये षट्सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

(20) बन्धन का जो कारण है उसके शिथिल हो जाने से और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गमन मार्ग नाड़ी का ज्ञान हो जाने से योगी किसी भी शरीर में प्रवेश कर सकता है।

(21) उदान वायु को जीतने से जल, कीचड़ और कण्टक आदि पदार्थों का योगी को स्पर्श नहीं होता और मृत्यु भी वशीभूत हो जाती है अर्थात् वह इच्छा मृत्यु को प्राप्त होता है जैसा कि भीष्म पितामह का उदाहरण प्रसिद्ध है।

(22) समान वायु को वश में करने से योगी का शरीर तेज-पुञ्ज और ज्योतिर्मय हो जाता है।

(23) कर्ण इन्द्रिय और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से योगी को दिव्य श्रवण की शक्ति प्राप्त होती है। अर्थात् वह गुप्त से गुप्त, सूक्ष्म से सूक्ष्म और दूरवर्ती से दूरवर्ती शब्दों को भली प्रकार सुन सकता है।

(24) शरीर और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से आकाश में गमन हो सकता है।

(25)शरीर के बाहर मन की जो स्वाभाविक वृत्ति

‘महा विदेह धारणा’ है उसमें संयम करने से अहंकार का नाश हो जाता है और योगी अपने अन्तःकरण को यथेच्छा ले जाने की सिद्धि प्राप्त करता है।

(26) पंच तत्वों की स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थतत्व—ये पाँच अवस्थाएँ हैं। इन पर संयम करने से जगत् का निर्माण करने वाले पंचभूतों पर जयलाभ होता है और प्रकृति वशीभूत हो जाती है। इससे अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्व, ईशित्व—ये अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

इस प्रकार योगी, समाधि अवस्था में पहुँचने के बाद जिस किसी विषय पर अपना ध्यान लगाता है उसी का पूर्ण ज्ञान किसी से बिना सीखे अथवा कहीं गये हुये प्राप्त हो जाता है। अन्त में परमात्मा की ओर अग्रसर होते हुये उसे वैसी ही शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं जो ईश्वर में पाई जाती है। वह त्रिकालदर्शी हो जाता है और सब लोकों में उसकी गति हो जाती है और उसके संकल्प मात्र से महान परिवर्तन हो जाते हैं। पर यह सब कुछ संभव होने पर भी महात्माओं का मत यही है कि साधक को अपना लक्ष्य सदा “कैवल्य पद” रखना चाहिये। ये समस्त सिद्धियाँ “अपरा” कही जाती हैं। परा सिद्धि वही है जिसका लक्ष्य अपने स्वरूप अनुभव करके मुक्ति प्राप्त करना होता है।


देश-विदेश के योगियों के अद्भुत चमत्कार

(श्री. कर्मपूजन वानप्रस्थी)

योगियों और महात्माओं के चमत्कारों की जितनी चर्चा इस देश में सुनी जाती है और उन पर जितना अधिक विश्वास किया जाता है, उसकी तुलना किसी अन्य देश में मिल सकनी कठिन है। थोड़े से देश प्रसिद्ध सन्तों की बात छोड़ दीजिये, यहाँ किसी छोटे से नगर या कस्बे में भी एकाध ऐसे साधु मिल ही जायेंगे जिनके विषय में लोग चमत्कारों की चर्चा करते हों। यद्यपि इन बातों में बहुत सी अतिशयोक्ति पूर्ण होती हैं और बहुत से व्यक्ति जान-बूझकर जनता को बहकाने के लिये भी ऐसी बातों को फैलाया करते हैं, पर चमत्कारों की बातें सर्वथा निराधार या बनावटी हैं यह कहने का साहस भी कोई नहीं कर सकता। क्योंकि अनेक चमत्कार ऐसी परिस्थितियों में देखे जाते हैं कि उनको बिल्कुल गलत कोई नहीं कह सकता। उदाहरण-स्वरूप हम इसी 21 मई 1959 के समाचार पत्रों में प्रकाशित एक खबर यहाँ दे रहे हैं—

“नई दिल्ली 21 मई। आज सायंकाल श्री शिव अवतार शर्मा नामक व्यक्ति ने राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद के समक्ष “दिव्य दृष्टि” का सफल प्रयोग किया। राष्ट्रपति ने एक कमरे में कुछ पंक्तियाँ लिखी तो दूसरे कमरे में श्री शिवअवतार शर्मा ने वे सारी की सारी पंक्तियाँ ज्यों की त्यों लिखकर दिखा दीं। राष्ट्रपति इस दिव्य दृष्टि के प्रयोग से अत्यधिक “प्रभावित हुये तथा श्री शर्मा को सलाह दी कि वे इस आध्यात्मिक विज्ञान को विकसित करने का प्रयत्न करते रहें।”

इसी प्रकार कुछ वर्ष पहले एक व्यक्ति ने दिल्ली के प्रसिद्ध बिड़ला भवन में अनेक आदरणीय व्यक्तियों तथा नेताओं के समक्ष ताँबे का सोना बना दिया था और एक साधु ने एक पूरी नम्बरी ईंट को मिश्री बना कर दिखा दिया था। आग पर चलने के प्रदर्शन तो प्रतिवर्ष अनेक स्थानों में किये जाते हैं। इस तरह के अनगिनत चमत्कार अथवा ऐसे कृत्य जिनका कारण एक बुद्धिमान व्यक्ति की समझ में नहीं आता, सदा सुनने और देखने में आते रहते हैं।

