नहीं रह जाता। इसलिए ऐसे व्यक्ति ढूंढ़ना जिनमें रत्ती भर भी कोई दोष न हो एक प्रकार से असंभव ही है। प्रत्येक में कुछ न कुछ बुराई मिलेगी, चाहे वह मात्रा में स्वल्प या महत्व में कम ही क्यों न हो।
यही बात सुखदायक परिस्थितियों के बारे में भी समझनी चाहिये। सदा किसी को अनुकूल ही अनुकूल अवसर मिलते रहें, प्रिय व्यक्ति, प्रिय आदर्श और प्रिय परिस्थितियाँ ही सदैव बनी रहें, यह आशा करना भी दुराशा मात्र ही है। जब हम सदा शुभ ही शुभ विचार और कार्य नहीं करते, जब हमारे मन से दुर्भाव और शरीर से दुष्कर्म होते रहते ही हैं तो उनके फलस्वरूप कष्ट, हानि, विछोह, शोक एवं विपत्ति भोगनी ही पड़ेगी। शुभ और अशुभ कर्मों का फल भोगना निश्चित है। जो हमने किया है उसका भोग मिलना ही ठहरा। जब शुभ कर्मों के सुखद फल हम भोगते हैं तो अशुभ कर्मों के दुखद दुष्परिणामों को भोगने के लिये भी हमें ही तैयार रहना होगा।
संसार में सज्जनता की तथा आनंददायक परिस्थितियों की कमी नहीं है पर यह भी मान लेना चाहिए कि दुष्टता और विपत्ति भी साथ ही पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। हमें दोनों से ही निपटना होगा। केवल श्रेष्ठता, सुन्दरता, भलाई और आनन्द की ही हम इस दुनिया में आशा करें और नीचता, कुरूपता, बुराई और दुःख से सर्वथा बचे रहना चाहें तो यह इच्छा कदापि, पूर्ण न हो सकेगी। हमें अपनी मनोभूमि को दुःखों के सहने और बुराइयों से निपटने के लिये भी उसी तरह सुनिश्चित करना पड़ेगा, सधाना पड़ेगा, जिस प्रकार वह सुखों के लिए सज्जनता से सान्निध्य के लिये खुशी-खुशी तैयार रहती है। धूप और छाँह की भाँति, रात और दिन की शाँति प्रिय ओर अप्रिय दोनों ही प्रकार के संयोग हमारे जीवन में आते रहने वाले हैं। इन दोनों की ही सम्भावना सुनिश्चित है। फिर हम एक के लिये, सुख के लिये, प्रिय के लिये तो हँसें उछलें और दूसरे के लिए, दुख के लिये, अप्रिय के लिये खिन्न हों, खेद मानें तो इसमें कोई बुद्धिमत्ता न होगी। इसे हमारा मानसिक बचपन ही कहा जाएगा। बच्चे जिस तरह जरा सी बात में रोने लगते हैं, रूठते और मचलते हैं, उसी प्रकार का आचरण हमारा भी हो तो इसे समझदारी नहीं कहा जाएगा।
यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि तीन गुणों से बने हुए इस संसार में जहाँ सतोगुण और रजोगुण का अपना-2 स्थान है वहाँ तमोगुण भी रहेगा ही। दुनिया में से उसे पूर्णतया हटाना या मिटाना सम्भव नहीं। इतना मान लेने के बाद अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि उनके दुष्प्रभावों से अपने को बचाने के लिए हमें क्या करना चाहिए? इस प्रश्न को यदि ठीक तरह हल कर लिया जाए तो हमारे जीवन की आधे से अधिक परेशानियाँ हल हो सकती हैं।
यह ध्यान में रखने की बात है कि दुनिया में जो काँटे-कंकड़ फैले हुए हैं उन्हें बीन कर अपने सभी यात्रा के मार्गों को हम निरापद बनाने का प्रयत्न करें तो इसमें सफलता मिल सकना कठिन है क्योंकि काँटे, कंकड़ों की संख्या अधिक है। विभिन्न रास्ते जिन पर हमें समय-समय पर चलना पड़ता है उनकी लम्बाई भी हजारों मील बैठती है। काँटे बीनने के लिए हम खड़े भी हों तो जीवन की अवधि भी इतनी लम्बी नहीं है कि जब तक सब काँटे बीने जा सकते हों तब तक जीवित रहें, फिर यदि जीवित भी रहें तो इसका भी कोई निश्चय नहीं कि जब तक यह बीने जाने की प्रक्रिया पूर्ण होगी, तब तक फिर और नये काँटे उस मार्ग पर न बिखर जाएंगे। इन परिस्थितियों में यही उचित प्रतीत होता है कि काँटे बीनने की प्रक्रिया को सीमित करके हम अपने पैरों में जूते पहनने का उपाय पसंद करें। यह अपेक्षाकृत सरल और सीधा उपाय है। थोड़ा पैसा और थोड़ा प्रयत्न करके ही हम अच्छे जूते पहन सकते हैं और फिर चाहे किसी मार्ग पर कितने ही काँटे-कंकड़ क्यों न बिखरे पड़ें हों, निर्भय होकर चले जा सकते हैं। जूतों के तले उन काँटे कंकड़ों का मुँह कुचलते चलेंगे और हमारे पैरों को तनिक भी आघात न पहुँचने देंगे।
संसार के हर दुर्जन को सज्जन बनाने की, हर बुराई को भलाई में बदल जाने की आशा करना वैसी ही आशा है जैसी सब रास्तों पर से काँटे-कंकड़ हट जाने की। अपनी प्रसन्नता और संतुष्टि का, यदि हमने इसी आशा को आधार बनाया हो, तो निराशा ही हाथ लगेगी। हाँ यदि हम अपने स्वभाव एवं दृष्टिकोण को बदल लें तो यह कार्य जूता पहनने के समान सरल होगा और इस माध्यम से हम अपनी परेशानी को बहुत अंशों में हल कर सकेंगे।
अपने स्वभाव और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकना कुछ श्रमसाध्य, समयसाध्य और निष्ठासाध्य अवश्य है, पर असम्भव तो किसी भी प्रकार नहीं है। मनुष्य चाहे तो विवेक के आधार पर अपने मन को समझा सकता है, विचारों को बदल सकता है और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकता है। इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जिनसे प्रकट है कि आरम्भ से बहुत हल्के और ओछे दृष्टिकोण के आदमी अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करके संसार के श्रेष्ठ महापुरुष बने हैं। इसी प्रकार ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जिनके विचार जब तक ऊँचे रहे तब तक प्रतिष्ठा के उच्च आसन पर अवस्थित रहे पर जब उनका अन्तःकरण कलुषित हो गया, विचार घटिया हो गये, तो उनका जीवनक्रम भी पतनोन्मुख हो गया और वे अधोगति को प्राप्त हुए। सामाजिक नैतिक, धार्मिक और राजनैतिक विचारों में अनेकों बार परिवर्तन करने पड़ते हैं, इसी प्रकार यदि मनुष्य चाहे तो विभिन्न समस्याओं पर विचार करने के अपने तरीके को, सोचने के ढंग को भी बदल सकता है। अपनी विचार शैली की त्रुटियों को समझ सकना और इनके सुधार में संलग्न होना यद्यपि बहुत बुद्धिमत्ता और उच्च साइंस का काम है, वह कठिन भी है, लेकिन असम्भव नहीं माना जा सकता।
यह दुरंगी दुनिया जैसी भी कुछ है, परमेश्वर की बनाई हुई है। इससे विचित्रताएं रहेंगी ही, इनसे खीझने, झुँझलाने और परेशान होने से काम न चलेगा वरन् एक ऐसा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा जिसके अनुसार जैसे भी कुछ यहाँ के लोग हैं, जैसी भी कुछ यहाँ की परिस्थितियाँ हैं उनके साथ अपना ताल मेल बिठा सकें, काम चलाऊ समझौता कर सकें और जीवन की गाड़ी को किसी प्रकार लुढ़काते हुए समय को पूरा कर लें।
हम अपनी मनमर्जी का अपने सब निकटवर्ती लोगों को, स्वजन सम्बन्धियों को, स्त्री पुत्रों को, देखना चाहें तो यह उचित न होगा। जितना संभव हो, उतना उन्हें झुकाने, समझाने और अपनी मनमर्जी का बनाने का प्रयत्न करना चाहिए परन्तु यह आशा कभी न रखनी चाहिए कि जैसा हम चाहते हैं पूर्णतः वे वैसा ही बन जावेंगे। क्योंकि हर व्यक्ति एक स्वतन्त्र धातु का बना हुआ है। जिस प्रकार वृक्षों की पत्तियाँ एक सी लगाने पर भी हर पत्ती एक दूसरे से भिन्नता लिए हुए होती है, उसी प्रकार हर मनुष्य अपनी कुछ खास रुचि, अभिलाषा, प्रकृति एवं प्रतिभा को लेकर बना है। हजारों जन्मों के, हजारों योनियों के विविध प्रकार के कार्यों और घटनाक्रम के आधार पर उसका यह वर्तमान जीवन बना है। कोई जीव इससे पिछले जन्म में विषधर सर्प था, उसे दूसरे को काटने और क्रोध से फुफकारते रहने की आदत थी, अब वह इस जन्म में मनुष्य हो गया तो उस पिछले जन्म के क्रोधी और आक्रमण संस्कारों का एक ही जन्म में पूर्ण समाधान हो सकना कठिन है। कितना ही वह बेचारा अपने में सुधार करे तो भी वे पिछले दुर्गुण किन्हीं अंशों में बने ही रहेंगे। वह भी मजबूर है। इतनी तेज प्रगति कर सकना उसके लिए भी कठिन है कि बरस छह महीने में ही उन पुरानी सब आदतों को भुला दे और वैसे संस्कार धारण कर ले, जैसे कितने ही जन्म मनुष्य शरीर में व्यतीत करने के बाद उत्पन्न होते हैं। इन परिस्थितियों में उस सर्प से मनुष्य में आने वाले अपने किसी स्वजन सम्बन्धी से असंतुष्ट रहना, उसकी आदतें हमारी इच्छानुसार न बदल सकने पर दुखी रहना हमारे लिए उचित नहीं है।
दूसरों की परिस्थितियों और मजबूरियों पर हमें वैसी ही सहानुभूति के साथ विचार करना होगा जैसी कि बच्चों की, रोगियों की स्थिति का ध्यान रखते हुए उनकी अशिष्टताओं और असमर्थताओं को उदारतापूर्वक सहन किया जाता है। हमारे निकटवर्ती सज्जन सम्बन्धी हमारी आज्ञा या इच्छानुसार पूर्णतया नहीं चलते तो हमें बड़ा क्रोध आता है और असंतोष भी होता है, क्योंकि हम यह मानते हैं कि जिस प्रकार अपने पालतू पशुओं को, कहने के अनुसार काम करने, जैसा चाहें उसी तरह रहने के लिए मजबूर किया जा सकता है, वही बात अपने स्वजनों सम्बन्धियों पर, स्त्री पुरुषों पर भी लागू होनी चाहिए। उन्हें भी वैसा ही आज्ञानुवर्ती होना चाहिए। यहीं हम भूल करते हैं। पशुओं पर जैसा अपना स्वामित्व होता है वैसा मनुष्यों पर नहीं है। जिस तरह पशु अपनी सम्पत्ति है और सब प्रकार हमारे आधीन है, वह स्थिति स्त्री, पुत्रों की, भाई भतीजों की नहीं है। किसी मनुष्य का किसी दूसरे पर चाहे वह स्त्री या सन्तान ही क्यों न हो, पशुओं जैसा अधिकार नहीं है और न हम उनके स्वामी ही हैं।
प्रत्येक मनुष्य एक दूसरे के साथ एक कर्तव्य सूत्र में बँधा हुआ है। उसकी मर्यादा इतनी ही है कि अपने आश्रितों, परिजनों, स्वजनों या संबंधित व्यक्तियों का उचित मार्गदर्शन करे। उनकी मनोभूमि को सुसंस्कृत बनाने के लिए आवश्यक दीक्षा का, स्वाध्याय सत्संग का तथा अनुभव एकत्रित करने का अवसर दे जिससे उनका ज्ञान एवं विवेक स्वतः इतना विकसित हो जाए कि वे लाभ हानि, बुराई भलाई, उचित अनुचित, कर्तव्य अकर्तव्य का अंतर स्वतः समझ सकें और जिस मार्ग पर हम चलना चाहते हैं उस पर वे अपने विकसित विवेक के आधार पर स्वतः चल सकें।
ज्ञान अनुभव और संस्कार एकत्रित करने के लिए समुचित अवसर यदि हम अपने आश्रितों एवं सम्बन्धियों के लिए जुटा सकें तो उनके बहुत कुछ उसी ढाँचे में ढल जाने की आशा है जैसा कि हम चाहते हैं। ऐसा न करके केवल आदर्श मात्र देने से संभव है उनकी अविकसित मनोभूमि हमारी शिक्षा को ठीक तरह हृदयंगम न कर सके और वे आज्ञानुवर्ती न बन सकें। ऐसी दशा में झुंझलाने या रुष्ट होने की कोई बात नहीं है। हमें अपना कर्तव्य पालन करते रहने का अधिकार है। उन्हें समझाने बुझाने, आगा पीछा सुझाने का कोई अवसर नहीं चूकना चाहिए, किंतु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर किसी का, यहाँ तक कि एक छोटे बच्चे तक का भी, एक व्यक्तित्व और स्वाभिमान होता है। जो कुछ कहना या समझना हो वह इस प्रकार होना चाहिए कि उसके सम्मान और स्वाभिमान को चोट न पहुँचे। हमारी वाणी में कटुता, क्रोध, अधिकार, अहंकार एवं आवेश नहीं होना चाहिए। एक चतुर वकील किसी न्यायाधीश को जिस धैर्य और शान्त मुद्रा में अपने पक्ष को दलीलों और प्रमाणों के साथ समझाता है हमारे समझाने का तरीका भी वैसा ही होना चाहिए। इसी से दूसरों को हमारी बात सुनने और समझने की इच्छा होती है। यदि क्रोध और आवेश के साथ कहा जा रहा है तो फिर वह कितना ही उचित या सत्य क्यों न हो सामने वाला उसे हृदयंगम न करेगा वरन् क्रोध की प्रक्रिया में उसे भी क्रोध उत्पन्न होने लगेगा और वह अच्छी बात का भी विरोध करने लगेगा। अपनी गलती मानना तो दूर उलटे अपनी बात की पुष्टि एवं आवश्यकता सिद्ध करने लगेगा।
यदि हमने अपना स्वभाव नहीं सुधारा है, यदि हमें दूसरों को समझाने या सुधारने के लिए आवश्यक मधुरता, आत्मीयता एवं धैर्य उपलब्ध नहीं है, तो यहाँ मानना पड़ेगा कि हम समझाने के अयोग्य हैं और किसी को भूले रास्ते से लौटा कर सीधे रास्ते पर लाने से सर्वथा असमर्थ रहेंगे, उलटे वैर विरोध बढ़ा लेंगे। माना कि दूसरों को समझाने और सुधारने की आवश्यकता है, पर उससे भी पहली आवश्यकता यह है कि इस आवश्यक कार्य को करने से पूर्व अपने आपको समझाने और सुधारने का प्रयत्न करें, अपने में नम्रता, मधुरता, शिष्टाचार, स्नेह, सौजन्य, धैर्य को इतनी पर्याप्त मात्रा में भर लें कि सामने वाले को प्रभावित कर सकना हमारे लिये सम्भव और सुगम हो सके। झगड़ालू, जिद्दी वकील जिस प्रकार उचले शब्दों का प्रयोग करके घटिया दर्जे की बहस करता है और न्यायाधीश को क्रुद्ध करके अपने पक्ष को ही खराब कर लेता है उसी प्रकार दुर्भावना, व्यंग, लाँछन से भरे हुए शब्दों में सामने वालों की नीयत पर हमला करते हुए, उसे मूर्ख साबित करते हुए यदि कुछ कहा सुना या समझाया बुझाया गया है तो निश्चय ही उसका परिणाम कुछ भी संतोषजनक न होगा।
दूसरों के सुधारने से पूर्व हमें अपने को सुधारना पड़ेगा और यह समझना पड़ेगा कि लाठी के बल पर किसी को कुछ देर के लिये चुप या विवश किया जा सकता है पर उसे बदला या सुधारा नहीं जा सकता। जब तक विवशता रहेगी तब तक वह चुप रहेगा पर अवसर मिलते ही वह दूने वेग से उलटा आचरण करके अपने अपमान का बदला चुकायेगा। जो पति अपनी पत्नियों पर या जो पिता अपनी सन्तान पर बहुत कड़ाई बरतते हैं, उन्हें मारते-पीटते, अपमानित करते या सताते हैं उन्हें उसका बदला उस समय मिलता है जब वे बुड्ढे हो जाते हैं या अन्य असमर्थताओं के कारण उनके हाथ में कुछ शक्ति नहीं रहती। इन दिनों उनको घर-वाले तरह-तरह से तिरस्कृत करते ओर सेवा-सहायता से जी चुराते हैं। ऐसी विषम अवस्था उनकी नहीं होती जिन्होंने युवावस्था में अपने स्वजनों के साथ स्नेह, उदारता एवं सम्मान का व्यवहार किया होता है। यह संसार कुएं की आवाज की तरह है, जैसा हम बोलते हैं वैसी ही प्रतिध्वनि लौट कर आती है। इसलिये यदि हमें अपने प्रति दूसरों का व्यवहार सज्जनता का देखने की इच्छा हो तो पहले हमें अपने को इस योग्य सिद्ध करना होगा कि हम उसके वस्तुतः अधिकारी हैं।
