धरा को ज्योतिर्मय कर दो


धरा को ज्योतिर्मय कर दो (kavita)

धरा को ज्योतिर्मय कर दो !

व्याप्त है गहन तिमिर जो आज-

चतुर्दिक् फैलाये अभिशाप।

ग्रसित करने को शाँति-सुधांशु-

आ रहा राहु चला चुपचाप ॥

हृदय में सद् विचार भर दो !

न हो जाये झंझा में शान्त-

तुम्हारा अमर दीप अभिराम।

युगों से करके पथ प्रशस्त-

आ रहा जलता जो अविराम॥

स्नेह उसमें इतना भर दो !

न रह जाये दुख-दैन्य विषाद-

विश्व में छाये नव-उल्लास।

असत पर हो सत का साम्राज्य-

आत्म-बल का पाकर आभास॥

प्रेरणा ऐसी शुभ भर दो !

-रामस्वरूप खरे ‘साहित्य रत्न’

सम्पादकीय-


अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए।

अधिकाँश व्यक्ति इस संसार में ऐसे हैं जो अपने आपको बहुत, हैरान, परेशान, अभागा और संकट ग्रस्त मानते हैं। इनकी मनोव्यथा सुनी जाय और ये जी खोल कर अपनी अन्तर्वेदना सुनावें तो ऐसा लगता है मानो भगवान् ने संसार का सारा दुख इन्हीं के मत्थे पटक दिया है, बेचारे रात दिन दुखी दशा पर खिन्न रहते हैं, रात-रात भर रोते रहते हैं, नींद नहीं आती। चिन्ता और वेदना में घुलते रहते हैं। कई बार तो ऐसा होता देखा गया है कि दुखी होकर वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। कई घर छोड़ कर चले जाते हैं, साधु बाबा जी बन जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद ऐसा करने से उनकी अन्तर्व्यथा दूर हो जायगी।

संसार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं जिसे सब सुख हों, किसी बात का अभाव न हो, सारी परिस्थितियाँ मनोनुकूल ही हों, कोई कष्ट न हो, कभी असफलता न मिले, कोई जिसका विरोधी न हो, ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर ढूंढ़े न मिलेगा। जहाँ अनेक सुख साधन मनुष्य को भगवान ने दिये हैं वहाँ कुछ थोड़े अभाव रखे हैं। विवेकशील व्यक्ति जीवन में उपलब्ध सुख सुविधाओं का अधिक चिन्तन करते हैं और उन उपलब्धियों पर संतोष प्रकट करते हुए प्रसन्न रहते हैं और उस कृपा के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते रहते हैं। थोड़े से अभाव एवं कष्ट उन्हें वैसे ही कौतूहल वर्धक लगते है जैसे माता अपने सुन्दर बालक के माथे पर काजल की बूँद लगा कर “डिढौरा” बना देती है कि कहीं ‘नजर’ न लग जाय।

इसके विपरीत अनेकों लोग उपलब्ध अनेकों सुख साधनों को तुच्छ मानते हैं और जो थोड़े से कष्ट एवं अभाव हैं उन्हें ही पर्वत तुल्य मान कर अपने आपको भारी विपत्तिग्रस्त अनुभव करते हैं। ऐसे लोग निरन्तर असन्तुष्ट रहते हैं, अपने सभी सम्बन्धित लोगों पर दोषारोपण करते रहते हैं ईश्वर को गाली देते हैं कि उसने हमें अमुक अभाव क्यों दिया? भाग्य को कोसते हैं कि वह इतना दुर्भाग्यपूर्ण क्यों है? माता-पिता और अभिभावक को बुरा कहते हैं कि उन्होंने अमुक साधन नहीं जुटाये जिससे हम उन्नतिशील स्थिति में होते? मित्रों और अफसरों को कोसते हैं कि उन्होंने उन्नति के लिए असाधारण सहयोग देकर बड़ा क्यों नहीं बना दिया? परिस्थिति,ग्रहदशा,दुनिया की बेवफाई, कलियुग का जमाना आदि जो भी उनकी समझ में आता है उसे बुरा भला कहते हैं और अपनी कठिनाईयों का दोष उनके मत्थे मढ़ते रहते हैं।

ऐसे लोगों की अधिकाँश मानसिक शक्ति इस रोने झींकने में ही चली जाती है। उनके बहुमूल्य समय का बहुत सा भाग इस कोसते रहने की प्रक्रिया में नष्ट हो जाता है। जिस समय का उपयोग वे अपनी कठिनाइयों को पार करने का उपाय सोचने और प्रयत्न करने में कर सकते थे उसको वे अपनी खिन्नता बनाये रखने और बढ़ाने में करते हैं। यह तरीका अपने समय और बल को नष्ट करने का ही है इसमें लाभ कुछ नहीं, उलटे उन कीमती शक्तियों के नष्ट होने की हानि ही है जिन्हें यदि बर्बाद होने से बचा लिया गया होता तो वे कठिनाईयों का एक बहुत बड़ा भाग आसानी से हल कर देतीं।

जीवन को शान्तिपूर्ण रीति से व्यतीत करने का तरीका यह है कि हम अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर न आँके। वरन् उतना ही समझें जितनी कि वे वास्तव में है तो हमारी अनेकों दुश्चिंताएं आसानी से नष्ट हो सकती हैं।

एक विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता है। फेल होने के समाचार से उसका मानसिक सन्तुलन डगमगा जाता है। वह इस असफलता को वज्रपात जैसी मानता है। सोचता है सारी दुनिया मुझे धिक्कारेगी, मूर्ख या आलसी समझेगी, मित्रों के सामने मेरी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल जायगी, अभिभावक कटु शब्द कह कर मेरा तिरस्कार करेंगे, यह कल्पना उसे असह्य लगती है, चित्त में भारी क्षोभ उत्पन्न होता है और रेल के आगे कटकर, नदी में कूद कर या और किसी प्रकार वह अपनी आत्महत्या कर लेता है। घर भर में कुहराम मच जाता है। वृद्ध माता-पिता रो-रो कर अन्धे हो जाते हैं। एक उल्लास पूर्ण हंसते खेलते घर का वातावरण शोक, क्षोभ और निराशा में परिणत हो जाता है। इस विपन्न स्थिति को उत्पन्न करने में सारा दोष उस गलत दृष्टिकोण का है जिसके अनुसार एक छोटी सी असफलता का मूल्य इतना बढ़ा-चढ़ा कर आँका गया।

एक दूसरा विद्यार्थी भी उसी कक्षा में अनुत्तीर्ण होता है। उसे भी दुख होता है पर वह वस्तुस्थिति का सही मूल्याँकन कर लेता है और सोचता है इस वर्ष बोर्ड की परीक्षा फल 43 प्रतिशत ही तो रहा। मेरे समान अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या 57 प्रतिशत है। वर्तमान परिस्थितियों में अनुत्तीर्ण होना एक साधारण सी बात है इसमें सदा विद्यार्थी ही दोषी नहीं होता वरन् प्रायः शिक्षकों की उदासीनता बिना पढ़े हुए विषयों के पर्चे आ जाना और नम्बर देने वालों की लापरवाही भी उसका कारण होती हैं। इस वर्ष अनुत्तीर्ण हो गये तो अगले वर्ष अधिक परिश्रम करने से अच्छे डिवीजन में उत्तीर्ण होने की आशा रहेगी आदि बातों से अपने मन को समझा लेता है और अनुत्तीर्ण होने की खिन्नता को जल्दी ही अपने मन में से हटाकर आगे के कार्यक्रम में लग जाता है।

दोनों ही छात्र एक ही समय एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए थे। एक ने आत्महत्या कर ली दूसरे ने उस बात को मामूली मान कर अपना साधारण क्रम जारी रखा। अन्तर केवल समझ का था परिस्थिति का नहीं। यदि परिस्थिति का होता तो दोनों को समान दुख होना चाहिए था और दोनों को आत्महत्या करनी चाहिए थी। पर ऐसा होता नहीं, इससे स्पष्ट है कि परिस्थितियों के मूल्याँकन में गड़बड़ी होने से मानसिक सन्तुलन बिगड़ा और उसी से दुर्घटना घटित हुई।

हमें चाहिए कि अपनी कठिनाइयों को बड़ा चढ़ा कर न देखें, वरन् उनको दूसरे अधिक आपत्ति ग्रस्त लोगों के साथ तुलना करके अपने आपको अपेक्षाकृत कम दुखी अनुभव करें। आपको आर्थिक कठिनाई रहती है, सभ्य सोसाइटी के लोगों जैसा जीवन यापन करने में वर्तमान आर्थिक स्थिति कुछ दुर्बल मालूम पड़ती है। थोड़ा आर्थिक अभाव अनुभव होता है और चिन्ता रहती है। इस स्थिति से छुटकारा प्राप्त करने के कई उपाय हो सकते हैं एक यह कि कुछ अधिक उपार्जन करने का प्रयत्न किया जाय। वर्तमान समय में जितना श्रम, समय और मनोयोग व्यवसाय में लगाया जाता है उससे अधिक लगाया जाए, कोई और सहायक धंधा ढूंढ़ा जाए या वर्तमान व्यवसाय में ही जो आय बढ़ने के उपाय संभव हों और दौड़-धूप करके जुटाया जाए। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि अपने खर्चे कम किये जाएं। दुनिया में सभी तरह के गरीब-अमीर लोग रहते हैं, अपनी-अपनी आमदनी के अनुसार जीवन यापन करने की योजना बनाते हैं। यदि अपनी आमदनी कम है तो क्यों न कम खर्च का बजट बनाकर काम चलाया जाए? खर्चा घटा लेने से कुछ सुविधाएं कम हो सकती हैं पर उस कमी का दुख उतना न होगा जितना बढ़े हुए खर्च की पूर्ति न होने पर दिन रात चिन्तित रहने के कारण होता है।

यदि दोनों प्रकार के प्रयत्न करते हुए भी समस्या हल नहीं होती तो किसी प्रकार काम चलाऊ रास्ता निकाल कर उसी में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की कोशिश करनी चाहिए। अपने से अधिक दुखी लोगों के साथ अपनी तुलना करने से मनुष्य यह अनुभव कर सकता है कि कुछ कष्ट होते हुए भी भगवान पर उसकी बड़ी कृपा है कि उसने उतना दुखी नहीं बनाया जितने अन्य लोग दुखी हैं। अस्पतालों में पड़े हुए बीमार, अंग-भंग, साधनहीन, संकट जंजालों में फँसे हुए, पारिवारिक उलझनों में बुरी तरह उलझे हुए अनेकों व्यक्ति इस संसार में बहुत ही दयनीय स्थिति में जीवन यापन करते हैं। उनसे अपनी तुलना की जाए तो प्रतीत होगा कि उनकी अपेक्षा अपनी स्थिति हजारों गुनी अच्छी है। यदि पशु पक्षियों, कीट पतंगों से अपनी तुलना की जाए तब तो निश्चय ही यह प्रतीत होगा कि अपने को प्राप्त सुविधाएं इतनी अधिक हैं कि इन थोड़ी सी कठिनाइयों को नगण्य ही माना जा सकता है।

इसी प्रकार जो व्यक्ति अभी हमें बुरे और अपने शत्रु प्रतीत होते हैं, उनके कुछ अपकारों की बात सोचना छोड़कर यदि उनके उपकारों को उनके द्वारा किये हुए सद्व्यवहारों को स्मरण करें तो निश्चय ही वे हमें शत्रु नहीं मित्र दिखाई पड़ेंगे। माता-पिता ने हमें एम.ए. तक नहीं पढ़ाया, यदि वे उतनी शिक्षा दिला देते तो आज हम ऊँची सर्विस प्राप्त करते होते, यह विचार मन में आने पर माता-पिता शत्रु जैसे प्रतीत होते हैं उनके प्रति द्वेष एवं दुर्भाव उत्पन्न होता है। पर यदि हम अपनी विचार धारा बदल दें और उनने जिन आर्थिक कठिनाइयों में रहते हुए उतने बड़े कुटुम्ब का पालन करते हुए, हमारा पालन पोषण किया एवं जितनी संभव थी उतनी शिक्षा व्यवस्था की, तो उनके उपकारों के प्रति मन श्रद्धा से झुक जाएगा और वे मित्र ही नहीं देवता के समान उपकारी प्रतीत होंगे।

दृष्टिकोण में थोड़ा अन्तर कर देने से हम असंतुष्ट और खिन्न जीवन को संतोष में परिणित कर सकते हैं। ईश्वर ने सुर दुर्लभ मानव जीवन प्रदान करके इतनी बहुमूल्य सम्पदा हमें प्रदान की है कि उसका मूल्य लाखों करोड़ों रुपयों में भी नहीं चुकाया जा सकता। जैसा शरीर कुल, सम्मान, विद्या, परिवार आदि अपने को प्राप्त है उसमें से प्रत्येक को विशेषता और सुविधा का चिन्तन करें, साथ ही यह भी सोचें कि यदि यह बातें उपलब्ध न होती तो उनके अभाव में अपना जीवन कितना नीरस होता- तो इस चिन्तन से हमें प्रतीत होगा कि हमारी वर्तमान परिस्थिति दुख दारिद्र से भरी नहीं, वरन् सुख सुविधाओं से सम्पन्न है।

दूसरों के द्वारा अपने प्रति जो उपकार हुए हैं उनका यदि हम विचार करते रहें तो यही अनुभव होगा कि हमारे निकटवर्ती सभी लोग बड़े उपकारी और सेवाभावी और स्वर्गीय प्रकृति के हैं। इनके साथ रहने में अपने को सुख ही सुख अनुभव करना चाहिए। इसके विपरीत यदि उनके दोष ढूँढ़ने लगे और उन घटनाओं को स्मरण किया करें जिसमें उनने कुछ अपकार किये तो हमें अपने सभी स्वजन संबंधी बड़े दुष्ट प्रकृति के, अपकारी, असुर एवं शत्रु प्रतीत होंगे और ऐसा लगेगा कि इन लोगों का संपर्क हमारे लिए नरक के समान दुखदायी है।

इस संसार का निमार्ण सत और तम शुद्ध और अशुद्ध, भले और बुरे तत्वों से मिल कर हुआ है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं जो पूर्णतः बुरा या पूर्णतः भला हो। समय-समय पर यह भली-बुरी परिस्थितियाँ दबती और उभरती रहती हैं। धूप-छाँव की तरह प्रिय और अप्रिय अवसर आते जाते रहते हैं। इनमें से किसे स्मरण रखा जाय और किसे भुलाया जाय यही विचार करना बुद्धिमत्ता का चिन्ह है। यदि हम दुखों को, अभावों को, असफलताओं को, दूसरों के अपकारों को ही स्मरण किया करें तो यह जीवन नरकमय दुखों से भर जायगा। हर घड़ी खिन्नता, निराशा और असंतुष्टि चित्त में छाई रहेगी। पर यदि दृष्टिकोण बदल लिया जाय और प्रिय प्रसंगों, सफलताओं, प्राप्त साधन सम्पदा के लोगों और दूसरों के किये हुए उपकारों को स्मरण किया जाय तो प्रतीत होगा कि भले ही थोड़े अभाव आज हों पर उनकी तुलना में सुख दायक वातावरण ही अधिक है, दुर्भाग्य की अपेक्षा सौभाग्य की ही स्थिति अपने को अधिक उपलब्ध है।

जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए सुविधा सामग्रियों की आवश्यकता अनुभव की जाती है, सो ठीक है। इसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। पर यह भी न भूल जाना चाहिए कि जो प्राप्त है उसका सदुपयोग किया जाय। उपलब्ध साधनों का सदुपयोग यदि हम सीख जायं, हर वस्तु का मितव्ययितापूर्वक उपयोग करें, उसका पूरा-पूरा लाभ लें तो जो कुछ प्राप्त है वही हमारे आनन्द को अनेकों गुना बढ़ा सकता है। अपनी धर्मपत्नी जैसी भी कुछ वह है यदि उसे अधिक शिक्षित, अधिक सुयोग्य बनाया जाय और उसके स्वभाव तथा गुणों का अपने कार्यक्रमों में ठीक प्रकार उपयोग किया जाय तो यही पत्नी जो आज व्यर्थ का बोझ जैसी मालूम पड़ती है- अत्यंत उपयोगी एवं लाभदायक प्रतीत होने लगेगी। जितनी आजीविका आज अपने को प्राप्त है यदि उसके खर्च को ही विवेक और मितव्ययितापूर्वक ऐसी योजना बनाई जाय कि प्रत्येक पैसे से अधिकाधिक लाभ उठाया जा सके तो यह आज की थोड़ी आजीविका भी आनंद और सुविधाओं में अनेक गुनी वृद्धि कर सकती है। इसके विपरीत यदि अपना दृष्टिकोण अस्त व्यस्त है तो बड़ी मात्रा में सुख−साधन उपलब्ध होते हुए भी वे कुछ लाभ न पहुँचा सकेंगे वरन् ‘जी के जंजाल’ बनकर परेशानियाँ और उलझनें ही उत्पन्न करेंगे।

