मोघमन्नं विंदते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि बध इतस तस्य
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी। ऋ.10।1-17।6
भावानुवाद-
जग में कुछ जन भाँति-भाँति से, भरते निज भंडार।
अन्न-वस्त्र धन रजत हेम के संग्रह में ही सार-
समझ भोग सामग्री से नित, करते नवल विलास।
भोग सुखों में डूब मानते, अपना चरम विकास॥
पर एकाकी भोग भोगते, समझ न पाते आप॥
कौर और का छीन भोगना, कितना अनुचित पाप॥
इधर क्षुधातुर वस्त्रहीन जन, पाते हैं संताप।
उधर संग्रही भोगी जन का, बढ़ता जीवन माप॥
किंतु सत्य यह समझें सब, यह भोग नहीं दुर्भोग।
एकाकी अविवेकी भोक्ता, रहा पाप निज भोग॥
यह संचित सामान भोग का, सिर्फ रोग का हेतु।
मात्र स्वयं के पोषक जिनके, महानाश का केतु॥
बढ़े विपुल ऐश्वर्य बढ़ावें, जन-जन का सुख मान।
निज रक्षण-भक्षण में रक्खें अन्धों का भी ध्यान॥
ऋद्धि सिद्धि का, स्वर्ग सृष्टि का साधन है सहयोग।
सुधा समन्वित सदुपयोग से अर्जित है सहयोग॥
अविवेकी का संपत्ति पाना, संचित करना व्यर्थ।
जो न लगाना उसे यज्ञ के, परहित के कुछ अर्थ॥
संपत्ति नहीं विपत्ति वह उसकी, रही उसे ही भोग।
सुधी विमल संपद का करने, मिल जुलकर उपयोग॥
-यज्ञदत्त अक्षय
सम्पादकीय-
मनुष्य जीवन में आये दिन उपस्थित रहने वाली कठिनाइयों का कुछ ठिकाना नहीं, कोई व्यक्ति इस संसार में ऐसा नहीं जिसे किसी न किसी प्रकार की आपत्तियों और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना न करना पड़ता हो, इस विश्व का निर्माण सत, रज, तम इन तीनों गुणों के मिलने से हुआ है। निस्संदेह दुनिया में सज्जनता, नेकी, सौहार्द, स्नेह और सहयोग की पर्याप्त मात्रा मौजूद है उससे प्रेरित होकर लोग एक दूसरे की भलाई करते हैं, स्वयं कष्ट उठाकर दूसरों को सुख पहुँचाते हैं तथा औरों के दुर्व्यवहार सहन कर लेते हैं। इस संसार में आनन्ददायक तत्व भी कम नहीं हैं। यदि आशा और उल्लास के कारण समुचित मात्रा में न हों तो कोई आत्मा जीवन को जीना ही स्वीकार न करती। कठिनाइयों के बावजूद सुविधाओं और आकर्षणों की इतनी बड़ी मात्रा मौजूद है कि यदि मृत्यु का प्रश्न सामने आवे तो हर कोई उसे नापसंद करता है और दुःखी होता है। मृत्यु का भय और इस बात की मात्रा ही अधिक है।
फिर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आज के युग में सर्वत्र सुखों की अपेक्षा दुःखों की ही वृद्धि हो रही है, भलाई के स्थान पर बुराई पनप रही है, सज्जनों की अपेक्षा दुर्जनों का ही बाहुल्य हो रहा है फलस्वरूप आनन्द और सन्तोष की अपेक्षा दुख और असन्तोष की बढ़ोतरी दिखाई देती है। तृष्णा और वासना की ओर लोगों का झुकाव अधिक हो जाने से व्यक्ति, दूसरों के प्रति सेवा और सद्भावना का व्यवहार करने की अपेक्षा आक्रमणात्मक रुख अपनाये हुए हैं। दूसरों को हटाकर या किसी अन्य प्रकार से मजबूर करके उसके तत्वों का अपहरण करने और स्वयं मौज मजा करने की इच्छाएं हर किसी के मन में, काम करने लगी हैं। इसके परिणामस्वरूप संघर्ष, क्लेश, असन्तोष, द्वेष आदि दुर्भावों की तथा अनाचार मूलक दुर्घटनाओं की अभिवृत्ति का कुचक्र चल पड़ा है। वासना ग्रसित मनुष्य अधिकाधिक इन्द्रिय सुखों की हविस से पागल होकर स्वाभाविक मर्यादाओं का उल्लंघन करने लगा है फलस्वरूप बीमारी दुर्बलता और अल्प जीवन का शिकार उसे होना पड़ रहा है।
इन परिस्थितियों में यदि कोई साधारण मनःस्थिति का व्यक्ति अपने चारों ओर अप्रिय, कष्ट-कर दुर्गन्धित वातावरण अनुभव करे और उससे दुखी रहे तो यह स्वाभाविक ही है। आज अधिकाँश व्यक्ति खिन्न और असंतुष्ट दिखाई पड़ते हैं इसके कारण में आवश्यकता की अपेक्षा साधन सामग्री की कमी, वातावरण में अनाचार की अधिकता तथा असज्जनता दुष्टता से पूर्ण व्यवहार जैसे कारण ही प्रधान हैं।
प्रश्न यह है कि क्या इन विषम परिस्थितियों के होते हुए भी हम उनसे किसी कदर अपने को अप्रभावित रख सकते हैं, उनकी प्रतिक्रिया से अपने को कम से कम प्रभावित किये अपना गुजारा कर सकते हैं, यदि ऐसा मार्ग मिलता है तो निश्चय ही इसे बड़ी बात कहा जा सकता है।
यह बात ध्यान रखने की है कि हर परिस्थिति, हर घटना, हर वस्तु के लिए कुछ बातें अनुकूल हैं तो कुछ प्रतिकूल पड़ती हैं। उनका विशेष प्रभाव अनुकूलों पर ही होता है, प्रतिकूलों पर या तो वह प्रभाव होता ही नहीं, होता भी है तो बहुत कम। आग का विशेष प्रभाव सूखी लकड़ी पर जितना होता है उतना गीली पर नहीं, पानी को जितना रेतीली जमीन सोखती है उतना पथरीली जमीन नहीं, बीमारी का आक्रमण जितना अशुद्ध रक्त वालों पर होता है उतना शुद्ध रक्त वालों पर नहीं, रंग जितना साफ कपड़े पर चढ़ता है, उतना गंदे पर नहीं, इसी प्रकार बुरी परिस्थितियों, बुरे तत्वों और बुरे व्यक्तियों का प्रभाव भी हलके दर्जे की मनोभूमि के लोगों पर ही पड़ता है। ऊंची और सुसंस्कृत मनोभूमि के लोग उससे बहुत कम ही प्रभावित होते हैं।
कुमार्ग पर ले जाने वाली अनेकों बुराइयाँ जगह-जगह मौजूद हैं और वे अपना क्षेत्र बढ़ाने के लिये भी सक्रिय रहती हैं। अनेकों व्यक्ति उनके चंगुल में फंसते हैं और अपने आपको उस रंग में इतना रंग लेते हैं कि फिर इस जाल से निकल सकना कठिन हो जाता है। जुए बाजी के, शराब खोरी के, सिनेमाबाजी के, व्यभिचार के, आवारागर्दी के, शैतानी के अड्डे हर जगह पाये जाते हैं, उनके जाल में अनेक लोग रोज ही फंसते हैं और अपना समय, स्वास्थ्य, धन लोक परलोक सभी कुछ गंवा कर छूँछ हो जाते हैं। इससे उन बुराइयों की शक्ति और सफलता का अन्दाज सहज ही लगाया जा सकता है।
पर यह प्रभाव एक खास तरह की उथली मनोभूमि के लोगों पर ही पड़ता है, वे ही इनके चंगुल में फंसते और बर्बाद होते हैं। उनका प्रभाव सभी पर पड़े ऐसी बात नहीं है। जहाँ एक व्यक्ति इन बातों में आसानी से ग्रस्त हो जाता है। वहाँ, उसी क्षेत्र का, उसी का पड़ोसी, उसी परिस्थितियों का व्यक्ति उन बातों से सर्वथा दूर रहता है। दूर ही नहीं रहता वरन् उन बुराइयों से घृणा भी करता है उनका विरोध भी। इस प्रकार यह स्पष्ट देखा जाता है कि जहाँ एक व्यक्ति उन बुराइयों के चपेट में अपनी आन्तरिक दुर्बलता के कारण सहज ही आ गया वहाँ दूसरा व्यक्ति उनसे अप्रभावित ही नहीं रहा वरन् उनके उन्मूलन में भी बहुत दूर तक सफल हुआ इससे यह अन्दाज भी लगता है कि बुराइयों में उनके अड्डों में अपना प्रभाव विस्तार करने की जो शक्ति है वह वहीं तक सीमित है जहाँ व्यक्तियों की मानसिक दुर्बलताएं उनके अनुकूल पड़ती हों, यदि मनोभूमि परिष्कृत हो तो उन बुराइयों का वहाँ पनपना ही नहीं ठहरना भी असम्भव हो जाता है।
यही बात बुरे व्यक्तियों के बारे में भी लागू हो जाती है। वे तरह-तरह से हमें सताने का षडयंत्र करते हैं और कई बार अपनी करतूतों में सफल भी होते हैं पर उसका कुचक्र हर किसी के ऊपर नहीं चल सकता वे बहुत शक्तिशाली होते हुए भी हर किसी को अपनी दुष्टता से मनचाही मात्रा में सता सकने में सफल नहीं हो पाते। उनके आक्रमण का शिकार भी बहुत बार उन्हीं को होना पड़ता है जो अपने भीतर उस तरह की दुर्बलताएं धारण किये हुए हैं जिन पर दुष्टता का आक्रमण सफल हो सके।
ठगों के जाल में अनेक लोग फंस जाते हैं और उनके द्वारा बहुत ही हानि उठाते हैं पर उन समस्त लोगों में अधिकतर ऐसी मनोवृत्ति के लोग होते हैं जो बहुत सस्ते में, बहुत सा लाभ प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। जिन्हें अपनी योग्यता एवं श्रम के आधार पर परिश्रम की कमाई पर संतोष है जो केवल नीतिपूर्वक उचित तरीके से जितना प्राप्त हो सकता है उससे काम चलाते हैं और प्रसन्न रहते हैं उन्हें कोई ठग नहीं ठग सकता। यों ठगी के अनेकों तरीके हैं पर उनमें सिद्धान्त एक ही काम करता है कि ठग लोग यह सोचते हैं कि शिकार में लालच पर्याप्त है कि नहीं, वह योग्यता और श्रम की बात को भुलाकर जैसे बने वैसे अधिक लाभ प्राप्त करने का इच्छुक है कि नहीं? यदि है तो ठग समझ लेते हैं कि यह हमारा पक्का शिकार है। इसे ठगा जा सकता है। फिर भी नोट दूना कराने, ताँबे से सोना बनाने, जमीन में से गढ़ा धन निकालने कोई बड़ा लाभ करा देने आदि के प्रलोभन देकर लोगों को लालायित करते हैं और यह निर्विवाद है कि लोभ में मनुष्य अन्धा हो जाता है, उसे उचित अनुचित, संभव असंभव, कुछ सूझता नहीं, ऐसी मनोदशा जब उत्पन्न कर लेते हैं तब ठग उसका माल असबाब लेकर चम्पत हो जाते हैं। यदि मनुष्य निर्लोभ हो तो इस प्रकार के प्रलोभनों के सामने आते ही उनके गुण अवगुण पर विचार करेगा, प्रलोभनकारी क्यों इतना उदार बन रहा है इस पर दृष्टि डालेगा। उसका विवेक सावधान रहा तो कुछ ही विचारने पर वास्तविकता का पता लग जायेगा और वह उस प्रयत्न में फंस कर अपनी हानि कराने से बचा रहेगा।
इसी प्रकार जिसके मन में अनुचित लोभ वृत्ति न होगी वह जुआ, लाटरी, सट्टा आदि की बुरी लतों से बचा रहेगा। चोरी, उठाईगीरी, बदमाशी बेईमानी के लिए न तो उसकी इच्छा होगी और वह अपकीर्ति नरक निन्दा राजदंड आदि की आपत्तियों से बचा रहेगा। इन दुष्कर्मों के अड्डे चाहे उसके कितने ही समीप क्यों न हों उनका कोई आकर्षक प्रभाव उस पर नहीं पड़ेगा वे उसे आकर्षित करने में समर्थ न हो सकेंगे।
आजकल इन्द्रिय मनोरंजनों के अनेक साधन चल पड़े हैं, उनकी ओर इन्द्रियाँ लालच के साथ आकर्षित हो जाती हैं और उन्हें अधिकाधिक मात्रा में भोगने के लिए मचलती हैं। दुर्बल मनोभूमि के लोग उनमें फिसलते हैं और अमर्यादित उपभोग के लालच में अपना शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य बिगाड़ लेते हैं। सिनेमा, नाच आदि मनोरंजन, मिठाई मसाले, चाट पकौड़ी आदि भोजन काम विकार की अनुचित प्रक्रियाएं उपलब्ध करने के अनेकों अवसर आज सर्वत्र मौजूद हैं और वे जन-साधारण के लिए बड़े हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं पर वह उन्हें ही उठानी पड़ती है, जिनकी विवेक शक्ति दुर्बल है, जो दूरवर्ती हानि-लाभ की परवा किए बिना आज के अभी के छोटे से आकर्षण में फंस जाते हैं। यदि यह विवेक दुर्बलता न हो तो यह प्रलोभन किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकते। ऐसे असंख्यों व्यक्ति हैं जो इनकी व्यर्थता और हानियों को जानते हैं और जबकि दूसरे लोग इनमें बुरी तरह फंसे होते हैं वे इनकी और आँख उठा कर भी नहीं देखते।
झगड़ालू, दुष्ट, उद्दण्ड, उच्छृंखल अशिष्ट लोग कई बार अपने दुष्ट स्वभाव से अकस्मात ही कटुवचन कहते और दुर्व्यवहार करते देखे गये हैं। ऐसे लोगों से निपटने का सरल तरीका तो उन्हें यह अनुभव करा देना ही है कि उद्दण्डता को रोकने वाली शक्तियाँ भी इस दुनिया में मौजूद हैं और वे मनमानी करने वालों को वैसा न करने के लिए मजबूर कर सकती हैं। ऐसी शक्ति किसी मजबूत संगठन, शरीरबल या सत्ता बल से ही उत्पन्न हो सकती है। देखा जाता है कि आज की बढ़ती हुई गुण्डागर्दी को रोकने के लिए जैसा विरोधी प्रबल जनमत आवश्यक है वैसा उठ नहीं रहा है वरन् लोग अपनी सुरक्षा का ख्याल करके उन गुण्डों का ही सहयोग और समर्थन करने लगते हैं।
जो हो उन लोगों की उद्दण्डता को तभी अवसर मिलता है जब सामने वाले में भी थोड़ी वैसी ही अनुकूलता हो। उनसे उदासीन रहना न संपर्क बढ़ाना, न झगड़ा मोल लेना, न डरना, न खुशामद करना, छेड़ना ऐसी अपनी नीति हो तो उनकी गुण्डागर्दी बढ़ना हद तक, नियमित हो जाता है। उद्दण्ड व्यक्ति यह देखते रहते हैं कि कौन आदमी उनसे डरता और खुशामद करता है वे समझ लेते हैं कि यह हमसे डरता है बस यही एक कारण ऐसा प्रतीत होता है कि इसे और डरा धमका कर अनुचित स्वार्थ सिद्ध करना चाहिए। बन्दर का किसी आदमी से या बच्चे से मुकाबला पड़े तो वह सामने वाले की आँखों और चेहरे को ध्यानपूर्वक देख कर यह पहचानता है कि यह मुझसे डर रहा है या नहीं भागने की सोच रहा है या नहीं, यदि उसको सामने वाला डरता और भागता दीखा तो वह समझ लेता है कि जीत मेरी ही है, बस वह दौड़ पड़ता है और काट खाता है। यदि यह छोटा बच्चा भी निडर होकर हाथ में एक छोटा पत्थर या लकड़ी का टुकड़ा भी लिये खड़ा रहे तो बन्दर अपनी दाल गलती न देख कर चला जाता है। यह बात उद्दण्ड लोगों के संबंध में भी है। यदि हम अपने मन में उनकी विशेषता स्वीकार न करें, उनकी परवा न करें और डरने या खुशामद करने की न सोचें तो हमारी इस उपेक्षा के पीछे हमारे आत्मबल और साहस को छिपा हुआ देखेंगे और फिर उलझने की हिम्मत न करेंगे।
