सबको प्यार करो !


सबको प्यार करो (kavita)

त्याग दया ममता से पावन यह संसार करो! सबको प्यार करो!!

बंधन में उलझे अलियों से, शूलों पर हंसती कलियों से, गंध भरी स्वप्निल गलियों से, प्रकृति नदी के प्रति निज मन में मंजुल भाव करो!

सबको प्यार करो!! मानव के चिर पीड़ित मन को, तन को, यौवन को, जीवन को, जग की व्यापकता जन-जन को, अपने विविध स्वरूप समझकर अंगीकार करो!

सबको प्यार करो!! उसको जो पग में गति देता, वर देता शापों को लेता, मूक भाग्य की नौका खेता, उसके चरणों पर श्रद्धा के मनहर सुमन धरो! सबको प्यार करो!!

-विद्यावती मिश्र


अखण्ड ज्योति के उत्तरदायित्वों में परिवर्तन

(भगवती देवी शर्मा धर्मपत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य )

‘अखण्ड ज्योति’ के इस अंक पर संपादक के स्थान पर मेरा नाम पढ़कर पाठकों को आश्चर्य होगा। अपने परिवार के अधिकाँश सदस्य ऐसे हैं जो बहुधा मथुरा आते रहते हैं और मेरे कार्य क्षेत्र से भली प्रकार परिचित हैं। काफी दिन हो गये परिवार के परिजनों की भोजन व्यवस्था का कार्य मेरे जिम्मे है। बाहरी दृष्टि रखने वाले-मेरे कार्य भार को देखकर बहुधा खिन्न होते हैं और सहानुभूति प्रकट करते हैं पर मुझे अपने उस कार्य में कितना आनन्द और संतोष हैं, इसे मैं ही जानती हूँ। अब यह कार्य मेरे स्वभाव का एक अंग बन गया है। परिवार के परिजनों, आगन्तुक अतिथियों की आये दिन बड़ी संख्या देखकर मुझे भोजन संबंधी अधिक कार्य भार की वृद्धि से परेशानी होना तो दूर उलटे दूने आनन्द का अनुभव होता है। बहुत दिनों से यही मेरी कार्य शैली रही है। अब उस कार्य शैली से भिन्न ‘अखण्ड ज्योति’ के सम्पादन के कार्य से भी मुझे संलग्न देखकर पाठकों को निश्चय ही आश्चर्य होगा।

हमारे छोटे भौतिक परिवार-की जिसमें मैं, आचार्यजी, मेरी सास तथा दो बच्चे कुल पाँच प्राणी हैं-की परिस्थितियों तथा गतिविधियों से परिजन भली प्रकार परिचित हैं। कुछ समय से आचार्य जी ने अखण्ड ज्योति का कार्य अपने जिम्मे लेने के लिए मुझसे कहा था, पर इन दिनों जो कार्य मेरे ऊपर या उसकी व्यस्तता, अपनी स्वल्प सामर्थ्य तथा अनुभवहीनता के कारण मुझे भारी संकोच था और मैं उनसे अपनी कमजोरियों की ओर ध्यान दिला कर यह बराबर कहती रही है कि यह कार्य मेरे बस का नहीं है। इतना बड़ा कार्य भार अपने कंधे पर उठाने में मुझे भारी झिझक, संकोच और भय दबा रहा था अपनी उस मानसिक स्थिति को मैं बराबर आचार्यजी के सामने रख रही थी, वे भी वस्तुस्थिति से अपरिचित नहीं हैं, अन्त में जो निर्णय उनने किया, जो आदेश उन्होंने दिया। उसे शिरोधार्य करना ही मेरे लिए एकमात्र मार्ग था। वह मैंने स्वीकार किया। कई महीने से चल रहे हम लोगों के बीच एक विवाद का अंत हुआ। फलस्वरूप सम्पादन में नाम परिवर्तन इस अंक में उपस्थित है। पाठक जिस प्रकार आश्चर्यान्वित होंगे, उसी प्रकार मैं भी भारी संकोच अनुभव कर रही हूँ।

आचार्य जी के घर में जब से मेरा प्रवेश हुआ है तब से मैंने उन्हें देवता रूप में पाया और परमेश्वर के रूप में उन्हें पूजा है। उनकी प्रत्येक इच्छा और प्रत्येक आज्ञा में मुझे अपना सौभाग्य और कल्याण अनुभव होता रहा है। समय-समय पर वे मुझे कई परीक्षाओं में डालते रहे हैं। गत नरमेध यज्ञ में उन्होंने अपनी सारी पैतृक एवं व्यक्तिगत सम्पत्ति, मेरे जेवर तथा प्रेस आदि जो कुछ था। सार्वजनिक घोषित कर देने, समाज को सर्वस्व दान कर देने का विचार किया, मुझसे सलाह ली, मेरी मनोभूमि में कुछ कच्चाई थी पर उनने कुछ गंभीरता से उस बात का महत्व बताया तो मेरे लिये वही बात सर्वश्रेष्ठ थी। उतनी ही आन्तरिक प्रसन्नता से मैं भी सहमत हो गई थी जितनी कि उनकी आन्तरिक इच्छा थी। इसी प्रकार छह वर्ष पूर्व जब उन्होंने शेष जीवन में ब्रह्मचर्य-पूर्वक रहने की बात सोची और मुझसे सलाह ली तो मुझे वही परम कल्याण का मार्ग अनुभव हुआ। कुछ दिन पूर्व वे दोनों बच्चों को समाज को देकर मुझे अपने साथ लेकर धर्म प्रचार के लिए देशव्यापी पर्यटन की बात सोचते थे तब भी मेरी पूर्ण सहमति थी। अब उनने अपनी वर्तमान इच्छा मुझे अखण्ड ज्योति चलाते रहने और स्वयं अन्यान्य महत्वपूर्ण कार्यों की ओर अग्रसर होने का निश्चय किया तो इनसे भी मुझे क्यों इनकारी होती। मेरी अयोग्यता बाधक थी, उसी के कारण संकोच भी था, पर जब उनका आदेश आशीर्वाद सामने है तो दूसरी बात सोचने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती। मैंने अपने इस छोटे से जीवन में ऐसी अगणित घटनाएं देखी हैं जिनमें उनके आशीर्वाद को पाकर तुच्छ व्यक्ति भी महान कार्य संपन्न कर सके हैं। उसी बलबूते पर मेरा संकोच शाँत हो जाता है और अखंड ज्योति की गुरुतम जिम्मेदारी को अपने कंधे पर लेने का साहस किसी प्रकार समेट पाती हूँ।

‘अखण्ड ज्योति’ के सम्पादन संबंधी यह परिवर्तन आचार्य जी ने क्यों किया इसकी एक विस्तृत पृष्ठभूमि है। उनका जीवन साधनामय जीवन है। सच्चे अर्थों में उनका अन्तः विश्लेषण किया जाय तो वे और कुछ पीछे-साधक पहले हैं। यही उनका सब से प्रिय कार्य रहा है, इसी में उनका मन रमता एवं रचता है। 24-24 लक्ष के 24 गायत्री पुरश्चरण उनने पूरे कर लिये थे तो उनने उसकी पूर्णाहुति स्वरूप कुछ धर्म-प्रचार कार्य करने का संकल्प किया था। उसमें उन्हें सात वर्ष लगाने थे। वे सात वर्ष अगले साल पूरे हो जाते हैं, इसलिए उन्हें अब फिर अपने साधना क्षेत्र में लौटना है। अखण्ड-ज्योति का यह सम्पादन परिवर्तन भी इसी योजना का एक अंग है।

अपने 24 महापुरश्चरण पूर्ण कर लेने पर उनने पूर्णाहुति की सप्तम वर्षीय योजना बनाई थी उसमें (1) गायत्री तपोभूमि की स्थापना जिसके द्वारा विश्व व्यापी गायत्री प्रचार हो सके। (2) अखण्ड अग्नि की स्थापना-जिसमें नित्य यज्ञ होते रहने से यज्ञ शक्ति की परिपुष्टि होना। (3) गायत्री परिवार की स्थापना-जिसमें 2400 शाखाओं के अंतर्गत सवालक्ष उपासक नित्य नियमित उपासना का संकल्प लेकर प्रतिदिन कम से कम सवा करोड़ गायत्री जप करते रहें (4) सहस्र कुँडी यज्ञ-जिसमें देश भर के गायत्री उपासक एक स्थान पर एकत्रित होकर एक सम्मिलित शक्ति का उद्भव कर सकें। (5) युग निर्माण के लिए नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान आँदोलन का आरंभ। (6) देश भर में 24000 कुण्डों के यज्ञ कराके गायत्री और यज्ञ का व्यापक प्रसार तथा भावी अशुभ समय की शाँति की सम्पन्नता। (7) चारों वेदों का सरल सुबोध एवं सस्ता हिन्दी भाष्य करके वेदज्ञान का विस्तार। सात वर्षों में यह सात कार्य उन्हें सम्पन्न करने थे।

कार्य बहुत बड़े थे। जिन दिनों 24 पुरश्चरण उन्होंने पूर्ण किये थे और यह सप्त सूत्री योजना मुझे बताई थी तो मैं अवाक् रह गई थी। अपने साधन जितने सीमित थे, योजना का प्रत्येक भाग जितना बड़ा था, उसे देखते हुए सातों तो क्या एक कार्य का एक अंश भी पूरा होना संभव नहीं दीखता था क्योंकि इन कार्यों के लिए प्रचुर धन, विशाल जन सहयोग और काफी समय एवं श्रम लगाने की आवश्यकता स्पष्ट थी। पर जिस छोटे से घर में हम पाँच प्राणी रहते हैं, उसके सीमित दायरे और सीमित साधनों को देखते हुए वह सात सूत्री योजना असंभव जैसी लगी। मैंने अपना संदेह उनके सामने विनम्र शब्दों में रखा तो वह मुसकराये और बोले ‘तुम्हें इतने दिन साथ रहते हो गये पर अभी भी तुम इन कार्यों में हम लोगों की व्यक्तिगत तुच्छ सामर्थ्य के आधार पर सफल असफल होने का अनुभव लगाती हो?’ इस संकल्प को हम नहीं वरन् वह शक्ति पूरा करेगी जिस के साथ जिसकी गोदी में हम लोगों ने अपने आप को सर्वतोभावेन सौंपा हुआ है।’ मैं चुप हो गई। उनकी आत्मिक प्रेरणा के आधार पर अनेक लोगों को सफलताएं प्राप्त करते देखा है, फिर अपना संकल्प अधूरा क्यों रहेगा? यह सोचकर मैंने मस्तक झुका लिया।

24 महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति स्वरूप जो 7 संकल्प उनने किये थे, उनमें से 5 पूर्णतया पूरे हो गए। दो संकल्प आधे शेष हैं, उनके लिए एक वर्ष शेष है, वह भी इस अवधि में पूरा हो जाने की संभावना है। (1) गायत्री तपोभूमि बन गई। यह आदर्श, देवालय, साधनाश्रम तथा धर्मप्रचार का केन्द्र भारत के अत्यन्त महत्वपूर्ण धर्मस्थानों में से एक है। (2) ऋषियों के आश्रमों में रहने वाली अखंड अग्नियाँ जो कभी न बुझें और जिनका पूजन नित्य यज्ञ द्वारा होता रहे, देश भर में अब दो चार स्थानों पर ही रह गई है। ऐसी अग्नियों का असाधारण आध्यात्मिक महत्व है, पर वह परम्परा लुप्त हो चली है। ऐसी अखण्ड अग्नि की स्थापना तपोभूमि में हो चुकी और उसका सदा जलते रहने का व्यवस्था क्रम बन गया। (3) अ.भा. गायत्री परिवार की शाखाएं 2400 से अधिक हो गई हैं। सवालक्ष उपासकों द्वारा सवा करोड़ जप का क्रम भली प्रकार चल पड़ा है। (4) सहस्र कुण्डी महायज्ञ बड़ी सफलता और शाँति के साथ संपन्न हो गया, इस युग का महानतम एवं अभूतपूर्व यज्ञ माना जाता है। (5) नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का युग निर्माणकारी कार्यक्रम अभी गायत्री परिवार की शाखाओं द्वारा ही प्रसारित किया गया है, यह आशा है कि उसका देशव्यापी रूप बनेगा और प्राचीन युग की महान परम्पराओं को भारत भूमि में प्रतिष्ठापित करने के लिए यह योजना महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त करेगी।

यह पाँच कार्य सम्पन्न हो चुके इन्हें ठीक प्रकार चलते रहने की योजना चल रही है। छठवें संकल्प के अनुसार 24 हजार कुण्डों के यज्ञ होने थे एक हजार कुण्डों का तपोभूमि में और तेईस हजार कुण्डों का देश भर में। उसका आधे में अधिक भाग अब तक पूर्ण हो चुका। जो आधा भाग शेष है वह भी वर्तमान प्रगति को देखते हुए अगले वर्ष पूर्ण हो जाना निश्चित है। चारों वेदों का सरल भाष्य करने और उसे अत्यंत स्वल्प मूल्य में जनता तक पहुँचाने की योजना में आचार्यजी लगे हुए हैं। तीन वेदों का भाष्य हो चुका है। एक का होना शेष है तथा उनका प्रकाशन और प्रचार होना है। यह कार्य अगले एक वर्ष में पूरा कर लेने का उनका विचार है। तब तक उनके संकल्प के सात वर्षों की अवधि भी पूर्ण हो जाएगी।

इस सप्त सूत्री संकल्प को पूर्ण करके आचार्य जी पुनः अपनी विशेष साधना में लगेंगे। पूरी बात तो अभी उनने स्पष्ट नहीं की है, पर मालूम होता है किन्हीं विशेष स्थानों पर किन्हीं विशेष आत्माओं के सान्निध्य में मथुरा से बहुत दूर रहने की उनकी योजना है। वे राष्ट्र के लिए एक विशेष व्यक्ति का आविर्भाव करने के लिए कुछ विशेष साधनात्मक कार्यक्रम बना रहे हैं। इसलिए अगले एक वर्ष में सप्त सूची संकल्प का शेष भाग पूरा करने के साथ साथ वे अपनी वर्तमान सीधी जिम्मेदारियों को दूसरों के हाथों सौंप देने में लगे हुए हैं। अखण्ड ज्योति का यह सम्पादकीय परिवर्तन भी उसी का एक पूर्व भाग माना जा सकता है।

गायत्री तपोभूमि को आत्मदानियों के जो जीवन दान प्राप्त हुए हैं, उसे इस युग की एक महान घटना कहा जा सकता है। अत्यन्त शुद्ध चरित्र, गहरी अध्यात्म निष्ठा सम्पन्न, सुयोग्य, सुशिक्षित, धर्मप्राण और भारतीय धर्म संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए तिल तिल कर अपने को होम कर देने की साधना लेकर जो आत्मदानी तपोभूमि पर आये हैं उनकी गतवर्षों में कार्य तत्परता की अगाध भावना को देखते हुए ऐसा लगता है कि आचार्य जी के संकल्प ही शरीर धारण करके आत्मदानियों के रूप में अवतरित हुए हैं। उन्हें उनका मानस पुत्र-धर्मपुत्र कहा जा सकता है। देशव्यापी धर्म जागृति के जो सपने उनने जीवन भर देखे हैं उनके यह मानस पुत्र पूरा करके रहेंगे ऐसा निश्चित दीखता है। गायत्री परिवारों का संगठन, उपासकों एवं धर्मव्रतियों की अभिवृद्धि, सद्ज्ञान का विस्तार, लोक शिक्षण, सत् साहित्य निर्माण, नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का विस्तार आदि कार्यों से वे चिपट गए हैं मानो इन्हें पूरा करने के लिए उनने जन्मधारण किया हो। ऐसी उच्च मनोभूमि का सम्पन्न आत्मदानियों का मिलना आचार्य जी का सप्त सूत्री योजना का भविष्य उज्ज्वल है। यह स्पष्ट कर देती है। इन मानस पुत्रों को पाकर वे बहुत संतुष्ट है, उस सुसंतति की प्राप्ति को वे बार-बार माता का एक विशेष वरदान बताया करते हैं। धर्म जागृति का बहुत महत्वपूर्ण कार्य यह आत्मदानी पूरा करेंगे इसका उन्हें पूरा और पक्का विश्वास है। जीवन यज्ञ, गायत्री परिवार पत्रिका, वेद वाक्य प्रकाशन तथा एक पैसा ट्रैक्ट माला की योजना उन्होंने बड़ी सफलतापूर्वक संभाली है। आगे देशव्यापी शिक्षण शिविरों का विस्तृत कार्यक्रम उनके सामने है। तपोभूमि की आश्रम व्यवस्था तथा व्यापक धर्म प्रचार की योजनाएं आशाजनक गति से चलती रहेंगी ऐसा विश्वास किया जा सकता है।

अब उनके अपने और मेरे भावी कार्यक्रमों की बात रह जाती है। आचार्य जी अगले नये साधनात्मक कार्य क्षेत्र में प्रवेश करेंगे। उनकी योजनाएं आध्यात्मिक आधार पर होती हैं, उनके पीछे कुछ दिव्य संदेश रहते हैं इसलिए उनमें हेर-फेर करने अनुरोध करने को भी अपनी हिम्मत नहीं होती। वैयक्तिक जीवन में कुछ मानसिक तथा बाहरी कठिनाइयाँ उनके सान्निध्य के अभाव में दुखी करती हैं, करेंगी, पर इसके लिए मैं उनको महान लक्ष्य से विचलित नहीं करना चाहती। मैं अब तक कभी उनके मार्ग में बाधक बनी भी नहीं-और न आगे बनना चाहती हूँ। वे जो उचित समझते हैं निश्चय ही उसके पीछे औचित्य ही परिपूर्ण होता है।

मेरे लिए एक ही कार्य उनने सौंपा है ‘कि साधना का यह प्रचंड स्त्रोत सूखने न पाये जिसके आधार पर गायत्री परिवार की सारी गतिविधियों की सफलता निर्भर है।’ चूँकि परिवार काफी बड़ा हो गया है, उसकी योजनाएं भी बहुत बड़ी हैं, उनको पूरा करने में तपोभूमि निवासी आत्मदानी तथा देशभर में फैले हुए व्रतधारी तथा उपासकगण संलग्न है। पर उनकी उस शारीरिक एवं मानसिक प्रक्रिया के पीछे एक सूक्ष्म शक्ति संपन्न आध्यात्मिक प्रेरणा की भी आवश्यकता है जिसके आधार पर युग निर्माण के कार्यक्रमों में आवश्यक निष्ठा एवं तत्परता सब लोगों में बनी रहे। आचार्य जी अगले वर्ष में जिस साधना में लगेंगे वे बहुत ऊँचे स्तर की है। पर मुझे उन्होंने यह सौंपा है कि गायत्री परिवार की प्रवृत्तियों में समुचित अध्यात्म तत्व सन्निहित रहे इसके लिए मैं भी एक विशेष साधना क्रम में लग जाऊँ।’

उनने मुझे तीन काम सौंपे हैं। (1) अखण्ड घृत दीपक जो यहाँ जलता है। वह 24 पुरश्चरणों के लिए था। वह कार्य पूरा हो जाने पर भी उसका विसर्जन न हो। उसे अभी 10 वर्ष और प्रज्ज्वलित रखा जाय। जिस प्रकार 40 दिन में एक गायत्री अनुष्ठान पूर्ण हो जाता है। इसी प्रकार 40 वर्ष तक जलते रहने पर अखण्ड घृत दीप भी ‘सिद्धि ज्योति’ बन जाता है। जब तीस वर्ष यह दीपक जल चुका सारे परिवार ने क्रमशः 24 घंटे जागरण रखकर उसे जलाये रखा-तो अब दश वर्ष के लिए ही उसे अधूरा क्यों छोड़ा जाए? दस वर्ष और भी इस दीपक का ज्वलित रखकर इसको ‘सिद्ध-ज्योति’ बनाया जाए।

(2) इस दीपक के सम्मुख अब अखण्ड जप का आयोजन किया जाय और दश वर्षों में 24 लक्ष के 24 अनुष्ठान और कराने का आयोजन करूं।

