(पं .श्रीराम शर्मा आचार्य)
यों तो गायत्री मन्त्र मानव मात्र के लिए उपास्य एवं कल्याण कारक है, उसकी शरण में जाने पर सभी का कल्याण होता है, पर जो लोग ब्रह्म परायण हैं, जिन्होंने अपनी सात्विक प्रवृत्तियों को जागृत करके ब्राह्मणत्व प्राप्त किया है, उनके लिए गायत्री परम कल्याण कारिणी है। एक उत्तम औषधि सभी को लाभदायक होती है पर जिनका पेट साफ होता है उन्हें वह तत्काल गुण दिखाती है। अपच के कारण जिनका पेट खराब है, उन्हें वही दवा कम लाभ पहुँचावेगी, देर में असर करेगी। गुणकारी इंजेक्शन भी जिनका खून खराब है, उन्हें इतना लाभ नहीं पहुँचाते जितना शुद्ध रक्त वालों को। इसमें दवा का कोई पक्षपात नहीं है और न इस बात का निषेध है कि जिन्हें अपच हो या खून खराब हो वे दवा या इंजेक्शन लें ही नहीं। ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। पर स्पष्ट बात यह है कि जिनकी आत्मा में सतोगुण की मात्रा अधिक है, उन्हें गायत्री उन लोगों की अपेक्षा बहुत अधिक, बहुत शीघ्र लाभ पहुँचाती है जिनमें दुर्गुण और कुविचार भरे हुए हैं।
सद्भावना युक्त व्यक्ति ब्राह्मण कहे जाते हैं, जिनमें ब्राह्मण मौजूद है उनके लिए गायत्री परम् जप है, परम साधन है, इस साधन का आश्रय लेकर वे अपना लोक परलोक बड़ी सरलता पूर्वक सुख शान्ति मय बना सकते हैं। उनके लिए यह गायत्री माता इतनी दयालु और दानी सिद्ध होती है जितनी शरीर को जन्म देने वाली परम करुणामयी माता भी नहीं हो सकती।
कहा भी है --
सर्व वेदमयी विद्या गायत्री पर देवता।
परस्य ब्रह्मणो माता सर्व वेदमयी सदा।
महाभाव मयी नित्या सच्चिदानन्द रूपिणी।
अर्थात्- गायत्री सर्व वेदमयी परा विद्या है। यही ब्राह्मण की माता है। यही नित्य सच्चिदानन्द स्वरूप तथा महा भावमयी भी है।
गायत्री वेद जननी गायत्री ब्राह्मणः प्रसूः।
गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन गीयते।
स्कंध पुराण - 9/51
गायत्री वेदों की माता है, गायत्री ब्राह्मण की माता है। यह गायन करने वाले का त्राण - उद्धार करती है इसलिए गायत्री कहते हैं।
किं ब्राह्म्णस्यपितरं किगु पृच्छसि मातरं।
श्रुतं चेदस्मिन् वेद्यंस पिता स पितामहः।
काठक संहिता 30।1
यह क्यों पूछते हो कि ब्राह्मण का बाप कौन है? माता कौन है? श्रुत (ब्रह्मज्ञान) ही उसका बाप और वही बाबा हैं।
ओंकार पितृ रूपेण गायत्री मातरं तथा।
पितरौ यो न जानाती स विप्रस्त्वन्यरेतसः।
ॐ कार को पिता और गायत्री को माता रूप में जो नहीं जानता, वह ब्राह्मण वर्ण शंकर है।
ब्राह्मण की माता गायत्री और पिता वेद है।
कहा भी है : -
मातात्वं च कुतः कस्य पिता कस्मात्समुद्भवः।
कुलात्कस्य समुत्वन्नं इदं ब्रह्मीति ब्राह्मणः।
गायत्री मन्तुमेवं तं पिता वेदोपि संभवः।
ब्रह्म कुल समुत्पन्नं इदं ब्रह्मीति ब्राहम्णाः॥
अर्थात् - मेरी माता कौन? पिता कौन? कुल कौन है? इसे जो जानता है वह ब्राह्मण है। गायत्री ही माता है, वेद ही पिता है, ब्रह्म ही कुल है, जो इस तत्व को जानता है, वही ब्राह्मण है।
ब्राह्मण के जीवन का लक्ष आत्मबल एवं ब्रह्मतेज को प्राप्त करना होता है। वह जानता है कि संसार में जो कुछ उत्तम है वह सभी आत्मबल और ब्रह्मतेज उपलब्ध करने पर प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए वह सम्पूर्ण आनन्दों के लिए वेद जननी गायत्री का ही आश्रय लेता है।
तेजो वै ब्रह्मवर्चसं गायत्री,
तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्वी भवति।
- ऐतरेय ब्राह्मण
अर्थात्-गायत्री में जो तेज है वही ब्रह्मवर्चस है। इससे उपासक तेजस्वी और ब्रह्म वर्चस्वी हो जाता है।
जिसने ब्रह्म वर्चस प्राप्त किया उसके लिए गायत्री साक्षात् कामधेनु गौ के सामान है। उसे इसी महाशक्ति के द्वारा अपनी अभीष्ट कामना पूर्ण करने वाले वरदान मिल जाते हैं। इसलिए गायत्री को वरदात्री कहा गया है। उसे परमदेवी भी कहते है। यों सभी दैवी शक्तियाँ ‘देवी’ कहलाती हैं। पर अन्य दिव्य शक्तियों की सीमा थोड़ी-थोड़ी है। वे उपासना करने पर मनुष्य का सीमित कल्याण करती हैं। किन्तु गायत्री के लिए ऐसा कोई सीमा बन्ध नहीं है, उसके गर्भ में समस्त शक्तियाँ सन्निहित होने से परम देवी कही जाती है। सच्चे मन से उपासना करके यदि उसका थोड़ा सा भी अनुग्रह प्राप्त किया जा सके तो साधक उस परम गति को प्राप्त कर लेता है जिसके कारण लोक में सुख और परलोक में अभीष्ट शान्ति प्राप्त होती है। कहा भी है :--
वंदे ताँ पणाँम देवीं गायत्री वरदाँ शुभाम्।
यत्कृपालेशतो यान्ति द्विजा वै परमाँ गतिम्।
उस वरदात्री परम देवी गायत्री को नमस्कार है जिसकी लेश मात्र कृपा से द्विज परम गति को प्राप्त होते हैं।
ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व बहुत कुछ गायत्री उपासना पर निर्भर रहता है क्योंकि जो सद्गुण सामान्य लौकिक प्रयत्न करने पर बहुत कठिनाई से प्राप्त होते हैं वे इस उपासना के माध्यम से स्वयमेव विकसित होने लगते हैं और उन अन्तः स्फुरणाओं के जागरण से उसका ब्रह्मणत्व दिन-दिन सुदृढ़ होता जाता है। आत्मा में पवित्रता का अंश दिन-दिन बढ़ता जाता है।
जपनिष्ठो द्विज श्रेष्ठो ऽखिल यज्ञ फलं भवेत्।
सर्वेषामेव यज्ञानाँ जायते ऽसौ महाफलः॥
जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति।
प्रसन्ना विपुलान् कामान् दयान्मुक्तिंच शाश्वतीम।
यक्षरक्षः पिशाचाश्च ग्रहाः सर्पाश्च भीषणाः।
जपिनं नोयसर्पन्ति भयभीताः समन्ततः।
यावन्तः कर्मयज्ञाः स्युः प्रदिष्ठानि तपाँसि च।
सर्वे ते जप यज्ञस्य कलाँ नार्हति षोडशीम्।
- तंत्र सार
अर्थात्-जप निष्ठ द्विज सब यज्ञों के फल को प्राप्त करता है। उस पर देवता प्रसन्न होते हैं और उनकी प्रसन्नता से लोक में सुख तथा परलोक में मुक्ति प्राप्त होती है। आसुरी शक्तियाँ उसे भयभीत नहीं करतीं। अन्य सभी साधना कर्मों में जप यज्ञ अधिक फल दायक एवं श्रेष्ठ है।
जिस प्रकार जड़ को सींचने से पत्र, पल्लव, पुष्प, फल आदि सभी की प्राप्ति हो जाती है। उन सबके लिए अलग-अलग प्रयत्न नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार गायत्री साधना में अन्य सभी साधनाओं द्वारा हो सकने वाले लाभ प्राप्त हो जाते हैं।
जप्यवेनैवतुसंसिद्धचेत् ब्राह्मणोनात्र संशयः।
कुर्यादन्यन्नवा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते।
मनु 2। 97
अर्थात्- ब्राह्मण चाहे कोई अन्य उपासना करे या न करे वह केवल गायत्री मन्त्र से ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
गायत्री सामुपासीनो द्विजो भवति निर्भयः।
-शिव तत्व विवेक
गायत्री की भली प्रकार उपासना करने से द्विज निर्भय हो जाते हैं।
यों दैनिक “पंच यज्ञो” को लौकिक नियम धर्मों में आवश्यक नित्यकर्म माना गया है और प्रतिदिन ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत यज्ञ, अतिथि यज्ञ, इन पाँच यज्ञों का करना सभी के लिए विधान है। पर आध्यात्मिक दृष्टि में अकेले गायत्री जप में पाँच यज्ञों का समावेश है। गायत्री के पाँच अंग भी पाँच ब्रह्म यज्ञ कहे गये हैं। नित्य इस उपासना के करने से पाँचों दैनिक यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
प्रणवो व्याहृतयः सावित्रि चेत्यैत पंच ब्रह्मयज्ञ।
अहरह ब्राह्मिणं किल्विषात्मा वयन्ती।
वोधायनस्मृति
एक प्रणव, तीन व्याहृति और गायत्री मन्त्र यही पाँच ब्रह्म यज्ञ हैं। इनकी निरन्तर उपासना करने वाला ब्राह्मण पवित्र हो जाता है।
प्राचीन काल में अनेक साधकों ने इसी उपासना के द्वारा मानव जीवन की सफलता का सर्वोच्च प्रतीक ‘ब्रह्मर्षि’ पद पाया। इतना ही नहीं देवताओं ने भी इसी महामन्त्र की शक्ति से असुरों को परास्त कर अपना देवत्व स्थिर रखा।
वृद्धैः काश्यप गौतम प्रभृतिभि भृर्ग्वंगिरोत्र्यादिभिः शुक्रागस्त्य बृहस्पति प्रभृतिभिर्ब्रह्मर्षिभिः सेवितम्॥
भारद्वाजयतं ऋषीक तनयेः प्राप्तं वशिष्ठात पुनः।
सावित्री मधि गम्य शक्र वसुभिः कृत्स्ना जिता दानवाः।
अर्थात्- इस गायत्री की उपासना करके वृद्ध काश्यप्, गौतम, भृगु, अंगिरा, अत्रि भारद्वाज बृहस्पति, शुक्राचार्य, अगस्त, वशिष्ठ आदि ने ब्रह्मर्षि पद पाया और इन्द्र, वसु आदि देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की।
इत्येवं संधिचार्याथ गायत्री प्रजपेत्सुधीः
आदि देवीं च त्रिपदा ब्राह्मणत्वादिदामजाम्।
शि. कै. 13-57
इन बातों पर विचार कर ब्राह्मण को चाहिए कि ब्राह्मणत्व प्रदान करने वाली गायत्री का जप किया करें।
बहुनाकिम होक्तेन यथावत् साधु साधिता।
द्विजन्मनामियं विद्या सिद्धि काम दुधा मता।
- शारदायाँ
अर्थात्- अधिक कहने की क्या आवश्यकता है। भली प्रकार साधना की हुई यह गायत्री विद्या द्विजों के लिए कामधेनु के समान सब सिद्धियों को देने वाली है।
इस कामधेनु का दूध ही इस जगती तल का ‘परम् रस’ कहलाता है। इसी को ब्रह्मानन्द कहते हैं। इससे मधुर आनन्द दायक और उल्लास भरी मादक वस्तु और कोई इस संसार में नहीं है। जिसे इस कामधेनु का दूध पीने को मिल गया, उसके सभी अभाव दूर हो जाते हैं, कोई वस्तु ऐसी नहीं रहती जो उसके कर-तल-गत न हो। ऐसा ब्रह्म सिद्धि प्राप्त गायत्री उपासक अपने आपको सर्व संतुष्ट, सर्व सुखी अनुभव करता है। उसके आन्तरिक आनन्द एवं उल्लास का ठिकाना नहीं रहता।
ब्रह्मानंद रसं पीत्वा ये उन्मत्त योगिनः।
इन्द्रोऽपि रंक बद्भा का कथा नृप कीटकः।
ब्रह्मानन्द रूपी परम रस को पीकर योगी जन आनंद मग्न उन्मत्त हो जाते हैं। उनके सामने इन्द्र रंक प्रतीत होता है फिर साधारण राजा अमीर जैसे कीड़े-मकोड़ों की तो बात ही क्या है।
गायत्री उपासना मानव मात्र की उपासना है। इस ईश्वर की वाणी को हृदयंगम करना और उसकी उपासना में तत्पर होना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है। परन्तु ब्राह्मण कुल में उत्पन्न अथवा ब्राह्मणत्व की आकाँक्षा करने वाले लोगों के लिए तो वह नितान्त आवश्यक है। शास्त्र कारों ने गायत्री उपासना को ब्राह्मण का अनिवार्य कर्त्तव्य बताया है और आदेश दिया है कि जीवन के अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्यों में गायत्री उपासना को प्रथम स्थान देना चाहिए। जो इस धर्म कर्त्तव्य का पालन नहीं करते, उनकी जगह-जगह तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें शूद्र चाण्डाल आदि कहा गया है। देखिए :-
गायत्री रहितो विप्रः शूद्रादृष्य शुचिर्भवेत्।
गायत्री ब्रह्मतत्वज्ञाः संपूज्यते जनै द्विजाः।
पागसर स्मृति 2-32
अर्थात्- जो ब्राह्मण गायत्री से रहित है वह शूद्र के समान अपवित्र है। जो ब्राह्मण ब्रह्मतत्त्व गायत्री को जानता है वही पूजने योग्य है।
गायत्री यो न जानाति ज्ञात्वा नैव उपासयेत्।
नाम धारक मात्रो सौ न विप्रो वृषली हि सः॥
जो गायत्री को नहीं जानता, यदि जानता भी है तो उपासना नहीं करता, ऐसा नाम मात्र का ब्राह्मण ‘वृषल’ शब्द से निन्दित होता है।
एवं यस्तु विजनाति गायत्रीं ब्राह्मण गुरुः।
अन्यथा शुद्र धर्मस्या द्वेदानाभपि पारगः।
-योगी याज्ञवलक्य
जो ब्राह्मण गायत्री को जानता और जपता है वही सच्चा ब्राह्मण है। जो गायत्री की उपेक्षा करता है वह वेद में पारंगत होने पर भी शूद्र समान है।
अज्ञात्वा चैव गायत्री ब्राह्मणया देव हीयते।
अपवादेन संयुक्तो भवेच्छु तिनिदर्शनात्। यो. दा.
गायत्री को न जानने वाला ब्राह्मण ब्राह्मणत्व से हीन और लोक निन्दित हो जाता है। ऐसा वेदों में कहा गया है।
गायत्र्युपासना नित्या सर्व वेदैः समीरिता।
यस्या विनात्वधः पातो ब्राह्मणस्याति सर्वथा।
देवी भागवत 12। 8
अर्थात्- वेदों में नित्य गायत्री उपासना करने का आदेश है। गायत्री उपासना न करने से ब्राह्मण की सब प्रकार अधोगति होती है।
सन्ध्या नोपासते यस्तु ब्राह्मणो हि विशेषतः।
सजीवन्नेव शूद्रः स्यान्मृतः स्वाचैव जायते।
दक्ष स्मृति 1-22
जो व्यक्ति, विशेषतया ब्राह्मण, संध्या उपासना नहीं करता, वह जीवित रहते शूद्र है और मृत्यु के उपरान्त श्वान बनता है।
केवलं वा जपेन्नितयं ब्राह्मणस्य च पृतये।
सहस्रभ्यसोन्नित्यं प्रातर्बाह्मण पुँगवः ।
-शिव वि 13 -18
ब्राह्मणत्व का आवश्यक कर्त्तव्य पालन करने के लिए प्रातः काल एक हजार गायत्री मंत्र जपना आवश्यक है।
गायत्रीष्वप्य विश्वासो यस्य विप्रस्य जायते।
स एव यवनो देवि, गायत्री स कथं जपेत्।1।
तस्य संसर्गिणों विप्राः पतिता स्तेऽत्र निन्दिताः।
गायत्री रहितस्यान्नं यवनादधमं स्मृतम्।2।
गायत्री रहितो विप्रः स एव पूर्व कुक्कुरः।
स चाणडाल समो देवि, किं तस्य जप पूजनम्।3।
-गायत्री तंत्र, तृतीय पटल।
अर्थात्- हे देवि, जिस ब्राह्मण का गायत्री पर विश्वास नहीं उसे यवन समान जानो। भला ऐसा व्यक्ति उपासना क्यों करेगा? उसके तो साथ रहने वाला भी पतित और निन्दित हो जायेगा। इसलिए उसका अन्न भी नहीं खाना चाहिए। जो ब्राह्मण गायत्री रहित है उन्हें इस जन्म के चाण्डाल और पूर्व जन्म के श्वान समझो। ऐसे को जप पूजन कैसा?
