रंग-बिरंगे फूल (kavita)

डाल के रंग-बिरंगे फूल

राह के दुबले-पतले शूल

मुझे लगते सब एक समान

न मैंने दुख से माँगी दया

न सुख ही मुझसे नाखुश गया

पुरानी दुनिया के भी बीच-

रहा मैं सदा नया का नया

धरा के ऊँचे-नीचे बोल

व्योम के चाँद-सूर्य अनमोल

मुझे लगते सब एक समान

गगन के सजे-बजे बादल

नयन में सोया गंगाजल

चाँद से क्या कम प्यारा है

चाँद के माथे का काजल

नखत से उजले-उजले वेश

चिता पर जलते काले केश

मुझे लगते सब एक समान

सुबह तक जलता हुआ चिराग

रात भर जागा हुआ सुहाग

मुझे समझाता बारम्बार

अंत में हाथ रहेगी आग

इसलिए छोटे-मोटे काम

बड़े या मामूली आराम

मुझे लगते सब एक समान

किरण के अनदेखे प्रिय चरण

फूल पर करते जब संचरण

तभी कोकिल के स्वर में गीत-

गूँथकर गाता है मधुबन

नये फूलों पर सोये छंद

मधुप की गलियाँ औ’ मकरंद

मुझे लगते सब एक समान

-रमाकान्त अवस्थी-


अखण्ड ज्योति की भावी विधि व्यवस्था

(भगवती देवी शर्मा धर्म पत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

गत अंक में आचार्य जी के आगामी कार्य-क्रम तथा तपोभूमि एवं अखण्ड-ज्योति की व्यवस्था के संबंध में चर्चा थी। परम पूज्य आचार्यजी जो सोचते हैं या आयोजन करते हैं उसमें कोई दैवी सूक्ष्म प्रेरणा सन्निहित होती है, इसलिए मैं उनके आदेशों में कभी ननुनच नहीं करती। पिछले सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ की घोषणा उन्होंने अचानक प्रातःकाल उठते ही कर दी थी। इससे पहले न किसी से पूछा, न योजना बनाई, न बजट बनाया, न यह सोचा कि इतने बड़े आयोजन को किस प्रकार पूर्ण किया जा सकेगा। जब उनने घोषणा की तो इतने विशाल आयोजन और अपनी साधन हीनता की तुलना करने हुए मैंने उनके सम्मुख अपना संशय उपस्थित किया तो हंस कर बोले-”जिसका कार्य है वह स्वयं जो इसे करा रहा है, स्वयं सारी व्यवस्था करेगा। हम लोग निमित्त मात्र हैं, अपना कर्तव्य करें, चिन्ता के झंझट में क्यों पड़ें।” मेरे पास चुप होने के अतिरिक्त और कोई मार्ग न था। मन का संदेह बना रहा, भय चिन्ता और परेशानी बनी रही। पर जब यह महान कार्य अभूतपूर्व सफलता के साथ सम्पन्न होते आँखों से देख लिया, तब पश्चाताप हुआ कि व्यर्थ ही मैंने आशंका और चिन्ता को इतने दिन मन में दबाये रहने का क्लेश उठाया। आचार्यजी की इच्छाओं और योजनाओं के पीछे जो शक्ति काम करती है वह गलत मार्ग दर्शन नहीं करती।

अभी जो योजना उनने बनाई हैं, उसके अनुसार एक वर्ष में वे अपनी साधना और शोध को पूर्ण करने के लिए मथुरा से बाहर जाने वाले हैं। कितना समय लौटने में लगेगा इसके बारे में उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया। वह समय अभी अनिश्चित हैं। उनके कन्धों पर यों अनेकों उत्तरदायित्व हैं पर मथुरा में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले उनके दो ही कार्यक्रम हैं। 1. गायत्री तपोभूमि 2. अखण्डज्योति कार्यालय। इनकी उनने व्यवस्था बनाई ही दी हैं।

जिन आत्म दानियों ने अपने जीवन धर्मसेवा के लिए दिये हैं। वे आचार्य जी के परखे हुए हैं आत्मिक सद्गुणों की, व्यक्तिगत आदर्शवादिता की एवं सेवा भावना की दृष्टि से वे परम विश्वस्त लोग हैं। उनने अब तक जिस लगन और निष्ठा का परिचय दिया हैं, उसे देखते हुए उन्हें विश्वास हो गया हैं कि धर्म जागृति का, युग निर्माण का, जो कार्य तपोभूमि में अपने कंधे पर उठाया हैं, उसे वे पूरी जिम्मेदारी से आगे बढ़ावेंगे। व्यवस्था की दृष्टि से संस्था का ट्रस्ट बना हुआ हैं जिसके कारण किसी आर्थिक गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं हैं। आत्मदानी बच्चों की भावना एवं कर्तव्य परायणता के देखते हुए संस्था के संकल्प की पूर्ति में कोई शिथिलता आने पावेगी ऐसी संभावना नहीं हैं। इस निश्चिन्तता के कारण वे धर्म प्रचार का, युग निर्माण का कार्य इन लोगों के कंधों पर डाल कर सन्तुष्ट हैं। उन्हें उसके भविष्य के उज्ज्वल एवं आशाजनक होने का विश्वास हैं।

अखण्ड ज्योति कार्यालय अभी तक तपोभूमि से अलग इसलिए रखा गया था कि आचार्य जी की चिरकाल में यह इच्छा रही हैं कि भारतीय महिला समाज में भी धर्म जागृति के लिए कुछ ठोस कार्य होने चाहिएं। वे सदा से इस बात के पक्ष में रहे हैं कि पुरुषों और स्त्रियों का कार्यक्षेत्र अलग अलग हैं और वह अलग-अलग ही रहना चाहिए। दोनों क्षेत्रों को जब भी सार्वजनिक जीवन में इकट्ठा करने का प्रयत्न किया गया हैं तभी उसके दुष्परिणाम उपस्थित हुए हैं। वे मुझ से यह आशा रखते रहे हैं कि मैं महिला समाज में धर्म जागृति का कार्य करूं। अपनी अयोग्यताओं के कारण मैं अब तक गिड़गिड़ाती रही उधर आचार्यजी भी अपने विगत महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति के सप्त सूत्रों सप्त वर्षीय कार्यक्रम में लगे रहे। इसलिये अभी तक उस दिशा में कुछ प्रगति न हो सकी। पर अब वे अपने साधना और शोध कार्यों के लिए बाहर जाने के पूर्व उस कार्य का भी शुभारंभ कराना चाहते हैं। इसी योजना के आधार पर गायत्री तपोभूमि की भाँति उनने अखण्डज्योति कार्यालय का आगामी कार्यक्रम निर्धारित कर दिया है जिसकी कुछ चर्चा गत अंक में की जा चुकी हैं।

अखण्डज्योति कार्यालय आचार्यजी के चिर स्वप्नों के अनुसार अब महिला समाज में धर्म जागृति का केंद्र बनने जा रहा है। साथ ही अपने विशाल परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति एवं कठिनाइयों के समाधान के लिए जिस आत्मबल तथा तपबल की आवश्यकता पड़ती रहती हैं, उसकी उत्पत्ति एवं पूर्ति भी आवश्यक है। यह दोनों कार्य उन्होंने मेरे सामने छोड़े हैं इनको पूर्ण करने के लिए उनने वह कार्यक्रम बनाया है जो गत अंक में छपा है।

आचार्यजी चाहते हैं कि उनकी 30 वर्ष की कमाई का प्रतीक अखण्ड दीपक अभी 10 साल और जलता रखा जाय और 40 वर्ष का जो दीप अनुष्ठान होता है वह पूर्ण किया जाय। जिस प्रकार अखण्ड अग्नि की स्थापना पर उस अग्नि का भोजन यज्ञ रूप में नित्य होना आवश्यक है। उसी प्रकार अखण्ड दीपक के आगे भी उसका भोजन कम से कम 60 माला जप नित्य होना आवश्यक है। गायत्री तपोभूमि में अखण्ड अग्नि रहती हैं। वहाँ एक हजार आहुतियों का हवन नित्य होता है। अखण्ड ज्योति कार्यालय में जो अखण्ड दीप जलता है उसके सम्मुख हम दोनों मिलकर कम से कम 60 माला जप अवश्य कर लेते हैं। इस प्रकार एक वर्ष में 24 लक्ष्य पुरश्चरण हम लोग अभी भी अवश्य कर लेते हैं। छह वर्ष पूर्व तक अकेले आचार्यजी अपना एक महा पुरश्चरण एक वर्ष में स्वयं पूरा करते थे। जब उनके 24 पुरश्चरण पूर्ण हो गए और सप्त सूत्री कार्य-क्रम की पूर्णाहुति में वे लगे तब से हम और वह दोनों मिलकर एक वर्ष में एक पुरश्चरण पूरा करते रहे हैं। इसी से जो थोड़ा आत्मबल, तप बल उत्पन्न होता है उसे वे परिवार के अनेकों परिजनों को पुण्य प्रसाद के रूप में दान करके उनकी भौतिक एवं आत्मिक प्रगति में, कष्ट निवारण में सहायता करते हैं।

अब उनके बाहर चले जाने पर यह प्रक्रिया कैसे जारी रहे ? इसके लिए उनने अखण्ड दीप के आगे अखण्ड जप का आयोजन किया है। उनके शरीर द्वारा 60 माला के जितना तप बल उत्पन्न होता था, अब उनके अभाव में उतना तप बल तभी उत्पन्न हो सकेगा जब “अखण्ड जप” जारी रखा जाय। यह कार्य कैसे हो? गत अंक में इसका कुछ साफ स्पष्टीकरण नहीं किया गया था। विचार विनिमय के लिए वह बात रोक ली गई थी, पर अब उसका निर्णय हो गया है। यह अखण्ड जप कुमारी कन्याओं द्वारा पूर्ण होगा। गायत्री अनुष्ठानों की पूर्णाहुति में कन्या भोजन का स्पष्ट विधान है। इस उपासना में कन्याओं को सर्वोपरि महत्व दिया गया है। वैसे भी ब्राह्मण के समान ही हिन्दू धर्म में कन्याओं का पूज्य स्थान है। गौ के समान ही कन्याएं भी पूजनीय मानी गई हैं। उनमें धर्म तत्व सबसे अधिक होता है। तपस्वी और नैष्ठिक ब्राह्मणों के अभाव में यदि धर्म कार्य के उपयुक्त किसी का नम्बर आता है तो वह कन्या ही है। चूँकि न तो अब सच्चे नैष्ठिक ब्राह्मण दृष्टिगोचर होते हैं और न मेरे कंधे पर रखी गई महिला जागृति योजना में उनके प्रवेश का ताल मेल बैठता है। इसलिए यही उचित था कि अखण्ड जप कुमारी कन्याओं द्वारा सम्पन्न हो।

आगामी दस वर्ष वक यह अनुष्ठान जारी रखने का आचार्यजी का मेरे लिए आदेश हुआ है। तब तक खंड जप के चालू रहने पर 24 लक्ष के 24 पुरश्चरण पूर्ण किये जाने हैं। अभी इतनी ही योजना है। 12 कन्याएं दो दो घंटा प्रति दिन जप करके 24 घंटे का अखण्ड जप पूरा कर लेंगी। इस व्यवस्था के अनुसार 24 महापुरश्चरण 10 वर्ष में आसानी से पूरे हो जावेंगे। इतना तो होना ही हैं। पर मेरी इच्छा है कि बढ़े हुए गायत्री परिवार की अधिक सेवा सहायता हो सके तथा धर्म सेवकों को अधिक प्रेरणा मिल सके इसके लिए 24 महापुरश्चरण ही काफी नहीं हैं, उनकी संख्या 108 की जाय। यह बोझ काफी बड़ा हो जायगा इसलिए अभी 24 पुरश्चरण पूरे करने के लिए 12 कन्याओं की योजना ही बनाई गई हैं।

आगामी वसन्तपंचमी से यह अखण्ड पुरश्चरण जारी होगा। 12 वर्ष से अधिक आयु की जो कुमारी कन्याएं इसमें भाग लेना चाहें उनके अभिभावक उन्हें उस समय तक प्रसन्नतापूर्वक मथुरा पहुँचा दें। उनके शील, स्वास्थ्य एवं स्नेह तथा सब प्रकार की देख-रेख वैसी ही की जायगी जैसी कोई माता अपने पेट से उत्पन्न हुई लड़कियों के लिए कर सकती हैं। सभी कन्याओं के लिए साधकों जैसे भोजन वस्त्र का भी यहाँ प्रबंध रहेगा। हर कन्या को उसकी वर्तमान शिक्षा, से आगे की शिक्षा का भी प्रबंध रहेगा। दो घंटा जप के अतिरिक्त शेष सारा समय उनके पास बाकी है, इसमें उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था की जायगी।

सरकारी पाठ्यक्रम का आधार यहाँ की शिक्षा में न रखा जायगा। वह शिक्षा पद्धति नारी को आदर्श नारी, धर्म परायण नारी बनाने के लिए न तो उपयुक्त है न आवश्यक ! उसे पढ़कर जो प्रमाण पत्र प्राप्त होते हैं उन्हें लेकर वे नौकरी कर सकती हैं पर उन आदर्शों एवं सद्गुणों से वंचित ही रह जाती हैं जो भारतीय नारी की महानता को बनाये रखने के लिए आवश्यक हैं। मैं उसी शिक्षा व्यवस्था का आयोजन करने का प्रयत्न करूंगी जिसके आधार पर यहाँ से जाने के बाद कन्याएं सच्चे अर्थों में गृहलक्ष्मी सिद्ध हो सकें। उन्हें पढ़ाने लिखाने पर जितना समय लगाया जायगा उतना ही उन्हें आदर्शवादी, कर्तव्यपरायण, सेवाभावी, सहनशील, शिष्ट, नम्र, सुशील एवं सच्चरित्र बनाने पर लगाया जायगा। उन्हें सफल गृहणी, गरीब घर में भी जाने पर भी वहाँ स्वर्ग का साम्राज्य उत्पन्न करने वाली गृहलक्ष्मी बनाने के लिए प्रधान रूप से ध्यान दिया जायगा और यही यहाँ की शिक्षा का उद्देश्य होगा। इसके फलस्वरूप कन्याएं अपने भावी जीवन में सुख शान्तिदायक दिव्य परिणामों की आशा कर सकेंगी। उन्हें उत्तम घर वर मिलने में चिर सुहाग की प्राप्ति, सुसंगति एवं पारिवारिक जीवन में सुख शान्ति का आधार ऐसी साधनाओं से बहुत कुछ सम्बन्धित रहता है। इस उपासना में लगा हुआ कन्याओं का समय उनके भावी जीवन के लिए एक दैवी वरदान सिद्ध हो सकता है।

महान नारियों के चरित्रों का यहां के पाठ्यक्रम में प्रधान स्थान रहेगा। रामायण अनिवार्य होगी। स्वास्थ्य रक्षा, शिशु पालन, गृह व्यवस्था, घरेलू अर्थ शास्त्र, संगीत और सिलाई कताई शिक्षा के प्रमुख भाग रहेंगे। भाषा, व्याकरण, गणित, इतिहास, भूगोल आदि अन्य आवश्यक विषय भी रहेंगे। प्रत्येक कन्या की वर्तमान शिक्षा जहाँ तक है वहाँ से आगे की बाते उसे बताने के लिए हर कन्या का शिक्षण पृथक पृथक भी रहेगा पर साधारण सदाचार और धर्म शिक्षण एक ही होगा, इस प्रकार न केवल शिक्षा के आधार पर वरन् गायत्री उपासना के पुनीत तप द्वारा उनमें वह तत्व उत्पन्न करने का प्रयत्न होगा कि वे किसी प्रकार जीवन के दिन पूरे करने वाली भार भूत नारी न रह कर पार्वती, सावित्री, अनुसूया, सीता, गान्धारी, कौशल्या, देवकी, शैव्या, दमयन्ती, पद्मिनी, अहिल्याबाई, लक्ष्मीबाई की प्रति-मूर्ति बन सकें। अपना जीवन धन्य बनाते हुए संसार के इतिहास में उज्ज्वल उदाहरण उपस्थित कर सकें।

आगे चलकर इस शिक्षा व्यवस्था का बड़ा रूप बन सकता है। इन्हीं आदर्शों को लेकर एक बड़ा नारी विद्यालय चल सकता है देशव्यापी नारी उत्थान के कुछ अन्य ऐसे कार्यक्रम बन सकते हैं। जिनके अनुसार स्थान-2 पर? महिलाएं जाकर स्त्रियों के शिक्षण शिविर चलावें और उन्हें सफल नारी की स्थिति तक पहुँचाने का प्रयत्न हो। यह बातें आगे की हैं। पर उनमें वह सब स्वप्न सन्निहित हैं जो आचार्य जी नारी जागरण के लिए देखते रहते हैं। आगे क्या रूप बनेगा यह समय ही बतावेगा पर अभी तो उसका आरंभ अखण्ड जप के रूप में प्रारम्भ किया जा रहा है उसमें 12 कन्याओं की आवश्यकता होगी । जो सज्जन अपनी कन्याएं भेजना चाहें वे इसके लिए पत्र व्यवहार कर लें। कम से कम 6 महीने के लिए आना आवश्यक हैं। 12 वर्ष से कम आयु की कन्याएं नहीं ली जावेंगी।

अखण्ड ज्योति के सम्पादन के बारे में यही हैं कि मैं अपनी स्वल्प योग्यता को जानती हूँ, उससे चिंतित भी हूं। पर जो कार्य सौंपा गया है इसे ईश्वरीय आदेश मानकर शिरोधार्य करना ही ठहरा। युग निर्माण के लिए समाज सेवा और धार्मिक क्रान्ति के लिए जीवन यज्ञ का एवं गायत्री परिवार से संगठन के लिए गायत्री परिवार पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है। उसे आत्मदानी बच्चे उत्साहपूर्वक चला रहे हैं। अखण्ड ज्योति का उद्देश्य अध्यात्म और साधना है, वह उत्तराधिकार मेरे कंधे पर आता है तो उसे भी आचार्य जी के आशीर्वाद और पाठकों के सद्भाव पर विश्वास करते हुए मुझे किसी प्रकार शिरोधार्य करना ही हैं।

अध्यात्म क्षेत्र के अविकारी पात्रों से भविष्य में अखण्ड ज्योति के उपयुक्त लेख बराबर भेजते रहने और उनकी परम्परा को यथावत् बनाये रखने का आचार्य जी स्वयं प्रबंध कर रहे हैं। वे स्वयं भी अब तक प्रकाश में न आये हुए गायत्री विज्ञान के अत्यंत रहस्यमय ग्रन्थ ‘विश्वामित्र कल्प’ में सन्निहित तत्वज्ञान पर प्रकाश डालने वाली एक लेख माला इसी जनवरी से आरंभ करेंगे। और वे कहीं भी रहें, हर महीने अध्यात्म विज्ञान के सूक्ष्म तत्व ज्ञान पर प्रकाश डालने वाला एक लेख देते रहेंगे। ‘विश्वामित्र कल्प’ एक रहस्य मय ग्रंथ है जिसके एक एक श्लोक में रहस्यमय भंडार भरा हुआ हैं। इस पर आज तक कोई भाष्य नहीं हो सका। उसका प्रत्येक मन्त्र गायत्री उपासकों के लिए एक पहेली बना हुआ है। इसके रहस्यों का उद्घाटन दक्षिणी मार्गी एवं वाममार्गी साधना क्षेत्र में एक आश्चर्य ही माना जायगा। इसी जनवरी से वह लेख माला चल पड़ेगी एवं आचार्य जी के सुविज्ञ सहचरों के लेख अखण्ड ज्योति में आने लगेंगे तो मेरा सम्पादन कार्य-भार बहुत कुछ सरल हो जायगा।

यों अखण्ड ज्योति अब भी अध्यात्मिक है। अध्यात्म विषय रूखा होता है। उसमें सबकी रुचि नहीं होती। आगामी योजना के अनुसार तो वह और भी अधिक अध्यात्मिक हो जायगी। ऐसी दशा में जिनकी अभिरुचि इस मार्ग में कम है या जो मनोरंजन के लिए अखबार खरीदते और पढ़ते हैं, उनके लिए वह और भी अधिक रूखी हो जायगी। ऐसी दशा में ग्राहक संख्या अब की अपेक्षा उसकी और भी घटेगी। यह बहुत ही अच्छा और सुविधाजनक होगा कि आगे से अखण्ड ज्योति के ग्राहक वे ही रहें जो अध्यात्म मार्ग के सच्चे जिज्ञासु हैं। मनमौजी लोग इसकी सदस्यता छोड़ दें। उनके कारण यहाँ की व्यवस्था में भी बड़ी गड़बड़ी पड़ती हैं। हर साल ढेरों ग्राहक टूटते बड़ते हैं। इस झंझट में ढेरों पत्रिकाएं अधिक छप जाती हैं जो बेकार जाती हैं, कभी कभी कोई अंक कम पड़ जाता है और ग्राहकों को शिकायतें करनी पड़ती हैं।