सुखी जीवन की आकाँक्षा सभी को होती है। वह उचित और स्वाभाविक भी है पर उसकी उपलब्धि तभी संभव है जब हम अपने दृष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें। सुधरा हुआ दृष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें सुधरा हुआ दृष्टिकोण स्वल्प साधनों और कठिन परिस्थितियों में भी शान्ति और सन्तोष को कायम रख सकता है। गरीबी में भी लोग स्वर्ग का आनन्द उपलब्ध करते देखे जाते हैं। पर यदि दृष्टिकोण अनुपयुक्त है, तो संसार के समस्त सुख साधन उपलब्ध होते हुए भी हमें सुखी न बना सकेंगे। अतएव सुखी जीवन की आकाँक्षा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उचित है कि अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करता रहे।


आत्म-उपदेश

(1) क्यों बेफायदा चिन्ता करते हो, किससे बेकार डरते हो। कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा न पैदा होता है न मरता है।

(2) जो है सो है, जो हुआ सो हुआ, जो होगा सो अच्छा होगा। तुम अतीत का दुःख न करो। भविष्य से भयभीत न हो / वर्तमान बीत रहा है।

(3) तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे जो खो दिया। जो लिया यहीं से लिया जो दिया सो यहीं दिया। जो लिया उसी से लिया जो दिया उसी को दिया। जो खाली हाथ आये थे सो खाली हाथ चले।

(4) जो आज तुम्हारा है यह कल किसी और का था और परसों किसी का था न यह किसी का है। तुम इसको अपना समझ कर प्रसन्न होते हो और यही प्रसन्नता तुम्हें अप्रसन्न कर रही है।

(5) परिवर्तन संसार की जान है। जिसको मौत समझते हो यही जीवन है। मिनट में तुम करोड़ों के वारिस और क्षणभर में लावारिस बन जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-बेगाना, दिल से मिटा दो। ख्याल से हटादो। फिर सब तुम्हारा है और तुम सब के हो। न यह जिस्म तुम्हारा है न तुम जिस्म के हो। यह आग से बनता है और यह आग में मिल जुल जाता है। मिट्टी से बनता है और मिट्टी में मिल जाता है। यह पानी से पैदा होता है। और पानी में समा जाता है। यह हवा से भरा हुआ है और हवा में भर जाता है। न हड्डी रहती है, न जबान, कान, आँख का निशान बाकी रहता है, मगर फिर भी तुम्हारा वैभव वैसे का वैसा ही रहता है। फिर तुम सोचो कि तुम क्या हो?

(6) यह जगह तुम्हारी और सब चीज तुम्हारी है। जहाँ से चाहो चल पड़ो, जहाँ पर चाहो ठहर जाओ और जहाँ पर चाहो खत्म कर दो। इसका न कहीं आदि है और न ही अन्त। तुम्हें किसका डर? अपना ही डर और आप ही डराने वाले हो।

(7) उठो तुम परमात्मा के अमृत पुत्रों! तुम प्रकृति की सबसे बड़ी शक्ति का प्रतीक हो। तुम्हारे अन्दर सम्पूर्ण दैवी शक्ति इस प्रकार भरी जैसे बीज में वृक्ष निहित है।

(8) वास्तव में तुमको किसी का डर नहीं, फिक्र नहीं, सन्देश नहीं, दर्द नहीं, तुम स्वयं को उसे सौंप दो।

(9) सब धर्मों में श्रेष्ठ धर्म हरि नाम जपना और निर्मल काम करना।

-के. पी. वर्मा


गायत्री का अधिकार और अनाधिकार


आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए

(श्री भगवानसहायजी वाशिष्ठ)

कस्यं मृजाना अतियन्तिरिप्रमायुर्दधानाः प्रतरंनवीय॥

आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु॥

अ. 18। 31।17॥

“आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बन कर अपनी अशुद्धि, मल अथवा अपमृत्यु को साफ कर दूर करते हैं। और नव दीर्घ आयुष्य धारण करते हैं। तत्पश्चात् हम धन और प्रजा के साथ अभ्युदय को प्राप्त होते हुए अपने घर में सुगन्धि रूप बन कर रहें।”

उक्त वेदमंत्र में आत्मसुधार के लिए बहुत ही सरल और स्पष्ट राजमार्ग बताते हुए आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा दी गई है। मंत्र के प्रारम्भ में आया है आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बनकर अपनी अशुद्धि व भल अथवा अपमृत्यु को साफ करते हैं। इसके अनुसार आत्मनिरीक्षण करते रहने से सारे दोष, बुराइयाँ, दुर्व्यसन आदि ठीक उसी प्रकार अलग-अलग हो जाते हैं जैसे छलनी में किसी पदार्थ को छानने पर उसका खराब अंश अलग रह जाता है और वस्तु शुद्ध और मल रहित बन जाती है। आत्मनिरीक्षण का अवलम्बन लेने पर मनुष्य के दोष अशुद्धि, बुराइयाँ आदि भी ठीक इसी प्रकार दूर हो जाती हैं।

मानव स्वभाव की कमजोरी के कारण उसमें कुछ न कुछ दोष, बुराइयाँ आदि अपना घर बनाये रहती हैं। किन्तु इन्हें स्वच्छन्दतापूर्वक पनपने देना मनुष्य के लिए बहुत घातक सिद्ध होता है। उस समय मनुष्य की वही हालत होती है जैसे उस खेत की, जो मालिक की देखभाल आदि से वंचित झाड़ झंखाड़, अनावश्यक कूड़ा, घास-पत्ता आदि से अनुपयोगी बन जाता है। ऐसे मालिक की देखभाल के अभाव में घर की दुर्दशा होती है। ठीक उसी प्रकार मानव जीवन बंजर जमीन, सफाई और निरीक्षण के अभाव में घर की तरह बेढंगा, दोषपूर्ण, अशुद्ध और विकृत बन जाता है। एक छोटे से अवगुण दोष के कारण जीवन में बट्टा लग जाता है। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि थोड़ी सी खराबी होने पर चाँदी का सिक्का बेकार हो जाता है, अच्छे से अच्छे भोजन को एक मक्खी अथवा कीड़ा घृणा युक्त बना देता है। घड़े में छोटा सा छेद होने पर उसको खाली कर देता है, एक छोटा सा फोड़ा जानलेवा बन जाता है। ठीक उसी प्रकार किसी भी सुपात्र की उपयोगिता एवं महत्ता उसके एक अवगुण एवं दोष से नष्ट हो जाती है। एक दोष से मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है पचास वर्षों की बहुत बड़ी नेकनामी को कुछ क्षण की बदनामी नष्ट कर देती है।

मनुष्य के चरित्र व्यवहार, स्वभाव, विचार, जीवन यापन दृष्टिकोण आदि में कुछ न कुछ कमी रह जाना स्वाभाविक है किन्तु जैसा कि ऊपर व्यक्त किया जा चुका है, एक छोटी सी बुराई भी जीवन की समस्त अच्छाइयों पर पानी फेर देती है। जिस प्रकार एक हल्के से धब्बे से किसी भी चित्र की सुन्दरता नष्ट हो जाती है उसी प्रकार किसी भी दोष से दूषित मनुष्य का जीवन कलंकित हो जाता है। चन्द्रमा के छोटे दो धब्बे उसके सौंदर्य में कितने बड़े बाधक हैं जो हर देखने वाले की आँखों में खटक जाते हैं। किसी मशीन का एक भी पुरजा बिगड़ जाने पर सारी मशीन का संतुलन और तत्परता नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार मनुष्य जीवन व्याप्त दोष, बुराइयों, अशुद्धियों आदि को दूर करके पूर्णता व अभ्युदय की ओर अग्रसर होने के लिए आत्म निरीक्षण रूपी छलनी की आवश्यकता है।

आत्म निरीक्षण के पथ पर चलते हुए मनुष्य को अपने जीवन एवं तत्सम्बन्धित विषयों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते रहना चाहिए और उनका सुधार करना चाहिए। जिस प्रकार मुनीम अपनी रोकड़ को बड़े ध्यान से मिलाता है और एक पैसे की भूल हो जाने पर उसको निकाल कर ही पीछा छोड़ता है, उसी प्रकार हमें भी अपने दोषों का पूरा-पूरा निरीक्षण करके उन्हें दुरुस्त करना चाहिए। यही आत्म निरीक्षण रूपी छननी है जिसमें चरित्र व्यवहार, स्वभाव आदि की सारी अशुद्धियाँ बुराइयां दूर हों जाती हैं।

इसके लिए मनुष्य को दोषज्ञ बनना चाहिए। इसका तात्पर्य यह नहीं पर दोष दर्शन की वृत्ति अपनाई जाय वरन् स्व छिद्रान्वेषण की आदत डाली जाय। दोषज्ञ का अर्थ है अपने दोषों का जानकार होना। लेकिन स्वदोष दर्शन और उन्हें दूर करने के पथ पर बहुत ही कम व्यक्ति बढ़ पाते हैं। कई तो अपने आप के स्तर एवं दोषों को जानते भी नहीं।

स्वदोष दर्शन परक बुद्धि आत्म निरीक्षण की क्षमता प्राप्त करने में सर्वप्रथम अपने दोषों को लोक शास्त्र के आधार पर देखना चाहिए अधिकतर लोग मनुष्य के सम्मुख, उसकी बुराइयों तथा दोषों का बखान नहीं करते इसलिए लोक व्यापी आधार पर उन्हें पहचानना चाहिए जब लोक में किसी भी बात पर दोष मिलता हो, अपनी असफलता, हानि के कारण दूसरे लोग जान पड़े, दुख कठिनाई अपने पर विधाता को दोष दिया जाए, ऐसे समय अपने अंतर को ढूँढ़ना चाहिए। अपनी आन्तरिक स्थिति को टटोल कर देखने पर पता चलता है कि इन सबका कारण हमारे स्वयं के अन्तर में ही मौजूद है। ऐसी परिस्थितियों में सूक्ष्म अन्तः निरीक्षण करने पर पता चलता है कि मनुष्य की मानसिक कमजोरी के कारण ही वह अपनी हानि दोष का कारण दूसरों को बताता है। अपनी परिश्रम हीनता एवं आलस्यवश ही असफलतायें मिलती हैं। लोक व्यवहार की कुशलता मिलनसारी के अभाव में ही सामाजिक अवहेलना, तिरस्कार सहना पड़ता है। सहनशीलता के अभाव में संसार कठोर जान पड़ता है। इस प्रकार बहुत कुछ बाहर दीखने वाली बुराइयां कमजोरियाँ अपने अन्तर में ही छिपी रहती हैं। ढूंढ़ने पर उन्हें पहचाना जा सकता है। अपने अन्तर को टटोलते हुए ठीक ही कहा है-

बुरा जो ढूँढन मैं चला मुझसा बुरा न कोय-

इस प्रकार अपने अंतर को खोजने पर अपनी कमजोरियाँ स्पष्ट दिखाई देंगी।

आत्मनिरीक्षण एवं दोष दर्शन में दूसरे लोगों से भी काफी लाभ उठाया जा सकता है। उदाहरणार्थ अन्य लोगों से घृणा करने, फटकारने, विश्वास न करने, व्यक्तित्व का कुछ भी मूल्य न समझने, तरह-तरह के दोष लाँछन लगने पर नाराज एवं उत्तेजित न होकर यदि यह देखने की कोशिश की जाय कि आखिर लोग ऐसा क्यों करते हैं । कहीं वास्तव में तो इनकी जड़ें स्वयं में नहीं जमी हुई हैं। इस प्रकार दूसरे लोगों की निगाह के अनुसार अपने अन्तर को टटोलना चाहिए। इससे अपने कई दोषों का पता लग जायगा। मनुष्य के फूहड़पन से ही लोग उससे घृणा करने लगते हैं, स्वान वृत्ति होने के कारण ही फटकार मिलती है। अपनी बेईमानी एवं स्वार्थ परायणता के कारण ही दूसरे अविश्वास करते हैं । अपनी अयोग्यता एवं व्यक्तित्व के प्रति सजग नहीं रहने पर ही दूसरों द्वारा तिरस्कार मिलता है। इस प्रकार दूसरों के अपने प्रति विचार, दृष्टिकोण आदि से लाभ उठाकर भी आत्मनिरीक्षण में सफलता मिल सकती है और अपने दोष बुराइयां आदि समझ में आ जाती है। निन्दा करने वाले से स्वदोष दर्शन में आत्म निरीक्षण में काफी सहयोग मिलता है। निन्दक की उपयोगिता एवं उसे हितकारी बताते हुये रहीम जी ने ठीक ही कहा है।

“निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय।

बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।

इस प्रकार नित्य आत्मनिरीक्षण का अभ्यास डाल लेने पर अपनी बुराइयां दोष अशुद्धियाँ, विकार समझ में आने लगते हैं। मनुष्य एक सुयोग्य सर्जन की भाँति आत्मनिरीक्षण रूपी सूक्ष्म दर्शक यंत्र द्वारा अपने अन्तर में छिपे हुये उन दूषित तत्वों को सरलता से देख सकता है जिनकी शिकायत अक्सर बाह्य वातावरण के सम्बन्ध में की जाती है। सूक्ष्म निरीक्षण करने पर अन्तर में आत्म प्रवंचना, आत्म क्षुद्रता, व्यग्रता, अव्यवहारिकता, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अन्धविश्वास, आलस्य, उदासीनता, फूहड़पन, कटुभाषण, मिथ्या आश्वासन देना, चाटुकारिता, हठ, दुराग्रहता, खीजना, व्यवहार का खोखलापन, अनुचित साहस, असावधानी, फैशन आदि अनेकों दोष विकार, अशुद्धियाँ नजर आयेंगी। आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी से ये दूषित तत्व अलग-2 दिखाई दें जिनसे मनुष्य का जीवन असफल हो जाता है और उसका कारण दूसरों को बताया जाता है।

जब आत्मनिरीक्षण द्वारा अपनी बुराइयां, दोष विकार समझ में आ जायँ तो उन्हें विवेक बुद्धि, आत्मबल से दूर करने के लिए ठीक उसी प्रकार प्रयत्न करना चाहिए जिस प्रकार एक शल्य चिकित्सक तटस्थ भाव से रोगी के शरीर के दूषित तत्वों को बाहर निकाल फेंकता है उनसे उसका निजी कोई सम्बन्ध नहीं होता । अक्सर कई व्यक्ति अपनी बुराइयों को जानकर भी दूर करने का प्रयत्न नहीं करते क्योंकि उनसे वे अपना मोह द्वारा सम्बन्ध बनाये रखते हैं। इसलिए तटस्थ और निष्पक्ष भाव से अपनी बुराइयों, दोषों को दूर करना चाहिए, आखिर बुराइयां तो बुराइयां ही हैं उनसे लगाव रखना सभी तरह अहितकर होता है। महापुरुषों की जीवन गाथाओं से पता चलता है कि उनमें जो भी कमजोरियाँ थीं उन्हें स्वयं ही नहीं देखा वरन् जन साधारण के समक्ष भी अपनी वास्तविक स्थिति को रखा, फलतः एक दिन वे पूर्ण निर्विकार एवं शुद्ध हृदय बन गये। अपनी बुराइयों को छुटाने का सरल मार्ग यह भी है कि अपने वास्तविक स्वरूप को जन साधारण के समक्ष रखना चाहिए ऊपर से कलई चमक-दमक, विज्ञापन बाजी से अपने असली रूप को छिपाना नहीं चाहिए। इससे अपनी बुराइयों को छिपाने की आदत पड़ जाती है और वे बुराइयाँ चिपकी ही रहती हैं। यदि सच्चे हृदय से अपनी बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया जाय तो एक दिन उनसे छुटकारा पाया जा सकता है। सूर, तुलसी, महात्मा गाँधी आदि महापुरुषों का जीवन हमारे समक्ष है। अपनी बुराइयों को समझते हुए उन्हें दूर करने का विनम्र प्रयत्न करते रहने से उन्होंने एक दिन पूर्ण रूपेण इनसे छुटकारा पाया और शुद्ध परिष्कृत स्वरूप प्राप्त किया।

