हृदय में नव उल्लास भरो


हृदय में नव उल्लास भरो (kavita)

पर-सेवा-रत हो निशि वासर, यह आभास करो! हृदय में नव उल्लास भरो!!

गिरे हुए, उनको अपनाकर?

मन के भ्रम को दूर भगाकर।

जग का मंजुल मधु सपना हर,

ऊंच नीच को गले लगाकर॥

सरल-हृदय से सबका दुखहर, अभिनव-आश भरो! हृदय में नव उल्लास करो!!

गिरि शृंगों को नाप-नाप कर।

सागर की गहराई माप कर।

असत कर्म से काँप-काँप कर, गिर गिर कर उठ हाँप हाँप कर,

तम से पूरित पथ को तजकर सदा प्रकाश करो! हृदय में नव उल्लास भरो!!

सुन्दर से सुन्दर छवि लखकर,

देख असुन्दर वस्तु भयंकर,

दुखदाई सुखदाई मन हर,

चिंतन कर सोचो तुम क्षणभर,

अखिल सृष्टि में ब्रह्म व्याप्त है यह विश्वास करो! हृदय में नव उल्लास भरो!!

-रामस्वरूप खरे साहित्य रत्न


परमपूज्य आचार्य जी का अज्ञातवास

यह अंक जब तक पाठकों के हाथों में पहुँचेगा तक तब परम पूज्य आचार्य जी अपनी अज्ञातवास की यात्रा को रवाना हो चुके होंगे। 4 जून को गायत्री जयन्ती का पर्व मनाने के बाद 5 जून को वे अपने पुनीत संकल्प की पूर्ति के लिए चल पड़ेंगे और एक वर्ष तक किसी विशिष्ट साधना में संलग्न रहेंगे।

साधनामय जीवन

यों उनका जीवन आरंभ से ही साधनामय है। जितना समय साधारण व्यक्ति अपनी आजीविका कमाने में लगाते हैं उतना वे नित्य अपनी साधना में देते रहे हैं। उन्होंने सर्वसाधारण के सामने अपने जीवन को एक प्रयोग के रूप में उपस्थित किया है कि गृहस्थ रहते हुए, आजीविका उपार्जित करते हुए, लोक सेवा करते हुये कोई मनुष्य आध्यात्मिक साधना भी कर सकता है, और उस मार्ग में आशाजनक प्रगति भी संभव हो सकती है। आमतौर से लोग गृहस्थ जीवन को लोकसेवा एवं परमार्थ साधना में बाधक मानते हैं, उनका अनुमान होता है कि ब्रह्मचारी या संन्यासी ही कोई आध्यात्मिक प्रगति कर सकने में सफल हो सकते हैं, गृह जंजालों में फँसे हुए लोगों के लिए तो वह मार्ग कठिन ही है। ऐसे लोगों की निराशा का समाधान यों शास्त्र-प्रमाणों, तर्कों और उदाहरण से भी हो सकता है पर परम पूज्य आचार्य जी ने इसके लिए अपना उदाहरण उपस्थित करना ही सर्वोत्तम उपाय समझा। गृहस्थ रहे और यह प्रमाणित किया कि आत्मोन्नति के लिए गृहस्थ जीवन किसी भी प्रकार बाधक नहीं हो सकता वरन् एक अच्छी परिस्थिति उत्पन्न कर लेने पर तो वह सहायक भी होता है।

क्या गृहस्थ जीवन बाधक बना?

जब साधना क्रम ठीक ही चल रहा था और गृहस्थ जीवन उनके मार्ग में कुछ बाधक भी न था तो घर छोड़कर कहीं दूर दिशा में अज्ञातवास करके ही कोई साधना करने की आवश्यकता उन्हें क्यों पड़ी? यह जिज्ञासा ‘अखंड-ज्योति’ परिवार के प्रत्येक प्रेमी सदस्य के मन में उठनी स्वाभाविक है। आज से एक वर्ष पूर्व जब उनने अपना यह विचार मेरे सामने उपस्थित किया तो मुझे भी यही आशंका हुई कि -कहीं गृह व्यवस्था उनके कार्यक्रम में बाधक तो नहीं हो रही हैं? मैं कहीं उनके मार्ग में रोड़ा तो नहीं हूँ? यों जब से मैंने इस घर में प्रवेश किया है तभी से मैंने यहाँ जीवित तीर्थ के दर्शन किये हैं। देव प्रतिमा को चलती-फिरती, खाती-बोलती देखा है फलस्वरूप मेरी अन्तरात्मा एक विशुद्ध ‘भक्त’ की भावना के ढाँचे में ढल गई है। उनकी आकाँक्षाओं के अनुरूप ही मैंने अपने को बनाने और चलाने का प्रयत्न किया है, परिवार की परिस्थितियों को भी ऐसा बनाया हैं जिससे उनके लक्ष की पूर्ति में बाधा न पड़े फिर भी मनुष्य मनुष्य ही है। उससे गलतियाँ होनी स्वाभाविक हैं, संभव है कोई पारिवारिक कारण ऐसा हुआ हो जिससे उन्हें घर छोड़कर कहीं अज्ञात वास में साधना करना सुविधाजनक जँचा हो।

इस आशंका को मैंने उन्हीं के सामने रखा क्योंकि यदि वस्तुतः घर असुविधाजनक एवं बाधक सिद्ध हुआ हो तो यह मेरी अब तक की जीवन साधना को असफल ही सिद्ध करता है। साथ ही उनका वह प्रयत्न भी असफल हो जाता है जिसके अनुसार वे संसार में यह उदाहरण उपस्थित कर रहे थे कि गृहस्थ जीवन आध्यात्मिक प्रगति के पथ में बाधक नहीं वरन् सहायक है। आचार्यजी की अज्ञातवास जाने की घोषणा-अब तक के हम दोनों के प्रयत्न को असफल ही सिद्ध कर सकती है। ऐसी दशा में जब कि छोटे दो बच्चों के उत्तरदायित्व से मुक्त होने से पूर्व ही वे गृह त्याग की बात सोचते हैं तो निश्चय ही वह गृहस्थ जीवन की तुच्छता एवं व्यर्थता को ही सिद्ध करता है।

अब तक के प्रयत्न की असफलता

आचार्य समर्थ हैं। उनके जीवन में अगणित आश्चर्यजनक सफलताएं जुड़ी हुई है। गृहस्थ में अध्यात्म साधना की सफलता का उनका प्रयोग यदि व्यर्थ चला जाता है तो इस एक असफलता से उनका कुछ बिगड़ता नहीं शेष सफलताएं भी उनके जीवन को प्रकाशवान बनाये रहने के लिए पर्याप्त हैं। पर मेरा तो सारे जीवन में केवल एक ही प्रयोग रहा है, वह है उनके अनुकूल अपने को ढालना और परिवार का वातावरण भी उनके अनुकूल उत्पन्न करना। यदि यह प्रयत्न व्यर्थ गया तो मेरे लिए यह अत्याधिक दुख और लज्जा की ही बात हो सकती है। ऐसा असफल जीवन जीने में मुझे कोई उत्साह नहीं -यह बात मैंने एक वर्ष पूर्व उन्हीं दिनों आचार्य जी को बता दी थी जब उन्होंने अज्ञातवास का प्रस्ताव सर्वप्रथम मेरे सामने रखा था।

मैंने उन्हें यह भी बताया था कि इसकी प्रतिक्रिया उनके लाखों अनुयायियों पर भी होगी। वे भी यही सोचेंगे कि जब आचार्य जी गृहस्थ वातावरण से अपने उद्देश्य पूरे न कर सके तो हमारे लिए भी वह संभव नहीं है। जब उन्हें घर छोड़ तप, साधना के लिए अज्ञातवास ही चुनना पड़ा तो हमारे लिए भी यही मार्ग उचित है। ऐसा सोचकर हजारों परिवार जो उनका अनुकरण करके अपने-अपने गृहस्थ जीवनों को आदर्श बनाने को प्रयत्नों में भारी सफलता भी मिल रही है-वह सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।

अब आचार्यजी का जीवन अकेले का उनका ही नहीं रहा वरन् असंख्यों व्यक्ति उससे प्रकाश प्राप्त करते हैं, इसलिए यदि कोई गलत कदम उठा तो उसका प्रभाव उन सभी पर पड़ेगा जो उनसे प्रकाश प्राप्त करते हैं। उनकी प्रत्येक क्रिया-एक आदर्श एवं अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित करती है। इसलिए अज्ञातवास की बात से जो प्रतिक्रिया उत्पन्न हो सकती है उसके लिये मैंने उन्हें अत्यन्त विनम्र शब्दों में समझाया और उन्हें इसके लिए पुनः विचार करने की प्रार्थना की। यों नारी सुलभ हृदय प्राप्त होने से मुझमें मोह आदि दुर्बलताएं भी कम नहीं हैं। स्वभावतः मैं उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति के साथ ममता भी उतनी ही रखती हूँ जितनी कोई नारी रख सकती है। इसलिए उनके सान्निध्य का सुख मेरे लिए स्वर्ग और वियोग का दुख नरक तुल्य अनुभव होना भी स्वाभाविक ही हैं। फिर भी मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि इस दुर्बलता से प्रेरित होकर मैं यह सब नहीं कह रही हूँ। ऐसे तो अनेक अवसरों पर मैंने आत्मनियंत्रण कर लिया है। नित्य कठोर श्रम संकल्प, आत्म दान, आजीवन ब्रह्मचर्य आदि अनेकों पिछले प्रसंगों की उन्हें याद दिलाते हुए मैंने कहा कि मुझमें दुर्बलताएं तो अनेक हैं पर वे ऐसी नहीं हैं कि उनके मार्ग में, उनके आदर्शों की पूर्ति में किसी प्रकार बाधक हों। इसलिए अज्ञातवास विरोधी मेरा प्रस्ताव केवल मोह न माना जाय। उसके अतिरिक्त जो तथ्य उसमें सन्निहित हों उन्हें भी समझा जाय।

मार्ग दर्शन में बाधा पड़ेगी

अनेकों साधक अपनी आध्यात्मिक साधना में आचार्यजी से नियमित मार्गदर्शन प्राप्त करते हुए प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं। अज्ञातवास में चले जाने पर क्या उनकी प्रगति, बीच में ही रुकी न पड़ी रहेगी? समय-समय पर साँसारिक पीड़ाओं और परेशानियों से त्रस्त व्यक्तियों को जो ज्योति एवं शान्ति की सामग्री उनसे उपलब्ध होती रहती है-वह क्रम क्या टूट न जायगा? इस प्रकार एक विशाल जन समुदाय अपनी लौकिक और पारलौकिक गुत्थियों को सुलझाने में जिस सम्बल का सहारा लेता है, यदि वह उनके सामने से हट जाय तो क्या उन्हें धक्का न लगेगा, निराशा न होगी? फिर इतने बड़े परिवार के अगणित व्यक्ति उन्हें अपने प्राण प्रिय आत्मीय जन की भाँति प्यार भी करते हैं, उनके सान्निध्य के लिये भ्रमर की भाँति मँडराते रहते हैं, क्या उन सब की कोमल भावनाएँ इस अज्ञातवास के कारण वेदनाग्रस्त न होंगी?

गायत्री तपोभूमि तथा अखण्ड ज्योति कार्यालय द्वारा जो युगनिर्माण के कार्यक्रम अभी चल रहे हैं उनके यथावत् चलते रहने के लिये भी उनकी उपस्थित अभी आवश्यक है। दोनों ही संस्थाएँ अभी उन्हीं से मार्गदर्शन प्राप्त करती हैं। दोनों को ही देर तक अभी उनकी आवश्यकता है। उनके अज्ञातवास से दोनों के ही कार्यक्रमों में अड़चन आवेगी। नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना-जिसके अंतर्गत अनेकों वैयक्तिक एवं सामाजिक बुराइयों का शमन एवं चरित्र गठन का कार्य अत्यन्त विशाल पैमाने पर किया जाने को है, उनके सक्रिय सहयोग के बिना लड़खड़ा सकता है। होमात्मक 24 हजार कुण्डों के गायत्री यज्ञ इस गायत्री जयन्ती तक सफलतापूर्वक पूर्ण हो गये, पर भारत भूमि में यज्ञीय जीवन यापन की वैदिक परम्परा का विकास किया जाना अभी शेष है। इन सब कार्यक्रमों को अधूरी स्थिति में छोड़कर अज्ञातवास को चले जाने से राष्ट्र की एक बड़ी आवश्यकता को हानि ही पहुँचेगी।

आशंकाओं का समाधान

मेरी इन सब आशंकाओं को आचार्य जी ने बहुत ध्यानपूर्वक सुना। यों वे अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी हैं- दूर तक प्रत्येक बात को बहुत सावधानी से सोचते हैं और काफी विचार विमर्श के बाद ही किसी निर्णय पर पहुँचते है इस अज्ञातवास सम्बन्धी निर्णय के पीछे भी बहुत दिनों से उनकी सूक्ष्म दृष्टि काम कर रही थी, और गुणागुणों पर पर्याप्त विचार विनियम करने के पश्चात् ही उनने यह प्रस्ताव उपस्थित किया था। फिर भी जब मैंने अपने तर्क उनके सामने उपस्थित किये तो उन्होंने कई दिनों तक फिर पुनर्विचार किया इतने पर भी उन्हें अपना पूर्व निर्धारित निर्णय ही अधिक उपयुक्त लगा और उन्होंने पुनः अपना वही विचार दुहराया। मेरी आशंकाओं के बारे में भी उन्होंने उत्तर दिये। कई बार उनकी युक्तियाँ तो मेरी समझ में ठीक तरह नहीं आती, कभी-कभी मन में सन्देह भी बना रहता है, फिर भी उनके साथ इतने लम्बे समय से रहने के कारण मैं जानती हूँ कि उनके विचारों, निर्णयों एवं अभिवचनों के पीछे कोई अतीन्द्रिय शक्ति काम करती है और इसके परिणाम प्रायः वैसे ही होते हैं जैसे वे सोचते हैं। तपोभूमि का निर्माण, गायत्री परिवार का संगठन, सहस्रकुंडी गायत्री यज्ञ, देश भर में 24 हजार यज्ञ, वेदों का प्रकाशन, युग निर्माण की विशद योजना आदि कार्यों के आरम्भ करते समय जो साधन उपलब्ध थे उनसे इन कार्यों की सफलता तो क्या-थोड़ी प्रगति की भी आशा नहीं की जा सकती थी। पर हम सबने आश्चर्य की तरह देखा कि वे असम्भव जैसे कार्य सम्भव ही नहीं सरल भी हो गये। यह प्रसिद्ध बातें हैं, इनके अतिरिक्त और भी अगणित ऐसी बातें हैं, जिन्हें सब कोई तो नहीं पर थोड़े से लोग जानते हैं कि उनकी अन्तः प्रेरणा भी अद्भुत होती है और उसके पीछे सुनिश्चित तथ्य छिपे होते हैं।

जब उनने अपने अज्ञातवास जाने की बात पुनः पुष्ट कर दी तो उसकी उपयोगिता और आवश्यकता स्वीकार करने में मुझे कुछ कठिनाई न थी, उनके विचार को सरल बनाना ही मेरे लिये कर्त्तव्य था, वही मैं कर भी रही हूँ। जो काम उन्होंने कभी भी सौंपा उसे अपनी तुच्छ योग्यता और शक्ति की परवाह न करके सदा मैंने आँख मुंह कर शिरोधार्य किया, अभी भी कर रही हूँ। आगे भी करूंगी जो आशंकाएं मेरे मनमें थी वे व्यक्तिगत रूप से समाधान कर लीं, उनका निर्णय मेरे लिए वेद वाक्य है पर मेरी ही भाँति अखण्ड ज्योति के अनेकों पाठक भी यह आशंकाएं कर सकते हैं क्योंकि अपना सारा ही अखण्ड ज्योति परिवार उन्हें मेरी ही तरह श्रद्धा आदर और आत्मीयता की दृष्टि से देखता है, सभी का उन पर अधिकार है। सभी उनसे अपने मन की व्यथा कह सकते हैं सभी को उनके वियोग का कष्ट हो सकता है, सभी को उनका सान्निध्य न रहने से हानि दृष्टि-गोचर हो सकती है, इसलिये सभी को इन प्रश्नों को उनके सामने उपस्थित करने की इच्छा हो सकती है जो मैंने उनके सामने रखे। इन आशंकाओं का उनके जो उत्तर दिये हैं वे हम सबके लिये विचारणीय हैं अतएव उन्हें इस लेख में लिपिबद्ध किया जा रहा है।

तपश्चर्या के लिए नीरवता आवश्यक

आचार्य जी का कथन है कि साधना और तपश्चर्या दो भिन्न वस्तुएँ हैं, दोनों की शक्ति और मर्यादाएं भी भिन्न-भिन्न हैं। साधना सामूहिक परिस्थितियों में हो सकती है, इससे मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में सन्निहित अन्नमय कोष और मनोमय कोष साधक के गुण, कर्म, स्वभाव में सात्विक परिवर्तन हो सकता है, इस परिवर्तन से उत्पन्न हुई आँतरिक निर्मलता के कारण ईश्वरीय प्रकाश की दिव्य किरणें साधक के अंतःप्रदेश में आती और उसे आलोकित करती हैं। वह आत्म कल्याण के मार्ग पर बढ़ता है और शाँति भी प्राप्त करता है। अन्नमय कोष को साधना द्वारा परिपुष्ट कर लेने पर शरीर निरोग और दीर्घजीवी कष्ट सहिष्णु और तितिक्षाशील बन सकता है। उसकी प्रतिभा निखर सकती है और कठिनाइयों से लड़कर सफलता का मार्ग प्रशस्त करने योग्य पुरुषार्थ उत्पन्न हो सकता है। मनोमय कोष की साधना से मानसिक विकारों,कुविचारों और दुर्गुणों का शमन होता है, स्मरण शक्ति एवं बुद्धि काल में अभिवृद्धि हो सकती है। चंचलता नष्ट होती और चित्त की एकाग्रता में सफलता मिलती है। साहस, धैर्य, निर्भयता, श्रद्धा, बढ़ती है और इन्द्रिय-विषयों के लिए उठती रहने वाली लिप्सा एवं वासना पर नियंत्रण स्थापित होता है। मन के प्रवाह को कुमार्ग में से रोककर सन्मार्ग पर अग्रसर करना एवं जन्म जन्मान्तरों तक संग्रहीत कुसंस्कारों का परिशोधन किया जा सकता है। शरीर का सर्वोपरि संचालक , मनोवृत्तियों का प्रधान निर्माणकर्ता मन ही है। मनोमय कोष की साधना करके मन जब काबू में आ जाता है तो आत्म निर्माण का कार्य सरल हो जाता है। फिर मनुष्य अपने आपको अभीष्ट परिस्थितियों के अनुरूप ढाल सकता है, अपने में मनोवाँछित विशेषताएं उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार वह अपने भाग्य का निर्माता आप बन सकता है।

उपासना और तपस्या का अन्तर

आचार्य जी ने यह भी बताया कि उपासना और साधना जो सामूहिक जीवन में रह कर की जा सकती है उसके द्वारा अन्नमय कोष और मनोमय कोष को विजय करके अपने व्यक्तिगत जीवन में अनेकों सतोगुणी विशेषताएं उत्पन्न करके जीवन लक्ष को पूर्ण करने के लिए प्रगति की जा सकती है और धीरे-धीरे इस मार्ग पर चलते हुए ईश्वर प्राप्ति भी हो सकती है। सर्व साधारण के लिए सद्गृहस्थों के लिए यही उपासना एवं साधना का मार्ग सरल एवं उपयुक्त भी है। ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग यह तीनों ही योग इस उपासना मार्ग के अंतर्गत आते हैं। तपश्चर्या का मार्ग उससे ऊपर का तथा अधिक शक्तिशाली है। आत्मा के सूक्ष्म अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत अनेकों शक्ति केन्द्र सन्निहित हैं। इनमें कुण्डलिनी योग के अंतर्गत षट्चक्र तो प्रसिद्ध ही है। पर बात वहीं तक सीमित नहीं है, इन षट्चक्रों से भी सूक्ष्म अन्य अगणित शक्ति ग्रंथियाँ मनुष्य के स्थूल और सूक्ष्म शरीरों में मौजूद है और उनमें अपने ढंग की अनेकों विशेषताएं छिपी हुई हैं। इन सुप्त संस्थानों को जागृत एवं क्रियाशील बनाकर मनुष्य अपने अन्दर ऐसे चुंबकीय शक्ति केन्द्र उत्पन्न करता हैं जो अखिल विश्व के अदृश्य अन्तरिक्ष में फैली हुई प्रकृति और परमेश्वर की अनेकों विभूतियों को अपनी ओर आकर्षित कर सके। तप का उद्देश्य उन आध्यात्मिक शक्तियों की उपलब्धि है जो अपना ही नहीं अन्य अनेकों का भी महत्वपूर्ण श्रेय साधन कर सकती हैं।

