गायत्री ज्ञान मन्दिर सैट

अब तक के प्रकाशित गायत्री साहित्य का सार लेकर चार-चार आने मूल्य की 52 पुस्तकें छापी गई हैं। 26 पुस्तकों में गायत्री महाशक्ति का परिचय विवेचन एवं साधना विधान भली प्रकार समझाया गया है तथा शेष में गायत्री महामन्त्र के 24 अक्षरों, प्रणव तथा व्याहृति की शिक्षाओं का वर्णन एक-एक पुस्तक में किया गया है। प्रत्येक पुस्तक ग्लेज बढ़िया कागज पर छपी हुई तिरंगे कवर से सुसज्जित है।

घर में गायत्री का एक छोटा पुस्तकालय स्थापित करने के लिए यह 13) मूल्य का सैट बहुत ही उपयोगी है।

गायत्री में सन्निहित शिक्षाओं की पुस्तकें

1—ईश्वर का विराट रूप

2—ब्रह्मज्ञान का प्रकाश

3—शक्ति का सदुपयोग

4—धन का सदुपयोग

5—आपत्तियों में धैर्य

6—नारी की महानता

7—गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा

8—प्रकृति का अनुसरण

9—मानसिक संतुलन

10—सहयोग और सहिष्णुता

11—इन्द्रिय संयम

12—पवित्र जीवन

13—परमार्थ और स्वार्थ

14—सर्वतोमुखी उन्नति

15—ईश्वरीय न्याय

16—विवेक की कसौटी

17—जीवन और मृत्यु

18—धर्म की सुदृढ़ धारणा

19—प्राणघातक व्यसन

20—सावधानी और सुरक्षा

21—उदारता और दूरदर्शिता

22—स्वाध्याय और सत्संग

23—आत्म-कल्याण का मार्ग

24—सन्तान के प्रति कर्त्तव्य

25—शिष्टाचार और सहयोग

26—विश्वव्यापी संकट

गायत्री विज्ञान तथा साधन की पुस्तकें

27—गायत्री की सुलभ साधना

28—गायत्री की सिद्धियाँ

29—गायत्री यज्ञ का महत्व

30—गायत्री की 24 शिक्षाएँ

31—गायत्री और यज्ञोपवीत

32—गायत्री साधना के चमत्कार

33—गायत्री की दिव्य शक्तियाँ

34—गायत्री द्वारा आत्मोत्कर्ष

35—गायत्री द्वारा भौतिक सफलताएँ

36—गायत्री से व्याधि निवारण

37—गायत्री से संकट निवारण

38—गायत्री से योग साधना

39—गायत्री से ब्रह्म साक्षात्कार

40—गायत्री के जगमगाते हीरे

41—गायत्री-महात्म्य

42—गायत्री उपनिषद्

43—गायत्री सहस्रनाम

44—अनादि गुरु मन्त्र गायत्री

45—गोपनीय गायत्री तंत्र

46—सचित्र गायत्री

47—स्त्रियों के गायत्री अधिकार

48—सामूहिक यज्ञ-योजना

49—मनुष्य जीवन की सार्थकता

50—यज्ञ और भारतीय संस्कृति

51—साँस्कृतिक पुनरुत्थान

52—गायत्री हवन पद्धति

—पता-अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा


Quotation

शुचिं पावकं ध्रुवं।

-ऋग॰ 7। 113

उनकी प्रशंसा करो जो धर्म पर दृढ़ हैं।

उनके गुण-गान न करो जिनने अनीति से सफलता प्राप्त की।


अकेला चल! अकेला चल!!

यदि तोर डाक शुने केउ ना आसे तबे एकला चलो रे।

एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे।

यदि केउ कथा ना कय, ओरे ओरे ओ अभागा,

यदि सबाई थाके मुख फिराये, सबाई करे भय तबे परान खुले,

ओ तुइ मुख फुटे तोर मनेर कथा एकला बलो रे ॥

यदि सबाई फिरे जाय, ओरे ओरे ओ अभागा,

यदि गहन पथे जाबार काले केउ फिरे ना चाय तबे पथेर काँटा,

ओ तुइ रक्तमाखा चरण तले एकला हलो रे ॥

यदि आलो न घरे, ओरे ओरे ओ अभागा,

यदि झड-बादले आँधार राते दुआर देय घरे तबे बज्रानले,

आपन बुकेर पाँजर ज्वालिये निये एकला ज्वलो रे॥

यदि कोई तुझ से कुछ न कहे। ओ भाग्यहीन! सब तुझ से मुँह फेर लें और सब तुझ से डरें—तो भी तू अपने खुले हृदय से-अपना मुख खोलकर अपनी बात अकेला कह।

अगर सब तुझ से विमुख हो जाएं। यदि गहन पथ प्रस्थान के समय कोई तेरी ओर फिरकर न देखे। तब पथ के काँटों को अपने लहू-लुहान पैरों से दलता हुआ अकेला चल।

यदि प्रकाश न हो, झंझावात और मूसलाधार वर्षा की अंधेरी रात में-जब अपने घर के दरवाजे भी लोगों ने बन्द कर दिये हों, तब उस वज्रानल में-अपने वक्ष के पिंजड़ को जला उसके प्रकाश में अकेला ही जलता रह।

—विश्वकवि श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर


कर्म, भक्ति और ज्ञान के समन्वय से आत्म-दर्शन

(श्री अरविन्द)

संसार के समस्त पदार्थों में जो ‘सत्य’ पाया जाता है, वह समस्त हमारे भीतर आ जाय, और यहाँ तक कि हमारा शरीर भी उसी से भर उठे, यह हमारा उद्देश्य है। हमारा “अन्तः ज्ञान” पहले दिमाग में ही उत्पन्न होता है। पर यदि वह इसी स्थान पर बना रहे तो जब तक हम ऊपर रहेंगे तभी तक वह काम देगा और ज्यों ही हम नीचे के स्तरों में आये कि उसका सम्बन्ध विच्छिन्न हो जायगा। इसीलिए हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने समाधि पर इतना जोर दिया था। इस उपाय से वे उस ज्ञान शक्ति को मनोमय क्षेत्र में ले आते थे। वहीं पर सूक्ष्म इन्द्रियों की सृष्टि होती है। ये सूक्ष्म इन्द्रियाँ बाहर की इन्द्रियों की सहायता के बिना भी दर्शन, स्पर्शन करने में समर्थ होती हैं।

जब तक शरीर का रूपांतर न होगा (इसका अर्थ यह नहीं है कि शरीर और मुख आदि की आकृति बदल जायगी) तब तक हमें अपनी विजय पूर्ण और सारयुक्त न समझनी चाहिये। पर ऐसा होने पर शरीर की कार्य-शक्ति में अन्तर आ जायगा। तब शरीर अमृतमय हो जायगा, रोग और बुढ़ापा दूर हो जायगा। हमारी आँखें इस समय जिस प्रकार देखती हैं उस समय उस तरह से न देखकर सृष्टि के असंख्यों रूपों, गुणों, आत्मिक शक्तियों के खेलों को देखने में समर्थ होंगी। हमारे कान सृष्टि के मूल शब्द को सुन सकेंगे। इसी प्रकार सब इन्द्रियाँ सृष्टि के गूढ़ और वास्तविक तत्व को ग्रहण करने लगेंगी। यह अन्तरंग ज्ञान की शक्ति मानव इन्द्रियों को प्राप्त हो सकती है इसमें कुछ भी संदेह नहीं है।

वैदिक-युग के ऋषि देवताओं की सृष्टि करते थे, उपनिषद्-युग के ज्ञानी व्यक्ति भी इस तथ्य को जानते थे। वे समस्त चैतन्य और ज्ञान-शक्ति को साररूप करके उद्दीप्त करते थे। उस समय वैज्ञानिक यंत्र न थे और ज्ञानीजन अन्तःज्ञान के द्वारा ही सृष्टि के रहस्य से अवगत होते थे। जवाला के पुत्र सत्यकाम ने गायें चराते-चराते ही अनन्त प्रकृति के स्वरूप को समझ लिया था, जिससे उसका अन्तरंग मधुमय हो उठा था। उनको पशु, पक्षी, वृक्ष, लता सभी से ज्ञान दान प्राप्त हुआ था। यही सनातन ज्ञान-पथ है और यही ज्ञान की मुक्त प्रणाली है। पर आजकल की वैज्ञानिक धारणा क्या है? इसके अनुसार अनुभव के साथ पदार्थ का मिलान करना ही ज्ञान प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। हम जो कुछ देखते-सुनते हैं अथवा अन्य लोग जो देखते-सुनते हैं, पढ़ते हैं, समझते हैं उतना ही ज्ञान हम मनुष्य के बारे में सत्य मानते हैं, उसके सिवा और कुछ हम नहीं जानते न मानते हैं। पर अब विज्ञान के क्षेत्र में भी कुछ नवीन विचारक आगे बढ़ रहे हैं और वे कहने लगे हैं कि “अन्यःज्ञान” (इंट्यूशन) एक बहुत बड़ी शक्ति है।

“शक्ति ही सब कुछ करती है और हम उसके यन्त्र अथवा मशीन हैं—योग का केवल इतना ही आशय नहीं है। साधक को यह अनुभव करना होगा कि शक्ति तो हमारी ही है। पुरुष (परमात्मा) की इच्छा से साधक ही कार्य किया करता है। शक्ति के साथ साधन का अगाँगी परिचय होने पर ही ज्ञान का विकास होता है। साधक सर्वप्रथम शक्ति के सम्मुख ही आत्म-समर्पण करता है, शक्ति की क्रीड़ा को ही वह देखता है, जगत को शक्ति का कौतुक ही अनुभव करता है। शक्ति के साथ में अपने को शक्ति के साथ मिलाकर, घुलाकर ही साधक यह देख सकता है कि अनन्त, विराट शक्ति के पीछे पुरुष विद्यमान है। पुरुष का दर्शन न होने से योग का पूर्ण विकास नहीं हो सकता। पुरुष का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होने पर हमको यह अनुभव होता है कि उसकी इच्छा ही हमसे कार्य कराती है। तब फिर “यन्त्र अथवा मशीन” होने की भावना उत्पन्न नहीं होती और साधक स्वयं को ही शक्ति स्वरूप समझने लगता है।

जब तक इस ‘पुरुष’ को नहीं जाना जाता—प्राप्त किया जाता तब तक अपने को यंत्र न समझने की साधना अपूर्ण ही रहती है। शक्ति ही सब कुछ कराती है, शक्ति ही विचार उत्पन्न करती है, शक्ति के स्पर्श से ही मशीन हिलती डुलती है, ऐसा भाव बहुत श्रेष्ठ होने पर भी, पूर्ण योगी के लिये अपर्याप्त है, उसे इससे और आगे बढ़ना है। हमारे यहाँ भाव अथवा शक्ति की कमी नहीं है। देश में सर्वत्र भक्ति में पागल हुये व्यक्ति मिल सकते हैं, पर भक्ति के साथ ज्ञान का होना भी परमावश्यक है। यह सत्य है कि भक्ति होने से भगवान का कार्य करने में शक्ति का अभाव न रहेगा, पर इसके द्वारा ज्ञान का विकास नहीं हो सकता। ज्ञान प्राप्त न होने से वृहत् सृष्टि में प्रवेश असंभव है, ज्ञान द्वारा ही भगवान के अनंत स्वरूप को ग्रहण किया जा सकता है। अनन्त विचित्रताओं-भेदों में ऐक्यता स्थापन किये बिना हमको क्षुद्र सृष्टि में रहना पड़ेगा और ऐसी क्षुद्रता भगवान की इच्छा के विरुद्ध है। इसलिये तुम सबको वृहत् होना चाहिये, ज्ञान के वास्तविक रूप को ग्रहण करना चाहिये। ज्ञान का ही अनुगामी समता का भाव है—समता ही वृहत सृष्टि का बीज मन्त्र है।

योगी को पूर्ण ज्ञान की आवश्यकता इस कारण से भी है कि उसके बिना पतन की बहुत आशंका रहती है। हमारे देश के आधुनिक साधकों में कर्म और भक्ति की कमी नहीं है, इसलिये उनको इन दोनों के साथ ज्ञान की भी साधना करनी चाहिये। हमारे देश में इस समय वैश्यत्व और क्षत्रियत्व का भाव परिस्फुटित हो उठा है, पर अभी ब्राह्मणत्व का परिस्फुरण नहीं हुआ है। अब जो इस त्रुटि को दूर करके ज्ञान की प्रतिष्ठा द्वारा ब्राह्मणत्व का विकास करेगा वही देश का मार्ग प्रदर्शक बन सकेगा।

इस सब का अभ्यास काम करने से क्रमशः होगा। भगवान के समक्ष आत्म समर्पण करके एक दूसरे का ध्यान रखकर, संघबद्ध होकर काम करते जाओ। मन में स्पष्टतः समझ लो कि कर्म ही जीवन का उद्देश्य नहीं है, ज्ञान का प्रकाश सृष्टि का सर्वोच्च अंग है। जब शक्ति और भक्ति के सम्मिश्रण से ज्ञान रूप धारण करेगा, तभी समस्त सृष्टि सार्थक हो जायगी। हमको हजारों बार उत्थान और पतन के भीतर होकर चलना पड़ेगा। पर आधे मार्ग में अवसाद (आलस्य) आकर जीवन का प्रसाद नष्ट न हो जाय, इस तरफ तीक्ष्ण दृष्टि रखना आवश्यक है। इसी दर्शन का अनुसरण करने से ज्ञान का अवतरण होना निश्चित है, इसमें निराशा अथवा संशय की कोई बात नहीं है।


ईश्वरीय सत्ता का अनुभव और हमारा अन्तर्ज्ञान

(श्री फिरोज काबसजी दावर एम. ए.)

इंग्लैण्ड के एक प्रसिद्ध विद्वान ने एक अवसर पर कहा था कि “मनुष्य धार्मिक प्राणी है।” यही कारण है कि मनुष्य का ध्यान सदैव सृष्टि की पहेली की तरफ आकर्षित होता रहता है और इसे सुलझाये बिना उसे चैन नहीं पड़ता। पेट की भूख की अपेक्षा भी ज्ञान की वुभुक्षा अधिक प्रबल होती है। एक दूसरे विद्वान ने एक बार धार्मिक-जीवन पर विचार करते हुये कहा था कि “ज्ञान-शक्ति सम्पन्न मनुष्य की अपेक्षा एक कुत्ते का जीवन अधिक सुखमय है क्योंकि उसके भीतर जिज्ञासा रूपी मीठी खुजली और ज्ञान की भूख नहीं होती। मनुष्य की बुद्धि ईश्वर का आशीर्वाद भी है और अभिशाप भी है, क्योंकि वह उसे सदैव ईश्वर सम्बन्धी शंका समाधान के भँवर जाल में घुमाये रहती है और तब तक चैन नहीं लेने देती जब तक कि वह सर्वज्ञ न हो जाय।”

“ईश्वर को बुद्धि से जान लेना सर्वथा असम्भव है। स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे कि हमारी इस प्रकार की चेष्टा सीढ़ियों से चढ़कर स्वर्ग में पहुँचने की चेष्टा के सदृश्य व्यर्थ है।” ईश्वर और हमारे बीच जो अंधकार का पर्दा पड़ा हुआ है उसे भेद सकने में मनुष्य की वैज्ञानिक और तार्किक बुद्धि सर्वथा असमर्थ है। वास्तव में परमात्मा की वैज्ञानिक ढंग से छानबीन करने और उसकी अपार शक्ति को तर्क द्वारा सीमाबद्ध करने और नापने की कोशिश करने में हम उस परात्पर पुरुष को बहुत छोटा बना देते हैं। जर्मनी के प्रोफेसर जैकोवी ने कहा है—”वह परमात्मा ही नहीं रह जाता जो हमारी समझ में आ सकता हो।” जो वस्तु भली-भाँति बुद्धि में आ जाती है उसके प्रति भय और आदर का भाव किसके हृदय में उत्पन्न होगा? उस व्यक्ति के सामने, जिसे हम समझ सकते हैं अपने अधीन कर सकते हैं, और जिसका विश्लेषण कर सकते हैं, हम क्यों सर झुकायेंगे? ऐसी दशा में ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और सर्वज्ञता कहाँ रहेगी? इसी भावना को ध्यान में रखते हुये योरोप के प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो ने कहा था-”ईश्वर को मैं जितना कम समझता हूँ उतना ही अधिक भक्ति के साथ मैं उसकी प्रार्थना करता हूँ।” यही कारण है कि सरल चित्त के अनपढ़ और साधारण पढ़े लिखे व्यक्ति उच्च कोटि के भक्त और संत हो चुके हैं और ईश्वरीय शक्ति का अच्छा परिचय दे सके हैं जब कि बड़े-बड़े दार्शनिक और तार्किक उस क्षेत्र में जरा भी प्रवेश नहीं कर सके हैं।

ईश्वर के अस्तित्व को पुष्ट करने वाले प्रमाण तीन श्रेणियों में विभक्त किये जाते हैं—

(1)उस शास्त्र से सम्बन्ध रखने वाले जिसमें वस्तुओं के तत्व और स्वभाव पर विचार होता है।

(2) सृष्टि-विकास के सिद्धान्त से सम्बन्ध रखने वाले।

(3) उस शास्त्र से सम्बन्ध रखने वाले जिसमें संसार के आदि कारणों पर विचार किया गया है।

पहली श्रेणी के प्रमाण का आशय यह है कि हमारे हृदय में ईश्वर की जो भावना सदैव से चली आती है वह उसकी प्रेरणा से ही है और यह उसकी सत्ता का एक प्रमाण है। दूसरे प्रमाण वाले यह कहते हैं कि बिना कारण के किसी कार्य की उत्पत्ति नहीं होती। उसका कोई कारण होना आवश्यक है। इसके अनुसार इस विश्व का जो कारण है वही ईश्वर है। तीसरे प्रमाण के अनुसार सृष्टि में जो अद्भुत व्यवस्था और नियमितता दिखलाई पड़ती है उससे प्रतीत होता है कि इसको रचने वाली कोई महान शक्ति अवश्य है। यह कहना कि परमाणुओं के आकस्मिक संयोग से सृष्टि के ये मस्त अद्भुत पदार्थ बन गये बुद्धि-संगत बात नहीं है।

यद्यपि ये तीनों प्रकार के प्रमाण अकाट्य नहीं कहे जा सकते और आलोचना करने वालों ने इनमें अनेक प्रकार की त्रुटियाँ बतलाई हैं। तो भी उनमें कुछ तथ्य अवश्य हैं और इसलिये उनकी अवहेलना न करने, उन पर गम्भीरता से विचार करना हमारा कर्तव्य है। ईश्वर की सिद्धि गणित के किसी सिद्धान्त की तरह नहीं हो सकती, पर साथ ही हम यह भी कह सकते हैं कि ईश्वर का खण्डन कर सकना भी उतना ही निष्फल है। सत्य बात तो यह है कि ईश्वर का अस्तित्व तर्क या प्रमाणों द्वारा करना अच्छा तरीका नहीं है। क्योंकि ज्ञान का भंडार महान्, विस्तृत एवं शक्तिमय है, किन्तु मनुष्य को उतनी ही परिमित राशि का ज्ञान है, जिसको उसने स्वयं अर्जन किया है। ऐसे परिमित ज्ञान के अन्दर उस अपरिमित शक्ति का समावेश किसी प्रकार से नहीं हो सकता। इसलिए यदि हम ईश्वर के अस्तित्व के विषय में वास्तव में कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो हमको आभ्यान्तरज्ञान (इंट्यूशन) का आश्रय ग्रहण करना चाहिये। बुद्धिजन्य ज्ञान की प्रक्रिया बाह्य होती है और उसके लिए हमको बाहर के ज्ञान का अर्जन करना होता है, जिसमें पर्याप्त समय लगाना पड़ता है और देर से सिद्धि मिलती है। इसके विपरीत आभ्यन्तरिक ज्ञान की प्रक्रिया आन्तरिक (आत्माकार) होती है और इसके द्वारा सत्य का प्रकाश तत्काल ही हमारी बुद्धि पर पड़ता है। यह आभ्यन्तरिक ज्ञान ही असंदिग्ध, उत्पादनशील और विकासशील होता है। आन्तरिक ज्ञान की एक विशेषता यह है कि वह स्वतः-प्रकाश नहीं होता है किन्तु उसे उस आलौकिक वस्तु से प्रकाश प्राप्त होता है जिसको वह अपना विषय बनाता है। आन्तरिक ज्ञान स्वतः प्रकाश रूप नहीं किन्तु प्रकाश को ग्रहण करने वाला होता है, क्रियाशील शक्ति नहीं किन्तु क्रिया का आधारभूत एक विचित्र कारण है।

इसी आन्तरिक ज्ञान की सहायता से हम सृष्टि के अन्दर ईश्वर की सत्ता का अनुभव करते हैं। जिन लोगों को यह ज्ञान प्राप्त नहीं है वे सहज ही में ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार कर देते हैं। अब दर्शन और विज्ञान ने भी अन्तर्ज्ञान की महत्ता को मान लिया है और बड़े-बड़े योरोपियन तथा अमरीकन विद्वानों का कहना है कि इसके बिना सत्य की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। इस आन्तरिक ज्ञान की सहायता से भी हम ईश्वर को पूर्ण रूप से नहीं समझ सकते, उसका अनुभव मात्र कर सकते हैं, और अधिक से अधिक उसकी सर्वशक्तिमत्ता की एक झलक पा सकते हैं। महासागर में अपार जलराशि है किन्तु हम उसमें से उतना ही जल ले सकते हैं जितना हमारे बर्तन में समा सकता है। इसी प्रकार हम लोग अपने-अपने आध्यात्मिक विकास के अनुसार ही ईश्वर का अनुभव कर सकते हैं।

आन्तरिक ज्ञान की इस सीमा पर पहुँच कर साधक को योग की सहायता लेनी पड़ती है। योगी का जीवन, उसकी दृष्टि एवं बातचीत ईश्वरमय पुरुष के सदृश्य होती हैं। योगी को विश्वास होता है कि वह उन तथ्यों को भी आध्यात्मिक रीति से जान सकता है जो बुद्धि की पहुँच के बाहर हैं। यद्यपि वह सत्य का अनुभव कर लेता है, तथापि वह भी साधारण मनुष्यों के सामने सिद्ध नहीं कर सकता। उसके अनुभव तक वहीं पहुँच सकता है जो आध्यात्मिक विकास में उसी दर्जे तक पहुँच गया हो। वह परमात्मा को जानता नहीं किन्तु उसका अनुभव करता है, यही नहीं परमात्मा के साथ उस की एकता हो जाती है। फिर वह ईश्वर के अतिरिक्त न तो कुछ जान सकता है, न देख सकता है, न अनुभव कर सकता है। वह समस्त सृष्टि में उस एक को देखता है और उसी में विलीन हो जाता है। तर्कवादी मनुष्य भले ही इस प्रकार के महात्मा को पागल समझें, पर ईश्वर के अस्तित्व को अनुभव करने का यही मार्ग है। हमारे देश के लोग सदा से इस तथ्य को स्वीकार करते आये हैं। इसीलिए प्रो. मैक्समूलर ने कहा था कि “संसार में सर्वत्र धर्म और दर्शनशास्त्र में विरोध दिखलाई पड़ता है। भारत वर्ष ही एक ऐसा देश है जहाँ दोनों में सामञ्जस्य है।”


स्वार्थपरता आध्यात्मिक पतन का मूल कारण है।

(श्री मेहरबाबा)

स्वार्थपरता मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति में एक बहुत बड़ी बाधा स्वरूप है। जब किन्हीं कारणों वश हमारी इच्छाओं की तृप्ति नहीं होती तभी स्वार्थपरता अस्तित्व में आती है। साथ ही जो मनुष्य मानव-स्वभाव के वास्तविक स्वरूप से अनजान होता है उसमें भी इस प्रवृत्ति का जन्म होता है। जन्म-जन्मान्तर के विकासक्रम में हमारे भीतर जो नाना प्रकार के संस्कार एकत्रित हो जाते हैं उनसे मानवीय चेतना आच्छादित हो जाती है। ये संस्कार ही इच्छाओं के रूप में प्रकट होते हैं और इन इच्छाओं द्वारा हमारी चेतना (ज्ञान) का क्षेत्र बहुत कुछ सीमित हो जाता है।