मेरी अनुभवहीनता की स्थिति में वही उपयुक्त होगा कि अगले वर्ष से पाठकों में से केवल वे ही ग्राहक रह जावें जो हर साल उथल-पुथल न किया करें। चंदा उनका देर सवेर में आवे तो भी पत्रिका भेजना उनके लिए बन्द न करना पड़ा करे। ऐसे ही स्थिरचित्त के ग्राहक अब अभीष्ट होंगे। हमारी आर्थिक स्थिति खराब हो गई, हमें पढ़ने की फुरसत नहीं मिलती आदि बहाने बताकर कई ग्राहक अपनी अध्यात्मिक अरुचि के कारण सदस्यता छोड़ देते हैं। इस उथल-पुथल में पते छप नहीं पाते, हाथ से लिखे जाते हैं उनमें भूल रहने से किसी किसी के अंक भी गुम होने की संभावना रहती हैं। अगले वर्ष जनवरी से स्थायी ग्राहकों के पते छपा लिये जायेंगे और यह आशा की जायगी कि जो थोड़े बहुत ग्राहक रहें वे स्थिर मति और व्यवस्थित रुचि के हों। इस दृष्टि से अखंड ज्योति के वर्तमान ग्राहकों से यह अगले वर्ष में अपने ग्राहक रहने न रहने का निश्चय सूचित कर दें ताकि जनवरी का अंक उतनी ही संख्या में छपाने और वे सब पते छपा लेने का प्रबंध कर लिया जाय। चंदा आगे पीछे भी भेजा जा सकता है पर सदस्यता के स्थायी होने की जानकारी प्राप्त होना आवश्यक है । इससे एक बहुत भारी कठिनाई का हल हो जायगा। पाठक अनुग्रहपूर्वक अपने निश्चय की सूचना इसी मास देने की अनुकम्पा कर सकें तो इससे मेरे कंधे पर आई हुई अनेक नई जिम्मेदारियों में से एक के हलका करने का बड़ा उपकार होगा। पत्र व्यवहार में, उसी प्रकार अपना पता हिन्दी भाषा में स्पष्ट अक्षरों में अपने ग्राहक नम्बर समेत लिखने की कृपा किया करें तो यह भी मेरे लिए एक बड़ी सुविधा की बात होगी।

अखण्ड ज्योति का महान् मिशन गत 20 वर्षों में बहुत कुछ कार्य कर चुका। उसे सफल कहा जा सकता है। आचार्य जी के कार्य सफल रहे हैं इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं हैं। अब इस मिशन का उत्तरार्ध मेरी अयोग्यता और अनुभव हीनता के कारण लड़खड़ा सकता है, असफल हो सकता है। इन कठिन घड़ियों में परिवार के परिजनों का स्नेह सद्भाव एवं सहयोग अभीष्ट है। परिवार के सदस्यों को आचार्य जी तो अपना बन्धु आत्मीय और स्नेह भाजन मानते रहे हैं। कुछ गुरुजनों को छोड़ कर शेष के प्रति वे पुत्र भाव रखते रहे हैं। मेरी भी स्वाभाविक मातृ ममता वैसी ही रहेगी। इन परिवर्तन की घड़ियों में परिजनों के प्रति असीम मातृभाव रखते हुए उनसे भी ममता एवं आत्मीयता की आशा रखूँगी। उस भारी उत्तरदायित्व को निबाहने में माता की कृपा, श्री आचार्य जी के आशीर्वाद के बाद स्वजनों के सद्भाव को ही प्रमुख आधार माना है। यह आधार दुर्बल साबित न होगा ऐसा मुझे विश्वास है।


सच्चे परिव्राजक ही राष्ट्र को ऊँचा उठा सकते हैं।

(स्वामी विशुद्धानन्दजी सरस्वती)

नयसीद्वति द्विषः कणोष्युक्थशंसिनः। नृभिः सुवीर उच्यसे॥ ऋ॰ 6। 45। 6

“तू शत्रुओं को वास्तव में हम से दूर ले जाता हैं और उनको वेदभक्त बनाता है इसलिए मनुष्यों में तुझे उत्तम वीर कहा जाता है।”

उक्त वेद मंत्र में उत्तम वीर वेद प्रचारक की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। वेद कहते हैं ज्ञान को। ज्ञान प्रचारक किस प्रकार सबसे उत्तम वीर होता हैं तथा अन्य मनुष्यों में उत्तम क्यों होता है यही इस वेद मंत्र में स्पष्ट किया गया है।

मानवता के शत्रुओं को, दुराचारियों को, नास्तिकों को क्रूकर्मियों को शरीर अथवा अन्य शक्ति बल से परास्त कर देना इतना महत्वपूर्ण एवं उत्तम कार्य नहीं हैं क्योंकि सम्भव है शक्ति के क्षीण होते ही वे पुनः मानवता पर हमला कर बैठें। अतः शक्ति बल से शत्रुओं को परास्त कर देना वीरता का लक्षण अवश्य है किन्तु वह व्यक्ति महावीर है जो शत्रुओं को सात्विकता युक्त ज्ञान पथ की ओर अग्रसर करके प्रकाश प्रदान करता है। शत्रु को विवेकयुक्त बनाना उसको बल प्रयोग से परास्त करने से भी अनेकों गुना महत्वपूर्ण है। अपने शत्रुओं अर्थात् विपरीत लोगों को जो वेद भक्त बनाता है वह उत्तमोत्तम वीर है, सच्ची प्रशंसा का पात्र है और मानव जाति में श्रेष्ठ है यह इस वेद मंत्र में कहा गया है। इससे वेद प्रचारक की महत्ता, महानता, उत्तमता का एवं समाज में उच्च स्थान का ज्ञान होता है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि वेद प्रचारक अर्थात् जन मन में ज्ञानज्योति जलाने वाले परिव्राजक राष्ट्र के प्राण, मानव जाति के शुभचिंतक, एवं देवस्वरूप होते हैं। जिस देश का परिव्राजक जीवित रहता है घर घर जाकर वेद सन्देश सुनाता है, जन मन में जागरण का सन्देश सुनाता है मानवता के शत्रुओं को सदाचारी ज्ञान निष्ठ बनाता है वह राष्ट्र वह जाति, वह समाज भाग्यवान होता है। उसके कदम प्रगति, उन्नति, एवं उत्थान की और अग्रसर हो उठते हैं। मृत प्रायः जाति में दिव्य चेतना का संचार हों उठता है। उदाहरणार्थ भारत के वैदिक युग महाभारत एवं रामायण काल को देखें। उस समय सच्चे परिव्राजकों ने आर्य जाति को, इस पुण्यमयी ऋषि भूमि को सब तरह से उन्नति एवं विकास की ओर अग्रसर किया जिसके फलस्वरूप संसार में प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ।

परिव्राजक वेद प्रचारक, बनने के लिए मुख्यतया निम्न बातों की आवश्यकता है जिन्हें अपना कर स्वयं युग एवं मानव जति का कल्याण किया जा सकता है।

(1) कर्तव्य निष्ठा - परिव्राजक का कर्तव्यनिष्ठ होना प्रथम व्रत है। इसलिए तपश्चर्या और त्याग की आवश्यकता है। अपने जीवन को यम, नियम साधना, सेवाकार्य आदि तपश्चर्याओं में तपा-तपा कर शुद्ध बना लेना आवश्यक है। क्योंकि जो स्वयं हुआ नहीं हैं वह दूसरे को क्या तपा सकता हैं? उसका स्वयं का जीवन व्यवहार आदि आदर्शपूर्ण नहीं है वह दूसरे को कैसे प्रभावित कर सकता है और अपनी छाप छोड़ सकता है। यह ध्रुव सत्य है कि कर्तव्य निष्ठ व्यक्ति के शब्द जो ही दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। हमारे ऋषि महर्षि आदि कर्तव्य निष्ठ थे। यही कारण है कि आज भी उनकी वाणी अज्ञानी को ज्ञान प्रकाश; अशक्त को महान् शक्ति, दुराचारी और अनैतिक लोगों को सदाचार और नैतिकता, ईश्वर दर्शनाभिलाषियों को ईश दर्शन प्रदान करती हैं। कर्तव्य निष्ठ व्यक्ति के शब्द अन्तरात्मा से निकले होते हैं जो विपरीत व्यक्ति पर भी सफल प्रभाव डालते हैं इसे ही सिद्धि महापुरुषों का चमत्कार कहते हैं।

जीवन निष्ठा के साथ-साथ परिव्राजक में त्याग वृत्ति होना अत्यावश्यक हैं। उसके हृदय में यह भावना प्रतिध्वनित होनी चाहिए कि “मैं ईश्वरीय आदेशों को जन मन में उतारने के लिए उसका एक माध्यम बनकर आया हूँ।” ईश्वर ने मेरा कार्य “देना ही देना” बताया है और वह भी सद्ज्ञान इसके बदले में मुझे संसार से बहुत ही कम जीवन निर्वाह की सामग्री मात्र लेनी हैं। जब तक यह भाव पैदा नहीं होता और इसके प्रति निष्ठा नहीं होती तब तक परिव्राजक का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकता। परिव्राजक के लिए अपने पवित्र उद्देश्य की पूर्ति एवं कर्तव्य पालन के लिए सर्वस्व यहाँ तक कि अपने शरीर को त्याग देने के लिए तैयार रहना चाहिए। यही महान् वीर परिव्राजक जन जागरण ज्ञान प्रचार जनकल्याण आदि कार्यों के उद्देश्यों को कर्तव्यों को पूर्ण कर सकता है जिसने त्याग को ही जीवन की कसौटी बनाया है। वही विश्व में नव चेतना फूँक सकता है। त्यागहीन जीवन इस ओर कुछ नहीं कर सकता।

परिव्राजक को इस त्याग पथ पर अग्रसर होने के साथ-साथ अपने कर्तव्य पालन के बदले कीर्ति, यश, नामवरी, या अन्य किसी प्रकार की कामना होना स्वर्ण घट में विष भरे होने के सदृश्य ही हैं जिसे सभी लोग घृणा, की दृष्टि से देखेंगे और दूर हट जायेंगे। अतः इनसे भी दूर रहना चाहिए।

(2) योग्यता वृद्धि-धर्म प्रचारक को जीवन भर विद्यार्थी का जीवन व्यतीत करना चाहिए। ज्ञान−विज्ञान की साधना को निरन्तर जारी रखना चाहिए। जब तक परिव्राजक का ज्ञान परिपूर्ण रूप से नहीं होता तो वह दूसरों में ज्ञान प्रकाश भली प्रकार पैदा नहीं कर सकता। ज्ञान प्राप्ति और बुद्धि बल के विकास के लिए जीवन भर विद्याध्ययन और साधना अत्यावश्यक है। अपने कर्तव्य धर्म का पालन करते हुए भी उक्त दोनों क्रम योग्यता वृद्धि के लिए चलते रहने चाहिए।

(3) दृढ़ता और साहस- परिव्राजक का जीवन एक क्रान्तिकारी का जीवन होता है जिसमें वह ज्ञान प्रकाश, वेदवाणी, नैतिकता, सदाचार, जन जागरण की प्रतिष्ठापना करता है और विरोधी एवं दूषित तत्व अनैतिकता, असभ्यता, अज्ञानान्धकार मुर्दनी को समाप्त करता है। मानव जीवन में नवीन प्राण का संचार करता है। इस महान क्रान्तिकारी उद्देश्य में विघ्न बाधाओं, रुकावटों कठिनाईयों एवं विरोधी तत्वों का सबल आक्रमण होना भी सम्भव है किन्तु इनसे लोहा लेकर अपने पवित्र एवं महान उद्देश्य की और बढ़ने वाला परिव्राजक अदम्य उत्साह एवं अचल दृढ़ता से ही सफल हो सकता है। जहाँ पर अपने उद्देश्य के लिए कष्ट सहिष्णुता, दुःख, परेशानियों को सहर्ष झेलने की क्षमता नहीं वहाँ उपरोक्त गुणों से सम्पन्न होते हुए भी परिव्राजक जीवन का उद्देश्य सफल होना असम्भव है। हिन्दू धर्म के लिए कई ऋषियों ब्राह्मणों, परिव्राजकों को राक्षसों का आहार बनना पड़ा मौत के घाट उतरना पड़ा। बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए लाखों करोड़ों बौद्ध भिक्षु विदेशों में काट दिए गये, कइयों ने दलदलों में, नालों में, बीमारियों में फँस कर प्राण त्याग दिये कि उनके उत्साह और दृढ़ता ने तथा लगनशीलता में एशिया के बहुत बड़े भाग में बौद्ध धर्म का विस्तार किया। गत दो सौ वर्षों से ईसाई मिशनरियाँ किस प्रकार कठोर गर्मी सर्दी लू, भूख प्यास, परेशानियाँ, विरोध आदि को सहन करती हुई दृढ़ता और साहस के साथ विश्व में ईसाई धर्म प्रचार का कार्य कर रही हैं। अतः परिव्राजक के जीवन में अदम्य उत्साह, दृढ़ता और लगनशीलता की आवश्यकता है।

उक्त बातों के साथ-साथ साधु को संसार की निन्दा स्तुति की भी परवा नहीं करनी चाहिए। जो निन्दा स्तुति की चिन्ता करेगा वह परिव्राजक के महान उद्देश्य को पूर्ण नहीं कर सकता। विरोधी तत्वों द्वारा उत्पन्न निन्दा, किंवदंतियां आदि उसके कदम को रोक देंगी।

परिव्राजक की महानता, उद्देश्य और आवश्यक बातों को अपना कर जो व्यक्ति इस और बढ़ता है वह न केवल स्वयं का ही वरन् अपने कुटुम्ब, समाज देश तथा मानव मात्र का कल्याण करता है।

खेद है भारत भूमि जो विश्व के लिए परिव्राजकों की केन्द्र भूमि थी, जिसके निवासियों का जीवन ही इस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए होता था आज वह परिव्राजकों से रहित होती जा रही है। विश्व की बात तो दूर रही स्वयं भारतीय जाति के लिए आज सच्चे परिव्राजकों की संख्या बहुत ही अल्प है। आज देश एवं जाति की इस महान आवश्यकता की पूर्ति के लिए राष्ट्र उन महान आत्माओं का आह्वान कर रहा है, भारत माता उन सपूतों की ओर आंखें लगाकर देख रही हैं जो परिव्राजक धर्म स्वीकार कर यहाँ पुनः वैदिक युग की स्वर्ण झाँकी को साकार करें। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आज हमारे देश को सच्चे परिव्राजकों, धर्मसेवकों धर्म प्रचारकों की अत्यन्त आवश्यकता है जो घर-घर जाकर नैतिकता, सदाचार, धार्मिकता, नवजागरण संगठन का सन्देश सुनायेंगे। इस आवश्यकता पूर्ति के लिए सेवा परायण, त्यागी, तपस्वी आत्माओं का तैयार होना आवश्यक है ताकि यह राष्ट्र पुनः उठ सके और उन्नति के शिखर पर पहुँच सके। भारतीय जाति नव चेतना, नव प्राण लेकर जाग उठे। इसमें संगठन हो, शक्ति हो, सामर्थ्य हो सम्पन्नता हो यही आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।

इस वेद मंत्र में उस वीर पुरुष का गुण गान किया गया है। जो अपने आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं की परवा न करके परिव्राजक बन कर संसार के ज्ञान धर्म और सदाचार की अभिवृद्धि के लिए प्राण प्रण से कार्य करता है।


हिंसा और अहिंसा का आधार हमारी मनोवृत्ति ही है।

(श्री. मेहर बाबा)

अहिंसा का मानव जीवन में बड़ा ऊँचा स्थान है। भारत के कई प्रमुख दार्शनिक तो कह गये हैं कि “अहिंसा परमो धर्मः” अर्थात् धर्म का सबसे बड़ा अंग या स्वरूप “अहिंसा” ही है। वर्तमान समय में महात्मा गाँधी ने “अहिंसा” को सर्वोपरि महत्व प्रदान किया है। और उसके सीमित प्रयोग द्वारा ही एक महान चमत्कार सम्पन्न करके दिखा दिया। पर जैसा सभी विचारशील अनुभव करते हैं “अहिंसा” की व्याख्या और उसके सम्बन्ध में कोई नियम बनाना सहज नहीं हैं। अहिंसा और हिंसा की गति बड़ी सूक्ष्म है और अनेक समय उन दानों का विश्लेषण करना कठिन होता है। अधिकाँश स्वार्थी लोग हिंसा अहिंसा का अर्थ अपनी सुविधानुसार करते हैं और अपने मन को संतोष देने अथवा दूसरों को बहकाने के लिये प्रायः अर्थ का अनर्थ कर डालते हैं। इस सम्बन्ध में भी मेहर बाबा ने एक लेख में अच्छा विवेचन किया है जिसकी मुख्य बातें यहाँ दी जाती हैं।

सामान्यतः “हिंसा” और “अहिंसा” शब्द इतनी विभिन्न परिस्थितियों पर लागू किये जा सकते हैं कि इन विभिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना जो अर्थ किया जायगा वह अधूरा ही रहेगा। यहाँ पर हम कुछ ऐसी परिस्थितियों का वर्णन करते हैं, जिनसे हिंसा और अहिंसा की विचार धाराओं के वास्तविक मर्म पर प्रकाश पड़ सकता है :-

(1) मान लो कि एक मनुष्य जो तैरना नहीं जानता, एक झील में गिर गया है और डूब रहा है उसके पास ही एक ऐसा मनुष्य खड़ा है जो तैरने में निपुण है और उसे डूबने से बचाना चाहता है। डूबता हुआ मनुष्य भय घबड़ाहट के सबब से सहायतार्थ आये हुये मनुष्य को ऐसे खराब ढंग से पकड़ता या जकड़ लेता है कि वह स्वयं तो डूबता ही हैं। बचाने वाले को भी डुबा देता है। इस खतरे को समझ कर बचाने वाला डूबते हुये मनुष्य के सिर पर आघात करके उसे बेहोश कर देता है। ऐसी परिस्थिति में सिर पर आघात करना हिंसा नहीं कहा जा सकता।

(2) मानो कि एक मनुष्य किसी ऐसे छूत के रोग से पीड़ित है जो केवल आपरेशन के ही द्वारा अच्छा हो सकता है। इस पीड़ित मनुष्य को चंगा करने के लिये तथा उसकी छूत से दूसरे मनुष्यों की प्राण रक्षा करने के उद्देश्य से एक डॉक्टर अपनी छुरी से उस रोगी के छूत वाले अंग को काट कर अलग कर देता है। इस परिस्थिति में छुरी से अंग को काटना हिंसा नहीं कहा जा सकता।

(3) मान लो कि एक दुष्ट स्वभाव का आक्रमणकारी किसी कमजोर देश पर चढ़ाई करता है। कोई तीसरा बलवान देश उसकी रक्षा करने की सदिच्छा से इस आक्रमणकारी का सामना करता है। ऐसे युद्ध में जो हिंसा होगी उसके लिये तीसरे राष्ट्र को कोई भी हिंसा का दोषी नहीं कह सकता।

(4) मान लो कि एक पागल कुत्ता आक्रमण करने पर उतारू है और स्कूल के बच्चों के उसके द्वारा काटे जाने की संभावना है। बच्चों को बचाने के लिए स्कूल के शिक्षक कुत्ते को मार देते हैं। कुत्ते को मारना हिंसा अवश्य है लेकिन उसमें किसी प्रकार का द्वेष और स्वार्थ न होने से उससे पाप नहीं लग सकता।

(5) मान लो कि एक उद्दण्ड प्रकृति का मनुष्य किसी हृष्ट पुष्ट शरीर वाले मनुष्य पर थूक देता है और इस प्रकार उसे अपमानित करता है। यद्यपि यह उद्दण्ड मनुष्य दुर्बल है अपमानित बलवान व्यक्ति उसे कुचल डालने की शक्ति रखता है, तथापि वह उसे किसी प्रकार क्षति नहीं पहुँचाता, किन्तु उसे शाँतिपूर्वक प्रेम से समझाता है। ऐसा करना अहिंसा है, किन्तु यह बलवान की अहिंसा है।

ऊपर लिखी परिस्थितियों में यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि कौन सा कार्य हिंसा है और कौन सा नहीं है। पहले उदाहरण में डूबते हुये आदमी के सिर पर आघात करने में यद्यपि उसकी अनुमति के बिना बल प्रयोग किया जाता है, तथापि यह कार्य उसकी प्राण रक्षा के निमित्त होता है। साधारण अवस्था में किसी को आघात पहुंचाना हिंसा माना जाता है, पर इस परिस्थिति में चूँकि यह कार्य डूबते हुये मनुष्य के हित के लिये निःस्वार्थ भाव से किया जाता है।