एक और भी बात है कि ऐसे लोगों को अपनी ओर से छेड़ना न चाहिए। साँप, बरें, भेड़िये आदि दुष्ट प्रकृति के जीव वैसे तो अपनी आन्तरिक दुर्बलता के कारण भीतर ही भीतर डरते रहते हैं पर छेड़ने पर उनकी मनोभूमि दुर्बल पड़ती है और वे आगे बढ़ कर अनर्थ करने पर उतारू हो जाते हैं फिर चाहे वे उस संघर्ष में स्वयं ही क्यों न पिस जाएं। इसलिये सुनिश्चित रूप से इतनी शक्ति न हो कि उन्हें भली प्रकार दबाया जा सके तब तक छेड़छाड़ न करनी चाहिए क्योंकि यदि उन्हें किसी संघर्ष में विजय मिलती है तो आगे के लिए उनकी हिम्मत और भी अधिक बढ़ जाती है। इसलिए जहाँ तक हो सके अपनी ओर से तब तक छेड़छाड़ न करने की नीति ही अपनानी उचित है जब तक कि उपयुक्त अवसर दृष्टिगोचर न हो।
इसी प्रकार दूसरों की साधारण छेड़छाड़ की भी उपेक्षा कर देनी चाहिए क्योंकि साधारण बात पर जो लोग बहुत आवेश में आ जाते हैं, बहुत घबराते और परेशान होते हैं वे भी मानसिक दृष्टि से दुर्बल माने जाते हैं और दुर्बल पर आक्रमण करने की हर किसी की इच्छा होती है। आवश्यकतानुसार विरोध किया जा सकता है और संघर्ष का अवसर आने पर उसके लिए भी प्रस्तुत रहना चाहिए। पर उसके लिए यह आवश्यक है कि अधीरता, आवेश, उत्तेजना, घबराहट, रोष एवं बेचैनी की अपनी स्थिति न बन जाय वरना सामने वाला अपनी दुर्बलता भाँप लेगा और समय-समय पर थोड़ा-थोड़ा चिढ़ाते या छेड़ते रह कर हमें और भी अधिक परेशान किये रहेगा। अपने चेहरे पर निर्भीकता, दृढ़ता, साहस, धैर्य एवं अनुद्वेष के भाव ही और सीधे शब्दों में उसे समझ लिया जाय तो वह सामने वाले की मजबूती को भाँप कर समझ भी जाता है क्योंकि कोई भी गुण्डा वस्तुतः पहले सिरे का कायर होता है। वह बाहर से जितना शेर बनता है उतना ही भीतर से पोला कमजोर भी होता है।
दैवी आपत्तियाँ, बीमारी, घाटा अपमान किसी प्रियजन की मृत्यु, विछोह, चोरी, अग्निकाँड आदि कई आकस्मिक कारण भी ऐसे आ जाते हैं जब अप्रत्याशित रूप से मनुष्य को कोई हानि एवं वेदना सहन करनी पड़ती है। ऐसी परिस्थितियाँ आने पर जो लोग भावावेश में बह जाते हैं, उस हानि को अत्याधिक बढ़ा-चढ़ाकर सोचते हैं, व्याकुल और बेचैन हो जाते हैं, सर्वनाश हुआ देखते हैं और भविष्य के बारे में घोर अन्धकारपूर्ण मानस चित्र बनाते हैं, वे लोग ही अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और आत्महत्या सरीखे कोई दुखद कार्य कर डालते हैं या इतने दुखी रहते हैं कि अपना स्वास्थ्य ही जला डालते हैं और आयु का एक बड़ा भाग कम कर लेते हैं। इसके विपरीत जो लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि- “मानव जीवन सुख और दुख के, लाभ और हानि के, सम्पत्ति और विपत्ति के ताने-बाने से बुना हुआ है, यह दोनों ही रात-दिन के गर्मी-सर्दी के जोड़े की तरह आती और जाती ही रहती हैं, इनके प्रभाव से कोई राजा रंक अछूता नहीं रहता, यह सभी के लिए स्वाभाविक एवं अवश्यंभावी है।” उसे इन आपत्तियों का इतना गम नहीं होता जितना भावुक और दुर्बल मनोभूमि के लोगों को होता है। वे समझदार व्यक्ति विवेक पूर्वक अपना मन समझा लेते हैं, आपत्ति के कारण लगे हुए आघात की मरहम पट्टी कर लेते हैं और काम चलाऊ साधारण स्थिति तक थोड़े ही समय में आसानी से जा पहुँचते हैं।
एक प्रकार की स्थिति दो अलग-अलग व्यक्तियों पर उनकी मनोभूमि के अनुसार अलग-अलग प्रकार के प्रभाव डालती है। संसार में बुराई और भलाई सभी कुछ पर्याप्त मात्रा में मौजूद है पर हम अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुसार उसे ही पकड़ते हैं जो अपने को रुचता है। यदि यह रुचि परिमार्जित हो तो संसार में जो कुछ श्रेष्ठ है उसे ही पकड़ने के लिये अपने प्रयत्न होते हैं और जिस प्रकार शहद ही मक्खी बगीची में से शहद और गुबरीले कीड़े गोबर इकट्ठा करते रहते हैं, उसी प्रकार अपनी मनोभूमि के अनुसार हम भी बुरे या भले तत्वों से अपना सम्बंध जोड़ कर अपने पल्ले सुख या दुख इकट्ठा कर सकते हैं। संसार में बुरा भला सभी कुछ है पर हम प्रायः उन्हीं तत्वों को आकर्षित एवं एकत्रित करते हैं जिस प्रकार की अपनी मनोदशा होती है।
इन सब बातों पर विचारशील व्यक्ति इस एक ही निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि हम जैसी परिस्थितियाँ प्राप्त करना चाहते हैं उसी के अनुसार अपनी मनोभूमि को ढाले। आत्मनियंत्रण और आत्म निर्माण के आधार पर हम अपने लिए अपनी भली बुरी दुनिया का निर्माण आप कर सकते हैं। अपने भाग्य के निर्माता स्वयं बन सकते हैं।
विश्व व्यापी चेतन महाशक्तियों में गायत्री का स्थान सर्वोपरि है। ईश्वर की अनेक शक्तियाँ हैं जो स्थूल जगत के विभिन्न पदार्थों के उत्पादन-विकास और विनाश के कार्य का सम्पादन करती हैं तथा प्राणियों के मनःक्षेत्र में प्रवेश करके उन्हें प्रेरणा, अभिरुचि एवं प्रवृत्ति के लिए अग्रसर करती हैं। इन्हीं शक्तियों को देवता कहते हैं। वैज्ञानिक लोग इनमें से कुछ स्थूल शक्तियों को यंत्रों के द्वारा वशवर्ती करके आवश्यक लाभ उठाते हैं। पर सूक्ष्म चेतन शक्तियाँ यंत्रों की पकड़ में नहीं आतीं। उन्हें भावना के प्रयोग के माध्यम से पकड़ा जाता है।
इस भावना प्रयोग का भी एक महत्वपूर्ण विज्ञान है जिसे आध्यात्म विज्ञान कहते हैं। पदार्थ विज्ञान की तरह, भौतिक साइंस की तरह यह भी एक उच्च कोटि की साइन्स है जिसके द्वारा मनुष्य अपने अंतर्जगत का मनचाहा विकास कर सकता है। मस्तिष्क की शक्तियों का, मनोबल का विकास मनुष्य जीवन में कितना उपयोगी है, यह किसी से छिपा नहीं है। इन्हीं बलों के आधार पर मनुष्य कितनी उन्नति, कीर्ति और सम्पत्ति का अधिकारी बनता है इसके अनेकों उदाहरण हम नित्य देखते हैं। इनसे भी ऊंचा और सूक्ष्म आत्मबल है। इसके द्वारा जो उन्नति होती है उसका मूल्याँकन हो सकना भी कठिन है।
जैसे गड्ढे में भरा हुआ थोड़ा सा जल उस अखिल विश्वव्यापी जल तत्व का एक लघु अंश है, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क तथा अन्तराल में निवास करने वाली अगणित महत्वपूर्ण शक्तियाँ भी उस अखिल विश्वव्यापी चेतना भण्डार की नहीं सी किरणें मात्र हैं। जैसे किसी विपुल जलशाली नदी से संबद्ध हो जाने पर किसी तालाब का पानी कभी सूखता नहीं, नदी का प्रवाह उसकी गहराई को सदा भरपूर ही रखता है, उसी प्रकार अखिल विश्वव्यापी चेतना शक्ति भाण्डागार से कोई आत्मा अपना सम्बंध बना लेती है तो वह शक्ति उस आत्मा में उतनी ही अपनी अनुकम्पा भरती रहती है जितनी धारण करने की उसमें क्षमता होती है।
गायत्री उस विश्वव्यापी चेतना शक्ति भण्डार का एक उच्चस्तरीय प्रवाह है। उस प्रवाह के साथ जिन व्यक्तियों ने अपने आपको जोड़ लिया वे अपनी पात्रता के अनुसार अभीष्ट तत्व प्राप्त कर लेते हैं। लघु आत्मा अपनी छोटी सी चेतना में विभु परमात्मा की महान चेतना शक्ति का प्रवाह अपने अन्दर धारण करने का जो प्रयत्न करती है उसे उपासना कहते हैं। उपासना कोई भावुकता, काल्पनिकता या भ्रान्ति नहीं है वरन् एक सुनिश्चित वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिस के आधार पर अतीत काल में बहुत से उपासक बहुत कुछ प्राप्त कर चुके हैं और अब भी बहुत कुछ प्राप्त कर रहे हैं।
विश्वव्यापी ईश्वरीय चेतना शक्ति प्रवाह गायत्री से सम्बंध स्थापित करके मनुष्य कितने प्रकार के लाभ प्राप्त कर सकता है? इसकी सही गणना कर सकना तो कठिन है पर प्राचीनकाल के तत्वदर्शियों ने उनकी एक अनुमानित सीमा एक सहस्र मानी है। जिस प्रकार किसी जड़ी बूटी का वैज्ञानिक विश्लेषण करके उसके भीतर पाये जाने वाले पदार्थों, क्षारों, विटामिनों तथा गुणों की व्याख्या की जाती है उसी प्रकार गायत्री महाशक्ति का विश्लेषण भी प्राचीन काल के अज्ञात तत्ववेत्ता लोगों ने किया है और निरूपण को ‘गायत्री सहस्रनाम’ नाम से प्रस्तुत किया है।
गायत्री सहस्रनाम का महत्व पाठ उपासना की दृष्टि से तो है ही पर उसमें लिखे हुए गायत्री के एक हजार नाम केवल नाममात्र ही नहीं है, वरन् प्रत्येक नाम में गायत्री तत्व में सन्निहित तत्वों, तथ्यों, गुणों, प्रभावों और विशेषताओं का विश्लेषण है। उन एक हजार में से प्रत्येक नाम पर यदि हम ध्यान दें तो यह पता चलेगा कि गायत्री की कितनी बड़ी महत्ता है और उसके अंतर्गत तथ्यों का उपयोग हम अपनी किन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर सकते हैं।
गायत्री के उन सहस्र नामों में से कुछ नामों का विश्लेषण उपस्थित किया जाता है-
अचिन्त्य लक्षणा
यह प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर दिया गया है कि गायत्री के सम्पूर्ण लक्षणों, गुणों का वर्णन और विश्लेषण मानव की स्वल्प बुद्धि द्वारा सम्भव नहीं। उसकी गरिमा अत्यधिक विस्तृत एवं व्यापक है। अपने प्रयत्न और अनुभवों से मनुष्य ने गायत्री के 1 सहस्र गुणों का पता लगाया है। इसका अर्थ यह नहीं कि गायत्री इतनी ही सीमित है। इनसे अधिक और कुछ कार्य उसकी शक्ति से नहीं हो सकता। ऐसी बात नहीं है। चेतना जगत में जो कुछ भी हलचलें होती हैं उन सब का सम्बंध गायत्री महाशक्ति से है और उन सब पर उस महाशक्ति के माध्यम से नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है। गायत्री की सर्वांगीण सम्भावनाएं अत्यधिक हैं, इतनी अधिक कि उन सबका पता लगाना तो दूर ठीक प्रकार चिन्तन कर सकना भी कठिन है। अब तक जिन एक सहस्र प्रमुख गुणों का पता इस विद्या के वैज्ञानिकों ने लगाया है केवल उन्हीं का उल्लेख गायत्री सहस्र नाम से हुआ है।
अव्यक्ता
यों उपासना की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में अन्य सभी साधनाओं की भाँति गायत्री का भी नाम और रूप व्यक्त करना पड़ा है। उच्चारण की दृष्टि से 24 अक्षरों में उसे स्वरबद्ध किया गया है और ध्यान का एकमात्र आधार रूप भी प्रस्तुत करके गायत्री माता की छवि में अंकित किया गया है पर यह ध्यान करना चाहिए कि यह नाम रूप पर आधारित माता का विग्रह केवल उपासना की अनिवार्य आवश्यकता के लिए ही है। वस्तुतः गायत्री मनुष्यों के समान शरीरधारी नहीं है वरन् वह अव्यक्त व्यापक शक्ति प्रवाह के रूप में उसी प्रकार फैली हुई है जैसे गर्मी, सर्दी विद्युत, ईथर आदि सूक्ष्म एवं अदृश्य रूप से सर्वत्र फैले रहते हैं। इस दृष्टि से उसे निराकार भी कहा जा सकता है।
अमृतार्णव मध्स्थला
अमृत के समुद्र में रहने वाली गायत्री है। मस्तिष्क के मध्य में जो सहस्रार कमल है, उसके मध्य में मधु-कोष या अमृत घट माना गया है। खेचरी क्रिया करते समय जब जिह्वा को उलट कर तालु के मूल में लगाते हैं तो इसी मधु कोष से अमृत की बूँद झरने ओर उसका रसास्वादन होने का अनुभव साधक को होता है। इस सहस्रार कमल पर ही विष्णु भगवान की शैय्या है। इसी को सहस्र फन वाला शेषनाग कहते हैं। इसका मध्य बिंदु जो अमृत कोष है, उसी में गायत्री शक्ति का मूल निवास है। शिवजी ने गंगा को जिस प्रकार मस्तिष्क के मध्य भाग में धारण किया हुआ है, इसी प्रकार प्रत्येक साधक उस विश्वव्यापी गायत्री शक्ति को सर्वप्रथम इस अमृतार्णव में उपस्थित चुम्बक केन्द्र में ही धारण करता है। फिर वह शरीर मस्तिष्क के विभिन्न भागों में तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विस्तृत होती है।
