बढ़ें श्रेय पथ पर सत्वर


बढ़ें श्रेय पथ पर सत्वर (kavita)

ओ3म् स्वस्तिपंथामनुचरेम सूर्याचन्द्र मसाविव।

पुनर्ददताऽद्मता जानता संभयेमहि ॥

नित्य नियम से अंबर में रवि, झाँक मधुर सा मुसकाता।

तिमिर आवरण हटा सहज ही, रम्य जागरण विकसाता॥

नवल स्फूर्ति भरता जन-जन में, जग की जड़ता द्रुत हरता॥

अविरत श्रेय साधना करता, संतत नव-जीवन भरता॥

औेर निशा में नियमित गति से, आता मधुर सुधाकर।

भाँति-भाँति की कला दिखाता, मनहर मंजु कलाधर॥

विमा सुध से हृदय गगन को, अवनी को नहला देता।

मधुर प्रीति जीवन में भरता, भव्य भाव विकसा देता॥

इसी भाँति आओ हम सब भी, बढ़ें, श्रेय पथ पर सत्वर।

सूर्य चंद्र सम नियमित गति से, उर उमंग नव साहस भर॥

जग से लें कम, देवें अविरल, सत्कार्य सदा भरपूर करें।

प्राप्त करें ऋतु ज्ञान विवेकी, कलुष तिमिर अब दूर करें॥

—यज्ञदत्त ‘अक्षय’


शक्ति -उपासना और मानव जीवन में सक्रियता

(स्वामी शिवानन्द जी सरस्वती)

ब्रह्म की सक्रिय अवस्था का नाम ही शक्ति है। जिस प्रकार उष्णता अग्नि से अभिन्न है, उसी प्रकार शक्ति भी ब्रह्म से अभिन्न है। माया, महामाया, मूल प्रकृति, अविद्या, विद्या, महेश्वरी, आदिशक्ति, आदि- माया , पराशक्ति , परमेश्वरी, जगदीश्वरी इत्यादि ‘शक्ति’ के ही पर्यायवाची हैं। नवदुर्गा, काली, अष्टलक्ष्मी, नव शक्ति , देवी आदि एक ‘पराशक्ति ‘ की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली, शक्ति के तीन प्रधान व्यक्त स्वरूप हैं।

जिसे अंगरेजी में ‘नेचर’ कहते हैं वह व्याकृत अथवा व्यक्त ‘प्रकृति’ है। मूल प्रकृति अव्याकृत अथवा अव्यक्त है। यही इस भेद रूप जगत का बीज है। मूल प्रकृति अथवा ‘अव्यक्त ‘ में जड़ तथा चेतन अभिन्न रूप से रहते हैं। अव्यक्त के अन्दर चेतन शक्ति अव्याकृत रूप से ही रहती है। सत, रज, तम के द्वारा शक्ति अपना कार्य करती है। इस स्थूल जगत की सृष्टि के लिये आकाश, वायु, तेज, अप (जल) और पृथ्वी ये पाँच तत्व अथवा पंच महाभूत उसके साधन हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार मिलकर जड़ अथवा अपरा प्रकृति कहलाते हैं। यह निम्न श्रेणी की है, अपवित्र है, खराबी पैदा करती है और स्वयं संसार के लिये बन्धन रूप है। परा-प्रकृति विशुद्ध है। वह स्वयं आत्मा रूप है, क्षेत्रज्ञ है। वही जीवन को धारण करने वाली है। यह समस्त जगत के भीतर प्रवेश करके उसे धारण किये हुये है। इसे चैतन्य प्रकृति भी कहते हैं।

शक्ति ही सब कुछ है। शक्ति के बिना हम न सोच सकते हैं, न बोल सकते हैं, न हिल डुल सकते हैं, न देख सकते हैं न सोच समझ सकते हैं। शक्ति के बिना हम न तो खड़े हो सकते हैं और न चल फिर सकते हैं, फल, नाज, शाक, भाजी, दाल, चीनी आदि सब शक्ति से ही उत्पन्न होते हैं। इन्द्रिय और प्राण भी शक्ति के ही परिणाम हैं। विद्युत शक्ति, आकर्षण शक्ति तथा चिन्तन शक्ति आदि सभी शक्ति के व्यक्त रूप हैं।

समस्त विश्व के अन्दर रहने वाली निर्विकार सत्ता का नाम शिव है। उनकी शक्ति के अनन्त रूप हैं, जिनमें प्रधान हैं चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रियाशक्ति। तत्व छत्तीस माने गये हैं। जब शक्ति चिद् रूप में अपना कार्य करती है तो उस समय निर्विशेष ब्रह्म विशुद्ध अनुभवमय हो जाता है और इसी को शिव तत्व कहते हैं। आनन्द शक्ति के व्यापार से जैसे ही जीवन का संचार होता है वैसे ही ब्रह्म की दूसरी अवस्था हो जाती है जिसे शक्ति तत्व कहते हैं। अपने अभिप्राय को व्यक्त करने की इच्छा से ही तीसरी अवस्था की प्राप्ति होती है। इसके अनन्तर ब्रह्म की ज्ञानावस्था होती है, यह है ईश्वर तत्व जिसमें जगत को उत्पन्न करने की इच्छा और शक्ति रहती है। इसके आगे की अवस्था में ज्ञाता और ज्ञेय का भेद उत्पन्न हो जाता है। यहाँ से क्रिया का आरम्भ हो जाता है। यही शुद्धि विद्या की अवस्था है। इस प्रकार ये पाँच अलौकिक तत्त्व ‘शिव’ की पंचधा शक्ति के अभिव्यक्त रूप हैं।

शक्ति के उपासक इस जगत को 36 तत्त्वों का बना मानते हैं। जिस प्रकार साँख्य इसे केवल 25 तत्वों से बना स्वीकार करता हैं। साँख्य के पुरुष के ऊपर शक्ति पंच कंचुक अर्थात् पाँच आवरण मानते हैं, जिनके नाम हैं-नियति, काल, राग, विद्या और कला। कला के ऊपर माया, शुद्ध विद्या, ईश्वर, सदाशिव, शक्ति और शिव हैं। इस प्रकार ये पच्चीस तत्वों के अतिरिक्त ग्यारह तत्त्व और स्वीकार करते हैं।

शक्ति की दो अवस्थाएँ होती हैं-शुद्ध साम्यावस्था और वैषम्यावस्था। पहली अवस्था वह है जिसमें तीनों गुण सत्व, रज, तम साम्यावस्था में स्थित रहते हैं। यह अवस्था प्रलय काल में होती है। उस समय असंख्य जीव अपने संस्कारों तथा अधिष्ठाता के साथ अव्यक्त अवस्था में रहते हैं। अधिष्ठाता का अर्थ है कर्म की अदृश्य शक्ति अथवा फल दायिनी शक्ति जो कर्म के भीतर छिपी रहती है।

प्रलय की अवधि समाप्त होने पर साम्यावस्थित शक्ति में स्पन्द अथवा स्फूर्ति होती है और वह इसलिये कि तिरोहित जीवों को अपने अपने कर्मों का फल भोगने की इच्छा होती है। यही वैषम्यावस्था है। अब ब्रह्म सृष्टि को उत्पन्न करने के लिये बाध्य हो जाते हैं। उनके संकल्प-मात्र से सृष्टि उत्पन्न हो जाती है। साम्यावस्था में रजोगुण शुद्ध और शाँत रहता है। विकास अथवा सृष्टि के समय वह अशुद्ध एवं क्षुब्ध हो जाता है। सृष्टि के समय जब आदि शक्ति के अन्दर क्षोभ होता है तो तीनों गुण, सत्त्व, रज, तम व्यक्त हो जाते हैं। सत्व गुण प्रधान चैतन्य का नाम विष्णु है, जो ब्रह्म की संरक्षिका शक्ति है। रजोगुण प्रधान चैतन्य ब्रह्मा है जो ब्रह्म की उत्पादिका शक्ति है। तमोगुण प्रधान चैतन्य शिव है, जो ब्रह्म की पुनर्निर्माण करने वाली अथवा संहारिका शक्ति है।

जो व्यक्ति शक्ति के इस स्वरूप को समझकर साधन करता है उसे इसके द्वारा शक्ति अथवा ईश्वर प्राप्ति हो सकती है। साधना और अभ्यास पर्यायवाची शब्द है। सिद्धि का अर्थ है शक्ति अथवा पूर्णता की प्राप्ति। साधना का क्रम तब तक चलते रहना चाहिये जब तक साधक सिद्ध न हो जाय। साधक की योग्यता, स्वभाव, रुचि, ज्ञान तथा विकास के भेद-से साधना में भेद होता है। अधिकारी पुरुष की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है। इस प्रकार साधना के चार भेद माने गये हैं। सर्वोपरी भाव ब्रह्म-भाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है। इसे अद्वैत भाव कहते हैं। इसके उपरान्त ऊँची श्रेणी के योगियों और भक्तों का ध्यान भाव आता है, जिसमें भक्त अथवा योगी अपने शरीर के भिन्न-भिन्न चक्रों में अपने इष्टदेव का ध्यान करता है। इससे नीचे का भाव है जिसमें केवल जप, प्रार्थना और स्तुति आदि से सम्बन्ध रहता है। चौथी अथवा सब से निम्न श्रेणी का भाव वह है जिसमें केवल बाह्य पूजा से ही सम्बन्ध है।

शक्ति अथवा शक्ति का उपासक अपने प्रत्येक मनुष्योचित कर्म को यज्ञ और पूजा का एक पवित्र कार्य बना देता है। खाते पीते, उठते बैठते अथवा अन्य किसी भी शारीरिक क्रिया को करते समय वह कहता ही नहीं अपितु मानता और विश्वास करता है कि उसके द्वारा और उसके अन्दर ‘शक्ति’ ही सब कुछ करा रही है। वह अपने जीवन और उसकी प्रत्येक क्रिया को इस रूप में देखता है, मानो प्रकृति में जो ईश्वर की क्रिया हो रही है उसी का यह भी एक अंग है-’शक्ति’ ही मनुष्य के रूप में व्यक्त होकर यहाँ अपना कार्य कर रही है। इस प्रकार की भावना से प्रेरित होकर कर्म करने से अकर्म की ओर प्रवृत्ति ही नहीं होती और यदि पहले से कोई बुरा अभ्यास होता है तो वह स्वयं जाता रहता है। जो इस प्रकार बनने का प्रयत्न करते हैं, इन्द्रियों को वश में करते हैं, सच्चे हृदय से माता के नाम की रट लगाते हैं, उन पर आदि शक्ति की अवश्य ही कृपा होती है।


नैतिकता-वास्तविक और कृत्रिम

(श्री बाडीलाल मोती लाल शाह)

हमारे देश में धर्म और नीति का जीवन में बड़ा उच्च स्थान माना जाता है। इतना ही नहीं कितने ही लोग तो धर्म के पीछे पागल बन फिरते हैं और सदा यही दावा किया करते हैं कि संसार में अगर कोई धर्म का पालन करने वाला देश है तो वह भारतवर्ष ही है। हिन्दू-धर्म ही संसार का सबसे महत्वपूर्ण और सारयुक्त मत है और उसी में ईश्वर और आत्मा के सच्चे स्वरूप का निरूपण करके धर्म और नीति के सर्वश्रेष्ठ नियमों का निर्माण किया गया है। ये बातें बिल्कुल झूँठी नहीं हैं। जिस समय यहाँ के मनुष्य धर्म के सच्चे स्वरूप को समझकर विवेकानुसार उसका पालन करते थे और युग धर्म के अनुसार आचरण करने में समर्थ थे तब यह देश वास्तव में “धर्म भूमि” कहलाने का अधिकार रखता था। पर आज अवस्था इसके विपरीत दिखलाई पड़ती है। लोग धर्म के वास्तविक आशय पर ध्यान नहीं देते, केवल एक लकीर को पीटकर धर्मात्मा बनने का ढोंग करते हैं। इसी का परिणाम है कि हम धर्म और नीति के नियमों पर चलने का दावा करते हुये भी वास्तव में उनको भ्रष्ट कर रहे हैं। उदाहरण के लिये अहिंसा और शील के नियमों पर ध्यान दो। हम यहाँ तक अहिंसा का पालन करते हैं कि पागल कुत्ते को भी नहीं मारते और कीड़े मकोड़ों की रक्षा का भी पूरा ध्यान रखते हैं,पर हमको स्वयं अपने प्रति भी अहिंसा का पालन करना चाहिये,इसका ध्यान भी कभी नहीं करते। अपनी बुद्धि की रक्षा न करने से मनुष्य बड़ा भारी प्रमादी बन जाता है, जो एक सबसे बड़ा आत्म हत्या का पाप है। आजकल तो यह दशा है कि यदि कोई यह उपदेश करे कि हिंसा करो तो धर्म के नाम पर ही हिंसा करने को कूद पड़ेंगे और यदि कोई कहे कि अहिंसा का पालन करो तो समाज और देश के साथ शत्रुता करने वाले के प्रति भी दया बुद्धि रखेंगे। इसका अर्थ है अपनी बुद्धि का खून और दूसरे की बुद्धि की गुलामी करना। यही इस समय हमारा ‘धर्म’ बना हुआ है। पर यह ‘आर्य-धर्म’ नहीं है वरन् ‘प्रेरित धर्म’ है और प्रेरित धर्म संसार में सबसे खराब चीज है, कोई भी धर्म न होने से भी वह बुरा है। हमको पहले अपने प्रति दया करनी चाहे अपनी आत्मा को निरोगी और पुष्ट बनाने के लिये उसका उपयोग करना चाहिये। क्योंकि बलवान आत्मा ही सबके प्रति दया का पालन कर सकती है। योरोप माँसाहारी है पर वह जानवरों के प्रति हम से कहीं अधिक दया का बर्ताव करता है। मनुष्यों को भी वह अनावश्यक कष्ट नहीं देता। इतना ही नहीं वह अनावश्यक कटु शब्द अथवा हल्ला-गुल्ला मचाने पर भी दूर रहता है। पर हम जीव-दया के ठेकेदार बनने वाले खुद अपने परिवार में भी साक्षात् नर्क की सी दशा उत्पन्न कर देते हैं। यहाँ पर हर एक धर्म के लाखों पंडित हजारों वर्षों से दया और अहिंसा की व्याख्या करते रहे हैं और लोगों को एक घड़ी में इधर और दूसरी घड़ी में उधर भ्रमित करते रहे हैं। किसी अनुभवी से पूछा जाय तो वह यही कहेगा कि ये व्याख्याएँ सापेक्ष अर्थात् गलत होती हैं।

सत्य बात तो यह है कि अपने प्रति दया का पालन करने वाला, अपने अन्तःकरण के चारों कोनों को निरोगी बनाने वाला ही स्वभावतः अहिंसक होता है। आशय यह है कि दया कोई नीति सम्बन्धी विषय नहीं है, वरन् भीतर के बल का स्वाभाविक परिणाम है। निर्बल व्यक्ति कभी दयालु नहीं बन सकता और निर्बल का दया-धर्म या तो ढोंग या आत्म हत्या की तरह होता है। दया? निर्बलों में दया? वह किस प्रकार की होती है यह जानना चाहते हो? क्या तुमने इस सम्बन्ध में स्वयं अपने व्यवहार पर विचार करके नहीं देखा है? अपने पुत्र पर दया करके तुम उसका विवाह कर देते हो! पर उस पर इसी समय एक जीव की और भविष्य में अनेक जीवों की जिम्मेदारी लादने का तुमको क्या हक था ? तुम अपने को ही सुशिक्षित, सुसंस्कारयुक्त नहीं बना सके हो, अपने पुत्र-पुत्रियों को भी ठीक ढंग से सुशिक्षित नहीं बना सके हो, और अब उन पुत्र-पुत्रियों पर जीवन भर की जिम्मेदारी का बोझ डालते हो। घोड़ा पर ज्यादा बोझ लादने वाले को तुम दोषी ठहराकर सरकार द्वारा दंडित कराते हो, पर स्वयं अपने बालकों को समर्थ बनाये बिना उन पर जीवन भर के लिये भार लाद देते हो, क्या यह बात तुम को दोषी बनाने वाली नहीं जान पड़ती? यह कैसा भयंकर पाप है! इससे तो वह कसाई ही अच्छा जो एक ही हाथ में जीव की वेदना का अन्त कर देता है। मुझे तो ऐसे बालकों के विवाह होते देखकर कंपकंपी आ जाती है और भारतवासियों के लिये मुख से अभिशाप निकलने लगते हैं।

अब हमारे यहाँ की शील और ब्रह्मचर्य की नीति पर दृष्टिपात करो। थोड़े से तो ब्रह्मचर्य का आजीवन व्रत लेकर साधु बन जाते हैं और बहुत से अपनी स्त्री के सिवाय अन्य किसी पर नजर नहीं डालने का व्रत लेते हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो विवाह करना चाहते हैं पर जातीय बन्धनों के कारण उनको विवश होकर कुँवारा रहना पड़ता है। अब इन तीनों के जीवन की जाँच करो। प्रथम श्रेणी वाले यदि सच्ची नीयत के भी होते हैं तो भी अन्तःकरण का बल न होने से नियमों का पालन नहीं कर सकते और छुपे व्यभिचार अथवा अप्राकृतिक दुराचार का आश्रय लेते हैं। दूसरी श्रेणी वाले सच्चे हों तो भी मानसिक शक्ति के अभाव से अपनी स्त्री से निरंकुश जानवरों की तरह व्यवहार करते हैं और कुछ बाहरी आकर्षण के फेर में भी पड़ जाते हैं। तीसरा वर्ग रात दिन स्त्री के लिये झींकता रहता है और इसलिये लाचार होकर चाहे जैसे कुकर्म में लिप्त हो जाते हैं। अब बताओ, क्या एक भी श्रेणी वाले शील की रक्षा कर सके? उपदेशक वर्ग के लिये अनिवार्य ब्रह्मचर्य की शर्त रखने से दुगुना नुकसान होता है। गृहस्थ वर्ग में जिम्मेदारी का भाव उत्पन्न होने के पहले ही विवाह हो जाने से कुँवारे रहकर व्यभिचार करने वालों से भी अधिक अब्रह्मचर्य का सेवन किया गया। जिन हजारों लोगों को लाचारी से कुँवारा रहना पड़ता है उनके द्वारा विश्वासघात, व्यभिचार, वैश्यागमन, अप्राकृतिक कर्म ये सब भयंकरताएँ उत्पन्न की जाती हैं। तुम जैसे-जैसे प्रकृति विरुद्ध मार्ग पर चलोगे वैसे-वैसे ही अधिक परेशानी, अधिक अन्तःकरण की निर्बलता तथा ढोंग की उत्पत्ति होगी ही । कुदरती कानून पर चलने में तुमको इस समय प्रचलित रूढ़ियों का भय लगता है। तुम इस भय को छोड़ नहीं सकते तो संसार में प्रकट होने वाली महान से महान समस्याओं का समाधान कैसे कर सकोगे? अच्छा है जब तक सारे समाज तथा देश का नाश हो जाय तब तक तुम रास्ता देखते रहो।

मैं फिर कहता हूँ- अनुभव से कहता हूँ- गहरा विचार करके कहता हूँ कि नीति शिक्षा नहीं किन्तु बल-’शक्ति’ ही रक्षा कर सकती है। वह बल भी अन्तःकरण के चारों अंगों का होना चाहिये। बलवान ही दया कर सकता है। बलवान ही शील का पालन कर सकता है, बलवान ही सत्य कथन कर सकता है, बलवान ही चुराने के बजाय प्रदान करने में आनन्द का अनुभव कर सकता है। इन बातों के सिवाय और धर्म का अर्थ ही क्या है? चाहे हिन्दू धर्म हो,चाहे जैन, चाहे ईसाई धर्म हो या मुसलमान किसी में इससे अधिक कोई बात नहीं कही गई है । इस बात को उत्पन्न करने के लिये नीति की नहीं वरन् तालीम -”कल्चर”- संस्कार की आवश्यकता पड़ती है और धर्म की रचना वास्तव में ऐसे संस्कार उत्पन्न करने के लिये की गई थी। पर आज तो लोग संस्कार शब्द का अर्थ भी भूल गये हैं। ऊँचे दर्जे की आदत ही संस्कार है। खाना, पीना, विवाह करना, संतानोत्पत्ति , बोलना लिखना, व्यापार करना, सामाजिक कार्य करना इत्यादि हर एक क्रिया ऊँचे मन से, ऊँचे शौक से की जा सके ऐसी आदत डालना, ज्ञान तंतु अपने आप ऐसी क्रिया करें ऐसा बन जाना ही संस्कार है। केवल कल्पनाएँ, व्याख्यान, नीति, कानून इनमें से कोई संस्कार नहीं हैं। ये तो केवल समर्थ व्यक्तियों के व्यवहार से देखकर पंडितों द्वारा रचे कल्पनाओं के जाले हैं।


हिन्दू जाति और उसका व्यावहारिक ज्ञान

(स्वामी रामतीर्थ)

ऐक्य, ऐक्य, ऐक्य-देश में सबको एकता की आवश्यकता अनुभव हो रही है। पर ऐक्य स्थापित होने के बजाय हमारे देश में लाखों शक्तियाँ एक दूसरे का अनहित कर रही हैं और कोई सुफल उत्पन्न करने वाली शक्ति दिखाई नहीं पड़ती। करोड़ों मस्तिष्क लगे हुये हैं, करोड़ों हाथ काम कर रहे हैं, परन्तु यह नहीं मालूम होता कि किधर बहे चले जा रहे हैं। हजारों सम्प्रदाएँ और संस्थाएँ इस राष्ट्र की नौका को खेने का प्रयत्न अपनी-अपनी मति के अनुसार कर रही हैं, परन्तु नियमानुसार कोई कार्य होता दिखाई नहीं देता। मित्रो! नौका की बल्लियों को अपनी जगह जहाँ का तहाँ रहने दो, अपनी जगह भी मत छोड़ो, किन्तु सब मिलकर एक ही दिशा में खेते चलो। ऐसी ही एकता अर्थात् भिन्न-भिन्न होने पर भी एकता बनाये रखने से ही तरक्की होती है। इस तरह अपनी-अपनी जगह पर काम करते रहो और मल्हार गाते रहो, पर आगे बढ़ते चले जाओ। राष्ट्र का हित तुमसे यह कहता है कि तुम सबके हित में अपना हित समझो।

इस प्रकार का व्याख्यान दे लेना तो बहुत सहज है और बड़े-बड़े संत महात्माओं ने सैकड़ों वर्षों से हमको यही उपदेश दिया है, तो भी भारतवर्ष में आज भी प्रेम और एकता का इतना अभाव क्यों है?

