सभी को उर से प्यार करो।
कंज वलियाँ प्रस्फुटित प्रसून,
ज्योत्स्ना शुभ्र सिंधु गंभीर।
नवोदित ऊषा साँध्याकाल,
दिव्य गोधूलि-रम्य सारि-तोर।
इन्हें देखो सुविचार करो।
सृष्टि की सुन्दर है हर चीज,
दृष्टि यदि हो तेरी अभिराम।
प्रकृति का पा सामीप्य, विचार
कहाँ जीवन पथ पर विश्राम?
कर्म-रत रह, उपकार करो?
विषमता-द्वेष-घृणा को छोड़
हृदय में भरकर नव-अनुराग।
जला जीव की ज्योति परार्थ
यही निर्वाण, यही है त्याग॥
मृत्यु का हँस-सत्कार करो!
रामस्वरूप खरे ‘साहित्य रत्न’
सम्पादकीय-
मनुष्य की अभिरुचि में यह विशेषता है कि वह जिस ओर मुड़ जाती है उसी ओर उसकी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियाँ पूरी तत्परता के साथ जुट जाती हैं। कोई व्यक्ति पहलवान बनना चाहता है, अखाड़े में जाता है और उस ओर उसकी पूरी अभिरुचि है तो उसका मन निरन्तर यही सोचता रहेगा कि किस प्रकार जल्दी से जल्दी बड़े से बड़ा पहलवान बना जाय? कौन-कौन सी कसरत की जाय? क्या-क्या दाव पेंच सीखे जायं? क्या-क्या खाया जाय आदि। इस सोचने का परिणाम यह होगा कि वह उसी प्रकार के साधन ढूंढ़ने और जुटाने लगेगा। जो कठिनाइयाँ रास्ते में आयेंगी उन्हें पार करेगा। घर के लोग उसकी इस अभिरुचि को ना पसन्द करेंगे, खर्चीली बतावेंगे तो भी वह उनसे लड़-झगड़ कर अपनी बात मनवाने का आग्रह करेगा। और किसी न किसी प्रकार अपना मनोरथ पूरा करने के लिए आवश्यक परिस्थिति पैदा कर लेगा। अभिरुचि की तीव्रता में यह शक्ति और सम्भावना छिपी रहती है कि वह कठिन और विपरीत परिस्थितियों से भी टक्कर लेती हुई अपना रास्ता बना लेती है। मूलतः यह अभिरुचि जीवन की दो प्रमुख दिशाओं में से एक दिशा में मुड़ती है (1) भौतिक (2) आध्यात्मिक। जिस प्रकार पृथ्वी के दो छोर हैं उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव, उसी प्रकार जीव की भी दो धारायें हैं। एक स्थूल दूसरी सूक्ष्म। स्थूल भौतिक जीवनधारा वह है जिसमें शरीर सुख का लक्ष रहता है और इन्द्रिय भोग, मान बड़ाई, वासना, तृष्णा, संग्रह, स्वामित्व एवं विलासिता की प्रधानता रहती है। आमतौर से लोग इसी धारा में बहते हैं। उनकी अभिरुचि इन्हीं बातों को पसन्द करती है। तदनुसार शरीर और मस्तिष्क की शक्तियाँ इन्हीं उपकरणों को जुटाने में लग जाती है। बहुत काल तक इस एक ही दिशा में संलग्न रहने से जीव का ढाँचा ही इस प्रकार का ढल जाता है कि यही सब साधन एकत्रित करने का अपना स्वभाव अकस्मात हो जाता है। बिना प्रयत्न के भी मन और शरीर अपने आप इस भौतिक साधन संग्रह में लगा रहता है और शरीर को सुख देने वाली वस्तुएं जुटाने और उनका उपयोग तथा संग्रह करने का ताना-बाना बुनता रहता है।
इस भौतिकवादी जीवन की दिशा एक ही होती है पसन्दगी के भेद से इनकी कार्य प्रणाली में थोड़ा अन्तर होता रहता है। जिस प्रकार स्वादिष्ट भोजन करने के इच्छुकों में भी थोड़ी रुचि भिन्नता पाई जाती है, कोई अमुक तरत व्यंजन पसन्द करता है तो किसी को अमुक प्रकार की मिठाइयाँ और साग तरकारियों में प्रसन्नता होती है उसी प्रकार आजीविका उपार्जन, व्यवसाय, मनोरंजन के साधन रहन-सहन, आहार-व्यवहार में थोड़ा अन्तर होते हुए भी भौतिक-स्थूल-अभिरुचि के लोगों की गति विधियाँ प्रायः एक ही दिशा में अग्रसर होती हैं।
दूसरी जीवन दिशा है आध्यात्मिक जिसे सूक्ष्म कहते हैं, इस ओर अभिरुचि रखने वाला व्यक्ति सदा यह सोचता रहता है कि मेरी आत्मा का कल्याण किस प्रकार हो? सुरदुर्लभ मानव शरीर का जो स्वर्ण सुयोग मिला है उसका सदुपयोग कैसे हो? जीवन का रूप प्राप्त कैसे हो? इस अभिरुचि में लोग ज्ञान साधना, आत्म संयम, सद्गुरु संग्रह, परोपकार, सदाचार एवं ईश्वर उपासना को प्रधानता देते हैं। स्वाध्याय और सत्संग के द्वारा अपने ज्ञान नेत्रों को खोलकर अन्धकार से प्रकाश की ओर चलने का प्रयत्न करते हैं।
दोनों दिशाओं का अन्तर स्पष्ट है। एक में शरीर सुख अधीन हैं, दूसरी में आत्म कल्याण की प्रमुखता है। जिस ओर मन का झुकाव होगा उस ओर चित्त अधिक लगेगा उसी प्रकार के साधन जुटाने की तैयारी रहेगी और उसी दिशा में प्रगति होने से संतोष मिलेगा। यों उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव की तरह वह दोनों धारायें जीवन रूपी पृथ्वी के दो छोर हैं आपस में जुड़े हुए हैं, अविच्छिन्न हैं फिर भी प्रधानता जिसकी रहेगी उसके विपरीत दूसरे की उपेक्षा स्वभावतः होने लगेगी।
कर्मयोग के सत्व ज्ञान में दोनों का समन्वय करने का प्रयत्न किया गया है। शरीर सुख के आवश्यक साधनों को समुचित मात्रा में उपलब्ध करके उनका सदुपयोग किया जाय और मन को परमार्थ साधन में लगाये रहा जाय। यह तरीका इस लिए भी ठीक है कि शरीर और आत्मा दोनों के सम्मिश्रण से ही जीवन की गतिविधि चल रही है। रथ के दोनों ही घोड़े हैं, दोनों के ही चारे दाने का प्रबंध करना पड़ेगा। इसलिए दोनों ओर ध्यान देने, दोनों को समन्वय करने, इन्हें आपस में टकराने से बचाकर सहयोग और समन्वय करने की नीति व्यवहारिक और बुद्धिमानी पूर्ण है। यही सरल और सुगम भी है।
इतना होते हुए भी इन दोनों दिशाओं की भिन्नता और प्रतिकूलता को स्वीकार करना पड़ता है गीताकार ने इसे स्वीकार किया है कहा है-
या निशा सर्व भूतानाँ तस्याँ जाग्रति संयमी।
यस्याँ जाग्रति भूतानि निसापश्यतो मुनेः॥
गीता 2। 69
सब प्राणियों के लिए जो रात्रि है उसमें योगी लोग जागते रहते हैं और जिसमें प्राणी जागते हैं उसे योगी लोग रात्रि समझते हैं
रात्रि और दिन तो योगी अयोगी सबके लिए एक ही समय पर होते हैं और सोने जागने का समय भी दोनों का एक ही है, पर इस श्लोक में आलंकारिक रूप से यह बताया गया है कि योगी और अयोगियों की अभिरुचि में रात्रि और दिन जितनी भिन्नता होती है। जिन विषयों में एक की अभिरुचि होती है उसी में दूसरे को उतनी ही अरुचि होती है जो अन्तर सोने और जागने की स्थिति में होता है वही योगी और अयोगी की मनोदशा में होता है।
यहाँ योगी और अयोगी का तात्पर्य भौतिक और आध्यात्मिक अभिरुचि के लोगों से है। उन लक्ष्यों और उद्देश्यों में दिन और रात जितनी परस्पर विरोधी भिन्नता रहती है। इस लक्ष्य भिन्नता के कारण उनके जीवन की गतिविधियों में एक अलग अन्तर भी स्पष्ट दिखाई पड़ता है।
भौतिकवादी दृष्टिकोण के व्यक्ति शरीर सुख को प्रधानता देते हैं। और उसी के सुख साधन जुटाने में तन्मय रहते हैं। यह तन्मयता बहुधा इतनी हो जाती है कि आध्यात्मिक स्वार्थों की उपेक्षा एवं अवहेलना की जाने लगती है। देखा गया है कि लोग वासना और तृष्णा की पूर्ति के लिए ऐसे जघन्य कार्य करने लगते हैं जिनसे परलोक बिगड़ता है, पाप लगता है और आत्म पतन होता है। चोरी, ठगी, लूट, हत्या, शोषण, अपहरण आक्रमण की घटनाएं भौतिक स्वार्थों की अहंकार की एवं अमीरी की प्राप्ति के लिए घटित होती है। दुष्टों की दुष्टता का यही आधार है।
सत्कार्यों में अरुचि होना उनके लिए अवकाश न मिलना भी भौतिकवादी अभिरुचि की प्रधानता के कारण ही होता है। परोपकार का कोई अवसर आने पर लोग कन्नी काटने लगते हैं, मुँह छिपाते हैं और बच निकलने का बहाना ढूंढ़ते हैं। ईश्वर उपासना के लिए दस-पाँच मिनट की भी फुरसत नहीं मिलती। स्वाध्याय और सत्संग के लिए कभी इच्छा नहीं होती। किसी दीन दुखी की सहायता या दान पुण्य की आवश्यकता दिखाई दे तो भी कंजूसी करता है। इसके विपरीत शरीर से संबंधित लाभों में सारा समय लगाने, अधिक से अधिक धन खर्च करने में तनिक भी संकोच नहीं होता। शान शौकत बढ़ाने वाले प्रीतिभोज, विवाह-शादी आदि प्रयोजनों में लोग ढेरों पैसा फूँकते रहते हैं, इससे उन्हें तनिक भी झिझक नहीं होती, पर जब आत्मकल्याण से संबंधित कोई परमार्थिक कार्य ऐसा सामने आता है जिसमें कुछ खर्च करना पड़े तो सारी कंजूसी इकट्ठी हो जाती है और लोग अपनी गरीबी तथा आर्थिक कठिनाई का रोना-रोने लगते हैं। सिनेमा, मनोरंजन, गपशप, तफरी, आलस्य-प्रमाद आदि में ढेरों समय बर्बाद चला जाता है, पर आत्मकल्याणकारी सत्कार्यों के लिए समय की भारी कमी बताई जाती है।
शरीर सुखों के लिए समय, इच्छा और खर्च का इतना बाहुल्य और आत्मकल्याण के लिए इन सबकी इतनी कमी होना इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य जीवन में अभिरुचि ही सबसे बड़ी शक्ति है। यह जिधर भी झुक जाती है उधर ही उसकी मानसिक, शारीरिक एवं साँसारिक शक्तियाँ लग पड़ती हैं उन्हीं में उसे रस आता है उधर ही सफलता मिलती है और वहीं मन लग जाता है।
यदि यह अभिरुचि अभ्यास मार्ग में लगे तो मनुष्य सत्कार्यों के लिए, मानसिक और आत्मिक उन्नति के लिए, साधना उपासना के लिए पर्याप्त समय प्राप्त कर लेता है, मन भी उन कार्यों में लगता है और आवश्यक साधन भी उपलब्ध हो जाते हैं संसार में जितने धर्मात्मा, लोकसेवी, परोपकारी, विद्वान, ईश्वर भक्त एवं महापुरुष हुए हैं, उन्हें आरंभ से ही इसके लिए कोई बनी बनाई पृष्ठभूमि नहीं मिली थी। वरन् उनकी अभिरुचि की तीव्रता ने विपरीत परिस्थितियों में भी मार्ग निकाला, साधन जुटाये और सफलता प्राप्त की। मनुष्य अपनी अभिरुचि को भौतिक आकर्षणों से बचाकर अध्यात्मिक दूरदर्शिता के मार्ग पर लगा दे, तो निश्चय ही वह इस सुरदुर्लभ मानव जीवन की प्राप्ति का पूरा लाभ उठा सकता है। भव बन्धनों से मुक्त होकर शाश्वत शक्ति का भागी बन सकता है। यह एक विचारणीय प्रश्न है कि हम जीवन का क्या उपयोग करें। शरीर सुख के लिए साधन जुटाने-अहंकार तृष्णा और वासना को पूरा करने में लगा दें या आत्मकल्याण एवं परमार्थ का साधन बनाने में प्रयुक्त करें। दोनों ही मार्ग स्पष्ट हैं। दोनों के परिणाम भी स्पष्ट हैं। भौतिकवादी जीवन में शरीर सुख की सम्भावना तो रहती है, पर वह लक्ष एक प्रकार से तिरोहित हो ही जाता है जिसके लिए ईश्वरीय वरदान स्वरूप यह दिव्य जन्म प्राप्त हुआ है। इन्द्रिय सुखों में और वासनाओं की पूर्ति में कुछ ऐसा आकर्षण है कि दुर्बल स्वभाव का प्राणी अनायास उधर ही झुक जाता है। तकाजा यही है कि इतनी छोटी कीमत में, 84 लाख योनियाँ के बाद लाखों-करोड़ों वर्षों की प्रतिक्षा के पश्चात् प्राप्त हुए इस मानव जन्म को नष्ट न होने दें। इन्द्रिय सुख तो कीट-पतंग एवं पशु-पक्षी भी अपनी-अपनी योनियों में प्राप्त कर लेते हैं यदि उतनी सी ही वस्तु इस शरीर में भी प्राप्त हुई फिर इसकी श्रेष्ठता क्या रह जाती है?
आत्मकल्याण, संसार की सेवा का परमार्थ एवं अनुकरणीय उदाहरण छोड़ जाने का उज्ज्वल यश यह तीनों बहुमूल्य वस्तुएं इन्द्रिय भोगों आदि तृष्णा साधनों की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान हैं। फिर मूल्यवान वस्तु की उपेक्षा करके घटिया चीज पर क्यों फिसला जाय? मनुष्य को जो असाधारण बुद्धिबल मिला हुआ है उसकी सफलता इसी में है कि जीवनयापन जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न पर दूरदर्शिता पूर्ण निश्चय किया जाय और स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म को, भौतिकता की अपेक्षा आध्यात्मिकता को अधिक महत्व दिया जाय।
प्रत्येक मनुष्य इस संसार के रंगमंच पर एक अभिनय करने आता है। अपनी मन-प्रवृत्ति से प्रेरित होकर अपने पाठ को दुहराता है-यही मनुष्य का जीवन है
- भगवतीचरण वर्मा
जीवन सब कलाओं से ऊपर है, और मैं यह भी घोषित करता हूँ कि जो व्यक्ति जीवन में पूर्णता पाने का प्रयास करता है वह एक महान कलाकार है।
-महात्मा गाँधी
(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)
गायत्री वह शक्ति केन्द्र है जिसके अंतर्गत विश्व के सभी दैविक, दैहिक, भौतिक छोटे-बड़े शक्ति तत्व अपनी-अपनी क्षमता और सीमा के अनुसार संसार के विभिन्न कार्यों का सम्पादन करते हैं। इन्हीं का नाम देवता है। ये ईश्वरीय सत्ता के अंतर्गत उसी के अंश रूपी इकाइयाँ हैं जो सृष्टि संचालन के विशाल कार्यक्रम में अपना कार्य भाग करते रहते हैं। जिस प्रकार एक शासन-तंत्र के अंतर्गत अनेकों अधिकारी अपनी-अपनी जिम्मेदारी निबाहते हुए सरकार का कार्य संचालन करते हैं, जिस प्रकार एक मशीन के अनेकों पुर्जे अपने-अपने स्थान पर अपने-अपने क्रिया कलापों को जारी रखते हुए उस मशीन की प्रक्रिया सफल बनाते हैं, उसी प्रकार यह देव तत्व भी ईश्वरीय सृष्टि व्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की विधि व्यवस्था का सम्पादन करते हैं।
गायत्री एक सरकार एवं मशीन के सदृश है जिसके अंग प्रत्यंगों के रूप में सभी देवता गुँथे हुए हैं। गायत्री के तीन अक्षर सत, रज, तम, तीन तत्वों के प्रतीक हैं। इन्हीं को स्थिति के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, महेश-सरस्वती, लक्ष्मी, काली कहते हैं। इन्हीं तीन श्रेणियों में विश्व की सभी स्थूल एवं सूक्ष्म शक्तियों की गणना होती हैं। जितनी भी शुभ-अशुभ, उपयोगी अनुपयोगी, शान्ति-अशाँति की प्रक्रियाएं दृष्टिगोचर होती हैं वे इन्हीं सत, रज, तम तत्वों के अंतर्गत हैं और यह तीन तत्व गायत्री के तीन चरण हैं। इस प्रकार समस्त शक्ति तत्वों का मूल आधार गायत्री ही ठहरती है।
ब्रह्मा, इस विशाल सृष्टि का मूल कारण तो अवश्य है पर स्वभावतः साक्षी दृष्टा के रूप में स्थित रहता हुआ स्वयं अपने आप में निष्क्रिय है। उसकी ‘गतिशीलता’ ही वह तत्व है जिसके द्वारा जगत के स्थूल और सूक्ष्म विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न होते हैं। इस गतिशीलता को ही प्रकृति, माया, चेतना, ब्रह्मपत्नी आदि नामों से पुकारा गया है। यही गायत्री है।
परमात्मा की कार्यकर्त्री देव शक्ति
सृष्टि का आरम्भ करते हुए परमात्मा ने अपने भीतर से जो शक्ति तत्व प्रादुर्भूत किया और सृष्टि संचालन की सार व्यवस्था उसे सौंप कर स्वयं निश्चित हो गया। इस प्रकार वह ब्रह्म निर्लिप्त, निरधिष्ठ, निरवद्य एवं अव्यय बना रहा और संसार का सारा कार्य उस प्रादुर्भूत शक्ति तत्व के द्वारा संचालित होने लगा। इस रहस्य का उद्घाटन निम्न प्रमाणों में होता है।
देवीह्यकोऽग्र आसीत्। सैव जगदण्डमसृजत्...... तस्या एव ब्रह्मा अजीजनत्। विष्णुरजी जनत्...... सर्वमजी जनत्.....सैषा पराशक्तिः।
-वृहवृचोपनिषद
सृष्टि के आरम्भ में वह एक ही देवी शक्ति थी। उसी ने यह ब्रह्माण्ड बनाया। उसी से ब्रह्मा उपजे। उसी ने विष्णु, रुद्र उत्पन्न किये। सब कुछ उसी से उत्पन्न हुआ। ऐसी है वह पराशक्ति।
निर्दोषो निरधिष्ठेयो निरवद्यसनातनः।
सर्वकार्यकरी साहं विष्णोरव्यय रुपिणः॥
-लक्ष्मीतंत्र
वह ब्रह्म तो निर्दोष, निरधिष्ठ, निरवद्य, सनातन अव्यय है। उनकी सर्व कार्यकारिणी शक्ति तो मैं ही हूँ।
इस महाशक्ति की सर्व व्यापकता का, सभी पदार्थों की अधिष्ठात्री विभूति, एवं सभी हलचल की मूल प्रेरिका होने का वर्णन अनेक ग्रन्थों में मिलता है। देखिए-