पर भारतवर्ष के बाहर भी ऐसे चमत्कारों की बातें प्रायः सुनने में आती हैं। ईसाई धर्म के प्राचीन ग्रन्थों में तो ऐसी सैंकड़ों घटनायें दी गई हैं और करोड़ों ईसाई उनको पूर्णतः सत्य मानते हैं। ईसाइयों की बाइबिल में लिखा है कि एक प्रसिद्ध महात्मा एलिक्षा ने एक मृत बालक को पुनर्जीवित किया था। इन्हीं महात्मा के पास एक विधवा स्त्री आई और आर्तस्वर से कहने लगी कि मेरे ऊपर एक महाजन का ऋण हो गया है जिसके बदले में वह मुझे और मेरी सन्तानों को बेच डालने का भय दिखा रहा है। आप इस भयंकर विपत्ति से मेरी रक्षा करें। महात्मा ने पूछा कि तुम्हारे घर में तुम्हारी कोई निजी संपत्ति है या नहीं। विधवा ने उत्तर दिया “एक छोटे से बर्तन में केवल थोड़ा सा तेल है।” महात्मा ने कहा “जाओ अपने पड़ोसियों के यहाँ से जितने बड़े-बड़े बर्तन मिल सकें माँग लाओ और अपने उस बर्तन से तेल ढाल-ढाल कर सब बर्तनों को भर दो। देखोगी कि जितना तेल निकाला जाता है उतना ही बढ़ता जाता है। सब बर्तन भर जायेंगे। उस तेल को बेच कर ऋण चुका देना, जो कुछ बच जाय उसे अपने निर्वाह को रख लेना ।” ऐसा ही हुआ और विधवा ने ऋण की विपत्ति से छुटकारा पा लिया। ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह के बारे में तो ऐसी सैंकड़ों घटनाएँ बाइबिल में दी गई हैं। ऐसी प्राचीन बातों को प्रमाणित करना तो सम्भव नहीं होता, पर जो कुछ बातें उनके सम्बन्ध में सुनने में आई हैं, उनसे यही विदित होता है कि ईसामसीह में जन्म से ही एक योगी पुरुष होने के लक्षण मौजूद थे, और जैसे अब भी बहुत से व्यक्ति स्वभावतः चमत्कारी शक्ति प्रदर्शित करने वाले मिल जाते हैं, उसी प्रकार ईसामसीह में भी ऐसी शक्ति थी जिससे वे असम्भव समझे जाने वाले अनेक कार्य कर सकते थे। संभव है उन्होंने साधना करके इस शक्ति को विशेष रूप से विकसित भी किया हो। कहा तो यहाँ तक जाता है कि उन्होंने भारतवर्ष में आकर योग की शिक्षा प्राप्त की थी। कुछ भी हो बाइबिल के अनुसार उन्होंने केवल हाथ से छूकर कितने ही लोगों का कोढ़ रोग दूर कर दिया, जन्मान्धों को दृष्टि प्रदान की, पाँच जौ की रोटियों से पाँच हजार व्यक्तियों को भोजन कराया और कई मृत व्यक्तियों को पुनर्जीवन प्रदान किया। ईसा के समकालीन एक एपोलिनियस नामक योगी थे। उन्होंने भारतवर्ष आकर सद्गुरु से योग शिक्षा प्राप्त की थी। उनके साथी शिष्य उनकी यात्रा का तथा शिक्षा का विवरण लिख कर रखते चले जाते थे और वे बातें अब भी एपोलिनियस के जीवन-चरित्रों में मिलती हैं। वे योगबल से भूत, भविष्यत् की घटनाओं को स्वच्छ दर्पण के प्रतिबिम्ब की तरह देख सकते थे। उन्होंने भी कई मृत व्यक्तियों को जीवित किया था।

स्पेन देश के “महात्मा इसीडोर” में असाधारण विभूतियाँ थीं। वैसे वे एक साधारण किसान थे। एक बार सारे दिन परिश्रम करने के बाद शाम को अपनी कुटी में आकर देखा कि एक दरिद्र यात्री अन्न की आशा से उसके दरवाजे पर बैठा है। महात्मा ने अपनी स्त्री से उस आदमी के लिये कुछ लाने के लिये कहा, परन्तु घर में कुछ भी न था। इसीडोर ने फिर कहा कि “भीतर जाकर देखो कि अन्न पात्र कुछ है या नहीं?” स्त्री ने उत्तर दिया कि मैं अभी तो उसे धो माँज कर रख कर आई हूँ, उसमें कुछ भी नहीं है। तब उन्होंने स्त्री से कहा कि उस बर्तन को तुम मेरे पास ले आओ। स्त्री जब घर में बर्तन लाने गई तो वह उसे बहुत भारी जान पड़ा। जब उसने ढक्कन उठाया तो देखा कि पात्र तुरन्त पके हुये उष्ण और स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ से परिपूर्ण है। उसने उसके द्वारा भूखे अतिथि को भरपेट भोजन कराया—फिर भी वह समाप्त नहीं हुआ।

ईसाई धर्म-साहित्य में ‘एग्निस’ नाम की साधिका की योग विभूतियों का वर्णन बहुत प्रसिद्ध है। एक दिन दो साधु उससे मिलने आये। बहुत देर तक आपस में आध्यात्मिक जीवन के विषय में बातचीत होती रही। अन्त में साधिका ने दोनों साधुओं को भोजन के लिये बैठाया। भोजन परोसने के पहले ही साधुओं ने देखा कि अकस्मात् एक थाली मेज के ऊपर आ गई। उसमें एक सुन्दर खिला हुआ गुलाब का फूल था। साधिका ने कहा—”बाबा जी” प्रभु ईसा ने दया करके भयंकर शीतकाल में जब पृथ्वी के बगीचों के सभी पुष्प नष्ट हो गये हैं, स्वर्ग के बगीचे से इस गुलाब को हमारे पास भेजा है। आप लोगों से बात करने से मेरे हृदय में जो आनन्द और तृप्ति का संचार हुआ है, यह उसी का निदर्शन है। “दोनों साधु इस विचित्र घटना को देख कर बड़े विस्मित हुये और अपने स्थानों को लौट गये । इसी साधिका ने पर्वत शिखर पर एक रमणीक विहार, बनवाया था, जिसमें 200 तपस्विनी साधिकाएँ उसके साथ रहती थीं। एक बार तीन दिन तक घर में अन्न नहीं रहा। सब लोगों ने उपवास किया। एग्निस ने प्रार्थना की—”प्रभु! तुम्हारे ही आदेश से मैंने इस विहार को बनवाया था। अब तुम क्या यह चाहते हो कि तुम्हारी सेविकाएँ अन्न के बिना प्राण त्याग दें। प्रभु! हमारे लिये अन्न की व्यवस्था करो अन्यथा हम सब मर जायेंगी। हम लोगों के लिये पाँच रोटियाँ भेज दो। स्वामिन्! हमारी आवश्यकताएँ बहुत ही साधारण हैं, परन्तु तुम्हारी शक्ति तो असाधारण है।” फिर उसने एक तपस्विनी से कहा—”जाओ बहिन ऊपर जाकर रोटी उठा लो, उसे प्रभु ईसा ने अभी भेजा है।” एक रोटी लाकर मेज पर रक्खी गई वह एक विचित्र वस्तु थी। उसमें से जितनी खाई जाती थी उतनी ही अलक्ष्य रूप से वह बढ़ जाती थी। बहुत दिनों तक आश्रम के सब लोगों की भूख उसी से निवृत्त होती रही।

