सब का हो कल्याण, सुखी हों सभी निरोगी हों। पर-सेवा-रत रहें सतत, सद्गुणी सु-योगी हों॥ हमारे पथ ज्योतिर्मय हों! भावनाएँ मंगलमय हों!!
सुख में, दुख में लाभ-हानि में रहें एक से हम। जियें और जीने दें सबको बन समदर्शी हम॥ सदा निष्काम-कर्म रत हों! भावनायें मंगलमय हों!!
काँटों की डाली पर पलकर हँसते सदा रहें। बिखरोयें सौरभ भू पर, नित आतप सदा सहें॥ सुमन से सभी सुमनमय हों! भावनाएँ मंगलमय हों!!
कष्ट और आपत्ति सफलता के सोपान बनें। करें विश्व-हितपान हलाहल शिव-भगवान बनें॥ दिव्य यह प्राण प्राणमय हों! भावनाएँ मंगलमय हों!!
—श्री रामस्वरूप खरे
मानव जीवन की विशेषता उसके आध्यात्मिक विकास में निहित है। आध्यात्मिक विकास से शून्य मानवता पशुता की ओर अग्रसर हो जाती है। ठीक इसी तरह आध्यात्मिक विकास से मानवता देवत्व की ओर विकसित होने लगती है। इस आध्यात्मिक विकास के प्रमुख दो उपाय हैं। (1) तप और (2) त्याग। अभ्यास से तप और वैराग्य से त्याग की वृद्धि होती है।
तपः—तप और नैतिकता का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। नैतिकता तप का पाठ सिखाती है। सभी धर्मों ने तप को स्वीकार किया है क्योंकि इसी से आगे जाकर त्याग की वृत्ति पैदा होती है। बुरी वासनाओं एवं इच्छाओं से अपने आपको रोकना तप कहलाता है। बौद्ध धर्म ने भी पंचशील के सिद्धाँत में झूठ न बोलना, चोरी न करना, निन्दा न करना, व्यभिचार न करना और हिंसा न करना आदि को प्रतिपादित किया है इसी तरह साँख्य शास्त्र में मन को विषयों से खींचना आत्मज्ञान के लिए आवश्यक बताया है। योग की तो जड़ तप ही है। यम और नियम योगी को तप में लगाते हैं। अतः आध्यात्मिक विकास में तप सर्वप्रथम आवश्यक आधार है। इसी से फिर आगे जाकर त्याग भावना का उदय होता है।
मनुष्य को जीभ और कामेन्द्रिय का नियंत्रण करना आवश्यक है। इससे मानसिक शक्तियों का विकास होने लगता है और स्वयं में एक विशेष शक्ति का अनुभव होने लगता है। इन दोनों से मनुष्य की शक्ति का क्षय बहुत बड़ी मात्रा में होता है। इतना ही नहीं, ये उसे पतन की ओर घसीट ले जाते हैं। मनुष्य ज्यों−ही इनका सदुपयोग करने लगता है उसमें उच्चकोटि की वासनाओं का उदय होता है जो उसे कल्याण एवं शाँति की ओर ले जाती हैं। मानसिक शक्तियाँ बढ़ने लगती हैं और वह व्यक्ति न केवल अपने लिए वरन् समाज के लिए बहुत ही हितकर सिद्ध होता है।
इस तरह तप से मनुष्य की मानसिक शक्ति बढ़ती है। इच्छाओं को रोकने से एक विशेष शक्ति का उदय होता है। वह शक्ति फिर उसमें सब कुछ करने का पुरुषार्थ जागृत करती है। समाज सेवा एवं सामाजिक परिवर्तन आदि के लिए तप से उत्पन्न मानसिक शक्ति की परमावश्यकता है। मानसिक शक्ति प्रबल तप से उत्पन्न होती है। तुच्छ वासनाओं पर नियन्त्रण करने से उच्च वासनायें पैदा होती हैं। तुच्छ वासनाएं केवल स्वयं को क्षणिक-भौतिक सुख प्रदान करती हैं किन्तु उच्च वासनाओं के जो भी व्यक्ति संपर्क में आता हैं उसे भी आनन्द प्राप्त होता है। आत्मसन्तोष, शक्ति , प्रफुल्लता, आदि जीवन को अमृत सागर में सराबोर कर देता है। आगे जाकर तो सभी वासनाओं का पूर्ण त्याग कर देना पड़ता है।
अपना सच्चा एवं कल्याणकारी ध्येय निश्चित करके उसके लिए तप (अभ्यास) करना श्रेष्ठ होता है। जब तप का ध्येय आत्मशक्ति एवं ज्ञान प्राप्ति हो तो मनुष्य को पूर्ण शाँति प्राप्त ही होती है। ब्रह्मज्ञान से आत्म कल्याण की मंजिल तय की जाती है किन्तु इसके लिए त्याग का भी त्याग आवश्यक है। अहंकार को त्याग करने पर ही मनुष्य उच्च स्थिति तक पहुँचता है।
ज्ञान पिपासु को, आत्मकल्याण चाहने वाले को तप में अति नहीं करनी चाहिए। उग्र तप से मनुष्य में अहंकार उत्पन्न होता है। इससे अभिमान का उदय होता है जो उसे पुनः पतन के गहरे गड्ढे में ढकेल देता है। मध्यम श्रेणी का तप ही हितकारी होता है। महात्मा बुद्ध भी जब तक उग्र तप में लगे रहे उद्देश्य की पूर्ति नहीं हुई किन्तु ज्यों−ही मध्यम मार्ग का अनुसरण किया तो थोड़े समय बाद तत्व-ज्ञान हो गया। अतः मुमुक्षुओं, समाज सेवियों, विकास की इच्छा रखने वालों को मध्यम मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
सेवा कार्य में लगना भी एक प्रकार का उच्च श्रेणी का तप है। परमार्थ या सेवा कार्य में लगने से सहज तप स्वतः हो जाता है। आज के युग में सेवा तप बहुत ही महत्व पूर्ण एवं आवश्यक है। यह एक युग की सर्वोपरि आवश्यकता है। इसके कई उदाहरण हमारा मार्ग प्रदर्शन करते हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य, रामतीर्थ, विवेकानन्द, ऋषि दयानन्द ने अपनी योग साधना का विचार छोड़कर समाज सेवा का मार्ग अपनाया। विवेकानंदजी से श्री रामकृष्ण परमहंस ने यही कहा “कि ब्रह्मानन्द की कुँजी मेरे पास है समाज सेवा एवं धर्म प्रसार के लिए तैयार हो जाओ” इसी एक आज्ञा से नरेन्द्रदेव विवेकानन्द बन गये और भारतीय धर्म को जागृत किया। इसी तरह शंकराचार्य, गौतमबुद्ध, ईसा, राम, व कृष्ण, आदि-आदि महापुरुषों ने समाज-सेवा से संसार को कल्याण की ओर मोड़ने में जीवन भर लगा दिया। इसके लिये उन्होंने कितना तप किया। राणाप्रताप, शिवाजी गुरु गोविंद सिंह आदि ने भी यही मार्ग अपनाया। जो व्यक्ति दूसरों की सेवा में दत्तचित्त होकर लगे रहते हैं वे दुर्गुणों एवं बुरी वासनाओं से बच जाते हैं। गृहस्थ जीवन की सफलता भी तप पर ही निर्भर है। तपविहीन गृहस्थी नारकीय यंत्रणाओं का सामान जुटाकर स्वयं को दुःख एवं परेशानियों में डाल देता है।
तप से मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास होता है। अतः जीवन के प्रथम भाग में तप की प्रधानता आत्म-विकास, व्यक्तित्व निर्माण आदि के लिये एवं तत्त्वज्ञान प्राप्त कर निर्वाण प्राप्ति के लिए इसकी आवश्यकता होती है। क्योंकि बार-बार अभ्यास एवं प्रयत्न करने पर भी विषय-वासनाओं की ओर मन चला जाता है। अतः इसके लिये यह आवश्यक है कि मनुष्य को संसार की असारता, अनित्यता, दुःखरूपता का ज्ञान हो जाय। इससे उसमें उपरामता पैदा होकर विषय-वासनाओं से मन हट जाता है। संसार से सहज ही में सम्बन्ध टूट जाता है। फिर मन को विषयों से रोकने के लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता।
अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति के लिये संसार की अनित्यता, दुःखरूपता नश्वरता को समझ लेना आवश्यक होता है। जो मनुष्य स्वयं दुःखी एवं दीन रहता है वही संसार की ओर दौड़ता है। सुख की चाह में इस दुःख से बचने के लिये जो व्यक्ति इधर दौड़ता है वह उल्टा दुःख ही प्राप्त करता है। किन्तु जब बाह्य पदार्थों की दुःख रूपता का ज्ञान हो जाता है तो अन्तर्मुखी हो जाता है। उसकी समस्त बाह्य क्रियायें आत्मा में केन्द्रित हो जाती हैं। वही मन पूर्ण शक्ति से आत्म दर्शन के लिये दौड़ पड़ता है। अन्त में आत्मानन्द प्राप्त होता है। जीवन धन्य हो जाता है।
तप और त्याग इन दोनों से जीवन को विकास की ओर बढ़ाने के लिए अभ्यास की परमावश्यकता है। इन्द्रियों पर नियंत्रण करने के अभ्यास से ही बुरी वासनाओं से बचना सम्भव हो सकता है। साथ ही संसार की अनित्यता दुःख रूपता, नश्वरता, आदि का बार-बार मनन करने से चित्त प्रदेश में इसकी धारणा को पक्का करने के लिए नियमित साधना एवं अभ्यास की आवश्यकता है। अभ्यास के अभाव में न वासनाओं पर नियंत्रण हो सकता है, न तत्त्व ज्ञान की प्राप्ति हो सकती और बहिर्मुखी वृत्ति अंतर्मुख हो सकती है इन सबके लिए अभ्यास एवं ज्ञान सहित वैराग्य की धारणा परमावश्यक है। योगविज्ञान में भी इनकी ही प्रधानता है।
इस तरह उपरोक्त तप एवं त्याग के पथ पर अभ्यास करते हुये बढ़ने वाला मनुष्य पशुत्व एवं मनुष्यत्व को पार कर देवत्व की ओर अग्रसर होता है। तप और त्याग मानव विकास के महत्त्वपूर्ण अंग है। तप और त्याग से जीवन को महान बनाने वाला व्यक्ति न केवल स्वयं के लिए ही अपितु समग्र संसार के लिए लाभदायक होता है। उसकी इस महानता की शीतल छाया में संसार शाँति, सुरक्षा, कल्याण का अनुभव करता है। एक व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास समस्त मानव जगत का विकास है और एक व्यक्ति का आध्यात्मिक पतन न केवल उसका ही अपितु सारे मानव जगत का पतन है। अतः पतन के मार्ग को छोड़कर विकास के साधन तप एवं त्याग की ओर बढ़ना ही कल्याणकारी है। मानवता का सदुपयोग इसी में है। सौंदर्य है, सब कुछ है।
(महात्मा गाँधी)
“मैं जिम्मेदार हूँ” “यह मेरा फर्ज है” यह विचार मनुष्य को हिला देता है और अचम्भे में डाल देता है। गैबी आवाज की प्रतिध्वनि सदा हमारे कान में पड़ा करती है—“मानव यह काम तेरा है, तुझे खुद हारना या जीतना है। तुझ जैसा तू ही है, क्योंकि प्रकृति ने दो समान वस्तुएँ कहीं बनाई ही नहीं। जो फर्ज तुझको अदा करना है वह तूने अदा न किया तो दुनिया के सालाना चिट्ठे में घाटा रहा ही करेगा”।
यह फर्ज जो मुझे अदा करना है क्या है? कोई कहेगा कि :—
आदम को खुदा मत कहो आदम खुदा नहीं। लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं॥
और कहेगा कि इस पद्य के अनुसार मुझे यह मानकर कि मैं खुदा का नूर हूँ चुपचाप बैठे रहना चाहिये। दूसरा आदमी कहेगा कि मुझे अपने आस-पास के लोगों के साथ हमदर्दी दिखाना भाईचारा रखना चाहिये। तीसरा कहेगा कि माँ-बाप की सेवा, बीबी-बच्चों का भरण-पोषण और भाई-बहिन मित्रों के साथ उचित व्यवहार करना चाहिये। पर इन सभी गुणों में मैं खुद अपने प्रति भी उसी रीति से व्यवहार करूं, यह मेरे समस्त कर्त्तव्य का अंग है। जब तक मैं अपने आप को न पहचानूँ तब तक दूसरे को कैसे पहिचान सकूँगा? और जब तक पहचानूँगा नहीं तब तक उनका सम्मान कैसे कर सकूँगा? बहुतेरे यह मानने लगे हैं कि जिन बातों का दूसरों से सम्बन्ध होता हो उनमें तो हमें कायदे से व्यवहार करना चाहिये। पर जब तक हमारे कामों का दूसरों से सम्बन्ध न हो तब तक हम अपनी मर्जी के मुताबिक जैसे चाहें वैसे व्यवहार कर सकते हैं। जो आदमी ऐसा मानता हो वह बिना समझे बोलता है। दुनिया में रहकर कोई भी आदमी बिना अपनी हानि किये खुद मुख्त्यार या स्वच्छन्द होकर व्यवहार नहीं कर सकता।
अब हमने देखा कि हमारा फर्ज खुद हमारी अपनी तरफ क्या है। अव्वल तो हमारे एकान्त के आचरण की खबर खुद हमारे सिवा दूसरों को होती नहीं, ऐसे आचरण का असर दूसरों पर होता है, इसलिये हम जिम्मेदार होते हैं इतना ही सोचना काफी नहीं है। उसका असर दूसरों पर होता है, इसलिये भी हम उसके जवाब-देह हैं। हर आदमी को चाहिये कि अपने उत्साह को काबू में रक्खे। एक महान् पुरुष का कहना है कि किसी भी आदमी की खानगी चाल-चलन मुझको बता दो, मैं तुरन्त बता सकता हूँ कि वह आदमी कैसा होगा और है।
ऐसे ही कारणों से हमारे लिये उचित है कि अपनी इच्छाओं को लगाम देकर रखें। यानी हमें शराब नहीं पीना चाहिये, पेटू की तरह ठूँस-ठूँस कर नहीं खाना चाहिये, नहीं तो अन्त में शक्तिहीन होकर हमें अपनी आबरू गँवानी होगी। जो आदमी विषय मार्ग से दूर रह कर अपने शरीर, मन, बुद्धि और प्राण की रखवाली नहीं करता वह बाहर के कार्यों में सफलता नहीं पा सकता।
यों विचार करते हुए मनुष्य अपनी अन्तर-वृत्तियों को स्वच्छ रख कर सोचता है कि इन वृत्तियों का क्या उपयोग करूं। जीवन में कोई निश्चित उद्देश्य होना ही चाहिये। हम जीवन के कर्त्तव्यों की खोज करके उनके पालन की ओर मन का झुकाव न रखें तो हम बिना पतवार की नाव की तरह भरे दरिया में डूबते-उतराते रहेंगे। हमारा ऊँचे से ऊँचा कर्त्तव्य यह है कि हम मानव जाति की सेवा करें और उसकी स्थिति सुधारने के यत्न में योग दें। इसमें सच्ची ईश्वर स्तुति, सच्ची बंदगी आ जाती है। जो आदमी भगवान् का काम करता है वह भगवान् का जन है; खुदा का बंदा है। खुदा का नाम लेने वाले ढोंगी धूर्त बहुतेरे दुनिया में विचरा करते हैं। तोता भी राम-राम कहना सीख लेता है इससे उसे कोई राम का भक्त -सेवक नहीं कहता। मनुष्य जाति को यथा योग्य स्थिति प्राप्त कराने का उद्देश्य हर आदमी अपने सामने रख और उसका अनुसरण कर सकता है। वकील ऐसे उद्देश्य से वकालत कर सकता है व्यापारी व्यापार कर सकता है। जो आदमी इस व्रत का पालन करता है वह कभी नीति धर्म से डिगता नहीं। उससे विचलित होकर मानव जाति को ऊपर उठाने का उद्देश्य पूरा किया ही नहीं जा सकता।
अब हम ब्यौरेवार विचार करें। हमें सदा यह देखते रहना पड़ता है कि हमारा आचरण सुधार की ओर जा रहा है या बिगाड़ की ओर। बनिज-व्यापार करने वाला हर एक सौदा करते हुए इस बात का विचार करेगा कि मैं अपने आपको या दूसरे को ठग तो नहीं रहा हूँ। वकील और वैद्य ऊपर बताई हुई नीति का अनुसरण करते हुए मुवक्किल और रोगी के हिताहित को अधिक सोचेगा। माँ बच्चे का पालन करते हुए सदा यह डर मन में रखकर चलेगी कि कहीं झूठे स्नेह या अपने दूसरे स्वार्थ से वह बिगड़ न जाय। ऐसा विचार रखकर मजदूरी करने वाला मजदूर भी अपने कर्त्तव्य का ख्याल रखकर कार्य करेगा। इस सारे विवेचन का निचोड़ यह निकला कि मजदूर अगर नीति नियम का पालन करते हुए अपने कर्त्तव्य का पालन करे तो वह अपने आधार व्यवहार में अपने आप को खुद मुख्त्यार मानने वाले धनी, व्यापारी, वैद्य या वकील से श्रेष्ठ माना जायगा। मजदूर खरा सिक्का है और व्यापारी वकील आदि अधिक बुद्धि या अधिक पैसे वाले होते हुए भी खोटे सिक्के जैसे हैं। इस प्रकार हम फिर यह देख रहे हैं कि हर आदमी उपर्युक्त नियम निभाने में समर्थ है। चाहे वह किसी भी स्थिति में क्यों न हो मनुष्य का मूल्य उसके चरित्र, उसके चाल-चलन पर आश्रित होता है, उसके पद-दरजे पर नहीं। उसके चरित्र की परख उसके बाहर के कामों से नहीं होती, उसकी अंतःवृत्ति जानकर की जा सकती है। एक आदमी एक गरीब को अपनी नजर से दूर करने के लिये एक डालर देता है। दूसरा उस पर तरस खाकर, स्नेह से आधा डालर देता है। इनमें आधा डालर देने वाला नीतिमान है और पूरा डालर देने वाला पापी है।
इस सारे विवेचन का सार यह निकला कि जो आदमी स्वयं शुद्ध है, किसी से द्वेष नहीं करता, किसी से नाजायज फायदा नहीं उठाता, सदा पवित्र मन रखकर व्यवहार करता है, वही आदमी धार्मिक है वही सुखी है और वही पैसे वाला है। मानव जाति की सेवा उसी से बन सकती है। खुद दिया-सलाई में आग न हो तो दूसरी लकड़ी को कैसे सुलगायेगी। जो आदमी खुद नीति का पालन नहीं करता वह दूसरे को क्या सिखायेगा? जो खुद डूब रहा हो वह दूसरे को कैसे पार उतारेगा? नीति का आचरण करने वाला दुनिया की सेवा किस तरह करनी होगी यह सवाल कभी उठाता ही नहीं, क्योंकि उसके लिये यह सवाल पैदा ही नहीं होता। मैथ्यू अर्नाल्ड कहता है—”एक वक्त था जब मैं अपने मित्र के लिये स्वास्थ्य, विजय और कीर्ति चाहा करता था, अब मैं वैसी कामना नहीं करता। इसलिये कि मेरे मित्र का सुख दुःख उनके होने न होने पर अवलंबित नहीं। इससे अब मैं सदा यही मनाता हूँ कि उसकी नीति सर्वदा अचल रहे”। इमर्सन कहता है कि “भले आदमी का दुःख भी उसका सुख है और बुरे का तो पैसा, उसकी कीर्ति भी उसके और दुनिया के लिये दुःख रूप है।
(डॉ. चमनलाल गौतम)
उस सृष्टि निर्माता की सुन्दर कलाकृति सर्वत्र छिटक रही है। अणु से लेकर ब्रह्माण्ड तक में उसकी सुन्दर रचना निहित है। भगवद्भक्तों एवं योगियों को यही आन्तरिक सुन्दरता उन्हें परमानंद प्रदान करती है। मानव तो उसकी कलाकृति का सर्वोपरि नमूना है। मनुष्य जीवन में सुन्दरता एवं शोभा का भंडार भरा पड़ा है। यही नहीं इसका उद्देश्य भी पवित्र एवं महान् है। सर्वशक्तिमान ईश्वर की रचना पर ध्यान दें तो उसकी अद्भुत कलाकृति पर आश्चर्य चकित एवं मुग्ध हो जाना पड़ता है। मनुष्य की कारीगरी इसके समक्ष नगण्य सी है। भिन्न-2 अंगों की सुन्दरतापूर्ण रचना, उनका सन्तुलन, पृथक-2 क्रियाशीलता आदि कलाकार की मधुर कलाकारी के प्रतीक हैं।
हाथ का कार्य हाथ कर रहे हैं। ठीक उसी तरह कान, आँख, पैर, नाक, मुँह आदि अंग अपने पृथक्-पृथक् निर्दिष्ट कार्य करते रहते हैं। बुद्धि अपने कार्य में लीन हैं। शरीर के भीतरी अंग की सूक्ष्म निर्माण कला तो और भी महत्वपूर्ण है। इन सब पर विचार करते हुए हमारी जिज्ञासा होती है कि बुद्धि में जो प्रकाश है वह कहाँ से आया है? जिस प्रकाश को प्राप्त कर बुद्धि शरीर का एवं भिन्न-2 अंगों का संचालन एवं अनुशासन आदि करती है। यह प्रश्न हमें बहुत गहरे में उतार देता है। जिसके आस-पास योगी एवं भगवद्भक्त केन्द्रित होकर उस तत्व की जानकारी के लिए साधना करते रहते हैं।
इसका निर्णय करने के लिए हमें विशेष उलझनों में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। अपने साधारण अनुभव और जरा तीक्ष्ण बुद्धि से इसका निर्णय करना चाहिए। जो शक्ति समस्त ब्रह्माण्ड का संचालन करती है, वही पिण्ड का भी काम करती है। पिण्ड इस ब्रह्माँड की एक इकाई है। एक ही ईश्वरीय तत्व सर्वत्र एक रस व्याप्त होकर सब का संचालन एवं संरक्षण करता है। उसी प्रकाश से मानव बुद्धि प्रकाशित होती है और इस शरीर का संचालन करती है।
फिर भी क्या कारण है कि हम अपने को दीन, दुःखी विस्मृत सा खोया हुआ महसूस करते हैं? अधिकाँश का जीवन भारस्वरूप क्यों बना रहता है? उस महान् सत्ता का स्पर्श हम क्यों नहीं कर पाते? उस आनन्द के अखण्ड अमृत सागर में हम क्यों नहीं सराबोर होते? हम चेतना विहीन एवं जड़ से क्यों प्रतीत होते हैं?