स्वं भूमि सर्व भूतानाँ प्राणः प्राणवताँ तथा। धीः श्रीः कान्तिः क्षमा शान्ति श्रद्धा मेधा धृतिः स्मृतिः स्व मुद्गीथेऽघ्धं मात्रासि गायत्री व्याहृति स्तथा। -
देवी. भा. 1-5
तुम्हीं सब प्राणियों को धारण करने वाली भूमि हो। प्राणवानों में प्राण हो। तुम्हीं धी, श्री, कान्ति, क्षमा, शान्ति, श्रद्धा, मेधा, घृति, स्मृति हो तुम ही ओंकार की अर्धयात्रा उद्गीथ हो, तुम ही गायत्री व्याहृति हो।
पूषार्यम मरुत्वाँश्च ऋषयोऽपि मुनीश्वराः। पितरोनागयक्षाश्च् गन्धर्वाप्सरसा गणाः॥
ऋगयजु सामवेदाश्च अथर्वांिगरसानि च।
त्वमेव पञ्च भूतानि तत्वानि जगदीश्वरि॥
ब्राह्यी सरस्वती सन्ध्या तुरीया त्वं महेश्वरी।
त्वमेव सर्व शास्त्राणि त्वमेव सर्व संहिता।
पुराणानि च तंत्राणि महागम मतानि च॥
तत्सद् ब्रह्म स्वरूपा त्वं किञ्चित्सद सदात्मिका। परात्वरेशी गायत्री नमस्ते मातरम्यिके॥
-वशिष्ठ संहिता
पूषा, अर्यमा, मरुत, ऋषि, मुनीश्वर, पितर, नाग, यज्ञ, गंधर्व, अप्सरा, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, अंगिरस, पंचभूत, ब्राह्मी, सरस्वती एवं संध्या -हे महेश्वरी तुम ही हो। सर्व शास्त्र, संहिता, पुराण, तंत्र, आगम, निगम तथा और भी जो कुछ इस संसार में है सो हे ब्रह्मरूपिणी, पराशक्ति गायत्री तुम ही हो। हे माता तुम्हें प्रणाम है।
आदित्य देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरो सुराः तेषाँ सर्व भूतानाँ माता मेदिनी माता मही सावित्री गायत्री जगत्युर्वी पृथ्वी बहुला विद्या भूता।
-नारायणोपनिषद्
अर्थात्-देव, गंधर्व, मनुष्य, पितर, असुर इनका मूल कारण अदिति अविनाशी तत्व है। वह अदिति सब भूतों की माता मोदिनी और माता सही है। उसी विशाल गायत्री के गर्भ में विश्व के सम्पूर्ण प्राणी निवास करते हैं।
परमात्मास्तु या लोके ब्रह्मशक्ति र्विराजते।
सूक्ष्मा च सात्विकी चैव गायत्री त्यमिधीयते।
अर्थात्- सब लोकों में विद्यमान जो सर्वव्यापक परमात्मा की शक्ति है वह अत्यन्त सूक्ष्म एवं सतोगुणी प्रकृति में निवास करती है। यह चेतन शक्ति गायत्री ही हैं।
अहं रुद्रोभिर्वसुभिञ्चराम्यहमादित्यैरुत विश्व देवैः। अहं मित्रावरुणोभाविभर्ग्य हमिन्द्राग्नी अहिमश्वि नोभा।
- ऋग्वेद 8।7।11
मैं ही रुद्र, वसु, आदित्य और विश्वेदेवों में विचरण करती हूँ। मैं ही मित्र, वरुण, इन्द्र, अग्नि और अश्विनी कुमारों का रूप धारण करती हूँ।
मया से अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणितिय ई श्रृणोत्युक्तम्। अमन्त वो माँ त उप क्षियन्ति श्रधि श्रुत श्रद्धि वं ते वदामि।
यह विश्व मुझ से ही जीवित है। मेरे द्वारा ही उसे अन्न मिलता है। मेरी शक्ति से ही वह बोलता और सुनता है। जो मेरी उपेक्षा करता है वह नष्ट हो जाता है। श्रद्धावानों, सुनो। यह सब मैं तुम्हारे ही कल्याण के लिए कहती हूँ।
विभूतियों का भण्डागार
इस महाशक्ति का विस्तार अत्यन्त व्यापक है जब समस्त सृष्टि की अगणित प्रक्रियाओं का संचालन उसी के द्वारा होता है तो कितने प्रकार की शक्तियाँ उसके अंतर्गत काम करती होंगी, इसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। पर मनुष्य सीमित है। उसकी आवश्यकतायें एवं आशंकायें भी सीमित हैं, जिन वस्तुओं को प्राप्त करके उसका व्यक्तित्व निखर उठता है एवं मन उल्लसित हो जाता है वे विभूतियाँ भी सीमित हैं। यह सीमित वस्तुएं गायत्री का एक बहुत छोटा अंशमात्र है। मनुष्यों में जो कुछ प्रशंसनीय एवं आकर्षक विशेषतायें दिखाई पड़ती है उन सबको उस महाशक्ति को छोटा सा प्रसाद हो समझना चाहिए। मानव शरीर में वह शक्ति किन प्रमुख रूपों में अधिष्ठित है इसका परिचय देते हुए माता स्वयं कहती है :-
अहं बुद्धि रहं श्रीश्च् धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा।
श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा॥
कान्तिः शान्तिः पिपासा च निद्रा तन्द्रा जरा जरा। विद्याविद्या स्पृहा वाँछा शक्ति श्चाशक्ति रेवच॥
वसा मज्जा च त्वक चाहं दृष्टिर्वागनृता ऋता।
परामध्या च पश्यन्ती नाडयेऽहं विविधाश्च् याः॥
किं नाहं पश्य संसारे मद्वियुक्तं किमस्ति हि।
सर्वमेवाहभित्येव निश्च्यं विद्धि पद्मज।
मैं क्या नहीं हूँ? इस संसार में मेरे सिवाय और कुछ नहीं है। बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शाँति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वांछा, शक्ति, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि, असत और संत वाणी, परा, मध्यमा, पश्यन्ती, नाड़ी संस्थान आदि निश्चय ही सब कुछ मैं हूँ।
अहमेक स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः। यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृर्षिं तं सुमेधा।
मैं तत्वज्ञान का उपदेश करती हूँ। मैं जिसे चाहती हूँ उसे समुन्नत करती हूँ, उसे सुबुद्धि देती हूँ ऋषि बनाती हूँ और ब्रह्मपद प्रदान करती हूँ।
रहस्यों का जानना आवश्यक है
गायत्री तत्व के सूक्ष्म रहस्यों को जानने के उपरान्त ही उसकी उपासना वास्तविक रूप में होना संभव है। उसके मर्म विज्ञान को समझो बिना साधारण रीति से जो उपासना क्रम चलाया जाता है, उसका परिणाम तो होता है पर उसकी मात्रा स्वल्प ही होती है। उपासना का समुचित सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए इस विज्ञान के रहस्यों को समझना और उनका अनुशीलन करना आवश्यक है। मनुष्य की आत्मा पर चढ़े हुए मल, विक्षेप आवरणों को हटाने के लिए जैसी तीव्र साधना एवं गहन निष्ठा की आवश्यकता है उसको उपलब्ध करने के गायत्री के तत्वज्ञान को समझना चाहिए।
शतपथ ब्राह्मण में एक आख्यायिका आती है जिसमें यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि पुरोहित गायत्री के मर्म से वंचित रहने के कारण साधारण उपासना करते रहने पर भी समुचित परिणाम प्राप्त न कर सका। आख्यायिका इस प्रकार है :-
एतर्द्धव तज्जनको द्यैदेही बुडिल माश्वतं राश्वि भुवाच यन्नु हो तदगायत्री विदव्रू था ऽअथकथœहस्ती भूतोव्वह सीति मुखंहास्या सम्राशन विवाञ्चकरेति हो वाच। तस्या ऽग्निरेव मुखं यदि हवाऽअपि वह्विवाग्ना वभ्यादघति सर्वमेव तत्सन्द हत्येव वœ है वैव विद्यद्यपि वह्विव सर्व मेव सत्संरसा शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः संभवति। -शतपथ
अर्थात्-”राजा जनक का पूर्व जन्म का पुरोहित बुडिल अनुचित दान लेने के पाप से मर कर हाथी बन गया। किन्तु राजा जनक ने विज्ञान तप किया और उसके फल से वह पुनः राजा हुआ। राजा ने हाथी को उसके पूर्व जन्म का स्मरण दिलाते हुए कहा-आप तो पूर्व जन्म में कहा करते थे कि मैं गायत्री का ज्ञाता हूँ। फिर अब हाथी बन कर क्यों बोझ ढोते हो? हाथी ने कहा मैं पूर्व जन्म में गायत्री का मुख नहीं समझ पाया था इसीलिये मेरे पाप नष्ट न हो सके।”
“गायत्री का प्रधान अंग मुख अग्नि ही है जैसे जो ईंधन डाले जाते हैं उन्हें अग्नि भस्म कर देती है वैसे ही गायत्री का मुख जानने वाले आत्मा अग्नि मुख होकर पापों से छुटकारा प्राप्त कर अजर अमर हो जाता है।”
गायत्री के जिस मुख को ऊपर की पंक्तियों में वर्णन है वह उसका प्रवेश द्वार-आरम्भिक ज्ञान है। जिस प्रकार भोजन को पेट में पहुँचाने के लिए मुख ही उसका प्रारम्भिक प्रवेश द्वार होता है उसी प्रकार उपासना का मुख यह है कि उपास्य के बारे में आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया जाय? यह ज्ञान ग्रन्थों के स्वाध्याय द्वारा एवं उस विद्या के विशेषज्ञों के सत्संग से जाना जा सकता है। यह दोनों ही माध्यम प्रत्येक सच्चे जिज्ञासु को अनिवार्यतः अपनाने चाहिए।
गायत्री ज्ञान-विज्ञान की महत्ता बताते हुए उपनिषद्कार ने बताया है कि ज्ञानपूर्वक की हुई उपासना से आत्मा में सन्निहित दिव्य तत्वों का विकास होता है और इस जीवन तथा संसार में जो कुछ प्राप्त होने योग्य है वह सभी कुछ उसे प्राप्त हो जाता है।
यो ह वा एवं चित् स ब्रह्म वित्पुण्याँ च कीर्ति लभते सुरभींश्च् गन्वान्। सोऽपहत पाप्मानन्ताँ श्रिय मश्नुतेय एवं वेद, यश्चौवं विद्वानेवमेत वेदानाँ मातरं सावित्री सम्पदभुपनिषद मुपास्त इति ब्राह्मणम्।
- गायत्री उपनिषद्
जो इस प्रकार वेदमाता गायत्री को जान लेता है वह ब्रह्मवित्, पुण्य, कीर्ति एवं दिव्य गन्धों को प्राप्त करता है और निष्पाप होकर श्रेय का अधिकारी बनता है
तीन चरणों की अनन्त सामर्थ्य
गायत्री को त्रिपदा कहा गया है, उसके तीन चरण हैं। इनमें से प्रत्येक चरण तीन लोकान्तरों तक फैला हुआ है। उसके माध्यम से आत्मा की गति केवल इसी लोक तक सीमित नहीं रहती वरन् वह अन्य लोकों तक अपना क्षेत्र विस्तृत कर सकता है और वहाँ उपलब्ध साधनों से लाभान्वित हो सकता है।
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टा व क्षराण्यष्टाक्षर हवा एवं गायत्र्यै पद मेतदुहैवास्या एतत्सयावेदतेषु लोकेषु तावद्धि जर्यात योऽस्याएतदेवं पदं वेद।
वृहदारण्यक 5।14।1
भूमि, अन्तरिक्ष, द्यौ ये तीनों गायत्री के प्रथम पाद के आठ अक्षरों के बराबर हैं। जो गायत्री के इस प्रथम पाद को जान लेता है सो तीनों लोकों को जीत लेता है।
जिस प्रकार बाह्य जगत में अनेकों लोक हैं उसी प्रकार इस शरीर के भीतर भी सप्त प्राण, षट्चक्र ग्रन्थियाँ, उपत्यिकाएं मौजूद हैं। साधारण मनुष्यों में यह प्रसुप्त अवस्था में अज्ञात पड़े रहते हैं, पर जब गायत्री उपासना द्वारा जागृत आत्मा इन अविज्ञात शक्ति केन्द्रों को झकझोरता है तो वे भी जागृत हो जाती हैं और उनके भीतर जो आश्चर्यजनक तत्व भरे पड़े हैं वे स्पष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार वैज्ञानिक लोग, इस ब्रह्माण्ड में बाह्य जगत में व्याप्त अनेक शक्तियों को ढूँढ़ते और उनका उपयोग करते हैं उसी प्रकार आत्म विज्ञानी साधक पिण्ड में देह में अंतर्जगत में सन्निहित तत्वों का साक्षात्कार करके उनकी दिव्य शक्तियों से लाभान्वित होते हैं। आत्म-दर्शन ब्रह्म साक्षात्कार एवं स्वर्ग लोक की प्राप्ति उनके लिए सरल हो जाती है। इस मार्ग में सफलता प्राप्त करने वाले अपनी परम्परा को आगे जारी रखने वाले कोई तेजस्वी उत्तराधिकारी भी अपने पीछे के लिए छोड़ जाते हैं।
तेवाएते पञ्च ब्रह्म पुरुषा स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपालस्य एतानेकं पञ्च ब्रह्म पुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाल वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्ग लोकम्। - छांदोग्य. 3।13।6
हृदय चैतन्य ज्योति गायत्री रूप ब्रह्म के प्राप्ति स्थान के प्राण, व्यान, अपान, समान, उदान ये पाँच द्वारपाल हैं। इनको वश में करे। जिससे हृदय स्थित गायत्री स्वरूप ब्रह्मा की प्राप्ति हो। इस प्रकार उपासना करने वाला स्वर्ग लोक को प्राप्त होता है और उसके कुल में वीर पुत्र या शिष्य उत्पन्न होता है
गायत्री का व्याख्या विस्तार
गायत्री महामंत्र के 24 अक्षरों में इतना ज्ञान विज्ञान भरा हुआ है कि उसका अन्वेषण करने से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। ब्रह्माजी ने गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया। महर्षि वाल्मीक ने अपनी वाल्मीक रामायण की रचना करते हुए एक-एक हजार श्लोकों के बाद क्रमशः गायत्री के एक-एक अक्षर से आरम्भ होने वाले श्लोक बनाये। इस प्रकार वाल्मीक रामायण में प्रत्येक एक हजार श्लोकों के बाद गायत्री के एक अक्षर का सम्पुट लगा हुआ है। महर्षि वाल्मीक गायत्री के महत्व को जानते थे उन्होंने अपने महाकाव्य में इस प्रकार का सम्पुट लगाकर अपने ग्रन्थ की महत्ता में और भी अधिक अभिवृद्धि कर ली।
श्रीमद्भागवत पुराण की भी गायत्री महामन्त्र की व्याख्या स्वरूप ही रचना हुई। श्रीहरि टीका में इस रहस्य को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है।
सत्यं परं धीमहि-तं धीमहि इति गायत्र्या प्रारम्भेण गायत्र्याख्या ब्रह्मविद्या रूपभेत्पुराण इति। - श्री धरी
वेद व्यास जी ने गायत्री प्रतिपाद्य सत्यं परं धीमहि तत्व में ही भागवत का प्रारम्भ मूल है। गायत्री के ही दो अक्षरों की व्याख्या में एक-एक स्कंध बनाकर 12 स्कंध पूरे किये हैं।
देवी भागवत पुराण के संबंध में भी यही मान्यता है कि उसकी रचना गायत्री मंत्र के अक्षरों में निहित तत्वों का उद्घाटन करने के लिए ही की गई है। मत्स्य पुराण में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख है।
यत्राधिकृत्य गायत्रीं वर्ण्यन्ते धर्म विस्तरः। वृत्रासुरवधोपेतं तद् भागवत मुच्यते।
मत्स्य पुराण 53। 20
जिसमें गायत्री के माध्यम से धर्म का विस्तारपूर्वक वर्णन है। जिसमें वृत्तासुर वध का वृत्तांत है, वह भागवत ही कही जाती है।
देवी भागवत पुराण का आरम्भ गायत्री के रहस्योद्घान के रूप में ही होता है
ॐ सर्व चैतन्य रूपाँ तामाद्याँ विद्याँ च धीमहि। बुद्धिर्योनः प्रचोदयात्।
-देवी भागवत
जो आदि अन्त रहित, सर्व चैतन्य स्वरूप वाली, ब्रह्म विद्या स्वरूपिणी आदि शक्ति है उसका हम ध्यान करते हैं। वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।
देवी भागवत, बारहवें स्कंध के अन्त में समाप्ति का श्लोक भी गायत्री तत्व के संपुट के साथ पूर्ण हुआ है।
सच्चिदानन्द रूपाँ ताँ गायत्री प्रतिपिदताम्।
नमामि ह्नीं मयीं देवी धियो योनः प्रचोदयात्।
उन ह्नीं मयी सच्चिदानन्द स्वरूपा गायत्री शक्ति को प्रणाम है। वे हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।
चारों वेद, वाल्मीक रामायण, श्रीमद्भागवत देवी भागवत ही नहीं न जाने कितने बड़े ज्ञान के भण्डार का प्रणयन-गायत्री के आधार पर हुआ वस्तुतः भारतीय धर्म को सारा ज्ञान-विज्ञान गायत्री रूपी सूर्य के सामने छोटे बड़े ग्रह उपग्रहों के रूप में भ्रमण करता है।
मंगलमयी मधु विद्या
वृहदारण्यक उपनिषद् में जिस मधु विद्या का विस्तारपूर्वक वर्णन कि या गया है उसका सम्बन्ध गायत्री से ही है। जिस प्रकार पारस मणि के स्पर्श से लोहे के टुकड़ों का ढेर भी सोना हो जाता है। उसी प्रकार इस संसार की अनेकों कड़ुई, कुरूप, कष्टदायक, प्रतिकूल वस्तुएँ तथा परिस्थितियों की उसके लिये मधुर, सौंदर्ययुक्त, सुखदायक व अनुकूल बन जाती है।
