राही! बीत चला अब दिन बहुत सो लिया
अब तो उठ चल धूप सुनहरी घटती प्रतिपल
दूर नगर है कठिन डगर है
किरणें हैं कुछ छिन, राही बीत चला अब दिन, राही
सुरभित उपवन, सुन्दर छाया पाकर जिसको पंथ भुलाया
लख तो तत्क्षण घटती प्रतिक्षण
धूमिल हुआ विपिन, राही बीत चला अब दिन, राही
चल अब क्यों करता है देरी रुक जाना जब घिरे अंधेरी
सुख के सपने
साथी अपने एक एक मत गिन, राही बीत चला अब दिन, राही
—त्रिलोकीनाथ बजवाल पिलानी
(स्वामी श्री सदाशिव जी महाराज)
वर्तमान समय में हम अनेक धर्म प्रेमी व्यक्तियों को “विश्व का कल्याण हो”—”मनुष्य मात्र को अभ्युदय हो” इत्यादि प्रचार-वाक्य कहते हुये सुनते हैं। निःसन्देह धर्म का लक्षण यही है कि प्राणी मात्र को आत्मवत् समझा जाय और प्रत्येक के कल्याण का सदैव ध्यान रखा जाय। भारतीय धर्म शास्त्रों में जहाँ कहीं मनुष्य के कर्तव्यों का विचार किया गया है वहाँ यह नहीं कहा गया है कि तुम अपने सम्प्रदाय अथवा जाति के मनुष्य से तो प्रेम करो और अन्य लोगों को शत्रु समझ कर घृणा करो और उनके नाश का उद्योग करो। दूसरे धर्मों में भले ही अपने से पृथक धार्मिक मतानुयायी को “काफिर” या अधार्मिक कह कर उसे मारने को भी पुण्य बतलाया हो, पर आर्य धर्म में अहिंसा को परम धर्म कह कर सब के हित का ध्यान रखने का ही उपदेश दिया है। पर वर्तमान समय में “विश्व का कल्याण हो” का नारा लगाते रहने पर भी मनुष्यों के हृदय में बड़ी संकीर्णता के भाव दृष्टिगोचर हुआ करते हैं। इसलिये “श्री विश्व हितैषी महामानव समाज” के संचालक स्वामी श्री सदाशिवजी महाराज ने अपनी एक रचना में विश्व कल्याण की व्याख्या करते हुए लिखा है—
वेदान्त की परिभाषा के अनुसार “विश्व” शब्द का अर्थ होता है व्यष्टि, स्थूल शरीर, अभिमान, क्योंकि जागृत अवस्था में हमको नाम और रूप के आधार पर जगत जो कुछ अनुभव जान पड़ता है उसका कारण अपनी स्थूल देह का “अभिमान” अथवा जानकारी ही होती है। जो लोग इस विश्व में रहने वाले सब नाम रूप वाले प्राणियों और पदार्थों का हित चाहते हैं वे ही विश्व हितैषी हैं। अनेक लोग तो “विश्व हित” का नाम सुनते ही डर जाते हैं। अज्ञानता के कारण वे इस प्रकार विचार करने लगते हैं कि “हाय, हाय, हमने अपने और अपने स्त्री, पुत्र, परिवार के सुख शाँति के लिये बड़े परिश्रम से जो धन संपत्ति, विद्या, बुद्धि अथवा पुण्य आदि प्राप्त किया है उसे दूसरों के लिये क्यों खर्च करें? अगर हम उनका उपयोग दूसरों के लिये कर डालेंगे तो फिर अपने लिये क्या करेंगे? क्या कोई दूसरा आदमी हमारा हित साधन करेगा? इस प्रकार अधिकाँश लोग “विश्व” अर्थ न समझ कर केवल माता पिता के रज-वीर्य से उत्पन्न इस स्थूल देह को आत्मा मान कर इससे संबंध रखने वाले स्त्री पुत्रादि को ही अपना मानते हैं और इस भ्रम में पड़ कर अनेक मूर्खतापूर्ण कार्य करते रहते हैं। पर इसका परिणाम यह निकलता है कि वे स्वयं भी दुःखी होते और जिन स्त्री-पुत्रों के लिये वे आत्मानन्द का त्याग करते हैं उन स्त्री-पुत्रादि को भी दुखी बनाते हैं।
विचारपूर्वक देखा जाय तो अखिल विश्व ब्रह्माण्ड में जो कुछ जड़ वस्तु अथवा स्थूल, सूक्ष्म, कारण देह धारी चैतन्य प्राणी हैं, वे सब अपने-अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये परस्पर सापेक्ष होते हैं। अर्थात् तुच्छ से तुच्छ जीव से लगाकर ईश्वर से सदृश्य शक्ति धारण करने वाले प्राणी को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये (सुख शाँति से जीवित रहने के लिये) एक दूसरे की सहानुभूति की अनिवार्य रूप से आवश्यकता रहती है। इसी भाव को प्रकट करने के लिये भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है—
सहयज्ञः प्रजा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्य ध्वमेष वोऽस्त्विष्ट कामधुक् ॥
अर्थात् “प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भकाल में यज्ञ सहित प्रजावर्ग की उत्पत्ति करके इस प्रकार कहा था कि तुम यज्ञ द्वारा अभिवृद्धि प्राप्त करो और वह यज्ञ ही तुम्हारी कामनाओं की पूर्ति के निमित्त कामधेनु बने।” “यज्ञ” का अर्थ होता है देव पूजा दान और संगतिकरण (संगठन) “देवपूजा” का अर्थ होता है—दिव्य आचरण वाले मनुष्यों का मान, आदर सहित अनुकरण करना, यह नहीं कि उनके प्रतीक स्वरूप धातु, पाषाण आदि की मूर्ति को बाह्याडम्बर सहित पूजा कर संतोष कर लेना। “दान” का अर्थ होता है—”यथायोग्य वितरण” अर्थात् जो व्यक्ति अपनी विद्या बुद्धि के द्वारा प्रचुर अर्थ-संग्रह करने में समर्थ हैं वे उनके द्वारा अन्य बुद्धि विद्या हीन पराश्रयजनों की सहायता करें जिससे वे भी शक्ति के अनुसार स्वावलंबी बन सकें। दान का अर्थ यह नहीं होता कि छल, कपट, प्रपंच द्वारा गरीब लोगों को खूब चूस-चूस कर अपार, धन, सम्पत्ति इकट्ठी करना, उसके द्वारा खूब विलासपूर्ण जीवन व्यतीत करना, और उसमें से झूठन (उच्छिष्ट) की तरह थोड़ी सी सम्पत्ति देश, जाति के नाम पर खर्च करके “दानवीर” की उपाधि ग्रहण कर लेना। इस प्रकार “देवपूजा” और “दान” के लिए शुद्ध हार्दिक भाव की आवश्यकता होती है और अधिकाँश मनुष्य चाहें तो उसे कर सकते हैं। पर तीसरा कार्य “संगतिकरण” अर्थात् एक से विचार रखने वाले व्यक्तियों को एक सूत्र में बाँधकर संगठित करना कठिन काम है, जिसे विशेष विद्या बुद्धि वाले व्यक्ति ही कर सकते हैं।
इसलिये जो लोग विशेष श्रेणी के विद्वान और बुद्धिमान होते हैं, वे ही जनता की रुचि और प्रकृति का ध्यान रख कर संगतिकरण (संगठन) के कार्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यज्ञ के साथ प्रजा की उत्पत्ति और व्यवहारिक जीवन में एक दूसरे का “सहयोग“ अनिवार्य होने से मनुष्य मात्र के लिये देवपूजा, दान और संगतिकरण रूपी ‘यज्ञ’ की उपासना परम कर्तव्य है। इसका मुख्य लाभ आगे के श्लोक में बतलाया गया है—
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥
अर्थात् “इस यज्ञ द्वारा तुम स्थूल देहाभिमानी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ ऐसे मनुष्य, देवताओं की भावना करते रहो (अर्थात् अपनी भावनाओं को निरन्तर चिन्तन द्वारा दिव्य मूर्तिमान बनाओ) इससे वे सूक्ष्म दैवी भावनाएँ भी तुम्हारी सहायता करती रहेंगी।” इसमें विशेष गूढ़ रहस्य यह है कि सूक्ष्म तथा कारण देहधारी दिव्यात्मा (देव) वायुमंडल में विचरण करते रहने पर भी अगर कोई कार्य कर सकते हैं तो किसी स्थूल देहधारी व्यक्ति के माध्यम से ही ऐसा कर सकना संभव होता है। इसीलिये यह कहावत प्रसिद्ध है कि “भावे हि विद्यते देवो” अर्थात् हमारी दिव्य भावनाओं का अवलंबन करके ही देवगण अपने संस्कारों के अनुरूप हमारा संचालन करते हैं। जिन लोगों की भावधारा विपरीत होती है उसे देवगण प्रभावित नहीं करते। इस प्रकार जो लोग उच्च आदर्शपूर्ण भारतीय संस्कृति के रहस्य को समझते हैं किसी भी हवन यज्ञ आदि के अवसर पर ऊपरी क्रियाकाण्ड को निमित्त बनाकर अपने आस-पास के अभावग्रस्त दीन-दुखी लोगों को अन्न वस्त्रादि देकर उनकी हार्दिक सहानुभूति प्राप्त करते हैं, जो एक सच्चा लाभ है। इसी प्रकार के अपने संस्कारों के अनुकूल विद्वान, बुद्धिमान एवं गुरुजनों को आदरपूर्वक बुला कर उनसे मार्ग-दर्शन की प्रेरणा ग्रहण करते हैं। यह उपर्युक्त श्लोक में “परस्पर भावयन्तः श्रेयः” का वास्तविक अर्थ है। इस प्रकार यज्ञ का अर्थ केवल सामग्री स्वाहा! करके निमन्त्रण खाने का पेशा करने वालों का भोज कर देना नहीं है, वरन् उसका आशय यही है कि हम हवन इत्यादि को निमित्त बनाकर अपने से हीन दर्जे वाले गरीबों की सहायता करें और अपने से अधिक विद्या बुद्धि वाले महापुरुषों से उपदेश ग्रहण करके अपने जीवन को अधिक शुद्ध, पवित्र और सहानुभूति युक्त बनावें।
(श्री. शम्भूसिंह कौशिक)
तन्तुन्तन्वत्रजसो, भानुमन्विहि,
ज्योतिष्मतः पथो रक्षधिया कृतान्।
अनुल्वणं वयस जोगु वामयो
मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥
ऋ॰ 10। 5। 3। 6
“साँसारिक कार्य करता हुआ तू तेजस्विता का, प्रकाश का अनुसरण कर। बुद्धि से निर्णय किये गये प्रकाशयुक्त पथ की रक्षा कर। निरन्तर कर्म और ज्ञान की साधना करता हुआ उलझन रहित कर्म का अवलंबन कर। मनुष्य बन और जनसेवक लोगों को पैदा कर।”
ऋग्वेद के उक्त मन्त्र में हमें पूर्ण मनुष्य बनने का आदेश दिया गया है। केवल मनुष्य शरीर धारण कर लेना ही मनुष्यता नहीं है। शरीर तो मनुष्य बनने के लिए एक माध्यम है, साधन है। शरीर साधन के माध्यम से जीवन पर्यन्त निरन्तर साधना ही मनुष्य बनने की उच्च मंजिल तक पहुँचाती है। मानव जीवन हमें इसीलिए प्राप्त होता कि इस अमूल्य अवसर का लाभ उठाकर पूर्ण मनुष्य बन जाय। इस प्रकार की पूर्णता प्राप्त कर लेना ही जीवन लक्ष्य कहलाता है। इसीलिए वेद भगवान आदेश करते हैं “मनुर्भवः” मनुष्य बन।
मनुष्य बनने के तीन साधन उक्त मन्त्र में बतलाये गये हैं जिनका अवलंबन कर मनुष्य बना जा सकता है—पूर्णता प्राप्त की जा सकती है।
(1) भानुम्+अनु+इहि (भानुमन्विहि)—”प्रकाश का अनुसरण कर”। इसके लिए अंधकारजन्य जीवन से निरन्तर प्रकाश, तेज, दिव्यता की ओर अग्रसर होना चाहिए। प्रकाश ही मनुष्य का पवित्र पथ है। इस प्रकाश एवं दिव्यता प्राप्ति के लिए निरन्तर ज्ञान-विज्ञान की साधना की आवश्यकता है। जीवन में प्रकाश का अवलंबन करने के लिए मुख्यता दो बातों की आवश्यकता है। (1) जीवन में अंधकारमय तत्वों को पहचानना, सूक्ष्म निरीक्षण करना और उन्हें छोड़ना। (2) प्रकाश की ओर अग्रसर होना।
जो पतन एवं विनाश की ओर बढ़ाते हों, जीवन बरबाद करते हों उन्हें अंधकारमय तत्व ही समझना चाहिए। साधारणतया मनुष्य को प्रकाश पथ से रोकने के लिए अंधकार में भटकाने वाले छह शत्रु होते हैं।
गर्व, लोभ, काम, मत्सर, मोह और क्रोध ये छह विकार मनुष्य के प्रकाश पथ में बड़े भारी विघ्न हैं। अपने निरन्तर के प्रयत्न से इन शत्रुओं को परास्त करके प्रकाश का अनुसरण करना चाहिए, जहाँ से तेज, दिव्यता, वीरता, असीम पुरुषार्थ एवं अन्य दैविक गुणों की धारायें निसृत होती हैं। अतः इन अंधकारजन्य बुराइयों, विकारों आदि से बच कर सत्पथ, प्रकाश मार्ग का अवलंबन करना मनुष्य बनने के लिए प्रथम आवश्यकता है।
मनुष्य बनने के लिए दूसरा साधन है—”ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान” अर्थात् अपने पूर्वजों के ज्ञान विज्ञान की साधना के लिए किये गये कठोर परिश्रम से विद्या प्रकाश, ज्ञान विज्ञान आदि की रक्षा कर, उनके अनुभवों से लाभ उठाकर उस विद्या भण्डार में अपना भी कुछ भाग डालें। मनुष्य अपने पूर्वजों की भाँति विद्या प्रकाश को अपने नवीन अनुसंधान के आधार पर और भी बढ़ावें तथा अन्धकार जन्य तत्वों से रक्षा करें।
वेद भगवान् के उक्त आदेश के अनुसार मनुष्य के ऊपर समाज सेवा की एक विशेष जिम्मेदारी डाली गई है जिसमें वह अपने विकास और प्रगति के साथ-साथ समाज की प्रगति एवं उत्थान के लिए भी सद्विचार सत्प्रेरणायें देता रहे। पूर्वजों के साधना एवं चिन्तन रूपी असीम पुरुषार्थ के फलस्वरूप विद्या भण्डार की रक्षा करता रहे। और उसमें स्वयं भी नवीन अनुसंधान करके अपना कुछ भाग डालता रहे। हमारे देश में वेद पुराण, मीमाँसा, स्मृति, दर्शन, शास्त्र आदि के रूप में विद्या विस्तार वेद भगवान के उक्त आदेश का परिणाम है।
मनुष्यता की उच्च मंजिल पर पहुँचने के लिए आवश्यक तीसरा साधन है उलझन रहित कर्म करना अर्थात् अपनी शक्ति एवं परिश्रम को व्यर्थ के कार्यों में खर्च न करके व्यवस्थित ढंग से सत्कार्यों एवं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में करना चाहिए। अक्सर मनुष्य अपने समय और शक्ति का तथा कार्य का व्यवस्थित रूप नहीं बना पाते और व्यर्थ के उलझन भरे कार्यों में इन्हें नष्ट कर देते हैं। फलतः जीवन के अन्त तक भी पूर्ण मनुष्य नहीं बन पाते हैं। इतना ही नहीं उनका जीवन भार रूप बन जाता है। अतः उलझन भरे कार्यों से बचना चाहिए क्योंकि इनमें व्यर्थ शक्ति और समय नष्ट होता है। अपनी सामर्थ्य एवं स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसी के अनुसार सफलता की ओर अग्रसर होने के लिए श्रम से कदम बढ़ाने चाहिएं। इसमें यदि कोई उलझन भी पैदा हो तो उससे विवेक एवं धैर्य के साथ काम लेकर बचना चाहिए इससे व्यर्थ शक्ति और समय का दुरुपयोग नहीं होता। यही कारण है कि कई महापुरुष अकेले होते हुए भी चुपके-चुपके महान् कार्यों, महान् योजनाओं, को कार्यान्वित करते हैं जिन्हें अचानक देखकर जनता चमत्कार समझ लेती है। अतः सदैव उलझन भरे कर्मों से बचकर अपनी शक्ति, सामर्थ्य एवं स्वरूप का सदुपयोग अपने पवित्र पथ की ओर अग्रसर होने में करना पूर्ण मनुष्य बनने के लिए आवश्यक साधन है।
जीवन में इन तीन तथ्यों को अपनाकर मनुष्य बन जाने से ही संतोष नहीं करना चाहिए वरन् अपने पश्चात् योग्य उत्तराधिकारी भी छोड़ जाना चाहिए जो अपने चलाये हुए इस पवित्र क्रम को आगे भी चलाता रहे। यही कारण है कि प्रत्येक स्त्री-पुरुष निःसंतान रहना पाप समझता है। संतान का वास्तविक तात्पर्य सुयोग्य जनसेवी नागरिक तैयार करके विश्व उद्यान से एक सुरम्य पुष्प पल्लवों से लदा हुआ वृक्ष लगा जाना है। पृथ्वी का बोझ बढ़ाने वाले बहुत सारे पिल्ले-पिल्ली पैदा करते जाना तो समाज के साथ अत्याचार करना है। चाहे अपने घर में चाहे बाहर अपने सद्विचारों की शृंखला को आगे चलाने वाला अनुयायी, शिष्य या उत्तराधिकारी ही वास्तविक संतान है। यही प्रथा वैदिक काल से चली आ रही है। आज भी इस परम्परा को वास्तविक रूप देना चाहिए।
मनुष्य बनने के लिए वेद भगवान के आदेशानुसार बताये गये साधनों का अवलंबन करके पूर्णता प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का पवित्र कर्तव्य है। जो भी इस ओर प्रयत्न करेगा उसे जीवन में पूर्णता प्राप्त होगी। सफलता उसके पीछे-पीछे चलेगी। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे पूर्वज ऋषियों का है। प्रकाश मार्ग का अवलंबन ज्ञान-विज्ञान की निरन्तर साधना एवं विद्या प्रकाश वृद्धि, उलझन भरे कार्यों से दूर रहकर अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य का सदुपयोग अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में करना योग्य उत्तराधिकारी तैयार करना उनकी जीवनधारा के मूल आधार थे। यही कारण था कि उन्होंने जीवन में पूर्णता प्राप्त की संसार के लिए अमूल्य ज्ञान भंडार का दान किया और जीवन में महान् कार्यों का संपादन किया। आज भी प्रत्येक व्यक्ति वेद भगवान के आदेशानुसार उक्त तथ्यों के आधार पर जीवन का सदुपयोग करे तो वही स्थिति प्राप्त हो सकती है इसमें तनिक भी सन्देह एवं शंका की बात नहीं है।
(डॉ. चमनलाल गौतम)
मनुष्य किसी भी प्रकार का साधन क्यों न करे, किसी भी धर्म में बतलाई गई उपासना पद्धति को क्यों न स्वीकार करे, दो बातों का होना सदैव आवश्यक माना गया है। वे दोनों हैं—त्याग और पवित्रता। संसार के विभिन्न धर्मों में कितनी ही बातें एक दूसरे के विपरीत जान पड़ती हैं, बाह्य क्रियाकलापों में जमीन आसमान का अन्तर देखने में आता है—एक मत का अनुयायी अपना धर्मानुष्ठान समाप्त होने पर प्राणियों को आहार दान द्वारा संतुष्ट करता है और दूसरे धर्म वाला वैसे ही अवसर पर उनका बलिदान कर देता है—फिर भी यदि उस धर्म के सिद्धान्तों का विवेचन न किया जाय तो उसमें त्याग और पवित्रता का उद्देश्य अवश्य निहित मिलेगा। क्योंकि आत्मा और परमात्मा का अनुभव मनुष्य को तब तक कदापि नहीं हो सकता जब तक उसके हृदय में सत्य निष्ठा और आन्तरिक श्रद्धा का प्रकाश न हो और ऐसा प्रकाश अधिक से अधिक आत्म समर्पण और आत्मानुशीलता के बिना संभव नहीं है, इस संबंध में एक महात्मा ने कहा है—
“बाह्य प्रकृति ईश्वर की छाया है और अन्तरात्मा, जो अपने आपको ढूँढ़ रहा है, उसका मुख्य और विशिष्ट दर्पण है। यदि ईश्वर की दिव्य सत्ता का सृष्टि की वस्तुओं द्वारा दर्शन करना है, तो इसके लिये सब से बड़ी आवश्यकता यही है कि इस दर्पण को सब प्रकार के मैल और दाग-धब्बों को छुड़ाकर स्वच्छ बना लिया जाय।”
यद्यपि यह उपदेश बड़ा सरल है और संसार के प्रत्येक माननीय धर्मग्रन्थ में किसी न किसी रूप में लिखा हुआ है, पर केवल इसके पढ़ लेने से अथवा इसकी प्रशंसा में बड़ी-बड़ी बातें कह देने से काम नहीं चल सकता, यह तो एक सेवा व्यवहारिक विषय है कि हम जितने अंशों में उसका पालन करेंगे उतना ही फल हमको दृष्टिगोचर होगा। जब तक मनुष्य अपने विचारों और चरित्र की छानबीन करके अपने दोषों को स्वयं न समझ लेगा और उनको वास्तव में त्याग कर अपने जीवन को शुद्ध न बना लेगा तब तक परमात्मा का प्रकाश किसी प्रकार मिलना संभव नहीं। यह सत्य है कि मनुष्य की अधोगामिनी प्रकृति को वश में करना और साँसारिक प्रलोभनों के ऊपर विजय पाना सरल कार्य नहीं है। सज्जनता और साधुता के लिये प्रसिद्ध बहुसंख्यक व्यक्तियों के चरित्र में भी गुप्त रूप से निकृष्ट विषय भोगों की लालसा पर्याप्त परिणाम में पाई जाती है, बड़े-बड़े धर्मध्वजी कहलाने वालों का जब भंडाफोड़ होता है तो उनको नारकीय कीड़े के सिवाय और कुछ नहीं कहा जाता। इसलिए साधारण मनुष्यों से यह आशा करना कि वे एक प्रभावशाली प्रवचन सुनकर अथवा सदुपदेश पूर्ण एक लेख पढ़ कर दोषों को त्याग देंगे और शुद्ध जीवन व्यतीत करने लगेंगे, ठीक नहीं है। पर अगर मन से दोषों की निकृष्टता को समझ कर उन्हें त्यागने का निश्चय कर लिया जाय और फिर नियमों का पालन सचाई के साथ किया जाय तो शीघ्र या विलंब से आत्मोन्नति के लक्ष्य तक पहुँचना सर्वथा संभव है। इस संबंध में चर्चा करते हुये एक संत पुरुष ने कुछ नियम इस प्रकार बतलाये हैं—
(1) अपने निकृष्ट आत्मभाव-अहंकार को मिटा कर जीव-सेवा का व्रत अंगीकार करना।
(2) इस बात का प्रयत्न करना कि किसी पदार्थ या अपने शरीर में भी आसक्ति न रहे। जो कुछ हमारे पास है उसे भगवान का समझ कर परोपकारार्थ लगाने को तैयार रहना और बदले में पाने की इच्छा न रखना।
(3) पृथ्वी के पदार्थों और संपत्ति की क्षणभंगुरता को अच्छी तरह समझ लेना।
(4) जिस कार्य का निश्चय किया हो उसे पूर्ण श्रद्धा और आत्म विश्वास के साथ करना।
आरम्भ में इन नियमों पर दृढ़ रहने का संकल्प करके अपने भीतर पाये जाने वाले दोषों और त्रुटियों को एक-एक करके दूर करते जाना चाहिये। यह ख्याल करना कि उपयुक्त नियमों का संकल्प करते ही हमको पूर्णरूप से महात्मा बन जाना होगा, नासमझी की बात है। यह तो स्पष्ट है कि अहंकार का मिटाना, सम्पत्ति और शरीर की आसक्ति का न रहना, कोई सहज बात नहीं है। इसका आशय यही है कि इन आदर्शों को अपने सामने रख कर जीवन-यात्रा की जाय और धीरे-धीरे पुराने स्वभाव को छोड़ कर नई आदतें ग्रहण की जायें। जब कभी अपनी कमजोरी या परिस्थितिवश मार्ग च्युत हो जाएं, पतन हो जाय तो उससे जरा भी न घबराकर फिर दुगने उत्साह और प्रयत्न से आदर्श को प्राप्त करने की चेष्टा की जाय। यह भली प्रकार स्मरण रखना चाहिये कि संयम, नियम, त्याग का मार्ग ऐसा सहज नहीं है कि हम सीधे कदम उठाते हुये बिना किसी विघ्न−बाधा के लक्ष्य तक पहुँच जायें। जैसा हम ऊपर कह चुके हैं कि ऐसे भाग्यवान तो करोड़ों में से कोई एक-दो मिलते हैं जो स्वभाव से ही इस मार्ग के पथिक हों और बिना विशेष कठिनाई के आत्मोत्थान की इस ऊर्ध्वगामी यात्रा को समाप्त कर ले। अन्यथा सभी मनुष्यों को इसमें बार-बार गिरना और पुनः चढ़ कर चलना ही पड़ता है। इसीलिये नीति और चरित्र के महान उपदेशक जेम्सऐलन ने एक स्थान पर स्पष्ट शब्दों में लिखा है—
“यदि तुम दस बार हारो तो भी हिम्मत मत छोड़ो; यदि सौ बार हारो तो भी उठो और अपने रास्ते पर चलो। यदि तुम हजार बार हारों तो भी निराश मत होओ। जब तुम ठीक रास्ते को जान गये हो और उस पर चलने लग गये हो तो तुम्हारी विजय निश्चित है, यदि तुम इस रास्ते को ही छोड़ दो तो बात दूसरी है।”