ठीक इन्हीं प्रश्नों का उत्तर पाने एवं अपनी वास्तविक स्थिति में दृढ़ होने के लिए ही यह जीवन क्रम है। इस विस्मृति का एक कारण यह भी है कि हम रात दिन अपनी क्षुद्र बुद्धि से दुःख, चिन्ता, अवसाद, गरीबी, मृत्यु, कठिनाइयों, जरा, व्याधि आदि की बातें सोचते-सोचते एवं इनसे बचने के लिए लगातार प्रयत्न करते हुए इन्हीं में इतने तन्मय हो गये हैं कि मानव जीवन की शोभा अणु-अणु में व्याप्त परमात्मा का सौंदर्य हमारे दृष्टिपटल से हट सा गया है। इस विषय को हम भूलते जा रहे हैं। इतना ही नहीं हम जीवन का उद्देश्य इतना भूल गये हैं कि आश्चर्य करना पड़ता है कि आखिर हमारे जीवित रहने का क्या लक्ष्य है।
यह स्थिति ठीक वैसी है जैसे एक मनुष्य किसी गाँव को जा रहा हो। वह मार्ग में आई कठिनाइयों का निराकरण करने में लग जावे या मार्ग में आये बाग, बगीचे व मन बहलाने के साधनों से अपना मन बहलाने लग जाय और उनमें इतना लीन हो जाय कि वह अपने गन्तव्य स्थान की ओर बढ़ने का विचार ही न करे, यही स्थिति हमारी हो रही है।
उस सृष्टि निर्माता की कलाकृति, जीवन की शोभा को देखने के लिए, लक्ष्य तक पहुँचने के लिए यह आवश्यक है कि उस पथिक की भाँति मार्ग के सुख दुःखों को प्रधानता न देकर उन्हें सहन करते हुये अपने गन्तव्य स्थान की ओर चलते रहना ही हमारा ध्येय होना चाहिए। साथ ही मार्ग के सुख दुखों के कारण देह बुद्धि को अपने विवेक एवं ज्ञान से समाप्त करना होगा। हमें यह समझना चाहिए कि हम शरीर नहीं हैं। हम मन एवं बुद्धि नहीं हैं प्रत्युत इनसे परे जो है—”वही” हम हैं। जिस आत्मा का सर्वत्र पसारा है वही तो हम हैं। क्योंकि ज्यों ही आत्मा इस शरीर को छोड़ती है तो बुद्धि का व्यापार खतम हो जाता है। शरीर भी अपनी क्रियाशीलता समाप्त कर देता है। केवल बचा रहता है पंच तत्वों का मिश्रण। जिसकी तुष्टि एवं पुष्टि में ही जीवन बिताया उस मृत शरीर की यह गति कि उसका स्पर्श भी लोग घृणित समझें। इस नश्वरता का अनुभव प्रायः हम करते ही रहते हैं। फिर भी हमारा ध्यान वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त करने की ओर नहीं मुड़ता। आत्मा के वास्तविक स्वरूप की, सौंदर्य की, जीवन की महत्ता की जानकारी प्राप्त करने की हमारी इच्छा ही नहीं होती। यही कारण है कि हम वास्तविक ज्ञान से परे हैं, सच्चिदानन्द की आनन्द एवं सौंदर्य से पूर्ण सृष्टि को नारकीय रूप में अनुभव करते हैं, दुःख, अभाव, कठिनाइयों एवं विपदा से ही जीवन को दूषित बना रहे हैं। यह हमारी ही भूल है। उस सृष्टि निर्माता ने तो सब कुछ अपने युवराज की सुरक्षा, सुविधा एवं आनन्द का ही सामान जुटाया है। सर्व सुख एवं साधनों से यह बगीचा अपने युवराज के लिए उसकी पूर्ण कलाकारी का उदाहरण है।
आत्मा भिन्न-2 शरीर रूपी साधनों को लेकर अपने परम पिता परमात्मा की ओर बढ़ रही है। उससे मिलकर एक रूप हो जाने की धुन उसे तीव्र जीवनधारा के रूप में बहाये लिये जा रही है। एक शरीर क्षीण एवं जीर्ण हुआ तो उसे छोड़ दूसरे को धारण किया। इस तरह अनेकों शरीरों को छोड़ती धारण करती, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही है संसार की कोई चीज उसे लुभा नहीं सकती, उसकी पिपासा को शान्त नहीं कर सकती। वह तो अपने परम प्रभु परमात्मा से मिलकर ही शान्त एवं आनन्दित हो सकती है। मनुष्य अज्ञानवश अपने पवित्र पथ को भुलाकर शरीर सम्बन्धी सुख सुविधाओं को ही अपना लक्ष्य समझता है। जो असत है। शरीर के समाप्त होते ही उनका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता।
ईश्वर का यह युवराज, अपने परमपिता का ही तो अंश है। यह अमृतपुत्र है। अमृत ही इसका भोजन है। यह पूर्णरूपेण अमृत से ही सराबोर है किन्तु भूल से, अज्ञान से, यह अमृत छोड़ विष का संचय कर रहा है। फलस्वरूप इसका जीवन दुःखी, अशाँत, हीन बन रहा है। जरा आधि-व्याधि, जन्म-मरण का दुःख, विपत्ति से उसका जीवन नारकीय बन रहा है। अपने आनन्द केन्द्र जीवन को दुःखों का केन्द्र बना रखा है।
मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य, प्रभु मिलन ही है। खाने-पीने मौज उड़ाने में इसका सही कल्याण निहित नहीं है। इस जीवन को धारण कर वह प्रभु मिलन के लिए ही अवतरित हुआ है। इस संसार का पसारा भी उसके इस पवित्र लक्ष्य की ओर अग्रसर होने में सहायता के रूप में ही है। इसको बन्धन का रूप मनुष्य स्वयं अपनी भूल एवं अज्ञान से ही देता है। यह व्यायाम शाला जो कि सर्व साधनों से सम्पन्न है हमारे ध्येयपथ में बढ़ने के लिये ही रची गई है। संसार के प्रलोभन एवं आकर्षण हमारी आध्यात्मिक दृढ़ता को परिपक्व बनाने के लिए ही हैं। कहीं ये वैभव, ऐश्वर्य भोगविलास आदि आकर्षण हमारे जीवन के केन्द्र न बन जायें। कहीं हमारे आत्म पथ से भटक कर हम इन्हें अपना लक्ष्य न बना लें। इसका ज्ञान एवं दृढ़ता आवश्यक है।
तैरना सीखना बिना किसी जलाशय अथवा नदी आदि के असम्भव है। इसी प्रकार इस संसार एवं इसके प्रलोभन आकर्षण हमें आध्यात्मिक मार्ग को तय करने के लिए तैरना सिखाते हैं। अपने आपको ध्येयपथ पर बढ़ाना भिन्न परिस्थितियों में स्वयं को परखना, जीवन में सूक्ष्म निरीक्षण करते रहना यह सब इस संसार की पाठशाला में सम्भव होता है। इसी कारणवश कई महात्मा जिन्होंने एकाँत में संसार के वातावरण से दूर रहकर ईश्वर प्राप्ति का प्रयत्न किया उनमें से कई असफल हुये। अप्सराओं द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कई कथायें भी प्रचलित हैं।
अपने आप पर अधिकार पाना आवश्यक है। इससे सारी परिस्थितियाँ स्वयं काबू में आ जाती हैं। आवश्यक साधन स्वतः चले आते हैं। अभाव नाम की कोई बात सृष्टि निर्माता की सृष्टि में नहीं है। केवल अभाव हमारे मनों में बसा हुआ है। जो हमारी मानसिक कमजोरी का परिणाम है।
पवित्र जीवन की महत्ता एवं उद्देश्य प्रेम और सेवा है। सर्वत्र प्रभु की स्थिति को ध्यान में रखकर प्राणी मात्र से शुद्ध आत्मीय प्रेम का सम्बन्ध स्थापित करना चाहिये। सब प्राणियों में परमात्मा का पवित्र अंश स्थित समझकर उसी भाव से उनकी सेवा करना चाहिए। इस प्रेम और सेवापथ पर चलता हुआ व्यक्ति सच्चिदानन्द की अनुभूति प्राप्त कर सकता है। विशुद्ध आत्मीय प्रेम में फिर अपने पराये के भेद का कोई भी स्थान नहीं रहता। कोई वस्तु अपनी नहीं रह जाती। इसी लिए तो कहा है कि “सौ हाथों से कमा और हजार हाथों से दान कर”। सेवा के पवित्र अवसरों की खोज में लगे रहना चाहिये। सेवा प्रेम एवं सेवा ही मानव का भूषण है इसी से वह सुन्दर लगता है। इसी से अपनी मंजिल तय करता है। प्रभु से मिलन करता है।
(स्वामी शिवानन्द सरस्वती)
संयम एक प्रकार का अनुशासन है जो साधक में वैराग्य लाता है और उसे योग-पथ पर अग्रसर होने में सहायता प्रदान करता है। यम अथवा आत्मनिग्रह का अभ्यास ही संयम है। यही सारे सद्गुणों का अधिष्ठान है।
संयम ही रोगों के विरुद्ध दृढ़तम चहार दीवारी है यही सारी व्याधियों से सुरक्षित रखता है। इससे सुन्दर स्वास्थ्य शक्ति बल तथा वीर्य की प्राप्ति होती है।
एक सप्ताह के लिए चाय, काफी अथवा धूम्रपान करना बन्द कर दो। इससे तुम्हारी इच्छाशक्ति बलवती होगी जिससे संयम कार्य में मदद मिलेगी। अन्य संयम तुम्हारे लिए सरलतर हो जायेंगे।
संयम का लक्ष्य मन को निम्न पाशवीय अभिरुचियों से ऊपर उठाना ही है। इससे निश्चय ही आत्मपरिष्कार में सहायता मिलती है।
नियताहार, संयम, उपवास, आत्मनियन्त्रण, आत्म-निग्रह, आत्मसंयम, परिमितता ये सब पर्यायवाची हैं।
मदोन्मत्तता, आत्यंतिकता, उद्भ्रान्तता, उन्माद, आत्म-तृप्ति, इन्द्रिय परायणता, लम्पटता, ये सब संयम के विपरीतार्थक शब्द हैं।
भोजन बन्द कर देना भोजन से संयम कहलाता है। अल्पाहार करना ही नियताहार है। अनाहार कभी एक बार कर लिया जाता है परन्तु अल्पाहार अभ्यास की वस्तु है। इच्छित वस्तु का परित्याग ही आत्म-निग्रह है। अनिच्छित वस्तु का परित्याग भी संयम ही है। नियमित समय तक, साधारणतः धार्मिक व्रतों में, भोजन न करना उपवास कहलाता है। युक्ति पूर्वक कुछ विशेष वस्तुओं का सीमित सेवन तथा कुछ का पूर्ण परित्याग ही परिमितता है। हम लोग दुर्गुणों में संयम तथा भोजन में मिताहार का प्रयोग करते हैं।
यह एक सुन्दर सद्गुण है कि एक मनुष्य दूसरों के साथ चाहे उनकी प्रकृति कैसी भी क्यों न हो, अपने को व्यवस्थित तथा उपयुक्त बनाता है। जीवन में सफलता पाने के लिए यह सर्वोत्तम तथा अनिवार्य सद्गुण है। शनैःशनैः इसका उपार्जन करना आवश्यक है। बहुसंख्यक-जन इसे नहीं जानते कि किस प्रकार दूसरों के साथ अपने को उपयुक्त बनावें। दूसरों के हृदय पर शासन करने के लिए तथा अन्ततः जीवन संग्राम में विजयी होने के लिए यथा काल व्यवस्था एक विचित्र सद्गुण है।
पत्नी नहीं जानती कि पति के साथ किस प्रकार अनुकूल बर्ताव करना चाहिये। वह सदा अपने पति को अप्रसन्न रखती है, घर में झगड़े का कारण बनती है और अन्ततः पति द्वारा परित्यक्त होती है। किरानी नहीं जानते कि अपने मालिक के साथ किस प्रकार व्यवहार करें। वह उससे झगड़ पड़ता है और शीघ्र ही अपनी करनी का फल भोगता है। शिष्य नहीं जानता कि गुरु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। व्यापारी नहीं जानता कि किस प्रकार वह ग्राहकों के साथ व्यवहार करे। फलतः वह अपने व्यापार तथा ग्राहकों से वंचित रह जाता है। दीवान यदि नहीं जानता कि महाराजा के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए तो उसको नौकरी से अलग होना पड़ता है। यथा काल व्यवस्था के ऊपर संसार आधारित है। जो इस कला अथवा विज्ञान को जानता है वह संसार में सकुशल निवास करता है और जीवन की सभी परिस्थितियों में सुखी रहता है।
यदि मनुष्य अपने को अनुकूलतः व्यवस्थित करना चाहता है तो उसमें विनम्रता होनी चाहिए। इसके विकास के लिए अधिक ज्ञान अथवा विज्ञान की आवश्यकता नहीं। यदि किरानी अपने मालिक की आदतों, प्रवृत्तियों तथा उसके तौर तरीकों से परिचित है और अपने को उसके अनुकूल सुव्यवस्थित रखता है तो उसका मालिक उसी का गुलाम बन जाता है। कुछ मृदु शब्द तथा स्नेह द्रव्य इन्हीं की आवश्यकता है—स्नेह द्रव्य कोमल बनाने के लिए मधुर भाषी बनो, नम्र बनो। अक्षरशः उसकी आज्ञा का पालन करो। कभी प्रत्युत्तर न दो। इस कहावत को याद रखो कि “आज्ञाकारिता सेवा से भी श्रेयस्कर है” तुम्हारा मालिक थोड़ा सम्मान चाहता है। “हाँ जी, हाँ जी” “जी हजूर” “बहुत अच्छा महाशय” ऐसा कहो। इसमें तुम्हारा मालिक तुम्हारा ही गुलाम बन जाता है। वह अपने हृदय में तुम्हारे लिए सुन्दर स्थान रखता है तुम उसके प्रिय हो जाओगे। जो कुछ तुम चाहोगे वैसा ही वह करेगा। यथा काल व्यवस्था के गुण को विकसित करने के लिए नम्रता तथा आज्ञाकारिता का होना आवश्यक है। अहंकारी तथा अभिमानी मनुष्य के लिए इस गुण का विकास करना बहुत कठिन है। वह सदा कठिनाइयों में पड़ा रहता है। अहंकार तथा घमंड ये ही इस सद्गुण के मार्ग में दो प्रबल बाधाएं हैं।
जब एक छात्र नहीं जानता कि उसी कमरे में रहने वाले दूसरे छात्र के साथ किस प्रकार बर्ताव करना चाहिए तब वैमनस्य होता है और उनकी मित्रता नष्ट हो जाती है। यथा काल व्यवस्था के द्वारा मित्रता चिरस्थाई रहती है। छात्रगण छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए झगड़ पड़ते हैं। एक छात्र कहता है “मैंने मिस्टर ‘क” को बहुत दिनों तक चाय पिलाई। मैंने अपने खर्चे से इन्हें कई दिनों तक सिनेमा दिखाया। परन्तु जब मैंने उनसे वासवेल लिखित “जौनसन की आत्मकथा” पढ़ने के लिए उधार माँगी तब उसने एक दम इन्कार कर दिया। वह किस तरह का मित्र है! मैं उसे बिल्कुल नहीं चाहता।” इस प्रकार मित्रता नष्ट हो जाती है। एक साधारण सी वस्तु मन को असंतुलित कर डालती है यथा काल व्यवस्था ही वह दृढ़ सूत्र है जो सबों को प्रेम तथा मित्रता के बन्धन में स्थित करता है। ऐसा मनुष्य संसार के किसी भी हिस्से में किसी भी व्यक्ति के साथ कुशलपूर्वक रह सकता है। ऐसा मनुष्य अज्ञात रूप से ही सबों का प्रेम पात्र बन जाता है। इससे अत्यन्त शक्ति तथा आनन्द की प्राप्ति होती है। इससे इच्छाशक्ति बढ़ती है।
इस प्रकार के व्यक्ति को कुछ त्याग करना पड़ता है। जिससे त्याग भावना विकसित होती है। इससे स्वार्थ का नाश होता है। वह अपनी वस्तु में दूसरे को भी हिस्सा देता है। उसे अपमान तथा अपशब्दों को सहन करना पड़ता है। उसे जीवन की एकता का दर्शन करना पड़ता है। वैदान्तिक साधना में यह बहुत सहायक है।
जो इस सद्गुण का अभ्यास करता है उसे घृणा तथा बड़प्पन की भावना को विनष्ट करना पड़ता है। उसे सबों को गले लगाना पड़ता है। इस सद्गुण के द्वारा विश्व-प्रेम की भावना विकसित होती है तथा घृणा भाव का नाश होता है।
ऐसे व्यक्तियों को अपने साथियों के निर्मम शब्दों को सहन करना पड़ता है। उसको धैर्य तथा सहिष्णुता का अभ्यास करना पड़ता है। ये सद्गुण स्वतः उसमें विकसित हो जाते हैं जब वह अपने को दूसरों के अनुकूल बनाने का प्रयत्न करता है। वह किसी भी वातावरण में रह सकता है वह एक झोंपड़ी में भी रह सकता है। वह ठंडी जगह में भी निवास कर सकता है। वह मन में संतुलन रखता है। वह अत्यन्त गर्मी तथा सर्दी को भी सहन कर सकता है। इस सद्गुण के द्वारा अन्ततः आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जिसके पास यह सुन्दर सद्गुण है वह इन तीनों लोकों में एक महान् पुरुष है। वह सदा सुखी तथा सफल है।
(श्री भगवान सहाय वाशिष्ठ)
मानव सृष्टि में आध्यात्मिक शक्ति अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस शक्ति का मनुष्य के जीवन में भोजन, आराम, लौकिक व्यवहार, कमाई आदि की तरह ही विशेष महत्व है। जिन-जिन भी जातियों में इस शक्ति का विकास हुआ, वे उन्नति की ओर बढ़ीं। भारत के प्राचीन गौरव का एक कारण इसके आध्यात्म शक्ति से सम्पन्न होना भी था। आध्यात्म शक्ति को किन्हीं शब्दों में चरित्र, बल मानसिक बल अथवा आत्म बल भी कहते हैं।
मानव के आध्यात्मिक विकास का स्वयं को भले या बुरे निर्देश देने से बहुत सम्बन्ध है। स्वयं को पवित्रता एवं महानता के निर्देश देने से अथवा अन्तरात्मा के निर्देशों के अनुकूल चलने के संकल्प करना जीवन को उन्नत एवं विकासशील बनाता है। इसी प्रकार अपने आपको बुरे निर्देश देना अर्थात् अपनी अन्तरात्मा के प्रतिकूल कार्य करना पतन एवं विनाश का कारण बनना है, जिससे मनुष्य का जीवन दुःख एवं परेशानियों से खराब होकर नारकीय सा बन जाता है।
एक धन ऐश्वर्य एवं भौतिक सम्पत्तियों से संपन्न व्यक्ति यदि जितना आध्यात्मिक शक्ति से शून्य है उतने ही अर्थ में सब से बड़ा दीन है। क्योंकि वह आध्यात्मिकता से रहित होने के कारण इन भौतिक सम्पत्तियों से उल्टा पतन एवं विनाश का मार्ग अपना लेगा। ईर्ष्या, द्वेष, परपीड़न, शोषण आदि से जीवन अशान्त एवं उद्विग्न बन जायगा। इनसे उसका मानसिक शक्ति का ह्रास हो जायगा जिसके फलस्वरूप पद-पद पर चिन्ता, भय, दुःख एवं अपनी शक्ति हीनता का अनुभव करेगा जो नारकीय यन्त्रणाओं से कम नहीं है। संसार का सब से बड़ा व्यक्ति वह है जो आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न है। वह अपने आध्यात्मिक बल से न केवल स्वयं को ही अपितु समग्र संसार को सुखी बना सकता है। ईश्वर के इस सृष्टि रूपी बगीचे में अपनी कलाकृति की छाप छोड़ जाता है क्योंकि उसका जीवन स्वयं के लिए नहीं होता।
अब यहाँ विचार करना है कि यह महान् आध्यात्मिक शक्ति क्या है, एवं इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है? अपने जीवन को इस अमृत से सराबोर करने वाली महान् आत्माओं ने यह अनुभव करके निर्णय किया है कि इस समस्त सृष्टि में मन रूपी एक तत्व अखण्ड विस्तार से, एक रस से सर्वत्र व्याप्त है। मानव मन उसकी एक इकाई है। किन्तु जब आध्यात्मिक शक्ति से शून्य मानव अपनी देह बुद्धि से इस तत्व का अनुभव करता है तो केवल पंचतत्वों का क्षणभंगुर यह पुतला नजर आता है क्योंकि अपने क्षुद्र ज्ञान के कारण उसका पसरा केवल देह तक ही मालूम पड़ता है। इसी कारण मानव देह या इससे सम्बन्धित भौतिक वस्तुओं की क्षति को ही वह अपनी क्षति समझता है। इस देह पर दुःख आदि पड़ने पर ही स्वयं को दुःखी समझ लेता है। किन्तु ज्यों−ही मानव अपने परोक्ष ज्ञान से, स्वयं को एक रस रूप, सर्वत्र व्याप्त उस अखण्ड ईश्वरीय तत्व की इकाई समझता हुआ एवं उसी में स्थित हुआ अनुभव करता है तो सर्वत्र अपना ही अपना दृष्टिगोचर होता है। अपने पराये का भेद समाप्त हो जाता है। उस चर-अचर व्याप्त तत्व में स्थित हुआ व्यक्ति सृष्टि में हल-चल मचा देने वाली शक्ति की अनुभूति प्राप्त करता है। साधारण विकास कार्यों की तो बात ही क्या है। उस सक्षम ईश्वरीय दिव्य शक्ति से सम्बन्ध स्थापित करने पर महान् एवं चमत्कारी कार्य सम्पन्न होते हैं। प्रकृति भी वहाँ अपनी मर्यादाओं का व्यतिरेक कर विपरीत फल देती है।
