(श्री सरस्वती कुमार “दीपक”)
कर्म की जगमग जले मशाल
एक दिए से जले दूसरा, सजे आरती थाल।
मानवता का यही धर्म है,
शान्ति, सुखों का यही मर्म है,
जो कि रमा करता जीवन में
वही भूमि का सत्य कर्म है,
हाथ साथ होकर कर देते, दूर दूर जंजाल।
कर्म सजाता सुन्दर खेती,
कुन्दन बन जाती है रेती,
अगर न हम मिट्टी से मिलते
मिट्टी कभी न महिमा देती,
किरणों की किन्नरियाँ पहना देती हैं वरमा
पर्वत झुक कर शीश झुकाते,
सागर, पग पखारने खाते,
हाथ बाँध कर बाँध नीर के
धरती का शृंगार सजाते-कन-कन में नव जीवन जागे, बजे कर्म करताल।
सेवाओं में, समझाने की सेवा सबसे बड़ी मानी गई है। ब्राह्मण ने इसी सेवा का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया इसलिए वह सब वर्णों में श्रेष्ठ सब का पूज्य माना गया। किसी को धन या कुछ वस्तुएँ दे देने का लाभ थोड़ी ही देर सुख पहुँचाता है, पर यदि कोई समझाने से समझ जाय, कुमार्ग छोड़कर सुमार्ग पर चलने लगे तो उसके सुखद सत्परिणामों की अत्यन्त विशाल सम्भावना बन जाती है।
सेवा का सबसे बड़ा अधिकारी हमारा अपना आपा-अपना मन ही है। वह भी वाल्मीकि से कम नहीं है। यदि हम नारद बन कर उसे समझ लेते है तो आज जो अपनी घटिया दर्जे की स्थिति है वह नहीं रहेगी। उससे निश्चित रूप से परिवर्तन होगा। महानता उपलब्ध होगी जिसके फलस्वरूप अपना अन्तःकरण सुख शान्ति से भर जाएगा, शत्रु मित्र बनेंगे असहयोग करने वाले सहयोगी बनेंगे उपेक्षा की दृष्टि से देखने वालों की आँखों से प्रेम और श्रद्धा चमकने लगेगी। अपना स्वभाव ऐसा मधुर होगा कि हर कोई संपर्क में आने की, लिपटने की कोशिश करेगा। कार्य ऐसे होंगे जिनसे अपना मान और महत्व सर्व साधारण की दृष्टि में दिन-रात बढ़ता ही चलेगा।
सेवा धर्म की उपयोगिता और आवश्यकता स्वीकार कर लेने के बाद यह प्रश्न उपस्थित होता है कि सेवा किस की करें”? मन में विश्व हित की, लोक कल्याण की, जनता जनार्दन की सेवा करने की भावना तो होनी चाहिए, पर उसका कार्य क्षेत्र एक नियत मर्यादा में ही होना चाहिए। अन्यथा बिना विवेक की सेवा का लाभ कुपात्र उठावेंगे अथवा ऊसर में बीज बोने की तरह शक्ति का अपव्यय होगा।
सेवा करते समय सत्पात्र का ध्यान रखना आवश्यक है। अपने से पिछड़े, समीपवर्ती, सम्बद्ध और विश्वास करने वालों की ही विचारात्मक सेवा हो सकना संभव है। ऐसे कितने ही व्यक्ति हो सकते हैं जो उपरोक्त कसौटियों पर ठीक उतरें। उन सब की भी यथा शक्ति सेवा आरम्भ करनी चाहिए पर अच्छा परीक्षण के लिए किसी एक को चुनें और उसके साथ पूरा श्रम करके यह देखें कि हमारी सेवा भावना और सेवा शक्ति कितनी सफल हो सकी? हमने अपने प्रयत्न का कितनी तत्परता के साथ किया और उसका क्या परिणाम निकला?
इस दृष्टि से हमारा अपना मन ही सेवा का सबसे बड़ा अधिकारी हो सकता है। जीवात्मा से वह छोटा भी है, संबद्ध भी है। समीप भी है और विश्वासपात्र भी है फिर उसी को क्यों न अपना सेवा भाजन बनावें”? यह सोचना ठीक नहीं कि उपकार तो दूसरों का होता है, अपना उपकार करना तो स्वार्थ होगा, उसे क्यों करें? बात ऐसी है कि-इस संसार में सभी अपने या सभी बिराने है। सब में अपना ही आत्मा समाया हुआ है इसलिए कोई भी बिराना नहीं, यदि बिराना ही मानते हो तो मन भी अपना कहाँ है? वही अपने कहने में कब चलता है? उसका व्यवहार भी मित्र जैसा कब है? दुष्ट साथी और विश्वासघाती नौकर की तरह वह हमें क्या कम दुःख देता है? जब अन्य दुष्टों को सुधारने की बात सोची जाती है तो अपने इस चौबीस घण्टे के साथी की ही उपेक्षा क्यों की जाय? जब दूसरों के बेटों को उपदेश देने की योजना है तो अपने बेटों को भी वैसे उपदेश करने में क्या दोष है? जब सारे नारी समाज को उद्धार करने की इच्छा हो तो अपनी पत्नी को नारी समाज से बाहर समझ कर उसकी उपेक्षा क्यों की जाय?
