हमारे कुछ अमूल्य ग्रन्थ रत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री -उपासकों के सहयोग तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।

1. गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग) मूल्य 10॥)

प्रथम भाग - गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधना विधान आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्व पूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)

द्वितीय भाग- गायत्री द्वारा वाम मार्गी ताँत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पञ्जर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम, आदि का संग्रह। मू. 3॥)

तृतीय भाग - गायत्री महामंत्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का साधना विज्ञान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण योग, शब्द योग, नाद योग, हठयोग, कुँडलिनी योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय कोष, मनोमय कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष, को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन। मूल्य 3॥)

2. गायत्री यज्ञ विधान (दोनों भाग) मूल्य. 4)

प्रथम भाग - गायत्री यज्ञ का विज्ञान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्र एवं साइन्स के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मूल्य 2॥)

द्वितीय भाग - गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया, जलयात्रा, मंडप प्रवेश, वेदी पूजन, कुशकण्डिका, अग्नि स्थापन, आहुति मन्त्र पूर्णाहुति वसोधरा, घृत अवधारण, भस्म धारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि विधान, जिसे समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मूल्य 2)

3. गायत्री चित्रावली (दोनों भाग) मूल्य. 3॥

प्रथम भाग - विविध प्रयोजनों के लिये गायत्री माता का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मूल्य 1॥)

द्वितीय भाग - व्याहृति समेत गायत्री के 26 अक्षरों में सन्निहित 26 महान् आदर्शों को 26 श्लोक 26 लेख एवं 26 आर्ट पेपर पर छपे तिरंगे चित्र द्वारा समझाया गया है। मूल्य 2॥)

4. गायत्री का मन्त्रार्थ मूल्य 1॥

अनेकों ग्रन्थों में, अनेकों ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार से किये हुए अर्थों का संग्रह, राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है।

सूक्त संहिता - मूल्य.1॥) इस पुस्तक में चारों वेदों से ऐसे 40 सूक्त संग्रह किये गये हैं जिन पाठ एवं मनन ये मनुष्य की 40 भौतिक साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। वैदिक मंत्र विद्या व यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पुस्तक है।

भारतीय संस्कृति की रूपरेखा मूल्य.2)

हिन्दू धर्म के आदर्शों, सिद्धान्तों विश्वास रीति-रिवाजों, मान्यताओं और प्रथा- परम्पराओं पर दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं विवेचनात्मक ढंग से प्रकार डालते हुए उनकी उत्कृष्टता सिद्ध की है। प्रत्येक ही धर्माभिमानी के लिए यह पुस्तक अवश्य ही पढ़ने योग्य हैं।

6) से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ ।

-अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा।


अपने घर में गायत्री ज्ञान मंदिर स्थापित कीजिए

अपने घर में छोटा गायत्री पुस्तकालय स्थापित करके अपने सारे परिवार को स्वजन सम्बन्धित तथा मित्रों को पढ़ाने योग्य चार-चार आना मूल्य की अत्यन्त सुन्दर, सस्ती, बढ़िया ग्लेज कागज पर तिर सुन्दर टाइटलों की (26+26=52) पुस्तकें चार चार आना मूल्य की छापी गई हैं। गायत्री महाविद्या की अत्यन्त महत्वपूर्ण साधना से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराने तथा इस महामन्त्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता, धार्मिकता, एवं आध्यात्मिकता की शिक्षाओं का विचार करने के लिए यह सैट बहुत ही उपयोगी है। प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट की स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।

गायत्री साधना विषयक पुस्तकें गायत्री के एक एक अक्षरों की व्याख्या पर पुस्तकें

(1) गायत्री महात्म्य(1) ईश्वर का विराट् रूप

(2) गायत्री की दिव्य शक्ति (2) ब्रह्मज्ञान का प्रकाश

(3) गायत्री द्वारा आत्मोत्कर्ष (3) शक्ति की उपयोगिता

(4) गायत्री की सिद्धियाँ (4) धन का सदुपयोग

(5) गायत्री द्वारा भौतिक सफलताएं (5) आपत्तियों में धैर्य

(6) गायत्री से व्याधि नाश (6) नारी की महानता

(7) गायत्री से संकट निवारण (7) गृह लक्ष्मी की प्रतिष्ठा

(8) गायत्री साधना के चमत्कार (8) प्रकृति का अनुसरण

(9) गायत्री के ब्रह्मा साक्षात्कार (9) मानसिक सन्तुलन

(10) गायत्री की सुलभ साधना (10) सहयोग और सहिष्णुता

(11) स्त्रियों का गायत्री अधिकार (11) इन्द्रिय संयम

(12) गायत्री और यज्ञोपवीत (12) पवित्र जीवन

(13) गायत्री की 24 शिक्षाएं (13) परमार्थ और स्वार्थ

(14) गोपनीय गायत्री मंत्र (14) सर्वतोमुखी उन्नति

(15) गायत्री यज्ञ का महत्व (15) ईश्वरीय न्याय

(16) यज्ञ और भारतीय संस्कृति (16) विवेक की कसौटी

(17) गायत्री हवन पद्धति (17) जीवन और मृत्यु

(18) सामूहिक यज्ञ योजना (18) धर्म की सुदृढ़ धारणा

(19) गायत्री के जगमगाते हीरे (19) प्राणघातक व्यसन

(20) गायत्री उपासना (20) सावधानी और सुरक्षा

(21) अनादि गुरु मंत्र गायत्री (21) उदारता और दूरदर्शिता

(22) गायत्री से योग साधना (22) स्वाध्याय और सत्संग

(23) सचित्र गायत्री (23) आत्म कल्याण का मार्ग

(24) गायत्री सहस्रनाम (24) समाज के प्रति कर्तव्य

(25) मनुष्य जीवन की सार्थकता (25) शिष्टाचार और सहयोग

(26) विश्वव्यापी संकट का गायत्री से समाधान (26) साँस्कृतिक पुनरुत्थान।

आज ही 13) भेजिए और अपने घर में छोटा गायत्री पुस्तकालय स्थापित कीजिए।

अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

वर्ष 21 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 02


दुख-सुख समझ समान


दुख-सुख समझ समान (kavita)

समय बदलता रहता प्रतिफल, दुख सुख समझ समान।

अपने प्रिय जीवन को साथी, भूल नहीं पहचान॥

प्रति दिन उठते ही प्राची में, देखा नया सवेरा,

और साँझ होते ही भू पर, देखा घोर अँधेरा

सुबह को हँसने वाला सूरज, सन्ध्या को मुख म्लान।

अपने प्रिय जीवन को साथी, भूल नहीं पहचान॥1।

जो रजनी ओढ़े आती है नभ में चादर काली

वही रात बिखरा कर जाती प्रातः जग में लाली

रात न आती तो क्या जग को मिलता स्वर्ण विहान।

अपने प्रिय जीवन को साथी, भूल नहीं पहचान॥2।

सूर्य चन्द्र दोनों पर चलती राहु केतु की माया

और सदा ही कुछ क्षण रह कर उड़ती धूमिल छाया

यही सृष्टि का नियम बताता, स्थिर कुछ मत जान।

अपने प्रिय जीवन को साथी, भूल नहीं पहचान॥3।

-त्रिलोकीनाथ व्रजवाल, पिलानी

सम्पादकीय


सुख शान्ति का सच्चा मार्ग

बाह्य जीवन में सुख और आन्तरिक जीवन में शान्ति प्राप्त करने की आकाँक्षा सभी को होती है। आनन्द के भी दो रूप हैं। एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म। स्थूल सुख वह है जो पंच भौतिक वस्तुओं के द्वारा होता है और जिनका रसास्वादन इन्द्रियाँ करती हैं। स्वादिष्ट भोजन, काम क्रीडा, धन, वैभव, महल मोटर श्री संपन्नता, स्त्री पुत्र, स्वस्थ सौंदर्य आदि के द्वारा जो प्रसन्नता की अनुभूति होती है वह बाह्य जीवन से संबंधित स्थूल सुख की श्रेणी में गिनी जाती है। उन्हें मनुष्य अपने परिश्रम, प्रतिभा एवं पुरुषार्थ द्वारा उपार्जित करता है।

आन्तरिक जीवन में सूक्ष्म सुख की अनुभूति जिसे शान्ति कहते हैं विद्या विवेक, संस्कृति, ज्ञान, विचार, गुण, आचरण, आदि मनःक्षेत्र की उच्च भूमिका से संबंधित हैं। कीर्ति, प्रतिष्ठा, श्रद्धा, सम्मान के रूप में इसकी छाया दूसरों के चेहरे पर झलकती देखी जा सकती है। अपने भीतर अनुद्वेग, निर्भयता, निश्चिन्तता, प्रसन्नता, उत्साह, आशा, सेवा उदारता, मैत्री स्नेह आत्मीयता, करुणा, संयम, संतोष, साहस, धैर्य आदि के रूप में इसे देखा जा सकता है।

सुख आधार वस्तुएं हैं। अपनी इच्छाओं के अनुकूल जितनी वस्तुएं प्राप्त होती हैं मनुष्य को उतनी ही सुखानुभूति होती है। इसके विपरीत उसकी आकांक्षाओं की तुलना में वस्तुओं का जितना अभाव होता है उतना ही उसके अभाव जन्य दुख अभाव होता है। किसी बीमारी या चोट से उत्पन्न दर्द एवं ताप का कष्ट सर्दी गर्मी, भूख, आकस्मिक दुर्घटना आदि के कष्ट भी कभी कभी आते हैं पर उनकी मात्रा पाँच प्रतिशत से अधिक नहीं होती। अधिकाँश दुख तो आकाँक्षाओं की तुलना में कम मात्रा में या घटिया श्रेणी की वस्तुएं प्राप्त होने के कारण होते हैं। जहाँ इच्छा और उपलब्धि का ताल मैल बैठ जाता है, लगभग समानता रहती है वहाँ मनुष्य सुखी और संतुष्ट रहते देखे जाते हैं।

दस प्रतिशत ऐसे दुख हैं जो ज्ञानी और अज्ञानी को समान रूप से होते हैं। बीमारी, मृत्यु, ऋतु प्रभाव, दुर्भिक्ष भूख, दुर्घटना आक्रमण, असफलता, आदि आकस्मिक दुख जो कई बार मनुष्य के प्रयत्नों से बाहर होते हैं प्रारब्ध जन्म या अधिदैविक दुख माने जाते हैं। प्रतिरोध और उपाय तो सभी का पर कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि सारी बुद्धिमता और प्रयत्नशीलता एक और रखी रह जाती है और विपत्ति सिर पर आ धमकती है, टाले नहीं टलती। ऐसे अवसरों पर मनुष्य के साहस, विवेक, धैर्य की परीक्षा होती है। कायर प्रकृति के अविवेकी लोग ऐसे अवसरों पर हड़बड़ा जाते हैं। अधीर होकर रोते चिल्लाते हैं, आत्म हत्या आदि की बात सोचते हैं। पर जिन्हें थोड़ा धैर्य, साहस और पुरुषार्थ प्राप्त है वे जानते हैं कि मानव जीवन सुख दुख के ताने बाने में बुना हुआ है। रात और दिन की तरह, शीत और गर्मी की तरह, भली बुरी परिस्थितियाँ भी आती जाती रहती हैं। इनमें धैर्य पूर्वक रहना और उस विपत्ति के पार निकलने का मार्ग ढूँढ़ना यही कर्तव्य है। अविवेकी लोग जहाँ अटल प्रारब्ध अन्य कष्टों को देखकर किंकर्तव्य विमूढ़ एवं कायर हो जाते हैं वहाँ विवेकवान व्यक्ति संसार चक्र की विषमता को समझते हुए किसी प्रकार मन समझा कर अपना दुख हलका कर लेते हैं।

जीवन में नब्बे प्रतिशत दुख इस आधार पर अवलम्बित है कि मनुष्य अपनी आकाँक्षा और परिस्थितियों का अन्तर कम करने का प्रयत्न नहीं करता। यह खाई जितनी ही चौड़ी होगी उतना ही अधिक दुख अनुभव होता रहेगा। एक मनुष्य लखपती बनना चाहता है इसके लिए उसके मन में अत्यंत तीव्र आकाँक्षा है। पर योग्यता एवं परिस्थितियों की विषमता के कारण हजार पाँच सौ भी इकट्ठे नहीं हो पाते, ऐसी दशा में उस मनुष्य को घोर असंतोष रहेगा और अपने को असफल, अभागा, दुखी एवं दरिद्री अनुभव करेगा। इसके विपरीत यदि उसकी आकाँक्षा पाँच सौ रुपये मात्र संग्रह करने की होती और लगभग उतना ही या उससे कुछ न्यूनाधिक उसे प्राप्त हो गया होता तो दुख का लेश भी अनुभव न होता वरन् सन्तोष एवं आनन्द ही मिलता।

जिस प्रकार दरिद्रता अन्य दुख में अधिकाँश लोग दुखी देखे जाते हैं उसी प्रकार रूप, सौंदर्य, स्त्री सन्तान, प्रशंसा, प्रतिष्ठा, ऐश, आराम एवं दूसरों के उचित अनुचित व्यवहार को जब इच्छानुकूल नहीं पाते तब भी दुखी होते हैं। बहुधा इसी प्रकार के दुखों का जीवन में बाहुल्य होता है। इनसे छुटकारा कैसे मिले इस प्रश्न पर विचार करने से दो ही हल समझ में आते हैं। एक यह कि जितनी हमारी आकाँक्षाएं हैं उतनी ही परिस्थितियाँ उपलब्ध हों। दूसरा यह कि- जैसी परिस्थितियाँ प्राप्त हैं उसके अनुरूप अपनी वर्तमान आकाँक्षाओं को सीमित कर लिया जाय। संसार में असंख्यों मनुष्य ऐसे हैं जो हमारी अपेक्षा हर दृष्टि से गये बीते हैं, उनसे अपनी तुलना करके हम अपनी वर्तमान स्थिति को भी सन्तोषजनक अनुभव कर सकते हैं।

अपनी एक आँख छोटी, कानी तिरछी या भोंड़ी है तो इसका दुख तभी होगा जब हम दूसरे बहुत सुन्दर बड़ी बड़ी आंखों से अपनी तुलना करें। अमुक आँखें इतनी सुन्दर हैं और हमारी ऐसी छोटी या भोंड़ी है इस तुलना में दुख अनुभव होना स्वाभाविक है। पर जब यह विचार किया जाय कि वे ऊँचे लोग जिनकी आँखें बिल्कुल ही नहीं हैं इस प्रकार की भोंड़ी आँख के लिए भी तरसते हैं तो अपनी स्थिति काफी सन्तोष जनक दिखाई देती। यही बात अन्य अभावों के बारे में भी सोची जा सकती है। हमें स्त्री, पुत्र, सौंदर्य, सम्मान आदि के कुछ अभाव हो सकते हैं, जैसा हम चाहते हैं उसकी अपेक्षा कम या घटिया किस्म की परिस्थितियाँ उपलब्ध हों तो उन लोगों से अपनी तुलना कम करनी चाहिए जो सर्व सुख सम्पन्न हैं या जिन्हें अधिक सुख साधन प्राप्त हैं, वरन् उन लोगों से अपनी तुलना करनी चाहिए जो हमारी वर्तमान परिस्थिति प्राप्त करने के लिए भी तरसते हैं।

मनुष्य जाति में ही लाखों करोड़ों मनुष्य अत्यन्त विपन्न परिस्थितियों में जीवन यापन करते हैं फिर भी वे हमारी अपेक्षा कम दुखी रहते हैं। फिर हमें क्यों थोड़े से अभावों के लिए इतने अधिक खिन्न हो रहे हैं? इतर योनियों के कीट पतंग पशु पक्षी आदि शरीर में रहने वाले जीवों की दृष्टि से तो हमारी स्थिति उतनी ही ऊँची हो सकती जैसा कि हम अपने मुकाबले में स्वर्ग के देवताओं को अधिक सुखी सोचते हैं। यदि हम किसी ऐसे वन्य पशु के शरीर में जन्म धारण किये होते जो विद्या, बुद्धि, वाणी, कुटुम्ब, घर वस्त्र, चिकित्सा सम्पत्ति, सम्मान, सुरक्षा, सहानुभूति, न्याय शासन आदि सभी साधनों से वंचित हैं तो निश्चय ही हम दरिद्र से दरिद्र मनुष्य को भी अपनी तुलना में अत्यन्त सौभाग्यवान मानते और सोचते कि यदि किसी दीन दरिद्र परिस्थिति में भी मानव देह की उपलब्धि हो सके तो कितना उत्तम हो। यदि कोई मनुष्य कहता कि हम मनुष्यों को तो धन संतान आदि का बहुत दुख है तुम पशु शरीर छोटा कर इसमें आकर क्या करोगे? तो निश्चय ही उसका उपदेश उपहासास्पद माना जाता। बेचारा जंगली पशु जो सभी साधनों से वंचित है वह बुरी से बुरी परिस्थिति के मनुष्य को भी अपनी अपेक्षा लाखों गुना सुखी अनुभव करता है। सुख दुख वस्तुतः सापेक्ष हैं। दूसरों की तुलना से ही इनकी अनुभूति होती है, इसलिए यदि हम दुखी रहना पसंद करें तो यही उचित है कि अपने से अधिक सुखी लोगों से तुलना करके अपने आपको दीन हीन मानें और खिन्न रहें। किन्तु यदि यह ठीक न लगे और इच्छा यह हो कि मन को सुखी एवं संतुष्ट रखा जाय तो एकमात्र उपाय यही है कि हम अपने से गिरी हुई विपन्न स्थिति वालों के साथ तुलना करके अपने आपको कहीं अधिक सौभाग्यशाली एवं सुखी अनुभव करें।

इसका अर्थ यह कदापि नहीं हैं कि हम वर्तमान की अपेक्षा भविष्य में और अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने का प्रयत्न न करें। इस प्रकार की अकर्मण्यता तो मानवीय आदर्शों के ही प्रतिकूल होगी। मनुष्य का स्वाभाविक धर्म उन्नति की और अग्रसर होना ऊपर उठना आगे बढ़ना है। इस प्रकृति धर्म को त्याग देने वाला धर्मद्रोही या पापी कहा जाता है। आलसी, अकर्मण्य, अनुत्साही लोगों को इसीलिए समाज में तिरस्कृत माना जाता है। कीर्ति और लक्ष्मी ऐसे लोगों को त्याग देती है। अस्तु आज की अपेक्षा कल अधिक उत्तम, अधिक विकसित, अधिक समृद्ध हो इसके लिए शक्ति भर प्रयत्न करना हर एक का कर्तव्य है। पर यह सब कर्तव्य भावना से, प्रसन्नता और उत्साह पूर्वक ही करना चाहिए। निराशा, खिन्नता, शोक और दुख को मन में धारण कर आज की स्थिति पर रुष्ट रहना एक ऐसी मानसिक बुराई है जिससे उन्नति के पथ पर बढ़ने में किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलती वरन् बाधा ही उत्पन्न होती है। उन्नतिशील भविष्य के लिए उत्साह और पुरुषार्थ पूर्वक प्रयत्न करना अलग बात है, इसके लिए वर्तमान स्थिति से दुखी या असंतुष्ट रहने की आवश्यकता नहीं। जिस प्रकार मैट्रिक का विद्यार्थी अपनी वर्तमान सफलताओं पर संतोष और गर्व अनुभव करते हुए ग्रेजुएट बनने की महत्वाकांक्षा रखता है और उसके लिए शक्ति भर चेष्टा करता है इसी प्रकार हम भी बिना वर्तमान स्थिति पर दुखी हुए और अधिक उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रयत्न कर सकते हैं।

आकांक्षाओं के अनुरूप परिस्थितियाँ उपलब्ध कर लेना हर किसी के लिए संभव नहीं, ऐसे सुयोग तो किसी विरलों को ही मिलते हैं। आकाँक्षाओं पर कोई प्रतिबंध नहीं, एक गरीब आदमी बे रोक टोक राजा बनने के सपने देख सकता है। पर इसके लिए जिस योग्यता, परिस्थिति, एवं साधना सामग्री की जरूरत है उसे जुटा लेना कठिन है, हमारी आकाँक्षाएं बहुधा ऐसी होती हैं जिनका वर्तमान परिस्थितियों से मेल नहीं खाता इसलिए उनका पूरा होना प्रायः बहुत कठिन होता है। ऐसे बुद्धिमान लोग विरले ही होते हैं जो अपनी वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप आकाँक्षाएं करते हैं और उनके पूर्ण होने पर सफलता एवं प्रसन्नता का सुख अनुभव करते हैं। अधिकाँश लोग यह नहीं देखते कि अपनी परिस्थितियों में इन दिनों कितनी उन्नति संभव है। संभावनाओं के अनुरूप इच्छाएं तो आसानी से पूरी हो जाती है पर जिन आकाँक्षाओं का ऐसा तालमेल नहीं बैठता वे असफल ही रह जाती हैं और आकांक्षी को अभाव और असफलता जन्य दुख की आग में जलाती रहती है।

दुख और क्लेशों की आग में जलने से बचने की जिन्हें इच्छा है उन्हें पहला काम यह करना चाहिए कि अपनी आकाँक्षाओं को सीमित रखें। अपनी वर्तमान परिस्थिति में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की आदत डालें। गीता के अनासक्त कर्मयोग का तात्पर्य वही है कि महत्वाकांक्षायें वस्तुओं की न करके केवल कर्तव्य पालन की करें। यदि मनुष्य किसी वस्तु की आकाँक्षा करता है और उसे प्राप्त भी कर लेता है तो उस प्राप्ति के समय उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति सर्वांगीण आत्मोन्नति के प्रयत्न कर कर्तव्य पालन करने की आकाँक्षा करे तो उसे सफलता मिलते समय मिलने वाले आनन्द की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती, वरन् जिस क्षण में कर्तव्य पालन आरम्भ करता है उसी समय से आकाँक्षा की पूर्ति आरम्भ हो जाती है और साथ ही सफलता का आनन्द भी मिलता चलता है।