महापुरुष इस दृश्य जगत में उस ईश्वरीय तत्व की स्थिति ठीक उसी तरह अनुभव करते आये हैं जैसे माला के भीतर का सूत्र। जब स्थूल नेत्रों से देखा जायगा तो माला में केवल मनिके ही नजर आएंगे और प्रथकत्व की भावना होगी, किन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो सबको धारण करने वाला सूत्र नजर आयेगा जिसके अभाव में इस दृश्य रूपी माला का अस्तित्व ही नहीं है। हमारे महापुरुष ऋषि-महर्षि आदि इसी तत्व में स्थित होकर आत्मीयता के एक सूत्र में बँधे हुये “वसुधैव कुटुम्बकम” का मधुर संगीत सुनाते रहे हैं। वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों व अन्य ऋषि प्रणीति ग्रन्थों में यह मधुर गान भरा पड़ा है जिससे मानव आत्मविभोर हो उठता है। आत्मीयता के इस चरम विकास को, परमानन्द को, जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर मानव धन्य हो जाता है, कृतार्थ हो जाता है। पूर्ण में पूर्ण मिलकर पूर्ण हो जाता है। इस मधुर अमृत का पान कर हमेशा के लिए अमर हो जाता है।
इस आध्यात्मिक शक्ति के विकास के लिए ठीक उसी तरह मानसिक साधना करनी होगी, जीवन को उसी तरह संयत एवं नियमित करना होगा जिस तरह पहलवान अपने शरीर बल की वृद्धि के लिए करता है। जबकि स्वास्थ्य जैसी भौतिक एवं तुच्छ शक्ति के लिये इस प्रकार के अनेक अभ्यास, साधन, आदि की आवश्यकता होती है तो उस महान् एवं सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न होने के लिए प्रचुर मात्रा में अभ्यास एवं साधना आदि करनी ही होगी। साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए सर्वप्रथम ब्राह्ममुहूर्त के महत्व को समझना आवश्यक है। उस समय का शाँत एवं प्राकृतिक वातावरण आध्यात्मिक चिंतन के लिए बहुत ही अनुकूल है। प्रत्येक आध्यात्मिक जिज्ञासु को सूर्योदय से दो घंटे पूर्व उठना आवश्यक है। महान पुरुषों के जीवन चरित्रों को देखा जाय तो ज्ञात होगा कि उनकी दिनचर्या सूर्योदय के दो तीन घंटे पूर्व से आरम्भ होती है।
आध्यात्म शक्ति सम्पादन के पवित्र लक्ष्य की ओर बढ़ने में “दृढ़ संकल्प और अभ्यास” ठीक उसी तरह के आधार हैं जैसे मानव देह में अस्थि पंजर। सर्व प्रथम अपने पवित्र लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए दृढ़ संकल्प और फिर उसके अनुसार अभ्यास करना प्रत्येक आध्यात्म पिपासु के लिये आवश्यक है। महान आशा एवं उत्साह के लिये अपने पवित्र संकल्पों को दृढ़ता के साथ साकार रूप में परिणित करने के लिए स्वतः अभ्यास करते रहना सफलता की कुँजी है। व्यक्त मन, पुस्तकीय ज्ञान, एवं विद्वत्ता की पहुँच, आध्यात्म तृष्णा को शाँत करने के लिये असम्भव सी है अतः केवल इसे ही प्रधानता देना तर्क के बल पर उस महान् शक्ति का विकास एवं अनुभव करना बड़ी भूल है क्योंकि बड़े-बड़े विद्वान, डिग्रियाँ प्राप्त, एक साथ कई विषयों के आचार्य पद प्राप्त करने वाले महानुभाव, कठिनाइयों एवं विपरीत परिस्थितियों में साहस छोड़ देते हैं। अपनी तर्क बुद्धि के बल पर नैतिकता एवं आध्यात्मिकता का उपदेश देने वाले साधारण से लोभ आने पर फिसल जाते हैं। इस तरह बाहरी पुस्तकीय ज्ञान से हमारा बौद्धिक स्तर उन्नत हो सकता है। किन्तु आध्यात्मिक विकास नहीं हो सकता।
स्वयं को असहाय एवं हीन समझना एक बड़ा भारी विघ्न है। लिखा भी है कि “नायं आत्मा बल हीनेन् लभ्यः” अर्थात् यह आत्मा बलहीनों से प्राप्त नहीं होती। अपने आपको परमपिता परमात्मा का युवराज समझना चाहिए। सर्वशक्ति सम्पन्न, सर्वाधार ईश्वर का युवराज कभी हीन, दुःखी शक्ति हीन क्यों होने लगा। यह केवल हमारा मिथ्या ज्ञान है जो हमें पतन की ओर ले जाता है। अपने पिता की भाँति सर्व शक्तियों से सम्पन्न यह पुरुषार्थी युवराज अपने पुरुषार्थ के बल पर शीघ्र ही अपना आत्मलक्ष्य प्राप्त कर सकता है। साधक को अपनी महानता एवं गौरव की अनुभूति जाग्रत करनी चाहिए? किन्तु सावधानी से सूक्ष्म निरीक्षण करते रहना चाहिये कि कहीं हमारा क्षुद्र अहंकार तो नहीं पनप रहा है जिसकी सीमा इस शरीर एवं इससे सम्बन्धित भौतिक जगत तक ही है। इतना ही नहीं पतन की ओर ले जाने वाला कण्टकाकीर्ण मार्ग है।
साधना पथ पर चलते हुये साधक को विषयों के दल-दल से बचना चाहिये। इस बड़े भारी विघ्न के कारण साधक की समग्र शक्तियों का क्षय होने लगता है और पतन की ओर गिरने लगता है। अपने पवित्र लक्ष्य की ओर प्रगति करने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन भी महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। इसके साथ-साथ स्वयं को पवित्र एवं परमार्थ कार्यों में लगाये रहना चाहिए। इससे चित्त भी विषयों की ओर नहीं दौड़ता और मानव-जीवन का सदुपयोग भी होता है। साधक को यह ध्यान में रखना चाहिए कि इन विषयों की दौड़ अंत तक उसका पीछा नहीं छोड़ती। जहाँ भी थोड़ी सी अपनी उन्नति देखकर यदि इन्हें ढिलाई दे दी तो ये साधक को अपनी कई गुनी शक्ति से पतन की ओर खेंच ले जाते हैं।
परनिन्दा भी साधक की आध्यात्मिक उन्नति में बड़ी बाधक है। दूसरों की निन्दा करने में न केवल आध्यात्मिक पतन ही होता है वरन् लौकिक व्यवहार में भी ईर्ष्या द्वेष आदि का द्वार खुलता है। जो मानव-जीवन को विषतुल्य बना देते हैं। यह सत्य है कि परनिन्दा करने वाला व्यक्ति अपने जीवन में कई प्रयत्नों के बावजूद भी अध्यात्म चेतना की अनुभूति प्राप्त नहीं कर सकता। अधिक विलास एवं अनर्गल भाषण से भी आध्यात्मिक प्रगति रुकती है और आयु भी क्षीण होती है।
स्वाध्याय एवं सत्संग मानव के अपने पवित्र लक्ष्य की ओर बढ़ने में बहुत बड़े सहायक हैं। इनसे यह ही नहीं कि समय का सदुपयोग होता हो वरन् कुछ समय के लिये उन महान आत्माओं से विचार द्वारा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इससे मानसिक विकास के साथ-साथ हमारा पथ प्रदर्शन भी होता है। इन उपरोक्त नियमों को ध्यान में रखते हुये प्रत्येक व्यक्ति को अपना सुव्यवस्थित जीवन बना लेना चाहिये। फिर उसके अनुसार आध्यात्म शक्ति से सम्पन्न बनने के लिये सत् प्रयत्न करना चाहिये। अमूल्य सुरदुर्लभ मानव जीवन का सदुपयोग अपने इस पवित्र लक्ष्य की ओर बढ़ने में ही है। यदि आज का मानव अपने को भौतिकता, भोग-विलास, हिंसा, शोषण, परपीड़न, बेईमानी के बहाव से बचकर आध्यात्मशक्ति को अपनावे तो निश्चय ही विकास और प्रगति का सुन्दर पथ निर्माण हो जावे। स्वयं को एवं मानव समाज को इस आध्यात्मिक चेतना की ओर मोड़ना प्रत्येक मानव सृष्टि के सदस्य का आवश्यक कर्तव्य है।
(योगीराज अरविन्द)
योग-साधन में सबसे बड़ी कठिनाई मन को वश में करने की होती है। इसकी चंचलता और शैतानी का कुछ ठिकाना नहीं। मन बिल्ली की तरह ताक लगाये बैठा रहता है और जैसे ही कोई महान विचार उदय होता है यह उस पर झपट पड़ता है और फिर नई-नई वासनाओं या कामनाओं का पचड़ा आरम्भ कर देता है। इच्छा का स्वरूप भी लगभग ऐसा ही है। हमने प्रायः देखा है कि श्रेष्ठ इच्छा का आगमन होते ही पुरानी इच्छा अपने पुराने अभ्यास के अनुसार उस पर चढ़ बैठती है। थोड़ी दूर चलने पर मालूम पड़ता कि इस विचार या इच्छा में तो कोई भूल थी। तब फिर मन को शान्त अवस्था प्राप्त होती है। इस प्रकार यह मन का विद्रोह बहुत समय तक चलता रहता है। धैर्य धारण करके धीरता के सहारे ही मन के इन भोगों को हटाना चाहिये। इसके पश्चात् मन धीरे-धीरे शिष्ट बनने लगता है।
साधना दो प्रकार की होती है—एक अपने लिये तपस्या करना और दूसरी साधना। इन्हीं को “कर्म योग“ और “ज्ञान योग“ के नाम से पुकार सकते हैं। ज्ञान-योग का स्वरूप साधारणतः यह है कि हम सब से अलग होकर यह निरीक्षण करते रहें कि मन के भीतर कैसी-कैसी आकाँक्षाएँ, प्रभाव और विचार उमड़ रहे हैं और शान्त हो रहे हैं। हमें उदासीन भाव से यह देखना चाहिये कि किस वस्तु से हानि पहुँच रही है। आरम्भ में तो इन वस्तुओं के साथ स्वयं भी मिलना पड़ता है, क्योंकि इसके बिना उन पर दृष्टि ही नहीं पड़ती। धीरे-धीरे अभ्यास हो जाने पर सभी बातें प्रकृति के त्रिगुण की क्रीड़ा-तरंगों से ही उत्पन्न होती हैं। वस्तुतः हम अपनी निजी शक्ति से किसी भी विचार, बोध या कार्य की उत्पत्ति होना नहीं मान सकते। सब प्रकृति का दिया हुआ ही होता है, प्रकृति द्वारा ही इन सब में हमारी प्रवृत्ति होती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि यह सब प्रकृति की ही ठगविद्या या विशेषता है—हम तो सिर्फ उससे मिले हुये ज्ञान रहित होकर पड़े हैं। सुख-दुख, पाप-पुण्य, फलाफल का द्वन्द्व मचा हुआ है। इससे बचने का एक मात्र उपाय यह है कि हम भी इसके विरुद्ध एक तरकीब या चाल से काम लेकर प्रकृति के कौशल को परास्त कर दें। वह चाल है अपना पृथक करण अर्थात् अपने को पूर्णतः प्रकृति से अलग समझना। भीतर का द्रष्टा पुरुष जितने अविचल भाव से स्थित हो सकेगा; उतना ही अधिक बन्धन स्वरूप द्वंद्व ढीला होगा और फिर अन्त में फिर द्वंद्व की इतिश्री हो जायगी। यही “ज्ञान योग“ का सार है। किन्तु इस ज्ञान योग के हो जाने से भी सब काम समाप्त नहीं हो जाता। प्रकृति के तीनों गुणों से अपने को मुक्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् उन गुणों का रूपांतर हो जाना चाहिये। गीताकार ने भी “निस्त्रेगुण्य” के परे हो जाने का निर्देश किया है, पर उसकी विशेष व्याख्या नहीं की है। अब हमको इस ओर स्वयं ही ध्यान देना चाहिये।
“कर्म योग“ का रहस्य भी इसी तरह का है। पहले फलाफल को समर्पण करके—अर्थात् फलाफल की आशा त्यागकर कार्य करते जाना चाहिए। हृदय में भगवान है ऐसा समझ कर, उनका स्मरण करते हुये सब कामों को आरम्भ करना चाहिये, जैसे कि गीता में भगवान ने कहा “यथा नियुक्तोऽस्मि” (इनमें भी “मैं” करता हूँ) इसके पश्चात् इस कतृत्व (कर्तापन) के अभिमान का भी त्याग (उत्सर्ग) कर देना चाहिये। फल के साथ ही साथ कर्म का भी समर्पण करना पड़ता है। हमको यह समझना चाहिये कि सब कर्म प्रकृति के गुणों के अनुसार ही होते हैं, इसे पुरुष द्रष्टा भाव से देखता रहे। ऐसा होने से आपको जान पड़ेगा एक विश्वभाव-युक्त शक्ति ही समस्त विचारों, अनुभवों और कार्यों में चल कर सृष्टि का सम्पादन कर रही है। ऐसा होने से ही हमको एक शान्त, समदर्शी और साक्षी की अवस्था प्राप्त होती है। तब भी हमारे भीतर द्वंद्व रहता है, किन्तु वह मन, प्राण और शरीर के ऊपरी भाग में ही रहता है—भीतर तो समता ही स्थिर रहती है। इस अवस्था में बाहर के अन्य लोग इसमें भी दोष गुण, छोटे-बड़े का आस्तित्व ही देखते हैं, किन्तु साधक के भीतर का पुरुष गुणातीत और शाँति मग्न अवस्था में ही रहता है। यह अवस्था निःसंदेह बहुत ऊँची है, फिर भी हमको इससे आगे बढ़ना आवश्यक है क्योंकि पक्की अवस्था तभी मानी जायगी जब गुणों का भी परिवर्तन हो जाय।
हमारे योग—पूर्ण योग की प्रणाली यही है कि हम स्वयं किसी साध्य (विशेष लक्ष्य) को लेकर उसे प्राप्त करने की साधना नहीं करते; बल्कि सब कुछ नारायणी शक्ति ही स्वयं करती है। उन्हीं के हाथ में साधना का सम्पूर्ण भार समर्पण करके स्थिर रहना चाहिये। भगवान अपने आप ही साधना करते हैं। उनकी दिव्य शक्ति ऊपर का केन्द्र स्वयं ही खोल देती है। वैसे तो सब कुछ हमारे ही द्वारा किया जाता है, पर ऊपर से वही देना आरम्भ करते हैं। आत्म समर्पण किये हुये योगी को भगवान विज्ञानमय जगत की नवीन ज्योति ही प्रदान कर देते हैं। उस प्रकृति के सारे गुणों का असली स्वरूप प्रकट हो जाता है। सत्त्व होता है—स्वच्छ और उज्ज्वल दिव्य ज्योति से। सत्त्व की प्रधानता में ज्योति-मण्डल के बीच समस्त ज्ञान, चिन्ता, अनुभव और इन्द्रियाँ तक प्रत्यक्ष सम्पन्न (साधित) हो जाती हैं। रज होता है—दिव्य तप एवं वास्तविक घटनाओं को नियमित करके चलने में। उस दिव्य तप का नाम ही क्रीड़ा है। तम का भी उसी में रूपांतर हो जाता है। तम
होता है—समरस, शान्त और गम्भीर आनन्द की गोद में सदा डूबे रहने से उसी विराट शाँति की गोद में ही समस्त कर्म बिना विघ्न बाधा के साधित होते रहते हैं। और कहाँ तक कहें सोना (शयन करना) भी उसी प्रकाश के समीप होता है। वह अवस्था कितनी शान्तिपूर्ण और सुखमय है उसे हम शब्दों द्वारा कह नहीं सकते। मनुष्य की भाषा और मन बहुत असम्पूर्ण है—उसके द्वारा इस दिव्य राज्य का कुछ भी वर्णन नहीं किया जा सकता। इस दिव्य राज्य में मनुष्य को भगवान स्वयं ही पहुँचा देते हैं। केवल उसका मनोभाव सत्य और निष्कपट होना चाहिये। मनुष्य के दोनों हाथ उठा कर पुकारने से भगवान सहस्र बाहु बढ़ाकर उसे ऊपर खींच लेते हैं।
ऊपर उठना चाहिये, इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई ऐसा विशेष स्थान है जहाँ सब प्रपंच छोड़ कर उठ जाना होगा। इसका मतलब यही है कि हमारा वर्तमान स्वभाव बड़े बुरे ढंग का हो गया है; इसलिये उन बुराइयों को दूर करने की आवश्यकता है। तात्पर्य यह कि आगे इस शारीरिक ज्ञान, इस जड़ बुद्धि, और देह सम्बन्धी भावना को छोड़ कर उठे बिना सूक्ष्म-सत्य अथवा अध्यात्म-सत्य का कुछ भी अनुभव नहीं किया जा सकता। जिस तरह इस जड़ शरीर के पीछे सत्य अन्न-कोष है, उसी प्रकार आत्म श्लाघा के पीछे एक विराट आत्म-कर्म है। योरोप निवासी जिसे बोधातीत या अव्यक्त मन कहते हैं, वही हमारा हिरण्यगर्भ है। इस सूक्ष्म मानस-लोक का विकास या उपाय जिस मनुष्य में जितना ही अधिक रहता है, उसके भीतर उतनी ही काव्यप्रतिभा, शिल्प प्रतिभा आदि प्रकट होती देखी जाती है। हमारी सूक्ष्म आन्तरिक आँखें सूक्ष्म कान आदि इन्द्रियों की सत्ता स्वतन्त्र होती है और उनका पृथक रूप से सुधार भी किया जा सकता है।
भागवत आनन्द भी इसी प्रकार का है। भगवान को जिसमें आनन्द होता है वही होता है और उसका धीरे-धीरे होना अनिवार्य है। हम तो सुख दुःख के रूप में द्वंद्व का अनुभव करते हैं, किन्तु वास्तव में दोनों ही आनन्द के विभिन्न रूप हैं। हम सहन करने की शक्ति को नष्ट करके इन्द्रिय-ज्ञान से दुख ही पाते हैं। किन्तु यह युग सनातन या पुराना नहीं है। कई बार ऐसा देखा गया है कि कठिन दुख भी अनायास ही आनन्द में परिणित हो गया है। इसका कारण यही है कि जिसे हम दुख कहते हैं वह भी आनन्द ही है। क्योंकि निश्चित की हुई चरम मात्रा लाँघ जाने पर उसके भीतर का आनन्द ही मिलकर बाहर प्रकट हो जाता है।
भारत की साधना में एक सुन्दर क्रम-धारा देखी जाती है। पहले वैदिक युग था, उस समय ऋषि लोग आध्यात्मिक और अलौकिक अनुभव-योग द्वारा ऊपरी सत्य में प्रवेश करते थे। वह युग बड़ा ही महत्वपूर्ण था। उस समय लोग देव लोक में जाते थे और देवताओं को भी जीवन-दान देते थे। उस समय के लोग आन्तरिक अनुभवी थे। इसके पश्चात् लोग इस वैदिक ज्ञान से हाथ धो बैठे। ब्राह्मण लोग सब कुछ छोड़ कर उप कथाओं में भिड़ गये। जान पड़ता है उस समय मनुष्यों को असली सत्य का रूप ही भूल गया। उपनिषद् काल में लोगों ने फिर एक बार सत्य की खोज की थी। अब की बार वह खोज आध्यात्मिक अनुभव द्वारा नहीं बल्कि अंतर्ज्ञान द्वारा की गई थी। इसी से उपनिषद् का सत्य बड़ा ही उदार और महान है। वे छोटे से छोटे अनुभव का बड़े से बड़े अनुभव के प्रकाश से शोधन करते थे और शुद्ध भाव से सत्य की ओर अग्रसर होते थे।
(श्री हेमचन्द्र साहित्य-मनीषी)
यद्यपि भारतीय दर्शन और वैदेशिक दार्शनिकों का अधिकाँश में यही मत है कि हमारा जीवात्मा परमात्मा का अंश है—वह उसी में से निकला है और अन्त में उसी में लय हो जायगा, पर अधिकाँश मनुष्यों ने न तो इस उक्ति की सत्यता को अनुभव किया और न उसके अनुसार आचरण किया। अधिक से अधिक थोड़े से लोगों ने ‘सोऽहं’ अथवा ‘तत्त्वमसि’ कहकर एक आदर्श के रूप में उसे स्वीकार किया तो दूसरी ओर कुछ ढोंगियों ने उसका उच्चारण करके अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने और सीधे-साधे लोगों को फँसाने का जाल रच डाला। इस प्रकार “सोऽहं” अथवा “मैं ईश्वर हूँ” केवल एक मौखिक वार्ता अथवा स्वार्थ-साधन की सी चीज हो रही है। अगर हजारों वर्षों में दस बीस या सौ-पचास व्यक्तियों ने उसे अपने जीवन में चरितार्थ कर दिखाया हो तो उनको अपवाद स्वरूप ही समझना चाहिये।
“सोऽहं” अथवा अद्वैतवाद के विरुद्ध दूसरा सिद्धाँत द्वैतवाद का है जो भारतवर्ष के कितने ही सम्प्रदायों में और ईसाई मुसलमान जैसे प्रसिद्ध मजहबों में भी जड़ जमाये हुये है। इनका कहना यही है कि परमात्मा और जीवात्मा में सदा से अन्तर रहा है और सदा रहेगा। इस मत के अनुसार जीवात्मा एक प्रकार से परमात्मा द्वारा निर्मित है और इसलिये उसका कर्तव्य है कि सदा उसकी पूजा, उपासना, भक्ति किया करे। इससे उसका कल्याण होगा और सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कर सकेगा। पर यह कोई विशेष वाञ्छनीय स्थिति नहीं है। जब तक हमारी बागडोर किसी दूसरे के हाथ में रहेगी, तब तक हमारा सुख और कल्याण अस्थायी ही है। जब वह किसी कारणवश असंतुष्ट हो जाय, या हमारी मनोवृत्ति ही किसी अन्य दिशा में मुड़ जाय तो हम फिर कष्ट सागर में तैरने लगेंगे। इस प्रकार की सदा-सदा के लिए परमुखापेक्षी स्थिति किसी भी स्वाभिमानी और विवेकशील जीव को प्रिय नहीं हो सकती। अगर वह कभी सबसे ऊँची स्थिति पर नहीं पहुँच सकता, उसे हमेशा दास, सेवक, अनुयायी ही रहना है तो फिर इतनी खटपट करने और त्याग तपस्या को अपनाने की आवश्यकता ही क्या?
