सहयोग भावना


सहयोग भावना (kavita)

सहना ववतु सह नौ भुनक्तु, सहवीर्य करवा वहै।

तेजस्विना वघीत मस्तु, मा विद्विषा वहै॥ - ऋग्वेद

प्रभो हमारे मनमानस में, नित्य प्रेम रस लहरावे।

हृदय गगन में भ्रातृभाव की, विजय पताका फहरावे॥

साथ-साथ रह शक्ति बढ़ावें, संजीवन संचार करें।

शुभ तेजस्वी ज्ञान बढ़ावें, निर्मल सत्य प्रसार करें॥

पोषण, मुख, आनन्द आदि का, सब मिलकर उपभोग करें।

सब मिल रक्षा करें परस्पर, हिल-मिलकर उद्योग करें॥

करें परस्पर द्वेष नहीं हम, क्षमा पूर्ण व्यवहार करें।

तुच्छ कलह की बातें भूलें, हृदयों में विश्वास भरें॥

नाथ! करें रक्षा हिल-मिलकर, खान-पान सब संग करें।

मिलकर सब बल-वीर्य बढ़ावें, उन्नति के सब ढंग करें॥

हो तेजस्वी ज्ञान हमारा, नहीं किसी से द्वेष करें।

बढ़े सभी में प्रेम निरन्तर, उन्नत अपना देश करें॥

प्रभो आप की स्नेह प्रभा से, आलोकित हो जग सारा।

प्रेम-सुमन से सुरभित होवे, उन्नति का यह मग सारा॥

-यज्ञदत्त अक्षय

सम्पादकीय


दोषों में भी गुण ढूँढ़ निकालिये

संसार की प्रत्येक वस्तु गुण-दोष-मय है। न तो कोई ऐसा पदार्थ है जिससे किसी प्रकार का दोष न हो और कोई चीज ऐसी जिसमें केवल दोष ही दोष भरे हों। मनुष्य के भीतर स्वयं दैवी और आसुरी दोनों प्रकार की वृत्तियाँ काम करती हैं। परिस्थिति के अनुसार उनमें से कभी कोई दबती है तो कभी उभरती है। जिससे एक मनुष्य जो एक समय से बुरा प्रतीत होता था दूसरे समय में अच्छा लगने लगता है।

हर वस्तु के बुरे और भले दोनों ही पहलू हैं। उन्हें हम अपनी दृष्टि के अनुसार देखते और अनुभव करते हैं। हंस के सामने पानी और दूध मिला कर रखा जाए तो केवल दूध ही ग्रहण करेगा और पानी छोड़ देगा। फूलों में शक्कर होती तो है पर उसकी मात्रा बहुत स्वल्प है, हम लोग किसी फूल को तोड़ कर चखें तो उसमें जरा सी मिठास प्रतीत होती है पर शहद की मक्खी को देखिए वह फूलों में से केवल मिठास ही चूसती है शेष अन्य स्वादों का जो बहुत सा पदार्थ फूल में भरा पड़ा है, उसे व्यर्थ समझ कर छोड़ देती है।

स्वाति की बूँद एक ही प्रकार की होती है पर उससे अलग-अलग जीव अपनी आंतरिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग प्रकार के लाभ उठाते हैं। साँप के मुख में जाकर स्वाति बूँद हलाहल विष बन जाती है, सीप के मुख में पड़ने से वह मूल्यवान मोती बनती है, बाँस के छेदों में जाने से वंशलोचन उपजता है और पपीहे के मुख में जाने से उसकी प्यास-मात्र लुप्त होती है। वस्तु एक ही थी पर अलग-अलग जीवों ने उसका उपयोग अपने-अपने ढंग से किया और उसका लाभ भी अलग-अलग उठाया। एक वैद्य पारद् को लेकर बहुमूल्य रसायन बनाता है जिससे अनेक व्यक्ति स्वास्थ्य लाभ करते हैं। दूसरी ओर उसी पारद को खाकर दूसरा आदमी प्राणघात कर लेता है। चाकू से एक विद्यार्थी कमल बनाता है, कागज काटता है, दूसरा ना समझ बालक उससे अपनी उंगली काट लेता है। बिजली से एक व्यक्ति बत्ती जलाने, पंखा चलाने और रेडियो बजाने का काम लेता है दूसरा उसी का गलत उपयोग करके अपने लिए संकट उत्पन्न कर लेता है।

सड़े गले कूड़े करकट का जब खाद रूप से सोना कमाया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि घटिया स्वभाव के आदमियों से भी यदि हम बुद्धिमत्ता पूर्ण व्यवहार करें तो उनसे सज्जनता की प्रतिक्रिया प्राप्त न हो। जब साँप, रीछ और बन्दर जैसे अनुपयोगी जानवरों को सिखा पढ़ा कर लोग उनसे तमाशा कराते और धन कमाते हैं तो कोई कारण नहीं कि हम बुरे, ओछे और मूर्ख समझे जाने वाले लोगों को अपने लिए हानिकारक सिद्ध होने देने की अपेक्षा उन्हें उपयोगी लाभ दायक न बना सकें। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हमारा निज का दृष्टिकोण और स्वभाव सही हो। यदि वही गलत है, यदि हम अपनी निज की दुर्बलताओं के प्रवाह में बहते हैं और छोटे-छोटे कारणों को बहुत बड़ा रूप देकर कुछ-कुछ समझने लगने की भूल करते हैं, सामने वाले में केवल दोष ही दोष ढूँढ़ते हैं, तो वही मिलेगा जो हमने ढूँढ़ा था। दोष विहीन कोई वस्तु नहीं, यदि हम दोष ढूंढ़ने की आदत से ग्रसित हो रहे हैं और किसी के प्रति दुर्भावपूर्ण भावना बनाये हुए हैं तो उसके जितने दोष हैं वे सब बहुत ही बड़े-बड़े रूप में दिखाई देंगे और वह व्यक्ति दोषों के पर्वत जैसा दीखेगा। यदि इसके विपरीत हमारा दृष्टिकोण उसी व्यक्ति के प्रति आत्मीयता पूर्ण रहा होता, उसकी सज्जनता पर विश्वास करते तो उसमें अनेकों गुण ऐसे दिखाई देते जिससे उसे सज्जन एवं सत्पुरुष कहने को ही जी चाहता।

भूल हर किसी से होती है। दुर्गुणों और दुर्बलताओं से रहित भी कोई नहीं है। पर जिसे हम प्यार करते हैं, उनकी भूलों पर ध्यान नहीं देते या उन्हें बहुत छोटी मानते हैं, यदि कोई बड़ी भूल भी होती है तो उसे हंसकर सहन कर लेते हैं और उदारतापूर्वक क्षमा कर देते हैं। यह अपनी भावनाओं का ही खेल है कि दूसरों की बुराई या भलाई बहुत छोटी हो जाती है या अनेकों गुनी बढ़ी-चढ़ी दीखती है।

लोगों की बुराई-भलाई इतना महत्व नहीं रखती जितनी हमारी दृष्टि, दृष्टि में दोष उत्पन्न हो जाए तो हर चीज अटपटी दिखाई देगी। रंगीन काँच का चश्मा पहन लिया जाए तो हर चीज उसी रंग की दिखाई देगी। पीलिया रोग वाले का चेहरा खून एवं मल-मूत्र ही पीला नहीं होता वरन् सभी चीजें उसे पीली दिखाई देने लगती हैं। कई व्यक्ति हर घड़ी किसी न किसी की निन्दा करते सुने जाते हैं, दूसरों के दोषों का वर्णन करने में उन्हें बड़ा मजा आता है, ऐसे लोग बहुधा अपने आपको आलोचक या सुधारक कहते हैं पर वस्तुतः बात दूसरी ही होती है। उनके मन में दूसरों के प्रति घृणा और द्वेष के भाव भरे होते हैं, वे ही दूसरों की निन्दा के रूप से बाहर निकलते रहते हैं। जो आदमी लहसुन खाकर या शराब पीकर आया है, उसके मुँह में से इन पदार्थों की दुर्गन्ध स्पष्ट रूप से आती है। इसी प्रकार दुर्भावना युक्त ओछे आदमियों के मुख में से निन्दा, बुराई, दोष दर्शन, छिद्रान्वेषण की धारा ही प्रवाहित होती रहेगी। ऐसे लोग किसी की भलाई या सद्भावना पर विश्वास नहीं कर सकते, उन्हें सभी धूर्त या दुष्ट दिखाई देते हैं। ऐसे लोगों को दोष दृष्टा ही कहा जायेगा। उनकी अपनी दुर्बलता उनके चारों ओर धूर्तता दुष्टता के रूप में बिखरी दिखाई पड़ती है।

इस प्रकार का दोषदर्शी दृष्टिकोण मनुष्य के लिए एक भारी विपत्ति के समान है। प्रेम और द्वेष छिपाये नहीं छिपते। दुर्भावों में वह शक्ति है कि जिसके प्रति उस तरह के भाव रखे जायें तो उस तक किसी न किसी प्रकार जा ही पहुँचते हैं और वह किसी दिन जान ही लेता है कि अमुक व्यक्ति मेरा निन्दक या द्वेषी है। यह जान लेने पर उसके मन में भी प्रतिक्रिया होती ही, वह भी शत्रुता करेगा। इस प्रकार उस दोष दर्शी के शत्रु ही चारों ओर बढ़ते जायेंगे। शत्रुता के साथ विपत्ति जुड़ी हुई है, जिसके जितने ज्यादा शत्रु होंगे वह उतना ही चिंतित, परेशान एवं आपत्तिग्रस्त रहेगा। उसके मार्ग में समय-समय पर अनेकों बाधाएं आती ही रहेंगी। उन्नति के मार्ग में सहयोग देने वालों की अपेक्षा रोड़े अटकाने वाले ही अधिक होंगे। ऐसी स्थिति अपने लिए उत्पन्न कर लेना कोई बुद्धिमता की बात नहीं है। निन्दात्मक दृष्टिकोण अपनाये रखना एक अबुद्धिमत्ता पूर्ण कार्य ही कहा जा सकता है।

यदि हम अपने आपसे सच्चे और सज्जन हों तो हमें सदा दूसरों की भलाइयाँ और अच्छाइयाँ दृष्टिगोचर होंगी। जिस प्रकार हम किसी के सुन्दर चेहरे को ही बार-बार देखते हैं उसी से प्रभावित होते हैं और प्रशंसा करते हैं। यद्यपि उसी मनुष्य के शरीर से मलमूत्र के दुर्गन्धपूर्ण कुरूप और कुरुचिपूर्ण स्थान भी हैं पर उनकी ओर न तो ध्यान देते हैं और न चर्चा करते हैं। इसी प्रकार सुरुचिपूर्ण मनो-भावना के व्यक्ति आमतौर से दूसरों के सद्गुणों को ही निरखते-परखते रहते हैं। उसके द्वारा जो अच्छे काम बन पड़े हैं उन्हीं की चर्चा करते हैं। उसके प्रशंसक और मित्र बनकर रहते हैं। आलोचकों और निन्दकों की अपेक्षा आत्मीयता, सद्भाव रखने वाला व्यक्ति किसी की बुराई को अधिक जल्दी और अधिक सरलता पूर्वक दूर कर सकता है।

कोई व्यक्ति जो अपने को सज्जन और समझदार मानता है उस पर यह जिम्मेदारी अधिक मात्रा में आती है कि वह सामान्य लोगों की अपेक्षा अपने में कुछ असामान्य गुण सिद्ध करे। सामने वाले से मतभेद होने पर उसे बुरा भला कहना निन्दा या अपमान भरे शब्द कहना, लड़-झगड़ पड़ना इतना तो निम्नकोटि के लोग भी करते रहते हैं। कुँजड़े और कंजड़ भी इस नीति से परिचित हैं? यदि इसी नीति को वे लोग भी अपनावें जो अपने को समझदार कहते हैं तो वे उनका यह दवा करना निस्सार है कि हम उस मानसिक स्तर के हैं। कुँजड़े-कंजड़ जैसे फूहड़ शब्द इस्तेमाल करते हैं इसे भले ही उनने न किए हों, शिक्षित होने के कारण वे साहित्यिक शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं पर नीति तो वही रही, भावना तो वही रही, क्रिया तो वही रही। वे अपने आपको शिक्षित कुँजड़ा या कंजड़ कह सकते हैं, इतनी ही उनकी विशेषता मानी जा सकती है।

हर समझदार आदमी पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह जिनकी निन्दा करना चाहता है उनकी अपेक्षा अपने आपको अधिक ऊंचा, अधिक सभ्य और अधिक सुसंस्कृत सिद्ध करे। यह भी तभी हो सकता है जब वह अपने में अधिक सहिष्णुता, अधिक प्यार, अधिक आत्मीयता, अधिक सज्जनता, अधिक उदारता और अधिक क्षमाशीलता धारण किये होना प्रमाणित करे। इन्हीं गुणों के आधार उसके बड़प्पन की तौल की जायेगी। यदि कभी भी दो व्यक्तियों में से एक को चुनना पड़े, एक को महत्व देना पड़े तो बाहर के विवेकशील आदमी इसी आधार पर महत्व देंगे कि किसने अधिक उदारता और सज्जनता का परिचय दिया। जिसमें यह अधिकता पाई जायेगी उसी की ओर लोगों की सहज सहानुभूति आकर्षित होगी। पर यदि ऐसा नहीं है तो दोनों एक ही स्तर पर रखे जायेंगे। दोनों की निन्दा की जायेगी और लोग उनके बीच में पड़ने की अपेक्षा उनसे दूर रहना ही पसंद करेंगे।

दूसरों की अच्छाइयों को ढूंढ़ने, उन्हें देख-देखकर प्रसन्न होने एवं उनकी प्रशंसा करते रहने का स्वभाव यदि हम अपना बना लें तो यह सारी दुनिया हमें एक सुरम्य सुगंधित बगीचे की तरह मनोरम दिखाई देगी। हर व्यक्ति और हर वस्तु में कुछ न कुछ अच्छाई मौजूद है। हमारे लिये इतना ही पर्याप्त है। शहद की मक्खी के लिए, इतना ही पर्याप्त है कि फूल में मिठास के तनिक से कण मौजूद हों, जब एक नन्हीं-सी विद्या और बुद्धि से हीन मक्खी इतना कर सकती है कि फूल में से अपने काम की जरा सी चीज को निकालने मात्र का ध्यान रखे और अपना छत्ता मीठे शहद से भर ले तो क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि लोगों के अंदर उपस्थित अच्छाइयों को ही तलाश करें भले ही वे थोड़ी-सी ही मात्रा में क्यों न हों। यदि हमारी दृष्टि ऐसी रहे तो हमें अपने चारों और सज्जन एवं स्नेही ही दिखाई देंगे। हमारा मन घड़ी प्रसन्नता और संतोष से ही भरा रहेगा।

ताली एक हाथ से नहीं बजती। अन्य व्यक्ति दुर्जन भी हो तो हमारी सज्जनता उनके हथियारों को व्यर्थ बना देगी। सड़क टूट हुई हो, जगह-जगह गड्ढे हों तो मोटर में बैठने वाले को दचके लगने स्वाभाविक हैं, पर बहुत बढ़िया किस्म की मोटर जिसमें लचकदार कामनी या स्प्रिंगदार सीटें हों-उस टूटी सड़क पर भी किसी यात्री को सुविधा पूर्वक यात्रा करा सकती है। दुनिया में बुरे लोग हैं-ठीक है-पर यदि हम अपनी मनोभूमि को सहनशील, धैर्यवान, उदार और गुदगुदी बना लें तो बढ़िया मोटर में बैठने वाले यात्री की तरह इस टूटी सड़क वाली दुनिया में भी आनंद पूर्वक यात्रा कर सकते हैं।

जो उपलब्ध है उसे कम या घटिया मानकर अनेक लोग दुःखी रहते हैं और अपने भाग्य को कोसते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि अधिक ऊंची किस्म के सुख-साधन, सामग्री प्राप्त करने के लिए उतावले होकर लोग अनुचित रीति से भी उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं और अन्याय और अत्याचार करने में भी नहीं चूकते। यह मार्ग समाज में अशान्ति और अपने लिये दुष्परिणाम उत्पन्न करने वाला ही है। ऐसे अनुचित कदम उठने में वह असन्तोष ही मुख्य कारण है जिससे, और अधिक मात्रा में, और अधिक बढ़िया किस्म की वस्तुएं प्राप्त करने की लालसा लगी रहती है। यदि हम इन लालसाओं पर नियंत्रण कर लें, अपना स्वभाव सन्तोषी बना लें, तो मामूली वस्तुओं से भी काम चलाते हुए प्रसन्न रह सकते हैं। अपने से भी कहीं अधिक गिरी स्थिति में, गरीबी में दिन गुजारने वाले लाखों करोड़ों व्यक्ति मौजूद है। उनकी तुलना में हम कहीं अधिक अच्छी स्थिति में माने जा सकते हैं। हमारी स्थिति के लिये भी लालायित करोड़ों व्यक्ति इस दुनिया में मौजूद है। दुःखी परेशान, चिन्तातुर एवं अभावग्रस्त भी इस संसार में कम नहीं हैं, उन्हें यदि हमारी स्थिति प्राप्त हो जाए तो निश्चय ही वे अपने भाग्य की सराहना करेंगे। इतने पर भी हम असंतुष्ट और दुःखी हैं तो इसमें कोई वास्तविक तथ्य नहीं है वरन् अपनी मानसिक लालसा ही इसमें मुख्य कारण है।

अपने से अधिक सुखी, अधिक साधन-सम्पन्न, अधिक ऊंची परिस्थिति के लोगों के साथ यदि अपनी तुलना की जाए तो प्रतीत होगा कि सारा अभाव और दारिद्र हमारे ही हिस्से में आया है। परन्तु यदि इन असंख्यों दीन-हीन, पीड़ित, परेशान लोगों के साथ अपनी तुलना करें तो अपने सौभाग्य की सराहना करने को जी चाहेगा। ऐसी दशा में यह स्पष्ट है कि अभाव या दारिद्र की कोई मुख्य समस्या अपने सामने नहीं है। समस्या केवल इतनी ही है कि हम अपने से गिरे लोगों से अपनी तुलना करते हैं या बढ़े हुए लोगों से। इस तुलना में हेर-फेर करने से हमारा असंतोष, संतोष में और संतोष, असंतोष में परिणित हो सकता है।

जिन स्वजन संबंधियों से, उनके छोटे-छोटे दुर्गुणों के कारण हमें झुँझलाहट आती है, जो हमें भार रूप और व्यर्थ मालूम पड़ते हैं, उनके द्वारा अपने ऊपर अब तक किये हुए अहसानों एवं उपकारों का स्मरण किया जाए तो लगेगा कि वह बड़े ही त्यागी, सेवा-भावी और उदार हैं। यदि उनकी अब तक की समस्त सेवा सहायताओं का स्मरण किया जाए तो लगेगा कि वे साक्षात उपकारों के देवता हैं। उनका कृतज्ञ होना चाहिए और भाग्य को सराहना चाहिये कि ऐसे उपकारी स्नेह मित्र स्वजन सम्बंधी हमें उपलब्ध हुए। तृष्णा का कोई अंत नहीं। एक से एक अच्छी और एक से एक सुन्दर चीजें इस दुनिया में मौजूद हैं। उस क्रम का अन्त नहीं आज जो कुछ हम चाहते हैं उसे मिलने पर कल और बढ़िया का मोह बढ़ेगा। बढ़ियापन का कहीं अन्त नहीं। इस कुचक्र में उलझने से सदा घोर असन्तोष ही बना रहेगा। इस लिए यदि चित्त का समाधान करना हो तो कहीं न कहीं पहुँच कर सन्तोष करना पड़ेगा। यदि उस सन्तोष को आज ही वर्तमान स्थिति में ही, कर लिया जाए तो तृप्ति, पूर्णता और संतोष के रसास्वादन का आनन्द आज ही उपलब्ध हो सकता है। इसके लिये एक क्षण की प्रतिक्षा न करनी पड़ेगी।

सुख और दुःख किन्हीं परिस्थितियों का नाम नहीं, वरन् मन की दशाओं का नाम है। संतोष और असंतोष वस्तुओं में नहीं वरन् भावनाओं और मान्यताओं से होता है। इसलिये उचित यही है कि सुख-शाँति की परिस्थितियाँ ढूँढ़ते फिरने की अपेक्षा अपने दृष्टिकोण को ही परमार्जित करने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न में हम जितने ही सफल होंगे अंतःशाँति के उतने ही निकट पहुँच जायेंगे।


गायत्री की सहस्र शक्तियाँ

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कामचार प्रभंजिनी-

पराई नारी या पराये पुरुष के प्रति अनुचित आकर्षण होना या अपनी धर्मपत्नी के प्रति भी रमणीय भाव होना, विषय विकार की ओर अमर्यादित ध्यान जाना कामचार है। इससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होता है। पारिवारिक, अनुवाँशिक और सामाजिक व्यवस्था बिगड़ती है। इन्हीं कारणों से उसे हेय माना गया है। इतना सब जानते हुए भी लोग मनोविकारों से ग्रसित होकर उसी तरफ झुकते हैं और अपना सत्यानाश करते हैं। इस कामचार की हानिकारक प्रवृत्ति को गायत्री माता घटाती हैं। विकार शाँत होते हैं। गायत्री माता के चित्त के प्रति पवित्र और पूज्यभाव रखते-रखते साधक नारी मात्र के प्रति वैसी ही मातृबुद्धि रखने लगता है। काम सेवन की व्यर्थता और हानियों को वह अच्छी तरह समझता है और उस ओर से घृणा भाव जागृत करके इस कुमार्ग से विमुख होता जाता है।