भारतवर्ष के योगियों के चमत्कारों से तो अठारह पुराण भरे पड़े हैं। प्राचीनकाल के ऋषि, मुनि तथा अन्य सभी साधक अधिकांश कार्यों की पूर्ति योगशक्ति से ही किया करते थे। विद्या के ऐतिहासिक युग में भी शंकराचार्य जी के योगबल की कथाएँ अनेक ग्रन्थों में लिपिबद्ध हैं। मण्डन मिश्र की स्त्री से शास्त्रार्थ करने के लिये उन्होंने परकाया प्रवेश किया था, नर्मदा के जल को बहने से रोक दिया था, आकाश मार्ग से गमन किया था आदि। बुद्ध के शिष्य मौद्गल्यायन और पिण्डोल ने भी राजगृह में ऐसा चमत्कार दिखाया था। वहाँ एक सेठ ने 60 हाथ ऊँचे बाँस पर एक कमण्डल टाँग दिया था और यह घोषणा करवा दी थी कि यदि कोई सच्चा अर्हत (आत्म-ज्ञानी)हो तो उसे आकाश मार्ग से आकर ग्रहण करे। इस प्रकार की बात जब मौद्गल्यायन और पिण्डौल के कानों में पहुँची और उन्होंने जंगल में शिकारियों को यह चर्चा करते सुना कि “आज कल कोई अर्हत नहीं है, जो हैं वे सब दिखावटी और कपटी हैं” तो उनको इसमें अपने गुरु तथा धर्म का अपमान जान पड़ा और उन्होंने शून्य-मार्ग से जाकर कमण्डल को बाँस से उतार लिया। इस पर जनता में उनकी बड़ी प्रशंसा फैल गई, पर बुद्ध भगवान ने उनको डाँट दिया और अपने संघ में सबको यह आज्ञा दे दी कि भविष्य में लौकिक कार्य के लिये कोई ऐसा योग शक्ति का चमत्कार न दिखलावे।

इस प्रकार के अनगिनत चमत्कार भारतवर्ष के धर्म-ग्रन्थों में भरे पड़े हैं। यहाँ ऐसा कोई महापुरुष शायद ही मिले जिसके नाम के साथ चमत्कारों की चर्चा न हो। मन चाही चीजों को एक क्षण में मँगा देना, पदार्थों का परिमाण बढ़ा देना, रोगियों को अच्छा कर देना, सोने, चाँदी, रत्न आदि की वर्षा करा देना आदि बातें तो यहाँ साधारण साधकों के कार्य माने जाते थे। यहाँ तो योग की सिद्धियों द्वारा पर्वतों, नदियों, समुद्रों को ही नहीं, सूर्य और चन्द्रमा तक को अधिकार में किया जा सकना और इच्छानुसार चलाया जा सकना संभव माना गया है। पर आत्म ज्ञान की दृष्टि से इस प्रकार का बड़े से बड़ा चमत्कार भी महत्वहीन समझा जाता है और उसे लाभदायक होने के बजाय आत्म-विकास के लिये हानिकारक माना जाता है। इसलिये सच्चे सन्त पुरुष धर्म-रक्षा का प्रश्न उपस्थित होने के सिवाय अन्य अवसरों पर कदापि योग शक्ति का प्रयोग चमत्कारों के लिये नहीं करते।


मन्त्र शक्ति का अद्भुत चमत्कार

(श्री गिरिजा सहाय व्यास)

भारतीय धर्म में मन्त्रशक्ति का स्थान बड़ा महत्वपूर्ण और हमारे वेद-शास्त्र पुराण सभी मन्त्रों की महिमा से भरे हैं। उनका मत यह है कि मंत्रों में शक्ति का अपार भंडार भरा है और जो कोई उनका विधिवत् साधन करेगा। वह उनकी शक्ति से अपना और दूसरों का कल्याण कर सकेगा। पर काल प्रभाव से अब मन्त्रों पर लोगों की वैसी श्रद्धा नहीं रही है और मन्त्रों द्वारा प्रत्यक्ष कार्य कराने वाले साधक भी नाम मात्र को ही मिलते हैं। इसके विपरीत अनेक धूर्तों ने इस विद्या के नाम पर लोगों को ठगना शुरू कर दिया है और वे तरह-तरह की चालें और हाथ की सफाई करके दर्शकों को धोखे में डाल देते हैं, इन बातों का परिणाम यह हुआ है कि जनता का विश्वास मन्त्रों पर से हट गया है और कोई समझदार व्यक्ति मन्त्र-शक्ति की सत्यता को मानने के लिये तैयार नहीं होता। यह स्थिति लोगों के लिये ही नहीं धर्म की दृष्टि से भी हानिकर है, क्योंकि मन्त्रों का मुख्य उद्देश्य चमत्कार दिखलाना नहीं, वरन् आत्मोन्नति के क्षेत्र में प्रगति करना है। सन्तोष का विषय है कि अब भारतीय राष्ट्र में जो नवीन चेतना की लहर उत्पन्न हुई है उसमें अन्य बातों के साथ इस ओर भी अधिकारी पुरुषों का ध्यान गया है और इस विद्या का विधिवत् साधन करने के कितने ही उदाहरण सम्मुख आ रहे हैं। इस सम्बन्ध में एक प्रामाणिक वर्णन गोरखपुर के सहयोगी “कल्याण” के वर्ष 26 संख्या 12 पृष्ठ 1498 में प्रकाशित हुआ है। जिसे हम पाठकों के हितार्थ ज्यों का त्यों उद्धृत कर रहे हैं—

बिरला हाउस, नई दिल्ली से मास्टर श्रीराम जी लिखते हैं—दिल्ली में अनुमान दो-ढाई मास से एक वैष्णव साधु आये हुये थे, जिनका नाम बाबा गोपालदास है। वे यहाँ पर आर्यनिवास नं.1 डॉक्टर लेन पर ठहरे थे। छत के ऊपर एक गोल सा छोटा कमरा है, उसी में वे रहते थे। उन्होंने गोपाल का एक चित्र काष्ठ की चौकी पर रख छोड़ा था। उस चित्र के चारों तरफ कनेर के पुष्प चढ़ाये हुए रक्खे रहते थे। गोपालदास बाबा उस चौकी के पास ही एक दरी पर बैठे तुलसी की माला फेरते थे। जो लोग उनके पास जाते, वे भी उसी दरी पर बैठ जाते थे। उनके पास जाने वालों को प्रसाद देने के लिये बाबाजी ईंट के छोटे-छोटे टुकड़े अनुमान 4,5 तोले वजन के एक हरे केले के टुकड़े में गोपाल की मूर्ति के सामने आधा मिनट रखकर उठा लेते थे, ईंट के टुकड़े सफेद मिश्री के टुकड़ों में बदल जाते थे और वे उन मिश्री के टुकड़ों को उन लोगों को दे देते थे, जो उनके दर्शन के लिये जाते। कभी-कभी ईंट का टुकड़ा कलाकन्द में बदल जाता था। यह अद्भुत परिवर्तन कैसे हो जाता है? सो तो वह बाबाजी ही जानते हैं और किसी को पता चला नहीं है। विज्ञानवेत्ता इस कारण को ढूँढ़ निकालें तो दूसरी बात है।

