परलोक जीवन और सात नर्क

(श्रीमती ऐनी बेसेण्ट)

मृत्यु के अवसर पर मनुष्य के स्थूल शरीर में से उसका छाया शरीर (ईश्वरमय शरीर) बाहर निकल जाता है। मनुष्य का प्राण और अन्य तत्व भी इसी छाया शरीर के साथ रहते हैं। इससे मनुष्य की देह और ज्ञानेन्द्रियाँ शून्य हो जाती हैं। स्थूल इन्द्रियाँ तो ज्यों की त्यों दिखाई पड़ती है, पर चूँकि उनका स्वामी चला गया, इसलिये वे कोई काम नहीं कर सकती। जो उनके द्वारा देखता था, सुनता था, स्वाद लेता था, या छूता था, वह निकल गया। उसके बिना अकेली इन्द्रियाँ केवल जड़ पदार्थ का समूह हैं और उनमें ज्ञान प्राप्त करने की शक्ति नहीं रह जाती। देह का स्वामी अर्थात् आत्मा, अपने समस्त जीवन चित्रों को देखता और उनके सम्बन्ध में विचार करता हुआ धीरे-धीरे बाहर निकलता है। इन चित्रों में उसके जीवन की छोटी बड़ी सब घटनाएं होती हैं। उस समय उसे स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि हमारी कौन-कौन कामनायें सफल हुई और कौन निष्फल हुईं, हम कहाँ-कहाँ हारे और कहाँ पर जीते, किससे प्रेम किया और किससे घृणा द्वेष किया। जीवन में जो मुख्य सार रहा वह भी स्पष्टतया दिखाई पड़ता है। जीवन में जो कुछ विचार प्रधान रूप से रहा है वह इस समय जीव पर अपना प्रभाव अच्छी तरह डालता है और उससे मालूम पड़ जाता है कि जीव को यमलोक में कितने समय किस अवस्था में निवास करना पड़ेगा। यह अवसर मनुष्य के लिये बड़े महत्व का और बहुत गंभीर होता है, जब उसके सामने उसका सब जीवन उपस्थित है, और भूतकाल का फल देखकर उसे मालूम पड़ जाता है कि हमारा भविष्य किस प्रकार का होगा। थोड़ी देर के लिये उसे यह भी मालूम पड़ जाता है कि मैं कैसा हूँ और मेरे जीवन का क्या उद्देश्य है? उसे इस समय यह देख पड़ता है कि ईश्वर के नियम अटल न्यायपूर्ण और हितकारी है। इसके पश्चात् स्थूल और छायामय शरीर के बीच का सम्बन्ध टूटता है, ये दोनों जन्म भर के साथी बिछुड़ते हैं और प्रायः मनुष्य शान्त होकर अचैतन्य अवस्था में प्राप्त होता है।

मृत्यु के समय जो अन्य व्यक्ति आस-पास स्थित हों उनका कर्तव्य है कि उस समय शान्त और मौन रहें, तथा भक्तियुक्त व्यवहार करें। ऐसा करने से मरने वाला व्यक्ति बिना किसी बाधा या क्षोभ के अपने जीवन चित्रों का दर्शन कर सकता है। पर जैसा कि भारत वर्ष में प्रायः देखा जाता है अनेक लोग उसी स्थान पर जोरों से रोने और विलाप करने लगते हैं, जिससे मरने वाले की एकाग्रता भंग हो जाती है। अपने स्वार्थ के ख्याल में मरते हुए प्राणी की शान्ति भंग करना और उसे सुख व शान्ति पहुँचाने का उपाय न करना बड़ी बुरी बात है। इसलिए सब धर्मों के बुद्धिमान पुरुष यह आदेश दे गये हैं कि मरते हुए मनुष्य के निकट धर्म ग्रन्थ का पाठ, ईश्वर प्रार्थना आदि की जाय। क्योंकि ऐसा करने से शान्ति बनी रहती है और जीव की सहायता के लिये लोगों के मन में निःस्वार्थ विचार उठते हैं जिससे उसके परलोक गमन में सहायता मिलती है।

ऐसा अनुमान किया गया है कि मरने के प्रायः 36 घंटे बाद जीव, छायामय (ईश्वर) शरीर को भी छोड़कर बाहर निकल जाता है। तब छाया शरीर भी स्थूल शरीर के पास रहकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। जो मुर्दे गाड़े जाते हैं उनके छाया शरीर कवर के ऊपर रह कर क्रमशः खत्म हो जाते हैं। जो मुर्दे जलाये जाते हैं उनके छाया शरीर भी जल्दी नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि स्थूल शरीर के प्रति उनका जो खिचाव रहता है, वह मिट जाता है। यह भी एक कारण है कि जिससे मुर्दा गाढ़ने की अपेक्षा उसे जला देना अच्छा है।

स्थूल शरीर में से छाया शरीर के निकल जाने के बाद उसमें से प्राण शक्ति निकल कर जगत में भरे हुये प्राणों में समा जाती है। अब मनुष्य का जीव (प्रेत) परलोक (काम लोक अथवा प्रेत लोक) की तैयारी करता है और उसके “लिंग शरीर” की अवस्था बदलती है, जिससे जीव शुद्ध होकर मोक्ष का अधिकारी बन सकें। “लिंग शरीर” की इस प्रकार बदली हुई व्यवस्था को यातजा-देह कहते हैं, अर्थात् इसमें अपने कर्मों का फल माँग कर जीव शुद्ध हो जाता है।

प्रेतलोक में भूलोक से आने वाले जीवों को सात अन्त भूमिकाओं अथवा परतों के गोले में रहना पड़ता है, जो एक प्रकार से उसका कैदखाना है। जब तक जीव कर्मों का फल भोगकर इस कैदखाने को भेद कर बाहर नहीं आ जाता तब तक उसकी मुक्ति नहीं हो सकती। अब जिस जीव की प्रकृति इन सात परतों में से जिसके अधिक अनुकूल होती है उसी में यह अधिक समय तक रहता है। एक सावक का कथन है कि साधारण जीव इस लोक में अपनी योग्यता के अनुसार पाँच से पचास वर्ष तक रहते हैं। आत्मोन्नति वाले जीव की “अंतःभूमिका” बहुत सूक्ष्म या बारीक होती है, इसलिये उसकी भावना देह के सातों परत बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं और वह प्रेत लोक से निकल कर ऊपर के लोक में जा पहुँचता है। जिस व्यक्ति की इतनी आत्मोन्नति नहीं हुई है परन्तु जिसने उचित आहार-बिहार द्वारा अपना जीवन शुद्ध रखा है और साँसारिक वस्तुओं में जिसकी वासना मन्द रही है, वह काम लोक से बहुत जल्दी तो नहीं निकल पाता, पर अब तक उस लोक में रहता है उस अपनी अवस्था का ध्यान नहीं रहता और वह बराबर एक शान्तिदायक स्वप्न सा देखता रहता है जब वह ऊपर वाले स्वर्ग लोक में पहुँच जाता है तभी उसे चेतना आती है जो जीव इनसे भी कम उन्नति वाले हैं उनको नीचे के दर्जे में तो बेहोशी की अवस्था में रहना पड़ता है और जब ये अपनी प्रकृति के अनुकूल अंतःभूमिका में पहुँचते हैं तभी उनको चेतना आती है। जीवन काल में जिन मनुष्यों में पशु प्रवृत्तियाँ बहुत प्रबल रही हैं, वे अपनी वृत्तियों से मिलते हुये नीचे के खंडों में जागृत हो जाते हैं और वहाँ के जीवन का भोग करते हैं। सर्व साधारण की भाषा में प्रेम लोक की इन्हीं सात अंतःभूमिका या परतों को सात नर्क के नाम से पुकारा जाता है।

जिन मनुष्यों की किसी कारण से अकालमृत्यु होती है जैसे अपघात, आत्मघात, वध (कत्ल) या किसी प्रकार के अचानक मरण से, तो उनके लिये दूसरा नियम है। यदि वे जीव शुद्ध हैं और इनका मन आत्मोन्नति की ओर रहा है तो इनकी विशेष रक्षा होती है और जितनी आयु बाकी बची थी उतने समय तक वे आनन्ददायक निद्रा के वशीभूत रहते हैं। परन्तु दूसरे प्रकार के लोगों को होश बना रहता है। बहुतों को तो मरते समय की सब बातें ज्यों की त्यों स्मरण रहती है और उनको अपने मरने की खबर भी नहीं होती। वे अपने कर्मों के अनुसार अंतःभूमिका में रहते हैं और उनका प्रेत लोक का जीवन तब आरम्भ होता है जब वे अपनी शेष आयु उस भूमिका में रह कर समाप्त कर लेते हैं। एक मनुष्य ने दूसरे व्यक्ति का खून किया था और इस अपराध में उसे फाँसी का दण्ड मिला था, प्रेत लोक में यह मनुष्य बार-बार उस मनुष्य को मार कर फिर गिरफ्तारी और फाँसी लगने का दुःख अनुभव करता था। जो आत्म हत्या करके मरते हैं, उनको भी अपने जीवन की निराशा, भय आदि का अनुभव बराबर होता रहता है और वे बार-बार आत्म हत्या का भयानक कृत्य करते रहते हैं। एक स्त्री आग में जल कर मर गई। मरते समय अपने को बचाने के लिये उसने बहुत प्रयत्न किया था इसका फल यह हुआ कि मरने के बाद भी कितने ही दिन तक वह वैसा ही प्रयत्न करने का और कष्ट पाने का अनुभव करती रही एक अन्य स्त्री आँधी के कारण नाव डूब जाने से अपने दूध पीते बच्चे के साथ मर गई। मरते समय भी उसका चित्त शान्त और प्रेममय था। इस कारण मर जाने पर भी वह अपने पति और बच्चों के आनन्ददायक स्वप्न देखती हुई सोती रही।

मनुष्य को अपने कर्मों का फल परलोक में अवश्य किसी न किसी रूप में भोगना पड़ता है इसलिए इस लोक में सब प्रकार के पापों और अनुचित कार्यों से बचे रहकर अपने जीवन को शुद्ध रखना ही उसका कर्तव्य है।


जीवन लक्ष्य महान


जीवन लक्ष्य महान (kavita)

ओ बाधाओं! यह मत समझो मैं दुर्बल इन्सान

मेरे इस जर्जर तन में भी है चेतन भगवान

मैंने हार न अब तक मानी

मेरा साहस है अभिमानी

भीषण से भीषण चोटों को सहता शैल समान ॥1॥

ओ बाधाओं! यह मत समझो मैं दुर्बल इन्सान।

माना मेरे पथ में तम है

पाँवों में कुछ बल भी कम है

पर मेरा यह प्राण पथिक भी है अद्भुत बलवान् ॥2॥

ओ बाधाओं! यह मत समझो मैं दुर्बल इन्सान

तुम चाहे कितनी भी आओ

आ आकर के पंथ डिगाओ

चलने वाला कभी न रुकता जीवन पंथ महान ॥3॥

ओ बाधाओं! यह मत समझो मैं दुर्बल इन्सान

- त्रिलोकीनाथ व्रजबाल, पिलाना


आप ईश्वर के पुत्र हैं!

(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम.ए.पी.एच.डी)

जो अपनी पैतृक सम्पत्ति को जान लेता है, अपने वंश के गुण, ऐश्वर्य, शक्ति,सामर्थ्य आदि से पूर्ण परिचित हो जाता है, वह उसी उच्च परम्परा के अनुसार कार्य करता है, वैसा ही शुभ व्यवहार करता है, उसी उत्कृष्ट भूमि में निवास करता है। जब तक किसी को अपने शील गुण और वंश का ज्ञान नहीं होता, तभी तक वह दीन स्थिति में रहता है।

यदि आप से कहा जाय कि आप इस संसार के सबसे बड़े सबसे अमीर और शक्तिशाली पिता के पुत्र हैं, तो आप मन ही मन क्या सोचेंगे? आप अपने को असीम शक्तियों का मालिक पाकर हर्ष के उल्लसित हो उठेंगे। आप अपने भाग्य को सराहेंगे? दूसरे आपको अपने सामने क्षुद्र प्रतीत होंगे।

वस्तुतः बात यही है! आप साधारण व्यक्ति नहीं हैं। आप एक ऐसे पिता के पुत्र हैं, जिसकी शक्तियाँ इस संसार में सबसे बढ़ी चढ़ी हैं। जो संसार के सब प्राणियों का जन्मदाता और पालनकर्त्ता है। आप परमात्मा की प्रेरणा और दिव्य विधान में जन्में हैं। आपके विचार, आपकी वाणी, आपके व्यवहार में परमात्मा के दिव्य तत्व ओतप्रोत हैं। आपका व्यक्तिगत कुछ नहीं, सब परमात्मा का ही है। आपका शरीर, इसकी विभिन्न क्रियाएं भी आपके आधीन नहीं हैं। वे भी ईश्वर के ही आधीन हैं। जिस परमात्मा के विधान से अनन्त ब्रह्माण्ड लोक संचालित होते हैं, उसी से आपका जीवन और क्रियाएं भी संचालित होती हैं।

साधारण अमीर पुत्र ही अपने को धन्य मानता है और अकड़ कर चलता है, पर आप तो कुबेरों के कुबेर लक्ष्मीपति के भाग्यशाली पुत्र हैं। आपका शरीर परमात्मा का पवित्र मंदिर है, आपका मन परमात्मा का विचार मंत्र है। आपकी सम्पदा की कोई पार नहीं, कोई मर्यादा नहीं।

आप ईश्वर के पुत्र होना स्वीकार कर लीजिए

आप हमारी बात मानिये, अपने को ईश्वर का पुत्र होना स्वीकार कर लीजिए। बस, आप उन तमाम सम्पदाओं के स्वामी बन जायेंगे, जो आपके पिता में हैं। पुत्र में पिता के सब गुण आने अवश्यम्भावी हैं। ईश्वर के पुत्र होने के नाते आप भी असीम शक्तियों और देवी सम्पदाओं के मालिक बन जायेंगे। ईश्वर के अटूट भण्डार के अधिकारी हो जायेंगे।

इमली के वृक्ष से एक छोटी पत्ती तोड़िये और इसे जिह्वा पर रखिए और दाँतों से चबाइये। आप उसे खट्टी पायेंगे। इमली के फल को चखिए वह और भी खट्टा है। इमली का फूल, छाल, बीज, पत्ती, कोपलें - सभी में खटाई का गुण थोड़े बहुत अन्तर से समान रूप में वर्तमान है। सर्वत्र वही गुण अदृश्य रूप से रमा हुआ है।

एक नीम से पत्ती तोड़ कर चखिए ....कड़वी है। उसकी निबोरी, उसकी छाल सभी कड़वी है। फूल कड़वे हैं। उसकी गन्ध तक से कड़वापन भासित होता है। नीम का बीज कड़वा, उसका पौधा कड़वा, फल कड़वा। जैसा बीज होता है, वैसा ही फल होता है। बीज से फल, और फल से उसी प्रकार का बीज वैसी ही सृष्टि -यही संसार के प्राणी जगत का क्रम हैं।

आप जन्तु विज्ञान विशारदों से बातचीत कीजिए। वे आपको बतलाएंगे कि जो गुण किसी भी जीव के पिता में होते है, वही उसकी सन्तान में पनपते और फलित होते हैं। दुधारू गाय की बछिया, माँ से भी अधिक दूध देती है। नस्ल सुधार वाले केवल ऊँची नस्लों वाली गायों की ही रक्षा करते हैं। उन्हीं के बच्चों को ध्यान से पालते हैं। पिता और माता के गुण उनके बच्चों में पूरी तेजी से उभर आते हैं। खूब फलते फूलते हैं।

फिर यदि आप अपने को ईश्वर का पुत्र होना स्वीकार कर लेते हैं, तो एक ऐसी शक्ति-स्त्रोत से अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं, जो अनन्त है, अटूट है। संसार के सर्वोच्च गुणों का आदि स्थान है।

ईश्वर हमको पिता होने के कारण कभी नहीं भूलता, हम ही उनको मूढ़तावश भूल बैठते हैं, यही दुःख का कारण है। वह पानी जैसी चीजों में रस की तरह है, सूर्य और चन्द्र में प्रकाश है, वेदों में ॐ है, आकाश में विस्तार है, मनुष्य में उनकी हिम्मत है, जमीन में खुशबू की तरह है, आग में उसकी दमक है और तपस्वियों में उनका तप है।

गीता के शब्दों में, “जो मुझे (ईश्वर को) सब जगह और सब चीजों को मेरे अन्दर देखता है, वह न कभी मुझसे पृथक होता है और न मैं उससे पृथक होता हूँ” जो मनुष्य एक मन एकाग्र होकर जानदारों के अन्दर सब घर में रहने वाले ईश्वर की पूजा करता है, वह योगी चाहे कहीं भी हो ईश्वर के अन्दर है।

महात्मा गाँधी जी कहा करते थे, “मेरा ईश्वर मेरा प्रेम और सत्य है। नीति और सदाचार ईश्वर है, निर्भयता ईश्वर है। आनन्द ईश्वर है। मानवीय सद्गुणों का सर्वोत्कृष्ट रूप है। मानवता की सेवा द्वारा ही ईश्वर के साक्षात्कार का प्रयत्न मैं कर रहा हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि ईश्वर न तो स्वर्ग में है, और न पाताल में, बल्कि हर एक के हृदय में है।”

ईश्वर सब लोगों में है, मगर सब लोग ईश्वर में नहीं हैं। क्या आप अपने को ईश्वर का पुत्र मानते हैं? यदि हाँ, तो उन्हीं गुणों को अपने चरित्र में प्रकट करना आरम्भ कर दीजिए।

ईश्वर के पुत्र होकर भी आप अपने को तुच्छ, निकृष्ट, या दीन−हीन नहीं कह सकते, क्योंकि ईश्वर तो शक्ति पुँज है।

ईश्वर के पुत्र होकर आप बैर, क्रोध, प्रतिशोध या शत्रुता के भाव मन में नहीं रख सकते, किसी का बुरा नहीं कर सकते, किसी का अहित नहीं सोच सकते, क्योंकि यह सम्पूर्ण विश्व परमात्मा का ही रूप है। (“पुरुष एवेद सर्वम्”-ऋग्वेद 10-60-2) इस विश्व में परमात्मा ही अनेक रूपों से जन्म ले रहा है। इर्द-गिर्द समाज में रहने वाले भाई बन्धु परमात्मा की प्रति-मूर्तियाँ हैं।

“ न मैं कैलाश में रहता हूँ, न बैकुण्ठ में मेरा वास भक्त के हृदय में है। (शिव स्त्रोत)

आप अपने को क्षुद्र हाड़ माँस चर्म रुधिर से बना हुआ पुतला समझना छोड़ दीजिए। मत मानिये कि आपका यह शरीर घृणित मल-मूत्र, माँस, रक्त, मवाद का पिण्ड है। पाप से उत्पन्न पाप करने वाला प्राणी है। नाशवान कुमार्गी, वासनामय है। अपने विषय में आज तक बनी हुई सब थोथी धारणाओं को तिलाँजलि दे दीजिए।

आप यह मानिए कि मेरा यह शरीर अखण्ड अगणित चेतन अणु परमाणुओं का संगठित तेज पुँज है। ईश्वर का साक्षी प्रतिनिधि है। अतएव पूर्ण है। इसे दूषित, रोगी, घृणित आदि कहने या मानने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। यह सब मेरा भ्रम है।

जब आपको अपनी इस दिव्य ईश्वरीय वंश-परम्परा का ज्ञान हो जाएगा, तब आपका जीवन, व्यवहार, चरित्र, बातचीत, रहन सहन और स्वभाव एक उच्च उद्देश्य से परिचालित होना प्रारंभ हो जायेंगे। आपके संपर्क में आने वाले सभी तेजोमण्डल से प्रभावित हो जायेंगे।

लोग दुखी या सुखी क्यों हैं?

