बुझ गये जो दीप उनकी याद में जल रहे हैं ज्योति के प्यासे नयन।
समय की नौका नियत की धार में,
लहर की सीमा बंधी पतवार में।
जिन्दगी की जीत शायद है छिपी,
आदमी की विवशता में हार में॥
चल चुके जो चरण हैं इस पथ पर प्रगति करती है उन्हीं का अनुसरण
कल्पना के आवरण में कामना,
कामना में मूर्त मन की याचना।
याचना की इष्ट बस केवल यही,
सिद्धि बन जाये स्वयं सम्भावना॥
साँझ की धुँधली प्रभा के अंक में मुस्कराती ज्योत्सना का अवतरण।
ज्योति की अनुराग मय मंगल शिखा,
त्याग का वह पाठ देती है शिखा।
युग युगों से जो मनुज के मोह को,
लक्ष्य है उत्सर्ग का देता सिखा॥
श्वास के अन्तहीन प्रवाह का गमन बनता है किसी का आगमन।
—शिवशंकर एम. ए.
सम्पादकीय
“आज मैं कुछ नहीं चाहता, आज मैं पाने की प्रार्थना नहीं करूंगा। आज मैं देना चाहता हूँ। देने की शक्ति चाहता हूँ। तुम्हारे संसार में कर्म के द्वारा तुम्हारी जो मैं सेवा करूंगा वह निरन्तर होकर मेरे प्रेम को जागृत और निष्ठावान बनाये रखे। तुम्हारे सामने मैं अपने आपको परिपूर्ण रूप से रिक्त कर दूँगा। रिक्त करके अपने को परिपूर्ण करूंगा।”
—रवीन्द्रनाथ टैगोर
विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की उक्त भाव व्यंजना में कर्म की अनवरत साधना से परमात्मा की पूजा का सन्देश झंकृत हो रहा है। अपनी कर्मशीलता और परिश्रम पुरुषार्थ आदि के द्वारा किस प्रकार उस परमपिता परमात्मा की पूजा करके उसकी प्राप्ति की जा सकती है। विराट का साक्षात्कार करके आत्म लाभ प्राप्त किया जा सकता है। यह विश्व कवि ने अपनी छोटी सी भाव व्यंजना में स्पष्टतया व्यक्त किया है। इससे सर्व प्रथम हमें जीवन में कर्मशीलता अबाधित गतिशीलता पुरुषार्थ का सन्देश मिलता है।
सृष्टि का प्रत्येक तत्व गतिशील है, कर्मशील है, परिवर्तनशील है, कदम कदम पर नई मंजिल की ओर बढ़ना इसका मूल मन्त्र है। कर्मशीलता, गतिशीलता के अभाव में विश्व का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। प्रकृति का प्रत्येक पदार्थ निरन्तर विश्व के उक्त सत्य का सन्देश दे रहा है। नदी अपनी निरंतर गतिशीलता से बही जा रही है। सूर्य उदय होता है, आकाश में आते सम्पूर्ण आलोक से प्रकाशित होता है, छिपता है, रात्रि अपनी काली चादर ओढ़े आती है, चली जाती है फिर दिन आता है। पेड़ वनस्पतियाँ उगते हैं, बढ़ते हैं, मिटते हैं। गतिशीलता, निरन्तर कर्मशीलता ही विश्व का मूल मंत्र है, प्रेरणा है, प्रकृति का नियम है। जहाँ गतिशीलता नहीं है, कर्म का निरन्तर क्रम नहीं है, वहाँ विश्व का अस्तित्व नहीं है, सृष्टि संचालन की आशा नहीं है।
मानव जीवन का अस्तित्व भी विश्व के प्रकृति के उक्त आदेश का पालन करने में ही है। कर्म ही जीवन है। महान विचारक रस्किन ने कहा है—”मनुष्य के श्रम का सर्वोच्च पारितोषिक उसे उपलब्ध पुरस्कार नहीं वरन् उसका सम्पूर्ण जीवन ही है।” जीवन की सार्थकता निरन्तर कर्मशीलता में है। उपनिषद् में है—
कुर्वन्नेवेह कर्माणि, जिजी विषेत्..... कर्म करते हुए ही हम सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करें।” कर्म के अभाव में प्राण प्रज्ञा एवं ज्ञान का विशेष महत्व नहीं है। कर्म के सम्पुट से ही प्राण प्रज्ञा और ज्ञान के संयोग से जीवन बना है। कर्म एक निरन्तर साधना है जिससे जीवन के वास्तविक मूल्य की प्राप्ति की जा सकती है। महापुरुषों का जीवन कर्म शीलता का जागृत उदाहरण है। ईसा, बुद्ध, शंकराचार्य, गाँधी की जीवनियों से ज्ञात होता है कि उन्होंने कर्म को ही अपना जीवन साथी चुना और उसके सहारे महानता प्राप्त की। पं. नेहरूजी ने एक जगह लिखा है “काम के भार से मैं अपने शरीर और मस्तिष्क की स्फूर्ति कायम रख पाता हूँ। श्रम ही जीवन है।” अमेरिका के धनपति हेनरी फोर्ड “हमारा काम ही हमें जीवन प्रदान करता है।” लोकमान्य तिलक ने लिखा है- “संसार में एक ही वस्तु को मैं परम पवित्र मानता हूँ, वह है मनुष्य का अनवरत श्रम।”
मनुष्य जीवन की सार्थकता सफलता, सिद्धि में श्रम का कर्मशीलता का प्रमुख स्थान है। श्रम का अवलम्बन लेकर मनुष्य महान बन सकता है। संसार का मार्ग बदल सकता है। कर्म शक्ति से क्या-क्या नहीं हो सकता। कर्म सन्देश देते हुए ही ऋषियों ने कहा है “उत्तिष्ठत जाग्रत, प्राप्य वरान्नि वरोधत।” उठो जागो और यथार्थ ज्ञान को प्राप्त करो।
कर्मशीलता निरन्तर गतिशीलता, आगे बढ़ने में भी अवरोधों, अभिघातों का आना स्वाभाविक है। सम्भव है यही विश्व की संघर्ष शीलता है जीवन संग्राम है। विश्व का कोई तत्व कोई पदार्थ ऐसा नहीं है जहाँ प्रतिरोध संघर्ष अभिघातों का सामना न करना पड़े। नदी को अपनी निरन्तरता गतिशीलता को कायम रखने के लिए कितने पहाड़ों घाटियों मैदानों में होकर गुजरना पड़ता है और कितने प्रतिरोधों का सामना करना पड़ता है। बीज को विशाल वृक्ष बनने की तैयारी में पृथ्वी के कठोर तल का सामना करके उसे तोड़ना पड़ता है। फिर अपनी वृद्धि के क्रम में कितने प्रतिरोध सहने पड़ते हैं। ठीक इसी प्रकार जीवन की गतिशीलता, कर्मशीलता में प्रतिरोधों का सामना करना भी स्वाभाविक ही है। क्योंकि बिना इनकी गतिशीलता के तीव्रता शक्ति स्फूर्ति पैदा नहीं होती। मनुष्यत्व के पथिकों को, आत्मलक्ष्य के जिज्ञासुओं को, जीवन यात्रा के यात्रियों को, जीवन के सफल कलाकारों को, अपनी गतिशीलता कर्मशीलता को जारी रखने के लिए आने वाले अभिघातों कष्टों प्रतिरोधों का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहना आवश्यक है। अपने पुरुषार्थ, अखण्ड परिश्रम, कर्म की गति को रोकना नहीं चाहिए वरन् अपनी जीवन नौका को इन बल्लियों से सुख दुःखों की उत्ताल तरंगों के ऊपर से बहा ले जाना चाहिए। कष्टों का वरण करके अपनी गतिशीलता का क्रम जारी रखना चाहिए। पथ की कठोर विभीषिकाओं की ओर संकेत करते हुए ऋषियों ने कहा है “क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया, दुर्गं पथस्तत कवयो वदन्ति” वह पथ क्षुरधारा के समान दुर्गम है ऐसा कवियों ने, जीवन यात्रा के सफल पथिकों ने जीवन दर्शकों ने कहा है।
किन्तु यह सब किस लिये, यह संघर्ष क्यों, इस विषम भार को वहन कर जीवन को तिल-तिल क्यों घिसा जाए? यह प्राण प्रण चेष्टा क्यों की जाए? इसका प्रत्युत्तर हमें उस पुष्प के जीवन से मिलता है जो अपनी मनोरम आभा, मधुर मकरन्द, सुन्दर छवि शक्ति सामर्थ्य तथा स्वयं को निखिल विश्व में उस विराट की अंक में एक आहुति तथा उसकी पूजा के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। हमारे प्रश्नों का प्रत्युत्तर देती हुई नदी हमें अपना मूक सन्देश दे रही है जिसके एक ओर की गतिशीलता, प्रतिरोध, अभिघात और कठिनाइयों का सामना सुदीर्घ यात्रा, मार्ग की उलझने और उसके दूसरी ओर जहाँ वह जा रही है विराट महासागर जिसमें वह अपने आपका उत्सर्ग कर अस्तित्व को मिटाकर अपने आपकी एक आहुति देती है और अपने को पूर्ण रूपेण उसमें लय कर देती है।
ठीक इसी प्रकार जीवन की गतिशीलता कर्मशीलता निरन्तर श्रम का निशेषलय भी उस एक विराट की अनन्य सत्ता में है। जगत के इस विशाल यज्ञ कुण्ड में मानव जीवन एक आहुति है। वेद में कहा गया है “कस्मै देवाय हविषा विधेम” अपनी जीवन रूपी हवि से हम परमदेव की अर्चना करते हैं। जीवन की कर्मशीलता का उद्देश्य भी विश्व यज्ञ की आहुति के रूप में होना आवश्यक है। शास्त्र कहता है “यद् यद् कर्म प्रकुर्वीततद् ब्रह्मनि समर्ययेत” ब्रह्मनिष्ठ गृहस्थ जो जो कर्म करे उन्हें ब्रह्म को उस विराट सत्ता को समर्पण कर दे जिसकी प्रेरणा से यह सृष्टि का क्रम चल रहा है। जहाँ एक ओर संसार संग्राम है निरन्तर गतिशीलता, कर्म, श्रम का सन्देश है उसके दूसरी ओर उस कर्तृत्व को उस परम सत्ता में जहाँ सारे कर्तृत्व घट विघटन का निःशेष रूप से लय होता है विसर्जित करके अपने आपको उस विराट में समर्पित करके अखण्ड आनन्द, प्रेम, पूर्णता, परम शान्ति, आत्मलक्ष्य प्राप्त करना आवश्यक है। यही जीवन यात्रा की कर्मशीलता श्रम, गति के उद्देश्य का निर्धारित सत्य है जो प्रत्येक बुद्धिमान मानव को अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)
गायत्री के 24 अक्षरों में भगवान् से सद्बुद्धि की प्रार्थना और याचना की गई है। सद्बुद्धि ऋतम्भरा प्रज्ञा-वह तत्व है जिसे प्राप्त कर लेने पर और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। कमल का फूल जब खिलता है तो उसकी सौंदर्य और गन्ध से आकर्षित होकर कौए, मधुमक्खियाँ और तितलियाँ दूर-दूर से अनायास ही दौड़ते चले आते हैं। उसी प्रकार जिस अन्तःकरण में गायत्री द्वारा आराधित सद्बुद्धि की आभा विकसित होती है—वहाँ लौकिक और पारलौकिक अनेकों सुख-साधन स्वयमेव आकर्षित होते हुये दौड़े चले आते हैं।
रामायण में कहा गया है—
जहाँ सुमति तहँ संपत्ति नाना।
जहाँ कुमति तहँ विपति निदाना॥
जहाँ सुमति का, सद्बुद्धि का प्रकाश होगा वहाँ नाना प्रकार की सम्पत्तियों के भण्डार जमा हो जाएंगे और जहाँ सुमति का अभाव होगा उसकी प्रतिपक्षी शक्ति कुमति निवास करेगी वहाँ अनेकों विपत्तियों की घटनाएँ छाई रहेंगी। सद्विवेक की आवश्यक मात्रा मस्तिष्क में हो तो मनुष्य ऐसा श्रेष्ठ आचरण करता है जिससे उसका जीवन बड़ी शान्ति और सरलता पूर्वक व्यतीत होता है। सदाचारी व्यक्ति को किसी का भय नहीं रहता। वह किसी का अनिष्ट नहीं करता तो दूसरे भी अकारण उसे हानि नहीं पहुँचाते। उसका व्यवहार सबसे मधुरता और उदारता का होता है तो दूसरे भी बदले में वैसा आनंद दायक व्यवहार करते हैं। संयमशील, उचित आहार विहार का जिनका जीवन है उन्हें अस्वस्थता और अल्पायु का भी दुःख नहीं होता। ऐसे विवेकशील लोग शरीर और मन में सदा सुखी एवं सन्तुष्ट रहते हैं।
प्रार्थना रूप गायत्री की उपासना में कोई नियम बन्धन नहीं है। जैसे साधारण कथा में भगवान् से प्रार्थना की जाती है। उसी प्रकार गायत्री के द्वारा भी भगवान से सद्बुद्धि माँगी जा सकती है। किंतु यदि आध्यात्म विज्ञान सम्मत प्रक्रिया द्वारा इस ऋतम्भरा तत्व को सूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में से आकर्षित करके अपने लिए समुचित मात्रा में प्राप्त करना हो तो गायत्री का उपयोग मन्त्र रूप में करना पड़ेगा। मन्त्र में विशेष शक्ति सम्मिलित रहती है पर साथ ही इससे शास्त्रीय नियम विधानों का बन्धन भी है। बिना विधान और प्रक्रिया का समुचित पालन किए मन्त्र तत्व जागृत नहीं होता और उसका वह फल नहीं मिलता जो उस महाशक्ति के द्वारा प्राप्त होना चाहिये।
प्रार्थना में भावना की प्रधानता
यों गायत्री को अगणित मनुष्य जानते हैं, उसका उच्चारण और स्मरण भी करते हैं उसका उतना ही सीमित लाभ भी होता है जितना कि समय समय पर ईश्वर से की जाने वाली प्रार्थना का होता है। प्रार्थना में भावना प्रधान होती है जितनी तीव्र गहरी भावना से प्रार्थना की जाएगी उतना ही उसका परिणाम भी होगा। ग्राह के मुख में फँसे हुए गज ने जब अपने अन्तस्तल की पूरी गहराई और प्रबल भावना के साथ भगवान् को पुकारा तो वे अपने वाहन गरुड़ की मन्दगति अपर्याप्त समझ कर अधिक जल्दी भक्त की रक्षा करने के लिए नंगे ही पैरों दौड़े आये। किन्तु कितने ही लोग ऐसे भी हैं जो देर तक प्रार्थना करते रहते हैं फिर भी उसका कुछ परिणाम नहीं होता। कारण एक ही है कि उनकी प्रार्थना में शब्द और विचार तो होते हैं। पर भावों की गंभीरता नहीं होती। उसके अन्तस्तल से निकली हुई प्रार्थना का प्रभाव तो होता है पर बहुत ही कम। गायत्री मन्त्र का उपयोग बिना किसी विधान के प्रार्थना रूप में किया जा सकता है। पर उसका न्यूनाधिक परिणाम प्रार्थना करने वाले की भावना के अनुरूप ही होगा।
प्रार्थना में भावना की प्रधानता का प्रतिपादन करते हुए शास्त्रों में कहा गया है—
भावेन लभते सर्वं भावेन देव दर्शनम्।
भावेन परमं ज्ञानं तस्याद भावावलम्बनम्॥
—रुद्र मल
भाव से ही सब कुछ प्राप्त होता है। भावना की दृढ़ता से ही देव दर्शन होते हैं। भावना से ही ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिये भाव का ही अवलम्बन करना चाहिये।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवनि तादृशी।
जिसकी जैसी भावना होती है उसे वैसी ही सिद्धि मिलती है।
ऐसी भावमयी प्रार्थना के लिए नियमोपनियमों या साधना विधानों का कोई बन्धन नहीं है।
अशुचिर्वाशुचिर्वापि गच्छन् तिष्ठन् यथा तथा।
अपवित्र हो अथवा पवित्र हो, चलता हो अथवा बैठा हो, जिस भी स्थिति में हो, बुद्धिमान मनुष्य गायत्री का जप करता रहे। इस जप के द्वारा पापों से छुटकारा होता है।
—गायत्री तन्त्र
मानसिक जप को प्रार्थना संज्ञा में माना गया है इसलिये उसमें नियम बन्धनों का प्रतिबन्ध नहीं है।
अशुचिर्वा शुचिर्वापि गच्छाँस्तिष्ठन् स्वपन्नपि।
मंत्रैक शरणो विद्वान् मनसैव सदाभ्यसेत्॥
न दोषो मानसे जाप्ये सर्व देशेऽपि सर्वदा।
पवित्र हो अथवा अपवित्र, चलते-फिरते, बैठते-उठते, सोते-जागते एक ही मन्त्र की शरण लेकर उसका सदा मानसिक जप करता रहे। मानसिक जप में किसी समय या स्थान का दोष नहीं होता।
प्रार्थना तभी सुनी जाती है जब उसमें अनन्यता एवं तन्मयता हो। विषयी, लोभी, कामी पुरुषों को अपने विषय में जैसी लगन होती है, वैसी ही यदि ईश्वर में निष्ठा और भक्ति हो तथा गज के समान गहन अन्तस्तल में प्रार्थना की जाए तो उसका प्रभाव भी वैसा ही होता है जैसा कि हुमायूँ की बीमारी के समय उसके पिता बाबर ने खुदा से इबादत की कि मेरा बेटा जी जाए और मैं उसके बदले में मर जाऊँ। उसी प्रार्थना सुनली गई। बाबर मर गया और हुमायूँ कठिन बीमारी में अच्छा हो गया।
प्रार्थना की सफलता का रहस्य भक्त की इन भावनाओं पर आधारित रहता है।
या प्रीतिरविवेकानाँ विषयेष्वन पापिनी।
त्वामनुस्यरतः सा में हृदयान्याय सर्पतु॥
—विष्णु पुराण
जिस प्रकार अविवेकी मनुष्यों की प्रीति विषयों में होती है, वैसी ही मेरी प्रीति सदा तुम में बनी रहे।
मन्त्र विद्या में विधि-विधान की आवश्यकता
मन्त्र विद्या का तत्त्व ज्ञान इससे भिन्न है। उसमें विधि-विधान, कर्मकाण्ड और मर्यादा की प्रधानता है। मन्त्र में प्रचण्ड शक्ति सन्निहित है। मन्त्र शास्त्र एक प्रत्यक्ष विज्ञान है। जिस प्रकार भौतिक विज्ञान के नियमों के आधार पर काम करने वाले यन्त्र विधिवत् चलाये जावें तो अपना कार्य नियमित रूप से करते हैं उसी प्रकार मंत्र भी यदि निर्धारित कर्मकाण्ड एवं विधान के आधार पर प्रयुक्त किये जाए तो उनके द्वारा वही लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं जो शास्त्रकारों एवं ऋषियों ने बताये हैं।
गायत्री की यदि विधिवत् शास्त्रीय प्रक्रियाओं के आधार पर उपासना की जाए तो वह मंत्र रूप होकर चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती है। जिस प्रकार प्रार्थना में भावना प्रधान है उसी प्रकार मंत्र में साधना विधान की प्रधानता है। भावना विहीन प्रार्थना निष्फल जाती है उसी प्रकार साधना विधान उपेक्षा करने पर मंत्र का समुचित परिणाम नहीं होता।
गायत्री जहाँ प्रार्थना है वहाँ वह महान रहस्यमयी मन्त्र शक्ति भी है। मन्त्र रूप में इस अनादि शक्ति की उपासना करने वाले साधक बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। गायत्री का महात्म्य बताते हुए साधना ग्रंथों में कहा गया है—
तदित्यृच समोनास्ति मन्त्रो वेद चतुष्टये। सर्वेवेदश्च यज्ञाश्च दानानि च तपाँस च। सम्मानि कलया प्राहुर्मुनयो न तदित्यृचः।
—विश्वामित्र
इस गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मन्त्र नहीं। समस्त वेद, यज्ञ, दान, तप भी गायत्री की एक कला के बराबर नहीं हो सकते, ऐसा ऋषियों ने कहा है।
सर्वेषाँजप सूक्तानामृचाञ्च यजुषान्त ता।
साम्नाँ चैकाक्षरादीनाँ गायत्री परमो जपः।
तस्याश्चैव तु ओंकारो ब्रह्मणा य उपासितः।
आभ्यान्तु परमं जप्यं त्रैलोक्येंऽपि न विद्यते॥
—बृहत् पाराशर संहिता
सम्पूर्ण वेदों, सूक्तों तथा प्रणव आदि मन्त्रों में सबसे श्रेष्ठ गायत्री जप ही है। जिस ओंकार की उपासना ब्रह्माजी द्वारा की गई वह भी गायत्री का ही अंग है। इनसे बढ़कर तीनों लोकों में और कोई जप संसार में नहीं है।
यतः साक्षात् सर्व देवतात्मनः सर्वात्म द्योतकः सर्वात्म प्रतिपादकोऽयं गायत्री मन्त्रः।
—संध्या भाष्य
यह गायत्री मन्त्र साक्षात् सर्व देवता स्वरूप, सर्व शक्तिमान्, सर्वत्र प्रकाश करने वाला तथा परमात्मा का प्रतिपादन करने वाला है।
दुर्लभा सर्व मंत्रेषु गायत्री प्रणवान्विता।
न गायत्र्याधिकं किंचित् त्रधीषु परिगीयते॥
अर्थात्—इस संसार में गायत्री के समान परम पवित्र और कोई दुर्लभ मंत्र नहीं है। श्रुति में गायत्री से अधिक और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है।
अष्टादशसु विद्यासु मीमाँसाति गरीयसी।
तपोपितर्क शास्त्राणि पुराणं तेभ्य एव च॥
ततोपि धर्म शास्त्राणि तेभ्योगुर्वो श्रुतिर्द्विज।
तपोप्पुपनिषच्छेष्टा गायत्री च ततोधिका॥
—वृ. संध्या भाष्य
अठारहों विद्याओं में मीमाँसा श्रेष्ठ है। उनसे भी न्याय शास्त्र श्रेष्ठ है। पुराणों की महत्ता उससे भी ऊँची है। धर्म शास्त्र उससे भी श्रेष्ठ हैं। उनसे ऊपर उपनिषदें हैं और उनसे भी श्रेष्ठ गायत्री है।