जीवन के उत्थान एवं पतन का केन्द्र मन है। यह मन जिधर चलता है, जिधर इच्छा ओर आकांक्षा करता है उधर ही उसकी अपनी एक दुनिया बन कर खड़ी हो जाती है। उसमें ऐसा अद्भुत आकर्षण एवं चुम्बकत्व है कि जिससे खिंचती हुई संसार की वैसी ही वस्तुएँ, घटनाएँ साधन सामग्री मानवी एवं देवी सहायता एकत्रित हो जाती है जैसी कि उसने इच्छा एवं कामना की थी। कल्पवृक्ष की उपमा मन की ही दी गई है। पृथ्वी का कल्पवृक्ष यही है। उसमें ईश्वर ने वह शक्ति विशाल परिमाण में भर दी है कि जैसा मनोरथ करे वैसे ही साधन जुट जाएँ और उसी पथ पर प्रगति होने लगे। मन को ही कामधेनु कहा गया है। वही कामना भी करता है और वही उनकी पूर्ति के साधन भी जुटा लेता है।
यदि सेवा ही करनी है तो इस कामधेनु की ही क्यों न करें, यदि पूजन और मंचन करना है तो इस कल्पवृक्ष का ही क्यों न करें जिससे हमारा अपना अभीष्ट सिद्ध हो और साथ ही संसार का भी सब प्रकार से कल्याण होने का योग बने। मन की अद्भुत शक्तियों का जितना-जितना पता चलता है उतना ही मनुष्य आश्चर्य चकित होता जाता है। मनोबल और उसकी इच्छा शक्ति के चमत्कार को जिनने देखा है, सुना है और समझा है वे जानते हैं कि हाड़ माँस का इस ठठरा में छिपा हुआ एक प्रचण्ड बेताल के रूप में यह मन ही बैठा रहता है। यह पैशाचिक कुकृत्य भी कर सकता है, स्वर्ग जैसे नन्दन बन की रचना कर सकता है और कुम्भकरण की तरह पड़ा-पड़ा जीवन क्षणों को बर्बाद भी करता रह सकता है। और देवताओं की पूजा फल दे न दे यह संदिग्ध है पर मन का देवता प्रत्यक्ष हैं। इसकी आराधना कभी निष्फल नहीं जाती। यह तुरन्त फल देता है। गाय की दिन में ठीक तरह सेवा करने से शाम को ही दूध की देगची भर देती है, यह मन की कामधेनु उससे भी अधिक उदार और निश्चित फलदायिनी है। गाय की सेवा कभी निष्फल भी हो सकती है पर इस कामधेनु का प्रत्युपकार तो निश्चित है।
यदि हम अपने आप की अपने मन की सेवा करने लगें तो सेवा का सत्परिणाम देखने के लिए परलोक की, अगले जन्म की प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी वरन नकद धर्म की तरह “इस हाथ दे उस हाथ ले” की उक्ति प्रत्यक्ष चरितार्थ होती दिखाई देगी। संसार के महापुरुषों के जीवन पर सूक्ष्म दृष्टि डालने से पता चलता है कि परिस्थितियों साधनों एवं योग्यताओं की दृष्टि से वे आरम्भ में बहुत पिछड़े हुए ही थे। उनकी जन्म जाति या साँसारिक स्थिति लगभग वैसी ही थी जैसी औसत दर्जे के लोगों की होती है। उनमें एक ही विशेषता थी-मनोबल की प्रखरता” इसी बल के आधार पर उन्होंने इतने बड़े कार्य सम्पन्न कर डाले जिन्हें देखने से हैरत होती है।
इन पंक्तियों में विश्व की उन असंख्य घटनाओं के उल्लेख करने का अवसर नहीं है जिनमें साधारण स्थिति के व्यक्तियों ने अपने प्रकट मनोबल और प्रबल पुरुषार्थ के बल पर अनहोनी जैसी बातों को संभव करके दिखा दिया। पुराणों और इतिहासों के पन्ने-पन्ने पर ऐसी गाथाएँ हमें पढ़ने को मिल सकती हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि व्यक्ति की महानता उसे उपलब्ध साधनों या परिस्थितियों में नहीं वरन् उसके मनोबल में सन्निहित है। जब जिसका मनोबल जितनी मात्रा में विकसित हुआ है तब उसने अपने क्षेत्र में उतनी ही अद्भुत सफलताएँ प्राप्त करके अपने उन साथियों को आश्चर्य में डाला है जो परिस्थितियों का रोना रोकर अपनी काहिली पर पर्दा डालने की कोशिश किया करते हैं।
मन को कल्पवृक्ष कहा गया है और इस पर चार फल-धर्म अर्थ काम मोक्ष-लगते हैं, ऐसा बताया गया है। दूसरों की सेवा करने से केवल धर्म ही प्राप्त हो सकता है, पर अपनी, अपने मन की सेवा करने से जब वह सुधर जाता है, सन्मार्ग पर चलने लगता है तो धर्म लाभ के अनेकों अवसर तो प्राप्त होते ही हैं साथ ही जीवन की प्रत्येक दिशा में उन्नति एवं सफलता का द्वार खुल जाता है और सब ओर से आनन्द तथा प्रसन्नता-जनक परिस्थितियाँ उपजती दिखाई देने लगती हैं। ऐसी स्थिति में बुद्धिमत्ता इसी में दिखाई पड़ती है कि पहले अपनी सेवा करने के लिए ही कटिबद्ध हुआ जाय।
यदि किसी का लक्ष पुण्य परमार्थ नहीं है, केवल स्वार्थ साधन ही अभीष्ट है तो उसे सेवाधर्म अरुचिकर एवं हानिकारक दिखाई देगा। अपनी शक्ति उसमें खर्च करते समय उसे संकोच एवं दुःख लगेगा पर अपनी सेवा करने में उसे वैसी कठिनाई न होगी। भौतिक जीवन की उन्नति के लिए मन का सधा हुआ होना आवश्यक है। यदि वह अव्यवस्थित असंयमित है तो कोई लौकिक सफलता भी न मिल सकेगी। इसलिए लौकिक सुख, सम्पत्ति चाहने वाले व्यक्ति को भी यह लाभदायक प्रतीत होगा कि मनोनिग्रह की दिशा में, आत्म निर्माण की दिशा में कुछ प्रयत्न किया जाय।