तीनों गुणों से भरी हुई परिस्थितियों तथा व्यक्तियों वाली इस दुनिया में हम अपने लिये केवल अच्छाई ही उपलब्ध करें, बुराइयों और विपत्तियों से बच कर सीधा शान्तिमय जीवन व्यतीत करें तो बाहर की हर प्रतिकूल परिस्थिति पर खीजने ओर झुँझलाने की आदत हमें छोड़नी पड़ेगी, अपने अन्दर सहिष्णुता का, सहनशीलता का, भूलने और क्षमा करने का गुण अधिकाधिक मात्रा में एकत्रित करना पड़ेगा। अपना सुधार यदि हम नहीं कर पाते, अपने में अनुदारता अहंकार उत्तेजना और दोष भरे हुए हैं तो सामने वालों को अपने अनुकूल बनाना तो दूर उल्टे जिस प्रकार दर्पण में अपना चेहरा दीखता है, उसी प्रकार सामने वाले भी अपने ही दुर्गुणों की छाया से आच्छादित, अपेक्षाकृत और भी अधिक दुर्गुणी दीखेंगे।
सन्त समागम हरिकथा, तुलसी दुर्लभ होय।
दारा सुत अरु लक्ष्मी, पापी के भी होय॥
बहुत गई थोरी रही, नारायण अब चेत।
काल चिरैया चुग रही, निसि दिन आयू खेत॥
धन जोबन यों जायगो, या विधि उड़त कपूर।
नारायण गोपाल भज, क्यों चाटै जग धूर॥
नारायण संसार में, भूपत्ति भये अनेक।
मैं मेरी करते रहे, लै न गए तृन एक॥
तेरे भावैं जो करौ, भलौ बुरौ संसार।
नारायण तू बैठिकै, अपनौ भवन बुहार॥
नारायण सत्संग कर, सीख भजन की रीत।
काम क्रोध मद लोभ में, गई आर्बल बीत॥
धन विद्या गुण आयु बल, ये न बड़प्पन देत।
नारायण सोइ बड़ो, जाकों हरिसों हेत॥
नारायण हरि भजन में, तू जनि देर लगाय।
का जाने या देर में, श्वासा रहै कि जाय॥
(क्रमशः-2)
आग्नेयी
गायत्री को अग्नि स्वरूपा कहा गया है। अग्निहोत्र-यज्ञ के द्वारा वह प्रतिष्ठित पूजित एवं परितुष्ट होती है। जिसके अन्तरात्मा में प्रवेश करती है उसे समुचित उष्णता, प्रतिभा, स्फूर्ति, तेजस्विता प्रदान करती है। जैसे अग्नि में पड़ने वाली प्रत्येक वस्तु उसी के जैसे गुण और रूप की बन जाती है, उसी प्रकार गायत्री रूप अग्नि में प्रवेश करने वाला साधक भी उस आदि शक्ति की विशेषताओं से भर जाता है। अग्नि जैसे कूड़े करकट को जला देती है वैसे ही साधक के मल आवरणों को, पाप तापों को, कुविचार कुसंस्कारों को गायत्री रूपी अग्नि भी जला डालती है। अग्नि प्रकाशवान है, साधक के अन्तःकरण में भी अज्ञानान्धकार को समाप्त करने वाला प्रकाश उत्पन्न होता है। ताँत्रिक विधान के अनुसार गायत्री मंत्र से अभिचारात्मक ‘आग्नेयास्त्र’ भी बन सकता है, जो प्रचण्ड गोला बारूद के ढेर से भी अधिक दाहक एवं नाशक शक्ति से भरपूर होता है।
आसन स्थिता
एक स्थान पर निष्ठा पूर्वक बैठने को, मन को जगह-जगह न हिला-डुला कर एक ही लक्ष्य पर चित्त केन्द्रित करने को आसन कहते हैं। गायत्री शक्ति का अवतरण उन्हीं मनः क्षेत्रों में होना संभव है जो साँसारिक कामनाओं और मानसिक उद्वेगों एवं आवेशों से चंचल नहीं रहते वरन् शान्ति, स्थिरता, निष्ठा, सन्तोष और प्रसन्नता को धारण कर एकाग्रतापूर्वक आत्मोन्नति की दिशा में प्रयत्नशील रहते हैं। गायत्री आसनस्थिता इसलिए कही गई है कि उसका अनुग्रह चंचल अस्थिर मति के लोगों को नहीं वरन् उन लोगों को प्राप्त होता है जो स्थान, भवना लक्ष्य और आकाँक्षा के दृष्टि से स्थिर है एवं दीर्घकाल तक धैर्य के साथ प्रेम पूर्वक साधना संलग्न रहते हैं।
अंतर ध्वान्ति नाशिनी
संसार के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक क्षेत्रों में अनेक ध्वान्तियाँ और भ्राँतियाँ फैली हुई हैं। इसके कारण आये दिन नानाविधि अनाचार और संघर्ष होते रहे हैं। इन्हीं के कारण लोग दिग्भ्रान्त होकर अपने लिए हितकर सरल मार्ग को भूल जाते हैं और उलटी दिशा में चल कर उत्थान के स्थान पर पतन का और सुख के स्थान पर दुख का वरण करते हैं। जैसे संसार में अनेक ध्वान्तियाँ और भ्रान्तियाँ है वैसे ही मनुष्य के अंतःकरण में भी जीवनोद्देश्य के संबंध में भारी अंधकार एवं भ्रम भरा होता है। लोग न तो जीवन के सही लक्ष्य को समझ पाते हैं और न उसको प्राप्त करने में संलग्न होते हैं। इस आन्तरिक विपन्नता को गायत्री दूर करती है। अन्धकार को हटा कर प्रकाश उत्पन्न करना तथा उलझनों को सही रूप से सुलझाना गायत्री शक्ति का प्रधान कार्य है।
इष्टदा
इष्टदा अर्थात् अभीष्ट वस्तुओं को प्रदान करने वाली। कामनाओं और उनकी पूर्ति के बीच में जितना अन्तर है उतना ही दुःख इस मनुष्य जीवन में समझना चाहिये। जिसकी कामनाएँ तृप्त हैं उसे ही सुखी माना जा सकता है। आकाँक्षा और परिस्थिति का ताल मेल मिलता रहे, दोनों साथ साथ रहें तो सदा प्रसन्नता एवं आनन्द की दशा बनी रहेगी। इस स्थिति को जीवन में बनाये रखने में गायत्री बहुत ही सहायक होती है। जो कामनाएँ अपने प्रारब्ध, पराक्रम, योग्यता एवं परिस्थिति के अनुकूल हैं, उनकी पूर्ति के लिए साधन जुट जाते हैं और जो आकाँक्षाएँ अपनी सीमा और औकात से बाहर की हैं या शीघ्र ही पूर्ण होने वाली नहीं हैं तो उनके सम्बन्ध में सन्तोष उत्पन्न हो जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्नति के लिये प्रयत्न और पुरुषार्थ करने की प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है, वरन् यह है कि अपनी शक्ति कल्पना के महल खड़े करने और उनकी पूर्ति न होने पर दुखी होने में नष्ट करने की अपेक्षा वर्तमान से पूर्ण सन्तुष्ट और उत्तम भविष्य के लिए प्रयत्नशील रहने में हमारा मन लगता है। ऐसी मनोभूमि के लोग उन्नति भी करते हैं और सुखी तथा सन्तुष्ट भी रहते हैं। उनकी इष्ट कामना पूर्ण ही रहती है।
इन्दु रूपिणी
इन्दु रूपिणी-चन्द्रमा के समान रूप वाली। चन्द्रमा को शान्ति और शीतलता का, प्रेम और सौंदर्य का देवता माना गया है। इसकी ज्योत्स्ना भी इन्हीं गुणों वाली है। गायत्री में भी ऐसी ही विशेषताएँ हैं। जिस प्रकार शरद पूर्णिमा की चाँदनी सारी पृथ्वी पर अमृत छिड़क देती है। उसी प्रकार गायत्री की पुण्यमयी किरणों के लिए जिस साधक ने अपने अंतर्द्वार खोल दिए हैं उसमें भी सर्वत्र ऐसा ही अमृत छिड़का मिलता है। चन्द्र चकोर की प्रीति प्रसिद्ध है, आत्मा भी जिस प्रीति की प्यासी है वह दिव्य प्रेम धारा गायत्री के द्वारा ही उसे प्राप्त होती है। समस्त मन्त्र नक्षत्रों के बीच गायत्री चन्द्रमा के समान अपनी सर्वश्रेष्ठता के साथ सुशोभित है।
इषुसंधान करणी
इषु कहते हैं धनुष-बाण को। उसका सन्धान करने वाली गायत्री की चोट बड़े से बड़े धनुष बाण से भी अधिक होती है। जैसे लक्ष्य वेधी बाण अपने लक्ष्य पर अचूक निशाने की तरह लगते हैं और जिस पर चोट करते हैं उसे भूमिसात् बना देते हैं, इसी प्रकार गायत्री शक्ति का प्रयोग भी जिस लक्ष्य के लिये किया जाता है वह निष्फल नहीं जाता। लौकिक एवं पारलौकिक प्रयोजनों में जिन्होंने गायत्री का आधार ग्रहण किया है उन्हें कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ा।
प्राचीन काल में जो आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, पाशुपत अस्त्र, सम्मोहनास्त्र आदि अस्त्र-शस्त्र युद्धों में प्रयुक्त होते थे उनमें मन्त्र शक्ति का ही प्रधान आधार रहता था। ब्रह्मदण्ड-ब्रह्मास्त्र आदि अस्त्र युद्ध में तो नहीं वरन् ब्राह्मणत्व की, ब्रह्मयज्ञों की रक्षा के लिये काम आते थे, इन्हीं पर ब्रह्मतेज आधारित था। परशुराम के कन्धे पर जो फरसा रहता था, जिससे उन्होंने 21 बार समस्त संसार को दिग्विजय किया था, वह यही गायत्री शक्ति सम्भव ब्रह्मदण्ड था। गायत्री को इस प्रकार शस्त्रास्त्र के रूप में भी प्रयुक्त किया जा सकता है।
इड़ा पिंगल रूपिणी
ब्रह्मरंध्र से लेकर कुण्डलिनी तक, सहस्रार-कमल से लेकर मूलाधार तक ब्रह्मनाड़ी में होकर दो विद्युत शक्ति प्रवाह निरन्तर बहते रहते हैं। इसमें से एक ऋण (नेगेटिव) है दूसरी धन (पॉजिटिव) है। इन्हें सूर्य शक्ति और चन्द्र शक्ति भी कहते हैं। योग की भाषा में इनके नाम इड़ा और पिंगला हैं। यह दायें-बायें नासिका स्वरों के साथ प्रवाहित होती हैं। जैसे बिजली से चलने वाले सारे यन्त्र दो प्रकार के ठण्डे और गरम तारों के मिलन पर ही अपनी सक्रियता बनाये रखने में समर्थ होते हैं, उसी प्रकार मनुष्य का शारीरिक और मानसिक संस्थान भी इन दोनों इड़ा पिंगला नाड़ियों पर अवस्थित है। यह दोनों प्रवाह गायत्री के ही लोम विलोम रूप हैं। इसलिए उसे इड़ा रूपिणी कहा गया है।
ईश्वरी देवी
ईश्वर को यों भाषा की दृष्टि से पुल्लिंग माना जाता है, पर वस्तुतः वह लिंग भेद से बाहर है, उसे न नर कहा जा सकता है न नारी। विद्युत, वाष्प, अग्नि, सर्दी, गर्मी आदि को भाषा की दृष्टि से किसी लिंग में गिन लिया जाए पर उन्हें तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो नर-नारी की कसौटी पर कसकर किसी भी पक्ष का घोषित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे स्त्री-पुरुष दोनों के लक्षणों में रहते हैं। ईश्वर के संबंध में भी यही बात है। उसे भक्त अपनी भावना के अनुसार ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ माता, पिता जो चाहे सो कह सकता है। इस प्रकार ईश्वर को पुल्लिंग बोधक शब्द में सम्बोधन न करके यदि ईश्वरी इस स्त्रीलिंग सूचक शब्द से कहा जाए तो इससे कुछ भी दोष नहीं आता।
जिस प्रकार सूर्य और उसकी तेजस्विता एक ही वस्तु है, अलग लगने पर भी वस्तुतः एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं, इसी प्रकार ईश्वर की दिव्य शक्ति चेतना एवं सक्रियता जिसे गायत्री के नाम से पुकारते हैं किसी भी प्रकार भिन्न नहीं हैं। इसी से उसे ईश्वरी देवी कहते हैं।
उषा
जिस प्रकार प्रभात काल होने पर ब्रह्म मुहूर्त में पूर्व दिशा में उषा का उदय होता है-पौ फटती है-हलका-हलका लाल पीला प्रकाश फैलकर सूर्य के उदय होने की पूर्व सूचना देता है तथा प्राणिमात्र में जगने-उठने और चलने की प्रेरणा प्रदान करता है, उसी प्रकार मानव अन्तःकरणों में छाई हुई सघन अज्ञान अन्धकार की निशा को समाप्त करने के लिए गायत्री शक्ति उषा के रूप में उदय होती है। जिसके भीतर यह उदयन शुरू हुआ नहीं कि उसे अपने अन्दर परमात्मा की दिव्य किरणें काम करती हुई परिलक्षित होती हैं। आत्मकल्याण के लिए सजगतापूर्वक कटिबद्ध होने की किसी दैवी प्रेरणा का अनुभव उसे वैसे ही होता है जैसे उषा उदय होने पर चिड़ियों तक को अनुभव होता है और वे अनायास ही प्रभु का नाम लेकर चहचहाने लगती हैं एवं घोंसले की सीमा में बैठी न रहकर अनन्त आकाश में उड़ने का आनन्द लेने को कटिबद्ध हो जाती हैं। आध्यात्मिक उषा-गायत्री श्री-साधक के मनः स्तर में ऐसी ही ज्योति, प्रेरणा, स्फूर्ति तथा तत्परता उत्पन्न करती है।
उड्ड प्रभा
उड्डप्रभा-नक्षत्रों की रोशनी। तारागणों की रोशनी देखने में छोटी और तनिक सी मालूम देती है पर वैज्ञानिक यंत्रों से देखने पर पता चलता है कि वह जितनी मालूम होती है वस्तुतः उससे असंख्यों गुनी अधिक है। “अल्फा सैंटोरो” जो हमसे सबसे निकट तारा है, पृथ्वी से इतनी दूर है कि इसके प्रकाश को हम तक आने में 8 वर्ष लगते हैं जब कि प्रकाश एक सैकिण्ड में 1850000 मील चलता है। जो तारे हमें जरा से दीखते हैं उनमें से हजारों ऐसे हैं जो पृथ्वी तो बेचारी क्या चीज-सूर्य से भी हजारों गुने बड़े हैं जबकि हमारा सूर्य ही हमारी इस पृथ्वी से ढाई लाख गुना बड़ा है।
तात्पर्य यह है कि तारे तथा उनकी रोशनी दीखती जरूर नन्हें से हैं पर वस्तुतः वे इतने बड़े हैं कि उनके विस्तार की कल्पना मात्र से सिर चकराने लगता है। गायत्री के सम्बन्ध में भी यही बात है। उसे थोड़े से अक्षरों का एक जरा सा मन्त्र कहा जा सकता है पर वस्तुतः उसकी महत्ता हमारी कल्पना शक्ति की सामर्थ्य से बहुत अधिक बड़ी है।
ऊर्ध्व केशी
अर्थात् जिसके बाल ऊपर को हों। यहाँ बालों से मतलब उन बालों से नहीं है जो सिर पर दीखते हैं और जिन्हें काढ़ा सँभाला जाता है, वरन् मस्तिष्क से निकलने वाली उन किरणों से आशय है जो विचार-प्रवाह के सूक्ष्म विद्युत तरंगों के रूप में निकलती रहती हैं। गायत्री से प्रभावित मस्तिष्क सदा ही ऊर्ध्वगामी विचार करता है। ऊपर की ओर, उच्च उद्देश्यों की ओर उसकी गति रहती है, नीच, पतनकारी, अधोगामी प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है और वह प्रवाह कुमार्ग की ओर न जाकर सन्मार्ग की दिशा में ही प्रवाहित रहता है। गायत्री अपने साधक को ऊर्ध्वगामी बनाती है और वह उच्चता की ओर दिन-दिन बढ़ते हुए अन्ततः ऊर्ध्व लोकों को ही प्राप्त कर लेता है।
ऊर्ध्वाधोगति भेदिनी
आत्म विकास की दिशा में बढ़ता हुआ साधक प्रारम्भ में सतोगुण की ओर, स्वर्गीय आनन्दों की ओर बढ़ता है। पर जब उच्च भूमिका में पहुँचता है तो त्रिगुणातीत हो जाता है। उसकी स्थिति परमहंस गति में, स्थितप्रज्ञता में, निर्विकल्प समाधि में हो जाती है। अधोगति से तो वह पहले ही छूट चुका था, इस उच्च स्थिति पर पहुँच कर वह सतोगुण जन्य स्वर्गादि सुख से भी विमुख हो जाता है और ब्रह्मानन्द से परमानन्द में लीन हो कर अविचल शान्ति का अधिकारी बनता है। इसी पूर्णावस्था तक पहुँचा देने वाली होने के कारण, समस्त शुभ-अशुभ भव-बन्धनों से युक्त कर देने के कारण गायत्री ऊर्ध्वाधोगति भेदिनी-अर्थात् ऊँची-नीची गतियों को समाप्त कर देने वाली कही जाती है।
ऋषिवेद नमस्कृता
ऋषियों और देवताओं द्वारा अभिनन्दित गायत्री ही है। मनुष्य को ऋषि बना देने की क्षमता गायत्री में है। उसके पाशविक कुसंस्कार समाप्त होकर धर्म कर्तव्यों के अनुरूप विचार आचरणों की प्रधानता हो जाती है तो वह ऋषि कहलाने लगता है। ऋषि का गौरव प्राप्त कर लेना मनुष्य के लिए चक्रवर्ती शासक या कुबेर के कोष का अधिपति बन जाने से भी बढ़कर अधिक महत्वपूर्ण है। जब यह गौरवास्पद स्थिति प्राप्त होती है तो वह ऋषि इस उत्थान के मूल कारण गायत्री के लिये अत्यन्त कृतज्ञतापूर्वक नतमस्तक होता है। ऋषि से अगली पदवी देवता की है। दिव्य गुणों, दिव्य स्वभावों, दिव्य आचरणों के कारणों को बढ़ाते-बढ़ाते वह ऋषि ही आगे चल कर, अमर हो कर देवता बन जाता है, तब भी उसे यही अनुभूति होती है। इस उच्च स्थिति पर पहुँचने के लिये गायत्री-रूपी सीढ़ी ही सर्व प्रधान उसकी सहायिका रही है। उसके प्रति उसका मन निरन्तर शतशः प्रणाम करता रहता है। इन्हीं कारणों से गायत्री को ‘ऋषि देव नमस्कृता’ कहा जाता है।
ऋण हर्त्री