चारों वेदों में विश्व का समस्त ज्ञान विज्ञान भरा हुआ है। भौतिक और आध्यात्मिक-लौकिक और पारलौकिक सुख शान्ति के सारे भण्डार वेदों में छिपे हुए हैं। समस्त प्रकार की सिद्धियों और शक्तियों को प्राप्त करने के रहस्य वेदों में मौजूद हैं। गायत्री वेद माता है। उसमें वेदों में सन्निहित समस्त विद्याएँ बीज रूप से मौजूद हैं। वेद विद्या के विस्तृत क्षेत्र में जो कुछ मौजूद है, उसका सार गायत्री में समाया हुआ है। इसलिए गायत्री उपासना करने वाला वेद विद्या के समस्त लाभों को प्राप्त कर सकता है।
वेद माता गायत्री की महत्ता का प्रतिपादन ग्रंथों में इस प्रकार किया गया है—
गायत्र्येव परो विष्णु गायत्र्येव परः शिवः।
गायत्र्येव परो ब्रह्मा गायत्र्येव त्रयी ततः॥
अर्थात्—गायत्री में ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तीनों शक्तियाँ समाई हुई हैं, गायत्री में वेदत्रयी भी सन्निहित है।
गायत्री वेद जननी गायत्री पाप नाशिनी।
गायवीव्यास्तु परन्नस्ति दिविचेह च पावनम्॥
गायत्री वेदों की जननी है, गायत्री पापों का नाश करने वाली है, गायत्री से अधिक श्रेष्ठ पवित्र करने वाला और कोई मन्त्र इस पृथ्वी और स्वर्ग पर नहीं है।
इति वेद पवित्राण्यर्भिहितानि एम्यः सावित्री विशिष्यते।
—शंखस्मृति
यों तो सभी वेद मंत्र पवित्र हैं पर उन सबों में गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ है।
त्रिम्यएव तु वेदेभ्यः पादं पादमद्दुहत।
तदित्यचोऽस्या सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः॥
—मनु. 2—77
अर्थात्—परमेष्ठी प्रजापति ने तीन वेदों का दोहन करके उससे गायत्री के तीन पाद बनाये।
ओंकार पूर्विकास्तिस्त्रों महाव्याहृतयो व्ययाः।
त्रिपदाचैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम्॥
अर्थात्—ॐकार पूर्वक तीन महाव्याहृतियों समेत त्रिपदा गायत्री की वेद का मुख्य ही जानना चाहिये।
गायत्री उपासना से दुष्कृतों का शमन
गायत्री उपासना का प्रभाव सबसे प्रथम मनुष्य के मनः क्षेत्र पर पड़ता है। उसके कुविचार दूर होते हैं, दुष्कर्मों में घृणा उत्पन्न होती है, आत्म निरीक्षण में अभिरुचि होती है और अपने अन्दर जो जो दोष दुर्गुण हैं उसे उपासक ढूँढ़-2 कर तलाश करता है। उनकी हानियों को समझता है और उन्हें त्यागने को तत्पर हो जाता है। इस प्रक्रिया के कारण उसका वर्तमान जीवन पापमुक्त होता है और जैसे जैसे यह पवित्रता बढ़ती है उसी अनुमान से पूर्व जन्मों के दुष्कृत संस्कार भी घटने और नष्ट होने लगते हैं। इसीलिये गायत्री को पाप-नाशिनी, मोक्ष-दायिनी, कल्याण-कारिणी कहा गया है। देखिये :—
गायत्र्या परमं नास्ति देवि चेह न पावनम्।
हस्तत्राण प्रदा देवी पतताँ नरकार्णवे॥
-शंखस्मृति अ. 12-25
नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली गायत्री के समान पवित्र करने वाली, वस्तु इस पृथ्वी पर तथा स्वर्ग में कोई नहीं है।
धर्मोन्नतिमधर्मस्य नाशनं जनहृछ्रु चिम्।
माँगल्ये जगतो माता गायत्री कुसनात्सदा॥
धर्म की उन्नति, अधर्म का नाश, भक्तों के हृदय की पवित्रता तथा संसार का कल्याण गायत्री माता करें।
गायत्री जाह्नवी चोमे सर्व पाप हरे स्मृतो।
गायत्रीच्छन्दसाँ माता माता लोकस्य जाह्नवी॥
—नारद पुराण
गायत्री और गंगा यह दोनों ही सब पापों का नाश करने वाली हैं। गायत्री को वेद माता और गंगा को लोकमाता कहते हैं।
गायत्रीयो जपेन्नित्यं स न पापेन लिप्यते।
—हरितास्मृति 3—42
जो गायत्री का नित्य नियमित जप करता है, वह पापों में लिप्त नहीं होता।
गायत्रीं पावनीं जप्त्वा ज्ञात्वा याति पराँ गतिम्।
न गायत्री विहीनस्य भद्रमत्र परत्र च॥
अर्थात्—परम पावनी गायत्री का श्रद्धापूर्वक जप करके साधक परम गति को प्राप्त करता है। गायत्री रहित का तो न इस लोक में कल्याण होता है न परलोक में।
गायत्री जाप्य निरतो मोक्षोपापं च विंदति
अर्थात्—गायत्री मन्त्र का जप करने वाला मोक्ष को प्राप्त करता है।
पराँसिद्धिमवाप्नोति गायत्री मुत्तमाँ पठेत्।
गायत्री का जप करने में परा सिद्धि प्राप्त होती है।
सुख सौभाग्य दायक महा मन्त्र
गायत्री महा मन्त्र की उपासना से उत्पन्न आध्यात्मिक शक्ति से मनुष्य के लौकिक जीवन पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है और उसकी अनेकों आपत्तियों तथा कठिनाइयों का समाधान होकर सुख, समृद्धि, सौभाग्य, सफलता एवं उन्नति के अवसर प्राप्त होते हैं। उपासकों के अनुभवों से भी यह प्रत्यक्ष है और शास्त्र वचनों से भी इसकी पुष्टि होती है।
एहिकामुष्यिकं सर्वं गायत्री जपतो भवेत्।
—अग्नि पुराण
अर्थात्—गायत्री जप से सभी साँसारिक कामनाएं पूर्ण होती हैं।
य एताँ वेद गायत्रीं पुण्या सर्व गुणान्विताम्।
तत्वेन भरतश्रेष्ठ सलोके न प्रणश्यति॥
—म. भा. भीष्म पर्व 14।16
जो इस पवित्र सर्वगुण सम्पन्न गायत्री के तत्व को जानता है, उसे इस लोक में कोई कष्ट नहीं होता।
यो हवा एववित् स ब्रह्मवित् पुण्याँ च कीर्तिं लभते। सुरभींश्च गन्धान् सोऽपहतपाम्या अनन्ताँश्चिययश्रुते य एवं वेद थश्चैव विद्वान् एवमेताँ वेदानाँ मातरमं सावित्रीं संपदमुपनिषदमुपास्ते।
—गोपथ ब्राह्मण
जो इस तत्व को जानता है वह पुण्य, कीर्ति, लक्ष्मी आदि को प्राप्त करता हुआ श्रेय प्राप्त करता है और वही वेदमाता गायत्री की वास्तविक उपासना करता है।
संकीर्णता यदा पश्येद्रोगाद्वा द्विषतोऽपिवा।
तदा जपेच्च गायत्री सर्व दोषापनुत्तमे॥
—बृहत्पाराशर स्मृति 8-60
रोना, शोक, द्वेष तथा अभाव की स्थिति में गायत्री जपने से इन कष्टों से छुटकारा मिल जाता है।
मन्त्र शक्ति का मर्म व रहस्य
उपरोक्त प्रकार के लाभों का प्राप्त होना गायत्री उपासक के लिए निश्चित रूप से सम्भव है पर यह सम्भावना तभी है जब मन्त्र की नियमित शास्त्रोक्त विधि में उसकी उपासना की जाए। गायत्री की मन्त्र संज्ञा तभी होती है जब उसमें विधिविधान की पूर्णता है। मन्त्र की शक्ति के बारे में कहा है कि :-
मननात्सर्वाभावानाँ त्राण्यात्संसर सागरात्।
मंत्र रूपाहि तच्छक्तिर्मनत्राण रूपिणी॥
जिसके मनन करने से सब अभाव दूर होते हैं, तथा जिसके द्वारा संसार सागर में त्राण मिलता है वह मनन शक्ति मंत्र रूप है।
मंत्राराधन के सम्बन्ध में साधना के नियमों पर जोर देते हुए कहा गया है कि :—
अर्थ ज्ञानं बिना कर्म न श्रेय साधनं यतः।
अर्थ ज्ञानं साधनीयं द्विजैः श्रेयोर्थिभिस्तन्॥
मंत्रार्थज्ञो जपन हूयन स्तथैबाह्यापयन द्विजः।
अधीत्य यत्किंचिदपि मंत्रार्थाधिगमेरतः॥
ब्रह्मलोक मवाप्नोति धर्मानुष्ठानतो द्विजः।
ज्ञात्वा ज्ञात्वा च कर्माणि जनोयोयोनुतिष्ठति॥
विदुष कर्मसिद्धिःस्यात्रषानाविदुषो भवेत्।
ज्ञानं कर्म च संयुक्तं भूर्त्यथं कथितं यथा॥
अधीतं श्रुत संयुक्तं तत्र श्रेष्ठं न केवलम्।
अर्थात्—मंत्र का अर्थ और विधान जानकर ही उपासना करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। मंत्र के अर्थ का अध्ययन भी करना चाहिये और उसके रहस्य को भी समझना चाहिये तभी मंत्र होता है। जो कर्म करना है उससे अधिकाधिक जानना चाहिये, पूरी जानकारी पर आधारित कर्म में ही सफलता मिलती है। ज्ञान और कर्म को मिलाकर अध्ययन और श्रवण के आधार पर जो किया जाता है वही उत्तम है।
और भी ऐसे ही कितने अभिवचन हैं जिनमें गायत्री महामंत्र की महत्ता एवं लाभों का वर्णन करते हुए इस बात का भी संकेत किया है कि यह सब कुछ तभी संभव हो सकता है जबकि उस साधना को विधि विधान पूर्वक नियमित रूप से सम्पन्न किया जाए।
गायत्री यः सदा विप्रो जपेत्तु नियतः शुचिः।
प याति परमस्थानं वायु भूतः स्वमूर्तिमान्॥
-संवर्त संहिता 1—21
जो साधक गायत्री को ‘नित्य नियमित रूप से पवित्रता पूर्वक’ जपता है वह सूक्ष्म लोक के परम स्थान को ब्रह्म निर्वाण को प्राप्त करता है।
गायत्र्या योग सिर्द्धथं जपं कुर्यात् समाहितः।
योग की सिद्धि के लिए साधक को सावधानी के साथ गायत्री जप करना चाहिए।
जपताँ जुह्वताँ चैव नित्यं च प्रयतात्मनाम्।
ऋषीणाँ परमं जप्यं गुह्यमेतन्नराधिप॥
—महा अनु.
अर्थात्—’नित्य जप करने के लिए, हवन करने के लिए’ ऋषियों का परम मन्त्र गायत्री ही है।
यथा कथं च जप्तैषा त्रिपदा परम पाविनी।
सर्व काम प्रदा प्रोक्ता विधिनाँकिं पुनतृय॥
—विष्णु धर्मोत्तर
हे राजन्—जैसे बने वैसे जप करने पर भी परम पावनी गायत्री कल्याण करती है, फिर ‘विधि पूर्वक उपासना करने के लाभ का तो कहना ही क्या है?’
जपताँ जुह्वताँ चैव विनियाते न विद्यते।
‘गायत्री जप और हवन करते रहने वाले का कभी पतन नहीं होता।’
न प्रमादोऽत्र कर्तव्यो विदुषमोक्षभिच्छता।
प्रमादेजृम्मते माया सूर्यापाये तमोयथा॥
—वेदान्त सिद्धान्तसार
कल्याण की इच्छा करने वाला ‘प्रमाद न करे।’ जैसे संध्या होते ही अन्धकार फैल जाता है वैसे ही प्रमाद आते ही माया दबोच लेती है।
देवो भूत्वा यजेद्देवं नादंवो देवमर्नयेत्।
‘अपने में देवता धारण करके’ ही देवता की पूजा करनी चाहिए। इसके बिना देवपूजन अवांछनीय है।
जप संख्यातु कर्तव्या नासंख्यातं जपेत् सुधीः।
‘जप संख्या गिनकर करना चाहिए।’ बुद्धिमान लोग बिना संख्या गिने जप न करें।
कितने ही मनुष्य शास्त्र विधि की साधना विधान को व्यर्थ मान कर मनमानी रीति से साधना करते हैं, अपनी मनमर्जी में चाहे जैसे नियम बना लेते हैं, चाहे जिस विधान को व्यर्थ कहने लगते हैं। ऐसी मनमानी करने वाले, शास्त्र विधि की अवज्ञा करने वाले एक प्रकार के बन्दर हैं, उनकी उछल-कूद का कितना परिणाम होगा, यह कह सकना अनिश्चित है।
शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ये नरः।
मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानरः॥
जहाँ शास्त्र निर्देश करता है वहाँ जो जाते हैं वे मनुष्य हैं और जहाँ मन चाहता है वहाँ जाते हैं वे वानर हैं।
इसलिये गायत्री महामंत्र से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यही उचित है कि शास्त्र विधि से बताये हुये विधि-विधान के साथ अपनी उपासना पूर्ण करें। आध्यात्म विज्ञान के महत्व पूर्ण सिद्धान्त के आधार पर नियमित साधना विधान की उपेक्षा न करे।
(अज्ञात वास से प्रेषित)
मृत्यु सी भयानक संकरी पगडंडी
आज बहुत दूर तक विकट रास्ते से चलना पड़ा। नीचे गंगा बह रही थी ऊपर पहाड़ खड़ा था। पहाड़ के निचले भाग में होकर चलने की सँकरी सी पगडंडी थी। उसकी चौड़ाई मुश्किल से तीन फुट रही होगी। उसी पर होकर चलना था एक पैर भी इधर उधर हो जाए तो नीचे गरजती हुई गंगा के गर्भ में जल समाधि लेने में कुछ भी देर न थी। जरा बच कर चलें तो दूसरी ओर सैकड़ों फुट ऊँचा पर्वत सीधा तना खड़ा था वह एक इंच भी अपनी जगह से हटने को तैयार न था। सँकरी सी पगडंडी पर सँभाल-सँभाल कर एक एक कदम रखना पड़ता था। क्योंकि जीवन और मृत्यु के बीच एक डेढ़ फुट का अन्तर था।
मृत्यु का डर कैसा होता है उसका अनुभव जीवन में पहली बार हुआ। एक पौराणिक कथा सुनी थी कि राजा जनक ने शुकदेवजी को अपने कर्मयोगी होने की स्थिति समझाने के लिए तेल का भरा कटोरा हाथ में देकर नगर के चारों ओर भ्रमण करते हुए वापिस आने को कहा और साथ ही कह दिया था कि यदि एक बूँद भी तेल फैला तो वहीं गरदन काट दी जाएगी। शुकदेव जी मृत्यु के डर से कटोरे से तेल न फैलने देने की सावधानी करते हुए चले। सारा भ्रमण कर लिया पर उन्हें तेल के अतिरिक्त और कुछ न दीखा। जनक ने तब उनसे कहा कि जिस प्रकार मृत्यु के भय से तेल की एक बूँद भी न फैलने दी और सारा ध्यान कटोरे पर ही रखा। उसी प्रकार में भी मृत्यु भय को सदा ध्यान में रखता हूँ जिससे किसी कर्तव्य कर्म में न तो प्रमाद होता है और न मन व्यर्थ की बातों में भटक कर चंचल होता है।
इस कथा का स्पष्ट और व्यक्तिगत अनुभव आज उस सँकरे विकट रास्ते को पार करते हुए किया। हम लोग कई पथिक साथ थे। वैसे रास्ते में खूब हँसते बोलते चलते थे पर जहाँ वह सँकरी पगडंडी आई कि सभी चुप हो गये। बात-चीत के सभी विषय समाप्त थे, न किसी को घर की याद आ रही थी और न किसी अन्य विषय पर ध्यान था, चित्त पूर्ण एकाग्र था और केवल यही एक प्रश्न पूरे मनोयोग के साथ चल रहा था कि अगला पैर ठीक जगह पर पड़े। एक हाथ से हम लोग पहाड़ को भी पकड़ते चलते थे। यद्यपि उसमें पकड़ने जैसी कोई चीज नहीं थी तो भी इस आशा से कि यदि शरीर की झोक गंगा की तरफ झुकी तो उस सन्तुलन को ठीक रखने में पहाड़ को पकड़-पकड़ कर चलने का उपक्रम कुछ न कुछ सहायक होगा। इस प्रकार डेढ़ दो मील की यह यात्रा बड़ी कठिनाई के साथ पूरी की। दिल हर घड़ी धड़कता रहा। जीवन को बचाने के लिए कितनी सावधानी की आवश्यकता है, यह पाठ क्रियात्मक रूप से आज ही पढ़ा।
वह विकट यात्रा पूरी हो गई, पर अब जी में कई विचार उसके स्मरण के साथ-2 उठ रहे हैं। सोचता हूँ यदि हम सदा मृत्यु को निकट ही देखते रहें तो व्यर्थ की बातों पर मन दौड़ाने वाली मृग तृष्णाओं से बच सकते हैं। जीवन लक्ष की यात्रा भी हमारी आज की यात्रा के समान ही है जिसमें हर कदम साध-साध कर रखा जाना जरूरी है। यदि एक भी कदम गलत या गफलत भरा उठ जाए तो मानव जीवन के महान लक्ष से पतित होकर हम एक अथाह गर्त में गिर सकते हैं। जीवन हमें प्यारा है तो उस प्यार को चरितार्थ करने का एक ही तरीका है कि सही तरीके से अपने को चलाते हुए इस सँकरी पगडण्डी से पार ले चलें जहाँ से शान्ति पूर्ण यात्रा पर चल पड़ेगा। मनुष्य जीवन ऐसा ही उत्तरदायित्व पूर्ण है जैसा उस गंगा तट की सँकरी पगडण्डी पर चलने वालों का। उसे ठीक तरह निबाह देने पर ही सन्तोष की साँस ले सके और यह आशा कर सके कि उस अभीष्ट तीर्थ के दर्शन कर सकेंगे। कर्तव्य पालन की पगडंडी ऐसी ही सँकरी है। उसमें लापरवाही बरतने पर जीवन लक्ष्य को प्राप्त होने की आशा कौन कर सकता है। धर्म को पहाड़ की दीवार की तरह पकड़ कर चलने पर हम अपना वह सन्तुलन बनाये रह सकते हैं। जिससे खतरे की ओर झुक पड़ने का भय कम हो जाए। आदि वक्त में इस दीवार का सहारा ही हमारे लिये बहुत कुछ है। धर्म की आस्था भी जीवन लक्ष्य की मंजिल को ठीक तरह पार कराने में बहुत कुछ मानी जाएगी।
चाँदी के पहाड़
आज सुक्की चट्टी पर धर्मशाला के ऊपर मंजिल की कोठरी में ठहरे थे, सामने ही बर्फ से ढकी पर्वत की चोटी दिखाई पड़ रही थी। बर्फ पिघल कर धीरे-धीरे पानी का रूप धारण कर रही थी, वह एक झरने के रूप में नीचे की तरफ बह रहा था। कुछ बर्फ पूरी तरह गलने से पहले ही पानी के साथ पिघलकर बहने लगती थी इसलिए दूर से झरना ऐसा लगता था मानों फेनदार दूध ही ऊपर बहता चला आ रहा हो। दृश्य बहुत ही शोभायमान था, उसे देख देखकर आँखें ठण्डी हो रही थीं।
जिस कोठरी में अपना ठहरना था उससे तीसरी कोठरी में अन्य यात्री ठहरे हुए थे। उनमें दो बच्चे भी थे एक लड़की दूसरा लड़का। दोनों की उम्र 11-12 वर्ष के लगभग रही होगी, उनके पिता माता यात्रा पर थे। इन बच्चों को कुलियों के पीठ पर इस प्रान्त में चलने वाली ‘कण्डी’ सवारी में बिठा कर लाये थे। बच्चे बहुत हँसमुख और बातूनी थे।
दोनों में बहस हो रही थी कि यह सफेद चमकता हुआ पहाड़ किस चीज का है। उनने कहीं सुन रखा था कि धातुओं की खानें पहाड़ों में होती हैं। बच्चे ने संगति मिलाई कि पहाड़ चाँदी का है। लड़की को इसमें सन्देह हुआ, वह यह तो नहीं सोच सकी कि चाँदी का न होगा तो और किस चीज का होगा। पर यह जरूर सोचा कि यदि इतनी चाँदी इस प्रकार खुली पड़ी होती तो कोई न कोई उसे उठा ले जाने की कोशिश जरूर करता । वह लड़के की बात से सहमत नहीं हुई। बहस और जिद्दा जिद्दी चल पड़ी।
मुझे विवाद मनोरंजन लगा, बच्चे भी प्यारे लगे। दोनों को बुलाया और समझाया कि यह पहाड़ तो पत्थर का है पर ऊँचा होने के कारण बर्फ जम गई है। गर्मी पड़ने पर यह बर्फ पिघल जाती है और सर्दी पड़ने पर जमने लगती है। वह बर्फ ही चमकने पर चाँदी जैसी लगती है। बच्चों का एक समाधान तो हो गया पर वे उसी सिलसिले में और भी ढेरों प्रश्न पूछते गये, मैं भी उनके ज्ञान-वृद्धि की दृष्टि से पर्वतीय जानकारी से सम्बन्धित बहुत सी बातें उन्हें बताता रहा।
सोचता हूँ बचपन में मनुष्य की बुद्धि कितनी अविकसित होती है कि वह बर्फ जैसी मामूली चीज को चाँदी जैसी मूल्यवान समझता है। बड़े आदमी की सूझ-बूझ ऐसी नहीं होती। वह वस्तु स्थिति को गहराई से सोच और समझ सकता है, यदि छोटेपन में ही इतनी समझ आ जाए तो बच्चों को भी यथार्थता के पहचानने में कितनी सुविधा हो।
पर मेरा यह सोचना भी गलत ही है। क्योंकि बड़े होने पर भी मनुष्य समझदार कहाँ हो पाता है। जैसे ये दोनों बच्चे बर्फ को चाँदी समझ रहे थे उसी प्रकार चाँदी ताँबे के टुकड़ों को, इन्द्रिय छेदों पर मचने वाली खुजली को, नगण्य अहंकार को, तुच्छ शरीर को बड़ी आयु का मनुष्य भी न जाने कितना अधिक महत्व दे डालता है। और उनकी ओर इतना आकर्षित होता है कि जीवन लक्ष्य को भुलाकर भविष्य को अन्धकारमय बना लेने की परवा नहीं करता।
साँसारिक क्षणिक और सारहीन आकर्षणों में हमारा मन इससे भी अधिक तल्लीन हो जाता है जितना कि छोटे बच्चों का मिट्टी के खिलौने के साथ खेलने में, कागज की नाव बहाने में लगता है। पढ़ना लिखना खाना पीना छोड़कर पतंग उड़ाने में निमग्न बालक को अभिभावक उसकी अदूरदर्शिता पर धमकाते पर हम बड़ी आयु वालों को कौन धमकाये? जो आत्म स्वार्थ को भुलाकर विषय विकारों के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली बने हुए हैं। बर्फ चाँदी नहीं है यह बात मानने में उन बच्चों का समाधान हो गया था पर तृष्णा और वासना जीवन लक्ष्य नहीं है इस हमारी भ्रान्ति का कौन समाधान करे?