व्यापक बाह्य जगत में प्रकृति का मध्य बिन्दु अमृतार्णव माना गया है। सब प्रकार के आनन्दों की किरणें इसी केन्द्र से उद्भूत होकर प्राणियों को नाना प्रकार के आनन्दों एवं उल्लासों का रसास्वादन कराती हैं। इस अमृतार्णव केन्द्र का जो रसोद्धव है, इसी गायत्री का निवास बताया गया है। इस प्रकार वह सब प्रकार के आनन्दों की मूल जननी मानी गई है।
अजिता
अर्थात्- जिसे कोई जीत न सके। गायत्री के टक्कर की और कोई शक्ति नहीं है जो उससे प्रतिद्वंदिता में ठहर सके या उससे अधिक बड़ी सिद्ध होकर उसे परास्त कर सके वशिष्ठ और विश्वामित्र का उपाख्यान प्रसिद्ध ही है कि गायत्री गौ के प्रताप से वशिष्ठजी ने राजा विश्वामित्र की विशाल सेना को भी भोजन से ही तृप्त नहीं किया था वरन् युद्ध होने पर उस गौ गायत्री ने ही उस सेना को परास्त कर दिया था। दूसरे शक्ति की उपासना से आश्चर्यचकित होकर विश्वामित्र ने राजपाट छोड़कर तप द्वारा गायत्री को सिद्ध करके विश्व का सर्वोपरि बल उपलब्ध करने का प्रयत्न किया और उसी की सिद्धि से वे एक अलग दुनिया की स्वतंत्र रचना करने तक में सफल हुए। अकेले विश्वामित्र ही नहीं, जिसने भी गायत्री का प्रत्यक्ष किया है उन्होंने उसे सर्वोपरि एवं अजिता ही पाया है।
अपराजिता
वह किसी से भी पराजित नहीं होता। संसार का कोई बड़े से बड़ा असुर, पाप, संकट, विघ्न या मनुष्य ऐसा नहीं है जो गायत्री को चुनौती दे सके, उससे अधिक प्रबल सिद्ध हो सके, उसे पराजित कर सके। उचित रूप से साधना की हुई गायत्री संकटों को भी पछाड़ती परास्त करती है, स्वयं कभी पराजित या परास्त नहीं होती।
अणिमा दिगुणाधार
अणिमा, लघिमा, महिमा आदि जो ऋद्धि सिद्धियाँ हैं उन चमत्कारी मानवी गुणों या विशेषताओं का मूल आधार गायत्री ही है। अष्ट सिद्धि, नव निद्धि जिन्हें उपलब्ध करके मनुष्य प्रकृति के विभिन्न क्षेत्रों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेता है और उनका इच्छित उपयोग करके देवताओं जैसे बल एवं ऐश्वर्य का अधिकारी बनता है। वे ऋषि सिद्धियाँ गायत्री शक्ति पर ही आधारित हैं। सिद्धि साधना के मार्ग पर चलने वाले योगियों का अनादिकाल में एकमात्र आधार ‘गायत्री’ ही रही है। अन्य साधनाओं द्वारा अस्थायी एवं हलकी सी ही सफलता किसी साधक को भले मिली हो पर चिरस्थायी और सर्वांगपूर्ण सिद्धियाँ तो केवल गायत्री के द्वारा ही संभव हुई हैं और हो सकती हैं।
अर्क मण्डल संस्थिता
अर्क अर्थात् सूर्य के मण्डल में बैठी हुई गायत्री का ही ध्यान पूजन किया जाता है। चित्रों में गायत्री माता को सूर्य मण्डल के बीच विराजमान ही चित्रित किया गया है। इस दृश्य सूर्य को प्राणतत्व का केन्द्र माना गया है। उससे केवल उष्णता या प्रकाश ही उपलब्ध नहीं होता वरन् वह समस्त संसार को प्राण भी देता है। प्राणियों में जो जीवन दिखाई देता है वह सूर्य से ही उद्भूत होता है। यदि सूर्य न हो तो इस पृथ्वी पर एक भी जीवित प्राणी दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। सूर्य मण्डल में जो प्राणशक्ति के रूप में विराजमान है वह गायत्री ही है। गायत्री शब्द का भी यही अर्थ है। गय-कहते हैं प्राण को और त्र- कहते हैं त्राण को। प्राणों का त्राण करने वाली जो शक्ति सूर्य मण्डल के माध्यम से इस पृथ्वी पर आती है वह गायत्री है। प्रकाश और उष्णता ज्ञान और पुरुषार्थ भी उसी के दो सहायक तत्व हैं।
अजरा
जो कभी वृद्ध नहीं होती, जिसकी शक्ति कभी क्षीण नहीं होती, जो सदा तरुण एवं प्रचण्ड ही रहती है। प्रकृति के नियमानुसार सभी वस्तुएं कालान्तर में दुर्बल हो जाती हैं और नष्ट होकर उनका पुनर्निर्माण होता है। प्रलय होने से पूर्व पंच तत्व तथा उनकी तन्मात्राएं इतनी दुर्बल हो जाती हैं कि सृष्टि का कार्य साधारण रीति से चलना कठिन हो जाता है। टूटी मशीनों की भाँति, बूढ़े की भाँति सृष्टि की व्यवस्था में आये दिन गड़बड़ी होती रहती है अन्ततः उनको बिगाड़ कर पुनर्निर्माण की आवश्यकता पड़ती है और प्रलय उपस्थित हो जाती है। किन्तु नव निर्माण होने पर हर तत्व नया होने और शक्ति में पूर्णता होने के कारण सतयुग में सारे काम विधिवत चलते हैं विकृतियाँ तो जैसे-जैसे वह सब पुराने होते जाते हैं, दुर्बल पड़ते जाते हैं तब बाद के युगों में होना आरंभ होती है। जो नियम सृष्टि की अन्य सब स्थूल सूक्ष्म वसुन्धरा पर लागू होता है पर गायत्री पर लागू नहीं होता। वह काल से प्रभावित नहीं होती उसमें कभी शिथिलता या जरावस्था का विकार नहीं आता।
अजा
उसका कभी जन्म नहीं होता। परमात्मा की अभिन्न सत्ता होने के कारण वह भी परमात्मा के समान ही अजन्मा है। उसका कोई आरम्भ काल नहीं जिस प्रकार सूर्य में उष्णता ओतप्रोत है उसी प्रकार ब्रह्म में जो चेतना समाई हुई है उसे गायत्री कहते हैं। साक्षी, दृष्टा, निर्विकार ब्रह्म में जो सक्रियता, विधि व्यवस्था, भावना, आकाँक्षा दिखाई देती है सत के साथ जो चित् और आनन्द जुड़ा हुआ है उसका कारण गायत्री महाशक्ति को ही समझना चाहिए । वह जन्मने व मरने वाली साधारण वस्तु नहीं है।
अकारादिज्ञकारान्ता
‘अ’ से लेकर ज्ञ अक्षरों तक ही जो वर्णमाला है। वह स्वर यंत्र से लेकर नाभि स्थान तक अवस्थित सूक्ष्म उपत्यिकाओं में से निरन्तर निकलती रहने वाली ध्वनियों के आधार पर विनिर्मित हुई है। इन 54 ध्वनियों को कंठ से नाभि तक स्थित इन उपत्यिकाओं को सन्निहित अनेक सद्गुणों के एक सत्प्रवृत्तियों का बीज मंत्र समझना चाहिए। देवनागरी लिपि के स्वर व्यंजनों की बनी वर्णमाला भी एक प्रकार की मंत्र साधना है। इस वर्णमाला को बालक जब बार-बार पढ़ते हैं तो उनकी इन अक्षरों से सम्बंधित देव शक्तियाँ जाग्रत होती हैं। इसीलिए इसे देवनागरी लिपि कहते हैं। इस वर्णमाला के 54 अक्षरों के लिए एक बार कण्ठ से नाभि तक आने और दूसरी बार नाभि से कण्ठ तक लौटने में 54+54=108 की संख्या हो जाती है। माला में 108 दाने होने का भी यही रहस्य है। देवनागरी वर्णमाला से सम्बोधित सभी 54 शक्तियाँ गायत्री स्वरूप हैं। इसलिये गायत्री को ‘अकारादिज्ञ कारान्ता’ माना गया है।
अरिषड़वर्ग भेदिनी
1. काय 2. क्रोध 3. लोभ 4. मोह 5. मद 6. मत्सर यह छः वास्तविक शत्रु माने गये हैं। साँसारिक शत्रु तो कुछ देर के लिए थोड़ी आर्थिक या शारीरिक हानि ही पहुँचा सकते हैं पर यह आन्तरिक शत्रु दिन-रात साथ रहने के कारण लोक और परलोक दोनों को ही नष्ट कर डालते हैं। अन्तःकरण की शान्ति, सदाशयता, सद्भाव, सद्वृत्तियां सभी कुछ इन शत्रुओं द्वारा तहस-नहस करके उनके स्थान पर भय, रोग, शोक, चिन्ता, द्वेष, क्लेश, कुढ़न, असन्तोष तथा नाना प्रकार की उलझनें दुर्गुण एवं कुसंस्कार उत्पन्न हो जाते हैं। उनका परिणाम पतन एवं नरक ही होता है। गायत्री शक्ति का आविर्भाव अन्तःकरण में होने से यह छहों आन्तरिक शत्रु दुर्बल होने लगते हैं और धीरे-धीरे वे समाप्त होते चले जाते हैं। साँसारिक शत्रुओं का भी मुकाबला जिस प्रकार कानून, दृढ़ता, चतुरता संगठन तथा शस्त्रों की सहायता से रोग का निवारण चिकित्सा से किया जाता है उसी प्रकार षडरिपुओं के भेदन के लिये गायत्री राम बाण है।
असुरघ्नी
असुरों की असुरता को नाश करने वाली है। किसी की दुष्टता को नष्ट करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उस दुष्ट व्यक्ति को मार ही डाला जाय। रोग निवारण के लिये ऐसा नहीं किया जाता कि रोग के साथ रोगी को भी नष्ट किया जाय। गायत्री उपासना से अंतःकरण की दुष्टता-सज्जनता में परिणित होने लगती है और जिस प्रकार अजामिल आदि अनेकों पापी भगवान की शरण में आ कर साधु सज्जन बन गए। उसी प्रकार गायत्री की प्रकाश किरणें जिन अन्तःकरणों पर पड़ती हैं उनके भीतर काम करने वाली असुरता की मात्रा घटनी आरंभ हो जाती है और वे सज्जन देवता बनने लगते हैं। इसके अतिरिक्त गायत्री अभिचार की ताँत्रिक प्रक्रिया में वह शक्ति भी है कि असुर को जड़मूल से भी नष्ट कर सके उसके कुकृत्य का समुचित दण्ड भी दे सके।
अलक्षमीघ्नी
अलक्ष्मी दरिद्रता को दूर करने वाली गायत्री है। दरिद्रता के मुख्य कारण प्रारब्ध पुण्यों की समाप्ति, आलस्य, अयोग्यता परिस्थितियों की प्रतिकूलता, साधनों की कमी सन्मित्रों का अभाव आदि है। गायत्री की उपासना से मनुष्य के स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन तुरन्त ही आरंभ हो जाते हैं। उसके गुणों में, कार्यों में, स्वभाव में ऐसा हेर-फेर होता है कि प्रतिकूलताएं भी अनुकूलता में बदलने लगती हैं। आलस्य के स्थान पर उत्साह, योग्यता सम्पादन करने को तत्परता, परिस्थितियों को सुलझाने में योग्य सूझ-बूझ स्वभाव में स्नेह सौजन्य एवं माधुर्य बढ़ने से मित्रों की संख्या तथा उनके सहयोग की मात्रा में वृद्धि के साधन जुटने लगते हैं। मितव्ययिता का स्वभाव बनता है और जितना उपलब्ध है उतने से काम चलाने एवं सन्तुष्ट रहने की प्रवृत्ति विकसित होती है। दैवी अनुग्रह के आकस्मिक अवसर भी ऐसे मिलते हैं जिससे दरिद्रता जन्य दुखों से छुटकारा मिलता है। आमतौर से गायत्री उपासक सदा भरे पूरे ही रहते हैं। भूखा नंगा दीन दरिद्र उनमें से कोई बिरला ही मिलेगा।
आदिलक्ष्मी
जिस लक्ष्मी से हम सभी परिचित हैं वह रुपया पैसा, सोना, चाँदी, जमीन जायदाद आदि के रूप में देखी और समझी जाती है। यह स्थूल है, इसका महत्व भी मामूली सा ही है। इसे उलूक वाहिनी चंचला, माया आदि के अनेक नामों से भी सम्बोधित किया जाता है। यह नशे के समान मादक और अविवेक लोगों के लिए उनके अधिक दुर्गुणी होने का कारण भी मानी जाती है। इसलिये महापुरुष इसे त्याज्य भी बताते हैं, आत्मकल्याण के तीव्र आकांशी इसे त्याग देते हैं और साधारण लोगों को भी इसकी सीमित संचय करने एवं अपरिग्रही स्वभाव बनाने का आदेश है। पर आदि लक्ष्मी गायत्री उन 26 संपदाओं की जननी है जिनका वर्णन गीता के सोलहवें अध्याय के आरंभिक तीन श्लोकों में किया गया है। इन्हें प्राप्त करने वाला विपुल रत्न राशि के भण्डार का स्वामी बनने की अपेक्षा अधिक उन्नतिशील, सुखी तथा सन्तुष्ट देखा जाता है। दैवी सम्पदाएं जो आत्मा के लिए आध्यात्मिक रत्न जटित आभूषणों के समान शोभनीय हैं, गायत्री के द्वारा ही प्राप्त होती हैं।
आदिशक्ति
संसार में अगणित शक्तियाँ अपने-अपने क्षेत्रों में काम कर रही हैं और उनके अपने-अपने महत्व भी हैं पर इन शक्तियों का मूल उद्गम उस आदि शक्ति में है जिसे गायत्री कहा जाता है। सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्म के अन्तःकरण के रूप में यही प्रादुर्भूत हुई, पीछे सूर्य की सहस्रों किरणों के समान पानी के सहस्रों बुदबुदों के समान और भी अगणित शक्तियाँ आवश्यकतानुसार समय-समय पर उत्पन्न और विकसित होती गईं। जैसे विश्व का आदि मूल परमेश्वर है, जीवों का मूल उद्गम ब्रह्मा है उसी प्रकार विश्व की समस्त शक्तियों का उद्गम गायत्री है। इससे उसे आदि शक्ति कहा जाता है।
आदित्य परिसेविता
प्राण शक्ति के केन्द्र हमारे इस नव ग्रह वाले सूर्य के मध्य में प्राण केन्द्र गायत्री का उल्लेख पहले हो चुका है। विश्व ब्रह्मांड में ऐसे-ऐसे अगणित सूर्य हैं। जैसे हमारे सूर्य में प्राण शक्ति प्रधान है वैसे ही अन्य सूर्यों में अन्यान्य प्रकार के तत्व प्रधान हैं कुछ सूर्य ऐसे हैं जो प्राण नहीं वरन् रेडियो तरंग प्रवाह प्रस्फुटित करते हैं और उसी के माध्यम से आज मनुष्य विभिन्न ग्रहों से संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। ईश्वर से जितना रेडियो तरंग प्रवाह इस पृथ्वी पर है वह किन्हीं सूर्य से इसी प्रकार आ रहा है जैसे सूर्य में गर्मी और रोशनी आदि है। विभिन्न सूर्यों में ऐसे-ऐसे विभिन्न प्रकार के असंख्य शक्ति तत्व हैं उन सबके उद्भव तथा पोषण का केन्द्र वह महान सूर्य है जिसका संकेत गायत्री के प्रथम और द्वितीय शब्द ‘तत्सवितु’ में किया गया है। यह साधारण सूर्य नहीं गायत्री रूप वह सूर्य है जिससे ब्रह्माण्ड के समस्त सूर्य शक्ति प्राप्त करते हैं जो सभी आदित्यों द्वारा परिसेवित है।