गायत्री के तीनों चरण समस्त सृष्टि को अपने लिए आनन्दपूर्ण मधुमय बना देने की शक्ति से परिपूर्ण है। नदियों को जल पूर्ण, समुद्र को रत्न पूर्ण और औषधि वनस्पतियों को जीवनी शक्ति से परिपूर्ण गायत्री का प्रथम चरण बनाता है। रात्रि और दिन किसी प्रकृति विपरीतता से तूफान, भूचाल अतिवृष्टि शीतोष्ण की अधिकता जैसी विकृतियों से बचकर हितकर वातावरण से आनन्दमय से पृथ्वी के परमाणु पर्याप्त मात्रा में अन्न, धातु, खनिज, रस, रत्न आदि प्रदान करते रहें तथा द्युलोक की मंगलमयी किरणें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहें ऐसी शक्ति गायत्री के दूसरे चरण में है। गायत्री का तीसरा चरण सूर्य की उत्पादक प्रेरक एवं विकासोन्मुख शक्तियों को नियंत्रित एवं आवश्यक मात्रा में पृथ्वी पर आह्वान करता है। न तो सूर्य की शक्ति किरणें पृथ्वी पर इतनी अधिक आयें कि ताप से जीवन रस जले और न उसकी इतनी न्यूनता हो कि विकास क्रम में बाधा पड़े। चूंकि वनस्पतियाँ जीव जन्तु एवं जड़-चेतन सभी अपना जीवन तत्व सूर्य से प्राप्त करते हैं। मानव प्राणी की चेतना एवं विशेष प्राण क्षमता भी सूर्य पर ही अवलम्बित है। इस विश्व प्रसविता-सविता पर गायत्री का तीसरा चरण नियंत्रण स्थापित करता है, इसलिये सृष्टि के समस्त संतुलन को गायत्री शक्ति के आधार पर स्थिर रख सकना संभव हो सकता है।
गायत्री में आध्यात्म तत्व तो प्रधान-रूप से है ही, वह आत्मबल और अंतर्जगत की अगणित सूक्ष्म शक्तियों को विकसित करके मनुष्य को इस पृथ्वी तल को देवता तो बना ही सकता है, साथ ही स्थूल सृष्टि में काम करने वाली सभी भौतिक शक्तियों पर भी उसका नियंत्रण है। इस विकास को प्राचीन काल में जब आत्मदर्शी लोग जानते थे तब वे इस संसार की ही नहीं अन्य लोकों की स्थिति भी शान्तिमय, मधुरिमा से पूर्ण बनाये रख सकने में समर्थ थे। भारतवर्ष का यही महान विज्ञान किसी समय उसे अत्याधिक ऊँची सम्मानास्पद स्थिति में रखे हुए था। आज इसी को खोकर हम मणिहीन सर्प की तरह दीन-हीन एवं परमुखापेक्षी बने हुए है। गायत्री में सन्निहित मधु विद्या का उपनिषदों का वर्णन इस प्रकार है :-
तत्सवितुर्वरेण्यम्। मधु वाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। भूः स्वाहा भर्गो देवस्य धीमहि। मधुनक्त मतोषसो मधुमत्यार्थिव रजः। मधुद्यौरस्तु नः पिता। भुवः स्वाहा। धियो योनः प्रचोदयात्। मधु मान्नो वनस्पतिमधु मा œ अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः। स्वः स्वाहा। सर्वाश्च मधुमती रहभेवेद œ सर्वभूयाँसं भूर्भुवः स्वः स्वाहा।
-वृहदारण्यक 6। 3 । 6
-(तत्सवितुर्वरेण्यं) मधुर वायु चले, नदी और समुद्र रसमय होकर रहें। औषधियाँ हमारे लिये सुखदायक हों।
-(भर्गो देवस्य धीमहि) रात्रि और दिन हमारे लिये सुखकारी हों, पृथ्वी की रज हमारे लिये मंगलमय हो। भू-लोक हमें सुख प्रदान करे।
-(धियो योनः प्रचोदयात्) वनस्पतियाँ हमारे लिए रसमयी हो। सूर्य हमारे लिये सुखप्रद हो। उसकी रश्मियाँ हमारे लिये कल्याणकारी हों। सब हमारे लिये सुखप्रद हों। मैं सबके लिए मधुर बन जाऊँ।
अंतर्जगत के गुप्त तत्व
मनुष्य के अंतर्जगत में तो विलक्षण शक्तियाँ भरी हुई है, उनका जागरण भी गायत्री महामंत्र द्वारा ही संभव है। इस महामंत्र का एक-एक अक्षर शक्ति बीज है। इन शक्ति बीजों के स्पर्श से शरीर में अवस्थित प्रधान षटचक्रों एवं अठारह उपचक्रों का इस प्रकार कुल 24 चक्रों का जागरण गायत्री उपासना से होता है। इन रत्न भण्डार सरीखे चक्र उपचक्रों में से प्रत्येक में ये शक्तियाँ और सिद्धियाँ भरी हुई हैं जिन्हें प्राचीन काल में ऋषि मुनि प्राप्त करके अपने को ईश्वरीय तत्वों का अधिकारी-उत्तराधिकारी बनाये हुए थे। इसका प्रमाण इस प्रकार मिलता है :-
चतुर्विशाँक्षरी विद्या पर तत्व विनिर्मिता।
तत्कारात् यातकार पर्यन्त शब्द ब्रह्मत्वरूपिणी।
-गायत्री तत्र
अर्थात्-’तत्’ शब्द से लेकर प्रचोदयात् शब्द पर्यन्त 24 अक्षरों वाली गायत्री पर तत्व अर्थात् पराविद्या से ओत-प्रोत है।
गायत्री के 24 अक्षरों में से प्रत्येक अक्षर शरीर में काम करने वाले प्रधान तत्वों में से एक-एक का प्रतिनिधि है। महामंत्र के 24 अक्षर किन-किन 24 महातत्त्वों से संबंधित है इसका वर्णन निम्न प्रमाण में देखिये :-
कर्मन्द्रियाणि पंचैव पंच बुद्धीन्द्रियाणि च।
पंच पंचेन्द्रियार्थश्य भूतानाँचैव पंचकम्॥ मनोबुद्धिस्तथात्माच अव्यक्तं च यदुत्तमम्। चतुविशत्यथैतानि गायत्र्या अक्षराणितु।
-योगी याज्ञवलक्य
अर्थात्- पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच तत्व, पाँच तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, आत्मा तथा परमात्मा यह चौबीस शक्तियाँ गायत्री के चौबीस अक्षरों में समाई हुई है।
यद्यपि यह शक्ति निराकार है, फिर भी उससे सम्बन्ध स्थापित करने आकर्षित करने अपने अन्दर धारण करने के लिये जो उपासना की जाती है वह निराकार रूप में संभव नहीं इसलिये उसके रूप की कल्पना करनी पड़ती है।
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य निगुर्णस्य गुणात्मनः।
उपासकानाँ सिद्धयथं ब्रह्मणों रूप कल्पना।
ब्रह्म अचिन्त्य, अप्रमेय, निर्गुण, गुणात्मा है उसका चिन्तन ध्यान संभव नहीं, इसलिए उपासकों की सफलता के लिये रूप कल्पना की गई।
परमात्मा तथा उसकी इस प्रधान शक्ति को लिंग भेद में विभाजित नहीं किया जा सकता। वह नर है न नारी परन्तु इतना अवश्य है कि उसे जिस रूप में जिस भाव से माना जाय उसी के अनुरूप वह सामने उपस्थित होते हैं। भक्त की भावना के ढाँचे में वह महाशक्ति भी मिट्टी की तरह आसानी से बदल जाती है और तदनुसार अपने आस्तित्व का परिचय देती है। भगवान को भक्त अपनी अभिरुचि के अनुसार माता, पिता, बन्धु, सखा, पति, पुत्र आदि जो चाहे सो मान सकता है और उसी के अनुसार उनको प्रत्युत्तर देते अनुभव कर सकता है।
इस संसार में माता का स्नेह एवं वात्सल्य सबसे उत्कृष्ट होता है इसलिए अन्य सम्बन्ध स्थापित करने की अपेक्षा उस ईश्वरीय सत्ता को माता के भाव से मानना मातृ संबंध स्थापित करना, अधिक उत्तम है। इस मान्यता के कारण वह शक्ति भी माता के अनुरूप स्नेह एवं वात्सल्यता के साथ हमारे सामने आ उपस्थित होती है। भगवान को माता के रूप में प्राप्त करना भक्त के लिए सबसे अधिक आनन्ददायक सौभाग्य हो सकता है। इसलिए गायत्री को माता के रूप में माना गया है और उसी रूप में उसकी पूजा होती है।
गायत्री माता को नारी रूप में देखने की प्रतिक्रिया होती है नारी मात्र को गायत्री माता का स्वरूप समझना। स्त्री जाति में मातृ भावना की स्थापना होकर साधक जब गायत्री की छवि को एक युवा नारी के रूप में सामने रखकर उसके चरणों पर अपना शुद्ध मातृ भाव समर्पित करता है तो यही अभ्यास धीरे ही दृढ़ होता हुआ इस स्थिति को जा पहुँचता है कि कोई स्त्री चाहे वह रूपवती या तरुणी ही क्यों न हो गायत्री माता की प्रतीक ही दिखाई पड़ने लगती है। यह मातृ बुद्धि प्राप्त होना एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक सफलता है।
नारी के प्रति पूज्य भावना
गायत्री उपासना से नारी मात्र के प्रति पवित्र भाव बढ़ते हैं और उसके प्रति श्रेष्ठ व्यवहार करने की इच्छा स्वभावतः होती है। ऐसी भावना वाले व्यक्ति नारी सम्मान के-नारी पूजा के-प्रबल समर्थक होते हैं। यह समर्थन समाज में सुख शान्ति एवं प्रगति के लिए नितान्त आवश्यक है। शास्त्रों में भी इसका समर्थन है :-
जगदन्वम्वामयं पश्य स्त्रीमात्रमविशेषतः।
नारी मात्र की जगदम्बा का स्तरूप माने।
स्त्रीणाँ निन्दाँ प्रहारंच कौटिल्यंचाप्रियं बचः।
आत्मनो हितमान्विच्छन्देवी भक्तो विवर्जयेत्॥
अपना कल्याण चाहने वाला माता का उपासक स्त्रियों की निन्दा न करे, न उन्हें मारे, न उनसे छल करे। न उनका जी दुखाये।
यत्रनारयस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्र नार्यो न पूज्यन्ते श्मशानं तन्नवै गृहम्।
जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ नारी का तिरस्कार होता है, वह घर निश्चय ही श्मशान है।
गायत्री उपासक की नारी जाति के प्रति, गायत्री माता की ही भावना रहती है, उन्हें वह परम पूज्य दृष्टि में देखता है ऐसी स्थिति में वासनात्मक कुविचार तो उसके पास तक नहीं फटकते :-
विद्या समस्तास्तवदेविभेदाः
स्त्रिय समस्तासक लाजगस्तु।
त्वैयकया पूरितमम्वयैतत्
कास्ते स्तुतिः स्तव्यपराषरोक्तिः
इस संसार में सम्पूर्ण परा अपरा विद्याएं आपका ही भेद है। मेरे संसार की समस्त नारियाँ आपका ही रूप है।
पिता से माता अधिक उदार
भक्त की कोमल भावनाएं तो यहाँ तक मानती है कि न्यायकारी पिता यदि हमारे किन्हीं अपराधों से कुपित होकर दंड व्यवस्था करेंगे तो माता अपनी करुणा से द्रवित होकर उस दण्ड में बचा लेंगी। बचा ही नहीं लेंगी वरन् परमपिता को धमका भी देंगी कि ‘मेरे भक्त को दुख क्यों देते हैं संसार में पूर्ण निर्दोष कौन है? जब सभी दोषी हैं, जब आप सभी पर दया करते हैं, उदारता और क्षमा का व्यवहार करते हैं तो मेरे भक्तों के प्रति वैसा उदार व्यवहार क्यों न करोगे? भक्त मानता है कि जब माता इस प्रकार अपना पक्ष लेगी तो फिर उनको सिफारिश पर पिता को झुकना ही पड़ेगा। इन भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति देखिये :-
पितेवत्वत्प्रेयाञ्जननि परिपूर्णागसिजने।
हितस्त्रोती वृत्या भवति च कदाचित्कलुषधीः।
किमेतन्नार्दोषः व इहजगतीति त्वमुचितैः।
रुपायै र्विस्मार्य स्वजनयसि माता तदसिनः।
-पराशर भट्ट
परम पिता परमात्मा जब अपराधी जीव पर पिता के समान कुपित हो जाते हैं तब आप ही उन्हें समझाती हो कि ‘यह क्या करते हो? इस संसार में पूर्ण निर्दोष कौन है’ उनका क्रोध शान्त कर आप ही उनमें दया उपजाती हैं। इसलिये आप ही हमारी दयामयी माता हैं।
परम पिता से महिमामयी माता अधिक उदार अधिक करुणापूर्ण अधिक वात्सल्य युक्त हैं, इसका एक उदाहरण कवि ने रामचन्द्र और जानकी की तुलना का बहुत ही सुन्दर किया है।
मातर्मैथिलि राक्षसी स्त्वयि तदैवार्द्रापराधास्त्वया।
रक्षन्त्या पवनात्माजल्लघु तरा रामस्व गोष्ठी कृता।
काकं तेच विभीषणं शरणभित्युक्ति क्षमौ रक्षतः।
सा न स्सान्द्र महागस सुखयतु क्षान्तिस्तवा कस्मिकी।
रामचन्द्रजी ने, शरण आने पर ही काक और विभीषण की रक्षा की। इसमें उनका क्या बड़ा गौरव है। जानकी जी की महानता देखो, उनने अपराध करने वाली राक्षसियों को बिना कोई प्रार्थना किये ही दण्ड देने को उद्यत हनुमान जी से छुड़ा दिया। जानकी जी की करुणा रामचन्द्रजी की अपेक्षा कहीं बड़ी है।
यह तो हुई भक्त की भावना और कवि की अनुभूति। पर तत्वतः भी गायत्री उपासना माता की गोद का सेवन करने और उसकी पयपान करने के समान सब प्रकार मंगलमय ही है।
(श्री चूड़ामन मोतीलाल मुन्शी)
इस विचार से अधिक मूर्खता की बात हो क्या सकती है कि सारे ब्रह्माण्ड की रचना एक आकस्मिक घटना है जब कि कला की सारी चतुराई एक सीप बनाने में भी असमर्थ है।
- जर्मी टेलर
आज के इस विज्ञान के चमत्कारिक युग में प्रायः बहुत से लोगों को यह कहते सुना जाता है कि ईश्वर नहीं है, यदि है तो उनकी तर्कशील बुद्धि को कोई ठोस प्रमाण की आवश्यकता है। अन्यथा वे इसे कोरी कल्पना कहने में जरा नहीं हिचकते। यदि हम उपर्युक्त सन्तवाणी के शब्दों पर अपना ध्यान एकाग्र करें तो हमें ईश्वर के आस्तित्व का बहुत कुछ ठोस प्रमाण मिलता है।
इस ब्रह्माण्ड की रचना सचमुच मनुष्य को आश्चर्यचकित कर देती है। आकाश, सूर्य, चन्द्र, तारे, पृथ्वी, वायु आदि की ओर ध्यान देने से हमारे मन में सहज ही यह विचार उठता है कि यह सब क्या है? इनका रचयिता कौन होगा? परंतु हम इसका ठीक से निर्णय न कर खामोश हो जाते हैं? हम आकाश की ओर ध्यान देते हैं तो उसकी सीमा का अनुमान लगाना हमारी बुद्धि से परे प्रतीत होता है। चन्द्र, सूर्य नित्य अपने कर्तव्यों पर आरुढ़ हैं। वायु भी अपने कर्तव्य पर डटी हुई है। तारागणों में झुँड के झुँड अपनी प्रतिभा से आकाश को सुशोभित करते हैं। वसुँधरा दिन-रात अविराम दौड़ लगा रही है। तात्पर्य यह कि यह सब नियमानुसार प्रतिदिन अपना-अपना कर्तव्य करते चले आ रहे हैं।
उक्त नियम तथा संचालन कार्य को देखकर हमें यह मानने के लिये विवश हो जाना पड़ता है कि इन सब के पीछे कोई महान् अदृश्य शक्ति कार्य कर रही है। इसी अदृश्य शक्ति को हम ईश्वर के नाम से पुकारते हैं। यदि उक्त नियम और संचालन कार्य में तनिक भी त्रुटि हो जाए तो कदाचित ही इस धरा पर किसी जीव का अस्तित्व शेष रहे। यदि हम इसे आकस्मिक घटना कहें तो यह युक्तिसंगत नहीं, क्योंकि सूर्य, चन्द्र, तारागण, पृथ्वी आदि किसी शक्ति के आश्रय बिना अपने-अपने स्थान पर रहते हुये नियमानुसार कार्य नहीं कर सकते, उन्हें किसी विवेकशील शक्ति का सहारा अपेक्षित है।
उन्हें किसी विवेकशील शक्ति ने अपने अधीन करके उन्हें नियमबद्ध कर रखा है तथा अपने आश्रय से उन्हें अपने-अपने स्थान पर टिका रखा है। यदि ये आश्रयविहीन होते तो कभी का इनका भी आस्तित्व नष्ट हो गया होता। इनमें नियमानुसार कार्य करने की बुद्धि है, जैसा भी आज तक किसी ने प्रमाणित नहीं किया है। अपितु इनमें बुद्धि नहीं है, ये जड़ हैं, ऐसा प्रमाणित हो चुका है। अतः यह मानना उचित है कि उक्त अदृश्य शक्ति के इशारों पर ही यह खेल हो रहा है और भविष्य में कब तक यह खेल होता रहेगा यह मनुष्य की बुद्धि से परे है।
चन्द्र, सूर्य की आकृतियाँ गोल तथा सुन्दर प्रतीत होती हैं, उनमें कहीं भी टेढ़ा या तिरछापन नहीं दिखाई देता। रात्रि में इनका और तारागणों का टिमटिमाता हुआ प्रकाश मन को कितना प्रसन्न करने वाला होता है? क्या इन्हें सुन्दर बनाने में किसी कलाकार का हाथ नहीं? है, अवश्य ही वह अदृश्य शक्ति (ईश्वर) ही इनकी कलाकार है। जैसे हमें एक चित्र को देखकर उसके बनाने वाले चित्रकार का बोध होता है उसी प्रकार इस विश्व की अनूठी रचना और उसके नियमबद्ध कार्य को देखकर उनके रचयिता और नियामक के बोध का महत्व सिद्ध हो जाता है।
मानव सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना जाता है और मानव-शरीर को ईश्वर की कलाकारी का एक सर्वोत्तम नमूना है। उसके अंग प्रत्यंगों की रचना उसके रचयिता की कुशल बुद्धि का परिचय देती है। हमारे शरीर का प्रत्येक अंग कितना उपयोगी है? खाने के लिये मुँह, स्वाद के लिए जिव्हा, देखने को नेत्र, सूँघने को नासिका, श्रवण के लिये कान, चलने के लिये पैर और मल आदि निकलने के लिये मार्ग बना दिये गये हैं। मस्तिष्क की सूक्ष्मातिसूक्ष्म नसें और आन्तरिक अवयवों की रचनाओं पर ध्यान देने से सचमुच उस रचियता की बुद्धि पर अवाक् हो जाना पड़ता है। यदि इस रचना में त्रुटि हो जावे अर्थात् कान के स्थान पर मुँह, मुँह के स्थान पर कान आदि की रचना हो जावे तो मनुष्य का जीवन जीवन न रहे अपितु इस प्रकार के व्यक्ति का जीवित रहना असंभव हो जावे। इस प्रकार की व्यवस्थित रचना करने वाला ईश्वर के अतिरिक्त और कौन हो सकता है?