संसार में ऋण को सबसे बड़ा शत्रु कहा जाता है। इससे चिन्ता, अपमान आदि की जो विपन्न स्थिति पैदा होती है वह शारीरिक कष्टों से भी अधिक दुख देती है। इसका कारण कभी-कभी तो आकस्मिक आपत्ति एवं आवश्यकता भी होती है पर अधिकतर खर्चीला स्वभाव और किन्हीं विशेष अवसरों पर उत्साह में आकर अपनी परिस्थिति से अधिक खर्च कर डालना होता है। गायत्री उपासना में मनुष्य को यह सद्बुद्धि प्राप्त होती है कि वह अपनी आमदनी और मर्यादा से अधिक खर्च नहीं करता चाहे उसे इसमें कष्ट ही क्यों न उठाना पड़े। ऐसे लोग एक तो ऋण-ग्रस्त होते ही नहीं। यदि हो भी जाएं तो आवश्यक खर्चों से कमी करके उऋण होने का प्रयत्न करते हैं। सन्मार्गगामी साधक पर सदय होकर कभी-कभी माता ऐसा अनुग्रह भी करती है कि ऋण मुक्त होने के कोई आकस्मिक सुयोग सामने आ जावें। धार्मिक दृष्टि से देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण यह तीन ऋण प्रत्येक व्यक्ति पर होते हैं और इन्हें चुका कर ही वह भव-बन्धनों से छूट सकता है। माता उसे ऐसी प्रेरणा और आकाँक्षा प्रदान करती है कि सत्कर्मों द्वारा वह इन तीनों ऋणों को चुकाता हुआ मानव-जीवन का उद्देश्य पूर्ण करता है। इन्हीं कारणों से गायत्री को ऋण हर्त्री कहते हैं।
ऋषि-मण्डल-चारिणी
वस्तुतः गायत्री ऋषि मण्डल में निवास करने वाली ही है। दुष्ट, दुराचारी, वासना तृष्णा में उलझे हुए, अधोगामी प्रवृत्तियों के गुलाम न तो गायत्री की उपयोगिता जानते हैं, न मानते हैं, न उसको जीवन में धारण करने का प्रयत्न करते हैं। उनके लिए वह व्यर्थ की वस्तु है। हीरे का मूल्य घसियारा भला क्या समझ पावेगा, उसकी परख तो जौहरी ही कर सकते हैं। जिनमें विवेक की समुचित मात्रा है वे ही गायत्री का महत्व जानते हैं और उससे लाभ उठाने के लिए प्राणपण से प्रयत्न करते हैं। ऋषियों के समाज से ही गायत्री का आचरण होता देखा गया है इसी से वह ऋषिमण्डल चारिण है।
ऋजु मार्गस्था
कल्याण के मार्ग में अवस्थित गायत्री ही है। ऋजु, आत्मकल्याण को कहते हैं, वह बिना किसी सुनिश्चित साधना मार्ग पर चले उपलब्ध नहीं हो सकता। उच्च विचार और उज्ज्वल चरित्र रखते हुए ऋजु मार्ग के पथिक को साधना संलग्न भी होना पड़ता है। यों अनेकों साधनाएं प्रचलित हैं, सन्तों ने अपनी अपनी सूझ-बूझ के अनुसार अनेकों साधन मार्ग तथा सम्प्रदाय चला रखे हैं, वे विभिन्न दिशाओं की ओर खींचते हैं और परस्पर भारी मतभेद से भी भरे हुए हैं। इन औंधे सौंधे मार्गों में से किन्हीं पर भटकते रहने से अनेकों व्यक्ति अपना बहुमूल्य समय भी बर्बाद करते हैं। साधना का सर्वश्रेष्ठ वेदोमत वही मार्ग है जिसको अब तक प्रत्येक ऋषि और तत्वदर्शी ने अपनाया है। अनादि काल से लेकर आज तक के शास्त्रवेत्ता एवं विज्ञ व्यक्तियों के द्वारा गायत्री उपासना का ही अवलम्बन स्वीकार किया जाता रहा है, उसे ही निर्भ्रान्त माना गया है। ऋजु मार्ग की सीधी सड़क को गायत्री ही कहते हैं।
ऐहकामुष्मि प्रदा
पारलौकिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तो गायत्री की उपयोगिता निर्विवाद है ही, इहलौकिक कामनाओं की पूर्ति में भी वह कम सहायक सिद्ध नहीं होती। यों तो वह अनुचित और असंबद्ध कामनाओं को शान्त कर देती है या फिर ऐसा सुझा देती है जिस पर चलकर मनुष्य अपनी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त करने के साधन जुटा सके, वे दोनों में से कोई मार्ग क्यों न निकले, इतना अवश्य होता है कि साधक का मन कामना-सन्तप्त नहीं रहता, उसे किसी न किसी प्रकार मानसिक शाँति का द्वार अवश्य मिल जाता है।
ओतप्रोत निवासिनी
यों मन्दिर देवालयों में, वेदी चौकियों में, प्रतिमाओं तथा चित्रों में, अग्नियों में, वेद मन्त्रों एवं भावना सूत्रों से आवाह्न करके गायत्री शक्ति को विशेष स्थानों पर स्थापित किया जाता है और वहाँ उसकी पूजा अर्चना भी होती है। उपासना विज्ञान की दृष्टि से यह आवश्यक भी है। पर ऐसा न समझना चाहिए कि वह इसी स्थिति तक सीमित है। या कहीं किसी लोक विशेष के स्थान विशेष में निवास करती है। उसकी सत्ता सर्वत्र समाई हुई है। प्रत्येक पदार्थ में तथा प्रत्येक व्यक्ति के अन्तःकरण में वह ओतप्रोत है। वह सर्वत्र है, कोई स्थान ऐसा नहीं जहाँ वह न हो। भावना द्वारा उसे कहीं भी प्रकट किया जा सकता है।
औपसन फल प्रदा
जिस प्रकार वर्षा, धूप आदि बिना बुलाये, बिना आमंत्रित किये चाहे जहाँ जा पहुँचते हैं और माँगने न माँगने पर भी अपना प्रसाद हर किसी को प्रदान करते हैं वह बात गायत्री में नहीं है। वह केवल उसे ही फल देती है जो उसकी उपासना करता है, साथ ही उपासना के परिमाण के अनुसार फल देती है। बछड़ा जब दूध पीने का उपक्रम करता है तभी उसे गाय दूध पिलाती है, यदि वह न पीना चाहे तो उसे दूध नहीं मिल सकता। फिर जितनी देर, जितनी तीव्र या मन्द गति से वह दूध पीता है उसी मात्रा में उसे उपलब्ध होता है। गाय बछड़े को दूध पिलाना चाहती है, पिलाती भी है पर उसकी मर्यादा उतनी ही होती है जितना बछड़े का प्रयत्न। ठीक यही बात गायत्री के सम्बन्ध में भी है, वह उपासना के अनुपात से ही फल-प्रद है। अनायास हर कोई बिना प्रयत्न के ही लाभ प्राप्त कर सके ऐसी छूट इस साधना में नहीं है।
कल-कंठिनी
मधुर वाणी वाली गायत्री है। ऋग्वेद में जिस मधु विद्या का वर्णन है वह गायत्री में सन्निहित मधुरता ही है। कटुता, कर्कशता, कठोर वचन बोलना, निन्दा, चुगली आदि जितने भी वाणी के, कंठ के दोष हैं उन्हें दूर करने में साधक निरन्तर ही प्रयत्नशील रहने लगता है और कुछ ही दिन में अपनी जिह्वा तथा भावना पर ऐसा नियंत्रण स्थापित कर लेता है कि किसी से दुर्वचन न कहे, हर किसी से मधुर और स्नेहयुक्त ही बोले तथा वैसा ही व्यवहार भी करे। कोयल को कल-कण्ठिनी कहते हैं उसकी मधुर वाणी सबको प्रिय होती है, गायत्री उपासना से भी हर किसी को यह कल-कंठ प्राप्त होता है। उसका स्वर कैसा ही रहे, स्नेह सौजन्य की समुचित मात्रा वचन में रहने से वह संगीत के समान हर किसी को मधुर लगता है, सभी उसकी इस वचन सज्जनता से प्रभावित होकर उसके प्रति प्रेम और आदर का व्यवहार करते हैं। यही वशीकरण मन्त्र भी है।
कल्याणी
कल्याण की करने वाली। कभी अकल्याण के उलटे प्रतिफल की सम्भावना गायत्री में नहीं है। कई तान्त्रिक कौल मन्त्र ऐसे होते हैं जिनमें उच्चारण या विधान सम्बन्धी कोई दोष रह जाए तो उसका परिणाम उलटा, हानिकारक हो जाता है, लाभ के स्थान पर हानि का, सिद्धि के स्थान पर विपत्ति का सामना करना पड़ता है। यह कठिनाई गायत्री साधना में नहीं है। उसमें कोई भूल या अशुद्धि भी हो जाए तो अधिक से अधिक इतनी हानि हो सकती है कि सत्परिणाम में कमी हो जाए, स्वल्प लाभ हो। पर ऐसी सम्भावना कभी भी नहीं है कि उससे कभी किसी का रंच मात्र भी अनिष्ट हो। वह हर किसी के लिए-बाल, वृद्ध, नर, नारी, गृही, विरक्त के लिए समान रूप से कल्याणकारक है।
काल रूपिणी
काल रूपिणी-अर्थात् समय-साध्य एवं विकराल भी। जैसे समय पर ही वृक्ष बढ़ते एवं फलते हैं, उसी प्रकार गायत्री साधना भी उतावली करने से नहीं, आवश्यक समय व्यतीत होने पर ही फल देती है। नियत समय पर साधना के लिये बैठना, उपासना के लिए जितना समय लगाना निश्चित किया हो उतना नियमित रूप से लगाना, जितने समय में वह सफल होती है उतने समय तक धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करना, यह सफलता के लिए आवश्यक शर्त है। काल के, समय के आधार पर गायत्री की सफलता निर्भर रहने के कारण उसे काल-रूपिणी कहा गया है। वह विकराल भी है। साधक के भीतरी दोष दुर्गुणों का ऐसे संहार करती है जैसे असुर निकन्दना दुर्गा ने महिषासुर आदि राक्षसों का किया था। वह साधक के सम्मुख उपस्थित कष्टों, विघ्नों एवं अनिष्टों को भी काल-रूपिणी बन कर मटियामेट करती है। उस विकरालता के सामने कोई अशुभ अनिष्ट ठहर नहीं सकता।
(श्री स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज)
किसी भी कार्य की सफलता के लिए उसके लिए उपयुक्त स्थान और अवसर की आवश्यकता होती है। यह ठीक है कि मनस्वी पुरुषार्थी लोग पत्थरों पर भी अपना रास्ता बना लेते हैं और असम्भव को भी सम्भव बना देते हैं। यह भी ठीक है कि एकाग्रता, निष्ठा, तन्मयता और प्रबल इच्छाशक्ति की प्रचण्डता के सामने अनुपयुक्त परिस्थितियाँ भी उपयुक्त बन जाती हैं, पर साथ ही यह भी मानना ही पड़ेगा कि उपयुक्त स्थान और वातावरण का भी कम महत्व नहीं है। यदि कार्य के अनुकूल परिस्थितियों एवं साधनों की व्यवस्था कर ली जाए तो मंजिल सहज ही होती है और असफलता का भय बहुत अंशों में दूर हो जाता है। इसके प्रतिकूल यदि साधनों का अभाव हो तो मनस्वी व्यक्तियों को भी अपना लक्ष्य पूर्ण करने में बहुत देर लगती है और बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। अनुकूल साधन प्राप्त होने पर जितने समय और श्रम में जितनी सफलता प्राप्त की जाती है, प्रतिकूल परिस्थितियों में उससे बहुत कम सफलता, अत्यधिक श्रम और समय लगाने पर उपलब्ध होती है। इसलिये उचित यही है कि किसी कार्य को करने के लिए उसके उपयुक्त परिस्थितियों और साधनों को तलाश कर लिया जाए।
यदि खेती ऊसर या पथरीली जमीन पर की जाए तो फसल बहुत कम ही उपजेगी। अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए उपजाऊ जमीन ढूँढ़नी पड़ेगी और साथ ही खाद, सिंचाई की सुविधा का भी प्रबन्ध करना होगा। यह ठीक है कि कोई मनस्वी व्यक्ति प्राण-पण से जुट जावें तो ऊसर जमीन को भी अपने पुरुषार्थ से उपजाऊ बना सकते हैं पर इसमें उन्हें उससे कहीं अधिक शक्ति व्यय करनी पड़ेगी जितनी कि अधिक उपजाऊ और जल-सुविधा की भूमि प्राप्त होने पर करनी पड़ती। इसलिये बुद्धिमान लोग कार्य की सफलता के लिये उपयुक्त साधनों और परिस्थितियों के सम्बन्ध में भी समुचित ध्यान दिया करते हैं।
आध्यात्मिक साधनाएँ कहीं भी की जा सकती हैं, अपना घर भी उसके लिये बुरा नहीं है। सभी भूमि गोपाल की होने के कारण सर्वत्र परमात्मा ही समाया हुआ है, इसलिए किसी स्थान विशेष में प्रभु का स्मरण करने का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। फिर भी उपयुक्त स्थान की अपनी बहुत कुछ विशेषता होती है। गीता के विभूति योग अध्याय में भगवान् ने बताया है कि विशेषता युक्त प्रत्येक वस्तु में मेरी प्रधानता समझनी चाहिये। यही बात स्थान के सम्बन्ध में भी लागू होती है।
जिस प्रकार पशुओं में गौ, पक्षियों में हंस, वृक्षों में पीपल, पौधों में तुलसी, धान्यों में जौ की सात्विकता प्रसिद्ध है, सतोगुणी तत्वों की मात्रा अधिक होने से उनका सान्निध्य एवं सेवन सब प्रकार मंगलमय माना जाता है, इसी प्रकार कुछ स्थानों और नदी सरोवरों में यह सूक्ष्म सात्विक शक्ति प्रचुर परिमाण में पाई जाती है, तदनुसार उनके समीप रहने वालों में भी सत् तत्व बढ़ता है और आध्यात्मिक सफलता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने ऐसे स्थानों की खोज उसी प्रकार की थी जिस प्रकार आज कल सोने, चाँदी आदि धातुओं की खानें खोजी जाती हैं। जो स्थान सत् तत्व से ओतप्रोत मिले उन्हें तीर्थ घोषित किया गया। वहाँ ऋषि-मुनियों ने अपने निवास एवं साधना के स्थान बनाये। साथ ही जनता को भी उन तीर्थों में स्थान एवं दर्शन के अभिप्राय से समय-समय पर आते रहने और वहाँ कुछ दिन निवास करके आत्मिक स्वास्थ्य लाभ करने का निर्देश किया। इन तीर्थों में उन ऋषियों का सान्निध्य, सत्संग एवं मार्ग दर्शन भी आगन्तुक तीर्थ यात्रियों को प्राप्त होता था, जिससे उनके अन्तःकरण की मुरझाई हुई कली फिर हरी हो जाती थी।
दुर्भाग्य और समय के फेर से आज तीर्थों का वातावरण भी विकृत हो गया है। वहाँ के निवासी ऋषियों के वंशज कहाकर दान दक्षिणा तो बटोरते हैं, पर चरित्र, तप, त्याग एवं ज्ञान विज्ञान से रहित होने के कारण आगन्तुकों का कुछ भला नहीं कर पाते। इतना ही नहीं उलटे अपने निम्न मानसिक स्तर और लूट खसोट के कारण लोगों में अश्रद्धा ही उत्पन्न करते हैं। इतना सब होते हुए भी उन स्थानों की सूक्ष्म शक्ति अभी भी पूर्ववत बनी हुई है। गंगा में अनेकों मगर, मेंढक पड़े रहें, उसमें मलमूत्र एवं दुष्कर्म भी करते रहें तो भी गंगा अपवित्र नहीं होती और न उसकी महत्ता में कोई कमी आती है। इसी प्रकार जो स्थान ऋषियों ने सत् तत्व प्रधान खोजे थे, मूलतः आज भी वैसे ही बने हुए हैं यद्यपि बाह्य वातावरण वहाँ का बहुत करके उलटा ही हो गया है।
स्थान की अपनी विशेषता होती है। श्रवण-कुमार जब अपने अन्धे पिता माता की काँवर कंधे पर रखकर उन्हें तीर्थ यात्रा कराने ले जा रहे थे तो एक स्थान ऐसा आया जहाँ पहुँचते ही श्रवणकुमार का मन बदल गया। उन्होंने काँवर जमीन पर रख दी और पिता माता से कहा-आप लोगों की आँखें ही तो नहीं है, पैर तो हैं, पैदल चलिए, मैँ सिर्फ आपको रास्ता बताऊँगा, कंधे पर लादे न फिरूंगा।” आदर्श पितृभक्त श्रवण कुमार में इस प्रकार का अचानक परिवर्तन देखकर उसके पिता क्रुद्ध न हुए वरन् वस्तु स्थिति को समझ गये और उन्होंने कहा “हम लोग पैदल ही चलेंगे पर तुम इतना अवश्य करो कि जल्दी ही इस स्थान को छोड़ दो और तेजी से चल कर कहीं दूसरी जगह में हमें ले चलो।” श्रवण कुमार ने ऐसा ही किया। जैसे ही वह क्षेत्र समाप्त हुआ, बालक की बुद्धि ने पलटा खाया और वह अपनी भूल पर बड़ा दुखी हुआ। पिता माता से रो-रोकर क्षमा माँगने लगा और पुनः कंधे पर बिठा लिया।
श्रवणकुमार के पिता ने बालक को सान्त्वना देते हुए एक पुराना इतिहास बताया कि इस स्थान पर एक दानव रहता था और यहाँ कुकृत्यों एवं कुविचारों का केन्द्र जमा रहता था। उन्हीं अशुभ संस्कारों से संस्कारित होने के कारण यह भूमि ऐसी है कि यहाँ कोई सद्विचार वाला व्यक्ति पहुँचे तो वह भी कुविचारी बन जाता है। इसलिए हे पुत्र, इसमें तुम्हारा दोष नहीं है यह भूमिगत दोष है। ऐसी पातकी भूमियों से दूर ही रहना चाहिए।