अपने विकारों को दूर कर देने पर नव जीवन, दीर्घ आयु, महान प्रतिभा, विवेक, सामर्थ्य की प्राप्ति होती है जैसा कि वेद मंत्र में आया है। “आत्म निरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बनकर अपनी अशुद्धि और मल को दूर करते हैं और नया दीर्घ जीवन धारण करते हैं।” यह निभ्रांति सत्य है कि निर्विकार शुद्ध बुद्ध, दोषरहित बन जाने पर मनुष्य को दीर्घ आयु, व नवजीवन की प्राप्ति होती है। वह शक्ति और सामर्थ्य का केन्द्र बन जाता है, उत्साह और साहस उसमें फूट-फूट कर निकलता है। सिद्धि सफलता उसके समक्ष हाथ जोड़े खड़ी रहती है।

वेद मन्त्र में आगे आया है कि “तत्पश्चात् हम धन और प्रजा के साथ अभ्युदय को प्राप्त होते हुए अपने घर में सुगन्धि रूप बनकर रहें।” आत्मनिरीक्षण द्वारा अपने दोषों को दूर कर देने से आत्मा का शुद्ध परिष्कृत सत् चित् आनन्द स्वरूप विकसित हो उठता है, उसमें जब सात्विकता, सौंदर्य, शक्ति, साहस, स्फूर्ति, सौजन्य की कलिकायें विकसित होती हैं तो एक मधुर गन्ध यत्र-तत्र फैल उठती है जिसके प्रभाव से धन सत्सन्तति, ऐश्वर्य, वैभव आदि एकत्रित हो जीवन में स्वर्गीय वातावरण का निर्माण करते हैं। अभ्युदय, प्रगति, उत्थान, विकास का सहज क्रम तीव्र हो उठता है। आत्म पवित्रता की मधुर गंध से लोक मानस आकर्षित हो उठता है और अपना अगुवा मान कर पीछे-पीछे चलने में अपना सौभाग्य मानता है।

वेदमन्त्र से प्रेरणा लेते हुए सूक्ष्म आत्म निरीक्षण करके अपने विकारों, दोषों, बुराइयों को ढूंढ़ना चाहिए और उन्हें दूर करना चाहिए। जब इससे जीवन परिष्कृत शुद्ध-बुद्ध स्वरूप बन जाता है तो परमात्मा का दिव्य प्रकाश स्वतः सहज रूप से प्रस्फुटित हो उठता है और लोक एवं परलोक में कल्याण की प्राप्ति होती है। ऋषियों के बताते हुये उक्त मार्ग पर चलकर ही मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है।


हम दूसरों के गुणों पर ही ध्यान दें।

(श्री रामानन्द तीर्थ)

जब कोई उपयोगी या होनहार आँदोलन उठाया जाता है तभी हमारे देश में दलबन्दी का भाव उत्पन्न होता है और उस आन्दोलन के नेता के चरित्र सम्बन्धी दोषों की चर्चा आरम्भ हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि अनेक फल- कली की अवस्था अथवा शैशव काल में ही मसल डाले जाते हैं।

उस दिन एक दूध बेचने वाले लड़के को देखा जो एक घर में दूध से भरी कुछ बोतलें लेकर जा रहा था। संयोग से एक बोतल उसके हाथ से फिसल पड़ी और टूट गई। इस पर उसका क्रोध भभक उठा और बाकी बोतलें भी उसने सड़क पर दे मारीं।

हमारे देश के ये ईर्ष्यालु अथवा छिद्रान्वेषी लोग भी ऐसी ही मनोवृत्ति का परिचय दिया करते हैं। वे किसी व्यक्ति में एक साधारण सी त्रुटि देखकर उसके अन्य समस्त अच्छे लक्षणों की तरफ से आँखें बन्द कर लेते हैं इसका परिणाम यह होता है कि लोगों की जो शक्तियाँ अपना और दूसरों का हित साधन करने में लगनी चाहिये थी, वे अकारण जाती हैं। इतना ही नहीं ऐसी सन्देहात्मक प्रवृत्ति का यह ही प्रभाव होता है कि अनेक अच्छे व्यक्ति श्रेष्ठ कर्म को त्याग कर हानिकारक कार्यों में प्रवृत्त हो जाते हैं क्योंकि जैसी कहावत है कि “किसी को चोर-चोर कहो तो वह सचमुच चोरी करने लग जायगा।”

पर क्या ऐसे लोगों को कोई ऐसा आधार नहीं दिखलाई पड़ता जिस पर खड़े होकर वे सबके साथ मिल-जुलकर काम कर सकें? क्या हमारे पड़ोसियों में कोई प्रशंसनीय गुण नहीं है? ऐसे लोगों से हम पूछना चाहते हैं कि उनको शुद्धता-अशुद्धता के नाम पर अपने मन से “ईश्वर की खुफिया पुलिस” बनने और दूसरे मनुष्यों के निजी (प्राइवेट) चरित्र में झाँकने का क्या अधिकार है? जिस मनुष्य का सार्वजनिक चरित्र देश के लिये उपयोगी सिद्ध हो रहा है उसकी चरित्र सम्बन्धी गुप्त बातों में सर खपाने से क्या लाभ हो सकता है? वह अपने व्यक्तिगत आचरण का हिसाब अपने परमेश्वर को स्वयं ही देगा। हम हस्तक्षेप करने वाले कौन हैं? दूसरों के गुण-दोषों पर विचार करने में हमारी जितनी शक्ति का अपव्यय होता है, उसे यदि हम अपने आदर्शों के अनुसार कार्य करने में लगाया जाय तो कितना लाभ हो सकता है। ये लोग इस बात पर भी ख्याल नहीं करते कि क्या ऊपर से दबाव डालने पर कोई व्यक्ति जरा सा भी सदाचारी बन सकता है? हम तो यह भी मानने को तैयार नहीं हैं कि सर्वसाधारण में जो प्रथायें या भावनायें प्रचलित हो गई हैं तदनुसार आचरण करना ही प्रशंसनीय अथवा शुद्ध है। यह तो एक बड़ी कमजोरी की बात है। काँटों के कारण हम गुलाब को त्याग नहीं देते। एक हलवाई चाहे भूसी खाकर जीवन निर्वाह करता हो, पर इस कारण हम उसकी बनाई हुई मिठाई का त्याग नहीं कर सकते। जो वस्तु किसी एक मनुष्य के पेट के भीतर जाती है,वह दूसरे मनुष्य को भ्रष्ट नहीं कर सकती, इसके विपरीत जो वस्तु उस मनुष्य के भीतर से निकलती है वही दूसरे को बिगाड़ सकती है। यदि स्वामी विवेकानन्द किन्हीं चीजों को खाते और पीते हैं तो क्या हुआ? जब तक उनसे उत्तम उपदेश आते हैं तब तक हमें परवाह नहीं कि उनके पेट के भीतर क्या प्रवेश कर रहा है। शिक्षक के व्यक्तित्व का विचार न करके हमको उसकी शिक्षा-प्रणाली के गुण-दोषों को परखना चाहिये। चित्रकार कुरूप है, तो क्या इस कारण हमको उसके बनाये सुन्दर चित्रों का तिरस्कार करना चाहिये? सर फ्राँसिस बेकन के घूसखोर होने के कारण क्या उनके द्वारा लिखे तर्क-शास्त्र के अनमोल ग्रंथ को फेंक देना चाहिये? अब इस बीसवीं सदी में तो हमको इतनी विवेक बुद्धि जागृत कर लेना चाहिये कि हम मनुष्यों के व्यक्तिगत चरित्र और उनके उपदेशों तथा सत्कार्यों को एक साथ मिलाकर न तोलें। कीचड़ से भरी कच्ची पोखर में उत्पन्न होने के कारण क्या हम सुन्दर कमल का तिरस्कार कर सकते हैं।

तुच्छ समझे जाने वाले बन्दरों को अद्वितीय सेना में परिणित कर देने ही में राम की बड़ाई थी पवित्र और विशुद्ध आत्मा से कौन मिल-जुलकर नहीं रह सकता? किन्तु महात्मा वही है जिसकी विशाल सहानुभूति और मातृवत् हृदय पापियों और नीचों को भी अपने विस्तृत अंक में समेट लेते हैं।

हमारे यहाँ रसोई घर से सम्बन्ध रखने वाली तुच्छ बातों को ही इतना अधिक महत्व दिया जाता है और उसके लिये समय तथा शक्ति का इतना अपव्यय किया जाता है कि हमको आध्यात्मिक और शारीरिक विकास का अवसर ही नहीं मिलता। निस्सन्देह ऐसा “रसोई धर्म” जो अनन्त, अमर आत्मा को निकम्मा बना दे, शोचनीय है । पथभ्रष्ट और सनकी उपदेशक ही अपने पड़ोसियों के व्यक्तिगत आचरणों की निन्दा किया करते हैं। पर हम उनसे पूछते हैं कि क्या स्वयं तुम्हारा उद्धार हो चुका है? वे नहीं जानते कि अपने आन्तरिक जीवन की रक्षा वही कर सकता है जो अपने साँसारिक जीवन को खो बैठे। यदि तुम कहो कि हम ऐसे ही जीवनमुक्त पुरुषों में से एक हैं तो मैं कहूँगा कि उठो और जगत के उद्धारक बन जाओ। बुद्ध भगवान प्रायः एक वेश्या के घर पर अतिथि हुआ करते थे। महात्मा ईसा ने मेरी मेगडालीन नाम की व्यभिचारी दोषी स्त्री को अपने पास बैठाया था। इसलिये जब तक हम दूसरों के दोषों पर जोर देते रहेंगे तब तक लोगों में प्रेम और मेल हर्गिज नहीं हो सकता।

हर व्यक्ति को हर एक दशा में होकर गुजरना पड़ता ही है। जैसे प्रकृति के नियमानुसार प्रत्येक मानव देह को शिशु अवस्था, बाल्यावस्था, युवावस्था आदि को पार करना पड़ता है। ठीक उसी प्रकार नैतिक और आध्यात्मिक जगत में भी शिशुता और बाल्यकाल की अवस्था में अनिवार्य है। पापी कहे जाने वाले हमारे नैतिक क्षेत्र के बच्चे हैं। जिनको भ्राँतिवश तुम “पतित” कहते हो, उनका अभी “उत्थान” नहीं हुआ है। वे अभी विद्यालय के नये विद्यार्थी हैं, जैसे कि कभी तुम भी थे।

कुछ लोग विश्वव्यापी प्रेम के विषय में बहुत होहल्ला मचाते हैं, परन्तु फिर भी अपने नेत्रों को अपने आश्रितों के चरित्र सम्बन्धी दोषों पर गाड़े रखते हैं और इस परस्पर विरोधी भावना को छुपाने के लिए कहते हैं कि “हम पाप से घृणा करते हैं, पर पापी से प्रेम करते हैं।” पर मैं आपको यही बताऊँगा कि जब तक आप किसी में भद्दापन (दोष) देख रहे हैं तब तक आप उससे कभी प्रेम नहीं कर सकते। प्रेम का अर्थ है सुन्दरता का, उत्तमता का देखना व अनुभव करना।

अन्धकार से लड़ाई लड़कर उसे कदापि दूर नहीं किया जा सकता। एक अँधेरे घेरे कमरे में यदि हम सब ओर ढेले फेकें, डंडा फटकारें, दरवाजों के शीशों को चूर-चूर कर दें, मेज और लौट-पौट दें, और और बराबर कोसते रहें, निन्दा करते रहें तो क्या इससे अन्धकार दूर हो जायगा? नहीं, अन्धकार को दूर करने का उपाय एक मात्र यही है कि वहाँ कोई लालटेन, मोमबत्ती आदि जलाओ, अन्धकार स्वयं ही दूर हो जाएगा। इसी प्रकार निषेधार्थक (खण्डन करने वाला) छिद्रान्वेषण, तेज को ठण्डा करने वाली, उत्साह को मन्द करने वाली प्रक्रिया से कभी मामला न सुधरेगा। आवश्यकता है केवल असंदिग्ध, प्रफुल्लित आशाजनक, प्रेमपूर्ण, उत्साह वर्धक भाव की सफाई के उद्देश्य से यदि समस्त कीचड़ नालियों से निकाल कर सड़क पर फैला दिया जाए तो क्या इससे कोई अच्छा परिणाम निकल सकेगा? कदापि नहीं? इसी प्रकार दूसरे के दोषों पर जोर देने से कोई भलाई न होगी। शाँति और सद्भाव रूपी ताजे जल की धारा को नाली में बहने दो तो सारी गन्दगी धुल जाएगी। कहा जाता है कि बादशाह अकबर ने एक लकीर खींचकर अपने बुद्धिमान मन्त्री बीरबल से कहा कि इस लकीर को किसी भी तरफ से बिना काटे या मिटाये छोटा कर दो। बीरबल ने उसके पास दूसरी बड़ी रेखा खींचकर अकबर की रेखा छोटी कर दी। यही ढंग है। बड़ी रेखा खींचना बुद्धिमानी है। जिस तरह बीरबल ने अकबर को भीतर से विश्वास करा दिया कि उसकी रेखा छोटी हो गई, इसी तरह लोगों को भीतर से उनकी त्रुटियों का बोध करा देना ही सच्चा छिद्रान्वेषण या आलोचना है। इसके बजाय निरर्थक गुराना या विलाप करना व्यर्थ है। हमें हरेक वस्तु की सुन्दरता देखनी चाहिए। कहा है कि “बुरों पर भौंको मत, किन्तु भालों की सुन्दरता का बखान करो।” यही सुधार का सच्चा मार्ग है।


Quotation

भलाई का मार्ग संसार में सबसे अधिक ऊबड़-खाबड़ तथा कठिनाइयों से पूर्ण है। इस मार्ग से चलने वालों की सफलता आश्चर्यजनक है, पर गिर पड़ना कोई आश्चर्यजनक नहीं। हजारों ठोकरें खाते-खाते हमें चरित्र को दृढ़ बनाना है।

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जीवन और मृत्यु, शुभ और अशुभ, ज्ञान और अज्ञान का यह मिश्रण ही माया अथवा जगत् प्रपंच कहलाता है। तुम इस जाल के भीतर अनन्त काल तक सुख ढूंढ़ते रहो-तुम्हें उसमें सुख के साथ बहुत दुःख तथा अशुभ भी मिलेगा। यह कहना कि मैं केवल शुभ ही लूँगा, अशुभ नहीं, निरा लड़कपन है- यह असम्भव है।

यदि दिल में लगन हो, तो एक महामूर्ख भी किसी काम को पूर्ण कर सकता है। पर बुद्धिमान मनुष्य वह है, जो प्रत्येक कार्य को अपनी रुचि के कार्य में परिणत कर सकता है। कोई भी काम छोटा नहीं।

-स्वामी विवेकानन्द


गान्धी दर्शन पर आधारित एकादश व्रत

(श्री सच्चिदानन्द जी, बी.ए.)