भारतीय धर्म में मनुष्य के लिये, प्रधान रूप से चार पुरुषार्थ बतलाये हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों में मोक्ष ही प्रधान और मुख्य साध्य है। मनुष्य को उसी मार्ग का अवलंबन करना चाहिये जिससे इस उद्देश्य की पूर्ति हो। यहाँ के धर्मशास्त्रों ने यथार्थ मनुष्य को इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करने का उपदेश दिया, पर साथ ही यह भी समझा दिया है कि अर्थ और काम को प्रधान पद न देकर गौण ही समझा जाय। क्योंकि धर्म से तो अर्थ और काम की प्राप्ति हो सकती है। पर अर्थ या काम से धर्म की प्राप्ति सम्भव नहीं। इसलिये सच्चे सुख और शान्ति की कामना रखने वाले व्यक्ति को अर्थ और काम का सेवन इसी विधि से करना चाहिये कि साँसारिक वातावरण में रहने के प्रभाव से उनके प्रति जो प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है वह धीरे-धीरे शान्त हो जाय और धर्म के सेवन में बाधा स्वरूप न बने। इसी तथ्य को दृष्टि में रखकर महाभारतकार ने कहा है—
ऊर्द्धवाहुर्बिरोम्येष न च कश्चित श्रणोति मे। धमदिर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते॥
अर्थात् काम और अर्थ से धर्म की प्राप्ति नहीं हो सकती। काम, मोह को उत्पन्न करता है और अर्थ से मनुष्य के स्वभाव में कृपणता आती है। इसलिये साँसारिक व्यवहार को निभाने के लिये इनका पालन करते हुये भी इनमें लिप्त होना पतन का कारण बतलाया है। इसलिये जहाँ तक संभव हो इनमें लिप्त न होकर धर्म-साधन पर ही ध्यान रखना मनुष्य के लिये कल्याणकारी है। धर्म-साधन के लिये यद्यपि नित्य नैमित्तिक कर्तव्यों का विधान किया गया है, पर उनके द्वारा मोक्षरूपी अन्तिम लक्ष्य की प्राप्ति कठिन है। शास्त्रों में भी धर्म-साधन का फल स्वर्ग प्राप्ति बतलाया है जो कुछ समय बाद समाप्त हो जाता है और मनुष्य को फिर इस पृथ्वी पर कर्मक्षेत्र में संलग्न होना पड़ता है। इसलिये मोक्ष-मार्ग के ज्ञाताओं ने योग, ज्ञान और भक्ति के विशेष साधन बतलाये हैं, जिनके द्वारा जीव सामर्थ्यशाली होकर साधन-शिखर तक पहुँच सकता है। ये साधन अपनी-अपनी रुचि और प्रकृति के अनुसार फलदायक होते हैं किन्तु कोई भी साधन ग्रहण किया जाय त्याग और पवित्रता के दो सर्व-प्रथम सोपानों पर प्रत्येक मुमुक्षु को चढ़ना पड़ेगा। इनके बिना कोई भी साधन फलदायक नहीं हो सकता। सब से पहले साधने की ये दो बातें हैं। इनके कर लेने पर आगे का मार्ग स्वयं ही मालूम होता जाता है।
(श्री रामखेलावन चौधरी)
जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिये, जिन गुणों की आवश्यकता होती है, उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण है—”दृढ़ इच्छा शक्ति।” अन्य गुण, जैसे ईमानदारी, साहस, परिश्रम और लगन आदि, दृढ़ इच्छा-शक्ति के अभाव में व्यर्थ हो जाते हैं। प्रायः ऐसा देखा गया है कि एक व्यक्ति के पास धन है, बल है और विद्या है परन्तु वह अपने जीवन-काल में कुछ भी नहीं कर पाता। यदि ऐसे व्यक्तियों के मानसिक जीवन का विश्लेषण किया जाय, तो स्पष्ट पता चल जायगा कि उनमें इसी दृढ़ इच्छा-शक्ति का अभाव था। इसके विपरीत ऐसे अनेक व्यक्ति इतिहास प्रसिद्ध हो गये हैं जो साधनविहीन थे परन्तु अपने मनोबल के कारण, वे कुछ का कुछ बन गये।
श्री रामचन्द्र जी प्रवासी बने रहे और उनके पास केवल धनुष-बाण ही था परन्तु अपनी दृढ़ता के बल पर उन्होंने तमाम साधन और अनुयायी जुटा लिये। उन्होंने रावण को पराजित किया और अपनी कीर्ति को अमर बना गये। इसीलिये कहा गया है—”क्रिया सिद्धिः सत्वे भवति महताँ नोपकरणे।” यह ‘सत्व’ और कुछ नहीं दृढ़ इच्छा-शक्ति ही है। यह सत्व जितनी अधिक मात्रा में मनुष्य में वर्तमान होगा, उतना ही वह जीवन में सफल होगा। सिकंदर नेपोलियन, महमूद गजनवी और चन्द्रगुप्त मौर्य आदि विजेता अपने निश्चय पर हिमालय की भाँति अटल रहे। लोग उनके लक्ष्य को असंभव बता कर उनकी हँसी उड़ाते रहे परन्तु उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति का कभी भी तिरस्कार नहीं किया। कोलंबस के मन में बड़ी तीव्र इच्छा थी कि वह अटलाँटिक को पार करके नया संसार खोज निकाले। उसके नाविकों ने हिम्मत हार दी और उसका भरसक विरोध किया परन्तु उसने जो कुछ करना था कर दिखाया। बँगला के प्रसिद्ध कवि माइकेल मधुसूदन दत्त को अँगरेजी का सफल कवि बनने और इंग्लैंड का भ्रमण करने की तीव्र इच्छा थी। वह अल्पायु में सफल कवि बने। महात्मा गाँधी तो दृढ़ इच्छा-शक्ति के मानो अवतार ही थे। उन्होंने अकेले ही संसार के सबसे बड़े साम्राज्य को हिलाकर झकझोर डाला। कहने का तात्पर्य यह है कि दृढ़ इच्छा-शक्ति जीवन में सफलता प्राप्त करने की कुँजी है।
यह दृढ़ इच्छा-शक्ति क्या है? इसका अर्थ है—”मैं यह काम करूंगा और करके ही रहूँगा चाहे जो कुछ हो।” ऐसी बलवती इच्छा को जिसकी ज्योति अहर्निश कभी मंद न हो, दृढ़ इच्छा-शक्ति कहते हैं। यह ‘ढुलमुलयकीनी’ की विरोधी प्रवृत्ति है। बहुत से लोग ठीक से निश्चय नहीं कर पाते कि वे क्या करें। उनका मन हजार दिशाओं में दौड़ता है। वे दृढ़ इच्छा-शक्ति के चमत्कार को क्या समझ सकते हैं? इस शक्ति के अंतर्गत दृढ़ निश्चय, आत्मविश्वास कार्य करने की अनवरत चेष्टा और अध्यवसाय आदि गुण आ जाते हैं। यह शक्ति मनुष्य के मुखमंडल पर अपूर्व तेज उत्पन्न करती है और आँखों में सम्मोहन का जादू लाती है। यही कारण है कि दृढ़ इच्छा-शक्ति संपन्न व्यक्ति के संपर्क में आते ही निर्बल चित्त वाले मनुष्य उसी प्रकार उसकी ओर आकर्षित होते हैं जैसे चुँबक की शिला की ओर लौह कण। उसके मस्तिष्क से मानसिक तरंगें निकल कर वायुमंडल में लहराती हैं ओर आस-पास के व्यक्तियों को अज्ञात रूप से प्रभावित करती हैं। रूप-रंग, धन-यौवन में उतना आकर्षण नहीं होता जितना दृढ़ इच्छा-शक्ति में होता है।
अब प्रश्न यह है कि ऐसी सम्मोहक दृढ़ इच्छाशक्ति को उत्पन्न कैसे किया जाय? उत्तर है-अभ्यास के द्वारा। अब से एक शताब्दी पूर्व तक मनोवैज्ञानिकों का विचार था, दृढ़ इच्छा-शक्ति एक सहज अर्थात् प्रकृति-प्रदत्त गुण है। आज यह विश्वास बदल रहा है। वह गुण मस्तिष्क के किसी अंग की सबलता या निर्बलता से संबन्धित नहीं है। वास्तव में यह मनुष्य की परिस्थितियों, आदतों और अभ्यास के अनुसार बनता अथवा बिगड़ता है। इस गुण का बीजारोपण जन्म से लेकर लालन-पालन के काल से ही हो जाता है। ऐसे परिवार में जो साधन संपन्न है, जिसमें बालक की प्रत्येक इच्छा पूरी की जाती है या जिसमें बालक माता-पिता की एक मात्र संतान होने के कारण प्रेम का भाजन होता है, पलने पर एक बालक में दृढ़-इच्छा शक्ति का उत्पन्न होना स्वाभाविक है, परन्तु हर दशा में ऐसा ही होता हो, यह नहीं कहा जा सकता। इच्छा शक्ति में दृढ़ता लाने के लिये यह आवश्यक है कि बालक कुछ अवरोधों का अनुभव करता रहे। साथ ही यह अवरोध ऐसे भी न हों जिन्हें बालक पार न कर सके और हतोत्साह हो जाय। अस्तु, बालक के लालन-पालन में माता-पिता को बहुत जागरुक रहना चाहिये। अज्ञानतावश या दुलार के कारण बालक की प्रत्येक इच्छा पूरी करने पर, उसमें ‘जिद’ करने का अवगुण पैदा हो जाता है। यह ठीक है कि बालक हर प्रकार से अपनी बात मनवाने का प्रयत्न करता है परन्तु ‘जिद’ के साथ अविवेक और स्वार्थ का अंश मिल जाने के कारण उसे दृढ़ इच्छाशक्ति कहना अनुचित है। दृढ़-इच्छाशक्ति के साथ विवेक सद्प्रयत्न और न्याय का संभोग होना चाहिये।
दृढ़ इच्छा-शक्ति के विकास में सबसे बड़ी बाधा भय और दुश्चिंता से उत्पन्न होती है। इसलिये बचपन से ही बच्चों को इन कुभावों से बचाना चाहिये। इच्छा की दृढ़ता से मनुष्य की ‘स्वतन्त्र सत्ता’ का बोध होता है, भय पराधीनता का सूचक है। जब बच्चों को हर प्रकार से भयग्रस्त रक्खा जाता है, तो उनमें दबने की आदत पैदा हो जाती है। वे दूसरों की इच्छा के आगे झुकने लगते हैं और उनकी स्वयं की इच्छाशक्ति निर्बल हो जाती है। इसी प्रकार चिंता भी एक दूषित मनोभाव है। यह चित्त में अस्थिरता और विभ्रम पैदा करती है। चिन्ता से मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ होकर किसी भी निर्णय पर पहुँचने में असमर्थ हो जाता है। बच्चों के लालन-पालन में इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उन्हें यथासंभव दुश्चिंता से दूर रक्खा जाय। दुश्चिंता का मूलकारण है बालक की शक्ति और उसकी सफलता के बीच समन्वय का न होना। जब बालक किसी वस्तु को प्राप्त करना चाहता है परन्तु इस कार्य में उसकी शक्ति अपर्याप्त होती है, तो वह चिंता से पीड़ित हो उठता है। यह बात मनोरंजन, पढ़ाई और घरेलू कामों के विषय में भी लागू होती है। जहाँ तक संभव हो, बालक को कोई भी ऐसा कठिन काम न देना चाहिये, जिसे पूरा करने में वह सर्वथा असमर्थ हो। इसके अतिरिक्त घर का वातावरण भी शुद्ध और पवित्र होना चाहिये। अभाव, गृह-कलह और अनैतिकता भी बालकों के मन में भीषण अन्तर्द्वन्द्व पैदा करते हैं और बालकों की दृढ़ इच्छाशक्ति को निर्बल बनाते हैं। बालकों को इनसे दूर रखना उचित है।
वयस्क होने पर हम स्वयं अपनी आदतों के लिये जिम्मेदार होते हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति को बनाये रखना हमारे अपने हाथ में है। सर्वप्रथम हमें तुरंत निश्चय करने तथा लक्ष्य चुनने की आदत डालनी चाहिये। जब हमारे सामने दो या दो से अधिक प्रबल आकर्षण हों, तो हमें उनके बीच में लटके नहीं रहना चाहिये या तो स्वयं या अपने किसी अन्तरंग मित्र से सलाह लेकर यह निश्चय कर लेना चाहिये कि हमें कौन-सा मार्ग अपनाना है। दो घोड़ों पर एक साथ सवार होकर चलना असंभव है। हमें एक हमारे परम आत्मीयजन ने इस प्रकार की दुविधापूर्ण स्थिति से निकलने का एक बड़ा ही व्यावहारिक उपाय बताया। वे स्वयं एक ऐसी ही स्थिति में पड़ गये जिसमें उनके सामने दो प्रबल आकर्षण थे। उनका मन कभी एक ओर दौड़ता, कभी दूसरी ओर। उनका स्वास्थ्य गिरने लगा और वह बड़े संकट में फँस गये। अन्त में वह कागज-कलम लेकर बैठ गये। उन्होंने दोनों आकर्षणों के पक्ष और विपक्ष में सारे तर्क लिख डाले। बाद में दोनों की तुलना करने पर जो आकर्षण उन्हें न्यायोचित और उपयोगी जान पड़ा, उसी को मानकर वे चलने लगे। बस उनके मन में जो संघर्षण था, शाँत हो गया और वे अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल हो गये। उनकी इच्छाशक्ति भी सबल हो गई।
किसी भी पक्ष को ग्रहण करने के पूर्व यह अवश्य सोचना चाहिये कि इस काम को करने में मेरी अधिक से अधिक कितनी हानि हो सकती है। फिर उस हानि को सहन करने के लिये तैयार हो जाना चाहिये और कार्य आरम्भ कर देना चाहिये। इससे मन में दृढ़ता उत्पन्न होती है और मनुष्य प्रलोभनों से बचा रहता है। प्रायः ऐसा भी होता है कि एक निश्चय पर पहुँचने के बाद कार्य आरम्भ किया गया, परन्तु कुछ समय बाद ही कोई अन्य प्रलोभन सामने आ जाती है। फिर वही पहले वाली अनिश्चय की स्थिति उत्पन्न हो गई। यदि मनुष्य इस नये प्रलोभन का शिकार हो गया तो उसकी इच्छाशक्ति निर्बल पड़ जाता है। अतः अपने प्रथम निश्चय से कभी भी डिगना नहीं चाहिये। प्रलोभनों के अतिरिक्त अपने निश्चय पर अटल रहने में दूसरे प्रकार की बाधाएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। वे हैं अप्रत्याशित कठिनाइयाँ। मनुष्य कितना ही दूरदर्शी एवं कल्पनाशील हो परन्तु किसी कार्य में सामने आने वाली कठिनाइयों का शतप्रतिशत अनुमान लगा लेना असंभव है। किसी निश्चय पर पहुँचने के बाद जब हम कार्य आरंभ करते हैं, तो अनेक ऐसी कठिनाइयाँ सामने आ जाती हैं, जिनकी हमने कल्पना भी न की थी। बस हमारा मन डाँवाडोल होने लगता है। हमें ऐसी स्थिति का सामना करने के लिये तैयार रहना चाहिये। कार्य सिद्धि के मार्ग में न जाने कौन बाधा कहाँ से आ जाय, अस्तु उसका सामना धैर्यपूर्वक करना चाहिये तभी दृढ़ इच्छा-शक्ति बनी रह सकती है।
हमें आशा है कि यदि पाठक उपर्युक्त विचारों पर अमल करेंगे तो उनकी अनेक दुविधाएँ दूर हो जाएंगी और उनके पास दृढ़ इच्छाशक्ति का गुण स्थायी रूप से वर्तमान रहेगा।
स्वयं अपना पूर्ण परिचय प्राप्त करना ही अन्तर्ज्ञान है, जिससे हमें पता चल जाता है कि हम क्या हैं और हमें क्या होना चाहिए, जिससे हम इस संसार में सुखपूर्वक और उपयोगी रूप से और उस लोक में शान्ति तथा आनन्द से रह सकें।
—जे0 मेरु
जब तक हम अपनी पहुँच से बाहर की वस्तुओं की इच्छा में झूला करते हैं तब तक हम पालने के बच्चे ही हैं। जब हम वासना करते-करते थक जाते हैं, तब इच्छा शक्ति सो-सी जाती है-उस समय हमें मृत्यु-शैया पर समझना चाहिए।
—बुल्वर
इस विचार से अधिक मूर्खता की बात हो क्या सकती है कि सारे ब्रह्माँड और पृथ्वी की अनूठी रचना एक आकस्मिक घटना है, जब कि कला की सारी चतुराई एक सिप्पी बनाने में असमर्थ है।
—जर्मीटेलर
(श्री0 गिरिजा सहाय व्यास)
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनाँसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्व सञ्जानाना उपासते॥
(ऋग्वेद 10। 151। 2)
“हे मनुष्यों साथ-साथ मिलकर चलो, मिलकर बोलो, तुम्हारी मानसिक भावनायें समान हों, जैसे पहले देवता समान ज्ञान रखकर कार्य करते थे (वैसे ही तुम भी करो)।
उक्त वेद मंत्र में मानव जाति के लिए संगठन बद्ध रहने का आदेश दिया गया है। वैदिक ऋचाओं में कई स्थानों पर परस्पर संगठन बद्ध रहने पर जोर दिया गया है। इससे सिद्ध होता है कि आज से बहुत समय पूर्व वैदिक-काल में ही आर्य जाति ने संगठन का महत्व जान लिया था। यही कारण था कि उनके संगठन बद्ध रहने से देश उन्नति, विकास की ओर बढ़ रहा था। धनधान्य सम्पन्नता, सुख, शान्ति, ज्ञान−विज्ञान, कलाकौशल आदि में भारतीय जनता बढ़ी-चढ़ी थी। वैदिक काल के इस स्वर्ण युग की कल्पना करते ही आज भी हमारे हृदयों में नवीन प्रेरणा जाग उठती है। यह सब उस समय आर्य जाति के संगठन का ही परिणाम था।
संगठन में महान शक्ति होती है। सूत का एक धागा आसानी से तोड़ा जा सकता है जब इस तरह के अनेकों धागे बटकर मोटा रस्सा बना दिया जाता है तो वह नहीं तोड़ा जाता। इसी प्रकार झाड़ू की सींकें बिखर जाएं तो उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता प्रकृति भी सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ को संगठन-बद्ध रहने की सूक्ष्म प्रेरणा देती है। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण पशु-पक्षियों में तथा इतर प्राणियों में देखा जा सकता है मधु-मक्खियों, बर्रे छत्ते बाँध कर संगठित रूप से रहती हैं। यदि वे तितर बितर हो जायँ तो उनकी क्या शक्ति रह जाती है। वे अपने संगठन बल से ही बड़े-बड़े शक्तिशाली मनुष्यों तथा जानवरों को परेशान कर देती हैं। चींटियां, हाथी, हिरण बन्दर आदि संगठनबद्ध सामूहिक रूप से रहते हैं इसमें प्रकृति की मूल प्रेरणा सन्निहित है।
मानव जाति के लिए भी संगठनबद्ध रहना आवश्यक है। क्योंकि संगठन में अनन्त बल, सामर्थ्य, परिश्रम आदि निहित है। उदाहरणार्थ हिन्दू जाति के इतिहास को देखने से पता चलता है जब तक पूर्वकाल में यह संगठनबद्ध रही तो आश्चर्यजनक कार्य किए। विश्व में अपना प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। ज्ञान-विज्ञान में देश सबसे बढ़ा-चढ़ा रहा। सम्पन्नता ऐश्वर्य शक्ति सामर्थ्य आदि में भी किसी प्रकार कम न था।
खेद है कि कालान्तर में वही हिन्दू जाति अपनी फूट के कारण निरन्तर पतन की ओर चली गई और उसे दुनिया की क्रूरता, अत्याचार, और आक्रमणों का शिकार होना पड़ा। इसकी संस्कृति एवं वैभव संपन्नता, ज्ञान-विज्ञान आदि को आक्रमणकारियों ने कुचल दिया। विदेशी आक्रमणकारियों ने हिन्दू जाति पर इसके असंगठन के कारण जो अत्याचार किये उसकी याद से रोमाँच हो उठता है। उत्तरी पश्चिमी सीमा पर तातारियों के हमले, महमूद गजनवी और गौर के आक्रमण, नादिरशाह द्वारा दिल्ली का कत्लेआम, मुगल, शासक का दमन चक्र और बर्बरतापूर्वक व्यवहार ने हिन्दू संस्कृति, धर्म परम्पराओं को कुचल दिया, ब्रिटिश शासन की तानाशाही, स्वराज्य माँग के बदले में जेल, फाँसी और मशीनगनों की बौछार। इन सबका मूल कारण भारतीयों की संगठन शून्यता ही थी। जिसका अन्त अभी तक भी नहीं हो पाया है।
आज भी भारतीय जनता तरह-तरह के मत भेद, जाति भेद, सांप्रदायिकता, अन्ध परम्पराओं, विभिन्न दलों, फिरकों आदि में छिन्न-भिन्न हो रही है। इन दीवारों ने 40 करोड़ भारतीय जनता की महान शक्ति, सामर्थ्य एवं पुरुषार्थ को छिन्न-भिन्न कर दिया है। यदि यही स्थिति चलती रही तो इस विज्ञान के युग में भारत पिछड़ा हुआ ही रह जायगा।
यदि हमें पुनः उस प्राचीन गौरव को प्राप्त करना है, अपने कदम प्रगति और विकास की ओर अग्रसर करने हैं, इस विज्ञान के युग में अपना अस्तित्व कायम रखना है तो 40 करोड़ भारतीय जनता को संगठनबद्ध होकर चलना होगा। संगठन की शक्ति महान होती है। अकेला तिनका आसानी से तोड़ा जा सकता है किन्तु अनेक तिनकों से बंटा हुआ रस्सा नहीं तोड़ा जा सकता। शरीर को सुव्यवस्थित रूप में चलाने के लिए इसके प्रत्येक अंग का सम्यक् कार्य करना आवश्यक है। यदि इसके अंगों का सहयोग और ताल मेल बिगड़ जाय तो शरीर का अस्तित्व नहीं रह सकता है। ठीक यही बात किसी जाति, समाज, राष्ट्र पर लागू होती है। समस्त राष्ट्र, जाति एक शरीर होती है। इसके विभिन्न अंग सम्प्रदाय, वर्ण जाति आदि का एक संगठनबद्ध जीवन भी होना चाहिए। अर्थात् अनेकता में भी एकता होना आवश्यक है तभी जाकर इसका बल; सामर्थ्य एवं प्रतिभा का उपयोग प्रगति उत्थान एवं विकास के लिए हो सकता है।
संगठन के इस महान् रहस्य को जान कर ही ऋषियों के हृदय में वेद भगवान् का पवित्र आदेश झंकृत हुआ—हे मनुष्यों साथ-साथ चलो तुम्हारे मनों के भाव एक हों। जैसे पहले देवता सम्यक् ज्ञान रख कर कार्य करते ये वैसे तुम भी करो।” निश्चय ही वेद भगवान का यह आदेश हमारे लिए संगठनबद्ध रहने के लिए है। साथ-साथ चलने में कितनी शक्ति है यह तो किसी विशाल सेना या किसी विशाल जुलूस को देखकर किया जा सकता है। यदि साथ-साथ चलकर भी प्रत्येक मनुष्य की मनोभावना अलग अलग हो, उद्देश्य अलग-अलग हो, तो भी वह संगठन किसी काम का नहीं। अतः साथ-साथ चलने के साथ मनोभावनायें उद्देश्य, विचार एक होने चाहिएं। जिस प्रकार पूर्व समय में देवताओं ने अपने संगठन और एक उद्देश्य से महान् शक्तिशाली असुरों को परास्त किया और स्वर्गीय जीवन प्राप्त किया।
वर्तमान समय में भारतीय जाति के लिए संगठनबद्धता की महान् आवश्यकता है। कुछ समय पूर्व स्वतन्त्र हुए इस महान् राष्ट्र की शक्तियाँ अभी प्रायः बिखरी हुई हैं। विचार भावनायें पृथक-पृथक हैं जिनके फलस्वरूप, राजनैतिक आन्दोलन, प्रान्तीयता, भाषा आन्दोलन, साम्प्रदायिकता, जातिवाद आदि का दूषित वातावरण फैल रहा है। यह हमारी प्रगति, विकास, उत्थान एवं सुख-शान्ति के लिए भारी विघ्न है, जो हमें ही खाये जा रहा है। अतः सभी देशवासियों को इसके रहस्य को जान कर परस्पर संगठन, सामूहिकता, एकता को अपनाना चाहिए। उक्त दूषित तत्वों से बचकर संगठन के लिए आवश्यक तत्वों को प्रोत्साहन देना चाहिए। इसी में हमारी उन्नति, प्रगति सम्भव है। “संघे शक्ति कलौयुगे” में संगठन का महान् रहस्य छिपा हुआ है आज जिसका संगठन है वही शक्तिशाली है। संगठन रहित कितनी भी शक्ति संपन्नता, बल वैभव क्यों न हो उसका आज कोई मूल्य नहीं है—
साहस को ठीक ही मानवीय सद्गुणों में सर्वप्रथम स्थान दिया गया है, क्योंकि कहा गया है कि यह ऐसा गुण है जिसके प्राप्त होने पर अन्य सब गुणों का होना निश्चित हो जाता है।
—चर्चिल
समाज, शारीरिक संस्था है। जिस प्रकार शरीर में प्रत्येक अवयव का संबंध है, उसी प्रकार समाजगत प्रत्येक व्यक्ति समाज-सूत्र द्वारा एक दूसरे में बँधा हुआ है।
—हर्बट स्पेन्सर
एक आदमी मृत्यु का मुकाबला तो बिना डरे कर सकता है किन्तु नैतिक बातों में परिपाटी से बाहर जाने की उसमें हिम्मत नहीं होती।
—एनातोले फ्राँस
(प्रो. ओमप्रकाश गुप्त एम. ए. एल. एल. बी.)