इसी प्रकार की एक कथा तब की है जब महाभारत होने को था। श्रीकृष्ण जी को भय था कि भाई भाइयों का युद्ध है, कहीं ऐसा न हो कि लड़ते-लड़ते किसी पक्ष का मोह उमड़ पड़े और दुष्टों के संहार का कार्य अधूरा ही रह जावे। इसलिए युद्ध के लिए ऐसी भूमि ढूंढ़नी चाहिए जहाँ नृशंसता और निर्ममता का बोलबाला हो। ऐसी भूमि तलाश करने के लिए श्रीकृष्ण जी ने सभी दिशाओं को दूर दूर तक दूत भेजे और वहाँ की विविध घटनाओं के समाचार लाकर देने का आदेश दिया। दूत गए और बहुत दिन बाद अपने अपने समाचार लाकर दिये। एक दूत ने बताया कि-”उसने एक स्थान पर ऐसी घटना देखी कि बड़ा भाई छोटे भाई को कह रहा था कि वर्षा के कारण खेत की मेंड़ टूट गई है उसे ठीक कर आओ। छोटे भाई ने बड़े को बड़ा अपमानजनक उत्तर दिया और कहा यह कार्य तू कर! बड़े भाई को ऐसा क्रोध आया कि छोटे भाई का गला मरोड़ डाला और उसकी लाश को घसीटता हुआ वहाँ ले गया जहाँ खेत की मेंड़ टूटी पड़ी थी। उस लाश को ही उसने मिट्टी की जगह डाल कर मेंड़ सुधारी। इस घटना को सुनकर श्रीकृष्णजी समझ गये कि जहाँ भाई-भाई के बीच नृशंसता बरती जा सकती हो वही भूमि इस युद्ध के लिए उपयुक्त है। उन्होंने उसी जगह लड़ाई का झंडा गड़वा दिया और अन्त तक दोनों ही पक्ष इस युद्ध को एक दूसरे के खून के प्यासे होकर लड़ते रहे।
उपरोक्त दो घटनाओं में जिस प्रकार भूमि के कुसंस्कारित होने की चर्चा है उसी प्रकार सुसंस्कारों की भूमियाँ भी होती हैं और वहाँ रहने से मनुष्य की भावनाओं और विचारधाराओं में तदनुकूल प्रवाह उठने लगते हैं। यदि उन प्रेरणाओं को थोड़ा प्रोत्साहन एवं सिंचन मिलता रहे तो निस्संदेह उस स्थान की सुसंस्कारिता से बहुत लाभ उठा सकते हैं। आध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिये तो ऐसे स्थान बहुत ही मंगलमय होते हैं। ऐसे स्थान का चुनाव कर लेने से उन्हें आधी सफलता तो उस चुनाव के कारण ही मिल जाती है।
सतोगुणी आध्यात्मिक साधनाओं के लिये हिमालय का उत्तराखण्ड बहुत ही उपयुक्त है। प्राचीन काल में अधिकाँश ऋषियों ने इसी भूमि में अपनी तपस्याएँ पूर्ण की थीं। इस प्रदेश में भ्रमण करने से पता चलता है कि भारतवर्ष के प्रधान-प्रधान सभी ऋषियों के आश्रम प्रायः इसी क्षेत्र में थे। कुछ ऋषि ऐसे भी थे जो आवश्यक प्रयोजनों के लिए देश के विभिन्न भागों में जाकर वहाँ अभीष्ट कार्य करते थे और कार्य की सुविधा के लिये वहाँ भी आश्रम बनाते थे पर जब भी उन्हें अधिक आत्मबल उपार्जन के लिये तप करने की आवश्यकता पड़ती थी तब फिर इसी हिमालय भूमि में जा पहुँचते थे। सहस्र-धारा होकर गंगा इसी प्रदेश में बहती है। यों गंगा का प्रथम दर्शन गंगोत्री से 18 मील ऊपर गोमुख नाम के स्थान में होता है पर वहाँ तो एक छोटा पतला-सा प्रधान झरना मात्र है, गंगा में जो जल एकत्रित होता है वह उत्तराखण्ड की हजार निर्झरणियों, लघु नदियों द्वारा होता है। इन सब को भी गंगा का अंग मानते हैं और ऐसा समझा जाता है कि गंगा इस प्रदेश में सहस्र धारा होकर बही है और फिर अन्त में सब मिलकर हरिद्वार से एक सम्मिलित पूर्ण गंगा बन गई है। इस प्रकार सारा हिमालय प्रदेश, उत्तराखण्ड, गंगा के द्वारा पवित्र होकर आध्यात्मिक साधना के साधकों के लिये अलभ्य सुयोग उपस्थित करता है।
ये ऊँचे, ठण्डे पर्वतीय प्रदेश स्वास्थ्य के लिये जलवायु की दृष्टि से बहुत ही लाभदायक माने जाते हैं। धनी सम्पन्न लोग गर्मी के दिनों में शान्ति, मनोरंजन एवं स्वास्थ्य लाभ करने के लिये इन मनोरम प्रदेशों में सैर करने जाया करते हैं। कश्मीर, शिमला, देहरादून, मंसूरी, अल्मोड़ा, नैनीताल, दार्जलिंग आदि अनेकों स्थान ऐसे हैं जहाँ जलवायु की उत्तमता के कारण स्वास्थ्य लाभ करने और प्राकृतिक मनोरम दृश्यों से आँखों तथा मनोदशा को सुधारने के लिये लाखों व्यक्ति जाया करते हैं और इस कार्य के लिये बहुत धन भी खर्च करते हैं। इस प्रकार उत्तराखण्ड का गंगा से पवित्र हिमालय प्रदेश स्वास्थ्य लाभ करने के लिये अद्वितीय एवं अनुपम स्थान है।
इस गये गुजरे जमाने में जब कि सर्वत्र बेईमानी और बदमाशी की विजय पताका फहरा रही है, उत्तराखण्ड आज भी अधिकाँश बुराइयों से बचा हुआ है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ की यात्रा को लाखों यात्री हर साल जाते हैं, उन सभी को इस बात की गवाही में पेश किया जा सकता है कि उस प्रदेश के पहाड़ी आमतौर से ईमानदारी होते हैं। चोरी, व्यभिचार, गुण्डागर्दी, झूठ-हरामखोरी, ईर्ष्या आदि पातकों की पहुँच वहाँ नहीं के बराबर ही है। जिन यात्रियों को पहाड़ियों से व्यवहार करना पड़ता है, वे एक स्वर से कह सकते हैं कि नीचे के प्रदेशों की अपेक्षा पहाड़ी लोग लाख-दर्जे ईमानदार और भले होते हैं। पुलिस के रजिस्टरों को भी इस सबूत में पेश किया जा सकता है कि इस प्रदेश में अपराध कितने कम होते हैं। इसका कारण उस प्रदेश के सूक्ष्म वातावरण की सात्विक विशेषता ही है जिसके प्रभाव से वहाँ के निवासी अभी भी, इस युग में भी, नेक और ईमानदार माने जाते हैं।
साधकों में जो अन्तः ऊष्मा बढ़ती है उसे शाँत करने के लिए हिमालय की शीतलता एक अद्भुत रसायन का काम करती है। गरम प्रदेशों में रहकर कठोर तपश्चर्या करने में कई बार बढ़ी हुई अंतःऊष्मा शान्त न हो सकी तो उस स्थिति में हानि होने की सम्भावना रहती है, पर हिमालय के आँचल में रहकर साधन करने वालों को इस प्रकार का कोई भय नहीं रहता।
जिस प्रकार मनुष्य उन्नति करने से ऊँचा उठता है। जिसमें सद्गुण आते हैं वह उस पद को प्राप्त करता है, जिससे भगवान प्रसन्न होते हैं वह दिन दिन ऊपर की ओर बढ़ता है। स्वर्ग ऊपर माना गया है, सूर्य चंद्र ऊपर दीखते हैं। हिन्दुओं के श्रेष्ठ लोक, जहाँ देवताओं समेत भगवान रहते हैं ऊपर माने जाते हैं। मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी आदि अन्य धर्मावलम्बी भी अपना ईश्वर ऊपर आसमान में मानते हैं। ऊँचाई देवत्व की प्रतीक मानी जाती है। पृथ्वी पर भी यही नियम लागू होता है। जो स्थान पृथ्वी पर जितने ऊँचे हैं वे उतने ही दिव्य वातावरण से युक्त माने जाते हैं। हिमालय की ऊँचाई भी उसकी उच्च आध्यात्मिक विशेषताओं का एक कारण है।
पाण्डव हिमालय में शेष जीवन समाप्त करने के लिए-ऊँचाई ही नहीं वरन् वातावरण की उच्चता को भी ध्यान में रखते हुए गये थे। स्वर्गारोहण नामक एक स्थान है जिसके बारे में कहा जाता है कि यहीं हिमालय में पहुँच कर पाण्डवों ने सीधा स्वर्ग को प्रस्थान किया था। एक मत यह भी है कि प्राचीन काल में उत्तराखण्ड ही स्वर्गलोक था। यहाँ तपस्वी साधक, ऋषि मुनि एवं देव स्वभाव के सत्पुरुष रहते थे। यहाँ इतनी अधिक सत्प्रवृत्तियाँ फैली रहती थीं कि इस वातावरण में लोगों को वे शारीरिक और मानसिक व्यथा, बाधाएँ न सताती थीं, जो संसार में सर्वत्र आमतौर से देखी जाती हैं। वहाँ के आनन्द और उल्लासमय वातावरण को देखते हुए यदि उसे क्षेत्र का नाम स्वर्ग रखा गया हो तो इसमें कुछ आश्चर्य की भी बात नहीं है। संभव है पाण्डव दिल्ली के क्षुब्ध वातावरण से हट कर शेष जीवन वहीं व्यतीत करने और देव पुरुषों के सान्निध्य में रहने गये हों। गंगोत्री से आगे गोमुख से सीधे बद्रीनाथ जाने के पर्वतीय मार्ग में नंदन कानन नामक क्षेत्र आता है। स्वर्ग में नंदन कानन होने की बात प्रसिद्ध ही है।
जो हो यह एक तथ्य है कि आध्यात्मिक साधनाओं के लिए गंगा तटवर्ती हिमालय भाग एक उपयुक्त स्थान है। साधना की महत्ता समझाने वाले केवल तीर्थयात्रा और देव दर्शन के लिए ही नहीं, कुछ समय निकाल कर यदि उधर साधना के लिए भी जाया करें तो उनकी साधना का मार्ग अधिक प्रशस्त हो सकता है। जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ाने के लिए कतिपय पहाड़ी प्रदेश अच्छे माने जाते हैं, उसी प्रकार आत्मोन्नति की दृष्टि से भी गंगा तटवर्ती हिमालय सब प्रकार उपयुक्त ही है।
भगवद् दर्शन प्राप्त करने का उपाय
मनुष्य अपने आपको पहचानने से भगवान को पहचान सकता है। ‘मैं कौन हूँ?’ भली भाँति विचार करने पर मालूम होता है कि ‘मैं’ नाम की कोई वस्तु है ही नहीं। हाथ, पैर, खून, माँस इत्यादि-इनमें से ‘मैँ’ कौन है? जिस प्रकार प्याज छिलका अलग करते-करते छिलका ही निकलता जाता है, शेष कुछ बचता ही नहीं, उसी तरह विचार करने पर “अपनत्व” के नाम से कुछ बचता नहीं, अन्त में जो कुछ रहता है वही आत्मा या चैतन्य है। अहम् भाव दूर हो जाने पर भगवान के दर्शन होते हैं।
‘मैं’ दो तरह का होता है। एक है पक्का ‘मैं’ और दूसरा कच्चा ‘मैं’। मेरा मकान, मेरा घर, मेरा लड़का-यह सब कच्चा ‘मैं’ है। और पक्का ‘मैं’ है-मैं उनका दास, मैं उनकी सन्तान और मैं वही नित्य-मुक्त-ज्ञान स्वरूप है।
-रामकृष्ण परमहंस
(डॉ. चमनलाल गौतम)
परमात्मा ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया है। इस उच्च पद के साथ-साथ उसे बहुत ही महत्वपूर्ण शक्तियों से विभूषित किया है। जब तक वह अपने आपको भूला रहता है तब तक यह शक्तियाँ दबी रहती हैं। जिस प्रकार से भस्म के कारण अग्नि से ज्वाला नहीं उठ पाती, उसी तरह आत्मा पर मनःविक्षेप और आवरण चढ़े होने की वजह से वह शक्तियाँ सुप्त रहती हैं। अपने को न पहचान कर जब मनुष्य अपने आपको एक क्षुद्र शरीरधारी मानता है तो साँसारिक विषय विकारों में उलझ कर अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारता है। पशु, पक्षी, कीट, पतंगों की तरह अपना जीवन व्यतीत करता है। विपत्तियाँ और कठिनाइयों उसके सामने आती हैं तो वह घबरा जाता है, भयभीत होकर रोता और चिल्लाता है, भाग्य को कोसता है, समाज को लाँछन लगाता है, अज्ञानान्धकार में ठोकरें खाता है, परन्तु फिर भी अपने दृष्टिकोण को नहीं बदलता। इसके विपरीत यदि वह अपने आपको जानता कि “ वह आत्मा है, अजर है, अमर है, अविनाशी है। उसको मारने, काटने और जलाने की शक्ति व सामर्थ्य किसी में नहीं है। वह शरीर नहीं है कि केवल उसी के लालन-पालन के लिए दिन-रात व्यस्त रहता है और मनुष्य जीवन की अनमोल घड़ियों को व्यर्थ के विषयों में फँस कर गँवा देता है। वह परमात्मा का राजकुमार है, उसे इसी पद के अनुसार आचरण करना चाहिए। आत्मा महान है, उसे निरन्तर महानता का विकास करना चाहिए। उसमें वह सभी शक्तियाँ हैं जो परमात्मा में हैं। जिस व्यक्ति ने उनको जितना जगा लिया वह उतना ही बड़ा महापुरुष, योगी और सिद्ध कहलाता है। संसार में जितनी भी आत्माएं अवतरित हुई हैं, परमात्मा ने उन सबको समान शक्तियाँ प्रदान की हैं। जिसे ज्ञान का आदिस्रोत मिल गया, वह इस घुड़दौड़ में आगे निकल कर अमर हो गया। जिस मनुष्य ने जितना आत्मविकास कर लिया, वह उतने ही महत्वपूर्ण कार्य कर जाता है। इसलिए शक्तिशाली और महापुरुषों ने जो श्रेष्ठ, असाधारण व चमत्कारी कार्य किये हैं, उनको हम भी कर सकते हैं। हमारे अन्दर अनन्त शक्तियों का भण्डार भरा पड़ा है। जिस प्रकार से हनुमान अपनी शक्तियों को भूले थे, जब उन्हें बताया गया कि उनमें समुद्र को लाँघने की शक्ति है तो वह आगे बढ़े और सफल हुए। आत्मविश्वास के अभाव में शक्ति के होते हुए भी वह उससे काम नहीं ले रहे थे।”
वह पुनः अपने आपको संकेत करता है कि “मुझ में वह शक्ति और सामर्थ्य है कि सूर्य और चन्द्र मेरी आज्ञा से चलें, वायु और अग्नि मेरे नियन्त्रण में रहें, प्रकृति की समस्त शक्तियाँ सम्मान पूर्वक मेरी आरती उतारें। मैं पहाड़ की तरह अडिग हूँ। आँधी और तूफान आयेंगे, मुझ से टकरा कर लौट जायेंगे। जो विषय विकार, वासनाएं, तृष्णाएं और इच्छाएं मुझसे जूझने का प्रयत्न करेंगी, वह, जैसे पत्थर के साथ शीशा टकराता है, वैसे चकनाचूर हो जायेंगी। विपत्तियाँ और कठिनाइयाँ मेरे मित्र के रूप में मेरे साथ निरन्तर रहेंगी, परंतु असफलता देखकर अपना सा मुँह लेकर लौट जायेंगी। मुझे कोई कष्ट नहीं पहुँचा सकता। कष्ट आने तो हैं परन्तु मैं उन्हें अनुभव नहीं करता। कष्ट तो शरीर को होने चाहिएं, आत्मा को नहीं।’
“मैं निरन्तर आगे बढूँगा, अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करूंगा। संसार में फूल की तरह दूसरों को सुगन्धि देते हुए अपना शरीर त्याग दूँगा, दीपक की तरह स्वयं जलकर अन्यों को प्रकाश दूँगा, साँसारिक-बन्धनों को तोड़ डालूँगा और स्वतन्त्र होकर सहस्रों को ज्ञान का दीपक दिखाकर मुक्त करूंगा। मैं श्रेष्ठ, पवित्र, निष्पाप, तेजस्वी और दिव्य स्वरूप हूँ, मैं अपने साथियों पर प्रभाव छोड़े बिना न रहूँगा, मैं समस्त प्राणियों के दुःखों को अपना ही दुःख समझूँगा और उस के निवारण में निरन्तर प्रयत्नशील रहूँगा। स्वार्थपरता, अज्ञानता, नास्तिकता, अश्लीलता, कामुकता, रूढ़िवादिता, अशिष्टता आदि की जड़ों को काट दूँगा। सुप्त आत्माओं को जगाना, अज्ञानियों को ज्ञान के सद्मार्ग पर लगाना, भूले भटकों को ठीक रास्ते पर लगाना मेरा परम कर्तव्य है। जो लोग साँसारिक विषयों में अन्धे हुए पड़े हैं, उनको मैं दिव्य ज्योति दूँगा ताकि उसके प्रकाश में वह अपने मार्ग का निर्णय कर सकें।”
“मुझ में इतनी शक्ति है कि मेरे कदम निरंतर आगे ही बढ़ते चले जाएंगे, मैं संसार में वह हलचल मचाऊँगा कि लोग दाँतों तले उँगली दबायेंगे, वह नवीन क्राँति करूंगा कि अपने समाज व राष्ट्र का कायाकल्प ही हो जाएगा, इसे दी गई मेरी औषधि रामबाण का काम करेगी, मैं सूर्य की तरह चमक कर संसार भर में अपना प्रकाश बिखेर दूँगा, भगवान के लिए पदार्थों को अकेले न भोग कर सबको बाँट दूँगा, सबको अपना भाई मानूँगा, ऊँच-नीच का भेद अपने मन से निकाल दूँगा, उनको सुख शान्ति रूपी अमृत पिलाने के लिए अपने शरीर की आहुति देनी पड़ेगी तो उसके लिए भी तैयार रहूँगा। इस क्षणभर शरीर के साथ मुझे कोई मोह नहीं है, यदि यह दूसरों की सेवा में नष्ट हो जाए तो मेरे लिए परम सौभाग्य की बात होगी। मैं नमक की तरह अपने आपको गलाकर दूसरों को ज्ञान रूपी स्वादिष्ट भोजन कराऊँगा। मैं समाज को एक शरीर मान कर अपने को उसका एक अंग मानूँगा। उसके किसी भी अंग में विकृति आने पर अपनी ही विकृति समझ कर उसे सुधारने की चेष्टा करूंगा। समाज में जो रूढ़ियां और कुरीतियाँ फैली हुई हैं, जिनके कारण उसका शरीर जर्जर होता जा रहा है, उनके ऊपर एटम बम की तरह गिर कर उनको समाप्त कर दूँगा। अनैतिकता ने जो इसका शरीर काला कर दिया है, उसे निकाल कर दूध की तरह सुन्दर बना दूँगा।”