जिसका मन बेकाबू है उसका साँसारिक जीवन असफल एवं दुःखमय ही रहता है। चटोरी जीभ वाला व्यक्ति जिसका मन हर घड़ी स्वादिष्ट पदार्थों को अधिक मात्रा में खाने के लिए ललचाता रहता, वह अपनी इस बुरी आदत के कारण ही अपनी पाचनशक्ति को खो बैठता है, और पेट खराब हो जाने पर नाना प्रकार के रोग उसे घेर लेते हैं। काम वासना की लिप्सा जिसके मन पर चढ़ी रहती है वह सोते जागते अपने जीवन रस को वे हिसाब निचोड़ता रहता है और अन्त में भीतर से खोखला होकर असमय में ही जरा जीर्णता और अकालमृत्यु का ग्रास बन जाता है। जिसका मन पढ़ने में नहीं लगता वह विद्यार्थी भला किस प्रकार विद्वान् हो सकेगा? जिस व्यापारी का चित्त अपने व्यवसाय की बारीकियों पर नहीं जमता, उछला उछला फिरता है, उससे पग-पग पर भूलें होती रहेंगी, और असावधानी की, विस्मृति की उपेक्षा की मात्रा बढ़ते रहने से घाटे की दिशा में ही उसका कारोबार चलेगा।
क्या कोई वैज्ञानिक ऐसा हुआ है जिसमें तन्मयता का, चित्त की एकाग्रता का गुण न रहा हो? यदि उसमें ध्यान मग्न होने की विशेषता न रही होती तो वह कदापि कोई महत्त्वपूर्ण खोज न कर सका होता। इंजीनियर, डाक्टर, कलाकार, चित्रकार कवि, साहित्यिक जो कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं उसके पीछे उनका मनोयोग ही काम करता है। राजनीतिज्ञ, दार्शनिक लोकनायक, सेनापति आदि महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियों का भार वहन करने वाले वे ही लोग होते हैं, जिनमें दूरदर्शिता होती है, समस्या के हर पहलू को बारी बारीकी से सोच समझ सकते है और यह सब मन के संयमित होने पर ही सम्भव है। ऐसे मनुष्य जिनका चित्त किसी काम पर नहीं जमता, उखड़ा-उखड़ा रहता है कभी किसी काम में सफल नहीं हो पाते, यहाँ तक कि चोरी उठाईगीरी, बेईमानी, व्यभिचार में भी वे कृतकार्य नहीं होते, वहाँ भी पकड़े जाते और बदनामी उठाते हैं।
योग साधना तो महर्षि पतंजलि के शब्दों में “चित्त वृत्तियों का निरोध “मात्र” ही है। योग साधना का सारा कर्मकाण्ड और विधि विधान चित्त निरोध के लिए ही है। ध्यान की तन्मयता से ही भगवान के दर्शन होते हैं। विषय विकारों की ओर से, माया मोह की ओर से चित्त का हटा लेना ही मोक्ष है। मूर्तिपूजा, कीर्तन, भजन पूजन का उद्देश्य भी मन की एकाग्रता ही है। सारी साधनाएँ मन को साधने के लिए ही हैं। भगवान के लिए क्या साधना करनी? वह तो पहले से ही प्राप्त हैं, रोम-रोम में रमा हैं, अनन्त वात्सल्य और असीम करुणा की वर्षा करता हुआ अपना वरद् हस्त पहले से ही हमारे शिर पर रखे हुए है, उसे प्राप्त करने में क्या कठिनाई है। कठिनाई तो मन के कुसंस्कारों की ही है जो आत्मा और परमात्मा के बीच में चट्टान बन कर अड़ा हुआ है। यदि यह कृपा करके अपनी अड़ से पीछे हट जाय तो बस अध्यात्म की सारी सिद्धि करतलगत ही है। मोक्ष और ब्रह्म निर्वाण प्राप्त हुआ हो रखा है। मन के काबू में आते ही सारी सिद्धियाँ मुट्ठी में ही आ जाती है।
मन सचमुच कल्पवृक्ष है। इसकी सेवा करके हम असीम लाभ, और अनन्त पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही इससे सध सकते हैं। लौकिक सुख और पारलौकिक शान्ति की कुँजी हाथ आ सकती है। पर यदि उसे साधा न गया तो वह शैतान की तरह हमारे शिर पर सवार होकर नाना प्रकार के कुकृत्य कराता है, विविध विधि नाच नचाता है। यदि हम इसे वश में नहीं करते तो इसके वश में हमें होना पड़ता है। कहते हैं कि-भूत लोगों को डराता और सताता रहता है पर, यदि कोई तांत्रिक उसे वश में कर लेता है तो फिर उसकी इच्छानुसार नाचता है, जो कुछ करना चाहता है करता है और जो मंगाया जाता है लाकर देता है। सचमुच का भूत किसी को देखना हो तो वह अपने मन के रूप में देख सकता है। असंयमी और मन किसी प्रबल शत्रु से-बेताल ब्रह्म-राक्षस से कम नहीं है, पर यदि उसे साध लिया जाय तो वही परम मित्र बन जाता है, देवता की तरह सहायक सिद्ध होता है।
हजारों मनुष्यों की थोड़ी-थोड़ी सेवा कर देने पर उतना लोकहित नहीं हो सकता जितना अकेले अपने को साध लेने और सुधार लेने से हो सकता है।
इसलिए सेवा का सबसे बड़ा पात्र एवं अधिक हमारा अपना आपा ही है। इसकी सेवा कर समस्त प्राणियों की-सारे विश्व ब्रह्माण्ड की सेवा कर सकते हैं। सेवाधर्म का आरम्भ करने के लिए प्रारंभिक सीढ़ी यही है। अपनी सेवा में की-विश्व मानव की सेवा सन्निहित है।
पार्थिव जगत में मानव को जो सार्वभौमता प्राप्त हुई है, उसे आत्मा की शक्ति के द्वारा ही नियन्त्रित किया जा सकता है। शुष्क विज्ञान मानवीय मूल्य की सहायता के समाज का कल्याण नहीं कर सकता। विज्ञान सार्थक तभी हो सकता है जब उसका प्रयोग करने वाले उच्च आदर्शों द्वारा प्रेरित हों। दूसरे शब्दों में, जैसे मनुज जीवन में समृद्ध हुआ है वैसे ही जब तक वह अपने भीतर के जीवन को भी संवर्धित और विकसित नहीं कर लेता तब तक पृथ्वी पर एकता, सहृदयता, प्रेम और सौंदर्य के स्वर्ग की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। यह केवल आध्यात्मिकता के विकास से ही हो सकती है। पाश्चात्य लोग इस सत्य का अनुभव करने लगे हैं, कि उनकी चेतना इतनी बहिर्मुखी हो गई है आत्मा, भगवान, अमृतत्व पर उन्हें विश्वास न हो पाता। लेकिन जब तक मनुष्य भगवान शासन को स्वीकार नहीं करता, उसके जीवन में मधु बसन्त की बयार नहीं बह सकती।