पीली मक्खियाँ
आज हम लोग सघन वन में होकर चुपचाप चले आ रहे थे तो सेवार के पेड़ों पर भिनभिनाती फिरने वाली पीली जंगली मक्खियाँ हम लोगों पर टूट पड़ीं। बुरी तरह चिपट गई, छुड़ाये से भी न छूटती थीं। हाथों से कपड़ों से उन्हें हटाया भी, भागे भी, पर उन्होंने बहुत देर तक पीछा किया। किसी प्रकार गिरते पड़ते लगभग आधा मील आगे निकल गये तब उनसे पीछा छूटा। उनके जहरीले डंक जहाँ जहाँ लगे थे वहाँ सूजन आ गई। दर्द भी होता रहा।
सोचता हूँ इन मक्खियों को इस प्रकार आक्रमण करने की क्यों सूझी? क्या इनको इसमें कुछ मिल गया है, हमें सताकर इनने क्या पाया? लगता है यह मक्खियाँ सोचती होंगी कि यह बन प्रदेश हमारा है, हमें यहाँ रहना चाहिये, हमारे लिए ही यह सुरक्षित प्रदेश रहे, कोई दूसरा इधर पदार्पण न करे। उनकी अपनी भावना के विपरीत हमें उधर से गुजरते देखा तो समझा होगा कि यह हमारे प्रदेश से हस्तक्षेप करते हैं। हमारे अधिकार क्षेत्र में अपना अधिकार चलाते हैं। हमारे उधर से गुजरने को सम्भव है उनने ढीठता समझा हो और अपने बल एवं दर्प का प्रदर्शन करने एवं हस्तक्षेप का मजा चखाने के लिए आक्रमण किया होगा।
यदि ऐसी ही बात है तो यह इन मक्खियों की मूर्खता थी। वह बन तो ईश्वर का बनाया हुआ था, कुछ उनने स्वयं थोड़े ही बनाया था। उन्हें तो पेड़ों पर रहकर अपनी गुजर बसर करनी चाहिए थी। सारे प्रदेश पर कब्जा करने की उनकी लालसा व्यर्थ थी क्योंकि वे इतने बड़े प्रदेश का आखिर करतीं क्या? फिर उन्हें सोचना चाहिए था कि यह साझे की दुनिया है, सभी लोग इसका मिल जुलकर उपयोग करें तो ही ठीक है। यदि हम लोग उधर से निकल रहे थे, उस बन श्री की छाया, शोभा और सुगन्ध का लाभ उठा रहे थे तो थोड़ा हमें भी उठा लेने देने की सहिष्णुता रखतीं। उनने अनुदारता करके हमें काटा, सताया, अपने डंक खोये, कोई कोई तो इस झंझट में कुचल भी गईं, घायल हुईं और मर भी गईं। वे क्रोध और गर्व न दिखातीं तो क्यों उन्हें व्यर्थ यह हानि उठानी पड़ती और क्यों हम सब की दृष्टि में मूर्ख एवं स्वार्थी सिद्ध होतीं। हर दृष्टि से इस आक्रमण और अधिकार लिप्त ये मुझे कोई बुद्धिमानी दिखाई न दी। यह पीली मक्खियाँ सचमुच ही ठीक शब्द था।
पर उन बेचारी मक्खियों को ही क्यों कोसा जाए? उन्हीं को मूर्ख क्यों कहा जाए? जबकि आज हम मनुष्य भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं। इस सृष्टि में जो विपुल उपभोग सामग्री परमात्मा ने पैदा की है, वह उसके सभी पुत्रों के लिए, मिल बाँटकर खाने और लाभ उठाने के लिए है। पर हममें से कोई जितना हड़प सके उतने पर कब्जा जमाने के लिए उतावला हो रहा है। यह भी नहीं सोचा जाता कि शरीर की कुटुम्ब की आवश्यकता थोड़ी ही है उतने तक ही सीमित रहें, आवश्यकता से अधिक वस्तुओं पर कब्जा जमा कर दूसरे को क्यों कठिनाई में डालें और क्यों मालिकी का व्यर्थ बोझ सिर पर लादें। जबकि उस मालिकी को देर तक अपने कब्जे में रख भी नहीं सकते।
पीली मक्खियों की तरह ही मनुष्य भी अधिकार लिप्सा में, स्वार्थ और संग्रह में अन्धा हो रहा है। मिल बाँटकर खाने की नीति उसकी समझ में ही नहीं आती। जो कोई उसे अपने स्वार्थ में बाधक होते दीखता है उसी पर आँखें दिखाता है अपनी शक्ति प्रदर्शन करता है और पीली मक्खियों की तरह टूट पड़ता है। इससे उनके इस व्यवहार से कितना कष्ट होता है इसकी चिन्ता किसे है?
पीली मक्खियाँ नन्हें-नन्हें डंक मारकर, आधा मील पीछा करके वापिस लौट गईं। पर मनुष्य की अधिकार लिप्सा, स्वार्थपरता और अहंकार से उद्धत होकर किये जाने वाले आक्रमणों की भयंकरता को जब सोचता हूँ तो बेचारी पीली मक्खियों को ही बुरा भला कहने में जीभ सकुचाने लगती है।
ठंडे पहाड़ के गरम सोते
कई दिन से शरीर को सुन्न कर देने वाले बर्फीले ठंडे पानी से स्नान करते आ रहे थे। किसी प्रकार हिम्मत बाँधकर एक दो डुबकी तो लगा लेते थे पर जाड़े के मारे शरीर को ठीक तरह रगड़ना और उस तरह स्नान करना नहीं बन पड़ रहा था जैसा देह की सफाई की दृष्टि से आवश्यक है। आज जगनानी चट्टी पर पहुँचे तो पहाड़ के ऊपर वाले तीन सप्त कुण्डों का पता चला जहाँ से गरम पानी निकलता है। ऐसा सुयोग पाकर मल-मलकर स्नान करने की इच्छा प्रबल हो गई। गंगा का पुल पार कर ऊँची चढ़ाई की टेकरी को कई जगह बैठ-बैठकर हांफते-हांफते पार किया और तप्त कुण्डों पर जा पहुँचे। बराबर-बराबर तीन कुण्ड थे। एक का पानी इतना गरम था कि उससे नहाना तो दूर हाथ दे सकना भी कठिन था। बताया गया कि यदि चावल दाल की पोटली बाँध कर इस कुण्ड में डाल दी जाए तो वह खिचड़ी कुछ देर में पक जाती है। यह प्रयोग तो हम न कर सके पर पास वाले दूसरे कुण्ड में जिसका पानी सादा गरम था। खूब मल-मलकर स्नान किया और हफ्तों की अधूरी आकाँक्षा पूरी की। कपड़े भी इस गरम पानी से खूब धुले, अच्छे साफ हुए।
सोचता हूँ कि जिन पहाड़ों पर बर्फ गिरता रहता है और छाती में से झरने वाले झरने सदा बर्फ सा ठंडा जल ही प्रवाहित करते रहते हैं उनमें कहीं कहीं ऐसे उष्ण सोते क्यों फूट पड़ते हैं? मालूम होता है कि पर्वत के भीतर कोई गन्धक की पर्त है वही अपने समीप से गुजरने वाली जलधारा को असह्य उष्णता दे देती है। इसी तरह किसी सज्जन में अनेक शीतल शान्ति दायक गुण होने से उसके व्यवहार ठंडे सोतों की तरह शीतल हो सकते हैं पर यदि दुर्बुद्धि की एक भी परत भीतर छिपी हो तो उसकी गर्मी गरम सोतों की तरह बाहर फूट पड़ती है और वह छिपती नहीं।
जो पर्वत अपनी शीतलता को अक्षुण्ण बनाये रहना चाहते हैं उन्हें इस प्रकार की गन्धक जैसी विषैली पर्तों को बाहर निकाल फेंकना चाहिये। यह एक दूसरा कारण इन तप्त कुण्डों का और भी हो सकता है कि शीतल पर्वत अपनी भीतर के इस विकार को निकाल-निकाल कर बाहर फेंक रहा हो और अपनी दुर्बलता को छिपाने की अपेक्षा सबके सामने प्रकट कर रहा हो जिससे उसे कपटी और ढोंगी न कहा जा सके। दुर्गुणों का होना बुरी बात है पर उन्हें छिपाना उससे भी बुरा है। इस तथ्य को यह पर्वत जानते हैं, यदि मनुष्य भी इसे जान लेता तो कितना अच्छा होता।
यह भी समझ में आता है कि हमारे जैसे ठंडे स्नान से खिन्न व्यक्तियों को गरम जल से स्नान कराने की सुविधा और आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पर्वत ने अपने बहुत भीतर बची थोड़ी सी गर्मी को बाहर निकाल कर रख दिया हो। बाहर से तो वह भी ठंडा हो चला है फिर भी भीतर कुछ गर्मी बच गई होगी। पर्वत सोचता होगा जब सारा ही ठंडा हो चला तो इस थोड़ी सी गर्मी को बचाकर ही क्या करूंगा इसे भी क्यों न जरूरतमंदों को दे डालूँ। उस आत्मदानी पर्वत की तरह कोई व्यक्ति भी ऐसे हो सकते हैं जो स्वयं अभाव ग्रस्त कष्ट साध्य जीवन व्यतीत करते हों और इतने पर भी जो शक्ति बनी हो उसे भी जनहित में लगाकर इन तप्त कुण्डों का आदर्श उपस्थित करें। इस शीत प्रदेश का वह तप्त कुण्ड भुलाये नहीं भूलेगा। मेरे जैसे हजारों यात्री उसका गुण गान करते रहेंगे क्योंकि उसमें त्याग भी तो असाधारण है। स्वयं ठंडा रह कर दूसरों के लिए गर्मी प्रदान करना, भूखे रहकर दूसरों को रोटी जुटाने के समान है। सोचता हूँ बुद्धिहीन जड़ पर्वत जब इतना कर सकता है तो क्या बुद्धिमान बनने वाले मनुष्य को केवल स्वार्थी ही रहना चाहिए?
आलू का भालू
आज गंगोत्री यात्रियों को एक दल का और भी साथ मिल गया। उस दल में सात आदमी थे। पाँच पुरुष दो स्त्रियाँ। हमारा बोझा तो हमारे कंधे पर था पर उन सातों का बिस्तर एक पहाड़ी कुली लिये चल रहा था। कुली देहाती था, उसकी भाषा भी ठीक तरह समझ में नहीं आती थी, स्वभाव का भी अक्कड़ और झगड़ालू जैसा था। झालाचट्टी की ओर ऊपरी पठार पर जब हम लोग चल रहे थे तो उंगली का इशारा करके उसने कुछ विचित्र डरावनी सी मुद्रा के साथ कोई चीज दिखाई और अपनी भाषा में कुछ कहा। सब बात तो समझ में न आई पर दल के एक आदमी ने इतना ही समझा—भालू-भालू। वह गौर से उस ओर देखने लगा। घना कुहरा उस समय पड़ रहा था कोई चीज ठीक दिखाई नहीं पड़ती थी पर जिधर कुली ने इशारा किया था उधर काले काले कोई जानवर उसे घूमते नजर आये।
जिस साथी ने कुली के मुँह से भालू-भालू सुना था और उसके इशारे की दिशा में काले जानवर घूमते दीखे थे, वह बहुत डर गया। उसने पूरे विश्वास के साथ यह समझ लिया कि नीचे भालू रीछ घूम रहे हैं। वह पीछे था, पैर दाब कर जल्दी जल्दी आगे लपका कि वह भी हम सबके साथ मिल जाए। कुछ ही देर में वह हमारे साथ आ गया। होंठ सूख रहे थे और भय से काँप रहा था। उसने हम सबको रोका और नीचे काले जानवर दिखाते हुए बताया कि भालू घूम रहे हैं। अब यहाँ जान का खतरा है।
डर तो हम सभी गये पर यह न सूझ पड़ रहा था कि किया क्या जाए? जंगल काफी घना था, डरावना भी। उसमें रीछ के होने की बात असम्भव भी नहीं थी। फिर हमने पहाड़ी रीछों की भयंकरता के बारे में भी कुछ बढ़ी-चढ़ी बातें परसों ही साथी यात्रियों से सुनी थीं जो दो वर्ष पूर्व मानसरोवर गये थे। डर बढ़ रहा था, काले जानवर हमारी ओर आ रहे थे। घने कुहरे के कारण शक्ल तो साफ नहीं दीख रही थी पर रंग के काले और कद में बिलकुल रीछ जैसे थे, फिर कुली ने इशारे से भालू होने की बात बात ही दी है अब सन्देह की कोई बात नहीं थी। सोचा, कुली से ही पूछें कि अब क्या करना चाहिये। पीछे मुड़कर देखा तो कुली ही गायब था। कल्पना की दौड़ ने एक ही अनुमान लगाया कि वह जान का खतरा देख कर कहीं छिप गया है या किसी पेड़ पर चढ़ गया है। हम लोगों ने अपने भाग्य के साथ अपने को बिलकुल अकेला असहाय पाया।
हम सब एक जगह बिलकुल नजदीक इकट्ठे हो गये। दो-दो ने चारों ओर दिशाओं की ओर मुँह कर लिये। लोहे की कील गढ़ी हुई लाठियाँ जिन्हें लेकर चल रहे थे, बन्दूकों की भाँति सामने तान लीं। और तय कर लिया कि जिस पर रीछ हमला करे वह उसके मुँह में कील गढ़ी लाठी ठूँस दे और साथ ही सब लोग उस पर हमला कर दें कोई भागे नहीं। अन्त तक सब साथ रहें चाहे जियें चाहे मरें। योजना के साथ सब लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। रीछ जो पहले हमारी ओर आते दिखाई दे रहे थे, नीचे की ओर उतरने लगे। हम लोगों ने चलने की रफ्तार काफी तेज कर दी, दूनी से भी अधिक। जितनी जल्दी हो सके खतरे को पार कर लेने की ही सब की इच्छा थी। ईश्वर का नाम सब की जीभ पर था। मन में भय बुरी तरह समा रहा था। इस प्रकार एक डेढ़ मील का रास्ता पार किया।
कुहरा कुछ कम हुआ, आठ बज रहे थे। सूर्य का प्रकाश भी दीखने लगा। घनी वृक्षावली भी पीछे रह गई, भेड़ बकरी चराने वाले भी सामने दिखाई दिये। हम लोगों ने सन्तोष की साँस ली, अपने को खतरे से बाहर अनुभव किया और सुस्ताने के लिए बैठ गये। इतने में कुली भी पीछे से आ पहुँचा। हम लोगों को वह घबराया हुआ देख कर भी कारण पूछने लगा। साथियों ने कहा—’तुम्हारे बताये हुए भालुओं से भगवान ने जान बचा दी। पर तुमने अच्छा धोखा दिया। बजाए उपाय बताने के तुम खुद छिप रहे।’
कुली सकपकाया, उसने समझा उन्हें कुछ भ्रम हो गया। हम लोगों ने उसके इशारे से भालू बताने की बात दुहराई तो वह सब समझ गया कि हम लोगों को क्या गलतफहमी हुई है। उसने कहा—’झाला गाँव का आलू मशहूर । बहुत बड़ा-2 पैदा होता है, ऐसी फसल इधर किसी गाँव में नहीं होती वही बात मैंने उंगली के इशारे से बताई थी। ‘झाला का आलू कहा था आपने उसे भालू समझा। वह काले जानवर तो यहाँ की काली गायें हैं तो दिन भर इसी तरह चरती फिरती हैं। कुहरे के कारण ही वे रीछ जैसी आपको दीखीं। यहाँ भालू कहाँ होते हैं, वे तो और ऊपर पाये जाते हैं आप व्यर्थ ही डरे। मैं तो टट्टी करने के लिए छोटे झरने के पास बैठ गया था। साथ होता आपका भ्रम उसी समय दूर कर देता।’
हम लोग अपनी मूर्खता पर हँसे भी और शर्मिंदा भी हुए। विशेषतया उस साथी को जिसने कुली की बात को गलत तरह समझा खूब लताड़ा गया। भय मजाक में बदल गया। दिन भर उस बात की चर्चा रही, उस डर के समय में जिस जिस ने जो-जो कहा था और किया था, उसे चर्चा का विषय बना कर सारे दिन आपस की छींटा कशी चुहल बाजी होती रही, सब एक दूसरे को अधिक डरा हुआ परेशान सिद्ध करने में रस लेते रहे।
मंजिल आसानी से कट गई, मनोरंजन का अच्छा विषय रहा।
भालू की बात जो घंटे भर बिलकुल सत्य और जीवन-मरण की समस्या मालूम पड़ती रही, अन्त में एक भ्रान्ति मात्र सिद्ध हुई। सोचता हूँ कि हमारे जीवन में ऐसी अनेकों भ्रान्तियाँ घर किये हुए हैं और उनके कारण हम निरन्तर डरते रहते हैं पर अन्ततः वे मानसिक दुर्बलता मात्र साबित होती हैं। हमारे ठाट बाट, फैशन और लावाजमें में कमी आ गई तो लोग हमें गरीब और मामूली समझेंगे, इस अपडर से अनेकों लोग अपने इतने खर्चे बढ़ाये रहते हैं जिनको पूरा करने के लिए कठिन पड़ता है। ‘लोग क्या कहेंगे’ यह बात चरित्र पतन के समय याद आये तो ठीक भी है पर यदि वह दिखावे में कमी के समय मन में आवे तो यही मानना पड़ेगा कि वह अपडर मात्र है। खर्चीला भी और व्यर्थ भी। सादगी से रहेंगे तो गरीब समझे जायेंगे कोई हमारी इज्जत न करेगा यह भ्रम दुर्बल मस्तिष्कों में ही उत्पन्न होता है जैसा कि हम लोगों को एक छोटी सी नासमझी के कारण भालू का हुआ था।
अनेकों चिन्ताएँ, परेशानियाँ, दुविधाएँ, उत्तेजनाएँ, वासनाएँ तथा दुर्भावनाएँ आये दिन सामने खड़ी रहती हैं, लगता है यह संसार बड़ा दुष्ट और डरावना है, यहाँ की हर वस्तु भालू की तरह डरावनी है। पर जब आत्म ज्ञान का प्रकाश होता है, अज्ञान का कुहरा फटता है, मानसिक दौर्बल्य घटता है तो प्रतीत होता है कि जिसे हम भालू समझते थे वह तो पहाड़ी गाय थी। जिन्हें हम शत्रु मानते हैं वे तो हमारे अपने ही स्वरूप हैं, ईश्वर के अंश मात्र हैं। ईश्वर हमारा प्रिय पात्र है तो उसकी रचना भी मंगलमय ही होनी चाहिये। उसे जितने विकृत रूप में हम चित्रित करते उतना ही उससे डर लगता है। यह अशुद्ध चित्रण हमारी मानसिक भ्रान्ति है वैसा ही जैसी कि कुली के शब्द आलू को भालू समझ कर उत्पन्न कर ली गई थी।
रोते पहाड़
आज रास्ते में ‘रोते पहाड़’ मिले। उनके पत्थर नरम थे। ऊपर किसी सोते का पानी रुका पड़ा था। पानी को निकलने के लिए जगह न मिली। नरम पत्थर उसे चूसने लगे। वह चूसा हुआ पानी जाता कहाँ? नीचे की ओर वह पहाड़ को गीला किए हुए था, जहाँ जगह थी वहाँ यह गीलापन धीरे धीरे इकट्ठा होकर बूँदों के रूप में टपक रहा था। इस टपकती बूँदों का लोग अपनी भावना के अनुसार ‘आँसू की बूँदें’ कहते हैं। जहाँ तहाँ से मिट्टी उड़कर इस गीलेपन से चिपक जाती है उसमें हरियाली के जीवाणु भी आ जाते हैं। इस चिपकी हुई मिट्टी पर एक हरी हरी मुलायम काई जैसी उग आती है। इस काई को पहाड़ में ‘कीचड़’ कहते हैं। जब वह रोता ही है तो आँखें दुखती ही होंगी और कीचड़ निकलती होगी। यह कल्पना कर लेना कौन कठिन बात है। रोते हुए पहाड़ आज हम लोगों ने देखे। उनके आँसू भी कहीं से पौंछे। कीचड़ों को टटोल कर देखा। बस इतना ही कर सकते थे। पहाड़ तू क्यों रोते है? इसे कौन पूछता? और क्यों वह इसका उत्तर देता?