“हम राष्ट्र का गौरव गिरने न देंगे, हमारा प्रत्येक बालक हकीकतराय और गुरु गोविन्दसिंह के बच्चों की तरह धर्म के नाम पर बलिदान होने को तैयार होगा, प्रह्लाद की तरह प्रभु विश्वासी होगा, नचिकेता की तरह साँसारिक भोगों को तिलाँजलि देकर आत्मा की भूख को बुझाने वाला होगा। राम, श्रवण कुमार, भीष्म जैसे पुत्र, कृष्ण जैसे मित्र, राम, लक्ष्मण, भरत जैसे भाई, सीता, सावित्री, गान्धारी, अनुसूया, पार्वती जैसी नारियाँ, रन्तिदेव, शिवि, दधीचि, बन्दा बैरागी जैसे आत्म त्यागी, अपने को तिल तिल जलाने वाले ऋषियों का प्रादुर्भाव होगा। नैतिक व साँस्कृतिक पुनरुत्थान के पथ पर हम निरंतर बढ़ते रहेंगे, युग निर्माण के हमारे स्वप्न साकार हो कर रहेंगे।
“अभी तक मैं नरक कूप में पड़ा जिन्दगी के दिन बिता रहा था। अपने और परिवार के पालन-पोषण में ही अपना समस्त जीवन लगाता था। इसी कार्य को अपना पूर्ण कर्तव्य मान बैठा था। भौतिक उन्नति में ही सुख का अनुभव करता था। आध्यात्म का अमृत नहीं चखा था। अब मेरी आँखें खुल चुकी हैं। अब से सेवा को मैंने अपने जीवन का ध्येय बना लिया है। यही सुख शाँति का स्रोत है। परमात्मा की प्रसन्नता का यह माध्यम है। मैं अपना गृहस्थ के कार्यों से बचा हुआ समस्त समय जनता में धार्मिक प्रवृत्तियाँ बढ़ाने और समाज सेवा के रचनात्मक कार्यक्रमों को क्रिया रूप देने में लगा दूँगा। मैं समय के मूल्य को जान गया हूँ, उसे व्यर्थ गँवाना मैं अपने जीवन पर एक आघात समझूँगा। मैं जानता हूँ कि समय का उचित मूल्याँकन ही मेरी वास्तविक उन्नति का साधन साबित होगा। मुझे जीवन निर्माण का मार्ग मिल चुका है। अब मैं इसे कदापि न छोड़ूंगा। यह मेरी बुद्धिमत्ता की कसौटी है। मैं उसमें सफल होकर रहूँगा।”
“मैं व्रत के महत्व को भली प्रकार से जानता हूँ और प्रतिज्ञा लेता हूँ कि जब तक इस शरीर में प्राण शेष है, तब तक सद्विचारों के प्रसार और राष्ट्र उत्थान के कार्यक्रम में नींव के पत्थर की तरह काम आऊँगा, समाज में धार्मिकता, आस्तिकता, परमार्थ, त्याग, संयम, श्रेष्ठता, आध्यात्मिकता आदि वृत्तियों को जागृत करने के लिए अपना सर्वस्व लगा दूँगा।”
उपरोक्त संकेतों को बार-बार पढ़ना चाहिए और इनका मनन करना चाहिए। मन को हम जैसे संकेत देते हैं वह अपनी गति को उसी ओर मोड़ लेता है। हमें पूर्ण विश्वास है कि यदि हम इन श्रेष्ठ संकेतों को पुनः पुनः ध्यान में लाते रहेंगे तो हमारा जीवन एक नये साँचे में ढलता जायेगा और उसके अनुसार हम अपने आपको मनुष्य कहलाने के अधिकारी बना लेंगे। प्राणी-मात्र इस श्रेष्ठ मार्ग पर चले, उस दयालु माता से यही विनम्र प्रार्थना है।
(पं. वेदप्रिय वेदालंकार)
तन्तुँ तन्वन् रजसो भानुमिन्विहि,
ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धियाकृतान्।
अनुल्बणं वयत जोगुवामयो,
मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥
-ऋक्. 10।53।6
“हे अग्ने! हमारे यज्ञ को बढ़ाते हुए सूर्यमंडल (प्रकाश) में पहुँचो। जिन ज्योतिर्मय मार्गों को श्रेष्ठ कर्मों द्वारा पाया जाता है, उनकी रक्षा करो, देवताओं को यज्ञ में बुलाओ और उपस्थिति विघ्नों को दूर करो (अथवा विघ्न रहित कार्यों का विस्तार करो! (मनुर्भव) मनुष्य बनो और (दैव्यं) देव हितकारी (जनम्) जन-संतान को उत्पन्न करो।”
वेदों की सब से बड़ी विशेषता, जिसे भारतीय और विदेशी, दोनों प्रकार के विद्वानों ने स्वीकार किया है, यही है कि उसमें कहीं सम्प्रदायवाद का चिन्ह नहीं मिलता। उसमें जितने उपदेश दिये गये हैं, वह मनुष्य मात्र के लिये हैं। उसमें न तो कहीं किसी दूसरे धर्म का नाम आया है और न किसी की निन्दा और अपनी प्रशंसा की गई है। उसमें तो केवल ऐसे कर्तव्य और मार्गों का निर्देश किया गया है जिससे मनुष्य अपना और दूसरों का कल्याण कर सके। यह एक बहुत बड़ा अन्तर है, जो वेद को संसार के समस्त धर्म ग्रन्थों से उच्च ठहराता है। अन्य सब ग्रन्थों में किसी एक मत की प्रशंसा की गई है उसी को सत्य बता कर ग्रहणीय ठहराया है और उसके सिवा अन्य सबको मिथ्या अथवा भ्रमपूर्ण बताया है। इससे एक तो यह बात सिद्ध होती है कि वेद वास्तव में सर्वाधिक प्राचीन है जब कि संसार में किसी अन्य मतमतान्तर का अस्तित्व न था। अगर उस समय कोई अन्य धर्म होता तो वेद में उसकी आलोचना की गई होती, उसकी भलाई-बुराई दिखाई गई होती, अथवा कम से कम अपने अनुयायियों को उससे दूर रहने की चेतावनी दी होती। पर जब ऐसी कोई बात कहीं नहीं मिलती तो हम इसी निर्णय पर पहुँचते हैं कि वेद वास्तव में मानवीय सभ्यता के आदि में प्रकट हुये और उनमें जो कुछ कहा गया है वह मनुष्यों के स्वाभाविक कर्तव्य और अधिकारों को दृष्टि में रख कर ही कहा गया है।
उपर्युक्त मन्त्रदृष्टा ऋषि ने मनुष्य को उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा की है जिससे वह स्वयं देव बन कर संसार में दैवी प्रकृति के व्यक्तियों के निर्माण में सहायक हो सके। मानव-समाज अभी विकास की अवस्था में है और प्रकृति के तीनों गुणों में से मनुष्यों पर रज और तम का प्रभाव विशेष रूप से देखने में आता है। ऐसे मनुष्य समाज पर अपना प्रभाव जमाने अथवा स्वार्थ-साधन के उद्देश्य से प्रायः धर्म-विरुद्ध, नीति विरुद्ध कार्यों पर उतारू हो जाते हैं। यह देव प्रकृति के सात्विक पुरुषों का ही काम है कि वे उत्कृष्ट आदर्श उपस्थित करके समाज को निम्नगामी होने से बचायें और उसे उच्च स्थिति की तरफ ले जायें। इसलिये भावी-संतान को नीति चरित्र, कर्तव्य की ऐसी व्यावहारिक शिक्षा देना कि वह महान् उत्तरदायित्व का पालन कर सके, समाज की सबसे बड़ी सेवा है।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये वेद ने पहला साधन यह बतलाया है कि “तन्तु तन्वन् रजसो भानुमिन्विहि” अर्थात् “तुम साँसारिक कार्यों को करते हुए सदैव प्रकाश (ज्ञान) का आश्रय लो।” जो कार्य ज्ञान पूर्वक किया जाएगा उसका परिणाम कभी अशुभ नहीं हो सकता, उसका शुभ फल देर में या शीघ्र अवश्य मिलेगा। मनुष्य का पहला लक्षण ज्ञान ही है और मनुष्य तथा पशु में मुख्य अन्तर यही है कि पशु को ज्ञान, विवेक, बुद्धि नहीं होती। जो मनुष्य ज्ञान से काम नहीं लेता अथवा अज्ञान में रहना ही पसन्द करता है उसे मनुष्य की बजाय पशु कहना ही अधिक उपयुक्त है।
मनुष्यता को सार्थक करने के लिये दूसरा आदेश वेद ने यह दिया कि “ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्” अर्थात् जिन ज्योतिर्मय (ज्ञान अथवा प्रकाश) मार्गों से हम श्रेष्ठ कर्म करने में समर्थ हो सकते हैं, उनकी रक्षा की जाए। मनुष्य का काम केवल अकेले ही ज्ञान सम्पादन करने से नहीं चल सकता, वरन् उसको संसार में सर्वत्र ज्ञान प्रसार की चेष्टा करनी चाहिए। यदि बहुसंख्यक लोग अज्ञानी ही बने रहे तो उनके उल्टे सीधे कामों से ज्ञानियों को भी अवश्य कठिनाई में पड़ना होगा। मनुष्य केवल अपने कृतकर्मों का ही परिणाम नहीं भोगता वरन् जिस समाज में वह रहता है उसके सामूहिक कर्मों का प्रभाव उस पर अवश्य पड़ता है। मनुष्य स्वयं चाहे जैसी स्वच्छता से रहे अगर उसके आस-पास के अधिकाँश व्यक्ति गन्दे रहते हैं, दूषित पदार्थों का उपयोग कर वातावरण को बिगाड़ते हैं तो उसका कुप्रभाव न्यूनाधिक परिमाण में उस स्वच्छता वाले व्यक्ति को भी सहन करना पड़ेगा। इसलिये वेद ने आज्ञा दी है कि प्रकाश (ज्ञान) के मार्गों की इस प्रकार रक्षा की जाए कि जिससे सभी लोग उनका उपयोग करके श्रेष्ठ कार्य करने में समर्थ हो सकें।
ज्ञान के पश्चात् कर्म का नम्बर आता है। ज्ञान की आवश्यकता इसीलिये है कि मनुष्य जो कर्म करता है वह उचित और लाभदायक ढंग से किये जाएं। अगर हम ज्ञान की बातों को केवल सुनते और कहते ही रहें और कर्म के रूप में उनका उपयोग न करें तो हमारा वह ज्ञान “मिथ्या” अथवा व्यर्थ ही है। इसी बात को लक्ष्य में रखकर उपर्युक्त मन्त्र में “अनुल्बणं वयत जोगुवामयः” का उपदेश दिया गया है कि “कार्य में उपस्थित होने वाले विघ्नों को दूर करो अथवा ऐसी ज्ञान युक्त विधि से काम करो जिससे कार्य में विघ्न अथवा कठिनाइयाँ उत्पन्न न हों। मनुष्य जन्म लेकर कर्म तो करना ही पड़ेगा, उससे तो मनुष्य किसी दशा में छूट ही नहीं सकता। पर एक मनुष्य कार्य को ऐसे ढंग से करता है कि उससे उसका और दूसरों का भी लाभ होता है और कुछ ऐसे भी काम करने वाले हैं जो दूसरों का ही नहीं अपना भी अहित कर डालते हैं। संसार में “अपने पैरों पर आप ही कुल्हाड़ी मारने” वालों अथवा “जिस पेड़ पर चढ़े हैं उसी को काटने” वालों की कमी नहीं है। ऐसे ही अज्ञानी जन समाज में अव्यवस्था उत्पन्न होने का कारण बनते हैं और सार्वजनिक हित को हानि पहुँचाते हैं। मनुष्यत्व के सच्चे अभिलाषी व्यक्ति का परम कर्तव्य है कि वह स्वयं ऐसे समाज विरोधी कार्यों से बचे और दूसरों को भी उनसे दूर रखने की बराबर चेष्टा करता रहे।
जो मनुष्य इस वेदोपदेश को हृदयंगम करके ज्ञान-मार्ग पर चलें, उसी के अनुकूल कर्म करें, दूसरे लोगों में भी ज्ञान का प्रचार करें और तदनुकूल जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दें, वे ही मनुष्य नाम के अधिकारी हो सकते हैं। मनुष्य का सर्वोच्च कर्तव्य और लक्षण “परोपकार” बतलाया गया है और उनके लिये सम्यक् ज्ञान का होना अनिवार्य है। जो मनुष्य नियम पूर्वक लगातार इस मार्ग पर चलता रहेगा और अपनी शक्ति तथा सामर्थ्य का उपयोग अपने साथ ही अपने संपर्क में आने वाले समस्त लोगों के हितार्थ करता रहेगा तो वह समय आने पर “मनुष्य” से उठकर ‘देवत्व’ के दर्जे में पहुँच जाएगा। इस प्रकार का ‘देवत्व’ किसी के कहने-सुनने अथवा उपाधि प्रदान करने से नहीं मिल सकता, वरन् उसका साधन सतत् सत्य-मार्ग का अनुयायी बना रहना और परोपकार का पूर्ण ध्यान रखना ही है। ऐसे ही देवत्व को प्राप्त मनुष्य अपने आचरण, मनोबल और शुभ संकल्पों के प्रभाव से अपनी सन्तान को अपने से भी अधिक शुभ गुण सम्पन्न बनाकर जनता के लिये मार्ग-दर्शक ‘देवों’ का निर्माण करने में समर्थ हो सकते हैं।
(श्री भगवानसहाय वशिष्ठ)
महापुरुषों के जीवन चरित्रों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि जीवन में एक सहायक, सच्चा मित्र, सहयोगी उनका आत्मविश्वास रहा है। विश्व में जो भी विकास हुआ है वह आत्मविश्वास की ही देन है। संसार के आविष्कारकों, वैज्ञानिकों, महा-पुरुषों, राजनीतिज्ञों एवं धनपतियों के जीवन का अध्ययन किया जाए तो मालूम होगा कि उनका कितना विरोध हुआ, साधनों का अभाव, सहयोग की कमी, फिर भी उन्होंने अपने आत्म-विश्वास के बल पर महान कार्यों का सम्पादन किया। महात्मा गाँधी का ही उदाहरण लीजिए जिन्होंने आधी दुनिया पर छाये ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा लेकर उसे भारत से निकाल दिया। महात्मा ईसा के आत्म-विश्वास का ही फल है कि आधी से अधिक दुनिया में ईसाई धर्म फैला हुआ है। तात्पर्य यह है कि आत्मविश्वास की जीवन-ज्योति के अभाव में मनुष्य का एक कदम आगे बढ़ना भी असम्भव है।
प्रातः होती है सूर्य अपनी स्वर्णिम किरणों से जगत पर चमक उठता है। वह बढ़ता जाता है और आकाश के मध्य अपने प्रचण्ड प्रकाश से विश्व को आलोकित कर नवजीवन देता है। किन्तु उसकी मूक प्रेरणा को कभी आपने सुना है। वह प्रातः आकर दरवाजा खटखटाता है और कहता है। ‘उठो, जागो, आगे बढ़ो मेरी तरह तुम भी अपने प्रकाश से प्रकाशित होओ।’ नदी कहती है “आगे बढ़ो अपने क्षुद्र एवं सीमित स्वरूप का त्याग करके विराट का वरण करो।’ पुष्प कह रहे हैं “अपने जीवन की सुरभित कलियों को विकसित करो और मधुर मुस्कान लिए हुए खिल उठो।” इसमें कोई सन्देह नहीं कि मनुष्य का विकास, उत्थान, प्रगति और सफलता ठीक उसी प्रकार सत्य और स्वाभाविक है जैसे सूर्य का प्रचण्ड प्रकाश, नदी को विराट की प्राप्ति, पुष्प का सौंदर्य। किन्तु आत्मविश्वास के अभाव में मनुष्य इन्हें दुर्लभ समझ कर अपनी गति कुँठित कर लेता है। अपने आपको हीन समझकर अपने सत्यस्वरूप को भुला देता है। आत्मविश्वास हीनता की भावना उसे निष्क्रिय और जड़ बना देती है, जो जीवन के मौलिक स्वरूप से विपरीत है, मृत है, नश्वर है।
जीवन देश काल परिस्थिति की सीमा से रहित है। हमारे पूर्वजों ने भूत में जो प्राप्त किया उससे अधिक हम प्राप्त कर सकते हैं। और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ उससे भी अधिक। उदाहरणार्थ कुछ समय पहले आज के युग की कल्पना एक स्वप्न मात्र थी। 16वीं शताब्दी का मनुष्य रेलों, विमानों, बड़े-2 यन्त्रों, वैज्ञानिक अनुसंधान, विश्व के राष्ट्रों की मैत्री और पड़ोसी का सा सम्बन्ध आदि को एक स्वप्न और कल्पना मानता था। पर प्रगति के पथ पर चलते हुए मनुष्य ने उन सब बातों को संभव कर लिया। यह क्रम आगे भी जारी रह सकता है और हम निरन्तर अधिकाधिक उन्नति की ओर अग्रसर हो सकते हैं। आशान्वित व्यक्ति ही जीवन की यथार्थता से लाभ उठा सकता है। अनंत आशावानों के बल पर ही संसार का भव्य भवन आधारित है। मनुष्य की भविष्य में सफलता, विकास, निश्चित है, निर्भ्रान्त है। मनुष्य की शक्ति और सत्ता अपरिमित है।
भविष्य के प्रति स्वर्णिम स्वप्न भी मनुष्य जीवन की प्रगति के प्रमुख आधार है। इन स्वप्नों में अनन्त अमृत भरा रहता है जिससे मनुष्य को उत्साह, महत्वाकाँक्षा, रुचि, प्राण रस एवं नवजीवन प्राप्त होता है। आकाँक्षाओं, अभिलाषाओं के भाव-चित्र ही जीवन तथा सृष्टि की कुरूपता का परिमार्जन कर उसे स्वस्थ, निखरा एवं विकसित रूप देते हैं। छोटे-2 भाव-स्वप्नों से ही इतिहासों में नये मोड़ पैदा होते हैं, संस्कृतियाँ बदलती हैं, समाज के ढाँचे बदलते हैं, दुनिया का असौंदर्य दूर किया जाता है। किन्तु इनके साथ-साथ कर्म का संयोग होना आवश्यक है। जब तक कर्म और अपनी आकाँक्षाओं का स्वर्णिम स्वप्नों का समन्वय नहीं होता तो ये केवल मानसिक विकार ही रह जाते हैं। जिन्होंने अपने रंगीन विचारों में कर्म का पुट दिया है उन्होंने नव निर्माण किया है। कर्म पर जुटे रहना आवश्यक है। उठकर चले बिना मंजिल का पाना असम्भव है। भले ही मंजिल पास हो या दूर-भव्य हो, या सुन्दर।
