अभिव्यक्ति


अभिव्यक्ति (kavita)

जल हूँ मैं छलकूँगा जी भर गागर की परवाह करूं क्या?

गागर फूट गई तो प्यासे अधरों पर ही रुक जाऊंगा॥

बन जाता है नीर भँवर का

जिस से नहीं बहा जाता है,

भय से प्रेरित हो कर रुकना

संयम नहीं कहा जाता है।

स्वर हूँ मैं गूंजूंगा जी भर वंशी की परवाह करूं क्या-

वंशी टूट गई तो वाणी के रन्ध्रों पर झुक जाऊंगा।

एकाकी को नहीं जरूरत

जो मुझको आवाज लगाए,

बस इतना काफी है जब-तब

वह सूनेपन से घबराए,

मन हूँ मैं विचरुँगा घर-घर तन की मैं परवाह करूं क्या-

तन न रहेगा तो धरती का ऋण हूँ आखिर चुक जाऊंगा।

जिस में गंध अधिक होती है

उस को पहले तोड़ा जाता,

जिस में रस ज्यादा होता है-

उस को और निचोड़ा जाता,

सौरभ हूँ महकूँगा जी भर उपवन की परवाह करूं क्या

उपवन रूठ गया तो सब के दरवाजों से टकराउँगा।

-रामावतार त्यागी।

सम्पादकीय


आचार्य जी की तप साधना का उद्देश्य

तप की शक्ति अपार है। जो कुछ अधिक से अधिक शक्ति सम्पन्न तत्व इस विश्व में हैं, उसका मूल ‘तप’ में ही सन्निहित है। सूर्य तपता है इसलिए ही वह समस्त विश्व को जीवन प्रदान करने लायक प्राण भण्डार का अधिपति है। ग्रीष्म की ऊष्मा से जब वायु मण्डल भली प्रकार तप लेता है तो मंगलमयी वर्षा होती है। सोना तपता है तो खरा तेजस्वी और मूल्यवान बनता है। जितनी भी धातुएँ हैं वे सभी खान से निकलते समय दूषित, मिश्रित व दुर्बल होती हैं पर जब उन्हें कई बार भट्टियों में तपाया, पिघलाया और गलाया जाता है तो वे शुद्ध एवं मूल्यवान बन जाती हैं। कच्ची मिट्टी के बने हुए कमजोर खिलौने और बर्तन जरा से आघात में टूट सकते हैं। तपाये और पकाये जाने पर मजबूत एवं रक्त वर्ण हो जाते हैं। कच्ची ईंटें भट्टे में पकने पर पत्थर जैसी कड़ी हो जाती हैं। मामूली से कच्चे कंकड़ पकने पर चूना बनते हैं और उनके द्वारा बने हुये विशाल प्रासाद दीर्घ काल तक बने खड़े रहते हैं।

मामूली सा अभ्रक जब सौ बार अग्नि में तपाया जाता है तो चन्द्रोदय रस बन जाता है। अनेकों बार अग्नि संस्कार होने से ही धातुओं की मूल्यवान भस्म रसायनें बन जाती हैं और उनसे अशक्त एवं कष्ट साध्य रोगों से ग्रस्त रोगी पुनर्जीवन प्राप्त करते हैं। साधारण अन्न और दाल शाक जो कच्चे रूप में न तो सुपाच्य होते हैं और न स्वादिष्ट। वे ही अग्नि संस्कार से पकाये जाने पर सुरुचिपूर्ण व्यंजनों का रूप धारण कर लेते हैं। धोबी की भट्टी में चढ़ने पर मैले-कुचैले कपड़े निर्मल एवं स्वच्छ बन जाते हैं। पेट की जठराग्नि द्वारा पचाया हुआ अन्न ही रक्त अस्थि का रूप धारण कर हमारे शरीर का भाग बनता है। यदि यह अग्नि संस्कार की, तप की प्रक्रिया बन्द हो जाए तो निश्चित रूप से विकास का सारा क्रम ही बन्द हो जाएगा।

प्रकृति तपती है इसलिये सृष्टि की सारी संचालन व्यवस्था चल रही है। जीव तपता है उसी से उसके अन्तराल में छिपे हुए पुरुषार्थ, पराक्रम, साहस, उत्साह, उल्लास, ज्ञान, विज्ञान आदि प्रकृति रत्नों की शृंखला प्रस्फुटित होती है। माता अपने अण्ड एवं गर्भ को अपनी उदस्थ ऊष्मा से पका कर शिशु को प्रसव करती है। जिन जीवों ने मूर्च्छित स्थिति से ऊंचे उठने की, खाने सोने से कुछ अधिक करने की आकाँक्षा की है उन्हें तप करना पड़ा है। संसार में अनेकों पुरुषार्थी, पराक्रमी एवं इतिहास के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ने वाले महापुरुष जो हैं, उन्हें किसी न किसी रूप में अपने ढंग का तप करना पड़ा है। कृषक, विद्यार्थी, श्रमिक, वैज्ञानिक, शासक, विद्वान, उद्योगी, कारीगर आदि सभी महत्वपूर्ण कार्य भूमिकाओं का सम्पादन करने वाले व्यक्ति वे ही बन सके हैं जिन्होंने कठोर श्रम, अध्यवसाय एवं तपश्चर्या की नीति को अपनाया है। यदि इन लोगों ने आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता, शिथिलता एवं विलासिता की नीति अपनाई होती तो वे कदापि उस स्थान पर न पहुँच पाते, जो उन्होंने कष्ट-सहिष्णु एवं पुरुषार्थी बनकर उपलब्ध किया है।

सभी पुरुषार्थों में आध्यात्मिक पुरुषार्थ का मूल्य और महत्व अधिक है, ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कि सामान्य धन सम्पत्ति की अपेक्षा आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा की महत्ता अधिक है। धन, बुद्धि, बल आदि के आधार पर अनेकों व्यक्ति उन्नतिशील, सुखी एवं सम्मानित बनते हैं पर उन सबसे अनेकों गुना महत्व वे लोग प्राप्त करते हैं जिन्होंने आध्यात्मिक बल का संग्रह किया है। पीतल और सोने में, काँच और रत्न में जो अन्तर है, वही अंतर साँसारिक सम्पत्ति एवं आध्यात्मिक सम्पदा के बीच में भी है। इस संसार में धनी, सेठ, अमीर, उमराव, गुणी, विद्वान, कलावन्त बहुत हैं पर उनकी तुलना उन महात्माओं के साथ नहीं हो सकती जिन्होंने अपने आध्यात्मिक पुरुषार्थ के द्वारा अपना ही नहीं सारे संसार का हित साधन किया। प्राचीनकाल में सभी समझदार लोग अपने बच्चों को कष्ट सहिष्णु, अध्यवसायी, तितिक्षा शील एवं तपस्वी बनाने के लिये छोटी आयु में ही गुरुकुलों में भर्ती करते थे ताकि आगे चलकर वे कठोर जीवन यापन करके अभ्यस्त होकर महापुरुषों की महानता के अधिकारी बन सकें।

संसार में जब कभी कोई महान कार्य सम्पन्न हुये हैं तो उनके पीछे तपश्चर्या की शक्ति अवश्य रही है। हमारा देश देवताओं और नररत्नों का देश रहा है। यह भारतभूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती रही है। ज्ञान, पराक्रम और सम्पदा की दृष्टि से यह राष्ट्र सदा से विश्व का मुकुटमणि रहा है। उन्नति के इस उच्च शिखर पर पहुँचने का कारण यहाँ के निवासियों की प्रचण्ड तप निष्ठा ही रही है, आलसी और विलासी, स्वार्थी और लोभी लोगों को यहाँ सदा से घृणित एवं निकृष्ट श्रेणी का जीव माना जाता रहा है। तप शक्ति की महत्ता को यहाँ के निवासियों ने पहचाना, तत्वत कार्य किया और उसके उपार्जन में पूरी तत्परता दिखाई। तभी यह संभव हो सका कि भारत को जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं सम्पदाओं के स्वामी होने का इतना ऊँचा गौरव प्राप्त हुआ।

पिछले इतिहास पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत का बहुमुखी विकास तपश्चर्या पर आधारित एवं अवलंबित रहा है। सृष्टि के उत्पन्न कर्ता प्रजापति ब्रह्माजी ने सृष्टि निर्माण के पूर्व विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल पुष्प पर अवस्थित होकर सौ वर्षों तक गायत्री उपासना के आधार पर तप किया तभी उन्हें सृष्टि निर्माण एवं ज्ञान विज्ञान के उत्पादन की शक्ति उपलब्ध हुई। मानव धर्म के आविष्कर्ता भगवान मनु ने अपनी रानी शतरूपा के साथ प्रचण्ड तप करने के पश्चात् ही अपना महत्व पूर्ण उत्तरदायित्व पूर्ण किया था। भगवान शंकर स्वयं तप रूप हैं। उनका प्रधान कार्यक्रम सदा से तप साधना ही रहा। शेष जी तप के बल पर ही इस पृथ्वी को अपने शीश पर धारण किये हुए हैं। सप्त ऋषियों ने इसी मार्ग पर दीर्घ काल तक चलते रह कर वह सिद्धि प्राप्त की जिससे सदा उनका नाम अजर अमर रहेगा। देवताओं के गुरु बृहस्पति और असुरों के गुरु शुक्राचार्य अपने अपने शिष्यों के कल्याण, मार्ग दर्शन और सफलता की साधना अपनी तप शक्ति के आधार पर ही करते रहे हैं।

नई सृष्टि रच डालने वाले विश्वामित्र की, रघुवंशी राजाओं का अनेक पीढ़ियों तक मार्गदर्शन करने वाले वशिष्ठ की क्षमता तथा साधना में ही अन्तर्हित थी। एक बार राजा विश्वामित्र जब बन में अपनी सेना को लेकर पहुँचे तो वशिष्ठजी ने कुछ सामान न होने पर भी सारी सेना का समुचित आतिथ्य कर दिखाया तो विश्वामित्र दंग रह गये। किसी प्रसंग को लेकर जब निहत्थे वशिष्ठ और विशाल सेना सम्पन्न विश्वामित्र में युद्ध ठन गया तो तपस्वी वशिष्ठ के सामने राजा विश्वामित्र को परास्त ही होना पड़ा। उन्होंने “धिग् बलं आश्रम बलं ब्रह्म तेजो बलं बलम्।” की घोषणा करते हुए राजपाट छोड़ दिया और सबसे महत्व पूर्ण शक्ति की तपश्चर्या के लिए ही शेष जीवन समर्पित कर दिया।

अपने नरक गामी पूर्व पुरुषों का उद्धार करने तथा प्यासी पृथ्वी को जल पूर्ण करके जन-समाज का कल्याण करने के लिए गंगावतरण की आवश्यकता थी। इस महान उद्देश्य की पूर्ति लौकिक पुरुषार्थ से नहीं वरन् तपशक्ति से ही संभव थी। भगीरथ कठोर तप करने के लिए बन को गये और अपनी साधना से प्रभावित कर गंगा जी को भूलोक में लाने एवं शिवजी को उन्हें अपनी जटाओं में धारण करने के लिए तैयार कर लिया। यह कार्य साधारण प्रक्रिया से सम्पन्न न होते। तप ने ही उन्हें संभव बनाया।

च्यवन ऋषि इतना कठोर दीर्घ-कालीन तप कर रहे थे कि उनके सारे शरीर पर दीमक ने अपना घर बना लिया था और उनका शरीर एक मिट्टी के टीले जैसा बन गया था। राजकुमारी सुकन्या को दो छेदों में से दो चमकदार चीजें दिखीं और उनमें उसने काँटे चुभो दिए। यह चमकदार चीजें और कुछ नहीं। च्यवन ऋषि की आँखें ही थीं। च्यवन ऋषि को इतनी कठोर तपस्या इसीलिए करनी पड़ी कि वे अपनी अन्तरात्मा में सन्निहित शक्ति केन्द्रों को जागृत करके परमात्मा के अक्षय शक्ति भण्डार में भागीदार बनने की अपनी योग्यता सिद्ध कर सकें।

शुकदेव जी जन्म से साधन रत हो गये। उन्होंने मानव जीवन का एक मात्र सदुपयोग इसी में समझा कि इसका उपयोग आध्यात्मिक प्रयोजनों में करके नर-तनु जैसे सुर दुर्लभ सौभाग्य का सदुपयोग किया जाए। वे चकाचौंध पैदा करने वाले वासना एवं तृष्णा जन्य प्रलोभनों को दूर से नमस्कार करके ब्रह्म ज्ञान की, ब्रह्म तत्व की उपलब्धि में संलग्न हो गये।

तपस्वी ध्रुव ने खोया कुछ नहीं। यदि वह साधारण राजकुमार की तरह मौज शौक का जीवन यापन करता तो समस्त ब्रह्माण्ड का केन्द्र बिन्दु ध्रुवतारा बनने और अपनी कीर्ति को अमर बनाने का लाभ उसे प्राप्त न हो सका होता। उस जीवन में भी उसे जितना विशाल राज-पाट मिला, उतना अपने पिता की अधिक से अधिक कृपा प्राप्त होने पर भी उसे उपलब्ध न हुआ होता। पृथ्वी पर बिखरे अन्न कणों को बीन कर अपना निर्वाह करने वाले कणाद ऋषि, वट वृक्ष के दूध पर गुजारा करने वाले बाल्मीक ऋषि भौतिक विलासिता से वंचित रहे पर इसके बदले में जो कुछ पाया वह बड़ी से बड़ी सम्पदा से कम न था।

भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने अपने काल की लोक दुर्गति को मिटाने के लिए तपस्या को ही ब्रह्मास्त्र के रूप में योग्य किया। व्यापक हिंसा और असुरता के वातावरण को दया और अहिंसा के रूप में परिवर्तित कर दिया। दुष्टता को हटाने के लिए यों तो अस्त्र-शस्त्रों का, दण्ड दमन का मार्ग सरल समझा जाता है पर वह भी सेना एवं आयुधों की सहायता से उतना नहीं हो सकता जितना तपोबल से अत्याचारी शासकों का सारी पृथ्वी से उन्मूलन करने के लिए परशुराम जी का फरसा अभूतपूर्व अस्त्र सिद्ध हुआ। उसी से उन्होंने बड़े-बड़े सेना सामन्तों से सुसज्जित राजाओं को परास्त करके 21 बार पृथ्वी को राजाओं से रहित कर दिया। अगस्त्य का कोप बेचारा समुद्र क्या सहन करता। उन्होंने तीन चुल्लुओं में सारे समुद्र को उदरस्थ कर लिया। देवता जब किसी प्रकार असुरों को परास्त न कर सके, लगातार हारते ही गये तो तपस्वी दधीचि की तेजस्वी हड्डियों का वज्र प्राप्त कर इन्द्र ने देवताओं की नाव को पार लगाया।

प्राचीन काल में विद्या का अधिकारी वही माना जाता था जिसमें तितिक्षा एवं कष्ट सहिष्णुता की क्षमता होती थी। ऐसे ही लोगों के हाथ में पहुँच कर विद्या उसका तथा समस्त संसार का लाभ करती थी। आज विलासी और लोभी प्रकृति के लोगों को ही विद्या सुलभ हो गई। फलस्वरूप वे उसका दुरुपयोग भी खूब कर रहे हैं। हम देखते हैं कि अशिक्षितों की अपेक्षा सुशिक्षित ही मानवता से अधिक दूर हैं और वे ही विभिन्न प्रकार की समस्यायें उत्पन्न करके संसार की सुख शान्ति के लिए अभिशाप बने हुए हैं। प्राचीन काल में प्रत्येक अभिभावक अपने बालकों को तपस्वी मनोवृत्ति का बनाने के लिए उन्हें गुरुकुलों में भेजता था और गुरुकुलों के संचालक बहुत समय तक बालकों में कष्ट सहिष्णुता जागृत करते थे और जो इस प्रारम्भिक परीक्षा में सफल होते थे, उन्हें ही परीक्षाधिकारी मान कर विद्यादान करते थे। उद्दालक, आरुणि आदि अगणित छात्रों को कठोर परीक्षाओं में से गुजरना पड़ता था। इसका वृत्तांत सभी को मालूम है।

ब्रह्मचर्य तप का प्रधान अंग माना गया है। बजरंगी हनुमान, बाल-ब्रह्मचारी भीष्म पितामह के पराक्रमों से हम सभी परिचित हैं। शंकराचार्य, दयानन्द प्रभृति अनेकों महापुरुष अपने ब्रह्मचर्य व्रत के आधार पर ही संसार की महान सेवा कर सके। प्राचीन काल में ऐसे अनेकों गृहस्थ होते थे जो विवाह होने पर भी पत्नी समेत अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करते थे।

आत्मबल प्राप्त करके तपस्वी लोग उस तप बल से न केवल अपना आत्म कल्याण करते थे वरन् अपनी थोड़ी सी शक्ति अपने शिष्यों को देकर उनको भी महापुरुष बना देते थे। विश्वामित्र के आश्रम में रह कर रामचन्द्र जी का, संदीपन ऋषि के गुरुकुल में पढ़कर कृष्णचन्द्र जी का ऐसा निर्माण हुआ कि भगवान ही कहलाये। समर्थ गुरु रामदास के चरणों में बैठ कर एक मामूली सा मराठा बालक, छत्रपति शिवाजी बना। रामकृष्ण परमहंस से शक्ति कण पाकर नास्तिक नरेन्द्र, संसार का श्रेष्ठ धर्म प्रचारक विवेकानन्द कहलाया। प्राण रक्षा के लिए मारे-मारे फिरते हुए इन्द्र को महर्षि दधीचि ने अपनी हड्डियाँ देकर उसे निर्भय बनाया, नारद का जरा सा उपदेश पाकर डाकू बाल्मीक महर्षि बाल्मीक बन गया।

उत्तम सन्तान प्राप्त करने के अभिलाषी भी तपस्वियों के अनुग्रह से सौभाग्यान्वित हुए हैं। तीन विवाह कर लेने पर भी संतान न होने पर शृंगी ऋषि द्वारा आयोजित पुत्रेष्टि यज्ञ के द्वारा राजा दशरथ को चार पुत्र प्राप्त हुए। राज दिलीप ने चिरकाल तक अपनी रानी समेत वशिष्ठ के आश्रम में रहकर गौ चराकर जो अनुग्रह प्राप्त किया उसके फल स्वरूप ही डूबता वंश चला, पुत्र प्राप्त हुआ। पाण्डु जब सन्तानोत्पादन में असमर्थ रहे तो व्यास जी के अनुग्रह से परम प्रतापी पाँच पाण्डव उत्पन्न हुए। श्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में कहा जाता है कि उनके पिता मोतीलाल नेहरू जब चिरकाल तक संतान से वंचित रहे तो इनकी चिन्ता दूर करने के लिए हिमालय निवासी एक तपस्वी ने अपना शरीर त्यागा और उनका मनोरथ पूर्ण किया। अनेकों ऋषि-कुमार अपने माता-पिता के प्रचण्ड आध्यात्मबल को जन्म से ही साथ लेकर पैदा होते थे और वे बालकपन में वे कर्म कर लेते थे तो बड़ों के लिए भी कठिन होते हैं। लोमश ऋषि के पुत्र शृंगी ऋषि ने राजा परीक्षित द्वारा अपने पिता के गले में सर्प डाला जाना देख कर क्रोध में शाप दिया कि सात दिन में यह कुकृत्य करने वाले को सर्प काट लेगा। परीक्षित की सुरक्षा के भारी प्रयत्न किए जाने पर भी सर्प से काटे जाने का ऋषि कुमार का शाप सत्य ही होकर रहा।

शाप और वरदानों के आश्चर्य जनक परिणामों की चर्चा से हमारे प्राचीन इतिहास का पन्ना पन्ना भरा पड़ा है। श्रवणकुमार को तीर मारने के दंड स्वरूप उसके पिता ने राजा दशरथ को शाप दिया कि वह भी पुत्र शोक से इसी प्रकार बिलख बिलख कर मरेगा, तपस्वी के मुख से निकला हुआ वचन असत्य नहीं हो सकता था, दशरथ को उसी प्रकार मरना पड़ा था। गौतम ऋषि के शाप से इन्द्र और चन्द्रमा जैसे देवताओं की दुर्गति हुई। राजा सगर के दस हजार पुत्रों को कपिल के क्रोध करने के फलस्वरूप जल कर भस्म होना पड़ा। प्रसन्न होने पर देवताओं की भाँति तपस्वी ऋषि भी वरदान प्रदान करते थे और दुख-दारिद्र से पीड़ित अनेकों व्यक्ति सुख शाँति के अवसर प्राप्त करते थे।

पुरुष ही नहीं तप साधना के क्षेत्र में भारत की महिलाएँ भी पीछे न थीं। पार्वती ने प्रचण्ड तप करके मदन दहन करने वाले समाधिस्थ शंकर को विवाह करने के लिये विवश किया, अनुसूया ने अपनी आत्मशक्ति से ब्रह्मा विष्णु महेश को नन्हे-नन्हे बालकों के रूप में परिणत कर दिया। सुकन्या ने तप करके अपने वृद्ध पति च्यवन को युवा बनाया।