स्वार्थपरता का घेरा इच्छाओं के घेरे के बराबर ही होता है। तरह-तरह की इच्छाओं के अवरोध (रुकावट) के कारण अपने यथार्थ स्वरूप की अभिव्यक्ति आत्मा के लिये असंभव हो जाती है। इससे हमारा जीवन अपने तक ही केन्द्रित और सीमित हो जाता है। इसके लिये हम इच्छानुकूल वस्तुओं की खोज करते रहते हैं, जो सब की सब परिवर्तनशील और क्षणभंगुर होती हैं। किन्तु ऐसी नाशवान वस्तुओं के द्वारा वास्तविक तृप्ति होनी असंभव है। जीवन की चंचल वस्तुओं से प्राप्त संतोष स्थायी नहीं होता और मनुष्य की चाहें या इच्छाएं अतृप्त बनी रहती हैं। इस प्रकार असंतोष का एक सामान्य भाव सदैव मौजूद रहता है, जिसके साथ सभी प्रकार की चिन्ताओं का आगमन होता है।

मनुष्य का निष्फल अहंकार जितने मुख्य रूपों में व्यक्त होता है वे हैं काम, लोभ, और क्रोध। कई दृष्टियों से ‘काम’ बहुत कुछ ‘लोभ’ के ही समान है, केवल इसके तृप्त होने की विधि भिन्न है, जिसका सीधा सम्बन्ध स्थूल क्षेत्र से रहता है। काम स्थूल शरीर के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति करता है। लोभ हृदय की विश्राम हीनता की एक अवस्था है, और वह अधिकार तथा सत्ता की लिप्सा से उत्पन्न होता है। इच्छाओं की पूर्ति के लिए अधिकार और शक्ति की खोज की जाती है। इस प्रयत्न में मनुष्य आँशिक रूप से ही सफल होता है, और उसका यह आँशिक संतोष, इच्छा की अग्नि को शाँत करने के बदले और भी भड़काता है। इस कारण लोभ के लिये अपने सम्मुख स्थित विशाल क्षेत्र पर विजय पाना असंभव होता है, और वह मनुष्य को अत्यन्त असंतुष्ट बना देता है। इससे क्रोध की उत्पत्ति होती है। क्रोध उत्तेजित मन का उफान है, इच्छाओं के खंडित होने से वह उत्पन्न होता है। उसका लक्ष्य होता है इच्छाओं के तृप्त होने के मार्ग की बाधाओं को दूर करना।

इस प्रकार काम, लोभ और क्रोध की प्रवृत्तियों द्वारा ही मनुष्य निराशा का अनुभव करता है और उसका निष्फल अहम् काम, लोभ और क्रोध के द्वारा ही अधिक तृप्ति के साधनों की खोज करता है। इस प्रकार हमारी आत्मा की चेतना असीम निराशा के दुष्ट चक्कर में फँस जाती है। काम, लोभ या क्रोध की पूर्ति न होने से ही निराशा उत्पन्न होती है। इन तीनों पतनकारी प्रवृत्तियों का विस्तार स्वार्थपरता के साथ ही होता है। इन तीनों अन्योन्याश्रित दुर्गुणों का मुख्य आधार स्वार्थपरता ही है, अतः स्वार्थपरता ही वास्तव में हमारी समस्त निराशा और चिंताओं का आदि कारण है। पर इस प्रयत्न में वह अपने आपको ही पराजित करती है। वह इच्छाओं के विस्तार द्वारा अपनी तृप्ति करना चाहती है, पर परिणाम में उसे एक असीम असंतोष ही मिलता है।

स्वार्थपरता का अनिवार्य परिणाम असंतोष और निराशा है, क्योंकि इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है। इसलिये सुख की समस्या का एकमात्र उपाय इच्छा त्याग है। पर बाहरी दमन के कारण इच्छाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त नहीं की जा सकती, वे केवल ज्ञान के द्वारा ही जड़ से मिटाई जा सकती हैं। यदि तुम विचारों की गहराई में डूबो और थोड़ी देर के लिए गम्भीरता पूर्वक विचार करो, तो तुम्हें इच्छाओं का खोखलापन मालूम हो जायगा। सोचो कि इतने वर्षों में तुम्हें कितना सुख मिला तथा कितना दुःख मिला। जीवन में तुमने जो भोग किया, वह आज शून्य के बराबर है और जीवन में तुम्हें जो कष्ट मिला वह भी कुछ नहीं के समान है। वास्तव में वह दोनों ही भ्रम थे। सुखी होने का तुम्हें अधिकार अवश्य है, लेकिन तो भी तुम स्वयं वस्तुओं की चाह करके अपने लिये दुःख पैदा करते हो। चाह या इच्छा सदैव अशाँति का कारण होती है। जिस वस्तु की तुमने चाह की यदि वह तुम्हें न मिली तो तुम निराश होते हो। यदि वह तुम्हें मिली तो तुम उसे और भी अधिक परिमाण में चाहते हो और इस कारण दुखी होते हो। इसलिये तुम यह कहो कि “मुझे कुछ भी न चाहिये” इससे तुम सुखी हो जाओगे। इच्छाओं या चाहों की असारता की अनुभूति तुम्हें अन्त में ज्ञान प्रदान करेगी। यह आत्मज्ञान इच्छाओं से तुम्हें मुक्त करेगा और इस प्रकार स्थायी सुख का पथ तुम्हें मिल जायगा।

यहाँ पर चाह और आवश्यकता का भेद भली भाँति समझ लेना चाहिये। अभिमान और क्रोध, वासना और लोभ, ये सब चाह के विभिन्न रूप हैं। तुम शायद यह कहो कि “मुझे जिन वस्तुओं की चाह है, उन सब की मुझे आवश्यकता है”—किन्तु यह एक भूल है। यदि रेगिस्तान में तुम प्यासे हो तो तुमको स्वच्छ जल की आवश्यकता है, न कि शर्बत की। जब तक मनुष्य का शरीर है तब तक आवश्यकताएँ रहेंगी और ऐसी आवश्यकताएँ पूरी करना जरूरी है। किन्तु ‘चाह’ मूढ़ कल्पना का परिणाम है। यदि सुख पाना है, तो सावधानी पूर्वक हमें उनको निर्मूल करना चाहिये।

स्वार्थपरता के नाश की दूसरी विधि है हमारे भीतर प्रेम का उदय होना। सच्चे अस्तित्व का अर्थ है “प्रेम करके मरना”। यदि तुम एक दूसरे को प्रेम नहीं कर सकते हो, तो तुम उन्हें कैसे प्रेम कर सकते हो जो तुम्हें यंत्रणा देते हैं? स्वार्थपरता की सीमाएँ अज्ञान द्वारा निर्मित होती हैं। किन्तु जब मनुष्य यह जान लेता है कि उसकी रुचि और कार्य क्षेत्र के विस्तृत, उदार होने से उसे अधिक गौरवपूर्ण संतोष की प्राप्ति होगी, तब वह सेवामय जीवन की ओर अग्रसर होता है। इस स्थिति में वह सदिच्छाओं को अपने मन में स्थान देता है। पर दुःख निवारण तथा परोपकार द्वारा दूसरों को सुखी करना चाहता है। यद्यपि ऐसी अच्छी इच्छाओं में भी स्वार्थ का अप्रत्यक्ष संबंध रहता है, तथापि उसके सत्कार्यों पर संकुचित स्वार्थपरता का अधिकार नहीं रहता।

व्यक्तिगत अहम् की रचना में जो इच्छाएँ प्रविष्ट होती हैं, वे या तो अच्छी होती हैं या बुरी? बुरी इच्छाएँ सामान्यतया स्वार्थपरता के नाम से पुकारी जाती हैं और अच्छी इच्छाएँ निस्वार्थता के नाम से। किन्तु स्वार्थपरता और निस्वार्थता के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती है। ये दोनों द्वैत के क्षेत्र में ही कार्य करती हैं। स्वार्थपरता का जन्म तब होता है जब सारी इच्छाएँ अपने संकुचित व्यक्तित्व के चारों ओर केंद्रीभूत कर दी जाती हैं। जब निस्वार्थता का उदय होता है तब इच्छाओं का सामान्य रूप में विस्तार होने लगता है। इच्छाओं के विस्तार का यह परिणाम होता है कि वे एक विशाल क्षेत्र को घेरती हैं। एक सीमित क्षेत्र तक रुचियों का संकुचित होना स्वार्थपरता है और एक विशाल क्षेत्र में रुचियों का विस्तार निःस्वार्थता है।

द्वैत की दुनिया से ऊपर उठकर एकात्मभाव की दुनिया में प्रविष्ट होने के लिये स्वार्थ का निस्वार्थता में परिणित होना नितान्त आवश्यक है। दृढ़ आग्रह के साथ तथा निरंतर सत्कार्यों के करते रहने से स्वार्थ क्षीण हो जाता है। स्वार्थ जब संकुचित क्षेत्र से विस्तृत क्षेत्र में बढ़ता है और सत्कार्यों के रूप में प्रकट होने लगता है, तब अपने ही नाश का साधन बन जाता है। तब व्यक्तिगत स्वार्थ अपने को जागतिक या सार्वजनिक हित में लीन कर देता है। यद्यपि यह निस्वार्थ और परहितपरायण जीवन भी द्वन्द्वों से आबद्ध होता है, परन्तु यह स्थिति द्वंद्वों से पूर्णतः मुक्त होने के पहले की एक आवश्यक सीढ़ी है। सत्कार्य वह साधन है, जिसके द्वारा आत्मा अपने अज्ञान का उन्मूलन कर सकता है।

अच्छाई को पार करके आत्मा परमात्मा में पहुँचता है। निस्वार्थता सर्वोपरि परमार्थ में लय हो जाती है। मुक्ति की अवस्था में स्वार्थपरता तथा निःस्वार्थता का अस्तित्व सामान्य अर्थ में नहीं रह जाता और सभी के प्रति आत्मीयता की भावना में इनका रूपांतर हो जाता है। विश्व के समस्त जीवन में एकता का ज्ञान हो जाने से परम शान्ति एवं अथाह आनन्द की उपलब्धि होती है। यह ज्ञान आध्यात्मिक गतिशून्यता नहीं है और इसके द्वारा सापेक्षिक मूल्यों का भी नाश नहीं होता। सभी के प्रति आत्मीयता की अनुभूति से ऐसी स्थायी समता की प्राप्ति होती है, जिसमें विवेक ज्यों का त्यों बना रहता है, तथा ऐसी शाँति प्राप्त होती है जो संसार के प्रति उदासीनता अथवा उपेक्षा का बर्ताव नहीं करती। ‘सर्व भूतेषु आत्मवत्, का यह भाव केवल वैयक्तिक दृष्टिकोण के समन्वय का ही परिणाम नहीं होता वरन् यह अंतिम सत्य से, जिसके अंतर्गत सब कुछ है, एकता की वास्तविक प्राप्ति का परिणाम होता है।

सभी इच्छाओं को निर्मूल करके अपना हृदय खोलो और उसमें केवल एक ही लालसा को स्थान दो—अर्थात् अंतिम सत्य से एकत्व प्राप्त करने की लालसा। उस अंतिम सत्य की खोज बाहरी परिवर्तनशील वस्तुओं में नहीं की जानी चाहिये। उसकी खोज अपने ही भीतर करनी चाहिये। प्रत्येक बार जब तुम्हारा आत्मा तुम्हारे मानवीय हृदय में प्रवेश करना चाहता है, तब वह बाहर तो ताला लगा हुआ पाता है, तथा भीतर इच्छाओं की बड़ी भीड़ लगी रहती है। स्थायी आनन्द का उद्गम स्थान सर्वत्र मौजूद है, किन्तु तो भी समस्त प्राणी अज्ञान जनित इच्छाओं के कारण दुःखी हैं। स्थायी सुख का लक्ष्य पूर्णतः तभी चमकता है जब सीमित अहंकार अपनी समस्त इच्छाओं के सहित अपने अंतिम नाश को प्राप्त होता है।

अन्त में एक बात स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि इच्छाओं को त्यागने का अर्थ संसार को त्याग देना या जीवन के प्रति पूर्णतया निषेधात्मक रुख धारण करना नहीं है। जीवन का ऐसा किसी भी प्रकार का निषेध मनुष्य को मनुष्यत्व शून्य बनाना है। ईश्वरत्व मनुष्यत्व से रहित नहीं है। आध्यात्मिकता का परमावश्यक कर्त्तव्य मनुष्य को अधिक मनुष्यत्व युक्त बनाना है। मनुष्य में जो सौंदर्य है, महानता है, तथा सात्विकता है, उन्हें मुक्त तथा व्यक्त करने के कार्य का नाम आध्यात्मिकता है। बन्धनों के भय से जीवन से दूर भागने से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। ऐसा करना जीवन का निराकरण है। प्रकृति की द्वन्द्वात्मक अभिव्यक्ति से भयभीत होकर पीछे हटने से पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती। बंधन से बचने के प्रयत्न का अर्थ है जीवन से भयभीत होना, किन्तु आध्यात्मिकता का अर्थ है परस्पर विरोधों से अभिभूत हुये बिना जीवन का ठीक और पूर्ण ढंग से सामना करना। ऐसी आध्यात्मिकता का पालन करने वाला जीवन के विभिन्न रूपों से अपना संपर्क बनाये रखकर भी आसक्ति से संपूर्णतः रहित होकर आचरण करता है, और इस प्रकार स्वार्थपरता के दोष में किंचित भी ग्रस्त नहीं हो पाता।


हमारी आन्तरिक शक्ति और सुन्दरता।

(“साधु वेश में एक पथिक”)

जिस प्रकार एक-एक ईंट के द्वारा अथवा एक पत्थर के ऊपर दूसरा पत्थर विधिवत रखते जाने से शरीर के रहने योग्य भवन बन जाता है, विधि की भूल होने से योग्यता की कमी से, तथा प्रमाद से, भवन असुन्दर, दुखदायी भी हो जाता है, उसी प्रकार एक-एक कर्म के ऊपर कर्म करते जाने से भाग्य-भवन बनता है। यह भवन भी विधि की भूल से, योग्यता के दुरुपयोग से, असुन्दर दुखद प्रतीत होता है परन्तु भवन बन जाने पर तब तक उसी में रहना होता है जब तक दूसरा अनुकूल सुन्दर भवन अपनी शक्ति से, विधिवत प्रयत्न से तैयार न कर लिया जाय।

इस लोक तथा परलोक की स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों का जितना ही ज्ञान हमें होगा उतना ही हम लोग उन शक्तियों का अपने जीवन-निर्माण में उपयोग कर सकते हैं।

केवल शक्ति प्राप्त होना ही शुभ सुन्दर सुख सौभाग्य की बात नहीं है, सौभाग्य की बात शक्ति के सदुपयोग का ज्ञान प्राप्त होना है।

शक्ति तो पशु-पक्षियों को मनुष्यों से अनेकों गुना अधिक प्राप्त हैं; परन्तु ज्ञान की कमी से मनुष्य के अतिरिक्त प्राणी उस प्राप्त शक्ति का स्वतन्त्रता पूर्वक सदुपयोग करके अपने जीवन को सुन्दर तथा बन्धन मुक्त नहीं बना पाते हैं।

विवेक के द्वारा हम लोग प्रकृति के नियमों का पालन कर प्रकृति को स्ववश कर सकते हैं और प्राकृतिक शक्ति से महान लाभ को प्राप्त हो सकते हैं।

प्राप्त शक्ति को आलस्य प्रमादवश व्यर्थ खोने से मनुष्य की देह प्रायः रोगी होती है, प्राप्त सम्बन्ध का दुरुपयोग करने से आगे मिलने वाले सम्बन्ध क्लेशदायक होते हैं। हम दूसरों को कष्ट देकर स्वयं अपने लिये उन्हीं कष्टों का मार्ग बनाते हैं। दूसरों को सेवा द्वारा सुख देकर हम अपने लिये सेवक तथा सुखद परिस्थिति तैयार करते हैं। हम दूसरों के बीच में सुख या दुख जो कुछ भी बोते हैं वही कई गुना काटते हैं।

मनुष्य के सामने चाहे जैसी परिस्थिति हो अपने में विवेक बढ़ाकर उसके सदुपयोग से अपने जीवन को कष्टों से; बन्धनों से मुक्त बना सकता है।

मनुष्य के शुद्ध और अशुद्ध संकल्प, अथवा भाव एवं विचार ही उपकारी और अपकारी, लाभ का सुख का सुयोग दिलाने वाले या हानि कष्ट के कुयोग में ढकेलने वाले, देव या दैत्यवत रूपों में काम करते रहते हैं।

प्रत्येक मनुष्य के साथ ऐसी शक्ति है, एक ऐसा प्रकाशित तेज है जिसको लेकर ही वह अपने आस-पास, अपने संकल्पों भावों के अनुसार सृष्टि रचता रहता है। यह सृष्टि मनुष्य की कामना, कल्प, तृष्णा की तरंगों से अनुरूप सुन्दर या असुन्दर बनती है। मनुष्य के विचारों संकल्पों का सम्बन्ध या तो दैवी शक्ति या आसुरी शक्ति से रहता है। उसी शक्ति की प्रेरणानुसार शुभ या अशुभ कार्यों में प्रवृत्ति होती है।

हम लोग संकल्प के साँचे में शक्ति को भरकर तदनुसार एक रूप गढ़ लेते हैं वही रूप देव या दैत्य नाम से प्रसिद्ध है। अपने बनाये हुए संकल्प रूप सूक्ष्म शरीर से सम्बन्धित रहते हैं और इन्हीं के द्वारा अनायास ही किसी में बहुत ऊँचे कार्यों की पूर्ति होती रहती है और किसी में बहुत ही नीची वृत्ति पायी जाती है।

मानसिक दुष्प्रवृत्तियों, कुभावनाओं को जीतना ही वास्तविक विजय है। अपने सद्गुणों को दोषों के प्रहारों से बचाना स्वाभिमान है इससे भी उत्तम असत संगाभिमान से अपने को असत रूप न होने देना स्वाभिमान है।

मन को शान्त रखने की कुशलता सबसे बड़ी विद्या है।

अपना सुन्दर निर्माण करने के लिये अर्थात् अपने को सुन्दर बनाने,असुन्दरता को मिटाने के लिये व्यर्थ चेष्टा, व्यर्थ प्रलाप, व्यर्थ चिन्ता तथा शोक में ह्रास होने वाली शक्ति को संयम के द्वारा बचाना चाहिए। जब आवश्यक कार्य न हो तब मौन रहना चाहिए , एकान्त में परमात्मा का चिन्तन करना चाहिए।

दूसरे के शब्दों में निन्दा, स्तुति, मान, अपमान मानना मन की कल्पना ही तो है? इसमें अपने मन को रागी द्वेषी न बनाना चाहिए।

हमें दोषों का त्याग करके इन्द्रिय को, मन को संयम में रखकर शक्ति के द्वारा सेवा करते हुए परमात्मा के चिन्तन द्वारा अपना निर्माण करना है। हम सबके पारस्परिक व्यवहार में जितनी अधिक उदारता अर्थात् देते रहने की आदत बढ़ेगी, जितनी अधिक सहनशीलता आयेगी, दया और क्षमा करते रहने का स्वभाव बन जायगा, निरन्तर प्रेममय तथा परमात्मामय मनोवृत्ति हो जायगी, उतनी ही शीघ्रता से हम अपने जीवन को सुन्दर, शान्तिमय, आनन्दमय बना सकेंगे।

अपने को सुन्दर दिखाने के लिये हम लोग शरीर को स्वच्छ रखने का प्रयास करते हैं। वस्त्र-आभूषण द्वारा शृंगार करते हैं, इसके साथ ही यदि अपने मन को सुन्दर दोष रहित नहीं बना पाते तो इस मन की मलिनता के कारण महान शक्ति के स्नेह पात्र नहीं हो सकते।

वास्तव में हमें अपने तन के साथ मन को, चित्त को बुद्धि और अहं को सुन्दर पवित्र बनाना ही होगा।

संसार में जो कुछ भी पवित्र है, शीतल, स्निग्ध, निर्लिप्त है वही सुन्दर है। सुन्दर पवित्र का संग ही सौंदर्य लाने का साधन है। वास्तव में अपना सत स्वरूप ही परम सुन्दर पवित्र है परन्तु उसका ज्ञान न होने के कारण हम बाह्य शृंगार को सब कुछ मान बैठे हैं।

एक सन्त का वचन है कि हमारा जीवन इतना सुन्दर होना चाहिये कि संसार स्वयमेव जीवन को प्यार करे और हमें इतना सुन्दर होना चाहिये कि भगवान स्वयं हमें प्यार करें, संसार से कुछ न चाहना और संसार के काम आते रहना हमारे जीवन की सुन्दरता है। भगवान से कुछ न चाहना और भगवान् की प्रसन्नता का निरन्तर ध्यान रखना भी हमारी सुन्दरता है।

अपने जीवन को सुन्दर बनाने के लिये असंयम को संयम से, स्वार्थभाव को सेवा से, व्यर्थ विषय चिन्तन को सार्थक चिन्तन से, देहाभिमान को आत्मज्ञान से, द्वेष को प्रेम से, क्रोध को क्षमा से, लोभ को उदारता पूर्वक दान से, अहंकार को विनम्रता से, बन्धन को असंग वृत्ति की दृढ़ता से मिटाना होगा।

लोभ, मोह, क्रोधादि विकारों के त्याग से हमारा जीवन शुद्ध होता है और दया, क्षमा, विनम्रता, सरलता, सेवा तथा दान से सुन्दर होता है। यथार्थ ज्ञान से सुन्दरता का दर्शन होता है और निष्काम प्रेम से सुन्दरता का सेवा में सदुपयोग होता है।

अभिमानियों के बीच में ही विनम्रता की पुष्टि होती है, लोभियों के बीच में ही संतोष-लाभ का अभ्यास सफल होता है। यदि विनम्र और संतोषी बनने में कष्ट होता है तो निस्संदेह जीवन में सद्गुण का सौंदर्य नहीं उतर पाता है। अपने दोषों से परिचित होना सद्गुण के सुन्दर पथ पर चलने का परिचायक है।

कोई कितना ही गरीब है, निर्धन है पर अपनी उन्नति के लिये वह उतना ही स्वतन्त्र है, जितना एक सम्राट हो सकता है। वह अपने भीतर ऐसी मस्ती ला सकता है कि सम्राट भी उसे पराजित नहीं कर सकता। जब तक किसी व्यक्ति या वस्तु का आश्रय लिया जाता है तब तक निर्भयता और वास्तविक शान्ति की अनुभूति नहीं हो पाती है। सनातन ज्ञान अथवा प्रेम का अनादर कर व्यक्ति और वस्तु की दासता में कितना कष्ट उठाना पड़ता है—इस सत्य पर विवेकी मानव को विचार करना चाहिये। यह एक चिरस्मरणीय बात है कि हमें व्यावहारिक क्षेत्र से अपने समस्त दोषों को मिटाना है। दोषों के मिटने पर मानवता की जागृति और दिव्यता के अवतरण का आरम्भ होता है। मानवता से ही दिव्यता की प्राप्ति सम्भव है, असुन्दरता और पशुता से यह नहीं आया करती है। सबसे ऊँचा ध्येय यही होना चाहिये कि हम अपने व्यवहार में सद्गुणों का विकास करें। हमें अपने जीवन के लिये दोनों की नहीं, सद्गुणों की आवश्यकता है। सद्गुणों के विकास से ही जीवन सुन्दर होता जाता है। यदि कोई क्रोध में आगे बढ़ता है तो हमें क्षमा में आगे बढ़ना चाहिये, कोई अपने आप में दोष-ही-दोष बढ़ाता है तो हमें अपने भीतर सद्गुणों की वृद्धि करनी चाहिये। सद्गुणों की वृद्धि से जीवन निःस्वार्थ, प्रेममय और पवित्र तथा सुन्दर होता है।


पुरुषार्थ द्वारा प्रारब्ध का निर्माण

(श्री शंभूसिंह कौशिक)

प्रारब्ध एवं पुरुषार्थ में कौन प्रधान है यह प्रश्न सदा से चला आ रहा है। मनुष्य अपने बुद्धिबल से इस सम्बन्ध में कई निर्णय करता आ रहा है। कभी अनेक उदाहरणों के आधार पर प्रारब्ध की प्रधानता बताई है और कभी पुरुषार्थ की। इस दुहरे निर्णय से साधारण मानव इसके वास्तविक मर्म को समझते समय एक दुविधा एवं उलझन में पड़ जाते हैं। आज के वैज्ञानिक एवं बौद्धिक युग में अन्य गुत्थियों की तरह इसका सही निर्णय कर वास्तविकता का पता लगाना आवश्यक है।