वेदभक्ति विहीनाश्च पाखण्ड मत गामिनः।
अग्नि होत्रादि सर्त्कम स्वधा स्वाहा विवर्जिताः।
पण्डिता अपि ते सर्वे दुराचार प्रवर्तकाः।
वेद भक्ति से विहीन, पाखण्डियों के मत पर चलने वाले अग्निहोत्र और स्वाहा स्वधा से रहित, ऐसे दुराचार प्रवर्तक पण्डित नारकीय है।
अन्य देवताओं की उपासनाएं साँसारिक लाभों सकाम प्रयोजनों, या सीमित लाभों के लिए होती हैं। पर आत्मबल प्राप्त करने के लिए तो गायत्री का ही आश्रय लेना पड़ता है। गायत्री को त्याग कर अन्य उपासनाओं में लगा रहा जाय तो अन्य प्रकार के लाभ मिल सकते हैं पर आत्म बल के लाभ से वंचित ही रहना पड़ेगा। इसलिए शास्त्रकारों ने ब्राह्मण के लिए यह आवश्यक बताया है कि गायत्री उपासना करने के अतिरिक्त यदि अन्य साधनाएं करना चाहे तो कर सकता है, पर इस महामंत्र को त्याग कर यदि उसने अन्य मंत्रों या अन्य देवताओं का सहारा लिया है तो यह उसकी भूल है। इस भूल के फलस्वरूप उसे ब्रह्मतेज का अभाव ही रहेगा।
अन्य कोई वस्तु उसे चाहे भले ही मिल जाय। इसलिए अन्य उपासनाओं के लिए गायत्री का त्याग करना उचित नहीं। यदि अन्य उपासनाएं करनी ही हो तो प्रथम स्थान गायत्री उपासना को देकर तब अन्य उपासनाएं करे।
गायत्री यः परित्यज्य चान्य मंत्रमुपासते।
न साफ ल्य मवानोति जन्म कोटिः शतैरपि।
-संध्याभाष्य
जो मनुष्य गायत्री मंत्र को त्याग कर अन्य मंत्रों की उपासना करता है वह चिरकाल में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
विहायताँ तु गायत्री विष्णु पास्ति परायणः।
शिवो पास्ति रतो विप्रो नरकं याति सर्वथा।
देवी भागवत्
जो विप्र गायत्री को त्याग कर विष्णु शिव आदि देवों की उपासना में रत है वह नरक को जाता है।
यज्ञ, जप, संस्कार ब्रह्मभोज, आदि धर्म कार्यों में केवल उन्हीं ब्राह्मणों को सम्मिलित करने की आज्ञा शास्त्रकारों ने दी है जो गायत्री उपासना नियमित रूप से करके अपने ब्राह्मणत्व को जीवित रखे हुए हैं। जिनने अपने इस कर्त्तव्य का त्याग कर दिया, जो गायत्री उपासना नहीं करते, उन्हें ऐसे धर्म कार्यों में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए।
न तिष्ठति तु यः पूर्वां नो पास्ते यश्च पश्चिमाम्।
स शूद्रवद् वहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विज कर्मणः।
अर्थात् जो प्रातः और सायं संध्या उपासना नहीं करता उसे सर्व द्विजोचित कर्मों से बहिष्कृत कर देना चाहिए।
अनभ्यासेन वेदानाम् आचारस्य च वर्जनात्।
आलस्यात् अन्न दोषाश्च मृत्युर्विप्रान जिघाँसति॥
वेदों का अभ्यास न करने से, आचार छोड़ देने से, आलस्य से, कुधान्य खाने से ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती है।
स्वयं शुद्धो हि पूतात्मा नरोन संत्रातु मर्हति।
गायत्री जप शुद्धो हि शुद्ध ब्राह्मण उच्यते।
गायत्री जप में शुद्ध हुआ ब्राह्मण ही शुद्ध कहा जा सकता है। जो स्वयं शुद्ध हो चुका है वही दूसरों को भी शुद्ध कर सकता है।
तत्स्माद्दानं जपे होमे पूजायाँ सर्व कर्मणि।
दानं कर्तुं तथा त्रातु पात्रं तु ब्राह्मणोर्हति।
इसलिए दान, जप, होम, पूजा आदि कर्मों में केवल सत्पात्र ब्राह्मण को ही लेना चाहिए।
लक्ष द्वादश युक्तस्तु पूर्ण ब्राह्मण ईरितः।
गायत्र्या लक्ष हीनं तु वेद कार्ये न योजयेत्।
शिव 13-4-6
बारह लाख गायत्री जपने पर ही पूरा ब्राह्मण कहलाता है। जिसने एक लाख भी जप न किया हो उसे वेद कार्यों में सम्मिलित न करना चाहिए।
चतुर्विशति लक्षं वा गायत्री जप संयुतः।
ब्राह्मणस्तु भवेत्पात्रं सम्पूर्ण फल योगदम्।
शि. वि. 15-14
जिस ब्राह्मण ने 24 लक्ष गायत्री जप कर लिया हो वही ‘सत्पात्र’ कहलाता है। उसी से फल की आशा की जा सकती है।
ब्राह्मण को भूसुर अर्थात् पृथ्वी का देवता कहते हैं। उसे ‘अपने पद और गौरव की रक्षा के लिए ब्राह्मणोचित कर्म जिनमें गायत्री उपासना प्रथम है - करने ही चाहिए। जो उन्हें न करके साधारण साँसारिक झंझटों में अपना जीवन नष्ट करता रहता है भारी भूल करता है। यों मनुष्य जन्म ही दुर्लभ है पर ब्राह्मण होना तो और भी बड़ा सौभाग्य है। जिन्हें यह सौभाग्य प्राप्त है वे अपनी इस देह को क्षुद्र कार्यों में न लगाकर आत्म कल्याण का मार्ग अपनावें। उपासना द्वारा आत्म बल प्राप्त करें और संसार में धर्म वृद्धि के लिए कटिबद्ध रहें।
ब्राह्मणस्य च देहोऽयं क्षुद्र कामाय नेष्यते।
कृच्छाय तपसे चेह प्रेत्यानन्त सुखाय च।
अर्थात्- ब्राह्मण का यह देह क्षुद्र कामों के लिए नहीं है। वह इस लोक में कठिन तप करके परलोक से सद्गति प्राप्त करने के लिए ही है।
सन् 1962 में एक राशि पर आठ ग्रह एकत्रित होने के कुयोग की चारों ओर चर्चा है। गत अंक में श्री योगेश जी जोशी का एक लेख पाठकों ने पढ़ा होगा। इस संबंध में अन्यत्र भी ज्योतिष शास्त्रियों में चर्चा चल रही है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध मासिक पत्र ‘एस्ट्रालोजिकल मैगज़ीन’ में इस संबंध में पिछले दिनों कई लेख छपे हैं, उनमें से कुछ के साराँश इस प्रकार हैं :--
डॉक्टर डब्ल्यू. जे. टुकर डी. एस. सी., के लेख का सार भाग यह है कि - “एक ही राशि पर इतने ग्रहों का एकत्रित होना कोई अभूत पूर्व घटना नहीं है। फिर भी इन ग्रहों का संयोग तृतीय विश्व युद्ध का कारण बन गया है। जनवरी सन् 61 से ‘नाटो संगठन की जन्म कुण्डली अपने प्रभाव प्रकट करना आरम्भ कर देगी।
1 जनवरी 61 को मकर के 20 अंश में शनि तथा वृहस्पति का योग होगा। यह योग आत्मघातक है और विश्व का युद्ध छिड़ जाने की आशंका प्रकट करता है। मैं तृतीय विश्व युद्ध की भविष्यवाणी तो नहीं करता पर विश्व के राजनीतिज्ञों को यह सचेत करना आवश्यक समझता हूँ कि वे अपने मतभेदों को वह भयानक समय आने से पूर्व ही हल करने का प्रयत्न करें अन्यथा संघर्ष होना अनिवार्य दीखता है। सन् 60 का ग्रीष्म काल भी विषम होगा। रूसी नेता इन दिनों अनेकों भूल भरे निर्णय करेंगे। जुलाई, अगस्त, सितम्बर 60 में ‘नाटो संधि’ में शान्ति भंग होगी। इन बाधाओं से सावधान रहना आवश्यक है।
श्री निरुवेंक्टाचारी एम. ए. का कथन है कि 5 फरवरी 62 को प्रातः 3 बजकर 16 मिनट पर महान योग होगा। इसी समय सूर्य ग्रहण भी है। चंद्र और मंगल का मेल ता. 4 फरवरी की प्रातः 6 बजकर 12 मिनट पर होगा। इसका बुरा प्रभाव भारत की राजनैतिक स्थिति पर पड़ेगा। तोड़-फोड़ तथा शासकों की अपकीर्ति की संभावना है। पाकिस्तान के ग्रहयोग में उस समय कन्या तथा धनु राशि का समन्वय है। उससे गहरी राजनीतिक उथल पुथल की संभावना है। सेनाओं में तथा श्रमिक वर्ग में असन्तोष होने और वर्तमान शासन का स्थान श्रमिकों की सरकार ग्रहण कर ले ऐसी संभावना है। उसकी विदेश नीति में परिवर्तन होने से पाकिस्तान के मित्र असंतुष्ट होंगे। चीन के लिए भी वह योग शुभ नहीं है। जनता के कष्ट बढ़ेंगे और बड़े राजनैतिक परिवर्तन होंगे। फारमोसा की समस्या का हल हो जायेगा। अमेरिका के सम्बन्ध अन्य देशों से बिगड़ेंगे। रूस की आन्तरिक व्यवस्था में बहुत उलट पलट होगी।
श्रीमती रुक्मिणी देवी बी. ए. ने अपने लेख में प्रकट किया है कि - सन् 1962 में जो अष्ट ग्रहयोग है उसमें मंगल ऐसा है जिसका साथ होने के कारण अन्य ग्रह भी अशान्त रहेंगे। तृतीय विश्व युद्ध की मैं भविष्य वाणी तो नहीं करता पर स्थिति विस्फोटक अवश्य है। अमेरिका की प्रारम्भ राशि मिथुन मानी जाने से यह योग आठवें और नौवें ग्रह में हो रहा है। इससे भयानक विनाश और संहार की संभावना है। अग्निकाँड और दुर्घटनाओं की भी संभावना हो सकती है। रूस की राशि कुँभ मानने में यह योग बारहवें या लग्न के घर में पड़ेगा। इससे इसकी आन्तरिक, राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में भारी लौट पलट हो सकती है। अन्तर्राष्ट्रीय साम्यवाद की शृंखला टूट सकती है।
बारह मिहिरि के अनुसार भूकम्प, अग्निकाण्ड, बाढ़, दुर्घटनाएं, महामारी, फैलने की इस कुयोग के कारण संभावना है। यह कुयोग मानव समाज के लिए चेतावनी है। हम ईश्वर धर्म का अवलम्बन लें जिनसे इस कुयोग के शान्त होने में सहायता मिले।
(श्री भगवान सहाय जी वशिष्ठ)
युगों-युगों से मानव बुद्धि जीवन के वास्तविक रहस्य की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रही है। ऋषियों मुनियों, पीर पैगम्बरों ने जीवन को खोजा। फलस्वरूप उन्होंने जो कुछ पाया उससे मानव समाज का मार्ग दर्शन किया। कितनों ने जीवन के रहस्य को समझा, आत्मसात किया ? किन्तु मानव समाज के लिए आज भी यह प्रश्न उतना ही जटिल और रहस्यमय बना हुआ है। “जीवन क्या है? इस प्रश्न का समाधान करने के लिए प्रचुर साहित्य दर्शन शास्त्र भरे पड़े हैं। जिन्होंने इसका उत्तर प्राप्त किया वे आज भी अपने अनुभव सिद्ध तथ्यों में इस प्रश्न का समाधान कर रहें है किन्तु जन साधारण के लिए यह प्रश्न उतना ही टेढ़ा और रहस्य मय प्रतीत हो रहा है।
जीवन की एक कठिनतम ग्रन्थि है किन्तु जितनी कठिन है उतनी ही यह सरल भी है। सूर्य का प्रकाश कृत्रिम साधनों द्वारा ठीक असली रूप में प्राप्त करना असम्भव है किन्तु वही सूर्य का प्रकाश प्रातः काल होते ही सहज सरलता पूर्वक प्राप्त हो जाता है। ठीक इसी प्रकार जीवन के रहस्य का पता सैकड़ों ग्रन्थों का अध्ययन करके भी समझ में नहीं आता। पर वस्तुतः दो वाक्यों से भी उसका रहस्य जाना जा सकता है। यही इस जीवन का सौंदर्य है, महानता है।
उपनिषद् में एक स्थान पर कहा गया है-
“यमैवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा
“विवृणुते तनूँ स्वाम” अर्थात् जिसे वह धारण करले, वरण करले, उसी को वह वह प्राप्त हो जाता है। वह ब्रह्म उसी के समझ अपने आपको निरावृत करता है। ठीक यही बात जीवन के संबन्ध में लागू होती है। जो व्यक्ति स्वयं जीवन को प्रेम करते हैं, उसका जीवन स्वयं वरण करते हैं, उनके समक्ष इसके रहस्य मय पर्त उतनी ही सरलता से खुल जाते हैं। जैसे प्रातःकाल के समय सूर्य उदय हो जाता है।
जीवन का एक और महान रहस्य है। वह यह कि इसे जिस-जिस दृष्टिकोण से देखा जाय यह उसी रूप में प्रकट हो जाता है। जिसका जैसा दृष्टिकोण रहा उसके लिए जीवन वैसा ही दिखाई दिया। उदाहरणार्थ किसी ने इसे मिथ्या नश्वर एवं भोग काल समझा और कहा “ब्रह्मसत्यं जगत मिथ्या”। दार्शनिकों ने देखा जीवन प्रज्ञा स्वरूप है। भक्तों ने जीवन के अनन्त आनन्द सागर में सराबोर कर दिया किसी ने इसे बड़ी-2 ऋद्धियों सिद्धियों का खजाना समझा। किसी ने इसे वसुधा पर सुख, आनन्द, मौज ऐश्वर्य भोग, शालीनता उपभोग का साधन माना। कइयों ने अपनी समन्वय बुद्धि से इसमें उक्त में से कई बातों का समन्वय भी किया।
प्राचीन तथा आधुनिक तथ्यों का अध्ययन एवं सम्मिश्रण करने पर एक नवीन तथ्य का सूत्रपात होता है उसके अनुसार जीवन को किसी विशेष अर्थ की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता और न ही उसका अर्थ केवल मात्र एक ही पहलू से किया जा सकता। जीवन एक स्वतंत्र इकाई नहीं वरन् विश्व की प्राण धारा का एक अंग है। जिसका उद्देश्य है निरन्तर की गतिशीलता, सतत प्रवाह इस अनन्त गतिशील प्राणधारा का कभी क्षय नहीं हो पाता। इसका स्वभाव है प्राणवान रहना, आगे बढ़ना।
किसी को पदार्थ तत्व आदि की गति शीलता प्रवाह धारा को कायम रखने के लिए आवश्यक है कि एक स्थान पर अपने आपको दूसरे स्थान के लिए उत्सर्ग किया जाय साधारण शब्दों में अपने अस्तित्व के अंश को खोकर दूसरे से मिला जाय अपने स्थान का दूसरे स्थान के लिए छोड़ कर आगे बढ़ा जाय। इसी से प्रवाह स्थिर रह सकता है। यदि नदी में बहने वाले पानी का कोई अंश अपने स्थान को छोड़कर आगे नहीं बढ़े और पीछे आने वाले के लिए स्थान न दे तो गति अवरुद्ध हो जायगी प्रवाह बन्द हो जायगा। अतः प्रवाह को जारी रखने के लिए आवश्यक है कि खुद को दूसरे के लिए मिटाया जाय। अपने स्थान को दूसरे के लिए छोड़ा जाय।
तात्पर्य है कि अपने आपको उत्सर्ग करने पर ही गतिशीलता कायम रह सकती है अर्थात् गतिमय होने के लिए अपने आपको देने के लिए तैयार करना आवश्यक है।
गति ही इस सृष्टि की प्राणधारा का मूल उद्देश्य है। सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर पता चलेगा सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ गतिशील है। और दूसरे के लिए अपने आपको उत्सर्ग कर उसे अपना स्थान देता है। बीज अपना अस्तित्व मिटा कर वृक्ष बनता है। वृक्ष बन कर अपना सौंदर्य फल फूल दूसरों को उत्सर्ग करता है। अन्त में अपनी प्राणशक्ति अनेकों बीजों को प्रदान कर अपने आपको मिटा देता है।
प्रकृति का ठीक यही सिद्धान्त जीवन पर लागू होता है। जिस जीवन में यह परम्परा पूर्णरूपेण प्रतिष्ठित है वही विश्वात्मा है। अनन्त प्राण परम्परा का अंग है। जो इसके विपरीत है वही असत् है। जो अलग-अलग रूप में है जो संकीर्ण है जो क्षण भंगुर है जो विनाश शील है जो अस्तित्व रहित है। वही मिथ्या है।
किन्तु आश्चर्य है कि विश्वात्मा का अंश मनुष्य अहं से ग्रस्त होकर अपनी स्वतन्त्र इकाई समझता है और मूक प्रकृति के उक्त सिद्धान्त के विरुद्ध अपने अस्तित्व को अमिट बनाने का प्रयत्न करता है मनुष्य प्रकृति से जो मिलता है उसे ग्रहण तो कर लेता है किन्तु अपने अहं की स्वतन्त्र इकाई के आधार पर वह उसे आगे प्रवाहित करने में कृपणता करता है यही जीवन का अभिशाप है यही सारे दुःखों का मूल कारण है यह कृपणता अपने लिए केवल ग्रहण ही करते रहने की भावना प्रकृति तथा सृष्टि के उक्त विधान के विपरीत है। विश्व की प्राण परम्परा के प्रतिकूल है और इसका प्रमुख कारण आगे के लिए अविश्वास, विश्व की अनन्त अखण्ड प्राण धारा के प्रति अनास्था ही है जिसके कारण जीवन की वास्तविक सिद्धि से मनुष्य लाभ नहीं उठा पाता और अभाव, अशक्ति, दुःख नारकीय यातनाओं का वरण करता है।
अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि आखिर इस रहस्य को कैसे हृदयंगम किया जाय? कैसे आत्मसात् किया जाय? जिसके दिव्य आलोक से सुखद एवं अमृत किरणों से जीवन अनन्त आनन्द के सागर में लहरा उठे। और यह भी निश्चय है कि जब उक्त प्रवाहधारा, गतिशीलता का अर्थ समझ में नहीं आयेगा तब तक जीवन का सही उद्देश्य कभी प्राप्त होने वाला नहीं है।
यह प्रवाह इतना स्पष्ट और सरल है कि साधारण व्यक्ति भी इसे जान सकता है। नेत्र हीन भी देख सकता है। और संसार के सारे ग्रन्थों को पढ़कर भी विशाल शास्त्र बुद्धि से यह समझ में नहीं आता। इसके लिए एक मात्र आस्था, निष्ठा की आवश्यकता है। दृढ़ आस्था और निष्ठा भी तब पैदा होती है जब मनुष्य में उसके प्रति विश्वास की गहरी जड़ जम जाती है। और विश्वास के लिए आवश्यक है कि उसका कोई न कोई आधार अवश्य मिले। इसके लिए जैसा कि पहले व्यक्त किया जा चुका है मूक प्रकृति से इसका उत्तर प्राप्त किया जा सकता है। ग्रह नक्षत्र की गति शीलता नदी का सतत प्रवाह ऋतुओं का क्रमश बदलना पेड़ पौधों का पैदा होना फलना फूलना अपनी प्राण शक्ति को दूसरे बीजों में प्रतिष्ठापित करके अपने को उत्सर्ग करना आदि से इसकी जानकारी की जा सकती है।
प्रकृति की प्रत्येक वस्तु अपने को दूसरों के लिए उत्सर्ग कर रही है। इस प्रकार इस संदेश को सुनकर विश्व की उस गतिशील अनन्त अखण्ड प्राण परम्परा के प्रति दृढ़ आस्था पैदा करनी अनिवार्य है। आस्थावान व्यक्ति जीवन के रहस्य को अवश्य समझ जायेगा और क्रियात्मक क्षेत्र में उसको आत्म के सात करेगा। आस्थावान व्यक्ति के समक्ष जीवन स्वतः अपने रहस्य को ठीक उसी तरह प्रकट कर देता है, अपने परदे अपने आप खोल देता है जैसे प्रातःकाल होते ही सूर्य अपने उज्ज्वल, धवल, प्रकाश से विश्व को आलोकित कर देता है। मनुष्य भी इसी प्रकार अपने में स्थिति अमृत भण्डार से अपनी प्यास बुझाता है।
अपने विराट स्वरूप की अनुभूति और उस अखण्ड प्राण परम्परा से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने जीवन को विश्व जीवन की एक इकाई, अपने व्यक्तित्व को विश्व मानव के एक अभिच्छन्द रूप में अनुभव करें।
किन्तु यह अनुभूति किसी बाह्य साधन से प्राप्त होना असम्भव है। बाह्य ज्ञान उपकरणों की सीमा है। सीमित वस्तु से अनन्त की अनुभूति नहीं हो सकती। उक्त अनुभूति तर्क वितर्क अथवा शास्त्रों का भार लाद लेने पर भी नहीं हो सकती। इसका आधार जीवन अपने व्यवहार से अपने अनुभव से ही अपने स्वरूप को प्राप्त होता है।
सृष्टि के उक्त रहस्य को प्रकृति के मूल सन्देश को ध्यान में रखते हुए अपना दृष्टिकोण बदल दीजिये। आपका जीवन अखण्ड विश्व प्राण परम्परा से बंधा हुआ अनुभव कीजिए। आपके पास आज जो कुछ भी है वह कितने मनुष्यों की देन है। क्या आप एक नहीं अनेकों जीवन में भी यह सब कुछ दे सकते हैं जो अब तक आपने प्राप्त कर लिया है। शास्त्र का उपदेश है- अखण्ड ही ब्रह्माण्ड की इकाई है। फिर विश्व में लेते ही लेते रहने से काम नहीं चलेगा। देने का क्रम भी जारी रखना आवश्यक है। जो जीवन आपको प्राप्त हुआ है वह लेकर रख लेने के लिए नहीं वरन् उसे अनेकों गुना बढ़ाकर देते रहने के लिए है। दूसरे दीपों को यह ज्योति सौंपने के लिए ही वह तुम्हारे पास व अखण्ड रूप में जलती रहनी चाहिए।
धन्य हैं वे जो जीवन को प्राप्त कर उसका समर्पण दूसरों को करते हैं। उत्सर्ग करने वाला ही वास्तव में जीवन को चाहता है। उसके समक्ष जीवन अपने रहस्य स्वतः प्रकट करता है। इसलिए पूर्ण समर्पण करना ही जीवन का वास्तविक रहस्य है। हमारे पूर्वज ऋषियों ने इस रहस्य को समझ कर ही जीवन को यज्ञैवे पुरुष की उक्ति प्रदान की थी। इसमें कोई सन्देह नहीं “जीवन” विश्व यज्ञ की एक विनम्र आहुति मात्र ही है।
(श्री शम्भूसिंह कौशिक)
मनुष्य जीवन का लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है क्योंकि जीवात्मा उस परमात्मा का ही एक अंश है और अंश तब तक शान्ति को प्राप्त नहीं कर सकता जब तक वह अपने अंश में न मिल जावे। जैसे पानी का उद्गम स्थान समुद्र है। इसलिए इधर-उधर नदी नालों में भटकता हुआ अपनी जल समाधि की तलाश में छटपटाता रहता है और अपने पिता समुद्र की गोद में पहुँच कर ही शाँति की साँस लेता है। इसी प्रकार अग्नि की उत्पत्ति सूर्य से होने के कारण उसकी लपटें सदैव अपने प्रियतम से मिलने को ऊपर को लपलपाती रहती हैं चाहे उसे कितना ही नीचे झुकाया जावें। पानी और अग्नि की तरह तोता, मैना, कौआ, गाय, भैंस आदि पशु-पक्षी तथा मनुष्य भी सभी अपने अपने समूह में पहुँच कर चैन लेते हैं क्योंकि तोता तोते से मनुष्य मनुष्य से उत्पन्न होने के कारण वह उसी के पास सुखी रहता है। कोई भी तोता पिंजरे में बढ़िया दूध रोटी खाते हुए भी वहाँ सुख का अनुभव नहीं करता है जितना अपने स्वजातीय तोतों में। इसी प्रकार जीवात्मा इस संसार के नाना प्रकार के भोग साधनों को प्राप्त करके भी उतना सुख प्राप्त नहीं करता है जितना कि अपने परम पिता परमात्मा से मिलने में अनुभव करता है।
उस परम पिता परमात्मा से मिलने के लिए जीवात्मा छटपटाती रहती है और उसका निरंतर स्मरण करके ही शाँति का अनुभव करता है। जब जीव परमात्मा का स्मरण, ध्यान एवं नाम उच्चारण करता है तो उसके गुणों का भी चिन्तन करता है और उनसे आकर्षित होकर उससे मिलने के लिए तड़पने लगता है। इस जप, तप, पूजा उपासना से अन्तरात्मा में एक दिव्य घर्षण होता है। इस घर्षण की वैज्ञानिक प्रक्रिया से अन्तःकरण में एक आध्यात्मिक विद्युत उत्पन्न होती है जिसमें एक चैतन्य चुम्बकत्व सन्निहित रहता है। कुतुबनुमा की सुई पर चुम्बक होने से उत्तरी ध्रुव की तरफ की धाराएँ उस सुई को अपनी ओर आकर्षित करती रहती हैं। जब तक यह चुम्बक उस सुई पर रहता है तब तक ही उत्तरी धारा उसे अपनी ओर खींचती रहती है। इसी प्रकार जीवात्मा में परमात्मा के पूजन, भजन से उत्पन्न होता रहता है उससे प्रभावित व्यक्ति को वह परमात्मा भी अपनी ओर आकर्षित करता है अपनी गोद में बिठाता है और अपने दिव्य गुणों से उसे भर देता है। अनेक दिव्य तत्व स्वयमेव जीवात्मा में एकत्रित होते रहते हैं और परमात्मा तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। इसलिए प्रत्येक जीवात्मा को अपने परम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति, उसका पूजन, भजन, उसके गुणों को मनन चिन्तन की वैज्ञानिक क्रिया को निरंतर करते रहना चाहिए जब तक उन्नति की सीमा तक न पहुँच जावे।
प्रत्येक वस्तु के विकास की एक सीमा होती है उस सीमा तक उन्नति के लिए निरन्तर उपाय ही धीर पुरुषों का अर्थ रहा है। जीवात्मा के विकास की चरम सीमा परमात्मा का साक्षात्कार करना, अपने अन्तःकरण में परम तत्वों को धारण करना है। जिस प्रकार ‘अणु’ का अन्तिम विकास ‘विष्णु’ में मिलना, ‘अंड’ का ‘ब्रह्माँड’ बनना है उसी प्रकार जीवात्मा को अपनी पूजा उपासना द्वारा अपना विकास महात्मा, विश्वात्मा और परमात्मा बन जाता है। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए उस प्यारे प्रभु के गुणों का चिन्तन और मनन निरंतर चलते रहना आवश्यक है। ‘भृंग कीट’ के उदाहरण में जब कीड़ा निरन्तर भृंग का ध्यान करता है तो वह शरीर समेत भृंग ही बन जाता है, इसी प्रकार मनुष्य भी भगवान के स्वरूप और गुणों की चिन्तन करता हुआ उसी जैसा बन जाता है।
वह परम पिता परमात्मा सर्वव्यापक और न्यायकारी है। जब जीवात्मा उसकी पूजा उपासना करता है तो उसे उस सर्वव्यापी सत्ता का बोध होने लगता है कि वह अन्तर्यामी प्रभु सारे जड़, चेतन पदार्थों में रमा हुआ है और हमारे अच्छे बुरे कर्मों का निरीक्षण कर रहा है। इस प्रकार उसकी सत्ता पर विश्वास होने लगता है कि वह सहस्रों नेत्रों से हमारे प्रत्येक के पाप पुण्य को देख रहा है। उसके विशाल नेत्रों से कोई बात छिपाई नहीं जा सकती है। जैसे कोतवाल के समक्ष चोर चोरी करने का साहस नहीं कर सकता उसी प्रकार सर्वव्यापी परमात्मा को सर्वत्र देखकर पूजा उपासना करने वाला भी कोई पाप कर्म नहीं कर पाता। वह बुराइयों से बचने लगता है और अच्छाइयों को ग्रहण करने लगता है। ऐसे अच्छे गुणों के ग्रहण करते रहने से वह व्यक्ति समाजोपयोगी बन जाता है। समाज में ऐसे उत्तम नागरिक ही उसकी व्यवस्था ठीक रख पाते हैं। समाज की व्यवस्था बनाये रखने के लिए उत्तम व्यक्ति आवश्यक है और उनके निर्माण के लिए परमात्मा की पूजा, उपासना का प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन में स्थान होना आवश्यक है।
इस प्रकार परमात्मा के गुणों का मनन चिन्तन करते रहने से और उसके उपकारों के प्रति श्रद्धा से मस्तक झुकाने से नम्रता, मधुरता और सहिष्णुता आदि सद्गुण स्वयमेव उत्पन्न होने लगते हैं। उसके अन्तःकरण में सेवा की वृत्ति जागृत होने लगती है। वह सबको प्यार करने लगता है और सब उसको प्यार करने लगते हैं। इस प्रकार के सद्व्यवहार से वह इस लोक में यशस्वी बनकर जीवन व्यतीत करता है और मरने पर सद्गति को प्राप्त होता है। इस प्रकार लौकिक व्यवहार के लिए जो गुण आवश्यक हैं वे भी भगवान की पूजा उपासना से उत्पन्न होने लगते हैं। इसके लिए भी पूजा उपासना का जीवन में स्थान होना आवश्यक है।
शारीरिक विकास के लिए भोजन, पानी और हवा पर्याप्त मात्रा में मिलना आवश्यक है। इनके बिना शरीर का पूर्ण विकास संभव नहीं। इसी प्रकार मन का पूर्ण भोजन उत्तम विचार है। इनके अभाव में मनुष्य कुँठित हो जाता है स्वाध्याय, सत्संग, शिक्षण, चिन्तन आदि के बिना मनुष्य का मस्तिष्क पशु श्रेणी में ही बना रहता है। जिस प्रकार शरीर के लिए संतुलित भोजन, मन के लिए उत्तम विचार आवश्यक है उसी प्रकार जीवात्मा को स्वस्थ रखने, बलवान बनाने और विकसित करने के लिए नित्य प्रति भगवत् साधना का संतुलित भोजन आवश्यक है। जैसे भोजन के अभाव में शरीर का विकास रुक जाता है और उत्तम विचारों के न मिलने पर मन कुँठित हो जाता है उसी प्रकार भगवान की पूजा उपासना न करने से भी जीवात्मा की शुभ करने की प्रेरक शक्ति कुँठित हो जाती है और अपने पूर्ण विकास की स्थिति परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रह जाती है।
जीवात्मा को निर्मल बनाने पर ही दिव्य तत्वों का आभास होता है। इसलिए जिस प्रकार घर की सफाई के लिए बुहारी लगाना, कपड़ों की सफाई के लिए साबुन लगाना, शरीर शुद्धि के लिए स्नान करना आवश्यक है उसी प्रकार संसार की दुष्प्रवृत्तियों के प्रभाव से जीवात्मा पर जमा होते रहने वाले कुसंस्कारों एवं मल विक्षेपों को हटाते रहने के लिए परमात्मा के पवित्र नामों का उच्चारण और उस के गुणों का चिन्तन करना आवश्यक है। इसके बिना अन्तःकरण में जमे हुए कुसंस्कार नष्ट नहीं होते हैं। जिस प्रकार बिना चौका लगाये भोजन करना उचित नहीं है इसी प्रकार बिना परमात्मा के भजन के दैनिक जीवन प्रारम्भ करना अशुद्ध ही रहता है।
जिस परम पिता परमात्मा ने यह अमूल्य मानव देह प्रदान किया है उसके प्रति नित्य कृतज्ञता के भाव प्रकट करना हमारा परम कर्त्तव्य है। कृतज्ञता मनुष्य जीवन में एक आवश्यक गुण है। इसके अभाव में मानव ही दानव बन जाता है। जो जीव अपने पर किये गये उपकारों का बदला नहीं चुकाता और उपकारियों का कृतज्ञ नहीं रहता वह तो पशुओं से भी गिरा समझा जाता है। बहुत से पशु, नेवला, गाय, भैंस, घोड़ा, कुत्ता आदि में भी यह गुण न्यूनाधिक मात्रा में सन्निहित रहने से वे मनुष्य को प्यारे हैं। कुत्ता अपने मालिक के उपकारों के बदले में नित्य प्रति पूँछ हिलाकर, पैर चाटकर अपने कृतज्ञता के भाव प्रकट करता रहता है। जो अपने ऊपर किये उपकारों को भूल जाता है उपकारी के प्रति प्रत्युपकार की भावना नहीं रखता वह कृतघ्न कहलाता है। ऐसे लोगों की कृतघ्नियों की शास्त्रकारों ने भरसक निंदा की है। यहाँ तक कहा है कि “कृतघ्न का माँस राक्षस भी नहीं खाते हैं।” जहाँ कृतज्ञता एक उच्च कोटि का गुण है वहाँ वह कृतघ्नता निकृष्ट कोटि का अवगुण है इसी कृतज्ञता तत्व के विकास के लिए हमारे धर्म में तो चूल्हा, चक्की, कुआँ, तालाब, पेड़, बैल, हल, यहाँ तक कि कूड़े के घूरे तक का पूजन करने का विधान बताया है और समय-समय पर वह सब किया भी जाता है। माता पिता और गुरुजन जिन्होंने इस शरीर के उत्पन्न करने और पालन करने में उपकार किये हैं उनको नित्य प्रति चरण स्पर्श करके प्रणाम करके हम अपने कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हैं। जो पितृ और ऋषि शरीर त्याग चुके हैं उनके उपकारों के प्रति श्राद्ध करके हम कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हैं। युग पुरुष महात्मा गाँधी के निधन दिवस पर सभी मनुष्य उनके उपकारों के लिए उनकी दिवंगत आत्मा को श्रद्धाँजली अर्पित करके यही भाव प्रकट करते हैं। तो फिर जिस परम पिता ने यह बहुमूल्य मानव शरीर प्रदान किया और नाना प्रकार के उत्तम पदार्थ दिये हैं, उसके प्रति नित्य प्रति उसकी पूजा उपासना द्वारा कृतज्ञता न प्रकट करने पर हम कर्त्तव्यच्युत एवं कृतघ्न बन जाते हैं।
वैसे तो उस परमात्मा की कृपा सभी प्राणियों को समान रूप से प्राप्त रहती है परन्तु जिस प्रकार जो बच्चा माता को अधिक याद करता रहता है, अधिक प्यार करता है, अधिक मचलता है, उसके मिलने के लिए व्याकुलता प्रकट करता है। माता उस बालक से जल्दी मिलती है। इसी प्रकार परमात्मा से मिलने के लिए जो जीवात्मा विशेष प्रयत्न पूर्वक लालायित हो उठता है वह उसकी समीपता तथा कृपा जल्दी प्राप्त कर लेता है। जो बछड़ा अपनी माता गाय के स्तन सहलाता है उसे ही प्यार से वह दूध पिलाती है, उसी प्रकार उस परमपिता परमात्मा का अनुग्रह अमरत्व उसे ही प्राप्त हो पाता है जो उसकी नित्य पूजा, उपासना करता है, उसके कार्य करने के लिए हनुमान की तरह, अर्जुन, प्रहलाद की तरह तत्पर रहता है।