महान् आत्मविश्वास, भविष्य के प्रति सुन्दर आकाँक्षायें लेकर जीवन पथ पर अग्रसर होने मात्र से ही काम न चलेगा। जीवन कोई रेल का इंजिन नहीं है जो लोहे की समतल पटरियों पर बिना किसी रुकावट के अगले स्टेशन पर पहुँच जाएगा। नदी को अपने लक्ष्य समुद्र की ओर बढ़ने में कितने पहाड़ों, वन-उपवनों, मैदान, धरती को पार करना पड़ता है। कहीं रुकावट पड़ती है तो अपना मार्ग स्वयं बनाती है, कहीं मुड़ती है, पता नहीं कितने विघ्नों, अवरोधों, रुकावटों को सहन कर वह अपने लक्ष्य पर पहुँचती है। ठीक इसी प्रकार जीवन का मार्ग, आदि से अंत तक कठिनाइयों का मार्ग है। उसमें पद-पद पर विघ्नों का सामना करना पढ़ता है। उसमें प्रतिक्षण विरोधी शक्तियों से प्रतियोगिता होती रहती है यही जीवन संघर्ष है। संसार में ऐसा कोई मार्ग नहीं है जो पूर्णरूपेण आपदाशून्य हो। हर यात्री को जीवन पथ में विघ्न, बाधाओं, विरोधों का सामना करना ही पड़ेगा।
मनुष्य की आकृति से पता चलता है कि उसे रुकने के लिए नहीं, आगे बढ़ने के लिए ही बनाया गया है। एक महापुरुष ने कहा है “यदि मनुष्य को ईश्वर ने पीछे हटने के लिए बनाया होता तो उसकी आँखें सिर के आगे न बनाकर पीछे की तरफ बनाता।”
यदि विघ्न बाधाएँ आती हैं, आपको झटका-मारती हैं, तो आप गिर जाते हैं हिम्मत पस्त हो जाते हैं किन्तु इससे काम नहीं चलेगा। गिरकर भी उठिये फिर चलने का प्रयास कीजिए। एक बार नहीं अनेकों बार आपको गिरना पड़े किन्तु गिर कर भी उठिये और आगे बढ़िये। उस छोटे बालक को देखिये जो बार-बार गिरता है किन्तु फिर उठने का प्रयत्न करता है और एक दिन चलना सीख जाता है। आप की सफलता, विकास, उत्थान भी उतना ही सुनिश्चित है। अतः रुकिए नहीं, उठिए। ठोकरें खा कर भी आगे बढ़िये, सफलता एक दिन आपका स्वागत करने को तैयार मिलेगी।
आने वाले विघ्नों, कठिनाइयों में भी अपना धर्म न छोड़ें। स्मरण रखिये प्रत्येक विघ्न-बाधा का सर्व प्रथम आघात आपके उत्साह आशा और भविष्य के प्रति आकर्षण पर होता है। इनका सीधा वार आपके हृदय पर होता है किन्तु कहीं आपका हृदय टूट नहीं पाये, इसके लिए यह सोच लीजिए कि जिस प्रकार घोर अन्धकार के बाद सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है उसी प्रकार आपका उज्ज्वल भविष्य प्रकाशित होने वाला है। अमावस की काली रात के पश्चात् चन्द्रमा की चाँदनी सहज ही फूट पड़ती है। आज का कठिन समय भी गुजर जाएगा, इसे हृदयंगम कर लीजिए। अपने आशावादी दृष्टिकोण, आकाँक्षाओं, उत्साह की सम्पत्ति को यों ही न खोइये। उनका बचाव कीजिए और प्रगति के पथ पर आशा और उत्साह के साथ आगे बढ़ते ही जाइये।
(स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती)
मनुष्य दूसरों की दृष्टि में कैसा जँचता है, इसका बहुत कुछ आधार उसके अपने व्यक्तित्व पर निर्भर रहता है। लोग विद्या पढ़ने, धन कमाने, पोशाक और साज सज्जा बनाने पर तो ध्यान देते हैं, पर अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने की दिशा में उपेक्षा ही बरतते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जितना महत्व योग्यता और सम्पदा का है उससे कम मूल्य व्यक्तित्व का नहीं है।
व्यक्तित्व का प्रभावशाली होना बड़ी से बड़ी सम्पदा या योग्यता से कम मूल्य का नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को किसी से विशेष स्वार्थ या लगाव है तो बात दूसरी है, नहीं तो यदि कोई किसी से प्रभावित होता है तो उसका मूल आधार उसका व्यक्तित्व ही होता है। शरीर का सुडौल या रूपवान् होना, दूसरों को कुछ हद तक प्रभावित करता है, वस्तुतः सच्चा प्रभाव तो उसके उन लक्षणों का पड़ता है जो उसके मन की भीतरी स्थिति के अनुरूप क्रिया और चेष्टाओं से पल-पल पर झलकते रहते हैं।
यदि भीतर की मानसिक स्थिति दुर्बल, अपरिपक्व एवं हीन है तो उसका परिचय स्वभाव एवं आदतों में तुरन्त दिखाई देगा। जरा-जरा सी बात पर उत्तेजित हो उठना, लाल-पीला हो जाना, कटु वाक्य कहने लगना या दूसरों पर उग्र शब्दों में दोषारोपण करने लगना, इस बात का चिन्ह है कि यह मनुष्य बहुत उथला और ओछा है। जीवन में प्रिय और अप्रिय प्रसंग आते रहते हैं, संसार में भले और बुरे सभी तरह के लोग हैं, हर आदमी के अन्दर कुछ बुराई और कुछ अच्छाई है, यह समझते हुए जो लोग अपने मस्तिष्क को सन्तुलित रखते हैं वे ही बुद्धिमान हैं। जो लोग छोटी-छोटी बातों को बहुत बड़ी मान बैठते हैं वे ही अधीर और उत्तेजित होते हैं। खिन्नता, निराशा, आवेश या उत्तेजना उन्हें ही आती है। यदि हमारा मानसिक स्तर उथला न हो, उसमें आवश्यक संजीदगी और गंभीरता हो तो आवेश आने का कोई कारण नहीं, वह हर अप्रिय परिस्थिति का भी मूल्याँकन करेगा। वह इस विविध विचित्रता युक्त विश्व की अनेक विचित्रताओं में अपने सामने उपस्थित विपन्न परिस्थिति को भी एक मामूली बात मानेगा ओर परेशान होने की अपेक्षा उसका कोई शान्तिमय समाधान ढूंढ़ेगा। ऐसे लोग बहुधा गम्भीर देखे जाते हैं। गम्भीरता एवं शास्त्रीयता प्रभावशाली व्यक्तित्व का सबसे बड़ा आधार है। जो लोग आवेश में नहीं आते, गम्भीर रहते हैं उनकी संजीदगी दूसरों की दृष्टि में उनका मूल्य बढ़ा देती है।
जल्दबाजी, क्षणिक विचार, अभी यह, अभी वह, अभी क्रोध, अभी प्यार, अभी प्रशंसा, अभी निन्दा, अभी विरोध, अभी समर्थन, ऐसे अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त स्वभाव का होना इस तथ्य का द्योतक है कि यह व्यक्ति भीतर से पोला है, इसका कोई सिद्धान्त नहीं, अपनी कोई निर्णय शक्ति नहीं, जब जो बात समझ में आ जाती है तब वही कहने या करने लगता है। इस प्रकार के ओछे व्यक्ति दूसरों की आँखों में अपना कोई स्थान नहीं बना सकते।
हर वक्त शंकित रहने वाले, प्रत्येक काम में कोई नुक्स निकालने वाले, हर किसी की आलोचना करने वाले, छिद्रान्वेषी व्यक्ति अपनी आन्तरिक दुर्बलता का परिचय देते हैं। भय और शंका जिनके मन में जम जाते हैं वे हर वक्त डरते रहते हैं, असफलता, गन्दगी और आशंका ही हर तरफ उन्हें दिखाई देती है। वे अपने लिये कोई काम चुन नहीं पाते। जो करते हैं उसमें सन्तुष्ट नहीं रहते, अपने काम को तुच्छ, निन्दनीय, हानिकारक मानते हैं और उसे छोड़ने की बात बार-बार कहते रहते हैं। छोड़ भी नहीं पाते। क्योंकि नया कदम उठाने लायक साहस उनमें नहीं होता। पुराने को ठीक तरह कर नहीं पाते। कर तो तभी पावें जब उसकी श्रेष्ठता और सफलता पर उन्हें विश्वास हो! अधूरे विश्वास पर अवलम्बित कार्य जैसे लंगड़े-लूले रहते हैं वैसे उनके हर काम होते हैं। इन स्थितियों का परिचय जिन्हें है वे ऐसी मनोभूमि के व्यक्ति को ओछा आदमी ही मानेंगे और कभी उसका सम्मान न करेंगे।
ओछे आदमी का एक चिन्ह यह है कि वह अपने बारे में ही सदा सोचता रहता है। अपना लाभ, अपनी हानि, अपनी भूल, अपना भविष्य, अपनी कठिनाई, अपना न्याय, अपना स्वास्थ्य, अपनी प्रतिष्ठा, अपना दुर्भाग्य, अपना स्वर्ग, अपनी मुक्ति आदि बातें ही उसके चिन्तन का मुख्य विषय होती हैं। दूसरों से जब भी बात करेगा अपना रोना रोवेगा, अपनी शेखी मारेगा। वह यह भूल जाता है कि दूसरों को तुम्हारे रोने गाने सुनने की न तो फुरसत है और न उसमें कोई दिलचस्पी। हर आदमी अपनी जिम्मेदारियों से लदा हुआ है, उसे दूसरे की सहानुभूति या सहायता चाहिए। यह जानते हुए भी जो लोग अपनी राम कहानी ऐसे लोगों को सुनाते हैं जो उसको हल नहीं कर सकते तो ऐसा सुनाना एक प्रकार से उनका समय नष्ट करना ही है। ऐसे सिर खाऊ लोगों को भला कौन पसन्द करेगा?
दूसरों में दिलचस्पी लेना और अपने बारे में आत्म-चिन्तन की दृष्टि से एक नियत समय पर ही थोड़ा सोचना उचित है। हर घड़ी अपने बारे में सोचते रहने वाले लोग स्वार्थी समझे जाते हैं, उन्हें दूसरे लोग उपेक्षणीय एवं तिरस्कार के योग्य ही समझते हैं। प्रभावशाली व्यक्ति बनने के लिये यह आवश्यक है कि हम दूसरों की दृष्टि में अपस्वार्थी सिद्ध न हों। दूसरों में दिलचस्पी लेकर सामाजिक प्राणी बन कर ही कोई व्यक्ति दूसरों को अपनी उदारता से प्रभावित कर सकता है और तभी बदले में हमें दूसरों का प्रेम, आदर एवं सहयोग मिल सकता है। अपने मतलब में चौकस रहने वाले, अपने ही सुख की फिराक में रहने वाले व्यक्ति, दूसरों की सद्भावना से वंचित रहते हैं, फलस्वरूप वे कुछ भी उन्नति नहीं कर पाते।
आलस, गन्दगी और अव्यवस्था भी ऐसे दुर्गुण हैं जो यह साबित करते हैं कि यह व्यक्ति अपने आप से लापरवाह है। जो अपने समय की, सामान की, शरीर की, वस्त्रों की, कार्यक्रमों की व्यवस्था नहीं कर सकता या नहीं करना चाहता, उसे जीवट का, जोरदार, सावधान या चैतन्य नहीं कहा जा सकता। ढीले-पोले, अस्त-व्यस्त स्वभाव के लोग वस्तुतः इसी लायक हैं कि उन्हें दूसरे आदमी हल्की निगाह से देखें। अपना चलना, उठना, बैठना, कपड़े पहनना, हजामत, बातचीत सभी में एक व्यवस्था, तेजी तथा सावधानी हो, तभी किसी की आँखों में हम सतर्क, सावधान एवं प्रगतिशील जँच सकते हैं।
यह बातें देखने सुनने में मामूली हैं पर अपनी मानसिक स्थिति का परिचय इन्हीं से दूसरों को मिलता है और वे इसी आधार पर हमारे ओछेपन एवं बड़प्पन को तौलते हैं।
मनुष्य जाति दो पहियों से चलने वाली गाड़ी के समान है। यदि दोनों पहियों में समानता हो तो गाड़ी ठीक प्रकार चलती है। इन पहियों में थोड़ा अंतर हो तो किसी प्रकार काम भी चल सकता है, पर वह अंतर यदि बहुत ज्यादा हो, एक पहिया बहुत बड़ा और दूसरा बहुत छोटा हो तो गाड़ी ठीक प्रकार न चल सकेगी। किसी प्रकार कुछ घिसट भी सकी तो उसे गाड़ी की सफलता एवं सार्थकता न कहा जाएगा।
स्त्री और पुरुष दोनों के सुविकसित होने से गृहस्थ की गाड़ी ठीक प्रकार चलती है। पर आज नारी की उपेक्षा करके पुरुष की ही सफलता को पर्याप्त मान लिया गया है। नारी के जिम्मे जो काम छोड़े गये हैं वे धन की प्रधानता वाले इस समाज में तुच्छ माने जाते हैं और यह अनुभव किया जाता है कि इनके लिए नारी का सुशिक्षित या सुसंस्कृत होना आवश्यक नहीं है। कामसेवन, संतानोत्पादन, शिशुपालन, भोजन बनाना, गृहव्यवस्था यह मोटे-मोटे चार काम उसके जिम्मे दिखाई पड़ते हैं। पर सबसे बड़ा वह कार्य किसी की दृष्टि में नहीं है कि वह परिवार के प्रत्येक व्यक्ति के बालक से लेकर वृद्ध तक के, मन को उल्लास एवं आनन्द से भरे रह सकती है और उनके अन्तःस्थल को छूकर मानवता के सभी आवश्यक गुणों को विकसित कर सकती है। नारी की महानता का वास्तविक पहलू यही है।
यदि उपरोक्त चार कामों पर भी दृष्टिपात किया जाए तो वे भी ऐसे तुच्छ या उपेक्षणीय नहीं हैं कि उनके लिए घटिया मानसिक स्तर की नारी को ही पर्याप्त मान लिया जाए। सन्तानोत्पादन में नारी का दायित्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है, वह अपने शरीर में से बालक का शरीर और अपने स्वभाव में से बालक का स्वभाव बनाती है। यदि उसका शरीर निरोग न हो, यदि उसका मस्तिष्क विकसित न हो, यदि उसका स्वभाव सुसंस्कृत न हो तो निम्न स्तर की, गिरे स्वास्थ्य वाली, दुर्गुणी, मूर्खा, फूहड़ नारी लगभग उसी स्तर के बालक उत्पन्न करेगी। यों कहने को वह सन्तान उत्पन्न करती रहेगी पर उस प्रजनन से परिवार की न तो शोभा बढ़ेगी न कीर्ति न समृद्धि। वरन् पूर्वजों की संचित कीर्ति और सम्पत्ति में पलीता लगाने वाली ही सिद्ध होगी।
काम सेवन जैसे तुच्छ विषय को ही लीजिए। उसकी सार्थकता भी केवल रूप यौवन पर निर्भर नहीं है वरन् अन्तःकरणों की एकता एवं सच्ची आत्मीयता पर ही निर्भर है। और यह दोनों बातें उन्हीं नर-नारियों में संभव हैं जिनकी मनोभूमि का समुचित विकास हुआ। अन्यथा केवल वह सब इन्द्रिय विकार का एक भौंड़ा अभिनय मात्र रहेगा। पशु पक्षियों में भी काम सेवन होता है, उसमें आनंद केवल इन्द्रिय द्वारों तक ही सीमित रहता है। परस्पर प्रेमभाव बढ़ाने या एक दूसरे को अन्तः आदान प्रदान करने से उस क्रिया का उनके लिए कुछ भी महत्व नहीं होता। काम सेवन के बाद ही वे दोनों साधारण सी बात पर लड़ने-मरने को तैयार हो जाते हैं। यदि मनुष्य की मनोभूमि भी वैसी ही निम्न कोटि की हो तो उस काम सेवन प्रक्रिया में उन कुछ क्षणों तक एक पाशविक सुखानुभूति इन्द्रिय द्वारों तक रहेगी। इतने मात्र से मानव अन्तःकरण कदापि संतुष्ट नहीं हो सकता। इन्द्रिय विकार की उत्तेजना में आत्मिक तन्मयता एवं एकता की जो अनुभूति है वही कामसेवन की सफलता है। इस सुख की आवश्यकता अनुभव करने और उसके योग्य मनोभूमि बनाने का कार्य विकसित अन्तःकरणों का है-कामी एवं विषयों लोगों का नहीं। इस दृष्टि से भी अविकसित नारी पर्याप्त नहीं। कामवासना में यदि कुछ आनन्द है तो उसकी अनुभूति विकसित अन्तःकरण वाले नर-नारी ही कर सकते हैं। नारी को अविकसित, असंस्कृत रखकर जो काम वासना का रसास्वादन करना चाहते हैं वे गलती पर ही हैं।
शिशु पालन साधारण कार्य नहीं है। नन्हे से बालक का शरीर अत्यन्त कोमल होता है, उसे ठीक तरह बढ़ने देने के लिए संतुलित दिनचर्या, आहार एवं नियमों का पालन आवश्यक है। इसे सुशिक्षित नारी ही समझ सकती है। गर्भावस्था के दिनों से ही शिशु-पालन शुरू हो जाता है। बालक को क्या खिलाना और कैसी मनः स्थिति से रखना, इसका समुचित ज्ञान होने के लिए शरीर शास्त्र, आरोग्य शास्त्र, आहार शास्त्र एवं मनोविज्ञान शास्त्र का ज्ञान होना आवश्यक है, ताकि उसी आधार पर जननी अपने आहार विहार को व्यवस्थित करके गर्भस्थ बालक का निर्माण और पोषण आरम्भ करे। यह कार्य फूहड़ स्त्रियाँ नहीं कर सकतीं। उन्हें इन विषयों का ज्ञान ही नहीं है तो कैसे जान पायेंगी कि उनकी किन शारीरिक और किन मानसिक क्रियाओं का बालक पर क्या असर पड़ेगा?