उस बाबाजी के पास जर्मन-राजदूत, जापानी-राजदूत, (संसद के अध्यक्ष) श्रीमावलंकर, श्रीसत्यनारायणसिंह, रायबहादुर लक्ष्मीकान्त मिश्र आदि गये थे। इनको भी इसी प्रकार का प्रसाद दिया गया था। जर्मन-राजदूत के साथ एक जर्मन महाशय भी थे। उन्होंने तो यह चमत्कार देखकर बाबाजी से अपना शिष्य बना लेने की प्रार्थना भी की।

इन दो प्रकार के चमत्कारों के अतिरिक्त तीन चमत्कार विशेष उल्लेखनीय हैं। पहला चमत्कार तो यह है कि श्री जुगलकिशोर जी बिरला ने एक ताँबे की चमची को एक केले के हरे पत्ते में लपेटकर अपने हाथ में लिया और बाबाजी के कहने के अनुसार श्री बिरला जी सूर्य के सामने खड़े हो गये। बाबाजी भी पास में खड़े कुछ मन्त्र जपते रहे। दो-तीन मिनट बाद ही चमची निकाली गई तो सोने की बन गई थी। अभी तक वह चमची श्री बिरला जी के मुनीम डालूराम जी के पास उसी आर्य-भवन में रक्खी हुई है।

दूसरा चमत्कार यह हुआ कि इस मिश्री के प्रसाद का वृत्तान्त सुनकर एक महाशय ने बाबाजी के पास जाने वालों में से किसी को यह बात कह दी कि हम तो बाबाजी की मन्त्रसिद्धि तब मानें जबकि वे पूरी-की-पूरी एक नंबरी ईंट को मिश्री की ईंट बना दें। ऐसी बात बाबाजी को सुनाई गई तो बाबाजी ने झट कह दिया कि गोपाल जी की कृपा से मिट्टी की ईंट के टुकड़े मिश्री के टुकड़े बन जाते हैं तो पूरी मिट्टी की ईंट बन जाना कौन बड़ी बात है। अतएव 18 सितम्बर बृहस्पतिवार को रात्रि के 8 बजे श्री बिरलाजी के तथा और कई सज्जनों के सामने एक नंबरी ईंट मँगाई गई और उसको धो-पोंछकर एक सज्जन के हाथ से काष्ठ की एक चौकी पर वह ईंट रखवा दी गई तथा एक केले के पत्ते से उस ईंट को ढ़क दिया गया। तीन-चार मिनट तक बाबाजी कुछ मन्त्र जपते रहे। फिर उस ईंट को उठाया गया तो केले के पत्ते में से एक दम श्वेत मिश्री की ईंट निकली। वह ईंट (बिरला-हाउस, दिल्ली में ) श्री जुगलकिशोर जी बिरला के पास रक्खी हुई हैं, सो ये दोनों चीजें तो मौजूद हैं, कोई भी देख सकता है।

तीसरी अद्भुत घटना तो मैंने स्वयं अपनी आँखों से देखी है। उस समय बाबू जुगलकिशोर जी बिरला, गायनाचार्य पंडित रमेश जी ठाकुर तथा ‘नवनीत’ के संचालक श्री श्रीगोपालजी नेवटिया उपस्थित थे। अनुमान दिन के दस बजे होंगे। उस समय किसी ने बाबाजी से कहा कि “एक दिन आपने पानी से दूध बनाया था, परन्तु उस दिन प्रभुदयाल जी हिम्मतसिंह का, माधवप्रसाद जी बिरला आदि जो सज्जन देखते थे, उनको सन्तोष नहीं हुआ था। बाबाजी इस प्रकार से दूध बनायें कि किसी को भी सन्देह न रहे। इस पर बाबाजी बहुत हँसे और बोले, उन लोगों की श्रद्धा की स्यात्, परीक्षा की गई होगी। इसके बाद बाबाजी ने कहा, ‘अच्छा एक काठ का पट्टा बाहर रक्खो और उस पर यह पानी की बाल्टी रख दो।’ बाबाजी ने जैसा कहा वैसा ही किया गया। बाबाजी ने अपनी चद्दर, जो ओढ़ रखी थी, वह भी उतार दी और एक कौपीन तथा उस पर एक तौलिया ही रक्खा और स्वयं दूर खड़े हो गये तथा सबको कह दिया कि उस बाल्टी को एक दफे फिर अपनी आँखों से देख लो। सबने वैसा ही किया। बाबाजी ने एक आदमी से कहा कि “तुम इस पट्टे पर बाल्टी के पास बैठ कर ओम् का जप करते रहो। फिर बाबाजी उस बाल्टी के पास गये और उसमें से कटोरी पानी की भरी और सबको वह पानी दिया गया। सबने कहा, यह तो पानी ही है। फिर बाबाजी श्री गोपाल जी की मूर्ति के पास जा बैठे और वह बाल्टी अपने पास मँगा ली। बाल्टी गमछे से ढ़क दी गई और एक लाल फूल, जो गोपाल जी की मूर्ति पर चढ़ा हुआ था, अपने हाथ से बाल्टी में डाल दिया। उसे पश्चात् जब गमछा हटाया गया, तब एकदम सफेद दूध देखने में आया। सबको एक-एक कटोरी दूध दिया गया। शेष दूध बिरला-हाउस पहुँचाया गया, जो अनुमानतः ढाई सेर था। वह दूध गरम करके जमाया गया और दूसरे दिन उसमें से मक्खन निकाल गया।

बाबाजी को ऐसी ही अनेक सिद्धियों का हाल गोस्वामी गणेशदत्त जी सुनाया करते हैं; परन्तु यहाँ पर तो संक्षेप में इतना ही उल्लेख किया गया है। इन कुछ आश्चर्यजनक बातों को देखकर मन में आया कि विज्ञानवेत्ताओं से विनयपूर्वक निवेदन करूं कि आर्य-ऋषियों और मुनियों द्वारा सम्मानित पातञ्जल-योगदर्शन के सूत्र ‘जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः’ में एक मन्त्रसिद्धि भी मानी गई है। मन्त्रसिद्धि का चमत्कार देखने का अब तक मुझे कोई अवसर नहीं मिला था, परन्तु ये कुछ चमत्कार अपनी आँखों से देखकर मुझे मन्त्रसिद्धि में पूर्णतया विश्वास हो गया है। साथ ही एक प्रकार का विस्मय भी उत्पन्न हो गया है। उसी विस्मय के कारण आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं से यह निवेदन करने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई है कि आप पातञ्जल-योगदर्शन के उपर्युक्त मन्त्र में वर्णित मन्त्रसिद्धि को मानते हैं या नहीं? और यदि नहीं मानते हैं तो या तो आय भी ऐसे ही चमत्कार अपने विज्ञान द्वारा करके दिखायें और यदि आप दिखाने में समर्थ नहीं हैं तो आप अपने अभिमान को त्याग कर भारतीय आर्य शास्त्रों में बताई गई मन्त्रसिद्धि को सहर्ष स्वीकार कर लें, क्योंकि आप तो अपने को बराबर ही सत्य का पुजारी घोषित करते रहते हैं।