दूसरा उदाहरण पहले से थोड़ा ही भिन्न है यहाँ भी बल प्रयोग किया जाता है, अर्थात् रोगी के छूत वाले अंग को शस्त्र के आघात से काट डाला जाता है। पर यह कार्य रोगी के हित के लिये किया जाता है और अनेक बार पहले से उसकी अनुमति भी ली जाती है। आपरेशन का उद्देश्य केवल रोगी को रोग के आक्रमण से बचाना ही नहीं होता, वरन् उससे संपर्क रखने वाले अन्य लोगों को भी रोग के कीटाणुओं से बचाना होता है। चूँकि आघात या क्षति पहुँचाने की कोई भावना इस कार्य में नहीं होती अतः साधारण अर्थ में इसे हिंसा नहीं कहा जा सकता। पर इसे अहिंसा कहना भी ठीक नहीं क्योंकि जीवित शरीर के एक भाग को काटने का यह एक प्रत्यक्ष कार्य होता है।

तीसरे उदाहरण की शिक्षा भी ध्यान देने योग्य है। यहाँ किसी स्वार्थयुक्त विचार से नहीं किन्तु केवल दुर्बल राष्ट्र की रक्षा के हेतु से युद्ध किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि आक्रमणकारी पर आघात किया जाता है और उसे क्षति पहुंचाई जाती है। किन्तु इस परिस्थिति में भी हमें हिंसा का प्रत्यक्ष उदाहरण नहीं मिलता। इस प्रकार के युद्ध का उद्देश्य केवल एक निर्बल राष्ट्र की रक्षा करना ही नहीं होता वरन् अप्रत्यक्ष रूप में उससे आक्रमणकारी का भी हित होता है। उसमें दुर्बल राष्ट्रों को वशीभूत करके उनका शोषण करने की जो दुष्प्रवृत्ति पाई जाती है, और जो एक प्रकार का रोग है, वह इस प्रकार दूर हो जाता है। दुर्बल की रक्षा निःस्वार्थ सेवा का एक मुख्य रूप है और कर्मयोग का एक अंग है। अनिवार्य साधन के रूप में बल का उपयोग करना सेवा के लिये यदि आवश्यक हो तो पूर्णतः न्यायोचित है। इसलिये दुर्बल की रक्षा के लिये यदि कोई युद्ध किया जाय तो यह आवश्यक है कि वह निःस्वार्थ और घृणा रहित हो। तभी उसका पूर्ण आध्यात्मिक महत्व हो सकता है। एक स्त्री पर एक मनुष्य अधम मनोवृत्ति से आक्रमण करता है। और दूसरा मनुष्य स्त्री के सम्मान और प्राण रक्षा के लिये बल का उपयोग करता है, तो वह न्यायोचित है। इसी प्रकार दुर्बल की रक्षा के लिये किया गया बल-प्रयोग भी सर्वथा न्यायोचित है।

चौथे उदाहरण में निःसन्देह हिंसा की बात है, किन्तु घृणा रहित होने और बच्चों के श्रेष्ठतर हित के लिये किये जाने के कारण यह हिंसा न्यायोचित है।

पाँचवे उदाहरण में “वीर” की अहिंसा” का दिग्दर्शन कराया गया है। इसे अकर्मण्यता समझना भूल है। और न यह “कायर की अहिंसा” है जिसमें कोई व्यक्ति भय के कारण आक्रमण का प्रतिकार नहीं करता। इसमें हिंसा न होने पर भी उसका कोई महत्व नहीं हैं। इस प्रकार विश्लेषण करने से मालूम होता है कि हिंसा और अहिंसा का आधार व्यक्ति की मनोभावना पर है। यों तो अहिंसा की सबसे उच्च स्थिति वह है जिसमें व्यक्ति समस्त प्राणियों को आत्मवत् समझता हुआ शत्रुता और मित्रता दोनों से परे रहता है और किसी भी परिस्थिति में हिंसा की भावना का उसके मन में प्रवेश नहीं होता, पर यह जीवन्मुक्त पुरुषों की बात है। साँसारिक व्यवहार में हमको अपनी मनोभावनाओं के अनुसार ही हिंसा अथवा अहिंसा का निर्णय करना चाहिये।


भारतीय संस्कृति मानवता प्रधान है।

(श्री. शम्भूसिह कौशिक)

वर्तमान समय में युद्धों की अधिकता और अस्त्र शस्त्रों के विकास के कारण अनेक लोगों का यही विचार हो गया है कि जो जाति जितनी ही युद्ध पटु होगी, दूसरों को दबाकर उनको अपने वश में रखने का ढंग जानती होगी, वही श्रेष्ठ है, और उसी को अन्य जातियों का मुखिया बनने का अधिकार है। हमारे देश के प्राचीन इतिहास में “चक्रवर्ती राजाओं” का हाल पढ़कर बहुत लोग कहने लगते हैं कि देखिये प्राचीन काल में जब यहाँ के निवासी युद्ध शास्त्र में निपुण थे तो वे भी संसार के सब देशों को जीतकर उनको अपने शासनाधीन रखते थे।

पर यदि भारतीय संस्कृति और साहित्य पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो स्पष्ट विदित होता है कि अकारण अन्य देश वासियों से युद्ध छेड़ कर उनको बर्बाद करना और गुलाम बनाकर शोषण करना भारतीय संस्कृति में कभी भी प्रचलित न था। यहाँ तो किसी कारणवश युद्ध करने पर हारे हुये शत्रु का राज्य फिर उसी को लौटा दिया जाता था, केवल अन्याय का प्रतिकार ही उससे कराया जाता था। यह तो ईसाई और मुसलमान (विशेषतः तातारी या तुर्क) सभ्यता का लक्षण है कि मित्र बन कर भी धीरे-धीरे दूसरे घर पर अधिकार जमा लेना अथवा दूसरा बहुत निर्बल हो तो खुल्लमखुल्ला उसे पददलित करके उसका शोषण करना, उससे पशुओं की तरह डंडे के जोर से अपनी सेवा कराना। इसके विपरीत भारतीय संस्कृति का उद्देश्य सदैव यही रहा है यदि हमारे पड़ोस का कोई देश या जन समुदाय पिछड़ा हुआ अथवा निर्बल है तो उसे अज्ञान से छुटकारा पाकर संगठित और सुसभ्य जीवन व्यतीत करने का मार्ग दिखलाना। इसी प्रकार भारतवर्ष ने प्राचीनकाल में एशिया, योरोप, और अमरीका तक के दूरवर्ती प्रदेशों में मानवोचित धर्म और सभ्यता का सन्देश पहुँचाया था और वहाँ के निवासियों के जीवन को अधिक सुखी और शाँतिमय बनाने का ज्ञान प्रदान किया था। हमारे पूर्वजों ने यह कार्य किस प्रकार सम्पन्न किया इसकी चर्चा करते हुये स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान पर लिखा है-

“आर्य लोग शान्ति प्रिय हैं, खेती−बाड़ी करते हैं, और परिश्रम करके अन्न पैदा करते हैं। वे अपने परिवार का पालन पोषण करके ही संतुष्ट हो जाते थे। इससे उनको विचार करने, संसार की समस्याओं पर चिन्तन करने का अवसर मिल जाता था। हमारे यहाँ के राजा जनक अपने हाथों से हल भी चलाते थे और अपने समय के एक प्रसिद्ध आत्मज्ञानी भी थे। इसके सिवा यहाँ अनेक ऋषि, मुनि, योगी आदि भी रहते थे। वे लोग सदा से यही समझते और उपदेश करते थे कि संसार मिथ्या है और इसके लिये लड़ना-झगड़ना बेकार है। यही कारण था कि यहाँ पर तलवार चलाने का ज्ञान और शक्ति होने पर भी उसका स्थान विद्या और धर्म के नीचे रखा गया है। उसका काम धर्म रक्षा करना बतलाया गया, अर्थात् मनुष्यों अथवा गाय बैल आदि पशुओं पर कोई पाप बुद्धि वाला अत्याचार करे तो उनकी रक्षा करना। ऐसे वीरों का नाम पड़ा श्रापद त्राता क्षत्रिय। इस प्रकार यहाँ जीवन निर्वाह के लिये कृषि वाणिज्य, और शास्त्र विद्या की पृथक-पृथक व्यवस्था करने पर भी सबका अधिपति तथा रक्षक धर्म को ही रखा गया। वह राजाओं का भी राजा है और सबके सो जाने पर भी जाग्रत रहता है। धर्म के आश्रय में सभी स्वाधीन और निर्भय रहते हैं। यह था भारतीय संस्कृति का सच्चा स्वरूप।”

इसके विपरीत योरोपियन लोग भारतवर्ष की सभ्यता को निकृष्ट सिद्ध करने के लिये कहते हैं कि आर्य लोग तो किसी अन्य देश से घूमते-घामते भारतवर्ष में आ पहुंचे और यहाँ के जंगली जाति वालों को मार काट कर, उनकी जमीन छीन कर स्वयं यहाँ बस गये। इस आक्षेप का उत्तर देते हुये स्वामी जी ने कहा है-”योरोपियन लोगों को जिस देश में मौका मिलता है, वहाँ के मूल निवासियों का नाश करके स्वयं मौज से रहने लगते हैं, इसलिये उनका कहना है कि भारत के आर्य लोगों ने भी वैसा ही किया था। ये “मरभुक्खे” किसको मारें, किसको लूटें यही विचारते हुये चारों ओर घूमते रहते हैं। और कहते हैं कि आर्य लोग भी ऐसा ही करते थे। पर हम पूछते हैं कि उनकी इस धारणा का आधार क्या है? या केवल उनकी कल्पना ही हैं! किस वेद अथवा सूक्त में अथवा अन्य भारतीय ग्रन्थों में तुमने देखा है कि आर्य दूसरे देशों से भारतवर्ष में आये? इस बात का प्रमाण तुमको कहाँ मिलता है कि उन लोगों ने जंगली जातियों को मार काट कर यहाँ निवास किया? इन मूर्खतापूर्ण बातों में कोई सार नहीं।”

“यह सत्य है कि रामचन्द्रजी ने दक्षिण को विजय किया था। पर उन्होंने किसके साथ लड़ाई की थी? लंका के राजा रावण के साथ । क्या रावण असभ्य और जंगल जाति का था? रामायण पढ़ कर देखो तो मालूम होगा कि ज्ञान विज्ञान में उसका देश रामचन्द्र जी के देश से भी बढ़ा-चढ़ा था। लंका की सभ्यता अयोध्या की सभ्यता से अधिक ही थी, कम नहीं। यदि यह कहो कि रामचन्द्रजी ने बानर आदि जातियों पर विजय प्राप्त की तो यह भी ठीक नहीं। उन्होंने बालि को मारा पर उसके राज्य या कोष को तो हाथ नहीं लगाया, सब ज्यों का त्यों वहाँ वालों का ही रहने दिया।

“इसके विपरीत योरोपियन लोगों को देखो। उन्होंने कब किसका भला किया है? जहाँ कहीं निर्बल जाति को पाया, उसे नेस्तनाबूद कर दिया। उनकी भूमि पर ये लोग स्वयं बस गये और वे जातियाँ मटियामेट हो गईं। अमरीका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, अफ्रीका सबका इतिहास यही एक बात पुकार-पुकार कर कह रहा है। केवल जहाँ इनका वश न चला वहीं की जातियाँ जीवित रह सकीं। भारत वर्ष ने कभी ऐसा काम नहीं किया । आर्य लोग स्वभाव से ही दयालु थे। उनके विशाल हृदय में दैवी प्रतिभा सम्पन्न मस्तिष्क में, कभी ऐसी पाशविक बातें नहीं आई। जहाँ आज योरोप का उद्देश्य सब को नाश करके स्वयं अपने को बचाये रखना दिखलाई पड़ता है, वहाँ आर्यों का उद्देश्य था-सबको अपने समान करना अथवा अपने से भी बड़ा करना। योरोपीय सभ्यता का साधन है- तलवार, और आर्यों की सभ्यता का मार्ग था-वर्ण विभाग। इस वर्ण विभाग द्वारा प्रत्येक मनुष्य धीरे धीरे सभ्यता के नियमों का अभ्यास करके समाज का माननीय सदस्य बन जाता था। योरोप में बलवानों की जय और निर्बलों की मृत्यु होती है। भारतीय संस्कृति के सभी नियम दुर्बलों की रक्षा करने की दृष्टि से बनाये गये थे।”

उपरोक्त विवेचन से हम सहज ही इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भारतवर्ष की संस्कृति अध्यात्म प्रधान है, जबकि अन्य देश धर्म का नाम लेते हुये भी प्रधानता भौतिक उन्नति को ही देते हैं। भारत वर्ष के मनीषियों ने सदा से यही शिक्षा दी है कि तुम संसार के भोगों को भोगते रहो, सुखपूर्वक जीवन बिताओ, पर उनमें ऐसे रत मत हो जाओ कि धर्म अधर्म, न्याय, अन्याय, नीति अनीति का ध्यान भी न रहे। तुम्हारे साँसारिक व्यवहारों और भोगों पर धर्म का नियंत्रण अवश्य रहना चाहिये। अर्थात् सुखों का भोग करते हुये भी सदा यह ध्यान रखो कि उनमें दूसरों का भी भाग है, इसलिये तुम उतना ही ग्रहण करो जितने पर तुम्हारा न्यायानुकूल अधिकार है। दूसरों के हिस्से पर हस्तक्षेप करने से ही कलह वैमनस्य और युद्ध की सृष्टि होती है। योरोप के जो विद्वान यह प्रतिपादित करते हैं कि “संघर्ष का होना हमारे अस्तित्व रक्षा के लिये आवश्यक है” वे एक बड़ी गलती करते है। उनका सिद्धान्त उन प्राणियों के लिये उपयुक्त है जो अभी पशु श्रेणी में है और जिनमें अभी बुद्धि तथा मानवीय सद्गुणों का विकास नहीं हुआ है। हम यह भी कह देना चाहते हैं कि पढ़ने लिखने, तरह तरह के यंत्र बना लेने, विज्ञान की आश्चर्यजनक खोज कर लेने का काम ही मनुष्यत्व नहीं है। प्राचीन काल के अनेक ऋषि मुनि प्रायः इन साँसारिक बातों से पृथक रहते थे, पर दीन दुखियों की सहायतार्थ वे अपने प्राण तक दे डालते थे, तो क्या वे मनुष्यत्व विहीन थे। विचारपूर्वक देखा जाय तो भारतीय संस्कृति का सार यही है कि वह मनुष्य में सबसे पहले मानवता की आत्मबुद्धि की प्रतिष्ठा करना चाहती है और साँसारिक भोगों को धर्म के नियंत्रण में रखने का उपदेश देती है।


मृत्यु के बाद भी हम जीवित रहते है।

(डॉ. चमनलाल गौतम)

मनुष्य का मरने के बाद क्या होता है, यह एक बड़ा गम्भीर प्रश्न है। कहने के लिये तो हमारे देश के अधिकाँश निवासी आस्तिक हैं, परलोक (स्वर्ग और नर्क) पर विश्वास रखते हैं और बात बात में इनकी दुहाई देते रहते हैं, पर वास्तव में इस विषय में कुछ समझने वाले और सच्चे दिल से विश्वास रखने वालों की संख्या बहुत ही कम है। क्योंकि जो व्यक्ति मुँह से तो परलोक और पुनर्जन्म का नाम लेता रहता है और इनके आधार पर लोगों को पाप कर्म न करने का उपदेश भी देता है, पर स्वयं जरा-जरा सी बात के लिये बेईमानी, छल, दगा करने को तैयार हो जाता है, तो हम कैसे मान लें कि वह परलोक पर विश्वास रखता है ? हम तो यही कहेंगे कि वह पक्का नास्तिक है, केवल पुराने संस्कारों के कारण स्वार्थ साधन के लिये स्वर्ग-नर्क का नाम लेता रहता है। यदि उसको सचमुच यह विश्वास हो कि प्रत्येक खोटे कर्म का फल हमको परलोक में मिलेगा तो फिर वह झूठ, कपट, विश्वासघात आदि का व्यवहार जानबूझकर और खुले आम कर ही कैसे सकता है?

इसमें तो तनिक भी सन्देह नहीं कि पुनर्जन्म और परलोक जीवन हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा सिद्धान्त है, और संसार के किसी अन्य धर्म ने इस विषय पर इस तरह बाकायदा खोज करके “मृत्यु के बाद के जीवन” को न तो सिद्ध किया है और न वे उसे जानते ही हैं। मुसलमान, ईसाइयों में परलोक का वर्णन नाम मात्र को है और उसे ऐसा रूप दिया गया है कि उससे मनुष्य के वर्तमान जीवन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। पर हिन्दू शास्त्रकारों ने इस विषय की ऐसी बारीकी से खोज की है कि मनुष्यों को अपने सब प्रकार के भले बुरे कर्मों के परिणामों का भली प्रकार ज्ञान हो जाता है और वे परलोक के स्वरूप को बहुत अच्छी तरह समझ सकते हैं। पर खेद है कि यह सब होने पर भी वे व्यवहार में इस बात का प्रमाण बहुत कम देते हैं कि उन्होंने इस ज्ञान से कोई लाभ उठाया है।

इसका कारण यही है कि इधर बहुत समय से लोगों ने पुराने समय की तरह अध्यात्मिक विषयों पर विचार और अभ्यास करना बन्द कर दिया है और साँसारिक धन, संपत्ति का महत्व उनकी निगाह में बहुत अधिक बढ़ गया है। अब वे आत्मज्ञान सिखलाने वाले गुरु की अपेक्षा तनख्वाह देने वाले सेठजी या मैनेजर साहब का बहुत अधिक आदर करते हैं। खाने पीने और भोग-विलास की आवश्यकताओं ने उनको ऐसा दबा लिया है कि उनको पारलौकिक और आगामी जन्म की समस्याओं पर ध्यान देने और इस विषय का अध्ययन करने की कभी फुरसत ही नहीं मिलती। इससे लोगों में धर्मभाव का ह्रास होता जाता है, स्वार्थ परता बढ़ती जाती है? नैतिकता और सच्चरित्रता की दृष्टि से पतन होता जाता है और ये पशुओं के सदृश्य खाने पीने और भोग को ही इस संसार में सार-वस्तु समझने लग जाते हैं।

इस दशा को देखकर अब अनेक संसार हितैषी व्यक्तियों ने परलोक के विषय में खोज और अध्ययन करके उसे ऐसे रूप में प्रकट करने का प्रयत्न किया है जिससे लोग वहाँ के सम्बन्ध में कुछ प्रत्यक्ष प्रमाण पा सकें और यह निश्चित रूप से जान लें कि परलोक की उपेक्षा करना उनके लिये वास्तव में घातक है। यह कार्य योरोप में प्रायः सौ वर्ष पहले उठाया गया था और इधर तो चालीस वर्ष से भारतवर्ष में भी हो रहा है। इसमें विभिन्न प्रकार के प्रयोग करके परलोक की आत्माओं से संदेश प्राप्त किये जाते हैं और उनके द्वारा मृतात्मा के सम्बन्धियों को विश्वास कराया जाता है कि वास्तव में उनके परिवार का मृत व्यक्ति परलोक में है। इन संदेशों में प्रायः ऐसी बातें होती हैं जिनको कोई बाहरी व्यक्ति नहीं जानता, इसी से अविश्वासियों को भी प्रमाण पाकर विश्वास करना पड़ता है।

परलोक विद्या से सबसे बड़ा लाभ तो यह हुआ है कि जिन लोगों के प्रिय सम्बन्धी बिछुड़ जाते हैं और जिनके वियोग में वे व्याकुल और दुःखी रहते हैं, जब उनके साँत्वना देने वाले संदेश उनको परलोक से प्राप्त हो जाते हैं तो उनको बहुत कुछ शाँति मिल जाती है। इस सम्बन्ध में सैंकड़ों उदाहरण ऐसे हैं कि परलोक विद्या ने लोगों की प्राण रक्षा कर दी, अन्यथा अपने प्रियजनों के वियोग में वे भी मर जाते।

दूसरा लाभ यह है कि संसार में इस समय जो जड़वाद या भौतिक विचारधारा फैलती जा रही थी, उसका परलोकवाद ने बहुत कुछ निराकरण कर दिया है। लोगों में जो नास्तिकता के भाव बढ़ते जाते थे और वे कहने लगे थे कि “मनुष्य तो केवल अणु-परमाणुओं का एक पुतला है, जिसका अन्त मरते ही हो जायगा, इसलिये मनुष्य को जब तक संसार में रहे खाना, पीना मौज उड़ाने के सिवाय और कुछ नहीं करना चाहिये। धर्म शास्त्र आदि सब खोटा ढोंग है, और परलोक की बातें स्वार्थी लोगों ने कल्पित करके फैला दीं इस प्रकार में मन माने विचारों से संसार में स्वार्थ परता का दिन दूना रात चौगुना विस्तार हो रहा था और नैतिकता की दृष्टि से मनुष्य दिन पर दिन गिर रहा था। परलोकवाद ने इस स्थिति को बहुत कुछ संभाला है और यह सिद्ध कर दिया है कि जीवन को इतना छोटा मानना और इसके फलस्वरूप मनुष्य से पशु श्रेणी में उतर जाना कार्य समझदारी की बात नहीं है। मनुष्य वही है जो शाश्वत जीवन पर विश्वास रख कर तदनुकूल व्यवहार संसार में करे। इसके लिये यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य अवश्य ही किसी विशेष धर्म का अनुयायी बन कर पूजा पाठ करे, पर विश्वव्यापी जीवन-धारा के नित्य (स्थायी) और सर्वत्र व्याप्त स्वरूप को जानना एक ऐसी अनिवार्य बात है कि जिसके बिना मनुष्य में सच्ची आस्तिकता मानवता का विकास प्रायः होना असम्भव है।

परलोकवाद के ज्ञान का एक शुभ परिणाम यह भी होता है कि विभिन्न मतमतान्तरों में पाई जाने वाली कटुता और विरोध का भाव शान्त हो जाता है और वे समझने लगते हैं कि हम चाहे कैसी भी विधि से पूजा पाठ और ईश्वर प्रार्थना करें पर मरने के बाद हमारी एक ही गति होने वाली है और उस समय सदाचरण और परोपकार का ही मूल्य सबसे अधिक माना जायगा। लौकिक धार्मिक रीति-रस्मों और उपासना की प्रणाली में तो देश, काल और समाज के भेद से अन्तर हो सकता है, उसको अधिक महत्व देना ओर उसके नाम पर ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुता के भावों को जन्म देना बुद्धिमानी की बात नहीं है। हम मंदिर मस्जिद और गिरजाघर में चाहे जैसी विधि से भजन और ईश-प्रार्थना करें पर हमको उसका उत्तम फल तभी प्राप्त हो सकेगा जब वह सच्चे हृदय से निकलेगी और उन विचारों को हम कार्य रूप में भी पूरा करके दिखायेंगे। इस उद्देश्य के लिये परलोक सम्बन्धी ज्ञान का प्रचार और उसकी कुछ जानकारी प्रत्येक व्यक्ति के लिये कल्याणकारी सिद्ध हो सकती है।


ब्राह्मण अपने कर्तव्य की उपेक्षा न करें

(श्री. रमेशचन्द्र शुक्ल एम. ए.)