मन की शाँति मिल गई, तो सफलता, सुख, वैभव इत्यादि सब कुछ मिल गया—आज का युग तो काफी सीमा तक अशाँति का युग है। मनुष्य को मालूम नहीं कि वह धर्म का आश्रय ले या विज्ञान का। पुरातन मूल विश्वास, धारणाएँ, काफी हद तक प्राणशून्य हो चुकी हैं और उनका स्थान भी अन्य मूल, विश्वासी और धारणाओं ने जम कर, स्पष्ट रूप में नहीं लिया है। आजकल तो मानों सभी कुछ अस्थिर है। रूढ़िगत धर्म में विश्वास तो बहुत पहले से ही जा चुका था, किन्तु आज तो विज्ञान की उपादेयता में भी काफी संदेह किया जाता है। विज्ञान का सम्बल तो वैसे भी नहीं लिया जा सकता, क्योंकि इसका कार्य ‘मूल्य-निर्धारण’ तो है ही नहीं। रोटी की समस्या भी काफी कठिन हो गई है। परिवार को पालन के लिये बड़े-छोटे सभी को किसी न किसी प्रकार का कार्य धनोपार्जन के लिये करना पड़ता है। संबंधियों में आपस में वह स्नेह-अनुराग भी नहीं रहा जो कदाचित् पहले के समय में रहता हो। मानव की भौतिकता और स्वार्थपरता अपनी सीमा का अतिक्रमण कर चुकी है। सहृदयता, सहानुभूति, सहिष्णुता, उदारता—इत्यादि की सद्वृत्तियाँ मानो लोप हो रही हैं।
आज पैसा ही पैगंबर बन गया है। इस पैसे की दौड़ में हम अपने शरीर, शान्ति, स्नेह—किसी की भी तनिक परवाह नहीं करते। न तो हमें अपनी आरोग्यता का ख्याल रहता है और न हमें अपने बीबी-बच्चों के प्रति ही अनुराग प्रदर्शित करने का समय है।
काम-वासना की भावना के प्रचार और प्रसार ने भी हमें काफी हद तक पथ भ्रष्ट किया है। आज के उपन्यास इस भावना को उत्तेजित करने में काफी सीमा तक सफल हुए हैं। आज के युवक को जीवन में ‘रोमाँच’ चाहिये—कुछ गर्म, रंगीन, सुगन्धित वातावरण अपने चारों ओर युवतियों को अपने जाल में फँसाना तो उसकी एक प्रिय हाबी हो गई है। आप कहीं भी चले जायें—क्लब में, स्टाफ रूप में, साहित्य गोष्ठी में, सेक्स की चर्चा ही प्रधान रूप से मिलेगी।
कहने का अर्थ यह है कि आज चारों ओर अशान्ति, अविश्वास, शुष्कता का साम्राज्य है।
मन की अशान्ति को दूर करने के निम्नलिखित पाँच साधन हैं—
परिस्थिति के अनुरूप अपने को ढालना।
शरीर का पूरा-पूरा ध्यान रखना।
“स्वार्थ-केन्द्रित” न रहना।
आशावादी होना।
परम सत्ता के न्याय में विश्वास रखना।
प्रथमतः हमें चाहिये कि हम अपने आपको परिस्थिति के अनुरूप ढालें और जिस परिस्थिति में हों उससे असन्तोष या घृणा न प्रकट करें। दिन कभी एक से नहीं रहते। पथ कभी सम होता है, कभी विषम। हमें चाहिए कि हम दुःख के विम पथ पर धैर्य न खो बैठें। प्रत्येक परिस्थिति की अपनी-अपनी हानि होती है और अपना-अपना लाभ। संसार की कोई भी ऐसी परिस्थिति नहीं जिसका कुछ न कुछ लाभ न हो। हमें लाभ की ओर ही ध्यान देना चाहिये। जिन मजदूरों को मिट्टी में कार्य करना पड़ता है, स्वास्थ्य भी तो उन्हीं का बढ़ता है। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि हमें परिस्थिति को बदलने या अनुकूल बनाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये। ज्ञान तो केवल यही है कि हमें प्रतिकूल परिस्थिति में हिम्मत नहीं खो बैठना चाहिये और जब हम देखें कि परिस्थिति में तब्दीली आती ही नहीं, तो हमें उस परिस्थिति से संतोष करना चाहिये। नीच वह नहीं जिसका कार्य आप नीच बतलाते हैं, किन्तु नीच वह है जो अपने कार्य में चाहे वह कार्य कितना ही छोटा हो, दिलचस्पी नहीं लेता और केवल काम-चलाऊ काम करता है।
इस जिंदगी में कभी पक्की सड़कें आती हैं और कभी कच्ची। हमें दोनों प्रकार की सड़कों को अपनाना है, सहर्ष और एक जैसे उत्साह से। कभी खीर खानी है; तो कभी चने चबा कर ही काम चलाना है। कभी फूलों के बिछौने पर सोना है तो कभी कंटकों की सेज भी अपनानी है। शान्ति प्राप्त करने का यही प्रथम साधन है कि हम अपने को प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित न होने दें।
दूसरा साधन है शरीर की सुरक्षा। शरीर को स्वस्थ-सुरम्य बनाना तो हमारा प्रथम धर्म है। यदि शरीर में कोई विकार उत्पन्न हो गया, तो मन तो अपने आप विकार-ग्रस्त हो जायेगा। हम भारत के लोग आत्मा-आत्मा का तो नारा अवश्य लगाते रहते हैं, किन्तु तन का विशेष ख्याल नहीं रखते। शरीर के स्वस्थ रहने पर ही, आत्मा स्वस्थ रहेगी। शरीर को स्वस्थ रखने के लिये यह परमावश्यक है कि हम यथाशक्ति कार्य करें और अधिक पैसा कमाने या विकास का अधिक आनंद लेने की धुन में शरीर का क्षय न करें, कार्य करने के समय कार्य करें और खेलने के समय खेलें। मन बहलाने के साधनों का पर्याप्त एवं उचित प्रयोग करें। चिंता तो शरीर के लिये घोर अनिष्टकारी है। इसका त्याग भी परमावश्यक है। जो शरीर औषधियों का गुलाम बन जाता है, वह कभी भी नीरोग नहीं रह सकता और न पूर्ण रूप से कार्य कर सकता। हमें शुद्ध चीजों का ही सेवन करना चाहिये।
तीसरा साधन यह है कि हम एक सीपी में रहने वाले जीवन की तरह “स्वार्थ केन्द्रित” न हों—सदा अपने स्वार्थ की ही बात नहीं सोचनी चाहिये, समाज, राष्ट्र का भी ख्याल करना चाहिये। उसका मन कभी भी शान्त-सुखद नहीं हो सकता जो सदा अपने ही लाभ के साधन क्रम जुटाता रहता है और जो अपने मित्रों को या अपनी स्त्री को अपने-केवल अपने ही-सुख का साधन-मात्र समझता है। स्वार्थरत प्रवृत्ति के लोग न केवल अपना ही नाश करते हैं किन्तु उन सब लोगों के लिये भी घोर अनिष्टकारी साबित होते हैं जो उनके संपर्क में आते हैं। ऐसे लोगों का पारिवारिक जीवन तो कभी भी सफल नहीं होता। मनुष्य को उदार, परोपकारी, सहानुभूतिमय होना चाहिये। जो आदमी दूसरे के हित की बात सोचता रहता है, उसे अपने दुःखों और अभावों का तो ख्याल ही नहीं रहता। इसीलिये उसके मन की शाँति बहुत कम भंग होती है। जो लोग अपने कमरों में अपने सिरों को झुकाये मुँह फुलाये बैठे रहते हैं और दूसरों से विचार-विनिमय करने के लिये बहुत कम अपने घरों से बाहर निकलते हैं, उनका सुखी और शाँत रहना काफी दुष्कर है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है; उसकी मानसिक एवं आत्मिक उन्नति तभी सम्भव है जब वह समाज में विचरता है और उस से लेन-देन का व्यवहार बनाये रखता है।
चौथी बात यह है कि हमें आशावादी होना चाहिये। जिस प्रकार पतझड़ के पश्चात् बसन्त का आगमन अवश्यंभावी है, उसी प्रकार दुःख के पश्चात् सुख का प्रकट होना स्वाभाविक है। दुःख की घड़ी बैठी नहीं रहती, कुछ समय के पश्चात् गुजर जाती है। दिन एक जैसे नहीं रहते, अच्छे दिन भी आते हैं। मनुष्य को धैर्य से काम लेना चाहिये, समय के साथ बिगड़ी भी बन जाती है। सबर एक बड़ा गुण है। दुःख की घड़ी का भी तो अपना लाभ होता है। वह हमारे “व्यक्तित्व का परिमार्जन करती है, हमारी योग्यताओं को अभिव्यक्ति का अवसर देती है भीषण से भीषण आपत्ति का भी कुछ न कुछ कुछ लाभ अवश्य हो सकता है। यदि दुःख का क्षण टले ही नहीं, तो इस संसार में जीवन ही असम्भव हो जाये।”
पाँचवाँ उपाय है—परम सत्ता के न्याय में विश्वास रखना। हमें कदापि भी नहीं भूलना चाहिये कि यह संसार भी किसी विधान के अनुसार परिचालित है और वह विधान पूर्ण, सर्व हितकारी है। हम प्रतिदिन क्या देखते हैं? यदि किसी की हानि होती है तो उसे लाभ भी होता है। जहाँ मृत्यु है, वहाँ जन्म भी है, इस दुनिया में अंधेर नहीं है। हाँ यदि हम ‘स्वार्थ-को हित’ हो कर सोचना आरम्भ करें, तो हमें चारों ओर अंधेर नजर आयेगा। मनुष्य को चाहिये कि वह सामाजिक दृष्टिकोण से सोचे, दुनिया का नागरिक बने।
(श्री. भगवान सहाय वाशिष्ठ)
आध्यात्मिक ज्ञान अथवा आत्म-विद्या भारत वर्ष की विशेषता है। यहाँ बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा व्यक्ति भी इस सम्बन्ध में कुछ न कुछ विचार रखता है और उन बातों की महत्ता को स्वीकार भी करता है। इस मनोवृत्ति के कारण इस देश में साधु, महात्माओं का बड़ा मान है। उच्चकोटि के विद्वान अथवा तपस्वियों की तो क्या बात, साधारण साधु वेषधारी लोग भी यहाँ जन-श्रद्धा के आधार पर सम्मान और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते रहते हैं। इतना ही नहीं बहुसंख्यक धूर्त, ढोंगी और ठग श्रेणी के व्यक्ति भी इस वेष में अपने को छिपाकर सर्व साधारण के पूजनीय बन बैठते हैं और जब तक किसी घटनावश उनका भंडा फोड़ नहीं होता तब तक मौज करते रहते हैं। इस सबके मूल में यही भाव काम करता है कि हमारे देश में सदा से बड़े-बड़े साधु, महात्मा, योगी, सिद्ध पुरुष होते आये हैं और वे इसी वेष में रहते थे। इसलिये लोग किसी भी साधु वेषधारी को देखकर सोचते हैं कि कहीं यह भी कोई पहुँचा हुआ महात्मा न हो और इसकी सेवा से हमारी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकें।
इसमें तो सन्देह नहीं कि हमारे यहाँ प्राचीन काल से बड़े-बड़े त्यागी और तपस्वी महात्मा होते आये हैं, जिन्होंने लोगों के कल्याण के लिये अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया और अनगिनत व्यक्तियों को आपत्तियों से मुक्त किया। यहाँ पर ऐसे महापुरुषों का भी आविर्भाव हो चुका है जो मुक्ति प्राप्त करके भी संसार में केवल इसी कारण बने रहे जिससे कि उनके द्वारा साधारण मनुष्यों को उन्नति-मार्ग में सहायता मिलती रहे। पुराणों में हमको ऐसे महान व्यक्तियों के नाम भी मिलते हैं जो अमर-पद को प्राप्त कर चुके हैं और आज भी संसार के किसी भाग में और किसी भी रूप में रहकर भूमंडल की व्यवस्था में सहयोग कर रहे हैं। पर हमारे देश में बीच के समय में शिक्षा का अभाव हो जाने के कारण इन सब बातों का वास्तविक रहस्य लोग भूल गये और इस सम्बन्ध में तरह-तरह की भ्रमपूर्ण कल्पनाएं करके इनको कहानी किस्से की तरह कहने-सुनने लगे। यही कारण है कि आधुनिक ढंग के पढ़े लिखे व्यक्ति इन बातों को कोरी गप्प समझते हैं और उन्होंने विशिष्ट शक्ति सम्पन्न महापुरुषों अथवा सिद्ध महात्माओं पर विश्वास करना ही छोड़ दिया है। पर इधर कुछ समय से इस देश और विदेशों के अनेक शिक्षित व्यक्तियों के मन में आध्यात्मिक भाव का उदय हुआ है और वे इन विषयों की खोज तथा व्याख्या करके कितने ही छिपे हुए रहस्यों का उद्घाटन कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में थियोसॉफिकल सोसायटी (ब्रह्म विद्या-समाज) के कितने ही संचालकों तथा साधकों ने विशेष रूप से श्रम किया है और संसार की व्यवस्था में भाग लेने वाले इन “महात्माश्रों” का सर्वांगपूर्ण विवरण अपनी पुस्तकों में लिखा है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने जो कुछ लिखा है वह ज्यों का त्यों ठीक है, पर इतना अवश्य है कि उनकी बातें कम से कम बुद्धिसंगत ढंग से कही गई हैं। आध्यात्मिक ज्ञान से शून्य अथवा उसके विरोधी लोगों के लिये तो इस प्रकार की बातें सर्वथा निरर्थक और निराधार कल्पना के सिवाय कुछ नहीं हो सकतीं, पर जो लोग इस भूमि की आध्यात्मिक शक्ति पर विश्वास रखते हैं और “हिमालय के दुर्गम भागों में रहने वाले महात्माओं “ के चमत्कारों का वर्णन कहते और सुनते रहते हैं उनके लिये यह वर्णन निस्सन्देह अत्यन्त आकर्षक जान पड़ेगा।
थियोसॉफी सिद्धान्त के अनुसार पवित्रता के मार्ग के चार दर्जे हैं—1 श्रोतापत्ति, 2 सकृदागामी, 3 अनागामी और 4 अर्हत्। इनको सिद्ध करके इनसे आगे का—अशेष नाम का पद प्राप्त करने से मनुष्य उतनी उन्नति साध चुकता है जितनी इस कल्प में साधनी चाहिये। फिर उसे इस पृथ्वी पर या किसी दूसरे गोले (ग्रह) पर जन्म लेने की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसे मनुष्य के सामने जब सात मार्ग आते हैं जिनमें से वह कोई भी एक ग्रहण कर सकता है। उनमें से बहुत मार्ग तो ऐसे हैं कि जिनको ग्रहण करने से मनुष्य इस पृथ्वी को छोड़ कर दूसरे भारी कामों में लगता है। शायद वे काम सारे सौर-मंडल से संबंध रखते हैं। इसलिये जो लोग अभी तक अशेष पद को प्राप्त हो चुके हैं उनमें से बहुतों का हाल हम लोगों को मालूम नहीं हो सकता।
बाकी के जो लोग हम नरतन धारियों के लिये कार्य कर रहे हैं उनके दो विभाग हो सकते हैं, एक स्थूल देहधारी और दूसरे वे जिन्हें स्थूल देह नहीं है वे “निर्वाण काय” कहाते हैं। मान लो कि वे इस भूलोक और निर्वाणलोक के बीच में स्थित हैं। वे मनुष्य जाति के कल्याणार्थ आत्मिक बल उत्पन्न करने में अपना सारा समय बिताते हैं। यह बल या शक्ति एक कुण्ड में जमा होती है और पृथ्वी पर स्थित महात्मा तथा उनके शिष्य मनुष्य जाति के हित के जो कार्य करते हैं उनमें से इस बल का उपयोग करते हैं।
स्थूल देहधारी महात्माओं की संख्या बहुत थोड़ी है। ये किसी एक देश से संबंध नहीं रखते वरन् इनका कार्य सारे जगत से संबंध रखता है। इस भूलोक में वे सब इकट्ठे नहीं रहते, पर ऊँचे के लोकों में वे एक दूसरे से सदैव मिलते रहते हैं। उन्हें पुनर्जन्म का बंधन तो है नहीं, इसलिये एक शरीर के जीर्ण हो जाने पर ये अपने कार्य की आवश्यकतानुसार जहाँ चाहें वहाँ दूसरा शरीर ग्रहण कर लेते हैं। इसलिये इनका शरीर किस देश का है यह कोई महत्व की बात नहीं। इस समय कई के शरीर तो भारतीय हैं, एक चीन का, दो अंगरेजी, एक-इटली का, एक हंगरी का और एक सीरिया के शरीर वाला है। पर हम फिर यह बतला देना चाहते हैं कि इन लोगों के लिये किसी खास देश का शरीर होना कुछ भी महत्व नहीं रखता। यह वर्णन हमने सिर्फ इसलिये किया है ताकि लोग समझ सकें कि महात्माओं को किसी एक जाति का मानना भूल की बात है।
इस “सिद्ध-संघ” के मुख्य अधिपति के विषय में अधिक कहने में भक्तिवश हमको संकोच लगता है। बड़े महाद्वीपों और खण्डों की व्यवस्था इनके हाथ में है। कोई एक करोड़ अस्सी लाख वर्ष बीते जब कुछ महर्षिगण इस पृथ्वी के विकास-क्रम में सहायता देने यदि यहाँ आये थे। उस समय तक मनुष्य शरीरों की उन्नती बिल्कुल नहीं थी और उनमें यह शान्ति नहीं थी कि वह सिद्ध-सम्प्रदाय में किसी पद के योग्य हो सकता। इस लिए इन शुक्रलोक के महर्षियों ने मानव जाति को उन्नति का मार्ग दिखलाया जिससे धीरे-धीरे यह भी अनेक उन्नती-प्राप्त जीव उत्पन्न होने लगे। तब ये महर्षिगण दूसरे लोकों में वहाँ के विकास में सहायता देने के लिये मुक्त हो गये। पर उनमें एक अब भी हमारे यहाँ सर्वोच्च पद पर अधिष्ठित हैं। इस पृथ्वी के विकास की सब व्यवस्था इन्हीं के हाथ में है, मनुष्य का विकास ही नहीं, वरन् पशु, वनस्पति, खनिज और उसके नीचे के भौतिक वर्ग और सब छोटे-बड़े देव वर्गों के विकास की व्यवस्था भी ये ही करते हैं।
इन अधिपति जो कि नीचे अन्य विभागों की व्यवस्था करने वाले महात्मा हैं उनके कार्यों का पूरा वर्णन कर सकना भी कठिन है। उनमें से एक भूल जाति में “मनु” होते हैं जिनका कार्य बड़ी अड़चनों का होता है। दूसरे धर्माधिपति होते हैं। इस संसार में जहाँ जैसे धर्म की आवश्यकता पड़ती है वहाँ वे वैसा ही धर्म प्रचार करते हैं। कभी इस कार्य के लिये आवश्यकतानुसार अपने किसी शिष्य को भेज देते हैं और कभी स्वयं ही जन्म लेते हैं इन्हें पूर्वीय देशों में बहुधा “बोधिसत्व” कहते हैं। हाल में इस पद पर भी मैत्रेय ऋषीश्वर विराजमान हैं। इनसे पूर्व इस पद पर “गौतमबुद्ध विराजमान थे। “बुद्ध” का पद प्राप्त होने के बाद जीव का इस पृथ्वी पर फिर जन्म नहीं हो सकता और अपना किसी उत्तराधिकारी को अपने काम सौंप कर बहुधा पृथ्वी के संबंध से बाहर चला जाता है। पर भगवान गौतम बुद्ध ने “बुद्ध” पद पाकर भी पृथ्वी को सहायता देने के हेतु से उससे किसी प्रकार का संबंध जारी रखा है। हर वर्ष एक बार सिद्ध-संघ को उनके दर्शन होते हैं और उनका आशीर्वाद मिलता है जिसे वे सारी पृथ्वी में फैला देते हैं। आर्य जाति को आरम्भ की उप जातियों में धर्म की शिक्षा देने के लिये इनके लिये इन्होंने बार-बार जन्म लिया था। मिश्र देश में रहस्य-ज्ञान-समाज का ज्ञान बताने वाले “हर्मीज” ये ही थे। सूर्य और अग्नि की पूजा के पारसी धर्म की स्थापना करने वाले आदि जटदुश्त ये ही थे, ग्रीस देश की रहस्य-ज्ञान-समाज (मिस्टरीज) का ज्ञान प्रकट करने वाले आरफियास ये ही थे। इसी प्रकार इन्होंने और कितने ही धर्मों की स्थापना करके विभिन्न देशों के निवासियों को विकास-मार्ग में आगे बढ़ाया था।
इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि इस जगह का विकास “राम भरोसे” नहीं चल रहा है जैसा लोग बिना विचारे मान लेते हैं। इसके विपरीत जगत की व्यवस्था और शासन विधिविधान के अनुसार बहुत चतुराई से किया जाता है। यह “महात्मा-संघ” इस कार्य को यथासंभव साधता है। मनुष्य की जो स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति है उसमें बाधा न डाल कर जितनी व्यवस्था हो सके उतनी ही ये करते हैं। ये संसार के प्रमुख मनुष्यों के साथ मिल कर काम करने का प्रयत्न करते रहते हैं। ये उनके चित्त में सलाह और सूचनाओं को प्रेरित करते हैं और उनको समस्त जगत के भ्रातृत्व की ओर चलने की प्रेरणा करते हैं जिससे आगे चलकर युद्ध का सर्वथा लोप हो जाय। पर हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि उन्हें सब लोगों के भाग्य-प्रारब्ध का भी विचार करना पड़ता है और उसमें बाधा नहीं डाली जा सकती।
पर सब कुछ होने पर भी ये “महात्मा” हमारे समान मनुष्य ही हैं। उनके शरीर हम लोगों की अपेक्षा बहुत अधिक शुद्ध और पूर्ण हैं जिससे वे हमारे लिये असंभव कार्यों को सहज में करते रहते हैं। वे वास्तव में पर्वतों के ऐसे स्थानों पर आश्रम बनाकर रहते हैं, जहाँ उनकी अनुमति बिना कोई पहुँच नहीं सकता। पर साधन करने से मनुष्य उन तक पहुँच कर उनका कृपा पात्र बन सकता है और उनकी सलाह से बड़े-बड़े कार्यों को सम्पन्न कर सकता है। कहा जाता है कि थियोसोफिकल सोसाइटी की संस्थापिका मैडम ब्लेवटस्की ने तिब्बत के पहाड़ों में स्थित सिद्धाश्रम में रह कर ही अपनी “सीक्रेट डाक्ट्रिन” पुस्तक लिखी थी और उनके बाद इस समाज के और भी कई प्रमुख सदस्य अपने साधन के बल से आश्रम में जाकर महात्माओं के दर्शन कर चुके हैं।
(कुमारी बिमला द्विवेदी बी.ए.)