बालक के गर्भकाल की क्रिया भी हमें आश्चर्यचकित कर देती है। जब बालक माना के गर्भ में रहता है तब उसके अंगों की रचना क्रमशः होती है तथा उसे उसकी खुराक भी प्राप्त होती रहती है। उक्त क्रिया बालक की माता द्वारा संचालित होने पर भी वह उससे अनभिज्ञ रहती है। उसे यह पता नहीं कि वह क्रिया कैसे और किस प्रकार होती है। फिर उस गर्भकाल में होने वाली क्रिया का कर्ता कौन हो सकता है? ईश्वर।
हम एक बल्ब बनाने की मशीन की ओर अपना ध्यान दें तो हमें पता चलेगा कि 25 नंबर के बल्ब बनाने वाली मशीन 25 नंबर के बल्ब ही बना सकेगी। 20 या 30 नंबर के बल्ब वह नहीं बना सकेगी। इसी प्रकार एक ही माता के होने पर भी उसके द्वारा उसकी सन्तान की भिन्न-भिन्न आकृतियाँ क्यों उत्पन्न होती हैं? इससे पता चलता है कि इन आकृतियों को उत्पन्न करने वाली कोई ज्ञानवान् शक्ति है और विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ बनाने में उसी शक्ति का हाथ है।
जब बालक इस संसार में अवतीर्ण होता है तब उसकी आकृति पर जन्म से ही भय, मुस्कुराहट, रुदन आदि के भाव स्पष्टतः दृष्टिगोचर होते हैं। बालक के इन भावों का उत्पन्नकर्ता भी ईश्वर के अतिरिक्त और कौन हो सकता है।
शरीर परिवर्तन की क्रिया भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। शारीरिक बढ़ावा अन्न, जल आदि को बचाने वाली भी तो कोई शक्ति अवश्य होना चाहिये। बिना कर्ता क्रिया कैसे सम्भव है? क्या वह पचाने का कार्य हम करते हैं? नहीं हमारे द्वारा यह कार्य होने पर भी हम उस क्रिया के कर्ता से अनभिज्ञ हैं। अतः वह शक्ति ईश्वर की ही है।
साग-सब्जी फल-फूल, वनस्पति, औषधियाँ और नाना प्रकार के वृक्ष आदि के बीज बोने पर वह कौन सी बुद्धिमत्ति शक्ति है जो बीज के अनुसार पौधा और उपज उत्पन्न करके उन्हें पुष्ट करती और समय-समय पर फल-फूल पैदावार, उपज आदि प्राप्त कराती रहती है? इस का उत्तर ईश्वर ही हो सकता है।
महात्मा गाँधी की निम्नाँकित वाणी में भला किसे अविश्वास हो सकता है? वह कहते हैं-
“मैं धुँधले तौर पर जरूर यह अनुभव करता हूँ कि जब मेरे चारों ओर सब कुछ बदल रहा है, मर रहा है, तब भी इन सब परिवर्तनों के नीचे एक जीवित शक्ति है जो कभी नहीं बदलती, जो सब को एक में गुंथित करके रखती है, जो नयी सृष्टि करती, उसका संचार करती है और फिर नये सिर से पैदा करती है। वही शक्ति ईश्वर है, परमात्मा है। मानता हूँ कि ईश्वर जीवन है, सत्य है, प्रकाश है। वह प्रेम है। परम मंगल है।”
प्रातः स्मरणीय गोस्वामी श्री तुलसीदास जी की वाणी का असत्य कहने का साहस किसमें हो सकता है उन्हीं के शब्दों में सुनिये।
व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी।
सत चेतन धन आनन्दराशी॥
आदि अन्त कोऊ जासु न पावा।
मति अनुमान निगम अस गावा।
बिनु पद चले सुने बिनु काना॥
कर बिनु कर्म करे विधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु वाणी वक्ता बड़ योगी॥
तन बिनु परसु नयन बिन देखा।
गहे घ्राण बिनु वास अशेषा।
अस सब भाँति अलौकिक करणी।
महिमा तासु जाई किमि बरणी॥
उपरोक्त लेख का यह सार निकलता है कि इस विश्व की रचना ईश्वर ने की है और सारा चराचर जगत उस ईश्वरीय शक्ति से व्याप्त है तथा उसका विनाश करने में कोई समर्थ है। यह शक्ति अपरिवर्तनशील, सनातन, सर्वशक्तिमान ज्ञानमय आनन्दमय और सर्वज्ञ है।
अविनाशी तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तु मर्हति॥
गीता
अतएव इस ब्रह्माण्ड की रचना को घटना मानना सर्वथा अनुचित है। उस चतुर, बुद्धिमान विवेकवान्, सर्वज्ञ सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान्, कलाकार की कलाकारी के समक्ष सचमुच हमारी कला की सारी चतुराई एक सीप बनाने में भी असमर्थ सिद्ध होगी। अस्तु।
(श्री रामजी द्विवेदी, बी. ए. ऑनर्स)
जिस समय हमें चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखायी पड़ता है, बुद्धि बेकाम हो जाती है उस समय प्रार्थना ही एकमात्र अचूक रक्षा-कवच है।
-महात्मा गान्धी
प्रारब्ध की चूक या वर्तमान जीवन के कुकृत्यों के फलस्वरूप जीवन में संकट की उपस्थिति होती है। उस समय आधार-भूमि खिसकती नजर आती है, हितैषी और बन्धु-बान्धव किनारा काट लेते हैं, भविष्य तिमिराच्छन्न हो जाता है और अक्ल पर पत्थर पड़ जाता है, उस विकट क्षण में प्रार्थना ही एक ऐसा प्रकाश-स्तम्भ है जहाँ पीड़ित और भ्रान्त प्राणी त्राण पा सकता है। संकट में तो नास्तिक को भी आस्तिक बन जाना पड़ता है। महान संकट से अपने आप या राष्ट्र को आच्छन्न पाकर नास्तिक हिंसक और क्रूरकर्मा नायकों को भी रक्षा हेतु प्रार्थना का अंचल पकड़ना पड़ा है। अमेरिका पर संकट की छाया पड़ने पर रुजवेल्ट और ट्रूमैन ने, जर्मनी पर आफत आने पर हिटलर ने, ब्रिटेन पर विनाश बादल मँडराते देख चर्चिल ने, मास्को को संहार के मुख में देख स्टालिन ने स्वधर्मानुसार प्रार्थना करने के लिए देशवासियों से अपील की थी।
पाश्चात्य ढाँचे और साँचे में ढले बाबू लोग प्रार्थना को अकर्मण्यता का पोषक और मिथ्या मन मोदक कहकर भले ही इसकी खिल्ली उड़ावे पर आज के घोर भौतिकवादी देशों में भी ऐसे लोग मिलेंगे जो प्रार्थना की अपरिमेयता के कायल हैं। प्रार्थना से संकट नाश एक अविश्वास नहीं, वरन् वैज्ञानिक मंथन का प्रतिफल है। विचार-शक्ति और शब्द की अमरता-सभी वैज्ञानिकों को मान्य है। प्रार्थना के समय सूक्ष्म वायु बदले में निहित बलप्रद प्रेरक विचार प्रार्थी को अतुल शक्ति नव चेतना और अभिनव बल प्रदान करते हैं। विचार अपने अनुकूल विचारों के आकर्षण द्वारा तदनुकूल परिपुष्ट, परिपक्व और उत्तरोत्तर उन्नत हो प्रार्थी के मनोभिलाषा की तत्क्षण पूर्ति करते हैं।
प्रार्थना से तात्पर्य है- परमात्मा से बातचीत करना उनसे संपर्क और आत्मीयता स्थापित करना। और फिर, उस जनम-मरण के साथी को खुले हृदय में प्रतिष्ठित होना ही पड़ता है। ईश्वर शक्ति का अकूत भंडार, बल, उत्साह, प्रेरणा, स्फुरणा का ‘पावर हाउस’ है प्रार्थना में हम उससे शक्ति प्राप्त करते हैं और संकट से हमारा पिण्ड छूट जाता है।
प्रार्थना की शक्ति में संकट-निवारिणी ताकत में विश्वास बुद्धि की चेष्टा से या तर्क की तीक्ष्ण दृष्टि से सम्भव नहीं, उसके लिए तो आत्मा का अनुभव ही वाँछनीय है। अति दीनता युक्त आर्त्तभाव की सच्ची प्रार्थना संकट को टालती ही नहीं समूल नष्ट भी कर देती है। प्रार्थना के द्वारा संकट के नाम से अभिहित साँसारिक घटनाओं का स्वरूप से नाश तो सम्भव है ही, साथ ही अज्ञान नष्ट हो जाने से दुनिया की स्थूल दृष्टि में सुख-दुख प्राप्त होते हुए भी प्रार्थी ने ‘दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते’ की स्थिति में पहुँच संकट से अलिप्त ही रहता है।
प्रार्थना के द्वारा योग-क्षेम वहन का गुरु भार भगवान के कन्धों पर आ जाता है। फिर तो सारी प्रतिकूल परिस्थितियाँ अनुकूल होने लगती हैं। उनमें मन लगाने वालों के लिए तो उनका कहना है-”मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादाप्तरिष्यसि।” (गीता 18। 58) अर्थात् मुझमें मन लगा लो, फिर मेरी कृपा से सारी कठिनाइयों से पार हो जाओगे। सभी संकटों से मुक्त होने के लिए प्रार्थना एक अमोघ साधन है। सभी संकटों में विपत्तियों में मम पन सरनागत भयहारी के वक्ता भगवान को पुकारो, वे ‘तेषामंह समुद्धर्मा’ की उद्घोषणा के अनुसार तुम्हारा संकट नष्ट कर देंगे।
सनातन काल से ही प्रार्थना द्वारा असंख्य विपद् ग्रस्त प्राणियों ने संकट नाश किया। सूरदास ने ललित ढंग से प्रार्थना द्वारा राज और द्रौपदी के संकट शमन का चित्र खींचा है-
जब लग गज बल अपनो बरत्यो,
नेक सर्यों नहिं नाम।
निर्बल ह्वै बल राम पुकार्यो,
आए आधे नाम॥
द्रुपद-सुता निर्बल भइता दिन,
तजि आए निज धाम।
दुःशासन की भुजा थकित भए,
बसन रूप भये स्याम॥
इतिहास भी हुमायूँ के प्राण-रक्षण के लिए की गयी बाबर की फलवती प्रार्थना को स्वीकार करता है। आधुनिक युग के महापुरुष परम भाग गाँधीजी ने प्रार्थना को वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक रूप प्रदान कर अपने व्यक्तिगत और समष्टि रूप जीवन में इसका सफल प्रयोग किया। प्रार्थना से सैकड़ों मरणासन्न रोगियों को जीवन लाभ हुआ है। कितने सन्त जेल में थे-पर प्रार्थना के बल पर दरवाजे खुल गए, बेड़ियाँ टूट गयी और वे मुक्त हो गए। आज हजारों ऐसे व्यक्ति हैं जिनका सारा दारोमदार प्रार्थना पर ही निर्भर है।
संकट और आपातकाल में प्रार्थना द्वारा अदृश्य और अलभ्य सहायता अवश्य प्राप्त करो। यदि सब तरह से निराश हताश हो गए हो, तो इस परीक्षित, अनुभूत योग का प्रयोग अवश्य करो। तुम्हारे संकट टिक न सकेंगे। प्रार्थना में अतुल शक्ति है, अमोघ और आशु प्रभाव है। प्रार्थनामय जीवन होने के बाद तो संकट जीवन में आने ही नहीं, न कोई कामना ही शेष रहती है-रही कुछ न हसरत न कुछ आरजू है।
सद्बुद्धि ही सर्वकल्याण और संकट हरण के मूल में होने से प्रार्थना की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति गायत्री मन्त्र में हुयी है। वेदों ने गायत्री को सर्वोच्च आसन देकर प्रार्थना का महत्व ही की स्वीकार किया है। क्योंकि गायत्री और कुछ नहीं -प्रार्थना ही है। गायत्री की शरण से करोड़ों ने संकट का मूलोच्छेद किया है।
हम संकट आने पर अधीर न हों, अपने प्रभु के इस नवीन यश का स्वागत करें। कुन्ती की तरह संकट को प्यार करें। संकट में ही तो वे स्मृति पट पर ठीक से आते हैं। भगवान् हमारे अति समीप हैं। हमारी प्रत्येक स्थिति उन्हें ज्ञात है। यदि उन्हें विश्वास पूर्वक पुकारा जाय तो वे उस पुकार को सुनकर स्थिर नहीं रह सकते। शीघ्र दुःख और संकट से तारेंगे। प्रभु परम दयालु परम सुखद हैं। हम उन्हें भूल गए हैं वे हमें नहीं भूले हैं। हाँ, भव-भय-भंजन विरद पर अटूट आस्था रख कर एक बार श्रद्धा और विश्वासपूर्ण वाणी से उस हेतु रहित जुग-जुग उपकारी को पुकारकर देखें तो सही हमारे संकट जीवित रह नहीं सकते। उस परम प्रभु की शरण में जाकर हम सब तरह से निर्भय हो सकते हैं।
दुख और सुख में भगवान को अपना साझीदार बनाकर हम अपने अहंकार और कष्ट को हलका कर सकते हैं। उपासना और प्रार्थना के द्वारा हम उस परम प्रभु के निकट तक जा पहुँचते हैं जिसकी कृपा की एक किरण से ही हमारी सारी उलझी हुई गुत्थियां सुलझ सकती हैं। ऐसे अमूल्य साधन को यदि हम आलस्य एवं उपेक्षा के कारण तिरष्कृत करते हैं तो वह हमारी भारी भूल ही कही जा सकती है। ऊंचे अफसरों और महापुरुषों का परिचय अनुग्रह और सान्निध्य प्राप्त करने के लिए हमें कितना धन और समय खर्चे करते हुए प्रसन्न करते हैं, पर परमात्मा की मित्रता प्राप्त करने के लिए उपासना में कुछ भी समय लगाते हुए झिझकते हैं। इसे बुद्धिमत्ता नहीं कहा जा सकता।
(श्री भँवरलाल दुबे)
“अन्त काले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्वत्र संशयः॥
अर्थात् अन्त समय में परमेश्वर का स्मरण करने वाला मनुष्य परमेश्वर भाव को प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।”
देह छोड़ते समय का कर्तव्य उक्त श्लोक द्वारा कितने अर्थ का “गागर में सागर” वत् है परन्तु जिस समय सारा शरीर इन्द्रियों सहित विवश की भाँति अयोग्य सा हो जाता है मन, बुद्धि, चित्त आदि क्षीण प्रायः हुए होते हैं, कहीं तो शरीर बेसुध, रोगग्रस्त व्यथित होकर स्मृति भ्रान्त हो जाती है ऐसे अन्त समय में परमेश्वर का स्मरण कितना कठिन है? यह स्वाभाविक प्रश्न है।
यों मरने के समय मनुष्य कितना ही पस्त पीड़ित या बेसुध हो पर मौन-अमौन रूप से अपने पुत्र-कलत्र व भौतिक ममता युक्त पदार्थों को तो अवश्य ही स्मरण कर लेता है। जब ऐसे विषम समय पर स्मृति के उपयोग से साँसारिक साधनों की प्राप्ति कर सकता है तो परमेश्वर का स्मरण भी अवश्य ही किया जा सकता है। पर ऐसा होता कहाँ है।
इसका कारण यह है कि जब से मनुष्य कुछ समझने लगा है तब से लगाकर मृत्युकाल पर्यन्त रात दिन साँसारिक बातों का ही ध्यान स्मृति में समाये रहता है अतः यथेष्ट अभ्यास वश वही प्रसंग प्रबल रूप से अभावशील रहने से अन्त समय में सहज ही स्मरण हो उठता है।
किसी बगीचे में देखने पर विदित होता है कि वनस्पतियों पर तथा फल-फूलों पर विभिन्न रंगों के जीवधारी रहते हैं। वे सब एक ही रंग के क्यों नहीं हो सकते? ऐसा इसलिये कि ये जीव जिस-जिस रंग का ध्यान करते हैं, तदनुकूल ही उनकी रंगाई सूक्ष्म रूप से होती रही है। लोहे को या लकड़ी को अग्नि में रखने से कुछ ही समय में वह अग्नि भाव से युक्त होकर अग्नि रूप हो जाता है और अग्नि के ही गुण धर्म उसमें आ जाते हैँ। इससे सिद्ध है कि पुरुष भी परमात्म भाव धारण करके नर से नारायण बन सकता है। अपने मन और बुद्धि को ईश्वर में अर्पण कर सतत अभ्यास द्वारा परमात्म भाव से प्रभावित रहना चाहिये। इस सतत जाग्रत रहने का नाम ही “अभ्यास” है। इस अभ्यास को रात दिन अन्तःकरण में प्रज्वलित रखने को “अभ्यास योग“ कहा है।
मन का स्वभाव ही ऐसा है कि जिस विषय पर इसकी क्रिया जितनी बार होगी उसी विषय का प्रभाव उतनी ही प्रबलता से इस पर जमता जायगा। अतः आरम्भ से ही सत्संग, शास्त्र ज्ञान, गुरु कृपा आदि के माध्यम से मनोभूमि पर परमात्मा भाव का ऐसा परम बीजारोपण कर अभ्यास योग के स्वाद-पानी से पोषण देने पर अन्त समय में सहज ही ईश्वर का स्मरण फलित होगा।
अन्त समय मृत्यु काल देहान्त आदि ऐसा बार-बार कहा गया है अतः इसका तात्पर्य क्या है? इसका प्रचलित अर्थ मृत्यु को समझा जाता है। परन्तु यह मृत्यु भी किस श्रेणी की समझनी चाहिये? क्योंकि क्षणिक मृत्यु, दैनिक मृत्यु, (निद्रा) अवस्थान्तर की मृत्यु (सपनयन, द्विज संस्कारादि) देहान्तर को मृत्यु (महामृत्यु), आदि अनेक मृत्यु हैं। इनमें से यहाँ कौन−सी मृत्यु अपेक्षित है? वस्तुतः सब ही मृत्यु (अन्त) यहाँ विचारणीय हैं।
हर प्रकार के अन्त के समय परमात्मा का स्मरण करना चाहिये, यदि कोई इसका यह आशय समझेगा तो इसका यही तात्पर्य होगा कि प्रतिक्षण परमात्मा का स्मरण करना चाहिये क्योंकि मनुष्य की मृत्यु प्रतिक्षण हो रही है। यदि देह त्याग ही मृत्यु है तो इस देह का कुछ न कुछ भाग प्रतिक्षण त्यागा ही जा रहा है। शरीर शास्त्री मानते हैं कि प्रत्येक शरीर सात वर्षों में पूर्णतया नवीन हो जाता है अर्थात् पहले के अणु बिगड़ कर उनका स्थान नये अणु लेते रहते हैं। यह परिवर्तन शनैः शनैः प्रतिक्षण होता रहता है। यदि किसी शरीर का भार दो मन है तो सप्त वर्षीय परिवर्तन के अनुसार प्रतिदिन ढाई तोले शरीराणु नष्ट होकर उतने ही नये आ जाने चाहिये। इस तरह इतने परमाणुओं की मृत्यु मानव शरीर में प्रतिदिन होती रहती है। उपवास के समय यह परिवर्तन शीघ्रता से होता है। प्रथम आयु में परमाणुओं की मृत्यु की अपेक्षा संवर्धन अधिक होता है अतः शरीर बढ़ता है और उत्तर आयु में मरने वाले परमाणुओं की संख्या अधिक होने से शारीरिक क्षीणता स्पष्ट ही है।
प्रतिदिन ढाई तोले परमाणुओं की मृत्यु होती है तो प्रतिक्षण कितनी मृत्यु होती है इसका अनुभव स्पष्ट है। यह क्षणिक मृत्यु ही दैनिक मृत्यु है। देह को इतना त्याग प्रतिफल प्रतिदिन करना पड़ता है। गीताकार ने जिस अन्त समय में परमात्मा का स्मरण सुझाया है उसका यही रहस्य है कि जीवन का प्रतिफल ही देह त्याग का अन्त समय है अतः किसी विशेष समय की प्रतीक्षा न करके श्वास-प्रश्वास के साथ भगवान के नाम जप का सहज अभ्यास कर शरीर समाप्ति वाले अन्त समय में नाम स्मरण हो जावे और गीता में कही हुई सद्गति प्राप्त होने के लिए निश्चिंत हो जाना चाहिए।
भगवान् इस संसार में केवल अपने को दान कर रहे हैं, अपने लिए वह कुछ भी नहीं लेते। हमारा आत्मा भी भगवान् के उसी स्वभाव को पाकर सत्य का लाभ करता है। वह भी संसार में भगवान के पास उनके सखा-रूप में खड़े होकर संसार के लिए उत्सर्ग करेगा, अपने भोग के लिए लालायित होकर समस्त अपनी ओर नहीं खींचेगा। इस देने में ही अमृत और लेने में ही मृत्यु। पैसा, कौढ़ी, शक्ति, सामर्थ्य समस्त ही सत्य हैं यदि उन्हें दान कर दें, और समस्त ही मिथ्या है यदि उसका संग्रह करना चाहें। यह बात जब हम भूल जाते हैं तो सब उल्टा पुल्टा हो जाता है, तब शोक, दुःख, भोग, तब ही काम, क्रोध, लोभ। जो वस्तु स्वभावतः देने की संग्रह की चेष्टा करने का यही पुरस्कार होता है। जब यह विचार करते हैं कि हम लेते हैं तो उसे दे देते हैं मृत्यु को एवं उसके साथ शोक, चिन्ता, भय, प्रभृति मृत्यु के अनुचरों को उनकी खुराक-स्वरूप अपने हृदय के रक्त से जीवित रखते हैं।
- टैगोर
(लेखक ईश्वरशरण पाण्डेय, एम. ए.)