मुसलमानी राज्य होने के पहले खुरासान देश के निवासी अलबरूनी नामक व्यक्ति ने समस्त भारत की यात्रा की थी। वह ज्ञान सम्पन्न, तत्वज्ञानी और बड़ा भारी पंडित था। उसने संस्कृत भाषा पढ़ी और हमारे धर्म शास्त्रों का अध्ययन किया। उसने इस देश को जैसा पाया उसका पूरा विवरण एक ग्रन्थ के रूप लिखकर छोड़ दिया। हिन्दू तत्वज्ञान, काव्य और ज्योतिष की वह बहुत प्रशंसा करता है और जिन पंडितों से वह मिला उनकी विद्वता की वह बहुत सराहना करता है। परन्तु स्त्रियों और सामान्य जनसमूह की शारीरिक और मानसिक स्थिति पर उसने बहुत शोक प्रकट किया है। उसने लिखा है कि नैतिक और धार्मिक रूप से वे महापतित और अनाथ हैं, और सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक टुकड़ों में बँटे हुए हैं। वे ठीक-ठीक विचार भी नहीं कर सकते । उनके शरीर बहुत दुर्बल हैं। उन मुसलमानों के सामने, जिनको लेकर महमूद गजनवी हर साल लूट-मार करने आया करता था, वे लोग कवायद न जानने के कारण रज कणों की तरह उड़ जाते थे।

इसके पश्चात् सम्राट बाबर ने भी यहाँ के निवासियों के विषय में ऐसी ही बातें लिखी हैं। वह लिखता है कि यहाँ के लोगों के प्रत्येक कार्य में चातुर्य,प्रवीणता और नवीनता की कमी है। इनके यहाँ न तो बगीचे हैं और न नहरें हैं, और यहाँ बारूद का कोई नाम भी नहीं जानता । ये लोग स्वतंत्रतापूर्वक एक दूसरे से मिलने के अयोग्य हैं।

यदि हम ऊपर के कथनों में से व्यक्तिगत द्वेष भाव की बातों को निकाल डालें, और जो कुछ बढ़ाकर कहा है उसे ठीक करलें, तो भी हमें शोक के साथ कहना पड़ता है कि इसमें बहुत कुछ सत्य है। व्यावहारिक ज्ञान की दरिद्रता ही से हमारे देश का अधःपतन हुआ और यही हमारी अवनति का कारण है।

यदि केवल शास्त्रार्थ करने की बात होती तो ‘राम’ भी औरों की तरह इन विदेशी इतिहास लिखने वालों के धुर्रे बहुत सुगमता से उड़ा सकता था। परन्तु प्यारो! उन्होंने तो सत्य और वास्तविक बात लिख रखी है, उसमें मैं ‘नहीं’ कैसे कर सकता हूँ । हमारी समस्त सामाजिक बुराइयों की जड़ व्यावहारिक ज्ञान की न्यूनता ही है। शारीरिक श्रम का तिरस्कार, जातियों और पंथों के अस्वाभाविक भेद, धर्म और सम्प्रदायों के कलहमूलक भेद, बाल विवाह, स्त्रियों पर लदा हुआ मानसिक और शारीरिक अन्धकार इत्यादि सभी दोष इसी व्यवहारिक ज्ञान की न्यूनता में शामिल हैं। इस सामाजिक अवनति को दूर करना बड़ा कठिन कार्य है। वर्क साहब ने एक बड़ी सुन्दर बात कही है कि “यदि तुम सुधार-कार्य को एक मनोविनोद का काम समझते हो तो तुमको उससे दूर ही रहना चाहिये।” इसका आशय यही है कि रूढ़ियों से छुटकारा पा सकना बड़ा भारी काम है। क्योंकि सच्चा कर्तव्यनिष्ठ पुरुष तो समाज और उसके कार्य कर्ताओं के दोषों को अवश्य दिखलायेगा, यदि आवश्यकता होगी तो उनकी निन्दा भी करेगा। इसलिये अनेक लोग उससे द्वेष-भाव रखने लग जाते हैं। वह कुछ कहता है और लोग उसके वाक्यों का अर्थ और कुछ निकालते हैं। पर क्या इस मतभेद के भय से हमको जैसी स्थिति है वैसे ही उसे रहने देना उचित है। क्या ‘यद् भवति तद् भवतु’ कहकर अपने स्वार्थ से ही काम रखना हमको शोभा देता है? क्या यह संभव है कि आप अपनी मोक्ष प्राप्ति की चिन्ता में लगे रहें और समाज को छोड़ दें,चाहे उसका कुछ भी हो? डूबने वाला समाज आपको अकेला कदापि नहीं छोड़ेगा। यदि समाज डूबता है तो तुम्हें भी उसके साथ डूबना पड़ेगा । यदि समाज उन्नति करता है तो तुम्हारी उन्नति भी अवश्य होगी। यह बात सर्वथा असम्भव है कि दूषित समाज में एक भी व्यक्ति दोष रहित और पूर्ण हो सके। समाज से अलग होकर किसी का तरक्की करने का विचार ऐसा ही है जैसा हाथ का शरीर से अलग होकर पूर्ण शक्ति प्राप्त करने की कोशिश करना।

वेद और उपनिषदों की शिक्षा के विपरीत ऐसा स्वार्थयुक्त विचार भारत में बहुत समय से फैला हुआ है। इसी के कारण समाज का अंग-अंग भी हो गया है और सोचनीय अवस्था भी हो गई है। हे भारत के होनहार नवयुवकों! हिन्दुस्तान का भविष्य काल तुम्हारा ही है और तुम्हीं उसके लिये उत्तरदाता हो। बहुमत के जादू में कायर लोग फँस जाते हैं। सत्य से भरा हुआ चैतन्य मनुष्य तो लोगों के विचार और अन्तःकरण पर राज्य करते हैं, नाममात्र के लिये बाहरी राजा कोई भी हो। बी. ए. और एम. ए. की पदवी तो तुम्हें विश्वविद्यालय में मिलती हैं, परन्तु क्रूर और शूर की पदवी तुम्हें स्वयं ही चुन लेनी होगी। सैकड़ों वर्षों से हमारे देश में द्वेषभाव और शून्यभाव से बड़ी हानि हो रही है और इसका मुख्य कारण लकीर का फकीर होना और मिथ्या बातों पर विश्वास करना ही है। चैतन्य आत्माओं का कर्तव्य है कि इस पुरानी तामसिक गति को हटाकर देश को शक्ति के मार्ग की तरफ अग्रसर करें। यह सत्य है कि जो समाज अपने पूर्वजों से पाई हुई वस्तु को त्यागकर देता है तो कोई बाहरी शक्ति उस समाज का नाश कर देती है। परन्तु साथ ही हमको यह भी ध्यान रखना चाहिये कि जो कुछ हमने अपने पूर्वजों से पाया है उसका बहुत आडम्बर न करें। क्योंकि जो समाज ऐसा करता है उसका नाश भीतर ही से हो जाता हैं।

आदर्श चरित्र में तो दुख का नाममात्र भी नहीं होता। वहाँ तो प्रेम और ज्ञान फैलाने वाली शाँति ही शाँति होती है। भला जिस समाज में ज्ञान का प्रकाश त्रासदायक प्रतीत होता है उसमें दुख रहित शाँति और प्रकाश कैसे साथ-साथ रह सकते हैं। यदि तुम्हारी प्रकृति ही ऐसी हो गई है कि आदर्श चरित्र का पालन नहीं कर सकते हो तो अपने चरित्र को बिल्कुल सरल और सत्य बनाओ। छोटे विचार वाले बड़े लोगों से किसी देश को बल प्राप्त नहीं होता बल्कि बड़े विचार वाले छोटे लोगों से देश का कल्याण होता है। पर शाँति कैसी हो ? जानवरों की सी काहिली भी शान्तिदायिनी मालूम होती है, श्मशान भूमि भी शाँतिमय दीख पड़ती है। पर हमको जीवित शाँति चाहिये, मरी हुई नहीं। जिस समय लोगों में अन्धकार फैला हो, लोग अँधेरे में ठोकरें खा रहे हों, उस समय अपने प्रकाश को एक डलिया के नीचे ढ़क रखना महापाप है। यदि तुम्हारे पास प्रकाश न होता तो तुमको इतना पाप न लगता। वह मनुष्य जो अपने शब्दों या कार्यों द्वारा दूसरों की सहायता कर सकता है, परन्तु ऐसे समय में भी चुप और उदासीन रहता है, वह उस सिपाही के सदृश्य पापी है जो अपनी जगह छोड़ देता है।


योग द्वारा आत्मसाक्षात्कार

(श्री गिरिजा सहाय जी)

योग-विद्या भारतवर्ष का एक अति प्राचीन ज्ञान है। योग शास्त्रों और पुराणों में तो इसके आद्य प्रणेता ब्रह्मा अथवा शंकर को बतलाया गया है। पर इतिहास और अन्य प्रमाणों द्वारा भी यह विदित होता है कि योगाभ्यास की कुछ क्रियाओं का प्रचार वैदिक काल के अंतर्गत ही हो गया था। इसका मुख्य उद्देश्य आत्मा का आत्मलीन होना है। क्योंकि संसार में जो भौतिक पदार्थ पाये जाते हैं वे सब आत्मा की दृष्टि से विजातीय हैं और इस कारण उन दोनों का उपयुक्त ढंग से मेल नहीं हो सकता। योग के द्वारा ही हम सृष्टि और ईश्वरीय लीला के तत्वों का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्तकर सकते हैं और उसके द्वारा चित्त को एकाग्र कर उर्ध्वगति को प्राप्त कर सकते हैं। यही अवस्था संसार में सर्वोपरि है और जीव का अंतिम उद्देश्य भी यही है। जिस व्यक्ति ने योगाभ्यास द्वारा आत्म-साक्षात्कार कर लिया है तो फिर उसे साँसारिक ईति मिति का कोई भय नहीं रहता और न वह कभी पतन के गर्त में गिर सकता है।

योगाभ्यास सर्वप्रधान सिद्धान्त चित्त अथवा मन की पूर्ण एकाग्रता है। यही कारण है कि ‘योगदर्शन’ में सबसे पहले सूत्र में यही बतलाया गया है कि “चित्त वृत्तियों का निरोध ही योग है।” योग विद्या के सर्वप्रधान व्याख्याता महर्षि पातञ्जलि ने न तो विभूतियों को, न सिद्धियों को, न चमत्कारों को योग का प्रधान अंग बतलाया, वरन् चित्तवृत्तियों को सब तरफ से खींचकर किसी भी विषय पर एकाग्र कर सकने की शक्ति को ही समस्त आध्यात्मिक उन्नति का मूलमंत्र मानकर उसी को सिद्ध करने का उपदेश लोगों को दिया। अन्य शास्त्रों ने भी ऐसी सम्मति प्रकट की है। “कठोपनिषद्” ने कहा है-

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।

नशान्तमानसोवापि प्रज्ञाने नैनमाप्नुयात्॥

अर्थात् “जो व्यक्ति पाप से छूट नहीं पाया है, जो इन्द्रियों के वशीभूत है, और जो असमाहित अर्थात् चंचल चित्तवाला है, वह कभी आत्मसाक्षात्कार नहीं पा सकता।”

एक अन्य स्थान में इसी विषय का वर्णन यों किया गया है-

यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।

बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहु परमाँ गतिम्॥

ताँ योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम्।

अप्रमतस्तदा भजति योगोहि प्रभवाष्ययौ॥

अर्थात्- “जब मनुष्य की पाँचों इन्द्रियाँ मन के वश में रहती हैं और बुद्धि की चंचलता मिट जाती है, तो इन्द्रिय, मन तथा बुद्धि की उसी स्थिर अवस्था को आत्मज्ञान प्राप्त करने का श्रेष्ठ मार्ग मानते हैं और ऐसी ही इन्द्रियों की स्थिरता को वे योग के नाम से पुकारते हैं।”

पर चित्त का स्थिर करना सहज कार्य नहीं है। साधारण मनुष्यों की क्या बात, बड़े-बड़े सन्त, महात्मा, विद्वान, बुद्धिमान भी समय-समय पर मनोवेग की शक्ति के सामने परास्त हो जाते हैं और अकर्म समझते हुये भी कितने ही कार्यों को कर डालते हैं। पौराणिक कथानकों से विदित होता है कि विश्वामित्र, पाराशर जैसे सर्वोच्च श्रेणी के ऋषि भी प्रलोभनों के सामने मन और बुद्धि को स्थिर न रख सके और पतन के गर्त में गिर गये। रावण जैसा विद्वान और विश्वविजेता भी एक नारी के कारण मतिभ्रष्ट हो गया और अपने साम्राज्य के नाश का कारण बन बैठा। इसीलिये योगाभ्यास में इस बात पर बहुत अधिक जोर दिया गया है कि उसका साधन करते समय मन में किसी प्रकार का प्रमोद अथवा भोग लिप्सा उत्पन्न न हो जाय। इस सम्बन्ध में योगाचार्यों का मत है कि चित्तवृत्ति का प्रवाह दो कारणों से होता है- एक वासना अर्थात् भावनामय संस्कार और दूसरा शरीर के भीतर के प्राणों का प्रवाह। प्राण के स्पन्दन से मन में भी स्पन्दन उत्पन्न होता है, इसलिये योगियों ने प्राण की गति को नियमित और वशीभूत करने की विभिन्न विधियाँ निकाली हैं। हठ योग, राजयोग, ध्यानयोग, जप योग, लय योग, भक्ति योग आदि योग की शाखाओं का आविष्कार इसी कारण हुआ है। इन साधन विधियों में बहुत अन्तर दिखलाई पड़ता है, पर प्राण प्रवाह पर नियंत्रण प्राप्त करने का उद्देश्य सब में पाया जाता है। यह बात योग शास्त्र में ही नहीं बतलाई गयी है भगवान मनु ने भी अपनी स्मृति में लिखा है-

दव्ह्मन्ते व्मायमाननाँ धातूनाँ हि यथा भला।

तथान्द्रियाणा दत्ह्मन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्॥

अर्थात्-”जिस प्रकार धातुओं के मैल आग में तपाकर जला दिए जाते हैं उसी प्रकार इन्द्रियों के सब प्रकार के विकार प्राणवायु के निग्रह द्वारा नष्ट किये जाते हैं।”

प्राण-निरोध का एक अन्य उद्देश्य हमारे शरीर यंत्र पर नियंत्रण प्राप्त करना भी होता है। यद्यपि उच्चकोटि के योगी शरीर को आत्मा से पृथक समझकर उसके सुख दुख को कोई महत्व नहीं देते, पर साधारण श्रेणी के साधकों के शरीर में यदि कोई विशेष दुख या कष्ट हो तो उनका ध्यान अवश्य उस और चला जाता है और चित्त की एकाग्रता में बाधा पड़ जाती है। प्राण-वायु पर नियन्त्रण प्राप्त कर लेने पर प्राण को इच्छानुसार देह के किसी भाग में संचालित किया जा सकता है और उसके द्वारा किसी भी विकार को दूर करना संभव होता है। इस प्रकार अपने शरीर को क्लेश रहित बनाकर योगीजन चित्त को एकाग्र करने में समर्थ होते हैं।

शारीरिक क्लेशों से भी बढ़कर चित्त की चंचलता का कारण साँसारिक वासनायें हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार सभी मनुष्यों के मन में पाये जाते हैं और इनके कारण साधन करते समय भी चित्त वृत्ति में चंचलता उत्पन्न हो जाती हैं। मनुष्य आत्मा का ध्यान करना चाहता है, पर उसका मन बार बार साँसारिक विषयों की ओर खिंच जाता है। इसीलिये योग शास्त्र में सर्वप्रथम यम नियम का विधान किया गया है। अर्थात् जो मनुष्य योगाभ्यास द्वारा आत्म साक्षात्कार का अभिलाषी है उसे सबसे पहले विभिन्न क्रियाओं और अभ्यासों द्वारा अपने शरीर तथा मन की शुद्धि कर लेनी चाहिये। योगी के लिये ब्रह्मचर्य, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह का अभ्यास करना अनिवार्य बतलाया गया है। जब मनुष्य इन व्रतों को ग्रहण कर लेता है तो स्वभावतः उसका ध्यान साँसारिक विषयों की तरफ से हट कर आध्यात्मिक विषयों की ओर आकर्षित होने लगता है। फिर प्राण पर नियन्त्रण हो जाने से मन की लगाम हाथ में आ जाती है और साँसारिक बातों में इधर-उधर भटकते मन को सहज ही वहाँ से खींचकर आत्म-चिन्तन में लगाया जा सकता है। इसी विचार से “योग-वशिष्ठ” में कहा गया है-

दुःसहा राम संसारविषवेग विषूचिका।

योग गारुड मन्त्रेण पावने नोय शाभ्यति॥

अर्थात्-”जिस प्रकार गारुड़ मन्त्र का ज्ञाता विष को दूर कर देता है उसी प्रकार साँसारिक विषयों के विष का शमन योगाभ्यास द्वारा ही किया जा सकता है।”

इसमें सन्देह नहीं कि योग द्वारा तरह-तरह की अलौकिक शक्तियाँ, विभूतियाँ तथा सिद्धियाँ भी प्राप्त हो सकती हैं और होती हैं, पर उनकी ओर ध्यान देना या उनका विशेष महत्व समझना भूल है। जो व्यक्ति योग द्वारा कोई चमत्कारिणी शक्ति प्राप्त करके साँसारिक स्वार्थों को सिद्ध करना चाहते हैं वे वास्तव में बड़े मूर्ख और अधम श्रेणी के व्यक्ति हैं। योग विद्या का एकमात्र उद्देश्य चित्त को मानसिक विषयों से हटाकर आत्मोन्नति में लगाना है जिससे मनुष्य को सच्चे सुख और शाँति की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत जो योग से प्राप्त होने वाली शक्ति को साँसारिक विषयों में लिप्त होने का साधन बनाना चाहते हैं उनको मूर्ख और अधर्म न कहा जाये तो और क्या कहा जाय? ऐसे व्यक्ति योगी कहलाने के बजाय योग-भ्रष्ट कहलाते हैं और उनको किसी प्रकार का लाभ होने के बजाय उलटे नरकगामी बनना पड़ता है। इसलिये हमको भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि योग का वास्तविक उद्देश्य आत्म साक्षात्कार ही है, जिससे मनुष्य स्वार्थ को त्यागकर परमार्थ का जीवन व्यतीत करने में समर्थ हो सकता है।


गृहस्थ-जीवन और हमारी मानसिक भावनाओं का विकास

(प्रो. लालजीराम शुक्ल)

अनेक अध्यात्मवादी व्यक्ति गृहस्थ आश्रम को माया मोह बढ़ाने वाला जंजाल मात्र समझते हैं। उनका विचार है कि अगर आत्मोन्नति करना है तो उसके लिये गृह-त्याग करके जप-तप करना आवश्यक है। पर उनकी यह धारणा निराधार है और काल्पनिक विचारों से उत्पन्न हुई है। गृहस्थ-जीवन, विशेषकर संतान उत्पन्न करके उसका यथोचित पालन पोषण करके उसे सुयोग्य नागरिक बना देना केवल एक बड़ी भारी समाज-सेवा ही नहीं है वरन् आत्मोन्नति का भी एक बड़ा साधन है।

वेदशास्त्र का पर्याप्त अध्ययन करने के पश्चात् जब देवर्षि व्यास को मानसिक शान्ति न मिली तो उन्होंने नारद जी से शान्ति के उपार्जन का मार्ग पूछा। नारद जी ने उन्हें बालकृष्ण की उपासना का उपदेश दिया। व्यासजी ने इस उपदेश को मानकर अपने शुष्क शास्त्रीय जीवन को त्यागकर रसमयी बालकृष्ण की भक्ति का जीवन स्वीकार किया। जिसके परिणामस्वरूप ‘श्रीमद्भागवत’ का सृजन हुआ। कृष्ण की बाललीला गा-गा कर न सिर्फ व्यासजी ने ही मानसिक शान्ति प्राप्त की किन्तु करोड़ों नर नारियों ने अपने आपको आनन्दमय बना लिया। आज भी कृष्ण-चरित्र भारत के करोड़ों लोगों के अवर्णनीय सुख का हेतु है।

मनोविज्ञान की दृष्टि से किसी भी बालक की सेवा से वही लाभ होता है जो उत्तम से उत्तम काम करने से होता है। बालक की सेवा परमात्मा की सेवा है। यदि बालक की सेवा कोई निःस्वार्थ भाव से करता है तो वह परमानन्द की प्राप्ति का अधिकारी अपने आपको बनाता है। जो माता-पिता अपनी संतान को अपनी न समझकर सर्वात्मा की समझते हैं, जो अपने को उनका रक्षक मात्र मानते हैं, वे सन्तान को योग्य ही नहीं बनाते किन्तु अपने आप में भी दैवी विभूतियों को जागृत करते हैं, जो मनुष्य को अपने आध्यात्मिक शत्रुओं के विनाश में बड़ी सहायक होती हैं। वे शिक्षक धन्य है जो अपने सभी शिष्यों से अपनी सन्तान जैसा व्यवहार करते हैं। बालकों के प्रति अपना और पराया भाव छोड़कर उनकी सेवा करना वैसा ही उच्चतर कर्म है जैसा कि कठिन से कठिन योगाभ्यास ।