कौशिकी-

गायत्री मंत्र का देवता सविता और ऋषि विश्वामित्र हैं। विश्वामित्र ने अत्यन्त कठोर तप करके गायत्री का तत्व दर्शन किया था इसलिए वे ही इसके दृष्टा कहलाये। विश्वामित्रजी के द्वारा ही उसका महत्व उद्घोषित हुआ और उन्होंने उसका विश्वव्यापी प्रचार किया। इसलिए गायत्री को विश्वामित्र प्राण प्रिय होने के कारण कौशिकी भी कहते हैं। कौशिक विश्वामित्र जी का ही दूसरा नाम है। विश्वामित्र के पास गायत्री की प्रचण्ड शक्ति का अतुलित भण्डार था इसलिये इस शक्ति को उसके संगठनकर्ता के नाम से भी पुकारते हैं।

कान्ति-

तेजस्विता, प्रतिभा, आत्मविश्वास, दृढ़ता, निर्भयता आदि गुणों को कान्ति कहते हैं। यों चेहरे की चमक तो कई व्यक्तियों को जन्मजात भी होती है और कई उसे तेल मालिश आदि उपचारों से पैदा कर लेते हैं, पर यह तो बनावटी और अस्थायी है। कच्ची कान्ति चेहरे पर नहीं नेत्रों में चमकती है। मनुष्यता के गुणों और कर्त्तव्यों के प्रति अटूट आस्था और निष्ठा के आधार पर मनुष्य की कर्मठता एवं दृढ़ता चमकती है वही सच्ची कान्ति है। गायत्री उपासक रंग रूप में कुरूप हैं तो भी उसमें यह काँति प्रवाह पर्याप्त मात्रा में रहता है।

कौमारी-

ब्रह्मचर्य की तेजस्विता और ही होती है, उसी में सतोगुण का भण्डार छिपा रहता है। यों नारी में धर्म तत्व और सतोगुण पुरुष की अपेक्षा स्वभावतः ही बहुत अधिक होते हैं, कुमारी अवस्था में ब्रह्मचारिणी कन्याओं में तो वह हिलोरें ही लेते रहते हैं। जिस प्रकार गीता के सातवें अध्याय में विशिष्ट महत्वपूर्ण वस्तुओं की विशेषता को अपनी विभूति बताया है उसी प्रकार गायत्री की स्वाभाविक विभूति का संसार में दर्शन करना हो तो वह कुमारी कन्याओं में किया जा सकता है। गायत्री अनुष्ठान आदि की पूर्णाहुति में कन्याओं को भोजन कराया जाता है। कन्याभोज, ब्रह्मभोज से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। गायत्री कुमारी शक्ति है। ब्रह्मचर्य उसकी प्राप्ति के लिए आवश्यक नियम है।

कुंडलिनियां-

गायत्री का युग्म यज्ञ है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। यज्ञकुण्ड में गायत्री का निवास बताया जाना ठीक ही है। क्योंकि जिस प्रकार छोटी-सी आवाज को लाउडस्पीकर यंत्र द्वारा सैकड़ों गुनी बढ़ा देते हैं और जिस आवाज को पास बैठे सौ पचास आदमी ही मुश्किल से सुन सकते थे उसे लाखों आदमी सुनते हैं इसी प्रकार गायत्री शक्ति का प्रचण्डता यज्ञ के माध्यम से हजारों गुनी हो जाती है। यही कारण है कि प्रत्येक गायत्री अनुष्ठान के अन्त में हवन करना आवश्यक माना जाता है।

कमण्डलु धारा-

गायत्री के चित्रों में, मूर्तियों में उसे कमण्डलु धारिणी बताया है। कमण्डलु का जल शान्ति का, स्नेह का, सद्भाव का, वात्सल्य का प्रतीक है। गायत्री माता के एक हाथ में यह दिव्य अमृत भरा है। उसकी गोदी में चढ़कर पयपान करने का प्रयत्न करने वाले उपासक को यह कमण्डलु में भरा अमृत पीने का अवसर सहज ही प्राप्त हो जाता है।

कर्म निर्मूलकारिणी-

बन्धन रूप कर्म वे होते हैं जो कामना, वासना, स्वार्थ एवं अहंकार की पूर्ति के लिए किए जाते हैं। कर्म अनासक्त भाव से कर्त्तव्य समझ कर किये जाते हैं वे साधारण प्रकार के दीखते हुए भी पुण्य परमार्थ स्वरूप बन जाते हैं। ऐसे कर्म बन्धन कारक नहीं होते। गीता में यह कर्मयोग विस्तारपूर्वक समझाया गया है। इस तत्व ज्ञान को गायत्री माता अपने उपासक के अन्तःकरण में बहुत गहराई तक प्रवेश करा देती हैं। उसके जीवन में ही उतार देती हैं जिससे उसके किये हुए कर्म के बन्धनकारी परिणाम निर्मूल हो जाते हैं।

काम दुधा-

स्वर्ग में देवताओं के पास एक कामधेनु है जो अमृतमय दूध देती है साथ ही समस्त कामनाएं भी पूर्ण कर देती है। इस पृथ्वी पर भी एक कामदुधा-कामधेनु है जिसे गायत्री कहते हैं। यह अपनी सेवा करने वाले को अगणित सद्गुणों का, सत्कर्म और सत् स्वभावों का अमृतमय दूध पिलाती है जिसे पीकर आत्मा अनन्तकाल तक तृप्ति अनुभव करता रहता है। यह कामधेनु जहाँ है वहाँ अपूर्ण कामनाओं का कोलाहल दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। कामनाएं या समाप्त हो जाती हैं, या फिर जो कुछ मंगलमयी आकाँक्षायें शेष रहती हैं उनके पूर्ण होने का सुयोग बन जाता है।

खड्ग-

खड्ग अर्थात् तलवार। हिंसक हत्यारे दुष्ट दानवों की दुरभिसंधि को दूर करने के लिए जैसे लपलपाती खड्ग ही अचूक औषधि है, उसी से उनका मद मर्दन होता है, उसी प्रकार गायत्री रूपी तलवार भी जीवन प्रगति में बाधक विघ्न-बाधाओं एवं तापों पर ऐसा आक्रमण करती है कि उनके भयावने स्वरूप को चूर-चूर ही होना पड़ता है। गायत्री उपासक बड़ी से बड़ी बाधाओं को पार करता हुआ अपने उस लक्ष को पूर्ण करने में सफल होता है।

खेटकरी-

खेटकरी अर्थात् शिकार करने वाली। जिस प्रकार कोई विवेकशील शिकारी सिंह, व्याघ्र, अजगर, मगर आदि त्रासदायक बुरे जीवों का आखेट कर उनके भय से संत्रस्त लोगों को अभय दान करते हैं उसी प्रकार गायत्री भी संसार में फैले हुए हानिकारक, पतनकारी, आसुरी तत्वों को वैसे ही साफ करती रहती है जैसे किसान अपने खेत में उगे हुए झाड़-झंखाड़ों को काटता उखाड़ता रहता है। जहाँ गायत्री देवी आखेट करती हुई विचरती हैं वहाँ संतापदायक तत्व फलते-फूलते नहीं, उनका उन्मूलन ही होता रहता है।

खेचरी-

बन्धन एवं मुद्रायें योग साधना में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मस्तक के मध्य बिन्दु त्रिकुटी में एक आध्यात्मिक अमृत कलश रहता है। जिह्वा को उलट कर तालु मूल में लगाने और अन्य नियमों के साथ उस अमृत कलश का विन्दुपान करने की विधि खेचरी मुद्रा कहलाती है। इसका विस्तृत विधान योग ग्रंथों में मौजूद है तथा अनुभवी गुरुओं से सीखा जा सकता है। 24 मुद्राओं में खेचरी को अधिक फलप्रद माना गया है, वह गायत्री स्वरूप ही है। गायत्री साधक प्रायः उसे ही करते हैं।

खलघ्नी-

खलों को, दुष्टों को माने वाली। भगवान के अवतार का उद्देश्य ‘परित्राणय साधूनाँ विनाशायाच दुष्कृताम्’ है। इसी प्रकार भगवती गायत्री भी दुष्कृतों खलों का शमन करती है। साधक को अपने भीतरी और बाहरी क्षेत्रों में अनेक खलों से नित्य ही काम पड़ता है, इनके निराकरण में गायत्री माता का सहारा लिया जा सकता है। इन खलों को निर्मलों में बदल देना असन्तों को सन्त बना देना इस महाशक्ति का प्रधान कार्य है।

गंगा-

जैसे भौतिक जगत में अनेक पाप तापों को हरण करने वाली, हरितमा, शीतलता शाँति और सम्पत्ति बढ़ाने वाली गंगा है, उसी प्रकार आध्यात्मिक क्षेत्र की भी एक गंगा है जिसे गायत्री कहते हैं। शिवजी की जटाओं से लेकर गंगासागर तक जिस प्रकार वह पुण्य नदी बहती है उसी प्रकार मस्तिष्क के मध्य बिन्दु ब्रह्मरंध्र ने निकल कर मेरुदण्ड में अवस्थित ब्रह्मनाड़ी में होती हुई यह मूलाधार तक जाती है और वहाँ कुण्डलिनी रूप बनकर विराजती है। इड़ा पिंगला के माध्यम से यह गंगा प्रवाह निरन्तर ज्वार-भाटे की तरह हिलोरें लेता रहता है। इस दृश्य गंगा में स्नान करने पर भव सागर से तरना संदिग्ध हो सकता है पर आध्यात्मिक गंगा गायत्री में अभिमंजन करने से परम श्रेय का अधिकारी बन जाना निश्चित ही है।

गोमयी-

गो माता के सहित ही गायत्री है। हिन्दू धर्म की चार शक्तियाँ गौ, गंगा, गीता और गायत्री मानी गई हैं। नदियों में जिस प्रकार गंगा की तुलना गायत्री से की जाती है उसी प्रकार पशुओं में गौ माता भी गायत्री रूप है। गायत्री उपासक के लिए गौ दुग्ध का सेवन, गौमूत्र से स्नान, गोमय से लिपे हुए घर में निवास, गोघृत से हवन तथा गौचारण । (गौओं का चराना) गायत्री शक्ति गोमयी है। गाय के शरीर में ओत-प्रोत है। गौ पालन, गौ सेवा भी गायत्री उपासना का ही एक अंग है।

गीता-

श्रीमद्भगवद् गीता के 18 अध्यायों में जो ज्ञान भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया है उसे गायत्री के 9 शब्दों का ही विस्तार कह सकते हैं। एक-एक शब्द की व्याख्या दो-दो अध्यायों में की गई है। गीता के ज्ञान में मानव जीवन को उच्च कोटी का सात्विक, कर्त्तव्य परायण एवं अनासक्त बनाने की शिक्षा दी गयी है यही शिक्षण गायत्री के 24 अक्षरों में भी है। गायत्री गीता और गायत्री स्मृति प्रकरण पढ़ने पर स्पष्ट हो जाता है कि जो ज्ञान इन अक्षरों में है उसी को भगवान ने और अधिक स्पष्ट और विस्तृत रूप में अर्जुन को बताया है। गीता को भी गायत्री की व्याख्या ही मानना चाहिये।

गुणत्रिय विभाविता-

गायत्री सत, रज, तम तीनों गुणों से परिपूर्ण है। जिस प्रकार वात, पित्त, कफ तीनों तत्व शरीर में सन्तुलित रहने पर ही स्वास्थ्य ठीक रहता है उसी प्रकार सत, रज और तम तीनों ही तत्व मनःक्षेत्र में आवश्यक मात्रा में उपस्थित रहें तभी उसका काम ठीक प्रकार चलता है। गायत्री की इन तीनों विशेषताओं को तीन देवियों के रूप में चित्रित किया गया है। सतोगुण की प्रतीक सरस्वती, रजोगुण की प्रतिमा लक्ष्मी, तमोगुण की प्रतिनिधि काली। इन तीनों को बुद्धि, सम्पत्ति और शक्ति इन तीन नामों से भी पुकारते हैं। सतोगुण को जीवन में प्रधान माना जा सकता है, पर शरीर निर्वाह के लिए अन्न, वस्त्र, मकान आदि के रूप से रजोगुण और अपनी या दूसरे की दुष्टता के प्रति क्रोध, उससे संघर्ष के रूप में तमोगुण भी आवश्यक है। गायत्री के तीन अक्षर इन तीनों गुणों के प्रतिनिधि हैं। वह साधक को आवश्यक मात्रा में इन तीनों को ही प्रदान करती रहती है। इसलिए गायत्री को ‘गुणत्रिय विभाविता’ कहा गया है।

गुणवती-

आकाश गंगा एक निहारिका मात्र नहीं है वरन् उसमें हजारों तारे भी जुड़े हुए हैं उसी प्रकार गायत्री केवल सद्बुद्धि दायिनी मन्त्रशक्ति मात्र नहीं है वरन् उसके साथ हजारों सद्गुण समन्वित हैं। जब गंगा दिखाई देती है तो उससे संबंधित तारे भी दृष्टिगोचर होते हैं, जिधर वह आकाश गंगा घूमती है उधर ही उसके तारे भी चलते हैं। इसी प्रकार जहाँ गायत्री का उदय होता है वहाँ उससे सम्बंधित अनेकों सद्गुण भी अपने आप प्रकट होने लगते हैं। उपासक को माता का अनुग्रह अनेक दिव्य गुणों के रूप में प्राप्त होता है। उसके मन, वचन और कर्म में एक से एक बढ़कर श्रेष्ठताएं जब उदय होती हैं तो जीवन तारागणों से विहँसित निशा की तरह झिलमिलाने लगता है।

गुर्वी-

गुर्वी कहते हैं भारी को। गायत्री को एक साधारण सी चीज नहीं मानना चाहिए, उसकी गुरुता इतनी बड़ी है कि संसार के सारे भौतिक पदार्थों को भी उसकी तुलना में तुच्छ माना जा सकता है। जिस क्षेत्र में भी गायत्री की शक्ति का चमत्कार देखा जाए वह अद्भुत और अद्वितीय दिखाई पड़ेगा। क्या लौकिक क्या पारलौकिक दोनों ही दिशाओं में, शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक सभी समस्याओं को सुलझाने में गायत्री एक बहुत बड़ी नितान्त असाधारण सिद्ध होती है। इसलिए उसकी गुरुता को जितना भी अधिक माना जाए कम ही रहेगा वह वस्तुतः गुर्वी है।

गुह्य अर्थात् गुप्त-छिपी हुई। यों गायत्री के 24 अक्षर प्रकट हैं, सबको मालूम है, पुस्तकों में छपे हैं फिर भी उसका सारा कलेवर छिपा हुआ है। कुछ पुस्तकों में उसका थोड़ा-सा विज्ञान प्रकट भी किया गया है पर अभी तक जितना अप्रकट है, जितना गुप्त है, जितना रहस्यमय है उसका अनुमान लगा सकना भी साधारण व्यक्ति के लिए कठिन है। उसके सामान्य विधान जो सर्व साधारण के लिए उपयोगी है जहाँ-तहाँ पुस्तकों में लिखे हैं, पर जो असाधारण तत्व ज्ञान एवं महत्वपूर्ण रहस्य है वह अप्रकट ही रखा गया है। उस ज्ञान और रहस्य को केवल अधिकारी व्यक्ति ही सदुपयोग के लिए उपलब्ध कर सके इसलिए उन बातों को गुप्त ही रखा गया है। अनुभवी मार्गदर्शक किन्हीं सत्पात्रों की प्रतीक्षा करते रहते हैं और जब कभी ऐसे जिज्ञासु मिल जाते हैं वे अपने अनुभव में आये हुए रहस्यों को बड़ी प्रसन्नता पूर्वक बता देते हैं। पर अनाधिकारी यदि उन्हें प्राप्त कर लें तो जल्दबाजी, अस्थिरमति और अशुद्ध भावनाओं के कारण या तो साधना काल में ही अपना कुछ अनिष्ट कर बैठते हैं, या फिर सफल भी हुए तो दूसरों को आश्चर्य चकित करने का एक खेल बनाने में या साँसारिक कामनाओं में दुरुपयोग करते हैं। ऐसे लोगों के हाथ यह विद्या, विशेषतया गायत्री का ताँत्रिक पक्ष पड़ने न पावे इसका बहुत ध्यान रखा गया है। गायत्री गुह्यातिगुह्य है। उसे अब तक के साधकों ने जितना जाना है प्रयत्न करने पर उससे भी बहुत अधिक जाना जा सकता है।

गर्वपहारिणी-

गर्व का अपहरण करने वाली, घमंड एवं अहंकार को नष्ट करने वाली शक्ति गायत्री है। धन, विद्या, सत्ता, रूप, प्रभुता आदि वस्तुओं को प्राप्त करके मनुष्य इतराने लगता है, अपने को दूसरों से बड़ा समझता है और अन्यों को छोटा समझ कर उनसे हेय व्यवहार करता है। यह मानसिक स्थिति मनुष्य के उथले, असंस्कृत, उद्धत एवं तुच्छ होने का चिन्ह है इस स्थिति के कारण मनुष्य आत्मिक दृष्टि से दिन-दिन अधिक पतनोन्मुख होता जाता है। उसके व्यवहार से लोगों में क्षोभ एवं रोष फैलता है सो अलग। घमण्डी आदमी एक प्रकार का असुर है जो अनेकों सद्गुणों से हाथ धो बैठता है। इसलिये गर्व का दूर किया जाना, चूर किया जाना आवश्यक है। गायत्री या तो ऐसी सद्बुद्धि देती है कि गर्व गलकर सज्जनता में परिणित हो जाए या फिर ऐसी विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है जिनकी ठोकर से गर्वचूर हो जाए। तात्पर्य यह है कि साधक का ही नहीं, दूसरे अन्य उद्धत व्यक्तियों का भी वह गर्व दूर करती रहती है।

घोषा-

घोष अर्थात् शब्द? घोषा अर्थात् शब्द स्वरूप शब्द को श्रुतियों में ब्रह्म माना गया है। शब्दों के ब्रह्म। शब्द की शक्ति अपार है। अखिल आकाश में व्याप्त ईश्वर तत्व में गायत्री मंत्र की स्फुट या अस्फुट उच्चारण से जो तरंगें उत्पन्न होती हैं वे विश्व के मानव मस्तिष्कों से टकराकर उनमें भी अपनी प्रतिध्वनि उत्पन्न करती हैं। जिस प्रकार उत्तम प्रवचन सुनते रहने से सुनने वालों में मस्तिष्कों में थोड़ी बहुत सद्वृत्ति बढ़ती ही है, उसी प्रकार गायत्री मंत्र का जप या उच्चारण करने से उनकी परम मंगलमयी तरंगें उठकर अगणित मस्तिष्कों में सूक्ष्म पर्दों तक टकराने लगती हैं। फलस्वरूप उनके मस्तिष्कों में भी किन्हीं अंशों में धार्मिकता का उदय होता है। इस प्रकार गायत्री का जप एक प्रकार से विश्व की महत्वपूर्ण मानसिक सेवा है। मंत्रोच्चारण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें अपने अन्तराल में छिपे हुए अनेक सूक्ष्म चक्रों एवं उपत्यिकाओं को भी जाग्रत करती हैं। शब्द विज्ञान के आधार पर गायत्री मंत्र जाप आत्म जागरण का एक श्रेष्ठ साधन है।

चतुर्भुज-

चार भुजाओं वाली। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, यह चार भुजाएं गायत्री की हैं। चारों वेद भी गायत्री की चार भुजाएं हैं। चारों दिशाओं में यह चार भुजाएं फैली हुई हैं। इनमें से एक भी वरद्हस्त यदि साधक के मस्तक पर पड़ जाए तो वह उसी सम्पदा का अधिकारी होकर धन्य बन जाता है। जिसके ऊपर माता के चारों हाथों से स्नेह सिंचन हो जाता है वह जीवनमुक्त ही है समस्त दैवी ऐश्वर्यों का अधिपति ही मानना चाहिए।

चातुरी-

चातुर्य-चतुरता, बुद्धिमत्ता। यों तो लोगों में जेब काटने से लेकर ठगने तक की, धन कमाने से लेकर मिटाने तक ही अनेक प्रकार की कला-कुशलताएं होती हैं, पर सच्ची चतुरता वह है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति मानव-जीवन का, नरतन धारण के सौभाग्य का समुचित लाभ उठा सके। गायत्री उपासक में वह चातुरी होती है। वह व्यर्थ के खेल खिलौनों में बच्चों की तरह न उलझ कर अपनी आत्मा का कल्याण करता है, अपने परलोक को बनाता है। जिसने इस दिशा में जितनी सफलता प्राप्त कर ली उसे उतना ही बड़ा चतुर कहा जा सकता है, उसी की चातुरी सराहनीय है। गायत्री में यह सच्ची चतुरता ओत-प्रोत है।

चरित्र प्रदा-

चरित्र को, आचरण को प्रशंसा योग्य बनाने में गायत्री माता बड़ा योग देती है। दुराचार से मन हटता है और सदाचार में प्रवृत्ति होती है। माता का अनुग्रह जिसे प्राप्त होगा वह चरित्र का धनी बनता जायेगा। पराई बहिन, बेटी को अपनी बहिन बेटी से बढ़कर मानना, पराये पैसे को ठीकरी के समान समझना, दूसरों के सुख-दुःख में अपने सुख दुख की अनुभूति करना यह तीन विशेषताएं उसके चरित्र में अधिकाधिक बढ़ती जाती हैं। आचार और विचार दोनों से मिलकर चरित्र बनता है। मातृभक्त न तो अशुद्ध विचार करता है और न दुष्कर्मों की ओर कदम बढ़ाता है।