पर कल्पना तो अपनी जिद की पक्की है, मन ही मन पर्वत से बातें करने लगी। पर्वत राज! तुम इतनी बन श्री से लदे हो, भाग दौड़ की कोई चिन्ता भी तुम्हें नहीं है, बैठे बैठे आनन्द के दिन गुजारते हो, तुम्हें किस बात की चिन्ता? तुम्हें रुलाई क्यों आती है?
पत्थर का पहाड़ चुप खड़ा था पर कल्पना पर्वत अपनी मनोव्यथा कहने ही लगा। बोला—मेरे दिल का दर्द तुम्हें क्या मालूम। मैं बड़ा हूँ ऊँचा हूँ वनश्री से लदा हूँ, निश्चिन्त बैठा रहता हूँ, देखने को मेरे पास कुछ है, पर निष्क्रिय, निःचेष्ट जीवन भी क्या कोई जीवन है। जिसमें गति नहीं संघर्ष नहीं, आशा नहीं, स्फूर्ति नहीं, प्रयत्न नहीं, पुरुषार्थ नहीं, वह जीवित होते हुए भी मृतक समान है।
सक्रियता में ही आनन्द है। मौज की छानने और आराम करने में तो केवल काहिली की मुर्दनी की नीरवता मात्र है, इसे अनजान ही आराम और आनन्द कह सकते हैं। इस सृष्टि के क्रीड़ाँगन में जो जितना खेल लेता है वह अपने को उतना ही तरोताजा और प्रफुल्लित अनुभव करता है। सृष्टि के सभी पुत्र प्रगति के पथ पर उल्लास भरे सैनिकों की तरह कदम पर कदम बढ़ाते, मोर्चे पर मोर्चा पार करते चले जाते हैं, दूसरी ओर मैं हूँ जो सम्पदाएँ अपने पेट में छिपाये मौज की छान रहा हूँ। कल्पना बेटी, तुम मुझे सेठ कह सकती हो, अमीर कह सकती हो, भाग्यवान कह सकती हो, पर हूँ तो मैं निष्क्रिय ही। संसार की सेवा में अपने पुरुषार्थ का परिचय देकर लोग अपना नाम इतिहास में अमर कर रहे हैं, कीर्तिवान बन रहे हैं, अपने प्रयत्न का फल दूसरों को उठाते देखकर गर्व अनुभव कर रहे हैं। पर एक मैं हूँ जो अपना वैभव अपने तक ही समेटे बैठा हूँ। इस आत्म ग्लानि से यदि मुझे रुलाई आती है, आँखों में आँसू बरसते हैं और कीचड़ निकलते हैं तो उसमें अनुचित ही क्या है?
मेरी नन्ही सी कल्पना ने, पर्वत राज से बातें कर लीं, समाधान भी पा लिया, पर वह भी खिन्न ही थी। बहुत देर तक यही सोचती रही, कैसा अच्छा होता यदि इतना बड़ा पर्वत अपने टुकड़े-टुकड़े करके अनेकों भवनों, सड़कों, पुलों के बनाने में खप सका होता। तब भले ही वह इतना बड़ा न रहता, संभव है इस प्रयत्न से उसका अस्तित्व भी समाप्त हो जाता लेकिन तब वह वस्तुतः धन्य हुआ होता वस्तुतः उसका बड़प्पन सार्थक हुआ होता। इन परिस्थितियों से वंचित रहने पर यदि पर्वत राज अपने को अभागा मानता है और अपने दुर्भाग्य को धिक्कारता हुआ सिर धुन धुनकर रोता है तो उसका यह रोना सकारण ही है।
लदी हुई बकरियाँ
छोटा सा जानवर ‘बकरी’ इस पर्वतीय प्रदेश की तरण तारिणी कामधेनु कही जा सकती हैं। वह दूध देती है, ऊन देती है, बच्चे देती है, साथ ही वजन भी ढोती है। आज बड़े-बड़े बालों वाली बकरियों का एक बड़ा झुण्ड रास्ते में मिला, लगभग सौ सवा सौ होंगी। सभी लदी हुई थी। गुड़, चावल, आटा लादकर वे गंगोत्री की ओर ले जा रही थीं। हर एक पर उसके कद और बल के अनुसार दस पन्द्रह सेर वजन लदा हुआ था। माल असबाब की ढुलाई के लिए खच्चरों के अतिरिक्त इधर बकरियाँ ही साधन हैं। पहाड़ी की छोटी छोटी पगडंडियों पर दूसरे जानवर या वाहन काम तो नहीं कर सकते।
सोचता हूँ कि जीवन की समस्याएँ हल करने के लिए बड़े-बड़े विशाल साधनों पर जोर देने की कोई इतनी बड़ी आवश्यकता नहीं है जितनी कि समझी जाती है। जबकि व्यक्ति साधारण उपकरणों से अपने निर्वाह के साधन जुटाकर शान्ति पूर्वक रह सकता है। सीमित उद्योगीकरण की बात दूसरी है पर यदि वे बढ़ते ही रहें तो इन बकरियों तथा उनके पालने वाले जैसे लाखों की रोजी रोटी छिन कर चंद उद्योगपतियों की कोठियों में जमा हो सकती है। संसार में युद्ध की जो घटाएँ आज उमड़ रही हैं उसके मूल में भी इस उद्योग व्यवस्था के लिए मारकेट जुटाने, उपनिवेश बनाने की लालसा ही काम कर रही है।
बकरियों की पंक्ति देखकर मेरे मन में वह भाव उत्पन्न हो रहा है कि व्यक्ति यदि छोटी सीमा में रहकर जीवन विकास की व्यवस्था जुटावे तो इसी प्रकार शान्ति पूर्वक रह सकता है जिस प्रकार यह बकरियों वाले भले और भोले पहाड़ी रहते हैं। प्राचीनकाल में धन और सत्ता का विकेन्द्रीकरण करना ही भारतीय समाज का आदर्श था। ऋषि मुनि एक बहुत छोटी इकाई के रूप में आश्रमों और कुटियों में जीवन यापन करते थे। ग्राम उससे कुछ बड़ी इकाई थे। सभी अपनी आवश्यकताएँ अपने क्षेत्र में अपने समाज से पूरा करते थे और हिल-मिलकर सुखी जीवन बिताते थे, न उसमें भ्रष्टाचार की गुँजाइश थी न बदमाशी की। आज उद्योगीकरण की घुड़-दौड़ में छोटे गाँव उजड़ रहे हैं बड़े शहर बस रहे हैं, गरीब पिस रहे हैं अमीर पनप रहे हैं। विकराल राक्षस की तरह घड़घड़ाती हुई मशीनें मनुष्य के स्वास्थ्य को, स्नेह संबंधों को, सदाचार को भी पीसे डाल रही हैं। इस यंत्रवाद, उद्योगवाद, पूँजीवाद की नींव पर जो कुछ खड़ा किया जा रहा है उसका नाम विकास रखा गया है पर यह अन्ततः विनाश ही सिद्ध होगा।
विचार असंबद्ध होते जा रहे हैं। छोटी बात मस्तिष्क में बड़ा रूप धारण कर रही है, इसलिए इन पंक्तियों को यहीं समाप्त करना उचित है। फिर भी बकरियाँ भुलाये नहीं भूलतीं। वे हमारे प्राचीन भारतीय समाज रचना की एक स्मृति को ताजा करती हैं, इस सभ्यतावाद के युग में उन बेचारियों की उपयोगिता कौन मानेगा, पिछड़े युग की निशानी कह कर उनका उपहास ही होगा। पर सत्य सत्य ही रहेगा मानव जाति जब कभी शान्ति और सन्तोष के लक्ष्य पर पहुँचेगी तब धन और सत्ता का विकेन्द्रीकरण अवश्य हो रहा होगा और लोग लगभग इसी तरह श्रम और सन्तोष से परिपूर्ण जीवन बिता रहे होंगे जैसे बकरी वाले अपनी मैं मैं करती हुई बकरियों के साथ बिताते हैं।
“आचार्यजी की डायरी” के इन पृष्ठों में भगवती भागीरथी के उद्गम ‘गोमुख’ की ओर गंगोत्री मार्ग द्वारा यात्रा के जो संस्मरण दिए गये हैं, हमारा विश्वास है पाठक उनसे विशेष प्रेरणा प्राप्त करेंगे। -सम्पा.
(सत्पथ का एक विनम्र यात्री)
धर्म शास्त्रों में ईश्वर को ‘सत्य’ रूप में उल्लेख किया गया है। वृहदारण्यक उपनिषद् 5।4 में कहा गया है—”सत्यह्येव ब्रह्म” अर्थ—सत्य ही ब्रह्म है। छाँदोग्य 6।2।1 में आया है “तत् सत्यम्” अर्थात्—सत्य ही वह—परमात्मा है। ऋग्वेद 1।164।46 में श्रुति है” एक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति अर्थात्—उस एक ही सत्य रूप परमेश्वर को विद्वान अनेक प्रकार से कहते हैं। तैत्तरीय उपनिषद् 2।1।1 में लिखा है—’सत्यं ज्ञान मनन्तं ब्रह्म’ अर्थात्—ब्रह्म-सत्य रूप ज्ञान रूप और अनन्त है। अथर्ववेद 12।1।1 का वचन है—सत्यं ऋतं वृहत् अर्थात्—सत्य स्वरूप परमेश्वर से ही यह विश्व ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है। छाँदोग्य 6।8।7 में उल्लेख है—’सदेव सोम्यद मग्र आसीदेक मेव द्वितीयम् अर्थात्—’ऋषि से पूर्व वह एकमेवा द्वितीय ‘सत्’ ही था।
सत्य की महिमा वर्णन करते हुए शास्त्रकारों ने उसे सर्वोपरि धर्म बताया है और कहा है ईश्वर को उसकी कृपा को प्राप्त करने का सर्व श्रेष्ठ साधन सत्य की उपासना ही है। महाभारत में सत्य की प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में अनेकों अभिवचन आते हैं—
नास्ति सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम्।
श्रुतिर्हि सत्यं धर्मस्य तस्मात्सत्यं न लोपयेत्॥
शान्ति पर्व 162।24
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं। असत्य से बढ़कर कोई पाप नहीं। सत्य ही धर्म का आधार है। अतएव सत्य का परित्याग कभी भी नहीं करना चाहिए।
सत्यं ब्रह्म तपः सत्यं, सत्यं विसृते प्रजाः।
सत्येन धार्यते लोकःर्स्वगं सत्येन गच्छति॥
शान्ति पर्व 190।1
सत्य ही ब्रह्म है। सत्य ही तप है। सत्य से ही सृष्टि उत्पन्न होती है। सत्य ही इस धरती को धारण किये हुए है। सत्य से ही स्वर्ग प्राप्त होता है।
अश्वमेघ सहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्।
अश्वमेघ सहस्रद्धि सत्यमेव विशिष्यते॥
शान्ति 162।26
सहस्र अश्वमेधों का पुण्य एक ओर, और सत्य को एक ओर तराजू में रखकर तोला गया तो सत्य ही भारी निकला।
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव।
उद्योग 33।47
जैसी नाव के द्वारा समुद्र पार किया जाता है उसी प्रकार स्वर्ग पहुँचने का आधार सत्य है।
अनृतं तमसो रुपं तमसा नीयतेह्यधः
तमोग्रस्ता न पश्यन्ति प्रकाशं तमसावृताः॥
शान्ति. 190।2
असत्य अन्धकार रूप है। इस अन्धकार में भटकने वाला मनुष्य प्रकाश से वंचित रहता है और पतन के गर्त में गिरता है।
यत्सत्यं स धर्मो, यो धर्मः स प्रकाशो यः प्रकाशः तत्सुखमिति।
—शान्ति. 190।5
जो सत्य है वही धर्म है। जो धर्म है वही प्रकाश है। जहाँ प्रकाश है वहीं सुख है।
मार्कण्डेय पुराण में भी ऐसे ही अनेक वचन मिलते हैं—
सत्येनार्वः प्रतपति, सत्यं तिष्ठति मेदिनी।
सत्यं चोक्तं परोधर्मः र्स्वगः सत्ये प्रतिष्ठितः॥
मार्क. पु. 8।41
सत्य से ही सूर्य तपता है। सत्य पर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य को ही परम धर्म कहते हैं। सत्य के ऊपर ही स्वर्ग ठहरा हुआ है।
सत्यमत्यन्त मुदितं धर्म शास्त्रेषु धीयताम्।
तारणाय अनृतं तद्वत् पातनाया कृतात्यनाम्॥
8—20
तारने का सर्वश्रेष्ठ साधन सत्य है और पतन का सबसे प्रधान हेतु असत्य है।
अग्निहोत्रमधीतं वा दानाद्याश्चाखिलाः क्रियाः।
भजन्ते तस्य वैफल्यं यत्य वाक्यमकारणम्॥
8—1/9
असत्य बोलने वाले के अग्निहोत्र अध्ययन, दान आदि सभी शुभ काम निष्फल हो जाते हैं।
मनस्येक वचस्येकं कर्मण्येक महात्मनाम्।
मनस्यन्यद् वचस्यन्यत् कार्येन्यद् दुरात्मनाम्॥
श्मशानवद् वर्जनीयो हि नरः सत्य बहिष्कृतः।
8।17
मन, वचन और कर्म में एकता रखने वाले मनुष्य महात्मा हैं। जिनके मन में कुछ और, वाणी में कुछ और तथा कर्म में कुछ और रहता है उन्हें दुरात्मा जानना चाहिए। असत्यवादी मनुष्य को तो श्मशान के तुल्य त्याज्य मानना चाहिए।
अन्य उपनिषदों में भी इसी प्रकार के अनेकों अभिवचन मिलते हैं। देखिए—
तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्मम नृतं न माया चेति।
—प्रश्नोपनिषद् 1।15
विशुद्ध ब्रह्मलोक उन्हें प्राप्त होता है जिनके अन्तःकरण में असत्य, छल, कपट और कुटिलता नहीं है।
सत्येन लभ्यस्तप सात्ह्येव आत्मा।
मुंडकोपनिषद् 3।1।5
यह आत्मा तप एवं सत्य के द्वारा ही प्राप्त होता है।
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्थाविततो देवयानः।
येनाक्रमन्त्यृषयोह्याप्त कामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्।
मुण्डक 3।1।6
सत्य ही जीतता है असत्य नहीं। सत्य से ही देव यात्रा प्रशस्त होती हैं। सत्य से ही ऋषि गण अपनी कामनाओं को जीतते हैं। सत्य रूप परमात्मा को प्राप्त करते हैं।
यो वै सधर्मः सत्यं वैतत् तस्मात्सत्यं वदन्त माहुःधर्म वदतीति धर्मवा वदन्त œ सत्यं वदतीत्येतद्धयै वै तदुभयभवन्ति॥
वृहदारण्यक 1।4।14
जो धर्म है वही सत्य है। इसी कारण सत्यवक्ता को धर्मवादी और धर्मात्मा को सत्यवादी कहते हैं। निश्चय ही सत्य और धर्म दोनों एक ही हैं।
मनुस्मृति का वचन है—
सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी।
अभ्यासानुसारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥
अर्थात्—लक्ष्मी सत्य के पीछे पीछे चलती है। जहाँ त्याग होता है वहाँ कीर्ति होती है। अभ्यास से विद्या प्राप्त होती है। और कर्मों के अनुसार बुद्धि का विकास होता है।
श्रीमद्भागवत् में लिखा है—
आत्मार्थेवा परार्थे जा पुत्रार्थे वापि मानवाः।
अमृतं ये न भाषन्ते ते बुधाः स्वर्ग गामिनः॥
अपने लिए पुत्रादि कुटुम्बियों के लिए अथवा दूसरे किसी के लिए भी जो झूठ नहीं बोलते वे ही स्वर्ग जाते हैं। बौद्ध धर्म में भी सत्य की ऐसी ही प्रतिष्ठा है—
एकं धर्म मतीतस्य मिथ्या वादिनो जन्तुनः।
वितृष्ठा पर लोकस्य नास्ति पाप मकरणीयम्॥
धम्मपद् 13।10
सत्य ही एकमात्र धर्म है। जो उसका उल्लंघन कर असत्य बोलता है वह परलोक को भूला हुआ मनुष्य संसार के समस्त पाप कर सकता है। सब पापों की जड़ असत्य ही है।
सत्य का चिन्ह “मन कर्म और वचन की एकता।” वां मनर्स्कमणाँ याथार्थं सत्यम्। जो बात मन से हो वही वचन से प्रकट की जाए और जो वचन कहा जाए वही कार्य रूप में भी हो। इस प्रकार की त्रिविध एकता ही सत्य का लक्षण है। पातञ्जलि योग दर्शन सूत्र 2।37 के भाष्यकार व्यास ने इसे और भी अधिक स्पष्ट किया है।
सत्यं यथार्थे वां मन से यथा दृष्टं यथाऽनुमितं तथा वां मनश्चेति, परत्र स्वबोध संक्रान्तये वागुप्ता सा यदि न वञ्जिता, भ्रान्ता वा, प्रतिपत्ति वन्ध्या वा भवेत्।
अर्थात्—वाणी के साथ-साथ मन का भी सच्चा होना चाहिए। जैसा देखा हो या जैसा अनुमान हो वैसा ही भाव प्रकट करने का निश्चय रखते हुए बात कहना ‘सत्य’ कहा जाएगा। उसमें छल न हो। दूसरों को भ्रम में डालने वाला या वस्तु स्थिति से भिन्न ज्ञान देने का प्रयत्न न किया जाए।
शास्त्रकारों ने, ऋषि महर्षियों ने एक स्वर से सत्य की महत्ता का प्रतिपादन किया है। इसका कारण यह है कि सत्य में आत्मा के स्वाभाविक स्वरूप और तेज का प्राकट्य होता है। असत्य एक प्रकार का आवरण है जिससे हमारी अन्तःज्योति मलीन और कलुषित होती है। आत्मा के विकास को सीधा उठते चलते, उर्ध्वगामी होने में सबसे बड़ी बाधा असत्य की ही है। छल, कपट, दुराव, छिपाव के कारण अंतर्मन में अनेक प्रकार के असमंजस पैदा होते हैं, आगा पीछा सोचना पड़ता है। झूठ खुलने का भय उत्पन्न होता है, असत्यभाषी कपटी ठहराये जाने पर जो निन्दा घृणा और अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है उसके भय से अन्तःकरण निरन्तर संत्रस्त रहता है। इन विकृतियों के रहते हुए आध्यात्मिक विकास में बाधा पड़ती है। जिस पौधे का जन्म किसी भारी पत्थर के नीचे हुआ हो उसे ऊपर उठने में बहुत असुविधा होती है, टेढ़ा तिरछा होकर वह मुश्किल से ही उस पत्थर के नीचे से बाहर निकल पाता है। निकल कर भी धीरे धीरे बढ़ता है और फिर भी टेढ़ा कुबड़ा कुरूप ही रहता है। जीव के विकास मार्ग में भी प्रधान बाधा यही है। यदि उसका अन्तःकरण स्वच्छ रहे। सीधे सीधे, सरल भोले और निश्छल व्यवहार का अवसर मिले। अपनी मनोगत बात को बिना लाग लपेट के प्रकट करते रहने की स्थिति हो तो निस्संदेह जीवात्मा बड़ी आसानी से अपना लक्ष्य पूर्ण करते हुए परमात्मा से मिल सकता है।
सरलता ही साधुता का चिन्ह है। जो जितना सीधा भोला भाला है जिसमें जितनी है निश्छलता, और सद्भावना है वह उतना ही बड़ा सन्त कहा जा सकता है। धर्म कर्तव्यों में सत्य की गणना सर्व प्रथम सर्वोपरि तत्वों में की गई है। इसलिए श्रेयार्थी को ईश्वर की ही भाँति सत्य का भी उपासक बनना पड़ता है। कोई व्यक्ति उपासना को प्रेम पूर्वक करता है किन्तु उसका मन असत्याचरण में अभिप्रेत है तो उसकी साधना अपूर्ण एवं अधूरी ही मानी जाएगी। उसे बहुत श्रम करने पर भी वह लाभ न मिल सकेगा जो सत्य निष्ठ-शुद्ध आचरण और सद्विचारों वाला व्यक्ति थोड़ी सी ही साधना से प्राप्त कर सकता है।
साँसारिक परिस्थितियाँ प्रायः ऐसी जटिल होती हैं कि पूर्ण सत्य का निर्वाह कठिन हो जाता है। दूषित वातावरण में रहने के कारण लोगों के स्वभाव ऐसे निम्नस्तर के हो जाते हैं कि उन्हें चटपटी लच्छेदार बातों और भड़कीले प्रदर्शनों के द्वारा ही प्रभावित करना सम्भव होता है। सीधी-सीधी बात उनके गले उतरती ही नहीं। सत्यवादी को मूर्ख माना जाता है और उसकी सरलता से नाना विधि अनुचित लाभ उठाने के लिए लोग तैयार बैठे रहते हैं। सचाई सदा सीधी, सरल और स्वाभाविक होती है। वह लोगों को रुचती नहीं। उनसे दुनियादार लोग उसी तरह प्रभावित नहीं होते जैसे निरन्तर चटपटी वस्तुएँ खाते रहने वाले की जीभ को सात्विक भोजन नहीं रुचता। इन परिस्थितियों में सत्यवादी को अपने व्रत का निर्वाह करना बड़ा कठिन हो जाता है। उसे दुनिया अटपटी लगती है और दुनिया को वह अजीब मूर्ख लगता है। ऐसी दशा में कितने ही सत्य की उपासना करने वाले खिन्न होकर विरक्त बन जाते हैं और ऐसे निर्जन स्थानों में रहने लगते हैं जहाँ लोक व्यवहार की न तो आवश्यकता रहे और न असत्य अपनाना पड़े।
पर यह पलायनवादी मनोवृत्ति ठीक नहीं। विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए सच्चे सत्य प्रेमी को उन कष्टों को सहने के लिए तैयार रहना चाहिए जो इस मार्ग के पथिक की परीक्षा करने के लिए आती हैं। यदि साधक डरे नहीं, असुविधाओं और विरोधों से घबराये नहीं, अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं को सीमित रखे, कष्ट सहिष्णुता का विपत्ति में हँसते रहने का और विरोधी के प्रति सद्भाव रखने का स्वभाव बना ले तो उसकी सत्यनिष्ठा आसानी से निभ सकती है। जो लोग सत्य पालन के महान लाभों से लाभान्वित होना चाहते हैं उन्हें उसके लिए अपने स्वभाव में इन आवश्यक गुणों को भी उत्पन्न करना ही पड़ेगा। सत्य सेवी का श्रेय तो प्राप्त हो जाए पर विरोध, हानि, अपमान, असुविधा एवं आपत्ति का सामना न करना पड़े ऐसा नहीं हो सकता।
परमाणु यंत्रों पर काम करने वाले वैज्ञानिक, अपने शरीर पर विशेष प्रकार का सुरक्षा आवरण पहनकर तब कार्य करते हैं। वे जानते हैं कि अणु प्रक्रियायें ऐसी जबरदस्त होती हैं कि यदि उनका थोड़ा भी विघटन हो जाए तो कष्टकर परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं इसलिए अणु कार्य आरम्भ करने से पहले वे अपनी सुरक्षा का आवरण सही कर लेते हैं। सत्य की उपासना करने वाले को भी अणु वैज्ञानिक की भाँति अपने स्वभाव में उन गुणों को लाना पड़ेगा जिससे परिस्थितियों से पली हुई दुनिया—अन्धे गाँव में आने पर ऊँट के पीछे जिस प्रकार लोग हाथ धो कर पड़ते हैं उसी प्रकार इसके पीछे भी पड़े तो वह अपनी सज्जनता, सहनशीलता, धैर्य और स्वल्प आवश्यकता वाले स्वभाव के कारण उस प्रतिरोध को सहन कर सके। बिजली घर का मिस्त्री जिस प्रकार खराब तारों को संभालते समय लकड़ी पर खड़ा होता है, रबड़ के दस्ताने हाथों में पहनता है और औजारों की मूँठ काठ की बनाता है उसी प्रकार सत्यसेवी को अपने अन्दर साधुता के अन्य गुण उत्पन्न करने पड़ते हैं। इसके बिना वह थोड़े ही दिनों में दुनिया के व्यवहार से इतना परेशान हो जाता है कि उसे अपना व्रत तोड़ने में ही कुशल दीखती है।