बालकों की सेवा करना सरल कार्य नहीं। विरले ही माता-पिताओं का अपनी सन्तान के प्रति योग्य दृष्टिकोण होता है। अधिकतर माता-पिता सन्तान की सेवा अपने सुख के हेतु करते हैं। बालकों के कल्याण के विषय में वे ध्यान नहीं देते। यह धर्म-बुद्धि नहीं, अधर्म-बुद्धि है। यह बालकों के प्रति प्रेम प्रदर्शन नहीं, अन्याय करना है जिसे हम जानते भी नहीं। यदि हम बालकों का लालन-पालन इसलिये करते हैं कि वे हमको रुपया कमाकर देंगे अथवा हमारा ज्ञान बढ़ावेंगे तो हम उनके प्रति सच्ची भलाई नहीं करते। कितने आमिषाहारी अजापुत्र की नई-नई बेर की कोपलें इसलिये खिलाते हैं कि उसका माँस खाने में स्वादिष्ट लगे। वे बकरे के बच्चे को बड़े परिश्रम के साथ पालते हैं। बच्चा भी जब तक जीता है, बड़ा ही सुखी रहता है किन्तु वास्तव में इस बच्चे को पालने वाले की बुद्धि पालने वाले की नहीं है। बकरी के बच्चे का वास्तविक सुख मीठी पत्तियों के खाने में नहीं है। पालन की बाह्य क्रिया के मूल में मारने की इच्छा है। उसे बच्चे का क्षणिक सुख उसकी मृत्यु में परिणत होता है। सन्तान से लाभ उठाने की इच्छा से उनका लालन-पालन करना ऐसा ही अनर्थमूलक है जैसा कि हत्या की इच्छा से बकरी के बच्चे को पालना। यह बाल-कृष्ण की सेवा नहीं है, यह अपने अहंकाररूपी भेड़िये के लिये खाद्य की तैयारी है।

बालक की सेवा कामवासना पर विजय प्राप्त करने में बड़ी भारी सहायक सिद्ध होती है। जितने ही छोटे बालकों की सेवा की जाय, उतना ही अधिक इस विषय में लाभ होता है। जो विधवायें अथवा अविवाहित स्त्रियाँ अपना जीवन पवित्रता से बिताना चाहती हैं, वे बालकों की सेवा, शिक्षा अथवा लालन- पालन का कार्य अपने ऊपर लेती हैं। बालकों के लालन-पालन से कामवासना भोग का रूप न ग्रहण कर शुद्ध-समाज प्रेम के रूप में प्रकाशित होती है। समाज-प्रेम कामवासना का शोधित रूप है। जो पति-पत्नी कामेच्छा से मुक्त होना चाहते हैं, वे लगन के साथ बालकों की सेवा करते हैं। बालकों की लगन से सेवा करना भोगेच्छा को शिथिल बनाना है।

बालक पति-पत्नी के प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप हैं। इस प्रकार परमात्मा की पूजा से भोग की इच्छा रूपी जड़-बुद्धि नष्ट हो जाती है। जब पति-पत्नी एक दूसरे का मिलन अपनी सन्तान में मूर्तिमान होते देखते हैं तब उनके क्षणिक मिलन की इच्छा दूर हो जाती है। अब जड़ आलिंगन की जगह चैतन्य आलिंगन होता है। जड़ आलिंगन शक्ति का विनाशक और मृत्यु कारक होता है और चैतन्य आलिंगन शक्ति का उत्पादक और अमरता का देने वाला है। संतान से माता-पिता को स्थायी सुख का ही लाभ नहीं होता, उन्हें अमरत्व की भी प्राप्ति हो जाती है। जो लोग संतान-निग्रह के उपायों का रतिक्रिया में उपयोग करते है वे वास्तव में दाम्पत्य प्रेम के रहस्य को ही नहीं समझते। वे अपने और दूसरे के प्रति अत्याचार करते हैं। उनकी कामवासना शान्त होने का कोई साधन ही नहीं रहता। उन्हें विषय भोग का क्षणिक सुख प्राप्त होता है, किन्तु उन्हें आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति नहीं होती जो कि सन्तान सेवा से ही प्राप्त हो सकती है। जैसे भोग जड़ता का मूर्त्तिमान रूप है, वैसे ही सेवा आध्यात्मिकता का।

क्रोध की विनाशक मैत्री भावना है। पारिवारिक जीवन मैत्री के अभ्यास का सबसे सुन्दर स्थल है। कौन ऐसा पिता होगा जो अपने पुत्र का कल्याण न चाहता हो ! कौन ऐसी माता होगी जो पुत्र के बिल्कुल निकम्मा होते हुए भी उसका जीना नहीं चाहेगी ! यह मैत्री भावना का अभ्यास मानसिक दृढ़ता लाता है, हमारे नकारात्मक विचारों को नष्ट करता है तथा निराशावाद का उन्मूलन करता है। क्रोध इसके सामने वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे सूर्य के प्रबल आतप से मेघ ।

बालकों का लालन-पालन घृणा की मानसिक वृत्ति का नाश करता है। प्रत्येक साधारण व्यक्ति अपने शरीर के प्रति प्रेम करता है और दूसरे के प्रति घृणा जिसका अहंकार जितना बड़ा होता है, उसकी घृणा भी उतनी ही बड़ी होती है। घृणा से व्याप्त लोग बाहर से बड़े साफ सुथरे रहते हैं। वे गन्दगी में हाथ डालना पसन्द नहीं करते। इसके विपरीत प्रेम अभिमान का दमन करता है और घृणा से निर्मित मानसिक ग्रन्थियों को खोलकर उनके विष को नष्ट कर देता है। माता प्रेम कर बालक की शारीरिक गन्दगी को साफ करती है, इस कार्य में उसे कोई भी घृणा और ग्लानि नहीं होती। इस काम को करके माता अपने मन को पवित्र बनाती है। जो स्त्रियाँ बाँझ रह जाती हैं, उन्हें इस प्रकार अपने मन को पवित्र बनाने का अवसर नहीं मिलता अथवा जिन स्त्रियों के मन में सन्तान की सेवा की भावना इतनी प्रबल नहीं होती कि उनकी घृणा की भावना को जीत सके, उन्हें प्रकृति सन्तान नहीं प्रदान करती अथवा संतान पैदा होकर उसे जीवित नहीं रहने देती। बाँझ स्त्रियाँ जितनी स्वच्छ दिखाई देती हैं उतनी सन्तान वाली स्त्रियाँ नहीं दिखाई देती। बाँझ स्त्रियाँ दूसरों के चरित्र की आलोचना बड़े चाव के साथ करती हैं। जो बात स्त्रियों के सम्बन्ध में सत्य है वही पुरुषों के विषय में भी सत्य है।

वास्तव में बच्चा एक शक्ति का केन्द्र है। जो बच्चे की सेवा इस भाव से करता है, कि उससे उसे शान्ति और आनन्द मिलता है तथा उसकी मानसिक शक्ति बढ़ती है, उसे अवश्य लाभ होता है। बच्चे के मन में अंतर्द्वंद्व नहीं होता। इसलिए उसकी शक्ति व्यर्थ खर्च नहीं होती। बच्चे के संपर्क में आते ही मनुष्य का मन भी बच्चे के मन जैसा सरल बन जाता है। जिस भाव से हम प्रभावित रहते हैं, उसी भावना को हम चरितार्थ भी करते हैं। बच्चे की सरलता बार-बार मन में लाने से, उसके प्रेम का चित्र बार-बार मन में अंकित करने से हम स्वयं सरल चित्त के हो जाते हैं और हमारा स्वत्व प्रेम से पूर्ण हो जाता है। जहाँ प्रेम है वहीं आनन्द है, वहीं शान्ति और वहीं सच्चा स्वास्थ्य है। प्रेम और परमात्मा एक ही तत्व के दो नाम हैं। प्रेम परमात्मा की शक्ति है। शक्ति और शक्तिमान में नाम का भेद है,तत्व का नहीं।


अनैतिकता और भ्रष्टाचार का उच्छेद कैसे हो?

(श्री सत्यभक्त )

भारतवर्ष की सबसे बड़ी वर्तमान समस्या अनैतिकता और भ्रष्टाचार की है। जब तक हमारे ऊपर एक मजबूत विदेशी जाति का शासन था, तब तक तो उसके दबाव से ये बुराइयाँ काफी हद तक प्रच्छन्न अवस्था में थी। पर जब वह दबाव हट गया और हम स्वयं अपने घर के कर्ताधर्ता बना दिये गये तब से हमारे अंतर्गत सभी दोष खुले रूप में प्रकट हो गये हैं। आज हाट-बाजार, कल, कारखाना, रेल, मोटर में जहाँ कहीं भी दस-बीस आदमी इकट्ठा होते हैं यही रोना सुनने में आता है। लोग बेशर्मी के साथ कहते हैं- “अजी साहब, इससे तो अंग्रेजों का जमाना ही हजार दर्जे अच्छा था। इस काँग्रेस के राज में तो रिश्वत और चोरी का बाजार जैसा गर्म है वैसा तब कभी देखने में नहीं आया था। और न आजकल की सी महंगाई कभी सहन करनी पड़ी थी।” पर ये मूर्ख और निर्लज्ज यह नहीं विचारते कि काँग्रेस का शासन स्थापित होने से किसी दूसरे लोक के आदमी तो यहाँ आकर नहीं बस गये। देश में जो आदमी अंगरेजी राज्य में रहते थे वे ही वर्तमान समय में भी रहते हैं। अब अगर वे पहले से ज्यादा बेईमानी और घूँसखोरी करने लग गये हैं तो इसका कारण यही है कि उनके सर पर पहले जो अंगरेजों के डण्डे का भय सवार रहता था वह अब जाता रहा। अर्थात् बेईमानी और भ्रष्टाचार की जघन्य आदतें उनके भीतर तब भी भरी हुई थी, पर भय के कारण वे पूर्ण रूप में प्रगट नहीं होती थीं। अब उस भय के दूर हो जाने से वे बुराइयाँ खुलकर खेलने लगी हैं और लोग अपने कुकर्मों के कारण परेशान हो रहे हैं।

चाहे जो हो इसमें सन्देह नहीं कि इस समय हमारे देश की अवस्था बहुत भयंकर हो उठी है। लोगों में स्वार्थ की भावना इतना जोर पकड़ती जाती है कि कभी-कभी तो उसे देखकर बड़ा भय लगने लगता है। समाज और देश का हित किस चिड़िया का नाम है इसे या तो अधिकाँश व्यक्ति जानते ही नहीं या भूल गये हैं। हर एक के मन में यही धुन समा गई है कि “मैं अधिक से अधिक कमाकर अपना घर भर लूँ और खूब ठाठ-बाठ से रहने लगूँ। इस कमाई में भले-बुरे, सच-झूँठ, पाप-पुण्य का ख्याल रखने की कतई जरूरत नहीं, ये तो सब मुँह से कहने की बातें हैं, जो कोई वास्तव में इनका पालन करने की कोशिश करते हैं वे मूर्ख हैं। आजकल के जमाने में कहीं ईमानदारी से काम चलता है? जब दूसरे लोग लम्बे-लम्बे हाथ मारकर कोठियाँ खड़ी कर रहे हैं तो मैं ही क्यों पीछे रहूँ?” इस प्रकार देश में एक ऐसी आग लगी है, एक ऐसा शैतानी चक्र चल पड़ा है कि लोग एक दूसरे को देखकर, एक दूसरे का उदाहरण देकर अनैतिकता और भ्रष्टाचार के मार्ग पर कूद-कूद कर, उछल-उछल कर आगे बढ़ रहे हैं और समाज के नाश और पतन का कारण बनने में जरा भी शर्म और हया का अनुभव नहीं करते। इसी मनोवृत्ति का फल है कि देश में महंगाई की समस्या भीषण रूप धारण कर रही है और बहुसंख्यक लोगों का जीवन निर्वाह बड़ा कठिन हो गया है। जिनके हाथ में शासन और व्यवस्था की बागडोर है वे भी प्रायः सबके सब ऐसी ही मनोवृत्ति के हैं। इसलिये सिवाय लम्बे-चौड़े वायदों और चिकनी-चुपड़ी बातों के उनसे कोई ठोस और फलदायक उपाय करते नहीं बनता।

यह परिस्थिति वास्तव में बड़ी सोचनीय और चिन्ताजनक है। दिखाने को तो हम रात-दिन धर्म और अध्यात्म की रट लगाये रहते हैं, वेद और उपनिषदों के उच्च आदर्शों की दुहाई देते रहते हैं, पर व्यवहार में टापुओं में बसने वाले जंगलियों से भी अधिक हीनता और पाशविकता का परिचय देते हैं। वे लोग कम से कम अपने फिर्के के दो-चार हजार व्यक्तियों के प्रति तो वफादार रहते हैं, उसके किसी व्यक्ति का अनहित नहीं कर सकते। पर हमारे ये ‘धर्म’ और ‘ज्ञान’ के ठेकेदार बनने वाले भाई तो अपने बगल के मकान में रहने वाले पड़ोसी से भी किसी भी तरह की धोखेबाजी करने में पशोपेश नहीं करते। जिस योरोप और अमरीका को ये लोग भौतिकवादी देश बताकर निन्दनीय ठहराते हैं, वहाँ के लोगों का व्यक्तिगत चरित्र और नीति का मानदण्ड भी हमारे इन ‘अध्यात्मवादियों’ से अनेक गुना अच्छा है। वहाँ लेन देन में कभी ऐसी बेईमानी नहीं बरती जा सकती, और सचाई का भी वे हमारी अपेक्षा बहुत अधिक ध्यान रखते हैं। समाज के हित को वहाँ सर्वोपरि स्थान दिया जाता है और सामूहिकता की भावना उनमें कूट-कूटकर भरी है। यही कारण है कि डेढ़, दो सौ वर्ष के थोड़े से समय में उन्होंने समस्त संसार पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया और आज पृथ्वी के बाहर अन्य लोकों में भी पैर रखने की चेष्टा कर रहे हैं। यह बात दूसरी है कि उनकी महत्त्वाकाँक्षा सीमा से बाहर ऐसा रूप धारण कर रही है कि वे अपने हाथ से ही पारस्परिक सर्वनाश की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं। पर उनके इस कार्य में हमारे यहाँ की सी हीनता, संकीर्णता अथवा अधर्म स्वार्थ- साधन का कोई चिन्ह नहीं है।

दूसरे महायुद्ध के पहले योरोप के देशों की दशा भी बड़ी संकटापन्न हो गई थी। वहाँ पर विभिन्न राष्ट्रों में प्रतिद्वन्द्विता का भाव इतना अधिक बढ़ गया था कि सबको अपनी सुरक्षा में सन्देह जान पड़ने लगा था। एक दूसरे के भय से सभी राष्ट्र युद्ध की अधिकाधिक तैयारी कर रहे थे और शस्त्रों के निर्माण में कल्पनातीत धन व्यय किया जा रहा था। समझदार लोग इस दशा को देखकर बड़े चिन्तित थे क्योंकि इससे जनता की सब प्रकार से हानि थी। इसलिये उन्होंने लोगों को यह समझाया कि अपनी नैतिकता और चरित्र को अक्षुण्ण रखोगे तो तुम सच्ची शाँति स्थापित कर सकोगे और कोई तुम्हारा कुछ बिगाड़ न सकेगा। इस उद्देश्य से प्रकाशित एक घोषणा-पत्र में, जिसमें सबसे ऊपर ‘लार्ड बाल्डविन’ के हस्ताक्षर थे, जन समुदाय के मार्ग-प्रदर्शनार्थ निम्न सम्मति प्रकट की गई थी-

“किसी भी राष्ट्र या जाति की शक्ति उसके सिद्धान्तों की सारयुक्तता पर निर्भर होती है। प्रत्येक राष्ट्र की विदेशी और गृह नीति वास्तव में वहाँ के लोगों के चरित्र तथा नेताओं के प्रोत्साहन द्वारा ही निश्चित की जाती है। उनको अपने जीवन में तथा नीति में ईमानदारी, श्रद्धा और प्रेम का अधिकाधिक समावेश करना चाहिये, क्योंकि इन्हीं गुणों के आधार पर एक नये संसार का निर्माण किया जा सकता है। बिना इन गुणों के बड़े से बड़े शस्त्र, बड़ी से बड़ी गुप्त संधियाँ केवल सर्वनाश के समय को थोड़ा-सा टाल सकती हैं। इसीलिये वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति-संगठन की है। सभी देशों में इस बात पर विश्वास करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह एक ऐसा कार्य है कि जिसमें सभी देशों और जातियों के सब पुरुष और स्त्री भाग ले सकते हैं। अगर इस कार्यक्रम को हम सब मिलकर शक्ति और योग्यता पूर्वक पूरा करें तो इससे संसार भर में शाँति की स्थापना हो सकती है।”

वास्तव में किसी महान कार्य को सिद्ध करने का यही मार्ग है । ईमानदारी के बिना कोई सत्कार्य और स्थायी लाभदायक कार्यक्रम पूरा हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार श्रद्धा की शक्ति द्वारा ही हम कठिन मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं। प्रेम और सहानुभूति के आधार पर ही सामाजिक संगठन संभव होता है और साधनों से उचित लाभ उठाया जा सकता है। बेईमान, श्रद्धा विहीन और अपस्वार्थी व्यक्ति डाकू, चोर और ठगों की तरह आर्थिक लाभ उठा सकते हैं, मौज, मजा और गुलछर्रे उड़ा सकते हैं, संसार के सामने ठाठ-बाट के साथ अकड़कर चल सकते हैं। पर ये सब बातें क्षणस्थायी होती हैं, और ऐसे व्यक्ति प्रायः इसी जीवन में अपनी करनी का कुफल भोगते देखे जाते हैं। जो बात ऐसे व्यक्तियों के संबन्ध में सत्य है वही समाज और राष्ट्रों पर भी लागू होती है। जब हमारे समाज के लोग इन सद्गुणों की उपेक्षा करके किसी भी उपाय से धन कमाने और उसके द्वारा भोग विलास या शान शौकत को ही सब से बड़ा काम समझेंगे, तो उसका कड़वा फल भी उनको ही भोगना पड़ेगा। इस प्रकार के कार्यों से समाज में अनैतिकता और भ्रष्टाचार का बोलबाला होना अनिवार्य है और उसका बुरा परिणाम किसी एक व्यक्ति को नहीं वरन् समस्त समाज को ही उठाना अनिवार्य है। ऐसी अवस्था में जो लोग वर्तमान महँगी और भ्रष्टाचार के लिये सरकारी अधिकारियों अथवा छोटे-बड़े व्यवसाइयों को दोष देते हैं उनका कथन मूर्ख स्त्रियों के रोने और कोसने से अधिक महत्व नहीं रखता। जब वे भी उसी समाज के अंग हैं और अनैतिक व्यापार करने वाले भी प्रायः उन्हीं के भाई-बंधु, पड़ोसी, मित्र आदि हैं, तो वे किस मुँह से अनैतिकता और भ्रष्टाचार की बुराई करते हैं। हमने देखा कि बाप तो सट्टेबाजी और ब्लैक मार्केटिंग करके रुपया कमा रहा है और बेटा महंगी के विरोध की सभा में गला फाड़ कर मुनाफाखोरी की निन्दा करता है!!

इसलिये अगर हम वास्तव में सच्चे दिल से शिकायत करते हैं और हमको सचमुच कष्ट भोगना पड़ रहा है, तो हमको इस जवानी जम खर्च और नामर्दों की तरह रोने-कलपने को छोड़कर क्रियात्मक ढंग से कोई कदम उठाना चाहिये। प्रत्येक नगर में निष्पक्ष और न्याययुक्त विचारों के व्यक्तियों की एक कमेटी या सभा का निर्माण किया जाय और वह ऐसे मामलों में बिना भय और पक्षपात के आन्दोलन करे। आरम्भ में अगर अनैतिक कार्य करने वाले एक-एक व्यक्तियों के विरुद्ध आवाज उठाना कठिन हो तो उस समुदाय का ही खुल कर विरोध करना चाहिये और जैसे-जैसे संगठन-शक्ति बढ़ती जाय बेईमान लोगों के मकान या दुकानों के सामने ही उनकी करतूतों का भंडाफोड़ करना चाहिये। ऐसे बेशर्म या दुस्साहसी व्यक्ति थोड़े ही होते हैं जो इस प्रकार की सार्वजनिक बदनामी या विरोध की तनिक भी परवा न करें और यदि ऐसे भी कुछ लोग हों तो समय आने पर उनके विरुद्ध भी कार्यवाही करने के अन्य तरीके निकाले जा सकते हैं। हमने तो ऊपर नमूने का एक कार्यक्रम बतलाया है, उत्साही और कर्मवीर व्यक्ति परिस्थिति और अवसर के अनुकूल विरोध करने के अनेक सक्रिय उपाय ढूंढ़ सकते हैं।

मूल बात यह है कि हम सचमुच अनैतिकता और बेईमानी के विरुद्ध हों। जो लोग दूसरों की मुनाफाखोरी या घूसखोरी का तो विरोध करते हैं पर अगर मौका लग जाय तो स्वयं वैसा ही कार्य करके धन बटोरने को लालायित रहते हैं, तो उनकी आलोचना या शिकायत का कोई प्रभाव कैसे पड़ सकता है? ऐसे लोग तो सबसे पहले दण्ड के पात्र हैं। हमको दूसरों की निन्दा तभी करनी चाहिये जबकि हमारी नीयत साफ हो और हम केवल व्यक्तिगत स्वार्थ से नहीं, वरन् समाज के हित का ख्याल करके अनैतिकता और भ्रष्टाचार का उच्छेद करने को कटिबद्ध हों!