-श्री अर्रा
(श्री. सत्यभक्त जी)
उद्यतसह सहस आज्ञनिष्ट
देदिष्ट इन्द्र इन्द्रियाणि विश्वा।
प्राचोदयत्सुदुघा दव्रे अन्तविं,
ज्योतिषा संववृत्वत्तमोऽवः॥
(ऋक् 5-31-3)
“उषा के प्रकाश से जब आदित्य का प्रकाश बढ़ जाता है तब इन्द्र उपासकों को सभी धन देते हैं। वे छिपाने वाले पर्वतों के बीच से दूध देने वाली गायों को बाहर लाते हैं और अपने तेज से सर्वथा व्याप्त अन्धकार को हटा देते हैं।”
इस संसार में समस्त कार्य शक्ति अथवा बल द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। लौकिक-पारलौकिक स्वार्थ-परमार्थ साधारण विशेष कैसा भी कार्य क्यों न हो उसके लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। शक्ति अनेक प्रकार की होती है, पर अधिकांश लोग शक्ति का अर्थ शारीरिक बल से ही लेते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि अनेक साँसारिक विषयों में सफलता प्राप्त करने में शारीरिक बल ही प्रधान सिद्ध होता है, पर तो भी बुद्धिमानों ने ज्ञान-बल को सर्वश्रेष्ठ माना है। संसार में पाये जाने वाले प्राणियों में हाथी सबसे बलवान है, पर मनुष्य बुद्धिबल से उसे शीघ्र ही वशीभूत कर लेता है।
ज्ञान भी अनेक प्रकार का है, वर्तमान समय में सार में सबसे बड़ा दर्जा “विज्ञान” का माना जाता है। विज्ञान ने संसार की कायापलट कर दी है और सब प्रकार की शक्तियों को अपने अधीन कर लिया है। कुछ समय पहले लड़ाई में शारीरिक बल प्रधान माना जाता था। युद्ध क्षेत्र में जो जोरों से तलवार, भाला, गदा आदि शस्त्रों का उपयोग कर सकता था, पर अब विज्ञान ने एक के बाद एक नये-नये आविष्कार करके ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि लाखों-करोड़ों हट्टे-कट्टे और पूर्ण रूप से साहसी व्यक्तियों को दो-चार आदमी मिनटों में मार सकते हैं।
पर विज्ञान के इस हद पर पहुँच जाने पर भी मनुष्य में सुरक्षित रहने की भावना बढ़ी नहीं है, वरन् वह पहले से भी कहीं अधिक भयभीत अवस्था को प्राप्त हो गया है। पहले तो जिनके पास पर्याप्त धन होता था, शारीरिक बल होता था अथवा जिनके हाथ में दृढ़ राजनैतिक शक्ति होती थी, वे अपने को थोड़े बहुत समय के लिये सुरक्षित समझ भी लेते थे, पर आज तो छोटे बड़े सब एक ही भय में ग्रस्त है, सभी का जीवन संशय में पड़ा हुआ है।
यह दशा देखकर लोग स्वभावतः इस प्राचीन सत्य को अनुभव करने लगे हैं कि जिस प्रकार सब प्रकार के बलों में ज्ञान-बल बड़ा है उसी प्रकार समस्त ज्ञान बलों में आत्म-ज्ञान रूपी बल सर्वोच्च है। वर्तमान समय में समस्त संसार एटम और हाइड्रोजन बमों के भय से व्याकुल है, इसे देखकर सन्तजन उपदेश दे रहें है कि आत्म-बल अणु-शक्ति से भी बहुत बढ़कर है, अगर तुम इस भय से बचना चाहते हो तो आत्मबल का सहारा लो और उसी को प्राप्त करने को प्रयत्न करो। यह तो स्पष्ट है कि सब प्रकार के बलों का स्त्रोत एक वही परमात्मा है, जिस प्रकार सूर्योदय से अन्धकार मिट जाता है, सर्वत्र प्रकाश फैल जाता है और अँधेरे में जो अनेक प्रकार के भय लगे रहते हैं वे भी नष्ट हो जाते है, इसी प्रकार परमात्मा का बल प्राप्त होने पर सब प्रकार के डरो का अन्त हो जाता है और मनुष्य समझ लेता है कि मैं आत्म स्वरूप हूँ और संसार की कोई शक्ति मेरा हनन नहीं कर सकती।
जिस प्रकार आत्म-ज्ञान से सब प्रकार की हानि और भय की निवृत्ति होती है उसी प्रकार सब प्रकार के लाभ भी, चाहे वे लौकिक हों या परलौकिक, आत्म ज्ञान की सहायता से ही मिलते है। अज्ञानी अथवा अदूरदर्शी को अगर लौकिक लाभ हो भी जाता हे तो वह उसका कल्याण करने के बजाय अकल्याणकारी ही सिद्ध होता है। वास्तविक सुख और शान्ति का लाभ तो तभी मिलना संभव है जब हम ईश्वर की कृपा से अपने हृदय को आलोकित करके इसीलिये इस मंत्र में कहा गया है कि जब मनुष्य का हृदय आत्म-ज्ञान रूपी प्रकाश (बल से भर जाता है तब इन्द्र (परमात्मा) अन्धकार को मिटाकर दूध देने वाली गायों (गुप्त शक्तियों और कल्याणकारी सामग्रियों) को उपासकों को प्रदान करते हैं। यह ख्याल करना कि आत्म-ज्ञान तो केवल गृह त्यागियों, साधुओं, संन्यासियों से सम्बन्ध रखने वाली चीज है, एक बहुत बड़ी गलती है। गीता में भगवान ने कहा है कि ‘नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते”। संसार में ज्ञान से बढ़कर