तंचक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं श्रणुयाम शरदः शतं प्रव्रवाम शरदः, शतमदीनाः स्याम शरदः शतं, भूयश्चशरदः शतात् ॥
यजु0 36, 24
“वह परमात्मा देवों का हित करने वाला हो। (जो) अनादि और विशुद्ध ज्ञान का उपदेश करता है। हम सौ वर्ष के जीवन काल में उसका दर्शन कर सकें। सौ वर्ष के जीवन में इसी ध्येय के लिए जीवित रहें। सौ वर्ष तक के जीवन में हम इस परमात्मा का श्रवण और मनन करते रहें। सौ वर्ष तक के जीवन काल में हम इस परमात्मा का गुणगान गाते रहें। सौ वर्ष के जीवन में हम कभी भी दीनता वृत्ति प्रकट न करें। सौ वर्षों से यदि अधिक जीवन भी मिले तब भी हम अपने जीवनकाल में उक्त कार्य करते रहें।
उक्त वेद मंत्र से ज्ञात होता है कि मनुष्य की आयु 100 वर्ष से कम नहीं वरन् अधिक ही है। इस संबंध में भारत के प्राचीन इतिहास का अवलोकन करने पर पता चलता है कि रामायण और महाभारत काल में मनुष्यों की आयु 100 वर्ष से अधिक होती थी। महाभारत के अधिकतर पात्र 100 वर्ष से अधिक आयु के थे। यहाँ तक कि इच्छामृत्यु के भी उदाहरण मिलते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्य की आयु 100 वर्ष है। “शतापूर्वे पुरुषाः” यह वेद भगवान की साक्षी है। उस समय केवल सौ वर्ष की आयु ही नहीं होती थी वरन् जीवन की अन्तिम अवस्था तक शरीर में शक्ति, स्फूर्ति, तेज बने रहते थे।
हमारी सौ वर्ष की आयु और उसमें भी शक्ति, सामर्थ्य, तेज, ओज आदि होने का एक कारण यह था कि मानव जीवन को बड़े सुव्यवस्थित एवं मर्यादापूर्ण नियम में बाँधा गया था जिनको धार्मिक माध्यम से प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक निर्धारित किया गया। इनमें आश्रम व्यवस्था भी एक थी। भारतीय ऋषियों ने दूरदर्शिता और बुद्धिमतापूर्वक आश्रम व्यवस्था बनाई थी। जीवन को चार भागों में विभक्त कर ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास इन चार आश्रम के विभिन्न धर्मपालन करते हुए 100 वर्ष जीने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इन चारों आश्रमों का यथाविधि पालन किया जाय तो मनुष्य को सौ वर्ष की आयु एवं सुन्दर स्वास्थ्य, शक्ति, सामर्थ्य आदि की प्राप्ति हो! प्रत्येक आश्रम में 25 वर्ष तक जीवन बिताना आवश्यक बताया गया है। आश्रम व्यवस्था के अनुसार आचरण करने से जहाँ जीवन में शतायु, शक्ति, बल आदि की वृद्धि होती है वहाँ मनुष्य जीवन के अन्य अंगों का भी विकास होता है। अस्तु प्रत्येक आश्रम के बारे में आवश्यक जानकारी करना चाहिए।
ब्रह्मचर्याश्रम :—ब्रह्मचर्याश्रम जीवन के प्रारम्भिक 25 वर्षों तक पालन किया जाता है। इन 25 वर्षों में मनुष्य के लिए ब्रह्मचर्यपूर्वक रहने का आदेश है। इसके साथ-साथ अपनी विभिन्न शक्तियों को विकसित करने एवं बढ़ाने का भी अवसर यही है। ब्रह्मचर्याश्रम मानव जीवन का सर्वांगीण विकास होता है। पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन शतायु होने के लिए अत्यावश्यक बताया गया है। ब्रह्मचर्य ही मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है कहा भी गया है “ब्रह्मचर्यतपसाँ देवा मृत्यु भुपाघ्नतः”। ब्रह्मचर्य तप से देवताओं ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की। अतः ऋषियों ने मनुष्य को शतायु होने के लिए सर्व प्रथम 25 साल तक ब्रह्मचर्याश्रम में रहने की आज्ञा दी जिससे शक्ति संचय, स्वास्थ्य तेज, बल स्फूर्ति आदि की वृद्धि होकर सौ वर्ष तक के सुखी जीवन का निर्माण होता है।
गृहस्थाश्रम :—मानव जीवन की दूसरी अवस्था 25 से 50 वर्ष तक गृहस्थाश्रम में प्राप्त शिक्षा, ज्ञान, स्वास्थ्य, अनुभव आदि से अपने गृहस्थ जीवन को सफल बनाया जाता है। गृहस्थाश्रम में आवश्यक नियमों का पालन कर संयमी, सदाचारी नैतिक एवं पवित्र जीवन बिताना आवश्यक है। गृहस्थाश्रम में आवश्यक नियमों का पालन करता हुआ मनुष्य सौ वर्ष तक जीने का अधिकारी होता है। गृहस्थ संचालन के लिए किये जाने वाले परिश्रम, पुरुषार्थ, व्यस्तता, परस्पर सहयोग, परम पिता परमात्मा के इस सृष्टि उद्यान में उसका युवराज बनकर आनन्द भोग करना आदि मनुष्य जीवन में सरसता, सुन्दर स्वास्थ्य, शक्ति, उत्साह, आत्मविश्वास आदि को बनाये रखते हैं जिससे मनुष्य शतायु को प्राप्त होता है।
वानप्रस्थाश्रम :—मानव जीवन की तीसरी अवस्था 50 से 75 वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम में बिताने की आज्ञा है। जिसमें वह लोक कल्याण, जनहित परोपकार आदि में जीवन बिताये। इस आश्रम में मनुष्य को ब्रह्मचर्यपूर्वक रहने का भी आदेश है। इस प्रकार परमार्थ साधना में रत, देश और समाज के कल्याण के लिए अथक परिश्रम, आदि मनुष्य जीवन में नवीन उत्साह, स्वास्थ्य, उच्च भावनायें शक्ति आदि को बनाये रखते हैं। साथ ही ब्रह्मचर्य का पालन भी जीवन शक्ति को नष्ट होने से बचाकर बढ़ाने में सहायक होता है। वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य का आत्म संबंध विस्तृत होकर अखण्ड देश प्रेम, समाज सेवा, राष्ट्रभक्ति आदि से मनुष्य में आत्मबल साहस, सहनशीलता, समानता, उदारता, शक्ति पुरुषार्थ की निर्झरिणी बहती रहती है जो उसकी उम्र को बढ़ाती है। यही कारण था कि महात्मा गाँधी कहते थे “मैं 125 वर्ष तक जिन्दा रहूँगा।”
संन्यास आश्रम :—मनुष्य जीवन में अन्तिम आयु 75 से 100 तक संन्यास आश्रम में बिताना चाहिए। इस अवस्था में मनुष्य का आत्म विस्तार समस्त विश्व ही नहीं चराचर मात्र के लिए हो जाता है। उसका जीवन सेवा, परमार्थ एवं कल्याण का प्रत्यक्ष स्वरूप बन जाता है। संन्यासी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं, सुख-दुःखों की परवाह न करते हुए निरन्तर जनहित, जनसेवा में प्रवृत्त हो जाता है। उसके अन्तःकरण में प्राणिमात्र की सेवा के लिए प्रबल भावनाएँ जाग उठती हैं जिनके संयोग से उसकी शान्ति, सामर्थ्य, स्वास्थ्य, प्रतिभा अनेकों गुना बढ़ जाती है। प्रकृति भी अपनी मर्यादाओं का व्यतिरेक कर उस सर्वजनहिताय, परमार्थगामी, विश्वबन्धु संन्यासी को अनुकूल परिणाम प्रदान करती है। फलतः उसकी आयु क्षीण नहीं होती और पूर्ण आयु प्राप्त होती है। इस प्रकार वह शतायु को प्राप्त होता है।
आश्रम व्यवस्था की उक्त भूमिका मनुष्य की आयु को 100 वर्ष का माध्यम मान कर की गई है। इससे अधिक होना भी कोई विशेष बात नहीं है। कम से कम सौ वर्ष तक जीने का प्रत्येक को अधिकार है जो इससे कम आयु को प्राप्त होता है उसका उत्तरदायित्व स्वयं उसी पर ही है, न कि अन्य किसी शक्ति पर। 100 वर्ष तक जीना मनुष्य का जन्म सिद्ध अधिकार है।
खेद है कालान्तर में जिस भारत भूमि में शतायु एवं सौ से अधिक आयु प्राप्त की जाती थी उसकी औसत आयु आजकल करीब 72 वर्ष है। भारतीय जाति अल्पायु हो गई है। जिस जाति का शरीर महान् शक्ति एवं सामर्थ्य का केन्द्र, जिसके चेहरे पर अदम्य उत्साह, तेज, वीरता, झलकती थी वह जाति आज निरुत्साह, निर्बल, तेजहीन होती जा रही है। इसका एक कारण आश्रम व्यवस्था का बिगड़ जाना भी है। आज कम उम्र में ही ब्रह्मचर्य नष्ट होता है, साथ ही प्रकृति विरुद्ध आचरण, असंयम, आहार-विहार आदि अन्य कारण भी हैं। किन्तु इसमें प्रमुख आश्रम व्यवस्था भी बिगड़ जाती है। यदि हम शतायु होना चाहते हैं, शक्तिशाली, सामर्थ्यवान, पुरुषार्थी होना चाहते हैं तो जीवन में आश्रम व्यवस्था को अपनाना होगा। आश्रम व्यवस्था से शून्य निरुद्देश्य भार रूप जीवन शीघ्र ही समाप्त हो जाता है वह अधिक नहीं टिक सकता। अतः जीवन की बारीकियों का सूक्ष्म दृष्टि से अनुशीलन करने वाले तत्वदर्शी ऋषि-महर्षियों की बनाई गई आश्रम व्यवस्था हमारे लिए सुखी जीवन प्रदान करेगी, यह सत्य है, निभ्रान्त है और अनुभव सिद्ध है जिसका बहुत पहले से ही परीक्षण किया जा चुका है। हमें भी दीर्घजीवी बनने के लिए इसी का अवलंबन करना हितकर सिद्ध होगा।
(श्री माताप्रसाद पाण्डेय)
चेतनता और मन दोनों एक ही वस्तु हैं, एक ही वस्तु के भिन्न-भिन्न दो नाम हैं। मन, चेतनता, जीवनी-शक्ति सब एक ही हैं। स्मरण रहे, कि जीवनी-शक्ति या मन, विश्वास और संकल्प के ऊपर संसार की सारी वस्तुओं में काया पलट कर सकता है। मन में अपार शक्ति है, मनोबल द्वारा शरीर के तमाम रोग दूर हो जाते हैं। लेकिन उनमें विश्वास की मात्रा किसी हालत में भी कम न होनी चाहिये। भावना सच्ची और प्रखर हो, यद्यपि भावना के अनुसार रूपांतर शनैः-शनैः होता है, तथापि वह अपना असर बिना दिखाये नहीं रह सकती।
अतः आप प्रातःकाल उठते ही सच्चे मन से संकल्प कीजिये कि अमुक रोग हमारा नाश हो जाय और शरीर के प्रत्येक अंगों पर हाथ फेरते जाइये और सच्ची भावना से कहते जाइये, “मैं निरोग हूँ! मेरे शरीर के अन्दर किसी प्रकार का भी रोग नहीं। मैं सुन्दर हूँ। मैं हृष्ट-पुष्ट हूँ। मेरी पाचन क्रिया बिल्कुल ठीक है। मैं जो कुछ भोजन करता हूँ, वह सर्वांश में पच जाता है और इससे शुद्ध खून, माँस, मज्जा एवं वीर्य बनता है, जिससे मैं निरोग और स्वस्थ हो रहा हूँ। मैं वीर्यवान, भाग्यवान, आरोग्यवान् हो रहा हूँ। मेरे शरीर के अन्दर से आरोग्यता झलक रही है”, लेकिन मित्रो! स्मरण रहे, विश्वास की कमी किसी भी हालत में न होनी चाहिये। तत्पश्चात आप शौचादिक क्रिया के लिये चले जाइये। ऐसा संकल्प प्रतिदिन करने से आपके शरीर पर एक विचित्र ही झलक आने लगेगी और आप देखते-2 निरोग और सुन्दर बन जायेंगे और आपके संकल्प के अनुसार आपका मन आपके शरीर के तमाम अणुओं को ऐसा बना डालेगा कि आप सर्वदा के लिये रोग-मुक्त हो जायेंगे और आपके ऊपर रोगों का कुछ भी बस न चलेगा।
विश्वास की दृढ़ता में कमी होने से कुछ अधिक देर लगती है, पर भावना शरीर के अणुओं पर बिना प्रभाव डाले नहीं रुक सकती; मनोबल एक विचित्र बल है। ज्यों ही आप कहेंगे कि अमुक रोग हमारा दूर हो जाय, त्यों ही उस रोग के अणु बदलने लगेंगे, मन में ऐसी शक्ति है कि उसमें आरोग्य की भावना आते ही शरीर के अणु-अणु में एक विचित्र शक्ति पैदा हो जाती है और वह शरीर के प्रत्येक अणु की गति को रोग की ओर से मोड़कर, आरोग्यवान् बना देती है। प्रिय पाठको, याद रहे, रोग का कारण केवल अज्ञान है। रोग भ्रममात्र है। भ्रम क्या है? भ्रम यह है कि लोग यह समझते हैं कि रोग का होना अनिवार्य है, यह भगवान की देन है। भला सोचने की बात है कि “भगवान की देन है”—ऐसा अंध-विश्वास करना क्या हमारे लिये लाभदायक है? कभी नहीं, हम कितनी भूल कर बैठते हैं। धन और प्राण दोनों डाक्टरों को देकर उनका दासत्व ग्रहण कर लेते हैं। लेकिन हम यह नहीं सोचते कि हमारे पास कितनी बड़ी शक्ति उपस्थित है। जिसके द्वारा हम बड़े से बड़े रोग को भी हटा सकते हैं। यह भेद या सच्चा ज्ञान जब तक छिपा रहेगा, तब तक मनुष्य रोग ऐसे भयंकर काल से छुटकारा नहीं पा सकता। सच्चा ज्ञान मनुष्य को सब बन्धनों से मुक्त कर पूर्ण स्वतन्त्र कर देता है।
शरीर पर मन का जो प्रभाव पड़ता है, वह किसी से छिपा नहीं है, हम जिस बात की मन से इच्छा करते हैं, वह तत्क्षण होकर ही रहती है। जैसे मैंने सोचा, हाथ सिकोड़ या हाथ फैलाऊँ, वह तुरंत होकर रहता है। आप भी विचार करें, क्या हाथ को फैलाने या सिकोड़ने के लिये कोई दूसरा हाथ होता है। नहीं, तो? केवल इच्छा-शक्ति ही इतना कर दिखलाती है। इच्छा होते ही शरीर का प्रत्येक यन्त्र भौंरे के समान नाचने लगता है। शरीर के प्रत्येक यन्त्र, प्रत्येक अंग, प्रत्येक अणु को चलाने वाली केवल मन की इच्छा-शक्ति ही है। अब आप भली भाँति समझ गये होंगे कि मनोबल कितना बड़ा बल है। मन का प्रत्येक परिवर्तन शरीर के ऊपर बिना प्रभाव डाले नहीं रहता। मन में क्रोध आते ही आँखें लाल हो जाती हैं, मन में भय का संचार होते ही सारा शरीर काँपने लगता है, कभी-कभी अधिक डर जाने से असाध्य ज्वर चढ़ जाता है।
इस पर आँखों से देखा हुआ दृष्टान्त पाठकों के सामने रख रहा हूँ।
आज से 6 वर्ष पहले मैं सुल्तानपुर जिले में, अमेठी तहसील, टीकर नामक जंगल में एक महात्मा की संगति में रहता था, इनका नाम ‘अलापी बाबा’ था, वे अब भी विद्यमान हैं। इस भयानक जंगल में यह महापुरुष अपनी तपस्या के बल पर निवास करते हैं।
लेख बढ़ने के भय से अधिक न लिखकर इतना ही लिख देना पर्याप्त होगा कि एक पहुँचे हुए महात्मा हैं। मैं इनके यहाँ सत्संगति के लिये रुका हुआ था, उस जंगल के पास एक बहुत बड़ा ऊसर है। उस लंबे-चौड़े ऊसर में एक बहुत बड़ा पीपल का वृक्ष भी है। मैं प्रतिदिन शाम को टहलते हुए उसी पीपल की ओर चला जाता, उस पीपल के पश्चिम की ओर एक छोटा-सा सिंगोर का वृक्ष अतीव गछनार मैंने देखा, वह मुझे अतीव भला मालूम हुआ, मैं प्रतिदिन उसी के नीचे जा बैठता और मुँह अँधेरा होते-होते वहाँ से वापिस लौट आता। एक दिन दैव-वशात् मैं वहाँ पर कुछ देरी तक ठहर गया। अँधेरी रात थी, उस भयानक ऊसर में मैं एक झाड़ी में बैठा अपने काम में व्यस्त था, अचानक मेरी निगाह उस पीपल के वृक्ष के नीचे जा पड़ी। मैंने वहाँ पर आपस में दो आदमियों को वार्तालाप करते देखा, जिसमें एक के हाथ में रस्सी से बँधी हुई ठंडी थी, उस हंडी में सुलगती हुई अग्नि मालूम हो रही थी। मेरे देखते-2 वे दोनों आदमी पीपल के पेड़ पर चढ़ गये। मुझे आश्चर्य हुआ, बात क्या है, मुझे प्रतीत हुआ इसमें कुछ कौतूहल अवश्य है। यह कौतूहल देखने के लिये मुझे और कुछ देर रुक ही जाना पड़ा। चारों ओर अंधेरी रात साँय-साँय कर रही थी, बड़ा डर मालूम हो रहा था, मैं टकटकी लगाये उसी पीपल की ओर देख रहा था, अचानक पूर्व की ओर से एक सुन्दर नौजवान को एक झपेली में कुछ लिये आते देखा। वह पुरुष पीपल के तले आकर ठहर गया, देखते-2 उसने अपने सारे वस्त्रों को अलग उतार कर रख दिया, एक लंगोटे के सिवा उसके शरीर पर और कुछ न रहा। अपनी बड़ी सावधानी के साथ पीपल पर जल चढ़ाया, फूल चढ़ाया, धूप-दीप किया, तत्पश्चात् हाथ जोड़कर एक पाँव के सहारे खड़ा होकर ध्यानपूर्वक कुछ प्रार्थना करने लगा। इसी बीच में उसके आगे दहकती हुई आग से भरी हंडियाँ गिरी। वह डर कर “हा माँ” ऐसा कहता हुआ भागा, और कुछ दूर जा कर लड़खड़ाते हुये जा गिरा, पुनः संभाल कर उठा और चिल्लाता हुआ भाग गया। पश्चात पीपल पर से वे दोनों आदमी भी उतर कर उसके कपड़े, पूजा का सामानभयडडडडडड झपोली के लेकर चले गये। मैं भी इस कौतुहल को सोचता हुआ स्वामी जी के पास आकर ज्यों का त्यों कह सुनाया; लेकिन श्री स्वामी जी ने कुछ ख्याल न किया। इसी के 10 वें दिन मैं स्वामी जी के पास बैठा पंखा कर रहा था कि अचानक दो आदमी स्वामी जी के पास आकर रोने लगे और रो-रो कर अपने लड़के की बीमारी का कारण, भूतपूर्व कथानुसार डर जाना बतलाये। मैं समझ गया, हो न हो वही बात है, जो मैंने अपनी आँखों देखी थी। बाद में कुछ बात खुली, वह रोगी भी लाया गया; वे दो आदमी भी बुलाये गये। रोगी के सामने सच्ची घटना का वर्णन प्रमाणों के सहित किया गया; उसके कपड़े दिये गये; अब उसे विश्वास हो गया कि मामला कुछ और ही है। वह रोगी अच्छा हो गया। बाद में पता चला कि वह व्यक्ति प्रतिदिन पीपल के तले जाकर श्मशान देवी की पूजा किया करता था। साथियों के छेड़ने पर उसने कहा कि मुझे जरा भी डर नहीं मालूम होता, जिसके कारण उसके साथियों ने वैसा किया। भला सोचिये तो, भय का परिणाम कितना भयंकर हुआ, जिससे जान पर बन आई। पूर्वोक्त घटना से पाठक भलीभाँति समझ गये होंगे, कि मन में भय का उत्पन्न हो जाना शरीर के लिये कितना घातक है। मनुष्य बैठे-2 कुछ न कुछ सोचा करता है; सोचते समय उसके विचार जैसे परिवर्तित हुआ करते हैं, वैसे उसके मुख की आकृति भी बनती जाती है। उसके हर्ष-विषाद के चिन्ह उसके मुँह पर साफ-साफ दिखाई पड़ते हैं; जिससे अनुभवी मनुष्य तत्काल बता देते हैं कि इसके विचार कैसे हैं। मन की दशा और स्वास्थ्य का कितना घनिष्ठ संबंध है, इसको आप समझ गये होंगे। इसलिये नित्य दुःखी या चिन्तित भी रहना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। जिन लोगों पर व्याधि का वहम चढ़ा रहता है, वे शीघ्र बीमार पड़ जाते हैं। दुःख या रोग का जितना अधिक चिन्तन करोगे, उतना ही अधिक सतायेंगे। रोग का स्मरण ही न करो, उसे अपने पास फटकने तक न दो, स्वप्न में भी उसकी ओर न देखो, उसकी कल्पनामात्र तक न करो। अगर भूल से कोई रोग हो जाय तो संकल्प द्वारा हटाओ, मन की इच्छा-शक्ति द्वारा सभी रोग हट सकते हैं।
यदि आप विश्वास के साथ इच्छा करें कि हम नीरोग हैं, तो आपके विश्वास के साथ वही अणु आपके भीतर जायेंगे, जो आपके शरीर को नीरोग बना देंगे। भोजन या जल पीते समय दृढ़ विश्वास कीजिये कि इस भोजन के कण-कण में आरोग्यता की दैवी-शक्ति कूट-कूट कर भरी हुई है; यह मेरे पेट में जाकर मुझे नीरोग बनाएगी; हमारे सारे रोगों का नाश कर देगी। जो कुछ भोजन कीजिये, जीने के लिये, अधिक भोजन विष बनकर शरीर में अनेकों प्रकार का रोग पैदा कर देता है। भोजन उतना ही करना चाहिये कि जितना हम पचा सकें।
भोजन करते समय जैसे विचार होंगे, तद्वत् भोजन का भी रूप बनता जायेगा। इसलिये भोजन करते समय अपने विचार बिलकुल सात्विक रखो। सात्विक आहार और सात्विक विचार से आप भी सात्विक बन जायेंगे।
मनुष्य इच्छा-स्वरूप है और कुछ नहीं। अनेक इच्छाओं के समूह का नाम मनुष्य है। जैसे-2 उसकी इच्छा विश्वास में परिवर्तित होती जायेगी, वैसे उसका रूप भी एक विचित्र साँचे में ढलता जायेगा। लोग कहते हैं कि ईश्वर करे कि हम नीरोग रहकर अधिक दिन तक जीवित रहें। मनुष्य अपनी तमाम इच्छाओं और आशाओं को दूसरे के बल पर छोड़ देते हैं, वे यह नहीं सोचते कि ईश्वर का वास कहाँ पर है? अगर वे जान जाएं कि इच्छा-शक्ति, विश्वास ही में ईश्वर रहता है, तो शायद वे ऐसी कायरता न दिखलायें। आपका रोग दूसरे के वश में नहीं; वह आपके वश में है। किसी के अनुग्रह की आवश्यकता नहीं। आप स्वयं रोगों पर विजय पा सकते हैं। विश्वास रखते हुए सच्चे मन से प्रतिदिन निरोग होने का संकल्प कीजिये, और बार-2 शरीर पर हाथ फेरते जाइये, आपका मन ही रोग का भी प्रेरक है। आप स्वयं एकान्त मैं बैठकर मनन कीजिये और सोचिये, पक्षपात से रहित होकर देखिये, मन में कितनी बड़ी शक्ति है। उसकी इच्छा-शक्ति कितनी प्रबल है। आप बलवान् और स्वतंत्र बनने के लिये मन की इच्छा-शक्ति से काम लिये हुये उस पर विश्वास रख कर आगे बढ़िये, आप अवश्य नीरोग, वीर्यवान् बन जायेंगे। वास्तव में हमारी आत्मा ही ईश्वर है, जब हमारे शरीर में ईश्वर का वास है, तब हम रोगी कैसे हो सकते हैं ऐसा विश्वास रखते हुये संकल्प करना चाहिये गोस्वामी जी ने कैसा साफ साफ कहा— “भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा- विश्वासरुपिणौ” गोस्वामी जी के पूर्वोक्त वचनों का भावार्थ यह है कि- शंकर अर्थात् परमात्मा विश्वास-रूप ही है। हमारा विश्वास ही सब कुछ करता है। यह स्पष्ट है। यह स्पष्ट है कि बिना विश्वास के ईश्वर भी कुछ नहीं करता अतः सच्चा ज्ञान यही है कि हमारा विश्वास और मन सब कुछ कर सकता है। जो आप चाहते हैं—आप ही की आत्मा, आप ही का विश्वास और आप ही का मन सब कुछ कर सकता है। इसलिये पाठक मित्रो, आप भी आज ही से मनोबल द्वारा सर्व-रोग-निवारण में लग जाइये।
(श्री देवीदत्त एम. ए. बी. टी.)
