प्राण अब बन साधना का दीप
लक्ष्य पथ पर हो नहीं तम शेष, प्राण अब बन साधना का दीप।
कर्म में ही है नहीं उत्सर्ग,
धर्म में ही है नहीं उत्सर्ग,
लोक मंगल से न यदि अनुराग,
आत्महित का यदि न उसमें त्याग,
पन्थ भूली है मनुजता त्रस्त, ज्ञान अब बन साधना का दीप।
बुद्धि ने तोड़े हृदय के तार,
बुद्धि ने बदला सभी संसार,
बुद्धि अब नर के लिए है भार,
आज जीवन एक कारागार,
क्षीण अब है कल्पना की शक्ति, ध्यान बन अब कामना का गीत।
मनुज ही मेरे लिए भगवान,
मनुजता के प्रति मुझे सम्मान,
मनुजता के प्रति मुझे सम्मान,
सत्य, शिव, सुन्दर जहाँ सुकुमार,
कर रहे हैं सिद्धि का शृंगार,
बन्द नयनों के अजस्र प्रवाह, गान अब बन आराधना का दीप।
-शिवशंकर मिश्र एम. ए.
सम्पादकीय-
मन का शान्त और संतुलित होना व्यक्ति की महानता का चिन्ह है। मनु भगवान ने धर्म के 10 लक्षणों की चर्चा करते हुए मनुष्य का सबसे पहला धर्म ‘धृति’ अर्थात् धैर्य बतलाया है। सामने उपस्थित उत्तेजनात्मक परिस्थिति की भी वस्तुस्थिति को यदि ठीक प्रकार समझने की कोशिश की जाए तो वह मामूली सी बात प्रतीत होगी। जिन छोटी-छोटी बातों को लेकर लोग सुख में हर्षोन्मत्त और दुख में करुणा कातर हो जाते हैं वस्तुतः वे बहुत साधारण बातें होती हैं। मनुष्य की मानसिक दुर्बलता ही है जो उसे उन छोटी-छोटी बातों में उत्तेजित करके मानसिक सन्तुलन को बिगाड़ देती है। इस स्थिति से बचना ही धैर्य है। धैर्यवान व्यक्ति ही विवेकशील और बुद्धिमान कहे जा सकते हैं, जो बात-बात में उत्तेजित और अधीर होते हैं वे चाहे कितने ही विद्वान या प्रतिष्ठित क्यों न हों, वस्तुतः ओछे ही कहे जायेंगे।
एक व्यक्ति के घर में पुत्र जन्म होता है, उसके हर्ष का ठिकाना नहीं रहता। इस हर्ष में पागल होने पर उसे यह नहीं सूझता कि इस प्राप्त लाभ के अवसर पर क्या करे - क्या न करे? जो खुशी उसके भीतर से फूटी पड़ती है उसे बाहर प्रकट करने के लिए वह उन्मत्तों जैसे आचरण करता है। दरवाजे पर नौबत नफीरी बजाना आरम्भ करता है। बड़े विशाल प्रीतिभोज की तैयारी करता है, नाच रंग का सरंजाम जुटाता है। बधाई बंटवाने के लिए अपने समाज में थाल, गिलास, मिठाई आदि बँटवाता है और भी न जाने क्या-क्या करता है। ढेरों पैसा उसमें फूंक देता है।
यह स्थिति एक प्रकार के पागलपन का चिन्ह है। पुत्र जन्म होना उसे अपने लिए एक अलभ्य लाभ मालूम पड़ता है, पर व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रकृति की एक अत्यन्त साधारण घटना है। प्राणि मात्र में प्रणय की इच्छा काम कर रही है और उस संयोग के फलस्वरूप बाल-बच्चे भी सभी जीव-जन्तुओं के होते रहते हैं। सन्तान में पुत्र और कन्या यही दो भेद हैं। इस सृष्टि में करोड़ों बालक नित्य पैदा होते हैं। जिस प्रकार घास-पात पेड़-पौधे रोज ही उगते सूखते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों में भी सन्तानोत्पादन की क्रिया चलती रहती है। प्रकृति प्रवाह की इस अत्यन्त तुच्छ प्रक्रिया को इतना महत्व देना कि खुशी का ठिकाना न रहे और उसके लिए वह उपयोगी धन जो किसी आवश्यक कार्य में लगाकर उससे महत्व पूर्ण लाभ उठाया जा सकता था-इस प्रकार हर्षोन्मत्त होकर लुटा देना किसी प्रकार बुद्धिमानी पूर्ण नहीं कहा जा सकता।
यदि वह व्यक्ति जिसके घर पुत्र जन्मा है वस्तुतः बुद्धिमान रहा होता तो उसके सोचने का तरीका भिन्न ही रहा होता। वह हर्षोन्मत्त न होकर गम्भीरता से सोचता कि घर में नया बालक जन्मने से उसके ऊपर क्या-क्या जिम्मेदारी आई है और उन्हें किस-किस प्रकार पूरा करना चाहिए। वह सोचता कि मेरी जिस धर्म पत्नी ने बालक को जन्म दिया है वह दुर्बल हो गई होगी, उसे अधिक विश्राम देने, तेल मालिश आदि के उपायों से उसके दुर्बल शरीर को पुष्ट करने, शीघ्र पचने वाले पौष्टिक खाद्य पदार्थों को जुटाने, नवजात शिशु की देखभाल के लिए कोई सहायिका नियुक्त करने, बालक को यदि माता का दूध पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है तो उसकी व्यवस्था करने में उसे क्या-क्या प्रयत्न करना चाहिए। इन प्रयत्नों में यदि पैसा खर्च किया जाता तो उसे धर्म पत्नी तथा बालक के स्वास्थ्य को सम्हालने में सहायक होता। पर यदि इन बातों पर ध्यान न देकर नफीरी बजवाने और दावतें उड़ाने में धन फूँका गया है तो यही मानना पड़ेगा कि वह व्यक्ति समझदार नहीं वरन् उत्तेजना के आवेश में बहने वाला व्यक्ति है।
यदि फालतू पैसा भी किसी आदमी के पास हो तो उसे इस प्रकार लुटाने की जरूरत नहीं है। उस नवजात शिशु के बड़े होने पर उसकी शिक्षा, विवाह, आजीविका आदि के लिए जिस धन राशि की आवश्यकता पड़ेगी, उसे जुटाने के लिए उसके नाम बैंक में या बीमे में पैसा जमा किया जा सकता है। यदि दान पुण्य करना है तो किन्हीं लोकोपयोगी कार्यों में या दीन दुखियों में, उपयोगी संस्थाओं में इसे दिया जा सकता है। पर यह समझ तभी उत्पन्न हो सकती है जब मनुष्य भावावेश में न बह रहा हो, हर्षोन्मत्त होने की दशा में भी मस्तिष्क विक्षिप्त सरीखा हो जाता है और उस स्थिति में कोई ठीक बात सोच सकना सम्भव नहीं होता।
“हमारी विवेक शीलता स्थिर रहे” यह जीवन को सुविकसित बनाने के लिए बड़ा आवश्यक है और यह तभी सम्भव है जब वह धैर्यवान हो, अधीरता से बचे। थोड़ी सफलताएँ, इच्छानुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त होने पर, सत्ता, अधिकार, सम्पत्ति मिलने पर बड़े अहंकारी बन जाते हैं। उनका व्यवहार, बातचीत का ढंग, सोचने का तरीका, शान शौकत, अकड़, शेखीखोरी सभी कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं कि उसे आधा पागल ही कहा जा सकता है। कुछ दिन पूर्व इस देश में राजे, नवाब, ताल्लुकेदार, जमींदार, साहूकार बहुत थे। उनके पास धन और सत्ता का बाहुल्य था, फल स्वरूप उनके पहनाव-उढ़ाव, बोलचाल, उठना-बैठना सभी कुछ विचित्र प्रकार के बन गये थे। क्षण-क्षण में विचित्र प्रकार की सनकें उठा करती थीं और चापलूस लोग उन सनकों से भरपूर स्वार्थ साधन किया करते थे। सत्ता और धन का बाहुल्य उन अमीरों को ऐसी अर्द्धविक्षिप्त स्थिति में पहुँचा देता था कि वे उचित-अनुचित का निर्णय करने में प्रायः असफल रहते थे। अभी भी जिनके पास ऐसे साधन मौजूद हैं, उन अमीरों एवं अधिकारियों की भयंकर स्थिति प्रायः उन राजा नवाबों जैसी हो जाती है।
इसमें दोष साधनों का नहीं, मनुष्य की मानसिक दुर्बलता का है। रामायण में एक चौपाई आती है :-
क्षुद्र नदी भरि चलि इतराईं।
जिमि थोरहि धन खल बौराईं॥
छोटे नदी नाले जिस प्रकार वर्षा के थोड़े से ही पानी को पाकर अपनी मर्यादाओं को छोड़कर उफनने इतराने लगते हैं। उसी प्रकार क्षुद्र पुरुष भी थोड़े सुख साधनों के प्राप्त होने पर बावले हो जाते हैं। इसमें वर्षा या जल का दोष नहीं-नाले की क्षुद्रता ही कारण है। क्योंकि समुद्र और विशाल नदी सरोवर विशाल क्षेत्र की भारी वर्षा का विपुल जल प्राप्त होने पर भी अपनी मर्यादाओं को नहीं छोड़ते। धैर्यवान और गम्भीर मानसिक स्तर के लोग भी विपुल सत्ता, शक्ति, विद्या, कीर्ति एवं सम्पदा प्राप्त होने पर भी इतराते नहीं वरन् अपने ऊपर आये हुए उत्तरदायित्वों की गम्भीरता को समझ कर और भी अधिक विवेक, धैर्य, दूरदर्शिता एवं नम्रता से काम लेते हैं। यदि धन या सत्ता का दोष रहा होता तो सभी पर उसका समान प्रभाव पड़ता, पर हम देखते हैं कि संसार में ऐसे असंख्य व्यक्ति हैं जो विपुल साधनों के हस्तगत होते हुए भी अत्यधिक जिम्मेदारी और सज्जनता की स्थिति में बने रहते हैं।
जिस प्रकार सफलता और सम्पदा को पाकर क्षुद्र प्रकृति के मनुष्य मानसिक संतुलन खो बैठते हैं, उसी प्रकार थोड़ा सी असुविधा, असफलता, आपत्ति एवं प्रतिकूल परिस्थिति सामने आने पर अत्यन्त कातर हो जाते हैं। घाटा, चोरी, धन हानि आदि कोई अर्थ विग्रह अवसर आने पर उन्हें लगता है मानो उनका सर्वस्व चला गया। अब वे सब प्रकार से दीन हीन हो गये। अब सदा उनको ऐसी ही विपन्न स्थिति में रहना पड़ेगा एवं आगे चल कर और भी गरीबी में प्रवेश करना पड़ेगा।
किसी परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाने पर उन्हें लगता है कि हमारा जीवन ही अन्धकार मय हो गया। असफलता की भयंकर प्रतिमूर्ति उन्हें चारों ओर नाचती दिखाई पड़ती है। उनके दुःख का ठिकाना नहीं रहता। मस्तिष्क ऐसा निष्क्रिय हो जाता है जिसमें यह विचार कहीं उठ पाते कि अगले एक वर्ष बाद फिर परीक्षा का अवसर मिलेगा और उन्हें थोड़े दिन बाद अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने का अवसर मिल जाएगा।
किसी से थोड़ी कहा सुनी हो जाए तो लगता है मानो मेरा सारा सम्मान चला गया। जिसने कटु वचन कह दिया उसने कलेजे में ऐसा छेद कर दिया जो जन्म भर न भरेगा। ये लोग उस छोटी सी बात को भुला सकने में प्रायः जीवन भर समर्थ नहीं होते, जब भी अवसर आता है उस छोटी सी बात को याद कर अपने द्वेष और घाव को हरा कर लेते हैं।
कोई मामूली सा मुकदमा लग जाए तो प्रतीत होता है मानो अब जेल या फाँसी ही भुगतनी पड़ेगी। कोई चोर-डाकुओं का भय दिला दे तो लगता है कि डकैती, लूट या चढ़ाई आज ही हमारे ऊपर होने वाली है। अपने घर में भूत रहता है, ऐसा भय कोई ओझा दिला दे तो रात भर नींद नहीं आती और चूहे खटपट करते हों तो लगता है कि भूत जिन्न घर में नाच रहे हैं। शनिश्चर, राहु केतु के ग्रह दशा का, मार्केश का भय दिला कर चतुर ज्योतिषी लोग ऐसे लोगों को खूब डराते हैं और उनकी पूजा पत्री के नाम पर काफी पैसे ऐंठ लेते हैं। कन्या विवाह योग्य हो जाए और लड़के ढूँढ़ने के लिए जाने पर सफलता न मिले। दहेज आदि का प्रश्न उठे तो उन्हें लगता है कि अब कन्या का विवाह न हो सकेगा। योग्य लड़का मिलेगा ही नहीं। इतनी बड़ी रकम दहेज में दिये बिना अब कोई लड़का मिलेगा ही नहीं। कन्या इन्हें पर्वत के समान भारी लगती है और रात दिन भाग्य को कोसते हुए, कन्या को अभागी बताते हुए चिन्ता में सिर धुनते रहते हैं। इस प्रकार अपना मनः क्षेत्र दुखित कर लेने पर उन्हें यह नहीं सूझता कि जो दो चार लड़के उनने ढूँढ़े हैं, इनके अतिरिक्त सज्जन और सुन्दर लड़के भी इस दुनिया में मौजूद हैं और थोड़ी दौड़ धूप करके उन्हें ढूँढ़ा जा सकता है एवं विवाह की समस्या को सरल बनाया जा सकता है।
किसी प्रिय जन का वियोग या देहावसान हो जाए तो उनकी आँखों से आँसू ही बन्द नहीं होते। दिन रात पेट में से हूक उठती रहती है। सारा संसार अंधकार मय दीखता है। लगता है इसके बिना जीवन कैसे सम्भव होगा? इस शोक वियोग से कितने ही व्यक्ति अपना भी प्राणान्त कर लेते हैं। ऐसी ही शीलयुक्त कई भावुक स्त्रियाँ पति की चिता पर जल मरती देखी जाती हैं। ऐसे लोगों की मनोभूमि एक ही प्रकार के शोक संकुचित विकारों से ऐसी आच्छादित हो जाती हैं कि वे विवेक पूर्ण विचार उठ ही नहीं पाते जिनके आधार पर यह सोचा जा सकता है कि प्रत्येक व्यक्ति स्वतः में एक पूर्ण इकाई है और किसी दूसरे के साथ रहने न रहने पर भी अपनी जीवन यात्रा अपने पाँवों पर खड़े होकर चला सकता है।
जीवों का आपसी मिलन और बिछुड़न समुद्र की लहरों की तरह क्षण-क्षण से होती रहने वाली एक ऐसी साधारण प्रक्रिया है जिस पर सीमित शोक ही मनाया जाना चाहिये। यह विचार भी उसके मन में नहीं उठते क्योंकि शोकाकुल मस्तिष्क भी अर्धविक्षिप्त स्थिति में ही होता है।
ऐसे दुर्बल मस्तिष्कों में भविष्य में किन्हीं आपत्तियों के आने की आशंकाएँ निरन्तर उठती रहती हैं। अपने ऊपर ऐसी ऐसी टिप्पणियों के आने की बातें सोच-2 कर अपना चित्त परेशान किया करते हैं जो वस्तुतः उनके जीवन में कभी नहीं आतीं।
यह अधीरता एवं मानसिक दुर्बलता मनुष्य के लिए कायरता का कलंक लगाने वाली, इसके पुरुषार्थ को कलंकित करने वाली है। पौरुष का प्रधान लक्षण यह है कि मनुष्य को आपत्तियों में न डरने वाला और हर प्रतिकूल परिस्थिति में अपने धैर्य को स्थिर रखने वाला होना चाहिए।
हर्ष और शोक के, लाभ और हानि के, संपत्ति और विपत्ति के, सफलता और असफलता के ताने बाने से मनुष्य का यह जीवन बना हुआ है। धूप छाँह की तरह प्रिय और अप्रिय दोनों ही प्रकार की परिस्थितियाँ जीवन में आती जाती रहती हैं। उनमें खेलने वाले खिलाड़ियों की तरह अपना मानसिक सन्तुलन स्थिर रखा जाए और हार जीत को विशेष महत्व न दिया जाए, तभी जीवन को आनन्दमय बनाये रहना सम्भव हो सकता है।
आध्यात्मिक गुणों में धैर्य को प्रथम स्थान इसीलिए दिया गया है, ‘धृति’ को धर्म का प्रथम लक्षण इसीलिए माना गया है कि वह किसी व्यक्ति के आत्मबल का प्रथम सोपान है। जिसमें आत्मबल नहीं वह निकृष्ट कोटि का दुर्बल है। इस दुर्बलता पर हम विजय प्राप्त करें, सुख और दुख की घड़ियों को हँसते हुए काटें और भली बुरी सभी परिस्थितियों में अपना मानसिक संतुलन स्थिर रखें तभी हम आध्यात्म मार्ग के पथिक कहे जा सकते हैं। इस पथ के पथिक हुए बिना यह संसार हममें से प्रत्येक के लिए डरावना ही अनुभव होता रहेगा।
(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)
यह मानव शरीर सुर दुर्लभ है। 84 लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात लाखों वर्ष बाद यह प्राप्त होता है। एक बार इसे व्यर्थ गँवा देने के पश्चात लाखों वर्ष बाद ही फिर ऐसा अवसर आने की सम्भावना होती है। इसलिए दूरदर्शी और विवेक शील लोग इन्द्रिय विषयों और तृष्णा जँजाल में फँसकर इस जीवन रूपी बहुमूल्य सम्पत्ति को व्यर्थ नष्ट करने की अपेक्षा आत्म कल्याण की बात ही सोचते हैं और उसी में अपनी भावना एवं शक्ति का अधिकाधिक उपयोग करने का प्रयत्न करते हैं।
शास्त्रकारों ने पग पग पर मनुष्य को यही शिक्षा दी है कि इन अमूल्य क्षणों को बाल क्रीड़ा में-शरीर की गुलामी में बर्बाद न करके अनन्त काल स्थिर रहने वाली सद्गति को उपलब्ध करने में ध्यान दिया जाए। इसी में उसका सच्चा हित, स्वार्थ, लाभ एवं कल्याण सन्निहित हैं।
इस आत्मकल्याण की साधना को योग कहते हैं। योग साधन द्वारा मनुष्य अपना वास्तविक स्वरूप तथा जीवन का लक्ष समझ सकता हैं। परम आत्मा को प्राप्त कर सकता है और जो कुछ इस संसार में प्राप्त करने योग्य है उसे प्राप्त कर सकता है। कहा गया है कि-
आत्मा वा अरे दृष्टव्य श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मको वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्चा विज्ञानेनेद œ सर्वं विदितम।
वृहदारण्यक 2।4।5
आत्मा ही देखने, सुनने, मनन और निदिध्यासन करने योग्य है। हे मैत्रेयी, उसे देखने, सुनने, समझने और अनुभव करने से इस संसार में जो कुछ है वह सब जाना जा सकता है।
अयं तु परमोधर्मो यद्योगेनात्म दर्शनम्।
याज्ञवलक्य
मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म कर्तव्य यही है कि योग के द्वारा आत्मदर्शन करें।
योगाग्नि र्दहति क्षिप्रयशेषं पाप पुञ्रजम्।
प्रसन्नं जायते ज्ञानं ज्ञानाग्नि न्निर्वाण मृच्छति॥
-कर्म पुराण
योग अग्नि में पापों का समूह जल जाता है। तब निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है और उससे ब्रह्म निर्वाण मिल जाता है।
योगेन रक्षयते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
-विदुर नीति
योग से ही धर्म की रक्षा होती है और योग से विद्या की रक्षा होती है।
द्वाविभौ पुरुषौ लोके सूर्य मण्डल भेदिनौ।
परिव्रां योग युक्तश्च रणेचाभि मुखेहतः॥
दो प्रकार से ही मनुष्य सूर्य मण्डल बेधता हुआ परमपद पास सकता है- एक योग युक्त होकर दूसरे धर्म रक्षा के लिए लड़ता हुआ मरने पर।
तपसा ब्रह्म विजिज्ञासत्व, तपों ब्रह्मेति।
तप ही ब्रह्म है। तप द्वारा ही वह ब्रह्म जाना जाता है।
जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट और क्लेश है, उनकी निवृत्ति साधारण उपचारों से नहीं हो सकती। किसी की कृपा एवं सहायता से भी उनकी क्षणिक निवृत्ति ही हो सकती है। दुखों का समूल निवारण योग साधना से ही सम्भव है लिखा है-
दुःसहा राम संसार विष वेग विषूचिका।
योग गारुड़ मंत्रेण पावने नोपशाम्यति॥
हे राम। संसार की विष वेदना सर्पिणी दुःसह है। यह योग रूपी गरुड़ से ही निवृत्त होती है।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः।
प्राप्तस्य योगाग्नि मयं शरीरम्॥
श्वेता. 2।12
शरीर के योगाग्नि मय होने पर उसे कोई रोग नहीं होता, बुढ़ापा नहीं आता, मृत्यु भी नहीं होती।
योग साधना का स्वरूप
आत्मकल्याण की योग साधना के वास्तविक स्वरूप से अपरिचित होने के कारण लोग उसे कष्ट साध्य मानते हैं और ऐसा सोचते हैं कि इस मार्ग पर चलने से उनकी लौकिक उन्नति में बाधा पड़ेगी। पर वास्तविकता यह नहीं है। आध्यात्मिकता के मार्ग को अपना कर साधना पथ पर चलने में केवल परलोक एवं परमार्थ ही नहीं सधता वरन् इस लोक में सुख शान्ति के साधन उपलब्ध होते हैं। योग साधना गृहस्थ में रहते हुए भी सुविधा पूर्वक हो सकती है, उसके लिए घर त्याग कर विरक्त भ्रमण करना आवश्यक नहीं। साधना से लोक और परलोक दोनों की सफलता मिलती है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही पदार्थ प्राप्त होते हैं।
साघयेद्या चतुर्वर्गं सैवास्ति ननुसाधना। मनु॰
जिससे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही सधते हों वही सच्ची साधना है।
लेकिन आज मनुष्यों में दूरदर्शिता का अभाव हो रहा है, आज थोड़ी कठिनाई उठाकर भविष्य को उज्ज्वल बनाने पर लोग विश्वास नहीं करते। वे इतना ही चाहते हैं कि आज इसी क्षण हमें अधिकाधिक मौज मजा करने का अवसर मिले। इस आतुरता में वे कर्म कुकर्म करते हैं और तुच्छ कार्यों को बहुत महत्वपूर्ण मानकर उन्हीं में उलझे रहते हैं। मनुष्य के इस मूर्खता पूर्ण भुक्कड़पन पर खेद प्रकट करते हुए अष्टावक्र ऋषि कहते हैं-
वुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते।
भोग मोक्ष निराकाक्षीं विरलो हि महाशयः॥
-अष्टावक्र
इस संसार में भोले लोग बहुत हैं मुमुक्षु भी दिखाई पड़ते हैं। पर योग और मोक्ष की इच्छा छोड़कर परमार्थी लोग संसार में कोई विरले ही दीखते हैं।
योग साधना जो आत्मा का सच्चा कल्याण कर सके गायत्री ही है। इस उपासना से बढ़कर और कोई तप, योग, साधन, ध्यान नहीं हैं। समस्त प्रकार की योग साधनाओं का आधार गायत्री ही मानी गई है।
गायत्र्येव तपो योगः साधनं ध्यान मुच्यते।
सिद्धीनाँ सामता माता नात् किंचिद् वृहत्तरम्॥
गायत्री साधना लोक न कस्यापि कदापि हि।
याति निष्फलता मेतत् ध्रुवं सत्यं हि भूतले।
योगिकानाँ समस्तानाँ साधनानाँ तु वरानने॥
-गायत्री मंजरी
गायत्री ही तप है, योग है, साधना है, ध्यान है, यह ही सिद्धियों की माता मानी गई है। इससे बढ़ कर श्रेष्ठ तत्व इस संसार में और कोई नहीं है। कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। समस्त योग साधनाओं का आधार गायत्री ही है।
मनोनिग्रह और आत्म संयम
गायत्री द्वारा आत्म कल्याणकारी योग साधना करने के लिए सर्व प्रथम साधक को चरित्रवान बनने की आवश्यकता होती है। अपने अन्दर जो दोष हैं उनको आत्म निरीक्षण के द्वारा पता लगा कर परित्याग करना चाहिये। मन बार बार उनकी ओर फिरे तो प्रायश्चित के दण्ड विधानों द्वारा तथा वैसे अवसर न आने देने की व्यवस्था करके उस पर अंकुश लगाना चाहिए। मन सीधे वश में नहीं आता, वह जन्म−जन्मांतरों से संचित कुसंस्कारों को भी आसानी से नहीं छोड़ता। इसके लिए उससे संग्राम ही करना पड़ता है। इसलिए साधना को एक संग्राम भी कहा गया है। आसुरी और दैवी शक्तियों का जो निरन्तर संग्राम हमारे मनः क्षेत्र में होता रहता है, उसी का दिग्दर्शन गीता में कौरव पाण्डवों के महाभारत युद्ध के रूप में कराया गया है। मन को निर्विषय, शान्त और स्थिर बनाना गायत्री उपासक के लिए आवश्यक है। इसमें सफलता प्राप्त करने के लिए मार्ग दर्शन इस प्रकार मिलता है :-
वन्धाय विषयासंगि मुक्त्यै निर्विषयं मनः।
विष्णु पुराण 6।7।28
विषयों में बन्धन और विषय त्याग देने से मुक्ति है।
यत्र यत्र मनोयाति ब्रह्मणस्तत्र दर्शनम्।
जहाँ जहाँ मन जाए वहाँ वहाँ परमात्मा के दर्शन करे।
दृष्टिं ज्ञान मयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्म मयं जगत्।
दृष्टि को ज्ञान मयी बनाकर सारे संसार को ब्रह्म मय देखना चाहिए।
वितर्क वाधने प्रतिपक्ष भावनाम।
योग दर्शन 2।33
दुर्भावनाएं मन में आने पर उनके विरोधी सद्भावनापूर्ण विचार करके कुविचारों को काटें।
मैत्री करुणामुदितोयेक्षाणाँ सुख दुःख पुण्या पुण्य विषयाणाँ भावनाताश्चित प्रसादम।
गी. सू. 1।33
मैत्री, करुणा, मुदिता, इन चार प्रकार के सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा, पापियों के बारे में चिन्तन करने से चित्त प्रसन्न रहता है।
चित्त की स्थिरता बड़ी चीज है पर वह गायत्री उपासक के लिए सरल भी है। इस मनोनिग्रह के द्वारा महत्वपूर्ण सिद्धियों का द्वार खुलता है :-
आविभूर्त प्रकाशानाम नुपद्रुत चेतसाम।
अतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्त विशिष्यते॥
-वाक्य प्रदीप
चित्त जब सत और तम से रहित होकर दीप्तिमान होता है और फिर रज को भी त्याग कर स्थिर हो जाता है तो भूत और भविष्य की प्रत्येक बात स्पष्ट दिखाई देने लगती है।
श्रद्धा और सदाचार की आवश्यकता
चित्त की चंचलता और कुमार्ग गामिता पर जैसे जैसे अंकुश लगता जाता है वैसे वैसे दुष्कर्मों से घृणा होती जाती है बुराइयाँ घटती जाती हैं, पाप छूटते जाते हैं और संयम सदाचार का जीवन बनता जाता है। श्रद्धा बढ़ती है और भ्रम सन्देहों का निवारण होता है। सच्चे ज्ञान का उदय अपने आप होने लगता है और सत्कर्मों में प्रवृत्ति बढ़ जाती है। यही ब्राह्मणत्व है। इस स्थिति के प्राप्त होने से आत्म कल्याण का मार्ग तीव्र गति से प्रशस्त होता है। इस अन्तःस्थिति से भगवान भी प्रभावित होते हैं और साधक की श्रद्धा के अनुरूप उस पर अनुग्रह करने लगते हैं। इस स्थिति का वर्णन इस प्रकार मिलता है :-
श्रद्धामयोऽयं पुरुषः यो यच्छद्ध स एव स।
-गीता
मनुष्य श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा है वह वैसा ही है।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा पराँ शन्ति मचिरेणाधिगच्छति॥
गीता 4।39
श्रद्धावान, इन्द्रियों को जीतने में तत्पर व्यक्ति सच्चे ज्ञान को प्राप्त करता है और ज्ञान को प्राप्त करते ही तुरन्त परम शान्ति प्राप्त कर लेता है।
समोऽहं सर्वभूतिषु न में द्वेषोऽस्तिन न प्रियः।
ये भजन्ति तु माँ भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
गीता 9।99
मेरे लिए सभी प्राणी समान हैं। न कोई मुझे प्यारा है, न किसी से द्वेष है। जो जिस भाव से मुझे भजता है मैं उसी रूप में उपस्थित होता हूँ।
भगवान सद्विचारों और सत्कर्मों से प्रभावित एवं प्रसन्न होते हैं। ऐसे सुकर्मी आस्तिक व्यक्ति ही ब्राह्मण माने गए हैं।
शमोदमस्तपः शोचं क्षान्तिरार्जव मेव च।
ज्ञान विज्ञान मास्तिक्यं ब्रह्म कर्म स्वभावजम्॥
शम, दम, तप, पवित्रता, शान्ति, सरलता, ज्ञान, ब्रह्म ज्ञान, आस्तिकता यह ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
जो व्यक्ति इन पवित्र कर्तव्यों को त्याग देता है, उसका सारा साधन भजन फूटे बर्तन में भरे गये पानी की तरह नष्ट हो जाता है :-
ब्राह्मण समद्दक् शान्तो दीनानाँ समुपेक्षकः।
स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्न भाण्डात् पयोयथा।
जो ब्राह्मण समदर्शी, शान्ति आदि का बहाना लेकर दीनों की उपेक्षा करता है, सेवा से जी चुराता है, उसका ब्रह्मज्ञान वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे फूटे बर्तन में से पानी टपक जाता है।
साधना मार्ग में संयम और सदाचार का अत्यधिक महत्व है। जो इस पर दृढ़ता पूर्वक आरुढ़ है, वह अधिक कष्ट साध्य साधनाएँ न कर सके, केवल गायत्री माता की साधारण उपासना करता रहे तो भी प्रशंसनीय सफलता प्राप्त कर लेता है।
सावित्री मात्र सारोऽपि वरं विप्र सुयंत्रितः।
मनु. 2-116
संयमी ब्राह्मण गायत्री मात्र जानता हो तो भी वह श्रेष्ठ है।
साधना पथ का मार्ग दर्शन
जो साधना में विधि व्यवस्था का, शास्त्र मर्यादा का ध्यान नहीं रखते, मनमानी चलाते हैं, उनका योग कुयोग बन जाता है और थोड़ा बहुत उन्हें प्राप्त होता है, वह भी इन्द्रिय प्रलोभनों या साँसारिक तुच्छ प्रयोजनों में खर्च हो जाने का खतरा बना रहता है। बहुधा ऐसे उच्छृंखल, नियंत्रण विहीन साधक पथ भ्रष्ट होकर उस उपलब्ध हुई नवोदित शक्ति का दुरुपयोग करते देखे गये हैं। इसलिए साधना काल में सतर्कता और आत्म नियन्त्रण की बड़ी आवश्यकता है।
कुयोगिनो ये विहिताद्यन्तरायैर्मनुष्यभूतौस्त्रिदशी य सृष्टैः।
-भागवत 2
कुयोगी जो विधिपूर्वक आत्म साधना नहीं करते, उन्हें नवोदित शक्तियाँ लुभाकर विषय भोगों में डाल देती हैं।
चित्त की स्थिरता एवं आत्म संयम पर पूरा ध्यान रखते हुए गायत्री उपासक को विधि पूर्वक साधना पथ पर अग्रसर होना चाहिए। गायत्री परा विद्या है, उसकी उपासना एक बहुत ही सुव्यवस्थित विज्ञान है। विज्ञान की शिक्षा को कोई शिक्षार्थी बिना किसी मार्ग दर्शक के अपने आप पूर्ण नहीं कर सकता। जब डाक्टरी, इंजीनियरिंग, रसायन, साइंस आदि साधारण कार्य बिना शिक्षक के नहीं सीखे जा सकते तो फिर आध्यात्म विद्या जैसे महान विज्ञान को अपने आप किसी सक्रिय मार्ग दर्शन के सफलता पूर्वक प्राप्त कर सकना कैसे सम्भव हो सकता है?
यों आत्म कल्याण की सभी साधनाओं में गुरु की आवश्यकता है पर गायत्री उपासना में तो यह आवश्यकता विशेष रूप में है। क्योंकि इस साधना का प्रधान आधार प्राण तत्व है। गायत्री शब्द के अक्षरों में स्पष्ट है कि- गय=प्राण, त्री=त्राण करने वाली अर्थात् प्राणों की रक्षा शक्ति ही गायत्री उपासक को अपने में विशेष प्राण बीज धारण करके आगे बढ़ना होता है और यह प्राण किसी प्राणवान साधना निष्णात गुरु से ही प्राप्त हो सकता है। जिस प्रकार गन्ने के, गुलाब के बीज नहीं होते, उसकी लकड़ी काट कर दूसरी जगह बोई जाती है, उसी प्रकार जिसने कम से कम सवा करोड़ जप किया हो ऐसे परिपक्व साधन वाले अनुभवी गुरु के प्राणों का एक अंश अपनी प्राण भूमिका में बोने से ही नवीन साधक का साधना वृक्ष बढ़ता और फल−फूलों से सुशोभित होता है। दीक्षा गायत्री उपासना का महत्वपूर्ण अंग है। साधना की सफलता चाहने वाले और शास्त्र की महत्ता को स्वीकार करने वालों के लिए तो वह अनिवार्य ही है। देखिए :-
दीक्षा मूलं जपं सर्वं दीक्षा मूलं परं पतः।
दीक्षामाश्रित्य निवसेधत्र कुत्राश्रमे वसन्॥
दीक्षा ही जप का मूल है, दीक्षा ही तप का मूल है। किसी भी साधना में दीक्षा का आश्रय लेकर ही प्रवेश करना चाहिए।
मंत्र विहीनस्य न सिद्धिर्नय सद्गतिः।
तस्यार्त्सव प्रयन्नेन गुरुणा दीक्षितो भवेत्॥
दीक्षा विहीन मन्त्र से सिद्धि प्राप्त नहीं होती इसलिए प्रयत्न पूर्वक गुरुदीक्षा लेनी चाहिए।
तद्विज्ञानार्थ स गुरु मेवामि गच्छेत्।
गुरुमेवाचार्य शम दमादि सम्पन्नभिगच्छेत्॥
शास्त्रज्ञों ऽपि स्वातंत्रेण ब्रह्म ज्ञानयन्वेषणं न कुर्यात।
-मुंडकोपनिषद्
साधना का मार्ग जानने के लिए गुरु की सेवा में उपस्थित होवें। शम, दम आदि सद्गुणों से सम्पन्न गुरु एवं आचार्य के पास जाना चाहिए। स्वयं शास्त्रज्ञ हो तो भी ब्रह्म विद्या की मनमानी साधना न करे।
आज के कृत्रिमता प्रधान युग में नकली चीजों की बाढ़ आ गई है। असली वस्तुओं का मिलना दुर्लभ होता जा रहा है। गुरु भी नकली ही अधिक हैं। जिनने शिष्य के भी गुण प्राप्त नहीं किये वे गुरु बनते हैं। जिनके पास अपनी साधना की पूँजी कुछ भी नहीं है, जिनसे अपना प्राण विकसित नहीं हुआ है, वह दूसरों को क्या प्राण दान देगा। उसकी दीक्षा में शिष्य का क्या हित साधन हो सकेगा? इस कृत्रिमता प्रधान युग में नकली से बचने तथा असली ढूँढ़ने की भारी आवश्यकता है।
गुरवो वहवस्तात शिष्य वित्तापहारकाः।
विरला गुरुवस्ते ये शिष्य सन्तापहारकाः॥
संसार में ऐसे गुरु बहुत हैं जो शिष्य का धन हरण करते हैं पर ऐसे गुरु कोई विरले ही होते हैं जो शिष्य का सन्ताप दूर करें।
गुरु कैसा हो? इसकी कुछ परीक्षाएँ नीचे श्लोक में बताई गई हैं। जो इन परीक्षाओं में खरा उतरे, उसे ही गायत्री उपासक अपना गुरु वरण करके साधना क्रम आगे बढ़ावें।
मातृतः पितृतः शुद्धः शुद्ध भावों जिनेन्द्रियः।
सर्वागमानाँ मर्मज्ञः सर्वशास्त्रार्थ तत्व वित्॥
परोपकार निरतो जप पूजादि तत्परः।
अमोघ वचनः शान्तो वेद वेदार्थ पारगः॥
योग मार्गानुसन्धायी देवताहृदयंगमः।
इत्यादि गुण सम्पन्नो गुरुरागम सम्यतः॥
-शारदा तिलक 2।142-144
जो कुल परम्पराओं से शुद्ध हो, शुद्ध भावनाओं वाला, जितेन्द्रिय, जो शास्त्रों को जानता हो, तत्वज्ञ हो, परोपकार में संलग्न, जप पूजा में परायण, जिसके वचन अमोघ हों, शान्त स्वभाव का, वेद और वेदार्थ का ज्ञाता, योग मार्ग का अनुसंधानकर्ता जिसके देवता हृदयमय हो, ऐसे अनेक गुण जिसमें हों, वही शास्त्र सम्मत गुरु कहा जा सकता है।
मंत्र साधन की विधि व्यवस्था
गुरु मुख से दीक्षा पूर्वक ग्रहण करने पर ही गायत्री की ‘मन्त्र’ संज्ञा होती है। इसके बिना वह साधारण प्रार्थना कही जाती है। जिस प्रकार अपनी दैनिक भाषा में कोई प्रार्थना कहना एक सामान्य बात है उसी प्रकार बिना दीक्षा की गायत्री भी एक साधारण पूजा प्रक्रिया है। गायत्री को मन्त्र रूप में ग्रहण करके उसकी साधना द्वारा आध्यात्म मार्ग पर बढ़ते हुए सच्चे विज्ञान को प्राप्त करना चाहिए। ऐसे मन्त्र योग से ही सिद्धि प्राप्त होती है।
मंत्राभ्यास योगेन ज्ञानं ज्ञानाय कल्पते।
न योगेन बिना मंत्रो न मंत्रेण विनाहीसः॥
द्वयोरभ्यास संयोगो ब्रह्म संसिद्धि कारणम्।
मन्त्राभ्यास और योग साधना से ही ज्ञान, ज्ञान कहा जाता है। न मन्त्र के बिना योग हो सकता है, न बिना योग के मन्त्र साधना हो सकती है। दोनों के सम्मिश्रण से ही सिद्धि प्राप्त होती है।
साधना की सफलता के लिए निम्न सोलह बातों का ध्यान रखना होता है। यह सभी बातें नियमित रूप से विधि पूर्वक करने से सफलता का मार्ग प्रशस्त होगा। इन सभी बातों पर अगले किसी अंक में विस्तृत प्रकाश डालेंगे। 16 स्मरणीय नियम इस प्रकार हैं-
भवन्ति मंत्र योगस्य षोडशांगानि निश्चितम्।
यथा सुधाँशोजयिन्ते कलाः षोडम शोभनाः॥
भक्ति शुद्धिश्चासनंच पञ्चांगस्यापि सेवनम।
आचार धारणे दिव्य देशसेवनमित्यापि॥
प्राण क्रिया तथा मुद्रा तर्पणं हवनं वलिः॥
यागो जयर तथा ध्यानं समाघिश्चोति षोडश॥
चन्द्रमा की सोलह कलाओं की ही तरह मन्त्र योग के भी सोलह सोपान हैं। (1) भक्ति (2) शुद्धि (3) आसन (4) पञ्चाँग सेवन (5) आचार (6) धारण (7) दिव्य देश सेवन (8) प्राण क्रिया (9) मुद्रा (10) तर्पण (11) हवन (12) बलि (13) त्याग (14) जप (15) ध्यान (16) समाधि।
इन सभी के सम्बन्ध में सतर्कता रखी जानी चाहिए पर आहार शुद्धि एवं इष्ट देव का निरन्तर ध्यान यह दो बातें तो अनिवार्य ही हैं। साधक अभक्ष्य कुधान्य से वैसे ही बचे जैसे विष से बचा जाता है। सोते जागते, चलते फिरते हर समय से माता का ध्यान रखना ही शीघ्र सफल बनने का अमोध साधन है।
आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः।
सत्व शुद्धौ धवा स्मृतिः॥
स्मृतिलाभे सर्व ग्रन्थीनाँ विप्र मोक्षः।
-उपनिषद्
अर्थात्-शुद्ध आहार ग्रहण करने से अन्तःकरण शुद्ध होता है। शुद्ध अन्तःकरण से स्मृति (ध्यान) निश्चित होता है और निश्चित ध्यान लगाने से सिद्धि प्राप्त होती है।
लघु साधन और पूर्ण पुरश्चरण
जिनके पास समयाभाव है, स्वल्प श्रद्धा है, उन आरम्भिक साधकों के लिए 9 दिन में 24 हजार का लघु अनुष्ठान बताया गया है। थोड़ी अधिक श्रद्धा बल है, जिनको कुछ अधिक समय लगाने में भी संकोच नहीं है, उन मध्यम स्थिति उपासकों को 40 दिन का सवा लक्ष अनुष्ठान कराया जाता है। पर पूर्ण पुरश्चरण 24 लक्ष का होता है। इस महामन्त्र की शक्ति परीक्षा करनी है तो कम से कम 24 लक्ष का एक पूर्ण पुरश्चरण करना चाहिए। इस सम्बन्ध में शास्त्रों का निर्देश इस प्रकार है-
भूयस्त्वक्षर लक्षं गायत्रीं संयतात्मको जप्त्वा।
-प्रपंच सार
गायत्री के एक एक अक्षर का एक एक लाख के कारण चौबीस लक्ष जप मनोनिग्रह पूर्वक करें।
लभतेऽभियताँ सिद्धिं चतुर्विशति लक्षतः।
-याज्ञवलक्य स्मृति
अर्थात्-चौबीस लाख जप का महापुरश्चरण करने से गायत्री की सिद्धि मिलती है।
साधना ग्रन्थों में ऐसा उल्लेख है कि सतयुग में जबकि वायु मण्डल शुद्ध था और साधकों के शरीर तथा मन सतोगुण से परिपूर्ण थे उस समय 24 लक्ष का पुरश्चरण पूर्ण माना जाता था। पर अब स्थिति बदल गई है। व्यक्तियों के शरीरों में तथा वातावरण में तमोगुण और रजोगुण व्याप्त हैं। स्थिति की शुद्धता अशुद्धता में सैंकड़ों गुना अन्तर आ गया है इसलिए साधना की मात्रा में भी उसी हिसाब से परिवर्तन करना उचित है। मामूली बुखार दो चार दिन दवा खाने से ही ठीक हो जाता है, यदि जीर्ण ज्वर हो तो बहुत दिनों तक दवा लेनी पड़ती है। इसी प्रकार मन कम अशुद्ध हों तो थोड़ी साधना से ही आत्म शक्ति निखर आती है पर दूषणों की अधिकता होने पर देर तक प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है।
इसी सिद्धान्त के अनुसार सतयुग में 24 लक्ष पुरश्चरण पूर्ण माना जाता था तो अब इस युग की कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए चौगुना प्रयत्न करना उचित ही है। इसलिए ऐसा उल्लेख है कि 24 लक्ष के 4 पुरश्चरण करना एक पूर्ण पुरश्चरण माना जाए।
कल्पोक्तैव कृते संख्या त्रेतायाँ द्विगुण भवेत्।
द्वापरे त्रिगुण प्रोक्ता कलौ संख्या चतुर्गुणा॥
-वैशम्पायन
अर्थात्-जो जप संख्या शास्त्रों में कही गई है वह सतयुग के विचार से है। त्रेता में उससे दूना, द्वापर में तीन गुना और कलियुग में चार गुना जप करना चाहिये।
षठणवति लक्ष संख्या जपं कलौ पुरश्चरणम्।
-गायत्री पुरश्चरण पद्धति
कलियुग में 96 लाख जप संख्या करने पर एक गायत्री महापुरश्चरण होता है।
कलौचतुर्गणं प्रोक्तं मंत्रानुष्ठान माचरेत्।
कलियुग में मंत्रानुष्ठान चार गुना करना चाहिये।
यदि 24 लक्ष के 4 अनुष्ठान किये जा सकें तो सर्वोत्तम अन्यथा गायत्री शक्ति का प्रत्यक्ष स्वरूप देखने के इच्छुकों को कम से कम एक 24 लक्ष पुरश्चरण विधि पूर्वक करना चाहिए। यों तो जिससे जितना बन पड़े उतना ही उत्तम है। सवा लक्ष और चौबीस हजार के मध्यम तथा लघु अनुष्ठानों का भी अपना अपना महत्व है। ये भी कल्याणकारी ही हैं।
परम कल्याण का मंगलमय मार्ग
गायत्री उपासना में कोई त्रुटि रह जाने से कोई अनिष्ट होने की सम्भावना स्वप्न में भी नहीं रहती। अधिक से अधिक इतनी ही हानि हो सकती है कि लाभ कम मिले। माता अपने पुत्रों का कभी किसी प्रकार का अनिष्ट नहीं करती।
कुर्वन्नापि त्रुटी र्लोके बालको मातरं प्रति।
यथाभवति कश्चिन्न तस्याँ अप्रीति भाजनः।
कुर्वन्नपि त्रुटीर्भक्तः कश्चिद् गायत्र्युपासने।
न तथा फल माप्नोति विपरीर्त कदाचन॥
-गायत्री संहिता
जिस प्रकार संसार में माता के प्रति भूल करने पर भी कोई माता बालक से शत्रुता नहीं करती उसी प्रकार उपासक से कोई भूल हो जाने पर भी गायत्री माता कुपित नहीं होती और न उसका कोई अनिष्ट ही करती है।
जप योग की महिमा अत्यधिक है फिर गायत्री जप तो सर्वोपरि है। उसकी महिमा का तो कहना ही क्या हैं?