घर का वातावरण यदि सात्विक हो तो उपासना का क्रम आनन्दपूर्वक चल सकता है, पर तप एक विशेष प्रकार की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके लिए नीरव एवं निर्बाध वातावरण की आवश्यकता होती है। सामूहिक जीवन में निरन्तर नाना प्रकार के विचार, भाव और प्रभाव उत्पन्न होते रहते हैं उससे मन पर जो प्रतिक्रिया होती है उससे उपासना का कार्यक्रम तो चलता रह सकता है पर तप में विक्षेप उत्पन्न होता है। तप के लिए हर किसी को नीरव निर्बाध एकान्त वातावरण में जाना पड़ता है। अब तक का साधनात्मक इतिहास इस बात का साक्षी है। देवताओं, मनुष्यों और असुरों ने विभिन्न उद्देश्यों के लिए अब तक अगणित बार तप किये हैं और उसके फलस्वरूप प्रकृति माता एवं परमपिता के सम्मुख अपने उन आध्यात्मिक पुरुषार्थों के बदले में अभीष्ट प्रतिफल-वरदान भी प्राप्त किये हैं पर हुआ यह सब घर से बाहर वन, पर्वत आदि एकान्त स्थानों में ही है। घर रह कर उपासना हो सकती है-तपस्या नहीं।

तपश्चर्या का अर्थ संन्यास नहीं

तप का अर्थ संन्यास नहीं है। संन्यासी घर छोड़कर, कवाय वस्त्र धारण कर, परिव्राजक बनता है उसका पुनः गृहस्थ में प्रवेश नहीं हो सकता, पर तपस्या में ऐसी बात नहीं है। अनेकों गृहस्थ तप द्वारा अभीष्ट शक्ति प्राप्त करके पुनः अपने साँसारिक जीवन में रहे हैं। प्राचीनकाल में अनेकों ऋषि कठोर तप करते थे उनमें से अधिकाँश गृहस्थ थे। वशिष्ठ विश्वामित्र, लोमश, जमदग्नि, अत्रि, गौतम, याज्ञवलक्य आदि ऋषि कई-कई बालकों, के पिता थे और अपनी धर्मपत्नियों के साथ गृह व्यवस्था में रहते हुए भी सघन वनों में तप की साधना व्यवस्था करते थे। भागीरथ ने गंगा को लाने के लिए प्रचंड तप किया, तप का उद्देश्य पूरा होने पर वे पुनः अपने घर आ गये। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, भस्मासुर, सहस्रार्जुन आदि ने भी प्रचंड तप किये थे। उनने भी अभीष्ट शक्ति प्राप्त की और अपने-अपने साधारण जीवन में लौट आये। पार्वती ने पति प्राप्त करने के लिए, ध्रुव ने ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए, स्वायंभु मनु और सतरूपा रानी ने दिव्य पुत्र प्राप्ति के लिये तप किये और सफलता का वरदान प्राप्त कर अपने घरों को लौट आये। आचार्य जी ने बताया कि-तप और संन्यास दो सर्वथा भिन्न चीज हैं। वे न तो संन्यास ले रहे हैं जिससे बच्चों की जिम्मेदारी से विमुख होने का प्रश्न पैदा हो और न सार्वजनिक जीवन से ही अलग हो रहे हैं ताकि मार्गदर्शन प्राप्त करने वाले लोगों के मार्ग के कोई अड़चन आवे। तप साधना में साधक की शक्तियाँ और भी तीव्र सूक्ष्म एवं स्वच्छ हो जाती हैं इसलिए वह दूर रहते हुए भी दूसरों को अन्तः प्रेरणा देता रह सकता है। अलौकिक कार्यों में तो वाणी तथा वस्तु विनिमय की आवश्यकता पड़ती है पर आध्यात्मिक कार्यों में इसकी विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती। वह कार्य सूक्ष्म चेतना के आधार पर दूर रहते हुए भी हो सकते हैं। अज्ञातवास में रहते हुए भी जिन लोगों को प्रेरणा देने की आवश्यकता है वह कार्य निर्बाध गति से चल सकता है।

ताँत्रिक तपश्चर्यायें घर में नहीं वरन् मरघट आदि नीरव स्थानों में रात्रि के समय होती हैं, इसमें भी जन कोलाहल से दूर रहने का ही उद्देश्य छिपा हुआ है। प्राचीनकाल में व्यस्त जीवन में रहने वाले लोग भी जब सुविधा मिलती थी तब कुछ समय के लिए किन्हीं पवित्र तीर्थों की एकान्त भूमि में, वहाँ निवास करने वाले तपस्वियों के सान्निध्य में-स्वल्पकालीन तप करने जाया करते थे आज कल तीर्थों का वह वातावरण नहीं रहा वहाँ भी शहरी रंग-ढंग जम गये हैं, पर प्राचीनकाल में उनकी स्थापना इसी दृष्टि से हुई थी। आज वे परम्परायें लुप्त होती जाती हैं फिर भी तप का महत्व अनादिकाल से जैसा था वैसा ही अब भी और आगे भी बना रहेगा।

अधूरे कार्य न रुकने का आश्वासन

अनेकों आवश्यक कार्यों को अधूरे छोड़ कर अभी तप साधना के लिए जाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि जो समस्याएं सामने हैं उन्हें सुलझाने के लिए बड़े परिमाण में आध्यात्मिक शक्ति की आवश्यकता है। गायत्री परिवार ने युग निर्माणकारी जिस नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का आरम्भ किया है उसे विशाल एवं व्यापक पैमाने पर विस्तृत किया जाना है। हमारा राष्ट्र लम्बे अन्धकार युग को पार कर अब स्वाधीनता का प्रभात काल देख रहा है। इस पुनीत पर्व पर राष्ट्र को सुनियमित करने के लिए अनेकों प्रयत्न अनेकों दिशाओं में हो रहे हैं, पर हमारी सबसे बड़ी सनातन सम्पत्ति आध्यात्मिकता के विकास के लिए जो प्रयत्न होना चाहिए था उसकी ओर उदासीनता एवं उपेक्षा ही दृष्टिगोचर होती है। जिन आन्तरिक सद्गुणों के आधार पर कोई जाति महान बन सकती है उन्हें विकसित करने वाला अध्यात्मवाद आज उपेक्षा के गर्त में पड़ा है। उसे अग्रगामी बनाकर ही मानवता का वास्तविक रूप देखा जा सकता है। हमारा देश महापुरुषों का देश रहा है। इसका विकास तभी माना जा सकता है जब यहाँ के निवासी अपने उज्ज्वल चरित्र और उच्च आदर्शों को कार्यान्वित करके केवल अपने यहाँ ही सच्ची शान्ति स्थापित न करें वरन् अनैतिकता से उत्पन्न हुई समस्याओं से संत्रस्त सारे संसार का भी मार्गदर्शन कर सकें। इस स्थिति को उत्पन्न करने के लिए गायत्री परिवार द्वारा तथा अन्य माध्यमों द्वारा प्रयत्न चल रहे हैं। इन प्रयत्नों में उत्साह, शक्ति , ईमानदारी, त्याग तथा पुरुषार्थ की भारी आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति कार्यकर्ताओं की अन्तःप्रेरणा द्वारा ही हो सकती है। यह प्रेरणा सभी को समुचित रूप से उपलब्ध होती रहे इसके लिए उग्रतप ही एकमात्र उपाय हो सकता है। इस अज्ञातवास में यही शक्ति उपलब्ध करने का प्रयत्न होगा।

व्यक्ति गत रूप से ही अनेकों साधक अपना आत्म बल बढ़ाने और जीवनोद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रयत्नशील हैं। इनके अपने प्रयत्न ही पर्याप्त नहीं है, और न मौखिक मार्गदर्शन मिलते रहने से ही काम चल सकता है वरन् आवश्यकता इस की है कि उनकी निज की साधना के अतिरिक्त कोई बाह्य शक्ति और सहायता भी उनकी प्रगति को तीव्र बनाने में सक्रिय सहायता प्रदान करे। तभी इनकी साधनाएं सफल हो सकती हैं। इस प्रकार का सहायता कोष भी तप साधना द्वारा ही संचित होने की आशा की जा सकती है। आचार्य जी साधक परिवार के लिए इसी शक्तिकोष की खोज में जा रहे हैं।

परिजनों के लिए अधिक सहकार

जिस प्रकार अपना धन देकर कोई किसी दूसरे की आर्थिक कठिनाई को हल कर सकता है, जिस प्रकार अपना रक्त देकर कोई किसी दूसरे घायल या बीमार की जीवन रक्षा कर सकता है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति अपनी तपस्या का एक अंग किसी दूसरे को देकर उसकी कठिनाइयों को सरल कर सकता है, किसी तपस्वी के आशीर्वाद के आधार पर इन दुखियों की बड़ी-बड़ी कठिनाइयों के हल होने की अनेक घटनाएं होती रहती हैं। यह आशीर्वाद केवल जीभ हिला देने मात्र से सफल नहीं हो सकते वरन् उसे सफल बनाने के लिए तप और पुण्य की आवश्यक मात्रा भी देनी पड़ती है। इस संसार में कर्म फल का का अटूट नियम है। मनुष्य अपने शुभ-अशुभ कर्म के फलस्वरूप ही सुख-दुख प्राप्त करता हैं। यदि किसी को उसके प्रारब्ध से अधिक सुख देना हो, या उसके प्रारब्ध से जुड़े हुए दुखों का कोई अंश कम करना हो तो इसके लिए सशक्त आशीर्वाद मिलना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब आशीर्वाद देने वालों के पास तप की पूँजी समुचित मात्रा में संग्रहीत हो और वह उसमें से आवश्यक अंश भी उस आशीर्वाद प्राप्त करने वाले को प्रदान करे। धर्म सेवा के कार्यों में लगे हुए ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जिनके मार्ग को सरल बनाने के लिए उन्हें इस प्रकार की सहायता आवश्यक होती है। इस अज्ञातवास साधना में एक प्रकार का आध्यात्मिक सहायता कोष एकत्रित करना भी आचार्य जी का उद्देश्य है।

आगामी सन् 62 में ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक राशि पर आठ ग्रह एकत्र होते हैं। महाभारत के समय एक राशि पर सात ग्रह थे इसका दुष्परिणाम 18 अक्षेहिणी जन-समूह का तथा आर्थिक एवं सामाजिक सुव्यवस्था का भारी विनाश हुआ था। आठ ग्रहों का एक राशी पर एकत्र होना उससे भी कुयोग है। उसकी शान्ति के लिए अनेक उच्चकोटि के तपस्वी इन दिनों विशिष्ठ तपस्याओं में संलग्न हो रहे हैं आचार्य जी के तप का एक उद्देश्य यह भी है।

देश और जाति की सेवा

इसके अतिरिक्त भी विश्व की अनेकों समस्याएं उनके सामने हैं। व्यक्ति गत रूप से उन्होंने अपने लिए स्वर्ग मुक्ति की ऋद्धि-सिद्धि की कभी आकाँक्षा नहीं की धर्म सेवी विशुद्ध ब्राह्मण का आदर्श जीवन बनाना और निभाना इतनी मात्र उनकी व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षा है। बाकी तो वे जो कुछ भी करते और सोचते हैं उसमें लोकहित एवं धर्मसेवा की भावनाएं ही प्रधान रूप में रहती हैं। इस तप साधन के समय भी उनके सामने ऐसे ही प्रश्न हैं। भारत की प्राचीन अध्यात्म विद्याएं एक-एक करके लुप्त हो गई या होती जा रही हैं, इनकी खोज करना आवश्यक है। वेदों का सामान्य शिक्षात्मक अर्थ उन्होंने जनता के सामने उपलब्ध कर दिया पर अभी वेद मंत्रों के वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक अर्थों का प्रकाश में लाया जाना शेष है। यह कार्य सूक्ष्म योग दृष्टि प्राप्त होने पर ही संभव है। वह दृष्टि तप साधना के बिना और किसी प्रकार उपलब्ध नहीं हो सकती ।

गायत्री तपोभूमि तथा अखण्ड ज्योति के बारे में यह चिन्ता है कि कहीं भविष्य में डगमगाने न लगें पर आचार्य जी पूर्ण निश्चिंत है जिन आत्म दानियों ने गायत्री तपोभूमि तथा गायत्री परिवार का संचालन कार्य अपने जिम्मे लिया है, वे काफी विश्वस्त और कर्मठ हैं। वे अपने उत्तरदायित्वों को भली प्रकार समझते हैं और उन्हें निभाते भी रहेंगे। अखंड ज्योति के लिए आचार्य जी ने नियमित रूप से अपनी रचनाएं देते रहने का आश्वासन दिया है। अब तक कई वर्षों से अत्याधिक कार्यव्यस्त रहने के कारण वे अखण्ड ज्योति के लिए स्वयं कुछ विशेष नहीं लिख सके थे पर अब वे पाठकों को अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर करने का मार्गदर्शन अखंड ज्योति के माध्यम से निश्चित रूप से करते रहेंगे। इस प्रकार गायत्री तपोभूमि की ही भाँति अखण्ड ज्योति का प्रकाश दीप भी अपने ढंग से जलता ही रहेगा।

मंगलमय यात्रा शुभ हो

आचार्य जी कम से कम एक वर्ष के लिए जा रहे हैं यह समय आगे भी बढ़ सकता है। कहाँ जा रहे है वह स्थान उन्होंने सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं किया है पर निश्चित रूप से वह हिमालय ही होगा। तप की प्राचीन परम्परायें हिमालय की ओर से ही पूर्ण होती रही हैं अब भी वही स्थान उसके लिए उपयुक्त है। निश्चित अवधि के पश्चात् वे अज्ञात स्थान से ज्ञात स्थान में निवास करने मन से चल रही है इससे प्रतीत होता है कि वे सार्वजनिक सेवा का आकार लेखनी, वाणी से ऊपर उठा कर तप साधना ही बनायेंगे। उनका आगामी कार्यक्रम तप प्रधान ही होगा।

मेरे मन में जो अनेकों आशंकाएं प्रारंभ में थी लगभग वैसी ही अनेकों पाठकों ने भी अपने पत्रों में प्रदर्शित की हैं। पर इतनी विवेचना उपलब्ध होने से समाधान हो गया और यह विश्वास बन गया कि उनका तप, साधना के लिए, देश एवं जाति के लिए किसी प्रकार अहितकर नहीं वरन् लाभदायक ही है।

वे अब तक जन साधारण की सेवा में जीवन भर संलग्न रहे हैं, इस तप साधना के बाद वे और भी अधिक ठोस सेवा जनता जनार्दन की करेंगे। तप के लिए जितना एकान्त उन्हें चाहिए वह मिलना उचित ही है, उससे वे अब की अपेक्षा और भी अधिक सक्षम बनेंगे और अखण्ड ज्योति परिवार के परिजनों की ही नहीं भारतीय धर्म और संस्कृति की भी विशाल परिमाण में एक महत्वपूर्ण सेवा कर सकने में समर्थ होंगे।

उन्हें अनेकों कष्ट उठाने होंगे, वे हम सबसे जुड़े रहेंगे, इस विचार से हमारे दुर्बल हृदय में करुणा पूर्ण आर्द्रता उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। उनकी विदाई की बात स्मरण करते ही आँखों में आँसू भर पड़ते हैं, पर यह सन्तोष है कि ऐसे ही आँसुओं से सींचे जाने पर धर्म का पौधा हरा रह सकता है देवमूर्ति आचार्य जी ने अपने सारे जीवन को तिलतिल कर ज्ञान की ज्योति जलाने के लिए होमा है हम लोग प्रभु बिन्दुओं से उनके चरणों में श्रद्धाँजलि चढ़ाते हुए भी सन्तोष कर सकते हैं। माता इन महामानव के महान लक्षों को पूर्ण करें यही कामना है।


गायत्री की तीन महाशक्तियाँ

गायत्री सर्व मंत्राणाँ शिरोमणितया स्थिता।

विघानामपि तेनैताँ सावयेर्त्सव सिद्धये॥

त्रिव्याहृति युताँ देवीर्मोकार युग सम्पुटाम्।

उपास्य चुतरो वर्गान्साधयेद्यो न सोऽन्धकीः॥

देव्या द्विजत्व मासाद्य श्रेयसेन्यंरतास्तुये।

ते रत्नमभिवाँच्छन्ति हित्वा चिन्तामणिं करात्॥

- वार्तिक

अर्थात्-गायत्री सब मंत्रों तथा विद्याओं में शिरोमणि है। उससे सब इन्द्रियों की साधना होती है। जो व्यक्ति इस उपासना से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त नहीं करते वे अन्धा बुद्धि वाले हैं। जो द्विज गायत्री मंत्र के होते हुए भी अन्य मंत्रों की उपासना करते हैं वे ऐसे ही मूर्ख हैं जैसे हाथ में आई चिन्तामणि को फेंककर छोटे रत्नों को ढूंढ़ने फिरने वाला मूर्ख होता है।

गायत्री को सब मंत्रों तथा सब क्रियाओं का शिरोमणि कहा गया है। यों भारतीय साधना विज्ञान में अनेकों दक्षिणमार्गी और वाममार्गी आध्यात्मिक विद्याएं भरी हुई हैं और उनके लाभ तथा परिणाम भी एक से बढ़कर चमत्कारपूर्ण हैं। आत्म कल्याण करने वाली साधनाओं की भाँति लौकिक सुख साधन जुटाने वाले अनुष्ठान भी अनेक हैं। मंत्र विद्या में एक से एक बढ़कर रत्न मौजूद हैं। प्राचीनकाल में यह साधना विज्ञान अपने चरम उत्कर्ष पर था और ऋषि मुनि इसी अनुसंधान में अपना अधिकाँश समय लगाते थे, और विश्व कल्याण के लिए अनेक मंगलमय उपहार उपस्थित करते थे। इन्हीं उपहारों के बलबूते पर यह देश किसी समय विश्व का मुकुटमणि बना हुआ था और ज्ञान, विज्ञान, व्रत, पुरुषार्थ, धन संपत्ति का भण्डार माना जाता था।

भारतीय साधना विज्ञान के आकाश में अनेकों साधना विद्याओं के बीच गायत्री उपासना सूर्य के समान सर्व प्रमुख मानी गई है। अनेक छोटे मोटे प्रयोजनों के लिए अनेकों मंत्र साधनों के विधान उपलब्ध हैं, इसी प्रकार किन्हीं विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनेकों देवी देवताओं की। उपासनाओं के विधान भी मौजूद हैं पर सर्वांगीण, लौकिक और पारलौकिक लक्षों को एक ही बाण से लक्ष बेध करने वाली गायत्री ही है। चारों वेदों की जननी होने के कारण सभी वेद विद्यायें इसमें बीज रूप में अवस्थित है। इसलिए सभी सिद्धियों की जननी भी इसे कहा जाता है। कोई सिद्धि ऐसी नहीं जो गायत्री साधना से प्राप्त न हो सकती हो।

अन्य मन्त्रों की साधना भी किन्हीं छोटे मोटे प्रयोजनों के लिए की जा सकती है और उनका सीमित फल भी प्राप्त किया जा सकता है पर शास्त्रकार का कथन है कि जब एक ही कल्प वृक्ष के नीचे बैठने से सारे मनोरथ पूरे हो सकते हैं तो अलग-अलग वृक्षों को ढूँढ़ते फिरने और उनके नीचे बैठने से क्या लाभ? चिन्तामणि सब मणियों में श्रेष्ठ और बहुमूल्य मानी गई है उसे फेंक कर जैसे छोटे-मोटे रत्नों के लिए परिश्रम करते फिरना मूर्खतापूर्ण है इसी प्रकार गायत्री उपासना की उपेक्षा करके छुटपुट साधनाओं में समय लगाना उपरोक्त शास्त्र वचन में व्यर्थ बताया गया है।

अब यह देखना है कि गायत्री की ऐसी क्या विशेषता है जिसके कारण इतना महत्व उसे मिला? बात यह है कि गायत्री विश्वव्यापी जीवनी शक्ति, चेतना शक्ति एवं प्राण शक्ति का स्वरूप है । क्रम निष्क्रिय है, उसे साक्षी, दृष्टा, निर्लिप्त माना गया है। विश्व के विभिन्न कार्यों में उसका सीधा हस्तक्षेप नहीं है। संसार में जो कुछ भी हलचल हो रही है विकास, परिवर्धन एवं विनाश का जो कुछ क्रम चल रहा है उसमें शक्ति की महिमा काम कर रही है। विश्व की रचना का आधार ही ब्रह्म की यह इच्छा शक्ति है-एकोऽहं बहुस्याम-मैं अकेला हूँ बहुत हो जाऊँ की ईश्वरीय इच्छा ने ही संसार की रचना और व्यवस्था का ढाँचा खड़ा कर दिया। वह इच्छा ही शक्ति रूपिणी होकर इस विश्व में ओतप्रोत हो रही है और सारी व्यवस्था का संचालन कर रही है।

इस मूल परा प्रकृति का नाम गायत्री है। पीछे आवश्यकतानुसार उसी से सत, रज, तम यह तीन गुण प्रस्फुटित हुए जिन्हें ब्रह्म, विष्णु, महेश या सरस्वती, लक्ष्मी, काली के नाम से पुकारा जाता है रचना, विकास और विनाश के लिए ज्ञान शक्ति और संपत्ति के लिए पीछे यह त्रिगुणात्मक विकास गायत्री से ही हुआ है। गायत्री के तीन अक्षरों में एक-एक करके तीनों तत्व समाए हुए हैं। इन तीनों ही प्रधान प्रक्रियाओं का उद्गम होने के कारण गायत्री को शक्ति बीज कहा गया है और उसकी उपासना को जड़ सींचने के समान बताया गया है जबकि अन्य साधना पत्तों पर चन्दन लगाने के समान हैं।