मानसिक बल और उसका विकास

(श्री भगवान सहाय वाशिष्ठ)

पूर्ण परिश्रम से कार्य करने वाले व्यक्ति को देखकर साधारण मनुष्य यह सोचते हैं कि इसका शरीर कितना फुर्तीला है एवं कार्य करने में इसके अमुक अंग किस तरह लगे हुए हैं। किन्तु यह सच्चा निर्णय नहीं हुआ। मनुष्य की वास्तविक शक्ति वह नहीं है जो आँखों से दिखाई दे। मनुष्य की मुख्य शक्ति है बुद्धिबल एवं मानसिक बल जो फिर स्थूल रूप में चक्षुओं द्वारा देखी जाती है।

किसी कार्य को करने में एक हाथ लगा रहता है किन्तु हाथ की स्वयं की कोई शक्ति नहीं है। वह हाथ बुद्धि एवं मानसिक बल से सम्बन्धित होता है और कार्य में व्यस्त रहता है। उक्त दोनों शक्तियों के अभाव में शरीर एवं अन्य वस्तुओं को अणुमात्र भी नहीं हिलाया जा सकता। इन दोनों शक्तियों के सामंजस्य से ही पूर्ण पुरुष का निर्माण होता है। बुद्धि किसी निश्चित लक्ष्य की ओर जाने का सही निर्णय करती है फिर मानसिक बल स्थूल अंगों से एकता प्राप्त कर उसे पूर्ण करता है।

इसके तत्व को समझना अत्यावश्यक है। तब ही मानसिक शक्ति की महत्ता को समझकर इसके विकास का मार्ग अपनाया जा सकता है। किसी भी कार्य के पूर्ण होने में साधारणतया दो स्थितियाँ होती हैं। प्रथम उसके सम्बन्ध में विचार करके उसका निर्णय करना कि हमें अमुक कार्य करना है। यह कार्य बुद्धि का है। बुद्धि अपनी विचार शक्ति से किसी कार्य का निर्णय करती है। फिर उस निर्णय का या विचार को क्रियात्मक रूप देने के लिए मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है।

मानसिक बल उस कार्य को सम्पन्न करता है और इस प्रकार सफलता या सिद्धि उपलब्ध होती है। बुद्धिमान मनुष्य वही है जो पहले अपनी बुद्धि से किसी कार्य का निर्णय करे और फिर उसे पूर्ण करने में मानसिक बल का उपयोग करे। केवल विचारों में बहते रहने वाले व्यक्ति जीवन में सफल नहीं होते। इसी तरह बिना बुद्धि का उपयोग किये जो कुछ सामने आ जाय उसी में अन्धे बनकर लग जाएं वे पशुवत् ही हैं। अन्त में अपनी प्रकृति प्रदत्त शक्ति को यों ही छिन्न भिन्न करके असफल होते हैं। अतः किसी कार्य की सफलता के लिए बुद्धिबल और मानसिक बल की आवश्यकता है। अच्छे-अच्छे विचारकों एवं कवियों में मानसिक बल भी हो तो वे बहुत कुछ सुधारात्मक एवं परिवर्तनकारी कार्य कर सकते हैं। केवल विचार ही विचार से कुछ नहीं होता प्रधानता तो कार्य की है।

अन्य कार्यों की तरह स्वास्थ्य सुधार एवं चिकित्सा में भी मानसिक बल का महत्वपूर्ण स्थान है। स्वास्थ्य रक्षा के लिये भिन्न-भिन्न साधनों को ढूँढ़ना बुद्धि का काम है और उन्हें उपयोग में लाने का कार्य मानसिक शक्ति का है। कार्य की सफलता तक दोनों क्रम ठीक चलते रहें तो सफलता अवश्य मिलती है।

मनुष्य में मानसिक बल एक महत्वपूर्ण शक्ति है। मानव जीवन में होने वाला सारा खेल इसी शक्ति का पसारा है। जिस व्यक्ति में मानसिक बल जितनी बड़ी मात्रा में होता है वह उतना ही कार्यशील एवं दक्ष होता है। भले ही बुद्धि बल की कमी या वातावरणवश या संस्कार के प्रभाव से वह अच्छे या बुरे कार्य में प्रवृत्त हो किन्तु वह उसमें तेजी से बढ़ता जायगा।

मानसिक शक्ति तत्त्वरूप से स्वभाव रूप से सभी व्यक्तियों में स्थित होती है। लोगों की यह धारणा गलत है कि प्रकृति जिसको बलवान या सम्पन्न अथवा हीन बनाती है उसे जन्म से ही उस तरह का उत्पन्न करती है। साथ ही इस तर्क में सबसे बड़ी गलती यह है कि मनुष्य या तो आखिरी अथवा आगे अर्थात् दोनों सिरों को ही प्रधानता देते हैं मध्यम मार्ग का अनुसरण नहीं करते जिससे हीन को सम्पन्न बनाया जा सके। कमी को पूरा किया जा सकता है। क्योंकि तत्व रूप से तो मानसिक बलहीन एवं महान् दोनों व्यक्ति में एक स्वभाव से स्थित हैं। केवल कर्मक्षेत्र की वजह से एक व्यक्ति महान् बन जाता है और एक दीन-हीन यहाँ तक कि अपना शरीर निर्वाह नहीं कर सकता।

निर्बलता को अथवा हीनता को दूर करने के लिए व्यक्ति पहले अपनी वर्तमान स्थिति पर विचार करे और कहाँ तक पहुँचना है इसका निर्णय करे। इसके लिए सर्वप्रथम एक छोटा सा लक्ष्य निश्चित करना चाहिए। जिस तरह मैट्रिक पास करने के लिए पहली, दूसरी, क्रमशः दस कक्षाओं को पास करना पड़ता है, उसी तरह छोटे-छोटे लक्ष्य निर्णय करना चाहिए। उस छोटे से लक्ष्य पर अपने चित्त को केन्द्रित करके सफलता के लिए प्रयत्न करना चाहिए। जब वह लक्ष्य पूरा हो जाय तो अपने उसी पथ पर दूसरा लक्ष्य निर्धारित कर उसके लिए भी इसी तरह प्रयत्न करना चाहिए। इस तरह ज्यों-ज्यों सफलता मिलती जाय अभ्यास करने वाले व्यक्ति को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाना चाहिए।