 अपना दृष्टिकोण विशाल बनाइये।

(स्वामी श्रीसदाशिवजी महाराज, प्रज्ञान मंदिर, अहमदाबाद)

आज समग्र विश्व में मानवता के लिये महान प्रयत्न किया जा रहा है, पर उसका परिणाम बहुत थोड़ा दृष्टिगोचर होता है। इसका कारण क्या है? इस विषय पर विचार करने से हम को जान पड़ता है कि संसार में दो प्रकार के मनुष्य पाये जाते हैं- एक तो वे जो व्यष्टि अथवा तुच्छ जीव भाव को केन्द्र मानकर व्यक्तिगत धन, मान, यश, प्रतिष्ठा इत्यादि ऐहिक सुखों की सफलता प्राप्त करने के लिये विहित अथवा अविहित, नैतिक अथवा अनैतिक, निन्दनीय अथवा अभिनंदनीय जैसा भी हो उपाय काम में लाते हैं। प्राणीमात्र जितने भी उपाय करते हैं उन सबका एकमात्र उद्देश्य यही होता है कि “मैं अधिक से अधिक सुख प्राप्त करूं।” इसका कारण यह है कि जीवमात्र आनन्द स्वरूप होते हैं। तैत्तिरीय संहिता में कहा गया है। “आनन्दण्द्हि एव खलु इमानि भूतानि जायन्ते अनन्देन जातानि जीवन्ति आनन्दं प्रत्याभि संविशन्तीति,” अर्थात् ‘समस्त प्राणीमात्र आनन्द में से ही उत्पन्न हुये हैं, आनन्द में ही जी रहे हैं, और सुषुप्ति’ (गाढ़ निद्रा) व मृत्यु के पश्चात् आनन्द में ही समा जाते हैं।” इस प्रकार प्राणीमात्र और आनन्द इन दोनों में कार्यकारण सम्बन्ध होने से सभी प्राणी आनन्द की इच्छा रखते हैं। इसमें एक शंका यह उत्पन्न होती है कि जब सब प्राणी आनन्द-स्वरूप ही हैं तो वे आनन्द को ढूँढ़ते क्यों फिरते हैं? इसका कारण यह है कि वे अपने स्वरूप को भूल गये हैं, पर उनमें जो आनन्दपन का मूल संस्कार है उसे नहीं भूल सके हैं। इसलिये वे इस जगत में तरह-तरह के भोगों को भोगते हुये सब में उसी संस्कार के प्रभाव से आनन्द को ही ढूँढ़ते रहते हैं। जब उनको एक वस्तु में आनन्द नहीं मिलता तब वे दूसरी वस्तु की इच्छा करते हैं, उसके लिये प्रयास करते हैं। जब उनकी इच्छा बहुत तीव्र हो जाती है तो विहित-अविहित कैसे भी उपाय से उस वस्तु को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं और उसका उपभोग करते हैं। उपभोग काल में उसे तात्कालिक तृप्ति का आनन्द भी प्राप्त होता है, पर यह आनन्द सापेक्ष होने से अधिक समय तक टिकता नहीं है। वे दूसरे किसी व्यक्ति को अपने से विशेष धनवान, विद्वान अथवा गुणवान देखकर अपने से अधिक सुखी समझते हैं और स्वयं भी वैसा ही होने का प्रयास करते हैं। संभव है वे अपने प्रयास में सफल होकर अधिक धनवान,विद्वान हो जायें, पर तो भी उनको वास्तविक और स्थायी सुख नहीं मिलता। तब वे निराश होकर देव, देवी अथवा शास्त्रों के सम्बन्ध में अश्रद्धावान बनकर अधिक दुखी हो जाते हैं।

यदि वास्तविक रूप से देखा जाय तो प्रत्येक प्राणी का ध्येय देव, देवी अथवा ईश्वर या शास्त्र नहीं है वरन् आनन्द है। प्रत्येक प्राणी को जिस प्रकार “आनन्द” प्राप्त हो सके वैसा ही आचरण वह करता है। जिसको खेलने में आनन्द मिलता है वह खेल करता है। इसी प्रकार धन, मान, यश, प्रतिष्ठा, विद्या, बुद्धि, छल−कपट, प्रपंच, चोरी, दगाबाजी, योग, जप, तप ध्यान, भजन, समाधि आदि उपायों में जिसे जिनके द्वारा आनन्द मिलता है वह उसी मार्ग से आनन्द की शोध कर रहा है और न्यूनाधिक परिणाम में आनन्द प्राप्त भी कर रहा है। पर वह उससे वास्तविक तृप्ति प्राप्त नहीं कर सकता वह अपने को कृतकृत्य अनुभव नहीं कर सकता।

इसका रहस्य यह है कि प्राणीमात्र आनन्द भोगने का जो प्रयास करते हैं वह केवल व्यष्टि जीव भाव को केन्द्र मानकर करते हैं। इस प्रकार एक ही समय में पृथ्वी के असंख्यों प्राणी पृथक-पृथक उपायों द्वारा एक ही “आनन्द” को प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं। प्राणीमात्र समष्टि की दृष्टि से, आत्मा की दृष्टि से एक ही है और जिस ब्रह्मस्वरूप ‘आनन्द’ को प्राप्त करने की वे चेष्टा करते हैं वह भी एक ही है। अब केवल ये प्राणी अपनी रुचि और संस्कार के अनुरूप जो प्रयास करते हैं वही भिन्न या पृथक होता है। शास्त्र की भाषा में इस बात को यों कह सकते हैं कि “कर्ता” (प्राणी) और “कर्तव्य” (आनन्द) तो एक ही हैं, केवल “कर्म” (उपाय या कार्यप्रणाली) में भेद है। जब तक इस भेद को दूर नहीं कर दिया जाता और कर्ता, कर्तव्य, कर्म में पूर्ण एकता स्थापित नहीं की जाती तब तक हजारों जन्म तक लाखों प्रकार के प्रयास करने पर भी शाश्वत सुख या आनन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती।

इस सम्बन्ध में जब विशेष विचार करते हैं तो ज्ञात होता है कि ‘कर्ता’ में कोई दोष नहीं है क्योंकि वह तो विशुद्ध आत्मा है। “कर्तव्य” भी आनन्द स्वरूप ब्रह्म होने से उसमें भी कोई दोष बतलाया नहीं जा सकता। इस लिये मुख्य दोष हमारे “ध्येय” का ही होता है। जैसा कहा जा चुका है अब भी जीव विभिन्न उपायों से अपनी योग्यता तथा रुचि के अनुसार अस्थायी आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। पर त्रुटि इतनी ही है कि उनके आनन्द की धारा बीच-बीच में टूट जाती है और तब उनको दुःख का अनुभव होता है। जो व्यक्ति, चाहे वह किसी देश, जाति व धर्म से सम्बन्ध रखने वाला क्यों न हो, इस आनन्द-धारा को अविच्छिन्न रख सकता है वह निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ है और हम कह सकते हैं कि उसने परमात्मा को प्राप्त कर लिया है।

इस परब्रह्म रूपी आनन्द-धारा के टूट जाने का क्या कारण है? जैसा हमने बतलाया है अधिकतर प्राणी व्यष्टि आनन्द स्वरूप तुच्छ आनन्द को ही केन्द्र बनाकर विविध कर्म कर रहे हैं,- फिर चाहे वे कर्म साँसारिक सुखों के निमित्त हों और चाहे भक्ति आदि साधनों द्वारा स्वर्ग, बैकुण्ठ, कैलाश आदि प्राप्त करने का उद्देश्य हो, अथवा वेदान्त आदि ज्ञान-विज्ञान का अभ्यास करके मुक्ति प्राप्ति का लक्ष्य हो। ऐसे व्यक्तिवादी लोग चाहे कैसे भी भले, धर्मात्मा दिखाई दें, पर उनका दृष्टिकोण संकुचित होने से उन को बहुत कम परिमाण में आनन्द की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार एक छोटे से प्याले में गंगाजल भरकर लाने वाला अपनी ही प्यास भली प्रकार बुझा नहीं सकता, वह दूसरों की तृष्णा क्या शान्त करेगा, उसी प्रकार केवल मात्र अपनी मुक्ति या बैकुण्ठ की ही कामना रखने वाले ‘धर्मात्मा’ चाहे वे कल्याण नहीं कर सकते, उनसे दूसरों की भलाई हो सकने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

उपरोक्त नियम के अनुसार संसार से जो व्यक्ति जितना अधिक ‘अहंभाव’ रखता है, अर्थात् अपने सुख-दुख, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क की चिन्ता रखता है, वह चाहे भले काम करने वाला हो या बुरे काम, चाहे विलासी हो और चाहे गृह त्यागी संन्यासी हो, चाहे भक्तिमार्गी हो और चाहे ज्ञानमार्गी हो, पर आध्यात्मिक दृष्टि से वह सबसे छोटा-क्षुद्र (शूद्र) समझा जायगा। इसके विपरीत जो व्यक्ति जितने अधिक अंशों में जाति, समाज, देश, राष्ट्र या विश्व को केन्द्र मानकर कर्म करता है उसका दायरा उतना ही बड़ा हो जाता है और आध्यात्मिक जगत में उसका दर्जा उतना ही उच्च माना जाता है। इन विभिन्न श्रेणी वालों को हम व्यक्तिवादी, समाजवादी, राष्ट्रवादी और विश्ववादी के नाम से पुकार सकते हैं अथवा मानसिक विकास की दृष्टि से इनको लघुमानव, मानव, महामानव, और अति-मानव भी कह सकते हैं।

इन चारों श्रेणियों में ‘व्यक्तिवादी’ सबसे अधम श्रेणी के होते हैं। जो व्यक्ति अपने जीवन-निर्वाह के लिये समाज से तरह-तरह से सहायता लेता हो पर समाज का हित-साधन करने में सबसे पीछे रहता हों, उससे नीच और कौन हो सकता है? वह उन पशुओं की तरह है जो घास और दाने को खाते ही नहीं, वरन् वहीं सो कर और टट्टी पेशाब करके खाद्य सामग्री को नष्ट भी करते हैं, इसी प्रकार व्यक्तिवादी श्रेणी का मनुष्य सदैव केवल अपने स्वार्थ पर ही दृष्टि रखता है और यदि अपने छोटे से स्वार्थ की पूर्ति के लिये समाज की बड़ी से बड़ी हानि भी होती हो तो भी परवाह नहीं करता।

वर्तमान समय में संसार में ऐसे व्यक्तिवादियों (क्षुद्र हृदय मनुष्यों) की संख्या ही अधिक है और प्रजातन्त्र प्रणाली के नियमानुसार वे ही शासन सभा के सदस्यों और शासकों का निर्वाचन करते हैं। यही कारण है कि आज समग्र विश्व में महान अंधाधुन्धी चल रही है और लोग अपने ही हाथ से अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने को तैयार हो रहे हैं।

वर्तमान समय में राष्ट्रवादी, जातीयतावादी व्यक्ति भी काफी संख्या में हैं और वे संसार में सामाजिक न्याय की स्थापना करना चाहते हैं, पर व्यक्तिवादियों के विरोध और षड़यंत्रों के कारण उनको सफलता प्राप्त नहीं होती और संसार सर्वनाश की ओर अग्रसर होता जाता है। हमारे वैदिक ऋषि इस प्रकार की परिस्थिति से परिचित थे। इसी कारण उन्होंने मनुष्यों को आरम्भ से ही ऐसी शिक्षा दीक्षा देने की योजना बनाई जिससे उनकी अहंभाव युक्त मनोवृत्ति का अंत हो सके। गायत्री-मन्त्र , जो वेदों का सार माना गया है, इस सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से हमारा मार्गदर्शन करता है। आज भी हम उसके सन्देश पर आचरण करके इस महान आपत्ति काल से मानवता की रक्षा कर सकते हैं।


सुखी जीवन के कुछ सूत्र

(श्री रामखेलावन चौधरी)

सुख जीवन की एक ऐसी दशा है, जिसमें मनुष्य संघर्ष से मुक्त रहता है। यह संघर्ष कई प्रकार का होता है। मनुष्य के चारों और शीत, ताप और रोग जैसी शक्तियाँ क्रियाशील रहती हैं और उसे इनसे निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है। मनुष्य की कुछ ऐसी आवश्यकताएँ भी होती हैं, जिनकी पूर्ति के बिना उसका जीवन बना नहीं रह सकता। उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कुछ वस्तुओं की आवश्यकता होती है और इन वस्तुओं का पाना सहज नहीं है। जीवन की धारा अक्षुण्ण बहती रहे, इसके लिए भोजन, वस्त्र और आवास की व्यवस्था होनी चाहिए। यह मनुष्य की नग्न आवश्यकताएँ हैं। हम जानते हैं कि इन्हें भी प्राप्त करना दुर्लभ हो रहा है। इनके अभाव में मनुष्य के मन में इच्छाएँ पैदा होती हैं और उनकी तृप्ति न होने पर मन में संघर्ष पैदा हो जाता है। अब समाज की बात लीजिए। मनुष्य ने अपनी सुरक्षा के लिए समाज की रचना की, पर यहाँ भी मनुष्य-मनुष्य के बीच स्वार्थ साधन और हितों के लिए संघर्ष चल रहा है। इस प्रकार रोगों, इच्छाओं और सामाजिक सम्बन्धों के कारण वह दशा नहीं पैदा हो पाती, जिसे हम सुख कहते हैं। सच्चा सुख पाने के लिए इन तीन प्रकार के संघर्षों पर विजय पाना अनिवार्य है।

अच्छा स्वास्थ्य सुख की कुँजी है। स्वस्थ रहने के लिए घी-दूध, मलाई-रबड़ी और उन्हें पचाने के लिए दवाओं के आवश्यकता नहीं है। यदि मनुष्य अपने शरीर के लिए आवश्यक भोजन की मात्रा का अनुमान लगाले (जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए सरल है) और शरीर जितना सहन कर सकता है, उतने श्रम और आराम का मार्ग निकाल ले, तो वह निरोग रहकर सुखी बन सकता है। आहार-विहार में संयम रखना ही सुख का प्रथम सूत्र है। यह प्रत्येक मनुष्य के हाथ में है। डॉक्टर या वैद्य इसमें अधिक सहायता नहीं कर सकते।

दूसरी बात इच्छाओं के बारे में है। कुछ ऐसी बातें हैं, जिनकी इच्छा होना स्वाभाविक है और उनकी पूर्ति के लिए प्रयत्न करना धर्म है। मनुष्य साधारण भोजन, वस्त्र और आवास के बिना न तो जीवित ही रह सकता है और न जीवित रहते हुए निश्चित रह सकता है। परन्तु आज मनुष्य की इच्छाओं की सीमा नहीं है। यदि हम-आप एक दिन के जीवन पर विचार करें और जितने कार्य करते हैं, उनकी सूची बना लें, तो स्पष्ट पता चल जायेगा कि हमारे अधिकाँश कार्य ऐसी इच्छाओं की पूर्ति के लिए होते हैं जिन्हें किसी प्रकार भी जायज या उचित नहीं कहा जा सकता। उनके बिना भी हम बड़े मजे में रह सकते हैं परन्तु इच्छा-पूर्ति की मृग-तृष्णा के पीछे हम पागल हो रहे हैं। यही वर्तमान मानव-जीवन के दुख का सबसे बड़ा रहस्य है। इच्छानुकूल वस्तुओं को प्राप्त कर लेना अपने हाथ में नहीं है। समय और यन्त्रों ने मनुष्य को परावलम्बी बना दिया है। साधारण चीजों को प्राप्त करने के लिए भी हमें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। हम इच्छाएँ बहुत करते हैं, परन्तु उनकी पूर्ति के साधन दूसरों के हाथ में हैं। हम भोजन बढ़िया चाहते हैं, पर न तो हम स्वयं खेती करते हैं और न गाय-भैंस पालते हैं। हम बढ़िया वस्त्र चाहते हैं पर मशीनों और मिल मालिकों का मुँह ताकते हैं, हम मकान चाहते हैं, और उसके लिए सरकार का सहारा लेते हैं। गाँधी जी ने सुखी होने के लिए स्वावलम्बी होना आवश्यक बताया है। यही उनके दर्शन का मूल है। या तो इच्छाओं को नष्ट कीजिए या इच्छाओं को पूरा करने के लिए स्वावलम्बी बनिए। तभी सुख मिल सकेगा।

अब सामाजिक सम्बन्धों की बात पर ध्यान दीजिए। चारों और बड़ी उन्नति हो रही है, ज्ञान-विज्ञान और कलाएँ फल-फूल रही हैं परन्तु मनुष्य मनुष्य के सम्बन्ध बिगड़ते जा रहे हैं। घर में, पड़ोस में, देश में और सारी दुनिया में एक यही बात देखने में आती है कि मनुष्य हिल-मिलकर नहीं रह सकता। एक-दूसरे को खा जाना चाहता है। यह कैसी स्थिति है? परस्पर अविश्वास और सन्देह बढ़ता जा रहा है। घर में पैसा है, कमी किसी बात की नहीं, परन्तु फिर भी सुख का लोप होता जा रहा है। वस्तुतः हम सब यह भूलने लगे हैं कि समाज में कैसे रहना चाहिए। हम आपके सामने तीन व्यावहारिक सूत्र प्रस्तुत कर रहें हैं; यदि इन पर अमल किया जाय तो आपके सामाजिक सम्बन्ध अवश्य सुधर सकते हैं, और सुख मिल सकता है।

एक तो जिसके लिए आप जो भी करते हैं; उसका बदला पाने की आशा छोड़ दीजिए। यदि आप किसी का काम इस आशा से करते हैं, कि किसी अवसर पर आप उस व्यक्ति से लाभ उठा सकेंगे, तो आप एक बहुत बड़ी दुराशा का बीज बो रहे हैं। आपकी यह इच्छा कभी न पूरी होगी। ऐसी इच्छा करने की अपेक्षा किसी का काम न करना ज्यादा अच्छा है।

दूसरे आप चारों ओर से एक बड़े समुदाय द्वारा घिरे हैं। वे जो भी कर रहे हैं, उसका प्रभाव आपके जीवन पर पड़ रहा है। उनके आधार पर आपकी सफलता और विफलता निश्चित होती है। यदि उनके कार्यों के परिणाम स्वरूप आपको सफलता मिलती है तो आप उनसे प्रसन्न होते हैं और विफलता मिलने पर अप्रसन्न। याद रखिये प्रत्येक दशा में उनके कार्यों पर आपका कोई नियन्त्रण नहीं। यदि उनके द्वारा आपका अपकार होता है, तो आप अवश्य ही दुःखी होते हैं। इसके लिए आप उन्हें दोष भी देते हैं, जबकि वे अपने काम अपने दृष्टिकोण से करते हैं। ऐसी दशा में आप अपने को उनकी परिस्थिति में रखकर देखें और विचार करें कि यदि आप उनकी जगह पर होते तो क्या करते? आपको तुरन्त ही आपका मन बता देगा कि मैं भी ऐसा ही करता। बस आपका दुःख दूर हो जायेगा। जिस बात पर आपका वश नहीं है, उसके लिए दुःखी होने से क्या लाभ है?

तीसरे, याद रखिये आप अमर नहीं हैं, धीरे-धीरे आपके जीवन का क्षय हो रहा है। सम्भव है आज सोने के बाद, हम कल न उठ सकें। इसलिए आज का अच्छे से अच्छा उपयोग करें। यदि कल जीवन बना रहे, तो यह सोचकर प्रसन्न होना चाहिए कि एक दिन और मिला। इस प्रकार एक-एक दिन जो मिलता है, मूल्यवान है और उसे स्वार्थ-लिप्सा में बिताना बड़ी भारी मूर्खता है। इस भाव से स्वार्थ नष्ट होगा और स्वार्थ नष्ट होने से सुख प्राप्त होगा।


बुरे विचारों का स्वास्थ्य पर कुप्रभाव

(डॉ. रामचरण महेन्द्र, पी. एच.डी.)