पवित्र वस्तु और कोई नहीं है और सच्चा सुख, लाभ, कल्याण पवित्र और शुद्ध अवस्था में ही संभव है। अपवित्र अशुद्ध, गन्दे विचारों वाला व्यक्ति अगर भोग विलास की सामग्री को पाकर अपने को सुखी भी समझ ले, तो वह सुख परिणाम में और भी बड़े दुःख, कष्ट का कारण सिद्ध होगा। ऐसा व्यक्ति किसी उपाय से धन-सम्पत्ति पा जाने पर भी तरह-तरह के दुर्व्यसनों का शिकार हो जाएगा जिससे कालान्तर में उस सम्पत्ति से ही नहीं वरन् अपने शरीर और स्वास्थ्य से भी हाथ धो बैठेगा। अथवा वह अनुचित लोभः लालच, धन लिप्सा में ग्रसित होकर सदैव अधिकाधिक धन की तृष्णा में फँसा रहेगा और उस धन से किसी प्रकार का सुख, आनन्द प्राप्त करने के बजाय उसकी रक्षा, नष्ट हो जाने की चिन्ता में ही समस्त जीवन व्यतीत कर देगा। यह भी न हो तो सम्भव है कि वह धन और वैभव के कारण अहंकार से ऐसा मत्त हो जाय कि दूसरे लोगों को नगण्य समझने लगे, उनके साथ दुर्व्यवहार करने लगे, अन्याय और अत्याचार पर उतारू हो जाय और इस प्रकार बदनाम होकर अन्य लोगों को अपना शत्रु, अहित चिन्तक बना ले। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि केवल धन, वैभव या सामग्री प्राप्त हो जाने से ही मनुष्य कदापि सुखी नहीं हो सकता। उसके लिये आवश्यक है कि हृदय के ऊपर दुर्गुणों का जो आवरण पड़ा है उसे दूर करके ईश्वरीय ज्ञान और सद्गुणों द्वारा उसके अन्धकार को दूर किया जाय और आत्म-ज्ञान के प्रकाश में आगे बढ़ा जाय।
दुनियाँ में ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी कम नहीं है जो ज्ञान की आवश्यकता और महत्ता को तो स्वीकार करते है, पर उसके लिये परमात्मा का आश्रय लेना अथवा प्रार्थना करना अनावश्यक समझते है। परिश्रमी शिक्षा से प्रभावित और नास्तिकता की तरफ झुके हुए व्यक्ति प्रायः कहा करते है कि आधुनिक विज्ञान ने ईश्वर की आवश्यकता को ही मिटा दिया है। ऐसे लोगों को अपने ज्ञान पर विशेष अहंकार होता है और वे समझते है कि हम यंत्रों द्वारा संसार में प्रत्येक काम को सिद्ध कर सकते है। इसमें सन्देह नहीं कि आज विज्ञान ने बहुसंख्यक मानवीय कार्यों की यंत्रों द्वारा और भी उत्तमता पूर्वक पूरा करके दिखा दिया हे और चन्द्रमा, मंगल आदि दूसरे लोकों तक पहुँचने की कल्पना को भी संभव कर दिया है, पर इनसे मनुष्यों का कल्याण होता दृष्टिगोचर नहीं होता। उल्टा इन आविष्कारों से विनाश की महा भयंकर संभावना पैदा हो गई है। ईश्वरीय ज्ञान एवं आत्म ज्ञान की विशेषता यही है कि उससे अशुभ नहीं वरन् शुभ परिणाम ही उत्पन्न होते है।
(श्री स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज)
आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर होने के इच्छुक साधक के लिये अपने आपको नियम पर दृढ़ रखने तथा नियमित जप, तप, उपासना साधना करते रहना ब्रह्म प्राप्ति के लिए आवश्यक ही नहीं प्रथम शर्त भी है। बिना साधना कि सिद्धि नहीं मिलती है। एक परीक्षा में सफल होने के लिए विद्यार्थी को कितना श्रम करना पड़ता है। एक मोती को समुद्र तल से निकालने के लिए किस प्रकार जान को हथेली पर रखकर समुद्र की गहराई में उतरना पड़ता है, किसी मंजिल तक पहुँचने में राही को कितना श्रम करना पड़ता है। साध्य तक पहुँचने के लिए साधना आवश्यक है। उसी प्रकार ब्रह्म साक्षात्कार के लिए पूज, उपासना, दैनिक कृत्य भी अनिवार्य है। इस प्राथमिक सोपान पर चलकर ही आगे बढ़ना सम्भव है।
किन्तु बहुधा साधना उपासना करते हुए भी लक्ष्य की प्राप्ति क्यों नहीं होती? समस्त जीवन चला जाता है, इतना ही नहीं अनेकों जन्म इसमें लग जाते है फिर भी उस परब्रह्म की अनुभूति प्राप्त नहीं होती? अशान्तियों और उद्वेगों से छुटकारा भी नहीं मिलता। इस असफलता का कारण क्या है यह प्रश्न विचारणीय है।
साधना के दो अंग हैं- चेष्टा और दूसरा त्याग। किसी की प्राप्ति के लिए चेष्टा करनी पड़ती है साथ ही उसके लिए त्याग भी? नदी अपनी सम्पूर्ण चेष्टा से विराट सागर की ओर धावमान होती है उसमें एकरस एक्य की प्राप्ति के लिए। किन्तु उसकी चेष्टा में वह सम्पूर्ण भाव भी परिलक्षित होता है जिसमें वह अपने आप को पद-पद पर विराट के लिए निवेदन करती हुई आगे बढ़ती है। अपनी वर्तमान स्थिति को उसी के लिए क्षण-क्षण में उत्सर्ग करती हैं।
आध्यात्मिक साधना का पथ भी ठीक इसी प्रकार है। जिस प्रकार पूजा, उपासना, साधना, स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान को विशुद्ध एवं शक्ति को सचेष्ट रखना पड़ता है दूसरी ओर सम्पूर्ण भाव से अपने आपको ईश्वर की इच्छा पर उसी के लिए से निवेदित करना पड़ता है। जब साँसारिक तुच्छ लाभों के लिए कुछ न कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है तो उस समग्र-अखण्ड, विश्वात्मा, ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए अपने आपको सम्पूर्ण रूपेण निवेदन करना ही पड़ेगा पतंगा अपने आपको सम्पूर्ण भाव से दीपक को अर्पण कर देता है और तभी वह लौ में मिल जाता है? अपने प्रियतम के मिलन के लिए उसे समग्र भाव से अपने आपको अर्पण करना पड़ता है।