किसी व्यक्ति की इच्छा है कि उसका पुत्र विद्वान बने। अब उसे तभी सन्तोष एवं आनन्द प्राप्त होगा जब वह छोटा बच्चा बड़ा होकर पूर्ण विद्वान बन जाये यदि वह ऐसा न बना तो पिता को सदा असंतोष ही रहेगा और यदि उसकी इच्छापूर्ण भी होती है तो भी उसे बच्चे के विद्वान बनने में जो बीस वर्ष लगते तब तक उसे सफलता मिलने पर प्राप्त होने वाली प्रसन्नता की प्रतीक्षा में दिन गुजारने पड़ते। कहने का अर्थ यह है कि वस्तुओं और परिस्थितियों पर अवलंबित आकाँक्षाएं एक तो बहुत समय बाद ही पूर्ण हो सकती हैं। दूसरे पूर्ण सफलता मिल ही जायेगी यही भी निश्चित नहीं, तीसरे जिस समय वह सफलता मिली उनके बाद थोड़े ही समय तक वह प्रसन्नता स्थिर रहेगी। इसके बाद वह कार्यक्रम पूरा हो जाने पर वह प्रकरण समाप्त हो जायेगा और नई आकाँक्षा आरम्भ होगी। ऐसी दशा में वह पिछली सफलता का आनन्द भी समाप्त हो जायेगा। बहुत दिन प्रतीक्षा के बाद, अनिश्चित और क्षणिक सुख प्राप्त करना हो तो हम अपनी आकाँक्षाओं को साँसारिक वस्तुओं पर अवलंबित कर सकते हैं। पर यदि ऐसी इच्छा हो कि आकाँक्षा आरंभ करते ही तत्काल सफलता का सुख अनुभव होने लगे, असफलता मिलने पर भी वह वह सुख नष्ट न हो तथा वह सुखानुभूति जीवन भर बनी रहे तो हमें अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा। अपनी आकाँक्षाओं का केन्द्र किन्हीं पदार्थों को न बनाकर कर्तव्य पालन को प्रधानता देनी होगी।

अपने पुत्र को विद्वान देखने की आकाँक्षा करने वाला व्यक्ति यदि अपनी आकाँक्षा को थोड़ी सी मोड़ दे और यों सोचने लगे कि “बच्चे को विद्वान बनाने के लिए जो कुछ मेरा कर्तव्य है सो शक्ति भर पूरा करूंगा’ तो परिस्थिति बिल्कुल बदल जायगी। वह कर्तव्य पालन की प्रक्रिया आज से ही आरंभ हो गई तदनुसार प्रसन्नता अनुभूति भी आज से ही आरंभ हो गई। विद्वान बनना न बनना केवल अपने प्रयत्न पर ही अवलम्बित नहीं है। उसके अभिरुचि, मस्तिष्क की बनावट, श्रमशीलता, परिस्थिति, स्वास्थ्य, आदि अनेक कारण ऐसे हैं जिनमें थोड़ी सी गड़बड़ी हो जाने पर यह भी संभव है कि हजार प्रयत्न करने पर भी लड़का विद्वान न बना सके। जो कुछ हम चाहते है वह अवश्य ही पूरा हो जायगा इसका कोई निश्चय नहीं। शक्ति भरा प्रयत्न करने पर भी अनेकों बार केवल असफलता ही हाथ रहती है। सफलता केवल अपने प्रयत्नों पर ही निर्भर नहीं है वरन् दूसरे ऐसे अनेकों कारण भी हैं जिनके ऊपर सफलता असफलता बहुत कुछ निर्भर रहती है और वे कारण जब अपने हाथ में नहीं हो यही मानना होगा कि किसी आकाँक्षा की सफलता पर ही यदि हमारा सुखी होना निर्भर रहा तो उसके पूर्ति भी अनिश्चित ही रहेगी।

कर्तव्यपालन पर आधारित आकाँक्षाओं के बारे में यह बात नहीं है। इसमें किसी दूसरे का हस्तक्षेप नहीं। अपनी जैसी योग्यता एवं परिस्थिति है उसके अनुसार हर आदमी कर्तव्य पालन कर सकता है और साथ ही उसका संतोष भी प्राप्त हो सकता है। गीता कार ने बार बार यह स्पष्ट किया है कि “मनुष्य का अधिकार केवल कर्तव्य पालन तक सीमित है परिणामों पर उसका कोई अधिकार नहीं।” जिस चीज पर अपना अधिकार नहीं उस पर अपनी प्रसन्नता को आधारित करना गलती है। अपने आनंद को दूसरों के हाथ बेच देना है। इसलिए जीवन को सुखी बनाने के लिए यही नीति सर्वोत्तम है कि हम जीवन को सर्वांगीण उन्नति की ओर अग्रसर करने के लिए पूरी सच्चाई और परिश्रमशीलता के लिए प्रयत्न करें। इस प्रयत्नशीलता को अपना धर्म कर्तव्य मानें और हर घड़ी इस बात का संतोष एवं गर्व अनुभव करें कि “कर्तव्य पालन में हम पूरी तत्परता एवं ईमानदारी के साथ जुटे हुए हैं।” हमारे संतोष एवं आनंद के लिए इतना ही पर्याप्त है।

-क्रमशः


आध्यात्म से जीवन समस्याओं का हल

(महात्मा करुणानंद सरस्वती)

अनेक लोग कहा करते हैं कि यह संसार दुःखों का घर है। यहाँ आकर मनुष्य को तरह तरह के बन्धनों में फँस कर व्याकुलता पूर्ण जीवन बिताना पड़ता है। इसमें सुख तो नाम मात्र का है और दुख तथा क्लेश सदा ही सहन करने पड़ते हैं। कभी धन की कमी से भर पेट भोजन न मिलने का रोना रहता है, तो कभी अन्धाधुन्ध खाने और भोग से शरीर में तरह तरह की व्याधियाँ उत्पन्न हो कर कष्ट देने लगती हैं। कभी सन्तान न होने से मन में खिन्नता रहती है तो कुछ समय बाद पुत्र की काली करतूतें तमाम इज्जत और प्रतिष्ठा को धूल में मिला कर बदनामी की गठरी सिर पर लाद देती हैं। इसलिए संसार को एक सा समझना ठीक नहीं, यह सुख दुख, आशा और निराशा, हर्ष और शौक का सम्मिश्रण है। तो भी इसके मुख प्रायः दिखावटी और क्षणिक होते हैं और उनका अंतिम परिणाम प्रायः दुःखपूर्ण ही होता है।

इन दुखों के निवारण के लिए लोग प्रायः विचार किया करते हैं। अनेक लोग इसी के लिए जप-तप, पूजा, प्रार्थना आदि का सहारा लेते हैं। पर इसमें न तो सब लोगों को सफलता मिलती है और न इसका परिणाम स्थायी ही होता है। वास्तव में सुख और दुख ऊपरी चीज नहीं है वरन् उसका संबन्ध हमारे आत्मा और अन्तरात्मा से है। अगर हमारे अन्तःकरण में शाँति है तो हमें संसार की अधिकाँश बातें और परिस्थितियाँ सुख रूप ही जान पड़ेंगी और अगर मन में अशाँति अथवा असंतोष है तो राजमहल का जीवन भी घोर यंत्रणादायक प्रतीत होगा इसलिये जो लोग स्थायी सुख और शाँति के इच्छुक हैं उनको आत्मा के स्वरूप को जानने और उसकी वाणी को सुनने का प्रयत्न करना चाहिये। इस प्रकार की आध्यात्मिकता ही मनुष्य को तुच्छ साँसारिक विषयों से ऊपर उठाकर जीवन में वास्तविक सुख और शाँति का समावेश कर सकती है। इस विषय की विवेचना करते हुए एक बड़े विद्वान ने लिखा है-

व्रत और प्रार्थना को आराधना नहीं कहा जा सकता। उसके लिये तो सबसे पहली आवश्यकता पवित्र और आकुल हृदय की है। कस्तूरी मृग के अन्दर होती है, पर वह समझता है कि सुगन्धि कहीं बाहर से आ रही है, इसलिये वह उसकी खोज में पागल बन जाता है। इसी प्रकार ईश्वर हमारे हृदय में निवास करता है, उसका अनुभव करने के लिये हमको अन्तर्मुख होना चाहिये। परमात्मा की आराधना के लिये मूर्ख मनुष्य जंगल, पहाड़, नदी, झील आदि दुर्गम स्थानों में सुन्दर फल ढूंढ़ता हुआ फिरता है, पर वह इस बात का विचार नहीं करता कि उसके पास ही भेंट चढ़ाने के लिये एक बहुत सुन्दर कमल का पुष्प है। यह पुष्प उसका मन है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने को एक जीता जागता यज्ञ बनावे। हम कोई भी दूषित, अपवित्र, विकृत और अपूर्ण वस्तु भगवान को अर्पण नहीं कर सकते। हमको यह समझ लेना चाहिये कि भगवान का मंदिर पवित्र है और हम स्वयं ही वह मंदिर हैं। उसमें से हमें एक ऐसे चरित्र का निमार्ण करना है जो बड़ी बड़ी कठिनाइयों में भी उज्ज्वल रहे। अगर ऐसा नहीं किया जायगा तो जीवन ऐसी निरर्थक और ऊटपटाँग घटनाओं का एक संग्रह बन जायगा जिनका कोई विशेष उद्देश्य नहीं है। ऐसे जीवन से कोई लाभ नहीं। जो बात जीवन को महत्वपूर्ण बनाती है वह है एक उच्च उद्देश्य। हमारा मुख्य कर्तव्य यही है कि जिन रुकावटों से उस उद्देश्य की पूर्ति में बाधा पड़ती हो उनको दूर करते हुये चलें। ........ऐसी ही मनुष्यता जीवन को जीने योग्य बनाती है। वह मनुष्यता शारीरिक स्वास्थ्य और धन-सम्पत्ति से भी अधिक मूल्यवान है। सचमुच बड़े लोग वे नहीं हैं जिनके पास अधिक धन है, या जो अधिक बुद्धिमान हैं, या जिनकी समाज में अधिक प्रतिष्ठा है। ईश्वर लोगों को इसलिये छोटा नहीं समझता कि वे गरीब और कम बुद्धि वाले है। महत्व की बात तो यह है कि कहाँ तक हमने दूसरों के साथ उदाहरण का व्यवहार किया है और हम अपने और दूसरों के साथ कहाँ तक ईमानदार और सच्चे रहे हैं।”

जो लोग अपनी आत्मा की आवाज सुनने और तदनुकूल व्यवहार करने का प्रयत्न नहीं करते वे कितने भी बड़े क्यों न हो जायें उनकी प्रतिष्ठा दिखावटी ही रहती है और समय-समय पर वे स्वयं भी इस बात को अनुभव करते है। उनको प्रायः अपने भीतर किसी बात का अभाव खटकता रहता है। वे इस बात के लिये संसार को दोषी बनाते हैं और कहा करते हैं कि यहाँ सब अपने-अपने स्वार्थ पर निगाह रखने वाले हैं, सच्चा प्रेम करने वाले कोई नहीं है। और वास्तव में बात ऐसी ही होती है कि अवसर पड़ने पर ऐसे लोगों के स्त्री, बच्चे भी उन का साथ नहीं देते उनको अपने जीवन में सच्चे सुख के दर्शन नहीं होते और वे दिन पर दिन अधिक दुखी होते जाते हैं। प्रकट में चाहे उनके चेहरे पर मुस्कुराहट क्यों न दिखाई पड़े और वे लोगों पर रौब तथा शान क्यों न गाँठते रहें, पर उनके हृदय में व्यथा और वेदना छिपी रहती है। जहाँ उनकी उम्र कुछ अधिक हुई कि उनको अपना जीवन निरर्थक जान पड़ने लगता है, और उनके भीतर संसार से चले जाने की एक अप्रत्यक्ष भावना पैदा होने लगती है। जब हम उनके अंतिम परिणाम पर दृष्टि डालते हैं तो उनकी अपेक्षा उन लोगों का जीवन कही अधिक धन्य जान पड़ता है जो दूसरों के लिये दुःख सहन करते, कष्ट पाते और रोते रहते हैं। इससे मनुष्य को संसार की वास्तविकता का ज्ञान होता है और वे कष्ट सहन द्वारा अपनी आत्मा को पवित्र तथा उन्नत बनाने में समर्थ होते हैं। इसके विपरीत जो लोग अपने को किसी प्रकार से बड़ा समझ कर दीन−हीन लोगों के प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं वे कमी आध्यात्मिक जीवन में विशेष अग्रसर नहीं हो सकते इस सम्बन्ध में निम्नलिखित विचार ध्यान देने योग्य हैं-

“कमजोर और असहाय लोगों की सहायता करने की प्रवृत्ति, परिष्कृत स्वभाव के लोगों की, एक विशेषता होती है। कोई मनुष्य दूसरे के हृदय की बात नहीं जानता, फिर वह उसके सम्बन्ध में निर्णय कैसे दे सकता है? हम दूसरे लोगों को उनके शब्दों या कार्यों से ही जानते हैं। हम उनके विचारों को नहीं जान सकते। उनके हृदय में कौन सी मूक भावनाएँ काम कर रही हैं, यह हम नहीं जानते। उनकी आत्मा के गुप्त-प्रदर्शन तक हमारी पहुँच नहीं है जब तक मनुष्य दूसरे के अनुभव को स्वयं भी प्राप्त न कर ले तब तक वह उसे जान नहीं सकता। फिर किस व्यक्ति का जीवन इतना पवित्र और चरित्र निष्कलंक है कि वह दूसरों के विषय में निर्णय ले सके? अगर आध्यात्मिक दृष्टि से विचार किया जाय तो हममें से कोई भी ऐसा नहीं निकलेगा जो दण्ड से बच सके। जब कोई शक्तिशाली पाशविक प्रवृत्ति हमको अविवेकी बना देती है तब हम बड़ी विचित्र परिस्थिति में पड़ जाते हैं और ऐसा कार्य कर बैठते हैं जिसे हम दूसरों के लिये दण्डनीय समझते हैं।

इस लिये हमारा कर्तव्य यही है कि हम पवित्रता और पुण्यात्मा होने के मिथ्या अभिमान को त्याग कर उन लोगों की सहायता करने को तत्पर रहें जिन्हें संसार ने स्वार्थ अथवा उपेक्षा वश निकृष्ट समझ रखा है। हमको स्मरण रखना चाहिये कि सबसे अधिक दुष्ट मनुष्य के अंदर भी उस दिव्य शक्ति की एक चिनगारी होती है। यही कारण है कि अनेक इतिहास प्रसिद्ध दुष्ट और भोग विलासी व्यक्ति अकस्मात् परिवर्तित होकर सच्चे ज्ञानी और महात्मा बन गये। इतना ही नहीं यदि हम स्वयं सच्चा आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करना चाहते हैं उसके लिये भी दीन हीन और पतित कहलाने वालों की सहायता और सेवा से बढ़कर और कोई मार्ग नहीं है। यही कारण है कि भगवान स्वयं पतित पावन कहे जाते हैं। शास्त्र में भी आत्मज्ञानी व्यक्ति का लक्ष्य यही बतलाया गया है-

न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्ग न पुनर्भवम्।

कामये दुख तप्तानाम् प्राणिनाम आर्तनाशनम्॥


उत्तम जीवन व्यवहार ही हमारा धर्म है।

(श्री राजगोपालाचार्य)

वर्तमान समय में अपने को धार्मिक कहने वाले व्यक्ति प्रायः यह मत प्रकट किया करते हैं कि संसार में धर्म ही सर्वोपरि है, इसलिये जीवन से सम्बन्ध रखने वाले आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक आदि विषयों को गौण समझना चाहिये, और उनका निर्णय धर्म को प्रमुख स्थान देकर ही करना चाहिये। यह बात सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है, पर कार्य रूप में इसका पालन संभव नहीं होता। क्योंकि धर्म राजनीति, विज्ञान आदि सभी मानव-प्रकृति के अंग हैं और उनका आधार “सत्य” पर है। जिस चीज का आधार सत्य के बजाय असत्य पर होगा, वह न तो कल्याणकारी हो सकती है और न स्थायी। इसलिये जो लोग अर्थ और राजनीति, विज्ञान आदि की उपेक्षा करके धर्म को ही प्रधानता देते हैं, वे प्रायः पाखंडी और ढोंगी हो जाते हैं, उनके कहने और करने में ऐक्य का भाव नहीं पाया जाता। वे मुँह से धर्म के लिये गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने पर भी जहाँ अपना स्वार्थ होता है वहाँ सर्वथा विपरीत मार्ग से चलते हैं और इस प्रकार संसार के अन्य लोगों को भी धर्म-विमुख करने में सहायक बनते हैं।

प्राचीनकाल में मनुष्य जीवन में इतना अधिक विरोध-भाव नहीं पाया जाता था। इसका खास कारण यह था कि उस समय विज्ञान की इतनी प्रगति नहीं हुई थी, और जो कुछ हुई थी वह साधारण जनता में वर्तमान समय की भाँति प्रचारित नहीं की गई थी। इसलिये धर्म और दर्शन के सिद्धान्तों के अनुसार ही राज्य और समाज के नियम भी निश्चित किये गये थे। इससे लोगों के व्यवहार और सिद्धान्तों में इतना परस्पर विरोधी-भाव उत्पन्न नहीं होता था। अब विज्ञान का विकास बहुत अधिक हो गया है और उसे सर्वसाधारण की शिक्षा का एक प्रमुख अंग बना दिया गया है, इससे परस्पर विरोधिता का भाव अकल्पित रूप से बढ़ गया है।

इससे भी अधिक विचारणीय दशा धर्म और राजनीति के सम्बन्ध में दिखलाई पड़ती है। इसका बहुत स्पष्ट उदाहरण देखना हो तो वर्तमान ईसाई राष्ट्रों पर निगाह डालना चाहिये। कहाँ तो ईसा का पूर्ण क्षमा-भाव रखने का उपदेश, और कहाँ आज कल के ईसाई कहलाने वाले शासकों की कूट नीति, हथियारों की प्रतिद्वंदिता और करोड़ों व्यक्तियों का संहार करने वाले महासमरों का आयोजन। ये ईसाई जिस प्रकार अपने व्यापारिक लाभ को अधिकाधिक बढ़ाने के लिये युद्ध-कला की दृष्टि से निर्बल राष्ट्रों का शोषण करते हैं और बराबरी वाले राष्ट्रों को युद्ध की भीषणता द्वारा नष्ट करने के उपाय करते हैं- ये दोनों बातें ईसा के उपदेशों के सर्वथा विपरीत हैं। पर ईसा के इन्हीं उपदेशों को बाईबल में प्रतिदिन पढ़ते और स्कूलों में सर्वत्र उनकी शिक्षा देते हुये ये लोग किस हृदय से लाखों करोड़ों लोगों के संहार की योजना बनाते रहते हैं, यह समझ में नहीं आता। एक ओर तो ये लोग गिरिजाघरों के लिये करोड़ों रुपए खर्च करते रहते हैं और बाईबल का संसार के कोने-काने में प्रचार करने का प्रयत्न कर रहे हैं, और दूसरी ओर वे ही लोग घातक से घातक अस्त्र तैयार करके अन्य देशों के बड़े-बड़े नगरों को दो चार मिनट के भीतर ही मटियामेट कर डालते हैं। इस प्रकार का कार्य एक बड़ा मिथ्याचार है और उसके फल से ईसाई सभ्यता का भवन ढहे बिना नहीं रह सकता।

इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि जो धर्म अथवा दर्शन आधुनिक विज्ञान के विरुद्ध होगा, उसकी गिनती आज दंभ और पाखंड में ही की जायगी। यदि मानव जाति को प्रगति और कल्याण के मार्ग पर अग्रसर करना है तो विज्ञान तथा धर्म और राजनीति तथा धर्म के बीच पाई जाने वाली सब प्रकार की विसंगतियों (परस्पर विरोधी बातों) का अंत कर देना चाहिये। इसी से मनुष्यों में ऐक्य की स्थापना होकर शाँति का प्रसार हो सकता है। सौभाग्यवश भारतवर्ष का दर्शनशास्त्र अत्यंत प्राचीन होने पर भी विज्ञान के बहुत कुछ अनुकूल है। उस धर्म मूलक दर्शन शास्त्र से जो नीति शास्त्र विकसित हुआ है, वह बहुत न्यायपूर्ण है और उसके आधार पर आध्यात्मिकता की रक्षा करते हुये समाज का उचित आर्थिक और राजनैतिक संगठन किया जा सकता है। विदेशी लोगों को यह बात कुछ आश्चर्य जनक जान पड़ती है, पर इसमें संदेह नहीं कि विकास के सिद्धान्त और नीतियुक्त शासन का निरूपण हिंदू धर्म में पहले ही कर दिया गया है। हिंदू धर्म के मुख्य आधार वेदान्त में परमात्मा की जो परिभाषा की गई है, वह किसी ऐसे परमात्मा से सम्बन्ध नहीं रखती जिसे मनुष्य की कल्पना ने उत्पन्न किया हो। गीता में ईश्वर की चर्चा जिन शब्दों में की गई है और उसके जो लक्षण बतलायें गये हैं उनसे वैज्ञानिक भी विरोध नहीं कर सकते। नौवें अध्याय में एक जगह स्पष्ट कह दिया गया है-

“सब चराचर सृष्टि मुझ में स्थिति है, और फिर आश्चर्य की बात यह है कि मैं उससे अलग हूँ और प्रकृति अकेली ही काम किया करती है। प्रकृति ही मेरे हस्तक्षेप बिना, चर और अचर सृष्टि को उत्पन्न करती है।”

उपनिषदों में स्पष्ट शब्दों में यह घोषित कर दिया गया है कि आदि शक्ति का क्रम से जो विकास हुआ है, उसी से विश्व की उत्पत्ति हुई है। यही बात आज कल के वैज्ञानिक भी कह रहे हैं। विज्ञान पिछले कुछ वर्षों में अणु और परमाणुओं द्वारा जगत के निर्माण के जिस सिद्धान्त पर पहुँचा है, वह भी हिंदू दर्शन में ज्यों का त्यों हजारों वर्ष पहले से मिलता है।

पर इन बातों से आगे बढ़कर उपनिषदों ने यह भी प्रतिपादित किया है कि प्रकृति से उत्पन्न होने पर भी मनुष्य को आत्मा की ही भक्ति और खोज करना चाहिये। क्योंकि आत्मा ही सत्य है और जो व्यक्ति उससे विमुख होकर केवल भौतिक उन्नति पर ही ध्यान देते है वे अंत में भ्रष्टाचार और कपट के कैद में फँस जाते हैं।

व्यक्तिगत लाभ का उद्देश्य न रख कर केवल समाज के हित की दृष्टि के काम करना ही भगवत् गीता में जीवन का मार्ग बतलाया गया है। उसमें सब कामों को समान रूप से प्रतिष्ठा के योग्य बतलाया गया है, और प्रत्येक कार्य को निर्लिप्त भाव से सच्चाई के साथ करने पर जोर दिया गया है। वास्तव में गीता एक अनोखी रीति से धार्मिक दृष्टि कोण से समाजवादी विचारधारा का प्रतिपादन करती है। गीता में कहा गया है कि “अपने नियत कर्मों को उचित रीति से पूरा करते रहना ईश्वर की बहुत बड़ी उपासना है।”

वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार समाज-संगठन का उचित मार्ग यही है कि कुछ लोगों को विशेष अधिकार प्राप्त कर लेने के बजाय समस्त कामों का बँटवारा जनसाधारण के हित की दृष्टि से बुद्धिमत्ता पूर्वक किया जाय। यदि हम चाहते हैं कि समाज व्यक्तिगत जीवन का इस प्रकार नियंत्रण करें कि प्रत्येक व्यक्ति सुविधापूर्वक जीवन निर्वाह कर सके, तो यह कार्य केवल कानून, पुलिस और फौज के द्वारा नहीं हो सकता। इसके लिये हमको जनता के विचारों में आध्यात्मिकता का समावेश करना पड़ेगा, जिससे हम अपना निर्धारण कर्तव्य आनंदपूर्वक करते रहें और समस्त समाज के हित का ध्यान रखें।


क्या स्वर्ग और नर्क इसी संसार में मौजूद है?