संसार में जन्म लेकर जीवित तो सभी प्राणी रहते हैं, पर मनुष्य योनि में आकर सफल जीवन उसी का कहा जाता है जो सुख, समृद्धि, यश गौरव आदि प्राप्त करके लोगों के बीच उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होता है। ऐसे व्यक्ति समाज में मुखिया, संचालक, नेता आदि नामों से पुकारे जाते हैं। पर इससे भी महान् पद मनुष्य को तब प्राप्त होता है जब वह आत्मज्ञान प्राप्त करके संसार के हित-साधन को अपना लक्ष्य बना लेता है।

सुख समृद्धि आदि भौतिक जगत से सम्बन्ध रखने वाली बातें हैं और उनके प्राप्त करने में विज्ञान से सहायता प्राप्त होती है। इस प्रकार के भौतिक ज्ञान को शास्त्र में “अविद्या”कहा गया है, जैसे-

विद्याँ चाऽविद्याँ न यस्तद् वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युँ तीर्त्वा विद्यया ऽमृतमश्नुते॥

उपनिषद् के इस वाक्य में स्पष्ट कहा गया है कि मृत्युलोक के धन्धों को चतुराई के साथ सम्पन्न करने के लिये “अविद्या” ही उपयोगी होती है। यहाँ “विद्या” से जो लोग लिखने-पढ़ने का आशय समझेंगे वे इस तत्व को कभी न जान सकेंगे। संसार के साधारण लोगों की दृष्टि में तो यह “अविद्या” ही असली विद्या जान पड़ती है, और जिसे उपनिषद्कार ने विद्या कहा है वह निकम्मी तुच्छ वस्तु प्रतीत होती है। क्योंकि उनके कथनानुसार तो जो ज्ञान पेट भरने, चाँदी की टुकड़े को प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करता है वही असली विद्या है। इसके विपरीत जिस ज्ञान से मनुष्य को अकिंचन अवस्था में रहना पड़े दिन भर परिश्रम करने पर भी दो चार रुपये गाँठ में दिखाई न दें यह विद्या नहीं, परम मूर्खता का चिन्ह है। गीता में भी इस बात को बहुत स्पष्ट रूप से कह दिया गया है-

या निशा सर्व भूतानाम् तस्याँ जागृति संयमी। यस्याँ जागृति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने॥

इस श्लोक में भी यही बतलाया गया है कि जिस विषय को संसारी लोग रात्रि के समान अन्धकार निरुपयोगी मानते हैं, ज्ञानी जन उसी के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, जिन बातों को दुनिया वाले बड़ी महत्व एवं लाभ की समझते हैं, ज्ञानवान उनकी तरफ से आँखों बन्द कर लेते हैं।”

संसार में आज तक जितने भी महापुरुष, ज्ञानी संत हुये हैं उन सबको, चाहे वे किसी देश और जाति के क्यों न हों यही कहा है कि शरीर-रक्षा और आश्रितों के पालन के लिये मनुष्य कोई व्यवसाय या रोजगार भले ही करता रहे, उसे यह सदैव याद रखना चाहिये कि उसका अंतिम लक्ष्य मोक्ष लाभ करना ही है। साथ ही यह भी कह दिया गया है कि विद्या और अविद्या दोनों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करके लौकिक और पारलौकिक उद्देश्यों को एक साथ पूरा कर लेना सरल काम भी नहीं है। उसके लिये जीवन में उत्तम प्रकार के संयम और प्रलोभनों से बचकर रहने की आवश्यकता है। इसीलिये कहा गया है-

सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्

“जो लोग सुख के फेर में पड़े रहते हैं उनको विद्या के दर्शन नहीं हो सकते और जो विद्या की आकाँक्षा रखने वाले हैं। उनको सुख की लालसा नहीं रखनी चाहिये।” इस मार्ग पर चल कर विद्या का प्राप्त कर सकना उन्हीं “विद्यार्थियों” के लिये सम्भव है जो आलस्य, मद, मोह, चंचलता, अभिमान, उद्दंडता आदि से बचकर ज्ञान की आराधना किया करते हैं। इस प्रकार के “विद्यार्थियों” को उचित मार्ग का प्रदर्शन भी वे ही दिव्य चरित्र वाले महानुभाव कर सकते हैं जो साँसारिक वैभव, सुखोपभोग से निर्लिप्त रह कर संसार के उद्धार का व्रत लिया करते हैं।

बिना ज्ञान के प्रसार के संसार में सच्चे सुख और शान्ति की स्थापना नहीं हो सकती। सैन्यबल, राज्य बल और अर्थबल से जो सुख-शान्ति प्राप्त की जाती है वह क्षणिक हुआ करती है। परन्तु ज्ञान अर्थात् विद्या के प्रभाव से जो शाँति स्थापित की जाती है, वह पर्याप्त समय तक स्थिर रह कर लोक कल्याण करती रहती है। यही कारण है कि प्राचीन भारत में ज्ञान को सर्वोपरि स्थान दिया गया था। यहाँ पर ज्ञान- प्रचार का कार्य करने वालों को सबसे अधिक श्रद्धाभाजन बतलाया गया था और उच्च स्वर से घोषित कर दिया था-

“नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्र मिह विद्यते।”

“ज्ञान के सदृश्य पवित्र संसार में अन्य कोई नहीं है।” प्राचीन भारत की आश्रम-व्यवस्था में ब्रह्मचर्य आश्रम को सबसे अधिक महत्व और वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इस देश की तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में भौतिक पदार्थों के बजाय ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ स्वीकार किया गया था। खेद का विषय है कि आज हम इन्हीं दोनों को सबसे अधिक उपेक्षित दशा में देख रहे हैं।

ज्ञान-प्रसार के अभाव से देशों में जो कष्ट और अशान्ति का वातावरण दिखलाई पड़ रहा है उसका दोष शासकों अथवा धनवानों पर उतना अधिक नहीं रखा जा सकता है जितना कि उस वर्ग पर जो ज्ञान विभाग का उत्तरदायी बनाया गया था और जिसे “ब्राह्मण” का नाम दिया गया था।

यह “ब्राह्मण”वर्ग वही है जिसके पूर्वजों ने अपने जीवन का ध्येय अध्ययन और अध्यापन बनाया था, यह ब्राह्मण कही जाने वाली जाति वही है जिसने किसी भी साँसारिक मान, किसी भी वैभव और किसी भी पद को महत्व न देकर ज्ञान को ही एक मात्र श्रेष्ठ विषय समझ कर अपनाया था। इसके लिये उन्होंने न केवल दरिद्रता, गरीबी को सहर्ष स्वीकार किया था, वरन् आवश्यकता पड़ने पर जिसके लिये वे अपना जीवन भी उत्सर्ग कर देते थे। यही कारण था कि उस समय देश के छोटे से लेकर बड़े से बड़े तक सब कोई ब्राह्मणों की महिमा को बखानते थे और उनके चरणों में मस्तक नवाना सौभाग्य का चिन्ह मानते थे।

पर आज उन्हीं ब्राह्मणों के वंशधर अपने कर्तव्य को भूल गये हैं और भौतिक सम्पत्ति के लिये नीच से नीच कार्य करने को तैयार हो जाते हैं। बस जहाँ उन्होंने अपने कर्तव्य की ओर से निगाह फेरी कि जनता में भी उनका दर्जा घट गया और लोग उनको अवहेलना की दृष्टि से देखने लगे। पूजा तो गुणों के कारण ही होती है। जब वह श्रेष्ठ कर्म ही न रहे तो लोगों की श्रद्धा कैसे टिक सकती थी इसलिये जो लोग ब्राह्मणों की उपेक्षा और दुर्दशा की शिकायत करते हैं उनको वास्तविक कारणों पर ध्यान देना चाहिये। यदि ब्राह्मण अब भी अपने प्राचीन कर्तव्य पर आरुढ़ हो जाएं और साँसारिक सुखों का मोह त्याग कर जन-कल्याण को अपना ध्येय बना लें तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि सर्वसाधारण की दृष्टि में वे फिर वैसे ही पूजनीय बन जायेंगे।


भय छोड़िए-निर्भय रहिए

(श्री गिरिजा सहाय व्यास)

मनुष्य की प्रगति के मार्ग में अनेक बातें बाधक हुआ करती हैं। असफल होने पर अनेक मनुष्य विचार करते हैं कि हम सच्चाई के साथ इतना प्रयत्न करते हैं और फिर भी हमको सफलता के दर्शन नहीं होते, तो अवश्य ही इसमें हमारे भाग्य का दोष है, अथवा दुनिया के अन्य व्यक्ति ऐसे स्वार्थी और कठोर चित्त हैं कि वे हमारी सहायता करने के बजाय हमारी प्रगति के मार्ग में रोड़ा अटकाते हैं और इसलिये हमको असफल होना पड़ता है। परन्तु सच्ची बात यह है कि उनमें स्वयं ही कोई न कोई ऐसी त्रुटि होती है कि जिसके कारण वे किसी भी काम में भली प्रकार सफलता प्राप्त नहीं कर सकते।

मनुष्य के स्वभाव में ऐसे बहुत से दोष पाये जाते हैं। जो जीवन-संघर्ष में अग्रसर होने में बाधक सिद्ध होते हैं। भय की भावना अथवा डरने का रोग उनमें सबसे अधिक प्रचलित है। वैसे थोड़ा सा भय सभी में पाया जाता है। उसके द्वारा मनुष्य को आत्मरक्षा की प्रेरणा मिलती और वह सावधान भी रहता है। पर जब यह भय की भावना बहुत अधिक बढ़ जाती तो मनुष्य का मन विकृत होकर निश्चेष्ट हो जाता है और उसके कार्य में बड़ी रुकावट पड़ने लगती है। इस भय में वास्तविकता का अंश बहुत थोड़ा होता है, अधिकाँश में हम अपनी कल्पना से भय का भूत बना लेते हैं। यह सच है कि हमारे मन में जो विशेष प्रकार के भय जड़ जमा लेते हैं उनका कोई कारण भी होता है, पर हम उस कारण को नहीं जानते केवल उसके प्रभाव से हमारे मन में किसी विशेष भय का संचार होने लगता है और वह हमारे लिये बहुत हानिकारक होता है। एक लेखक ने इसका एक उदाहरण लिखा है जो इस प्रकार है-

“एक दिन किसी नाई की दुकान पर कितने ही व्यक्ति बैठे, कुछ हजामत करा रहे थे और कुछ स्थान खाली होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इतने में हजामत की कुर्सी पर बैठा एक आदमी अचानक उठ खड़ा हुआ और आधी हजामत की हालत में ही चेहरे पर लगे साबुन को पोंछकर बाहर चला गया। दूसरे लोग आश्चर्य में आकर देखते ही रह गये। एक व्यक्ति ने नाई से पूछा-”इसे क्या हो गया, अपना कोट भी छोड़ गया और हजामत भी आधी ही बनवा गया?”

नाई ने उत्तर दिया- “यह हमेशा ऐसे ही करता है। उसका ख्याल है कि ऐसी छोटी जगह में ज्यादा देर बैठने से उसका दम घुटने लगेगा। अब एकाध घंटे बाद वह फिर वापस आ जायगा तब मैं उसकी हजामत को पूरी करूंगा।”

ऐसे अनेक व्यक्ति जिनको “बन्द जगह” का भय जग जाता है बन्द कमरे में रहने से डरते हैं, लिफ्ट पर नहीं चढ़ सकते, सुरंग में गुजरने पर एक दम व्याकुल हो जाते हैं, रेल के डिब्बे में भी यात्रा नहीं कर सकते। इस प्रकार के भय के कारण समय और पैसे की तो हानि उठानी पड़ती है, पर इसके कारण अपचन, दमा, हृदय रोग, सिर दर्द आदि की शिकायत भी पैदा हो जाती हैं। अमरीका के कई बड़े नगरों में बहुत ऊँचे-ऊँचे मकान हैं, न्यूयार्क में तो एक के ऊपर एक करके 80 मंजिलों तक की इमारतें हैं उन सब में लिफ्ट द्वारा चढ़ना पड़ता है। लिफ्ट भी ऐसी जगहों में काफी देर से गन्तव्य स्थान तक पहुँचती है। जिन लोगों को ‘बन्द जगह’ का भय होता है, वे ऐसे अवसरों पर बहुत अधिक व्याकुल हो जाते हैं।

एक सज्जन की इस भय के कारण ऐसी आदत पड़ गई थी कि बीस-तीस मील की रेलयात्रा में भी वे प्रत्येक स्टेशन पर डिब्बा बदलते रहते थे। ऐसे भय की भावना का कारण ढूंढ़ने के लिये रोगी के बचपन के इतिहास की पूर्ण रूप से खोज की जाती हैं। एक बार एक ऐसे व्यक्ति की जब जाँच की गई तो मालूम हुआ कि “बाल्यावस्था में उसे एक तंग गली में होकर घर जाना पड़ता था। इस गली का एक सिरा तो बाजार में था और दूसरा सिरा दूसरी तंग गली में जाकर मिल जाता था। एक दिन उस व्यक्ति ने बाजार वाले सिरे पर पहुँच कर देखा कि वहाँ पर फाटक बन्द कर दिया गया है। जब उसने पीछे लौट जाना चाहा तो देखा कि एक बड़ा काला कुत्ता उस पर झपटने को तैयार है। गली इतनी तंग थी कि वह बचकर भाग न सका। डर के मारे वह गिर कर बेहोश हो गया। इस घटना से वह बीस पच्चीस वर्ष तक ऐसा आतंकित रहा कि जब किसी तंग गली में गुजरना हो उसे एकाएक भय लगने लगता। “इसी प्रकार” एक स्त्री ने जब अपने धर के एक अंधेरे से कमरे में आलमारी खोली तो उसे उसमें एक साँप बैठा दिखलाई पड़ा। उसे ऐसा भय लगा कि वहीं पर बेहोश होकर गिर गई। बाद में घर के अन्य लोगों ने वहाँ पहुँच कर साँप को मारा। पर उस स्त्री के मन में उस दिन के भय ने ऐसा घर कर लिया कि वह जब किसी अंधेरी जगह में जाती तो साँप की कल्पना करके भयभीत हो जाती।”

इसी प्रकार अनेक लोग वर्षों पहले की छोटी छोटी और झेली हुई घटनाओं के प्रभाव से अपने जीवन में एक ऐसा रोग उत्पन्न कर लेते है कि जिससे उनका विकास, रुक जाता है, अनेक कार्यों में, जिनके लिए वे सब प्रकार से उपयुक्त होते हैं, असफल होना पड़ता है, मानसिक शक्ति निर्बल पड़ जाती हैं और जीवन में उल्लास का अंश बहुत कुछ नष्ट हो जाता है। इसलिये हमारा कर्तव्य है कि यदि बच्चों के साथ ऐसी घटना हो जाय और उसमें डरने की आदत जड़ पकड़ती जान पड़े तो तुरन्त उसको वास्तविकता का ज्ञान कराके उसका प्रतिकार कर देना चाहिये। अन्यथा बड़े होने पर भय की भावना तो बनी रहती है, पर हजार चेष्टा करने पर भी यह पता नहीं चलता कि आखिर हम ऐसा भयभीत क्यों होने लगे। मनोवैज्ञानिक चिकित्सक ऐसे मरीजों का इलाज करते समय केवल यही करते हैं कि उससे बार-बार पूछकर और जिरह करके उस मूल घटना का पता लगा लेते हैं, जिसके कारण वह शिकायत उत्पन्न हुई है। जब कारण का पता लग जाता है तो उसकी निःसारता का ज्ञान करा देना सहज होता है और ऐसा करने से शिकायत प्रायः दूर हो जाती है। इस विषय में अमरीका के प्रसिद्ध विद्वान रामर्सन ने बड़ी स्पष्टता से कहा है। उस काम को अवश्य करो, बस भय का अन्त हो जायगा।”

वास्तव में यह कथन सोलह आना सत्य है। भय प्रायः काल्पनिक चीज है। उसका आधार किसी बाहरी वस्तु में नहीं होता वरन् हमारे मन में ही होता है। इसलिये यदि हम विचारपूर्वक अपने मन का संस्कार कर डालें, भय के कारण पर भली प्रकार से सोच कर उसे जड़ मूल से दूर कर दें इसी में हमारा कल्याण है। अन्यथा एक बुरी आशंका से हमारे भीतर ऐसी मानसिक निर्बलता जन्म ले लेती है कि उससे हमारा व्यक्तित्व बहुत कुछ विनष्ट हो जाता है। यदि ऐसा भय संयोगवश हमको पहले से लगा हुआ है तो उसका सबसे अच्छा उपाय वही है जो रामर्सन ने बतलाया है कि उस काम को अवश्य किया जाय, बार बार किया जाय अन्त में हमारी उस पर विजय होनी निश्चित है।


हमारा जीवन ‘दिव्य’ क्यों नहीं हो पाता?