(3) अखण्ड दीप और अखण्ड जप जहाँ रहे वहाँ के संस्कार लेकर ही ‘अखण्ड ज्योति’ निकले।

यह दश वर्षीय योजना उन्होंने मेरे लिए प्रस्तुत की है। दश वर्ष तक इस योजना को पूर्ण करके मैं इस कार्य का उत्तरदायित्व अन्यों पर छोड़कर उस दिशा में बढूं जिसकी अभी से चर्चा करना असामयिक ही होगा।

उनकी आज्ञा को मैंने शिरोधार्य किया है। अखण्ड-ज्योति कार्यालय में जो घृत दीप जलता है, उसका अधिकाँश उत्तरदायित्व अब तक भी मुझ पर तथा हमारी सास जी पर था, फिर भी आचार्य जी उसकी देखभाल एवं सुरक्षा में बहुत समय देते थे, अब वह उत्तरदायित्व मैंने अपने ऊपर पूर्णतया ले लिया है।

अखण्ड जप किस प्रकार आरंभ किया जाय इसके लिए जनशक्ति की आवश्यकता पड़ेगी। यह किस प्रकार पूर्ण हो यह अभी विचार करना है। अभी इस व्यवस्था में तीन-चार महीने लग सकते हैं। तैयारी पूर्ण होने पर इसे आरंभ कर दूँगी। और दश वर्ष में 24-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण इसी अखण्ड दीपक की छाया में पूरे करने में संलग्न रहूँगी।

(3) अखण्ड-ज्योति का सम्पादन इस अंक से आरंभ कर दिया है और यह प्रयत्न करूंगी कि पत्रिका में गये हुए लेखों के साथ वह प्रेरणा भी जुड़ी हुई हो, जिससे उन लेखों का प्रभाव पाठक की अन्तरात्मा पर निश्चित रूप से हो।

इस आयोजन का उद्देश्य गायत्री परिवार के सदस्यों की आत्मिक स्थिति तथा सुख-शाँति की अभिवृद्धि ही है। इसी संकल्प के आधार पर यह त्रिविध कार्यक्रम आरंभ किया गया है।

यह पंक्तियाँ लिखते समय अखण्ड दीप और अखण्ड-जप वाली दोनों प्रक्रियाएं उतनी कठिन नहीं मालूम हो रही हैं। जितना अखण्ड-ज्योति पत्रिका का कार्य कठिन मालूम देता है। यह बहुत झंझट भरा काम है। इसमें आचार्य जी पिछले वर्षों काफी परेशान रहे हैं फिर मेरी क्षमता तो उनकी तुलना में नगण्य है। फिर भी जो आदेश है वह तो करना ही है।

मेरे लिए जो तीन सूत्री दश वर्षीय कार्यक्रम निर्देशित हुआ है उसे ईश्वरीय आदेश मानकर मैं आरंभ करती हूँ। आचार्यजी को उनके आदेशों को मैंने सदा इसी रूप में देखा और माना है। पर अपनी दुर्बलताओं के कारण मेरा नारी हृदय बार-बार सकपका जाता है।

आप पाठकों, परिजनों, आत्मीयों, धर्म पुत्रों से एक ही अनुरोध है कि जब इस भारी बोझ को लेकर चलने में मेरे दुर्बल पैर कंपकंपाने लगें तब आप प्रोत्साहन और शुभकामना एवं सहानुभूति का एक शब्द कह दिया करें। वह ममता भरा शब्द भी मुझे देवतुल्य आचार्यजी के आशीर्वाद की ही तरह अपेक्षित है।


अपने आप को पहचानिए

(श्री ब्रह्मानंद सरस्वती)

परमात्मा ने आत्मा को अपनी सब शक्तियों से विभूषित कर दिया है। उसने स्वार्थवश कुछ छुपा कर नहीं रखा। आत्मा में अनन्त शक्तियाँ हैं। वह अद्भुत कार्य कर सकती है। महान् आत्माओं ने ऐसे कार्य कर दिखाए हैं जिन्हें पढ़ व सुनकर हम दाँतों तले उंगली दबाने लगते हैं। कई बार तो हमें उन पर संदेह होने लगता है। परंतु मनुष्य में वह शक्ति है कि वह असंभव को भी संभव बना सकता है।

मनुष्य जब तक अपने स्वरूप को नहीं पहचानता, तब तक वह क्षुद्र बना रहता है। जब वह अपने आपको जान लेता है तो वह महान हो जाता है। वह अपने आपको शरीर समझ कर अपनी समस्त क्रियाओं को उसी के लिए सीमित कर लेता है, तो उसमें सूक्ष्म शक्ति का अभाव होने लगता है क्योंकि जिसमें स्वयं कुछ भी शक्ति नहीं है उसे हम उपास्य देव मान कर चलें तो उससे शक्ति की प्राप्ति की किसी प्रकार की आशा नहीं की जा सकती। आत्मा के बिना तो वह क्रियाहीन है। इसलिए जो व्यक्ति अपने को केवल शरीर समझ कर उसके अनुरूप अपने जीवन को ढालता है उसकी भौतिक शक्तियाँ भले ही बढ़ती रहें परंतु उसका आत्मिक बल दिन दिन क्षीण होता रहता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति ‘खाओ पिओ और मौज उड़ाओ’ का पक्षपाती रहता है। वह उचित अनुचित, न्याय अन्याय आदि किसी भी बात पर विचार नहीं करता। वह तो केवल अपने आपको देखता है। अपने लाभ के लिए वह किसी की बड़ी से बड़ी हानि की परवाह नहीं करता। ‘कोई मरे कोई जिए, सुथरा घोल पतासा पिए’ उसे तो केवल अपने लाभ से ही मतलब है।

केवल भौतिक उन्नति चाहने वाला व्यक्ति अपनी आत्मा का हनन करता है। वह अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए झूठ, छल कपट, धोखेबाजी घूस आदि को अपनाने में कुछ भी संकोच नहीं करता। दूसरे की बढ़ती देखकर ईर्ष्या, द्वेष करने लगता है।

इसके विपरीत जो व्यक्ति सत्य, प्रेम, न्याय, दया, सहानुभूति, सेवा, परोपकार, संतोष आदि गुणों को अपनाता है और भौतिक लाभ के लिए कभी भी अपने सत्य पथ से विचलित नहीं होता, वह दिन-दिन ऊँचा उठता जाता है और उसकी सूक्ष्म शक्तियाँ बढ़ती रहती हैं क्योंकि आत्मा के गुणों के अनुकूल चलना ही अपने लिए शक्ति का स्त्रोत खोल लेना है।

अपने को शरीर मानकर उसके अनुरूप कार्य करने वाला व्यक्ति कभी भी सुखी नहीं रह सकता। क्योंकि भौतिक वस्तुएं परिवर्तनशील होती हैं, उनमें स्थायित्व नहीं होता, उनको एक दिन क्षीण होना ही है, इसलिए उनके साथ ममत्व रखने वाला व्यक्ति दुखी रहेगा ही। अपने को शरीर समझने वाला ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे महान शत्रुओं को, जो उसकी जड़ों को काटते रहते हैं, अपना मित्र समझता और अपने कार्यों में इनको प्रवेश करने की सहर्ष आज्ञा देता है जिससे उसका लौकिक व पारलौकिक दोनों प्रकार का पतन अवश्यम्भावी है।

अपने आपको आत्मा मानने वाला निरंतर सुख शाँति की ओर बढ़ता है। वह किसी सांसारिक वस्तु के क्षीण होने से अपनी क्षति नहीं मानता। वह धन, ऐश्वर्य और वैभव के लिए झूठ, छल, कपट आदि निन्दनीय उपायों को कभी नहीं अपनाता। काम, क्रोध आदि उसके पास फल नहीं सकते। यदि हम चाहते हैं कि हम दुख के जाल से निकल कर आनन्द की सीमा में प्रवेश करें तो हमें अपने आपको पहचानने का प्रयत्न करना चाहिए।


आत्मिक समता की आवश्यकता

(श्री अरविन्द)

समता ही सच्ची आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख अवलम्बन है और जब साधक भाव, वचन या कर्म से किसी प्राणिक गति में निज को बह जाने देता है, तब वह समता से ही विच्युत होता है। समता तितिक्षा एक ही चीज नहीं, यद्यपि यह बात संशयरहित है कि समता के प्रतिष्ठित होने से मनुष्य की सहनशीलता और तितिक्षा की क्षमता अत्यधिक परिणाम में, यहाँ तक असीम रूप में बढ़ जाती है।

समता का अर्थ होता है मन और प्राण का अचंचल तथा अविचलित होना। इसका अर्थ यह होता है कि जो कुछ घटित हो या तुम्हें जो कुछ कहा जाता हो या तुम्हारे संबंध में जो कुछ किया जाता हो, इन सबका तुम पर कोई स्पर्श न हो और न तुम इन सबसे विचलित होओ, वरन् तुम इन्हें सीधी दृष्टि से देख सको, तुम्हारी यह दृष्टि व्यक्तिगत भावनाओं की विकृतियों से विमुक्त रहे और तुम यह समझने का प्रयत्न करो कि इनके पर्दे के पीछे क्या चीज है, ये चीजें क्यों घटित हो रही हैं, इनसे क्या सीखा जा सकता है, हमारे स्वयं के अंदर क्या चीज है, जिस पर इनका प्रहार हो रहा है और इन सबसे हम कौन-सा आन्तरिक लाभ उठा सकते हैं या कौन-सी प्रगति कर सकते हैं। इसका अर्थ होता है प्राणिक गतियों पर आत्म प्रभुत्व का होना, क्रोध, संवेदनशीलता अहंकार और कामना तथा और सब बाकी चीजों पर भी आत्म प्रभुत्व का होना, अपनी भावमय सत्ता को इन चीजों के हाथों में पड़ने देकर आन्तरिक शाँति को विक्षुब्ध नहीं होने देना, इन चीजों के प्रवाह और वेग में नहीं बहना और न कार्य ही करना, सदैव अपनी आत्मा को शाँत आन्तरिक स्थिति से बोलना और कार्य करना। किसी पूर्ण मात्रा में इस समता को प्राप्त करना आसान नहीं, परंतु इसे अपनी आन्तरिक स्थिति और बाह्य गतियों का अधिकाधिक आधार बनाने का प्रयत्न हमें सदैव करते रहना चाहिए।

समता का एक और अर्थ भी है-मनुष्यों, उनकी प्रकृति उनके कार्यों और उन्हें चलाने वाली शक्तियों के प्रति समदृष्टि रखना। इससे हमें देखने और निर्णय करने में अपने मन

से समस्त व्यक्तिगत भावनाओं को, यहाँ तक कि समस्त मानसिक पक्षपातों को ढकेल बाहर करने में सहायता मिलती है। व्यक्तिगत भावना सदैव विकृति ले आती है और इससे यह होता है कि हम मनुष्यों के कार्यों को ही नहीं वरं उनके पीछे ऐसी चीजों को देखते हैं जो अधिक प्रायः वहाँ नहीं होती हैं। इसके परिणाम में गलतफहमी होती है, गलत निर्णय होते हैं और ये चीजें ऐसी होती हैं जिनका वर्णन किया जा सकता था। छोटे-छोटे महत्त्वों वाली चीजें बहुत बड़े रूप धारण कर लेती हैं।

मैंने देखा है कि जीवन में होने वाली इस प्रकार की प्रतिकूल घटनाओं में से आधी से अधिक का कारण यही रहता है, किन्तु साधारण जीवन में व्यक्तिगत भावनायें और संवेदनशीलता मानव-प्रकृति का स्थायी अंग रहती हैं और स्व-रक्षा के लिए उनकी आवश्यकता भी हो सकती है, पर मेरे विचार में वहाँ भी मनुष्यों और चीजों के प्रति एक सबल विशाल और सम-दृष्टिकोण बनाये रखना रक्षा का कहीं अधिक अच्छा साधन होता है, किन्तु साधक के लिए तो इन चीजों को पार करना और आत्मा की प्रशाँत शक्ति में निवास करना ही उसकी प्राप्ति का आवश्यक अंग है।

आन्तरिक प्रगति की पहली शर्त है प्रकृति के किसी भी अंग में हो रही या विद्यमान गलत गति को पहचानना, गलत भावना, गलत वचन, गलत कर्म जो कुछ भी हो उसे पहचानना और गलत का अर्थ होता है उस चीज से जो सत्य से विच्युत हो, भगवान के मार्ग से विच्युत हो और तब एक बार पहचान लेने पर इसे उचित ठहराना है और इसका समर्थन करना है, वरन् इसे स्वीकार करना है और भगवान को अर्पित कर देना ताकि उनकी ज्योति और कृपा अवतरित हो अपने इसके स्थान पर सच्ची चेतना की ठीक गति को प्रतिष्ठित करे।

पूर्ण समता की स्थापना में लंबा समय लगता है और यह तीनों पर निर्भर करती है-आन्तरिक समर्पण के द्वारा अन्तरात्मा का भगवान को आत्मार्पण ऊपर से आध्यात्मिक प्रशान्ति एवं वीरता का अवतरण ओर समता का विरोध करने वाली समस्त अहमात्मा, राजसिक तथा अन्य भावनाओं का स्थिर, दीर्घ तथा अटल वर्णन। पहली चीज जो करनी है वह है हृदय का पूर्ण निवेदन एवं अर्पण-अहं, रजोगुण आदि का वर्जन कार्यकारी हो सके, इसके लिए आध्यात्मिक शाँति एवं समर्पण का वर्द्धन अनिवार्य है।


ब्राह्मणत्व की महान जिम्मेदारी

(श्री शम्भूसिंह कौशिक)

उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवान्यज्ञेन बोधय।

आयुः प्राणं प्रजाँ पशून्कीर्ति यज्ञमानं चवर्धय।

अ. 19। 13। 1

अर्थात्-हे वेद का अनुशीलन करने वाले ब्राह्मण उठ? तैयार हो, देवों को अर्थात् विद्या और ज्ञान की कामना करने वालों को यज्ञ द्वारा अध्ययन द्वारा जगा। आयु, प्राणशक्ति, प्रजा, पशु कीर्ति और यजमान को बढ़ा।

उक्त वेद मंत्र में ब्राह्मण के महान् कर्तव्य और उत्तरदायित्व का विवेचन किया गया है। वेद भगवान ब्राह्मण के महत्वपूर्ण कर्तव्य का ज्ञान कराते हुए उसे कार्य रूप में परिणित करने का आदेश दे रहे हैं और ब्राह्मण को सावधान कर रहे हैं। उक्त वेद मन्त्र के अनुसार ‘ब्राह्मणास्पते’ वेदज्ञानुसार चलने वाला वेद पालक होना ब्राह्मण का प्रथम आवश्यक कर्तव्य है। वेदज्ञान से परिपूर्ण होने के लिए उसे विचार एवं कार्य दोनों में उतारने के लिए, वेद भगवान की आशाओं के अनुसार आचरण करने के लिए ब्राह्मण का प्रारम्भिक जीवन होता है। यह प्रारम्भिक जीवन वेदाध्ययन, वेदाभ्यास एवं वेद के अनुकूल आचरण करके उसे जीवन में सराबोर करने का समय है। ब्राह्मण को सर्वप्रथम वेदज्ञान, वेदानुकूल आचरण, वेदाध्ययन आदि में रत होकर तपश्चर्यामय जीवन बिताना चाहिए। जब इसमें पूर्णता प्राप्त हो जाय तो वेद भगवान दूसरा आदेश दे रहे हैं।

‘उत्तिष्ठ’ उठ, सावधान हो। वेदाध्ययन एवं उसके अनुसार जीवन को बना लेना ही ब्राह्मण के लिए काफी नहीं है। इसके बाद भी कुछ और महान शक्ति को समझ और सावधान हो। शक्ति सम्पन्न होते हुए भी यदि मनुष्य निरुद्देश्य हो, उसके जीवन में सावधानी न हो, ढीलढाल हो तो वह शक्ति कोई महत्व नहीं रखती। तथा वह शक्ति सम्पन्न व्यक्ति भी कुछ नहीं कर सकता। उसका जीवन यों ही निरुद्देश्य समाप्त हो जाता है। अतः आगामी कर्तव्य क्षेत्र में उतरने के पहले वेद भगवान ब्राह्मण को सावधान करते हैं और सदैव अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहने के लिए सचेत करते हैं।

जिस प्रकार युद्ध शुरू होने के पूर्व सेना को सेनापति की ओर से सावधान होने का आदेश मिलता है उसी प्रकार वेद भगवान भी ब्राह्मण को इस संसार के समरांगण में अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए उतरने से पहले सावधान कर रहे हैं। निश्चय ही ब्राह्मण का जीवन संसार में व्याप्त अज्ञानान्धकार, बुराइयां, दुख, कमजोरी कुरीतियाँ आदि को दूर करने लिए ही होता है। दूषित एवं अनैतिक तत्वों से संघर्ष कर स्वस्थ समाज के निर्माण का महान् उत्तरदायित्व ब्राह्मण पर ही है। संसार पथिक को उलझनों, संघर्ष, कठिनाईयों दुखों, उद्वेगों से बचाकर अपने विस्तृत वेदज्ञान अमृत का पान कराते हुए उसे सुख, शाँति, सम्पन्नता, आदि से परिपूर्ण करना ब्राह्मण का ही पवित्र और पावन तथा महान् कर्तव्य है।

वेदज्ञान से पूर्ण होकर और सावधान होकर फिर ब्राह्मण को क्या करना चाहिए इसके लिए वेद भगवान कहते हैं “देवान यज्ञेनबोधय।” देवों को अर्थात् सत्पथ का अनुगमन करने वालों को, परमार्थ के लिए कुछ त्याग एवं कष्ट सहन करने वालों को यज्ञ द्वारा जगा। अर्थात् उनमें यज्ञ भावनाओं को भरके, परमार्थ, समाज सेवा धर्मसेवा की शिक्षा देकर उन्हें जगा। ब्राह्मण का प्रधान आवश्यक कर्तव्य सच्चे जनसेवक एवं त्यागी तपस्वी व्यक्तियों का निर्माण करना है। यदि ब्राह्मण अपने वेदज्ञान, ब्रह्मचर्य, तपस्या आदि की शक्ति से लोगों की भौतिक कमियों को पूरा करें तो कोई महत्व की बात नहीं है। वैसे इनकी भी आवश्यकता है किन्तु सर्वप्रथम सच्चे जनसेवकों, उत्तम शिष्यों, लोकसेवियों का निर्माण करना आवश्यक है इसलिए उक्त वेद मंत्र में इस पर प्रथम जोर दिया है।

समाज में, समाजसेवी, धर्मसेवी, परोपकारी व्यक्ति बहुत कम ही निकलते हैं। अधिकतर लोग सम्पन्नता, ऐश्वर्य एवं साँसारिक जीवन ही अच्छा समझते हैं। अतः इस दूसरे वर्ग का हित साधन करने के लिए भी वेद भगवान् ब्राह्मण को आदेश दे रहे हैं। “आयुः प्राणं, प्रजाँ पशून्कीर्ति यजमानं चवर्धय” आयु को, प्राणशक्ति को, सत्संतान को, पशुओं को कीर्ति को और यजमान को बढ़ा। ब्राह्मण सत्शिक्षण, सदुपदेश, सद्ज्ञान प्रसार से लोगों की आयु, प्राणशक्ति, सत्संतान, पशु कीर्ति आदि को बढ़ावें। क्योंकि इनकी वृद्धि भी तभी संभव है जब इनके सम्बन्ध में सम्यक् ज्ञान एवं आवश्यक जानकारी हो। अतः यह भी एक महान आवश्यक कर्तव्य है जिसकी जिम्मेदारी ब्राह्मण को दी गई है।

समाज की उक्त भौतिक सम्पदायें बढ़ने पर योग्य यजमान का निर्माण करना भी अत्यावश्यक है। उक्त भौतिक सम्पदायें प्राप्त व्यक्ति में आस्तिक, श्रद्धालु, विश्वासी, नम्र, परोपकारी एवं राष्ट्र हित की भावनायें भरना भी कोई साधारण कार्य नहीं है।