खरगोन के एक भाई लिखते हैं, “गत वर्ष मैं बीमार पड़ा था। बड़ी कठिनता से ईश्वर की कृपा से बच तो गया, पर तबसे कुछ न कुछ व्याधि दबा ही लेती है। आठ माह की बात है कि पता नहीं किस रोग से एक विद्यार्थी की आकस्मिक मृत्यु हो गई। फिर मैंने समाचार पत्र में एक और मृत्यु का हाल पढ़ा । इससे मेरा दिल थोड़ा घबड़ाने लगा। गर्मी के दिन थे। शाम के पाँच बजे का टाइम था। मैंने सोचा शायद गर्मी के कारण मन घबड़ा रहा है। इसलिए स्नान किया, परन्तु मेरे मन की घबड़ाहट बढ़ती गई। हृदय में धड़कन इतनी बढ़ गई कि मुझे महसूस होने लगा कि मेरा हार्ट फेल होने वाला है। वह घबड़ाहट मैं सहन नहीं कर सका। डॉक्टर बुलाया गया। उन्होंने अच्छी तरह मेरे शरीर की परीक्षा की और अच्छी तरह देख-भालकर निर्णय किया कि मुझे कोई रोग नहीं है; न कोई दिल सम्बन्धी हलचल ही है। परन्तु मुझे शान्ति नहीं हुई। मैंने दूसरे डॉक्टर को बुलवाया; पर उन्होंने भी यही कहा कि मेरे शरीर में कोई रोग नहीं है। हृदय की हलचल दो चार दिन में ठीक हो जायेगी। फिर भी धड़कन न गई। .... इसके कुछ माह बाद मुझे दूसरे नगर में जाने का मौका आया। उन्हीं दिनों मैंने समाचार पत्र में पढ़ा कि एक युवक प्रसिद्ध स्टार बनने जाने के लोभ में रेल में कटकर मर गया। यह पढ़ते ही मुझे महसूस होने लगा कि जैसे मेरा हार्टफेल हुआ जा रहा है। धड़कन बढ़ गई। दवाई उपचार हुआ। फिर सबसे बड़े डॉक्टर को बुलाया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारा हृदय मुझ जैसा ही सुदृढ़ है, निरोग है। तुम अपने मन से डर और मृत्यु के बुरे विचारों को निकालो। मुसीबत यह है कि मैं तो इन बुरे विचारों को छोड़ना चाहता हूँ; पर ये बुरे विचार मुझे नहीं छोड़ते और धीरे-धीरे मौत के मुँह में ले जा रहे हैं।”

वास्तव में अनेक शरीरगत रोगों का कारण हमारा मन होता है। मनुष्य का शरीर उसकी प्रत्येक भावना के प्रतिक्रियात्मक प्रभाव को स्पष्ट करता है। कहा गया है “मूलं नास्ति कुतः शाखा।” अर्थात् जहाँ मूल या जड़ नहीं, उस पौधे की शाखाएँ भी नहीं हो सकतीं। रोग की भूल मन में नहीं है, तो भला उसकी शाखाएँ प्रशाखाएँ कैसे शरीर में पनप सकती हैं।

आप मन में एक विचार ले लीजिए अच्छा या बुरा। फिर चेहरे को दर्पण में देखिए। जैसा विचार होगा, वैसा ही भाव चेहरे और शरीर के द्वारा प्रकट होगा, शरीर क्रियाओं द्वारा अन्दर के भाव को प्रकट करेगा। मन के विचार के साथ शरीर परिवर्तित होता है, खिलता और मुर्झाता है। गुप्त मन में संचित भाव की प्रतिक्रिया शरीर पर चलती ही रहेगी।

कोई मधुर विचार, कोई प्रसन्नता की बात मन में लाइये, फिर दर्पण में चेहरा देखिए । चेहरे पर खुशी प्रकट हो जायगी, जैसे फूल खिल उठा हो। आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति और सफलता का एक भी विचार मन लाइये। फिर इनका चमत्कार चेहरे और समूचे शरीर पर देखिए। आप पायेंगे कि वह विकसित हो रहे है। उसके अवयव, रगरेशे खिल रहा हैं, आपको जीवन का रस आ रहा है।

अब किसी बुरे विचार, क्रोध, घृणा, आवेश, वैर, द्वेष को मन में लाइये, आप पायेंगे कि चेहरा उदास हो गया है, या उत्तेजित होकर फड़क रहा है अथवा घृणा से सिकुड़ रहा है, या आवेश से काँप रहा है। इस प्रकार जैसे-2 विचार मन में आते जायेंगे, वैसे वैसे चेहरे के रूप में परिवर्तन होता जायेगा। जब आप चेहरे में एक मामूली भाव रखने से इतना परिवर्तन देखते हैं, तब जर अनुमान कीजिए कि बुरे विचारों से मनुष्य के जटिल शरीर के आन्तरिक अंगों में क्या क्या सूक्ष्म परिवर्तन होते होंगे। स्मरण रखिए, विचार एक बीज की तरह उत्पादक पदार्थ है। जैसे बीज में से अंकुर, डंठल, पत्तियाँ और फल इत्यादि पनपते हैं, वैसे ही एक विचार के साथ अनेक नन्हें नन्हें सूक्ष्म मनोभावों का उत्थान पतन होता जायेगा और उसी की प्रतिक्रियाएँ शरीर में प्रकट हो जायेंगी। खेद की बात है कि आधुनिक अस्पतालों में साधारण बीमारी में शल्य क्रिया तक कर दी जाती है। नाना दवाइयाँ दी जाती हैं, पर रोग और व्याधि के मनोवैज्ञानिक पहलू को बहुत कम चिकित्सक देखते हैं।

श्री शान्तिलाल एन. अमीन ने अपने लेख में लिखा है कि अमेरिकन अस्पतालों में मनोवैज्ञानिक और मानसोपचारक, शस्त्रोपचारक के साथ रहकर अनेक अनावश्यक आपरेशनों से रोगियों को मुक्त -कर देते हैं। न्यूयार्क के एस. डी. ए. अस्पताल के “सयको सेमंटिक मेडिसन” का विशेष विभाग रखा गया है, जहाँ मानसिक रोगी, विक्षिप्त तथा दीर्घकालीन अवधि से चले आ रहे पुराने उदर रोगियों और विक्षिप्तों की एक विशेष प्रकार से चिकित्सा की जाती है। सर्जन की शक्ति और कुशलता की परख इस बात से होती है कि कितने रोगियों को मानसोपचार द्वारा आपरेशन से बचाया गया।

भय, शंका, निराशा, उद्वेग, ईर्ष्या, क्रोध, आवेश आदि वे विषैले विकार हैं, जो अन्दर ही अन्दर शरीर में विषैले रोगों की उत्पत्ति करते हैं। एक तनिक से भय या मानसिक आघात की प्रतिक्रिया शरीर में टूट फूट कर देती है। जो दृढ़ चित्त व्यक्ति होते हैं, वे तो ऐसे आघात आसानी से सह लेते हैं और उसके विषैले प्रभाव से जल्दी छुटकारा पा जाते हैं, पर कमजोर ढुलमुल स्वभाव के व्यक्ति इन आघातों से बुरी तरह विचलित हो जाते हैं। ये आघात उनके स्मृति-पटल पर स्थायी छाप छोड़ जाते हैं और उनकी जटिल और निगूढ़ प्रतिक्रियाएँ दिमाग में निरन्तर हरी रहती हैं। ऊपर जिस मानसिक रोगी का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है, उनके मन में एक के बाद एक इस प्रकार के कई कटु भय के मानसिक आघात पड़े हैं; मौत के स्मरण मात्र से वे अस्त व्यस्त हो जाते हैं। बराबर मौत, बीमारी और संसार छोड़कर चलने की भय-मिश्रित मन-स्थिति ने उन्हें हृदय की धड़कन का रोगी बना दिया है। तनिक सी घटना देखते या सुनते ही पुरानी बुरी घटनाएँ अंतर्मन से कूद-कर स्मृति पटल पर आ जाती हैं और दिमाग में जहरीलापन उत्पन्न कर देती हैं। यदि खोज की जाय तो प्रत्येक व्यक्ति के मन में बचपन की या यौवन के प्रारंभ की कोई दुखद घटना मिलेगी, जो उनका पीछा नहीं छोड़ती। घटना का स्मरण ही हृदय की धड़कन का कारण बनता है। बहुत से भय तो मनुष्य के शरीर की आकृति पर स्थायी प्रभाव डाल जाते हैं। आप उनका चेहरा देखकर स्वतः मालूम कर सकते हैं कि ये किसी मानसिक आघात के शिकार हैं ।

बुरे विचार विषैले पदार्थों की तरह हैं। जैसे विजातीय तत्त्व निकल जाने से शरीर में शान्ति मिलती है, उसी प्रकार बुरे विचारों को मन से निकालकर ही मन की शान्ति प्राप्त की जा सकती है और स्वस्थ मानसिक जीवन व्यतीत किया जा सकता है। भय के भी अनेक रूप हैं जैसे निर्धनता का भय, आलोचना का भय, रोग का भय, प्रेम से वंचित होने का भय, बुढ़ापे का भय, मृत्यु का भय। इन सभी प्रकार के भयों से साहसपूर्वक युद्ध करना चाहिए।

रोग का भय शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बहुत जल्दी नष्ट करता है। मनुष्य का शरीर सौ वर्ष स्वस्थ और सशक्त रहने के लिए बना है। ग्रामीणों को देखिए। वे रोगों के विषय में कुछ नहीं जानते, तो काल्पनिक रोगों की बाबत सोचते भी नहीं, बीमार भी कम होते हैं। हम तनिक से बीमार होते ही मौत और अति की अनहोनी कुकल्पनाओं में फँस जाते हैं। ये कल्पनाएँ विषैले बीज हैं। अपनी जड़ें जमा लेते हैं। कालान्तर में जिन रोगों से डरते हैं, वे ही शरीर में प्रकट होकर रहते हैं। महामारी, हैजा, सर्प का काटना आदि अनेकों रोगों के हम मिथ्या भय से ही डर कर मरते हैं।

बुरे विचार रखना एक गन्दी आदत है। हीनता की भावना, रोग की कल्पना, पराजय की विचारधारा, नैराश्य, शंका का परित्याग कीजिए। भगवान् कृष्ण ने स्वयं ही मर्म स्पष्ट कर दिया है, “यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति ता दृशी।” मनुष्य अपनी अच्छी या बुरी भावना के अनुसार ही सिद्धि प्राप्त करता है। यदि वह रोग मूलक कुकल्पना में जकड़ा रहा तो समय आयेगा कि वह रोग के चंगुल में पड़ेगा। निर्बल रोगमूलक मनः स्थिति स्वयं रोगों के रूप में प्रकट हो जायगी। अतः बुरे विचारों से सदा दूर रहिए।

अथर्ववेद में कहा गया है “त्वं नो मेघे प्रथमा” अर्थात् सद्बुद्धि ही संसार में सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। जिसने अपनी विचारधारा शुद्ध कर ली है, उसने सब कुछ प्राप्त कर लिया है। कानों से अच्छे विचार सुनो और श्रेष्ठ विचार ही मन में रखो। अपनी निन्दा या दूसरों की त्रुटियाँ सुनने में समय नष्ट न करो। “मा विदीध्यः” चिन्ता करना व्यर्थ है। चिन्ता में खून सुखाने की अपेक्षा कठिनाई का हल सोचना श्रेष्ठ है।


गौ की उत्पत्ति और उसका सर्वोपरि महत्व

(श्री धर्मेन्द्रनाथ, ढकियारघा)

गौ की अपार महिमा और दैवी गुणों से हिन्दू शास्त्रों के पृष्ठ भरे पड़े हैं। पुराणों में गौ के प्रभाव और उसकी श्रेष्ठता की ऐसी अनगिनत कथाएँ मिलती हैं जिन से विदित होता है कि हमारे पूर्वज गौ के महान भक्त थे और उसकी रक्षा करना अपना बहुत बड़ा धर्म समझते थे। गौ-रक्षा में प्राण अर्पण कर देना हिन्दू बड़े पुण्य की बात समझते थे और उसका पालन करना बड़े सौभाग्य की बात मानी जाती थी। गौ का महत्व यहाँ तक समझा जाता था कि उसके शरीर में उन 33 करोड़ देवताओं का निवास बतलाया गया और उसकी उत्पत्ति अमृत,लक्ष्मी आदि चौदह रत्नों के अंतर्गत मानी गई । यद्यपि ये कथायें एक प्रकार की रूपक हैं पर उनके भीतर बड़े-बड़े आध्यात्मिक तथा कल्याणकारी तत्त्व भरे हैं।

गौ की उत्पत्ति की पुराणों में कई प्रकार की कथायें मिलती हैं। पहली तो यह है कि जब ब्रह्मा एक मुख से अमृत पी रहे थे तो उनके दूसरे मुख से कुछ फेन निकल गया और उसी से आदि-गाय सुरभि की उत्पत्ति हुई। दूसरी कथा में कहा गया है कि दक्ष प्रजापति की साठ लड़कियाँ थीं उन्हीं में से एक सुरभि भी थी। तीसरे स्थान पर यह बतलाया गया है कि सुरभि अर्थात् स्वर्गीय गाय की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय चौदह रत्नों के साथ ही हुई थी। सुरभि से सुनहरे रंग की कपिला गाय उत्पन्न हुई। जिसके दूध से क्षीर सागर बना।

प्राचीन काल से आर्य-जाति गौ की बहुत अधिक महिमा मानती आई है। ऋग्वेद तथा अन्य वेदों में भी गौ के गुणानुवाद के सैकड़ों मंत्र भरे पड़े हैं। गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने भी कहा है कि ‘गौओं में कामधेनु मैं हूँ।” गाय के शरीर में सभी देवता निवास करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि धन की देवी लक्ष्मी जी पहले गाय के रूप में आयी और उन्हीं के गोबर से विल्व वृक्ष की उत्पत्ति हुई।

कपिल मुनि के शाप से जले हुये अपने साठ हजार पूर्वजों की राख का पता जब राजा रघु नहीं लगा सके तब वे गुरु वशिष्ठ जी के पास आये। गुरुजी ने दया करके उनकी आँखों में नन्दिनी गाय का मूत्र आँज दिया, जिससे रघु को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई और वे पृथ्वी में दबी हुई अपने पुरखों की राख का पता लगाने में समर्थ हो सके।

गंगाजी को पहले पहल जब संसार (मृत्यु लोक) में आने को कहा तो वे बहुत दुखी हुई और आना कानी करने लगीं। उन्होंने कहा कि “पृथ्वी पर पापी लोग मुझ में स्नानादि करके अपवित्र किया करेंगे, इसलिये मैं मृत्युलोक में न जाऊँगी। तब पितामह ब्रह्माजी ने समझाया कि “लोग तुमको कितना भी अपवित्र करें किन्तु फिर भी गौ का पैर लगने से तुम पवित्र होती रहोगी।” इससे भी गौ और गंगा के हिन्दू धर्म से विशेष सम्बन्ध होने पर प्रकाश पड़ता है।

रामचन्द्र जी पूर्वज महाराज दलीप की गौ-सेवा का उदाहरण बड़ा महत्वपूर्ण है। उन्होंने एक दिन मार्ग में जाती हुई नन्दिनी को देखकर प्रणाम नहीं किया, इस पर उसके महाराज को पुत्रहीन होने का शाप दे दिया। इससे दुखी होकर वे गुरु वशिष्ठ के पास गये और शाप से मुक्ति पाने के लिए बड़ी विनय करने लगे। वशिष्ठ जी ने नन्दिनी गाय उनको दे दी और उसका भली प्रकार से पूजन और सेवा करने को कहा। उनके आदेशानुसार राजा और रानी दोनों मिलकर उसकी सेवा करने लगे। राजा गाय को वन में चराने ले जाते। वे नन्दिनी के चलने पर चलते थे, उसके बैठने पर बैठ जाते थे। एक दिन राजा का ध्यान जरा देर के लिए वन के दृश्य की तरफ चला गया कि नन्दिनी बड़े जोर से चिल्लाई। राजा ने देखा कि एक सिंह गाय को दबोच कर खाना चाहती है। उन्होंने तुरन्त अपना धनुष उठाकर तीर चलाना चाहा, पर दैवी मायावश तीर छूट न सका। तब राजा ने विवश होकर नन्दिनी गाय के बदले अपना शरीर सिंह को देने के लिये चुपचाप उसके सामने पड़ गये। पर जब कुछ देर तक पड़े रहने पर भी सिंह ने उनको नहीं खाया तो उन्होंने मस्तक उठाकर देखा। उस समय वह माया रूपी सिंह गायब हो चुका था और केवल नन्दिनी खड़ी प्रसन्न हो रही थी। राजा की इस अनुपम भक्ति से वह संतुष्ट हो गई और उसने राजा को पुत्र होने का वरदान दे दिया।

प्रसिद्ध देशभक्त महादेव गोविन्द रानाडे के जन्म के सम्बन्ध में भी ऐसी ही बात सुनने में आई है। उनके माता पिता के कोई पुत्र न था और वे वृद्ध हो चले थे। एक दिन कोई संत उनके दरवाजे पर भिक्षार्थ आ गए। दंपत्ति ने उनकी बड़ी सेवा की । साधु ने उन्हें उदास देखकर कारण पूछा और निस्सन्तान होने की बात सुनकर कहा-तुम एक दूध देने वाली सवत्सा काली गाय रखो। उसको साबुत गेहूँ खिलाओ, जो गोबर के साथ निकल आवें। उन्हीं दानों को धोकर, साफ करके आटा तैयार करो। ब्रह्मचर्यपूर्वक रहकर उसी की रोटी खाओ। छह मास तक ऐसा करने से तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हो सकेगी। दंपत्ति ने वैसा ही किया और फलस्वरूप उनको पुत्ररत्न प्राप्त हुआ काली गाय से पुत्र प्राप्त होने की बात भारतवर्ष में सर्वत्र प्रसिद्ध है।

गणेश जी के जन्म समय की एक मनोहर कथा इस प्रकार है कि गणेशजी जब उत्पन्न हुये उसी समय महादेव जी ने भूल से उनका मस्तक काट दिया। इससे पार्वती जी बहुत अधिक रोने लगी। गणेश जी को ठीक करने को देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार बुलाये गये और उनको मुँह माँगा वरदान देने को कहा गया। इस पर उन्होंने किसी हाथी का मस्तक जोड़ कर गणेशजी को जीवित कर दिया और वरदान में स्वयं महादेवजी को ही माँगा। इस पर बड़ी समस्या उपस्थित हो गई और निपटारा करने को देवताओं की पंचायत की गई। उसमें महादेवजी का मूल्य एक गाय रक्खा गया और वही अश्विनी कुमार को देकर संतुष्ट किया।

भगवान कृष्ण का गौ-पालन और गौ-भक्ति तो प्रसिद्ध ही है जिससे उनका नाम ही गोपाल पड़ गया। वे स्वयं गायों को चराते थे, उनकी सब प्रकार से सेवा सुश्रूषा करते थे, जो गायों को कष्ट पहुँचाता था उसे दण्ड देते थे। गायों की रक्षा को ही उन्होंने गोवर्धन धारण किया और इन्द्र का मान मिटा दिया। भागवत में बतलाया है कि जब गोपियों के साथ रास करते हुये वे अत्यन्त शान्त हो गये तो अपने बाँये अंग से उन्होंने गौ उत्पन्न की जिससे दूध का एक कुण्ड बन गया और सब किसी ने उसी दूध को पीकर अपनी कान्ति दूर की। कृष्णजी के सम्बन्ध में ऐसी कथाएँ भरी पड़ी हैं। यह कहने में कोई अत्यन्ति नहीं कि भगवान कृष्ण को गौ-पालन से ही अपूर्व शक्ति प्राप्त हुई थी जिसके प्रभाव से उन्होंने संसार का उद्धार करने वाली गीता का ज्ञान प्रकट किया।

च्यवन ऋषि के विषय में भी एक बड़ी रोचक कथा है कि एक बार वे गंगाजी के गर्भ में तपस्या कर रहे थे। वहीं पर कुछ मछुए मछली मारने आये तो जाल में मछली के बदले मुनिजी ही फँस कर चले आये। मछुए उनको राजा के दरबार में बेचने के लिये ले गये। राजा ने उनके बदले में एक थैली सोने की मोहरें मछुओं को देना चाहा, परन्तु मुनि जी ने कहा कि हमारा मोल इतना कम नहीं हो सकता । राजा ने और भी बहुत सा सोना और अन्त में अपना समस्त राज्य मुनिजी के बदले में देना चाहा, पर उन्होंने उसे कम ही बतलाया। तब राजा ने विनयपूर्वक पूछा ‘महाराज, आप ही बतलायें कि आपका मूल्य क्या होगा?” च्यवन ऋषि बोले कि हमारा मूल्य एक गाय है। आप एक गाय दे दीजिये, बस यही हमारा वास्तविक मूल्य है।” इस पर मछुओं को एक गाय दे दी गई। इससे प्रकट होता है कि उस युग में गाय का मूल्य राज्य से भी अधिक समझ जाता था।

राजस्थान के क्षत्रियों में प्रमुख सिसोदिया वंश के संस्थापक बघा रावल बचपन में गायें चराया करते थे। एक दिन की बात है कि एक गाय ने गोष्ठ (गौशाला) में आकर दूध नहीं दिया। मालकिन ने यह शंका करके कि बघा ने गाय को दुहकर सब दूध पी लिया है, उसे खूब पीटा। निरपराध बघा को इससे मर्यान्तक पीड़ा हुई। दूसरे दिन भी वह गाय चराने गया और इस बात की खूब निगरानी रखने लगा कि गाय के दूध को कौन पीता है। संध्या के समय जब गायें घर की ओर चलीं तो उसने देखा कि एक गाय झुण्ड से अलग होकर एक लिंग-महादेव पर दूध ढाल रही है। अब तो बघा को चोर का पता लग गया और वह लाठी लेकर महादेव को पीटने लगा। भोले बाबा उसकी सरलता और सच्चाई को देखकर प्रसन्न हुये और उन्होंने बघा को वरदान दिया । इससे आगे चलकर वे बड़े प्रतापशाली नरेश बने और उन्होंने महान सिसोदिया वंश की स्थापना की। इसी वंश में राणा साँगा और महाराणा प्रताप जैसे देशभक्त, उत्पन्न हुये जिनका नाम और यश आज भी लोगों को प्रेरणा दे रहा है।

इसी प्रकार भारतवर्ष में सदा से बड़े-बड़े व्यक्ति गौ की सेवा में संलग्न रहे हैं और इसके प्रभाव से उनको यश, मान, धन आदि समस्त साँसारिक सफलतायें प्राप्त हुई हैं। वास्तव में गौ भारतवर्ष के सामाजिक और धार्मिक जीवन की एक स्तम्भ के समान है और उसे सदैव सुदृढ़ बनाये रखना हमारा परम कर्त्तव्य है।


कर्मवाद और भाग्यवाद

(श्री योगेन्द्र ब्रह्मचारी)

हमारे देश में आज जितनी त्रुटियाँ और अभाव दृष्टिगोचर होते हैं उनमें से अधिकाँश का कारण यहाँ की जनता में प्रचलित भाग्यवाद का अंधविश्वास है। कर्म का सिद्धान्त तो हिन्दू धर्म का एक बहुत बड़ा अंग है और इसे भारतीय तत्व-ज्ञान की एक अनुपम खोज माना गया है। जो जैसा करेगा उसे उसका वैसा फल या परिणाम अवश्य ही भोगना पड़ेगा यह धर्म का ही नहीं वरन् नीति और चरित्र का भी बहुत उच्च सिद्धान्त है और जो इसे नहीं मानता वह मानव नहीं दानव या पशु श्रेणी में गिने जाने योग्य है।

पर खेद है कि पिछले कई सौ वर्षों में इस ‘कर्म वाद’ के सिद्धान्त की बहुत अधिक छीछालेदर हुई है तथा अज्ञानी और आलसी लोगों ने, जिनमें हम भीख माँगने वाले साधुवंशधारियों की गणना विशेष रूप से कर सकते हैं, इसे ‘भाग्यवाद’ के रूप में बदल कर पतन का साधन बना दिया है। कहाँ तो ‘कर्मवाद’ यह शिक्षा देता था कि हम जैसा करेंगे वैसा ही अवश्य हमको भोगना पड़ेगा, इसलिये हम सदैव शुभ और उन्नतिकारी कर्म करें; जिससे हमारा भावी जीवन सुखी और कल्याणमय हो। और कहाँ भाग्य का यह रोना कि “दाने-दाने पर मुहर है”-”जो हमारे भाग्य में है वह अवश्य मिल जायगा।” फिर परिश्रम, उद्योग, पुरुषार्थ करने से क्या लाभ? भगवान के भरोसे बैठे रहो वह चींटी से लेकर हाथी तक के खाने-पीने की व्यवस्था करता है, तो क्या हम मानव तन धारियों को, जो सदा उसका नाम लेते रहते हैं, भूखों मर जाने देगा? हरगिज नहीं । हमारे संत महात्मा कह गये है :-

अजगर करै ना चाकरी-पंछी करै ना काम।

दास मलूका कह गये सब के दाता राम ॥

न जाने किस अशुभ घड़ी में ऐसे निकम्मेपन और कायरता के उद्गार जनता के दिमाग में भरे गये थे कि आज समूचा देश नहीं तो कम से कम 90 प्रतिशत भारतवासी तो ‘भाग्यवाद’ के पक्के शिकार हैं। ये बेचारे जीवन-निर्वाह के लिये कोई न कोई धंधा, कारबार अवश्य करते हैं, पर भाग्यवाद के विष के कारण उनके जीवनों में कोई उत्साह या उल्लास नहीं रहता। वे यही विचार करते रहते हैं कि हम चाहे जितनी मेहनत, कोशिश करें मिलेगा हमें उतना ही जितना हमारे भाग्य में लिखा है। यह भयंकर विचार उनके पुरुषार्थ के भाव को कुँठित कर देता है और वे दिन पर दिन अकर्मण्य बनते चले जाते हैं। वे यही सोचते हैं जब हमारा भाग्य ही नहीं बदल सकता तो हमारी कंगाली भी दूर नहीं हो सकती, हमें धन नहीं मिल सकता, हम तरक्की नहीं कर सकते, फिर ज्यादा प्रयत्न ही क्यों किया जाये?