मानसिक बल का सम्पादन करने अथवा विकसित करने के लिए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पहले पहल बड़े कार्य को लक्ष्य बनाकर उससे नहीं उलझना चाहिए। क्योंकि शक्ति के अल्प होने के कारण बड़े कार्य में सफलता नहीं मिलती और प्रारम्भ में ही निराशा प्राप्त होती है। मानसिक बल बढ़ना तो दूर रहा उल्टा हताश होना पड़ेगा। अतः सर्वप्रथम सरल मार्ग का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। इस तरह से आखिरी मंजिल तक पहुँचा जा सकेगा।


Quotation

इच्छा को जीतकर शान्ति लाभ करना—सब जीवों पर दया करना यही सब धर्मों का मूल है।

—बुद्ध

धर्म की क्षति जिस अनुपात से होती है, उसी अनुपात से आडम्बर की वृद्धि होती है।

—प्रेमचंद


उज्ज्वल भविष्य का शुभ चिन्ह

अखण्ड ज्योति के गत अंकों में व्रतधारी आन्दोलन की संक्षिप्त रूप रेखा पाठकों को समझाने का प्रयत्न किया गया है। प्रसन्नता की बात है कि युग निर्माण की इस योजना का सर्वत्र हार्दिक स्वागत किया गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार प्रगतिशील धर्मसेवी सत्पुरुषों का संगठन है। इस पत्रिका को पढ़कर वे पढ़ने का शौक मात्र पूरा नहीं करते पर स्वाध्याय द्वारा आत्म-निर्माण करके और जीवन को सफल बनाने वाला रास्ता ढूंढ़ने का प्रयत्न करते हैं। इस परिवार के प्रत्येक सदस्य के अन्तःकरण में यह तथ्य भली प्रकार भर चुका है कि भगवान का अनुग्रह प्राप्त करने,स्वर्गीय शान्ति का रसास्वादन करने, जीवन मुक्ति का आनन्द लेने, आत्मा को परमात्मा में लीन करने जैसे आध्यात्मिक लक्ष को प्राप्त करने के लिए केवल जप, ध्यान, पूजा, उपवास, हवन आदि ही पर्याप्त नहीं हैं वरन् यह भी आवश्यक है कि अपना जीवन सद्विचारों एवं सत्कार्यों से परिपूर्ण बनाया जाय और उसमें लोक-सेवा का समुचित स्थान रहे।

जिसके जीवन का दृष्टिकोण व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति ही है वह निश्चय ही बहुत घटिया एवं तुच्छ व्यक्ति है। संसार में असंख्यों व्यक्ति ऐसे भरे पड़े हैं जिनका मस्तिष्क खुदगर्जी के विचारों से ही भरा रहता है। वे खुदगर्जी के अतिरिक्त दूसरी बात सोच ही नहीं सकते है। उनके कार्यों में स्वार्थ ही स्वार्थ भरा रहता है। उन्हें परमार्थ की-लोकहित की-जन-सेवा की कोई उपयोगिता एवं आवश्यकता समझ में नहीं आती। इसे वे व्यर्थ की बात मानते हैं। जिस कार्य से स्वार्थ सिद्ध न हो वह कार्य उनकी दृष्टि में मूर्खतापूर्ण प्रतीत होता है। ऐसे स्वार्थी लोग अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए बुरे से बुरे कार्य करने में संकोच नहीं करते। ऐसे लोगों की कमी अध्यात्म क्षेत्र में भी नहीं है। अपने आपको धर्मात्मा समझने और कहलाने वाले भी अनेकों व्यक्ति ऐसी ही खुदगर्जी में डुचे देखे जाते हैं। मुझे स्वर्ग, मुक्ति , ऋद्धि-सिद्धि, देव कृपा एवं वरदान प्राप्त हों और उन्हें उपलब्ध करके मैं स्वयं इस लोक या परलोक में खूब मौज मजा करूं इतना ही उनका दृष्टिकोण होता है। जिस प्रकार धन कमाने की तृष्णा में व्यक्ति दिन रात उपार्जन के गोरखधन्धे में लगा रहता है, उसी प्रकार यह आध्यात्मिक या धर्मात्मा कहलाने वाले व्यक्ति भी कुछ जप तप करते हैं तो उसके मूल में उनकी व्यक्तिगत स्वार्थपरता की दृष्टि में एक समान है। अन्तर केवल कार्यक्रम और योजना भर का है लक्ष दोनों के एक है। एक बम्बई के ताजमहल होटल में, कश्मीर में फ्राँस में जाकर मौज मजा करना चाहता है दूसरा स्वर्ग और बहिश्त में रंग रेलियाँ करने के सपने देखता है। आज अध्यात्म क्षेत्र में भी अधिकाँश जप-तप करने वाले स्वार्थी कामनाओं और वासनाओं के लिए ही लालायित रहते हैं। जप-तप को तो उन वासनाओं की पूर्ति का एक उपाय मात्र मान कर चलते हैं। यदि उस कामना की पूर्ति में बाधा या विलम्ब दिखता है तो साधना को छोड़ ही नहीं देते वरन् उसे व्यर्थ बताकर कुपित भी होते हैं।

प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के धर्म-प्रेमी परिजन इस घटिया श्रेणी के नहीं हैं, इतने वर्षों तक उच्चकोटि के तत्वज्ञान की पत्रिका के पृष्ठों का अध्ययन किया है, फलस्वरूप उनकी यह मान्यता सुदृढ़ हो चुकी है कि परमात्मा का सच्चा अनुग्रह प्राप्त करने के दो प्रधान माध्यता का साधना और सेवा का समन्वय होना आवश्यक है। साधना से सेवा का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। इन दोनों में से एक को छोड़ दिया जाय तो लक्ष की ओर प्रगति नहीं हो सकती। बिजली की धारा बहाने के लिए दो तारों की आवश्यकता होती है, यदि टूट जाय तो वह विद्युत प्रवाह रुक जायगा। ईश्वरीय कृपा की विद्युत धारा अन्तःकरण में अवतीर्ण करने के लिए साधना और सेवा के दोनों ही तार आवश्यक हैं। एक के अभाव में प्रगति रुक जायगी। केवल साधना करने वाले व्यक्ति अपनी स्वार्थपरता के कारण ईश्वर की दृष्टि में ओछे और खुदगर्ज जाँचेंगे। ऐसे लोग चाहे कितनी ही मिन्नतें करें, कितना ही गिड़गिड़ायें, स्तोत्र प्रार्थना करें उस अन्तर्यामी की दृष्टि में भिक्षुक और स्वार्थी ही जाँचेंगे, उन्हें कभी भी प्रभु का सच्चा प्यार प्राप्त नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो केवल सेवा कार्यक्रमों में लगे हैं, उनकी आत्मा में यदि ईश्वरीय श्रद्धा नहीं है तो उनके सेवा में साँसारिकता ही प्रधान रहेगी। आजकल जिस प्रकार अनेकों राजनैतिक पार्टियों एवं सामाजिक संस्थाओं के कार्य कर्त्ताओं तथा नेताओं में जो स्वार्थ संघर्ष देखा जाता है, उससे स्पष्ट है कि उनकी सेवा केवल बाह्य स्तर पर अवलंबित है, यदि उन्होंने आध्यात्मिक एवं धार्मिक स्तर पर यह सेवा लक्ष अपनाया होता तो यह खेदजनक बातें उनके चरित्र में दृष्टिगोचर न होतीं, जिनके कारण उनका सारा सेवा कार्य एक प्रकार से व्यर्थ ही सिद्ध हो रहा है।