मनुष्य की सत्ता और उसका कर्त्तव्य

(श्री भारतीय जोगी)

सनातनमेनमाहुरुताद्य स्यात् पुनर्णवः।

अहोरात्रे प्रजायेते अन्यो अन्यम्य रुपयो॥

(अथर्व 10-8-23)

‘आत्मदेव सनातन कहे जाते हैं पर फिर भी यह नवीन रूप में प्रकट होते रहते हैं। इन्हीं में दिन-रात्रि एक दूसरे के रूप में उत्पन्न होते रहते हैं।’

इस मंत्र में परमात्मा और उनकी सृष्टि के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है। हम संसार में इस सम्बंध में विशेषतः दो तरह की बातें सुना करते हैं। ज्ञानी और तत्वदर्शी इसे अनादि, अनन्त, नित्य, शाश्वत बतलाते हैं। संसार में जो कुछ नित्य नई घटनाएं हुआ करती हैं उन सबको वे स्वप्न अथवा माया कहते हैं और उनकी दृष्टि में वे सर्वथा ‘मिथ्या’ है। दूसरी तरफ साधारण लोग दृश्य जगत को ही सत्य मानते हैं। वे चाहे मुँह से परलोक, परमात्मा, ब्रह्म का नाम लेते रहें, पर व्यवहार में उनको काल्पनिक ही मानते हैं। भारतवर्ष ‘कर्मवाद’ का सबसे बड़ा गढ़ा है और यहाँ बालक से लेकर बुड्ढे तक के मुख से ‘भाग्य’ ‘तकदीर’ और ‘कर्म’ के शब्द सुनने में आते हैं। पर झूठ, बेईमानी, विश्वासघात, छल, कपट, निर्दयता आदि का व्यवहार करते समय कोई ‘कर्म-फल’ का भय नहीं करता। अगर कोई परलोक का, पाप का भय दिखाकर समझाता भी है, तो यही उत्तर मिलता है ‘परलोक को किसने देखा है?’ ‘अब तो आराम से गुजरती है, आकवत की खुदा जाने।’

इस दृष्टि से विचार किया जाए तो आत्मा की नित्यता, पाप-पुण्य के परिणाम और सृष्टि के नियम का ज्ञान सर्व साधारण को होना अत्यावश्यक है।

जब तक उनके हृदय में यह विश्वास नहीं हो जायेगा कि यह दृश्य-जगत, अदृश्य परमात्मा के आधार पर ही टिका हुआ है और हम इसमें जो कुछ भी देख रहे हैं वह सब उसी महाशक्ति के द्वारा उसकी प्रेरणा से हो रहा है, तब तक वे सच्चे अर्थ में ‘धार्मिक’ नहीं बन सकते। वे चाहे भजन, पूजा, मन्दिर में दर्शनों के लिए जाने, कथा-वार्ता सुनने, व्रत-उपवास आदि का कितना भी दिखावा क्यों न कर लें, सच्ची आस्तिकता का, सच्ची भक्ति का, सच्ची धार्मिकता का उनमें विकास नहीं हो सकता। इसके विपरीत जिसको आत्मा की सत्ता, उसकी अविनश्वरता और कर्मफल की अनिवार्यता का ज्ञान हो चुका है, जो इनमें अन्तर से विश्वास रखता है, वह कभी पाप-मार्ग की ओर नहीं आ सकता।

इसी तथ्य को दृष्टिगोचर रखकर वेद हमको बतलाते हैं कि यद्यपि यह संसार और इसके पदार्थ हमको नित्य बिगड़ते और नवीन बनते दिखलाई पड़ते हैं, पर वास्तव में यह ‘सनातन’ है। इसके रूपों का बनना-बिगड़ना और नवीन वस्तुओं का प्रकट होना एक ऊपरी बात है। यह परिवर्तन केवल ‘व्यक्तिगत’ है। अर्थात् हम जिस नई चीज या प्राणी को उत्पन्न होते देखते हैं वह उसके अपने लिए और थोड़े से सम्बंधित मनुष्यों के लिए तो ‘नवीनता’ का अर्थ रखता है, पर समस्त संसार की अथवा सृष्टि की दृष्टि से उसमें कुछ भी नयापन नहीं है। वह एक ही सनातन नियम या प्रणाली का एक अति क्षुद्र परिवर्तन मात्र है। उदाहरण के लिए आज हमारे घर एक बच्चे का जनम हुआ, तो उसके माता-पिता, सम्बंधी और कुछ पास-पड़ोस के व्यक्तियों के लिए वह अवश्य नवीन जान पड़ेगा, आगे चलकर उसका एक नया नाम और रूप भी उनको दिखलाई पड़ेगा, पर यदि संसार के मानव समूह की दृष्टि से देखें तो वह भी अन्य करोड़ों वर्षों के सदृश्य है जिसमें कोई नहीं विशेषतः नहीं है। जिन तत्वों से यह बच्चा बना है उन्हीं से और भी सब बच्चे बने हैं और बड़ा होने पर यह भी उन्हीं की तरह खायेगा, पियेगा, सोयेगा और अन्य काम करेगा। इसलिए मनुष्यत्व की निगाह से इस बच्चे में कोई नयापन नहीं है।

इस बात को वेद मंत्र में भी एक उदाहरण देकर भलीभाँति समझा दिया गया है। जिस प्रकार सदैव नये दिन-रात आते रहते हैं, उनमें होने वाली घटनाओं में कुछ भिन्नता जान पड़ती है, उनको भिन्न तारीख और वार के रूप में स्मरण रखा जाता है, पर वास्तव में देखा जाए तो सूर्य के उदय अस्त होने के द्वारा उत्पन्न होने वाले सभी दिन और सभी रात एक से हैं। जैसा दिन सोमवार का वैसा ही शुक्रवार का। जैसा दिन आज दिखाई पड़ रहा है वैसा ही आज से दस-बीस हजार वर्ष पहले भी दिखाई देता था। इसलिए नित्य नवीन दिन का आगमन होने पर भी काल की दृष्टि से वह अपरिवर्तनीय- सनातन ही है।

इस प्रकार उपर्युक्त वेद मंत्र में हमको एक महान सत्य का उपदेश दिया गया है जिसको हृदयंगम करके हम प्रतिदिन जीने मरने वाले क्षुद्र कीड़ों की श्रेणी से उठकर दैवी शक्ति से ओत-प्रोत ‘देव’ की श्रेणी में पहुँच सकते हैं। जो मनुष्य दृश्य जगत को, अपने स्थूल शरीर को और संसार में प्राप्त साधारण भोगों को ही सब कुछ समझता है, उसकी स्थिति उस कीड़े, मछली या चौपायों से उत्तम नहीं कही जा सकती जो सदैव भोजन को खोजते-फिरते हैं और निकृष्ट पदार्थों को उदरसात करके खूब मोटे हो जाते हैं। ऐसे जीव पेट भर जाने से खूब संतुष्ट क्यों न रहते हों, अपनी बुद्धि के अनुसार अपने को ‘सुखी’ क्यों न मानते हों, पर संसार में न तो उनकी कोई विशेषता है और न नवीनता। एक मनुष्य की दृष्टि में वे करोड़ों रेंगने वाले या तैरने वाले जीव समूह में से एक है जिनका न कोई नाम है, न पहिचान। इसी प्रकार जो मनुष्य खाने, पीने, सोने और भोगने को ही जीवन मानते हैं, उनका अन्त कुछ ही वर्षों में हो जाता है, वे मिट्टी से उत्पन्न होकर मिट्टी में ही मिल जाते हैं। पर जो इस स्थूल जगत में रहते हुए भी अपने मूल स्वरूप को जानता है और उसके अनुरूप व्यवहार करता है, वह कभी नाश को प्राप्त नहीं होता। शरीर का अथवा काल का परिवर्तन तो उसके लिए एक खेल या स्वप्न की तरह है जो सदा से होता आया है और आगे भी सदा होता रहेगा। पर वह स्वयं जिस अविनाशी तत्व और नियम का एक अंश है वह तो सनातन है। वह न कभी नष्ट हुआ है और न होगा। यदि वह न होता तो आज यह सृष्टि दिखलाई ही न पड़ती।

भारतीय जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह अध्यात्म भावना ही है। संसार के सभी देशों ने प्राचीन काल से इसकी शिक्षा भारत से ही ग्रहण की है। यद्यपि मिश्र, चीन, जापान आदि के लोगों को भी अध्यात्म-विद्या से प्रेम है, पर वहाँ भी इसका प्रसार भारतीय मनीषियों द्वारा ही हुआ था। वास्तव में यह भारतवर्ष की अमूल्य धरोहर है जिसकी रक्षा करना हमारा परम कर्त्तव्य है।

वेदों का स्पष्ट आदेश, घोषणा यही है कि मनुष्य हाड़-माँस अथवा पंचतत्व का पुतला नहीं है। जो अपने को ऐसा समझता है वह महा मूर्ख और अभागा है। मनुष्य तो चैतन्य स्वरूप, प्रकाश रूप और सबका कर्ता-धर्ता है। वह नित्य नया जान पड़ने पर भी वास्तव में उस सनातन सत्ता परमात्मा का अंश है जिसका न कभी नाश हुआ और न होगा। इसलिए ज्ञानी मनुष्य को तदनुरूप ही व्यवहार करना चाहिए।


साधना के लिये गंगा तट की महिमा और महत्ता

(स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज)

भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय 10 श्लोक 31 में स्वयं मुख से कहा है- ‘स्रोतसामस्मि जाह्नवि’ अर्थात- नदियों में भागीरथी गंगा मैं हूँ।

भगवद् स्कन्द 11 अध्याय 16 में आता है-’तीर्थानाँ स्रोतसाँ गंगा’ तीर्थों में गंगा सबसे श्रेष्ठ है।

यों गंगाजल की लौकिक महत्ता भी कम नहीं है। पर इसका मूल महत्व तो पारलौकिक एवं आध्यात्मिक ही है। गंगा से कितने मनुष्यों और अन्य जीव-जन्तुओं की तृष्णा शाँत होती है, कितनी भूमि हरी-भरी शस्यश्यामला बनती है, उसके जल से सिंचित होकर कितनी घास-पात, कितना अन्न, शाक, फलों का भण्डार उत्पन्न होता है इसे सभी लोग जानते हैं। सभी जानते हैं कि लाखों करोड़ों मनुष्यों और पशु-पक्षियों का जीवन गंगा पर निर्भर रहता है। यदि गंगा का अवतरण न हुआ होता तो आज जहाँ की भूमि हरी-भरी दीखती है, जहाँ अगणित मनुष्य और पशु-पक्षी आनन्द से किलोल करते हैं वहाँ का दृश्य दूसरा ही हुआ होता। उस भूमि पर आज श्मशान जैसी विभीषिका दृष्टिगोचर होती। भगवती गंगा जिस प्रदेश में होकर गुजरती है वहाँ के समीपवर्ती लोगों को तो जीवन के बहुमूल्य आधार दिये ही हैं, साथ ही दूरवर्ती जनता को भी बहुत कुछ दिया है। यहाँ की समृद्धि दूर-दूर तक फैल कर प्रकारान्तर से सारे देश की श्री, समृद्धि को बढ़ाती है। जैसे पानी से भरे हुए भगौने का उसके किसी एक छोटे स्थान पर भी आग से गरम किया जाए तो वह गर्मी सारे बर्तन या पानी में फैल कर सभी को गरम कर देती है, इसी प्रकार गंगा के द्वारा उत्पन्न हुई समृद्धि सारे देश को ही नहीं सारे विश्व को समृद्ध बनाती है। जो सघन बन गंगा के किनारे हैं उनकी कीमती लकड़ी देश के कोने-कोने में जाकर गृह निर्माण एवं काष्ठ शिल्प की आवश्यकता पूरी करती है। यहाँ की उर्वरा भूमि में उत्पन्न हुआ अन्न समीपवर्ती लोगों की आवश्यकता से कहीं अधिक होता है और दूरवर्ती लोगों की भी क्षुधा शाँत करने में सहायक होता है। ब्राह्मी आदि अगणित जड़ी-बूटियाँ गंगाजल में ही पनपती हैं। गंगा के द्वारा मनुष्य जाति को जो आर्थिक लाभ होता है, जो विपुल श्री सम्पदा प्राप्त होती है उसका अनुमान लगा सकना भी कठिन है।

आरोग्य की दृष्टि से गंगाजल का जो महत्व है उससे आधुनिक वैज्ञानिक एवं डॉक्टर भी आश्चर्यचकित हैं। विश्लेषण करने पर गंगाजल में ताँबा, स्वर्ण, पारद आदि धातुओं एवं अनेक बहुमूल्य क्षारों की ऐसी संतुलित मात्रा मिली है जिसका सेवन एक प्रकार से औषधि का काम करता है। अच्छे स्वास्थ्य को वह और भी अधिक बढ़ाने में सहायक होता है। गिरे हुए स्वास्थ्य को गिरने से रोकता है और बीमारियों को निरोग बनाने में बहुमूल्य औषधि का काम करता है। अनेकों रोगी जो वर्षों तक खर्चीला औषधि उपचार करने पर रोग मुक्त न हो सके, केवल मात्र गंगाजल के सेवन से रोग मुक्त होते देखे गये हैं। कोढ़ की एक मात्र चिकित्सा गंगाजल मानी गई है। प्राचीन काल के आयुर्वेद ज्ञाता कोढ़ी लोगों को गंगा किनारे रहने और निरन्तर गंगाजल सेवन करते रहने की सलाह देते थे और उसका परिणाम भी आशाजनक होता था आज शहरों का मल-मूत्र पड़ते रहने से गंगा की वह विशेषता नहीं रही और रोगियों को उतना लाभ नहीं होता फिर भी प्राचीन परिपाटी के अनुसार आज भी भारत के अधिकाँश कोढ़ी गंगा किनारे निवास करते देखे जा सकते हैं।

संग्रहणी, शोध, वायु विकार, श्वास रोग, मृगी, हृदय रोग, रक्त चाप, मूत्र रोग, वीर्य और रज विकारों में गंगाजल का प्रभाव होता है, यों लाभ तो सभी रोगों में करता है। गंगाजल चिरकाल तक किसी शीशी या बर्तन में रखा रहने पर भी खराब नहीं होता। यह गुण संसार के और किसी सरोवर आदि के जलों में नहीं है। जल के खराब न होने का कारण यह है कि उसमें विकृति उत्पन्न करने वाले दूषित कीटाणुओं को मार डालने का गुण है। डाक्टरों ने एक बार यह परीक्षण किया कि हैजे के कीटाणु भरी बोतल को एक पात्र में रख कर थोड़े से गंगाजल में डाला और इसके परिणाम की जाँच की। उन्हें आशा थी कि विषैले कीटाणुओं से गंगाजल भी वैसा ही विषैला हो जायेगा पर परिणाम इससे भिन्न निकला। गंगाजल में पड़ते ही हैजे के कीटाणु नष्ट हो गये, पर गंगाजल दूषित न हुआ। यदि गंगा में यह विशेषता न हुई होती तो प्रतिदिन लाखों मन मल-मूत्र जो उसमें पड़ता है उसके कारण उसका जल रोग उत्पन्न करने वाला हो गया होता। ऐसा तो नहीं हुआ है गंगा की पवित्रता तो अभी भी बनी हुई है। पर प्रतिदिन पड़ने वाली गन्दगी को नष्ट करने में उस जल के गुणकारी अमूल्य तत्व नष्ट होते हैं और उसकी आरोग्यवर्द्धनी शक्ति भी घटती है। अब वही गंगाजल अधिक उपयोगी माना जाता है जो हिमालय के उन भागों में उपलब्ध है जहाँ मल-मूत्र का अधिक मिश्रण नहीं हो पाया है। यदि गंगा तटवर्ती हिमालय प्रदेशों में आरोग्य वर्धक स्वास्थ्य गृह खोलने की ओर सरकार ध्यान दे तो उससे रोगियों को शारीरिक ही नहीं आध्यात्मिक भी आशाजनक लाभ हो सकता है।

संसार की प्रत्येक वस्तु के तीन स्तर होते हैं- 1. स्थूल 2. सूक्ष्म 3. कारण। बाह्य दृष्टि से जो गुण या लाभ दिखाई पड़ते हैं वे स्थूल हैं। जो वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा गम्भीर अनुसंधान द्वारा प्रमाणित होते हैं वे सूक्ष्म हैं और जो तत्वदर्शी आत्म विज्ञान वेत्ता सूक्ष्म दृष्टा योगियों के द्वारा योग दृष्टि से देखें और समझे जाते हैं वे कारण-गुण कहलाते हैं। तुलसी यों स्थूल दृष्टि से एक हरा-भरा पौधा मात्र है। सूक्ष्म दृष्टि से ज्वर नाशक एवं अन्य कई रोगों का शमन के गुण उसमें है। कारण शोध पर पता चलता है कि उसमें सतोगुणी आध्यात्मिक तत्व इतनी अधिक मात्रा में है कि उसे घर में लगाने से और सेवन करने से शरीर में सतोगुणी प्रवृत्तियाँ अनायास ही बढ़ने लगती हैं। इसीलिये इसका धार्मिक कार्यों में उत्साहपूर्वक प्रयोग किया जाता है। गाय के संबंध में भी यही बात है। स्थूल दृष्टि से वह एक सीधा-साधा उपयोगी पशु मात्र है। सूक्ष्म दृष्टि से दूध में प्राण तत्व एवं जीवनी शक्ति की उतनी अधिक मात्रा है जितनी संसार के और किसी पदार्थ में नहीं। कारण दृष्टि से उसके कणों में देवत्व के परमाणु व्याप्त है जिसके सान्निध्य से मनुष्य में दिव्य गुण, धर्म, स्वभावों की, आचार एवं विचारों की अभिवृद्धि होती है। तुलसी और गाय की तरह प्रत्येक पदार्थ में अपने-अपने स्थूल, और कारण स्तर होते हैं। उन्हीं के अनुसार उनके गुणों का निरूपण किया जाता है। प्याज और लहसुन में स्थूल दृष्टि से थोड़ी सी बदबू के अतिरिक्त अन्य सब गुण-ही-गण् हैं पर कारण दृष्टि से उनमें तामसिकता की प्रधानता है। सेवन करने वालों में काम विकार और क्रोध भड़काते हैं इसलिए इन्हें त्याज्य माना जाता है।

गंगा भी स्थूल दृष्टि से, एक आर्थिक लाभ वाली उपयोगी नदी मात्र है। सूक्ष्म दृष्टि से उसमें आरोग्य वृद्धि का विशेष गुण है। किन्तु कारण दृष्टि से उसकी महिमा एवं महत्ता अपार है। उसकी कल-कल ध्वनि कानों को पवित्र करती है, उसके दर्शन से नेत्रों की कुवासनाएं शाँत होती हैं। उसकी समीपता से मन के कुविचारों पर अंकुश लगता है, उसके स्नान और पान से अन्तःकरण की भावनाएं सात्विक बनती हैं। मनुष्य के रोम-रोम में जन्म-जन्मान्तरों से संचित दुष्प्रवृत्तियां रमी होती हैं, इन्हीं के उभार से मनुष्य दुष्कर्म करने का थोड़ा-सा भी अवसर मिलने पर फिसल पड़ता है और न चाहते हुए भी बरबस दुष्कर्म कर बैठता है। यदि इन संस्कारजन्य प्रवृत्तियों पर अंकुश लग सके तो मनुष्य बहुत से पापों से बच सकता है।

गंगा के महात्म्य में जगह-जगह उसके पापनाशक गुण का वर्णन किया गया है। उसका तात्पर्य इन्हीं मानसिक दुष्प्रवृत्तियों से है जो अवसर आने पर, प्रलोभन उत्पन्न होने पर कुमार्ग की ओर, कुकर्म की ओर धकेल देती है। गंगा का सान्निध्य, इनके ऊपर एक शक्तिशाली अंकुश के समान है। गंगा महात्म्य में पापनाश का मूल तत्व यही अंकुश है।