सच पूछा जाये तो यह भाग्यवाद का ढकोसला मानव-समाज का एक बहुत बड़ा कलंक है। यह कैसे पैदा हो गया ? तो इसका उत्तर यही है कि कुछ स्वार्थी और चालाक लोगों ने धर्म की आड़ लेकर इसे फैला दिया। जो लोग चालाकी से अथवा ताकत के द्वारा दूसरे लोगों का स्वत्व अपहरण करके स्वयं मालदार और श्रीमान बनते हैं, अथवा बैठे ठाले तर माल उड़ाते रहते हैं वे लूटे जाने वाले गरीब लोगों को इन्हीं शब्दों से संतोष देते हैं। वे समझते हैं कि यदि हम भाग्य अथवा तकदीर का सहारा नहीं लेते तो इन लोगों में असंतोष का भाव उत्पन्न होगा और वे हमारी लूट अथवा ठगी के विरुद्ध कुछ न कुछ हाथ पैर मारेंगे। इसलिये वे उनको ईश्वर और धर्म के नाम पर भाग्य का ऐसा भूत बनाकर दिखला देते हैं कि वे बेचारे उससे भयभीत हो जाते हैं और अपनी दुर्दशा और हानि को ईश्वरीय विधान समझ कर चुप रह जाते हैं। पर इससे उनमें धीरे-धीरे अकर्मण्यता और उदासीनता की भावना घर करती चली जाती है और उनका जीवन प्रायः नष्ट हो जाता है।

वास्तव में भाग्यवाद सर्वथा निराधार और काल्पनिक चीज है। अगर प्रारब्ध का कोई अर्थ है तो उद्योग उससे कहीं बड़ी चीज है। शास्त्रों में भी स्थान- स्थान पर ऐसे उपाख्यान मिलते हैं जिनसे विदित होता है कि उद्योग द्वारा मनुष्य भाग्य पर निश्चित रूप से विजय प्राप्त कर सकता है। “सावित्री-सत्यवान” की कथा में सत्यवान के भाग्य में युवावस्था में मरना लिखा था, पर सावित्री ने मृत्यु से लड़कर उसे वापस लौटा लिया। यह उदाहरण अगर उद्योग की प्रधानता को नहीं बतलाता तो और क्या प्रकट करता है? भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाले संसार में किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकते और उनका जीवन निराशा और शोक करते रहने में ही व्यतीत हो जाता है।

यदि भारतवासी इस ‘भाग्यवाद’ के चक्कर में न फँसकर पुरुषार्थ का सहारा लेते तो आज हमारे देश की रंगत ही कुछ और होती। जब कि धर्म, आध्यात्म, दर्शन के सिद्धान्तों से अपरिचित और ईश्वर की सत्ता का भी ज्ञान न रखने वाले देश उद्योग के सहारे थोड़े से समय में ही उन्नति की चोटी पर पहुँच गये तो हम लोग, जिनकी सभ्यता हजारों वर्ष पहले ही संसार के कोने-कोने में व्याप्त हो चुकी थी और जहाँ के विद्वान संसार भर को शिक्षा देते थे, क्यों न आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी बन जाते? पर इस दूषित भाग्यवाद ने तो हमको एक नम्बर का काहिल और परमुखापेक्षी बना दिया। हम पसीने की कमाई से सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने के बजाय भीख के टुकड़ों को अधिक वाँछनीय समझने लगे। उद्योग में विश्वास करने वाले अमरीका, योरोप आदि के गरीब और मजदूर भी हमारे यहाँ के अधिकाँश लोगों की अपेक्षा आराम और सम्मान का जीवन व्यतीत कर रहे हैं और हमारे देश के शिक्षित और उच्च श्रेणी के व्यक्ति भी जन्मकुँडली के ग्रहों तथा देवी देवताओं की कृपा का भरोसा किये समय काटते रहते हैं।

हिन्दू शास्त्रों के मतानुसार मनुष्य में अनन्त शक्ति, असीम उत्साह और अपार सामर्थ्य है और वह पुरुषार्थ द्वारा चाहे जब ईश्वर के समकक्ष पदवी तक प्राप्त कर सकता है। अन्य धर्मों में तो मनुष्य को स्वभावतः पापी बतलाया है और वह सदैव ईश्वर के दण्ड या कृपा का पात्र बना रहता है। पर हिन्दू धर्म में आत्मा को परमात्मा का अंश ही माना गया है जो अपने को पहिचान कर फिर उसी में लीन हो सकता है। ऐसे महान और उद्दात्त सिद्धान्त वाले धर्म के अनुयायी “भाग्य” जैसी निरर्थक और सारहीन धारणा के वशीभूत होकर पतन के गर्त में गिर जायें तो निस्सन्देह यह बड़े ही शोक और लज्जा की बात है। अभी तक लोग उस व्यक्ति को नास्तिक कहते थे जो ईश्वर पर विश्वास नहीं करता, पर हम कहते हैं कि जो अपने आपके ऊपर विश्वास नहीं करता वह उससे भी बड़ा नास्तिक है। हिन्दू तत्त्वज्ञान और संस्कृति के अनुयायिओं को तो सदैव पुरुषार्थी होकर साहस और अध्यवसाय के साथ आत्मोन्नति के शिखर पर चढ़ने का प्रयत्न करते रहना चाहिए।


अब होली का त्यौहार कैसे मनाया जाय?

(श्री शंभूसिंह जी)

किसी भी जाति के त्यौहार और उत्सव वहाँ के इतिहास और परम्परा के परिचायक होते हैं। उनसे उस जाति के ओज, शौर्य और अन्य गुणों का भी अनुमान लगाया जा सकता है। पर आजकल हमारे अधिकाँश देशवासी त्यौहारों के मूल-तत्व को भूलकर उनको प्रायः उल्टे-सीधे ढंग से मनाने लग गये हैं, जिससे लाभ के स्थान पर प्रायः हानि ही होती जान पड़ती है।

समाज में विशेष रूप से चार श्रेणियों के व्यक्ति दिखलाई पड़ा करते हैं। पहले प्रकार के व्यक्ति वे हैं जो अपने स्वार्थ का ध्यान बहुत कम रखते हैं और अपनी शक्ति तथा साधनों का उपयोग संसार के हित के लिये करते हैं। दूसरी श्रेणी के मनुष्यों में शक्ति की अधिकता होती है और वे उस बल का प्रयोग सज्जनों की रक्षा तथा दुष्टों के दमन में करते हैं। तीसरे व्यक्ति वे होते हैं जो ज्ञान और शारीरिक शक्ति का अभाव होते हुये भी आर्थिक दृष्टि से सफल होते हैं। वे कृषि,पशु पालन और व्यापार द्वारा उचित ढंग से धन कमाकर समाज के अनेक अभावों को दूर करने में सहायक बनते हैं। चौथी श्रेणी उन मनुष्यों की होती है जो ज्ञान, बल और धन से रहित होते हुये शारीरिक श्रम से समाज की अत्यन्त उपयोगी सेवा करते हैं। इन चारों प्रकार के मनुष्यों को हम भारतीय समाज के प्राचीन संगठन के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के नाम से पुकार सकते हैं।

ये चारों श्रेणियों के व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति के अनुसार समाज सेवा करते हुये एक दूसरे को सहयोग व सहायता प्रदान करते रहते थे। अपने कर्तव्यों के स्मरणार्थ प्रत्येक श्रेणी का एक-एक त्यौहार भी नियत किया गया था। इनमें से श्रावणी ब्राह्मणों का त्यौहार है जिस पर वे किसी पवित्र जलाशय के तट पर अपने धार्मिक कर्तव्यों का स्मरण करते हुये नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं कि उस वर्ष द्विजत्व के कर्तव्य के पालन व सद्ज्ञान के प्रचार में दत्तचित्त रहेंगे। दशहरा क्षत्रियों का त्यौहार माना गया था। इस दिन पुरुषार्थी व्यक्ति अपने बल-पौरुष का अभ्यास कर हथियारों को साफ करके काम के लायक बनाते थे। दिवाली वैश्यों का त्यौहार माना गया था, जिसमें वे अपने आर्थिक कारबार का सिंहावलोकन करके आगामी वर्ष के लिये बजट और योजना पर विचार करते थे। चौथा होली का त्यौहार है जिसमें श्रमजीवी वर्ग की ओर से सेवा और समानता के आदर्श की घोषणा की जाती थी।

वर्तमान समय में यद्यपि सभी त्यौहारों में अनेक दोष घुस गये हैं और उनका आदर्श स्वरूप अधिकांश में लोप हो गया है, परन्तु होली का रूप सबसे अधिक बिगड़ा है। वैसे इस त्यौहार के मनाने की जो प्राचीन परिपाटी प्रतीक रूप में अब भी प्रचलित है उससे स्पष्ट प्रकट होता है कि यह एक विशुद्ध सामूहिक यज्ञ है। इस सम्बन्ध में निम्न तथ्य ध्यान देने योग्य हैं-

(1) एक मास पूर्व शमी की लकड़ी गाढ़कर फाल्गुन सुदी 15 को लकड़ी, कंडे इकट्ठे करके जलाना यज्ञ का ही रूप है।

(2) जलाने से पूर्व आचार्य पंडित द्वारा उसका पूजन होना और गाँव के मुखिया द्वारा पूजन करवाना यह यज्ञ के यजमान बनाये जाने का चिन्ह है।

(3) होली में नारियल के लच्छे लपेट कर डालना यज्ञ की पूर्णाहुति में नारियल चढ़ाने का चिन्ह है।

(4) इसके पूजन में मिठाई गुड़ आदि चढ़ाकर बच्चों में बाँटना यज्ञ में प्रसाद वितरण का लक्षण है।

(5) इसकी लपटों में, अग्नि में हविष्यान्न की बालों को पकाकर खाना भी यज्ञ का ही एक लक्षण है।

(6) होली ही एक ऐसा त्यौहार है जो ऋतु-राज बसंत में आता है। इसी समय सर्दी का अन्त और ग्रीष्म का आगमन होता है। इस समय ऋतु-परिवर्तन से चेचक के रोग का प्रकोप होता है। इस संक्रामक रोग से बचने के लिये पुराने समय में टेसू के फूलों का रंग बनाकर एक दूसरे पर डालने की प्रथा चलाई गई थी और यज्ञ की सामग्री में भी इन्हीं फूलों की अधिकता रखी गई थी जिससे वायु में उपस्थित रोग के कीटाणु नष्ट हो जायें। पर आज उस टेसू के लाभदायक रंग के स्थान पर हानिकारक विदेशी रंगों का प्रयोग किया जाता है और लोग उनके चटकीलेपन को पसन्द भी करते हैं। अब यह प्रथा बहुत विकृत हो गई है और लड़के तथा नवयुवक बुरे-बुरे रंग सर्वथा अनजान और भिन्न समाज वालों पर भी डाल देते हैं जिससे अनेक बार खून-खराबा की नौबत तक आ जाती है और रंग की होली के बजाय खून की होली दिखलाई पड़ने लगती है। यह मूर्खता की पराकाष्ठा है, और ऐसे लोग त्यौहार मनाने की बजाय देश तथा धर्म की हत्या करते हैं।

(7)होली को पूर्वजों ने एक सामूहिक सफाई के त्यौहार के रूप में भी माना था। जैसे दिवाली पर प्रत्येक व्यक्ति निजी घर की लिपाई, पुताई और स्वच्छता करता है, उसी प्रकार होली पर समस्त ग्राम या कस्बे की सफाई का सामूहिक कार्यक्रम रखा जाता था। बसंत ऋतु में जब पेड़ों के पत्ते झड़-झड़ कर चारों ओर फैल जाते हैं, बहुत कुछ कूड़ा कबाड़ भी स्वभावतः इकट्ठा होता है, उस सबकी सफाई होली में कर दी जाती थी। पर अब लोग उस उद्देश्य को भूलकर दूसरों पर कीचड़ और धूल फैंकने को त्यौहार का अंग समझ बैठे हैं। इससे उल्टा लोगों का स्वास्थ्य खराब होता है अनेक बार आँख आदि में चोट भी लग जाती है।

(8) प्राचीन समय में होली प्रेमभाव को बढ़ाने वाला त्यौहार था। अगर वर्ष भर में आपस में कोई झगड़े या मनमुटाव की बात हो गई हो तो इस दिन उसे भुलाकर सब लोग प्रेम से गले मिल लेते थे और पुरानी गलतियों के लिये एक दूसरे को क्षमा करके फिर से मित्र सहयोगी बन जाते थे। अब भी इस दिन एक दूसरे के यहाँ मिलने को जाते हैं, पर प्रायः नशा करके और गाली बककर झगड़ा पैदा कर लेते हैं, जो होली के उद्देश्य के सर्वथा प्रतिकूल है।

वास्तव में होली का त्यौहार हमारे समाज में सबसे अधिक सामूहिकता का परिचायक है और यदि इसे समझदारी के साथ मनाया जाय तो यह हमारे लिये अत्यन्त कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है। जिस प्रकार होली के पौराणिक उपाख्यान में बतलाया गया है कि सच्चे भक्त प्रहलाद ने असत्य और अन्याय का प्रतिरोध करके सत्य की रक्षा की थी और उसी की स्मृति में होली के त्यौहार की स्थापना की गई थी, उसी प्रकार हम भी यदि इस वास्तविक उद्देश्य का ध्यान रखकर होली का त्यौहार मनायें तो इस अवसर पर वर्तमान समय में होने वाली अनेक हानियों से बचकर इस त्यौहार को लोक-कल्याण का एक प्रमुख साधन बना सकते हैं।

सामूहिक-यज्ञ विधिः- इस वर्ष होली का त्यौहार फाल्गुन सुदी 15(ता॰ 24 मार्च 1956) को मनाया जायगा। इसके लिये पहले से जो शमी वृक्ष (छोंकरा या खेजड़ी) की लकड़ी गाढ़ने की प्रथा है उसे एक अच्छा लम्बा, चौड़ा और गहरा हवन कुण्ड खोदकर उसके बीच में खड़ा किया जाये। इसके बाद नित्य प्रति या सुविधानुसार सब लोग मिलकर गाँव के बाहर जावें और वहाँ से हवन की समिधाएँ (पलास, आम, पीपल, बड़, गूलर, खैर आदि की लकड़ी) तथा अरने उपले (कंडे) इकट्ठे करें और उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर जमा करते रहें। यदि सब साथ न जा सकें तो अपनी सुविधानुसार थोड़े-थोड़े लोग भिन्न-भिन्न समय भी जा सकते हैं। पर होली से पूर्व एक महीने के भीतर चार बार सबको अवश्य सम्मिलित होकर सामूहिक रूप से समिधाएँ इकट्ठी करने को जाना चाहिये।

(1) सामूहिक रूप से जाने वालों की वेशभूषा एक सी हो और वह यथासंभव बसंती रंग (हलके पीले रंग) की हो। उनके हाथों में कलावा बाँधकर तिलक लगा दिया जाय और साथ में शंख, घंटा, घड़ियाल और कीर्तन के साधन हों।

(2) सबके पास समिधाओं के संग्रह करने के साधन जैसे कुल्हाड़ी, गैंती, हँसिया, टोकरी आदि में से कोई एक वस्तु हो।

(3) गाँव के बाहर जाकर सब गायत्री मंत्र का जप करते हुये हवन के उपयुक्त औषधियों और समिधाओं का संग्रह आरम्भ कर दें। क्या-क्या वस्तु संग्रह करना है यह सब लोगों को पहले ही समझा दिया जाय।

(4) जंगल को जाते समय शंख, घंटा, घड़ियाल बजाते और कीर्तन करते हुये जाना चाहिये। बीच बीच में गायत्री परिवार के नारे और राम, कृष्ण भक्त प्रहलाद आदि के नामों का जय घोष करना चाहिये।

(5) निश्चित समय तक संग्रह करने के पश्चात् शंख बजाकर सब को एकत्रित कर लिया जाये और उन्हें अपने-अपने एकत्रित सामान को व्यवस्थित ढंग से ले चलने को कहकर कीर्तन और जय ध्वनि करते हुये अपने निश्चित स्थान पर आना चाहिये। वहाँ शाँति पाठ करके सबको विदा करना चाहिये। यह सामूहिक कार्य अगर किसी कारणवश अधिक न हो सके तो महीने में एक बार तो अवश्य हो।

(6) गाँव में घर-घर जाकर होलिका-यज्ञ के लिये हविष्यान्न, औषधियाँ, मेवा, गोला, घृत, शक्कर आदि सामग्री में से कोई एक वस्तु लाने की प्रार्थना करनी चाहिये।

(7) होली की निश्चित तिथि व समय पर यज्ञ स्थल पर पहुँचकर कुँड व होली का पूजन आचार्य (पंडित) द्वारा विधिवत् कराना चाहिये।

(8) हवन होने के पश्चात् अपने साथ लाये नारियल, गोला, सुपाड़ी आदि से पूर्णाहुति करनी चाहिए तथा कीर्तन करते हुए 4 परिक्रमा लगानी चाहिए।

(9) इस हवन की उठती हुई ज्वालाओं में अपने-अपने खेत से लाए हुए पके अन्न की बालों को सेंकना चाहिए और सब को प्रसाद रूप में वितरण करके खाना चाहिए। जो अकेला खाता है सो पाप खाता है। अगर व्यक्तियों की संख्या अधिक हो तो एक साथ बहुत सी मिलाकर सेक लें और उनको सबको वितरण कर दें। इस भुने अन्न को खाने से दाँतों को लाभ होता है।

(10) इसके पश्चात् होलिका की भस्म को मस्तक पर लगाकर सत्यव्रत प्रहलाद की तरह ईश्वर की उपासना में दृढ़ रहने का व्रत लेना चाहिए। दूसरे दिन चैत्र मास आरम्भ हो जाता है और होलिका दाह की कल्पना करके प्रतिपदा को स्नान का त्यौहार मानते हैं। इसके लिए केसू (या टेसू) के फूल रात को ही भिगोकर रंग तैयार कर लेना चाहिये। सबको अपने साथ यही रंग लेकर एक स्थान पर इकट्ठा हो प्रेमपूर्वक होली का रंग खेलना चाहिये। मस्तक पर गुलाल, या चन्दन, रोली आदि लगा देना चाहिये। केसू के फूलों का रंग स्वास्थ्य के लिये लाभजनक होता है, इसलिये जहाँ पैदा न होते हों वहाँ के व्यापारियों को बाहर से मँगवाकर देना चाहिये।

रात्रि में प्रवचन :- दोपहर तक रंग आदि खेलने से निवृत्त होकर स्वच्छ पानी से स्नान करके नवीन वस्त्र धारणकर मित्रों से भेंट करना चाहिये। सायंकाल के पश्चात् किसी सार्वजनिक स्थान में सभा की जाय। उसमें किसी माननीय व्यक्ति को सभापति बनाकर होली के महत्व, उसमें उत्पन्न हो गई कुरीतियों तथा आगामी सुधारों के सम्बन्ध में प्रवचन किये जायें। होलिका का उपाख्यान सुनाकर उससे प्राप्त होने वाली शिक्षाओं को समझाया जाय तथा हो सके तो जनता के मनोरंजनार्थ भक्त प्रहलाद का नाटक भी दिखलाया जाये। इस अवसर पर जहाँ जैसी सुविधा हो सुरुचिपूर्ण गायन, भजन, कीर्तन, कवि सम्मेलन आदि का आयोजन भी किया जा सकता है।

भैया दूज :- तीसरे दिन भाई बहिन का त्यौहार होता है जिसमें बहिन अच्छे भोजन बना भाई को खिलाती है और वह उसे कुछ भेंट देता है। यह भी बड़े महत्व का त्यौहार है। वास्तव में ग्राम में उत्पन्न सभी बालक बालिकायें परस्पर भाई-बहिन ही होते हैं। वर्तमान समय में मूर्खता तथा संकीर्णता के कारण यह भावना लुप्त होती जाती है। अब हमको प्रयत्न करके उसे पुनः जागृत करना है। सभी महिलायें हमारी माताएं और बहिनें हैं इसी भावना का प्रतीक यह भैयादूज का त्यौहार है। इसलिये गाँव के सभी बालक बालिकाओं को एक स्थान पर इकट्ठा करके बालिकाओं द्वारा बालकों के तिलक कराना और कलावा बँधवाना चाहिये, तथा बालकों द्वारा उनको कुछ बताशे या अन्य मिठाई प्रसाद के रूप में दिलवाना चाहिये। यह कार्यक्रम प्रति वर्ष होते रहने से आजकल के युवकों की अश्लील भावनाएँ शुद्ध होने लगेंगी तथा हमारे समाज पुनः माता पुत्र और भाई-बहिन की शुद्ध भावना का अधिकतम रूप में प्रचार होने लगेगा।