अखण्ड-ज्योति परिवार का लक्ष एवं दृष्टिकोण बहुत ही स्पष्ट एवं स्वच्छ है। उसका प्रत्येक सदस्य यह अनुभव करता है कि सेवा को जीवन में समुचित स्थान दिये बिना आध्यात्मिक लक्ष कदापि पूर्ण नहीं हो सकता। जप-तप की अनिवार्य आवश्यकता को वह भली प्रकार अनुभव करता है पर साथ ही यह भी जानता है कि यदि जनसेवा की उपेक्षा की गई तो ईश्वर को प्रसन्न कर सकना और अपने अन्तःकरण को देव भूमिका में विकसित कर सकना कदापि संभव नहीं। अध्यात्म का तात्पर्य ही “सब प्राणियों में अपनी आत्मा को और अपनी आत्मा को सब प्राणियों में देखना” है। जहाँ यह दृष्टि होगी, वहाँ सेवा करने की वृत्ति अनिवार्य रूप से विकसित होगी। दान और दया इन दो गुणों को अध्यात्म का प्रधान चिन्ह माना गया है। दया के कारण दूसरों के कष्टों को देखकर जो वेदना उत्पन्न होती है उसका प्राकट्य दान के रूप में होता है। भौतिक वस्तुओं के अभाव में दुःख पाने वाले लोगों को अन्न, जल, वस्त्र औषधि तथा शारीरिक सेवा करके उनकी सहायता की जाती है यह दान का स्थूल रूप है। सद्ज्ञान और सदाचार के अभाव में ही संसार के अधिकाँश दुःख हैं। इन अज्ञान और पाप की पीड़ा से कराहते हुए दीन दुखियों का कष्ट दूर करने के लिए अन्न, जल, औषधि से काम नहीं चल सकता। इनका दुःख मिटाने के लिए उस सद्ज्ञान की आवश्यकता है जिससे जीवन क्रम में सतोगुण की वृद्धि हो और स्थायी सुख-शान्ति का मार्ग प्रशस्त हो। अध्यात्मवादी व्यक्ति अपनी साधना करते हैं साथ ही सद्ज्ञान का सदावर्त भी बाँटते हैं। दया उनकी अन्तरात्मा में से छलकती है फलस्वरूप वे दान करने के लिए विवश हो जाते हैं। दानों में ज्ञान दान सब से श्रेष्ठ माना गया है। इस महादान का संयोजन-ब्राह्मण-इसी दृष्टि से लोक पूज्य माना जाता है। ब्राह्मणत्व का अनिवार्य कर्तव्य ज्ञान दान है। दान की महत्ता से हिन्दू धर्म-ग्रन्थों का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है । पर खेद की बात है कि हमारे अन्य अनेक आदर्शों के रूढ़िमात्र बढ़ जाने के कारण जिस प्रकार दुर्गति हो रही है उसी प्रकार दान तत्व का भारी दुरुपयोग हुआ। जब मानस से निकली हुई धर्म श्रद्धा की निर्झरिणी कुपात्रों-चंद स्वार्थी व्यसनी और पाखण्डियों के ऐश आराम का निमित्त मात्र बन कर रह जाती है तो अध्यात्म की आत्मा रो पड़ती है। जिस पुनीत जलधारा से सिंचित होकर धर्म उद्यान को लहलहाते हुए नन्दन वन की तुलना में विकसित होना चाहिए था वह धारा गंदे दलदलों में कीचड़ बढ़ाने और उत्पन्न करने का निमित्त बनती है तो किसी भी सहृदय का दुःखी होना स्वाभाविक है। आज दान तत्व की ऐसी ही दुर्गति हो रही है। लोग दान-पुण्य खूब करते हैं पर पात्र कुपात्र का—कार्य अकार्य का विचार किये बिना उसका उद्देश्य ही विकृत हो जाता है।

अखण्ड-ज्योति परिवार विचारशील, विवेकवान एवं दूरदर्शी लोगों का संगठन है। उसमें श्रद्धा कूट-कूट कर भरी गई है। साथ ही विवेक का पुट भी समुचित मात्रा में मौजूद है। इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि जब कभी कोई सुव्यवस्थित आध्यात्मिक आयोजन सम्मिलित रूप में किया जाय तो उसका सब स्वजन समुचित स्वागत करें। परिजनों की विचारधारा एक निर्धारित लक्ष की ओर नियमित गतिविधि से प्रवाहित होती है। इसलिए हम सब का कदम-कदम मिल कर चलना सहज ही हो जाता है। इस लम्बी अवधि में इस परिवार के सदस्यों ने अपने व्यक्ति गत जीवनों में भारी परिवर्तन किया है। जिनके फोटो एवं भाषण छपते हैं ऐसे नेता भले ही हम में से न बनें हो पर उज्ज्वल चरित्र आदर्शवाद, सेवा भावना एवं सच्ची ईश्वर परायणता की दृष्टि से अत्यन्त उच्चकोटि के हजारों महापुरुषों का निर्माण हुआ है। यदि कभी इस संस्था के आदर्शवादी एवं धर्मपरायणता लोगों का इतिहास लिखने का अवसर आया—जैसी कि निकट भविष्य में सम्भावना भी है—तो सारा संसार देखेगा कि आदर्शवादी परम्परा को कायम करने में इस संस्था के परिजन कितने अग्रगामी रहे हैं।

प्रशंसा और विज्ञापन से बचकर ठोस धर्मसेवा करने में आस्था रखने वाले अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य विगत बीस वर्षों में जो कार्य कर चुके हैं उसके लिए भारत माना गर्व अनुभव कर सकती हैं। हमारे यह अग्रगामी कदम मंद होने वाले नहीं हैं। अब तक अथक गति से हम सब आगे बढ़ते रहे हैं। यह प्रगति मन्द नहीं होगी। आगे और भी दूने उत्साह से हम आगे बढ़ेंगे। इस भारत भूमि को प्राचीन काल जैसी ऋषि भूमि बना देने का—इस देश में देव पुरुषों का बाहुल्य कर देने का—नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का जो लक्ष्य निर्धारित किया है, वह अधूरा नहीं रहने दिया जायगा। वह पूरा होने जा रहा है, पूरा होकर रहेगा। श्रेष्ठ पुरुषों की यह विशेषता प्रसिद्ध है कि वे या तो कोई कदम उठाते नहीं, यदि उठाते हैं तो मंजिल पर पहुँच कर रहते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार ने जिस युग निर्माण के लिए संकल्प किया है वह उसे अधूरा नहीं छोड़ सकता।