सावित्री ने यम से संघर्ष करके अपने मृतक पति के प्राण लौटाये। कुन्ती ने सूर्य का तप करके कुमारी अवस्था में सूर्य समान तेजस्वी कर्ण को जन्म दिया क्रुद्ध गान्धारी ने कृष्ण को शाप दिया कि जिस प्रकार मेरे कुल का नाश किया है वैसे ही तेरे सारे कुल का इसी प्रकार परस्पर संघर्ष में अन्त होगा। उसके वचन मिथ्या नहीं गये। सारे यादव आपस में ही लड़कर नष्ट हो गये। दमयन्ती के शाप से व्याध को जीवित जल जाना पड़ा। इड़ा ने अपने पिता मनु का यज्ञ सम्पन्न कराया और उनके अभीष्ट प्रयोजन करने में सहायता की। इन आश्चर्यजनक कार्यों के पीछे उनकी तप-शक्ति की महिमा प्रत्यक्ष है।

देवताओं और ऋषियों की भाँति ही असुर भी यह भली-भाँति जानते थे कि तप में ही शक्ति की वास्तविकता केन्द्रित है। उन्होंने भी प्रचण्ड तप किए और वरदान प्राप्त किए जो सुर पक्ष के तपस्वी भी प्राप्त न कर सके थे। रावण ने अनेकों बार सिर का सौदा करने वाली तप साधना की और शंकर जी को इंगित करके अजेय शक्तियों का भण्डार प्राप्त किया। कुम्भकरण ने तप द्वारा ही छः-छः महीने सोने जागने का अद्भुत वरदान पाया था। मेघनाद, अहिरावण और मारीच की विचित्र माया-शक्ति भी उन्हें तप द्वारा ही मिली थी। भस्मासुर ने सिर पर हाथ रखने से किसी को भी जला देने की शक्ति तप करके ही प्राप्त की थी। हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, सहस्रबाहु, बालि आदि असुरों के पराक्रम का भी मूल आधार तप ही था। विश्वामित्र और राम के लिए सिर दर्द बनी हुई ताड़का, श्री कृष्ण चन्द्र के प्राण लेने का सहारा करने वाली पूतना, हनुमान को निगल जाने की क्षमता सम्पन्न सुरसा, अशोक वाटिका में सीता को नाना प्रकार के कौतूहल दिखाने वाली त्रिजटा आदि अनेकों असुर नारियाँ भी ऐसी थीं जिन्होंने आध्यात्मिक क्षेत्र में अच्छा खासा परिचय दिया है।

इस प्रकार के दस बीस नहीं हजारों लाखों प्रसंग भारतीय इतिहास में मौजूद हैं जिनसे तप शक्ति के लाभों से लाभान्वित होकर साधारण नर तनुधारी जीवों ने विश्व को चमत्कृत कर देने वाले स्वपर कल्याण के महान आयोजन पूर्ण करने वाले उदाहरण उपस्थित किए हैं। इस युग में महात्मा गाँधी, सन्त विनोबा, ऋषि दयानन्द, मीरा, कबीर, दादू, तुलसीदास, सूरदास, रैदास, अरविन्द, महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस, रामतीर्थ आदि आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा जो कार्य किए गये हैं, वे साधारण भौतिक पुरुषार्थों द्वारा पूरे किए जाने सम्भव न थे।

परम पूज्य आचार्य जी ने भी अपने जीवन के आरम्भ से ही यह तपश्चर्या का कार्य अपनाया है। 24 महापुरश्चरणों के कठिन तप द्वारा उपलब्ध शक्ति का उपयोग उन्होंने लोक कल्याण में किया है। फलस्वरूप अगणित व्यक्ति इनकी सहायता से भौतिक उन्नति एवं आध्यात्मिक प्रगति की उच्च कक्षा तक पहुँचे हैं। अनेकों को भारी व्यथा व्याधियों से, चिन्ता परेशानियों से छुटकारा मिला है। साथ ही धर्म जागृति एवं नैतिक पुनरुत्थान की दिशा में आशा जनक कार्य हुआ है। 24 लक्ष गायत्री उपासकों का निर्माण एवं 24 हजार कुण्डों के यज्ञों का संकल्प इतना महान था कि सैकड़ों व्यक्ति मिलकर कई जन्मों में भी पूर्ण नहीं कर सकते किन्तु वह सब कार्य कुछ ही दिनों में बड़े आनन्द पूर्वक पूर्ण हो गया। गायत्री तपोभूमि का, गायत्री परिवार का निर्माण एवं वेद भाष्य का प्रकाशन ऐसे कार्य हैं जिसके पीछे उनकी साधना तपश्चर्या का ही प्रताप झाँक रहा है।

आगे उन्होंने और भी प्रचण्ड तप करने का यदि निश्चय किया है और भावी जीवन को तप साधना में ही लगा देने का निश्चय किया है तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। वे तप का महत्व समझ चुके हैं कि संसार के बड़े से बड़े पराक्रम, पुरुषार्थ एवं उपार्जन की तुलना में तप साधना का मूल्य अत्यधिक है। जौहरी काँच को फेंक कर रत्न की साज संभाल करता है। उन्होंने भी भौतिक सुखों को लात मार कर यदि तप की सम्पत्ति एकत्रित करने का निश्चय किया है तो हम मोह-ग्रस्त परिजन भले ही खिन्न होते रहें, वस्तुतः उस निश्चय में दूर-दर्शिता और बुद्धिमानी ही ओत-प्रोत है।

सम्भव है वे अभी और कुछ दिन ठहर कर उस आराधना को करते जो तुरन्त ही उन्होंने आरम्भ की है। इस शीघ्रता का कारण उनकी जल्दबाजी नहीं वरन् वर्तमान परिस्थितियों की विवशता ही है। संसार का वातावरण दिन-दिन तेजी के साथ ऐसा विषाक्त होता चला जा रहा है कि उसमें कोई छोटी सी चिनगारी भी विस्फोट कर सकती है। संसार का भयंकर अहित हो सकता है। इस भयंकरता को शाँत करने के लिए विश्व शान्ति का जो वरुणास्त्र चाहिए वह तप के द्वारा ही उपलब्ध हो सकता है। असुरता का जो विकराल रूप सामने उपस्थित हुआ है, उसके शमन के लिए प्राचीन काल के दधीचि व भगीरथ जैसे उदाहरणों का प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है।

अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ ज्वालामुखी की तरह भीतर ही भीतर धधक रही हैं। यू 2 जहाज रूस में गिराये जाने और पेरिस का शिखर सम्मेलन असफल हो जाने के बाद यह पंक्तियाँ लिखते समय तक जो घटना-चक्र प्रत्यक्ष और गुप्त रूप में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में घटित हो रहा है, वह काफी चिन्ताजनक है। कौन जानता है कि उसका विस्फोट कब हो जाए? अगला युद्ध तीर तलवारों से, तोप बन्दूकों से वर्षों तक लड़ा जाने वाला नहीं होगा वरन् दो-चार घण्टे के भीतर ही प्रलय के दृश्य उपस्थित कर देगा। उससे लड़ने वाले देश ही नहीं, न लड़ने वाले शान्ति प्रिय लोग भी तबाह हो जाएँगे। सन् 62 में अष्टग्रही योग से वर्तमान विश्व राजनीति का विचार करने से चिन्ता जनक लक्षण और भी अधिक बढ़ जाते हैं। चीन और भारत के मनोमालिन्य जैसी गुत्थियाँ तो संसार में सर्वत्र फैली पड़ी हैं। इन बारूदी सुरंगों में से भी कभी कोई ऐसे विस्फोट हो सकते हैं जिनकी चिनगारी विकराल रूप धारण करके समस्त विश्व के लिए सत्यानाशी परिणाम उपस्थित कर दें। मोरक्को, चिली आदि में जो प्रकोप हुए हैं उनसे धन जाति की अपार हानि हुई है। ऐसे ही उपद्रव और भयंकर रूप से सामने आ सकते है।

राजनैतिक और वैज्ञानिक दोनों मिलकर रचना कर रहे हैं वह केवल आग लगाने वाली, नाश करने वाली ही है। ऐसे हथियार तो बन रहे हैं जो विपक्षी देशों को तहस नहस करने में अपनी विजय पताका गर्व पूर्वक फहरा सकें। पर ऐसे शस्त्र कोई नहीं बना पा रहा है जो लगाई हुई आग को बुझा सके, आग लगाने वालों के हाथों को कुँठित कर सके। और जिनके दिलों व दिमागों में नृशंसता की भट्टी जलती है, उनमें शान्ति एवं सौभाग्य की सरसता प्रवाहित कर सकें। ऐसे शान्ति शस्त्रों का निर्माण राजधानियों में, वैज्ञानिक प्रयोग शालाओं में नहीं हो सकता है। प्राचीन काल में जब भी इस प्रकार की आवश्यकता अनुभव हुई है तब तपोवनों की प्रयोगशाला में तप साधना के महान प्रयत्नों द्वारा ही शान्ति शस्त्र तैयार किये गये हैं। पूज्य आचार्यजी तथा उनकी सरीखी और भी कई आत्माएँ इसी प्रयत्न के लिए अग्रसर हुई हैं।

संसार को, मानव जाति को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए अनेक प्रयत्न हो रहे हैं, उद्योग धंधे, कलकारखाने, रेल तार, सड़क, बाँध, स्कूल, अस्पताल आदि का बहुत कुछ निर्माण कार्य चल रहा है। इससे गरीबी और बीमारी, अशिक्षा और असभ्यता का बहुत कुछ समाधान होने की आशा की जाती है पर मानव अन्तःकरणों में प्रेम और आत्मीयता का, स्नेह और सौजन्य का, आस्तिकता और धार्मिकता का, सेवा और संयम का निर्भर प्रवाहित किये बिना विश्व शान्ति की दिशा में कोई ठोस कार्य न हो सकेगा। जब तक सन्मार्ग की प्रेरणा देने वाले, गाँधी, दयानन्द, शंकराचार्य, बुद्ध, महावीर, नारद, व्यास जैसे आत्मबल सम्पन्न मार्गदर्शक न हों तब तक लोक मानस को ऊंचा उठाने के प्रयत्न सफल न होंगे। लोक मानस को ऊंचा उठाये बिना, पवित्र और आदर्शवादी भावनाएं उत्पन्न किये बिना लोक की गतिविधियाँ ईर्ष्या-द्वेष, शोषण, अपहरण, आलस्य प्रमाद, व्यभिचार, पापाचार से रहित न होंगी तब तक क्लेश और कलह से, रोग और दारिद्र से कदापि छुटकारा न मिलेगा।

लोक मानस को पवित्र, सात्विक एवं मानवता के अनुरूप नैतिकता से परिपूर्ण बनाने के लिये जिन सूक्ष्म आध्यात्मिक दिव्य तरंगों का प्रवाहित किया जाना आवश्यक है, वे उच्चकोटि की आत्माओं द्वारा विशेष तप साधना से ही उत्पन्न होंगी। मानवता की, धर्म और संस्कृति की यही सबसे बड़ी सेवा है। आज इन प्रयत्नों की तुरन्त आवश्यकता अनुभव की जाती है क्योंकि जैसे जैसे दिन बीतते जाते हैं असुरता का पल्ला अधिक भारी होता जाता है। देरी करने में अहित और अनिष्ट की ही अधिक सम्भावना हो सकती है।

समय की इसी पुकार ने पूज्य आचार्य जी को वर्तमान कदम उठाने को, अज्ञातवास में जाने को बाध्य किया है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये आज तक कुछ भी प्रयत्न नहीं किया है। धन ऐश्वर्य कमाना तो दूर, आध्यात्मिक साधनाओं के लिये भी उनका दृष्टिकोण व्यक्तिगत लाभ का नहीं रहा। वे जो कुछ भी जप तप करते हैं प्रायः उसी दिन किसी पीड़ित परेशान व्यक्ति के कल्याण के लिये अथवा संसार में धार्मिक वातावरण उत्पन्न करने के लिये उसे दान कर देते हैं। अभी कई जन्म भी लेने का उनका विचार है। संसार में धर्म की स्थापना हुए बिना, मानव प्राणी के अन्तराल में मानवता की समुचित प्रतिष्ठापना किये बिना, किसी स्वर्ग मुक्ति में जाने का उनका विचार बिल्कुल ही नहीं है। इसलिये वे अपने लिये कोई सिद्धि नहीं चाहते। विश्व हित ही उनका अपना हित है। इसी लक्ष्य को लेकर तप की अधिक उग्र अग्नि में अपने को तपाने को उन्होंने वर्तमान कदम उठाया है। माता उनका मनोरथ सफल करें, यह प्रार्थना हम सबको करनी चाहिये।


स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों का स्रोत-गायत्री

(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

वृक्ष का मूल कारण बीज हैं। बीज न हो तो वृक्ष का अस्तित्व ही संभव नहीं। बीज से ही वृक्ष उत्पन्न होता है। बीज की शक्ति का ही विकसित रूप वृक्ष है। इतना होते हुए भी बीज की अपेक्षा वृक्ष का विस्तार उपयोग और मूल्य अधिक होता है। ब्रह्म की अचिन्त्य और अनिर्वेद सत्ता का प्रबल प्रस्फुरण और विकसित स्वरूप वह परा प्रकृति है जिसे आध्यात्मिक भाषा में गायत्री कहते हैं। ब्रह्म को बीज माना जाए तो गायत्री को सुविकसित वृक्ष कहा जाएगा।

पिता से माता का महत्व सौ गुना अधिक माना गया है। इस दृष्टि से परं ब्रह्म परमात्मा से जगतजननी गायत्री माता की महिमा उसकी सक्रियता के कारण अधिक मानी गई है।

जगन्माता च प्रकृतिः पुरुषश्चता जगत्पिता।

गरीयसीति जगताँ माता शतगुणैः पितुः॥

ब्रह्म वैवर्त पुराणं (कृष्ण जन्म खंड 50)

जगत की माता प्रकृति है और जगत का पिता पुरुष (ब्रह्म) है। संसार में पिता से सौ गुना अधिक माता का महत्व माना जाता है।

आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही प्रकार की सूक्ष्म शक्तियों से गायत्री माता ओत-प्रोत हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में वह प्रधानतः ब्रह्म तेज के रूप में परिलक्षित होती हैं। वह परमब्रह्म परमात्मा का ही प्रकट स्वरूप है। वह साधक को ब्रह्म निर्वाण पद तक सुविधा पूर्वक पहुँचा देती है। देवी भागवत पुराण में इस बात को स्पष्ट कर दिया है।

परब्रह्म स्वरूपा च निर्वाण पद दायिनी।

ब्रह्म तेजो मयी शक्ति स्तधिष्ठातृ देवता॥

अर्थात् गायत्री परब्रह्म स्वरूप तथा निर्वाण पद देने वाली है। वह ब्रह्म तेज शक्ति की अधिष्ठतृ देवी है।

यह महाशक्ति सत, रज, तम इन तीनों गुणों से प्रभावित होकर मनुष्य जीवन में ज्ञान, क्रिया और धन के रूप में प्रकट होती है। उपासक को ज्ञानवान, क्रियावान् तथा धनवान् बना देती है।

सात्त्विकस्य ज्ञान-शक्ति राजसस्य क्रियात्मिका।

द्रव्य शक्तिस्तामसस्य तिस्राश्चकथितासव॥

दे .भा. 3/7/26

सात्त्विक की ज्ञानशक्ति, राजस्व की क्रिया शक्ति, तामस की द्रव्य शक्ति ये तीन प्रकार की शक्ति कही गई हैं।

पिण्ड में अन्तर्हित शक्ति कोष

इन तीन शक्तियों का कोष जिन चक्रों में भरा हुआ है गायत्री के द्वारा वे सूक्ष्म चक्र भी जागृत होते हैं :-

इच्छा शक्तिश्च भूः कारः क्रिया शक्तिर्भुवस्तथा।

स्वः कारः ज्ञान शक्तिश्च, भूर्भुवः स्वः स्वरूपकं॥

मूल पद्मश्च भूर्लोको विशुद्धन्च भुवस्तथा।

सुर लोकः सहस्रा गायत्री स्थान निर्णयः॥

भूः- इच्छा शक्ति। भुवः- क्रिया शक्ति। स्वः- ज्ञान शक्ति। यह भूर्भुवः स्व का रूप है। भूः- मूलाधार चन्द्र, भूलोक। भुवः- विशुस्राव चन्द्र, भुवः लोक। स्वः- सहस्रार चन्द्र, सुरलोक यह गायत्री का स्थान है।

मनुष्य के मेरु दण्ड में छः प्रधान चक्र हैं, इन चक्रों में जो शक्तियाँ और सिद्धियाँ भरी हुई हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए गायत्री उपासना द्वारा ही इन षट् चक्रों का जागरण किया जाता है। मूलाधार चक्र में निवास करने वाली कुण्डलिनी महाशक्ति का इन छहों चक्रों पर अधिकार है। इस कुण्डलिनी का गायत्री का ही स्वरूप माना गया है। मनुष्य के अंतर्जगत को प्रकाशवान् बनाने वाले जो दश प्राण अवस्थित हैं तथा उनके कारण जिन सूक्ष्म दश महा विद्याओं का ज्ञान होता है, वह सभी विज्ञान भी गायत्री पर ही निर्भर हैं।

कुण्डलिन्या समुद्भूता गायत्री प्राण धारिणी ।

प्राण विद्या महाविद्या यस्याँ वेत्ति स वेद वित्॥

-योग चूड़ामणि।

अर्थात् कुण्डलिनी रूप में प्रकट होने वाली, चैतन्य प्राण को धारण करने वाली, चैतन्य शक्ति गायत्री है। यह गायत्री ही प्राण विद्या है, यही महा विद्या है, जो इस रहस्य को जानता है वही तत्वदर्शीय है।

मूलादि ब्रह्मरंध्रान्ता गीयते मननाद्यतः।

मनतात् त्राटि षट् चक्रं गायत्री तेन कथ्यते॥

मूलाधार चक्र से लेकर ब्रह्म रंध्र पर्यन्त षट् चक्र जिसकी उपासना से खुल जाते हैं उसे गायत्री कहते हैं।

मानव शरीर अनन्त स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों का भण्डार है पर उनका बाह्य जगत के व्यर्थ विचारों और कार्यों में अपव्यय होता रहता है। इस अपव्यय को रोक कर यदि उनकी वृत्तियाँ अन्तर्मुखी बना ली जाएं और अंतर्जगत में ही काम करने लगें तो निश्चय ही प्रचण्ड अंतर्बल प्राप्त कर सकता है।

देखिए :-

बहिमुर्खस्य मंत्रस्य वृत्तयो या प्रकीर्तिताः।

ता एवान्तर्मुखरयास्य शक्तियः परिकीर्तिताः॥

मन अर्थात् चित्त के बहिर्मुख होने पर जो वृत्तियाँ कहीं जाती हैं वे ही उसके अन्तर्मुख होने पर ‘शक्तियाँ’ कहलाती हैं।

अंतर्जगत की दश महा विद्याएँ

अंतर्जगत का अत्यन्त विस्तृत विज्ञान है यह दश विद्याओं के रूप में दश भागों में बँटा हुआ है। वैदिक वाङ्मय में इन विद्याओं का विस्तारपूर्वक वर्णन है। (1) उदगीथ विद्या (2) संवर्ण विद्या (3) मधु विद्या (4) पंचाग्नि विद्या (5) उपकोशल विद्या (6) शाँडिल्य विद्या (7) दहर विद्या (8) भूमा विद्या (9) मन्ध विद्या (10) दीर्घायुष्य विद्या इन दश विद्याओं की ऋषियों की सम्पत्ति थी। इन सम्पत्तियों के द्वारा ही वे अपरिग्रही एवं निर्धन रहते हुये इस भूलोक में कुबेर भण्डारी बने हुये थे। जो कुछ देवताओं के पास है उसे वे इसी मानव शरीर में इसी लोक में करतल गत कर लेते थे।

तंत्र मार्ग में भी यही दश विद्याएं अन्य नामों से उपलब्ध हैं। यद्यपि आसुरी वाममार्गी तंत्रोक्त विधान देव सम्प्रदाय के दक्षिणमार्गी वैदिक विधान से भिन्न है फिर भी उनके द्वारा भी उन्हीं सिद्धियों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। तंत्र मार्ग में (1) इन्द्राणी (2) वैष्णवी (3) ब्रह्माणी (4) कौमारी (5) नारसिंही (6) वाराही (7) माहेश्वरी (8) भैरवी (9) चण्डी (10) आग्नेयी इन दश नामों से दश महाविद्याओं की साधना की जाती है।

इन महाविद्याओं का विस्तृत वर्णन इन पंक्तियों में सम्भव नहीं। सुविधानुसार अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में कुछ समय उपरान्त करेंगे, अभी तो इतना ही जानना पर्याप्त होगा कि गायत्री के तीनों अक्षर एक प्रकार से आध्यात्मिक त्रिवेणी के समान हैं। जिस प्रकार गंगा, यमुना और सरस्वती के मिलन से तीर्थराज प्रयोग की भौतिक त्रिवेणी बनी है, उसी प्रकार गायत्री के तीन अक्षरों से सन्निहित इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की तीन महाधाराओं के मिलन से आध्यात्मिक त्रिवेगी बनती है। प्रयाग की त्रिवेणी में स्नान करने का पुण्य फल होता है पर इस योग त्रिवेणी में स्नान का जो महाफल है उसका तो वर्णन ही हो सकना कठिन है। लिखा है कि-

इड़ा भोगवती गंगा पिंगला यमुना नदी।

इड़ा पिंगल योर्मऽध्ये सुषुम्ना च सरस्वती॥

इड़ा नाड़ी गंगा हैं, पिंगला यमुना है। इन दोनों के बीच में सुषुम्ना है वही सरस्वती है।