(श्री0 भगवानसहाय वाशिष्ठ)

संसार में जन्म लेकर मनुष्य जिस प्रकार चाहे वैसा जीवन बिताने को स्वतंत्र है। जो लोग भाग्य अथवा ईश्वरवाद का यह अर्थ करते हैं कि हम तो कर्म करने में परतंत्र है जैसा कर्म हमसे ईश्वर या भाग्य कराता है वैसा ही करते हैं वे प्रायः सभी धोखेबाज या आत्म वंचक होते हैं। वे अपने कुकर्मों और निर्बलताओं पर पर्दा डालने के लिये एक बहाना ढूंढ़ लेते हैं। इस बात को सभी मनुष्य कहते हैं कि मनुष्य जीवन पशु-पक्षियों के जीवन से श्रेष्ठ है और उसका मूल्य भी बहुत अधिक है। पर वे ही मनुष्य ऐसे नीच कर्म करते हैं जैसे पशु-पक्षी भी नहीं करते। फिर ऐसे मनुष्यों के कार्यों का उत्तरदायित्व किसके ऊपर रखा जाय? जब भगवान ने आपको पशु-पक्षियों की योनियों से निकाल कर मनुष्य योनि में जन्म दिया तब उसका आशय यह तो कदापि हो ही नहीं सकता कि वह पशुओं से भी निकृष्ट श्रेणी के कार्य करे मनुष्य जीवन का उद्देश्य काफी ऊँचा रखा गया है और मावन-जन्म को देवत्व प्राप्त करने का साधन बताया गया है, ऐसी दशा में जो व्यक्ति दैवी जीवन प्राप्त करने योग्य कर्म नहीं करता वह अपने कर्तव्य से विमुख समझा जायगा। यह उद्देश्य कैसे सिद्ध हो सकता है इस सम्बन्ध में एक विचारक का मत है-

“इस श्रेय की प्राप्ति के लिये मनुष्य के भीतर शुद्ध विवेक का होना आवश्यक है। हमें यह निर्णय करना चाहिये कि हमारा और दूसरों का कल्याण किस बात में है। हमें देश, काल, प्रसंग और परिस्थिति का ज्ञान होना चाहिये। इस ज्ञान और शुद्ध विवेक बुद्धि से हम प्रत्येक कठिन अवसर पर यह जान सकते हैं कि हमारा कर्तव्य, हमारा धर्म क्या है, और यदि हम में दृढ़ता, निग्रह और संयम शक्ति हो तो हम अनुचित कर्म और अधर्म से बच सकते हैं। विवेक के साथ यदि हमारे भीतर संयम शक्ति और दृढ़ता न हो, तो केवल विवेक से हम अपना कल्याण नहीं साध सकते। वह हमें अकर्त्तव्य और अधर्म से नहीं बचा सकता। अच्छे बुरे संस्कारों के अनुसार हमारे मन के प्रवाह चलते हैं और बहुत हद तक हम उसी के अनुसार कर्म करते हैं। उनमें से बुरे प्रवाहों मनोवृत्तियों -और कर्मों को रोकना संयम का काम है। मनुष्य की शारीरिक, बौद्धिक ओर मानसिक शक्तियों का जैसे जैसे विकास होता जाय, वैसे वैसे उसकी संयम शक्ति भी बढ़ती जानी चाहिये। उसके इस प्रकार बढ़ने से ही मनुष्य उन शक्तियों का सदुपयोग करके अपना कल्याण कर सकता है। जिस प्रकार रेलगाड़ी की चाल बढ़ाने की युक्ति तो मालूम हो जाय, पर ठीक समय पर उसे रोकने की तरकीब न सीखी हो, तो ऐसी गाड़ी में अवश्य अनर्थ होगा। उसी प्रकार यदि अपनी बढ़ती हुई शक्तियों को मनुष्य वश में ने रख सके तो निश्चित है कि वे शक्तियाँ उसके और मानव-समाज के नाश का कारण बनेंगी। इसलिये हमारी बढ़ती हुई शक्तियों के साथ हममें विवेकयुक्त संयम की वृद्धि होनी चाहिये। इस संयम की सहायता से हम अपने मन को शुद्ध कर सकते हैं अपने विकारों और दुष्ट वृत्तियों को रोक सकते हैं और अनुचित कर्मों से बच सकते हैं। संयम से हमारा चित्त निर्मल होता जायगा और यह निर्मलता संयम-शक्ति को बढ़ायेगी। इस प्रकार इन दोनों गुणों का विकास एक-दूसरे की सहायता से होता रहेगा। उनके विकास के बिना हमारा व्यवहार शुद्ध नहीं हो सकता। अतः जीवन शुद्धि के लिये व्यवहार शुद्धि का होना अनिवार्य है दिव्य जीवन प्राप्त करने का यही मार्ग है।

दूसरी बात जिसकी आवश्यकता जीवन की शुद्धि और उसे धर्मयुक्त बनाने के लिये है, वह है सद्गुणों और सत्कर्म का अभ्यास। बहुत से मनुष्य सद्गुणों को स्वाभाविक समझकर उनके लिये किसी प्रकार के प्रयत्न की आवश्यकता नहीं समझते, पर यह विचार ठीक नहीं कहा जा सकता। सद्गुण उद्योग और अभ्यास से ही प्राप्त होते हैं। यों कहने के लिये कितने ही व्यक्तियों में सद्गुणों के अंकुर दिखाई पड़ते हैं, पर जब मनुष्य यथोचित प्रयत्न करके उन्हें दृढ़तापूर्वक धारण न करे तब तक उनके द्वारा सत्कर्म होना सम्भव नहीं होता। सत्कर्म ही इस बात की कसौटी है कि सद्गुण हमारे भीतर भली प्रकार जड़ जमा चुके हैं। वे यद्यपि सद्गुण पुरुषार्थ से ही सिद्ध होते हैं पर बिना सद्गुणों के कोरा पुरुषार्थ मनुष्यों में आसुरी भाव की वृद्धि करता है। इससे उनमें स्वार्थ भाव की वृद्धि हो जाती है और वे दूसरों को कष्ट देने वाले बन जाते हैं। अतः शुद्ध व्यवहार, और सद्गुण युक्त पुरुषार्थ ही मानव जीवन की पूर्णता के लक्षण हैं और ऐसे ही जीवन को दिव्य जीवन कहते हैं। पर खेद का विषय है कि इस सम्बन्ध में बहुत कुछ कहने और सुनने पर भी आचरण की दृष्टि से हमारे देश की स्थिति शोचनीय ही है। इस सम्बन्ध में एक विद्वान के निम्न उद्गार विचारणीय हैं-

“हम जब दिव्य जीवन या आध्यात्मिक जीवन के विषय में बोलते या लिखते हैं, तब हमारे संस्कारों के अनुसार हम अपने दार्शनिक, आध्यात्मिक और धार्मिक ग्रंथों का अपने यहाँ के प्राचीन ऋषि, मुनियों, अवतारों, पूर्वजों आदि का बड़े गौरव और अभिमान के साथ वर्णन करते हैं। वे निस्सन्देह सब गौरव और अभिमान के योग्य हैं, परंतु उस गौरव तथा अभिमान के साथ हमको अपनी वर्तमान दशा का भी विचार करना चाहिये। साथ ही हमको इस प्रश्न पर भी विचार करना चाहिये कि बार-बार भारत भूमि में ही ईश्वर के अवतार क्यों होते हैं? हमारे महान ग्रंथों में लिखा है कि पाप बढ़ जाने पर ही ईश्वर अवतार लेता है। तो भारत भूमि में ही बार-बार ईश्वर के अवतार होने पर भी यहाँ की जनता आज तक ऐसी अवनति की दशा में क्यों है ? ज्ञान से भरे हुये अनुपम ग्रंथ, हमारी प्राचीन उच्च संस्कृति, महापुरुषों की अखंड परम्परा यह सब उत्तराधिकार में मिलने पर भी आज हमारी ऐसी घोर दुर्दशा क्यों हो गई है ? मान लें कि आज हम अपने प्राचीन धर्म के अनुसार आचरण नहीं करते, पर हजार वर्ष पूर्व या उससे भी पहले तो हम धर्म के अनुसार आचरण करते थे। परन्तु ऐसा करते हुये भी प्रत्येक विदेशी आक्रमण के अवसर पर हमको पराजय का मुख ही क्यों देखना पड़ा ? हम मानते हैं कि दुनिया के दूसरे लोगों की अपेक्षा हम अधिक धार्मिक और सुसंस्कृत हैं, तत्वज्ञान का हमारे देश में सब से अधिक विकास हुआ है, मोक्ष के बारे में सबसे अधिक हमने ही विचार किया है। पर इन बातों के होते हुये भी हम व्यवहार में दूसरे देशवालों की अपेक्षा अधिक बेईमान और स्वार्थी क्यों हैं? अपने देश बन्धुओं को लूटकर, उन्हें चूस कर, उनका शोषण करके, खुद सुखी होने की समाज घातक प्रवृत्ति हमारे देश भाइयों में सर्वत्र क्यों दिखलाई पड़ती है? पुनर्जन्म और परलोक में श्रद्धा रखने वाले, मोक्ष और ईश्वर आदि के विषय में आस्तिक बुद्धि रखने वाले हम लोग प्रत्यक्ष जीवन में असत्य का आचरण क्यों करते हैं? आज इस भारत देश में लाखों क्या करोड़ों लोग ऐसे है जिन्हें पेट भर खाना नहीं मिलता, पहनने को पूरे कपड़े नहीं मिलते, रहने को घर तो क्या झोंपड़ी भी नहीं मिलती। करोड़ों बालक बिना दूध के रहकर जैसे तैसे जीते हैं और बड़े होते हैं। ऐसी स्थिति में भी देश द्रोही लोग तरह-तरह के पाप कर्म करके लखपति और करोड़पति बनते रहते हैं। चोरबाजारी करने वाले, रिश्वत लेने वाले, माल में मिलावट करने वाले, उचित टैक्स की चोरी करने वाले लोग धन के साथ मान प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं। ऐसी दशा में हमारा दिव्य जीवन का विचार कैसे सफल हो सकता है?”

कोई भी सत्य प्रेमी और न्यायशील व्यक्ति ऊपर की बातों की सचाई से इनकार नहीं कर सकता। तो फिर इसका कारण यही है कि हम लोगों का धर्म और तत्व ज्ञान अधिकतर कहने तक ही सीमित रहा है उस पर व्यवहार बहुत कम किया गया है। अथवा जो लोग उस पर विश्वास रखते हैं और आचरण करते हैं, वे सामाजिक जीवन को त्याग कर एकान्तवासी और त्यागी साधु संन्यासी बन जाते हैं और उनके उदाहरण का समाज में रहने वाले गृहस्थी जनों पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिये जब तक सत्य, न्याय सद्गुण और सत्कर्म की बातों को लोगों के दैनिक जीवन में सम्मिलित न किया जायगा तब तक कोई वास्तविक परिणाम दिखलाई पड़ना संभव नहीं है। इसके लिये सामाजिक संगठन में गहरे परिवर्तन की आवश्यकता है और हमारी शिक्षा का जड़मूल संस्कार होना भी जरूरी है। हम लोग आशा करते थे कि विदेशी शासन के हट जाने और स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाने पर ऐसे ही धर्म के सच्चे नियमों के आधार पर प्रतिष्ठित समाज का निर्माण किया जायगा, पर अभी तक उसके लक्षण दिखलाई नहीं पड़ते। आर्थिक और राजनीतिक विषयों में तो प्रगति की कुछ चेष्टा की भी जा रही है, पर धार्मिक, सदाचार और नैतिक विषयों में उलटा कुछ पतन ही दिखलाई पड़ रहा है। इसके कितने ही कारण बतलाये जाते हैं, पर सबसे बड़ा करण तो यही है कि हमारे समाज के अधिकाँश व्यक्तियों में अनीति और चरित्र हीनता ने प्रवेश कर लिया है और वे एक दूसरे की कमजोरी छुपाने ओर दबाने की कोशिश करते रहते हैं। जब समाज के साधारण जनों में ही नहीं उसके कर्णधारों तक में ऐसे दोष पैदा हो जाते हैं तो उसका उद्धार बड़ा कठिन होता है। इसमें तो सन्देह नहीं कि हमारी संस्कृति में दैवी गुणों का समावेश है और अब भी उसका बीज नष्ट नहीं हुआ है, इसलिये यदि कोई सच्चा और सद्गुणी नेता समाज को दैवी-जीवन के पथ पर चलाने का निश्चय कर लेगा और उसके हाथ में शक्ति भी होगी, तो यह उद्देश्य सफल हो सकेगा।


Quotation

जिसकी आप अपने अन्तःकरण से अभिलाषा करते हैं वह आपको अवश्य ही मिलेगा। जिसको आपने मन, कर्म और वचन से अपना आदर्श माना है, वह आपके सामने अवश्य ही प्रकट होगा। इसका कारण है, जब भी आप किसी पदार्थ विशेष की इच्छा करते हैं और मनसा, वाचा, कर्मणा उसको पाने के लिये यत्न करना शुरू करते हैं, तो उसी समय से उस पदार्थ के साथ आपका सम्बन्ध जुड़ जाता है, और जितना भी आपका मन उस पदार्थ के लिए अधिक उत्सुक होता जाता है उतना ही दृढ़ आपका सम्बन्ध भी होता जाता है। लेकिन इतना सब कुछ होने पर भी आपको मनोनुकूल सफलता नहीं मिल पाती। कारण स्पष्ट है। आप अपने जीवन के स्थूल पहलुओं पर तो अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं परन्तु अपने लक्ष्य की ओर से उपेक्षित ही रहते हैं। लेकिन यदि आप सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको अपने अभिलषित लक्ष्य पर मन, वचन और कर्म से स्थिर रहना होगा और तभी आप विजय पताका लिए, सारे संसार को आश्चर्य में डाल सकेंगे।

-स्वेट मार्डन-


स्वर-विज्ञान और स्वास्थ्य-रक्षा

(श्री स्वामी निगमानन्द सरस्वती)

भगवान ने मनुष्य जन्म के समय से ही देह के साथ एक ऐसा आश्चर्यजनक अपूर्व उपाय रच दिया है जिसे जान लेने पर प्रायः किसी भी साँसारिक विषय में असफलता का दुख नहीं हो सकता। चूँकि अधिकाँश मनुष्य इस उपाय को नहीं जानते और न उससे लाभ उठाने का प्रयत्न करते है, इसी कारण अनेक कार्यों में उनको सफलता प्राप्त नहीं होती, इस विषय का विवेचन जिस शास्त्र में किया गया है उसे स्वरोदय शास्त्र कहते हैं। स्वर-शास्त्र प्रत्यक्ष फल देने वाला है। मुझे पद पद पर इसका आश्चर्यजनक फल देखकर आश्चर्य चकित होना पड़ा है।

जीव के जन्म से मृत्यु के अंतिम क्षण तक निरन्तर श्वास प्रश्वास क्रिया होती रहती है और यह श्वास नासिका के दोनों छेदों से एक ही समय एक साथ समान रूप से नहीं चला करता, कभी बाँये ओर कभी दाहिने पुर से चलता है। कभी-कभी एकाध घड़ी तक दोनों छेदों से समान भाव से भी श्वास प्रवाहित होता है बाँये नासापुर के श्वास को ‘इड़ा’ में चलना, दाहिनी ओर से चलने को पिंगला में चलना, और दोनों पुरों से समान भाव से चलने पर उसे सुषुम्ना में चलना कहते हैं। एक नासापुर को दबा कर दूसरे के द्वारा श्वास को बाहर निकालने से साफ मालूम हो जाता है कि एक नासिका से सरलतापूर्वक श्वास प्रवाह चल रहा है और दूसरा नासापुर प्रायः बन्द है अर्थात् उससे अन्य नासापुर के समान सरलता से श्वास बाहर नहीं निकलता। जिस नासिका से सरलतापूर्वक श्वास बाहर निकलता हो, उस समय उसी नासिका का श्वास कहना चाहिये। क्रमशः अभ्यास होने पर बहुत आसानी से मालूम हो जाता है कि किस नासिका से श्वास प्रवाहित हो रहा है। यदि मनुष्य का स्वास्थ्य स्वाभाविक दशा में हो और रहन सहन प्रकृति के अनुकूल हो तो प्रतिदिन प्रातः काल सूर्योदय के समय से ढाई-ढाई घड़ी के हिसाब से एक-एक नासापुर से क्रमानुसार श्वास चलता है। इस प्रकार रात दिन में बारह बार बायीं और बारह बार दाहिनी नासिका से श्वास चलता है। इस श्वास प्रश्वास का क्या प्रभाव होता है इस सम्बन्ध में शास्त्र में कहा गया है-

वहेत्तावद् घटी मध्ये पंचतत्वानि निर्दिशेत

(स्वर शास्त्र)

प्रतिदिन रात-दिन 60 घड़ियों में ढाई-ढाई घड़ी के हिसाब से स्वर परिवर्तन होने से क्रमशः पंचतत्वों का उदय होता है। इस श्वास-प्रश्वास की गति को समझ कर कार्य करने पर शरीर स्वस्थ रहता है और मनुष्य दीर्घजीवी होता है। फलस्वरूप समस्त साँसारिक कार्यों में सफलता मिलने के कारण सुखपूर्वक संसार यात्रा पूरी होती है।

वाम नासिका का श्वास फल

जिस समय इड़ा नाड़ी अर्थात् बायीं नासिका से श्वास चलता हो उस समय स्थिर कर्मों को करना चाहिये, जैसे अलंकार धारण, दूर की यात्रा, आश्रम में प्रवेश, मकान बनाना, द्रव्यादि का ग्रहण करना तालाब, कुआँ, जलाशय आदि की प्रतिष्ठा करना। बायीं नाक से श्वास चलने के समय शुभ कार्य करने पर उन सब कार्यों में सिद्धि मिलती है।

दक्षिण नासिका का श्वास फल

जिस समय पिंगला नाड़ी अर्थात् दाहिनी नाक से श्वास चलता हो उस समय कठिन कर्म करने चाहिये, जैसे कठिन क्रूर विद्या का अध्ययन और अध्यापन, नौकादि आरोहण, तन्त्र साधना, बैरी को दण्ड, शास्त्राभ्यास, गमन, पशु विक्रय; ईंट, पत्थर, काठ तथा रत्नादि का घिसना और छीलना, संगीत अभ्यास, यन्त्र-तन्त्र बनाना, हाथी घोड़ा तथा रथ आदि की सवारी सीखना, व्यायाम, षट्कर्म साधन, भूतादि साधन, औषध सेवन, लिपि लेखन, दान क्रय-विक्रय, युद्ध, भोग, राजदर्शन आदि।

सुषुम्ना का श्वास फल

दोनों नाकों से श्वास चलने के समय किसी प्रकार का शुभ या अशुभ कार्य नहीं करना चाहिये। उस समय कोई भी काम करने से वह निष्फल होगा। उस समय योगाभ्यास तथा ध्यान धारणादि द्वारा केवल भगवान को स्मरण करना उचित है। सुषुम्ना नाड़ी से श्वास चलने के समय किसी को भी शाप या वर प्रदान करने पर वह सफल होता है।

इस प्रकार उचित स्वर में कार्य करने से मनुष्य अनेक प्रकार के लाभ उठा सकता है। इसका सबसे बड़ा उपयोग रोगोत्पत्ति का पहले से ही ज्ञान हो जाना और उसका सहज में निवारण कर सकना है। उदाहरण के लिये शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को यदि सवेरे नींद टूटने पर सूर्योदय के समय पहले यदि दाहिनी नाक से श्वास चलना आरम्भ हो, तो उस दिन से पूर्णिमा तक के बीच में गर्मी के कारण कोई पीड़ा होगी। इसी प्रकार कृष्णपक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय पहले यदि बायीं नाक से श्वास चलना आरम्भ हो तो उस दिन से अमावस्या तक के अन्दर कफ या सर्दी के कारण कोई पीड़ा होगी।

दो पखवारों तक इसी प्रकार विपरीत ढंग से सूर्योदय के समय निःश्वास चलता रहे तो किसी आत्मीय स्वजन को भारी बीमारी होगी अथवा मृत्यु होगी, या और किसी प्रकार की विपत्ति आयेगी। तीन पखवारों से अधिक लगातार ऐसी ही गड़बड़ी होने पर निश्चय ही अपनी मृत्यु हो जायगी।

बिना औषध रोग निवारण

अनियमित क्रिया के कारण जिस प्रकार हमारी देह में तरह तरह के रोग पैदा होते हैं उसी तरह औषध बिना ही, भीतरी क्रियाओं द्वारा नीरोग होने का उपाय भगवान ने बना दिया है। इन स्वर-शास्त्रोक्त उपायों को काम में लाने से न तो बहुत दिन तक रोग की यंत्रणा सहन करनी पड़ती है, न अर्थ व्यय होता है और न दवाइयों से अपना पेट भरना पड़ता है। साथ ही जब इस प्रकार योग विद्या के इस कौशल से एक बार रोग जात रहता है, तो दुबारा उसके आक्रमण की संभावना नहीं रहती। ज्वर का आक्रमण होने पर जिस नासिका से श्वास चलता हो, उसे बन्द करके दूसरी नासिका से श्वास लेना चाहिये। जब तक ज्वर न उतरे और शरीर स्वस्थ न रहे तब तक लगातार दूसरे ही नासापुट से श्वाँस लेते रहना चाहिये। ऐसा करने से दस-पंद्रह दिन में उतरने वाला ज्वर पाँच सात दिन में ही उतर जायगा और कष्ट भी कम उठाना पड़ेगा। ज्वरकाल में मन ही मन चाँदी के समान श्वेत वर्ण का ध्यान करने से और भी शीघ्र लाभ होता है। इसी प्रकार और भी कई तरह के ज्वर, सिरदर्द, अजीर्ण, दंतरोग, स्नायविक पीड़ा, दमा, नेत्ररोग भी योग सम्बन्धी साधारण विधियों से ठीक हो जाते हैं।

स्वर-विज्ञान का प्रयोग इसी प्रकार के अनेक महत्वपूर्ण कार्यों में किया जा सकता है। यात्रा को सफल बनाना, गर्भाधान द्वारा सौभाग्यशाली संतान प्राप्त करना, शत्रु वशीकरण, अग्नि को बुझाना, चिर यौवन प्राप्त करना आदि अनेकों कार्यों में इससे उल्लेखनीय सहायता मिल सकती है। स्वर विज्ञान की जानकारी कठिन नहीं है, पर सफलता प्राप्त करने के लिये इच्छानुसार स्वर को कम या ज्यादा समय तक चलाने का अभ्यास करना पड़ता है।


दुःख का कारण पाप ही नहीं है।

(श्री मोहनचन्दजी पारीक)

आम तौर से दुख को नापसन्द किया जाता है। लोग समझते हैं कि पाप के फलस्वरूप अथवा ईश्वरीय कोप के कारण दुख आते है। परन्तु यह बात पूर्णरूप से सत्य नहीं है। दुखों का एक कारण पाप भी है परन्तु यह ठीक नहीं कि समस्त दुख पापों के कारण ही आते हैं।