नित्य जीवन में नियमित रूप से सर्वव्यापी परमात्मा का पूजन भजन करने से जीवात्मा में सद्गुणों का विकास आरंभ होने लगता है, वह बुराइयों से बचने लगता है, उनके व्यवहार में सात्विकता बढ़ जाने से सब संतुष्ट होने लगते हैं, वह सेवाभावी बनने लगता है। फलस्वरूप उसे संसार में समुचित श्रेय एवं सम्मान भी प्राप्त होता है। कहने का साराँश यह है कि उसका समस्त जीवन पुण्यमय बनने लगता है जिसका परिणाम है सुख शाँति एवं स्वर्ग, मुक्ति। इसलिए उस परमात्मा की पूजा उपासना करके अपनी आत्मा में दिव्यतत्वों का विकास करना ही इस मानव जीवन का लक्ष्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आत्मा का भोजन - भजन करने के पश्चात् ही शरीर का भोजन करना सार्थक है। इसीलिए तत्व दर्शियों की एक महत्वपूर्ण उक्ति ध्यान रखने ही योग्य है कि - “भोजन उसी को करना चाहिए जो भजन करता है।”
(श्री सन्त साहबदास)
कबीर साहब वेदान्त मत को गलत बतलाते थे। अर्थात् वे यह मानने को तैयार नहीं थे कि जीव और ब्रह्म एक ही हैं। क्योंकि ऐसा होने पर फिर उपासना, भक्ति, पूजा आदि की आवश्यकता ही जाती रहती है और मनुष्य में झूँठा अभिमान घुस जाता है कि हम तो ब्रह्म हैं, इसको साँसारिक नियमों और लौकिक प्रथाओं के मानने की क्या जरूरत है। इससे लोगों में उच्छृंखलता और कर्त्तव्य हीनता की प्रवृत्ति बढ़ती है। नीचे के पद में उन्होंने अपने ढंग से ऐसे ब्रह्म ज्ञानियों का खण्डन किया है-
बूझि लीजै ब्रह्मज्ञानी।
घोरि-घोरि वर्षा बरसावै, पुरिया बुन्द न पानी॥ 1॥
चींटी के पग हस्ती बाँधै, छेरी वीगै खायो।
उदधि माहँ ते निकसि छाँछरी, चौड़े गेह करायौ॥2॥
मेढुक सर्प रहै इकसंगै, बिल्ली श्वान वियाही।
निप उठि सिंह सियार सों जूझै, अद्भुत कथा नजाही॥3॥
संशय मिरगा तन मन घेरे, पारथ बाना में लै।
सायर जरै सकल वन डाहै, मच्छ अहेरा खेलै॥4॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना, को यहि ज्ञानहि बूझै।
बिन पंखे उड़ि जाहि अकाशै, जीवहि मरण न सूझै॥5॥
(1) ब्रह्म ज्ञान के फैलाने वाले गुरु लोग नये- नये ग्रन्थों को बनाकर लोगों को यह समझाने की बेहद चेष्टा कर रहे हैं कि ब्रह्म, जीव, माया सब एक ही है। उनकी वाणी वर्षा के समान शिष्य गण के बीच बरसती है, पर किसी के ऊपर एक बून्द पानी भी नहीं गिरता, अर्थात् उनमें से कोई भी ब्रह्म नहीं बन सका।
(2) चींटी का तात्पर्य बुद्धि से है क्योंकि वह चींटी के समान सूक्ष्म से सूक्ष्म विषयों में प्रवेश कर जाती है और हाथी कहते हैं मन को, जैसे अनेक जगह लिखा है “मन-मतंग मानै नहीं”। पर बुद्धि ही मन का संचालन करती है। छेरी (बकरी) का तात्पर्य है माया से, उसने बीगा (भेड़िया) रूपी जीव को खा लिया। वास्तव में तो जीव का यह कर्त्तव्य था कि वह माया का नाश कर देता, पर माया ने उसे अपने प्रभाव में फँसाकर अपना अनुगामी बना लिया। इस विश्व रूपी समुद्र से निकल कर जीव ने इस विस्मृत जगत में माया द्वारा अपना घर बनवा लिया अर्थात् वह अपने आत्मरूप को भूलकर साँसारिक प्रपंचों में फँस गया।
(3) यह संसार कैसा है कि जहाँ मेंढक रूपी जीव और सर्प रूपी काल एक साथ रहते हैं। काल बराबर शरीरों को खाता रहता है और मेंढकों की तरह नये-नये शरीर उत्पन्न होते रहते हैं। बिल्ली से आशय है मनुष्य की मानसिक वृत्ति का, क्योंकि जैसे बिल्ली गारस (दूध दही आदि) को ढूँढ़कर खाती रहती है इसी प्रकार मन भी रस पूर्ण विषयों में लीन रहना पसन्द करता है। श्वान का अर्थ है साँसारिक आनन्द और भोग से, हमारी मानसिक वृत्तियाँ उसी में लग जाती हैं अर्थात् वे एक दूसरे से विवाहित अथवा सम्बन्धित हो जाते हैं। फिर यह संसार कैसा है कि यहाँ सदैव ज्ञान रूपी सिंह को अज्ञान रूपी सियार दबा देता है। इस प्रकार संसार की वास्तविक दशा को देखने से जान पड़ता है कि ब्रह्मज्ञानियों की बातें केवल जबानी जमा खर्च है। उनके द्वारा कोई मनुष्य ब्रह्म रूप नहीं बन रहा है बल्कि और भी अधिक प्रपंच में फँस रहे हैं।
(4) इस मानव शरीररूपी वन में संशय रूपी हिरन फिर रहे हैं। उनको मारने के लिए पारथ अर्थात् गुरु लोग ब्रह्मज्ञान रूपी बाण चलाते हैं। पर उनकी वाणी से संशय तो दूर नहीं होते हैं उल्टा सायर अर्थात् मनुष्य में स्वाभाविक रूप से पाया जाने वाला विवेक और सद्ज्ञान नष्ट हो जाता है। जब गुरुओं के शिष्य वही विपरीत ज्ञान दूसरे लोगों को देते हैं तो वे भी वनों की तरह जल जाते हैं। इस प्रकार लोगों को भगवान का ज्ञान जो होना था वह न हो सका तो जीव काल रूपी मगरमच्छ के शिकार बन जाते हैं।
(5) कबीर साहब कहते हैं कि यह संसार बड़ा अद्भुत है और ब्रह्म भी अद्भुत है। इन दोनों के सम्बन्ध में जिनको यह ज्ञान हो गया है कि ये भ्रम मात्र हैं, ऐसे पुरुष संसार में कदाचित् ही दिखने में आते हैं। पर जो बिरले मनुष्य इस बात को समझ लेते हैं कि यह मन और माया दोनों धोखे की बातें हैं अर्थात् इन्हीं के कारण मनुष्य संसार सागर में और नाना योनियों में भ्रमण करता फिरता है, वे मनुष्य फिर सहज में इससे उड़ जाते हैं अर्थात् इस के बाहर निकल कर भगवान को प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ कुछ लोग शंका करेंगे कि वह बिना पंख के कैसे उड़ सकेंगे तो कबीर साहब बतलाते हैं कि उपासना दो प्रकार की होती है। एक बन्दर के बच्चे की सी, जो स्वयं ही अपनी माता को पकड़े रहता है। उसी प्रकार ऐसा व्यक्ति भी नाना प्रकार के शास्त्रों से विचार करके और असत्व सिद्धान्तों का खण्डन करके स्वयं ही अपने उपास्यदेव को प्राप्त करता है। दूसरी उपासना बिल्ली के बच्चे की सी होती है, जो सब से नाता तोड़ कर केवल अपनी माता की आशा लगाये रहता है। वह बिल्ली जहाँ ठीक स्थान देखती है वहीं अपने बच्चे को उठा कर ले जाती है। उसी प्रकार जो जीव वेद, शास्त्र सबको छोड़ कर और किसी के खण्डन -मंडन में ध्यान न देकर केवल यह निश्चय कर लेता है कि मैं भगवान् का हूँ वे ही मेरा कल्याण करेंगे, उसको भगवान ही हंस रूप बना कर अपने लोक में ले जाते हैं।
इस प्रकार कबीर साहब ने “अहं ब्रह्मास्मि” न कह कर साँसारिक कर्तव्यों से दूर हटने वाले लोगों का खण्डन करके यह सिद्ध किया है कि कोरी ब्रह्मज्ञान की बातों से न तो संसार का काम चल सकता है और न जीव का उद्धार हो सकता है। उसका परम कर्तव्य यही है कि भगवान पर दृढ़ भरोसा रखकर उनकी आज्ञाओं के अनुसार सत्कर्म करता रहे। तभी उसका उद्धार होना सम्भव है।
(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए., पी. एच. डी.)
मन का भाव दब कर मन की एक ग्रन्थि बन जाता है। जो व्यक्ति अनेक मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं उसका कारण यह दबे हुए नाना प्रकार के कुँठित भाव ही हैं। बचपन की किस कटु अनुभूति के कारण ये दलित भाव दुःख और व्याधि के कारण बनते हैं और मनुष्य को परेशान किए रहते हैं।
क्रोधी, चिड़चिड़ी, बात बात में झगड़ने वाली कर्कशा नारी के बिगड़े हुए स्वभाव का कारण बचपन में उस पर नाना प्रकार के दमन हैं। कठोर व्यवहार भी विकसित होकर गुप्त भावना ग्रन्थि का रूप धारण कर लेता है। जो नारी या पुरुष बच्चों को घृणा करता है, उसका कारण यह है कि उसमें मातृत्व या पितृत्व के सहज स्वाभाविक भाव पनपने नहीं पाये हैं। अनेक पाश्चात्य अविवाहित नारियाँ पालतू कुत्तों तथा बिल्लियों को अपने पास रखती हैं, उनका प्रेम से चुम्बन करती हैं और अपने मातृत्व के सहज वात्सल्य का माधुर्य लूटती हैं। जो कोमल स्नेह नारी की प्राकृतिक सम्पदा है जिससे मानव शिशु पलता - पनपता है, वह कुत्ते बिल्लियों पर न्यौछावर कर के तृप्त किया जाता है। वात्सल्य और प्रेम की इन भावनाओं को निकालने से पाश्चात्य नारियाँ कृत्रिम मातृत्व के सुख का अनुभव करती हैं तथा मन में आह्लादित रहती हैं।
जिन पुरुषों तथा नारियों में इस प्रकार की अन्य अनेक इच्छाएँ कुँठित पड़ी हैं, वे समाज के भय से दलित होकर मन में कुण्ठा उत्पन्न कर सकती हैं। महत्वाकाँक्षा, प्रसिद्धि, महत्ता आदि न मिलने से मनुष्य चोर, डाकू या शैतान बन सकता है। नारियों की सेक्स भावना अतृप्त रहने से उनमें हिस्टीरिया, प्रमाद, चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो सकते हैं। अतः मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक स्वस्थ स्त्री पुरुष का अवरुद्ध भावनाओं को निकालने के मार्ग ढूँढ़िये। ऐसी नारियाँ समाज सेवा में तन मन लगा कर अपने हृदय का भार हलका कर सकती हैं अथवा यतीम खाने के अनाथ बच्चों की देख रेख, प्यार, सेवा, पालन, पोषण, सेवा, सुश्रूषा कर मातृत्व की सहज वृत्ति की तृप्ति कर सकती हैं। उन्हें चाहिए कि वे गरीबों की बस्तियों की ओर निकल जाया करें। वहाँ के अर्द्धनग्न और भूखे बच्चों की देख रेख किया करें। उन्हें स्नान करायें और स्वच्छ वस्त्र धारण करायें, उनके साथ खेलें, गायें, बातचीत करें। इस प्रेम से गुप्त भावनाओं को निकालने का स्वस्थ मार्ग मिलता है जो मानसिक स्वास्थ्य और सुख के लिए अमृत तुल्य है। आपके मन की कोई भी भावना, यदि अतृप्त है तो मानसिक संस्थान में भावना ग्रन्थि (काम्लेक्त) उत्पन्न करेंगी और नाना मनोविकारों में प्रस्फुटित होंगी। वह हमारे गुप्त प्रदेश में बाहर निकलने और तृप्ति प्राप्त करने के अवसर देखा करती हैं। जो उसे निर्दयता से कुचल डालते हैं, वे मानसिक रोगों के शिकार बनते हैं।
सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जाता है। औरतों में हिस्टीरिया, मिर्गी, पागलपन, त्वचा रोग हो जाते हैं। पुरुष गन्दी गालियाँ देते हैं। इस भावना का उदात्तीकरण ही उचित है। उच्च साहित्य के अध्ययन, भजन कीर्तन, पूजन, काव्य-निर्माण, चित्रकारी, समाज सेवा के नाना कार्यों द्वारा वृत्ति को तृप्त किया जा सकता है।
वह लड़का, जो छोटे जानवरों को पीटने या सताने में आनन्द लेता है, वास्तव में अपने छिपे पौरुष और शासन करने के भाव को गलत तरीके से प्रकट कर रहा है। इस मार्ग पर चलते-2 संभव है वह एक मारने पीटने वाले दुष्ट व्यक्ति के रूप में पनप जाये। इसके विपरीत यदि वह अपनी इन्हीं भावनाओं को सुनियंत्रण करे, तो एक नेता, सैनिक, सर्जन बन सकता है। जो बच्चे छोटे-2 खिलौने या खेलने के नए-2 आविष्कार करते रहते हैं, वे उन्हीं भावनाओं का विकास कर अच्छे इंजीनियर या वैज्ञानिक बन सकते हैं।
मान लीजिए एक युवक का विवाह उसकी प्रेमिका से तय हो चुका है। उसे उसमें नई प्रेरणा मिली है और वह नए जोश से अपना काम करने में लगा हुआ है। अक्समात वह सम्बन्ध टूट जाता है। उसे भारी निराशा का धक्का लगता है। संभव है आवेश में आकर वह आत्म हत्या कर डाले या किसी विध्वंसात्मक प्रवृत्ति में लग कर प्रतिशोध लेने पर उतारू हो जाय। यह भाव का गलत विकास है। इससे स्वयं उसके भी मस्तिष्क और शरीर को क्षति होगी। उसे किसी प्रिय कार्य में पूरी तरह प्रवृत्त होकर, तन्मय होकर आत्म-विस्मृति करनी चाहिए। भावात्मक शक्ति को उत्पादक मार्ग देना चाहिए जिससे स्वयं उनका और समाज का कुछ हित हो सके। महाकवि तुलसीदास, भक्त प्रवर सूरदास, प्रेम दिवानी मीराबाई, भावविह्वल भक्त कबीर, गुरु नानक आदि की भावनाएँ शाश्वत कवि के रूप में प्रवाहित हुई जिनसे युग दिव्य प्रेरणाएँ आज भी ले रहा है। तुलसी का प्रेम ईश्वरीय शक्ति के यशोगान में लगा, सूर के भजनों में आज भी उनकी आत्मा के दर्शन मिलते हैं। ये महामानव स्वयं अपने कार्य से ही प्रेम करने लगे थे। इन्होंने रुके हुए गुप्त भावों को प्रकट होने का स्वस्थ रूप दिया। हम स्वयं भी अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए मनोनुकूल इच्छानुरूप, माध्यम ढूँढ़ सकते हैं।
आत्म-निरीक्षण कर देखिए कि किस प्रकार की भावात्मक शक्ति आप में जमी पड़ी है? और उसके विकास का सबसे स्वस्थ रूप क्या हो सकता है? किससे आपकी आन्तरिक तृप्ति होती है? क्रोध का ज्वालामुखी, घृणा का तूफान, आवेश की सुलगती अग्नि मनोनुकूल प्रिय कार्यों से लगने से शान्त होती है। जिस भावना से सम्बन्धित रुकी हुई शक्ति हो, उसके अनुकूल ही रुचिकर उत्पादक प्रिय कार्य का चुनाव कीजिए। इन माध्यमों पर सही सफलता निर्भर है।
हमें अपने एक उत्पातकारी विद्यार्थी की स्मृति आज भी हरी है। वह कालेज आते हुए बाग के पेड़ और फल तोड़ता, मालियों को परेशान करता, छोटे विद्यार्थियों को पीटता था। सभी उससे तंग थे। पढ़ने में उसका किंचित भी मन न था। उसे फौज में जाने की सलाह दी गई। वही पेशा उसके कठोर भावों के अनुकूल पड़ता था। विद्यार्थी ने राय मान ली। आज वही उत्पातकारी विद्यार्थी अच्छा जनरल है। फौजी जीवन की कठोरताओं में भी सफलता प्राप्त करता जा रहा है। जब तक उसे अपनी रुचि, प्रकृति, स्वभाव, संस्कारों के अनुकूल क्षेत्र नहीं मिला, तभी तक वह शरारती रहा। अपना क्षेत्र मिलते ही, वह द्रुतगति से आगे बढ़ने लगा। अभी सफलता तो तभी मिली हुई समझिये जब मनुष्य अपने मनोनुकूल क्षेत्र पा ले।
जीविका उपार्जन के बाद किसी दूसरे प्रिय आनन्ददायक, प्रेरणाप्रद, मनोरंजक कार्य में तन्मय हो जाने से अवरुद्ध मनोग्रन्थियों को खुलने और बचपन तक की भावात्मक शक्ति को बाहर निकलने का स्वस्थ अवसर मिलता है।
अपने से पूछिए क्या मैं अपने भावों को ठीक तरह पहचानता हूँ? जब मैं क्रोधित हो उठता हूँ तो क्या उसमें दूसरे का कसूर होता है या यह स्वयं मेरी भावात्मक कमजोरी है? मेरे व्यक्तित्व में वह छिपा हुआ भाव कौन सा है, जो प्रायः मुझे परेशान किया करता है? क्या मैं उसे किसी उत्पादक शुभ कार्य की ओर मोड़ सकता हूँ?