इस प्रकार उक्त वेद मंत्र में बताया गया है कि स्वयं वेदज्ञान से परिपूर्ण हो, सावधान हो, दूसरों को सावधान करें और समाज का सभी तरह कल्याण करें।

ब्राह्मणत्व की महान मर्यादाओं कर्तव्यों, आदि पर मनन करके उसके महत्व को समझ के उसके अनुकूल जीवन बनाकर स्वयं को, राष्ट्र को, समाज को धन्य बनाना प्रत्येक ब्राह्मण का आवश्यक कर्तव्य है। आज ऐसे ही सच्चे ब्राह्मणत्व का गौरव प्रिय है अपने कर्तव्यों की ओर ध्यान देना और उनके पालन करने के लिए तत्पर होना आवश्यक है। ब्राह्मणत्व की जिम्मेदारी महान है। उसकी ओर जागरुक रहने के लिए ही वेद भगवान ने इस मंत्र में आदेश किया है।


Quotation

जिसने विपत्ति को नहीं जाना, उसने न तो कभी अपने को पहचाना और न स्वयं अपने सद्गुणों को समझा। -मैलेट

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सारी उन्नति के लिए प्रथम आवश्यक वस्तु विश्वास है। किसी काम में प्रारंभ ही से शंका करना है, अनिवार्य असफलता को आह्वान करना है। संदेह सारी प्रेरणा का हनन कर देता है और जिस प्रयत्न में प्रेरणा नहीं होती वह व्यर्थ जाता है। -डॉ. पट्टाभी

यदि किसी मनुष्य को सफल, बलशाली और आदर्श जीवन बनाना है-ऐसा जीवन जो प्रलोभन और आफत की आँधी का दृढ़ता से मुकाबला करेगा, तो उसे थोड़े से सरल और अटल नैतिक सिद्धान्तों पर बनाना चाहिए। इनमें से चार ये हैं, न्याय, ईमानदारी, सच्चाई और कृपा। ये चार नैतिक सत्य जीवन बनाने के लिए वैसे ही आवश्यक हैं जैसे कि एक घर बनाने के लिए सम चतुर्भुज की चार रेखाएं। -एक विद्वान


देवत्व की ओर बढ़ने का साधन-सतोगुण

(डॉ चमनलाल गौतम)

धर्मशास्त्रों में सृष्टि के विकास का जो विवरण दिया है, उसमें बतलाया गया है कि संसार में सर्वप्रथम खनिज द्रव्य, पत्थर आदि का प्रादुर्भाव हुआ, उसके बाद वनस्पति, पेड़ पौधे आदि उत्पन्न हुए, फिर पशु-वर्ग और अंत में मनुष्यों का आविर्भाव हुआ। विचारकों का मत है कि अभी मनुष्य में मनुष्यत्व के गुणों का विकास थोड़ी ही मात्रा में हुआ है, जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा उसकी मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियां बढ़ती जायेंगी। इसका परिणाम यह होगा कि कुछ हजार वर्ष बाद पृथ्वी पर जो मनुष्य पाये जायेंगे वे आजकल के मुकाबले में ‘देव कहलाने योग्य होंगे। संसार के विकास क्रम में वैसे सैकड़ों सीढ़ियाँ हैं, पर उसके मुख्य विभाग में पाँच ही समझनी चाहिए।

सृष्टि का एक नियम यह भी है कि कोई पदार्थ या प्राणी किसी भी श्रेणी अथवा अवस्था में क्यों न दिखलाई पड़े, पर उसमें अन्य सब श्रेणियों के गुण और विशेषताएं बीज रूप में निहित रहती हैं। यही कारण कि सच्चे आत्मदर्शी व्यक्तियों की दृष्टि में एक छोटे-छोटे कीड़े में भी परमात्मा का अस्तित्व स्पष्ट दिखलाई पड़ता है और वे नीच से नीच चांडाल को पवित्र से पवित्र ब्राह्मण के तुल्य मानते हैं। यही कारण है वेदान्त सिद्धाँत के अनुसार इस संसार में सिवाय ब्रह्म के और कोई तत्व नहीं है। इसका एक-एक अणु परमात्मा का ही अंश है और अंत में उसी में जाकर लय होगा। बीच की अवस्था में जितना भी अंतर दिखलाई पड़ता है वह प्रकृति का विकार है।

ऊपर जीव तत्व के विकास के संबंध में जिन पाँच श्रेणियों का जिक्र किया गया है उनके संबंध में भी यही नियम लागू है, अर्थात् प्रत्येक श्रेणी में अन्य श्रेणियों के भी गुण रहते हैं। इतना ही नहीं प्रत्येक श्रेणी में कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें अपनी से भिन्न श्रेणी की विशेषताएं ही अधिक दिखलाई पड़ती हैं। यह बात मनुष्य पर विशेष लागू होती हैं क्योंकि इसमें चेतना शक्ति का विकास ऐसे ढंग से हुआ है कि वह अपने में इच्छानुसार अनेक प्रकार के भले अथवा बुरे परिवर्तन कर सकता है। इसी तथ्य को दृष्टि गोचर रख कर एक विद्वान ने मनुष्य को पाँच श्रेणियों में बाँट कर उनकी पहिचान और विशेषताओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। साराँश रूप में उन पाँचों का परिचय इस प्रकार है।

(1) प्रथम श्रेणी में वे बहुत अल्प विकास वाले व्यक्ति आते हैं जिनका दायरा केवल अपने स्थूल शरीर तक ही सीमित रहता है। इन लोगों को केवल अपने खाने, पीने आदि का ख्याल रहता है। अपने सिवाय वे संसार में किसी की आवश्यकता को नहीं समझते, चाहे वह उनका निजी से निजी संबंधी ही क्यों न हो। इन पेट-पालू लोगों को खनिज श्रेणी में समझना चाहिए। संसार के अनेकों जंगली, बज्रमूर्ख, पागल और परम स्वार्थी व्यक्ति तो इस श्रेणी में आते ही हैं, पर हम बड़े-बड़े धनकुबेरों, विद्वान पंडितों और साधु महात्माओं को भी इस श्रेणी में रख सकते हैं। यदि वे संसार में दूसरों के भले का ख्याल न करके केवल अपने ही स्वार्थ की पूर्ति में लगे रहते हैं। ऐसे लोग अपने शरीर में अत्यन्त आसक्ति रखते हैं और शरीर के सिवाय उनकी दृष्टि में मनुष्यता, धर्म, आत्मा, परमात्मा का तनिक भी स्थान नहीं होता। इसके परिणामस्वरूप वे संसार के अन्य सब लोगों को विरक्तता और तिरस्कार के भाव से देखते हैं और दूसरे भी उनके प्रति ऐसे ही भाव रखते हैं।

(2) दूसरी तरह के मनुष्य वे होते हैं जिनके विचारों का दायरा पहली श्रेणी वालों से तनिक बड़ा होता है और वे अपने समस्त कार्यों का उद्देश्य अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करना समझते हैं। ये लोग वनस्पति-वर्ग के कहे जा सकते हैं। जिस प्रकार पेड़ अपनी शाखाओं और पत्रों को पोषण पहुँचाता है, उसी प्रकार थे अपने बाल बच्चों का ध्यान रखते हैं, पर अन्य किसी से कोई सरोकार नहीं रखते । अगर अपने परिवार के लाभ के लिए दूसरों को हानि भी पहुँचानी पड़े तो उसमें भी उनका कोई संकोच नहीं होता। जहाँ तक हमारा अनुमान है प्रथम श्रेणी के लोग पाषाणवत् तो संसार में बहुत अधिक नहीं पाये जाते, पर इस दूसरी श्रेणी वालों की संख्या संभवतः सबसे अधिक है। खासकर हमारे देश में ऐसे लोगों की बहुतायत दिखलाई पड़ती है जो अपने ‘बाल-बच्चों’ के सिवाय और किसी के लिए चिंता करना बेकार समझते हैं। ऐसे लोग अपने परिवार के धन, मान, प्रतिष्ठा, उच्चता, कुलीनता आदि का बहुत घमण्ड रखते हैं और अपने संकुचित विचारों के कारण समाज के लिए सर्वथा निरुपयोगी सिद्ध होते हैं।

(3) इससे आगे पशु-वर्ग के लोगों का नंबर आता है जिस प्रकार बंदर, हाथी, हिरण, चींटियाँ, मधुमक्खियाँ समूह बनाकर रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर समूह की रक्षा के लिए मरने कटने को तैयार हो जाते हैं, उसी प्रकार इस तीसरे श्रेणी के व्यक्तियों का विकास इतना हो जाता है कि अपनी जाति या समाज का ख्याल रखते हैं। पर दूसरी जाति या समाज वालों को वे प्रायः विरोधी की दृष्टि से देखते हैं, और उनकी निन्दा, बुराई का एक भी अवसर नहीं जाने देते। इन लोगों को पेट-पालू और कुटुम्ब-पालन लोगों से अधिक विकास वाला समझा जा सकता है, पर जब हमारे साथ में और भी अनेकों जातियों के लोग रहते हैं और जिनसे हमारा बराबर काम पड़ता है। वहाँ केवल अपनी जाति के हित और स्वार्थ पर ही दृष्टि रखना प्रशंसनीय बात नहीं समझी जा सकती।

(4) चौथी श्रेणी में वे लोग आते हैं जिनको हम मनुष्य कहते हैं। वे समझते हैं कि हमने जिस स्थान में जन्म ले लिया है और जहाँ के अन्न-जल से हम जीवन धारण कर रहे हैं वहाँ के सभी निवासी हमारे भाई या साथी हैं और उनका हानि लाभ हमारा ही हानि-लाभ है। वे लोग अपना क्षेत्र समस्त देश को समझते हैं, पर अन्य देश वाले उनकी दृष्टि में ‘विदेशी’ होते हैं। उनके साथ धोखे, चालाकी या शत्रुता का व्यवहार करना वे बुरा नहीं समझते और आवश्यकता हो तो युद्ध करके उनका नाश कर डालना भी अपना कर्तव्य मानते हैं। फिर भी जहाँ पहली तीन श्रेणी वाले केवल अपने को या थोड़े से लोगों को ही अपना मानते हैं, ये करोड़ों देशवासियों को अपना संबंधी या साथी मानते हैं और उनके हित का ख्याल रखते हैं। इस श्रेणी के व्यक्ति राष्ट्रों के नेता, संचालक और रक्षक माने जाते हैं। वर्तमान समय में अधिकाँश लोगों की दृष्टि में मनुष्य का सबसे ऊँचा सम्माननीय दर्जा यही है।

(5) पांचवीं श्रेणी वह है जिसका विकास अभी हुआ नहीं है और जो देश काल की सीमा को त्याग कर मनुष्य मात्रा को अपना समझते हैं और सबके हित का समान रूप से ध्यान रखते हैं। वैसे आदर्श के रूप में पहले अनेकों भारतीय ऋषि मुनि इस श्रेणी के हो चुके हैं और अब भी टॉलस्टाय, गाँधी, रस्किन आदि महानुभाव ऐसे ही विश्व हितैषी हुए हैं। पर इन लोगों की संख्या बहुत ही कम है और सर्वसाधारण उनकी इस विशेषता को भली प्रकार अनुभव भी नहीं करता। इसीलिए हमारा यह कहना कि इस श्रेणी का विकास अभी भविष्य में होना है जब इन विचारों के मनुष्य पर्याप्त संख्या में पायेंगे और उनको आश्चर्य की निगाह से न देखकर वास्तविक मनुष्य ही समझा जायेगा।

यह विचार करना ठीक नहीं कि इनमें किसी भी श्रेणी के व्यक्ति में शतप्रतिशत एक ही प्रकार का विचार पाया जाता है और अन्य सब गुणों से वह सर्वथा होता रहता है। जैसा हम कह चुके हैं यह बात सृष्टि-नियम के विरुद्ध है। इस संबंध में एक विचारक का कथन है कि ‘खनिज वर्ग के लोगों में तमोगुण (जड़ता) की अधिकता रहती है और सतोगुण बहुत ही कम अंश में होता है। ऊपर की श्रेणियों में ज्यों-ज्यों आत्म विकास बढ़ता जाता है उसी के अनुसार उत्तरोत्तर सतोगुण बढ़ता है और तमोगुण कम होता जाता है। परंतु किसी भी गुण का सर्वथा अभाव किसी भी दशा में किसी व्यक्ति में नहीं होता। फलतः निम्न श्रेणी के लोगों में भी तारतम्य से कुछ न कुछ भाव ऊपर की श्रेणियों के अवश्य रहते हैं। इसी प्रकार ऊपर की श्रेणी वालों में भी तारतम्य से निम्न श्रेणियों के भाव रहते हैं। यद्यपि खनिज-वर्ग के देह वालों में विश्व-प्रेम तक के भाव मौजूद तो रहते हैं परंतु वे इतने सत्य और अविकसित होते हैं कि प्रत्यक्ष में प्रतीत नहीं हो सकते। इसी तरह देव वर्ग के महापुरुष भी अपने शरीरों से प्रेम रखते हैं, परंतु उनमें सतोगुण इतना अधिक बढ़ा हुआ रहता है कि किसी शरीर विशेष ही में उनकी आसक्ति नहीं होती। तमोगुण जड़ात्मक है, रजोगुण रागात्मक और क्रियात्मक एवं सतोगुण सुख और ज्ञानात्मक है। सतोगुण से मनुष्य उन्नति करता है और तमोगुण से गिरता है।” गीताकार ने कहा है-

ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्य गुण वृत्तिस्था अधो गच्छन्ति ताम साः॥

अर्थात् सतोगुण का सेवन करने वाले ऊपर को उठते हैं, रजोगुणी बीच में ठहरते हैं और कनिष्ठ तमोगुण का सेवन करने वाले नीचे गिरते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को सात्विक आचरणों से अपने में सतोगुण का विकास करते रहना चाहिए यही अधर्म श्रेणी से निकलकर उच्च श्रेणी में पहुँचने का उपाय है।


एक साथ चलो, आगे बढ़ो

(श्री गिरिजा सहाय व्यास)

अश्वमन्वती रीयते संरभघ्वमुत्तिष्ठत प्रतरता सखायः। अत्राजहीमोऽशिवा ये असच्छिवान्वयमुत्तरेमाभिवाजान्

यजु. 35। 10

‘दुख स्वरूप पत्थरों वाले (यह संसार नदी) बह रही है। हे मनुष्यों? परस्पर एक मत होकर एक साथ प्रयत्न करो। उठो? सावधान होकर अच्छी तरह पार करो। जो अमंगलकारी हैं उन्हें यहाँ ही छोड़ दें। (और) कल्याणकारी बातों को, पदार्थों को (ज्ञान को) अपना लक्ष्य बनाकर भली प्रकार उसे तर जाओ।’

उक्त वेद मंत्र में संसार रूपी नदी की विषमता कठिनाई आदि का वर्णन करते हुए मानव को संगठनबद्ध होकर उसे पार करने की प्रेरणा दी गई है। साथ ही विपरीत एवं दूषित तत्वों को छोड़कर कल्याणकारी एवं हितकर तत्वों को अपना कर आगे बढ़ने का आदेश दिया गया है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि यह संसार एक नदी की तरह बह रहा है। जिसमें कठिनाईयाँ, दुख परिस्थितियाँ कुयोग आदि भी पत्थर रूप में बह रहे हैं। जो भी प्राणी इस संसार रूपी नदी में उतरेगा उसे उक्त पत्थरों का सामना करना पड़ेगा। इन कठिनाइयों, दुखों, परेशानियों आदि पत्थरों के प्रवाह का सामना सभी को करना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य को जीवन के प्रारंभ से अंत तक इनके थपेड़े खाने ही पड़ते हैं। मालूम करने पर पता चलेगा कि अधिकाँश व्यक्ति अपने दुखों, कठिनाईयों परेशानियों आदि की शिकायत करते हुए मिलेंगे।

बहुत कम ऐसे होते हैं जो इन्हें सहन करके संसारनद के तीव्र प्रवाह में अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों की संख्या बहुत ही कम होती है। बहुसंख्यक लोग वही होते हैं जो अपना जीवन उक्त पत्थरों के प्रवाह में छोड़ देते हैं अपने जीवन को रोते झींकते और भार ढोने की तरह ही व्यतीत करते हैं इन लोगों का एकाकी प्रयत्न इतना सबल और ठोस नहीं होता कि ये इस संसार रूपी नदी को पार कर सकें। इसी समस्या का समाधान करते हुए वेद भगवान आज्ञा देते हैं कि ‘हे मनुष्यों? एकमत होकर एक साथ उद्योग करो, उठो, सम्हलो और इस नदी को अच्छी तरह पार करो। इस संसार रूपी नदी को पार करने के लिए संगठन की शक्ति निश्चय ही महत्वपूर्ण है। संगठन के लिए सर्वप्रथम हमारा एक मत एवं एक विचारधारा आवश्यक है। जहाँ परस्पर विरोधी विचार होंगे वहाँ संगठन होना असम्भव है। इसीलिए वेद भगवान पहले एक विचार वाले बनने पर जोर दे रहे हैं।

जब एक विचार एक मत स्थिर हो जावें तब संसार नदी में बहते हुए कठिनाई दुख परेशानी, आपत्तियों आदि पत्थरों के प्रवाह से बचने के लिए सामूहिक प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार संगठनात्मक प्रयत्न से दुर्बल, दीन, शक्तिशाली, सभी तरह के व्यक्तियों की हित होता है। संगठन में महान शक्ति होती है।

सामूहिक प्रयत्न भी यदि सुस्ती या आलस्यपूर्ण हों तो सफलता मिलना तो दूर उल्टी अधिक हानि हो जाती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को सावधान होकर, सम्हलकर सचेत होकर विपरीत तत्वों से संरक्षण प्राप्त करने एवं उनकी हानि से बचने के लिए संगठनबद्ध होकर प्रयत्न करना चाहिए। परस्पर सहयोग, सहायता, सहिष्णुता, उपकार की भावनायें, आत्मीयता आदि एक दूसरे को दुखों कठिनाईयों एवं परेशानियों से बचाने के लिए आवश्यक हैं। इसी का निर्देशन उक्त वेद मंत्र में किया गया है। इस प्रकार के प्रयत्नों से परस्पर एक दूसरे को संसार नदी में जीवन पथ पर अग्रसर करने में सहायक हो सकते हैं।

एक मत हो, संगठन हो और सावधानी से आगे बढ़ने के प्रयत्न हों किन्तु यदि विवेक का अवलम्बन न किया जाय अर्थात् अच्छे बुरे की पहचान कर तदनुकूल व्यवहार न हो तो भी मनुष्य को इस संसार नदी में उक्त प्रस्तरों के थपेड़े खाने पड़ते हैं, दुख कठिनाई एवं परेशानियों का शिकार होना ही पड़ता है। इसलिए वेद भगवान आज्ञा देते हैं कि ‘जो अमंगलकारी हैं उनको यहाँ ही छोड़ दें और कल्याणकारी तत्वों को आधार बनाकर उत्तमता से तर जाएं।’

अक्सर विवेक के अभाव में मनुष्य की व्यक्तिगत अथवा सामूहिक शक्ति अनावश्यक एवं अमंगलकारी कार्यों में नष्ट हो जाती है। और परिणाम में दुख कठिनाईयों आदि का सामना करना पड़ता है। अविवेक साँसारिक विषय, भोग, वासनाएं, संग्रह की इच्छा, स्वार्थ आदि को प्रधानता देता है। जिनका परिणाम दुख और कठिनाईयाँ ही है। अतः इनको विवेक की कसौटी पर कसना चाहिए और जो दुखदाई हों, अमंगलकारी हो उन्हें छोड़ देना चाहिए। कल्याणकारी, हितकारी एवं शुभ बातों को अपनाना चाहिए। यही विवेकशीलता है। कुवासनाओं, बुरी भावनाओं, एवं कुकर्मों को त्याग कर महान कल्याणकारी एवं उच्च लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।

उक्त तथ्यों के अनुसार इस संसार में दुखों कठिनाईयों, परेशानियों भय आदि से बचकर सुख शाँति, कल्याणकारी, पवित्र जीवन बिताकर आत्मलक्ष्य प्राप्त करने के लिए संगठित एक विचार सावधान और सचेत होकर एक साथ उद्योग, अमंगलकारी दुखदायी तत्वों को छोड़कर कल्याणकारी पथ को अपना लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना चाहिए। यही वेद भगवान की मानव मात्र के लिए आज्ञा है। यही ईश्वरीय आदेश है जिसका पालन करना प्रत्येक मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है।