बहुत बार ऐसा भी होता है कि ईश्वर की कृपा के कारण, पूर्व संचित पुण्यों के कारण और पुण्य संचय की तपश्चर्या के कारण भी दुख आते हैं। भगवान को किसी प्राणी पर दया करके उसे अपनी शरण लेना होता है, कल्याण के पथ की ओर ले जाना होता है उसे भव बन्धन से, कुप्रवृत्तियों से छुड़ाने के लिये ऐसे दुखदायक अवसर उत्पन्न करते हैं जिनकी ठोकर खाकर मनुष्य अपनी भूल को समझ जाय, निद्रा खोलकर सावधान हो जाय।

साँसारिक मोह, ममता और विषय वासना का चस्का ऐसा लुभावना होता है कि उन्हें साधारण इच्छा होने से छोड़ा नहीं जा सकता। एक हल्का सा विचार आता है कि जीवन जैसी अमूल्य वस्तु का उपयोग किसी श्रेष्ठ काम में करना चाहिए परन्तु दूसरे ही क्षण ऐसी लुभावनी परिस्थितियाँ सामने आ जाती हैं, जिसके कारण वह हलका विचार उड़ जाता है और मनुष्य जहाँ का तहाँ उसी तुच्छ परिस्थिति में पड़ा रहता है। इस प्रकार की कीचड़ में से निकालने के लिये भगवान अपने भक्त में झटका मारते हैं, सोते हुये को जगाने के लिये बड़े जोर से झकझोरते हैं। यह झटका और झकझोरा हमें दुःख जैसा प्रतीत होता है।

मृत्यु के समीप तक ले जाने वाली बीमारी परम प्रिय स्वजनों की मृत्यु, असाधारण घाटा, दुर्घटना, विश्वसनीय मित्रों द्वारा अपमान, या विश्वासघात जैसी दिल को चोट पहुँचाने वाली घटनायें इसलिये आती हैं, कि उनके जबरदस्त झटके, आघात से मनुष्य तिलमिला जाय और सजग होकर अपनी भूल सुधार लें। गलत रास्ते को छोड़कर सही रास्ते पर आ जाय।

धर्म कर्म करने में, कर्तव्य धर्म का पालन करने में असाधारण कष्ट सहना पड़ता है। अभावों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा दुष्टात्मा लोग अपने पाप पूर्ण स्वार्थों पर आघात होता देख कर उस धर्म सेवा के विरुद्ध हो जाते हैं और नाना प्रकार की यातनायें देते हैं। इस प्रकार के कष्ट सत्पुरुषों को पग-पग पर झेलने पड़ते हैं।

निःसंदेह कुछ दुख पापों के परिणामस्वरूप भी होते हैं परन्तु यह निश्चित है कि भगवान की कृपा से, पूर्व संचित शुभ संस्कारों से और धर्मसेवा की तपश्चर्या से वे भी आते हैं। इसी प्रकार जब अपने ऊपर कोई विपत्ति आवे तो यह ही नहीं सोचना चाहिये कि हम पापी हैं, अभागे हैं, ईश्वर के कोप भाजन हैं। सम्भव है वह कष्ट हमारे लिये किसी हित के लिये ही आया हो, उस कष्ट की तह में शायद कोई ऐसा लाभ दिया हो जिसे हमारा अल्पज्ञ मस्तिष्क ठीक ठीक रूप से न पहचान सके।

दूसरे लोग अनीति और अत्याचार करके निर्दोष व्यक्ति को सता सकते हैं। शोषण, उत्पीड़न और अन्याय का शिकार होकर कोई व्यक्ति दुख पा सकता है। अत्याचारी को भविष्य में उसका दंड मिलेगा पर इस समय तो निर्दोष को ही कष्ट सहना पड़ा। ऐसी घटनाओं में उस दुःख पाने वाले व्यक्ति के कर्मों का फल नहीं कहा जा सकता। हर मौज मारने वाले को पूर्व जन्म का धर्मात्मा और हर कठिनाई में पड़े हुये व्यक्ति को पूर्व जन्म का पापी कह देना उचित नहीं। ऐसी मान्यता अनुचित एवं भ्रमपूर्ण है। इस भ्रम के आधार पर कोई व्यक्ति अपने को बुरा समझे, आत्मग्लानि करे, अपने को नीच या निन्दित समझे इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। कर्म की गति गहन है उसे हम ठीक प्रकार नहीं जानते केवल परमात्मा ही जानता है।

मनुष्य का कर्तव्य है कि सुख दुख का ध्यान किये बिना सदैव अपने उत्तरदायित्व का पालन करे और सद्मार्ग पर चलता रहे। कार्य में सफलता मिलती है या असफलता, प्रशंसा होती है या तिरस्कार प्राप्त होता है, लाभ में रहते हैं या घाटे में, इन सब बातों के कारण अपने कर्तव्य का त्याग करना किसी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि जगत में ईश्वरीय न्याय सब जगह काम कर रहा है। हम अपनी छोटी बुद्धि से उसे समझें चाहे न समझें, वह जल्दी प्रकट हो या देर से आये, पर हमारे कर्मों का सच्चा फल हमको अवश्य मिलेगा। इसलिये हमको किसी भी अवस्था में ईश्वरीय नियमों का उल्लंघन करना उचित नहीं।


वास्तविक प्रार्थना का सच्चा स्वरूप

(श्री. धर्मेन्द्रसिंह जी)

मानव मात्र शान्ति चाहता है-चिरशान्ति ! पर वह शान्ति है कहाँ ? संसार तो अशान्ति का ही साम्राज्य है। शान्ति के भंडार तो वही केवल शक्ति पुँज सर्वेश्वर भगवान ही हैं। वे ही परम गति हैं और उनके पास पहुंचने के लिए सत्य हृदय की प्रार्थना ही पंख स्वरूप हैं। उनके अक्षय भंडार से ही सुख शान्ति की प्राप्ति होती है।

प्रार्थना कीजिये। अपने हृदय को खोल कर कीजिये चाहे जिस रूप में कीजिए। चाहे जहाँ एकान्त में कीजिये भगवान सर्वत्र है। वे तुरन्त ही आपकी तुतली बोली को समझ लेंगे। प्रातःकाल प्रार्थना कीजिये, मध्याह्न में कीजिये, संध्या को कीजिये, सर्वत्र कीजिये और सभी अवस्थाओं में कीजिये, उचित तो यही है कि आपकी प्रार्थना निरन्तर होती रहे। यही नहीं आपका सम्पूर्ण जीवन प्रार्थनामय बन जाय।

प्रभु से माँगिये कुछ नहीं। वे तो सबके माँ बाप हैं। सबकी आवश्यकताओं को वे खूब जानते हैं। आप तो दृढ़ता से उनके मंगल विधान को सर्वथा स्वीकार कर लीजिये। उनकी इच्छा के साथ अपनी इच्छा को जोड़ कर एक रूप कर दीजिये भगवान की हाँ में हाँ मिलाते रहिये तभी सच्ची शान्ति का अनुभव कर सकोगे।

जब कभी जो भी परिस्थिति अनुकूल अथवा प्रतिकूल आ जाय भगवान को धन्यवाद दीजिए और हृदय से कहिए :-

‘प्रभो मैं तो यही चाहता था।’

भगवान के साथ फुटबाल (गेंद) और खिलाड़ी जैसा सम्बन्ध जोड़िये। उनके खेल की फुटबाल बन जाइये। जिधर की और ठुकराएं, उधर ही ढुलक जाइये।

बस इसी भाँति भगवान की इच्छा में ही अपनी इच्छा को लीन कर देना ही सच्ची प्रार्थना है इसी प्रार्थना के द्वारा आप ऊपर उठ सकेंगे। प्रभु की प्राप्ति का यही सर्वोत्तम उपाय है ‘मामेक शरणं व्रजा।’

अपने स्वार्थ के लिए प्रार्थना करना उचित नहीं। हाँ, दूसरों के कल्याण के लिए प्रार्थना करना उत्तम है। इससे प्रभु प्रसन्न होते हैं।

जहाँ भी सुविधा हो एकान्त में बैठ कर मन को शिथिल कर एकाग्र कर दीजिये नेत्र मूँद लीजिये। विरोधी विचारों को हटा दीजिए। प्रार्थना पर अपने चित्त को बार-बार लगाइये। ज्यों-2 आपका सम्बन्ध परमात्मा के साथ अधिक-अधिक जुड़ता जावेगा, त्यों-त्यों आपके रोम-रोम में पवित्रता का संचार होता जावेगा। विश्वास सिंचित प्रार्थना से तुरन्त ही लाभ होगा। प्रार्थना सुन्दर, श्रद्धा और विश्वासयुक्त होनी चाहिये। प्रभु में प्रीति प्रतीत दोनों ही होनी चाहिये। एक उनके सिवा प्रार्थी की कोई दूसरी गति नहीं होनी चाहिये। श्री गोस्वामी तुलसीदास जी ने कितना अच्छा कहा है कि :-

सीता पति रघुनाथ जी तुम लगि मेरी दौर। जैसे काग जहाज को, सूझत ठौर न और॥

बाली को भगवान श्री रामचन्द्र जी ने मारा और फटकारा भी, पर ज्यों ही उसने कहा कि :-

प्रभू अजहूँ मै पापी अंत काल गति तोर।

भगवान के हृदय में करुणा का सागर उमड़ पड़ा। चीर हरण के अवसर पर सती द्रौपदी की प्रार्थना में प्रीति, प्रतीति और गति दोनों थी। देखिये।

हाथ उठाय अनाथ नाथ सौं, पाहि पाहि प्रभूपाहि तुलसी निरखि ‘प्रीति-प्रतीत-गति, आरत पाल कृपाल मुरारी’ बसन वेष राखी विशेष लखि विरदावलि नर-नारी॥ इस प्रीति-प्रतीत-गति से युक्त प्रार्थना से अच्युत का भी आसन हिल गया। लेना पड़ा ग्यारहवाँ अवतार (बस्त्रावतार)।

त्राहि तीन कहि द्रोपदी, चुपरहि उठाई हाथ तुलसी कियो ग्यारहों बसन वेष जदुनाथ॥

यह है अलौकिक चमत्कार सच्ची प्रार्थना का।

प्रार्थना रोगियों के लिए धन्वन्तरि है असहायों का सहारा, निर्बलों का बल अनाथों का आश्रय दाता माता पिता है। संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो प्रार्थना से प्राप्त न हो सके। पर सावधान ! प्रभु से प्रार्थना करके फिर असार संसार की माँग कर बैठना बहुत अनुचित है। उनके तो केवल एक ही माँग होनी चाहिये-वह यह कि, उनकी कृपा हमारे ऊपर सदा बनी रहे। उनके चरणाम्बुजों की दासता मिलती रहे। यह सारी शक्तियाँ उन्हीं की दी हुई होने के कारण से उन्हीं की सेवा में सदा समर्पित रहे।


तैलंग स्वामी का अद्भुत योगबल

(श्री. शिवप्रसाद पंडित)

तैलंग स्वामी आन्ध्र प्रदेश के निवासी थे। वे योगशास्त्र में निष्णात थे और उन्होंने अपने समय के बड़े-बड़े योगियों से इस विद्या की शिक्षा ग्रहण की थी। उनका मानसिक झुकाव बाल्यावस्था से ही वैराग्य की तरफ था और वे अविवाहित रह कर धर्म साधन करने के इच्छुक थे, पर माता के बहुत अधिक आग्रह करने पर उन्होंने विवाह कर लिया और जब तक माता जीवित रही वे गृहस्थाश्रम का निर्वाह करते रहे। पर जैसे ही माता की मृत्यु हुई और उन्होंने श्मशान में जाकर उसका अन्त्येष्टि संस्कार किया, उसी समय उन्होंने अपना संसार त्याग का निश्चय सब प्रकट कर दिया। उन्होंने श्मशान भूमि से घर लौटना भी स्वीकार नहीं किया और अपने हिस्से की समस्त जायदाद अपने सौतेले भाइयों को देकर वहीं कुटी बना कर रहने लगे। उस समय उनकी अवस्था 48 वर्ष की थी और नाम शिवराम था।

कुछ समय बाद वे तीर्थ यात्रा को निकल पड़े घूमते घूमते उनकी भेंट एक वृद्ध साधू से हुई, जो योग विद्या का अच्छा ज्ञाता था। उसने भी इन्हें योग्य अधिकारी देख कर सच्चे हृदय से शिक्षा देना आरम्भ किया। कुछ समय बाद उसी से संन्यास की दीक्षा लेकर ये तैलंग स्वामी ने नाम से प्रसिद्ध हुये।

गुरु का देहान्त होने पर कुछ वर्षों तक वे सेतुबन्ध रामेश्वर और नेपाल में रहे, पर दोनों जगह उनकी योग विद्या के चमत्कारों की बात फैल गई और उनके दर्शनों के लिये लोगों की भीड़ जमा होने लगी। इससे उनको बड़ी असुविधा हुई और योग साधना में विघ्न पड़ने लगा। तब वे तिब्बत की तरफ चले गये। वहाँ मान सरोवर के तट पर रह कर उन्होंने बहुत समय तक योगाभ्यास किया। जब उनको सिद्धि प्राप्त हो गई तो वे वहाँ से चल कर मोक्ष-धाम काशी नगरी में पधारे। कुछ समय तक तो वे दशाश्वमघ घाट पर योगाश्रम बनवा कर वहीं रहने लग गये। उसी आश्रम में वे जिज्ञासुओं को योग विद्या की शिक्षा दिया करते थे और अभाव ग्रस्त लोगों की सहायता भी करते रहते थे।

बंगाल के हुगली जिले में श्रीरामपुर नाम का एक गाँव है। उसमें जय गोपाल नाम का व्यक्ति निवास करता था। उसके मन में वैराग्य का उदय होने से वह घरबार की सब व्यवस्था अपने पुत्रों के सुपुर्द करके काशीधाम में चला आया। उसने पहले से ही तैलंग स्वामी का नाम सुन रखा था। काशी आने पर वह हर रोज स्वामी जी के दर्शनों के लिये आया करता था और थोड़ा फल, फूल और दूध उनके लिये ले जाता था। इस प्रकार बराबर जाते रहने से स्वामी जी की कृपा दृष्टि उस पर रहने लगी। एक दिन उसने स्वामी जी से कहा कि “आज न जाने क्यों मेरी छाती धड़क रही है और घबड़ाहट हो रही है। इससे मुझे शंका होती है कि कोई अशुभ घटना न हो।” स्वामी जी ने कहा कि “मैं अभी तुम्हारे घर का समाचार मंगाये देता हूँ।” यह कह कर उन्होंने जरा देर के लिये आँखें बन्द कर लीं, और फिर जय गोपाल से कहा कि “तुम संध्या के समय भोजन करके यहाँ आना।” जब वे संध्या समय वहाँ आए तो स्वामी ने कहा कि आज प्रातः तुम्हारे बड़े पुत्र की हैजा से मृत्यु हो गई है।” यह सुन कर जय गोपाल बड़ा व्याकुल हो गया। तब स्वामी जी ने उसे संसार की असारता का उपदेश दिया जिससे उसे कुछ शाँति प्राप्त हो गई। रात्रि के समय निद्रावश सो जाने पर उसको अपना पुत्र दिखलाई पड़ा। दूसरे दिन उसने अपने घर को “अरजैंट” तार भेज कर समाचार मँगाये तो उत्तर आने पर मालूम हुआ कि स्वामी जी का कथन अक्षरशः सत्य था।

काशी में आने के बाद स्वामी जी घोर जाड़े की ऋतु में भोजन और निद्रा का त्याग करके दो-दो, तीन-तीन दिन तक गंगाजी के जल पर पड़े रहते और कठिन से कठिन गर्मी के मौसम में तपे हुये पत्थरों पर बैठे रहते। वे भिक्षा माँगने किसी के घर नहीं जाते, जो कुछ भक्त लोग आश्रम में आकर दे जाते उसी को संतोषपूर्वक ग्रहण करते। एक बार एक दुष्ट स्वभाव के मनुष्य ने उनकी परीक्षा लेने के लिये आधा सेर चूने को पानी में घोलकर दूध की तरह बना दिया और स्वामी जी के सामने रख कर विनयपूर्वक कहा “महाराज यह दूध आपके लिये लाया हूँ।” स्वामी जी ने तत्काल ही पहिचान लिया कि यह चुना है, तो भी बिना कुछ कहे बर्तन को उठा कर सबका सब पी गये। उस आदमी को भय लगा कि जब इनको मालूम होगा कि यह चूना है तो यह क्रोधित होंगे और कदाचित मुझे मार बैठेंगे। इससे वह कुछ पीछे हट कर बैठ गया। पर स्वामी जी चूना पीकर भी पूर्ण शान्त बने रहे और उन्होंने जरा सा मुँह भी नहीं बिगाड़ा यह देख कर उसे बड़ा पश्चाताप हुआ और अपने अपराध की क्षमा माँगने लगा। पर स्वामी जी ने उसकी बात पर कुछ भी ध्यान न देकर वह सब का सब चूने का पानी उल्टी करके बाहर निकाल दिया। उनकी सामर्थ्य देख कर वह दुष्ट चकित होकर बैठा रह गया।

एक बार काशी से राजा का एक अफसर नाव द्वारा राम नगर से बनारस आ रहा था। उस समय तैलंग स्वामी पद्मासन लगा कर जल के ऊपर तैर रहे थे। उस अफसर ने मल्लाहों से इनके विषय में पूछा और प्रशंसा सुनकर इनको अपनी नाव में बैठा लिया। उसने इनसे कुछ प्रश्न किये, पर स्वामी जी चुपचाप गूँगे बहरे की तरह बैठे रहे। जब नाव बीच धारा में पहुंची तो स्वामी जी ने उस अफसर की तलवार, जो बड़ी सुन्दर और बहुमूल्य थी, देखने को माँगी। न जाने कैसे वह उसी समय हाथ से छूट कर गंगाजी में गिर पड़ी। इस पर वह अफसर बड़ा नाराज हुआ, क्योंकि वह उसे किसी बड़े अंगरेज की तरफ से भेंट स्वरूप प्राप्त हुई थी। इतने में नाव किनारे पर आ लगी। वहाँ स्वामी जी का एक मुख्य शिष्य उपस्थित था। उसने अफसर को गुस्सा होकर बकते हुये देखा तो कहा कि “आप नाराज न हों, मैं गोताखोरों को बुलाकर गंगाजी में से तलवार निकलवा दूँगा।”

स्वामी जी ने जब देखा कि उनका शिष्य बहुत दुखी हो रहा है तो उन्होंने गंगाजी में हाथ डाला और तीन तलवारें निकाल कर अफसर के हाथ में रखीं कि इनमें से जो तुम्हारी हो उसे पहिचान कर ले लो। यह चमत्कार देख कर अफसर तो भौंचक्का रह गया और अपने अपराध के लिये क्षमा माँगने लगा। अफसर ने अपनी तलवार पहिचान कर लें ली और शेष दो तलवारें स्वामी जी ने पुनः पानी में फेंक दी।

एक दिन पृथ्वीगिरि नाम के साधु का शिष्य इन से मिलने को आया। उस समय स्वामी जी के पास बहुत से व्यक्ति बैठे हुये थे। थोड़ी देर में ये दोनों, लोगों के देखते-देखते अदृश्य हो गये। लगभग आध घंटे बाद स्वामी जी तो अपने स्थान पर फिर दिखाई देने लगे, पर पृथ्वीगिरि का शिष्य वहाँ दिखलाई न पड़ा।

तैलंग स्वामी एक सिद्ध योगी थे, यह ऊपर दिये चमत्कारों से भली प्रकार विदित होता है। उनमें हर तरह की बड़ी-बड़ी शक्तियाँ थीं, पर उन्होंने उनके द्वारा सिवाय लोगों के उपकार के अपकार कभी नहीं किया और अपने साथ शत्रु भाव रखने वालों को भी कभी किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाई। इससे यह भी प्रकट होता है कि वे केवल योगी ही न थे वरन् एक सच्चे सन्त और साधु भी थे। अपनी मृत्यु का समय आने पर उन्होंने अपने सब शिष्यों और भक्तों को एक दिन पहले ही उसकी सूचना दे दी थी। उसके अनुसार संवत् 1944 (सन 1887) की पौष सुदी 11 के दिन संध्या के समय उन्होंने योगासन पर बैठ कर चित्त को एकाग्र करके देह त्याग किया। ऐसा कहा जाता है कि उस समय उनकी आयु 280 वर्ष की थी।


Quotation

“ऐ मनुष्य, तू मौन को अपना ! शान्त जीवन उन्नति का सूचक है। इतने लम्बे दिन में कम से कम एक घंटा चुप रह। यद्यपि तेरा सारा दिन बेकार और निरर्थक बातों में व्यतीत हो जाता है, तथापि वास्तविकता यह है कि तुम कुछ भी नहीं करते, अर्थात् उचित और मतलब की बात तेरी दैनिक कार्य विधि में एक भी नहीं होती। यदि तुम महान बनना चाहते हो, जिससे तुम्हारी बातों का दूसरों पर कुछ प्रभाव हो, तो थोड़ी देर के लिये अपनी गपबाजियों तथा व्यर्थ की बातों को छोड़ दो और मौन का स्वर्णिम संदेश सुनो।”