पर सत्य बात यही है कि इस प्रकार सदा-सदा के लिये परमात्मा और जीव की स्थिति को सर्वथा भिन्न मानना न तो तर्क और बुद्धिसंगत जान पड़ता है न वह कोई अधिक अच्छी स्थिति ही कही जा सकती है। आधुनिक विज्ञान, जो कुछ वर्ष पहले ईश्वर के अस्तित्व से सर्वथा इनकार करता था अब उसकी सत्ता को मानने का उपक्रम कर रहा है, पर उसमें द्वैत की तो गुंजाइश ही नहीं है। वह खोज करते-करते यहाँ तक पहुँचा है कि इस विश्व का अंतिम मूल तत्व एक ही है—जड़, चैतन्य सबका उसी में से विकास हुआ है और अंत में उसी में लय हो जायगा। इसलिए मनुष्य ही क्यों प्रत्येक प्राणी और पदार्थ ईश्वर का ही अंश है जो एक दिन उसमें अवश्य मिल जायगा। यह सिद्धाँत पालन करने में ही नहीं समझने में भी कठिन है और इसलिए साधारण मनुष्य जल्दी इस पर विश्वास नहीं कर सकते। जिसके जीवन में युग-युग से दुर्बलता घुस गई है, गुलामी ने दिमाग में डेरा डाल रखा है, वह एकाएक कैसे इस बात पर विश्वास कर सकता है कि वह सर्वशक्तिमान सत्ता का भाई-बन्धु है और चाहे जब जैसा बन सकता है। इस विषय का विवेचन करते हुये एक विद्वान ने ऐसी ही मनोवृत्ति वालों का यथार्थ चित्र इन शब्दों में खींचा है।
“ऐसी ही हीन वृत्ति हमारी भी है। अनेक काल से भिखारी बने आ रहे हैं। देवता बने, इन्द्र बने, स्वर्ग के सिंहासन पर बैठे पर तब भी भिखारीपन नहीं मिटा। क्षुद्र पोखर विराट सागर की कल्पना भी कैसे कर सकता है? यदि छोटे पोखर से कहा जाय कि कुछ दूर पर अनन्त जल राशि का विशाल लहराता सागर ठाठें मार रहा है तो वह उसे मजाक ही समझेगा। जुगनू के लिए प्रकाश पुँज की कल्पना असंभव है। क्षुद्र अपनी क्षुद्रता के घेरे को तोड़कर आगे बढ़ने का साहस ही नहीं कर सकता। किसी भी विराट रूप की कल्पना उसके लिए केवल सिर दुखाना है। जो तुच्छता में बन्द हैं, तंग दायरे में कैद हैं यदि वे विराट के तथ्य को न समझ सकें या अपने से विशाल के अस्तित्व को संदेह की नजरों से तौलें, तो कोई आश्चर्य नहीं। जातिवाद, वर्गवाद, पथबाद की तंग दीवारों में जीने वाले के लिए अखिल मानव स्पष्टि में एकत्व के दर्शन पाना असंभव नहीं तो अशक्य अवश्य है। ऐसे लोगों से सच्चा आत्म ज्ञानी यही कहेगा कि तुम ईश्वर की सजीव मूर्तियाँ हो। तुम सबमें वह विराट चेतना जल रही है, किन्तु उस आग पर राख पड़ी है। उसकी ज्वाला बुझी नहीं है, दब गई है। आवश्यकता है राख को दूर करने की। राग-द्वेष के कूड़े कर्कट को दूर करो तो जान जाओगे कि तुम स्वयं ईश्वर हो।”
“मानव उस क्षुद्रता की कैद से इतना चिपट गया है कि जात-पाँत और अन्य भेदों के क्षुद्र घेरों से ऊपर उठ कर सोचने समझने की ताकत ही उसमें नहीं रही है। वह जिस क्षेत्र में जाता है वहाँ भी उस वेद को साथ में लिये जाता है। ब्राह्मण अपने नाम के पीछे शर्मा लगाना कभी न भूलेगा। वैश्य अपने नाम के बाद गुप्ता लगाना उतना ही आवश्यक समझता है जितना कि रोटी खाने के बाद हाथ धोना। उसकी यह क्षुद्र घेरे में जी सकने की आदत सह अस्तित्व में सब से बड़ी बाधा है। सेवा के क्षेत्र में भी जाति-पाँत की दीवारें उसे तंग कर रही हैं। सामाजिक जीवन की स्वतंत्रता में ये दीवारें रुकावट डाल रही हैं।”
अपने को परमात्मा से भिन्न दीन, हीन तुच्छ जीव मात्र समझने से केवल आत्मिक विकास का मार्ग ही रुद्ध नहीं होता, वरन् मनुष्य का मानसिक और सामाजिक विकास भी रुक जाता है और उसके सभी व्यवहारों में संकीर्णता क्षुद्रता का प्रवेश होने लगता है। और तो और ऐसे अनेक मनुष्यों में मानवता के स्वाभाविक गुणों का भी लोप हो जाता है। वह सम्प्रदाय भेद होने से अपने साथी को भी गैर समझता है और आवश्यकता होने पर उसकी साधारण सेवा भी नहीं कर सकता।
चाहे सिद्धान्त की दृष्टि से, चाहे तर्क की दृष्टि से और चाहे उपयोगिता की दृष्टि से द्वैत की अपेक्षा अद्वैत की भावना रखना ही श्रेष्ठ और कल्याणकारी है। सदा परमात्मा के आगे यह रोना रोते रहने से कि हम पापी हैं, पाखंडी हैं दीन, हीन, मलीन हैं, आप हमको शरण में लेकर हमारा उद्धार करें। इसके मनुष्य का उपकार तो कम और अपकार ज्यादा होने की संभावना है। इससे उसके भीतर ऐसी दुर्बलता का भाव घुस जायगा कि उससे कभी कोई महान कार्य होना संभव ही न होगा। इसके बजाय अपने को सर्वशक्तिमान ईश्वरीय सत्ता का अंश मानने से मनुष्य कैसी भी अच्छी या बुरी परिस्थिति में रहे उसका दृष्टि बिन्दु उच्च रह सकेगा और वह अवसर आने पर अवश्य ऊँचा उठेगा। मनोविज्ञान की दृष्टि से भी हीनता की मनोवृत्ति रखना कभी श्रेयस्कर नहीं हो सकता, चाहे हम उसे कैसे भी धार्मिक शब्द में लपेट कर पेश करें। इसलिये हमको संसार में दिखलाई पड़ने वाली विभिन्नता से भ्रमित न होकर समस्त सृष्टि और परमात्मा के एकत्व में ही विश्वास रखना चाहिये। उपनिषद् में उच्च स्वर से इस तथ्य की घोषणा की गई है—
यथोदकं वृष्टं दुर्गे पर्वतेषु निधावति।
एवं धर्मान्पृथक् पश्यं स्ताने वानुधावति॥
यथोदकं शुद्धेशुद्ध मासिक्तं तादृगेवभवति।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम॥
अर्थात्—पर्वत शिखर पर बरसने वाला जाने अनेक धाराओं में विभाजित होकर पर्वत की चारों दिशाओं में बहता है। इसी प्रकार, अज्ञानी पुरुष एक से अनेक रूप देखता है तो शिखर पर गिरने वाले जल के समान भ्राँत हो जाता है। पर पानी में डाला हुआ पानी उसके साथ मिलकर एक हो जाता है। यही बात ज्ञानी की आत्मा के सम्बन्ध में भी है, जो अनेक रूपों में एक रूप का दर्शन करता है।
(श्री शंभूसिंह कौशिक)
शास्त्रों में बतलाया गया है कि धर्म ही मनुष्य का सब से बड़ा आश्रय और सद्गुण है। इसका आशय यह है कि धर्म के द्वारा ही मनुष्य को अपने कर्त्तव्य का बोध होता है और उसी का पालन करके वह ऊर्ध्वगति को प्राप्त हो सकता है। धर्म के द्वारा ही मनुष्य को परमात्मा तथा उसकी लीला का कुछ अनुमान हो सकता है और आध्यात्मिक पथ में प्रगति करके वह जीवनमुक्त पद प्राप्त कर सकता है।
पर धर्म के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान मनुष्य के लिये सहज नहीं है। क्योंकि संसार में इतने अधिक विभिन्न धर्म और धर्म-गुरु पाये जाते हैं। मनुष्य का एक निश्चय पर पहुँचना कठिन होता है और वह प्रायः भ्रम में पड़ जाता है। अगर ऐसा नहीं होता है तो मनुष्य कुछ निस्सार कर्म काण्डों को धर्म का सार समझ बैठता है और सब तरफ से आँखें बन्द करके एक लकीर पर चलते चला जाता है। इस प्रकार के धर्म-पालन को अंध श्रद्धा का नाम दिया जाता है और उससे चाहे मनुष्य को थोड़ा-सा संतोष भले ही हो जाय आध्यात्मिक जीवन से उसे अनजान और वंचित ही रहना पड़ता है।
यों तो धर्म का आविर्भाव मानव-सभ्यता के आदि काल से ही हो चुका है। पर उस समय मनुष्य जो कुछ अद्भुत घटना देखता था उसी में ईश्वर की कल्पना कर लेता था। यदि वह देखता कि कहीं आकस्मिक रूप से पृथ्वी में से या जल में से अग्नि प्रकट हो गई तो वहीं पूजा प्रार्थना शुरू कर देता था। इसी प्रकार उल्कापात, तीव्र तूफान, भूकम्प आदि नाशकारी घटनाओं को भी वह ईश्वर का कोप समझ कर उसे भेंट पूजा द्वारा संतुष्ट करने की चेष्टा करता था, इसी प्रकार उसने ईश्वर की सत्ता के विषय में एक मनमानी कल्पना करके उसे धर्म का रूप दे दिया।
पर जैसे-जैसे मनुष्य एक ही प्रकार की घटनाओं को लगातार सर्वत्र देखता गया और उन पर मनन करके उसने प्रकृति के नियमों की एकरूपता को समझ लिया तो वह ब्रह्म और प्रकृति की अखण्डता को अनुभव करने लगा। वह समझने लगा कि संसार में भिन्न-भिन्न रूप और नाम दृष्टि-गोचर होते हैं वास्तव में उनका उद्गम स्थान एक ही है और व्यवहार में पृथक-पृथक जान पड़ने पर भी उनके भीतर एक ही सत्ता-एक ही शक्ति कार्य कर रही है। इस से उसके हृदय में ज्ञान, प्रेम, भक्ति के उच्च भावों का उदय होने लगा और उसकी क्षुद्र वृत्तियाँ दूर होने लगीं।
यह मनुष्य के उत्थान का-ऊर्ध्व गति को प्राप्त होने का वास्तविक मार्ग है। यह मनुष्य के लिये एक स्वाभाविक रास्ता है, जिसमें अस्वाभाविकता की कोई बात नहीं जान पड़ती। पर संसार में ऐसे लोगों का अभाव नहीं जो इस सरल-स्वाभाविक मार्ग को महत्व हीन बतला कर अपना एक निराला पंच-जीवन-दर्शन स्थापित करने में ही अपना बड़प्पन समझते हैं। वे कहते हैं कि वही दर्शन और साधन प्रणाली श्रेष्ठ है जिसमें अपनी कोई विशिष्टता हो। इस विषय की आलोचना करते हुये विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक लेख में कहा है—
“अनेक व्यक्ति स्पर्धापूर्वक यह कहते हैं कि इस प्रकार का एक विशेष भाव रहने वाला दर्शन-शास्त्र प्रकृष्ट (अति उत्तम) है। सब रूप त्याग कर किसी एक विशेष मनुष्य में, ईश्वर का दर्शन करना ही चरम पूजा है। मुझे मालूम है कि मनुष्य इस प्रकार के कृत्रिम उपाय द्वारा हृदय की किसी एक वृत्ति विक्षुब्ध करके बहुत बड़े परिमाण में लाभ उठा सकता है। किसी एक रस को अत्यन्त तीव्र बनाकर खड़ा कर सकता है। किन्तु, क्या इतना करना ही हमारी साधना का लक्ष्य होना चाहिये। अनेक बार देखा जाता है कि अन्धे होने पर स्पर्श शक्ति आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। परन्तु क्या इस प्रकार से शक्ति एक स्थान से चुरा कर दूसरे स्थान पर उपचय (अति-संग्रह) करने से उसे शक्ति की सार्थकता कहा जा सकता है? जहाँ उसका नाश हुआ है क्या वहाँ का विचार नहीं करना चाहिये? जहाँ से शक्ति को नष्ट किया गया क्या उस त्रुटि का दुष्परिणाम हमको भोगना नहीं पड़ेगा?”
हमारे देश में सैंकड़ों प्रकार के पंथों और सम्प्रदायों ने ईश्वर और धर्म के जो एक दूसरे से सर्वथा भिन्न प्रकार के चित्र खींचे हैं और लोगों को नई-नई तरह की साधन-प्रणालियों में लगाया है उसके फल से उनका कोई विशेष कल्याण हुआ हो ऐसी बात नहीं। जो लोग इस प्रकार के कृत्रिम उपायों से एक विशेष प्रकार की उन्नति करने में लग जाते हैं उनका जीवन प्रायः असन्तुलित हो जाता है। वे दर्शनीय अथवा चमत्कारी भले ही बन जायँ पर संसार के काम के नहीं रहते और इस कारण उनके जीवन का सर्वांगपूर्ण विकास भी नहीं हो पाता। बिना इस प्रकार के सर्वांगीण विकास के हम मुक्ति मार्ग में अग्रसर नहीं हो सकते। विश्वकवि की यह सम्मति विचारणीय है—
“वस्तुतः स्वभाव का परिपूर्ण लाभ ही धर्म है, और धर्म-नीति का श्रेष्ठ लाभ यही है। भगवान की धारणा को संकीर्णता में बाँध कर भक्ति की उत्तेजना को उग्र नशे की तरह बनाने में मनुष्यत्व की सार्थकता नहीं मानी जा सकती। भगवान को भी उनके स्वभाव (स्वाभाविक रूप) में ही प्राप्त करने की साधना करनी होगी, तभी हमारा कल्याण होगा। भगवान को केवल अपनी किसी विकृति (त्रुटि) को उपयोगी बना कर, उनको लेकर बहुत-बहुत जोश दिखाने को हम मंगलमय नहीं मान सकते। हो सकता है कि उसमें कहीं सत्य छिपा हो। पर जो शक्तिमान है वह तो उसके द्वारा किसी प्रकार अपना काम चला सकता है, किन्तु उनके दल-में जो अन्य साधारण शक्ति के व्यक्ति आकर जमा होते हैं उनका कुछ ठौर ठिकाना नहीं। उनका आलाप क्रमशः प्रलाप हो उठता है, एवं वे उत्तेजना और उन्माद के पथ पर अपघात (अकाल मृत्यु) को प्राप्त होते हैं।”
सत्य बात यह है कि शुद्ध धर्म कोई गूढ़ रहस्य या कठिन समस्या नहीं है। सीधे से सीधा और अल्प ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी उस पर चलता हुआ अपना और संसार का कल्याण कर सकता है और इस प्रकार आत्मोन्नति के उच्च स्थान पर पहुँच सकता है। पर जो धर्म को अस्वाभाविक बातों में फँसा कर उसे किसी प्रकार सिद्धि, चमत्कार अथवा गुरुडम का साधन बना लेते हैं वे कभी उसके मर्म को प्राप्त नहीं कर पाते और धर्म के रहस्य की बड़ी-बड़ी बातें करने पर भी वे मुक्ति-मार्ग से दूर बने रहते हैं। साँसारिक राग दोषों से बच कर मुक्ति पथ का अनुगामी स्वाभाविक धर्म का अनुयायी ही हो सकता है।
(श्री गिरिजा सहाय व्यास)
हिन्दू शास्त्रों में स्वर्ग का नाम अगणित स्थानों पर आया है। हिन्दुओं के पूजनीय देवता स्वर्ग में है, बृहस्पति देवों के गुरु हैं, शंकर जी के पुत्र स्कन्द सेना पति हैं, कुबेर कोषाध्यक्ष हैं आदि-आदि। वर्तमान समय में भी सौ में से 90 हिन्दुओं का यह विश्वास है कि ऊपर आकाश में कहीं स्वर्गलोक अवश्य मौजूद है, जहाँ पुण्यात्मा लोग मरने के बाद जाते हैं। स्वर्ग-प्राप्ति के लालच से ही बहुसंख्यक व्यक्ति मन्दिर, शिवालय, कुआँ, तालाब, धर्मशाला आदि बनवाया करते हैं, गरीबों को पैसे बाँटते हैं, गौओं को घास खिलाने, बन्दरों को चने डालते हैं, पूजा, पाठ, जप, तप, तीर्थयात्रा आदि करते हैं। साराँश यह है कि वर्तमान हिन्दू समाज में “स्वर्ग” एक बड़ी “प्रेरक” शक्ति है, जिसके प्रभाव से लोग अनेक प्रकार के समाजोपयोगी और परोपकार के कार्य करते रहते हैं।
पर हम यह भी जानते हैं कि स्वर्ग-सम्बन्धी उपर्युक्त विश्वास प्रधानतः अनपढ़ और कम पढ़े लोगों में पाया जाता है। कुछ अधिक शिक्षा-प्राप्त लोग मुँह से स्वर्ग की बात अवश्य कहते हैं। पर उनको इस बात पर दृढ़ विश्वास नहीं होता कि वास्तव में आकाश में ऊपर स्वर्ग और नीचे नर्क लोक इसी प्रकार बसे हैं जैसे हम अपनी इस पृथ्वी को देख रहे हैं। वे कहते हैं कि ‘स्वर्ग-नर्क और कहीं नहीं’ इसी पृथ्वी पर मौजूद हैं और जो व्यक्ति जैसे कर्म करता है उसका स्वर्गीय या नारकीय फल उसे यहीं प्राप्त हो जाता है। इनके अतिरिक्त हिन्दुओं में ही जो एक श्रेणी आध्यात्मवादियों और वेदाँतियों की है और जिसमें प्रायः ऊँचे दर्जे के विद्वान पाये जाते हैं, वे ऐसे स्वर्ग में बिलकुल विश्वास नहीं करते। उनके मतानुसार मनुष्य इसी लोक में इच्छानुसार आत्मोन्नति करके परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त कर सकता है।
इस प्रकार स्वर्ग के विषय में लोगों में अनेक प्रकार के विचार और कल्पनायें प्रचलित हैं। यद्यपि हिन्दुओं के पुराण स्वर्ग की कथाओं से ही भरे-पड़े हैं, पर अब आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से शिक्षित लोगों का विश्वास उनमें बहुत ही कम रह गया है। नई रोशनी के व्यक्ति तो इन बातों को अधिकाँश कल्पित ही मानते हैं।
पर अब थोड़े वर्षों से एक नई विचारधारा का जन्म हुआ है। इसके अनुयायी हिन्दू शास्त्रों और पुराणों की बातों को कपोल कल्पित तो नहीं बतलाते हैं पर वे कहते हैं कि ये वर्णन-रूपक और अलंकारों के द्वारा बहुत बढ़ा-चढ़ा कर किये गये हैं जिससे वास्तविक बातों को न समझ कर लोगों में तरह-2 के भ्रम उत्पन्न हो गये हैं। ऐसे लोगों में सर्व प्रधान थियोसोफिकल समाज का नाम लिया जा सकता है। इन लोगों ने हिन्दू धर्म के सभी सिद्धाँतों की नवीन ढंग से खोज की है और उनके वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला है। क्योंकि ये लोग अधिकाँश में विदेशों के निवासी और उच्चकोटि के विद्वान, प्रतिभाशाली व्यक्ति थे, इसलिए उन्होंने जो कुछ कहा है उसके बुद्धि संगत और विज्ञान के अनुकूल होने का भी ध्यान रखा है।
इन विद्वानों के मतानुसार स्वर्ग लोक ही नहीं पुराणों में बतलाये सातों लोक अवश्य हैं, पर जैसा समझा जाता है वे हमसे बहुत दूर या सर्वथा पृथक नहीं हैं। उनका कहना है कि ये सब लोक हमारे इर्द-गिर्द ही मौजूद हैं, पर उनमें से प्रत्येक की बनावट भिन्न प्रकार के परमाणुओं की है जिसका हमको न तो ज्ञान है और न हम उन्हें अनुभव कर सकते हैं।
जब यह कहा जाता है कि एक मनुष्य एक लोक से दूसरे लोक को गया तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान को चला गया। इसका अर्थ यही है कि उसने अपनी चेतना को दूसरे लोक की ओर बदल दिया। प्रत्येक मनुष्य में सात में से नीचे के पाँच लोकों की प्रकृति भरी है और उनकी प्रकृतियों से बने कोश भी उसमें रहते हैं, जिनके द्वारा वह उन लोकों में वैसी शिक्षा पाने पर क्रिया कर सकता है। इसलिये “एक लोक से दूसरे लोक में जाने” का अर्थ अपने को एक कोष से हटाकर दूसरे कोष में स्थिर करने का है। जैसे स्थूल शरीर से चेतना खींचकर लिंग शरीर में स्थिर करने से भुवर्लोक का सब ज्ञान मिलने लगेगा, और मनोमय कोष स्थिर करने से मनो लोक का भाव होने लगेगा। प्रत्येक शरीर अपने ही लोक के कर्मों को ग्रहण कर सकता है। इसलिए उसे उसी लोक का ज्ञान होना संभव होता है। इस प्रकार यदि चेतना लिंग शरीर में स्थिर है तो उसे केवल भुवर्लोक का ही ज्ञान होगा। जब चेतना स्थूल इन्द्रियों द्वारा कार्य करती है तो उसे केवल भूर्लोक का ही ज्ञान होता है, यद्यपि ये सभी लोक हमारे आस-पास एक की स्थान में और एक ही काल में वर्तमान हैं। वास्तव में इन सब लोकों को मिलने से एक बड़ा विराट रूप होता है जिसके बहुत ही थोड़े भाग को हम लोग एक बार में देख सकते हैं, क्योंकि हमारी शक्ति वहीं तक सीमित है।
मनुष्य जाति को इस समय जिन पाँच खण्डों या लोकों से सम्बन्ध है वे ये हैं—भूः या स्थूललोक, भुवः या एस्थूल, मनोलोक, बुद्धिलोक , और निर्वाण या काललोक। मनुष्य योनि के आरम्भ की अवस्था को छोड़कर बाकी समय में मनुष्य अपना विशेष काल इस “मनलोक” में ही खर्च करता है। क्योंकि जंगली लोगों को छोड़कर दूसरे मनुष्यों को स्वर्ग में रहने की अवधि पृथ्वी के जीवन काल की अपेक्षा प्रायः बीस गुनी होती है। अर्थात् साधारण सद्गृहस्थ वहाँ 600 से 1000 वर्ष तक रहते हैं और विशेष पुण्यात्मा तथा परोपकारी इससे कहीं अधिक समय तक रहते हैं। उसके पश्चात् वे फिर पृथ्वी पर ही जन्म लेते हैं। इस तरह जीवों का सच्चा और पक्का घर पृथ्वी की अपेक्षा यह मनोलोक ही है। पृथ्वीलोक में जन्म धारण करके आना यह उस जीव के जीवन में छोटी परन्तु मुख्य घटना है। इसलिये हम स्थूल शरीर धारियों को उस लोक का हाल समझने के लिए प्रयत्न करना एक दृष्टि से अति आवश्यक है।
दुर्भाग्य से उस मनोलोक का वर्णन इस भूलोक की भाषा में अच्छी तरह हो ही नहीं सकता। वहाँ की प्रकृति यहाँ की प्रकृति की अपेक्षा इतनी सूक्ष्म (बारीक) है और यहाँ की चेतना (ज्ञान) की अपेक्षा वहाँ की चेतना इतनी अधिक बड़ी तथा भिन्न प्रकार की है कि वहाँ का वर्णन यहाँ की भाषा में कर सकना प्रायः असंभव ही है। उदाहरण के लिये मनोलोक में देश और काल का भान ही नहीं होता। जो बातें यहाँ से दूर के स्थानों में और एक के बाद एक होती हैं वे उस लोक में एक साथ और एक ही स्थान पर होती दिखलाई देती हैं। इसका कारण कुछ भी हो पर वहाँ रहने वाले जीवों को ऐसा ही भान होता है। वहाँ की अवस्था का वर्णन एक महापुरुष ने जो योग-शक्ति द्वारा उस स्थान को देख सकते थे, इस प्रकार किया है।
“स्वर्ग के जीवन के विषय में विचार करते हुये हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि वह बड़े गाढ़े सुख का धाम है। स्वर्ग में सब प्रकार के दुःख और बुराइयाँ छूट जाती हैं और प्रत्येक जीव वहाँ पूर्ण रूप से सुखी रहता है। प्रत्येक जीव वहाँ पहुँचने के कारण उतना आत्मानन्द भोग करता है, जितनी भोगने की उसकी शक्ति होती है।
इस लोक में प्रथम बार कुछ कुछ ज्ञान इस बात का होता है कि ईश्वर किस प्रकार का होगा और वह हमें किस प्रकार का बनाना चाहता है। संसारी मनुष्य को जो सुख के विचार हैं वे यहाँ की ज्ञानदृष्टि में बहुत निरर्थक मालूम होते हैं। यहाँ यह देख पड़ता है कि ये विचार ठीक नहीं है और इनसे सुख प्राप्त नहीं हो सकता। इस लोक में कवियों के विचारों से भी बढ़कर सत्य और सुन्दरता पाई जाती है।
इस लोक में आने वाले को इसका प्रथम लक्षण यह देख पड़ता है कि यहाँ किसी प्रकार का दुःख और विकार तो है ही नहीं, वरन् यहाँ सर्व व्यापक सुख के भोग में लोग मग्न रहते हैं। वह सुख अपना प्रभाव सब के ऊपर अवश्य फैलाता है और जब तक जीव स्वर्ग-वास करता है तब तक उसे छोड़ता नहीं इस लोक में रहने से ही यह आनन्द उत्पन्न होता है। बाकी सब जीवों की पूर्ण खुशी से इसे भी खुशी बनी रहती है। पृथ्वी में ऐसी कोई अवस्था या वस्तु नहीं जिससे उसकी उपमा दी जा सके।
इस मनोलोक की प्रकृति के अणु, परमाणुओं में कम्पन बहुत शीघ्रता से होते हैं। यद्यपि हम सिद्धान्त रूप से यह जानते हैं कि हमारी पृथ्वी के पदार्थ के कारण भी सदैव कामयुक्त रहते हैं, चाहे वे देखने में कैसे भी ठोस जान पड़ते हों इसके बाद जब हमको भुवर्लोक का अनुभव हो जाता है तो यह कम्पन स्पष्ट दिखलाई पड़ने लगते हैं और उनके द्वारा ऐसी-ऐसी चमत्कार-युक्त बातों की सम्भावना जान पड़ती है जिनकी भूलोक में हम कल्पना भी नहीं कर सकते। जब भुवर्लोक की ऐसी स्थिति है तो मनोलोग (स्वर्ग) की क्या स्थिति होगी इसको शब्द किस प्रकार प्रकट कर सकते हैं। यहाँ के अणुओं के कम्पनों से वहाँ के अणुओं का कम्पन करोड़ों गुना अधिक हैं, इसलिये यहाँ की और वहाँ की अवस्था में भी वैसा ही अन्तर हैं।”
इस प्रकार जो लोग समझते हैं कि स्वर्ग में पृथ्वी से बढ़ कर भोग विलास की सामग्री मिलती है, वे बड़ी गलती में हैं। यह सत्य है कि वहाँ का जीवन यहाँ के जीवन से करोड़ों गुना आनन्द पूर्ण है पर वह इन्द्रिय तुष्टि का तुच्छ आनन्द नहीं है, वरन् आत्मानन्द है। पृथ्वी के भोग विलास का अन्त तो थोड़े या बहुत समय बाद ही प्रायः ग्लानि में होता है, पर आत्मानन्द निरन्तर बढ़ता ही जाता है क्योंकि स्वर्ग से ऊपर कई लोक हैं जिनमें जीव उन्नति करके जा सकता है। इन सब लोकों के जीवों की ज्ञान राशि तथा शक्ति असीम है, पर उनका लक्ष्य सदैव परसेवा और प्रेम करना ही होता है। पृथ्वी पर भी इन गुणों को हम अपने भीतर अधिक से अधिक बढ़ा सकते हैं और जब हम वैसा करेंगे तभी हमको स्वर्गीय जीवन का कुछ भान होना संभव है।
(डॉ बद्रीनारायण माथुर एम. ए.)