कई लोग सोचते हैं कि किये हुए दुष्कर्मों का फल हमें गंगा स्नान करने के बाद न भोगना पड़ेगा, यह सोचना गलत है। किये हुए शुभ अशुभ कर्मों का प्रतिफल तो भोगना ही पड़ता है, वह स्नान आदि साधारण उपायों से छूट नहीं सकता। साधारणतया प्रत्येक कर्म का फल भोगना ही पड़ता है पर यदि उससे भी छुटकारा पाना हो तो प्रायश्चित और तपश्चर्या का कष्ट साध्य उपाय ही उसका माध्यम हो सकता है। चोरी करने वाले को जेल होती है, पर यदि चोर अपनी भूल मान कर अपना पाप प्रकट कर दे, चुराई हुई वस्तु लौटा दे और जितना दण्ड कानून से मिलना चाहिए उतना दण्ड भुगतने को स्वेच्छापूर्वक तैयार हो जाए तो उसे जेल से छूट मिल सकती है। जैसे गोपाल ने घनश्याम की चोरी की। कुछ दिन बाद उसे सद्बुद्धि आई। चोरी के पाप की भयंकरता को समझा। अब वह उस पाप से छूटना चाहता है। उसने अपनी अन्तरात्मा से सलाह ली। वह घनश्याम के पास पहुँचा। अपना पाप प्रकट किया, चुराई हुई वस्तुएं लौटा दी और साथ ही उसे जो छः महीने की कानूनन सजा होनी चाहिए थी, उसके बदले में वह घनश्याम के यहाँ कैदी के तौर पर बिना वेतन मजदूरी करने को तैयार हो गया, साथ ही भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा भी ली। ऐसी स्थिति में निश्चय ही घनश्याम को दया आवेगी, वह उसके शुद्ध भावना का सम्मान भी करेगी। क्रोध के स्थान पर उस पर प्रेम करेगा और उसने जिस मजबूरी में चोरी की थी वह वस्तुएं तो खर्च डाली पर चुराई हुई वस्तुएं लौटाने की व्यवस्था करने में उसका कितना कष्ट और त्यागपूर्ण दौड़−धूप करनी पड़ती उसे देखते हुए संभव है घनश्याम कुछ वस्तु लौटा भी दे और कम भी लेले। साथ ही मानव के नाते वह इतना तो अवश्य ही करेगा कि छः महीने तक कैदी के रूप में उसने जो निःशुल्क सेवा करने का प्रस्ताव किया था उसे अस्वीकार कर दे अर्थात् गोपाल को गले लगाते हुए कहे- मित्र तुम्हारा इतना अलौकिक साहस ही क्या कम है जो अपना प्रकट कर दिया, वस्तुएं लौटा दी। इतना भी इस दुनिया में कौन करता है? तुम्हारा सौजन्य सराहनीय है। भूल सभी से हो जाती है, पर उस भूल को स्वीकार करना और उसका प्रायश्चित करना या तो किसी मनुष्य की महानता का सबसे बड़ा प्रमाण है। तुम महान हो, तुमने जो साहस दिखाया उसके लिए मैं गदगद हूँ अब इतना मैं नहीं कर सकता कि तुम्हें कैदी की तरह छः महीने अपने घर पर रखूँ। मैंने तुम्हें क्षमा ही नहीं किया वरन् अपनी सम्मानास्पद मित्र भी माना है। आओ- हम लोग गले मिलें और एक-दूसरे के सच्चे मित्र बन कर रहें।

इस प्रकार प्रायश्चित्य में ही चुराने वाले केवल की कंपकंपी का और जिसका चुराया गया था उसके रोप एवं शाप का शमन हो सकता है। न्यायालय को भी अपने न्याय दण्ड का प्रयोग करने की माथापच्ची नहीं करनी पड़ती। शास्त्रकारों ने उन सभी पाप कर्मों के प्रायश्चित्य बताये हैं जो किये जा चुके और जिनके दण्ड मिलने निश्चित हैं। इन प्रायश्चित्तों के आधार पर मनुष्य स्वयं अपने आप ही सुधार सकता है और उनके दण्ड को तपश्चर्या आदि के रूप में भुगत सकता है। किये जा चुके पापों की निवृत्ति का तो प्रायश्चित ही एक मात्र आधार है जो गंगा तट पर और भी सुगमता से हो सकता है। पर गंगा महात्म्य का वर्णन करते हुए शास्त्रकारों ने जिन पापों के नाश का उल्लेख किया है वे मनोगत कुसंस्कार ही है। इनकी गणना भी मानसिक पापों में ही है, उनका उफान रुक जाना भी एक प्रकार से भावी पाप नष्ट हो जाना ही है। पिछले और अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसका तात्पर्य यही है कि पिछले अनेक जन्मों के संचित उन कुसंस्कारों का शमन होता है जो पाप कर्मों के वास्तविक उत्पादक हैं।

गंगा के सान्निध्य से इन पाप वृत्तियों के नष्ट होने के अनेकों शास्त्र प्रमाण मिलते हैं। पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड, अध्याय 60, 39 और 43 में इस प्रकार के कतिपय श्लोक हैं, उनमें से कुछ नीचे देखिये-

गंगेति स्मरणादेव क्षयं याति च पातकम्।

कीर्तनादतिपापानि दर्शनाद्गुरुकल्मषम्॥

गंगा जी के नाम के स्मरण-मात्र से पातक, कीर्तन से अतिपातक और दर्शन से भारी-भारी पाप (महापातक) भी नष्ट हो जाते हैं।

स्नानात पानाश्च जाह्नव्याँ पितृणाँ तर्पणात्तथा।

महापातकवृन्दानि क्षयं यान्ति दिने-दिने॥

गंगा जी में स्नान, जलपान और पितरों का तर्पण करने से महापातकों की राशि का प्रतिदिन क्षय होता रहता है।

अग्न्ना दह्यते तूलं तृणं शुष्कं क्षणाद यथा।

तथा गंगाजलस्पर्शात् पुँसाँ पापं दहेत् क्षणात्॥

जैसे अग्नि का संसर्ग होने से रुई और सूखे तिनके क्षणभर में भस्म हो जाते हैं उसी प्रकार गंगाजी अपने जल का स्पर्श होने पर मनुष्यों के सारे एक ही क्षण में दग्ध कर देती है।

तपोभिर्बहुभिर्यज्ञैर्व्रतैर्नानाविधैस्तथा।

पुरुदानैर्गतिर्या च गंगा संसेव्य ताँ लभेत्॥

तपस्या, बहुत से यज्ञ, नाना प्रकार के व्रत तथा पुष्कल दान करने से जो गति प्राप्त होती है, गंगाजी सेवन करने से मनुष्य उसी गति को पा लेता है।

त्यजन्ति पितरं पुत्राः प्रियं पत्न्यः सुहृद्गणः।

अन्ये च बान्धवाः सर्वे गंगा तान्न परित्यजेत्॥

पुत्र पिता को, पत्नी प्रियतम को, संबंधी अपने संबंधी को तथा अन्य सब भाई-बंधु भी प्रिय को छोड़ देते हैं, किन्तु गंगाजी अपने जनों का परित्याग नहीं करती।

विष्णुपादाब्जसम्भूते गंगे त्रिपथगामिनि।

धर्मद्रवेति विख्याते पापं में हर जाह्नवि॥

गंगे! तुम विष्णु का चरणोदक होने के कारण परम पवित्र हो तथा तीनों लोकों में गमन करने से त्रिपथ गामिनी कहलाती हो। तुम्हारा जल धर्ममय है, इसलिये तुम धर्मद्रवी के नाम से विख्यात हो। जाह्नवी? मेरे पाप हर लो।

विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुपूजिता।

त्राहि मामेनसस्तस्मादाजन्ममरणान्तिकात्॥

भगवान विष्णु के चरणों से तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। तुम श्री विष्णु द्वारा सम्मानित वैष्णवी हो। मुझे जन्म से लेकर मृत्यु तक के पापों से बचाओ।

श्रद्धया धर्मसम्पूर्णे श्रीमता रजसा च ते।

अमृतेन महादेवि भागीरथि पुनीहि माम्॥

धर्म से परिपूर्ण महादेवी भागीरथी! तुम अपने शोभायमान रजःकणों से और अमृतमय जल से मुझे श्रद्धा-सम्पन्न बनाती हुई पवित्र करो।

गंगा गंगेति यो ब्रूयाद् योजनानाँ शतैरपि।

मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥

जो सैकड़ों योजन दूर से भी ‘गंगा, गंगा’ ऐसे कहता है वह सब पापों से मुक्त हो विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

पाठयज्ञपरैः सर्वैर्मन्त्रहोमसुरार्चनैः।

सा गतिर्न भवेञ्जन्तोर्गंगासंसेवया च या॥

पाठ, कर्मों से भी जीव को वह गति नहीं मिलती, जो गंगा जी के सेवन से प्राप्त होती है।

विशेषात्कलिकाले च गंगा मोक्षप्रदा नृणाम।

कृच्छ्राञ्च क्षीणसत्वानामनन्तः पुण्यसम्भवः॥

विशेषतः इस कलिकाल में सत्त्वगुण से रहित मनुष्यों को कष्ट से छुड़ाने-मोक्ष प्रदान करने वाली गंगा जी ही हैं। गंगाजी के सेवन से अनन्त पुण्य का उदय होता है।

पुनाति कीर्तिता पापं दृष्टा भद्रं प्रयच्छति।

अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम्॥

गंगा जी नाम लेने मात्र से पापों को धो देती हैं, दर्शन करने पर सप्त पीढ़ियों तक को पवित्र कर देती हैं।

न गंगासदृशं तीर्थं न देवः केशवात्परः।

ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः॥

ब्रह्मा जी का कथन है कि गंगा के समान तीर्थ, श्रीविष्णु से बढ़ कर देवता तथा ब्राह्मणों से बढ़कर कोई पूज्य नहीं है।

तीर्थानाँ तु परं तीर्थं नदीनामुत्तमा नदी।

मोक्षदा सर्वभुतानाँ महापातकिनामपि॥

गंगा तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ, नदियों में उत्तम नदी तथा सम्पूर्ण महापातकियों को भी मोक्ष देने वाली हैं।

सर्वेषाँ चैव भूतानाँ पापोपहतचेतसाम्।

गतिरन्यत्र मर्त्यानाँ नास्ति गंगासमा गतिः॥

जिनका चित्त पाप से दूषित है, ऐसे समस्त प्राणियों और मनुष्यों की गंगा के सिवा अन्यत्र गति नहीं है।

पवित्राणाँ पवित्रं या मंगलानाँ च मंगलम्।

महेश्वरशिरोभ्रष्टा सर्वापापहरा शुभा॥

भगवान शंकर के मस्तक से होकर निकली हुई गंगा सब पापों को हरने वाली और शुभकारिणी है। वे पवित्रों को भी पवित्र करने वाली और मंगलमय पदार्थों के लिये भी मंगलकारिणी हैं।

कहा भी गया है- ‘औषधि जाह्नवी तोयं वैद्यो नारायणः हरिः।’ अर्थात् आध्यात्मिक रोगों की दवा गंगाजल है और इन रोगों के रोगियों के चिकित्सक नारायण हरि परमात्मा हैं। उन्हीं की कृपा से आन्तरिक पाप-दोषों का समाधान होता है। पाप वृत्तियाँ एक प्रकार की आध्यात्मिक बीमारियाँ ही हैं इनका उपचार साँसारिक उपायों से नहीं वरन् गंगातट पर निवास करते हुए नारायण हरि की, परब्रह्म परमात्मा की उपासना करने में ही है।


हे दयामय! हमें अंधेरे से निकाल

(महात्मा गाँधी)

इस जगत में कोई अवर्णनीय छिपी शक्ति घट-घट में भरी हुई है। वह मुझे इन आँखों से तो नहीं दिखाई देती है, फिर भी मुझे यह प्रतीति जरूर होती है कि वह है। वह अदृष्ट शक्ति हम पर किसी-न-किसी तरह अवश्य प्रभाव डालती है। उसके वर्णन के लिये कोई विशेषण काफी नहीं हो सकता क्योंकि वह इन्द्रियातीत है, अपनी इन्द्रियों से हम जो कुछ भी जान सकते हैं, उससे वह भिन्न है।

फिर भी थोड़े अंश में ईश्वर की हस्ती को सिद्ध करने के लिये बुद्धि-तर्क का प्रयोग हो सकता है। सामान्यतः प्राकृत जगत में भी हम जानते हैं कि कई लोग अपने राजा को न तो पहचानते ही हैं, न उसके विषय में उन्हें कुछ ज्ञान ही होता है कि वह राजा कैसे और क्यों राज्य करता है? ऐसा होते हुए भी लोग इतना निश्चित जानते हैं कि कोई-न-कोई राजा अवश्य है। मैसूर यात्रा में मैंने ऐसे अबोध लोग पाये जिनको पता नहीं था कि मैसूर में कौन राज्य करता है, जब मैंने उनसे पूछा, तब उन्होंने जवाब दिया- ‘कोई देव राज्य करता होगा’ इससे यह नतीजा निकलता है कि जब इन लोगों का ज्ञान अपने राजा के बारे में इतना कम है, तब मेरा ज्ञान ईश्वर के बारे और भी कितना कम होना चाहिये, क्योंकि जितना अन्तर उन लोगों के और उनके राजा के बीच में है, उससे बहुत अधिक अन्तर मेरे और ईश्वर के दरम्यान है। ऐसी दशा में यदि मैं उस राजेश्वर-परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाता हूँ तो इसमें कौन-सा आश्चर्य हो सकता है? परन्तु जिस प्रकार मैसूर के गरीब लोग अपने राजा को न जानते हुए भी यह जानते हैं कि हमारे देश में कुछ-न-कुछ व्यवस्था जरूर है, ठीक उसी प्रकार मैं भी जानता हूँ कि इस जगत में एक बड़ी व्यवस्था कायम है। मैं अनुभव करता हूँ कि इस विश्व की प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक जीवधारी एक अविचल नियंत्रण के मातहत काम कर रहे हैं। वह नियंत्रण जड़ नहीं हो सकता, क्योंकि कोई जड़ नियंत्रण चैतन्यमय मनुष्य पर शासन नहीं कर सकता। और अब तो श्री जगदीशचन्द्र बसु ने हमें सिद्ध कर दिखाया है कि इस जगत में सब चीजें चैतन्यमय हैं। इसलिए हम यह क्यों न कहें कि जो शक्ति जीव-मात्र को नियमबद्ध रखती है, वही ईश्वर है। इसमें शक्ति और उसका संचालक, नियम और नियन्ता एक ही है। परन्तु इसलिये कि मैं उस नियम और नियन्ता से अनजान हूँ, मुझे कोई अधिकार नहीं है कि मैं उसकी हस्ती से ही इन्कार कर दूँ। जिस तरह प्राकृत राजा की हस्ती से इन्कार करने से उसकी हस्ती मिट नहीं सकती, न कोई लाभ ही हासिल हो सकता है, ठीक इसी प्रकार ईश्वर की हस्ती से इनकार या अज्ञान से कुछ हासिल नहीं हो सकता, मैं ईश्वरीय कानून की पाबन्दी से किसी प्रकार छूट नहीं सकता। बल्कि जैसे प्राकृत राजा की हस्ती और उसके नियमों को मानने से उलटा उसके शासन में रहना सरल होता है, उसी तरह ईश्वर और उसके नियमों के ज्ञान और स्वीकार करने से इस संसार में जीवन सरल बनता है।

मुझे यह निरन्तर अनुभव होता है कि मेरे इर्द-गिर्द सब वस्तुओं में परिवर्तन होता ही रहता है और इस परिवर्तन के अन्दर कोई अपरिवर्तनीय तत्व समाया हुआ है। वह अपरिवर्तनीय, अविचल शक्ति सबको धारण कर रही है, सबको पैदा करती है, सबका नाश करती है और फिर से रचना करती है, इसी शक्ति को ईश्वर कहिये। क्योंकि दृष्ट पदार्थ-मात्र का नाश होता रहता है, इससे मैं इस नतीजे पर पहुँचता हूँ कि एक अदृश्य ईश्वर ही कायम है।

अब प्रश्न है कि यह शक्ति पोषक है या नाशक? दैवी है या राक्षसी? मैं उसे पोषक और दैवी अनुभव करता हूँ, क्योंकि इस मृत्युमय संसार में जीवन प्रवाह अविच्छिन्न चल रहा है। असत्य नाशवान है, एक सत्य ही स्थिर है। अंधेरे में भी प्रकाश भरा ही है। इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर चेतन है, सत्य है, प्रकाश है, ईश्वर प्रेम की मूर्ति है, वही शुभतम शुभ है।

परन्तु जो केवल बुद्धि को ही तर्क को ही संतुष्ट करके रह जाए, वह ईश्वर कहाँ से हो सकता है? फिर बुद्धि को तो निश्चित रूप से संतुष्ट करना असंभव सा है। इसलिये ईश्वर तो वही है, जो हृदय का स्वामी बन सकता है, जो उसको हिला सकता है। अपने भक्त के प्रत्येक कार्य में उस प्रभु की प्रतीति होनी चाहिये और यह मैं कर सकूँगा। मेरे नम्र और मर्यादित अनुभव से मेरा यह मन्तव्य दृढ़ हुआ है। जितना मैं शुद्ध होने की कोशिश करता हूँ, उतना ही मैं ईश्वर के नजदीक जा रहा हूँ- ऐसी प्रतीति होती है। आज तो मेरी श्रद्धा यत्किंचित् ही कहीं जा सकती है, लेकिन जब वह हिमालय जैसी अचल और उसकी चोटी पर बसने वाले हिम की तरह शुद्ध और स्वर्णमय बन जायेगी, तब तो मैं उसके कितना नजदीक पहुँच जाऊंगा? तब तक तो स्वर्गीय ‘न्यू मैन’ के शब्दों में हम गावें-

हे दयामयी ज्योति!

इस अंधेरे में तू ही मेरा अगुआ बन।

रात-अंधेरे से छा गयी है।

मैं घर से दूर-दूर भटक रहा हूँ।

तू ही मेरा अगुआ बन।

मेरे पैरों को साबित रख।

मुझे दूर के दृश्यों की कोई दरकार नहीं है।

बस, मेरे लिए तो एक कदम ही काफी है।


मन को स्वस्थ कैसे बनाया जाए

(श्री रामखेलावन चौधरी)

शारीरिक स्वास्थ्य जीवन में आवश्यक है परन्तु उससे कहीं अधिक मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकता है। मनोवैज्ञानिक खोजों से यह सिद्ध हो चुका है कि यदि मनुष्य का मन स्वस्थ नहीं है, तो शरीर भी स्वस्थ नहीं रह सकता। बहुत से लोग सिर दर्द, अपच, भूख की कमी, जोड़ों के दर्द तथा इसी प्रकार के अन्य रोगों से कष्ट पाते रहते हैं, परन्तु जब वे डाक्टरों के पास जाकर अपने शरीर के विभिन्न अंगों की जाँच करवाते हैं, तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य होता है कि शरीर में कहीं कोई खराबी नहीं है। वास्तव में उनके कष्ट का कारण कोई न कोई मानसिक विकार होता है और डॉक्टर कोई दवा देकर उसे दूर करने में असमर्थ होता है। प्रायः वह यही कह देता है कि आपको कोई रोग नहीं है, खाइये, पीजिये, ठीक हो जायेगा। वास्तव में ऐसे लोगों को मानसिक उपचार की आवश्यकता है। मानसिक उपचार के अंतर्गत औषधियों को कोई स्थान नहीं प्राप्त है। उसके लिये आवश्यक है मनुष्य के दृष्टिकोण में परिवर्तन। यह काम कुछ परिस्थितियों में मनोवैज्ञानिकों को सौंपा जा सकता है क्योंकि वे ही ऐसी विधियों से अवगत होते हैं जिनसे किसी व्यक्ति के जीवन के प्रति उसके दृष्टिकोण को बदला जा सकता है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए मनोवैज्ञानिकों पर बहुत अधिक निर्भर रहना, बहुत उचित नहीं कहा जा सकता। मनोवैज्ञानिक तो केवल पागलों, असाधारण मानसिक असंतुलन की दशा वाले व्यक्तियों का उपचार करने में विशेष होता है। उसका काम इतना खर्चीला होता है कि सामान्य मानसिक स्वास्थ्य के लिए उसकी सेवायें प्राप्त करना कठिन है। यदि साधारण जन कुछ बातों का ध्यान रखें तो वे अपने आप मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा मनोवैज्ञानिकों की सहायता के बिना ही कर सकते हैं। अतः हम इन बातों पर संक्षेप में प्रकाश डालेंगे।

सबसे पहले हमें यह जानना चाहिए कि मनुष्य का मन कैसे बनता है और उसकी शक्ति का स्रोत क्या है? अब से दो-सौ वर्ष पहले प्राच्य तथा पाश्चात्य दर्शन और धर्म की मान्यता यह थी कि ‘मन’ और ‘शरीर’ दो अलग-अलग संज्ञाएं हैं। शरीर नाशवान है परन्तु ‘मन’ आत्मा की शक्ति है, जो शरीर के नष्ट होने पर अपना काम बन्द कर सकती है परन्तु नष्ट नहीं होती। जीव-विज्ञान की खोजों के फलस्वरूप इस मान्यता में परिवर्तन हो गया है। मन-शक्ति भी शरीर का एक धर्म है। उसका निवास मस्तिष्क और स्नायु मंगल में होता है। इन शरीराँगों के सबल-निर्बल या नष्ट होने पर मन भी सबल निर्बल और नष्ट होता है, ऐसा आधुनिक मनोवैज्ञानिकों का विश्वास है। हो सकता है कि इस मान्यता पर कुछ लोग विश्वास न करें। परन्तु इतना तो मानना ही पड़ेगा कि मन और शरीर का अन्योन्याश्रित संबंध है। यों तो शरीर के गुण अधिकाँश रूप में वंश परम्परा के अनुसार निश्चित होते हैं परन्तु जन्म के बाद से मनुष्य जैसी वायु, जल और भोजन का सेवन करता है, उसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है और शरीर के अनुसार मस्तिष्क बनता है तथा मस्तिष्क के अनुरूप मन बनता है। भारतीय साहित्य में सात्विक, राजसिक और तामसिक भोजनों की चर्चा है। इन तीन प्रकार के भोजनों से तीन प्रकार का मन बनता है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में भी विद्वानों का विचार था कि शरीर का मन से संबंध है परन्तु उस बात को ठीक वैज्ञानिक तरीके से समझाया नहीं गया था।

मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि यदि मनुष्य निरन्तर अशुद्ध वायु का सेवन करता रहे, तो उसका रक्त दूषित हो जायेगा, उसके मस्तिष्क को शुद्ध रक्त न मिलने से उसकी मानसिक क्रियाएं निर्बल हो जायेंगी। बुद्धि का विकास रुक जायेगा, अवधान शक्ति नष्ट होगी, एकाग्रता भी न पैदा हो सकेगी, आलस्य बढ़ जायेगा, शरीर पर गन्दी वायु के प्रभावों से मन पर भी प्रभाव पड़ेगा। मदिरा का सेवन करने से तर्क और चिन्तन की शक्ति निर्बल पड़ जाती है। मनुष्य की मानसिक दशा ऐसी हो जाती है कि वह व्यावहारिक जीवन व्यतीत करने में असमर्थ हो जाता है। अन्त में वह सामाजिक परिस्थितियों के साथ साम्य स्थापन नहीं कर पाता। पास-पड़ोस, सगे-संबंधी, ईष्ट-मित्र सभी उसे त्यागने लगते हैं और अन्त में उसका मानसिक स्वास्थ्य पूर्णतया नष्ट हो जाता है। विभिन्न खाद्य पदार्थों का भिन्न-भिन्न प्रभाव मन पर पड़ता है। कोई मनुष्य की संवेगात्मक शक्तियों को बल देता है, जैसे क्रोध को उद्दीप्त करता है, कोई काम शक्ति को अनावश्यक रूप से जाग्रत करता है, कोई मन को स्थिर बनाता है। इन सब बातों से स्पष्ट है कि मानसिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाने के लिए प्रत्येक मनुष्य को शुद्ध वायु, बल तथा भोजन की व्यवस्था रखनी चाहिये। खेद की बात है कि आजकल बहुत कम लोगों का ध्यान इस ओर आता है। शहरी जीवन ऐसा खराब हो गया है कि लोग भेड़-बकरियों की तरह रहते हैं, घर का बना शुद्ध ताजा भोजन न पसंद करके होटलों और जलपान गृहों की खाक छानते घूमते हैं, तम्बाकू और चाय का इतना अधिक सेवन होने लगा है कि मनुष्य अपनी आय का एक बड़ा अंश इन पर फूँक देता है। खानपान संबंधी इन आदतों को दूर किये बिना मानसिक स्वास्थ्य अच्छा नहीं बनाया जा सकता।

शुद्ध वायु, जल और भोजन के संबंध में अच्छी जानकारी प्राप्त करने के लिए सत्संबंधी साहित्य यदा-कदा पढ़ते रहना चाहिए, यद्यपि इस संबंध में मनुष्य का दृष्टिकोण सदा प्रयोगात्मक रहना चाहिए। थोड़ा विवेक से काम लेने पर मनुष्य अपनी कठिनाइयों का हल अपने आप निकाल सकता है। उदाहरण के लिए यदि आप की आय कम है, आप कोई अच्छा मकान खुली जगह में बनवा नहीं सकते और अधिक किराया देकर कोई हवादार बंगला नहीं ले सकते जिससे आपको किसी घनी आबादी वाले मोहल्ले में रहना पड़ता है, तो रोने से काम नहीं चल सकता। सवेरे तड़के उठकर खुले मैदान या पार्क में जाकर शुद्ध वायु और धूप का सेवन किया जा सकता है। यही बात खान-पान के लिए सत्य है। मनुष्य को अपने लिए भोजन की मात्रा और प्रकार का निश्चय कर लेना चाहिए। यदि ध्यान पूर्वक मनुष्य प्रायोगिक तौर पर एक अवधि तक एक प्रकार का भोजन करता रहे, तो उससे यह जान सकेगा कि वह भोजन उसके मन को स्वस्थ रखने में कहाँ तक सहायक हो सकता है। बाद में वह अपने भोजन के विषय में कोई निश्चित निर्णय कर सकता है।

श्रम-विश्राम का ध्यान रखना भी बहुत आवश्यक है। अत्यधिक श्रम से, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, मनुष्य अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। सीमा से अधिक काम करते रहने पर मानसिक शक्तियाँ कुण्ठित हो जाती हैं। मनोवैज्ञानिक प्रयोगों ने सिद्ध कर दिया है कि अधिक श्रम करने और निरन्तर करने से स्नायु दुर्बल हो जाते हैं। सोचने, कंठस्थ करने, कल्पना करने की और दूसरी शक्तियाँ जवाब दे देती हैं। इसलिए आप जो काम करें इस बात का ध्यान रखें कि यदि अपनी कार्यकुशलता घट रही है और काम की उत्तमता गिर रही है तो काम बन्द कर दीजिए। यदि आप एक काम लगातार छः घंटे करते हैं, तो उसकी उत्तमता, उस काम की उत्तमता से कम होगी यदि वह अलग-अलग दो या तीन टुकड़ों में किया गया है। जिस काम में अधिक एकाग्रता और गम्भीर चिन्तन आवश्यक होता है, उसे अधिक समय तक नहीं किया जा सकता। देर तक काम करने से वह याँत्रिक बन जाता है।

मानसिक स्वास्थ्य के लिये विश्राम भी उतना ही आवश्यक है जितना कि भोजन। विश्राम से मनुष्य खोई हुई शक्ति पुनः वापिस पा जाता है। विश्राम के अंतर्गत सोना, निश्चल लेटना, मौन रहना आदि बात आ जाती है। इन्हें कितनी देर करना चाहिए, इसकी सीमा नहीं निर्धारित की जा सकती। जिस व्यक्ति में जीवनी शक्ति अधिक होती है, वह काम भी अधिक कर सकता है और उसे कम विश्राम की आवश्यकता होगी। इसलिए आवश्यकतानुसार ही विश्राम करना चाहिए। आप प्रायोगिक तौर पर विश्राम की सीमा निर्धारित कर सकते हैं। अधिक धन कमाने के लोभ, मनोरंजन की लत और अनियमित जीवन के कारण विश्राम की ओर से मनुष्य उदासीन हो जाता है। अन्त में उसकी जीवनी शक्ति नष्ट होगी और मानसिक शक्तियाँ कुण्ठित हो जायेंगी। आप ठीक से न सोयें तो आपकी स्मृति, ध्यान और बुद्धि पर प्रभाव पड़ेगा और उन्माद का रोग लग सकता है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य के लिए विश्राम आवश्यक है।


गायत्री मंत्र की अनुभूति

(डॉ. चमनलाल गौतम)

इमन्युएल काण्ट जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिकों में से हुए हैं। उन्होंने दर्शन संबंधी बहुत पुस्तकें लिखी हैं। एक पुस्तक के उपसंहार में वह लिखते हैं कि मुझे दो बातों से भय लगता है। पहली यह कि रात्रि के समय जब मैं नक्षत्र खचित आकाश की ओर देखता हूँ तो मेरे मन में विचार उत्पन्न होते हैं कि इन लाखों और करोड़ों सितारों की रचना करने वाली शक्ति कितनी महान होंगी? इस विशालतम सृष्टि की रचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जब एक ओर उस सर्वशक्तिमान की असीम शक्तियों के बारे में सोचता हूँ और दूसरी ओर अपनी क्षुद्र और सीमित शक्तियों पर नजर डालता हूँ तो मुझे भय लगता है कि वह सृष्टि की रचना करने वाला कितना महान है और मैं कितना छोटा हूँ।

दूसरी बात जिससे भय लगता है, यह है कि जब मैं कोई अनुचित कार्य करता हूँ तो मेरे अन्दर से एक आवाज आती है कि यह कार्य तुम्हें नहीं करना चाहिए, यह अनुचित है। वह आवाज इतनी शक्तिशाली होती कि मुझ पर अपना हुक्म चलाती है। जब मैं इस संबंध में गम्भीरता पूर्वक विचार करता हूँ तो प्रतीत होता है कि यह मेरे अंतर से आनी वाली आवाज मुझ से किसी महान शक्ति के द्वारा प्रसारित होती है।

काण्ट लिखते हैं कि इन दोनों बातों से उन्हें भय लगता है और उनका अनुमान है कि सृष्टि की रचना करने वाली महान शक्ति और मेरे अन्तर से प्रेरणा देने वाली शक्ति दोनों एक है। परन्तु इनका कोई वैज्ञानिक तथ्य प्राप्त नहीं होता और बुद्धि से इसका समाधान भी नहीं होता, इसलिये मैं इसको मानने के लिये तैयार नहीं हूँ। वह मान भी कैसे सकते हैं? बुद्धि तो तर्क-वितर्क करती है। अनुभव से ही विश्वास की नींव पक्की होती है।

भारतीय ऋषियों का आधार अनुभव था, अनुमान नहीं। जिस बात को इमेन्युएल काण्ट ने अनुमान मात्र कहकर छोड़ दिया, उसकी अनुभूति लाखों वर्ष पहिले भारतीय ऋषियों ने यहाँ कर ली थी। वह अनुभूति स्थल लाखों और करोड़ों आत्माओं का तारक गायत्री मंत्र है। गायत्री मंत्र के अर्थ पर विचार करने पर यह बात स्वयमेव सिद्ध हो जाती है। भूः भुवः स्वः- पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक, तीन लोकों की रचना करने वाले ॐ रूपी परमात्मा है। उनकी वरणीय ज्योति का हम ध्यान करते हैं। क्यों करते हैं? उनसे हमारा क्या संबंध है? इसलिये कि वह ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ हमारी यह है कि जो सृष्टि की रचना करने वाले हैं वही हमारी बुद्धि के प्रेरक हैं। इन दोनों शक्तियों में कोई अन्तर नहीं है।

जिस बात को काण्ट अनुमान के साथ कहते हैं, उसे गायत्री मंत्र के ऋषि निश्चय के साथ कहते हैं कि ऐसा ही है क्योंकि यह उनकी साक्षात अनुभूतियों का परिणाम है।

गायत्री मंत्र के अर्थ पर कुछ और गम्भीरता पूर्वक विचार करें तो प्रतीत होता है कि इससे तीन बातों का ज्ञान होता है- 1. ‘सवितुर्वरेण्यं भर्ग’ वह तेजस्वी वरण करने योग्य और पाप नाशक शक्ति अर्थात् परमात्मा तत्व। 2. ‘धियो यो नः’ जीव का बुद्धि तत्व 3. ‘प्रचोदयात्’ परमात्मा और बुद्धि बल को मिलाने वाला प्रेरक संबंध। एक अखिल ब्रह्माण्ड का केन्द्र है, दूसरा जीवन का केन्द्र। तीसरा उनको मिलाने वाला प्रचोदयात्मक तत्व।

गायत्री मंत्र वह दिव्य शक्ति है जो मनुष्य की क्षुद्रताओं को नष्ट करती है, मलिनताओं को धोती है, उसके आसुरी तत्वों को समाप्त कर दैवी तत्वों का विकास करती है। क्षुद्र से क्षुद्र प्राणी की अनुभूति है कि छोटे से छोटे अनुचित कार्य करते हुए उसके अपने अन्दर से एक आवाज आती है कि यह कार्य अविवेक पूर्ण है। इससे उसको या समाज को हानि होगी। यह उसे करना न चाहिए। लोभ के वशीभूत होकर मनुष्य घृणित से घृणित कार्य करने पर उतारू हो जाता है परन्तु एकबार यह आवाज अवश्य आती है। गायत्री मंत्र का साधक उसे स्पष्ट और शक्तिशाली रूप में अनुभव करता है। साधना और तप के अभाव से वह उस आवाज के अनुसार भले ही आचरण न कर सके परन्तु यह निश्चित है कि वह अपनी कमी को अनुभव करता है। यह सफलता की पहली सीढ़ी है। प्रायः देखा जाता है कि लोग अपनी कमियों और कमजोरियों का अनुभव ही नहीं करते, उनके मानस क्षेत्र में अंधकार का पर्दा पड़ा रहता है। उनके दोष उन्हें दोष ही दिखाई नहीं देते, दोषों की निवृत्ति कैसे हो? गायत्री का साधक ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता जाता है त्यों-त्यों उसे अपने दोष स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। उसकी आत्मा उसे निरंतर नोचती रहती है। एक दिन वह भी आ जाता है कि उसे छोड़ने पर उतारू हो जाता है। जिस बात को साधारण व्यक्ति एक कठिन समस्या मानते हैं, गायत्री के सहायक के लिए वह एक सहज बात होती है क्योंकि गायत्री मंत्र मनुष्य के स्थूल तत्व को कम करके सूक्ष्म तत्व को विकसित करता जाता है। सूक्ष्म तत्व के विकास होने पर शक्ति की वृद्धि होती है। शक्ति वृद्धि होने पर दोषों और दुर्गुणों के विरुद्ध संघर्ष करने और उन पर विजय पाने की शक्ति प्राप्त होती है। ज्यों-ज्यों यह सामर्थ्य बढ़ती जाती है त्यों-त्यों मनुष्य अणु से महान बनता जाता है। यही गायत्री मंत्र की साधना का उद्देश्य और यही उसकी अनुभूति है।

गायत्री मंत्र की साधना से अंतःकरण में एक दिव्य-ज्योति की उत्पत्ति होती है जो हृदय गत अंधकार को नष्ट करती है, जिस प्रकार से साबुन से कपड़े उजले हो जाते हैं, झाड़ू से कमरे को साफ किया जाता है, उसी प्रकार से गायत्री मंत्र रूपी दिव्य साबुन मन रूपी कपड़ों को साफ करता है। यह ऐसा चमत्कारी दिव्य झाड़ू है कि मन रूपी कमरे में जो दुर्गुण, दोष आसक्ति राग-द्वेष सभी कूड़ा पड़ा हुआ है, उसको धीरे-धीरे निकाल देता है। यह कूड़ा-करकट निकलने के बाद ही मन भगवान के बैठने योग्य पवित्र आसन बनता है। गायत्री मंत्र की साधना भगवान को बुलाने का एक प्रकार का निमन्त्रण पत्र है क्योंकि इससे बुद्धि शुद्ध व पवित्र होती है और ऐसे साधक को परमात्मा का साक्षात्कार होता है।


मानव की सद्वृत्तियों एवं शक्तियों को जगाना आवश्यक है।

(श्री अगरचन्द नाहटा)

संसार विचित्रताओं का भण्डार है। प्रकृति ने प्रत्येक प्राणी में रूप, रंग, आकृति, आवाज, रुचि आदि की भिन्नता रखी है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना व्यक्तित्व सिद्ध है। अर्थात् बहुत बातों में समानता होने पर भी कुछ बातों में ऐसा मौलिक भिन्नता या विशेषता पाई जाती है, जिससे उनकी स्वतंत्र रूप से पहचान हो सके।

वैसे तो समय-समय पर मानव की रुचि और मान्यता पर अच्छाई और बुराई आधारित है। पर बहुत सी बातें ऐसी भी होती हैं, जिन पर देश, काल एवं परिस्थिति का प्रभाव नहीं पड़ता। कोई बुरी बात सब समय के लिए बुरी ही मानी जाती है, तो कई अच्छी बातें भी चिरकाल से अच्छी ही मानी जाती रही है। अच्छाई और बुराई का भी संबंध जुड़ा हुआ सा है। एक ही व्यक्ति में कुछ बातें भली हैं, तो कुछ बुरी भी मिलती है। सब समय व्यक्ति के भाव एक जैसे ही नहीं रहते। अतः अच्छा व्यक्ति बुरा भी बन जाता है और बुरा अच्छा। इससे यह सिद्ध होता है कि प्रत्येक व्यक्ति में बुराई के साथ अच्छाई भी रहती है और सदा के लिए कोई व्यक्ति बुरा ही नहीं होता।

भारतीय मनीषियों ने मानव की वृत्त एवं प्रवृत्तियों को दो या तीन भागों में बाँट दिया है। वे हैं दैवी और आसुरी तथा सात्विक, राजसिक, तामसिक। ये इनके ग्रंथोक्त भेद हैं। प्रकृति से ही प्रत्येक मानव में अच्छी और बुरी वृत्तियों का चक्र चलता रहता है, उसे देवासुर संग्राम कहा गया है।

दुष्ट व्यक्तियों में भी सात्विक भाव होते अवश्य हैं। इस बात का हम इस तरह से भी अनुभव कर सकते हैं कि पवित्र वातावरण एवं सन्तपुरुषों की संगति में रहने से दुष्ट भी शिष्ट बन जाते। इससे यह मालूम होता है कि सात्विक भाव उसमें विद्यमान अवश्य था, पर वह दबा हुआ था, जो अच्छे निमित्त को पाकर प्रकट हो गया। इसलिए महापुरुषों ने पापियों से घृणा न कर, पाप से घृणा करने का उपदेश दिया है। सन्त-महात्माओं ने सदा यही काम किया है। उन्होंने जनता की सोई या दबी हुई अच्छी वृत्तियों एवं शक्तियों को जागृत एवं प्रकट कर दिया है। इसके लिये सबसे पहले उन्होंने अपने जीवन को ऊंचा उठाया, महान साधना की। क्योंकि व्यक्ति का प्रभाव बिना उसमें विशेष गुण प्रकट हुए, दूसरों पर यथेष्ट रूप में नहीं पड़ता। साधक का कान, असाधक के लम्बे व्याख्यानों से भी अधिक प्रभावशाली होता है, क्योंकि उसके पवित्र जीवन से दूसरों के हृदय में उनके लिये आदर एवं भक्ति-भाव स्वयं प्रकट हो जाता है और उस आदर-भाव से प्रकट होने के बाद उस व्यक्ति का एक-एक शब्द जादू-का-सा असर करता है। हम देखते हैं कि ‘अंगुलिमाल’ जैसा भयानक डाकू और महान घातक भी भगवान बुद्ध से संपर्क में आते ही साधु-पुरुष बन जाता है। इसी तरह ‘अंगुलिमाल’, भगवान महावीर का शिष्य बन जाता है, जो कि सात व्यक्तियों की हत्या रोज करता था। अर्थात् महापुरुषों के उपदेश, सत्संग या घटना विशेष से हृदय में परिवर्तन हो जाता है।

इस युग में भी महात्मा गाँधी जैसे युग-प्रवर्त्तक महापुरुष हुए, जिन्होंने अहिंसा सत्य एवं सेवा के द्वारा लाखों व्यक्तियों को अपना अनुगामी बना लिया। उनकी वाणी में इतना बल आ गया था कि लाखों व्यक्ति उनके संकेत मात्र से स्वराज के लिये प्राणों का बलिदान देने को तैयार हो गये उसी के परिणाम स्वरूप भारत स्वतंत्र हुआ। आज भी महामना विनोबा, जो मानव में रही हुई सद्वृत्तियों पर अटल विश्वास रखते हैं, हजारों लाखों व्यक्तियों के प्रेरणा केन्द्र हैं। जो काम सरकार नहीं कर सकती, हजारों व्यक्ति, सत्ता एवं अधिकार के बल पर नहीं किया जा सकता, वह काम उन्होंने मानव-हृदय को उद्बुद्ध करके सहज ही में कर दिखाया है। लाखों एकड़ भूमि, उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर लोगों का हृदय परिवर्तन करके प्राप्त कर ली है। कइयों ने तो जीवन दान तक दे दिया है। हृदय परिवर्तन एवं सद्वृत्तियों को जागृत करने का यह अनुपम उदाहरण है।

हाल ही में कई बड़े-बड़े डाकू आत्मसमर्पण करते हुए उनके शरणापन्न हो गये। इस युग का यह महान चमत्कार मानव में रही हुई सद्वृत्तियों के प्रति आस्था पैदा करता है और उन वृत्तियों को जागृत करने का महान संदेश देता है।

हम देखते हैं कि माँ का कुक्षि से जन्म ग्रहण करते ही कोई भी बच्चा दुष्ट नहीं होता। सरल एवं भोला सा लगने वाला सीधा लड़का, क्रमशः आस-पास के वातावरणादि से दुष्ट बन जाता है। अनेक कुसंस्कार उसमें प्रवेश कर जाते हैं। बुरी आदतें पड़ जाती हैं। इसलिए संग का अभाव बड़ा काम करता है, यह तो प्रत्यक्ष ही है। चाहे कुछ देरी से हो या कम मात्रा में हो, पर सत्संग का प्रभाव भी इसी तरह पड़ेगा ही। इसलिए संत-समागम में आते रहने से आत्मा की सद्वृत्तियों के जागृत होने में बड़ी सहायता मिलती है। यह प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव का विषय है, अतः सत्संग के महात्म्य पर विशेष लिखने की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती।

आत्मा अनन्त शक्तियों का भण्डार है। उसका हमें ज्ञान व भान नहीं है। अभ्यास से शक्तियों का विकास होता है। नारी को अबला कह कर उसे पुरुषार्थ हीन बना दिया गया, अन्यथा शक्ति की उसमें कमी नहीं। इसी तरह प्रत्येक व्यक्ति की गुप्त शक्तियों को जागृत कर उसे सन्मार्ग में लाने की परमावश्यकता है।

विज्ञान ने आज बहुत से बहुत आविष्कार करके परमाणु की अनन्त शक्ति को प्रत्यक्ष कर दिया है। जब भौतिक जड़ पदार्थों में भी इतनी महान शक्ति है एवं अभी और अनंत संभावनाएं हैं तो चैतन्य स्वरूप आत्मा की शक्ति का तो पार ही नहीं है। हमारे ऋषि-मुनियों के प्राप्त विवरणों से उसका कुछ आभास हमें मिल ही जाता है। योगसूत्र के विभूतिपाद में एवं जैनागमों में जो शक्तियों का विवरण है उससे स्पष्ट है कि अभी तक विज्ञान भी बहुत सी बातों में वहाँ तक पहुँच नहीं पाया है। देवों एवं विद्याधरों में तो अचिन्त्य शक्ति थी ही पर मनुष्यों में भी आध्यात्मिक शक्तियाँ इतनी विकसित हो चुकी थी कि आकाश में उड़ने के लिए वायुयानों आदि वाह्य साधनों के बिना केवल मंत्र, विद्या या इच्छा बल से ही जहाँ जाना हो वायुयानों की गद्दी से भी पहले पहुँच सकते थे। अवधिज्ञान मनपययि एवं केवल ज्ञान की शक्ति देखें तो आज का ज्ञान-विज्ञान उनके सामने कुछ भी नहीं है। कहने का आशय यही है कि आत्मा में अचिन्त्य एवं अनन्त शक्ति है, उन्हें जागृत एवं प्रकट करना है। सद्वृत्तियों, सद्गुणों का विकास करना है, हृदय परिवर्तन की कला प्राप्त करनी है जिससे मानव मात्र का मंगल हो।