जपात् सिद्धि-जपात् सिद्धि, जपात् सिद्धिर्न संशयः।
अर्थात्- जप से ही सिद्धि होती है, जप से ही सिद्धि होती है। जप से ही सिद्धि होती है। इसमें संशय नहीं। तीन बार एक ही वाक्य की पुनरावृत्ति करके शास्त्रकार ने यह बताया है कि जप की महानता कितनी अधिक होती है।
गायत्री को ‘ब्रह्मास्त्र’ कहा गया है। इस हथियार को हाथ में लेकर जीवन संग्राम में अड़ने वाला व्यक्ति कभी नहीं हारता। इस शस्त्र की चोट वह जिस मोर्चे पर करता उसमें उसे विजय ही प्राप्त होती है।
एकं ब्रह्मस्त्र मादाय न्यं गण्यतः क्वचित्।
आस्ते न धीर वीरस्य भंगः संकार केलिषु॥
-खंडन खाद्य
अन्य शस्त्रास्त्र न होने पर भी जो वीर ब्रह्मास्त्र को हाथ में लेकर संग्राम में खड़ा हो जाता है वह विजयी ही होता है, पराजित नहीं।
संसार में जितने भी महामन्त्र हैं उनमें गायत्री को सर्वोपरि माना गया है। मनुष्य ही नहीं देवता भी इसी की उपासना करते हैं और इसी के बल पर अपना देवत्व सुरक्षित रखते हैं। यदि मनुष्य श्रद्धा पूर्वक वेद माता की शरण को अपनाये रहे तो भी अपनी मनुष्यता सुरक्षित रख सकता है।
सप्त कोटि महामन्त्रा गायत्री नायकाः स्मृताः।
आदि देव मुपासन्ते गायत्री वेदमातरम्॥
अर्थात् सप्त कोटि महामन्त्रों में गायत्री सर्वोपरि सेना नायक के समान है। देवता इसी की उपासना करते हैं। वही चारों वेदों की माता हैं।
गायत्री योग साधना का केन्द्र बिंदु हैं। योगेश्वर भगवान शंकर की उपासना तपस्या भी गायत्री द्वारा होती थी।
गायत्री वेद मातास्तिसाद्या शक्तिर्मताभुवि।
जगताँ जननी चैव ताम्रपासेऽहमेंवाहि॥
-गायत्री मंजरी
भगवान शंकर कहते हैं-गायत्री वेद माता है। यही आदि शक्ति कहलाती है। वही विश्व जननी हैं। मैं उसी की उपासना करता हूँ।
माता की अनुकम्पा से साधक क्या प्राप्त कर सकता है? इसकी एक झाँकी देखिए :-
सायमद्यीयान्तो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरद्यीयान्तों रात्रि कृतं पापं नाशयति।
सायं प्रातः प्रयुञ्जानों अपापों भवति।
निशीथे तुरीय संध्यायाँ जप्त्वा वाक् सिद्धिर्भवति। नूतनायाँ प्रतिमायाँ जप्त्वा देवता सान्निध्यं भवति।
प्राण प्रतिष्ठायाँ जप्त्वा प्राणानाँ प्रतिष्ठा भवति। भौमाश्विन्याँ महादेवी सन्निद्यौ जप्त्वा महामृत्युँ।
तरन्ति स महामृत्युँ तरति एवं वेद।
-देव्यथव शीर्ष
सायंकाल उपासना करने वाले के दिन में किए हुए पाप नष्ट होते हैं। प्रातः उपासना करने वाले के रात्रि में किए पाप नष्ट होते हैं। दोनों समय उपासना करने वाला सर्वथा निष्पाप होता है। मध्य रात्रि में तुरीय संध्या करने से वाक् सिद्धि होती है। नई प्रतिमा से देव सान्निध्य प्राप्त होता है। भौमाश्विनी योग में जप करने से महामृत्यु से तर जाता है। जो इस विद्या को जानता है वह मृत्यु से पार होता है। यही अविद्या नाशिनी ब्रह्मविद्या है।
ऐसी महा महिमामयी माता के चरणों में सब प्रकार नत मस्तक होना और शरण में जाना ही हमारे लिये श्रेयस्कर है।
त्वं माते सर्व देवनाँ सर्व सिद्धि प्रदायता।
तेन सत्येन में सिद्धि देहि मातर्नमोस्तुते॥
हे माता। तुम सब देवताओं की सब सिद्धियों को प्रदान करने वाली हो। मुझे भी सिद्धि प्रदान कीजिए, हे माता। आपको प्रणाम है।
(स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती)
मानव जीवन में संयमशीलता की आवश्यकता को सभी विचारशील व्यक्तियों ने स्वीकार किया है। साँसारिक व्यवहारों एवं सम्बन्धों को परिष्कृत तथा सुसंस्कृत रूप में स्थित रखने के लिए संयम की अत्यन्त आवश्यकता है। संसार के प्रत्येक क्षेत्र में जीवन के प्रत्येक पहलू पर सफलता, विकास एवं उत्थान की ओर अग्रसर होने के लिए संयम की भारी उपयोगिता है। विश्व के महान पुरुषों की जीवनियों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि उन्होंने जीवन में जो भी सफलता, उन्नति, श्रेय, महानता, आत्म कल्याण आदि की प्राप्ति की, उनके कारणों में संयम शीलता की प्रधानता है। संयम के पथ पर अग्रसर होकर ही उन्होंने अपने जीवन को महान बनाया। इसमें कोई संदेह नहीं कि संयम शीलता के पथ पर चल कर ही मनुष्य सही मानव बनता है, देवता बनता है, बनता है जन-जन का प्रिय, जिसके पीछे चलकर मानव जाति धन्य हो जाती है।
अपनी मानसिक वृत्तियों, बुरी आदतों एवं वासनाओं पर काबू पाना ही संयम शीलता के पथ पर अग्रसर होना है जिससे मनुष्य की शक्तियों का व्यर्थ ही ह्रास न होकर केन्द्रीयकरण होने लगता है जो जीवन में एक विशेषता ला देता है जिसके कारण मनुष्य जीवन में क्या से क्या बन जाता है।
अपने विकारों पर नियन्त्रण करने तथा हानिकारक आदतों से छुटकारा पाने के लिए जो चेष्टा जो क्रिया की जाती है उसी का नाम संयम है। किन्तु यह कार्य इतना सरल नहीं है जितना कि केवल इसके अर्थ को समझ लेना। जब इसे क्रिया क्षेत्र में अथवा साधना क्षेत्र में उतारा जाता है तो संयम शीलता का पथ बड़ा कठिन जान पड़ता है। अपनी एक छोटी सी बुरी आदत अथवा मानसिक विकार पर नियन्त्रण कर लेना कितना मुश्किल होता है यह वे लोग अच्छी तरह जानते हैं जो इस पथ पर चलते हैं। जो मानसिक विचार वासनाएँ अथवा बुरी आदतें जितने समय से अपना घर किए होती हैं वे उतनी ही प्रबल और दुर्दमनीय होती हैं। उन्हें पछाड़ देना साहसी एवं शूरवीरों का ही कार्य है। किसी आदत को, वासना अथवा विकार को देख लीजिए, जब वह अपना घर कर लेता है तो उसे निकालना बड़े साहस का काम होता है। उदाहरणार्थ बीड़ी, तम्बाकू या पान का उपयोग करने वाले व्यक्तियों को देख सकते हैं। ये आदतें बड़ी सरलता से अपना घर कर लेती हैं। किन्तु इनका छोड़ना कितना कठिन काम होता है-उनके लिए।
संयम शीलता के उक्त दुर्दम्य पथ पर चलने के लिए, अपने विचारों, आदतों, वासनाओं पर नियंत्रण करने के लिए निम्न बातों का सहारा लेना आवश्यक है।
1. आत्म संयम के पथिकों को प्रतिदिन अपना आत्म निरीक्षण करते रहना अत्यावश्यक है। अपने विचारों तथा कृत्यों के बारे में सदैव सूक्ष्म निरीक्षण करते रहना चाहिए। विचारों तथा कार्यों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। जैसे विचार होंगे वे ही क्रिया रूप में अवश्य परिणत होंगे। इसलिए बुरी विचारधारा से सदैव बचना चाहिए, साथ ही विचारों से किये जाने वाले कृत्यों से दूर रहना आवश्यक है। आत्म निरीक्षण के लिए प्रातः उठते समय एवं सायंकाल को सोते समय अपने दिनभर के कार्यों विचारों का लेखा जोखा लेना चाहिए। सायंकाल को सोने के पूर्व अपने दिनभर के कार्यों एवं विचारों का निरीक्षण करना चाहिए। समय के विरुद्ध जो कार्य विचार आदि किए उनके लिए सच्चे हृदय से प्रायश्चित करना, भविष्य में न करने का संकल्प लेना आवश्यक है। इसी प्रकार प्रातःकाल अपनी पिछली कमियों को ध्यान रखते हुए दिनभर में वे व्यवहार में न आवें इससे सचेत होकर अपनी दिनचर्या को योजना बनानी चाहिए। इस प्रकार प्रतिदिन आत्म निरीक्षण करने से संयम शीलता की और चरित्र गठन की ओर सरलता से बढ़ा जा सकता है। इस प्रकार आत्म निरीक्षण के लिए डायरी बना लेनी चाहिए। इससे अपनी संयम साधना में काफी सहयोग मिलेगा।
2. आत्म संयम के अभिलाषियों के लिए दोषों, बुराइयों को जानबूझ कर छिपाना, उन पर कृत्रिमता का पर्दा डालकर ढक देना अथवा स्वीकार करने में संकोच करना सर्वथा अनुपयुक्त है। चरित्र गठन या आत्म संयम के लिए अपनी बुराइयों को मुक्त कंठ से स्वीकार करना होगा। इसका अभ्यास स्वयं से शुरू करना चाहिए। एकाँत में बैठकर अपने हृदय के समक्ष अपनी बुराइयों, दुष्कृत्यों एवं दुर्विचारों पर विचार करके उन्हें स्वीकार करना होगा।
3. संयम शीलता के लिए नैतिक बल बढ़ाना भी आवश्यक है। ज्यों ज्यों मनुष्य का नैतिक स्तर ऊँचा होता जाएगा त्यों त्यों ही विचारों कार्यों में संयम बढ़ेगा।
4. संयम साधना में संगति एवं स्थान का काफी प्रभाव पड़ता है। दुश्चरित्र एवं दुर्विचारों वाले व्यक्तियों में तथा उन स्थानों में जहाँ असंयम वातावरण व्याप्त होता हैं, संयम साधना में सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती, क्योंकि इनसे अपनी बुरी आदतों दुर्विचारों एवं दुष्कृत्यों को और भी प्रोत्साहन मिलता है। जिसके कारण मनुष्य अपने पवित्र लक्ष्य में असफल हो जाता है। कभी कभी संयोग से अपने इष्ट मित्रों के प्रभाव से या स्वच्छ एवं सात्विक वातावरण में रहकर तथा महापुरुषों का संग करके मनुष्य बड़ी बड़ी खराब आदतों एवं दुर्विचारों को त्याग देता है और जीवन में काफी उन्नति कर जाता है। अतः संयम शीलता की ओर अग्रसर होने के लिए विपरीत संगति, स्थान, वातावरण का त्याग करना होगा।
5. संयम साधना के पथ पर चलना कोई आसान कार्य नहीं है। जब मनुष्य को उसकी बुरी आदतें, दुर्विचार, वासनायें पछाड़ पछाड़ कर पटकती हैं तब अच्छे-2 धैर्यवानों का धैर्य टूट जाता है, निराशा टपकने लगती है और सफलता का भविष्य संदिग्ध दिखाई देता है। असंयम के शैतान से लड़कर उस पर विजय प्राप्त करना कोई आसान कार्य नहीं है। अतः इसके लिए अटूट साहस और धैर्य की आवश्यकता है। धैर्य और साहस के साथ इस ओर निरन्तर प्रयत्न करने पर अवश्य ही संयम साधना पूर्ण होती है और मनुष्य अपने लक्ष्य में सफल हो जाता है। जल्दीबाजी अथवा अधीरता से लक्ष्य तक पहुँचना प्रायः असम्भव ही होता है।
6. किसी भी महान उद्देश्य अथवा पवित्र लक्ष्य की ओर अग्रसर होने के लिए किसी माध्यम अथवा आधार की आवश्यकता होती है। क्योंकि प्रारंभिक स्थिति के साधक में हृदय की दुर्बलता अथवा मानसिक कमजोरी होती है। क्योंकि सभी तो महात्मा नहीं होते। अतः चरित्र गठन अथवा संयम साधना के पथ पर अग्रसर होने के लिए बाह्य क्रिया अथवा अन्य साधना विधि की आवश्यकता पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसी तथ्य को समक्ष रखकर भारतीय ऋषियों ने मनुष्य के लिए भिन्न-2 साधना विधियों का निर्धारण करके उन्हें कर्तव्य घोषित किया। अतः जप, ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, यम, नियम आदि की साधनायें मनुष्य की संयम शीलता के लिए बहुत महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इनके अनुसार अभ्यास करने पर मनुष्य अपने जीवन में संयमशीलता में सफलता प्राप्त करके महान एवं पवित्र जीवन का निर्माण कर सकता है।
नाहं तन्तुँ न वि जानाम्योतुँ,
न यं वयन्ति समरेऽतमानाः।
कस्य स्तित्पुत्र इह वक्त्वानि,
परो वदात्यवरेण पित्रा ॥
-ऋग. 6-9-2
“मैं ताना या बाना कुछ नहीं जानता तथा प्रयत्न द्वारा जो वस्त्र प्रस्तुत किया जाता है, उसके सम्बन्ध में भी मुझे विशेष ज्ञान नहीं है। इहलौकिक पिता की बातें सुनने वाला पुत्र अन्य लोक का रहस्य कैसे जान सकता है?”
यह संसार उस परमात्मा की कृति है जो सबका आदि कारण है। जब उसने इच्छा की तभी मूल तत्त्व में स्फुरण होकर जगत का विकास हुआ। इसलिए किसी मनुष्य की सामर्थ्य नहीं कि वह इस जगत की उत्पत्ति का यथार्थ वर्णन कर सके। स्वयं वेद ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि “प्रकृति के तत्व को कोई नहीं जानता तो उनका वर्णन कौन कर सकता है? इस सृष्टि की उत्पत्ति कारण क्या हैं? यह विभिन्न सृष्टियाँ किस उपादान-कारण से प्रकट हुई?