आचार्य वर्तनाचारा
आचार्यों के बरतने योग्य आचार वाली व्यवस्था गायत्री में अभिप्रेत है। सर्वसाधारण को अपने विचारों और कार्यों को किस ढाँचे में ढालना चाहिए इसका विस्तृत विवेचन गायत्री गीता और गायत्री स्मृति विवेचन में हुआ है। इसे मानव जाति का सार्वभौम धर्मशास्त्र कह सकते हैं। इस विधि व्यवस्था का जो जितना पालन करता है वह उतने अंशों में धर्मात्मा एवं कर्त्तव्यपरायण कहा जा सकता है। जिसने अपने आचरण को, आचार विचार को, इसी व्यवस्था के ढाँचे में भली प्रकार ढाल लिया है- जिसने मानवता के सभी आवश्यक गुणों और कर्त्तव्यों को अपने व्यवहारिक जीवन में उतार लिया है वही ‘आचार्य’ कहलाता है। अमुक परीक्षा उत्तीर्ण या अमुक विद्यालय के संचालक को आज की व्यावहारिक भाषा में ‘आचार्य’ कहा जाता है परन्तु वस्तुतः आचार्य वही है जिसने गायत्री गीता एवं गायत्री स्मृति में बताये हुए आचरण को अपनाया है।
श्रीरघुवीर प्रताप तें, सिन्धु तरे पाषान।
ते मतिमंद जे राम तजि, भजहिं जाइ प्रभु आन॥
कबीर यह तन जात है, सकै तो राख बहोर।
खाली हाथों वे गये, जिनके लाख करोर॥
मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसो भाग।
यह कबीर कब लग रहै, रुई लपेटी आग॥
कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।
आप ठगे सुख ऊपजे, और ठगे दुख होय॥
कबीर यह तनु जात है, सकै तो ठौर लगाय।
कै सेवा कर साधुकी, कै हरिके गुण गाय॥
उज्ज्वल पहिने कापड़ा, पान सुपारी खाय।
कबीर हरिकी भक्ति बिन, बाँधा यमपुर जाय॥
मनुष जन्म दुर्लभ अति, होत न बारम्बार।
तरुवर सों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार॥
कबीर सब जग निरधना, धनवंता नहिं कोय।
धनवंता सो जानिये, जाके रामनाम धन होय॥
सौ पापनका मूल है, एक रुपैया रोक।
साधु होय संग्रह करै, मिटै न संशय शोक॥
मर जाऊं माँगूँ नहीं, अपने तनुके काज।
परमारथके कारने, मोहिं न आवे लाज।
करनी बिन कथनी कथै, अज्ञानी दिन रात।
कूकर जिमि भूसत फिरे, सुनी सुनाई बात॥
तुलसी या जग आयकै, पाँच रतन हैं सार।
संतमिलन अरु हरिभजन, दया, दीन उपकार॥
(श्री स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज)
दुनिया में जो कुछ हो रहा है, दिखाई दे रहा है, हो चुका है तथा जो होने जा रहा है वह सब ‘शक्ति’ का ही क्रीड़ा किलोल है। संसार जड़ तत्वों का बना है। पदार्थ में उसके गुण तो हैं पर क्रिया एवं चेतना न होने से वह कुछ कर नहीं पाता। हलचल का-उत्पत्ति, विकास, पतन और परिवर्तन का क्रम तो ‘शक्ति’ द्वारा ही संचालित होता है। शक्ति की प्रक्रिया जिस दिन सिमट जाती है, समाप्त हो जाती है उसी दिन प्रलय आ उपस्थित होती है। शरीर से जिस दिन प्राण शक्ति गई उसी दिन मृत्यु हो जाती है। फिर यह सारा कलेवर चाहे वह संसार के रूप में हो या शरीर के रूप में निर्जीव एवं निकम्मा बन जाता है फिर इसकी कोई उपयोगिता नहीं रहती। दीपक का सारा प्रकाश उसकी ज्वलन्तशील लौ में केन्द्रित है। लौ बुझी नहीं कि वह तेल बत्ती तथा मिट्टी का ठीकरा एक कबाड़ मात्र रह जाता है।
इस संसार में जो कुछ चमक दीखती है, जो कुछ हलचल होती है उसमें शक्ति की विद्युत काम करती है। इसलिये शक्ति ही उपासनीय है। शक्ति को ईश्वर में भी स्फुरता पैदा करने वाली माना गया है यह मान्यता रखी गई है शक्ति ही अव्यक्त ब्रह्म को व्यक्त रूप में, अचिन्तय सत्ता को चिन्त्य रूप देने में समर्थ होती है। इसलिए उसी की महत्ता अधिक है। कहा गया है कि-’शक्ति के बिना शिव, शव (लाश) मात्र है।’
इस शक्ति के दो रूप हैं एक स्थूल दूसरा सूक्ष्म। एक को क्रिया दूसरी को चेतना कहते हैं। स्थूल पंच भौतिक पदार्थों में सम्बंध होकर शक्ति के द्वारा जो हलचलें होती हैं वे क्रिया कहलाती हैं और जो भावना, बुद्धि, संकल्प, इच्छा, एकाग्रता, आवेश, विचार आदि के संयोग से अन्तःप्रदेश में गतिविधि उत्पन्न करती है उसे चेतना कहते हैं। क्रिया शक्ति के द्वारा इस संसार में सारी मशीनें चल रही हैं, सारे वैज्ञानिक उपकरण काम कर रहे हैं, समस्त जीवों के शरीर अपने-अपने पाचन रक्ताभिषरण आदि भीतरी एवं श्रम निर्माण, व्यवस्था कला आदि विविध प्रकार की क्रिया कलाओं का आयोजन कर रहे हैं। चेतना के द्वारा विद्या विलास, अन्वेषण, विचार विमर्श, रोग द्वेष, हर्ष-विषाद सुख, आदि के कार्य चलते हैं। चेतना का एक भाग स्व संचालित है, उस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं, वृक्षों वनस्पतियों में पदार्थों के विकास में, शरीरों के भीतर की स्वाभाविक गति विधियों में चेतना शक्ति, सीधे सार्वभौम शक्ति भण्डार से आकर अपना काम करती रहती है और सृष्टि का कार्यक्रम अनवरत रूप से चलता रहता है।
अब उस चेतना शक्ति का प्रसंग आता है जो मनुष्य के मस्तिष्क, हृदय एवं अन्तःकरण में सन्निहित है। यह मानवीय चेतना इतनी प्रचण्ड है कि इसे सार्वभौम अविज्ञात, विश्वव्यापी चेतना शक्ति के समतुल्य ही कहा जा सकता है। यों सार्वभौम चेतना शक्ति के कार्यों को देख कर मानव बुद्धि ठगी सी रह जाती है पर मानवीय चेतना की गुरुता का वह सार्वभौम शक्ति मूल्याँकन करती होगी तो वह भी स्तब्ध ही रह जाती होगी।
बादलों के द्वारा करोड़ों मन पानी इधर से उधर करते रहना, भूकम्प, बिजली, वर्षा वृक्ष और पौधों में हरियाली पत्र-पल्लव फल-फूल आदि की शोभा, वीर्य बिन्दु से शरीर और शरीर में बिन्दु की उत्पत्ति, परमाणुओं की गतिशीलता, ग्रह नक्षत्रों का परिधि भ्रमण आदि बातों पर जिस ओर दृष्टिपात किया जाय उधर आश्चर्य ही आश्चर्य दिखाई देता है। पर जब प्राणियों के अंतर्गत विशेषतया मानव अन्तःकरण में प्रस्फुटित चेतना शक्ति के कार्यों को देखा जाता है तो लगता है कि प्रकृतिगत शक्तियों पर उसने काबू पाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अपने बुद्धिबल से प्रकृति के गहन गह्वर को तिल-तिल कर के छान डालने में वह लगा हुआ है और कुछ अब तक भी प्राप्त कर सका है वह आश्चर्यजनक है, फिर भविष्य की सम्भावनाओं का तो कहना ही क्या है?
पृथ्वी के ध्रुव प्रदेशों में अवस्थित मध्य बिन्दु स्थल पर यदि वह थोड़े से भी परमाणु बम गिरा दें तो इस पृथ्वी का अपनी धुरी से हटकर किसी अन्य ग्रह के साथ टकरा जाना और चूर-चूर होकर धूलि बन जाना सम्भव है। ऊबड़-खाबड़ धरती के वृक्ष को चीर कर वह अपने बुद्धि बल से ही मनमानी मात्रा में अन्न, फल, धातुएं, रत्न खनिज तथा विद्युत सम्पदा प्राप्त करता है, बुद्धिबल से ही उसने आकाश में उड़ने और जल में तैरने के यान बनाए हैं। इस बीहड़-डरावनी अस्त-व्यस्त धरती का चित्र भी सुन्दर और सुसज्जित बनाने में, एक नगण्य द्विपद पशु मनुष्य को देव तुल्य आनन्दों का अधिकारी बनाने में, नाना विधि सुख-साधना सामग्री जुटाने में यह मानवीय अन्तःचेतना ही काम कर रही है। इसने प्रकृति पर, प्रकृति गत साधनों और शक्तियों पर विज्ञान के माध्यम से बहुत बड़ी मात्रा में आधिपत्य प्राप्त किया है और आगे इससे भी अधिक आधिपत्य प्राप्त करने की तैयारी है। इस चेतना शक्ति का जितना गुणगान किया जाए उतना ही कम है। उसने प्रयत्न करके वनों के सम्राट सिंह और मंत्री हाथी को ही अपने हाथों का खिलौना नहीं बनाया है वरन् देवताओं को भी अपना वशवर्ती और आज्ञाकारी बना कर छोड़ा है। स्वयं भगवान तक को उसके वश में होने को विवश होना पड़ा है। भक्त के वश में भगवान वैसे ही खेलता देखा गया है जैसे बालक गेंद से खेलते हैं।
इसी अन्तः चेतना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिशा में विकास करने का नाम तपश्चर्या है। मनुष्य के शरीर में काम करने वाली क्षमताएं तुच्छ हैं, उनके द्वारा उतना भी कार्य नहीं हो सकता जितना बैल घोड़े आदि कर लेते हैं। फिर बुढ़ापा, बीमारी, चोट, दुर्घटना आदि के अवसर या जाने पर तो वह भी समाप्त होकर शरीर को लुँज पुँज अपाहिज अवस्था में छोड़ सकती है। इसी प्रकार वह धन शक्ति जिसे आज महत्व दिया जाने लगा है शरीर शक्ति से भी तुच्छ है। अग्नि प्रकोप, जल प्रवाह, चोरी, राज दण्ड, अपव्यय आदि में उसकी बड़ी मात्रा भी स्वल्प काल में नष्ट हो सकती है। भाषण, लेखन, शिल्प कला कौशल एवं अन्य प्रकार के चातुर्य भी मस्तिष्कीय एवं स्नायविक शक्ति के आधार पर टिके होते हैं। इनमें गड़बड़ी पड़ जाने पर चतुर एवं प्रशंसित व्यक्ति भी अपना महत्व खो सकते हैं।
मानव शरीर में जो अनेकों बाह्य विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं उनके मूल में उसकी सूक्ष्म प्रतिभा ही काम करती है। यह आत्मबल की प्रतीक है। संकल्प बल इच्छा शक्ति, अन्तर्विद्युत इसी को कहते हैं। यह अंतर्बल इतना कठिन है कि भारी से भारी कठिनाइयों से टक्कर लेकर असम्भव को सम्भव बना देता है। धैर्य, साहस, उत्साह, निष्ठा, तन्मयता, निर्भयता, आत्म-विश्वास, दृढ़ता इसी के प्रकट लक्षण हैं। यह तो हुई आत्मबल के साँसारिक उपयोग की बात। यदि सूक्ष्म जगत में होने वाली इस आत्मबल की प्रक्रिया को देखा जाय तो लगता है कि ईश्वरीय विधान के बाद मनुष्य की अन्तः चेतना ही है जो प्रकृति के विभिन्न क्षेत्रों में अपना अधिकार जमाने और उसे इच्छानुसार चलाने में समर्थ है।
भारतीय इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठ इन आध्यात्म विज्ञानी, तपस्वी महापुरुषों के चरित्रों से भरे हुए हैं। जिन्होंने असंभव को सम्भव कर दिखाया और प्रकृति के साधारण विषयों को ही उलट-पुलट करके दिखा दिया। तप करके लोग ऐसी-ऐसी विचित्र शक्तियाँ, विचित्र वरदान, विचित्र पदार्थ प्राप्त करते थे जो साधारणतः देखने या सुनने में नहीं आतीं। शाप और वरदान के कारण ऐसे कार्य सम्पन्न होते थे जो साधारण जीवन में आश्चर्यजनक एवं असम्भव मालूम पड़ते थे। अष्ट सिद्धियों और ऋद्धियों का वर्णन योग ग्रंथों में मिलता है। पतंजलि योग दर्शन को विभिन्न साधनाओं के विभिन्न प्रतिफल बताये गये हैं। वे ऐसे हैं जो साधना और तपश्चर्या से विमुख व्यक्तियों को असत्य मालूम दे सकते हैं पर जिनके अंतर्बल को जाना और अभिवर्द्धन किया है वह भली प्रकार समझते हैं कि यह विभूतियाँ तो तुच्छ हैं साधना के बल पर आत्मा को इतना महान बनाया जा सकता है कि वह परमात्मा के समान बन जाय, परमात्मा सत्ता का साझीदार बनकर वही सब अधिकार प्राप्त कर ले जो स्वयं परमात्मा को प्राप्त हैं।
तप एक विशुद्ध विज्ञान है। जिस प्रकार रसायन विद्या, पशु, विद्या, चिकित्सा विद्या, शिल्प शास्त्र, विद्युत विज्ञान, कृषि विद्या, संगीत शिक्षा आदि अनेकों स्थूल विद्याएं इस संसार में विविध प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होती हैं उसी प्रकार सूक्ष्म जगत में काम कर रही उन प्रक्रियाओं पर नियंत्रण प्राप्त करने में आत्मविद्या का उपयोग होता है। जिस प्रकार मस्तिष्क में जो करने का विचार आता है वही शरीर काम करने लगता है। उसी प्रकार सूक्ष्म जगत में जो प्रक्रिया काम करती है वह ही कुछ समय उपरान्त घटनाओं के रूप में प्रकट हो जाती है।
जिस प्रकार विचारों पर नियंत्रण करके हम अपने साधारण कर्मों को भलाई या बुराई की दिशा में मोड़ सकते हैं उसी प्रकार सूक्ष्म जगत में काम कर रही प्रक्रियाओं को आत्मबल के आधार पर प्रभावित कर लिया जाय तो संसार में जैसी घटनाएं घटित होने की तैयारी थी उसे रोका, मोड़ा या बदला जा सकता है। प्राचीन काल में यों भी लोग ऐसा करते भी रहे हैं। आज वैज्ञानिक बादलों पर बर्फ का चूरा छिड़क कर जहाँ चाहे वहाँ मनचाही वर्षा कराने में सफल हो गये हैं। आध्यात्म विज्ञान के वैज्ञानिक अपनी आत्म शक्ति को बरफ के चूरे से भी अनेकों गुना सूक्ष्म और सशक्त बना लेते हैं कि उसे विश्व की गतिविधियों को अनिष्ट की दिशा में जाने से रोककर मंगलमय परिस्थितियों की विश्वहितकारणी वर्षा करा सकें। विश्व की सार्वभौमिक परिस्थितियों को दुख दारिद्र की, रोग शोक की, भय कलह की परिस्थितियों से बहुत अंशों में बचा सकना और किन्हीं भयानक संकटों को अपने बढ़े हुए आत्मबल के द्वारा संतुलित करना योगियों की शक्ति के अंतर्गत आ जाता है। वे ऐसा करते भी हैं। कई बार व्यक्तिगत रूप से भी कुछ सत्पात्रों को आवश्यक सहायता प्रदान करते हैं जिससे कि तात्कालिक कठिनाइयों से छुटकारा पाकर धर्म सेवा के कार्यों में अधिक प्रगति कर सकें।