जन्म होने के पश्चात् कई वर्ष तक बालक की पूरी-पूरी सावधानी रखनी होती है। इसी सावधानी के आधार पर बालक की शारीरिक और मानसिक प्रगति सम्भव है। इस सम्बन्ध में क्या करना, क्या न करना इसका ज्ञान न हो तो बेचारी जननी क्या करे? उलटा सीधा जो उसकी समझ में आता है करती रहती है, फलस्वरूप उनकी अज्ञानता बालकों को रोगग्रस्त कर देने या मृत्यु के मुख तक पहुँचा देने का भी कारण होती है। पाश्चात्य देशों के बालक हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर होते हैं, न रोते हैं, न बीमार पड़ते हैं वरन् कमल के फूल की तरह उठते और खिलते चले आते हैं! दूसरी ओर भारतवर्ष है जहाँ बालक जन्म से ही रोगी रहने का अभिशाप लेकर आते हैं। उनका ठीक प्रकार पोषण गर्भावस्था में न हुआ तो नींव वहीं से कमजोर हो कर आती है। फिर जन्म के बाद अज्ञानता पूर्ण पालन पोषण के कारण उन्हें दस्त, नाक बहना, ज्वर, जिगर, तिल्ली, सूखा, अफरा, आँखें दुखना, रोना, चेचक पड़ना आदि न जाने कितने रोग लग जाते हैं। उपचार ज्ञान न होने से स्त्रियाँ भूत पलीत, दई देवता और भी न जाने क्या टंट घंट करती रहती हैं फलस्वरूप बच्चे मृत्यु के मुख में सरकते रहते हैं। भारत की बाल मृत्यु संख्या संसार में सबसे अधिक है। इसका एकमात्र कारण हमारी नारी की अविद्या ही है। पाश्चात्य देशों में जहाँ नारी सुविकसित है बच्चों के रोगी रहने की, बाल मृत्यु की समस्या नाम मात्र को ही दिखाई देती है।
भोजन की उपयोगिता लोग भूख बुझाने और जायका चखने के लिए समझते हैं। इसी दृष्टि से भोजन की किस्में चुनी और पसन्द की जाती है। पर वस्तुतः भोजन मनुष्य के जीवन-मरण का प्रश्न है। उसका रक्त, माँस, वीर्य, मस्तिष्क, आरोग्य, आयुष्य सभी कुछ भोजन पर निर्भर है। इस महत्वपूर्ण कार्य को हाथ में लेने वाले व्यक्ति को आहार विहार विज्ञान की विस्तृत जानकारी होनी चाहिए, ताकि वह केवल उपयोगी पदार्थों का आरोग्य की दृष्टि से ही चुनाव करे और स्वाद लगने वाली किन्तु हानिकारक वस्तुओं का रसोई में से बहिष्कार कर सके। इस ज्ञान के अभाव में अंट-शंट चीजें केवल स्वाद की दृष्टि से हमारी रसोई में स्थान पाती हैं। खर्च भी बढ़ता है, पेट भी खराब होता है और रोगों का भी शिकार बनना पड़ता है। इसी प्रकार पकाने की विद्या भी एक विशेष विद्या है। इसकी जानकारी के बिना बहुमूल्य लाभदायक वस्तुएँ जल-भुनकर कोयला मात्र, लाभ रहित बना दी जाती हैं। रबड़ी या खोया, दूध का कोयला मात्र है। दूध में जो पोषक जीवन-तत्व थे, वे सभी जलाने-भुनाने पर नष्ट हो जाते हैं केवल कोयला बचता है उसे ही लोग स्वादिष्ट मान कर चाव से खाते हैं। इसी प्रकार तेल, घी में तली-भुनी चीजें अपने स्वाभाविक जीवन तत्वों से वंचित हो जाती हैं। पैसा भी लगा और उपयोगिता भी हाथ से गई, यह दुहरी हानि पाक विद्या का शास्त्रीय ज्ञान न होने से ही होती है। गृहिणी यदि पाक-विद्या का वैज्ञानिक पहलू जानती हो तो स्वाद की अधिक चिन्ता किए बिना भोजन को अमृत रूप बना सकती है और उससे घर के सभी लोगों को निरोग, हृष्ट-पुष्ट एवं दीर्घजीवी बनाने में अत्यन्त महत्वपूर्ण योग दे सकती है। पर यह संभव तभी है जब नारी सुविकसित हो। अविद्या के अन्धकार में भटकने वाली बेचारी बेबस नारी जिसे दीन दुनिया का कुछ पता ही नहीं है केवल ढर्रे पर चलती रह सकती है, फिर उसका परिणाम जो भी हो सो होता रहे।
गृह व्यवस्था का कार्य भी छोटा नहीं है। उसके भी उतने ही विभाग हैं, जितने किसी राज्य सरकार के होते हैं। प्रत्येक विभाग पर समुचित ध्यान देने लायक जिनके मस्तिष्क हैं वे ही राज्य सरकार को कारखाने को, व्यवसाय को, संस्था को चला सकते हैं और उन्हीं के सुप्रबन्ध में गृहस्थ की व्यवस्था भी चल सकती है। काम छोटा हो या बड़ा हो, दोनों को ठीक तरह पूरा करने के लिये सुविकसित मस्तिष्क चाहिए। इसके बिना अविकसित मस्तिष्क जहाँ भी रह रहे होंगे, वहीं अव्यवस्था फैल रही होगी। गृहिणी का मानसिक स्तर यदि विकसित न हो तो वह घर के प्रबन्ध में बात-बात में भूल करेगी और हर कार्य में संभाल की अपेक्षा बिगाड़ ही होगा। गृह व्यवस्था के अनेक विभाग होते है। प्रत्येक में यदि थोड़ा-थोड़ा भी नुकसान हो तो सब मिलाकर काफी नुकसान हो जाता है। महीने या साल की गिनती की जाए कि कुल कितना नुकसान हुआ, इसका अन्दाज लगाया जाए और यह देखा जाए कि दूसरी सुयोग्य गृहिणी ने अपनी कुशलता से कितनी सँभाल एवं किफायत की तो पता चलेगा कि दोनों की मानसिक स्थिति के अन्तर ने घर की आर्थिक स्थिति तथा अन्य परिस्थितियों को बनाने व बिगाड़ने में काफी योगदान दिया है।
भारतीय नारी की वर्तमान दुरवस्था प्रत्येक दृष्टि से अवाँछनीय है। उससे हमारी पारिवारिक एवं वैयक्तिक परिस्थितियों में ही विपन्नता नहीं आती वरन् सामाजिक जीवन पर भारी दुष्प्रभाव पड़ता है। जितनी संख्या पुरुषों की है उतनी ही स्त्रियों की भी है। जैसे हाथ, पाँव, आँख, कान, मन और मस्तिष्क पुरुषों के हैं वैसे ही स्त्रियों के भी हैं। जब पुरुष अपने पुरुषार्थ से इतना उपार्जन, निर्माण, प्रबन्ध एवं संघर्ष कर सकता है तो नारी भी कुछ न कुछ कर ही सकती है। गृह व्यवस्था को सँभालने के बाद भी उसके पास कुछ न कुछ क्षमता बचती ही है और उसका कुछ न कुछ उपयोग हो ही सकता है। इसके द्वारा राष्ट्र की सामर्थ्य और सम्पत्ति बढ़ ही सकती है। वे गृह उद्योगों में अपने बचे हुए समय को लगाकर या परिवार के अर्थ तन्त्र में किसी न किसी प्रकार का योगदान देकर परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने एवं राष्ट्र की सम्पत्ति को बढ़ाने में सहायता कर सकती हैं। करोड़ों नारियाँ जो अपना आधे से अधिक समय बेकार गँवाती हैं यदि उसका सदुपयोग कर सकें तो अरबों रुपयों की समृद्धि बढ़ सकती है।
जिस अविकसित स्थिति में नारी आज पड़ी है उसमें सुधार आरम्भ कर दिया जाए तो वह थोड़े दिनों में कुछ से कुछ बन सकती है। जब कि वे कैदी की तरह बन्द रहने और महत्वपूर्ण कार्यों की क्षमता से वंचित रहने के लिए विवश हैं तो उनसे कुछ आशा नहीं की जा सकती पर यदि उन्हें अवसर मिले तो पुरुषों की भाँति अगणित नारियाँ भी ऐसी निकलेंगी जो अपनी स्वाभाविक प्रतिभा से संसार को आश्चर्यचकित कर दें। अभी पिछले ही दिनों लंका की प्रधान मंत्री श्रीमती भण्डारनायके बनी हैं। यह प्रतिभा करोड़ों नारियों में मौजूद है पर उसे विकसित न होने देकर हम अपना उनका और सबका केवल अहित ही करते हैं।
यदि नारी को घर की चार दीवारी से बाहर जाकर संसार और समाज को समझने एवं आवश्यक अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिले तो वह प्रत्येक क्षेत्र में अपनी कुशलता का परिचय दे सकती है। यदि उसे समुचित शिक्षा मिले तो वह अपनी बौद्धिक क्षमता से परिवार के लिए एक श्रेष्ठ मन्त्री का काम कर सकती है। बच्चों की शिक्षा दीक्षा का बहुत काम वह स्वयं कर सकती है। यदि उसे आवश्यक शिक्षा और वातावरण प्राप्त होते तो हमारी सामाजिक प्रगति जो रुकी पड़ी है उसको वह आसानी से आगे बढ़ा सकती है।
संसार के अन्य देशों में जहाँ नारी को अवसर मिला है उसने शिक्षा, साहित्य, उद्योग, शासन, विज्ञान, समाज सेवा आदि विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है और जिन चार कार्यों को नारी के लिए भारतवर्ष में पर्याप्त माना जाता है उन्हें करते हुए भी अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं राष्ट्रीय सुख शान्ति को बहुत बड़ी मात्रा में बढ़ाया है। संसार के जिन देशों ने नारी उत्थान के द्वार खोले, उन्हें पुरुषों के समान ही शिक्षा दीक्षा एवं मनुष्य के स्वाभाविक अधिकारों को प्राप्त करने का अवसर दिया उन्होंने इस बुद्धिमत्ता का परिचय देकर कुछ खोया नहीं वरन् पाया ही है।
भारत का प्राचीन आदर्श नारी के प्रति असीम श्रद्धा और सम्मान का रहा है। वे हर क्षेत्र में पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिला कर साथ-साथ बढ़ती और बढ़ाती रही है। मध्य काल के अज्ञानान्धकार युग में जहाँ अनेक अव्यवस्थाएँ हमारे देश में फैलीं वहाँ नारी की प्रगति में अवरोध भी एक संकट के रूप से पनपा। अब समय आ गया है कि हम अपनी उस भूल को सुधारें नारी के विकास की आवश्यकता को अनुभव करें और इसके लिए सच्चे मन से प्रयत्नशील बनें।
(श्री चूड़ामन मोतीलाल मुन्शी)
‘सुर नर मुनि सब की यह रीती।
स्वारथ लाग करें सब प्रीती॥’
लोगों की दृष्टि में स्वार्थ बुरा समझा जाता है, परन्तु स्वार्थ बुरा नहीं है। स्वार्थ का तात्पर्य है ‘अपना लाभ-अपना भला-अपना हित करना।’ दूसरे शब्दों में कहें तो यह हो सकता है कि ‘अपना हित करने की भावना से प्रेरित होकर किसी प्रकार का शारीरिक अथवा मानसिक श्रम करना।’ यदि हम शब्दकोष को उठाकर देखें तो हमें विदित होगा कि उसमें भी स्वार्थ अभिप्राय उपरोक्त ही बताया गया है। हम स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, हमारा जीवन सुख-शान्तिमय व्यतीत हो-ऐसा कौन नहीं चाहता? यह भावना हमारे भले की, हित की है और अपना भला या हित करना कोई पाप नहीं है, बल्कि यह कहा जाए कि ‘हमारा धर्म है’ तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इस बात का स्पष्टीकरण कर दिया है-’उद्धरेद त्मनात्मानं नात्मान मवसादयेत्।’ अर्थात् ‘मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार (भला) करे।’
सामान्यतः स्वार्थ के दो प्रकार माने गये हैं-(1) दूसरे को लाभ पहुँचाते हुए अपना भला (हित) करना और (2) दूसरे को हानि पहुँचा कर अपना भला करना। इसमें प्रथम को उच्चकोटि का (मानवोचित) स्वार्थ और द्वितीय को निम्नकोटि का अर्थात् स्वार्थ का ‘घृणित रूप’ कहा जा सकता है।
स्वार्थ करना मनुष्य का स्वभाव है, परमात्मा ने उसके मन की रचना इस प्रकार की है कि वह जब तक यह न जान ले कि ‘अमुक कार्य करने में मुझे लाभ है’ तब तक वह किसी भी प्रकार का कार्य करने को उद्यत न होगा। स्वभाव की इस परवश के कारण मनुष्य स्वार्थ करता है। यदि वह स्वार्थ न करे तो शायद उसका जीवित रहना असम्भव हो जावे। इसी प्रकार, मनुष्येत्तर पशु-पक्षी आदि भी स्वार्थ को अपनाते हैं। गाय को लीजिये, वह अपने बच्चे के अतिरिक्त किसी दूसरी गाय के बच्चे को दूध नहीं पिलायेगी। इसी तरह पक्षियों में भी स्वार्थ की वृत्ति पायी जाती है। वे अपने शिशुओं की सुरक्षा के लिए घोंसले बनाते और उनकी खुराक का प्रबन्ध करते हैं। तात्पर्य यह है कि सभी प्राणियों का स्वभाव स्वार्थी अर्थात् अपना हित करने का है। और वे बिना स्वार्थ किये रह ही नहीं सकते।
स्वार्थ की भावना का मूल अभिप्राय स्थायी सुख की चाहना है। सभी मनुष्य स्थायी सुख चाहते हैं। दुःख तो कोई लवलेश भी नहीं चाहता। मनुष्येत्तर प्राणियों में बुद्धि न होने के कारण वे स्थायी सुख प्राप्त करने में असमर्थ हैं, परन्तु परमात्मा ने मनुष्य को एक विशिष्ट गुण ‘बुद्धि’ प्रदान की है। इसलिए वह स्थायी सुख प्राप्त करने का अधिकारी है। इस सुख की खोज मनुष्य अनन्त काल से करता चला आ रहा है और इसके लिए उसने अनेकों साधन भी एकत्रित कर लिए हैँ परन्तु उसे फिर भी स्थायी सुख की प्राप्ति नहीं हुई।
मनुष्य बुद्धि प्रधान और सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी है। ऐसी दशा में उसका स्वार्थ निम्नकोटि का नहीं हो सकता। मनुष्य अपने स्वार्थ का उपयोग गलत ढंग से करता है, इसलिए वह सुख-शाँति से वंचित रहता है। स्वार्थ का सदुपयोग या दुरुपयोग हमारी बुद्धि पर निर्भर है। यदि हम स्वार्थ का सदुपयोग करें तो हमें अवश्य ही चिरस्थायी सुख की प्राप्ति हो सकेगी। जैसे चाकू को घरेलू काम में भी लाया जा सकता है और इसी चाकू से किसी की जान भी ली जा सकती है। उसी प्रकार स्वार्थ के विभिन्न उपयोगों से सुख और दुःख दोनों प्राप्त किये जा सकते हैं।
भाई, भाई की जायदाद हड़पने, दुकानदार ग्राहक का गला मसकने, सेठ अपने मुनीम को अल्प वेतन देकर अधिक काम कराने, बढ़िया माल की अपेक्षा घटिया माल देने, नकली माल को असली बताकर रुपया ऐंठने, साहूकार कर्जदार से अधिक ब्याज प्राप्त करने,कम पैसे में गिरवी का माल पचा जाने की नीयत से सम्पत्ति का बंधक-विक्रय करने, श्रमिकों से अधिक परिश्रम कराकर भी उन्हें यथोचित पारिश्रमिक न देने, चोरी-ठगी, छल-कपट, कालाबाजार झूठ-फरेब, भ्रष्टाचार, रिश्वत आदि के मामले आज के युग में प्रायः पग-पग पर देखे और सुने जाते हैं। यह सब निम्नकोटि के स्वार्थ-स्वार्थ के घृणित रूप हैं, और स्वार्थ का गलत ढंग से उपयोग करना है। सच पूछा जाए तो इसे स्वार्थ कहना स्वार्थ शब्द का अनादर करना है। इस प्रकार के व्यवहार से क्षणिक सुख की प्राप्ति भले ही हो, परन्तु स्थायी सुख की प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती। उसके साथ-एक बात और भी है कि इन कार्यों में दूसरों का अनहित होने के कारण प्रकृति के नियमानुसार हम दण्ड के भी भागीदार होते हैं। प्रकृति का यह अटूट नियम है कि ‘जैसा बोओगे, वैसा पाओगे।’ जैसे अब का एक दाना बोने पर लाखों दाने प्राप्त होते है, उसी प्रकार दूसरे का हित या अहित करने से उसका प्रतिफल अनेक गुना होकर उसी के अनुसार हमें प्राप्त होता है। एक विद्वान का कथन है कि ‘जो अन्य को हानि पहुँचा कर अपना हित चाहता है, वह मूर्ख अपने लिए दुःख के बीज बोता है।’
मनोविज्ञान का भी यह अटल नियम है कि दूसरों को हानि पहुँचाने के विचार अपनी ही हानि के विचारों में परिणत हो जाते हैं। अर्थात् हानि के विचार करने मात्र से वे हमें निश्चित ही हानि पहुँचा देते हैं। इससे यह सिद्ध है कि दूसरों को हानि पहुँचा कर हम जो स्वार्थ सिद्ध करते हैं तथा उससे जो क्षणिक सुख की प्राप्ति होती है, वह मिथ्या और कोरी दिखाऊ है, क्योंकि हमें ईश्वरीय नियम के अनुसार निश्चित ही दण्ड भुगतना पड़ता है। इसलिए दूसरों का अहित करने (स्वार्थ का दुरुपयोग करने) से हमारे स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती, हमारा भला, हित नहीं होता। अतः इस प्रकार का घृणित स्वार्थ त्याज्य है और उच्च कोटि का मानवोचित स्वार्थ ग्रहण करने योग्य है।
हम मानव हैं, इसलिये हमें मानवोचित कोटि का स्वार्थ करना चाहिए। यदि हम इहलोक, परलोक, स्वर्ग-नरक न भी मानते हों तो भी हमें निम्नकोटि का स्वार्थ तो किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए। व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो भी हमें वही करना चाहिए जो हम दूसरों से अपने प्रति करवाना चाहते हैं। हम अपने प्रति दूसरों से अपना हित करवाना चाहते हैं, इसीलिये हमें दूसरों का हित करना चाहिए। सच्चा स्वार्थ इसे ही कहा जा सकता है। हम बाजार से प्रत्येक वस्तु देख कर, चुन कर, अच्छी लेते हैं, उसी प्रकार हमें अपनी आत्मा के कल्याण के लिए, अपनी भलाई के लिये सत्य, दया, नेकी-भलाई, ईमानदारी आदि दैवी सम्पदा के अमूल्य गुण अवश्य ही लेने चाहियें। दैवी सम्पदा के गुणों को धारण करना ही उच्चकोटि का मानवोचित स्वार्थ है।
स्वार्थ का दुरुपयोग करने से अनेकों प्रकार के रोग मनुष्य को घेरे रहते हैं और मनुष्य जीवन भर बेचैनी का अनुभव करता हुआ दुर्गति को प्राप्त होता है। इतिहास के क्षेत्र में देखिए, सिकन्दर ने स्वार्थ का दुरुपयोग किया और छोटे-बड़े सभी राज्यों को पराजित कर सम्राट बन बैठा। इस स्वार्थ में सिकन्दर को क्या मिला? हत्या, शाप, परपीड़न और पाप! इसी पाप ने अन्त में सन्ताप का रूप धारण कर उसे दुर्गति के हवाले कर दिया और सिकन्दर के हाथ कुछ न आया। उसकी धन-दौलत माल-असबाब और उसकी सेना उसे निर्दयी काल के पंजे से न छुड़ा सकी। इसीलिए कहा है :-
“सिकन्दर जब गया दुनिया से, दोनों हाथ खाली थे।”
इसके विपरीत आध्यात्मिक क्षेत्र में कबीर, नानक, सूर, तुलसी आदि सन्तों को लीजिए, जिन्होंने सच्चे अर्थों में अपनी भलाई की खोज करके अपना और लोगों का कल्याण किया। आज भी इन सन्तों की रचनाएँ घर-घर में बड़े प्रेम और आदर के साथ पढ़ी और सुनी जाती हैं एवं हमें भलाई के मार्ग को प्रशस्त करने में सहायता प्रदान करती हैं। इन सन्तों के प्रति हमारे मन में प्रगाढ़ श्रद्धा भरी है। उनकी कीर्ति अजर-अमर है और भविष्य में भी रहेगी।
अतः यदि हमारा स्वभाव स्वार्थ करने का ही है तो हमें सच्चे अर्थों में स्वार्थ की खोज करना चाहिए, जिसमें हमें चिरस्थायी सुख की प्राप्ति हो। हमारा स्वार्थ दूसरे के अनहित में नहीं, वरन् दूसरों के हित में ही निहित है। इसलिए दूसरों का हित चाहने वाला ही सच्चे अर्थों में स्वार्थी कहलाने का अधिकारी है।
यदि हम सचमुच अपना हित साधन करना चाहते हैं तो हमें अपना दृष्टिकोण परिवर्तित करना होगा, निम्न-कोटि के स्वार्थ से ऊँचे उठकर उच्च कोटि का स्वार्थ अपनाना होगा। चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते, तात्पर्य यह है कि प्रत्येक कार्य करते समय हमें यही ध्यान रखना होगा कि हमारा हित, हमारा भला, हमारा स्वार्थ, हमारा सुख, हमारी शान्ति कहाँ निहित है? हमें अपने भीतर से उत्तर-मिलेगा, अन्य का भला करने में! इसलिए हर कार्य हमें अपनी भलाई करने के लिये ही करना चाहिए और प्रत्येक में हमारे स्वार्थ की छाप लगा देना चाहिए। हम जिधर दृष्टि फेरें, बस हमें अपना स्वार्थ ही स्वार्थ नजर आए।
हमारे हृदय में एक देवता का निवास है। उक्त देवता हमें सदा सच्चा और हितकारी परामर्श देता है। आप अपने कार्यों के विषय में उससे परामर्श लेकर अपना मार्ग सुनिश्चित कर सकते हैं। वह हमें कभी भी गलत राय नहीं देता। अपितु जब-जब हम गलत कार्य करने लगते हैं, तब-तब वह हमें चेतावनी देता है, सावधान! रुको!! इस घृणित कार्य में तुम्हारी भलाई नहीं है। इस कार्य को न करो! परन्तु हम मोहवश वह कार्य कर बैठते हैं। फलतः हमें दुःख उठाना पड़ता है। इसलिये हमें चाहिए कि हम उन हृदयस्थ देवता का सदा परामर्श लेते रहें और उसकी आज्ञानुसार सारे कार्य करें। अपने आत्मा से परामर्श लेकर कार्य करने वाला सच्चे अर्थों में स्वार्थी ही कहा जायेगा, क्योंकि हमारी आत्मा सदैव हमें अपनी भलाई की ओर अग्रसर करती है।
शास्त्रकारों ने परमार्थ की बहुत महिमा गाई है, वस्तुतः परमार्थ क्या है? स्वार्थ का ही उच्च कोटि का स्वरूप! अपितु यह कहना अनुचित न होगा कि स्वार्थ ने ही परमार्थ का बाना पहन रखा है। परमार्थ में स्वयं के अहम्-कल्याण की भावना छिपी रहती है। जब तक हमारे मस्तिष्क में परमार्थ शब्द गूँजता रहेगा, तब तक वह स्वार्थ नहीं तो और क्या कहा जावेगा?