क्या कारण है कि समान परिस्थितियों में रहने वाले कुछ व्यक्ति दुःखी हैं उसी स्थिति के दूसरे सुखी हैं? अतृप्त और दुःखी व्यक्तियों की धारणा है कि ईश्वर की इच्छा अनुसार ही लोग सुखी और दुःखी होते हैं। ईश्वर ही विपत्तियाँ देते हैं, हमें सजाएँ देते हैं जो हमारे जन्म के पापों का दुष्परिणाम हैं। किन्तु यह तर्क थोथा और सारहीन है।

सोच कर देखिए क्या कोई ऐसा पिता हो सकता है जो अपने सब पुत्रों को बराबर प्रेम न करता हो? या अकारण ही उन्हें दुःखी करता हो? पिता तो सदैव स्नेह की वर्षा करता है। उसकी डाँट फटकार में भी स्नेह स्निग्धता छिपी रहती है।

संसार में असंख्य स्त्री पुरुषों ने ईश्वर के प्रेम स्नेह, सहायता, दिशा संकेत को समझा है। मन में अनुभव किया है। फिर यदि आप ही उसे अनुभव नहीं करते तो यह आप ही का दोष है। सूर्य तो चमक रहा है। उसकी रश्मियों को अनुभव न करना आपकी ही गलती मानी जायगी।


तपस्वियों! राष्ट्र का पथ प्रदर्शन करो।

(श्री भगवान सहाय जी वाशिष्ठ)

भद्रमिच्छन्तः ऋषयः स्वर्विदस्तपोदीक्षा मुप निसेदुरग्रे।

ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै

देवा उप संनमन्तु ॥ अथर्व. 19। 41

“सुख और कल्याण की कामना करते हुए सुख के वास्तविक स्वरूप को जानने वाले ऋषियों ने पहले तप और दीक्षा का अनुष्ठान किया। उस तप और दीक्षा साधना के पश्चात् राष्ट्रीय भावना, बल और सामर्थ्य प्रकट हुआ। इसलिए विद्वान लोग इसके लिए सिर झुकायें।”

उक्त मंत्र में ऋषियों के आदर्श जीवन उद्देश्य का विवेचन है। इससे ज्ञात होता है कि वे न केवल अपने सुख और कल्याण को ही जीवनोद्देश्य समझते थे वरन् राष्ट्र एवं समाज का नेतृत्व कर उसमें नया बल साहस उत्साह एवं राष्ट्रीय भावनाओं का विकास करते थे। यह उक्त वेद मंत्र में बताया गया है।

मंत्र के प्रारम्भ में बताया है कि “सुख और कल्याण की इच्छा करते सुख के यथार्थ स्वरूप को जानने वाले ऋषियों के हृदय में भी अन्य मनुष्यों की तरह सुख और कल्याण की कामना उत्पन्न हुई। मानव की यह स्वाभाविक मानसिक भूख होती है। प्रत्येक मनुष्य अपने सुख के लिए अपना क्रियाकलाप चलाये रखते हैं। सभी इसी केन्द्र पर चक्कर लगाये रहते हैं कि येन केन प्रकारेण उन्हें सुख मिले, कोई धन संग्रह करके सुख प्राप्त करना चाहता है कोई-कोई योग साधना, पूजा उपासना, सम्पन्नता कीर्ति चाहना आदि से सुख चाहता है। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति सुख प्राप्ति के लिए भिन्न भिन्न मार्गों का अवलम्बन करता है। किन्तु इस विभिन्नता के दलदल में वास्तविक सुख के मार्ग को अपनाकर उस पर चलना ही उक्त उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है।

ऋषियों ने सुख के वास्तविक स्वरूप को जाना था। उन्होंने अपने जीवन के वास्तविक सुख और आत्म कल्याण का मार्ग राष्ट्र एवं समाज की सेवा में ही पाया। जैसा कि वेदमंत्र के अन्त में आया है। ऋषियों ने राष्ट्रीय भावना, बल, सामर्थ्य का विकास किया और इसी से उन्होंने वास्तविक सुख और कल्याण को प्राप्त किया यह वेद भगवान की साक्षी से स्पष्ट सिद्ध है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि सच्चा सुख और कल्याण का पवित्र राजपथ राष्ट्र की सेवा में ही है। जब हृदय में समाज सेवा, जन जागरण एवं राष्ट्रोत्थान के लिये तीव्र भावनायें उदय होती हैं तब एक मीठे दर्द भरे अलौकिक आनन्द की सृष्टि होती है जिसमें भाव विभोर होकर मनुष्य अपनी निष्काम कर्म साधना से राष्ट्र में नव प्राण, बल, नवीन उत्साह एवं पुरुषार्थ को फूँकता है। सोये राष्ट्र में नव चेतना का संचार करता है। एक नहीं अनेकों व्यक्ति उस मानवता के पुजारी के सत्प्रयत्नों एवं मार्गदर्शन से वास्तविक सुख एवं कल्याण प्राप्त करते हैं। ऐसा व्यक्ति स्वयं देवदूत होता है, राष्ट्र और जाति का प्राण होता है। उसके जीवन का समस्त क्रियाकलाप इसी महान साधना के लिए होता है। ऋषि अपने लिए कुछ नहीं करते। उनका जीवन दूसरों के लिए ही होता है यही उनके जीवन का महान आदर्श है।

हमारे ऋषियों का जीवन भी ठीक इसी क्रम से होता था। उन्होंने वास्तविक सुख और कल्याण का मार्ग जन सेवा से ही समझा। वह सेवा कार्य भी उच्च श्रेणी का। किसी को धन एवं शारीरिक आवश्यकता पूर्ति के साधन प्राप्त कर देना कोई महत्वपूर्ण सेवा कार्य नहीं है सबसे महत्वपूर्ण सेवा कार्य बुरे विचारों को हटा कर सद्विचारों को प्रतिष्ठापित करना, मनुष्य का आत्मा कल्याण के लिए मार्ग दर्शन करना आदि आदि। इसी प्रकार समाज का भी पथ प्रदर्शन करना, ऋषियों ने इसी पवित्र पथ का अवलम्बन किया था।

जब ऋषियों ने वास्तविक सुख और आत्म-कल्याण का सच्चा मार्ग राष्ट्र सेवा एवं समाजोत्थान में ही देखा तो इसके लिए उन्होंने सर्व प्रथम तप और दीक्षा का अनुष्ठान किया। इसमें उन्होंने स्वयं की जीवन निष्ठा आदर्श एवं आत्म बल संचय किया। क्योंकि उन्होंने उस मनोवैज्ञानिक तथ्य को समझ लिया था जिसके अनुसार कार्य आरम्भ करने से पहले शक्ति और साधन जुटा लिये जायं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिसका स्वयं का जीवन आदर्श, नैष्ठिक एवं पवित्र नहीं है वह दूसरों को प्रभावित नहीं कर सकता। जो स्वयं प्रकाशित नहीं है वह दूसरों को प्रकाशित नहीं कर सकता। ठीक इसी तथ्य के आधार पर ऋषियों ने पहले तप और दीक्षा का अनुष्ठान किया जिसमें स्वयं के आदर्श पवित्र जीवन का निर्माण, आत्म बल वृद्धि, सहनशीलता, ज्ञान विज्ञान और अखण्ड साधना का अनुभव आदि को आत्मसात किया।

उक्त तप और दीक्षा के पश्चात ऋषियों ने राष्ट्रीय भावना, बल, साहस, सामर्थ्य का विकास किया। उनकी ऋचायें आज भी नवीन प्रेरणा, अनंत शक्ति सामर्थ्य एवं राष्ट्रीय भावनाओं को हमारे हृदय में झंकृत करती हैं। उन्होंने राष्ट्र में नये बल, बुद्धि, विज्ञान, कौशल, साहस, पुरुषार्थ को जागृत किया था। जाति में नव चेतना का आह्वान किया था। यही कारण है कि वैदिक काल का स्वर्ण युग विश्व इतिहास में अपना एक उच्च स्थान रखता है। जिस सतयुग की भव्य कल्पना करके ही हम आत्म विभोर एवं उल्लसित हो उठते हैं वह उन राष्ट्रहित चिंतक, समाज सेवा, समाज कल्याणकारी हमारे पूर्वज ऋषियों की ही देन है जिनके लिए नमन करने, उनका अनुसरण करने की आज्ञा वेद भगवान ने दी है। विद्वान पुरुषों को उनका अनुसरण करना ईश्वरीय आज्ञा है।

यह निर्भ्रांत सत्य है कि जिस देश में इन ऋषियों की मर्यादाओं एवं कर्तव्यों का क्रम चलता रहता है वह देश प्रगति एवं उत्थान की और बढ़ता रहता है। कालान्तर में हमारे देश की जो स्थिति हुई वह इसके ऋषियों से विहीन हो जाने के परिणाम स्वरूप ही है। लम्बे अरसे की गुलामी, आध्यात्मिक एवं नैतिक पतन, कमजोरी, दुर्बलता एवं हीनत्व आदि ने भारत में अपना घर भर लिया इसलिए ऋषि परम्परायें समाप्त हो गईं। राष्ट्र का पथ प्रदर्शक ऋषि नहीं रहा अतः यह राष्ट्र अवनति के गर्त में गिरा। सौभाग्य से पुनः ऋषि आत्माओं का इस भूमि पर अवतरण हुआ जिन्होंने अपने जीवन को जला जलाकर अपना बलिदान कर, सर्वस्व निछावर कर इसे स्वतंत्र किया किन्तु अभी ऋषि परम्परा का कार्य समाप्त नहीं हुआ है। गुलामी की लम्बी नींद से जगा हुआ यह अर्ध निद्रित भारत अभी आलस्य प्रभाव, शैतानी विचारधारा अंधस्मृति से प्रसिद्ध है इस पर भी भौतिकता की विनाशकारी लहरों में थपेड़े खा रहा है। भौतिकता की इन भयंकर लहरों से बचाने, नवीन प्राण एवं चेतना का संचार करने, जन जन में जागरण का सन्देश सुनाने, सोई हुई भारतीय जनता को जगाने, अन्ध प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए ऋषि परम्पराओं को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।


प्राणीमात्र की एकता और आधुनिक विज्ञान

(स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती)

संसार में मनुष्य को सबसे अधिक असंतोष तभी होता है, जब कि वह दूसरे मनुष्यों को अपने से अधिक धनवान, बुद्धिमान, शक्तिशाली देखता है। उनका मुझसे अधिक सम्मान होता है, वे मुझसे अधिक सुख से रहते हैं और इस कारण उसको एक प्रकार ही ईर्ष्या या संताप होता है। यदि मनुष्य संसार की वास्तविकता को समझने का प्रयत्न करे और जो भेदभाव का पर्दा नेत्रों के सम्मुख पड़ा है उसे हटा दे तो वह सब प्रकार के कष्टों और असंतोष से छुटकारा पाकर उच्च कोटि के आनन्द को प्राप्त कर सकता है।

समस्त शास्त्रों और महापुरुषों ने मनुष्यों को यही उपदेश दिया है कि मनुष्य का सबसे ऊँचा लक्ष्य “आत्म-भाव” प्राप्त करना है। जैसे मनुष्य अपने शरीर के लिये समझता है कि यह मेरा है उसी प्रकार उसे संसार के समस्त शरीरों को अपना ही समझना चाहिए। यदि वह हृदय से ऐसा अनुभव करने की चेष्टा करेगा और इसका अभ्यास बढ़ाता जायेगा, तो जिस प्रकार अपने शरीर पर उसका अधिकार है वैसे ही दूसरे शरीर भी उसके अधिकार में आ जायेंगे। यद्यपि सुनने में यह बात अनोखी सी जान पड़ती है, पर आप परीक्षा करके देखेंगे तो यह पूर्ण रूप से सत्य सिद्ध होगी।

जब मनुष्य इस प्रकार के विचार और भावनायें अपने भीतर जमा लेता है तो इसका एक बहुत उत्तम परिणाम तुरन्त दिखलाई पड़ने लगता है। साधारण लोग धन के लिये उदास और चिन्तित क्यों होते हैं? क्योंकि वे चाहते हैं कि ये बाग-बगीचे, सुन्दर-सुन्दर स्थान हमारे हों। पर क्या मनुष्य सार्वजनिक बागों में जाकर धनवानों के समान ही आनन्द नहीं उठा सकता? क्या वहाँ के सुन्दर फूल और फलों को कोई धनवान मनुष्य चार आँखों से देख सकता है जब कि तुम केवल दो आँखों से देखते हो? बागों में कोकिल आदि पक्षियों का मनमोहक गाना वह भी उसी प्रकार दो कानों से सुनता है जैसे कि तुम सुनते हो। तो फिर तुम उस बाग के स्वामी बनने की मूर्खतापूर्ण इच्छा क्यों करते हो? इसलिए “राम” का कहना है कि दुनिया के सब बागों को तुम अपना ही समझो दुनिया के सब शरीरों को भी अपना ही समझो। अनुभव करो कि सब प्रभावशाली शक्तियाँ और विशिष्ट मन तुम्हारे ही है। यह ऐसी कल्पना नहीं जिसे तुम अस्वाभाविक या कठिन कह सको। जीवन में उच्च आदर्शों की प्राप्ति के लिये क्या तुम्हें अनेक गुणों की साधना नहीं करनी पड़ती? उसी प्रकार तुम सब शरीर और मनों के अपने होने का भी अभ्यास कर सकते हो और इससे एक अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्त कर सकते हो। यह तथ्य चाहे तर्क शास्त्र, विज्ञान दर्शन, शास्त्र से सिद्ध न हो सके, पर अनुभव द्वारा यह अवश्य सत्य प्रतीत होता है।

किसी सज्जन ने समाचार पत्रों में एक विज्ञापन छपाया था जिसका शीर्षक था “मनुष्य का भ्रातृत्व”। पर हम इस शीर्षक को सार्थक और प्रशंसनीय नहीं समझते। इसी प्रकार “ विश्वव्यापी मातृत्व” भी भ्राँति युक्त जान पड़ता है। “भाई शब्द कुछ भेद बतलाता है। अनेक भाई एक दूसरे से कलह करते, लड़ते दिखलाई पड़ते हैं, किन्तु हम तो किसी भी प्रकार के भेद के लिए जरा सा स्थान भी नहीं रखना चाहते। इसलिए उपर्युक्त शीर्षक के बजाय हम “मनुष्य की एकता और संयुक्त एकता” शीर्षक अधिक अच्छा समझते हैं। आप कहेंगे कि “तुम तो फिर वही आत्मा का राग ले बैठे जो ऐसी सूक्ष्म है कि हमारी समझ में आ ही नहीं सकता।” अच्छी बात है, तब मैं इस विषय की चर्चा बहुत ही स्थूल स्थिति-बिन्दु से आरम्भ करूंगा। हम अपने स्थूल शरीरों को ही सबसे पहले लेंगे। यदि हम आत्मा की प्रकृति को त्याग भी दें यदि हम आत्मा को अपना सच्चा स्वरूप न समझें, तो हमारे स्थूल शरीर भी यही सिद्ध करते हैं कि हम सब एक हैं। भावना के लोक में भी विज्ञान सिद्ध करता है कि तुम सब एक हो। आप शंका करेंगे कि एक शरीर दो कुर्सी पर बैठा लिख रहा है और दूसरा दुकान में खड़ा हुआ सौदा तोल रहा है वे दोनों एक कैसे हो सकते हैं? समुद्र में हमको एक लहर यहाँ और दूसरी वहाँ जान पड़ती हैं, वे विभिन्न आकार प्रकार की जान पड़ती है, किन्तु वास्तव में ये सब लहरें या तरंगें एक ही हैं, क्योंकि वे उसी पानी से हैं। वही एक समुद्र इन विभिन्न लहरों के रूप में प्रकट होता है। जिस पानी ने इस समय एक लहर का रूप धारण कर रखा है वही थोड़ी देर बाद दूसरी लहर बनावेगा।

लहरों के मामले में जो कुछ दिखलाई पड़ता है वही हमारे नैतिक शरीरों के सम्बन्ध में भी सत्य है। जो पदार्थ इस समय मेरे शरीर का रूप लिये हुये हैं, वे ही कुछ समय बाद दूसरे शरीर को बनावेंगे। इतना ही नहीं, जो भौतिक परमाणु मेरे शरीर के बनाने वाले जान पड़ते हैं, वे ही हमारे जीवन काल में ही दूसरी देह में चले जाते हैं। तुम साँस द्वारा ऑक्सीजन हवा को भीतर खींच रहे हो, और कार्बोनिक एसिड की श्वाँस को बाहर निकाल रहे हो। इस कार्बोनिक एसिड गैस को पौधे साँस के लिये खींचते रहते हैं और ऑक्सीजन गैस को निकालते रहते हैं। उस ऑक्सीजन को फिर तुम साँस के लिए भीतर खींचते रहते हो। इससे जान पड़ता है कि पौधों के साथ तुम्हारा भाइयों का सा सम्बन्ध है। तुम्हारी साँस उनमें जाती है और उनकी साँस तुम्हारे भीतर बैठती है। तुम पौधों में साँस छोड़ते हो और पौधे तुममें साँस प्रविष्ट करते हैं। इस प्रकार तुम बाग-बगीचों और पौधों से भी अभिन्न हो।

अब हम इस विषय पर दूसरे पहलू से विचार करेंगे। हम सब मनुष्य एक ही पृथ्वी पर बसते हैं, और एक ही सूर्य, चन्द्रमा तथा वायु मंडल हमको घेरे हुये हैं। इस प्रकार एक बार जो हवा तुम्हारे भीतर जाती है वही कुछ देर बाद दूसरे के भीतर पहुँच जाती है। तुम फल, शाक, भाजी, अन्न या माँस आदि जो कुछ खाते हो उसके कुछ भाग से तो तुम्हारे शरीर का पोषण होता है और शेष भाग मल मूत्र के रूप में बाहर निकल जाता है। वह सड़कर और खाद बनकर फिर शाक भाजी और पौधों में प्रविष्ट कर जाता है और अन्य मनुष्यों द्वारा फिर ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार हम देखते है कि जो पदार्थ एक बार तुम्हारा था वही कुछ समय बाद दूसरों का हो जाता है।

यदि हम सूक्ष्म दर्शक यंत्र (खुर्दबीन) से अपने शरीर की चमड़ी को देखें तो हम शरीर से बहुत सूक्ष्म जानदार परमाणु बाहर आते देखेंगे, इतना ही नहीं हमको यह भी दिखलाई पड़ेगा कि परमाणु हमारे शरीर से बाहर ही नहीं आ रहे हैं, वरन् वैसे ही जानदार परमाणु बाहर से आकर हमारे शरीर के भीतर भी जा रहे हैं। इस प्रकार निरन्तर कुछ परमाणु हमारे शरीर से निकल रहे हैं और कुछ उसके भीतर जा रहे हैं। दुनिया में बराबर ऐसा ही विनिमय (अदला-बदला) हो रहा है। जो जानदार परमाणु तुम्हारी देह से बाहर आते हैं वे हवा में फैल जाते हैं और तुम्हारे आस-पास के अन्य मनुष्यों के शरीरों में प्रवेश कर जाते हैं। इसी प्रकार दूसरों के परमाणु तुम्हारे शरीर में घुसते रहते हैं। इस प्रकार विज्ञान इस बात को असंदिग्ध रूप से सिद्ध करता है कि तुम्हारे सब भौतिक शरीर एक ही हैं। शायद तुमको इस पर विश्वास न हो और तुम कहने लगो कि दूसरे के जीवित परमाणु मेरे शरीर में कैसे आ सकते हैं? इस सम्बन्ध में हम आपको इस बात पर विचार करने को कहेंगे कि “गंध” क्या चीज है? आप जानते हैं कि जो चीजें हम सूँघते हैं, उनसे बाहर निकलने वाले छोटे सजीव परमाणु ही गन्ध का कारण होते हैं। फूल छोटे जानदार जर्रे बाहर निकालते हैं, इसलिए उनमें सुगन्ध आती है। यह एक प्रत्यक्ष और विज्ञान द्वारा सिद्ध तथ्य है। इसी प्रकार क्या तुम्हारे शरीरों से गन्ध नहीं निकलती? अवश्य निकलती है। पर तुम्हारी घ्राणेन्द्रिय नाक इतनी तीव्र नहीं है, या यों कहा कि इस प्रकार की सामर्थ्य नहीं रखती कि उस गन्ध को ग्रहण कर सके। पर चूँकि कुत्तों की घ्राणेंद्रिय अधिक तीव्र होती है, इससे वे सूँघ कर तुमको जान लेते हैं और ढूंढ़ लाते हैं। यदि तुम्हारी देह से गन्ध न आती होती तो कुत्ते तुमको भीड़ या घर के भीतर से भी कैसे ढूंढ़ सकते? तुम्हारे शरीरों से निकलने वाली यह गन्ध सिद्ध करती हैं कि छोटे सजीव परमाणु तुम्हारे शरीर को छोड़कर बाहर निकलते रहते हैं।

एक मनुष्य बीमार है। तुम उसके पास जाते हो और कमरे तक से उसकी बीमारी की गंध आती है। एक मनुष्य किसी संक्रामक रोग से बीमार है- हैजा, चेचक या प्लेग से। उसकी बीमारी का छूत दूसरे लोगों को कैसे लग जाती है? इसका एकमात्र कारण यही है कि जो छोटे जर्रे बीमार आदमी की देह से निकल रहे है वे तुम्हारी देह में बैठ जाते हैं इस तरह बीमारी हमें पकड़ लेती हैं और हम अपने को रोगी अनुभव करने लगते है। एक मनुष्य के सर्दी (जुकाम) हो जाती है, तो उसके साथ रहने वाले दूसरे मनुष्य को भी, अगर वह कोमल स्वभाव का है, सर्दी हो जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि हम सब के शरीर एक हैं। हमारे सबके स्थूल शरीर भी एक हैं फिर आत्मा का तो कहना ही क्या है? इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्यों पर बुरा या भला प्रभाव डाल रहा है। यदि वह रोगी है, दुर्व्यसनों में लिप्त है, बुरे विचारों वाला है तो वह अपने आस पास के अन्य लोगों को अवश्य कुछ न कुछ हानि पहुँचाता है और इस दृष्टि से दोषी है। साथ ही यदि हम ऐसे व्यक्ति के सुधार का, उसे सहायता देकर बीमारी या दुर्व्यसन से छुड़ाने का प्रयत्न नहीं करते तो हम भी कम दोषी नहीं है। हमको इस बात को पूर्ण निश्चित रूप से जान लेना चाहिये कि संसार में जितने मनुष्य ऊपर से भिन्न भिन्न दिखलाई पड़ते हैं उनके शरीर और आत्मा एक ही हैं, वे वास्तव में भाई-भाई हैं और उनको दूसरों के हित की वैसी ही चिन्ता रखनी चाहिये जैसी कि वे अपने हित की रखते हैं।