निश्चय जानिये, आपको अपनी भावना के उदात्तीकरण का कोई न कोई स्वस्थ मार्ग अवश्य मिल जायगा। यह मनुष्य के स्वयं अपने आपको अध्ययन करने, स्व परीक्षा द्वारा अपनी गुप्त रुचि का ज्ञान प्राप्त करने तथा मन की नाना क्रियाओं को देखने से सम्बन्ध रखता है। आप खुद ही अपनी मनोवृत्तियों की दिशा तथा प्रवाह को पहचान सकते हैं। भावनाओं के प्रवाह में केवल यह ध्यान रखिए कि वह दिशा स्वस्थ, सुन्दर और समाज के लिए कल्याणकारी हो, जन हितकारी हो। आपका भी लाभ हो तथा अधिक जनता का हित साधन हो। विषय वासना की कलुषितता तथा दुर्गन्धि से उसका सम्बन्ध तनिक भी न हो। आपका चुना हुआ मार्ग नैतिक हो और आपके अन्दर के देवता को जगाने वाला हो। उसके प्रति आपका उत्साह सदा ही बना रहे और उससे आपकी मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ सतत जागृत और विकसित होती रहें।
(श्री दौलतराम कटरहा दमोह)
शिवपुराण में एक कथा आई है कि एक बार विष्णु और ब्रह्मा में बड़ाई छोटाई का झगड़ा उठा। फल-स्वरूप दोनों युद्ध - भूमि में उतर आए। शिवजी ने ऊपर नीचे अपरिमित विस्तार वाले अग्नि-स्तम्भ के रूप में अवतीर्ण होकर मध्यस्थता की। अग्नि-स्कंध का पता लगाने विष्णु नीचे की ओर और ब्रह्मा ऊपर की ओर चले। ऊपर जाते हुए ब्रह्मा को मार्ग में केतकी - पुष्प मिला। उसने ब्रह्मा से कहा कि वह स्वयं स्तम्भ के बीच से गिरकर स्तम्भ के अंत का पता लगाने वर्षों से नीचे की ओर गिरता चला जा रहा है परंतु अंत का पता नहीं लगता। तब ब्रह्मा ने केतकी पुष्प से कहा कि तू मेरे साथ चलकर साक्षी भर देना कि हमने स्तम्भ के ऊपरी सिरे का पता लगा लिया है। इधर विष्णु नीचे की ओर स्तम्भ के अन्त का पता न पाकर वैसे ही लौट आए। जब विष्णु और ब्रह्मा वापस लौटने पर पुनः मिले तो ब्रह्मा ने ऊपरी सिरे का पता पा लेने की बात कही और केतकी ने साक्षी दी। विष्णु ने सरल हृदय होने के कारण ब्रह्मा के कथन पर कोई आपत्ति नहीं उठाई और ब्रह्मा का वाक्य सत्य मानकर उनका अभिनन्दन किया। पर शिवजी को ब्रह्मा की कुटिलता अच्छी नहीं लगी। जहाँ वे विष्णु के हृदय की ऋजुता (आर्जव, सरलता) से अत्यन्त प्रसन्न हुए वहाँ उन्होंने ब्रह्मा की खूब भर्त्सना भी की और उन्हें दण्डित भी किया। उन्होंने साकार रूप धारण कर विष्णु से कहा कि तुम ईश्वरत्व चाहते हुए भी सत्य पालक हो अतएव जगत में तुम्हारी मूर्ति प्रतिष्ठित होगी और तुम्हारी उपासना प्रचलित होगी।
पौराणिक कथा साहित्य को कपोल कल्पित मानने वालों से भी मैं उपर्युक्त कथा के अंतिम अंश से सार ग्रहण करने के लिए निवेदन करूंगा। विष्णु विजय और ईश्वरत्व चाहते हुए भी सत्य पालक थे। शिव ने भी उनकी सराहना की। विजय और ईश्वरत्व चाहते हुए भी हम सत्य-पालन को विशेष माने, उसे ही प्राथमिकता दें, कथा के इस संदेश मात्र को हम यहाँ से स्वीकार करें।
मनुष्य जब कोई कार्य करने के लिए अग्रसर होता है तब उसे अनेक प्रलोभनों का सामना करना पड़ता है। उसके अंतर्हृदय में ही एक द्वन्द्व उठ खड़ा होता है कि आखिर मैं किस पक्ष का वरण करूं। ऐश्वर्य चाहने वाले को असत्य का अवलम्बन करने का प्रलोभन होता है किन्तु जब ऐश्वर्य की कामना उसे सत्य से विचलित नहीं कर पाती, जब वह सत्य पर दृढ़ या अडिग रहता है तब उसके हृदय का देवत्व उसके हृदय में घुसे हुए असुरत्व पर विजयी होता है और वह व्यक्ति महान बन जाता है। दानत्व पर देवत्व की विजय ही महान बनने की प्रक्रिया है। विष्णु ने भी विजय और ईश्वरत्व के प्रलोभन पर विजय पाई अतः वे त्रैलोक्य में पूज्य बने।
जो भी व्यक्ति संसार में महान बनता है वह प्रलोभनों पर विजय पाने के अनन्तर ही महान बनता है। प्रलोभनों पर जितनी ही बड़ी उसकी विजय होती है उतना ही अधिक वह महान भी होता है। वस्तुतः प्रलोभनों पर विजय ही मनुष्य ही महानता की कसौटी है। महापुरुषों के जीवन की उपलब्धियों का हमें इसी कसौटी पर कसकर आँकना चाहिए। हम यहाँ प्रातः स्मरणीय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के लोकोत्तर चरित को इस कसौटी पर कस कर देखें और उनके चरित्र से अनुपम शिक्षा ग्रहण करें।
पिता दशरथ राम को राज्य देने का प्रस्ताव करते हैं किंतु माता कैकेयी इस प्रस्ताव का जोरदार विरोध करती हैं। अब राम के सामने राज्य का प्रलोभन है, माता कौशल्या को सुखी देखने का प्रलोभन है, पिता की जीवन - रक्षा का प्रलोभन है और अन्य स्वजनों को वियोग - जन्य दुख से दूर रखने का प्रलोभन है किंतु वे नर - श्रेष्ठ इन प्रलोभनों पर सहज ही विजय प्राप्त कर लेते हैं और लक्ष्मण से दृढ़ता पूर्वक कहते हैं --
यस्याः मदभिषेकार्थे मानसं परितप्यति
माता नः सा यथा न स्यात्सविशंका तथा कुरु॥
तस्याः शंकामयं दुःखं मुहूर्तमपि नोत्सहे
मनसि प्रति संजातं सौमित्रऽहमुपेक्षितुम्॥
वाल्मीकीये 2-22-67
“मेरे अभिषेक से जिसके मन में कष्ट हो रहा है वह हमारी माता कैकेयी जिस प्रकार शंकित न हों वैसा करो। उसके मन में शंका से भी उत्पन्न दुःख की उपेक्षा एक क्षण के लिए भी मैं नहीं कर सकता।” रामचन्द्र तो सत्य पर इतने दृढ़ हैं, राज्य के प्रलोभन पर इस तरह विजय पाए हुए हैं कि उस के लिए भाई भरत का तनिक भी विरोध नहीं करना चाहते। वे भाई भरत पर हाथ उठाने की कौन कहे संसार के किसी भी प्राणी पर अन्याय पूर्वक हाथ नहीं उठाना चाहते। वे अपना व्यक्तिगत अधिकार विसर्जित करने को सदैव तैयार हैं पर किसी अन्य के अधिकार का अपहरण भी नहीं करना चाहते। वे चाहते तो वनवास के कष्टों को न भोगकर, किसी भी राजा का राज्य हड़प कर अथवा कोई प्रिय कार्य कर सहज ही राज्य सुख भोगते किन्तु इन्द्रिय-गत सुखों के प्रलोभन पर उनकी विजय इतनी महान थी कि उनके सरल हृदय ने इस बात की कभी कल्पना तक न की। एक अन्य प्रसंग पर उन्होंने लक्ष्मण से कहा-
नेयं मम मही सौभ्य दुर्लभा सागराम्बरा।
नहीच्छयम धर्म्मेण शक्रत्वमपि लक्ष्मण॥
वाल्मीकीये 2- 97-7
“समुद्र से घिरी हुई यह पृथ्वी मेरे लिए दुर्लभ नहीं है पर अधर्म के द्वारा तो इन्द्र का भी पद मैं नहीं चाहता।” राम अधर्म के प्रलोभन से इस प्रकार दूर खिंचे हुए हैं कि वे ब्राह्मण श्रेष्ठ जाबालि को उत्तर देते हुए कहते हैं -
नैव लोभान्न मोहाद्वा न चाज्ञानात्तमोन्वितः।
सेतुँ सत्यस्य भेत्स्यामि गुरोः सत्य प्रतिश्रवः॥
वाल्मीकीये 2।106।17
“लोग मोह या अज्ञान- रूप तुम्हारे द्वारा प्रेरित होने पर भी सेतु के समान पिता के सत्य का मैं त्याग नहीं करूंगा क्योंकि मैं सत्य प्रतिज्ञ हूँ”। इस प्रकार हम देखते हैं कि राम किसी भी प्रलोभन में आकर न्याय मार्ग से विचलित होना नहीं जानते। संपूर्ण प्रलोभनों पर उनकी विजय पूर्ण है। वे कदाचित असद् ग्राही नहीं है अर्थात् बुरे उपायों से किसी भी वस्तु का संग्रह करने वाले नहीं हैं। उनमें हम विष्णु के समान ही प्रलोभनों पर विजय पाने की क्षमता पाते हैं अतएव हम इस दृष्टि से उन्हें विष्णु का अवतार कह सकते हैं। उनका पुण्य चरित्र हमें यह सीख देता है कि किसी भी प्रलोभन में आकर हमें असौम्य मार्ग का अवलम्बन नहीं करना चाहिए।
मनुष्य के सौम्य आचरण का प्रभाव उन सभी व्यक्तियों पर पड़ता है जो उससे संपर्क रखते हैं। उसका विशेष प्रभाव तो उन बंधु-बाँधवों व मित्रों पर पड़ता है जो उसके निकट संपर्क में रहते हैं। फिर उसके निकटतम संपर्क में रहने वाले पुत्र पुत्रियों पर उसकी जीवन-चर्चा के प्रभाव का क्या कहना। अज्ञात-रूप से वे अनायास ही अपने माता-पिता की जीवन-चर्या को और उनके चरित्र-गत उत्तम संस्कारों को आत्मसात् कर लेते हैं, अपने स्वभाव व चरित्र में उतार लेते हैं और इस तरह उत्तम संस्कारों का उत्तराधिकारी होने से उनका जीवन भी अधिकाधिक समृद्ध और उज्ज्वल होता है। इस तरह उत्तम आचरण करने वाले सदाचारशील व्यक्ति को उत्तम संतान के रूप में अपने त्याग और तपस्या का सुफल मिलता है। यदि महापुरुषों के माता- पिता और पूर्व पुरुषों के जीवन पर एक दृष्टि डाली जाय तो पता चलेगा कि उनके माता पिता अथवा पूर्वजों को वे उनकी तपस्या के परिणाम स्वरूप ही प्राप्त हुए। दूसरे शब्दों में हम कदाचित यह भी कह सकते हैं कि महापुरुषों का उत्कर्ष उनके माता पिता अथवा पूर्वजों की तपस्या और आत्म-त्याग के कारण ही हुआ। कहा भी है --
“बाढ़ै पूत पिता के धर्मा,
खेती उपजै अपने कर्मा”।
हमारी यह धारणा तब और भी अधिक दृढ़ हो जाती है जब हम गंभीरतापूर्वक इस बात पर विचार करते हैं कि किसी भी चरित -हीन या कुसंस्कारी व्यक्ति की संतान तेजस्वी नहीं बनी और किसी भी तेजस्वी पुरुष के पूर्व पुरुषों में उत्तम संस्कारों का अभाव नहीं रहा।
आज के युग को भौतिक वाद का युग कहा जाता है। लोग अज्ञान वश कहते हैं कि बेईमानी खूब फलती फूलती है और ईमानदारी की रोटियों के लाले पड़ते हैं। दुर्भाग्यवश जनता बिलकुल भूली हुई है कि बेईमानी का उन पर तथा उनकी संतान पर कैसा घातक प्रभाव पड़ता है। इस संबंध में मैं अपनी ओर से कुछ न कह कर अमेरिका के आदरणीय विलियम डेविट हाहड डी.डी. के विचार उनकी “प्रेक्टिकल इथिक्स” से उद्धृत कर देना अधिक उपयुक्त समझता हूँ। “बेईमानी की प्रवृत्ति मनुष्य की नैतिक चेतना को इतनी अधिकता से हजम कर जाती है कि उसके कारण व्यक्ति की संतान में भी मानसिक और नैतिक दुर्बलता आ जाती है। अनुवाँशिकता का वैज्ञानिक अध्ययन यह बताता है कि बेईमानी की प्रवृत्ति से व्यक्ति का जो पतन एवं ह्रास होता है वह अनेक प्रकार की विकृतियों के परिणामों की अपेक्षा कहीं अधिक घातक एवं गंभीर होता है। एक बेईमान व नीच प्रकृति के व्यक्ति के पुत्र अथवा पुत्री के विकास में पिता - माता के संस्कारों द्वारा प्राप्त उनकी पाप - प्रवणता एवं असामाजिक प्रवृत्ति सतत् बाधक सिद्ध होती है और इसका मुआवज़ा (परिहार) पिता द्वारा विरासत में दी गई किसी भी धन राशि से नहीं हो सकता”। एक अन्य लेखक माडस्ली का आदरणीय हाइड महोदया उद्धरण देते हैं जिसमें वह लिखता है कि “यदि मैं इस संबंध में अपने निरीक्षण के परिणामों पर विश्वास करूं तो मैं ऐसे किसी अन्य व्यक्ति को नहीं जानता जिसके द्वारा अपनी संतान में पागलपन पैदा किए जाने की उतनी संभावना है जितनी कि उस व्यक्ति के द्वारा जो अपने व्यवहार में अत्यन्त संकीर्ण स्वार्थी, संशयालु कपटी, दूसरों को धोखा देने वाला है और जो कभी अपने अन्तःकरण तथा अपने साथियों के साथ एकात्मता, ईमानदारी और सच्चाई के संबंध स्थापित नहीं कर पाता। ऐसी प्रवृत्ति के माता-पिताओं में अन्य विकारों से वस्तुतः माता पिताओं की अपेक्षा अपनी संतान से पागलपन उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है क्योंकि ऐसे माता-पिताओं की संपूर्ण नैतिक चेतना रुग्ण एवं दूषित हो जाती है और वह उनके स्वभाव में बहुत भीतर उतर कर किसी विशेष विकृति की अपेक्षा अधिक घातक सिद्ध होती है।”
हमारे दीर्घ-दर्शी ऋषियों ने शायद इसी से सचाई, सरल स्वभाव और निष्कपट आचरण पर बहुत जोर दिया है। पिप्पलाद ऋषि (प्रश्नोपनिषद् में) सरलता और निष्कपटता की महिमा बखानते हुए कहते हैं “तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति” (अध्याय 1- मंत्र 16) “अर्थात्” जिनमें कुटिलता, अनृत मायाचार (कपट) नहीं हैं उन्हें ही यह विशुद्ध ब्रह्मलोक प्राप्त होता है” सत्य की प्रशंसा से ऋषि ने कहा है। “तेषामसौ ब्रह्म लोको येषाँ तपो ब्रह्मचर्य्यं, येषु सत्य प्रतिष्ठितम्” (अध्याय 1-मंत्र 15) अर्थात् “जिनमें कि तप और ब्रह्मचर्य है तथा जिनमें सत्य स्थित है उन्हीं को यह ब्रह्म लोक प्राप्त होता है”।
धन के लिए कुटिल व असत्यपूर्ण साधनों का अवलम्बन मनुष्य को लेते देख सहज ही प्रश्न उठ सकता है कि आखिर मनुष्य किस प्रेरणा से ऐसा करता है? मैं सोचता हूँ कि मनुष्य अपने व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से ऐसा बहुत कम करता है। मनुष्य अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए या संतान के सुख के विचार से ही अधिकतर ऐसा अपयशकर उपाय अपना कर पैसा कमाता है। किंतु मनुष्य यह भूल जाता है कि न्याय पूर्ण साधनों से हट कर कमाया हुआ धन तो उस हीरे की कनी के समान है जिसके साथ खेलते-खेलते कोई बालक उसे अपने मुँह में रख लेता है। और मृत्यु की गोद में सो जाता है। अन्याय से धन अर्जित करने वाले की भी प्रायः आध्यात्मिक मृत्यु हो जाती है और उस धन से जो भी लोग पलते हैं उन सबका भी उस कृत्य का समर्थन व अनुमोदन करने से प्रायः आध्यात्मिक अंत हो जाता है, जो भी व्यक्ति चाहता हो मेरी संतान वीर्यवान तेजस्वी, आयुष्मान्, यशस्वी, विद्वान् बलवान्, धनवान एवं भाग्यवान बने उसे चाहिए कि वह अन्यायोपार्जित धन को चौथ के चन्द्रमा के समान ही त्याग दे। संतान को अन्याय की कमाई खिला खिला कर हम कभी महान् नहीं बना सकते। प्रत्युत साधारण परिस्थिति के दंपत्ति भी यदि न्याय पर आरुढ़ रहें अथवा अन्य किसी चरित्र वर्द्धक व्रत का अनुष्ठान करें तो वे भी असाधारण संतान को जन्म दे सकते हैं। यज्ञ व तप से श्रेष्ठ संतति प्राप्त होती है यह बात अनुभव - सिद्ध है। अत्यन्त साधारण स्थिति के माता - पिता ने ही तो अपने स्वभाव को ऋजुता के कारण महादेव गोविन्द रानाडे और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे नर-रत्नों को अपने पुत्र- रूप में पाया था। किंतु जिन लोगों को यह विश्वास रहा कि “धन तो बड़ा बने रहेंगे” वे सच्चे अर्थों में न कभी स्वयं बड़े बने और न उनकी संतान ही बड़ी बनती देखी गई। ऐसे लोग सचमुच सदा जीते रहे अर्थात् जीवित भी रहे और विजयी भी बने रहे।