पाप क्या है? पुण्य क्या है? सत् क्या है? असत् क्या है? उचित क्या है? अनुचित क्या है? शुभ क्या है? अशुभ क्या है? अच्छा क्या है? बुरा क्या है? मानव जाति ने जबसे विचार करना आरम्भ किया तब से ये प्रश्न उसके सामने हैं। ऐसा नहीं है कि इनके सार्वभौम उत्तर प्राप्त करने की कोशिश नहीं की गई। परन्तु प्रयत्न के बावजूद भी कोई ऐसा समाधान कारक उत्तर नहीं मिला है जिसे सब देश और सब काल में सबके लिए उपयुक्त कह सकें। यही कारण है कि परम पुरातन होते हुए भी ये प्रश्न नित्य नवीन बने हुए हैं।
नैतिकता की मान्यताओं को अधिकाँश विचारक देशकाल और पात्र सापेक्ष मानते हैं। इस कारण से एक ही कार्य एक समय, एक स्थान में एक व्यक्ति के लिये अच्छा सिद्ध होता है और वही कार्य दूसरे समय, दूसरे स्थान में दूसरे व्यक्ति के लिये अनैतिक बन जाता है जैसे-युद्ध के समय सामूहिक हत्या उचित मानी गई किन्तु अन्य परिस्थिति में हत्या पाप है, अपराध है। इस अनिश्चयात्मक स्वरूप के कारण ही लगता है नैतिक मान्यताएँ जनसाधारण को अनावश्यक, अनाकर्षक जँचती हैं। उन्हें लगता है कि अच्छा-बुरा का विचार करना समय की बरबादी और निरी मूर्खता है। आज भी संसार में ऐसे लोगों का अभाव नहीं है जो सुकरात को मूर्खराज की उपाधि से निःसंकोच विभूषित करते हैं।
सामान्यजन प्रत्येक प्रश्न पर व्यापारी दृष्टि से विचार करते हैं। वे प्रत्येक कार्य को लाभ-हानि की तुला पर तोलते हैं। नैतिक मान्यताएँ इस तुला से हानिकारक जँचती है और इस स्वार्थी निष्कर्ष को नैतिक मान्यताओं के स्वरूप की अनिश्चयात्मकता का बल मिल जाता है। फिर क्या गिलोय और नीम चढ़ी। जनसामान्य में नैतिकता की ऐसी शोचनीय अवस्था होते हुए भी ऐसा कह सकना सम्भव नहीं है कि वे नैतिक मान्यताओं की पूर्ण उपेक्षा कर सकते हैं। वे जाने-अनजाने कहते ही रहते हैं कि अमुक ने अच्छा नहीं किया, अमुक अन्यायी है, पापी है, दुराचारी है इत्यादि। उनके ये कथन सिद्ध करते हैं कि कोई व्यक्ति भले ही अपने लिये नैतिक आचरण को अनावश्यक कहे पर जहाँ दूसरे के आचरण का प्रश्न आता है, उसको आवश्यक मानता है। जिस व्यक्ति से हमारा कोई सरोकार नहीं, हानि-लाभ की आशा नहीं उसके आचरण की भी हम आलोचना करते ही हैं, अच्छा-बुरा का निर्णय करते हैं। इससे स्पष्ट है कि नैतिकता की कसौटी हमारी हानि लाभ वाली तुला नहीं हो सकती। वह उससे सर्वथा पृथक है।
हम दूसरे व्यक्ति को उसके बाह्य आचरण से अच्छा या बुरा ठहराते हैं। हमारे पास इसके अतिरिक्त दूसरा साधन भी नहीं हैं। पर बाह्य आचार के आधार पर किया गया नैतिक निर्णय हमेशा ठीक ही होगा, ऐसा नहीं कह सकते। दो व्यक्तियों का बाहरी व्यवहार एकसार होते हुए भी एक नीति युक्त और दूसरा अनैतिक हो सकता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति ने दया से द्रवित होकर एक भिखारी को एक रुपया दिया और दूसरे ने उसे अपनी आँखों के सामने से हटाने के लिए एक रुपया दिया। कहने का मतलब यह है कि एक ने पसीज कर और दूसरे खीझकर रुपया दिया। जहाँ तक देने का संबंध है इस उदाहरण में दोनों ने दिये हैं, समान दिये हैं पर दान के पीछे जो भावना है उनमें जमीन-आसमान का अन्तर है। भावना के कारण एक का वही कार्य नैतिक है तो दूसरे का वही कार्य अनैतिक है। काम अच्छा हो इतना ही बस नहीं है बल्कि अच्छी भावना से भी किया गया होना चाहिए।
जो अच्छा काम अच्छी भावना से किया गया हो, उसका परिणाम हमेशा शुभ ही हो, यह आवश्यक नहीं है। कार्य के परिणाम को उसकी नैतिकता की माप मानना ठीक नहीं। उदाहरणार्थ मुझे एक घड़ी प्राप्त करनी है अब मैं इस लक्ष्य को कई तरीकों से सिद्ध कर सकता हूँ-यथा खरीदकर माँगकर, चोरी करके। साधन के अनुसार मेरी लक्ष्य-प्राप्ति का स्वरूप भी नैतिक से अनैतिक बनते जाता है। यही कारण है कि महात्मा गाँधी लक्ष्य का ही शुद्ध होना आवश्यक नहीं बल्कि साधन का भी शुद्ध होना आवश्यक है, कहते थे। उनके अनुसार शुद्ध साधन से ही शुद्ध लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। साम्यवादी नैतिक भूमिका और गाँधीवादी नैतिक भूमिका में यह बुनियादी फर्क है।
अच्छे काम का, अच्छी भावना से शुद्ध साधनों के द्वारा किया जाना, उसके नैतिक होने के लिये अपरिहार्य शर्तें हैं। साथ ही वह काम आत्म स्फूर्त भी हो। जो कार्य दबाव या भय से किया जावेगा, वह दबाव या भय के कारण दूर होते ही लुप्त हो जावेगा। यदि कोई विनोबा जी के साथ पद यात्रा में सुबह शाम होने वाली प्रार्थना में उनके नैतिक भय या नियम के दबाव से शामिल होकर प्रार्थना करता है तो उसका वह कार्य नैतिक नहीं कहा जा सकता। ऊपर से लादा हुआ कार्य नैतिक नहीं हो सकता है। यहाँ तक नैतिकता की मान्यता पर विषय गत दृष्टि से विचार किया गया। लेकिन यह प्रश्न तो रह ही जाता है कि हम कैसे जाने कि कौन काम शुभ है? कौन अशुभ है? कौन सत है और कौन असत कार्य है? इसके लिये सर्वमान्य एक मापदण्ड न हो सकने पर भी वैसे मापदण्ड का सर्वथा अभाव नहीं है। संसार से जितने नीतिशास्त्र के आचारवान विचारक संत महात्मा हो गए हैं एक स्वर से घोषित करते हैं कि आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्। सारे संसार के नीतिशास्त्र का सार संक्षेप है। रूसी ऋषि टॉलस्टाय कहते थे जो व्यक्ति जितना कम लेता है और जितना ज्यादा वापस देता है उसी अनुपात में वह उतना ही नैतिक है। महात्मा गाँधी की अहिंसा क्या है-सर्वभूतों से आत्मवत् प्रेम ही तो है।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत् इस पाँच शब्दों के लघु वाक्य में समस्त नीतिशास्त्र का निचोड़ सम्मिलित है-यह सहसा विश्वास नहीं होता है। सत्य की सरलता ही उसे पहिचानने में कठिनाई उपस्थित करती है समस्त नैतिक सिद्धान्त क्या बताते हैं? यही न कि हमारे सारे व्यवहार दूसरों के प्रति इस प्रकार हों जिससे हम अपना सर्वतोमुखी विकास करते हुए दूसरों के उसी प्रकार के विकास में सर्व भावेन सहयोग कर सकें। इस प्रकार का व्यवहार नहीं हो सकता है जो ऊपर के पाँच शब्दों में प्रकट किया गया है। इसी वाक्य का अविकल अनुवाद सा करते हुए संत कन्फ्यूशियस ने कहा “जो व्यवहार तुम अपने प्रति नहीं पसन्द करते, वह दूसरों के प्रति न करो।” साक्षात् धर्म के लक्षण बताते हुए मनु ने कहा-स्वस्थ न प्रियमात्मनः धर्म का एक प्रबल लक्षण अपनी आत्मा को जो प्रिय लगे, वह करना है। अब कोई कह सकता है कि हमारी आत्मा को तो चोरी करना प्रिय है। जो उसका धर्म वही है परन्तु आपको चोरी करना प्रिय नहीं है क्योंकि जिसे जो काम प्रिय है, उसे यदि और लोग करें तो उसे खुश होना चाहिये। कोई चोर नहीं चाहेगा कि सब चोर हों क्योंकि वैसी हालत में उसका काम नहीं बनेगा। अतः हम जिस कार्य को अपने प्रति नहीं चाहते कि कोई करे उसका आचरण हम दूसरों के प्रति करें-एक सच्ची कसौटी है। हम नहीं चाहते कि कोई हमारे साथ झूठा व्यवहार करे अतः हमें चाहिए कि हम सबके साथ सत्य व्यवहार करें। हम नहीं चाहते कि कोई हमारा जी दुखाए, अतः हमें चाहिए कि हम अपने आचरणों से किसी को कष्ट न दे। हम अपनी जान की रक्षा करते हैं, हमें अपनी जान प्यारी है। इसी से यह अपरिहार्य व्यवहार निश्चित हो जाता है कि हम दूसरे की जान की रक्षा करें। सत्य, अहिंसा के सिद्धान्त का मूल यही विचार है। इसी प्रकार अस्तेय, अपरिग्रह आदि अन्य सार्वभौम नैतिक सिद्धान्तों के विषय में आप अपने अन्तःकरण से स्वयं जान सकते हैं।
उपर्युक्त नीति वाक्य के अनुसार अपने आचरण की जाँच करने के लिये जितनी सद्विवेक बुद्धि की जरूरत है उतनी प्रत्येक सामान्य व्यक्ति को प्रकृति से प्राप्त है। हमारी समस्या नीति की अज्ञानता उतनी नहीं है जितना नीति का आचरण है। अर्जुन के समान हम सबकी स्थिति है- “जा नाभि धर्न्य न धमे प्रवृतिः जानन्यः धर्न्य न चम निवृत्तिः।” धर्माधर्म का ज्ञान इन सबको रहता है तदनुकूल आचरण के अभाव से सारी समस्या खड़ी होती है। यदि हम वसुधैव कुटुम्बकम, का आदर्श अपनाकर अपने व्यवहारिक जीवन में आत्मनः प्रतिकूलानिपरेषाँ न समाचरेत् का आचरण करें तो हम धर्म और नीति की रक्षा करते हुए सच्चे अर्थों में स्व, पर कल्याण कर सकते हैं।
(श्री मोहनचंद पारीक)
आत्म कल्याण के लिये परिश्रम तो मनुष्य को स्वयं ही करना पड़ता है, पर सत्संग और सदुपदेश उसके प्रधान अवलम्ब हैं। हमारे कानों को सदुपदेश रूपी सुधा निरन्तर प्राप्त होती ही रहनी चाहिये। मनुष्य का स्वभाव चंचल है। इन्द्रियों की अस्थिरता प्रसिद्ध है। यदि आत्म सुधार में सभी इन्द्रियों को वश में रक्खा जाय तो उचित है। क्योंकि अवसर पाते ही इनकी प्रवृत्ति पतन की ओर होने लगती है। सदुपदेश वह अंकुश है, जो मनुष्य को कर्त्तव्य पथ पर निरन्तर चलते रहने को प्रेरित करता रहता है सत्य से विचलित होते ही कोई शुभ विचार या स्वर्ण-सूत्र पुनः ठीक मार्ग पर ले आता है।
प्रत्येक सदुपदेश एक ठोस प्रेरक विचार है। जैसे कोयले के छोटे से कण में विध्वंशकारी विपुल शक्ति भरी हुई है, उसी प्रकार प्रत्येक सदुपदेश शक्ति का जीता-जागता ज्योति पिंड है। उससे हमको नया प्रकाश और नवीन प्रेरणा प्राप्त होती है। महापुरुषों की अमृतमयी वाणी, कबीर, रहीम, मीरा बाई सूरदास आदि महापुरुषों के प्रवचन, दोहों ओर गीतों में ये महान जीवन सिद्धान्त कूट-कूट कर भरे हुये हैं। जिनका आधार गहरे अनुभव के ऊपर रक्खा गया है। आज ये अमर तत्व-वेत्ता हमारे मध्य नहीं हैं, उनका आर्थिक-शरीर विलुप्त हो गया है पर अपने सदुपदेश के रूप में, वे वह जीवन सार छोड़ गये हैं जो हमारे पथ प्रदर्शन में बड़ा सहायक हो सकता है।
आदमी मर जाता है, उसके साथ उसके साज सामान, महल, दीवारें टूट-फूटकर नष्ट हो जाते हैं, परन्तु उसके जीवन का सार उपदेश और शिक्षायें-वह अमर वस्तु है नव युगों तक जीवित रहती है। इस पृथ्वी पर आज तक न जाने कितने व्यक्ति आये और मृत्यु के प्राप्त हुये, उनका नाम निशान तक शेष नहीं बचा, किन्तु जिन विचारकों, तत्ववेत्ताओं और महापुरुषों ने अपने जीवन के अनुभव रक्खे हैं वे आज भी मशाल की तरह प्रकाश दे रहे हैं।
मनुष्य का अनुभव धीमी गति से धीरे-2 बढ़ता है अब यदि हम केवल अपने ही अनुभवों पर टिके रहें तो, बहुत दिनों में जीवन का सार पा सकेंगे। इस से अच्छा यही है कि हम विद्वानों के अनुभवों को ध्यानपूर्वक पढ़ें और इन्हें अपने अनुभवों से परखें, तोलें और जीवन में ढालें। सदुपदेशों को ग्रहण करना अपने आप को लाभान्वित करने का एक सरल उपाय है। सदुपदेश हमारे लिये जीते जागते प्रकाश स्तम्भ हैं। जैसे समुद्र में जहाजों को उचित मार्ग बताने के लिये “प्रकाश स्तम्भ” बनाये जाते हैं विद्वानों के ये उपदेश ऐसे ही प्रकाश स्तम्भ हैं।
हमको कोई दूसरा अच्छी सलाह दे, उसको सुनना हमारा कर्त्तव्य है, परन्तु आपके पास अंतरात्मा का निर्देश है। आप अपनी आत्मा की सलाह से काम करते रहिये। कभी धोखा नहीं खावेंगे।
जिन्होंने बहुत उपदेश सुने हैं, वे देवता रूप हैं। कारण, जब मनुष्य की प्रवृत्ति अच्छाई की और होती है, तभी वह सदुपदेशों को ग्रहण करता है। तभी सत्संग में बैठता है। तभी मन में और अपने चारों ओर वैसा शुभ सात्विक वातावरण बनाता है। किसी विचार को सुनने का तात्पर्य चुपचाप उसमें रस लेना, उसमें रमण करना भी है। जो जैसा सुनता है, कालान्तर में वैसा ही बन भी जाता है। हम जिन सदुपदेशों को ध्यानपूर्वक सुनेंगे, कल निश्चय ही वैसे बन भी जावेंगे।
एक विद्वान ने कहा है, जल जैसी जमीन पर बहता है उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे बुरे विचारों का लोगों की संगति के अनुसार बदल जाता है। इसलिये चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन मूर्ख व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल मिल जाते हैं और उनके संपर्क से अपने आपको भी दुष्ट ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, किन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भय रहती है जहाँ वह, उठता बैठता है। आदमी का घर चाहे जहाँ हो पर वास्तव में उसका निवास स्थान वह है जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों या विचारों की सोहबत पसन्द है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति पर निर्भर है। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे कर्म करे, यह बहुत ही कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, किन्तु धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग या सदुपदेशों से ही प्राप्त होती है। स्मरण रखिये कुसंग से बढ़कर कोई हानिकारक वस्तु नहीं हैं सत्संगति से बढ़ कर कोई लाभ नहीं है।
जब हम सदुपदेशों की संगति में रहते हैं, तो गुप्त रूप से अच्छाई में बदलते भी रहते हैं। वह सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक क्रिया स्थूल नेत्रों से दीखती नहीं हैं किन्तु इसका प्रभाव तीव्र होता है। अन्ततः मनुष्य उन्हीं के अनुसार बदल जाता है।
गंगा जल से जिस प्रकार शरीर शुद्ध होता है, सदुपदेश से मन बुद्धि और आत्मा पवित्र होती है। धर्मात्मा पुरुषों की शिक्षा एक सुदृढ़ लाठी के समान है जो गिरे हुये पतितों को सहारा देकर ऊंचा उठती है और बुरे अवसरों पर, गिरने से बचा लेती है। जो शिक्षित हैं, उनके लिये सैकड़ों एक से एक सुन्दर अनुभव पूर्ण ग्रन्थ विद्यमान हैं, कवियों, विचारकों इनका मनन व आचरण करना चाहिए। जो अशिक्षित है वे लोग भी धर्मात्माओं के संग से इतनी शक्ति प्राप्त कर सकते हैं कि जिसमें अपने आपको संभाल सकें और विपत्ति के समय अपने पैरों पर खड़ा हो सकें। स्वयं भगवान गीता में कहते हैं
नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्र मिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसं सिद्धः कालेनात्मनि विन्दति
॥4।38
अर्थात् इस संसार में सद्ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कोई भी पदार्थ नहीं है उस ज्ञान को कितने ही काल से कार्य योग के द्वारा सुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने आप ही आत्मा में पा लेता है।
यदि कोई चाहे कि वह दुनिया में अपना स्वार्थ साधन भी करे और ईश्वर को भी प्राप्त कर ले तो यह असम्भव है। -अज्ञात
*****
दो मनुष्य ईश्वर को प्रसन्न करते हैं एक तो वह जो सच्चे हृदय से उसकी सेवा करता है, क्योंकि वह उसे जानता है, दूसरा वह जो उसे निष्कपट भाव से ढूँढ़ता है क्योंकि उसे नहीं जानता। - पाणिनी
(लेखक-श्री सच्चिदानन्द जी )
असंग्रह के पश्चात् शरीरश्रम का नम्बर आता है। धीरे-धीरे सूक्ष्मता से स्थूलता की ओर आ रहे हैं। शरीर श्रम को मध्यायु में तुच्छता की दृष्टि से समृद्ध लोगों ने देखना प्रारम्भ कर दिया था। जिसका परिणाम भी सामने आया। राष्ट्र के गुलाम हो जाने के साथ-साथ साँस्कृतिक सत्परंपराएं आदि ही नहीं यहाँ का सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो गया था और देश पर बिना किसी परिश्रम के नीतिज्ञ श्रमनिष्ठों का अधिकार हो गया था।
शरीर श्रम को अपने एकादश व्रतों में स्थान देकर गाँधीजी ने श्रम की आवश्यकता का ही नहीं, इसकी महानता का भी समर्थन किया। व्रत रूप में स्वीकार कर लेने से यह सिद्ध हो गया कि शरीर श्रम अहिंसा, सत्य आदि ईश्वरीय बातों की तुलना में किसी बात में छोटा नहीं है। हम बहुत कुछ शरीर श्रम इसलिये नहीं करते हैं कि हम इसे गिरी हुई नजर से देखने के आदी हो गये हैं। लेकिन गाँधीजी के रास्ते से जिन्दगी का काफिला ले जाने वाले शरीरश्रम को अपना परम धर्म मानते हैं। प्राचीन काल में शरीरश्रम पर ही वर्ण व्यवस्था खड़ी की गई थी। हमारे देश के प्राचीन ऋषि लोग भगवान से यह प्रार्थना किया करते थे कि हे भगवन् हम कर्म करते हुए एक सौ वर्ष तक जीवित रहें। अर्थात् कर्महीन बनकर इस पृथ्वी का बोझ न बनें। गान्धी-शरीरश्रम व्रत के अनुसार जब तक मनुष्य के घट में श्वाँस है तब तक उन्हें श्रमनिष्ठ रहना चाहिए और यह तभी सम्भव है जबकि जीवन के उषाकाल से ही हम श्रम के अभ्यासी बन जायं। जवानी से ही श्रम व्रत का पालन करने वाला जीवन की शाम आ जाने पर भी काम में लगा रहता है। और व्रत की कुछ भी परवाह न करने वाला प्राणी गीदड़ की तरह मोटा होने पर भी गद्दे पर पड़ा रहता है। अतः श्रम अभ्यास डालने के लिये भारतीय नौजवानों को क्षणमात्र भी विलम्ब नहीं करना चाहिए। इन्हें राष्ट्र को समृद्धिशील बनाना है।
प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार भी शरीरश्रम मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है। समृद्ध हो जाना अच्छी बात है किन्तु समृद्धि मनुष्य के अंगों की शक्ति नहीं छीन ले आज अगर समृद्ध भारतीय नागरिकों के मन से तपस्विता और कर्मनिष्ठता की भावना जाग उठे तो राष्ट्र की काया पलट जाय। एक बेजोड़ क्रान्ति हो जावे। क्योंकि समृद्ध जनों के कर्म मार्ग से गतिरोध आने की सम्भावना बहुत कम होती है।
शरीरश्रम का केवल लौकिक महत्व नहीं है इसमें दार्शनिक सत्य भी भरा हुआ है। जो लोक और परलोक सर्वत्र पूजित है। शरीर श्रम से अन्तःकरण की शुद्धता सम्बन्धित होती है।
शरीरश्रम करने के बाद प्राणी अपने आश्रम को लौटता है। थकान और प्यास के मिटने पर भोजन की इच्छा तेज होती है। ठीक इसी तरह एकादश व्रतों में भी एक क्रम है। इसके क्रम भंग से गूढ़ार्थों की तारतम्यता नष्ट हो जाती है उसी तरह शरीरश्रम व्रत के पश्चात् अस्वाद व्रत की व्यवस्था दी गई है। अस्वाद व्रत गान्धीजी का अपना व्रत है। वह भी किसी अन्य व्रत से कम वजन नहीं रखता। प्रायः आज के दिन में हम शरीर धर्म के निर्वाह के लिये भोजन नहीं करते। स्वाद के आनंद के लिए भोजन करते हैं। विदेशों में भोजन को सड़ाकर तथा शुष्क रूप देकर खाने का प्रचलन हो चला है तो भारत में भोज्य सामग्रियों को तलकर नष्ट करके खाने की परम्परा का श्रीगणेश हो गया है। मनुष्यता और पशुता में इतना ही अन्तर है कि मनुष्य अपनी समझदारी से काम करता है और पशु में समझदारी नहीं होती। अतः एक व्यक्ति को मनुष्य होने के नाते यह समझ कर भोजन करने बैठना चाहिये कि हम मात्र स्वाद के लिये नहीं बल्कि जीवन के धर्म का पालन तथा शरीर परिपोषण के लिए भोजन करने जा रहे हैं। यही अस्वाद व्रत है। अस्वाद व्रत के पालन का यह अर्थ नहीं है कि आप ऐसी वस्तुओं को खाइये जिसमें कोई स्वाद न हो। वह तो निस्वाद है। और निस्वाद की गणना में मिट्टी आदि आते हैं। मिट्टी आदि खाने से कभी भी शरीर की चैतन्यता कायम नहीं रह सकती। अतः अस्वाद की व्याख्या करते समय महात्माजी ने बताया है कि भोजन को शरीर की आवश्यकता समझना चाहिये न कि उसे स्वाद के भुलावे में पड़कर मुँह में डाल लेना चाहिये।