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3-प्रेम! प्रेम!! प्रेम!!! प्रेम ही एक अति उत्तम भोजन है। यही एक श्रेष्ठ तथा स्वादिष्ट पदार्थ है। इसे उदारता के वस्त्र में बाँध ले। यदि जान बूझकर खा ले तो भी तेरा भला। यदि किसी को खिला दे तो भी तेरा भला। यदि कोई लूटकर या चोरी से तेरी गठरी में से खा ले तो भी तेरा भला ही होगा।

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20- संकुचित विचार वाला मनुष्य कभी विशाल हृदय और स्वतन्त्र विचार रखने वाला नहीं बन सकता। प्रेम के सौदे में भार नहीं, वह बहुत हल्का है, परन्तु उसका विस्तार इतना है कि किसी भी संकुचित हृदय में उसकी समाई नहीं हो सकती।

-प्रभुआश्रित


अपने स्वरूप को पहचानिये।

(श्री गणपति विनायकराव शास्त्री)

अध्यात्म मार्ग के पथिक के सामने सबसे पहले एक प्रश्न उपस्थित हुआ करता है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप क्या है? वर्तमान समय में पश्चिमी शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों में से तो अधिकाँश इस प्रश्न को बेकार समझते हैं, क्योंकि वे अपने स्थूल शरीर को ही सब कुछ समझते हैं और उसी को पुष्ट बनाने का प्रयत्न करते हैं। इसी विचार से वे सदैव ऐसे उपायों को ढूँढ़ते हैं जिनसे शारीरिक सुखों की वृद्धि हो सके और किसी भी तरह की असुविधा का सामना न करना पड़े। पर यदि गम्भीरता पूर्वक सोचा जाय तो यह “मनुष्य” की बहुत ही अधूरी और घटिया दर्जे की व्याख्या है। अगर इस हाड़, माँस और चाम के सिवाय और कुछ नहीं है, और बढ़िया किस्म के भोजन तथा वस्त्र प्राप्त कर लेने के सिवाय उसका और कोई ऊँचा उद्देश्य नहीं है, तो उसमें गाय, भैंस, घोड़ा आदि पशुओं की अपेक्षा थोड़ा ही अन्तर माना जायगा।

कहते हैं कि पुराने युगों में दो व्यक्ति थे। एक था विरोचन और दूसरा इन्द्र। उन दोनों के हृदय में भी ऐसा ही प्रश्न उठा कि मनुष्य क्या है-हम जो हमेशा “मैं” शब्द कहा करते हैं उसका क्या अर्थ है? वे दोनों ब्रह्माजी के पास अपनी इस समस्या का समाधान करने पहुँचे। ब्रह्माजी ने उनकी बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए एक बड़ी सी थाली में पानी भरवाकर उनके सामने रख दिया और कहा कि इसके ऊपर झाँक कर देखो। उस थाली के पानी में उनको प्रतिबिम्ब दिखलाई दिया। ब्रह्माजी ने कहा कि “इस थाली में तुमको जो दिखाई पड़ रहा है वही तुम हो।” इस बात को सुनकर वे बड़े प्रसन्न हुये क्योंकि सुन्दर वस्त्राभूषण पहिन कर उनको जल में अपनी बड़ी सुन्दर प्रतिच्छाया दिखलाई पड़ी थी। वे सोचने लगे कि “वाह, हम कैसे दर्शनीय और आकर्षक हैं। विरोचन ने तो उसी समय अपने साथियों के पास जाकर कह दिया कि “मैं तो “मैं” का पता लगा आया। तुम सब भी दर्पण आदि में देखकर अपने स्वरूप को पहचान सकते हो। इस प्रकार विरोचन के दल वाले अपने शरीर को ही अपना सच्चा स्वरूप समझकर उसे स्वच्छ, सुन्दर और सुदृढ़ बनाने में दत्त चित्त हो गये।

पर इन्द्र को थोड़ी देर बाद ही कुछ शंका होने लगी, कि थाली में तो हमने अपने वस्त्र और आभूषणों और मुख की छाया देखी थी। अगर “मैं” का अर्थ इन कपड़े, गहने आदि से है तो यह कोई महत्व की चीज नहीं। कपड़े मैले होकर फट जाते हैं और हम उनको उतार कर फैंक देते हैं। आभूषण भी गिरने पड़ने से खराब हो जाते हैं और उनको तोड़ कर फिर से बनाया जाता है। पर ऐसा होने से हम यह कभी नहीं समझते की “मैं” फट गया और बेकार होने से फेंक दिया गया। मनुष्य के शरीर की भी यही दशा है अगर दुर्घटना के कारण उसकी एक अँगुली कट जाती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि “मैं” कट गया। कुछ समय बाद घाव अच्छा हो जाने पर मनुष्य को उस अँगुली का ध्यान भी नहीं आता और वह पूर्ववत् जैसे का तैसा मनुष्य अथवा “मैं” बना रहता है। इसलिए केवल नेत्रों से दिखाई पड़ने वाले शरीर को ही मनुष्य का वास्तविक रूप मान लेना ठीक नहीं। यह विषय इससे कहीं अधिक गहरा और विचारणीय है। इस सम्बन्ध में विवेचना करते हुये एक विद्वान ने जो कुछ लिखा है, उससे हम अपने स्वरूप को पहिचानने में कुछ सहायता पा सकते है।

“इसमें सन्देह नहीं कि अपना स्वरूप जानने का प्रयत्न करना बड़ा कठिन है। परन्तु “हमारा कर्तव्य क्या है?” क्या इसकी मीमाँसा करना कुछ कम कठिन है? यदि “मैं” के विषय में दार्शनिकों और वैज्ञानिकों में मतभेद है तो “मेरा कर्तव्य क्या है?” इस विषय में भी विद्वानों में कुछ कम मतभेद नहीं रहा है। यदि “आत्म शास्त्र” बड़ा जटिल है तो “कर्तव्य शास्त्र” भी बहुत सी उलझनों से परिपूर्ण है। और सबसे मुख्य बात तो यह है कि जिस चीज के स्वरूप का ही हमको पता नहीं तो उसके कर्तव्य का निर्णय कैसे किया जा सकता है? कर्तव्य का निश्चय तभी हो सकता है जब स्वरूप का निश्चय हो जायगा। जिन्होंने अपने स्वरूप को बिना पहिचाने अपने कर्तव्य का निश्चय करना चाहा, वे सदा भूलभुलैयां में ही पड़े रहे। इस लिये “मैं क्या हूँ” यह प्रश्न बड़ा महत्वपूर्ण है, बिना इसकी मीमाँसा किये हम “कर्तव्य शास्त्र” में एक कदम भी आगे नहीं चल सकते। उदाहरण के लिये यदि शरीर ही का नाम “मैं” है और शरीर के साथ ही इस “मैं” का भी अंत हो जाता है, तो इस “मैं” का भी कर्तव्य वैसा ही क्षणिक होगा जितना क्षणिक यह शरीर है। तब हम प्रत्येक कार्य के औचित्य और अनौचित्य का निर्णय करने के लिये केवल उन्हीं बातों पर दृष्टि रखेंगे जिनका सम्बन्ध हमारे इस शरीर और सौ पचास वर्ष के जीवन से है इसके आगे जाने की कोई उपयोगिता नहीं। कल्पना कीजिये कि मुझे किसी स्थान में केवल दो दिन रहना है, तो उस अवस्था में मुझे उन्हीं कामों के करने की आवश्यकता है जो दो दिन से सम्बन्ध रखते हों। क्या जरूरत है कि वहाँ ऐसा मकान बनाया जाय जो बरसों तक रह सके? क्या आवश्यकता है कि उन व्यक्तियों से सम्बन्ध जोड़ा जाय जो दो दिन से अधिक रहेंगे? उन शक्तियों और कार्यक्रमों पर ध्यान देने की भी क्या आवश्यकता है जिनका प्रभाव दो दिन के बाद पड़ेगा? परन्तु यदि “मैं” शरीर से अलग कोई अधिक स्थायी और विस्तृत पदार्थ है तो उसका कर्तव्य भी उसी प्रकार का मानना पड़ेगा।

“जो “मैं” का अर्थ समझने का यत्न नहीं करते उनका उदाहरण उस मनुष्य के समान है जो किसी जंगल में बड़े वेग से दौड़ रहा है, पर जब लोग उससे पूछते है कि “तुम कौन हो?” तो वह कहता है “मैं नहीं जानता। “ लोग पूछते हैं “तुम कहाँ को जाओगे?” वह कहता है “मैं नहीं जानता।” ऐसे व्यक्ति के विषय में आप क्या कहेंगे? यही न कि वह पागल है? इसलिये जो लोग इस “मैं” के तत्व या आत्म तत्व की खोज करने वालो को बुद्धि शून्य समझते हैं, उनकी बुद्धिमत्ता में यदि संदेह किया जाय तो कोई अनुचित बात न होगी”

इसलिये यदि मानव जीवन को सफल बनाना है, अपना वास्तविक कल्याण साधन करना है तो हमको सबसे पहले इस बात पर विचार करना चाहिये कि “मैं क्या हूँ - मनुष्य का यथार्थ स्वरूप क्या है? जब तक हम इस बात का दृढ़ निश्चय न कर लेंगे कि हम शरीर से भिन्न आत्म स्वरूप है, तब तक हम कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं कर सकते। फिर तो हमारा ध्यान उसी खाओ, पियो, मौज उड़ाओ वाले सिद्धान्त की तरफ जाएगा जो हमारा पतन कर देगा और हमको कीड़े-मकोड़ों की तरह बना देगा। जब मनुष्य को अपने दैवी स्वरूप का ज्ञान होगा तभी वह मनुष्य से देवता बनने की चेष्टा करेगा और उससे ऊँचा उठकर ब्रह्मस्वरूप बनने की अभिलाषा रखेगा।


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ईश्वर तो कल्पवृक्ष है। वह सभी की इच्छा पूरी करेगा। किन्तु उससे माँगना पड़ेगा। संसारी के और सर्वत्यागी के ज्ञान में बड़ा अंतर होता है। संसारी व्यक्ति का ज्ञान है दिये का उजाला जिससे घर के भीतर ही प्रकाश होता है- अपनी और घर की चीजों के सिवा और कुछ वह समझ नहीं पाता। सर्वत्यागी का ज्ञान सूर्य का प्रकाश है। उस प्रकाश में भीतर-बाहर सब चीजें देख पड़ती है।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस


कर्म योग द्वारा सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

(श्री. गंयाप्रसाद जी बनोली)

संसार की उत्पत्ति भगवान से हुई है और भगवान ही सारे जगत में परिपूर्ण हैं। मनुष्य अपने कर्मों द्वारा इन भगवान की पूजा करके परम सिद्धि रूप भगवान को सहज ही प्राप्त कर सकता है। जो जिस कार्य को करता हो, जिसका जो स्वाभाविक कर्म हो उसी को करे, न तो सबके कर्म एक से हो सकते हैं और न एक सा बनाने की व्यर्थ चेष्टा ही करनी चाहिये। नाटक में सभी पात्र एक ही पात्र का पार्ट करना चाहें तो वह खेल बिगड़ जायेगा। इसलिये अपनी अपनी जगह सभी की जरूरत है और सभी का महत्व है। राजा और मजदूर दोनों की ही आवश्यकता है और दोनों ही अपना अपना महत्व रखते हैं। इसलिये कर्म न बदलो मन के भाव को बदल डालो। कर्म का छोटा बड़ा पन बाहरी है। महत्व तो हृदय के भाव का है। ऊँच नीच का भाव रखकर राग द्वेष पूर्वक पराये अहित के लिये लोक दृष्टि में शुभ कर्म करने वाला नरक गामी हो सकता है।

स्वार्थ को सर्वथा छोड़कर निष्काम भाव से श्री भगवान की प्रीति के लिये भगवद्ज्ञानसार साधारण स्वकर्म करता हुआ ही मनुष्य परम सिद्धि रूप परमात्मा को पा सकता है। मनुष्य इस प्रकार अपने प्रत्येक कर्म को मुक्ति या भगवत् प्राप्ति का साधन बना सकता है। जिस कर्म में काम, क्रोध, लोभ आदि नहीं हैं जिसमें भगवान को छोड़कर अन्य किसी भी फल की आकाँक्षा नहीं हैं जो कर्म की अथवा फल की आसक्ति से नहीं किन्तु भगवान के दिये हुये स्वाँग का खेल अच्छी तरह खेलने की इच्छा से निरन्तर भगवत्- स्मरण करते हुये भगवत् प्रीत्यर्थ सात्विक कर्म उत्साह पूर्वक किया जाता है, उसी विशुद्ध कर्म से भगवान की पूजा होती है। यह पूजा अपने किसी भी उपर्युक्त दोषों से रहित विहित स्वकर्म के द्वारा प्रत्येक स्त्री पुरुष सहज ही अपने अपने स्थान में रहते हुये ही कर सकता है। केवल मन के भाव को बदल कर कर्म का प्रवाह भगवान की ओर मोड़ देने की जरूरत है। फिर प्रत्येक कर्म तुम्हारी मुक्ति का साधन बन जायेगा और अपने सहज कर्मों को करते हुये भी तुम भगवान को प्राप्त कर जीवन सफल कर सकोगे।

यदि तुम व्यापारी या दुकानदार हो तो यह समझो कि मेरा यह व्यापार धन कमाने के लिये नहीं है श्री भगवान की पूजा करने के लिये है। लोभवृत्ति से जिन जिन के साथ तुम्हारा व्यवहार हो इन्हें लाभ पहुंचाते हुये अपनी आजीविका चलाने मात्र के लिये व्यापार करो। याद रखो- व्यापार में पाप लोभ से ही होता है। लोभ छोड़ दोगे तो किसी प्रकार से भी दूसरे का हक मारने की चेष्टा नहीं होगी। वस्तुओं का तोल-नाप या गिनती कभी ज्यादा लेना और कम देना बढ़िया के बदले घटिया देना और घटिया के बदले बढ़िया लेना आढ़ती दलाली वगैरह हमें शर्त से ज्यादा लेना आदि व्यापारिक चोरियाँ लोभ से ही होती हैं। परन्तु केवल लोभ ही नहीं छोड़ना है, दूसरों के हित की भी चेष्टा करनी है। जैसे लोभी मनुष्य अपनी दुकान पर किसी ग्राहक के आने पर उसका बनावटी आदर सत्कार करके उससे ठगने की चेष्टा करते हैं, वैसे ही तुम्हें कपट छोड़कर ग्राहक को प्रेम के साथ सरल भाषा में सच्ची बात समझा कर उसका हित देखना चाहिए।

यह समझना चाहिये कि इस ग्राहक के रूप में साक्षात् परमात्मा ही आ गये हैं। इनकी जो कुछ सेवा मुझसे बन पड़े वही थोड़ी है। यों समझ कर व्यापार करोगे तो तुम श्री भगवान के कृपा पात्र बन जाओगे और यह व्यापार ही तुम्हारे लिए भगवन् प्राप्ति का साधन बन जायेगा।

यदि तुम दलाल हो तो व्यापारियों को झूँठी सच्ची बातें समझाकर अपनी दलाली के लोभ से किसी को ठगाओ मत। दोनों के रूप में ईश्वर के दर्शन कर सत्य और सरल वाणी से दोनों की सेवा करने की चेष्टा करो। याद रखो! अभी नहीं तो आगे चलकर तुम्हारी इस वृत्ति का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ेगा यदि न भी पड़े तो कोई हर्ज नहीं है, तुम्हारी मुक्ति का साधन तो हो ही जायेगा।

तुम हाकिम हो तो अपने स्वाँग के अनुसार दया पूर्ण न्याय करो तुम्हारे इजलास में कोई भी मुकदमा आवे तो उसे ध्यान से सुनो रिश्वत खाकर या अन्य किसी भी कारण से पक्षपात और अन्याय न करो। प्रत्येक न्याय चाहने वाले को भगवान का स्वरूप समझकर न्याय रूप सामग्री से उसकी पूजा करो उसे न्याय प्राप्ति में जहाँ तक हो सहूलियत कर दो और सेवा के भाव से ही अपने को मजिस्ट्रेट या जज समझो, अफसर नहीं। तुम्हारी इसी निष्काम सेवा से भगवान की कृपा होगी और तुम भगवन् प्राप्ति कर सकोगे। तुम वकील हो तो पैसे के लोभ से कभी अन्याय का पैसा मत लो, झूँठी गवाहियाँ न बनाओ, किसी को तंग करने की नीयत न रखो। प्रत्येक मुश्किल को भगवान का स्वरूप समझकर भगवत् सेवा के भाव से उचित मेहनताना लेकर उनका न्याय-पक्ष ग्रहण करो।

तुम चाहो तो भगवान की बड़ी सेवा कर सकते हो और सेवा से तुम्हें भगवन् प्राप्ति हो सकती है।

तुम डॉक्टर या वैध हो तो रोगी को भगवान का स्वरूप समझ कर उसके लिये सेवा के भाव से ही उचित पारिश्रमिक लेकर औषधि की व्यवस्था करें लोभ वश रोगी को सताओ नहीं। गरीबों का सदा ध्यान रक्खो। तुम अपनी निःस्वार्थ सेवा से भगवान के बड़े प्यारे बन सकते हो और भगवान प्राप्ति कर सकते हो।

तुम मालिक हो तो नौकरों को सताओ मत, अभिमान वश अपने को बड़ा न समझो, अपने स्वाँग के अनुसार नौकरों से काम लो परन्तु मन ही मन उन्हें भगवान का स्वरूप समझ कर उनके हित रूपी सेवा करने की चेष्टा करते रहो। मन से किसी का तिरस्कार न करो। लोभवश किसी की न्याय आजीवन को न काटो। उनके भले में लगे रहो। इसी से तुम पर भगवान कृपा करेंगे और तुम्हें अपना परम पद प्रदान करेंगे।

इसी प्रकार और भी सब लोगों को अपने कर्मों द्वारा भगवान की निष्काम पूजा करनी चाहिये।

उपरोक्त तथ्यों से हम यह सार निकालते हैं कि भगवान की प्रसन्नता प्राप्ति के लिए किसी विशेष धन या ऐश्वर्य की आवश्यकता नहीं है बल्कि जो काम हम करते हैं, उसी को विवेकपूर्णता से किये जायें। लोभ वृत्ति उत्पन्न करके हम छल, कपट आदि को न अपनायें। अपने ग्राहकों या व्यवहार में आने वालों को भगवत् स्वरूप मानकर चलें। हम अपने काम को हीन न समझें। उसी में सुन्दरता लाने का प्रयत्न करें। इसी से हम उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं, मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, आनन्द के समुद्र में गोते लगा सकते हैं। सभी प्रकार की सिद्धियाँ उसके पैरों पर लौटती हैं।


विघ्नराज गणेशजी और उनकी उत्पत्ति

(श्री.सदाशिव दिनकर एम.ए)

गणेश जी का हिन्दू-धर्म में बड़ा ऊँचा स्थान है। प्रत्येक शुभ कार्य का आरम्भ करने के पूर्व उनका स्मरण कर लेना, उनकी पूजा करना आवश्यक माना गया है। इसका कारण यह है कि गणेश जी जिस प्रकार विघ्न-विनाशक है, उसी प्रकार उनको विघ्नेश्वर भी माना गया है। इसका आशय यह है कि यदि आरम्भ में ही गणेश जी की पूजा न की जायगी तो उस कार्य में वे विघ्न उपस्थित करेंगे, और यदि उनको प्रसन्न रखा जाएगा तो वे समस्त विघ्नों का परिहार करके कार्य को सिद्ध करने में सहायक बनेंगे।

कुछ भी हो, गणेश जी का स्थान देव-समाज में बड़े महत्व का है। उनका व्यक्तित्व भी अनोखा है। मनुष्य का शरीर, हाथी का सिर, लम्बा पेट, चूहे की सवारी सभी बातें निराली हैं। साधारण लोग तो इन बातों को कौतूहल की निगाह से देखते हैं, पर विद्वानों के मतानुसार ये बातें गणेश जी में पाये जाने वाले विशेष गुणों और शक्तियों के चिन्ह हैं। इन विषयों का विवेचन करते हुये श्री सम्पूर्णानंद जी ने कुछ वर्ष पूर्व “गणेश” नाम की एक पुस्तक लिखी थी जिसमें विविध पुराणों के आधार पर गणेश जी की उत्पत्ति और उनसे सम्बन्ध रखने वाली भिन्न-भिन्न कथाओं का उल्लेख करके उनके स्वरूप पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। उनमें से कुछ कथायें यहाँ दी जाती हैं।

पुराणों में गणेश जी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई प्रकार की कथायें कही गई हैं जिनसे उनके वास्तविक स्वरूप और महत्व पर प्रकाश पड़ता है। गणेश जी का एक मुख्य नाम विनायक भी है। इसके सम्बन्ध में “वाराह पुराण” में निम्न कथा दी गई है-