-ए॰ एल॰ सामन

क्या तुम निशाना चूक गये हो ? यदि चूक गये हो तो क्या हुआ अब भी तो निशाना चमकता हुआ दिखाई दे रहा है। क्या तुम दूर तक दौड़ते हुए थक गये हो? थोड़ी देर दम ले लो और पुनः प्रयत्न करो।”

-एला वेलर विल काक्स


मंत्र शक्ति का जीवनोत्कर्ष में उपयोग

(स्वामी माधवतीर्थ जी)

शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में भगवान का नाम स्मरण करने और मंत्र की महिमा बहुत अधिक है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस युग में मिथ्या नाम और रूपों की संख्या बहुत अधिक हो गई है। वैसे मनुष्य में इतनी शक्ति है कि वह समाज का सुधार कर सकता है, पर मनुष्य की आयु अल्प होती है और समाज में रहने से छोटी उम्र में ही उसमें मिथ्या संस्कारों का उदय हो जाता है। इन संस्कारों के कुप्रभाव का मुकाबला मंत्र शक्ति द्वारा ही संभव होता है।

मनुष्य का जीवन भूतकाल से संस्कारों की स्मृति और वर्तमान संयोगों के दबाव से चलता है। इन दोनों कारणों के बीच में सामंजस्य रहना चाहिये। छोटी उम्र में जो संस्कार पड़ जाते हैं उनका स्मरण बहुत ज्यादा रहता है। अगर वे संस्कार उत्तम हों तो उनमें लाभ पर्याप्त हो सकता है। पर वर्तमान समय के जल्दबाजी के जीवन में न तो माँ बाप को इतनी फुर्सत रहती है कि बालक के संस्कारों को ठीक करने में समय दे सकें और न स्कूलों में शिक्षकों को ही इस काम के लिये समय मिलता है। इसके अतिरिक्त माँ बाप और शिक्षक भी समाज के दृष्टिकोण के अनुसार चलने को विवश रहते हैं। यह तो सभी जानते हैं कि वर्तमान समय में समाज में अनेक प्रकार की गलत बातें फैली हुई हैं। इस काल में इन्द्रिय सुख की लालसा दिन पर दिन बढ़ती जाती है, इसलिये मनुष्यों का अधिकाँश समय “अर्थ” और “काम” इन दो पुरुषार्थों में ही खर्च हो जाता है। जो विचार धारा योरोप में बह रही है उसका बहुत कुछ असर पिछले दो सौ वर्षों में हमारे देश पर भी पड़ा है। सौभाग्य की बात इतनी ही है कि अभी हमारे देश में बहुत सा प्राचीन साहित्य बच रहा है और उसकी मदद से मनुष्य को अनेकता से एकता का पाठ पढ़ने को मिल सकता है। उसी साहित्य का एक अंग मंत्र शक्ति भी है।

शायद कोई भाई यह शंका करे कि मन्त्र जपने में तीन चार घंटा खर्च करने की अपेक्षा उतने समय में अन्य उद्योग करके अगर किसी गरीब मनुष्य को खाना, कपड़ा दिया जा सके, तो क्या यह ज्यादा पुण्य का काम न होगा ? यह ठीक है कि गरीब मनुष्य की सहायता करना भी पुण्य का कार्य है और कोई उसको बुरा नहीं कह सकता, पर मन्त्र शक्ति से नया जीवन मिलता है और मोक्ष का रास्ता खुल जाता है। गीता में कहा है कि “यज्ञ, दान और तप ये तीनों मनुष्य को पवित्र करने वाले हैं, यज्ञों में जप यज्ञ श्रेष्ठ है।” इस लिये संसार का कार्य करते रहने पर भी भगवान का नाम जपना परम कल्याणकारी है। अपनी जाति की भलाई करने का स्वभाव तो अनेक पशु में भी पाया जाता है, पर ज्ञान रखने वाले मनुष्य को इससे ज्यादा ऊँचा जीवन व्यतीत करना चाहिए। आजकल के कच्ची बुद्धि वाले मनुष्य इस विषय पर भली प्रकार विचार तो नहीं करते, केवल जल्दबाजी के संस्कार के प्रभाव से समाज की नकल करने लग जाते हैं और उसी को ठीक मान लेते हैं। ऐसे जल्दबाजी के स्वभाव को संयमित करने के लिये पहले मन्त्र-जप की आवश्यकता होती है। कुछ समय बाद जब यह उद्देश्य सिद्ध हो जाय, तब गुरु के उपदेश से मनुष्य परमात्मा का ध्यान कर सकता है और आत्मज्ञान का अधिकारी बनता है। क्योंकि परमात्मा का निवास सर्वत्र है इसलिये मन्त्र जप करने वाला सबमें परमात्मा को देखने का प्रयत्न करेगा और इस प्रकार उसके भीतर अद्वैत भाव का उदय हो सकेगा।

अनेक द्वैत-भाव वाले भी ऐसे होते हैं कि उनकी संगति से थोड़े समय के लिये अद्वैत-भाव उत्पन्न हो जाता है। यह योरोप के लोगों का मनोभाव है। इन लोगों का अंतिम लक्ष्य यही रहता है कि मनुष्य के साथ मनुष्य का सा बर्ताव करना। पर भारतीय जीवन का उद्देश्य साधारण मानव जीवन से ऊपर उठकर दिव्य जीवन प्राप्त करना माना गया है। पिछले सौ-दो सौ वर्षों में व्यापार, शिक्षा, शासन आदि का सम्बन्ध होने से हमने जहाँ पश्चिम वालों से कुछ गुण सीखे है वहाँ अनेकों मूर्खता की बातें भी ग्रहण कर ली हैं। अब हमको जीवन मार्ग का संशोधन करना पड़ेगा, जिससे पश्चिम के मनुष्य भी हमारे यहाँ अद्वैत ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने आवें।

वर्तमान सामाजिक जीवन में जो मनुष्य दूसरों के हित का ख्याल रखते हैं, वे भी इन्द्रिय सुख में डूबे रहते हैं। पर यह दैवी जीवन का मार्ग नहीं है। ऐसा जीवन व्यतीत करने के लिए सच्ची वाणी और सच्चे शब्द की आवश्यकता है। जिस प्रकार एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ सम्बन्ध करने के लिए बात करनी पड़ती है और उसमें शब्द का ही प्रयोग होता, उसी प्रकार भगवान के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के लिए भी शब्द की आवश्यकता होती और वही शब्द “मन” कहा जाता है। मंत्र शक्ति से एक नवीन आकर्षण युक्त क्षेत्र तैयार होता है और उसमें भक्त तथा भगवान के बीच का भेद दूर हो जाता है। आधुनिक विज्ञान में भी कहा गया है कि “एक आकर्षण के क्षेत्र में देश और काल का अस्तित्व जाता रहता है।

मन्त्र की शक्ति

लगभग पचास वर्ष पहले की बात है कि वाणी के प्रसिद्ध विद्वान बाबू भगवानदास अपने मकान के बाहर बैठे हुए थे। उसी समय एक अंधा ब्राह्मण तथा एक अन्य व्यक्ति जो उसका हाथ पकड़ कर ले जा रहा था, वहाँ पर आये और भोजन को कुछ माँगने लगे। बाबू भगवानदास ने कहा कि “अभी भोजन तैयार होने में एक घंटा की देर है, इसलिये अगर एक घंटा बाद आओ तो भोजन मिल सकेगा।”

अंधे ब्राह्मण ने कहा कि “मुझे तो दिखलाई पड़ता नहीं, कहीं घूम फिर सकना मेरे लिये कठिन जान पड़ता है, इसलिये आप स्थान बता दें तो एक घंटे तक मैं यहीं बैठा रहूँगा।” वे लोग दालान में बैठ गये। कुछ देर बाद बाबूसाहब ने अंधे भिखारी से दो एक बातें कीं तो उनका उत्तर उसने ऐसे ज्ञान युक्त ढंग से दिया कि उनको मालूम हो गया कि यह कोई विद्वान आदमी है। इसके पश्चात उन्होंने उससे ऊंकार की उपासना के सम्बन्ध में बातचीत की तो मालूम हुआ कि उसे इस विषय का ‘प्रणववाद’ नामक एक प्राचीन ग्रंथ मुखाग्र है।

बाबू साहब को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने कहा कि आप अब कुछ समय इसी स्थान पर निवास करो और मुझे “प्रणववाद का रहस्य समझाओ इसके पश्चात उन्होंने दो पंडितों को नियत करके ‘प्रणववाद’ का सम्पूर्ण ग्रंथ लिखवा लिया और फिर अंगरेजी में उसका अनुवाद करके एक बहुत श्रेष्ठ ज्ञान प्रदायिनी रचना प्रकाशित करा दी।

यह सभी जानते हैं कि पुराने जमाने में पुस्तकें छापी नहीं जाती थीं और पुस्तकों को लिखकर रखना भी बड़े श्रम और अर्थ व्यय का कार्य था- उस समय अनेक व्यक्ति ऐसे पाये जाते थे जिनको हजारों और लाखों श्लोकों की संख्या वाले ग्रंथ याद थे। श्रीमद्भागवत में 18 हजार श्लोक हैं, स्कन्दपुराण उससे भी बड़ा है, महाभारत में एक लाख श्लोक बतलाये जाते हैं। ऐसे अनेक महान ग्रंथ उस समय के लोग बिना लिखे ही बना लेते थे और याद भी रखते थे। ऐसी आश्चर्यजनक शक्ति जो उस समय के ब्राह्मणों में दिखलाई पड़ती थी उसका की मूल आधार यही था कि वे त्रिकाल संध्या, गायत्री मन्त्र की उपासना, सदाचार तथा संयम का पालन करते थे। इसके लिये सात्विक आहार पर तथा सात्विक वातावरण में रह कर अपने को इस प्रकार की साधना के योग्य बनाते थे। इस प्रकार उनको ऐसी मंत्रशक्ति प्राप्त हो जाती थी जिससे वे अनेक आश्चर्यजनक कार्यों को सिद्ध कर दिखाते थे।


भारत में योगिनियाँ भी थीं।

(श्रीमती सुलोचना गौतम)

भारतवर्ष योगियों की भूमि है और पिछले हजारों वर्षों से यहाँ अनेक उल्लेखनीय योगियों का आविर्भाव हो चुका है। पर ये सभी योगी पुरुष ही हुये हैं स्त्रियों में किसी उल्लेखनीय योगिनी का नाम बहुत कम सुनने में आया है। वैसे स्त्रियों में भी मीराबाई, सहजोबाई जैसी प्रसिद्ध आध्यात्मिक ज्ञान सम्पन्न महिलाएं हुई हैं, पर वे प्रायः भक्ति मार्ग की अनुयायिनी थीं। पुरुषों के समान हठयोग, राजयोग के कठिन साधन करने वाली महिलाओं की संख्या अधिक नहीं है, और जो ऐसी नारियाँ हुई भी हैं उनके सम्बन्ध में विशेष बातें जनता को ज्ञात नहीं क्योंकि साधन करने पर भी सामाजिक नियमों के कारण उनको अपने लिये जन समुदाय से पृथक ही रखना पड़ता है। दूसरा कारण यह भी है कि शास्त्रों में जगह जगह यही आदेश दिया है कि स्त्रियों के लिये विशेष साधनाओं का कोई प्रयोजन नहीं, पतिव्रत ही उनके लिये सबसे बड़ा और प्रभावशाली साधन है। ऐसी दशा में स्त्रियाँ योग जैसे साधनों में तभी प्रवृत्त होती हैं जब या तो ये आजन्म ब्रह्मचारिणी रहें या फिर आरम्भिक जीवन में ही वैधव्य की अवस्था को प्राप्त हो जायें। नीचे एक ऐसी ही योगिनी का परिचय दिया जाता है। जो हठयोग की समाधि अवस्था तक पहुँच गई थी और जिसने अध्यात्म मार्ग में उल्लेखनीय प्रगति करके दिखाई थी। यह विवरण उन्हीं के परिवार के एक विद्वान श्री हरिनारायण जी पुरोहित ने प्रकाशित कराया।

जयपुर (राजस्थान) के महाराजा के यहाँ श्री मन्नालाल जी एक विद्वान् और कर्मकाण्डी पुरोहित थे। उन्हीं के घर में “योगिनी मोतीबाई” का जन्म संवत् 1899 सन् 1942 में हुआ। बाल्यावस्था में ही इन में आध्यात्मिक प्रवृत्ति के लक्षण दिखलाई पड़ने लगे थे। ग्यारह वर्ष की अवस्था में इनका विवाह हो गया पर थोड़े ही वर्ष बाद विधवा हो गईं। उस समय सती प्रथा तो बन्द हो गई थी, पर उन्होंने अन्य प्रकार से दो तीन बार देह त्यागने का प्रयत्न किया, पर मृत्यु समीप नहीं आई इसी अवसर पर किसी अदृश्य वाणी ने इनसे कहा-आत्महत्या महापाप है, अपने शरीर से अपना और पराया कुछ उपकार कर, जब अन्त आयेगा तो यह नश्वर काया अपने आप छूट जायगी।” बस, वे भगवत् आज्ञा को शिरोधार्य कर ईश्वर के भजन में लवलीन हो गईं। कुछ समय बाद एक वृद्ध योगी और फिर एक तपस्विनी योगिनी का सत्संग प्राप्त हुआ जिनसे इन्होंने योग की साधनाएं, सीखीं और आसन प्राणायाम, नेति, धौति, नौलि, बगोली, ध्यान, धारणा करते करते समाधि तक का साधन विधिपूर्वक करने लगीं। इसके सिवाय उनको स्वरोदय का भी अच्छा अभ्यास हो गया। प्रारम्भिक अवस्था में लाख की बनी पाँच रंग की पाँच गोलियाँ अपने पास रखती थीं और उन पर पंचत्व की धारणा किया करती थीं। फिर उनको छाया पुरुष की सिद्धि हो गई थी। वे सदैव नासिकाग्र पर दृष्टि रखती थीं, केवल 3, 4 घंटे के करीब ही भूमि पर बिस्तर बिछा कर सोती थीं और 24 घंटे में एक बार अल्प भोजन करती थीं।

योगिनी मोतीबाई ने हठ योग, राजयोग, भक्तियोग का साधन करके ऊंचे दर्जे की आत्मिक शक्ति प्राप्त कर ली थी। वे योगशक्ति के प्रभाव से दूसरों के मन की बात जान लेती थीं, और जब उचित जान पड़ता तो उनके होनहार की बात भी कह देती थीं। अनेक स्त्री पुरुषों के सामने आते ही उन्होंने स्वयं उनकी मनोकामना की बात बतला दी थी और उसके पूर्ण होने का मार्ग भी बतला दिया था। तो भी वे यथासम्भव इन चमत्कारी बातों से दूर रहती थी। क्योंकि इस प्रकार के कार्यों से आत्मशक्ति की हानि होती है। और अहंकार उत्पन्न होने का भय रहता है।

अपनी मृत्यु का समय दस महीने पहले ही उन्होंने अपने छोटे भाई को बतला दिया था और यह भी समझा दिया था कि घर में किसी से कहना मत। पर एक बार कौतूहल वश उसके मुँह से यह बात माता के सामने निकल गई। इससे सब घर वालों को बड़ा दुःख हुआ और वे कहने लगे कि इस प्रकार के विचार प्रकट करना ठीक नहीं है। इन्होंने भी व्यर्थ में उनको दुःख पहुंचाया बुरा समझ कर बहाना बना कर बात को टाल दिया कुछ महीने बाद सबने जगन्नाथपुरी की यात्रा की तैयारी की। जयपुर से यात्रियों का एक बड़ा संघ चला। जगन्नाथजी के दर्शन करने के बाद सब लोग गंगासागर में भी कपिलदेव के दर्शन और पूजन को गये। वहाँ पूजन करके मोतीबाई ने कपिल भगवान के सम्मुख हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि “हे कपिल मुनिजी, आप सच्चे ज्ञान दाता हैं और आपने जैसे अपनी माता को मुक्ति दी थी, वैसे ही मेरी भी सद्गति शीघ्र ही कीजिये।” इस बात को सुनकर माता जी ने नेत्रों में आँसू भर कर कहा- “मोती यह क्या प्रार्थना तूने की, तैने कैसी बात कही।” पर मोतीबाई चुप रही’ गंगासागर से जहाज में बैठकर सब चल दिये। कुछ ही समय बीता था कि जहाज में ही मोतीबाई की तबियत सचमुच बिगड़ने लगी और उन्होंने अपनी माता की गोद में सहारा लेकर कमलासन लगाकर प्राण चढ़ा लिये। थोड़ी देर में स्तब्ध हो गईं। माताजी ने सिर पर हाथ रखा तो कपाल मानो उबल रहा है-ऐसा प्रतीत हुआ। कुछ ही क्षण में बाईजी के नेत्र खुले और फिर वे खुले के खुले ही रह गये। उनकी पवित्र आत्मा ने इस नश्वर शरीर को त्याग दिया। उस समय एक झन्नाटे की सी आवाज हुई। जिसको वहाँ उपस्थित सब यात्रियों ने सुना। इससे उन लोगों ने यही अनुमान किया कि वे विमान पर चढ़कर परमधाम को चली गईं। यह घटना माघ सुदी 4 सम्वत् 1932 की है।

योगिनी मोतीबाई का चरित्र हमको बतलाता है कि नारियाँ किसी भी दृष्टि से पुरुषों से कम नहीं हैं और अवसर तथा सुविधा प्राप्त हो तो वे सब प्रकार के कार्य योग्यतापूर्वक सम्पन्न करके अपना और दूसरों का कल्याण कर सकती हैं।


तंत्र-शास्त्र में मुद्राओं का महत्व

(श्री0 योगेन्द्रजी ब्रह्मचारी)

तंत्र-शास्त्र भारतवर्ष की बहुत प्राचीन साधन प्रणाली है। इसकी विशेषता यह बतलाई गई है कि इसमें आरम्भ ही से कठिन साधनाओं और कठोर तपस्याओं का विधान नहीं है, वरन् वह मनुष्य के भोग की तरफ झुके हुये मन को उसी मार्ग पर चलाते हुये धीरे धीरे त्याग की ओर प्रवृत्त करता है। इस दृष्टि से तंत्र को एक ऐसा साधन माना गया कि जिसका आश्रय लेकर साधारण श्रेणी के व्यक्ति भी आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर हो सकते हैं। यह सत्य है कि बीच के काल में तंत्र का रूप बहुत विकृत हो गया और इसका उपयोग अधिकाँश में मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि जैसे जघन्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिये किया जाने लगा, पर तंत्र का शुद्ध रूप ऐसा नहीं है। उसका मुख्य उद्देश्य एक एक सीढ़ी पर चढ़ कर आत्मोन्नति के शिखर पर पहुँचना ही है।

तन्त्र-शास्त्र में जो पंच प्रकार की साधना बतलाई गई है, उसमें मुद्रा साधन बड़े महत्व का और श्रेष्ठ है। मुद्रा में आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि योग की सभी क्रियाओं का समावेश होता है। मुद्रा की साधना द्वारा मनुष्य शारीरिक और मानसिक शक्तियों की वृद्धि करके अपने आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है।

मुद्रायें अनेक हैं। घेरण्ड संहिता में उनकी संख्या 25 बतलाई गई है, पर शिव-संहिता में उनमें से मुख्य मुद्राओं को छाँट कर दस की ही गणना कराई है जो इस प्रकार हैं- (1) महामुद्र (2) महाबन्ध (3) महाभेद (4) खेचरी (5) जालन्धर बन्ध (6) मूलबन्ध (7) विपरीत करणी (8) उड्डीयान (9) वज्रोली, और शक्ति चालिनी।

तन्त्र मार्ग में कुण्डलिनी शक्ति की बड़ी महिमा बतलाई गई है। इसके जागृत होने से षट्चक्र भेद हो जाता है और प्राणवायु सहज ही से सुषुम्ना से बहने लगती है। इससे चित्त स्थिर हो जाता है और मोक्ष मार्ग खुल जाता है। इस शक्ति को जागृत करने में मुद्राओं से विशेष सहायता मिलती है। इनकी विधि योग ग्रंथों में इस प्रकार बतलाई गई है :-

महामुद्रा-गुरु के उपदेशानुसार बाँये टखने (पैर की पिंडली और पंजे के बीच की दोनों तरफ उठी हुई मोटी हड्डी) से योनि मण्डल (गुदा और लिंगेन्द्रय के बीच का स्थान) का दबा कर दाहिने पैर को फैला कर दोनों हाथों से पकड़ ले और शरीर के नवों द्वारों को संयत करके छाती के ऊपरी भाग पर ठुड्डी को लगा दे। चित्त को चैतन्य रूप परमात्मा की तरफ प्रेरित करके कुम्भक प्राणायाम द्वारा वायु को धारण करे। इस मुद्रा का पहले बाँये अंग में अभ्यास करके फिर दाँये अंग में करे और अभ्यास करते समय मन एकाग्र करके उसी नियम से प्राणायाम करता रहे।