देव-गण भी इन सृष्टियों के पश्चात ही उत्पन्न हुए हैं, तब कौन जानता है कि यह सृष्टि कहाँ से उत्पन्न हुई? यह विभिन्न सृष्टियाँ किस प्रकार हुई? इन्हें किसने रचा? इन सृष्टियों के जो स्वामी दिव्य धाम में निवास करते हैं वही इनकी रचना के विषय में जानते हैं?” इसी तथ्य को समझ कर उपर्युक्त मन्त्र में कहा गया है कि इस सृष्टि रूपी वस्त्र का ताना-बाना किस प्रकार ताना गया और फिर वस्त्र को किस प्रकार बुना गया है, इसका वर्णन कर सकना मनुष्य की शक्ति के बाहर है। हम तो अपने नेत्रों से तैयार सामग्री को ही देख रहे है। हमारे पूर्वज भी हम को इसी प्रकार देखते आए हैं। तब हम किस प्रकार जानें कि आदि में इसकी रचना किस प्रकार की गई थी ? इसका अगर कोई मार्ग है तो यही कि हम सच्चे हृदय से इसके रचयिता परमात्मा की पूजा, उपासना करें, उसके आदेशों का यथार्थ रूप में पालन करें और अपने जीवन को उसके बनाये नियमों के अनुकूल बनावें। ऐसा करने से ही हम आत्मा और प्रकृति के रहस्य को जानकर अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं। वास्तव में परमात्मा ही इस संसार का धारक है और वहीं इसमें ओत-प्रोत है। वही सब का स्वामी और सच्चा पिता है। जो कोई बालकोचित सरलता से उस भगवान की गोद में बैठने की अभिलाषा करेगा- उसकी शरण में जायेगा, वही सच्चे ज्ञान का अधिकारी बन सकेगा।
इस मन्त्र से दूसरी शिक्षा हम को यह प्राप्त होती है कि परमात्मा के स्वरूप, सृष्टि के रहस्य और प्रकृति के नियमों के विषय में मनुष्य को हठधर्मी-कट्टरता नहीं करनी चाहिए। जब हम इन बातों का निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, जब कि बड़े से बड़े ज्ञानी और विद्वान को भी इस विषय में अनुमान और अटकल से काम चलाना पड़ता है, जबकि अति प्राचीन मुनियों और आचार्यों के मतों में भी इस सम्बन्ध में पर्याप्त भेद दिखलाई पड़ता है, तो किसी एक मत या सिद्धान्त को लेकर उसी को एक मात्र सत्य बतलाना, उसे दूसरों पर जबर्दस्त लादने की कोशिश करना और जो उसे स्वीकार न करे उसे “पापी, राक्षस, नारकीय, काफिर आदि कहना, ज्ञानी का नहीं वरन् अज्ञानी होने का चिन्ह है। इसका अर्थ यह नहीं कि आप अपने पूर्वजों द्वारा निश्चित किये अथवा अपनी आत्मा से उद्भूत धर्म-मार्ग को न मानें, तदनुसार आचरण न करें, वरन् इसका आशय यह है कि धर्म के विषय में आप उदारता से काम लें, कट्टरपंथी न बनें। गीता में भगवान कृष्ण ने जो कहा है, कि “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहा” उसका भी आशय यही है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने विचार और आत्मा के अनुकूल मार्ग पर चलना उचित है, इसी में कल्याण है और उसे जबर्दस्ती या बहका कर मार्गच्युत करना पाप है।
खेद के साथ कहना पड़ता है कि कितने ही लोगों ने इस सत्य सिद्धान्त को भुलाकर अपने से भिन्न विचार वालों पर आक्षेप करना, गुमराह बतलाना और वश चले तो उनको बल पूर्वक अपने मार्ग से च्युत करना ही महत्वपूर्ण और प्रशंसनीय कार्य समझ लिया है। ईसाई और मुसलमान धर्माध्यक्षों के कारनामे तो इतिहास में प्रसिद्ध ही हैं जिन्होंने जीते जी जलाने और तलवार का भय दिखाकर करोड़ों मनुष्यों को धर्मच्युत किया। पर हमारे देश में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं रही जिन्होंने धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर निर्दोष व्यक्तियों का खून बहाया और आपस में एक दूसरे के सिरों को तोड़ा। अब भी बहुसंख्यक व्यक्ति धार्मिक खंडन-मंडन में ही अपनी विद्या बुद्धि की सार्थकता समझते हैं। पर इससे किसी प्रकार का लाभ होने के बजाय परस्पर में द्वेष-भाव की वृद्धि होती है और संगठन तथा सहकारिता से जो बहुत बड़े-बड़े कार्य होने सम्भव होते हैं उनके मार्ग में कठिनाइयाँ उपस्थित हो जाती हैं।
यदि शान्त और निष्पक्ष भाव से विचार किया जाए तो धर्म का सम्बन्ध मुख्यतया आत्मा से है। ऊपरी रहन सहन तथा आचार-विचार में तो देश काल और परिस्थिति के कारण अन्तर पड़ता ही रहता है। उदाहरण के लिए जब रेल नहीं थी तब यात्रा में भी मनुष्य जिस प्रकार शौच, स्नान, ध्यान, पूजा पाठ के नियमों का निर्वाह करते रहते थे अब रेल में बीस-तीस घण्टे तक लगातार यात्रा करते रहने पर वैसा कर सकना असम्भव है। इसी प्रकार जब लोग मुख्यतया खेती का ही धंधा करते थे और छोटे गाँवों में रहते थे, तब वे खान-पान की वस्तुओं के सम्बन्ध में जैसी शुद्धता रख सकते थे वह अब कलकत्ता, बम्बई, दिल्ली जैसे बड़े नगरों में निवास करते हुए और प्रातः 6 बजे ही काम करने के लिए चल देने पर रख सकना सम्भव नहीं है। पर इन बातों के कारण सत्य, न्याय, ईमानदारी परोपकार उदारता आदि के व्यवहार में अन्तर नहीं पड़ सकता और ये ही वास्तविक धर्म के लक्षण हैं। अगर हमको सत्कर्म करने का अभ्यास है और धर्म के सच्चे स्वरूप को समझते हैं तो प्रत्येक देश और काल में तदनुसार व्यवहार कर सकते हैं।
इस वेद मन्त्र में स्पष्ट बतला दिया गया है कि परमात्मा के स्वरूप और सृष्टि के रहस्यों के विषय में सदैव विवाद करते रहना अथवा इस सम्बन्ध में मीन-मेख निकालते रहना कोई विशेष महत्व की बात नहीं है। इन बातों का यथार्थज्ञान मनुष्य को हो सकना प्रायः असम्भव है। यह विषय सदा से विवादास्पद रहे हैं और रहेंगे। केवल वे ही मुट्ठी भर मनुष्य जो आत्मा के साधन और ध्यान द्वारा ज्ञान के अन्तिम शिखर पर पहुँच गये हैं इस विषय में किसी हद तक निर्भ्रान्त कहे जा सकते हैं, पर उस दर्जे पर पहुँच जाने के बाद वे न तो वाद-विवाद में पड़ सकते हैं और न अपने मन को दूसरों पर लादने की चेष्टा कर सकते हैं। साधारण मनुष्यों के लिए तो सृष्टि का ताना-बाना और उससे उत्पन्न होने वाला वस्त्र (जगत) हमेशा एक पहेली बना रहेगा। ऐसा व्यक्ति तो कभी इस साधारण-सी समस्या को ही न सुलझा सकेगा कि वृक्ष में से पहले कौन सी चीज उत्पन्न हुई? इसलिए ऐसे मनुष्यों के लिए वेद का यह आदेश सर्वथा उचित है कि वे ‘सृष्टि के ताने बाने’ के रहस्योद्घाटन के सम्बन्ध में आवश्यकता से अधिक चिन्तित न हों वरन् जिसकी बुद्धि इस सूक्ष्म विषय को जहाँ तक ग्रहण कर सकती है, उसी से सन्तुष्ट रहें। मुख्य बात तो ईश्वरीय आदेश के अनुकूल सदाचार, नीति और चरित्र का पालन करना है। यही सच्चे अर्थ में ईश्वर की पूजा और उपासना है। धर्म-शास्त्रों में जप, तप, ध्यान, भजन की जो विधियाँ बतलाई गई हैं उनका तात्पर्य भी यही है कि उनके द्वारा मनुष्य में भौतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का भाव भी उत्पन्न होता रहे और वह धर्म के मुख्य अंगों का पालन करने में समर्थ हो सके।
“ज्ञानी ब्रह्म को जानना चाहता है। भक्त के लिए भगवान सर्वशक्तिमान, षड़ैश्वर्य पूर्ण भगवान हैं। परन्तु वास्तव में ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं, वे ही सच्चिदानन्दमयी हैं। जैसे मणि और उसकी ज्योति। मणि की ज्योति कहने से ही मणि का बोध होता है, और मणि कहने से ही उसकी ज्योति का। बिना मणि को सोचे उसकी ज्योति की धारणा नहीं हो सकती, वैसे ही बिना मणि की ज्योति को सोचे मणि की भी। एक ही सच्चिदानन्द की शक्ति के भेद से उपाधि-भेद होता है इसलिए उनके विविध रूप होते हैं।
“‘तारा, वह तो तुम्हीं हो।’ जहाँ कहीं कार्य (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) है वहीं शक्ति है, परन्तु जल के हिलकोरे, बुलबुल आदि होने पर भी जल हैं। सच्चिदानन्द ही आद्यशक्ति है- जो सृष्टि, स्थिति प्रलय करती है। जैसे कप्तान कोई काम नहीं करते, तब भी वही हैं, और जब वे लाट साहब के पास चले हैं तब भी वही हैं। केवल उपाधि का भेद है।”
-स्वामी रामकृष्ण परमहंस
(श्री भगवान सहाय वाशिष्ट)
कर्म के सम्बन्ध में तरह-2 की मान्यताएँ चली आ रही हैं। कई दर्शन कर्म को बन्धन मानते हैं और कर्मक्षेत्र से मुक्त होना, निष्क्रिय होना ही मुक्ति का अर्थ लगाते हैं। कर्म क्षेत्र को मिटा करके उससे प्राप्त निश्चिन्तता को मुक्ति समझते हैं। और इसी लिए ब्रह्म को निष्क्रिय बताते हैं। साँसारिक क्रिया क्षेत्र को माया कह कर उसका त्याग कर देते हैं। कर्म-मात्र को बन्धन मानते हैं और निष्क्रिय होना ही मुक्ति का द्वार समझा जाता है।
भारतीयों ऋषियों ने ब्रह्म-कर्म-मुक्ति का सूक्ष्म रहस्य जान लिया था। जिसके अनुसार कहा है :-
“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्या भिसंविशन्ति, तद् विजिज्ञासस्व सद ब्रह्म।”
ब्रह्म की उस विराट सत्ता की अनुभूति करने वाले ऋषि ने जब संसार की समस्त क्रिया शीलता के सम्बन्ध में मनन चिन्तन किया और अपने सूक्ष्म नेत्रों से देखा तो उन्हें इस समस्त क्रिया शीलता का आधार ब्रह्म ही दिखाई दिया। उपनिषदों का कर्म के सम्बन्ध में यही अनुभव सिद्ध एवं सत्य सन्देश है।
सृष्टि और जीवन की गहराई में पैठने वाले ऋषियों ने ब्रह्म को निष्क्रिय नहीं कहा। “परास्य शक्ति विधैव श्रूयते”-ब्रह्म से ही क्रिया होती है। उनके स्वभाव के मूल्य में ही क्रिया हैं कर्म हैं। कर्महीनता, निष्क्रियता, अवास्तविक है, ईश्वरीय विधान के विश्व नियम के विरुद्ध है, फिर वहाँ मुक्ति की आशा भी निरी कल्पना मात्र ही है। कर्म पथ पर चल कर ही मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है। आध्यात्मिकता की पहली शर्त ही ‘कर्म’ है। जिससे हमारी निष्क्रियता और उदासीनता नष्ट हो जाती है और तब ही जीव की सीमित चेतना, विश्व चेतना में प्रवेश करती है। कर्म पथ पर अविश्रान्त चल कर ही कर्मरत ब्रह्म में प्रविष्ट हुआ जा सकता है उससे एकाकार प्राप्त किया जा सकता है। उदासीनता और निष्क्रियता का अर्थ है हमारी आध्यात्म यात्रा अवरुद्ध हो गई।
कर्म द्वारा मुक्ति कैसे प्राप्त हो? कर्म साधना कैसे की जाए जिससे कर्म बन्धन रूप न बनकर मुक्ति बन जाए। इसका समाधान करते हुए ऋषियों ने कहा हैं-
“आनन्दा दह्येव खलु इमानि भूतानि जायन्ते आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसं विशन्ति।”
‘परमात्मा आनन्द स्वरूप हैं, उस आनन्द से ही समस्त भूत उत्पन्न होते हैं। जीवन धारण करते हैं सचेष्ट एवं रूपांतरित होते रहते हैं।’
परमात्मा स्वयं आनन्द स्वरूप हैं। उसके कर्म कलाप में भी आनन्द ही मूल उद्देश्य हैं अर्थात् आनन्द के लिये ही वह कर्मरत हैं। वह आनन्द स्वरूप आनन्द के लिये ही जीवों का सृजन करता है, सचेष्ट एवं रूपांतरित करता है।
विश्व भुवन में व्याप्त विश्वात्मा की कर्मशीलता के मूल में आनन्द ही है। आनन्द के लिये वह यह सृष्टि व्यापार चला रहा है इसीलिये वह कर्मरत होता हुआ भी मुक्त है, निर्विकार है, आत्मस्वरूप है आनन्द स्वरूप है।
वस्तुतः कर्म के मूल में दो भाव छिपे होते हैं। कर्म दो प्रकार से होता है एक तो अपने अभाव की पूर्ति अथवा किसी प्रयोजन के हेतु, दूसरे आनन्द से भी कर्म किया जाता है। इन दोनों दृष्टिकोणों में ही मुक्ति और बन्धन का रहस्य छिपा हुआ है।
जो कर्म प्रयोजन अथवा अभाव पूर्ति के लिए किया जाता है किसी कामना को लेकर, किया जाता है वही कर्म हमारे बन्धन का कारण है। भले ही वह कैसा भी कर्म है। आनन्द के लिये जो कर्म किया जाता है वह बन्धन नहीं होता। वास्तव में वही कर्म मुक्ति का साधन है। क्योंकि ब्रह्म के कर्म व्यापार के मूल में आनन्द है। जब हम भी आनन्द के लिए कर्म करेंगे तो उससे आनन्द स्वरूप की अनुभूति की प्राप्ति हो सकेगी।
जब हम अपने परिजनों अथवा दूसरों का कार्य करते हैं जिसमें दासत्व भाव नहीं होता अथवा अपना स्वयं का काम करते हैं जिससे राग द्वेष आसक्ति एवं अभाव जन्य कामनाओं का सम्बन्ध न हो तो उस कर्म में आनन्द की प्राप्ति होती है और वह हमें नहीं बाँधता। वह हमारे लिये मुक्ति द्वार हैं। इस आनन्द कर्म में हर समय रहते हुए भी हम मुक्ति का अनुभव कर सकते हैं।
कर्म की मुक्ति ही आनंद में है और आनंद की मुक्ति ही कर्म में है। दोनों ही अपनी पृथक-पृथक सत्ता से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते, इसीलिये उपनिषदों में कहा गया है जो केवल संसार कर्म में रत हैं वे अन्धकार में पड़े हुए हैं और जो केवल ब्रह्म ज्ञान में रत हैं वे उनसे भी अधिक अंधकार में हैं जहाँ बन्धन हैं। ब्रह्म हीन कर्म अथवा आनंद से रहित कर्म अन्धकार है और कर्म हीन ब्रह्म उससे भी अधिक शून्य और अन्धकार युक्त है। जिस ब्रह्म से सृष्टि का क्रिया कलाप चल रहा है, यह सब कुछ हो रहा है उस परमात्मा को इस सबसे विवर्जित करके मानना और साथ साथ स्वयं भी कर्म का त्याग करना नास्तिकता ही तो है। आनंद का धर्म ही जब कर्म है तो कर्म द्वारा उस आनंद स्वरूप के साथ ऐक्य प्राप्त हो सकता है। भगवान कृष्ण ने गीता में इसे ही कर्मयोग के नाम से अर्जुन को उपदेश दिया है।
जैसा कि ऊपर व्यक्त किया जा चुका है प्रयोजन से, अभाव पूर्ति के लिए, काम से यदि कर्म किया जाएगा, तो वही बन्धन का कारण बन जाएगा, जब कर्म अपने मूल साथी आनंद से बिछुड़ जाएगा तब वह आनंद से गिर जाएगा, जड़ बन जाएगा और बन्धन रूप सिद्ध होगा। जहाँ बन्धन हैं वहाँ मुक्ति नहीं। बंधन से ही गति अवरुद्ध हो जाती, जीवात्मा और विश्वात्मा के मिलन के मार्ग में दीवार खड़ी हो जाती है जो उसे आबद्ध कर उसकी गति को कुण्ठित कर देती है। और स्वार्थ, कामना पूर्ति का मेल ही कर्म को बंधन का कारण बना देता है। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के शब्दों में “कर्म जब हमें स्वार्थ की संकीर्णता में केवल लपेटकर रखता है तो भयंकर बंधन हो जाता है। तब हमारी शक्ति उस पराशक्ति के विरुद्ध चलती है। उस समय हम भूमा स्थिति की ओर उस विश्वात्मा की ओर अग्रसर नहीं होते। अपनी क्षुद्रता में आबद्ध हो जाते हैं। हमें वह विपरीत दिशा में ले जाती है।”
कर्म को स्वार्थ कामनाओं प्रयोजनों से मुक्त करके आनंद, परमार्थ की ओर ले जाना होगा। आनंद के लिए कर्म करना होगा। कर्म, कर्म के लिये करना होगा। हम छोटा या बड़ा जो कुछ भी कर्म करें उसका सम्बन्ध आनंद स्वरूप द्वारा संचालित विश्व क्रिया के साथ जोड़ देना होगा जिसका उद्देश्य ही आनंद है। और जब कर्म तथा आनंद का सम्मिलन होगा तभी मुक्ति भी सम्भव है।
एक पतिव्रता नारी के कर्म का मूल्य जब अपने स्वामी के प्रति प्रेम एवं उसकी सेवा होती है, जब वह स्वामी के आनंद को ही अपना आनंद समझकर वैसा ही बर्तती है, उसके समस्त क्रिया कलापों का उद्देश्य अपने स्वामी के लिए होता तब वह स्वयं आनंद का अनुभव करती है। यह कर्मयोग का ज्वलन्त उदाहरण है। किन्तु यदि इन्हीं कर्मों को वही स्त्री एकाकी स्वार्थ हित, अपने प्रयोजनार्थ, अपनी कामना के लिए करे तो परिणाम दुःख साध्य होगा।
महापुरुष का जीवन कर्तव्य परायण होता है, वे निरंतर भारी श्रम करते हुए भी आनंद शान्ति सुख का अनुभव करते हैं, जब केवल 6 घण्टे आफिस में साधारण श्रम करने वाले बाबू लोग थके माँदे हारे हुये एवं क्लान्त दिखाई देते हैं। इसमें कर्मयोग का ही रहस्य है, महापुरुष आनन्द के लिए कर्म करते हैं, अपने कर्मों की आहुतियाँ देकर निरंतर उस आनंद स्वरूप की पूजा करते रहते हैं और दफ्तर का एक बाबू ऑफिसर या अन्य कोई भी जो केवल प्रयोजन से कामना से कर्म को करता है, उसे कर्म बंधन बन जाता है जहाँ परेशानी क्लान्ति दुख पीड़ा ही है।
कर्म का उद्देश्य आनंद हो। हम जो कुछ कर्म करें, उसका स्वयं के लिए निवेदन न करके क्षण क्षण पद पद पर विश्वात्मा को समर्पित करते रहें। उस आनंदस्वरूप के लिये ही कर्म करें। भगवान ने गीता में उपदेश दिया हैं “यद् यत् कम प्रकुर्वीत तद् ब्रह्माँणि समर्पयात्” जो जो कर्म करें वह ब्रह्म को अर्पण करें। हमारे समस्त कर्मों का विसर्जन एकमात्र ब्रह्म में हो, अपनी आसक्ति कामना प्रयोजन से कर्म सर्वथा मुक्त हो, फलाशा का पूर्णतः त्याग हो, कर्म को विशुद्ध आनंद स्वरूप बनावें और तभी हम मृत्यु तीर्त्वा अमृत लाभ कर सकेंगे, उस आनंदस्वरूप के साथ ऐक्य हो सकेंगे। कर्मरत रहकर ही हमारे लिये मुक्ति प्राप्त कर सकना संभव हो सकता है।
(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए., पी. एच. डी.)