सत्य का सज्जनता से अनन्य सम्बन्ध है। सत्यनिष्ठा उसी की निभेगी जो सज्जन होगा। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि सत्यनिष्ठा से सज्जनता के सभी आवश्यक गुण उत्पन्न हो जायेंगे। एक के बिना दूसरी बात निभ ही नहीं सकेगी। तामसी राजसी इच्छाओं और आवश्यकताओं वाला व्यक्ति सत्यनिष्ठ रह सके यह कठिन है। सत्य केवल सच बोलने तक ही सीमित नहीं है। वरन् वह एक सर्वांगीण सर्वतोमुखी जीवन साधना है। वैसी ही साधना जैसी अन्यान्य कष्ट साध्य योग साधनाएँ परमात्मा को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। सत्य पालन की साधना से भी जीवात्मा परमात्मा तक इसी प्रकार पहुँच सकती है जैसे अन्यान्य योगों के साधक तपस्वी लोग ब्रह्म सायुज्य की स्थिति तक पहुँचते हैं। जिस प्रकार सभी साधनाओं में कुछ कष्ट उठाने और कुछ त्याग करने के लिए तैयार होना पड़ता है उसी प्रकार सत्य साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।
सफलता क्षेत्र में सत्य का भी वही स्थान है जो ईश्वर का। जिस प्रकार शिव, विष्णु आदि की उपासना की जाती है उसी प्रकार ही सत्य की भी आराधना है। सिद्ध हुआ सत्य भी साधक को वैसे ही वरदान दे सकता है जैसे कोई अन्य देवता या साक्षात् परमात्मा प्रसन्न होने पर अपने आराधक को प्रदान करते हैं।
पातञ्जलि योगदर्शन साधन पाद के सूत्र 36 में कहा गया है—
सत्य प्रतिष्ठायाँ क्रिया फलाश्रित्वम्।
अर्थात्—सत्य में स्थिति दृढ़ हो जाने पर क्रिया फल का आश्रय बन जाती है।
इसका तात्पर्य यह हुआ कि सत्यनिष्ठ की वाणी के द्वारा जो क्रिया होती है अर्थात् जो कुछ वह कहता है सो फलीभूत सफल होता है। उसकी वाणी कभी असत्य नहीं होती। अनेकों पुण्य कार्य करने से जो फल अन्य लोगों को मिलते हैं वह फल सत्यनिष्ठ को अपनी वाणी साधना से ही मिल जाते हैं। यदि वह किसी को शाप या वरदान दे तो पूर्ण सफल होता है। किसी ने जो शुभ नहीं किया है उसका सत्परिणाम उपस्थित कर देने की शक्ति उसमें उत्पन्न हो जाती है। यह तो एक प्रत्यक्ष एवं प्रकट सिद्धि है। इसके अतिरिक्त भी सत्यनिष्ठ अनेक आध्यात्मिक सफलताओं से सम्पन्न हो जाता है।
(श्री स्वामी सच्चिदानन्दजी महाराज)
इस संसार में परोपकार को पुण्य माना जाता है। जिसने दूसरों के लिए जितना अधिक दान, त्याग, श्रम या प्रयत्न किया हो उसे उतना ही बड़ा पुण्यात्मा कहते हैं। इसी तथ्य को हृदयंगम कर धर्म प्रेमी सज्जन अपने जीवन में निजी कार्यों से समय और निजी आवश्यकताओं से धन बचाकर उसे परमार्थ के कामों में लगाते हैं।
परदेश में पहुँचने पर अनजान जगह में किसी व्यक्ति को ठहरने की असुविधा होना स्वाभाविक है क्योंकि एक तो प्रत्येक गृहस्थ के पास सीमित जगह होती है फिर अनजान आदमी का विश्वास कौन करे? ऐसी दशा में दूर प्रदेश में जाकर ठहरने की समस्या किसी भी परदेशी के लिए सचमुच ही बहुत उलझन भरी होती है। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए अनेकों धनी मानी लोग जहाँ तहाँ धर्मशालायें बनवाते हैं जिनमें यात्री आनन्द पूर्वक ठहर सकें। यह अवश्य ही पुण्य है। कई व्यक्ति कुएँ बनवा देते हैं जहाँ जल की आवश्यकता वाले लोग जल प्राप्त कर सकें। कई सज्जन प्याऊ लगवाते हैं ताकि लोटा डोर न होने पर भी बिना श्रम किये ही तुरन्त ठंडा जल पीकर पथिक अपनी प्यास बुझा सकें। कई सज्जन तालाब खुदवाते हैं जहाँ मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी जल प्राप्त कर सकें लोगों को स्नान की, वस्त्र धोने की, घर के लिए पानी ले जाने की तथा खेती सिंचाई की आवश्यकता भी पूर्ण हो सके। बाग-बगीचे लगवाने वालों के भी ऐसे ही उद्देश्य होते हैं। उन वृक्षों की छाया में लोग शीतलता प्राप्त करें, पशु पक्षी भी उनका लाभ उठावें, पुष्प और फलों से लोग प्रसन्नता तथा तृप्ति अनुभव करें। लंगड़ी लूली वृद्ध गौओं की कसाई से रक्षा करने के लिए गौशालाएँ स्थापित करते हैं इनकी भी प्रशंसा ही की जानी चाहिए।
कितने ही पुण्यात्मा लोग भूखों को भोजन देते हैं। सदावर्त लगाते हैं। सन्तों ब्राह्मणों एवं समाज सेवियों का भोजन वस्त्र से सत्कार करते हैं। प्राचीन काल के सभी ब्राह्मण और साधु समाज सेवी होते थे इसलिए उनके भोजन आदि की आवश्यकताएँ पूरी करना एक प्रकार से समाज सेवा के अनेक स्रोतों को संचालित करना ही था। इसी से ब्रह्म भोज का पुण्य माना गया था। आज भी यदि सच्चे समाज सेवी साधु ब्राह्मण मिल सकें तो उनकी भोजन आदि की आवश्यकताएँ पूर्ण करना ब्रह्म भोज ही होगा और उसका शास्त्रोक्त पुण्य भी मिलेगा। कितने ही दयालु सज्जन अन्धे, अपाहिजों को दीन हीनों को शीत से बचाने के कम्बल, रजाई, धोती, कपड़े आदि बाँटते हैं यह भी पुण्य ही है। कितने ही सत्पुरुषों ने अपने धन का सदुपयोग करने के लिए औषधालय, अस्पताल,प्रसूति गृह खुलवाये हुए हैं जहाँ पीड़ित लोग जाकर अपने कष्टों एवं रोगों से मुक्ति के लिए आवश्यक सुविधाएँ प्राप्त करते हैं। कितने ही विद्यालय एवं पाठशालाएँ धनी-मानियों के धन या जनता के चन्दे से चलते हैं। इनसे ज्ञान वृद्धि होती है। पुस्तकालय एवं वाचनालय भी इसी श्रेणी में आते हैं। यह सब परमार्थ ही है। इनके संयोजकों के सत्प्रयत्न निश्चय ही सराहनीय हैं।
कितने ही व्यक्ति श्रम संभव प्रयत्नों के द्वारा लोक सेवा का पुण्य परमार्थ करते हैं। श्रम दान भी धन दान के समान ही—वरन् उससे भी कुछ बढ़कर पुण्य माना गया है। उत्साही सेवाभावी लोग मिलजुलकर सेवा समिति जैसे संगठन बनाते हैं और मेले-ठेलों में जहाँ जनता को विशेषकर स्त्री बच्चों के खोने आदि की कुशंका रहती है यह स्वयं सेवक उनकी बड़ी सहायता करते हैं। प्यासों को पानी पिलाते हैं, खोये हुओं को ढूंढ़कर यथा स्थान पहुँचाते हैं, चोर बदमाशों से रखवाली करते हैं, नदी स्नान आदि के अवसरों पर डूबते हुओं को बचाते हैं इस प्रकार की निस्वार्थ सेवा बुद्धि को परमार्थ ही कहा जाएगा। आजकल विकास योजनाओं के अंतर्गत श्रम दान से सड़कें, नहरें, पुल आदि बनाने का, घाट तालाबों की सफाई का काम जहाँ तहाँ उत्साहपूर्वक होता देखा जाता है। महामारी एवं बीमारी फैलने के दिनों में लोग घर घर जाकर रोगियों की चिकित्सा, परिचर्या, मृत-संस्कार आदि के जोखिम भरे काम करते हैं इन प्रयत्नों की कौन प्रशंसा न करेगा।
कुछ लोग ऐसी ही लगन और सेवा भावना से जनता की बौद्धिक एवं संगठनात्मक सेवाएँ करते हैं। प्रवचनकर्ता, व्याख्यान दाता, लेखक, ग्रन्थकार, पत्रकार, गायक लोगों में ज्ञान और सद्भाव बढ़ाने के लिए अपनी विद्या, वाणी, लेखनी का उपयोग करते हैं। इससे आवश्यक ज्ञान एवं कर्तव्य परायणता के लिए उत्साह प्राप्त होता है। किसी समय यह कार्य साधु ब्राह्मण समाज ने पूरी जिम्मेदारी से अपने कन्धे पर उठाया हुआ था और उसे लाखों वर्षों तक निबाहा भी भली प्रकार। आज इस काम को सार्वजनिक संस्थाओं के अंतर्गत रहकर तथा स्वतन्त्र रूप में अनेक विचारक विद्वान और लोक सेवी अपने अपने ढंग से कर रहे हैं और जानकारी, राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक चेतना को बढ़ाने में लगे हुए हैं। यह भी पुण्य ही है। कितनी संस्थाएँ विभिन्न वर्गों के संगठन बनाती और बढ़ाती हैं ताकि लोगों में एकता और प्रेम बढ़े एवं उनके अधिकारों की रक्षा हो। देश की स्वाधीनता के लिए हजारों लाखों मनुष्यों ने जो कष्ट सहे, त्याग किये और प्राण दिये उसमें भी जनहित की ही पुण्य भावना प्रधान रूप से काम करती थी। वैज्ञानिक शोधों में लगे हुए तथा आध्यात्म, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्रों में सदुद्देश्य के साथ प्राण पण से जुटे हुए लोगों को पुण्यात्मा ही कहा जाएगा! क्योंकि उनका उद्देश्य परहित—परमार्थ है। परमार्थ को ही पुण्य का प्रधान चिन्ह माना गया है।
किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता सज्जनता एवं महानता की परख उसके पुण्य परमार्थ भरे कार्यों को देखकर की जाती है। की भी क्यों न जावे? जो अपने प्रयत्न पुरुषार्थ श्रम और त्याग से दूसरों को लाभ पहुँचाता है, अपनी जिन समय, श्रम, धन, बुद्धि आदि शक्तियों का उपयोग अपने लिए करके वह और भी अधिक सुख साधन सामग्री एकत्रित कर सकता था, उसे उसने दूसरों की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से त्याग किया तो उसकी इस उदारता की सराहना की ही जानी चाहिए। लोक में कीर्ति के साथ ऐसे लोगों को परलोक में भी सद्गति मिलनी ही चाहिए। शास्त्रों में पुण्य फल के बदले स्वर्ग आदि सुखों के प्राप्त होने की जो बात लिखी है उसमें प्रकट है कि पुण्य परमार्थ की महत्ता मनुष्यों की भाँति परमात्मा भी स्वीकार करते हैं। उसे धर्म मानते हैं और उनके संयोजक धर्मात्मा को सद्गति एवं सुख शान्ति प्रदान करते हैं।
इस पुण्य परमार्थ की कसौटी पर जब हम उन व्यक्तियों को कसते हैं जो कष्ट साध्य एकान्त साधनाओं में लगे हुए हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह लोग केवल अपनी ही भलाई के लिए प्रवृत्त हैं। इन्हें पुण्य परमार्थ से कोई सरोकार नहीं। इस दृष्टि में उन्हें स्वार्थी भी कहा जा सकता है और उन लोगों की अपेक्षा अनुदार एवं संकीर्ण माना जा सकता है जो अपने समय और श्रम का एक बड़ा भाग जनता की भलाई करते हुये पुण्य परमार्थ में लगाते हैं।
यह प्रश्न सचमुच ही विचारणीय है क्योंकि साधारण रीति से यह तपस्वी लोग स्वार्थी मालूम पड़ते हैं जो अपने ही लिये ऋद्धि-सिद्धि, स्वर्ग-मुक्ति प्राप्त करने में एक साधारण स्वार्थी की भाँति लगे हुए हैं। पर दूसरी ओर कई बातों पर विचार करने से उसके दूसरे पहलू भी सामने आते हैं जो असमञ्जस में डाल देते हैं। सोचने की बात है कि साँसारिक जीवन में रहते हुए अपनी कमाई से खूब आनन्द के दिन काटते हुए थोड़ा सा धन या समय देकर अन्य पुण्यात्माओं की तरह पुण्य और यश लिया जा सकता था जो इतना कष्ट साध्य मार्ग इन्होंने क्यों अपनाया? घर गृहस्थी को क्यों छोड़ा? एकान्त प्रदेशों में जहाँ जीवनोपयोगी वस्तुओं का घोर अभाव और अनेक प्रकार के कष्ट ही कष्ट हैं। वहाँ जाने का निश्चय क्यों किया? खून को जमा देने वाली ठंड और तीव्र ग्रीष्म एवं प्रचण्ड वर्षा में यह नंगे उघाड़े क्यों पड़े रहते हैं। इतनी कठोर तितिक्षा एवं कष्ट सहिष्णु बनने की मूर्खता इन्होंने क्यों की जबकि थोड़ा सा दान करने पर ही पुण्य फल मिल सकता था। थोड़ी सी पूजा उपासना घर गृहस्थी में रहते हुए भी कर लेने पर जब यह माना जाता है कि भगवान् थोड़े ही जप तप से पूजा-पाठ से प्रसन्न हो जाते हैं और स्वर्ग मुक्ति प्रदान कर देते हैं तो इतना कष्ट उठाने का इन्हें क्या प्रयोजन था? और लोगों की तरह यह भी क्यों नहीं दोनों हाथों में लड्डू रखे रहे? जिससे संसार का आनन्द भी मिलता रहता और पुण्य परलोक भी सधता रहता।
लगता है शायद यह लोग कम पढ़े या अल्पबुद्धि होंगे। किसी ने बहका कर इन्हें इस मार्ग पर लगा दिया होगा पर यह बात भी सही नहीं है। इन तपस्वियों में कितने ही अत्यन्त उच्च कोटि के विद्वान एवं भूतकाल के प्रमुख चतुर, क्रियाकुशल, सफल, प्रभावशाली, प्रतिष्ठित, धनी, सत्ता सम्पन्न एवं ऐसे लोग हैं जिन्हें कोई बहका नहीं सकता। जिनके बहकाने पर हजारों लोग इधर से उधर होते थे, उंगलियों के इशारे पर नाचते थे। उन्हें कोई यों ही बहका देगा और वह भी ऐसे कष्ट साध्य जीवन यापन में शेष सारे जीवन प्रवृत्त रहने के लिए बहका देगा यह बात भी समझ में आने योग्य नहीं है।
फिर यह गुत्थी ज्यों की त्यों रह जाती है कि कुँआ बनवाने, तालाब खुदवाने, ब्रह्मभोज कराने, विद्यालय पुस्तकालय श्रमदान या संगठनात्मक एवं प्रचारात्मक सार्वजनिक कार्य करने की अपेक्षा इन सुविज्ञ और सुसंस्कृत व्यक्तियों ने यह तपश्चर्या का मार्ग क्यों चुना? उनने इन्द्रियों के सारे विषय त्याग दिये, धन सम्पत्ति को तिनके की तरह ठोकर मार दी, शरीर की सामान्य सुविधाओं की भी परवा न करी शीत, उष्णता, अन्धकार की विषमता, वस्त्र और भोजन का अभाव मकान में रहने की अपेक्षा वृक्षों की छाया या गुफाओं में रहने का दुस्साहस किया, जन शून्यता का, एकाकीपन में रहने का दुस्साहस किया, जन शून्यता का एकाकीपन कितना अखरता है इसे मानव स्वभाव का जानकार कोई भी व्यक्ति भली प्रकार समझ सकता है। बाल बच्चों का, मान प्रतिष्ठा का, धन ऐश्वर्य का, इन्द्रिय सुखों का मोह त्याग करना, साँप, बिच्छू, सिंह व्याघ्र आदि के बाहुल्य से जीवन को हर घड़ी संकट में डाले हुए, रोगी हो जाने पर जहाँ न कोई चिकित्सा की व्यवस्था है न परिचर्या की, ऐसे स्थान पर पड़े हुए लोगों का त्याग भी साधारण नहीं है। इतने विचार शील और इतने त्यागी व्यक्ति यदि सार्वजनिक सेवा से पुण्य परमार्थ अर्जन करने में लगे तो वे उतने त्याग के कारण बहुत यश और पुण्य कम सकते हैं साथ ही इतने कष्ट साध्य जीवनयापन की कठिनाई से बच सकते हैं। फिर क्यों नहीं यह लोग समाज सेवा में लगते? अपने जीवन को एक तरह से बरबाद क्यों कर रहे हैं? यह प्रश्न सहज ही हर तर्कशील मस्तिष्क में उठता है और उसका समाधान चाहता है।
इन तपस्वियों की तपश्चर्या को यदि साँसारिक क्षेत्र में प्रवृत्ति मार्गी सब विचार शील लोग मूर्खता या स्वार्थपरता मानते तो भी सन्तोष होता कि भ्रान्त यह तपस्वी ही हैं, इनका विचारशील लोग तो समर्थन नहीं करते। पर बात ऐसी भी नहीं है। संसार के श्रेष्ठ मस्तिष्क इन त्यागी तपस्वियों की प्रशंसा ही नहीं करते, उनकी आवश्यकता और उपयोगिता को भी जानते हैं। इतना ही नहीं वे उनसे प्रकाश और बल मार्ग दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने को भी आतुर रहते हैं। ऐसी स्थिति में तपस्वियों की महत्ता का रहस्य साधारण बुद्धि के लोगों के लिए और भी गूढ़ होता जाता है।
महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी की विद्वत्ता, प्रतिभा और दूरदर्शिता को सारा देश जानता है। वे उच्चकोटि के वकील थे और भारत की राजनीति में उनने जो महत्वपूर्ण भाग लिया, स्वतन्त्रता संग्राम के संचालन में उनने जिस कौशल का परिचय दिया, उसका परिचय सर्व साधारण को नहीं वरन् उस समय की गोपनीय स्थितियों के जानकार उच्चकोटि के नेताओं को ही है। मालवीयजी ने हिन्दू संस्कृति की कितनी सेवा की अपना सारा ही जीवन सेवा कार्यों में लगाया हिन्दू विश्वविद्यालय की नींव रखी तब उसका शिलान्यास कराने के लिए एक ऐसे ही तपस्वी की आवश्यकता पड़ी जो उतना ही महान हो, जितना विश्व विद्यालय की स्थापना का उद्देश्य महान् था। मालवीयजी ने इसके लिए तलाश की-आध्यात्म क्षेत्र के ऊँचे क्षेत्रों से उनका निजी परिचय था। उन्होंने वर्तमान काल का कोई सर्वोच्च ऋषि इस कार्य के लिए तलाश किया। “जिन खोजा तिन पाइयाँ” की उक्ति के अनुसार बहुत खोज के बाद उन्हें वह तपस्वी मिल ही गया। और किसी प्रकार बहुत अनुनय विनय के बाद रजामंद करके उस अवधूत योगी को वे अत्यन्त अवरुद्ध स्थान से खोजकर बनारस लाये और विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए भूमि पर सर्व प्रथम गायत्री का एक महापुरश्चरण करा के पवित्र किया, तत्पश्चात् उस अवधूत योगी के हाथों वास्तविक शिलान्यास कराया। पीछे अन्य रस्में और लोग करते रहे, पर उन अवधूत का आशीर्वाद मिलने पर ही मालवीयजी ने अपने प्रयत्न को सफल और भाग्य को धन्य माना।
काशी विश्वविद्यालय को स्थापित हुए बहुत काल बीत गया बात पुरानी पड़ गयी। जिन लोगों ने उन महात्मा के दर्शन किये थे उनमें से अधिकाँश दिव्यंगत हो गये। जनता वर्तमान की बातों को ध्यान रखती है और भूतकाल को, यदि वह विशेष प्रयत्न पूर्वक लिपिबद्ध या स्मारक रूप में आबद्ध न किया जाए तो उसे भूल जाती है। उस योगी अवधूत की उन दिनों भारतवर्ष के घर-घर चर्चा थी। मालवीयजी की खोज में सभी लोग बहुत प्रभावित थे और यह गर्व करते थे कि भारत भूमि अभी ऋषियों से रहित नहीं हुई है। पर आज तो वह बात एक अतीत की धुँधली रेखा की तरह विस्मृति के गर्त में चली गई है। उसका स्मरण संभवतः कुछ गिने चुने लोगों को ही होगा।
मालवीयजी जिस योगी को विश्वविद्यालय का शिलान्यास करने लाये थे वह एक नग्न अवधूत थे। शरीर पर एक चिन्दी वस्त्र भी धारण नहीं करते थे और बहुत लम्बे समय से मौन थे। कहते हैं कि चिरकाल पूर्व उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ उपनिषदादि समस्त शास्त्रों का अध्ययन किया, दंडधारी संन्यासी बने और उसके उपरान्त उन्होंने विहंग अवधूत अवस्था धारण कर ली, सारे वस्त्र त्याग दिये, मौन धारण कर लिया, भोजन के लिए प्रयत्न छोड़ दिया, एक दिन किसी गृहस्थ ने भिक्षा माँगने पर उनकी हथेली पर गरम दाल दी जिससे उन्हें कष्ट हुआ और उस दिन से माँगने के लिए हाथ पसारना छोड़ कर मुट्ठी बाँध ली। वह मुट्ठी फिर उन्होंने कभी नहीं खोली। उन्होंने अपनी उम्र तपस्या हिमालय की अत्यंत ऊँची हिमाच्छादित चोटियों पर खुले में रहकर उस स्थान में की जहाँ साधारण मनुष्यों का पहुँच सकना और जीवित रह सकना कठिन है।
उनकी आध्यात्मिक विशेषताओं को, तप से उत्पन्न आत्म बल को जो लोग जानते थे उनके दर्शनों के लिए लालायित रहते थे। पर उन दिनों वैसा योग किसी-किसी को कभी ही मिलता था। महामना मालवीयजी, गोस्वामी गणेशरनजी, बाबा काली कमली वाले आदि उच्च कोटि के धर्मसेवी उन्हें अपने गुरु रूप में मानते थे। उन्होंने इन महापुरुषों के आशीर्वाद को उपलब्ध करके ही वह बड़े-बड़े कार्य किए जो वे अपनी व्यक्तिगत क्षमता से शायद ही कर पाते। सर्व साधारण ने उस योगी के दर्शन विश्वविद्यालय की स्थापना के समय एक बार ही सर्वोच्च मंच पर किया था। तब से किसे पता है कि वे कहाँ गये? जीवित हैं या मर गये?