“एक बार देवताओं और तपस्वी ऋषियों के चित्त में इस विषय में चिन्ता उत्पन्न हुई कि बहुत से अवसरों पर सन्मार्गगामियों के कामों में बाधा उपस्थित हो जाती है और असद् गामियों के काम निर्विघ्न पूरे हो जाते है। इस विषय में बहुत विचार करने पर निश्चय किया गया कि रुद्र की शरण में जाने से इसका कोई उपाय मालूम पड़ सकता है। वहाँ पहुँच कर सबने देवाधिदेव शिव की स्तुति की और उनसे प्रार्थना की कि कोई ऐसी युक्ति कीजिये कि जो अकर्म करने वाले हैं उन्हीं के कार्यों में बाधा पड़ा करे। देवगण की प्रार्थना सुन कर महादेव जी ने उमा की ओर निर्निमेष नेत्रों से देखा। उसी समय रुद्र के मुख रूपी आकाश से एक परम सुन्दर तेजस्वी कुमार वहाँ प्रकट हो गया। उसमें परमेष्ठी (ब्रह्मा) के सब गुण विद्यमान थे और वह दूसरा रुद्र जैसा ही लगता था। उसके रूप को देख कर पार्वती जी को क्रोध आ गया और उन्होंने शाप दिया कि “है कुमार ! तू गजवक्त्र (हाथी के सिर वाला) प्रलम्ब जठर (लम्बे पेटवाला) और सर्पेरूपवीत (सांपों के जनेऊ वाला) हो जायगा। इस पर शंकर जी ने क्रोधित होकर जो अपने शरीर को धुना तो उनके रोमों से हाथी के सिर वाले, नीले भ्रंजन के से रंग वाले, अनेक शास्त्रों को धारण किये हुये इतने विनायक उत्पन्न हुये कि पृथ्वी क्षुब्ध हो उठी है, देवगण भी घबरा गये। तब ब्रह्मा जी ने आकाश में प्रकट होकर देवताओं को धैर्य धारण करने को कहा और महादेव जी से प्रार्थना कि “हे त्रिशूलधर, आपके ये सब विनायक उसके वश में रहे जो आपके मुख से पैदा हुआ है। आप प्रसन्न होकर इन सब को ऐसा ही वर दें।” तब महादेव ने अपने उस पुत्र से कहा कि “तुम्हारे अब पुत्र, गजास्व, गणेश और विनायक नाम होंगे। यह सब क्रूर दृष्टि प्रचण्ड विनायक तुम्हारे भृत्य होंगे। यज्ञादि कार्यों में तुम्हारी सबसे पहले पूजा होगी, अन्यथा तुम कार्य के सिद्ध होने में विघ्न उपस्थित कर दोगे। इसके अनन्तर देवगण ने गणेश की स्तुति की और शंकर ने उनका अभिषेक किया। विनायक का जन्म जिस तिथि को हुआ उसी को गणेश चतुर्थी कहते हैं।”

शिवपुराण की गणेश जन्म वाली यह कथा तो सर्वाधिक प्रसिद्ध है जिसमें कहा गया है कि पार्वती जी ने स्नान करके अपने शरीर के मैल से गणेश जी की रचना की थी और शंकर जी ने उसे काट डाला था। पर ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसको कुछ भिन्न रूप में लिखा गया है। उसके अनुसार “जब शिव पार्वती के विवाह को बहुत समय व्यतीत हो गया और उनके कोई संतान न हुई तो पार्वती जी ने श्री कृष्ण का व्रत किया और इससे उन्होंने गणेश को जन्म दिया। उस अवसर शनि देवता के सिवाय और सभी देवियाँ बालक को देखने आये। बहुत आग्रह करने पर शनि आये तो नीचा सिर करके खड़े रहे। पार्वती जी के पूछने पर उन्होंने बताया कि मुझे ऐसा शाप है कि जिस बालक को देखूँगा तो उसी का अनिष्ट होगा। पार्वती ने न माना। शनि के सिर उठाते ही बच्चे का सिर कट कर गिर गया। तब विष्णु ने एक हाथी का सिर काट कर जोड़ दिया, जिससे बालक पुनर्जीवित हो उठा। तब से उसे “गणपति” पद मिला।”

“सुप्रभेदागम” ग्रंथ में एक और कथा दी गई है कि “ शिव के सोमेश्वर लिंग की पूजा करने से बड़े बड़े पातकी भी स्वर्ग पहुँचने लगे। इससे देवगण घबरा गये। उन्होंने शंकर जी से कहा कि इन अनाधिकारियों का स्वर्ग आना रोकिये। महादेव ने कहा कि मैं तो कुछ नहीं कर सकता, पार्वती से कहो। पार्वती को देवों पर दया आ गई और उन्होंने विघ्नेश्वर की सृष्टि करने का निश्चय किया। वे उबटन के साथ अपने शरीर के मैल को मिला कर पहुँची, जहाँ मालिनी नाम की हाथी के से मुखवाली एक राक्षसी उस पदार्थ को खा गई। इससे उसे गर्भ रह गया और समय आने पर पाँच सूँड वाला लड़का पैदा हुआ। शंकर ने इसको अपना पुत्र मान लिया और पाँच सूँड को मिला कर एक सूँड कर दिया। यह लड़का गणपति हुआ। यह साधारणतः लोगों के कार्य में विघ्न डालता है इसलिये विघ्नेश्वर कहलाता है। परन्तु जो लोग इसकी पूजा करते हैं उनके मार्ग को निष्कंटक बना देता है, इसलिए “विघ्न हर” भी कहते है।”

इसी प्रकार पुराणों में गणेश जी के सम्बन्ध में बहुत प्रकार की कथायें दी गई हैं, जिनमें कुछ बातें मिलती हुई हैं और कुछ में अन्तर है। पर इन सबसे यह आशय निकलता है कि (1) गणेश जी स्वभावतः विघ्न कर्ता देवता हैं (2) उनको संतुष्ट करने से विघ्न दूर हो जाते हैं (3) किसी न किसी प्रकार पार्वती जी ने इनको जन्म दिया (4) शिवजी ने उनको अपना पुत्र मानकर गणों का स्वामी बनाया (5) आरम्भ में वे गज वदन नहीं थे, कहीं न कहीं से लाकर हाथी का मस्तक उन पर रखा गया।

इन्हीं तथ्यों को लेकर सर्वसाधारण में गणेशजी के सम्बन्ध में और भी बहुत सी कथाएं प्रचलित हो गई हैं जो गणेश जी के व्रत अथवा अन्य प्रसंगों पर कही जाती है पर इनका प्रचार प्रायः साधारण जनता और स्त्रियों में नहीं है। विद्वान लोग इन वर्णनों को रूपक मानकर इनका लोकोपकारी अर्थ करते हैं। उदाहरणार्थ श्री चम्पत राम जी ने अपने धर्म समन्वय सम्बन्धी ग्रंथ में लिखा है-

“गणेश जी के साथ का चूहा विवेचक, विभाजक, भेदकारक, विस्तारक, विश्लेषक, बुद्धि का चिन्ह है। गणेश जी का सिर कटना अहंकार का नाश होना है और हाथी का सिर लगाना संयोजक, समन्वयकारक, संश्लेषक बुद्धि का उदय होना है। ज्ञान और तम्मूलक व्यवहार के लिये सामान्य और विशेष दोनों परिचय आवश्यक है-विभाजक और समाहकारक दोनों प्रकार की बुद्धियाँ चाहिये, परन्तु प्रधानता समन्वय बुद्धि की ही है, इसलिये गजानन चूहों पर सवारी करते हैं। इस संश्लेषक बुद्धि के कारण ही गणेश जी युद्धिसागर माने जाते है। गणेश जी एक दन्तता उनकी अद्वैत प्रियता की सूचक है। उनके मोदक प्रिय होने का अर्थ है ‘मोद’ (आनन्द) देने वाला।”

इतिहास की खोज करने वाले विद्वानों का कहना है कि वेदों में गणेश जी का नाम कहीं पर नहीं आया है। जिन दो-एक मंत्रों में “गणपति” शब्द आया है वह बृहस्पति के लिये प्रयुक्त किया गया है। गणेश जी का जिक्र गुप्त-काल में बने पुराणों में ही पाया जाता है जिससे विदित होता है कि जब वैदिक धर्मावलम्बी ब्रह्मावर्त से आगे चल कर, इस देश के भीतरी भागों में प्रविष्ट हुये और वहाँ उनका आदि वासियों से संपर्क हुआ तो वे अपने देवताओं के साथ उनके भी कुछ देवताओं को पूजने लग गये और धीरे-धीरे उनको अपना ही बना लिया। गणेश जी ऐसे देवताओं में सर्व प्रमुख है।

कुछ भी हो गणेश जी को मान्यता इस समय देश व्यापी है। जब कि वैदिक कालीन अनेक बड़े-बड़े देवताओं जैसे वरुण, मित्र, अर्यमा, अश्विनीकुमार आदि का इस समय पता भी नहीं है, गणेश जी का सम्मान समस्त हिंदू जाति में सर्वाधिक है। किसी भी देवता की पूजा क्यों न हो, कोई भी धार्मिक संस्कार क्यों न हो, विघ्नविनाशक के रूप में गणेश जी की पूजा सबसे पहले की जानी अनिवार्य है। इतना ही नहीं उन्होंने, बौद्ध और जैन धर्मावलम्बियों पर भी अपना प्रभाव विस्तृत किया और उनकी लोकप्रियता को देखकर उन धर्मों के शास्त्रों में भी उनका उल्लेख किया गया। जैनियों में विवाह के अवसर पर “विनायक-मंत्र” की पूजा की जाती है। उस अवसर पर जो श्लोक पढ़े जाते है वे विचारणीय हैं-

गणा नाँ मुनीनामधीशस्व्वतस्ते

गणेशाख्यया में भवन्तं स्तुवन्ति।

सदा विघ्न सन्दोह शान्तिर्जनानाँ

करे संलुठत्यायत श्रेयसा नाम॥

कलेः प्रभावात्कलुषाशयस्व

जनेषु मिथ्यामद वासिते पु।

प्रवर्तितोऽन्यो गणराजनाम्ना,

लम्बोदरो दन्तिमुखो गणेशः॥

य तस्त्वमेवासि विनायको मे

दृष्टेष्टयोगानवरुद्धभावः।

त्वन्नाम मात्रेण परा भवन्ति

विघ्नारयस्तर्हि किमत्र चित्रम्॥

अर्थात् - (हे जिनेन्द्र) आप मुनियों के गणों के अधीश हैं इसलिये जो लोग आपकी “गणेश” के नाम से स्तुति करते हैं, उनके विघ्न शान्त हो जाते हैं और कल्याण का भण्डार उनके हाथ में आता है। मलिन कलिकाल के प्रभाव से लोगों में लम्बोदर और द्रस्तिमुख के रूप में दूसरे ही गणराज का प्रचार हो गया है।

क्योंकि आप की पूर्ण रूप से विनायक हैं, इस लिये इसमें आश्चर्य ही क्या है कि आपके नाम मात्र से विघ्न रूप शत्रु हार जाते है।

बौद्ध धर्म में “रुधिन-माला” नाम का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसमें अनेक देव-देवियों को सिद्ध करने के मंत्र लिखे हैं। उनमें एक मंत्र गणेश जी का भी है जो ज्यों का त्यों नीचे दिया जाता है।

“ॐ नमः श्रीगणपतये। ॐ आः गः शान्ति कुरु ष्ब माँ ही भूँ हुँ, स्वाहा, हृदयः। ॐ राग सिद्धि सर्व्वार्थ में प्रसादय प्रसादय हुँ ज ज स्वाहा, उप हृदहः। ॐ आः गः स्वाहा, ॐ वरदकराय स्वाहा, ॐ वक्तैक दष्ट्रै विघ्नेश हुँ फट स्वाहा, ॐ गणपत्यै स्वाहा, ॐ शान्तिंकटि भ्रुँ हारिणेश डाकिनि हुँ फ ट स्वाहा, ॐ जः मेसि हुँ कुरु वँ ॐ अन्ये होः ज ज स्वाहा।”

इस मंत्र के आरम्भ में तो पुरुष रूपी गणपति की ओर संकेत किया गया है और अंतिम भाग में स्त्री रूपी गणपति शक्ति का उल्लेख है। इस मंत्र के साथ “गणपति-भावना” (ध्यान) भी दिया हुआ है। उसमें गणपति का स्वरूप इस प्रकार वर्णन किया गया है-

“भगवन्त गणपति रक्तवर्ण जटामुकुटकिरीटिनं सर्वाभरण भूषितं द्वादशभुजं लम्बोदरैक वदनं अर्द्धपर्य्यंकताण्डवं त्रिनेत्रमप्पेक दन्तं सत्य भुजेषुकुठार शरअंकुशवज्रषंगशलं च वाम भुजेषु भूवल चाप खटवाँग अष्टकूपाल शुषूमाँस कपाल फठकं च रक्त पद्मे भूषकोपस्थितमिति।”

अर्थात्- “भगवान गणपति का, जो रक्तवर्ण, जटा मुकुट किरीट धारी, समस्त अभरण युक्त, बारह भुजा वाले, लम्बोदर, एक मुख, अर्द्धपर्त्वंकताण्डव मुद्रा से बैठे, तीन नेत्र वाले, एक दंत, दाहिने हाथों में कुठार, तीर या खड्ग और शूलधारी और बायें हाथों में मूसल, धनुष, खटवाउंग रक्त या सूखे माँस का पात्र और फट धारी और लाल कमल पर मूषक के ऊपर स्थित हैं, (ध्यान करें)।”

बौद्ध धर्म के साथ गणेश जी की मूर्ति चीन, जापा, वर्मा आदि देशों में भी पहुँच गई और वहाँ अनेक मन्दिरों तथा प्राचीन भग्नावशेषों में गणेश जी की मूर्तियाँ मिलती हैं। इनमें भारतीय मूर्तियों से कुछ अंतर दिखलाई पड़ता है पर गणेश जी की सूँड, उनकी सवारी का मूषक, उनके हाथों में लिये अस्त्र शस्त्र सब पूर्णतः मिलते-जुलते हैं। इस प्रकार वैदिक देवताओं से भिन्न होते हुये भी गणेश जी का प्रभाव अन्य समस्त देवताओं की अपेक्षा विस्तृत भूभाग में फैला हुआ है और वे ही सबसे अधिक पूजनीय माने जाते हैं।


श्री अरविन्द घोष की पूर्ण योग साधना

(श्री जीवनदत्त पण्ड्या एम. ए. पी. एच. डी.)

भारतीय साधन प्रणाली के कितने ही अंग हैं, जिनमें योग-मार्ग बहुत ऊंचा माना गया है। भक्ति, पूजा, उपासना, भजन, तप आदि विधियों का तो साधारण श्रेणी के मनुष्य भी पालन कर सकते हैं, पर योग की आरम्भिक साधना भी काफी कठिन मानी जाती है। उसे वे ही लोग कर सकते हैं जिनमें आध्यात्मिकता का कुछ अंश है और त्याग और तपस्या में जिनको अनुराग है।

योग का वास्तविक आशय है जीव का भगवान के साथ एकत्व प्राप्त करने की चेष्टा करना। अथवा यों कह सकते हैं कि आत्मा और परमात्मा का उपयोग ही योग-साधना का सर्वोच्च लक्ष्य है। इसके लिये विभिन्न महात्माओं ने अनेक प्रकार की योग-शक्तियों का आविष्कार किया है, जो आज कल हमारे देश में प्रचलित है। इनमें हठयोग, राजयोग, शक्तियोग, कर्मयोग और ज्ञानयोग का नाम अधिक प्रसिद्ध है। जपयोग और क्षव योग को भी महत्व पूर्ण माना गया है। पर इन समस्त योगों की साधना में मनुष्य को अपने साधारण रहन-सहन में विशेष परिवर्तन करना पड़ता है और जीवन के कुछ अंगों का दमन और कुछ का अधिकाधिक विकास करना पड़ता है। उदाहरण के लिये हठयोग की साधना में षट्कर्म जैसे प्रकृति के साधारण नियमों से भिन्न और कठिन विधियों से काम लेना पड़ता है और आसन-प्राणायाम आदि का विशेष रूप से अभ्यास करना पड़ता है। राजयोग में भी लगातार घण्टों तक ध्यान करते रहना और साँसारिक व्यवहारों से अपने को बहुत कुछ हटा लेना आवश्यक होता है। इन सब बातों का साराँश यही है कि अब तक योग के जो स्वरूप लोगों में प्रचलित हैं उसे साधारण जीवन यापन से बहुत भिन्न समझा जाता है, और जो लोग उस मार्ग को ग्रहण करते हैं वे प्रायः गृहस्थ जीवन का त्याग कर देते हैं। इससे अब कुछ नवीन संत पुरुषों ने योग की ऐसी विधियों का प्रचार आरम्भ किया है जिनकी साधना साँसारिक-जीवन का पालन करते हुये ही भली प्रकार से की जा सके और जिससे काफी ऊँचे आध्यात्मिक दर्जे पर भी पहुँचा जा सके। ऐसे योग-प्रचारकों में श्री अरविन्द घोष का नाम बहुत अधिक प्रसिद्ध है, उन्होंने वर्षों के अभ्यास और अध्ययन से अपने शिष्यों को जिस “पूर्ण योग“ का उपदेश दिया उससे उपर्युक्त उद्देश्य भली प्रकार पूरा हो जाता है। इस सम्बन्ध में इस योग का अभ्यास करने वाले एक लेखक का कथन है- “पूर्ण योग वह सर्वांग साधन प्रणाली है जिससे साँसारिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन के बीच सर्व विजयी सामंजस्य स्थापित हो सके, अर्थात् जीवन को बिना खोये भगवान को प्राप्त करना, मानव-जीवन के भीतर भगवान और प्रकृति का पुनर्मिलन साधित करना। इसमें “पूर्ण” शब्द ही यह सूचित करता है कि यह योग मनुष्य को पूर्णत्व प्राप्त कराता है। अर्थात् यह आत्मा के भीतर जीवन को पूर्णत्व प्रदान करता है, सार्थक बनाता है। यह जीवन के किसी भी भाग को, चाहे वह शरीर, प्राण या मन किसी से सम्बन्ध रखने वाला क्यों न हो, त्याग नहीं करता। इसका उद्देश्य यह है कि मनुष्य के अंदर निहित भगवत् सत्ता के दृढ़ आधार के ऊपर समाज का एक महान् भवन निर्मित किया जाय। वेदान्त सिद्धान्त पर आधार रखने वाले योगों का उद्देश्य होता है आत्मा के अंदर जीवन को लय कर देना, पर “पूर्ण योग“ की विशेषता यह है कि वह आत्मा के भीतर से जीवन को प्राप्त कराता है। पुराने ढंग से सभी योग प्रायः “आत्म केन्द्रित” थे, साँसारिक जीवन से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था, वे केवल परलोक से ही सम्बन्ध रखते थे। वे इस गतिशील जगत को स्वप्न, माया और मृगमरीचिका समझ कर इससे दूर ही रहे, और निराकार ब्रह्म में अपनी आत्मा की मुक्ति प्राप्त करने की चेष्टा में ही लगे रहे। उन्होंने समाधि को ही सबसे अधिक महत्व प्रदान किया, और मन को एक दम स्थिर बनाकर अथवा यों कहे कि मारकर ही शारीरिक चेतना को शाँत (निस्तब्ध) बनाने की चेष्टा है।

“पूर्ण योग“ भी आत्मा और परमात्मा में भेद की भावना को तो मिटाना चाहता है, परन्तु वह केवल अपनी आत्मा की मुक्ति के लिये ही प्रयास नहीं करता, वरन् विश्वात्मा भगवान के अंदर समस्त मानव-समाज को पूर्णत्व प्रदान कराना चाहता है। वह अपनी स्वार्थ युक्त मुक्ति के लिये नहीं, वरन् मानवता के भीतर भगवान की अभिव्यक्ति के लिये चेष्टा करता है। यह जीवन के अंदर आदर्श और वास्तविकता को एक बना देना चाहता है। संक्षेप में यह कह सकते हैं कि यह जीवन को भगवानमय दिव्य बनाता है और पृथ्वी को स्वर्ग (दिव्य धाम) में रूपांतरित करता है।

जब हम पूर्ण योग की साधना प्रणाली पर विचार करते हैं तो हमको निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक जान पड़ता है - (1) शुद्ध मन से आत्मोत्सर्ग की भावना, (2) अपनी सत्ता के प्रत्येक अंश का सच्चाई के साथ पूर्ण समर्पण, (3) भगवान के साथ सचेतन एकता, (4) उनके रूपांतरकारी स्पर्श को प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करना, (5) भगवान ने जो कर्म हमारे लिये निर्दिष्ट किया है उसे दृढ़ विश्वास रखकर अंगीकार करना, (6) भगवान की इच्छा के सामने अपने सब कर्मों और सर्वस्व को उत्सर्ग कर देना, (7) अहंकार, अभिमान, द्वेष, कामना, वासना आदि प्रकृति के समस्त दोषों को त्याग कर भगवन् द्वारा किये जाने वाले रूपांतर को तैयार होना, (8) प्राणों की शुद्धि (9) हृदय का प्रेम और भक्तिभाव (10) मन की प्रकाशमयी एकाग्रता (11) प्राणों का सौंदर्य और सामंजस्य (12) जिस परिस्थिति में भगवत् इच्छा ने रखा है उसके साथ प्रत्येक कार्य में सामंजस्य। योग का अर्थ यही है कि आत्मा को पहिचाना जाय, परिपूर्ण बनाया जाय, आत्मा का विस्तार किया जाय, और विश्वात्मा भगवान की भीतर आत्मा को विकसित बनाया जाय। अपने आप को भगवान की इच्छा के सम्मुख सदा सुख और नमनशील रखो। तुम यह समझ लो भगवान की शक्ति ही तुमसे काम करा रही है, तुम उसका एक यंत्र हो और उसकी इच्छानुसार कार्य करना तुम्हारा कर्तव्य है। कर्म फल की कामना का त्याग करो। यह विश्वास करके कि भगवान समस्त भूतों (पदार्थों) में आत्मा के रूप में व्याप्त है और ज्ञान पूर्वक सबसे प्रेम करो। ऐसा करने से भगवान की शक्ति तुमको “अति मानस स्तर” (मनुष्य की वर्तमान अवस्था से ऊँचा आत्म शक्तियुक्त दर्जा) पर पहुँचा देगी। वहाँ पहुँचकर ही तुम आत्मा और जड़ तत्व को विश्वात्मिका सत्ता के अंदर एक साथ मिल सकते हो।