प्रत्येक मनुष्य में ईश्वरीय तत्त्व विद्यमान है, जो उसे धर्म और अधर्म, भले और बुरे, उचित और अनुचित का विवेक कराता है और निरन्तर सत्य मार्ग पर चलते रहने की प्रेरणा देता है। इस नीर-क्षीर विवेक शक्ति को हम धर्म-बुद्धि कह सकते हैं। ईश्वरीय दैवी विधान का स्वरूप कुछ ऐसा है कि सत्य, नीति और धर्म के मार्ग पर चलते रहने से हमें मानसिक और आत्मिक शान्ति मिलती है। इसके विपरीत असत्य, झूठ, पाप, अनीति, मिथ्याचार के रास्ते का अनुसरण करने से मानसिक क्लेश उत्पन्न होता हैं। नाना प्रकार की चिन्ताएँ व्यर्थ ही सताती रहती हैं।
धर्मबुद्धि प्रत्येक व्यक्ति में जन्म से ही होती है, पर कुछ व्यक्ति अपनी परिस्थितियाँ ऐसी बना लेते हैं कि वे उसके संकेत को नहीं सुनते। पर्याप्त समय तक समस्या पर सोच विचार नहीं करते। धार्मिक दृष्टि से निर्णय नहीं करते। फल यह होता हैं कि धीरे-2 धर्म बुद्धि का क्षय हो जाता है। निर्णयों में धर्म के प्रतिकूल आचरण करना पड़ जाता है। धर्म बुद्धि को दबा कर प्रतिकूल निर्णय और आचरण से मनुष्य को हानि या प्रतिशोध का गुप्त डर बना रहता है। मनुष्य चिन्ता में घुलता जाता है। शूल की तरह धर्म बुद्धि के प्रतिकूल आचरण मनुष्य में भय चिंता, बुरे स्वप्न, हृदय की धड़कन, सिर दर्द और अशाँति पैदा करता है।
एक बार महाराज हरिश्चंद्र कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य का निर्णय न कर सकने के कारण चिंता में फँस गये। क्या उचित है, क्या अनुचित है, यह न सोच सकने के कारण वे मानसिक क्लेश से पीड़ित थे। उनका मन अशान्ति से भरा हुआ था। मोह का पर्दा उन पर बुरी तरह छाया हुआ था। महारानी शैव्या ने इन शब्दों द्वारा उनके मानसिक क्लेश का निराकरण किया और धर्म बुद्धि को जाग्रत किया-
त्यज चिन्ता महाराज स्वमत्य मनुपालय।
श्मशानवद वर्जनीयों नरः सत्य बहिष्कृतः॥
नातः परतरं धर्म वदन्ति पुरु षस्य तु।
यादृशं पुरुषव्याघ्र स्वसत्यपरिपालनम्॥
अग्निहोत्रमधीतं वा दानाद्याश्चाखिलाः क्रियाः।
भजते तस्य वैफल्यं यस्य वाक्यमकारणम्॥
सत्य मत्यन्त मुदितं धर्मशास्त्रेषु धीमताम्।
ताराणायनृतं तद्वत् पातनायाकृतात्मनाम्॥
मार्क. 8।17-20
महारानी शैव्या ने अपने पति महाराज हरिश्चन्द्र से कहा-
“महाराज। चिन्ता छोड़िये। अपने सत्य की रक्षा कीजिए। जो मनुष्य सत्य से विचलित होता है, वह श्मशान की भाँति त्याग देने योग्य है।
हे नरश्रेष्ठ। पुरुष के लिए अपने सत्य की रक्षा से बढ़ कर कोई धर्म नहीं बतलाया गया है।
जिसका वचन निरर्थक हो जाता है (जो धर्म-बुद्धि के अनुसार कर्तव्य निश्चित नहीं करता), उसके अग्निहोत्र, स्वाध्याय तथा दान आदि सम्पूर्ण निष्फल हो जाते हैं।
धर्मशास्त्रों में बुद्धिमान पुरुषों ने (धर्म बुद्धि द्वारा पोषित) सत्य को संसार सागर से तरने के लिए सर्वोत्तम साधन बताया है। इसी प्रकार जो धर्म बुद्धि की अवहेलना करता है, जिसका मन वश में नहीं है, ऐसे पुरुषों को पतन के गर्त में गिराने के लिए असत्य को ही प्रधान कारण बतलाया गया है। धर्मबुद्धि के अनुसार कार्य करना ही जीवन का सबसे बड़ा लाभ है।”
आसक्ति रहित धर्मबुद्धि द्वारा ही आचरण करना चाहिए। धर्म के पालन से, प्रतिदिन के कार्यों में धर्म प्रयोग करने से मनुष्य के अन्तःकरण की शुद्धि होती है। सब प्रकार के क्लेश दूर होते हैं। धर्म केवल पुस्तकों में पढ़ने मात्र की ही वस्तु नहीं है, प्रत्युत नित्यप्रति के जीवन में उतारने की वस्तु है धर्म बुद्धि के अनुकूल आचरण करने से मनुष्य दैनिक व्यवहार में ऐसी कोई गल्ती नहीं करता, जिसके लिए बाद में प्रायश्चित करना पड़े।
मनुष्य के मन की अनेक वृत्तियाँ हैं-स्वार्थवृत्ति, भोगवृत्ति, दम्भवृत्ति और धर्मवृत्ति। जब कोई समस्या सामने आती है, तो इन नाना वृत्तियों में संघर्ष चलने लगता है। जब जिस वृत्ति की प्रधानता या प्रभुत्व होता है, तब वैसा ही निर्णय हो जाता है लेकिन मन के शान्त संतुलित अवस्था में आते ही पाशविक वृत्तियों के निर्णय की असत्यता प्रकट हो जाती है। तब धर्मबुद्धि अपना दिव्य प्रकाश दिखलाती है। उसमें हमें भोगवृत्तियों की निस्सारता प्रकट हो जाती है। पश्चाताप होता है और धर्मबुद्धि इस कुकृत्य की सजा देती है। मनुष्य को स्वयं अपने आप ही ग्लानि हो जाती है। आत्म-भर्त्सना के फलस्वरूप अनेक व्यक्ति आत्म हत्याएँ तक कर लेते हैं।
धर्मबुद्धि के पालने से चरित्र में सद्गुणों का विकास होता है। धर्मबुद्धि का सुख अमल में है, केवल ज्ञान में नहीं। धर्म को दैनिक जीवन का आधार बना लेने से ही जीवन सुखद और फलदायी हो सकता है। धर्मबुद्धि के विकास से चित्त की शुद्धि, विचारों की पवित्रता और आचरण की स्वच्छता आती है।
जब आप पूरी तरह शान्त रहते हैं, मन संतुलित रहता है, किसी प्रकार का बाहरी दबाव आप पर नहीं होता, तो आपके मन-मन्दिर में भगवान् उदित होते हैं, और आपको नेक सलाह देते हैं। इसी पर निरन्तर अग्रसर होते रहिए। ईश्वरीय प्रेरणा पर भरोसा रखने वाला कठिन अवसरों पर भी नेक सलाह पाता है। भविष्य उसके लिये अन्धकार की वस्तु न रह कर दिन जैसा स्पष्ट रहता है।
ईश्वर संसार का शासन करता है। हमें बुद्धिमत्ता से अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए, और इस प्रश्न को उसी के सुपुर्द छोड़ देना चाहिए।
-जान जे
(श्री भारतीय योगी)
संसार के ऊपर नाश और विपत्तियों की जो काली घटायें छाई हुई हैं और जिनकी चर्चा हम प्रायः राजनीतिज्ञों और भविष्यवक्ताओं के मुख से सुनते रहते हैं, वे इस समय और भी भयंकर रूप धारण कर रही हैं। आशावादी लोग कुछ समय की ऊपरी शान्ति और मेल-मिलाप की बातों को देख कर संसार-संकट के टल जाने की आशा करने लगते हैं, पर शीघ्र ही कोई नई घटना ऐसी हो जाती है कि सर्वनाशी संग्राम का भय बिल्कुल निकट ही जान पड़ने लगता है। पिछले दिनों बड़े राष्ट्रों के कर्णधारों के आवागमन तथा शिखर-सम्मेलन की चर्चा से लोगों में शाँति-स्थापित हो जाने का विचार उत्पन्न होने लगा था, पर एक अमरीका हवाई जहाज द्वारा रूस के ऊपर जासूसी करने से वह समस्त आशा-निराशा में परिणत हो गई और जिस शिखर-सम्मेलन की इमारत को कई महीनों के परिश्रम से खड़ा किया था, वह तीन घंटे के भीतर ही चकनाचूर हो गई। उसके बाद तुरन्त ही दोनों देशों में सैनिक तैयारियाँ बढ़ा दी गईं और एक दूसरे को धमकियाँ दी जाने लगीं। ऐसी दशा में शाँति की आशा करना मन मोदकों के समान ही है। न जाने किस दिन एक साधारण सी घटना के कारण तनातनी पैदा हो जाए और विश्व के प्रमुख राजनैतिक नेताओं की स्पर्धा और अहंकार के कारण युद्ध का शंख-नाद सुनाई पड़ने लगे।
अभी तक इस भावी संकट के सम्बन्ध में जो कुछ विचार किया गया है उससे भविष्यवक्ता इसी निर्णय पर पहुँचे हैं कि इस सम्बन्ध में सबसे कठिन स्थिति सन 1962 के फरवरी मास के प्रथम सप्ताह में उत्पन्न होगी। उस समय लगभग आठ ग्रह एक ही राशि में एकत्रित हो रहे हैं और इसके परिणाम स्वरूप संसार में प्राकृतिक और राजनैतिक हलचल के अत्यन्त बढ़ जाने की पूर्ण आशंका है। ज्योतिषियों के मतानुसार उस समय मंगल, शनि, शुक्र, सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति यह बात ग्रह एक साथ मकर राशि में आ जायेंगे। केतु इनके पास ही रहेगा और परिस्थिति को गंभीर बनाने के लिए पर्याप्त प्रभाव डालेगा। इन ग्रहों के प्रभाव से आकाश से आने वाली विश्व तरंगों (कॉस्मिक रेज) और आकर्षण तरंगों में ऐसा परिवर्तन होने की संभावना है जिससे पृथ्वी का वातावरण एक साथ क्षुब्ध हो जाए, मनुष्यों के दिमाग भी अशान्त हो उठें। जैसे गर्मी और सर्दी की लहरों से मनुष्य शीघ्र ही व्याकुल हो उठते हैं और उनके नित्य कर्मों में बड़ा अन्तर पड़ जाता है, उसी प्रकार विश्व-तरंगों के प्रभाव से मनुष्य की बुद्धि और दिमाग पर विचित्र प्रकार का प्रभाव पड़ता है और वे ऐसे कार्य करने को तत्पर हो जाते हैं जिनकी साधारण समय में कोई सम्भावना नहीं होती। यह आठ ग्रहों का संयोग भी ऐसा ही अवसर बतलाया जाता है और उस समय के लिए जो संभावनायें प्रकट की जा रही हैं वे काफी भयजनक और नाश की सूचक हैं।
इन भावी घटनाओं के सम्बन्ध में अनेक ज्योतिषियों और राजनीतिज्ञों की सम्मतियाँ हम समय-समय पर पाठकों के लाभार्थ उपस्थित कर चुके हैं। अभी हाल में मद्रास के एक बहुत बड़े विद्वान ज्योतिष प्रेमी ने ग्रह-गणना के फल की जाँच करने के लिए कुम्भकोणम के एक पंडित से प्रश्न किया था, जिनके पास “भृगुसंहिता” के समान भविष्य बतलाने वाला एक अप्राप्य ग्रन्थ है। इस ग्रंथ का नाम “आत्म-नूल” (सूत्र, धागा एवं व्याख्या) है और इसमें व्यक्तियों तथा देशों की भावी घटनाओं पर विस्तार किया गया है। इस ग्रन्थ के द्वारा वर्तमान समय की घटनाओं और आठ ग्रहों के योग का जो फल दिया गया है, उसका साराँश इस प्रकार है-
जब यह सात या आठ ग्रहों का योग पड़ेगा तो लगभग दो या सवा दो दिन तक आकाश स्थित ग्रहों में भयंकर संघर्ष होता रहेगा।
दुनिया के शासकों, विभिन्न देशों के प्रमुख नेताओं, मनुष्य जाति के संचालकों के मस्तिष्क में भारी उथल-पुथल मच जाएगी, जिसके कारण वे ऐसे कार्य करने लगेंगे कि उनके परिणाम स्वरूप उन देशों के निवासियों को अनेक प्रकार के कष्ट सहन करने होंगे।
सामाजिक और साम्प्रदायिक उपद्रवों के कारण लोगों को बड़ा कष्ट उठाना पड़ेगा। विरोधी तत्व विशेष रूप से सक्रिय हो जायेंगे। व्यक्तियों और सम्पत्ति के विरुद्ध हिंसात्मक अपराधों में बहुत वृद्धि हो जाएगी। प्रायः सभी देशों की सरकारें काल्पनिक योजनाओं और दिखावटी उद्योगों की पूर्ति के लिए जनता पर असहनीय टैक्सों का बोझा लाद देगी। संसार के सभी भागों के लोगों की साधारण आय किसी न किसी प्रकार के ऐसे टैक्सों द्वारा हड़प कर ली जाएगी। कहने के लिए ये सब काम सर्व साधारण के हितार्थ होंगे, पर वास्तव में उनके कारण लोगों की तकलीफ और परेशानी बढ़ जाएगी।
प्रकृति और पंचभूतों में हलचल उत्पन्न होने से बड़ी-बड़ी दुर्घटनायें होंगी। महासमुद्र भीषण रूप धारण कर लेंगे। समुद्र का जल पृथ्वी पर चढ़ आयेगा। संसार के अनेक भागों में पर्वताकार लहरें उठकर आस पास की जमीन को डुबा देंगी जिससे लोगों को अकथीय कष्ट उठाने पड़ेंगे।
खौफनाक तूफान और जोरदार वर्षा के कारण अनेक स्थानों में प्रलयकाल का सा दृश्य उपस्थित हो जाएगा। उसी समय अन्य अनेक स्थानों में अवर्षण के फलस्वरूप त्राहि-त्राहि मची होगी और सूर्य की तीक्ष्ण किरणें जमीन और प्राणियों को भून डालेंगी।
सन् 1962 के अन्त तक एक बहुत शक्तिशाली आकर्षण शक्ति सम्पन्न व्यक्ति का आविर्भाव होगा जो कि भगवान के अवतार के समान जान पड़ेगा। यह व्यक्ति दैवी तेज सम्पन्न होगा। जिसके प्रकाश से चारों ओर एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक आभा प्रसारित हो जाएगी। (आश्चर्य से स्तम्भित होकर लोग यही कहेंगे कि पिछले दो हजार वर्षों में ऐसी घटना संसार में कभी देखने में नहीं आई। इस भविष्यवाणी से कुछ लोग ऐसा अनुभव करते हैं कि नेताजी सुभाष बोस उस समय जन-साधारण में प्रकट हो जायेंगे, पर हम इस बात पर विश्वास नहीं करते। तो भी लोगों की जानकारी के लिए हमने “नूल” की भविष्यवाणी का साराँश ज्यों का त्यों प्रकट कर दिया है, जिससे यथा समय उसकी परीक्षा की जा सके।)
विभिन्न भागों में सामाजिक कलह और अशाँति की वृद्धि होगी। जातियों और सम्प्रदायों के लड़ाई झगड़े और संघर्ष बहुत बढ़ जायेंगे। जाति भेद की प्रथा चूर-चूर हो जाएगी। सत्य का सूर्य बादलों में छुप जाएगा और परोपकार की भावना प्रायः लुप्त हो जाएगी। इसके परिणाम स्वरूप जो अव्यवस्था और गड़बड़ी फैलेगी, उससे स्त्रियों, मन्दिरों और ईश्वरोपासना के स्थानों के विरुद्ध अपराधों में विशेष रूप से वृद्धि होगी।
पर एक विचित्र बात यह होगी कि ऐसे विपरीत काल में अनेक दिखावटी धर्माचार्य और धर्म-प्रचारक पैदा हो जायेंगे जो प्रकट में जप, तप और भगवान की उपासना का डंका पीटेंगे, पर जिनका उद्देश्य निजी स्वार्थ-साधन ही होगा। सच्चे धर्म का लोप होगा और मिथ्या तथा बनावटी धर्म प्रचलित किये जायेंगे।
इस योग में जो ग्रह आयेंगे वे भी अनिश्चित साथियों के नजदीक में रहने के कारण अपने को अप्रसन्न और कष्ट में अनुभव करेंगे। परिणाम स्वरूप सूर्य का तेज भी पूर्वापेक्षा घट जाएगा। (ग्रहों के इस युद्ध का वर्णन विख्यात ज्योतिषी वराह मिहिर ने भी किया है, पर उसमें सूर्य के तेज हीन होने की बात नहीं लिखी है।)
इस अवसर पर राहु, श्लेषा नक्षत्र में से योग के घर को देखता रहेगा और बहुत हानिकारक सिद्ध होगा। राहु और मंगल दोनों ही सबसे अधिक शक्तिशाली बुराई और नुकसान करने वाले ग्रह माने गये हैं।
यद्यपि मंगल हानिकारक माना गया है, पर दक्षिण दिशा के प्रदेशों को वह लाभकारी सिद्ध होगा क्योंकि वही उन प्रदेशों का स्वामी है। दक्षिण विभाग में और उत्तरी विभाग के भी दक्षिणी प्रदेशों में मंगल रक्षा-कार्य करेगा। (यह स्पष्ट बतलाना कठिन है कि दक्षिणी भाग कहाँ से माने जायें। प्राचीन ग्रंथों में विंध्याचल के नीचे दक्षिण माना गया है। कहीं पर हिमालय से दक्षिणी भाग माना गया है। और कहीं पर मेरु पर्वत से दिशाओं का हिसाब बतलाया गया है। पर मेरु पर्वत कौन सा है यह निश्चित पूर्वक नहीं कहा जा सकता।
मुख्य-मुख्य पहाड़ों पर भी प्रभाव पड़ेगा और ज्वालामुखियों के भड़कने की भी सम्भावना है। जिन देशों में बहुत ऊँचे गगनचुम्बी मकान बनाये गये हैं-(जैसे अमरीका के चालीस और साठ मंजिलों के मकान मशहूर हैं) उन पर विशेष खराब असर पड़ेगा। बहुत विशाल और ऊँची इमारतों को आँधी तूफान, भीषण वर्षा और ओलों से हानि पहुँचेगी। इस समय वर्षा ऐसे अधिक वेग से होगी कि जिससे यही जान पड़ेगा कि इन्द्र ने समस्त बादलों को इसी अवसर के लिए एकत्रित कर लिया है।
नवम्बर 1962 के लगभग सप्त ऋषि के क्षेत्र से एक धूमकेतु (पुच्छल तारा) उदय होगा और पृथ्वी की तरफ आयेगा। यह एक अशुभ चिन्ह होगा। सन् 1960 से भी पृथ्वी के अनेक स्थानों में ऐसी घटनायें होंगी जिनसे सन् 1962 की अति भयंकर घटनाओं का कुछ दिग्दर्शन हो सकेगा।
ग्रहों के योग का प्रभाव संसार के अन्य देशों पर भारतवर्ष की अपेक्षा अधिक पड़ेगा, भारत की “कर्म-भूमि” अपेक्षाकृत सुरक्षित रहेगी। यहाँ भी गंगा और ब्रह्म पुत्र के क्षेत्र में अन्य भागों की अपेक्षा अधिक हानि होगी।
संसार के विभिन्न देशों में जो व्यक्ति सामाजिक, राजनैतिक, अन्य क्षेत्रों के प्रमुख नेता समझे जाते हैं वे बड़े खतरे की स्थिति में पड़ जायेंगे। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी मृत्यु अथवा नाश अवश्यम्भावी है। पर इस अवसर पर राजनैतिक हलचलें और उलट फेर बहुत जोर के होंगे। जिसके फल से कितने ही प्रसिद्ध नेता शक्ति हीन हो जायेंगे और नये नेताओं का उदय होगा। किसी भी प्रकार का सामाजिक तथा राजनीतिक गम्भीर उलटफेर इस अवसर पर होना अवश्यम्भावी है। इसके सिवा इस समय किसी-किसी स्थान पर समुद्र का सूख जाना और धरातल का फटना और जंगलों तथा पशुओं के लिए संकट उपस्थित होना भी बतलाया गया है।
यह ग्रह-योग सात या आठ ग्रहों का बतलाया गया है। कुछ लोग केतु को इससे अलग बतलाते हैं और कुछ उसे सम्मिलित करते हैं। “नूल” उसे सम्मिलित करने के पक्ष में है। जिन स्थानों में पहाड़ हैं उन पर खराब असर पड़ेगा। इसके लिए “नूल” में “मलेटा इडम” का शब्द आया है। इसका अर्थ पर्वत का निम्न भाग, पर्वत क्षेत्र, पर्वत की उपत्यिका और उनके पास के मैदान सभी से हैं। पर “नूल” के पढ़ने वाले पंडित ने बतलाया कि इस शब्द के दो भाग करके इसका अर्थ सभ्यता के केन्द्र बहुत बड़े-बड़े शहरों और राजधानियों से भी हो सकता है और इस अवसर पर उन पर कुप्रभाव पड़ना सम्भव है।
केतु और राहु का सम्बन्ध ऐसा है कि जहाँ इनमें से किसी एक का शक्तिशाली योग होगा, वहाँ दूसरे का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ेगा। इस दृष्टि से इस योग में समस्त नौ ग्रहों को सम्मिलित मानना चाहिए। वास्तव में इस योग के अवसर पर राहु की स्थिति वैसी ही प्रभावशाली हैं जैसी कि अन्य ग्रहों की। इसलिये “नूल” में इसका नाम ‘नव-सम्मेलनम’ दिया गया है। इसका शब्दार्थ तो नौ ग्रहों का सम्मेलन है, पर “नव” का अर्थ नवीन या नया भी होता है। इस प्रकार यह अवसर एक नई दुनिया की सृष्टि होने का है जबकि एक नवीन सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का उदय होगा और मानवीय सम्बन्धों के मूल्यों में वर्तमान समय की अपेक्षा बड़ा अन्तर पड़ जाएगा। इस दृष्टि से यह पुनर्जीवन या पुनर्निर्माण का समय होगा और जब नई शक्तियाँ पुरानी शक्तियों को हटाकर उनका स्थान ग्रहण करने लगेंगी तो उन दोनों में तनातनी, कलह और संघर्ष होना अनिवार्य है।
इस अवसर पर केवल एक ही योग नहीं है, वरन् “नूल” के मतानुसार इस समय नौ प्रकार के योग हैं-सप्त योग, अष्ट योग, गोल योग, अगोल योग, तिथि योग, अतिथि योग, कर्मयोग, अकर्म योग, कर्तरी योग। पर “नूल” के पंडित इन सबका स्पष्ट अर्थ नहीं बतला सके। जहाँ तक अनुमान किया जाता है “गोल योग“ का सम्बन्ध केवल व्यक्तिगत जन्म कुण्डलियों से होगा। सार्वदेशिक फल से सम्बन्ध रखने वाले योग का नाम “वृहत संहिता” में श्रृंगारक योग लिखा है, पर “नूल” में उसे “अगोल योग“ कहा गया है। नामों के इस अन्तर का क्या कारण है यह समझ में नहीं आया।
मंगल पृथ्वी का पुत्र है। आकाशीय पिंडों में से मंगल ही पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों के शुभाशुभ कार्यों से विशेष प्रभावित होता है। वर्तमान समय की भाँति जब पाप कर्मों की वृद्धि हो जाती है तो उनका कुपरिणाम मंगल तक पहुँचता है और इससे वह क्रोधित और नाराज होता है। समय-समय पर वह मनुष्य जाति को इन कर्मों का दण्ड देता रहता है। मंगल पर्याप्त शक्तिशाली ग्रह है और वह मनुष्यों को बुरे कामों के विरुद्ध चेतावनी देने के लिए भाँति-भाँति की दुर्घटनाओं और आपत्तियों के रूप में दण्ड देता रहता है। पृथ्वी माता यह देखकर दुःखी होती है कि उसका पुत्र ही धरातल पर ऐसी-ऐसी विपत्तियों को भेजता है। इससे पृथ्वी का कलेजा फटने लगता है और परिणाम स्वरूप जगह-जगह भूकम्प, पृथ्वी में दरारें पड़ जाना, पहाड़ों का खिसकना आदि घटनायें देखने में आती हैं।
ऐसा जान पड़ता है, किसी दैवी योजना के अनुसार पृथ्वी निवासियों के पाप कर्म मंगल में पहुँचते हैं, मंगल उनसे नाराज और व्यथित होकर पाप कर्म करने वालों को पाप की सजा देता है। भयंकर तूफान, अग्निकाण्ड, प्रलयंकारी वर्षा और बाढ़, लड़ाई-झगड़े, मारकाट और महायुद्ध भी मंगल के कुपित होने से उत्पन्न होते हैं।
इस प्रकार “नूल” में निकट भविष्य में होने वाली घटनाओं की भयंकरता पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। पर साथ ही उसमें स्पष्ट शब्दों में यह कह दिया गया है कि ईश्वरीय योजना का पूरा रहस्य मनुष्य को कभी ज्ञात नहीं हो सकता। जिन ऋषियों ने “नूल” की रचना की है उन्होंने अपने ऊपर किसी प्रकार का उत्तरदायित्व नहीं लिया है और सर्वत्र यही लिखा है कि ईश्वरेच्छा से ऐसा होना सम्भव जान पड़ता है। इस अवसर के लिए “नूल” में भयंकर घटनाओं का होना अवश्य लिखा है पर उससे ऐसा नहीं जान पड़ता कि तीसरा महायुद्ध ऐसे सर्वनाशी रूप में होगा कि जिससे दुनिया का अस्तित्व ही नष्ट हो जाएगा। आठ ग्रहों के योग से संसार में कई प्रकार की प्राकृतिक और राजनैतिक विपत्तियों का आना सम्भव है और मनुष्य जाति के लिये भयंकर दण्ड सहन करना पड़े, इसके भी चिन्ह दिखलाई देते हैं, पर अन्तिम परिणाम स्वरूप संसार का कल्याण भी हो सकता है। सैकड़ों वर्षों से भिन्न-भिन्न देशों में जो लड़ाई-झगड़े चल रहे हैं और जिनके फलस्वरूप प्रति बीस-पच्चीस वर्ष बाद संसार में घोर हलचल मच जाती है, इनका अन्त होकर एक ऐसी दीर्घकाल व्यापी शान्ति का आविर्भाव हो सकता है, जिसमें मनुष्य को आध्यात्मिक विकास का अवसर प्राप्त हो और वह पशुत्व तथा दानवता की प्रवृत्तियों को त्याग कर देवत्व के गुणों को ग्रहण करने लगे। पर इन स्वर्गीय प्रदेशों में पहुँचने के पूर्व मनुष्य को अपने वर्तमान पापों का प्रायश्चित करना ही पड़ेगा। इस अवसर पर विभिन्न देशों की क्या परिस्थिति होगी और एकत्रित होने वाले आठ ग्रहों के योग का प्रभाव भिन्न भिन्न देशों पर कैसा पड़ेगा इसकी विवेचना आगामी लेख में की जाएगी।
(श्री आत्मदर्शी)
आधुनिक मनोविज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि जो-जो शब्द जानकर या अनजान में अपने ही मुख से उच्चारण करते हैं, वे हमारे जीवन, हमारी आदतों और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। मनुष्य अनजान में कुछ न कुछ बोलता रहता है। किन्हीं शब्दों का प्रयोग कर बैठता है। कुछ ही कह देता है, पर हम यह नहीं समझते कि हमारे इन शब्दों में जीवन को बनाने या बिगाड़ने की शक्ति छिपी हुई है। शब्दों के दो रूप हो सकते हैं, शुभ और सात्विक शब्द जैसे “महाशय, देवियों”, महाराज, बन्धुवर, महात्मा, प्रियवर, राम, कृष्ण, हरि, ओम इत्यादि। दूसरी ओर अशुभ और कुत्सित शब्द जैसे दुष्ट, राक्षस, पापात्मा, बदमाश, शरारती तथा असंख्य गालियाँ। हम नहीं जानते कि दैनिक जीवन में किस वर्ग के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं तथा उनका क्या प्रभाव होगा?