(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए., पी-एच. डी.)

यदि हम किसी से बहुत नाराज होते हैं, तो प्रायः कह उठते हैं, “तू नर्क में जा।” यदि प्रसन्न हो उठते हैं, तो कह उठते हैं, “ईश्वर करे तू स्वर्ग में रहे।” स्वर्ग और नर्क मनुष्य की बुद्धि के दो छोर हैं, कल्पना क्षितिज के दो किनारे हैं। मन की वृत्तियों के दो रूप हैं।

स्वर्ग मनुष्य के आनंद और सुख की सर्वोच्च कल्पना का अंतिम बिन्दु है। हम अधिक से अधिक जिस शाश्वत सुख, आनंद, सौंदर्य की कल्पना कर सकते हैं, वे सब स्वर्ग में केन्द्रीभूत हैं। मनुष्य ने स्वर्ग के साथ हर प्रकार की अच्छाइयाँ संयुक्त कर रखी हैं। हमारे जीवन का सिरमौर चरम लक्ष्य स्वर्ग ही है। जीवन में हम जो अच्छे कर्म करते हैं, वे स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से वशीभूत होकर किया करते हैं।

हम सोचते हैं, इस आसमान के ऊपर कोई परम रमणीय सुरम्य प्रदेश है, जिसमें सृष्टि के समस्त वैभव एकत्रित हैं। हम इस संसार में शुभ कर्मों के फलस्वरूप जो स्थिति प्राप्त करते हैं, यह स्वर्ग ही है। वहाँ हमें उन्हीं लोगों से भेंट होती है जो पुण्य आत्माएँ हैं और जिन्होंने धर्म तथा पुण्य कार्य किए हैं। उनसे ईश्वर प्रसन्न हुए हैं और वे ही स्वर्ग में श्रेष्ठतम सुख दिया करते हैं। हमारे शुभ चिन्तन का यह एक छोर है। नौ आसमानों में आखरी आसमान स्वर्ग है।

और नर्क? जो व्यक्ति इस संसार में दुष्ट व्यवहार, गंदे काम, दुष्प्रवृत्तियों की पूर्ति, शत्रुता, द्वेष, ईर्ष्या प्रतिशोध आदि में लगा रहता है, उससे ईश्वर अप्रसन्न होता है। मन में जमी हुई वासना हमसे पाप कराती है। हम भिन्न-भिन्न दुष्कर्मों में फँसते हैं। दूसरों को सताने की दुष्टता करते हैं। अतः ईश्वर की आज्ञा से दण्ड स्वरूप हमें नर्क में धकेल दिया जाता है। वहाँ हमें नाना प्रकार की घोर यातनाएँ दी जाती हैं। शुभ और अशुभ कर्मों की सजा दी जाती है। जिसके जितने अधिक पाप कर्म होते हैं, उसे उतनी ही कठोर यातनाएँ मिलती हैं। नर्क पाप कार्यों के कुफल-चिन्तन का दूसरा छोर है।

मनुष्य जैसा इस दुनिया को देखता है, स्वर्ग और नर्क को भी उसी प्रकार की दुनिया समझता है। जन साधारण का विश्वास है कि स्वर्ग नवाँ आसमान होना चाहिए, और नर्क नवाँ पाताल, अर्थात् पृथ्वी के अंदर किसी आखरी छोर पर स्थित एक संसार।

लेकिन स्वर्ग और नर्क इसी भौतिक संसार में हैं। हम मर कर नहीं, जीते जी, इसी शरीर से उसका अनुभव कर सकते हैं। इन्हीं नेत्रों से उन्हें देख सकते हैं, इन्हीं इन्द्रियों से उसकी मृदुता या कटुता का रसास्वादन कर सकते हैं। स्वर्ग नर्क दूर नहीं, हमारे समीप हैं। हमारी पहुँच की परिधि में हैं।

स्वर्ग और नर्क मरने पर नहीं, जीते जी ही हम सब को इसी संसार में मिल जाता है स्वर्ग समीप है। हमारी पहुँच के भीतर है।

स्वर्ग और नर्क को दो सड़कें जाती हैं। अच्छाई वाली सड़क का अन्तिम स्टेशन है, स्वर्ग, दूसरी और बुराई और अपकीर्ति की सड़क है जिसका अंतिम स्टेशन नर्क। दोनों एक दूसरे के ठीक विरोध में हैं। दोनों दिशाएं एक दूसरे से ठीक उल्टी है। दोनों की रेलगाड़ियां विपरीत दिशा में जाती हैं। यह बात नहीं कि कोई नर्क वाली रेलगाड़ी में बैठ जाये और यह आशा करता रहे कि मैं स्वर्ग पहुँच जाऊँगा। जो स्वर्ग जाने वाली रेलगाड़ी में बैठा है, वह तो निश्चय ही पर्वतों के कलेजे चीरता, नदियों को पार करता, शुष्क मुरझाये प्रदेशों से गुजरता अनेक प्रकार की कठिनाइयों के क्षितिज पार करता हुआ ज्योतिपूर्ण उल्लासमय स्वर्ग में पहुँच ही जायेगा।

पृथ्वी का स्वर्ग कहाँ है?

जिसे उत्तम स्वास्थ्य का पूरा सुख प्राप्त है, खुल कर भूख लगती है और जो अपने शरीर के सब अवयवों को पूर्ण स्वस्थ रखता हुआ स्वस्थ मन भी रखता है, रोगमुक्त है, स्थिर और शान्तचित्त है, वह स्वर्ग में ही निवास करता है। रोगों से भरा शरीर पाकर मनुष्य नर्क में ही निवास करता है। आरोग्य में स्वर्ग का सुख भरा हुआ है। आरोग्य वह साधन है जिसके द्वारा हम संसार को नापते हैं। जिसके पास स्वस्थ, निर्विकार, सुदृढ़, स्वच्छ रोगमुक्त शरीर है, वह पृथ्वी पर ही स्वर्ग की एक झाँकी देख लेता है। रोगी जीते जी सल युक्त वातावरण में निवास करता है, अनेक जीर्ण विषों से परिपूर्ण रहता है और इस जीवन में ही नर्क की यातनाएं सहन करता है। अनेक भूलों से रोग होते हैं, फिर जमा हुए विष से पुराने और असाध्य रोग पैदा होते हैं और नर्क जैसी पीड़ायें भुगतनी पड़ती हैं।

“मृतकल्पा हि रोगिणः”

(म. भा. उद्योग पर्व 88,52)

रोगी पुरुष मरे हुए के समान होता है। उसका जीवन नर्क तुल्य है। शारीरिक और मानसिक रोग नर्क में धकेलने वाले शत्रु हैं। सौ वर्ष तक स्वस्थ स्वर्ग में निवास करो।

जब आप किसी के प्रति दया का सच्चा प्रदर्शन करते हैं, तो आपकी आत्मा में जो सुख होता है, वह मनः स्थित स्वर्ग से क्या कम है? जब आपका हृदय प्रेम और वात्सल्य से उद्वेलित होता है, आपको स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। एक प्रेममय पिता और माता अपनी सुखी, संतुष्ट और उन्नतिशील संतान के मध्य रह कर जो सुख लूटता है, वह स्वर्ग से क्या कम है। जिस परिवार के सब सदस्य एक दूसरे के प्रति प्रेम और आत्मीयता से भरे रहते हैं, सहयोग और सहायता करते रहते हैं, वह स्वर्ग का सुख लूटता है। परिवार के झगड़े, कटुता, वैमनस्य, हिंसा और स्वार्थ वे दूषित दुष्प्रवृत्तियाँ हैं, जिनके प्रयोग और व्यवहार से मनुष्य जीते जी नर्क की यातनाएँ पाता है। दुर्भावनायें मनुष्यत्व का कलंक हैं। वे हम में जहर पैदाकर दानवत्व की ओर खींचती हैं।

क्रोध, घृणा-ईर्ष्या, वैमनस्य, प्रतिशोध, घमंड, विषय वासना आदि अपनी काषायों का दासत्व करते रहना नर्क में रहने के समान है इसी प्रकार दूसरे की गुलामी में कड़वे घूँट पीने पड़ते है। परतन्त्रता से मौत अच्छी मानी गई है। कोई पाँच ही रुपये महीने पर दासत्व स्वीकार करते हैं, कोई, बड़ी राशि पर, किसी अन्य प्रलोभन पर। इस प्रकार अपने आप को बेच देने वाला नर्क में रहता है ऐसे भी साधु, संत, ज्ञानी, ऋषि, महात्मा हुए हैं, जो लाख रुपये पर भी गुलामी मंजूर नहीं करते। स्वतंत्र जीवन में स्वर्ग का सुख है।

वही दुःखी है जिसकी तृष्णा विशाल है, जो नित्य नई-नई चीजों, विलास सामग्रियों की कामना किया करता है रुपये की प्राप्ति की दुर्दमनीय इच्छा की पूर्ति के लिए दिन रात कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता है। तृष्णा दुःख का मूल है। गरीब वह नहीं है, जिसके पास कम है, बल्कि वह जो अधिक चाहता है। धनवान होते हुए भी जिसकी धनेच्छा दूर नहीं हुई, वह सबसे अधिक अभागा है। वह भी एक प्रकार के नर्क में निवास करता है। जिसने अपनी कामनाओं और वासनाओं का दमन करके मन को जीत लिया है, उसने स्वर्ग पाया है। अथर्ववेद में सत्य ही कहा है-

“वद्धान्मुच्चासि पद्धकम्”

(अथर्व. 6।121।4)

बन्धन में पड़े हुओं को मुक्त करो। अज्ञान और कुसंस्कारों से छूटना मानों नर्क से छूटना है।

पुण्य और पसीने की कमाई से मनुष्य स्वर्गीय सुख लूटता है।

श्री आनन्द कुमार ने अपनी पुस्तक “आत्मविकास” में एक बड़ी ही मार्मिक बात लिखी है। यह मनुष्य के लौकिक संबन्ध की है। पृथ्वी का स्वर्ग कहाँ है? वे लिखते हैं-

“इस पृथ्वी का नाम वसुमती (अर्थात् धनवाली) है। इसमें जो वसुता नहीं प्राप्त करता, वह भौतिक जीवन का आनंद नहीं पा सकता। जो वसुमत (धन सम्पन्न) होता है, वह वसुमती का भोग करता है, जो वसुकीट होता है, वह “नाना रत्न वसुन्धरा” में भी नर्क का दुःख भोगता है। लौकिक जीवन की ऐसी ही व्यवस्था है।”

स्वर्ग में रहना है तो दरिद्रता को मार भगाओ। गरीबी, बेबसी और लाचारी अनेक नारकीय यातनाओं की जननी है। जिसके पास आर्थिक स्वतंत्रता है, उसके पास स्वर्ग की कुँजी है। इस सम्बन्ध में निम्न सफलता-सूत्र स्मरण रखने योग्य है :-

“पृणन्नापिरपृणन्त मभिष्यात्।”

(ऋग्वेद 10।117।7)

सौ हाथों से कमाओ, हजार हाथों से दान करो। न कमाने वाले त्यागी से कमाकर दान करने वाला श्रेष्ठ है।

देवः वाँर्य बरते। (ऋग्वेद 6।112)

धन एक दैवी पदार्थ है। इसका सम्बन्ध मनुष्य की आन्तरिक पवित्रता तथा ईमानदारी से है। धन उन्हीं के पास ठहरता है। जो सद्गुणी है। दुर्गुणी की विपुल सम्पदा भी स्वल्प काल में नष्ट हो जाती है और वह प्रत्यक्ष नर्क का दुःख भोगता है। पाप की कमाई असंख्य दुःखों को देने वाली है।

“रमन्ताँ पुण्या लक्ष्मी।”

अथर्व 7।114।4

बेईमानी की कमाई से कोई फलता फूलता नहीं। नर्क में जाता है।

दैवी गुणों से स्वर्ग जैसा सुखः-

जितने भी सात्विक दैवी भाव हैं, उन सबके मूल में स्वर्ग की स्वर्णिम आभा है। उन्हें धारण करने में मनुष्य आन्तरिक सुख और संतोष का अनुभव करता है, क्षमा, दया, प्रेम, मृदुता, सत्, आशा, सहानुभूति- इन सभी दैवी गुणों में, इन्हें अपने जीवन में उतारने से स्वर्ग जैसा सुख मिलता है। इन सबके मूल में भगवान है। भगवान की विशेष कृपा से मनुष्य इनके अनंत सुख का अनुभव करता है, उसका विवेक जाग्रत होता है। उसके हृदय में विराजित परम प्रभु उसे स्वर्ग का सुख प्रदान करते हैं। स्वर्ग आपकी पहुँच के भीतर है क्योंकि आप इन ईश्वरीय गुणों को धारण कर सकते हैं। चरित्र में पूर्ण विकास कर सकते हैं।

मर्त्या हवाअग्ने देवा आसुः।

- शत ब्रा 11।1।2।12

यदि रखिए, मनुष्य शुभ कार्य करके देव बनते हैं। अतः शुभ कर्म कीजिए और इसी शरीर से भ्रसुर का पवित्र पद प्राप्त कीजिए। शुभ कार्य ही पुजते हैं। उन्हें करने में मनुष्य स्वर्ग का सुख और शान्ति प्राप्त करता है।

शुक्रोऽसि भ्राजोऽसि स्वरसि ज्योतिरसि।

-अथर्ववेद

आप शुद्ध, तेजस्वी, आनंद मय एवं प्रकाशवान् हैं। इसलिए आत्मबन्धु, दैवी गुणों को धारण करके स्वर्ग का सुख लूटिये। नर्क का प्रधान कारण तामसी भाव है। सब अज्ञान में होता है, तो मनुष्य पाप करता है। इनमें जमे हुए दुर्भाव मनुष्य से दुष्कर्म कराते हैं, अनेक नारकीय परेशानियों में ढकेलते हैं। अनीति और अधर्म कि विचार सर्वथा त्यागने योग्य है। जो देवी गुणों की उपेक्षा कर असत्य और पाशविक भावों को अपनाते हैं, उन्हें अपयश ही मिलता है। आप ईश्वर के अंग हैं। उन अंशी भगवान् की शक्ति आपके अंदर स्वर्ग की सृष्टि कर सकती है।


उपासना में इन्द्रिय-निग्रह की आवश्यकता

(श्री आगरचन्द नाहटा)

मानव जीवन में उपासना का बड़ा महत्व है। उपासना से सद्गुणों का विकास होता है और यावत् परमात्मा-दशा प्राप्त होती है। सद्गुणों के विकास का सबसे प्रधान साधन है-गुणी व्यक्तियों की आदर, भक्ति, पूजा, सेवा और गुणों की आराधना। आराधना और उपासना एक ही है।

उपासना का अर्थ है समीप बैठना, रहना और वह दो तरह से होता है (1) परमात्मा या सद्गुरु के पास बैठना और (2) आत्मा या आत्मीय गुणों के पास बैठना। वास्तव में हम इन दोनों तत्वों से बहुत दूर बैठे हुए हैं। परमात्मा को तो हम भूल से गये हैं, कभी दुःख-दर्द के समय ही उसका स्मरण आता है। यदि उसके नाम की माला भी फेरते हैं तो हमारा मन इधर उधर भटकता रहता है इसलिए हम परमात्मा के समीप नहीं पहुँच पाते। इसी प्रकार सद्गुरुओं के पास पहले तो हम अधिक समय बैठते ही नहीं हैं, और बैठते हैं तो भी मन घर और बाहर के कामों में लगा रहता है। उनकी वाणी को हम जीवन में स्थान नहीं देते, उनकी साधना से हम प्रेरणा ग्रहण नहीं करते। उनकी उपासना करते हैं, यह कह ही कैसे सकते हैं? आत्मा से भी हम बहुत दूर हैं। उसके दर्शन एवं अनुभव का प्रयत्न नहीं करते। शरीर में ही आत्म बुद्धि की हुई है। इसलिए आत्मा की उपासना हम नहीं कर रहे हैं यह निश्चित है।

उपासना और वासना में विरोध है अतः जहाँ तक तुम्हारा मन वासनाओं में भटकता है वहाँ तक सच्ची उपासना हो नहीं पाती बाहरी दिखावा तो ढोंग है उपासना नहीं।

‘उपासना’ में उपास्य के साथ तल्लीन हो जाने की परमावश्यकता है। जब तक वह स्थिति प्राप्त नहीं होती, साधक का चरम विकास नहीं हो सकता और उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए इन्द्रिय निग्रह की अत्यंत आवश्यकता है। जब तक इन्द्रिय के विषय भोगों में हमारा मन लगा रहता है तन जुड़ा रहता है-तब तक उपासना में तल्लीनता नहीं आ सकती। इसीलिये सभी धर्मों में इन्द्रिय दमन को महत्व दिया गया है। इन्द्रियों के बहिर्मुखी होने से हमारा मन चंचल रहता है। कभी सुन्दर पदार्थों या रूप के दर्शन में मन ललचाता है, कभी मधुर गायन को सुनने के लिए हम बड़े उत्सुक हो जाते हैं, कभी विविध रसों का आस्वादन करने को जिह्वा की लोलुपता नजर आती हैं। कभी सुगन्धित पदार्थों के प्रति आशक्ति देखी जाती है और कभी कोमल वस्तुओं के स्पर्श के लिए मन ललचा उठता है। इस तरह पाँचों इन्द्रियों के तेईस विषयों में मन भटकता रहता है। तब उपासना में तल्लीनता आयेगी कैसे?

जैन धर्म में संयम और तप को बहुत अधिक महत्व दिया गया है और इसका प्रधान कारण इन्द्रियों का निरोध करना ही है। संयम के सत्रह प्रकारों में पाँच इन्द्रियों का दमन सम्मिलित है ही, और तप का अर्थ भी है-इच्छाओं का निरोध। इसमें भी इन्द्रिय दमन की प्रधानता है। पाँचों इन्द्रियों में एक एक इन्द्रिय पर भी अंकुश न रहने से कितना दारुण दुख उठाना पड़ता है, इसके विषय में हाथी, हरिण, मच्छ आदि के दृष्टाँत दिये गये हैं और यह कहा गया है कि जब एक एक इन्द्रिय की विषयासक्ति का परिणाम दारुण है, तो जिनकी पाँचों इन्द्रियाँ छूट के साथ विषय-भोगों में लगी हुई हैं, उनका क्या हाल होगा ? यह तो प्रत्येक व्यक्ति स्वयं सोचले। ‘इन्द्रिय-पराजय-शतक’ नामक प्राचीन प्राकृत ग्रन्थ में इसका बड़े सुन्दर रूप में विवेचन एवं ज्ञान उपदेश प्राप्त होता है। उसकी कुछ गाथाओं का हिन्दी पद्यानुवाद बुद्धू लाल श्रावक का बनाया हुआ नीचे दिया जा रहा है। इसके प्रारम्भ में ही कहा गया है कि वही शूरवीर और पंडित प्रशंसनीय है, जिसके चरित्र-धर्म को इन्द्रिय रूपी चोरों ने नहीं लूटा।

शूरवीर पंडित वही, सदा प्रशंसागार।

चारित्र धन जाको नहीं, हरत अक्ष-वटमार॥

दूसरी गाथा में कहा गया है कि इन्द्रिय चपल तुरंग के समान है। दुर्गति के गर्त में वे खींच ले जाती है। यह जानकर सत्पुरुषों के वचन रूपी लगाम से इन्द्रिय रूपी घोड़ों को वश में करना चाहिये। इन्द्रियों को थोड़ी सी ढीली छोड़ने पर बहुत दुःख उठाना पड़ता है। तुच्छ विषय भोगों में सुख नाम मात्र का है, दुःख का पार नहीं। देवलोक के देव, इन्द्रिय दमन नहीं कर सकने के कारण ही मोक्ष नहीं पा सकते। विषय भोगों में ही वे लगे रहते हैं अतः व्रत नियम ग्रहण नहीं कर पाते! मनुष्य व्रती बनने के कारण मोक्ष पा सकता है।

सभी व्रतों-नियमों का भी उद्देश्य है- इन्द्रियों का निग्रह। जब तक इन्द्रियाँ वश में नहीं, तब तक न तो अहिंसा धर्म का पालन हो सकता है, न अपरिग्रह आदि का। अधिकाँश पाप इन इन्द्रियों के विषयों की आसक्ति के कारण ही किये जाते हैं। साधना में चित्त की एकाग्रता और अन्तर्मुखता की बड़ी आवश्यकता है और विषयासक्ति वाले व्यक्ति की चंचलता मिट नहीं सकती क्योंकि कभी अच्छा खाने की इच्छा होती है, कभी देखने, सुनने आदि की। इच्छाओं का अंत नहीं, एक की पूर्ति हुई नहीं, दूसरी अनेक इच्छाएं तैयार। अतः उपासक को इन्द्रिय निग्रह अवश्य करना चाहिये।

इन्द्रिय-निग्रह का अर्थ है बाह्य पदार्थों के आकर्षण को कम करना अंतर्मुखी बनना विषयों की ओर दौड़ने वाली इन्द्रियों को रोकना, इन्द्रियों का निग्रह करके हमें उन्हें अपने बस में लाना है। वे स्वेच्छाचारी न रहकर हमारे आधीन हो जायं और हम उनसे जो काम लेना चाहें, जहाँ लगाना चाहें वहीं वे लग जायं ऐसा अभ्यास कर लेने से इन्द्रियाँ हमारी उपासना में बाधक न बनकर साधक बन सकती हैं। जैन-आगमों में कहा गया है कि- “जे आसवा ते परिसवा” अर्थात् जो कर्म बंधन के कारण हैं वे मुक्ति के कारण भी बन सकते हैं। अपनी इन्द्रियों के सदुपयोग करने की कला यदि हम सीख लें तो इस शरीर और इन्द्रिय के द्वारा हम आत्मोत्थान कर सकते हैं। कानों का विषय है सुनना अतः यदि हम विषय विकार-वर्धक और मन को चंचल करने वाली क्रोधादि काषाय-रागद्वेष उत्पन्न करने वाली बातों को न सुनकर सत्पुरुषों की वाणी को सुनें तो हमारा उद्धार सहज ही हो सकता है। इसी तरह अन्य इन्द्रियों का भी हम सदुपयोग करके अपनी उपासना को आगे बढ़ा सकते हैं।