त्रिवेणी योगः सा प्रोक्ता तत्र स्नानं महाफलम्।

यह योग की त्रिवेणी है। इसमें स्नान करने का महा फल होता है।

जो कुछ इस विशाल ब्रह्माण्ड में है वह सब इस शरीर रूपी पिण्ड में भी सूक्ष्म रूप से मौजूद है। जो वस्तु हमें बाहर से उपलब्ध होती है उन सब को साधना द्वारा अंतर्जगत से भी प्राप्त किया जा सकता है। बाहर कोई वस्तु ऐसी नहीं जो भीतर न हो।

देहेऽस्मिन् वर्तते मेरुः सप्त द्वीप समन्वितः।

सरितः सागराः शैलाः क्षेत्राणि क्षेत्र पालकाः॥

ऋषियों मुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा।

पुण्य तीर्थानि पीठानि वर्तन्ते पीठ देवताः॥

सृष्टि संहार कर्तारौ भ्रमन्तौ शशि भास्करौ।

नभो वायुश्च वन्हिश्च जलं पृथ्वी तथैव च॥

त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वाणि देहतः।

मेरुं संघेठ्य सर्वत्र व्यवहारः प्रवर्तते॥

जानाति यः सर्वमिदं स योगी नात्र संशयः।

ब्रह्माण्ड संत्तके देहे यथा देशं व्यवस्थितः॥

-शिव संहिता

इसी देह में मेरु, सप्त द्वीप, सरिता, सागर, शैल, क्षेत्र, क्षेत्र पालक, ऋषि, मुनि, नक्षत्र, ग्रह पीठ, पीठ देवता, शिव, चन्द्र, सूर्य, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, तीनों लोक, सब प्राणि निवास करते हैं। जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में है। इस रहस्य को जो जान सकता है वही योगी है।

आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा जो इन अन्तरंग शक्तियों पर अधिकार कर लेता है उसके लिए वे वैसी ही उपयोगी हो जाती हैं जैसी बिजली एटम से भाप आदि की शक्तियों पर अधिकार प्राप्त करके आज के वैज्ञानिकों ने उन्हें मनुष्य की सेवा में प्रयुक्त कर दिया है। भौतिक जाति में जो शक्ति भौतिक क्षमता सम्पन्न दिखाई पड़ती हैं वही अंतर्जगत में आध्यात्मिक क्षमता के रूप में प्रकट होती है। गायत्री की आध्यात्मिक शक्ति साधक के सन्मुख सिद्धियों के रूप में सामने आती है। उसे लगता है कि अदृश्य लोक के कोई देव दानव उसकी सेवा में उपस्थित हो गये हैं और उसकी आज्ञा का पालन करने के लिये हर क्षण तत्पर रहते हैं।

यक्ष राक्षस गन्धर्वा अप्सरोगण किन्नराः।

सेवन्ते चरणं तस्य सर्वेतस्य वंशानुगाः॥

यक्ष, राक्षस, गंधर्व, अप्सरा, किन्नर आदि उसके वश में हो जाते हैं और उसके चरणों की सेवा करते है।

स्थूल जगत की भौतिक शक्तियाँ

यही मातृ तत्व संसार में परमाणु शक्ति स्थूल, सूक्ष्म, प्राण, भाव आदि रूपों में काम कर रहा है। उसे अभिवादन करते हुए इस प्रकार वर्णन किया है :-

परमाणु स्वरूपे च द्वयणुकादि स्वरूपिणि। स्थूलातिस्थूल रूपेण जगदधात्रि नमोऽस्तुते॥ सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूपे च प्राणापानादि रूपिणि।

भावाभाव स्वरूपे च जगद्धात्रि नमोऽस्तुते॥

जगद्धात्री स्तोत्र

परमाणु स्वरूप, द्वि अणु रूपिणी, स्थूलातिस्थूल, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, प्राण अपान व्यान आदि रूपिणी, भावाभाव स्वरूपा, जगद्धातृ आपको नमस्कार है।

यह भौतिक शक्ति गायत्री के 24 अक्षरों के अनुसार 24 प्रकार की है। हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों ऋषियों की भाषा से इन्हें 24 मातृका कहा गया है। इनके नाम इस प्रकार हैं -(1) चन्द्रमेश्वरी (2) अजिनबला (3) दुरितारि (4) कालिका (5) महाकाली (6) श्यामा (7) शान्ता (8) ज्वाला (9) तारिका (10) अशोका (11) श्रीवत्सा (12) चण्डी (13) विजया (14) अंकुशा (15) पन्नगा (16) निर्वाणी (17) बला (18) धारिणी (19) धरण प्रिया (20) नरदत्ता (21) गान्धारी (22) अम्बिका (23) पद्मावती (24) सिद्धायिका।

भौतिक विज्ञान के वर्तमान वैज्ञानिकों ने इनकी शोध अपने ढंग से की है। वे इस शक्ति को “एनर्जी आव फोर्स” के नाम से पुकारते हैं। हीट पावर (ताप) इलेक्ट्रिकल एनर्जी (ताकत) एनर्जी आफ एलैस्टिसिटी (स्थिति) एनर्जी आफ ग्रेविटेशन (मध्याकर्षण) एनर्जी आफ मोशन (गति) क्लेटिक एनर्जी (क्रिया) कॉस्मिक इलैक्ट्रिक सिटी (विश्व विद्युत) इन्टैलिजेन्स (ज्ञान), सुपर फोर्स (उच्च शक्ति) आदि अनेकों भेदों में इस शक्ति को विभक्त किया गया है और उसके गुण कर्मों को जानकर आविष्कारों का तारतम्य मिलाया है।

शरीर में काम करने वाली विद्युत शक्तियों का भी आधुनिक वैज्ञानिकों ने पता लगाया है। (ओजस) औडीलिक फोर्स उंगलियों तथा नेत्रों का तेज परसनल मेगनिट शारीरिक चुंबकत्त्व आदि नामों से इसके भेदों का पता लगाया है। डॉक्टर किलनर ने एक ‘ओरोस्पेक’ नामक एक ऐसे यन्त्र का आविष्कार किया है जिसके द्वारा मानव शरीर के अंतर्गत विभिन्न व्यक्तियों के शरीर में काम करने वाली विभिन्न प्रकार की विद्युत शक्तियों की संख्या तथा मात्रा का पता लगाया जा सकता है। यह शरीर विद्युत योग साधनों से उत्पन्न सूक्ष्म दृष्टि के द्वारा भी स्पष्टतः देखी जा सकती है। तत्व दर्शियों ने इसके स्वरूप का वर्णन इस प्रकार किया है :-

तडिल्लेखा तन्वी तपन शशिं वैश्वानरमयो।

तडिल्लता समरुचिर्विद्युल्लेखेव भास्वती॥

बिजली की बेल के समान, तपते हुए चन्द्रमा के समान, अग्निमयी वह शक्ति दृष्टि गोचर होती है।

योग शास्त्रों में शरीर के अन्तः प्रदेश में काम करने वाले सहस्रों तत्वों का पता लाखों वर्ष पूर्व लगा लिया था। आधुनिक विज्ञान ने भी इस मार्ग पर कदम उठाने शुरू किए हैं और पिछले दिनों तक शोधें हुई हैं उनके अनुसार एथेरिक बाडी (प्राण भण्डार) माइस्टिक रोज (हृत पद्म) सोलर प्लेकिसस (सौर जगत) कार्डिअक प्लेसिस (अनाहित चक्र) थिराइड ग्लाण्ड (कंठ ग्रंथि) पाइनियल ग्राण्ड (आज्ञाचक्र) पाइट्यूटरी बाडी (शक्ति ग्रन्थि) आदि का पता चलाया है और यह माना है कि इन विलक्षण संस्थानों द्वारा मनुष्य की प्रसुप्त प्रतिभाओं और विशेषताओं के भाव अभाव से, मन्दता और तीव्रता से भारी सम्बन्ध है। फिर भी वे यह नहीं जान सके कि औषधि, सर्जरी आदि सीमा से बाहर के अति सूक्ष्म संस्थानों का विकास किस प्रकार संभव है। इसका उत्तर एवं मार्ग दर्शन तो योग शास्त्र ही कर सकता है और करता रहा है।

योग साधना का राज मार्ग

इन सूक्ष्म शक्ति संस्थानों के जागरण के लिए साधना विज्ञान के अनुसार बन्ध और मुद्राओं का विधान शास्त्रों में मौजूद है। गायत्री के 24 अक्षरों से सम्बन्धित इस प्रकार की 24 साधनाएं प्रसिद्ध हैं। (1) महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियान (4) जालन्धर बंध (5) मूलबंध (6) महाबन्ध (7) खेचरी (8) विपरीत करणी (9) योनि मुद्रा (10) वज्रौली (11) शक्ति चालनी (12) तडागी (13) माण्डवी (14) शाँभवी (15) अश्विनी (16) पाशिनी (17) काक्री (18) मातंगी (19) भुजाँगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कयवी (24) आकाशी।

आठ प्राणायाम (1) सूर्यभेदन (2) उज्जायी (3) सीत्कारी (4) शीतली (5) भस्त्रिका (6) भ्रामरी (7) मूर्छा (8) प्लाविनी।

यह भी इन्हीं सूक्ष्म संस्थानों के जागरण के लिए हैं। 84 प्रकार के योग आसनों से भी यह उद्देश्य पूरा होता है पर यह सब समझने में नए विज्ञान को कुछ देर लगेगी। फिर भी यह आशा की जा सकती है कि आधुनिक वैज्ञानिक अपनी खोजों को जारी रखते हुए एक दिन वहीं पहुंचेंगे जहाँ बहुत समय पूर्व हमारे ऋषि पहुँच गए थे।

योग दर्शन के द्वितीय अध्याय में अष्टाँग योग साधना की सीढ़ियों का वर्णन है। अहिंसा की साधना करने वाले से हिंसक जीव भी वैर त्याग देते हैं। सत्य की आराधना करने वाले के मुख से निकले हुए शाप वरदान सफल होते हैं। अस्तेय वृत्ति धारण करने से बहुमूल्य रत्नों के समान वस्तुएँ उपलब्ध होती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने से तेजस्विता मिलती है। अपरिग्रह सध जाने पर जन्म−जन्मांतरों का तथा भूत-भविष्य -वर्तमान का ज्ञान हो जाता है। पवित्रता की साधना हो जाने पर घृणा तथा परसंसर्ग से छुटकारा मिलता है। अन्तःकरण ही पवित्रता से मन की प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रियों पर विजय और आत्म साक्षात्कार करने की क्षमता प्राप्त होती है। सन्तोष धारण करने से सर्वोत्तम सुख मिलता है। तप साधना से मल दोष दूर हो जाने पर अणिमा, लघिमा, महिमा, आदि आठ शारीरिक सिद्धियों प्राप्त होती हैं। स्वाध्याय से इष्टदेव का साक्षात्कार होता है। ईश्वर प्रणिधान से समाधि लग जाती है। आसन सध जाने से सर्दी गर्मी आदि के द्वन्द्व दुख नहीं पहुँचाते। प्राणायाम से पाप और अज्ञान का आवरण मिटता है। प्रत्याहार से इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं।

अन्य साधनाओं से अन्य प्रकार की भी अनेक सिद्धियाँ मिलती हैं। अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, दूर दर्शन दूर श्रवण, परचित्र विज्ञान, परकाया प्रवेश, आकाशारोहण, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि का वर्णन योग ग्रन्थों में मौजूद है। वे सभी गायत्री उपासना से संभव हैं। कहा गया है कि :-

गायत्री द्वारा योग साधना के पिपीलिका मार्ग, दादर मार्ग, बिहंगम मार्ग यह तीन मार्ग हैं। इन पर चलने से परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चारों वाणियाँ प्रस्फुटित होती हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, आय निवेश यह पाँचों क्लेश दूर होते हैं। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीया यह चारों अवस्थाएँ परिमार्जित होती हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धास्थ, आज्ञाचक्र यह छहों चक्र जागृत होते हैं एवं मस्तिष्क के मध्य भाग में व्यवस्थित सहस्रार कमल में ब्रह्म तेज विकसित होने लगता है। आकाश, महाकाश, पराकाश, तत्वाकाश, सूर्यकाश, इन पाँचों आकाशों में उसकी गतिविधि विस्तृत होने लगती है। सातों भूमिका में शुभेच्छा, विचारण, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थ भाविनी, तुर्यगा अपनी नियमित गतिविधि से विकसित होती जाती हैं। गायत्री के माध्यम से योग साधना करने वाला साधक योग मार्ग के नौ विघ्नों-व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्ति, अलब्ध भूमिका, अनवस्थित पर विजय प्राप्त कर लेता है।

गायत्री ही वह महाशक्ति है जो सारे विश्व का नियन्त्रण करती है। उसकी सत्ता से संसार की प्रत्येक क्रिया नियमित रूप से होती रहती है। उपनिषद् में इसका वर्णन यों आया है-

भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपसि सूर्यः।

भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पंचमः॥

(क.ठ. 2-6-3)

जिसके भय से अग्नि तपती है, जिसके भय से सूर्य जलता है, जिसके भय से इन्द्र, वायु और यम दौड़ते रहते हैं।

ऐसी परम महिमामयी माता का श्रद्धा पूर्वक अंचल पकड़ने वाला साधक क्या नहीं प्राप्त कर सकता है? उसे श्रुति सम्मति मार्ग से उपलब्ध है सकने वाला प्रत्येक पदार्थ मिल सकता है।

गायत्र्या सर्व संसिद्धि र्द्विजानाँ श्रुति संमता।

अर्थात् वेद सम्मत सारी सिद्धियाँ गायत्री उपासना से मिल सकती हैं।


जीवन का साध्य आत्म ज्ञान

(ले. श्री अमरचन्द नाहटा)

हम दूसरे पदार्थों, व्यक्तियों को जितना जानते हैं, उतना अपने को नहीं जानते। “दिया तले अंधेरा” कहावत प्रसिद्ध है। बाह्य की ओर ही हमारा मन, वचन, काय व इन्द्रियाँ लगी रहती हैं। उन्हें अपने आपका विचार करने का अवकाश ही नहीं मिलता, दूसरों की भूलों व कमजोरियों का तो हम तत्काल ही अनुभव कर प्रकाशित करते रहते हैं। पर अपनी कमजोरियाँ व भूखें हमारे ध्यान में नहीं आतीं। कोई बतलाता है तो हमें बुरा लगता है। हमें अपने सुधार की तनिक भी चिन्ता नहीं होती।

“अपने को पहचानो”- यह शीर्षक पढ़कर कई पाठक चौंक सकते हैं, क्योंकि अपने को तो सभी पहिचानते हैं। क्या आत्मा से भी अपने आपका स्वरूप छिपा है? जो इसे “जीवन की सार्थकता” माना जाए? प्रश्न तो किया जा सकता है। पर विचार करने पर भी वास्तव में बात कुछ ऐसी ही है। हम देह, वाणी, पहनावा आदि बाहरी बातों से अपने भीतर की पहिचान करते हैं, वह सही नहीं है।

अभी तक अपने से मतलब हमने अपने शरीर, मन व इन्द्रियों से लगा रखा है और यही सबसे बड़ी भ्राँति है। शरीर व बाह्य कुटुम्ब धनादि के के साथ आत्मीय भाव जोड़ उनकी प्राप्ति व अप्राप्ति पर उत्पन्न एवं विनाश में सुख दुःखादि कल्पना व अनुभूति करते रहते है। शरीर में कोई रोगादि बाधा उपस्थित हुई तो बेचैन हो उठते हैं। शरीरादि जिन्हें मान रखा है, जो कोई बाधा पहुँचाता है कष्ट देता है तो उसके प्रति क्रोध, द्वेष आदि से अभिभूत हो अपने आप से बाहर हो जाते हैं। अर्थात् वास्तव में जो हमारा नहीं है उसे तो हमने अपना मान रखा है, और जो अपनी आत्मा का स्वरूप है उसे भुला दिया है। हम देखते हैं कि शरीर, धन, कुटुम्ब आदि तो देखते ही देखते नष्ट हो जाते हैं। फिर भी उनकी आशक्ति नहीं घटती है। शरीर हमारा है, इन्द्रियाँ हमारी हैं, हम बोलते-चालते, सोते-पीते व विविध प्रवृत्तियाँ करते रहते हैं, पर अपने वचन पर भी ध्यान नहीं देते कि “ये हमारे हैं।” इस कथन का भाव यही होता है कि हम और ये अभिन्न नहीं हैं। हमारा और इनका सम्बन्ध मात्र है। हम सत्य का अनुभव नहीं कर पाते कि जिस जिस पिता, पुत्र, पौत्री, माता, बहिन, स्त्री, धनादि को हम “हमारी” कहते हैं। इसका ही मतलब हैं कि हम इनसे अभिन्न नहीं भिन्न हैं। हम कुछ और ही हैं। ये तो हमारी हैं पर हम ये नहीं हैं। हम इनके मालिक हैं, उपभोग करने वाले हैं पर उपभोक्ता तो उपभोग्य वस्तुओं से सदा भिन्न ही रहते हैं। तदनुसार शरीरादि हमारे हैं। इस शब्द से ही ध्वनित होता है कि हम और ही हैं व इनसे भिन्न हैं। विचारिये इनको “हमारा कहने वाले हम” कौन हैं ? किसके लिए हमारा यह प्रयोग किया गया है। “मैं यह कहता हूँ, यह बोलता हूँ, यह सोचता हूँ” कहते हैं, परन्तु क्रियाओं के कर्ता का यह अनुसंधान नहीं करते-यह कितनी विचित्रता है, इसलिए “अपने को पहचानो” यही सार्थकता कहा गया है।

प्राणी अनन्तकाल से भव भ्रमण कर रहा है, इसका प्रधान कारण है अपने को नहीं पहचानना या पर को अपना मान लेना। इस भ्राँति का मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणी उन्मूलन नहीं कर सकते, मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी हैं जिसने “अहम्” की खोज की है। उसकी उपलब्धि की है। उस भ्राँति को पकड़ा व पहिचाना है। अपनी वर्तमान अवस्था और बन्धन के कारणों पर गम्भीरता से विचार किया है। बन्धन के कारणों को ज्ञात कर उनसे छुटकारा प्राप्त किया है। उस पथ का पथिक बनकर बन्धनों से मुक्त हुआ है। उसने अपने को पहिचान कर अपने ही में समाया है और परमानन्द प्राप्त किया है।

वास्तव में विचार किया जाए तो विश्व की बाहरी वस्तुओं में जो भी आनन्द प्रतीत होता है उसका कारण भी “स्व” ही है। आत्मा संज्ञक तत्व ही है। क्योंकि आनन्द उपभोक्ता यही है। उपभोक्ता नहीं हो तो उपभोग कौन करेगा व उपभोग के बिना आनन्दानुभव भी कैसे होगा? यद्यपि वह बाह्य पदार्थों का उपभोग जन्य आनन्द कल्पित है-अनारूपित है, वास्तविक नहीं है, फिर भी कल्पना व आरोप करने वाला भी तो आत्मा उससे विपरीत कल्पना करती हैं वे ही पदार्थ व क्रियायें दुःखदायक प्रतीत होने लगती हैं। आसक्त मानव को बाह्य पदार्थ में आनन्द मिलता है। विरक्त व योगी को उसमें कुछ भी आनन्द नहीं मिलता है। उसका यही कारण है। किसी को किसी में, किसी को उससे विरोधी बातों व वस्तुओं में। कोई योग से आनन्द मानता है। वास्तव में आनन्द तो सभी में है। नहीं तो किसी में नहीं, भिन्न-2 अनुमति होने का कारण आत्मा का भिन्नत्व सूचक है। प्रत्येक प्राणी के शरीर में अवस्थित उपाधि से सम्बन्धित हो भिन्न-2 है। इसी स्थिति के अनुसार ही कल्पना होती है, व कल्पना के अनुसार ही अनुमति होती है। यदि अनुभूति करने वाला न हो तो वे ही शरीर इन्द्रियाँ व बाह्य पदार्थ सभी पड़े रहते दिखाई देते, पर मरण के बाद उनकी कुछ भी अनुभूति नहीं होती। इससे देह का आत्मा से भिन्नत्व सिद्ध होता है जो भौतिक साधनों (पंचतत्वों) के सम्मिश्रण से ही आत्मा की उत्पत्ति बिखरने से विनाश मानते हैं, वे पंचभूत से सर्जित देह को वहाँ पड़ा देखते हैं, पंचभूत उस समय कहाँ और क्यों चले जाते हैं। उनको उसमें डालकर उसे जीवित क्यों नहीं कर लेते? पर भ्रम बिना ही ही रहता है, जीवित एवं मरण की वे वास्तविक अपल बिद्ध नहीं कर सकते।


Quotation

मेरा अन्तःकरण कहता है कि इस पृथ्वी पर मनुष्य का अवतरण वास्तव में दूसरों के लिये ही हुआ है। कोटि-कोटि रूपों में बिखरा हमारा मानव-समाज एक अखण्ड आत्मीयता के प्रवाह में बंधा है। मैं तो प्रतिक्षण यही अनुभव करता रहा हूँ कि मेरे अन्तरीय और बाह्य जीवन के निर्माण में कितने अगणित व्यक्तियों के श्रम का हाथ रहा है। इस अनुभूति से उद्दीप्त होकर मेरा अन्तःकरण सर्वदा आतुर रहता है कि मैं कम से कम इतना तो इस दुनिया को दे सकूँ जितना कि मैंने उससे अभी तक लिया है।

-आइन्स्टीन


संसार का कल्याण आध्यात्म से ही संभव हैं।

(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए., पी. एच. डी.)