व्रतधारी आन्दोलन की रूप-रेखा सामने आने पर अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्यों ने बड़ा हर्ष और उत्साह प्रकट किया है क्योंकि इस योजना से अपने अभीप्सित कई लक्ष एक साथ पूरे होते है। आत्म-कल्याण, आध्यात्मिक उन्नति, जीवन मुक्ति का लक्ष इससे पूरा होता है क्योंकि सर्वश्रेष्ठ उपासना ‘गायत्री’ का आश्रय लेने से आत्मा पर चढ़े हुए कलुष कल्मष छूटते हैं, पवित्र आत्मा ईश्वरीय प्रकाश का आविर्भाव तुरन्त होता है और परमात्मा की समीपता का मार्ग अति सरल हो जाता है। व्रतधारी आन्दोलन में भाग लेने वाले प्रत्येक परिजन के लिए गायत्री उपासना अनिवार्य है। इस संकल्प में सम्मिलित होने से उपासना की ढील-ढाल दूर हो जाती है। नियमित उपासना का कर्तव्य कंधे पर आ जाने से उसी प्रकार तत्परता होती है जैसे परीक्षा का लक्ष रखने वाले विद्यार्थी को पढ़ने का रंग चढ़ा रहता है। व्रतधारी का संकल्प एक प्रकार से परिक्षा फार्म भर देने के समान है जिसकी प्रेरणा से उसे उपासना करना आवश्यक हो जाता है। आत्मबल बढ़ने, अनन्त सुख-शान्ति का द्वार खोलने एवं जीवन का लक्ष्यवेध करने के लिए व्रतधारी का प्रथम संकल्प बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। साधना में प्रेरणा देने का यह अत्यन्त ही सरल एवं प्रभावशाली मार्ग है।

अज्ञान और पाप से पीड़ित मानव प्राणियों के प्रति सच्ची दया भावना चरितार्थ करके उन्हें सद्ज्ञान दान करने की जो प्रक्रिया व्रतधारी आन्दोलन के साथ जुड़ी हुई है। किसी को सन्मार्ग की ओर प्रेरणा देने से बढ़कर और कोई उपकार नहीं हो सकता। समय का दान सबसे बड़ा दान है। धन दान तो उपेक्षा पूर्वक भी किया जा सकता है, जिसके पास बहुत धन है वह किसी काम में अधिक पैसा भी दे सकता है। पर समय सबके पास समान है—वह उतना ही दिया जा सकता है जितनी सच्ची श्रद्धा मन में हो। श्रद्धा के अभाव से समय दान नहीं बन पड़ता। सद्ज्ञान प्रसार और धर्म फेरी के लिए समय दान की जो शर्त व्रतधारी के लिए रखी गई है उसके पीछे सच्ची सेवा का-सच्चे दान का तत्वज्ञान छिपा हुआ है। इसी धर्म-सेवा से कोई साधक ईश्वर को प्रसन्न कर सकता है और अक्षय पुण्य का भागी बन सकता है। धन का दान तुच्छ है क्योंकि वह तुच्छ संयोग से भी कमाया जा सकता है और भार भूत अनावश्यक धन को कोई किसी पर प्रचुर मात्रा में उड़ेल भी सकता है, वह अनीति उपार्जित भी हो सकता है पर समय के बारे में यह एक भी बात लागू नहीं होती। समय तो कोई व्यक्ति तभी दान करेगा जब उसमें पूरी निष्ठा होगी। निष्ठा पूर्वक सद्ज्ञान प्रसार के लिए समय दान करना यह त्रिविध संयोग पुण्य की महान् त्रिवेणी है। जिसमें स्नान करने वाला साधक पीढ़ियों समेत तर ताना है।

आत्म-कल्याण के दोनों ही साधन उपासना और सेवा का व्रतधारी आँदोलन में पूरा समन्वय एवं सम्मिश्रण है। युग निर्माण की जो महान् सम्भावना इस आन्दोलन में सन्निहित है उसे समय की सबसे बड़ी पुकार कहा जा सकता है। नैतिक बुराइयों दुष्प्रवृत्तियों और कुरीतियों से आज का वातावरण ऐसा गंदा और विषाक्त हो रहा है कि उसमें साँस लेते हुए दम घुटता है। यदि इस वातावरण को बदला न गया तो हमारा भविष्य सब प्रकार अन्धकारमय ही बनेगा। जागृत धर्मात्माओं पर इसकी जिम्मेदारी है कि जन-समाज को कुमार्ग पर जाने से रोके और सन्मार्ग की प्रेरणा दें। श्रेष्ठ पुरुषों के सत्प्रयत्नों से आगे भी युग बदले हैं, अब भी बदल सकते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार का शक्ति शाली संगठन यदि तन्मयता और तत्परता पूर्वक युग निर्माण संकल्प को पूरा करने खड़ा होता है तो आज जो अनैतिकता की काली घटाएँ चारों ओर गरजती दिखाई पड़ती हैं वे फट सकती हैं, हट सकती हैं। भारतीय संस्कृति की प्रखरता का पुण्य प्रभाव हम पुनः ला सकते हैं, वह लाने के लिए ही व्रतधारी आन्दोलन है।

अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों ने इस आँदोलन की महत्ता को समझा और स्वीकार किया है यह हमारे शुभ भविष्य का चिन्ह है। परिजन इस योजना को सफल बनाने के लिए जिस उत्साह और निष्ठा के साथ अग्रसर हो रहे हैं, उसे देखते हुए यह विश्वास दिन-दिन दृढ़ होता जाता है कि भारत भूमि में धार्मिक चेतना की जो महान् परम्परा अनादि काल से चलती आ रही है वह मूर्च्छित भले ही हो गई हो मरी नहीं है अब वह मूर्छा भी समाप्त होने जा रही है। नव-चेतना का—धर्म जागृति का—संयम और सदाचार का- नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का स्वर्ण बिहान अब बिल्कुल निकट है। परिवार के परिजनों का उत्साह उसी उज्ज्वल भविष्य का शुभ शकुन है।


Quotation

उत्तम शिष्टाचार अच्छे मन का आभूषण है। कोई भी बिना इस भूषण के सचमुच महान नहीं हो सकता है।

—ए वी.एलकट

आत्म सम्मान, आत्म-ज्ञान, आत्म-संयम ये तीनों पूर्ण शक्ति को प्राप्त कराते है। मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट विजय वह है जो अपने आप पर प्राप्त करता है।

—अर्ज स्टर्लिंग

*समाप्त*