एक एक इन्द्रिय के संयम से मनुष्य में कितनी अद्भुत-शक्तियों का विकास होता है इसका कुछ विवरण पातंजलि के ‘योग सूत्र’ में पाया जाता है। वास्तव में इन्द्रियाँ अपने आप में भली बुरी कुछ भी नहीं हैं। उनको प्रेरणा देने वाला मन और आत्मा है। अतः हमें अपने मन को वश में करना आवश्यक है और वह वश में होगा आत्मा द्वारा। क्योंकि सर्वोपरि सत्ता आत्मा ही है। उसने अपना मान भुला दिया है अपनी अनंत शक्तियों को वह भूल बैठा है इसीलिये मन उस पर हावी हो गया है। पर अभ्यास और वैराग्य के द्वारा विवेक और ज्ञान की लगाम में मन रूपी घोड़े को वश में किया जा सकता है। यदि हम अपनी इन्द्रियों और मन की एकाग्रता के साथ उपासना करेंगे तो सच्ची उपासना होगी और वैसी उपासना से ही हमारा कल्याण हो सकेगा। परमात्मा और आत्मा की दूरी को कम कर उसके साथ एकरूप हो जाना ही उपासना का उद्देश्य है। उपास्य और उपासक के अभिन्न हो जाने में ही उसकी सफलता है।


वह स्वर्ग पुत्र जो संसार का उद्धार करते हैं।

(श्री पाल रिचार्ड)

संसार की सब जातियों में कुछ मनुष्य ऐसे हैं जो सर्वसाधारण के तुल्य नहीं होते। निस्संदेह उनकी आकृति और रूप रंग में कोई अंतर नहीं होता तो भी वे जन साधारण से उतने ही भिन्न होते हैं जितना कि स्वर्ग का प्रकाश और आनंद, मृत्युलोक के अधिकार और दुःख से भिन्न होता है। ऐसे लोगों में उसी स्वर्गीय प्रकाश का आनंद रहता है। संसार के पुत्रों में वे ही स्वर्ग के पुत्र है।

इन स्वर्गीय पुत्रों में अधिकाँश को कोई नहीं जानता। वे उन प्रकाशपूर्ण स्थानों में निवास करते हैं, जिनको जन साधारण ढूंढ़ते फिरते है और जिनके अदृश्य गुप्त द्वारों की तलाश में वे ठोकरें खाते फिरते हैं। वे स्वर्ग पुत्र उन सब बातों को समझते हैं जिनसे सर्वसाधारण प्रायः अनजान हैं। इसका कारण यह कि वे वास्तविक आदर्श जीवन बिताते हैं जीवन के ऊँचे दर्जे के सत्य पर आचरण करते हैं। जब तक अन्य व्यक्ति भी उस मार्ग पर न चलें तब तक वे उनको कैसे जान सकते हैं? उनके पास वह वस्तु है, जिसको प्राप्त करने के लिये लोग आकाँक्षा रखते हैं और जिसे तब तक कोई नहीं पा सकता, जब तक उसके मन में सच्ची आकाँक्षा जागृत न हो’ वह वस्तु जीवन का परम आनंद है।

ऐसे स्वर्ग के पुत्र कभी-कभी आपस में भी एक दूसरे को नहीं पहचानते। वे जगत भर में फैले हुये हैं। कभी-कभी जब उनमें से दो परस्पर मिल जाते हैं तो फौरन एक दूसरे को ताड़ जाते हैं। परन्तु साधारणतः मनुष्य समुदाय के बीच वे पृथक-पृथक ही रहते हैं। पर इस प्रकार प्रकट में विभक्त रहते हुये भी आत्मिक दृष्टि से वे निकटवर्ती होते हैं। वे दूर-दूर रहते हुये भी एक ही जगह रहते हैं, वे प्रायः एकान्तवासी होते हैं और संसार के कोलाहल के बीच में रहकर भी मौनता का आनंद भोगते हैं।

ऐसे लोग बहुधा गरीबी में ही जन्म लेते हैं या पीछे गरीब हो जाते हैं। पर भाई उनको इस गरीबी के बदले संसार भर का राज्य या धन भंडार भी दिया जाय तो भी वे इसके लिए तैयार न होंगे। वे तो अपने को समस्त लोकों के सम्राट मानते हैं और वास्तव में वे सब कर्मों और प्रारब्धों के स्वामी होते हैं। प्रारब्धों के कारण जो घटनाएं होती हैं उनके तो वे स्वामी हैं ही, पर स्वयं प्रारब्ध के भी वे स्वामी होते है। किसी की सामर्थ्य नहीं जो उनकी इस पूर्ण सत्ता में बाधा डाल सके। उनकी दरिद्रता की बराबरी संसार की समस्त संपत्ति भी नहीं कर सकती। वे पूर्ण रीति से विरक्त होने पर भी सब तरह से भरे पूरे हैं। संसार के सभी भंडार उन्हीं के हैं। वे कष्ट और क्लेशों को खूब समझते हैं। सर्वसाधारण के जीवन की तरह उनका जीवन भी संकटों से भरा होता है और दूसरों की तरह उनका जहाज भी कभी कभी टूट जाता है, पर बाह्य जगत में चाहे जितनी आँधी और तूफान चलता रहे, पर उनकी आन्तरिक शाँति पर उसका तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता। जैसे समुद्र की घोर गर्जन करने वाली लहरों के ही ऊपर वहाँ के पक्षी परिस्थितियों में भी इन स्वर्ग पुत्रों की आत्मा गम्भीरता की शक्ति का सहारा ढूंढ़ लेती है, और उसी पर विश्राम करती है। रणभूमि में भी वे शाँति का उपभोग करते हैं, और ऐसी शाँति भोगते हैं जो सब प्रकार के ज्ञान से भी आगे बढ़ी हुई है। कोई ऐसा नरक नहीं, जिसमें वे परमब्रह्म की मुस्कान की चमक न देखते हो।

इन लोगों की ऐसी सर्वोच्च स्थिति का कारण यह नहीं कि किसी खास धर्म के अनुयायी होने से उनको यह लाभ प्राप्त हुआ है। ऐसे स्वर्ग पुत्र प्रत्येक धर्म में पाये जाते हैं, परन्तु वे बहुधा सभी धर्मों की सीमा से बाहर रहते हैं। धर्म (मजहब) तो नीचे के मार्ग हैं और वे महात्मा तो शिखर पर रहते हैं- उस शिखर पर जहाँ सब मार्ग जाकर मिल जाते हैं, जहाँ सब धर्म सम्पूर्णता को पहुँच जाते हैं, वहाँ स्वर्ग पुत्र ही पृथ्वी के सच्चे पुत्र हैं। वे पृथ्वी को अपनी जननी की तरह प्यार करते हैं, क्योंकि वह मनुष्य, जो संसार से प्रेम नहीं करता, वह स्वर्ग को समझ ही क्या सकता है? वे संसार में ही स्वर्ग की रचना कर देते हैं और संसार में ही स्वर्गीय जीवन धारण करते हैं। वास्तव में संसार मनुष्य को स्वर्ग से पृथक नहीं करता, वरन् यह मनुष्य की ही करतूत होती है कि वह स्वर्ग को संसार से अलग कर देता है। जब मनुष्य संसार को नर्क बना सकता है, तो वह इसे स्वर्ग भी बना सकता है। संसार या शरीर मनुष्य को स्वर्ग से पृथक नहीं कर सकते। हाँ मनुष्य की स्वार्थपरता ऐसा कर सकती है। यदि मनुष्य स्वर्गीय आनंद को संसार में नहीं पा सकता तो फिर कहाँ पावेगा ? स्वार्थपरता इस मृत्यु के बाद तक, इस हाड़, माँस की देह के नष्ट हो जाने पर भी कायम रह जाती है। स्वार्थपूर्ण आत्मा पृथ्वी पर ही क्लेश नहीं भोगती यदि वह स्वर्गों के स्वर्ग में चली जाय तो वहाँ भी क्लेश ही भोगेगी। ऐसा कौन स्वर्ग है जो अपना आनंद ऐसी आत्मा को प्रदान करेगा?

जिस स्वर्ग में वे स्वर्गीय पुत्र रहते हैं, वह स्वर्ग उस स्वर्ग से, जिसे धर्म-सम्प्रदायों ने “स्वर्ग” मान रखा है- बड़ा दूर है। स्वर्ग और नर्क मनुष्य की वासनाओं और उसके भय के भड़कीले चित्र को अनंत में लटका देते हैं- अर्थात् स्वर्ग की लालसा और नर्क का भय मनुष्य की आत्मा को मुक्ति प्रदान करने में उलटे मार्ग के रोड़े बन जाते हैं- जब भय और लालसा बनी रही तो स्वर्ग कैसा? वासना और भय से बचना ही तो सच्चा स्वर्ग है। इस प्रकार स्वर्ग पुत्रों का आनंद और दुःख सर्वसाधारण के आनंद और दुःख से बहुत भिन्न होता है।

उपनिषद् में कहा गया है- “उसको ढूंढ़ो जिससे सब भूतों ने जन्म ग्रहण किया है, जिसके द्वारा भूत (प्राणीमात्र) जीवित रहते हैं और अंत में उसी में लय हो जाते हैं। सब कुछ आनंद ही से पैदा हुआ है, आनंद से ही सबका अस्तित्व कायम है और फिर सब आनंद में ही लय हो जाते हैं।” बस, स्वार्थपरता के गला घोट बन्धन को तोड़ते ही वे पुनः आनंद को प्राप्त कर लेते हैं और शाँतिपूर्वक उस सत्ता में मिल जाते हैं, जो अनादि, अनन्त, असीम, अखंड, अदोष, और अकलंक है। आत्मा को स्वार्थपरता से मुक्त करना बड़ा भारी बलिदान है। संसार के कुछ मनुष्य इस महान बलिदान में लगे हुये हैं। वे इस त्याग में इसीलिये लगे हैं कि क्लेश और अंधेपन (अज्ञानता) में भी एकाग्रता की शक्ति द्वारा परमात्मा के द्वार को खोल दें।

मैंने स्वर्ग के पुत्रों की खोज में संसार का पर्यटन किया है। अब वह अवसर आ गया है, जब उन सबको मिलाकर एकता के केन्द्र की रचना करनी चाहिये। अब वे भविष्य में जन्म लेने वाले नवीज संसार के हृदय की सृष्टि करें, क्योंकि इन पवित्र पुरुषों में अनेक सीधी सादी आत्मायें भी हैं। उनमें कोई खेतों के गड़रिये हैं, कोई जातियों के गड़रिये हैं और कोई साँसारिक रणक्षेत्र के योद्धा हैं। यदि उनमें से कुछ को आत्म चिन्तन के प्रकाश के सिवाय और किसी तरह का ज्ञान नहीं है, तो कई ऐसे भी हैं जो आत्मा के स्वर्ग को प्रकाशित कर रहे हैं। स्वर्ग अपना आनंद तो सबको देता है, परंतु अपनी शक्ति किसी किसी को ही प्रदान करता है। ऐसे प्राणी इस संसार में प्रतीत नहीं होते, फिर भी वे इसी संसार के हैं वर्तमान काल में उनको जैसा आत्म ज्ञान और बल प्राप्त हुआ है वैसा बहुत समय से नहीं हुआ था। उसी शक्ति से वे आज भूतकाल की समस्त वस्तुओं को चकनाचूर करके भविष्य की जातियों के लिये बिखेर रहे हैं।


मानवता का उच्च लक्ष्य और अधिकार

(श्री रामेश्वर जी शिकारी, खरगोन)

‘मानव’ अथवा “मानवता” शब्द से अनेक प्रकार के अधिकारों और कर्तव्यों का बोध होता है। हमारे शास्त्रों के मतानुसार पूर्व जन्म के कर्मों के परिणाम स्वरूप ही बुरे और भले फल की प्राप्ति होती है। उच्च कोटि के सत्कर्म करने से ही जीव मानव योनि में आता है, और उसमें भी किसी ज्ञानी और शुभ कर्म करने वाले के यहाँ जन्म लेना और भी सौभाग्य का लक्षण है। आत्मा का स्वभाव ही नाना योनियों में भ्रमण करने का है और मुक्ति प्राप्त होने से पूर्व मनुष्य को भी बहुत से शरीरों में अवतरित होना पड़ता है। गीता में स्पष्ट कह दिया गया है- “ अनेक जन्म संसिद्धि ततोः यान्ति पराँगतिम्”। अपने पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का फल भोगने के लिये ही जीवात्मा भौतिक शरीर में आता है और संसार में भ्रमण करते हुये वह भविष्य के लिये “क्रियमाण-कर्म करता रहता है। वह जैसा कार्य इस समय कर रहा है, उसे उसी प्रकार का फल भविष्य में सहन करना पड़ेगा। गोस्वामी जी का कथन सर्वथा सत्य है-

कर्म प्रवान विश्व करि राखा।

जो जस करहिं सो तस फल चाखा॥

इसका आशय यही है कि सत्कर्म और शुद्धाचरण द्वारा मनुष्य हर प्रकार की उन्नति करने और अन्त में मुक्ति प्राप्त करने का पूर्ण अधिकारी है। मनुष्य के भीतर जीवात्मा है वह परमात्मा का अंश होने के कारण सब प्रकार की शक्तियों का धारक और सर्वज्ञ है। वह कर्मों से बंधा होने के कारण विभिन्न योनियों में भ्रमण करता रहता है। उसकी श्रेष्ठता और हीनता और अवनति उसके कर्मों पर ही निर्भर है। वह चाहे श्रेष्ठ कर्म करके भगवान बन जाय और चाहे नीच कर्म करके नरक का कीड़ा हो जाय। जिस मानव देह की गर्मी (ताप) नष्ट हो जाती है उसे मुर्दा कहा जाता है। इसी प्रकार जिस मनुष्य का जप-तप क्षीण हो जाता है उसे सत्कर्मों में अरुचि हो जाती है उसकी आत्मा पतित हो जाती है। इसके विपरीत श्रद्धा, विश्वास की आन्तरिक भावना लेकर कर्म करने से शक्ति संचय होता है, जिसके द्वारा वह आत्मोन्नति के मार्ग में अग्रसर हो सकता है।

भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने सबसे उत्कृष्ट कर्म यज्ञ को बतलाया है। यज्ञ रूपी तप से ही त्याग और दान की भावना जागृत होती है। यज्ञ रूप तप से ही समस्त ब्रह्माण्ड के प्राणियों का पालन पोषण होता है। शास्त्र में कहा गया है कि यज्ञ द्वारा ही ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की। सब प्रकार के यज्ञों में गायत्री यज्ञ सर्व श्रेष्ठ है क्योंकि इससे आत्म-कल्याण के साथ ही विश्व-कल्याण भी साधित होता है और सच पूछा जाय तो विश्व कल्याण अथवा परमार्थ की भावना ही आत्म कल्याण का सबसे बड़ा साधन है। इसलिये जब यज्ञ आसन पर बैठते ही साधक निम्न श्लोक उच्चारण करता है।

ॐ अपवित्र पवित्रोवा सर्वावस्थाँ गतोऽपिवा।

यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं सः बाह्य भ्यंतरः शुचि॥

वैसे ही उसके अन्तर में शान्ति और आनन्द की एक लहर व्याप्त हो जाती है। इसके बाद आचमन का मंत्र बोलकर वह अपनी दृष्टि को विश्वव्यापी बनाने के लिये कहता है-

ॐ स्वस्तिन नः इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्तिनः पूषा विश्ववेदाः।

स्वन्तिनस्ताक्ष्योऽरिष्टनेमि स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु॥

“हे इन्द्रदेव, विश्वेदेवा, गरुड़, बृहस्पति आप हमारा सबका आत्म कल्याण करें।” इस प्रार्थना में यज्ञकर्ता अपने लिये भौतिक वैभव की इच्छा नहीं करता, वरन् विश्वकल्याण की भावना को जागृत करके सबके साथ आत्मोन्नति की कामना करता है। इसके लिये वह मनुष्य मात्र ही नहीं वरन् प्राणीमात्र तथा पंच भूतों के लिये सच्ची शान्ति की अभिलाषा प्रकट करता हैं-

“ॐ धौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्ति रोषधयः शान्तिः बनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि।”

“आकाश, भूतल, मध्यभाग, अन्तरिक्ष, जल, औषधियों वनस्पतियाँ, देवगण, ब्रह्मारूपात्मक तत्व सर्वत्र सब कुछ सर्वदा शांति ही शान्ति हो।” कितनी विशाल और उद्दात्त भावनायें भरी हुई हैं इस प्रार्थना में प्राणीमात्र से भ्रातृभाव- आत्मभाव की इससे बढ़कर भावना क्या हो सकती है? इसीलिए फिर इससे भी अधिक स्पष्टता के साथ कहा है-

“ॐ विश्वानिदेव सवितुर्दुरितानि परासुव।

यद् भद्रं तन्नः आसुव॥

“हमारे समस्त पापों को नष्ट कर दीजिये और जो कुछ कल्याणकारी है वह हम सबको प्रदान कीजिये।” इस प्रकार जो व्यक्ति आन्तरिक मन से नित्यप्रति ऐसी भावनाएं करेगा अगर वह आदर्श जीवन की ओर अग्रसर हो तो इसमें आश्चर्य क्या है? इस प्रकार वह सहज ही में देवत्व प्राप्त कर सकता है। इससे बढ़कर मनुष्य के लिये कौन सा अधिकार हो सकता है। शोक है उन मानव नाम धारियों के लिए जो ऐसा अधिकार और समस्त शक्तियों के होते हुये भी जड़ पदार्थों के लालच में पड़ कर पतित बनाने वाले कर्म करते हैं। ऐसे ही हतभाग्यसों के लिए महात्माजनों ने कहा है-

जन्मैव व्यर्थता नित्यं भव भोग प्रलोभिना।

काँच मूल्येन विक्रतों हन्तं चिन्तामणिर्मया॥

“संसार के भोगों के लोभी अपना जन्म व्यर्थ ही खो देते हैं और चिन्तामणि रूपी मानव जन्म को विषय भोग रूपी काँच के मूल्य में बेच डालते हैं।” कैसे शोक की बात है कि जन्म मरण रूपी रोग की दवा नहीं करते, तो फिर पशु आदि की योनि प्राप्त होने पर वे क्या करेंगे? मनुष्य, आज करूंगा, कल करूंगा- इसी प्रकार सोचते विचारते समय बिता देता है। जब समय पूरा हो जाता है और काल-भगवान सम्मुख उपस्थित हो जाते है तब पछताने लगता है कि मैंने इतना समय आलस्य में व्यर्थ गँवा दिया। इसी बात को लक्ष्य में रखकर रावण ने लक्ष्मण जी को राजनीति का उपदेश देते हुये कहा था कि “सबसे बड़ी नीति यही है कि जो कुछ श्रेष्ठ कार्य हो उसे तुरन्त पूरा कर लो और जो कार्य निकृष्ट जान पड़े उसके लिये रुक कर विचार करो, ऐसा करने से सम्भवतः वह खराब विचार समय बीत जाने से स्वयं मिट जायेगा। “मनुष्य की प्रशंसा इसी में है कि भूल से अथवा जानकारी न होने से अयोग्य कर्म अपने से उन्हें ज्ञान होने पर त्याग देना और धर्म तथा नीति के अनुकूल आचरण करना।

खेद है कि वर्तमान समय में ऐसे व्यक्ति भी उत्पन्न हो गये हैं जो स्वयं तो धर्म और जप,तप, यज्ञादि शुभ कर्मों से दूर रहते ही हैं, पर अन्य लोग जो इन्हें करना चाहते हैं, उनके मार्ग में भी बाधक बनते हैं। ऐसे व्यक्ति सोचते हैं कि अगर लोग सत् मार्ग पर चलने लग गये, तो हम उनके साथ जो मनमाना व्यवहार करते रहे और उनको हर तरह से दबा कर रखते आये, उसमें अन्तर पड़ जायेगा। क्योंकि अन्याय, अनाचार, मनमानी आदि बातें दूषित वातावरण में ही पनप सकते हैं। पुण्य और श्रेष्ठ कर्मों के प्रकाश में उनकी दाल नहीं गल सकती। ऐसे “बड़प्पन” के भूखे लोगों के लिये क्या कहा जाय यह समझ में नहीं आता। पर कुछ भी हो हम यह जानते हैं समय बदल गया है, समाज में आध्यात्मिकता की एक नई चेतना उत्पन्न हो गई है और वह ऐसे स्वार्थी जनों के अड्डा लगाने की नीति से रुक नहीं सकती। जो मानव जीवन के आदर्श को समझकर कल्याणकारी मार्ग को ग्रहण कर लेगा, वह अवश्य मानवता के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करके रहेगा।


संकल्प बल कैसे बढ़ाएं?