परन्तु एक विषय में तुमको सदा सावधान रहना होगा कि योग का उद्देश्य तुम्हारी व्यक्तिगत मुक्ति नहीं है, वरन् इसका उद्देश्य मनुष्य मात्र के अंदर भगवान की अभिव्यक्ति करना है। तुम तो केवल उसके एक केन्द्र - एक यंत्र हो।


गायत्री जप से संसार का अभ्युदय

अनेक बार ऐसा देखने में आता है कि एक मनुष्य किसी मंत्र की उपासना करता है, और मन में ऐसा विचार करता है कि इसे किसी को बतलाना ही चाहिये। ऐसा व्यक्ति न तो अपना भला कर सकता है और न दूसरों का। क्योंकि ऐसे व्यवहार से मन में ईर्ष्या का भाव उत्पन्न होता है और इसके कारण मंत्र का गौरव और प्रभाव अपने आप समाप्त हो जाता है। यह सत्य है कि बिना अधिकार के मंत्र नहीं दिया जा सकता, पर अधिकारी जान कर भी वर्षा वश मंत्र देने में आनाकानी करना ठीक नहीं। मंत्र का साधन करने वाला और दूसरे से साधन कराने वाला उदार चित्त का, पूर्ण श्रद्धा वाला होना चाहिये। व्यक्तिगत अभ्युदय की इच्छा रखते हुये यह भी समझ रखना चाहिये कि समष्टि में ही व्यक्ति समाया हुआ है। ऐसा समझने वाला अपने साथ संसार का भी भला कर सकता है।

गायत्री मंत्र का जप यज्ञोपवीत धारण करने वाला प्रत्येक थोड़े बहुत अंशों में करता ही है। पर इस मंत्र में क्या बतलाया गया है? इसका प्रयोग बहुत कम लोग करते हैं। आजकल तो प्रत्येक गुरु यज्ञोपवीत के साथ गायत्री मंत्र देता है और कह देता है कि अब बिना नागा जप करते रहना। दुख की बात है कि अधिकाँश में गुरुओं को भी मंत्र का अर्थ नहीं आता। इसका नतीजा वह होता है कि मंत्र दीक्षा लेने और यज्ञोपवीत धारण करने वाला व्यक्ति यह तो नहीं समझता कि “यह हमारा धर्म है अतः श्रद्धापूर्वक इसका पालन करना चाहिये।” इसके विपरीत वह यह सोचता है कि “यह हमारी परम्परा है।” इसलिये यज्ञोपवीत और दीक्षा से सैकड़ों रुपया खर्च कर देने पर भी, वे थोड़े समय बाद उसे भुला देते है।

इस प्रकार का जप, जप नहीं कहलाता। वह तो संस्कृत की एक पंक्ति को पढ़ लेना मात्र है। आज के अर्थ युग में मनुष्य केवल द्रव्य के लिये जप करने या कराने की अभिलाषा करता है। वह सोचता है कि मैं ऐसा कौन सा जप करूं कि जिससे लक्ष्मीजी मनमाना धन दे दें। पर वह यह नहीं सोचता कि समस्त जपों के मूल में गायत्री जप ही मौजूद रहता है। कोई भी अनुष्ठान करना हो प्रायश्चित में पहले गायत्री माता का जप ही किया जाता है। इसी से प्रकट होता है कि गायत्री का गौरव सर्वाधिक है। आश्चर्य है कि इस तथ्य को जानने पर भी हम द्रव्य के लिये इधर-उधर मारे-मारे फिरते हैं। चाहे किसी ने वेदाभ्यास न किया हो, शास्त्र और पुराण न बाँचे हों, तो भी यदि गायत्री जप में तुम्हारी सच्ची श्रद्धा होगी, तो वह गायत्री का जप सब वस्तुओं को प्राप्त करा देगा। महर्षि व्यासजी ने कहा है-

यथा मधु ये पुष्पेभ्यो घृतं दुग्घाद रसात् पयः।

एवं हि सर्व वेदानाँ गायत्री सार मुच्यते॥

“जिस प्रकार पुष्पों का सार शहद, दूध का घी, और सब रसों का सार दूध है वैसे ही सब वेदों का सार गायत्री है।”

कहा जाता है कि श्री कृष्ण के लिये अर्जुन में ऐसी तल्लीनता का भाव था कि जब अर्जुन सो जाता तो उसके साँस में भी श्री कृष्ण का शब्द सुनाई पड़ता था। इसी प्रकार गायत्री का जप भी ऐसे होना चाहिये कि रोम-रोम और श्वाँस-श्वाँस में उसी की रट लगी रहे। जिस प्रकार औषधि शारीरिक व्याधि को दूर करती है वैसे ही इस प्रकार किया हुआ गायत्री जप समस्त मानसिक और शारीरिक व्याधियों का दूर करने वाला होता है। पर जब तक ऐसा न होने लगे तब तक हमें धैर्यपूर्वक उसमें लगा रहना चाहिये।

जप करने वाला व्यक्ति धैर्यवान् न हो तो उसका चित्त एकाग्र नहीं हो सकता, और जब तक एकाग्रता न हो तब तक जप जैसा होना चाहिये वैसा नहीं हो पाता। संकटों के दुर्ग में फंसे हुये जगत के तरने का उपाय गायत्री मंत्र ही है। जब तक इसका अनुभव नहीं किया जाता तब तक इसके अस्तित्व का पता भी नहीं चलता। पर यदि हम गायत्री के किसी सच्चे भक्त का उपदेश ग्रहण कर लें, तो हम भी इस मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं।

गायत्री मंत्र यह एक व्यक्ति का नहीं पर समष्टि (समाज) के कल्याण का साधन करने वाला मंत्र है। इसलिये सामुदायिक हित का ध्यान रखकर इस मंत्र का जप करने से जितना लाभ हो सकता है उतना लाभ व्यक्तिगत हित की भावना रखने से नहीं हो सकता। इस जप का महत्व समझ लेने के बाद यदि हम अन्य मनुष्यों को इसके करने की प्रेरणा करे तो उनके जप का कुछ फल भी हमको प्राप्त होता है। अगर बहुत से लोग इस तरफ ध्यान दें और इस प्रकार एक दूसरे को जप करने की प्रेरणा देते चले जाये तो एक दिन समस्त संसार में धर्म का अभ्युदय हो सकता है।


एक महात्मा की ‘सोऽहं’ साधना

(श्री ब्रह्मचार आत्मानंद द्विवेदी)

महात्मा फूलसिंह स्यालकोट (पंजाब) के मुँडे की ग्राम के निवासी थे। वे सदा “सोऽहं” का जप करते रहते और इसको ‘लेखा’ के नाम से पुकारते। अगर कोई उनसे प्रश्न करता कि “बाबा जी क्या कर रहे हो” तो ये तुरन्त यही उत्तर देते कि ‘लेखा (अर्थात् हिसाब) कर रहा हूँ।

महात्मा जी की अवस्था जिस समय चालीस वर्ष को हुई तो उनके भाई-बंधु उनकी बेकारी को देखकर असन्तुष्ट हो गये। वे सोचने लगे कि यह कोई काम नहीं करता खा-पीकर चुपचाप, बैठा रहता है। इसलिए उन्होंने कहा- “तुम दिन भर बेकार बैठे रहते हो, और कुछ न हो तो गाय-भैंसों को चरने के लिये ले जाया करो।” बाबा जी का स्वभाव था कि जब कोई उनसे किसी काम के लिए कहता तो दो बार तो इनकार करते, पर तीसरी बार कहने पर उसे स्वीकार कर लेते। इसलिए जब उनके भाइयों ने तीसरी बार यह बात कही तो उन्होंने स्वीकार कर लिया। उस दिन से वे गाय-भैंसों को चराने के लिए ग्राम से बाहर ले जाने लगे। वे जहाँ कहीं मैदान देखते वहीं ठहर जाते। जब वे चारों तरफ किसानों की हरी-भरी खेती देखते तो गायों को बुलाकर और उनकी पीठ पर हाथ फेर कर कहते-”बेटा, किसी की खेती को चरने मत जाना। क्योंकि इसमें मनुष्यों के हिस्से का भी अनाज है। मनुष्य भूखे मरें ऐसा काम मत करना। जब किसान अपने हिस्से का अनाज निकाल लेगा तब भूसा चारा तुमको ही मिलेगा।

फूलसिंह जी जब गायों को यह बात सिखाते तो सब गायें खड़ी होकर उनकी बात सुनती रहती। महात्मा जी तो यह उपदेश देकर समाधि में लीन हो जाने और गाय-भैंसें मैदान में घास चरने लगतीं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि वे कभी किसी के खेत में घुसी हों। महात्मा जी उनको दिन भर चरने देते और शाम को हाँक कर घर ले आते। गाँवों के और भी बहुत से लड़के उसी मैदान में अपने पशुओं को चराने लाते थे। वे दोपहर के समय महात्मा जी से कहते “बाबा, आप हमारे ढोरों को देखते रहना हम घर जा कर रोटी खा आवें और आपका भोजन भी यहीं ले आवें।” बाबा जी कहते- “अच्छा बेटा, जाओ मैं ढोरों को देखता रहूँगा।” लड़के खूब निश्चिन्त होकर घर चले जाते, क्योंकि वे जानते थे कि बाबा जी के सामने ढोर किसी तरह की गड़बड़ी नहीं करेंगे। यह बराबर देखने में आता था कि जो पशु लड़ने वाले होते थे वे भी उनकी बात सुनकर सीधे हो जाते थे और अपना स्वभाव छोड़कर सब के साध मिलकर घास चरने लगते थे। जब ग्राम के लोगों को इस बात का पता लगा तो वे अपने उपद्रवी स्वभाव के पशुओं को महात्मा जी के पास लाकर कहते- “बाबा जी मैं अपनी इस उपद्रवी गाय भैंस को यहाँ छोड़े जाता हूँ, इसकी देखभाल करते रहना।” बाबा जी सब की बात स्वीकार कर लेते और उनके पास आकर वे पशु सचमुच सुधर जाते, तथा शाँति कि साथ चरते रहते। जब इन सब बातों की खबर घर के लोगों को लगी तो उन्होंने समझ लिया कि बाबा जी अवश्य ही सिद्ध पुरुष हैं और तब से उन्होंने गाय-भैंस चराने के काम से उनको मुक्त कर दिया।

फूलसिंह जी का स्वभाव ऐसा था कि काम से उनकी हानि होती हो उसे भी लाभदायक ही मान लेते थे। सन 1904-5 में पंजाब के प्रसिद्ध उपदेशक पं. दौलतराम गुजरानवाला में राय कर्मचन्दजी जज के यहाँ कथा बाँचने गये। वहाँ उन्होंने फूलसिंह जी की चर्चा की। गुजरान वाला से उनका ग्राम दस बारह कोस दूर था। जज साहब ने बाबाजी को बुलाने के लिए आदमी भेजा। बाबाजी वहाँ पर पधारे और लगभग 15 दिन रहे। उसी अवसर पर वहाँ होशियारपुर का मुसलमान हकीम आया जो आँखों का इलाज करता था। उसने राय साहब से कहा कि “आप अपनी आँखों की दवा करालें।” पर उन्होंने इन्कार कर दिया। उसने देखा कि बाबाजी भी वृद्ध हैं उनसे पूछ लिया जाए। अगर वे राजी हो जायेंगे तो यहाँ से खाली हाथ लौटना नहीं पड़ेगा। बार-बार पूछने पर बाजी ने अपने स्वभाव के अनुसार ‘हाँ’ कह दिया। पहले तो उन्होंने कहा कि मेरी आँखें ठीक हैं और दवा की कोई जरूरत नहीं जान पड़ती। पर हकीम ने कहा कि आँख में फूली है वह ठीक हो जाएगी। ऐसा कह कर उस बेवकूफ ने आँख में नश्तर लगा दिया जिससे और सुधरने के बजाय और भी बिगड़ गई और अन्त समय तक उसमें से पानी बहता रहा। जब इस बात की खबर राय साहब को लगी तो उन्होंने उस हकीम को पकड़वा मँगाया और कहा कि “इस हकीम को अब कैदखाने में रहना पड़ेगा। इसने आपकी आँख खराब कर दी मैं अब इसकी जिन्दगी खराब कर दूँगा।” पर बाबाजी ने कहा- “नहीं रायसाहब, ऐसा मत करना। उसने तो भले करने के लिए नश्तर लगाया था, पर मेरे दुर्भाग्य से आँख बिगड़ गई। इसमें इसका क्या अपराध है?” रायसाहब ने कहा- “नहीं बाबाजी, यह दुष्ट सब जगह अब भी अपने हाथ की प्रशंसा करता फिरता है।” फिर भी बाबा ने उसे छोड़ देने का आग्रह किया और वहाँ से छुटकारा पाते ही वह जान बचाकर अपने घर भाग गया।

मुँडे की ग्राम का पटवारी आर्य समाजी था। और बाबाजी का बड़ा भक्त भी था। एक बार वह बाबाजी को गुरुकुल के उत्सव में ले गया। उसने वहाँ ले जाकर उसको जिस स्थान पर बैठा दिया वे अंत तक वहीं बैठे रहे। पटवारी उत्सव में शामिल होकर उनके खाने पीने की बात भी भूल गया। जब एक दो दिन बाद उसे याद आया तो इनके पास आकर कहा- “बाबाजी, मैं तो बहुत अधिक कामों में फंस कर आपकी याद ही भूल गया।” बाबाजी ने कहा- “बेटा, जाओ अपना काम करो मैं तो आनन्द में हूँ, मुझे भूख-प्यास कुछ नहीं लगी। तुम उत्सव का काम करो।” बात यह थी कि वे सदैव अन्तर्मुख होकर जप में ही लगे रहते थे। बाहर की घटनाओं और शारीरिक भूख-प्यास की उन्हें खबर ही नहीं होती थी।

अपनी युवावस्था में वे एक बार जालन्धर के तलवंडी ग्राम को गये थे। उस समय वहाँ रेल नहीं चली थी और वहाँ से उनका ग्राम 125 मील था। जब वे घर को रवाना हुये तो थोड़ी दूर चलने पर उनको प्यास लगी। सड़क पर चलते-चलते जब उनको प्यास का ख्याल आया तो सोचा कि अगले गाँव में पी लेंगे। पर जप करने की धुन में उनको अगले ग्राम का पता ही नहीं लगा। इसी प्रकार एक-एक करके अनेक ग्राम निकल गये और जप में ध्यान लगा रहने से उनको पानी पीने का मौका ही नहीं मिला और वे घर तक पहुँच गये।

सुनने में यह बात असंभव सी जान पड़ती है कि मनुष्य बिना पानी पिये इतने फासले तक चला जाय। पर एक तो बाबाजी की आत्मा ब्रह्ममय हो रही थी जिस पर प्राकृतिक शक्तियों का प्रभाव बहुत कम पड़ता है और दूसरे बाबाजी बालब्रह्मचारी थे। एक बार उन्होंने सुप्रसिद्ध पं गणपति शर्मा जी से ब्रह्मचर्य पर बात करते हुये कहा था कि “मैंने आज तक वीर्य को देखा ही नहीं कि कैसा होता है।” इस अखंड ब्रह्मचर्य के प्रभाव से वे 128 वर्ष की आयु तक जीवित रहे और अंतिम समय तक उनकी इन्द्रियाँ ऐसी सतेज रही कि युवक भी चलने फिरने में उनकी बराबरी नहीं कर सकते थे। 120 वर्ष की आयु में उनकी दाढ़ी और मूँछ के सफेद बाल पुनः काले हो गये थे, नये दाँत फिर से आने लगे थे और शरीर की झुर्रियाँ मिटकर देह चर्म फिर से चमकदार बन गया था वे दिन रात में कभी नहीं सोते थे, सदैव उनका “सोऽहं” जप चलता ही रहता था। इसी के प्रभाव से 128 वर्ष पूर्ण निरोग जीवन बिताकर सबको पहले से सूचना देकर बैठे-बैठे परम को चले गये।

जप की शक्ति बहुत अधिक है, पर वह उसी अवस्था में प्रभावशाली होता है जब कि मनुष्य उसे अन्तरात्मा से करें और उसमें अपने को भूल जाय ऐसा ही जप करने वाला दैव शक्ति प्राप्त करके उसके द्वारा अपना और दूसरों का कल्याण कर सकता है।


Quotation

ईश्वर का भक्त अपने ईश्वर के लिये सब सुखों तथा सब वस्तुओं का परित्याग कर देता है। जैसे कि चींटी चीनी के ढेर में मर जाती है, परन्तु पीछे नहीं लौटती है।

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जो प्रलोभनों के बीच में रह कर मन को वश में करके पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है, वही सच्चा शूरमा है।

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जिस तरह एक भिखारी एक हाथ से सितार एक हाथ से ढोलक साथ ही मुँह से गाता जाता है, उसी तरह संसारी जीवों तुम भी साँसारिक कर्म करो, परन्तु ईश्वर के नाम को न भूल कर उसका भी ध्यान करते रहो।

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कुतुबनुमा की सुई हमेशा उत्तर की ओर रहती है, इसी से समुद्र में जहाजों को अड़चन नहीं पहुँचती। इसी तरह जिसका ध्यान ईश्वर की तरफ है, वह संसार रूपी समुद्र में नहीं मटक सकता है।

-स्वामी रामकृष्ण परमहंस


हम भारतीय संस्कृति के आदर्शों को न भूलें

(श्री मोहनचन्द्र पारीक)

किसी देश, जाति अथवा समाज की संस्कृति से अभिप्रायः उन नैतिक आदर्शों से है जिन पर उनका जीवन अवलम्बित होता है। संस्कृति के आदर्श यद्यपि पुरुषों के धार्मिक विश्वासों, विचारों एवं भावनाओं में अन्तर्निहित रहते हैं तथापि बाह्य जीवन में भी उनकी अभिव्यक्ति दृष्टि गोचर होती है। किसी सम्प्रदाय के मनुष्यों के आचार-विचार, रीति-नीति, वेश-भूषा, रहन-सहन तथा खान-पान को देखकर उसकी सभ्यता का आसानी से पता चल जाता है। जातीय जीवन में संस्कृति के आदर्शों की अमिट छाप रहती है। भारतीय साहित्य का अवलोकन करने से प्रतीत होता है कि भारतवासियों के विचारों में आत्मवाद एवं धार्मिक भावनाओं का प्राबल्य रहा है। हिन्दुओं के जातीय जीवन में भी इसके लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं।

भारतीय संस्कृति में इसके मौलिक तत्व क्या हैं? वे कौन से स्त्रोत हैं जिनसे यह अनुप्राणित हैं?