तपस्वी लोगों के बारे में यह सोचना उचित नहीं कि वे केवल अपने ही लाभ के लिए इतने कष्ट उठाकर तप करते हैं। अपना निज का स्वार्थ तो उनका इतना ही होता है कि अपनी आत्मा को तप की अग्नि में तपाकर खरे सोने के समान निर्मल बना लें जिससे उसे परमात्मा का सजातीय बनने और उसमें मिल सकने योग्य करना संभव हो सके। जिस प्रकार अंगार के ऊपर चढ़ी हुई राख के कारण उसका रंग काला और प्रकाश और गर्मी का अभाव दीखता है उसी प्रकार आत्मा पर भी पाप तापों का आवरण चढ़ा होने से वह अल्पज्ञ एवं दीन हीन स्थिति में पड़े हुए साधारण जीवों जैसा दिखाई पड़ता है पर जब साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा वह राख की परत हट जाती है तो अंगार अपनी प्रकाशवान उष्णतायुक्त स्थिति को पुनः प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार ईश्वर का अविनाशी अंश आत्मा भी तप अग्नि में अपने को तपाकर निर्मल, निष्पाप एवं निरावरण बनकर ईश्वरीय दिव्य प्रभा से चमकने लगता है। साथ ही उसमें वे सब विशेषताएं भी उत्पन्न हो जाती हैं जो ईश्वरीय प्रकाश से परिपूर्ण आत्मा में होनी चाहिएं।
परमार्थ और परोपकार के बड़े-बड़े आयोजनों द्वारा लोगों को जो कुछ लाभ पहुँचाया जाना संभव है उतना लाभ आत्मबल के धनी अपनी-अपनी आत्मशक्ति के थोड़े से छींटें छिड़क कर ही पहुँचा देते हैं। किसी पुण्य प्रारब्ध से हीन दीन दरिद्र व्यक्ति को कोई अन्न दान करने वाला दानी कुछ दिन तक पेट ही भरते रहने की व्यवस्था कर सकता है उसके प्रारब्धजन्य दारिद्र को दूर नहीं कर सकता। पर कोई तपस्वी अपने तप का एक छोटा अंश उसे दे दे तो उतने मात्र पुण्य से वह उम्र भर धनी सम्पन्न लोगों जैसा उन्नत जीवन व्यतीत कर सकता है। वैसा उन्नत जैसा शायद उस अन्न दान करने वाले का स्वयं का भी न हो। औषधालय खोलने वाला व्यक्ति तात्कालिक उपचार भी कष्ट निवारण में अपने चिकित्सा कार्य द्वारा कुछ लाभ पहुँचा सकता है पर यदि दुष्कर्मों के फलस्वरूप उसके शरीर और मन में अनेकों कष्टकारक विकृतियाँ समय-समय पर फूटती रहती हैं तो उनका उपचार कोई चिकित्सक नहीं वरन् आत्मबल सम्पन्न तपस्वी ही कर सकता है। स्कूली शिक्षा की व्यवस्था करने वाले विद्यादानी किसी को उच्च पदवी धारी बनाकर रोजी रोटी कमाने लायक बना सकते हैं पर आत्मबल का कहीं से एक कण मिल जाने पर तो बाल्मीकि सरीखे डाकू भी बिना किसी कालेज में प्रवेश किए आदि कवि महर्षि बाल्मीकि बन सकते हैं।
श्रम, समय, धन और मस्तिष्क द्वारा किये जाने वाले परोपकार लोगों का कुछ भला तो करते हैं पर वह थोड़ा सा, तात्कालिक और अस्थिर होता है। उनका स्वरूप प्रकट दिखाई देने के कारण संसार में उनकी प्रशंसा तो खूब होती है पर पुण्य उसी अनुपात से होता है जिस अनुपात से कि लोगों को साधारण या गम्भीर समस्याओं का समाधान उनके द्वारा संभव होता है। कीर्ति भी सत्कर्मों का एक फल ही है। साधारण पुण्यों का फल भी कीर्ति तक ही सीमित है। लोग अपने नाम का पत्थर लगा कर, अपनी प्रशंसा छापे में छपा कर अपने दान की कीमत जीते जी ही वसूल कर लेते हैं। फिर परिलोक में तो थोड़ी छूँछ मात्र मिलनी शेष रह जाती है। गत अंक में छपे पिछले लेख में अनेक पुण्य परमार्थों की चर्चा और प्रशंसा की गई है। स्वार्थ में दिन-रात डूबे हुए केवल अपना ही घर भरने और रोज मजा करने की धुन में लगे हुए लोगों के द्वारा इतना होना भी अच्छा ही है। सारी की सारी शक्तियाँ वासना और तृष्णा में लगने की अपेक्षा यदि उनका कुछ समय, श्रम और धन किसी शुभ कार्य में-परमार्थ में लग जाता है तो उतने अंशों में तो उनका समय या धन का सदुपयोग ही माना जा सकता है। ‘न कुछ से कुछ अच्छा’ वाली कहावत के अनुसार जो भी कोई भी थोड़ा बहुत पुण्य परमार्थ कर ले वह अच्छा ही है। इस निमित्त में उसके मन पर जितने कुछ धर्म संस्कार जमते हैं वे आगे चलकर सन्मार्ग में सहायक ही होते हैं। इस दृष्टि से परमार्थ के प्रयत्न उचित और उत्तम ही हैं। पर इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी तुलना आत्म बल उपार्जन करके तप के प्रयत्नों से की जाने लगे। दोनों की स्थिति में उतना ही अन्तर है जितना चींटी और हाथी में होता है।
संसार में सबसे बड़ा धन तप का धन है। स्वास्थ्य बल, धन बल, बुद्धि बल, उसके आगे तुच्छ हैं। जिनके पास सोने का ढेर जमा है वह पचासों मनुष्यों की आवश्यकताएं क्षणभर में पूरी कर सकता है पर जिस की पोटली में आधा सेर आटा ही है वह कितना तो दूसरों को देगा कितना अपने लिए रखेगा। उससे कितना अपना भला करेगा कितना दूसरों का? संसार को सुखी बनाने और सुधारने के लिए संगठनात्मक, प्रचारात्मक और रचनात्मक अनेकों प्रयत्न किये जाते हैं, पर उन लोक सेवियों में समुचित आत्मबल आवश्यक तपोबल न होने से वे कार्य एक प्रदर्शन मात्र बनकर रह जाते हैं। दूसरों पर जैसा प्रभाव पड़ना चाहिए वैसा नहीं पड़ता। उनकी बातों को लोग सुन तो लेते हैं पर जीवन में ढालने को तैयार नहीं होते क्योंकि उन नेताओं और मार्ग दर्शकों के पास उस शक्ति का अभाव रहता है जो दूसरों के अन्तःकरण में गहराई तक प्रवेश करके उसमें प्रकाश एवं परिवर्तन उपस्थित कर सकता है। योगी लोग अपनी वाणी या प्रत्यक्ष क्रिया का उपयोग न करते हुए भी अपने आत्मबल का प्रवाह प्रसारित करके अनेकों व्यक्तियों में सन्मार्ग के प्रति वह उत्साह, उमंग, आकाँक्षा और तत्परता उत्पन्न कर सकते हैं जो अनेकों धुँआधार भाषणों से भी संभव नहीं है। इस प्रकार गंभीरतापूर्वक देखा जाय तो योगी लोग उच्चकोटि के परमार्थी सिद्ध होते हैं। उनका तप अपने तक ही सीमित नहीं होता, उसका प्रसाद अगणित लोगों को मिलता है। जैसे फूल खिलता है तो उसकी शोभा और सुगंधी दूर-दूर तक के लोगों को प्रसन्नता प्रदान करती है उसी प्रकार तपस्वी के शरीर और आत्मा में से अहर्निशि प्रवाहित होते रहने वाले विद्युत प्रवाह से अगणित लोग अनायास ही लाभान्वित होते रहते हैं। सान्निध्य में तो चन्दन के वृक्ष के सामान अपने समीपवर्ती लोगों को भी अपने ही जैसा सुगंधित बना देने का भी अनुग्रह करते हैं।
शक्ति के उत्पादन में घर्षण की कष्टसाध्य प्रक्रिया आवश्यक है। पहलवानी करने वाले जानते हैं कि कुश्ती पछाड़ने लायक क्षमता उत्पन्न करने के लिए उन्हें कितने दण्ड़-बैठक लगाने होते हैं। चाकू की धार तेज करने के लिए उसे सानगर के पत्थर पर बार-बार अपने आपको इतना रगड़वाना पड़ता है कि रगड़ के समय चिनगारियाँ उड़ने लगती हैं। मिट्टी के बर्तन पकाते समय इतनी आग सहनी पड़ती है कि बेचारा लाल हो जाता है, उत्तीर्ण होने वाले छात्र जानते हैं कि परीक्षा के दिनों में उन पर क्या बीतती है। यह कष्ट सहिष्णुता ही शक्ति की जननी है। प्राचीन काल में व्यक्ति अपने बच्चों को ऋषियों के आश्रमों में कष्ट सहिष्णु जीवन यापन करते हुए विद्याध्ययन के लिए भेजते थे ताकि वे तपस्वियों के सान्निध्य में आवें और पकने वाले बर्तनों की तरह मजबूत और टिकाऊ होकर निकलें। आज सर्वत्र विलासिता, फैशन परस्ती और नजाकत का बोलबाला है। फलस्वरूप हर दृष्टि से बच्चे और कमजोर होते चले जा रहे हैं।
साधना के लिए कोलाहल और जन विक्षेप से दूर वातावरण की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक और अन्वेषण कार्य ऐसे ही वातावरण में संभव होते हैं। नाना प्रकार के विक्षेपों, चिन्ताओं, समस्याओं और प्रतिक्रियाओं के बीच साधारण राम नाम तो लिया जा सकता है, काम चलाऊ पूजा पाठ भी हो सकता है पर वह एकाग्रता और तन्मयता जिसमें साधक की सारी शक्तियाँ एक ही दिशा में एकाग्र और तन्मय होकर लक्ष्यवेध कर सकें एकान्त में ही सम्भव है। इस दृष्टि से यदि तपस्वी लोग एकान्त स्थान ढूंढ़ लें तो उसमें कुछ अनुचित नहीं है। आध्यात्म की लोक शिक्षण करने की बहुत बड़ी व्यवस्था करने वालों से भी अरविंद को भी अपने लिए व्यक्तिगत रूप से तो एकान्त की ही सुविधा रखनी पड़ती थी। हमारे पूज्य आचार्यजी को भी यदि इस मार्ग का अनुसरण करना पड़ा है तो यह स्वाभाविक ही है।
उन धूर्तों की बात जाने दीजिए जो किसी न किसी बहाने लोगों को ठगते ही रहते हैं। उनके लिए योगी और तपस्वी का ढोंग बना लेना भी अपने व्यवसाय का एक प्रकार हो सकता है। ऐसे लोग हर क्षेत्र में मिलेंगे। गंगा में भी मगरमच्छ रहते हैं। पर वस्तुतः जो तपस्वी एवं योगी हैं उनका कष्ट साध्य, त्यागपूर्ण जीवन यापन करना आत्मबल उपार्जन के लिए एक आवश्यक कृत्य है। इसके लिए उन्हें स्वार्थी न समझा जाना चाहिए क्योंकि जितना परमार्थ, लोकहित, हजारों तथाकथित लोक सेवी नहीं कर पाते उतना एक आत्मबल सम्पन्न मनुष्य कर सकता है। पिछले दिनों भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, भगवान शंकराचार्य, महात्मा गाँधी, स्वामी दयानन्द, स्वामी रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण योगी अरविन्द आदि अगणित ऐसे तपस्वी इस भारत भूमि में हुए हैं जिन्होंने अपनी दौड़ धूप, वाक् चातुरी एवं कृपा कुशलता से नहीं वरन् आत्मबल के सामर्थ्य से जन साधारण का महान उपकार किया है, भले ही वह उपकार स्थूल चर्म चक्षुओं से दिखाई न पड़े। प्राचीन काल के ऋषियों के महान उपकारों का तो वर्णन ही कैसे किया जाय? उसके लिए सारा विश्व सदैव कृतज्ञ रहेगा। इन लोगों को स्वार्थी नासमझ कहना हमारी स्थूल दृष्टि का ही परिणाम हो सकता है।
निःस्वार्थ प्रेम की प्रेरणा
मैं केवल प्रेम का ही प्रचार चाहता हूँ। मेरे उपदेश वेदान्त की समता और आत्मा की विश्व-व्यापकता पर ही आधारित हैं। दुखियों के दर्द को अनुभव करो और उनकी सेवा करने को आगे बढ़ो, भगवान तुम्हें सफल करेंगे। मैं अपने मस्तिष्क में इसी विचार को रख कर 12 वर्ष तक घूमा हूँ। मैं इस दौर में भूखा प्यासा भले ही मर जाऊं, पर नव जवानों? मैं तुम्हारे लिए यह वसीयत छोड़ जाता हूँ कि गरीबों, अज्ञानियों और दुखियों की सेवा के लिए प्राण प्रण से लग जाओ।
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मनुष्य की आयु सीमित है और संसार की सभी वस्तुएं मिटने वाली हैं पर वे ही जीवित हैं जो दूसरों के लिए जीते हैं। बाकी सब तो मुर्दे से भी बढ़कर हैं।
-स्वामी विवेकानन्द
मनुष्य का जीवन दो धाराओं का सम्मिलन है, यह दो धाराएं नर और नारी कही जाती हैं। दिन और रात महाकाल के दो विभाग हैं इन दोनों के संमिश्रित एवं संतुलित क्रम से ही सृष्टि व्यवस्था चलती है। यदि इनमें से एक ही रहे, दूसरा नष्ट या क्षीण हो जाय तो जीवों का जीवित रहना ही संभव न रहे। इसी प्रकार अन्न जल, निद्रा-जागरण, जन्म−मरण के जोड़े भिन्न-भिन्न प्रकार होते हुए भी मिलकर एक क्रम व्यवस्था का निर्माण करते हैं। दो धागे या तिनके मिलाकर बटने से ही रस्सी बनती है यदि वह दो नहीं केवल एक ही धागा या तिनका हो तो रस्सी न बन सकेगी। ऋण और धन निगेटिव और पॉजिटिव दो विद्युत धाराएं आपस में न मिलें तो बिजली की जो प्रचंड शक्ति विभिन्न क्षेत्रों में काम करती है अपने अस्तित्व तक का परिचय देने में समर्थ न हो।