आज के भौतिकवादी युग में जो स्वार्थ, हिंसा, आपाधापी, षड़यन्त्र और राजनैतिक सत्ता को हथियाने के कुटिल प्रयत्न चल रहे हैं, उन्हें देख कर मनुष्य की बुद्धि पर तरस आता है। विज्ञान एटम और हाइड्रोजन बम तथा नर संहार के शत-शत साधन तैयार कर रहा है। मनुष्य अपनी उच्च शक्तियाँ मानव मात्र के हित के स्थान पर संहार में लगा रहा है। मनुष्य में राग, द्वेष, अहं आदि स्वार्थ भाव बुरी तरह बढ़ गये हैं। प्रत्येक कार्य में मनुष्य स्वयं अपना ही संकुचित स्वार्थ देखता हैं, उसी की पूर्ति चाहता है। वह दूसरों की सुख-सुविधा का किंचित भी भाव नहीं रखता। जैसे पशु, पक्षी, कीटाणु केवल अपनी ही निकट आवश्यकता और क्षणिक सुख या वासना की पूर्ति सोच कर कार्य करते हैं, बहुत से व्यक्ति वैसे ही अपना स्वार्थ-सिद्ध करने की सोचते रहते हैं। एक दूसरे को सताते या शोषण करते रहते हैं। फलतः वे आन्तरिक रूप से भी दुःखी हैं। इस प्रकार आज का मानव दीन-हीन कृतघ्न पशु जैसा बन गया है। वह मोह जनित अन्धकार में भटक रहा है। अपने वास्तविक स्वरूप को जैसे भूल गया है।

वास्तव में मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है। स्वभाव से उत्तम है। एक से एक उत्तम मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक शक्तियों से सम्पन्न है। किन्तु इन सब से अधिक उसमें आत्म शक्ति है। यह आत्मिक शक्तियाँ अन्य किसी भी प्राणी को नहीं दी गई हैं। केवल मनुष्य को ही ईश्वर के विशेष अनुग्रह पर ये अद्भुत शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। उसका जन्म किसी विशेष ईश्वरीय योजना से सम्पन्न हुआ है। उसमें विशेष ज्ञान, शक्ति और सामर्थ्य भरे गये हैं। अन्तरात्मा के रूप में उसे वह दिव्य अंश प्राप्त हुआ है, जो उसे उच्चतम दैवी आदर्शों की ओर खींचा करता है और पशुता से ऊँचा उठने की दिव्य प्रेरणा दिया करता है।

आज संसार में जो द्वेष, वैमनस्य, कटुता, शत्रुता, स्वार्थ और अशान्ति फैली हुई है, उसका एक मात्र कारण आत्मिक भाव की कमी है। समाज में दुर्भावना का प्रभुत्व है, उसे निकालने के लिए आध्यात्म की बड़ी भारी आवश्यकता है। अध्यात्म-भाव संसार में सर्वत्र चिरन्तन, शाश्वत, सबको बन्धुत्व की रज्जु में पिरोने वाला और विश्वमात्र का कल्याण करने वाला दिव्य भाव है।

स्वार्थ और दुर्भावना मानव-समाज को विघटित करने वाले कीटाणु हैं। इनसे समाज में विषम भाव उत्पन्न होते हैं। आज का धनिक वर्ग निर्धन वर्ग को उपेक्षा की दृष्टि से देखता है, पढ़ा लिखा आदमी निरक्षर वर्ग से घृणा करता है। इस विषमता ने आज न केवल समाज को अपितु सगे-सम्बन्धियों को अलग-अलग कर दिया है। इतना ही नहीं, उनमें ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुता के दुर्भाव भी पैदा कर दिए हैं। जब तक मनुष्य में संतोष, धैर्य, शान्ति, क्षमा आदि आत्मिक भाव विकसित नहीं होते, तब तक समाज समुन्नत नहीं हो सकता। अतः समाज का कर्तव्य है कि वह ऊँच-नीच गरीब-अमीर और अन्य संकुचित भेद-भावों को त्याग कर एक दूसरे का सम्मान करना सीखे और मानवता को उन्नत करने का यत्न करे।

सामाजिक और साँसारिक सम्प्रदायों की ओर मनुष्य खिंच रहे हैं। बढ़िया मकान, सुन्दर पत्नी, कुबेर का धन, राज्य, सत्ता का मोह आदि आदि की इच्छा मनुष्य को बनी हुई है। इन वस्तुओं के मिल जाने से भी मनुष्य की तृप्ति नहीं होती। अर्थ की, अधिकार की, सत्ता की भूख जितनी मिटाओ उतनी ही अधिकाधिक भड़कती है। मनुष्य के एक सन्तान है, तो उसे दूसरी संतान का मोह सताता है। किसी के कन्याएँ की कन्याएँ हैं। वह पुत्र के मोह में अतृप्त छटपटा रहा है। मन ही मन बेचैन है। कुछ अपने गाँव में सत्ता पा गए हैं, तो प्रान्त में उससे बड़ी सत्ता और अधिक अधिकारों के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक कर रहे हैं, पैसा व्यय कर वोट जीत रहे हैं। उन्हें हमेशा यह भय रहता है कि कहीं चुनाव में वे हार न जाएं। इस प्रकार राजनीति और सामाजिक क्षेत्रों में अतृप्ति और असंतोष है। अधिकार की आपाधापी है। और अधिक लूटने खसोटने की पिपासा है। तीव्र असंतोष हैं। अशान्ति है।

मानव जीवन का सर्वोपरि साध्य है शान्ति। वातावरण की शान्ति और मन की शान्ति। इस शान्ति से ही मनुष्य का शाश्वत सुख और आत्मसंतोष मिलता है। यह शाँति न तो राजनीति की सत्ता से ही मिलती है और न सामाजिक अधिकारों से ही। ये दोनों ही क्षेत्र सदा अतृप्ति से भरे हुए हैं। इनमें राग और द्वेष का ताण्डव है। इन्द्रियाँ बलपूर्वक हिंसा और लोभ की ओर आकृष्ट होती हैं, पाप करती हैं, दूसरों का दोष दर्शन करती हैं और इसका कुफल है अतृप्ति और अशाँति। जो पाप, दोष, अज्ञान, अन्धकार में पड़कर नीचता और स्वार्थपरता से कार्य करेगा, वह निश्चय ही दुखी रहेगा। आज इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के कारण आसुरी संग्राम मचा हुआ है।

संसार की शान्ति और कल्याण की एक मात्र दवा आध्यात्म ही है। आध्यात्म हमें अशुभ वृत्तियों से दूर कर पवित्रता, विशुद्धता, प्रकाश और शान्ति की ओर आकृष्ट करता है। आध्यात्म हमारे हृदय में रहने वाले परम प्रभु का उज्ज्वल प्रकाश है। इस प्रकाश को फैलाने से चारों ओर शाँति और पवित्रता का शुभ वातावरण फैलता है।

आध्यात्म मनुष्य के प्रत्येक विचार, गुप्त भाव, और कार्य को ईश्वरीय प्रेम और शक्ति से परिपूर्ण करता है। ऐसा व्यक्ति थोथी वासनाओं और पर दोष-शान्ति में समय नष्ट नहीं करता, तुच्छ बातों में मन नहीं लगाता, अज्ञान और अन्धकार में नहीं भटकता।

आध्यात्म हमें अपने ज्ञान के नेत्र खोलने के साधन प्रस्तुत करता है। नीचता, दोष-दर्शन, अज्ञान, अनिष्ट, अशुभ वृत्तियों से ऊँचा उठाकर विशुद्ध आत्म भाव के लोक में ले जाता है। इसे अपनाने से हम सर्व व्याप्त पवित्रता और आनन्द के दर्शन करते हैं।

आध्यात्म हमें मन और इन्द्रियाँ रोक कर एक केन्द्रीय सत्ता में वृत्तियाँ एकाग्र करने की शिक्षा देता है। यह वह दृष्टि है जो हमें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक तृप्ति और संतोष देता है। हम अपने संकुचित स्वार्थों से ऊंचे उठकर “सब” की भलाई के तत्वों में सोचते हैं।

आध्यात्म वह भावना है जो तन और मन के मल विकार निकालती है। मनुष्य अपनी गलतियों को समझता है और प्रायश्चित करता है। विकार दूर होने लगते हैं। आत्मज्ञान से तन−मन शुद्धि एवं पुराना शरीर नया हो जाता है। आध्यात्म जीवन का सच्चा काया कल्प है।

आध्यात्म वृत्ति धारण करने से “स्व” के स्थान पर “पर” का पोषण होता है, मानसिक तृप्ति मिलती अभय है। समता और संयम का पोषण होता है। आवश्यकताएँ कम हो जाती हैं और मनः शान्ति बढ़ जाती है। मनुष्य की आवश्यकताएँ तो अनगिनत असंख्य हैं। उनकी पूर्ति अनेक जीवनों में भी संभव नहीं है। आध्यात्म मानसिक नियंत्रण की शिक्षा देता है।

मुनि नथमल जी के शब्दों में, “आध्यात्मवाद से आवश्यकता की पूर्ति नहीं, उसकी पूर्ति के साधनों का विकार मिट सकता है। आध्यात्म से पदार्थ की प्राप्ति नहीं, प्राप्त पदार्थ पर होने वाला ममकार या बन्धन छूट सकता है।”

आध्यात्म एक पावन प्रकाश है, भौतिकवाद अज्ञान तिमिर!


आत्म-विश्वास का मर्म

(श्री चूड़ामन मोतीलाल मुंशी, बुरहानपुर)

आत्म विश्वास का अर्थ है ईश्वर की अनन्त शक्ति में विश्वास। जो असंख्य विपत्तियों से घिर जाने पर भी कार्य करता रहता है और कर्तव्यच्युत नहीं होता वही सच्चा आत्म-विश्वासी है।

उपर्युक्त वचन महात्मा गाँधी के हैं। बहुत से लोग आत्म-विश्वास का गलत अर्थ लगाते हैं और उनकी दृष्टि में आत्मा का अस्तित्व और आत्मविश्वास निज शरीर तक होता है। इस प्रकार की मान्यता रखने वाले तथा ईश्वरीय शक्ति पर विश्वास रखने वाले व्यक्तियों के लिये ही शायद गाँधीजी को उक्त पंक्तियाँ लिखने की आवश्यकता पड़ी।

ईश्वर सर्व-शक्तिमान, अनन्त, सर्व व्यापक एवं असीम है। उसकी थाह आज तक किसी ने नहीं पाई है। संसार की बड़ी से बड़ी शक्ति के साथ भी उसकी तुलना नहीं की जा सकती। इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ईश्वर ने अपने एक अंश मात्र से धारण कर रखा है, मनुष्य तो उसका एक अंश मात्र है। संसार भर के धर्मों में से किसी भी धर्म के ग्रन्थ को उठा कर देख लीजिए। सब में ईश्वर की व्यापकता का ही वर्णन किया गया है।

ईश्वर सर्वव्यापी होने के कारण हम सब उसी एक ही विराट पुरुष के अंग हैं। इसलिए परमात्मा को विश्वात्मा भी कहा गया है। मनुष्य जब उस परमपिता परमात्मा का अंश होने से उसमें जो शक्ति कार्य कर रही है वह भी उस अंशी भगवान की ही है। ऐसी दशा में उस असीमित को किसी सीमा के बन्धन में नहीं बाँधा जा सकता।

इन सब बातों का आशय है कि मनुष्य उस विश्वरूपी मशीन का एक छोटा सा पुर्जा है और सर्वत्र एक ही परम तत्त्व आत्मा व्याप्त हो रहा है। जिसे हम आत्मा के नाम से या परमात्मा के नाम से पुकारें बात एक ही है। जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश से भिन्न नहीं है, उसी प्रकार वह अंशी भगवान् भी उसके अंश से भिन्न नहीं हैं। आत्मा और परमात्मा दोनों का सम्बन्ध अभिन्न है। अतएव आत्मा पर विश्वास करने का अभिप्राय परमात्मा पर विश्वास रखना ही होता है।

आत्म-विश्वासी का जीवन सुख-शान्तिमय होता है। वह हर्ष, शोक, भय, निराशा, सन्देह और चिंतादि मनोविकारों से सर्वथा रहित होता है। आत्म-विश्वासी, दृढ़निश्चयी और दैवी-सम्पदा का स्वामी होता है। इस कारण उसका प्रत्येक कदम सफलता के द्वार खोलता है। वह ईश्वर की अनन्त शक्ति में अटूट विश्वास रखता है। इसलिए वह विषम से विषम परिस्थिति में भी हिमालय की भाँति अटल और अचल होता है और परिस्थितियाँ उससे टकराकर चकनाचूर हो जाती हैं। दुनिया की कोई भी शक्ति उसे कर्तव्यच्युत नहीं कर सकती। वह सर्वत्र एक मात्र आत्मा (परमात्मा) के ही दर्शन करता है। ऐसा व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण के मत में सर्वश्रेष्ठ योगी माना गया है। उन्होंने गीता में कहा है-

आत्मौपभ्येन सर्वत्र समं पश्यतियऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमोमतः॥ 6-32॥

इसके विपरीत अविश्वासी व्यक्ति काम, क्रोध, आदि विकारों के चंगुल में फंसा रह कर अपने जीवन को दुःख, क्लेश और अशान्तिमय बनाने वाले मार्ग पर सदा आरुढ़ रहता है। उसके अन्तस्तल आसुरी सम्पदा का कुराज्य स्थापित होने के कारण वह चिन्ता, भय, शोक, निराशा, सन्देह, घृणा आदि दूषित मनोविकारों से अपने को घिरा हुआ पाता है और अन्त में दुर्गति को प्राप्त होता है। यह तो परम पिता परमात्मा का अपमान है।

ऊपर कहा गया है कि मनुष्य ईश्वर का अंश है अतः अंश में वह गुण होना अनिवार्य है जो अंशी में होते हैं, परन्तु मनुष्य अनात्मा पर विश्वास करता है। इसलिए उसमें ईश्वरीय गुणों का विकास नहीं हो पाता। इन गुणों का विकास हमारे आत्म-विश्वास पर निर्भर है। हमारा अपने प्रति जैसा विश्वास होता है, वैसे हमारे गुण, स्वभाव आदि होते हैं। हम जो कुछ हैं, जैसे भी हैं, हमारे विश्वास के ही फल स्वरूप हैं। गीता में कहा गया है-श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव स। अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा है वैसा ही स्वरूप है।

मनुष्य उस शेर के बच्चे ही तरह अपनी शक्तियों को विस्मृत कर बैठा है, जो एक बकरियों के झुण्ड में भूल से रह गया था और अपने जाति स्वभाव को भूल चुका था। जब उस शेर के बच्चे से कहा कि “तुम शेर के बच्चे हो” बकरियों में रहकर यह क्या दीन-हीन अवस्था में पड़े हो ? “इतना सुनते ही वह शेर की तरह गुर्राने लगा और उसमें पूर्ववत् शक्तियाँ जागृत हो गईं।” मनुष्य का स्वभाव भी ऐसा हो गया है। वह काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों (जो अनात्मा के ही स्वरूप हैं) वशीभूत हो कर दीन-हीन दशा में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है एवं अपनी आत्मिक शक्तियों से अपरिचित-सा हो गया है। उसे भी उस शेर के बच्चे की तरह संकेत देने से उसकी शक्तियाँ स्वाभाविक ही उत्तेजित हो उठती हैं।

हमारे सन्त और शास्त्र युगों-युगों से यही संकेत देने का कार्य कर रहे हैं। वे चिल्ला-2 कर कह रहे हैं “मनुष्य! तू निर्विकार आत्मा है, सर्व शक्तियों का पुँज है! अभय है, आनन्दमय है! तेरा जन्म दीन-हीन अवस्था में व्यतीत करने के लिए नहीं हुआ है, इस जगत में तुझे महान कार्य करने के लिए भेजा गया है आदि। परन्तु उस ओर ध्यान नहीं देते। जब तक हम इधर ध्यान नहीं देंगे तब तक हमारी आत्मिक शक्तियाँ जागृत न हो सकेंगी और हम ज्यों के त्यों पड़े रहेंगे। ईश्वर ने हमें यह नर देह पशु की तरह भोग भोगने और खाने कमाने के लिए नहीं दिया है बल्कि इसके लिए दिया है कि मनुष्य आत्मा को पहचाने, निरन्तर समुन्नत रहे और सुख-शान्तिमय जीवन व्यतीत करे तथा अन्त में आत्मा (परमात्मा) का दर्शन कर अपना जीवन सफल बनावे। इसके लिए सत्संग, स्वाध्याय, स्तुति प्रार्थना, उपासना आदि उपाय भी बताये गए हैं। इन साधनों के करते रहने से हमारी सात्विक वृत्तियाँ जागृत हो जाती हैं और उनके बल में असंख्य गुनी वृद्धि होती है जिससे आत्म दर्शन सुलभ हो जाता है।

अतः हमें आत्म विश्वासी होना चाहिए। हमें परमात्मा (अपने हृदय आत्मा) पर विश्वास रखकर प्रतिदिन नियमित रूप से उसकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना करना चाहिए तथा भूत भविष्य की चिन्ता न कर वर्तमान पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हुए अपने दैनिक कार्य ईमानदारी से करते रहना चाहिए। अपने कर्म ईमानदारी से करते रहना भी ईश्वर की पूजा ही कही जाती है। गीता में कहा है कि “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः। अर्थात् मनुष्य कर्म द्वारा ईश्वर की पूजा करके परम सिद्धि को प्राप्त होता है। जिसने इस प्रकार जीवन बना लिया है वस्तुतः वह ही सच्चे अर्थों में आत्मविश्वासी कहलाने का अधिकारी है। इस विषय में मनोविज्ञान के सुप्रसिद्ध विद्वान का मत यहाँ वर्णनीय है। वे लिखते हैं कि “मनुष्य की किसी बात में कार्य क्षमता उसके आत्म-विश्वास पर निर्भर करती है। यह आत्म-विश्वास सच्चे आध्यात्मिक चिन्तन का परिणाम है। जो मनुष्य वर्तमान काल के कर्तव्य पर ही अपने ध्यान को केन्द्रित करता है और बची हुई शक्ति को आध्यात्मिक चिन्तन में लगाता हैं, उसका आत्म-विश्वास नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति प्रत्येक काम में आगे पीछे की बात को बहुत कुछ सोचता रहता है जो भविष्य के बारे में अत्यधिक चिन्तन करता है वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिन्ता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म-विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं।


धर्म का सच्चा रूप

(सन्त विनोबा)

श्री रामानुजाचार्य की कथा सभी जानते होंगे। उन्होंने अपने गुरु के मन्त्र को जग विदित करने के लिये स्वयं नरक भोगना भी पसंद किया और देश भर में घूम कर उस मंत्र का खुला उपदेश दिया। उस समय तक ब्रह्मविद्या को गुप्त रखने की हमारे यहाँ परम्परा थी। वह गलत थी, ऐसा मैं नहीं कहता। उसमें भी कुछ सार था। ब्रह्म विद्या को बाजार में बेचने के लिए ले आने पर उसका कुछ मूल्य नहीं रह जाता, इसलिये उसे गुप्त रखने में ही मिठास है। लेकिन उसे प्रकट करने का मिठास भी अलग ही है। महाराष्ट्र में ज्ञानदेव और एकनाथ ने वही किया।

जैसे श्री रामानुज ने हिन्दुस्तान भर में ब्रह्मविद्या के दरवाजे खोल दिये, वैसे ही ज्ञानदेव ने भी महाराष्ट्र में ब्रह्मविद्या की संपन्नता कर दी-”इये मराठिचिये नगरी, ब्रह्मविद्येचा सुकालु करी।” उन्होंने आगे यह भी कहा है-”गुरु शिष्याचिये एकाँती” अर्थात् जो ज्ञान गुरु के मुख से एकान्त में शिष्य को प्राप्त होता है, वही ज्ञान भक्त सारे विश्व को मेघ की तरह गर्जना करके बाँटता है।

उन दिनों ब्रह्म विश्व को दूर रख कर कहीं जा छिपा था, लुप्त हो गया था, वह ध्यान धारणा से ही हाथ लगने की स्थिति में पहुँच गया था। लेकिन ज्ञानदेव ने वह रहस्य सबके सामने प्रकट कर दिया। महाराष्ट्र में ज्ञानदेव ने यह जो महान् पराक्रम किया, रामानुज और चैतन्य ने वही देश भर में किया। वे जहाँ-जहाँ गये, ज्ञान बाँटते गये, स्त्रियाँ, नन्हें-बच्चे और साधारण जनता सबको ज्ञान बाँटते गये। इसी लिए यह भावना है कि चैतन्य भगवान कृष्ण के अवतार ही हुए हैं, क्योंकि उनमें प्रेम साकार हो उठा था।

यह जो प्रेम का धर्म सन्तों ने हमें सिखाया, हमें अब उसे आगे बढ़ाना है। क्योंकि प्रेम का यह धर्म उस काल की जिन मर्यादाओं में बँध गया था, वे मर्यादाएँ आज नहीं हैं। इसलिए आज हम दो पग आगे बढ़ेंगे, संतों के सिखाये ज्ञान को पहचानेंगे, उसे नया रूप देंगे और सारे संसार के सामने रखेंगे। यह इच्छा इस युग के अनुरूप ही है।