भारतीय संस्कृति ईश्वर और धर्म में पूर्ण आस्था रखती है। ईश्वर सर्वव्यापक है और उसको धर्माचरण द्वारा प्रसन्न किया जा सकता है। धर्म के आचरण से ऐहिक और पारलौकिक कल्याण होता है। धर्म का आधार श्रद्धा और विश्वास है। कामना रहित शुभ कर्म करने से अन्तःकरण शुद्ध होता है। इससे ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान ही जीवन मुक्ति का साधन है। यही जीवन का चरम लक्ष्य है। जो संसार के समस्त प्राणियों को आत्म स्वरूप समझता है तथा जो समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहता है, वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। इस स्थिति के प्राप्त करने के लिये ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ होना पड़ता है।

सदाचार एवं सेवा का भारतीय संस्कृति में महान आदर है। सदाचार के अंतर्गत सरलता स्वाभाविकता, सुशीलता, निष्कपटता, सत्यता आदि अनेक गुणों का समावेश होता है। “आचार” परमो धर्मः कहकर ऋषियों ने आचार को परम धर्म का लक्षण बताया है। चाहे सर्वस्व नष्ट हो जाय परन्तु आचार की रक्षा करनी चाहिये क्योंकि सदाचार में ही मानवता, प्रतिष्ठित है। स्नेह सहानुभूति तथा भूत दया सदाचार के ही अंग हैं। भारतवर्ष में स्वार्थ के स्थान पर सदैव परमार्थ को ही आदर दिया है। परोपकार में ही जीवन की सार्थकता मानी गई है। यह सेवा की भावना केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं है, वरन् ‘सर्वभूत हितोरताः’ अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियों की भलाई में इसका पर्यवसान है। भगवान राम और कृष्ण का जीवन सदाचार और सेवा से ओत-प्रोत था।

भारतीय संस्कृति में त्याग एवं बलिदान की महिमा विशद् रूप से वर्णन की गई है। धर्म का पालन करने में चाहे प्राणोत्सर्ग करना पड़े, परन्तु धर्म का पालन करना चाहिये। इस प्रकार प्राणार्पण करने से सद्गति होती है। इस प्रकार के बलिदानी अक्षय कीर्ति को छोड़ जाते हैं। देवताओं के प्रार्थना करने पर दधीचि ने आत्म त्याग कर दिया था। गुरु गोविन्द सिंह के बच्चों ने धर्मार्थ आत्म बलिदान कर दिया था। प्रेम और शान्ति के निमित्त वर्तमानकाल में महात्मा गाँधी बलिदान हो गये। भारतीय इतिहास के अतिरिक्त बलिदान की ऐसी अमर गाथायें क्या अन्यत्र देखने को मिल सकती हैं। स्वधर्म पालन के हेतु जो सहर्ष प्राण विसर्जन कर सके, वही सच्चा बलिदानी है।

भारतीय संस्कृति सत्य और अहिंसा पर आधारित है। जिसका सत्य में अटूट विश्वास हो, जो पक्का अहिंसावादी हो, वही सच्चा भारतीय है। जिसके मन में सच्चे विचार आते हों, जो सत्य भाषण करता हो और जिसके व्यवहार में सत्यता हो, जिसका भीतर बाहर एक सा हो, वही भारतीय संस्कृति का सच्चा अनुयायी है। जो सम्पूर्ण प्राणियों को ‘आत्मवत् देखता हो, दीन दुखियों के प्रति जिसके हृदय में क्षमा का समुद्र उमड़ता है, जिसकी मानव मात्र के लिये सच्ची सहानुभूति हो वही वास्तव में भारतीय संस्कृति में प्रतिष्ठित है। सत्यवादी हरिश्चंद्र, महाराज युधिष्ठिर महावीर स्वामी गौतमबुद्ध महात्मा गाँधी इस अर्थ में भारतीय संस्कृति के दीप्तिमान नक्षत्र हैं।

अतिथि सत्कार और शरणागत वत्सलता भारतीय संस्कृति की अन्यतम विशेषतायें हैं। किसी वर्ण का अतिथि क्यों न हो, जब गृहस्थ के द्वार पर आ जाता है तो उसका उचित सम्मान किया जाता है। गृहस्थी का कर्तव्य है कि स्वयं दुख उठाकर भी अतिथि सेवा के लिये तत्पर हो जाय। अतिथि सेवा की बड़ी महिमा है। इसी प्रकार शरण में आये हुए की रक्षा करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य हो जाता है। शरणागत के लिए जाति एवं संप्रदाय का भी विचार छोड़ दिया जाता हैं। निशाचर कुल भूषण विभीषण के शरण में आने पर श्री राम चन्द्र उसे अभय कर देते हैं। और इसी प्रकार शरणार्थी सुग्रीव को अभयदान देते है और दुष्ट बालि से उसकी प्राण रक्षा करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं। दो यवन सिपाहियों को शरण में लेकर महाराज हम्मीर की भयंकर विपत्ति का सामना करना पड़ा, परन्तु उन्होंने शरणागत की प्राण-प्रण से रक्षा की।

भारतीय सभ्यता में नारी धर्म का विशेष महत्व है। भारतीय नारी एक बार पति के रूप में जिसको वरण कर लेती है उसको जीवन पर्यन्त नहीं छोड़ती। पति प्राण भारती की देवियाँ अन्य पुरुष की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखती। वैवाहिक सम्बन्ध होने के अनन्तर पति उनके लिये देवता के तुल्य हो जाता है। वे उनके चरणों में अपना सर्वस्व अर्पण कर देती हैं। पति व्रत के कारण ही भारतीय नारियों के चरित्र में सुशीलता, पति परायणता आदि गुणों का प्रादुर्भाव हुआ है। भारतीय नारी आज भी लज्जा सेवा और शील की खान हैं। वह क्रोध में भी पति का अनिष्ट नहीं सोचती। पति के अनिष्ट होने पर वह सती हो सकती है और जौहर करने के लिये धू धू करती हुई आग में कूद सकती है। सीता सावित्री, उमा, द्रौपदी, गाँधारी पद्मिनी आदि देवियाँ पतिव्रत के कारण प्रातः स्मरणीय हैं।

जो भारतीय सभ्यता किसी समय विश्वविदित थी, जिसने समस्त संसार को अपने आँचल में लपेट लिया था तथा जिसने भूमण्डल पर दिव्य प्रेम की वर्षा की थी, वही पाश्चात्य सभ्यता के संसर्ग से अपनापन खो बैठी। पहिले मुस्लिम सभ्यता ने आक्रान्त कर दूषित कर डाला। पाश्चात्य अँग्रेजी सभ्यता ने गौरव हीन बना डाला। भारतीय जीवन पर विदेशी सभ्यता का कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि प्रायः सब लोग उसके प्रभाव में रहने लगे। हमारी आस्तिकता को नास्तिकवाद ने आत्म सात कर लिया विद्वान की चकाचौंध में हम ईश्वर और धर्म का तिरस्कार करने लगे। अंग्रेजी भेष-भूषा और अंग्रेजी आचार-विचार का भारतीय जीवन पर ऐसा अनिष्टकारी प्रभाव पड़ा कि सारा आत्मगौरव नष्ट हो गया तथा आत्माभिमान नष्ट हो गया।

अब भारतवर्ष में पुनः परमपूज्य तपोनिष्ठ वेद मूर्ति श्री आचार्यजी महाराज ने साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का बीड़ा उठाया है। अब हमें पुनः भारतीय आदर्शों को अपनाने की आवश्यकता है। अपनी संस्कृति को खोकर ही हमारी दुर्गति हुई थी। अतः जब तक हम पुनः उसका आलिंगन नहीं करेंगे तब तक हमारा उद्धार नहीं हो सकता। भारतीय संस्कृति में नास्तिकवाद नहीं आस्तिकवाद है, स्वार्थवाद नहीं परमार्थवाद है, हिंसावाद नहीं अहिंसावाद है, भोगवाद नहीं योगवाद है तथा अनात्मवाद नहीं आत्मवाद है। इसी को अपनाने से हमारा उत्थान होगा ईश्वर भारतवासियों को सद्बुद्धि दे कि वे अपनी संस्कृति का आदर करना सीखें।


खोज करने से सद्गुरु भी मिलते हैं।

(श्री शिवचैतन्य जी परमार्थी)

अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर होने के लिए किसी भी साधक को ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है जो उसे न केवल सन्मार्ग का उपदेश करे वरन् अपने व्यक्तिगत अनुभवों से प्रभावित, प्रोत्साहित एवं अग्रसर बनाने की क्षमता भी रखता हो। इस आवश्यकता की पूर्ति में आज अधिकाँश साधक असफल ही रहते हैं। ऐसा मार्ग दर्शक खोजने चलते हैं परन्तु समुद्र किनारे मोती ढूंढ़ने गये बालक के हाथ जिस प्रकार सीप और घोंघे ही लगते हैं, इसी प्रकार स्वल्प प्रयत्न से सद्गुरु प्राप्त करने के इच्छुकों को कोई नकली व्यक्ति ही उपलब्ध होता है और इसके फलस्वरूप उन्हें असफलता एवं निराशा ही हाथ लगती है।

विचारणीय बात यह है कि क्या सचमुच आज सच्चे मार्ग दर्शकों का अभाव हो गया है? क्या योग्य एवं अनुभवी गुरु संसार में से समाप्त हो गये हैं? नहीं, बात ऐसी नहीं, है। किसी वस्तु की किसी जमाने में कमी हो सकती है पर उनका पूर्ण लोप नहीं होता। खोज और प्रयत्न करने वाले अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर ही लेते हैं फिर आध्यात्म मार्ग से पथिक ही अपनी आवश्यक वस्तु-सच्चे मार्ग दर्शक से वंचित रहे इसका कोई कारण नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि उपयुक्त और अधिकारी व्यक्ति की तलाश करते समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाय और भावुकता के आधार पर, चमक दमक के आधार पर जल्दबाजी से किसी को गुरु न माना जाये वरन् उसकी आन्तरिक स्थिति के बारे में गंभीर दृष्टि से पता लगाया जाय और वास्तविकता प्रतीत होने पर ही उसकी सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाय। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रख कर जब बड़ी बड़ी रहस्यपूर्ण खोजें हो सकती हैं तो सद्गुरु को उसी आधार पर क्यों नहीं खोज निकाला जा सकता।

विज्ञान की नई नई खोजें हो रही हैं। ऐसे तथ्यों और सिद्धान्तों का पता चल रहा है जो अब से पहले किसी को पता न था, ग्रहों उपग्रहों तक दौड़ने के जो यंत्र बने हैं तथा इस दिशा में जो महत्वपूर्ण बातें ज्ञात हुई हैं उनके आविष्कर्ता वैज्ञानिक अपनी सफलता पर गर्व अनुभव कर रहे हैं। इससे पूर्व भी प्रकृति के अनेक ऐसे रहस्यों का पता लगाया जा चुका है जो उस शोध से पूर्व सर्वथा अज्ञात थे और जब वे आविष्कार सामने आये तो सर्वत्र आश्चर्य प्रकट किया गया। रेल, तार टेलीफोन, बिजली, रेडियो, टेलीविजन, हवाई जहाज, दूरबीन, कैमरा, एक्सरे, क्लोरोफार्म आदि अब साधारण बातें हैं। उन दिनों हर आदमी इनकी चर्चा करते हुए एक भारी कौतूहल अनुभव करता था।

जिन सिद्धान्तों, प्रकृति की जिन सूक्ष्म प्रक्रियाओं के आधार पर इन आविष्कारों का उद्घाटन हुआ वे अनादि काल से उसी प्रकार मौजूद थे जिस प्रकार आज हैं पर जब तक उनके बारे में जानकारी न थी तब तक अल्पज्ञ मनुष्य उसके अस्तित्व के बारे में भी कोई कल्पना न कर पाता था।

मनुष्य की यह अल्पज्ञता केवल विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं सभी क्षेत्रों में फैली पड़ी है। मनुष्यों की पहचान के बारे में भी यही अल्पज्ञता बाधक होती है। दूसरों के वास्तविक स्वरूप को व उनकी आन्तरिक स्थिति को परखने में हम बहुधा असफल रहते हैं। वह असफलता सामान्य मनुष्यों के क्षेत्र तक सीमित रहे तो उतना हर्ज नहीं, जितना कि महापुरुषों की वास्तविकता को परखने में भूल होने के कारण हर्ज होता है। समय -समय पर युग पुरुष होते रहते हैं। सन्तों, मुनियों, तत्वदर्शियों और आत्मबल सम्पन्न लोगों की किसी काल में कमी नहीं रहती, उनकी महत्ता को परखने में भूल होने के कारण उस समय के लोग उससे लाभ नहीं उठा पाते।

भगवान राम और कृष्ण तक को उस युग के लोगों ने यदि पहिचाना होता तो उन्हें इस प्रकार सताया न गया होता, उनके साथ ऐसे दुर्व्यवहार न किये गये होते। सीता पर लाँछन लगाने वाले धोबी को क्या पता था कि वह एक महाशक्ति पर लाँछन लगा रहा है। शिशुपाल को क्या पता था कि जिन्हें वह इतने दुर्वचन बोल रहा है वह कृष्ण नगण्य गोप बालक से कुछ अधिक है। तीस रुपया इनाम पाने के लालच से जिस शिष्य ने अपने गुरु ईसामसीह को फाँसी लगवाने के लिए पकड़वा दिया उसे क्या मालूम था कि यह तुच्छ सा साधु आगे चल कर आधी से अधिक दुनिया का मार्ग दर्शक बनेगा और इसके साथ विश्वास घात करने के फलस्वरूप मुझे इतिहास में खल-नायक के रूप में याद किया जाता रहेगा। यदि उसे ऐसा पता होता तो अवश्य ही वह उस तीस रुपयों का लोभ छोड़ देता।

बाल्मीकि डाकू को यह पता होता कि जिस साधु को वह लूट रहा है वह नारद साधारण यात्री नहीं देवर्षि है तो वह क्यों उनको लूटकर कपड़े उतरवाता? हिमाचल पत्नी सुनयना को पता होता कि उसकी पुत्री पार्वती साधारण लड़की नहीं है तो उसे तप करने से क्यों रोकती और क्यों शिव को दूल्हा रूप में दरवाजे पर आया देखकर अपने दुर्भाग्य पर दुखी होती? अशोक वाटिका में फल खाने वाले वानर को साधारण बन्दर न समझ कर यदि राक्षस लोग उसे बजरंगबली हनुमान समझते तो पूँछ जलाने की धृष्टता क्यों करते? चाणक्य की प्रचण्ड शक्ति से यदि नन्द नरेश परिचित रहे होते तो साधारण सी बात पर उसका अपमान करके अपने वंश और राज्य का सर्वनाश क्यों कराते?

इस प्रकार के अगणित उदाहरण इतिहास में ऐसे मौजूद हैं जिनमें स्पष्ट है कि महापुरुषों को उनके साथियों तक ने नहीं पहचाना। गौएं चराने वाले गोप क्या जानते थे कि उनके समान ही रोज गायें चराने वाला साथी लड़का योगेश्वर भगवान कृष्ण हो सकता है। ध्रुव, प्रहलाद, शंकराचार्य, मीरा, गान्धी, तिलक सुकरात, सूर आदि की महत्ता यदि उनके समकालीन लोगों को प्रतीत होती तो निश्चय ही उन्हें उतना तिरस्कार न सहना पड़ता।

मनुष्य की स्थूल बुद्धि और चमड़े की आँखें केवल बाहरी बातों को ही देख समझ पाती हैं उसमें वह सूक्ष्म दृष्टि नहीं होती कि किसी की लघुता एवं महानता की अन्तः स्थिति को समझ सकें। इसी कमजोरी के कारण कितने ही भोले लोग धूर्तों द्वारा ठगे जाते हैं और कितने ही जिज्ञासु किन्हीं सत्पुरुषों की सहायता से वंचित रह जाते हैं। इस कठिनाई का हल एक ही प्रकार से हो सकता है कि हम अपनी तत्वदर्शी अन्वेषण बुद्धि की ऋतम्भरा प्रज्ञा को विकसित करें। इस अन्वेषक बुद्धि के अभाव में चिरकाल तक मानव जाति को वैज्ञानिक आविष्कारों से वंचित रहना पड़ा और जब वह महत्वपूर्ण क्षमता उसे प्राप्त हुई तो विज्ञान दिन पर दिन तीव्र गति से प्रकृति के महान रहस्यों का उद्घाटन करने के लिए बढ़ रहा हैं।

हमें अपने जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए जिस ज्ञान तत्व और सूक्ष्म विज्ञान की आवश्यकता है वह यद्यपि बहुत कुछ पुस्तकों में उपलब्ध होता है, फिर भी उसे हृदयंगम कराने और अभ्यास भूमिका में लाने के लिए किन्हीं ऐसे मार्ग दर्शकों की आवश्यकता होती है जिन्होंने इस ज्ञान विज्ञान को स्वयं हृदयंगम और अभ्यस्त किया है। परन्तु भारी कठिनाई यह है कि ऐसे लोगों को परखा कैसे जाय? इस विचित्र युग में नकली चीजें इतनी बढ़ गई हैं कि असली चीज वाले को अपनी अच्छाई स्पष्ट करने में भी संकोच होता है। नकली के व्यापारी बढ़ा चढ़ा कर अपने माल का ढिंढोरा पीटते हैं फलस्वरूप भोले आदमी उनके चंगुल में आसानी से फँस जाते हैं और पीछे बहुत कुछ गंवाकर निराश लौटते हैं। जब कि इन विपत्तियों का चारों ओर भयंकर विस्तार हो रहा हो तब सच्चे आदमियों को अपनी बात खुली जबान से कहने तक में संकोच होना स्वाभाविक है क्योंकि दूध के जले लोग छाछ पर विश्वास कर ही लेंगे यह आशा कैसे की जा सकती है?

धूर्तों का स्वार्थ होता हैं, उन्हें बिना कुछ प्रयत्न और कष्ट का झंझट उठायें केवल अपने विज्ञापन बल पर बहुत कुछ प्राप्त हो जाता है यदि कभी कलई खुली भी तो उनकी मूल बेहया स्थिति को कोई हानि नहीं होती । उनकी हानि तो केवल इतनी ही हुई कि कलई उतर गई और वस्तुतः जैसे थे वैसे ही लोगों पर प्रकट हो गये। पर जो सच्चे हैं उनकी स्थिति सर्वथा भिन्न है। उन्हें स्वार्थ कुछ भी साधना नहीं होता केवल परमार्थ ही करना होता है। जो कष्ट साध्य अन्तः स्थिति प्राप्त की है उसे कोई जाने ही और उससे लाभ उठाये ही, इसमें उन्हें कुछ आग्रह भी नहीं होता, वरन् उदासीनता ही होती है क्योंकि यदि मार्ग दर्शन के लिए उन्हें कोई नहीं पूछता तो इसमें उनकी हानि कुछ नहीं वरन् अपने समय का आत्म कल्याण में ही लगाते रहने का लाभ ही है। परमार्थ न करें, उन्हें सेवा का अवसर न मिले तो भी उनके आत्म कल्याण का जो कार्यक्रम चल रहा था उसके होते हुए लक्ष पूर्ति की कोई बाधा नहीं आती। निश्चय ही असली चीजों का -नकली चीजों की तरह ढिंढोरा नहीं पीटा जा सकता और न उनकी चमक दमक ही नकली जैसी बनाई जा सकती है।

इन परिस्थितियों में आत्म निर्माण के आकाँक्षी के लिए एक भारी कठिनाई यह पड़ती है कि वह श्रेय पथ पर चलने के लिए जिस मार्ग दर्शक की आवश्यकता है उसे प्राप्त कैसे करें? नकली गुरुओं की भरमार के उलझन भरे जाल से अपने को कैसे बचायें? अनाधिकारी लोगों की कला वाणियों में भ्रमित होकर जो बर्बादी होती है उससे आत्म रहा कैसे करें?

इस समस्या को हल करने का एक ही मार्ग है अपनी अन्वेषण बुद्धि को, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को, जागृत करना। वैज्ञानिकों ने इसी औजार की सहायता से प्रकृति के गर्भ में छिपे हुए सूक्ष्म रहस्यों को ढूंढ़ निकाला और इतने आश्चर्यजनक आविष्कार किये। आगे भी मनुष्य की सारी महत्वाकांक्षाएं इसी एक आधार पर अवलम्बित हैं कि वह अन्वेषण बुद्धि द्वारा तर्कपूर्ण वैज्ञानिक प्रवृत्ति के आधार पर अभीष्ट दिशा में अग्रसर होगा। यही आधार हमारे लिए सच्चे गुरु की खोज में भी सहायक हो सकता है। ढूंढ़ने वालों ने सब कुछ पाया है, इस संसार में सब कुछ मौजूद है- चिरकाल से मौजूद था, अब भी मौजूद है, पर हम उसे वैज्ञानिक दृष्टि के अभाव में प्राप्त नहीं कर पाते। यदि उस दृष्टिकोण को अपना लिया जाय तो वैज्ञानिक शोधों तक ही वह बात सीमित न रहे, उसके द्वारा सद्गुरु प्राप्त हो सकते है और आगे चलकर इस आधार पर परमात्मा की उपलब्धि भी हो सकती है।


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जो मनीषी हैं, वे स्तुति से न तो प्रसन्न होते और न निंदा से अप्रसन्न ही होते हैं। जो लोग उनके निंदक अथवा प्रशंसक होते हैं, वे ऐसों के आचार व्यवहारों को छिपाकर रखते हैं। वे पूछने पर भी अहितकर विषय के सम्बन्ध में हितकारी पुरुष से कुछ नहीं कहते और जो उनके ऊपर आघात करते हैं, उनसे वे बदला लेने की भी इच्छा नहीं रखते।

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ऐसे लोग अप्राप्त वस्तुओं के लिये दुःख न करके समय पर प्राप्त हुई वस्तु ही से काम चला लिया करते हैं बीती हुई बातों के लिये न तो वे दुःखी होते और न उनका स्मरण करते हैं।

-महात्मा भीष्म पितामह


विद्या और ज्ञान का त्यौहार बसंत पंचमी

(डॉ. चमनलाल गौतम)

हिन्दू धर्म की कुछ अपनी विशेषताएं हैं। इन विशेषताओं के कारण ही इसे जगत में इतनी ऊँची पदवी प्राप्त थी। इसके प्रत्येक रीति रिवाज, पर्व, त्यौहार और संस्कार में महत्वपूर्ण रहस्य छिपा रहता है जो हमारे जीवन की किसी न किसी समस्या का समाधान करता है। हमारे मानसिक व आत्मिक विकास का साधन बनता है। शारीरिक व बौद्धिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है, विचारों को एक नई मोड़ देता है।

जिस प्रकार से अन्य पर्व व त्यौहार महत्वपूर्ण रहस्यों का उद्घाटन करते हैं, उसी तरह से बसंत पंचमी का त्यौहार भी अपने अन्दर एक जीवन प्रेरणा लिए आता है। इस त्यौहार से हम जीवन का सूक्ष्म कायाकल्प करना आरम्भ करते हैं। मनुष्य योनि 84 लाख योनियों के पश्चात् प्राप्त होती है इसलिए हमारे मनः क्षेत्र में पशु वृत्तियों का आधिपत्य होता है मनुष्य की जैसी मानसिक वृत्तियां होती है वह वैसे ही कार्य करने पर बाध्य होता है। शरीर के कार्यों का संचालन तो मन के विचारों पर निर्भर करता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने भौतिक उन्नति से आध्यात्मिक व मानसिक उन्नति को उत्तम समझा था और उन्होंने अपने मूल्यवान जीवनों को इन्हीं खोजों में लगा दिया था कि मानव का मानसिक व आत्मिक विकास किस प्रकार से हो?