पर वे अभी जीवित हैं, मरे नहीं हैं। अज्ञात स्थान पर हैं तो भी ज्ञानी व्यक्तियों की तरह अपनी निज की तपश्चर्या ही नहीं कर रहे वरन् कई लोक सेवी व्यक्तियों को प्रेरणा देकर उतना लोक हित कर रहे हैं जो शायद अपने अकेले शरीर से वे कदापि न कर पाते।
गंगा के उद्गम स्थान के समीप यह महात्मा अभी भी रहते हैं। लम्बी अवधि से प्राण को धारण किए-किए अब शरीर भी जीर्ण हो गया है फिर भी आँखों में बड़ा तेज है, अंधेरे में भी वे चमकती हैं। शीत सहते-सहते चमड़ी स्याह काली, बहुत कड़ी और मोटी हो गई है। इन दिनों एक आठ फुट लम्बी, आठ फुट चौड़ी लकड़ी से बनी जिस कुटी में वे रहते हैं वह जाड़े के दिनों में बर्फ से ढक जाती है। कुटी में ठण्डी हवा प्रवेश न करने पावे इसलिए भीषण हिमपात आरम्भ होने पर कार्तिक से कुटी के सब छेद योग से बन्द कर दिए जाते हैं। बैसाख में जब बर्फ गलती है तभी वह स्थिति आती है कि कुटी से बाहर निकला और भली प्रकार घूमा फिरा जा सके। किसी आवश्यकता के समय लोहे के बेलने से बर्फ काट कर कुटी से बाहर निकल सकना जाड़ों में भी सम्भव तो हो सकता है पर ऐसा किया विशेष आवश्यकता के समय ही जाता है। साधारणतः शीत के छह महीने में कुटिया बन्द रहती है और उसी में उनकी जीवन-यात्रा चलती रहती है।
हमारे कुलपति परम पूज्य आचार्यजी के लिए कोई यह नहीं कह सकता कि उनमें सेवा भावना नहीं है, या सेवा के महत्व को नहीं जानते। उनका सारा जीवन ही सेवा और परमार्थ से ओत-प्रोत है। पर वे भी इन्हीं महात्माओं से प्रकाश प्राप्त करते हैं, समय समय पर उनके आदेशों को ग्रहण करते और उसी के आधार पर चलते हैं। यों हर कोई उनका प्रकाश प्राप्त नहीं कर सकता उसके लिए समुचित पात्रता भी कम है। आचार्य जी सदा यही कहते रहते हैं कि मैं एक तुच्छ व्यक्ति हूँ। मेरी सामर्थ्य तुच्छ है, मुझे जो प्रकाश एवं बल मिला है उसका स्रोत कोई दूसरा ही है। ‘कोई दूसरा’ कहने से उनका तात्पर्य ऐसे ही आत्मधन के धनी पुरुषों का होता है। इन दिनों भी आचार्यजी उनके प्रत्यक्ष सान्निध्य के लिए दौड़े गये हैं।
जिन एक महापुरुष का जिक्र उपरोक्त पंक्तियों में किया है, वे अकेले ही नहीं है, वरन् भारत भूमि में ऐसे और भी अनेक महापुरुष हैं उन्होंने तपस्या को ही सार्वजनिक शिक्षा माना है, यद्यपि यह बात लगती बड़ी अटपटी है कि कोई व्यक्ति जन-साधारण से दूर रहकर भी क्या कोई पुण्य परमार्थ कर सकता है?
भले ही हमें आश्चर्य जनक लगे, भले ही हमारे समझ में न आवे पर यह बात भी है सत्य ही कि मनुष्य एकान्त तपश्चर्या द्वारा आत्म कल्याण ही नहीं, भारी जन हित भी पुण्य परमार्थ भी कर सकता है। कैसे? इस प्रश्न पर अगले अंक में चर्चा करेंगे।
(पं. मुकटबिहारीलाल शुक्ल बी. ए., एल. एल. बी.)
लोग कहते सुने जाते हैं हम भगवान की याद करते हैं, हम नित्य प्रति उनको भजते हैं पर वे कृपा नहीं करते, वे सुनते तक नहीं। भगवान की याद तो हम करते हैं परन्तु क्या कभी उस याद का हमने विश्लेषण किया है? उस याद का क्या मूल्य है? किस प्रकार की वह याद है? क्या हमने उस कथित याद और भगवान् के प्रति कहे जाने वाले प्रेम को जो कोई माता अपने दूर देश में बसे हुए और मुद्दतों से न देखे गये पुत्र के प्रति या कोई युवक अपनी नव-विवाहित-पत्नी से या कोई कंजूस अपने धन से प्रेम करता है, किया है? अंग्रेजी में कहावत है प्रेम से प्रेम उत्पन्न होता है। यह कैसे सम्भव है कि स्वयं तुम अपने मित्र से प्रेम सच्चे अर्थों में न करो और अपना स्वार्थ पूरा करने की गरज से उससे दोस्ती करो और आशा यह करो कि वह पूरी तौर से तुम्हारी मदद करे। यही व्यवहार अगर कोई भी तुम्हारे प्रति चाहे वे तुम्हारे भाई बहिन, माता पिता ही क्यों न हों, करे तो क्या तुम पसन्द करोगे? और भरसक उनकी सहायता करोगे? अथवा उनसे निष्कपट प्रेम करोगे? जब तुम इसके लिए स्वयं तैयार नहीं हो तो भगवान् को क्यों दोष लगाते हो? वह तुम्हारी सहायता नहीं करते, तुम्हें नहीं अपनाते और वे तुम्हें दर्शन तभी देंगे जब तुलसी दास जी की भाँति तुम्हारी आन्तरिक भावना यह हो :-
“कामहिं नारि पियार जिमि लोभिहिं प्रिय जिम दाम। तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहिं राम॥
यह कहना निरर्थक है कि भगवान् सुनते नहीं हमारी पुकार पर उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। यह सम्भव है कि स्विच दबाने पर बिजली का बल्ब न जले परन्तु यह तो असम्भव है कि सच्चे दिल से भगवान् को पुकारो और वह शरणागत हितकारी होते हुए भी मदद न करे। एक दो नहीं अनेक उदाहरण केवल हमारे देश में ही नहीं अन्य देशों में भी प्रसिद्ध हैं कि भगवान् ने अपने शरणागत भक्त की सहायता की है और कभी उसे निराश नहीं किया। महात्मा गाँधी ने स्पष्ट भाषा में इसी सिद्धान्त का समर्थन किया है। वह कहते हैं कि—”मैंने कभी भगवान में प्रतिक्रिया का अभाव नहीं पाया। जब जब मुझे अन्धकार नजर आया और जब-जब मेरी जीवन नैया सुविधा पूर्वक चलती न दीख पड़ी मैंने उसे अपने हाथ के पास बिल्कुल समीप पाया। मुझे जीवन में एक क्षण भी तो ऐसा याद नहीं आता जब मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि भगवान मेरा साथ छोड़ रहे हैं।”
आगे महात्माजी कहते हैं कि—”इस दुनिया में मैंने भगवान से अधिक कड़ाई से काम लेने वाला मालिक नहीं देखा। वह निरन्तर हमारी परीक्षा करता रहता है और जब हमें प्रतीत होता है कि हमारा विश्वास हट रहा है या शरीर हमें जवाब दे रहा है और हम डूबे जा रहे हैं तो वह किसी न किसी प्रकार हमारी सहायता को आते हैं और यह साबित करते हैं कि हमें उसका विश्वास इस दशा में भी नहीं छोड़ना चाहिए। वह हमारी सच्ची पुकार पर सदा हमारी मदद करने को तैयार हैं लेकिन अपने ढंग से, न कि जिस प्रकार हम चाहते हैं उस प्रकार, ऐसा मैंने पाया है। एक भी तो उदाहरण मुझे ऐसा याद नहीं आता जब ऐन वक्त पर भगवान ने मुझे छोड़ दिया हो।”
प्रार्थना की प्रतिक्रिया का विवेचन करते हुए गाँधीजी आगे और भी स्पष्ट हैं—”भगवान धृष्ट की प्रार्थना स्वीकार नहीं करते, न उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं जो उनके साथ सौदा करते हैं। अगर तुम्हें भगवान से मदद लेनी हो तो तुम (विषयों से) नग्न होकर उनके पास जाओ, बिना किसी दुराव के उन तक पहुँचो और तुम्हारे दिल में यह भय और संदेह भी न हो कि तुम जैसे पतित की वह कैसे मदद करेंगे। वे किसी से भेद नहीं करते और तुम्हें मालूम होगा कि एक-2 करके तुम्हारी सारी प्रार्थनायें स्वीकार हो गई। मैं यह सब अपने निजी अनुभव से कह रहा हूँ। मैं अग्नि परीक्षा पार कर चुका हूँ।”
कमजोर दिल और निर्बल आत्मा पुरुष भगवान से भौतिक सुख, धन, सन्तान, यश, स्वास्थ्य, आदि क्षणिक सुख देने वाली तुच्छ वस्तुयें माँगा करते हैं। उच्चकोटि के भक्त भी इन पदार्थों की भीख माँगना अपने स्वाभिमान का खोना समझते हैं। वे अपनी छोटी-2 बातों के लिए भगवान का एहसान लेने को तैयार नहीं।
एक सन्त ने कहा है कि “मुझे भगवान से कुछ नहीं चाहिये। अगर भगवान को किसी चीज की आवश्यकता हो तो वह मुझसे ले सकता है।” कौन परवाह करता है कि वह सर्वशक्तिमान है या नहीं। मुझे न उसकी शक्ति चाहिए , न उसकी शक्ति का प्रदर्शन। मैं, भगवान से प्रेम करता हूँ क्योंकि मैं उनसे प्रेम करना चाहता हूँ और मेरे लिए वह प्रेम रूपी भगवान है यह बहुत काफी है। मनुष्य के अन्दर भगवान से ज्यादा ताकत है, क्योंकि भगवान में ताकत नहीं कि इन्सान को सुधार सके लेकिन इन्सान की ताकत है कि भगवान को अपने प्रेम और तड़पन द्वारा बुला सके।
जिस प्रकार जो प्रेमी आपस में घुल मिल जाते हैं। उनके दरम्यान कोई परदा या छिपाव नहीं रहता। किसी को अपने स्वार्थ सिद्धि की परवाह नहीं, अगर परवाह है तो निःस्वार्थ भाव से अपने प्रेमी की सेवा और सहायता करने की और उससे सच्चा निष्कपट प्रेम करने की। उसी प्रकार जब उस ‘असरन सरन’ की शरण में भक्त चला जाता है तो भगवान के दर्शन देने का क्या प्रश्न, वह तो परछांई की भाँति हर वक्त अपने भक्त के साथ रहते हैं। शरण पड़ने के विषय में महर्षि रमन के विचार कैसे सुन्दर हैं। वह कहते हैं। “भक्त भगवान की शरण जाता है और इसका मतलब यह है कि भक्त का अपना व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है। अगर शरणागति सम्पूर्ण है तो अपना निजी मान समाप्त हो जाता है और तब फिर कोई दुख और शोक नहीं हो सकते।”
एक अंग्रेज ईश्वर भक्त ने भी इन्हीं विचारों का समर्थन बड़े सुन्दर प्रकार से किया है। वह लिखता है “शरण जाने में प्रेमी प्रतीत करता है कि प्रेमी और परमात्मा एक हो गए हैं” और यही भगवान् का सच्चा और पूर्ण दर्शन है।
और यही हृदयोद्गार तो स्वामी रामतीर्थ के हैं :-
मैं अपनी सूरत पैं आप शैदा,
कि राम मुझ में मैं राम में हूँ।
(श्री शम्भूसिंहजी कौशिक)
परम पिता परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना इतने विचित्र ढंग से की है कि मनुष्य की बुद्धि चक्कर खाने लगती है। इस सृष्टि का सर्व श्रेष्ठ प्राणी मनुष्य है। वह इसके रहस्यों को जानने का प्रयास सदैव से करता आ रहा है। ज्ञानी जन इन रहस्यों का अन्वेषण कर, मानव को नये नये रूप में लाते जा रहे हैं। परमात्मा के युवराज मानव की शक्ति अपरिमित है। इसने विशाल पयोधि के अन्तस्थल को चीर डाला और उसके धरातल की छानबीन करनी आरम्भ कर दी। उसके गर्भ में छुपे रत्नों को ढूँढ़ डाला। उस अथाह समुद्र की थाह भी इस बुद्धिमान् मानव की क्षमता के बाहर की वस्तु नहीं रही।
समुद्र की खोज से ही वह सन्तुष्ट नहीं हुआ, इसने आकाश में उड़ान लगाना आरम्भ किया और नक्षत्रों के समाचार ले आया। समर्थ मानव ने अन्य लोक वासियों से अपना सम्बन्ध स्थापित करना आरम्भ कर दिया।
समस्त विश्व के सर्वोच्च शिखर माउन्ट एवरेस्ट पर भी अपने चरण जा धरे। इन सब शिखरों पर चढ़ना और उनके मनोरम दृश्यों का आनन्द लेना इसके लिए अब मनोरंजन की सामग्री हो गई है। पर्वतों के दुर्गम मार्गों को उसने अपने जन्य यन्त्रों से तोड़ फोड़ कर सीधे और सरल बना दिये हैं। इनकी गोदी में छिपे हुए बहुमूल्य रत्नों को इसने खोदना आरम्भ कर दिया है। हिंसक पशुओं और सृष्टियों से भरपूर जंगल अब मानव के लिए एक सामान्य गोचर भूमि से अधिक कुछ नहीं है। इस अतुलित बलशाली मानव ने ध्रुवों तक खोज कर डाली है। इसकी बुद्धि की कहाँ तक प्रशंसा करें इसने पय, पवन, पावक और पृथ्वी सभी पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है। ये सभी इसकी सेवा प्रमाद रहित होकर कर रहे हैं।
द्रुत-गति से प्रवाहित होने वाली नदियों के प्रवाह को इसने यथेच्छ दिशा में मोड़ दिया है। उनकी तेज धाराओं को बाँध कर बड़े-बड़े बाँध बना दिये हैं। जिनसे नहरें निकाल कर मरुस्थल को भी हरे भरे उद्यानों में परिवर्तित कर दिया है।
अपनी यात्रा के साधनों को इतना आरामदेह बना लिया है कि अत्यन्त तप्त प्रदेश में भी इसे अब गरमी नहीं सताती है। अपने कल नल के सहारे महाद्वीपों और द्वीपों को अत्यन्त निकटवर्ती पड़ौसी बना दिया है।
सम्पूर्ण भूतों पर यह विजयी हो गया है। अपनी इस भौतिक सफलता पर यह गर्भित हो उठा है और उस सृष्टि नियन्ता परमपिता परमेश्वर को भूलने में गौरव का अनुभव करता है। जिसने इसके ऊपर अनेकों उपकार किए हैं। जो स्वभाव से बड़ा दयालु ओर परोपकारी है।
ऐसे दयालु परमात्मा को भुलाकर वह अपने वास्तविक लक्ष्य को भूलता जा रहा है। प्राचीन भारतीय तत्व ज्ञानियों ने अन्ततोगत्वा दुख को प्रदान करने वाले इस भौतिक और क्षण भंगुर विज्ञान की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया। उन्होंने समुद्र की तरंगों की ओर विशेष ध्यान न देकर अपने अन्तःकरण की तरंगों को पहचाना।
विज्ञान की दुनिया से प्रभावित होने वाले अब भी सावधान हो और शेष जीवन को ईश्वरानुग्रह प्राप्त करने में लगा। वह बड़ा कृपालु है। यह सृष्टि और तेरी शक्ति उसकी कृपा का प्रयत्न-प्रभाव है। जिस बुद्धि बल पर आज तू इतना इठलाता है यह सब उस दया सागर का एक बिन्दु है। अपना कोई स्वार्थ न होते हुए भी उसने जीवों के कल्याण के लिए संसार रचना की है। उसकी कृपा प्राप्त करने के लिए हम अपनी बुद्धि को उसकी ओर मोड़ें। नदियों के प्रवाह को मोड़ने वाले, अपनी मन के प्रवाह को प्रभु की ओर मोड़ दे। वह माता पिता के समान कृपालु है। जब परमपिता अपने प्यारे वत्स, जीव को अपनी ओर आता देखता है तो भक्त वत्सल अधीर होकर नंगे पैर दौड़ पड़ता है। दया सिंधु अपने प्यारे पुत्रों को अपने अनन्त शक्ति रूप हाथों से उठा लेता है। अपनी गोद में लेकर उसे सच्चे आनन्द का पयपान कराता है। जिसे पीकर वह सदैव के लिए तृप्त हो जाता है।
पर्वत, मस्तकों को अपने चालों से परिमर्दन करने वाले ओ गर्वित मानव! अनन्य मन से उस जगत नियन्ता की स्तुति, प्रार्थना कर! उसके आदेश को शिरोधार्य करके उसके अनुसार आचरण कर!! उस प्रभु से प्राप्त तन, मन, धन को उसकी ही सेवा में लगाने में संकोच मत कर। हे पयोदधि के मन्धन कर्त्ता! अपने अन्तःकरण को मथकर देख, तभी तुझे सच्ची शान्ति प्राप्त हो सकेगी। इसके लिए उस परमेश्वर की उपासना करना, सत्कर्मों में प्रवृत्त रहना, दया, उपकार को धारण करना ही श्रेष्ठ साधन हैं! ज्यों-ज्यों तू परमात्मा की तरफ चलेगा। त्यों-त्यों वह भी बढ़ता दिखाई पड़ेगा। जैसे बालक को आता हुआ देखकर माता स्वयं दौड़कर उसे गोद में ले लेती है कि कहीं इसे चोट न लग जावे, इसी प्रकार जब साधक प्रभु की तलाश में निकलता है—तो जगत पिता भी उसको अपनी वात्सल्यमयी गोद में खिलाने के लिये लालायित हो उठता है। अत्यन्त प्रीति से उसे अपनाना है और तभी मानव का जीवन सार्थक हो पाता है।
आज सारे संसार का सार जानने वाला स्वयं अपने निर्माता प्रभु का रूप नहीं जान पाया। उसकी प्राप्ति के बिना ही देव दुर्लभ मानव जीवन को समाप्त किये जा रहा है।