(एक साधक)

सब तरह के आध्यात्मिक साधन का आधार मन के संयम और नियंत्रण पर रहता है। मन ही इन्द्रियों का स्वामी है और इन्द्रियाँ उस हालत में सुमार्ग पर चल सकती हैं जब कि मन कुमार्ग गामी न हो। यदि मन हमारे वश में नहीं है, उच्छृंखल है, तो उससे कोई भजन साधन ठीक तरह से हो सकना असंभव है और उस हालत में आत्मोन्नति की आशा ही व्यर्थ है।

सत्संग

मन को साधने में बहुत कुछ सहायता ऐसे पुरुषों की संगति से मिल सकती है जिन्होंने हमसे अधिक उन्नति करली है और जिनकी मानसिक शक्ति हम से बहुत अधिक बड़ी चढ़ी है। उच्च विचार वाला पुरुष हमें वास्तविक सहायता दे सकता है, क्योंकि जिस प्रकार के कम्प (गति) हम पैदा कर सकते हैं, उससे अधिक उच्च प्रकार के कम्प (गति) वह पुरुष पैदा करके जगत में प्रेरित करता रहता है। पृथ्वी पर पड़ा हुआ लोहे का टुकड़ा अपने आप गरम नहीं हो सकता, पर वह अग्नि के समीप रख दिया जाता है तो उष्ण कम्पों को ग्रहण करके गरम हो जाता है।

उसी प्रकार जब हम किसी शक्तिशाली विचार वाले महापुरुष के पास पहुँचते हैं, तो उसके मानसिक कम्पन हमारी देह पर प्रभाव डालते हैं और उसमें भी वैसे ही सजातीय कम्प उत्पन्न कर देते हैं। इस कारण हमारा स्वर उनसे मिल जाता है अर्थात् उनके और हमारे मन में एक ही प्रकार के संकल्पों की प्रेरणा होती है। उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी मानसिक शक्ति बढ़ गई है और हममें ऐसे सूक्ष्म भावों को ग्रहण करने की सामर्थ्य आ गई है जो साधारण अवस्था में हमारी समझ आ सकने में बहुत कठिन थे। किन्तु जब हम फिर अकेले रह जाते हैं तो सूक्ष्म भाव ग्रहण करने की शक्ति फिर गायब हो जाती है।

श्रोतागण एक बड़े व्याख्यानदाता का भाषण सुनने जाते हैं, उसे भली प्रकार समझते जाते हैं और उसके सार को तत्काल बुद्धि में ग्रहण कर लेते हैं। वे प्रसन्न होकर लेक्चर से वापिस जाते हैं और दिल में समझते हैं कि आज हमें ज्ञान का उत्कृष्ट लाभ हुआ। पर अगले दिन जब वे किसी मित्र से उस व्याख्यान की चर्चा करते हैं, तो वे उन बातों को स्पष्ट रूप से नहीं बतला सकते, जो कल उनकी समझ में भली प्रकार आई थी। उस समय उनको यही कहना पड़ता है कि निःसंदेह कल मैंने व्याख्यान का आशय भली प्रकार समझ लिया था, पर आज वह पकड़ में नहीं आता।” इसका कारण यही होता है कि व्याख्यानदाता के भावों का अनुभव हमारे मानसिक शरीर और जीवात्मा को तो हो चुका है, पर वह अभी इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि हम उसको बाह्य रूप में भी स्पष्ट प्रकट कर सकें। पहले दिन जब हम व्याख्यान के असली मर्म को भली प्रकार समझ रहे थे तब सामर्थ्यवान उपदेशक के शक्तिशाली कम्पों ने जिन रूपों की रचना की थी और उनको हमारी मानसिक देह ने ग्रहण कर लिया था। पर दूसरे दिन जब उन बातों को दोहराने में असमर्थता प्रतीत होती है तो इससे यह प्रकट होता है कि हमको उन विचारों को कई बार दोहराना चाहिये। वैसे भाषण कर्ता और श्रोता में एक ही शक्ति काम कर रही है, किन्तु एक ने उसे उन्नत बना लिया है और दूसरे में वह सोई हुई शिथिल पड़ी हुई है। ऐसी शिथिलता किसी बलवान व्यक्ति की शक्ति का संसर्ग होने से तेज हो सकती है।

अपने से अधिक उन्नत पुरुषों की संगति से दूसरा लाभ यह भी होता है कि उनके संसर्ग से हमारा कल्याण होता है और उनके उत्साह प्रदायक प्रभाव से हमारी वृद्धि होती है। इस रीति से सद्गुण शिष्यों को अपने समीप रख कर जो लाभ पहुँचा सकते हैं, वह केवल भाषण द्वारा उपदेश करने की अपेक्षा कहीं अधिक होता है। यदि इस प्रकार बिल्कुल निकट रहने का अवसर न मिल सके तो पुस्तकों द्वारा भी बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं। पर पुस्तकें भी सावधानी के साथ चुनी जानी चाहिये। किसी वास्तविक महापुरुष के ग्रन्थ को पढ़ते समय हमें पूर्ण रीति से शिष्य की भावना रखनी उचित है। अर्थात् हमको अपना चित्त ऐसी निरपेक्ष अवस्था (साम्यावस्था) में रखना चाहिये कि जिससे हम उसके संकल्पों के कम्पों को, जहाँ तक संभव हो ग्रहण कर सकें। जब हम शब्दों को पढ़ चुकें तो हमें चाहिये कि उन पर ध्यान देवें, उनका चिन्तन करें, उनके असली आशय को अनुभव करें, उनके तमाम गुप्त अर्थों को उनमें से निकाल लेवें। हमारी चित्त वृत्ति एकाग्र होनी चाहिये ताकि शब्दों के अवसरण को छोड़कर हम ग्रंथकर्ता की चित्त वृत्ति का भाव ग्रहण कर सकें। इस प्रकार का पाठ करना अथवा पढ़ना शिक्षा का काम देता है और हमारी मानसिक उन्नति में बड़ा सहायक होता है। जिस पाठ में इतना प्रयत्न नहीं किया जायगा वह दिल को बहलाने वाला और हमारे ज्ञान भण्डार को कुछ बढ़ाने वाला ही हो सकता है, पर उससे हमारी उतनी मानसिक उन्नति और वृद्धि नहीं हो सकती जैसी कि पूर्ण चिन्तन और मनन द्वारा संभव होती है।

एकाग्रता

मन की शक्ति को बढ़ाकर संकल्पों को जोरदार बनाने का दूसरा साधन है चित्त की एकाग्रता। हम ऊपर इस बात को दिखला चुकें हैं कि जिन विषयों की ओर वृत्ति लगाई जाती है, उन्हीं के रूप को मानसिक देह ग्रहण कर लेती है। पातंजलि योग सूत्र में “चित्तवृत्ति के निरोध” का यही अभिप्राय है कि बाह्य सृष्टि के मनोरम प्रतिबिंबों को जो प्रतिक्षण पलटते रहते हैं रोका जावे। मानसिक देह की निरन्तर चंचल वृत्तियों को रोकना, और नियत विशेष ध्येय के आकार में उनको संलग्न अथवा स्थित करना, एकाग्रता का प्रथम अंग है। यह एकाग्रता जड़रूप (मानसिक) देह से सम्बन्ध रखती है। उसको चित्तवृत्ति के साथ इतना संयुक्त करना चाहिये कि वह हमारे अन्तर में उतर जावें। यह एकाग्रता का दूसरा अंग होता है।

एकाग्रता के अभ्यास में अपने चित्त को केवल एक ही मूर्ति (रूप) पर टिकाया जाता है। अभ्यास करने वाले (ज्ञाता) का पूरा ध्यान एक ही लक्ष्य पर बिना हल चल के दृढ़ता पूर्वक स्थिर किया जाता है। बाह्य विषयों से आकर्षित होकर चित्त को निरन्तर इधर उधर जाने और भिन्न भिन्न बातों की चिन्ता करने से रोका जाता है। इसके लिये इच्छा शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है कि वह मन के अन्यत्र भटकते ही उसे पुनः खींच कर लक्ष्य पर ले आवे।

जब चित्त एक मूर्ति को स्थिरता से धारण कर लेता है, और ज्ञाता (अभ्यास) एकाग्र भाव से उसका ध्यान करता है, तो उसको ध्येय वस्तु का इतना ज्ञान हो जाता है जितना किसी अन्य वाचिक वर्णन (बातचीत) से नहीं हो सकता। किसी चित्र या प्राकृतिक दृश्य का जितना साँगोपाँग ज्ञान उसके प्रत्यक्ष दर्शक से होता है उतना उसके वर्णन को पढ़ने अथवा सुनने से नहीं हो सकता। पर यदि हम ऐसे वर्णन पर चित्त को एकाग्र कर लें तो उसका चित्र मानसिक देह पर बन जायेगा, और तब हमको जितना लाभ होगा उतना केवल शब्दों का पाठ करने से नहीं हो सकता। शब्द तो किसी विषय के संकेत मात्र हैं और उन पर मनन करने से उनकी मूर्ति हमारे मन में उत्पन्न हो सकती है। अगर हम उस पर बराबर ध्यान लगाते रहें तो वैसे वैसे ही उसका रूप हमारे मन में अधिकाधिक स्पष्ट होता जायेगा और हम उसके विषय में कही अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेंगे।

संकल्प शक्ति का विकास करने के जो अनेक मार्ग हैं उनमें सत्संग अथवा स्वाध्याय तथा चित्त को एकाग्र बनाना मुख्य है, क्योंकि उनको मनुष्य थोड़े प्रयत्न से कहीं भी प्राप्त कर सकता है। चित्त के एकाग्र होने से प्रत्येक प्रकार के जप और भजन का फल स्पष्ट देखने में आता है।


जीवन का लक्ष्य एक हो।

(श्री रामखेलावन चौधरी)

महाभारत में वर्णित वीरों की कथाओं में अर्जुन की कथा बड़ी शिक्षाप्रद है। अर्जुन लक्ष्यभेध में सर्वोपरि समझे जाते थे। विद्यार्थी काल में उन्होंने एक वृक्ष पर स्थापित काठ की चिड़िया का सर सफलतापूर्वक भेध कर अन्य विद्यार्थियों के सामने अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित कर दी थी। उनके अचूक लक्ष्यभेध का प्रमुख कारण यह था कि उनकी दृष्टि एक मात्र लक्ष्य पर ही गड़ी रहती थी। उस कथा का निष्कर्ष यह है कि यदि आप अपने जीवन में निश्चित तथा अचूक सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो प्रारम्भ में ही एक लक्ष्य का चुनाव कर लीजिये। जेम्स ऐलेन नामक अंग्रेजी के एक लेखक ने अपने एक लेख- सफलता का रहस्य में एक लक्ष्य के चुनाव को सबसे अधिक महत्व दिया है। खेद की बात है कि बहुत कम लोग अपने जीवन के ध्रुव लक्ष्य को पहचानने के लिये अपने भाग्य और भगवान को कोसते हैं।

अंग्रेजी की एक कहावत है- यदि आपके कार्य का श्रीगणेश ठीक से हुआ है, तो आपको काफी सफलता प्राप्त होगी। यह बात सही भी है। जीवन का श्रीगणेश ‘लक्ष्य निश्चय’ के साथ ही होना चाहिये। यदि लक्ष्य निश्चित हो गया, तो आपके जीवन के समस्त कार्य व्यापार नियमबद्ध हो जाते हैं। यदि किसी जहाज का कोई गन्तव्य स्थान निश्चित न हो तो वह समुद्रों में लाखों मील का सफर कर डालने पर भी इधर उधर भटकता रहेगा और उसकी यात्रा अधूरी रहेगी। एक असफल एवं निराश व्यक्ति की भावनाओं को व्यक्त करते हुये उर्दू का एक कवि ‘जौक’ कहता है-

जौक इस बहरे जहाँ में किश्तिए उम्रे रवाँ

जिस जगह पर जा लगी, वह ही किनारा हो गया।

इस कवि की उक्ति को हम निराशाजनक ही कहेंगे। संसार रूपी समुद्र के किसी तट पर जीवन नौका के जा ठहरने पर किसी मनुष्य को संतोष नहीं हो सकता। यदि मनुष्य की जीवन नौका जहाँ-तहाँ जा टकराए तो ‘मनुष्य’ और घास के तिनके में अन्तर क्या रहा? वह मनुष्य क्या है, जो परिस्थितियों के प्रभाव में इधर उधर बह जाने को ही जीवन की सार्थकता मानता है। वास्तव में हमारी शिक्षा दीक्षा के समस्त आयोजन ही इसलिए किये जाते हैं कि जीवन के प्रभात काल में ही प्रत्येक मनुष्य के जीवन का लक्ष्य निश्चित हो जाये और जीवन की संध्या तक पहुँचते पहुँचते यह एक लंबी यात्रा पूरी कर सके। व्यक्तिगत जीवन में लक्ष्य निर्धारित होने से मनुष्य सफलता की सीढ़ी पर द्रुतगति से चढ़ता जाता है। एक समाज अथवा राष्ट्र का लक्ष्य निश्चित होने से सारा समाज या देश उन्नति के शिखर पर आसीन हो सकता है।

जीवन के लक्ष्य का निश्चय जितनी जल्दी हो जायेगा, मनुष्य उतना ही अधिक लाभ में रहेगा। लक्ष्य निर्धारित करने के लिये कोई विशेष आयु नहीं स्थिर की जा सकती है। फिर भी उत्तम यह है कि विद्यार्थी जीवन में या उसकी समाप्ति होने तक प्रत्येक मनुष्य का लक्ष्य अवश्य ही निश्चित हो जाना चाहिये। चौदह से लेकर बीस वर्ष की आयु तक में लक्ष्य का स्थिर हो जाना उपयोगी सिद्ध होता है। यदि जीवन की औसत सीमा पचहत्तर वर्ष मान ली जाय, तो मनुष्य को जुटकर काम करने के लिये लगभग 40-45 वर्ष मिलते हैं। प्रारम्भिक आयु में लक्ष्य स्थिर हो जाने से, मनुष्य को अपने अंतिम काल में अपनी सफलता का सुख उठाने का अवसर मिल जाता है। लक्ष्य प्राप्ति के लिये काफी समय तक संघर्ष करना पड़ता है। यदि देर में लक्ष्य निश्चित हुआ, तो संघर्ष करते करते जीवन का अन्त आ जाता है और मनुष्य उस आनन्द से वंचित रह जाता है। जो सफलता के अन्त में प्राप्त होता है।

सबसे अधिक महत्वपूर्ण समस्या यह है कि लक्ष्य चुना कैसे जाय। अच्छा तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का लक्ष्य स्वयं चुने। वह अपनी सहज नैसर्गिक शक्तियों, रुचियों, सामर्थ्यों और अर्जित योग्यताओं के विषय में जितना अधिक जानता है, उतना अन्य जन नहीं जानते। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक नवयुवक को अपने जीवन का लक्ष्य चुनने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। इस सम्बन्ध में एक आपत्ति यह हो सकती है कि इस आयु में मनुष्य अनुभव हीन होता है, उसे असफलता और उस के दुष्परिणामों का ज्ञान नहीं होता। इसलिये वह ठीक से लक्ष्य का चुनाव करने में असमर्थ रहता है। ‘प्रयत्न और भूल’ के मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार नवयुवक को चलने देना उचित न होगा क्योंकि लक्ष्य चुनाव में भूल घातक सिद्ध हो सकती है। इस दृष्टि से कुछ लोगों का मत है कि माता-पिता, शुभचिन्तकों और शिक्षकों पर ही नवयुवकों के लक्ष्य चुनाव के प्रश्न को छोड़ देना चाहिये। यह पहलू भी बहुत उत्तम नहीं प्रतीत होता। कभी-कभी माता-पिता कुछ मोहवश और कभी अज्ञानवश बालकों के लिये एक ऐसा लक्ष्य चुनने के लिए लालायित रहते हैं जिसकी प्राप्ति में वे स्वयं अपने जीवन में असफल हो चुके होते हैं। वे अपने बच्चों को अपनी अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति का साधन बनाना चाहते हैं। उन्हें बच्चों की शक्तियों और उनकी सीमाओं का तनिक भी ज्ञान नहीं होता। ऐसी दशा में जानबूझकर बालकों को असफलता के मार्ग में ढकेले जाने की संभावना रहती है। लक्ष्य चुनाव के लिये शिक्षक कुछ अधिक उपयुक्त प्रतीत होते हैं क्योंकि वे निष्पक्ष दृष्टि से अपने विद्यार्थियों की योग्यताओं और रुचियों को पहचान सकते हैं और इस कार्य के अनुकूल योग्यता भी रखते हैं। पर कठिनाई यह है कि हमारी शिक्षा का ढाँचा कुछ ऐसा है कि शिक्षक इस काम को कर नहीं पाते।

हमारे सामने तो बीच का रास्ता है। नवयुवकों को लक्ष्य चुनाव में सहायता देने के लिये पाठशालाओं और माता-पिता का सहयोग होना चाहिए। हर्ष की बात है कि सरकार की ओर से हमारे देश में पथ-प्रदर्शन सेवाओं का संगठन किया जा रहा है। अन्य उन्नत देशों में इस प्रकार की सेवाओं का विधिवत् संचालन हो रहा है। हमारे पास तो जो धन उपलब्ध है, उन्हीं से कार्य ले सकते हैं। वर्तमान में माता-पिता और अध्यापकों का ही यह कर्तव्य है कि वे लक्ष्य चुनाव के काम में नवयुवकों का मार्ग दर्शन करें। हमारे देश में माता-पिता इस दृष्टि से बहुत पिछड़े हैं, वे अपने बच्चों के लिए भोजन वस्त्र और यत्किंचित् शिक्षा की व्यवस्था तो कर देते हैं परन्तु जीवन के लक्ष्य के सम्बन्ध में कभी पूछताछ तक नहीं करते। उन्हें इस उदासीनता का त्याग करना चाहिए। लक्ष्य का निश्चय न होने से हमारे नवयुवकों की शक्ति का अपव्यय होता है और राष्ट्र की भारी हानि होती है।

लक्ष्य का चुनाव आवश्यक है परन्तु उसके बाद भी कुछ बातें रह जाती हैं। एक पथिक को घने बीहड़ जंगल से होकर जाने वाले मार्ग पर लाकर खड़ा कर देने से ही काम नहीं चलता। उस मार्ग पर उसे सुरक्षा पूर्वक कुछ दूर पहुँचाना भी आवश्यक है। जिससे उसके मन में आत्मविश्वास का भाव जाग्रत हो जाय। आत्मविश्वास पैदा होते ही वह अपने मार्ग पर अकेला जा सकेगा। प्रारम्भ में भूलें होने की अधिक संभावना रहती है और प्रारंभ की भूलें खतरनाक होती हैं। अस्तु लक्ष्य चुनाव के पश्चात् भी कुछ समय तक नवयुवकों का पथ -प्रदर्शन करते रहना चाहिए। उसके आगे निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना मनुष्य का अपना निजी कर्तव्य और उत्तरदायित्व होता है।

प्रत्येक मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि लक्ष्य निश्चित कर लेने के बाद भी उसके मार्ग में बड़े बड़े प्रलोभन आयेंगे। लक्ष्य दूर होता ही है और उससे होने वाला लाभ भी दूरस्थ होता है। बीच में ऐसे अनेक काम आ सकते हैं, जिनसे तात्कालिक लाभ होने की संभावना रहती है। ऐसे लाभ को देखकर मनुष्य का मन डगमगाने लगता है। वह विचलित होकर पथभ्रष्ट हो जाता है। ऐसे अवसरों पर मन को दृढ़ रखने की आवश्यकता है। अपने जीवन के लक्ष्य के प्रति मनुष्य को हर दशा में सजग रहना चाहिए। इसका एक उत्तम उपाय यह है कि प्रतिमास या प्रतिवर्ष अपने कार्यों और उपलब्धियों की अवश्य जाँच करनी चाहिए। इससे अपनी प्रगति का अनुमान हो जाता है, उत्साह बढ़ता है और लक्ष्य पर दृष्टि जमी रहती है। मनुष्य को किसी ऐसे क्षेत्र में पदार्पण नहीं करना चाहिए, जिससे अपने निश्चित लक्ष्य का विरोध हो। ऐसे मित्रों या संगति से भी दूर रहना चाहिए जिनके प्रभाव से लक्ष्य विमुख होने की संभावना हो। यदि आपने संगीत में नैपुण्य प्राप्त करने को अपने जीवन का लक्ष्य चुना है तो क्रिकेट खेलने या बटेर लड़ाने वाले के साथ मैत्री रखने में पथ भ्रष्ट हो जाना सम्भव है। अपना अध्ययन, चिन्तन और मनोरंजन सभी कुछ लक्ष्य के अनुकूल हृदय मंदिर में जलती रहे और उसका कोना-कोना प्रकाशित रहे, इस बात को स्मरण रखना है।

अन्त में, आप यह भी स्मरण रखें कि जो आपका लक्ष्य स्थिर है, तो आप सैकड़ों व्याधी से दूर रहेंगे। आपका मन अनिश्चित और अन्तर्द्वन्द्व से मुक्त रहेगा। दुविधापूर्ण परिस्थितियों में निर्णय ले सकेंगे और आपकी इच्छा शक्ति बनेगी। आप समय का सदुपयोग करना सीख सकें क्योंकि जब फालतू बातों की ओर आपका ध्यान न जायेगा तो समय का अपव्यय अपने आप रुक जायेगा। प्रायः आप अपनी शक्ति की संपदा का भारी अपव्यय करते रहते हैं परन्तु लक्ष्य के निश्चय से आपकी शक्ति का एक एक कण उसी की पूर्ति में लगेगा। आपको तभी अपनी शक्ति का अनुमान होगा। सूर्य की किरणों में यों साधारण गर्मी ही है परन्तु जब बहुत सी किरणें आतिशी शीशे द्वारा एक केन्द्र बिन्दु पर इकठ्ठा करली जाती हैं, तो उनमें भस्म कर देने की शक्ति आ जाती है। आप निर्बलता का अनुभव इसलिए करते हैं कि आप की शक्तियाँ बिखरी रहती हैं। आपका लक्ष्य ही आपकी शक्तियों को समेटने वाला आतिशी शीशा है। अब यह स्मरण रखें कि जीवन का लक्ष्य एक हो।


Quotation

जो जैसा विचार करता है वह वैसा ही बना जाता है। जैसा हम चाहेंगे हमें मिलेगा।

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बाइबिल में लिखा है, “माँगो और तुम्हें मिलेगा।” खटखटाओ और द्वार तुम्हारे लिए खुल जाएंगे। “तलाश करो, और तुम पा लोगे” हमारे अन्तर में एक ऐसी प्रज्ञा है जो समय और दूरी व व्यवधान लाँघकर सत्य का दर्शन कर लेती है।

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इस दृष्टि को मलिन नहीं होना चाहिए। वे बाह्य और मिथ्या रुपों का भेदन कर सच्चाई तक पहुँचती है। ऐक्स-रे की शक्ति से भी अधिक उसकी पारदर्शकता है। यही जीवन को सार्थक बनाती है।

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अपने भीतर की इस महानता के अतिरिक्त और कोई सार्वभौमिकता नहीं।

सत्यकाम विद्यालंका


संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु प्राप्त करें!