यों तो पुराणों में व्रतों का एक अथाह सिंधु संचित है, किंतु महात्मा गान्धी के संपर्क में आने पर उनमें से बहुतों ने नवीनता का परिधान धारण कर और अधिक गौरवान्वित एवं लोक पूजित हो गये। गान्धी जी के विचार मंथन से निम्नाँकित ‘एकादश व्रत’ राष्ट्र निर्माण की नींव हैं-

अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य असंग्रह,

शरीरश्रम अस्वाद सर्वत्र भय वर्जन।

सर्वधर्म समानत्व स्वदेशी स्पर्श भावना,

नियम व्रत निष्ठा से ये एकादश सेव्य है।

उपरोक्त एकादश व्रतों में प्रारम्भ के दो ‘अहिंसा और सत्य’ संसार में जितने धर्म हैं सबों के दोनों पैर हैं। यही मनुष्य के आदर्श जीवन दर्शन के मूलाधार हैं। भारतीय दर्शन योग शाखा के प्रवर्तक महर्षि पतंजलि के अनुसार सत्य को पहला स्थान मिलना चाहिए किन्तु महात्मा गान्धी ने अहिंसा को पहला तथा सत्य को दूसरा स्थान दिया है। इसमें भी एक दार्शनिक रहस्य है। महर्षि के उपदेशों का लक्ष्य व्यक्ति को असंप्रज्ञात आत्म समाधि का अनुभव कराना था। जहाँ केवल आनन्द है। दुःख का जहाँ पर लेश मात्र भी मिश्रण अथवा चिन्ह नहीं है। गान्धी जी सम्प्रज्ञात समाज समाधि के प्रवर्तक थे। व्यक्ति को अहिंसा के आचरण एवं अन्य अभ्यासों के पुरुषार्थ से समाधिस्थ होकर सत्य का अनुभव कराना था। और समाज सत्य के आचरण और सत्य के चिंतन से अहिंसा की ओर उन्मुख होता है। व्यक्ति सत्य के लिए अहिंसक तथा शान्ति प्रिय समाज की स्थापना के लिए सत्यशील होकर अपने लक्ष्यों की दिशा में अग्रसर होता है। वस्तुतः सत्य और अहिंसा में मतभेद है। मानव जीवन दर्शन एवं समाज दर्शन की युग दृष्टि में ये परस्पर अन्योन्याश्रित हैं।

अहिंसा के स्वरूप का निर्धारण करते समय गान्धी जी ने अपने पूर्वकालिक परिभाषाओं की संकीर्णताओं को तोड़ फेंका है। प्राण हत्या का अर्थ अहिंसा का हलकापन ही प्रगट करता है। गान्धी जी अपनी प्रकृति के अनुसार इस सिद्धान्त की गहरायी में भी उतरे थे। उनका कथन था कि “कुविचार मात्र हिंसा है, मिथ्या भाषण हिंसा है, द्वेष हिंसा है, तथा किसी का बुरा चाहना हिंसा है।” अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों में “आत्मनः प्रतिकुलानि परेवाँ समाचरेत” ही अहिंसा पूर्ण रूप है। संवेगहीनता अंतर्निर्देशनों को न श्रवण कर उनकी अवहेलना कर देना ही सामान्य स्तर पर अहिंसा के रास्ते को छोड़ कर भटक जाना है अहिंसा का बटोही सहिष्णु होता है। बस पास पड़ोस तथा अपनी मित्र मण्डली के आसुरी प्रकृति के वेग को उतारने के लिए चेष्टाशील रहता है। तथा अपने जीवन को नमूना के रूप में समाज को समक्ष रखता है। अगर उस नमूने को देखकर समाज की भीड़ की और से अपशब्दों का पुरस्कार भी पाता है और संतोष एवं अनावेग के लिए यह सोचता है कि अज्ञान में अनेक मनुष्य ईश्वर को भी गाली देते हैं। अहिंसा का यह साधक यह जानता है कि दुष्ट प्रवृत्तियों के नर-नारियों द्वारा उपहास होना ध्रुव निश्चित है। भगवान तथागत बुद्ध ने भी यह स्वीकार किया था कि “इस वसुन्धरा पर कोई ऐसा पुरुष नहीं आया जिसका केवल मान अपमान हुआ हो। मान और अपमान “अहिंसक को भ्रष्ट करने में असमर्थ होते हैं।”

अहिंसा धर्म का मूलाधार है इसलिये कि अहिंसा का सिद्धान्त समाज रूपी शहर की वह बड़ी टंकी है जिसमें पानी की व्यवस्था है। अहिंसा के जल से समाज के प्राणों की तृष्णा बुझाई जाती है। तथा अन्य रूपों में भी शीतलता के लाभ से समाज जीवन की प्रफुल्लता का अनुभव करता है। धर्म उस मान्यता को कहते हैं जिसमें समाज को धारण करने की शक्ति है और यह निर्विवाद सिद्ध है कि अहिंसा ही एक मात्र ऐसा सिद्धान्त है जिसमें समाज के भार को वहन करने का बल है क्योंकि अहिंसा से व्यक्ति की संवृत्तियाँ, सत्प्रवृत्तियां, सद्मान्यतायें एवं आन्तरिक विश्वास अंकुरित होकर एक ऐसे विशुद्ध सामाजिक वातावरण का निर्माण कर देते हैं कि जिसमें सभ्यता और संस्कृति के विकसित होने के सुयोग और संयोग सहज हो जाते हैं। अतः अहिंसा वह ध्वनि है जो मनुष्य के (विकृत और विकास भरे मन और मस्तिष्क से नहीं) शुद्ध अन्तः करण से आती रहती हैं और सच्चा अहिंसक वह है जो दूसरों के प्राणों को अपने प्राणों जैसा मानता हुआ लोक व्यवहार और कर्म में अपने जीवन को व्याप्त रखता है।

अब तक इस बात पर बराबर विवाद होता रहा है कि ईश्वर सत्य है अथवा असत्य है? ईश्वर सत्य अथवा सिद्ध करने के लिये मनुष्य की सीमित मानसिक एवं बौद्धिक शक्ति से जो कुछ पैदा हो सकता था वह किया गया किंतु अथवा असत्य विशेषण संयुक्त ईश्वर नामी वस्तु यथार्थतः है क्या? इसका उत्तर महात्मा गान्धी ने दिया। गान्धी जी ने बताया कि भाई! विवाद बन्द करो। देखो! सत्य ही ईश्वर है। तब से सत्य की परिभाषा परिशोधित होकर मनोविज्ञान विहित एवं आचार प्रधान हो गई क्योंकि लौकिक विशेषणों के आर-पार पारलौकिक सत्ता की कल्पना करना कठिन जान पड़ता था। साथ ही साथ वह हमारे व्यवहार की दुनिया से भी दूर जा पड़ता था। गान्धी जी का जीवन मनुष्य को समाज से दूर जंगल में ले जाकर ईश्वर प्राप्त करना नहीं था। इसलिये उन्होंने ईश्वर को जंगल से लाकर समाज में प्रतिष्ठित किया। ‘सत्य ही ईश्वर है’ इस परिभाषा से हमें यह स्वतः अनुभव होने लगा कि ईश्वर हमारे बीच खड़ा है। अगर हमारी वाणी कर्म और विचारों में अहिंसाव्रत सच्चाई विद्यमान है, तो हमारा अस्तित्व ईश्वर से ओतप्रोत हुआ और इस प्रकार गान्धी जी के इंगित करने पर व्यक्ति एकाकी समाधि से सामाजिक समाधि की ओर आगे बढ़ा। राष्ट्र में नैतिक समानता की भावना जागृत हुई। गान्धी के शब्दों में- “विचार में, वाणी में और आचार में सत्य होना ही सत्य है। इस सत्य को सम्पूर्णतः समझने पर जगत में कुछ और जानना बाकी नहीं रहता।” इसका उत्तर श्री कृष्ण ने दिया है। उन्होंने अर्जुन को कर्म क्षेत्र में नियोजित करते हुये बताया है कि सत्य की प्राप्ति अभ्यास यानी—कर्म वैराग्य—यानी विशेष लगन। गान्धी जी के अनुसार भी सच्चाई के किसी भी कार्य को विशेष लगन से करने पर व्यक्ति ईश्वर को पा सकता है। ईश्वर रूपी सत्य सत्ता से बाहर नहीं है। अपितु समग्रता में अस्तित्व मात्र ही सत्य है और सत्य ही ईश्वर है।

वेद की तरह गान्धी जी के अनुसार भी नैतिक आचारों को मानने वाला व्यक्ति आस्तिक है। गाँधी का ईश्वर विश्वासों के क्षेत्र में “एक नैतिक सत्य” है। इन नैतिक शक्तियों में ही कर्मों के फलों का निश्चय न करने के भाव हैं मनुष्य को पूर्ण सत्य का ज्ञान नहीं होता है। इसे सापेक्ष सभ्यों के ज्ञान के सहारे ही आदर्श की एक एक सीढ़ी पर चढ़ता हुआ सत्यपरता की ओर उन्मुख होता है। इस तरह पूर्ण सत्य का अनुभव ही आत्म जीवन का अन्त है। अष्टाँग योग के व्यक्तिगत मूल्यों को समान में “सत्य ही ईश्वर है” इस मान्यता से उतारा जा सकता है। गान्धी जी का सत्य यथार्थता, मानवता की सीमा में निवास करता है। त्यागमय जीवन से इस सत्य की साधना सहज हो जाती है। भोगमय जीवन गान्धी जी की दृष्टि में इसलिये वाँछनीय नहीं है क्योंकि इससे सत्य का आचरण दुर्लभ हो जाता है ।

एकादश व्रत का तीसरा व्रत अस्तेय है। अस्तेय एक मिथ्या रहित सत्य की भावना है। जो वस्तु हमारे श्रम से अर्जित नहीं है, उसे किसी भी साधन के सहारे अपना लेना स्तेय है। किंतु श्रमार्जित स्वार्थ को ग्रहण करना अस्तेय है। अस्तेय शोषण की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। बिना किसी परिश्रम के अन्याय द्वारा प्रकाश अथवा अन्धकार में समाज की आँखों के सामने अथवा पीछे अपनायी गयी वस्तु चोरी है और चोरी न करना ही स्तेय व्रत है। इस एक व्रत के पालन में केवल अन्तःकरण ही नहीं शुद्ध हो जाता अपितु सारा मानव समाज आरोग्यपूर्ण हो सकता है । समाज दरिद्रता का बहुत कुछ कारक अस्तेय व्रत को भंग कर देना है। भारतीय प्राचीन संस्कृति के अनुसार दूसरों की वस्तु को बिना उनकी आज्ञा के अपने प्रयोग में ले लेना भी अस्तेय व्रत को भंग कर देना है। वे ‘दूसरे’ अपने भाई बंधु आदि ही क्यों न हों लेकिन आज के साम्यवादी युग में उसकी परिभाषा जरा और अधिक उत्कृष्ट हो गई है। अपनी आवश्यकताओं को सही जानना और उन्हीं की मात्रा में संचय रत रहना ही अस्तेय व्रत का पालन करना है। सर्वोदय के अनुसार आवश्यकता से अधिक अपने पास रखना स्तेय है और उसे समाज को दान कर देना अस्तेय है।

गान्धी जीवन दर्शन के अनुसार सत्य और अहिंसा की खोज में अति व्याप्त रहना ही ब्रह्मचर्य है किंतु यह सामान्यजनों की बात नहीं है। शुद्ध मानस एवं शुद्धाचरण से वीर्य रक्षण के शौर्य नैतिक कर्तव्य को भी हम ब्रह्मचर्य के भीतर गिनते हैं किंतु सूक्ष्म चिंतन से सर्वेंद्रिय संयम ही ब्रह्मचर्य के रूप में आभासित होता है। गान्धी जी उपनिषदों के इस कथन से सहमत हैं कि भोग की इच्छा से ब्रह्मचर्य के व्रत के पालन में नहीं लगा जा सकता सर्वव्यापी प्रेम के लिये ही ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। जिस समय तक व्यक्ति केवल परिवार अथवा परिवार के सदस्यों में अनुरक्त है तब तक उसका प्रेम सर्वव्यापी नहीं हो सकता और आन्तरिक प्रेम की सर्वव्यापकता ही ब्रह्म विभूति की चर्या है। अपने प्रेम को किसी एक व्यक्ति को सौंप देना ब्रह्मचर्य व्रत को भंग कर देना है। ब्रह्मचर्य व्रत के पालन के लिये अन्तर प्रकृति और बाह्य व्यवहार में एकता का होना आवश्यक है। भगवान श्री कृष्ण के अनुसार मन से स्रडडडडडड रूप का चिंतन करता हुआ शरीर को संयम नियम की फांसी पर चढ़ाये रखना “मिथ्याचरण” है। अतः ब्रह्मचारी वही है जिसने अपने मन को सुसंस्कारों से संस्कृत कर दिया। जिसने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर अपने दुर्जेय मन को भी अधिकृत कर लिया।

ज्ञानतः और विज्ञानतः सब तरह से सूक्ष्म का महत्व स्थूल से अधिक है। उसी तरह ब्रह्मचर्य में भी इसके सूक्ष्म पहलू अधिक महत्वपूर्ण हैं। अतः ब्रह्मचर्य का उद्देश्य शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य की प्राप्ति भी है और इन प्राप्तियों का महत्व शारीरिक स्वास्थ्य से अधिक है क्योंकि इनके अभाव में शारीरिक शक्ति आसुरी कृत्यों में भी अपने को लगा सकती है जिनसे समाज समाधि यानी शान्तिप्रिय सत्यशील समाज की स्थापना नहीं हो सकती । अतः आत्मशक्ति को जागृत करना भी ब्रह्मचर्य का उद्देश्य है।

असंग्रह की चर्चा करते समय आज के विज्ञान विमूढ़ विचारक अपने मन को बहुत कष्ट में पाते हैं। वे असंग्रह व्रत का सम्बन्ध निवृत्ति मार्गों निकम्मे साधुओं के चरित्र से जोड़ देते है। सचमुच ही यह अज्ञानता समाज में बड़ा असंतुलन पैदा कर देती है। असंतुलन का अर्थ अकर्मण्यता नहीं है अपितु आध्यात्म पर आधारित यथार्थ की एक मानवी भावना है। आध्यात्मिकता यह संसार वास्तव में सत्य नहीं है यह व्यवहार में सत्य है। अतः इसकी सभी वस्तुयें नित्य नव नूतन रूप लेती रहती है। इस रूपांतर की क्रिया में फंसा हुआ विश्व अथवा कोई वस्तु अपना कैसे हो सकता है? किसी भी वस्तु पर मनुष्य का शाश्वत संबन्ध नहीं हो सकता। और जब शाश्वत सम्बन्ध अप्राकृतिक एवं अनैसर्गिक है तब संग्रह अथवा परिग्रह का कोई अर्थगत प्रयोजन नहीं दीख पड़ता अतः किसी भी वस्तु में अहंभाव का आरोप अज्ञान है और अहंभाव से प्रेरित होकर किसी भी वस्तु का संग्रह करना एक अज्ञान सिद्ध कर्म है। ज्ञान तो वही है जब हम अपनी वस्तु को अपनी और जो अपनी नहीं है उसे अपनी न मानें। तथा अहंभाव से विवेकच्युत होकर वस्तु संग्रह के लिये उत्कोच, मिथ्याचरण शोषण आदि के रास्ते अपनी ईश्वरीय महनीयता से पूर्ण जीवन को न ले जावें। अतः किसी भी वस्तु में अहं जनित आत्मभाव के प्रतिबिम्ब को न देखना ही असंग्रह व्रत है। यहाँ तक कि शरीर तक को अपना न समझना ही “असंग्रह” व्रत का पालन करना है। अपने शरीर में अहंभाव के शिथिल होने से विषय वासनाओं रूपी गिद्धों के ‘पंख’ कट जाते हैं और मनुष्य का सहज ईश्वरीय जीवन नाना प्रकार के भोग रूपी मगरमच्छों के मुँह में जाने से बच जाता है। यही नहीं सत्य अहिंसा ब्रह्मचर्य और अस्तेय व्रतों के पालन के लिये भी इस व्रत का महत्व अधिक है।

भारत का प्रत्येक हिंदू अथवा हिन्दी भाषी ‘यज्ञ’ शब्द से परिचित है। यज्ञों में आहुति देने के पश्चात् “इदम न मम” कहने की प्रथा है। इस प्रथा अथवा विधान का तात्पर्य केवल यही है कि हे भगवान्! यह हवन सामग्री जो आहुति के रूप में तुझे दे रहा हूँ, “मेरी नहीं है।” अर्थात् अपनी वस्तु को अपना न मानता हुआ व्यक्ति आदान-प्रदान करता हुआ भारतीय आर्य संस्कृति की लपटों को जाज्वल्यमान रखता है। यही असंग्रह व्रत है। इस असंग्रह व्रत का व्यावहारिक तात्पर्य ही यह है कि व्यक्ति अपनी सामग्रियों में अहंभावना न रखे। इस अहंभावना के कारण मानवीय गुणों से पूर्ण दरिद्र अथवा अभावग्रस्त व्यक्ति को नीची नजरों से देखते हुये उससे बचकर चलते देखे जाते हैं। असंग्रह व्रत को समझे तथा उसे अपने जीवन में उतारे बिन मनुष्य मनुष्य से कट जाते हैं, अपरिग्रह दो कटे-कटे रहने वाले मनुष्यों को एक में जोड़ देता है। कर्मयोगियों को असंग्रह व्रत एक ऐसा मार्ग लगा जिससे चलकर सारी मानवता प्रेम के चौराहे पर पहुँच जाय। अपरिग्रही पशुता की केंचुल का परित्याग कर देवत्व की ओर बढ़ चलता।—

(शेष अगले अंक में)


प्रेम की साधना

मैं इसे नम्रता से स्वीकार करता हूँ कि चाहे मैं उतना सफल न होऊँ लेकिन मैं अपने व्यक्तित्व के रेशे-रेशे को प्रेम की साधना में डुबोना चाहता हूँ। मैं इस साधना द्वारा अपने प्रभु का साक्षात् करने के लिए व्यग्र हूँ।