बसंत पंचमी सरस्वती का - विद्या का त्यौहार है। जिस दिन हम पशुता से मनुष्यता की ओर बढ़ने की तैयारी आरम्भ करते हैं, बड़ी धूम धाम के साथ इस त्यौहार को मानते हैं इसलिए कि हमने जीवन के सबसे बड़े रहस्य को समझ लिया है कि बिना विद्या और ज्ञान के मनुष्य पशु होता है। आज हमने उससे ऊपर उठने का संकल्प किया है। उत्तम ग्रंथों के स्वाध्याय, सत्संग और ज्ञानोपार्जन के बिना विवेक की अनुभूति नहीं होती। कर्तव्य-अकर्तव्य, सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय आदि के निर्णय करने को शक्ति व प्रेरणा जब तक जाग्रत नहीं होती तब तक मनुष्य मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता। मनुष्य के अन्य कार्य तो पशु बड़ी सुन्दरता व स्फूर्ति के साथ करते हैं। बल्कि कई बातों में तो पशु मनुष्य से बढ़ कर हैं। मनुष्य की श्रेष्ठता तो उपरोक्त गुणों के विकास में ही है।

बसंत का त्यौहार हर्ष व उल्लास का त्यौहार है इसमें नई नई उमंगें उत्पन्न होती हैं। इससे हम शोभा और सौंदर्य की वृद्धि करना सीखते हैं। जिस प्रकार से ऋतु में परिवर्तन होना आरम्भ होता है उसी तरह से हमारे जीवन में भी नवीन परिवर्तन का श्री गणेश होना चाहिए। बसंत के दिन लोग पीले बसंती नए कपड़े पहनते हैं। यह उज्ज्वल जीवन का प्रतीक है। इससे शोभा और सौंदर्य टपकता है। इसलिए हर वर्ष अपने जीवन में सौंदर्य वृद्धि के लिए इस दिन विचार करते हैं हमारे अन्दर जो मलिनताएं हैं, उन्हें दूर करने का प्रयत्न करते हैं।

बसंत के दिन सरसों, अरहर व अन्य प्रकार के पीले फूल लाये जाते हैं। उनका अभिप्राय यह होता है कि हमारा जीवन भी फूल जैसा आदर्श बनना चाहिए। फूल खिलता है, संसार को सुगन्धि देता है। वह किसी से कुछ माँगता नहीं, निरन्तर देने के स्वभाव बनायें रहता है। जब मनुष्य उसके शरीर पर आघात करता है तब भी वह दुःखी नहीं होता उसे क्षोभ नहीं होता है, तोड़ने वाले के ऊपर क्रोधित नहीं होता बल्कि शरीर त्यागने से पूर्व भी हँसते हँसते देवताओं, महापुरुषों, व विद्वानों के गले में सजावट का माध्यम बनता है। उसका यह कार्य अनुकरणीय है। हमारा जीवन भी फूल जैसा तपोमय हो, उज्ज्वल हो, यह प्रेरणा इस महान त्यौहार से हम ग्रहण करते हैं।

हमारे पूर्वज इस तथ्य को भली प्रकार से जानते हैं कि जिन सूक्ष्म गुणों की छाप मनुष्य के मस्तिष्क पर डालनी हो, उनका स्थूल रूप ही उनके सामने रखना उपयुक्त होता है, उसी से वह प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं। अपने बौद्धिक स्तर के अनुरूप ही मनुष्य हर एक विचार को अपनाता है। इस त्यौहार में भी ऐसा होता है। जिस वस्तु को हम उत्तम समझते हैं, उसका सम्मान करते हैं, प्रतीक रूप में बस उस की पूजा करते हैं, यही सनातन पद्धति चली आ रही है, बसंत के दिन हम जीवन विद्या को सीखना आरम्भ करते हैं इसलिए विद्या के प्रतीकों का हमें सम्मान करना चाहिए, उनकी पूजा करनी चाहिए, जिसकी हम पूजा करते हैं, जनता की दृष्टि में वही श्रेष्ठ गिनी जाती है। विद्या, बुद्धि की प्रतीक सरस्वती हैं। सरस्वती देवी के एक हाथ में पुस्तक और दूसरे में वीणा होती है। ज्ञान प्राप्त करने के साथ साथ में उल्लास, स्फूर्ति, झंकार भी की आवश्यक है। वीणा के भजने से मन तरंगित होता है हमारे जीवन में विद्या के साथ साथ जीवन को सुन्दर व शोभायमान बनाने के लिए नई नई उमंगें पैदा हों। तुम सरस्वती पूजन करते हैं ताकि हमारे अन्दर इन गुणों का विकास हो। इस दिन हम कागज कलम, दवात की पूजा करते हैं क्योंकि यही शिक्षा प्राप्त करने के साधन हैं। इस दिन हमें विद्वानों का सम्मान करना चाहिए। उन्हें सम्मान सूचक पद देने चाहिए ताकि साधारण व्यक्ति भी इस मार्ग की ओर अग्रसर हों, आम लोग उसी ओर चलते हैं जिसका विशेष प्रकार से सम्मान किया जाता है। चूँकि आज कल धनवानों की लोग कदर करते हैं इसलिए जनता की प्रवृत्ति अधिक धन प्राप्त करके सम्मान प्राप्त करने की है। इस प्रवृत्ति को हमें एक नई मोड़ देना है। हमारे सामने हर वर्ष यह शुभ अवसर आता है परन्तु हम उसे केवल मनोविनोद में ही समाप्त कर देते हैं। जनता के दृष्टिकोण को बदलने के लिये हमें विद्वानों का सम्मान विशेष धूमधाम के साथ करना चाहिए। वेद शास्त्रों की पूजा व उनके जुलूस निकालने चाहिए। सिख लोग अपने पवित्र धर्म ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहब का जुलूस निकाला करते हैं। हमें भी यह पद्धति अपनानी चाहिए।

शिक्षा और विद्या की वृद्धि के सम्बन्ध में जो भी विचार उत्पन्न हों, उन को क्रियान्वित करने का प्रयत्न करना चाहिए। पुस्तकालय, स्कूल, पाठशालाएं बढ़ाने के प्रयत्न होने चाहिए। गायन संगीत और भाषण के आयोजन होने चाहिए। उत्तम पुस्तकें लिखने वालों को पुरस्कार मिलने चाहिए। यदि हम उनको कुछ भेंट देने की स्थिति में न हो तो उनका विशेष सम्मान करना चाहिए। बच्चों को उत्साहित करने के लिए इनाम देने चाहिए। सरस्वती के चित्र का पूजन व जुलूस निकलना चाहिए।

बसंत का त्यौहार हमारे लिए पीले फूलों की जयमाला लिए खड़ा है। यह उन्हीं के गले में पहनाई जायेगी जो लोग उस दिन से पशुता से मनुष्यता, अज्ञानता से ज्ञान अविवेक से विवेक की ओर बढ़ने का दृढ़ संकल्प करते हैं और जिन्होंने तप, त्याग और अध्यवसाय से इन्हें प्राप्त किया है, उनका सम्मान करते हैं, संसार में ज्ञान गंगा को बढ़ाने के लिए भागीरथ जैसा तप करने की प्रतिज्ञा करते हैं। श्रेष्ठता का सम्मान करने वाला ही श्रेष्ठ होता है। इसलिए आइए हम इस शुभ अवसर पर उत्तम मार्ग का अवलम्बन लें।


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रात दिन परिश्रम में लगे रहना, लाभ के लक्षण है। निरन्तर काम में लगे रहने से मनुष्य की वृद्धि हो जाती है। प्रमादियों को, आलसियों को लक्ष्मी नहीं चाहती। जो लोग उत्साहहीन होते हैं वे भी सदा निर्धन ही रहते हैं।

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कोमल, स्वभाव, सबका भला चाहना, किसी का बुरा न चाहना, क्षमा करना, धैर्य रखना, किसी का तिरस्कार न करना, ये काम आयु को बढ़ाने वाले हैं।

-महात्मा विदूर


मानसिक उन्नति में भोजन का स्थान

(डॉ. जयाशंकर जोशी एम.डी.)

मन को सात्विक मार्ग पर चलाना बड़ा कठिन है। सात्विकी मन से ही ईश्वर का ठीक ढंग से भजन हो सकता है और उसी के द्वारा आत्मोन्नति संभव होती है। प्रायः संत जन उपदेश देते हैं कि पहले मन को वश में करो तब तुम भजन साधन में अग्रसर हो सकोगे। पर इस बात को स्पष्ट रूप से बहुत कम लोग समझते हैं कि आखिर मन को वश में कैसे किया जाय? सिद्धान्त और कल्पना की दृष्टि से तो बहुत से उपदेश दिये जा सकते हैं, पर कोई ऐसा उपाय भी तो होना चाहिये जिसके अनुसार आचरण करने से मन की शुद्धता बढ़ती जाय।

इस सम्बन्ध में जो कई मार्ग बतलायें गये हैं, उनका एक प्रधान अंग “भोजन की शुद्धता” है। इसे हर एक आदमी समझ सकता है और चेष्टा करे तो पालन भी कर सकता है। अधिकाँश लोग तो यही ख्याल करते हैं कि भोजन से हमारा स्थूल शरीर बनता है पर वास्तविक बात यह है कि हमारा सूक्ष्म शरीर, जिस केन्द्र मन होता है, वह भी भोजन द्वारा ही बनता है, भोजन से जहाँ रस, रक्त, माँस, हड्डी आदि बनते हैं, वहाँ उससे एक प्रकार की विशेष गैस अथवा हवा भी बनती है जो “प्राण-वायु” कहलाती है। प्राणियों की जीवनी शक्ति और कार्यों का आधार इसी प्राण वायु से हमारा मन और विचार भी बनते हैं। इसलिये जैसे गुण भोजन में होंगे वैसे ही हमारे मन में प्रकट होंगे। शुद्ध रोटी, दाल और शाक खाने वाले व्यक्ति का मुकाबला उस व्यक्ति से करिये जो रोज तरह तरह के माँस, अण्डे, शराब आदि का भक्षण करता है तो आपको दोनों के स्वभाव का अन्तर प्रत्यक्ष दिखाई पड़ जायेगा। जहाँ प्रथम प्रकार का भोजन करने वाला शिष्ट, शान्त, दयालु स्वभाव का होगा, दूसरी श्रेणी के भोजन वाला अवश्य ही किसी हद तक क्रोधी, लड़ाकू और स्वार्थी प्रकृति का जान पड़ेगा। वह तो केवल भोजन की एक विशेषता का प्रभाव हुआ, पर तात्विक भोजन की दृष्टि से और भी कई बातें आवश्यक हैं जिनका वर्णन एक आध्यात्मिक गुरु ने विस्तार पूर्वक किया है। उसका कुछ सारांश यहाँ दिया जाता है :-

(1) भोजन की सबसे पहली शर्त यह है कि वह उत्तम और श्रेष्ठ कमाई का हो। जो भोजन अधर्म अथवा किसी पाप कर्म द्वारा उपार्जित मन से प्राप्त किया जाता है उसका परिणाम हानिकारक होता है।इसके सम्बन्ध में एक दृष्टान्त दिया जाता है कि एक महात्मा किसी राजा के यहाँ जाया करते थे और वहाँ उनका बड़ा सम्मान होता था। एक दिन राजा के यहाँ भोजन करने के उपरान्त उन्होंने कुछ देर विश्राम किया। चलते समय उनकी दृष्टि स्नानगृह की खूँटी पर टँगे रानी के हार पर पड़ी जिसे वह संयोगवश स्नान करते समय वहाँ भूल गई थी। महात्मा ने उसे वहाँ से उतार कर अपने वस्त्रों में रख लिया और अपने स्थान को चले गये। वहाँ जब रानी को हार का ख्याल आया तो उसकी खोज होने लगी और सेवकों ने बड़ी दौड़ धूप की पर कोई फल न निकला। दूसरे दिन दोपहर के समय वे ही महात्मा हार को लेकर राज दरबार में आये और उसे लौटा कर उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया। साथ ही यह भी कहा कि मुझे इसका उचित दण्ड दिया जाये। जिससे मैं चोरी के पाप से छुटकारा पा सकूँ। उनके बहुत आग्रह करने पर उस युग के कानून के मुताबिक उनके दोनों हाथ काट डाले गये। पर राजा को इस बात का आश्चर्य बना रहा कि ऐसे संसार त्यागी वीतराग स्वभाव के महात्मा ने ऐसा कार्य क्यों किया? मंत्रियों ने उनको सुझाया कि सम्भव है एक दिन महात्मा जी ने ऐसा भोजन कर लिया होगा जिससे उनके चित्त में इस प्रकार का दूषित विकार उत्पन्न हो गया। जब इस विषय में अधिक जाँच की गई तो मालूम हुआ कि उस दिन जो भोजन बना था उसमें वह अन्न सम्मिलित था जो सरकारी पुलिस ने चोरों के गिरोह को पकड़ कर बरामद किया था। उसके स्वामी का पता न लगने के कारण उसे राज्य भण्डार में जमा कर लिया गया और उत्तम श्रेणी का देखकर उसमें से कुछ चावल को राजा के भोजनालय में भेज दिया गया।

संभव है यह दृष्टान्त कल्पित ही हो और केवल शिक्षा देने की गरज से बनाया गया हो पर इसमें संदेह नहीं कि खोटी कमाई का भोजन मनुष्य के मन में अच्छे संस्कार उत्पन्न नहीं कर सकता। उसके प्रभाव से चित्त में अवश्य ही खोटे भाव उत्पन्न होंगे और कार्य रूप में भी उनका परिणाम बुरा ही होगा।

(2) भोजन को सादा, ताजा और सब तरह का स्वच्छ होना भी परमावश्यक है। तरह-तरह के जायकेदार भोजन पाचन शक्ति पर भार स्वरूप हो जाते हैं। इसके सिवाय ऐसा भोजन “स्वाद” के कारण प्रायः अधिक भी कर लिया जाता है। जो चित्त को बिगाड़ता है। इसके सिवाय माँस, मदिरा, लहसुन, प्याज और अधिक मसालेदार, भोजन सदैव उत्तेजक होता है और उससे मनुष्य के मन में तामसी विचार उत्पन्न होते हैं। इसलिये जो लोग भजन या जप में मन को एकाग्र करना चाहते हैं उनके लिये ऐसा भोजन वर्जित है।

(3) भोजन बनाने और परोसने वाले शुद्ध आचरण के और उच्च विचारों के व्यक्ति हों क्योंकि भोज्य पदार्थों में इनका हाथ बार-बार लगता है और उसका प्रभाव पड़ता है। वह प्रभाव शरीर और मन पर भी प्रकट होता है। सबसे उत्तम भोजन तो वही माना जाता है जो अपने से उच्च आचरण वाले व्यक्ति के द्वारा तैयार किया गया हो। इसीलिये कदाचित प्राचीन समय में ब्राह्मणों के हाथ का भोजन सर्वश्रेष्ठ माना गया था। पर अब अवस्था बदल गई है और जो ब्राह्मण रसोइये का काम करते हैं उनके आचरण प्रायः पतित हो गये हैं वे नशा करते हैं और गन्दे भी बहुत रहते हैं। इसलिये उनके हाथ का भोजन अब लाभ के बजाय हानिकारक ही सिद्ध होता है।

ऐसी दशा में सबसे अच्छा नियम यह है कि अपना भोजन अपने हाथ से बनाया जाय या अपनी माता के हाथ का बना भोजन किया जाय। माता का स्नेह ऐसा उच्चकोटि का होता है कि उसके हाथ के भोजन से हानि की संभावना की ही नहीं जा सकती। यदि माँ वृद्ध और असमर्थ हो तो फिर पत्नी के हाथ का भोजन करना चाहिये पर उसको भी धार्मिक और पवित्र विचारों का बना लेना आवश्यक है। उसको नीच संगति से सदैव पृथक रखना चाहिये।

(4) भोजन यथासंभव एकान्त में करना चाहिए जहाँ उस पर किसी की दृष्टि न पड़े। मैस्मरेजम वालों ने सिद्ध करके दिखा दिया है कि मनुष्य की आँख में बिजली की शक्ति है, जिसका भला या बुरा प्रभाव सामने के पदार्थ पर पड़ सकता है बहुत से लोगों की दृष्टि प्राकृतिक रूप से ऐसी खराब होती है कि उससे भोजन बिगड़ जाता है अथवा उसमें दूषित प्रभाव पैदा हो जाता है। ऐसी आशंका से बचने के लिये भोजन एकान्त में करना लाभकारी है।

(5) भोजन सामने आने पर पहले अपने इष्टदेव या गुरु मूर्ति का ध्यान करें और उनको मानसिक भोग लगाकर, भोजन को उनका प्रसाद समझकर ग्रहण करें, भोजन का थोड़ा सा अंश कुत्ता, चिड़ियाँ आदि प्राणियों के लिये निकाल थाली के बाहर भूमि पर रख देना चाहिए। जो इस तरह भोजन करता है वह प्रायः भोजन में इन सब नियमों का पालन करने से स्वास्थ्य और मन दोनों की उन्नति प्राप्त करता है और आत्मिक साधन में सुविधा रहती है।

पशुबलि कलंक को अब धो ही डाला जाय


राजस्थान में एक हजार स्वयं सेवकों द्वारा कूच कराने की योजना

(श्रीराम शर्मा आचार्य)

हिन्दू धर्म का मूलभूत तत्वज्ञान इतना महान है कि उसके प्रत्येक सिद्धान्त एवं विधान में विश्व कल्याण की -मानवता के चरम उत्थान की संभावनाएं ही सन्निहित हैं। देवताओं और ऋषियों ने इस महान धर्म का ढाँचा इतने उच्च कोटि के आदर्शों द्वारा विनिर्मित किया है कि उसके व्यवहार का परिणाम स्वर्गीय वातावरण का निर्माण ही हो सकता है। परन्तु दुःख की बात है कि पिछले अज्ञानान्धकार युग में उसमें जहाँ तहाँ अनैतिक और अहितकर मान्यताओं और रूढ़ियों का भी समावेश होने लगा और आज जो रूप हिन्दू धर्म का हमारे सामने है उससे कई चीजें बहुत खटकने वाली ही नहीं, उन भावनाओं के सर्वथा प्रतिकूल भी हैं जिनको लेकर ऋषियों ने इस महान धर्म की रचना की थी।

ऐसी विकृतियों में पशु बलि को सर्वोपरि कलंकी प्रथा कहा जा सकता है। मूक पशु पक्षियों को देवी देवताओं के नाम पर कत्ल किया जाना उन देवताओं की महिमा को समाप्त करके सारे सभ्य समाज के सामने उन्हें घृणित, निंदित, नीच, क्रूर एवं हत्यारा सिद्ध करता है। जिस देवता को प्रसन्न करने के लिये बलि चढ़ाई जाती है वस्तुतः उन्हें असीम कष्ट और असीम लज्जा इस कुकृत्य से होती है। क्योंकि देवता शब्द ही दिव्य तत्व, दया, करुणा, दान, उदारता, सेवा, सहायता, आदि सत्प्रवृत्तियों का द्योतक है, जिसमें यह गुण न हों- उलटे नन्हें मुन्ने बेबस और बेबस प्राणियों का खून पीने की इच्छा हो उन्हें देवता कौन कहेगा? वे तो असुर एवं पिशाच ही गिने जायेंगे। देवताओं के महान गौरव को नष्ट कर उन्हें दुनिया के सभ्य समाज के सम्मुख इस बुरे रूप में उपस्थित करना वस्तुतः उनके साथ दुश्मनी करना है, उन्हें कलंकित करने का प्रयत्न करने वाले के प्रति वे प्रसन्न होंगे, इसकी आशा कदापि नहीं की जा सकती। परिणामस्वरूप जो लोग पशुबलि करते हैं उनसे उलटे रोग, शोक, अज्ञान आदि क्लेश कलह, दुष्टता, दुर्बुद्धि आदि अनेक दुखों की ही वृद्धि होती है। पशुबलि करने वाले लोगों में से फलते फूलते कोई विरला ही देखा जाता है अन्यथा उन्हें निर्दोष जीवों की हत्या तथा देवता को कलंकित करके उनके क्रोध एवं शाप के फलस्वरूप नाना प्रकार के कष्ट ही मिलते हैं।

पशुबलि प्रथा से देवताओं का भारी अपयश होता है, हत्या का नृशंस पाप लगता है और बलि करने कराने वालों के पाप का निश्चित परिणाम भुगतने के लिये इस लोक में नाना प्रकार के दुःखों एवं परलोक में नारकीय यंत्रणाओं का भागी बनना पड़ता है। यह कुप्रथा निश्चित रूप से हिन्दू धर्म पर एक भारी कलंक है। जिस धर्म का मूल ही दया और अहिंसा हो उसमें इस प्रकार के कुकृत्यों को किसी भी प्रकार धर्मानुकूल नहीं कहा जा सकता।