Quotation

योगवासिष्ठ के दिव्य सूत्र

आहार का उपयोग प्राण-धारण के लिए है, प्राण-धारण का उद्देश्य तत्व-जिज्ञासा है और तत्व जिज्ञासा की आवश्यकता इसलिए है कि संसार में फिर जन्म-मरण दुःख न भोगना पड़े।

मुक्ति प्राप्त करने के लिए भोगों का त्याग, आत्म-विचार और मन तथा इन्द्रियों का निग्रह आवश्यक है और इनकी पूर्ति अपने पुरुषार्थ के सिवाय अन्य किसी विधि से नहीं हो सकती।

दृष्टा के ऊपर दृश्य पदार्थ की सत्ता रहने का नाम बन्ध है और दृश्य पदार्थ की सत्ता जिस दशा में मिट जाए उसका नाम युक्ति है।

ब्रह्मज्ञान कौन प्राप्त कर सकता है? जिसकी भोगों की इच्छा दूर हो गई हो, जिसके मनोरथ न रहे हो और जिसकी बुद्धि व्युत्पन्न हो गई हो वह ब्रह्मज्ञान का अधिकारी है।


नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है।

सर्वांगीण प्रगति को ही प्रगति कहा जा सकता है। यदि शरीर के किसी एक अंग की उन्नति हो और शेष अंग अवनत पड़े रहें तो उससे कोई सन्तोषजनक परिणाम नहीं निकल सकता। पेट खूब मोटा हो जाए और हाथ पैर पतले रहें तो इससे कुरूपता और असुविधा ही बढ़ेगी। फील पाँव रोग में एक पैर मोटा हो जाता है और शेष सब अंग स्वाभाविक रहते हैं तो वह एक पैर का मोटा होना किसी प्रकार की प्रसन्नता नहीं बढ़ा सकता। इसी प्रकार यदि हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी रहे और जीवन की अन्य दिशाएं अविकसित रहें तो वह आर्थिक उन्नति सुखदायक न होकर मोटे पैर वाले व्यक्ति की तरह कष्ट कारक ही होगी।

माना कि धन बहुत है। पर उसकी उपयोगिता तभी है जब उसका सदुपयोग होने की व्यवस्था हो, यदि उसका दुरुपयोग होने लगा तो वह अमीरी वस्तुतः गरीबी से भी अधिक कष्टदायक एवं विपत्ति उत्पन्न करने वाली होती है। उपार्जित धन को अकेला कमाने वाला ही खर्च नहीं करता उसका लाभ वह अकेला ही नहीं उठाता वरन् परिवार के सब लोग मिलजुल कर ही उसका उपयोग करते हैं। घर के अन्य सदस्य यदि बुद्धि वाले हों तो संग्रहित धन ही उनके लिये आपस में लड़ मरने या तरह-तरह के दुरुपयोग करके अन्ततः रोग, अपकीर्ति, कलह, पाप एवं दण्ड के भोगने का कारण बनता है।

आज धन उपार्जन को प्रवृत्ति बड़े प्रबल वेग से हर मनुष्य के मस्तिष्क में काम कर रही है। व्यक्ति का एक ही लक्ष्य मालूम पड़ता है, अधिकाधिक धन उपार्जन करना और उसकी होली जलाकर तमाशा देखना। आमतौर से यही प्रधान आकाँक्षा है, यह दूसरी बात है कि सफलता किसे कितनी मात्रा में मिले। धन को महत्व देना उचित है और आवश्यक भी। पर उसे इतना महत्व मिलना नहीं चाहिये कि जीवन की अन्य महत्वपूर्ण दिशाएं उपेक्षित ही पड़ी रहें।

धन की आवश्यकता परिवार के लिये होती है। मनुष्य जितना कमाता है उसका अपने लिये तो एक बहुत स्वल्प भाग ही काम में लाता है, शेष तो परिवार के प्रयोजनों में ही खर्च होता है। मरने के बाद भी मनुष्य अपने उपार्जन को अपने परिवार के लिये ही छोड़ जाता है। जिस परिवार के प्रति मनुष्यता की ममता धन के ही समान नहीं, वरन् उससे भी अधिक है, उसकी संतुलित उन्नति के लिए समुचित ध्यान न दिया जाए तो यह दुर्भाग्यपूर्ण बात ही होगी। जेवर, कपड़ा भोजन, सवारी, जायदाद आदि के साधन लोग अपने परिजनों के लिये जुटाते हैं। उनकी बीमारी, शादी आदि के अवसरों पर भी मनमाना खर्च करते हैं, पर यह ध्यान नहीं देते कि इनकी योग्यता, शक्ति, सामर्थ्य, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व को विकसित करने के लिये भी कुछ किया जाना चाहिये। बहुत हुआ तो स्कूल कॉलेजों की शिक्षा का प्रबंध कर दिया। इससे नौकरी तो मिल सकती है पर वे सद्गुण नहीं आते जो जीवन के वास्तविक विकास के लिए आवश्यक हैं। इन्हीं सद्गुणों को विकसित करने का प्रयत्न परिवार के प्रति सच्ची सेवा एवं ममता कही जा सकती है।

प्राचीन काल में यह देश नग-रत्नों की खान था। घर-घर में महापुरुष पैदा होते थे। उनके विचार और कार्य इतने उच्च कोटि के थे कि संसार भर में वे देव श्रेणी में गिने जाते थे। यहाँ के तैंतीस करोड़ निवासी, तैंतीस कोटि देवताओं के नाम से विख्यात थे। भारतीय समाज के इतने सुविकसित और सुसंस्कृत होने की महत्ता को सारे संसार ने स्वीकार किया था और इसी आधार पर भारत को जगद्गुरु एवं चक्रवर्ती शासक का सम्मान प्रदान किया था। ऐसे सद्गुणी कभी गरीब रह ही नहीं सकते। लक्ष्मी उनका पीछा छोड़ ही नहीं सकती यह देश स्वर्ण सम्पदाओं का स्वामी था। यहाँ के लोग सोने को पहनते ही न थे वरन् उसके भवन तक बनाते थे। बल और पुरुषार्थ में उनका कोई सानी न था।

भारतीय समाज प्राचीन काल में इसलिए समुन्नत था कि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार की सर्वांगीण उन्नति का ध्यान रखता था, आज की तरह केवल धन के पीछे पागल न था। सर्वांगीण प्रगति के महत्व को जब से भुलाया जाने लगा तब से पारिवारिक प्रगति रुक गई। धन कमाने वाले, ऊंचे औहदों पर नौकरी करने वाले लड़के बच्चे अब भी घरों में पैदा होते हैं, पर उनके द्वारा कोई ऐसा कार्य नहीं होता जिस पर गर्व करने की जी चाहे।

यह स्पष्ट है कि व्यक्ति का निर्माण उसकी माता करती है। माता का ज्ञान अनुभव और अन्तःकरण जितना विकसित होगा, उतना ही बालकों का मन और मस्तिष्क भी विकसित होगा। अच्छे पेड़ हमेशा अच्छी भूमि में पनपते हैं। बीज कितना ही बढ़िया क्यों न हो यदि भूमि ऊसर है तो वहाँ न तो फसल पक सकती है और न अच्छा बगीचा लग सकता है। इसी प्रकार अच्छी माताओं के होने पर ही सुसंतान की आशा की जा सकती है और जिन घरों में सुसंतति है उन्हें ही घर कहना चाहिये। अन्यथा दुर्बुद्धि और दुर्गुणी, रोगी और आलसी बालकों के घर को तो नरक का नमूना ही कह सकते हैं। वहाँ निरन्तर कलह, ईर्ष्या, द्वेष, असंतोष, चोरी, अवज्ञा, अपकीर्ति एवं उत्पात की आग जलती रहेगी। ऐसे घरों में उसी तरह गुजारा करना पड़ता है जैसे सूत मरघट में अपनी जिन्दगी गुजारता है।

माता के संस्कार बालक पर जाते हैं यह एक निश्चित तथ्य है। इसलिये जिन्हें अपने घर को सुसंतति से हरा-भरा, फला-फूला देखना हो उन्हें पहले माता का निर्माण करना चाहिए। लोग इतना ही करते हैं कि बालक स्वस्थ हो इसके लिये गर्भावस्था में स्त्री को घी दूध, मेवा, लड्डू आदि खिलाते हैं। दूध अधिक निकले इसके लिए माता को जीरा, सोंठ, बबूल का गोंद आदि खिलाते हैं। इससे लोगों की बुद्धि में इतनी समझदारी तो जान पड़ती है कि वे माता को खिलाने से उसका लाभ बालक को मिलने की बात स्वीकार करते हैं। बच्चा बीमार हो तो माता को परहेज से रहने की अमुक चीज खाने, अमुक न खाने की हिदायत करते हैं। पर यह बुद्धिमानी यहीं समाप्त हो जाती है। कैसा अच्छा होता यदि लोग यह भी अनुभव करते कि माता के ज्ञान, अनुभव और अन्तःकरण के विकास का प्रभाव बालकों पर भी अवश्य पड़ेगा। इसलिये सन्तान को सुयोग्य बनाने के लिए पहले उसकी माता को सुयोग्य बनाना आवश्यक है। यदि इतनी जानकारी लोगों की रही होती तो आज हमारे समाज का स्तर ही दूसरा हुआ होता।

राम हमारे घरों में आये, इसके लिए कौशल्या की जरूरत है। कृष्ण का अवतार देवकी की कोख ही कर सकती है। कर्ण, अर्जुन और भीम के पुनः दर्शन करने हों तो कुँती तैयार करनी पड़ेगी। हनुमान चाहिये तो अंजनी तलाश करनी होगी। अभिमन्यु का निर्माण कोई सुभद्रा ही कर सकती है। शिवाजी की आवश्यकता हो तो जीजाबाई का अस्तित्व पहले होना चाहिये यदि इस ओर से आँखें बंद कर ली गई और भारतीय नारी को जिस प्रकार अविद्या और अनुभव हीनता की स्थिति में रहने को विवश किया गया है, उसी तरह आगे भी रखा गया हो आगामी पीढ़ियाँ और भी अधिक मूर्खता उद्दंडता लिए युग आवेगी और हमारे घरों की परिपाटी को नरक बना देंगी। परिवारों से ही समाज बनता है फिर सारा समाज और भी घटिया लोगों से भरा होने के कारण अब से भी अधिक पतनोन्मुखी हो जायेगा।

आज हमारे बालकों की क्या स्थिति है, इसे बाहर ढूंढ़ने जाने या कोई रिपोर्ट तैयार कराने की जरूरत नहीं है। हममें से हर कोई अपने-अपने घरों को देख सकता है और छाती पर हाथ रखकर कह सकता है कि अपने बच्चों के गुण कर्म स्वभाव के संबंध में संतोष है या असन्तोष? अब अंधे माता-पिता को कंधे पर बिठा कर तीर्थ यात्रा कराने वाले श्रावण कुमार ढूंढ़ने न मिलेंगे। पिता का संकेत और विमाता की इच्छा मात्र प्रतीत होते ही वन गमन करने वाले राम आज किसी घर में तलाश तो किये जाएं? भाई के लिये जान देने वाले भरत और लक्ष्मण शायद ही किसी विरले घर में मिलें? पति के आदेश पर बिक जाने वाली शैव्या आज कितने पतियों को प्राप्त है यह जानना कठिन है। ऐसे उच्च मानसिक स्तर से भरे हुए परिवार आज ढूंढ़े नहीं मिल सकते। इसका एकमात्र कारण है- नारी की अधोगति। जब सोता ही सूखा गया तो नाले में पानी कहाँ से बहेगा? जब नारी की दुर्दशाग्रस्त स्थिति में पड़ी है तो उससे उत्पन्न होने वाली सन्तान के समुन्नत होने की आशा करना दुराशा मात्र ही है।

शरीर के सुख साधन पैसे के बल पर खरीदे जा सकते हैं पर आत्मा को विकसित करने वाले सद्गुण धन के बदले में नहीं मिल सकते। परिजनों की भौतिक समृद्धि के सुखोपभोग के ऐशोआराम के साधन कोई धनी व्यक्ति आसानी से जुटा सकता है पर बालकों पर संस्कार डालने का काम धन खर्च करने मात्र से नहीं हो सकता। यदि इतने में ही परिवार की उन्नति हमने मान रखी हो तो बात दूसरी है पर यदि हमने विकसित व्यक्तित्व का मूल्याँकन किया हो और यह माना हो कि बात की बात में नष्ट हो जाने वाली दौलत की अपेक्षा व्यक्तित्व की प्रतिभा की महत्ता अधिक है तो निश्चय ही उसके लिए वे प्रयत्न करने होंगे जिनसे व्यक्तित्व विकसित होता है। ऐसे प्रयत्नों में सबसे प्रधान, सब में आवश्यक यह है कि नारी के मानसिक संस्थान को प्रबुद्ध किया जाए। इसके लिए उसे एकदम घुटाने वाली पराधीनता से गुण करना होगा। इन बंधनों में रहते, किताबी ज्ञान करा देने जैसे उपायों से न उसे आगे बढ़ाया जा सकता है और न ऊंचा उठाया जा सकता है।

भविष्य की चिन्ता प्रत्येक व्यक्ति को रहती है। आने वाले कल की निश्चिन्तता के लिये जो कुछ बन पड़ता है सुरक्षात्मक प्रयत्न करते हैं। बीमा व्यवसाय इसी आधार पर टिका हुआ है। हमारा बुढ़ापा शान्तिमय बीते इसके लिये कुछ बचा लेना, जमा कर लेना ही पर्याप्त न होगा वरन् जिन लोगों के साथ जीवन के अंतिम दिन काटने हैं उन्हें सज्जन और सौम्य बना लेना ही वह कार्य होगा जिससे भावी जीवन की शाँति के संबंध में निश्चिन्तता हो सके। आज हमारे बच्चे उद्दंडता, अवज्ञा, आलस्य एवं विलासिता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। यह स्थिति अभिभावकों से लेकर अध्यापकों तक को चिन्तित बनाये हुए है। राष्ट्र का भविष्य जिस भावी पीढ़ी के हाथ में है वह यदि सद्गुणी न हुई तो समाज में बुराइयाँ ही बढ़ेंगी। जिस भ्रष्टाचार का, अनैतिकता का, विलासिता का, स्वार्थता का आज चारों ओर बोलबाला है उसके कारण अवाँछनीय कार्यों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है। यदि यह अभिवृद्धि न रुकी तो उन्नति की अनेक योजनाओं के होते हुए भी भविष्य अन्धकारमय ही रहेगा।

हमारा व्यक्तिगत और राष्ट्रीय भविष्य इस बात पर निर्भर है कि भावी पीढ़ियाँ सुसंस्कृत हों। स्कूली शिक्षा से आजीविका उपार्जन करने तथा विविध क्षेत्रों की साधारण जानकारी मिलने की बात पूरी हो सकती है, पर वे सद्गुण जो मानव की प्रधान सम्पत्ति हैं और जिनके ऊपर व्यक्ति तथा राष्ट्र की श्रेष्ठता निर्भर करती है, स्कूलों में नहीं सीखे जा सकते। उनके शिक्षण का सही स्थान है- घर का वातावरण और उसका निर्माण करती है- गृहिणी व्यक्ति और राष्ट्र की उन्नति के लिए हो रहे अनेकों प्रयत्नों में सुगृहिणी निर्माण कार्य अत्यधिक आवश्यक है। उपेक्षा करने पर बड़ी से बड़ी प्रगति भी व्यर्थ सिद्ध होगी। क्योंकि जब आगामी पीढ़ियों का व्यक्तित्व ही विकसित न हो सका तो बढ़ी हुई समृद्धि का भी कुछ लाभ न उठाया जा सकेगा वरन् बन्दर के हाथ में पड़ी हुई तलवार की तरह उसका दुरुपयोग एवं दुष्परिणाम ही हाथ लगेगा।

56 लाख साधुओं एवं भिखारियों का प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न है। इतने लोगों की उपार्जन क्षमता कुण्ठित पड़ी रहे और उनका निर्वाह भार जनता को वहन करना पड़े तो यह अर्थ संतुलन को बिगाड़ने वाली बात है। उससे भी बढ़कर चिंता की बात यह है कि हमारी आधी आबादी-नारी, कैदियों की भाँति घरों की चार-दीवारी में कलंकियों की तरह मुँह पर पर्दा डाले, घर वालों के लिए एक भार बनी बैठी रहे। इससे भी हमारा पारिवारिक एवं राष्ट्रीय अर्थ तंत्र असंतुलित ही होगा। यदि उनकी सामर्थ्य को विकसित किया जाए तो राष्ट्र के अर्थ तंत्र को समुन्नत बनाने में इतना योग मिल सकता है जितना कितनी ही विशालकाय योजनाएं भी नहीं दे सकती। इस समस्या के सामने भिखारियों की समस्या तुच्छ है। यदि हम नारी के विकास की समस्या को हल कर लें तो भिखारियों से भी अनेकों गुनी समस्या का हल हुआ समझना चाहिए।

जिन नारियों को हम माता, पत्नी, बहिन या पुत्री के रूप में प्यार करते हैं, जिन्हें सुखी बनाने की कुछ चिन्ता करते हैं उनके लिये रूढ़िवादी मान्यताओं द्वारा हम अपकार भी पूरा-पूरा करते है। किसी स्त्री का जब सूर्य अस्त हो जाता है और घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं होती तो उस बेचारी पर कैसी बीतती है इसे हममें से हर कोई जानता है। पर्दा प्रथा के कारण जो नारी बाजार से साग खरीदकर लाना भी नहीं सीख सकी, किसी के बात करना भी जिसे नहीं आता वह मुसीबत के समय पति या बच्चों के लिये दवा खरीदने या चिकित्सक को बुलाकर लाने में भी समर्थ नहीं हो सकती। ऐसी स्त्रियों को जब अपने और अपने बच्चों के गुजारे की समस्या सामने आती है तब आगे केवल अंधकार ही दीखता है। किसी के दरवाजे पर भिखारी की तरह अपमान पूर्वक टुकड़ों से पेट भरते हुए उन्हें जिस व्यथा का सामना करना पड़ता है उसकी कल्पना यदि नारी को बन्धन में रखने वाले करें तो उनकी छाती पसीजे बिना न रहेगी। मानवता का दृष्टिकोण अपनाया जाए तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि नारी का भविष्य अंधेरे में लटकता हुआ छोड़ना अभीष्ट न हो तो उसे स्वावलंबी, अपने पैरों पर खड़ी होने योग्य बनाना ही चाहिये।

दहेज की समस्या कोई स्वतंत्र समस्या नहीं, नारी की अयोग्यता की ही समस्या है। दहेज वे लोग माँगते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है। उनका कहना है कि हमारे घर की अच्छी आर्थिक स्थिति का लाभ तुम्हारी लड़की उपयोग करे इसके बदले में हमें दहेज की कीमत मिलनी चाहिए। इस माँग का दूसरा उत्तर यह हो सकता है कि दहेज का पैसा लड़की की योग्यता बढ़ाने में खर्च कर दिया जाए और उसे किसी गरीब किन्तु योग्य लड़के के साथ ब्याह दिया जाए। लड़की अपनी योग्यता से कुछ उपार्जन करके उस लड़के की आय को बढ़ा सकती है और उससे अधिक आनन्द में रह सकती है जितनी किसी अमीर घर में-केवल उन लोगों के अनुग्रह और अपनी दीनता के बल पर सुखी रहती है। यदि लड़कियाँ सुशिक्षित हो जाएं तो माँगने वालों को सौदा पटाने की हिम्मत ही न पड़े। फिर भी यदि दहेज का राक्षस न मरे तो लड़कियाँ अपनी शिक्षा के बल पर आर्थिक स्वावलम्बन प्राप्त करके अविवाहित जीवन भी व्यतीत कर सकती हैं।

किसी भी दृष्टिकोण से विचार किया जाए यह नितान्त आवश्यक है कि नारी को वर्तमान दुरावस्था में न पड़ा रहने देकर उसे ऊपर उठाया जाए, आगे बढ़ाया जाए। उसकी शक्ति और सामर्थ्य बढ़ने से हानि किसी की नहीं, लाभ सभी का है। पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर प्रत्येक क्षेत्र में उसे सहयोग देने वाली नारी, इस वंचित, अशिक्षित, अनुभवहीन, अयोग्य एवं भार रूप नारी की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होगी। विवेक की पुकार यही है कि स्वार्थ और परमार्थ की दृष्टि से, न्याय और कर्त्तव्य की दृष्टि से, नारी के विकास में सहयोग दें- बाधक न बनें।


हिमालय का हृदय-धरती का स्वर्ग

(कोई एक)

बहुत दिन पूर्व किसी मासिक पत्रिका में एक लेख पढ़ा था जिसका शीर्षक था- ‘स्वर्ग इस पृथ्वी पर ही था।’ लेखक ने धार्मिक या आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं, यह लेख भूगोल और इतिहास को दृष्टि में रखकर लिखा था। उसमें अनेकों युक्तियों से यह सिद्ध किया था कि- ‘हिमालय का मध्य भाग प्राचीन काल में स्वर्ग कहलाता था। आर्य लोग मध्य एशिया से तिब्बत होकर भारत में आये थे। उन दिनों हिमालय इतना ठंडा न था, पिछली हिमप्रलय के बाद ही वह हिमाच्छादित हो जाने के कारण मनुष्यों के लिए दुर्गम हुआ है। इससे पूर्व वहाँ का वातावरण मनुष्यों के रहने योग्य ही नहीं, अनेक दृष्टियों से अत्यन्त सुविधाजनक एवं शोभायमान भी था। इसलिए आर्यों के प्रमुख नेतागण-जिन्हें देव कहते थे- इसी भूमि में निवास करने लगे। गंगा यमुना के दुआवा, आर्यावर्त और जम्बूद्वीप में बसे हुए अपने साथियों और अनुयायियों का मार्ग दर्शन वे यहीं रहकर करते थे। सम्पत्ति, आयुध ग्रंथ तथा अन्य आवश्यक उपकरण वे यहीं सुरक्षित रखते थे ताकि आवश्यकतानुसार तथा समयानुसार उनका उपयोग समतल भूमि भिखारियों के लिए होता रहे और वे वस्तुएं युद्ध के समय दस्युओं, असुरों अनार्यों के हाथ न लगने पावे। देवताओं के राजा की पदवी ‘इन्द्र’ होती थी। प्रत्येक इन्द्र का सिंहासन इस हिमालय के हृदय प्रदेश स्वर्ग में ही होता था।

इस लेख में यद्यपि अनेकों प्रबल युक्तियाँ थीं, पर उस समय वे अपने मन में उतरती नहीं थी, क्योंकि जिस स्वर्ग की इतनी महिमा गाई गई है, जिसे प्राप्त करने के लिए हम इतना त्याग और तप करते हैं क्या वह इसी पृथ्वी का एक साधारण क्षेत्र मात्र होगा? फिर स्वर्ग को एक लोक कहा गया है। लोक का अर्थ है, पृथ्वी से बहुत दूर अंतरिक्ष में स्थित कोई ग्रह नक्षत्र जैसे स्थान। इसके अतिरिक्त मानव की अन्तरात्मा में अनुभव होने वाली सुख शान्ति को भी स्वर्ग माना जाता है। फिर हिमालय के एक भाग विशेष को स्वर्ग कैसे माना जाए?