अस्वाद व्रत के पालन में स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों को लेने की पूर्ण व्यवस्था है किंतु औषधि रूप में जिस तरह रोगी को मात्रा रूप में औषधि दी जाती है उसी तरह इस शरीर को मात्रा और समय से ऐसे स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ दिये जा सकते हैं। जो सड़ाया हुआ, सुखाया हुआ, तला हुआ तथा तामसिक और उत्तेजक न हो। अस्वाद व्रत के स्वरूप को ठीक-ठीक समझ कर उसके पालन करने से मनुष्य कभी भी रोगों के चंगुल में नहीं पड़ सकता। स्वाद रचना की एक अनुभूति है। वास्तविक जीवन से इसका किंचित मात्र सम्बन्ध नहीं है। इसलिये वास्तविक जीवन की भोज्य वस्तुओं को समझ कर उन्हें मात्रा रूप में ग्रहण करना ही अस्वाद व्रत का पालन करना है। स्वादिष्ट भोजन उसी हालत में लेना चाहिये जब कि उससे शरीर के पोषण की आशा हो। अस्वाद व्रत के पालन से प्राणी में ब्रह्मचर्य आदि व्रतों के पालन की शक्ति आ जाती है।
अस्वाद के बाद गान्धीजी का अभय नाम का आठवाँ व्रत आता है। ‘अभय’ मानव हृदय की एक ऐसी अवस्था है जिससे जीवन की सक्रियता कभी बाधित नहीं होती। अभय एक ऐसी वस्तु है जिसके पास रहने से मनुष्य घोर संकटों में भी कभी निराश नहीं होता। निर्भयता एक ऐसा अस्त्र है जिसको साथ रखने पर हर मानव प्राणी कभी भी असत्य, अन्याय, असुरता आदि की शक्ति से पराजित हो अपने जीवन का मार्ग नहीं बदल देता। यही नहीं किसी भी प्रकार के रंगीन व्यक्तित्व से भी बड़े प्रभावित नहीं होता। निर्भयता वस्तुतः प्रत्येक मानव प्राणी के हृदय की आत्म चेतना है। आत्म विद्युत है।
गान्धीजी के अनुसार शारीरिक शक्ति और शौर्य वीरता नहीं है। दुनिया के भयों से मुक्त हो जाना ही वीरता है। मौत का भय, धन दौलत के लुट जाने का भय, कुटुम्ब परिवार विषयक भय, रोग भय, शत्रु, सरकार और समाज भय आदि जितने प्रकार के भय हैं, इन भयों की आँधी में हिमालय की तरह खड़ा ही निर्भयता है। और अभय व्रत का पालन है। मौत के भय का दमन हम अपनी आत्म भावना की शक्ति से कर सकते हैं। अहिंसा, अस्तेय और असंग्रह के व्रतों का पालन करते हुये हम चोर डाकुओं से अपने धन दौलत के लुट जाने के भय से मुक्त हो सकते हैं। वे आदमी कितने आश्चर्य के विषय हैं जो भूखे और नंगे मरते हुये मानव प्राणियों के बीच में निवास करते हुये भी अपनी तिजोरियों में लाख पर लाख रखते जाते हैं। सच पूछिये तो ऐसे मनुष्य कायर हैं, उन्हें अपनी अकर्मण्यता का भय हैं। अभय व्रत का पालन करने वाला गान्धीवादी अपनी कर्मशीलता पर दृढ़ रहता है। अभय व्रत के पालन में मनुष्य को निन्दा स्तुति आदि से भी सत्य और अहिंसा के रास्ते से विचलित नहीं होना चाहिये। कल्पित मान और प्रतिष्ठा की रक्षा में मन न लगाने वाला व्यक्ति ही सच्चा अभयव्रती है। ऐसे भी भय आते हैं जिसमें कुटुम्ब भी खतरे के दायरे में आया हुआ नजर आता है। मनुष्य की जीविका तक के चले जाने के चिन्ह दीखने लगते हैं। लेकिन मिथ्या जगत की समृद्धि की आशा अथवा विनाश के भय में पड़कर सत्य और अहिंसा पर चलने वाला कभी कभी भी दिग्भ्रान्त नहीं होता, वह गान्धी मार्ग पर निरन्तर चलता रहता है। उसके मस्तिष्क में देह भावना के स्थान पर देही की भावना होती है। परिवार के उपरान्त कभी-कभी मनुष्य रोगों के संक्रमित हो जाने के भय से रोगी की सेवा के लिये कटिबद्ध नहीं हो पाता। किंतु सत्य का सच्चा पथिक अभय होकर सेवा का सेनानी बनने के लिये तैयार हो जाता है। अभय हो जाना एक महान मनस्थिता भी है।
यों तो भय मात्र से छूटना बहुत ही कठिन है। अभयव्रत का पूर्ण पालन तो आत्मज्ञ प्राणी ही कर सकता है। किंतु व्यक्ति मात्र अभय व्रत का पालन करते हुये आत्मज्ञता की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। देश की अपनी साँस्कृतिक प्रतिभा जो यहाँ की मिट्टी और जलवायु की उपज है उस पर पाश्चात्य संस्कृति द्वारा होते हुये हिमपात को वीरता और धीरतापूर्वक रोकने का प्रयत्न करते रहना भी सूक्ष्म दृष्टि में अभयव्रत के अंतर्गत ज्ञात होता है। यहाँ पर एक बात स्पष्ट कर देने की आवश्यकता है -भौतिकवादी मानव प्राणी से कदापि अभयव्रत का पालन नहीं हो सकता भले ही उनके हाथों में बड़ी से बड़ी शक्ति क्यों न आ गई हो। अभयव्रत का पालन केवल आध्यात्मिक अतिरिक्त प्राणियों से ही सम्भव है। क्योंकि देह भावना के स्थान पर देही के अमरत्व में उनकी अविचल निष्ठा होती है। गान्धी जी के शब्दों में अभय मोह रहित स्थिति की पराकाष्ठा है।
एकादश व्रत में अस्वाद और सर्वत्र भय वर्जन आध्यात्मपरक अधिक होने के नाते अपना उत्तरदायित्व सर्वधर्म समानत्व व्रत को दे डालता वह गान्धी जी का नवाँ व्रत है। जहाँ सारी इकाइयाँ पूर्ण होकर बाद में अद्वैत रूप धारण कर लेती हैं। मर्य धर्म समानत्व का सरल रूपक वेदान्त की अद्वैत मान्यता है। अद्वैत में सारे दार्शनिक सिद्धान्त एक ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। एक ब्रह्म की सत्ता को ही सत् रूप में स्वीकृत किया जाता है। इस व्रत में भी यही होता है। विनोबा के जीवनम् सत्य शोधनम् के अनुसार विश्व के सारे धर्मों में मानवता रक्षण, अहिंसा के पालन एवं प्रेम प्रचार की ही बात कही गई है। अतः धर्मों के प्रवर्तक संत एवं ज्ञानियों की भिन्नताओं के बावजूद भी उनकी धुनियों में मानव वर्ग एक ही स्वरूप के अन्तरबिम्ब का दर्शन करता है। यह अन्तरबिम्ब देश जाति और रंग की भिन्नता की भावना की लहरों में भी आँदोलित नहीं हो पाया। इसे शुद्ध अन्तःकरण वाला निरपेक्ष व्यक्ति देख सकता है। सभी धर्मों के सिद्धान्तों एवं संतों को यौगिक अतेन्द्रिक अनुभूतियों में भी सभ्यता की झलक दीख पड़ती है। इस सभ्यता के सिद्धान्त रूपी प्रदीप की रोशनी में अपनी जीवन की रचना करना ही सर्वधर्म समानत्व व्रत का पालन करना है। सारे धर्मों में यह कहा गया है कि ईश्वर है। उसकी संख्या एक है। वह सत्य है। वह प्रेम से प्राप्त होता है। मनुष्य के सद्व्यवहार से प्रसन्न होता है। विश्व के नैतिक आचारों को जीवन में उतार लेने से उसके विश्वगत सापेक्ष सत्यों का आभास होता है आदि। इन संत मात्र के अनुभूति सूत्रों में विश्वास रखकर अन्य धर्म वालो की कट्टरता का प्रेम व्यवहार से परिष्कार करते हुये मानव मात्र में ईश्वर की झाँकी करता हुआ उनके साथ आत्मीयता का प्रयोग करते रहना गान्धी के सर्वधर्म समानत्व व्रत का लक्ष्य है। हम कुछ हैं। इस भावना के निर्बल हो जाने पर सर्वधर्म समानत्व के व्रत का पालन सरल हो जाता है और आदमी धीर-धीरे देवता होने लगता है। गान्धीजी के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास हुआ था। वे केवल भारत में गुलामी की जंजीरों को ही तोड़ने के लिये नहीं थे अपितु एक नव कर्म स्फूर्ति आस्तिक समाज की रचना हेतु अवतरित हुये थे। यही कारण था कि अपने व्रतों के साथ उन्होंने स्वदेशी व्रत का आह्वान किया। स्वदेशी व्रत को उन्होंने महाव्रत के नाम से पुकारा था। गान्धीजी के अनुसार स्वदेशी व्रत राष्ट्र का एक महान विस्तृत धर्म है। गान्धी जी ने स्वदेशी शब्द का सम्बन्ध स्वधर्म से जोड़ दिया था जिसके लिये भगवान श्री कृष्ण ने पहले ही कहा है कि “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः” गान्धी जी अपने स्वधर्म स्वरूपी स्वदेशी व्रत का न पालन करना भयावह ही नहीं आत्महत्या से भी अति निकृष्ट समझते थे। उनकी सारी राष्ट्र निर्माण की महत्वाकाँक्षायें इसी एक व्रत में कंजीर्ण थी। उन्होंने स्वदेशी रूपी ग्राम्य-राज्य के रूप में समर्थ गुरु रामदास के रामराज्य का सपना देखा था स्वदेशी व्रत का तात्पर्य अपने देश के वस्त्र विचार और दर्शन के मूलभूत तत्वों एवं तन्तुओं से है। इसमें “जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” की महनीयता भी कूट-कूट कर भी हुई है। इसमें राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं के सार्वभौम एवं सर्वकालिक उत्तर भी मौजूद हैं।
गान्धी जी का अंतिम व्रत स्पर्श भावना का था। स्पर्श के आधार पर व्यक्ति का किसी भी व्यक्ति को ऊंचा अथवा नीचा मानना घोर अज्ञानता है। अगर हमें कोई नीचा समझ कर स्पर्श करने से परहेज रखता तो उसके इस छोटी सी अकल में कभी भी ईश्वर के अविनाशी अंश में अपवित्रता नहीं आ सकती और ना ही वह नीच ही हो सकता है। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य को अस्पृश्यता की मनोवृत्ति को समाप्त कर देना चाहिये। इस भावना के रहते हुये कभी भी हम अपने समाज का सर्वोदय नहीं कर सकते। अस्पृश्यता की भावना मनुष्य की सबसे नीच अंतःवृत्ति का धोवन करती हैं। इसे देखकर एक प्रबुद्ध प्राणी को महान आश्चर्य होता है कि मनुष्य के समान बुद्धि प्रधान कुछ जीवों के चरित्र में इतना बड़ा दोष कैसे आ गया? अस्पृश्यता निवारण एक समाज सुधार एवं सर्वोदय समाज की नींव है। इससे विश्व बन्धुत्व की भावना को भी बल मिलता है और परस्पर प्रेम का प्रसार भी होता है जो व्यक्ति और समाज का एक मात्र उद्देश्य है।
गाँधी जी के एकादश व्रत वे दिव्य विमान है जिन पर आरुढ़ होकर मानवता भूतल पर बसे हुये आनन्द निर्मित स्वर्ग की ओर प्रस्थान करती है
(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम. ए. पी.एच. डी.)
क्या आप अत्याधिक चिन्तनशील प्रकृति के हैं? सारे दिन अपनी बाबत कुछ न कुछ गंभीरता से सोचा ही करते हैं? कल हमारे व्यापार में हानि होगी या लाभ, बाजार के भाव ऊँचे जायेंगे, या नीचे गिरेंगे। अमुक ने हमारा रुपया उधार ले रखा है, वह वापस करेगा भी या हड़प लेगा? दिनों दिन बाजार में महंगाई उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। कल का खर्च कैसे चलेगा? कन्या बड़ी होती जा रही है। उसके लिये योग्य समृद्ध और शिक्षित वर का कैसे प्रबन्ध होगा? हमारा पुत्र पढ़ता कम है। सारा समय खेलने में व्यतीत करता है। परीक्षा में कैसे उत्तीर्ण होगा? हमारी नौकरी लगी रहेगी, या छूट जायगी? हमारा स्वास्थ्य गिरता जा रहा है, कैसे सुधरेगा? हमें जल्दी ही लम्बी यात्रा पर जाना है। मार्ग की कठिनाइयाँ कैसे हल होंगी? ऐसी ही किसी समस्या को लेकर आप दिन-रात चिन्तन करते रहते हैं।
दीर्घ स्थायी थकान
आप अपने मस्तिष्क को सारे दिन विशेषतः रात में किसी भी चिन्तन की क्रिया में डाल देते हैं। जैसे गाड़ी का पहिया किसी लीक में पड़ कर आगे निरन्तर उसी दिशा में बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मस्तिष्क को चिन्तन की किसी भी समस्या में उसको लगा देने से वह उसी में फँसा रहता है। वह खुद रुकता नहीं बल्कि चिन्तन के प्रवाह में आगे बढ़ता रहता है। मस्तिष्क तो चिन्तन का एक यंत्र है। उसका कार्य चिन्तन करना ही है। यदि आप उसे कोई अच्छी या बुरी समस्या दिये रहेंगे, तो निश्चय जानिये, वह उसी समस्या के उखाड़-पछाड़ में संलग्न रहेगा। वह विश्राम की परवाह न कर बौद्धिक चिन्तन ही किए जायगा।
आधुनिक मनोविज्ञान वेत्ताओं की नई खोज यह है कि अधिक बौद्धिक चिन्तन मनुष्य के शरीर के लिए हानिकारक है। जो जितना अधिक मानसिक चिन्तन करता है, उसका शरीर उतना ही क्षीण होता जाता है। भूख नष्ट हो जाती है। भोजन में कोई भी रुचि नहीं रह जाती। रक्तचाप, व्रण, हृदय रोग, सिर दर्द आदि उभर उठते हैं। चिन्तनशील व्यक्ति प्रायः भयभीत से, शंकालु से और भविष्य के लिए चिन्तित रहते हैं। गुप्त मन में बैठा हुआ उनका भय ही उन्हें खाया करता है।
आप बौद्धिक चिन्तन या मानसिक श्रम करने वालों के स्वास्थ्य को देखिए। वे पहले दुबले रहते हैं तो भी शरीर पर माँस नहीं बढ़ता। उनकी हड़ियाँ ही हड्डियाँ चमका करती हैं। मेरे एक मित्र हैं जो लेखन का काम करते हैं। एक दिन मेरे पास आये। बोले रात में नींद नहीं आती। फल यह होता है कि सारे दिन थकान बनी रहती है। हाथ पाँव टूटते से रहते हैं। नेत्रों में नींद छाई रहती है और सर भारी रहता है। डॉक्टर को दिखाया तो न बुखार है, न इन्फ्यूलेन्जा, न और कोई शारीरिक विकार पर थकान बनी रहती है। दिमाग में सारे दिन रात एक अजीब प्रकार का तनाव बना रहता है।
हमने उन्हें बताया कि इस मानसिक व्यग्रता का मुख्य कारण सतत चिन्तन है। अधिक बौद्धिक चिन्तन से स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है। उसी की प्रतिक्रिया इनके शरीर पर दिखाई देती है। इन्होंने अपने मस्तिष्क को आराम नहीं दिया वरन् लगातार चिन्तन करते-करते उसे इतना कार्य बोझिल बना दिया कि मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। अधिक सोचने-विचारने से, दिमाग सारे दिन चिन्तन में लगाये रखने से स्नायु पर अतिरिक्त भार पैदा हो गया। इससे शारीरिक क्रियाओं में रुकावट उत्पन्न होने लगी। फलस्वरूप अपने को मानसिक दृष्टि से थका हुआ पाने लगे।
एक परीक्षार्थी की समस्या
इस दिन की परीक्षा देने के उपरान्त एक परीक्षार्थी अस्पताल गया। उसे रक्त चाप, अनिद्रा, थकावट, जीर्ण, सिर दर्द और हृदय रोगों की शिकायत प्रारंभ हो गई थी। डॉक्टर ने उसके शरीर की परीक्षण की, जीभ देखी, फिर कब्ज के कारण यह सब होना समझकर पेट की सफाई की चिकित्सा प्रारम्भ की, लेकिन कोई लाभ न दिखाई दिया। रोगी उसी प्रकार कुम्हलाया और मुरझाया सा रहा। उसके नेत्र कुछ लाल से कुछ चढ़े हुए से दीखते रहे, मुख पर चिन्ता मिश्रित निराशा झलकती रही। अन्त में कोई रोग नहीं है, यह कह कर अस्पताल से विदा किया गया।
फिर वही विद्यार्थी मेरे पास सलाह के लिए आया। मुझसे देह तक अपनी परीक्षा संबंध तैयारी, अधिक पढ़ना लिखना, रात में रोशनी के सामने घण्टों पढ़ते रहना तथा असंख्य तत्वों की जानकारी को मन में स्मरण रखने की कोशिश करने की बाते बताता रहा।
वह बोला, प्रोफेसर साहब, क्या बताऊं वर्ष छह महीने तो मित्रों में मजेदारी, यूनियन के नाम कार्यों, सैर सपाटा में बीत गये। छह माही परीक्षा तैयारी न होने की वजह से बैठे ही नहीं। जैसे परीक्षा पास आई सोचने लगे कि पढ़ाई से कोर्स कैसे तैयार हो। फिर तो सब काम छोड़कर केवल एक मात्र अध्ययन ही में लग गये। दिन रात परीक्षा तथा कोर्स का ही चिन्तन और सब संसार जैसे खो चुका हो। रात में सोते, तो स्वप्न में भी परीक्षा में बैठे-2 पर्चे करते ही अनुभव करते। फल यह हुआ कि सारा मस्तिष्क भारी थकान में बोझिल हो उठा।
बौद्धिक परिश्रम की भी एक सीमा है। आपका मस्तिष्क जितना भार संभाल सकता है, उतना ही चिन्तन, विचार और मनन इत्यादि करना चाहिए। इस सम्बन्ध में कुछ पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों की नई खोजें और बहुमूल्य विचार यहाँ उद्धृत किये जाते हैं। मानस रोगों के सम्बन्धों में डॉक्टर डेविड हैराल्ड फिल्क के विचार क्रान्तिकारी हैं। वे लिखते हैं-
मानसिक रोगों से पीड़ित अधिकाँश व्यक्तियों के रोगों की जड़ आवश्यकता से अधिक चिन्तन करना है बहुत सोच विचार करने से मस्तिष्क थकान से भर जाता है और स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ मानसिक रोगियों का परीक्षण करने से मैंने पाया है कि वे आवश्यकता से अधिक सोच विचार करते हैं। इन लोगों के मस्तिष्क सदैव व्यस्त रहते हैं। वे वास्तविक या काल्पनिक समस्याओं की उधेड़ बुन में सदैव लगे रहते हैं या हम समस्याओं के अभाव में यही कल्पना करते रहते हैं कि अमुक स्थिति के उत्पन्न होने पर हमारी प्रतिक्रिया क्या होगी। इस सतत चिन्तन के फलस्वरूप जो मानसिक तनाव स्वास्थ्य पर तो पड़ता ही है, भावात्मक सम्बन्ध भी अव्यवस्थित हो जाते हैं।
समस्या का निदान
आप पूछेंगे मानसिक तनाव और यह दीर्घ थकान कैसे दूर हो? हमारा क्या दृष्टिकोण होना चाहिये?
डॉक्टर फिल्क का उत्तर, “पूर्ण स्थिर व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है कि आपके विचार और कार्यों में समुचित समन्वय हो।” अर्थात् आप जितना सोचें और चिन्तन करें, उतना ही शारीरिक कार्य करें, हाथ पाँव हिलायें। खूब खेलें कूदें, अपने शरीर से भी परिश्रम करें।
शारीरिक व्यायाम और हाथ पाँव का कार्य करने, मनोरंजन करने, खेल-खेलने से मानसिक रोगियों का तनाव कम हो जाता है। उनका मन चिन्तन से हटकर अन्य कार्यों में लगता है। इससे मस्तिष्क को आराम मिलता है। डॉक्टर फिल्क ने अपने मानस रोगियों को कम से कम एक घन्टे तक कुछ न सोचने की सलाह दी है। ऐसा करने से भावात्मक तनाव कम होता है।
सोचिये कम, कीजिए अधिक-यह नियम मस्तिष्क को विश्राम देता है। कार्य करने से आपका समूचा शरीर काम में आता है, अवयव थकते हैं, अच्छी निद्रा आती है। इन शारीरिक क्रियाओं से कुछ विश्राम मिल जाता है।
आप देखेंगे, पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ मस्तिष्क के थकान से कम ग्रसित होती हैं। ये पुरुष की अपेक्षा दीर्घजीवी होती हैं। इसका कारण यह है कि वे हाथ पाँव का श्रम बौद्धिक चिन्तन की अपेक्षा बहुत करती हैं। उनके मस्तिष्क में अति चिन्तन की आदत नहीं होती। एक कारण यह है कि वे अधिक पढ़ी-लिखी नहीं होती। इस वजह से सतत चिन्तन के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले मानसिक रोग उन्हें नहीं सताते। उनका मानसिक संतुलन पुरुषों की अपेक्षा स्वस्थ होता है।
शरीर का भी पर्याप्त कार्य कीजिए। इस प्रकार मस्तिष्क को विश्राम देकर आप अधिक स्वस्थ और निश्चिंत बन सकेंगे। जब किसी निर्णय की आवश्यकता हो, तो पहले मन को शान्तः संतुलित और तरोताजा बनाने की ओर सचेष्ट रहिये ताजगी की स्थिति में आप जो निर्णय करेंगे, वही सही होगा।
जो लोग पाप करते हैं उन्हें एक न एक विपत्ति सदा घेरे ही रहती हैं, किन्तु जो पुण्यकर्म किया करते हैं वे सदा सुखी और प्रसन्न रहते हैं।
- महात्मा भीष्म
*****
आत्मनिरीक्षण के द्वारा जो व्यक्ति जीवन में अपना मार्ग विषयों से भरे हुये जंगल में स्वयं निश्चित करता है, वह अपना ज्ञान औरों पर नहीं बघारता बल्कि अपने आचार से औरों को उपदेश देता है।
महर्षि व्यास
(डॉ. लक्ष्मीनारायण प्रेमी, एम. ए.)