अतः यदि आप अपना भला चाहते हैं और स्वार्थ साधन करना चाहते हैं तथा ऐसा सुख चाहते हैं, जो कभी नष्ट न हो तो आप दूसरों की भलाई में लग जाइये और उन्हें सुख पहुँचाइये। इसी में आपका स्वार्थ निहित है और तभी आप अपना भला कर सकते हैं, स्थायी-सुख प्राप्त कर सकते हैं, अन्यथा नहीं। यदि आपको दुःख अभीष्ट है, तो पहुँचाइये दूसरों को पीड़ा, कीजिए उनका अहित! परन्तु स्मरण रहे, ईश्वरीय नियम के अनुसार बदले में आप को वही असंख्य गुना मिलेगा! आज न सही, कल वह दिन अवश्य आयेगा जब हमें उसका परिणाम भुगतना ही पड़ेगा। उस समय हमें सिकन्दर की तरह कोई बचा नहीं सकेगा। इसलिये सोचो और निश्चित करो कि हमारा स्वार्थ, हमारा भला, हमारा सुख कहाँ पर निहित है?
(डॉ. रामचरण महेन्द्र एम.ए., पी.एच.डी.)
इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध कलाकार दम्पत्ति ने अपने विवाह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ मनाई है। उन्होंने दाम्पत्य जीवन के ये दिन बड़े सुख, शान्ति और सरसता से व्यतीत किए हैं। उनसे जब उनकी सफलता का रहस्य पूछा गया, तो नए दम्पत्तियों के लाभार्थ उन्होंने कई बड़े अनुभवपूर्ण सिद्धान्त बताये हैं। उनका विचार है कि इनके पालन करने से नए विवादित जोड़ों को सुख मिल सकता है। जो दम्पत्ति दुःखी हैं, उनको इन नियमों को व्यवहार में लाना चाहिये। जितने भी सूत्र सम्भव हों, उन्हीं को धारण करना चाहिए।
नियम 1- पति-पत्नी एक दूसरे को सच्चे हृदय के गहन तल से प्रेम करें। प्यार का अर्थ है प्रियजनों के दोष और त्रुटियों को क्षमा करते रहना। मत-भेद होने पर समझौता करें और गलतफहमी होने पर जल्दी से जल्दी उसे दूर करें। प्रेम में अहंभाव को भुला देना चाहिये। क्षमाशीलता से सरसता पुनः आ जाती है।
नियम 2- पति-पत्नी परस्पर एक-दूसरे में अविचलित विश्वास रखें। दाम्पत्य जीवन में सन्देह के समान कोई बड़ा शत्रु नहीं है। मन को विषमय बनाने के लिये सन्देह से बढ़ कर अन्य भावना नहीं है।
नियम 3- साथ-साथ रहें। सुख-दुःख में, संपद् विपद में, हर्ष और आह्लाद में सदा एक दूसरे के साथ रहें। जीवन में कष्ट आयें, तो साथ सहें, हर्ष के अवसर आयें, तो साथ ही हर्षित होकर खुशी मनावें। बीमारी में एक दूसरे का पूरा साथ दें। धर्म के सब कार्य हमारे यहाँ सम्मिलित मिलकर मनाने की प्रथा है। सम्मिलित दान, स्नान, यात्रा, कर्म इत्यादि से धर्म की सिद्धि मानी गई है। पति-पत्नी को चाहिए कि सब कामों में साथ-साथ रहें।
नियम 4- एक दूसरे की निस्वार्थ भाव से सेवा करें और उसके लिए अपने स्वार्थों का परित्याग करें। पत्नी पति के लिए और पति पत्नी के लिए अपने संकुचित स्वार्थ का त्याग करें, इस पारिवारिक त्याग से, आदान-प्रदान की नीति से काम लें। इससे वाणिज्य व्यापार तो चलता ही है, पर गृह संसार में भी यही नीति लाभ देती है।
नियम 5- एक दूसरे के आचरण की आलोचना न करें। बुराई किसमें नहीं हैं। कमजोरियों से कौन बचा है, सबसे पहले दम्पत्ति को दोषान्वेषण की आदत छोड़ देनी चाहिये। एक दूसरे के दोष दर्शन से दाम्पत्य जीवन में कटुता उत्पन्न होती है और पारस्परिक विश्वास नष्ट होता है। दोष देखने का अर्थ एक दूसरे को नीचा दिखाना है। इससे घृणा उत्पन्न होती है। यह घृणा बड़े-बड़े राज्यों को समाप्त कर देती है। घृणा से मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं।
नियम 6- मैं अपनी पत्नी की अपेक्षा बड़ा हूँ या मैं अपने पति से ऊँची हूँ, यह सब मन में न आने दीजिये। इससे अहंभाव उत्पन्न होता है, स्वेच्छाचारिता बढ़ जाती है और स्वार्थ की इस खींचा-तानी में दाम्पत्य जीवन की डोर टूट जाती है। दाम्पत्य जीवन में तो दोनों को सदा समानता का ही भाव मन और कर्म में रखना चाहिए।
नियम 7- विवाह किया है, इसलिए हमारा दूसरे के ऊपर पूरा-पूरा हर प्रकार का अधिकार है। हम अपने साथी से सब प्रकार की आशा कर सकते हैं। ऐसा कभी भी न सोचें। मनुष्य आखिर मनुष्य ही है, देवता नहीं है। मनुष्य में चाहे योग्यता और शक्ति कितनी ही बड़ी क्यों न हो, किन्तु दुर्बलता आखिर सब में है-इस बात को स्मरण रखिए। हो सकता है कि अपनी पत्नी से या पति से कोई दुर्बलता सूचक कार्य हो जाए, यदि ऐसा हो तो उदारतापूर्वक उसे क्षमा कर देने में ही दोनों की भलाई है।
नियम 8- सदा गम्भीर मत बने रहिए, इससे जीवन नीरस हो जाता है। दोनों मिल-जुलकर हँसी-खुशी के लिए भी समय रखिये, हँसना, बोलना, मनोरंजन करना भोजन से भी अधिक उपयोगी है। हँसमुख आदमी कभी अस्वस्थ नहीं रहता। हृष्ट-पुष्ट और स्वस्थ व्यक्ति ही प्रसन्न चित्त होते हैं। एक प्रख्यात जर्मन डॉक्टर का तो यहाँ तक कथन है कि हँसने से शरीर का रक्त उष्ण रहता है और नाड़ी की स्पन्दन क्रिया नियमित होती है। हँसने से जबड़े मजबूत होते हैं, शरीर में बल और साहस की वृद्धि होती है। हँसना जीवन की शक्ति को बढ़ाता है, प्रसन्नता और आनन्दी स्वभाव चेतना शक्ति बढ़ाते हैं। मृदुल हास से स्वभाव, शरीर और आत्मा दृढ़ होती है, हास-परिहास, दाम्पत्य जीवन के लिए बहुत आवश्यक है, स्वास्थ्य और सुख का आधार है। हँसते हुए जीवन बिताना एक प्रकार से मानसिक और शारीरिक शक्ति बढ़ाने की चिकित्सा है। तात्पर्य यह है कि हँसना भोजन से भी अधिक उपयोगी है।
नियम 9- पहले प्रियजन बाद में मैं-पहले उसका सुख फिर मेरा सुख, इस बात को स्मरण रखते हुए अपने सुख को पीछे रखिये।
नियम 10-पति पत्नी से और पत्नी पति से पूरे शिष्टाचार का पालन करें। अभ्यागत के प्रति भी ऐसा ही व्यवहार उचित है। अशिष्ट व्यवहार दाम्पत्य जीवन में भी सर्वथा निन्दनीय और त्याज्य है।
(श्री दत्तात्रेय आतेगाँवकर एम.ए.)
हिन्दू-धर्म के विशेष नियमों में ब्रह्मचर्य का सबसे अधिक महत्व माना गया है। प्राचीन काल में तो इसे समाज की आधार शिला ही माना गया था और इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि हमारे देश में ब्रह्मचर्य आश्रम का वास्तविक रूप से पालन होता रहता तो देश कभी दुर्दशा को प्राप्त नहीं होता। पर बीच के समय में जब गुरुकुलों की प्रथा ढीली पड़ गई और अधिकाँश बालकों का पालन-पोषण और शिक्षा घरों में ही होने लगी तो इस आश्रम के नियमों का पालन कठिन हो गया। फिर तो यहाँ पाँच-पाँच और दस-दस वर्ष के बालकों का विवाह होने लग गया और ब्रह्मचर्य किस चीज का नाम है यह भी अधिकाँश लोग भूल गये।
फिर भी जिन लोगों में ब्रह्मचर्य की चर्चा कायम रही और जो उसके महत्व को स्वीकार करते रहें, वे भी अपने को असमर्थ समझ कर उससे विमुख रहने लगे। लोगों ने समझ लिया कि घर में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन असम्भव है और उसके लिये प्रयत्न करना बेकार है। ब्रह्मचर्य का पालन तो गृहस्थों से दूर जंगल में बने गुरुकुलों में रहकर ही सम्भव था। जब वह प्रथा नष्ट हो गई तो अब उसके लिए झूठ-झूठ चर्चा करने से क्या लाभ?
पर जब हम इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक विचार करते हैं तो मालूम होता है कि हमने ब्रह्मचर्य के अर्थ को ही ठीक नहीं समझा है। लोग यह समझ लेते हैं कि जननेन्द्रिय विकार का निरोध करना ही ब्रह्मचर्य है। पर यह ब्रह्मचर्य की अधूरी व्याख्या है। इस सम्बन्ध में महात्मा गाँधी का मत था कि “विषय मात्र का निरोध ही ब्रह्मचर्य है। जो और-और इन्द्रियों को जहाँ-तहाँ भटकने देकर केवल एक ही इन्द्रिय के रोकने को प्रयत्न करता है वह निष्फल प्रयत्न करता है। कान से विकार की बातें सुनना, आँख से विकार उत्पन्न होने वाली वस्तुएँ देखनी, जीभ से विकारोत्तेजक वस्तु चखना, हाथ से विकारों को भड़काने वाली चीज छूना और इन सब बातों को करते हुए जननेन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करना, यह तो आग में हाथ डालकर जलने से बचने का प्रयत्न करने के समान हुआ। इसलिए जो जननेन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करे, उसे पहले ही से प्रत्येक इन्द्रिय को उस इन्द्रिय के विकारों से रोकने का निश्चय कर ही लेना चाहिए। हमारा यह अनुभव है कि ब्रह्मचर्य की संकुचित व्याख्या से नुकसान हुआ है। अगर हम सब इन्द्रियों को एक साथ वश में करने का अभ्यास करें तो जननेन्द्रिय को वश में करने का प्रयत्न शीघ्र सफल हो सकता है, तभी उसमें सफलता प्राप्त की जा सकती है।
“वैसे तो सभी इन्द्रियों के विकारों से हमारे मन की पवित्रता भंग होती है, पर ब्रह्मचर्य का सबसे अधिक सम्बन्ध आस्वाद व्रत से है। इसका अर्थ है कि स्वाद न करना, अर्थात् जायके की भावना से बचकर जिस प्रकार दवाई खाते समय हम इस बात का विचार नहीं करते कि वह जायकेदार है या नहीं, पर शरीर के लिए उसकी आवश्यकता समझ कर ही उसे उचित मात्रा में खाते हैं, उसी प्रकार अन्न को भी समझ लेना चाहिए। अन्न का अर्थ यहाँ पर समस्त खाद्य पदार्थ हैं, अतः इसमें दूध और फल का भी समावेश होता है। जैसे कम मात्रा में ली हुई दवाई असर नहीं करती या थोड़ा असर करती है और ज्यादा लेने पर नुकसान पहुँचाती है, वैसा ही हाल अन्न का भी है। इसलिए स्वाद की दृष्टि से किसी चीज को खाना हानिकारक है। स्वादिष्ट चीज को मनुष्य प्रायः ज्यादा खा लेता है, इसलिए भोज्य पदार्थों को कृत्रिम रीति से अधिक स्वादिष्ट बनाना शरीर के हित के विरुद्ध है।”
“इस दृष्टि से विचार करने पर हमें पता लगता है कि जो अनेक चीजें हम खाते हैं उनमें से अनेकों शरीर रक्षा की दृष्टि से अनावश्यक हैं। “पेट चाहे जो करावे”-”पेट चाण्डाल है”-”पेट कुई-मुँह सुई”-”पेट में पड़ा चारा तो कूदने लगा बेचारा”-’जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ-फूली नहीं बदन में समाती है रोटियाँ”-ये सब कहावतें बहुत सारगर्भित हैं। पर लोग इस तरफ बहुत ही कम ध्यान देते हैँ और घरों में माँ-बाप बचपन से ही तरह-तरह की जायकेदार चीजें खिला कर बच्चों की आदतें बिगाड़ देते हैं। इस कारण बड़े होने पर उनके शरीर में अनेक प्रकार के रोग पैदा हो जाते है और स्वाद की दृष्टि से जीभ बहुत बिगड़ जाती है। इसके कड़वे फल हमको कदम-कदम पर दिखलाई पड़ते हैं। अनेक तरह के खर्च बढ़ जाते हैं, वैद्य और डाक्टरों की हाजिरी देनी पड़ती है, शरीर तथा इन्द्रियों को वश में रखने के बदले उनके गुलाम बनकर अपंग-सा जीवन बिताना पड़ता है। एक अनुभवी वैद्य का कथन है कि उसने दुनिया में एक भी निरोगी मनुष्य नहीं देखा। इसका खास कारण स्वाद के फन्दे में फँस जाना ही होता है।”
इन बातों को पढ़कर अनेक लोग घबराते हैं कि घर में रहकर इस नियम का पालन कैसे होगा? क्योंकि वहाँ तो प्रत्येक चीज को तरह-तरह के मसाले, मीठा, खटाई, खुशबू मिलाकर स्वादिष्ट बनाने की चेष्टा की जाती है। इस सम्बन्ध में एक बात तो हमको यह जान लेना चाहिए कि इस प्रकार के नियम का अर्थ यह नहीं होता कि आप एक ही दिन में पूरा परिवर्तन कर डालें। पर यदि यह समझ लिया जाए कि स्वाद की गुलामी शारीरिक अस्वस्थता की उत्पादक है और उससे ब्रह्मचर्य का स्थिर रहना प्रायः असम्भव हो जाता है, तो हम परिस्थिति के अनुसार कोई न कोई मार्ग निकाल सकते हैं। इसलिए इस नियम को स्वीकार करने पर अगर हम चौबीसों घण्टे खाने की चिन्ता ही करते रहें कि क्या खायें, तो यह गलती है। हमको अपनी आदतों पर ध्यान देना चाहिए कि हमें किस प्रकार के स्वाद की आदत पड़ गई है। तब उसको धीरे-धीरे कम किया जाना चाहिए। अगर हम देखें कि हमको मीठा ज्यादा पसन्द आता है और मिठाइयों की इच्छा होती रहती है तो सप्ताह में कुछ दिन ऐसे नियत कर लेने चाहिएं कि उनमें मीठा न खाया जाए। पहले सप्ताह में एक या दो दिन ही उसका त्याग किया जाए। धीरे-धीरे ऐसा हो जाएगा कि आप सप्ताह में एक दिन ही मीठा खाने लगेंगे और शेष दिन उससे बचे रहेंगे। इसी तरह अगर नमकीन या चाट आदि की आदत पड़ गई हो तो उसे भी छोड़ना चाहिए। भोज्य पदार्थों के सम्बन्ध में प्राकृतिक नियम यह है कि उसमें अग्नि का कम से कम संयोग किया जाए। इस दृष्टि से फल ही मनुष्य के लिए सबसे अधिक उपयुक्त भोजन ठहरता है। पर यह तो एक ऊँचा आदर्श है। सब किसी को इतना आगे बढ़ने की आवश्यकता नहीं। तो भी यदि भोजन में फलों का अधिक समावेश किया जाए और शेष खाने में से मसालों को बिल्कुल कम करके सीधा सादा रोटी और शाक खाया जाए तो स्वास्थ्य की बहुत उन्नति हो सकती है और ब्रह्मचर्य का पालन भी सहज में हो सकता है। जब हम बिल्कुल सादा भोजन करेंगे और कृत्रिम जायके वाली चीजों को त्याग देंगे तो भोजन कभी अधिक मात्रा में न होगा। अधिक पेट भरने पर ब्रह्मचर्य का अधिक भंग होता है, यह एक सुनिश्चित बात है। इसी प्रकार मसाले भी उत्तेजक होते हैं और जो उनको अधिक खाते हैं उनको भी ब्रह्मचर्य के पालन में कठिनाई पड़ती है। इसलिए ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों के लिए स्वाद का त्याग करके भोजन के सम्बन्ध में विशेष सावधान रहना परमावश्यक है।
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग तथा तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना के समुचित अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग) मू. 10॥)
प्रथम भाग-गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री संबंधी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मंत्रों का साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों के लिये विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
द्वितीय भाग-गायत्री द्वारा वाममार्गी ताँत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पञ्जर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह। मूल्य 3॥)
तृतीय भाग- गायत्री महामंत्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का साधना विधान। जप-योग, ऋजुयोग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुँडलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय-कोष मनोमय-कोष, विज्ञानमय-कोष, आनंदमय-कोष की सिद्धि करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। मूल्य 3॥)
गायत्री यज्ञ विधान (दोनों भाग) मू. 4)
प्रथम भाग-गायत्री यज्ञ का विज्ञान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्र एवं साइन्स के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मूल्य 2)
द्वितीय भाग-गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया, जलयात्रा, मंडप प्रवेश, वेदी पूजन, कुशकण्डिका, अग्नि स्थान, आहुति मन्त्र, पूर्णाहुति, घृत अवघ्राण, भस्म धारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि विधान, जिसे समझ कर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मूल्य 2)
गायत्री चित्रावली (दोनों भाग) मू. 3॥)
प्रथम भाग-विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मूल्य 1॥)
द्वितीय भाग-व्याहृति समेत गायत्री के 26 अक्षरों में सन्निहित 26 महान् आदर्शों को 26 श्लोक, 26 लेख एवं 26 आर्ट पेपर पर छपे तिरंगे चित्रों द्वारा समझाया गया है। मूल्य 2)
गायत्री का मन्त्रार्थ मू. 1॥)
अनेकों ग्रन्थों में, अनेकों ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार से किये हुए अर्थों का संग्रह, राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है।
पता :- ‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा।
मुझको गत और अनागत की परवाह नहीं है,
जब हँसता गाता मेरे आगे वर्तमान है।
मैं नहीं सुनाता उस अतीत की गाथाएँ
जो लाख बुलाने पर भी लौट नहीं आता,
मैं वर्तमान की धरती का ही गायक हूँ
छलिया भविष्य के भ्रम से मेरा क्या नाता,
काली रजनी के अनाचार की कथा कहूँ क्या,
जब मेरे द्वारे मुसकाता स्वर्णिम विहान है।
मंजिल पर आगे बढ़ते जाने का आदी,
सुख-दुख जो कुछ भी मिले सहन कर लेता हूँ,
सूखी बगिया में नूतन फूल खिलाने को
विष भरे शूल भी मिले ग्रहण कर लेता हूँ,
प्यारी धरती के आँचल की छाया क्यों छोड़ूं,
जब मेरे आगे शीश झुकाता आसमान है।
यों तो रुकने को बहुत बहाने होते हैं,
हम असफलता का दोष समय को देते हैं,
जो चलने वाले पथिक, कहाँ कब रुकते हैं,
वे कभी न लेते बल्कि सहारा देते हैं,
वे वर्तमान से लड़ते, उसमें ही जीते हैं,
पर भूत, भविष्यत् की चिंता करता जहान है।
-‘सुधेश’
*समाप्त*