मेरा प्रभु सत्य स्वरूप है लेकिन अपनी साधना के प्रारंभ में ही मैंने पहिचान लिया था कि यदि मुझे जीवन का चरम सत्य पाना है, तो मुझे प्रेम की हुकूमत के सन्मुख सर झुका देना होगा।

हमें प्रेम का विस्तार करना चाहिये। पहले अपने ग्राम को प्रेम करना चाहिये, फिर अपने जिले को प्रेम करना चाहिये , तत्पश्चात् अपने स्वदेश और अन्ततः विश्व प्रेम में अपने को लीन कर देना चाहिये।

मेरे पास तो प्रेम के अतिरिक्त किसी पर भी किसी प्रकार का अधिकार नहीं है। प्रेम देता है कभी कुछ भोगता नहीं। प्रेम सदा दुःख सहता है, कभी प्रतिशोध नहीं लेता। जहाँ प्रेम है, वहीं भगवान् हैं।—महात्मा गाँधी


विश्वासयुक्त प्रार्थना का प्रभाव

(श्री चूड़ामन मोतीलाल मुंशी)

प्रार्थना श्रद्धावान भक्त के हाथ में स्वर्ग के दिव्य भण्डारों को खोलने की कुँजी है। प्रार्थना द्वारा जब भक्त प्रभु को आत्म-समर्पण कर देता है तभी उसमें नवीन बल, साहस, पौरुष, धैर्य आदि दैवी सम्पदाओं का विकास होता है।

भगवान पर अविचल विश्वास रखकर श्रद्धा−भक्ति पूर्वक प्रार्थना करने से हमारी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है। इसके अतिरिक्त नरसिंह, द्रौपदी आदि भक्तों के कई ज्वलन्त प्रमाण हैं। यह सत्य है कि भगवान् प्रार्थना से पूर्व ही हमें उत्तर देते हैं। परन्तु चाहिये प्रार्थी का भगवान पर अटूट विश्वास और एक मात्र भगवान की ही शरणागति। इसे ही विश्वास युक्त प्रार्थना कहते हैं।

प्रार्थना में श्रद्धा-विश्वास की अतीव आवश्यकता होती है। बिना श्रद्धा-विश्वास के प्रार्थना वैसी ही है जैसे बिना पहियों की गाड़ी । विश्वास संचित प्रार्थना का प्रभाव बिजली जैसा होता है। इसलिये हमें श्रद्धा-विश्वास सहित भगवान से प्रार्थना करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त प्रार्थना में और एक बात ध्यान रखने योग्य है। वह है आत्म-विश्वास। हमें सर्व प्रथम अपने आत्म-विश्वास में अभिवृद्धि करनी होगी क्योंकि आत्म-विश्वास के बिना भगवान पर भी विश्वास नहीं होता। इसके बिना प्रार्थना अधूरी रहेगी। महात्मा गाँधी ने एक स्थान पर कहा है कि आत्म-विश्वास का अर्थ है ईश्वर की अनन्त शक्ति में विश्वास। जो असंख्य विपत्तियों से घिर जाने पर भी अपने कर्तव्य से वंचित नहीं होता वह ही सच्चा आत्म-विश्वासी है।”

दरअसल में हमारी आत्मा ही परमात्मा का संक्षिप्त स्वरूप है। और प्रार्थना करने का तात्पर्य है आत्मा का परमात्मा से अनन्य संयोग। अतएव प्रार्थना में आत्म-विश्वास की कमी किसी भी दशा में नहीं होनी चाहिये।

जब भगवान अर्थात् विराट पुरुष आदिकर्त्ता ने विश्व रचना का संकल्प किया तो उनकी संकल्प शक्ति ने विश्वकर रूप धारण कर लिया। मनुष्य उसी विराट पुरुष जगत्कर्त्ता का अंश है। वेद भी कहते हैं “वह एक ही अनेक है।” गीता में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है ममैवाँशो जीवलोके जीवभृतः सनातनः। इससे सिद्ध है कि मनुष्य परमात्मा का अंश है और अपनी आत्मा पर विश्वास रखने का तात्पर्य है भगवान् पर विश्वास रखना ।

प्रार्थना में, विश्वासयुक्त प्रार्थना में रोगी को निरोगी , निर्धन को धनी तथा निर्बल को बलवान बनाने और मरणासन्न व्यक्ति को नवजीवन प्रदान करने की अमोघ शक्ति है। प्रार्थना से ही द्रौपदी की लज्जा रक्षा हुई, विभीषण को लंकेश्वर का पद प्राप्त हुआ, गजराज के प्राणों की रक्षा भी प्रार्थना ही से हुई, नरसी की हुँडी सिकारने में भी प्रार्थना का ही हाथ था तथा प्रार्थना की शक्ति से ही भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई है। ऐसे अनेकों उदाहरणों से पाठक परिचित ही होंगे।

जो परमात्मा का भजन करता है, उसके सुख दुःख का ख्याल परमात्मा स्वयं करता है। हम भक्तों के भक्त हमारे। भक्त की लाज भगवान् कभी नहीं जाने देता, परन्तु भक्त को भगवान् कसौटी पर अवश्य कसता है, क्योंकि उसपर कृपादृष्टि भी वही रखता है। भक्त के लिये असम्भव वस्तु को सम्भव भी वही बना देता है। भक्त की प्रतिष्ठा को भी निरन्तर वही बढ़ाता है। इसका अनुभव हमें भक्तों के परम पावन चरित्रों से होता है। मीरा, सूर,तुलसी को कौन नहीं जानता?

पिता सदैव अपने पुत्रों का हित चाहता है। अतः अवश्य ही हमें कल्याण की ओर अग्रसर करेगा। प्रभु का जीवन सिद्धि रूपी प्रसाद हमें अवश्य मिलेगा। यदि प्रार्थना कृत्रिम होगी तो असफलता मिलेगी। यदि इसके साथ हृदय की धारा प्रवाहित हो तो चमत्कार रूप में परिणाम शीघ्र ही उपलब्ध होगा। साधक के कारण एवं प्रेम भरे हृदय की निकली हुई आवाज अवश्य ही प्रभु के कानों तक पहुँचती है। वे शीघ्र ही अपने भक्त की रक्षा करने के लिये गजराज की पुकार एवं द्रौपदी की लाज बचाने के समय जैसे चले आये थे, उसी तरह पहुँचते है। महापुरुष एवं भक्त सदैव ही इसका अनुभव करते आये हैं।

जब भगवान् को कोई कृपा प्रकट करनी होती है तो वे उस कृपा के आश्रय का मन स्वयं अपनी ओर खींच लेते हैं। जो लोग यह कहते हैं कि केवल भगवान् का स्मरण करने से स्थूल प्रकृति में कैसे परिवर्तन हो जायेगा, वे यह नहीं जानते कि परिवर्तन की क्रिया तो बहुत पहले से ही प्रारम्भ हो चुकी रहती है। प्रार्थना तो केवल भक्त के हृदय में भगवद् इच्छा की केवल प्रत्यावृत्ति मात्र होती है। जब कभी विपत्तिकाल में भगवान् की अनुकम्पा प्राप्त करने की अभिलाषा उत्पन्न हो ,तब जान लेना चाहिये कि भगवान् की ओर विपत्ति निवारण की योजना बन रही है। ज्यों-ज्यों उनकी योजना प्रौढ़ होती है, त्यों-त्यों हमारी श्रद्धा और विश्वास तीव्रतर होता चलता है। अतः विपत्ति निवारण हमारी प्रार्थना का फल नहीं होता बल्कि हमारी प्रार्थना ही सफलता का चिन्ह होती है।

यदि आप धन, जन, ऋण, मान-प्रतिष्ठा, वाद-विवाद, कलह आदि किसी भी प्रकार के कष्ट से पीड़ित हैं और सब ओर से निराश हो चुके हैं तो प्रार्थना की शक्ति से अवश्य ही लाभ उठावें हमारे कष्टों को काटने के लिये प्रार्थना ही एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिसका वार कभी खाली नहीं जाता। हृदय से उठी सच्ची विश्वासयुक्त प्रार्थना में सब कुछ प्राप्त करा देने की विलक्षण शक्ति है। हमें अपनी आत्मा (जो परमात्मा का संक्षिप्त रूप है) पर विश्वास रख कर विनम्रभाव से गद् गद् हो प्रतिदिन ईश्वर प्रार्थना करनी चाहिये। ईश्वर शक्ति और सामर्थ्य का भण्डार है, उसमें हर तरह की सहायता करने की क्षमता है। ईश प्रार्थना के लिये कोई विधि-विधान का बन्धन नहीं है, प्रार्थना आप चाहें जब और चाहें जहाँ कर सकते हैं। प्रार्थना की शक्ति अपरिमित है, अजेय है। दिन का प्रारम्भ प्रार्थना से करें और दिन का अन्त भी प्रार्थना से करें। महात्मा गाँधी ने प्रार्थना के विषय में लिखा है— “प्रार्थना मेरे जीवन का ध्रुव तारा है। एक बार मैं भोजन करना छोड़ सकता हूँ किंतु प्रार्थना नहीं।”


श्रद्धा और उसकी शक्ति

(कुमारी विमला द्विवेदी वी.ए.)

तत्वदर्शी कन्फ्यूशियस का कथन है कि श्रद्धा पर्वतों को भी चलायमान बना देती है।

उक्त वाक्य में एक गम्भीर तत्व निहित है, जो पर्वत बड़े-2 तूफानों और आँधियों के वेग से विचलित नहीं होते हैं, जो पृथ्वी की अन्तराग्नि के विस्फोट को भी झेल जाते हैं, वे श्रद्धा के बल से किस प्रकार से चल-विचल हो जायेंगे, इस बात को मानने में साधारण बुद्धि सिर हिलाती है। परन्तु यदि भाषा के अलंकार पर ध्यान दिया जाये, तो वास्तव में बाधाओं के पर्वत श्रद्धा के बल के सामने से हट ही नहीं जाते, अपितु चूर-चूर हो जाते हैं। आश्चर्य नहीं यदि श्रद्धा की अटलता पर्वतों की अटलता को भी दूर कर दे। श्रद्धा के बल का अनुमान भी सहज नहीं। इसने ऐसे-2 कार्य कर दिखाये हैं जिसकी कल्पना भी कभी किसी ने न की थी।

एकलव्य व्याध अपनी अटल भक्ति एवं श्रद्धा से प्रकाण्ड धनुर्धर हुआ। श्रद्धा के ही सहारे विज्ञानाचार्य चगदीशचन्द्र वसु ने वृक्षों में जीव की कल्पना को प्रत्यक्ष प्रमाणित कर दिया। उनके द्वारा आविष्कृत यन्त्रों का चमत्कार देखकर योरोप अमेरिका आदि पाश्चात्य देश, ओठों पर अंगुली रख गये। बुद्धि, शंकर, नानक ने संसार की विचार धारा को पलट दिया। कोलम्बस, न्यूटन आदि ने क्या-2 कर दिखाया सो भी सभ्य संसार से छिपा नहीं है। भगवान कृष्ण ने गीता में सत्य ही कहा है-

“श्रद्धा वाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः”

अर्थात् जितेन्द्रिय और तत्पर हुआ श्रद्धावान् पुरुष ज्ञान को प्राप्त करता है। फिर वह ज्ञान किसी प्रकार का क्यों न हो। बड़े-2 दार्शनिक, वैज्ञानिक, आविष्कारक, लेखक, योगी, ऋषि, मुनि, वीर योद्धा ही नहीं चोर डाकू तक श्रद्धाँ के आधार पर ही अपने-2 कार्य में सफल हुए।

सफलता की पहली सीढ़ी श्रद्धा ही है। यदि ध्रुव श्रद्धा अर्थात् अटल विश्वास नहीं, तो हम न तो अपनी शक्तियों को एकाग्र कर सकते हैं और न किसी कर्म में तत्पर वा तन्मय हो सकते हैं। हमारे जीवन का लक्ष्य ऐसा हो कि हमारे समस्त जीवन का समावेश उसमें हो जाय। वह हमारे रोम-2 में से अनुबद्ध हों, उसमें हमारा अनन्य भाव हो, दूसरी बात पर हमारा ध्यान ही न जाय। इतना होने पर उसकी सफलता में हमारा अटल विश्वास हो, कोई शक्ति हमें उसकी पूर्ति में योग देने से न रोक सके। हम उसी के लिये जियें, उसी के लिये मरें। सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते हम उसी का चिन्तन करें।

इस प्रकार का अटल विश्वास होने पर हम आत्मनिर्भरता से काम लें। एक बार बुद्धि के बल से ऊँचा और व्यापक लक्ष्य निश्चित करके हम अपने नियम आप बनायें। संसार हमारी उस लगन पर हँसे या वाह-वाह करे, हमें इसकी चिन्ता न हो। हमारा भाव केवल एक हो कि हमने उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये जन्म लिया है, बिना उसे पूरा किये हमें मरने का भी अवकाश नहीं। उसके बिना हमारा जीवन ही निष्फल है। लोक विरोध का भय हमारे पास न फटकने पावे। हमारा ध्रुव विश्वास रहे कि हमारे महान उद्देश्य की सिद्धि में परमात्मा हमारा सहायक है। पवित्र आत्माओं, शुभ कार्यों और महान उद्देश्यों की रक्षा भगवान स्वयं करते हैं। बड़े-2 कर्तव्यशीलों के सामने ऐसी बाधायें आ जाती हैं कि उनके पाँव डिग जाते हैं। निराशा से उनका कलेजा काँपने लगता है, विपत्ति के बादल उन्हें अन्धकार में डुबा देते हैं। ऐसे समय पर कोई मानवों की सहायता काम नहीं देती। ऐसे समय पर कोई मानवों की सहायता काम नहीं देती। उस समय केवल परमात्मा का, हाथ ही उनके सिर पर रहता और उन्हें घुटने टेक देने से बचा लेता हैं। वे मनुष्यों की सहायता की उपेक्षा करते हुए उसे प्रतिफल अपने समीप पाते हैं। उनकी भावना यही होती है कि हम तो निमित्त मात्र हैं, यदि जय है तो परमात्मा की और पराजय है तो उसी की। उसका दया रूपी जल, श्रद्धा की लहलहाती हुई लतिका को बाधाओं के तप्त झोंकों से सूखने नहीं देता।

इन भावों के साथ श्रद्धा वह अभीष्ट फल देती है, जिसकी शीतलता हमारे परिश्रम की थकावट को क्षणमात्र में हर लेती हैं। उस समय हम उस अपूर्व आनन्द को प्राप्त करते हैं जो कर्तव्य पालन के पश्चात् मिला करता है। हमारी श्रद्धा एवं भक्ति हमें वहाँ जाकर बिठा देती है जहाँ से हम अपने बोये हुये बीजों को फूलता-फलता देखकर फूले नहीं समाते। उस समय जो हमारे मार्ग में रोड़े अटकाते थे, वे ही सतृष्णा नेत्रों से हमारी ओर देखते हैं, अपने कर्मों पर पश्चाताप करते हैं।

स्वामी दयानन्द की श्रद्धा जब फल लाई तो उसकी कटुता में भी कितनी मधुरता थी, गुरु गोविन्दसिंह के पुत्रों और ईसा के प्राण लेने वालों को क्या पता था कि उनका सन्देश इतना पवित्र है जिसके सुनने को एक दिन समस्त विश्व लालायित होगा।

विद्यार्थियों की श्रद्धा ही उन्हें अध्ययन के अनेक कष्टों को सहन कराती है और उन्हें आगे बढ़ाती है। यदि उन्हें सफलता में श्रद्धा न होती, तो वे अपने जीवन को क्यों कष्टमय बनाते? उनमें भी “पो पच्छद़ः स एव सः” जैसी जिस की श्रद्धा है, वह वैसा हो जाता है। अन्तःकरण की प्रवृत्ति पर श्रद्धा का सर्वस्व निर्भर है और श्रद्धा की अटलता पर ही हमारे चरित्र का भवन निर्माण होता है। इसलिये जीवन को सफल बनाने के लिये श्रद्धा पूर्वक कार्य करना हमारा परम धर्म है। इटली के उद्धारक महात्मा मैजिनी का यह उप-उपदेश स्वर्णाक्षरों में अंकित करने योग्य है :-