(श्री आत्मदर्शी)

आप से पूछा जाय कि क्या आप इस संसार और मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठ वस्तु प्राप्त करना चाहते है? तो आप अवश्य पूछेंगे कि “बतलाइये वह क्या है? हम अवश्य ही उसे प्राप्त करना चाहेंगे।”

हमारे पास अधिक धन नहीं है, जो कुछ भी है, उसे देकर यदि हम संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु पा सकें, तब भी हम उसे पाना चाहेंगे।

हमारे पास दो हाथों की शक्ति है। यदि उससे हम उस श्रेष्ठ वस्तु को प्राप्त कर सकते हैं, तो इसमें कोई कमी नहीं रखेंगे। अपनी सीमित शारीरिक शक्ति से अवश्य ही उसे प्राप्त करेंगे।

हमारे पास एक क्रियाशील मस्तिष्क है। उसकी सहायता से यदि हम इस श्रेष्ठतम वस्तु को पा सकते हैं, तो अवश्य उसे पाना चाहेंगे।

लेकिन निश्चय जानिये वह वस्तु न धन से, न शारीरिक शक्ति से, न किसी बड़ी बाहरी ताकत से ही जीती जा सकती है। वह तो हम सब के लिए सर्व सुलभ है। पहुँच के भीतर है। उसके लिए केवल सतत और निरन्तर अभ्यास मात्र की ही आवश्यकता है।

संसार में सर्वश्रेष्ठ और सर्वशक्तिवान वस्तु बड़ी दिव्य और अदृश्य है। हम सभी के पास वह मंत्र है, जिसमें यह वस्तु उत्पन्न की जा सकती है। अथर्ववेद में कहा गया है :-

त्वं नो मेधे प्रथमा

-अथर्व. 6।108।1

सद्विचार ही संसार में सर्वश्रेष्ठ वस्तु है।

विचार उत्पन्न करने का यंत्र हमारा मस्तिष्क है मस्तिष्क का कार्य नए नए विचार उत्पन्न करना है। सद्विचार एक सही दिशा में बहने वाली शक्ति है। जो विचार मनुष्य को नई शक्ति, नई भावना से भर देता है और निरन्तर सही मार्ग में प्रगति की इच्छा उत्पन्न करता है, वह मानव की बहुमूल्य सम्पत्ति है। विचार मंत्र को सही तरह चलाने से मनुष्य निरन्तर आगे बढ़ता जाता है लेकिन उस मंत्र को गलत रीति से घुमा कर कष्टों में फँस सकता है। मन में उद्विग्नता पैदा कर नाना प्रकार की गलतियाँ कर सकता है।

ऐसे व्यक्ति भाग्यशाली हैं, जो विचार मंत्र को ठीक तरह से संचालित कर जीवन को सद्प्रेरणा से भर लेते हैं और किसी प्रकार की दूषित भ्रान्तियों या अंध विश्वासों में नहीं फँसते। विचार मंत्र को उल्टी दशा में घुमा देने से मनुष्य नाना भ्रान्तियों, रूढ़ियों, अंतर्मन की जटिल ग्रन्थियों से भर जाता है। उसका राक्षसी स्वरूप उभर उठता है। आज समाज में जो व्यक्ति भ्रमित, चिन्तित है, उद्विग्न रहते हैं, मानसिक परेशानियों से आक्रांत रहते हैं, उसका मुख्य कारण यह है कि वे विचार मन्त्र का गलत प्रयोग कर रहे हैं। जिस मंत्र से वे देवत्व को जाग्रत कर सकते हैं, उसी को गलत दिशा में घुमा कर वे अपने घिनौने स्वरूप को जगाते हैं और दुख के नर्क में पड़े रहते हैं। सही रूप में प्रयुक्त मस्तिष्क का फल सद्विचार है। गलत रूप में प्रयुक्त मस्तिष्क का कुफल कुविचार और कुकल्पनाएं हैं। कुविचार मनुष्य को जीते जी नर्क की अग्नि में धकेल देते हैं। कुविचारी आत्म हीनता की, या अपनी कमजोरी की बात सोच सोच कर मन में नाना यन्त्रणायें सहा करता है, चिन्तित परेशान हुआ करता है। दूसरों को अपना शत्रु समझता है। रोग शोक, चिन्ता, व्याधि, कटुता, ग्लानि, निर्बलता, शक्तिहीनता इत्यादि के कुविचार मनुष्य के भारी शत्रु हैं। सही दिशा में चलने वाला मस्तिष्क मनुष्य का प्रेरक है, गलत दिशा में चलने वाला सबसे बड़ा शत्रु।

संसार में मनुष्यों, अपने मस्तिष्क को सही दिशाओं में चलाओ। गलत दिशा में लगाकर जीवन को भार मत बनाओ। गलत दिशा ही जीवन को भार स्वरूप बनाने वाली विभीषिका है। एक विद्वान को समझदार और बुद्धिमान व्यक्ति को अपने मस्तिष्क से सद्विचार ही उत्पन्न करने चाहिए। आत्मविश्वास विकसित करना चाहिए। यहाँ हम कुछ विचार बीज दे रहे हैं। इन्हीं दिशाओं में विचार मंत्र को घुमाना चाहिए। एक विचार बीज को मानसिक खेत में बो देने से वैसे ही शुभ वृक्ष, उत्पन्न होते हैं और मन एक रम्य वाटिका बन जाता है।

कुछ दिव्य प्रेरक विचार बीज

जहाँ आशा, विश्वास उत्साह, और स्थिर बुद्धि होती है, वहाँ लक्ष्मी तथा हर प्रकार का सौख्य आता है, यह मेरी निश्चित नीति और निश्चित मति है। मैं अपनी उन्नति की आशा अपनी शारीरिक, बौद्धिक, और मानसिक शक्तियों के प्रति पूर्ण विश्वास और अपने लक्ष्य के प्रति उत्साह की पूँजी लेकर जीवन में प्रविष्ट होता हूँ। अपने उद्देश्य में मेरी बुद्धि पूर्ण रूप से स्थिर है।

जिसका अपनी आत्मा में विश्वास होता है, पृथ्वी में उसके लिए कौन सी वस्तु साध्य नहीं है? आत्मा ही सब शक्तियों और गुणों का अपने आप एक उत्पत्ति स्थल है। मैं अपनी आत्मा को ईश्वर का दिव्य रूप समझता हूँ। मुझमें ईश्वर मेरी आत्मा का रूप धारण कर विराजमान हैं। मेरे मन, वचन और कर्मों के माध्यम से ईश्वर ही प्रकट हो रहा है।

जिसका आत्मा में विश्वास नहीं होता, जो उसकी आज्ञा को नहीं सुनता, उनका चित्त सदा संशय से उद्भ्रान्त रहता है और वह सर्वत्र भ्रान्ति ही भ्रान्ति को पाता है। मैं यह जान कर सही दिशा में ही चलता हूँ।

“यस्य तस्मिन्न विश्वासः तदाज्ञाँ न शृणोति यः

संशयोद् भ्रान्तचित्तः स भ्रान्ति मेवाधिगच्छति॥”

-विद्याधर नीतिरत्नम्

अत्यन्त थक कर भी, यदि कोई अपने साहस और उत्साह को न छोड़े, तो दुर्गम अरण्य भ्रान्त होकर भी वह अपने मार्ग को अवश्यमेव पा जाता है। मैं कठिन स्थितियों में भी अपने साहस और उत्साह को सम्हाले रहता हूँ। अतः मैं अपने सही मार्ग पर चलता रहूँगा।

अनन्ते के वयं क्षुद्रा नैवं चिन्त्यं कदाचन

कणस्य पर्वतस्यापि स्थितिस्तस्मिन् यतः समा

-वि नीतिरत्नम्

इस अनन्त ब्रह्माण्ड में हम क्षुद्रों की क्या पूछ है ऐसा कभी मत विचारों, उसमें कण और पर्वत दोनों एक समान स्थिति है। इन दोनों को अपने विकास का समान अवसर मिलता है। मैं चाहे कण हूँ, तो भी विकसित हो सकता हूँ। मुझे निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। बूँद बूँद से सागर बनता है। शक्ति का कण कण एकत्रित कर मैं महानता की ओर बढ़ रहा हूँ।

निर्धन और निर्बल होकर भी मानव सदा ही महान है। मानव को मानव बनाना चाहिए। मानवता को प्राप्त करना ही उसकी अन्तिम गति है। मैंने अपने इस जीवन में ही महानता की सिद्धि को अपना लक्ष्य चुना है।

किं धनं किम् बलं लोके का वा राजादिसत्क्रिया

नैतिकं बल माधेयम् यद्धि सर्वार्थ साधकम्॥

-विद्याधर नीतिरत्नम्

धन क्या, बल क्या, अथवा राजाओं से प्राप्त सत्कार भी कौन−सी विशेषता रखता है? ये कुछ नहीं। नैतिक बल को धारण कीजिए जो कि समस्त अर्थों को सिद्ध करने वाला है।

“हीनोऽहं हन्त दीनोऽहम व्यामोहं त्यज सत्वरम

नाकाशों रजसाक्रान्तो चिरं म्लानोहि तिष्ठति।”

-विद्याधर नीतित्नम्

मैं हीन हूँ। मैं दीन हूँ। इस व्यामोह को सदा के लिए त्याग दीजिए। आकाश चिरकाल तक केवल धूल से ही आच्छन्न नहीं रह सकता है। अन्त में उसे स्वच्छता प्राप्त होती है। धूल इत्यादि तो क्षणिक है। इसी प्रकार आपकी परेशानियाँ क्षणिक हैं। अस्थायी हैं। अल्पकालिक हैं, वे अब अन्त के निकट ही हैं। क्यों व्यर्थ ही घबराते या अशान्त होते हैं। स्मरण रखिए, न आप दीन है, न आप किसी भी प्रकार से हीन या निर्बल हैं। आप तो सत्चित् आनन्द स्वरूप परम शक्तिशाली आत्मा हैं। आपमें अद्भुत गुप्त शक्तियाँ छिपी पड़ी हैं।

आत्म विश्वास की कुँजी से उन्हें खोलिये।

प्रसुप्तं नाम यत् किञ्चत् ज्योति स्तेन्त र्विराजते

कुरु यत्नेन तद् बुद्धम लोको बुद्धो भविष्यति।

- विद्याधर नीतिरत्नम्

जो ज्योति आप में सुप्त हो रही है, उसको यत्न पूर्वक प्रबुद्ध कीजिए उस ज्योति के प्रबुद्ध होने पर समस्त संसार भी प्रबुद्ध हो जायेगा।

“ध्रुवं कुर्त्तु समर्थेऽसं सर्व सर्वत्र सर्वदा”

एषा सुभावना रक्ष्या व्यक्तिभिः सन्ततं दृढा।

- विद्याधर नीतिरत्नम्

व्यक्तियों का कर्तव्य है कि वे निरन्तर इस भावना को दृढ़ रखें कि मैं सब स्थानों पर सदा सब कुछ करने में निश्चित रूप से पूर्णतः समर्थ हूँ। इस भावना को दृढ़ करने से मनुष्य की गुप्त शक्तियाँ विकसित होती हैं। अपनी शक्तियों के प्रति मनुष्य का जितना दृढ़ विश्वास पकता जाता है, ज्यों-ज्यों उसमें महानता के गुणों का आविर्भाव होता जाता है।

सद्विचार (अपनी बुद्धि प्रतिमा और शक्तियों के प्रति अखण्ड विश्वास) ही मनुष्य की उन्नति का मूल मन्त्र और संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। उसे धारण करने से मनुष्य सफलताओं की ओर स्वतः अग्रसर होने लगता है। जिसने अपने विचार मंत्र को सही दिशा में चलाना सीख लिया है उसकी उन्नति में देर नहीं समझनी चाहिए।


अपने गुरु स्वयं बनिये

(श्री लक्ष्मी नारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम. ए.)

बच्चा जब पैदा होता है तो उसकी बुद्धि, उसका ज्ञान, उसकी समझदारी गीली मिट्टी के लोंदे के समान होती है जिसका निर्माण किसी भी रूप आकार में कुम्हार अपनी इच्छा के अनुसार कर सकता है। अपने चारों ओर के वातावरण से धीरे-धीरे शिशु सीखता रहता है और उसकी बुद्धि क्रमशः परिपक्व होती रहती है। यह सीखने का कार्य मानव के सारे जीवन भर चलता रहता है। हम एक बुजुर्ग के अनुभव को महत्व क्यों देते हैं। क्योंकि उसने दुनिया हमसे अधिक देखी है। दुनिया की ठोकरों से उसने अधिक सीखा है। संसार की अच्छाइयों बुराइयों ने उसकी आँखें अधिक खोली हैं।

बड़ा होने के बाद मनुष्य पढ़ता है, लिखता है। वह दूसरों के अर्जित ज्ञान से लाभ उठाता है। पर पुस्तकीय ज्ञान व स्वअर्जित ज्ञान होता है। जो उसने अपनी आंखें, कान और मस्तिष्क को खुला रखकर प्राप्त किया है। कहावत भी है कि पढ़ने से गुनना अधिक काम आता है।

अपना सुधार, अपना संस्कार मनुष्य स्वयं करता है। हम किसी के कहने से कदाचित् ही अपने को परिवर्तित करते हों। हम किसी की बात ग्रहण करते हैं या उसे अग्रह समझते हैं तभी जब हमारी निज की बुद्धि हमें वैसे करने को कहती हैं और यह ठीक भी है। ‘सुनो सब की करो मन की’ कहावत का उद्देश्य ही यही है।

गिवन ने कहा है कि ‘प्रत्येक मनुष्य को दो प्रकार की शिक्षाएं मिलती हैं, एक वह जो वह दूसरों से ग्रहण करता है, और दूसरी वह जो वह स्वयं अपने को देता है और निश्चय ही दूसरी शिक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।”

बहुत से लोगों की प्रवृत्ति अंतर्मुखी नहीं होती। बहुत से लोगों की प्रकृति ग्रहणशील नहीं होती। ऐसे ही लोगों के लिए कहावत कही गई है कि ‘गुजर गई बिसर गई।’ उनके सुधार की आशा कैसे की जा सकती है जिन्हें अपनी शक्तियों को समझने की क्षमता ही न हो। जो अपने को ही नहीं समझ सकते वे भला दूसरों को क्या समझेंगे। ऐसे आदमियों पर जब उन्हीं की गलती के फलस्वरूप कोई कष्ट या दुर्भाग्य की आँधी आती है तो उनके हाथ पैर फूल जाते हैं। वे क्या करें और क्या न करें यह नहीं समझ पाते। उन्हें अपने पर विश्वास ही नहीं होता। मन की बुद्धि तो सदा दूसरों के हँकाये हकती रही है। कवि वर्डसवर्थ ने कहा है कि ‘वे दो चीजें जो देखने में तो विरोधी लगती है पर वे अवश्य साथ ही साथ चलेगी और वे है मानवोचित स्वतंत्रता और मानवोचित परतंत्रता, मानवोचित आत्मनिर्भरता और मानवोचित परामितता।’ मनुष्य को दूसरों के ज्ञान से अवश्य लाभ उठाना चाहिए, दूसरों के अनुभव, बुद्धि ज्ञान पर उसे अवश्य निर्भर रहना चाहिए, पर साथ ही साथ अपनी स्वयं की बुद्धि, सोचने विचारने की शक्ति तथा निर्णय करने की क्षमता को ताक पर उठाकर नहीं रख देना चाहिए। दूसरों को गुरु अवश्य बनाओ, पर अपने गुरु बिना स्वयं बने काम नहीं चलेगा, ठीक से काम नहीं चलेगा।

सर वाल्टर स्काट ने कहा है कि प्रत्येक मनुष्य की शिक्षा का सर्वोत्तम भाग वह है जो वह स्वयं अपने को देता है।” अन्धानुकरण बुरा है। किसी ने सत्य कहा है कि समझदारी से नास्तिक होना अच्छा है। पर नासमझी में आस्तिक होना भी लाभप्रद नहीं है। कोई जो कुछ कहता है उसे करने या मानने के पहले अपनी बुद्धि से भी तो उसको निर्धारित करने की क्षमता रखो। अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करो, अपने मार्ग का स्वयं निर्माण करो। दूसरों के बनाये फावड़े, कुदाली, हथौड़ी ढलिया, आदि का अवश्य उपयोग करो पर उनकी सहायता से मार्ग स्वयं ही बनाओ। तुम एक काम केवल इसलिए मत करो, एक बात केवल इसीलिए मत मानों क्योंकि उसे तुम्हारे पिता, गुरु या बड़ा कहता है। आज्ञा पालन धर्म है अवश्य पर अपनी बुद्धि, अपनी आत्मा अपने मन की सलाह लेना उससे बड़ा धर्म है।

सैमुएल स्माइल्स ने अपनी पुस्तक ‘सेल्फ-हेल्प’ में कहा है कि जो शिक्षा हम स्कूल तथा कालेज में पाते हैं वह तो केवल प्रारम्भिक शिक्षा मात्र है। उसका महत्व विशेष रूप से इसीलिए है क्योंकि उससे मस्तिष्क को ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) मिलती है और वह हमें अनवरत बनाती है इसमें शिक्षा कार्य की निरन्तरता भी दी जाती है वह निश्चय ही हमारी ‘उतनी’ नहीं होती बनिस्बत उसके जो हम स्वयं अर्जित करते हैं। वह ज्ञान जो परिश्रम के फलस्वरूप प्राप्त किया जाता है वह हमारे अधिकार की वस्तु होती है- एक ऐसी सम्पत्ति जो केवल हमारी होती है। वह प्रयत्न जो प्रत्यक्ष रूप से हमारी होती है, वही प्रमुख और महत्वपूर्ण वस्तु है। दी हुई सुविधाएं, पुस्तकें, न शिक्षक गण, रटे-रटाए पाठ हमें सक्षम बना सकेंगे उस समय तक जब तक हम अपने ही प्रयत्नों से अपनी ही बुद्धि तक मस्तिष्क से उन्हें प्राप्त न करेंगे।

हमें अपने ही पैरों पर खड़े होना चाहिए। अधिक अनुभव पर ही हमें अधिक निर्भर रहना चाहिए हमारे इस कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि गुरु का महत्व ही नहीं है, गुरु की आवश्यकता ही नहीं है। गुरु की आवश्यकता, उपयोगिता तथा पूजनीयता तो सर्वमान्य है ही हमारे एक महर्षि ने जो कुत्ता बिल्ली आदि तक शिक्षा से ग्रहण किया था। और यह दृष्टान्त ही इस बात का द्योतक है कि मनुष्य को ग्रहणशील प्रकृति का होना चाहिए। उसे जो जहाँ से अच्छा मिले उसे निःसंकोच ग्रहण करना चाहिए। अर्थ यही होता है कि आपको अपने गुरु स्वयं बनना पड़ेगा और बनना चाहिए भी।

भगवान ने आखिर हमें बुद्धि काहे के लिए दी है? इसी के लिए कि हम उसका प्रयोग करें। यह भगवान ही की इच्छा है। उसकी इच्छा को न समझना, वैसा न करना तो ईश्वर विमुखता है। अतः अंतर्मुखी प्रवृत्ति, ग्रहणशील प्रकृति, अपने को तथा अपने चारों ओर के फैले वातावरण को समझने और उससे लाभ उठाने की क्षमता, आत्म-निर्भरता अनुभवों को बटोरने और उन्हें अपने जीवन की प्रगति के हथियार के रूप में काम में लाने की समझदारी प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है, अनिवार्य है।

संसार की ठोकरें भी बुरी नहीं होती, बशर्ते वह आँखें खोल दें। एक शायर ने ठीक कहा है “लात दुनिया ने जो मारी, बन गया दीदार (धार्मिक) वह, थी बुरी ठोकर मगर शैतान, रुखसत हो गया।”

आत्म अनुभव, आत्म शिक्षण मनुष्य को कठिनाइयाँ और विरोधों के बीच शान्त और संतुलित बुद्धि का रहने की योग्यता देता है और वह क्या कम बात हुई। अतः अपने गुरु स्वयं बनिये।


सन् 62 का भयंकर ग्रहयोग

(श्री योगेशकुमार जोशी मंड्रोला)

विक्रम सम्वत् 2018 की पौष मास की अमावस्या तद्नुसार दि. 5 फरवरी 1962 ई. को इस शताब्दी में ही नहीं अपितु हजारों वर्षों में अद्वितीय ग्रहयोग हैं।

वैसे तो 6 या 7 ग्रह एक राशि पर कुछ वर्षों के अन्तर से एकत्रित होते ही रहते हैं। इसी शताब्दी में ही 1910, 1921 और 1934 ई. 6 या 7 ग्रहों का योग था। यद्यपि ये योग भी कोई शुभ फलप्रद नहीं थे तथापि इनसे इतनी हानि नहीं हुई जितनी तृतीय विश्व युद्ध में होगी या महाभारत युद्ध में हुई थी। तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से सम्वत् 2018 की ग्रह स्थिति केवल महाभारत युद्ध कालीन ग्रह स्थिति से ही समीचीन प्रतीत होती है।

वैसे तो त्रेतायुग का राम-रावण का संग्राम भी बहुत ही भीषण था। उस संग्राम की भीषणता जो इस लोकोक्ति से ही ज्ञात होती है जिसमें उपमा होने तक का कोई दूसरा युद्ध दिखाई नहीं दिया। राम रावणयोर्युद्ध रामरावणयोरिव” अर्थात् राम रावण का युद्ध तो राम रावण की तरह ही था।

परन्तु इतने भयंकर युद्ध को भी विश्व युद्ध की संज्ञा नहीं दी जा सकती, क्योंकि उस युद्ध का परिणाम सार्वभौमिक न होकर कुछ साम्राज्यों तक ही सीमित था। विगत दोनों विश्व युद्धों की तुलना न तो महाभारत कालीन युद्ध से की जा सकती है और न सम्वत् 2018 की ग्रह स्थिति से ही।

ज्योतिर्विज्ञानानुसार जो विशेषतायें महाभारत और सं. 2018 के साथ संलग्न हैं वे विगत दोनों युद्धों के साथ नहीं है। साथ-साथ यह भी निर्विवाद सत्य है कि महाभारत के भीषण युद्ध की भयंकर ज्वालाओं ने अधिकाँश ,जन, धन, ज्ञान, विज्ञान और कला कौशल की कथा मात्र ही अवशेष छोड़ी थी।

उसी महाभारत युद्ध कालीन ग्रह स्थिति के उपमन अनुरूप खेट कौतुक वि सँ. 2018 में होगा। निम्न चक्र में महाभारत युद्ध और सं 2018 की ग्रह स्थिति इत्यादि का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है।