गायत्री शब्द के तीन अक्षरों का भावार्थ समझने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह उस सर्व प्रधान शक्ति तत्व का आकर्षण मन्त्र है जिसे प्राण कहते हैं। प्राण को जीवन, ज्ञान और शक्ति का उद्गम केन्द्र माना गया है। इसी के आधार पर विश्व की समस्त प्रक्रिया अपना काम कर रही है। इसी शक्ति उद्गम को गायत्री मन्त्र के माध्यम से अधिकाधिक मात्रा में खींचकर साधक अपने भीतर धारण करता है। यह धारणा जितनी अधिक मात्रा में होती जाती है। गायत्री उपासना से साधक उस शक्ति का भंडार अपने भीतर जमा करता है जो विश्व के समस्त पदार्थों एवं गतिविधियों पर अपना नियंत्रण रखती है। उस शक्ति के साथ जब साधक का संबोध हो जाता है तो वह भी संसार के सभी पदार्थों एवं गतिविधियाँ के साथ अपना सीधा सम्बन्ध स्थापित कर लेता है और उनका नियन्त्रण करने लगता है।

प्राण के अंतर्गत गतिशीलता क्रिया एवं शक्ति सन्निहित है उसके लिए गायत्री मन्त्र में सविता शब्द का प्रयोग हुआ है। उस सन्निहित शक्ति के लिए भर्ग शब्द का प्रयोग होता है। सविता की शक्ति भर्ग हैं। भर्ग सविता का गर्भ है। गायत्री का उपासक सविता रूपी प्राण की महाशक्ति ‘भर्ग’ को अपने गर्भ में धारण करता है और प्रचण्ड तेजस्विता का प्रसव करता है। साधक के गर्भ में से तेजस्विता का प्रसव कराने के कारण सविता को प्रसविता-जनक एवं उत्पादक भी कहते हैं। जिस प्रकार सूर्य की गर्मी से संसार के जड़ चेतन सभी का जन्म एवं विकास होता है उसी प्रकार आध्यात्मिक सविता से प्राण के द्वारा मानव शरीर-पिण्ड में अन्तर्हित असंख्य प्रकार के शक्ति बीजों का उद्भव एवं विकास होता है।

गायत्री में दूसरा जो महातत्व सन्निहित है वह है-चेतना एवं ज्ञान। वरेण्य एवं धिय-इन दो शब्दों में उस चेतना का संकेत है जिसे विवेक एवं ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। परा विद्या यही है। आत्म ज्ञान, आत्म निर्माण, आत्म प्राप्ति एवं आत्म साक्षात्कार इसी महातत्व के अंतर्गत आते हैं। साधनाएं इसी की प्राप्ति के लिए होती हैं। अद्वैत, हेतु और द्वैत का विवेचन इसी भूमिका के स्पष्टीकरण के लिए है । वेदाँत शास्त्र इसी तत्व ज्ञान का परिमार्जन करता है। यह तो हुई उच्च भूमिका की बात। साधारण लौकिक जीवन में स्मरणशक्ति , बुद्धि की तीक्ष्णता, चतुरता, व्यवहार कुशलता, विवेकशीलता दूरदर्शिता, उच्च साहस, धैर्य, प्रसन्नता, निश्चिन्तता एकाग्रता, लगन, निष्ठा, दृढ़ता आदि मानसिक शक्तियाँ इसी श्रेणी में आती हैं। गायत्री का प्राणतत्व इस चेतना को भी अपने भीतर भरे हुए है। गायत्री का तीसरा तत्व है जीवन देवस्य (दिव्य) और प्रचोदयात् (प्रेरणा) यह दो शब्द इसी के लिए काम में आये हैं। शरीर को देर तक स्थिर रखना, निरोग जीवन, वंश की शुद्ध परम्परा, शान्तिपूर्वक शरीर त्याग, आदर्शवादी आचरण, इन्द्रियों की मर्यादा में रहना, मन का विचारों से अचंचल रहना, दिव्य जीवन, आन्तरिक शान्ति, जीवन को चलाने योग्य सभी आवश्यक सुख साधनों की उपलब्धि, स्वास्थ्य, सौंदर्य, इन्द्रिय शक्तियों की स्थिरता, स्फूर्ति, श्रमशीलता, जीवन, धन, विद्या , ऐश्वर्य, मैत्री, प्रशंसा, नेतृत्व, सुखी परिवार आदि अनेक साधनों की उपलब्धि इसी दिव्य जीवन-प्रेरणाप्रद जीवन की सीमाओं में आती है। मनुष्य जीवन को सन्तुष्ट एवं प्रगतिशील बनाने वाले सभी आवश्यक साधन इन दो शब्दों में सन्निहित शक्तियों के द्वारा साधक प्राप्त कर सकता है। वे सभी साधन गायत्री की विश्व व्यापी महान शक्ति के प्रसाद माने गये हैं।

तीन व्याहृतियों में ही इन्हीं तीन तत्वों का संकेत है-भूः में प्राण शक्ति , भुवः में जीवनोपयोगी साधन सम्पत्ति और स्वः में ज्ञान शक्ति का समावेश है। इन तीन को पाकर मनुष्य सब प्रकार धन्य हो जाता है। जिसे यह तीन तत्व प्राप्त हो गये वह इनकी प्रशाखा के रूप में नाना प्रकार के उन अगणित पदार्थों तथा विशेषताओं को प्राप्त कर सकते हैं जिन्हें लोग ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से पुकारते हैं, जिनकी प्राप्ति आश्चर्यजनक मानते हैं और जिनके लिए तरसते रहते हैं।

गायत्री प्राण शक्ति, प्राण रक्षिणी शक्ति, प्राण वर्द्धिनी शक्ति है। इसका मर्म इन तीन अक्षरों में संकेत रूप से सन्निहित है देखिए :-

‘गा’ चेति सर्वगा शक्ति ‘यत्री’ तत्र नियंत्रिका।

अर्थात् -गा शब्द यह सर्वगामिनी शक्ति का बोधक है। उस शक्ति पर नियन्त्रण करने वाली है ऐसा अर्थ ‘यत्री’ शब्द में सन्निहित है।

‘गा’ कारो गतिदः प्रोक्त ‘य’ कारो शक्ति दायिनी।

‘त्र’ स्त्राताच तथा विद्धि ‘ई’ कार स्वयं परम्।

अर्थात् ‘गा’ कार से गति देने वाली, ‘य’ कार से शक्ति दायक ‘त्र’ से त्राण करने वाली और ‘ई’ कार स्वयं परम तत्व की बोधक है।

सा हैषागयाँस्तत्रे। प्राणाः वैगयास्तत्प्राणाँस्तत्रे तद्यद् गयाँस्तत्रे तस्याद् गायत्री नाम।

-शतपथ 14।15।7

अर्थात्-गायत्री प्राणों का त्राण-रक्षण करती है। ‘गय’ कहते हैं प्राण को, उस प्राण को जो रक्षण करे उसका नाम गायत्री।

गायत्री ‘प्राण’ का अजस्र भण्डार है, वह इस विश्व का महान तत्व है। उसकी महत्ता शब्दों से नहीं वरन् उसकी प्रक्रियाओं की एक-एक किरण में दृष्टिगोचर हो सकती है। इस प्राण के जब एक छोटे भाग पर भी साधक अपना अधिकार कर लेता है तो वह आसानी से अनुभव कर सकता है कि उस व्यापक तत्व की शक्ति कितनी महान है और उसमें प्रवेश करते-करते कितनी बड़ी महानता का अधिष्ठाता बना जा सकता है। प्राण की महिता का वर्णन शास्त्र इस प्रकार करते हैं-

यद्वाव प्राणो जागार तदेव जागारितम् इति।

-ताण्डवय 10।4।4

प्राण को जागृत करना ही महान जागरण है।

प्राणोऽस्यि प्रज्ञात्मा। तं मामयुरमृतमित्यु पारस्वायुः।- शाँखायन 5।2

मैं प्राण ही प्रज्ञा रूपी आत्मा हूँ। मुझे ही आयु और अमृत जानो और मेरी उपासना करो।

प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यतप्रतिष्ठितम्।

मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रींच प्रज्ञाँ च विधेहि न इति। -प्रश्नोपनिषद्

इस विश्व में जो कुछ है वह सब प्राण के आधीन है जो कुछ स्वर्ग में है वह भी प्राण के ही आधीन है। हे प्राण तू हमें माता के समान पाल और लक्ष्मी तथा प्राण हमें प्रदान कर।

स एब वैश्वानरो विश्व रुपः प्राणोऽग्निरुदयते। -पिप्पलाद

यह प्राण ही सारे संसार में वैश्वानर रूप में प्रकट होता है।

प्राणाद्धये व खल्विमान भूतानि जायन्ते। प्राणानि जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभि संविशन्तीति। -तैत्रीयन्तीति।

प्राण शक्ति से ही समस्त प्राणी पैदा होते हैं। पैदा होने पर प्राण से ही जीते हैं, और प्राण में ही प्रवेश कर जाते हैं।

प्राणो वा ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च् -छाँदोन्य

प्राण ही बड़ा है और श्रेष्ठ है।

प्राणो वै बलम। प्राणो वा अमृतम्। आयुर्नः प्राणः। राजा ये प्राणः । - बृहदारण्यक

प्राण ही बल है। प्राण ही अमृत है। प्राण ही आयु है। प्राण ही राजा है।

प्राणो विराट प्राणोदेष्ट्री प्राणंसर्व उपासते। प्राणोह सूर्यश्चन्द्रमाः प्राणमाहुः प्रजापितम्। -अथर्व

प्राण विराट् है। प्राण सबका प्रेरक है। इसी से सब प्राण की उपासना करते है। प्राण ही सूर्य और चन्द्रमा है। प्राण को प्रजापति कहा जाता है।

प्राणाय नमो यस्य सर्वं वशे। यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम्।

-अथर्व, का.11

जिसके वश में यह सारा संसार हो रहा है उस प्राण को नमस्कार है। यही सबका स्वामी है। उसी में सारा संसार समाया हुआ है।

सर्वा ऋचाः वेदाः सर्वे घोषाः एकैव व्याहृतिः प्राण एवं प्राण ऋच इत्येव विद्यात्।

ऐतरेय 2।2।10

जितनी ऋचाएँ है, जितने वेद हैं, जितने पोष हैं, वे सब प्राण स्वरूप हैं। इन रूपों में प्राण ही व्याप्त है, उसी को उपासना करनी चाहिए।

दहृाते ध्यायमानानाँ धातूनाँ हि यथा मलाः। तथेन्द्रियायाँ दहृान्ते दोषः प्राणस्य निग्रहान्॥ -मनु॰

जिस प्रकार अग्नि में तपाये जाने पर धातु का मल जल जाता है उसी प्रकार प्राण का निग्रह करने से इन्द्रियों के विकार जल जाते हैं।

अथर्ववेद के 11।12 में प्राण को परमात्मा का श्रेष्ठतम प्रतीक मानकर उसका अभिनन्दन करते हुए स्तुति की गई है :-

नमस्ते प्राणक्रान्दाय नमस्ते स्तनयित्नवे।

नमस्ते प्राण विद्युते नमस्ते प्राण वर्णते।

प्राण में जिस शक्ति एवं तेजस्विता का अनूठा भण्डार है उसे गायत्री में सविता शब्द से स्मरण किया गया है। यह सविता ही गायत्री का देवता है। सविता की उपासना वस्तुतः तेज की उपासना है। इससे आत्मा सब प्रकार के अन्धकार आवरणों से मुक्त होकर तेजस्वी-प्रकाश हो जाता है। आत्मा रूपी सूर्य जब अपने दिव्य प्रकाश से प्रकाशवान् होता है तो उसकी किरणें अपने को ही नहीं विश्व ब्रह्मांड के एक बहुत बड़े भाग को प्रकाश में तेजस्विता से परिपूर्ण बना देते हैं। इस अलौकिक अध्यात्म सूर्य का महत्व शास्त्रों में इस प्रकार बताया गया है।

नत्वा सूर्य परं धाम ऋग् यजुः साम रूपिणाम्। -सूर्य पुराण।

ऋग, यजु, साम, रूप परंधाम सूर्य को नमस्कार है।

कृत्वैक हि त्रिधात्मानमेषु लोकेषु तिष्ठति।

देवान् यथायथं सर्वान् निवेश्य स्वेषु रश्मिषु॥ सूर्योपनिषद्

तीनों लोकों में तीन भाग होकर वह सविता देव अवस्थित हैं। समस्त देवता उन्हीं की रश्मियों में बंधे हुए हैं।

सविता दिव्य शक्ति यों का उत्पादक, चराचर का सृजन करने वाला कहा गया है। भौतिक एवं आध्यात्मिक सभी शक्तियाँ सविता के द्वारा ही प्रादुर्भूत एवं विकसित होती हैं। कहा गया है कि-

प्रजापतिः सविता भूत्वा प्रजा असृजत्।

-तैत्तरीय 1।6।4।1

प्रजापति सविता बन कर समस्त सृष्टि को उत्पन्न करता है।

सविता वै देवानाँ प्रसविता। -शतपथ 1।1।2।17

सविता देव शक्तियों को जन्म देने वाला है। सविता वै प्रसवानामीशे। - ऐतरेय 1।30

सब उत्पादक शक्ति यों का स्वामी सविता है। इस सूर्य लोक को, प्रकाश भूमिका को-प्राप्त करने के लिए तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा एवं विद्या की आवश्यकता होती है। जो इस स्थिति को-इस लोक को प्राप्त कर लेते हैं वह अभय पद को, नोत्त को प्राप्त करता है। स्मरण रहे यह आदित्य-यह चमकने वाला-उदय अस्त होने वाला सूर्य नहीं वह प्राण रूपी दिव्य तेज ही है। गायत्री में इसी सूर्य की उपासना का विधान है।

अथोत्तरेण तपसा बह्मचर्येण श्रद्धया विद्यात्मान मन्विष्यादित्य मभि जयन्ते। एतद्धे प्राणा नाभायतन मेतदमृतम भय मेतत्परायण मेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येथ निरोध :-

तप से, ब्रह्मचर्य से, श्रद्धा से, विद्या से आत्मा ढूँढ़ कर जो-जो आदित्य लोक को प्राप्त करते हैं वे पुनः जन्म नहीं लेते। यह आदित्य ही प्राणों का आधार है। यही साधकों का परम आश्रय है यही अभय पद है, यही मोक्ष है।

यह दिव्य तेज उस साधक तक ही सीमित नहीं रहता वरन् उसके पुत्र पौत्रों तक-शिष्य प्रशिष्यों तक चला जाता है। जैसे चन्दन के निकट उगने वाले पौधे सुगंधित हो जाते हैं वैसे ही उसके तेज उपासक साधक के निकट संपर्क में आने वाले लोग भी तेजस्वी हो जाते हैं।

तेजो वै गायत्री छन्दसाँ तेजो रथन्तरं साम्नाम् तेजश्च्तुर्विशस्तोमानाँ तेज एव तत्सम्यक् दधाति पुत्रस्य पुत्रतेजस्वी भवति।

गायत्री सब वेदों का तेज है। सामवेद का यह रथन्तर छन्द है। चौबीस स्तंभों का यह तेज है। इस तेज का धारण करने वाले के पुत्र पौत्र तेजस्वी होते हैं।

योगी लोग जिस कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करके परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं वह इस शरीर में समाये हुए महाप्राण रूपी सूर्य की महाशक्ति ही है। वह गायत्री ही है-इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।

सवितुर्देवस्य पर ब्रह्मणः कुण्डलिनी गायत्री एव। -ब्रह्म यामल तन्त्र

परब्रह्म स्वरूप सविता देव की कुण्डलिनी शक्ति गायत्री हैं।

कुँडलिन्याँ समुदभूता गायत्री प्राण धारिणी।

प्राणविद्या विद्या महाविद्या यस्ताँ वेत्तिस वेदमृत् -योग चूड़ामणि

कुण्डलिनी शक्ति से उत्पन्न हुई गायत्री प्राण धारिणी शक्ति है। इस महाविद्या को जो जानता है वही ज्ञानी है।

उस अध्यात्मिक सूर्य के प्रतिबिम्ब इस भौतिक सूर्य का महत्व भी कम नहीं हैं। यह स्थूल विश्व इसी के द्वारा जीवन धारण करता है :-

आदित्यो ह्यादि भूतत्वात् प्रसूता सूर्य उच्यते।

परंज्योतिः तमः पारे सूर्योऽयं सवितेति च।

-सूर्य सिद्धान्त

सूर्य समस्त संसार का आदि कारण है इसी से उसे आदित्य कहते है। संसार की प्रत्येक वस्तु को उत्पन्न करता है इसलिए सविता है। अन्धकार को दूर करता है इसलिए परम ज्योति है।

भर्ग सविता के तेज का बोधक है। संसार के प्रमुख तेजस्वी तत्वों की गणना भर्ग संज्ञा में की गई है। अत्रि को भर्ग माना गया है। स्वयं गायत्री की गणना भर्ग संज्ञा में हैं।

पृथित्येव भर्गः अगिनरेव भर्गः वसवएव भर्गः गायत्र्येव भर्गः प्राच्येव भर्गः वसन्तएव भर्गः त्रिवृदेव भर्गः ऋग्वेद एव भर्गः होतेव भर्गः वागेव भर्गः।

अर्थात्- पृथ्वी, अग्नि, वसु, गायत्री, प्राची, बसन्त, वित्रृत्त, ऋग्वेद होता है और वाक् ये देश पदार्थ भर्ग बोधक हैं।

यह प्राण तत्व, दूसरी भूमिका में प्रज्ञा होकर चेतना एवं बुद्धि रूप में परिलक्षित होता है। इस ज्ञान के प्राप्त होने पर मनुष्य की अध्यात्म भूमिका विकसित होती है और वह ऋषि, दिव्य दृष्टि एवं तत्व ज्ञान की श्रेणी में सुविधापूर्वक जा पहुँचता है। यह प्राण ही प्रज्ञा है, इसकी पुष्टि करते हुए शास्त्र कहता है :-

योवै प्राणः सा प्रज्ञा, यावा प्रज्ञा स प्राणः

- शांख्यायन अरण्यक 5।3

जो प्राण है सो ही प्रज्ञा है तो प्रज्ञा है सो ही प्राण है। प्राण का यह द्वितीय तत्व प्रज्ञा मानव जीवन रूपी त्रिवेणी की दूसरी धारा है। इसका महत्व पारस मणि के समान है। इसे ही छू कर पशु पक्षियों से भी अनेक बातों में पिछड़ा हुआ यह दुर्बल मानव प्राणी विश्व का मुकुट मणि बनता है। इसी के अभाव से जहाँ एक व्यक्ति रोते झींकते मुश्किल से पेट पालते हुए जिन्दगी के दिन किसी प्रकार पूरे करता है वहाँ इस प्रज्ञा तत्व से सम्पन्न दूसरा व्यक्ति देवताओं की तरह पूजा जाता है, अपना जीवन धन्य बनाता है और अपने साथ दूसरों को धन्य भाग बनाता है। स्वयं तरता है और दूसरों को तराता है। इस प्रज्ञा तत्व की ज्ञान बल की महत्ता देखिए :-

नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

गीता 4।38

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र और कोई वस्तु नहीं है।

ज्ञानतः सुलभः मुक्ति र्भ् क्ति र्यज्ञादि पुण्यतः।

ज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है और यज्ञादि पुण्य कर्मों में साँसारिक सुख प्राप्त होते हैं।

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यों न मेघया न वहु श्रुतेन।

यह आत्मा केवल प्रवचन, बुद्धि बल और बहुत सुनने से प्राप्त नहीं हो सकता ।

नि बिना ज्ञान विज्ञाने मोक्षस्याधि गमों भवेत्।

बिना ज्ञान विज्ञान के मोक्ष प्राप्त नहीं होती।

योग हीनं कथं ज्ञानं मोक्षदं भवतीह भोः।

योगोऽपि ज्ञान हीनस्तु न क्षयो मोक्ष कर्माणि।

तत्मात् ज्ञानंच योगंच मुमुक्षुदृढ़मभ्यसेत्।

योग रहित ज्ञान और ज्ञान रहित योग कभी भी मोक्ष नहीं दे सकते। इसलिए ज्ञान और योग का बार-बार दृढ़तापूर्वक अभ्यास करना चाहिये।

सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परि समाप्यते।

-गीता 4। 33

हे अर्जुन सब कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।

ज्ञानाग्नि सर्व कर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा।

-गीता 4। 37

ज्ञान की अग्नि में सब कर्म भस्म हो जाते हैं।

बुद्धिर्यस्य बलंतस्य निर्बुद्धिस्य कुतोवलम्।

जिसमें बुद्धि है उसी में बल है। निर्बुद्धि में बल कहाँ से आया?