सविता का वरण और सत्यनारायण का व्रत एक ही तत्व का द्विधा वर्णन है। इस रहस्य को कतिपय सुविज्ञ जन ही जानते हैं। सत्यनारायण व्रत करने तथा कथा सुनने का प्रचार आसिन्धु हिमाचल सम्पूर्ण भारत में हैं। यह एक महान् व्रत है। स्वयं भगवान भक्त नारद जी को योगस्थ अवस्था में यह रहस्य बताते हैं “सत्यनारायण स्यवं व्रतं सम्यक् विधानतः, कृत्वा सद्यः सुखं भुक्त्वा परत्र मोक्षमाप्नुयात्” सम्यक् विधान से करने पर यह व्रत भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान कर देता है। इसके पालन से मानव मोह से मुक्त हो परमानन्द प्राप्त कर लेता है उसके अखिल दुःख नष्ट हो जाते हैं।
इस व्रत का अर्वाचीन प्रचलित रूप तो केवल रुढ़ियत्ता मात्र ही प्रतीत होता है आज कल सम्यक् विधान पूर्वक यह व्रत नहीं किया जाता। इस व्रत का मौलिक स्वरूप समझने के लिये प्रथम श्री सत्यनारायण का श्री स्वरूप जानना परमावश्यक है।
सत्यनारायण दो शब्दों का यौगिक है। “यदस्ति त्रिषु कालेषु न बाधते सत् सद् ब्रह्म” जो सत्ता तीनों कालों में एक रस अबाध अखण्ड हो वह सत्य है। जीव और प्रकृति भी अनादि अनन्त होने से सत्य कहलाते हैं; किन्तु ये निर्विकार नहीं, प्रकृति सनातन सत्य होते हुए भी परिवर्तन शील है, ईश्वरीय नियमों में आबद्ध है स्वतंत्र नहीं अतः अनुपास्य है। जीव भी “अजोनित्यं शाश्वतोऽयं” अनादि सत्य है किन्तु यह अल्पज्ञ, अणु; अल्पशक्ति है। इनके अतिरिक्त जो परम सूक्ष्म तत्व नारायण हैं वे ही उपास्य हैं क्योंकि वे पूर्ण सत्य हैं, सर्व तंत्र स्वतंत्र हैं, परमसूक्ष्मता के कारण प्रकृति और जीव दोनों में व्यापक हैं अतएव सर्व प्रेरक और सर्व नियामक, सर्वाधार हैं। अल्पज्ञ अणु जीव उन सर्वज्ञ ‘महतो महीयान’ सच्चिदानन्द से ही कुछ प्राप्त कर सकता है। जड़ प्रकृति से तो जड़ता ही प्राप्त होगी।
बहिर्मुख इन्द्रियों के विषय मनुष्य को बलात् प्रकृति की भुवन मोहनी रूप सज्जा में आसक्त कर देते हैं। प्राकृतिक विषयों का मोह ही समस्त दुःखों का कारण है। मानसकार कहते हैं “मोह सकल संसृति कर मूला” गीताकार भी यही कहते हैं।
“ध्यायते विषयान् पुँसान् संगस्ततेषूपजायते।
संगात् संजायते कामः कामात् क्रोधो ऽभिजायते॥
क्रोधात् भवति संमोहः संमोहात् स्मृति विभ्रमः।
स्मृति भ्रंशात् बुद्धिनाशे बुद्धि नाशात् प्रणश्यति॥
विषयों के ध्यान से मानव उनमें आसक्त हो जाता है यह आसक्ति ही मोह है यही विनाश का कारण है। विषयासक्ति में मनुष्य इतना लीन हो जाता है कि वह भोक्ता है पर भोग्य बन जाता है। कर्त्ता है पर कर्म, दृष्टा होकर भी दृश्य बन जाता है। इस निविड़ अन्धकार में वह आत्मस्वरूप को भूल जाता है। इस अधोगति से वह स्वयं को सँभाल नहीं सकता।
श्री सत्यनारायण का व्रत एवं गायत्री मन्त्र एक स्वर से यही सन्देश दे रहे हैं कि इस मोहान्धकार को त्याग कर परम ज्योति का साक्षात् करो, प्रकृति के मोहनी रूप से ऊपर उठ कर सत्यनारायण सविता देव का वरण करो।
वेद उपनिषद्, और गीता प्रभृति सभी मुहुर्मुहुः यही सन्देश देते हैं कि प्रकृति की जड़ता से परे परम चेतन सत्य को प्राप्त करो।
“उद्वयं तमसस्परिस्वः पश्यन्त उत्तरं, देवं देवत्रा सूर्य भगन्य ज्योतिरुत्तमम्” “तमस् की सीमा से परे आनन्दमय सविता की मंगल ज्योति का साक्षात् करो”
“असतो मा सत गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मा अमृतं गमय।”
असत् से परे सत् की ओर चलो, अज्ञानाँधकार से परे ज्ञान मय निर्मल ज्योति की ओर चलो, जीवन मरण की आवागमनमयी चक्री से निकल कर अमरता की ओर चलो। परमानन्द को प्राप्त करो।
वेदमाता गायत्री का भी यही संदेश है—कि वही सच्चिदानन्द (भूर्भुवः स्वः) सर्वप्रेरक (सविता) वरण करने योग्य है उपास्य है उसी के लिए आत्म समर्पण कर दो।”
वैदिक साहित्य में तमस, अंधकार, अज्ञान, अविद्या माया, विमर्श, प्रकृति प्रधान, अन्यक्त , विकुण्ठा शक्ति त्रिपुरसुन्दरी वाक् आदि प्रकृति के ही वाचक पर्याय शब्द हैं। इधर सत्य, नारायण, सविता, पुरुष, परमपुरुष, परमात्मा, सत्, ज्ञान, सच्चिदानन्द, ज्योति प्रकाश ब्रह्म, सूर्य आदि नारायण के समानार्थी हैं। जो प्रकृति से परे परम सूक्ष्मतत्त्व के वाचक हैं।
बृहदारण्यक् उपनिषद् में ‘सत्यं, शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार भी बताई गई है स—जीव, ति-प्रकृति यम् शासक नियामक अर्थात् जो सत्ता जीव और प्रकृति दो पर शासन करती है दोनों का नियमन करती है वही ‘सत्य’ है।
‘नारायण’ शब्द भी जीव और प्रकृति में व्यापक सर्व नियन्ता का ही बोध कराता है।
“आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो नर सूनवः”
आपः सर्वत्र विस्तृत प्रकृति है, इस प्रकृति में तथा जीव में निवास करने वाला नारायण है।
सत्यनारायण और सविता तत्वतः एक ही हैं। सविता उस उत्पादिका सत्ता का नाम है जो सर्वव्यापक होकर सब में ‘प्रेरणा’ करती है जो जड़ान्धकार से परे निर्मल ज्योति स्वरूप है। प्रसविता होने से सारी सृष्टि उन्हीं के ज्ञान का परिणाम है।
प्राचीन वेदमंत्र भाष्यकारों ने भूर्भुवः स्वः तीनों महाव्याहृतियाँ का अर्थ क्रमशः सत्-चित्-आनन्द किया है। भू का अर्थ सत् है, सत्य। भुवः चित् एवं स्वः आनन्द से चिदानन्द भाव निकलता है जो नारायण का वाचक है इस प्रकार भूर्भुवः स्वः सच्चिदानन्द सत्यनारायण के वाचक शब्द हैं।
भू का सत्तात्मक अर्थ सर्वमान्य है उसी की सत्ता से अखिल ब्रह्माण्ड ठहरा हुआ है जिस प्रकार भूमि उत्पादिका है उसी प्रकार वह शक्ति भी उत्पादिका है प्रसवित्री है जननी है।
संध्या के मन्त्रों में ‘भू’ का सम्बन्ध मस्तिष्क से स्थापित किया है “भू पुनातु शिरसि” वह ईश्वर सविता अपनी सर्वश्रेष्ठ भू विभूति से मेरे शिर को पवित्र करे। पुनः इसी प्रकार में कहा “सत्यं पुनातु पुनः शिरसि” पुनः सत्यं विभूति से मेरे शिर को पवित्र करे। इससे स्पष्ट है कि भू और सत्यं का भाव एक ही है। गायत्री मन्त्र में सात में से तीन ही व्याहृतियों का प्रयोग किया जाता है शेष चार को इन तीन में ही अन्तर्निहित मान लिया है ‘सत्य’ भू व्याहृति में निहित है जैसा उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है।
गायत्री मंत्र का देवता ‘सविता’ है इसका भावार्थ ऊपर दिया जा चुका है। सारी ही व्याहृतियाँ सविता की आत्मरूपा हैं। ॐ भू शीर्ष स्थानीय व्याहृति से इसका सर्वाधिक सम्बन्ध प्रतीत होता है शीर्ष स्थानीय होने से भू प्रेरणाशक्ति भी है जो सविता का अर्थ है। अतः भू सत्य और सविता एक ही अर्थबोधक हैं।
‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ पद में सविता का दर्शक तत् शब्द आया है जो उसकी सूक्ष्मता, अभौतिकता, सर्वव्यापकता और अगोचरता का प्रतीत है। वह जो वां मनसातीत सविता शक्ति है उसके लिए उपनिषदों ने अन्यत्र कहा है “तत्सत्ये प्रतिष्ठतं” वह सत्य में प्रतिष्ठित है। इसीलिए महात्मा गाँधी सत्य को परमेश्वर का श्रेष्ठ नाम मानते थे।
‘भर्गो देवस्य धीमा हे’ उस ज्योतिर्मय पापनाशक सविता के दिव्य तेज को ही धारण करें क्योंकि “सत्यं वै धर्मः” वह सत्य ही धर्म है धारणीय तत्व है ‘असतो मा सत गमय’ उसी की ओर चलना है। ‘सत्यमेव जयते’ उसी की विजय होती है।
वह सविता या सत्यनारायण ही वरेण्यं है वरण करने योग्य है। व्रत लेना और वरण करना एक ही चीज है। पत्नी पति को वरण करने से ही पतिव्रता कहलाती है।
(श्री कैलाशनाथ प्रियदर्शी एम.ए)
जीवन की सब से महान एवं अवश्यम्भावी घटना मृत्यु है। इसके आधार पर संसार का प्रत्येक व्यक्ति मानव जीवन की सफलता एवं असफलता पर अपना निर्णय देता है। धर्म शास्त्र तो यह कहते ही हैं कि—यं यं वापि स्मरन् मावं त्यजत्यन्ते कलेववं। तं तं में वे ति कौन्तेय सदा तद्भाव भाविता। अर्थात् मरण काल में जिन-जिन भावों का स्मरण करता हुआ मनुष्य अपने शरीर को त्यागता है उसी-उसी भावयुक्त जन्म को, स्वर्ग को अथवा मोक्ष को प्राप्त करता है। यह बहुत गंभीर बात है। इसका विवेचन धर्म ग्रन्थों में यत्र तत्र सर्वत्र प्राप्त है। किन्तु लौकिक दृष्टि से इस पर सभी विचार करते एवं निर्णय देते हुए पाये जाते हैं।
कानपुर के साम्प्रदायिक दंगे में जिस समय श्री गणेशशंकर विद्यार्थी, शान्ति का प्रयास करते हुए, मारे गये उस समय गाँधी जी ने इस मृत्यु को महाबलिदान की संज्ञा देते हुए कहा था कि काश मुझे भी इस प्रकार की मृत्यु का सौभाग्य प्राप्त होता। और उनकी इच्छा भी भगवान ने पूर्ण की। उनकी मृत्यु के पूर्व ऐसी अनेक घटनायें घटित हो चुकी थीं जिनसे यह विदित हो गया था कि गाँधी जी की हत्या का प्रयत्न किया जा रहा है। गाँधी जी भी स्वयं यह बात जानते थे। फिर भी, ईश्वर पर अनन्य आस्था रखने वाले, गाँधी जी पूर्ण निर्भय थे और उनका विश्वास था कि जब तक ईश्वर को उनके इस शरीर से काम लेना है तब तक उनका बाल बाँका नहीं हो सकता और जिस दिन इसकी आवश्यकता न रह जाएगी इस जीवन को कोई बचा न सकेगा। उनकी यह निर्भयता, यह आत्म एवं परमात्म विश्वास, यह सेवा भावना, जीव कल्याण में अनुरक्ति आदि सम्पूर्ण भावों का प्राकट्य उनके प्रार्थना सभा में जाते समय ‘हे राम’ शब्द से युक्त मृत्यु से प्रकट हो जाती है।
संसार के सभी व्यक्ति अपने-अपने विश्वासों के अनुसार मृत्यु काल की घटनाओं का विवेचन किया करते हैं। महर्षि दयानन्द की मृत्यु उनकी निर्भीकता एवं सत्यवादिता के कारण विषदान द्वारा हुई। जिस समय उनका मरण काल समीप आया वे मृत्यु शैया पर उठ कर बैठ गये। अत्यन्त निर्बल होते हुए भी उनमें उठकर बैठ जाने का बल आ गया। उन्होंने ईश्वर की प्रार्थना में कुछ वेद मन्त्र कहे और यह कहते हुए प्राण त्याग दिये कि हे ईश्वर तेरी इच्छा पूर्ण हो। उनकी मृत्यु के इस दृश्य ने गुरुदत्त विद्यार्थी सदृश शिक्षित नास्तिक को आस्तिक बना दिया। उनकी इस मुद्रा में उनके जीवन का तप, त्याग, ब्रह्मचर्य, निर्भीकता, ईश्वर निष्ठा एवं साहस प्रत्यक्ष दृष्टि गोचर होता है।
देश की स्वतंत्रता के लिये दीवाने, अनेक शहीदों का इतिहास उनकी मृत्यु काल में जाज्वल्यमान हो उठा है। भगतसिंह फाँसी के तख्ते पर हँसते-हँसते चढ़ गये। उनके शरीर का वजन पहले से बढ़ गया था। यह जानते हुए कि उन्हें शूली पर चढ़ना है उनका देश प्रेम उन्हें वह मस्ती प्रदान किये हुए था जो तपस्वियों की निधि होती है। फिर भला वे चिन्तित क्यों होते और उनका वजन क्यों न बढ़ता। यही हाल रामप्रसाद बिस्मिल का था। उनके देश प्रेम का गान फाँसी के तख्ते पर भी गूँज उठा था और चन्द्रशेखर आजाद की मस्ती, उनकी दीवानगी आज भी प्रयाग के एलफ्रेड पार्क में पहुँचते ही स्मरण हो आती है।
गाँवों में चौपाल पर बैठकर, जाड़े के दिनों में अलाव के आस-पास जब कभी किसी सौभाग्यशाली की मृत्यु की महत्वपूर्ण एवं प्रभावशालिनी चर्चा चल पड़ती है तब एक के बाद एक विलक्षण मृत्युओं की गाथायें गाई जाने लगती हैं। किसी तेरहवीं, श्राद्ध अथवा प्रायः श्मशान घाट पर इस प्रकार की चर्चायें स्वाभाविक ही हैं। मृत्यु के समय साहस की जितनी प्रशंसा होती है उतनी अन्य बातों की नहीं। क्यों न हो मृत्यु भी तो एक महान युद्ध है जिसमें विजय पाना साहस के बिना असम्भव है। यह वह विदाई है जिसके बाद पुनर्मिलन असम्भव है। यह वह यात्रा है जिसका आरम्भ सर्वस्व त्याग पर होता है। सब माया, सब मोह, सब कामनायें समाप्त करने पर इस यात्रा का सुखद समारम्भ होता है। ऐसे समय में जब परिवार छूट रहा हो, धन सम्पत्ति, यश, वैभव सब से अलग हो जाना हो, तब परिवार के छोटे बड़े सब की आँखों में अश्रु, मुख पर उदासी, वाणी में चीत्कार, हृदय में हाहाकार देख, सुन एवं समझ कर भी होठों पर मुस्कान रहे। मृत्यु काल के सहस्र बिच्छुओं के डंक से भी अधिक पीड़ा को सहता हुआ भी मुँह से आह न निकले तो फिर भला ऐसी अलौकिक वीरता एवं साहस की सराहना कौन न करेगा?