इटली के साधुओं ने एक भविष्यवाणी की थी कि 14 जुलाई को प्रलय होगी। यद्यपि भारतीय ज्योतिषियों और आध्यात्म वेत्ताओं ने इसका एक स्वर से खण्डन किया था, फिर भी बात दूर दूर तक फैल गई और लोगों के मन में भय तथा चिन्ता का संचार हुआ। उस दिन बहुत से लोगों का मन परेशानी तथा आशंका में डूबा रहा।
बात बीत गई। प्रलय एक उपहास एवं मखौल की चीज बन गई है। इटली के वे योगी जिनने भविष्यवाणी की थी त्रिकाल दर्शन की उच्च भूमिका तक पहुँचे न होने पर भी अपनी उथली अनुभूतियों को उच्च श्रेणी की विभ्रांत मानने लगे होंगे। समय से पूर्व अपनी स्थिति निश्चय हो जाने से पहले जो लोग अभिमत प्रकाशित करने लगते हैं उन्हें इसी प्रकार उपहासास्पद एवं लाँछित होना पड़ता है। साथ ही वे महत्वपूर्ण आध्यात्म विद्या को भी लाँछित करते हैं इसलिए योग शास्त्र के भारतीय तत्व वेत्ताओं ने परिपक्वावस्था आने से पूर्व अपनी किन्हीं अनुभूति को प्रकाशित न करने का विधान किया है।
14 जुलाई बीत जाने पर लोग प्रलय के संबंध में निश्चिंत हो गये। एक चिन्ता जनक भ्रान्ति का निराकरण समय ने कर दिया यह अच्छा ही हुआ। फिर भी प्रलय एक पहेली है ही। मनुष्य जाति को एक न एक दिन उसका शिकार होना ही है। भले ही वह दिन बहुत नजदीक न हो पर ज्योतिष शास्त्र एवं भौतिक विज्ञान के अनुसार वह सत्यानाशी दिन क्रमशः निकट ही आता चला जा रहा है। और 14 जुलाई न सही—फिर कभी इस दुर्दिन का हमें सामना करना ही होगा। एक दिन हम सबको प्रलय का शिकार होना ही है। उस दिन की सम्भावना किस प्रकार निकट आती जा रही है, आइये इस पर कुछ विचार करें।
खगोल विद्या के वर्तमान विज्ञानाचार्यों के अनुसार आज से पाँच अरब वर्ष पूर्व विश्व की सारी भौतिकी सामग्री एक केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित थी। तब उसका स्वरूप क्या था, इसका ठीक ठीक निर्णय नहीं हो सका, पर इतना निश्चित है कि उस एकत्रित सामग्री से किसी अज्ञात कारण से विस्फोट हुआ और उसके असंख्य टुकड़े टुकड़े होकर चिनगारियों की तरह अलग अलग दिशाओं में भाग निकले। यही टुकड़े विभिन्न ग्रह नक्षत्र हैं। वैज्ञानिकों की दृष्टि से यही सृष्टि का आरम्भ है। उस मूल विस्फोट की भड़क से जो शक्ति उत्पन्न हुई थी वह धीरे-धीरे कम तो होती जा रही है पर बनी अभी भी हुई है। प्रत्येक ग्रह नक्षत्र जहाँ अपनी धुरी पर चक्कर लगाता है, अयन कक्ष की यात्रा करता है वहाँ वह तेजी के साथ अपने सौर परिवार को साथ लिए एक दूसरे से दूर भी हटता जा रहा है।
इस बात को यों समझिये—एक रबड़ का गुब्बारा लिया जाए, उस पर स्याही के कुछ निशान लगा दिये जाय। तब उसमें हवा भरी जाए। गुब्बारा जैसे-जैसे फूलता जाएगा वे स्याही के निशान एक दूसरे से दूर होते जायेंगे। इसी प्रकार इस आदि विस्फोट की शक्ति से यह ब्रह्माण्ड अभी भी गुब्बारों की तरह फूलता ही जा रहा है और सारे ग्रह नक्षत्र उस अनन्त शून्य में अपने मूल केन्द्र से निरन्तर दूर अधिक दूर—भागते चले जा रहे हैं। पर जिस प्रकार बारूद का पटाखा फूटने पर उससे उचटे हुए टुकड़े थोड़ी देर बाद ठंडे होते, रुकने और गिरने लगते हैं, उसी प्रकार वह पाँच अरब वर्ष पहले विस्फोट की भड़क से उत्पन्न हुई शक्ति भी शिथिल होनी शुरू हो गई है। ग्रहों के आगे भागने की शक्ति काफी क्षीण हो गई है। आगे यह और भी कम होती जाएगी और एक दिन ऐसा आ जाएगा कि प्रत्येक ग्रह नक्षत्र की धुरी पर घूमने, अयन वृत्त में चक्कर काटने, एक दूसरे से अलग भागने की आदि की सभी गतियाँ शिथिल हो जायेंगी और वे अशक्त होकर गिर पड़ेंगे और एक केन्द्र पर आपस में टकरा कर फिर एकत्रित हो जायेंगे। इसके बाद वही विस्फोट वाला क्रम फिर चलेगा।
वैज्ञानिकों की प्रलय यही है। जबकि स्थूल विस्फोट की शक्ति समाप्त हो जाने से अशक्त ग्रह पुनः अपना अस्तित्व समाप्त करने के लिए गिर पड़ने और टूट फूट जाने के लिए विवश होंगे। वर्षों की सही गणना तो नहीं हो सकी कि वह प्रलय कितने दिन बाद होगी पर इतना निर्विवाद है कि मानव जाति के भाग्य का इस ब्रह्माण्ड के अस्तित्व का अंतिम निपटारा करने वाला वह दिन तेजी से निकट आ रहा है।
मूल विस्फोट से उठी हुई जिस चिनगारी ने पृथ्वी के रूप में अपना अस्तित्व प्रकट किया वह बहुत दिनों तक आग के गोले की तरह घूमती रही। धीरे-धीरे वह ठंडी हुई फलस्वरूप कितने ही प्रकार की गैसों का उद्भव हुआ। भारतीय ज्योतिषी उनकी संख्या 49 बताते हैं। 49 पवन प्रसिद्ध हैं। इन गैसों के कारण अजस्र वर्षा आरम्भ हुई। दीर्घ काल पश्चात् जब वह वर्षा रुकी तो बादलों को चीरकर सूर्य की किरणें पृथ्वी पर आई और उनके प्रभाव में वनस्पतियों तथा जीवों का प्रादुर्भाव हुआ। फिर भी भीतर की गर्मी पूर्णतया शान्त नहीं हुई। वह यदाकदा भूकम्पों के रूप में ज्वालामुखी फूटने एवं अग्नि रस (लावा) उगलने के रूप में बाहर आती रही। जिससे समय समय पर भयंकर दृश्य उपस्थित होते रहे। छोटे बड़े भूकम्प तो अभी भी आते रहते हैं। पर पृथ्वी के आरम्भ काल में भीतरी अग्नि ने भड़क कर भयंकर विस्फोट उपस्थित कर दिये। एक विस्फोट में पृथ्वी का एक टुकड़ा उड़ गया जो मंगल ग्रह के रूप में विचरण कर रहा है। मंगल को भूमि पुत्र माना जाता है। एक विस्फोट में एक टुकड़ा उड़ा कि वह चन्द्रमा बन गया। कहते हैं कि जहाँ आज समुद्र हैं वहाँ का भूखण्ड उड़कर चक्कर काटता हुआ गोल पिण्ड के रूप में परिणत हो गया और पृथ्वी की परिक्रमा करने वाला यही चन्द्रमा है। हमारी पृथ्वी जिस सौर मण्डल की सदस्या है उसमें बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, यूरेनस, नैपच्यून और प्लूटो यह आठ ग्रह और भी हैं। कुछ ग्रहों के साथ चन्द्रमा जैसे उपग्रह भी हैं। इन नौ ग्रहों के बीच में कई सौ अवात्तर ग्रह एवं कई हजार बहुत छोटे पिण्ड हैं। जिन्हें पुच्छल तारों या उल्काओं के रूप में हम कभी कभी देखते हैं। यह भी किसी ग्रह से उचटी हुई ऐसी ही सामग्री है जिसने कोई उल्लेखनीय स्थान नहीं बनाया है और यों ही छितराई हुई उड़ती फिरती है। हो सकता है इनमें से कुछ पुच्छल तारे या उल्काएं पृथ्वी में से फूटी हों।
यह विस्फोट का सिलसिला अब समाप्त हो गया हो तो बात नहीं है। पृथ्वी के गर्भ में भरी हुई अत्यंत तीव्र अग्नि कभी भी भड़क सकती है और जहाँ हम आप बैठे हैं इस भाग को उल्का, पुच्छल तारे, चन्द्रमा, मंगल आदि के रूप में परिणत कर सकती है। ऐसी सम्भावना यदि सार्थक हो जाए तो सारी पृथ्वी के लिये न सही उस उखड़े हुए भाग के लिये तो प्रलय ही होगी।
यों ब्रह्माण्ड में अगणित सूर्य भरे पड़े हैं, सबके अपने अपने ग्रह हैं और वे अपने ग्रह मण्डल को लिए एक अयन वृत्त में घूमते भी रहते हैं। इनमें से कोई सूर्य ठंडा पड़ जाए, विकृत हो जाए, भड़क उठे या सन्तुलन खो बैठे तो अन्य सौर मण्डलों से टकरा कर उन्हें चूर चूर कर सकता है और फिर यह क्रम आगे बढ़कर अन्य ग्रह नक्षत्रों से टकराने का क्रम जारी रखता हुआ यह प्रलय का आयोजन कर सकता है। अनन्त सौर मण्डलों में से कई सूर्य काफी बूढ़े हो चुके हैं उनकी जीवन लीला भी मनुष्य की ही भाँति समाप्त हो सकती है। और वह प्रलय जिसमें हमें भारी भय लगता है बात की बात में सामने आ खड़ी हो सकती है।
जिस सूर्य से हमारी पृथ्वी जीवन, गुरुत्वाकर्षण तथा अन्यान्य अनेकों तत्व प्राप्त करती है। वह सूर्य भी समय समय पर भड़कता रहता है। कई हजार वर्ष पूर्व सूर्य में एक भयंकर विस्फोट हुआ था जिसका भारी प्रभाव पृथ्वी पर पड़ा, वह अपने केन्द्र से विचलित हो गई और दीर्घ काल तक भयंकर हिम वर्षण होता रहा। यदि वह उस झटके से सम्भल न गई होती तो उस समय प्रलय हो गया होता और हम लोग आज उसकी चर्चा करने के लिये उपस्थित न होते। बीस हजार वर्ष पूर्व भी सूर्य ताप में अचानक कमी आ जाने से भी पृथ्वी को ऐसा ही झटका लगा था, तब उसकी भीतरी आग बाह्य स्तर ठंडा होने के दबाव से भड़क उठी थी और उस भीतर से ऊपर आये हुये अग्नि रस ने हिमालय की पर्वत माला, अरब की भूमि, काश्मीर एवं मारवाड़ के रेगिस्तान को जन्म दिया था, जब यह प्रदेश ऊपर उगले गये। तभी अन्य अनेकों सुसंस्कृत प्रदेश समुद्र के गर्भ में अदृश्य हो गये। आज जो भूखण्ड का नक्शा हमें दिखाई पड़ता है वह उसी 20 हजार वर्ष पूर्व वाली खण्ड प्रलय के बाद का है, इससे पूर्व इस पृथ्वी का नक्शा भिन्न ही था। आज का बहुत सारा स्थल उस समय पूर्ण जल मग्न था। यही उस समय का विस्फोट समुद्र तल आज थल के रूप में प्रस्तुत हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी ऐसे पाँच हिम युगों से गुजर चुकी है। कौन जाने कब छठा हिम युग आ जाए और उसे पार कर सकना पृथ्वी के लिए सम्भव हो भी सके या नहीं? सूर्य ऐसी फिर कोई गड़बड़ी कर बैठे तो बेचारी पृथ्वी को न जाने इसके इशारे मात्र से क्या क्या दुःख भोगने को प्रस्तुत होना पड़े।
ग्रह विज्ञान के ज्ञाताओं को ऐसे लक्षण भी दृष्टि गोचर हुए हैं जिनसे सूर्य के फट पड़ने की आशंका की जाती है। ऐसी स्थिति में हम सब पर क्या बीतेगी, इसकी कल्पना करना भी कँपा देने वाला है। सूर्य ही क्यों पृथ्वी भी जैसे-2 बूढ़ी होती जा रही है उसकी शक्ति गिरती जा रही है। ऋतुएँ परिवर्तित हो रही हैं। उत्पत्ति का क्रम शिथिल हो रहा है। अन्न की पैदावार घट रही है, तेल एवं खनिज पदार्थों का भी भण्डार धीरे-धीरे चुकता जा रहा है। धीरे-धीरे ऐसी समस्या भी उत्पन्न हो सकती है कि अन्न या दूसरे जीवनोपयोगी पदार्थों के अभाव में लोग भूखों मर जाएं, वह भी एक प्रकार की प्रलय होना ही है। चन्द्रमा के समान ठंडी हो जाने पर पृथ्वी पर भी कोई जीव न रह सकेगा। नाम के लिए पृथ्वी चन्द्रमा की भाँति बनी रहे पर उस पर जीवों का गुजारा न हो तो प्रलय के अतिरिक्त क्या कहा जाएगा? चन्द्रमा बेचारा प्रलय ही भोग रहा है।
पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन एवं सर्दी गर्मी की प्रक्रिया भी विचित्र रीति से परिवर्तित हो रही है। उत्तरी ध्रुव गरम होता चला जा रहा है और उधर की बर्फ तेजी से पिघल रही है। उधर दक्षिणी ध्रुव दिन दिन ठंडा होता चला जा रहा है जिससे बर्फ का बोझ बढ़ रहा है। पृथ्वी अपनी वर्तमान धुरी पर इन दोनों ध्रुवों का भार सन्तुलित होने के कारण ही घूम रही है। वह सन्तुलन बिगड़ जाए; एक ध्रुव हलका और दूसरा भारी हो जाए तो पृथ्वी की अपनी धुरी भी बदलनी पड़ेगी। उस स्थिति में आज जहाँ भूमध्य रेखा है वहाँ अगाध जल और हजारों फुट मोटी बर्फ से ढके ध्रुव होंगे और जहाँ आज ध्रुव है वहाँ खेती के लायक जमीन निकल आवेगी। उस स्थिति में भूमध्य रेखा के आस पास बसी हुई आबादी के लिए प्रलय ही होगी और उस नई निकली जमीन पर बसने के लिए बचे खुचे लोगों का जो प्रयत्न होगा वह भी आरम्भ में ही गिनती गिनने सीखने के समान एक नया ही प्रयत्न होगा।
आज जहाँ उत्तरी ध्रुव है वहाँ 10 हजार वर्ष पूर्व स्थल था और मनुष्य तथा पशु-पक्षी रहते थे। उन स्थलों में ऐसे पशु शरीर मिले हैं जिनके मुँह में घास है। बर्फ की ठण्डक में उनके शरीर इतने दिन तक भी सुरक्षित बने रहे हैं। मुँह में लगी घास में यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह हिम प्रलय यकायक हुआ। कोई प्राणी भागने या सम्भलने भी न पाया कि पलक मारते यह परिवर्तन हो गया। जल-थल में और थल-जल में परिवर्तित हो गया। गर्म प्रदेश हिम से लद गये और हिमाच्छादित प्रदेशों की भूमि ऊपर निकल आई। हटा हिम युग यदि फिर आ जाए तो पलक मारते मारते ऐसी ही प्रलय फिर सामने आ उपस्थित हो सकती है।
उत्तरी ध्रुव के आस पास लाखों वर्गमील क्षेत्र में फैली हुई 2000 से लेकर 9850 फुट तक मोटी बर्फ की तरह यदि पूरी तरह पिघलने लगी तो समुद्र की सतह 150 से 200 फुट तक ऊँची उठ जाएगी। अभी भी समुद्र जल दिन-दिन बढ़ रहा है और उसकी सतह बराबर ऊँची उठती चली आ रही है। जब यह 200 फुट ऊँची उठी तो कितने ही प्रदेशों को ले डूबेगी फिर बहुत थोड़ी पृथ्वी मनुष्य के रहने लायक बचेगी। उत्तर में गर्मी बढ़ जाने से हिमाचल आदि पहाड़ों की ऊँची चोटियों की जमी हुई बर्फ भी पिघल चुकेगी ऐसी दशा में जो अनेकों नदियाँ बहती हैं वे भी सुख चुकेंगी। केवल वर्षा जल मात्र पर नदी सरोवरों को निर्भर रहना होगा। तब जमीन के भीतर की पानी की सतह भी नीची हो जाएगी। ऐसी दशा में सिंचाई के लिये ही नहीं पीने के लिए जल भी दुर्लभ होगा। इस निर्जल व्रत को करता हुआ मनुष्य अपने अस्तित्व को आखिर कितने दिन बनाये रहेगा?
और यह शैतान का सपूत मनुष्य क्या कम नटखट है। वह भी इस काँच के महल में पत्थर फेंकने की, इस फूँस के झोंपड़े में दिया सलाई का खेल करने को मचल रहा है। एटम बमों, हाइड्रोजन बमों में जो विस्फोट एवं परीक्षण हो रहे हैं वे किसी दिन बारूद में डाली हुई चिनगारी का काम दे सकते हैं। ध्रुव प्रदेशों का सन्तुलन बिगड़ने में ऐसे कुछ ही बम पर्याप्त हैं। पृथ्वी पर फैली हुई और समुद्रतल में भरी हुई हाइड्रोजन गैस इन बमों के कारण ‘हेलियम गैस’ में बदल सकती है। तब पृथ्वी और समुद्र में से हजारों फुट ऊँची अग्नि ज्वाला उठेगी और उनकी लपटों में से इस पृथ्वी पर कुछ बच सकेगा इसकी आशा नहीं की जा सकती।
शास्त्रों में लिखा है कि यह पृथ्वी धर्म पर टिकी हुई है। जैसे जैसे धर्म घटता जाता है वैसे वैसे पृथ्वी भारी होती जाती है। जब यह पाप भार बहुत बढ़ जाता है तो शेषजी उसे अपने फन पर धारण नहीं कर पाते, वह गिर पड़ती है और टूट कर चूर-चूर हो जाती है। हम देखते हैं कि पाप का बोझ दिन दिन बढ़ रहा है। लोग धर्म से विमुख और पाप में प्रवृत्त होते जाते हैं। यह क्रम चलता रहा तो बेचारे शेषजी कब तक? और क्यों? इस पाप का भार वहन करेंगे। जिस दिन वे ऊब गये, समझिए बस उसी दिन ही प्रलय है। इस कच्ची मिट्टी की बनी धरती के चूर-चूर होने में लगेगी ही कितनी देर!