उलूक-यातु शुशुलूक-यातु जहि
श्व-यातुमुत लोक यातुम।
सुपर्ण-यातुमुत ग्रध्रयातु दृष्टदेव
प्रमृण रक्ष इन्द्र॥
(ऋग् 7। 104। 22)
अर्थात् (1) गरुड़ के समान चाल-चलन अर्थात् घमंड, गर्व, अहंकार (2) गीध के समान बर्ताव अर्थात् लोभ—दूसरों के माँस पर स्वयं पुष्ट होने की इच्छा (3) चिड़ियों के समान व्यवहार अर्थात् अत्यन्त काम विकार (4) कुत्ते के सामान रहना अर्थात् आपस से लड़ना और दूसरे के सामने दुम हिलाना (5) उल्लू के समान आचार अर्थात् मूर्खता का व्यवहार करना, उल्लू जिस प्रकार प्रकाश से भागता है उस प्रकार ज्ञान की ज्योति से दूर भागना (6) भेड़िये के समान क्रूरता—ये 6 राक्षस हैं। गर्व, लोभ, काम, मत्सर, मोह और क्रोध ये छः ऐसे विकार हैं कि जिनको, जैसे पत्थर से पक्षियों को मार कर भगाते हैं, उसी प्रकार दिल को दृढ़ बनाकर दूर करना चाहिये, और इनसे सबको बचाना चाहिये।”
अहंकार, लोभ, मोह, मत्सर, काम, क्रोध आदि मनुष्य के भीतरी शत्रु हैं। संसार में अधिकाँश मनुष्यों के कुछ बाहरी शत्रु भी हुआ करते हैं। पर उनको मनुष्य भली प्रकार पहचानता है और जब वे निकट आते हैं तो उनसे अपनी रक्षा करने को सावधान हो जाता है। पर जो शत्रु हमारे मन के भीतर से ही उत्पन्न होते हैं और मित्र का सा लुभावना वेष रखकर आते हैं, उनसे बच सकना बड़ा कठिन होता है। मनुष्य का कर्तव्य है कि उनके वास्तविक रूप को समझ कर और उनसे अन्त में होने वाली हानियों को जान कर आरम्भ से ही प्रतिकार करता रहे। वेद भगवान ने उनसे दृढ़तापूर्वक दूर रहने का उपदेश देते हुये उनकी उपमा अन्य प्राणियों में पाई जाने वाली बुरी प्रवृत्तियों से की है। जिस प्रकार अहंकार के कारण गरुड़ को परेशान होना पड़ा, भोजन का अति लोभ होने से गिद्ध को उदर पीड़ा सहन करनी पड़ती है, काम वृत्ति की अधिकता से चिड़ियाँ सदैव उद्विग्न रहती हैं, पारस्परिक ईर्ष्या द्वेष के भाव के फलस्वरूप कुत्तों को मार खानी पड़ती है, अंधकार से मोह रखने के कारण उल्लू को निन्दनीय समझा जाता है, और सदैव क्रूरता, क्रोध का भाव मन में रखने से भेड़िए को निकृष्टतम प्राणी कहा जाता है, उसी प्रकार इस तरह की बुरी प्रवृत्तियाँ रखने वाले मनुष्य भी निन्दा के पात्र समझे जाते हैं। मनुष्य का धर्म है कि वह अपने से कहीं नीचे दर्जे के प्राणियों के अवगुणों की नकल कदापि न करे और संसार में रहकर ऐसे आदर्श कार्य करे जिनसे उनका मनुष्य कहलाना सार्थक हो।
यद्यपि काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि की प्रवृत्ति न्यूनाधिक परिमाण में सभी मनुष्यों में पाई जाती है और जैसी आज संसार की अवस्था है उसमें इनका सर्वथा निराकरण कर सकना बड़ी कठिन बात है। तो भी मनुष्य का कर्तव्य है कि इनके वशीभूत होने के बजाय इन पर अपना नियंत्रण रखे। जैसे आतताइयों द्वारा आक्रमण किये जाने पर क्रोध की, सृष्टि-संचालन में काम की, संतान पालन में मोह की, गृहस्थी की व्यवस्था में लोभ अथवा मितव्ययिता की आवश्यकता पड़ती है। पर अपनी आवश्यकता के लिये इनका उपयोग करना एक बात है और इनके वशीभूत होकर अनुचित कार्यों को भी करने लगना बिल्कुल भिन्न बात है। जो लोग इन वृत्तियों के वशीभूत होकर इनको ठीक सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं वे बड़े भ्रम में पड़े हैं। चाहे इन वृत्तियों को सामयिक परिस्थिति के कारण कभी-कभी क्षम्य मान लिया जाय, पर ये प्रशंसनीय तो किसी दशा में नहीं मानी जा सकतीं। चाहे इनके द्वारा कोई आर्थिक लाभ उठा ले, साँसारिक सत्ता प्राप्त कर ले, पर वास्तव में ये मनुष्यत्व से गिराने वाली वृत्तियाँ हैं। जिसमें इन वृत्तियों की जितनी कमी होगी वह उतना ही श्रेष्ठ श्रेणी का व्यक्ति समझा जायगा। इसीलिये महात्मा पुरुषों में इनका सर्वथा अभाव माना जाता है, और जो कोई महात्मा का रूप धारण करके भी इन वृत्तियों को नहीं त्याग सकता, उनकी निन्दा होती है। साँसारिक व्यवहारों में लगे हुये व्यक्तियों का कम से कम उपयोग किया जाय। और किसी भी दशा में उनका दास तो बना ही न जाय। जो मनुष्य इन हीन प्रवृत्तियों के फन्दे में इतना अधिक फँस जाता है कि इच्छा करने पर भी उनसे अपने को मुक्त नहीं कर सकता, तो फिर वह “मनुष्य” नाम का अधिकारी भी नहीं रहता।
इस प्रकार वेद का उपदेश बुराइयों को दूर करने का है। इसके लिये अन्य मन्त्रों में बताया गया है कि हमको कभी बुराइयों का चिन्तन नहीं करना चाहिये और न किसी से बुराई की बात सुननी चाहिये। इतना ही नहीं संयोगवश जब कोई बुरी बात हमारे मन में आवे तो तुरन्त सावधान होकर मन को उनकी तरफ से हटा लेना चाहिये क्योंकि बुरी बातों की तरफ आकर्षित होने से हम बुरे कर्म करने में प्रवृत्त हो जाते हैं और उनसे हमारा पतन होता है। इसीलिये जैसे ही इस प्रकार का कोई हानिकारक विचार उत्पन्न हो हमको उसके विपरीत विचार द्वारा उसका खंडन कर देना चाहिये। स्मरण रखो यह बात केवल हमारी दृढ़ता पर आधार रखती है। कमजोर मन के व्यक्ति स्वयं भी और दूसरों के द्वारा बहकाये जाने पर भी बहुत जल्द बुराइयों में प्रवृत्त हो जाते हैं और अपना पतन कर लेते हैं। इसलिये मानव जीवन की सफलता के लिये आत्मिक उत्थान के लिये, हमको अपने मन को सदैव दृढ़ रखना और पतन के मार्ग से बचकर रहना परम आवश्यक है।
वेद का मंगलमय उपदेश यही है कि मनुष्य को सदैव परीक्षा करके अपनी बुराइयों को हटा कर, श्रेष्ठ सद्गुणों को अपने भीतर धारण करना चाहिये। व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के दुर्गुण पाये जाते हैं और उसी प्रकार समाज में दुर्जन व्यक्ति भी होते हैं इन दोनों को दूर रखना चाहिये। अपने मन के विकारों को रोकना और दूर करना हमारा व्यक्तिगत कार्य है। अगर हम ऐसा न करेंगे तो इससे हमको ही हानि उठानी पड़ेगी, क्योंकि विकार युक्त भावनाओं और कार्यों से कभी स्थायी लाभ अथवा कल्याण की प्राप्ति नहीं हो सकती। इस प्रकार समाज में पाये जाने वाले दुर्जन व्यक्तियों का नियन्त्रण सब लोगों को मिलकर सामुदायिक रूप से करना चाहिये। यदि उनको बुरी प्रवृत्तियों से न रोका जायगा और समाज में दुर्जनों की संख्या बढ़ जायगी तो उस समाज का पतन और अंत में नाश अवश्यम्भावी है। आज तक अनेक बड़ी-बड़ी जातियों और राष्ट्रों का अन्त इसी प्रकार हो चुका है। इसलिये व्यक्ति और समाज में से बुरी प्रवृत्तियों को दूर करने का ध्यान हमको सदैव रखना उचित है।
(श्री ज्वालाप्रसाद गुप्त. एम.ए.एल.टी.)
किसी ने सत्य ही कहा है कि गाँधी जी का जीवन इतिहास का एक अद्भुत अध्ययन है जिसे मानव जाति कभी भी भुला नहीं सकती। आपके दिव्य जीवन-प्रसंगों का स्मरण वास्तव में कितना पुनीत है। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद अस्तेय, अपरिग्रह तथा अभय आपके जीवन के अनुकरणीय हैं और उन पर एक विहंगम दृष्टि डालना आवश्यक है।
सत्य—साधारणतया ‘सत्य’ का अर्थ हम सच बोलना ही समझते हैं, परन्तु वास्तव में विचार, वाणी और आधार में सत्य ही सत्य होना चाहिये। इस सत्य को संपूर्णतया समझने वाले को संसार में और कुछ भी जानना नहीं रहता, क्योंकि सारा ज्ञान इसमें समाया है। सत्य शब्द का मूल सत् है। सत् का अर्थ है होना, सत्य अर्थात् होने का भाव । सिवा सत्य के और किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है। इसीलिये परमेश्वर का सच्चा नाम सत् अर्थात् सत्य है। अतः परमेश्वर सत्य है, कहने की अपेक्षा सत्य ही परमेश्वर है यह कहना अधिक उपयुक्त है। जहाँ सत्य है वहाँ ज्ञान-शुद्ध ज्ञान है। जहाँ सत्य नहीं वहाँ शुद्ध ज्ञान हो नहीं सकता, इसीलिये ईश्वर नाम के साथ चित्-ज्ञान शब्द जोड़ा गया है। जहाँ सत्य-ज्ञान है वहाँ आनन्द ही आनन्द है, शोक हो ही नहीं सकता। इसी कारण ईश्वर को सच्चिदानन्द कहते हैं। इस सत्य की आराधना के लिये ही हमारा जीवन और हमारी हर एक प्रवृत्ति हो । इस प्रसंग में सत्य हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, रामचन्द्रजी, इमाम हसन, अन्य ईसाई संत इत्यादि के चरित्रों पर विचार कर लेना चाहिये और सभी बालक, बड़े बूढ़े, स्त्री पुरुष आदि को चलते-बोलते, खाते पीते, खेलते अर्थात् हर काम करते हुये सत्य की रट लगाये रहनी चाहिये। बापू का कथन है कि यह सत्य रूपी परमेश्वर उनके लिये तो रत्न चिन्तामणि सिद्ध हुआ है।
अहिंसा—अहिंसा का साधारण अर्थ है हिंसा न करना अर्थात् किसी को कभी न मारना या सताना। परन्तु वास्तव में कुविचार मात्र हिंसा है। मिथ्या भाषण हिंसा है, द्वेष हिंसा है। किसी का बुरा चाहना हिंसा है। अब यह प्रश्न उठता है कि यदि कोई हमें सताये तो उस दशा में हमें क्या करना चाहिये। चोर हमें सताते हैं। उनसे बचने के लिये हम इन्हें दण्ड देते हैं परन्तु इससे चोरी का अंत तो होता नहीं। उनका उपद्रव सहते जाना भी ठीक नहीं क्योंकि इससे कायरता पैदा हो सकती है। वास्तव में हमें उन्हें सुधारने और अपनाने के लिये उपाय सोचने का कष्ट उठाना चाहिये। यह अहिंसा का मार्ग है। इसमें उत्तरोत्तर दुःख ही उठाना पड़ता है। अखण्ड धैर्य धारण करना पड़ता है। और यदि ऐसा हुआ तो अन्त में चोर साहूकार बन जाता है और हमें सत्य के अधिक स्पष्ट दर्शन होते हैं। इस प्रकार अहिंसा मार्ग पर हम जगत को मित्र बनाना सीखते हैं। संकट सहते हुये भी अंत में शान्ति और सुख की वृद्धि होती है। इस प्रकार पूज्य बापू के मतानुसार अहिंसा का अर्थ है सर्वव्यापी प्रेम।
ब्रह्मचर्य—ब्रह्मचर्य का अर्थ है कि पुरुष और स्त्री एक दूसरे को विषय की दृष्टि से न देखें, एक दूसरे को विषय के विचार से न छुएं; उनके मन में स्वप्न में भी विषय के विचार न उठें। ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और काया से होना चाहिये। जो शरीर को वश में रखता हुआ जान पड़ता है, पर मन से विकार का पोषण किया करता है, वह मूढ़, मिथ्याचारी है। मन को विकारपूर्ण रहने देकर शरीर को दबाने का प्रयत्न करना हानिकर है। जहाँ मन है, वहाँ अन्त में शरीर भी घसीटाये बिना नहीं रह सकता। हम प्रतिपल यह अनुभव करते हैं कि शरीर तो वश में रहता है पर मन नहीं रहता। यदि हम मन के अधीन हो जायें तो शरीर और मन में विरोध खड़ा हो जाता है, मिथ्याचार का आरम्भ हो जाता है। इसके कारण का पता लगाने से ज्ञात होता है कि ब्रह्मचर्य का संकुचित अर्थ किया गया है। जननेन्द्रिय-विकार के निरोध को ही ब्रह्मचर्य का पालन माना गया है। परन्तु वास्तव में यह अधूरी और खोटी व्याख्या है। विषय मात्र का निरोध ही पूर्ण ब्रह्मचर्य है। जो और-और इन्द्रियों को जहाँ-तहाँ भटकने देकर केवल एक ही इन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करता है, वह निष्फल प्रयत्न करता है। कान से विकार की बातें सुनना, आँखों से विकार उत्पन्न करने वाली वस्तु देखना, जीभ से विकारोत्तेजक वस्तु चखना, हाथों से विकारों को भड़काने वाली चीजों को छूना और साथ ही जननेन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करना, यह तो आग में हाथ डाल कर जलने से बचने का प्रयत्न करने के समान हुआ। इसीलिये जो जननेन्द्रिय को रोकने का निश्चय करे, उसे पहले ही से प्रत्येक इन्द्रिय को उस-उस इन्द्रिय के विकारों से रोकने का निश्चय कर लेना चाहिये। यदि हम सब इन्द्रियों को एक साथ वश में करने का अभ्यास करें तो जननेन्द्रिय को वश में करने का प्रयत्न शीघ्र ही सफल हो सकता है। अतः ब्रह्मचर्य की संकुचित व्याख्या से भ्रमित न होकर हमें ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्म की, सत्य की शोध में चर्या, अर्थात् तत्संबंधी आचार। इस मूल अर्थ से सर्वेन्द्रिय-संयम का विशेष अर्थ निकलता है। केवल जननेन्द्रिय-संयम के अधूरे अर्थ को तो हमें भुला ही देना चाहिये। इस संबंध में गृहस्थ में रहने वालों की परिस्थिति पर भी विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है। जो विवाहित हैं उन्हें याद रखना चाहिये कि उनकी स्त्री मित्र, सहचरी और सहयोगिनी है, केवल भोग विलास का साधन नहीं। आत्म-संयम जीवन का नियम है। इसलिये मैथुन तभी किया जा सकता है जब कि पति पत्नी दोनों चाहें और वह भी नियमों से शासित होकर जिन्हें दोनों ने शाँत चित्त से तय कर लिया हो। केवल भोग विलास के लिये वीर्य हानि करना और शरीर को निचोड़ना कैसी मूर्खता है?