किन्तु यह सब मृत्यु काल में ही करने से हो जायगा ऐसा सम्भव नहीं। इसके लिये तो सम्पूर्ण जीवन की साधना भी प्रायः अपर्याप्त हो जाती है। कुछ थोड़े से भाग्यशाली व्यक्ति ही जीवन भर साधना कर के सफल हो पाते हैं और इसीलिये विश्व के इतिहास में इनी गिनी ही ऐसी मृत्युएं हैं जिनकी सराहना सदियों की चर्चा का विषय बन जाती है। हमारा इतिहास तो ऐसे उदाहरणों का ही इतिहास है। राजस्थान का जौहर, जब कि राजपूतों के युद्ध में चले जाने पर उनके घर की नारियाँ विजय की ओर से निराश हो जाने पर जलती ज्वाला में कूद पड़ती थीं, मृत्यु का एक ऐसा अद्वितीय उदाहरण है जिसकी जोड़ का विश्व के इतिहास में कोई वृत्तान्त नहीं है। हमारे पड़ोसी देश जापान ने प्रागैतिहासिक काल में युद्ध के समय खाई पाटने के लिये अपने सहस्रों नवयुवकों को स्वेच्छा से उस खाई में जीवित डालकर विश्व को अपनी वीरता एवं त्याग से चमत्कृत कर दिया था। उसको अभी विश्व भूल भी न पाया था कि इस द्वितीय महायुद्ध में पुनः वहाँ के नवयुवक एवं नवयुवतियों ने अपने अद्वितीय बलिदान का उदाहरण उपस्थित किया। अपने प्राणों की भेंट चढ़ाकर भी, यह जानते हुए भी, कि हमें इस टारपिडो, इस प्लेन अथवा इस गोले के साथ मरना निश्चित है फिर भी उन्होंने मृत्यु का हँसते-हँसते आलिंगन किया और विश्व को चमत्कृत कर दिया। हमारे देश के विभाजन के समय हमारे पंजाब की नारियों ने अपनी सतीत्व रक्षा में जिस बलिदान की झाँकी उपस्थित की उसकी तुलना केवल राजस्थान के जौहर से की जा सकती है। विश्व में अन्यत्र इसकी समता का इतिहास अप्राप्य है। जब एक ओर सतीत्व की रक्षा का प्रश्न था और दूसरी ओर मृत्यु का आलिंगन, तब हँसते-हँसते मृत्यु को गले लगा लेना जीवन के किस महान त्याग की भूमिका है यह समझ कर धर्म प्रेम की महान भावना से हृदय गद्-गद् हो जाता है। यह उन मूक बलिदानों का इतिहास है जिनका नाम व्यक्तिगत रूप से विदित न होकर सामूहिक रूप से अनन्त काल तक प्रेरणा प्रदान करता रहेगा और जिनके अदृश्य चरणों में शीश झुका कर मानव अनन्त काल तक परम शान्ति प्राप्त करेगा।
यह सब घटनायें थोड़े समय के लिये रुक कर विचार करने के लिये हमें बाध्य करती हैं। हमें यह सोचने के लिये प्रेरित करती हैं कि हम इनमें से किस प्रकार की मृत्यु को अपनाने की लालसा करें। यद्यपि यह कहना उनके लिये कैसे प्रिय हो सकता है जो मृत्यु को भुलाकर खाने पीने और मौज करने में लीन हैं, चाहे मृत्यु उनके द्वार पर ही क्यों न आ पहुँची हो। किन्तु प्रिय हो अथवा अप्रिय यह तो सत्य है, यथार्थ है और अवश्यम्भावी है। जो बेखबर रहेंगे मृत्यु उन्हें अनायास ही आकर दबा लेगी और वे यही सोचते रह जायेंगे कि हाय, हमें तो यह मालूम ही न था। हम तो अभी इसके लिये तैयार ही न थे। किन्तु जो उसके लिये तैयारी किये रहेंगे उनके सारे जीवन में संयम, दृढ़ता, लगन और सत्य का समागम तो रहेगा ही साथ ही जब मृत्यु आयेगी तो वे मुस्कुरा कर उसका स्वागत करेंगे और कहेंगे आइये, चलें मैं तो तुम्हारी प्रतीक्षा में ही अपने सम्पूर्ण कार्य निबटाये बैठा था। मृत्यु उनके लिये एक खेल हो जायगी। गीता के शब्दों में जीर्ण वस्त्र उतार कर नवीन वस्त्र धारण करना। उपनिषद् की भाषा में काम करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करना अकर्मण्य रहकर नहीं और विश्व के शब्दों में वाह-वाह क्या अच्छी मृत्यु पाई। मरण समय में भी अधरों पर मुसकान जिह्वा पर भगवान और चेहरे पर गंभीरता। सम्पूर्ण जीवन का उज्ज्वल इतिहास मानो स्वर्णिम अक्षरों में लिख गया हो उसी से चेहरा देदीप्यमान हो उठा है। और जो यह समझते हैं कि विश्व के सम्पूर्ण प्राणी मृत्यु को प्राप्त करेंगे किन्तु मैं सदैव जीवित रहूँगा, उनके लिये तो विश्व के सम्पूर्ण महापुरुष, सम्पूर्ण दर्शन सम्पूर्ण इतिहास एवं सम्पूर्ण धर्म-ग्रंथ व्यर्थ हैं। धर्मराज युधिष्ठिर के शब्दों में सब से बड़ा आश्चर्य यह है कि प्रतिक्षण प्राणियों को काल के गाल में जाते हुए देखकर भी शेष प्राणी यह सोचते हैं कि हमें काल के गाल में नहीं जाना है। किन्तु जो जीवन को एक खेल न समझ कर किसी उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त प्राप्त एक संयोग समझते हैं उन्हें इन बातों पर विचार करके अपने जीवन के कार्यक्रम को दत्तचित्त होकर पूर्ण करने में लग जाना चाहिये। मृत्यु की ओर से सदा सावधान रहना भय नहीं अपितु कार्य रत रहने का साहस प्रदान करेगा।
(श्री मार्कण्डेय जी)
मानव में मानवता तभी टिक सकती है जबकि उसे ऐसी शिक्षा दी जावे जिससे उसका सतत विकास होता रहे। जीवात्मा स्वभाव से ही ऊँची उठने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहती है।
सुशिक्षा से मनुष्य अपनी कमियों को पूर्ण करता है। चाहे शारीरिक हो मानसिक एवं अध्यात्मिक हो सभी के सतत विकास का माध्यम शिक्षा है।
वर्तमान समय में जो शिक्षा दी जाती है वह हमें पूर्ण विकास के मार्ग पर न लेजाकर अहंकारी, प्रमादी तथा मर्यादा से च्युत करने में सहायक बन रही है। आज के विद्यार्थी, वास्तविक विद्या के अर्थी न होकर केवल सर्टिफिकेट प्राप्त करने वाले हैं। हमारे राष्ट्र नायक शिक्षा में धार्मिता का समावेश करने में हिचकते हैं चाहे उसके अभाव में हमारे बालक चरित्रहीन हों या प्रपंची, अथवा उद्दण्ड स्वभाव वाले ही क्यों न बन जायें।
आज की शिक्षा, शिक्षार्थी तथा शिक्षक तीनों जीवन विकास में किस प्रकार सहायक हों, तथा शिक्षालय में कितना प्रेम सद्भावना आदि विशिष्ट गुण, वातावरण पैदा हों यह समस्या विचारणीय ही नहीं किन्तु परम आवश्यक है। इस समय की वे घटनायें जो आये दिन विद्यालयों में सुनाई दे रही हैं, उनसे शिक्षा के वर्तमान स्वरूप का स्पष्ट चित्र सारे संसार को दिखाई दे रहा है।
आज की शिक्षा में भौतिकवाद का बोलबाला है। शिक्षा के विषय ऐसे चुने गये हैं कि उस विषय की अधूरी ही शिक्षा दी जाती है। शिक्षार्थी की बौद्धिक शक्ति का विकास होता नहीं, वे तोता रटंत या रिकार्ड मशीन की तरह एक विशेष स्थिति में ही रह जाते हैं।
वर्तमान शिक्षा एकाँगी है। वास्तविक शिक्षा वह है जिससे मनुष्य अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों पथ का पथिक बन सके जिससे मनुष्य का तन सबल, मन स्वच्छ हो, वह छल प्रपंच रहित, परोपकारी बुद्धिमान तथा एक सुयोग्य नागरिक बने वही सच्ची शिक्षा कही जा सकती है।
आज अध्यात्मिक शिक्षा भी मनुष्य को पूर्ण अमली ज्ञान कराने में असमर्थ हो रही है। जो कुछ भी अध्यात्म के नाम पर अथवा धर्म कृत्य करने कराने वाली शिक्षा दी जाती है वह भी एक यन्त्रवत क्रिया मात्र ही रह जाती है क्योंकि शिक्षक आध्यात्म तत्व, कर्मकाँड के रहस्य को शिक्षार्थी के अन्तर में नहीं उतार पाते। उधर शिक्षार्थी भी अधूरे ज्ञान एवं उपेक्षित मन से अपूर्ण बातें ही सीखते जाते हैं। आत्मज्ञान, वेदाँत के मर्म को भी सही रूप में नहीं जान पाते।
मनुष्य को शिक्षा जितनी अपने जीवन के प्रारम्भ में मिलती है और जितनी उस अवस्था में ग्रहण कराई जाती है उतनी अन्य काल और अवस्था में ठीक-ठीक सम्भव नहीं। बालकपन में हम एक प्रबल जिज्ञासु होते हैं। उस समय के संस्कार जीवन भर जमे रहते हैं। अतएव शिक्षा किसी भी देश के बालकों को ऊँचे उठाने में समर्थ है। धर्मवान्, कर्तव्य निष्ठ, परोपकारी, ज्ञानवान तथा राष्ट्र के सच्चे सपूत बनाने में अच्छी विकासपूर्ण सुशिक्षा दी जानी चाहिये।
मानव जीवन के उत्थान में वही शिक्षा समर्थ है जो उसके विवेक, पुरुषार्थ, सेवा, कृतज्ञतादि भावनाओं को विकसित करे। मनुष्य को सब अवस्थाओं में सुखी प्रसन्न प्रमादहीन बनाये। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि अब शिक्षा के वर्तमान स्वरूप में विकृतियां आ गई हैं। अतः उसमें परिवर्तन करना आवश्यक है। शिक्षा जीवन निर्माण का कारण है। शिक्षा का आदर्श जो हमें आत्मोन्नति की मंजिल में ले जावे एवं हमारे वास्तविक लक्ष्य तथा अभीष्ट की पूर्ति में सहायक हो वैसा ही रक्खा जावे।
अच्छी शिक्षा का आदर्श हमें नीति निपुण सर्व आत्मभावना दायक विश्व के समस्त प्राणियों के प्रति दया, सेवा, भलाई, अपनत्व आदि गुण स्वभाव संस्कार वाले बनाना है।
अच्छी शिक्षा जितनी आवश्यक है उतनी ही उसके उच्च गुण कर्म स्वभाव वाले शिक्षक भी होने चाहियें अथवा बनाने के लिए हमें प्रयत्न करना होगा। योग्य शिक्षक ही तो हममें से दयानन्द, विवेकानन्द, गाँधी तिलक आदि जैसे सच्चे शिक्षार्थी उत्पन्न करते हैं।
अच्छी शिक्षा का ही परिणाम था कि प्राचीन समय में मेधावी, तेजस्वी, मनस्वी और यशस्वी छात्र हमारे देश में होते थे। गौतम, व्यास, पतञ्जलि करणादि, वशिष्ठ जैमिनि जैसे विश्वगुरु भी तो हमारे देश में हुये थे जिनके ज्ञान का आज विश्व ऋणी है।
शिक्षा गुरु को शिक्षक के वास्तविक उद्देश्य तथा मानव-जीवन के परम लक्ष की दृष्टि को जानकर असली राष्ट्र निर्माता के रूप में अपने को एक आदर्श गुरु बनना होगा। हमारी शिक्षा की सफलता योग्य गुरुओं की अपेक्षा रखती है। बालकों के भावी-जीवन तथा समाज की प्रमुख समस्या को स्थिर, प्रेरणा तथा शुद्ध हितकारी वातावरण की ओर जाने में योग्य शिक्षकों की आवश्यकता है।
शिक्षा ऐसी हो जिससे, आत्मा को गति मिले, मानवता का प्रसार हो, शिक्षार्थी की शारीरिक, मानसिक उन्नति हो।
शिक्षा प्रसार संस्थायें अपने इस महत्वपूर्ण कार्य को अच्छी प्रकार से समझें। शिक्षा को किसी विशेष दृष्टिकोण में ही आबद्ध न किया जाय क्योंकि शिक्षा से मनुष्य सब प्रकार की उन्नति करता है। यदि संकुचित बातों में ही शिक्षा का आदर्श और विकास सीमित कर दिया गया तो वह पंगु बन सकती है।
मनुष्य की सुन्दर भावनायें विकसित होती रहें। उनमें दया, प्रेम, उदारता, तथा एक दूसरे को अपना जान सकें ऐसी शिक्षा भी देनी ठीक होगी। कोई भी शिक्षा तब तक अधूरी है जब तक कि वह मानव के विकास में अच्छी प्रकार से प्रमाणित न हो जाय।
वैदिक युग में शिक्षा को इतना महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता था कि जीवन का प्रथम भाग इसी में समाप्त हो जाता था। इसी प्रथमावस्था की शिक्षा शिक्षार्थी के भावी जीवन को सुन्दर बना देती थी। गुरुकुलों की शिक्षा, जहाँ पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन कराते हुये दी जाती थी वहाँ विद्याभ्यास के साथ-साथ ही शिक्षार्थीगण नीति शास्त्र, राज्य रक्षा के प्रकार, तथा राष्ट्र के प्रमुख-प्रमुख हितों की महत्वपूर्ण समस्याओं को भी सीख जाया करते थे।
गुरुकुल के विद्यार्थी उस समय राष्ट्र की निधि समझे जाते थे। आचार्यों द्वारा शिक्षा प्राप्त करके शिक्षार्थी एक सफल गृहस्थ, विद्वान, सदाचारी, अध्यात्मतत्त्व, ज्ञानी, आस्तिक होता था और साथ ही मनुष्य भी।
आज की शिक्षा को जब उस वैदिक युग की शिक्षा से मिलाते हैं तो इसी परिणाम पर दृष्टि जाती है कि वर्तमान शिक्षा अधूरी है। माना कि उस वैदिक युग में और इस युग में बहुत अन्तर है। न वैसे शिक्षक हैं न शिक्षा, किन्तु जो कुछ भी प्राप्त है उससे भी शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाकर शिक्षा का आदर्श एवं लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि शिक्षा से मानव में पूर्णता आती है। जीवन स्तर और बौद्धिक शक्ति का विकास होता है। राष्ट्र का उत्थान अच्छी शिक्षा प्राप्त होने से हो सकता है। अतएव शिक्षा के सर्वांगीण विकास के मूलतत्व को विकसित करना नितान्त आवश्यक है। शिक्षालयों का वातावरण जिस ओर अधिक अच्छा बनाया जाय उसके लिए प्रत्येक संभव प्रयत्न किया जाय। मनुष्य के मस्तिष्क के साथ ही उसके हृदय को भी विशाल एवं उदार जिस शिक्षा के माध्यम से बनाया जाय, आज वैसी ही शिक्षा की नितान्त आवश्यकता है।
गत दो अंकों में ‘अखण्ड-ज्योति’ के परिजनों को व्रतधारी बनने की प्रेरणा दी गई थी। प्रसन्नता की बात है कि उसका सर्वत्र समुचित स्वागत हुआ है। अधिकाँश स्वजनों ने यह अनुभव किया है कि परमार्थ के विचारों का एक मनोरंजन मात्र सफलता और उस विषय की कुछ पुस्तकें या पत्रिकाएं पर्याप्त नहीं हैं। इतने तक ही सीमित रह जाने से वह प्रगति संभव नहीं—जो किसी धर्मप्रेमी के जीवन की होनी चाहिए।
विचारों का उद्देश्य-कार्य के लिए प्रेरणा देता है। यदि कोई विचार केवल मस्तिष्क के दायरे में ही घूमता रहे और कार्य रूप में परिणत न हो तो उससे इतना ही लाभ है कि खाली दिमाग में बुरे विचार आने की संभावना थी, वह रुक गई। यह तो एक अनिष्टकर आक्रमण का प्रतिरोध हुआ, इससे एक हानि रुकी पर वह लाभ तो न हुआ जो सद्विचार अपनाने के उपरान्त होना चाहिए था। दरवाजे मजबूती से बन्द कर दे—चोरी की गुंजाइश न छोड़े तो इतना ही लाभ है कि चोर जो माल उठा ले जा सकते थे, वह न उठा ले जा सके, पर इतने मात्र से व्यापारिक लाभ या आर्थिक उन्नति का अवसर तो नहीं आया। लाभ तो तब है जब उपार्जन में वृद्धि हो, कारोबार बढ़े, लाभ के स्रोत खुलें। किसान केवल रखवाली करता है और बढ़ाने के लिए खाद, पानी, बीज, नराई, गढ़ाई आदि का प्रबन्ध न करे तो बढ़िया फसल प्राप्त करने का लाभ उसे न मिल सकेगा।
जो सद्विचार हमें सत्साहित्य के स्वाध्याय या श्रेष्ठ पुरुषों के सत्संग से मिलते हैं, वे तभी लाभदायक हो सकते हैं, जब उन्हें क्रिया रूप में परिणत किया जाय। देखा गया है कि यही समस्या नहीं सुलझ पाती। व्यावहारिक जीवन का ढर्रा कुछ ऐसे ढंग से चल पड़ा होता है कि उसमें परमार्थ के विचारों को प्रवेश करना किस प्रकार संभव है यह समझ में नहीं आता। आज के अर्थ संकट युग में शारीरिक और मानसिक शक्तिहीनता के कारण तथा सामाजिक दुर्व्यवस्था के कारण उत्पन्न चिन्ताओं से व्यक्ति इतना व्यस्त और परेशान रहता है कि सामने उपस्थित कार्य ही पूरा नहीं हो पाता, फिर परमार्थ के लिए एक नया शिर दर्द कौन बढ़ावे?
यों प्रत्येक आत्मा की—विशेष तथा धर्म और विवेक में आस्था रखने वाले सत्पुरुषों की आकाँक्षा यह अवश्य रहती है कि चौरासी लक्ष योनियों के बाद एक स्वर्ण सौभाग्य की तरह प्राप्त हुआ यह सुरदुर्लभ मानव जीवन ऐसे ही मिट्टी के मोल बर्बाद न होना चाहिए। इसका कुछ सदुपयोग हो, इसमें कुछ परमार्थिक कार्य भी बन पड़े तो ठीक है, पर इस आकाँक्षा को मूर्तिमान देखने में कोई बिरले ही भाग्यशाली सफल होते हैं अन्यथा अन्य अनेक मनोरथों की भाँति इस मनोरथ को मन में दबाये हुए ही जीवन लीला समाप्त होती है।
बहुत हुआ तो किसी ने अपने संचित धन का एक अंश किसी ऐसे कार्य के लिए दे दिया, जिससे पुण्य परमार्थ दिखाई पड़ता हो, साथ ही कुछ कीर्ति प्रशंसा भी मिलती हो। देखा गया है कि परमार्थ भावनाओं को सत्कर्मों के लिए आत्मा की पुकार की तृप्ति लोग कुछ धार्मिक कर्मकाण्ड करके पूरी करने की कोशिश करते हैं। चारों धाम की तीर्थयात्रा, बड़ा सा ब्रह्म-भोज, भागवत की कथा, व्रत उद्यापन, बच्चों का जनेऊ मुण्डन, बड़े से प्रीति-भोज, बहिन-भानजी की शादी में खर्च आदि अर्थ सम्भव एवं लोक प्रशंसा देने वाले कार्य करके प्रसन्न होते हैं। इसमें भी अधिक कदम किसी ने बढ़ाया तो मन्दिर, धर्मशाला, कुआँ, बावड़ी आदि बनवा दी, जो उसकी धर्म प्रियता का प्रमाण प्रदर्शित करती रहे। उन संस्थाओं को भी लोग दान देते हैं जो उनके गले में फूल माला पहनायें, अभिनन्दन करें, ऊँची कुर्सी पर बिठावें, नाम और फोटो छापें, उनके नाम का पत्थर लगावें। संस्थाओं से सम्बन्धित या एकत्रित व्यक्ति उन से परिचित हों, उन्हें धर्मात्मा मानें ऐसा करना लोग अच्छा व्यापार भी मानते हैं। ऐसा करने से उनकी साख बढ़ती है, नये ग्राहक मिलते हैं व्यापार को चमकने की सम्भावना बढ़ती है।
देखा गया है कि अनेकों वकील और डॉक्टर इसी उद्देश्य को लेकर विभिन्न संस्थाओं में प्रवेश करते हैं कि उनकी परमार्थ प्रियता से प्रभावित होकर लोग उनके ग्राहक बनें। कीर्ति और प्रशंसा प्राप्त करना अच्छी बात है, पर इसी मंजिल पर अटके रहे तो लक्ष तक पहुँचना कठिन हो जायगा। परमार्थ के द्वारा आत्मा को जो असीम आनन्द प्राप्त हो सकता है उसे प्राप्त करने के लिए लम्बी मंजिल तय करनी होती है, कुछ ठोस और गंभीर कदम उठाने होते हैं। उपरोक्त बातें तो प्रारम्भिक संस्थान के बल प्रोत्साहन मात्र हैं।
आत्मा का परम स्वार्थ-बंधन-मुक्ति एवं अनन्त आनन्द-जिस गतिविधि के द्वारा उपलब्ध होता है वही परमार्थ है। परमार्थ की भी हमें साँसारिक स्वार्थों जितनी चिन्ता तो करनी ही चाहिए। आत्मा की भूख, आवश्यकता और महत्वाकाँक्षा को बिलकुल ही ध्यान में न देकर केवल शरीर जन्म समस्याओं में ही उलझे रहना, मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी को शोभा नहीं देता है। उसकी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता और विवेकशीलता की कसौटी यही हो कि जीवनयापन की गतिविधि में उसने परमार्थ का कितना समावेश किया। जिसकी गतिविधियाँ जितना परमार्थ पूर्ण हैं, वह उतना ही विवेकवान कहा जा सकता है।
परमार्थ का सही स्वरूप
(1) अपनी व्यक्ति गत दुर्बलताओं को दूर करना—गुण कर्म स्वभाव को सात्विकता से ओत-प्रोत करना तथा (2) दूसरों की अधिकाधिक सेवा सहायता करना। हमारे मनः क्षेत्र में अनेकों दुर्भावनाएँ, दुष्प्रवृत्तियां, बुरी आदतें भरी होती हैं। सामने उपस्थित समस्याओं के रूप को समझने तथा उनका हल सोचने में जिस विशाल दृष्टिकोण की आवश्यकता है, उसके अभाव में ओछी दृष्टि से उनका समाधान भी ओछा ही निकलता है। कुसंस्कारी मन में भरे हुए अनेकों कुविचार तथा ओछे दृष्टिकोण के कारण हमारा सारा क्रियाकलाप औंधा तथा ओछा हो जाता है। परमार्थ मार्ग में यह सब से बड़ी बाधा है।
मानसिक दुर्बलताओं और अपूर्णताओं को समझना और उन्हें सुधारना ही आत्म-निर्माण है। आत्म-निर्माण के लिए ही आस्तिकता एवं धर्मसाधना का सारा ढाँचा खड़ा किया गया था। पर आज तो वह ढाँचा भी लड़खड़ा गया है। आस्तिकता और पूजा का अर्थ आज आत्म-चिन्तन, अपने दोष को ढूँढ़ना और उन से छुटकारा पाने के लिए परमात्मा से आत्म-बल माँगना नहीं रहा। अब तो लोग ईश्वर या देवी देवताओं की मनौती या पूजा इसलिए करते हैं कि उन्हें अमुक भौतिक लाभ मिल जाय। देवी-देवता प्रसन्न होकर उनकी उचित अनुचित तृष्णाओं को पूरा कर दें। पूजा का यह बहुत ही निकृष्ट रूप है। यह परमार्थ नहीं है। इससे आत्म-निर्माण या आत्म-कल्याण का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता। अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को ढूँढ़ना और उन्हें हटाना ही परमार्थ का प्रथम आधार हो सकता है।