अब भक्ति का रूपांतर सर्वोदय में होगा। “सम सर्वेषु भूतेषु”- इस भक्ति को अब ‘पराभक्ति’ नहीं रखना है, ‘सामान्य भक्ति’ बनाना है। किसी एक को ही समाधि में यह अनुभव होता है कि ये प्राणि-मात्र मेरे सखा हैं, सारे भेद मिथ्या हैं, वे मिटने चाहियें। किंतु आज यही अनुभव सबको होना चाहिये। दूसरे शब्दों में, अब सामाजिक समाधि सधनी चाहिए। परमात्मा मेरे मुँह से यह बहुत बड़ी बात कहलवा रहा है। बंगाल की यात्रा में मैं उस जगह पहुँचा था, जहाँ श्री राम कृष्ण परमहंस देव की पहली समाधि लगी थी। तालाब के किनारे उसी जगह बैठ कर मैंने कहा था कि “रामकृष्ण को जो समाधि लगी थी, उसे अब हमें सामाजिक बनाना है।” यह भी ज्ञानदेव ने कह दिया है-”बद्धीचे वैभव अन्य नाहिं दुजे।” अर्थात् एकत्व का अनुभव सबको होना चाहिए।

विज्ञान के इस युग में साम्य योग भी केवल समाधि में अनुभव करने की चीज नहीं रही, अपितु सारे समाज में अनुभव करने की बात बन गयी है। साम्य योग पहले शिखर था, पर अब नींव बन गया है। अब हमें साम्य योग के आधार पर जीवन बनाना चाहिए। यही विज्ञान-युग की माँग है, आवश्यकता है।

हम पीछे कह चुके हैं कि हमें भक्ति का रूपांतर सर्वोदय में करना है। भक्ति का मूलमन्त्र देने वाले थे प्रहलाद। उन प्रहलाद ने नरसिंह भगवान् से यह वर माँगा।

‘प्रायेण देव मुनयः स्वविमुक्तिकामः।

मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः॥

नैनान् विहाय कृपणान् विमुमुक्षुरेकः।

-अपनी ही मुक्ति की कामना करने वाले देव और मुनि बहुत हो गये, जो जंगल में जाकर मौन साधना किया करते थे। लेकिन उनमें परार्थ निष्ठा नहीं थी। परन्तु मैं तो इन कृपण जनों को छोड़ कर मुक्त नहीं होना चाहता। यह कितनी कड़ी आलोचना प्रहलाद ने की कि उन मुनियों के पीछे स्वार्थ लगा हुआ था, परार्थ नहीं। ‘मैं अकेला मुक्त नहीं होना चाहता’-यह संस्कृत साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उद्गार है। ‘मुझे अकेले को मोक्ष नहीं चाहिए’ इस कथन में प्रहलाद ने कितना कवि-हृदय उड़ेल दिया है।

वास्तव में मोक्ष अकेले पाने की वस्तु नहीं है। जो समझता है कि मोक्ष अकेले हथियाने की वस्तु है, मोक्ष उसके हाथ से निकल जाता है। ‘मैं’ के आते ही मोक्ष उसके हाथ से निकल जाता है। ‘मेरा मोक्ष’ ये शब्द ही परस्पर-विरोधी हैं, गलत हैं। ‘मेरा’ मिटने पर ही मोक्ष मिलता है। इसलिए हमारा कहना है कि हमें सामाजिक समाधि साधनी है।

आज बहुत से साधु इस सामाजिक समाधि या सामूहिक साधना के विचार से काफी दूर हो गये हैं। धर्म की जड़ता ने ही इस असामाजिकता को बढ़ावा दिया है। शास्त्रों की दुहाई देकर भी इसे सिद्ध किया जाता है, पर वह साधुता, वह धर्म और वे शास्त्र निकम्मे हैं, जो सामाजिक साधना की ओर नहीं ले जाते! यदि हमारी साधना और हमारा धर्म समाज के लिए होगा, तो हम स्वतः समाज के लिए उपयोगी साबित होने का प्रयत्न करेंगे।


मनःशक्तियों का सदुपयोग

(स्वामी नित्यानन्द सरस्वती)

महात्मा गाँधी की याद आते ही सहसा उनके शरीर की तस्वीर आँखों में घूमने लगती है। सहसा आश्चर्य हो आता है “वह दुबला-पतला शरीर और इतने महान कार्य।” महान् कार्यों में इनके शरीर की इतनी प्रधानता नहीं हैं जितनी उनके मनोबल की। उनका मन स्वस्थ एवं शोधा हुआ था। मन के ठीक-ठीक निर्माण कर लेने पर दुबले-पतले व्यक्ति भी महान-2 कार्य सम्पन्न करते हैं। इसी तरह यदि हम शरीर से कितने हृष्ट-पुष्ट हों और यदि हमने स्वस्थ मन का निर्माण नहीं किया है तो हम स्वयं के समाज के लिए विशेष हितकर नहीं हो सकते। हमारे जीवन का महत्व संसार में कुछ नहीं होगा। मनुष्य के मन का स्वस्थ एवं शोधा हुआ होना परमावश्यक है। साथ-ही-साथ शरीर भी हो तो यह जीवन में एक वरदान ही है।

मन का स्वस्थ होना और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि यदि मन स्वस्थ होगा तो दुबला पतला शरीर भी बहुत कुछ कर सकेगा। महात्मा गाँधी में सक्रियता और फुर्तीलापन उनके स्वस्थ मन के कारण ही थी। वे जब किसी भी कार्य या संकल्प पूर्ति में जुट जाते तो उन्हें आगे पीछे की चिन्ता नहीं होती थे। वर्तमान क्षण और संकल्प या कार्य ही उनके समक्ष होता था। उनकी इस अविचल, शान्त गम्भीर मनःस्थिति के कारण ही महान कार्य सम्पन्न होते हैं।

मन का ठीक-ठीक निर्माण एवं उसे स्वस्थ बनाने के लिए निम्नलिखित बातों को जीवन में अपनाना चाहिये। इससे हमारा मन स्वस्थ बनेगा और मनः शान्ति बढ़ेगी।

जीवन में निरन्तर सक्रियता की आवश्यकता है। जो जीवन अकर्मण्य है वह एक अभिशाप ही है। कहावत भी है “खाली दिमाग शैतान का घर है।” कार्य शीलता से रहित जीवन भार स्वरूप ही है। अकर्मण्य एवं आलसी व्यक्ति सदैव इस संसार में पिछड़े हैं। ऐसे व्यक्तियों को इस संघर्षमय कर्मक्षेत्र संसार में स्थान नहीं हैं। जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने कोई जादू या छल से महानता प्राप्त नहीं की है। उनकी महानता का एकमात्र कारण उनका निरन्तर कर्तव्य परायण एवं निष्ठा पूर्ण जीवन ही था। उनके जीवन में ‘आराम हराम’ था।

जीवन की निरन्तर सक्रियता में उद्दण्डी मन की चंचलता, संकल्प, विकल्प, वासना आदि नष्ट हो जाते हैं। कार्य व्यस्त और परिश्रमी व्यक्ति धीरे-धीरे इस चंचल मन पर बाजी मार लेते हैं। मन एक अजीब भूत है जो अपनी कल्पना एवं विचारों के सहारे आकाश पाताल और लोक लोकान्तरों में उड़ा उड़ा फिरता है। ऐसे मन पर काबू पाना सहज नहीं होता। इस भूत को निरन्तर काम में जोते रहना ही इसे बस में करने का एक मंत्र है।

जीवन में सक्रियता की इसलिए भी आवश्यकता है कि ईश्वर ने हमें क्रिया शक्ति दी है-कुछ करते रहने के लिए। अतः यदि हम अकर्मण्य रहे और ईश्वरीय विधान के विपरीत चले तो यह शक्ति हम से छीन ली जाती है। इन्द्रियाँ अपनी क्रिया शक्ति को खो देती हैं। ऐसा व्यक्ति हाथ पैर होते हुए भी मुर्दा ही है। वह जीवन में पराधीनता के सिवा और कुछ नहीं देख सकता।

स्वस्थ मन के निर्माण में दूसरा साधन यह है कि हमारे मन, वचन और कर्म तीनों में एकता स्थापित हो। जो सोचा जाए या तो कल्पना की जाए वही कहा जाए और जो कहा जाये वही किया जाये। इस तरह का दृढ़ निश्चय स्वस्थ मन के निर्माण में बहुत ही महत्वपूर्ण है। जो मनुष्य केवल कल्पनाओं की उड़ानें लेता हो तथा कहता कुछ और हो और करता कुछ और हो, वह शेखचिल्ली जैसा ही है। उसे जीवन में असफलता, निराशा, परावलम्बन आदि के सिवा और कुछ नहीं मिल सकता।

मन को सदैव बुद्धि एवं विवेक के नियंत्रण में रखना चाहिए। क्योंकि इसमें अनेक जन्म जन्मान्तरों के संस्कार भरे पड़े हैं। मन को पूर्व संस्कारों से प्रभावित होकर तद्नुकूल कार्य करने की आदत होती है। अतः इसे बुद्धि के नियंत्रण में रखकर अनावश्यक तत्वों एवं गलत मार्ग में जाने से बल पूर्वक रोकना चाहिये। इस ओर दी गई तनिक भी ढील बुरे कर्मों के ओर लगने में अधिक प्रोत्साहित करती है। ऐसी ढिलाई एक बड़ी भूल होती है। जो व्यक्ति यह निर्णय कर लेता है कि अभी तो अमुक कार्य कर लो फिर बार में इसे नहीं करेंगे। ऐसे व्यक्तियों को मन पछाड़ पछाड़ कर मारता है। उनकी आवाज पर अचानक कोई कार्य करने पर उतारू नहीं होना चाहिए। बुद्धि और विवेक से ठीक ठीक निर्णय करके फिर कार्यक्षेत्र में मनोयोग के साथ उतरना चाहिए।

मन को स्वस्थ बनाने का एक साधन ईश्वर चिन्तन भी है। परमात्मा की खोज में इसे लगा देना ही अधिक महत्वपूर्ण है। संसार के सारे धर्म कर्म, योग, साधना, उपासना आदि इसी केन्द्र पर केन्द्रित हैं।

शोधी हुई मनः शक्ति स्वयं एक चमत्कार है। स्वस्थ मन वाला व्यक्ति संसार के लिए एक वरदान होता है। वह संसार को कुछ न कुछ देकर ही जाता है। जबकि दूषित मन वाले सृष्टि में विकृति एवं दोष उत्पन्न करके जाते हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वस्थ एवं सबल मन के निर्माण का पूरा ध्यान देना चाहिए।


पहले स्वयं पर विजय प्राप्त कीजिये

(श्री प्रो. रामप्रसाद चतुर्वेदी एम. ए.)

शुभ कर्म सदैव शुभ रहेंगे, उनमें देश, काल एवं जाति का कोई बन्धन नहीं है। जहाँ मनुष्य हैं, वहीं शुभ कर्म हैं और जहाँ शुभ कर्म हैं, वहाँ मोक्ष तो होगा ही। मोक्ष की प्राप्ति के लिए इधर उधर जाने की आवश्यकता नहीं है।

मोक्ष की कामना से मनुष्य तीर्थों में जाते हैं, परन्तु तीर्थ कर्मों को नहीं बदल सकते। जैसा किया हैं, वैसा फल पाना ही होगा। मोक्ष की इच्छा है तो पहले अपने कर्मों को बदलो। यदि अशुभ कर्मों को शुभ कर्मों में बदल दिया गया तो फिर जीवन की धारा ही बदल जाएगी।

तीर्थ स्नान के पश्चात् भी दुष्कर्मों को नहीं छोड़ा तो वह सब व्यर्थ होगा। पुण्य की जड़ को हरी रखने के लिए पुण्य का ही जल सींचना पड़ेगा। पाप का ताप तो उसे सुखा डालेगा। तीर्थों में जाने से मन की विचार धारा बदल सकती हो तो वहाँ जाने में कोई हानि नहीं है। परन्तु, अभीष्ट सिद्धि तो हमारे कर्म से ही होगी।

गीता, गंगा, गायत्री यह तीनों ही मोक्षदायिनी बताई गई हैं। परन्तु गीतापाठ के उपरान्त भी उसकी शिक्षाओं पर अमल न किया तो गीता अपनी मोक्षदायिनी शक्ति का प्रयोग किस प्रकार करेगी? गंगा स्नान के पश्चात् भी मन निर्मल न हुआ तो क्या लाभ होगा उससे ? गायत्री की सिद्धि भी तभी होगी, जब ज्ञान और कर्म में प्रवृत्त हुआ जाएगा। यह माना कि इन तीनों में शक्ति है, परन्तु उस शक्ति से काम लेने के लिए स्वयं भी तो कुछ करना होगा ?

प्राचीनकाल में हमारे ऋषियों की तपस्या ने इन्द्रासन तक तो हिला डाला था, परन्तु आज इन्द्रासन तो क्या मनुष्यों के भी आसन विचलित नहीं होते। इसका कारण यह नहीं है कि आज कोई तप और अनुष्ठान नहीं करता, बल्कि इसका कारण है कि आज की तपस्या में तेज नहीं रहा। आप अपने शरीर को तपस्या की अग्नि में कितना ही झौंकिये, जब तक तन, मन और वाणी भी दत्तचित्त होकर आपका साथ नहीं देते तब तक आपका कर्म फलदायक नहीं होगा।

तेजस्विता बातों से उत्पन्न नहीं होती। उसके लिए साधना की आवश्यकता है। साधना भी पूर्ण सम्पन्न होनी चाहिए। ‘मन कहीं तन कहीं’ वाली बात से कार्य सिद्धि तो हो नहीं सकती। उससे तो परिश्रम भी व्यर्थ जाता है।

जिसने क्रोधादि विकारों को त्याग दिया, वही सच्चा साधक है। यदि आत्मा के मल दूर नहीं हुए तो साधना के मार्ग में आने वाले विघ्न ही कैसे दूर होंगे?

साधक जब तेजस्वी हो जाता है तो वह संसार के साम्राज्य को भी त्याग सकता है। क्योंकि उसके जीवन में मोह ममता का अभाव हो जाता है। उसकी आत्मा स्वच्छ हो जाती है और यह सब ज्ञान का ही प्रभाव है।

जहाँ ज्ञान है, विवेक है, शुद्ध बुद्धि और श्रेष्ठ कर्म हैं वहाँ सभी समृद्धियाँ उपस्थित हैं। जिसका मन प्रभु चिन्तन में लगा है, उसके लिए कोई कामना शेष नहीं रहती। जिस साधक में ज्ञान का अभाव है, वह सत्य का निरूपण करने में समर्थ नहीं होता।

ज्ञान के साथ ही अभ्यास की भी आवश्यकता है। जैसे देह को स्वस्थ रखने के लिए दैनिक उपचार स्नान, नियमित आहार और व्यायाम किया जाता है, वैसे ही मन को स्वस्थ रखने के लिए नियमित अभ्यास आवश्यक होता है।

हमारे मन में ऐसे विचार न उठें जो दुःख, मोह, क्रोध, पश्चाताप आदि में हमें डाल दें। इसलिए बाह्य संसार से दूर रहकर साधना में लगें।

लोगों से मिलना जुलना उतना ही रखें जितने के बिना काम न चलता हो। अन्यथा अधिक मनुष्यों का संपर्क मन को दूषित कर डालेगा क्योंकि उससे मोह, वासना, क्रोध और लोभ आदि का आविर्भाव होने लगता है।

लोगों का अधिक संसर्ग हमारे अहंकार को जागृत करेगा। साधक होने के नाते हम अपने को श्रेष्ठ तो मानेंगे ही, साथ ही इच्छा उत्पन्न होगी कि आने वाले सभी व्यक्ति हमको प्रणाम करें। वे हमारी सेवा और सत्कार करें। यदि किसी ने सत्कार में किंचित् त्रुटि भी कर डाली तो हमारा अहंकार उससे बदला लेने की सोचेगा और इस प्रकार हमारा मन क्रोध से विषाक्त हो जाएगा। हमारा जीवन आध्यात्मिक भित्ति पर चढ़कर भी नीचे गिर पड़ेगा।

ज्ञान भी पूरा हो तो लाभप्रद है अन्यथा अधूरा ज्ञान कभी-कभी कुएँ में ढकेल देता है। तलवार का निर्माण यह सोचकर हुआ कि इसके द्वारा शत्रु से रक्षा हो सकेगी। परन्तु, यदि आप अपनी तलवार का ठीक उपयोग नहीं जानते तो वह बहक जाएगी और जिसे आप मारना चाहते हैं, सम्भव है कि वही तुम्हारी तलवार किसी प्रकार अपने अधिकार में करले और उसका प्रयोग भी तुम्हारे विरुद्ध ही कर बैठे। तो विचार कीजिये कि इसमें दोष तलवार का होगा या स्वयं आपका?

तलवार आपकी है, उसका प्रयोग भी आपने ही किया, परन्तु वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुई, आप अपने अज्ञान के कारण उसका ठीक उपयोग नहीं कर सके। अथवा उसके भोंथरी होने का पता तब चला जब आपने उसे म्यान से बाहर निकाला। इसमें दोष तलवार का नहीं, आपका है।

वीर पुरुष तो शत्रु को हथियार देकर युद्ध करते हैं। वे निहत्थे पर वार कभी नहीं करते। उन्हें इस बात की चिन्ता नहीं होती कि यदि शत्रु का दाव लग गया तो हमारे दिये हुये हथियार से वह हमारा ही वध कर देगा। वे तो अपनी शक्ति पर भरोसा करते हैं, अपनी विजय में उन्हें विश्वास है, साथ अपने कर्तव्य से भी अनभिज्ञ नहीं हैं।

एक बार एक सेनापति अपने सैनिक की कर्तव्य हीनता पर रुष्ट हो गया और उसने, उस सैनिक को दो कोड़े जमा दिये। सैनिक धृष्ट था, उसने बंदूक उठाकर सेनापति पर चला दी। परन्तु, किसी प्रकार लक्ष्य चूक गया और गोली सेनापति को नहीं लगी। सेनापति ने अन्य सैनिकों को उसे बन्दी बनाने का आदेश देकर कहा-’मुझे तुम्हारे द्वारा गोली चलाई जाने का दुःख नहीं हैं, परन्तु दुःख इस बात का है कि बन्दूक का सही उपयोग नहीं जानते। तुम्हें यह भी नहीं मालूम कि उसे किस समय, किस के विरुद्ध प्रयुक्त करना चाहिए और सब से बड़े दुःख की बात तो यह है कि तुम निशाना लगाना भी नहीं जानते। यदि किसी शत्रु से लड़ते तो स्वयं मारे जाते और यह बंदूक भी शत्रु के हाथ पड़ जाती।’

सैनिक के मिथ्या अहंकार का यह समुचित उत्तर था। जो व्यक्ति हथियार चलाना न जाने, उसे उसके रखने का भी अधिकार नहीं होना चाहिए। सैनिक के अहंकार ने ही क्रोध जागृत किया और क्रोध ने शस्त्र-संधान का ज्ञान भी नष्ट कर डाला। तो क्या लाभ हुआ ऐसे अहंकार से?

इससे सिद्ध हुआ कि बन्दूक बुरी वस्तु नहीं है, हम स्वयं बुरे हैं कि उसके गुणों को जानते हुए भी उचित उपयोग नहीं कर सकते।

सत्य भाषण को ही लीजिए। शास्त्र कहते हैं कि सदा सत्य बोलना चाहिए, परन्तु शास्त्रों का ही कथन ‘सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यमप्रियम्’ भी है। इसके शब्दार्थ की ओर ही मत जाइये। यह विचार कीजिए कि इसमें कौन-सा भाव छिपा है। सत्य बोलिए, परन्तु अप्रिय अथवा जिस सत्य से किसी की हानि हो रही हो तो उस सत्य को कहने के लिए उतावले मत हूजिए। मान लीजिए कि किसी निर्दोष को प्राण दण्ड मिलने वाला है, उसका अपराध तो न था परन्तु वह घटनास्थल पर किसी कारणवश उपस्थित था, उसकी उपस्थिति उसका हत्यारा होना सिद्ध करती है। उसी में आप साक्षी हैं तो आपके द्वारा उपस्थिति होने की बात कहना ही उसे मृत्युदण्ड दिलाने में सहायक हो जाएगा।

संसार के सभी पदार्थ उपयोगी हैं। विष का प्रभाव मारक है परन्तु उचित रीति से व्यवहार करने पर वह भी औषधि बन जाता है। दुराचारी व्यक्ति भी स्वयं बुरा नहीं है, बुरे से बुरे मनुष्य को सुधारा जा सकता है, क्योंकि उसकी आत्मा अनन्त गुणों से विभूषित है। भोग लिप्सा में फँसे हुए व्यक्तियों के भी चरित्र का जब विकास हुआ तो वे महात्मा बन गए। प्रतिशोध से धधकते हुए हृदय वाले पुरुष भी शान्ति, क्षमा और दया की मूर्ति बनते देखे गए। इसलिए संसार में कोई भी मनुष्य बुरा नहीं है। यदि हम स्वयं मनुष्य हैं तो हमें किसी का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, किसी के प्रति घृणा-भाव नहीं रखना चाहिए और न किसी को ठुकराना चाहिए।

मार्ग से भ्रमित व्यक्ति के जीवन-प्रवाह को मोड़ा जा सकता है, परन्तु मोड़ने वाला सद्गुरु सुयोग्य हो। आज शिष्य तो बहुत मिल सकते हैं, परन्तु सुयोग्य गुरु का मिलना ही कठिन है। इसलिए यदि किसी को बुरे मार्ग पर चलता देखें तो चेष्टा करें कि वह अपने ठीक मार्ग पर आ जाए।

दूसरे के छिद्र देखने से पहिले अपने छिद्रों को टटोलो। किसी और की बुराई करने से पहिले यह देख लो कि हम में तो कोई बुराई नहीं है। यदि हो तो पहले उसे दूर करो। दूसरों की निन्दा करने में जितना समय देते हो, उतना समय अपने आत्मोत्कर्ष में लगाओ। तब स्वयं इससे सहमत होगे कि परनिन्दा से बढ़ने वाले द्वेष को त्याग कर परमानन्द प्राप्ति की ओर बढ़ रहे हो।

मनुष्य कितना दुर्बल है कि वह अपने ही मन और इन्द्रियों को वश में नहीं रख सकता। दूसरों की अनिष्ट कामना करने वाले उस मानव की इन्द्रियाँ ही उसका आदेश पालन नहीं करतीं। जब उसके जीवन राज्य में ही विद्रोहाग्नि भड़क रही है तो वह दूसरों का दमन करने की इच्छा क्यों करता है ?