लेकिन उसे पढ़कर यह एक बात कुछ समझ में आई कि आध्यात्मिक दृष्टि से स्वर्ग कोई लोक विशेष हो सकता है, सुख शाँति की अमुक आन्तरिक स्थिति को भी स्वर्ग कहा जा सकता है पर यही शब्द पृथ्वी के किसी महत्वपूर्ण भाग के लिए प्रयुक्त हुआ हो, ऐसा भी हो सकता है। इस तथ्य पर विचार किया तो कई ऐसी बातें सूझ पड़ी जो पृथ्वी पर स्वर्ग होने की संभावना को प्रकट करती है।

राजा दशरथ अपनी पत्नी समेत इन्द्र की सहायता के लिए अपने रथ पर सवार होकर स्वर्ग गये थे। जब रथ का पहिया धुरी में से निकलने लगा तब साथ में बैठी हुई कैकयी ने अपनी उंगली धुरी के छेद में डालकर रथ को टूटने से बचाया था। एक बार अर्जुन भी इन्द्र की सहायता के लिए स्वर्ग गये थे, तब इन्द्र ने उर्वशी अप्सरा को उनके पास भेजकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया था। एक बार इन्द्र का इन्द्रासन खाली होने पर नीचे से राजा नहुष को वहाँ ले जाया गया था और उन्हें वहाँ बिठाया गया था। त्रिशुँक भी सशरीर वहाँ पहुँचे थे। राजा ययाति सशरीर स्वर्ग गये थे। पर जब उन्होंने वहाँ अपने पुण्यों की बहुत प्रशंसा करनी आरंभ की तो उनके पुण्य क्षीण हो गये और उन्हें स्वर्ग से नीचे धकेल दिया गया। देवर्षि नारद बहुधा देव सभा में आया जाया करते थे। इस प्रकार के अनेकों उदाहरण ऐसे हैं जिनसे स्वर्ग में मनुष्यों का सशरीर आना-जाना सिद्ध होता है। देवता तो प्रायः नीचे आया ही करते थे। रामायण और भागवत में पचासों जगह देवताओं के पृथ्वी पर आने और मनुष्यों से संपर्क स्थापित करने के वर्णन आते हैं। अप्सराएं स्वर्ग से ऋषियों के आश्रमों में आती थीं और कइयों को मोहित करके उनके साथ रहती तथा संतान उत्पन्न करती थीं। शृंगी ऋषि को उनने मोहित किया था, विश्वमित्र के साथ रहकर मेनका ने शकुन्तला को जन्म दिया था। यह सूक्ष्म शक्ति वाले सूक्ष्म रूप वाले देवी-देवताओं का वर्णन नहीं है वरन् उनका है जो मनुष्यों की तरह ही शरीर धारण किये थे। चन्द्रमा और इन्द्र ने ऋषि पत्नियों से व्यभिचार किया और फलस्वरूप उन्हें शाप का भागी भी होना पड़ा था।

इन घटनाओं पर विचार करने पर ऐसा लगता है कि यदि स्वर्ग नामक कोई स्थान पृथ्वी पर भी रहा तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यदि ऐसा न होता तो देवताओं का पृथ्वी पर और भूलोक वासियों का स्वर्ग में पहुँचना कैसे सम्भव रहा होता?

पुराणों में सुमेरु पर्वत का विस्तृत वर्णन आता है जिसमें कहा गया है कि देवता सुमेरु पर्वत पर रहते थे। पतंजलि योग प्रदीप में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है- ‘---मध्य में सुवर्णमय पर्वत राज सुमेरु विराजमान हैं। उस सुमेरु पर्वत राज के चारों दिशाओं में चार शृंग (पहाड़ की चोटी) हैं। उनमें जो पूर्व दिशा में शृंग है वह रजतमय है। दक्षिण दिशा में जो है वह वैदूर्यमणिमय है, जो पश्चिम दिशा में शृंग है वह स्फटिकमय (प्रतिबिम्ब ग्रहण करने वाला) है और जो उत्तर दिशा में शृंग है वह सुवर्णमय (या सुवर्ण के रंग वाले पुष्प विशेष के वर्ण वाला) है। ----सुमेरु पर्वत देवताओं की उद्यान भूमि है, जहाँ मिश्रवन, नन्दनवन, चैत्ररथ वन, सुमानसवन-चार वन हैं। सुमेरु के ऊपर सुधर्म नामक देवसभा है, सुदर्शन नामक पुर है और वैयरुनत नामक प्रसाद (देव महल) है। ----इसके ऊपर स्वर्ग लोक है जिसको महेन्द्रलोक कहते हैं। उसमें त्रिदश, अग्निष्बाद, याम्य, तुषित, अपरिनिर्मित वशवर्ती, परिनिर्मित वशवर्ती ये छः देवयोनि विशेष निवास करते हैं। ये सब देवता संकल्प सिद्ध अणिमादि ऐश्वर्य सम्पन्न और कल्पायुष वाले तथा वृन्दारक (पूजने योग्य) कामभोग और औपपादिक देह वाले हैं और उत्तम अनुकूल अप्सराएं इनकी स्त्रियाँ है --- सुमेरु अर्थात् हिमालय पर्वत उस समय की ऊंची कोटि के योगियों के तप का स्थान था।’

महाभारत में पाण्डवों के स्वर्गारोहण का विस्तार पूर्वक वर्णन है। स्वर्ग जाने के लिए द्रौपदी समेत पाँचों पाण्डव हिमालय में गये हैं। अन्य सब तो बीच में ही शरीर त्यागते गये पर युधिष्ठिर सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे पर सशरीर स्वर्ग जाने में समर्थ हुए हैं। इन्द्र का विमान उन्हें स्वर्ग को ले गया है। यह स्वर्गारोहण स्थान सुमेरु पर्वत के समीप ही है। बद्रीनाथ से आगे तेरह मील चलने पर सीढ़ियों की तरह एक के ऊपर एक यह स्वर्गारोहण शिखर दिखाई पड़ते हैं। इन्हें स्वर्ग की सीढ़ियाँ भी कहते हैं चौखम्भा शिखरों को भी स्वर्ग की सीढ़ी कहा जाता है। इस प्रदेश से पहले यक्ष गंधर्व किन्नर रहते थे, जिनने स्वर्गारोहण के लिए जाती हुई द्रौपदी का अपहरण कर लिया था। भीम ने उनसे युद्ध करके द्रौपदी को छुड़ाया था।

पुराणों में सुमेरु के स्वर्णमय होने का वर्णन है। कवियों ने स्थान-स्थान पर सोने के पहाड़ के रूप में सुमेरु की उपमा दी है। अब भी इस हिमाच्छादित सुमेरु पर्वत पर पीली सुनहरी आभा दृष्टिगोचर होती है। देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर देवता की नगरी अलकापुरी यहाँ से समीप ही है। अलकनंदा के उद्गम स्थल को अलकापुरी कहा जाता है। इससे भी प्रदेश में स्वर्ग होने की बात पुष्ट होती है।

सुमेरु पर्वत, स्वर्गारोहण, अलकापुरी, नन्दनवन यह सभी स्थान हिमालय के उस भाग में आज भी मौजूद हैं। इसे ही हिमालय का हृदय कहते हैं। इस स्थान को यदि प्राचीन काल में स्वर्ग कहा जाता हो तो असम्भव नहीं है। गंगाजी का उद्गम भी यह पुण्य क्षेत्र है। पुराणों में वर्णन है कि गंगा स्वर्ग से नीचे उतरी। गंगा ग्लेशियर इसी प्रदेश में फैला हुआ है। भगवती शिवजी के मस्तक पर उतरी इस आख्यान की भी पुष्टि इस तरह होती है कि शिवलिंग शिखर गोमुख से ऊपर है। गंगा वहीं होकर आती हैं। शिवलिंग शिखर के पास ही नन्दन वन है। नन्दन वन स्वर्ग में ही था इसका वर्णन पुराणों में आता है। नन्दिनी नदी वहीं बहती है। स्वर्ग में रहने वाली कामधेनु की पुत्री नन्दिनी के साथ इस नदी की कुछ संगति बैठती है। चन्द्र पर्वत इसी प्रदेश में है। कहते हैं चन्द्रमा पर्वत पर निवास किया करते थे। बद्रीनाथ क्षेत्र से मिले हुए सूर्य कुण्ड, वरुण कुण्ड, गणेश कुण्ड अब भी मौजूद हैं कहते हैं कि इन देवताओं का निवास इन-इन प्रदेशों में रहता था। केदार शिखर होकर इन्द्र का हाथी मिलते हैं। एक बार ऐरावत पर चढ़े हुए इन्द्र दुर्वासा ऋषि के आश्रम के समीप होकर गुजरे और ऋषि के स्वागत का तिरस्कार किया तो उन्हें दुर्वासा ऋषि ने शाप दे दिया था।

गंगोत्री से गोमुख की ओर चलते हुए मार्ग में यह विचार आया कि यदि किसी प्रकार सम्भव हो सके तो इस धरती के स्वर्ग के दर्शन करने चाहिये। भावना धीरे-धीरे अत्यन्त प्रबल होती जाती थी पर इसका उपाय न सूझ पड़ता था। गोमुख से आगे वह धरती का स्वर्ग आरंभ होता है। मीलों की दृष्टि से इसकी लम्बाई चौड़ाई बहुत नहीं है। लगभग 30 मील चौड़ा और इतना ही लम्बा यह प्रदेश है। यदि किसी प्रकार इसे पार करना सम्भव हो तो बद्रीनाथ केदारनाथ इसके बिलकुल नीचे ही सटे हुए हैं। यों बद्रीनाथ गोमुख से पैदल के रास्ते लगभग 250 मील है पर इस दुर्गम रास्ते से तो 25 मील ही है। ऊंचाई की अधिकता, पर्वतों के ऊबड़-खाबड़ होने के कारण चलने लायक मार्ग न मिलना तथा शीत अत्यधिक होने के कारण सदा बर्फ जमा रहना, रास्ते में जल, छाया, भोजन, ईंधन आदि की कुछ भी व्यवस्था न होने आदि कितने ही कारण ऐसे हैं जिनसे वह प्रदेश मनुष्य की पहुँच से बाहर माना गया है। यदि ऐसा न होता तो गंगोत्री, गोमुख आने वाले 250 मील का लम्बा रास्ता क्यों पार करते? इस 25 मील से ही क्यों न निकल जाते?

इस मार्ग से कितने ही वर्ष पूर्व स्विट्जरलैंड के पर्वतारोही दल ने चढ़ने का प्रयत्न किया था। उसे उस आरोहण में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा था। सुना था कि शिवलिंग पर चढ़ते हुए दल के एक कुली का पैर टूट गया था और एक आरोही केदार शिखर पर चढ़ते हुए बर्फ की गहरी दरारों में फंस कर अपने प्राण गंवा बैठा था। फिर भी उस दल ने वह मार्ग पार कर लिया था। इसके बाद दुस्साहसी हिम अभ्यस्त महात्माओं के एक दल भी उस दुर्गम प्रदेश को पार करके बद्रीनाथ के दर्शन कर चुके हैं।

साहस ने कहा-’यदि दूसरे इस मार्ग को पार कर चुके हैं तो हम क्यों पार नहीं कर सकते?’ बुद्धि ने उत्तर दिया- ‘उन जैसी शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य अपनी न हो, ऐसे प्रदेशों का अभ्यास और अनुभव भी न हो तो फिर किसी का अन्ध अनुकरण करना बुद्धिमत्ता नहीं है।’ भावना बोली- ‘अधिक से अधिक जीवन का खतरा ही तो हो सकता है यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। कहते भी हैं कि स्वर्ग अपने मरने से ही दीखता है। यदि इस धरती के स्वर्ग को देखने में प्राण संकट का खतरा मोल लेना पड़ता है तो कोई बड़ी बात नहीं है। उसे उठा लेना पड़ता है तो कोई बड़ी बात नहीं है। उसे उठा लेने में संकोच न करना चाहिए।’ व्यवहारिकता पूछती थी- ‘यक्ष भी दिये तो रास्ता कौन दिखावेगा? उतनी सर्दी को शरीर कैसे सहन करेगा? सोने और खाने-पीने की क्या व्यवस्था होगी? अब तक समुद्रतल से 11 हजार फुट ऊंचाई चढ़ी गई है। ऋषिकेश से यहाँ तक आने में 170 मील में 9 हजार फुट चढ़े जिससे पैरों के देवता कूच कर गये हैं। अब आगे 12 मील के भीतर 9 हजार फुट और चढ़ना पड़ेगा तो उस चढ़ाई की दुर्गमता पैरों के बस से सर्वथा बाहर की बात होगी।

इस प्रकार अंतर्द्वंद्व चल रहा था। निर्णय कुछ नहीं हो पा रहा था। प्रश्न केवल साहस का ही न था, अपनी सीमित शक्ति के भीतर भी वह सब है या नहीं, यह भी विचार करना था। मस्तिष्क सारी शक्ति लगाकर समस्या का हल खोज रहा था, पर कोई उपाय सूझ नहीं पड़ता था। अन्तरात्मा कहती थी कि-’अब धरती के स्वर्ग के बिलकुल किनारे पर आ गये तो उसके भीतर प्रवेश करने का लाभ भी लेना चाहिये। गंगातट पर से प्यासे लौटने में कौन समझदारी है। मरने पर स्वर्ग मिला या न मिला कौन जाने। यहाँ बिल्कुल ही समीप धरती का स्वर्ग मौजूद है तो उसका लाभ क्यों नहीं लेना चाहिये?’

स्मरण शक्ति ने इस दुर्गम पथ की स्थिति बताने वाला एक प्राचीन श्लोक उपस्थित कर दिया-

तत ऊर्ध्वंतु भृमीद्घ्रा मर्त्य संचार दूरगाः।

आच्छन्नाः संततस्थापि धनोत्तुँग महाहिमै॥

गोमुखी तो विशाला दूर्नाति दूरे विराजते।

तत्रायं गमने मार्गः सिद्धानाँचामृताँघसाम्॥

‘उस (गोमुख) से आगे के पर्वत अतीवस घन, ऊंचे और भारी बर्फ से ढके हैं। वे मनुष्य की पहुँच से बाहर हैं। उस ओर से बद्रीनारायण पुरी बहुत दूर नहीं है, लेकिन वह मार्ग मनुष्य के लिए असम्भव है, वह सिद्ध और देवताओं का मार्ग है। इस मार्ग से वे ही जाते है।’

‘अपने ऐसे भाग्य कहाँ जो इस सिद्ध और देवताओं के मार्ग पर चल सकें।’ इस प्रकार की निराशा बार-बार मन में आती थी, पर साथ ही आशा की एक बिजली सी कौंधती थी और कोई कहता था कि- ‘जाकी कृपा पंगु गिरि लंघहि, रंग चलें और छत्र धाराई’ वाली कृपा उपलब्ध होती है तो वह भूतल का दुर्गम प्रदेश ही क्या और भी ऊंचे से ऊंचे दुर्गम स्तरों को पार और प्राप्त किया जा सकता है।’

यह भाव जैसे-जैसे प्रबल होते गये वैसे-वैसे ही अन्तःकरण में एक नवीन आशा और उत्साह का संचार होता गया। सर्वशक्तिमान की सत्ता कैसी अपरम्पार है कि वह कामना पूर्ण होकर रही, वह दिन भी आया जब उस पुण्य प्रदेश में प्रवेश करके वह तन सार्थक बना। न भूलने योग्य उन क्षणों का जब भी स्मरण हो आता है तब रोमाँच खड़े हो जाते हैं, आत्मा पुलकित हो उठती है और सोचता हूँ कि प्रभु यदि उन्हीं आनन्दमय क्षणों में चिरशाँति प्राप्त हो जाती तो कितना उत्तम होता। पर जो कर्मफल अभी और भोगना है उसे कौन भोगता, यह सोच कर किसी प्रकार मन को समझाना ही पड़ता है।

इस पुण्य प्रदेश हिमालय के हृदय और धरती के स्वर्ग की यात्रा और स्थिति का वर्णन करने से पूर्व, इस क्षेत्र की महत्ता पर विचार करेंगे। जिस प्रकार हृदय में स्थित रक्त धमनियों के द्वारा सारे शरीर में फैलता है, जैसे उत्तर ध्रुव का चुम्बकत्व सारी पृथ्वी पर अपना आकर्षण फैलाये हुए है, लगता है कि उसी प्रकार हिमालय का यह हृदय अपने-अपने दिव्य स्पन्दनों के द्वारा दूर-दूर तक आध्यात्म तरंगों को प्रवाहित करता है।

जिस प्रकार हृदय के ऊपर कितने ही प्रकार के स्वर्ण रत्नों से जटित आभूषण धारण किये जाते हैं, उसी प्रकार इस हिमालय के हृदय के चारों ओर एक घेरे के रूप में कितने ही महत्वपूर्ण तीर्थों की एक सुन्दर शृंखला पहनाई हुई है। महाभारत के बाद जो तीर्थ इस क्षेत्र में अस्त-व्यस्त हो गये थे उनका पुनरुद्धार करने की प्रेरणा जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य को हुई और उन्होंने कठिन प्रयत्न करके उन तीर्थों को पुनः स्थापित कराया। जिस प्रकार चैतन्य महाप्रभु ने ब्रजभूमि के विस्मृत पुण्य क्षेत्रों को अपने योग बल से पहचान कर उन स्थानों का निर्माण कराया था, उसी प्रकार जगद्गुरु शंकराचार्य को भी यह प्रेरणा हुई थी कि वे उत्तराखण्ड की विस्मृत देव भूमियों तथा तपोभूमियों का पुनरुद्धार करावें। वे दक्षिण भारत के केरल प्रान्त से चलकर उत्तराखण्ड आये और उन्होंने बद्रीनाथ आदि अनेकों मन्दिरों का निर्माण कराया। आज उत्तराखण्ड का जो गौरव परिलक्षित होता है उसका बहुत कुछ श्रेय उन्हीं को है।

इस ‘हिमालय के हृदय’ के किनारे-किनारे जितने तीर्थ हैं उतने भारतवर्ष भर में और कहीं नहीं हैं। देवताओं की निवास भूमि सुमेरु पर्वत पर बताई गई है। सुमेरु पर पहुँचना मनुष्यों के लिए अगम्य है। इसलिए जनसंपर्क की दृष्टि से कुछ नीचे उत्तराखण्ड की तपोभूमि में देवताओं ने अपने स्थान बनाये। राजा का व्यक्तिगत समय अपने राजमहलों में व्यतीत होता है, वहाँ हर कोई नहीं पहुँचता। पर राजदरबार का स्थान राजा जनकार्यों के लिए ही सुरक्षित रखता है। सुमेरु यदि देवताओं का राजमहल कहा जाए तो उससे कुछ ही नीचे के समीपतम देव स्थानों को राजदरबार कहा जा सकता है। उत्तराखण्ड के नक्शे पर एक दृष्टि डाली जाए तो यह निश्चय हो जाता कि ‘हिमालय के हृदय’ से नीचे के भाग का देवभूमि कहा जाना सार्थक ही है।