पूजा, उपासना, नियम, साधना के पथ पर दृढ़ता रखकर बढ़ने वाले अनेकों साधक मिला जायेंगे जो कठोरतम चेष्टाएँ जारी रखते है किन्तु अपने आपका समर्पण करने वाले साधक बहुत ही कम दिखाई देते है। यह ही ब्रह्म साक्षात्कार के पथ का रहस्य है। अक्सर मनुष्य उस प्रियतम, परमात्मा के मिलन पथ में भी कृपणता करता है और अपने आपको स्वयं के हाथों में ही रखना चाहता है। दूसरों के-उस विराट के हाथों में नहीं देना चाहता? कठोर साधनाओं और व्रत पालन में वह प्राण पण चेष्टा जारी रखता है अपनी साधना का हिसाब लगाकर एक विशेष अभिमान पूर्ण आनन्द के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का मूल्यांकन करता है।
तुच्छ मनुष्य केवल अपनी शक्ति, सामर्थ्य साधना के बल पर उस विश्वात्मा के साथ व्यापार नहीं कर सकता। उस अनन्त अखण्ड, सर्वव्यापक को नहीं जान सकता और न उसकी अनुभूति हो प्राप्त कर सकता हैं इनके साथ-साथ उसे अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसके लिए निवेदित, उत्सर्ग करना ही पड़ेगा। बिना इसके सिद्धि प्राप्त नहीं होगी और तभी प्रभु मिलन का पथ सहज सुगम और लघु बन जायेगा। उसकी दिव्य अनुभूति, हमारे हृदय में उसी तरह आलोकित हो उठेगी जैसे प्रातः होते ही सूर्य की प्रकाश किरणों से विश्व भुवन प्रकाशित हो उठता है। उसके लिए तब कोई कठिन साधना नहीं करनी पड़ती है।
ब्रह्म प्राप्ति के लिए हमें अपने आपको देना होगा। उन्होंने तो अपने आपको दे डाला। सर्वव्यापी प्रभु सर्वदा सर्वत्र ही हमारे भीतर बाहर व्याप्त है। हमारे अन्दर अभाव है, हम संकीर्णता का बना पहने हुए है, मैं और ममत्व की रंगीन ऐनक लगाये हुए हैं इसी लिए उनके पुण्य मिलन से हम दूर है। हमने नाना प्रकार के स्वार्थ अहंकार, क्षुद्रता के कठिनतम घेरों में अपने आपको आबद्ध कर लिया है जहाँ अपनी स्वतन्त्र सत्त को देखते है, किन्तु प्रभु मिलन के मार्ग को यही तो कठिन बनाये हुए है और हमें उस की अनुभूति से वंचित रखते है। इसी कमी के कारण हम कठिन साधनाएँ करते हुए भी देर तक विश्वात्मा, ब्रह्म की झलक नहीं पाते।
उपासना, साधना पूजा, आदि का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर को प्राप्त करना ही नहीं है वरन अपने आपको उनके लिए समर्पित करने के लिए भी है। दिन प्रतिदिन भक्ति द्वारा, पूजा उपासना सेवादि द्वारा अपने आपको उस ब्रह्म में बाधा हीन रूप से व्याप्त कर देना ही उपासना आदि का सच्चा रूप है और ऐसी ही पूजा से प्रभु को प्राप्त करने की चिर इच्छापूर्ण होती हैं।
उपनिषद् में कहा है कि ‘ब्रह्म तल्लक्षमुच्यते” ब्रह्म ही उसका लक्ष है। तो फिर लक्ष को अपनी ओर नहीं खींचा जा सकता, अपने आपको ही लक्ष्य तक पहुँचाना होता है। जिस प्रकार निशाना लगाकर तीर चलाने पर वह सम्पूर्ण रूपेण अपने लक्ष्य के प्रति अपने आपको अर्पण करता है उसी प्रकार ब्रह्म प्राप्ति के लिए उसी में सर्वस्व अर्पण करके तन्मय हो जाना पड़ेगा। सकल अवस्थाओं में सकल कार्यों उपलब्धि एवं स्थितियों में वही एक मात्र भाव बनाये रखना पड़ेगा।
प्रभु से हमारी दूरी, दुःख, वेदना, क्लान्ति आदि इसलिए है कि हम अपने अहं को मिटा नहीं पात। यह अहं ही हमारे और उनके बीच में दीवार बन बैठा हे जो अपनी स्वतंत्र सत्ता शक्ति सामर्थ्य से उस अखण्ड, सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान को पाने की मिथ्या कल्पना करता है और हमें उनसे दूर रखता हैं इसलिए अहंकार को उसके उच्च शिखर से उतार कर निम्न स्थिति में ले जाना होगा। सकल विश्व के साथ समानता एवं एकता रखकर अपने आपको सब के पीछे ले जाकर खड़ा करना होगा सबसे नीचे बैठना होगा। हम अकिंचनता और दीनता में प्रभु की कृपा दृष्टि पाकर सदा के लिए उनके बन जायेगा। जब हम सब प्राणिमात्र के साथ बैठे है एकता स्थापित करते हैं अपने अहंकार को कम करके परमात्मा के हाथों में अपना समर्पण करते हैं तभी हम उस ब्रह्म की गोद में बैठने के अधिकारी बनते है।
ब्रह्म साक्षात्कार के लिए अपने ज्ञान की विशुद्धि शक्ति के सचेष्टता के साथ-साथ अपना आत्म संपर्क उस परम सत्ता में करना होगा। अहंकार को मारना होगा। अपने को उस प्रभु के हृदय देश में स्थापित कर उसी की इच्छा से सर्व क्रिया कलाप जारी रखना होगा। अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसमें निवेदित करना होगा। अहंकार, स्वार्थ, तुच्छता संकीर्णता को त्याग नम्रताशील, सामंजस्य, उदारता की साधना करनी होगी। अकिंचन भाव से परमात्मा सत्ता को सर्वत्र स्वीकार करते हुए भेद, विविधता ऊंच-नीच की दृष्टि का त्याग करना होगा।