तेषाँ सतत युक्ताँनाँ भजताँ प्रीति पूर्वकम्।

ददामि बुद्धि योगंतं येन मामुपयान्ति ते।

तेषामेवानुकम्पाथ महमज्ञानजं तमः।

नाशायाम्यात्मभावस्थो ज्ञान दीपेन भास्वता।

-गीता 10। 10। 11

सदा मुझे प्रीति पूर्वक भजने वाले साधक को मैं ‘बुद्धि योग‘ प्रदान करता हूँ। जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं। उनके अंतःकरणों में निवास करता हुआ मैं प्रकाशवान ‘ज्ञानदीप’ द्वारा अज्ञान जन्य अन्धकार दूर कर देता हूँ।

एकः शत्रुर्नद्वितीयोऽस्ति शुत्रुरज्ञान तुल्यः पुरुषस्य राजन्।

येन्नावृतः कुरुते संप्रयुक्तो, घोराणि कर्माणि सुदारुणानि।

-महा. छान्ति 297। 28

इस संसार में मनुष्य का एक ही शत्रु है, उसके समान दूसरा और कोई है ही नहीं। यह शत्रु ‘अज्ञान’ है। इसी से ग्रसित होकर मनुष्य दारुण कर्मों को करने लगता है।

इस अज्ञान को दूर करने वाला ज्ञान जिसे प्राप्त हो गया वह न पाप रूप दारुण कर्मों को करता है और न परिणाम में शत्रु के समान दुख देने वाले पाप दंडों को भोगता है।

भगवान जब भक्त पर प्रसन्न होते हैं तब माया के बंधनों से छुड़ाने वाले और इस जगत की वास्तविक स्थिति को समझाने वाले दिव्य ज्ञान को प्रदान करते हैं। भगवान ने अर्जुन को मोह बंधन से छुड़ाने एवं अपना विराट वास्तविक स्वरूप दिखाने के लिए यही ऋतम्भरा प्रज्ञा रुपी दिव्य चक्षु प्रदान किए थे। गीता में भगवान ने अर्जुन को यह दिव्य चक्षु देते हुए कहा-

दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्यते योगमैश्वरम्।

हे अर्जुन तू इन साधारण चर्म चक्षुओं में मेरा योग ऐश्वर्य नहीं देख सकता इसलिए तुम्हें “दिव्य चक्षु” प्रदान करता हूँ।

यही दिव्य चक्षु गायत्री में सन्निहित प्रज्ञातत्व है। यही ईश्वरीय विभूति आत्म मार्ग के पथिकों के भक्तों के अन्तःकरण में सद्बुद्धि के रूप में निवास करती है।

‘सर्वस्य बुद्धि रूपेण जनस्य हदि संस्थिते’

इस परम कल्याणकारी ज्ञान शक्ति को उपलब्ध करने के लिए निरन्तर प्रयत्न करने को वेद भगवान ने आदेश किया है :-

उत्तिष्ठध्वं जागृध्वमग्निमिच्छध्वं भारताः।

-श्रुति

हे बुद्धिमानों! जागो, उठो और ज्ञान की इच्छा करो।

इस प्रज्ञा को प्राप्त करके व्यक्ति अपने विचार ही नहीं आचरण को भी श्रेष्ठ बना लेता है। विचारों के श्रेष्ठ होते ही आचरण भी श्रेष्ठ होने लगते हैं तदनुसार मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर होता जाता है। गायत्री उपासना करते हुए साधक मनुष्य योनि में रहते हुए भी देवता बन सकता है।

भजन्त विश्वे देवत्वं नाम ऋतं सपन्तो अमृत मेवैः।

-ऋग्वेद 1। 68। 2

अपने आचार व्यवहार को श्रेष्ठ रखकर सभी कोई देवत्व को प्राप्त कर सकते हैं।

इस प्राण, प्रज्ञा और जीवनरूपी त्रिपदा गायत्री के दो चरण प्राप्त कर लेने के उपरान्त सुख शान्ति एवं ऐश्वर्यपूर्ण दिव्य जीवन भी प्राप्त होता है। अध्यात्मिक और भौतिक दोनों में से किस ऐश्वर्य का लाभ लें यह साधक की आन्तरिक स्थिति के ऊपर निर्भर है। आमतौर से जिनने प्रगति की इतनी मंजिल पार कर ली होती है वे तुच्छ विषय विकारों एवं तृष्णा वासनाओं की पूर्ति के लिए नहीं ललचाते और न इसमें उस कमाई को खर्च करते हैं। पर बल बुद्धि के जो साधक उन चीजों को भी प्राप्त करना चाहते हैं वे उन्हें भी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। इन दोनों ही सम्भावनाओं का शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है। गायत्री का एक-एक अक्षर देवता की उपासना से मनुष्य का बहुत सा उपकार हो सकता है तो 24 अक्षर 24 देवता हैं। जब एक देवता की उपासना से मनुष्य का बहुत सा उपकार हो सकता है तो 24 देवताओं की शक्ति से सम्पन्न गायत्री मंत्र से कितना उपकार नहीं हो सकता?

गायत्र्यावर्णमेकैकं साक्षात् देव स्वरूपकम्।

तस्मात् उच्चारणत्तस्य त्राण मेव भविष्यति।

गायत्री का एक-एक अक्षर साक्षात् देवस्य रूप है, इसलिए उसके उच्चारण से उपासक का कल्याण ही होता है।

जिसे आत्म कल्याण का इतना बड़ा माध्यम उपलब्ध है उसे रोग, शोक, दुख दारिद्र, शत्रु, चिन्ता शोक, आक्रमण आदि किसी बात का भय नहीं रहता। वह अपने को पूर्ण सुरक्षित एवं निर्भय अनुभव करता है।

गायत्री की विभूतियों का संक्षिप्त सा विवरण इस प्रकार है :-

कामान्दुग्धे विप्रकर्षत्य लक्ष्मी,

पुण्यं सूते दुष्कृतं या हिनास्ति। शुद्धाँ शान्ताँ मातरं मंगलानाँ,

धेनु धीरा गायत्री मंत्र याहुः।

अर्थात् आवश्यक वस्तुओं को प्रदान करती है, दुर्भाग्य, दारिद्र आदि कष्टों को दूर करती है, पुण्य बढ़ाती है, पाप का विनाश करती है, ऐसा परम शुद्ध शान्त कल्याण जननी गायत्री को विज्ञ पुरुष गायत्री कहते हैं।

शत्रुतोनभयम् तस्य दस्युतो कवानराजतः।

न शस्त्रानल तो यौधा स्कदाचित्सम्भाविष्यति॥

न उसे शत्रुओं का भय रहता है, न डाकुओं का, न राजा का, न हथियारों का, न अग्नि का, वह सब प्रकार के भयों से निर्भय हो जाता है।


व्यावहारिक आध्यात्मिकता

(सन्त विनोबा)

इन दिनों ‘इन्टर काँटिनेंटल वैलीस्टिक मिसाइल’ नामक आग्नेयास्त्र का ईजाद हुआ है। उससे जैसे वह जगह बैठ कर सारी दुनिया को आग लगा सकता है वैसे ही एक जगह बैठ कर सारी दुनिया में शान्ति कायम करने का दुनिया को बचाने की तरकीब हमें ढूँढ़नी चाहिए। वह एक जगह बैठ कर कंट्रोल्ड मिसिलो भेज सकता है, उसे कहेगा कि न्यूयार्क या वाशिंगटन पर जाकर गिरो, तो वह मिसाइल वहाँ जाकर ठीक उसी एंगल (कोण) में, हुक्म के मुताबिक गिरेगा। इस तरह घर बैठे दुनिया को आग लगाने की ताकत विज्ञान ने ईजाद की है, वहाँ आपको ऐसी ताकत ढूँढ़नी चाहिए कि घर बैठे दुनिया को प्रभावित कर सके।

वह ताकत आध्यात्मिक के सिवाय दूसरी कोई नहीं हो सकती है। इसलिए ‘स्पिरिच्युआलिटी’, रुहानियत, आध्यात्मिकता इस जमाने की माँग है उसके बिना मुक्ति मुमकिन नहीं है। मैं व्यक्तिगत मुक्ति की हो नहीं, बल्कि सारे समाज की नजात की बात करता हूँ। इसलिए मैं कहता हूँ कि पुराने जमाने में हम किसी एक विषय पर भावना पैदा करते जाते थे। उस पुरानी मन की भूमिका पर काम करने से कोई मसला हल नहीं होगा। इसलिए अब हमें भारत की पुरानी कुवत, ताकत, जो रुहानियत में है, उसे बाहर लाना होगा उसी ताकत से कश्मीर के, हिन्दुस्तान के और दुनिया के मसले हल होंगे।

मैंने आपके सामने जो चार बातें रखीं, उनके मूल में हमारा भारतीय चिंतन है, जिसमें ब्रह्मविद्या आती है। उन चार बातों में पहली बात यह थी कि राजनीति की जगह लोक नीति चले। इन्डायरेक्ट डेमोक्रेसी की डायरेक्ट डेमोक्रेसी, पीपल्स डेमोक्रेसी चले। दूसरी बात यह थी कि हवा, पानी और सूरज की रोशनी के जैसे जमीन भी सबके लिए हैं, उसकी मलकियत नहीं हो सकती है। तीसरी बात यह थी कि आपको शान्ति-सेना कायम करनी होगी, मर मिटने के लिए राजी होना होगा हर हालत में मारने के लिए जाने वाले सिपाही को भी मर मिटने के लिए तैयार होना ही पड़ता है। वह ऐसी प्रतिज्ञा नहीं कर सकता है कि मैं मारूंगा, लेकिन मरूंगा नहीं। इसलिए हमें एक ठंडी ताकत पैदा करनी होगी और उसके लिए हर घर की संपत्ति हासिल करनी होगी। चौथी बात यह थी कि कुल दुनिया का आज का ढाँचा बदलना पड़ेगा। उसके बिना दुनिया आगे नहीं बढ़ सकती है।

आज मैंने उन सबके मूल में जो ब्रह्मविद्या है, उसकी तरफ आपका ध्यान खींचा है। वह पुरानी ब्रह्मविद्या नहीं है। अभी मुझे एक भाई मिले, जो पाँच साल पहले मिले थे। वे आध्यात्मिक क्षेत्र में काम करते हैं। मैंने उनसे पूछा कि आपने क्या काम किया, तो उन्होंने कहा कि ध्यान करता था, मैंने कहा इसमें क्या ब्रह्मविद्या हुई? जैसे काम करने की ताकत होती है, वैसे ध्यान की भी एक ताकत होती है।

जैसे कोई काम करने की ताकत बढ़ाता है, तो क्या यह कहा जायेगा कि वह अध्यात्म में आगे बढ़ा है? वैसे ही किसी एक विषय पर एकाम होना, मैं एक ताकत समझता हूँ। इसमें रुहानियत कहाँ है? जो बड़े-बड़े वैज्ञानिक होते हैं, उनका दिमाग दूसरी बात सोचता ही नहीं, उसी पाइंट, (बिंदु) पर सोचता है। मेरी ही मिसाल लीजिए । मुझे एकाग्रता के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता है, मुझे चारों ओर ध्यान हो तो उसी में तकलीफ होती है। कुछ लोगों की ऐसी हालत होती है कि वे किसी कोठरी में गये तो अपनी आँख से पचास चीजें देख लेते हैं, लेकिन मैं किसी जगह पहुँचा, तो मुझे पता ही नहीं चलता है कि वहाँ क्या-क्या है। मुझे ध्यान के लिए एकाग्रता के लिए कुछ भी मेहनत करनी नहीं पड़ती है। लेकिन एकाग्रता हो गई तो क्या आध्यात्मिक स्थिति बदल गयी, रुहानियत आ गयी?

एकाग्रता तो एक मामूली ताकत है। लेकिन हम लोगों में एक गलतफहमी बैठी है। कोई किसी एकाँत में, गोशै में, गुफा में गया, तो हम समझते हैं कि आध्यात्मिकता आयी। लेकिन मुझे लगता है, लोगों में रहने से क्यों घबड़ाते हैं और ऐसी गुफा में बैठते हैं, जहाँ न हवा है, न रोशनी है, बदबू भी होती है। मैंने एक स्वामीजी की गुफा देखी । जहाँ उनकी समाधि लगती थी, वहाँ इतना अंधेरा था कि मैं तो हैरान हो गया। इस जमाने का समाधि लगाने वाला जो महापुरुष होगा, वह अंधेरे में नहीं जायेगा। बंगाल में विष्णुपुर में एक तालाब के किनारे बैठकर रामकृष्ण परमहंस की समाधि लगी थी, उसी स्थान पर बैठकर मैंने बड़ी नम्रता से कहा था कि रामकृष्ण ने जो काम शख्यी, निजी, व्यक्तिगत समाधि का किया था, वही काम सामाजिक तौर पर सामाजिक समाधि का मैं करना चाहता हूँ।

जो समाधि व्यक्ति को हासिल हुई, वही सारे समाज को हासिल हो। रामकृष्ण ने गुफा में बैठकर, अंधेरे में समाधि लगाने की कोशिश नहीं की, बल्कि बिल्कुल खुली हवा में कुदरत में, आसमान के नीचे बैठकर कोशिश की। उन्हें किसी चीज का डर नहीं था। जो कुदरत से, खुली हवा से, इन्सान से डरता है और दूर किसी गुफा में जाकर कहता है कि अब मेरा ध्यान लगता है, वह इतना टूटा-फूटा मन लेकर क्या करेगा? जरा कहीं खट आवाज हुई, चिड़िया फड़फड़ायी तो इनका ध्यान उधर जाता है। इस तरह गोशे में जाकर ध्यान-चिंतन करने की जो पुरानी बात थी, उसे मैं ब्रह्मविद्या नहीं मानता हूँ।

ब्रह्मविद्या के माने हैं, आपका और मेरा दिल एक हो और आप सबके लिए मेरे मन में उतना ही प्यार हो, जितना प्यार मुझे अपने लिए है। मुझमें और दूसरों में कोई फरक, भेद नहीं है, इसका जिसे एहसास हुआ, उसे ब्रह्मविद्या का स्वाद चखने को मिला। इसी ब्रह्मविद्या की तरफ इन दिनों मेरा सारा ध्यान है।


विश्व प्रेम ही ईश्वर प्रेम है।

(श्री भगवान साहब वशिष्ठ)

“आनन्दा दहयेव खाल्विमानि भूतानि जायन्ते”

यह सारी सृष्टि आनन्द से ही उत्पन्न हो रही है। आनन्द ही इसका उद्देश्य है। उपनिषदों में इस सृष्टि को उस रस स्वरूप से ओतप्रोत बताया है। प्रत्येक मनुष्य के हृदय में उस आनन्द स्वरूप का निवास है और आनन्द की पूर्ण प्राप्ति ही उसका चरम लक्ष है। मनुष्य के हृदय में विकारों के बीच भी वह रस स्वरूप निवास करता है जो सत्य है और चिरस्थायी है। किन्तु बहुत कम लोग उस आनन्द स्वरूप को रस स्वरूप परम सत्य का अपने में दर्शन कर पाते हैं। अधिकाँश उसे भुलाकर यत्र, तत्र दुःख, पीड़ा, अशान्ति, कलह की नारकीय यातनायें सहते रहते हैं।

उस आनन्दस्वरूप, रस स्वरूप की प्राप्ति के लिए प्रेम ही एकमात्र मार्ग है प्रेम के पथ का अवलम्बन लेकर ही उस प्रेमस्वरूप रस का दर्शन किया जा सकता है। प्रेम की साधना ही हमारे हृदयों में स्थित उस प्रेम स्वरूप के दर्शन का राजमार्ग है। ज्यों-2 प्रेम विकसित होगा त्यों-त्यों उसका स्वरूप अधिक स्पष्ट होता जायगा और अन्त में एकाकार होकर वह प्रेम अबाधित हो सर्वत्र बिखर जायगा जहाँ आनन्दमय प्रेमस्वरूप के सिवा और कुछ होगा ही नहीं। जिधर दृष्टि पड़ेगी वहाँ वह दिखाई देगा और हमारे अन्तःकरणों में भी वही अपने निर्मल एवं उज्ज्वल प्रकाश से प्रकाशित हो उठेगा।

प्रेम द्वारा उस प्रेम स्वरूप की प्राप्ति में ही जीवन की सार्थकता है। इच्छा की अन्तिम चरितार्थता प्रेम में ही है। साधारण दृष्टि से देखने पर मालूम होता है कि प्रत्येक प्राणी प्रेमी है। वह किसी न किसी से प्रेम करता ही है। माँ-बाप अपने बच्चों से पुरुष स्त्री से मित्र-मित्र से साथी-साथी से। कोई धन, कीर्ति, यश, भव्य भवनों से प्रेम करता है तो कोई प्रकृति से, तो कोई ईश्वर से। तात्पर्य यह है कि सृष्टि का कार्य संचालन प्रेम के माध्यम से ही हो रहा है। इस विश्वभुवन में प्रेम उपासना प्राणी मात्र का स्वाभाविक धर्म है। इसके बिना जीवन का आस्तित्व कायम नहीं रहता ।

प्रेम साधना के पथ पर बढ़ता हुआ मनुष्य जब उन्नति की ओर अग्रसर होता है तो वह अन्त में उस प्रेमस्वरूप के दर्शन करता है जहाँ सर्वत्र प्रेम से शून्य कुछ है ही नहीं। इसे ही विश्व प्रेम भी कहते हैं। इस विश्वप्रेम की प्राप्ति कैसे हो? इसका मर्म बहुत कम लोग जानते हैं और उनमें से भी बहुत कम इसको प्राप्त कर पाते हैं।

त्याग और प्रेम का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है प्रेम तो बिना दिए जी नहीं सकता। आप लीजिये मुझे नहीं चाहिए। इस नीति से प्रेम की प्राप्ति की जा सकती है। “मैं ही लूँगा आपको नहीं दूँगा” की नीति से प्रेमस्वरूप की प्राप्ति तो दूर परस्पर का प्रेम भी समाप्त हो जाता है। उत्सर्ग पर ही, त्याग पर ही प्रेम जीवित है। परमपिता परमात्मा का हमसे कितना प्रेम है, उसने हमारे लिए अपने अमूल्य भण्डारों को खोल रखा है। हम भी जो कुछ हमारे पास है उसे दे डालें। तन, मन, धन, योग्यता जो कुछ हो दूसरों के हित साधन के लिए समर्पित करें।

इसे देने में उत्सर्ग के मार्ग में, व्यवसायिक बुद्धि को बीच में न आने दिया जाय। जो कुछ दे उसके बदले में कुछ प्राप्ति की आशा न रखें। जो अपने पास है उसे देते रहें, निस्वार्थ भाव से उत्सर्ग करते रहें। आप देखेंगे विश्वप्रेम का स्त्रोत आप में उमड़ पड़ेगा। आप आनन्दित हो उठेंगे। स्वयं ही नहीं सारे वातावरण को प्रेममय बना देंगे। लेने ही लेने की प्रवृत्ति के कारण कुछ ही समय में कैकई ने राजतिलक उत्सव को शोक में परिणित कर दिया था। किन्तु उसके विपरीत राम और भरत के त्याग ने प्रेम की नई लहर बहा दी।

निस्वार्थ त्याग के पथ पर चलकर भेड़ चराने वाला बालक ईसा मसीह बन गया। त्याग के पथ का अवलम्बन लेकर ही महात्मा गाँधी, सेन्टपाल आदि ने जन-जन में उस प्रेमस्वरूप के दर्शन किए। निस्वार्थ त्याग ही प्रेमस्वरूप की उपलब्धि करा सकता है। अतः अपने पास जो कुछ है उसे उन्मुक्त भाव से लुटा दीजिए दूसरों के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर दीजिए। आप का त्याग और निस्वार्थ भाव जितना उच्च होगा उतना ही आपमें ईश्वरीय प्रेम, विश्वप्रेम का पुण्य प्रकाश प्रस्फुटित होगा। जिसके दिव्य प्रकाश से आपका जीवन धन्य बन जायगा।

अहंकारी, अभिमानी, स्वार्थी एवं महत्वाकाँक्षी के हृदय में विश्वप्रेम की अनुभूति नहीं हो सकती। इसलिए विश्वप्रेम के लिए अपने अहंकार को मारना होगा। “अपने हृदय को खाली करो-मैं उसे प्रेम से भर दूँगा।” इस ईश्वरीय महावाक्य में स्पष्ट संकेत है कि अहंकार को निकाल देने पर हृदय में ईश्वरीय प्रेम की प्रतिष्ठा हो सकती है।

अहंकारी मनुष्य की शक्ति से विश्व प्रेम दूर होता है। अहंकार किसका-धन, दौलत, वैभव ऐश्वर्य का? नहीं यह सब यहीं छोड़ना पड़ेगा। नाम, पद, प्रतिष्ठा का अहंकार है तो यह रंगीन चोला यही उतारना पड़ेगा। बड़े-2 शक्ति वान सामर्थ्यवान इस धूल में मिल गये हैं। फिर किसका अभिमान? अपने आपको इस अहंकार के नागपाश से विमुक्त करके अपने हृदय में विश्व प्रेम की प्रतिष्ठापना कर अपना तथा अन्य लोगों का जीवन धन्य बनाइये। अपनी नई सृष्टि बसाने की कोशिश में जीवन खोया जाय क्योंकि वह अस्वाभाविक है, असंगत है, ईश्वरीय विधान के विपरीत है, परिणाम दुःखदायी और विनाश ही है।

संसार के प्रत्येक तत्व में भलाई-बुराई सन्निहित हैं। न कोई पूर्णतः बुरा है और न कोई भला। मनुष्य के हृदय में भी विकारों के बीच ही प्रेम की जड़ जमी हुई है। शुभ तत्व बीज रूप में सभी में स्थित है। ऐसी दशा में बुराइयां को देखना अथवा दूषित दृष्टिकोण को अपना कर घृणा निन्दा को गले लगाना प्रेम साधना के पथ में भारी विघ्न है। अपना दृष्टिकोण बदल जाने पर जो दूषित और बुरे तत्व हैं उनमें भी अच्छाई, उस ईश्वरीय तत्व की झाँकी दृष्टिगत होती है। वहाँ भी उस प्रेमस्वरूप के दर्शन होते हैं क्योंकि विश्वप्रेम की प्राप्ति में कहीं दोष, बुराइयां, कमजोरियाँ रहती ही नहीं है। घृणा, परनिन्दा से प्रेम मर जाता है। अतः यह दृष्टिकोण त्याज्य है। इसके विपरीत अच्छाई का दर्शन करना आवश्यक है।