संसार को जीतने की इच्छा करने वाले मनुष्यों! पहले अपने को जीतने की चेष्टा करो। यदि तुम ऐसा कर सके तो एक दिन तुम्हारा विश्व-विजेता बनने का स्वप्न पूरा होकर रहेगा। तुम अपने जितेन्द्रिय रूप से संसार के सब प्राणियों को अपने संकेत पर चला सकोगे। संसार का कोई भी जीव तुम्हारा विरोधी नहीं रहेगा।

आप कहेंगे कि ‘आज भोजन मन पसंद नहीं बना’ भाई! वह भोजन मन को पसन्द नहीं आया तो न सही, उदर पूर्ति तो हुई उससे? भोजन पेट भरने के लिए ही तो किया जाता है, उसमें मिर्च-मसाले कम थे, अथवा मिठाई का अंश नहीं था तो वह बुरा कैसे हो गया? मन के स्वामी तुम हो, फिर वह तुम्हारी बात क्यों नहीं मानता? यदि तुमने दृढ़ता से सोचा होता कि मन माने या न माने, मैं इस भोजन को अवश्य करूंगा तो मन कभी विरोध नहीं करता।

मन बालक के समान चंचल है। बालक यदि कहने से नहीं मानता तो ताड़न की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार मन भी बिना ताड़न के नहीं मानता। आप उसे इधर-उधर जाने से रोकिए, प्रयत्न पूर्वक रोकिए तो वह रुक जाएगा।

लोग कहते हैं कि राम ने रावण को मारा। परन्तु रावण इतना बलवान था कि यदि वह सच्चरित्र होता तो एक राम क्या हजार राम मिल कर भी न मार पाते। वह अपने चारित्रिक पतन के कारण ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसे राम ने नहीं मारा, उसने स्वयं ही अपने को मार लिया। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है :-

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥

-गीता 6/6

‘जिस जीवात्मा ने मन और इन्द्रियों के सहित अपने शरीर को जीत लिया है, वह जीवात्मा स्वयं ही अपना मित्र है और जिस जीवात्मा ने अपने मन इन्द्रियों सहित देह को जीता है, उसके साथ वह स्वयं शत्रु के समान भाव रखता है।’

परन्तु राम ने रावण को हथियार के बल पर जीता, प्रेम के बल पर नहीं, इसलिए रावण तो मारा गया, किन्तु रावणत्व का नाश नहीं हुआ। आज रावण के समान बुरे काम करने वाले व्यक्तियों की कमी नहीं है। यदि गणना करने लगें तो सहस्रों रावण दिखाई देंगे और राम खोजने पर भी कहीं न मिलेंगे।

यदि किसी प्रकार रावण को प्रेम के बल पर झुकाया जा सकता तो आज संसार की रूप-रेखा नए प्रकार की होती। यदि कंस को किसी प्रकार समझा कर सत्वगुण सम्पन्न बनाया जा सकता तो उसके साथ जरासंध आदि भी धर्म के प्रचार में लग गए होते। यदि दुर्योधन को ज्ञान और कर्म का उपदेश दिया जा सकता तो महाभारत से संसार का विनाश न हुआ होता। इससे हमारा यह अभिप्राय नहीं है कि राम और कृष्ण ने भूल की, बल्कि प्रयोजन यह है कि किसी प्रकार ऐसा होना सम्भव होता तो क्यों इतना भारी विनाश होता?

कब क्या हो सकता है? यह समय की परिस्थिति पर ही निर्भर है। चेष्टा की जाए तो परिस्थितियाँ भी बदल सकती हैं। अशान्ति के दावानल को बुझाने के लिए छोटे दायरों से निकल कर विराट बनना होगा। हृदय की क्षुद्रता को भी दूर कर समुद्र के समान गंभीर और विशाल होना होगा। जब आपके हृदय में प्रेम, कल्याण, दया, सेवा और सद्भावना का बीज अंकुरित हो जाएगा, तब आपको संसार का महान ऐश्वर्य भी तुच्छ लगने लगेगा। आपकी आत्मा व्यक्तिवाद से उठकर समष्टिवाद की ओर बढ़ेगी।


चिन्ताओं की उलझन से बाहर निकलिए

(श्री भगवान सहाय वशिष्ठ)

मानव-जीवन संघर्ष का जीवन है। इसमें आदि से अन्त तक कठिनाइयाँ ही कठिनाइयाँ हैं। पद-पद पर आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष के बिना अपने अस्तित्व को कायम रखना प्रायः असम्भव सा ही है। जीवन में तरह-तरह के विघ्न, कठिनाइयों तथा आपत्तियों का आना स्वाभाविक ही है। संसार का एक भी मार्ग ऐसा नहीं जान पड़ता जिसमें विघ्न, बाधाओं का सामना न करना पड़ता हो और इन संघर्षों, विघ्नों, कठिनाइयों के साथ-2 चिन्ता, भय, असन्तोष का पैदा हो जाना स्वाभाविक ही है। औसत मनुष्य को देख लीजिए, वह किसी न किसी बात को लेकर चिन्तित, भयग्रस्त अवस्था में मिलेगा। उदाहरणार्थ किसी व्यक्ति को अपने कार्य में हानि उठानी पड़ी है, किसी की नौकरी छूटने वाली है, किसी घर में रोग शैया पड़ी है, किसी के पास खाने-कमाने के साधन नहीं हैं, ऐसी परिस्थितियों में चिन्ता होना स्वाभाविक ही है। इस प्रकार जीवन में पद-पद पर चिन्ताओं का सामना करना पड़ता है। किन्तु विशेषता यह है कि मनुष्य भिन्न-2 तरह से इनका सामना करते हैं। कई तो चिन्ताओं के भयंकर जाल में उलझ कर अपने जीवन को जड़ बना कर असफल हो जाते हैं। इसके विपरीत कई उनसे उसी प्रकार लाभ उठा लेते हैं जिस प्रकार जहर को शुद्ध रूप में उपयोग करने पर वह अचूक दवा का काम देता है।

चिन्ता हमें अपनी विषम परिस्थितियों से जूझने का संकेत करती है, किसी को परीक्षा उत्तीर्ण होने की चिंता है, व्यापार में हानि लाभ की चिंता है, बाल-बच्चों की उचित शिक्षा दीक्षा की चिंता है, घर का खर्च उचित रूप से चलाने की चिंता है, किन्तु केवल चिंता मात्र कर लेने से तो यह परिस्थितियाँ सुलझने से रहीं। इनके लिए एकमात्र सुगम और निश्चित मार्ग है श्रम शीलता। अपने आपको निरंतर अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्य में जुटाया जाए। यदि आपको चिंतायें घेरती हैं, निराशा आकर आपका हृदय तोड़ती है तो आप काम में जुट जाइये, शक्ति भर परिश्रम कीजिए। आप देखेंगे कि आपकी चिंता का भाग बहुत कम हो जाएगा और थोड़े दिनों में आपको अपने कर्मों में सफलता मिलेगी। गहरी चिंता में वे ही व्यक्ति पड़ते हैं जो करते कम हैं और सोच-विचार अधिक करते रहते हैं। परिश्रमी व्यक्ति कार्य में संलग्न होकर अपनी चिंताओं से बहुत कुछ छुटकारा पा लेता है। अपनी चिंताओं का सामना कर उनसे छुटकारा पाने के लिए आवश्यक है कार्य में जोर शोर से जुट जाया जाए। इस प्रकार कार्य द्वारा अपनी चिंताओं के समाधान के लिए संघर्ष करने पर जीवन में नैतिक साहस की वृद्धि होती है, जीवन में एक गति पैदा होती है।

बहुत से लोग अपनी चिंताओं के वास्तविक स्वरूप को अपनी कल्पना में काफी बड़ा बना लेते हैं। साधारण सी बातों को अपनी कल्पना से बढ़ा-चढ़ा कर अपने मस्तिष्क पर चिंताओं का एक भारी बोझा एकत्रित कर लेते हैं। इससे छोटी-2 बातों तथा चिंताओं में मनुष्य उलझ जाते हैं और आगे बढ़ने से रुक कर छटपटाया करते हैं। अतः अपनी साधारण चिंताओं को कल्पना शक्ति के आधार पर अतिरंजित रूप न देकर छोटे से छोटा गिना जाए। अपनी कल्पना शक्ति का उपयोग उन्हें दूर करने के उपाय सोचने में करना चाहिए। अपनी-2 छोटी-2 समस्याओं को बढ़ा−चढ़ा लेने पर मनुष्य जीवन में असफल हो जाते हैं। अतः चिंताओं का कभी अतिरंजन नहीं करना चाहिए।

रामायण की कथा से सभी परिचित हैं। महावीर हनुमान जब समुद्र लाँघ कर लंका में सीता का पता लगाने जा रहे थे तो मार्ग की दीर्घता आदि कठिनाई की चिंता रूपी सुरसा ने उनकी गति में रुकावट डाली। ज्यों-2 वे उसे कल्पना द्वारा बड़ा और कठिन समझने लगे, त्यों! त्यों! ही वही चिंता रूपी सुरसा अपना आकार बढ़ाती रही किन्तु ज्यों ही हनुमानजी ने अपनी कल्पना द्वारा कठिनाई को क्षुद्र समझ लिया अर्थात् उन्होंने अपना छोटा सा रूप धारण कर लिया तो सहज ही में उस सुरसा रूपी विशाल चिंता से मुक्त होकर अपने पथ पर आगे बढ़ गये। ठीक इसी प्रकार ही हमारे कई भाई अपनी कठिनाइयों को सुरसा की तरह विशाल आकार प्रदान कर देते हैं और तब तक उससे छुटकारा पाना असम्भव होता है। छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है अपना स्वरूप छोटा बना लेना अर्थात् कठिनाइयों को क्षुद्र समझ कर अपने प्रयत्न प्रारम्भ कर देना। इससे इस राक्षसी के चंगुल से बचा जा सकता है।

चिंताग्रस्त लोगों में ऐसे भी लोगों की संख्या अधिक होती है जो अक्सर अपनी भूत एवं भविष्य कालीन बातों की चिंता में मग्न रहते हैं। भले ही उनकी वर्तमान चिंता छोटी सी हो किन्तु वे उसके साथ अपने भूत भविष्य का सम्बन्ध जोड़कर चिंता का भारी बोझा अपने ऊपर लाद लेते हैं। हमें अपने वर्तमान पर ध्यान देना चाहिए उसी की चिंता करनी चाहिये। किसी भी क्षेत्र में अपनी सफलता के लिए वर्तमान में घोर परिश्रम कीजिए। भूत भविष्य की बातों को लेकर चिंता करते रहने से कुछ लाभ नहीं, अपनी वर्तमान समस्याओं की चिंता कर उन्हें सुलझाने का प्रयत्न कीजिए। अपनी भविष्य में आने वाली परिस्थितियों की कल्पना करके अपने आपको चिंता में न फंसाइये। यह निश्चित है कि भविष्य के प्रति आप जो कल्पना करते हैं उसका स्वरूप बदला जा सकता है। आपकी भावी परिस्थितियाँ, कठिनाइयाँ, उलझनें, आशंकायें समाप्त हो सकती हैं, यदि आप केवल वर्तमान की ही चिंता करें और उसके लिए अपने प्रयत्न जारी कर दें।

कमजोरियाँ, अभाव मनुष्य में होते हैं। मनुष्य स्वभाव की यह कमजोरी है कि कुछ न कुछ अपूर्णता उसमें रह जाती है। अतः अपनी किन्हीं भूलों के लिए बार-बार अपने को धिक्कारना, अपने को मूर्ख या अयोग्य मान बैठना उचित नहीं, इससे अपनी क्षमता शक्ति घटने लगती है। अपनी किसी पिछली अयोग्यता, असमर्थता, कमजोरी से अपने आपको स्थायी रूप से असफल, भाग्यहीन समझ बैठना उपयुक्त नहीं है। इस प्रकार की चिन्ता मनुष्य को ले बैठती है और उसके जीवन विकास को समाप्त कर देती है। मनुष्य से गल्तियाँ होना स्वाभाविक है, उनकी चिन्ता न कर भविष्य में ऐसा न करने की प्रतिज्ञा करके अपनी चिन्ताओं के भार को, आत्म-ग्लानि के विचारों को समाप्त कर देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य यह समझता हैं कि वह पूर्ण है, उससे गल्तियाँ नहीं हो सकतीं तो वह अपने को गलत समझता है।

अत्यधिक चिन्ता से निराशा ग्रस्त होकर मनुष्य जब कोई काम करता है तो उसकी सफलता की सम्भावना बहुत कम रहती है। अनिश्चित स्थिति एवं तकलीफों से डर कर भागने अथवा ढिलमिल होने की अपेक्षा हमें धैर्य पूर्वक उनका सामना करना चाहिए। ठोकरें खा-खा कर भी यदि उठ-उठ कर चलने का मार्ग अपना लिया जाए तो निश्चय ही अपनी परिस्थितियों पर विजय प्राप्त की जा सकती है। चिन्ताओं से छुटकारा मिल सकता हैं।

अधिकतर लोग चिन्ताओं को अपनी छाती चिपकाए रहते हैं। स्वयं ही उसमें उलझे रहते हैं। यदि अपने किसी अन्तरंग मित्र से मदद ली जाए तो चिन्ताओं से सहज ही में छुटकारा पाया जा सकता है। अपनी चिन्ता का विषय अपने अभिन्न मित्र, गुरु, मार्ग दर्शक, संरक्षक के समक्ष रखिए, वे आपकी चिन्ताओं को कम करके आपके भार को हल्का करेंगे। दूसरों से सान्त्वना मिलने पर मनुष्य बहुत कुछ हद तक अपनी चिन्ताओं से मुक्त हो जाते हैं।

अपनी चिन्ताओं एवं परेशानियों से सुलझने का एक ही सरल मार्ग है- ईश्वर की संरक्षणता जिसमें सान्त्वना मिलती रहें। इसके लिए सर्वोत्तम उपाय है ईश्वर की उपासना। ईश्वर से कठिनाइयों का मुकाबला करने की शक्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। इससे हृदय में अपूर्व शक्ति प्राप्त होती है और चिन्ताओं से छुटकारा मिलता है।

मनुष्य यदि अपनी चिन्ता न करके दूसरों के लिए चिन्ता का स्वभाव बना ले तो चिन्ताओं का वह बोझ जिससे जीवन नीरस एवं सौंदर्य विहीन बन जाता है, से बचा जा सकता है। दूसरों के लिए चिन्ता करने वाले अन्तःकरण में एक प्रकार की शान्ति और हल्कापन अनुभव करते हैं, साथ ही दूसरों का हित साधना भी सम्भव हो जाता है।


Quotation

प्रायः दुश्चिन्ताओं का कोई आधार नहीं होता। केवल कोई अस्पष्ट की आशंका व्यक्ति को अस्वस्थ कर देती है। यह रोग उस अपरिपक्व वय के व्यक्ति को जकड़ लेता है जो नैसर्गिक उद्वेगों का अस्वाभाविक रीति से निरोध करता हैं। चिन्ता से बढ़कर, आज के मनुष्य का और कोई बड़ा शत्रु नहीं हो सकता। चिन्ता करने वाले व्यक्ति को जीवन के महत्व पूर्ण कार्य करने वाला समय ही नहीं मिलता। उसका सारा समय तो व्यर्थ की उधेड़ बुनों में ही चला जाता है। जितना अधिक वह अपनी भूलों और असफलताओं पर विचार करता है, उतना ही अधिक उसका मस्तिष्क असन्तुलित होता है।

हमारी चिन्ता का एक बड़ा कारण यह है कि हम चाहते हैं कि दूसरे सदा हमारे बारे में चिन्तित रहें और जब वह ऐसा नहीं करते, हम स्वयं चिन्तित हो जाते हैं। इसका उपाय इसके अलावा कुछ नहीं है कि हम सदैव अपने को कार्यव्यस्त और बहिर्मुखी रखें।

-सत्यकाम विद्यालंकार


साधना में सेवा का महत्व

(श्री 108 स्वामी सच्चिदानन्दजी महाराज)

प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रताः’। जो सब जीवों का हित-चिन्तन करते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं। अतः साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह सेवा-भावी बने।

विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवा व्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिन्ता रहती हैं, वे व्यक्ति सेवा कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते।

सेवा-व्रती का हृदय करुण और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहकता बढ़ती जाती है।

दुखियों की सेवा, निर्बल की रक्षा और रोगियों की सहायता सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवाव्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अन्तः करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्ट हो जाती है।

सेवाव्रती का शरीर स्वच्छ रहना आवश्यक है। उसे अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान करना चाहिए। अपवित्र और रोगी मनुष्य की प्रवृत्ति कभी स्वच्छ नहीं रहती। उनमें क्रोध, ईर्ष्या आदि की उत्पत्ति हो जाती है। इससे विभिन्न वासनाएँ भड़क उठती हैं। फिर मनुष्य अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता।

जब असंयम का अधिकार बढ़ता है, तब दुष्कर्मों की वृद्धि होती है। सुख की कामना से की गई सेवा भोग में परिवर्तित हो जाती है। तब साधक में अहंकार जागृत होता है। सत्य का लोप हो जाता है, पाप-वृत्तियाँ अपना पंजा कठोर करती हुई उसे बुरी तरह जकड़ लेती हैं।

स्थूल शरीर की इच्छाएं मनुष्य के धर्म का अपहरण कर लेती हैं, उस समय अन्याय और दुराचार का बोलबाला होता है। यदि अपने मन पर नियंत्रण नहीं हो तो सेवा, कुसेवा बन जाएगी और जीवन की सुख-शान्ति का लोप हो जाएगा।

मन शुद्ध हो तो अपने पराये में भेद नहीं रहता। वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, पुत्र पत्नी आदि का मोह भी मिट जाता है। फिर सत् को अपनाना और शुद्ध संकल्पों में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परमतत्व के अस्तित्व का बोध होता है।

अहं का शोधन होने पर मानापमान की चिन्ता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है, अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है।

सेवा द्वारा सुखोपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है अतः सब प्राणियों में परमात्मा को स्थित मानते हुए जो तुम्हारी सेवा चाहे, उसी की सेवा करो। सबको अपना स्वरूप मान कर सेवा कार्य में लग जाओ। परन्तु देश, काल और पात्र का विचार कर सेवा करना चाहिये।

बालक, वृद्ध और रोगी मनुष्यों को संकट में पड़ा देखकर उनकी उपेक्षा न करो। दुःखी व्यक्तियों का दुःख दूर करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। जिन्हें तुम्हारी सेवा की आवश्यकता नहीं, उनकी सेवा करने से कोई लाभ नहीं है।

सेवा के लिए कोई निश्चित स्थान नहीं होता। उसके लिए किसी दिखावे की भी आवश्यकता नहीं हैं। सच्चा सेवक वही है जो बिना प्रदर्शन अपना कार्य करता रहे। सेवा कार्य किसी से प्रशंसा प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि अपना कर्त्तव्य समझ कर किया जाता है।

सेवा कार्य में जब कोई बाधा पड़े, आलस्य के कारण कार्य न होता हो, मन में विश्राम करने की इच्छा उत्पन्न हुई हो, तब समझना चाहिए कि यह वासनात्मक शरीर की इच्छा है। इनकी पूर्ति अपने कर्त्तव्य से गिर जाने के समान होगी और उससे शरीर में प्रमादादि अवगुण बढ़ते जाएंगे।

स्थूल देह का पक्ष मत लो। शरीर तुम्हारा वाहन है, तुम शरीर के वाहन नहीं हो। इसलिए उसका उपयोग अपनी विवेक पूर्ण बुद्धि के द्वारा करो। उसे मिथ्या मार्ग पर चलने से रोको। परन्तु, इसकी अनिवार्य आवश्यकताओं की उपेक्षा भी मत करो, अन्यथा शरीर की शक्ति निर्बल हो जाएगी और वह तुम्हारा साथ देने में समर्थ न रह सकेगा।

सेवा के मार्ग में आने वाले विघ्नों की परवाह न करो। उन्हें धकेलते हुए बढ़े चले जाओ। उस समय अपने दुःख को दुःख न मानकर दुःखियों की सेवा को ही अपना सुख समझो। तुम्हारे जिस सुख में किसी दूसरे का अहित छिपा हो, उस सुख का त्याग कर देना सच्ची सेवा है।

सेवा के बदले में धन या सम्मान की इच्छा वाला सेवक अपनी सेवा का विक्रय करता है और यह सेवा-विक्रय वह जघन्य कर्म है, जिससे सद्गुणों का लोप हो जाना सम्भव है। सेवक का कर्म तो सेवा है, मान-अपमान का उसे कोई भय नहीं होता। जिसका मन यह समझे कि मैं अपना कर्त्तव्य ही कर रहा हूँ अथवा मैं अपने मार्ग से विचलित नहीं हुआ हूँ तो दूसरे लोग चाहे उसकी निन्दा ही करें, सेवक का उससे कोई अनिष्ट नहीं होगा।

जो व्यक्ति सत्य मार्ग से हटकर सेवा का आडम्बर करते हैं, वे अपने भ्रमपूर्ण विचारों के कारण सेवा का यथार्थ भाव नहीं समझ पाते, स्वार्थ भाव से की जाने वाली सेवा सेवक के लिए अपमान का कारण होती है और उससे उसका कोई आत्मिक लाभ भी नहीं होता।

साधक की साधना का प्रारंभ सेवा से होता है, आगे चल कर त्यागी बन जाता और अंत में सिद्धि को प्राप्त होकर परमात्मा में मिल जाता है। परन्तु प्रपंची सेवक प्रारम्भ में स्वामी, फिर रागी और अन्त में मोह को प्राप्त होकर संसार सिंधु में डूब जाता हैं।

सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण सम्बन्धों को समाप्त कर देती है, इसलिए किसी को अपना मान कर सेवा न करो, बल्कि सेवा को कर्त्तव्य मान कर अपने और पराये सभी की सेवा करो। परमात्मा के अंश भूत होने के नाते सब प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है।

अपने जिस दुःख से दूसरों का हित होता हो, उसे सहन कर लो। अनेक साधु, सन्तों, ऋषियों और महापुरुषों ने परहित पर अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिये। यह देह नाशवान है, किसी न किसी दिन इसका अंत तो होना ही है, इसलिए दूसरों के हित में इसका उपयोग होता हो तो उससे अधिक पुण्य और क्या होगा ?