महाभारत युद्ध

1. सभी ग्रह तुला राशि में स्थित थे।

2. शनि तुला राशि में उच्च थे।

3. तुलाचर राशि है।

4. मार्ग शीर्ष शुक्ला त्रयोदशी का क्षय था।

5. क्षयी त्रयोदशी से पूर्व चन्द्रवार था।

6. क्षयी त्रयोदशी से पूर्व भरणी नक्षत्र था।

7. कार्तिक में दो ग्रहण थे।

8. क्षयी अमावस्या को सूर्य ग्रहण था।

वि. सम्वत् 2018

सभी ग्रह मकर राशि में स्थित हैं।

शनि मकर में होता है।

मकर चर राशि है।

मार्ग शीर्ष शुक्ला त्रयोदशी का क्षय होगा।

क्षयी त्रयोदशी से पूर्व चन्द्रवार है।

श्रावण में दो ग्रहण हैं।

माघ अमावस्या क्षयी होगी।

क्षयी अमावस्या को सुर्य ग्रहण होगा।

5 फरवरी 1962 का सूर्य ग्रहण भारत में दृष्टि गोचर नहीं होगा। ग्रहण बेला भारत में सूर्योदय से पूर्व सार्वदेशिक भारतीय समय 3 बजकर 30 मिनट से 4 बज कर 54 मिनट तक है। यह ग्रहण पूर्वी एशिया प्रशान्त क्षेत्र और अमेरिका के पूर्वी तट पर दिखाई देगा। इससे एक वर्ष पूर्व खग्रास सूर्यग्रहण 15 फरवरी 1961 को सोवियत भूमि पर दिखाई देगा। जिसके छाया पथ में क्रिमिया, स्टालिन आड और पश्चिमी साइबेरिया है। इन योगों के साथ-2 सन् 1962 के कूट योग के साथ एक अन्य विशेषता यह भी है 1962 के पश्चात् 12 वर्षों में दो बार (सन् 1964 तथा 1973 ई.) में मास क्षय है।

5 फरवरी 1962 का ग्रहयोग अमेरिका के अधिपति मिथुन से अष्टम एवं रूस के अधिपति कुम्भ राशि से 12 वें है। सामान्यतया इस योग का प्रभाव न्यूनाधिक रूपेण सभी राष्ट्रों पर पड़ेगा। किन्तु इंग्लैण्ड, जर्मनी, सीरिया, अमेरिका, उत्तरी अफ्रीका, चीन, फ्राँस, इटली, रूस, भारत, हंगरी, संयुक्त राज्य, अरब और पाकिस्तान आदि देशों पर विशेष प्रभाव पड़ेगा।

इस योग का फल ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार अतीव अशुभ फलप्रद है। यथा-

यदा षठणाँ योगो भवतीह यदैकत्र भवने

तदा गोलो योगः प्रलय पद मिन्द्रोऽपि लभते।

भवेल्लो को रंकस्त्यजति खलु पुत्रञ्च जननी

नृपाणाँ हानिस्याच्चलति वसुधा शुष्यति नदी॥

अपिच-

सप्तचाष्टौ ग्रहावापि यद्येकत्र समाश्रिताः।

मन्त्रीनाशो भवेत्तत्र मित्रभेदः परस्परम्॥

इन श्लोकों का तात्पर्य यह है। गोल या कूट योग होने से मानव स्वार्थ सिद्ध के वशीभूत होकर भेद बुद्धि के द्वारा मित्रता भंग करते हैं। आये दिन असुरता के साम्राज्य का विस्तार होता है। उसके फलस्वरूप परस्पर कलह, क्लेश, रोग, शोक, भय दुःख और दरिद्र की वृद्धि होती है। कहीं तो दरिद्रता इतनी अधिक हो जाती है कि माताएं अपने पुत्रों तक का परित्याग कर देती हैं। यत्र तत्र अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प महामारी रेत, विमान दुर्घटना प्रकृति के माध्यम से अधि दैहिक, अधि भौतिक, अनुतापों का भीषण प्रकोप होता है। चतुर्दिशक अशान्ति के वातावरण का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। कई देशों के प्रधान नेताओं की मृत्यु होती है। सैनिक गठबन्धन और शस्त्रास्त्र की प्रतिद्वंद्विता में अहर्निश वृद्धि होती है। सम्भव है कि शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों के नायक अपना मानसिक सन्तुलन व्यवस्थित न रख सके और विश्व युद्ध की घोषणा कर दें।

यदि मानवता के दुर्भाग्य से विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया तो सर्वनाश सन्निकट ही दृष्टिगोचर होता है। विषाक्त यम और घातक अणु-परमाणुओं की वर्षा करके जो युद्ध लड़ा जावेगा वह अत्यन्त भयानक होगा यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। आधुनिकतम शस्त्रास्त्रों से केवल भूमण्डल ही नहीं सुदूर ऊपर अंतरिक्ष में भी मारण शक्ति व्याप्त हो जावेगी। चारों ओर हाहाकार और त्राहि त्राहि की चीत्कारें होने लगेंगी। दग्ध अर्धदग्ध, विषमूर्च्छित और स्वाँसावरुद्ध जनता के करुणा क्रन्दन से दिशायें प्रतिध्वनित हो उठेंगी तथा सर्वत्र संहार व प्रलय का दृश्य उपस्थित हो जावेगा। प्रलयंकारी तृतीय विश्व युद्ध में केवल विपुल जन धन की ही नहीं किन्तु विश्व की सर्वोत्तम निधि सभ्यता और संस्कृति का भी विनाश हो जायेगा।

भावी विश्व युद्ध की कल्पना या भविष्य वाणी केवल ज्योतिर्विद् ही करते हों ऐसी बात नहीं है, किन्तु न्यूनाधिक रूपेण सभी जानते हैं कि विश्वयुद्ध की विभीषिका शिर पर मंडरा रही है। विश्व के कर्णधार राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, शिक्षाशाली, आदि सभी प्रयत्न भी करते हैं कि विश्व युद्ध की भावना को ही समाप्त कर दिया जावे। विश्वयुद्ध के मूलभूत कारण मतभेद और साम्राज्य लिप्सा के त्यागने का विफल प्रयत्न सभी करते हैं आशा निराशा के पंक में निमग्न भयंकर शस्त्रास्त्रों के निर्माता संसार को तथा अपने आप को धोखा देने के लिए निशस्त्रीकरण सम्मेलन भी बारम्बार करते हैं, किन्तु उनमें से सफल एक भी एक नई होता। इसका कारण यह है कि इनकी बुद्धि को प्रेरित करने वाले ग्रह युद्ध कारक स्थिति में जा रहे हैं। ग्रह प्रेरणा देते हैं पर बाध्य नहीं करते। आप क्या चाहते हैं यह अधिकतर आप पर ही निर्भर है। ग्रहों से प्रेरित बुद्धि को सद्बुद्धि में परिवर्तित या परिवर्धित कर दे यह शक्ति केवल बुद्धि दाता सर्वशक्ति सम्पन्न गायत्री मन्त्र और गायत्री यज्ञ में ही है।


महाशिवरात्रि की प्रेरणा

(डॉ. चमनलाल गौतम)

हिन्दू धर्म अध्यात्म प्रधान धर्म है। इसका दृष्टिकोण भौतिक नहीं वरन् आध्यात्मिक है। हमारे पूर्वजों ने भली प्रकार जान लिया था कि क्षणभंगुर भौतिक सुखों से मनुष्य कभी भी स्थाई सुख शाँति प्राप्त नहीं कर सकता। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए मानसिक व आत्मिक विकास की आवश्यकता है। आत्मिक उन्नति के लिए उन्होंने धार्मिक नियमों को बनाया जिसे अपना कर मनुष्य अपनी पाशविक वृत्तियों को कम करता हुआ अपने परम लक्ष्य की ओर बढ़ता जाता है। इन धार्मिक नियमों में अनेक प्रकार की साधनाएँ व उपासनाएं हैं। उनमें एक-व्रत की साधना भी है। व्रत से शारीरिक, मानसिक व आत्मिक सब प्रकार की उन्नति होती है। विश्राम से शारीरिक क्षेत्रों में नवजीवन आ जाता है। पाचन प्रणाली को भी विश्राम लेने की आवश्यकता पड़ती है जिससे पेट में पड़ा हुआ अन्न हजम हो जाता है और पेट आगामी कार्य के लिए तैयार हो जाता है और शक्ति आने से इसके बाद खाया हुआ अन्न स्वाभाविक रूप से पच जाता है। व्रत से दोषों व दुर्गुणों का परिमार्जन होता है। शरीर के सूखने से वह भी सूखने लगते है। आध्यात्मिक प्रगति का तो यह अमोघ उपाय है। चिंतन और मनन के लिए उत्तम अवसर होता है। अधिक खाने वाले व्यक्तियों के विचार स्थूल होते हैं। वह कोई सूक्ष्म बात नहीं सोच सकते। पेटू लोग प्रायः स्थूल बुद्धि के होते हैं इसलिए बुद्धि में तीव्रता लाने के लिए हमारे धर्म शास्त्रों में व्रतों का विधान है। व्रत के दिन जो विचार मन में आते हैं, उनकी एक अमिट छाप मस्तिष्क पर पड़ जाती है। हमारे धर्माचार्यों ने व्रतों के साथ ऐसी कथाओं और विचारों को जोड़ दिया है जो हमारे इस जीवन और परलोक को भी सुधारने में सहायक सिद्ध होते हैं। महाशिवरात्रि व्रत जो फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है और इस वर्ष 25 फरवरी 1960 को पड़ रहा है, हमारे लिए महान सन्देश लाता है।

जब समुद्र मंथन हो रहा था और अनेक प्रकार की उपयोगी वस्तुओं के निकलने के पश्चात् जब हलाहल विष निकला तो सब देवता घबरा गए कि यदि यह विष संसार में फैल गया तो समस्त संसार इसके प्रभाव से संतप्त हो जाएगा, संसार में एक प्रकार की प्रलय आ जाएगी, प्राणियों का जीवित रहना कठिन हो जाएगा, सोच विचार कर देवता भगवान शंकर के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वह इस होने वाले अनिष्ट से बचने का उपाय बताएं और सहायता दें। महादेव कहलाने वाले शंकर ने अपने शरीर की परवाह न करते हुए उस हलाहल विष का पान करने का निश्चय किया। जिस व्यक्ति के मन में परोपकार की भावनाएं जाग्रत हो जाती हैं भगवान स्वयं उसकी सहायता करते हैं, उसकी आत्मिक शक्तियों का विकास होने लगता है,

आज के युग में अशान्ति फैलने का प्रमुख कारण स्वार्थपरता है। हर एक व्यक्ति और देश दूसरों को हड़प जाना चाहता है और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के हानि लाभ को नहीं देखता है। एटम व हाइड्रोजन बम का आविष्कार इसी मनोवृत्ति के आधार पर हुआ है। यदि राष्ट्र नायकों के मस्तिष्कों से यह स्वार्थ भावना जाती ही रहे तो संसार में शान्ति की स्थापना कोई कठिन कार्य नहीं है। मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन को लिया जाए तो विदित होता है कि वह अपने व्यक्तिगत जीवन में इसी तत्व के आधार पर सुख शान्ति को स्थिर रख सकता है।

आज हमारे देश में लाखों नर नारी भगवान शिव के उपासक हैं। उपासना का अर्थ है समीप बैठना। उपासक देव के गुणों का चिन्तन मनन, उन्हें ग्रहण करने का प्रयत्न करना, उस पर अग्रसर होने की चेष्टा करना। सच्चे शिव के उपासक वही हैं जो अपने मन में स्वार्थ भावना त्याग कर परोपकार की मनोवृत्ति को अपनाते हैं जब हमारे मन में यह विचार उत्पन्न होने लगते हैं तो हम अपने आत्मीयजनों के साथ झूठ, छल,कपट, धोखा, बेईमानी, ईर्ष्या, द्वेष आदि से मुक्त हो जायेंगे। यदि शिवरात्रि व्रत के दिन हम इस महा पथ का अवलम्बन नहीं लेते तो शिव का व्रत और पूजन केवल लकीर पीटना मात्र रह जाता है। उसका कोई विशेष लाभ नहीं होता ।

भगवान शिव का नंगा रहना अपरिग्रह प्रतीक है। परिग्रह एक प्रकार का पाप है क्योंकि किसी वस्तु का परिग्रह करने का अर्थ हुआ दूसरे को उस वस्तु से वंचित रखना। अन्न के भण्डार जमा रखने वाला दूसरों को भूखा मारने के लिए बाध्य करता है। जिसके अनेकों मकान और बंगले हैं, वह औरों को झोपड़ी बनाने से भी वंचित रखते हैं। संसार में परिग्रह करने वाले धनवानों का पूजन और सम्मान कोई नहीं करता बल्कि त्यागी, तपस्वी और अपरिग्रही सन्तों की, महात्माओं की चरणाधूल मस्तक पर लगाई जाती है। उनका जीवन आदर्श संसार में शान्ति स्थापित करने के लिए होता है भगवान शंकर सर्वशक्तिमान थे परन्तु उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं किया। सादा जीवन और उच्च विचार ही उनके जीवन का आदर्श रहा। इसी से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की उन्नति होना सम्भव है।

भगवान शिव ने योग साधना से अपने जीवन को परिष्कृत किया था। वह गुणों के भण्डार थे। शक्ति उनके इशारे पर नाचती थी। वह अपने तीसरे नेत्र से बड़ी से बड़ी शक्ति को जला कर राख करने की सामर्थ्य रखते थे। कामदेव को तो उन्होंने भस्म कर दिया था। हमें भी शक्ति की वृद्धि करके अपने व्यक्तिगत जीवन व समाज में से अनैतिकता, अश्लीलता और कामुकता को दूर करने का प्रयत्न करना है।

महादेव रुण्डों की माला अपने गले में पहनते थे अर्थात् क्रोध को वश में किए हुए थे। गंगा उन की जटाओं से निकल रही है। आध्यात्मिक शान्ति की गंगा का प्रवाह उनसे आरम्भ होता है। उनके मस्तक पर चन्द्रमा का चिन्ह रहता है। वह शान्ति प्रिय और संसार को शान्ति का प्रकाश देने वाले हैं। वह निरंतर अपनी साधना में लीन रहते हैं। इसी उपाय से उन्होंने अनेक प्रकार की शक्तियों को प्राप्त किया है। गायत्री मंजरी नाम की पुस्तक में वर्णन आता है कि भगवान शिव की साधना का मूलाधार गायत्री उपासना था। इसे उन्होंने पृथ्वी की सबसे बड़ी शक्ति कहा है। वह अखण्ड अग्नि अर्थात् यज्ञ भगवान के समक्ष अपनी साधना का उनके जीवन में विशेष स्थान था। इनके द्वारा प्राप्त शक्ति के द्वारा ही त्रिशूल अथवा त्रितापों को दूर करने की सामर्थ्य रखते थे। यदि हम भी सुखी रहना चाहते हैं तो हमें उनका अनुकरण करना चाहिए।

महान आत्माएं अपने व अन्य प्राणियों में कोई अन्तर नहीं मानती। वह दूसरों को अपने बराबर ही समझते हैं। उनके मन में छोटे बड़े का कोई भेदभाव नहीं रहता। गीता में भगवान ने स्वयं कहा है कि पंडित और ज्ञानी वह है जो विद्या विनय युक्त ब्राह्मण, हाथी गाय आदि को एक समान मानता है। आज लोग धन, वैभव पद, प्रतिष्ठा, आदि के पद में अपने से छोटों को दुत्कारते हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं और अपने छोटेपन का परिचय देते हैं। वह कभी यह नहीं सोचते कि इस प्रकार का व्यवहार उनके साथ किया जाए तो उन्हें कैसा लगे? ब्राह्मण अपने से छोटी जाति में उत्पन्न मनुष्यों से घृणा करते हैं। परन्तु महादेव ने तो भूत, प्रेतों को अपना साथी बनाया अर्थात् छोटी जाति वालों को अपने गले से लगाया, उनके उत्थान के लिए सत्प्रयत्न किए। महात्मा गाँधी इस गुण में आज के युग के शिव ही थे। शिवरात्रि व्रत मनाने का अधिकार ब्राह्मण से लेकर चाण्डाल तक को है भोले बाबा के लिए सब एक समान हैं।

यह धारणा है कि भगवान शिव भाँग व धतूरे खाते पीते थे अतः हमें भी उसका सेवन करना चाहिए। वह तो परोपकार की मूर्ति थे। प्राणियों को इनके विषैले प्रभाव से हानि न हो इसलिए वह इन्हें ग्रहण करते थे। हम भी अपने समाज के लिए अपने शरीर को कष्ट पहुँचाए तो ही भाँग धतूरा खाने की अलंकारिक भाषा की वास्तविकता को समझ सकते हैं।

एक वर्ष के बाद भगवान शिव हमें चैतन्यता प्रदान करते हैं कि “संसार के लोगों! उठो और जागो यदि अपनी और दूसरों की सुख शान्ति चाहते हो तो अपरिग्रह, सादा जीवन, उच्च विचार, अक्रोध, परोपकार, समता, परदुःख कातरता, परमात्मा की समीपता को अपनाओ। भोग विलास का जीवन व्यतीत करने से क्षणिक सुख भले ही मिल जाय परन्तु उसमें स्थायित्व नहीं है। स्वार्थ में क्षणिक आनन्द अवश्य आता है परन्तु उसका अन्त पतन में है। केवल अपनी उन्नति में ही सन्तुष्ट न रहो वरन् दूसरों की, अपने समाज और राष्ट्र की उन्नति को अपनी सफलता मानो।” इन सन्देशों को यदि हम अपने अन्तःकरण में स्थान देते हैं तो हम सच्चे शिव उपासक हैं।

गायत्री परिवार के प्रियजनों को यह महाशिवरात्रि व्रत निष्ठापूर्वक मनाना चाहिए। अपनी शाखा के सब सदस्यों का व्रत रखने की प्रेरणा देनी चाहिए और विधि पूर्वक शिव पूजन करना चाहिए। प्रातः काल गायत्री यज्ञ और सत्संग का आयोजन करें जिसमें भगवान शिव के गुणों का गान और समाज के प्रति कर्तव्यों पर प्रकाश डाला जाय। जनता से इस पुनीत पर्व पर नशीली वस्तुओं के त्याग के संकल्प लेने चाहिये। त्याग, परोपकार, सादा जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वह इस शुभ अवसर पर जनता को महान अनिष्ट से बचाने के लिए सिगरेट, बीड़ी, शराब, भाँग, गाँजा, अफीम आदि नशीली वस्तुओं को छुड़वाने के संकल्प करें तभी वह शिव जी की आत्मका को प्रसन्न कर के कल्याण के भागी बनेंगे।


आध्यात्म विद्या का प्रथम सोपान

(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

भारतवर्ष की चिरकाल से प्रधान सम्पदा ‘आध्यात्म विद्या’ रही है। आज जिस प्रकार पाश्चात्य देशों में भौतिक विज्ञान का विकास हुआ है उसके आधार पर अनेकों छोटे बड़े आविष्कार हुए हैं और इन आविष्कारों से सुख सुविधाओं में वृद्धि हुई है। इसी प्रकार प्राचीन काल में भारतवर्ष में आध्यात्म विद्या का विकास था उसके साधारण तत्व ज्ञान एवं साधना विधान की जानकारी घर घर में थी और उनके आधार पर शान्ति और समृद्धि की सिद्धियाँ भी सभी को उपलब्ध थी।

इतिहास के पृष्ठों पर जब दृष्टिपात करते हैं तो प्रतीत होता है कि जब तक इस पुण्य भूमि में आध्यात्म ज्ञान का प्रकाश प्रज्ज्वलित रहा तब तक मनुष्य का आन्तरिक स्तर और सुख साधनों का बाहुल्य सन्तोष जनक स्थिति में बना रहा। कारण यह है कि इस विद्या के दो क्षेत्र हैं (1) आत्मनिर्माण (2) योग साधना। आत्म निर्माण की प्रक्रिया तत्वज्ञान के अंतर्गत आती है। धर्म सदाचार, इन्द्रिय निग्रह, ब्रह्मचर्य परलोक, पुनर्जन्म, व्रत, उपवास, दान पुण्य, स्वाध्याय, सत्संग कथा, कीर्तन, तीर्थ यात्रा, मौन तितीक्षा, यम, नियम आदि का उद्देश्य यह है कि व्यक्ति अपने भीतर निरन्तर काम करने वाली दैवी और आसुरी प्रकृतियों में से आसुरी प्रकृति का दमन करके दैव प्रकृति का विकास करें। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग पर इसलिए विशेष जोर दिया गया है कि मनुष्य अपनी बुराइयाँ और कमजोरियाँ जो साधारणतः समझ में नहीं आती, इन दोनों के आधार पर ढूंढ़े और पहचाने।

धर्म नियमों का पालन करने की विधि व्यवस्था का भी यही प्रयोजन है कि जो कार्य समाज और व्यक्ति के लिए अन्ततः दुखद हैं उन्हें तात्कालिक प्रलोभनों एवं आकर्षण की उपेक्षा करके भी त्याग करने का प्रयत्न किया जाय। परलोक, पुनर्जन्म, स्वर्ग, सद्गति आदि की मान्यताओं के पीछे भी यही लक्ष्य है कि व्यक्ति तुरन्त की लाभ हानि से प्रभावित होकर की बुराइयों को अपनाने एवं अच्छाइयों को त्यागने के लिए ढुलकने न लगे। आज नहीं तो कल उसके शुभ कर्मों का फल मिलने ही वाला है यह आशा स्थिर रहती है तो मनुष्य असफलताओं और आपत्तियों को भी धैर्य पूर्वक सह लेता है। आज कोई प्रारब्ध कर्म हमारे सत्प्रयत्नों का शुभ परिणाम उत्पन्न नहीं होने देता तो भी कुछ चिन्ता की बात नहीं, देर सवेरे में वह मिलेगा ही यह विश्वास अन्तःकरण में गहराई तक जमा हो तो ही व्यक्ति नैतिक आचरणों पर दृढ़ रह सकता है। यदि वे विश्वास ढीले हों तो व्यक्ति के किसी भी प्रलोभन पर फिसल जाने की आशंका बनी रहेगी।

ईश्वर की सर्वसत्ता और न्याय परायणता का,कर्म फल के सुनिश्चित परिणाम होने की मान्यता का भी यही आधार है कि व्यक्ति अपने दुष्कर्मों को छिपे चोरी करके कहीं यह न मानने लगे कि मैं लोक निन्दा या राजदण्ड से बच गया तो अब मेरा क्या बिगड़ने वाला है। ईश्वर की सर्वसत्ता का विश्वास ही इस मानसिक दुर्बलता को हटाने का एक मात्र उपाय है। भगवान सर्वत्र है वह सब को देखता है, छिपे हुए जो दुष्कर्म किये गये हैं उन्हें भी वह जानता हैं, वह न्यायकारी और निष्पक्ष होने के कारण पाप का दण्ड भी अवश्य देगा यह मान्यता यदि मन क्षेत्र में दृढ़ता पूर्वक जमी हुई हो तो बुराई करने की हिम्मत इसी प्रकार न पड़ेगी जैसे पुलिस के निष्ठुर न्यायाधीश के सामने खड़े हुए चोर का चोरी करने का साहस नहीं होता। बुराइयों से बचना और अच्छाइयों को अपनाना ही पुण्य माना गया है। पुण्य कर्मों से ईश्वर प्रसन्न होता है और सुखदायक सत्परिणाम प्रदान करता है यह मान्यता स्थिर रहने पर लोग उत्साहपूर्वक सन्मार्ग पर चलते हैं। भले ही परिस्थितिवश संसार में उन्हें कीर्ति प्रशंसा, प्रत्युपकार या सुख सुविधा प्राप्त न हो तो भी ईश्वर की सर्वज्ञता को समझने के कारण सन्मार्गगामी को किसी प्रकार की खिन्नता या निराशा नहीं होती है।