पुरुषार्थ एवं प्रारब्ध की वास्तविकता का रहस्य जानने के लिए सर्वप्रथम हमें इसके मूल ‘कर्म’ की रूप-रेखा समझनी आवश्यक है। ‘कर्मणा गहनो गति’ के अनुसारी कर्म की गति भी गहन ही बताई गई है, फिर भी साधारण जानकारी एवं ऋषियों के अनुभवों के आधार पर इस पर विचार करना चाहिए। हमारे पूर्वज ऋषियों ने इस सम्बन्ध में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त कर ली थी, जो अब भी हमारा मार्ग प्रदर्शन कर रही है। समय के भेद से कर्म के भी तीन भेद किये गये हैं। (1) क्रियमाण कर्म, (2) संचित कर्म एवं (3) प्रारब्ध कर्म। यहाँ कर्मों के इन तीन स्वरूपों और प्रभावों पर बिना किसी उलझन में पड़े साधारण बुद्धि से निर्णय करना चाहिए।

क्रियमाण कर्म

मनुष्य को अपनी आयु के विकास के साथ “मैं” का भाव होने लगता है। अपने अल्प ज्ञान के कारण देह से होने वाली क्रियाओं में “मैं करता हूँ” यह भावना करने लगता है। क्रियमाण कर्म का अर्थ वर्तमान काल में होने वाले कर्मों से है। वर्तमान काल वह है जिसमें जीव आत्मा व्यक्त अर्थात् साकार (प्रकट) रूप से शरीर धारण करके आता है) इस शरीर से होने वाले कार्य क्रियमाण कर्म कहलाते हैं। जब यदि “मैं करता हूँ” की भावना रहती है तो ये क्रियमाण कर्म आगे आकर संचित एवं प्रारब्ध का रूप बन जाते हैं और फिर वे परिपक्व होकर संस्कार बनते हैं। एक ही प्रारब्ध एवं संचित कर्म और संस्कार आदि के प्रभाव से अनेक कर्मों का सूत्रपात होता है और यह कर्म की गहन गति जीवात्मा को बन्धन में डाले रहती हैं और भिन्न-भिन्न योनियों में भ्रमण कराती रहती है। अतः क्रियमाण कर्म वे हुए जो वर्तमान जीवन काल में किए जा रहे हैं।

क्रियमाण कर्म का स्वरूप मनुष्य की स्वयं कार्य करने की इच्छा पर निर्भर है। ईश्वर ने प्रत्येक जीव को कार्य करने की स्वतंत्रता दी है। इसमें जीव तनिक भी परतन्त्र नहीं हैं। यह अवश्य है कि पूर्व संस्कार जीवात्मा को अपने अनुकूल कार्य करने के लिए अवश्य ललचाते हैं। अशुभ संस्कार अशुभ कर्म एवं शुभ संस्कार शुभ कर्म करने के लिए ललचाते हैं। इस लालच में पड़ने या न पड़ने के लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी है। अपने दृढ़ निश्चय से इन संस्कारों के प्रभाव से बचा जा सकता है। पूर्ण भोजन कर लेने पर भी अपनी पूर्व जन्मों की पशुवृत्ति से अधिक खा लेने के संस्कारों के प्रभाव से अधिक खा लेने, जीवात्मा के कल्याण के विपरीत कार्य करना ये सब पूर्व संस्कारों के आकर्षण से होता है। इन प्रलोभनों से बचने के लिए भी मनुष्य स्वतंत्र है। वर्तमान काल में मनुष्य दान पुण्य करके आगे स्वर्ग भी प्राप्त कर सकता है, भगवद्भजन, सेवा, परमार्थ में लगकर ईश्वर प्राप्ति भी कर सकता है। यही नहीं भौतिक जगत में पूर्ण प्रयत्न करके धनी, विद्वान, नेता, महान पुरुष आदि बन सकता है और उसी प्रकार बुरे कर्म करके नारकीय यन्त्रणायें भोग सकता है।

अतः वर्तमान काल में मनुष्य का पुरुषार्थ प्रधान है। अपने पुरुषार्थ के बल पर भावी जीवन को कैसा भी बनाया जा सकता है। पुरुषार्थ वर्तमान काल में परम बलवान है। प्रारब्ध एवं अन्य कोई सत्ता इसे रोक नहीं सकती। ऐसे पुरुषार्थी महान पुरुषों से इतिहास भरा पड़ा है जिन्होंने बड़ी-2 कठिनाइयों एवं विपरीत परिस्थितियों को सहन करते हुए पुरुषार्थ के बल से असम्भव को भी सम्भव कर दिखाया है। बड़े-बड़े निर्माण कर्म एवं परिवर्तन कार्य इस पुरुषार्थ के बल से किए जाते हैं। अतः वर्तमान काल में पुरुषार्थ की प्रधानता एवं उपादेयता को स्वीकार करना आवश्यक है।

संचित कर्म

संचित कर्मों की नींव क्रियमाण कर्म हैं। इन क्रियमाण कर्मों में कुछ तो वर्तमान काल में ही भोग लिए जाते हैं और कुछ शेष रह जाते हैं। ये शेष रहे क्रियमाण कर्म चित्त में इकट्ठे होते रहते हैं। कर्मों का यह अक्षय भण्डार बिना भोगे समाप्त नहीं होता है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते करते भी जीव इन्हें भोगते भोगते समाप्त नहीं कर पाता। क्योंकि दूसरे नये अशुभ कर्मों के साथ रक्त बीज की भाँति ये बढ़ते रहते हैं। इस तरह यह भंडार बढ़ता ही रहता है। ऐसी परिस्थिति में जीव की मोक्ष का कोई ठिकाना ही नहीं। लेकिन इसके लिए भी भगवान ने मार्ग बताया है। गीता में भगवान ने ऐसी युक्ति बताई है, जिससे जैसे घास के मीलों लम्बे ढेर को एक आग की चिनगारी जलाकर भस्म कर देती है उसी तरह—

“ज्ञानाग्नि सर्व कर्माणि भस्मसात् कुसते तथा”

इन कर्मों के अक्षय भंडार को ज्ञानरूपी अग्नि ही भस्म करती है। पवित्र अनुभवमय एवं साक्षात्कार मय ज्ञान का प्रकाश जब हृदय में उत्पन्न होता है तो सारे संचित कर्म जल जाते हैं। जीव की लम्बी यात्रा समाप्त होती है।

प्रारब्ध कर्म

चित्त रूपी गोदाम में संचित कर्म जो कि व्यवस्थापूर्वक एक के पीछे एक परतों की भाँति इकट्ठे होते हैं समय पर परिपक्व होकर कालाँतर में भोगने के लिये प्रारब्ध का रूप लेकर आते हैं। परिपक्व होने पर ये कर्म और भी शक्ति -शाली हो जाते हैं। अतः ये भोग काल में अपनी कई गुनी शक्ति से जीवात्मा को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यही कारण है कि मनुष्य कई विपरीत परिस्थितियों में स्वयं ही फँसकर दुःख एवं परेशानियाँ उठाते हैं। अतः भूतकाल में किए हुये कर्म परिपक्व होकर कालान्तर में भोगने के लिए प्रारब्ध का रूप बनकर आते हैं।

जिन-जिन कर्मों को भोगने के लिए अमुक-अमुक देह धारण करने पड़ते हैं, उनमें उन्हें भोगना ही पड़ता है। बिना भोगे प्रारब्ध का नाश नहीं होता है। जैसे कोई व्यक्ति अमरूद का पेड़ लगाता है। समय पर उसमें अमरूद आने लग जाते हैं। वह अमरूद खाते-खाते ऊब जाता है और इच्छा करता है कि “अब आम खाऊँ “ किन्तु अमरूद के पेड़ में तो आम लगने से रहे। आम खाना है तो आम का पेड़ लगाना पड़ेगा और उसमें भी काफी समय बाद आम आने लगेंगे। तब तक तो अमरूद खाने ही पड़ेंगे। यही बात प्रारब्ध भोग के सम्बन्ध में है। एक दिन स्वयं की इच्छा सो किए कर्म आज प्रारब्ध बनकर आ गये हैं तो उन्हें भोगना ही पड़ेगा।

साधारणतया प्रारब्ध के दो भाग कर सकते हैं। एक साधारण या निर्बल प्रारब्ध—जैसे भौतिक वस्तुओं का अभाव, जीविका की कमी, अज्ञानता, स्वास्थ्य विकृति आदि आदि। इन सबको प्रयत्न एवं पुरुषार्थ से हल किया जा सकता है। जैसे कि महापुरुष अपनी विपरीत एवं कठिन परिस्थितियों को बदलकर अपने अनुकूल परिस्थितियाँ बना लेते हैं।

दूसरा होता है असाधारण अथवा अटल प्रारब्ध। यह तो अवश्य भोगना ही पड़ता है। जैसे आग लगना, भयंकर प्राणाघात, बीमारी, बिजली पड़ना, आदि। ये अटल प्रारब्ध जीव पर इस तरह आते हैं कि इनसे बचने के लिए प्रयत्न करने का अवसर भी नहीं मिलता।

वैसे अधिकतर प्रारब्धों को भोगना पड़ता है। क्योंकि वे इतने “मध्यकाल” में जब परिपक्व होकर आते हैं तो उनका बल एवं आकर्षण शक्ति कई गुना हो जाती है। आध्यात्मिक एवं आत्मबल से रहित व्यक्ति उनके आकर्षण से बच नहीं सकता। अध्यात्म शक्ति एवं आत्मबल के विकसित होने पर बड़े-2 प्रारब्धों के आकर्षण से बचा जा सकता है।

विवेक एवं ज्ञान से भी प्रारब्ध से उत्पन्न होने वाली अशान्ति, दुःख, कठिनाई आदि को शान्ति में बदला जा सकता है। प्रारब्ध कर्म हमारे एक समय सोच समझकर किये हुये कर्मों के परिणाम स्वरूप ही तो भोगने के लिए आते हैं अतः स्वयं ही कारण समझकर आत्मसंतोष करना चाहिए। इससे प्रारब्ध भोगने के फलस्वरूप उत्पन्न हुई अशान्ति, उद्विग्नता, आदि से छुटकारा मिलेगा और उन्हें शान्ति से एवं गंभीरता से भोगा जा सकेगा। यही कारण है कि भगवद्भक्त , योगी, महापुरुष प्रारब्ध भोगने से अधिक व्याकुल नहीं होते न खुश ही होते हैं। उन्हें प्रभु की इच्छा या स्वयं की कृति का फल समझकर संतोषपूर्वक सहन कर लेते हैं। यहाँ तक कि इनको वे महसूस भी नहीं करते और अपने पवित्र लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं। मन की ऐसी समत्व स्थिति ही जीवन मुक्ति का मूल होती है। प्रारब्धवश आये सुख दुःख आदि में समत्व भाव से स्थिति हुआ व्यक्ति जीवन मुक्त ही तो है। अतः प्रारब्ध के इस रहस्य को जान लेना जीवात्मा को समत्व प्रदान करता है और जन्म मरण से निकालता है।

साराँश में संचित कर्मों का क्षय ज्ञान से हो जाता है, प्रारब्ध कर्म का भोगने एवं इसके वास्तविक तत्व को जान लेने से होता है। शेष रहता है क्रियमाण कर्म। क्रियमाण कर्म के अंतर्गत पुरुषार्थ प्रधान है अतः अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए पुरुषार्थ करना मानव की विशेषता है। इसी तरह समत्वभाव, एवं ज्ञान की प्राप्ति में साधना, संयम, तपश्चर्या रूपी प्रयत्न या पुरुषार्थ करना पड़ता है। अतः पुरुषार्थ की प्रधानता एवं महत्ता को स्वीकार कर उन्नति पथ पर अग्रसर होना मानव की विशेषता है। आज की तदवीर कल की तकदीर है। कल की जैसी तकदीर का निर्माण करना है वैसी तदवीर इसी क्षण से प्रारम्भ कर देना चाहिए।


आत्मोन्नति के पथ पर

(श्री भगवान सहाय वाशिष्ठ)

मानव ने विज्ञान के बल से कई तरह की शक्तियाँ प्राप्त कर ली हैं फिर भी दो घटनायें उसकी आँखें खोल देती हैं। यहाँ वह बराबर सोचता है कि आखिर यह प्रपंच क्यों है? जन्म मरण के प्रश्नों पर विचार करते ही उसका सिर झुक जाता है। अन्त में आश्चर्य चकित होकर यह कहना ही पड़ता है कि अवश्य ही कोई विशेष शक्ति इस सृष्टि का संचालन एवं नियमन कर रही है। “मैं कौन हूँ” “कहाँ से आया हूँ” ‘यहाँ आने का क्या उद्देश्य है’ “मेरी इच्छा के बिना भी मौत क्यों आती है” इन प्रश्नों के पैदा होते ही मनुष्य का भौतिक ऐश्वर्य, बड़ाई, सम्पत्ति भोग आदि नीरस जान पड़ते हैं। निरन्तर इन प्रश्नों का सही उत्तर प्राप्त करके शान्ति प्राप्त करना चाहता है। किन्तु इनका उत्तर बाहर से नहीं मिलता। और इनका उत्तर पाने के लिए अंतर्दृष्टि करनी पड़ती है। इस तरह मानव जीवन में एक मोड़ पैदा हो जाता है। वह बहिर्मुख से अन्तर्मुख हो जाता है। साथ ही उस सृष्टि निर्माता की शरण लेनी पड़ती है जिसके प्रसाद स्वरूप इन प्रश्नों का उत्तर मिलता है और मनुष्य अपने आपको पहचान कर स्वान्तः सुख की प्राप्ति करता है।

भारतीय ऋषियों ने व महापुरुषों ने बहुत पहले ही इन प्रश्नों पर विचार करके सही उत्तर प्राप्त किया था। इतना ही नहीं उन्होंने उस परम पिता का साक्षात्कार कर उसी महान् सत्ता को स्वीकार एवं प्रतिपादित किया था, जिसके परिणामस्वरूप वेद, उपनिषद्, मीमाँसायें, स्मृतियाँ, दर्शन आदि अब भी हमारी इस आध्यात्मिक पिपासा को शान्त कर रहे हैं।

अन्तर दृष्टि होते ही हम मनुष्य की तीन स्थितियाँ अनुभव करने लगते हैं। प्रथम-पशु दशा जिसमें प्राणी में देह बुद्धि की प्रधानता रहती है। देह सम्बन्धी सुख दुःख भोग आदि को ही स्वयं में अनुभव करने लगता है। दूसरी होती है मनुष्य दशा जिसमें मानवोचित मर्यादाओं का पालन होता है। तीसरी है देव दशा अर्थात् सूक्ष्म आत्मस्थिति, ब्राह्मीस्थिति जो मानव की जीवन सिद्धि की अन्तिम मंजिल है। इस स्थिति में स्थित हुआ जीवात्मा उस परम पिता परमात्मा के साक्षात्कार की लम्बी यात्रा पूरी करता है। ऐसा व्यक्ति शरीरान्त पश्चात सर्वत्र चाँदनी की तरह छिटक जाता है, लौ में लौ मिल जाती है, चिद्रूप हो जाता है।

प्रकृति का स्वभाव है कि वह अधोगामिनी है। वह मनुष्य को मनुष्यत्व की मर्यादाओं से हटाकर पशुत्व की ओर ले जाती है। किन्तु मानव ईश्वर प्रदत्त पुरुषार्थ के बल से अपने चित्त प्रदेश में चलने वाले विकार-युद्धों से लोहा लेता हुआ पशुता का अतिक्रमण कर मनुष्यत्व में पहुँचता है और इसी तरह मनुष्यत्व से देवत्व की ओर। देवदशा का वह पवित्र अनुभव उसे आनन्द में सराबोर कर देगा।

इस प्रकार पशुत्व से देवत्व की ओर बढ़ने का नाम ही अध्यात्म विकास, आत्मोन्नति, जीवनलाभ आदि है। किन्तु यह साधारण कार्य नहीं है। इसके लिए पूर्ण शक्ति भर साधन, आत्म परीक्षण की बारीकियाँ, इस मार्ग में आने वाले विघ्नों से लोहा लेना आदि किसी तरह कम महत्व के नहीं हैं।

सर्वप्रथम हम इस मार्ग में रुकावट डालने वाली बातों पर विचार करें। अपनी आत्मीयता को विकसित करके इसकी विशाल भूमिका बनाने में साधारणतया तीन तरह के विघ्न होते हैं। (1) जन्म जात या स्वाभाविक (2) वंश परम्परागत (3) व्यक्तिगत अर्थात् स्वयं पनपाया हुआ। इनमें प्रथम अधिक शक्ति शाली होता है। कई जन्मों से चले आ रहे इन स्वाभाविक जन्मजात बुरे संस्कार रूपी विघ्नों का मूलोच्छेद करना किन्हीं-किन्हीं का काम होता है। इन संस्कारों को मिटाने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना पड़ता है। शेष दो से लोहा लेना कठिन नहीं है।

इन तीनों कारणों से भिन्न-भिन्न विघ्न जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ने में आते हैं। उनमें प्रमुखतः निम्न हैं—

(1) क्रोध अर्थात् आवेश :- जब मनुष्य का तन या मन किसी ‘आवेश एवं क्रोधवशात्’ अनियंत्रित हो जाता है तो कोई भी कार्य सुचारु रूप से एवं बुद्धिपूर्वक नहीं हो सकते।

(2) भोग एवं विषयों से प्रीति :- यह इतना बुरा दुर्गुण है कि साधक यदि सावधानी से काम न ले तो उसे पछाड़ देता है। उसका आत्मनियन्त्रण समाप्त हो जाता है। जिसके परिणामस्वरूप शीघ्रता से पतन की ओर जाने लगता है।

(3) लोभ :- अपनी भावी आवश्यकताओं की कल्पना करते हुए परिग्रह के लिए व्यस्त रहना। बुढ़ापे में क्या होगा, मेरे बाल-बच्चे की परवरिश कैसे होगी, मेरा अमुक काम कैसे चलेगा आदि विचारों से लोभ की नींव जमती है। मनुष्य इसमें रत होकर अपना वास्तविक मार्ग भूल जाता है।

(4) मोह एवं सत्ता :- लौकिक सम्बन्धों को प्रधानता देकर अपने पराये की भावना रखना एवं अधिकार का गर्व यह एक दुर्गुण ही नहीं अपितु जीवन सिद्धि में बड़ा भारी शत्रु है। यह उसे सही मार्ग से भुलाकर कण्टकाकीर्ण मार्ग में भटका देता है।

(5) आलस्य :- साधन पथ का एक बड़ा विघ्न है। निरन्तर साधना एवं पुरुषार्थपूर्ण प्रयत्नों से जी चुराकर बैठे रहने से सफलता कभी भी प्राप्त नहीं हो सकती है।

(6) तृष्णा :- अपनी आवश्यकताओं को बढ़ाकर उसकी पूर्ति के लिए लालायित रहना तृष्णा जैसे विघ्न को उत्पन्न करना है।

साधक को इन विघ्नों से अधीर एवं व्याकुल नहीं होना चाहिए। साथ ही परिणाम के उतावलेपन में अपनी साधना में बाधा नहीं करनी चाहिए। धीरे-धीरे प्रयत्न के साथ इनको हटाना चाहिए। अचानक ये बुराइयाँ एवं विघ्न कभी भी समाप्त नहीं होते। “शनै शनैरुरमेद बुद्ध्याधृति गृहीतया” गीता के इस सिद्धान्त से इन सभी की जड़ों को काटना चाहिए।

इन बुराइयों में प्रवृत्त होने एवं इन्हें बढ़ाने में भ्रम का बहुत बड़ा हाथ होता है। भ्रम में भटक कर मनुष्य सत्पथ से झूठे विश्वास पर विचलित हो जाता है। “अपने कुटुम्ब को निराधार कैसे छोड़ूं इसके लिए तो जैसे तैसे कमाना उचित ही है।” बड़े-2 महापुरुष आये और चले गये फिर भी सृष्टि क्रम वैसा ही चल रहा है फिर मैं क्यों अपने जीवन को परेशानी एवं उलझनों में डालूँ”। “अमुक व्यक्ति मेरा रिश्तेदार , गाँव का, जाति का है उसकी सिफारिश करके या जैसे तैसे अमुक काम में मदद करना मेरा काम है।” इन भ्रमों में पड़ने पर मनुष्य वास्तविकता को भूल जाता है। कर्तव्य पथ से च्युत हो जाता है। इससे बचने के लिए कर्तव्य का सूक्ष्म निरीक्षण एवं अपनी मानसिक शक्तियों का विकास करना आवश्यक है।

अध्यात्म विकास एवं आत्मोन्नति के लिए “प्रार्थना” का महत्व जानना आवश्यक है। प्रार्थना की महत्ता एवं प्रधानता इस पथ पर सभी ने स्वीकार की है। ठोस विज्ञान पर आधारित योग मार्ग ने भी ईश्वर प्रणिधान की प्रधानता का अनुमोदन किया है। स्तुति, उपासना और प्रार्थना साधक के लिए आवश्यक है।

अतः अपने पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए परमात्मा का अस्तित्व सर्वोपरि स्वीकार करना आवश्यक है। उसका अंश समझना ही साधक का अपने ध्येय पथ पर अग्रसर होना समझना चाहिए। ईश्वर के दिव्य गुणों का चिन्तन एवं वर्णन कर उसकी स्तुति करना चाहिए। पुनः उन दिव्य गुणों से सम्पन्न परमेश्वर का स्वयं में ध्यान के द्वारा दर्शन करना चाहिए, क्योंकि उसका अंश रूप ही तो उसका यह युवराज है। फिर अपनी सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करना चाहिए क्योंकि उस का निवास हर जगह एवं प्रत्येक प्राणियों में है। अतः स्वयं भी उस सर्वात्म दृष्टि को रखते हुए सबकी सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। पूजा उपासनाओं का उद्देश्य इसी से सम्बन्ध रखता है। यदि इसी तत्व को समझते हुए पूजा उपासनायें की जायँ तो सफलता अवश्य मिलती है।

क्योंकि पिता सदैव अपने पुत्रों का हित चाहता है अतः अवश्य ही हमें कल्याण पथ की ओर अग्रसर करेगा। प्रभु का जीवन-सिद्धि रूपी प्रसाद अवश्य मिलेगा। उक्त प्रार्थना यदि कृत्रिम होगी तो असफलता मिलेगी और यदि इसके साथ हृदय की धारा प्रवाहित होवे तो चमत्कार रूप में परिणाम शीघ्र ही उपलब्ध होगा। साधक के करुणा एवं प्रेम भरे हृदय से निकली हुई आवाज अवश्य ही प्रभु तक पहुँचती है। वह शीघ्र ही अपने भक्त की रक्षा के लिए , गज की पुकार एवं द्रौपदी की लाज बचाने के समय जैसे चले आये थे, उसी तरह पहुँचते हैं। महापुरुष एवं भक्त सदैव से ही इसका अनुभव करते आये हैं।


पदार्थों की कारण-शक्ति

(श्री क. ख. ग)

पदार्थों को जिस रूप में हम देखते हैं, समझते हैं, वस्तुतः उनकी भीतरी गुप्त शक्ति उससे कहीं अधिक होती है। पानी गड्ढे या तालाबों में ढेरों भरा पड़ा रहता है, पर उसकी कुछ विशेष शक्ति प्रतीत नहीं होती। पर जब उसे भाप के रूप में परिणित किया जाता है तो एक छोटी टंकी भरा पानी हजारों मन भारी रेल को तूफान की चाल से दौड़ा ले जाता है। रेल की चाल वस्तुतः उस थोड़े से कुछ मन पानी की शक्ति है जिसका साधारणतः कुछ विशेष महत्त्व प्रतीत नहीं होता। पानी की सूक्ष्म शक्ति हम तब अनुमान करते हैं जब वह रेल दौड़ाने का चमत्कार दिखाता है, साधारण बुद्धि उस छिपी शक्ति को समझने में प्रायः असमर्थ ही रहती है।

पानी की यह सूक्ष्म शक्ति वह हुई जिससे रेल चलती है। इससे भी अधिक सूक्ष्म एक और शक्ति उसमें है जिसे कारण-शक्ति या अध्यात्म-शक्ति कहते हैं। पानी में पवित्रता की कारण-शक्ति सन्निहित है, जल प्यास को बुझाता है यह सर्व विदित है, कपड़े, शरीर या फर्श का मैल धो डालना भी उसका गुण है। यह बातें सभी को विदित हैं। पर उसकी कारण-शक्ति को पहचानना हर किसी का काम नहीं। यह मशीनों की सहायता से नहीं जानी जा सकती, वैज्ञानिक उपकरणों की पहुँच अभी इतनी नहीं हो पाई है जिससे यह जाना जा सके कि किस पदार्थ में क्या कारण-शक्ति सन्निहित है। उसकी समुचित परीक्षा अध्यात्म शक्ति से ही होती है।