प्रेम उपासना के लिए हृदय शुद्धि भी अत्यावश्यक है। अपने विकारों को समझकर यथावत् उन्हें दूर करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए। इसके अतिरिक्त दूसरों के लिए अपना हृदय सदैव खुला रखना चाहिए। दुराव छिपाव प्रेम साधना में बाधक है। हृदय द्वारा ही दूसरों के हृदयों पर आधिपत्य किया जा सकता है। बुद्धि की दौड़ तर्क वितर्क, चालाकी, प्रतिभा के प्रदर्शन से मित्र को भी पराया बना देती है। शुद्ध हृदय और निष्कपट व्यवहार से शत्रु को भी मित्र बनाया जा सकता है अतः भूलकर ही चालाकी दुराव छिपाव से काम न लेकर सबसे निष्कपट व्यवहार एवं सहृदयता के सम्बन्ध कायम करने चाहिये।

प्रेम की साधना आत्मभावों को जोड़ना और उनके विस्तार में ही है। साधारणतया मनुष्य उन वस्तुओं से प्रेम करता है जिन्हें वह अपनी समझता है। जो उन्हें अच्छी लगती है जिनमें वह प्यार करता है। अच्छी लगने वाली वस्तुओं के मूल में वह आत्मभाव ही है जो उनसे जुड़ा हुआ है। कोई अपने मकान, सम्पत्ति से, कोई अपने बाल बच्चों से, कोई अन्य चीजों से प्रेम करते हैं और दूसरों के बाल बच्चों, धन, चीजों मकान आदि से प्रेम नहीं हैं, वह उन्हें अपनी नहीं समझता। किसी भी वस्तु के आकर्षण में आत्मभाव जोड़ देने पर ही वह अच्छी लगती है। इसलिए विश्वप्रेम के लिए, सर्वत्र उस प्रेमस्वरूप के दर्शन के लिए अपने आत्मभाव को चारों ओर जोड़ देना आवश्यक है।

अपने चारों ओर आत्मभाव आरोपित करके अपने पराये की भेद दृष्टि हटा देनी चाहिए। सभी बच्चों, स्त्री-पुरुषों, पशु-पक्षियों से आत्मभाव स्थापित किए जायं। इससे सर्वत्र अपना ही अपना नजर आयेगा और उनसे प्रेम सम्बन्ध कायम होंगे। सभी को अपना समझने का अभ्यास डालना चाहिए। यदि कोई किसी अर्थ में बुरा भी है तो घृणा, निन्दा न की जाय क्योंकि जैसे कोई व्यक्ति अपनी सन्तान भाई बन्धु की बुराई को क्षमा करता हुआ उसे प्रकाश में नहीं लाता, उसी प्रकार प्रशंसाजनक, बातों को ही प्रधानता देता है। यही भाव अन्य सभी से बनाना आवश्यक है।

प्रेम टूटे हृदयों को जोड़ता है, बिछुड़ों को मिलाता है, विद्वेष को शान्त करता है। यदि उसमें वास्तविकता, सचाई हो, मायाचार, कृत्रिमता एवं बुद्धि व्यापार न हों । इस तरह का सच्चा प्रेम सीधा मनुष्य के हृदय पर अधिकार करता है और उसे जीतता है। इसके विपरीत बनावटी, कृत्रिम दिखावटी प्रेम उल्टा सम्बन्धों में विष बीज को बो देता है। अतः इससे सावधान रहना चाहिए।

विश्वप्रेम की साधना में मूल आधार है अपने आत्मभाव का विस्तार। इसका नियमित अभ्यास डालना आवश्यक है। इसका प्रारम्भ अपने घर पड़ोस से करना चाहिये। सर्वप्रथम अपने घर के लोगों से ही आत्मीयता के सम्बन्ध कायम करने चाहिए। उससे बढ़ाकर अपने पड़ौस मुहल्ले, प्रान्त, देश, समाज तक अपने आत्मभाव का विस्तार करना चाहिए और एक दिन यही भाव विश्व मानव के साथ स्थापित हो जाता है। पवित्र प्रेम का अभ्यास पहले अपने घर से ही प्रारम्भ करना चाहिए। प्रेम की प्रारम्भिक पाठशाला घर ही और इससे बढ़कर फिर अपना क्षेत्र विस्तृत करते रहना चाहिए।

सेवा भी प्रेमोपासना का एक आवश्यक अंग है। दूसरों की अपने से जितनी बने उतनी भरपूर सेवा करनी चाहिए। वृद्ध, रोगी, बाल बच्चों की खूब सेवा करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में अपने जीवन से दूसरों को कुछ न कुछ देते रहने की नीति अपनानी चाहिए। जीवन का उद्देश्य यही होना चाहिये।

प्रेम ही जीवन है। प्रेम साधना ही जीवन का उद्देश्य है। निखिल विश्व में उसे अनन्त, रस स्वरूप, प्रेमस्वरूप की दिव्य अनुभूति प्राप्त करना हृदय में विश्व प्रेम को प्रतिष्ठापित करना ही आत्मा का उद्देश्य है।

प्रेमोपासना के पथ पर आशापूर्ण उत्साह पर बढ़ते हुए हमें उस दिन की प्रतीक्षा में रहना चाहिए, जिस दिन मृत्यु और कष्टों में भी उस प्रेम स्वरूप की दिव्य छाया दिखाई दे। तब सर्वत्र प्रेम ही प्रेम होगा। सब कुछ अपना ही अपना लगेगा।


क्या हमारे शरीर का अमर होना सम्भव है?

(श्री ‘भारतीय योगी’)

जब हम सभ्य संसार के मध्य-काल के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो हमको दो बातें विशेष रूप से दिखलाई पड़ती हैं। इस काल में भौतिकवाद का प्रचार विशेष बढ़ गया था और लोगों का ध्यान धन, वैभव, भोग विलास के साधनों की वृद्धि में लगा हुआ था। इस जमाने के विद्वानों और पदार्थ विद्या (विज्ञान) के ज्ञाताओं ने दो बातों की तरफ विशेष ध्यान दिया- एक रसायन (सुवर्ण बनाना) और दूसरे अमरत्व। रसायन के सम्बन्ध में भारतीय विद्वानों ने पारस-भस्म द्वारा तरह-तरह के परीक्षण किये और पुराने ग्रन्थों की बातों पर विश्वास किया जाए तो कुछ लोगों को इसमें सफलता भी प्राप्त हो गई थी। पर इस विद्या को सदैव अत्यन्त गोपनीय रखा गया था। इसलिए यदि किसी को इसमें सफलता भी हो गई तो उसका रहस्य प्रायः मृत्यु के पश्चात् उसी के साथ चला गया।

पर अमरत्व के विषय में स्थिति कुछ दूसरी रही। एक अमरत्व तो किसी देवी, देवता, सिद्ध महापुरुष के वरदान या आशीर्वाद द्वारा माना गया। यह एक निजी विश्वास से सम्बन्ध रखने वाली बात थी। इसके लिए कठोर तपस्या और गम्भीर साधना की आवश्यकता बतलाई गई थी, जो सबके लिये सम्भव नहीं मानी जा सकती।

दूसरा उपाय योगाभ्यास का है। योग में बड़ी-बड़ी शक्तियाँ मानी गई हैं और उसके द्वारा अमर होना ही नहीं वरन् और भी ऐसी-ऐसी गुप्त शक्तियों का प्राप्त होना लिखा है कि जिनके मुकाबले में ‘अमरत्व’ कोई बड़ी चीज नहीं। वास्तव में योगशास्त्र का अर्थ तो प्रायः यह है कि योगी उन्नति करते-करते ईश्वर के दर्जे तक पहुँच जाता है और उसके लिये संसार की कोई भी चीज या कार्य असम्भव नहीं होता।

तीसरा उपाय औषधियों या जड़ी बूटियों का सेवन करना था। इससे “अमरत्व” प्राप्त होता था उसका वास्तविक अर्थ स्वास्थ्य और आयु की वृद्धि ही होता था। अब भी प्राचीन शास्त्रों तथा आयुर्वेद ग्रन्थों में इसके प्रमाण और विधान मिलते हैं, पर उन सबका तात्पर्य आयु की वृद्धि ही जान पड़ता है।

इस दृष्टि से जब हम अमरत्व के विषय में विचार करते हैं तो हमको उन कट्टर भाग्यवादियों की बात एक प्रकार की हठधर्मी या अंध विश्वास ही जान पड़ता है, जो यह कहते हैं, मनुष्य की आयु सर्वथा पहले से निश्चित है और उसमें एक दिन की घटा बढ़ी हो सकना असम्भव है- “राई घटै न तिल बढै रह रे जीव निशंक।” हमारी समझ में इस प्रकार की धारणा अज्ञान की ही परिचायक है। समझदार आदमी अब भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि रहन-सहन, आचरण, संयम और प्रयत्न करने से उम्र अवश्य घट या बढ़ सकती है। आजकल के लोगों की बात छोड़ दीजिए। वेद, शास्त्र, पुराण आदि सभी के प्रमाणों से इस बात को सिद्ध किया जा सकता है कि आयु को दीर्घ बनाना असम्भव नहीं है। उदाहरणार्थ शुल्क यजुर्वेद के मन्त्र 23-24 में कहा गया है-

“मनुष्य के स्थूल शरीर की कम से कम आयु 100 वर्ष की है और उसे योगाभ्यास द्वारा बढ़ाया जा सकता है।” इसी वेद में अथवा (मन्त्र 3-60) में लिखा है कि “मनुष्य की आयु कहाँ तक बढ़ाई जा सकती है इसकी कोई सीमा नहीं, वह अमर भी हो सकता है।”

आयुर्वेद के सबसे माननीय ग्रंथ संहिता में ऐसे कितने ही प्रयोग दिये गये हैं जिनके सेवन करने से 1000 साल तक आयु होना संभव माना है। सुश्रुत संहिता में स्पष्ट रूप से लिखा है कि यदि उसकी बतलाई विधि के अनुसार सवा मन शिलाजीत का सेवन कर लिया जाय तो मनुष्य अवश्य ही एक हजार वर्ष तक जीवित रह सकता है। (देखो सुश्रुत संहिता का चिकित्सा स्थान पृष्ठ 718)

“योगदर्शन” में प्राणायाम और समाधि की जो क्रियाएँ बतलाई गई हैं उनका एक उद्देश्य शरीर को चिरस्थायी बनाना ओर मृत्यु पर विजय प्राप्त करना भी है। योगशास्त्र में जगह-जगह ऐसी सिद्धियों का वर्णन है जिनके द्वारा योगी अपने शरीर को पर्वत के समान भारी या रुई के समान हलका कर सकता है, पानी पर चल सकता है, आकाश में उड़ सकता है, आग में नहीं जल सकता और कोई रोग या पीड़ा उस पर असर नहीं डाल सकती। योगी तो आजकल भी देखने में आते हैं जो कई-कई सप्ताह तक साँस बन्द करके जमीन में गड़ जाते हैं, तेज जहर, काँच और लोहे की कीलें खा लेते हैं, शरीर को हथौड़ों से पिटवाते हैं, तो भी उन पर कोई असर नहीं पड़ता, योग की इन्हीं शक्तियों को और सिद्धियों को ध्यान में रखकर स्वामी विवेकानन्द ने विज्ञान का गर्व रखने वाले अमेरिकनों के सामने स्पष्ट शब्द में कह दिया था-

“योग शास्त्र वर्णित प्राणायाम के सिद्ध होने पर मानो अनन्त शक्ति का द्वार खुल जाता है। मानलो किसी व्यक्ति ने प्राणायाम के विषय को पूर्ण तरह से समझ लिया और उसे जीतने में भी सफलता प्राप्त कर ली तो फिर संसार में ऐसी कौन सी शक्ति है जो उसे प्राप्त नहीं? उसकी आज्ञा से चन्द्र सूर्य भी हट सकते हैं, छोटे से छोटे परमाणु से लेकर बड़े से बड़े सूर्य तक पर उसका अधिकार रहता है। क्योंकि उसने प्राण पर विजय प्राप्त कर ली है। प्राणायाम का लक्ष्य उस शक्ति को प्राप्त करना ही है जिससे प्रकृति वशीभूत हो सकती है। जब योगी सिद्ध हो जाता है तो प्रकृति में ऐसी कोई वस्तु नहीं रहती जो उसके वश में न हो जाए। अगर वह देवताओं को बुलायेगा तो वे उसकी आज्ञा पाते ही हाजिर हो जायेंगे। अगर वह किसी मरे हुए व्यक्ति को आज्ञा देगा तो वह भी तुरन्त सामने उपस्थित होगा। प्रकृति की सभी शक्तियाँ उसकी आज्ञानुसार दास की भाँति कार्य करती हैं।”

श्वेताश्वेतर उपनिषद् के दूसरे अध्याय में भी योग की ऐसी महिमा लिखी है-

लघुत्वमारोग्यम वर्ण प्रसादा स्वरसोवष्टंच। गंधः स्तम्भो मूत्र पुरीषमल्यं योग प्रवित्त प्रथमा वदन्ति॥ 1॥

पृथ्व्याप्ते जोहानिलखे समुत्थिते पंचात्मके योग गुणे युवत्ते। न तस्य रोगो नजरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगानिग्नमयं शरीरं॥ 2॥

अर्थात् शरीर का हल्कापन, स्वास्थ्य, निर्लोभता, सुन्दर वर्ण, मीठा स्वर, मल-मूत्र की अल्पता और शरीर में से एक प्रकार की मनोहर सुगन्ध- ये सब लक्षण योग आरम्भ करते ही दिखलाई पड़ने लगते हैं॥ 1॥ जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँचों तत्वों से योग की अनुभूति उत्पन्न होती है तब समझना चाहिए कि योग आरम्भ हो गया। जिसने इस प्रकार योग-अग्नि से युक्त शरीर प्राप्त कर लिया है, उस पर रोग, बुढ़ापा, मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं पड़ता॥ 2॥

वास्तव में विचार पूर्वक देखा जाए तो यह मनुष्य का शरीर यंत्र या मशीन की तरह है। जिस प्रकार कोई मशीन एक होशियार कारीगर के हाथ में रहकर पचास वर्ष चल सकती है और वही एक अनाड़ी के हाथ में पड़ जाने से पाँच वर्ष में ही बेकार हो जाती है, उसी प्रकार मनुष्य शरीर भी ढंग से रहने और पूर्ण देखभाल करने से सौ-डेढ़ सौ या अधिक समय तक काम दे सकता है, पर लापरवाह और असंयमी आदमी उसे पच्चीस-पचास वर्ष में ही खत्म कर डालता है। जिस प्रकार कोई मशीन पच्चीस वर्ष की गारंटी होने पर भी समय समय पर मरम्मत करने ओर पुर्जों के बदलने से पचास-साठ वर्ष तक भी काम दे सकती है, उसी प्रकार जो मनुष्य संयम, रसायन प्रयोग, कायाकल्प अथवा योग साधन का सहारा लेकर शरीर को विकारों से मुक्त रखते हैं, वे उसे सौ वर्ष तक भी कायम रख सके तो उसमें अविश्वास की कोई बात नहीं है। यही शरीर से अमर होना कहा जा सकता है।


प्रार्थना का महत्व

प्रार्थना मेरे जीवन का ध्रुवतारा है। एक बार मैं भोजन करना छोड़ सकता हूँ किन्तु प्रार्थना नहीं। आत्मा को परमात्मा में लीन करने का एकमात्र साधना प्रार्थना ही है। - (महात्मा गाँधी)

सत्य की भाँति प्रार्थना भी गाँधीजी के जीवन का एक अंग बनकर रही है, जो उक्त वाणी से स्पष्ट ही है। ये प्रार्थना का महत्व भली−भांति समझते थे। प्रार्थना से उन्हें नवशक्ति प्राप्त हुई थी जिसके द्वारा उन्होंने अपना और लोगों का कल्याण किया। उनके जीवन रूपी समुद्र में जब-जब ज्वारभाटा उठा तब-तब प्रार्थना द्वारा शक्ति से उसे नष्ट करने में समर्थ हुये और अपने स्थान पर ध्रुव की भाँति अटल और अचल रहे। बिना प्रार्थना किये वे रह ही नहीं सकते थे। प्रार्थना के प्रति उनके मन में प्रगाढ़ श्रद्धा थी। इन विषयों पर उन्होंने एक स्थान पर लिखा है-ईश्वर-प्रार्थना ने मेरी रक्षा की । प्रार्थना के आश्रय बिना में कभी का पागल हो गया होता । मेरी ऐसी अवस्था हो गई कि मुझे प्रार्थना के बिना चैन पड़ना कठिन हो गया। ईश्वर में मेरा विश्वास ज्यों-ज्यों बढ़ता गया, प्रार्थना के लिये मेरी व्याकुलता भी उतनी ही दुर्दमनीय हो गई । प्रार्थना के बिना मुझे जीवन नीरस एवं शून्य प्रतीत होने लगा। प्रार्थना की महत्ता का जितना वर्णन किया जाय, थोड़ा है। उसकी शक्ति अपरिमित है, अव्यर्थ है इस कलियुग में मानव के लिये प्रार्थना ही एक सहज और सुगम साधन है जिसके द्वारा मनुष्य जीवन संग्राम में विजयी होकर अपने परम लक्ष्य परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है। मनुष्य का जीवन संघर्षमय है। उसके अंतराल में सदैव देवासुर संग्राम चला करता है। इस संग्राम के चलते रहने का नाम जीवन है। इस परिस्थिति में मुक्ति प्राप्त करना असंभव तो नहीं, परन्तु कठिन अवश्य है।

प्रार्थना द्वारा संग्राम में सुयोग्यता से विजय प्राप्त की जा सकती है और देवी सम्पदा का स्वराज्य स्थापित किया जा सकता है। दैवी सम्पदा मोक्ष प्रदायिनी होती है तथा आसुरी सम्पदा हमें बन्धनों में जकड़े रखती है। गीता में कहा गया है :-

दैवी सम्पदा विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।

मनुष्य की आत्मा युगों-युगों से नाना प्रकार की योनियों में भटकती चली आ रही है और सुख की खोज में तड़प रही है। परन्तु उसे सुख नहीं प्राप्त हो रहा है। इस संसार में जितने प्राणी हैं, जब सुख की ओर दौड़ रहे हैं, परन्तु किसे भी सुख की प्राप्ति होती नहीं दिखाई दे रही है। गरीब से लेकर अमीर, पदाधिकारी, मन्त्री, राज्यपाल अथवा किसी भी सर्वोच्च अधिकार प्राप्त व्यक्ति की ओर ध्यान दें परन्तु आपको इनमें कोई भी सुखी नहीं दिखाई देखा। आप यदि उसके अन्तराल में ठहर कर देखेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि उसमें कहीं न कहीं कष्ट रूपी चिंगारी जल रही है। पशु पक्षी, जानवर आदि के बारे में तो यह कहना होगा कि वे भी दुःखी नहीं है।

भले ही मनुष्य बुद्धि-प्रधान माना जावे परन्तु इस विषय में तो वह शिशु जैसा अबोध है, क्योंकि वह सुख की खोज संसार में कर रहा है हीरे की खोज नदी और नालों में कर रहा है। परन्तु वहाँ भी उसे प्राप्त होने वाला नहीं। क्योंकि पानी की बूँद जब तक सागर में नहीं मिल जाती तब तक वह शान्ति प्राप्त नहीं कर सकती। उसी प्रकार हमारी प्रार्थना भी परमात्मा में लीन हुए बिना सुख शांति नहीं पा सकती।

मनुष्य को निज स्वरूप का ज्ञान न होने के कारण उसे प्रायः पाशविक वृत्तियों में रमण करने की आदत हो गई है जिससे उसकी आत्मा पर कुसंस्कारों का भार हो गया है। जब तक यह भार निर्मूल नहीं हो जाता तब तक सुख की प्राप्ति असंभव है। हमारे सन्त और शास्त्र बतलाते हैं कि सुख और शान्ति के भण्डार तो सर्वेश्वर भगवान् ही हैं। यह संसार तो अशान्ति का ही साम्राज्य है। इसमें सुख कहाँ ?