धर्म के नाम पर अधार्मिक कृत्यों का प्रचलन प्रत्येक धर्म प्रेमी को एक मार्मिक पीड़ा पहुँचाने वाली बात है। कोई खाने की दृष्टि से माँस खावे तो उसकी व्यक्तिगत स्वार्थपरता ही मानी जायेगी इससे सारा समाज या सारा धर्म कलंकित नहीं होता पर पशुबलि सरीखे कृत्यों से तो हमारे अहिंसा, सत्य, प्रेम और दया मूलक धर्म की मूल मान्यताओं पर ही कुठाराघात होता है इसे देखकर सच्चे धर्म प्रेमी यदि चिन्तित खिन्न, और विहल हो तो यह सर्वथा उचित ही है।

इस विपन्न स्थिति को आखिर कब तक चलने दिया जाय? यह विचारणीय प्रश्न है। पिछले कुछ दिनों से हिन्दू धर्म की महानता को कलंकित करने वाली यह बातें अपनी जड़े जमायें बैठी हैं क्या आगे भी इनको ऐसे रूप में बैठें रहने दिया जाय? इस नवयुग की जागरण बेला में जबकि आत्म निरीक्षण, आत्म संशोधन और भविष्य निर्माण के लिए प्रयत्न चल रहा है तो यह भी उचित एवं आवश्यक है कि पशु बलि जैसी कलंकी कुप्रथाओं का उन्मूलन किया जाय।

गायत्री परिवार हिन्दू धर्म के शुद्ध स्वरूप को परिष्कृत एवं विकसित करने के लिये अपने जन्म काल से कटिबद्ध रहा है। अब तक विचार निर्माण एवं संगठनात्मक कार्यक्रमों को ही अपनाया गया था। अब समय आ गया है कि हिन्दू संस्कृति को कलंकित करने वाली विकृतियों के विरुद्ध कुछ संघर्षात्मक कदम भी उठायें जायें। अत्यंत सस्ता धार्मिक साहित्य लाखों करोड़ों लोगों तक पहुँचा कर धर्म के विशुद्ध स्वरूप से जन साधारण को अवगत कराने का प्रयत्न किया जाता रहा है। साप्ताहिक सत्संगों, गोष्ठियों, पर्व और संस्कारों के धर्मोत्सवों, शिक्षण शिविरों, यज्ञानुष्ठानों सम्मेलन और समाजों के माध्यम से वाणी द्वारा देश व्यापी लोक शिक्षण का भारी कार्य हुआ है पर इतने मात्र से ही कार्य न चलेगा अब नैतिक दुष्प्रवृत्तियों एवं सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए प्रबल लोकमत जागृत करने एवं प्रतिरोधी मोर्चा खड़ा करने की आवश्यकता को भी पूरा करना पड़ेगा।

व्यक्तिगत जीवन में माँसाहार, नशेबाजी, व्यभिचार, चोरी, बेईमानी, असंयम, आलस्य, गंदगी, ईर्ष्या, द्वेष, उद्दंडता, स्वार्थपरता आदि कितनी ही दुष्प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। हमारे सामाजिक जीवन में पशुबलि, दहेज, मृतकभोज, बालविवाह, फिजूल खर्ची, फैशनपरस्ती, अन्धविश्वास, नीच-ऊंच आदि अनेकों कुरीतियाँ पनप रही हैं। इन सभी के विरुद्ध किसी न किसी रूप में ऐसा प्रतिरोधी मोर्चा खड़ा करना होगा कि इन सत्यानाशी सड़कों पर दौड़ने वाले जनसमाज को रोका जा सके।

यद्यपि ऐसा प्रतिरोधी मोर्चा एवं वातावरण बनाना बहुत कठिन है जो बिना कोई तीव्र कटुता या झगड़ा फसाद खड़ा किये अपने उद्देश्य में सफल हो सकें, फिर भी इसके लिए प्रयत्न तो करना ही होगा। युग की चुनौती हमें हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहने नहीं देगी। अपने महान धर्म की, अपनी महान जाति की शान को विश्व के सम्मुख उज्ज्वल करने के लिए हमें कुछ प्रयत्न करना ही होगा, गायत्री परिवार ने युग निर्माण का जो उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर लिया है, उसे पूरा करने के लिए उसे कदम आगे बढ़ाने ही होंगे। अब उसका श्रीगणेश होना ही है, वह किया भी जा रहा है।

व्यापक असुरता के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए आरम्भ में एक मोर्चा चुनना ही युद्ध विद्या के अनुसार उचित माना जाता है। महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ करते हुए सर्व प्रथम नमक सत्याग्रह आरम्भ किया था। यों देखने में वह छोटा और कम महत्वपूर्ण था फिर भी आरम्भ की दृष्टि से वही उपयुक्त था अन्ततः उसकी प्रतिक्रिया व्यापक हुई और वह लड़ाई अनेक मोर्चों पर फैल गई। हमारे अनैतिकता विरोधी अभियान को भी यह गतिविधि अपनानी होगी। आरम्भ में व्यक्तिगत सुधार में माँसाहार, खान पान को आरम्भिक बात मानकर नशा विशेष और झूठन न छोड़ने का अभियान आरम्भ किया गया। हर्ष की बात है कि गत एक वर्ष में लगभग 80-82 हजार मनुष्य इन बुराइयों को छोड़ने की प्रतिज्ञा धर्म वेदियों पर ईश्वर को साक्षी देकर संकल्प पूर्वक कर चुके हैं और इन्हें दृढ़ता पूर्वक निबाह भी रहे हैं। सामाजिक जीवन दहेज और मृत्यु भोज सम्बन्धी प्रतिज्ञा आन्दोलन तेजी से चल रहा है। करीब 10 हजार अभिभावकों ने यह प्रतिज्ञाएं ली हैं कि वे अपने बच्चों के विवाह में न दहेज देंगे न लेंगे। इसी प्रकार लगभग 17 हजार कुमारियों ने यह धर्म प्रतिज्ञाएं की हैं यदि उनके अभिभावक दहेज के बिना उनका विवाह कर सकने में सफल न हुए तो वे आजीवन अविवाहित रहने को तैयार हैं। मृतक न भोजन करने और न खाने के लिए लगभग 1॥ लाख व्यक्ति अब तक प्रतिज्ञाएं ले चुके हैं। अन्य वैयक्तिक परिवार का प्रतिज्ञा आन्दोलन तेजी से चल रहा है। आगे यह और भी तीव्र होगा। इसके लिये अत्यन्त सस्ते 20 ट्रैक्ट लाखों की संख्या से प्रचारित किये गये है। प्रवचनों और प्रचार के लिए भारी प्रयत्न हो रहा है।

अब कुछ संघर्षात्मक कदम उठाने का भी श्री गणेश किया जा रहा है। इसके लिए ‘पशुबलि’ को प्रथम मोर्चा चुना गया है। यह बुराई न्यूनाधिक मात्रा में सभी प्रदेशों में मौजूद है। पर पहाड़ी प्रान्त, बंगाल एवं राजस्थान इस बुराई में अग्रणी हैं। अकेले राजस्थान को ही लीजिए वहाँ अब तक की जानकारी के अनुसार 183 स्थान ऐसे हैं जहाँ कम से कम एक सौ से लेकर कई हजार तक पशुबलि चढ़ जाते हैं। वह हत्याएं बेचारी काली माता को कलंकित करने के लिए की जाती है। गायत्री परिवार सत्य सनातन धर्म को मानने वाला होने के कारण अन्य देवताओं की भाँति काली माता के प्रति भी श्रद्धा रखने वाला है। वह अपनी आराध्य माता को इस कलंक से बचाने के लिए बड़े कष्ट उठाने और बड़े से बड़ा त्याग करने को भी प्रस्तुत हो गया है।

निश्चय यह किया गया है कि पशुबलि विरोधी मोर्चा मथुरा के समीपवर्ती प्रान्त पहले राजस्थान प्रान्त से आरम्भ किया जाय। धीरे-धीरे उसे अन्य प्रान्तों में भी विस्तृत किया जायेगा। आगामी जून से एक हजार धर्मप्रेमी स्वयंसेवक राजस्थान में पशुबलि विरोधी आन्दोलन करने रवाना होंगे।

(1) प्रचार द्वारा जन साधारण को इस कुप्रथा की हानियाँ समझाना (2) शास्त्रों की संख्या में प्रचार पत्र पुस्तिकाएं ट्रैक्ट वितरण करना, पोस्टर चिपकाना, दीवारों पर वाक्य लिखना, प्रवचन, मौलिक लालटैनों में स्लाइड चित्र दिखाना, संगीत भजन, जुलूस, सभा आदि उपायों का इसके लिये अवलंबन करना, गाँव गाँव पंचायतें, पशुबलि न करने के सामूहिक फैसले कराना (3) जिन मन्दिरों में बलि होती है उनके पुजारियों, संचालकों एवं प्रबन्धकों को इसे बन्द करने का निर्णय कराना और (4) जहाँ आवश्यकता हो वहाँ पशुबलि के स्थान पर अपनी गर्दनें अड़ा देना भी इस प्रचार जत्थे का काम होगा। इस चतुर्मुखी कार्यक्रमों को लेकर यह एक हजार धर्म सेवकों की सेना जून 60 के प्रथम सप्ताह में रवाना होगी। इस सेना के सेनापति श्री शंभू सिंह जी कौशिक नियुक्त किये गये हैं। आत्मदानी रामूसिंह जी की लगन, निष्ठा, सच्चाई, वीरता एवं धर्म के लिए शरीर को हथेली पर लिये फिरने की सीख से सारा गायत्री परिवार परिचित है। उनके नेतृत्व में जाने वाला यह जत्था पहाड़ जैसी कठिन दीखने वाली मंजिल को भी सरल बना सकता है। इस पर हर कोई सहज ही विश्वास कर सकता है। करना या मरना जिसका जीवन व्रत रहा हो वह क्या नहीं कर सकता?

कई कमजोर तबियत के व्यक्ति सोचते हैं कि कही कोई उपद्रव या अशान्ति इस आन्दोलन के कारण खड़े न हो जायें ऐसे लोगों को हम पूर्ण आश्वस्त कर देना चाहते हैं कि हमारे प्रत्येक आन्दोलन में पूर्ण अहिंसा, शिष्टता, मधुरता, सहनशीलता का समावेश रहेगा। स्वयं कष्ट उठाने के अतिरिक्त किसी विरोधी को कोई हानि न पहुँचने दी जायेगी। कानून और व्यवस्था की प्रत्येक मर्यादा का पूरा ध्यान रखा जायेगा और जहाँ की उपद्रव रोकने में सारी शक्ति लगा दी जायगी। देश का हर उत्तरदायी व्यक्ति जानता है कि चीन आक्रमण तथा देश के सम्मुख उपस्थित अनेक आन्तरिक समस्याओं को देखते हुए यह नितान्त आवश्यक है कि कोई फूट न पड़े। गायत्री परिवार के संचालक भी अपनी जिम्मेदारी को एक देश भक्त नागरिक की तरह भली प्रकार समझते हैं और हर शंका शंकित मन को आश्वस्त करना चाहते हैं कि हम अपने लक्ष तक भले ही देर से पहुँचें पर कोई अशान्ति या उपद्रव की स्थिति कहीं भी न आने देंगे।

पशुबलि विरोधी आन्दोलन के लिए एक हजार धर्म सैनिकों की आवश्यकता है। प्रत्येक सैनिक को कम से कम तीन महीने का समय लेकर आना चाहिए। पीछे उनके वापिस जाने पर दूसरे स्वयं सेवक उनका स्थान ग्रहण करते रहेंगे इस प्रकार यह कार्य चलता रहेगा। जिन्हें इस आन्दोलन में भाग लेने की तीव्र इच्छा है पर समय का बहुत अभाव है वे कम से कम एक महीने के लिए भी आ सकते हैं। भोजन का प्रबन्ध संस्था करेगी पर अन्य किसी आर्थिक सहायता की आशा स्वयं सैनिकों को कर लेनी चाहिए। शरीर को स्वस्थ, शिक्षित, सद्गुणी, मिष्ठाभाषी, कष्ट सहिष्णु होना आवश्यक है। जो इस धर्म सेवा में शामिल होना चाहें वे अभी से अपना नाम भेज कर स्वीकृति प्राप्त कर लें। गायत्री परिवार की तीन हजार शाखाओं में कई लाख सदस्य हैं। इनमें से एक हजार स्वयं सेवकों की संख्या पूरी हो जाना कुछ अधिक कठिन नहीं है। समय से पूर्व ही यह संख्या पूरी हो जायेगी।

गायत्री परिवार की यह नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का सुव्यवस्थिति कार्यक्रम बहुत दिनों से ठोस एवं रचनात्मक ढंग से सुव्यवस्थित क्रम से चल रहा है पर संघर्षात्मक कार्यक्रम में यह पशुबलि विरोधी आन्दोलन हमारा प्रथम प्रयास है। यह कदम पशुबलि तक ही सीमित नहीं है वरन् आगे दहेज, मृतक भोज आदि अनेकों सामाजिक कुरीतियों एवं वैयक्तिक अनैतिकताओं के विरुद्ध भी उठाया जायगा। इस आन्दोलन को सफल बनाने में हार्दिक आशीर्वाद, सद्भाव, सहयोग एवं मार्ग दर्शन की प्रत्येक धर्म प्रेमी से करबद्ध प्रार्थना है। आन्दोलन के पीछे सच्ची धर्म भावना के अतिरिक्त जन साधारण का, विशेषतया विज्ञ विचारशील सज्जनों का आशीर्वाद एवं मार्ग दर्शन ही वह तत्व है जिसके आधार पर किसी उल्लेखनीय सफलता की आशा की जा सकती है।


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जो मनुष्य दूसरे की स्त्री को माता के समान, दूसरे के धन को ढेले के समान और सब प्राणियों को अपने समान देखता है, वही परमात्मा को देख सकता है।

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पृथ्वी के तीन रत्न है- जल, अन्न, और प्रिय-वचन, पर मूर्खों ने जड़ पदार्थों के टुकड़ों का नाम रत्न रख छोड़ा है।

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जीना उसी मनुष्य का सम्भव है जो गुणी और धर्मात्मा हो। गुण-धर्म से हीन मनुष्य का जीना व्यर्थ है।

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गुणों के कारण मनुष्य उत्तम और ऊँचा गिना जाता है। ऊँचे आसन पर बैठने से उत्तम नहीं होता। मन्दिर की चोटी पर बैठा कौआ क्या गरुड़ हो सकता है?

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अन्न और जल के समान कोई दान नहीं है, गायत्री से बढ़ कर कोई मंत्र नहीं है और माता से बढ़ कर कोई देवी नहीं।

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निर्बुद्धि शिष्य को पढ़ाने से, दुष्ट स्त्री को प्यार करने से और दुखियों के साथ कारबार करने से पंडित जन दुःख ही पाते हैं।


तपोभूमि में प्राकृतिक चिकित्सा तथा शिक्षा की व्यवस्था

गत सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ से पूर्व तपोभूमि में प्राकृतिक चिकित्सा तथा उसकी शिक्षा की आयोजना की गई थी, सभी आवश्यक तैयारियाँ पूर्ण करली गई थी पर उन्हीं दिनों अनायास दैवी प्रेरणा से सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ की घोषणा करनी पड़ी और तुरन्त ही उसकी तैयारी में जुट जाना पड़ा तदनुसार वह प्राकृतिक चिकित्सा तथा शिक्षा की योजना स्थगित करनी पड़ी। महायज्ञ पूर्ण होने के बाद 24 हजार कुण्डों का संकल्प हो गया उसकी पूर्ति में लगभग सवा वर्ष लगा। उस युग का वह अभूतपूर्व संकल्प पूर्ण हो जाने पर अब वह अवसर आ गया है कि स्थगित की हुई प्राकृतिक चिकित्सा एवं शिक्षा की योजना को आरम्भ किया जा सके।

आगामी चैत्र सुदी 1 संवत् 2018 के नव वर्षीय शुभ दिन से वह मानव जाति की अत्यन्त महत्व पूर्ण सेवा का कार्य आरम्भ किया जा रहा है। इसमें ऐसे व्यक्ति लिए जावेंगे जो अपने निज के स्वास्थ्य को सुधारने के साथ साथ संसार की सबसे श्रेष्ठ आरोग्य विद्या प्राकृतिक चिकित्सा की शिक्षा भी प्राप्त करना चाहें। अभी प्रारंभ में कठिन कष्ट साध्य, छूत एवं संक्रामक रोगों के ऐसे रोगी नहीं लिए जावेंगे जो अपनी सामान्य शरीर सेवा आप स्वयं न कर सकें। फिलहाल ऐसे लोग प्रवेश किये जावेंगे जिनकी पाचन क्रिया खराब हो चुकी है। भूख नहीं लगती, पेट में नाना प्रकार के उपद्रव खड़े होते रहते हैं, नींद नहीं आती, सिर चकराता रहता है, खून नहीं बनता, दिन दिन कमजोर और पीले पड़ते जाते है, स्वप्नदोष, प्रमेह, पेशाब में पीलापन आदि की शिकायत रहती है। आम कमजोरी के कारण जो लोग धीरे-धीरे मौत के मुँह में सरकते चले जा रहे हैं उन्हें बचाने, भविष्य में वैसी परिस्थिति न आने देने का ही काम हाथ में लिया गया है। दुग्ध कल्प, छाछ कल्प, फल कल्प, जो चिकित्सा,सूर्य चिकित्सा, यज्ञ चिकित्सा आदि आधार पर ऐसा प्रयत्न किया जायेगा कि शरीर भीतरी दुर्बल अंग सशक्त होकर पुनः काम करने लगें और रोगी को नवजीवन प्राप्त होने जैसा आनन्दमय अनुभव होने लगे।

तीन मास का शिक्षा काल रहेगा। इसमें (1) स्वास्थ्य रक्षा विज्ञान, (2) रोगों से छुटकारा पाने की प्राकृतिक क्रिया (3) सूर्य नमस्कार, आसन प्राणायाम, लाठी चलाना आदि व्यायाम तथा (4) जीवन की विभिन्न समस्याओं के सुलझाव इन चारों विषयों पर प्रतिदिन चार क्लास लगा करेंगे। साथ ही शिक्षार्थी के शरीर में जो रोग कष्ट होगा उसके निवारण के लिए उसकी चिकित्सा भी चलती रहेगी। तीन मास में यह शिक्षा और चिकित्सा पूरी होने पर जो छात्र परीक्षा में उत्तीर्ण होंगे उन्हें प्रमाण पत्र भी दिये जावेंगे। यह छात्र स्वयं स्वास्थ्य लाभ करने के उपरान्त अपने क्षेत्र में अन्य रोगियों व चिकित्सा कर सकने में भली प्रकार समर्थ हो सकें ऐसी पूरी आशा की जा सकती है।

चिकित्सा एवं शिक्षा की कोई फीस नहीं है। भोजन भार अपना हर छात्र को स्वयं उठाना होगा प्रारम्भिक शिक्षासत्र आगामी चैत्र नवरात्रि से आरम्भ होगा। इसमें एक दो दिन पूर्व ही शिक्षार्थियों को मथुरा आ जाना चाहिए। प्रवेश बहुत सीमित संख्या में ही होगा इसलिए इच्छुकों को तपोभूमि से विस्तृत नियमावली मंगाकर अपना प्रवेश का शीघ्र ही भेजना चाहिए और प्रवेश कार्य स्वीकृति अभी से प्राप्त कर लेनी चाहिए। देर से आवेदन पत्र आ जाने पर अगले शिक्षा सत्रों के लिए ठहरना होगा क्योंकि सीमित संख्या में ही अभी व्यवस्था हो सकती है।


शत-शत उन्हें प्रणाम


शत-शत उन्हें प्रणाम (kavita)

करो कवि, शत-शत, उन्हें प्रणाम!

प्यासों को दें नीर, क्षुधित को पवन अन्न-प्रसाद।

वस्त्र-हीन को वस्त्र, भूमि-हीनों को भू-प्रसाद॥

सदा जो देते दान अनाम!

करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम!!

निराधारों को दें आधार, बतायें भूलों को जो राह।

साँत्वना दें जो बनकर सुहृद, कराहें जब पीड़ित भर आह॥

कर्म में जिन के नहीं विराम!

करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम॥

तिमिर में दे जो दिव्य-प्रकाश, रुदन में अभिनवसा मधुहास।

व्यथा के बदले में मुस्कान, अकेले में तेरा आभास॥

वही तेरे स्वरूप अभिराम।

करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम॥

स्वयं सहते हैं आतप शीत, विनत हो जाते पा फल -भार।

थके पथिकों को दें विश्रान्ति, सुखद छाया ये तरु-उपहार॥

चोट सह दें जो फल रस-धाम।

करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम॥

दीप जला करता आलोकित पंथ, जो होता तुम से पूर्ण।

बहा करती सरिता अनवरत, धरा की रहे न प्यास अपूर्ण॥

करें सेवा, जो हो निष्काम।

करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम॥

-राम स्वरूप खरे, साहित्य रत्न

*समाप्त*