इस प्रकार होलिकोत्सव मनाने से हम में सामूहिकता की भावना की वृद्धि होगी और वर्तमान समय में इसने जो वीभत्स रूप ग्रहण कर लिया है जिससे अधिकाँश भले लोग इससे नाक भौं सिकोड़ने लगे हैं, उसका भी संशोधन हो जायेगा। इस अवसर पर विधि पूर्वक यज्ञ करने से इस मौसम की बीमारियों से रक्षा होगी, स्वास्थ्य तथा सद्भावना की वृद्धि होगी और फसल में पौष्टिक तत्व बढ़ेंगे। परस्पर के रागद्वेष और मनोमालिन्य के भाव मिटकर परस्पर सहयोग और स्नेह का व्यवहार होने लगेगा। हिन्दू समाज में फैला जात-पात और ऊँच-नीच का भूत शाँत होकर एकता की वृद्धि होगी। इस प्रकार होली का त्यौहार अश्लीलता और कुत्सितता का भंडार होने के स्थान पर हमारे जातीय संगठन को सुदृढ़ बनाने वाला तथा नर नारियों में सद्भावों का विकास करने वाला बन सकेगा।


सफलता का रहस्य

(प्रो. मोहनलाल वर्मा, एम. ए. एल. एल. बी)

जीवन में प्रगति के हेतु कुशलता की अपेक्षा दृढ़ता अधिक वाञ्छनीय है। यद्यपि चरित्र की श्रेष्ठता किसी ऐसे कारण पर अवलम्बित नहीं समझी जानी चाहिये, तथापि यह परम सत्य है। उचित कार्य करना उसकी मीमाँसा की अपेक्षा उत्तम है, और चाहे हम श्रेष्ठतर बनना चाहें या अधिक सम्पन्न और सुखी होना चाहें, हर दशा में हमारा कार्यक्रम एक ही प्रकार का होना चाहिये। स्वर्ण कार्य ही स्वर्ण-युग निर्माण का एक मात्र साधन है।

जीवन की उपयोगिता केवल नैतिक मूल्यांकन द्वारा ही निर्धारित की जा सकती है। एक बार निश्चय कर लीजिये कि जब आप की अन्तरात्मा किसी कार्य को उचित बतलावे, तो अनिश्चित और अकर्मण्य नहीं रह जायेंगे, बल्कि उस पर अग्रसर होंगे, और समझ लीजिये कि एक मानव को दैवी वरदान की जितनी आशा हो सकती है, उसकी कुँजी उसे प्राप्त हो गई है।

अपने कर्तव्य से बच निकलकर या उसकी अवहेलना करके आप अपने सुख की वृद्धि नहीं कर सकते। बुद्धिमान और सज्जन भीरुता जनित भयों ने नहीं डरते, और जिस और उनका कर्तव्य संकेत करता है विश्वासपूर्वक बढ़ते चले जाते हैं। कर्तव्य के आह्वान, पर परमात्मा में विश्वास रखते हुए वे हजारों खतरों का मुकाबला करते हैं और उन पर विजय पाते हैं।

सच्ची सफलता के लिये केवल एक वस्तु की आवश्यकता है। धन की नहीं, शक्ति की नहीं, कुशलता की नहीं, ख्याति की नहीं, स्वतंत्रता की नहीं, स्वास्थ्य की भी नहीं-अपितु एकमात्र चरित्र की- पूर्ण अनुशासित इच्छा शक्ति की- केवल वही हमारी सच्ची सहायता कर सकती है। और यदि हम इस अर्थ में सफल नहीं हो सके हैं, तो हमारा जीवन निष्फल रहा है।

हमारा जीवन वैसा ही बन जायेगा जैसा हम उसे बनाना चाहेंगे। यह सत्य है कि हम सब कवि, संगीतज्ञ; बड़े कलाकार या वैज्ञानिक नहीं बन सकते, क्योंकि सम्भव है इन क्षेत्रों में दक्ष होने की प्रतिभा हम में न हो। परन्तु हमें उन सद्गुणों का अर्जन अवश्य करना चाहिये, जो हमारी पहुँच में हैं। सद्भावना, गम्भीरता, श्रमशीलता, भोग विलास से घृणा, दानशीलता, स्पष्टवादिता, क्षुद्रता से निवृत्ति, विशाल हृदयता आदि बहुत से सद्गुण जिन्हें हम अपने चरित्र का अंग बना सकते हैं और जिन के विषय में यह बहाना नहीं चल सकता कि इनके लिये हम में स्वाभाविक-प्राकृतिक अयोग्यता है। फिर भी हम जान बूझकर अपने वाँछित स्तर से नीचे रहते हैं।

हमें ऐसा कार्य कदापि न करना चाहिये जिससे हमें लज्जा आये। केवल एक ही ऐसा सच्चा साक्षी है, जिसकी सम्मति हमारे लिये महत्वपूर्ण है और वह हमारी अन्तरात्मा है। एक विदेशी तत्वज्ञानी का मत है कि संतुष्ट अन्तरात्मा अनन्त आनन्द का स्रोत है।

अपने जीवन निर्माण के हेतु सदा ऊपर की और देखो, नीचे को नहीं। जो ऊपर उठना नहीं चाहता, वह नीचे की ओर खिसकता है जो आत्मा उड़ने की हिम्मत नहीं करती, रसातल में गिरती है। खेद का विषय है कि हम लापरवाही से कहते हैं कि प्रसिद्धि या सुयश केवल शब्द मात्र हैं। वस्तुतः इस शब्द में वह जादू है जिससे हमारी स्नायु बलिष्ठ होती हैं, और हमारे हृदय में उष्णता आती है। महान् आत्माओं के जीवन का अनुशीलन युवकों को जाग्रत करता है और वे हाथ उठाकर शपथ लेने को प्रेरित होते हैं कि वे उन्हीं के समान महान कार्य करके अमर ख्याति प्राप्त करेंगे।

परन्तु यह सब होते हुए भी, जीवन की वास्तविकता का ध्यान रखते हुए, साधारण प्रकार की महत्वाकाँक्षायें हमारे ध्यान देने योग्य नहीं हैं, एवं हमारे समय के कतिपय महान् व्यक्तियों के लिये शासन की ओर से दिया हुआ आदर और उपाधियाँ बिल्कुल लाभप्रद नहीं हुई, क्योंकि उनकी महानता उनके उच्च चरित्र और महान् कार्य के कारण थी, ख्याति या प्रशंसा के कारण नहीं।

साधारण महत्वाकाँक्षा का एक बड़ा दोष यह है कि उसकी तृप्ति नहीं होती । पहाड़ की एक चोटी पर चढ़कर अन्य चोटियाँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं, और उन्हें पार करने की इच्छा बलवती हो जाती है। उदाहरण स्वरूप नैपोलियन, सिकन्दर आदि महान् विजेताओं की राज्य लोलुपता को तृप्त करना असम्भव था। अनुचित आकाँक्षा के शिकार होने के कारण वे न शान्ति ही पा सके और न कृतज्ञता ही का अनुभव कर सके। प्रगतिशील व्यक्ति का पथ अवरुद्ध हो जाने पर उसको आत्मग्लानि हो जाती है।

स्वार्थमय महत्वाकाँक्षा मृग तृष्णा के समान एक ज्योतिर्मय प्रवञ्चना है। यह एक मनोहर छलावा है, जो प्रतिभावान नवयुवक के हृदय की क्षुद्र खिड़की को खोल कर अन्दर प्रवेश करता है और संकुचित घर की दीवारें दूर होती जाती हैं, यहाँ तक कि वह एक राज प्रासाद बन जाता है। उसकी छत ऊँची उठकर आकाश तक पहुँच जाती है और अदृश उंगलियाँ उसको मूल्यवान चित्रों से सुसज्जित कर उसका नाम स्वर्णाक्षरों में हर जगह अंकित कर देती हैं।

यह सब कुछ प्राप्त हो जाता है, परन्तु प्रेम जो वाञ्छनीय है नहीं मिल पाता और इससे पूर्व कि हम इन पुरस्कारों की प्राप्ति अनुभव कर सकें, मृत्यु हमें चिता में ढकेल देती है।


भारतीय संस्कृति का मूल आधार-आध्यात्मिकता

(श्री शिव प्रकाश)

भारतीय संस्कृति के द्रष्टा, उद्गाता, निर्माता और प्रवर्त्तक भारतीय “ऋषि” रहे हैं, जिन्होंने समाधि के दिव्यतम शिखरों पर स्थित होकर तत्व उपलब्ध किया, देखा, अनुभूति ली और भौतिक जगत की परिस्थिति, स्थान-काल और पात्र यानी मनुष्य की योग्यता, विकास एवं विभिन्न विषयक धारणा-शक्ति के अनुसार इसे स्वरूप प्रदान किया। इसीलिये भारतीय संस्कृति का मूल सदा से आध्यात्म या परमात्मा रहा है। चूँकि भारतीय संस्कृति का मूल भगवान हैं और जिन्होंने इसे देखा-उपलब्ध किया, वे ही दृष्टा-ऋषि हैं, जो परातत्त्व को प्राप्त कर स्वयं भगवान या उनके सदृश गुण-प्रभाव वाले बन गये हैं। उनकी अनुभूति जब विचार, भावना में अवतरित होकर वाणी का स्वरूप धारण करती है तो उसी वाणी को हम वेद-(ज्ञान) शब्द से बोध करते हैं।

ऋषि जब सच्चिदानन्द के उच्च स्तरों से नीचे आकर दुःख, रोग, वासना-पंकिल पापेच्छा-स्वार्थ युक्त कामनाओं से भरी इस सृष्टि को देखते हैं तो अनायास- स्वभावतः ही उन की अन्तरात्मा अभीप्सा करने लगती है कि इस सृष्टि में भी सभी सुखी, आरोग्य, शुभ दृष्टि वाले एवं आनन्द मय बनें। उनकी यही अभीप्सा संसार में फलवती-चरितार्थ हो इसके लिये उन्होंने भिन्न-भिन्न, सद्गुणों का चयन, दुर्गुणों का परित्याग , संयम, नियम, जप, तप, उपासना, दान, उपकार, सत्कर्मों के विधान रचे। पर ये बाह्य कर्म विधानों के रूप- एक ही लक्ष्य स्थान पर जाने वाले विविध पंथों की भाँति कभी एक नहीं हो सकते। इसके अतिरिक्त व्यक्ति यों और समुदायों की मनोवृत्ति तथा रुचि में देश, काल और पात्र के कारण जो भेद रहता है उसके अनुसार भी विभिन्न प्रकार के मार्गों की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिये भिन्न-भिन्न ऋषियों द्वारा एक ही काल-देश एवं पात्र के लिये भिन्न-भिन्न विधान रचे गये। परिस्थिति की परिवर्तित स्थिति के अनुसार उन विधानों के स्वरूपों की विविधता बढ़ती ही गयी, पर लक्ष्य की एकता के कारण इन विविध विधानों को एक दूसरे के विरोध में कभी खड़ा नहीं किया गया। जब कभी मन-बुद्धि की सीमितता, अज्ञानता और खण्डित-अपूर्ण दृष्टि के कारण व्यापक-विस्तृत विरोध हुआ तो उसी समय किसी ऋषि के प्रगटीकरण द्वारा उसे प्रेम, ज्ञान, अनुभूति और सामञ्जस्य से दूर किया गया-समाधान पूर्वक अज्ञान के अन्धकार का नाश हुआ।

भारतीयों की इसी आस्था, श्रद्धा, विरबास एवं निष्ठा के कारण ही भारतीय संस्कृति अनेकों बाह्य रूप परिवर्तनों के बीच बहती हुई भी अपनी अखण्डता- अजस्रता-निरन्तरता संरक्षित रखे रही साथ ही सदा समय-समय पर आवश्यक परिमार्जन होते रहने के कारण कोई कालिमा-कलंक और काई इसमें नहीं लगने पाई और न आज भी उस में कोई धूलिकण और धूमिलता का लवलेश वहाँ टिकने पाय है-भले ही यह कहा जा सकता है कि आज उसके लक्ष्य के अनुसार आचरण करने वालों की संख्या में भारी कभी आ गयी है, पर व्यक्ति रूप से ही नहीं-सामाजिक रूप से भी उसका स्वरूप अव्याहत और अक्षुण्ण रहा है। इसीलिये इस संस्कृति और धर्म को सनातन कहा जाता है।

भारत की आध्यात्मिकता में ही भारतीय संस्कृति का निवास है यही भारतीयता है, इसीलिये ही भारतीय संस्कृति एकमात्र आध्यात्मिक, अति मानसिक- अतिबौद्धिक संस्कृति है। जिस प्रकार परमात्मा सृष्टि के सभी प्राणियों के कल्याण का विधान करता हुआ सृष्टि, रक्षा और संहार करता है-उसी भाँति भारतीय संस्कृति भी सदा सद्गुणों की सृष्टि, उनका संरक्षण एवं कल्याण विरोधी दुष्ट तत्वों के विनाश की व्यवस्था करती है। वस्तुतः यह मानवीय, विश्वव्यापी एवं सर्वलोक हितकारिणी संस्कृति है। जो इसका अपनी अज्ञानता के कारण विरोध करता है, उसका भी कल्याण करने की ही यह संस्कृति सोचती और मार्ग बताती है।

अभी तक मनुष्य ही इस सृष्टि का सर्व-श्रेष्ठ या सर्वाधिक विकसित प्राणी है। इससे इतर सभी प्राणियों की अपेक्षा मनस्तत्व (मन-बुद्धि) का उन्नत विकास इसी में आकर हुआ है। पर मन-बुद्धि का स्वभाव ही है सभी वस्तुओं का विश्लेषण करना सभी को अलग अलग करके देखना, एक दूसरे के विरोध में खड़ा करना, समष्टि रूप से भी अनुकूल और प्रतिकूल की भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ बनाना आदि-आदि। यदि इसके द्वारा कहीं संगठन-एकता-मिलन कराये भी जाते हैं तो उसका आन्तर भेद ज्यों-का-त्यों अविचल रखा जाता हैं तो इस का एक श्रेष्ठतर नाम रखा गया है “आत्म स्वातन्त्र्य”। यह वैयक्तिक स्वतन्त्रता का संरक्षण एवं पोषण करते हुए आत्म स्वार्थ (अपने आपके सुख स्वार्थ) में आकर परिणत हो जाता है। यदि यह उदार भाव से अपना विस्तार भी करता है तो कभी अनन्तता- असीम विस्तार की और - जो अध्यात्म दृष्टि की गति है, पग नहीं बढ़ाता, क्योंकि ऐसा करने से उस की भेदवादी वृत्ति नष्ट होती है। भेदवादी दृष्टि को खेना-उसे नष्ट होने जाने दे ने में वह अज्ञानता से अपना ही अस्तित्व विनाश होता हुआ देखता है। अपना अस्तित्व नष्ट होने देना कौन पसन्द करता है? अतः इसी भय के कारण वह विस्तार में जाते हुए कहीं अटक कर अपनी सीमा बना लेता है और इस सीमा से बाहर के व्यक्तियों, समूहों और दलों को यदि अपना विरोधी नहीं तो पराया बना लेता हैं और यही कारण है कि (आत्म चेतना हीन) बुद्धिवादी संस्कृति, चाहे वह सुख, वैभव, ऐश्वर्य, सौंदर्य कला एवं विज्ञान में कितनी ही उन्नति क्यों न प्राप्त कर ले, आध्यात्मिक (भारतीय) संस्कृति की विरोधिनी होती है।

बुद्धिवादी संस्कृति और दर्शन वैयक्तिक सत्ता के विलय (अहं तत्व के विनाश) को सदा भय की दृष्टि से देखते हैं। लगता है कि इसके बिना तो जीवन, जीवन ही नहीं रह सकता। पर भारतीय संस्कृति ने इसी के द्वारा जो खोज पाया है- उपलब्ध किया है, वही इसे अमर बनाता है। व्यक्ति सत्ता को विकसित कर समष्टि रूप होना, मन-बुद्धि के व्यापार को शान्त कर अखण्ड में प्रवेश पाना, भारतीय संस्कृति का भावात्मक आदर्श है। बुद्धि जिसकी कल्पना करने में असमर्थ है, फिर उसकी प्राप्ति करने-कराने की तो बात ही नहीं-इस आदर्श को कोरी भावुकता, कह कर उपेक्षा या मजाक कर सकती है-और इसे असम्भव कह कर मानव जीवन को इसके लिये खपाना व्यर्थ बना सकती है, फिर भी भारतीय संस्कृति उसे भेद कर अपनी दिव्यता समय-समय पर उद्भासित करती रही है।


शिवरात्रि का व्रत और उसकी कल्याणकारी शिक्षाएं

(डॉ.चमन लाल)

हिन्दू धर्म में जितने त्यौहार मनाये जाते हैं वे सभी किसी न किसी साँस्कृतिक, ऐतिहासिक या वैज्ञानिक आधार पर प्रचलित किये गये हैं। यह बात दूसरी है कि बहुत अधिक समय बीत जाने और राजनैतिक, सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियों में परिवर्तन हो जाने से उनका महत्व हमको पूर्ववत् नहीं जान पड़ता । तो भी यदि हम उनको उचित रीति से मनायें, उनमें उत्पन्न हो गई त्रुटियों को दूर कर दें और उनमें समयानुकूल तत्वों का भी समावेश कर दें तो उनसे अभी बहुत लाभ उठाया जा सकता है। देश की साधारण जनता की उनके ऊपर हार्दिक आस्था है, और इन त्यौहारों और धार्मिक उत्सवों के द्वारा उनको बड़ी कल्याणकारी नैतिक और चारित्रिक शिक्षाएं दी जा सकती हैं। यहाँ पर हम शिवरात्रि के व्रत के सम्बन्ध में कुछ विवेचना करना चाहते हैं, आगामी मास में मनाया जाने वाला है।

शिवरात्रि के व्रत की कथा इस प्रकार हैं कि फाल्गुन कृष्ण 13 के दिन एक बहेलिया को किसी साहूकार ने कर्ज अदा न करने पर गाँव के बाहर एक शिवालय में बन्द कर दिया। वहाँ उसने शिवरात्रि के व्रत की कथा सुनी। फिर कर्ज चुकाने का वायदा करने पर साहूकार ने उसे छोड़ दिया। वह दिन भर का भूखा और थका आजीविका के लिये इधर-उधर शिकार मारने की कोशिश करने लगा पर उस समय कोई जानवर उसे न मिल सका। इस प्रकार लाचारी से उसका दिन भर का व्रत हो गया। जंगल में ही रात हो जाने से वह आत्म रक्षार्थ शिवालय के पास ही एक विल्व-वृक्ष पर बैठ गया। रात के समय कई हिरनियाँ और एक हिरन पानी पीने के लिए उस रास्ते से निकले और उन्हें मारने के लिए उसने अपना धनुष उठाया। पर उनके विनय करने और दूसरे दिन सुबह लौट कर आजाने का वचन देने पर उसने उन्हें छोड़ दिया। इस प्रकार वह रात को भी भूखा ही रह गया। उस दिन व्रत के कारण अनेक गृहस्थी और साधु भी वहाँ शिवजी की पूजा करने को आते रहे और उनकी बातचीत को सुनकर उसे भी शिवरात्रि की महिमा का कुछ बोध हो गया और इससे उनके मन के विकार बहुत कुछ निकल गये। इसलिए जब प्रातःकाल वे सब हिरन हिरनियाँ उसके सामने अपना वचन निभाने को उपस्थित हुये तो उस पर बड़ा प्रभाव पड़ा ओर उसने इस पाप-कर्म को छोड़कर सेवा और परमार्थ में जीवन लगाने का निश्चय कर लिया और आगे चलकर वह एक सच्चा धर्मात्मा बन गया।

यह तो शिवरात्रि के व्रत की स्थूल कथा है। पर इसका सूक्ष्म आशय यह है कि जिसमें यह सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है वह शिव है। जो सारे जगत को अपने भीतर लीन करे लेते हैं वे ही भगवान शिव हैं। ‘शिव महिम्न स्तोत्र” में एक जगह लिखा है कि -”महासमुद्र रूपी शिवजी एक अखण्ड पर-तत्व हैं। इन्हीं की अनेक विभूतियाँ अनेक नामों से पूजी जाती हैं। यही सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान हैं, यही व्यक्त -अव्यक्त रूप से क्रमशः सगुण ईश्वर और निर्गुण ब्रह्म कहे जाते हैं, तथा यही “परमात्मा” “जगदात्मा” “शंकर” “रुद” आदि नामों से सम्बोधित किये जाते हैं। यह भक्तों को अपनी गोद में रखने वाले “आशुतोष” हैं। यही त्रिविध तापों के शमन करने वाले है तथा यही वेद और प्रणव के उद्गम हैं। इन्हीं को वेदों ने “नेति-नेत” कहा है। साधन पथ में यही ब्रह्मवादियों के ब्रह्म, साँख्य-मतावलम्बियों के पुरुष, तथा योगपथ में आरुढ़ होने वालों की प्रणव की अर्धमात्रा हैं।

जो सुखादि प्रदान करती है वह रात्रि है, क्योंकि दिन भर की थकावट को दूर करके नवजीवन का संचार करने वाली यही है। “ऋग्वेद” के रात्रिसूक्त में इसकी बड़ी प्रशंसा की गई है, कहा है-”हे रात्रे! अकिष्ट जो तम है वह हमारे पास न आवे।” शास्त्र में रात्रि को नित्य-प्रलय और दिन को नित्य-सृष्टि कहा गया है। एक से अनेक की और कारण से कार्य की और जाना ही सृष्टि है और इसके विपरीत अनेक से एक और कार्य से कारण की ओर जाना प्रलय है। दिन में हमारा मन, प्राण और इन्द्रियाँ हमारे भीतर से बाहर निकल बाहरी प्रपंच सी ओर दौड़ती हैं, और रात्रि में फिर बाहर से भीतर की ओर वापस आकर शिव की ओर प्रवृत्त होती है। इसी से दिन सृष्टि का और रात्रि प्रलय की द्योतक है । समस्त भूतों का अस्तित्व मिटाकर परमात्मा से आत्म समाधान की साधना ही शिव की साधना है। इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है वह रात्रि जो आत्मानन्द प्रदान करने वाली है और जिसका शिव से विशेष सम्बन्ध है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में यह विशेषता सर्वाधिक पाई जाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उस दिन चन्द्रमा सूर्य के निकट होता है। इस कारण उसी समय जीवरूपी चन्द्रमा का परमात्मा रूपी सूर्य के साथ भी योग होता है। अतएव फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को की गई साधना से जीवात्मा का शीघ्र विकास होता है।