अतः सुख प्राप्त करने के लिये हमें अपने अन्तःकरण में जमे हुए कुसंस्कारों को निर्मल कर देना होगा। इन संस्कारों को नष्ट करने के लिये प्रार्थना ब्रह्मास्त्र का काम करती है। जिस प्रकार शरीर का सम्बन्ध भोजन से है, उससे कई अधिक गुना संबंध आत्मा का प्रार्थना से है। भोजन से शरीर हृष्ट-पुष्ट, बलवान बनता है, उसी प्रकार प्रार्थना से हमारी आत्मा दृढ़ और बलिष्ठ बनती है। बलवान आत्मा ही प्रभु का साक्षात्कार करने में समर्थ है।

भगवान कभी भी यह नहीं चाहते कि हम प्रतिदिन उनकी प्रार्थना करके हमारी शरणागति का हवाला उनके सामने प्रस्तुत करें। परंतु यह हमारा परम कर्त्तव्य हो जाता है क्योंकि परमात्मा ने हम पर अकारण कृपा करके यह अमूल्य मानव-देह प्रदान किया है। इसलिये हम पर उनका बहुत बड़ा उपकार है। हम पर किए गये इस उपकार के प्रति हमें ईश्वर का कृतज्ञ होना चाहिये। मानव का यही स्वभाव है, यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम मानव नहीं अपितु दानव हैं, बल्कि यह भी कहा जाय कि नमक हराम हैं, तो कोई अत्युक्ति न होगी। ऐसे लोगों की निन्दा करते हुए गीता में कहा गया हैं।

आसुरी योनि मापन्ना मूढ़ा जन्मनि जन्मनि।

माम प्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्य धमाँ गतिम्॥

इस सब बातों को देखते हुये प्रार्थना आवश्यक नहीं, अनिवार्य भी है। यदि हम अपना जीवन सुख-शान्तिमय बनाना चाहते हैं तो प्रतिदिन ईश्वर प्रार्थना करनी चाहिये। इस विषय में स्वामी श्रीकृष्णनन्द जी ने कितना ही अच्छा कहा है। प्रार्थना कीजिये। अपने हृदय को खोलकर कीजिये। अपनी टूटी-फूटी लड़खड़ाती भाषा में ही कीजिये, भगवान सर्वज्ञ हैं। वे तुरन्त ही आपकी तुतली बोली को समझ लेंगे। प्रातःकाल प्रार्थना कीजिये, मध्याह्न में कीजिये, संध्या को कीजिये, सर्वत्र कीजिये और सभी अवस्थाओं में कीजिए। उचित तो यही है कि आपकी प्रार्थना निरन्तर होती रहे। यही नहीं आपका सम्पूर्ण जीवन प्रार्थनामय बन जाय।

हृदय से प्रार्थना करने का तात्पर्य है कि हमें श्रद्धा−विश्वास सहित ईश्वर से प्रार्थना करना चाहिये। क्योंकि बिना श्रद्धा-विश्वास के हार्दिक प्रार्थना हो ही नहीं सकती। श्रद्धा-विश्वास विहीन प्रार्थना का कोई मूल्य नहीं है। बिना श्रद्धा-विश्वास के हमारा हृदय गूँगे के समान होता है, जो बोल नहीं सकता।

गोस्वामी तुलसीदास, भक्त प्रवर सूरदास, दीवानी मीरा, श्री नरसी मेहता, गजराज आदि भक्तों की गाथाएं आज भी प्रार्थना की महत्ता का परिचय दे रही हैं। जब-जब इन भक्तों को कष्ट का सामना करना पड़ा, तब-तब इन्होंने प्रार्थना की शक्ति से ही उसका सामना करके सफलता प्राप्त की ओर अपने जीवनलक्ष्य परमात्मा का दर्शन किया। अतः हमें प्रतिदिन ईश्वर-प्रार्थना करने का विषय बना लेना चाहिये। जिसके द्वारा हम परमात्मा का साक्षात्कार कर अपने जीवन को सफल बनावें।


VigyapanSuchana

प्रार्थना

हे सत्य, हे मेरी अन्तरात्मा के बीच निवास करने वाले अन्तर्हीन सत्य, सब-कुछ आप ही हैं। इस आत्मा में जो आपसे इसलिए फिर देश-काल गम्भीरता-निधिड़ता की कोई सीमा नहीं यह आत्मा अनन्तकाल तक रहने वाला है सत्यम् मन्त्र इसका द्योतक है। आप हैं और केवल आप ही हैं। आत्मा की अतल-स्पर्श गम्भीरता से यह मन्त्र निकला है, मानों वह हमारे मन एवं संसार के अन्यान्य समस्त शब्दों को अपने में भरकर सबके ऊपर प्रकाशमान हैं। सत्यं, सत्यं। उसी सत्य में मुझे पहुँचा दीजिए, हमारी उसी अन्तरात्मा के गूढ़तम अनन्त सत्य में, जहाँ आप हैं और कोई भी नहीं।

- रवीन्द्रनाथ टैगोर


महाभारत के दो माननीय श्लोक

(श्री अगरचन्द्र नाहटा)

पशु-पक्षियों की अपेक्षा मानव जीवन को दुर्लभ और श्रेष्ठ बतलाया गया है। इसका कारण है मन और बुद्धि की विशेष शक्ति का होना। अन्य प्राणियों की अपेक्षा प्रकृति से ही मनुष्य को ज्यादा ग्राम हुई है। इस शक्ति के द्वारा मानव ने अनेक आविष्कार किये और गहरे चिंतन और विवेक द्वारा आत्मा को बहुत ऊँची स्थिति में पहुँचाया। मनीषियों के जो कार्य अभ्युदय और निःश्रेयस के कारण हों, उन्हें धर्म की संज्ञा दी है। भारतवर्ष में अनेक ऋषि-मुनियों ने एकाँत जंगलों में एवं पर्वतों में जाकर कठोर तप और साधना की और उसके फलस्वरूप जो कल्याण पथ उन्हें दिखाई दिया, उसे उन्होंने जगत के समक्ष रखा। एक दीप से अनेक जले। मानव समाज अज्ञान रूपी अन्धकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर बढ़ा। अपने कल्याण के साथ विश्व के कल्याण की उदात्त भावना उदित हुई। समस्त प्राणियों को अपने समान मानते हुए बन्धुत्व या प्राणियों को अपने समान मानते हुए बन्धुत्व या मैत्री भाव का प्रचार होने लगा। हिंसा से विरत होकर अहिंसामय जीवन की ओर प्रगति हुई । जैसा बर्ताव हम दूसरों की ओर से अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार हम दूसरों के साथ करें। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषामं न समाचरेत् आत्मतवत् सर्वभूतेषु यो पश्यति सः पश्यति। यह आदर्श वाक्य जनमन में प्रतिष्ठित हुए। मिथ्या भाषण, चोरी, पर स्त्री गमन, त्याज्य है, सत्य, आचार्य एवं ब्रह्मचर्य उपादेय है, इस तरह का मानवधर्म प्रतिष्ठित हुआ। बड़े-बड़े महापुरुष समय-समय पर उत्पन्न हुए और उन्होंने कठोर साधना एवं गहरे चिन्तन से बन्धन और मोक्ष के कारणों को ढूँढ़ा सुख और दुःख क्या है? और क्या होते हैं? इत्यादि जीवन के अनन्त प्रश्नों का समाधान खोजा और अपनी उदात्त वाणी से अनुभव की अमृतवर्षा कर मानवों को अजर-अमर बना दिया। धर्म मानव के मस्तिष्क की सबसे महत्वपूर्ण उपज है। धर्म के सम्बन्ध में जितना चिन्तन गहराई और अनेक दृष्टि-बिन्दुओं से भारतवर्ष में हुआ है उतना विश्व के अन्य किसी भी देश में नहीं हुआ साथ ही जीवन में भी धर्म की जितनी प्रतिष्ठा भारतीय मानवों में हुई, उतनी अन्यत्र शायद ही कहीं हुई हो। भारत में ऐसे ज्ञानी, योगी, भक्त , जीवनमुक्त सन्त महात्मा हुए इनकी तुलना में अन्य किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति को नहीं रखा जा सकता। ऐसे गौरवशाली भारतवर्ष की आज जो स्थिति है, उसका जितना नैतिक पतन हो गया है, उसे देखकर अवश्य ही हृदय को गहरा आघात लगता है। थोड़े वर्षों पहले तक जो नीतिमय जीवन और धर्म-भावना यहाँ के जन-जन में दिखाई देती थी, उसका सहसा इतना अधिक लुप्त हो जाना बड़ी ही विचारणीय और अखरने वाली बात है।

गम्भीर विचार करने पर यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि हमने अपने महापुरुषों और उनकी अनुभव वाणी से जो प्रेरणा एवं शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये थी वह नहीं ग्रहण कर रहे हैं और पाश्चात्य भौतिक उन्नति की चकाचौंध से हम किंकर्त्तव्यविमूढ़ से हो गये हैं। मध्यकाल में बाहरी क्रियाकाण्डों व रूढ़ियों पर अधिक जोर दिया गया और धर्म के मौलिक तत्व भूला से दिये गये। इसका परिणाम यह हुआ कि मन्दिर और गुरुओं के पास जाते हुए भी धार्मिक ग्रंथों को पढ़ते व सुनते हुए भी, वास्तविक धर्म से हम दूर होते गये और इसी का परिणाम है कि हमारे आदर्श और व्यवहार में बहुत अधिक अन्तर आ गया है। आज के नवयुवकों एवं नवशिक्षकों की तो धर्म के प्रति आस्था ही नहीं रही, वे इसे पाखण्ड, ढोंग और मानव की प्रगति में बाधक तक कहने लगे हैं। इसलिए हमें अपने महापुरुषों की जीवनी और वाणी से पुनः ऐसी प्रेरणा और शिक्षा ग्रहण करनी आवश्यक है कि जिससे जीवन में धर्म पुनः प्रतिष्ठित हो। धर्म की उत्पत्ति कहाँ से होती है? उसकी बुद्धि किन कामों में आती है? उसकी स्थिति या स्थापना किसके द्वारा होती है? और किन-किन बातों से धर्म की बेल सूखकर नष्ट हो जाती है? इसके संबंध में महाभारत में दो बहुत ही सुन्दर श्लोक प्रश्नोत्तर के रूप में आये हैं। पहले श्लोक में उपर्युक्त प्रश्न उठाये हैं और दूसरे में उनका उत्तर दिया गया है।

प्रश्न-कथमुत्पद्यते धर्मः कथं धर्मो विवर्धते।

कथं च स्थाप्यते धर्मः कथं धर्मो विनश्याति॥

उत्तर -सत्येनोत्पद्यते धर्मो दया दानेन वर्धते।

क्षमया स्थाप्यते धर्मः क्रोध लोभाद विनश्यति॥

उत्तर क्या है? थोड़े में बहुत अधिक कह दिया गया है। दूसरे श्लोक पर पुनः विचार करते रहने की आवश्यकता है। आप उस पर जितना मनन करेंगे, उतना ही उसका महत्व अधिकाधिक प्रकट होता जायगा।

सबसे पहली विचारणीय बात यह है कि धर्म की उत्पत्ति कहाँ से होती है? और उसके उत्तर में कहा गया है कि सत्य से। सत्य शब्द बहुत व्यापक है। केवल झूठ बोलना ही असत्य नहीं है पर हमारे मन में कुछ और है और वाणी में कुछ दूसरी ही बात है और आचरण उससे भिन्न है तो वह जीवन का सबसे बड़ा असत्य है। मनुष्य में कमजोरियाँ बहुत सी हैं और गलतियाँ भी होती ही रहती हैं पर यदि हम अपने दोषों और पापों को पाप रूप में ही मानते हैं फिर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते पर इसके लिए हार्दिक पश्चाताप करते रहते हैं तो एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जिस दिन हम अपने जीवन के सुधार या उद्धार में प्रगति कर आगे बढ़ सकेंगे। पर यदि हम अपने दोषों को दोष ही नहीं मानेंगे और उन्हें छिपाते रहेंगे, या झूठी शान या दिखावट के लिए जीवन में कपट या धोखाधड़ी को स्थान देंगे तो हमारा जीवन दिनोंदिन अधिकाधिक कलुषित होता जायगा। क्योंकि सत्य से हम दूर हट गये, जो वस्तु जिस रूप में नहीं समझी या विपरीत समझी, यह तो असत्य ही हुआ। बोलना तो पीछे होता है, सबसे पहले मन में खराबी आती है, वाणी और वर्तन तो उसके बाद। इसीलिए हमें अंतर को टटोलते रहना है कि उसमें असत् का आकर्षण तो नहीं बढ़ गया।

अब दूसरा प्रश्न है, यदि किसी शुभ संयोग से सत्य या धर्म की ओर हम अभिमुख हो गये हैं तो उस धर्म भावना में कमी न हो, अपितु वह बढ़ती ही चली जाय, इसके लिए हम क्या उपाय करें? तो ऊपर के श्लोक में इसके उत्तर में कहा गया है कि दया और दान से धर्म की वृद्धि होती है क्योंकि हिंसा मानव समाज में पशुओं की अपेक्षा भी अधिक बढ़ी हुई है। अहिंसा के द्वारा ही एक दूसरे का संरक्षण हो रहा है, नहीं तो परस्पर में कट मर कर सारे प्राणी, समाप्त ही हो गये होते। प्रेम वात्सल्य, अनुकम्पा, करुणा, दया, सहानुभूति, सद्भावना, सहयोगिता सभी अहिंसा के ही विविध रूप हैं। अपने जन्म के साथ ही प्राणी को दूसरे की सहायता अपेक्षित होती हैं, क्योंकि वह उस समय आत्मरक्षा करने में समर्थ नहीं होता। इसीलिए माता-पिता, परिवार की वात्सल्य या प्रेम भावना से ही वह जीवित रहता है व बढ़ता है। दया का ही एक प्रकार दान है। हमारे पास जो कुछ है, यदि उसके देने से दूसरे का कुछ भी भला होता हो तो हम करुणा या दया भाव से उसकी अवश्य सहायता करें, यही हमारा कर्तव्य हो जाता है। जबकि हमारा जीवन दूसरों की सहानुभूति, सहायता पर निर्भर है और हम दूसरों से किसी न किसी रूप में प्रतिपल ग्रहण ही कर रहे हैं तो हम दूसरों को अपनी शक्ति संपत्ति द्वारा सहायता दें, यह हमारा स्वधर्म हो जाता है।


कृपया घबराया मत कीजिए।

(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए. पी. एच. डी.)

आपको रेलगाड़ी से जाना है। गाड़ी में अभी एक घन्टा देर है, पर आपके मन में यह धुकधुकी कैसी? चिन्ता और घबराहट आपको अस्त-व्यस्त किये हुए है। आपको एक घन्टा से पहले से ही गाड़ी छूट जाने का गुप्त भय है। आप तब तक इस चिन्ता और भय से मुक्ति नहीं पाते, जब तक रेल के डिब्बे में पैर नहीं रख लेते, आपके दिमाग में हर प्रकार की चिन्ताएँ घर बनाये रहती हैं, जैसे टिकट खरीदने की चिन्ता, जेब कट जाने या माल चुराये जाने का भय, डिब्बे में स्थान न पाने का डर, गाड़ी के समय से पहले आ जाने का भय, अपनी ही घड़ी के पीछे हो जाने का भय, कुली न मिलने की शंका, अगले कनेक्शन पर गाड़ी छूट जाने की चिंता आदि। इसी प्रकार की न जाने कितनी चिन्ताएँ आपको अस्त व्यस्त कर देती हैं। आप जल्दी-2 चलते हैं, दो चार वस्तुएँ मार्ग में ही भूल जाते हैं, रुपये गिरा देते हैं, या किसी को कुछ आवश्यक सूचना देना भूल जाते हैं। स्टेशन पहुँचते हैं, तो मालूम होता है कि अभी गाड़ी आने में देर है फिर घबराहट शुरू, क्या हमें अच्छी सीट मिलेगी? क्या यह सारा सामान डिब्बे में चढ़ जायगा? क्या सामान का बोझ टिकटों पर ले जा सकने के भार से अधिक तो नहीं है, आपके छोटे बच्चे, जिसका टिकट आपने उसे छोटा समझ कर नहीं खरीदा है, चेकर द्वारा पकड़ तो नहीं लिया जावेगा?

गाड़ी आती है और आप आश्चर्य से देखते हैं कि आपकी सब चिताएँ फिजूल थी? सारी घबराहट व्यर्थ आप मिथ्या काल्पनिक भय में डूबे हुए व्यर्थ ही मन को अस्त-व्यस्त कर रहे थे।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ चिन्ता नहीं होती। जिस गाड़ी में जायेंगे, उसके बारे में सूचनाएँ प्राप्त कर लेते हैं, परन्तु जब उस गाड़ी को पकड़ने का समय समीप आता है तो ऐसे शान्ति और चिन्तामुक्त बैठे रहते हैं, जैसे उन्हें स्टेशन पर जाना ही नहीं है। ऐसा लगता हैं कि यदि वे नींद में भी हों, तब भी गाड़ी पकड़ लेंगे। ऐसे व्यक्तियों का मानसिक संतुलन इतना मजबूत होता है कि उनकी दिनचर्या तथा विविध कामों में किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं होती। यह एक दृष्टान्त मात्र है।

घबड़ाहट के अनेक स्थान हैं। परीक्षार्थियों के लिए परीक्षा भवन में अनेक विद्यार्थी आधा पर्चा तो गुप्त भय के कारण भूल जाते हैं। जैसे ही इम्तहान के भवन में दाखिला हुए कि मन में धुकधुक शुरू हो जाती है। जो याद किया है, उसका आधा हिस्सा भूल जाते हैं। घबराहट में जो जानते हैं, उसे भी गलत लिखते हैं। डॉक्टर के लिए घबराहट खतरनाक है। यदि आपरेशन करते समय रोगी की गिरती हुई अवस्था देखकर कहीं वह घबड़ा उठे, तो मृत्यु ही निश्चित है। रेलगाड़ी, मोटरगाड़ी या मोटर साइकिल, रिक्शा आदि के चालक यदि कहीं घबड़ा उठें, तो न जाने कितनों के टक्करें लग जाया करें। वक्ता जब बोलने, या अभिनेता जब अभिनय करने को खड़ा होता है, घबड़ा उठे तो बुरी तरह फेल होता है। जीवन के हर क्षेत्र में घबड़ाहट हानिकारक और घातक है। घबराना भी एक प्रकार की मानसिक आदत है। अतः मनुष्य को इसके स्वरूप को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये और बचने का प्रयत्न करना चाहिये।

जगत तथा समाज में भयानक परिस्थितियाँ आती हैं, उन पर नहीं बल्कि घबराहट की जड़ मनुष्य के मन में मौजूद रहती है। अस्थिरता, असन्तोष, रोग, चंचलता इत्यादि बाह्य जगत पर निर्भर न होकर अस्वास्थ्यकर वातावरण पर निर्भर है। एक व्यक्ति एक भयानक स्थिति देखकर घबरा उठता है, जबकि दूसरा अपने मन के संतुलन और सामर्थ्य के कारण वीरता से उसका सामना करता है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों के सिद्धान्तों के अनुसार मनुष्य की जितनी बाहरी क्रियाएँ हैं, उनकी जड़ें मनुष्य के गुप्त मन में रहती हैं। यह गुप्त मन सक्रिय, सतेज, सशक्त और बड़ी प्रबल सामर्थ्य वाला है। अन्दर से यह बाह्य मन तथा शरीर को चलाया करता है। यदि गुप्त मन में (प्रायः बचपन में) कोई भय बैठ जाए, तो उसके फलस्वरूप बुरी सूचनाएँ और बुरे विचार, डर उत्पन्न होते रहते हैं। भय का गुप्त घातक प्रभाव शरीर पर पड़ता है। हम में हानिकारक परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं। हम खतरनाक फलों की कुकल्पनाएँ किया करते हैं। दूसरे जो व्यक्ति घबराते हैं, उन्हें देखकर छूत के रोग की तरह हमें भी घबराहट उत्पन्न होती है। घबराहट गुप्त मन में बनी हुई जटिल भय की मानसिक ग्रन्थि की दूषित प्रतिक्रिया है। इस आदत की जड़ मनुष्य के प्रारम्भिक जीवन, घर की परिस्थितियाँ, भावात्मक अनुभवों में पाई जाती है।

विचार करके देखिये कि घबराहट की डरपोक आदत आपको कैसे पड़ी? बाल्यावस्था में आपको कौन-कौन से भय दिखाये गये? किस-किस ने तंग किया, डराया, धमकाया या परेशान किया? शिक्षकों ने कितनी बार डाँटा डपटा, बुरा भला कहा? सौतेली माँ ने कैसा कुव्यवहार किया? किन-किन कार्यों में आपको असफलता मिली?