अपने हृदयों को श्रद्धा से परिपूर्ण करो। केवल मुँह से श्रद्धा का नाम न लो, वरन् अपने रोम-2 में श्रद्धा भरो। अपने मन और वाणी को एक बनाओ अपने आचरणों को पवित्र करो। अपने लक्ष्य की सिद्धि में तन्मय होकर लग जाओ। अपने जीवन को यहाँ तक धर्ममय बनाओ कि लोग तुम्हें धर्म की निस्पृहता की, लोक सेवा की अनन्यता की सात्विक श्रद्धा एवं भक्ति की चलती फिरती मूर्ति समझने लगें। अटल श्रद्धा का ही दूसरा नाम भक्ति है।


ब्रह्मदेव कृत सामूहिक यज्ञ

(श्री योगेशकुमार जोशी ज्योतिषाचार्य मएड्रेला)

आज किसी ग्राम, नगर या जनपद विशेष में ही नहीं किन्तु अखिल भारतीय स्तर पर ग्राम-ग्राम तथा नगर-नगर में लोक कल्याणार्थ सामूहिक गायत्री यज्ञों से प्रसूत सुगन्धित धूम्र वायु मण्डल में व्याप्त होकर, सूक्ष्माकाश को स्वच्छ करता हुआ संसार को मंत्रभूत शुभ संदेश दे रहा है। दुर्भाग्य से इस प्रकार के शुभ कर्मों की पवित्र परम्परा एक लम्बी अवधि तक अवरुद्ध हो गई थी, क्योंकि विगत सहस्रों वर्षों से वैदिक धर्म पर घातक आक्रमण होते आये हैं। उसी का परिणाम है कि जगद्गुरु भारत समुन्नत सभ्यता, सर्वमान्य सँस्कृति और श्लाघनीय धर्म का रूप इतना अधिक विकृत हो गया कि स्वयं भारतवासी ही उसको सन्देह की दृष्टि से देखते हैं। चिरकाल पर्यन्त परतन्त्र रहने के कारण हमारे विचार शनैः शनैः इतने संकुचित हो गये कि हम भगवती श्रुति के अध्ययन और यज्ञ के करने कराने पर भी एक जाति या सम्प्रदाय विशेष पर ही आधिपत्य मानने लग गये। इसी कारण आज धर्म के ठेकेदार बनने वाले कुछ महानुभावों से सुना जाता है सामूहिक यज्ञ द्विजेतर जातियों की उपस्थिति में वैदिक मन्त्रों का उच्चारण, श्रमदान आदि के सहयोग से यज्ञ में सम्मिलित करना ठीक नहीं। पौराणिक वाङ्मय में विभिन्न स्थलों पर इसके स्पष्ट प्रमाण समुपलब्ध होते हैं कि भारत में विश्व कल्याणार्थ सामूहिक यज्ञों की परम्परा सनातन हैं। विधर्मियों के शासनकाल से धीरे-धीरे इस परम-पुनीत-परम्परा का लोप होता आया है, तत्फलस्वरूप एक समय ऐसा आ गया कि विश्व कल्याणार्थ सामूहिक यज्ञों की परम्परा पर भी कुछ व्यक्तियों ने आश्चर्य करना प्रारम्भ कर दिया। पद्म पुराण से उद्धृत एक सामूहिक यज्ञ का वर्णन प्रस्तुत करते हैं। इसके अध्ययन से प्रमाणित होता है कि यह सामूहिक यज्ञ परम्परा नई नहीं है।

स्थान-स्थान पर आज जिन सामूहिक यज्ञों से हम लाभान्वित हो रहे हैं। उन्हीं यज्ञों के प्रेरणा स्रोतों में से एक का वर्णन पढ़ा करते हैं।, प्रसंगवश चर्चा होने पर महामहिम भीष्म जी ने यज्ञ के विषय में महर्षि पुलस्त्य से पूछा- ब्रह्मन्

कथं यज्ञो हि देवेन विभुना तत्र कारितः।

के सदस्या ऋत्विजश्च ब्राह्मणाः के समागताः॥

के भागास्तस्य यज्ञस्य किं द्रव्यं का च दक्षिणा

का वेदी किं प्रमाणं च कृ तं तत्र विरिंचिना॥

ब्रह्माजी ने यज्ञ कैसे किया? ऋत्विज् और ब्राह्मण कौन-2 थे? उस यज्ञ के विभाग क्या-2 थे? द्रव्य और दक्षिणा क्या थी? वेदी कितने प्रमाण की थी? तथा-

कं च कामम् भिघ्या यन्वेधा यज्ञं चकार ह।

हे महर्षि “ब्रह्माजी ने किस कामना के उद्देश्य से यज्ञ किया?”

महामहिम भीष्म जी द्वारा पूछे गये महान प्रश्नों के उत्तर में महर्षि पुलस्त्य उस कारण को बताते हैं जिस कामना से यज्ञ किया गया था। महर्षि कहते हैं-

हितार्थ सुर मर्त्यानाँ लोकानाँ प्रभवाय च।

देवताओं और मनुष्यों के हित के लिए तथा लोक कल्याण के लिए वह यज्ञ ब्रह्माजी ने किया था। वही लोक कल्याण की उद्धत भावना आज भी भारतीयों के हृदयों में व्याप्त है, क्योंकि आदिकाल से ही भारतवर्ष में लोक कल्याणार्थ कार्य के पाठ पढ़ाये जाते रहे हैं।” सामूहिक यज्ञों द्वारा लोक कल्याण” की जो पुनीत परम्परा हमारे पूर्वजों ने स्थापित की थी, उसी का फल है कि इस कलिकाल में भी हमने सहस्र कुण्डी जैसे विशाल यज्ञ के दर्शन किए जिस प्रकार विश्व कल्याणार्थ हुए सहस्र कुण्डी यज्ञ में दूर-दूर से अनेक विद्वान विचारक और संत महात्मा एकत्रित हुए थे और ऋषियों के नाम पर बनाये हुए नगरों में ठहरे थे इसी प्रकार ब्रह्मदेव द्वारा आयोजित उस यज्ञ में लोक कल्याण की भावना से अनेक ऋषि मुनि आदि एकत्रित हुए थे।

ब्रह्माथ कपिल श्चैव परमेष्ठी तथैव च।

देवाः सर्प्तषयश्चैव त्र्यंबकश्च महायशाः॥

सनत्कुमार श्च महानुभावो,

मनु र्महात्मा भगवान्प्रजा पतिः।

पुराण देवोऽथ तथा प्रचक्रे,

प्रदीप्त वैश्वानर तुल्य तेजाः॥

कपिलजी, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भारद्वाज विश्वामित्र और जमदग्नि आदि सप्तऋषि, त्र्यम्बक, सनत्कुमार आदि महानुभाव महात्मा मनु, प्रजापति तथा प्रतीत वैश्वानर तुल्य तेज युक्त पुराण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु आदि भी उस यज्ञ में पधारे थे।

शुभ कार्यों में आसुरी शक्तियों के प्रकोप की अत्यधिक सम्भावना रहती है, परन्तु भगवान भक्तों की श्रद्धा की परीक्षा करने के उपरान्त उसकी रक्षा का भार अपने जिम्मे ले लेते हैं।

ब्रह्मदेव कृत यज्ञ के प्रतिरक्षणार्थ ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु से अत्यन्त विनम्र शब्दों में प्रणाम पूर्वक निवेदन किया-

उत्फुल्लामल पद्माक्ष शत्रु पक्ष क्षयावह।

यथा यज्ञेन मेघ्वंसो दानवैश्च विधीयते॥

तथा त्वया विधातव्यं प्रणतस्य नमोऽस्तुते॥

हे पद्माक्ष ! शत्रु पक्ष क्ष्यावह! कृपया आप ऐसा कोई प्रबंध करिए जिससे यज्ञ की दानवों से रक्षा हो सके।” इतना सुनते ही भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी को आश्वासन देते हुए कहा-

भयं त्यजस्व देवेश क्षयं नेष्यामि दानवान्।

ये चान्ये विघ्न कर्तारो यातु घानास्तथा सुराः॥

घातयिष्याम्यहं सर्वान्स्वस्ति ते स्तुपितामह।

देवेश! आप निर्भय रहें। मैं दानवों को नष्ट कर दूंगा। पितामह! यातु, धानादि अन्य असुर जो विघ्नकर्ता है उनको भी समाप्त कर दूँगा आप निश्चिन्त रहें।” इस प्रकार आसुरी शक्तियों के आक्रमण की प्रति रक्षा का भार स्वयं भगवान ने ले लिया और सहायतार्थ वहीं स्थित हो गये। मथुरा महायज्ञ में भी असुरों ने कम उपद्रव नहीं किये थे पर भगवान ने उन सब का संरक्षण किया।

जिस प्रकार विभिन्न समाजों और संप्रदायों के लाखों व्यक्ति, मथुरा में इस युग के अपूर्व सहस्रकुंडी यज्ञ के दर्शनों के लिए एकत्रित हुए थे उसी प्रकार के, दानव गंधर्व आदि अनेक जातियों वाले दर्शनार्थी, ब्रह्मदेव कृत उस यज्ञ के दर्शनार्थ वहाँ एकत्रित हुए थे-

ततो देवाः समायाता दानवा राक्षसैस्सह।

भूत प्रेत पिशाचाश्च सर्वेतत्रागताः क्रमात्॥

गन्धर्वा प्सरश्चैव मुनयो वेद पारगः।

ऋषयो ब्रर्ह्मष यश्चैव द्विजा देवर्ष यस्तथा

देव, दानव, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, अप्सरा गण, नाग, विद्याधर गण, वनस्पति, औषधि, यज्ञ पर्वत आदि सभी उस यज्ञ में एकत्रित हुए थे।

वह महायज्ञ किसी व्यक्ति या समाज विशेष के लिए न होकर, सकल, चराचर के कल्याण के लिए था। इसी लिए सभी ने उसमें स्वेच्छया अपना-अपना यथोचित सहयोग प्रदान किया था। मथुरा यज्ञ भी सभी के सहयोग से सम्पन्न हुआ।

स्वयं च वरुणो रत्नं दक्षश्चान्नं स्वयं ददौ

उस यज्ञ में स्वयं वरुण ने रत्न दिये तथा दक्ष ने अन्न दिया।

अन्न पाचन कृत्सोमोमतिदाता बृहस्पतिः।

अन्न पाचन का कार्य चन्द्रमा ने एवं सलाहकार का कार्य देव गुरु बृहस्पति ने किया।

धन दानं धनाघ्यक्षो वस्त्राणि विविधानि च।

विविध प्रकार के वस्त्रों और धन का दान धनाध्यक्ष कुबेर ने किया।

विश्व कर्माणमाहूय ब्रह्मणः शीर्ष मुएडनम्।

विश्वकर्मा को बुलाकर और कर्म कराया गया।

विभिन्न विभागों के अध्यक्षों की नियुक्तियाँ इस प्रकार की गई।

द्वाराध्यक्षं तथा शक्रं वरु णं रसदायकम्।

वित्त प्रदं वैश्रवणं पवनं गंध दायिनम्॥

उद्योत कारिणं सूर्यं प्रभुत्वे माधवः स्थितः।

द्वाराध्यक्ष- इन्द्र, रसाध्यक्ष जलादि पेय पदार्थों के वितरक वरुण, कोषाध्यक्ष- कुबेर, सुगन्ध आदि स्वच्छिकरण वस्तुओं के अध्यक्ष- वायु, प्रकाशाध्यक्ष सूर्य तथा सर्वाधिकारी पद पर भगवान विष्णु को नियुक्त किया गया।

विभागाध्यक्षों की नियुक्तियों के पश्चात् सभी ने अपने-2 आसन ग्रहण कर लिए। यथा देवताओं के समीप ही ऋषियों के आसन थे। ब्रह्माजी के दक्षिण पार्श्व में सनातन विष्णु का स्थान था तथा ब्रह्माजी के वाम पार्श्व में पिनाकी भगवान शंकर विराजमान थे। जब सबने अपने-2 स्थान ग्रहण कर लिए तब ऋत्विजों का वरण किया गया।

ब्रह्मणा पूजिताः सर्वे प्रणि पात पुरः सरम्।

अनुगृह्यो भवद्भिस्तु सर्वे रस्मिन क्रताविह

ब्रह्माजी ने सबको प्रणाम कर उनकी पूजा की और कहा कि आप लोगों ने इस यज्ञ में पधारने की कृपा की है इसके लिए मैं आपसे अनुगृहीत हूँ।

देवताओं की तरह चारों वर्णों ने भी निज-निज योग्यतानुसार, विश्व कल्याण के लिए आयोजित उस सामूहिक महायज्ञ में सहयोग दिया था- ब्राह्मणों ने वेद ध्वनि की। क्षत्रियों ने सायुध स्थित होकर प्रतिरक्षा के उत्तरदायित्व में सहयोग दिया। वैश्यों ने विविध प्रकार के सरस व्यंजन आदि के माध्यम से अपना सहयोग दिया। वैश्यों द्वारा कृत कार्य तो इतना अपूर्व और प्रागदृष्ट था कि सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उनका नाम करण ही “प्राँग्वाट” कर दिया-

जश्रुतं प्रागदृष्टं च दृष्ट्वा तुष्ठः प्रजापतिः

प्रागवाटेति ददौ नाम वैश्यानाँ सृष्टि कृ द्विभुः॥

शुद्र वर्ण ने भी आवश्यक सहयोग देकर अन्य वर्णों के समान पुण्य फल प्राप्त किया था।

उपर्युक्त उद्धरण से यह सिद्ध होता है कि वहाँ “शूद्र” भी उपस्थित थे। और उन्हीं की उपस्थिति में-

महर्षयो वीत शोका वेदानुच्चै वाचयन्।

“वीत शोक महर्षियों ने वेदों को उच्च स्वर से पढ़ा। और वह उच्च स्वर भी इतना अधिक शक्ति सम्पन्न था कि उसका प्रसारण तीनों लोकों में हो गया- तीनों लोकों में स्वर का प्रसारण अलंकारिक हो सकता है किन्तु इसमें कोई अलंकारिता दृष्टिगोचर नहीं होती है कि वेद मन्त्रों का उच्चारण उस स्वर से किया गया।

ब्रह्मघोषेणते विप्रा नाद्यन्तस्त्रि विष्टपम्।

जब वह वेद ध्वनि तीनों लोकों में व्याप्त हो गई तो इसमें कोई सन्देह नहीं है कि वहाँ पर स्थिति शूद्रों ने उसे सुना हो। अर्थात् शूद्रों ने भी वह वेद ध्वनि अवश्य सुनी। इससे सिद्ध होता है कि “ उस स्वर से वेद मन्त्रों का उच्चारण करना, वह भी शूद्रों की उपस्थिति में, यदि शास्त्र विरुद्ध होता तो ब्रह्मदेव द्वारा कृत उस यज्ञ में धर्म शास्त्रों के रचयिता यह कार्य (शूद्रों की उपस्थिति में उच्च स्वर से मन्त्रोच्चारण) कदापि न करते। वहाँ सप्तर्षि आदि सभी ऋषि महर्षि उपस्थित थे, यदि किसी के भी मत में उक्त कार्य अनुचित होता तो उसके विरोध का विवरण भी इस यज्ञ वर्णन में मिलता।

विश्व कल्याण की भावना से अभिप्रेरित होकर अन्य वर्णों की तरह द्विजेतर जातियों ने भी अपना-अपना सहयोग दिया था। यज्ञ प्रबन्धकों ने भी उनका सहयोग आवश्यकतानुसार सहर्ष अंगीकार किया था। तथा उनकी उपस्थिति में ही उच्च स्वर से वेदोच्चारण किया था। द्विजेतर जातियों की उपस्थिति में मंत्रोच्चारण की परम्परा प्रातः स्मरणीय ऋषि-महर्षियों द्वारा ही स्थापित की हुई है। यह गायत्री परिवार को कोई अभिनव प्रयोग नहीं है। यह परम्परा ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित होने के कारण शास्त्रीय है और शास्त्रीय होने के कारण महान है।

ब्रह्माजी द्वारा कृत उस महायज्ञ का कार्य प्रारम्भ होने की बेला सन्निकट आ गई किन्तु तब-तक भी जब ब्रह्माजी की पत्नि सावित्री यज्ञ मण्डप में नहीं पहुँची तो-

सु सत्कृता च पत्नी सा सावित्री च वराँगना।

अर्ध्वयुणा समाहूता एहि देवि त्वरा न्विता॥

सम्यक् प्रकार से सजी हुई सावित्री को अध्वर्यु पुलस्त्य ने बुलाया” देवि यहाँ शीघ्र आओ।” किन्तु