शिवजी के रूप की एक दूसरी व्याख्या है। वह यह कि जहाँ अन्य समस्त देवता वैभव और अधिकार के अभिलाषी बतलाये गये हैं, वहाँ शिवजी ही एक मात्र ऐसे देवता हैं, जो संपत्ति और वैभव के बजाय त्याग और अकिंचनता को वरण करते हैं। अन्य देवता जहाँ सुन्दर रेशमी वस्त्रों से अलंकृत किये जाते हैं वहाँ शिवजी सदा नंगे, भस्म लपेटे दीनजन के रूप में रहते हैं। इसी त्याग और अपरिग्रह के कारण वे देवताओं में महादेव कहलाते है। इस प्रकार शिवजी का आदर्श हमको शिक्षा देता है कि यदि परमात्मा ने हमको योग्यता और शक्ति दी है तो हम उसका उपयोग शान शौकत दिखलाने के बजाय परोपकार और सेवा के लिए करें। शिवजी का उदाहरण यह भी प्रकट करता है कि जिसे जितनी अधिक शक्ति मिली है उसका उत्तरदायित्व भी उतना ही अधिक होता है। जिस प्रकार समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने पर उसे पीने का साहस शिवजी के सिवाय और कोई न कर सका उसी प्रकार हमें भी यदि परमात्मा ने विशेष धन, बल, विद्या आदि प्रदान किये हैं तो उनका उपयोग दीन दुखी और कष्ट ग्रसित लोगों के उपकारार्थ ही करना चाहिए।

एक विदेशी विद्वान ने लिखा है कि ऋग्वेद व अथर्ववेद में शिव के रुद्र रूप को, मंगलमय बतलाया है। समस्त वैदिक साहित्य में उन्हें अग्नि का रूप माना गया है। अग्नि और शिव के नामों में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। सारे महाभूतों में अग्नि ही एक ऐसा तत्व है जो भय को सहन नहीं कर सकता । अग्नि का गुण संहार न समझ कर रचना मानना अधिक युक्ति युक्त है। अग्नि के इन दोनों स्वरूपों से मनुष्य की वास्तविकता की भी परीक्षा हो जाती है। यहाँ पर हम यह भी कह देना आवश्यक समझते हैं कि अग्नि का सम्बन्ध गायत्री से भी है और इस महामंत्र में अग्नि की सारी शुभ शक्तियाँ पुँजीभूत हैं।

“गायत्री-मंजरी” में “शिव-पार्वती संवाद” आता है, जिसमें भगवती पूछती है कि “ हे देव! आप किस योग की उपासना करते हैं जिससे आपको परम सिद्धि प्राप्त हुई है?” शिव इस संसार में आदि-योगी थे, योग के सभी भेदों को मालूम कर चुके थे। उन्होंने उत्तर दिया-”गायत्री ही वेदमाता है और पृथ्वी की सबसे पहली और सबसे बड़ी शक्ति है। वह संसार की माता है। गायत्री भूलोक की कामधेनु है। इससे सब कुछ प्राप्त होता है। ज्ञानियों ने योग की सभी क्रियाओं के लिए गायत्री को ही आधार माना है।”

इस प्रकार विदित होता है कि भगवान शंकर हमें गायत्री-योग द्वारा आत्मोत्थान की ओर अग्रसर होने का आदेश देते हैं। पर पिछले कुछ समय से लोग इस तथ्य को भूल गये हैं और उन्होंने भंग पीना तथा बढ़िया पकवान बनाकर खा लेना ही शिवरात्रि के व्रत का साराँश समझ लिया है। मनोरंजन के लिये स्वाँग, तमाशे, गाने के साधन रह गये हैं। अर्थ लोलुप तथा स्वार्थी लोगों ने इन्हीं बाह्य क्रियाओं को सत्य बताकर वैसे ही श्लोक गढ़कर रख दिये जिससे सीधे सादे लोग भ्रम में पड़ गये ।

गायत्री-परिवार का कर्तव्य है कि वह इस महान पर्व को शुद्ध शास्त्रोक्त रीति से मनाकर लोगों को स्व कल्याण का मार्ग दर्शावे। इसके लिए फाल्गुन कृष्ण 13 की रात्रि को ही प्रत्येक शाखा के सदस्यों को अपने ज्ञान-मन्दिर अथवा किसी निकटवर्ती शिवालय पर इकट्ठे होकर शिवजी का कीर्तन करना चाहिए । चौदस को प्रातः 4 बजे से 7 बजे तक गायत्री का जप करें। 7 से 10 तक हवन करना चाहिए । रात्रि में सार्वजनिक सभा की जाय जिसमें धर्मप्रेमियों को बुलाकर शिवरात्रि के महत्व पर प्रवचन किया जाय और लोगों को दुर्व्यसनों के त्याग करने की प्रेरणा दी जाय । यही शिवरात्रि का वास्तविक लाभ है।


सामाजिक सुधार और महापुरुष

(ला. हरदयाल एम. ए.)

महापुरुषों के वाक्य जाति की चिरस्थायी संपत्ति हैं। उनके चरित्र जाति के युवकों के सामने उचित मार्ग पर चलने के लिए उच्च आदर्श पेश करते हैं। उनके विचारों को जीवित रखना जाति का परम कर्तव्य है।

संसार में दो प्रकार के महापुरुष होते हैं। एक वे, जो किसी विचार की धुन में चल पड़ते हैं और उसके प्रचार में मस्त होकर सारे संसार को भूल जाते हैं। जान बूझकर अपने जीवन को संकीर्ण और अपूर्ण बना लेते हैं। उच्च आदर्श के अनुसार उनका जीवन प्रशंसा के योग्य नहीं होता, क्योंकि वे अपनी शारीरिक मानसिक ओर नैतिक शक्तियों को पूर्ण रूप से बढ़ने नहीं देते। वे अपनी मानसिक उन्नति को तुच्छ समझते हैं। शरीर की ओर से तो बिलकुल उदासीन हो जाते हैं। सभा ओर समाज के नियम, सभ्यता पूर्वक बात-चीत करने के ढंग, साँसारिक व्यवहार का अनुभव आदि बातें उनके लिए कोई आदरणीय वस्तु नहीं है। नंगधड़ंग, पागल, उजड्ड तथा असभ्य बन कर संसार से अलग रहकर लोगों के पथ-प्रदर्शक बनते हैं। सदा उन्हें एक ही विचार की लौ लगी रहती है, जिसे वे हर समय हर मनुष्य तक पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं। जीवन के दूसरे अंगों के विषय में पूछो तो उन्हें तनिक भी उनका पता नहीं । वे अपनी सम्पूर्ण शक्तियाँ जाति को एक ही मार्ग दिखलाने में खर्च कर देते हैं। जाति बड़ी बन जाती है परन्तु वे स्वयं मनुष्य नहीं रहते कुछ और ही हो जाती हैं। कोई उन्हें पागल कहता है और कोई साधू। आधा संसार उन पर हँसता है और आधा उनकी पदरज को पवित्र समझ कर सिर पर चढ़ाता है।

यह तो उन महापुरुषों का हाल है जो अपना सारा जीवन किसी एक सच्चाई के प्रचार में बिता देते हैं। वे उस ताड़ के वृक्ष की तरह होते हैं जो सीधा जाता है। न उसमें छाया होती है और न फूल। वह केवल आकाश से बातें करता है। उसकी चोटी को देखकर मनुष्य मूर्छित हो गिर पड़ता है। इस प्रकार के महापुरुष सदैव संसार से अलग, नैतिक धुन में लगे रहते हैं। उनसे मिल कर साधारण मनुष्य शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, परन्तु लाभ नहीं उठा सकते। उनको सभा, समाज, उत्सव, विवाह, मेला, त्यौहार इत्यादि का शौक नहीं होता। वे सबके कृपालु और सहायक बन सकते हैं परन्तु किसी के मित्र या लंगोटिया यार नहीं। वे दस आदमियों में बैठकर बातें भी नहीं कर सकते क्योंकि जहाँ जरा किसी बात ने उनके विचारों को एक निश्चित मार्ग से हटाया ओर उनका मन विचलित हुआ।

दूसरे प्रकार के महापुरुष ताड़ के वृक्ष के अनुसार नहीं, वरन् बरगद के वृक्ष के सदृश होते हैं, जिसकी शाखाओं में पक्षी बसेरा करते और जिसकी छाया से पथिक सुख उठाते हैं। जिसकी ओर देखकर दृष्टि आकाश तक नहीं पहुँचती वरन् पत्तों ही रह जाती है। सूरज की चमक से चौंधियाई हुई आँखों को हरियाली से शीतलता प्राप्त होती है। ऐसे महा पुरुष संसार में रहकर और लोगों के सुख और दुख आनन्द ओर शोक में शामिल होकर घरबार के कर्तव्यों को पूरा करते हुए संसार के सामने व्यवहारिक धर्म का नमूना रखते हैं। वे अपने प्राकृतिक भावों को नहीं मारते वे प्रेम के रक्त को नहीं बहाते फिरते। वे मानुषिक विशेषताओं और गुणों को नमस्कार करके विचार की मूर्ति बनने की कोशिश नहीं करते। परन्तु दूसरे भाइयों की तरह जीवन-मार्ग में प्रवेश करके इस प्रकार रहते हैं जैसे पानी में कमल। काम वैसे ही करते हैं, जैसे उनके पड़ोसी, परन्तु उद्देश्य का फर्क होता है। स्वार्थपरता नहीं वरन् परोपकार और कर्तव्य-परायणता उनके जीवन का लक्ष्य होता है।

महापुरुषों के जीवन का लोगों के मन पर बड़ा भारी प्रभाव पड़ता है उन्हीं के जीवन को आदर्श मान कर लोग दूसरों के क्लेश और दुःखों को मिटाने और अपनी जिन्दगी में सुधार करने का प्रयत्न करते हैं।

हर महापुरुष के मन में एक बड़ा विचार होता है, जिसको वह व्यावहारिक रूप से संसार के सामने लाने का प्रयत्न करता रहता है। वही उसका धर्म होता है। वही उसके जीवन के चरित्र का प्राण होता है। वही उसके जीवन के चक्र का केन्द्र होता है। वही उसके कामों के मोतियों की माला की लड़ी हो जाती है। उससे बहुत से प्रश्नों का उत्तर मिलता है। उससे उस मनुष्य के कामों का भेद मालूम होता है। जिस प्रकार एक बड़े कारखाने में लोग सारी कलों को देखते हैं परन्तु एञ्जिन, जिसके बल से सारा काम चलता है, नहीं देखते उसी प्रकार जब तक हम किसी महापुरुष के मन तक पहुँचकर उसके बड़े विचार का न समझें तब तक हम उसके जीवन से ठीक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते। परन्तु यह आवश्यक नहीं कि वह महापुरुष प्रत्येक समय और प्रत्येक काम में भाग लेने के पहिले इस विचार को प्रत्येक मनुष्य के सामने प्रकट करता रहे। कोई भी महापुरुष ओछे आदमियों की तरह सदैव अपने मन की बातें दूसरों के सन्मुख नहीं करता रहता। अपनी तबियत के सम्पूर्ण अंगों को प्रत्येक भले बुरे मनुष्य को नहीं दिखाता रहता। वह अपने दुःखी मन के भावों को हर समय मित्र और शत्रु के सामने नहीं खोलता रहता ताकि असावधान मित्र उस पर ठट्ठे का नमक छिड़कें और सावधान शत्रु उसे और घायल करें। जो मनुष्य गम्भीर और बुद्धिमान होते हैं वे नीच और अदूरदर्शी मनुष्यों की भाँति अपने विश्वासों को पल-पल में वर्णन नहीं करते, परन्तु उन्हें व्यवहार में लाकर दूसरों को दिखा देते हैं कि तुम भी ऐसा करो।

महापुरुषों का जीवन हम लोगों के लिए उन्नति का मार्ग दिखलाने वाला होता है परन्तु वह हमारी बाढ़ रोकने वाला घेरा; जिसके पार जाना पाप कहा जाता है नहीं बन सकता। कोई महापुरुष नहीं चाहता कि उसके वाक्य और कार्य जातीय जीवन के लिए शृंखला बन जायें, जो युवा पुरुषों को आगे पैर रखने से रोकें। हम अपने महापुरुषों को अपना सहायक नहीं, बल्कि शत्रु बना देंगे, यदि हम सपूत होने के बदले कपूत होने ही को आज्ञापालन का लक्षण समझेंगे। जाति की उन्नति हर समय होती रहेगी। कौन है जो उसको रोक सके? कौन है जो अपने कामों को जातीय प्रवाह की धार रोकने के लिए बाँध बनाना चाहता है? कौन है जो स्वयं इस बात को न माने कि उसने भी समय के साथ नये विचार प्राप्त किये है? यदि कोई मनुष्य ऐसा हैं जो पत्थर के खम्भे की तरह एक ही स्थान पर खड़ा रहा हो और जातीय झुँड दूर निकल गया हो तो वह महापुरुष नहीं, वह कुम्भकरण है। वह “दकियानुसी” समय का एक नमूना है। अजायबघर में रखे जाने के योग्य है। जातीय समाज में आने के योग्य है। जातीय समाज में आने के योग्य नहीं।


चाह-चिन्ता और त्याग

(श्री कमल भटनागर)

सामाजिक प्राणियों में कोई भी ऐसा जीव नहीं जिसे किसी प्रकार की कोई चाह न हो। इच्छाएँ अनन्त होती हैं, उनका अन्त होना असम्भव है। एक इच्छा की पूर्ति के उपरान्त तुरन्त ही दूसरी उठ खड़ी होती है। परन्तु चाह दुखों की जड़ है- चिन्ता की अर्धांगिनी है। अधिक से अधिक दुखों का अनुभव तब ही होता है जब इच्छाएँ अत्याधिक बढ़ जाती हैं और पूर्ति न होने से मन में चिन्ताएँ घर कर जाती हैं। इससे शरीर को घुन लग जाता है? अतएव इच्छाओं से दुख का बीज पनपता है और तब तक बढ़ता है जब तक कि उसकी पूर्ति नहीं हो जाती है। वही प्राणी मुक्तात्मा है जिसमें कोई चाह नहीं। चाह का त्याग करते रहने पर वह आनन्द होता है जो स्वर्ग में भी नहीं, फिर किसी भी वस्तु का अभाव नहीं रहता। अतः चाह का त्याग कर वास्तव चाह रहित प्राणी बनना हो तो दूसरों की चाहों की पूर्ति करते जाना चाहिए, पर यह ध्यान रहे कि इससे किसी को दुःख न हो, किसी का अधिकार खंडन न हो।

चाह की पूर्ति के लिए कुछ त्याग करना आवश्यक है। जिसकी चाह है उसके प्राप्त करने में कुछ त्यागना ही पड़ेगा। यदि सुखी रहना है, दुखों से बचना है, तो मोह छोड़ना होगा, लोभ छोड़ना होगा, मान-अभिमान छोड़ना होगा और छोड़ना होगी इस जीवन से अपनत्व की ममता। तब किसी भी वस्तु का वियोग दुखी न कर सकेगा चारों तरफ आनन्द ही आनन्द नजर आएगा।

सुखी होने से पूर्व सुख की लालसा का त्याग करना पड़ेगा क्योंकि सारे दुखों की जड़ सुखों की लालसा ही तो है। सुखों की तृष्णा ही तो मनुष्य को लोभी, मोही, लालची, अभिमानी बना देती है, दुखों बढ़ा देती है। अमुक वस्तु की आपूर्ति ही द्वेष, कलह, वेदना उत्पन्न कर देती है। दुखों को कम करने के लिए, हमें उस वस्तु को त्यागने के लिए पहले से तैयार रहना चाहिए जिसे पाने के लिए हम अत्यधिक बेचैन रहते है, जिसकी कमी हमें व्याकुल बनाए रखती हैं। यदि आपके भीतर यह त्याग की भावना उत्पन्न हो गई तो आपको कभी दुखी होने का अवसर नहीं आयेगा।

तनिक अपने मन में विचार कीजिये कि जिसे सबसे प्रिय समझते है अत्याधिक प्रेम करते हैं अपनी समझते है उसे त्याग भी सकते हैं या नहीं? यदि किसी को अपने व्रत से अधिक प्रेम है तो उसे तैयार रहना चाहिए त्याग ने के लिए भी, फिर उसे दुख न होगा, वियोग-वेदना न होगी। जो कुछ है वह मेरा नहीं ऐसी भावना रख कर संबंध रखना चाहिए। किसी निजी संबंधी से वियोग होते समय हम क्यों रोते बिलखते है? केवल मोह और सुख की आशा के लिए। सुख की लालसा के ही कारण लाभी धन के लिए, अभिमानी, अधिकार के लिए, वीर प्रयुक्त बल के लिए एवं भोगी इन्द्रिय सुख की लालसा के लिए रोते रहते हैं। केवल वही सुखी निर्भय एवं शान्त रह सकता है जिसने सुख की इच्छाओं को त्याग दिया है और प्राप्त सुख को बाँटते रहने का संकल्प कर लिया है। पर ऐसा दान करते समय भी अभिमान रहित रह कर महानता के ज्ञान का परिचय दिया जाना चाहिये। ऐसा महान कार्य कराने के लिए दैवी शक्तियाँ कठिन परीक्षाएँ लेती है। प्रभु जिससे महान कार्य करवाना चाहता है उसे बार बार दुख देकर उसकी दुर्बलताएँ दूर करने के लिए परीक्षाएँ लेता है। सत्यवादी हरिश्चन्द्र, ध्रुव, प्रहलाद, शिवाजी हमारे सामने प्रत्यक्ष प्रमाण है। अतएव महान त्याग के लिये कार्य करने से पहिले कटिबद्ध हो जाओ। तब चाह और इच्छायें आपका किसी प्रकार का अनिष्ट नहीं कर सकती।


मर कर अमर बनिये

(डॉ. उदयभानुजी)

सब नदियाँ समुद्र में जाकर मिलती हैं। समुद्र को जिंदा रखने के लिए अपनी हस्ती मिटा देती हैं। सिपाही अपने राजा को जीवित रखने के लिए, बीज वृक्ष को पैदा करने के लिए अपने अस्तित्व को खोता है। क्यों खोता है? इसका उत्तर हमारे पास नहीं है। हम तो केवल इतना जानते हैं कि इस संसार में यह बात देखी जाती हैं कि एक को जीवित रखने के लिए दूसरे को मिटना या मिटाना पड़ता है।

यदि स्वार्थ के वशीभूत नदियाँ अपना पानी समुद्र को देना बंद कर दें, यदि सिपाही प्राणों का मोह करके राजा के लिए लड़ना छोड़ दें, यदि बीज गलने के डर से अपने को खेत से अलग रखने लगें, तो यह संसार बदल जायेगा। समुद्र सूख जायगा और सब देश जल में डूब जाएंगे, राजा बलहीन हो जायेगा गुंडों का राज्य होगा; खेती न होगी और सब लोग हाय अन्न! हाय अन्न!! कह कर मर जाएँगे। मानो प्रलय हो जायेगा।

अपनी हस्ती को मिटाकर दूसरों को जीवित रखने की भावना हम इस संसार में देखते हैं। जहाँ जीवन है, वहाँ हम यह पाठ भी पढ़ते हैं। जहाँ यह सिद्धाँत काम में नहीं आता वहाँ देखने को मिलती है, मौत! जिस समाज में अपने को मिटाकर उसको जीवित रखने वाले व्यक्ति होते है, वह समाज जीवित रहता है, ओर ऐसे व्यक्तियों के अभाव में समाज मर जाता है, नष्ट हो जाता है।

भारतवर्ष की संस्कृति सब से अच्छी है, और सब से पुरानी है। आप चाहे मानें या न मानें, किन्तु मैं मानता हूँ। मैं इसको मत नहीं, सिद्धाँत मानता हूँ। अच्छी इसलिए मानता हूँ कि इसमें सब व्यक्तियों को निर्भीक बनने और बनाने का आदेश है, प्रचार करने की प्रेरणा है, पशुबल से नहीं, प्रेम से। सब से पुरानी इसलिये मानता हूँ, कि भारत ने अपनी दीक्षा सब लोगों को दी है। जब दूसरे देश अविद्या के अंधकार में पड़े हुए सो रहे थे, उस समय इस तपोभूमि भारत के ऋषि अपनी भौतिक और आध्यात्मिक शक्ति को पूर्ण रूप से विकसित कर चुके थे। किन्तु मुझे उस में सब से अच्छी बात कौन सी नजर आती है? आप कहेंगे- अहिंसा, दान, तप या भजन-पूजन। किन्तु मैं इन को नहीं मानता मेरी अपनी सम्मति में भारत में सब से अच्छी चीज है संसार को उन्नत करने के लिए अपने को मिटा देने की भावना। भारत के ऋषि चाहते थे कि संसार में आर्यत्व फैले। केवल हम ही श्रेष्ठ बने। इस जगत् में अविद्या, गरीबी, पाखंड न रहे। सारा संसार अपनी भौतिक और आत्मिक उन्नति करे। यह हमारी महत्वाकाँक्षा थी और उसे पूरी करने के लिए हम अपने को मिटा देना चाहते थे।

आज सारा संसार दुःखी है। लोग कहा करते थे कि भारत वर्ष में भिन्न भिन्न धर्म है, अनेक जातियाँ है, छुआछूत है। इसलिए लड़ाई होती है। पर आज उस यूरोप को देखो जो अपने विज्ञान पर फूला नहीं समाता था। जहाँ धर्म नाम की चीज ईसा के चन्द मन्दिरों में पड़ी सड़ रही है। शाँति नाम की कोई वस्तु वहाँ नहीं रह गई है। सब लोग भारत से आशा किये बैठे हैं। यह भारत का अध्यात्मवाद ही है, जो उन अशाँत-आत्माओं को प्रशाँत करेगा। पर यह केवल व्याख्यानों के जरिये से न होगा। यह होगा उन लोगों के द्वारा जो मर कर अमर बनना चाहेंगे।

*समाप्त*