जब समाज में इन तत्वों की वृद्धि होती है तभी विकास, उन्नति आदि संभव होते हैं। अतः यदि हमें अपने कदम उन्नति प्रगति एवं उत्थान की ओर बढ़ाने और अपने प्राचीन महान गौरव एवं विशिष्टता को प्राप्त करने के लिए अग्रसर होना है तो उक्त ईश्वरीय आदेश का पालन करना होगा। हम सबको एक विचार, संगठन, सामूहिक प्रयत्न तथा दूषित तत्वों से दूर होकर एक ही राष्ट्रीय भावनाओं के अनुसार अग्रसर होना आज की महान आवश्यकता है। इस पथ को अपनाएं बिना भौतिकता एवं विनाश के प्रवाह में बहते हुए इस विश्व में अपना अस्तित्व कायम रखना असम्भव है। इस पर गंभीरता से विचार कर प्रत्येक भारतीय को तदनुकूल आचरण करना सच्चा धर्म पालन है, ईश्वरीय आदेश एवं वेदाज्ञा का आदर है।


मृत्यु से खेलना सीखो

(श्री भगवनसहाय वाशिष्ठ)

‘मृत्यु’ के समान भयानक शब्द संसार में कदाचित ही दूसरा होगा। मनुष्य मात्र के लिए मृत्यु एक निश्चित बात है। एक स्वाभाविक और अनिवार्य स्थिति है। जल्दी या देर में, प्रत्येक व्यक्ति को इस स्थिति में होकर गुजरना ही पड़ेगा। मृत्यु के सम्मुख किसी की विनती, घूँस अथवा धमकी का कोई असर नहीं होता। राजा से लेकर रंक तक को अंत में मृत्यु की शैया पर अवश्य सोना पड़ेगा। एक कवि ने कहा है-

“आयु रूपी नगरी के दो द्वार हैं एक आनन्द-दायक जन्म और दूसरा भय भीषण मृत्यु।”

फारसी के प्रसिद्ध कवि फिरदौसी ने मृत्यु की तुलना खेत काटने वाले के साथ करते हुए लिखा है कि “हम सब सूखी घास की तरह हैं, और काटने वाला बुड्ढ़े और जवान का ख्याल किये बिना सब को एक समान भाव से काटता जाता है। इस दुनिया का निर्माण ही इस ढंग से हुआ है कि जिसने माँ के पेट से जन्म लिया है उसे मरना भी अवश्य पड़ेगा। हर एक मनुष्य एक दरवाजे से आकर दूसरे दरवाजे से निकल जाता है, जब कि समय उसकी घड़ियाँ गिनता हुआ बेपरवाही से खड़ा रहता है।”

अनेक मनुष्यों को हम मरते हुए देखते हैं, सुनते हैं, ओर यह भी जानते हैं कि किसी दिन हमको भी अवश्य मरना होगा यह होने पर भी मृत्यु की भयंकरता इतनी अधिक है कि उसका नाम सुनते ही थरथराहट आ जाती है। मनुष्य की लालसा इतनी अधिक है कि एक दम मृत्यु के किनारे बैठा महाजर्जर वृद्ध मनुष्य भी उससे दूर भागने का प्रयत्न करता है।

मृत्यु के विषय में हमारे जो विचार हैं उनसे ऐसा प्रकट होता है कि मानो मृत्यु के समय घोर वेदना होती है। इसी वेदना की कल्पना से काँप उठते हैं। जिस प्रकार अंधकार पूर्ण अनजान स्थान में जाते हुए हमको डर लगता है, वैसी ही बात मृत्यु के विषय में है। मृत्यु के पीछे क्या होगा इसका कोई पता नहीं। वर्तमान समय के बड़े से बड़े वैज्ञानिक और उनके आधुनिक से आधुनिक यंत्र मृत्यु के बाद के जीवन के संबंध में कोई बात जानने में असमर्थ सिद्ध हुए हैं। हमारे पास मृत्यु के पश्चात का हाल जानने के लिए अगर कोई साधन है तो वह हमारी धर्मकथाएं और किम्वदन्तियाँ हैं। पर इनकी सत्यता को सिद्ध करने का हमारे पास कोई ऐसा दृढ़ प्रमाण नहीं है जिसे सब विचारों के व्यक्ति स्वीकार कर सकें। इसलिए हम अधकचरे, असत्य और मनमाने विचार बनाकर मृत्यु का काल्पनिक भाव उत्पन्न कर लेते हैं।

मृत्यु की भयानकता का एक कारण यह भी है कि हम प्रायः मरने के पहले अधिकाँश व्यक्तियों को तरह-तरह के यंत्रणादायक रोगों में फंसकर कष्ट पाते और तड़फड़ाते देखा करते हैं। इसलिए लोगों का यह ख्याल हो जाता है कि इन यंत्रणाओं का कारण मृत्यु ही है। पर इसमें एक भूल की बात यह है कि हम बीमारी और मृत्यु को एक साथ मिला देते हैं। ध्यानपूर्वक देखा जाय तो जो व्यक्ति मृत्यु के पहले बीमारी की पीड़ा से भयंकर कष्ट पाता और चीत्कार करता रहता है, मृत्यु के बाद उसके मुख पर एक परम शाँति का सा भाव आ जाता है। इसलिए हमको तो ऐसा अनुमान होता है कि मनुष्य को अपार व्यथा और पीड़ा में से मुक्त करने के लिए ही परमात्मा ने मृत्यु को भेजा है। अगर हम इस विचारधारा को सत्य मानें तो मृत्यु को दुखदायी मानने के बजाय सुखदायी समझना चाहिए। महाकवि गालिब ने इसी आशय को दृष्टिगोचर रखकर कहा है-

अशरते कतरा है दरिया में फना हो जाना। दर्द का हद से गुजरना है, दवा हो जाना॥

अर्थात् “पानी की एक बूँद का सर्वोत्तम आनंद इसी में है कि वह नदी में जाकर मिल जाय, इसी प्रकार दर्द जब हद से बढ़ जाता है तो वही दवा हो जाता है अर्थात् मृत्यु के रूप में उसमें उससे पीड़ा का अंत हो जाता है।”

मृत्यु हमको इतनी खराब चीज जान पड़ती है कि अगर हमारा बस चले तो ‘मृत्यु’ को ही मृत्यु दण्ड सुना दें। पर हमको विचार करना चाहिए कि अगर संसार में मृत्यु न हो तो कैसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाएगी। कुछ ही वर्षों में संसार में सब प्राणियों की संख्या इतनी अधिक बढ़ जाएगी कि फिर नये प्राणियों की सृष्टि के लिए स्थान ही न रहेगा। जिस प्रकार कि दफ्तर के टेबल पर फाइलें बराबर आती तो रहें, पर उनको निबटारा करके वापस न लौटाया जाय तो वही की सी दशा संसार की भी दिखलाई पड़ेगी। इसके अतिरिक्त मनुष्य युवावस्था समाप्त होने के बाद ज्यों ही वृद्ध होने लगता है वैसे ही उसका मन जीवन की प्रवृत्तियों से हटकर निवृत्ति की तरफ जाने लगता है। ऐसा निवृत्ति का भाव और अकर्मण्यता आने से शरीर रोगों का घर बनने लगता है। अनेक शारीरिक व्याधियों से पीड़ित रहता हुआ और घिसटता हुआ अगर मनुष्य जीवित भी रहा करे तो उसे वह अमरत्व शाप के समान सिद्ध होगा। इस अवस्था में मृत्यु उसके लिए आशीर्वाद रूप होती है। मनुष्य समस्त दिन के कार्यों से जब थक जाता है और विरक्त होने लगता है तो रात्रि में उसे निद्रा की आवश्यकता होती है जिससे दूसरे दिन वह पुनः ताजा और कार्यक्षम हो जाता है। इसी प्रकार इस जीवन से थका हुआ मनुष्य मृत्यु रूपी निद्रा थकावट को दूर करके शाँति का अनुभव करता है और नये जन्म के लिए तैयारी करता है। बहुत से धर्मों ने पुनर्जन्म के सिद्धाँत को सत्य माना है। उसके अनुसार यह मानना पड़ता है कि मृत्यु के बाद भी शाश्वत जीवन है। यद्यपि इस बात को हम पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं कर सकते, पर जब हम उत्पत्ति के क्रम पर विचार करते हैं तो यही जान पड़ता है कि गुठली से आम का पेड़ पैदा होता है, उसमें फल लगते हैं, फल में बीज रहता है और बीज में फिर विशाल आम के पेड़ का सूक्ष्म रूप मौजूद होता है। इस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टि से इस जीवन के परिपक्व होकर समाप्त होने पर दूसरे जीवन की संभावना होना सर्वथा तर्क विरुद्ध नहीं कहा जा सकता।

इस प्रकार अगर मृत्यु के पीछे शाश्वत जीवन हो तो फिर ‘मृत्यु’ किसको समझा जाय? भगवद् गीता में इसका उत्तर दिया गया है कि ‘आत्मा अमर है, देह नाशवान है, इसलिए मृत्यु देह की होती है आत्मा की नहीं। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा भी एक जीर्ण शरीर को त्याग दूसरे नवीन शरीर में प्रवेश करता है।’ महात्मा सुकरात को जब जहर का प्याला पिला दिया गया तो उसके शिष्यों ने पूछा कि उसके शव की अंतिम व्यवस्था किस प्रकार की जाय? इस पर उसने उत्तर दिया कि ‘मेरे शव को चाहे पृथ्वी में गाड़ दो और चाहे अग्नि में जला दो मुझे किसी बात में एतराज नहीं है। मेरी आत्मा तो अमर है, इसलिए मैं कभी नहीं मर सकता।

इस प्रकार जिस मृत्यु से मनुष्य को परम शाँति मिलती है और नई यात्रा के लिए ताजगी और प्रफुल्लता प्राप्त होती है भयानक कैसे कहा जा सकता है? जो प्राकृतिक स्थिति सबके लिए निश्चित है, उसे सहर्ष क्यों न अंगीकार किया जाय? इस स्थिति को प्राप्त होते समय हमारी अंतिम भावना यह होनी चाहिए-

तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥


“आध्यात्मिक मानव” की आवश्यकता

(श्री सत्यभक्त)

पश्चिमी देशों में कुछ समय से एक नये आँदोलन का जन्म हुआ है जिसे संक्षेप में एमआरए (मौरल री. आरमामेंट) के नाम से पुकारा जाता है। विज्ञान और यंत्र-विद्या में ऊँचे दर्जे की सफलता पाकर भी जब योरोप और अमरीका के लोगों को शाँति नहीं मिल सकी, इतना ही नहीं वे एक दूसरे के खून के प्यासे बनकर दुनिया में आग लगाने को तैयार होते गये तब कुछ विचारकों को इस पागलपन का इलाज करने की चिंता हुई। जब उन्होंने इस ‘बीमारी’ के कारणों पर विचार किया तो उनको यही जान पड़ा कि हमारे देशवासी एक मात्र भौतिक सुख और सम्पत्ति को ही महत्व दे रहे हैं और त्याग तथा परोपकार की भावना उनमें से अधिकाँश में निकल गई है। उनका आदर्श अधिक से अधिक रुपया कमाना और फिर उसके द्वारा साँसारिक वैभव और ऐश्वर्य का उपभोग करना रह गया है। एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच में जो आत्मा की समानता और एकता का संबंध है उसको उन्होंने बिल्कुल भुला दिया है और एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को अपना ‘भक्ष्य’ अथवा ‘शिकार’ समझ रहा है। इसका नतीजा स्वभावतः यह दिखलाई पड़ रहा है कि संसार में ईश्वरीय अथवा धार्मिक नियम के बजाय ‘जंगल का कानून’ प्रचलित हो गया है और जिस मनुष्य के हाथ में शक्ति आ जाती है वही दूसरों को नष्ट करना या मार कर खाना अपना अधिकार समझता है। ऐसी दशा में वैज्ञानिक उन्नति अगर सर्वनाश का साधन बन जाय तो क्या आश्चर्य है।

इस दुरावस्था को देखकर कितने ही सहृदय व्यक्तियों ने संसार भर के मनुष्यों, विशेष कर योरोप, अमरीका के भौतिक साधन सम्पन्न लोगों को नैतिकता का उपदेश देना आरंभ किया। उन्होंने समझाया कि आज कल लोगों के स्वभाव में ऐसी खराबी आ गई है कि वे मुँह से तो मीठी-मीठी बातें करते रहते हैं और पीछे से छुरा भोंक देते हैं। सार्वजनिक और राजनैतिक जीवन में भी डिक्टेटरशिप, हत्याकाँड, नजरबंदी के कैम्प, सर्वस्व अपहरण और युद्ध जैसे उपायों का ही आश्रय लिया जा रहा है। आजकल के मनुष्य ने दूसरे लोगों में पाई जाने वाली ‘बुराई’ को ठीक करने के ये रास्ते समझ रखे हैं, पर अभी तक इनके द्वारा बीमारी घटने के बजाय बढ़ती ही जाती है। सभी राज्यक्राँति के कार्यक्रम में इस समस्या को हल करने का उपाय यह बतलाया गया था कि ‘मनुष्य को नवीन साँचे में ढाला जाय।’ पर खेद से कहना पड़ता है कि इतने वर्ष बीत जाने पर भी कम्युनिज्म मनुष्य को नये साँचे में ढालने में समर्थ नहीं हुआ है। इसलिए अब रूस के साथ सहानुभूति रखने वाले लोगों में भी यह धारणा उत्पन्न होती जाती है कि इस समस्या का हल किसी अन्य उपाय से ही हो सकना संभव है। हम सब लोग न तो पूँजीपति ही हैं और न सब कम्युनिस्ट ही कहे जा सकते हैं। पर एक बात में हम सब अवश्य मिलते हैं हम में से सभी अपनी कठिनाइयों का कारण दूसरों को समझते हैं और चाहते हैं कि उनमें ऐसा परिवर्तन हो जाय कि हमको कठिनाई सहन न करनी पड़े। इस सच्चे तथ्य को हम चाहे विश्वशाँति, समानता, मानव अधिकार, देशभक्ति, राष्ट्रीयता, साम्राज्यवाद, स्वाधीनता, न्याय आदि किसी शब्द का बहाना लेकर प्रकट करें पर वास्तव में हमारा उद्देश्य निजी स्वार्थ की पूर्ति होता है।

जब तक कोई दूसरा दल हमारी अभिलाषाओं के पूर्ण होने में रोड़ा नहीं अटकाता तब तक हम संतुष्ट रहते हैं, चाहे उसकी प्रकृति और चरित्र जैसे का तैसा क्यों न बना रहे। पर जब हमारी अभिलाषाओं को खतरा जान पड़ता है, तो हम परिवर्तन करने के लिए किसी भी उपाय-हिंसा का भी प्रयोग करने को तैयार हो जाते हैं। पर इस प्रकार के उपाय से किसी मनुष्य के कार्य ही बदले जा सकते हैं, उसका स्वभाव और मूल चरित्र प्रायः ज्यों का त्यों बना रहता है। यही कारण है कि पिछले दिनों में बहुत बड़े-बड़े उपायों के करने पर भी केवल विभिन्न राष्ट्रों के ‘शक्ति-संतुलन’ में अंतर पड़ गया है, पर युग की प्रवृत्ति ही दुनिया को सर्वनाश की तरफ ले जा रही है।

इस समय ‘एटम युग’ ने सबसे अधिक महत्व प्रकृति की सबसे छोटी वस्तु ‘परमाणु’ को दिया है। इसके विपरीत ‘आदर्शवाद के युग’ में सबसे अधिक महत्व समाज के सबसे छोटे अंश मनुष्य को दिया जाता है। जिस प्रकार एटम का सबसे अधिक ज्ञान रखने वाला और उसकी कारीगरी से परिचित राष्ट्र ही सैनिक तैयारियों की प्रतियोगिता में सबसे आगे निकलेगा, उसी प्रकार जो जाति मनुष्य की प्रकृति को बदलने का रहस्य और विधि जानती होगी वही आदर्शवाद के आधार पर जगत के पुनर्निर्माण के कार्य में पहला नंबर प्राप्त करेगी।

अब हम यह भी बतला देना चाहते हैं कि चाहे एटम और हाइड्रोजन बम बनाने वाले कैसा भी दावा क्यों न करें, आदर्श अथवा विचारों की शक्ति उससे बड़ी है। क्योंकि विचार ही मनुष्य के दिमाग पर नियंत्रण रखते हैं और दिमाग हाथों पर नियंत्रण रखता है जिनके द्वारा एटमबम तैयार किया जाता है और वही यह निश्चय करता है कि एटमबम को कहाँ और किस प्रकार चलाया जाय। वर्तमान-युग को समझने के लिए सबसे अधिक ध्यान इसी बात पर दिया जाना चाहिए। किसी राष्ट्र की शक्ति का निर्णय केवल उसके आर्थिक साधनों, पैदावार और जनसंख्या के आधार पर नहीं करना चाहिए। इन सबसे बढ़कर विचारों की शक्ति होती है जो मनुष्य के दिमाग तक को भेदकर भीतर घुस जाती है और उसमें एकता के भाव को उत्पन्न कर देती है।

कोई भी विचार जब तक केवल एक वर्ग या जाति में सीमित रहता है तब तक वह विशेष महत्व का नहीं समझा जा सकता। उस दशा में तो उसके कारण प्रायः दूसरे वर्ग या समुदाय वालों से विरोध ही उत्पन्न होता है। पर जिस विचार में सब देशों और सब जातियों के मनुष्यों में फैल सकने की शक्ति होती है वही मानव-जाति को एक सूत्र में संगठन करके संसार का नव निर्माण कर सकता है।