जल में कारण-शक्ति पवित्रता की है। वह न केवल हमारे शरीर का मैल छुड़ाता है वरन् आत्मिक दृष्टि से भी हमें पवित्रता प्रदान करता है। हिन्दू धर्म में स्नान का महत्व बहुत बताया गया है। प्रत्येक धार्मिक कार्य के पूर्व स्नान आवश्यक है। दैनिक जीवन में भी नित्य स्नान के बिना भजन नहीं होता। स्वास्थ्य विज्ञान की दृष्टि से जाड़े के दिनों में रोज स्नान करना आवश्यक नहीं। योरोप के ठंडे देशों में लोग बहुत-बहुत दिनों बाद नहाते हैं। पर उससे इनके स्वास्थ्य में कोई अन्तर नहीं आता। जाड़े की ऋतु में वैसी ही स्थिति जब इस देश में हो जाय तो शरीर-शास्त्र की दृष्टि से स्नान की उतनी आवश्यकता नहीं रहती। परन्तु अध्यात्म दृष्टि से पानी के अन्दर जो पवित्रता प्राप्त हुई है, उसका उपयोग अन्तःकरण की पवित्रता बढ़ाने तथा स्थिर रखने की दृष्टि से नितान्त आवश्यक माना गया है। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हमारी धर्म परम्परा में स्नान को एक आवश्यक धार्मिक कर्त्तव्य माना गया है।

जल की स्थूल शक्ति खेती सींचने, ठण्ड के बनाये रखने, प्यास बुझाने तथा सफाई करने की है। उसकी सूक्ष्म शक्ति रेल को दौड़ाने जैसे प्रचण्ड कार्य कर सकने वाली सामर्थ्य के रूप में परिलक्षित होती है। कारण-शक्ति के रूप में उसकी शक्ति हमारे अन्तःकरण, मन, विचार तथा चेतना स्तर को पवित्रता प्रदान करती है।

सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने अपनी लाखों वर्षों की तप साधनाओं द्वारा उपलब्ध अपनी आत्म-शक्ति से संसार के विभिन्न पदार्थों का अन्वेषण एवं विश्लेषण करके उनकी कारण-शक्ति का पता लगाया था और उसके द्वारा मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव में आवश्यक हेर-फेर करने की प्रक्रिया बनाई थी। वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में जड़ी-बूटियों, के रासायनिक पदार्थों के, खंड-खंड करके उनके सूक्ष्म गुणों का पता लगाया जाता है और उनका किस रोग के निवारण में या किस कार्य में किस प्रकार क्या उपयोग हो सकता है, यह पता लगाया जाता है। यह विश्लेषण कार्य रसायनशाला में लगे कुछ उपकरणों के आधार पर या अन्य परीक्षणों द्वारा जान किये जाते हैं। पर उनकी कारण-शक्ति का पता लगाने के बारे में कोई वैज्ञानिक उपकरण नहीं बन सके हैं। वैज्ञानिक क्षेत्र भौतिक शक्ति तक ही सीमित है, इसलिए उसके द्वारा कारण-क्षेत्र की खोज कर सकना कठिन भी है।

किसी पदार्थ की स्थूल सामर्थ्य की अपेक्षा उसकी सूक्ष्म शक्ति की क्षमता हजारों गुनी होती है। कपड़े धोने, सफाई का काम करने की अपेक्षा जल की वह सूक्ष्म शक्ति जो रेल चलाती है, हजारों गुनी अधिक महत्वपूर्ण है। इससे भी गहरी वह शक्ति है जो पवित्रता प्रदान करती है-वह इस रेल चलाने की सामर्थ्य की तुलना में हजारों गुनी अधिक महत्वपूर्ण है। रेल तो बिजली, तेल, पैट्रोल आदि से भी दौड़ाई जा सकती है, पर अन्तःकरण की पवित्रता जो मनुष्य को महापुरुष एवं देवता तक बना सकती है कितनी महान है इसकी कल्पना भी करना कठिन है। जिस प्रकार मामूली वस्तु के भी परमाणु (एटम) उस वस्तु की अपेक्षा करोड़ों गुने शक्तिशाली होते हैं, उसी प्रकार हर पदार्थ की कारण सत्ता में ही उसकी वास्तविक एवं प्रचंड शक्ति छिपी रहती है।

तुलसी का पौधा हमारे यहाँ बहुत पवित्र माना जाता है। उसे घरों में स्थापित करते हैं, पूजा करते हैं, प्रसाद पंचामृत आदि पवित्र धर्म विधानों में उपयोग करते हैं। कोई व्यक्ति मरने को होता है तो उसके मुख में तुलसीदल डालते हैं। तुलसी के बारे में जो यह पवित्र भावना हमारे समाज में प्रचलित है वह अकारण नहीं है। उसके पीछे उसकी कारण-शक्ति ही सन्निहित है। तुलसी का पौधा जिस घर में रहेगा वहाँ सतोगुणी प्रवृत्तियाँ, धर्म भावना, संयम, सदाचार का वातावरण तैयार करेगा, उसमें निरन्तर प्रवाहित होती रहने वाली अदृश्य, तरंगें पवित्रता एवं धार्मिकता की चेतना उसी प्रकार फैलाती रहती हैं जिस प्रकार गुलाब के फूल से सुगन्ध फैलती है। सुगन्ध को हमारी नाक पहचानती है, इसलिए उसके गुण पर अविश्वास का कोई कारण नहीं होता, पर तुलसी की कारण-शक्ति को नाक या आँख से देखा, सूँघा नहीं जा सकता, इसलिए हमारा मन बहुधा विचलित हो जाता है और अविश्वास एवं संदेह प्रकट करने लगता है।

किसी पौधे या खाद्य पदार्थ की स्थूल शक्ति वह है जो उसे देखने सूँघने या चखने से अनुभव में आती है। मिर्च का चरपरापन, टमाटर की खटाई, फूल की लुभावनी सूरत तथा गंध उसकी स्थूल सामर्थ्य कहीं जा सकती हैं। मिर्च की दाहकता, टमाटर का रक्त शोधक गुण, गुलाब की शीतलता तथा विरेचन, उसकी सूक्ष्म सामर्थ्य है जो दिखाई तो नहीं पड़ती पर शरीर यन्त्र के भीतरी कलपुर्जों द्वारा या वैज्ञानिक मशीनों द्वारा आसानी से पहचानी जा सकती है। पर इन पदार्थों में कारण-शक्ति —मनुष्य के अन्तःकरण पर प्रभाव डालने वाली सामर्थ्य क्या है, इसे किस प्रकार जाना जाय? इसे जानने का एकमात्र तरीका आत्मशक्ति ही है। वह आत्मशक्ति जिसने प्राचीनकाल में खगोल विद्या आदि महत्वपूर्ण विद्याओं का बिना किसी मशीन या दूरबीन की सहायता के पूरा-पूरा अन्वेषण कर लिया था, इन पदार्थों की कारण शक्ति को जानने का प्रमुख आधार हो सकती है।

वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से तुलसी और करंजवा में लगभग एक समान गुण हैं। दोनों ही कीटाणुनाशक तथा ज्वर निरोधक हैं। रासायनिक विश्लेषण की दृष्टि से इन दोनों में आश्चर्यजनक समता है। यह सब होते हुए भी तुलसी की पूजा होती है, उसे घरों में लगाया जाता है, पर करंजवा के पौधे को वह श्रेय नहीं दिया गया है। पूजा उपकरणों में तुलसीदल के स्थान पर करंजवा के पत्ते काम में नहीं आ सकते हैं और न माला के काम में ही तुलसी के स्थान पर करंजवा की लकड़ी काम में लाई जा सकती है। इस भेद-भाव का आधार दोनों की कारण-शक्तियों में अन्तर होना ही है।

हमारे धर्म शास्त्रों में कई वृक्षों, वनस्पतियों, पशुओं, सरिताओं, सरोवरों, पर्वतों, प्रदेशों को विशेष महत्व दिया गया है। पीपल का वृक्ष पूजा जाता है, उससे भी बड़े तथा उपयोगी अन्य वृक्षों को वह मान्यता प्राप्त नहीं है। गाय की अपेक्षा भैंस अधिक दूध तथा घी देती है पर उसकी पूजा नहीं होती क्योंकि गाय के शरीर, गोबर, मूत्र, दूध, घी तथा साँस में जो पवित्रता उत्पन्न करने वाले तत्व हैं, वे भैंस में नहीं हैं। दूध, घी अधिक प्राप्त करने के लिए भैंस खरीदी जा सकती है पर कन्या के विवाह में गौदान के समय तथा मृत्यु काल में वैतरणी पार करने के लिए भैंस का दान करने से काम नहीं चल सकता। पंचगव्य पंचामृत में गोरस ही उपयोग होगा। गाय का दूध पीने वाले में बुद्धिमत्ता, स्फूर्ति, सात्विकता आदि आत्मिक चेतनाएँ बढ़ती हैं। इसके स्थान पर भैंस का दूध अधिक गाढ़ा, स्वादिष्ट चिकना होते हुए भी आलस्य, मंदबुद्धि, तमोगुण एवं जड़ता पैदा करता है। मशीनों से इस अन्तर को साबित नहीं किया जा सकता पर दो व्यक्तियों को गाय और भैंस के अलग-अलग दूध पिलाकर कुछ ही दिनों में उसके स्वभाव में उत्पन्न होने वाला अन्तर आसानी से जाना जा सकता है। कारण-शक्ति की परीक्षा का सीधा तरीका यही है कि उन पदार्थों का उपयोग व्यक्तियों को कराकर देखा जाय कि उनके अन्तःक्षेत्र में पहले की अपेक्षा क्या अंतर हुआ। यद्यपि जीवन की गतिविधियाँ अन्य कारणों पर भी निर्भर रहती हैं, पर कोई भी पदार्थ अपनी सूक्ष्म चेतना का प्रभाव उपयोग करने वाले पर छोड़े बिना रहता नहीं है। इसलिए हमें प्रत्येक पदार्थ का उपयोग करने से पूर्व उसकी कारण-शक्ति के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर लेनी आवश्यक है।


जीवन में निर्भीकता आवश्यक है।

(डॉ. चमनलाल गौतम)

“बल पुण्य और दुर्बलता पाप है। यदि किसी को धर्म की शिक्षा देनी हो तो वह “अमरत्व” रूपी धर्म है। इस बात की आवश्यकता है कि हमारे खून में गर्मी हो, स्नायुओं में बल हो। न किसी को हानि पहुँचानी चाहिए और न किसी पर अत्याचार ही करना चाहिए, पर दूसरों की कुचेष्टाओं को चुपचाप सह लेना भी पाप है।” इस प्रकार से स्वामी विवेकानन्द ने हमारा उचित ही मार्ग प्रदर्शन किया है। वास्तव में आत्म दुर्बलता होने के कारण ही किसी मनुष्य में भय के चिन्ह दिखाई देने लगते हैं। किसी के आत्म-बल की परीक्षा करनी हो तो यह देखना चाहिए कि उसमें छोटी-छोटी बातों पर आशंका, सन्देह और भय तो उत्पन्न नहीं हो जाते। जो रोग, शत्रु, चोरी, डाके, सर्प, धनाढ्यों, अफसरों आदि से भयभीत होते रहते हैं उन्हें निर्बल मनुष्य ही मानना पड़ेगा। भय एक ऐसा तत्व है जो मनुष्य को निरन्तर नीचता की ओर ले जाता है। निर्भयता से आत्मिक उत्थान की ओर प्रगति होती है।

महात्मा गाँधी ने एक स्थान पर कहा है कि “बल तो निर्भयता में है, शरीर में माँस बढ़ जाने में नहीं।” भगवान कृष्ण ने भी गीता में दैवी संपत्तियों का वर्णन करते हुए ‘निर्भयता’ को सबसे पहले रखा है, इससे उनका अभिप्राय यह है कि बिना अभय के दूसरी सम्पत्तियों का मिलना असम्भव है क्योंकि निर्भयता ही तो वह शक्ति है जो मनुष्य के आत्म-बल को बढ़ाती है। मनुष्य में जो साहस, उत्साह और आशा दिखाई पड़ती है वह उसी दैवी गुण के कारण होता है। आप जानते हैं कि स्वतन्त्रता से शक्ति का विकास होता है और बन्धन से यह क्षीण होती है। चूँकि निर्भयता मनुष्य के प्राण को स्वतन्त्र बनाती है इसलिए उसे ऐसी शक्ति कहा जा सकता है, जो जीवन में एक नव स्फूर्ति ला देती है। आशंका रहित मनुष्य ही संसार में शक्तियों का विकास कर सकता है, सफलता की देवी उसी की आरती उतारने के लिए आतुर रहती है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उन्होंने कठिन से भी कठिन परिस्थितियों में सफलता प्राप्त करने के लिए इसी शक्ति का सहारा लिया है।

एक बार नेपोलियन की सेनाओं के पैर शत्रुओं के प्रबल आक्रमण के कारण उखड़ने लगे। सभी अपना प्राण बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। एक सेना अधिकारी उसके पास आया और कहा “हम तो हार गये।” नेपोलियन ने कहा “तुम ही हारे गये, वह सेना नहीं हारी।” इसके पश्चात् वह तुरन्त ही सेना का संचालन स्वयं करने लगा और चमकती तलवारों, बन्दूक, तोप के गोलों की परवाह न करते हुए आगे ही बढ़ता गया। अपने सेनापति को इस प्रकार आगे बढ़ते देखकर सैनिक भी रुक गये और पुनः युद्ध करने लगे। अब उनका उत्साह और साहस बढ़ रहा था। नेपोलियन की निर्भीकता की शक्ति ने उन में नव-बल का संचार कर दिया, वह शत्रुओं पर टूट पड़े और विजयी हुए।

निर्भयता वह तत्व है जो हमारी सोई हुई शक्तियों को जगा देता है। इसके बिना मनुष्य जीवन संग्राम में सफल नहीं हो सकता। यह हमारे जीवन को सबल, स्वाधीन और सफल बनाता है। इसके विपरीत भय वह आसुरी तत्व है जो हमारी उन्नति के मार्ग में बाधक है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में इसके दुष्परिणाम देखे जाते हैं।

भय, शारीरिक व मानसिक शक्तियों को क्षीण करता है। उससे खून सूख जाता है। मन दुखी, चिन्तित, शोकातुर और व्याकुल रहता है। कभी-कभी तो एकदम मूर्छा और हार्टफेल भी हो जाता है। स्मरण शक्ति कम हो जाती है। आँखों की रोशनी क्षीण होने लगती है। आत्म-तेज मन्द पड़ जाता है। यह एक ऐसा विष है जो मनुष्य को अशक्त बना देता है। रोग का भय मनुष्य को रोगी बना देता है। रोगी को भय का विष चढ़ जाये तो उसके रोग में वृद्धि होना निश्चित है। इतनी क्षति रोग से नहीं होती जितनी उसके परम सहायक भय से होती है। निर्भय रोगी शीघ्र ही स्वस्थ हो जाता है। सर्प काटने पर जो मनुष्य भयभीत हो जाते हैं, उनको विष बहुत जल्दी चढ़ जाता है। परन्तु भय रहित मनुष्य पर उस से बहुत कम प्रभाव पड़ता है।

भय ग्रस्त व्यक्ति अपने मानसिक सन्तुलन को खो बैठता है। उसको कुछ सूझ नहीं पड़ता क्या करे और क्या न करे। चोर चोरी करते पकड़ा जाये, किसी व्यक्ति को जंगल में बाघ का सामना करना पड़े तो यही दशा होती है। भय की अधिकता होने पर तो जबान बन्द हो जाती है, हृदय अपनी गति को रोक देता है।

भय से प्रभावित होकर मनुष्य अपने कर्तव्य को भूल जाता है, वह किंकर्तव्य-विमूढ़ हो जाता है। चोर को यदि सिपाही का खटका हो तो सिपाही के न होते हुए भी वह अपनी कल्पना शक्ति से उसे साकार कर लेता है। भूतों का कोई अस्तित्व नहीं होता, परन्तु फिर भी जंगल में जाता हुआ मनुष्य पेड़ों पर उनकी कल्पना करता है और जब उसकी कल्पना से उनका आकार बन जाता है तो भयभीत होता है और “मैंने भूत देखा है”-बड़े विश्वास के साथ यह घोषणा करता है। इस सम्बन्ध में अध्यात्म, रामायण में अच्छा उदाहरण मिलता है। जब राम और सीता का विवाह हो रहा था और उस समय परशुराम जी, जो इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय शून्य कर चुके थे, पधारे तो महाराज दशरथ उनको देख कर बहुत घबराये और अपना मानसिक संतुलन खो बैठे। चाहिए तो यह था कि बाहर से आने वाले अतिथि का यथोचित स्वागत किया जाये, वह यह भूल गये और जोर-जोर से कहने लगे “रक्षा करो, रक्षा करो, मेरे पुत्र के प्राणों की रक्षा करो।” दंडवत् प्रणाम करके फिर बोले “मुझे पुत्र के प्राणों का दान दीजिए।” परशुराम ने उनकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। यह इसलिए हुआ कि भय मनुष्य निर्णयात्मिका बुद्धि खो देता है जिससे उसे उचित अनुचित का कोई ज्ञान नहीं रहता।

भय एक ऐसी मानसिक निर्बलता है जिससे मनुष्य शक्ति, सामर्थ्य और योग्यता होते हुए भी अपने आपको अशक्त , असमर्थ और अयोग्य समझने लगता है। मनुष्य अपने सम्बन्ध में जैसी धारणा बनाता है वह वैसा ही बनता जाता है। योग्यता व समर्थता की भावना रखने वाले व्यक्ति में इन शक्तियों का विकास होता रहता है। भय से आत्मा संकुचित होती है जिसका अवश्यंभावी परिणाम कायरता है। कायरता से वह भीरु; छोटा और दब्बू बनता है। शारीरिक शक्ति से कोई व्यक्ति हृष्ट और शास्त्रीय विद्या से पुष्ट क्यों न हों, भय के कारण वह अपने को छोटा मानने लगता है और वैसे ही छोटेपन के कार्य करता है। भयभीत मनुष्य निरंतर विपत्तियों में पड़ा रहता है। राई के बराबर कष्ट भी उसको सहन नहीं होता। उससे भी वह चिल्लाने लगता है। भय छोटे दुख को बड़ा बनाने की शक्ति रखता है।

भय से आत्मा निर्बल होती है और आत्मा के निर्बल होने से ही मनुष्य नीच कर्म करने की ओर प्रवृत्त होता है। बुराइयों और पापों का कारण कमजोरी ही है। इनसे बचने का उपाय आत्मबल वृद्धि है। भय से हिंसा वृत्ति का पोषण होता है। कहते हैं कि यदि बाघ को कोई व्यक्ति जंगल में मिल जाये और वह अपना मार्ग निर्भयतापूर्वक चलता रहे तो वह बाघ मार्ग काटकर निकल जाता है और उस पर आक्रमण नहीं करता। यदि मनुष्य घबरा जाये या बाघ को यह आशंका हो जाये कि वह मनुष्य उस पर आक्रमण करेगा तो वह उसे मारने की चेष्टा करता है। सर्प इस भय से मनुष्य को काटता है कि वह उसे मार न दे। मनुष्य भी सर्प को इसीलिए मारते हैं कि वह उन्हें काट न खाए। बलवान शत्रु से भयभीत होकर ही कायर पीठ पीछे से काट करके ढेर कर देता है। दण्ड से डरकर ही झूठ बोला जाता है।

ऐसी तामसी शक्ति ,जो हमारी शारीरिक, मानसिक व आत्मिक शक्तियों को क्षीण करती है, उससे बचना चाहिए। जिनके मन में इसका प्रवेश नहीं होता वह सर्वदा सुखी रहते हैं। स्वामी रामतीर्थ वन में निर्भयता पूर्वक घूमते थे और कहते थे मुझे सर्प और बाघ कुछ नहीं कहते, मैं निर्द्वन्द्वता पूर्वक विचरण करता हूँ। स्वामी दयानन्द किसी नदी में पैर लटकाये बैठे थे तो कछुआ उनके पैरों के पास आ गया। किसी ने कहा स्वामी जी! पैर ऊपर कर लीजिए, कछुआ काट लेगा। उन्होंने उत्तर दिया “जब मैं इसे कुछ नहीं कहता तो यही मुझे क्यों काटेगा।”

जो मनुष्य अपने को शरीर-भाव से ऊँचा उठा लेता है, आत्मबल व निर्भयता का अमृत पान करता है, वह अपने को अजर अमर मानता है। यदि रोग आ जाये तो वह यह समझता है कि शरीर के क्षीण होने से उसकी क्षति होने वाली नहीं है। चोरी हो जाये तो वह रोता नहीं, मकान में आग लग जाये तो वह चिल्लाता नहीं। व्यापार में घाटा पड़ जाये तो वह चिन्तित नहीं होता। विपत्तियों को हंसी खुशी झेलता है। आर्थिक लाभ के लिए वह झूठ, छल, कपट, बेईमानी को नहीं अपनाता। इसका कारण यह है कि कुछ चला जाये तो वह उसे अपनी हानि नहीं समझता और आ जाये तो उसे लाभ नहीं मानता। सार यह कि जो व्यक्ति आत्मा की अमरता का विचार करता रहता है वह साँसारिक भयों से मुक्त हो जाता है। डाकू उसे डरा नहीं सकते, बलवान पुरुष उसे भयभीत नहीं कर सकते। उसके शरीर व मन स्वस्थ रहते हैं। इसलिए हमें भी इसी मार्ग का अनुकरण करके अपने जीवन को सुखी बनाना चाहिए। निर्भयता जीवन विकास का एक आवश्यक अंग है। इसकी भी जीवन में आवश्यकता है।


अपने जीवन को आनन्दमय बनाइए

(डॉ. रामचरण महेन्द्र, एम.ए., पी-एच. डी.)

शुक्रोऽसि भ्राजोऽसि स्वरसि ज्योतिरसि।

—अथर्व वेद

“तू शुद्ध, तेजस्वी, आनन्दमय एवं प्रकाशवान् है। इसलिए हे जीव, पतित होकर कुमार्गगामी मत बन। प्रसन्न रह!”