वैवाहिक जीवन में पूर्ण ब्रह्मचर्य का अनुभव बापू के मतानुसार इस प्रकार संभव है कि विवाहित अविवाहित सा बन जाय और इस दिशा में जो सुन्दर अनुभव बापू ने किया, वह विरले ही किसी ने किया होगा। विवाहित स्त्री पुरुष का एक दूसरे को भाई बहन मानने लगना सारी झंझटों से मुक्त होना है। संसार भर की सारी स्त्रियाँ बहनें हैं, माताएँ हैं, लड़कियाँ हैं, यह विचार ही मनुष्य को एक दम ऊँचा उठाने वाला है। इससे पति पत्नी कुछ खोते नहीं, उलटे अपनी पूँजी बढ़ाते हैं। विकार रूपी मैल को दूर करने से प्रेम भी बढ़ता है और विकासर नष्ट होने से एक दूसरे की सेवा भी अधिक अच्छी हो सकती है तथा एक दूसरे के बीच कलह के अवसर कम होते हैं।
अस्वाद—यह व्रत ब्रह्मचर्य से निकट संबंध रखने वाला है। यदि इस व्रत का भली भाँति पालन किया जाय तो ब्रह्मचर्य-अर्थात् जननेन्द्रिय संयम बिलकुल सरल हो जाय। अस्वाद का अर्थ है स्वाद न करना। स्वाद अर्थात् रस, जायका। जिस प्रकार दवा खाते समय इस बात का विचार नहीं करते कि वह स्वादिष्ट है या नहीं, पर शरीर के लिये उसकी आवश्यकता समझ कर ही उसे उचित मात्रा में खाते हैं, उसी तरह अन्न आदि को भी समझना चाहिये। इसलिये स्वाद की दृष्टि से किसी भी खाद्य पदार्थ को चखना व्रत का भंग है। स्वादिष्ट पदार्थ को ज्यादा खाने से तो सहज ही व्रत का भंग होता है। इससे यह स्पष्ट है कि किसी पदार्थ का स्वाद बढ़ाने, बदलने या उसके अस्वाद को मिटाने के अभिप्राय से उसमें नमक इत्यादि मिलाना व्रत का भंग करना है। परन्तु यदि हम यह जानकर कि अन्न में नमक की अमुक मात्रा में आवश्यकता है और इसलिये उसमें नमक छोड़ें तो इससे व्रत का भंग नहीं होता। शरीर पोषण के लिये आवश्यक न होते हुए भी केवल मन को धोखा देने के लिये आवश्यकता का आरोपण करके किसी खाद्य पदार्थ में कोई चीज स्वाद के लिये मिलाना वास्तव में मिथ्याचार ही कहा जायगा। इस दृष्टि से विचार करने पर हम देखेंगे कि अनेक वस्तुयें जो हम खाते हैं, वे शरीर रक्षा के लिये आवश्यक न होने से त्याज्य ठहरती हैं और इस प्रकार जो असंख्य चीजों को छोड़ देता है, उसके समस्त विकारों का शमन हो जाता है।
अस्वादव्रत के महत्व को समझ चुकने पर हमें उसके पालन के लिये प्रयत्न करना चाहिये। इसके लिये अहर्निश खाने की चिन्ता करना आवश्यक नहीं है। केवल सावधानी की जागृति की अत्यधिक आवश्यकता है। ऐसे करने से कुछ ही समय में हमें स्वयं मालूम होने लगेगा कि हम कब और कहाँ स्वाद करते हैं अथवा नहीं। मालूम होने पर हमें चाहिये कि हम अपनी स्वाद वृति को दृढ़ता के साथ धीरे-धीरे कम करते जायँ। इस दृष्टि से संयुक्त पाक यदि वह अस्वाद वृत्ति से किया जाय तो बहुत ही सहायक है। इस व्रत के पालन से ब्रह्मचर्य पालन में बड़ी सहायता मिलेगी।
अस्तेय—अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना। दूसरे की वस्तु को उसकी अनुमति के बिना लेना चोरी है ही परन्तु मनुष्य अपनी कही जाने वाली वस्तु को भी चुराता है। उदाहरणार्थ, किसी माता पिता का अपने बालकों के जाने बिना, उन्हें न मालूम होने देने की इच्छा से, चुपचाप किसी वस्तु को खाना। यह कहा जा सकता है कि किसी घर का वस्तु-भण्डार घर के सब प्राणियों का है, परन्तु उसमें से यदि कोई चुपचाप गुड़ की एक डली भी ले ले तो वह चोर है। किसी के जानते हुये भी उसकी चीज को उसकी आज्ञा के बिना लेना चोरी है। यह समझ कर किसी चीज को अपने पास रख लेना कि वह किसी की भी नहीं है, चोरी है। अर्थात् राह में मिली हुई चीज के अधिकारी हम नहीं बल्कि उस प्रदेश का राजा या व्यवस्थापक है। किसी आश्रम या संस्था के समीप मिली हुई कोई भी वस्तु उस आश्रम के मंत्री या व्यवस्थापक को जानी चाहिये और यदि वह आश्रम के किसी व्यक्ति की या आश्रम की न हो तो मंत्री या व्यवस्थापक उसे सिपाही को सौंप कर दर्ज करा दे। सच पूछो तो अस्तेय इससे भी बहुत आगे जाता है। जिस चीज की लेने की हमें आवश्यकता न हो, उसे जिसके पास वह है, उसकी आज्ञा लेकर भी लेना चोरी है।
उक्त समस्त चोरियों को बाह्य या शारीरिक चोरी कह सकते हैं, परन्तु इससे भी सूक्ष्म और आत्मा को नीचे गिराने वाली या पतित बनाये रखने वाली चोरी, मानसिक है। मन से किसी चीज को पाने की इच्छा करना या उस पर जूठी नजर डालना चोरी है। बड़े-बूढ़े या बालक आदि का किसी बढ़िया चीज को देखकर ललचा जाना मानसिक चोरी है। बहुतेरी चोरियों का मूल कारण हमारी यह जूठी इच्छा ही मालूम होगी। आज जिस चीज के लिये केवल विचार ही में जूठी इच्छा है, कल उसे पाने के लिये हम भले बुरे उपाय सोचने लग जायेंगे और जैसे चीज की वैसे ही विचार की भी चोरी होगी।
अपरिग्रह—जो चीज मूल में चोरी की नहीं है, पर आवश्यक है उसका संग्रह करने से वह चोरी की चीज के समान हो जाती है क्योंकि हम उसका परिग्रह करते हैं परिग्रह का अभिप्राय सञ्चय या इकट्ठा करना है। सत्यशोधक तथा अहिंसक परिग्रह नहीं कर सकता। धनवान के घर उसके लिये अनेक अनावश्यक चीजें भी रहती हैं, मारी मारी फिरती हैं, बिगड़ जाती हैं, जबकि उन्हीं चीजों के अभाव में करोड़ों दर-दर भटकते हैं, भूखों मरते हैं और जाड़े से ठिठुरते हैं। यदि सब अपनी आवश्यकतानुसार ही संग्रह करें तो किसी को अभाव न हो और सब संतोष से रहें। आज तो दोनों अभाव का अनुभव करते हैं। करोड़पति अरबपति होने की चेष्टा करता है तो भी उसे संतोष नहीं रहता। कंगाल धनी बनना चाहता है, उसे पेट भर मिल जाने से ही संतोष होते नहीं दीख पड़ता। परंतु कंगाल को पेट भर पाने का हक है और समाज का धर्म है कि वह उसे उतना प्राप्त करा दे। सच्ची संस्कृति सुधार और सभ्यता का लक्षण परिग्रह की वृद्धि नहीं बल्कि विचार और इच्छापूर्वक उसकी कमी है। हमारा यह आदर्श होना चाहिये कि हम नित्य अपने परिग्रह की जाँच करते रहें और जैसे बने वैसे उसे घटाते रहें। जैसे-2 परिग्रह कम करते हैं, वैसे-2 सच्चा सुख और सच्चा संतोष बढ़ता है तथा सेवा और क्षमता की वृद्धि होती है।
अभय—भगवान ने गीता के 16 वें अध्याय में दैवी संपदा का वर्णन करते हुए इसकी गणना प्रथम की है। वास्तव में बिना अभय के सत्य की शोध कैसी? बिना अभय के अहिंसा का पालन कैसा? अभय अर्थात् समस्त बाह्य भवों से मुक्ति-मौत का भय, धन माल लुटने का भय, कुटुँब परिवार संबंधी भय, रोग का भय, शस्त्र प्रहार का भय, आबरू इज्जत का भय, किसी को बुरा लगने का भय, संबंधियों के वियोग का भय आदि। यों भय की वंशावली जितनी बढ़ावें, बढ़ायी जा सकती है। परंतु सत्यशोधक के लिये इन सब भयों को तिलाँजलि दिये ही छुटकारा है। वास्तव में निश्चय से, सतत् प्रयत्न से और आत्मा पर श्रद्धा बढ़ने से अभय की मात्रा बढ़ सकती है। हमें बाह्य भयों से तो मुक्त होना ही है और साथ ही साथ अंतर में जो शत्रु वास करते हैं उन पर भी विजय पाना है। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का भय है। इन्हें जीत लें तो बाह्य भयों का उपद्रव अपने आप मिट जाय। भय मात्र देह के कारण हैं। देह-संबंधी रोग-आसक्ति दूर हो तो अभय सहज ही प्राप्त हो। सभी वस्तुओं के प्रति ममत्व की भावना दूर कर देने पर भय कहाँ रह जाता है? ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा;’ यह रामबाण वचन है। कुटुँब, धन, देह, जैसे के तैसे रहेंगे, पर उनके संबंध की अपनी कल्पना हमें बदल देनी होगी। ये ‘हमारे’ नहीं ‘मेरे’ नहीं, ईश्वर के हैं। मैं भी उसी का हूँ, मेरा अपना इस जगत में कुछ भी नहीं है, तो फिर हमें भय किसका हो सकता है। वह ही हमारी रक्षा करेगा और आवश्यक शक्ति तथा सामग्री देगा तथा जो कुछ करेगा अच्छा ही करेगा, यों यदि हम स्वामी न बन कर सेवक बनें, शून्यवत् रहें, तो सहज ही समस्त भयों को जीत लें और शान्ति प्राप्त करके सत्यनारायण के दर्शन करें। यह है बापू की भावना ‘अभय व्रत’ के संबंध में।
वास्तव में पूज्य बापू ‘महान् से भी महानतम थे। उपरोक्त महाव्रत उनके जीवन के सच्चे आदर्श थे। यदि हम उनका अनुकरण करें तो हम भी अपने जीवन को श्रेष्ठ तथा उन्नत बना सकते हैं।
(श्री रामनाथ एम.ए.)
कई वर्ष पहिले की बात है कि जापान का एक मछली पकड़ने वाला छोटा जहाज अपने देश के किनारे से कुछ सौ मील के फासले पर मछलियाँ पकड़ रहा था। वह अपना काम खत्म कर चुका था और अपने अड्डे की तरफ वापस लौट रहा था कि आकाश से कुछ गर्म सी राख उसके ऊपर गिरी। उस राख में न मालूम क्या तत्व भरा था कि उसके नौ मल्लाह उसी दम मृतप्रायः होकर गिर गये। जहाज के चालक उनको यथासंभव शीघ्र अपने कार्यालय में लाये और तुरन्त अस्पताल पहुँचाया। पर वह राख ऐसी साँघातिक थी कि बड़े-बड़े डाक्टरों की बुद्धि भी उनकी चिकित्सा करने में चकरा गई। वह कई वर्ष तक अस्पताल में पड़े रहे। अमरीका तक के डॉक्टर उनका इलाज करने आये। पर उनमें से कुछ तो जीवन भर को रोगी और निकम्मे हो गये, कुछ निर्बल अवस्था में जीवन व्यतीत करते रहे और कुछ अंत में मर गये।
यह राख देखने में तो साधारण ही थी, पर वह उस एटम बम से निकली हुई थी जिसे अमरीका वालों ने परीक्षणार्थ पैसिफिक के एक निर्जन टापू में चलाया था। इन बमों के धड़ाके से धूल पत्थर, बम के आवरण की राख जो उड़ती है वह आकाश में कई मील ऊपर चली जाती है और वहाँ से सैंकड़ों मील तक उड़ती चली जाती है। वास्तव में वह पृथ्वी के सभी भागों तक पहुँचती है पर उसका, जहाँ तक उसकी सक्रियता विशेष रहती है, वहीं तक उसका घातक प्रभाव पड़ता है। उससे दूरवर्ती भागों में यंत्रों द्वारा उसका अस्तित्व तो जाना जा सकता है, पर मनुष्य के जीवन पर उसका कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ता।
जिस दिन से जापान के उक्त माँझी दुर्घटना ग्रस्त हुये उसी समय से संसार के साधारण लोग अणु-अस्त्रों की भयंकरता से परिचित होने लगे। उनको मालूम हो गया कि अब संसार में ऐसे शस्त्र तैयार हो गये जो केवल लड़ने वालों को ही नहीं मारते वरन् सैंकड़ों हजारों कोस पर बैठे हुये, सोये हुए, सर्वथा अनजान लोगों का भी सर्वनाश कर डालते हैं। इस कारण अब सब देशों में अणु सामग्री से निकलने वाली घातक किरणों की खोज की जा रही है और उससे उत्पन्न होने वाले रोगों की चिकित्सा के लिये पृथक डॉक्टर तैयार किये जा रहे हैं।
अब प्रश्न होता है कि आखिर एटम और हाइड्रोजन बमों में ऐसे कौन से तत्व होते हैं जो इस प्रकार अदृश्य रूप से लोगों पर ऐसा घातक प्रभाव डालने की शक्ति रखते हैं? दूसरा प्रश्न यह होता है कि हम उस हानिकारक प्रभाव से किस प्रकार अपनी रक्षा कर सकते हैं? इस विषय का अध्ययन करने के लिये अभी अमरीका में 16 वैज्ञानिकों की एक कमेटी बैठाई गई थी जिसने अपनी रिपोर्ट में इस संबंध की अनेक आवश्यकीय बातों पर प्रकाश डाला था। उसके आधार पर साधारण लोगों की जानकारी के लिये कुछ तथ्य एकत्रित किये थे वे इस प्रकार हैं।
रेडियो विकिरण शब्द का संबंध “रेडियम” से है। संसार में जितने तत्व पाये जाते हैं उनमें से बहुतों के, जैसे सोना, चाँदी, ओषजन आदि के अणु स्थिर दशा में रहते हैं और वे जैसे के तैसे ही बने रहते हैं। परन्तु रेडियम जैसे कुछ तत्व ऐसे हैं जिनके अणु हमेशा अस्थिर दशा में रहते हैं और वे चाहे जब अपने आप विच्छिन्न होने लगते हैं। जब ये अणु छिन्न विच्छिन्न होते हैं तो इनमें से “ऊर्जा” (शक्ति) निकलती है। यह “ऊर्जा, अनेक रूपों में होती है और इनमें से अनेक प्रकार की किरणें निकलती हैं, जिनमें से कुछ तो हानिकारक नहीं होती, पर “गामा” किरणें जो इन्हीं से निकलती हैं, बहुत शक्तिशाली होती हैं। देखने में प्रकाश की साधारण किरणों की तरह ही होती हैं, परन्तु सामान्य प्रकाश की किरणें मानव शरीर को भेद कर अन्दर नहीं जा सकतीं जबकि “गामा” और “एक्स किरणें मानव शरीर को बड़ी सरलता से भेद कर पार कर पारकर जाती हैं। इतना ही नहीं मानव शरीर के जिस तन्तु में से ये किरणें गुजर जाती हैं उनमें अनेक रासायनिक और प्राणी शास्त्रीय परिवर्तन कर जाती हैं, ऐसी सभी किरणों को जो शून्य स्थान में एक जगह से दूसरी जगह शक्ति ले जाती हैं, रेडियो विकिरण कहा जाता है। यहाँ इस शब्द का आशय विशेष रूप से ‘गामा’ किरणों से ही है क्योंकि वे मानव शरीर पर सब से अधिक हानिकारक प्रभाव डालती हैं।
“ये किरणें मानव शरीर पर किस प्रकार प्रभाव डालती हैं रेडियो विकिरण का प्रभाव शरीर पर अनेक रूपों से हो सकता है। यदि इसकी तीव्रता बहुत अधिक हो तो मनुष्य को ल्यूकोमिया जैसे रोग हो सकते हैं और शीघ्र या विलंब से मृत्यु हो जाती है। यदि रेडियो विकिरण की मात्रा अपेक्षाकृत कम हो तो उसका प्रभाव यह हो सकता है कि व्यक्ति का आयुष्यकाल कुछ कम हो जाय, और वह अपने वास्तविक समय से पूर्व ही मर जाय। एक परिणाम यह भी हो सकता है कि सन्तान उत्पन्न करने की क्षमता समाप्त हो जाय कम हो जाय और अंतिम, किन्तु सबसे अधिक दूरगामी भयावह परिणाम यह हो सकता है और प्रायः होता है कि व्यक्ति के शरीर को बनाने वाले सेलों (कोषों) में ऐसा विशेष परिवर्तन हो जाता है जो केवल उस व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहता वरन् जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता चला जाता है जब तक कि उसका वंश ही समाप्त न हो जाय। उदाहरण के लिए यदि रेडियो सक्रियता के कारण किसी के कोषों में ऐसा परिवर्तन हो गया कि जिससे उसकी दृष्टि शक्ति क्षीण हो गई, तो यह त्रुटि उसकी प्रत्येक आगामी पीढ़ी में भी पाई जायगी और प्रत्येक पीढ़ी में अधिकाधिक बढ़ती जायगी। इसी प्रकार यदि किसी के कोषों में परिवर्तन होने से उसकी संतानोत्पादन की शक्ति कम हो जाय तो दो चार पीढ़ी में उसके वंश का समाप्त हो जाना निश्चित ही है।”
ये बातें केवल साधारण लेखकों की कल्पनायें या इधर-उधर से सुनी सम्मतियाँ ही नहीं हैं वरन् बड़े-बड़े राष्ट्रों के कर्णधार भी इनको स्वीकार करते हैं। हमारे प्रधान मंत्री अनेक बार अणुयुद्ध के विरुद्ध चेतावनी दे चुके हैं कि यदि इसकी प्रगति को रोका न गया तो इससे संसार का अधिकाँश में नाश हो जायगा। अब इसी 29 अप्रैल को इंग्लैंड के प्रधान मंत्री मेकमिलन ने कहा है कि “रूस ने जो अणुबमों के परीक्षण किये हैं उनके फल से ब्रिटेन के वायु मंडल की रेडियो सक्रियता बहुत बढ़ गई है, उसका बुरा प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर और भावी बच्चों पर पड़ रहा है। हड्डी संबंधी रोग बढ़ रहे हैं।” इसी प्रकार 31 मार्च को अमरीका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ0 लाइनस पौलिंग ने कहा कि अब अणुओं के परीक्षणों से जितनी रेडियो सक्रियता वाली धूल आकाश में फैल चुकी है, उससे 50 हजार अमरीकन या तो मर जायेंगे या कैंसर से बुरी तरह रोगग्रस्त होंगे। यदि ये परीक्षण जारी रहे तो इससे अनेक गुनी प्राण हानि होगी। अभी तक हुये परीक्षणों का दुष्प्रभाव उन 23000 बच्चों पर भी पड़ेगा जो अभी तक पैदा ही नहीं हुये हैं।
इतना ही नहीं युद्धकाल में शक्तिशाली बमों से रेडियो सक्रियता समस्त विश्व में छा जायगी। उससे मानव शरीरों पर और भी भाँति-भाँति के कुप्रभाव पड़ सकते हैं। उससे लाखों व्यक्तियों के शरीरों में ऐसे परिवर्तन हो सकते हैं कि उनकी संतान अंधी, बहरी या अन्य प्रकार से विकृत अंगों वाली हो। ऐसा होना देश और समाज के लिये बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा। जनसंख्या के एक भाग का नष्ट हो जाना तो फिर भी सहन किया जा सकता है, क्योंकि प्रयत्न करने पर आबादी को अधिक वेग से बढ़ाया जा सकता है, पर यदि समाज के आधे चौथाई व्यक्ति भी इस प्रकार अपंग या बुद्धिहीन हो जायेंगे तो वे सदैव समाज पर भार बनकर रहेंगे और इससे उस देश का पतन अवश्यम्भावी हो जायेगा।
अणुशक्ति से होने वाली हानियाँ केवल युद्ध में अणु-शास्त्रों के प्रयोग पर ही निर्भर नहीं हैं वरन् अणुशक्ति से काम करने वाली जो मशीनें आजकल लगाई जा रही हैं उनसे भी वही समस्या सामने आती है। अणु-इंजनों में जो राख या अवशेष रहेगा वह भी हद दर्जे का रेडियो सक्रिय पदार्थ होगा और उससे निकलने वाली किरणें भी मनुष्यों को वैसी ही हानि पहुंचायेंगी जैसे कि युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले बमों की। अभी तो अणुशक्ति से चलने वाले कारखाने बिल्कुल आरम्भिक अवस्था में हैं और उनको एक प्रकार परीक्षणार्थ चलाया जा रहा है पर यदि लाभ पर दृष्टि रखने वाले व्यवसायियों का बोलबाला रहा तो वे कम खर्च की निगाह से अणु-इंजनों का व्यवहार अवश्य बढ़ायेंगे और इस प्रकार मानव समाज की असीम क्षति करने के उत्तरदायी होंगे।
(योगिराज स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज)
इस समय योरोप और अमरीका के विद्वानों ने भौतिक साइन्स में बड़ा नाम किया है। उन्होंने प्रत्येक पदार्थ के मूलतत्वों का पता लगाकर उनके गुण और दोषों की अलग-अलग जानकारी प्राप्त कर ली है। अब वे उन मूलतत्वों को अलग-अलग तादाद में और नये-नये तरीके से मिलाकर ऐसे आश्चर्यजनक पदार्थ और यंत्र बना रहे हैं कि उनके द्वारा दुनिया की कायापलट होती चली जा रही है। आरम्भ में तो वैज्ञानिक लोग सिवाय प्रत्यक्ष पदार्थों या शक्तियों के और किसी चीज पर विश्वास ही नहीं करते, पर धीरे-धीरे वे मानसिक शक्तियों का परिचय प्राप्त करने लगे और इस बात को स्वीकार करने लगे कि इन सूक्ष्म शक्तियों द्वारा भी अनेक कार्य संपन्न हो सकते हैं। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, साइकोमैट्री आदि विद्याओं की उत्पत्ति और विकास इन सूक्ष्म शक्तियों का अध्ययन, मनन और अभ्यास करने से ही हुआ है।
मैस्मरेजम का आविष्कार और प्रयोग करने वाले सब से पहले व्यक्ति डॉ0 मिस्मर साहब थे, जो आस्ट्रिया के निवासी थे और जिन्होंने यहाँ की राजधानी बीना में डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त की थी। वहाँ पर इनकी मुलाकात “फादरहिल” नामक पादरी से हुई जो “ऐनीमैल मैग्नेटिज्म” (प्राणियों की आकर्षण) शक्ति के सिद्धान्त के जानकार थे। इन्होंने पादरी से इस संबंध में कुछ बातें सीखीं और जब उन में कुछ सचाई मालूम होने लगी तो स्वयं खोज करने लगे। इससे उनको बिना किसी तरह की दवा के अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने में सफलता मिलने लगी। उनका उत्साह बहुत बढ़ा और उन्होंने रूस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, पेरिस आदि देशों में जाकर वहाँ बादशाहों को अपनी विद्या का परिचय दिया और ऐसे अस्पताल खुलवाये जहाँ इस विधि से इलाज किया जाने लगा। यद्यपि आरम्भ में वैज्ञानिकों ने मिस्मर का बहुत विरोध किया और उनके काम को ठगी, जालसाजी, हाथ की चालाकी आदि बतलाया, पर धीरे-धीरे इस शक्ति का ज्ञान अन्य लोगों को भी होने लगा और कुछ समय में “मानसिक शक्ति द्वारा अन्य मनुष्यों को प्रभावित करना” विज्ञान की एक शाखा मान ली गई। इस संबंध में एक लेखक ने कहा है—
“डॉ. मिस्मर साहब इस विद्या में जहाँ तक पहुँच पाये थे वह यह था कि हर बड़े जानदार में एक प्रकार की चुम्बकीय शक्ति होती है जिसके द्वारा वह दूसरों को प्रभावित कर सकता है और उनके कष्टों को दूर कर सकता है, अथवा उनको नुकसान भी पहुँचा सकता है। इसका नाम उन्होंने “ऐनीमल मैगनेटिज्म” (हैवानी आकर्षण) रक्खा था, परन्तु बाद में दूसरे वैज्ञानिक इस विषय में और भी आगे बढ़ गये। मशहूर हिप्नाटिस्ट “लेबाल्ट” ने यह खोज की कि हर बड़े जानदार में ही नहीं, वरन् छोटे से छोटे प्रत्येक प्राणी में यह शक्ति रहती है और इसे वे ‘जूमैगनेटिज्म’ के नाम से पुकारने लगे। इसके पश्चात् “पारीश्यिन” साहब अपनी खोज में इस नतीजे पर पहुँचे कि यह चुम्बकीय शक्ति एक प्रकार का पतला और ऐसा सूक्ष्म द्रव्य है कि जो बहुत शीघ्र एक स्थान से निकल कर दूसरे स्थान को चला जाता है और यह जानदारों में ही नहीं वरन् संसार के हर एक पदार्थ में मौजूद है। इसलिये वे इसे “मैगनेटिक फ्लूड” कहने लगे। इसी प्रकार श्री जेन वेक और श्री बार्डिक इत्यादि ने भी इस संबंध में कुछ नई-नई बातें मालूम कीं। नि0 बार्डिक ने जो नई बात वैज्ञानिक जगत को बतलाई वह यह थी कि जिन वस्तुओं के परमाणु अधिक घने होते हैं वह अपने अन्दर से इस प्रकार की किरणें फेंकती हैं जो मनुष्य की शारीरिक और मानसिक स्थिति के लिये लाभदायक होती हैं। उनमें एक ऐसी आकर्षण शक्ति होती है कि जिसका बहुत कुछ संबंध शरीर और मन से रहता है। जवाहरात में हीरा सबसे अधिक गुणकारी है क्योंकि उसके परमाणु इतने अधिक घने होते हैं कि उसे हथौड़ों से भी नहीं तोड़ा जा सकता। धातुओं में सुवर्ण सबसे भारी है और इसलिये उसका धारण करना प्राचीन काल से शुभ व लाभदायक माना जाता है।”
सम्मोहन अथवा हिप्नोटिज्म