इन्हीं बातों पर विचार करके संसार में सच्ची शाँति की स्थापना का प्रयत्न करने वालों ने सबसे अधिक जोर एक ‘नये स्वभाव का मनुष्य’ उत्पन्न करने पर दिया है और वे निरन्तर ऐसे मनुष्यों की संख्या बढ़ाने में ही संलग्न रहते हैं। सच पूछा जाए तो आज कल हम सच्चा राजनीतिक अथवा राष्ट्र नेता उसी को कह सकते हैं जो मनुष्य के पुनःनिर्माण की कला का ज्ञाता हो। यह एक ऐसा आवश्यक कार्य है कि जिसकी पूर्ति में बड़े और छोटे सब मनुष्यों को ध्यान देना चाहिए। इसके लिए किसी बहुत बड़ी योग्यता, विद्या अथवा चतुराई की आवश्यकता नहीं। इसके लिए अगर किसी बात की आवश्यकता है तो वह है हार्दिक सच्चाई की। अगर मनुष्य इस बात को निश्चित रूप से समझ ले और मान ले कि मनुष्य मात्र एक ही स्त्रोत से आते हैं, अंत में एक ही स्थान को जाते हैं और जब तक वे पृथ्वी पर रहते हैं, सुख प्राप्ति की आवश्यकता भी सभी को अवश्य रहती है, तो फिर झगड़े की कोई बात ही नहीं रह जाती। तब प्रत्येक मनुष्य का यही कर्तव्य हो जाता है कि वह ऐसा कोई काम न करे जिससे दूसरे लोगों की सुख प्राप्ति में बाधा पड़े। अगर वह ऐसा करेगा तो निश्चय है कि उसकी सुख प्राप्ति में बाधा नहीं पड़ सकती। यह कोई असम्भव बात या कोरी कल्पना नहीं है। एक समय था जब कि एक मनुष्य दूसरे को मार कर खा जाने में भी कोई बुरी बात नहीं समझता था, एक दूसरे के प्रति उनमें न कोई सहानुभूति थी और न कठिन परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए किसी प्रकार का संगठन था। ऐसे मनुष्यों का नमूना अब भी अफ्रीका और कुछ टापुओं में देखा जा सकता है। आरंभ में सर्वत्र यही अवस्था थी और मनुष्य अपने को छोड़कर किसी के प्राणों की परवाह नहीं करता था। पर आज ऐसे लोगों का सर्वथा अभाव नहीं है जो सर्वसाधारण के हित के लिए अपने प्राणों को निस्वार्थ भाव से उत्सर्ग कर देते हैं। अपने परिवार की रक्षा के लिए कष्ट सहने वाले या जान दे देने वाले तो हजारों, लाखों की तादाद में मिल सकते हैं। दूसरों के साथ कुछ उपकार कर देने वालों की संख्या तो अब भी बहुत अधिक है। जब कुछ हजार या लाख वर्ष में मनुष्य में इतना परिवर्तन हो सकता है, वह लगभग पशु की दशा से तरह-तरह की विधाओं, कलाओं, ज्ञान, विज्ञान, योग, आध्यात्म का ज्ञाता बन सकता है, तो आगामी वर्षों में अपनी विपत्ति के मूल कारण को समझकर अगर व्यक्तिगत स्वार्थ को त्याग दे तो यह कोई असंभव बात नहीं है। अगर संसार की आर्थिक व्यवस्था में क्राँतिकारी परिवर्तन कर दिये जाएं तो इसमें से आधा काम तो दस पाँच साल के भीतर ही पूरा हो सकता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि इस उद्देश्य की पूर्ति तभी हो सकेगी जब कि मनुष्य की प्रकृति ही बदल दी जाय। अब तक मनुष्य को नैतिक और चारित्रिक शिक्षा देने का भार घर, स्कूल और धर्म गुरुओं के ऊपर समझा जाता था। पर घरों में तो इस बात का ज्ञान बहुत कम पाया जाता है कि जीवन की आवश्यक शिक्षा किस प्रकार दी जाय। स्कूलों ने अपना कर्तव्य केवल पढ़ने लिखने तथा किसी तरह की कारीगरी की शिक्षा देना ही समझ लिया है। धर्म-गुरुओं का प्रभाव बहुत घट गया है और बहुत थोड़े लोग इस मनोभाव को लेकर मंदिरों तथा तीर्थों में जाते हैं। इसलिए आज मनुष्य को चरित्र और अध्यात्म की शिक्षा देने के लिए किसी और ही विधि की आवश्यकता है। अगर हम इस प्रयत्न में सफल नहीं हुए तो वर्तमान शताब्दी मानव जाति के सर्वनाश की शताब्दी सिद्ध होगी और इसका कारण यही बतलाया जायगा हम मनुष्यों की प्रकृति के बदलने में असमर्थ सिद्ध हुये।


Quotation

कार्य को वचन के अनुसार बनाओ और वचन को कार्य के अनुसार। दोनों में फर्क न रहे।

-शेक्सपियर


पावन कर्म-यज्ञ-दान-तप

(श्री गिरीश देव वर्मा.बहराइच)

अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछा कि हे मधुसूदन! आप संन्यास व त्याग की बात करते हैं तथा अनासक्त होकर सात्विक कर्मों के करने की भी बात करते हैं, किन्तु कर्म तो सभी दोष युक्त है। खेती ही को लें तो यह एक सात्विक क्रिया है लेकिन हल जोतने आदि में कितने ही जन्तु मरते हैं। तालाब, मंदिर आदि बनवाना पुण्य कर्म है परंतु इसमें कितने प्राणियों की हिंसा हो जाती है। सबेरे दरवाजा खोलते ही सूर्य का प्रकाश घर में प्रवेश करता है, उससे असंख्य जन्तु नष्ट हो जाते हैं। हम गेहूँ, चावल, तरकारी, फल, दूध आदि नित्य सेवन करते हैं, किन्तु यह सभी पदार्थ जीवधारी हैं। इनको उपयोग लाना तो मारण क्रिया ही हो जाती है। इसी तरह जब सभी कर्म दोषयुक्त हैं, तो क्या करें।

भगवान ने कहा कि अर्जुन! कुछ लोग ऐसा ही कहते हैं कि सभी कर्म दोष युक्त हैं अतः त्याज्य हैं। किन्तु मेरा यह निश्चित मत है कि तीन कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं। वे मनुष्य के परम कर्तव्य हैं। नित्य की क्रियाओं में जो पाप मनुष्य से हो जाता है, उसको यह तीन कर्म नाश करके, उसको पवित्र बना देते हैं। वे कर्म हैं यज्ञ-दान-तप।

यज्ञ दान तपः न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥

गीता 185

अर्थ-यज्ञ दान तप कर्म त्यागने योग्य नहीं है, वे कर्तव्य हैं। यज्ञ दान व तप मनुष्यों को पवित्र करने वाले हैं।

एतान्यपि तु कर्माणि सगं त्यवत्वा फलानि च। कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥

गीता 18-6

अर्थ-हे पार्थ! यह सब कर्म आसक्ति व फल को त्याग कर करने चाहिएं। ऐसा मेरा निश्चित व उत्तम मत है। हे परंतप! मनुष्य तीन प्रकार के शरीरों से घिरा है। सबसे छोटा तो यह हाड़ माँस का बना शरीर है। दूसरा शरीर समाज का है जिसमें माता, पिता, मित्र, पड़ौसी आदि आते हैं। तीसरा शरीर प्रकृति का है, अर्थात् हर प्राणी, हवा, पानी, आकाश आदि देवताओं से घिरा हुआ है। संसार का कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जो इन तीन शरीरों से घिरा न हो। इन तीन शरीरों का उपयोग हर मनुष्य करता रहता है और इस्तेमाल से उसमें विकार उत्पन्न करता है। उसी क्षति को पूर्ण करने के लिए हमने यह तीन कर्म बनाये हैं, ताकि मनुष्य यज्ञ, दान, तप करके पाप से मुक्त हो जावे। मनुष्य इन तीन शरीरों का व्यवहार करके इतना कर्जदार हो जाता है कि बगैर यज्ञ, दान, तप किये, इन ऋणों से छुटकारा नहीं पाता।

भगवान की यह वाणी कितनी कल्याणकारी है। मनुष्य मात्र के ऊपर यह उनकी महान् कृपा है! कबीरदास ने इन्हीं शरीरों को चादर कहा है। यह मनुष्य इन्हीं चादरों को ओढ़ ओढ़कर मैली कर देता है, और गंदी चादर छोड़कर चला जाता है। वह ऐसा कर्म नहीं करता है कि चादर मैली न हो। कबीरदास जी कहते हैं कि

सो चादर सुर नर मुनि ओढ़े,

ओढ़ ओढ़ मैली कर दीनी-

चदरिया झीनी झीनी बीनी।

दास कबीर जतन से ओढ़े,

जैसी कि घर दीनी-

चदरिया झीनी झीनी बीनी।

(1) प्रकृति को लीजिए। हम शुद्ध वायु श्वास लेते हैं किन्तु प्रश्वास द्वारा गंदी वायु निकालते हैं। प्रकृति हमको ऑक्सीजन देती है मगर हम उसका कार्बन बनाकर निकालते हैं। हमको क्या अधिकार है कि हम शुद्ध वायु को गंदा करें और यदि करते हैं तो उसके लिए प्रायश्चित रूप में क्या करते हैं। वरुण देवता हमको शुद्ध जल देता है मगर हम पेशाब व पसीना बनाकर विसर्जन करते हैं। प्रकृति हमको शुद्ध भोजन देती है मगर हम विष्ठा बना कर निकालते हैं। हम बड़े-बड़े इंजिन, कल कारखाने खड़े करके प्रकृति को अशुद्ध करते हैं। हम एटम बम बनाकर सारी सृष्टि को दूषित करते हैं। हमें क्या अधिकार है कि हम गंदगी फैलावें। यदि यह पाप कर्म करने ही हैं तो उसको शुद्ध करने का हम क्या उपाय करते हैं। प्रकृति को दूषित करके हम जो कर्जदार हो जाते हैं उसकी अदायगी का हम क्या जतन करते हैं।

भगवान ने बताया कि प्रकृति के प्रति होने वाले पाप कर्म से छूटने के लिए हर मनुष्य को यज्ञ करना चाहिए। प्रकृति रूपी शरीर को जो हानि होती है उसे पूरा करना ही यज्ञ है। हम अपने घरों में नित्य यज्ञ करें। बाहर मोहल्लों में साप्ताहिक बड़े यज्ञ करें, तथा बड़ी-बड़ी मशीनों, इंजनों व बमों से जो अशुद्धता फैल रही है उसकी शुद्धि के लिए बड़े शत कुण्डी व सहस्र कुण्डी यज्ञ करें। यज्ञ से वायु शुद्ध होती है, वर्षा ठीक से होती है, अनाज काफी पैदा होता है। रोग नहीं आते हैं। यज्ञ से प्रकृति के छीजन की पूर्ति होती है और हम उसके ऋण से मुक्त हो जाते हैं। इसलिए यज्ञ हमारा परम कर्त्तव्य है। यह एक पावन कर्म है।

यज्ञ शिष्टाशिः न सन्तो मुच्यन्ते सर्व किल्विषैः। सुखने ते व्यधं पापा ये पचन्त्यात्म कारणात्॥

-गीता 3-13

अर्थ- यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले पुरुष सब पाप से छूट जाते हैं। जो पापी लोग अपने लिये ही पकाते हैं, वे तो पाप ही को खाते हैं।

अन्नाद्भवति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ कर्म समुद्भवः॥

गीता 3-14

अर्थ- सब प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होता है। वर्षा यज्ञ से होती है। यज्ञ कर्म से होता है।

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षर समुद्भवम। तस्मार्त्सव गतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥

गीता 3-13

अर्थ-कर्म को ब्रह्म से उत्पन्न हुआ जान। ब्रह्म अक्षर (अविनाशी परमात्मा) से उत्पन्न हुआ है। इससे सर्वव्यापी ब्रह्म नित्य यज्ञ में प्रतिष्ठित है।

(2) दूसरा शरीर हमारा समाज है जिसमें माँ, बाप, गुरु, मित्र, परिवार, परिजन, संस्था, समाज आदि आते हैं। यह सभी हमारे लिये मेहनत करते हैं। जब हम इस संसार में आये तो दुर्बल व असहाय स्थिति में थे। इसी समाज ने हमको बड़ा किया, बल दिया, बुद्धि दी तथा ज्ञान मार्ग दिखाया। इसी समाज में पल कर हम वास्तविक रूप में मनुष्य हुए हैं। हम समाज के कर्जदार हो चुके हैं। इसी ऋण को चुकाने के लिए दान की व्यवस्था है। मनुष्य, समाज को आगे बढ़ाने में जो सहायता करता है वही दान है। समाज के इस ऋण को चुकाने के लिए हमें तन, मन, धन से दान करना चाहिए। बगैर मन, वचन कर्म से दान किये, हम पवित्र नहीं हो सकते और न पाप से छुट्टी पा सकते हैं। अतः दान भी हमारा परम कर्तव्य है। यह मनुष्यों को पावन बनाने वाला है। कलियुग में तो दान की सर्वश्रेष्ठ महत्ता है।

प्रगट चारि पद धर्म के काले महुँ एक प्रधान। जेन केन विधि दीन्हे दान करदू कल्यान॥

दान तभी सार्थक होता है जब वह सत्कार्य के लिए सत्पात्र को दिया जाए। दान भी नित्य कर्म है। इसलिए गायत्री संस्था ने इस धर्मघट के रूप में एक आवश्यक दैनिक धर्म कर्तव्य नियत किया है। इस कुबुद्धि के साम्राज्य में सद्विचारों का प्रकाश करने से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ सत्कर्म नहीं हो सकता।

(3) तीसरा आचरण यह शरीर है। यह प्रतिदिन छीजता जाता है। हम अपने मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि से काम लेते हैं इनको छिजाते हैं। इस शरीर से हम अनेकों अनावश्यक कार्य लेते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि करके इसमें विकार उत्पन्न करते हैं। समय का पालन न करके हम इस शरीर को जर्जर बनाते जाते हैं। हम निद्रा, भोजन, विश्राम से इसकी थकावट मिटाने का प्रयत्न करते हैं मगर जो छीजन इसमें होती जाती है उसकी पूर्ति केवल तप से हो सकती है। जो शरीर व इन्द्रियों में अशुद्धि आ जाती है, उसका निवारण केवल तप से संभव है। शास्त्र कहता है कि :-

कायेन्द्रिय सिद्धिर शुद्धि क्षयात्तपसः।

योगसूत्र 2-43

अर्थात्- तप से अशुद्धि के क्षय होने पर शरीर व इन्द्रियों की शुद्धि होती है। तप व ब्रह्मचर्य से मनुष्य मृत्यु पर भी विजय पा सकता है।

तप बल रचह प्रपंचु विधाता। तप बल विष्णु सकल जगत्राता॥ तप बल संभु करहिं संघारा। तप बल शेष धरइ महिभारा॥ तप आधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाई तपु अस जिय जानी॥

तप हर मनुष्य का परम पुनीत कर्तव्य है। तप से शरीर शुद्ध, निरोग, सबल बना रहता है तथा शरीर के प्रति किये पापों से हमें मुक्ति मिलती है। तप अनेकों प्रकार के हैं। गीता में इसका विशद वर्णन है।

इस तरह हम देखते हैं कि इस संसार में प्रकृति, समाज तथा शरीर से हम घिरे हुए हैं। इन तीनों का कार्य अच्छी तरह चल सके उसके लिए यज्ञ, दान, तप का विधान बताया गया है। यह कर्म कर्तव्य हो जाते हैं। यह स्वभावतः ही हमें मिल गये हैं। यह कृत्रिम भी नहीं है। इनकी हानि यज्ञ, दान, तप से पूरी करता है। जो मनुष्य यज्ञ, दान, तप न करके इन तीनों शरीरों की छीजन को पूरी नहीं करता है वह मरने पर क्या जवाब देगा। जो संसार में गंदगी फैलाता है और उसकी सफाई नहीं करता, वह घोर नरक में आता है और नाना प्रकार के क्लेशों को सहता है। यज्ञ, दान, तप, पुण्यकर्म हैं। इन्हीं के द्वारा हम भगवान के निकट पहुँचते हैं। महर्षि बाल्मीकि भगवान राम से कहते हैं कि-

मन्त्रराज नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहिं सहित परिवारा॥ तरपन होम करहिं विधि नाना। प्रिय जवाँइ देहिं बहु दाना॥ तुम्ह से अधिक गुरुहिं जिय जानी। सकल भाँग सेवहिं सनमानी॥

आज संसार में इन तीनों शरीरों के छीजन की मात्रा बहुत बढ़ गई है। नये नये वैज्ञानिक आविष्कारों ने प्रकृति को दूषित कर दिया है। नित कल कारखानों से बढ़ने वाले धुओं ने वायु मंडल को विषाक्त कर दिया है। एटम बम के परीक्षणों से जो प्रकृति दूषित हो रही है उसका आभास सभी को मिल रहा है। इस तरह आज संसार में अनीति, अन्याय, पाप, अत्याचार, स्वार्थ, धोखेबाजी, झूठ, छल कपट का बाजार गरम है। हमारा समाज इन बुराइयों से खोखला हो गया है। नैतिकता का अभाव हो गया है। समाज व संस्थाओं की दशा आर्थिक संकट के कारण शोचनीय हो रही है। हर जगह स्वार्थपरता बढ़ती जा रही है। अब रहा शरीर, इस पश्चिमी सभ्यता व शिक्षा ने हमारे रहन सहन को ऐसा कृत्रिम बना दिया है कि हम बिल्कुल लिफाफा बन रहे हैं। आज कोई मनुष्य अपने को पूर्ण स्वस्थ व पूर्ण निरोगी नहीं कह सकता है। हमारे खाने की वस्तुएं दूषित हो गई हैं। हमारे पीने का जल भी दूषित हो गया है। हमारा रहन, सहन सोना जागना सब दूषित हो गया है। शरीर में रोग सदैव घर बनाये हुए हैं। हम दवाओं के भरोसे जी रहे हैं। हम पूर्ण आयु न प्राप्त करके अकाल मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं।

ऐसे समय में जबकि तीनों शरीरों का वृहद रूप में विनाश हो रहा है, तब यज्ञ, दान तप की विशेष आवश्यकता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमारी गायत्री संस्था कार्य कर रही है।


कर्म-फल की अमिट छाप

(श्री हेमचन्द साहित्य मनीषी)

हमारे देश में पढ़े-लिखे और ज्ञानियों की ही नहीं वरन् अशिक्षित ग्रामीण जनता तक की यह धारणा है कि संसार का प्रत्येक कार्य और घटना कर्म-फल के अधीन है। हमने जैसा किया है वैसा ही हम पा रहे हैं और जैसा अब कर रहे हैं उसका वैसा ही फल आगे चलकर पायेंगे, यह विचार यहाँ की जनता में दृढ़ रूप से समाया हुआ है। पर खेद है कि लोग उसके वास्तविक रहस्य से अनजान हैं, इसलिए उसका उल्टा सीधा अर्थ लगाकर लाभ के स्थान में हानि उठा लेते हैं। जैसा कि प्रायः देखा गया है कि अनेक लोग तो कर्म का अर्थ भाग्य लगाकर एक प्रकार से निकम्मे अथवा काहिल बन जाते हैं। इसलिए आवश्यकता है कि लोगों को कर्म-सिद्धाँत की वास्तविकता स्वरूप और उसका अर्थ समझाया जाय। इस संबंध में आधुनिक थियोसॉफी समाज की अधिष्ठात्री मिसेज एनी बीसेंट ने अपने ग्रन्थों में अनेक रहस्यों को प्रकट किया है जिनके आधार पर कर्मों के स्वरूप का कुछ परिचय यहाँ दिया जाता है।

कर्म की व्यवस्था समझने के लिए सबसे पहले विश्व के तीन मण्डलों और उनके संबंधी मनुष्यों के तत्वों का स्पष्ट ज्ञान होना आवश्यक है। ये तीन मंडल हैं-सुषुप्ति मण्डल, स्वर्ग-मंडल और भूमंडल। भूमंडल के दो विभाग सूक्ष्म (गगन मंडल) और स्थूल (पृथ्वी) हैं। प्रथम सुषुप्ति मंडल में बुद्धि तत्व और महाकारण देह रहती है। दूसरे स्वर्ग में मनस तत्व और कारण देह तथा मानसिक अथवा संबंधी देह रहती है। (3) गगन मंडल में काम तत्व और सूक्ष्म देह है। (4) भूमंडल में लिंग तथा स्थूल तत्व और स्थूल देह रहती है।

विश्व के स्थूल मंडल अर्थात् इस जगह में कार्य करने के लिए जीवन को स्थूल देह की सहायता लेनी पड़ती है, इसलिए जीव की चेतना का प्रकाश मस्तिष्क की शक्तियों से सीमाबद्ध किया जाता है। गगन-मंडल की प्रकृति कई दरजे की सूक्ष्मता वाली होती है, इसलिए इस मंडल के कार्य के लिए जीव कई प्रकार की सूक्ष्म उपाधियों से काम लेता है। इन सब उपाधियों को ही सूक्ष्म शरीर के नाम से पुकारते हैं। स्वर्ग अर्थात् देवयान मंडल भी दो भागों में विभक्त है, जिनमें से एक को रूप भवन और दूसरे को अरूपभवन कहते हैं। रूप भवन में जीव मायावी शरीर के आश्रय से काम करता है, इस मायावी रूप को मानसिक प्रकृति से बनने के कारण मानसिक देह भी कहते हैं। अरूप भवन में कारण शरीर काम देता है। चतुर्थ मंडल मनुष्य की पहुँच से बहुत ऊँची है इसलिए उसका विशेष विवरण देना यहाँ पर अनावश्यक प्रतीत होता है।

यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि इन मंडलों की प्रकृति में परस्पर बड़ा अंतर होता है। प्रत्येक मंडल की प्रकृति अपने ऊपर के मंडल से अति घन और स्थूल होती है। सृष्टि क्रम में भी इसी प्रकार प्रकृति सूक्ष्म से स्थूल और अघन से घन होती जाती है। इसके अतिरिक्त इन मंडलों में देवों (तत्वों) के बहुत से गण भी बसते हैं। देव गणों की बहुत सी श्रेणियाँ होती हैं। सबसे उच्च श्रेणी के महामति वाले देवगण सुषुप्ति मंडल में रहते हैं, और नीची श्रेणी के मन्दमति वाले देवगण स्थूल मंडल में निवास करते हैं। प्रत्येक मंडल में कोई भी ऐसा अणु नहीं है जिसमें प्रकृति और पुरुष का संयोग न हो। अणु के शरीर को प्रकृति कहते हैं और उसके प्राण को पुरुष के नाम से पुकारा जाता है। कणों के पृथक-पृथक संघात अनेक प्रकार के रूप रूपांतर और मूर्तियों को धारण कर अपनी-अपनी जाति के देवगणों से प्रविष्ट अथवा संयुक्त होते हैं।

गगन मंडल के देवगण मनुष्य का सूक्ष्म शरीर निर्माण करते हैं, और उसकी सूक्ष्म इंद्रियों को सचेत करते हैं, जिनके द्वारा मनुष्य इन्द्रिय ज्ञान प्राप्त करता है। जहाँ कहीं थरथराहट (वाइब्रेशन) अथवा स्पर्श होता है, वहाँ कोई न कोई देवता अपने आपको उससे सम्बन्धित कर लेता है। मनुष्य का मन अपने भवन अर्थात् गगन मंडल की सूक्ष्मतर प्रकृति में कार्य करके नाना प्रकार के आकार उत्पन्न करता है, इन आकारों को संकल्प-रूप कहते हैं। मन की जिस शक्ति से ये रूप उत्पन्न होते हैं, उसे कल्पना शक्ति कहते हैं। बात चीत के समय संकल्प-रूपों को दूसरों के समक्ष प्रकट करने के लिए शब्द तो एक तुच्छ और अधूरा साधन है। शब्दों में इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि वह एक मनुष्य के मन के आशय को दूसरे के मन में यथार्थ रूप से पहुँचा सकें। यही कारण है कि प्रायः वार्तालाप में एक आशय को प्रकट करने के लिए बार-बार लंबे लंबे वाक्य कहने पड़ते हैं। पर ये संकल्प रूप जिन देवताओं से संबंधित होते हैं उनका एक-एक विशेष रंग होता है, जिसे देखने से मनुष्य के मन का आशय शब्दों की अपेक्षा कहीं अधिक ठीक और शीघ्र समझा जा सकता है। यह रंगों की भाषा एक बड़ा गुप्त रहस्य है, जिसे जानकर मनुष्य सहज ही में देवताओं से वार्तालाप कर सकता है। ये रंग प्रत्येक मनुष्य के मुख मंडल के पास उसी प्रकार दिखलाई पड़ते हैं जैसे हम इन मूर्तियों के चारों तरफ एक प्रभामंडल देखा करते हैं। पर ये रंग उन्हीं महापुरुषों को दिखलाई पड़ते हैं जिनकी दिव्य-दृष्टि खुल जाती है और इनके ही द्वारा वे किसी व्यक्ति के आन्तरिक विचारों और कर्मों का पता लगा लेते हैं।

मनुष्य अपने संकल्प रूपों को उत्पन्न करके उन्हें केवल दूसरे मनुष्यों की ओर भेजता ही नहीं वरन् अपने से मिलते जुलते अन्य संकल्प के रूपों को जो गगन-मंडल में उपस्थित रहते हैं और वैसे ही विचार वाले अन्य व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न किये गये थे, चुम्बक की तरह अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। यदि उसके संकल्प उत्तम और शुद्ध होंगे तो वे वैसी ही कल्याणकारी शक्तियों को स्वाभाविक रूप से अपनी ओर आकर्षित करेंगे। इनके फल से वह आदमी उस समय ऐसे श्रेष्ठ या महान कार्य कर जावेगा जो बाद में स्वयं उसे आश्चर्यजनक जान पड़ेंगे। इसी प्रकार यदि मनुष्य में संकल्प निकृष्ट और अशुद्ध हैं, तो अपकारी शक्तियों के समूह को आकर्षित कर इनके बल द्वारा अपने बित्त से बढ़कर ऐसा अपराध कर डालेगा जिसके लिए उसे बाद में महा पश्चाताप होगा और वह कहेगा ‘आरण्य है कि ऐसा बड़ा काम कर्म करने का साहस मुझ में कहाँ से आ गया! उस समय अवश्य ही मेरे सिर पर कोई भूत चढ़ गया होगा जिसने ऐसी करतूत मुझ से करा दी।’ निःसंदेह गगन-मंडल की अपकारी शक्तियों ने उसके म्लेच्छाभाव होने के कारण उसकी ओर खिंच कर वह क्रूरतापूर्ण शक्ति प्रदान की थी। संकल्परूपी देवता चाहे भले हों या बुरे, मनुष्य की वासनायुक्त सूझ देह के देवताओं और उसके निज संकल्पों के साथ संबंध उत्पन्न कर लेते हैं। पर यह संबंध सजातीय अर्थात् अपने से मिलते-जुलते व्यक्तियों पर ही होता है। विजातियों पर उनका कुछ वश नहीं चलता क्योंकि वे परस्पर प्रतिघातक होते हैं। इसलिए सत्पुरुष केवल अपने तेज के बल से ही मलीन अथवा अधर्म योनि के देवताओं को परे भगा देते हैं।

साँसारिक मनुष्य प्रायः इस संसार में व्यतीत हुए 50-60 वर्ष के जीवन को ही सत्व समझते हैं। पर वास्तव में यह जीवन कुछ भी महत्व का नहीं है, क्योंकि इस जीवन के बाद मनुष्य को इसी देह के सूक्ष्म और कारण शरीर द्वारा हजारों या लाखों वर्ष का जीवन अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए वेदान्तियों का यह कहना है कि इस संसार का जीवन तो इन्द्रजाल सदृश्य भ्रम है, असत्य नहीं कहा जा सकता। पारलौकिक जीवन की तुलना में यह जीवन वास्तव में नगण्य है। पर इसका महत्व इस दृष्टि से अवश्य बहुत अधिक है कि इस लघु जीवन में ही हमको स्वतंत्र कर्म करने का अधिकार मिलता है और इस समय हम जैसे कर्म करते हैं उन्हीं का फल हमको आगामी हजारों वर्षों तक भोगना पड़ता है।


न मद न दीनता

(डॉ. राम महेन्द्र, एम. ए. पी. एच. डी.)

प्रायः मनुष्य के जीवन में एक ऐसा स्थल आता है, जब उसे यह भ्रम होने लगता है कि उसे अन्यों की अपेक्षा बहुत ज्ञान है, उसकी योग्यताएं दूसरों से कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हैं, उसकी बुद्धि सर्वोत्कृष्ट है, वह दूसरों से आगे की बात सोच सकता है। और उसके मुकाबले में दूसरे कुछ नहीं जानते। वह अपने विषय में दम्भपूर्ण अत्युक्तिमय धारणा बना लेता है। अपने निर्णयों को दूसरों से कहीं उत्तम और फलदायक समझता है। यह भ्राँति का एक पहलू है। इस वृत्ति में फंसकर मनुष्य मिथ्या दंभ में डूबा रहता है। उसकी उन्नति रुक जाती है और वह कोई भी नवीन बात नहीं सीखना चाहता। प्रायः यह कह दिया करता है।

“इसमें नई बात क्या है। हम तो पहले से ही इस बात को जानते थे। हमें पहले ही ज्ञात था कि अमुक बात अमुक रीति से होने वाली है। यह क्या, अनेक व्यक्तियों, संख्याओं, घटनाओं के विषय में जानते हैं कि किस प्रकार घटनाक्रम चलने वाला है। हम सर्वज्ञ हैं। संसार किस करवट उठता है, किस करवट बैठता है, यह सब जानते हैं। हमसे क्या छिपा है? हमसे कौन बड़ा, हम सब जानते हैं। उड़ती चिड़िया के पंख गिन सकते हैं।”

यह दंभ की भावना खतरनाक मानसिक भ्रम है। यह एक ऐसा मोहक मद है, जिसमें फंसकर मनुष्य अपनी कीर्ति के नशे में भर जाता है। यह एक मृगमरीचिका है जो उसे अपनी शक्तियों के विषय में दम्भपूर्ण अत्युक्तिमय धारणा से भर देती है। ऐसी भावना में फंसकर मनुष्य की उन्नति रुक जाती है। वह कोई भी नई बात नहीं सीखना चाहता। पुराने तान, संचित अनुभव और शिक्षा पर ही संतोष करता रहता है।

ज्ञान की कोई सीमा नहीं। संसार में इतना बड़ा ज्ञान बिखरा हुआ है, ज्ञान के इतने रूप और विषय हैं, इतने वर्ग हैं कि उसकी कोई मर्यादा नहीं। जो व्यक्ति यह दंभ करता है कि उसे सब कुछ आ गया है और सीखने के लिए कुछ भी अवशेष नहीं रहा है। वह गलती करता है। इस खतरे से यदा बचते रहना चाहिए।

जो व्यक्ति अपने धन का मद करता है, वह भी मूर्खों के स्वर्ग में निवास कर रहा है। संसार में एक से एक धनी कुबेर पड़े हुए हैं। बड़े-बड़े पूँजीपति हैं, मिलों के मालिक हैं, व्यापारी हैं, राजा महाराजा हैं। अतः धन का मद त्याग देना चाहिए।

आपको अपनी शारीरिक शक्ति का घमंड है, पर क्या आपको मालूम है कि इसकी उपयोगिता सत्य, न्याय और मर्यादा की रक्षा में ही है। आप अपनी शक्ति से यदि अन्याय का विरोध करते हैं, तभी उत्तम है।

बुद्धि की, धन व शारीरिक बल की सीमाएं अनन्त हैं। संसार के व्यक्ति निरंतर इस बात का प्रयत्न कर रहे हैं कि इन क्षेत्रों में और आगे बढ़ा जाय, खोजें की जाएं, प्रत्येक क्षेत्र का विकास किया जाय। फिर आप किस बात से दंभ में भूले बैठे हैं। आपकी उन्नति के लिए अनेक क्षेत्रों में अभी बहुत सा कार्य करने को पड़ा हुआ है। अंधकारमय पक्षों पर आपको नया प्रकाश डालना है, भूले हुओं को मार्गदर्शन करना है, जो रुक गये हैं, उन्हें बढ़ाना है। स्वयं अपने अंदर से एक नहीं अनेक त्रुटियों को छाँट छाँट कर निकाल डालना है। प्रत्येक प्रकार का नवीनतम ज्ञान संग्रह करना है। अपने अनुभवों से निष्कर्ष निकालने हैं। दंभ का आनंद क्षणिक है। जब मनुष्य को ज्ञान का विस्तार और दूर दृष्टि प्राप्त होती है, तो उसका दंभ दूर हो जाता है और मिथ्याडम्बर का मायाजाल टूट जाता है।

अपने समय में अत्युक्तिपूर्ण धारणा से बचना पहला खतरा है। जिससे हमें सदा सावधान रहना चाहिए। जिसने महानता प्राप्त की है, उसने सदा विनयशीलता, गुण ग्राहकता और विनम्रता के गुणों को धारण किया है। अपने स्वार्थों को छोड़कर शिष्यत्व की भावना से लाभ उठाया है। महापुरुषों से परिचय प्राप्त कर उनके सत्संग से आगे बढ़े हैं। कहावत भी है ‘ज्यों पलास संग पान के पहुँच राजा हाथ’। महापुरुषों के साथ आगे बढ़ने में मनुष्य की उन्नति के नये क्षेत्र मिलते हैं।

इस संबंध में यह ध्यान रखिए कि झूठा प्रशंसा करने वालों के पंजों में न फंस जाएं। ये लोग हमारे मिथ्या दंभ को अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा करके फुला देते हैं। हमारी गलतियाँ हमसे छिप जाती हैं। अज्ञानियों की प्रशंसा के बजाय ज्ञानवानों की झिड़कियाँ लाभदायक हैं, क्योंकि उनकी झिड़की से मनुष्य को अपने दोष का ज्ञान हो जाता है, परंतु बुद्धिहीन दोषों को भी गुण बतलाकर मिथ्या दंभ का प्रोत्साहन देते रहते हैं जो अत्यन्त हानिकारक होता है।

तात्पर्य यह है कि अपने विषय में यदि अनुचित दंभ आ गया है, अति अतिशयोक्तिपूर्ण धारणा जम गई है, तो उसका त्याग कर दीजिए। अभी दुनिया में आपको बहुतों से बढ़ना है, बहुत कुछ ज्ञान, बुद्धि, बल विवेक अर्जित करना है, अनेक क्षेत्रों में विकसित होना है, अतः उन्नति का यह कार्य आज से ही प्रारंभ कर डालना चाहिए।

जिस प्रकार दम्भपूर्ण अत्युक्तिमय धारणा हानिकर है, उसी प्रकार इसकी दूसरी सीमा अर्थात् अपने आपको क्षुद्र या हीन मानना भी खतरनाक है। यह भ्रम का दूसरा पहलू है जिससे सदा बचना चाहिए। अपने आपको तुच्छ समझना एक प्रकार से अपने अंदर निवास करने वाली सत्चित् आनन्द स्वरूपा आत्मा का तिरस्कार करना है। ईश्वर की शक्ति का अनादर करना है। जिस व्यक्ति का संबंध ईश्वरीय शक्ति से हो, वह भला क्यों कर तुच्छ हो सकता है।

हीनत्व की भावना एक बड़ी मानसिक निर्बलता है, उसे मन से निकाल देना चाहिए।

आपके पास धन नहीं है, तो क्या हुआ है? संसार के अनेक बड़े व्यक्तियों के पास कुछ भी नहीं था। फिर भी वे महान् कहलाए। संसार ने उनकी पूजा की, समाज उनके इशारों पर चला। यदि धन की कमी ने आपको हीन बनाया है, तो उसे आज ही छोड़ दीजिए।

यदि आप सदा सुस्त और निराश दिखाई देते हैं, तो गलती कर रहे हैं, कारण इनसे आपकी उत्पादन शक्तियाँ पंगु हो जाती हैं, लाभ कुछ नहीं होता, आपके मालिक या अफसर आपसे परेशान रहते हैं। आपकी बुद्धि आपकी कार्यकुशलता आपकी महत्ता प्रकट नहीं हो पाती।

यदि आप स्वयं अपना तिरस्कार और अपमान ही करेंगे। यदि आप स्वयं को ठोकर मारेंगे, तो दूसरे को ठोकर लगायेंगे और जो कोई भी आयेगा, ठोकर ही मारता आयेगा।

आप यह दृढ़ भावना मन में रखिए कि अनिष्ट, निराशा, भय, आत्मग्लानि और आत्म तिरस्कार की दुर्भावनाएं आपके जीवन पर आरुढ़ नहीं हो सकती। इन सबको भगा देने का आत्मबल प्रचुरता से आप में विद्यमान है। प्रतिकूल विचार और परिस्थितियाँ आपको सत्पथ से डिगा नहीं सकेंगी।

ऊपर लिखी दोनों सीमाओं से बचते रहिए। न अपने विषय में अत्युक्तिपूर्ण दंभ की ही भावना को प्रोत्साहित कीजिए और न तुच्छता की भावना ही आने दीजिए। मध्य मार्ग ही श्रेष्ठ है। जैसा आदर्श समर्थ पुरुषों का होना चाहिए वैसे ही विवेकशील बनिये। उचित न्यायोचित विचारों के अनुकूल ही चलना पुरुषार्थ है।


सादा जीवन उच्च विचार

(श्री मोहनचन्द्र पारीक माँगरोल)

भारतवर्ष के महर्षियों ने जीवन का उद्देश्य चार पदार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति स्थिर किया है। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पुरुषार्थ को साधन ठहराया है। हमारे देश में धर्म का आचरण इसलिए श्रेष्ठ माना जाता है कि उसके द्वारा इस लोक में उन्नति तथा परलोक में सुगति प्राप्त होती है। पाश्चात्य जीवन का उद्देश्य ठीक इसके विपरीत है वहाँ के निवासियों ने भोग-विलास को अधिक आदर दे रखा है। इसलिए उनके मतानुसार ऐहिक सुखों की प्राप्ति ही जीवन का चरम उद्देश्य है। ‘खाओ, पीवो और मौज उड़ावो’ ही उनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य है- इससे सिद्ध होता है कि पूर्वी व पाश्चात्य जीवन के उद्देश्यों में मौलिक एकता नहीं है-एक अतीन्द्रिय जगत् को प्रधानता देते हैं दूसरे इन्द्रिय जगत को। एक आत्मा की आत्म साधना को श्रेष्ठ मानते हैं दूसरे शरीर की साधना को। एक त्याग को महत्व देते हैं दूसरे संग्रह को।

सादगी और उच्च विचार जीवन का एक अत्यन्त सुँदर आदर्श है। प्राचीन काल से यही भारतीय जीवन का मनोतीत सिद्धाँत रहा है। सरलता स्वयं चरित्र का भूषण है परंतु उच्च विचार के संयोग से इसमें और अधिक रमणीयता आ जाती है। सादगी एवं उच्च विचार के समन्वय से सद्चरित्रता उत्पन्न होती है।

सादगी और उच्च विचार का चरित्र पर विलक्षण प्रभाव पड़ता है। सादगी के साथ अनेक गुण मिले हुए हैं। सादगी को अपनाने से निष्कपटता, साधुता, सदाशयता, उदारता आदि गुण अपने आप आ जाते हैं। जो व्यक्ति सादगी को आदर देता है, उसका भीतर बाहर एक-सा हो जाता है। उसके मन, वचन, कर्म में समरसता आ जाती है। छल,कपट, प्रवंचना, धूर्तता आदि दुर्गुण उससे दूर भाग जाते हैं। इस प्रकार उच्च विचार मनुष्य के हृदय की संकीर्णता को नष्ट करते हैं। सहानुभूति को जागृत करते हैं तथा हृदय को विशाल बनाते हैं। संसार के महापुरुषों में सादगी और उच्च विचार पूर्ण मात्रा में मिलेंगे।

सादगी और उच्च विचार रखने वाला सुसंस्कृत मनुष्य प्राणी मात्र में ईश्वर का दर्शन करता है। वह समझता है कि जनता की सेवा करने से ईश्वर प्रसन्न होता है। ऐसे व्यक्ति में आत्म विश्वास उत्पन्न हो जाता है। उसका हृदय संवेदनशील होता है। वह किसी को पीड़ा तो पहुँचा ही नहीं सकता। वह सदैव दूसरों की पीड़ा हरने को तैयार रहता है। दूसरों की सेवा करने की भावना उसमें दृढ़ हो जाती है। उसकी स्वार्थ भावना से काम करने की प्रवृत्ति दिन-दिन नष्ट होती जाती है वह परोपकार की भावना से काम किया करता है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का सिद्धाँत उसके जीवन का अंग बन जाता है।

सदाचारी मनुष्य अपूर्व सुख और शाँति का अनुभव करता है। कारण यह है कि सादगी से मनुष्य की आवश्यकता कम हो जाती है। जिसकी आवश्यकता थोड़ी है, वह सदैव सन्तुष्ट रहता है। जिसकी इच्छा प्रबल है, वह मनुष्य सदैव दुख भोगता है। उसे कभी शाँति नहीं मिलती। इसलिए सुख और शाँति प्राप्त करने का सुगम साधन सादगी और उच्च विचार है।

‘सादा जीवन उच्च विचार’ सदैव ही भारतीयों का आदर्श रहा है। भारतवर्ष के मनीषियों ने इस सिद्धाँत के विचार सारे जगत के लिए विस्तारित किये हैं। सादगी प्रत्येक भारतवासी के जीवन का अंग थी। यहाँ के निवासी कृत्रिम जीवन में बिल्कुल विश्वास नहीं रखते थे। पाश्चात्य देशों ने किसान के बल से मानव जीवन की काया पलट दी है। वहाँ के निवासी कृत्रिम साधनों द्वारा विविध प्रकार से सुखोपभोग में लीन रहते हैं। उनकी दृष्टि में इन्द्रियों की तृप्ति ही जीवन का साध्य है। इनके परिणाम भी दृष्टिगोचर हो रहे हैं कि उनका जीवन कितना अशाँत, कितना कृत्रिम तथा कितना असन्तोषपूर्ण है। इसके विपरीत है भारतीय आदर्श। यहाँ के निवासी इन्द्रियोपभोग तथा कृत्रिमता को निकृष्ट समझते थे। सादगी के द्वारा विषयोपभोग का परिहार करते थे। उनका ध्येय शरीर में लिप्त न होकर मोक्ष की प्राप्ति करता था।

भारतीयता का आदर्श मनुष्य की अन्तरात्मा का विकास करना है। यह लक्ष्य तभी पूर्ण हो सकता है जब हम सादगी और मितव्ययिता को अपनाते हुए अपरिग्रही और संतोषी जीवन बिताने के लिए अग्रसर हों। जब साँसारिक कामनाओं और वासनाओं से मनुष्य का मन पीछे हटता है तभी उसे आत्म-कल्याण , धर्म, ईश्वर और परमार्थ की बात सूझती है। यदि उसका मन साँसारिक वासनाओं, तृष्णाओं में ही लगा रहे तो उसकी अन्तःप्रेरणा सत्कर्मों की ओर मुश्किल से ही उन्मुख होती है। इसलिए जिन्हें जीवन लक्ष प्राप्त करना हो उनके लिए आवश्यक है कि सादगी, संतोष और उच्च विचारों को अपनाने के लिए तत्पर हो। इसके बिना आत्मिक प्रगति में सफलता प्राप्त हो सकना कठिन है।


साधना का वास्तविक स्वरूप

(श्री सन्त कृष्णनन्दजी महाराज)

आत्म साक्षात्कार का एक मात्र उपाय साधना है। इसमें संदेह नहीं कि साधनाएँ अनेकों प्रकार की होती हैं और उनमें से कई साधनाएं दूसरी साधनाओं से विपरीत जान पड़ती हैं। हमारे हिन्दू धर्म में ही एक समुदाय ईश्वर के निराकार रूप का ध्यान करता है तो दूसरा उसको साकार मानकर मंदिरों में उसकी पूजा और सामूहिक आरती करता है। इसी प्रकार किसी ने अहिंसा और प्रत्येक प्राणी पर दया करने को मुक्ति का साधन माना है तो दूसरा भैंसे, बकरे आदि का बलिदान करने को स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बतलाता है। इन बातों को देखकर एक साधारण मनुष्य के मन में स्वभावतः यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि वास्तव साधना का आशय क्या है और विभिन्न प्रकार की साधनाओं में से किसको सत्य समझा जाय?