मनुष्यों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है एक तो वे जो कुछ न होने पर भी प्रसन्न रहते हैं, दूसरे वे जो सब कुछ होने पर भी उदास और खिन्न।

प्रसन्न रहना या उदास रहना संसार की वस्तुस्थिति, घोर और विषम परिस्थिति पर इतना निर्भर नहीं है, जितना मनुष्य की स्वनिर्मित आदत के ऊपर। आनन्द, प्रसन्नता, विषाद, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध आदि मानसिक अवस्थाएँ हैं जो हम स्वयं ही बनाया करते हैं। हमारी प्रत्येक भावना एक आदत है जिसे खुद हमने अभ्यास द्वारा बनाया है।

वह मनुष्य बड़ा भाग्यवान है, जिसने सदा अच्छी और विषम साँसारिक स्थिति में प्रसन्न रहने की आदत बनाई है। प्रसन्नता, सन्तोष, उल्लास, हर्ष, उत्साह वे मनः स्थितियाँ हैं, जो मनुष्य के मानसिक आरोग्य की द्योतक हैं।

जिस व्यक्ति ने उदासी की आदत बना ली है, वह एक ऐसे पिशाच के पल्ले पड़ गया है, जो सदा सर्वदा उसकी जीवन-शक्ति को चूसता रहेगा। इस आदत से परेशान रहने वाला व्यक्ति मीठे पदार्थ को भी कड़वे रूप में देखेगा, उसे प्रिय और उपयोगी वस्तु भी अप्रिय और अनिष्टकारी ही दिखाई देगी। उसे संसार घोर दुख में डूबा, नाना व्याधियों से परेशान दिखाई देगा। यदि किसी ने उदासी का काला चश्मा नेत्रों पर लगा लिया है, तो उसे समस्त समाज, मित्र, नागरिक, जीव उदासी की काली छाया से ढके हुए प्रतीत होंगे। वास्तव में बात यह है कि मनुष्य बाहरी वातावरण से इतना परेशान नहीं रहता, जितना स्वयं अपने मन की दुःखपूर्ण और गलत आदतों से परेशान रहता है। संसार स्वयं दुःखपूर्ण नहीं है। वह तो गलत मानसिक स्थिति और त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण से देखने का दुष्परिणाम है।

ईश्वर स्वयं आनन्दमय है। उसमें उल्लास, उत्साह, प्रसन्नता है। आप भारत के देवी देवताओं के चित्र देखते जाइये। सभी का मुख मण्डल आन्तरिक सद्भाव की आभा से देदीप्यमान है। उससे अमित आनन्द बरस रहा है। दूसरे शब्दों में वे चुपचाप हमें यह मौन सन्देश दे रहे हैं—

“संसार के स्त्री-पुरुषों! सदा आनन्दित रहो। चिन्ता एक क्षणिक मानसिक अवस्था है। उसे दूर करने का उपाय हम से सीखो! हमारे मुख मंडल से जो आनन्द की वर्षा हो रही है, उसे तुम भी अपने स्वभाव में धारण करो। संसार आनन्द का घर है। प्रकृति में चारों ओर से आनन्द की रसधारें प्रवाहित हो रही हैं। आनन्द के इस निरन्तर प्रवाहित होने वाले स्रोत को अपने अन्दर धारण करो। संसार आनन्दमय है। तुम स्वयं आनन्द की राशि हो। आनन्द से ही संसार की सृष्टि हुई है। जीवन में प्रतिदिन साँस लेते, खाते-पीते, उठते-बैठते दिन रात अपने मुख मण्डल से आनन्द की किरणें विकीर्ण करो।”

प्रसन्नता का स्वभाव निरन्तर खुशी मनःस्थिति में रह कर उत्पन्न किया जा सकता है। जो चेहरे की खिन्नता से मुक्ति पा लेगा, वह मन से क्षोभ वृत्ति को दूर कर सकेगा। चेहरे की प्रसन्नता का सम्बन्ध पवित्र और आनन्दमय विचारों से है। स्थायी रूप से ईश्वर और प्रकृति के आनन्दमय रूप को मन में धारण कर लेने से वैसी ही मुख मण्डल की स्थिति हो जाती है।

आनन्द ईश्वर का एक महत्वपूर्ण गुण है। यह आप में प्रचुर मात्रा में भरा हुआ है। आपकी आत्मा ईश्वरीय गुणों से परिपूर्ण होने के कारण स्वतः आनन्दानुमुख होती है। आनन्दमय रहना तो हमारी प्रकृति का एक अंश है। प्रसन्न रहने से आत्मा तृप्त रहती है; उदास रहने में मानसिक ग्रन्थियों के ऊपर जोर पड़ता है। उदास स्वभाव रखने से अन्दर ही अन्दर से नाना प्रकार से विष निकला करते हैं, जो वातावरण को दुःखपूर्ण बना देते हैं। उदासी का कारण कुविचार और कुकर्म है। उनका परित्याग कर देना चाहिए :—

अप दुष्कृतान्य जुष्टा-यारे।

—ऋग्वेद

कुविचारों और कुकर्मों से दूर रहो।

ये दुष्ट भावनाएँ इन विकारों को धारण करने वालों को ही नष्ट कर देती हैं।

अपास्यत् सर्व दुर्भूतम्।

—अथर्ववेद 3।7।7

अन्दर के सब दुर्भावों को निकाल बाहर करो बाहरी शत्रु उतनी हानि नहीं कर सकते जितनी अंतःशत्रु करते हैं।

“अपेहि मनसस्पतेऽपक्राम परश्चर।

—अथर्ववेद 20।96।24

मानसिक पापों का परित्याग कीजिए।

वास्तव में मन में जमी हुई वासना और कुविचार ही उदासी पैदा करते हैं।

उदासी एक मानसिक रोग है। स्वयं मनुष्य अपने दुर्भाव को मन में स्थायी रख चुपचाप चिन्तामूलक विचारों के अभ्यास के द्वारा उदासी का मानसिक रोग बढ़ा लेता है। कठिन परिस्थितियों से संघर्ष न कर सकने की भावना एक कल्पित भय से मनुष्य को भर देती है। इस गुप्त भय भावना के कारण व्यर्थ की नाना चिन्ताएँ हमें चारों ओर से घेरे रहती हैं।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक लेखक प्रो. लालजीराम शुक्ल का तो विचार है कि जब तक मनुष्य अपने दृष्टिकोण को नहीं सुधारता अर्थात् जब तक उसकी वासना का रेचन अथवा शोधन नहीं होता, तब तक वह रोग का अथवा झक का रूप धारण करके प्रकाशित होता है। यह वासना मनुष्य को कोई भी रचनात्मक कार्य नहीं करने देती, मनुष्य को निराशावादी बनाये रहती है। यह निराशावादिता एक दर्शन का रूप धारण कर लेती है। उदासी की आदत दूर कीजिए और प्रसन्नता का स्वभाव बनाइये। बातचीत में अधिक से अधिक हँसिये। प्रसन्न व्यक्तियों के साथ संग कीजिए। संग से ही मनुष्य अच्छा या बुरा बनता है। उदास व्यक्तियों से बचिए और फूल की तरह खिले हुए व्यक्तियों के साथ रहिये। यह सत्संग आप में प्रसन्नता का स्वभाव पैदा करेगा।

मन में प्रसन्नता के यौवन और उल्लास के विचार प्रचुरता से आने दीजिए। मन में सोचिये कि मेरा स्वभाव आनन्द से परिपूर्ण है तथा भगवान का आनन्द और प्रसन्नता नित्य निरन्तर मेरे मन और जीवन को भर रहा है। मैं इस दृढ़ विश्वास से अग्रसर हो रहा हूँ कि भगवान का दैवी आनन्द सदा मेरे साथ है। मैं प्रकृति से आनन्द की किरणें खींचता हूँ।

जब मेरे मन में कुछ शिथिलता का अनुभव होता है तो मैं भगवान के आनन्दमय रूप को ही मन में धारण करता हूँ। भगवान के दैवी आनन्द से भरे चित्रों को ही देखता हूँ। मेरा सम्बन्ध आनंद से है। मैं अपने अन्दर से आनन्द ही प्रकाशित करता हूँ।

यदि आप उदासी की मानसिक स्थिति से निकलना चाहते हैं तो उस प्रकार के विचारों का प्रवाह रोक दीजिए। दूसरे प्रकार के उत्फुल्लकारी विचारों को प्रचुरता से अपने गुप्त मन में आने दीजिए। जो विचार अधिक देर तक मानसिक क्षेत्र में घूमता रहेगा वही आपके मानसिक स्वभाव का एक अंग बन जायेगा।

स्वामी कृष्णानंद के शब्दों में “प्रसन्नता, स्वास्थ्य और सफलता का भोजन है ईश्वर चिन्तन, सहृदयता, आशा और शुभेच्छा। यदि आप मुक्त हस्त होकर यह मानसिक भोजन वितरित करेंगे तो स्वास्थ्य, प्रसन्नता और सफलता आपका अनुगमन करेंगी। विचार भावनाओं का भोजन है। दुःख, रोग, और असफलता, भय, विषाद, दोष-दर्शन और स्वार्थपरता संबंधी विचारों के भोजन पर पलते हैं। जब आप उन्हें उनका भरपूर भोजन देते हैं अर्थात् गलत अनर्थकारी चिन्तन करते हैं, तो वे आपके जीवन में प्रवेश करते हैं। प्राणी की तरह वे भी वहीं रहते हैं जहाँ उन्हें उनका अनुकूल भोजन मिलता है।”

दुःख, भय, रोग, असफलता, विषाद के दुष्ट विचारों को कदापि मनो मन्दिर में न आने दीजिए। उत्तम मनः स्थिति का चुनाव कीजिए और स्थायी रूप से उन्हीं विचारों में निवास कीजिए। भय, परेशानी और उत्तेजना के ध्वंसकारी विचारों पर विजय मनुष्य की एक बड़ी सफलता है।


कन्फ्यूशियस के उपदेश

(श्री साँवलिया बिहारी वर्मा)

चीन के निवासी बौद्ध धर्म के अनुयायी माने जाते हैं, पर इसके सिवाय वहाँ अन्य मतों के मानने वाले भी पाये जाते हैं। मुसलमानों की संख्या कई करोड़ है और ईसाई भी पर्याप्त हैं। पर वहाँ का मुख्य धर्म ‘कन्फ्यूशियस’ है, जिसमें ‘ताओ’ धर्म के सिद्धान्तों का भी समावेश हो गया है।

‘कन्फ्यूशियस’ चीन के एक विख्यात धर्म-प्रचारक तथा सिद्ध पुरुष हो गये हैं। चीनी लोग उन्हें ‘कुंगफुतेज’ के नाम से पुकारते हैं। चीन देश की सभ्यता को प्रतिष्ठित करने वालों में ‘कुंगफुतेज’ का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। इस धर्म में तथा बुद्ध की शिक्षाओं में पारस्परिक विशेष भेद न होने के कारण, इन दोनों का प्रचार साथ ही साथ हुआ। चीन के निवासी साँसारिक व्यवहारों के लिए ‘कुंग’ के सदुपदेशों में श्रद्धा रखते हैं, साथ ही पारलौकिक विषयों के लिये बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को मानते हैं। इस प्रकार चीनी सभ्यता और संस्कृति का मूलाधार दोनों धर्मों की सम्मिलित शिक्षा है। इन दोनों धर्मों की शिक्षा दूध-पानी की तरह मिलकर चीनवासियों के जीवन में इस प्रकार घुल-मिल गई हैं कि इन दोनों के प्रभाव का पृथक कर सकना दुस्तर है।

कुंग; बुद्ध के समकालीन थे। उनका जन्म ईसा से 551 वर्ष पहले हुआ था। 17 वर्ष की आयु तक पुरातत्व विद्या, गान-विद्या आदि में दक्षता प्राप्त करने पर पठन-पाठन समाप्त किया। तत्कालीन राजा ‘चाव’ इन से बड़ा प्रभावित हुआ और अनेक ऊँचे पदों पर कार्य करते हुये 51 वर्ष की अवस्था में ये राज्य के प्रधान मंत्री नियुक्त किये गये। अपने सदुपदेशों को व्यवहार में लाकर इन्होंने लोगों को चकित कर दिया। देश से चोरी, डकैती का नाम मिटने लगा, लोगों ने घरों में ताला लगाना बन्द कर दिया, सर्वथा शान्ति विराजने लगी। किन्तु लोभी, अत्याचारी सामन्तों को यह पसन्द न आया और उनके षड़यन्त्रों के फलस्वरूप आप मन्त्री-पद से हटा दिये गये। 73 वर्ष की आयु में आपका देहान्त हुआ। आपके 500 शिष्यों ने गुरु की समाधि पर तीन वर्ष तक शोक मनाया और आपके उपदेशों का खूब मनन किया, तथा दूर-दूर के देशों में आपकी नीतिमय शिक्षा का प्रचार किया।

कुंग के सिद्धांत :-

कुंग ने मनुष्य जीवन की ओर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने स्वर्ग, ईश्वर आदि की चर्चा ही नहीं की। उनके एक शिष्य ‘ची-लू’ ने पूछा—”भगवन्, मैं ईश्वर की सेवा किस प्रकार कर सकता हूँ?” उत्तर में कुँग ने कहा—”जब तुम्हें यह ज्ञान नहीं कि मनुष्य की सेवा किस प्रकार की जाय, तब देवों की सेवा के विषय में किस प्रकार पूछ सकते हो?” पुनः शिष्य ने पूछा—”भगवन्, मृत्यु के सम्बन्ध में सम्यक् रूप से विचार प्रकट कीजिये?” कुंग ने उत्तर दिया—”प्रिय ची-लू, जब तुम्हें जीवन के विषय में पर्याप्त ज्ञान नहीं है, तब तुम्हें मृत्यु के सम्बन्ध में कैसे ज्ञान हो सकता है?” पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि कुंग ने ईश्वर अथवा परलोक के अस्तित्व से इनकार किया। आत्मा के पुनर्जन्म पर उन्हें विश्वास था। फिर भी उन्होंने परलोक के सुधारने की उतनी चिन्ता नहीं की, जितनी इहलोक को सुधारने की। मनुष्य सामाजिक जीव है, वह समाज में रहता है, पनपता है और अन्त में नष्ट हो जाता है। उसका समाज के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बना हुआ। अतः समाज की उन्नति से उसकी उन्नति होगी। वैयक्तिक उन्नति मानव जीवन का लक्ष्य नहीं, यह तो सामाजिक जीवन का फल है।

कुँग के मतानुसार मनुष्य स्वभावतया अच्छा होता है और अच्छाई की ओर उसकी प्रवृत्ति होती है। अच्छाई की पराकाष्ठा सिर्फ सन्तों में हो सकती है। अतएव प्रत्येक मनुष्य को निष्काम-भाव से तथा ईमानदारी और तत्परता के साथ कर्तव्य पालन करना चाहिये। समाज के प्रत्येक प्राणी के साथ सद्व्यवहार करना हमारा परम धर्म है। माता-पिता के प्रति, दीनजनों तथा सेवकों के प्रति, भाई-बन्धुओं के साथ सहानुभूति रखने की सुन्दर शिक्षा देकर कुंग ने चीनी सभ्यता को बहुत ऊपर उठाया है।

कुँग ने शिक्षा पर विशेष जोर दिया। उनके मत से मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य अपने को समाज के लिये उपयोगी बनाना है। कुँग के एक शिष्य ने पूछा—”मान्यवर, सामाजिक गुण क्या हैं?” उत्तर मिला—”दूसरे से प्रेम करना।” दूसरे शिष्य ने पूछा—”भगवन्, क्या कोई ऐसा नियम है कि जिसका पालन जीवन पर्यन्त करना चाहिये?” उत्तर में कुँग ने कहा-”दूसरे के साथ ऐसा बर्ताव न करो, जैसा तुम दूसरों से अपने प्रति नहीं चाहते।” इस प्रकार कुंग के उपदेश का साराँश आत्म-विश्वास और पड़ोसियों के प्रति उदारता है।

वे प्राणियों या देह से पृथक जीवात्मा का अस्तित्व मानते थे। उनका विश्वास था कि दिवंगत पुरुष की आत्मा बिना शरीर के ही रहती है। आत्मा न केवल मनुष्य में ही होती है, अपितु वायु, अग्नि, पहाड़, नदी आदि में भी होती है और सभी की पूजा होती है। सबका दर्जा स्वर्ग और मनुष्य के बीच का है। इन आत्माओं के साथ-साथ पिशाचों की भी सत्ता मानी गई है। कुँग मृत पितरों और शरीर रहित आत्माओं को इस प्रकार बलि प्रदान करते थे, मानों वे साक्षात् उनके सामने उपस्थित हों। इन आत्माओं का काम अपने उत्तराधिकारियों की रक्षा करना समझा जाता था।

कुंग के कुछ उपदेश नीचे दिये जाते हैं :—

(1)धनवान के लिये निरभिमान होना सहज है, किन्तु निर्धन के लिये संतोष प्रकट करना कठिन है।

(2) सदाचार के प्रति अनुराग, सौंदर्य के प्रति अनुराग की तरह, हृदय से होना चाहिये।

(3) अपनी तुलना में भी दूसरों को परखने का आत्मशासन रखो। इसी को मनुष्यता का सिद्धान्त कहते हैं।

(4) न्याय के प्रति प्रेम, विद्वता के प्रति आदर, तथा सदाचार मनुष्य को विशिष्ट पुरुष बनाने में समर्थ होता है।

(5) प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि अपनी वाणी पर संयम रखे और अपने आचरण के प्रति सजग रहे।

(6) संसार एक मुसाफिरखाना है।

(7) काम का आरम्भ करना मनुष्य के हाथ में है और उसे पूरा करना ईश्वर के हाथ में है।

(8) क्षण भर अपने क्रोध को दबाकर तुम जीवन भर के पश्चात्ताप से बच सकते हों।

(9) जिस प्रकार तुम दूसरों के दोष दिखाते हो उसी प्रकार अपने दोष भी देखो, दिखाओ। जिस प्रकार अपने आपको क्षमा कर सकते हो, उसी प्रकार दूसरों को भी क्षमा करो।

(10) आज्ञापालन सत्कार से कहीं उत्तम है।

(11) बीस वर्ष तक धार्मिक जीवन व्यतीत करना पर्याप्त नहीं है, किन्तु एक दिन भी बुराई करना बहुत बड़ा दोष है।

(12) बुद्धिमान पुरुष वचन देने में विलम्ब करता है, किन्तु वचन देने पर उसका पालन अवश्य करता है।

(13) आनन्द की तीन कुँजियाँ हैं-(1) दूसरों में दोष न देखना, (2) दूसरों की निन्दा न करना, न सुनना, और (3) दूसरों की बुराई न करना।

(14) मनुष्य का हृदय आइने के समान होना चाहिये, जिस पर समस्त वस्तुओं का प्रतिबिम्ब पड़ता है, किन्तु इससे उसमें मैलापन नहीं आता।

(15) कोलाहल न बाजार में है, न शाँति जंगल में, सब कुछ मनुष्य के हृदय में है।

(16) जब तुम जीवित प्राणी के प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करने में असमर्थ हो तो मृत व्यक्ति के प्रति कर्तव्य का पालन किस प्रकार कर सकोगे?

(17) ज्ञानी पुरुष के लिए अपना चित्त स्वर्ग है, किन्तु अज्ञानी के लिए वह नरक है।

(18) सच्चा सद्भाव अपने संगियों के प्रति प्रेम करना है और सच्चा ज्ञान अपने साथियों को पहचानना है।

(19) जो ईश्वरीय नियम से अनभिज्ञ है वह श्रेष्ठ मनुष्य नहीं हो सकता।

(20) ज्ञानी मनुष्य सन्देह से, धार्मिक मनुष्य चिन्ता से और वीर मनुष्य मद से मुक्त रहता है।


जीवनोत्कर्ष में विवेक और वैराग्य का स्थान

(श्री रोहित मेहता)

आध्यात्मिक मार्ग के पथिक के लिये विवेक का साधन केवल अस्थायी रूप से करना पर्याप्त नहीं माना गया है। अन्य साधनों की भाँति विवेक कोई ऐसी वस्तु या शक्ति नहीं है कि जिसमें एक बार सिद्धि पाकर फिर अभ्यास की जरूरत न पड़े और आवश्यकता पड़ने पर ही उसका उपयोग किया जाय। इसके विपरीत वह एक ऐसी सचेतन, सूक्ष्म और अपार्थिव शक्ति है जो जीवन में आदि से अन्त तक हमारे साथ रहती है और हमारे कामों का निरीक्षण किया करती है। यदि हम कभी उसकी प्राप्ति से संतुष्ट हो जाते हैं, उसका नियमित उपयोग आवश्यक नहीं समझते तो हमारे कार्यों में तुरन्त हानि और क्षीणता का भाव उत्पन्न हो जाता है।

विवेक का वास्तविक आशय यह है कि हम मानसिक, भावात्मक और भौतिक जीवन में जागरुक बने रहें। यदि हम अपने स्थूल जीवन में निष्क्रिय, भावात्मक जीवन में निश्चेष्ट और मानसिक जीवन में निष्प्राण होंगे, तो समझना चाहिये कि हम विवेक के साधन से पृथक हैं। संसार के प्रत्येक विषय के दो पहलू अवश्य होते हैं—सत्य और असत्य अथवा आवश्यक और अनावश्यक। इसलिये प्रत्येक कार्य में विवेक की साधना—उपयोग अत्यावश्यक है। हमारा मन इतना सतेज होना चाहिये कि हम किसी भी कोने में से आते हुये विचार प्रवाह को जान सकें। हमारा हृदय इतना शुद्ध होना चाहिये कि भावों की सूक्ष्मतर लहरों का प्रत्युत्तर दे सकें और हमारी स्थूल इन्द्रियाँ इतनी सुसंस्कृत होनी चाहिये कि स्थूल जगह के सूक्ष्म आन्दोलनों को भी ग्रहण कर सकें। इसका आशय यही है कि हमारी स्थूल और सूक्ष्म शक्ति यों का विकास उच्चतम होना विवेक की साधना के लिये परमावश्यक है। वर्तमान विज्ञान कहता है कि अपनी परिस्थिति के साथ जो जीवन मिलजुल जाता है उसके लिये आगे विकास की कोई संभावना नहीं रहती। इसके विपरीत जो जीवन परिस्थिति से असंतुष्ट है, उसे स्वीकार नहीं करता है, वही विकसित हो सकता है।

यही बात विवेक के सम्बन्ध में भी है। वह सरिता के प्रवाह के सदृश्य गतिमान और शक्तिमान है। वह एक ऐसी अवस्था है जिसमें हमारी समस्त शक्तियाँ उत्तरोत्तर सचेत और सतर्क बनती जाती हैं। विवेकयुक्त अवस्था वही है जो हमें उच्चतम भूमिका पर लाकर जीवन की समस्याओं के हल करने का मार्ग दिखावे। जैसे-जैसे हम एक उच्च भूमिका पर पहुँचेंगे वैसे ही असन्तुष्ट होकर उसका त्याग करेंगे, क्योंकि पर्वत के उच्च शिखर पर पहुँचते ही हमको उससे भी उच्चशिखर का दर्शन होगा। विवेक शक्ति इसी प्रकार हमारा आगे की तरफ पथप्रदर्शन करती रहती है।

कुछ लोग प्रश्न करेंगे कि ऐसी असंतोष की अवस्था आध्यात्मिक साधना में कैसे सहायक होती है? आध्यात्मिक जीवन का आशय क्या है? हमको जो सानुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त हो गई है उसी के बीच सदैव “सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्” स्वरूप की अनुभूति होना ही सच्चा आध्यात्मिक जीवन है। जिसको ऐसा अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त होता है वही वास्तव में संत, योगी, आध्यात्मिक पुरुष है।

स्थूल और सूक्ष्म इन्द्रियाँ यद्यपि हमें सत तत्व का दर्शन नहीं करा सकती हैं, किन्तु सत्य के समीप निषेधात्मक रूप से हमें ले जा सकती हैं। सत् शिव और सुन्दर क्या है, यह वे अवश्य बता सकती हैं। भूतकाल का अनुभव बताता है कि हम सत्य प्राप्ति में असफल हुये हैं, क्योंकि हमारा जीवन अभी भी दुःखमय है। संसार में अनेक प्रकार की वस्तुओं से हम आकर्षित हुये हैं और उनकी प्राप्ति से हमने सुख पाने की आशा की है। परन्तु प्रत्येक समय ऐसी प्राप्ति के पश्चात् हमें अनुभव हुआ है कि उसके द्वारा वाँछित सुख प्राप्त नहीं हुआ और सत तथा आनन्द की खोज अभी बाकी है। इस तरह के अनुभवों से सत् को निषेधात्मक रूप में समझने में हम समर्थ बनते हैं। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में यदि हमारा मन और हृदय सतेज और सचेत न रहे तो यह निषेधात्मक ज्ञान हमें शीघ्र ही प्राप्त होगा। विवेकशील साधक वही है जो जीवन की विविध घटनाओं के बीच रहते हुये ऐसा ज्ञान प्राप्त करे।

विवेक के बाद वैराग्य का अभ्यास भी आध्यात्मिक प्रगति के लिये आवश्यक है। इस सम्बन्ध में पहली बात यह है कि इच्छाओं का दबाना या उन्मूलन करना वैराग्य का अर्थ नहीं है। ऐसा करने से तो मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है और वह मूढ़ या पाखंडी बन जाता है। इसलिये विद्वानों का मत है कि वैराग्य उस स्थिति का नाम है जब मनुष्य किसी कार्य को करते हुये भी उसमें लिप्त नहीं होता। इसके लिये हमको मन की अत्यन्त सतर्क अवस्था में रहकर जीवन का साक्षी बनना चाहिये। सतर्क रहकर जीवन का निरीक्षण करना ही विरक्तावस्था है। यह निरपेक्षता ही वास्तव में वैराग्य है। जीवन की परिपूर्णता का भाव परिपूर्ण रूप से करते हुए उसके प्रति आसक्ति न होना ही उत्तम कोटि का वैराग्य है। विवेक से मन पराकाष्ठा को पहुँचता है और उसी अवस्था में वैराग्य द्वारा उसका संतुलन होता है। विवेक से यदि वैराग्य उत्पन्न नहीं होता तो उससे मन चिड़चिड़ा, क्रोधी, अधीर तथा अत्यधिक उत्तेजित हो जाता है। वैसे यदि वैराग्य की पुष्टि विवेक से न हो तो उससे निष्क्रियता, अत्यन्त उदासीनता एवं शून्यता आ जाती है। तनी हुई अवस्था में यदि मन शान्त रहता है, मनुष्य सच्चा आध्यात्मिक कार्य कर सकता है। वैराग्य द्वारा ही सात्विक कार्य वास्तव में सम्पन्न हो सकता है और वैराग्य के लिये अखंडित परित्याग की वृत्ति—जो विवेक है—नितान्त आवश्यक है। मनुष्य के सामने सदैव रुचिकर और रुचि के प्रतिकूल घटनाएँ आया करती हैं। और वह या तो उसका स्वागत करता है या तिरस्कार। पर ऐसा करने से उसकी प्रगति रुक जाती है। किन्तु यदि इस अवसर पर वह विरक्त अर्थात् निरपेक्ष और पूर्णतया शान्त रहता है तभी वह सच्चे आध्यात्मिक पथ पर द्रुतगति से अग्रसर होगा।