साँसारिक मनुष्य जब किसी से मिलते हैं तो वे कुछ प्राप्त होने की आशा से ही मिलते हैं। जहाँ उन्हें कुछ पाने की आशा नहीं होती, वहाँ वे नहीं जाते। परन्तु, सेवा-भावी व्यक्ति जब किसी से मिलता है तो वह यही सोच कर मिलता है कि ‘मुझे सेवा करने का भी एक अवसर मिला है, क्या मैं इसे कुछ दे सकता हूँ?’ क्योंकि देने की वृत्ति उसके स्वभाव में आ गई होती है।

यदि वह किसी को धन देने में समर्थ नहीं है तो इससे सेवा का महत्व तो कम नहीं हो जाएगा। वह धन नहीं दे पाता तो श्रेष्ठ विचार तो दे ही सकता है। उसके द्वारा जो सेवा-कार्य होता है, वह बड़े से बड़े धन-दान की अपेक्षा श्रेष्ठ है।

सेवा व्रती का कर्त्तव्य हैं कि वह छोटी-छोटी सेवाओं द्वारा भी प्राणियों का बहुत उपकार कर सकता है और कुछ नहीं तो सद्भावना के दो शब्द भी कभी-कभी मनुष्य को धैर्य प्रदान करते हैं और उससे अत्यन्त हित-साधन होता है।

कोई भावुक व्यक्ति अपने जीवन से निराश होकर आपके पास आकर अपने भावों को व्यक्ति करे तो उस समय आपके सान्त्वना भरे दो शब्द ही उसे आत्म हत्या करने से रोक सकते हैं। विचार कीजिए कि आपके वह दो शब्द क्या किसी बहुत बड़े सम्पत्तिदान से कुछ कम महत्व रखते हैं? जीवन से निराश हुए मनुष्य की प्राण-रक्षा में योगदान देना एक बहुत बड़ी सेवा है। इससे कौन इन्कार कर सकता है?


नेहरूजी के जन्म का गुप्त रहस्य

लगभग सत्तर वर्ष पहले एक बार पंडित मदनमोहन मालवीय, पं. दीनदयाल शास्त्री और पं. मोतीलाल नेहरू- ये तीनों हरिद्वार के पास ऋषिकेश गये थे। पं. मालवीय जी आरम्भ से ही श्रद्धालु प्रकृति के थे, इसलिए प्रतिदिन प्रातःकाल गंगा तट पर भ्रमण करने जाते और कहीं किसी प्रसिद्ध योगी को तपस्या करता सुनते, वहीं जाकर उसके दर्शन करते थे।

एक दिन संध्या के समय उन्होंने एक पेड़ के ऊपर लम्बी जटा वाले योगी के दर्शन किए। उस पेड़ के नीचे की डाली पर एक हँड़िया लटक रही थी। पूछ-ताछ करने से पता लगा कि वे योगी महाराज पेड़ पर रहकर तपस्या करते हैं। प्रातः काल एक बार वे पेड़ से नीचे उतरते हैं और गंगा जी में स्नान करके फिर पेड़ पर चढ़ जाते हैं। उसी समय अगर उस पेड़ पर लटकी हाँड़ी में कुछ मिल जाता है तो उसका प्रसाद लेकर फिर पेड़ पर चढ़ जाते हैं और यदि हाँड़ी में कुछ न मिलता तो बिना कुछ खाये ही पेड़ के ऊपर चले जाते हैं।

इस घटना की चर्चा करते हुए स्वयं मालवीय जी ने बतलाया था कि ‘ऐसी बात सुन कर इस साधु की तरफ हमारी श्रद्धा बढ़ गई। दूसरे दिन प्रातः काल से कुछ पहले ही हम वहाँ जा पहुँचे, पर योगी वहाँ मौजूद न था, वह स्नान करने चला गया था। कुछ समय बाद यह वापस आ गया। उसके हाथ में पानी का भरा हुआ घड़ा था। यद्यपि योगी महाराज वृद्ध थे पर उनकी देह तेज से चमक रही थी। हम सबने उनको प्रणाम किया। उन्होंने पूछा कि ‘क्या चाहते हो ?’ मैंने मोतीलाल की तरफ इशारा करके कहा कि ‘इनको पुत्र की अभिलाषा है!’ योगी ने मोतीलाल जी की तरफ निगाह करके कहा-इनके नसीब में तो पुत्र नहीं है।’ यह बात सुन कर मैं और दीनदयाल बोल उठे कि ‘आप तो कर्म योगी हो, इस लिए आप तो असंभव को भी संभव कर सकते हो। यदि आप ही हमारी सहायता न करोगे तो दूसरा कौन कर सकता है?’

इसके पीछे दीनदयालजी ने शास्त्र के वचन उद्धृत करके सिद्ध किया कि कर्मयोगी सब कुछ कर सकता है और उसे दूसरों का उपकार करने में हिचकिचाना नहीं चाहिये। योगी ने कुछ उत्तर नहीं दिया वरन् चुपचाप विचारता रहा। इसके बाद उसने घड़ा से थोड़ा जल लेकर तीन बार जमीन पर छिड़क दिया। और चौथी अंजली जल लेकर उसे मोतीलाल जी पर छिड़क दिया। तब वह हमारी तरफ देख कर मन्द स्वर में बोले-’आप लोगों ने मेरे साथ बड़ी ज्यादती की है। मेरी जन्म-जन्म की तपस्या का फल तुमने मुझसे ले लिया है।’ मालवीय जी लिखते हैं कि ‘उस समय योगीराज का चेहरा एक दम फीका पड़ गया था। वह बिना कुछ कहे पेड़ पर चढ़ गया। हम तीनों भी अपने ठहरने के स्थान पर वापस आ गये। दूसरे दिन हम फिर योगी का दर्शन करने गये तो वे पेड़ पर नहीं थे, वरन् पेड़ की जड़ के पास उनकी मृत देह पड़ी थी। योगी ने अपनी समस्त तपस्या का फल अर्पित कर दिया था।


Quotation

दस महीना बाद मोतीलाल जी के घर पर पुत्र का जन्म हुआ और उसका नाम जवाहरलाल रखा गया। वही ये जवाहर लाल नेहरू हैं जो वास्तव में समस्त जगत में प्रकाश फैला रहे हैं। सचमुच वह “फरिश्ता” हैं “अवतारी पुरुष” हैं। उन्होंने जो कार्य सिद्ध किया है वह उनकी जन्म-जन्म की तपस्या का फल है।

पं. जवाहरलाल के जन्म से सम्बन्धित इस कथा को स्वयं मालवीय जी ने लिखा था और दिल्ली के “शेरे-पंजाब” नामक उर्दू पत्र ने उसको कहीं से प्राप्त करके प्रकाशित किया था। इस विवरण को पढ़ कर श्री एन. वी. सेन नामक सज्जन ने इसके सम्बन्ध में जाँच करने का विचार किया और स्वयं पं. नेहरू को पत्र लिख कर इसकी सचाई बतलाने को कहा। ता. 25-5-57 को नेहरू जी के निजी सेक्रेटरी श्री सी आर श्रीनिवासन का पत्र उनको मिला कि “नेहरू जी ने आपका (श्री सेन का) पत्र पाने के बाद “शेरे पंजाब” के लेख को पढ़ा। इस सम्बन्ध में उनका कहना है कि उन्होंने ऐसी बात अभी तक किसी के मुख से नहीं सुनी थी।”

नेहरू जी का यह उत्तर मिलने पर श्री सेन ने “शेरे-पंजाब” के एडिटर से लिखा पढ़ी की। उनकी तरफ से साफ शब्दों में यह उत्तर मिला कि “यह घटना स्वयं मालवीय जी ने एक प्रसिद्ध व्यक्ति को निजी-पत्र में लिखी थी, उसी में से इसे लिया गया है। वह पत्र अभी मौजूद है और वे उसे दिखाने को तैयार हैं।

श्री नेहरू ने श्री सेन को जो उत्तर दिया था, उसमें कहा गया था कि “यदि यह घटना सत्य होती तो मेरे पिताजी अथवा मालवीय जी ने मुझको उसका जिक्र किया होता। पर इस सम्बन्ध में श्री सेन का विचार यह है कि “सम्भव है कि इन दोनों बुजुर्गों ने किसी खास कारणवश यह जवाहरलाल जी से न कही हो। क्योंकि अवतारी पुरुष विशेष कार्य को सिद्ध करने के लिए ही पृथ्वी पर प्रकट होते हैं और जिस समय उनको अपने पूर्व जन्म के विषय में ज्ञान हो जाता है उसी समय उनका जीवन निराशा युक्त हो जाता है। इस प्रकार एक दृष्टि से तो यह अज्ञान आशीर्वाद स्वरूप समझना चाहिए।

यौवन जीवन का कोई नियत समय नहीं अपितु मन की स्थिति है, इच्छा का उद्वेग हैं, कल्पना की विशिष्टता, अनुभूतियों का प्राबल्य है, भीरुता पर पराक्रम का प्रभुत्व है, आलस्य के प्रति प्रेम की अपेक्षा साहसिक कार्यों की भूख है।

अधिक वर्षों तक जीने से ही कोई वृद्ध नहीं हो जाता। लोगों पर बुढ़ापा तभी आता हैं जब वे अपनी इच्छा-शक्ति को तिलाँजलि दे देते हैं। आयु शरीर पर झुर्रियाँ डाल देती है, किन्तु उत्साहहीनता आत्मा पर झुर्रियाँ डालती है। चिंता, सन्देह, आत्म संशय, भय और निराशा ही लम्बे-लम्बे वर्ष हैं। जो सिर को झुकाकर विकासोन्मुख आत्मा को मिट्टी में मिला देते हैं।

मनुष्य किसी भी आयु में हो, उसके हृदय में विश्व के रहस्यों के प्रति आश्चर्य तथा नक्षत्रों और नक्षत्रों जैसी वस्तुओं के प्रति मधुर आकर्षण रहता ही हैं। तभी वह घटनाओं की निर्भीक चुनौती को बच्चों की अतृप्त जिज्ञासा के समान उल्लास और जीवन की क्रीड़ा समझता है।

हम उतने ही जवान हैं, जितना हमें विश्वास है, और उतने ही बूढ़े हैं जितना हमें सन्देह है।

“सफल जीवन”

“सफल जीवन”

गायत्री साधना से वेद-ज्ञान की प्राप्ति

(देवी भागवत पुराण से)

नारायण तीर्थ नामक स्थान में महर्षि विदग्ध शाकल्य का आश्रम था। वहाँ वे अपने एक हजार शिष्यों के सहित निवास करते थे। महर्षि के एक शिष्य याज्ञवलक्य भी उन दिनों उन्हीं के पास थे। महर्षि ने उन्हें ऋग्वेद में पारंगत कर दिया था।

एक दिन आनर्त देश के नरेश सुप्रिय उनके आश्रम पर पहुँचे और वहाँ की सुख-शान्ति देखकर कुछ दिन वहाँ रह कर ऋषि-मुनियों का सत्संग करने की उन्हें इच्छा हुई। महर्षि ने उनके निवास के लिए अपनी आश्रम-भूमि में ही व्यवस्था कर दी और एक विद्यार्थी को यह कार्य सौंपा कि वह नित्यप्रति राजा सुप्रिय का अभिषेक कर उन्हें सुखी रहने का आशीर्वाद दिया करे।

नित्य की भाँति आज भी याज्ञवलक्य राजा को शुभाशीष देने के लिए गए, परन्तु राजा को नित्यकर्म से निवृत्त होने में देर हो गई। उन्होंने नम्रता से कहा-’ऋषिवर! आप कुछ देर रुकें।

याज्ञवलक्य ने सोचा कि ‘आश्रम-जीवन में आलस्य नहीं करना चाहिए।’ उन्होंने राजा से भी ऐसा कहा कि- ‘राजन्! आश्रम-जीवन है। इसमें एक-एक क्षण बहुमूल्य है।’

राजा पर इसका उल्टा प्रभाव पड़ा। उसने सोचा कि ‘यह विद्यार्थी अभिमानी है।, वह बोला-’ऋषि कुमार! यदि तुम रुकना नहीं चाहते तो सामने पड़े लक्कड़ पर जल डाल कर चले जाओ।’

याज्ञवलक्य ने ऐसा ही किया। सूखे लक्कड़ पर पानी डालकर वे चले गए। सायंकाल में राजा की दृष्टि उस पर पड़ी। लक्कड़ हरा हो गया और उसमें नवीन पत्तियाँ तथा फल, फूल लग गए। यह देख राजा अत्यन्त आश्चर्य चकित हो गये। उन्होंने सोचा ‘मैंने यह स्वर्ण अवसर गँवा दिया। जिस जल ने इस शुष्क काष्ठ को हरा-भरा कर दिया, वह यदि मुझे पर पड़ता तो क्या मुझे भी सब प्रकार सुखी न कर देता।’

राजा ने महर्षि विदग्ध शाकल्य के पास अपने मंत्री को भेज कर निवेदन कराया कि ‘आज वाले विद्यार्थी को ही कल प्रातःकाल अभिषेक के निमित्त भेजें।’ यह सुनते ही महर्षि ने याज्ञवलक्य को बुलाकर कहा कि-’वत्स! कल राजा का अभिषेक करने के लिए तुम्हीं जाना।’ परन्तु याज्ञवलक्य ने इसका कुछ उत्तर न दिया।

दूसरे दिन याज्ञवलक्य के स्थान पर अन्य विद्यार्थी को आया देख कर राजा को प्रसन्नता न हुई। उन्होंने उससे भी अभिषेक जल को सामने पड़े अन्य लक्कड़ पर छोड़ने को कहा। विद्यार्थी जल उस पर डाल कर चला गया। परन्तु उस लक्कड़ में कोई परिवर्तन न हुआ।

राजा के मन की अशाँति बहुत बढ़ गई। अब वे स्वयं महर्षि की सेवा में उपस्थित हुए। विदग्ध शाकल्य ने राजा को सादर आसन दिया और अभिप्राय जानकर याज्ञवलक्य को समीप बुलाकर बोले-’वत्स! राजा हमारे अतिथि हैं। इनका इच्छित करना हमारा कर्तव्य है। अतः जिस कार्य से इनका हित हो, वही करो।’

याज्ञवलक्य ने नम्रता से कहा-’गुरुदेव! यह तपोभूमि है। यहाँ प्रमादी पुरुष का कल्याण सम्भव नहीं है। राजा के प्रमाद का इन आश्रय वासियों पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा।’

राजा ने याज्ञवलक्य से क्षमा-याचना की। तब विदग्ध शाकल्य बोले-’वत्स याज्ञवलक्य! क्षमा माँगने वाले पर क्रोध कैसा ? अतः राजा पर प्रसन्न होकर इनकी कामना पूर्ण करो।’

याज्ञवलक्य बोले-’गुरुदेव! राजा मेरे सामने नहीं, मेरे चमत्कार के सामने झुका है। मैं इसके हित में कुछ कर सकूँ यह सम्भव नहीं है।’

विदग्धशाकल्य क्रोधित हो उठे। उन्होंने कर्कश स्वर में कहा-’रे मूर्ख! मिथ्याभिमानवश हमारा अपमान कर रहा है। ऐसे प्रमादी शिष्य का इस आश्रम में कोई काम नहीं है। अतः तू मुझसे प्राप्त वेद-विद्या को मुझे लौटा कर यहाँ से चला जा।’

याज्ञवलक्य ने सोचा-’जो गुरुजन अभिमान के वशीभूत होकर अनुचित आज्ञा दें, उनसे विलग हो जाना ही उचित है।’

विदग्धशाकल्य से प्राप्त ऋग्वेद-विद्या को लौटाकर याज्ञवलक्य वहाँ से चल दिए। उनके मन में विविध प्रकार के संकल्प-विकल्प उठ रहे थे। उन्हें लगा कि गुरुदेव का अपमान करके उन्होंने ठीक कार्य नहीं किया क्योंकि जहाँ वे जाते वहीं उनके आश्रम त्याग की बात सुनकर लोग उनकी निन्दा करते। परन्तु, उनका हृदय कहता कि जो कार्य उनसे हो गया है, वह किसी प्रकार भी अनुचित नहीं हुआ। जहाँ प्रमाद है, अभिमान है, स्वार्थ की भावना है, वह स्थान अवश्य ही त्याज्य है।

इस प्रकार विचार करते और भ्रमण करते हुए कई मास व्यतीत हो गए। एक दिन वे प्रभास तीर्थ के निकट पहुँचे। वहाँ उनके नाना महर्षि वैशंपायन निवास करते थे। महर्षि से याज्ञवलक्य ने अपना सब वृत्तांत कहा और उनकी आज्ञा पाकर उन्हीं के पास रहने लगे।

वैशंपायन ने याज्ञवलक्य को यजुर्वेद की शिक्षा दी। अल्पकाल में ही वे यजुर्वेद के पूर्ण ज्ञाता हो गए। उनकी दिव्य प्रतिभा से वैशंपायन अत्यन्त प्रसन्न हुए और वे शीघ्र ही आश्रम के कुलगुरु घोषित कर दिए गए।

इसके पश्चात् एक दिन सुमेरु पर्वत पर प्रमुख महर्षियों की एक बृहद् सभा हुई। उसकी सूचना सात दिवस पूर्व प्रसारित की गई और उसमें सम्मिलित न होने वाले को ब्रह्म हत्या लगने की बात कही गई। यह जानकर महर्षि वैशम्पायन ने वहाँ जाने का विचार किया। परन्तु चलने की शीघ्रता में किसी प्रकार उनका पाँव एक शिशु पर पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार यह बाल हत्या तो लगी ही, साथ ही सभा में जाना स्थगित करने के कारण ब्रह्म हत्या का पाप और लग गया।

वृद्धावस्था और कृश शरीर के कारण प्रायश्चित करने की महर्षि में शक्ति न रही। अतः उन्होंने याज्ञवलक्य से कहा कि-”किसी बड़े विद्यार्थी से इसका प्रायश्चित कराओ।”

याज्ञवलक्य ने उत्तर दिया-”भगवन्! इन विद्यार्थियों की शक्ति सीमित है, यदि मुझे प्रायश्चित करने की आज्ञा दें, तो मैं इस कार्य को भले प्रकार पूर्ण कर सकूँगा।”

महर्षि ने समझा, याज्ञवलक्य को बड़ा अभिमान हो गया है, यह अन्य शिष्यों को अत्यन्त निस्तेज समझता है। अतः वे बोले-’याज्ञवलक्य! तू इन विद्यार्थियों को इतना हीन समझता है कि इनका अपमान करने में नहीं चूका। अतः मुझे तेरे जैसे अभिमानी शिष्य का त्याग करना ही उचित लगता है। तू मेरी दी हुई वेद-विद्या को लौटा कर चाहे जहाँ चला जा।’

याज्ञवलक्य को इससे बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने कहा कि ‘प्रभो! मरे मन में आपके प्रति अत्यन्त-भक्ति-भाव था, उसी के वशीभूत होकर मैंने ऐसा कहा है। इन विद्यार्थियों का निरादर करने का मेरा किंचित् अभिप्राय न था।’

परन्तु वैशम्पायन का क्रोध शान्त न हुआ। याज्ञवलक्य ने उनसे प्राप्त हुआ यजुर्ज्ञान लौटा दिया और भारी हृदय से आश्रम-त्याग कर चल दिए।

भ्रमण करते हुए याज्ञवलक्य विश्वामित्र तीर्थ में पहुँचे। वहाँ उनके पिता देवरात तप करते थे। पुत्र को आया देख कर वे प्रसन्न हुए। उन्होंने याज्ञवलक्य की दुःख-कथा सुनकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- ‘पुत्र! हमारे वंश में अब तक कोई भी निराश नहीं हुआ। क्योंकि हमारे कुल गोत्र के आदि प्रवर महर्षि विश्वामित्र हैं। उन्होंने गायत्री-साधना द्वारा महान् ब्रह्मवर्चस् को प्राप्त किया है। उसी गायत्री मंत्र के द्वारा तुम्हारे मन का पूर्ण विषाद और निराशा शीघ्र ही दूर हो जाएगी।’

याज्ञवलक्य ने पूछा-’पिताजी! महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय हैं, यह हमारे कुल के आदि प्रवर किस प्रकार हुए?’