परमार्थ का दूसरा आधार सेवा है। दूसरों के प्रति उदारता, दया, करुणा, सहायता, मैत्री आत्मीयता एवं सद्भावना रख कर अधिकाधिक उदार व्यवहार करने से ही साधुता चरितार्थ होती है। इन्हीं गतिविधियों से आत्मा में पुण्य के, धर्म के, सात्विकता के संस्कार जमते हैं और उन्हीं के द्वारा लोक-परलोक सुधरता है। यों आज कुपात्रों की संख्या बहुत है। किसी उदारता का अनुचित लाभ उठाने और उसका दुरुपयोग करने वाले लोग बहुत हैं, उन से सावधानी रखना आवश्यक है। फिर भी सच्ची सेवा के लिए भी बहुत क्षेत्र पड़ा हुआ है। दूसरों को हमारी सहायता की बहुत आवश्यकता है। जो कुछ हमारे पास है वह निश्चय ही हमारी आवश्यकता से अधिक है।
परमात्मा ने मनुष्य को जो शरीरबल, बुद्धिबल, धनबल, प्रदान किया है वह उसका पेट पालने जितना ही नहीं वरन् उस से कहीं अधिक है। सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को जो असाधारण प्रतिभाएँ एवं क्षमताएँ दी हैं उनका उद्देश्य यह नहीं कि व्यक्ति वासना और तृष्णा की पूर्ति में उन्हें लगाये रहे वरन् यह है कि अपने से हीन स्थिति के मनुष्यों तथा प्राणियों की सेवा सहायता करता हुआ अधिक पुण्य एवं आत्म सन्तोष उपार्जित करे। यही उपार्जन उसके जीवनोद्देश्य को पूरा करने को इसका महत्वपूर्ण साधन माना गया है।
आत्म निर्माण और परमार्थ के मानवोचित आदर्शों को व्यवहारिक जीवन में कैसे घुलाया जा सके? इस समस्या का एक व्यवहारिक एवं समयानुकूल हल ‘व्रतधारी’ आन्दोलन है। जिन शिक्षाओं को ‘अखण्ड-ज्योति’ गत 21 वर्षों से देती रही है, अब वह समय आया कि वह शिक्षायें मूर्ति रूप धारण करें। स्वाध्याय और सत्संग के द्वारा जिन आत्माओं में आध्यात्मिक चेतना एवं धार्मिकता उत्पन्न हुई है अब उसके चरितार्थ करने का समय आ गया। शिक्षा वही है जो क्रिया में परिलक्षित हो। अन्यथा तोता रटना तो एक मनोरंजन मात्र है।
इस संस्था के प्रत्येक सदस्य को धार्मिक माना जा सकता है। जहाँ तक विचार क्षेत्र की धर्म भावनाओं का सम्बन्ध है हम में से प्रत्येक सदस्य अपने को धार्मिक सिद्ध करने का पूर्ण अधिकारी है। क्योंकि अखण्ड-ज्योति ने गत 21 वर्षों में जिस विवेकसम्मत धार्मिकता का प्रतिपादन किया है उसे संकीर्ण साम्प्रदायिक या भ्रान्त नहीं कहा जा सकता। वह सार्वभौम, सर्वमान्य, मानवता के आदर्शों के अनुरूप धार्मिकता है। उसे जिन लोगों ने पसन्द एवं स्वीकार किया है वे धर्म के निष्कर्षों तक पहुँच चुके हैं यह मानने में किसी को आपत्ति न होनी चाहिए, पर इतने से ही काम न चलेगा। मान्यताओं को आचरण में लाना आवश्यक है।
आत्म-निर्माण और सेवा-साधना यह हमारे मन और शरीर को पवित्र बनाने वाले माध्यम हैं। इन दोनों माध्यमों को जीवन के अन्य आवश्यक एवं दैनिक कार्यों से जोड़ने के लिए व्यवहारिक कदम उठाना ही व्रत धारण है। व्रतधारी का उद्देश्यपूर्ण विचारों को कार्यान्वित करने के लिए अग्रसर होना, यह सक्रियता प्रत्यक्ष परिणाम उपस्थित करेगी। धर्म भावना से ओत-प्रोत व्रतधारी जब अपनी श्रद्धा को क्रियान्वित करेगा तो उसके द्वारा वही सब होगा जो संसार की महान विभूतियाँ कहलाने वाले महापुरुषों के द्वारा होता रहा है। हमारे व्रतधारी परिजनों में से अगले ही दिनों इतिहास को उज्ज्वल करने वाली विभूतियाँ सामने आवें और युग निर्माण की महत्व पूर्ण भूमिका प्रस्तुत करें तो इसमें किसी को आश्चर्य न होना चाहिये। सद्विचारों से सुसम्पन्न आत्माओं को जब कभी सत्कार्य करने में प्रवृत्त होने का अवसर मिला तो उन्होंने संसार को एक नया प्रकाश दिया है। नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान की —युग निर्माण की योजना को सफल बनाने के लिए जिस उत्साह से, जिन लोगों ने व्रतधारण किये हैं उसे देखते हुए आशाजनक भविष्य की उत्साहवर्धक कल्पनाएँ करना किसी भी प्रकार अनुचित नहीं कहा जा सकता।
अध्यात्मवाद वह तत्व है जो मनुष्य के अन्तःकरण में से भ्रष्ट आकाँक्षाओं और ओछी मान्यताओं को हटाकर विशाल हृदय, उदार दृष्टिकोण एवं दूरदर्शिता की भावना क्षेत्र में प्रतिष्ठापना करता है। यह प्रतिष्ठापना ही मानवता का, महानता का, धार्मिकता का प्रतिनिधित्व करती है। इसको ही अपनाकर मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनता और मनुष्यता के आवश्यक सद्गुणों से सम्पन्न होता है। विश्वामित्र ऋषि के पास रह कर राम-लक्ष्मण जो सीख कर आये थे। संदीपन ऋषि ने गोप-बालक कृष्ण को जो सिखाया था, समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को जो शिक्षा दी थी, नानक ने गुरु गोविन्द सिंह को और अपने शिष्यों को जो सिखाया था वही आध्यात्म है। इसी आध्यात्म को सीखने के लिए प्राचीन समय में सभी बालक गुरुकुलों में भर्ती होते थे और वहाँ से महापुरुष बन कर निकलते थे। नालिन्दा और तक्षशिला के विश्व-विद्यालयों में ‘विष्णु गुप्त चाणक्य’ प्रभृति सहस्रों अध्यापक छात्रों को वह शिक्षा देते थे, जिसे प्राप्त करके शिक्षार्थी विश्व की विभूतियों में चार चाँद लगाने वाले नर रत्न बन कर निकलते थे। आज हमारा दुर्भाग्य ही है कि अज्ञानान्धकार के युग में हमारे आध्यात्मिक आदर्शों को ऐसा विकृत किया गया कि उसमें प्रभावित लाखों आदमी दुर्दशा ग्रस्त, हीन दशा में देश के लिए भार बने हुए विचरते दिखाई पड़ते हैं।
यह अनात्म है। नकली आध्यात्म है। असली आध्यात्मवाद का स्पर्श भी जिसे हो जायगा वह पारस स्पर्श करने वाले लोहे की तरह अपने को बदला हुआ पावेगा। उस आध्यात्म की छाया भी जिस पर पड़ जायगी वह कल्पवृक्ष के नीचे बैठे हुए पथिक की जैसी मनोवाञ्छा पूरी करेगी। उस आध्यात्मवाद की एक बूँद भी जिसकी जीभ पर पड़ जायगी वह अपने को अमरता प्राप्त देवताओं की तरह पाप तापों से निवृत्ति स्वर्गीय भूमिका में विचरण करता हुआ अनुभव करेगा।
उसी असली आध्यात्मवाद की ओर परिजनों को उन्मुख करने के लिए व्रतधारी आन्दोलन का प्रथम कार्यक्रम है। नित्य उपासना व्रतधारी की आवश्यक शर्त है। मन लगे चाहे न लगे इसे गायत्री मंत्र की एक माला अवश्य करनी चाहिए। यज्ञ पिता की उपासना के लिए उसे कम से कम एक धूपबत्ती या एक बार घृत दीप जलाना आवश्यक है। उपासना की विधि चाहे कितने ही छोटे रूप में क्यों न की जाय पर यही सही है, यही ऋषि प्रणीत है, यही आर्य है, यही वैदिक परम्परा है यह मान्यता-हममें से हर एक को स्थापित करनी है। गायत्री ही भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ ही भारतीय धर्म का पिता है यह तथ्य हम सबको भली भाँति समझ लेना है। यदि आर्य सिद्धान्त सत्य है तो यह भी सत्य है कि हमारी सनातन एवं अनादि उपासना गायत्री एवं यज्ञ पर ही आधारित है। अन्य उपासना विधियाँ भी चल सकती हैं पर वे इस शाश्वत साधना का स्थान ग्रहण नहीं कर सकतीं जिसका कि अवलम्बन लेकर हमारे ऋषि−मुनियों, देव अवतारों, से लेकर सामान्य नागरिकों को महानता प्राप्त करने की शक्ति एवं प्रेरणा प्राप्त होती रही है।
उपासना के साथ ही ‘चिन्तन’ का नम्बर आता है। जिस कसौटी पर आत्म और अनात्म, सत् और असत्, खरे और खोटे की परख हो सकती है वह विवेक ही है और यह विवेक हमारे सही चिन्तन पर निर्भर रहता है। स्वाध्याय और सत्संग की महिमा धर्मग्रन्थों में बहुत गायी गई है, इनका बहुत महात्म्य बताया गया है। इसका कारण इन दोनों के द्वारा सही चिन्तन प्राप्त होना ही है। आज स्वाध्याय के नाम पर किसी देवता या महापुरुष की कथा वृत्तान्त या एक ही पुस्तक को रोज रोज पढ़ते रहने की रूढ़ि प्रचलित है। एक पुस्तक का रोज-रोज पाठ करके लोग समझ लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, यह लकीर पीटना कोई उद्देश्य पूरा न करेगा, वरन् जीवन के विभिन्न प्रश्नों पर सही दृष्टिकोण देने वाली विचार शृंखला ही स्वाध्याय कहलाने की सच्ची अधिकारिणी है। व्रतधारी नित्य चिन्तन करेगा, जीवन की विभिन्न समस्याओं पर सही दृष्टिकोण में सोचेगा। इस सोचने में, चिन्तन में सहायता देने के लिए यह संस्था इसे उपयुक्त विचार सामग्री देती रहेगी। व्रतधारी के पास संस्था द्वारा प्रति सप्ताह एक अंक भेजने और नित्य ही चिन्तक के लिए कुछ ठोस सामग्री देने का कार्यक्रम बनाया गया है। चिन्तन आवश्यक है। उसके बिना आध्यात्मिक प्राप्ति हो नहीं सकती। चिन्तन का यह दूसरा कार्यक्रम भी गायत्री और यज्ञ की उपासना के समान ही आवश्यक है।
अपने गुण, कर्म, स्वभाव पर वैसी ही सूक्ष्म दृष्टि रख जाय जैसी सी.आई. डी. वाले राजद्रोहियों पर रखते हैं तो अपनी त्रुटियाँ आसानी से पकड़ी जा सकती हैं, समझ में आ सकती हैं और सुधारी जा सकती हैं। सबमें बड़ी कठिनाई एक ही है कि अपने दोष इसी तरह समझ में नहीं आते जैसे अपनी आँखों में लगा हुआ काजल अपने को दिखाई नहीं पड़ता। यदि यह पकड़ अपने हाथ में आ जाय तो समझना चाहिए कि आत्मनिर्माण की आधी समस्या हल हो गई।
डायरी लिखना व्रतधारी के लिए इसीलिए एक आवश्यक कर्तव्य निर्धारित किया गया है कि वह अपने गुण कर्म स्वभाव पर रोज ही बारीकी से निगाह रखे। जो बुराइयाँ पकड़ में आयें उन्हें नोट करें। पुलिस वाले एक रजिस्टर रखते हैं जिसका नाम “नम्बर 8” होता है। उसमें हलके के बदमाशों के नाम नोट रहते हैं। इन बदमाशों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जाती है। ऐसी सावधानी बरतने से उन बदमाशों की पूरी तो नहीं बहुत कुछ बदमाशी सीमित हो जाती है। इसी प्रकार अपने गुण, कर्म, स्वभाव के हलके में रहने वाले बदमाशों के—कुसंस्कारों के नाम नोट रखे जाएं, उन पर निगरानी रखी जाय तो धीरे-धीरे इनकी उद्दंडता सीमित होती चलेगी। जिस प्रकार मुखिया नम्बरदार सरपंच को पुलिस वाले अपना सहयोगी बनाते हैं उन्हें प्रोत्साहन एवं सम्मान देते है वैसे ही अपने सद्गुणों की परख, प्रशंसा और प्रोत्साहन का कार्य इस डायरी के आधार पर हो सकता है। व्यापारी जैसे अपनी नगदी, माल, और जायदाद का बही खाता रखते को आचरण में व्रतधारी अपने गुण कर्म, स्वभाव का हिसाब रखता जाय तो अन्तः प्रदेश की अव्यवस्था पर काबू प्राप्त किया जा सकता है और आत्म निर्माण का कार्य बहुत सरल हो सकता है।
आत्मा को परमात्मा के रूप में परिणत करने, आत्मसाक्षात्कार, ईश्वर मिलन, ब्रह्मनिर्वाण एवं जीवन मुक्ति प्राप्त करने का एक ही मार्ग है आत्म निर्माण। व्रतधारी को इस दिशा में तेजी से अग्रसर करने की पूरी-पूरी चेष्टा इस सत्संकल्प के आधार पर की गई है।
बुरे विचारों और बुरे कार्यों की ओर मनुष्य का मन स्वभावतः चलता है, कोई परिस्थिति एवं प्रेरणा मिलने पर तो वह और भी अधिक तेजी से उस ओर अग्रसर होता है किन्तु सद्विचारों और शुभ कार्यों के बारे में ऐसी बात नहीं है। उसके लिए पहले तो इच्छा ही नहीं होती, यदि किसी प्रेरणा या उत्तेजना से इच्छा हुई भी तो वह उत्साह ठंडा होते ही शिथिलता आ जाती है, और वह शुभ संकल्प लड़खड़ाने लगता है, यदि उसे सँभालने का प्रयत्न न किया गया तो कुछ ही दिनों में वह समाप्त भी हो जाता है। जप, तप, साधना, दान, पुण्य, सेवा परमार्थ की इच्छा और कल्पना कई लोग करते हैं पर यदि उस इच्छा के पीछे प्रेरणा प्रोत्साहन बना रहा तो ही उसका कार्य रूप बनता है अन्यथा वह मनोरथ केवल कल्पना मात्र रह कर समाप्त हो जाते हैं।
आत्म निर्माण और परमार्थ यह दो कार्य मानव जीवन को सफल बनाने वाले मुख्य आधार हैं। इनके लिये प्रत्येक धर्मप्रेमी की अभिरुचि भी होती है। परन्तु इच्छा शक्ति एवं संकल्प बल की दुर्बलता के कारण वे भावनाएं चरितार्थ नहीं हो पातीं, कभी थोड़ा सा कुछ कार्य हुआ भी तो मानसिक शिथिलता आते ही उत्साह ठंडा पड़ता है और कोई मामूली सी झंझट आने के बहाने वह कार्यक्रम समाप्त हो जाता है।
अमुक व्रत निभ नहीं सका, इसका हेतु लोग अमुक कठिनाई आ जाना बताया करते हैं। यह एक बहाना है। वास्तविकता इससे भिन्न है। तथ्य यह है कि वह कठिनाई आने से पूर्व मन उस सम्बन्ध में उत्साह खो चुका होता है, कोई बहाना इस झंझट से छुटकारा पाने के लिए ढूंढ़ता रहता है। जब कोई बहाना मिल जाता है तो उसे अपनी दुर्बलता छिपाने का एक अच्छा अवसर मानकर झट उस शुभ संकल्प को समाप्त कर देता है जहाँ ऐसी बात नहीं होती वह व्रत निभता रहता है। अनेक झंझटों और कठिनाइयों के बीच भी लोगों ने बड़े बड़े कठिन व्रत जीवन भर निभाये हैं, कोई सामाजिक आपत्ति उसमें बाधक हुई भी है तो उस आपत्ति का अनिवार्य काल समाप्त होते ही वे तुरन्त अपने व्रत पर आरुढ़ हो जाते हैं और जो उस कठिनाई के समय से छूट हुई थी उसकी पूर्ति भी कर लेते हैं। यदि निष्ठा सच्ची और पक्की हो तो वह सब कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लेता है, उसकी यात्रा रुकती नहीं।
यह मानसिक दुर्बलता ही है जो मार्ग सन्मार्ग के पालकों को पग पग पर बाधक बनती है। कितने ही ऐसे विचारक, मनीषी, सेवाभावी और उच्च महत्वाकांक्षाएं रखने वाले लोग होते हैं जो यदि अपने आदर्शों को लगातार निबाहते रह सके होते तो निश्चय ही संसार के इतिहास में अपना काम अमर कर गए होते, दूसरे के लिए अनुकरणीय प्रकाश स्तंभ सिद्ध हुए होते, जीवन का लक्ष पूर्ण करते हुए अत्यन्त आनन्दपूर्वक नर-तन की सार्थकता का रसास्वादन करते। पर उनकी उच्च मनोभूमि को इस हत्यारी मानसिक दुर्बलता ने ही सफल न होने दिया। उन बेचारों ने जब जब छुट पुट प्रयत्न आरंभ किये कि यह दुर्बलता आड़े आई। कोई छोटी सी प्रतिकूल परिस्थिति सामने आते ही उत्साह ठंडा हुआ, प्रयत्न छूटा, प्रगति समाप्त हो गई। इस प्रकार की अनेकों महान आत्माएं हैं जिनके उच्च अन्तःकरण को इस दुर्बलता ने विकसित नहीं होने दिया। उनकी आन्तरिक बेकार चली गई।
इस दुर्बलता पर विजय प्राप्त करने का एक मात्र उपाय “व्रतशीलता” है। प्रतिज्ञा में, शपथ में, प्रण में एक प्रेरणा विकास करती है। जब-जब मन ढीला पड़ता है तब तब अंतरात्मा धक्का मारती है कि यह करते रहने का तो व्रत लिया था। व्रत तोड़ना कायरता है, अधर्म है, पाप है, लोकापवाद का-निन्दा अपयश का हेतु है, इसलिए जैसे बने वैसे अब इस व्रत को तो निबाहना ही है।
सज्जनों और देवताओं की उपस्थिति में अग्नि देवता को साक्षी करके भाँवर फिरते हुए पति पत्नी आजीवन दाम्पत्ति संबंध निवाहने की प्रतिज्ञा करते है तो फिर अनेक अड़चनें आते रहने पर भी उसे निबाहते हैं। निबाहने की भावना हो तो कठिनाइयाँ लुढ़कती पुढ़कती चलती रहती हैं और व्रत भी निभ जाता है। व्रत निभे तो स्थिर मन से स्थिर कार्यक्रम के अनुसार स्थिर प्रयत्न का जो परिणाम होना चाहिए वह भी होता ही है। विवाह के समय ली हुई प्रतिज्ञा-अनेक आँधी तूफानों से टकराती हुई अन्ततः भरी पूरी गृहस्थ फुलवारी के रूप में उपस्थित होती है। नाती पोतों से भरा पूरा घर छोड़कर ही वह दम्पत्ति अपनी जीवन लीला समाप्त करते हैं।
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों ने गत 21 वर्षों में अपनी मनोभूमि को निश्चय ही बहुत परिष्कृत किया है। उन्होंने इतने उच्च विचार, लम्बे समय तक निरंतर प्राप्त किये हैं कि यदि उनके कार्य रूप में परिणत होने का अवसर आ जाय तो इनमें से प्रत्येक परिजन एक युगपुरुष-नररत्न सिद्ध हो सकता है। उनमें अनेकों की शक्ति और स्थिति भी ऐसी है कि वे अपना जीवन सफल करें इतना ही नहीं वरन् अनेकों के बुझे हुए दीपकों को जलाकर इस निराशा की निशा में धर्म और ज्ञान की दीपावली जगमग कर सकते हैं। पर कठिनाई एक ही है मानसिक दुर्बलता। उसे परास्त करने के लिए जिस व्रतशीलता की आवश्यकता है उसके बिना कोई ऊँची आशा भी नहीं की जा सकती।
कुछ कर गुजरने के लिए व्रतशीलता, संकल्पव्रत आवश्यक है। हिन्दू धर्म में संकल्प पर बहुत जोर दिया गया है। पंडित लोग हर छोटी छोटी बात का संकल्प कराते हैं। यहाँ तक कि संख्या सरीखे दैनिक कृत्य में भी पहले संकल्प बोला जाता हे, कोई दान देना हो, ब्राह्मण भोजन कराना हो, तो पहले संकल्प पढ़ाया जायेगा तब वह कार्य सम्पन्न होगा। आरंभ में संकल्प करना फिर उसे पूर्ण करना, यह मानसिक उत्साह और आत्मविश्वास बढ़ाने का अचूक नुस्खा है। मैं अमुक कार्य करूंगा यह प्रण करने के बाद जब पूर्ण कर लिया जाता है तो करने वाले की हिम्मत बढ़ती है उसे अपनी क्षमता और शक्ति पर विश्वास होता है, अपनी कुशलता सफलता पर उसे गर्व होता है। मनोबल बढ़ाने का यही मार्ग है। सचमुच ही सफलता के लिए संकल्प-बल आवश्यक है। एक बार असफल होने पर भी यह संकल्प बल ही उसे बार-बार प्रयत्न करने और जब तक सफलता न मिले निरन्तर लगे रहने की प्रेरणा देता है। निराशा की या प्रयत्न छोड़ बैठने की तो व्रतधारण करने वाले के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। उसे तो हर परिस्थिति का सामना करते हुए-चाहे कितना ही विलम्ब क्यों न लगे अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए लगे रहने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं है। वह व्रत की पूर्ति के लिए जीवन भर प्रतीक्षा एवं प्रयत्न करने में प्रसन्नता पूर्वक लगा रह सके ऐसी प्रेरणा संकल्प व्रत में ही सन्निहित रहती है।
हम लोग जीवन में कुछ ठोस काम कर सकें इसके लिए व्रतशील होना आवश्यक है। प्रतिज्ञाबद्ध होकर जो कार्य हो सकेगा वह व्रतहीन रहने पर किसी प्रकार संभव नहीं है। कई व्यक्ति एक ऐसी लंगड़ी दलील उपस्थित किया करते हैं कि—”हम व्रत तो नहीं लेते पर यह कार्य करने का प्रयत्न करेंगे। व्रत लेने पर यदि वह नहीं किया तो पाप लगेगा। इसलिए व्रत न लेना ही उचित है।”