(श्री लक्ष्मीनारायण टंडन ‘प्रेमी’)
अपने वर्तमान से अधिकाँश मनुष्य संतुष्ट नहीं होते हैं। जो वस्तु अपने अधिकार में होती है उसका महत्व, उसका मूल्य हमारी दृष्टि में अधिक नहीं दीखता। वर्तमान अपने हाथ में जो होता। अपने गत जीवन की असफलताओं का भी रोना वे यही कह कर रोया करते हैं कि हमें भगवान या भाग्य ने अच्छे अवसर ही नहीं दिए अन्यथा हम भी जीवन में सफल होते। ऐसा कहना उनकी अज्ञानता है। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अनेक ऐसे अवसर आते हैं जिनसे वह लाभ उठा सकता है। पर कुछ लोग अच्छे और उचित अवसर को पहिचानने में ही अक्षम्य होते हैं। ठीक अवसर को भलीभांति पहचानना तथा उससे उचित लाभ उठाना जिन्हें आता है जीवन में सफल वे ही होते हैं। पर यह भी सत्य है कि अच्छे अवसर प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अनेक बार आते हैं। अब हम उन्हें न पहचान पावें या पहचानने पर भी उनसे उचित लाभ न उठा पावें तो यह हमारा अज्ञान है। एक पाश्चात्य विद्वान का कहना है “अवसर के सर के आगे वाले भाग में बाल होते हैं, सर के पीछे वह गंजा होता है। यदि तुम उसे सामने से पकड़ सको, उसके आगे बालों को, तब तो वह तुम्हारे अधिकार में आ जाता है, पर यदि वह किसी प्रकार बचकर निकल गया तो स्वयं जुपिटर भी चाहें तो उसे पकड़ नहीं सकते।” एक उर्दू शायर ने भी कहा है - “गया जो वक्त (समय या अवसर) वह फिर कर नहीं आता, नहीं आता, न पाओगे, न पाओगे, कहीं देखो, कहीं ढूंढ़ो।”
आपको अनेक ऐसे मनुष्य मिलेंगे जो बिना सोचे-समझे यह कह देते हैं कि फलाँ - फलाँ को जो जीवन में सफलतायें मिली वह इत्तफाक के कारण। घटनावश उनका भाग्य उनके ऊपर सदय हो गया और यह इत्तफाक है कि आज सफलता पाकर वे इतने बड़े हो सके। पर सच पूछा जाय तो इत्तफाक से प्रायः कुछ नहीं होता। संसार के समस्त कार्यों के पीछे कार्य - कारण-सम्बन्ध होता है। और यदि इत्तफाक से ही वास्तव में किसी को सुअवसर प्राप्त हो जाता है, तो भी हम न भूलें कि यह बात हमें ‘अपवाद’ के अंतर्गत रखनी चाहिए। नियम, नियम है, और अपवाद, अपवाद। अपवाद नियम नहीं हो सकता। श्री सैमडल स्माइल्स ने कहा है” जीवन में किसी बड़े फल की प्राप्ति के पीछे इत्तफाक का बहुत थोड़ा हाथ होता है।” अंधे के हाथ बटेर भी कभी लग सकती है। कभी किसी अललटप्प साहसिक कार्य या योजना से भी सफलता मिल सकती है, पर सफलता प्राप्त करने का सर्वसाधारण और जाना पहिचाना मार्ग है केवल लगन, स्थिरता, परिश्रम, उद्देश्य के प्रति आस्था और समझदारी।
एक बहुत सुन्दर चित्र आपके सामने आता है। यह चित्र इत्तफाक से ही सुन्दर नहीं बन गया है। उसकी सुन्दरता के पीछे चित्रकार का वर्षों का ज्ञान, अनुभव, परिश्रम और अभ्यास है। इस चित्रकला में योग्यता पाने के लिए उसने बरसों आँखें फोड़ी हैं, दिमाग लगाया है तब उसके हाथ में इतनी कुशलता आ पाई है। उसने उन अवसरों को खोजा है जब वह प्रतिभावान चित्रकारों के संपर्क में आकर कुछ सीख सके। जो अवसर उसके सामने आये, उसने उन्हें व्यर्थ ही नहीं जाने दिया वरन् उन अवसरों से लाभ उठाने की बलवती इच्छा उसे थी और क्षमता भी।
मनुष्यों की समझदारी तथा चीजों को देखने परखने की क्षमता में अन्तर होता है। एक मनुष्य किसी एक घटना या कार्य से बिल्कुल प्रभावित नहीं होता, उससे कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकता, जब कि एक दूसरा मनुष्य उसी कार्य या घटना से बहुत कुछ सीखता और ग्रहण करता है। एक रूसी कहावत है कि वह जंगल से होकर गुजरता है और उसे लकड़ी नहीं दिखाई देती। दिल्ली में बारह बरस रहे पर झाड़ झोंकते रहे, ऐसे ही आदमियों के लिए कहा गया है।
साधारण रूप से मनुष्य की बुद्धि तथा प्रवृत्ति तीन प्रकार की हो सकती है। मान लीजिये एक नदी के तट पर तीन लड़के खेल रहे हैं। तीनों खेलने के बाद घर वापस आते हैं। आप एक से पूंछते हैं भाई तुमने वहाँ क्या देखा? वह कहता है ‘वहाँ देखा क्या, हम लोग वहाँ खेलते रहे बैठे रहे।’ ऐसे मनुष्यों की आँखें, कान, बुद्धि सब मंद रहती है। दूसरे लड़के से आप पूछते हैं कि तुमने क्या देखा तो वह कहता है कि ‘मैंने नदी की धारा, नाव, मल्लाह, नहाने वाले, तट के वृक्ष, बालू आदि देखी।’ निश्चय ही उसके बाह्य चक्षु खुले रहे, मस्तिष्क खुला रहा था। तीसरे लड़के से पूछने पर वह बताता है कि ‘मैं नदी को देखकर यह सोचता रहा कि अनन्त काल से इसका स्रोत ऐसा ही रहा है। इसके तट के पत्थर किसी समय में बड़ी-बड़ी शिलाएँ रही होंगी। सदियों के जल प्रवाह की ठोकरों ने इन्हें तोड़ा-मरोड़ा और चूर्ण किया है। प्रकृति कितनी सुन्दर है, रहस्यमयी है। तो फिर इनका निर्माता भगवान कितना महान होगा, आदि।’
यह तीसरा बालक आध्यात्मिक प्रकृति का है। उसकी विचारधारा, अन्तर्मुखी है। ऐसे ही प्रकृति के लोग अवसरों को ठीक से पहचानने और उनसे काम लेने की पूरी क्षमता रखते हैं। सालोमन ने कहा है “बुद्धिमान मनुष्य की आँखें उसके सर में होती हैं किन्तु मूर्ख अंधकार में चलते हैं।”
एक बार जॉनसन ने एक सज्जन से कहा था कि ‘कुछ लोग एक घोड़ागाड़ी में बैठकर उतने थोड़े समय में जितना सीख सकते हैं, उतना कुछ लोग पूरा योरोप घूम कर भी नहीं सीख सकते।’ भला ऐसे आदमी अवसर को क्या पहचानेंगे और उनसे क्या लाभ उठावेंगे।
निकोलन पोसीन नामक प्रसिद्ध चित्रकार ने एक बार कहा था कि मेरे जीवन के व्यवहार व नियम यह है कि जो कुछ करने के योग्य है वह बहुत अच्छी तरह से करना चाहिये।” और जब वह अत्यन्त वृद्ध था तब उससे किसी ने पूछा आपके इतने यश का क्या कारण है। इटली चित्रकारों में उसका इतना ऊँचा स्थान क्यों है? उसने जोर के साथ उत्तर दिया कि मैंने किसी चीज को छोड़ा नहीं, उसके प्रति उपेक्षा नहीं दिखाई। यह है सफलता की कुँजी। सतत परिश्रम के फल स्वरूप ही सफलता मिलती है, इत्तफाक से नहीं जो भी अवसर उनके सामने आये उन्होंने दत्तचित्त हो उनसे लाभ उठाया।
यदि हम एक कक्षा के समस्त बालकों को समान अवसर दें, तो भी हम देखते हैं कि सभी बालक एक समान लाभ नहीं उठाते या उठा पाते। बाह्य सहायता या इत्तफाक का भी महत्व होता है पर हम अँग्रेजी कहावत न भूलें ‘भगवान उनकी ही सहायता करता है जो अपनी सहायता स्वयं करना जानते हैं।’
अतः आलस्य और कुबुद्धि का त्याग कीजिये। अवसर खोइये मत। उनसे लाभ उठाइये।
अनेक ऐसे आविष्कार हैं जिनके बारे में हम कह सकते हैं कि इत्तफाक से आविष्कर्त्ता उन्हें या गया। पर यदि हम ईमानदारी से गहरे जाकर सोंचे तो स्पष्ट हो जायगा कि इत्तफाक से कुछ नहीं हुआ है। उन आविष्कर्त्ताओं ने कितना अपना समय, स्वास्थ्य, धन और बुद्धि खर्ची है आविष्कार करने के लिए। जिन्हें जनसाधारण इत्तफाक कहता है वह वे अवसर हैं जिनकी कि आविष्कर्ता ने अपनी प्रतिभा के बल पर समृद्धि की है। न्यूटन के पैरों के निकट इत्तफाक से वृक्ष से एक सेब टपक कर गिर पड़ा और न्यूटन ने उसी से गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त ज्ञान कर लिया। पर न जाने कितनों के सामने ऐसे टूट-टूट कर सेब न गिरे होंगे। पर सभी क्यों नहीं न्यूटन की भी भाँति गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त ज्ञात कर सके? कारण स्पष्ट है। अवसर आया और न्यूटन ने उस अवसर को पकड़ा और उससे लाभ उठाया। न जाने कितने वर्षों से न्यूटन ने इस सिद्धान्त की खोज में दिन रात एक किये थे। सेब का उसकी आँखों के सामने गिरना एक ऐसा इत्तफाक था जिसने बिजली की भाँति उनके मस्तिष्क में ज्योति दी और वह इस आविष्कार के ज्ञाता बन सके। अतः यदि आप जीवन में सफलता चाहते हैं तो अवसर से लाभ उठाना सीखिये।
(श्री योगेश कुमार जोशी मण्ड्रेला)
सुधोपम तुलसी के व्याख्यान को सुनकर महर्षि नारद ने भगवान विष्णु से नम्रता पूर्वक पूछा “भगवन्! वेद जननी गायत्री की उपासना पहले किस-2 ने की थी।”
ब्रह्मणा वेद जननी पूजिता प्रथमे मुने।
द्वितीये च देव गणोस्तत्पश्चाद्विदुषाँ गणौ।
तथा चाश्वपतिः पूर्व पूजयामास भारते॥
भगवान विष्णु ने नारद जी से कहा “हे मुने वेद जननी पहले ब्रह्मा से, दूसरे देव गणों से, तत्पश्चात् विद्वत् गणों से पूजित हुई। तदनन्तर भारत में अश्वपति ने इसकी आराधना की।
“अश्वपति कौन था?” नारद ने निज जिज्ञासा नारायण से निवेदित की। उसने सबके द्वारा पूजनीया सावित्री की विशिष्ट आराधना कैसे और क्यों की। प्रभो! कृपया मेरी जिज्ञासाओं का समुचित उत्तर देकर मुझे अनुग्रहीत करें।”
नारायण ने कहा “नारद! शत्रुओं को निस्तेज और उनकी शक्ति का परिमर्दन करने वाला नरवरेन्द्र अश्वपति भद्र देश का राजा था। उसके राज्य में धन धान्य, सुख-समृद्धि, कला-कौशल, ज्ञान -विज्ञान सभी यथेष्ट मात्रा में थे। गौ ब्राह्मण साधु महात्माओं की सेवा करके वह अपना इह और परलोक सुधार रहा था। न्याय-शीला सम्पन्न उस राजा की महिषी निज धर्म परायण, सती साध्वी मालती सन्तान प्राप्ति के लिए वशिष्ठ जी के आदेश से गायत्री की आराधना में अपना समय लगाकर कृतार्थ होती थी।”
साच राज्ञी महासाध्वी वशिष्ठ स्योपदे शतः।
चकारा राघने भक्तया सावित्र्या श्वैव नारद॥
भगवान विष्णु ने नारद से कहा “महामुने! राजा और रानी को सावित्री की आराधना करते हुए जब कुछ दिन व्यतीत हो गये तो एक दिन आकाशवाणी हुई कि तुम दश लक्ष गायत्री का जप करो।”
“शुश्रावा काशवाणीञ्च नृपेन्द्रश्चा शरीरिणीम।
गायत्री दशलक्षञ्च जपं कुर्विति नारद॥”
उन्होंने अशरीरिणी आकाशवाणी को सुना। (एवं उसके अनुसार) 10 लक्ष जप का अनुष्ठान प्रारम्भ कर दिया। प्रातः काल ब्रह्म बेला में शैय्या त्याग करके शौच स्नानादि से निवृत्त होकर सपत्नीक राजा संध्या करता था। तत्पश्चात् वेद जननी गायत्री माता के विग्रह का षोडशोपचार पूजन करते थे। प्रातः कालीन जपादि कर्त्तव्यों से निवृत्त होकर अपनी धर्मपत्नी के सहित अश्वपति मध्याह्न की पूजा किया करते थे। रात्री में, नीराजन, स्तोत्रादि पाठ के पश्चात, सन्निकट रहने वाले गायत्री उपासक परस्पर गायत्री विषयक ज्ञान विज्ञान पर विचार-विमर्श किया करते थे। एक दिन महर्षि पराशर भी उस विचार गोष्ठी में उपस्थित हुए। महर्षि ने उपस्थित समुदाय की उपदेश श्रवण की लालसा को पूर्ण करते हुए सुधा प्रवर्षिणी वाणी में सदुपदेश दिया। गायत्री जप के महत्व का दिग्दर्शन कराते हुए, पराशर ने कहा -
“सकृज्जपश्च गायत्र्या पावं दिन कृतं हेरत्।
दशघा प्रजपान्नृणा दिवारात्र्यघ मेवच ॥”
अर्थात् गायत्री के एक बार के जप से दिन में किए हुए पाप, तथा दश बार गायत्री मन्त्र का उच्चारण करने से अहोरात्र में किए हुए पापों का विनाश हो जाता है।
“शतघा च जपाच्चैवं पापं मासार्जितं परम्।
सहस्रधा जपाच्चैव कल्मषंवत्सरार्जितम्॥
लक्ष जन्म कृतं पापं दशलक्षं त्रि जन्मनः।
सर्व जन्म कृतं पापं शतलक्षो विनश्यति॥”
“एक सौ जप से एक मास के अर्जित पाप, एक सहस्र जप करने से एक वर्ष के अर्जित पाप, एक लक्ष जप से एक जन्म के पाप, दश लक्ष जप करने करने से तीन जन्म के तथा शतलक्ष (एक कोटि) गायत्री जप करने से सकल जन्म जन्मान्तरों के पापों का विनाश हो जाता है।”
“करोति मुक्तिं विप्राणाँ जपोदश गुण स्ततः।
करं सर्प फणाकारं कृत्वातु ऊद्ध्व मुद्रितम्॥”
महर्षि पराशर कहते हैं कि पूर्वाभिमुख होकर, हाथ को सर्प फणाकृति की उर्ध्व मुद्रा से रखकर किए हुए जप का दश गुणित फल होता है। इस प्रकार के जप के लिए श्वेत कमल के बीजों की अथवा संस्कृत स्फटिकादि की माला प्रशस्त कही गई है।” इसके करने से क्या? इसका फल महर्षि मद्रदेश के सम्राट अश्वपति से कहते हैं।
“एवं क्रमेण राजर्षे दश लक्षं जपं कुरु।
साक्षात् द्रक्ष्यसि सावित्रीं त्रिजन्म पातकक्षयात्॥”
हे राजर्षे! इस क्रम से दश लक्ष जप करो। एतत् फलस्वरूप तीन जन्म के पापों का क्षय हो जावेगा, इसलिए तुम साक्षात् सावित्री के दर्शन करोगे।”
भगवान विष्णु देवर्षि नारदजी से कहते है :--
“दत्वा सर्वं नृपेन्द्राय प्रययौ स्वालयं मुनीः।
राजा सम्पूज्य सावित्री ददर्श वरमाप च॥”
इस प्रकार मुनि राजा के लिए सर्वस्व देकर अपने आश्रम को चले गए और सावित्री को पूजकर राजा ने दर्शन और वरदान को प्राप्त किया।”
लोक कल्याण की भावना से अभिप्रेरित होकर नारदजी ने भगवान विष्णु से पूछा --
“नृपः केन विधानेन संपूज्य श्रुति मातरम्।
वरञ्च किं वा संप्राप वद सोऽश्वपतिनृपः॥”
नरेन्द्र अश्वपति ने किस विधान से वेद माता को पूजकर, क्या वरदान प्राप्त किया?”