अँग्रेजी में एक कहावत है “दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें” तुम नहीं चाहते कि कोई तुम्हारे साथ अशिष्ट व्यवहार करे, तुम्हारा अपमान करे, तुम्हारी अवहेलना करे यदि कोई ऐसा करता है तो तुम्हें बुरा लगता है। अतः सोचो कि जैसा तुम्हें इन बातों से बुरा लगता है, वैसे ही यदि तुम दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करोगे तो उन्हें भी बुरा लगेगा। अतः कर्त्तव्य है कि तुम दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो। यह साधारण कर्त्तव्य है, समझदारी है, मनुष्यता है। मनुष्य के चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा इसी के द्वारा सम्भव है कि उसका व्यवहार दूसरों के प्रति कैसा होता है। एक संभ्रान्त सज्जन मनुष्य वह है जो कि अपने आश्रितों अपने से दुर्बलों तथा परिस्थितियों से लाचार मनुष्यों के प्रति सहृदयता, उदारता तथा सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करता है। जो किसी के बिगड़े समय तथा उसकी प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उससे बेजा फायदा उठाता है, वह और भले ही कुछ हो पर निश्चय ही भला आदमी नहीं हैं।
प्रत्येक से मृदु और शिष्ट व्यवहार करो। इससे दूसरों को तुम्हारे प्रति प्रेम और श्रद्धा होगी। इससे अप्रत्यक्ष रूप से तुम्हारा ही लाभ है। अतः यदि पुण्य और परोपकार के भाव से नहीं, निस्वार्थ और त्याग के भाव से नहीं तो व्यक्तिगत लाभ, स्वार्थ व्यवहारिकता की दृष्टि से ही दूसरों के प्रति सदय और विनम्र रहो। लेडी माँटग्यू का कहना है कि शिष्टता में जेब से कुछ खर्च नहीं और वह सब कुछ खरीद लेती है। आप अपने गुरुजनों, बड़ों, बराबर वालो, मित्रों छोटों तथा आश्रितों के प्रति समुचित तथा सद्व्यवहार करेंगे तो उनके लिए तथा अपने लिए आनन्द का स्रोत बहावेंगे। दूसरों को इससे इसलिये प्रसन्नता होती है क्योंकि वे समझते हैं कि आप उनके व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धावान हैं। परन्तु हमें स्वयं तो उनसे भी अधिक हर्ष होता है-इसलिये कि हम में दूसरों के हृदयों को जीत लेने की क्षमता है।
सच पूछा जाय तो अच्छे व्यवहार की शिक्षा हमें स्वयं से प्राप्त होती है। यदि हम समझदार हैं तो अपना ही अनुभव हमें इस स्वप्राप्त शिक्षा की उपादेयता बता देगा। यह शिक्षा किसी स्कूल, कालेज या पुस्तक से इतनी और इतनी अच्छी तरह सीखी जा सकती है जितनी कि स्वयं की बुद्धि से। विनम्र, दयालु, शिष्ट, परोपकारी होने में हमें कौन पैसा खर्चना पड़ता है। केवल इच्छा मात्र की आवश्यकता है। श्री सैमुअल स्माइल्स का कहना है कि समाज में भलमनसाहत का व्यवहार एक उस प्रकाश के शान्त प्रभाव के समान है जो समस्त प्रकृति को रंग देता है। मुखरित शक्ति से यह प्रभाव अधिक शक्तिशाली होता है, कहीं अधिक लाभप्रद है।
साधारण छोटी शिष्टतायें या शिष्टतापूर्ण व्यवहार, जीवन के क्षीण परिवर्तन का आधार बनती हैं। अलग-अलग देखने पर वे बहुत थोड़े मूल्य की जँचेगी, पर उनके एकत्रीकरण में बार-बार दोहराने से वे महत्वपूर्ण बन जाती हैं। वे इसी भाँति साधारण हैं जैसे प्रतिदिन एक पैनी बचाने पर बारह मास में या जीवनभर वैसा करने से क्या महत परिणाम होगा, इस सम्बन्ध में सर्वविदित कहावत वाली बात सामने आती है।
अच्छे श्रोता बनिये। हर मनुष्य अपनी ही कहना चाहता है। कोई किसी की सुनना नहीं चाहता। आप पहले समझदारी से दिल के साथ उसकी पूरी बात सुन तो लीजिये उसे सब कुछ कह तो लेने दीजिये, उसे अपना हृदय तो हल्का कर लेने दीजिये। एक बार उसे मनमानी कह लेने दीजिये। फिर तो आपका बिना मोल का गुलाम हो जायगा। और तब आप उससे चाहे जो कुछ कहेंगे वह ध्यान और प्रेम से आपकी बातें सुनेगा और मानेगा।
वैसे ही दूसरों की सम्मति का आदर कीजिये। कुछ लोग दूसरों की सन्मति सुनना ही नहीं चाहते आपको उससे मतभेद हो सकता है, पर आपमें सहनशीलता तो होनी ही चाहिये। ‘सुने सब की करे मन की’ में भी यही बात बताई गई है। आपको विरोध ही, मतभेद प्रकट करना है तो खूबसूरती से मिठास से, समझदारी से प्रकट करना चाहिये। यह तो आपके हाथ में है। अपने इतिहास में हमने पढ़ा है कि एक महान् यवन सम्राट की लिखी हुई बातों को एक व्यक्ति ने गलत बनाया। सम्राट ने उसके कहे अनुसार परिवर्तन कर दिया। उसके जाने के बाद महामन्त्री ने पूछा आपने ऐसा क्यों किया जबकि आप जानते थे कि आप ठीक थे। सम्राट ने कहा मुझे अपनी बात पर विश्वास था। उसके जाने के बाद मैं फिर पहले का जैसा रहने दूँगा। पर उसके कहे अनुसार करने से मेरी कुछ हानि नहीं हुई और उसको आत्मिक प्रसन्नता हुई होगी। अब आप ही सोचिये यदि उक्त मनुष्य को सम्राट की इस उदारता का जब पता चला होगा तो वह सदा को उनके हाथों बिक गया होगा। उक्त उदाहरण दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो की महत्ता का द्योतक है। सिद्धान्तों और सम्मतियों पर दृढ़ता के साथ स्थिर रहना बुरा नहीं है पर यह काम विनम्रता और स्नेहपूर्वक भी किया जा सकता है, न कि जोर जबरदस्ती लड़ झगड़ कर, घूसों और गालियों के बल पर। कड़े शब्द तथा व्यंग ऐसे है जिनकी चोट का जख्म कभी नहीं भरता। प्रत्येक वस्तु में अपनी आत्मीयता स्थापित करो। दूरी और परायापन अच्छी बात नहीं है। हो सकता है जिसे आज तुम गैर, दूसरा और विरोधी समझ रहे हो, ठीक से देखने-परखने पर तुम्हें अपना और निकट का ही लगे। शर्त केवल एक है, अपनी ही मत हाँके जाओ। अपनी ही भावनाओं इच्छाओं, विचारों का ध्यान मत करो। दूसरों की भावनाओं, विचारों का भी ध्यान रखो। एक बार एक अंग्रेज उपदेशक ने एक सुन्दर चुटकुला कहा। यह वह था- एक दिन प्रातः जब धुन्ध छाया था मैं पर्वत पर जा रहा था। दूर पर्वत पर एक विचित्र सी लगती हिलती-जुलती वस्तु मुझे दीखी जो राक्षस की भाँति मुझे लगी। परन्तु जब मैं अधिक निकट आ गया तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह एक मनुष्य था। और जब मैं उसके बहुत निकट पहुँच गया तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह तो मेरा ही भाई है।
दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखने पर तुम उसके निकट पहुँच सकोगे। उसकी आत्मीयता के कारण तुम उसके वास्तविक, सच्चे रूप को पहचानने में अधिक समर्थ होंगे। अतः संसार को अपने अनुकूल कर लेने का, जीवन में सदा सफलता पाने का दूसरों के हृदयों को जीतने का, स्वार्थ और परमार्थ दोनों के लिये यह आवश्यक है कि तुम दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो। गरीब, अमीर, विद्वान, मूर्ख, राजा, पुरोहित, व्यापारी, विद्यार्थी, स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध, युवा सभी के लिए सुलभ है कि वे सहृदय, सरल, सरस सहानुभूतिपूर्ण, सच्चा और खुला हुआ हृदय सबके लिए रखें। यह एक ईश्वरीय वरदान है। जो दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना जानते हैं उनमें ये समस्त गुण स्वतः आ जाते हैं।
सर्वश्रेष्ठ धर्म तो वह है कि जो मनुष्य की प्रकृति को ही बदल दे, जो अन्तःकरण के सत्य से आत्मा का अविच्छेद सम्बन्ध कर दे और जो सदा शुद्धि की तरह हो। -गाँधीजी
*****
“धर्म की नाप तो प्रेम से, दया से और सत्य से होती है। सत्य की कभी हत्या नहीं हो सकती।” -गाँधीजी
(डॉ. चमनलाल गौतम)
महापुरुषों की जयन्ती मनाने का अभिप्राय यह होता है कि हम उस दिन उनके जीवन पर एक दृष्टि डालें, उनके कार्यों का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करें कि उन्होंने किन कठिन परिस्थितियों का सामना करके उनसे जूझकर लोक सेवा, परोपकार और निःस्वार्थ भावना से ओत-प्रोत होकर तप और त्याग के माध्यम से देश, जाति और राष्ट्र का कल्याण किया। जयन्ती मनाना उनके कार्यों की प्रशंसा व सम्मान करना है ताकि भविष्य में भी लोग इसी मार्ग पर अग्रसर हों, क्योंकि लोग जिस वस्तु या गुण का सम्मान करते हैं लोग उन्हीं को अपनाने का प्रयत्न करते हैं।
महापुरुषों के अतिरिक्त देवी-देवताओं और अब नारी पुरुषों की भी जयन्तियाँ मनाई जाती हैं जैसे राम, कृष्ण, आदि। प्रति वर्ष ज्येष्ठ शुक्ला 10 को गायत्री जयन्ती मनाई जाती है। गायत्री लाखों और करोड़ों हिन्दुओं का इष्ट है। यह हमारे जीवन का सब से आवश्यक तत्व है, प्रकाश स्तम्भ है, अज्ञानान्धकार में भटकने वालों को मार्गदर्शन करता है, संसार सागर में डुबकियाँ लगाने वालों को बचाकर पार लगा देता है, प्राणी इस संसार के गोरखधंधे से घबरा जाता है तो मानो अपने प्रिय पुत्र पर वरद हस्त फेर कर उसे साँत्वना देता है, मनुष्य जगत की ठोकरों से तंग आ जाता है तो उसे धैर्य और सहन शक्ति प्रदान करता है ताकि वह कष्ट और कठिनाईयों के बीच भी हंसता रहे, मृत्यु भी सामने आए तो उस से भी संघर्ष करने की ठान ले। गायत्री माता इतनी दयालु हैं कि वह अपने पुत्र का दुःख सहन नहीं कर सकती और उसे दुःख से सुख, अज्ञान से ज्ञान, असत्य से सत्य की ओर ले जाती है। उसके त्रितापों को नष्ट कर देती है। उसके अभावों का दूर करती है लौकिक और पारलौकिक सब प्रकार की उन्नति में सहायक सिद्ध होती है। मनुष्य को मनुष्य बनना सिखाती है। उसे अपने पारिवारिक व सामाजिक कर्तव्यों का ज्ञान कराती है ताकि वह पथभ्रष्ट न जाए। दुष्ट, कुकर्मी, ठग, चोर, बेईमान, व्यसनी, छली, कपटी, स्वार्थी व्यक्तियों को सन्मार्ग पर लाने का यह अमोध अस्त्र है जो हजारों और लाखों बार आजमाया हुआ है।
गायत्री मन्त्र देखने में तो बहुत छोटा सा 24 अक्षरों का मन्त्र दीखता है परन्तु इसमें गजब शक्ति है। हृदय परिवर्तन की यह रामबाण औषधि है। इससे अनेक प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसमें अनेक प्रकार की विद्याओं का संकेत मिलता है। इसमें वह तत्व ज्ञान भरा पड़ा है जिसे अपनाकर मनुष्य अजर-अमर हो जाता है। इसके एक-एक अक्षर में वह शिक्षाएं भरी पड़ी हैं जिसे अपने जीवन में उतार कर मनुष्य धन्य हो सकता है।
यही कारण है कि आदि काल से ऋषियों ने इस परम पुनीत मंत्र को अपनाया है और इसके बिना जल ग्रहण न करने का आदेश दिया है। इसका चमत्कार प्रभाव उन्होंने अनुभव कर लिया था तभी बच्चों के थोड़ा समझदार होते ही इसकी दीक्षा दे देते हैं, और उसे जीवन भर धारण किए रहने की शिक्षा देते हैं कि इसी के सहारे अपनी जीवन नाव पार करना। जो मनुष्य इतने महान, प्रेरणादायक और कल्याण कारी तत्व को भूल जाता है, वह पतन के मार्ग पर चलना आरम्भ कर देता है। हम संसार के झंझटों में फंस कर इस ज्ञान दीप को भूल न जाएं प्रतिवर्ष इसकी जयन्ती मनाते हैं जो इस वर्ष 5 जून को है ताकि यदि हम किसी कारण इसे भूल गए हों तो पुनः उसे ग्रहण कर लें।
गायत्री माता के चार पुत्र चार वेद हैं। गायत्री के एक-एक चरण की व्याख्या स्वरूप चार वेद बने हैं। इस महामन्त्र का जो अर्थ और रहस्य है, उसका प्रकटीकरण चारों वेदों में ही हुआ है। बीज रूप में जो गायत्री में है, वह विस्तार से वेदों में है। वेद को ईश्वरीय ज्ञान माना जाता है। यह पवित्र हृदय ऋषियों के स्वच्छ, अन्तःकरणों में अवतरित हुआ था। गायत्री की घोर तपश्चर्या करके ही वह इसकी सामर्थ्य प्राप्त कर सके थे, गायत्री के मन्थन का यह परिणाम था। गायत्री हमारी भौतिक व आध्यात्मिक दोनों प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। वेद में भी दोनों प्रकार के विषय हैं। यह ज्ञान और विज्ञान का भण्डार हैं। इसने मनुष्य जाति को सब प्रकार की विद्याओं का विज्ञान दिया है, इसने उस की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान किया है। यह वह अमृत है जिसे पीकर उसके आन्तरिक नेत्र खुल जाते हैं, उसे वास्तविकता का ज्ञान होता है, उसके मनः क्षेत्र में ज्ञान का उदय होता है, वह अपने और समाज के जीवन को सत्पथ पर ले जाता है।
परन्तु खेद की बात है कि हम अपने अमूल्य रत्नों को भूल गए। हमारे स्वार्थों ने हमें इन से अलग कर दिया। फलस्वरूप इस जीवन विद्या से वंचित रहने लगे। दीपक के अभाव से जैसे मनुष्य अंधेरे में ठोकरें खाता है। हम भी दिन-दिन अवनति की ओर जाने लगे। जिन लोगों ने इन्हें अपनाया वह इनसे यथेष्ट लाभ उठा चुके हैं और उठा रहे हैं।
प्रसन्नता की बात है कि अ.भा. गायत्री परिवार ने लुप्त प्रायः गायत्री, विद्या को जन-जन के मन मानस में स्थापित करने का प्रयत्न किया और इसमें आशाजनक सफलता भी मिली है। जो कार्य गायत्री परिवार के कर्मठ कार्यकर्ताओं ने अब तक किया है लाखों और करोड़ों हिन्दुओं तक गायत्री माता का संदेश पहुँचा दिया है, यह इतिहास के पन्नों में अमर रहेगा। परन्तु यह कार्य अभी अधूरा है। माँ की प्रसन्नता तभी प्राप्त की जा सकती है जब उस के पुत्रों की ओर भी ध्यान दिया जाए, उपेक्षा के गर्त में पड़े वेदों का घर-घर में प्रचार हो, शिव जी के मन्दिर में गणेश और स्वामी कार्तिकेय भी होने चाहिए। गायत्री के साथ-साथ उसके चारों पुत्रों- चार वेदों की भी स्थापना होनी चाहिए।
अभी तक वेद विद्या को सर्वसाधारण के लिए सुलभ बनाने के लिए दो कठिनाइयाँ सामने आ रही थी। एक तो यह कि जो हिन्दी भाष्य उपलब्ध थे, उनके अर्थ इस प्रकार से किए गए थे कि उनको समझना कठिन था और दूसरी यह कि उनका मूल्य इतना अधिक रखा गया था कि वह साधारण व्यक्तियों कि लिए खरीदना सम्भव न था। गायत्री तपोभूमि ने इन दोनों कठिनाईयों को दूर करने का प्रयत्न किया है। परम पूज्य प्रातः स्मरणीय वेद पूर्ति तपोनिष्ठ आचार्य जी महाराज ने चारों वेदों का सरल भाष्य इस ढंग से किया है कि उसे कोई हिन्दी पढ़ा लिखा व्यक्ति भी पढ़ और समझ सके। दूसरे उसका मूल्य इतना कम रखा गया है कि उसे हर एक व्यक्ति गरीब, अमीर खरीद सकता है। ऋग्वेद की 3, अथर्व वेद की 2, यजुर्वेद की 1 और साम वेद की 1, इस प्रकार कुल सात जिल्दों में बना है। इन सबका मूल्य 45 रु. है, परन्तु प्रचारार्थ 35 रु. में दिया जाएगा। रेल पार्सल द्वारा मंगवाने से 2 रु. और डाक द्वारा 5-6 रुपया लगेंगे जो मंगवाने वाले को ही देने होंगे। 5 सैट मंगवाने वाले को डाक खर्च फ्री किया जाएगा।
गायत्री जयंती के दिन गायत्री माता का गुण गान गाया जाता है, घर-घर में उसके व्यापक प्रचार के संकल्प किए जाते हैं, सभा, आयोजन, यज्ञ और जुलूस निकाले जाते हैं ताकि अग्नि पर पड़ी राख की भाँति यदि गायत्री विद्या का हमारे जीवन से लोप हो गया हो तो, हम उसे पुनः स्मरण करें और अपने जीवन में चरितार्थ करें। माँ अपने पुत्रों को अपनी छाती से अलग नहीं कर सकती। उसे उन्हें चिपकाए रहने में ही प्रसन्नता अनुभव होती है। गायत्री जयन्ती को वेद जयन्ती भी मानना चाहिए। इस दिन गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा में वेद भगवान की स्थापना हो। प्रदर्शन से उसकी व्यापक जानकारी होती है। वेद भगवान के जुलूस निकाले जाएँ जिस तरह सिख लोग गुरु ग्रन्थ साहब की पूजा पर्व पर करते हैं। वेद भगवान का जय-जय कार हो लाखों हिन्दुओं ने अभी तक वेद भगवान के दर्शन तक न किए होंगे। गाजे बाजे, कीर्तन आदि के साथ निकले जुलूस का जनता पर एक छाप पड़ेगी कि वेद भारतीय संस्कृति के विकास का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। स्वस्तिवाचन, हवन, भजन आदि के साथ सुन्दर चाँदी के सिंहासन पर वेद भगवान की स्थापना करनी चाहिए। वेद कथा का प्रबन्ध करना चाहिए। सभा और सम्मेलन करके वेद भगवान की महत्ता हिन्दु जगत पर स्थापित करनी चाहिए ताकि हम और उनका आकर्षण बढ़े और हमारा राष्ट्र दिन-दिन नैतिक व साँस्कृतिक पुनरुत्थान की ओर बढ़े।
इसी दिन गंगा दशहरा मनाया जाता है। इस दिन तप की प्रतिमूर्ति भागीरथ ने गंगा का अवतरण किया था। घोर तप के फलस्वरूप ही वह प्यासी जनता को तृप्त कर सके थे। भागीरथ की आत्मा हमें पुकार-पुकार कर कह रही है केवल योजनाओं और बातों से काम न चलेगा वरन् काम के लिए कमर कसनी होगी और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने जीवनों को खपाना होगा तभी गंगा प्रसन्न होगी और मुँह माँगा वरदान देंगी। अनैतिकता झूठ, छल, कपट, बेईमानी, नास्तिकता, लोभ, स्वार्थीपन, अन्धविश्वास के इस युग में ज्ञान गंगा को अवतरित करने के लिए घोर परिश्रम करना होगा। गायत्री माता को घर-घर पहुँचाने के लिए परिजनों को जो कष्ट मुसीबतें और संघर्षों का सामना करना पड़ा वैसे ही समय परिश्रम और तप की बलि अब भी देनी होगी। एक शाखा में एक वेद की स्थापना तो सरल है। कुछ सदस्य मिलकर इस कार्य को कर सकते हैं गाँव मुहल्ले से चन्दा इकट्ठा कर सकते हैं। परन्तु यहाँ तक हमें सीमित नहीं रहना है। हमें तो सारे विश्व को वेद ज्ञान ने सींचना है। संसार में वेदों की धूम मचा देनी है और एक बार फिर दिखा देना है कि भारत जगतगुरु है और सारे विश्व को अध्यात्म ज्ञान देने का अधिकारी है, वह सबका नेतृत्व करेगा और वेदों की अद्वितीय महत्ता को और स्थापना करेगा। गायत्री का न अक्षर हमें यह शिक्षा देता है कि जो कुछ तुम्हारे पास है परहित के लिए लुटा दो। अपने पास कुछ मत रखो। वेद सृष्टि का आदि ज्ञान है। हमें इस बीज को सब ओर बखेर देना हैं ताकि उससे सुन्दर फल देने वाले कल्याणकारी और शान्तिदायक पेड़ उगे और उसकी छाया में बैठकर विश्व सुख और समृद्धि का अनुभव करे।
गायत्री परिवार के कर्मठ कार्यकर्ताओं का कर्तव्य है कि सबसे पहिले अपना शाखा में वेद स्थापना की योजना बनाएं। जुलूस का प्रबन्ध करें ताकि निश्चित रूप से गायत्री जयन्ती के शुभ अवसर पर वेद भगवान की स्थापना हो जाए। इसके साथ-साथ अपने क्षेत्र में धर्म फेरी करके कम से कम 4 वेदों की स्थापना का प्रयत्न किया जाए। अपने ग्राम व नगर के धर्मप्रेमी जनों को स्वतंत्र वेद स्थापना के लिए प्रेरित किया जाए। गायत्री माता की प्रसन्नता इसी में हैं कि उसके पुत्रों का गुणगान किया जाए। गायत्री जयन्ती के अवसर पर गायत्री माता को यह उत्तम भेंट है। साँस्कृतिक पुनरुत्थान की ओर यह एक प्रशंसनीय कदम है। आशा और पूर्ण विश्वास है कि गायत्री परिवार की 6 हजार शाखाओं ने जिस प्रकार भारतीय संस्कृति के माता और पिता-गायत्री और यज्ञ का विस्तार किया है। उसी तरह ईश्वरीय ज्ञान-वेद के प्रचार को व्यापक रूप देकर धार्मिक उन्नति में योग देगी।
“यदि कोई तुम्हें मारने आये तो हँसते-हँसते मर जाओ इसी का नाम आत्मिक बल या रूहानी ताकत है।”
*****
तुम्हारे कार्य से किसी को दुख न पहुँचे इसका ज्ञान रखना एवं इसके अनुसार कार्य करना तुम्हारा कर्त्तव्य है। -मा. गाँधी
(श्री स्वामी रामानन्द जी)
मनुष्य का पतन शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से होता है। हमको जिस प्रकार शरीर और व्यवहार सम्बन्धी विषयों में सावधान रहने की आवश्यकता है, उसी प्रकार मानसिक दोषों से भी सतर्क रहना आवश्यक है। मानसिक दोष सूक्ष्म इन्द्रियों के विषय होने के कारण अधिक कठिनता से दूर किये जा सकते हैं। मानसिक दोष ही वास्तविक पाप हैं और उनसे प्रत्येक क्षण सावधान रहना बचे रहना परमावश्यक है।
काम क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असंयम, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा मनुष्य में रहने वाले ये बाहरी दोष तनिक सा अवसर पाते ही उत्तरोत्तर बढ़ने लगते हैं।
मुनि सनत्सुजात के अनुसार, “जैसे व्याध मृगों को मारने का अवसर देखता हुआ उनकी टोह में लगा रहता है, उसी प्रकार इनमें से एक-एक दोष मनुष्यों का छिद्र देखकर उस पर आक्रमण करता है।”
अपनी बहुत बड़ाई करने वाला, लोलुप, अहंकारी, क्रोधी, चंचल और आश्रित की रक्षा न करने वाले ये 6 प्रकार के मनुष्य पापी होते हैं। महान संकट के पड़ने पर भी जो निडर होकर पाप कर्मों का आचरण करते हैं। सम्भोग में ही मन रखने वाला, विषमता रखने वाले, अत्यन्त भारी दान देकर पश्चाताप करने वाला, कृपण, काम की प्रशंसा करने वाला तथा स्त्रियों के द्वेषी ये सात तथा पहले के छः ये तेरह प्रकार के मनुष्य नृशंस कहे गये हैं। इनसे सावधान रहें?