व्यग्रा सा कार्य करणे स्त्री स्वभावेन नागता।

स्त्री स्वभाव से गृह कार्य में व्यग्रा वह सावित्री नहीं आई। गृह कार्यों में व्यस्त रहने के कारण सावित्री न आ सकी. यह मुख्य कारण नहीं था। उसके न आने का मुख्य कारण था अपनी सहेलियों की प्रतीक्षा करना। सावित्री को प्रतीक्षाकाल में भी निःचेष्ट रहना अनुचित प्रतीत हुआ अतः उसने गृह कार्य करना ही प्रारम्भ कर दिया। और पुलस्त्य जी के बुलाने पर उसने कहा-

लक्ष्मी रद्यापिना याता पत्नी नारायणस्य या।

अग्नेः पत्नी तथा स्वाहा धूम्रोर्णातु यमस्यतुः॥

वारुणी वै तथा गौरी वायोर्वे सुप्रभात था।

ऋद्धि र्वे श्रवणी भार्या शम्भो गौंरी जगत्प्रिया॥

मेधा श्रद्धा विभूतिश्च अनसूया घृतिःक्षमा।

गंगा सरस्वती चैव नाद्या याताश्च कन्यका॥

इन्द्राणी चन्द्र पत्नीतु रोहिणी शशिनः प्रिया।

अरु न्धती वसिष्ठस्य सप्तर्षीणाँ च याः स्त्रियः॥

अनसूया त्रिपत्नी च तथान्याः प्रमदा इह।

वध्वो दुहितरश्चैवसख्यो भगिनि कास्तथा॥

नाहमेकाकिनी यास्ये यावन्ना याँ तिताः स्त्रियः।

ब्रूहि गत्वा विरं चिंतु तिष्ठता वन्मुहूर्तकम्॥

नारायण की पत्नी धूम्रोणाँ अभी तक नहीं आई हैं। वरुणी, गौरी, सुप्रभा, ऋद्धि, वैश्रवणी, मेघा श्रद्धा विभूति, अनसूया, धृति, क्षमा, गंगा, सरस्वती, भी अभी तक नहीं आई। मैं अकेली नहीं आऊंगी, अतः आप जाकर ब्रह्माजी से कह दें कि कुछ देर ठहरें।

ऐसा सुनकर पुलस्त्य जी ने ब्रह्माजी से कहा-

सावित्री व्याकुला देव प्रसक्त गृह कर्मणि।

सख्योनाम्यागता यावत्ता वन्ना गमनं मम॥

देव! सावित्री की सखियाँ भी अभी तक नहीं आई हैं तब तक मेरा आगमन भी नहीं हो सकता।

“केवल यजमान की स्त्री ही यज्ञ में सम्मिलित हो सकती है” यदि ऐसा नियम होता तो सावित्री को अपनी सखियाँ, अनसुयादि की प्रतीक्षा नहीं करती और हवन कार्य में सम्मिलित हो जाती।

अनुसूया, अरुंधती, आदि सप्तर्षियों की स्त्रियों, वारुणी गौरी प्रभूति महिलाएँ जब सत्य-युग में ही यज्ञ में सम्मिलित हो सकती थी, तो फिर इस युग में स्त्रियों का यज्ञ में सम्मिलित होना धर्म-शास्त्रों की मर्यादा के प्रतिकूल कैसे हो सकता है। स्त्रियों को वेदाधिकार से वंचित रखना- वेद विरुद्ध है, ऋषि मुनियों द्वारा स्थापित परम्परा के विरुद्ध है। स्त्रियों का यज्ञ में बैठना, वैदिक मन्त्रों का शूद्रों की उपस्थिति में उच्चारण करना, सामूहिक यज्ञ करना आदि-आदि प्रवृत्तियां सदा से ही चलती आ रही हैं। उपरिलिखित कतिपय उद्धरणों से स्पष्ट विदित होता है कि पुरुषों के समान स्त्रियों को भी वेदाध्ययन और यज्ञ करने का अधिकार हैं। प्रस्युत देवता आदर्श ऋषि मुनियों द्वारा प्रमाणित है।

हमारा पवित्र कर्तव्य हो जाता है कि हम भी स्त्रियों को विश्व कल्याण और आत्म कल्याण के लिए वेद विहित कर्मों का पालन करने के लिए अधिक से अधिक प्रोत्साहित करें।” ऐसा करने से वेद-शास्त्र की मर्यादाओं का पालन होगा। देश और समाज के उन्नयन में हम सहयोग देकर अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति करेंगे।


आपकी कठिनाइयाँ क्या हैं?

( डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए., पी-एच. डी. )

छोटे लोगों को छोटी तकलीफें बड़ी लगती हैं-

क्या आपने पहाड़ियों को देखा है? पहाड़ियों को भोजन, निवास तथा वस्त्र आदि की अनेक असुविधाएं होती हैं। उन लोगों में बेहद गरीबी, बेबसी और लाचारी है। घोर सर्दी, फिर बारिश और तन ढ़कने को वस्त्र तथा गर्मी के लिए ईंधन का अभाव। पैसा पास नहीं। यदि बीमार पड़ जायें, तो दवा दारु की कोई सुविधा नहीं।

पर फिर भी पहाड़ी लोग हम आप से ज्यादा स्वस्थ, सुन्दर, तृप्त और दीर्घजीवी मिलते हैं। अभाव, गरीबी, बेबसी और कठोर ठंड में भी सुखी रहते हैं। उनके पास हर पग पर कठिनाइयाँ हैं। किन्तु उनका साहस देखिए, वे हर प्रकार की कठिनाई को पार कर निरन्तर जीवन में आगे बढ़ते हैं। कभी अनुकूल परिस्थिति न होने की शिकायत नहीं करते। कठिनाइयों से डर कर उन्होंने पहाड़ों पर रहना छोड़ा नहीं है। उनकी पीढ़ियाँ उन्हीं विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों में पलती-पनपती आ रही हैं।

संसार में ऐसा कौन है जिसे कठिनाइयों का सामना न करना पड़ा हो? प्रत्येक व्यक्ति ने असंख्य कठिनाइयों में से गुजर कर सफलता की मंजिल पार की है। वे कठिनाइयों से भागे नहीं हैं। जो कठिनाइयों से जितना युद्ध करता है, वह उतना ही मजबूत बनता है। उसमें उतनी ही शारीरिक,मानसिक और आत्मिक शक्तियों का विकास होता है। कठिनाइयाँ मनुष्य के स्वावलम्बन को बढ़ाती हैं और इच्छा शक्ति को प्रबल करती हैं।

जैन मुनि श्री सुखलाल जी के संकल्प बल को देखकर संसार चकित रह गया। उन्होंने अनेक दिन अनशन करके व्यतीत किए। कई सप्ताह केवल जल पी कर बिताये। कई सप्ताह केवल भोजन किया पर जल न पिया। गर्म शिलाओं पर बैठ कर तपस्या की, कई बार ठंडे बर्फ जैसे पत्थरों पर बैठ कर मंत्र जाप किया। फिर अन्त में बीस दिन निराहार रह कर जीवन त्याग दिया। इस घोर तपश्चर्या के बावजूद उन्होंने 60 वर्ष का स्वस्थ जीवन व्यतीत किया। कल्पना कीजिए, उनके मार्ग में कितनी कठिनाइयाँ थी। एक वस्त्र से काम चलाते, मीलों का पैदल सफर करते, घन्टों स्वाध्याय करते, यदि किसी पर क्रोध आ जाता, तो अपने आप को सजा देते, उसका उपवास द्वारा प्रायश्चित करते। 60 वर्ष का उनका जीवन केवल मनोबल के सहारे चलता रहा। वे जीवन भर सबल मन से कठिनाइयों से युद्ध करते रहे। कभी हार नहीं मानी! वे कहा करते थे कि जो व्यक्ति कठिनाइयों से लड़ने और जूझकर अभ्यास करता रहता है, वह नई अप्रत्याशित कठिनाई आने पर उस से कभी भयभीत नहीं होता। डट कर उनका सामना करता है और पूर्ण विजय प्राप्त करता है।

मनुष्य का यह स्वभाव है कि उसे जितना ढीला छोड़ो, वह उतना ही आलसी और निष्क्रिय बनता जाता है। जिसको जितना नर्मी या प्यार से रखो, वह उतना ही कोमल बन जाता है। जंगलों में उगने वाले बेर के वृक्ष को देखिए। न जल न मुलायम उर्वर भूमि, न कोई देख-रेख। ऊपर से झुलसा देने वाली गर्म-गर्म लू, रेत के तूफान, और ऊँट और बकरियों के चर जाने का भय। पर वाह रे बेर के वृक्ष! तू इन सब कठिनाइयों में भी तपस्वी की भाँति अटल अडिग खड़ा है। तेरा कठिनाईयों से लगातार युद्ध करने का आदर्श अनुकरणीय है। वह अंगूर की बेल किस अर्थ की जो तनिक सी धूप या लू से, अथवा तनिक सर्दी से कुम्हला जाय! बेर शूर वीरता का प्रतीक है। कठिनाइयों से सदा युद्ध करने का दिव्य संदेश देने वाला है। राजस्थान में जब वर की सवारी निकलती है तो घोड़े पर चढ़े हुए वर के साथ-साथ एक व्यक्ति बेर के वृक्ष को भी साथ लेकर चलते हैं। ऐसा मालूम होता है मानों हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने वर को सदा कठिनाइयों से युद्ध करने की प्रेरणा दी है। यह बेर का वृक्ष कह रहा है-

“ हे युवक! जीवन में तू इस बेर के वृक्ष की तरह कठिनाइयों से सतत युद्ध करते रहना। प्रतिकूलताओं के सामने कभी पीठ न दिखाना। संघर्ष से ही तु जीवन कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करेगा। इच्छा शक्ति की वृद्धि के लिए तुझे सदा कठिनाइयों से लड़ने का अभ्यास करना है। मेरी तरह निडर और शूर-वीर बन। कायरता की कृति ही मनुष्य के दुःखों का कारण है। शूरवीरता की पौरुष मनोवृत्ति संसार की कठिनाइयों का अन्त कर देती है। तू साहसी है। वीर है। पौरुष का प्रत्यक्ष नर है। जीवन की प्रतिकूलताओं से भागना नहीं।”

निर्बल मन का व्यक्ति कल्पित कठिनाइयों के नर्क में निवास करता है-

आप अपनी समस्याओं को ध्यान से देखिए सब को एक कागज पर स्पष्ट लिख लीजिए। आप पायेंगे कि इनमें से बहुत सी तो धूमिल रेखाएँ भर हैं जो कल्पना लोक की जननी हैं। शायद ये जीवन में कभी भी घटने वाली नहीं है।

कुछ कठिनाइयाँ वाह्य जीवन और समाज से सम्बन्धित हैं। संभव है आप आर्थिक कठिनाइयों में फंसे हैं? या समाज के कुछ व्यक्ति आप से बैर भाव रखते हैं? आप के सामाजिक सम्बन्ध शायद बिगड़े हुए है कन्या के विवाह की कठिनाई में फंसे हुए हैं। राजनीति की किसी पार्टी वाले आपको परेशान कर रहे हैं? आपका व्यापार नहीं चलता समाज में आपको यश और प्रतिष्ठा नहीं मिली है? आपको आपकी नौकरी छूटने का भय बना रहता है? आपके अफसर परेशान करते हैं या आपकी बेइज्जती करते हैं? संभव है आपको बिरादरी वालों ने जाति से बहिष्कृत कर दिया? ये सब बाहरी कठिनाईयाँ है।

साधारण व्यक्ति प्रायः इन्हीं या इसी प्रकार की और बहुत सी बाह्य कठिनाइयों में व्यस्त रहते हैं। इन कठिनाइयों से मुक्ति के लिए वाह्य जीवन की जटिलताओं को बुद्धिपूर्वक हल करना चाहिए। समाज में अपने मित्रों हितैषियों, सम्बन्धियों और परिचितों से मिलकर जटिलता को दूर करना चाहिए।

इन कठिनाइयों का कारण अपने आप को सामाजिक वातावरण में पूरी तरह फिट न कर पाना है। हमें आशा नहीं छोड़नी चाहिए। प्रत्युत योग्यताएँ बढ़ा कर समाज में अपना उचित स्थान बनाना चाहिए। संभव है आप एक नगर या एक पेशे में असफल रहते हो। दूसरा नगर और दूसरा पेशा लीजिए। नए मित्र बनाइये। अपने से बड़ों से सलाह लीजिए। चार व्यक्ति जो कहें, उनकी सहायता से कर्त्तव्य निश्चित कीजिए। कभी-कभी जल्दबाजी न करने से और धैर्यपूर्वक रुकने से कठिनाइयाँ स्वतः सुलझ जाती हैं।

आपके जीवन में जटिल गुत्थियाँ आयेंगी। दो तरफ को प्रलोभन होगा, पर आप धैर्य से रुके रहें। सोचते रहें। बहुत जटिलताएँ तो स्वतः ही हल हो जाएंगी। “उतावला सो बावला”- यह सत्य ही कहा गया है।

बाहरी कठिनाइयाँ आन्तरिक कठिनाइयों का आरोपण मात्र हैं-

वास्तविक कठिनाइयाँ मनुष्य के गुप्त मन में निवास करती हैं। निर्बल मन का व्यक्ति सदा कल्पित भयों में निवास करता है। अभद्र कल्पनाएं किया करता है तनिक सी जटिलता आते ही कायरता दिखाने लगता है। अनेक कठिनाइयाँ मिल कर गुत्थियों (मानसिक जटिलताओं ) की सृष्टि कर देती हैं।

हम अन्दर ही अन्दर ही सोचते हैं, “अमुक कठिनाई आ गई तो क्या करेंगे? यदि हमारी आय आदि का साधन जाता रहा तो क्या होगा? यदि दुकान में घाटा हो गया तो क्या होगा? यदि रात में चोरी डकैती या हत्या हो गई तो क्या होगा? यदि कोई हम पर आक्रमण कर बैठा तो क्या होगा? हमारा बच्चा स्कूल गया है। उसे किसी ने चुरा लिया, तो क्या होगा? पत्नी स्वस्थ नहीं रहती। इसकी बीमारी बढ़ गई तो क्या होगा”

इस प्रकार की असंख्य कठिनाइयों की कल्पनाएं आपके मन में हो सकती हैं। कायरता की दूषित मनोवृत्ति इन कल्पनाओं से मिलकर परिस्थितियों को उलझा देती है। कायर होने पर ही हम अपने विषय में हीनता और अशक्तता में अपने आपको अशक्त और निर्बल होने की कल्पना करते हैं। इस जिस परिस्थिति से डर आते हैं, वही हमारी हानि करती है। दूसरी ओर कठिन परिस्थिति से भी यदि हम न डरें और अपनी पूरी शक्ति और साहस बढ़ जाते हैं।

गाँधीजी लिखते हैं, “मैं कायरता को मानव की बड़ी कमजोरी मानता हूँ। आप कायरता से मरें, इसकी अपेक्षा आपका बहादुरी से प्रहार करते हुए और कष्ट सहते हुए मरना मैं बेहतर समझता हूँ। मनुष्य का आध्यात्मिक विकास सदा कठिनाइयों से लड़ते रहने से होता है।”

मनुष्य मन आध्यात्मिक चिन्तन से बलवान बनता है—इस विषय में प्रसिद्ध मनोविज्ञान बेन्ता प्रो॰ लालजीराम शुक्ल की सम्पत्ति दीर्घकालीन अनुभव का निचोड़ है। वे लिखते हैं, “मनुष्य के मन में अपार शक्ति है। वह जितनी शक्ति की आवश्यकता का अनुभव करता है, उतनी शक्ति अपने भीतर से (अर्थात् गुप्त मन से) ले सकता है। जो व्यक्ति अपने आपको कर्त्तव्य -दृष्टि से बड़े-बड़े संकटों में डालता रहता है, वह अपने भीतर अपार शान्ति की अनुभूति भी करने लगता है। उसे अपने संकटों को पार करने के लिए असाधारण शक्ति भी मिल जाती है। उसकी इस प्रकार की आँतरिक शक्ति की अनुभूति ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है, उसकी कार्यं क्षमता भी बढ़ती जाती है। जिस व्यक्ति को अपने कर्त्तव्य का पूरा निश्चय है, जो उसे पूरा करने के लिए सर्वस्व खोने को तैयार रहता है, उसे कोई परिस्थिति भयभीत नहीं करती। कर्त्तव्य का ज्ञान रहने पर बाहरी कठिनाइयाँ घट जाती हैं।”