जब योरोप में मैस्मरेजम का काफी प्रचार हो गया और अनेक विद्वानों ने उस पर ग्रंथ भी लिख डाले तो अन्य लोग इस संबंध में नवीन शक्तियों की खोज और परीक्षा करने लगे। उनमें से मैनचेस्टर के एक डॉक्टर ब्रेड ने सन् 1941 में हिप्नोटिज्म के सिद्धान्त का पता लगाया। उन्होंने बतलाया कि मिस्मर साहब ने जो प्राणियों की आकर्षण शक्ति का स्वतन्त्र अस्तित्व माना है और उसका एक स्थान से दूसरे स्थान में प्रवाह देना बतलाया है, वह मत ठीक नहीं है। “मैस्मरेजम” के प्रयोग में किसी व्यक्ति को स्ववश करने और उसे आदेश देकर इच्छानुसार कार्य कराने का रहस्य “मानसिक संकल्प” के सिवाय और कुछ नहीं। किसी मनुष्य से प्रभावशाली ढंग से कोई बात कह कर जब उसे विश्वास करा दिया जाता है तो वह तदनुसार आचरण करने लगता है। सम्मोहन विद्या का मूल तत्व यह संकल्प शक्ति ही है जिसे अंगरेजी में “सजैशन” कहते हैं। हाथ फेरना, नाक की नोक पर निगाह का जमाना, किसी चमकीली वस्तु को निगाह गढ़ा कर देखना आदि क्रियाएँ इस “संकल्प प्रकाश” क्रिया की सहायक हैं। इस संबंध में इस विद्या के एक जानकार व्यक्ति की सम्मति इस प्रकार है—
“किस प्रक्रिया को करने से किस शरीर-यन्त्र को अवसन्न किया जा सकता है, इस बात का ज्ञान सम्मोहनकारी को प्राप्त कर लेना आवश्यक है। यदि हम किसी व्यक्ति की आँखों के ऊपर तीक्ष्ण दृष्टि डालकर उसके नेत्रों में अवसन्नता ला सकेंगे, तो उसके शरीर में भी अवसाद का भाव उत्पन्न हो जायगा। इसके बाद “सो जाओ” कह कर ‘संकल्प’ का प्रयोग करने से उसमें निद्रा का भाव उत्पन्न हो जायगा।” मैस्मरेजम वाले तो रोगों को दूर करने, बन्द चिट्ठियों को पढ़ने, देर देश में रहने वाले व्यक्तियों के पास संदेश भेजने, चोरी गई या छुपी हुई वस्तुओं का हाल जान लेने आदि के चमत्कारी कार्य करते हैं। इसको साँसारिक सफलता कह सकते हैं। इसके विपरीत योग विद्या का उद्देश्य साँसारिक बंधनों से निवृत्त होना है जो मैस्मरेजम से उच्चकोटि का है।
नये वर्ष के शुरू में हर एक देश और जाति के लोग अपने-अपने ढंग से खुशियाँ मनाते हैं और अपने इष्टदेव की उपासना करते हैं, ताकि उनके अगले वर्ष के कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हों। इस लक्ष्य की पूर्ति और नवीन शक्ति की प्राप्ति के लिए अनेकों प्रकार के अनुष्ठान किये जाते हैं। हिन्दूधर्म के मतानुसार सृष्टि रचना का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था इसलिए हमारा वर्ष इसी दिन से शुरू होता है जिसका पूर्वार्द्ध छह माह आश्विन कृष्ण अमावस्या को समाप्त होता है और उत्तरार्द्ध भाग आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है। वर्ष के इन दोनों भागों के आरम्भ में हमारे पूर्वज महाशक्ति की आराधना किया करते थे। इन्हीं दिनों सर्दी, गर्मी की प्रधान ऋतुओं का मिलन होता है। इसी सन्धि बेला को नवदुर्गा कहा जाता है।
सर्दी-गर्मी की ऋतुओं का मिलन, दिन और रात्रि के मिलने के समान सन्ध्या काल है। पुण्य पर्व है। दिन और रात के मिलन काल-सन्ध्या का समय पूजा, उपासना और आत्म साधन के लिए बहुत ही उपयोगी माना जाता है क्योंकि सूक्ष्म दृष्टि से देखने से पता चलता है कि इस समय किया गया थोड़ा श्रम भी अधिक फलदायक होता है, इसलिए इस समय ईश्वराधन को ही विशेष रूप से महत्ता दी गई है और अन्य कार्य जैसे कि भोजन करना, सोते रहना, यात्रा आरम्भ करना, मैथुन करना आदि वर्जित माने गये हैं क्योंकि इस सन्ध्या के समय इन कार्यों को करने से हानि होती देखी गई है। यही नियम ऋतुओं के मिलन-नवरात्रि पर लागू होता है।
पुराणों में अलंकारिक भाषा का प्रयोग किया गया है। नवरात्रि के संबंध में लिखा गया है कि ऋतुएँ इन दिनों रजस्वला होती हैं। जिस प्रकार से रजस्वला स्त्री का उस काल में आहार-विहार और आचार-विचार में विशेष ध्यान रखा जाता है, उसी प्रकार से हमें भी इन दिनों को विशेष सावधानी के साथ बरतने का आदेश दिया गया है।
आरोग्य शास्त्र के आचार्यों का कहना है कि आश्विन और चैत्र के महीनों में सूक्ष्म ऋतु परिवर्तन के परिणामस्वरूप शारीरिक स्वास्थ्य की दीवारें हिल जाती हैं और अनेकों व्यक्ति ज्वर, जूड़ी, हैजा, दस्त, चेचक आदि रोगों से ग्रस्त देखे जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार शरीर शोधन कार्यों के लिए यह दो महीने बहुत ही उपयुक्त हैं इसलिए इस काल में आहार-विहार में विशेष प्रकार से संयम रखना चाहिए।
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर इन नौ दिनों को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक सब प्रकार की उन्नति की दृष्टि से लाभदायक माना गया है इसलिए उपवास आदि विशेष साधनाओं द्वारा अनुष्ठान करने का विधान बनाया गया है। यह समय गायत्री साधना के लिए सब से अधिक उपयुक्त है। आश्विन की नवरात्रि 3 अक्टूबर को आरम्भ होकर 11 अक्टूबर को समाप्त होगी। इन नौ दिनों में उपवास रखकर चौबीस हजार गायत्री मन्त्रों के जाप का या दो सौ चालीस गायत्री चालीसा पाठ या 2400 गायत्री मन्त्र लेखन का अनुष्ठान करना चाहिए। नौ दिन में अनुष्ठान पूर्ण करने के लिए नित्य प्रति 27 माला गायत्री जप, या 27 गायत्री चालीसा पाठ या 267 गायत्री मन्त्र लेखन करने चाहिए।
साधना के साथ उपवास के लिए (1) एक समय बिना नमक का अन्नाहार, (2) एक समय फलाहार, (3) दो समय दूध और फल, (4) एक समय आहार और एक समय फल दूध, (5) केवल दूध का आहार इसमें से जैसी सुविधा हो अपनी सामर्थ्यानुकूल उपवास करना चाहिए। साधना का अधिकाँश भाग प्रातःकाल ही पूरा करना चाहिए। समय के अभाव व अन्य कारणों से सायंकाल को भी किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य पालन, भूमिशयन, बाल न कटवाना (दाढ़ी के बाल अपने हाथ से बनाये जा सकते हैं), चर्म के जूतों का त्याग आदि के नियमों का, जहाँ तक सम्भव हो, पालन करना चाहिए। आचार, विचार और व्यवहार को पवित्र रखना चाहिए। उत्तम धार्मिक ग्रन्थों का स्वाध्याय करना और मनन चिन्तन द्वारा उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन का एक अंग बना लेना चाहिए। उपवास और साधना के दिनों में किये गये मनन और चिन्तन का स्थाई प्रभाव हमारे अंतःकरण पर पड़ता है। अंतःकरण की पवित्रता पर ही हमारी सुख शान्ति निर्भर करती है।
अनुष्ठान की समाप्ति पर नवें दिन जप का शताँश हवन, ब्रह्म-भोज, कन्या भोज और प्रसाद वितरण करना चाहिए। ब्रह्म कहते हैं आत्मा को इसलिए आत्मा का भोजन—ब्रह्मदान ही सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म-भोज माना गया है। गायत्री ज्ञान प्रसार के लिए गायत्री चित्र, चालीसा, माला व अन्य साहित्य का वितरण किया जा सकता है।
गायत्री परिवार शाखाओं को इस परम पुनीत पर्व को सामूहिक रूप से मनाना चाहिए। इसकी तैयारी के लिए पहिले से ही धर्मफेरी करके सामूहिक अनुष्ठान में भाग लेने वालों के नाम नोट कर लेने चाहिएं। जो व्यक्ति किन्हीं कारणों से सामूहिक उपासना में भाग न ले सके, उसे अपने घर पर ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए। जो लोग पूरा अनुष्ठान न कर सकें, उन्हें 12 माला गायत्री जप या 12 चालीसा पाठ या 108 मन्त्र लेखन करने के लिए प्रोत्साहित करें। इस साधना के साथ अनुष्ठान के विशेष नियम लागू नहीं होते। जो लोग सामूहिक साधना करने के लिए तैयार हो जायें, उन्हें अनुष्ठान के विशेष नियमों की जानकारी करवा देनी चाहिए। साधकों का धोती या दुपट्टा कोई एक वस्त्र पीला अवश्य होना चाहिए।
नवरात्रि गायत्री उपासकों का बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है इसलिए इसको धूमधाम के साथ मनाना चाहिए। गायत्री माता की प्रसन्नता के लिए उनके व्यापक ज्ञान प्रसार की योजना बनाना चाहिए। आपके ग्राम व नगर में कोई ऐसा घर न बचे जिसमें आप गायत्री माता का सन्देश पहुँचाने का प्रयत्न न करें। बड़े-बड़े शहरों में निकटवर्ती मुहल्ले में यथाशक्ति प्रचार करना चाहिए। पूर्णाहुति के दिन अधिक से अधिक जनता को बुलाने का प्रयत्न करना चाहिए और स्थानीय विद्वानों द्वारा गायत्री और यज्ञ की महत्ता और इनकी मानव जीवन के लिए उपयोगिता पर प्रवचन कराने चाहिए। जहाँ प्रवचन कर्ता का प्रबंध न हो सके वहाँ गायत्री महाविज्ञान व यज्ञ विधान के पहिले भागों में से उपयुक्त लेखों का सुना देना चाहिए। आशा है शाखाएँ उत्तम रीति से इस पर्व को मनाने का प्रयत्न करेंगी।
यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारा कोई विरोध न करे तो मन को हमेशा शाँत रखो और हृदय में पवित्र विचारों को स्थान दो।
—स्वामी रामतीर्थ
जो चीज सरलता से मिल जाती है वह महान नहीं होती। महान चीजों को प्राप्त करने के लिए तो दुर्गम मार्ग से चलना होता है।
—लोकमान्य तिलक
भारतीय संस्कृति में लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार की उन्नति के उचित स्थान हैं। उसके लिए उचित शिक्षा दीक्षा का विधान है। अध्यात्म को मुख्य उद्देश्य स्वीकार करते हुए भी भौतिकता की अवहेलना नहीं की जाती। जीवन उपयोगी वस्तुओं को प्राप्त करने का भी आदेश दिया गया है। हमारे पर्व, त्यौहार और संस्कार भी हमारे मस्तिष्क पर सामूहिक रूप से दोनों प्रकार की छाप डालते हैं। अनेकों त्यौहार और संस्कार हमें जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देते हैं, कुछ संगठन बना कर अत्याचारियों से रक्षा के लिए, संयम और ब्रह्मचर्य पूर्वक रहने से और व्यायाम आदि द्वारा स्वास्थ्य सुधारने की ओर संकेत करते हैं। इनमें से विजयादशमी का त्यौहार, जोकि हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है, हर्ष और उल्लास का त्यौहार है, इससे हमारे अंदर वीरता और साहस की वृद्धि होती है, अपने शरीर को बलिष्ठ और बलवान बनने की प्रेरणा मिलती है। अपने पूर्वजों की याद आने पर मन में एक नवीन उत्साह उदय होता है, शिथिल अंग फड़कने लगते हैं और सूखी नसों में तीव्र गति से रक्त का संचार होने लगता है। इससे राष्ट्रीय भावना का प्रसार होता है। किसी देश, जाति राष्ट्र के उत्थान के लिए यह आवश्यक अंग हैं।
यह दिन भारतवर्ष के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि कहा जाता है कि इस दिन भगवान राम ने ऋषि-मुनियों और सन्त-महात्माओं पर अत्याचार करने वाले उनके रक्त को कर रूप में लेने वाले जिसके राज्य के सत्य, न्याय और दया प्रस्थान कर चुके थे, रावण जैसे अजेय और शक्तिशाली शत्रु पर विजय प्राप्त की थी। इसी आश्विन मास में पाण्डव दुर्योधन द्वारा दिये गये अज्ञातवास के बाद प्रकट हुए थे, उसी दिन अन्यायी दुर्योधन व उसके राज्य को नष्ट करने के लिए महाभारत युद्ध का आरम्भ हुआ था। उसी विजयादशमी के शुभ अवसर पर इन्द्र ने वृत्तासुर का वध किया था। प्राचीनकाल में राजा लोग भी वर्षा के कई महीनों से एक स्थान पर रुकी हुई सेना को विजयादशमी के दिन कूच करने की आज्ञा देते थे। यह मान्यता है कि इस दिन किया गया कोई भी कार्य असफल नहीं होता। इसीलिए व्यापारी लोग इस दिन अपने कार्य को शुरू करते हैं, किसान अपने खेतों में बीज बोते हैं व अन्य कार्य करते हैं।
यह शुभ त्यौहार प्रति वर्ष हमारे लिये उत्तम और कल्याणकारी सन्देश लाता है, हमारी सोई हुई शक्तियों को जगा देता है, हमारे ठण्डे पड़ गये खून में उत्तेजना उत्पन्न करता है, एक नई शक्ति का संचार करता है, अपने पूर्वजों के चिन्हों पर, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में साहस, उत्साह, निर्भयता और बुद्धि से काम लेकर वानरों का संगठन करके शक्तिशाली राक्षसों का संहार किया था, चलने की प्रेरणा देता है। उनके आदर्श चरित्र की स्मृति में हम दशहरे या विजयादशमी का उत्सव तो धूमधाम से मना लेते हैं, परन्तु जो महत्वपूर्ण भावना, उसके पीछे निहित है, उस पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। हमने गौण वस्तु को मुख्य और मुख्य को गौण मान लिया है इसलिए उससे कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाते। होना तो यह चाहिये कि स्थान-स्थान पर रामायण की कथाएँ हों, सभाओं के आयोजन किये जायें, जिसमें भगवान राम के उज्ज्वल चरित्र का गुणगान किया जाय। जनता को एक गलत दृष्टिकोण दिया जाता है कि केवल रामायण का पाठ करने और भगवान राम का चरित्र सुनने से हमारा कल्याण हो जायगा। कथा में केवल उन घटनाओं का वर्णन किया जाता है जिनको सुनने से जनता को कुछ भी शिक्षा प्राप्त नहीं होती, यह अवश्य होता है कि उनका मनोरंजन हो जाता है और उनका समय अच्छी तरह से व्यतीत हो जाता है। इसके बजाय जनता का अमूल्य समय नष्ट न कर उनके सामने सही दृष्टिकोण रखना चाहिए कि भगवान राम ने अपने जीवन में यह आदर्श कार्य किये हैं, जो हम को भी करने चाहिएं। सत्य, क्षमा, सहनशीलता, सर्वदा प्रसन्न चित्त रहने, भोग में त्याग, करने, पिता की आज्ञा पर संपूर्ण राज्य को ठुकरा देने, एक पत्नी व्रत, पराई स्त्री पर कुदृष्टि न डालने माता, स्त्री, भाइयों आदि से आदर्श व्यवहार करने का विवेचन करना चाहिए ताकि हम उनके जीवन से प्रेरणा प्राप्त करके उनको अपने जीवन में उतार सकें।
विजयादशमी के दिन राजघराने तथा सामन्तों के परिवारों में शस्त्रास्त्र, हाथी, घोड़े, स्वर्ण आदि का पूजन किया जाता है। कहीं-कहीं तलवार का पूजन होता है। भाव रक्षा का हथियारों से है। विदेशों से रक्षा का भार तो सरकार पर है। अस्त्र-शस्त्रों का बिना लाइसेन्स के रखना भी जुर्म है।
इसलिए आधुनिक परिस्थितियों को देखते हुए लाठी की पूजा करनी चाहिए। यह हमारे बहुत काम आ सकती है। चोरी और डाके की तो नित्य वारदातें होती ही रहती हैं। उन से बचने के लिए सामूहिक संगठन बनाने चाहिए। इस शुभ त्यौहार पर व्यायामशालाओं का उद्घाटन करना चाहिए जिनमें मुद्गर, डंबल, नाल, स्प्रिंग, पैरलेल बार, वेट लिफ्टर आदि सामान रखना चाहिए। स्वास्थ्य सुधार के नियमों और व्यायाम की महत्ता पर पर्चे छपवाकर जनता में बाँटने चाहिए। सभा सम्मेलनों का आयोजन करना चाहिए जिसमें स्थानीय विद्वानों और डॉक्टरों को बुलाकर उनके प्रवचन कराने चाहिए कि देश के जन मानस के बिगड़ते हुए स्वास्थ्य को किस प्रकार से सुधारा जाय। यह स्वास्थ्य का त्यौहार है, उस दिन लोगों से नियमित डंड बैठक, आसन, प्राणायाम, घूमने व आहार में संयम रखने के संकल्प लेने चाहिए। शारीरिक स्वास्थ्य सुधार राष्ट्र उत्थान का एक आवश्यक अंग है। इस पर पूरा ध्यान देना चाहिए।
हिन्दू संस्कृति में माता, पिता और गुरु को ब्रह्म, विष्णु और शिव के नाम से संबोधित किया गया है क्योंकि इनके प्रयत्न से ही बालक का विकास होता है। इस उपकार के बदले में बालक को इन तीनों के प्रति अटूट श्रद्धा मन में धारण किये रहने का शास्त्रकारों ने आदेश दिया है। “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव” इन श्रुतियों में इन्हें देव-नर तन धारी देव-मानने और श्रद्धा रखने का विधान किया है। यह कृतज्ञता की भावना सदैव बनी रहे, इसलिये गुरुजनों का चरण स्पर्श, अभिनन्दन करना नित्य के धर्मकृत्यों में सम्मिलित किया गया है। यह कृतज्ञता की भावना जीवन भर धारण किये रहना आवश्यक है। यदि इन गुरुजनों का स्वर्गवास हो जाय तो भी मनुष्य की वह श्रद्धा स्थिर रहनी चाहिये। इस दृष्टि से मृत्यु के पश्चात् पितृ यज्ञों में मृत्यु की वर्ष तिथि के दिन, पर्व समारोहों पर श्राद्ध करने का श्रुति स्मृतियों में विधान पाया जाता है।
श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धापूर्वक किये कार्य को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह श्राद्ध कहलाता है। जीवित पितरों और गुरुजनों के लिए श्रद्धा प्रकट करने-श्राद्ध करने के लिए, उनकी अनेक प्रकार से सेवा-पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है परन्तु स्वर्गीय पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने का, अपनी कृतज्ञता को प्रकट करने का कोई निमित्त बनाना पड़ता है। यह निमित्त है—श्रद्धा, मृत पितरों के लिए कृतज्ञता के इन भावों का स्थिर रहना हमारी संस्कृति की महानता को ही प्रकट करता है। जिनके सेवा सत्कार के लिए हिन्दुओं ने वर्ष में 15 दिन का समय पृथक निकाल लिया है पितृ भक्ति का इससे उज्ज्वल आदेश और कहीं मिलना कठिन है।
श्रद्धा तो हिन्दू धर्म का मेरुदंड है। हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों में आधे से अधिक श्राद्धतत्व भरा हुआ है। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, पृथिवी, अग्नि, जल, कुंआ, तालाब, नदी, मरघट, खेत, खलिहान, भोजन, चक्की, चूल्हा, तलवार, कलम, जेवर, रुपया, घड़ा, पुस्तक, आदि निर्जीव पदार्थों की विवाह या अन्य संस्कारों में अथवा किन्हीं विशेष अवसरों पर पूजा होती है। यहाँ तक कि नाली या घूरे तक की पूजा होती है। तुलसी, पीपल, वट, आँवला आदि पेड़, पौधे तथा गौ, बैल, घोड़ा, हाथी, आदि पशु पूजे जाते हैं। इन पूजाओं में उन जड़ पदार्थों या पशुओं को कोई लाभ नहीं होता परन्तु पूजा करने वाले के मन में श्रद्धा एवं कृतज्ञता का भाव अवश्य उत्पन्न होता है। जिन जड़ चेतन पदार्थों से हमें लाभ मिलता है, उनके प्रति हमारी बुद्धि में उपकृत भाव होना चाहिए और उसे किसी न किसी रूप में प्रकट करना ही चाहिए। यह श्राद्ध ही तो है।
मरे हुए व्यक्तियों को श्राद्ध कर्म से कुछ लाभ है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि होता है, अवश्य होता है। संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भाँति हर एक जीवन है। विश्व एक शिला है तो व्यक्ति एक परमाणु। जीवित या मृत आत्मा इस विश्व में मौजूद है और अन्य समस्त आत्माओं से संबंध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हों तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है। जाड़े और गर्मी के मौसम में हर एक वस्तु ठण्डी और गर्म हो जाती है। छोटा सा यज्ञ करने पर भी उसकी दिव्य गन्ध व भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुँचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शान्तिमयी सद्भावना की लहरें पहुँचाता है। यह सूक्ष्म भाव तरंगें तृप्तिकारक और आनन्ददायक होती हैं। सद्भावना की तरंगें जीवित मृत सभी को तृप्त करती हैं परन्तु अधिकाँश भाग उन्हीं को पहुँचता है जिनके लिए वह श्राद्ध विशेष प्रकार से किया गया है।
स्थूल वस्तुएं एक स्थान से दूसरे स्थान तक देर में, कठिनाई से पहुँचती हैं परन्तु सूक्ष्म तत्वों के संबंध में यह बात नहीं है। उनका आवागमन आसानी से हो जाता है। हवा, गर्मी, प्रकाश और शब्द आदि को बहुत बड़ी दूरी पार करते हुए कुछ विलंब नहीं लगता। विचार और भाव इससे भी सूक्ष्म हैं। वह उस व्यक्ति के पास जा पहुँचते हैं जिसके लिए वह फेंके जाए। तर्पण का कर्मकाण्ड प्रत्यक्ष रूप से बुद्धिवादी व्यक्तियों के लिए कोई महत्व न रखता हो परन्तु उसकी महत्ता तो उसके पीछे काम कर रही भावना में है। भावना ही मनुष्य को असुर, पिशाच, राक्षस, शैतान या महापुरुष, ऋषि, देवता, महात्मा बनाती है। इसी के द्वारा मनुष्य सुखी, स्वस्थ, पराक्रमी, यशस्वी तथा महान बनते हैं और यही उन्हें दुखी, रोगी दीन, दास और तुच्छ बनाती है। मनुष्य और मनुष्य के बीच में जो जमीन आसमान का अन्तर दिखाई देता है, वह भावना का ही अंतर है। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने अपने धार्मिक कर्मकाण्डों का माध्यम इसी महान शक्ति को बनाया है।
उपरोक्त कारणों के फलस्वरूप हिन्दू अपने पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता प्रकट करने और उनके प्रति अपनी भावनाओं को उत्तेजित करने के लिए वर्ष में पंद्रह दिन का समय देते हैं। इस वर्ष श्राद्ध आश्विन बदी पड़वा गुरुवार 17 सितंबर 59 से आश्विन कृष्णा 30 शुक्रवार 2 अक्टूबर 59 तक रहेंगे। श्राद्ध को केवल रूढ़िमात्र को पूरा न कर लेना चाहिए वरन् पितरों के द्वारा जो हमारे ऊपर उपकार हुए हैं। उनका स्मरण करके, उनके प्रति अपनी श्रद्धा और भावना की वृद्धि करनी चाहिए। साथ-साथ अपने जीवित पितरों को भी न भूलना चाहिए। उनके प्रति भी आदर सत्कार और सम्मान के पवित्र भाव रखने चाहिए।
श्राद्ध में ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, पात्र आदि का दान दिया जाता है। इसमें ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिस व्यक्ति विशेष को आप जो वस्तुएँ दान रूप में दे रहे हैं, वह शीघ्र ही उनके काम आने वाली हों, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली हों। ऐसा न हो कि आप रुपया खर्च करके दान दें और वह वस्तुएं उनके घर पर लंबे समय तक बिना काम के पड़ी रहें।