यद्यपि अलग-अलग सम्प्रदायों ने साधना की विभिन्न प्रणालियाँ बतलाई हैं पर ‘साध्य’ उद्देश्य के विषय में किसी को विशेष मतभेद नहीं है। प्राचीनकाल के सभी सम्प्रदाय ईश्वर-मुक्ति सान्निध्य निर्वाण, बैकुंठ, स्वर्ग, “वहिदत”, “हविन” आदि को साधना को उद्देश्य बतला चुके हैं। इन सबका स्वरूप यही बतलाया गया है कि मनुष्य को संसार में जो तरह-तरह के अभाव और कष्ट सहन करने पड़ते हैं, वहाँ उनका कोई भय नहीं रहता। वहाँ मनुष्य हर तरह के सुख, आनन्द उपभोग करता है, रोग, शोक, शारीरिक कष्ट, बुढ़ापा, निर्बलता आदि की वहाँ कभी संभावना नहीं होती। अधिकाँश सम्प्रदाय परलोक ही नहीं इस लोक में भी साधना द्वारा अभावों की निवृत्ति और सुखों की वृद्धि का विश्वास दिलाते हैं।

इसलिए हम कह सकते हैं कि साधना का मुख्य उद्देश्य ‘सुख’ की प्राप्ति है फिर वह चाहे छोटे दर्ज का हो या बड़े दर्जे का।

पर ‘सुख’ के संबंध में जब हम गंभीरतापूर्वक विचार करते हैं तो प्रतीत होता है कि अधिकाँश लोग उसका अर्थ गलत लगाते हैं और इसीलिए साधना का स्वरूप समझने में भी उनको भ्रम हो जाता है। वे इन्द्रियों की तृप्ति को ही सुख समझ बैठते हैं। इसलिए सदैव उसी के लिए प्रयत्न करते रहते हैं। पर जैसा हम जानते हैं इन्द्रियों के अभावों की पूर्ति कभी संभव नहीं होती। पहले तो किसी अभाव की एक बार पूर्ति हो जाने पर थोड़ी बहुत समय पश्चात फिर उसी अभाव का अनुभव होने लगता है, और दूसरे एक अभाव की पूर्ति हो जाने पर दूसरा अभाव उत्पन्न हो जाता है। इसलिए इन्द्रियजन्य साँसारिक भोगों द्वारा कभी स्थायी ‘सुख’ की प्राप्ति संभव नहीं होती। वरन् जब कभी बीच में थोड़े समय के लिए भी किसी कारणवश उन सुखों की प्राप्ति में बाधा पड़ जाती है तो घोर दुख का अनुभव होने लगता है। उस समय उन ‘सुखों’ की आदत पड़ जाना और भी अधिक दुख अनुभव होने का कारण बन जाता है।

इसलिए हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सुख का आधार इन्द्रियों को तृप्त करने वाले पदार्थ अथवा भोग नहीं हो सकते, वरन् उस सुख का, जिसे किसी सीमा तक स्थायी माना जा सकता है, आधार कुछ और ही है, इस संबंध में एक ज्ञानी और संसार त्यागी महात्मा का विचार नीचे दिया जाता है।

“विचार करने पर पता लगता है कि हम इन्द्रिय ग्राह्य विषयों द्वारा अतीन्द्रिय आत्मा के अभाव की पूर्ति की चेष्टा कर रहे हैं, इसी से हमारे अंतर की आकाँक्षा पूर्ण नहीं होती, उल्टी विषय-वासना बढ़ती रहती है। भोग ऐश्वर्य ही यदि आत्मा के अभाव को पूर्ण कर सकता तो विषय की पूर्ति होने पर उसे लेकर आत्मा चुप हो जाती। हम बहुत बार मन चाही चीज पा जाते हैं, परंतु उसे पाकर हम चुप क्यों नहीं रह सकते? उस वस्तु से मन क्यों हट जाता है, और फिर दूसरे विषय की कामना क्यों करते हैं? उदर और उपस्थ के सुख को ही तो संसारी जन चरम सुख मानते हैं, परंतु उनके पा जाने पर भी वे संतुष्ट और स्थिर नहीं रह सकते। कामना के समय विषय में जितने सुख की कल्पना की जाती है, भोग के समय अथवा प्राप्ति के दूसरे ही क्षण वह फिर उतने सुख की वस्तु नहीं मालूम होती, फिर किसी दूसरे अभाव का बोध होने लगता है। दिखलाई यही पड़ता है कि जीवन का अभाव अथवा उसकी कामनाएँ तो नित्य (स्थायी) हैं, परंतु उसके सुख के विषय और जिसके द्वारा वह सुख भोग करता है वह शरीर-ये दोनों ही अनित्य (अस्थायी) हैं इसीलिए ‘अनित्य’ पदार्थों के द्वारा नित्य अभाव की पूर्ति नहीं होती। वास्तव में अनुभव नहीं होता, ये विषय तो भौतिक देह को अतिक्रम कर अति सूक्ष्म आत्मा के निकट पहुँच ही नहीं सकते। इसीलिए आत्मा का अभाव नहीं मिटता। आत्मा को आत्म स्वरूप का ही अभाव है और उसे अपने स्वरूप की प्राप्ति से ही उसके अभाव की पूर्ति होकर उसे सुख हो सकता है और यही सुख जीव मात्र का सच्चा साध्य या ध्येय हो सकता है।

इससे विदित होता है कि मनुष्य का लक्ष्य आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना और उसी के अनुसार आचरण करना है। आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग क्या है, इसकी चर्चा हमारे देश में सर्वत्र सुनी जाती है। एक साधारण भीख माँगने वाले साधु नामधारी से लेकर ऋषिकेश के गुफाओं में रहने वाले तपस्वियों तक के मुख से आत्म ज्ञान का उपदेश सुनने को मिल सकता है। पर इनमें थोड़े से व्यक्तियों को छोड़कर आत्मज्ञान के नाम पर व्यवहारिक मार्ग दिखलाने वाले कोई नहीं होते। वे या तो कुछ सुनी सुनाई चमत्कारों की बातें या असम्भव साधन विधियाँ बतलाकर श्रोता को चक्कर में डाल देने के सिवाय कुछ नहीं जानते। इसलिए साधुओं और संन्यासियों के फेर में पढ़ने के बजाय आत्मज्ञान के सच्चे जिज्ञासु को सद्ग्रन्थों का सहारा लेना कहीं अधिक कल्याणजनक है। इनमें प्राचीन वीतराग ऋषि-मुनियों ने प्राणिमात्र के हित को दृष्टि में रखकर विभिन्न योग्यता वाले पात्रों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की साधन विधियाँ बतलाई हैं। उन सब का उल्लेख कर सकने का तो यहाँ पर स्थान नहीं है, पर भारतीय आत्मज्ञान के स्रोत उपनिषदों में सर्वसाधारण के लिए सुलभ साधना प्रणव का जप ही बतलाया है। इसके संबंध में लिखा है।

स्वदेहमरिणं कृत्वा प्रणवं चोत्तएरणिम।

ध्याननिर्मथ नाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत्।

प्रणवो धनुः शरो आत्मा ब्रहतल्लक्ष्यमुच्यते।

अप्रमतेन वेद्धव्य शरवत् तन्मयो भवेत्॥

प्राण्वात्प्रभावो ब्रह्म प्रणवत्प्रभावो हरिः।

प्रणवात्प्रभावो रुद्रः प्रणवो हि परो भवेत्॥

अर्थात्- अपनी देह को नीचे की अरुणि और प्रणव को ऊपर की अरुणि करके ध्यान रूप मंथन में छिपी हुई वस्तु (अग्नि) के समान देव को देखे। प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है, उस बाण का लक्ष्य ब्रह्म है, जितेन्द्रिय पुरुष को उसे सावधानी के साथ बेधना चाहिए। प्रणव से ब्रह्मा है, प्रणव से हरि (विष्णु) है और प्रणव से ही रुद्र है और प्रणव ही परातत्त्व है।”

एक अन्य विद्वान ने भी साधना का साराँश यही बतलाया है। उनका मत संक्षेप में इस प्रकार है-

“अधिकारी भेद से शास्त्रों में कल्याण साधनार्थ, तीर्थ, व्रत, नियम, योग, निष्काम कर्म आदि अनेक साधन बतलाये हैं। पर जन्म-जन्म के कुसंस्कारों से जब मनुष्य का मन मलीन रहता है, तो उसके कुप्रभाव से इन साधनों में मन नहीं लगता। इसलिए इसका उपाय महात्माओं ने नाम-जप बतलाया है। भगवान के किसी नाम या प्रणव का जप निरंतर करता रहे और निष्काम भाव से अर्थात् फलेच्छा रहित होकर तीर्थ, व्रत, यज्ञ आदि शुभ कार्य करे तो इससे मनु शुद्ध होता है, और फिर मोक्ष के चार साधन विवेक, वैराग्य, षट् सम्पत्ति और मुमुक्षु भाव की क्रमशः प्राप्ति होती है।”

मानव जन्म को सफल बनाने का सब से बड़ा साधन तो परमार्थ और निष्काम कर्म का आचरण ही बतलाया गया है, पर यह कार्य बिना दीर्घकालीन अभ्यास और निरन्तर आत्मोत्थान के नियमों का ध्यान रखे संभव नहीं। लाखों-करोड़ों में कोई एक भगवान का कृपापात्र ऐसा हो सकता है जो स्वभाव से ही इस मार्ग का पथिक बन सके, अन्यथा धार्मिक आदेशों का क्रमशः पालन करते हुए भी इस लक्ष्य की प्राप्ति करनी होती है।


Quotation

धर्म शास्त्रों में मातृभूमि को परमपूजनीय बतलाया है। जो धर्म के रहस्य को समझते हैं वे अपने हृदय में यह विश्वास करते हैं कि अपनी मातृभूमि से प्रेम करना ही धर्म का सबसे छोटा और सबसे बड़ा अंग है।

-श्री अरविन्द घोष

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उच्च जीवन ही से उच्च चरित्र वाले उत्पन्न होते हैं।

- पोप


हिन्दू संस्कृति में विवाह का उद्देश्य

(श्री सच्चिदानन्द एम. ए.)

संसार की अन्य जातियों की अपेक्षा हिन्दू जाति की अपनी कुछ विशेषताएं हैं। इसका आधार आध्यात्मिकता है। ऋषि अपनी लंबी खोज के परिणामस्वरूप इस निर्णय पर पहुँचे थे कि मनुष्य जीवन की सच्ची सुख शाँति और आनन्द आध्यात्मिकता में ही है। इसलिए उन्होंने हिन्दू जाति के प्रत्येक क्रियाकलाप, आचार व्यवहार एवं चेष्टा में इस तत्व का विशेष स्थान रखा। यही कारण है कि हमारी छोटी से छोटी क्रिया में भी धर्म का दखल है। हमारा खान पान, मलमूत्र त्याग, सोना उठना आदि सभी शारीरिक मानसिक, बौद्धिक क्रियाएं धर्म द्वारा नियंत्रित की गई हैं ताकि इनको भी हम ठीक ढंग से करें और जैसा करना चाहिए, उससे नीचे न गिरें और मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ सकें। हमारे वेद शास्त्रों का प्रयास इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए है। ऊँचे आदर्शों को लेकर चलने के कारण ही संसार की सभी सभ्य जातियों में इसका हमेशा ऊँचा स्थान रहा है। विवाह के संबंध में भी यही बात लागू होती है क्योंकि हिन्दू धर्म में विवाह का उद्देश्य काम वासना की तृप्ति नहीं वरन् मनुष्य जीवन की अपूर्णता को दूर करके पूर्णता की ओर कदम बढ़ाना है। विवाह में प्रयोग आने वाले मंत्र हमें इसी ओर संकेत करते हैं।

यह तो मानना ही पड़ेगा कि सृष्टि की रचना के लिए परमात्मा ने स्त्री और पुरुष में कुछ ऐसे आकर्षण उत्पन्न किये हैं जिससे वह एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। इस सृष्टि का क्रम तो चलना ही है, उनमें वह स्वाभाविक काम प्रवृत्तियाँ तो जागृत होंगी ही और हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार मनुष्य जन्म 84 लाख पशु पक्षी कीट पतंग आदि योनियों के पश्चात प्राप्त होता है, और वह पशु प्रवृत्तियां उसमें रहती ही हैं, इसलिए जिस प्रकार से पशु को स्वच्छन्द छोड़ देने से वह किसी भी खेत में चरता रहता है इसी तरह मनुष्य भी स्वच्छन्दता प्राप्त करके अपनी स्वाभाविक काम वासना को शाँत करने के लिए अनियंत्रित हो जायेगा और स्त्रियों के लिए पुरुष के हृदय में और पुरुष के हृदय में स्त्रियों के लिए अनुचित आकर्षण की भावना जाग उठेगी और अवसर मिलने पर वह अपनी पशु प्रवृत्ति को चरितार्थ करेगा। इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए ही विवाह की व्यवस्था की गई है कि पुरुष एक स्त्री तक सीमित रहे और संसार की अन्य स्त्रियों को पवित्र दृष्टि से देखे। इस प्रकार से विवाह वह पुनीत संस्कार है जिसने मानव को मानव बनाने का कार्य किया है और उसकी पशु प्रवृत्तियों पर नियंत्रण लगा दिये हैं। इसके अभाव में मनुष्य पशु से गया गुजरा होता। न उसकी कोई पत्नी होती न माँ न बहिन न बेटी अपनी काम वासना पूर्ति के लिए वह कुत्तों की तरह लड़ता, झगड़ता और छीना झपटी करता। हिन्दू धर्म के अनुसार होने वाले विवाह में प्रयोग में आने वाले मंत्रों द्वारा कन्या यह कहती है कि-

“तुम कभी पर स्त्री का चिन्तन नहीं करोगे और मैं पति परायण होकर तुम्हारे ही साथ निर्वाह करूंगी। तुम्हारे सिवा अन्य किसी पुरुष को पुरुष ही नहीं समझूँगी।”

उपनिषदों में आता है कि सृष्टि के आरंभ से ही स्त्री धारा व पुरुष धारा-दो धाराएं चलीं। इन दो धाराओं का मिलन ही सृष्टि विस्तार का कारण है। विवाह का वास्तविक उद्देश्य स्त्री धारा को पुरुष धारा में मिलाकर उसे मुक्ति की अधिकारिणी त्रिवेणी बनाना है। विवाह के समय कन्या अग्नि को साक्षी करके कहती है। “आज मैं इस युवक को पति रूप में स्वीकार करती हूँ ताकि पति लोक को पहुँच सकूँ।” युवक एक और मंत्र के द्वारा कहता है “मैं इस देवी को पत्नी के रूप में गृहण करता हूँ ताकि ब्रह्मलोक में पहुँच सकूँ। एक मंत्र में पति लोक का वर्णन है दूसरे में ब्रह्मलोक का। वास्तव में दोनों का एक ही अर्थ है। पति लोक है पतियों का पति ईश्वर। ब्रह्मलोक है वह परमात्मा जिससे बड़ा और कुछ नहीं। हमारी संस्कृति में पति और पत्नी ईश्वर को प्राप्त करने के लिए गृहस्थ में प्रवेश करते हैं। संसार की और कोई भी संस्कृति ऐसा ऊँचा आदर्श उपस्थित नहीं कर सकती। इसीलिए एक विद्वान ने लिखा है कि ‘विशाल मानव जाति की एकता का अनुभव तभी हो सकता है जब व्यक्ति समष्टि के लिए अपने व्यक्तित्व का बलिदान कर दे। इस त्याग को उद्भूत करने की प्रारम्भिक पाठशाला है परिवार और इसका आधार है विवाह प्रथा।’ कन्या अपने घर को छोड़ कर अपना शरीर, मन और आत्मा सब कुछ अपने पति के चरणों में अर्पण कर देती है, उसे ही अपना देवता मानती है। उसकी प्रसन्नता में ही उसकी प्रसन्नता होती है। वह अपने व्यक्तित्व को पति में मिला देती है। एकता अनुभव करती है और पति उसे अपनाकर अपनी वृत्तियों, कामनाओं, इच्छाओं, वासनाओं को नियन्त्रित और संयमित करता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जाता है। स्त्री पुरुष की पशु वृत्तियों को अपने तक सीमित कर लेती है। इस तरह उसे पशुता की ओर कदम बढ़ाने से रोकती है। मन गतिशील है। वह निरंतर कार्य करता रहता है। एक तरफ से मुड़कर वह दूसरी ओर लग जाता है। जब उसकी शक्तियों का व्यय इधर से बच जाता है तो वह निर्माण कार्य में लगता है और मनुष्य को श्रेष्ठ मार्ग की ओर अग्रसर करके पूर्णता की ओर बढ़ाता है।

भारतीय संस्कृति में विवाह एक धार्मिक बंधन है। धर्म का नियंत्रण रहने से यह संबंध शिथिल नहीं हो पाते क्योंकि धर्म के प्रति श्रद्धा होने के कारण वह अधर्म करके, पाप कमा कर, नरक भोगों को प्राप्त नहीं करना चाहते। इस तरह से विवाह को धार्मिक कर्तव्य समझते हुए साँसारिक दौड़ में कदम से कदम मिलाकर एक साथ चलते हैं चाहे कभी-कभी आपस में मन मुटाव भी हो जाये। यदि एक दूसरे में अरुचि भी उत्पन्न हो जाए तो भी पर पुरुष या पर स्त्री की ओर आँख उठाकर देखने या ध्यान करने को वह अधर्म और पाप समझते हैं।