हिन्दू धर्म का एक प्रधान स्तम्भ-गीता

(श्री ब्रह्म प्रकाश जी)

मनुष्य का सर्वप्रधान उद्देश्य जीवन के रहस्य को समझना और तदनुसार बुद्धिमत्ता पूर्वक व्यतीत करना बतलाया गया है। सभी धर्म शास्त्रों में नीति, चरित्र, परोपकार आदि के जो उपदेश दिये गये हैं, उनका सार यही है कि अपना जीवन मनुष्योचित ढंग से बितायें। इस प्रकार के धर्म-ग्रन्थों में गीता का दर्जा सब से ऊँचा है। गीता में धर्म की आरम्भिक बातें नहीं बतलाई गई और न बहुत स्पष्ट नैतिक नियमों का उपदेश दिया गया है। ये बातें तो धर्म के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले सभी व्यक्ति जानते हैं और कुछ अंशों में उनका पालन करने का उद्योग भी करते हैं। गीता के आरंभ के थोड़े से श्लोक तो भूमिका स्वरूप हैं जिनमें कथा रूप में महाभारत का युद्ध आरम्भ होते समय भी कृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता का उपदेश देने के प्रसंग पर प्रकाश डाला गया। दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से गीता की वास्तविक शिक्षा आरम्भ होती है, जिसमें भगवान कृष्ण ने यह बात बताई है कि तुम घटनाओं का अर्थ गलत लगाते हो। बन्धुओं और गुरुजनों के मारने को तुम जितना महत्व देते हो वह बहुत अधिक है। उसका मूल्य इतना नहीं है। यहीं से कर्तव्य की अबाधता और देह की क्षुद्रता के सम्बन्ध में गीता का उद्देश्य आरम्भ होता है।

गीता जीवन शास्त्र है। यों तो सनातन हिन्दू धर्म का आधार वेद माने जाते हैं, पर वेद बड़े ग्रन्थ हैं, कठिन भाषा में लिखे हैं और उनमें ऐसी बहुत सी क्रियाएँ हैं जिनको आचरण में लाना आधुनिक काल में अत्यन्त कठिन है। इसलिये वर्तमान काल में गीता का हिन्दुओं में प्रायः ऐसा स्थान हो गया है जैसा ईसाइयों में बाइबिल का है। गीता में एक और विशेष गुण है जिसे हम सार्वभौमिकता कह सकते हैं। गीता साम्प्रदायिक ग्रंथ नहीं है। इसमें हर देश के रहने वाले और हर धर्म के मानने वालों के लिये तत्व दर्शन की सामग्री मिल सकती है। गीता में वर्णित विषय को हम मुख्यतः इन चार विभागों में विभाजित कर सकते हैं—

नियम

संसार में हमको नियम हर जगह दिखाई पड़ता है। सूर्य ठीक समय से निकलता और अस्त होता है। भोजन और औषधियों के गुण नियम के अनुसार होते हैं। सारा संसार, स्थावर, जंगम, सब नियम से बँधे पाये जाते हैं। एक विद्वान का कथन है कि इस सर्वव्यापक नियम के रूप में ईश्वर हमको नित्य दिखाई देता है। इसे हम इन शब्दों में भी कह सकते हैं कि जो नियम की अवाधता में विश्वास करता है वही आस्तिक ईश्वर का मानने वाला है। इस सम्बन्ध में गीता में कहा गया है।

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। नहि कल्याण कृत कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥

अर्थात्-हे अर्जुन! उस मनुष्य का न तो इस लोक में और न परलोक में ही नाश होता है और न बुरा होता है, जो भला कर्म करने वाला है उसकी कभी दुर्गति नहीं होती। इस श्लोक में ‘अमुत्र’ (परलोक) शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। पश्चिमी “कर्तव्या कर्तव्य शास्त्र” इस लोभ का विचार करके ही किसी कृति या घटना का मूल्य लगाता है। पर गीता इह-लोक और परलोक दोनों का विचार करके मूल्य स्थिर करती है। इसलिये गीता का निर्णय अधिक पूर्ण और अधिक महत्व का होगा। नियम की अबाधता के उपदेश मात्र से ही, यदि इस पर हमारा पूर्ण विश्वास हो जाये तो हमारे जीवन में महान परिवर्तन हो जायगा। जैसे किसी खजाँची को कोई सरकारी दफ्तर कुछ रुपया नौकरों की तनख्वाह बाँटने को दे और वह उसे चुरा ले तो यह विचार पूरी मूढ़ता का होगा कि चोरी छिपी रहेगी। जिनको वेतन मिलना था वे शिकायत करेंगे तो चोरी खुलकर खजाँची को सजा दी जायगी। यही नियम संसार के हर काम में है। कोई पाप चाहे सफलतापूर्वक थोड़े या बहुत काल के लिये छिपाया जा सके,पर अंत में अपना बुरा फल दिये बिना न रहेगा। यह धारणा दृढ़ होने से हम स्वयं पाप से बचने लगेंगे और समाज का बड़ा हित होगा। गीता में कहा गया है—

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योजुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमोमतः॥

“हे अर्जुन! जो सब प्राणियों के सुख और दुख को अपने सुख और दुख के समान समझता है, वह परम श्रेष्ठ योगी है।” यह उपदेश भी संसार के लिए व्यापक है। एक प्रसिद्ध अंगरेज विद्वान ने भी कहा है कि “औरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम दूसरों से अपने साथ चाहते हो।”

कर्म

जीवन की परिस्थितियाँ इतनी गहन और बहुधा उलझी हुई होती हैं कि विचारशील और अध्ययनशील व्यक्तियों को भी सरलता से मार्ग स्पष्ट नहीं दिखाई देता। “जीवन-शास्त्र” की दृष्टि से ऐसी स्थिति के लिये गीता में सर्वोत्तम मार्ग दर्शाया गया है :—

कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफल हेतुर्भूमास्ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थात् “तेरा कर्म करने मात्र में ही अधिकार है, फल में नहीं। कर्मों के फल के पीछे मत दौड़ और सावधान रह कि कहीं तू आलसी बनकर कर्म करना ही न छोड़ बैठे।”

इसमें स्वार्थ रहित काम करने का, लोकहित का काम करने का उपदेश दिया गया है। ईश्वर ने हमारे ही हित के लिये हमें जिस स्थिति में रखा है, वही स्थिति हमारे लिये सब से अच्छी है। इसलिये हमारा कल्याण इसी में है कि हम अपनी बुद्धि और शक्ति के अनुसार अच्छे से अच्छा काम करते जायँ और उसका फल भगवान के ऊपर छोड़ दें। हमारा कर्म हमारे लिये बड़े महत्व की बात है, क्योंकि कर्म से ही हमारा भला-बुरा होता है। इसलिये इस सम्बन्ध में केवल नकारात्मक उपदेश कि “कर्म करो पर फल की इच्छा न रक्खो” पर्याप्त नहीं है। इसलिये गीता में आगे चल कर कहा है—

यज्ञ शिष्टाशिनः सन्तो मुच्यंते सर्व किल्विषै। भुञ्जतेते त्वधं पापा ये पचन्त्यात्म कारणात्॥

“यज्ञ करके जो बच रहे, उसे खाने वाले श्रेष्ठ जन सब पापों से छूट जाते हैं, पर जो केवल अपने शरीर के पोषण के लिये भोजन पकाते हैं उन्हें पाप लगता है। गीता का ‘यज्ञ’ शब्द बड़े महत्त्व का है। पंडितवर राधाकृष्णन कहते हैं—

“गीता का यज्ञ वेदों का यज्ञ” कर्मवाण नहीं है। इसमें तो सभी त्यागमय कर्म शामिल हैं, जिनसे व्यक्ति अपना धर्म एवं पुरुषार्थ सर्वव्यापक भगवान को अर्पण कर देता है। इसका आशय यह निकला कि निःस्वार्थ बुद्धि से किया गया प्रत्येक सार्वजनिक कार्य ‘यज्ञ’ है। जो स्थायी रूप से सार्वजनिक सेवा करता है और अपने निर्वाह के लिए कुछ धन पारिश्रमिक लेता है वह पुण्यात्मा है।

प्रज्ञान

जीवन के प्रत्येक क्षण में हम कुछ न कुछ कर्म करते रहते हैं। “न हि कक्ष्यत्क्षणमपि जातु निष्ठत्व कर्मकृत।” कर्म तो जीवन का लक्षण है। पर कर्म के लिये विवेक और विवेक के लिये ज्ञान की आवश्यकता होती है। अन्धा व्यक्ति दो सुन्दर वस्तुओं में से एक को कैसे चुनेगा? अतः अच्छा जीवन बिताने के लिये ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता है।

गीता के अनुसार ईश्वर सारे जगत में व्याप्त हैं ‘तागा मोतियों की माला में पुहा रहता है, इसी तागे के आधार पर सब मोती एक साथ टिके रहते हैं। इसी प्रकार ईश्वर के आधार पर सारा जगत टिका है। चेतन और जड़ दोनों ईश्वर की प्रकृतियाँ हैं। इस प्रकार सारे जगत का स्वामी ईश्वर ही है। इस सम्बन्ध में गीता में स्पष्ट कहा गया है—”मया ततामिदं सर्वं जगदव्यक्त मूर्तिना” अर्थात् मेरी अव्यक्त मूर्ति से वह सारा जगत् कपड़े के ताने बाने की भाँति बना हुआ है। कपड़े में ताने-बाने के सिवाय कुछ नहीं होता। जगत् में भी जो कुछ है सब ईश्वर अव्यक्त अप्रकट होते हुये भी जगत् रूप से प्रकट है। यह एक बड़ी ही आश्चर्य की बात जान पड़ती है, पर वास्तव में ईश्वर प्रकट भी है और अप्रकट भी।

भक्ति

गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति का समन्वय है। भक्ति से किया हुआ कर्म मीठा हो जाता है। माता अपनी सन्तान के लिये क्या-क्या कष्ट नहीं भोगती। जब बालक माता की गोद में आ बैठता है, तो उसे कितना सुख मिलता है। पर सब प्रकार के साँसारिक सुखों की प्रतिक्रिया में दुख भी रहता है। जिनकी सन्तान बीमार हो जाती है या मर जाती हैं,उन्हें कितना और कैसा गहरा दुख होता है? साँसारिक प्रेम में सुख भी है और दुख भी विचारशील मनुष्य ऐसा प्रेम चाहता है जिसमें प्रतिक्रिया न हो। ऐसा प्रेम सदा एक रस रहने वाले ईश्वर से ही हो सकता है। उसी प्रेम को ‘भक्ति’ कहते हैं। भक्ति का एक रूप जनता की निःस्वार्थ सेवा है; क्योंकि भगवान सर्वव्यापक है।

गीता के 11वें अध्याय में अर्जुन को प्राप्त भगवान के विश्व रूप दर्शन का वर्णन है। अर्जुन ने संसार की सारी महानता, संसार की सारी सुन्दरता, महानता भगवान में देखी। ऐसे रूप के दर्शन हम कैसे कर सकते हैं। केवल प्रभुभक्ति ही यह फल दे सकती है, और उस भक्ति का फल केवल दर्शन नहीं वरन् भगवान का ज्ञान और उनमें प्रवेश करके उन्हीं का सा हो जाना है।

इस प्रकार मनुष्यों को सन्मार्ग दिखलाकर साँसारिक बन्धनों से छुड़ाने की दृष्टि से गीता अद्वितीय है और उसका अनुशीलन हमारे लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी है।


हमारे व्रत धारण की पृष्ठभूमि

अखण्ड ज्योति के गत अंक में पाठकों और परिजनों को केवल एक पत्रिका के पाठक न रह कर नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान के महान मिशन को सफल बनाने में सहयोग देने का आह्वान किया गया। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसका समुचित स्वागत किया है।

वह जीवन ही क्या, जिसमें परमार्थ के लिए कोई स्थान न हो। वह मनुष्य ही क्या जो अपने पीछे कुछ आदर्श और अनुकरणीय उदाहरण न छोड़ जाय। मानव जीवन की जिम्मेदारी महान है। केवल आजीविका उपार्जन करते रहना यह तो निर्जीव जीवन है। जिनके भीतर कुछ चेतना, जागृति एवं ज्योति होती है उनका जीवन क्रम केवल साँसें पूरी करने में समाप्त नहीं होता उनकी अन्तरात्मा स्वयं ऊँची उठती है और दूसरों को ऊपर उठाने में अपने लक्ष की पूर्ति अनुभव करती है।

यों भौतिक दृष्टि से अपने आपको अधिक शक्ति ,संपत्ति एवं सत्ता से सम्पन्न बनाने में अनेकों लोग सफलता प्राप्त कर लेते हैं। जो ऐसी सफलता नहीं भी प्राप्त कर पाते वे भी इसके लिए जी तोड़ प्रयत्न करते ही रहते हैं। अधिक धनी मानी बनने के लिए कौन प्रयत्न नहीं करता, यह तो चींटी और दीमक भी करती हैं। पर धन्य उसी का जीवन है जिसने अपनी अन्तरात्मा के सद्गुणों को विकसित करने में सफलता पाई-जिसने अपने समाज को, राष्ट्र को, विश्व मानव को अधिक गौरवान्वित अधिक सुख शान्तिमय परिस्थितियों में पहुँचाने का प्रयत्न किया। यही जीवन दर्शन है। जिसने इस तथ्य को समझा और व्यावहारिक जीवन में क्रियान्वित किया वस्तुतः वही सच्चा बुद्धिमान है। यों हर आदमी अपने को चतुर और बुद्धिमान कहता है पर इस क्षण-भंगुर शरीर के समाप्त होने पर जिन गतिविधियों के लिए आत्मा को पश्चात्ताप नहीं प्रसन्नता अनुभव हो, वस्तुतः सच्ची बुद्धिमत्ता वही है।

अखण्ड-ज्योति परिवार विवेकवानों का-सहृदय और सद्भावना युक्त सज्जनों का एक कौटुम्बिक संगठन है। जो लोग अखण्ड ज्योति को एक अखबार मानते हैं और इसके पाठकों को “कुछ बाँचने के शौकीन” मानते हैं वे वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित ही कहे जा सकते हैं। सच बात यह है कि अखण्ड ज्योति एक विचार दीपक है जिसके प्रकाश में दुनिया के कौने-कौने में से ऐसे लोग खोजकर एक सूत्र में पिरोये गये हैं—जिनमें आत्मकल्याण एवं परमार्थ की समुचित भावना विद्यमान है। इस प्रकार की एक–सी अभिरुचि एवं प्रकृति के लोगों का एक कौटुम्बिक संगठन ही अखण्ड ज्योति परिवार है। सद्ज्ञान की—विवेक एवं सद्विचारों की देवी—गायत्री—और सत्कर्म-परमार्थ एवं आदर्शवाद के प्रतीक-यज्ञ-देवता को उपास्य मानकर यह परिवार अपने विचारों और कार्यों को उस दिशा में प्रस्फुटित करता है, जिसमें मानव जीवन की सच्ची सफलता सन्निहित है। अखण्ड ज्योति पत्रिका द्वारा ऐसी ही चेतना एवं प्रेरणा देने का प्रयत्न किया जाता रहता है।

गत बीस वर्षों में ‘अखण्ड ज्योति’ परिवार द्वारा सद्विचारों के प्रचार एवं सज्जनों को इस पत्रिका के माध्यम से एक संगठित सूत्र में पिरोने का काम किया है। यह कार्य सचमुच ही महत्वपूर्ण है। पर केवल इतने तक ही सीमित रहने से काम न चलेगा। हमारा उदीयमान राष्ट्र- अज्ञानान्धकार की लम्बी रात्रि को पार करके आशामयी ऊषा का दर्शन करने में समर्थ हुआ है। इस पुनीत बेला में जब सब ओर निर्माण की पुकार है तब हम अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन भी चुपचाप नहीं बैठ सकते। पिछले अन्धकार युग में जहाँ हमारी विभिन्न प्रकार की क्षति हुई है वहाँ नैतिक और साँस्कृतिक क्षति भी कम नहीं हुई। इन जख्मों को पूरा करने के लिए जिस मरहम की आवश्यकता है उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

सोमनाथ के टूटे हुए मन्दिर की हमने प्रचुर धन व्यय करके मरम्मत कर ली। प्राचीनकाल जैसा न सही—कम से कम टूटे हुए खंडहर की हीन दशा में पड़ा रहने देने से, उसे संभाल लिया। क्या भारत माता का नैतिक एवं साँस्कृतिक मंदिर ऐसा ही टूटा पड़ा रहेगा? नहीं, इसकी भी मरम्मत करनी होगी। प्राचीन काल के ऋषियुग जैसी स्थिति तक न पहुँचा जा सके, तो भी इतना तो करना ही होगा कि हमारा समाज संसार के अन्य समाजों की अपेक्षा सच्चरित्रता में, सद्गुणों में, सज्जनता में, सत्कर्मों में पीछे न रहे। हम सदा से अग्रिणी रहे हैं। संसार का मार्गदर्शन करते रहे हैं, सारे मानव समाज को अपने उच्च आदर्शों में अनुप्राणित करते रहे हैं। हमारे लिए यह उचित न होगा कि भारत की इस मूलभूत विशेषता को अस्त-व्यस्त, नष्ट-भ्रष्ट पड़ा रहने दें। सोमनाथ मंदिर से भी अधिक गौरवमयी हमारी साँस्कृतिक महानता खेदजनक अवस्था में पड़ी रहे तो यह हम सबके लिए एक लज्जा की ही बात होगी।

अखण्ड ज्योति परिवार को अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान है। शत्रु चढ़ आये और सेना हाथ पर हाथ रखे बैठी रहे, आग से घर जलते रहें और ‘फायर ब्रिगेड’ वाले खड़े तमाशा देखते रहें, दंगा होता रहे और पुलिस वाले हंसते रहें, तो यह उसके लिए एक बड़ी लज्जा की बात होगी। जो जिस कार्य का विशेष रूप में उत्तरदायी है उसकी उपेक्षा असहनीय होती है। वे साधारण लोग जिनके ऊपर विशेष उत्तरदायित्व नहीं है, यदि उपेक्षा करें तो क्षमा किये जा सकते हैं पर वे समझदार और जिम्मेदार लोग जो उन बुराइयों को रोक सकते हैं, न रोकें—जो लाभ पहुँचा सकते हैं वे न पहुँचावें तो निश्चय ही—उन्हें अधिक अपराधी माना जायगा। खेती सूखती रहे और नहर का पानी, सींचने के लिए उपलब्ध न होने दे तो उस अफसर की निन्दा ही की जायगी। अखण्ड ज्योति परिवार की भी यही स्थिति है, उसके पास वह व्यक्ति हैं-वह सामान है-जिनके द्वारा इस महान राष्ट्र की महान नैतिक एवं साँस्कृतिक परम्पराओं को पुनः प्रतिष्ठापित किया जा सकता है। यदि हम लोग आलस्य एवं उपेक्षा वश अपने कर्तव्य में विमुख होते हैं तो कर्तव्यहीनता के वैसे ही अपराधी बनते हैं जैसा कि एक फौजी कप्तान युद्ध के आवश्यक कर्तव्यों की उपेक्षा करने पर ‘कोर्ट मार्शल’ का दंड पात्र बनता है। उपेक्षा, लापरवाही और कर्तव्य हीनता भी विशिष्ट व्यक्तियों के लिए उतना ही बड़ा अपराध है जितना सामान्य व्यक्तियों के लिए चोरी, लूट, हत्या आदि दुष्कर्मों को भयंकर कुकृत्य समझा जाता है।

हम इस युग निर्माण की महत्वपूर्ण बेला में अपने रोजमर्रा के साधारण कार्यों से फुरसत न मिलने का बहाना बनाकर अपनी उपेक्षा एवं अश्रद्धा पर पर्दा डालने के प्रयत्न में देर तक सफल नहीं हो सकते। इस आत्म वंचना को कोई स्वीकार नहीं कर सकता। फुरसत उस काम के लिए नहीं मिलती, जिसे हम सबसे अधिक बेकार मानते हैं। जो कार्य अपनी दृष्टि में महत्वपूर्ण जँचते हैं उन्हें प्राथमिकता देते हैं और उनके लिए समय सबसे पहले मिलता है। पैसे की तंगी हो तो भी जो कार्य आवश्यक प्रतीत होते हैं उनके लिए अन्य खर्चें कम करके, यहाँ तक कि रोटी कपड़े में भी कमी करके, कर्ज लेकर भी उसे पूरा करते हैं। पर यदि कोई बात बेकार जंचे तो उसके लिए एक दो पैसा खर्च करना भी पहाड़ जैसा मुश्किल मालूम पड़ता है। आधा घंटे का समय मिलना भी कठिन दिखता है। यह एक स्पष्ट सच्चाई है। इसे छिपाया नहीं जा सकता है। अपने आपको धोखा देकर आत्म वंचना करते रहने से अपना मन समझाया जा सकता है कि “क्या करें, हमारी परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थीं कि अमुक शुभ कार्य करते।” पर वस्तुतः ऐसी बात बिलकुल भी नहीं है। हमें किसी कार्य का महत्व सच्चे मन से स्वीकार हो और उसे करने की सच्ची लगन हो, तो कठिन से कठिन परिस्थिति में भी पर्याप्त साधन मिल सकते हैं।

राजा परीक्षित, केवल सात दिन की अवधि मिल जाने पर जीवन लक्ष पूरा करने में सफल हो गया था। शर शैया पर कराहते हुए भीष्म धर्मोपदेश करते रहने के लिए बहुत दिन तक शरीर धारण किये रहे। राजा कर्ण को युद्धस्थल में मृत्यु के मुँह में पड़ा होने पर भी ब्राह्मण को दान देने के लिए दाँतों में लगी सोने की कील मिल गई थी। सात दिन के भूखे उशस्ति-परिवार ने अपनी थाली में आई हुई रोटियाँ अपने से अधिक भूखे अतिथि चाँडाल को देकर-स्वयं भूखा रहना स्वीकार कर लिया था। इससे अधिक विपन्न परिस्थिति किसी की नहीं हो सकती। अश्रद्धा से, उपेक्षा से, आलस्य से यदि हम लड़ सकें तो अवकाश की साधनों की रंच भर भी कमी हमें नहीं रह सकती, यह अक्षरशः सत्य है।

वह अवसर अब आ गया—जब कि राष्ट्र के नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए हमें कटिबद्ध होना है। हमें स्वाध्याय की अभिरुचि है अखंड-ज्योति पढ़ते हैं—सो ठीक है। दैनिक भजन गायत्री उपासना करते हैं—सो भी ठीक है। साधु सज्जनों का मान सम्मान करते हैं सो भी उत्तम है। तीर्थ, व्रत, पूजन कीर्तन दान पुण्य करते हैं सो भी सराहनीय है। पर इतने तक ही सीमित हो जाने से काम चलने वाला नहीं है। यह साधन हैं—लक्ष नहीं। लक्ष तो आत्म कल्याण है। यह सभी उपचार, आध्यात्मिक दृष्टिकोण सद्गुण एवं सत्प्रवृत्तियाँ के विकसित करने के लिए है। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम नियमित रूप से आत्म चिन्तन करें, अपने दोषों को ढूंढ़ निकालें और उनके स्थान पर स्वभाव में सात्विक तत्वों का समुचित मात्रा में समावेश करें। यह कार्य केवल विचारते रहने या पुस्तकें पढ़ते रहने से ही न हो सकेगा। कुछ सक्रिय कार्य करना पड़ेगा। सक्रिय कार्यों के करने में ही मनःभूमि पर गहरी छाप पड़ती है और उसका संस्कार बनता है। क्रिया के अभाव में सद्भावना भी केवल एक कल्पना या आकाँक्षा ही रह जाती है, उसकी न तो भीतर कोई छाप पड़ती है और न संस्कार बनता है।