नर और नारी का भी जोड़ा इसी प्रकार का है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के संतुलन सहयोग से ही एक स्वस्थ मानव जीवन विनिर्मित होता है। इसी संतुलन के आधार पर गृहस्थ जीवन की ही नहीं सारे सामाजिक जीवन की सुव्यवस्था भी निर्भर है। इन दोनों में एक विकसित दूसरा अविकसित रहे, एक उन्नत दूसरा अवनत रहे तो पंगु, लंगड़े, काने, टोंटे, अर्धांग बाल रोग से पीड़ित मनुष्य की तरह कुसमता और अपूर्णता ही दिखाई पड़ेगी। सृष्टि संचालन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया नर-नारी के संयोग पर निर्भर है, प्रकृति ने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इन दोनों को अलग-अलग बनाकर भी सुदृढ़ स्नेह एवं आकर्षण के धागे से सींच दिया है। इतना ही नहीं दोनों में ऐसे अभाव भी रखे हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए उनका पारस्परिक सहयोग आवश्यक हो गया है। जिस प्रकार नर-नारी का असहयोग रहने से सृष्टि क्रम आगे चलना बन्द हो सकता है उसी प्रकार पारस्परिक प्रेम एवं सहविकास के बिना गृहस्थ की गाड़ी भी टूटे पहिये के छकड़े की तरह चर मर कर गिर सकती है और लकड़ियों का एक ढेर मात्र रह सकती है।
मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में नारी का सहयोग नितान्त आवश्यक है। यह सहयोग जितना ही हार्दिक, जितना ही वास्तविक जितना ही सक्रिय और जितना ही संतुलित होगा उतना ही जीवन की विभिन्न दिशाओं में प्रगति संभव रहेगी। ऐसा सोचा जाता है कि व्यवसायिक क्षेत्र की सफलता पुरुष के अपने प्रयत्न पर निर्भर है उसमें स्त्री का कुछ विशेष योग नहीं है स्त्री तो गृह व्यवस्था में ही सहायक हो सकती है। पर यह बात भी आँशिक रूप से ही सत्य है। स्त्री की उपयोगिता के बारे में आमतौर से इतना ही सोचा जाता है कि वासना तृप्ति शिशु पालन और गृह प्रबंध के लिए उसकी आवश्यकता है पर वस्तुतः उसका क्षेत्र इससे कहीं बड़ा है। नारी का सबसे बड़ा प्रभाव पुरुष के मनःक्षेत्र पर पड़ता है। आशा, उत्साह, प्रसन्नता, स्फूर्ति, संतोष आदि जीवन के बहुमूल्य तथ्यों को नारी के द्वारा दिए हुए वरदान कहें तो अत्युक्ति न होगी। एक सुविकसित सुखी जीवनसंगिनी नारी जिसे प्राप्त हुई हो उसे इन वरदानों की प्राप्ति होनी चाहिए।
वासना तृप्ति, शिशु-पालन और गृह प्रबंध के लिए समाज में ऐसी अनेक सुविधाएं मौजूद हैं जिनके द्वारा कुछ थोड़ा अधिक खर्च करके यह तीनों ही सुविधाएं मिल सकती हैं। वेश्यावृत्ति मौजूद ही है, शिशु पालन और शिक्षण के लिए सुप्रबंध सज्जित संस्थाएं मौजूद हैं अपने संतान न हो तो संसार में इतने गरीब और बहु संतान से दुखी व्यक्ति मौजूद हैं जो खुशी-खुशी अपने बच्चों को गोद रखने के लिए दे सकते हैं। होटलों में चाहे जैसा भोजन तैयार है, गृह प्रबंध तो बड़े घरों में आमतौर से नौकरों पर निर्भर रहता ही है। इन कार्यों के लिये धर्मपत्नी का होना अनिवार्य नहीं है, यह कार्य उसके बिना भी चल सकते हैं। यह बात अलग है कि पत्नी सस्ती पड़ती है और बाहर इन कार्यों के लिए कुछ अधिक खर्च करना पड़े। यदि उन्हीं बातों तक नारी की उपयोगिता सीमित होती तो केवल गरीब लोग ही सस्तेपन की दृष्टि से विवाह के झंझट को सिर पर ओढ़ते अमीर लोग अपनी स्वच्छन्दता में नियंत्रण डालने वाले और अगणित उत्तरदायित्वों से लदे हुए विवाह बंधन में बंधने के लिये तैयार न होते।
नर और नारी दोनों की अन्तरात्मा का निर्माण कुछ ऐसे विचित्र ढंग से हुआ है कि उनके उल्लेख का प्रस्फुरण एक-दूसरे के अंतःस्पर्श से ही होता है। इस संयोग के बिना दोनों खोये-खोये से रहते हैं दोनों को कोई अज्ञात अभाव हर घड़ी खटकता रहता है। वयस्क कुमार कुमारी इस उल्लास की तलाश में तृषित नेत्रों से इधर-उधर झाँकते देखे जाते हैं। विधुर और विधवाएं जिनका साथी बिछुड़ गया है एक दर्द, टीस वेदना पीड़ा और कसक को अपने कलेजे में छिपाये फिरते हैं। समय कुसमय जब उनकी यह हूक प्रबल हो जाती है तो उनके भीतर कितनी असह्य ऐंठने होती हैं इसका वर्णन न तो शब्दों में सम्भव है और न व्याख्या करके किसी को समझाया जा सकता है। इसे तो केवल भुक्तभोगी ही जानते हैं।
दक्ष प्रजापति के यज्ञ में गई हुई सती जब अपने पति शंकर का अपमान सहन न कर सकी तो वे यज्ञ में ही कूद पड़ीं। यह दर्द भरा समाचार जब शिव को मिला तो उनका अन्तःकरण हाहाकार कर उठा। वेदना से उनका हृदय फूट कर बाहर निकलने लगा। योगेश्वर सदा समाधि में रहने वाले शिव का कामदेव को तीसरे नेत्र से जलाकर भस्म कर देने वाले शिव का धैर्य और विवेक धर्मपत्नी के वियोग की उस प्रचंड पीड़ा के सामने ठहर न सका। शंकर हतप्रभ हो गये। उनका आन्तरिक हाहाकार ऐसा उमड़ा कि मानों प्रलय ही फूट रही हो। उसने मरी हुई सती की जली हुई लाश को कंधे पर लादा और पागल उन्मत्तों की तरह अपनी वेदना की लहरों के साथ-साथ उछलने लगे। सती की लाश को कंधे पर रखे शंकर का रोम-रोम जो हाहाकार कर रहा है जैसी प्रचंड पीड़ा से आलोकित हो रहा है उसे देखते हुए देवता काँपने लगे। उन्हें लगा मानों शंकर के अन्तस्तल का चीत्कार अपने कलेवर को फाड़ कर अब तब में फट पड़ने वाला ही है। दशों दिशाओं में हाहाकार मच गया। विष्णु ने उस विपत्ति की घड़ी को टालने के लिए शोक के प्रचण्ड वेग को शमन करने के लिए अपने चक्र से उस लाश के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। वे टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ शक्ति पीठ बने।
नारी के अभाव की जो क्षति ज्ञान विज्ञान के अधिपति शंकर के लिए असह्य थी कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है इसका उपयोग हम वासना के कीड़े, उसके द्वारा उपलब्ध होने वाले लाभों के आधार पर सोचें और इसी दृष्टि से मूल्याँकन करते हैं तो हमारी हीन दृष्टि ही है इससे नारी की महत्ता कम नहीं होती। देवता और भगवान कहने वालों ने अपने नाम का गौरव तभी सार्थक माना जब उनकी पत्नियों के नाम उनके नाम से पहले जुड़े। लक्ष्मी नारायण, सीताराम, शची पुरन्दर आदि युग्मों में पतियों से पहले पत्नियों का ही उल्लेख हुआ है। यह तथ्य बताते हैं कि जिन्हें आत्मा की प्रकृति का ज्ञान है, वे यह जानते हैं कि नारी के द्वारा नर को क्या मिलता है।
नर का रोम-रोम नारी की अनुकम्पा का नन्हा सा खिलौना मात्र है। पिता के एक बूँद पानी मात्र को लेकर माता ने बच्चे को अनन्त दान दिया है। उसने अपने खून में खून, माँस में से माँस प्राण में से प्राण का दान नौ महीने तक अजस्र रूप से जारी रखा, तब उसका शरीर इस योग्य बन पाया कि धरती पर पैर रखकर यहाँ की परिस्थितियों को सहन कर सके। इसके बाद भी उसका यह दान समाप्त नहीं होता अपनी छाती के वह खारी और लाल खून को बच्चे की प्रवृत्ति के अनुकूल न पाकर वह उसे सफेद रंग में मीठे स्वाद में बदलती है और दूध के रूप में पिलाती है। इतना ही नहीं उसने अपने आपको उसकी आत्मीयता के रंग से इतना रंग दिया कि यही पता नहीं चलता कि बच्चा और वह एक है या दो। बच्चा जब कपड़ों में टट्टी कर देता है, पेशाब फिर देता है तब उसे उतना भी क्रोध नहीं आता जितना स्वयं बीमार हो जाने पर अपना मल-मूत्र कपड़ों में निकल जाने पर आता। बच्चा बीमार हो जाता है तो वैसी ही बेचैनी अनुभव करती है जैसी किसी को स्वयं अपने बीमार होने पर हो सकती है। इस सृष्टि में माता की उदारता, आत्मीयता और अनुकम्पा अद्वितीय कही जाती है।
नारी दान की मूर्ति है वह बालक को जो देती है वह प्रकट है क्योंकि लोग जानते हैं कि यह उसे सब देने वाला और कोई नहीं है। पर वह पति को भी देती है वह पुत्र से किसी भी प्रकार कम नहीं है। भूल उसके मूल्याँकन में होती है। जो मानसिक वरदान नारी अपनी अन्तरात्मा को निचोड़ कर पति को देती है उसे लोग सोच नहीं पाते, समझ नहीं पाते। बालक के प्रति दान की भाँति उनका प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है इसलिए लोग समझते हैं कि यह सब उसने स्वयं उपार्जित किया है। पर तथ्य यह नहीं है। वास्तविकता यह है कि माता से प्रतिदिन पाने के बाद बालक में जो कमी रह गई थी उसकी पूर्ति वह पत्नी से करता है, तब वह इस योग्य बनता है कि उसे एक सुविकसित सुसंस्कृत मनुष्य कहा जा सके।
पैदा काई भी क्यों न हो उसे उपयुक्त भूमि की, एवं पानी की आवश्यकता होती ही है उसके बिना उसका विकास संभव नहीं। इसी प्रकार व्यक्ति के मानस संस्थान का उचित विकास होने के लिए माता तथा नारी का अभीष्ट सहयोग अपेक्षित है। इन पंक्तियों में अभीष्ट सहयोग से मतलब माता के लाड़ प्यार से पालन पोषण और पत्नी के वासना तृप्ति करने से नहीं है। यह तो आमतौर से सर्वत्र ही होता रहता है। माता अपने आन्तरिक संस्कारों को बालक के जन्म में पूर्ण पर्याप्त मात्रा में उसके मन, मस्तिष्क, हृदय या नाड़ी संस्थान में भर देती है। बच्चे की प्रकृति का आधे से अधिक भाग उसके जन्म से पूर्व बन चुका होता है। शेष आधा ही सत्संग, स्वाध्याय, वातावरण अनुकरण आदि के आधार पर बनता है। यदि माता ने बालक का निर्माण केवल शरीर तक ही सीमित नहीं रखा है उसे अपने उच्च संस्कार भी प्रदान किये हैं तो यह माना जायेगा कि निर्माण में उसने अभीष्ट सहायता दी है। इसी प्रकार पत्नी ने वासना और व्यवस्था तक ही सीमित न रहकर यदि पति की अन्तरात्मा को छुआ है, उसकी प्रसुप्त मनोभूमि को सुविकसित करने में प्रसन्नता, उत्साह, आशा, स्फूर्ति, धैर्य, साहस आदि गुणों को प्रस्फुटित करने में योगदान दिया है तो इसे भी अभीष्ट सहयोग कहा जायेगा। जिस व्यक्ति को सहृदय और सुसंस्कृत माता एवं पत्नी प्राप्त हुई है उसे सब प्रकार सौभाग्यशाली ही कहा जा सकता है और इन दोनों के द्वारा उसका अंतस्तल इतना विकसित हो गया होता है कि वह जीवन की किसी भी दिशा में आशाजनक प्रगति कर सकता है और बड़ी कठिनाई के साथ हँसते-हँसते टक्कर ले सकता है।
उपार्जन, उन्नति और प्रसन्नता के अनेकों साधन जुटाने के लिए हम दिन रात जी जान से प्रयत्न करते हैं। फलस्वरूप बहुत कुछ उपकरण जुटा भी लेते हैं परन्तु उनका प्रभाव केवल बाहरी जीवन तथा इन्द्रियों की प्रसन्नता तक ही सीमित रहता है। अन्तस्तल को छूने और विकसित करने वाली वस्तु उनमें से कोई नहीं होती। मनुष्य की महानता उसकी साधन सामग्री पर नहीं वरन् उसके आन्तरिक गुणों पर निर्भर करती हैं। अनेक व्यक्तित्व के आन्तरिक दुर्बलता और हीनता की भावना से ग्रसित व्यक्ति कोई कहने लायक उन्नति नहीं कर सकते। ऐसे भाग्य से अनायास ही कोई लाभदायक अवसर प्राप्त ही हो जाय तो वह स्थिति देर तक कायम नहीं रह सकती। व्यक्तित्व के दोषों के कारण अन्ततः दुख दुर्भाग्य ही सामने आ खड़ा होगा। इसलिए बुद्धिमान लोग अपने में, अपने स्त्री बच्चों और परिजनों में अच्छे स्वभाव गुण और आचार की अभिवृद्धि का प्रयत्न करते हैं। क्योंकि स्थायी उन्नति केवल सुविकसित मनोभूमि पर ही अवलम्बित है। दुर्बुद्धि मनुष्य किसी प्रकार कुछ उपार्जन भी कर ले तो उससे उसके अहंकार एवं दुर्गुणों की वृद्धि में ही सहायता मिलती है और पतन की घड़ी तेजी से समीप आने के कारण बनने लगते हैं।
सुसंस्कारों के संग्रह होने में और भी अनेकों कारण हैं। सबसे बड़ा कारण माता द्वारा गर्भ काल में ही बालक को अपनी अन्तः स्थिति का दान और बड़े होने पर पत्नी द्वारा उसके अहम का उद्बोधन, शोधन और अभिवर्धन ही है। इन दोनों के द्वारा जितनी वास्तविकता के साथ यह व्यक्ति के अन्तःनिर्माण कार्य हो सकते हैं उतना अनेकों विश्वविद्यालय मिल कर भी नहीं कर सकते। अपार सम्पत्ति का स्वामी होकर भी विपुल कीर्ति और सत्ता का अधिकारी होकर भी मनुष्य इतनी शाँति और प्रसन्नता प्राप्त नहीं कर सकता जितनी कि नारी अपनी अन्तरात्मा को निचोड़ कर नर को मिलाने की प्रक्रिया में प्रदान कर देती है। माता केवल दूध ही नहीं पिलाती स्नेह भरा वात्सल्य भी पिलाती है साथ ही अगणित सुसंस्कार भी। इसी प्रकार पत्नी केवल वासना की तृप्ति ही नहीं करती वरन् अंतर की अनेकों उत्तेजनाएं, अशांतियों और अव्यवस्थाओं का भी शमन कर देती है, वह माता की तरह भले ही दूध न पिलाती हो पर दृश्य रूप से जो कुछ पिलाती है वह अंतः तृप्ति के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है।