देवरात ने उत्तर दिया-’महर्षि अंगिरा के वंश में अजीगर्त नामक एक पुरुष हुए। उनके तीन पुत्र थे-शुनः पुच्छ, शुनः शेप और शुनोलाँगूल। राजा रोहिताश्व ने शुनः शेप को यज्ञपशु के रूप में क्रय किया। उससे जाते समय मार्ग में विश्वामित्र का आश्रम आया। तब शुनः शेप ने उनसे प्राण-रक्षा की प्रार्थना की। महर्षि ने राजा रोहिताश्व से उसे मुक्त कराया और अपने दत्तक पुत्र के समान रखा। वह शुनः शेप ही मेरे पिता थे। मैंने भी गायत्री मंत्र द्वारा भगवान् सवितादेव को प्रसन्न कर उन्हीं के समान तेजस्वी पुत्र की याचना की थी। तुम भी उन्हीं सवितादेव की उपासना करो। वही तुम्हारा कल्याण करेंगे।’

पिता की आज्ञा पाकर याज्ञवलक्य ने गायत्री-साधना आरम्भ की तब सविता देव प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर वर माँगने को कहा। याज्ञवलक्य ने उन्हें बारम्बार प्रणाम किया और बोले-’प्रभो आप अन्तर्यामी हैं। मेरी कामना आपसे छिपी हुई नहीं है। मैं समस्त वेद-शास्त्रों के ज्ञान की याचना करता हूँ। वही मुझे प्रदान करो।’

इच्छित वर देकर सविता देव अन्तर्ध्यान हो गए। उसी समय से याज्ञवलक्य के हृदय में सूर्य के समान ही अलौकिक ज्ञान ज्योति प्रकट हुई और वे सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हो गए।


गुरु पूर्णिमा का पुनीत पर्व।

(श्री गौरीदत्त झा साहित्याचार्य)

माता पिता की सेवा करना सन्तान का धर्म है। उसकी महिमा शास्त्रों में विस्तार पूर्वक कही गई है पर गुरु की महत्ता उनसे भी बड़ी है क्योंकि माता पिता केवल शरीर को जन्म देते, शरीर का रक्षण और पोषण करते हैं पर गुरु द्वारा आत्मा का विकास, कल्याण एवं बन्धन मुक्ति का जो महान कार्य सम्पन्न किया जाता है, उसकी महत्ता शरीर पोषण की अपेक्षा असंख्यों गुनी अधिक है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर-मनुष्य जीवन में आध्यात्मिकता को समझने वाले ऋषियों ने गुरु पूर्णिमा का पुनीत पर्व विनिर्मित किया।

आषाढ़ सुदी 15 को गुरु पूर्णिमा का पर्व होता हैं। हिन्दू धर्म में प्रचलित अन्य सभी त्यौहारों की अपेक्षा इसका महत्व अधिक माना गया है। क्योंकि सन्मार्ग के प्रेरक सभी व्रतों पर्वों त्यौहारों से लाभ उठाया जा सकना तभी सम्भव है जब सद्गुरुओं द्वारा उनकी उपयोगिता एवं आवश्यकता सर्व साधारण को अनुभव कराई जा सके। यदि मार्ग दर्शक एवं प्रेरक सद्गुरुओं का अभाव हो जाए, उनकी बात पर ध्यान न दें तो पर्व त्यौहारों एवं धर्म शास्त्रों से लाभ उठा सकना जनता के लिए सम्भव न होगा। धर्म ग्रन्थ घरों में रखे तो रहेंगे, उनके पाठ पूजन भी होते रहेंगे पर उनमें वर्णित तथ्यों में अभिरुचि तो गुरु प्रेरणा बिना कैसे उत्पन्न हो सकेगी? इसी प्रकार सारे त्यौहारों की चिन्ह पूजा होती रहेगी, लोग उन अवसरों पर मिठाई मलाई खाते रहेंगे, हँसी खुशी मनाते रहेंगे पर उनके द्वारा जो कल्याणात्मक प्रवृत्तियाँ विकसित होनी चाहिएं वे गुरु के बिना सम्भव न हो सकेंगी।

जैसे नेत्रों के बिना संसार का सारा वैभव अदृश्य रहता है। जैसे प्रकाश कि बिना सर्वत्र अन्धकार ही छाया रहता है, उसी प्रकार गुरु के बिना भी समस्त धर्म शास्त्रों, कर्मकाण्डों, व्रत पर्वों के होते हुए भी अन्धकार ही छाया रहेगा। इसीलिए गुरु की महिमा को हिन्दू धर्म में अत्यधिक महत्व दिया गया है। गुरु विहीन को “निगुरा” कहकर एक प्रकार की गाली दी गई है। गुरु विहीन व्यक्ति के सत्कर्म भी निष्फल जाने की घोषणा की गई है। गुरु की आवश्यकता एवं उपयोगिता को लोग भूल न जाएं वरन् भली प्रकार ध्यान में रखें, इसी दृष्टिकोण से गुरु पूर्णिमा का त्यौहार प्रचलित है और उसे उत्साह पूर्वक धार्मिक क्षेत्रों में मनाया भी जाता है। शायद ही कोई विचार शील धार्मिक या शिक्षण संस्था ऐसी हो जो गुरु पूर्णिमा पर अपने उत्सव आयोजन न करती हों। प्रत्येक शिष्य अपने आध्यात्मिक गुरुओं का और प्रत्येक छात्र अपने शिक्षा अध्यापकों का इस दिन अभिवादन करता है और उनके चरणों पर अपनी श्रद्धाँजलि के सुमन अर्पित करता है।

स्कूली छात्रों में दिन-दिन बढ़ रही उद्दंडता, अनुशासन हीनता और धर्म पथ के पथिकों में बढ़ रही अवज्ञा और अनास्था को देखकर देश में सभी विचार शील लोग चिन्तित हैं। भय है कि यह दुष्प्रवाह यदि रोका न गया तो हमारा भावना स्तर बहुत ही निम्न श्रेणी का हो जाएगा और जिस प्रकार गंगोत्री के धारा प्रवाह के शुष्क हो जाने पर सारी गंगा के ही सूख जाने का भय हो सकता है, उसी प्रकार गुरु भाव शिथिल होने पर सारी धर्म प्रवृत्तियों, ज्ञान राशियों के मुरझा जाने का धूमिल होने का भय उपस्थित हो जाएगा। विज्ञ विचारक इस समस्या के कारण चिन्तित हैं और इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि गुरु भक्ति की परम्परा किसी न किसी रूप से जीवित अवश्य रखी जाए।

आज की जितनी तो नहीं पर प्राचीन काल में भी इस बात की आवश्यकता अनुभव की गई थी कि मानव अंतःकरण की सत्प्रवृत्तियों को जीवित रखने एवं विकसित करने के लिए गुरु तत्व के प्रति जन मानस में आस्था कायम रखी जाए। इसी कारण गुरु पूर्णिमा का पर्व बना था और प्रत्येक शिक्षा संस्था तथा धर्म संस्था अपना यह आवश्यक कर्तव्य मानती थी कि इस पर्व को पूरे उत्साह और समारोह पूर्वक मनाया जाए। इतिहास साक्षी है कि लाखों वर्षों तक इस देश में गुरु पूर्णिमा उसी उल्लास पूर्ण वातावरण से मनाई जाती रही जिस प्रकार आज होली दिवाली मनाई जाती हैं। इस पर्व पर प्रत्येक छात्र का अपने अध्यापकों के प्रति और प्रत्येक शिष्य का अपने गुरु के प्रति भक्ति भाव समुद्र के ज्वार की तरह उमड़ता था और गुरुजनों का वात्सल्य भी अमृतमयी गंगा की तरह लहराता था। वह दिन कितने मंगलमय थे, यह भावोल्लास हमारे साँस्कृतिक भविष्य को उज्ज्वल बनाने में कितना सहायक होता था इसका सही मूल्याँकन कर सकना भी हमारे लिए कठिन है।

राष्ट्र निर्माण के लिए आज जिस प्रकार योजना आयोग के अंतर्गत तेजी के साथ निर्माण कार्य हो रहा हैं उसी प्रकार युग निर्माण के लिए भी हमें अपनी अस्त-व्यस्त साँस्कृतिक परम्पराओं की पुनः सुव्यवस्था एवं जीवित जागृत करना होगा। इस दिशा में गुरु तत्व की महिमा को अक्षुण्य रखना एवं उसकी महत्ता से जन साधारण को परिचित कराना भी एक आवश्यक कदम होगा। इससे जहाँ जन मानस में अपने मार्ग दर्शकों के प्रति पनपने वाली अनास्था एवं कृतघ्नता घटेगी, वहाँ एक लाभ भी होगा कि जनता की तेज आँखें उन ढोंगी गुरुओं का भंडा फोड़ भी कर देंगी जो विज्ञ विचारकों की आलोचना से बचकर किसी कोने में पड़े हुए रोग कीटाणुओं की तरह पनपते और फलते-फूलते रहते हैं। साथ ही सुयोग्य सद्गुरुओं का उत्साह बढ़ेगा और वे अपने चरित्र एवं कर्तव्य के प्रति और भी अधिक जागरुक रहकर आदर्श उपस्थित करने का प्रयत्न करेंगे।

गुरु पूर्णिमा का पर्व उसी उत्साह पूर्वक मनाये जाने का धार्मिक संस्थाओं को प्रयत्न करना चाहिए जैसे कि आजकल होली दिवाली मनाये जाते हैं यों अनेकों धार्मिक एवं शिक्षा संस्थाएँ आज भी इस पर्व को किसी रूप में मनाते हैं पर अब उसमें नवीन चेतना, नया उत्साह एवं व्यवस्थित कार्यक्रम सम्मिलित करने की आवश्यकता है। इस दिशा में अखण्ड ज्योति परिवार को पहल करनी होगी। अपने परिवार ने सदा से समाज को नेतृत्व किया है। धर्म जागृति के लिए उसका नाम इतिहास में अमर रहे, इतना कार्य किया जा चुका है पर इतने में ही संतोष नहीं माना जाना चाहिए। हमें देश में धर्म जागृति के लिए एक के बाद दूसरा कदम उठाते ही चलना है।

अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को आगामी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर ता. 8 जुलाई को अपने घर पर यह पुनीत पर्व मनाना चाहिए। सामूहिक गायत्री जप, हवन, गुरु पूजन, गुरु तत्व की महत्ता पर प्रवचन, श्रद्धाँजलि और शान्ति पाठ यह प्रमुख कार्यक्रम इस पर्व में हों। जहाँ यह आयोजन सामूहिक हो सकता हो, पास-पड़ोस के या अन्य धार्मिक अभिरुचि के लोगों को बुलाया जा सके तो उत्सव का रूप सामूहिक हो सकता है, अन्यथा उसे व्यक्तिगत एवं निजी पारिवारिक आयोजन का रूप दिया जा सकता है। ता. 8 जुलाई को प्रातः काल नित्यकर्म स्नानादि से निवृत्त होकर घर के नर, नारी, बाल, वृद्ध सब एकत्रित हों, बीच में हवन की वेदी या कुण्ड बनाया जाए। एक चौकी पर गायत्री माता की तथा गुरु देव की स्थापना की जाए। व्यासजी धर्म प्रवचन कर्ताओं में सबसे अग्रणी माने जाते हैं, सच्चे मार्ग दर्शक ही गुरु कहलाने के अधिकारी हैं। इसलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। यदि भगवान वेद व्यास जी का चित्र बना सकें तो सबसे उत्तम है अन्यथा अपने अपने गुरुओं का अथवा गुरुजनों का चित्र चौकी पर स्थापित किया जा सकता हैं। सब लोग पहले पवित्री करण, आचमन, शिखा बंधन प्राणायाम, न्यास करें। इसके बाद सब लोग एक एक माला का जप करें। इसके बाद हवन किया जाए, यदि हवन विधि पूरी आती हो तो ठीक-अन्यथा हवन सामग्री, समिधा एवं वेदी पर गायत्री मन्त्र पढ़ कर जल के छींटे मार कर उन हवन वस्तुओं को पवित्र कर लिया जाए। इसके बाद गायत्री मन्त्र बोलते हुए अग्नि स्थापित की जाए, पहले घी की सात आहुतियाँ देकर फिर 24 या 108 आहुतियों का गायत्री मन्त्र के अंत में स्वाहा कार लगाते हुए हवन कर लिया जाए, अन्त में मिठाई की एक आहुति, सुपाड़ी के साथ पूर्णाहुति और चम्मच भरकर घी डालते हुए वसोधारा कर ली जाए। आरती, भस्म धारण बचे घृत का मुख कर लगाना, साष्टाँग प्रणाम, परिक्रमा करके हवन पूरा कर लेना चाहिए। अन्य मन्त्र याद न हों तो यह सारी क्रियाएँ गायत्री मन्त्र से हो सकती हैं। जहाँ सुगन्धित सामग्री न हो वहाँ हलुआ, खीर, मिष्ठान्न, तिल जौ, चावल शक्कर घी आदि जो वस्तुएँ आसानी से उपलब्ध हो सकें उनसे हवन कर लेना चाहिये।

जप और हवन के बाद रोली, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, चन्दन आदि से गायत्री माता तथा गुरु देव के चित्र का पूजन किया जाए। फिर उपस्थित लोगों में से कोई विज्ञ व्यक्ति गुरु तत्व की महत्ता पर प्रवचन करे। जिन गुरुजनों से अब तक प्रेरणा मिली है उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करें और जिनने अभी तक कोई गुरु वरण नहीं किया है, वे किसी उपयुक्त स्थिति के व्यक्ति को मानसिक संकल्प द्वारा गुरु वरण कर सकते हैं। देव शयन के कारण प्राचीन परिपाटी के कारण इन दिनों विधिवत गुरु दीक्षा ली या दी नहीं जा सकती। पर मानसिक संकल्प कर लेना और समय आने पर उसका विधान पूरा कर लेने में कोई हर्ज नहीं है। ‘निगुरा’ होना धर्मच्युत होने का चिन्ह है। गुरु पूर्णिमा के दिन अपने परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को जिसने अब तक गुरु दीक्षा न ली हो, मानसिक संकल्प द्वारा गुरु वरण करके इस गायत्री से युक्त हो जाना चाहिए। गुरु मन्त्र के रूप में गायत्री को ग्रहण करके उसकी एक माला का जप करने का व्रत परिवार के प्रत्येक सदस्य को लेना चाहिए।

हर वर्ष गुरु के चरणों में गुरु पूर्णिमा के दिन कुछ श्रद्धाँजलि भेंट करने की परम्परा चिरकाल से चली आती है। आमतौर से शिष्यगण इस दिन अपने गुरुओं को यज्ञोपवीत, फल, अन्न, वस्त्र तथा पैसा गुरुदक्षिणा के रूप में देते हैं। उनका प्रायः अभिवादन करते हैं, रोली, पुष्प, कलावा आदि से सम्मान करते हैं। पर इतना पर्याप्त नहीं है। आत्म कल्याण तभी हो सकता है, जब गुरुजनों की सत शिक्षाओं को हृदयंगम किया जाए, उनके मार्ग दर्शन के अनुसार अपना जीवन ढाला जाए, जो बुराइयाँ अपने अन्दर आ गई हों, उन्हें ढूँढ़ ढूँढ़ कर निकाला जाए और श्रेष्ठ सद्गुणों की नई स्थापना अपने अंतःकरण में की जाए।

स्वाध्याय एवं सत्संग से मनुष्य ऋषि ऋण से गुरु ऋण से मुक्त हो सकता हैं। सत् साहित्य के कुछ पृष्ठ नित्य पढ़ने का संकल्प लेकर गुरु चरणों में सच्ची श्रद्धाँजलि अर्पित की जा सकती है। अब समय आ गया है कि पुष्प, फल, भोजन दक्षिण आदि से ही गुरु पूजन पर्याप्त न माना जाए वरन् जन जन को अपना जीवन निर्माण करने के लिए गुरु के उपयोगी वचनों को हृदयंगम करने और उन्हें कार्य रूप में परिणित करने का प्रयत्न किया जाए। हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर यदि एक बुराई छोड़ने और एक अच्छाई ग्रहण करने की परम्परा पुनः आरंभ की जाए तो जीवन के अंत तक इस क्रम पर चलने वाला मनुष्य पूर्णता और पवित्रता का अधिकारी बनकर मानव जीवन के परम लक्ष को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार उस पूर्णिमा का पुनीत पर्व हमारे व्यक्तिगत कल्याण और सामूहिक रूप से युग निर्माण में भारी सहायक सिद्ध हो सकता है।

अखण्ड ज्योति परिवार के अधिकाँश सदस्य परम पूज्य आचार्य जी को गुरु भाव से मानते हैं। विधिवत् गुरु-दीक्षा सम्भवतः बहुत थोड़े लोगों ने ही ली होगी पर हम में से प्रत्येक पाठक उन्हें उनके उज्ज्वल चरित्र और अब तक ही महान् जन-सेवाओं के कारण उनका आदर करता है, उनके प्रति अभाव श्रद्धा रखता है। लाखों मनुष्यों ने उनकी प्रेरणा से अपने जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए हैं और आगे इससे भी कहीं अधिक लोक हित उनके द्वारा सम्भव दिखाई पड़ता है। गुरु-दीक्षा लेना न लेना इतना महत्व नहीं रखता जितना आत्मिक श्रद्धा एवं ब्राह्मण में ही दृष्टि गोचर हो सकने वाली आचार्य जी की अगणित महानताएँ और विशेषताएँ हमारे मस्तक उनके समक्ष अनायास ही अपने सामने नत करा लेते हैं। वे बिना वरण किए हुए भी हम सबके सहज-पितर हैं-अनायास ही गुरु हैं।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हम उनके प्रति भी अपनी कृतज्ञता प्रकट करें। यह सद्भावना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धाँजलि हो सकती है। उनकी वाणी का हम मूल्य समझें। वे जो कुछ कहते हैं उसे ध्यानपूर्वक सुनें, विचार मनन करें और हृदयंगम करने का प्रयत्न करें। ‘अखण्ड-ज्योति’ उनकी जिह्वा है, वाणी है। जिस प्रकार किसी ब्राह्मण को भोजन कराते समय उसके जिह्वा के मधुर और तृप्त करने वाला आहार प्रदान करते है, उसी प्रकार आचार्यजी की जिह्वा ‘अखण्ड-ज्योति’ को सींच कर हम उन्हें तृप्त कर सकते हैं, उनके निश्चय को सफल बनाने का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अखण्ड ज्योति को हम नियमित रूप से पढ़ें, दूसरों को पढ़ावें, उसमें उल्लिखित विचारों को आध्यात्मिक लोगों में प्रशस्त करें तो एक बड़ी बात आचार्य जी को तृप्त करने के लिए हो सकती है। इस वर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक काफी घट जाने से आचार्यजी अज्ञातवास जाने से पूर्व काफी खिन्न और चिंतित थे। उनके लौटने से पूर्व अखंड ज्योति की ग्राहक संख्या पहले जितनी बढ़ाकर हम गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु ऋण का एक बड़ा ऋण चुका सकते हैं। एक दो नये ग्राहक बढ़ा देना हममें से किसी के लिए कठिन नहीं है, केवल उपेक्षा और आलस्य को छोड़कर दो चार आदमियों से इस सम्बन्ध में चर्चा कर दें तो एक दो ग्राहक सहज ही बन सकते हैं। इतना छोटा प्रयत्न भी हमारी गुरु भक्ति की परीक्षा की एक महत्वपूर्ण कसौटी का काम कर सकता है। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को तो इस अवसर पर कदम आगे बढ़ा कर अपना कर्त्तव्य पालन करना ही है।


सहयोग भावना


सहयोग भावना (kavita)

सुनती हूँ सहयोग भावना में बसते भगवान!

हो जाती जन-जन की आत्मा जिस क्षण एकाकार,

बन जाता लघु-बिन्दु तभी है व्यापक पारावार,

तृण की निर्बलता लेती है हाथी को भी बाँध,

और शुष्क कण कर देता है भू की पूरी साध,

बन कर एक अनेक शक्ति कर लेते प्राप्त महान,

सुनती हूँ -------

सामूहिक श्रम स्वयं विश्वकर्मा कहलाता है,

सृजन स्रोत बन मरुथल को मधुमास बनाता है,

स्वयं भगीरथ कोटि-कोटि हाथों की गुरु-गरिमा,

गंगा सरिता नहीं पुण्य जग-जीवन की महिमा,

सह साधन सहभोज समन्वय से संभव कल्याण! सुनती हूँ -------

बनी हुई सहयोग भावना ही है मंगल-मूर्ति

श्राँत पथिक को भी यह देती नवगति नवल-स्फूर्ति,

एकाकी तप-व्रत-निष्ठा का बदल गया अब रूप,

सुखी समष्टि व्यक्ति को देगी गौरवपूर्ण स्वरूप,

युग-युग से ही कहते आये गीता वेद पुराण।

सुनती हूँ -------

-विद्यावती मिश्रा

*समाप्त*