ऐसे लोग न तो व्रत की शक्ति को समझते हैं और न मर्यादा को। व्रत लिये बिना कोई प्रयत्न देर तक उस दिशा में टिका रहेगा ऐसी आशा नहीं की जाती। जिम्मेदारी का काम देने से पूर्व किसी व्यक्ति से बौण्ड भराये जाते हैं। बिना व्रत लिए कोई व्यक्ति जिम्मेदारी निबाहने योग्य नहीं समझा जाता। प्राचीन काल में कोई छात्र गुरुकुल में शिक्षा तभी प्राप्त कर सकता था जब उसका व्रतबंध-उपनयन-संस्कार हो जाय। बिना प्रतिज्ञा का व्यक्ति बेपेंदी का लोटा है जो किधर भी लुढ़क सकता है। सरकारी किसी प्रतिनिधि संस्था में, असेम्बली या पार्लमेण्ट में भी चुना हुआ सदस्य तभी प्रवेश कर सकता है जब यह निर्धारित शपथ ले ले। कोई सदस्य शपथ लेने से इनकार करे—कहे शपथ की क्या जरूरत है हम तो ऐसे ही पार्लमेन्ट के नियम पालन करते रहेंगे, तो उसे संकल्प शक्ति की महत्ता तथा आवश्यकता से अपरिचित बेवकूफ कह कर चुनाव में सफल होने पर भी उस संस्था से बहिष्कृत कर दिया जायगा। सरकारी नौकरियों से लेकर शिक्षा संस्था में प्रवेश पाने तक के लिए एक निर्धारित प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करने होते हैं। निश्चय ही व्रतशीलता आवश्यक है। महान कार्यों के लिए तो उसकी अनिवार्य आवश्यकता है। इसके अभाव में मनोबल शिथिल हो जाना और किसी भी प्रवाह में बह जाने की आशंका बनी रहती है।
अब हम सब अपने उच्च विचारों को सामूहिक रूप से कार्यान्वित करने के लिए सुव्यवस्थित योजनाबद्ध कदम उठा रहे हैं। ऐसी संक्राति बेला में ‘व्रत’ ही हमारा प्रधान अवलम्बन है। दुर्बल मनोभूमि में इसी आधार पर दृढ़ता एवं निष्ठा संभव है। व्रत लेने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि आज ही इस क्षण पूर्ण रूपेण वह स्थिति प्राप्त हो जानी चाहिए जिसके लिए प्रतिज्ञा की गई है वरन् यह है कि ईमानदारी और सचाई के साथ यह प्रयत्न करेंगे कि निर्धारित लक्ष की ओर निरन्तर बढ़ते रहेंगे। बीच बीच में जो बाधाएं आपत्तियाँ, अड़चनें एवं असफलताएं सामने आवेंगी उनमें हताश न होते हुए—भूलों को सुधारते हुए—निरन्तर लक्ष मार्ग पर बढ़ते रहेंगे। दिशा और यात्रा की निरन्तरता का ही व्रत लिया जाता है। यदि इरादा और प्रयत्न छोड़ न दिया जाय तो व्रत निभता ही है, चाहे प्रगति कितनी ही धीमी क्यों न हो पर प्रयत्न कर्ता का व्रत टूटा हुआ नहीं माना जा सकता। कोई भी त्रुटि न हो ऐसी स्थिति व्रत धारण के दिन नहीं वरन् संकल्प पूर्णता के दिन प्राप्त होती है।
आत्म निर्माण और परमार्थ साधना का व्रत लेने में उन लोगों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए जो इन दोनों बातों की महत्ता स्वीकार करते हैं और उन्हें कार्य रूप में परिणत करना चाहते हैं। आत्म निर्माण का जो कार्यक्रम व्रतधारी के लिए निर्धारित किया गया है वह कुछ भी कठिन नहीं है। उपासना, आत्म चिन्तन, स्वाध्याय, गुण कर्म स्वभाव का लेखा जोखा यह चारों काम व्यवहारिक दृष्टि से भी बहुत सरल हैं। इन्हें कौन नहीं कर सकता है? अब तक भी हम लोग अस्त व्यस्त रूप से इन कार्यों को करते ही रहे हैं। फिर नित्य, निरन्तर, नियमित रूप से इन्हें करने की प्रतिज्ञा लेकर अपनी कार्यशैली को अत्यधिक प्रभावशाली बनाने का अवसर आने पर झिझकने की आवश्यकता ही क्या है? यह एक अव्यवस्था को व्यवस्था में, ढिलमिल नीति को तीव्र प्रयत्न में परिणत करने का प्रयत्न है। इससे प्रत्येक परिजन को आत्मिक प्रगति में सहायता ही मिल सकती है, कोई नई अड़चन-आने की तो किसी भी प्रकार संभावना है ही नहीं।
आत्म कल्याण का व्रत धारण करने के पश्चात् यह स्मरण निरन्तर बना रहना स्वाभाविक है कि हमें शरीर यात्रा संबंधी साँसारिक कर्तव्यों का पालन करने के समान ही आत्मा की हित साधना करने का भी ध्यान रखना है और आत्म कल्याण को भी अपना स्वार्थ एवं लाभ उसी तरह मानना है जैसे व्यापार, आहार, स्नान, शयन आदि को आवश्यक मानते हैं। यह निष्ठा मनःक्षेत्र में जमते ही हमारे जीवन क्रम में आश्चर्य जनक परिवर्तन दिखाई पड़ने लगता है। व्रत धारण की महिमा प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने लगती है। तब यह पता चलता है कि व्रत धारण यों कहने और सुनने में बहुत हलकी सी बात थी, पर उसके पीछे कितना ठोस आधार मौजूद था।
आत्म कल्याण के लिए आत्म निर्माण के लिए जिस प्रकार उपासना, आत्म चिन्तन और गुण कर्म स्वभाव का लेखा जोखा रखना आवश्यक है उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि दैनिक जीवन में—परमार्थ के लिए-परोपकार के लिए-लोक सेवा के लिए नित्य ही कुछ नियमित समय और श्रम लगाया जाता रहे। यह भी भजन का ही एक भाग है। सेवा के बिना भजन पूरा नहीं होता। भजन शब्द संस्कृत की ‘भज्-सेवयाँ’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है सेवा। उपासना, जप, ध्यान पूजन अर्चन की भाँति ही सेवा भी प्रत्येक भजन में आस्था रखने वाले धर्म प्रेमी के लिए आवश्यक है।
जो जप तो खूब करता है पर परमार्थ से लोक सेवा से उदासीन है, उसे व्यर्थ मानता है, ऐसे व्यक्ति को अधकचरा अध्यात्मवादी ही कह सकते हैं प्राचीन काल में जितने भी ऋषि मुनि हुए हैं उनसे साधना से जप तप से लोक सेवा को रत्ती भर भी कम महत्व नहीं दिया है। उनके जीवन क्रम पर गंभीर दृष्टि डालते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वे जितना समय जप तप में लगाते थे, उससे कई गुना समय जन कल्याण की सेवा मय प्रवृत्तियों में भी लगाते थे। सेवा विहीन भजन निश्चय ही अपूर्ण है। अपूर्ण प्रयत्न का फल भी अपूर्ण ही रह जाता है।
परोपकार में आजकल वे कार्य गिने जाते हैं जो आँखों से प्रत्यक्ष दिखाई दें। जैसे मन्दिर धर्मशाला बनवाना, गौशाला बनाना सदावर्त बाँटना, प्याऊ, लगाना, ब्राह्मण भोजन कराना, कथा कीर्तन चिड़ियों का दाना डालना आदि। यह कार्य हर एक को होते दिखाई पड़ते हैं, जिससे करने वाला और देखने वाला दोनों ही अपनी आँखों से अपनी कृति को देख लेते हैं और प्रशंसा प्रसन्नता तथा सन्तोष का अनुभव कर लेते हैं। यह कार्य उत्तम हैं। पर हलके दर्जे के हैं, उनके परिणाम भी हलके ही हैं। कुछ देर के लिए कुछ जीवों को इन कार्यों में सुविधा मिलती है। इतना ही इनका लाभ है। पर इनसे किसी के जीवन की समस्यायें नहीं सुलझतीं। वे कार्य महान पुण्य माने गये हैं जिनसे किसी की समस्याएं सुलझती हैं। ऐसा कार्य विचारदान, ज्ञान-दान ही हो सकता है जो लोगों के दृष्टिकोण को बदल कर उन्हें हीन दशा से उच्च स्थिति में पहुँचा दे। सद्विचार के अभाव में ही संसार में तीन चौथाई दुःख हैं। यदि यह कमी पूरी हो जाय तो स्वल्प साधन होते हुए भी मनुष्य स्वर्गीय सुख शान्ति का रसास्वादन कर सकता है। उसके सामने उपस्थित पहाड़ जैसी कठिन समस्याएं तिनके के समान हलकी हो सकती हैं।
धन से संभव सत्कार्यों की अपेक्षा पसीना बहाकर श्रमदान द्वारा किये जाने वाले शुभ कर्मों का महत्व अधिक है। उनमें भी श्रेष्ठ वे कर्म हैं जो विचारों द्वारा किये जाते हैं। ज्ञान दान, विद्या दान, एवं धर्मोपदेश को संसार का सर्व प्रधान सत्कर्म माना गया है। इसे करने के कारण ही ब्राह्मण को समाज में सर्वोपरि सम्मान दिया गया है।
यों सद्विचारों की सदा ही मनुष्य को आवश्यकता रहती है। इसके बिना किसी भी युग में बालकों का स्वस्थ विकास और युवाओं का नियंत्रण एवं वृद्धों को सेवा मार्ग में लगना संभव नहीं होता। यह तो शाश्वत आवश्यकता हुई। आज की स्थिति में तो चारों ओर अनैतिकता का साम्राज्य छाया हुआ है और दुष्प्रवृत्तियाँ इतने विकराल रूप में ताण्डव नृत्य कर रही हैं कि यदि स्थिति में हेर फेर न हुआ तो मनुष्य जाति को सामूहिक आत्म-घात करना पड़ेगा। द्वापर के यदुवंशियों की तरह सारी दुनिया आपस में ही लड़ मर कर समाप्त हो जायगी। यह दुष्प्रवृत्तियाँ हर व्यक्ति के अन्तःकरण को-हर घर को-नरक बनाये हुए हैं। सामाजिक सुव्यवस्था की मर्यादाएं टूटती जा रही हैं। इन परिस्थितियों में भौतिक सुख साधन कितने ही क्यों न बढ़ा लिए जाय। सुख शान्ति की दिशा में रत्ती भर भी प्रगति संभव न होगी।
इन परिस्थितियों में हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण सेवा कार्य यही हो सकता है कि—धार्मिक वातावरण पैदा करने के लिए पूरी शक्ति से लगें। इस वातावरण को उत्पन्न करके दृष्टता को सज्जनता में परिणत किया जा सकता है। अनीति और अन्याय पाप और पशुता की उत्पीड़ा से कराहती हुई मानवता को सन्तोष की साँस लेने का अवसर मिल सकता है।
गायत्री संस्था के सम्मुख नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान की जो विशाल योजना है। उसका एक मात्र उद्देश्य लोगों के अन्तः प्रदेश में धार्मिक आदर्शों की प्रतिष्ठापना कराके जन साधारण को कर्तव्य परायण सदाचारी एवं समाज सेवी सभ्य नागरिक बनाना है। जीवन के प्रत्येक पहलू को सन्मार्ग के पथ पर विकसित करने की इस योजना के अंतर्गत पूरी-पूरी चेष्टा की जायगी। पर अभी हाल में—आन्दोलन के प्रारम्भ काल में—कुछ सरल कार्यक्रम उसी प्रकार हाथ में लिये गये हैं जिस प्रकार परीक्षा के समय विद्यार्थी सबसे पहले उन्हीं प्रश्नों को हल करता है जो उसे अधिक सरल दीखते हैं। इस संस्था में भी अभी 20 कार्यक्रम हाल में लिए हैं 10 रचनात्मक 10 निषेधात्मक।
रचनात्मक यह है—(1) सेवा भावना (2) सामूहिकता (3) मितव्ययिता (4) स्वच्छता (5) सादगी (6) शिष्टाचार (7) समता (8) स्वास्थ्य संवर्धन (9) स्वाध्याय (10) आस्तिकता। इन दस प्रवृत्तियों को लोगों के भावना क्षेत्र में उतारने के लिए समझना, इन्हें चरितार्थ करने के लिए हर व्यक्ति की स्थिति के अनुसार कार्यक्रम देना तथा इनके प्रतिकूल जो आदतें पड़ गई हों उन्हें सुधारना।
निषेधात्मक यह है—(1) माँसाहार (2) नशेबाजी (3) शारीरिक और मानसिक व्यभिचार, अश्लीलता (4) जुआ-चोरी (5) आलस्य (6) अन्ध विश्वास (7) भ्रष्टाचार (8) दहेज अनमेल विवाह (9) मृतक भोज (10) पशु-पीड़न। यह बुराइयाँ हमारे सामाजिक जीवन को बुरी तरह अस्त व्यस्त किये देर ही हैं। इनके दुष्परिणामों में से जन साधारण को परिचित कराना इनके प्रति घृणा उत्पन्न कराना और इन्हें छोड़ने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना।
व्रत धारी के परमार्थ कार्यक्रम में इन 10 रचनात्मक और 10 निषेधात्मक कार्यों का समावेश रहेगा। इन बातों का महत्व उसे स्वयं समझना है और अपने 7 धर्म साथियों को समझाना है। इस संस्था में प्रकाशित होने वाले चारों अंक प्रति सप्ताह इस शिक्षण की पर्याप्त सामग्री लेकर व्रतधारी के घर उपस्थित हुआ करेंगे। इनको पूरे ध्यान के साथ स्वयं पढ़ना और अपने धर्म साथियों को पढ़ने में प्रवृत्त करना उसका आवश्यक कार्य होगा।
यह चिन्ता करने की जरूरत नहीं कि—”हमारा कार्यक्षेत्र सीमित है। इतने बड़े समाज सुधार के कार्य तो कोई नेता, प्रचारक या फालतू समय वाले लोग कर सकते हैं। हमारे पास जब अपने निज के कार्य के लायक भी समय नहीं हो तो अन्यान्य लोगों को समझाते बुझाते फिरना या किसी की मर्जी के विरुद्ध उसे कहने पर व्यर्थ का झगड़ा मोल लेने का कार्य हमसे न हो सकेगा। हम इस झंझट में क्यों पड़ें।”
वस्तुतः कठिनाई वैसी नहीं है जैसी समझी जा रही है। हमारे पास ठोस विचार हों, और इन्हें रुचि पूर्वक सुनने समझने मात्र के लिए यदि कुछ लोगों को तैयार किया जा सके तो निश्चय ही उनके विचारों में परिवर्तन होगा। विचार बदलने के साथ साथ कामों में भी हेर फेर अवश्य होता है। एक छोटा सा संगठित गुट यदि एक प्रकार के विचारों से प्रभावित दीखता है तो देखा-देखी और भी अनेक लोग उस प्रवाह में बहते हैं। एक को देखकर दूसरे का प्रभावित होना यही दुनिया की चाल है। अनिच्छा होते हुए भी देखा देखी के कारण यदि हानिकारक बातों को अपनाये रहने को विवश होते हैं तो अच्छे अनुकरणीय, विवेक संगत तथ्यों से लोग प्रभावित न हों ऐसा नहीं हो सकता। जमाने को बदलना एक आदमी के लिए कठिन हो सकता है, पर जनशक्ति की चण्डी जिस ओर मुड़ जाय उसी ओर लोक मानस का मुड़ जाना सहज है।
युग निर्माण की योजना काफी कठिन और बड़ी मालूम देती है, पर यदि अपना व्रतधारी परिवार इसके लिए कृत संकल्प हो जाय तो यह पूर्ण निश्चय है कि कुछ ही दिनों में वातावरण बदलने में आश्चर्य जनक सफलता मिल सकती है। गायत्री मंत्र ब्राह्मण के अतिरिक्त दूसरे न पढ़ें, यज्ञ में स्त्रियों न बैठें, इन दो बातों का संकीर्णतावादी लोग आज से तीन चार वर्ष पूर्व ही घोर विरोध करते थे। लड़ाई झगड़े तक पर आमादा होते थे। पर इन थोड़े ही दिनों से इस संस्था के प्रयत्न ने वातावरण बदल दिया। अब इस प्रकार का विरोध करने वालों की संख्या पाँच प्रतिशत भी नहीं रही है। विरोधी भी समर्थक बन गये हैं। देखा देखी में बहुत काम होता है, वातावरण बदलता है और युग पलट जाते हैं।
परमार्थ का सबसे बड़ा सेवा कार्य व्रतधारी को यही सोचा गया है कि वह फिलहाल उपरोक्त 20 कार्यक्रमों का और आगे चलना धार्मिकता की बहुमुखी प्रवृत्तियों को सुविस्तृत करने के लिए अपनी मनोभूमि तथा आदत तैयार करे साथ ही जितने अधिक लोगों तक इन विचारों को पहुँचा सके जितने अधिक लोगों को इस प्रभाव से प्रभावित कर सके उसके लिए प्रयत्न करे। आरंभ में सात धर्म साथी बनाने की बात रखी गई है पर पीछे तो यह संख्या अनेक गुनी बढ़ाई जानी चाहिए—स्वयं ही बढ़ेगी।
हर मनुष्य का बीसियों पचासों आदमियों से संबंध रहता है। व्यापार, नौकरी, या जो भी कार्य क्षेत्र अपना हो इससे संबंधित अनेकों लोगों से मिलना जुलना होता ही रहता है। इनमें से उन लोगों को पहले छाँटना चाहिए जिनमें थोड़ी विचारशीलता और सज्जनता दिखाई पड़ती हो। अन्य वार्तालाप के साथ साथ यदि उस व्यक्ति के उपयुक्त कुछ विचार मौखिक रूप से या अपने अंक एवं पुस्तिकाएं पढ़ने देकर धर्म प्रचार कार्य आरंभ किया जा सकता है। झिझक और संकोच की कमजोरी जब दूर हो जाती है तो साधारण स्थिति के लोग भी अनेकों लोगों को प्रभावित कर सकने में सफल होते हैं। संस्थाओं के कार्य ऐसे ही पूरे होते हैं। लोग अपने कारोबार करते हुए थोड़ा सा ध्यान और समय यदि किसी सत्प्रवृत्ति को बढ़ाने में लगाते हैं तो वह निश्चय ही बढ़ती और फैलती है। काँग्रेस, आर्य समाज आदि के मिशन शिक्षित कामकाजी लोगों ने ही थोड़ा समय देकर आगे बढ़ा दिये हैं।
(महात्मा गाँधी)
(श्री बालकृष्ण अग्रवाल)
‘जहाँ चाह है वहाँ राह है’ यह एक पुरानी कहावत है, परन्तु इसमें बड़ा बल है। मनुष्य की जैसी अच्छी बुरी इच्छा होती है वह उसी के अनुसार अपनी समस्त शक्तियों को लगा देता है और उसमें सफल होता है। मनुष्य की जैसी इच्छा होती है, वह वैसा ही बनता चला जाता है। कवि, लेखक, वक्ता, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनने की इच्छा रखने वाला अपनी क्रियाओं को उसी दिशा में मोड़ देता है और अपनी सारी शक्तियों को एकाग्र करके उस में लगा देता है, परिणामस्वरूप वह वही बन जाता है।
हमारा भविष्य हमारे अपने हाथों में है। उसको बनाने वाले हम स्वयं ही हैं। एक विद्वान् युवकों से कहा करते थे कि “यही समय है जब तुम्हें अपने मार्ग का निश्चय कर लेना चाहिए नहीं तो बाद में पछताना पड़ेगा कि मैंने स्वयं अपने भविष्य को अन्धकारमय बनाया है। इच्छा एक ऐसी वस्तु है जो आसानी से हमारे स्वभाव में आ जाती है। इसलिए दृढ़ इच्छा करना सीखो और उस पर दृढ़ बने रहो। इस तरह से अपने अनिश्चित जीवन को निश्चित बना कर उन्नति का मार्ग प्रशस्त करो।”
जिस मनुष्य में कोई इच्छा नहीं होती, वह क्रियाहीन और निरुत्साही बना रहता है। ऐसे ही मनुष्य संसार में दीन-दीन दशा में देखे जाते हैं। मनुष्य को पिछड़ा हुआ और गिरी हुई परिस्थितियों में रखने वाली कोई वस्तु है तो वह इच्छा शक्ति का अभाव है जिसे हमें दूर करना है। जिस तरह नदी का चलता पानी स्वच्छ व स्वास्थ्यप्रद होता है और एक स्थान पर खड़ा पानी गंदला और स्वास्थ्य विनाशक होता है उसी तरह से इच्छा शक्ति जीवन में आगे बढ़ने और कुछ करने के लिए प्रोत्साहित करती रहती है और इसके अभाव में हमें वर्तमान परिस्थितियों में ही सन्तुष्ट होना पड़ता है। यदि हम आलसी बन कर अपना जीवन बिता देते हैं, तो भगवान के द्वारा दिये गये उत्तरदायित्व को निबाहने से जी चुराते है, अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने से भागते हैं। हम यहाँ जागरुक रहने और दूसरों को जगाये रखने के लिए आये हैं। जब हमारी शक्तियाँ ही गुप्त पड़ी रहेंगी तो हम दूसरों के लिए कुछ करने में कैसे समर्थ होंगे? पहले तो अपनी शक्तियों को जाग्रत करने के लिए इच्छा शक्ति को बढ़ाना चाहिए और अपने जीवन का एक निश्चित मार्ग चुन लेना चाहिए तभी हमें सन्तोष होगा कि यहाँ हम मुर्दों की तरह नहीं बल्कि जिन्दों की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
एक संन्यासी कहा करते थे कि “जैसा तुम चाहो वैसे ही बन सकते हो क्योंकि इच्छा शक्ति का दैव के साथ ऐसा घनिष्ठ संबन्ध है कि हम सच्चे दिल से जो कुछ होने की इच्छा करें, वही हो सकते हैं। ऐसा कोई नहीं है जिसकी उत्कट इच्छा आज्ञाकारी, सन्तोषी, नम्र अथवा उदार होने की हो और वह वैसा ही न हो जाये।” महापुरुषों के जीवन चरित्र इस सत्य की गवाही देते हैं। उन्होंने संसार में जितने बड़े-बड़े कार्य किये हैं, उन में इसी महाशक्ति का सहारा मुख्य था। यह तो सभी कार्यों की जड़ है। इसके बिना तो किसी कार्य का आरम्भ होना भी सम्भव नहीं है। अब यह व्यक्ति विशेष की बुद्धि और विवेक पर निर्भर है कि वह अपनी इच्छा शक्ति को किस ओर लगाये। चोर, डाकू भी इसके आधार पर सफल होते हैं और सन्त, महात्मा और महापुरुष भी इसी के सहारे समाज में क्रान्तियाँ करते हैं। धन्य हैं वह जो प्रभुदत्त इस शक्ति को उत्तम मार्ग में लगाते हैं।
जगद्वन्धु माँ, शक्ति दो, साधना दो।
अचल अर्चना दो, अटल बन्दना दा॥
हमें भक्ति दो सर्वदा प्रेम मण्डित।
हमें ज्योति दो वह सदा जो अखण्डित॥
न इच्छा रहे ना बसे वासना आ-
तुम्हें में मगन मन यही कामना दो॥
जगद्वन्धु माँ, शक्ति दो, साधना दो।
अचल अर्चना दो, अटल बन्दना दा॥
न हो हर्ष से, शोक में क्षुब्ध यह मन।
सतावे न सुख दुःख कटे मोह बन्धन॥
सभी यह तुम्हारा, तुम्हारे सभी हैं-
तुम्हीं सर्वमय हो यही भावना दो॥
जगद्वन्धु माँ, शक्ति दो, साधना दो।
अचल अर्चना दो, अटल बन्दना दा॥
कभी काम की कल्पना ना कँपाये।
कभी क्रोध प्रतिशोध होकर न आये॥
जले राग की आग में मन न मेरा-
यही धारणा दो, यही भावना दो॥
जगद्वन्धु माँ, शक्ति दो, साधना दो।
अचल अर्चना दो, अटल बन्दना दा॥
विषय वासना विष भरी है अटारी।
यही बुद्धि दे दो बनें ब्रह्मचारी॥
मिले मान अपमान पथ में तुम्हारे-
लगें सब परम प्रिय यही धारणा दो॥
जगद्वन्धु माँ, शक्ति दो, साधना दो।
अचल अर्चना दो, अटल बन्दना दा॥
*समाप्त*