मनुष्य प्रायः तीन तरह से पाप में प्रवृत्त होता है। (1) शरीर (2) वाणी और (3) मन द्वारा। इनके भी विभिन्न रूप हो सकते हैं। विभिन्न अवस्थायें और स्तर हो सकते हैं। ये प्रत्येक मनुष्य का अधःपतन करने में समर्थ हैं। तीनों द्वार बन्द रक्खें, शरीर, मन और वाणी का उपयोग करते हुये बड़े सचेत रहें। कहीं ऐसा न हो कि आत्म संयम की शिथिलता आ जाए और पाप पथ पर चले जायं।
शरीर के पापों में से समस्त दुष्कृत्य सम्मिलित हैं। जिन्हें रखने से ईश्वर के भव्य मन्दिर रूपी पार कराने वाले पवित्र मानव शरीर को भयंकर हानि पहुँचती है। कंचन तुल्य काया में ऐसे विचार उपस्थिति हो जाते हैं जिनसे जीवित अवस्था में ही मनुष्य नर्क की यन्त्रणायें प्राप्त करता है।
हिंसा प्रथम कायिक पाप है। आप सशक्त हैं, तो हिंसा द्वारा अशक्त पर अनुचित दबाव डालकर पाप करते हैं। मद् ईर्ष्या द्वेष आदि की उत्तेजना में आकर निर्बलों को दबाना, मारपीट या हत्या करना जीवन को गहन अवसाद से भर लेना। हिंसक की आत्मा मर जाती है। उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, उसकी मुख मुद्रा से क्रोध, घृणा, द्वेष की अग्नि निकला करती है।
चोरी करना कायिक पाप है। चोरी का अर्थ भी बड़ा व्यापक है। किसी के माल को हड़पना, डकैती, रिश्वत आदि तो स्थूल रूप में चोरी है ही, पूरा पैसा पाकर अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से न करना भी चोरी का ही एक रूप है। किसी को धन, या सहायता या वस्तु देने आश्वासन देकर, बाद में सहायता प्रदान न करना भी चोरी का एक रूप है। इसलिये ये कार्य अनिष्टकारी एवं त्याजनीय हैं।
व्यभिचार मानवता का सबसे निकृष्टतम कायिक पाप है। जो व्यक्ति व्यभिचार जैसे निंद्य-पाप-पंक में डूबते हैं, वे मानवता के लिए कलंक स्वरूप हैं। गन्दी कहानियाँ और दुर्घटनायें सुनने में आती रहती हैं। यह ऐसा पाप है, जिसमें प्रवृत्त होने से हमारी आत्मा को महान् दुःख होता है। मनुष्य आत्म उन्नति का रोगी बन जाता है, जिससे आत्मा तक की दुष्प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। पारिवारिक सुख, बाल बच्चों, पत्नि का पवित्र प्रेम, समृद्धि नष्ट हो जाती है। सर्वत्र एक काला अन्धकार मन वाणी और शरीर पर छा जाता है। परमपिता परमात्मा ने यह मनुष्य देह सुकार्य करने के लिए दी है। इसलिए इस जीवन में अच्छे कर्म ही करते रहना चाहिये जिनसे आत्मा का कल्याण हो। तथा साथ ही समाज का भी भला हो, जिससे सुख शान्ति का साम्राज्य स्थापित हो सके।
(देवी भागवत पुराण से)
एक समय की बात है कि पृथ्वी पर घोर अकाल पड़ा। अनावृष्टि के कारण सब ओर सूखा ही सूखा दिखाई पड़ने लगा। बड़े-बड़े सरोवर भी सूख गए। पशु-पक्षी सभी जल के लिए भटकने लगे। घरों में मनुष्यों की लाशें सड़ने लगी। नीचे से पृथ्वी का रस सूखा और ऊपर से सूर्य का ताप इतना बढ़ा कि अग्नि-वर्षा सी होने लगी।
यह बात सभी जानते थे कि महर्षि गौतम की तप-शक्ति बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। गौतम जी गायत्री के उपासक थे। संयम और दुर्भिक्ष होते हुए भी उनके आश्रम की भूमि में सुभिक्ष था। वहाँ जल की और अन्न की कोई कमी नहीं थी।
इस स्थिति में बहुत से ब्राह्मण एकत्र होकर महर्षि के आश्रम पर पहुँचे और कुशल-प्रश्न के अनन्तर उन्होंने अपना कष्ट कह सुनाया महर्षि ने उन्हें हर प्रकार सान्त्वना दी और उनसे वहीं रहने का अनुरोध किया।
गौतम महर्षि ने भगवती गायत्री से प्रार्थना की अम्बे मैं तुम्हें बारम्बार नमस्कार करता हूँ। तुम प्राणियों की विपत्तियों को दूर करने में समर्थ हो। इस घोर दुर्भिक्ष के समय में मैं भी प्राणियों की सेवा कर सकूँ, ऐसा बल दो। हे जगज्जननी, तुम ही इस घोर संकट से उद्धार करने वाली हो।
माता गायत्री ने कहा - महर्षि मैं तुम्हें यह अक्षय पात्र देती हूँ। वृक्ष के समान यह पात्र तुम्हारी इच्छित वस्तुओं से सदापूर्ण रहेगा।
वही हुआ। अक्षय पात्र के द्वारा अन्न, वस्त्र, आभूषण, धन-धान्य सभी के ढेर लग गए। ब्राह्मणों की पत्नियाँ श्रेष्ठ वस्त्रालंकार में देवांगनाएं जैसी लगने लगीं। महर्षि जब जिस वस्तु की इच्छा करते, तभी उस वस्तु को अक्षय पात्र पूर्ण कर देता। उस समय वह आश्रम चारों ओर सौ-सौ योजन बढ़ गया था और वहाँ की शोभा इन्द्रपुरी की शोभा से भी बढ़ी चढ़ी थी।
उस गौतम-नगरी में यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म विधिवत होते थे। देवगण भी यज्ञ भाग पाते हुए प्रसन्न थे। गौतम का यश सर्वत्र छा गया था। देवराज इन्द्र ने भी अपनी सभा में इनकी अत्यंत प्रशंसा की। भगवती गायत्री के अनुग्रह से वे बारह वर्षों तक सब परिवारों का भरण-पोषण करते रहे।
महर्षि गौतम की प्रशंसा सर्वत्र फैल गई। उन्होंने प्राणी-मात्र के कल्याण करने की जो प्रार्थना भगवती गायत्री से की थी, उसके फल-स्वरूप जल सृष्टि और धन-धान्यादि की उत्पत्ति होने लगी। सूर्य का ताप अपनी विकरालता छोड़कर पूर्व मान पर आ गया। इससे उत्पन्न हुए उत्कर्ष को कुछ ईर्ष्यालु व्यक्ति सहन न कर सके। उन्होंने माया की एक गौ निर्मित की, जिसका देह जीर्ण-शीर्ण था। उनकी प्रेरणा से वह गौ महर्षि के आश्रम के सामने जाकर मर गई। तब उन दुष्टों ने उसकी हत्या का आरोप महर्षि पर लगाने की चेष्टा की।
महर्षि को इस कार्य से अत्यंत क्षोभ हुआ। वे नेत्र मूँद कर समाधि में लीन हो गए। तब उन्हें इस चाल का पता लग गया। समाधि भंग होने पर महर्षि ने उन्हें शाप दिया- ‘मूर्खों! तुम अपने कर्म का फल भोगो और वेदादि कर्मों से विमुख, अधम गति प्राप्त करो।’
शाप के कारण उन ईर्ष्यालु व्यक्तियों का सभी ज्ञान लुप्त हो गया, उन्होंने जो कुछ अध्ययन आदि किया था, उस सबको ही वे भूल गए, उनका सम्मान नष्ट हो गया। समाज में उनकी पूछ न रही। सभी मनुष्य उनसे घृणा करने लगे।
अब उन्हें अपने दुष्कर्म पर पश्चाताप होने लगा। वे उस स्थिति से मुक्त होने का उपाय सोचने लगे। जब कोई यत्न न सूझा तब वे झिझकते हुए, सिर झुकाए हुए महर्षि के पास पहुँचे और उनके चरण पकड़कर क्षमा याचना करने लगे। उन्होंने कहा- ‘महर्षि! हमसे भीषण अपराध बन पड़ा है। परंतु आज उदार मन वाले हैं, हमारे दुष्कर्म को क्षमा कर दीजिए। हे ऋषि श्रेष्ठ! हम पर प्रसन्न हो जाइये। हमारे अपराध को भूल जाइये।’
उनका रुदन सुनकर गौतम का हृदय भी भर उठा। वे बोले ‘भगवती गायत्री की उपासना से तुम्हारा कल्याण संभव है। अतः एकाग्र मन से उन्हीं का जप करो।’
उन्हें विदा करने के पश्चात् महर्षि ने सोचा- ‘इन बेचारों का कोई दोष नहीं था। यह सब प्रारब्ध का ही खेल है। भगवती गायत्री इनका कल्याण करे।’ यह कहकर वे पुनः भगवती की उपासना में लग गए।
भक्ति विभोर गौतम को पुनः भगवती के दर्शन हुए। उन्होंने माता की स्तुति की और निवेदन किया कि - ‘हे अम्बे! संसार में पुनः समृद्धि छा गई है। सभी प्राणी आपकी कृपा से सुखी हैं। सर्वत्र सुभिक्ष और महान ऐश्वर्य दृष्टिगोचर हो रहा है। सभी पीड़ित जन अपने-अपने घरों को जा चुके हैं। अब आपका यह अक्षय-पात्र मेरे किस काम आवेगा?’
माता ने गौतम के शिर पर स्नेह पूर्वक हाथ फेरा और बोली ‘गौतम! मेरी दी हुई सिद्धि तुम्हारे पास रहे। यह कभी न कभी तुम्हारे काम आवेगी।’
गौतम बोले- ‘मातेश्वरी! तुम्हारी यह सिद्धि अब मुझे नहीं चाहिए। जब तक यह परमार्थ में लगी रही, तब तक तो उपयोगी थी, परंतु अब मुझे यह भार रूप लग रही है। इसके कारण मेरी बुद्धि कुँठित होने लगी है। इसके पास रहने से प्रमाद और ईर्ष्या की उत्पत्ति संभव है।’
माता ने महर्षि का हृदयगत भाव समझ लिया। वे बोली- ‘जैसी तुम्हारी इच्छा है, वही होगा।’
यह कहकर माता गायत्री अंतर्ध्यान हो गई। महर्षि की इच्छानुसार अक्षयपात्र की शक्ति समाप्त हो गई। जिस आश्रम में इन्द्रपुरी जैसी शोभा विराजमान थी, वह आश्रम अब नीरव और निताँत शान्त हो गया था।
अब महर्षि का मन भी शान्त था। वे पुनः भगवती की उपासना में लीन हो गए।
जो मनुष्य दूसरे के ऐश्वर्य को नहीं सह सकता, जिसकी बुद्धि कलुषित है, जो परधन हरण करता है, जो प्राणियों की हिंसा करता है, जो झूठ बोलता है, जो कठोर वचन कहता है और जिसका मन निर्मल नहीं है, उसके हृदय में भगवान् निवास नहीं करते।
*****
इन्द्रियाँ ही मनुष्य की शत्रु हैं। आशा मिट जाने पर यह पृथ्वी ही स्वर्ग है। विषयों में प्रेम ही बन्धन है। सदा सन्तुष्ट ही बड़ा धनी है। मन को जय करने वाला ही संसार में विजयी है।
*****
दूसरों की उन्नति करने में स्वाभाविक ही तुम्हारी भी उन्नति हुआ करती है। दूसरों की भलाई करने में तुम अपने अहंकार और लौकिक हित को जितना ही भूलोगे, उतना ही उसका परिणाम अधिक शुभ होगा।
(पं. तुलसीरामजी, वृन्दावन)
आचार्य श्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः।
नार्त्ते नाप्यव मन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषतः॥
(मनु. 2। 225)
आचार्य, पिता, माता और बड़ा भाई-दुखी मनुष्य भी इनका अपमान न करे विशेषकर ब्राह्मण तो कभी अपमान न करे।
यं माता पितरौ कलेशं सहेते संभवे नृणम्।
नतस्य निष्कृतिः शाक्या कर्त्तुं वर्ष शतैरपि॥127॥
मनुष्य की उत्पत्ति में जो दुख पिता माता सहते हैं उसका बदला सौ वर्ष में भी चुकाया नहीं जा सकता।
तयो र्नित्यं प्रियं कुर्या दाचार्यस्य च सर्वदा।
तेष्चेव त्रिषु तुष्टेषुतपः सर्वं समाप्यते॥228॥
नित्य उन दोनों (मात-पिता) का और सदा आचार्य का प्रिय कार्य करें। इन तीनों के प्रसन्न होने पर सब तप पूरा हो जाता है।
तेषाँ त्रयाणाँ शुश्रूषा परमं तप उच्यते।
नतैरभ्यननु ज्ञातो धर्म मन्यं समाचरेत्॥229॥
इन तीनों की (माता पिता आचार्य)सेवा ही बड़ा भारी तप कहा गया है इनकी आज्ञा बिना पुत्र व शिष्य अन्य धर्म को न करे।
सर्वे तस्या हता धर्मा यस्यै ते त्रय आदृताः।
अनाहतास्यु यस्यै ते सर्वास्तस्या फलाः क्रियाः॥234॥
जिसने इन तीनों का आदर किया उसने सब धर्मों का आदर किया और जिसने इनका अनादर किया उसके सब काम व्यर्थ हो जाते हैं।
या वत् त्रयस्ते जी वे युस्तावन्नान्यं समाचरेत्।
तेष्येव नित्यं शुश्रूषाँ कुर्यात् प्रिय हितेरतः॥235॥
जब तक ये तीनों जीयें तब तक दूसरा धर्म न करे। उन्हीं की प्रसन्नता और हित चाहता हुआ नित्य उनकी (माता पिता आचार्य) ही सेवा करे।
लोगों को ऊपर के वचनों पर ध्यान देना चाहिये।
त्रिस्वेते ष्विति कृत्यं हि पुरुष स्य समाप्यते।
एष धर्मः परः साक्षाद्र प धर्मोऽन्य उच्यते॥237॥
इन तीनों की सेवा से पुरुष का सब कर्म सफल होता है इनकी सेवा ही परम धर्म है अन्य सब उपधर्म हैं।
वृद्धौ च माता पितरौ साध्वी भार्या सुतः शिशुः।
अप्य कार्य शतं कृत्वा भत्तव्या मनुश्व्रवीत्॥
(कृत्यकल्पतरु-गार्हिस्थ्यकाण्ड)
वृद्ध माता-पिता, पतिव्रता स्त्री छोटी अवस्था का पुत्र इनका पालन अनुचित कार्य करके भी करना चाहिए।
पुत्र दारम प्रति विधाय प्रव्रजतः पूर्वः साहसदण्डः॥36॥
स्त्रिय च प्रव्रा जयतः॥37॥
लुप्तव्यवायः प्रव्रजेदापुच्छय धर्म स्थान्॥38॥
अन्यथा नियभ्येत॥39॥
(कौटलीय अर्थशास्त्र, अध्यज्ञ प्रचार 2।1)
पुत्र और स्त्रियों के जीवन निर्वाह का प्रबन्ध न करके यदि कोई पुरुष संन्यासी होना चाहे तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ॥36॥ इसी प्रकार पुरुष अपने साथ स्त्री को भी संन्यासी बन जाने के लिये प्रेरणा करे उसे भी प्रथम साहस दण्ड दिया जावे ॥37॥ जब पुरुष की मैथुन शक्ति सर्वथा नष्ट हो जाए उस समय धर्मस्थ (धर्मशास्त्र के अनुसार व्यवहार पदों का निर्णय करने वाले) अधिकारी पुरुषों की अनुमति लेकर तभी वह संन्यासी होवें ॥38॥ यदि कोई पुरुष इस नियम का उल्लंघन करे तो उसे पकड़कर कारागार में बन्द कर दिया जाय॥39॥
कुछ महानुभाव युवावस्था में अपने नादान बच्चे, जवान स्त्री, निर्धन वृद्ध माता पिता के जीवन निर्वाह का प्रबन्ध न कर संन्यासी हो जाते हैं और उन महानुभावों को भी जो उनको प्रोत्साहन देते हैं उक्त शास्त्राज्ञा पर विचार करना चाहिए।
कुल चार दिनों का जीवन था,
दो काट चुके दो कटने हैं,
दो दिन के बाकी जीवन में
संसार दिखायेगा क्या-क्या?
खुद जान बूझ कर ही जिसने
काँटों में पैर बढ़ाया हो,
उसको काँटों से बचने की
तरकीब बतायेगा क्या-क्या?
अनुमान लगाने बैठूँ तो
सचमुच सिर चकरा जायेगा,
मैं ने थोड़े से जीवन में
खोया क्या-क्या, पाया क्या-क्या?
सब भले-बुरे की परिभाषा
ही बदल जायगी क्षण भर में,
यदि तुम्हें बताने बैठूँ मैं
देखा है भला-बुरा क्या-क्या?
हर चीज मुझे जब हासिल थी,
मिलता था मगर एक तू ही नहीं,
क्या तुझको बताऊँ तेरे बिना
इस दिल का तमाशा था क्या-क्या?
मैं तो पहचान नहीं पाया,
तू ही जाने तेरी माया,
जीवन के इन व्यापारों में
मेरा क्या-क्या तेरा क्या-क्या?
-यादराम शर्मा रजेश
*समाप्त*