आत्म कल्याण चाहने वालों के लिए जहाँ कथा कीर्तन, तीर्थ व्रत, जप, हवन आवश्यक हैं वहाँ सक्रिय समाज सेवा भी आवश्यक है। लोक सेवा से मुँह मोड़कर केवल भजन ही करते रहना न तो युक्तियुक्त है और न उससे लक्ष की प्राप्ति हो सकती है। प्राचीनकाल के एकोंएक ऋषि मुनियों का जीवन इस बात का साक्षी है कि उनने जितना समय भजन साधन में लगाया उससे कहीं अधिक श्रमदान कल्याण के लिए धर्मप्रचार एवं रचनात्मक सेवा कार्यों में किया है। यही परम्परा हमारे लिए भी अनुकरणीय हो सकती है।

सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ के मंगलाचरण के साथ-साथ अखण्ड ज्योति परिवार ने राष्ट्र के नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का व्रत लिया है। अपना परिवार इस व्रत को लेकर ‘व्रतधारों’ बना है। इस व्रत से हम सब बँधे हुए हैं। अब पीछे हटने में न तो शोभा है और न सम्मान। जन समाज के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाने, धार्मिकता, आस्तिकता- सहिष्णुता-विवेक शीलता, सामूहिकता, सदाचार, संयम, श्रम और सेवा की प्रवृत्तियों को विकसित करने का व्रत हमने आवेश में, उत्साह में या जल्दबाजी में नहीं लिया है। परिस्थितियों ने हमारे कंधे पर डाला है, इस जिम्मेदारी से हम इनकार नहीं कर सकते। वे प्रबुद्ध आत्माएं जिनमें त्याग और परमार्थ की-धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की चेतना मौजूद है उनका यह परम पवित्र कर्तव्य है कि जनसाधारण में इन तत्वों का विकास करें। जो अमीर स्वयं अमीरी भुगते और गरीबों को उसका कुछ भी लाभ न दे उस अमीरी को धिक्कार है। इसी प्रकार जो विवेकशील धर्म प्रेमी अपनी ही आत्मा से धर्म की ज्योति जलाते रहे दूसरों को उस स्वर्गीय स्थिति का आस्वादन कराने के लिए कुछ प्रयत्न न करें—उस धार्मिकता को धिक्कार है। इस आत्म धिक्कार से बचने के लिए ही अखण्ड ज्योति परिवार की प्रयुद्ध आत्माओं ने धर्म जागरण के लिए व्रत लिया है। हमारी आध्यात्मिक जिम्मेदारी एवं कर्तव्य बुद्धि ने ही हम सबको व्रतधारी बनने के लिए प्रेरित किया है। यह कोई आवेश या अत्युत्साह नहीं है।


योजना कठिन नहीं-सरल है।

अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन अब साधारण स्वाध्यायशील धर्म प्रेमी ही न रहें ऐसी हमारी आंतरिक इच्छा है इस संस्था ने युग निर्माण का परम पुनीत व्रत लिया है इसे सफल बनाने में हम सब शक्ति भर प्रयत्न करें।

पिछले अंक में (1)आत्म निर्माण (2) जनजागृति (3)रचनात्मक कार्यों का विस्तृत कार्य-क्रम प्रकाशित किया गया था। उसकी रूप-रेखा बड़ी है। हमारा राष्ट्र बहुत बड़ा है,उसमें समस्यायें भी बड़ी हैं उसके उत्थान के लिए छोटी, सीमित एवं एकाँकी योजना नहीं बन सकती। बड़े कार्यों का ढंग भी बड़ा ही होता है। हमारी युग निर्माण योजना में यदि अनेक कार्य-क्रमों का समावेश है तो यह स्वाभाविक ही है, इसमें आश्चर्य- जनक कोई बात नहीं है।

योजना जितनी बड़ी है, उतनी ही सरल भी है। यह कैसे पूरी हो सकेगी इस संबंध में चिन्ता करने का कुछ कारण नहीं है। कालचक्र पलट रहा है, जिन्हें विवेक की सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त है वे स्पष्ट देख रहे हैं कि अज्ञान के अन्धकार का युग बीत गया अब प्रकाश की—जागृति की-नव निर्माण की पुण्य-बेला आरंभ हो रही है। समय बड़ा बलवान है। वह पलटता है तो व्यक्ति भी बदलते हैं और परिस्थितियाँ भी परिवर्तित हो जाती हैं।

जो होने जा रहा है, उसमें सहयोग देकर श्रेयलाभ करना बुद्धिमत्ता ही है। राजनैतिक स्वतंत्रता आने वाली थी, उसे लाने में जिनने योग दिया वे आज नेता महापुरुष और युग निर्माता के नाम से सम्मानित किये जाते हैं। जो समय को न पहचान सके, अपनी व्यक्तिगत समस्यायें सुलझाने में इन स्वराज्य सेवकों से भी अधिक कष्ट सहते रहे वे आज पछताते हैं। उनकी व्यक्तिगत समस्यायें भी न सुलझ सकीं और एक बड़े सौभाग्य से वंचित रह गये। इस दुहरी हानिकारक स्थिति से उन्हें पश्चाताप होता है। जिन्होंने समय के साथ चलने का साहस किया वे प्रसन्न है उनकी व्यक्तिगत समस्यायें भी किसी प्रकार हल हो ही गई और वीर पुरुषों की गणना में अपने को गौरवान्वित करके जो आत्म संतोष पाया वह अतिरिक्त लाभ उपलब्ध रहा।

यह निश्चित है कि हमारा व्यक्तिगत चरित्र आज जिस गिरी हुई स्थिति में है कल उसमें नहीं रहेगा। उसे ऊँचा उठाना ही है। यह ठीक है कि स्वराज्य प्राप्त होने के बाद इन दस वर्षों में अनैतिकता ने सब क्षेत्रों में पैर बढ़ाये हैं, पर यह फैलाव चिरस्थायी नहीं है; प्रतिरोध की वह शक्तियाँ जन्म ले रही हैं; विकसित हो रही हैं जो इस बढ़ती हुई अनैतिकता को रोकेंगी और उसे घटने के लिए विवश कर देंगी। लम्बे लंघन में से उठकर अच्छा हुआ रोगी यह सोचता है कि सभी स्वादिष्ट पदार्थ जितनी जल्दी हो सके खा लूँ। उसकी नीयत खराब हो जाती है चिकित्सक और परिचारकों के पंजे में से छूटते ही लंघन के दिनों में जो मन मारना पड़ा था, छोटी-छोटी स्वादिष्ट चीजों से वंचित रहना पड़ा था अब थोड़ी सुविधा मिलते ही वह जल्दी-जल्दी उस विवशता की पूर्ति करना चाहता है और जो कुछ स्वादिष्ट मिलता है उसे ही बिना मात्रा, आवश्यकता एवं लाभ हानि का विचार किये मन मानी खाना चाहता है। यही बात आज हमारे जन समाज की है।

स्वाधीनता प्राप्त होने से मन का साहस बढ़ा, विदेशी शासन चला जाने से शासन की उन्नति कम हुई, गान्धी जैसे प्रकाश-दीप के बुझ जाने और हमारे वर्तमान पथ-प्रदर्शकों द्वारा अपने अच्छे उदाहरण उपस्थित न कर सकने के कारण जन साधारण की नीयत डावाँडोल हो गई है। भ्रष्टाचार एक क्षेत्र में नहीं, सभी क्षेत्रों में बढ़ा है, इसे स्वीकार करने में कुछ आपत्ति नहीं की जा सकती। पर इसमें निराशा की कुछ बात नहीं है। लंघन से उठा रोगी सर्वथा विवेक विहीन नहीं होता। उसे स्वयं भी समझ आती है और उसके हितैषी ऐसी अनियन्त्रित गड़बड़ी करने से उसे रोकते भी हैं। उसकी वह बेवकूफी देर तक चलती नहीं रह सकती, अन्ततः समझदारी ही जीतती है। पिछले दिनों जो अनैतिकता बढ़ी है वह देर तक नहीं चलेगी उसे सीमाबद्ध होना ही है-उसे घटना और हटना ही पड़ेगा। समझदारी और प्रतिरोध की चेतना उसे उसके लिए विवश करके मानेगी।

व्यक्तिगत अनैतिकता की ही भाँति सामाजिक कुरीतियाँ भी एक समस्या हैं। लम्बी विदेशी पराधीनता ने हमारे सामाजिक स्तर को, भावना क्षेत्र को बहुत गिराया। इस गिरावट से जो चोटें लगीं, घाव हुए वही सामाजिक कुरीतियों के रूप में सामने मौजूद हैं। इनके द्वारा जो अपार क्षति हो रही है, प्रगति में बाधा पड़ रही है, उसकी भयंकरता को सोचकर रोमाञ्च खड़े हो जाते हैं। एक छोटी सी कुरीति को लीजिए—”पर्दा”। मुसलमानी शासन काल में बहिन बेटियों का सतीत्व सुरक्षित न था, आत्म रक्षा के सामयिक उपाय की तरह तथा शासकों की संस्कृति में पर्दा मौजूद रहने से उनके अनुकरण के रूप में भारत में भी पर्दा अपनाया गया। उस समय वह बात किसी हद तक ठीक भी थी, पर आज जब वैसी आवश्यकता नहीं रही तो भी एक चिन्ह पूजा एवं रूढ़ि के रूप में उसे जारी रखना, समाज के आधे अंग—नारी को लुँजपुँज बनाये रखना है।

जिस समाज का आधा अंग सर्वथा अविकसित हो, अपनी सुरक्षा एवं आजीविका के लिए भी जिसे दूसरों पर अवलंबित रहना पड़े, वह राष्ट्र पर एक प्रकार से भार ही है। इस स्थिति को न बदला जाय तो नारी के द्वारा समाज के विकास में योग देना तो दूर उसकी सुरक्षा एवं भरण पोषण में ही पुरुष की शक्ति समाप्त होती रहेगी। नारी को सुविकसित एवं स्वावलम्बी बनाया जाना आवश्यक है, पर पर्दे की मान्यता जो हमारे मस्तिष्कों में जड़ जमाये हुए हैं वह रूढ़ि नारी के विकास मार्ग में चट्टान की तरह अड़ गई है। यदि उसे न हटाया जाय तो यह निश्चित है कि जिस प्रगति की आवश्यकता है उसे प्राप्त करने में शताब्दियाँ लग जायेंगी।

प्रसंगवश पर्दा प्रथा की चर्चा कर दी गई। ऐसी ही अनेकों कुरीतियाँ हैं जो हमारे सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन के लिए अभिशाप बनी हुई हैं। नशेबाजी में प्रतिदिन लगभग बीस लाख रुपया खर्च होता है। यह रकम इतनी बड़ी है जिसे बचाकर हम वर्तमान स्कूल कॉलेजों की अपेक्षा तीन गुने अधिक विद्यालय खोल सकते हैं। अपनी शिक्षा समस्या हल कर सकते हैं। इतना ही नहीं—नशेबाजी द्वारा होने वाली स्वास्थ्य की बर्बादी को रोककर उत्पादन बढ़ा सकते हैं और दवादारु का खर्च घटा सकते हैं। यह तो नशेबाजी का आर्थिक पहलू हुआ, उसके द्वारा शारीरिक अस्वस्थता के कारण व्यक्ति को पीड़ा सहनी पड़ती है, अल्पायु में जीवन समाप्त होने से पीछे स्त्री बच्चे अनाथ रह जाते हैं, तथा नशे के द्वारा मानसिक एवं चारित्रिक गिरावट का भी हिसाब लगाया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि यह एक छोटी सी नशेबाजी की सामाजिक बुराई कितनी भयंकर है। इसे रोकने का प्रयत्न न किया जाय तो हमारी बर्बादी का भयंकर मार्ग खुला पड़ा रहेगा।

यद्यपि नशीली चीजों में कोई मीठा, नमकीन बढ़िया स्वाद नहीं होता—उलटी वे कड़ुई कसैली होती हैं फिर भी आदत से लाचार होकर लोग उन्हें पीते हैं और धन, धर्म तथा स्वास्थ्य की होली फूँकते हैं। यह आदतें ही हैं जो मुश्किल से छूटती हैं। मनुष्य में एक भारी दुर्बलता यह है कि जिस विचार, विश्वास या व्यवहार को कुछ दिन अपनाये रहता है वे उसके मन में बस जाते हैं, फिर वे न तो उसे बुरे लगते हैं, और न उन्हें छोड़ने की तबियत होती है। इसके विपरीत यदि कोई उन्हें छोड़ने को कहे तो उलटा बुरा लगता है और उस दोष बताने वाले से लड़ने को जी होता है। बुरी आदतें एवं बुरी मान्यताएं भी जब बहुत दिनों सहचरी रहती है तो वे एक प्रकार से प्रिय और मधुर लगने लगती हैं, उन्हें अपनाने के कई तर्क, कई कारण, कई उदाहरण ढूंढ़ निकालते हैं। बहुत बार तो इन बुरी बातों के पक्ष में शास्त्र प्रमाण तक ढूंढ़ निकाले जाते हैं।

दहेज की बुराई से हर बाल बच्चेदार आदमी परिचित है। मृतक भोज भी जंगली प्रथा है जिसमें एक आदमी मरे उसकी खुशी में माल मलीदे उड़ाये जायं, यह वस्तुतः मनुष्यता की लज्जित करने वाला रिवाज है। घर का एक व्यक्ति मरा साथ ही लम्बे प्रीतिभोज में घर की कुर्की हो गई। यह दुहरी क्षति उन शोक संतप्त लोगों को कितनी महंगी एवं कष्ट कारक हो सकती है इस बात को मामूली समझ का आदमी भी अनुभव कर सकता है। पर चूँकि यह प्रथाएं चल रही हैं, नशेबाजी की आदत की तरह मान्यताएं और भावनाएं भी आदत में घुल जाती हैं तो फिर उन्हें छोड़ने का साहस नहीं होता। ऐसी बीसियों कुरीतियाँ हमारे समाज में जड़ जमाये हुए हैं। इन्हें यदि इसी रूप में रहने दिया जाय, बदलने का प्रयत्न न किया जाय तो वह दुर्बलताएं ही हमें ले डूबेंगी। प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध पड़े रहेंगे।

व्रतधारी आन्दोलन व्यक्तिगत एवं सामाजिक दुष्प्रवृत्तियों के संशोधन का आँदोलन है। व्यक्तिगत चरित्र में, आदर्श लक्ष्य एवं दृष्टिकोण को ऊँचा उठाया जाना आवश्यक है। यह हमारी संस्कृति एवं सभ्यता के अनुरूप है। युग युगान्तरों में यह देवताओं का देश रहा है। अब हम दुश्चरित्र एवं कुमार्ग गामी कहलावें, दीन हीन स्थिति में पड़े रहें, हमारी भावनाएं और आकांक्षाएं घटिया हों तो यह हमारे लिए लज्जा की बात होगी। हमारा राष्ट्रीय, साँस्कृतिक एवं सामाजिक गौरव इसी में है कि इस देश का बच्चा बच्चा मनुष्यता के आदर्शों को समझने वाला, उन्हें अपने अन्दर धारण करने वाला और उनकी रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी करने की हिम्मत रखने वाला हो। गुण, कर्म और स्वभाव की दृष्टि से हमें ऐसा सुसंस्कृत होना चाहिए कि प्रत्येक भारतीय अपनी आत्मा की दृष्टि में और सारे संसार की दृष्टि में महापुरुष परिलक्षित हो।

व्यक्ति भौतिक दृष्टि से साधन सम्पन्न बनें यह प्रयत्न होना ही चाहिए पर यदि चारित्रिक दृष्टि से गुण-कर्म और स्वभाव की दृष्टि से ऊँचे न उठ सके तो यह भौतिक उन्नति हमें सुख शान्ति उपलब्ध कराने के स्थान पर उलटे फिजूल खर्ची, विलासिता एवं उच्छृंखलता के कुमार्ग पर भटका देगी। इसलिए आज की यह महत्वपूर्ण आवश्यकता है कि व्यक्तिगत चरित्र को उज्ज्वल बनाने के लिए सामूहिक एवं संगठित प्रयत्न किये जायं।

इसी प्रकार सामाजिक कुरीतियों को हटाकर उन स्वस्थ परम्पराओं की पुनः प्रतिष्ठापना करनी है जो लाखों करोड़ों वर्ष तक इस देश के सामाजिक जीवन की प्रधान अंग रही हैं। भारतीय संस्कृति की मूल मान्यताएं एवं परंपराएं विवेक, आदर्शवाद एवं देश काल पात्र की अनुकूलता पर आधारित रहती हैं। समयानुसार सुधार एवं परिवर्तन के लिए उनमें पूर्ण गुंजाइश रखी गई है। आज की परिस्थिति के अनुरूप आवश्यक सुधार एवं हेर-फेर करना हमारे धार्मिक आदर्शों के सर्वथा अनुकूल है। ऐसा समय समय पर होता रहा है और होना चाहिए। इसके आदेश एवं प्रमाणों से हमारे शास्त्रों का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है।

व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में व्याप्त अनैतिकता एवं कुप्रवृत्तियों को हटाकर विवेक एवं सदाचार से परिपूर्ण स्वस्थ परम्पराओं की स्थापना करना आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। युगनिर्माण का यही प्रमुख आधार है। नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के अंतर्गत हमें यह दो ही कार्य करने हैं। छोटे मोटे अन्य सभी कार्यक्रम इन दो बातों के अंतर्गत आ जाते हैं।

हममें से प्रत्येक व्रतधारी को यह समझ लेना है कि अपनी व्यक्तिगत दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करने के लिए कुछ न कुछ प्रयत्न नियमित रूप से करते रहना है। यह प्रयत्न अपने तक भी सीमित नहीं रखना है वरन् अधिकाधिक लोगों को इस प्रक्रिया से लाभान्वित करना है। जो बुराइयाँ सामाजिक रूप धारण कर चुकी हैं उन्हें भी इस प्रकार सुधारना है जिस प्रकार कि हम अपने आत्मनिर्माण के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को अधिक स्वस्थ, अधिक पवित्र एवं अधिक विवेक सम्मत बनाने का प्रयत्न आरम्भ करने—उस दिशा में धीरे तेज जैसे भी बन पड़े उस गति से चलने का हमारा व्रत है। इस व्रत का पालन कुछ भी कठिन नहीं है। यह बहुत ही सरल है। बशर्ते कि इन दो आवश्यक तथ्यों को अपने दैनिक जीवन के आवश्यक कार्यों में सम्मिलित कर लें।


अब हम लोग कदम-कदम मिलाकर चलेंगे।

यों देखने में मनुष्य हाड़ माँस का पुतला है तथा उसका बुद्धि-बल बहुत मामूली सा लगता है। इतना मामूली कि उसके बूते अपने निज के शरीर और परिवार से संबंधित समस्याएं भी नहीं सुलझतीं। परन्तु यदि उसकी अन्तर-भूमि अपनी शक्ति और प्रतिभा का सही मूल्याँकन करले एवं उसका ठीक उपयोग करने से तत्पर हो जाय तो निश्चय ही बड़े से बड़े कार्यों का पूर्ण हो सकना बहुत ही सरल है। जीवन में जितनी भी कठिनाइयाँ, त्रुटियाँ एवं असफलताएं दिखाई देती हैं उनमें से अधिकाँश का कारण अपनी मानसिक दुर्बलता ही होती है। जो मानसिक दृष्टि से दुर्बल है वस्तुतः वही दुर्बल है। जिसकी अन्तरात्मा शक्ति सम्पन्न है उस बलशाली का सामर्थ्य से बाहर कुछ भी कार्य नहीं है।

अखण्ड ज्योति परिवार ने जो व्रत लिया है क्या वह उसके लिए कठिन है? नहीं-कदापि नहीं! प्रबुद्ध अन्तःकरण से सम्पन्न धर्म-परायण आत्माएं ही सदा से चारित्रिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का कार्य सम्पन्न करती रही हैं। इतिहास की इस परम्परा को दुहराना हमारे लिए कठिन है यह सोचना बिलकुल अनुचित है। यह कार्य तो ब्राह्मण संस्थाएं ही पूर्ण करती रही हैं। इसे हमीं पूरा करेंगे, यह हमारी ही जिम्मेदारी है।

यह आवश्यक नहीं कि इस परिवार के सभी लोग घर बार छोड़कर इस धर्मोत्थान के कार्य में ही जुट पड़ें। निस्संदेह ऐसी आत्माओं की भी आवश्यकता है, जिनमें उतना आत्मबल मौजूद है वे इस प्रकार का आत्म त्याग कर चुकी हैं, करने जा रही हैं। पर ऐसी आशा सबसे नहीं की जा सकती। फिर भी हर व्यक्ति कुछ न कुछ तो इस संबंध में कर ही सकता है। हमारा एक ही आग्रह है कि कोई भी हमारा परिजन ऐसा न रहे जो इस युग निर्माण योजना में कुछ भी भाग न लेता हो, सर्वथा उदासीन हो। यह सहयोग कितना ही थोड़ा क्यों न हो पर होना अवश्य चाहिए, इस योजना में कितना ही कम भाग क्यों न लिया जाय पर भागीदारी तो रहनी ही चाहिए।

किसी कार्य को संकल्पबद्ध होकर करने से विचारों में निष्ठा एवं कार्य में स्थिरता रहती है। इसी आध्यात्मिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए हिन्दू धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य में पूर्ण संकल्प कराया जाता है। नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना में सहयोग देने, स्पष्ट भागीदार बनने का संकल्प ही व्रत धारण है। व्रत धारण कर लेने पर कोई व्यक्ति पहले की अपेक्षा अपनी अधिक जिम्मेदारी अनुभव करता है और उस व्रत को निभाने का अपेक्षाकृत अधिक प्रयत्न करता है। इसलिए गत अंग में व्रतधारी के दो संकल्प पत्र लगाये गये थे। एक अपने लिए तथा एक अपने जैसे विचारों का कम से कम एक और व्रतधारी बनाने के लिए। इन संकल्प पत्रों को भर देने में संकोच या उपेक्षा करना उचित नहीं।

कई व्यक्ति सोचते हैं कि “इतने कार्यक्रम जो योजना के अंतर्गत छपे थे उन्हें पूरा करना हमारे बस की बात नहीं, फिर हम क्यों संकल्प पत्र भरें।’ यह विचार सर्वथा अनुपयुक्त है। योजना के अंतर्गत दिये हुए सभी विचारों तथा कार्यों को जो पूरा कर सके वह कोई मनुष्य नहीं वरन् देवता ही हो सकता है। ऐसी आशा किसी से नहीं की जा सकती और न व्रतपत्र में कहीं ऐसा उल्लेख ही है। व्रत केवल इस बात का है कि “हम आत्म निर्माण तथा समाज सुधार के कार्य को अपने अन्य आवश्यक कार्यों की तरह नैतिक कार्यक्रम में सम्मिलित रखेंगे और जितना कुछ न्यूनाधिक प्रयत्न हमसे बन पड़ेगा उतना निरन्तर करते रहेंगे।” क्या यह व्रत कठिन है।

यदि किसी शुभ कार्य के लिए—सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रयत्न करने का भी व्रत न लिया जाय तो निस्संदेह कोई व्यक्ति उस दिशा में कुछ भी कर सकने में समर्थ न होगा। ढिलमिल विचारों का कोई ठिकाना नहीं, आज का जोश कल ठंडा हो जाता है। पर एक बार कोई प्रतिज्ञा शपथपूर्वक कर ली जाय तो भला आदमी उसे निबाहने के लिए शक्तिभर प्रयत्न करता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखकर परिजनों को व्रतशील बनने पर बहुत जोर दिया जा रहा है। हममें से प्रत्येक प्रबुद्ध आत्मा को व्रतधारी बनना ही चाहिए ताकि इस कार्यक्रम को सफल बनाने में उसका योग निरन्तर एवं नियमित रूप में चलता रहे एवं जब शिथिलता आवे तब व्रतधारण का स्मरण उसे पुनः चैतन्य कर दे।

हमारा आरंभिक कार्यक्रम यह है कि नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के प्रत्येक पहलू को हम सब व्रतधारी पूर्णरूप में समझें, उस पर मनन और चिन्तन करें, अपने विचार और विश्वासों को उसी के अनुरूप ढालें। साथ ही इस तैयारी में अपने समीपवर्ती और भी कुछ लोगों को साथ ले लें। यदि ऐसे साथी 7 मिल सकें तो बहुत ही प्रसन्नता एवं सफलता की बात मानी जायगी। पर यह 7 साथी से न्यूनाधिक भी हो सकते हैं।