(डाक्टर रामचरण महेन्द्र एम0ए0, पी0एच0डी0)
आत्मिक शुद्धि, आत्मिक शान्ति तथा लोकहित के लिए अपने आपको भगवदार्पण करना हिन्दू संस्कृति की एक बड़ी विशेषता रही है। जब तक मनुष्य अपने आपको क्षुद्र साँसारिक जीव मानता रहता है और स्वयं अपनी व्यक्तिगत शक्ति से ही किसी महान उद्देश्य की पूर्ति चाहता है, तब तक वह सफल नहीं होता। उसकी शक्तियाँ पंगु सी रह जाती है। वह महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने आप को दुर्बल और पापयुक्त पाता।
लेकिन इसके विपरीत जब वह सब ओर सहायता की आशा त्याग कर एक मात्र ईश्वर को ही आत्म-समर्पण कर देता है, तब वह मन में अमित शान्ति का अनुभव करता है और गुप्त दैवी शक्ति प्राप्त करता है। अपने आपको भगवदार्पण कर देने से कोई कैसा ही पापी क्यों न हो, भगवान की भक्ति के अद्भुत प्रभाव से, उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है और उसे शीघ्र ही परम शान्ति मिल जाती है किन्तु शर्त यही है कि यह आत्मार्पण विशुद्ध प्रेम भाव से होना चाहिए। अनन्य भाव से प्रेमपूर्वक अपने आपको ईश्वर में लय कर देने वाला दैवी शक्ति वाला हो जाता है और उसे सदा रहने वाली परम शान्ति प्राप्त होती है। जो संसार के अन्य आश्रयों को छोड़ नित्य निरन्तर निष्काम भाव भगवान को सब कुछ सौंप देता है, भगवान उसकी रक्षा ही नहीं करते, वरन उसका लौकिक एवं पारलौकिक भार भी सम्हालते है।
प्रभु को आत्मार्पण करते हुए मनुष्य अपनी समस्त मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक शक्तियों को समेट कर भगवान के चरणों में रख देता है। तब मानव की पुरानी प्रवृत्तियाँ जो साँसारिक भोगों में लिप्त थीं, एक नवीन दिशा की ओर, नीचे से ऊँचाई की ओर, साँसारिकता से देवत्व की ओर उठने लगती हैं। नए आत्मिक मनोरथों की पूर्ति के लिए नई स्वर-धारा फूटती है, भक्ति का हृदय ही जैसे गीतों के रूप में बहने लगता है। वृत्तियों को संयमित कीजिए और फिर अपने सब कार्य, अपनी शक्तियों तथा इच्छाओं को भगवान में समर्पित कर दीजिए। वही व्यक्ति लोक-कल्याण के कार्यों में पूर्ण सफल रहा है जिसने अपना सब कुछ भगवान को सौंप दिया हैं।
अपना सब कुछ ईश्वर को सौंप देना, ईश्वर का दासानुदास या अंग बन कर आत्मिक शक्ति एकत्र करना-आत्मशुद्धि की यह साधना हमारे देश में प्राचीन काल में चली आयी है। गीता में भगवान ने आत्म-शुद्धि का अनुष्ठान निम्न शब्दों में किया है -
तमेव शरणं गच्छ सर्वीवेन भारत। तत्प्रसादात्पराँ शान्ति स्थान प्राप्स्यासि शाश्वतम्॥
हे भारत! सब प्रकार से उस परमेश्वर की अन्य शरण को प्राप्त हो। उस परमात्मा की कृपा से ही परम शान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्याग कर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता, रहित होकर केवल एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरन्तर भगवान् के नाम गुणा, प्रभाव और स्वरूप का चिन्तन करते रहना एवं भगवान का भजन स्मरण करते हुए ही उनकी आज्ञानुसार कर्तव्य तथा कर्मों का निस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह सब प्रकार से परमात्मा के अनन्यशरण होना है।
चेतना सर्वकर्माणि मपि सन्यस्य मत्परः बुँद्धियोग मुपाश्रित्य मच्चित्त सततं भव॥
सब कर्मों को मन से मुझ में अनन्य भाव से अर्पण करके मेरे परायण हुआ समत्व बुद्धि रूप निष्काम कर्मयोग को अवलम्बन करके निरन्तर मुझ में चित्त स्थिर करने वाला बन।
यस्य नहिं कृतो भावों बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वापि स इमांल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥
जिस पुरुष के अन्तःकरण में मैं कर्ता हूँ, ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि साँसारिक पदार्थों में और सम्पूर्ण कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न पाप से बँधता है।
जैसे अग्नि वायु और जल के द्वारा प्रारब्ध वश किसी प्राणी की हिंसा होती देखने में आवे तो भी वास्तव में हिंसा नहीं है, वैसे ही जिस पुरुष का देह में अभिमान नहीं है और स्वार्थ रहित केवल संसार के हित के लिए ही जिसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती है, उस पुरुष के शरीर और इन्द्रियों द्वारा यदि किसी प्राणी की हिंसा होती हुई लोकदृष्टि में देखी जाय, तो भी वास्तव में हिंसा नहीं है, क्योंकि आसक्ति, स्वार्थ और अहंकार के न होने से किसी प्राणी की हिंसा हो ही नहीं सकती तथा बिना कर्तव्य अभिमान के किया हुआ कर्म वास्तव में अकर्म ही है, इसलिए वह पुरुष पाप से नहीं बँधते हैं