इस मुद्रा से देह की सारी नाड़ियाँ चलने लगती हैं। जीवनी शक्ति स्वरूप शुक्र स्तम्भित हो जाता है, सारे रोग मिट जाते हैं, शरीर पर निर्मल लावण्य छा जाता है, बुढ़ापा और अकाल मृत्यु का आक्रमण नहीं होने पाता और मनुष्य जितेन्द्रिय होकर भवसागर से पार हो जाता है।

खेचरी मुद्रा-इस मुद्रा से प्राणायाम को सिद्ध करने और समाधि लगाने में विशेष सहायता मिलती है। इसके लिए जिव्हा और तालु को जोड़ने वाले माँस-तंतु को धीरे-धीरे काटा जाता है, अर्थात् एक दिन जौ भर काट कर छोड़ दिया जाता है, फिर तीन चार दिन बाद थोड़ा सा और काट दिया जाता है। इस प्रकार थोड़ा काटने से उस स्थान की रक्त वाहिनी शिराएं अपना स्थान भीतर की तरफ बनाती जाती हैं और किसी भय की सम्भावना नहीं रहती। जीभ को काटने के साथ ही प्रतिदिन धीरे-धीरे बाहर की तरफ खींचने का अभ्यास करता जाय। इस अभ्यास करने से कुछ महीनों में जीभ इतनी लम्बी हो जाती है कि यदि उसे ऊपर की तरफ लौटा जाय तो वह श्वास जाने वाले छेदों को भीतर से बन्द कर देती है। इससे समाधि के समय साँस का आना जाना पूर्णतः रोक दिया जाता है।

विपरीत करणी मुद्रा-योगियों ने मनुष्य के शरीर में दो मुख्य नाड़ियाँ बतलाई हैं- एक सूर्य नाड़ी और दूसरी चन्द्र नाड़ी। सूर्य नाड़ी नाभि के पास है और चन्द्रनाड़ी तालु के मध्य में है। मस्तक में रहने वाले सहस्र-दल-कलम से जो अमृत झरता है वह सूर्य नाड़ी के मुख में जाता है। इसी से अन्त में मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। यदि यही अमृत चन्द्रनाड़ी के मुख में गिरने लगे तो मनुष्य निरोगी, बलवान और दीर्घजीवी हो सकता है। इसके लिये तेज शास्त्र में साधक को आदेश दिया गया है कि सूर्यनाड़ी को ऊपर और चन्द्रनाड़ी को नीचे ले आवे। इसके लिये जो मुद्रा बतलाई गई है उसकी विधि शीर्षासन की है, अर्थात् मस्तक को जमीन पर टिका कर दोनों पैरों को सीधे ऊपर की तरफ तान दे और दोनों हाथ की हथेलियों को मस्तक के नीचे लगा दे। तब कुम्भक प्राणायाम करें।

योनि मुद्रा-इसके लिये सिद्धासन पर बैठ कर दोनों अंगूठों से दोनों कान, दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों मध्यमा (बीच की उंगली) से दोनों नाक के छेद और दोनों अनामिका से मुँह बन्द करना चाहिये। फिर काकी मुद्रा (कौवे की चौंच के समान होठों को आगे बढ़ा कर साँस खींचना) से प्राण वायु के भीतर खींच कर अपान वायु से मिला देना चाहिये। शरीर में स्थित छहों चक्रों का ध्यान करके ‘हूँ’ और ‘हंस’ इन दो मंत्रों द्वारा सोयी हुई कुँडलिनी को जगाना चाहिये। जीवात्मा के साथ कुंडलिनी को युक्त करके सहस्र दल कमल पर ले जाकर ऐसा चिन्तन करना कि मैं स्वयं शक्तिमय होकर शिव के साथ नाना प्रकार का विहार कर रहा हूं। फिर ऐसा चिन्तन करना चाहिये कि “शिव-शक्ति के संयोग से आनन्द स्वरूप होकर मैं ही ब्रह्म रूप में स्थित हूँ।” यह योनि मुद्रा बहुत शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाली है और साधक इसके द्वारा अनायास ही समाधिस्थ हो सकता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मुद्राओं में शारीरिक मानसिक और आत्मिक तीनों प्रकार के अभ्यासों का ऐसा समन्वय किया गया है कि मनुष्य की भीतरी शारीरिक शक्तियाँ मानसिक शक्तियाँ, जागृत हो जाती हैं और वह ऊंचे दर्जे के आत्मिक अभ्यास के योग्य हो जाता है। पर एक बात का ध्यान रखना परमावश्यक है और वह यह कि मुद्राओं का अभ्यास किसी भी दशा में किसी से सुन कर या पढ़ कर नहीं करना चाहिये, वरन् योग्य गुरु से सीख कर ही उसका अभ्यास करना अनिवार्य है।


विदेशों में दैव संयोगों की धारणा

(श्री लीलारानी)

हमारे देश की साधारण जनता, विशेषतः ग्राम वासियों में टोना टोटका का बड़ा महत्व माना जाता है। वे लोग अधिकाँश बीमारियों का इलाज इसी विधि से करते हैं और जन्म से मरण तक जितनी भी रस्में होती हैं उनमें अधिकाँश बातें ऐसी होती हैं जिनका प्रत्यक्ष में कोई अर्थ नहीं होता। आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति ऐसी बातों को कुसंस्कार या अन्धविश्वास के नाम से पुकारते है। पर हम बतलाना चाहते हैं कि ऐसी रस्में “विश्वास” योरोप और अमरीका तक के व्यक्तियों में पाये जाते हैं और जो लोग ऐसा विश्वास करते हैं उनको तदनुसार फल भी प्रायः मिलता है। हम चाहे ऐसी बातों को “संयोग” के नाम से पुकारें पर यदि उनके मूल स्वरूप की खोज की जाय तो उनका कुछ आधार उनमें कुछ तत्व भी दिखलाई पड़ता है।

आधुनिक ज्ञान और विज्ञान का आरम्भ और सबसे अधिक प्रचार अंगरेज जाति में हुआ है। इसी के द्वारा संसार के दूर-दूर के भागों में नवीन ज्ञान की ज्योति पहुँची है, और लोगों का जीवन निर्वाह के नवीन नियमों में मार्ग दर्शन हुआ है। इस अंगरेज जाति के ग्रामीण लोगों में ही नहीं बड़े से बड़े घरानों में ऐसे विश्वास प्रचलित हैं जिनको टोना टोटका के सिवाय और कुछ नहीं कह सकते। कुछ समय पूर्व मि0 बालबियन इंग्लैंड के प्रधान मंत्री थे और वहाँ शासक दल के बड़े प्रभावशाली नेता माने जाते थे। एक समय प्रसंग छिड़ने पर उन्होंने कहा कि “जिस दिन मैं पैदा हुआ था, हमारी रसोईदारिन जो एक बुढ़िया थी, मुझे कम्बल में लपेट कर सीढ़ियों पर चढ़ गई, ताकि मैं संसार में उन्नति के सोपान पर चढ़ सकूं। उसकी इच्छा थी कि मैं बहुत बड़ी पदवी प्राप्त कई, इसलिये वह मुझे एक दम छत पर ले गई और कुर्सी पर खड़ी होकर दोनों हाथों जहाँ तक सम्भव था, ऊपर की और उठा दिये।” इस प्रकार के और भी अनेकों विश्वास प्रसवकाल के सम्बन्ध में अंगरेजों में प्रचलित है। हमारे देश की भाँति बच्चे के जन्म दिन के शुभ अशुभ होने का खयाल भी रखा जाता है। इस सम्बन्ध में वहाँ एक कविता प्रचलित है जिसका भावार्थ यहाँ दिया जाता है-

“सोमवार का उत्पन्न होने वाला बच्चा सुन्दर होता है, मंगलवार का श्रीमान होता है, बुधवार का दुखी रहता है, बृहस्पतिवार वाले को दूर की यात्रा करनी पड़ती है, शुक्रवार का प्रेमशील और उदार होता है, शनिवार वाले को परिश्रम द्वारा रोटी कमानी पड़ती है और रविवार वाला सुन्दर सौभाग्यशाली, बुद्धिमान और प्रमुदित होता है।”

इसी प्रकार बालक का जन्म समय भी उसके सौभाग्य या दुर्भाग्य का कारण माना जाता है। 4, 8 और 12 अथवा 3,6,9 और 12 बजे उत्पन्न होने वाला बालक विशेष रूप से भाग्यशाली माना जाता है। अगर जन्म के समय बालक का सिर झिल्ली से ढका हो तो इसे बड़ा शुभ चिन्ह माना जाता है और उस झिल्ली को सदैव बहुत संभाल कर रखा जाता है। एक वर्ष की आयु तक बच्चे के नाखून और बाल काटना बुरा समझा जाता है और कहते हैं कि यदि पहली बार काटे हुये नाखूनों को “ऐश” नामक पेड़ के नीचे गाड़ दिया जाय तो बालक उच्च कोटि का गवैया होता है। आयु के प्रथम वर्ष में बच्चे को दर्पण दिखाना बुरा माना जाता है। बच्चे के दाहिने हाथ को धोने के बजाय गीले कपड़े से पोंछ देते हैं। ताकि बड़ा होने पर धन संग्रह करने में सफल हो सके।

जब तक गिरजाघर में ले जाकर बच्चों का “बपतिस्मा” न हो जाय तब तक उसे किसी के घर ले जाना अमंगल जन्म माना जाता है। जिस समय उसे बपतिस्मा के लिये गिरजाघर ले जाते हैं, उस समय यदि वहाँ कोई नई कर्ब खुदी दिखलाई पड़े तो यह बच्चों की मृत्यु का चिन्ह है। बपतिस्मा के अवसर पर गिरजे का उत्तरी दरवाजा खुला रखा जाता है ताकि उसमें होकर बच्चे के भीतर निवास करने वाला शैतान भाग सके। अगर बच्चा “पवित्र जल” छिड़कने से न रोवे तो इसे अशुभ माना जाता है और उसे चुपके से चिकोटी काट कर रुला दिया जाता है। अगर “बपतिस्मा” के लिये एक लड़का और एक लड़की पादरी के सामने एक ही समय लाये जायें? तो पादरी पहले लड़के को बपतिस्मा देता है? क्योंकि ऐसा न करने से कहते हैं कि लड़के की दाढ़ी-मूंछें लड़की को निकल आयेंगी।

विवाह

विवाह के सम्बन्ध में भी सर्वसाधारण में ऐसी कितनी ही धारणायें प्रचलित हैं जो केवल “विश्वास” से सम्बन्ध रखती है। उदाहरणार्थ लोगों की धारणा है कि मई में विवाह करना अशुभ होता है। इसका फल यह होता है कि प्रायः अप्रैल के अंत में विवाहों की संख्या बहुत बढ़ जाती है। इसी प्रकार विवाह के दिन के सम्बन्ध में शुभ अशुभ का विचार किया जाता है। इस विषय में एक जनश्रुति लोगों में प्रायः सर्वत्र सुनी जाती है जिसका अर्थ यह है-

“सोमवार का विवाह स्वास्थ्य के लिये, मंगल पर धन के लिये, बुध का सब बातों के लिये शुभ है बृहस्पति का विवाह असफलता, शुक्र का हानि और शनिवार का भाग्यहीनता देने वाला है।”

दुलहन के लिये अपने विवाह की घोषणा सुनना, विवाह की पूरी पोशाक पहिन कर दर्पण देखना अथवा विवाह की पोशाक को दीपक के प्रकाश में देखना निषिद्ध है। दुलहन की पोशाक के सम्बन्ध में एक जनश्रुति भी प्रसिद्ध है कि “उसमें कुछ चीजें पुरानी हों, कुछ नई हों, कुछ माँगी हुई हों और कुछ पीले रंग की हो।” दुलहन जब विवाह के लिये गिरजे को रवाना होती है तो पहले दाहिना पैर घर की देहरी पर रखती है। यदि गिरजे में प्रवेश करने पर ठीक पहले वहाँ की घड़ी बजे तो यह शुभ चिन्ह है और इसके लिये देहातों की दुलहनें, जब तक घण्टा नहीं बजता, तब तक बाहर खड़ी रह कर उसकी प्रतीक्षा किया करती हैं। किसी किसी स्थान पर दो पत्थर खड़े करके और तीसरा पत्थर उनपर आड़ा रख कर नव-दंपत्ति का रास्ता रोक दिया जाता है और उन्हें उछल कर उसे पार करना पड़ता है। जो मित्र उनको इस कार्य में सहायता देते हैं उनको कुछ भेंट दी जाती है। जिस प्रकार हमारे देश के पूर्वी प्राँतों में विवाह के अवसर पर धान की खीलें फेंकी जाती हैं। उसी प्रकार अंगरेजों में भी गिरजा से लौटते समय नव-दंपत्ति पर चावल फेंके जाते थे। अब कुछ वर्षों से चावल के बजाय “कनफैटी” (चमकीले कागज की बनी छोटी-छोटी टिकुलियाँ) फेंकी जाती हैं। दंपत्ति पर पुराने जूते फेंकने का रिवाज भी अंग्रेजों में सर्वत्र प्रचलित है। दुलहन पतिगृह में प्रवेश करते समय एक पत्थर का टुकड़ा साथ में ले जाती है।

मृत्यु

जब कई व्यक्ति मर जाता है तो उसके मित्र पड़ोसी तथा अन्य परिचित लोग उसके पास इकट्ठे हो जाते हैं और उसके हाथ को छूते हैं। आजकल उसका कारण यह बतलाया जाता है कि उन व्यक्तियों को मरने वाले से किसी प्रकार का द्वेष-भाव नहीं पर प्राचीनकाल में उसका उद्देश्य प्रेतात्मा के कोप से सुरक्षित रहना था। अब से दो तीन सौ वर्ष पहले किसी-किसी स्थान में मृत व्यक्ति के नाम पर एक रोटी, एक प्याला बियर (जौ की शराब) तथा छः आना ऐसा एक व्यक्ति को दिया जाता था, जो इन को खा पीकर मरने वाले के पापों को अपने ऊपर लेता था। इस व्यक्ति को ‘सिन ईटर” (पाप-भक्षक) कहते थे और हम समझते हैं कि वह उसी श्रेणी का व्यक्ति होता होगा जैसे कि “महा ब्राह्मण” हमारे यहाँ होते हैं।

अन्य शकुन

ऊपर जिन बातों का जिक्र किया गया है उनके सिवाय और भी ऐसी सैंकड़ों धारणायें लोगों में प्रचलित हैं जिनसे लोग विपत्ति या मृत्यु आने का अनुमान लगाया करते हैं। तस्वीर का गिरना, घर में बिल्ली का मर जाना चूहों का मेज कुर्सी आदि को काटना, शीशे का टूटना, छछूँदर का घर की तरफ आना, कुत्ते का रोना, मुर्गे का आधी रात के पहले बोलना, शवयात्रा के समय घोड़े का धीरे से हिनहिनाना आदि घटनायें सदैव अशुभ समझी जाती हैं। कान में सनसनाहट होने से बदनामी और नाक में खुजली होने से क्लेश की आशंका की जाती है। दाहिना हाथ खुजलाने से रुपया मिलने की और बायाँ हाथ खुजलाने से रुपया जाने की संभावना की जाती है। पैर में खुजली होना यात्रा का चिन्ह माना जाता है। छींक भी बहुत महत्वपूर्ण शकुन माना जाता है। इसके विषय में एक कहावत है-

“सोमवार की छींक अमंगल जनक है, मंगल की किसी अपरिचित से प्रेम कराती है, बुध को छींकने से किसी का पत्र आता है, बृहस्पति की छींक से कुछ भलाई होती है। शुक्र की छींक शोक उत्पन्न करने बाली होती है और शनिवार को छींकने से दूसरे ही दिन प्रिय जन से भेंट होती है।

इस प्रकार अंगरेजों में भी हमारे देश की भाँति टोना-टोटका, जंत्र-मंत्र का काफी प्रचार है। इंग्लैंड में कितने ही लोग ‘ताबीज’ बेचते हैं और अनेक स्त्री पुरुष मनोकामनाओं की सिद्धि के लिये उनको खरीदते हैं। कितने ही लोग विपत्ति से बचने के लिये भेड़ के गाल की हड्डी, विशेष शक्ल का आलू चाँदी की अंगूठी, छछूँदर का पैर, तरह तरह के नग, कोपला, चमड़े से ढकी पारे की शीशी, ईंट का टुकड़ा आदि न मालूम क्या क्या चीजें साथ में लिये फिरते हैं?


हम क्या चाहते है?

लोग समझते हैं कि संसार में और हम कुछ जानें या न जाने हमारी इच्छा ही हमारे लिए सबसे अधिक सुस्पष्ट है और वही सर्वाधिक जाज्वल्यमान है। किन्तु यह निरा भ्रम है। वास्तव में यथार्थ इच्छा ही हमसे अगोचर रहती है। उसके अगोचर रहने का एक कारण यह है कि हमें उस इच्छा ने ही नाना अनुकूल और प्रतिकूल अवस्थाओं के भीतर से गढ़ने का भार ले रखा है। जो विराट इच्छा मनुष्य मात्र को मनुष्य बनाने के लिए उद्योगी है वास्तव में वही हमारे अन्तः करण में रहकर अपना काम करती रहती है। वह इच्छा तब तक अदृश्य रूप से अपना कार्य करती रहती है जब तक हम अपने आपको सर्वांश में उसके अनुकूल नहीं पाते।

जो इच्छा मनुष्य की सार्थकता की साधना में रत है वही उसकी सबसे अच्छी और नित्य की इच्छा है। मनुष्य की इच्छा उससे तब तक गुप्त रहती है जब तक उसकी सार्थकता उसके लिए एक रहस्य बनी रहती है। “किस चीज से मेरा पेट भरेगा या किससे मेरी कीर्ति होगी” यह बताना कोई कठिन नहीं है किन्तु “किस में पूर्ण होऊँगा” “मैं कौन हूँ, मेरे भीतर जो प्रकाश चेष्टा है उसका क्या परिणाम है, उसका उद्देश्य क्या है” इस बात को कौन स्पष्ट रूप से जानता है तथा अब तक कितने व्यक्तियों ने जान पाया है।

वस्तुतः हम लोगों का जीवन इसीलिए है और हम निरन्तर इसी काम में लगे रहते हैं। अपनी उसी अदृश्य इच्छा से प्रेरित होकर इसी बात की रातदिन परख कर रहे है। आज कहते हैं खेल चाहिए कल कहते हैं धन चाहिए परसों कहते हैं मान चाहिए। इस तरह रातदिन अविश्राम गति से संसार सागर का मंथन कर रहे हैं। यह जानने के लिए कि हम क्या चाहते हैं। हम समझते हैं कि रुपया ढूंढ़ते हैं, या, बन्धु ढूँढ़ते हैं। किन्तु ये अपनी अन्तः इच्छा की प्यास को बुझा नहीं पाते और इसके उपरान्त भी हमें क्या चाहिए इसके लिए चारों तरफ खोज करते फिरते हैं, भटकते हैं।

जिन्होंने अपनी उक्त इच्छा का अन्तः प्रेरणा का सन्धान पा लिया है वे कहते हैं और प्रार्थना करते हैं।

“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्माऽमृत गमय। अविरावार्म एधि।

रुद्रयत्ते दक्षिणं मुखंतेन माँ पाहिनित्यम्”

असत्य से मुझे सत्य में ले जाओ। अंधकार से मुझे ज्योति में ले जाओ, मृत्यु से मुझे अमृत में ले जाओ। अंधकार से मुझे ज्योति में ले जाओ। मृत्यु से मुझे अमृत में ले जाओ हे स्व प्रकाश, मेरे निकट होओ। रुद्र तुम्हारा जो प्रसन्न मुख है उसके द्वारा तुम मेरी सदा काल रक्षा करो।

मनुष्य के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि निरंतर के प्रयत्न से अपनी सच्ची इच्छा नित्य इच्छा का सन्धान प्राप्त करे। तत्पश्चात सच्चे हृदय से उक्त प्रार्थना करें तभी वह संपूर्ण बन सकता है। किन्तु इसे केवल कानों से सुनने से कोई फल नहीं। मुँह से उच्चारण मात्र कर लेना तो ओर भी वृथा है। जब हम सत्य को, आलोक को, अमृत को यथार्थ में चाहेंगे और अपने सम्पूर्ण जीवन से उसका परिचय देंगे तभी उक्त प्रार्थना सफल हो सकती है। जिस प्रार्थना को हम मन में प्राप्त नहीं कर सकते उसके पूर्ण होने की कोई सम्भावना ही नहीं रहती । अतः सुनकर अथवा मुँह से बोलकर भी हमें अपनी उस प्रार्थना को सम्पूर्ण जीवन लगाकर सन्धान करना होगा। सत्य की आकाँक्षा, अमृत की आकाँक्षा, हमारी समस्त आकाँक्षाओं में अन्तर्निहित है किन्तु हम तब तक उसे नहीं पा सकते जब तक वह अपने सम्पूर्ण धूलि स्तर को विस्तीर्ण करके मुक्त आकाश में अपने पंख नहीं फैला लेता।

-टैगोर-

*समाप्त*