यदि आप किसी मनोविश्लेषण करने वाले विद्वान से अपना मनः विश्लेषण करावें, तो वह आपको मन में बनी हुई जटिल कटु और निराशावादी भावना ग्रन्थि का कारण बतलायेगा। जिस बच्चे को आप बार-बार बुरा-बुरा कहते हैं, ताड़ते, धमकाते या निरुत्साहित करते हैं, उसकी समस्त उत्पादक शक्तियाँ पंगु हो जाती हैं, वह बचपन से ही सुस्त और निराशावादी बन जाता है। उसको लज्जा और हीनत्व की भावना बुरी तरह आ घेरती है। वह लज्जा जाता है, दूसरों के समक्ष अपनी सच्ची बात भी कहते हिचकता है। बुरे व्यवहार से उसका आत्म-विश्वास नष्ट हो जाता है। यहीं से उसकी घबराने की आदत निकलती है। विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों से युद्ध करने की शक्ति उसमें नहीं रह जाती है।

अतः मात-पिता, अभिभावक, अध्यापक का कर्तव्य है कि अनुचित डाट-फटकार बच्चों पर न करें। उनकी गलतियों और मूलों को प्यार से ही सुलझावें। ऐसी ताड़ना न कर दें कि बच्चे की महत्वाकाँक्षा ही नष्ट हो जाए। विषम परिस्थितियों से लड़ने की आदत उसमें न रहे।

इसके विपरीत बच्चे में नेतृत्व के गुणों को प्रोत्साहित करने चाहिए। उसके आत्म-विश्वास को पुष्ट करने वाले पुराने वृत्तांत, उसकी छोटी सी विजय के रहस्य, उसकी शानदार सफलताओं, विषम परिस्थितियों में भी हिम्मत के कार्यों की भरपूर सराहना दिल खोलकर मुक्त कंठ से प्रशंसा करनी चाहिए।

प्रसिद्ध मनःशास्त्री श्री लालजीराम शुल्क ने तो लिखा है कि “छोटे बच्चे को किसी काम के लिए लज्जित कर देना उसमें घबड़ाने की मनोवृत्ति पैदा कर देना है। ऐसा बालक जन्म भर दूसरों के द्वारा लज्जित किए जाने से डरता है। अतएव उसमें नया काम करने की अथवा नये लोगों से मिलने की हिम्मत ही नहीं होती। हम देखते हैं कि कभी-कभी बड़े लोग बालक की किसी बात पर हँस देते हैं। कक्षा में यदि कोई प्रश्न पूछे तो बालक उपेक्षा कर देते हैं। इस प्रकार बालक लज्जा जाता है, फिर उसमें दूसरों के सामने मुँह खोलने की हिम्मत नहीं रहती। कभी-कभी बालक अपनी किसी भूल के लिए सब लोगों के सामने लज्जित हो जाता है। इसके अनुभव भी बड़े अप्रिय होते हैं। वह इन कटु अनुभवों को भूलने की चेष्टा करता है। वह इन्हें भूल भी जाता है, परंतु ऐसे अनुभव उसको इच्छा शक्ति को निर्बल कर देते हैं। परीक्षा की परिस्थिति का सामना करना पड़ता है, तो घबड़ा जाता है। वास्तव में यह उसके दबे भाव का नई परिस्थिति पर आरोपण है। इससे कष्ट है कि हमें बच्चे को अधिक डाट फटकार और विपरीत संकेत नहीं देने चाहिए। उसकी भूलों की लम्बी-चौड़ी आलोचना नहीं करनी चाहिए, कटु अनुभवों को बार बार सामने पेश नहीं करना चाहिए।

अपने मन का विश्लेषण कर अपनी घबराहट का वास्तविक कारण जानिये। बार-2 पुरानी स्मृतियों का स्मरण कीजिये। अपनी घबराहट का कारण मालूम होने पर विवेक बुद्धि से उसे दूर किया जा सकता है।

आप गम्भीर दृष्टि से इन कारणों को देखेंगे तो पायेंगे कि वास्तव में ये आपकी कल्पित भावनायें नहीं थी। इनमें सचाई बहुत कम हैं। जिन कारणों को फिजूल सोच-सोच कर आप घबड़ा जाते हैं, वे वास्तव में होने वाले नहीं है। आप इतने बड़े हो गये, पर वे आपके जीवन में कभी नहीं घटे हैं।

वर्तमान विवेकपूर्ण विचार, गुप्त मन को दिये जाने वाले स्वस्थ संकेत या सजेशन और आत्मविश्वास पूर्ण आचरण-ये तीन ऐसे अमोध उपाय हैं, जो हमारी घबराहट की आदत को दूर सकते हैं। इन तीनों से मनुष्य का आत्म-विश्वास बढ़ाया जा सकता है। ज्यों-2 आत्म-विश्वास बढ़ता है, घबराहट की आदत छूटती है।

आप इसलिए घबरा जाते हैं, क्योंकि कार्य की तैयारी पूरे सामर्थ्य और पूरी ताकत से नहीं करते हैं। संसार बड़ी तैयारी और गहराई चाहता है। अधूरे मन से किया हुआ काम फेल होकर आपके आत्म विश्वास को तोड़ डालता है। घबराहट होने लगती है। जो भी कार्य हाथ में लें, उसे शुरू करने से पूर्व पूरी तरह जो कुछ भी हो सकता है मानसिक और बौद्धिक तैयारी कर डालिये। अच्छी तैयारी घबराहट को कभी उत्पन्न न होने देगी। जो व्यक्ति हर बुरी परिस्थिति को लिये तैयार है, उसे क्यों घबराहट होगी? चोर लोग घबराते हैं, बचते हैं, डरते हैं, लज्जित होते हैं। आप जब अच्छी तैयारी कर लेते हैं, तो तमाम कमजोरी समाप्त हो जाती है। जो भी कार्य आप हाथ में ले उसकी पूरी-पूरी तैयारी कर लिया करें। आपकी घबराहट की विरोधी भावना शाँत भावना है। जो शान्ति अविचलित मनःस्थिति को धारण कर लेता है, वह घबराहट का अन्त कर लेता है। हमें शान्त और स्थिर मनःस्थिति में विकास की मानसिक आदत डालनी चाहिए। हर कार्य करते समय मनःशान्ति धारण रखनी चाहिए। शान्ति के ही गुप्त आत्म-निर्देश गुप्त मन को देने चाहिए। आप सदा यही सोचा कीजिये-

मैं सब काम शान्ति से करता हूँ। व्यर्थ के कल्पित भावों में आकर जल्दबाजी नहीं कर बैठता हूँ। मैं शान्त हूँ। परम शान्त और स्थिर हूँ। मेरा मानसिक संतुलन सदा ठीक रहता है। मैं जानता हूँ कि चंचलता से मुक्त रह कर ही मैं उन्नति कर सकता हूं। मुझे कभी कोई घबराहट नहीं होती, क्योंकि मैं भगवान की शक्ति से स्वस्थ प्रसन्न एवं निश्चिंत हूँ। भगवान की शक्ति और प्रेरणा से मेरे लिए जो शुभ और स्थायी है, वही होगा। कोई तूफान या परेशानी मेरी शान्त मनः स्थिति को भंग नहीं कर सकती।

इस प्रकार की गुप्त प्रेरणा बार-2 अपने गुप्त मन को देते रहिये। दिन रात इसी भावना को मन में जमाने से मन की हालत संतुलित हो जायगी। आप मन में ऐसे शान्त व्यक्तियों, मुनियों, विद्वानों, विचारकों, के मानस चित्र मन में लाइये, जैसे शान्त आप स्वयं होना चाहते हैं। इन्हीं बड़े व्यक्तियों की मूर्तियां आपको घबराहट में प्रेरणा देती रहेंगी।

अपनी कल्पना का प्रयोग सही दिशा में कीजिए अर्थात् कल्पना द्वारा ऐसे शुभ और पौरुष पूर्ण मानस चित्र बनाइये जिनमें आप अपना पूर्ण सफल रूप देख सकें। जो सफलता और शान्तिपूर्वक रहने के चित्र आप कल्पना में देखते हैं वे निश्चय ही आपके जीवन में प्रत्यक्ष होंगे। मान लीजिये आपको भावना देने में घबराहट महसूस होती है। अब आप मन में बड़ी सभा का चित्र बनाइये और अपने को उसके सामने धारा प्रवाह बोलते हुए कल्पित कीजिये। सफलता और शान्ति रहने का मानसिक अभ्यास करते-2 निश्चय ही बाह्य जीवन में भी पा सकेंगे।

काम को शान्त, स्थिर और प्रसन्न मन से कीजिये। पहले ही यह न मान बैठिये कि आप अमुक कार्य न कर सकेंगे। धीरे-2 बोलिये। एक-एक काम ही एक बार पूर्ण कीजिये। सम्भव है बहुत से कार्य एक साथ सामने आते देख आप गड़बड़ा जायं और गुप्त भय से थकावट अनुभव करने लगें। धीरे-2 कार्य निपटाने से घबराहट कम होती है।

मन में कार्य की सफलता का पूरा-पूरा विश्वास और संकल्प को दृढ़ रखिए। आप जिस काम को हाथ में ले रहे हैं, उसमें जरूर सफलता प्राप्त करेंगे, यह भाव रखने से मनुष्य की तमाम शक्तियाँ जाग्रत होकर सफलता के लिए प्रयत्नशील बनती हैं अपनी विशेषताओं, अपनी शक्ति यों अपने ईश्वरीय गुणों का ही विचार लगातार कीजिए। भूलकर भी अपनी निर्बलताओं या कमियों को मन में मत लाइये अन्यथा घबराहट बढ़ेगी। निर्बलताओं की बात सोचने से आत्मग्लानि का थोड़ा विचार मन में आता है और कमजोरी पैदा करता है। पहले ऐसे छोटे-छोटे काम हाथ में लीजिए जिनमें आप सफल हो सकते हैं। फिर इनसे कठिन और कष्ट साध्य कार्य हाथ में लेकर उनमें सफलता प्राप्त कीजिए। इससे आपका आत्म विश्वास बढ़ जायगा।

घबड़ाहट का कारण गुप्त मन में संचित भय है अतः जिन बातों को करने में डर लगता हैं, उन्हें अवश्य करना चाहिए। जिन व्यक्तियों से मिलने में संकोच या लज्जा आती है, उनसे जरूर मिलना चाहिए। ऐसा अभ्यास करते-करते मन का छुपा हुआ डर निकल जाता है। अतः सहर्ष मन से निडर होकर आपत्तियों और कठिनाइयों का स्वागत कीजिए।


गुरुजनों को श्रद्धाँजलि अर्पित करने का पर्व गुरु पूर्णिमा

(डॉ. चमनलाल गौतम)

जन्म लेने के पश्चात् मनुष्य का बालक दूसरों पर आश्रित रहता है। वह स्वयं कोई भी कार्य नहीं कर सकता। बोलना, चलना आदि सभी कार्य उसे सिखाए जाते हैं। यदि उसका मार्गदर्शन और सहायता न की जाए तो वह अंधेरे में टटोलता ही रहेगा, वह किसी भी क्षेत्र में उन्नति नहीं कर सकेगा, पशुओं के सम्बन्ध में यह बात नहीं है। उनके बच्चे जन्म लेने के बाद फुदकने लगते हैं, दूध पीने का स्थान स्वयं ढूँढ़ लेते हैं, उनके दैनिक व स्वाभाविक कृत्यों के लिए किसी मार्ग-दर्शक व सहायक की आवश्यकता नहीं रहती हैं।

हिन्दू धर्म संसार के सभी धर्मों से श्रेष्ठ माना जाता है। बड़े शास्त्र, दर्शन, ब्राह्मण ग्रन्थ, स्मृतियाँ गीता, महाभारत, रामायण आदि साहित्य आज भी संसार को ज्ञान प्रदान कर रहे हैं जिससे वह अपने जीवन के स्वस्थ निर्माण का मार्ग निकाल सकें। हमारे तत्वदर्शी ऋषियों ने हजारों वर्षों की खोज और अनुभव के पश्चात् यह निर्णय किया था कि मनुष्य केवल आर्थिक उन्नति से सुखी नहीं रह सकता। उसका जीवन उत्तम गुणों से अलंकृत होना चाहिए, वह जीवन के तत्व, उद्देश्य व सार को समझे और उसी प्रकार का व्यवहार करें, स्वयं जिए और दूसरों को जीने दे, दीप बनकर स्वयं जले और दूसरों के अज्ञानांधकार को दूर करे, उनके सुख-दुःख को अपना ही सुख-दुःख समझे, यह मनुष्यता है यदि मनुष्य के जीवन ने यह व्यवहार धारण न किया तो यह पशु से बढ़कर माना जाएगा क्योंकि आहार, निद्रा, भय और मैथुन के चार कार्य तो पशु भी कर लेते हैं, मनुष्य में क्या विशेषता रही। मनुष्य को सच्चा मनुष्य बनने के लिए गुरु की नियुक्ति की जाती थी। जब बालक खुद समझदार हो जाता था तो वेदारम्भ कराने के लिए उसे गुरु के आश्रम में भेज दिया जाता था, गुरु उसे दीक्षित करके यज्ञोपवीत संस्कार कर मनुष्यता की सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए मार्गदर्शन करता था। पूर्वकाल में गुरुजन आजकल की तरह वैज्ञानिक अध्यापक नहीं होते थे। वह अपने गृहस्थ के संचालन के लिए शिष्य के भोजन आदि की व्यवस्था वह आश्रम की ओर से कर देते थे। एक तो शिष्य को स्नेह और प्रेम की गंगा में स्नान करने को मिलता था। जीवन के अन्धियारे में प्रकाश की ज्योति मिलती थी, आर्थिक व्यवस्था की कोई चिन्ता नहीं रहती थी, स्वच्छ और उत्तम वातावरण में रह कर विद्याध्ययन करके अपने मस्तिष्क का विकास करता था, आदर्श जीवन के महान आदेशों को वह गुरु की साधारण पाठशाला में व्यवहारिक रूप से सीखता था। गुरुजन अपने सारे जीवन की कमाई शिष्य को देकर प्रसन्न होते थे कि यह ज्ञान दान की स्वस्थ परम्परा आगे भी इसी प्रकार चलती रहेगी। ताली दोनों हाथों से बजती है। पूर्वकाल में गुरु और शिष्य दोनों आदर्श महान होते थे। या यूँ कहना चाहिए कि गुरु अपने महान तप, त्याग, प्रेम, सेवा, निर्लोभता, निःस्वार्थता, संयम, सदाचार आदि सद्गुणों के कारण सबको जीत लेता था, अपना बना लेता था। उसके महान आदर्श को देखते हुए ही गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पदवी से विभूषित किया गया है। मनु भगवान ने तो विद्या को माता और आचार्य को पिता कहा ।

अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तत्मै श्री गुरवे नमः॥

वह गुरु जो संसार रूपी अंधेरे में भटकते प्राणी को ज्ञान रूपी अंजन प्रदान करके उसके बंद हुए नेत्रों को खोल देता है, वह देवता नहीं तो क्या है, भोग विलास में पड़े हुए व्यक्तियों को संयम और विवेक का पाठ पढ़ाता है, गृहस्थ के जीवन में फँसे हुए अविवेकियों को जो अपने पावन कर्त्तव्यों को भूल चुकें हैं, मार्ग दिखाता है, जीवन मोड़ पर कठिनाइयों से घबराए हुओं को जो धैर्य देता है, जीवन से निराश होने वालों को जो आशा का अमृत पिलाता है, वह गुरु देवता नहीं तो क्या है। ऐसे गुरु-देवताओं को शिष्यगण श्रद्धांजलि अर्पित करके थे, जयन्ती मनाते थे, अपनी श्रद्धा के फूल चढ़ाते थे। उस दिन नये और पुराने सभी शिष्य एकत्रित होकर समारोहपूर्वक गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व-उत्सव आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष को जो इस वर्ष 8 जुलाई 1960 को होगा मनाया करते थे। अपनी श्रद्धा के प्रतीक रूप में वह गुरु के लिये श्रेष्ठ भोजन, वस्त्र और धन अपने गुरु को भेंट रूप में देते थे। गुरु द्रव्य और पुष्प अर्पण करने वाले दोनों प्रकार के शिष्यों पर एक प्रकार समान स्नेह रखते थे, यही उनकी विशेषता भी।

पूर्वकाल में जैसे महान गुरु होते थे। वैसे ही शिष्य भी होते थे। खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग पकड़ता है। गुरु को देखकर शिष्य भी वैसा बनता जाता है गुरु के मन में ब्राह्मण तत्व, परोपकार सेवा की भावनाएँ विद्यमान रहती हैं तो शिष्य भी उन्हीं पदचिह्नों पर चलने लगता है। वह गुरु की आज्ञाओं का पालन करता है चाहे उसके शरीर का नाश तक क्यों न हो जाय। वह गुरु आज्ञा को ब्रह्म वाक्य मानता है। आरुणी अपने गुरु की आज्ञा मान कर सारी रात ठंडे जल के प्रवाह में लेट कर मेढ़ को रोके हुआ था। शिवाजी ने शेरनी का दूध लाने के लिये अपने जीवन को संकट में डाल दिया था। अर्जुन आदि पाण्डवों ने गुरु द्रोणाचार्य का बदला लेने के लिए द्रोपद पर चढ़ाई करके उसे परास्त कर के गुरु के सामने बंदी बना कर के लाए थे, भगवान कृष्ण अपने गुरु महर्षि गर्ग के पुत्र को दूसरे लोगों से लेकर आये थे और उनकी इच्छा को पूर्ण किया था, हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र को राष्ट्र-हित के लिए अपना सारा राज-पाट दे दिया, राजा दशरथ ने गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से महर्षि विश्वामित्र को यज्ञ की रक्षा के लिए, राक्षसों को मारने के लिए, अपने हृदय के टुकड़ों राम और लक्ष्मण को दे दिया था, ऐसे भी शिष्य हुए जो गुरु के पास, ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए आए थे परन्तु गुरु ने उन्हें गाए चराने के लिये आज्ञा दी तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और कर्त्तव्य पालन करते हुए उन्होंने अभीष्ट ज्ञान सिद्धि प्राप्त की। गुरुजनों के विश्वास पर शिष्य महान शक्तियाँ प्राप्त कर लेते थे। एकलव्य का उदाहरण एक उज्ज्वल प्रमाण है।

इस गुरु शिष्य परम्परा को चलाए रखने कि लिए ही यह गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इसके अनेक लाभ हैं। यह एक माना हुआ सिद्धाँत है कि जनता जिस वस्तु को महत्व देती है। लोगों का झुकाव उसी और हो जाता है। आज के युग में धन की महत्ता बहुत बढ़ गई तो धनवान लोग उचित या अनुचित कैसे भी धन बटोरना चाहते हैं। बेईमानी धोखेबाजी, भ्रष्टाचार, रिश्वत, का कारण है। जब हमारे देश में तपस्वियों का मान था तो घर में तपस्वी उत्पन्न होते थे। जब शारीरिक शक्ति की मान्यता थी तो अर्जुन, भीम जैसे महारथी निकलते थे। राष्ट्र की चारित्रिक उन्नति के लिए सच्ची विद्या के प्रसार की आवश्यकता है यह तभी सम्भव होगा जब विद्या का सम्मान होगा। विद्वानों की पूजा होगी, लोग विद्याध्ययन की ओर झुकेंगे। जनता फिल्म अभिनेताओं और अभिनेत्रियों का सम्मान करती है तो नवयुवक और नवयुवतियाँ घर भाग कर भी वह बनने की चेष्टा करते हैं आज विद्यार्थियों में उद्दण्डता अनुशासनहीनता व दूषित वातावरण के कारण अन्य भी हो सकते हैं परन्तु उनमें से एक अध्यापकों का वह महान आदर्श उपस्थित न करना भी है। सार यह कि विद्यावानों का जितना हम सम्मान करेंगे उतने ही विद्वान बढ़ेंगे और देश की उन्नति होगी यह हमारा कर्तव्य है। इसी को एक प्रकार के यज्ञ के अर्थों में एक देव पूजा भी है। देव तुल्य महापुरुषों की पूजा-सम्मान करना। इस यज्ञ को बन्द नहीं होने देना चाहिये, अन्यथा यह परम्परा ही लुप्त हो जाएगी। आज हम बड़ों का सम्मान करते हैं तो कल दूसरे हमारा सम्मान करेंगे। यह उत्तम शिष्टाचार की परम्परा चलती जाएगी। यह केवल गुरुओं तक ही सीमित नहीं है वरन् घर, के बड़ों पर भी लागू होती है। माता, पिता, सास आदि की पूजा का सम्मान, उनके नित्य प्रति चरण स्पर्श की प्रतिज्ञा लेना भी उच्च श्रेष्ठ परम्परा है जिसे चालू करना चाहिए। इससे हमारे गृहस्थ में सुख शान्ति का साम्राज्य स्थापित होगा। बच्चे अपने माता, पिता व गुरुओं की आज्ञाओं का पालन करेंगे। उद्दण्डता और अनुशासनहीनता कम होगी।

गायत्री परिवार एक आदर्श संस्था है। उसे यह पर्व धूम धाम से मनाना चाहिये। इस पर्व को व्यास पूजा भी कहते हैं। उयोसडडडडड शब्द से देर अध्यापक का अर्थ निकलता है। इस दिन हमें अध्यापकों उपदेशकों व मन्त्र देने वाले गुरुओं का पूजन व भेंट रूप में सम्मान करना चाहिए। यह पूजा उपस्थित विद्वानों और चित्र से भी हो सकती है। महर्षि व्यास के चित्र व खड़ामों की पूजा भी होनी चाहिए। अभी गुरु पूर्णिमा को एक महीने से भी अधिक समय है। उसके लिए अभी तैयारी करनी चाहिए ताकि अधिक से अधिक व्यक्ति इस में भाग लें उस समय पूजा के अतिरिक्त सभा सम्मेलनों का भी आयोजन करना चाहिए। जहाँ विद्वानों का अभाव हो वहाँ यह लेख भी पढ़कर सुनाया जा सकता है। सभी उपस्थित व्यक्ति यों में अपने बड़ों के चरण स्पर्श करने के संकल्प लेने चाहिए। इस प्रकार के संकल्प करने चाहिए कि वह अमुक संख्या में लोगों से इस प्रकार के संकल्प होंगे। इस प्रकार से गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य का कर्त्तव्य है कि वह इस दिन अपनी श्रद्धांजलि भेंट करें।


कार्य कुशलता का गुण तथा उससे लाभ

(श्री रामखेलावन चौधरी, बी. ए.)