“जानामि ते महाराज यत्ते मनसि वर्तते।
वाञ्धितं तव पत्न्याश्च सर्वं दाग्यामिनिश्चितम्।
साध्वी कन्याभिलाषञ्च करोतितव कामिनी।
त्वं प्रार्थयसि पुत्रंच भष्यति क्रमेणते॥”
हे नरवरेन्द्र! मैं तेरी और तेरी पत्नी की अभिलाषा को जानती हूँ। मैं तुम दोनों की कामनाओं को पूर्ण करूंगी। तेरी साध्वी धर्मपत्नी कन्या की अभिलाषा करती है, और तुम पुत्र की अभिलाषा रखते हो। तुम दोनों की मनोकामना क्रमेण पूर्ण होगी।” यह वरदान देकर वेदमाता ब्रह्मलोक को चली गई। राज राजेश्वर अश्वपति की अपेक्षा सावित्री देवी ने अपने पुत्री मालती देवी की इच्छा पूर्ति को प्राथमिकता देकर नारी की महत्ता का उदाहरण विश्व के सम्मुख प्रस्तुत किया।
“आराधनाच्च सावित्र्य बभूव कमला कला।
सावित्रीति च तन्नाम चकाराश्वपति नृपः॥”
आदिशक्ति सावित्री आराधना से नृप दंपत्ति को प्रथम कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। यह कन्या सावित्री की आराधना से प्राप्त हुई थी इसलिए अश्वपति ने उस बालिका का नाम भी सावित्री रखा।
यह “ब्रह्मदैवर्त्त पुराण के 23 वें अध्याय को सावित्री-उपाख्यान” से तीन उद्देश्यों का प्रतिपादन करता है--
“सा च राज्ञीमहासाध्वीवशिष्ठस्योपदेशतः।
चकाराराधनं भक्त या सावित्र्याश्चैव नारद॥”
इस श्लोक से स्पष्ट है कि स्त्रियों को गायत्री अधिकार है।
दूसरे वह सदा से ऋषि- मुनियों द्वारा समर्थित रहा है। वशिष्ठ जी जैसे महर्षि ने स्वयं, अश्वपति की रानी मालती को उपदेश दिया था कि तुम सावित्री की आराधना करो। यदि स्त्रियों को वेदाधिकार नहीं होता तो वशिष्ठ जी उसे प्रोत्साहित नहीं करते किन्तु उसका विरोध ही करते। और यदि राज भय से विरोध नहीं करते तो कम से कम तटस्थ अवश्य रहते। किन्तु इस उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है कि स्त्रियों को गायत्री अधिकार सदा से है और वह श्रुति-स्मृति विहित है।
(2) साध्वी कन्याभि लाषञ्य करोति तव कामिनी।
त्वं प्रार्थयसि पुत्रंच भविष्यति क्रमेण ते ॥
वेद जननी ने कहा “तेरी पत्नी कन्या चाहती है और तुम पुत्र चाहते हो। अभिलाषा तो दोनों की पूर्ण होगी पर क्रम से अर्थात् पहले तो स्त्री की अभिलाषा से कन्या रत्न की उत्पत्ति होगी।”
यदि राजा और रानी की एक ही अभिलाषा होती तो यह निर्णय करना कठिन था कि सावित्री अधिक प्रसन्न किसकी आराधना से हुई। अर्थात् पुरुष की आराधना से या स्त्री की आराधना से किन्तु हमारा सौभाग्य है कि उनकी कामना भिन्न भिन्न थी। जगजननी सावित्री ने पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक श्रेष्ठ है इसका निर्णय स्पष्ट शब्दों में ही कर दिया कि पहले तुम्हारी स्त्री की अभिलाषा पूर्ण होगी। इससे यह सिद्ध होता है कि गायत्री पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों पर शीघ्र प्रसन्न होती है।
(3)”आराधनाच्च सावित्र्या बभूव कमलाकला।”
अर्थात् सावित्री की आराधना कभी भी निष्फल नहीं होती। अश्वपति दंपत्ति ने सुसंतति की प्राप्ति के लिए आराधना की थी उनकी कामना को वेदमाता ने पूर्ण किया।
(डॉ. चमनलाल गौतम)
त्यौहारों की महत्ता को सभी स्वीकार करते हैं। मनुष्य जब निरन्तर एक काम करता रहता है, चाहे वह उसके लिए कितना ही रुचिपूर्ण क्यों न हो, वह उससे ऊब जाता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष उसमें सजीवता लाने के लिए काम में परिवर्तन कर लेते हैं, कुछ समय के लिए कुछ और काम करने के पश्चात् वह पहिले वाला काम करने लगते हैं। इस परिवर्तन अथवा पहिले के काम में कुछ विश्राम होने से वह कार्य पूर्ववत् होने लगता है। इसी तथ्य के आधार पर हिन्दू धर्म में त्यौहारों की व्यवस्था की गई है। इन त्यौहारों में इस उद्देश्य की पूर्ति के साथ-साथ अन्य महत्वपूर्ण रहस्य भी छिपे हुए हैं। नौकरी, व्यापार आदि के व्यस्त कार्यक्रम से अवकाश प्राप्त करके स्वादिष्ट भोजन, सुन्दर वस्त्र, व अन्य मनोरंजन के साधन तो रहते ही हैं जिससे मुर्दा मन में भी नव जीवन का संचार हो जाता है। वह कुछ समय के लिए अपने नित्य के चलने वाले कार्य को भूल जाता है और जिस प्रकार से मुरझाई हुई फल की कली खिल जाती है, उसी प्रकार से उसका मन खिल जाता है। उसके इस प्रफुल्लित मन से शारीरिक व मानसिक शक्तियों का विकास होता है। गृहस्थी व आजीविका के साधनों के द्वारा जो चिन्ताएं उसे खा रही थीं, उस क्षति की कुछ पूर्ति इन अवसरों पर हो जाती है।
त्यौहार केवल मनोविनोद के लिए मनाए जाते हों ऐसी बात नहीं है। यह जीवन को उज्ज्वल और महान बनाने का साधन भी बनते हैं। यह हमारे लिए नवीन सन्देश लाते हैं। यह जीवन को श्रेष्ठ व आदर्श बनाने वाले सिद्धान्तों के विचार ही हमारे सामने नहीं रखते वरन् उन विचारों को क्रियात्मक रूप में हमारे जीवन को व्यवहार में ला देते हैं। त्यौहारों की इस विशेषता के कारण इन्हें मनाने पर अधिक बल दिया जाता है।
हमारे मनीषी ऋषियों ने उन विचारों के विस्तार का माध्यम इन त्यौहारों को बनाया जिसमें उनको आशंका थी कि इनमें व्यक्तिगत पतन और सामाजिक अस्तव्यस्तता होना संभव हो सकती है। आज जाति पाँति के झगड़ों से हमारा सामाजिक ढांचा जर्जर होता जा रहा है। संगठन दिन-दिन शिथिल होता जा रहा है। गाँधीजी ने सबको एकता के सूत्र में बाँधने के लिए ही सबको गले लगाने का उपदेश दिया था। यह सामाजिक विकृति अब बढ़ती जा रही है। इस समस्या को सुलझाने का एक सुन्दर साधन है होली का त्यौहार जिसमें छोटे बड़े सभी अपनी सामाजिक ऊंच नीच, अमीरी गरीबी पद प्रतिष्ठा आदि को भूल जाते हैं एक दूसरे से गले मिलते हैं। गुलाल व रंग द्वारा अपने सम्बन्धों का प्रदर्शन करते हैं और एक दूसरे के साथ बेतकल्लुफी के साथ व्यवहार करते हैं। पिछले वर्ष में एक दूसरे के द्वारा हुए मनोमालिन्य को भूल जाते हैं। विरोधी भावों से जो फूट के बीज उत्पन्न हो रहे थे, वह समाप्त हो जाते हैं और उसके स्थान पर सामूहिकता और संगठन की नींव रखी जाती है। बिछड़े हुए फटे हुए हृदयों को यह त्यौहार मिला देता है। इससे एक नव उल्लास उत्पन्न होता है।
होली के उत्सव में एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें समानता के भाव आते हैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सब एक साथ मनोरंजन करते हैं। इसमें वर्णाश्रम धर्म की कोई मर्यादा नहीं रहती। धर्म शास्त्रों की भी आज्ञा है कि ब्राह्मण इस दिन चाण्डाल को स्पर्श कर सकता है। इस दिन लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, नालियों में से स्वयं कूड़ा-कचरा निकालते हैं। होली के शुभ अवसर पर जब समानता के भावों का प्रदर्शन होता है, सामूहिक सफाई व स्वच्छता के कार्यक्रम रखने चाहिए। सार्वजनिक स्थानों की सामूहिक सफाई करनी चाहिए ताकि इस कार्य को व्यवसाय के रूप में करने वाले लोगों के मन से यह हीन भाव निकल जाए कि झाड़ देना, नाली साफ करना आदि कार्य घृणित व नीच हैं, इन्हें बड़े-बड़े व्यक्ति भी करने में संकोच नहीं करते। इस हीन भाव के मन से निकल जाने से वे अपने व्यवसाय में अधिक रुचि लेंगे वरना वह अपनी डेढ़ ईंट की मस्जिद अलग खड़ी कर लेंगे और अपने को पृथक जाति घोषित कर देंगे। सामूहिक स्वच्छता के माध्यम से हम अपने जाति और देश के संगठन को बनाए रह सकते हैं। प्रेम भावों की वृद्धि से आपस में आकर्षण बढ़ता है। यह आकर्षण बढ़ता है। यह आकर्षण ही एकता का सूत्र है।
इस महान उद्देश्य की ओर ले जाने वाले महान त्यौहार में कुछ विकृतियाँ आ गई हैं। हास परिहास इतना विकृत हो जाता है कि वह अश्लीलता का रूप धारण कर लेता है। ग्रामों में लोग फगुआ, चौताल, और झूमर गाने लगते हैं और कुछ असभ्य लोग स्त्रियों को देखकर अश्लील गाने गाने लगते हैं। भाभियों से अश्लील पूर्ण हंसी मजाक करने की एक प्रथा समाज में घुस गई है। इस अवसर पर लोग गंदी गालियाँ देने से भी नहीं चूकते, काम वासना की तृप्ति का एक शुभ अवसर मानते हैं। कुछ लोग मनमाने ढंग से भाँग, शराब आदि का सेवन करते हैं। यह उल्लास व प्रसन्नता के माने जाने वाले साधन समाज के लिए घातक हैं। हंसी मजाक तो सभी करते हैं। इसके बिना तो जीवन नीरस हो जाएगा, यह शरीर रूपी पौधा सूख जायगा। सन्त महात्मा और महापुरुष भी मनोविनोद करते हैं परन्तु उसमें सभ्यता टपकती है। इस शुभ अवसर पर जब हमें अपने मनोभावों व चरित्र का विकास करना चाहिए हम सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करके सामाजिक पाप के भागी बनते हैं।
माना कि होली का उत्सव हर्ष और उल्लास के लिए आता है परन्तु इसमें अपने ऊपर नियन्त्रण रखना भी सीखना चाहिए। कूड़ा करकट और गंदगी फेंकने से किसी के मूल्यवान वस्त्र खराब हो जायेंगे इस पर विचार नहीं किया जाता। प्रायः ऐसा होता है कि होली के दिनों में यदि कोई व्यक्ति अच्छे कपड़े पहनकर जा रहा हो तो उस पर रंग आदि जानबूझ कर फेंका जाता है कि उसके वस्त्र खराब हो जायं। यह व्यवस्था बंद होनी चाहिए। हमें सभ्य पुरुषों की तरह व्यवहार करना चाहिए। हमें चाहिए कि भद्दे रंग और कीचड़ से होली खेलने के स्थान पर टेशू के रंग से होली खेलें। इससे एक लाभ यह भी होता है कि चेचक की बीमारी का शमन होता है। अश्लीलता का व्यवहार बंद कर जीवन को उज्ज्वल बनाने वाले भजन व गीत व उपदेशों के आयोजन करने चाहिए। अश्लीलता के विष वृक्ष को समाज से उखाड़ फेंकने के लिए अश्लीलता नाम की राक्षसी का कागज का पुतला बना कर, गाजे बाजे के साथ जुलूस निकाल कर उसके पूतले व अश्लील चित्रों व साहित्य की होली जलाई जानी चाहिए ताकि लोग यह समझें कि इस घातक प्रथा का बहिष्कार करना चाहिए। गंदे चित्रों को घरों से हटवाने के सामूहिक प्रयत्न होने चाहिए। टोली बना बनाकर घर-घर धर्मफेरी करनी चाहिए। और लोगों से कामुकता का प्रदर्शन करने वाले चित्रों को हटा कर शिक्षा-प्रद वेद वाक्यों को टाँगने की प्रार्थना करनी चाहिए। इस सामूहिक प्रयास के अतिरिक्त गायत्री परिवार के कार्यकर्ताओं को यह संकल्प लेने चाहिए कि वह आगामी वर्ष में 24, 54 या 108 घरों से अश्लील चित्र हटवाकर वेद वाक्य लगावेंगे अथवा गाली देने की गंदी आदत, सिनेमा, काम वासना को भड़काने वाले साहित्य को पढ़ना छुड़वायेंगे।
वास्तव में होली जलाने का आधुनिक रूप यज्ञ का ही परिवर्तित रूप है। आज लोग केवल लकड़ी जलाकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। पूर्वकाल में यह सामूहिक यज्ञ का रूप था। यज्ञ की प्रथा का लोप होने से इसका शुद्ध रूप भी विकृत हो गया है। अब हमें इसका पुनरुत्थान करना है। यज्ञ हमारी भारतीय संस्कृति का पिता माना गया है। समय के फेर से जो विकृति इसमें आ गई है, उसका सुधार करना चाहिए। होली के शुभ अवसर पर गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा में सामूहिक यज्ञ होने चाहिए। यज्ञ के साथ-साथ प्रवचन आदि की भी व्यवस्था रहनी चाहिए ताकि जिन विचारों को पहिले व्यक्त किया गया है उनको कार्यान्वित करने की प्रेरणा दी जाए। इस समय पके अन्न की बालें, जौ आदि को सेंक कर उसका प्रसाद वितरण करना चाहिए।
आदर्श जाति के इन आदर्श त्यौहारों को हम आदर्श रूप से ही मनाएं ताकि उनमें छिपे जीवन नीति के उत्तम सिद्धान्तों को व्यवहारिक रूप देकर उन्नति के महान पथ पर अग्रसर हो सकें।
प्रेम के जाग्रत होने का यह अर्थ नहीं है कि हम मधुरता और सुख में ही वितरण करें, किन्तु इस जागृति से हममें उन वीरोचित प्रयत्नों का जागरण हो, जहाँ मृत्यु से जीवन को अमरता प्राप्त होती है और कष्ट सहन के द्वारा वास्तविक आनन्द मिलता है।
-टैगोर
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हँसी की बात नहीं है, यह जीवन का सत्य है। मनुष्य मूर्ख है यदि वह अपना नुकसान देखकर रोता है। नुकसान होने पर ही आत्मा को विचार करने और ईश्वर को पूछने का समय मिलता है और सत्य का दर्शन भी प्रभु तभी करता है।
-टॉलस्टाय
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अपने शरीर को अन्तरीप समझो जिसमें समुद्र की लहरें दिन - रात टकराया करती हैं लेकिन तब भी वह अपने स्थान को नहीं छोड़ता। इसी प्रकार जितनी आपत्तियाँ तुम पर आवें, सभी को वीरता के साथ सहन करो और उनसे विचलित न हो।
-मारकस अनटोनियस
(पं. मुकटबिहारीलाल शुक्ल बी. ए. एल. एल. बी.)