हमारे समाज की नारी आज जिस हीन दशा में पड़ी है उसमें तो पाक-विज्ञान, शिशु पालन, गृह व्यवस्था, परस्पर, शिष्टाचार सम्बंध, आरोग्य ज्ञान, हिसाब किताब, सामान्य ज्ञान, जैसी गृहस्थोपयोगी मामूली बातों की भी आशा नहीं की जा सकती, उसके यह साधारण कार्य भी भोंड़े, त्रुटिपूर्ण और अस्त-व्यस्त पड़े रहते हैं फिर उन सुसंस्कारों की आशा कैसे की जाय जो वे अपने तक ही सीमित न रखकर अपने पति और पुत्रों को प्रदान कर सकती हैं।
नारी को अविकसित और पद दलित रखकर पिछली शताब्दियों में अपने पाशविक अहंकार की पूर्ति की है। मैं समर्थ हूँ, मेरे पुरुषार्थ पर ही नारी जीवित रहे, इस अहंभाव से प्रेरित होकर उसने नारी को एक कोने में बिठा दिया पर्दे में रखा, घरों की चहार दीवारी में कैद किया और घर में या घर से बाहर निकल कर कुछ भी न करने की व्यवस्था बना दी। उसका अहंकार फूला न समाया। मैं कितना समर्थ हूँ कि एक नारी की स्वाभाविक क्षमता की पूर्ति भी अपने ही द्वारा कर सकता हूँ। इसे उसने अपना बड़प्पन माना और गर्व भी अनुभव किया। इस व्यर्थ के अहंकार में पुरुष का तो कुछ लाभ हुआ नहीं, नारी की सारी क्षमताएं कुँठित हो गईं वह सभी दृष्टियों से लुँज पुँज बन गई। ऐसी दीन स्थिति में पड़ी हुई गृहिणी जिसने अपने मानसिक संस्थान को शिक्षा और अनुभव के रहित परिस्थितियों में पड़े रहकर सब प्रकार दुर्बल बना लिया है, पुरुष के लिए अपने परिवार के लिए, स्वयं अपने लिए उपयोगी भी क्या हो सकती है। वह एक बोझे की तरह लदी रहती है और दुर्भाग्यवश बीच धारा में ही नाव डूबी, पति का विछोह हुआ तो स्वयं की अयोग्यता, आजीविका के अभाव और कुटुम्बियों के अपमानजनक संकीर्ण व्यवहार के कारण उसे कितनी व्यथा के साथ शेष जीवन पूरा करना पड़ता है ऐसी प्रत्यक्ष देखी अगणित घटनाओं की यदि कुछ भी चर्चा की जाय तो सहृदय पाठकों का हृदय द्रवित हुए बिना न रहेगा। इस दुर्दशा में पुरुष का वह अहंकार ही कारण है जिसने नारी को पिंजड़े के पक्षी की तरह कैद करके अपने मनोरंजन का साधन तो बनाया पर उस बेचारी को उड़ने की शक्ति से वंचित कर दिया।
नारी को ‘गृह लक्ष्मी’ बताया गया है। मान्यता है कि जहाँ लक्ष्मी का पदार्पण होता है वहाँ सुख सम्पदा की कमी नहीं रहती। नारी लक्ष्मी का साक्षात जीता स्वरूप है। सुविकसित, सुशिक्षित, सुसंस्कृत नारी अपने पति के लिए, सन्तान के लिए, परिवार के लिये स्वयं अपने लिए एक वरदान है।’ शरीर का निर्माण बढ़िया आहार-बिहार से हो सकता है पर मनोभूमि का विकास जिस पर सर्वतोन्मुखी उन्नति अवलम्बित है, आदर्श नारी के समुचित सहयोग के बिना सम्भव नहीं। इस कार्य को अध्यापक और उपदेशक भी नहीं कर सकते क्योंकि माता के गर्भ से ही जो बालक रुचिपूर्ण आदतें और दुर्गुण लेकर पैदा हुआ है इसमें एक सामान्य सी सीमा तक ही बाह्य प्रयत्नों द्वारा सुधार सम्भव है।
समाज को सुखी और सम्पन्न बनाने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय और राजनैतिक प्रयत्न हो रहे हैं। यह उचित भी है और सराहनीय भी। पर यदि समाज का आधा भाग ही उससे लाभान्वित हो तो यही मानना पड़ेगा कि यह एक बाँह की कमीज एक टाँग का पाजामा पहनने जैसा उपहासास्पद कार्य होगा। इसे व्यवस्थित प्रगति नहीं कहा जायेगा। समाज को सुविकसित और सच्चे अर्थों में समृद्ध बनाने के लिए नारी की उपेक्षा करने से काम नहीं चलेगा। उसकी भी मानसिक, सामाजिक, बौद्धिक एवं साँस्कृतिक उन्नति के साधन उसी प्रकार जुटाने पड़ेंगे जैसे पुरुष वर्ग की उन्नति के लिए जुटाये जा रहे हैं।
सामाजिक और पारिवारिक जीवन की सुव्यवस्था विकसित नारी के ही द्वारा सम्भव है। इतना ही नहीं मनुष्य का मनःक्षेत्र जो समस्त प्रकार की प्रगति, समृद्धि एवं शक्ति का केन्द्र है। नारी के सहयोग पर ही प्रफुल्लित और प्रस्फुट हो सकेगा। अपने भाग्य निर्माण की, भविष्य निर्माण की इन मंगलमयी घड़ियों में हमें इधर भी ध्यान देना होगा। इस अनिवार्य आवश्यकता की उपेक्षा से जितनी जल्दी विमुख हो सकना सम्भव हो, उतना उत्तम है।
(श्री मनुभाई पी. शुक्ल)
पश्चिमी देशों के ज्योतिषियों के मतानुसार पृथ्वी पर होने वाली घटनाओं पर सबसे अधिक प्रभाव नौ ग्रहों का पड़ता है। पर प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों ने ग्रहों के बजाय नक्षत्रों के प्रभाव को मुख्य माना है। जैसा हम जानते हैं समस्त आकाश अश्विनी से लेकर खेती तक 27 नक्षत्रों, मंडलों में बंटा हुआ है। पृथ्वी का जो भाग जिस नक्षत्र मंडल के प्रभाव में होता है उसे उसी प्रकार का ही फल भोगना होता है।
हिन्दू ज्योति में सर्वतोभद्रचक्र, कर्मचक्र और कर्पूर चक्र जगत व्यापी घटनाओं की भविष्यवाणी करने की दृष्टि से बड़े महत्वपूर्ण हैं। उनमें इन 27 नक्षत्र मण्डलों के बहुसंख्यक रूपों का वर्णन किया गया है जो भावी घटनाओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अद्वितीय और यथार्थ हैं। पर उनके अनुसार फलादेश कहने में कठिनाई यह है कि वर्तमान संसार नक्षत्रों के प्रभाव क्षेत्र के अनुसार विभाजित नहीं किया गया है वरन् राजनैतिक शक्तियों के प्रभाव के अनुसार उसका विभाजन हो रहा है। नौ ग्रहों में से नेपच्यून, हर्शल, शनि आदि ऐसे हैं जिनको सूर्य की परिक्रमा में बहुत अधिक समय लगता है और इसके फल से उनके और अन्य ग्रह नक्षत्रों में होकर गुजरने में बड़ा अन्तर पड़ जाता है। ये 27 नक्षत्र भी चार भागों में बाँटे गये हैं- ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन और कार्बन।
ऑक्सीजन समूह-भरणी, कृतिका, पुष्य, मघा, पूर्वा, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद। ये नक्षत्र दक्षिण दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं और वहाँ के शासक माने जाते हैं।
नाइट्रोजन समूह-अश्विनी, मगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरा, हस्त और स्वाति। यह समूह उत्तर दिशा का प्रतिनिधि और शासक है।
कार्बन समूह-रोहिणी, अनुराधा, ज्येष्ठा, उत्तराषाढ़ा, अभीजित, श्रावण और घनिष्ठा। यह पूर्व दिशा का प्रतिनिधि और शासनकर्ता समूह है।
हाइड्रोजन समूह-आद्रा, अश्लेषा, मूल, पूर्वाषाढ़ा शताभिषा, उत्तराभाद्रा और रेवती। यह पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि तथा शासनकर्ता समूह है।
सन् 1962 के फरवरी के मास के प्रथम सप्ताह में निरनय सिद्धाँत के अनुसार ग्रहों की स्थिति इस प्रकार रहेगी-
चन्द्रमा धनु और मकर में प्रवेश करेगा।
हर्शल-मघा-वृष के नवाँश में।
प्लूटो-पूर्वा-सिंह के नवाँश में।
नेपच्यून-विशारदा-मेष के नवाँश में।
मंगल-उत्तराषाढ़ा-मीन के नवाँश में।
शनि उत्तराषाढ़ा-मीन के नवाँश में।
सूर्य श्रावण-कर्क के नवाँश में।
शुक्र श्रावण-कर्क के नवाँश में।
केतु घनिष्ठा-सिंह के नवाँश में।
बृहस्पति घनिष्ठा-सिंह के नवाँश में
बुद्ध घनिष्ठा-सिंह के नवाँश में।
राहु अश्लेषा-कुम्भ के नवाँश में।
इससे पाठक स्पष्ट देख सकते हैं कि समस्त ग्रह केवल दो नक्षत्र समूहों में उपस्थित हैं। हर्शल, प्लूटो और नेपच्यून, ऑक्सीजन समूह में होकर गुजर रहे हैं और शेष ग्रह कार्बन समूह में होकर कार्बन (कोयला) एक पार्थिक द्रव्य है जबकि ऑक्सीजन ज्वलनशील पदार्थ है जिसमें बड़ी जल्दी आग लगाई जा सकती है।
अगर पिछली घटनाओं पर दृष्टि डालें तो सन् 1934 (वि. 1930) की 15 जनवरी को बिहार और उड़ीसा में एक महाभयंकर भूकम्प आया था और कच्छ तथा सौराष्ट्र में बड़ी कठोर शीत लहर आई थी। इनसे धन जन की अपार क्षति हुई थी। फसल एकदम चौपट हो गई थी, जमीन की जगह पानी और पानी की जगह जमीन दिखलाई देने लगी थी। उस समय ग्रहों की स्थिति इस प्रकार थी-
हर्शल-आश्विनी-मेष नवाँश
केतु-अश्लेषा-मीन नवाँश
नेपच्यून-पूर्वा फल्गुणी-तुला नवाँश
बृहस्पति चित्रा-कन्या नवाँश
बुध ज्येष्ठा-मीन का नवाँश
सूर्य-चन्द्रमा-उत्तराषाढ़-कुम्भ नवाँश
मंगल-श्रावण-कर्क नवाँश
शनि-श्रावण-कर्क नवाँश
राहु-घनिष्ठा-कन्या नवाँश
शुक्र-घनिष्ठा-तुला नवाँश
अगर हम उपर्युक्त दोनों ग्रह दशाओं की परस्पर तुलना करते हैं तो इनमें बहुत कम अन्तर दिखलाई पड़ता है। सन् 1934 में बृहस्पति ग्रहों के योग से बाहर था और केतु अश्लेषा में था। सन् 1962 में राहु अश्लेषा में 5 और बृहस्पति 7 ग्रहों के योग में आ गया है।
भारत का स्वामी ग्रह बुध उस समय अपने ही नक्षत्र ज्येष्ठा में था, पर सन् 1962 में वह वृश्चिक राशि में रहेगा जिसका स्वामी मंगल है। इस अवसर पर बुध घनिष्ठा (स्वामी मंगल) और कुम्भ (स्वामी शनि) और सिंह नवाँश में होगा। इस प्रकार इन दोनों अवसरों पर बुध की स्थिति में बहुत कुछ समानता है। इससे मैं इस निर्णय पर पहुँचता हूँ कि सन् 62 में भी एक भयंकर भूकम्प और शीत लहर आयेगी।
संसार की कुण्डली में यह योग 10वें घर में है। राहु चौथे घर में और हर्शल तथा प्लूटो 5वें घर में हैं जो अशुभ हैं। नेपच्यून हमको सातवें घर से देख रहा है। यह गृह स्थिति प्रजातंत्र शासनों के लिये शुभ नहीं है। जो पिछड़े हुये देश औपनिवेशिक अथवा निरंकुश शासन प्रणाली के विरोध में खड़े हैं और संघर्ष कर रहे हैं, उनको भी कठिनाई सहन करनी पड़ेगी क्योंकि नेपच्यून षड़यंत्रों और गुप्त कार्यवाहियों का द्योतक है। इसलिए इस अवसर पर पिछड़े हुए देशों में गुप्तचरों की कार्यवाहियाँ बहुत अधिक बढ़ जाएंगी। नवाँश की कुंडली में राहु अश्लेषा में है जो हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री पं. नेहरू का जन्म नक्षत्र है। इस अवसर पर उनकी रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की जानी परमावश्यक है। सन् 1962 में भारत की वैदेशिक नीति को बड़ी ही कठिन परीक्षा में होकर गुजरना पड़ेगा।
जब कि सूर्य ध्रुव-स्थिर नक्षत्रों के विभाग में होकर निकलेगा तो संसार की बहुत सी सरकारों को महत्वपूर्ण कष्ट उठाने पड़ेंगे। इस समूह में रोहिणी और तीनों ‘उत्तरा’ नक्षत्र हैं। इसी समय मंगल, भरणी, मघा और तीनों ‘पूर्वी’ के समूह से निकलेगा। इसके फल से पृथ्वी में युद्ध का वातावरण पैदा हो जायेगा। अगर इस अवसर पर शनि ‘दारुण तीक्ष्म समूह में गुजरेगा तो युद्ध का विस्तार बहुत अधिक हो जायेगा और विश्व-युद्ध आरंभ हो जायेगा। केवल मंगल का क्रूर उस समूह में गुजरना भी किसी राष्ट्र में भयंकर विद्रोह उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त होता है।
‘कर्पूर चक्र’ के अनुसार शनि के मकर राशि में होकर गुजरने का कुप्रभाव उत्तर दिशा में पड़ता है। इस दृष्टि से भी नेपाल, बिहार, तिब्बत और हिमालय के भागों को भूकम्प का भय है। ता.- 5 फरवरी 62 को जो सूर्य ग्रहण लगने वाला है यह भी घनिष्ठा नक्षत्र में है। इसका संबंध मकर राशि से है जिसका प्रभाव जल पर पड़ता है। गुजरात, कच्छ, सौराष्ट्र और राजस्थान इस विभाग में आते हैं। चूँकि यह ग्रहण जाड़े की ऋतु में पड़ेगा, इसलिये एक कठोर शीत-लहर की सम्भावना है जिससे खेतों की फसल नष्ट हो जायेगी और भयंकर अकाल पड़ जायेगा। इस ‘गोलयोग‘ से और भी बहुत से योग बनते हैं। जैसे कहा गया है-
दिन नाथेन्दु कवयो यदैकत्र समाश्रिताः।
उत्तरस्याँ दिशिभयं प्रजाकंदति नित्यशः॥
‘जब सूर्य, शुक्र और चन्द्रमा एक साथ किसी एक ही राशि में होकर गुजरते हैं तो भारतवर्ष के उत्तरी भागों में आपत्ति का समय आता है। विशेष रूप से पंजाब, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्राँत में। इस अवसर पर प्रजा बहुत दुःख पाती है।’