प्रायः लोगों को यह कहते हुए पाया गया है कि आज की दुनिया में विशेष-ज्ञान सफलता के लिए परमावश्यक है। नये-नये वाणिज्य, व्यवसाय उत्पन्न हो रहे हैं, कार्य-प्रणाली को सीखने के लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। उदाहरण के लिए बिजली का काम लीजिये। बिजली से अनेक प्रकार के काम लिए जाते हैं और किसी न किसी रूप में बिजली का प्रयोग मशीनों को चलाने में होता है। सड़क पर चलने वाला हर एक आदमी बिजली का काम नहीं कर सकता। यदि वह करने का प्रयत्न करता है तो असफल होगा ही, साथ वह अपने लिए संकट को भी आमन्त्रित करेगा। जरा भी चूका कि प्राण से हाथ धोना पड़ा। इन सब बातों को देखते हुए, यह कहा जाता है कि सफलता प्राप्त करने के लिए विशेष ज्ञान या जिसे प्रविधिक ज्ञान कहते हैं, की आवश्यकता है। यदि ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाय, तो तुरन्त ही धन कमाने और उन्नति करने का साधन हमारे हाथ आ जायगा। इस विचार धारा के आगे कार्यकुशलता जैसे चारित्रिक गुण की महत्ता की ओर बहुत कम लोग दृष्टिपात करते हैं। यह ठीक है कि प्रविधिक ज्ञान सफलता की कुँजी है परन्तु कार्यकुशलता के अभाव में वह ज्ञान फीका पड़ जाता है। ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें प्रविधिक ज्ञान है, परन्तु वे उन्नति नहीं कर पाते क्योंकि उन्होंने प्रविधिक के साथ कार्यकुशलता का गुण अपने में उत्पन्न करने का कोई प्रयत्न नहीं किया।

प्रविधिक ज्ञान प्राप्त कर लेने से मनुष्य केवल किसी टेढ़े-मेढ़े काम को करने की प्रक्रिया को समझ लेता है, परन्तु वह उस कार्य को उत्तम से उत्तम ढंग से नहीं कर पाता। इस उत्तमता का प्रतिमान क्या है? यदि कोई मनुष्य किसी काम को अन्य लोगों की अपेक्षा में, कम शक्ति करके पूरा कर लेता है, परन्तु कम की मात्रा और उसकी सुन्दरता उन लोगों के नाम की मात्रा और सुन्दरता से अधिक हो, तो इस प्रतिमान के सहारे हम बता सकते हैं कि वह मनुष्य उत्तम ढंग से काम करता है। इसी को दूसरे शब्दों में कार्यकुशलता कहते हैं।

कार्यकुशलता एक उत्तम गुण है जिससे प्रत्येक व्यक्ति का थोड़े से समय में ही प्रत्यक्ष लाभ होता है। उसके साथ-साथ समाज का भी लाभ होता है आज के औद्योगिक युग में तो यह गुण अत्यन्त महत्व का है। जिस देश में कार्यकुशल नागरिक जितनी अधिक संख्या में होंगे, उतना ही वह देश उन्नति करेगा। वहाँ से हर प्रकार का अभाव दूर होगा क्योंकि कार्यकुशलता नागरिक जीवनोपयोगी वस्तुओं का उत्पादन आवश्यकता से अधिक बढ़ाते हैं। ऐसे ही देशों में घी-दूध की नदियाँ बहती हैं। कार्यकुशलता से ही ज्ञान-विज्ञान की भी उन्नति होती है। रूस, अमेरिका तथा अन्य उन्नतिशील देशों का उदाहरण हमारे सामने है। जब मनुष्य अपनी कार्यकुशलता बढ़ाना चाहता है, तो वह ऐसे साधनों का विकास करता, जिनकी सहायता से काम करने में कम शक्ति और कम समय खर्च हो। इस प्रयत्न द्वारा ही बड़े-बड़े आविष्कार हुए हैं। रेल-तार, हवाई जहाज, मोटर तथा इसी प्रकार के उपयोगी आविष्कार उन्हीं लोगों ने किये हैं, जिनमें कार्यकुशलता का गुण वर्तमान था। इस प्रकार उन्होंने अपनी भावी पीढ़ी को असीम लाभ पहुँचाया और स्वयं भी अपने जीवन में ही प्रसिद्धि प्राप्त करके इतिहास में अमर हो गये।

अब हमें इस बात पर विचार करना है कि यह कार्यकुशलता का गुण कैसे उत्पन्न हो। सबसे पहले हमें अपने मन से विचार का उन्मूलन करना होगा कार्यकुशलता एक दैवी गुण है। वास्तव में यह एक अर्जित गुण है, जिसे मनुष्य अपने जीवन काल में ही अभ्यास से प्राप्त कर सकता है। कार्यकुशल बनने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने कार्य में रुचि ले। जो लोग मन मारे, उत्साह हीनता के साथ काम करते हैं वे कभी भी कार्यकुशल नहीं बन सकते। आपने यदि अपने लिए किसी ऐसे काम का चुनाव कर लिया है, जिससे आपका चित्त नहीं लगता, तो आप अपनी भूल को तुरन्त सुधार लीजिये। सवेरे का भटका यदि शाम को घर वापस आ जाय तो वह भूला नहीं कहलाता। भूल सुधारने में लज्जा किस बात की। आप अपने काम को अपनी रुचि के अनुसार बदल दें। अन्यथा न आपका अपने कार्य में जी लगेगा, न कार्यकुशलता आयेगी और न आप उन्नति कर सकेंगे।

बहुत से लोगों को अपनी रुचि के अनुसार काम मिल जाता है, फिर भी वे कार्यकुशल नहीं बन पाते क्योंकि उन्हें अपना कर्म करने में आनन्द का अनुभव ही नहीं होता। यह आनन्द की अनुभूति कैसे हो, यदि वे अपने कार्य में तल्लीन होना नहीं जानते। कार्य के साथ एकाकार होने में जो आनन्द आता है, उसे आप दो चार दिन या एक सप्ताह तक निरंतर अनुभव करें। फिर तो आपको उस काम के करने की चाट पड़ जायगी। बिना काम, किये आप रह न सकेंगे। वास्तव में आप काम, आराम और मनोरंजन के भेदभाव को भूल बैठेंगे। आपको अपना काम करने में भी आराम मिलेगा और उसी से आपको मनोरंजन भी प्राप्त होगा। यदि ऐसी भावना मनुष्य में उदय हो जाय तो फिर वह कार्यकुशल अपने आप बन जायगा। इस समय सामान्य समाज में एक बड़ी ही दूषित मनोवृत्ति घर करती जा रही है। अपने पद पर जो लोग कम काम करते हैं, उन्हें बुद्धिमान कुशाग्र बुद्धि समझा जाता है। कर्म करने वाले उत्साही जनों को तेली का बैल कहते हैं। यह भावना लगभग उस चींटी की भावना के समान है, जो घोड़े की लीद में पकड़कर उसे ही शक्कर समझ बैठती है। क्या इस भावना से काम करने वाले लोग कभी कार्यकुशल हो सकते हैं? उनसे क्या देश और समाज का लाभ हो सकता है? वास्तव में ऐसी भावना रखना एक भीषण समाज विरोधी अपराध करार दिया जाना चाहिए और ऐसे लोगों को कड़े से कड़ा दण्ड दिया जाना चाहिए। खेद है कि हमारा समाज ऐसे लोगों की सराहना करता है। तभी तो हम अन्य राष्ट्रों की तुलना में पिछड़े हुए हैं।

अपने में कार्यकुशलता का गुण पैदा करने के लिए केवल भावना का सहारा लेना ही पर्याप्त नहीं है। मनुष्य का ध्यान कार्य-प्रणाली की ओर भी रहना चाहिए। जो लोग अपने से पहले वाले लोगों की घिसी-पिटी कार्य-प्रणाली अपना लेते हैं और उसी तरह काम करते रहते हैं, उनकी कार्यकुशलता बढ़ नहीं सकती। काम के अंग-प्रत्यंग के विषय में सब सोचना चाहिए और इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि उस कार्य के अमुक अंग को किस नयी विधि द्वारा किया जा सकता है। यदि कार्य-प्रणाली में कुछ आवश्यक परिवर्तन समझ में आवे तो उसका प्रायोगिक ढंग से व्यवहार करना चाहिए और उस प्रयोग के फलस्वरूप यदि काम सुविधा से हो या शक्ति और समय की बचत हो, तो उस विधि का अपना लेना चाहिए। वास्तव में यह भी एक आविष्कार है, जो साधारण होते हुए भी व्यापक परिणाम उत्पन्न कर सकता है। नयी कार्य प्रणाली अपनाने वाला व्यक्ति अपनी कार्य को विधिपूर्वक करते हैं, वे अवश्य सफल होते हैं। अतः कार्यकुशलता बढ़ाने की ओर प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान रहना ही चाहिए।


Quotation

तुम सेवा करने के लिए आये हो, हुकूमत करने के लिए नहीं। जान को कष्ट सहने और परिश्रम करने के लिए तुम बुलाये गये हो, आलसी होकर वार्तालाप में समय नष्ट करने के लिए नहीं।

-’सन्त वाणी’

चारों वेदों का सरल हिन्दी भाष्य


अत्यन्त सस्ता और सुन्दर सुसज्जित संस्करण

वेद हिन्दू धर्म के मूलभूत धर्म शास्त्र हैं भारतीय संस्कृति का उद्गम वेद ही है। वेद मंत्रों में सन्निहित रहस्यों को सुलभ बनाने के लिये उनकी व्यवस्था के रूप में उपनिषदों, स्मृतियों, पुराणों एवं अन्य धर्मग्रन्थों की रचना की गई। भारत किसी समय जिस ज्ञान और विज्ञान के कारण संसार में सर्वोच्च स्थान पर उपस्थित था, जिस तत्वज्ञान का साक्षात्कार कर ऋषियों ने सब कुछ पाया था, वह सारी की सारी ज्ञान सम्पदा वेदों में सन्निहित है। विदेशों लोग इस वेद ज्ञान को अपने यहाँ ले गये और उसके आधार पर उन्होंने अपनी प्रगति के लिये बहुत कुछ प्राप्त किया।

वेद की प्रत्येक ऋचा में एक विलक्षण रत्न भण्डार भरा हुआ है, एक अनुपम अमृत सागर लहलहा रहा है। उसके कुछ कण, कुछ बिन्दु जिन्हें प्राप्त हो जाते हैं, उनका जीवन सफल हो जाता है, धन्य हो जाता है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना प्रत्येक हिन्दू धर्माभिमानी का परम पवित्र कर्तव्य माना गया है। प्राचीन काल में घर-घर वेद पाठ होता था। वेद की कथायें कही जाती थी। वेद से विहीन कोई भी धर्म प्रेमी न होता था। फलस्वरूप उनको लोक और परलोक की सुख शान्ति के, सफलता और समृद्धि के सभी सत्परिणाम सहज ही प्राप्त होते रहते थे।

चारों वेदों के भाष्य ऐसी सरल भाषाओं में किया जाना आवश्यक था जो प्राचीन संस्कृत भाष्यों के आधार पर होने के साथ सस्ता भी हो। अब तक कहीं वेद छपे भी हैं तो वे इतने महंगे हैं कि साधारण जनता उन्हें खरीद नहीं पाती। दूसरे उनकी भाषा भी इतनी कठिन हैं कि साधारण पढ़े-लिखें लोग समझ नहीं पाते। इस कठिनाई को दूर करने के लिये गायत्री तपोभूमि द्वारा चारों वेदों के अत्यन्त सस्ता, बढ़िया कागज पर छपा, कपड़े की मजबूत जिल्दों से सुरक्षित संस्करण प्रकाशित किया है। गायत्री परिवार के कुलपति परमपूज्य पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा प्राचीन सायण भाष्य के आधार पर यह हिन्दी संस्करण सम्पादित हुआ है। मूल वेद मंत्रों के साथ-साथ सरल हिन्दी अनुवाद बड़े सुयोग्य ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यदि पाठकों ने इस प्रयत्न का समुचित स्वागत किया तो आगे अध्यात्म परक और विज्ञान परक भाष्य भी उपलब्ध होने की आशा की जा सकती है।

ऋग्वेद की 3, अथर्ववेद की 2, यजुर्वेद की 1 सामवेद की 1, इस प्रकार कुल 7 जिल्दें चारों वेदों की हैं। इन सातों का मूल्य 44) है। पर प्रचारार्थ कुछ समय के लिये इनका मूल्य 35) ही लिये जायगा। यह जिल्दें काफी भारी हैं इसलिये यदि अपने लिये स्टेशन बहुत दूर न हो तो रेल से मँगाने में ही फायदा रहेगा। रेल भाड़ा करीब 2-3 रुपया बैठेगा पर डाक से मंगाने में 5-6 रु. से कम न लगेगा। डाक का खर्च मंगाने वाले को ही देना होगा।

इस अलभ्य अवसर को चूकिये मत, अपने घर में वेद स्थापना करके अपने धर्म प्रेम को चरितार्थ कीजिये और अपने लिये एक सैट मंगाने के लिए 5) पेशगी के साथ आर्डर भेजिये।

व्यवस्थापक :-

गायत्री प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि मथुरा।


अपने घर में गायत्री ज्ञान मन्दिर स्थापित कीजिये।

अपने घर में छोटा गायत्री पुस्तकालय स्थापित करके अपने सारे परिवार को स्वजन संबंधियों तथा मित्रों को पढ़ाने योग्य चार-चार आना मूल्य की अत्यन्त सुन्दर, सस्ती, बढ़िया ग्लेज कागज पर तिरंगे, सुन्दर टाइटलों की (36+26-52) पुस्तकें चार चार आना मूल्य की छापी गई हैं। गायत्री महाविद्या की अत्यन्त महत्वपूर्ण साधना से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराने तथा इस महामन्त्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता, धार्मिक एवं आध्यात्मिकता की शिक्षाओं का विचार करने के लिए यह सैट बहुत ही उपयोगी है। प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट की स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।

गायत्री साधना विषयक पुस्तकें

(1) गायत्री महात्म्य

(2) गायत्री की दिव्य शक्ति

(3) गायत्री द्वारा आत्मोत्कर्ष

(4) गायत्री की सिद्धियाँ

(5) गायत्री द्वारा भौतिक सफलताएं

(6) गायत्री से व्याधि नाश

(7) गायत्री से संकट निवारण

(8) गायत्री साधना के चमत्कार

(9) गायत्री से ब्रह्म साक्षात्कार

(10) गायत्री की सुलभ साधना

(11) स्त्रियों का गायत्री अधिकार

(12) गायत्री और यज्ञोपवीत

(13) गायत्री की 24 शिक्षाएं

(14) गोपनीय गायत्री तंत्र

(15) गायत्री यज्ञ का महत्व

(16) यज्ञ और भारतीय संस्कृति

(17) गायत्री हवन पद्धति

(18) सामूहिक यज्ञायोजन

(19) गायत्री के जगमगाते हीरे

(20) गायत्री उपासना

(21) अनादि गुरु मन्त्र गायत्री

(22) गायत्री से योग साधना

(23) सचित्र गायत्री

(24)गायत्री सहस्रनाम

(25) मनुष्य जीवन की सार्थकता

(26) विश्वव्यापी संकट का गायत्री से समाधान

गायत्री के एक-एक अक्षरों की व्याख्या पर पुस्तकें

(1) ईश्वर का विराट् रूप

(2) ब्रह्मज्ञान का प्रकाश

(3) शक्ति की उपयोगिता

(4) धन का सदुपयोग

(5) आपत्तियों में धैर्य

(6) नारी की महानता

(7) गृह लक्ष्मी की प्रतिष्ठा

(8) प्रकृति का अनुसरण

(9) मानसिक सन्तुलन

(10) सहयोग और सहिष्णुता

(11) इन्द्रिय संयम

(12) पवित्र जीवन

(13) परमार्थ और स्वार्थ

(14) सर्वतोन्मुखी उन्नति

(15) ईश्वरीय न्याय

(16) विवेक की कसौटी

(17) जीवन और मृत्यु

(18) धर्म की सुदृढ़ धारणा

(19) प्राणघातक व्यसन

(20) सावधानी और सुरक्षा

(21) उदारता और दूरदर्शिता

(22) स्वाध्याय और सत्संग

(23) आत्म कल्याण का मार्ग

(24) समाज के प्रति कर्त्तव्य

(25) शिष्टाचार और सहयोग

(26) साँस्कृतिक पुनरुत्थान।

आज ही 13) भेजिए और अपने घर में छोटा गायत्री पुस्तकालय स्थापित कीजिए।

अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा।


हमारे कुछ अमूल्य ग्रन्थ रत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग से तीस वर्ष की व्यक्ति गत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।

1. गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग) मूल्य 10॥)

प्रथम भाग-गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों को साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्व पूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन । मूल्य 3॥)

द्वितीय भाग- गायत्री द्वारा वाम मार्गी ताँत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पज्नर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह। मूल्य 3॥)

तृतीय भाग-गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का साधना-विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुंडलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष, विज्ञानमय-कोष आनन्दमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दर्शना । मूल्य 3॥)

2.गायत्री यज्ञ विधान (दोनों भाग) मू. 4)

प्रथम भाग-गायत्री यज्ञ का विज्ञान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्र एवं साइन्स के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मूल्य 2)

द्वितीय भाग-गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया, जलयात्रा, मंडप प्रवेश, वेदी पूजन, कुशकण्डिका, अग्नि स्थापन, आहुति मंत्र, पूर्णाहुति, वसोधरा, अवध्राण भस्म धारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि विधान, जिसे समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मू.2)

3.गायत्री चित्रावली (दोनों भाग) मू॰ 3॥)

प्रथम भाग-विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू॰ 1॥)

द्वितीय भाग-व्याहृति समेत गायत्री के 26 अक्षरों में सन्निहित 26 महान् आदर्शों के 26 श्लोक, 26 लेख एवं 26 आर्ट पेपर पर छपे तिरंगे चित्रों द्वारा समझाया गया है। मू॰ 2)

4. गायत्री मन्त्रार्थ मू॰ 1॥)

अनेकों ग्रन्थों में, अनेकों ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार से किये हुए अर्थों का संग्रह। राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी उसमें हैं।

5. सूक्त संहिता-मू॰ 1॥) इस पुस्तक में चारों वेदों से ऐसे 40 सूक्त संग्रह किये गये हैं जिनके पाठ एवं मनन से मनुष्य की 40 भौतिक साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। वैदिक मंत्र विद्या की यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पुस्तक है।

भारतीय संस्कृति की रूपरेखा - मू॰ 2

हिन्दू-धर्म के आदर्शों, सिद्धान्तों, विश्वासों, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और प्रथा-परम्पराओं पर दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं विवेचनात्मक ढंग से प्रकाश डालते हुए उनकी उत्कृष्टता सिद्ध की है। प्रत्येक हिन्दू धर्माभिमानी के लिये यह पुस्तक अवश्य ही पड़ने योग्य है।

6) से अधिक की पुस्तक लेने पर डाक खर्च मुफ्त।

-अखण्ड ज्योति प्रेस मथुरा।


“जागरण का शंख”


जागरण का शंख (kavita)

आज संस्कृति की रक्षा, हित, नूतन पाठ पढ़ाना है।

मर-मर कर जीना क्या जीवन? हँस-हँस कदम बढ़ाना है॥

उठो, सुप्त ओ ऋषि सन्तानों! निशि गत हुई-भोर आया।

देखो नव-प्रकाश ऊषा का, जो है पूर्व ओर छाया॥

पशु-पक्षी सब सजग हो उठे, छेड़ मधुर प्रेरक, गाने।

कृषक श्रमिक सब श्रम-पूजा हित प्रस्थित हुए लक्ष्य पाने॥

जगो, नया विश्वास हृदय ले, जग को तुम्हें जगाना है।

कुपथ छोड़, सद्पथ संस्कृति को, फिर से तुम्हें दिखाना है॥

निज अतीत की ओर निहारो, सोचो तनिक विचार करो।

त्याग, दया, ममता, करुणा शुचि, बुद्ध देव-सी हृदय घरो॥

शरणागत-वत्सल ‘शिवि’ का क्या नाम भूल ही जाओगे?

‘रन्ति देव’ की अतिथि-अर्चना, सहज भूल क्या पाओगे?

ध्रुव सी निष्ठा, भागीरथ सा यत्न सदैव सिखाना है।

गुरु गोविन्द सुबन सी श्रद्धा, देकर प्राण निभाना है॥

आज विषमता खड़ी हुई है दिखा भयावह अपना रूप।

और स्वार्थ के वशीभूत हो मनुज पड़ा है अन्धे कूप॥

कैसे हो तम दूर पंथ का, सतयुग का सुन्दर निर्माण?

दीप बुझ गये बिना स्नेह के, जग का जीवन है त्रियमाण!!

गाकर दीपक राग, बुझे दीपों को पुनः जलाना है।

अंजनि-नन्द-सा-श्रमकर, सीता की सुधि फिर लाना है॥

दिव्य-संस्कृति के मन्दिर का, शिलान्यास करना होगा।

बलि-वेदी को आज विहँस, सिरःसुमनों से भरना होगा॥

गिर-गिर कर उठ, सँभल-सँभल, गिरि शृंगों पर चढ़ना होगा।

लक्ष्य-पूर्ति-हित कंटक पथ पर, साहस ले बढ़ना होगा?

शंख जागरण का अब फिर से, मिलकर तुम्हें बजाना है।

नये राष्ट्र की नई मूर्ति को, मिलकर आज सजाना है॥

*समाप्त*