सभी मनुष्यों और विशेष रूप से बुद्धिजीवी व्यक्तियों में स्मृति की प्रधानता है। इसको बड़ा सद्गुण समझा जाता है। विद्यार्थी हो या अध्यापक, वकील हो या जज, लेखक हो या वक्ता, डॉक्टर हो या इंजीनियर तीव्र स्मरण शक्ति से ये अपने कार्य में बड़ी सफलता प्राप्त करते हैं। कुछ लोगों की स्मरण शक्ति इतनी अच्छी होती है कि वह एक दफा जिस आदमी को देख लेते हैं, उसकी सूरत को कभी नहीं भूलते। प्राचीन काल में जब पुस्तकें छापी नहीं जाती थीं स्मरण शक्ति ही की सहायता से वेद तथा शास्त्र याद किये जाते थे और संस्कृत को तो प्रायः इसी प्रकार जीवित रखा गया है। हर विषय के अध्ययन में स्मरण शक्ति की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु इतिहास, भूगोल इत्यादि में तो यह विशेष रूप से सहायक होती है। स्मृति एक बड़ा लाभदायक गुण है। यह सभी स्वीकार करते हैं और समझते हैं कि विस्मृति एक अभाव है, कमजोरी है और अवगुण है। एक विद्यार्थी खूब याद कर लेने के बाद परीक्षा के समय जब पढ़ा हुआ पाठ भूल जाता है तो अपने को धिक्कारता है और चाहता है कि यदि उसमें विस्मृति जैसा अवगुण न होता तो वह निःसंदेह प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता। किसी वकील को अवसर पर जब कानून की कोई धारा अथवा नजीर याद नहीं आती या किसी डॉक्टर को बिना किताब देखे औषधियों के गुण और नाम याद नहीं आते अथवा किसी अध्यापक या वक्ता को पढ़े हुये वाक्य या कथन नहीं याद आते तो वह अपनी विस्मृति पर लज्जित होता है। विस्मृति को कोई नहीं चाहता और यही इच्छा करता है कि काश उसकी स्मरण शक्ति इतनी अच्छी होती कि वह किसी देखी, याद की अथवा सुनी हुई चीज को कभी नहीं भूलता ।
इसमें सन्देह नहीं कि स्मृति एक महान गुण है परन्तु यह समझ लेना कि विस्मृति एक अवगुण है और हानिकारक है भूल है। वास्तविकता यह है कि स्मृति की भाँति विस्मृति भी एक गुण है और जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है। यह आश्चर्य की बात भले ही लगे परन्तु निताँत सत्य है कि जितना याद रखना जरूरी है उतना ही भूलना भी आवश्यक है।
एक वृद्ध एवं निःसहाय आदमी का इकलौता जवान बेटा मर जाता है। उस बुड्ढे के लिये सारा संसार अंधकारमय दीखता है। वह लाचार है, दुखी है और जिन्दगी से बेजार है क्योंकि उसको हर समय अपने प्रिय पुत्र की जो उसके जीवन का एक मात्र सहारा था हरदम स्मृति बनी रहती है, उसका चित्र बुड्ढे के मानसिक नेत्रों के सामने से नहीं हटता, उसके कामों और गुणों को याद करके वह हरदम विह्वल होता है। उसकी दशा बड़ी दयनीय है, उसके मित्र आकर धैर्य रखने की सलाह देते हैं पर उसको धैर्य नहीं होता। बजाय धैर्य और साँत्वना के अगर उसको “भूल जाने” की सलाह दी जावे, और किसी प्रकार उसकी विस्मृति शक्ति को सक्रिय बना दिया जाय तो उसका कितना उपकार हो जावे। अगर किसी प्रकार उसकी स्मरण शक्ति लोप हो जावे और केवल विस्मरण शक्ति का उस पर प्रभाव हो तो उसको अपने पुत्र के वियोग का रत्ती भर भी दुख नहीं व्यापेगा, जिस प्रकार “क्लोरोफार्म” सूँघा देने पर शरीर की काट-छाँट करने पर भी कोई पीड़ा नहीं होती।
एक विद्यार्थी को परीक्षा में पास होने की पूरी आशा थी पर वह फेल हो जाता है। अपने अध्ययन का परिश्रम उसकी आँखों के सामने नाचता है जो हानि और लज्जा फेल हो जाने से हुई वह किस दशा में नहीं भूलता अथवा लोक सभा या अन्य किसी संस्था के चुनाव में जब कोई उम्मीदवार असफल हो जाता है तो उस ग्लानि, हानि और अपयश की स्मृति करके वह अधीर होता है। यह असफल विद्यार्थी और पराजित उम्मीदवार किसी को अपना मुँह नहीं दिखाना चाहते हैं और कभी-2 आत्म हत्या तक करने पर उतारू हो जाते हैं। यदि उस समय उनकी स्मरण शक्ति शून्य कर दी जाय और केवल विस्मृति का प्रभाव उनके मस्तिष्क पर रहे तो कैसा अच्छा रहे।
आप बड़े चिन्तित हैं आपके सगों ने जिन पर आपने जीवन भर उपकार किया आपके साथ विश्वास किया या आपके शिष्य अथवा संतान ने आपकी आज्ञा का उल्लंघन किया या आप जिनसे आदर सम्मान की आशा करते थे आपका अपमान और निरादर किया तो स्मृति ही के कारण आपको अपने उपकार याद करके महान् दुख होगा। और वही पुत्र, शिष्य अथवा मित्र ही जिनको आप अभिन्न समझते थे आज आपके शत्रु तुल्य दीख पड़ते हैं। अगर किसी प्रकार यह सम्भव हो कि - जो अपना कर्त्तव्य अथवा भलाई आपने उनके प्रति की उसको एक-दम से भूल जावें और वह आपको याद ही न रहे तो न तो आपको कोई दुख व्यापे और न पुत्र, शिष्य, मित्र ही के सम्बन्ध की ही इति श्री हो।
एक व्यक्ति किसी समय में बड़ी दरिद्रता पूर्ण जीवन व्यतीत कर चुका है अथवा सामाजिक बहिष्कार और अपमान का शिकार हो चुका है या अन्य प्रकार का कष्ट भोग चुका है। या पुराना जमींदार अथवा राजा जमींदार उन्मूलन तथा राज्य समाप्त होने के बाद अपनी वर्तमान स्थिति में जब उसे साधारण नागरिक जैसा जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है अतीत की याद करके रोता है झींकता है और अपने सुखद वर्तमान जीवन को भी अकारण क्लेशमय बनाता है केवल इसलिये कि उसमें विस्मृति का अभाव है। अगर वह सोने के अक्षरों में लिखी जाने वाली सूक्ति “बीती ताहि बिसार दे आगे सुधि लेय” का मनन चिन्तन और पालन कर सके, कैसा उत्तम हो।
उपरोक्त कतिपय उदाहरणों से सिद्ध होता है कि दुख चिन्ता जैसे रोगों को दूर करने में विस्मृति रामबाण का काम करती है। अमेरिका के प्रसिद्ध डॉक्टर का कहना है “वर्षों के अनुभव के बाद मैंने निर्णय किया है कि दुख और चिन्ता को दूर करने के लिये “भूल जाओ” से बढ़कर कोई औषधि नहीं है। पुरानी दुखद घटनाओं और मित्रों के अन्याय और कृतघ्नता एवं कटु स्मृतियों के प्रभाव से बचने के लिए अंग्रेजी में एक मात्रा नुस्खा “क्षमा करो और भूल जाओ” का है जिसके पान करने से प्रभु ईसामसीह को सूली की पीड़ा जरा भी नहीं आयी और महात्मा (सुकरात) को विष का प्याला पीने में कोई संकोच नहीं हुआ और वे दोनों हमेशा के लिए अमर हो गये।
हर समय प्रसन्न रहना या गाते रहना और परोपकार में लगे रहने से भी पुरानी कटु स्मृतियाँ भूली जा सकती हैं। मैंने एक योरोपियन अस्सी वर्षीय योगी “अकिल येहर” को बड़ा स्वस्थ बालक की भाँति फुर्तीला और सदा मुस्कुराते हुए देख कर उनसे पूछा कि आपकी प्रसन्नता और उत्तम स्वास्थ्य शायद इसलिये है कि आपको संसार का कोई कष्ट नहीं है और आपका सुखद जीवन है। तो उन्होंने उत्तर दिया कि साँसारिक कष्ट तो मुझे इतने हैं कि शायद ही किसी पर हों। मेरी पत्नी मर चुकी है। मैंने अपने इकलौते बेटे को उच्च शिक्षा दी, फ्लाइग ऑफीसर नियुक्त कराया। उसका विवाह किया परन्तु वह मुझ से रूठ कर चला गया और कई वर्ष हो गये एक पत्र तक नहीं डाला और हम दोनों को किसी की भी खबर नहीं है। मेरा कोई रिश्तेदार बुढ़ापे में मदद करने को नहीं है। कुछ दिनों तक मैं बड़ा रंज करता रहा और बीमार हो गया जिससे बचने की उम्मीद नहीं रही। इन विपत्तियों से छुटकारा पाने के लिए मैंने तय किया कि मैं पुराने इतिहास को भूल जाऊँगा और मैंने ऐसा ही किया। प्रत्येक युवक को मैं अपना लड़का समझता हूँ जो कोई भी मेरे पास आ जाता है उसको निःशुल्क योग आसन सिखलाता हूँ और इस प्रकार सैकड़ों रोगियों को स्वस्थ बना चुका हूँ। हर समय प्रभु का स्मरण करता हूँ और मग्न रहता हूँ। मुझे कभी ध्यान तक नहीं आता कि मेरा पहला दुखद इतिहास क्या था?
साराँश यह है कि जीवन को सुखमय और सफल बनाने के लिए स्मृति और विस्मृति दोनों ही आवश्यक हैं। परन्तु हमें गम्भीरता पूर्वक निश्चित कर लेना चाहिये कि हम क्या याद रखें और क्या भूलें। जो चीजें हमेशा याद करने की हैं वे हैं दूसरे का उपकार, कर्ज व किराये तथा बिलों का अदायगी, प्रभु प्रार्थना, व्यायाम, बड़ों को प्रणाम करना, अपने कर्तव्य का पालन, सुशिक्षाओं पर चलना, रोज का हिसाब लिखना, किसी के आये हुये पत्र का उत्तर अवश्य देना, किसी मीटिंग में समय पर पहुँचना खास तौर पर जब आपके इन्तजार में सभा का कार्य रुका रहे आदि। जिन बातों को भूलना लाभप्रद हैं वे हैं किसी प्रिय का वियोग, चिन्ता दुखद घटनायें, दूसरे की कृतघ्नता तथा अपकार, बुराई के बदले की भावना, पूर्वजों से चली आई पुरानी रंजिश, तथा कोई भी अप्रिय एवं प्रतिकूल घटना।
अनमोल रत्न
संयम जहाँ अर्थहीन है वहाँ सिर्फ निष्फल आत्म-पीड़न है और उसी को लेकर मानना सिर्फ अपने ही को ठगना नहीं बल्कि दुनिया को भी ठगना है।-शरद बाबू
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आत्म-सम्मान, आत्म-संयम, ये तीनों पूर्ण मुक्ति प्राप्त कराते हैं। मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट विजय वह है जो अपने आप पर प्राप्त करता है। -अर्ल स्टार्लिग
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आत्म-प्रतिष्ठा, आत्म-ज्ञान, और आत्म-दमन, केवल इन्हीं तीनों से जीवन को अपार शक्ति प्राप्त होती है, केवल शक्ति ही नहीं क्योंकि शक्ति तो स्वयं ही बिना बुलाये चली आयेगी किन्तु नियम से रहना भी आ जायेगा, और बिना भय के जिस नियम से हम रहते हैं वहीं नियम हम बनाते हैं, और चूँकि ठीक बात ही ठीक होना - अनुसरण करना बुद्धिमत्ता है - परिणाम को तुच्छ समझते हुए।
-टेनीसन ।
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यह महत्व की बात नहीं है कि हमने कितने लोगों की सेवा की। निरहंकार सेवा हुई कि नहीं, इसी से सेवा का मूल्य आँका जाता है। संख्या अल्प होते हुए भी अगर उसका छेद शून्य हो, तो उसका मूल अनन्त हो जाता है। उसी प्रकार अल्प सेवा को निरहंकारिता का छेद प्राप्त होने से उसका मूल्य अनन्त हो जाता है।
-विनोबा।
रजिस्ट्रेशन आफ पेपर्स (सेंट्रल) नियम 1956 के 8वें नियम के अंतर्गत अखण्ड ज्योति धार्मिक पत्र के स्वामित्व तथा अन्य विषयों के सम्बन्ध में प्रकाशित किया जाने वाला विवरण :-
फार्म
प्रकाशन का स्थान- गायत्री तपोभूमि, मथुरा।
प्रकाशन का अवधि क्रम - प्रत्येक मास
मुद्रक का नाम- श्री राम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता - भारतीय
पता- अखण्ड ज्योति कार्यालय मथुरा
प्रकाशक का नाम- श्री राम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता- भारतीय
पता- अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा
संपादिका का नाम - भगवती देवी वर्मा
राष्ट्रीयता - भारतीय
पता- अखण्ड ज्योति कार्यालय मथुरा
सत्वाधिकारी - श्री राम शर्मा आचार्य
मैं श्री राम शर्मा आचार्य, यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिए सब विवरण, जहाँ तक मैं जानता हूँ तथा मेरा विश्वास है सत्य हैं।
मार्च 1962 प्रकाशक के हस्ताक्षर
(श्रीराम शर्मा आचार्य)
दे प्रभा! वरदान ऐसा, दे विभो! वरदान ऐसा।
भूल जाऊँ भेद सब, अपना पराया मान वैसा॥
मुक्त होऊँ बंधनों से मोह माया पाश टूटे।
स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष आदिक दुर्गुणों का संग छूटे॥
प्रेम मानस में भरा हो, हो हृदय में शान्ति छाई।
देखता होऊँ जिधर मैं, दे उधर तू ही दिखाई॥
नष्ट हो सब भिन्नता, फिर बैर और विरोध कैसा।
दे प्रभो! वरदान ऐसा, दे विभो! वरदान ऐसा॥
ज्ञान के आलोक से उज्ज्वल बने यह चित्त मेरा।
लुप्त हो अज्ञान का, अविचार का छाया अंधेरा॥
हो प्रभो, परमार्थ के शुभ कार्य में रुचि नित्य मेरी।
दीन दुखियों की कुटी में ही मिले अनुभूति तेरी॥
दूसरों के दुःख को समझूँ सदा मैं आप जैसा।
दे प्रभो! वरदान ऐसा, दे विभो! वरदान ऐसा॥
हो अभय, अविवेक तज, शुचि सत्य पथगामी बनूँ मैं।
आपदाओं से भला क्या, काल से भी ना डरूं मैं॥
सत्य को ही धर्म मानूं, सत्य को ही साधना मैं।
सत्य के ही रूप में तेरी करूं आराधना मैं॥
भूल जाऊँ भेद सब अपना पराया मान तैसा।
दे प्रभो! वरदान ऐसा, दे विभो! वरदान ऐसा॥
-राम कुमार भारतीय
*समाप्त*