बृहस्पति और केतु का योग ऐसा नाशकारी नहीं है जैसा कि बृहस्पति और राहु का। इतना ही नहीं बृहस्पति केतु के अशुभ फल को बहुत कुछ कम भी कर देता है। उत्तराषाढ़ा, श्रवण और घनिष्ठा उत्तरी पश्चिमी दिशा के प्रतिनिधि हैं इसलिए उन भागों में कष्ट के समय का सामना करना पड़ेगा। भारतवर्ष की शासक कन्या राशि है और उससे 5वें घर में यह योग होने वाला है। बारहवें घर का स्वामी 5वें घर में आ गया है। नई देहली की कुण्डली में यह योग 7वें घर में हैं। इसके फल से भारत वर्ष की पंच वर्षीय योजना में बारबार विभिन्न परिवर्तन होंगे। शिक्षा, व्यवसाय और व्यापार में गंभीर उतार-चढ़ाव और परिवर्तन होंगे जो जनता के लिए अहितकर जान पड़ेंगे। इस देश के शासन कार्य में अमरीका का प्रभाव बढ़ेगा। प्रमुख व्यक्तियों का जीवन संकट में रहेगा।
(डॉ. लक्ष्मीनारायण टंडन ‘प्रेमी’)
पर-आश्रित होने पर मनुष्य को अपना सम्मान खोना पड़ता है। वह दूसरों की दया पर निर्भर रहता है। अतः इससे उसकी मानसिक परतंत्रता प्रारंभ हो जाती है। यह सब से बुरी गुलामी होती है। दूसरों की दया, कृपा, पक्ष पाने के लिए उसे अपनी आत्मा के विरुद्ध जाना पड़ता है, अपनी आत्मा को दबाना पड़ता है। इससे इसका घोर पतन होता है। अपनी स्वतंत्र इच्छा, अपने स्वाभाविक। निर्णय अपनी बुद्धि तथा मन निर्देशन पर चलने की स्वतंत्रता छिन जाती है। उसमें साहस ही नहीं रहता कि वह अपने उपकार दाता की इच्छा के विरुद्ध जा सके। कितनी परवशता होती है, कितना अधःपतन।
यदि दान और कृपा वह ग्रहण करे जो अंधा, अपंग, निराश्रित, वृद्ध हो, तो वह अवश्य क्षम्य है। पर जो दान इसलिए लेता है कि वह दान लेने का अभ्यस्त हो गया है, जिसके मुँह में हराम का खून लग चुका है, वह बुरा है, अधम है। दान लेना बुरा तब होता है जब वह उदारतावश दिया जाय और पाने वाले से इसके बदले से कुछ मिलने की आशा न हो। जब कोई मनुष्य अपने परिश्रम से ऊंचा उठना चाहता है तो उसके शरीर, मन तथा आत्मा की उन्नति होती है। जो सदा दान पर रहना चाहता है उसके सोचने-विचारने की शक्ति क्षीण हो जाती है।
अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक ओलिवर गोल्ड स्मिथ ने लिखा है कि जब कोई मनुष्य हमेशा दूसरों की कृपा पर निर्भर रहता है तो उसका सारा संकल्प, भावना और क्रिया दान देने वाले से नियंत्रित होती है और कुछ दिनों में धीरे-धीरे उसकी मानसिक स्वतंत्रता नष्ट हो जाती है।
एहसान का बोझ बड़ा भारी होता है। एहसान लेने वाली जिह्वा बन्द हो जाती है। ‘आप ही मर जायेगा अहसान का मारा हुआ’। जब हम एहसान से दब चुके हैं तो हमसे नैतिक अनैतिक सभी कार्य कराये जा सकते हैं। धूर्त लोग अपना मतलब साधने के लिये पहले अहसान के बोझ से ही उसकी आत्मा खरीद लेते हैं।
दान देने से हमारे ग्रंथों में बड़ी महिमा गाई है। पर दान सच्चा वही है जो दान के उपयुक्त पात्रों को दिया जाय और निस्वार्थ भाव से दिया जाय। गीता में भी दान के तीन भेद बताये हैं-सात्विक, राजसिक, तामसिक। केवल सात्विक दान ही धर्म है। ओलीवर गोल्ड स्मिथ ने कहा है अगर आदमी को उसी प्रकार की दलीलों और जोरदार भाषणों से यह शिक्षा दी जाती है कि हमें बाँधने वाले दानों का लेना घृणास्पद है, जिस दलील और जोर से दान देने की शिक्षा दी जाती है तो हम देखते हैं कि समाज का प्रत्येक आदमी अपने पद के कर्त्तव्यों को प्रसन्नतापूर्वक परिश्रम से पूरा करता है। न तो वह आशा के कारण अपने परिश्रम में ढिलाव करता, न निराशा के कारण दुखी और क्रुद्ध होता है।
कपड़ा जब तक निर्मल स्वच्छ होता है तब तक मनुष्य का प्रयत्न सतत यही रहता है कि उसमें दाग न लग पाये, वह मैला न हो जाय। पर जहाँ एक बार दाग लगा कि फिर मनुष्य कपड़े की निर्मलता स्वच्छता की ओर से लापरवाह हो जाता है। दान लेने वाले से मनोवैज्ञानिक ढंग से उसकी भावना का विश्लेषण कीजिये। अपनी परवशता पर वह झुँझलाता है कि उसने क्यों दान लेकर अपनी आत्मा की शाँति और मानसिक स्वतंत्रता खोई। वह भविष्य में दया, पक्ष, या दान न लेने का संकल्प करता है। पर उसकी आदत तो बिगड़ चुकी होती है। एकबार जिससे वह दान ले चुकता है, उससे दूसरी बार भी वह इन्कार नहीं कर सकता। मानसिक झुंझलाहट के अवसर पर दानी के प्रति कृतज्ञ भी हो जाता है और फिर वह अपने स्वतन्त्र होने का विचार ही छोड़ देता है। अपने को दानी का आश्रित समझ कर वह उसकी चापलूसी करता है और उस पर आश्रित रहने का आदि हो जाता है और इस प्रकार आदर और तिरस्कार सहता है। उसे मानसिक जेलखाने में बराबर घुलना पड़ता है। हर एक नया दान उसके पहले वाले बोझ को और भारी बना देता है। और फिर वह इस सीमा तक दब जाता है कि वह गुलामी का आदी हो जाता है और गुलामी को वह कोई बुरी चीज नहीं समझता।
अब वह एक को छोड़ कर दूसरे से दान लेना आरम्भ करता है और फिर दूसरे को छोड़ कर तीसरे से। बराबर दान लेने वाला आदमी आलसी हो जाता है और इस प्रकार वह समाज के लिए एक भार स्वरूप हो जाता है। ऐसे को दान देना बेकार है। जिसमें आत्म सम्मान नहीं है, वह क्या और नीचे गिरेंगे। वे तो गिरे हुए हैं ही। पर जिसमें तनिक भी आत्म सम्मान शेष है, नीचे तो वे गिरते हैं दान लेने से। दान लेना मनुष्य को निकम्मा बना देता है।
लूले-लँगड़े, अपाहिज आदि को दान दिया जाता है कर्तव्य की भावना से प्रेरित होकर। अतः देने तथा लेने वाले दोनों ही न्याय-स्तर पर हैं। अब उस कृपा, दया, सहायता या दान के विषय में सोचिये जो माता-पिता या गुरुजन अपनी सन्तानों या छोटों को देते हैं। यह दान न देना बुरा है न लेना। क्योंकि दान देने वाला इस आशा से देता है कि आगे चलकर सन्तान अपने माता-पिता का पालन करेगी। अतः ये दोनों ओर से दान न होकर कर्तव्य हुआ। दान बुरा वहाँ है जहाँ वह भिक्षा समझ कर दिया जाता है।
दान लेने वाला, पर आश्रित तो पाप का भागी है ही, जो दान देता है वह भी कम पापी नहीं है क्योंकि वह दान ग्रहण करने वाले को सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करने की क्षमता या इच्छा से वंचित करता है। मातहत होना दूसरी बात है। अपने से बड़े, अपने अफसर पर निर्भर रहना निन्दनीय नहीं है क्योंकि हम अपने अफसर की आज्ञा का पालन करते हैं और उसके बदले में उससे कुछ रियायतें माँगते हैं।
दान देने वालों का भी पतन होता है केवल दान लेने वाले का ही नहीं होता। दान देने वाला सदा जी हुजूरों, चापलूसों से घिरा रहेगा। अतः वह वास्तव में क्या है? इसे वह कभी न समझ पावेगा। वह अपने को उस बड़प्पन का अधिकारी समझेगा जिसके योग्य वह नहीं है।
अतः दान लेना हमारे लिए शर्म की बात होनी चाहिए। जो दूसरों की भिक्षा प्राप्त करके जीवन में सुख और सफलता चाहते हैं उन्हें सिवाय कष्ट, निराशा, पश्चाताप और निरादर के और कुछ नहीं मिलता। अपनी मेहनत से कमाई रूखी रोटी भी दान के मालपुओं से अधिक उत्तम है।
अतः अपने पैरों पर स्वयं खड़े हो। दूसरों का मुँह न ताको। तुम मनुष्य हो, कुत्ते नहीं कि किसी ने दया करके एक टुकड़ा फेंक दिया और तुम दुम हिलाने लगे। तुम ईश्वर के महान पुत्र हो, तुम सर्व समर्थ हो, तुम क्षमतावान हो। तुम केवल अपने असीम बल को भूले हुए हो। अपने ऊपर भरोसा रखो, अपनी महानता को सोचो, अपने अज्ञान का परित्याग करो। शेर के पुत्र होकर तुम बकरियों की तरह क्यों मिमियाते हो। याद रखो भगवान् ने तुम्हें हाथ, पैर, बुद्धि सब दी। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं और तुम्हें कभी दूसरे का आश्रय ग्रहण करने को बाध्य हो तो उससे जल्दी से जल्दी भागने का प्रयत्न करो, आत्म निर्भर बनो।
“अखण्ड ज्योति” इस अंक के साथ अपने जीवन के 16 वर्ष पूर्ण करके 17वें वर्ष में पदार्पण कर रही है। इस अवसर पर वह अपने परिवार के सभी सदस्यों का अभिनन्दन करती है जिनके स्नेह सहयोग और आत्मभाव ने उसे जीवित ही नहीं रखा आगे भी बढ़ाया है।
अखण्ड ज्योति का एक मात्र उद्देश्य मानव जीवन को ऊँचा उठाने वाले सद्ज्ञान का प्रसार करना ही है। इसलिए उसने बाहरी विज्ञापनों से हो सकने वाली भारी आय को तिलाँजलि देकर आरम्भ के पृष्ठ से अन्तिम पृष्ठ तक केवल सद्ज्ञान को ही छापना उचित समझा है। वार्षिक चन्दा भी इतना सस्ता रखा है कि सम्पादन, प्रबंध, मकान किराया, पत्र व्यवहार आदि का कोई खर्च उस पर न लगाने पर भी कागज छपाई का मूल्य मुश्किल से पुरा हो पाता है। कई वर्षों में तो काफी घाटा भी चला जाता है। पूँजी और साधनों के अभाव में भी ‘अखण्ड ज्योति’ के चलते रहने में प्रेमी पाठकों की व्यापक सद्भावनाओं को ही श्रेय है।
इस वर्ष अधिक ज्ञान वर्धक साहित्य देने की दृष्टि से अखंड ज्योति की पृष्ठ संख्या ड्यौढ़ी की गई है। पर मूल्य सवाये से भी कम केवल आठ आना बढ़ाया गया। ऐसी दशा में इस वर्ष काफी घटा रहने की सम्भावना है। इसकी पूर्ति तभी सम्भव है जब इस वर्ष नये ग्राहक बढ़ाने का कुछ अधिक प्रयत्न किया जाए। इस प्रयत्न में यदि आप थोड़ा सा सहयोग दें तो आपकी प्रिय अखण्ड ज्योति सम्भावित घाटे से बच सकती है और अधिक सेवा कर सकने में समर्थ हो सकती है। हमें आपकी अब तक सद्भावना पर भारी विश्वास है और इस दिशा में हर प्रेमी से इस वर्ष कुछ अधिक आशा रख रहे हैं।
जिनका वर्ष बीच के किसी महीने से प्रारम्भ हुआ है वे सन 55 के अंकों का मूल्य 2॥) वार्षिक के हिसाब से काट कर, शेष जो बचे उसको सन 56 के 3) में से कम करलें और शेष पैसा भेज दें। अधूरे वर्ष का हिसाब रखने में हमें भी और पाठकों को भी भारी अड़चन रहती है। जिनने सन 56 का चन्दा भी 2॥) ही भेजा है उनसे शेष भी शीघ्र ॥) भी भेज देने की प्रार्थना है। अन्यथा उनका चन्दा अक्टूबर 56 में समाप्त हो जाएगा। इस प्रकार लटकता हिसाब छोड़ना असुविधाजनक ही है।
यहाँ से हर महीने दो बार जाँच कर ‘अखण्ड ज्योति’ भेजी जाती है 1. पते में गलती 2. डाक में गड़बड़ी 3. पता बदल लेने पर भी सूचना न देना, आमतौर से यही कारण अंक न पहुंचने के होते हैं। यदि किसी मास अंक न पहुँचे तो उसी मास त. 15 के लगभग सूचना देकर दूसरी प्रति तब दुबारा भेजना कठिन होता है। गतवर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक रजिस्टर चोरी चले गये थे, इस झमेले में भी अनेक ग्राहकों के अंक पहुंचने में असुविधा हुई। वह एक विशेष दुर्घटना थी उस विवशता के लिए क्षमा प्रार्थना के अतिरिक्त और कुछ करने में हम असमर्थ भी थे। गतवर्ष के कुछ अंक अभी स्टॉक में मौजूद हैं जिन्हें जो अंक न मिले हों वे सूचना देकर मँगा सकते हैं। हर पत्र में पूरा पता और अपना ग्राहक नम्बर लिखते रहने की एवं जवाबी पत्र भेजने की हर पाठक से विशेष प्रार्थना है।
-व्यवस्थापक
“अखण्ड ज्योति” प्रेस, मथुरा।
नया विहान आ रहा सुषुप्ति तज बढ़े चलो!
नवीन चेतना भरो, प्रशस्त पथ किये चलो!!
धरा सभीत हो रही, कि धन्ध्कार बढ़ रहा!
सुबुद्धि ध्वंस में निरत, महान स्वार्थ बढ़ रहा!!
सृजन विलाप कर रहा, कि राग-द्वेष बढ़ रहा!
उदित सुधाँशु शान्ति और, राहु आज बढ़ रहा!!
बढ़े न और इस तरफ , कृपाणा खींच कर चलो!
न मृत्यु से डरो कभी दहाड़ते हुए चलो!!
विपत्ति के पहाड़ टूट, पंथ रोक लें नहीं!
न स्वर्ग के अनन्त भोग, मोह लें तुम्हें कहीं!!
चरण जिधर बढ़े सुदृढ़, नवीन राह हो वही!
गगन झुके धरा उठे कि स्वर्ग ही बने मही!!
रुके न यह प्रयाण गीत ध्वज लिये बढ़ चलो!
नवीन क्रांति का बिगुल, बजा विहँस चले चलो!!
मचल उठा समुद्र यह, अनन्त ज्वार आज ले!
सुधीर शान्त जो सदा, महाप्रलय का साज ले!!
अजेय यह नगेश भी तुम्हें मुकार है रहा!
महान आश ले तुम्हें, निहार विश्व है रहा!!
मशाल ज्ञान की जला विनाश तम, बढ़े चलो!
शहीद हो कि देश-हित नवीन बलि दिये चलो!!
बुझे न दीप जो जला न स्नेह ही चुके कभी!
अनीति के समक्ष यह, न भाल ही झुके कभी!!
असीम श्रम करो कि विश्व-वाटिका विहँस उठे!
नवीन प्रेरणा भरो, सृजन स्वयं विहँस उठे!!
नवीन अर्चना करो, विमुक्त ही बढ़े चलो!
नवीन साधना करो, स्वलक्ष्य को बढ़े चलो!!
-राम स्वरूप खरे ‘साहित्य रत्न’
*समाप्त*