आध्यात्मिक चिन्तन से मनुष्य शान्तिपूर्वक परिस्थिति पर विचार करना सीखता है। ठंडे मन से विचारने से कर्त्तव्य बुद्धि स्वच्छ हो जाती है, उचित अनुचित का विवेक जाग उठता है। कर्त्तव्य सम्बन्धी उलझे हुए विचार सुलझ जाते हैं। ये विचार सुलझते ही वास्तविक और काल्पनिक कठिनाइयों का स्पष्टीकरण हो जाता है। जो व्यक्ति अपने चारों ओर आपत्तियों को घिरा हुआ पाता है, उसका कारण उसके उलझे विचार ही हैं। अपने मन के विचारों, समस्याओं, और संकटों को दो भागों में विभाजित कीजिए।

1- वे कार्य या निर्णय जो तुरन्त करने के हैं। ये वे कर्त्तव्य हैं जिन्हें आगे नहीं सरकाया या टाला जा सकता।

2- वे कार्य जो अभी कुछ टल सकते हैं और जिनपर अभी शान्तिपूर्वक पुनः विचार किया जा सकता है। इस वर्ग की कठिनाइयों के विषय में दूसरों से सलाह भी ली जा सकती है।

कुछ ठहर कर जल्दबाजी और उत्तेजना छोड़कर आप अनुभव करेंगे कि आपकी बहुत सी पर्वत सदृश कठिनाइयाँ धीरे धीरे कम होती जा रही जब उनका असली समय आयेगा, तो आप पायेंगे कि वे बिल्कुल ही काल्पनिक थी और उनसे द्वंद्व एक मूर्खता ही थी।

यदि हम कर्त्तव्य बुद्धि को जागरुक रखें, नीचे चलने वाली हवाओं की तरह कठिनाइयों से ही समाप्त हो जायं। मनुष्य जितना ही ऊँचे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से वस्तुस्थिति को देखता है उतना ही कठिनाइयाँ उसे तुच्छ प्रतीत होती हैं। साहसपूर्ण विचारों में निवास करने से विषम परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त होती है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति को साँसारिक कठिनाइयाँ तुच्छ लगती हैं। वह सदा उन्हें रौंदता हुआ कर्त्तव्य पग पर आरुढ़ होता है।


कर्तव्य पथ का प्रेरक- रामनवमी पर्व

(डॉ. चमनलाल गौतम)

मनुष्य की महानता की कसौटी उसका जीवन व्यवहार है। शरीर, वाणी और मन के सुन्दर व्यवहार को ही शास्त्रकारों ने धर्म कहा है। धर्मात्मा वही होता है जिसका चरित्र उज्ज्वल और व्यवहार अनुकरणीय हो। महापुरुष उसे कहते हैं जो असाधारण कार्य करता है। जिसको देखकर लोग चकित हो जाते हैं। साधारण जनता की अपेक्षा उसमें कुछ विशेषताएं होती हैं, इसलिए वे उनको विशेष प्रकार का आदर और सम्मान देते हैं। वह अपने शरीर की परवाह न करते हुए उस देश और जाति की निःस्वार्थ सेवा में लगा देता है, कर्तव्य पालन के लिए वह अपना सर्वस्व नाश करने के लिए तैयार रहता है। उसके मन में कोमलता होती है, वह दीन-दुखियों के कष्टों को सहन नहीं कर सकता और अपने जीवन की अनमोल घड़ियों को उनके दुःख निवारण में लगा देता है, वह उनके दुःख को अपना दुःख और उनके सुख को अपना सुख समझता है। वह जनता को अभिन्न आत्मा मानता है और तरक व्यवहार करता है। वह अपनी सम्पत्ति को राष्ट्र की सम्पत्ति समझता है। राष्ट्रोत्थान में उस सबको स्वाहा करने में तनिक भी संकोच नहीं करता। गिरे हुओं को ऊँचा उठाना तो उसका जीवन लक्ष्य होता है। इतना होने पर भी उसे इसके बदले में कोई चाह नहीं होती। ऐसी आत्माएं ऊपरी दृष्टि से तो साधारण मनुष्य के आकार में दीखती हैं परन्तु वास्तव में वह देवतुल्य होती हैं। लोग उनकी चरणधूलि को अपने मस्तक पर लगाकर अपने जीवन को धन्य मानते हैं। उनकी पूजा और सम्मान करते हैं ताकि उनके श्रेष्ठ जीवन से शिक्षा ग्रहण करके हम भी उनके पद चिन्हों पर चलने का प्रयत्न करें।

जिस महापुरुष के प्रति हमारे मन में आदर के भाव अधिक होते हैं, उनके कार्यों का गम्भीरता पूर्वक अध्ययन करते हैं और यदि हम में गुणवान ग्राहकता की शक्ति है तो हम भी अपने जीवन को उनके जैसा ही बनाने की चेष्टा करते हैं। यही कारण है कि हम अपने आदर्श महापुरुषों की जयन्तियाँ मनाते हैं ताकि यदि अपने गृहस्थ के व्यस्त कार्यक्रम में उनके उज्ज्वल चरित्र को भूल गए हों तो पुनः उनके देदीप्यमान चरित्र को अपने स्मृति पटल पर अंकित कर लें।

भारतीय इतिहास में भगवान् राम का चरित्र सबसे उच्च और आदर्श रहा है। सहस्रों वर्षों से भारतीय जनता उनकी जीवन गाथा को पढ़ती और सुनती आई है क्योंकि कर्तव्य का पथप्रदर्शन करने में वह सर्वोपरि है। यदि रामायण को हम हिन्दू जीवन का कर्तव्य शास्त्र कह दें तो इस में कोई अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि भगवान राम के जीवन में पग पग पर हम कर्तव्य पालन के दिग्दर्शन होते हैं। यही मानव जीवन की सबसे बड़ी सम्पत्ति है। जो व्यक्ति मनुष्य शरीर धारण करने के रहस्य को समझकर सद्भाव पर अग्रसर होकर उसे श्रेष्ठता की ओर ले जाता है, माता-पिता, बहिन भाई आदि परिवार के सदस्यों के प्रति उनके पोषण व शिक्षा, आदि का पूरा-पूरा ध्यान रखता है, उनके जीवन को उन्नतिशील बनाता है, इसके अतिरिक्त जो अपने आपको समाज का एक अंग मानता है। समाज के शरीर को पीड़ा होने पर अपने शरीर में दर्द अनुभव करता है और जैसे अपने शरीर में कट होने पर तरह-तरह के उपाय सोचे जाते हैं, वैसे ही समाज कल्याण के लिए प्रयत्नशील रहता हैं, तब समझना चाहिए कि उसने कर्तव्य शास्त्र का अध्ययन किया है और तभी अपने जीवन को उसी के अनुसार बनाने में समर्थ हो पाया है।

भगवान राम इन तीनों कसौटियों पर खरे उतरते हैं। उनके व्यक्ति गत जीवन में कोई ऐसी बात नहीं दिखाई देती जिससे हम उन्हें एक साधारण मनुष्य कह सकें। अध्यात्म रामायण में वह स्वयं श्रीमुख से कहते है कि “राम कभी झूठ नहीं बोलता, राम एक बात करता है।” ऐसे उत्कट साहस के साथ इन शब्दों को कहना हर किसी की सामर्थ्य की बात नहीं है। उन्हें कभी किसी पर क्रोध नहीं आया। वह दूसरों की बुराइयों की ओर ध्यान नहीं देते थे, उनकी अच्छाइयों का गुणगान करते रहते थे। जिन्होंने उनके साथ उपकार किया हो उसे वह बार-बार याद करते रहते थे परन्तु जिनके साथ उन्होंने उपकार किया है, उसे वह कभी अपनी जवान पर नहीं लाते थे। उन्होंने भोग में त्याग का आदर्श व्यवहार हमारे सामने रखा है। राजकुमार होने के नाते वह सभी प्रकार के भोग भोगते होंगे परन्तु जब त्याग का समय आया तो उन्हें तनिक भी क्षोभ नहीं हुआ। महर्षि बाल्मीकि जी के शब्दों में।

आहतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य बनाय च।

न मया लक्षितस्तसय स्वल्पोऽप्याकार विभ्रमः॥

अर्थात् “राज्याभिषेक के लिए बुलाये गये और वन के लिए विदा किए गए रामचन्द्र के मुख के आकार में मैंने कुछ भी अन्तर नहीं देखा”

भारतीय इतिहास बड़ों के सम्मान और माता-पिता की आज्ञा पालन के उदाहरणों से भरा पड़ा है। भीष्म पितामह ने अपने पिता की प्रसन्नता के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य पूर्वक रहने और विशाल राज्य पर अधिकार न जमाने की प्रतिज्ञा की थी, श्रवण कुमार ने अपने अन्धे माता-पिता को काँवर में बिठा कर समस्त तीर्थों में घुमाया था, नचिकेता पिता की प्रसन्नता के लिए यमपुर चले गए। परन्तु भगवान राम का जीवन सबसे उज्ज्वल है कि जब उनका राज्याभिषेक होने वाला था, उन्हें वल्कल वस्त्र पहनकर वन जाना पड़ा और वह भी चौदह वर्ष के लिए, जहाँ खाने, पहनने, रहने सब प्रकार के कष्टों का सामना करना हो। ऐसा उदाहरण संसार के इतिहास में मिलना कठिन है। पिता के लिए इस महान् त्याग ने राम को हिन्दु जीवन में ओत प्रोत कर दिया है। यदि वह अपने पिता की आज्ञा पालन न करके वन न जाते तो सम्भव है रामायण का जन्म न होता और भारतवर्ष का इतिहास कुछ और ही होता। यदि वह साधारण मनुष्यों की तरह राज्य के लिए लड़ते रहते तो उनकी गिनती केवल राजाओं में होती और वह करोड़ों नर नारियों के हृदय सम्राट न होते। जब कैकेयी के द्वारा उनको वनवास का आदेश मिलता है तो वह कितनी प्रसन्न मुद्रा में कहते हैं कि—

पिता दीन मोहि कानन राजू।

जहिं सब भाँति मोर बड़ काजू॥

अध्यात्म रामायण में वह माता कैकेयी से कहते हैं कि “वह पिता के लिए विष खा सकते हैं, अग्नि की ज्वालाओं में कूद सकते हैं, अपने शरीर का त्याग कर सकते हैं। जब भरत के राज्याभिषेक की बात उन्होंने सुनी तो उनके मन में कुछ भी ईर्ष्या, द्वेष के भावों की जाग्रति नहीं हुई। भरत के लाख प्रयत्न करने पर भी वह अयोध्या नहीं लौटे और उन्हें आदर्श शासक बनने के लिए उपदेश देते रहे।

भगवान राम केवल अपने ही परिवार के प्रति कर्तव्य निष्ठा नहीं रहे वरन् राष्ट्रोत्थान के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। वास्तव में उस शरीर का धारण ही आसुरी शक्तियों के नाश और देवत्व के विकास के लिए हुआ था। दक्षिण भारत में रावण के यज्ञ के मुखिया आर्यों की नई बस्तियों को नष्ट करके राक्षस राज्य की स्थापना करने का प्रयत्न जारी था। उस आर्य बस्तियों के अग्रस्त आदि नेताओं ने उन्हें असफल करने का प्रयत्न किया परन्तु वह उसमें कामयाब नहीं हुए और उनकी गतिविधियाँ बढ़ती ही गई। इस समय उन्हें एक सुयोग्य और वीर नेता की आवश्यकता थी जिस का काम भगवान राम ने किया। उन्होंने खरदूषण आदि हजारों राक्षसों को समाप्त करके बढ़ते हुए राक्षस साम्राज्य की स्थापना को रोक दिया। लंका के निकट की छोटी जातियों का संगठन करके रावण जैसे शक्तिशाली राजा का वध करके देश में शान्ति की स्थापना की। इसके लिए उन्हें, चौदह वर्ष तक वनों में कितने कष्ट सहन करने पड़े होंगे उसकी कल्पना करके हृदय काँप उठता है। प्रजा के हित के लिए उन्होंने अपनी प्रिय पत्नी तक का त्याग स्वीकार किया। वह स्वयं त्याग की मूर्ति थे।

रामनवमी के शुभ अवसर पर हम भगवान राम का पूजन करें, उत्सव कर धूम धाम से मनाए रामायण पाठ के आयोजन रखें, पारायण करवायें, जुलूस निकालें और यज्ञ व सभाएं करें। सभा में भगवान के उज्ज्वल चरित्र का गुणगान किया जाय, उपरोक्त गुणों को समझ कर जनता को बताया जाए कि हमें भगवान राम की कथा का पाठ ही जीवन भर नहीं करते रहना है वरन् इसके साथ-साथ उनके आदर्श गुणों व कार्यों को अपने जीवन में धारण करना है। यदि हमारी प्रवृत्ति इस ओर नहीं बढ़ती है तो हम राम के जीवन से कोई विशेष लाभ नहीं उठाते। जिस प्रकार से उन्होंने अन्याय के विरुद्ध झंडा खड़ा किया था, हमें भी सद्ज्ञान प्रसार के लिए जनता का मार्ग दर्शन करना है, अन्याय व अज्ञान के उन्मूलन के लिए अपने कर्तव्य को समझना है।

गायत्री मन्त्र के अर्थ पर यदि गम्भीरता पूर्वक विचार किया जाए तो विदित होगा कि मनुष्य जीवन का सम्पूर्ण कर्तव्य शास्त्र इसमें भरा पड़ा है। जिस ऋतम्भरा बुद्धि से सत्य और असत्य का निर्णय किया जाता है, उसे ही गायत्री कहा जाता है। इस परिभाषा में सभी प्रकार के कर्तव्य आ जाते हैं । जब मनुष्य की बुद्धि शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं उसके विवेक का तीसरा नेत्र खुल जाता है, तभी वह अपने कर्तव्यों को ठीक-ठीक समझने लगता है। “धियो यो नः प्रचोदयात्” में परोपकार की भावना है ही। यही कारण है कि गायत्री को वेदों की जननी और भारतीय संस्कृति को आध्यात्मिक माता कहा जाता है। इस अवसर पर हम गायत्री माता की उपासना व प्रसार को भी न भूलें।


Quotation

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स्वर से दिव्य ज्ञान

जीव-जन्तुओं की मूक भाषा

वशीकरण की सच्ची सिद्धि

ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग

प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि,

मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा

हस्तरेखा विज्ञान

गृहस्थ योग

चिन्ताओं के छुटकारे का मार्ग

मधुर सम्बन्धों का रहस्य

मूल्य में कमी के लिए लिखा-पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। 6) से अधिक पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ। 3) से कम की वी. पी. नहीं भेजी जाती। 3) से 6) के बीच मूल्य की पुस्तकें लेने पर लगभग 1॥) अलग।


वास्तविक जीवन की झलक


वास्तविक जीवन की झलक (kavita)

विपदाओं संघर्षों पर जय पाना जीवन है,

भीगे नयनों के पट पर मुस्काना जीवन है।

जीवन है मकरन्द खिले फूलों में मिलता है,

जीवन है अरविन्द स्वच्छ सरवर में खिलता है।

जीवन चपल अलिन्द सुमन पर रुकता-झुकता है,

जीवन मस्त गयन्द जिसे माटी ही मुक्ता है॥

दुख की वीणा पर सुख का स्वर गाना जीवन है।1।

जीवन गति का नाम, धाम से जिसको काम नहीं

जीवन है वह पंथ कि जिस पर यति विश्राम नहीं

जीवन है पाथेय समय के अविचल राही का

जीवन है बल कुरुक्षेत्र के तपे सिपाही का

पौरुष के माथे पर श्रम का बाना जीवन है।2।

जीवन है शृंगार कर्म का, तप की गीता है,

जीवन है वह घट जो अक्षय जल पी रीता है,

जीवन उसका अनुगत जिसने उसको जीता है,

जीवन उसका स्वामी जिसका यौवन बीता है,

सगर-सुतों पर सुरसरि-धार बहाना जीवन है।3।

जीवन चिर जाना फिर सी युग युग अनजाना है,

जीवन प्राप्ति कि जिसका आशय ही खो जाना है,

जीवन कलित कल्पना सपनों की रंगीनी है,

जीवन मौन मृत्यु मन्दिर के लिए नसेनी है,

जीवन मिटना मिट कर के बन जाना जीवन है।4।

विपदाओं संघर्षों पर जय पाना जीवन है।

-विद्यावती मिश्र

*समाप्त*