स्मरण रखिए आपके मुख से निकलने वाला हर एक शब्द, प्रत्येक स्वर, (चाहे उसका कुछ भी अर्थ हो) हमारे समग्र शरीर को चलायमान कर देता हैं। हमारी सूक्ष्म नाड़ियाँ झंकृत हो उठती हैं। हमारे मुखमण्डल के अवयव विशेष रूप से तनते या ढीले पड़ते रहते हैं। हमारे ओष्ठ हिलते हैं, पर साथ ही हमारे नेत्र, हमारे कपोल, हमारा मुखमण्डल एक विशेष तरह से देदीप्यमान हो उठता है।
प्रत्येक शब्द के साथ भावों और नाना अर्थों का एक विपुल संसार जुड़ा हुआ है। जब हम अपना प्रिय शब्द बोलते हैं, तो गुप्त रूप से उससे संयुक्त समस्त भाव, विचार, कथाएँ और प्रभाव हमारे शरीर में एक बार ही घूम जाते हैं। उनसे हमें गुप्त आत्मिक बल मिलता है। जब महात्मा गान्धी जी के गोली लगी तो उनके मुख से “हे राम।” शब्द निकले और वे इन शब्दों के साथ धड़ाम से पृथ्वी पर ढेर हो गये। इन शब्दों के उच्चारण में गाँधी जी ने गुप्त आत्मिक शक्ति के अनुभव किया था। हिन्दू सेनाएँ “महावीर हनुमान की जय” बोलकर अनेक युद्धों में विजय प्राप्त करती रही हैं। अनेक व्यक्ति “शिव” का प्रयोग करते हैं। कुछ “हरिकृष्ण” शब्द बोलते हैं, कुछ “राधाकृष्ण” कहते हैं। हिन्दू देवी-देवताओं के नाम बोल-बोलकर भारतीय जनता प्राचीन काल से शक्ति संग्रह करती चली आई है। “सत्यनारायण देगा, गुरु रक्षा करेगा, सत्य श्री-काल, प्रभु देगा” आदि-2 अनेक शब्द हम दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं। प्रत्येक शब्द के साथ संयुक्त विचार गुप्त मन में भर जाते हैं।
इन सात्विक शब्दों के उच्चारण से, एक शक्तिशाली पवित्र विचारधारा और शुद्ध सात्विक भाव हमारे मानसिक जगत में फैल जाते हैं। पूरा मानसिक वातावरण उसी स्वर और विचार से आच्छादित हो उठता है। शरीर का अणु-अणु उसी शब्द से काँप उठता है, उसी के अनुसार नए सिरे से ढलने लगता है।
आप कोई शब्द पूरे विश्वास से उच्चारण कीजिए और साथ ही दर्पण में अपने मुख की आकृति भी देखिए। उस शब्द के उच्चारण से आपके मुख पर क्या क्या परिवर्तन दिखाई देते हैं?
आप पायेंगे कि उस शब्द के भाव या अर्थ के अनुसार ही आपकी आकृति भी बनती बिगड़ती जा रही हैं। जैसे ही क्रोध, आवेश, गाली गलौज या कुत्सित उत्तेजना का कोई शब्द आपके मुख से निकलता है, वैसे ही आपका मधुर चेहरा तन जाता है, ओंठ काँपने लगते हैं, सम्पूर्ण शरीर में अजीब थरथराहट सी उत्पन्न हो जाती है, नेत्र लाल होकर चढ़ जाते हैं। इन बाहरी परिवर्तनों के अलावा शरीर के अन्दर समग्र मानसिक जगत में अजीब कोलाहल, कसक और तेजी पैदा हो जाती है। जितनी देर तक क्रोध के ये कटु शब्द मुख से निकलते रहेंगे, उतनी देर तक आन्तरिक मानसिक संस्थान में भी सर्वत्र भयंकरता छाई रहेगी। वैसी ही कटु और अस्थिर अन्तर स्थिति बनती जाएगी। आपका हृदय क्रोधाग्नि में फुँकने लगेगा। दिल की धड़कन बढ़ जायेगी। शरीर में गर्मी, खुश्की और वायु का प्रकोप प्रतीत होगा। देर तक क्रोध के शब्दों का उच्चारण करने से सिर में भारीपन आ जाएगा और कमर में दर्द रहने लगेगा।
बुरे शब्दों के उच्चारण से मानसिक बीमारियाँ
स्वर विज्ञान बतलाता है कि बुरे, कटु, अशुभ और वासना-मूलक गन्दे शब्दों की जड़ें मनुष्य के गुप्त मन में बैठ जाती हैं। जो व्यक्ति गाली देते हैं, उनकी अश्लीलता उनके गुप्त मन में मौजूद रहती है। दीर्घकाल से मन में जमी हुई वासना का मैल ही इन कुशब्दों और गालियों से बार बार निकला करता है।
प्रत्येक शब्द एक प्रकार का विचार बीज है। जो शब्द मन में एक बार जम जाता है, वही धीरे-धीरे अपने गुण रूपी अंकुरों को चारों ओर फैलाया करता है। ये जड़ें पुनः पुनः वही शब्द बोलने या व्यवहार में लाने से बढ़ पनप कर वृक्ष बन जाती हैं। पहले आदमी इन शब्दों (विशेष रूप से गालियों) का अर्थ नहीं समझता, पर धीरे-धीरे यह शब्द ही अच्छे या बुरे फल प्रकट करते हैं।
जो व्यक्ति या असभ्य जातियाँ मुँह से कुशब्द, गालियाँ, क्रोध और घृणा सूचक कुशब्दों का उच्चारण किया करते हैं, उनके बच्चों के चरित्रों को नीचे गिराने में इन कुशब्दों का विशेष हाथ होता है। बच्चा तो कोमल दूध के समान निष्कपट स्वच्छ मन का होता है। वह जो अश्लील या गन्दे शब्द अपने माँ बाप, पास-पड़ोस या निकट वातावरण से सुनता है, वह उन्हें ही उचित समझ कर उन्हें ग्रहण कर लेता है। बड़ा होने पर इन्हीं शब्दों का गन्दा तात्पर्य समझ कर उधर की ओर ढुलक उठता है। इन्हीं शब्दों के अनुसार उनके जीवन ढलने लगते हैं और वे सदा के लिए पतन के मार्ग पर पड़ जाते हैं।
मनोविज्ञानवेत्ता बतलाते हैं कि प्रत्येक बोला हुआ शब्द गुप्त मन पर प्रबल संस्कार छोड़ता है। उस संस्कार से वातावरण बनता है। यह वातावरण जीवन का निर्माण करता है। अतः हमारी जिह्वा से निकलने वाले शब्दों का जीवन में भारी महत्त्व है। शब्द ही मनुष्य के भाग्य-निर्माता हैं। अच्छे शब्द, प्रेरक शब्द, धर्म भावनाओं और पवित्र संकल्पों से भरे हुए शब्द संसार-संघर्ष में सफलता या विफलता देने वाले हैं।
मधुर शब्द जीवन को सरस या नीरस बनाता है। धार्मिक और वेद के वाक्यों से नूतन विचारों, भव्य भावनाओं और उन्नत संस्कारों की उपलब्धि होती है।
प्रेरक शब्द से मनुष्य कठिनाइयों और उत्तेजना के अनेक क्षणों में विजय पाने में समर्थ हुआ है। विचारकों, महर्षियों, महान कवियों, धर्मोपदेशकों और महापुरुषों के शब्द अनेक व्यक्तियों के जीवन में नया मोड़ उत्पन्न करने वाले होते हैं। शब्द (अर्थात् यह विपुल साहित्य) ही संग्रहित न रहें, तो मनुष्य जाति में जो श्रेष्ठ हैं, वही लुप्त हो जाए। तम के निगूढ़तम क्षणों में भव्य शब्दों द्वारा प्रकाश की अभिनव प्रभा का उदय होता है।
शब्द साधना से सुप्त मानवीय शक्तियाँ जागती हैं। मनुष्य में नई शक्ति और अद्भुत सामर्थ्य का उदय होता है। निष्प्राण जैसे व्यक्ति में नई जान और नई आशा का विकास होता है। कालिदास प्रारम्भ में मूढ़ थे, पर मार्मिक शब्दों ने ही नए ज्ञान का उद्रेक किया था। भारतीय मनीषियों ने इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य को आधार मान कर मन्त्र-विज्ञान नामक प्रक्रियाओं को जन्म दिया है। भारतीयों के मुख से निकलने वाले मन्त्र वास्तव में कुछ ऐसे चुने हुए सशक्त, सप्राण और प्रखर शब्द हैं, जो अपना विशेष अर्थ रखते हैं। हमारे आचार्यों ने ये शब्द बड़े अनुभव और ज्ञान के बल पर बनाये और जीवन भर का सारा निचोड़ थोड़े से शब्दों में भर दिया है। मन्त्रों में प्रयुक्त शब्दों का साकार हो जाना, जीवन में पूरी तरह उतर आना और जीवन का उन्हीं के अनुसार चलने लगना मन्त्र सिद्धि होना कहा जाता है। जो इन मन्त्रों की सिद्धि कर लेता है, भारतीय पद्धति के अनुसार उसके जीवन का काया-पलट हो जाता है।
अतः मन्त्रों के सही अर्थ समझिये और जीवन में उतारिये।
(डॉ. चमनलाल गौतम)
मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा जाता है। वह परमात्मा का राजकुमार है। परमात्मा ने उसे अनेकों प्रकार की अद्भुत शक्तियों से विभूषित किया है जिनकी सहायता से उसने अपना सर्वतोमुखी विकास किया। शारीरिक क्षमता कम होते हुए भी उसने हाथी, शेर आदि को बन्दी बना कर अपने इशारों पर नचाया। विज्ञान के वह वह चमत्कार उसने दिखाए जिसे देखकर बुद्धि भ्रमित हो जाती है, बुद्धि बल से उसने उन-उन वस्तुओं का निर्माण कर लिया जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। नये-नये भौतिक आविष्कार मनुष्य की विकसित बुद्धि का परिचय देते हैं। मनुष्य आज इतना शक्तिशाली हो गया है कि घर बैठे हजारों लाखों व्यक्तियों के भविष्य को मटियामेट कर सकता है। उसने ऐसी मशीनों का निर्माण किया है कि हाथ से काम करने वाले अनेकों व्यक्तियों की अपेक्षा मशीन की सहायता से एक व्यक्ति अधिक काम कर सकता है। परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि की वह महान शक्ति और सम्पत्ति प्रदान की है जिसे पाकर वह धन्य हो गया।
परमात्मा ने किसी भी प्राणी को पूर्ण नहीं बनाया। अपूर्णता की कमी को अनुभव करते हुए वह पूर्ण बनने का प्रयत्न करता है। यही उसके जीवन का उद्देश्य होता है। अन्य प्राणियों की अपेक्षा जहाँ मनुष्य में अधिक गुण हैं वहाँ उसमें कमियाँ भी हैं। पशु उससे बढ़े चढ़े हैं। पशु का बालक जन्म लेते ही उछलने, कूदने लगता है। उसे खड़े होना, चलना, दूध पीना, माता को पहचानना आदि बातें सिखाई नहीं जातीं वरन् वह स्वयं सीख जाते हैं। मनुष्य के बालक के साथ यह बात नहीं हैं। बिना सहायता के वह आगे नहीं बढ़ सकता। उसे प्रत्येक कार्य की शिक्षा दी जाती है। यदि उसे साँसारिक कार्यों की शिक्षा न दी जावे तो वह पशु से भी अधिक विकसित न होगा। उसे सहायता की आवश्यकता पड़ती है।
भारतीय मनीषियों ने हजारों वर्षों के अनुभव के पश्चात यह निष्कर्ष निकाला था कि मनुष्य जीवन केवल खाने-पीने और मौज उड़ाने के लिए नहीं है, चौबीसों घण्टों भौतिक जीवन को सुखी बनाने की दौड़-धूप में लगे रहना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है वरन् इससे भी श्रेष्ठ उद्देश्य जीवन का निर्माण है जिससे वास्तव में मनुष्य मनुष्य बनता है। यही कारण है कि भारतीय ऋषियों ने भौतिक उन्नति को गौण और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति को जीवन का मुख्य उद्देश्य निर्धारित किया था। वह भली प्रकार जानते थे कि “जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्द्विज उच्यते” जन्म से सभी शूद्र होते हैं। संस्कारों के द्वारा उसे द्विज बनाया जाता है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। उन्होंने ऐसे ऐसे उपाय खोज निकाले जिससे मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बन जाता है। इन उपायों का नाम उन्होंने संस्कार रखा। डॉ. राजबली पाण्डेय ने लिखा है कि संस्कृत साहित्य में संस्कार का प्रयोग शिक्षा, संस्कृति, प्रशिक्षण, सौजन्य, पूर्णता, व्याकरण सम्बन्धी शुद्धि संस्करण, परिष्करण, शोभा आभूषण, प्रभाव, स्वरूप, स्वभाव, क्रिया, काम, स्मरण शक्ति पर पड़ने वाला प्रभाव, शुद्धि क्रिया, धार्मिक विधि विधान, अभिषेक, विचार भावना, धारणा, कार्य का परिणाम क्रिया की विशेषता आदि अर्थों में हुआ है।” महर्षि गौतम ने इस बात का समर्थन किया है कि संस्कारों से नैतिक विकास होता है। उन्होंने दया, क्षमा, अनुसूया, शौच, शम, उचित व्यवहार, निरीहता तथा निर्लोभता-आत्मा के आठ गुणों का जन्म संस्कारों द्वारा होते लिखा है।
हीरे और जवाहरात जिस स्थिति में बाजार में देखे जाते हैं, उस हालत में वह खानों से नहीं निकलते, उनको खराद पर चढ़ाया जाता है, तब वह निखरते हैं। विधिवत संस्कार द्वारा ही उसकी शोभा बढ़ती है। पारे को विधि पूर्वक जारण मारण करके संस्कार द्वारा ही संजीवन रसायन बनाया जाता है। बाग में सुन्दर वृक्ष सुशोभित करने के लिए माली को उसकी बड़ी देख भाल करनी पड़ती है। खाद, पानी, गुड़ाई, निराई, काट-छाँट, कलम आदि अनेक प्रक्रियाओं के द्वारा ही वह पौधे को मन चाहे रूप में बनाता है। जहाँ इस प्रकार के संस्कार करने वाला माली नहीं होता वहाँ पौधे कुरूप, अस्त-व्यस्त, और विकृत परिस्थिति में पड़े रहते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने नर पशु को द्विज-आदर्श वाद के दृष्टिकोण को अपनाने वाला महामानव बनाने की विधि का आविष्कार किया था जिसे ‘संस्कार विज्ञान’ का नाम दिया गया था। जिस समय लोगों को अपने धार्मिक कृत्यों, कर्मकाण्डों आदि पर आस्था थी और विधिवत संस्कार आदि कराये जाते थे, उस समय यहाँ घर घर में महापुरुष जन्म लेते थे क्योंकि षोडश संस्कारों द्वारा मनुष्य धीरे धीरे महानता के पथ पर आगे बढ़ता रहता है।
आज सब और भौतिकवाद की ध्वनि सुनाई दे रही है। पाश्चात्य दृष्टिकोण को अपना कर हमने अपने धार्मिक विश्वासों को खो दिया है। हिन्दू धर्म के रीतिरिवाज, व्रत, त्यौहार, कर्मकाण्ड, साधना, हवन आदि पर हमारी आस्था कम हो रही हैं। हम उनका उपहास करते हैं। यही कारण है कि आध्यात्मिक दृष्टि से उतने विकसित नहीं हो पाते और दीन हीन बन कर दुःख पाते रहते हैं। यह निश्चय के साथ कहा जा सकता है कि हिन्दू धर्म की प्रत्येक प्रक्रिया में अवश्य कुछ रहस्य छिपा रहता है। वह अन्ध विश्वास पर आधारित नहीं है। वह बुद्धि और तर्क की कसौटी पर खरे उतरती हैं। हम उन्हें बाह्य दृष्टि से देखते हैं, उनकी गहराई तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं करते, इसलिए नासमझी के कारण उनकी उपेक्षा करते हैं। अब समय आ गया है कि हम उनको समझें और पुनः उनको जीवन विकास के लिए प्रयोग में लावें।
संस्कारों के महत्व पर परम पूज्य आचार्य जी ने लिखा है कि षोडश संस्कारों के विधि विधान एवं कर्मकाण्ड में आहुतियों, शक्तिशाली मन्त्रों के प्रयोगों, अनेकों रहस्यपूर्ण क्रिया-प्रक्रियाओं के द्वारा विविध अवसरों पर किसी व्यक्ति पर ऐसा सूक्ष्म प्रभाव छोड़ा जाता है कि उसकी मनोभूमि, बुराइयों क्षुद्रताओं से ऊपर उठकर अच्छाइओं एवं महानताओं को ग्रहण कर सके। समय समय पर होने वाले इन षोडश संस्कारों का कर्मकाण्ड तो रहस्य पूर्ण अध्यात्म विज्ञान के चमत्कारी सत्परिणामों से परिपूर्ण है ही साथ ही उस अवसर पर जो शिक्षाएँ दी जाती हैं, वे भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उत्सव मनाते हुए मनोभूमि को विशेष उल्लसित करके उस समय जो शिक्षाएँ दी जाती हैं वे ठीक समय पर बोये जाने वाले बीज की तरह फलवती होती हैं।
अ. भा. गायत्री परिवार ने भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का जो बीड़ा उठाया है उसमें संस्कारों को पुनः व्यावहारिक रूप देने का विशेष महत्व है। डबरा आदि कई शाखाओं ने इनके महत्व को भली प्रकार समझा है और उन शाखाओं से विधिवत संस्कार किये जाते हैं। अब किसी भी शाखा को पीछे नहीं रहना है। विधि विधान को समझने और करने के लिए तो संस्कार पद्धति हैं ही। अखण्ड-ज्योति के आगामी अंकों में प्रत्येक संस्कार पर एक लेख माला आरम्भ होगी जिसमें उनके रहस्य और महत्व को दर्शाया जाएगा। आशा है पाठक उनसे कुछ प्रेरणा प्राप्त करेंगे।
(श्री अगरचन्दजी नाहटा)
संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु है समय क्योंकि जो समय बीत जाता है उसे वापस नहीं प्राप्त किया जा सकता। प्राणियों के जीवन का समय सीमित है। और उसका एक-एक पल बड़ी तेजी से छीजता जा रहा है। अञ्जलि-जल की तरह प्रतिक्षण छीजते हुए समय का एक दिन अन्त आ ही जाता है और हमारे सारे भावी मनोरथ यों ही धरे रह जाते हैं। वैसे भी लोगों की प्रायः यह शिकायत रहती हैं कि क्या करें। काम तो बहुत से करने हैं पर समय नहीं मिलता हैं। बहुत से काम जिन्हें हम बहुत ही महत्व के एवं उपयोगी समझते हैं, करना चाहते हुए भी उन्हें समयाभाव से नहीं कर पाते। समय का मूल्य आँकना बड़ा ही कठिन है। एक क्षण भर के प्रमाद, आलस्य या देरी से हम बहुत बार महान लाभ से वंचित रह जाते हैं।
वैसे तो मनुष्य हर समय कुछ न कुछ प्रवृत्ति करता ही रहता है पर सभी प्रवृत्तियाँ आवश्यक, उपयोगी एवं लाभप्रद नहीं होतीं। जीवनयापन के लिए कुछ प्रवृत्तियाँ तो अनिवार्य होती हैं पर विचार करने पर पता लगता है कि अनावश्यक और असद्प्रवृत्तियों में भी हम बहुत सा समय व्यर्थ खो देते हैं। हर समय मनुष्य काम ही काम करता है। ऐसी बात भी नहीं। हमारा बहुत सा समय बेकार और निकम्मा जाता है। काम करते करते या काम पूरा कर लेने के बाद विश्राम की भी आवश्यकता होती है जिससे काम करने की शक्ति का पुनः संचय होता है। प्रकृति ने ही ऐसा विधान बना रखा है कि दिन में काम करे और रात में नींद लेकर विश्राम भी करें, जिससे दिन भर के लिये किए काम की थकावट दूर हो जाए और दूसरे दिन पूरी ताजगी के साथ पुनः काम में जुटा जावे। प्रवृत्तियाँ भी सब समय मनुष्य एक ही प्रकार की न करके अनेक प्रकार की करता है। जैसे-कोई भी व्यक्ति केवल खड़ा ही खड़ा नहीं रह सकता। थोड़े समय बाद बैठने की आवश्यकता भी हो जाती है। हर व्यक्ति कुछ समय खेल कूद में बिताता है, कुछ समय विचारों की गहराई में और कुछ समय बात-चीत में। इस तरह मन, वचन और काया अर्थात् इन्द्रियों का उपयोग विविध प्रकार से होता रहता है। कुछ समय तक आँखें निरन्तर देखने का काम करती हैं पर थोड़े समय बाद ही नेत्रों को बन्द करने या विश्राम देने की आवश्यकता हो जाती है। इस तरह काम और विश्राम दोनों में समय बीतता जाता है। पर विश्राम का अर्थ आलस्य या निकम्मों का निठल्लापन नहीं, विश्राम काम के लिए ही हो।