विवाह के मधुर संबंध से आत्मभाव का विकास होता है। विवाह द्वारा उसके ममत्व का विस्तार स्त्री तक होता है। फिर बाल बच्चे होने पर उनकी ओर बढ़ता है। इस तरह धीरे-धीरे विस्तार पाता हुआ गली, मुहल्ले, नगर, प्राँत देश और समस्त विश्व में व्याप्त होकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के उच्चतम आदर्श की ओर बढ़ता है। यह उच्चतम आत्म विकास प्रेम की अन्तिम सीढ़ी है और वह अपने परम लक्ष्य को प्राप्त हो जाता है। पुरुष स्त्री की साधना का व्यवहारिक क्षेत्र दाम्पत्य जीवन है। जो इसमें असफल रहे, उसकी साधना अधूरी ही मानी जाती है। यह दोनों के लिए परीक्षा का क्षेत्र है। इसमें तरह तरह के दुख कलह, कठिनाइयाँ आती हैं। एक दूसरे के लिए त्याग के अवसर आते हैं, कभी-कभी प्रतिकूल व्यवहार हो जाता है। इन में सहन शीलता धैर्य, त्याग, क्षमा आदि गुणों को प्रकट करने वाला ही उत्तम साधक माना जाता है।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति में विवाह का वास्तविक उद्देश्य काम वासना की तृप्ति नहीं मनुष्य जीवन के परम पुनीत कर्तव्य आध्यात्मिक उन्नति के द्वारा ईश्वर प्राप्ति है जो अन्य जातियों व संस्कृतियों में देखने में नहीं आता।




गौ की उपयोगिता और हमारा कर्तव्य

(प. रामस्वरूप शर्मा’शास्त्री’)

गोभिर्विप्रैश्च वेदश्च सतीभिः सत्यवादिभिः। अलुब्धै र्दान शीलैश्च सप्तभि र्धार्यते मही।

पृथ्वी को धारण करने वाले सात तत्व इस श्लोक में बताये गये हैं, उनमें गौ का प्रथम स्थान है। गौ का प्रथम स्थान क्यों है? इस प्रश्न पर हम थोड़ा सा भी विचार करें तो पता चल जायेगा कि माता-पिता, गुरु इनमें प्रथम स्थान माता का माना जाता है तो “गावो विश्वस्य मातरः” गाय विश्व की माता ही ठहरी, उसे क्यों न प्रथम स्थान प्राप्त हो? गौ की उपयोगिता सर्वत्र आपको दिखलाई देगी, चाहे आप धार्मिक दृष्टि से देखें, चाहे आर्थिक व चाहे स्वास्थ्य की दृष्टि से। गौ संसार का वह अनुपम धन है जिसकी समता हो ही नहीं सकता। धार्मिक दृष्टि से देखें तो अपना कोई धार्मिक कृत्य ऐसा नहीं जिसमें गौ की आवश्यकता नहीं होती। चाहे वह हमारे षौडस संस्कार हों चाहे अन्य कोई यज्ञ आयोजन हों। ऐसा प्रतीत होता है जैसे गौ ब्राह्मण एक ही कुल के हों और उनके दो भाग कर दिये गये हैं। आर्थिक दृष्टि से देखें तो ऐसा प्रतीत होगा कि हम गौ के बिना जीवित ही न रह सकेंगे। आज संसार का बहुत बड़ा भू भाग ऐसा है जहाँ हमारे कृषि यंत्र बेकार साबित हुये हैं, केवल गौ माता के पुत्र ही हमें रोटी देते हैं। इसके अतिरिक्त अनेकों स्थल ऐसे हैं जहाँ रेल बस आदि नहीं पहुँच पाते वहाँ का जीवन व यातायात का अवलम्ब केवल गौ पुत्र हैं।

यदि यह भी मान लें कि हम समस्त पृथ्वी पर यंत्रों से कृषि कर लेंगे, तो यह यंत्र क्या खाद भी दे सकेंगे? अथवा श्री मैथिलीशरण जी के शब्दों में-

यदि तुम कहो कि हम कलों से जोत लेवेंगे मही।

हम पूछते हैं क्या कलें वह दूध भी देंगी सही॥

दूध भी मिल सकेगा? यदि नहीं तो आप सोचें कि हमारे खेत कितने समय तक बिना खाद के अन्न दे सकेंगे? और बिना दूध के कितने समय हमारा स्वास्थ्य साथ देगा?

इन महापुरुषों से हम और पीछे यदि अपने गौरवपूर्ण इतिहास पर दृष्टि डालें, तो एक दो नहीं, बीसियों गौभक्त आपको मिलेंगे। महर्षि वशिष्ठ का कामधेनु के लिए प्राणों की बाजी लगाना, महाराज दिलीप का गोचारण तथा गौ के बदले सिंह के सामने अपने को प्रस्तुत कर देना कौन भूल सकता है? महर्षि च्यवन का अपने शरीर के बदले नहुष का चक्रवर्ती राज्य ठुकरा कर एक गाय का मूल्य निश्चित करना गौ की कितनी बड़ी महत्ता प्रदर्शित करता है पाठक विचार करें।

गौ की महत्ता केवल हिन्दू धर्म में ही हो ऐसी बात नहीं है, संसार के सभी धर्मों के जो सत्यान्वेषी पुरुष हैं इस विषय में एक मत हैं अब पृथक-पृथक धर्म के व्यक्तियों की गाय की महत्ता के संबंध में विचार धारा नीचे दी जाती है।

इस्लाम धर्म में गाय का स्थान

आज देश में बहुत बड़ी संख्या ऐसे व्यक्तियों की है, जो समझते हैं इस्लाम धर्म में गोवध अनिवार्य है। यदि ऐसा होता तो कई भारत के प्रसिद्ध मुस्लिम सम्राट कभी इसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाते। न मौलाना लोग गोवध के विरुद्ध फतवा ही देते। इस तथ्य की पुष्टि में कुछ उदाहरण दिये जाते हैं।

“जब भारत का शासन सूत्र तैमूरवंशी मुगल बादशाहों के हाथ आया, तो उसका प्रथम शासक बाबर हुआ। मरने के समय उसने अपने पुत्र हुमायूँ को एक पत्र लिखा था वह पत्र उसके हस्ताक्षर सहित हूबहू नवाब भूपाल के पुस्तकालय में है। उसका फोटो लेकर छपरे के प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता डॉ. सैय्यद महमूद ने ‘मॉर्डन रिव्यू’ में एक लेख निकाला था जिसमें गौ हत्या से परहेज रखने की खास हिदायत की गई थी।” (अखबार तोहफए हिन्द 9 जुलाई, 1923)

2- गाय की कुर्बानी करना इस्लाम धर्म का नियम नहीं है। (फतवे हुमायूँनी भाग 1 पृष्ठ 360)

3-गरीब मुसलमान के लिए कुर्बानी जरूरी व और नैमित्तिक नहीं है। (मौलाना हसन निजामी का फतवा)

4-गाय की कुर्बानी जरूरी और नैमित्तिक नहीं है। अगर कोई इसे छोड़ देता है तो धर्म विरुद्ध काम नहीं करता। (लखनऊ के मौलाना हबी का फतवा जिस पर अब्दुल हसन, अब्दुल वहीद, अब्दुल अदबली हाजी, काजी हसन मोहम्मद के दस्तखत हैं)

5- “मैं तो कुरान न अरब की प्रथा ही गौ की कुर्बानी का समर्थन करती है”। हकीम अजमालखाँ

6-”हजरत आयशा फरमाती हैं कि गाय का दूध दवा, मक्खन सिफा और गोश्त सरासर मर्ज है।”

7-”नवाब साहब मुर्शिदाबाद, नवाब राधनपुर नवाब मंगरौल, नवाब दरजाना जिला करनाल, नवाब गुड़गाँवा, यह सब गोवध के विरोधी है।” (हिन्दुस्तान लखनऊ, 2 नवंबर 1924)

8-”सुन्दर वसुन्धरा भारत में गाय माँगलिक समझी जाती है। उसकी भक्तिभाव से पूजा होती है, और इसी से खेती होती है। इसके द्वारा उत्पन्न अन्न, दूध, मक्खन आदि से यहाँ के अधिकारियों की गुजर होती है। गौ माँस निषिद्ध और उसे छूना पाप समझा जाता है।” (आईन ए अकबरी आईन से पृष्ठ 63)

उपरोक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि गौ का कितना महत्व मुसलमानों की दृष्टि में है। यदि कुछ व्यक्ति भ्रमवश या रूढ़िवादिता के वशीभूत हो इस स्पष्ट सत्य की उपेक्षा कर दें तो बात दूसरी है। जिसने सत्यासत्य के अन्वेषण में आँखें बंद न कर ली हों, इस सचाई से कौन इंकार कर सकेगा?

गौ ईसाई धर्मावलम्बियों की दृष्टि में-

1-”गौ हमारे दुग्ध भवन की देवी है, वह भूखों को भोजन देती, नंगों को आच्छादन और बीमारों को स्वास्थ्य प्रदान करती है।” होडर्स हेरीमैन अमेरिका का प्रसिद्ध पत्रकार।

2-”मैं इसकी कल्पना कर सकता हूँ के किसी राष्ट्र कि बिना भी गौ हो सकती है, किन्तु मैं स्वप्न में भी यह अनुमान नहीं कर सकता कि कोई राष्ट्र बिना गौ के भी रह सकता है” (सर विलियम वैडरवर्न)

3-”गौ के सौम्य रूप से वास्तव में देवत्व भय है। उसमें एक महानता और भव्यता है, जो ग्रन्थ देवता के अनुरूप है, उसमें शत प्रतिशत मातृत्व है, और उसका निश्चय मनुष्य जाति से माता का संबंध है” (श्री वाल्टर ए. डामर अमेरिका के प्रसिद्ध लेखक)

4- “जिन लोगों ने संसार में कुछ नाम कमाया है, जो अत्यन्त बली और वीर हुये हैं, जिनके समाज में बाल मृत्यु की संख्या बहुत घट गई है, जिन्होंने व्यापार धन्धों पर अधिकार प्राप्त किया है, जो साहित्य और संगीत कला का आदर करते हैं, तथा जो विज्ञान व मानव बुद्धि की प्रत्येक दशा में प्रगतिमान हैं, वे वैसे लोग हैं जिन्होंने गौ के दूध और दूध के बने पदार्थों का स्वच्छंदता से उपयोग किया है।” (डॉ. ई. बी. भैकालम अमेरिका)

5-”कोई जाति बिना गौ पालन के समृद्धि शाली नहीं हो सकती, गौ सबसे उत्तम भोजन मानव को प्रदान करती है। घास खाकर अमृत का दान करती है। जहाँ गौ की अच्छी सेवा की जाती है, वहाँ की भूमि उपजाऊ, सभ्यता उच्च, जाति अधिक स्वस्थ व बलवान होती है। गौ का दूध संसार में अमूर्त पदार्थ है। गोबर व गोमूत्र की खाद भूमि के लिए अक्सार है।” (फिजिकल कल्चर अमेरिका के संपादक)

जिन कतिपय ईसाई विद्वानों की सम्मतियाँ प्रस्तुत की गई हैं वह इतनी स्पष्ट और पक्षपात रहित कही गई हैं, कि उनका प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। उन्होंने जो अपनी सम्मति दी है उस पर स्वयं आचरण भी किया है। हम लोगों ने गौ की प्रशंसा के गीत तो बहुत गाये लेकिन उसके पालन पोषण और बुद्धि पर बहुत कम ध्यान दिया है। हमारे यहाँ जो गायों का मूल्य और सम्मान था वह हमने भुला दिया। आज यह गौ का पुजारी देश करोड़ों अरबों का शुष्क दुग्ध उन देशों से क्रय करता है, जिन पर गाय के विरोधी होने का आरोप है। यदि हम अपनी पुरातन सभ्यता संस्कृति जैसा मान गौ को अब भी देने लगे, पाश्चात्य देशों से गौ सेवा का सबक लें, कृष्ण की गौ सेवा की पवित्र स्वर लहरी जो गोचारण में आत्म विभोर हो बजी थी सुन सकें, तो यह अपना देश पुनः उस स्थान पर पहुँच सकता है जहाँ पहले था। यह भारत भूमि शस्य श्यामला बन पुनः सोना उगलने लगेगी। गौ वह अमर धन है जिससे हमें संसार के चारों पदार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। हम चाहते हैं कि वह दिन शीघ्र आए, जब हम देखें कि गायें हमारे आगे हैं, पीछे हैं। चारों ओर हैं “गताँमध्येवसान्यहम्” हम गायों के मध्य में हैं।


आर्थिक समस्या पर विचार करने का त्यौहार - दीवाली

त्यौहार और संस्कार एक संस्कृति के प्राण कहे जो सकते हैं। संस्कारों द्वारा तो मनुष्यों के अन्तःकरण पर जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाले उत्तम विचारों की अमिट छाप डालने का प्रयत्न किया जाता है। त्यौहार एक देश और जाति की सामूहिक समस्याओं को सुलझाने का माध्यम बनते हैं। इन शुभ अवसरों पर मिल जुल कर, संगठित रूप से यह विचार विनिमय किया जाता है कि हमारी अमुक समस्या का समाधान किस प्रकार से किया जा सकता है। त्यौहारों द्वारा मानव मस्तिष्क पर क्रियात्मक रूप से यह छाप डालने की चेष्टा की जाती है कि हम सब समाज रूपी शरीर के अभिन्न अंग है। अपने को समाज से पृथक मानने और वैसा व्यवहार करने में अपने स्वार्थों का ही हनन करना है और समाजहित का ध्यान रखते हुए तदनुरूप व्यवहार करने में सब प्रकार से अपना और समाज का लाभ है।

जिस प्रकार से विजयादशमी स्वास्थ्य संवर्धन का, बसंत पंचमी विद्या का, शिवरात्रि त्याग का, होली सफाई और स्वच्छता का, रामनवमी न्याय की रक्षा का, गायत्री जयन्ती तप का, गुरु पूर्णिमा श्रेष्ठ पुरुषों और गुरुजनों के सम्मान का, हरियाली अमावस्या वृक्षारोपण का, श्रावणी यज्ञोपवीत और वेद का, कृष्ण जन्माष्टमी गौ पालन का त्यौहार है, उसी प्रकार दिवाली हमारी आर्थिक समस्या को सुलझाने का शुभ अवसर है या यूँ कह सकते हैं कि दीपावली राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था का दिग्दर्शन करने और उसकी प्रगति के लिए नवीन योजना बनाने का समय है। अर्थ व्यवस्था व्यक्तिगत व सामूहिक दोनों रूपों से एक महत्वपूर्ण समस्या है जिसको सुलझाये बिना हम सुख और समृद्धि के मार्ग पर नहीं चल सकते। जो धन सम्पत्ति हमारे पास है या अपने पुरुषार्थ द्वारा हम कमाते हैं, उसका क्या उचित उपयोग होना चाहिए, पिछले वर्ष में जो आर्थिक कठिनाइयाँ हुईं उनके क्या कारण थे ओर उनको दूर करने के लिए आगामी वर्ष में क्या-क्या प्रयत्न करने चाहिएं। आड़े वक्त में काम आने के लिए अपनी आय में से कौन-कौन से खर्चे कम करके बचत योजना बनानी चाहिए, इन बातों पर सामूहिक रूप से विचार करने के लिए ही दिवाली का त्यौहार मनाया जाता है। इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजन किया जाता है और पिछले वर्ष के आय व्यय का लेखा जोखा नई बहियों पर अपना व्यापार शुरू किया जाता है। उनका पूजन किया जाता है। इस दिन अपनी आय व्यय का बजट बनाया जाना चाहिए। उसकी परीक्षा करनी चाहिए। जो व्यक्ति अपनी आय-व्यय की जाँच पड़ताल नहीं करता, यह देखने का प्रयत्न नहीं करता कि कहीं मेरी आय से अधिक खर्च तो नहीं हो रहा, उसको बुद्धिमान मनुष्य नहीं का जा सकता क्योंकि उसके सामने कठिनाइयों का आना स्वाभाविक है। वर्ष में एक बार तो इस पर विचार कर ही लेना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी ऐसे व्यक्ति को विचारवान कहा है।

“तुलसी, सो समरथ, सुमति,

सुकृती, साधु सुजान।

जो विचारि व्यवहरत जुग,

खरच लाभ अनुमान॥

गृहस्थ जीवन में कार्य व्यस्तता के कारण नित्य प्रति जिन बातों पर विचार करने में हम असमर्थ रहते हैं, उनको अतिरिक्त समय में विशेष प्रकार की प्रसन्न मुद्रा में सोचने का अवसर हमें इन त्यौहारों से मिलता है।

दिवाली पर आगामी वर्ष की बचत योजना में बजट भी बना लेना चाहिए। जितनी आय हो, उतना ही खर्च करने में भी बुद्धिमानी नहीं है क्योंकि, कौन जानता है कि कब मुसीबत पड़ जाय। इसलिए विपत्तिकाल के लिए अवश्य धन संचय रखने की योजना बनानी चाहिए कि आगामी वर्ष में हर मास इतने रुपये कमाये जायेंगे। बचत योजना में सहयोग के लिए साधन हमारे सामने है। बैंक या डाकखाने में कुछ रकम अपनी धर्म पत्नी या बच्चों के नाम से जमा करा सकते हैं, अपने जीवन का बीमा करा के हर मास कुछ रुपए निकाल सकते हैं, नेशनल सर्टिफिकेट खरीद सकते हैं या फिक्स डिपॉजिट करा सकते हैं।

पूर्व काल में लोग बचत के लिए जेवर आदि मूल्यवान धातुओं की वस्तुओं को बनवा लेते थे। और कान, गले, हाथ, नाक आदि शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों पर पहन लेते थे क्योंकि उस समय धन की सुरक्षा का भय होता था। चूँकि आज धन की सुरक्षा के लिए बैंक आदि अन्य साधन उपलब्ध हैं इसलिए जेवरों की कोई आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। उसमें तो आर्थिक हानि ही है क्योंकि जितने धन को जेवर के रूप में बंद कर लेते हैं उससे पर्याप्त मात्रा में ब्याज मिल सकता है।

दिवाली को छोड़कर अन्य त्यौहारों पर केवल एक देवता या अवतार की ही पूजा की जाती है या उनके साथ धर्म पत्नी की, जैसे राम के साथ सीता, शंकर के साथ पार्वती की पूजा होती है। यह दिवाली के त्यौहार की विशेषता है कि इसमें दो ऐसे देवी देवताओं का पूजन होता है जिनका सीधे रूप में कोई संबंध नहीं है। लक्ष्मी और गणेश का साथ-साथ पूजन करने का अर्थ यह है कि लक्ष्मी का आह्वान करने के साथ साथ, विचारशीलता का भी समावेश होना चाहिए। धन कमाने के साथ उस का उचित उपयोग भी जानना चाहिए। जिस प्रकार से अग्नि अत्यन्त लाभदायक होते हुए भी असावधानी में हानि पहुँचा देती है उसी प्रकार से धन से सब सुख सुविधाएं प्राप्त होते हुए भी यदि उसका दुष्प्रयोग किया जाए तो वह जीवन को नाश की ओर ले जाता है।

सामाजिक दृष्टि से देखने पर भी दीवाली का महत्व कम नहीं है क्योंकि दीवाली आने से कई दिन पूर्व ही सर्वत्र घर द्वार की सफाई होनी आरंभ हो जाती है। घर की दीवारों पर सफेदी और रंगाई की जाती है। टूटे फूटे स्थानों की मरम्मत की जाती है। चूने और सीमेंट के अभाव में मिट्टी और गोबर से ही यह काम लिया जाता है। इस प्रकार से इस के आने के कई महीनों पहले विशेषकर वर्षा के चार महीनों की गंदगी दूर हो जाती है और स्वच्छता का वातावरण उत्पन्न होता है। स्वच्छता का स्वास्थ्य से संबंध है। जहाँ गंदगी होती है वहाँ रोग की उत्पत्ति होती है। स्वच्छता से स्वास्थ्य का सुधार होता है और मन प्रसन्न और प्रफुल्लित रहता है। विष्णु भगवान द्वारा नरकासुर के मारे जाने का तात्पर्य भी यही है कि नरक अर्थात् गन्दगी रूपी असुर को उस दिन मारा जाता है।

*समाप्त*