हरिद्वार से ही लीजिये। यहाँ ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था। दक्ष प्रजापति ने कनखल में यज्ञ किया था और उनकी पुत्री सती अपने पति शिव का अपमान सहन न करके इसी यज्ञ में कूद पड़ी थी। यह मायापुरी, सप्तपुरियों में से एक है। देवप्रयाग में बारह भगवान का निवास हुआ है। सूर्य तीर्थ यहाँ है रघुनाथ जी तथा काली भैरव की भी स्थापना है आगे ढुँढप्रयाग तीर्थ में गणेशजी ने तप किया था। श्रीनगर में भैरवी पीठ है, चामुण्डा, भैरवी कंसमर्दिनी, गौरी, महषिमर्दिनी, राजेश्वरी देवियों का यहाँ निवास है। चण्ड-मुण्ड, शुँभ-निशुँभ महिषासुर आदि असुरों का उन्होंने यहीं वध किया था। सौडी चट्टी से 5 मील ऊपर स्वमि कार्तिक का स्थान है। इससे पूर्व मठचट्टी के सामने सूर्य प्रयाग में सूर्यपीठ है और वहाँ से दो मील भणगा गाँव में छिन्न मस्ता देवी तथा वहाँ से दो मील आगे जैली में कूर्मासना देवी विराजमान हैं। गुप्त काशी में अन्नपूर्णा देवी का निवास है। नारायण कोटी में लक्ष्मी सहित नारायण की प्रतिष्ठा है। 1 मील पच्छिम के पहाड़ पर यक्ष देवता का मेला लगता है रामपुर से दो मील आगे शाकम्बरी देवी हैं जहाँ एक मास शाक खाकर तप करने का बड़ा महत्व मान जाता है। त्रियुगी नारायण में नारायण मन्दिर के अतिरिक्त लक्ष्मी, अन्नपूर्णा और सरस्वती की स्थापना है। शिव पार्वती विवाह भी यहीं हुआ था उस विवाह की अग्नि एक चतुष्कोण कुँड में आज तक जलती रहती है। नारायण मन्दिर में अखण्ड दीपक भी जलता है। सोन प्रयाग में मन्दाकिन और वासुकी गंगा है। वासुकी नाग का निवास इन गंगा के तट पर था। पास ही कालिका देवी का स्थान है। सोन प्रयाग से आघ मील आगे व स्थान है जहाँ शिव ने गणेश का सिर काटा था और फिर हाथी का सिर लगाया था। यहाँ बिना सिर गणेश की प्रतिमा है।

केदारनाथ तीर्थ में वह स्थान है जहाँ पाण्डव अपने कुलघात के दोष का निवारण करने के लिए शंकर भगवान के दर्शनों के लिए गये थे। पर उन पाप को देखते हुए शिवजी वहाँ से भैंसे का खल बनाकर भागे। भागते हुए भैंसे को पीछे से पाँडवों ने पकड़ लिया। जितना अंग पकड़ में आया उतना वहाँ रह गया शेष अंग को छुड़ा कर शिवजी आगे भाग गये। हिमालय में पाँच केदार हैं- केदारनाथ, मध्यमेश्वर, तुँगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर। रुद्रनाथ के समीप वैतरणी नदी बहती है। पुराणों में वर्णन आता है कि यमलोक में जाते समय जीव को रास्ते में वैतरणी नदी मिलती है। गोपेश्वर में एक वृक्ष पर लिपटी हुई बहुत पुरानी कल्पलता है जो प्रत्येक ऋतु में फूल देती है। स्वर्ग में कल्पवृक्ष या कल्पलता होने की बात की संगति इस कल्पलता से बिठाई जाती है। पास ही अग्नि तीर्थ है। यहीं कामदेव का निवास था। शंकरजी से छेड़छाड़ करने के अपराध में उसे यहीं भस्म होना पड़ा था। काम की पत्नी रति ने यहाँ तप किया था इसलिए वहाँ रति कुण्ड भी है।

पीपल कोटि से 3 मील आगे गरु गंगा है यहाँ विष्णु के वाहन गरुड़ का निवास माना जाता है। जोशीमठ में नृसिंह भगवान विराजते हैं। विष्णु प्रयाग में विष्णु भगवान का निवास है। यहाँ ब्रह्म कुँड, शिवकुँड, गणेशकुँड, टिंगी कुँड, ऋषि कुँड, सूर्यकुँड, दुर्गाकुँड, कुबेर कुँड, प्रहलाद कुँड अपने अधिपतियों के नाम से विख्यात हैं। पाण्डुकेश्वर से एक मील आगे शेष धारा है जहाँ शेष जी का निवास माना जाता है। बद्रीनाथ में नर, नारायण, गरुड़, गणेश, कुबेर, उद्धव तथा लक्ष्मी जी की प्रतिमाएं हैं। सरस्वती गंगा और अलकनन्दा के संगम पर केशव प्रयाग है, पास ही सम्याप्रास तीर्थ है। यहाँ गणेश गुफा तथा व्यास गुफा है। व्यास जी ने महाभारत गणेश जी द्वारा यहीं लिखाया था।

केदार खंड में वर्णन है कि कलियुग में मलेच्छ शासन आ जाने और पाप बढ़ जाने से शंकरजी काशी छोड़कर उत्तरकाशी चले गये अब यहीं उनका प्रमुख स्थान है। विश्वनाथ का मन्दिर यहाँ प्रसिद्ध है। देवासुर संग्राम के समय आकाश से गिरी हुई शक्ति की स्थापना भी दर्शनीय है। आगे ढोढी तालाब है, जहाँ गणेश जी का जनम हुआ था।

गंगोत्री के समीप रुद्रगैरु नामक स्थान है यहाँ से रुद्र गंगा निकलती है, यहाँ एकादश रुद्रों का निवास स्थान है। जाँगला चट्टी के पास गुँगुम नाला पर वीरभद्र का निवास है।

इस प्रकार हिमालय के हृदय स्थल पर खड़े होकर जिधर भी दृष्टि घुमाई जाए उधर तीर्थों का वन ही दिखाई देता है। गंगोत्री आदि ठंडे स्थानों के निवासी जाड़े के दिनों में ऋषिकेश उत्तरकाशी आदि कम ठंडे स्थानों में उतर आते हैं। उसी प्रकार लगता है कि देवता भी सुमेरु पर्वत से नीचे उतर उत्तराखण्ड में अपने सामुदायिक निवास स्थल बना लेते होंगे। इन देव स्थलों में आज भी जन कोलाहल वाले बड़े नगरों की अपेक्षा कहीं अधिक सात्विकता एवं आध्यात्मिकता दृष्टिगोचर होती है। देव तत्वों की प्रचुरता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण कोई व्यक्ति अब भी देख सकता है।

तपस्वी लोग तपस्या द्वारा देवतत्वों को ही प्राप्त करते हैं। जहाँ देवतत्व अधिक हो वहीं उनका प्रयोजन सिद्ध होता है। इसलिए प्राचीन इतिहास, पुराणों पर दृष्टि डालने से यही प्रतीत होता है कि प्रायः प्रत्येक ऋषि ने उत्तराखण्ड में आकर तप किया है। उनके आश्रम तथा कार्यक्षेत्र भारत के विभिन्न प्रदेशों में रहे हैं पर वे समय-समय तप साधना करने के लिए इसी प्रदेश में आते रहे हैं। विविध कामनाओं के लिए विभिन्न व्यक्तियों ने भी तपस्याएं इधर ही की हैं। अनेक असुरों ने भी अपने उपासना क्षेत्र इधर ही बनाये थे। कतिपय देवताओं ने भी तप यहीं किया था। करते भी क्यों न? धरती का स्वर्ग और हिमालय का हृदय तो यहीं से समीप पड़ता है।

बद्रीनाथ में विष्णु भगवान ने तपस्वी का रूप धारण कर स्वयं घोर तप किया था। उस तीर्थ में जाने का प्रधान द्वार होने के कारण हरिद्वार नाम पड़ा। राजा वेन ने यहीं तप किया था। कुशावर्त पर्वत पर दत्तात्रेय जी ने तप किया था। हरिद्वार से तीन मील आगे सप्त सरोवर नामक स्थान पर गंगा के बीच में बैठ कर सप्त ऋषियों ने तप किया था। गंगाजी ने उनकी सुविधा के लिए उनका स्थान छोड़ दिया और सात धाराएं बन कर बहने लगीं। बीच में सातों ऋषियों के तप करने की भूमि अलग-अलग छूटी हुई है। इसी स्थान पर जन्हुमुनि तप करते थे। जब भागीरथ गंगा को लाये और भगवती बड़े वेग से गर्जन-तर्जन करती आ रही थी तो मुनि को यह कौतुहल बुरा लगा। उन्होंने गंगा को अंजली में भरकर पी लिया। भागरथी आगे-आगे चल रहे थे उन्होंने गंगा को लुप्त हुआ देखा तो आश्चर्य में पड़े। कारण मालूम होने पर उन्होंने जन्हु मुनि की बड़ी अनुनय-विनय की तब उन्होंने गंगा को उगल दिया। इसी से सप्त सरोवर के बाद की गंगा को जन्हु पुत्री या ‘जाह्वी’ कहते हैं। इससे ऊपर की गंगा ‘भागरथी’ कहलाती है। जन्हु के उदर में रहने के कारण वे जन्हुतनया कही गई।

रावण, कुम्भकरण, मेघनाद आदि को मार डालने के कारण रामचन्द्रजी, लक्ष्मण जी को ब्रह्म हत्या का पाप लगा। इस पाप के फलस्वरूप लक्ष्मण जी को क्षयरोग और रामचन्द्र जी को उन्निद्र रोग हो गया। वशिष्ठजी ने इस पाप से छूटने के लिए उन्हें तप करने को कहा- ‘लक्ष्मणी जी ने लक्ष्मण झूला में और रामचन्द्रजी ने देव प्रयाग में दीर्घ काल तक घोर तप किया। बड़े भाइयों को इस प्रकार तप करते देखकर भरत और शत्रुघ्न ने भी उनका अनुकरण किया। भरत ने ऋषिकेश में और शत्रुघ्न ने मुनी की रेती में तप किया। इसी क्षेत्र में बाबा कालीकमली वालों का बनाया हुआ ‘स्वर्गाश्रम’ नामक स्थान है जहाँ आज भी अनेकों सन्त महात्मा तप करते हैं। लक्ष्मण झूला से 30 मील आगे व्यास घाट में व्यासजी ने तप करके आत्मज्ञान पाया था।

देव प्रयाग में ब्रह्मा जी ने भी तप किया था। अलकनंदा और गंगा के संगम का दृश्य बहुत ही मनोहर है। प्रसिद्ध विद्वान मेघातिथि ने यहीं तप करके सूर्य शक्ति को प्रत्यक्ष किया था। वशिष्ठ तीर्थ भी यहीं है जहाँ वशिष्ठजी ने तप किया था। वहाँ वशिष्ठ गुफा नाम की एक विशाल गुफा भी नगर से कुछ पहले है। रघुवंशी राजा दलीप, रघु और अज ने यहीं तप किये थे, शाप पीड़ित बैताल और पुष्पमाल किन्नरी ने भी अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए देवप्रयाग के समीप ही तप किया था।

आगे चल कर इन्द्रकील नामक स्थान पर अर्जुन ने तप करके पाशुपति अस्त्र प्राप्त किया था। खाण्डव ऋषि जहाँ तप करते थे उसके समीप बहने वाली नदी खाण्डव-गंगा कहलाती है। श्रीनगर के पास राजा सत्यसंघ ने तप करके कोलासुर राक्षस को मारने योग्य सामर्थ्य प्राप्त की थी। राजा नहुष ने भी यहीं तप करके इन्द्र पद पाया था। वन्हि धारा और वन्हि पर्वत के बीच अष्टावक्र ऋषि का तप स्थान है। राजा देवल ने भी समीप ही कठोर साधना की थी।

रुद्र प्रयाग में नारदजी ने तप करके संगीत सिद्धि प्राप्त की थी। अगस्त मुनि ने जहाँ अपना सुप्रसिद्ध नवग्रह अनुष्ठान किया था वह उन महर्षि के नाम पर ‘अगस्त मुनि’ कहलाने लगा। शौनक ऋषि ने यहाँ एक यज्ञ किया था। भीरी चट्टी के पास मन्दाकिनी के समीप भीम ने तप किया था। इससे आगे शोणितपुर में वाणासुर ने अपने रक्त का यज्ञ करके तपस्या की थी और शिवजी को प्रसन्न करके सम्पूर्ण जगत को जीत लेने में सफलता प्राप्त की थी।

चन्द्रमा को जब क्षय रोग हो गया था तो उसने कालीमठ से पूर्व मतंग शिला से पाँच मील आगे राकेश्वरी देवी स्थान पर तप करके रोग मुक्ति पायी थी। फाटा चट्टी से आगे जमदग्नि ऋषि का आश्रम है। सोमद्वार से आगे-2 मील पर गौरी कुण्ड है। पास ही नाथ संप्रदाय के आचार्य गुरु गोरखनाथ का आश्रम है। उन्होंने यहीं तप किया था। केदारनाथ तीर्थ में इन्द्र ने जिस स्थान पर तप किया था वह स्थान इन्द्र पर्वत कहलाता है। ऊखीमठ में राजा मान्धाता ने तप किया था। गुप्त काशी के पूर्व मन्दाकिनी नदी के दूसरी पार राजा बलि ने तप किया था, यहीं वलिकुण्ड है। तुँगनाथ के पास मार्कण्डेयजी का आश्रम है। मण्डल गाँव चट्टी के पास बालखिल्य नदी है। यह नदी बालखिल्य ऋषियों ने अपनी तप साधना के लिए अभिमंत्रित की थी। राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ यहीं किया था और सन्तान के लिए सौ वर्ष तक तप आयोजन भी इसी स्थान पर किया था।

नन्द प्रयाग से आगे विरही नदी के तट पर सती विरह में दुखी शंकर ने अपने शोक को शाँत करने के लिए तप किया था। कुम्हार चट्टी के 6 मील पश्चिमोत्तर ऊर्गम गाँव है यहाँ राजा अज ने तप किया था। कल्पेश्वर के समीप दुर्वासा ऋषि का स्थान था। एक दिन ऐरावत हाथी पर सवार होकर इन्द्र उधर से निकले तो महर्षि ने उन्हें फूलमाला भेंट की। इन्द्र ने अभिमान पूर्वक उसे हाथी के गले में पहना दिया। इससे क्रुद्ध होकर दुर्वासा ने इन्द्र को शाप दिया था। समीप ही कल्प स्थल है जहाँ पूर्व काल में कल्प वृक्ष का होना माना जाता है। वृद्ध बद्री के पास गुफाएं हैं जहाँ प्राचीन काल में तपस्वी लोग अपनी साधनाएं किया करते थे। जोशीमठ में जगद्गुरु शंकराचार्य ने तप किया था, उपनिषदों के भाष्य लिखे थे और ज्योतिष पीठ नामक गद्दी स्थापित की थी। यहीं उन्होंने अपना नश्वर शरीर भी त्यागा। जोशीमठ से छः मील आगे तपोवन है। यहाँ व्यास जी का वेद विद्यालय था। शुकदेवजी का आश्रम भी यहाँ से समीप में ही है। पाण्डुकेश्वर में पाण्डवों के पिता राजा पाण्डु ने तप किया था। यहाँ से 6 मील आगे हनुमान चट्टी है जहाँ वृद्ध होने पर हनुमान जी ने तप किया है। एक बार भीम उधर से निकले, उन्हें अपने बल पर अभिमान था। हनुमानजी ने कहा ऐ वीर! मैं बहुत वृद्ध बन्दर हूँ। अब मुझ से मेरे अंग भी नहीं उठते, तुम मेरी पूँछ उठाकर उधर सरका दो तो बड़ी कृपा हो। भीम ने पूँछ उठाई पर उठ न सकी। तब उन्होंने हुनमानजी को पहचाना और क्षमा माँगी। हनुमान चट्टी के पास अलकनन्दा के उस पार क्षीर गंगा और घृत गंगा का संगम है। पूर्व काल में इनका जल दूध और घी के समान पौष्टिक था। यहीं वैखानस मुनि तप करते थे। राजा मरुत ने यहीं एक बड़ा यज्ञ किया था जिसकी भस्म अभी भी वहाँ मिलती है। कर्णप्रयाग में कर्ण ने सूर्य का तप करके कवच और कुण्डल प्राप्त किये थे।

गंगोत्री मार्ग में उत्तरकाशी तपस्वियों का प्रमुख स्थान रहा है। परशुराम जी ने यहीं तप करके पृथ्वी को 21 बार अत्याचारियों से विहीन कर देने की शक्ति प्राप्त की थी। जड़भरत का र्स्वगवास यहीं हुआ था, उनकी समाधि अब भी मौजूद है। नचिकेता का तपस्थल भी यहीं है। नचिकेता सरोवर देखने योग्य है। यहाँ से आगे नाकोरी गाँव के पास कपिल मुनि का स्थान है। पुरवा गाँव के पास मार्कंडेय और मतंग ऋषियों को तपोभूमियाँ हैं। इसके पास ही कचोरा नामक स्थान में पार्वती जी का जन्म हुआ था। हरिप्रयाग (हर्षिल) गुप्तप्रयाग (कुप्ति घाट) तीर्थ भी इसी मार्ग में पड़ते हैं। आगे गंगोत्री का पुण्य धाम है जहाँ भागीरथी ने तप करके गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण किया था। यहाँ अभी भी कितने ही महात्मा प्रचंड तप करते हैं। शीत ऋतु में जब कि कभी-कभी तेरह फुट तक बर्फ पड़ती है ये तपस्वी बिल्कुल नग्न शरीर रह कर अपनी कुटियाओं में तप करते रहते हैं। गोमुख गंगा का वर्तमान उद्गम यहाँ से 18 मील है। उस मार्ग में भी कई महात्मा निवास करते और तप साधना में संलग्न रहते हैं।

सिखों के गुरु गोविंद सिंह ने जोशीमठ के पास हेम कुण्ड में 20 वर्ष तक तप करके सिख धर्म को प्रगतिशील बनाने की शक्ति प्राप्त की थी। स्वामी राम तीर्थ का यहीं सबसे प्रिय प्रदेश था। वे गंगा और हिमालय के सौंदर्य पर मुग्ध थे। टिहरी के पास गंगा जी में स्नान करते समय वे ऐसे भाव विभोर हुए कि उसकी लहरों में ही विलीन हो गये।

उत्तराखण्ड को साधना क्षेत्र चुनने में इनमें से प्रत्येक ने सूक्ष्म दृष्टि से ही काम लिया है। वे जानते थे कि हिमालय के हृदय-धरती के स्वर्ग प्रदेश की दिव्य शक्ति अपनी ऊष्मा को अपने निकटवर्ती क्षेत्र में ही अधिक बिखेरती है इसलिये वहीं पहुँचना उत्तम है। अग्नि का लाभ उठाने के लिये उसके समीप ही जाना पड़ता है। आध्यात्मिक तत्वों की किरणें जहाँ अत्यन्त तीव्र वेग से प्रवाहित होती हैं वह स्थान सुमेरु केन्द्र ही है। केवल पानी वाली गंगा ही वहाँ से नहीं निकली आध्यात्मिक गंगा का उद्गम भी वहीं है। उस पुण्य प्रदेश-धरती के स्वर्ग को देख सकना कैसे सम्भव हुआ? वहाँ क्या देखा और क्या अनुभव किया? वहाँ की दुर्गमता किस प्रकार सुगम बनी है? इसका विवरण अब उपस्थित करना है।

(शेष अगले अंक में)


अकेला राही


अकेला राही (kavita)

चल रहा राही अकेला ही नहीं,

साथ आँसू का उजाला चल रहा।

जल रहा दीपक न यह इस रात में,

सुबह लाने को वियोगी जल रहा॥1

पीर पथ की सहचरी वन कर चली।

हर कली के साथ मिट्टी की डली॥

राह के दोनों किनारे हाथ हैं।

राह के पत्थर पगों के साथ हैं॥2

गल रहा राही अकेला ही नहीं,

साथ में हिमगिरि युगों से गल रहा॥

चल रहा राही अकेला ही नहीं,

साथ आँसू का उजाला चल रहा॥3

राह की दूरी न किस के सामने,

हाय! मजबूरी न किस के सामने।

पर पगों की ओर आँसू ढल रहा,

भूल कर दूरी विचारा चल रहा॥4

ढल रहा आँसू अकेला ही नहीं,

सान्ध्य पथ पर सूर्य साथी ढल रहा।

चल रहा राही अकेला है,

साथ आँसू का उजाला चल रहा॥5

साथ में हैं दीप दो जलते हुए,

हाथ में हैं अश्रु दो ढलते हुये।

साथ हैं तारे गगन के रात में,

सूर्य साथी बन गया है प्रात में॥।6

चाँद का संसार रजनी में जला,

सूर्य का संसार दिन में जल रहा।

चल रहा राही अकेला ही नहीं,

साथ आँसू का उजाला चल रहा॥7

चल रहा राही निडर विश्वास पर,

उड़ सका पक्षी निडर आकाश पर।

लक्ष्य तक पथ साथ में आगे बढ़ा,

स्वयम् का विश्वास चोटी पर बढ़ा॥8

जो स्वयम् को मान एकाकी रुका,

जिन्दगी अपनी स्वयम् वह छल रहा।

चल रहा राही अकेला ही नहीं,

साथ आँसू का उजाला चल रहा॥9

धूलि में मिल बीज डाली पर खिला,

जो चला वह राह से आगे मिला।

कौन है जो रोक ऐसे पग सके,

जिन्दगी वह है कि जिससे पथ थके॥10

जल रहा दीपक अकेला ही नहीं,

शलभ भी जलते अंधेरा जल रहा।

चल रहा राही अकेला ही नहीं,

साथ आँसू का उजाला चल रहा॥11

रघुवीरशरण मित्र


VigyapanSuchana

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