प्रकृति के साथ साथ मनुष्य ने भी अपनी सुविधा के लिए काम के समय के साथ अवकाश का समय भी निकाल रखा है। जैसे सप्ताह में सात दिन काम करके रविवार को छुट्टी मनाई जाती है ताकि मनुष्य काम से ऊब न जाए और अपने बचे हुए अन्य प्रकार के काम छुट्टी के दिन पूरे कर सके। मनोरंजन, मिलना-जुलना, कहीं आना जाना, आवश्यक सामान खरीदना आदि कार्य जिन्हें वह 6 दिनों में नहीं कर सका, वह 7 वें छुट्टी के दिन कर सके। इसी तरह बहुत से और भी छुट्टी के दिन होते हैं जिन दिनों में उसे निश्चित कार्य से अवकाश मिलकर अन्य कार्य करने की सुविधा मिल जाती है। विद्यार्थियों को भी परीक्षा से पहले कुछ दिन परीक्षाओं की अच्छी तरह तैयारी करने के लिए (छुट्टी के) मिल जाते हैं। इसी तरह परीक्षाओं के बाद भी लम्बी छुट्टियाँ मिलती हैं ताकि परीक्षा के दिनों में जो उन्हें अधिक श्रम करना पड़ता है उसकी थकावट दूर हो। इधर परीक्षाओं का परिणाम घोषित करने के लिए अध्यापकों आदि को भी समय मिल सके। इसी तरह अमुक वर्षों तक कार्य कर लेने के बाद सरकार की ओर से भी व्यक्ति को अवकाश तथा निवृत्ति मिल जाती है जिससे अवकाश के समय में वह अपने इच्छित काम कर सकें।
अब प्रश्न यह रहता है कि हम अवकाश के दिन या समय का उपयोग किन कामों में करें। इस सम्बन्ध में हमारे भारतीय धर्मों में 4 आश्रमों में विभाजित जीवन में बड़ी सुन्दर व्यवस्था मिलती है कि ब्रह्मचर्याश्रम अर्थात् बाल्यावस्था में विद्याध्ययन अर्थात् योग्यता की प्राप्ति करके गृहस्थ आश्रम में अपने कौटुम्बिक जीवन के सुसंचालन में लगें। उसमें अर्थोपार्जन, सन्तानोत्पादन करने के बाद वानप्रस्थ आश्रम को स्वीकार किया जाए जिसमें सेवा एवं साधनामय जीवन रहें। परिवार के साथ व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक उन्नति भी करे। संकुचित कुटुम्ब की ममता से अपने को ऊपर उठाकर विश्व वात्सल्य के भाव को जागृत करें और सबके हित के लिये अपने जीवन को समर्पण कर दें। वास्तव में अवकाश के समय का उपयोग भी हमें अपनी आध्यात्मिक उन्नति एवं जन कल्याण में ही करना उचित है। विद्यार्थी अपने छुट्टियों के दिनों में आस-पास के अशिक्षित लोगों को शिक्षित बनाने का प्रयत्न करें। व्यर्थ ही इधर उधर घूमने और गप्पे मारने, ताश खेलने आदि में समय बर्बाद न करें। अच्छे-अच्छे ग्रन्थों के स्वाध्याय से अपने ज्ञान को परिपुष्ट करें और दूसरों को भी ज्ञान का दान दें। सेवाभाव से सबको सहयोग दें। पर आजकल हम यह देखते हैं कि लम्बी-लम्बी छुट्टियों से विद्यार्थियों का जीवन बरबाद सा होता है। वे इन दिनों में कई बुरी आदतें डाल लेते हैं। इससे घर वाले भी परेशान होते हैं और स्वयं का जीवन भी बिगड़ता है। वास्तव में उनके सामने कोई ध्येय एवं आदर्श नहीं होता कि इन छुट्टियों का उपयोग वे किस तरह से करें जिससे स्वपर-उभय का कल्याण सम्पादन हो।
अब से थोड़े वर्षों पहले शिक्षणालयों में छुट्टियाँ बहुत ही कम होती थीं। जब हम पढ़ते थे तब केवल प्रतिपदा को ही छुट्टी होती थी। उसके बाद महीने में चार छुट्टियाँ होने लगीं पर ग्रीष्मावकाश आदि की लम्बी छुट्टियाँ तो इधर कुछ वर्षों में ही बढ़ी हैं। इससे विद्यार्थियों को तनिक भी लाभ नहीं हुआ अपितु नुकसान हुआ है। आजकल वर्ष में 4-6 महीने तो छुट्टियों में ही बीत जाते हैं। यदि इतने समय में मनोयोग पूर्वक और पढ़ाई की जाए तो जिस श्रेणी में पहुँचने के लिए आज आठ वर्ष लगते हैं वह चार-पाँच वर्षों में ही पूरी हो सकती है। इन तीन चार वर्षों की बचत का भावी जीवन में बड़ा भारी महत्व है। शिक्षा का स्तर तो पूर्वापेक्षा बहुत ही गिर चुका है। पहले के पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थी आज की आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों से बहुत तेज होते थे। इस तरह विद्यार्थियों के अमूल्य जीवन की बरबादी को रोकने का राष्ट्रीय सरकार एवं उनके हितैषी पिता-माता एवं अध्यापकों का परम कर्तव्य होना चाहिये।
औद्योगिक क्षेत्र में भी हम देखते हैं कि रविवार आदि अवकाश के दिनों का उपयोग मजदूर आदि लोग शराब पीने, सिनेमा देखने आदि बुरी आदतों में ही करते हैं। उनको भी अपने अवकाश के समय के सदुपयोग की कला सीखनी चाहिए। उस दिन सब को सम्मिलित होकर अपने परिवार देश और राष्ट्र की उन्नति कैसे हो? उत्पादन कैसे बढ़े? बरबादी कैसे मिटे? इस सम्बन्ध में विचार विमर्श करना चाहिये। संत समागम, प्रार्थना, ईश्वर भजन-कीर्तन, अच्छे ग्रन्थों का पढ़ना, अपने बच्चों को कुसंस्कार से दूर कर सुसंस्कारित करना, पीड़ित एवं दुःखी व्यक्तियों की सेवा करके समय का सदुपयोग करना चाहिए। निवृत्त या अवकाश प्राप्त व्यक्तियों को भी इसी तरह स्व पर कल्याण में लग जाना चाहिए। जीवन का एक क्षण भी प्रमाद एवं बुरे कामों में न हो इसका पूरा विवेक रखना ही मानव कर्तव्य है।
(डॉ. लक्ष्मी नारायण टण्डन ‘प्रेमी’ एम. ए.)
सुख, सुविधाएँ नहीं वरन् सतत प्रयत्न और कठिनाइयाँ मनुष्य का निर्माण करती हैं। परिस्थितियों से जूझने, अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करने, आगे बढ़ने, जीवन में सफलता पाने आदि की प्रेरणा हमें कठिनाइयों से मिलती है। कठिनाइयों से परिचित हो जाने के पश्चात वे उसे शत्रु नहीं वरन् मित्र लगती हैं। एक शायर का कथन हैं ‘मुश्किलें इतनी पड़ीं मुझ पर कि आसाँ हो गई।’
जीवन का कोई भी तो ऐसा क्षेत्र नहीं हैं जहाँ कठिनाइयों का सामना करने से आप बच पावें। जीवन एक कर्म-भूमि है, एक युद्ध क्षेत्र है। यहाँ वीरों की भाँति उनसे लड़ो पराजित करो। एक महापुरुष के प्रेरणार्थक शब्द देखिए :-
“विश्व के विस्तृत युद्ध-क्षेत्र में तुम एक बेजुबान गूँगे पशु की भाँति न हो जिसे जहाँ चाहे हँकाया जा सके वरन् इस युद्ध में तुम एक वीर की भाँति लड़ो। बिना कठिनाइयों से लड़े, बिना उन्हें जीते, छुटकारा कहाँ? ये कठिनाइयाँ, ये ठोकरें, हमारी सबसे बड़ी मित्र, गुरु तथा मार्ग प्रदर्शक होती हैं।
एक समझदार तो कठिनाइयों का स्वागत करता है। तुम आओगी तभी तो मेरे आन्तरिक गुणों, साहस, शीलता तथा प्रतिभा को प्रकाश में आने का अवसर मिलेगा।
प्रसिद्ध अँग्रेजी लेखक जान हंटर ने कहा है कि ‘क्या कोई ऐसा मनुष्य है जिसका हृदय कठिनाइयाँ तोड़ देती हैं, जो तूफान के आगे झुक जाता है? ऐसा मनुष्य संसार में बहुत कम मिल सकेगा। क्या कोई ऐसा मनुष्य है जो विजय पाने की कामना रखता है? इस प्रकार का आदमी कभी असफल नहीं होगा?’
आलसी, निकम्मे, पराश्रित, भाग्य का रोना रोने वाले, दुर्बल हृदय मनुष्य को सफलता कभी वरमाला नहीं पहनाती। कठिनाइयाँ हमें सर्वोत्तम अनुभव और आशावर्धक प्रेरणा देती हैं। हमारी भूलें, हमारी त्रुटियाँ ही हमारी गुरु, हमारी पथप्रदर्शक बनती हैं। तो फिर कठिनाइयों से घबराना मूर्खों का काम है।
चार्ल्स जेम्स फाक्स कहा करते थे कि वह ऐसे आदमी से अधिक आशा करते हैं जिसे असफलता प्राप्त हुई हो और तब भी वह अपने प्रयत्नों में निरंतर लगा रहे, बनिस्बत उस पुरुष के जिसका जीवन सफलताओं से पूर्ण हो। “जिसके सामने कठिनाइयाँ आयेंगी ही नहीं, वह तो निश्चिन्तता से टाँग पर टाँग रखे बैठा रहेगा। वह और कहते हैं कि यह बुरा नहीं है यदि तुम मुझे बताओ कि उक्त नव युवक को अपने प्रथम भाषण में सफलता मिल गई। वह अपने प्रथम सफलता से संतुष्ट हो सकता है। पर मुझे एक ऐसा नवयुवक दिखाओ जिसे पहले प्रयत्न में सफलता न मिली हो और तब भी वह निरन्तर प्रयत्नशील रहा हो। निश्चय ही मैं दूसरे वाले युवक का पक्ष लूँगा और मेरा विश्वास है कि वह अपने जीवन में आगे चल कर अधिक सफलतायें पायेगा बनिस्बत इस मनुष्य के जिसे प्रथम प्रयत्न में ही सफलता मिल गई थी।”
सफलता, यह भी हो सकता है कि इत्तफाक से भी मिल गई हो। अन्धे के हाथ बटेर लगना कहावत प्रसिद्ध भी है। ऐसा आदमी पूर्ण निश्चिन्त हो कर बैठा रहेगा। वह सोचेगा, कि अब मुझे हाथ पैर हिलाने की क्या आवश्यकता हैं। भाग्य तो यों ही मेरे ऊपर सदय है और मुझे तो बिना परिश्रम, प्रयत्न किए ही सफलतायें मिलती रहेंगी। यही झूठा विश्वास उसके पतन का कारण भी बन सकता है।
हममें समझदारी जितनी असफलता के फलस्वरूप आती है, उतनी सफलता के फलस्वरूप नहीं। हार्नटूक कहा करते थे कि अपने देश से अधिक परिचित मैं इसलिए हो पाया हूँ क्योंकि मैं बीच−बीच में मार्ग भूल जाता था। इस विद्वान का कहना है कि अपने अन्वेषण-कार्य में जब बहुत बड़ी बाधा उपस्थित पाता था तब प्रायः होता यही था कि अपनी खोज के तट पर ही आ लगता था।
बड़े-बड़े कार्य, उच्च विचार, खोज, आविष्कार, आदि का जन्म कठिनाइयों के मध्य में ही हुआ है। किसी भी नेता की जीवनी आप देखें, किसी भी धर्म-क्षेत्र के किसी महापुरुष के जीवन का आप अध्ययन करें, आप देखेंगे कि कितनी भयानक कठिनाइयों का पहले उन्हें सामना करना पड़ा था। अंग्रेजी में कहावत है “असफलता, सफलता का स्तम्भ है।” असफलता की नींव पर ही सफलता की इमारत बनाई जाती है।
प्रसिद्ध अमरीकन प्रेसीडेन्ट वाशिंगटन ने जितने युद्ध जीते उससे कहीं अधिक हारे। पर वे कभी निराश नहीं हुए। इसी से अन्त में विजय श्री उन्हें ही प्राप्त हुई।
प्रसिद्ध लेखक सैमुअल स्माइल ने कहा है ‘आवश्यकता एक कठोर अध्यापिका हो सकती है परन्तु प्रायः पाया यही गया है कि वह सिखाती सर्वोत्तम है।’ यह सत्य है कि कठिनाइयाँ कोई नहीं चाहता, उसका सामना करने से कभी कतराना चाहते हैं-और यह स्वाभाविक भी है, पर जब वह सामने आ ही जाए तो उसका डट कर सामना करना चाहिए।
प्रायः हम अपनी शक्ति का ठीक से अन्दाजा नहीं लगा पाते। हम झिझकते हैं कि भला यह हम कैसे कर पायेंगे। परीक्षा देने के पूर्व विद्यार्थी घबराता है कि वह पर्चा कैसे करेगा। पर जब एक बार पर्चा उसके हाथ में आ जाता है तो वह हीन भावना, भय की भावना, निराशा की भावना दूर हो जाती है। उसकी बुद्धि और कलम चलने लगती है और वह पर्चा करके ही छोड़ता है।
दुर्भाग्य, कठिनाइयों का उज्ज्वल पहलू भी होता है। वे हमारे सामने हमारी वास्तविक शक्ति का परिचय, स्पष्ट चित्र रख देती हैं। यदि हम वास्तव में चरित्रवान हैं, यदि हममें वास्तविक क्षमता है तो हम उन लाभप्रद जड़ी-बूटियों की भाँति हैं जो जितनी ही फेंटी जाएंगी, मथाई जाएंगी, कूटी जाएंगी उतना ही लाभप्रद सुगन्धित सर्वोत्तम रस देंगी। कठिनाइयाँ हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाती हैं। वे हमें आत्म-नियन्त्रण सिखाती हैं। हमें सूझ-बूझ, साहस, बल, विश्वास देती हैं।
सैमुअल स्माइल ने कहा है कि ‘जीवन के युद्ध को प्रायः आगे बढ़कर ही लड़ना चाहिए। यदि बिना युद्ध के ही हमें सफलता मिलती है तो वह बिना सम्मान वाली विजय है। यदि कठिनाइयाँ न होंगी तो सफलता भी न होगी। यदि कोई ऐसी चीज नहीं हैं कि जिसके लिए प्रयत्न किया जाए, लड़ा जाए तो इसका अर्थ यह है कि कोई ऐसी वस्तु ही नहीं है जिसे प्राप्त किया जाए। कठिनाइयाँ दुर्बलों को डरा सकती हैं, परन्तु जो साहसी, बलवान तथा दृढ़ निश्चयी हैं उनके लिए तो वे प्रेरणा शक्ति हैं।
फल की चिंता मत करो-यही गीता सिखाती है। प्रयत्न करो। प्रयत्न करना, कर्तव्य करना ही तुम्हारे हाथ में है और बस यही चीज वास्तविक भी है, महत्वपूर्ण भी है। सच्ची असफलता उद्देश्य की प्राप्ति में असफल रहने में भी नहीं है, वरन् प्रयत्न न करने में या प्रयत्न न करने के बाद असफल होने पर हाथ पैर समेट लेने में है।
शेखचिल्ली की तरह सोचने से और अपनी आत्मा को धोखा देने से कोई लाभ नहीं है कि ‘अगर ऐसा होता तब मैं ऐसा करता।’ समझदारी, बहादुरी और मनुष्यता इसमें है कि जो और जैसा भी रूप है इस समय, उसी को क्षेत्र मान कर प्रयत्न करो, लड़ो। यदि प्रतीक्षा करोगे कि हमारी मनचाही परिस्थिति या वातावरण हो जाए तो सम्भव है कि तुम्हारा पूरा जीवन प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा में बीत जाए। केवल इच्छा करने मात्र से काम नहीं चलेगा, उस इच्छा को कार्य-रूप भी दो। एक शक्तिशाली प्रयत्न हजारों व्यर्थ इच्छाओं से श्रेष्ठ है। ‘अगर ऐसा होता’ ‘मगर वैसा हो’ आदि भूल जाओ। अगर-मगर निराशा और कमजोरी के चिन्ह हैं कर्म क्षेत्र में लंगोट कसकर कूद पड़ो। असंभव शब्द मूर्खों के शब्द-कोष में मिलता है। प्रारम्भ में कुछ भी सरल नहीं होता। अभ्यास कठिन से कठिन वस्तु को सरल कर देता है। कठिनाइयाँ क्रूर नहीं होती हमारी शत्रु नहीं होतीं। उनका बाह्य रूप भले ही कठोर हो पर उनका अन्तर कोमल होता है।
(मुनि श्री अमरचन्दजी महाराज)
कबीर की आध्यात्मिक वाणी साधारण जनता को भी मिली है। वे बनारस में रह रहे थे, बनारस तो विद्वानों का धाम है। वहाँ एक सज्जन थे, जिन्होंने अपना जीवन विविध शास्त्रों के अध्ययन में व्यतीत किया था। वेदान्त की चर्चा में अपना समय लगाया था। अपना ब्रह्मचर्याश्रम समाप्त कर चुके थे और सोच रहे थे कि आगे क्या किया जाए? गृहस्थाश्रम में प्रवेश करूं या संन्यासी बनूँ? उन्होंने अनेक विद्वानों से सम्मति ली, किन्तु मन को पूरा पूरा समाधान नहीं मिला। तब उन्होंने कबीर जी से समाधान पाने की इच्छा की। वह बड़े-बड़े प्रश्नों को सुन कर सुन्दर रूप से सुलझा देते थे।
ब्रह्मचारी कबीर के पास पहुँचा। दिन का समय था और सूरज चमक रहा था और कबीर उस समय धूप से बैठे सूत सुलझा रहे थे। ब्रह्मचारी ने वहाँ पहुँच कर नमस्कार किया और कहा-मैं एक प्रश्न करने आया हूँ। वेद वेदान्त पढ़ चुका हूँ। अब मेरे समक्ष यह प्रश्न उपस्थित है कि मुझे गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहिए अथवा संन्यास में प्रवेश करना चाहिए?
कबीर ने कहा-अच्छा, जवाब दूँगा।
ब्रह्मचारी को बैठे बैठे बहुत देर हो गई और उसने कहा-उत्तर दीजिए। कबीर ने कहा-जरा सूत तो सुलझा लूँ।
थोड़ी देर में सूत सुलझाते-2 बड़बड़ाने लगे। पत्नी आई तो उससे कहने लगे-यह भी कोई घर है? यहाँ इतना अँधेरा है कि सूत सुलझाऊँ तो कैसे सुलझाऊँ?
पत्नी ने यह बात सुनी, वह खड़े पैरों लौट गई और दीपक जला लाई।
ब्रह्मचारी पंडित यह देख कर चकित रह गये। सोचने लगे-लोग कहते हैं कि कबीर जी बड़े तत्वज्ञ हैं किन्तु यह तो पागल मालूम होते हैं। चमकती हुई धूप में भी इन्हें अन्धकार दिखाई देता है। और दीपक जलवा रहे हैं और इनकी पत्नी भी ऐसी ही दीखती है। उसने भी तो दीपक जलाकर रख दिया। नहीं कहा कि प्रकाश हुआ है, सूर्य चमक रहा है। यहाँ अन्धकार कहाँ हैं?
वह ऐसे ही विचारों में डूबता उतरता रहा। आखिर ऊब कर उसने कहा-मेरे प्रश्न का उत्तर मिल जाना चाहिये।
कबीर बोले-उत्तर तो दे दिया और क्या चाहते हो? विस्तार में सुनना चाहते हो, देखो। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहते हो तो तुम्हें ऐसा परिवार बनाना होगा। अपने परिवार को अनुकूल बना सकते हो और स्वयं परिवार के अनुकूल बन सकते हो तो गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने में कोई हानि नहीं हैं। दिन में दीपक जलाना चाहो तो जला सको। तुम्हारी पत्नी बिना किसी तर्क वितर्क तुम्हारी आज्ञा का पालन कर सके और तुम्हारा प्रेम व स्नेह इतना महान हो कि उसके बल पर जो चाहो, वही अपने परिवार से करवा सको। पत्नी और संतति को आज्ञाकारी बना सको और जीवन में हर जगह स्नेह और क्षमता का दान प्रदान कर सको तो गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर सकते हो और यदि संन्यासी बनना है तो उसका भी आदर्श बतलाये देता हूँ।
इतना कह कर कबीरजी उस ब्रह्मचारी को लेकर एक टीले पर पहुँचे, वहाँ एक जराजीर्ण संन्यासी रहते थे। हिलना-डुलना भी उनके लिए बहुत कठिन काम था, कबीरजी ने वहाँ पहुँच कर आवाज लगाई-महाराज दर्शन देना।
महाराज नीचे आये लड़खड़ाते हुए और बड़ी कठिनाई से कबीर जी से बोले-कहिये, क्या बात है?