कथा पुराणों का, धर्मग्रन्थों का प्रधान लक्ष यह है कि भगवान, के ऋषियों के या देवताओं के ऐसे प्रवचन, संस्कार, जनता को सुनावें जिनमें धर्म पक्ष पर चलने का आदेश एवं अनीति पर चलने का निषेध हो, इन शास्त्र वचनों पर श्रद्धा करना, मानना और अपनाना अपना धर्म कर्तव्य है यह आस्था बना लेने पर उन सद्ग्रंथों का श्रवण एवं पठन करने वाला निश्चय ही आत्म निर्माण की दिशा में चलेगा। जो बुराइयां उसे अपने में दीखेंगी उन्हें छोड़ेगा और जो अच्छाइयाँ प्रसुप्त होंगी उन्हें जागृत करेगा।

पुराणों में अनेकों कथानकों का विस्तार पूर्वक वर्णन है। उन्हें सुनने सुनाने का पुण्य माना जाता है। इस पुनीत परम्परा के पीछे भी यही तथ्य काम करता है कि सत्कर्म करने वाले महापुरुषों के चरित्रों की श्रेष्ठता से प्रभावित होकर सुनने वाले वैसे ही आचरण अपनावें। दुष्कर्म करने वालों को असुर के निन्दित नाम से चिन्तन करके अन्त में उनकी दुर्गति का दृश्य उपस्थित करना और सत्कर्म करने वालों को देव संज्ञा में लेकर अंत में उन्हें विजय, समृद्धि कीर्ति, सद्गति, मुक्ति आदि से लाभांवित होते दिखाना यही पौराणिक उपाख्यानों का मूल प्रयोजन है। साधारण उपदेशों की अपेक्षा कथानक के रूप में कोई तथ्य उपस्थित किया जाय तो वह अधिक प्रभावशाली होता है इसलिए शिक्षा के आदेश ग्रन्थों की अपेक्षा पुराणों का ढंग अधिक आकर्षक एवं प्रभावशाली सिद्ध हुआ। जनता ने उसे पसंद भी किया। कथाएं स्वभावतः रोचक होती हैं। आवश्यकता के अनुरूप वस्तुएं बढ़ती घटती हैं। पुराण अधिक पसंद किये गये तो उनकी संख्या भी और कलेवर का भी विस्तार हुआ। कुछ अंश को छोड़कर शेष सारे ही कथानक इसी उद्देश्य सिद्ध के लिए है। पुराणों का सुनना पुण्य भी इसी लिए माना गया है कि लोग उनमें वर्णित सत् शास्त्रों से प्रेरणा ग्रहण करके आत्म निर्माण की स्थिति में अग्रसर हों।

संसार में दो ही प्रलोभन मुख्य हैं (1) लोभ (2) काम। इन दोनों के प्रलोभन में ही मनुष्य दुष्कर्मों की ओर बढ़ता है तथा स्वार्थी बनता है। इन पर नियंत्रण स्थापित किये बिना कोई व्यक्ति सदाचारी नहीं बन सकता। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए दान पुण्य और इन्द्रिय निग्रह ब्रह्मचर्य पर जोर दिया गया है। ब्राह्मणों को, विद्या प्रसार के लिए गरीबों को दीन दुखियों की सेवा लिए, सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने के लिए, समाज कल्याण के लिए, ईश्वर की प्रसन्नता पूजा के लिए धन खर्च करना दान पुण्य कहा जाता है। धन का लोभ त्यागने, अपनी कमाई का कुछ हिस्सा इन कार्यों में लगाने से शुभ पुण्य फल प्राप्त होते हैं। यह मान्यता धन की अनियंत्रित इच्छा पर अंकुश ही नहीं लगाती वरन् अपनी श्रम उपार्जित कमाई को बिना मूल्य दे डालने की भी अभिरुचि पैदा करती है। यह अभिरुचि यदि बढ़ती रहे तो मनुष्य लोभ से उत्पन्न होने वाले दुष्कर्मों से बच सकता है।

इन्द्रिय निग्रह, ब्रह्मचर्य, नारी मात्र को नरक का द्वार या माता, बेटी, बहिन मानने की धारणा के पीछे काम विकार को घृणित मानने, उस पर अंकुश लगाने की प्रेरणा है। काम विकार को मानसिक उद्वेगों की जड़ माना गया है। भोगेच्छा से समाज में जितनी विकृति, बुराई, दुराचार, विलासिता, फैशन परस्ती, बढ़ती है उतनी और किसी प्रकार नहीं। अनियंत्रित भोगेच्छा से शारीरिक और मानसिक व्यभिचार फैलता है। शारीरिक व्यभिचार से अनेकों रोग पैदा होते हैं, स्वास्थ्य चौपट होता है, आयु घटती है, तेज नष्ट होता है, बुद्धि क्षीण होती है। दुर्बलता घेरती है, इसका प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ता है, हर कार्य में अपूर्णता और असफलता रहती है। ऐसे लोगों की संतान कमजोर, बीमार, अल्पजीवी, अविकसित, बेढंगी एवं दुर्गुणी होती है। इन से भी बढ़कर मानसिक हानि है। जिनके मन में व्यभिचार के विचार घूमते रहते है, जो युवा नारियों का भोग दृष्टि से चिन्तन करते रहते हैं, उनकी अधिकाँश मानसिक शक्तियाँ इसी जंजाल में उलझ कर नष्ट भ्रष्ट हो जाती हैं।

जिस प्रकार तेज शराब से पीने वाले का कलेजा जल जाता है और उसका दिल दिमाग खोखला हो जाता है उसी प्रकार काम सेवन का चिन्तन करते रहने वाले व्यभिचारी इस वासना की तेज और नशीली शराब में अपना आध्यात्मिक कलेजा जला डालते हैं। मूल्यवान मानसिक शक्तियाँ इसी आग में जल जाती हैं। ऐसे लोगों के अंदर कोई ऐसी महत्वपूर्ण प्रतिभा जीवित नहीं रहती जिसके आधार पर वह कोई आदर्श या आध्यात्मिक पुरुषार्थ का उदाहरण उपस्थित कर सके। मानसिक व्यभिचार की बीमारी से ग्रसित लोग एक के बाद एक नीची सीढ़ी पर ही उतरते हैं, उनके विचार और कार्य दिन दिन दुर्बल ही होते जाते हैं। इन हानियों को ध्यान में रखते हुए आत्म विद्या के तत्व दर्शियों ने ब्रह्मचर्य एवं इन्द्रिय निग्रह को धर्म का अंग माना है। नारी के विषय में अशुभ चिन्तन की अपेक्षा पवित्र भावनाएं रखने का निर्देश किया है। गृहस्थों की भी भोग सीमा को मर्यादित किया है। यह सब प्रतिबंध आत्मनिर्माण की दृष्टि से आवश्यक है। धन के लोभ की भाँति, कामवासना पर नियंत्रण स्थापित करना व्यक्ति तथा समाज के स्वस्थ विकास में सहायक होने के कारण इन्हें धर्म का महत्व पूर्ण अंग मान लिया गया है।

इस संसार में सबसे बड़े स्थूल भौतिक प्रलोभन दो ही हैं। (1) लोभ (2) काम। इनसे यदि कोई व्यक्ति बच सके तो वह उसकी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का अपव्यय एवं दुरुपयोग रुक सकता है। जिस प्रकार बूँद बूँद टपकने से घड़ा खाली हो जाता है और कन कन जोड़ते रहने से मन भर जमा हो जाता है, उसी प्रकार अपव्यय से बचाकर शरीर एवं मन की क्षमताओं को सन्मार्ग पर चलने दिया जाय तो साधारण प्रकार का जीवन यापन करते हुए भी मनुष्य आध्यात्मिक पूर्णता की ओर तेजी से बढ़ता रह सकता है।

मनुष्य की आत्मा तो ईश्वरीय अंश होने के कारण उन्हीं सब विशेषताओं और शक्तियों से परिपूर्ण है जो उसके उद्गम परमात्मा में है विशुद्ध हुई कोई आत्मा वही सब करने से समर्थ हो सकती है जो परमात्मा कर सकता है। अवतारी, देव पुरुष और ऋषि महर्षि इसी कक्षा में प्रवेश करने वाले जीव थे। इस ऊँची कक्षा का आत्मिक विकास मार्ग भिन्न होकर मानवता के धार्मिक आचरणों पर आधारित लोभ और काम से बचा लिया गया साधारण जीवन भी ऐसा होता है कि उसकी विशेषताओं को जन साधारण की तुलना में चमत्कारी ही कहा जा सकता है।

महाभारत में कथा आती है कि एक साधू अपने तपबल से गीले वस्त्रों को हवा में अधर लटकाकर कपड़े सुखाने की सिद्धि प्राप्त कर चुका था। एक दिन वह पेड़ के नीचे लेटा था। ऊपर डाली पर बैठी चिड़िया को तेज दृष्टि से देखा तो चिड़िया उस दृष्टि तेज में जल कर नीचे गिर पड़ी। अपनी इन सिद्धियों पर उसे बहुत अहंकार हुआ। एक दिन वह नगर में जिस घर भिक्षा माँगने गया उसमें गृह स्वामिनी पतिव्रता नारी अपने पति की सेवा में लगी हुई थी। उसने कहा महात्मा जी थोड़ी देर बैठ जाइए, पति सेवा करलूँ तब आपको भिक्षा दूँगी। स्त्री के इस वचन को साधू ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होने लगा। साधु को क्रोधित देख कर गृह स्वामिनी ने कहा-महात्मन् में चिड़िया नहीं, पतिव्रता हूँ। अपना कर्तव्य पालन निष्ठा पूर्वक करती हूँ। मुझे आपके क्रोध से कुछ हानि नहीं पहुँच सकती।

साधु को आश्चर्य हुए कि उसने चिड़ियां जलाने की बात कैसे जानी। इस रहस्य को उसने विनय पूर्वक पूछा तो उसने कहा-अमुक नगर में अमुक नाम का वैश्य रहता है वह इसका रहस्य बतावेगा। साधू वहीं चल दिया। जाकर देखा तो एक बनिया अपनी दुकान चला रहा था। उसने साधु को देखते ही कहा-भगवन् मैं तो ईमानदारी से व्यवसाय करने वाला दुकानदार मात्र हूँ। आपके यहाँ आने का प्रयोजन जानने लायक सिद्धि मिली है वह तो इस ईमानदारी के व्यवसाय के कारण ही है। अधिक जानने के लिए आपको अमुक नगर में अमुक चाण्डाल के पास जाना पड़ेगा। साधु वही पहुँचा तो पिता माता की सेवा कार्य को भी पूर्ण निष्ठा से करते देखा। उस चाण्डाल ने बिना पूछे ही साधू के आगमन का प्रयोजन कह दिया और निवेदन किया कि वह योगाभ्यास तो नहीं जानता पर उसकी आत्मा कर्तव्य परायणता की साधना से ही इतनी पवित्र हो गई है कि उस से अनायास ही कितनी ऐसी बाते प्रकट होने लगी हैं जो साधारण लोगों में नहीं होती। पतिव्रता स्त्री ईमानदार वैश्य और कर्तव्य परायण चाण्डाल की उत्तम जीवन यापन साधना का महत्व तब साधु की समझ में आया और जाना कि वह साधारण दिखने वाली बातें भी किसी बड़े योगाभ्यास की भाँति ही शक्तिशाली हैं।

आत्म निर्माण का तात्पर्य तामसी प्रवृत्तियों से छुटकारा पाकर सर्वागुणी प्रकृति को अपनाना है। आध्यात्म विद्या का आधा भाग इसी प्रयोजन के लिए है। यह प्रयोजन जितना जितना पूर्ण होता जाता है मनुष्य की दैवी शक्तियाँ अपने आप उसी प्रकार निखरती जाती हैं जैसे अंगार के ऊपर जमी हुई राख को हटा देने से भीतर की दहकती आग प्रत्यक्ष दिखाई देने लगती है, या जंग लगी तलवार पर से जंग छुड़ा दी जाय तो वह दमकने लगती है। संसार में अनेकों ऐसे महापुरुष हुए हैं। जिनने यद्यपि कोई योगाभ्यास नहीं किया था अपने उज्ज्वल चरित्र और स्वस्थ मनोभूमि के कारण महापुरुषों की श्रेणी में पहुँचे और संसार में महा कार्य प्रतिपादित कर सकने में समर्थ हुए। यदि उन्हीं की शारीरिक और मानसिक दिशाएं कुमार गामिनी रही होती तो निश्चय ही वे सदा महापुरुष ने होकर कोई चोर, डाकू, भोग-विलासी धनी-अमीर मात्र बनकर जिंदगी के दिन पूरे करके अपने पीछे निन्दा की सम्पत्ति छोड़ कर मरे होते।

आत्म निर्माण का लाभ कम लाभ नहीं है व्यक्ति के अपनी साँसारिक सुख शाँति एवं उन्नति के लिए यह परम उपयोगी है। इन्द्रियों पर संयम रखना, नियमितता, प्राकृतिक जीवन की अभिरुची इसी प्रवृत्ति के द्वारा संभव है और स्पष्टतः स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन का यही मार्ग है। लोभ से बचकर ही मनुष्य ईमानदार उदार, परोपकारी, कर्तव्य परायण रह सकता है, जो ऐसा है उस पर सर्वत्र विश्वास किया जाएगा, उसके कंधे पर दुनिया बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी डालते हुए प्रसन्नता अनुभव करेगी, उन्नति का यही सीधा रास्ता है। ईमानदारी से व्यापार चला सकते हैं। ईमानदारी से पदोन्नति होती है। ईमानदार पर हर कोई विश्वास करता है और उसके साथ साझा, सहयोग करने को उद्यत होता है। ईमानदार पर दूसरे कृपा करते हैं और अनायास ही उसकी उन्नति की, समृद्धि में सहयोग करते हैं। कभी कभी कुछ ईर्ष्यालु लोग उनसे चिढ़ते और हानि पहुँचाते भी देखे गये हैं, पर ऐसे लोग या अवसर कम ही सामने आते हैं। ईमानदारी से अन्ततः मनुष्य लाभ से ही रहता है। बेईमानी की नीति काठ की हाँडी की तरह एक बार ही विश्वासघात का लाभ उठा सकती है, दूसरी बार लोग उनसे सावधान हो जाते हैं और फिर उसके लिए किसी का विश्वास और सहयोग प्राप्त करना कठिन हो जाता है। चोर उठाईगीरों की जिंदगी ही एक तरह से बरबाद हो जाती है।

नारी मात्र के प्रति पवित्र भावना रखकर काम विकार से बचे रहने वाले व्यक्ति समाज में भव्चरित्र और शूरवीर आदर्शवादी एवं जीवटदार माने जाते हैं। ऐसे लोग अपनी आत्मा के सामने ही नहीं जन समाज के सामने भी सीना चौड़ाकर गर्व से मस्तक ऊंचा उठाकर स्वाभिमानी, धर्म परायण और एक बड़े प्रलोभम की विजय करने वाले सफल सेनापति की तरह सम्मान के अधिकारी होते हैं। उनकी हर बात में बल रहता है और हर कोई उनसे प्रभावित होता है। निर्लोभ होने की भाँति ही इन्द्रिय निग्रही होना भी इस संसार की एक बहुत बड़ी बहादुरी है। इन अग्नि परीक्षाओं में उत्तीर्ण लोग खरे सोने की तरह चमकते हैं, आदर पाते हैं और समाज में अपने लायक उचित स्थान उपलब्ध कर लेते हैं। जो इन परीक्षाओं में खोटे उतरे वे कितने ही चतुर, विद्वान, गुणवान क्यों न हो सर्वत्र संदेह और अविश्वास की दृष्टि से ही देखे जाते रहे हैं। जन मानस में अपनी स्थिति आदरणीय बनाये बिना निश्चय ही कोई व्यक्ति ऊँचा नहीं उठ सकता, आगे नहीं बढ़ सकता। बेईमानी के व्यापार देर तक नहीं चलते वे आज नहीं तो कल असफल होकर ही रहते हैं। नारी मात्र के प्रति पवित्र दृष्टि रखना एक उच्च कोटि की नैतिक ईमानदारी है। इस कसौटी पर खरा उतरने वाले के लिए लौकिक उन्नति के अनेकों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष साधन उत्पन्न होते चलते हैं। मानसिक शक्तियों के क्षरण का रुकना और उनका विकासोन्मुख होना तो प्रत्यक्ष लाभ स्पष्ट ही है।

अत्याचारी लोगों के दाम्पत्ति जीवन में कितनी निष्ठा, आत्मीयता एवं शाँति रहती है, इसे बेचारे अनपढ़ लोग क्या समझ पायेंगे ? उनका गृहस्थ जीवन गरीबी में भी अमीरी के आनंद और संतोष से भरा होता है। ऐसे परस्पर संतुष्ट दंपत्ति ही स्वस्थ मन की संतान उत्पन्न कर सकते हैं। जिन स्त्री पुरुषों में खिचाव तनाव, क्षोभ अविश्वास बना रहता है उनकी सन्तानें अनेक मानसिक दोषों और दुर्गुणों से त्रस्त देखी गई हैं। व्यभिचार जन्म संतानें आम तौर से कुपात्र और चरित्रहीन निकलती हैं। वैश्याओं के गर्भ से आज तक कोई महापुरुष जन्मते नहीं सुना गया। यदि हमें अपने कुल उज्ज्वल करने हैं, संतान सुख प्राप्त करने की कामना है तो भी यौन सदाचार की रक्षा करनी ही होगी। यह स्मरण रखने की बात है कि शारीरिक संयम तक का ही सदाचार अपूर्ण है। मानसिक व्यभिचार से दूर रहे बिना, मजबूरी का ब्रह्मचर्य थोथे चने की भाँति है जिसकी बाहरी शक्ल तो अवश्य होती है पर भीतर जीवन कुछ भी नहीं होता। शारीरिक असंयम कुछ देर ही शरीर का क्षरण करता है पर मानसिक व्यभिचार तो निरन्तर ही वह हानि पहुँचाता रहता है।

अध्यात्म विद्या का प्रथम भाग, आत्म निर्माण की आवश्यकता, न केवल लौकिक वैयक्तिक, समाजिक जीवन में उत्कर्ष के लिए है वरन् उसके दूसरे भाग साधना द्वारा शक्ति उद्भव करने के लिए भी वह आवश्यक शर्त है। सूक्ष्म और कारण शरीरों में जिन रहस्य मय ऋद्धि-सिद्धियों का अक्षय भण्डार भरा हुआ है उनका खुलना भी उन्हीं के लिए संभव है जिसने लोभ और काम पर विजय प्राप्त करके आत्म निर्माण किया है। राजयोग में पहले (1) पाँच नियम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और (2) पाँच नियम (शक्ति, संतोष, तप, स्वास्थ्य, ईश्वर प्रणिधान) आवश्यक बनाये गये हैं। इनकी साधना हो जाने पर ही (3) आमन, (4) प्राणायाम, (5) प्रत्याहार (6) धारणा (7) ध्यान (8) समाधि का अष्टांग योग पूर्ण होता है और तभी साधक उन अलौकिक दिव्य शक्ति सामर्थ्यों को प्राप्त करने का अधिकारी बनता है।


Quotation

धर्म अन्तः प्रकृति है, वही सारी वस्तुओं का ध्रुव सत्य है। धर्म ही वह चरम लक्ष्य है जो हमारे अंदर काम करता है। -रवीन्द्र

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वास्तविक धर्म यह है कि जिन बातों को मनुष्य अपने लिए अच्छा नहीं समझते, दूसरों के साथ भी ऐसी बातें हरगिज न करें। -महाभारत


एक बार फिर लहराओ


एक बार फिर लहराओ (kavita)

आज हिमालय की चोटी पर एक बार फिर लहराओ!

पुण्य-पताका दिव्य-संस्कृति की जग-नभ में फहराओ!!

महा प्रलय की प्रथम उषा में मनु ने यह हवा लहराई!

संयम नियम विनय श्रद्धा से गर्वोन्नत हो फहराई!!

इसी पताका के नीचे समवेत स्वरों में गान हुआ!

गहन अमा की अँधियारी में ज्ञान दिवा का भान हुआ!!

नील-गगन में अपने श्रम से अपना केतन लहराओ!

वर्तमान में उस अतीत की शुभ सुस्मृतियाँ दुहराओ!!

अरे, यही वह तपोभूमि है कर्मभूमि सुन्दर पावन!

कर्म जहाँ पूजा जाता है धर्म जहाँ है मन - भावन!!

निश्छल सरल हृदय बसते हैं पर सेवा में रत होकर!

जहाँ पराजित कर देते हैं परशुराम को नत होकर!!

त्याग माह, निःस्वार्थ प्रेम से हर मानव को दुलराओ!

विषम हलाहल भी जग- हित पी, नहीं किसी को ठुकराओ!!

आदि काल से देते आये तुम्हीं जगद्गुरु बनकर ज्ञान!

आशान्वित जो उन्हें शान्ति दो, उठो और जागो कर ध्यान!!

सभी क्षुब्ध हैं, सभी सशंकित होते जाते आकुल प्राण!

बन दधीच सर्वस्व दान दे कर दो मानवता का त्राण!!

पावस बन सींचो धरती को जल -पूरित हो घहराओ!

दे अपने प्राणों का बलि भी शरणागत को ठहराओ!!

प्रकृति-अंक में पालित-पोषित, बने स्वावलम्बी जन-जन!

गुरुकुल बने पुनः जिसमें ही सदाचार श्रम का पूजन!!

वर्ण-व्यवस्था, वर्णाश्रम का सादर भाव जगे उर में!

सर्वोदय की प्राण-प्रेरणा जाग उठे फिर हर घर में!!

‘सभी सुखी हों, सबका हित हो’ यही भावना भर, गाओ!

जन-जन के मानस में पावन- सत्य - साधना सरसाओ!!

-राम स्वरूप खरे ‘साहित्य रत्न’

*समाप्त*