यह बात युक्तिसंगत नहीं दीखती कि यदि किसी वृद्ध या वृद्धा की मृत्यु हो तो वृद्ध या वृद्धाओं को ही भोजन कराया जाय या दान दिया जाय या विधवा के स्वर्गवास होने पर विधवाओं को ही दान दिया जाय। आवश्यकता को देख कर ही दान की महत्ता और लाभ सिद्ध होता है। भोजन कराते समय निर्धन विद्यार्थियों की फीस आदि के लिए भी स्थान रखना चाहिए। पितरों के लिए दिये गये दान द्वारा उनके जीवन का उत्थान होगा तो उनकी अन्तरात्मा से आपके पितरों के प्रति शान्तिदायक सद्प्रेरणाएँ निकलेंगी। इसी प्रकार से सत्कार्यों में योग देने के लिए दान के अन्य उपाय सोचे जा सकते हैं।
तर्पण तो श्राद्ध में किया ही जाता है। इसके साथ-साथ पितरों की शान्ति के लिए अखण्ड-ज्योति प्रेस द्वारा प्रकाशित “सूक्त संहिता” नाम पुस्तक में वर्णन पितृ सूक्त के मन्त्रों से हवन करना चाहिए क्योंकि हिन्दू धर्म में कोई भी शुभ या अशुभ कार्य हवन के बिना पूर्ण नहीं माना जाता।
देव ऋण, ऋषि ऋण से पितृ ऋण बड़ा माना जाता है इसलिए उक्त ऋण को चुकाना हमारा कर्तव्य है। महापुरुषों, ऋषियों, सन्त महात्माओं और अवतारों के जीवन चरित्रों का मनन करना चाहिए। समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए जो जो महान् कार्य उन्होंने असहनीय कष्ट झेल कर किये हैं, उन पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। यदि अपनी परिस्थितियाँ आगे बढ़ने से रोकती हों तो जिन कठिन परिस्थितियों में उन्होंने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन का उत्थान किया है, इसका अध्ययन करना चाहिए और उनके ऋण को चुकाने के लिए जन कल्याण के लिए सत्संकल्प करने चाहिएं। प्रायः संकल्प के बिना बड़े कार्य सफल नहीं होते। इसलिए इनका हमारे शास्त्रों में विधान रखा गया है। परहित की भावना उत्पन्न होने से अपनी आध्यात्मिक उन्नति का द्वार भी खुल जाता है और जितना उस मार्ग पर वह आगे बढ़ता जाता है, उससे अधिक वह स्वयं को उन्नति पथ पर अग्रसर हुआ पाता है। इसलिए अखण्ड-ज्योति परिवार का कोई भी परिजन ऐसा न रहे जो अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए भविष्य में सत्कार्यों के लिए संकल्प न करे।
गायत्री परिवार शाखाओं को पितृ तर्पण सामूहिक रूप से करना चाहिए। इसके लिए पूर्णमासी और अमावस्या के दिन हैं। शाखा मन्त्रियों का कर्तव्य है कि वह अपने साप्ताहिक सत्संगों में या विशेष बैठक बुलाकर सामूहिक पितृ तर्पण की योजना बनाएं। उपरोक्त दो दिन इसके लिए नियत किये गए हैं। इन दिनों निकट के तालाब या नदी (इसके अभाव में कुआँ) पर जाकर आगे बताई गई तर्पण विधि से सामूहिक तर्पण करना चाहिए।
जिन्होंने वासनाओं को जीता है, वे ही मुक्त हुए हैं। जिन्होंने ईर्ष्या का त्याग किया है, उन्हीं को प्रेम की प्राप्ति हुई है और जिन्होंने धैर्य धारण किया है, वे ही शुभ परिणाम को प्राप्त कर सके हैं।
—हसन बसरी
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर शौच, स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर धुले हुए वस्त्र पहनने चाहिए। पूर्व की ओर मुख करके सन्ध्योपासना आदि करने के पश्चात बाँये और दाँये हाथ की अंगुलि में
ॐ पवित्रेस्थो वैष्णाव्यौ सवितुर्वः प्रसवऽउत्पु नाभ्यच्छिद्रेणासूर्यस्य रश्मिभिः। तस्यतेपवित्रपते—पवित्र पूतस्य यत्कामः पुनेतच्छकेयम्॥
के मन्त्र को पढ़ते हुए पवित्री को धारण करना चाहिए। इसके बाद हाथ में जल, चावल, जौ और तीन कुश लेकर नीचे लिखे मंत्रों से संकल्प पढ़ना चाहिए।
ॐ विष्णवे नमः 3 । हरिः ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे कलियुगे कलिप्रथमचरणे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे मुकगौत्रोत्पन्नः अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्तः) अहं श्रीपरमेश्वरप्रीर्त्यथं देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये।
संकल्प के पश्चात् तुलसीदल, फूल, चावल, सफेद चन्दन, चाँदी या ताँबे के पात्र में रख कर उसके ऊपर पूर्वाभिमुख एक बालिश्त लम्बे तीन कुश रखने चाहिए। पात्र में तर्पण के लिए जल भर कर तीनों कुशाओं और तुलसी दल को दांये हाथ में लेकर बाँये हाथ से ढक लेना चाहिए और निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए देवताओं का आवाहन करना चाहिए।
ॐ विश्वेदेवास आगत शृणुता म इमँ हवम्। एदं बर्हिर्निषीदत॥ (यजु0 7। 34)
ॐ विश्वेदेवाः श्रृणुतेम हूँ हवं में ये अन्तरिक्षे य उप द्यविष्ठ ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन्वर्हिषि मादयध्वम्॥ (यजु0 33। 53)
आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः।
ये तर्पणोऽत्र विहिताः सावधाना भवन्तु ते॥
देवताओं का आवाहन करके तर्पण वाले पात्र में से कुशों द्वारा दायें हाथ की अंगुलियों के अग्रभाग से चावल मिला हुआ एक-एक अंजलि जल लेकर नीचे लिखे देवताओं के नाम मन्त्र पढ़ते हुए दूसरे पात्र में गिराना चाहिए।
देव दर्पण
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम् । ॐ विष्णुस्तृप्यताम् । ॐ रुद्रस्तृप्यताम्। ॐ प्रजापविस्तृप्यताम्। ॐ देवास्तृप्यन्ताम्। ॐ छन्दाँसितृप्यन्ताम्। ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। ॐ पुराणाचार्यस्तृप्यन्ताम् । ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम्। ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यन्ताम्। ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्। ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम् । ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम् । ॐ नागस्तृप्यन्ताम्। ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्। ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ॐ सरितस्तृप्यन्ताम्। ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम। ॐ रक्षाँसितृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णान्तृप्यन्ताम् । ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्। ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्। ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यन्ताम्।
इसी प्रकार से नीचे दिये मंत्र वाक्यों से ऋषियों को भी एक एक अंजलि जल देना चाहिए।
ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। ॐ अंिगरास्तृप्यताम्। ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। ॐ पुलस्तृप्यन्ताम्। ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम्
दिव्य मनुष्य तर्पण-
इसके पश्चात् यज्ञोपवीत को गले में माला की तरह कर लेना चाहिए और उत्तर की ओर मुख करके पहिले वाली कुशों को दायें हाथ की कनिष्ठिका अंगुलि के मूल भाग में रख कर निम्नाँकित मंत्र वचनों को दो-दो बार उच्चारण करके जौ सहित दो-दो अंजलि जल दिव्य मनुष्यों के लिए अर्पण करना चाहिए।
ॐ सनकस्तृप्यताम् ॥ 2 ॥ ॐसनन्दनस्तृप्यताम् ॥ 2॥ ॐ सनातनस्तृप्यताम् ॥ 2 ॥ ॐ कपिलस्तृप्यताम् ॥ 2 ॥ ॐ आसुरिस्तृप्यताम् ॥ 2 ॥ ॐ वोढुस्तृप्यताम् ॥ 2 ॥ ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् ॥ 2 ॥
दिव्य पितृतर्पण
पहिले वाली कुशों को बटने के बाद उन्हें अंगूठे और तर्जनी के बीच में दक्षिण की ओर रख लेना चाहिए। तर्पण करने वाले को दक्षिण की ओर मुख करके दायें घुटने को भूमि पर रख कर यज्ञोपवीत को बांये कन्धे पर कर लेना चाहिए। तर्पण वाले पात्र में काले तिल मिला कर दिव्य पितरों के लिए अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग से नीचे दिये मंत्र वाक्यों का उच्चारण करते हुए तीन-तीन अंजलि अर्पण करना चाहिए।
ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥ 3 ॥ ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ ॐ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः ॥ 3 ॥ ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः॥ 3 ॥ ॐ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः॥ 3 ॥
यम तर्पण
उपरोक्त विधि से ही नीचे दिये मन्त्र वाक्यों से चौदह यमों के लिए तिल सहित तीन-तीन अञ्जलि जल अर्पण करना चाहिए।
ॐ यमाय नमः ॥ 3 ॥ ॐ धर्मराजाय नमः ॥ 3 ॥ ॐ मृत्यवे नमः ॥ 3 ॥ ॐ अन्तकाय नमः ॥ 3॥ॐ वैवस्वताय नमः ॥ 3 ॥ ॐ कालाय नमः ॥ 3॥ ॐ ॥ सर्वभूतक्षाय नमः ॥ 3 ॥ ॐ औदुम्बराय नमः ॥ॐ ॥ दघ्नाय नमः ॥ 3 ॥ ॐ नीलाय नमः ॥ 3 ॥ ॐ परमेष्ठिने नमः ॥ 3 ॥ ॐ वृकोदराय नमः ॥ 3 ॥ ॐ चित्राय नमः ॥ 3 ॥ ॐ चित्रगुप्ताय नमः ॥ 3 ॥
मनुष्य पितृतर्पण
पितरों का आवाहन इन दो मन्त्रों से करना चाहिए।
ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्यु शन्तः समिधीमहि। उशन्नुशत आवह पितृन्हविषे अत्तवे॥
(यजु0 19। 70)
ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः। अणिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥
(यजु0 19। 58)
इसके बाद पहिले बनाई गई विधि से ही पितरों का नाम व गोत्र बोलते हुए हर एक के लिए तिल सहित तीन-तीन अञ्जलि जल अर्पण करना चाहिए।
अस्मत्पिता (बाप) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रों वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मत्पितामहः (दादा) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो रुद्ररुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मैं स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मत्प्रपितामहः (परदादा) अमुकशर्मा अमुकसगोत्र आदित्यरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मन्माता अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा रुद्ररुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मत्प्रपितामही (परदादी) अमुकी देवी दा अमुक कसगोत्रा आदित्यरुपा तृत्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मत्सापत्नमाता (सौतेली माँ) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 2 ॥
इसके पश्चात् नौ मन्त्रों का उच्चारण करते हुए पूर्वोक्त विधि से जल पृथ्वी पर गिरते रहना चाहिये।
1—ॐ उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः। असुँ य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥
(यजु0 19। 49)
2— अंगिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः। तेषाँ वयँ सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम॥
(यजु0 19। 50)
3—आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः। अणियज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्माम्॥
(यजु0 19। 58)
4—ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रु तम्। स्वाधास्थ तर्पयत में पितृन्॥
(यजु0 2। 34)
5—पितृभ्यः स्वाधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यःस्वधायिभ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। अक्षन्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वम्॥
(यजु0 19। 36)
6—ये चेह पितरो ये न नेह याँश्च विद्मयाँ 2॥ उचन प्रविद्द्म त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वाधाभिर्यज्ञँ, सुकृतं जुषस्व॥
(यजु0 19। 67)
7—मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥
(यजु0 13।27)
8—मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवँ रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता॥
(यजु0 13। 28)
9—मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँऽअस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः॥ (यजु0 13।29) ॐ मधु। मधु। मधु। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्॥
इसके बाद नीचे लिखे मन्त्रों का केवल पाठ करना चाहिए।
ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराव नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वास आधत्त।
(यजु0 2। 32)
द्विवतीयगोत्रतर्पण
पूर्वोक्त विधि से निम्नाँकित वाक्यों का तीन बार उच्चारण करते हुए तीन-तीन अंजलियां तिल सहित जल की द्वितीय गोत्र मातामह आदि को अर्पण करनी चाहिए।
अस्मन्मातामहः (नाना) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मत्प्रमातामहः (परनाना) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो रुद्ररुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मैं स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मद्वृद्धप्रमातामहः (बूढ़े परनाना) अमुकशर्मा अमुकसगोत्र आदितयरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 ॥ अस्मन्मातामही (नानी) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मत्प्रमाता मही (परनानी) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा रुद्ररुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मद्वृद्धप्रमातामही (बूढ़ी परनानी) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा आदित्यरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 3 ॥
पत्न्यादितर्पण
अस्मत्पत्नी (भार्या) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 1 ॥ अस्मत्सुतः (बेटा) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3॥ अस्मत्कन्या (बेटी) अमुकीदेवी दा अमुकसगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 1॥ अस्मत्पितृव्यः (पिता के भाई) अमुकशर्मा अनुकगोत्रो वसुरुप-स्नृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मान्मातुलः (मामा) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3॥ अस्मद्भाता (अपना भाई) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरुपस्तृप्यताम इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3॥ अस्मत्सापत्नभ्राता (सौतेला भाई) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मत्पितृ-भगिनी (बूआ) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 1॥ अस्मन्मातृभगिनी (मौसी) अमुकी देवी दा अमुकगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 1 ॥ अस्मदात्मभागिनी (अपनी बहिनी) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 1 ॥ अस्मत्सापत्नभगिनी (सौतेली बहिन) अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 1॥ अस्मच्छ्वशुरः (श्वशुर) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मैद्गुरुः अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मदाचार्यप्त्नी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरुपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ 2॥ अस्मच्छिष्यः अमुकशर्मा अमुकसगोत्रा वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मत्सखा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥ अस्मदाप्तपुरुषः अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरुपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ 3 ॥
इस के पश्चात् यज्ञोपवीत को बायें कंधे पर रख कर पूर्व की ओर मुख करके इन श्लोकों का पाठ करते हुए जल को गिराना चाहिए।
देवासुरास्तथा यक्षा नागा गर्न्धवराक्षसाः। पिशाचा गुह्यकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः॥ जलेचरा भूनिलया वाय्वाधाराश्य जन्तवः। प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्देत्तेनाम्बुनाखिलाः॥ नरकेषु समस्तेषु यतनासु च ये स्थिरताः। तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मयाः॥ येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकंिगक्षणः॥ ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ॥ अतीतकुलकोटीनाँ सप्तद्वीपनिवासिनाम् । आ ब्रह्ममुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम् ॥ येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणाः॥ ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः। ते गृह्वन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोद्कम् ॥
अर्घ्य दान
एक पात्र में शुद्ध जल ले कर उस पर अनामिका अंगुलि से षड्दल कमल बनाने के बाद उस में तुलसीदल, पुष्प, चावल और चन्दन छोड़ना चाहिए। फिर एक दूसरा पात्र ले कर उस पर चन्दन षड्दल कमल बनाना चाहिए और देवताओं का आवाहन पूजन करते हुए पहिले पात्र के जल से अर्घ्यदान देना चाहिए। मन्त्र इस प्रकार है।
ॐ ब्रह्य जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्या उपमा अस्य निष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः ॥ (यजु0 13 । 3) ॐ ब्रह्मणे नमः ब्रह्मणं पूजयामि ॥
ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्यपाँ सुरे स्वाहा ॥ (यजु0 5 । 15) ॐ विष्णवे नमः। विष्णुँ पूजयामि ॥
ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः ॥ (यजु0 16 । 1) ॐ रुद्राय नमः। रुद्र पूजयामि ॥
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गों देवस्य धीमहि। धियो नः प्रचोदयात् ॥ (यजु ॰ 36 । 3) ॐ सवित्रे नमः । सवितारं पूजयामि ॥
ॐ मित्रस्य चर्षणीघृतोऽवो देवस्य सानसि । द्युम्नं चित्रश्रावस्तमम् ॥ (यजु ॰ 11 । 62) ॐ मित्राय नमः पूजयामि ॥
ॐ इमं में वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय । त्यामवज्ञ्युराचके ॥ (यजु0 21 । 1) ॐ वरुणाय नमः। वरुणं पूजयामि ॥
सूर्योपस्थान
निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करके सूर्य भगवान को प्रणाम व प्रार्थना करनी चाहिए।
ॐ अद्दश्रमस्य केतवो धिरश्मयो जनाँ 2 अनु। भ्राजन्तों अग्नयो यथा। उपयामगृहीतोऽसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय। सूर्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोऽहम्मनुष्येषु भूयासम् ॥ (यजु0 8 । 40)
हँसः शुचिषद्द्वसुरन्तरिक्षस द्धोता वेदिषदतिथि-र्दुरोणासत्। नृषद्द्वरसदृतसद्वयोमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत॥ (यजु0 10। 24) इसके बाद दिग्देवताओं को नमस्कार करना चाहिए। ‘ॐ इन्द्राय नमः’ प्राच्यै। ‘ॐ अग्नये नमः’ आग्नेय्यै। ‘ॐ यमाय नमः’ दक्षिणायै। ‘ॐ निऋर्तये नमः’ नैऋत्यै। ‘ॐ वरुणाय नमः’ पश्चिमायै। ‘ॐ ईशानाय नमः’ ऐशान्यै। ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’ ऊर्ध्वायै। ‘ॐ अनन्ताय नमः’ अधरायै।
इसके पश्चात् जल में नमस्कार करना चाहिए।
ॐ ब्राह्मणे नमः। ॐ अग्नये नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ औषधिभ्यो नमः। ॐ वाचे नमः। ॐ वाचस्पतये नमः। ॐ महद्भ्यो नमः। ॐ विष्णवे नमः। ॐ अद्भ्यो नमः। ॐ अपाम्पतये नमः। ॐ वरुणाय नमः॥
मुख मार्जन
अब शुद्ध जल से मुख को धो डालना चाहिए।
ॐ संवर्चसा पयसा सन्तनूभिरगन्महि मनसा सँ शिवेन। त्वष्टा सुदत्रो विद्धातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम् ॥
(यजु0 2। 24)
विसर्जन
देवताओं का विसर्जन निम्न मन्त्र से करें।
ॐ देवा गातुविदो गातुँ वित्त्वा गातुमित। मनसस्पत इमं देव यज्ञं, स्वाहा वाते धाः॥
(यजु0 8। 21)
समर्पण
अब तक का किया गया तर्पण कार्य भगवान को समर्पित करना चाहिए।
अनेन यथाशक्तिकृतेन देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणारुयेन कर्मणा भगवान् मम समस्तपितृस्वरूपी जनार्दनवासुदेवः प्रीयताँ न मम। ॐ तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु। ॐ विष्णवे नमः।
गायत्री तपोभूमि द्वारा प्रकाशित अन्य पत्रिकाएँ
‘अखण्ड-ज्योति’ के अतिरिक्त गायत्री तपोभूमि द्वारा दो अन्य पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं—’जीवन यज्ञ’ (पाक्षिक) और ‘गायत्री परिवार पत्रिका’।
‘जीवन यज्ञ’ का पहला सामाजिक अंक होता है, जिसमें सामाजिक बुराइयों (दहेज, पशुबलि, मृत्युभोज बाल-विवाह, माँसाहार, नशे, जुआ सट्टा, अंधविश्वास, परिवार नियोजन, अश्लीलता आदि) स्वास्थ्य, नारी, बच्चों, रामायण, घरेलू समस्याओं, नैतिकता, जीवन को यज्ञमय व श्रेष्ठ बनाने संबंधी लेख छपते हैं। ‘जीवन यज्ञ’ का दूसरा धर्मकथाँक होता है जिसमें सत्य, प्रेम, न्याय, दया, सदाचार, संयम, सादगी, कर्तव्य पालन, ज्ञान, सेवा, अहिंसा, विवेक आदि श्रेष्ठ गुणों संबंधी शिक्षाप्रद कथाएँ आती हैं। ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ (मासिक) अ0 भा0 गायत्री परिवार की शाखाओं की गतिविधियों का समाचार पत्र है जिसमें शाखाओं द्वारा किये गए यज्ञ, सम्मेलन आदि आयोजनों के समाचार, तपोभूमि के प्रकारात्मक आदेश, नैतिक व साँस्कृतिक पुनरुत्थान के क्रियात्मक उपाय, कार्यकर्ताओं की कठिनाइयों के समाधान संबंधी लेख प्रकाशित होते हैं। यदि आपने इन्हें अभी तक न देखा हो तो नमूने की कापी मुफ्त मँगाइए। जीवन यज्ञ का वार्षिक मूल्य 6) और परिवार पत्रिका का 3) मात्र
*समाप्त*