कबीर-कुछ नहीं, आपके दर्शन करने थे।
दर्शन देकर संन्यासी ऊपर चले गये, काँपते हुए, गिरते-पड़ते हुए। तब कबीर ने फिर आवाज लगाई और कहा-महाराज, दर्शन देना, बात कहना तो बाकी रह गया।
संन्यासी फिर नीचे आये, दम फूलने लगा। पसीने से तर हो गये और हाथ पैर लड़खड़ाने लगे। फिर भी अति संयमित मुद्रा में बोले-कहिये, क्या बात है?
कबीर-कुछ बात नहीं है। दर्शन हो गये।
संन्यासी जैसे के तैसे, प्रसन्न मुद्रा में वापिस लौट गये। उनके चेहरे पर तनिक भी क्रोध और आवेश की झलक दिखाई नहीं दी।
तब कबीर जी ने उस ब्रह्मचारी से कहा-उत्तर मिल गया? संन्यासी बनना है तो ऐसे बनना, मैंने बुलाया तो अशक्त होते हुए भी नीचे आ गये। फिर बुलाया तो फिर चले गए और केवल दर्शन देने के लिये चले आये। और शान्त भाव से लौट गये। तुमने उनके चेहरे पर क्रोध या अभिमान की एक भी रेखा देखी? कुछ भी चिन्ह नजर आया? वे जिस भाव से शान्तभाव से नीचे उतरे, उसी शान्तभाव से ऊपर चढ़ गये। तुम्हें संत बनना है तो ऐसे संत बनना।
ब्रह्मचारी पंडित ने कबीरजी को नमस्कार किया। और कहा-मैं कृतार्थ हुआ। आपने बहुत सुन्दर मार्ग प्रदर्शित किया है। मैं सोचूँगा और जो कुछ बनना है, आपके आदर्श के अनुकूल बनने का प्रयत्न करूंगा।
हमें अपने जीवन का विश्लेषण करना चाहिये। साधु बनना है तो असीम क्षमा की आवश्यकता हैं। हमें अपने विकारों से लड़ना है। क्रोध और अहंकार की एक छोटी सी लहर भी अंतस्तल में नहीं उठने देनी है। अगर उठ खड़ी हुई तो जीवन न इधर का रहेगा, न उधर का रहेगा।
गृहस्थ बनना है तो भी आदर्श बनना है। वहाँ भी क्रोध और अहंकार की लपटों से बचना है। यह लपटें उठती रहीं तो गृहस्थ की सरसता पनप नहीं सकती और जीवन नारकीय बन जाएगा।
आशय यह है कि मनुष्य किसी भी आश्रम में और किसी भी स्थिति में रहे, क्रोध और अहंकार से बचता रहे।
(पं. देवदत्त शुक्ल बी.ए. एल. एल. बी.)
एक विदेशी कवि का कथन है “महापुरुषों की जीवनियाँ हमें स्मरण कराती हैं कि हम भी अपने जीवन को महान बना सकते है” कवि का कथन सत्य से परिपूर्ण है। गाँधीजी जैसी महान आत्माओं के जीवन चरित्र का अध्ययन करने से प्रतीत होता है कि उनको महानता के पथ पर अग्रसर करने में महापुरुषों की जीवनियों का कितना महत्वपूर्ण हाथ रहा है। जिन महापुरुषों के विचार और कार्य हमारे अनुकूल होते हैं, जिनका हम हृदय से सम्मान करते हैं, उनकी जीवन घटनाओं की छाप हमारे मस्तिष्क पर पड़ती है। परम पूज्य आचार्यजी गायत्री तपोभूमि के संस्थापक और अखिल भारतीय गायत्री परिवार के कुलपति हैं। साधना क्षेत्र में वह वह बहुत आगे बढ़ चुके हैं। चौबीस चौबीस लक्ष के 24 गायत्री महापुरश्चरण उन्होंने किए हैं। पूर्व काल में सवा करोड़ जप करने वाले को वशिष्ठ की पदवी प्रदान की जाती थी। उनका इतना सम्मान किया जाता था कि वशिष्ठ ही अयोध्यापुरी के राजाओं के राजगुरु हुआ करते थे जिनकी आज्ञा के बिना राज्य में पत्ता भी नहीं हिलता था, उनके पथ प्रदर्शन में ही सब कार्य हुआ करते थे। इसका अर्थ यह है कि सवा करोड़ गायत्री जाप के तप के द्वारा आत्मा इतनी महान बन जाती है कि वह व्यक्ति राष्ट्र के नेतृत्व के योग्य बन जाता है। पूज्य आचार्यजी की साधना वर्षों पहिले से छह करोड़ के लगभग हो चुकी हैं। उनकी महानता की माप वशिष्ठ के आत्म विकास से ही हो सकती है। इस महान तप के कारण ही उन्हें इस युग का विश्वामित्र कहा जाता है। विश्वमित्र के द्वारा नवीन सृष्टि की रचना हुई मानी जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने अपने क्रान्तिकारी विचारों द्वारा एक नए समाज का निर्माण किया था। महर्षि वशिष्ठ गायत्री साधना को केवल ब्राह्मणों तक ही सीमित रखना चाहते थे परन्तु विश्वामित्र ने जो कि समस्त विश्व के मित्र, स्नेही और हितैषी थे और प्राणी मात्र में परमात्म तत्व का अनुभव करते थे, इन सीमित अधिकार की दीवारों को तोड़ फोड़ दिया था और महर्षि वशिष्ठ के विचारों के विरुद्ध एक आन्दोलन खड़ा कर दिया था। परम पूज्य आचार्यजी ने भी एक नई सृष्टि की रचना की है, एक नये समाज का निर्माण किया हैं समाज को एक नई मोड़ दी है। उसके लिए वह सदैव स्मरणीय रहेंगे। सैंकड़ों वर्षों से जिस जाति का इतना पतन हो चुका हो कि उसने उन्हें भजन पूजन के अधिकारों से भी वंचित कर रखा हो। ऐसी-ऐसी कपोल कल्पित घोषणाएँ कर दी हों कि कोई स्त्री यदि वेद मन्त्र सुन या पढ़ लेगी या गायत्री जाप कर लेगी तो उसके परिवार में महान अनिष्ट होगा। ऐसे समय में स्त्रियों को गायत्री जप, हवन में भाग लेने का अधिकार देना एक नई सृष्टि की रचना ही है क्योंकि पुराने विश्वासों के अन्धानुकरण करने वाले पंडितों के विरुद्ध इस आवाज को उठाना जिन पर हिन्दू जनता गम्भीर आस्था और श्रद्धा रखती है, अद्भुत साहस का काम है। भारत वर्ष में होने वाले हजारों यज्ञों में जो रुकावटें उन लोगों ने डाली हैं, जनता को इन पवित्र धार्मिक कृत्यों के विरुद्ध उत्तेजित किया, उन्हें हर प्रकार से डराया, धमकाया, शास्त्रों की दुहाई दी परन्तु सत्य के पुजारी के सामने उनकी कुछ न चली। सैकड़ों वर्षों से जहाँ वेद मन्त्रों की आहुतियाँ मन में उच्चारण करते हुए दी जाती थीं, वहाँ अब उच्च ध्वनि सुनाई दे रही है, क्या यह आश्चर्य नहीं है?
गायत्री परिवार के कार्यकर्तागण कोई सेठ साहूकार या बड़े आदमी नहीं हैं परन्तु उनके माध्यम से देश में एक अद्भुत धार्मिक क्रान्ति हो चुकी है। जितने बड़े और सफल आयोजन पिछले पाँच वर्षों में गायत्री परिवार द्वारा हुए हैं, उतने और किसी भी धार्मिक संस्था द्वारा सम्पन्न नहीं हुए हैं। गुरु गोविन्दसिंह ने एक स्थान पर कहा है कि मैं चिड़ियों से बाज मरवाऊंगा अर्थात् छोटे दीखने वाले व्यक्तियों से बड़े बड़े कार्य करवाऊंगा। पूज्य आचार्यजी के सम्बन्ध में भी वही बात सिद्ध होती है, जो यज्ञायोजन बड़े-बड़े महात्माओं के द्वारा ही केवल सम्भव हो सकते हैं। वह कम पढ़े लिखे, कम बुद्धि और सामर्थ्य रखने वाले व्यक्तियों से उन्होंने करवाये हैं। क्या यह कम गौरव की बात है?
आजकल अधार्मिकता नास्तिकता का विशेष प्रभाव नवयुवकों पर पड़ा है। उनके सामने परमात्मा का कोई अस्तित्व नहीं और धर्म केवल ढोंग है और धार्मिक कर्मकाण्डों में अपना समय और शान्ति का व्यर्थ खोना है। गायत्री परिवार के प्रतिज्ञाबद्ध चार लाख से अधिक सदस्यों के नाम व आयु देखने से प्रतीत होता है कि वे अधिकाँश नवयुवक हैं। नवयुवकों को धर्म मार्ग की ओर अग्रसर करना क्या नई सृष्टि की रचना नहीं है।
धर्म प्रचार का उत्तरदायित्व ब्राह्मणों और साधु महात्माओं पर रहा है। आज ब्राह्मणों ने अपने कर्तव्यों को तिलाञ्जलि दे दी है। 56 लाख साधु समाज पर बोझ बन रहे हैं। गृहस्थों का कार्य इनकी आज्ञाओं व उपदेशों का अनुकरण कर अपने जीवन का निर्माण करना था। परन्तु पूज्य आचार्यजी ने उन्हें वह शक्ति ओर सामर्थ्य दे दी है कि वह साधारण गृहस्थ होते हुए, छोटा सा व्यापार व नौकरी करते हुए सन्त महात्माओं और ब्राह्मणों जैसे कार्य योग्यता पूर्वक सम्पन्न कर रहे हैं। साधारण बुद्धि से वह आयोजनों की इतनी उत्तम व्यवस्था कर लेते हैं कि देखने पर आश्चर्य होता है। आवश्यकता पड़ने पर वह अच्छे प्रवचन दे लेते हैं। कर्मकाण्डी पंडितों से
धर्म प्रचार का उत्तरदायित्व ब्राह्मणों और साधु महात्माओं पर रहा है। आज ब्राह्मणों ने अपने कर्तव्यों को तिलाञ्जलि दे दी है। 56 लाख साधु समाज पर बोझ बन रहे हैं। गृहस्थों का कार्य इनकी आज्ञाओं व उपदेशों का अनुकरण कर अपने जीवन का निर्माण करना था। परन्तु पूज्य आचार्यजी ने उन्हें वह शक्ति ओर सामर्थ्य दे दी है कि वह साधारण गृहस्थ होते हुए, छोटा सा व्यापार व नौकरी करते हुए सन्त महात्माओं और ब्राह्मणों जैसे कार्य योग्यता पूर्वक सम्पन्न कर रहे हैं। साधारण बुद्धि से वह आयोजनों की इतनी उत्तम व्यवस्था कर लेते हैं कि देखने पर आश्चर्य होता है। आवश्यकता पड़ने पर वह अच्छे प्रवचन दे लेते हैं। कर्मकाण्डी पंडितों से
कंकड़ पारस एक समान
भक्त नामदेव की पत्नी और भागवत नामक व्यक्ति की पत्नी परस्पर सहेलियाँ थीं। भागवत की स्त्री के पास एक पारस मणि थी, वह उसने नामदेव की स्त्री को देकर कहा- ‘इससे तू अपने काम लायक लोहा सोना बना ले और फिर तुरन्त इसे मुझे लौटा दे। सावधान। किसी को यह बात मालूम न हो।’ नामदेव की पत्नी ने बहुत सा लोहा सोना बना लिया। घर आने पर नामदेव को यह बात मालूम हुई तो उसने पारस ले लिया और चन्द्रभागा में स्नान कर पारस मणि को उसमें डाल दिया। भागवत की पत्नी के मणि माँगने पर नामदेव की पत्नी घाट पर पहुँची तब उसे मालूम हुआ कि मणि चन्द्रभागा में डाल दी गई। घर पहुँच कर उसने अपनी सहेली से सब बात कह दी। सहेली ने अपने पति भागवत से सब बात कही तो वह बड़ा रुष्ट हुआ। उसने यह बात उड़ा दी कि नामदेव ने पारस मणि चुरा ली है और वह उसे माँगने के लिए घाट पर गया। देखते देखते वहाँ भीड़ लग गई। नामदेव ने कहा- ‘मणि चन्द्रभागा के अर्पण कर दी। नहीं मानते तो निकाल कर दिखा दूँ।’ लोग हँसने लगे- ‘बोले, नदी के गर्भ से मणि निकाल लाना संभव नहीं।’ नामदेव ने डुबकी लगाई और कुछ कंकड़ लाकर सामने रख दिये। बोले- ‘लो, एक के बदले अनेक पारस मणि।’ व्यंग करते हुए भागवत ने उन कंकड़ों से लोहा लगाया तो तुरन्त सोना बन गया। उपस्थित व्यक्ति नामदेव की जय जयकार कर उठे।
भक्त नामदेव की पत्नी और भागवत नामक व्यक्ति की पत्नी परस्पर सहेलियाँ थीं। भागवत की स्त्री के पास एक पारस मणि थी, वह उसने नामदेव की स्त्री को देकर कहा- ‘इससे तू अपने काम लायक लोहा सोना बना ले और फिर तुरन्त इसे मुझे लौटा दे। सावधान। किसी को यह बात मालूम न हो।’ नामदेव की पत्नी ने बहुत सा लोहा सोना बना लिया। घर आने पर नामदेव को यह बात मालूम हुई तो उसने पारस ले लिया और चन्द्रभागा में स्नान कर पारस मणि को उसमें डाल दिया। भागवत की पत्नी के मणि माँगने पर नामदेव की पत्नी घाट पर पहुँची तब उसे मालूम हुआ कि मणि चन्द्रभागा में डाल दी गई। घर पहुँच कर उसने अपनी सहेली से सब बात कह दी। सहेली ने अपने पति भागवत से सब बात कही तो वह बड़ा रुष्ट हुआ। उसने यह बात उड़ा दी कि नामदेव ने पारस मणि चुरा ली है और वह उसे माँगने के लिए घाट पर गया। देखते देखते वहाँ भीड़ लग गई। नामदेव ने कहा- ‘मणि चन्द्रभागा के अर्पण कर दी। नहीं मानते तो निकाल कर दिखा दूँ।’ लोग हँसने लगे- ‘बोले, नदी के गर्भ से मणि निकाल लाना संभव नहीं।’ नामदेव ने डुबकी लगाई और कुछ कंकड़ लाकर सामने रख दिये। बोले- ‘लो, एक के बदले अनेक पारस मणि।’ व्यंग करते हुए भागवत ने उन कंकड़ों से लोहा लगाया तो तुरन्त सोना बन गया। उपस्थित व्यक्ति नामदेव की जय जयकार कर उठे।
अच्छे यज्ञ करवा लेते हैं। आजकल नवयुवकों को इस ओर लाना ही कठिन है। उनको साधक बना कर प्रचारक व उपदेशक बनाना तो असम्भव सा ही दीखता है। वे अपने घर नौकरी व व्यापार के कार्यों से समय बचाकर मुहल्ले-मुहल्ले और ग्राम ग्राम घूमते हैं, कड़ी धूप में पैदल चलते हैं, भूख प्यास को सहन करते हैं। अपना धन व्यय करके साहित्य वितरण करते हैं, शाखा स्थापित कराने, यज्ञ कराने, व्यसन छुड़वाने, नये गायत्री उपासक बनाने आदि की प्रतिज्ञाएँ लेकर घी, शक्कर, नमक, एक समय का भोजन आदि त्याग कर, ब्रह्मचर्य पालन, भूमि शयन, बाल न कटवाना आदि के व्रत लेकर समाज कल्याण के लिए आपको अर्पित करते हैँ। क्या यह नई सृष्टि की रचना नहीं है?
पूज्य आचार्यजी का जीवन आश्चर्यों से भरा हुआ है। उन्होंने स्वयं एक पुस्तक में लिखा है कि वेद माता की कृपा से उन्हें थोड़े समय में इतना ज्ञान प्राप्त हुआ है जितना एक साधारण व्यक्ति को 100 वर्षों में प्राप्त होना सम्भव नहीं था। गायत्री तत्व ज्ञान के संबन्ध में जितनी खोज उन्होंने की है, उतनी आज तक किसी ने नहीं की होगी। गायत्री संबंधी रहस्यों का उद्घाटन जितना उन्होंने किया है, उतना अभी तक किसी ने नहीं किया। उनके समान गायत्री साधना और तप करने वाला भी कोई दिखाई नहीं देता। आध्यात्म ज्ञान संबंधी डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें उन्होंने लिखी हैं। 1956 में दस हजार साधकों से 24-24 हजार गायत्री जाप के अनुष्ठान करवा कर 105 कुण्डी यज्ञ करवाया था। पाँच वर्ष के थोड़े से समय में देश के कोने कोने में गायत्री, यज्ञ और भारतीय संस्कृति का प्रसार किया। 3000 गायत्री परिवार की शाखायें स्थापित कराकर उन क्षेत्रों में धार्मिक जागृति की गंगा बहा दी। कलियुग के समय में जब लोग धर्म से चिढ़ते हैं, सवा लक्ष साधकों के सवा सवा लाख के गायत्री अनुष्ठान करवाना, उनसे 52 उपवास करवाना, वर्ष भर तक ब्रह्मचर्य का पालन कराना और उसके पश्चात उनके अनुष्ठान की पूर्णाहुति के रूप में एक हजार कुण्डों का गायत्री महायज्ञ सम्पन्न करना क्या कम चमत्कार की बात है जिसमें जनता से एक पैसा भी नहीं माँगा गया हो। सभी लोग दाँतों तले उँगली दबाकर रह गए। कंस ने जब प्रजा पर अत्याचार आरम्भ किया था और ग्वालों से सब दूध लेना शुरू कर दिया था कि प्रजा का कोई व्यक्ति दूध न पिये। भगवान कृष्ण ने उसके विरोध में आन्दोलन खड़ा किया था और ग्वालों का गठन करके उन्हें कहा था कि तुम केवल अपनी अपनी उँगली लगा दो यह गोवर्धन उठ जायेगा अर्थात् तुम्हारी थोड़ी थोड़ी सहायता से यह आन्दोलन सफल हो जाएगा और हुआ भी ऐसे ही। पूज्य आचार्य जी ने भी इतना बड़ा साहस गायत्री परिवार के छोटी सामर्थ्य वाले साधकों पर किया था कि बड़े आयोजन करने के लिए राजा, महाराजा, सेठों और अमीरों के सहयोग की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि जिस प्रकार से भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पहाड़ उठाने जैसा बड़ा कार्य ग्वालों की सीमित शक्तियों से कर लिया, उसी प्रकार यह गायत्री सहस्र कुण्डी यज्ञ जिसको सभी ने आश्चर्य की दृष्टि से देखा है, गायत्री परिवार के मतवालों की संगठन शक्ति का फल है। सहस्र कुण्डी यज्ञ के पश्चात अब तक 24 हजार कुण्डों के यज्ञों को सम्पन्न कराके घर घर में भगवान के प्रति आस्था व श्रद्धा उत्पन्न करना उनके महान तप का ही परिणाम है। चारों वेदों का प्रकाशन भी कम गौरव की बात नहीं है। अभी तक किसी संस्था ने प्राचीन भाष्यों के आधार पर वेद प्रकाशित नहीं किये हैं। परम पूज्य आचार्य जी हमारे हृदयों के सम्राट हैं। आध्यात्मिक उन्नति के लिए उन्होंने हमारे लिए एक उत्तम मार्ग प्रशस्त किया है। लुप्त प्रायः गायत्री व यज्ञ विद्या का उन्होंने पुनरुत्थान किया है। गायत्री विद्या एक वर्ग विशेष तक सीमित थी। आज सभी लोग उससे लाभ उठा रहे हैं। उनके पथ प्रदर्शन और सहयोग से लाखों व्यक्तियों ने भौतिक व आध्यात्मिक शुभ परिणाम प्राप्त किए और कर रहे हैं। युग निर्माण के क्रान्तिकारी प्रहरी हैं। तप और त्याग की साक्षात मूर्ति हैं। नम्रता और सरलता उनके स्वभाव में कूट कूट कर भरे हुए हैं। अहंकार उनके पास फटक तक नहीं सकता। संयम के महान आदर्श हैं। उनकी नस नस से परमार्थ और सेवा की भावनाओं का उदय होता है। परम पूज्य आचार्य जी का वरद्हस्त सदैव हमारे ऊपर बना रहे, माता से यही कामना है।
यदि मानस में दृढ़ निश्चय है,
फिर कहाँ कौन, किस का भय है?
होता विदेश भी अपना घर,
बन जाता है रिपु भी सहचर,
जलते हैं दीप ठोकरों में,
काँटों में फूलों अवसर,
इसमें भी क्या कुछ संशय है?
यदि मानस में दृढ़ निश्चय है।
बंध सकता है झंझा-प्रवाह,
मिल सकती है सिंधु की थाह।
मरु हरे-भरे हो जाते हैं,
खुल सकती है अग्नि में राह,
मुट्ठी में बँधा हिमालय है,
यदि मानस में दृढ़ निश्चय है।
तीनों कालों में तेरी गति,
तू दशों दिशाओं भूपति।
हे जन्म-जन्म के भ्रमित पथिक,
है नहीं अल्प भी इसमें अति-
कण-कण में तेरा परिचय है,
यदि मानस में दृढ़ निश्चय है।
है जगत कलपना का कौशल,
सपनों में लग सकते हैं फल।
आशाएँ पूरी होती हैं,
चाहिए एक विश्वास प्रबल,
पार्थिवता भीतर की लय है,
यदि मानस में दृढ़ निश्चय है।
असफलताएँ अभिशाप नहीं,
अपमानों का संताप नहीं।
सिद्धियाँ बिना दुख-कष्ट सहे
मिलती हैं अपने-आप नहीं,
जो तपा उसी की ही जय है,
यदि मानस में दृढ़ निश्चय है।
-श्री गोविन्द वल्लभ पंत
*समाप्त*