प्रलय की बात मखौल नहीं है, वह एक सुनिश्चित तथ्य है। आज के वैज्ञानिकों की तरह 11 वीं शताब्दी के भारतीय ज्योतिष विद्या के आचार्य भास्कराचार्य भी इस दुखदायी सम्भावना से चिन्तित थे। इसका उनने उल्लेख भी किया है। पर इससे क्या? प्रकृति का उदय और अस्त अवश्यंभावी है। आज नहीं तो कल वह होने ही वाला है। पर वह इतनी निकट नहीं है जितनी इटली के साधुओं ने समझा। प्रलय तो होगी ही—पर अभी कुछ देर है।
चार वेद घट शास्त्र में बारु मिली है दोय।
दुख दीने दुःख होत है, सुख दीने सुख होय॥1॥
ग्रन्थ पन्थ सब जगत के, बात बतावत ठीन।
राम हृदय, मन में दया, तन सेवा में लीन ॥2॥
तन मन धन दै कीजिये, निशि दिन पर उपकार।
यही सार नर देह में, वाद-विवाद बिसार॥3॥
चींटी से हस्ती तलक, जितने लघु गुरु देह।
सबकौं सुख देवो सदा, परम भक्ति है येह॥4॥
काम-क्रोध अरु लोभ मद, मिथ्या छल अभिमान।
इनसे मनकौ रोकिबो, साँचौ व्रत पहिचान॥5॥
श्वास-श्वास भूल नहीं, हरि का भव अरु प्रेम।
यही परम जिय जानिये, दैंत कुशल अरु क्षेम॥6॥
मान धाम धन नारि सुत, इन में जो न आसक्त।
परमहंस तिहिं जानिये, घर ही माहिं विरक्त ॥7॥
प्रिय भाषण पुनि नम्रता, आदर प्रीति विचार।
लज्जा क्षमा अयाचना, ये भूषण नर धार ॥8॥
शीश सफल संतनि नमें, हाथ सफल हरि सेब।
पाद सफल सत्संग गत, तब पावै कछु मेव ॥9॥
तनु पवत्र सेवा किए, धन पवित्र अरु दान।
मन पवित्र हरि भजन कर, होत त्रिविध कल्यान ॥10॥
धिक मानस तनु भक्ति बिन धिक मति बिना विवेक।
विद्या धिक निष्ठा बिना, धिक सुख हरि बिन टेक ॥11॥
विद्या बल धन रूप यश, कुल सुत बनिता मान।
सभी सुलभ संसार मे, दुर्लभ आतम ज्ञान ॥12॥
प्रिय भाषी शीतल हृदय, संयम सरल उदार।
जो जन ऐसौ जगत में, तासो सबको प्यार ॥13॥
पूरण भय जगदीश को, जाके मन में होय।
गुप्त प्रगट भीतर बहिर, पाप करत नहिं सोय ॥14॥
सत्य वचन आधीनता, परतिय मात समान।
इतने में हरि ना मिलें, तुलसीदास जमान॥15॥
राम नाम जपते रहो, जब लगि घट में प्रान।
कबहुँ दीनदयाल के, भनक परैगी कान॥16॥
दया धरम का मूल है, नरक मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोड़िये, जब लग घट में प्रान ॥17॥
(श्री परमात्मा स्वरूप शर्मा)
“होनहार बिरवान के चिकने चिकने पात” उर्दू की यह एक प्रसिद्ध कहावत है। इसका अभिप्राय यह है कि आगे जा कर जिन्हें महान बनना होता है, जिन के द्वारा बड़े कार्य सम्पन्न होने होते हैं, उनके लक्षण पहिले से ही दीखने आरम्भ हो जाते हैं। महापुरुषों के जीवन चरित्र अध्ययन करने से प्रतीत होता है कि जिस प्रकार के असाधारण कार्य उन्होंने अपने जीवन में किए, उनकी झलक बचपन में ही दिखाई दे गई थी। उदाहरण के लिए स्वामी शंकराचार्य ने 16 वर्ष की छोटी सी आयु में भारतवर्ष के बड़े-बड़े पंडितों को शास्त्रार्थ में हरा दिया था। शिवाजी ने 13 वर्ष की आयु में नोदण का किला जीता था। सन्त ज्ञानेश्वर ने 12 वर्ष की आयु में भगवद्गीता पर मराठी में ‘ज्ञानेश्वरी’ टीका लिखी थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 14 वर्ष की आयु में शेक्सपियर के ‘मैक्बेथ’ नामक नाटक का बंगला अनुवाद किया था। सिकन्दर ने 16 वर्ष की आयु में शेरोनिया का युद्ध जीता था। श्रीमती सरोजिनी नायडू ने 13 वर्ष की आयु में 13 सौ पंक्तियों की एक अंग्रेजी कविता लिखी थी। बंगाली कवयित्री श्रीमती तारु दत्त की आयु केवल 18 वर्ष की थी जिस समय वह अंग्रेजी में कविताएँ लिखकर प्रसिद्ध हो गई थी। रानी अहिल्याबाई की आयु राज काज हाथ में लेते समय 12 वर्ष की थी। श्री हरीन्द्र चट्टोपाध्याय ने चौदह वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध नाटक “अबू हसन” लिखा था।
परम आदरणीय श्री आचार्यजी के बाल्यकाल में कुछ ऐसे लक्षण उत्पन्न हो गए थे जो महानता की कसौटी पर खरे उतरते हैं। मुझे उनका बचपन का एक क्षुद्र साथी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, इसलिये उनके थोड़े से संस्मरण यहाँ व्यक्त करना चाहूँगा।
बहुत कम लोग जानते हैं कि श्री आचार्यजी कविता लिखना भी जानते हैं। यह उनके बाल्यावस्था का शौक है जो उन्होंने 12 वर्ष की आयु में शुरू कर दिया था। उस समय उनकी कविताएँ देहली और आगरा के दैनिक पत्रों में छपती रही थीं। ‘अखण्ड ज्योति’ में भी अनेकों अत्यन्त सुन्दर कविताएँ छपी हैं परन्तु वह उन्होंने अपने नाम से नहीं दी हैं। अखण्ड ज्योति आदि पत्रिकाओं में छपने के लिए आने वाली कविताएँ इस सुन्दर ढंग से ठीक कर देते थे कि कवि लोग आश्चर्य चकित रह जाते थे। वह यह समझते थे कि उन्होंने किसी कवि से यह दुरुस्ती करवा ली होगी। अनेकों तरुण कवियों को उनसे मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ है।
वास्तविक रुचि का विषय उनके लेख थे जो उन्होंने 13 वर्ष की आयु में लिखने आरम्भ कर दिये थे। घर में वह हर समय लिखते ही देखे जाते थे। उस समय के उनके लेखों में वह जीवन और शक्ति थी कि एक बार पढ़ने से पाठक के शरीर में एक बिजली सी दौड़ जाती थी। डायनेमो ही बिजली उत्पन्न कर सकता है। जिसके पास विचार, शक्ति और सामर्थ्य हो वही दूसरों में इनका संचार कर सकता है। उस समय के आपके लेखों को पढ़कर हजारों व्यक्ति भारत माता को अंग्रेजी पंजों से छुड़ाने के लिये युद्ध क्षेत्र में कूद पड़े थे। आपके हृदय में भी निरन्तर एक तड़पन रहा करती थी कि किस प्रकार से हमारा देश विदेशी शासन से मुक्त हो। एक बार तो वह घर वालों की नजर बचाकर अकेले आगरा की ओर चले थे। जिस बात का वह निश्चय कर लेते थे, उसे वह अवश्य करके ही छोड़ते थे चाहे उसमें उन्हें कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना क्यों न करना पड़े। उन दिनों कड़कती धूप थी। चूँकि घर से बिना किसी को सूचना दिये चले थे इसलिए न ही पैरों में जूते थे और न सर पर टोपी। जेब भी खाली और कहीं विश्राम करने के लिये बिस्तर भी न था। नीचे से बालू तप रही थी और ऊपर से सूर्य भगवान् अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। शरीर की जो हालत हो सकती है, उसका तो सहज अनुमान किया जा सकता है। उनके पैरों में छाले पड़ गये थे। इन कष्टों को सहन करते हुए भी वह आगरा पहुँचे और विदेशी राज्य के विरुद्ध हो रहे प्रचार कार्य में भाग लिया। इसी सम्बन्ध में वह कई बार जेल जा चुके हैं। जहाँ वह सनातन धर्म के प्राण पं. मदनमोहन जी मालवीय के साथ रहे हैं जो उनके दीक्षा गुरु भी हैं।
एक बार एक वृद्ध महिला किसी छूत के रोग से पीड़ित हो गई। वह जाति की भी छोटी थी। वैद्य लोग उसके शरीर को छूना भी पसन्द नहीं करते थे। आपको पता चला तो आपने उनकी परिचर्या करना आरम्भ की। वृद्धा ने कहा “बेटा! तुम ब्राह्मण हो। तुम्हें मुझे छूना उचित नहीं है। तुम्हारे घर वाले देख लेंगे तो मुझ पर बहुत नाराज होंगे कि मेरे लड़के से अपनी सेवा करवा रही है।” (स्मरण रहे श्री आचार्यजी के पिताजी आदि चार भाई हैं और उस समय गाँव के बड़े जमींदार थे। गाँव में उनका मकान बड़ी हवेली और किले की तरह है। मुख्य द्वार इतना बड़ा है कि जिसमें से हाथी आसानी से आ जा सकता है और वह इसी उद्देश्य से बनवाया भी गया था) आपने उत्तर दिया “मैं कोई बुरा कार्य नहीं कर रहा। उन्हें इस पवित्र कार्य को करते देखकर मुझसे प्रसन्न ही होना चाहिए। और फिर मेरा आपके प्रति मनुष्यता के नाते कर्तव्य है कि आपके दुख को अपना दुख समझूँ और तद्नुसार तुम्हारी सेवा करूं।” वीर! यह छूत का रोग है। यदि यह तुम्हें हो गया तो मैं कहीं की न रहूँगी “बुढ़िया ने गम्भीर स्वर में कहा। किसी की सेवा करते हुए यदि मुझे अपने शरीर की आहुति देनी पड़े तो, इसे मैं अपना सौभाग्य समझूँगा।”
बाल विवाह की प्रथा भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही है। श्री आचार्य जी का विवाह भी उनकी इच्छा के विरुद्ध छोटी आयु में कर दिया गया था। जिन महापुरुषों के सद्प्रयत्नों से हजारों और लाखों आत्माओं को मार्ग दर्शन प्राप्त होता हो, वह भला इन भौतिक बन्धनों में भला क्यों बँधा रहना पसन्द करेंगे? ऐसी महान आत्माओं में तो कुछ करने या मिटने के तूफान उठते रहते हैं। छोटी सी आयु में ही आपकी अन्तरात्मा में वैराग्य उत्पन्न हुआ। एक साथी को अपने विचारानुकूल बनाया और चल दिये घर से। जो कपड़े शरीर पर पहने हुए थे। उनके अतिरिक्त कोई वस्त्र उनके पास न था। केवल कुछ रुपये थे। देहली का टिकट ले लिया, दोनों मित्रों के घर वालों को पता चला तो चारों ओर ढूँढ़ने निकले। उनमें उनके एक रिश्तेदार उसी गाड़ी पर बैठ गये जिस पर वह दोनों बैठे थे। अगले स्टेशन पर देखभाल करने पर ढूँढ़ लिया। पूछा गया- कहाँ जा रहे हो। ‘हिमालय पर तप करने के लिये’ आचार्यजी का साफ उत्तर था। कोई धन के साधन तो तुम्हारे पास हैं नहीं खाओगे क्या? पुनः प्रश्न किया गया। “जो कुछ हमारे ऋषिगण खाया करते थे। महर्षि दुर्वासा दूव का सेवन करते थे। पिप्पलाद मुनि पीपल के फल पर ही शरीर का निर्वाह कर लेते थे। हमारे लिए भी गंगा का स्वच्छ जल और पेड़ों के पत्ते पर्याप्त हैं, उनसे पेट की अग्नि शान्त कर लिया करेंगे” छूटते ही कहा गया जैसे यह उनकी जबान पर ही रखा हो और पहिले से ही ऐसी योजना बना रखी हो। वहाँ जाने का तुम्हारा उद्देश्य क्या है? “तपोबल प्राप्त करना” “तपोबल प्राप्त करके क्या करोगे?” अज्ञानान्धकार में भटकती हुई आत्माओं को सन्मार्ग पर लाने का प्रयत्न करूंगा, दुखियों के दुखों में सहायक बनूँगा, विश्व का कल्याण करूंगा।”
एक बार श्री आचार्यजी ने देखा कि एक बहेलिये ने कुछ कबूतरों को पकड़ा है। उनका कोमल हृदय दया से द्रवित हो गया। उन्होंने बहेलिए से प्रार्थना की कि वह उनको छोड़ दे। उसने कहा—”मुझे तो इनके मूल्य से मतलब है। यदि तुम इसका मूल्य दे दो तो मैं इन्हें छोड़ दूँगा।” वह घर गए और बहेलिया द्वारा माँगे हुए दाम लेकर कबूतरों को छुड़वा दिया। इसी प्रकार गाय का मूल्य देकर एक बार उन्होंने एक गाय को कसाई से बचाया था।
जब मैं उनके जीवन पर एक दृष्टि डालता हूँ, उनके खोजपूर्ण ग्रन्थों को पढ़ता हूँ, उनके व्यक्तिगत जीवन का गम्भीर अध्ययन करता हूँ, सेवा और परमार्थ के आश्चर्य चकित कार्यों को सुनता हूँ तो मेरे मन में सहसा यह बात आती है कि “होनहार विरवा के चिकने चिकने पात” महापुरुषों की महानता बचपन से ही प्रतीत होने लगती है।
(पं. तुलसीराम शर्मा, वृन्दावन)
निरपेक्षं मुनिंशान्तं निर्वैरंस मदर्शनम्।
अनुब्रजाम्यहं नित्यं प्रयेयेत्यं ध्रिरेणुभिः॥
—श्री.भा. 11।14।16
भगवान् कृष्ण कहते हैं कि जिन्हें तृष्णाएँ नहीं सतातीं, जिन्हें किसी से बैर नहीं, जो सबको समता की दृष्टि से देखते हैं, जिनका चित्त शान्त रहता है। ऐसे श्रेष्ठ मानवों के मैं सदा पीछे-पीछे इसलिए घूमता रहता हूँ कि इनकी चरणरज से मैं स्वयं पवित्र हो जाऊँ।
नैष ज्ञान वताशक्य तपस्या नैवचेज्यया।
सम्प्राप्तुमिन्द्रियाणाँ तुसं य मेनैवशक्येत्॥
—म. भा. शाँ. अ. 280
परमात्मा उन्हें नहीं मिलता जो केवल शास्त्र चिंतन, तप, यज्ञ आदि तक ही सीमित हैं। आत्म संयम ही परमात्मा की प्राप्ति का प्रधान हेतु है।
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम्।
कर्मणा मनसावाचा ब्रह्मसम्पद्यतेतदा॥
-म.भा.शाँ.अ. 174।57
जिस स्थिति में मनुष्य पूर्ण निर्वैर हो जाता है मन, वचन और कर्म से किसी के प्रति अशुभ भाव नहीं सोचता है, उसी स्थिति में ब्रह्म की प्राप्ति संभव होती है।
तितिक्षया करुणया मैत्र्या चाखिल जन्तुषु।
समत्वे न च सर्वात्मा भगवान् सम्प्रसीदति॥
—श्री. भा. 4।11
भगवान को प्रसन्न करने के तीन ही उपाय हैं—
तितीक्षा—प्रतिकूलताओं का मुकाबला करना
करुणा—दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानना
मित्रता—सबके लिए आत्मीयता की भावना रखना।
विप्रान् स्वलाभ सन्तुष्टान् साधून् भूतसुहृत्तमान्।
निरहंकारिणः शान्तान्भमस्ये शिरसाऽसकृत्॥
—श्री. भा. 10।52।30
भगवान् कृष्ण कहते हैं कि मैं उन ब्रह्मगुण सम्पन्न व्यक्तियों को बार बार प्रणाम करता हूँ जो अहंकार रहित, सन्तोषी, शांतचित्त, सबको प्यार करने वाले और परमार्थ परायण हैं।
न ही दृशं सं वननं त्रिषुलोकेषुविद्यते।
दया मैत्री च भूतेषुदानं च मधुराचवाक्॥
—म. भा. आदि 87।12
दीन दुखियों के प्रति दया, सर्वसाधारण के प्रति उदारता और सज्जनों से मित्रता की वृत्ति रखने वाले व्यक्ति मनुष्यों की तो क्या बात, परमात्मा को वश में कर लेते हैं।
पर पत्नी पर दृव्य परहिंसासु मतिष्ट।
न करोति प्रमान् भूवतोष्यते तेन केशव॥
—भविष्य पुराण 1।112
भगवान् उन पर प्रसन्न रहते हैं जो पर स्त्री के प्रति, पराये धन के प्रति पवित्र भाव रखते हैं और किसी को नहीं सताते।
परापवादं पैशुन्य मनृतं च न भाषते।
अन्योद्वेगकरं चापि तोष्यहतेन केशवः॥
—विष्णु पु. 3।8
जो पराई निन्दा, चुगली, मिथ्या भाषण और कटु वचन बोलने की दुष्प्रवृत्तियों से बचे रहते हैं भगवान् उन पर प्रसन्न होते हैं।
तप्यन्ते लोक तापेन प्रायशः साधबोजनाः।
परमाराधनंतद्धि पुरुषस्या खिलात्मनः॥
-भा. 8। 7
भगवान की भक्ति का चिन्ह यह है कि दूसरों की हीन दशा देखकर हृदय करुणद् हो उठे। सज्जन सदा दूसरों के दुःख में पिघल जाते हैं।
यदन्येषाँहितं नस्यादात्मनः कर्म पौरुषम्।
अपत्र पेतवा येन न तत्कुर्यात् कथंच न॥
-महा. शा. अ. 150। 63
अपने जिस किसी कार्य या पुरुषार्थ से दूसरे का हित न होता हो और जिसके करने से समाज में लज्जित होना पड़े, वह कार्य कदापि न करना चाहिए।
यद्यप्य शीला नृपते प्राप्नुवन्ति श्रियं कचित्।
न भुँजते चिरंतात समूलाश्चिन साँतते॥
कुकर्मी लोग यदि लक्ष्मी प्राप्त भी करलें फिर भी वह लक्ष्मी का भोग अधिक दिन नहीं कर सकते। कुछ दिन बाद मूल से नष्ट हो जाते हैं।
न पण्डितो मतोराम बहु पुस्तकं धारणत।
परलोक भयं थस्य न अड़िपण्डितं वुधाः॥
-विष्णुधर्मोत्तर पु.खं. 2 अ. 51
बहुत पुस्तकें पढ़ने वाले को पण्डित नहीं कहते। पण्डित तो वह है जो परलोक का भय मन में भली प्रकार धारण करके कुमार्ग से बचते हुए सन्मार्ग पर ही चलता है।
निषेवते ब्रशस्तानि निन्दितानि नसेवते।
अनास्तिकः श्रद्दघान एतत्पण्डित लक्षणम॥
-म.भा.उघोग.अ. 33
किसी व्यक्ति के आस्तिक होने की दो ही परीक्षायें हैं- 1. दुष्कर्मों से बचना 2. सत्कर्मों में प्रवृत्त रहना।
वृत्तेन भवत्यार्यो न धनेन न विद्यया।
-म.भा. उ. अ. 90
मनुष्य की श्रेष्ठता धन या विद्या से नहीं- सदाचार में सन्निहित है।
बृत्तस्थ मपिचाण्डालं तं देवा ब्राह्मणं विदुः।
चरित्रवान् चाण्डाल को देवता लोग ब्राह्मण ही समझते हैं।
शूद्रोऽपि शील सम्पन्नो ब्राह्मणादधिको भवेत्।
ब्राह्मणो विगताचारः शूद्राद्धीन तरोभवेत्॥
-भ. पु. अ. 44
सदाचार सम्पन्न शूद्र भी ब्राह्मण से अधिक है दुराचारी ब्राह्मण शूद्र से गया हुआ है।
चतुर्वेदोपि दुवृर्न्त सशूद्रादतिरिच्यते।
-म.भा. वन. अ. 313
चारों वेदों का जानकार ब्राह्मण यदि दुराचारी है तो वह शूद्र से गया बीता है।
वृत्तं यत्नेन संरत्तयं ब्राह्मणेन विशेषतः।
अक्षीण वृत्तोन क्षीणो वृत्ततस्तुहतोहतः॥
-म.भा. वन. अ. 313
अपने चरित्र की भली प्रकार रक्षा करनी चाहिए और ब्राह्मण विशेष रूप से अपने चरित्र को अच्छा बनावे। जो सदाचार से गिरा नहीं, वह गिरा नहीं और जो व्यवहार में गिर गया, वह गिर गया।
यज्ञ दान तषाँसीह पुरुषस्य न भूतये।
भवन्ति यः सदाचार समुलूलंघ्य प्रवर्तते॥
मार्कण्डेय पु. अ. 31
जो पुरुष सदाचार को त्याग कर पापपूर्ण जीवन यापन करते हैं उनके लिए यज्ञ, दान, तप मंगल देने वाले नहीं होते।
शीलेनहि त्रयोलोकाः शक्याजेतुँ न संशयः।
नहि किंचिदसाध्यं वैलोके शीलवताँ भवेत्॥
-म. भा. शाँ. 124। 15
सच्चरित्रता से ही तीनों लोक जीते जाते हैं और इसमें संशय नहीं और संसार में शीलवानों को कुछ भी कार्य कठिन नहीं।
यद्यप्पशीला नृपते प्राप्नुवन्तिश्रियंकचित्।
न भुज्जते चिरंतात समूलाश्चन संतिते॥
-म. भा. शाँ. अ. 124
यद्यपि कभी-कभी दुराचारी पुरुष भी सम्पत्ति प्राप्त कर लेते हैं फिर भी अन्त में जड़ चेतन से नष्ट हो जाते हैं।
ओ सिद्ध तपस्वी ! जाग, जाग !
ओ सोते सैनिक ! जाग, जाग !
अपना सब गौरव खो बैठा, हत भाग्य हाय, यह देश आज,
पुरुषों ने वीरों का बाना, बहिनों ने खोई लोक-लाज,
आ पहुँची पतन-पराकाष्ठा, सब भाँति सभी डूबा समाज,
श्री-हीन हुई उर्वरा भूमि, गौरव-विहीन है शैल-राज!
मिट चले आगरा, इन्द्रप्रस्थ, हो चले भस्म काशी-प्रयाग!
ओ सिद्ध तपस्वी ! जाग, जाग !
ओ सोते सैनिक ! जाग, जाग !
भूला तू अपना पूर्व-रूप, बन गया आज ऐसा कठोर !
तेरे अंतर में उठी न उस बलिदान-भावना की हिलोर,
जिसके हित अगणित बालाएँ सहती रहतीं अपमान घोर,
जिससे प्रेरित होकर कितने ही युवा, वृद्ध, बच्चे, किशोर-
कारागारों में थे अथवा निर्वासित थे घरबार त्याग!
ओ सिद्ध तपस्वी ! जाग, जाग !
ओ सोते सैनिक ! जाग, जाग !
यदि स्वार्थ त्याग तू आज वीर ! हो गया कहीं परमार्थ-लीन,
सावेग तोड़ कर लौह-पाश, होंगे मानव बन्धन-विहीन !
फिर रह न सकेंगे जीवन में हो सत्वहीन, बन पराधीन,
गावेंगे सब स्वाधीन-गीत, होगा न किसी का मन मलीन!
अब दसों दिशाओं से केवल हो रहा ध्वनित यह एक राग-
ओ सिद्ध तपस्वी ! जाग, जाग !
ओ सोते सैनिक ! जाग, जाग !
राजेश. एम. ए.
*समाप्त *