व्रतधारी धर्म सेवकों की मनोभूमि में नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना में सन्निहित विचारों एवं विश्वासों को गहराई तक प्रवेश कराने के लिए संस्था की ओर से पूरा-पूरा प्रयत्न किया जायगा। अच्छा तो यह होता कि हम स्वयं एक-एक व्रतधारी के साथ साल-साल छह छह महीने रहते और उनके मस्तिष्क में अपनी अन्तर्वेदनाएं एवं भावनाएं उड़ेल देते। अथवा ऐसा होता कि व्रतधारी लोग मथुरा आकर कम से कम वर्ष दो वर्ष मथुरा रहते और हम लोग घुल मिलकर विचार विनिमय करते तथा कुछ करने की व्यावहारिक योजना हर व्रतधारी के लिए बनाते। पर लगता है कि यह दोनों ही बातें कठिन हैं। अधिक व्यक्तियों को कम समय में प्रेरणा देने का कार्य हर व्रतधारी के यहाँ जाकर उनके साथ रहने की योजना द्वारा पूरा नहीं हो सकता। इस तरह तो दस बीस व्यक्तियों की भी सेवा न हो सकेगी। इसी प्रकार कार्य व्यस्त परिजनों से भी यह आशा नहीं की जा सकती कि अपने आवश्यक कर्तव्यों को छोड़कर लम्बे समय तक हमारे साथ रहने का अवकाश निकाल सकेंगे।

तीसरी स्थिति जो व्यावहारिक है वह यही है कि मथुरा रहकर पत्र व्यवहार द्वारा परिजनों के साथ विचार विनिमय जारी रखा जाय और उन्हें कर्तव्य पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रोत्साहन एवं पथ प्रदर्शन पहुँचाने का प्रयत्न किया जाय। चूँकि अपने परिजन बहुत बड़ी संख्या में हैं, उन सबकी नियमित रूप से प्रतिदिन स्याही कलम की सहायता से कार्ड लिफाफों में पत्र लिखना कठिन है। इसलिए यह कार्य ‘प्रेस’ के साधन से सम्पन्न किया जा सकना ही संभव हो सकता है।

गत 20 वर्ष से अब तक इस संस्था में ‘अखंड ज्योति’ पत्रिका निकलती रही है। यह महीने में एक बार हमारे विचार लेकर पाठकों के पास पहुँचती है। यह अवधि बहुत लम्बी है। जो योजना आरंभ की गई है उसके लिए इतनी लम्बी अवधि का पत्र व्यवहार काफी नहीं है। यह विचार विनिमय जल्दी-जल्दी होना चाहिए यह एक वास्तविक आवश्यकता है। इसलिये यह निश्चय किया गया है कि हमारे विचार प्रति सप्ताह अपने स्वजनों के पास पहुँचते रहें। डाक के माध्यम से छपे कागजों में लपेट कर हम हर स्वजन के दरवाजे पर हर हफ्ते उपस्थित हुआ करें।

अब इस संस्था की ओर से चार पत्र प्रकाशित होने लगे हैं (1) अखण्ड ज्योति ता. 1 को (2) जीवन यज्ञ सामाजिक अंक ता. 8 को (3) गायत्री परिवार पत्रिका ता.15 को (4) जीवन यज्ञ धर्म कथा अंक ता. 23 को। इस प्रकार हर हफ्ते एक पत्र प्रकाशित होता है। प्रत्येक अंक में इतने पृष्ठ होते हैं कि एक घंटा प्रतिदिन उन्हें पढ़ा जाय तो एक सप्ताह लग जाता है। इस प्रकार हम इन पत्रों के सहारे प्रत्येक परिजन से एक घंटा रोज सत्संग कर सकेंगे और उन्हें आत्म निर्माण एवं लोक सेवा की आवश्यक प्रेरणा एवं प्रगति प्राप्त करने में सहायक हो सकेंगे।

जीवन यज्ञ अब तक लम्बे अखबारी साइज में निकलता था और उसमें चरित्र बल के ही लेख रहते थे। अब यह परिवर्तन किया गया है कि उसका साइज अखण्ड-ज्योति जैसा ही कर दिया जाय ताकि उसकी भी जिल्द बन सके और पुस्तक रूप में सदा सुरक्षित रखा जा सके। दूसरा परिवर्तन यह किया गया है कि ता. 8 के अंक में समाज सुधार सर्व आत्म निर्माण संबंधी लेख रहा करेंगे और ता. 23 के अंक में धर्मभावनाएं एवं सत्प्रवृत्तियाँ उत्पन्न करने वाली धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथाएं रहा करेंगी। गायत्री परिवार के कार्यक्रम एवं आयोजनों की सूचना गायत्री परिवार पत्रिका में रहा करेगी अभी वह ता. 20 को निकलती है कुछ ही दिनों में उसे ता.15 को निकाला जाने लगेगा ताकि प्रति सप्ताह का क्रम ठीक रहे। इसी प्रकार जीवन यज्ञ के दो भागों को कुछ ही दिनों में अलग-अलग दो मासिकों का रूप दे दिया जायगा। प्रत्येक मासिक सात सात दिन के अन्तर से पहुँचने की व्यवस्था हो जाने से चारों पत्रों को मिलाकर एक साप्ताहिक पत्र माना जा सकता है। यह साप्ताहिक साहित्य निश्चित रूप में प्रत्येक व्रतधारी को उपलब्ध होता रहे ऐसी योजना बनाई गई है। इस आधार पर हम लोग परस्पर विचार विनिमय करने के अत्यंत आवश्यक कार्य को पूरा कर सकते हैं।

जिनके व्रतधारी संकल्प पत्र भर कर आयेंगे उनके लिए यह चारों अंक भेजने आरंभ कर दिये जावेंगे। जिनके पास जो अंक पहुँच रहे हों उसकी सूचना ये व्रतधारी संकल्प-पत्र में लिख देते ताकि वह दुहरा न पहुँचने लगे। इन अंकों को आरंभ से अंत तक पढ़ना और उनमें दिये हुए विचारों पर शान्त चित्त से मनन करना प्रत्येक परिजन का कर्तव्य है। अपनी जैसी धार्मिक अभिरुचि के अपने कुटुम्बी, संबंधी मित्र परिचित ऐसे और ढूंढ़ने चाहिए जिनमें इनके पढ़ने की अभिरुचि हो या पैदा की जा सके।

सद्विचार प्रचार की धर्म फेरी लगाना सच्ची तीर्थ यात्रा का पुण्य फल प्राप्त करना है। सप्ताह के सात दिन होते हैं। एक-एक दिन एक-एक सात धर्म साथी सज्जनों के यहाँ जाकर उन्हें अपनी यह पत्रिकाएं पढ़ने देना फिर एक से वापिस लेकर दूसरे को देने की योजना द्वारा इन सातों में नियमित संपर्क बना रह सकता है। इन धर्म साथियों को केवल पत्रिकाएं देना ही पर्याप्त न होगा वरन् उनसे मित्र भाव बढ़ाना तथा अपने प्रभाव से सन्मार्ग गामी बनाने का प्रयत्न करना भी आवश्यक है। प्रत्येक व्रतधारी इस प्रकार सत धर्म साथी बनाये तो नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का प्रचार देश भर में घर-घर हो सकता है और युग निर्माण के वे स्वप्न सहज ही पूरे हो सकते हैं जो आज बहुत कठिन और कष्टसाध्य दिखाई पड़ते हैं।

अभी आरंभ में व्रतधारियों के लिए इतना ही कार्यक्रम है? विचार निर्माण में ही क्रांति के बीजाँकुर सन्निहित है। विचारों में परिवर्तन करके ही हम किसी के कार्यों में परिवर्तन होने की आशा कर सकते हैं। विचारों के बीज ही समुचित खाद-पानी पाकर सुरभित फल पुष्पों से लदे वृक्ष का रूप धारण करते हैं। योजना के अंतर्गत अनेक रचनात्मक कार्य भी हैं। वे यथा अवकाश सुविधानुसार करने के हैं। दैनिक कार्यक्रम में स्वयं स्वाध्याय करना और दूसरे सात धर्म साथियों तक विचार साहित्य पहुँचाना इतना ही कार्यक्रम रखा गया है। इसे पूरा करने में किसी श्रद्धावान एवं एकाभावी धर्मप्रेमी को कोई कठिनाई हो सकती है। यह कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह कार्यक्रम जितना महत्वपूर्ण है उतना ही सरल भी है।

प्राचीन काल में ब्रह्मा की एक परम्परा थी कि प्रत्येक साधू वह घर-घर जाकर धर्मोपदेश करता था, और एक-एक रोटी हर घर से माँगकर पेट भरता था ताकि अपने शरीर को इस योग्य बनाये रहे कि उसके द्वारा धर्मोपदेश की प्रक्रिया बन्द न हो जाय। निज की साधना तपश्चर्या एवं विद्याध्ययन के अतिरिक्त उनका समय इस धर्म-सेवा के परमार्थ में ही लगता था। इस सनातन, ब्राह्मण परम्परा को हम पुनः आरंभ कर रहे हैं। प्रत्येक व्रतधारी के द्वार पर इन चार अंकों द्वारा प्रति सप्ताह हम पहुँचेंगे और सात दिन के योग्य धर्मोपदेश की विचार सामग्री हम देंगे। दैनिक आधा घंटा तक स्वाध्याय से हमारी बात सुनने का समय हर परिजन को निकालना चाहिए। जो हमें अपना स्नेह भाजन मानते हैं, हमारे प्रति सद्भाव रखते हैं, उन्हें यह साहित्य नियमित रूप से पढ़ने का दैनिक पूजन, भजन की भाँति ही कार्यक्रम बना लेना चाहिए। आधा घंटा हमारी बात सुनने के लिए समय निकालना उनके लिए कुछ कठिन न होना चाहिए। जो हमारे मिशन की महत्ता को समझते हैं या व्यक्तिगत रूप से हमारे प्रति सद्भाव रखते हैं। जिन्होंने व्रतधारण किया है उन्हें नियमित रूप से—उपरोक्त योजना के अनुसार सद्विचार पहुँचाने का कार्य हम निरन्तर करते रहेंगे। ब्राह्मण का जो कर्तव्य धर्मोपदेश देकर अपने यजमानों को सन्मार्ग पर प्रवृत्त करना उन्हें महान् बनाना है। यह कार्य करने के लिए हम तत्पर हो रहे हैं। व्रतधारियों को अपना कर्तव्य पालन करना है। यदि ब्राह्मण दरवाजे पर आवे तो उसका सत्कार करें, अतिथि को घर से भूखा न जाने दे। एकाध रोटी उसे दे दे, जिसके उसकी धर्मोपदेश की शक्ति बनी रहे। भूखा रखने पर तो उसका शरीर ही चलना बन्द हो जाय और अतिथि को विमुख लौटाने का पाप भी लगेगा।

धर्म घट स्थापित करने की योजना गत अंक में छापी गई है। यह प्रत्येक व्रतधारी का आवश्यक कर्तव्य है। एक रोटी जितना अन्न उस धर्म घट में नियमित रूप से प्रतिदिन डालते रहना चाहिए। समझना चाहिए कि यह व्रतोपदेश करने वाले आचार्य जी की दैनिक भिक्षा है। इस भिक्षा से हमारा बुद्धि शरीर-विचार प्रसार संगठन—जीवित रहेगा और यह सेवा क्रम नियमित रूप से चलता रहेगा।

सन्त बिनोवा ने उस दिन अपने प्रवचन में कहा था—”पाँडव पाँच नहीं छह थे। छटा पाण्डव कर्ण था। कुन्ती ने उसे त्याग दिया था। इसके परिणाम स्वरूप महाभारत हुआ। इसलिए आप अपने परिवार में एक दरिद्र नारायण को और सम्मिलित कर उसे अपना भाग दें ताकि पुनः महाभारत की पुनरावृत्ति न हो।”

परिजन हमें भी अपने परिवार का एक सदस्य मानें। घर के सब लोग जितना भोजन करते हैं, उतना न दें तो छोटे बच्चे को जितना प्रेम उपहार दो पैसा प्रतिदिन मिलता है उनका हमें-हमारी संस्था को अवश्य दें। धर्म घट में यह एक मुट्ठी अन्न या दो पैसा प्रतिदिन पड़ता रहे तो वह चारों अंकों की कागज छपाई एक पोस्टेज का मूल्य हो सकता है। यह चारों अंक इस धर्म मुट्ठी के आधार पर जीवित रह सकते हैं और परिजनों को आत्मिक उन्नति में आवश्यक योग देते हुए युगनिर्माण की उस महान् जिम्मेदारी को पूरा कर सकते हैं जो गत सहस्र कुँडी महायज्ञ के अवसर पर इस संस्था ने अपने कन्धे पर उठाई है।

क्या आप इस महान् अभियान में हमारे सहयोगी होंगे? अथवा फुरसत न मिलने, आर्थिक कठिनाई होने आदि का कोई बहाना बनाकर उपेक्षा करेंगे? यह निर्णय आपको अब कर ही लेना है। क्योंकि संस्था महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रही है उसे अपने साथियों की सही स्थिति का पता लगाना ही है ताकि उसी आधार पर मंजिल पार करने की तैयारी की जाय।

—श्रीराम शर्मा आचार्य


दूसरों की प्रशंसा कीजिए, प्रोत्साहन दीजिए

(पं. केशवदेव गोस्वामी)

प्रशंसा प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा होना मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह भूख मानव हृदय में कभी कम नहीं होती है। इस भूख को वास्तविक ढंग से शान्त करने में कोई-कोई व्यक्ति ही सफल होते हैं। सच्चाई, ईमानदारी, सेवा, परमार्थ कार्य आदि से अपने जीवन को महान् बनाने वाला व्यक्ति ही इस भूख को वास्तव में शान्त करता है। प्रशंसा उसके पीछे दौड़ी-दौड़ी फिरती है। संसार को वह नवीन मार्ग प्रदर्शित करता है। गलत मार्ग का अनुकरण करने वाला व्यक्ति प्रशंसा का अधिकारी बनने में असफल रहता है।

किसी की केवल आलोचना ही न करके यदि उसके सद्गुणों की प्रशंसा भी की जाय तो वह हमारा मित्र बन जायगा। दूसरों की अच्छाइयों की प्रशंसा करने की कला मनुष्य स्वभाव की एक अमूल्य निधि है। इससे वह सफलता के अनेकों साधन उपलब्ध करके स्वयं और दूसरों के प्रगतिशील एवं विकसित जीवन का निर्माण कर सकता है। सच्ची एवं उदार प्रशंसा करने का ढंग भी विरले ही व्यक्ति जानते हैं। चापलूसी करना प्रशंसा करना नहीं है। सच्चे हृदय से मनुष्य के गुणों के प्रति प्रेम भरे अपने भाव उद्गारों को जी खोलकर अभिव्यक्त करना प्रशंसा का सच्चा स्वरूप है। इन भाव उद्गारों से प्रशंसा करने वाला तथा पाने वाला दोनों ही आनन्द में डूब जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में प्रशंसा करने के लिए कोई न कोई बात अवश्य होती है। सर्वथा गुणहीन व्यक्ति कोई भी नहीं है। अतः सच्चाई और ईमानदारी के साथ सभी की प्रशंसा करना चाहिए। प्रशंसा का रूप इतना भी नहीं बढ़ा देना चाहिए जिससे कि वह चापलूसी जैसा बन जाय। मिथ्या प्रशंसा या चापलूसी मनुष्य को गलत मार्ग पर ले जाती है और परिणामस्वरूप कहने वाले तथा सुनने वाले का पतन ही होता है। अतः प्रशंसा में सदा ईमानदारी, निष्पक्षता, सच्चाई होना आवश्यक है। चाटुकारिता अर्थात्, चापलूसी; दूसरों को उल्लू बनाने की भावना, स्वार्थ साधन की प्रधानता रखना प्रशंसा करना नहीं वरन् धूर्तता है। इससे उभय पक्षों को हानि एवं अवनति ही उठानी पड़ती है।

प्रशंसा में अवसर एवं विषय की प्रधानता भी महत्वपूर्ण होती है। जब किसी से मिला जाय तो उस व्यक्ति से सम्बन्धित शुभ कार्य, सफलता आदि का ध्यान रखकर उसे बधाई देना नहीं भूलना चाहिए। क्योंकि जब मनुष्य अपनी सफलता एवं शुभ कर्मों के लिए बधाई प्राप्त करता है तो बहुत ही प्रसन्न होकर प्रशंसा करने वाले का मित्र बन जाता है। यदि कोई असफल हो गया हो अथवा कोई दुर्घटना घटी हो तब सच्चे हृदय से अपनी सहानुभूति प्रकट करने में नहीं चूकना चाहिए। भविष्य के लिए उसे उत्साहित करना चाहिए जो व्यक्ति किसी की असफलता, दुःख दर्द में विशेष सहायता न करके केवल सच्चे हृदय से अपनी सहानुभूति भी प्रकट करता है वह उसे प्रियजन एवं अपना निकट सा प्रतीत होता है।

इसी तरह शत्रु की प्रशंसा भी की जाय तो शत्रुता घट सकती है। वशिष्ठ जब चाँदनी रात में बैठे हुए अपनी पत्नी से विश्वामित्र की प्रशंसा कर रहे थे कि “सुन्दरी यह चाँदनी किस तरह चारों ओर छिटक रही है मानों विश्वामित्र की तपस्या ही चारों और छिटक रही है।” इसका परिणाम यह हुआ कि वशिष्ठ, जी के भारी शत्रु एवं उनके बच्चों को मार देने वाले, विश्वामित्र जो उन दोनों को भी मारने के लिए आये थे और कुटिया के पीछे खड़े थे आकर वशिष्ठ मुनि के पैरों में पड़ गये। साराँश यह है कि सच्चे हृदय से एवं मुक्त कंठ से शत्रु की, की हुई प्रशंसा उसे मित्र रूप में बदल कर कृतज्ञ बना देती है।

प्रशंसा कई प्रकार की होती है। जैसे कि रंग-रूप, पराक्रम सत्कार्यों की, सच्चाई ईमानदारी की, व्यक्ति की विशेषताओं का वर्णन। इन सभी बातों को ध्यान में रखकर निष्पक्ष एवं ईमानदारी पूर्वक प्रकाश डालने से क्या बड़े, क्या छोटे सभी तरह के व्यक्ति प्रभावित होते हैं। पुरुष अपनी स्त्री की सुन्दरता, भोजन बनाने की कला, सद्गुण, शीलता आदि की प्रशंसा करके और स्त्री अपने पति के सद्गुण, शुभकर्म, पुरुषार्थ, पराक्रम, ज्ञान, स्वास्थ्य, उपार्जन, चातुरी आदि की प्रशंसा करके एक दूसरे के अधिक सहयोगी एवं अधिक घनिष्ठ हो सकते हैं।

बच्चे तक भी प्रशंसा पाने के लिए कितने लालायित होते हैं। मनुष्य की इस स्वाभाविक भूख का अनुमान तो बच्चों तक की स्थिति से लगाया जा सकता है। खेलकूद में, पढ़ने में, एवं परिश्रम में सफलता पाने अथवा उनकी अन्य बातों की प्रशंसा करके बच्चों का उत्तम निर्माण किया जा सकता है। बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। अपनी प्रशंसा सुनकर फूले नहीं समाते।

अपने छोटे, सेवक, भृत्य आदि की प्रशंसा करने से भी कभी नहीं चूकना चाहिए। अकसर इस श्रेणी के व्यक्तियों को उच्च श्रेणी के व्यक्तियों से प्रशंसा प्राप्त करने के अवसर बहुत ही कम मिलते हैं। यदि सच्चे हृदय से इनसे भी प्रशंसा एवं सहानुभूति प्रकट की जाय तो ये प्रफुल्लित होकर और उत्साह से अपना सेवा कार्य करते हैं।

इसी तरह जिस किसी में भी कोई स्वाभाविक गुण हों और वह उससे अनभिज्ञ हो तो उसकी प्रशंसा करके उत्तम सद्गुण के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए। ऐसा करने से न केवल वह कृतज्ञता प्रकट करता है वरन् उक्त गुण का विकास करके अपने कार्य को प्रगतिशील बनायेगा। हमारे देश में गुरु शिष्य परम्परा में एक यह बात भी अपना स्थान रखती है कि सूक्ष्म एवं दिव्य दृष्टि गुरु जब शिष्य को उसकी अंतर आत्मा में छिपे महान् सत्यों का ज्ञान देकर प्रोत्साहन देता है तो वे साधारण से शिष्य महान् बनकर संसार की बहुत बड़ी सेवा करते हैं। राम-कृष्ण जी ने विवेकानन्द का, विरजानन्द जी ने दयानन्द का, समर्थ रामदास ने वीर शिवाजी जैसे महान् व्यक्तियों का निर्माण उनके सद्गुणों को विकसित करके ही किया था।

प्रशंसा एक उपहार है, जिसका परिणाम सदैव आनन्दमय होता है। इसके मुकाबले साधारण लौकिक वस्तुओं की सहायता उतना महत्व नहीं रखती। प्रशंसा एवं आत्म सम्मान प्राप्त करने की भावना सभी में होती है। हर व्यक्ति इसका भूखा होता है। अतः हमें दूसरों की प्रशंसा करने में न तो कंजूसी ही करनी चाहिए और न किसी की चापलूसी ही करनी चाहिए। हमें एक दूसरे को दाद देने—प्रोत्साहित करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को विकसित करना चाहिए।

==================================

रजिस्ट्रेशन ऑफ न्यूज पेपर्स (सेंट्रल) नियम 1956 के 8 वें नियम के अंतर्गत “अखंड ज्योति” सामयिक पत्र के स्वामित्व तथा अन्य विषयों के सम्बन्ध में प्रकाशित किया जाने वाला विवरण-


VigyapanSuchana

फार्म 4

(1) प्रकाशन का स्थान-अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा

(2) प्रकाशन का अवधि क्रम—प्रत्येक मास

(3) मुद्रक का नाम—श्रीराम शर्मा आचार्य

राष्ट्रीयता— भारतीय

पता— अखण्ड ज्योति कार्यालय मथुरा

(4) प्रकाशक का नाम—श्रीराम शर्मा आचार्य

राष्ट्रीयता— भारतीय

पता— अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा

(5) संपादक का नाम—श्रीराम शर्मा आचार्य

राष्ट्रीयता— भारतीय

पता— अखण्ड-ज्योति कार्यालय, मथुरा

(6) सत्वाधिकारी— श्रीराम शर्मा आचार्य

मैं, श्रीराम शर्मा आचार्य यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिये गये सब विवरण, जहाँ तक मैं जानता हूँ तथा मेरा विश्वास है, सत्य हैं।

मार्च 1959 प्रकाशक के हस्ताक्षर

( श्रीराम शर्मा आचार्य )

----***----

मानवता का विष पी जाओ


साँसों का सरगम (kavita)

साँसों का सरगम भरो समय के अधरों में,

चलती साँसों को जीने दो, दफनाओ मत!

कुछ और बढ़ाओ उम्र दिलों के धड़कन की,

जीवित जग को जहरीला कफन उढ़ाओ मत!!

जाकर मिट्टी से तिलक करो मानी नभ का,

पदरज से पावन कर दो चाँद-सितारों को!

शंकर बन कर मानवता का विष जी जाओ,

बंदी कर लो मुट्ठी में शोख बहारों को!!

तुम कर पाओ तो करो हलाहल को अमृत—

लेकिन दुनिया को विष के घूँट पिलाओ मत!!

अब तो उस दिन को और निकट लाओ मानव,

जिस दिन अपनी धरती नभ का इतिहास लिखे!

ऊपर तो देख-देख कर आँखें पथराई,

अब भू के दर्पण में नभ का प्रतिबिम्ब दिखे!!

हर दीपक को सूरज-सी उमर दिलाओ तुम—

घर-घर में जलने अनगिन दीप बुझाओ मत!!

साँसों के चलने का तो एक बहाना है,

मानवता जीवित है अपने विश्वासों से!

जीवन खुद अपना गला घोंट लेगा उस क्षण,

जब मौत सजायेगी धरती को लाशों से!!

विष के बादल बन-बन कर मत बरसो भू पर,

प्राणों को बूँद-बूँद के हित तरसाओ मत!!

*******

—महेश संतोषी