हमारे पास अपना कुछ नहीं है। जो कुछ है ईश्वर का ही है। हम अपने लिए नहीं वरन् सब कुछ ईश्वरीय सेवा के भाव से हैं इस भावना से कार्य करने पर मनुष्य असंख्य शक्तियाँ प्राप्त करते है। इसी से कवि ने सत्य कहा है -
“मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सब तोय तेरा मुझको सौंपते, क्या लागे है मोय।”
हे भगवान मेरा कुछ नहीं है। यह शरीर तुम्हारा है। यह तुम्हारे कार्यों, संसार और समाज की सेवा के लिए लगे और फिर आपकी सेवा से वापस पहुँच जाय, इसमें मेरा क्या लगता है यह आपको अर्पित हैं।
संसार में बड़े बड़े महात्मा, विद्वान, और विचारक हो गय है। मनुष्यों ने अपने जीवन ज्ञान विज्ञान की आराधना में समाप्त कर दिये है। लोग जीवन भर नाना विषयों की एक से एक विद्वत्ता पूर्ण पुस्तकें लिखते रहे है, किन्तु हम देखते है और उनमें से अधिकांश पुस्तकें नष्ट हो गई। बहुत से नष्ट होती जा रही है। जिन पुस्तकों के लेखकों ने केवल यशलिप्सा या विद्वता के दंभ की पूर्ति का लक्ष्य सामने रखकर साहित्य-साधना की थी, वे अन्धकार में क्षण भर के लिए प्रकाश करने वाली चिनगारी की तरह चमक कर बुझ गए। किन्तु जिन विद्वानों ने अपने को भगवदार्पण कर ईश्वरीय सत्ता से गुप्त दैवी बल ग्रहण कर साहित्य निर्माण किया उनमें गुप्त रूप से ऐसी महान् शक्ति का आविर्भाव हुआ कि वह ग्रन्थ युग-युग होने पर आज भी सर्वत्र पूजनीय, प्रेरक और जनता के गले का हार बने हुए हैं।
महाकवि मिल्टन ने अपनी तमाम काव्य शक्तियों को ईश्वर के अर्पण कर दिया। अपने आप को ईश्वर का एक अंग या हिस्सा मात्र मानकर ईश्वरीय प्रेरणा से ग्रन्थ निर्माण किये। इससे उनकी कविता में वह दैवी शक्ति एवं बल आया कि वह शाश्वत भावना स्पष्ट कर सकी और बड़ी लोकप्रिय हुई इसी प्रकार अपने अन्तिम दिनों में महाकवि वर्डसवर्थ ड़ड़ड़ड़ अध्यात्म में डूब गये और उनकी कविता उच्चतम आत्मज्ञान की परिचायिका बनी। वे चरम प्रसिद्धि प्राप्त कर सके। भारत में गोस्वामी तुलसीदास, भक्त प्रवर सूरदास, मीराबाई, कबीर, गुरुनानक इत्यादि अनेक सन्त महाकवियों ने अपना शक्तियों को ईश्वर के अर्पण कर दिया। जैसे लोग पुष्प अक्षत धूप इत्यादि अर्पित करते है, वैसे उन्होंने अपनी काव्य शक्तियों को ईश्वर को अर्पित कर दिया। इस आत्मार्पण से उनकी स्वार्थ भावना, यशोलिप्सा, प्रचार भावना, अहंभाव दूर हो गए। उनका विशुद्ध आत्म तत्त्व निखर उठा। इस ब्रह्म संस्पर्श से वे भक्ति, प्रेम, विनय, सेवा, करुणा, नीति, इत्यादि के ऐसे हृदय-स्पर्शी भजन, दोहे, गीत लिख सके, जो युग-युग व्यतीत हो जाने पर आज भी हमें नए उत्साह, आह्लाद, प्रेम और प्रेरणा से भर देते है। यह भक्ति साहित्य आत्मार्पण का श्रेष्ठ उदाहरण है।
जो अपने लिए न लिखकर ईश्वर के लिए लिखता है, ईश्वर का प्रतिनिधि होकर शब्द उच्चारण करता है, इस सम्पूर्ण विश्व में एकमात्र परमात्मा को ही प्रकट देखता है (पुरुष एवेद सर्वम्-ऋग्वेद 10।90।2) संसार को परमात्मा का ही प्रत्यक्ष स्वरूप मानकर इसकी सेवा भाव के लिए लिखता है, वह निश्चय ही स्थायी लोक रंजक साहित्य की सृष्टि करेगा इसी उद्देश्य के लिए ईशावास्योपनिषद् में लिखा गया है -
ओम् ईशावास्यामिदं सवं यत्किंच जगत्यां जगत्। तेन व्यक्तेन भुजिज्या मा गृधः कस्यविस्वद्धनम्॥
अर्थात् संसार में जो कुछ है, वह ईश्वर से व्याप्त है। सब ईश्वर का है और ईश्वरमय है। इस विश्व में परमात्मा ही अनेक रूपों में जन्म ले रहा हैं।
प्रेम में डर कहाँ?
जहाँ डर रहेगा वहाँ प्रेम का रह सकना संभव नहीं चूहा, बिल्ली, से कैसे प्रेम करेगा? हिरन और शेर की दोस्ती कैसे निभेगी? प्यार में तो निर्भयता आती है। दिन भर हत्या का धन्धा करते रहने वाले कसाई से भी उसके स्त्री बच्चे नहीं डरते। क्योंकि वे जानते है कि जहाँ प्रेम है वहाँ हिंसक और हत्यारे से भी कुछ डर नहीं है। ऋषियों के आश्रमों में सिंह व्याघ्र भी अपना स्वभाव छोड़कर सज्जनता और सहानुभूति का आचरण करते है, क्योंकि वहाँ प्रेम के परमाणु पर्याप्त मात्रा में फैले रहते है।
यदि मुर्गी के बच्चों पर कुत्ता झपटता है तो मुर्गी अपने बच्चों की रक्षा के लिए कुत्ते का मुकाबला करने में अड़ जाती है, फिर चाहे वह असफल ही क्यों न रहे। जंगल में अपने बच्चे पर आक्रमण करने वाले चीते और भेड़ियों से गायें टक्कर लेती है चाहे इस युद्ध में उन्हें अपनी जान ही क्यों न गँवानी पड़े। बच्चों का प्रेम उन्हें मौत के डर से भी छुटकारा दिला देता है। जिसके प्रति सच्चा प्रेम होता है उसके कल्याण के लिए अनेकों ने अपने जीवन उत्सर्ग किये है।
काबा कहाँ नहीं?
नानक एक बार मक्का गये। वहाँ वे सोये हुए थे तो मुसलमानों ने आकर कहा तू कैसा बेअदब है जो काबा की तरफ पैर करके सा रहा है। नानक ने नम्रता पूर्वक कहा मुझे हर दिशा में खुदा का घर दीखता है। जिधर उसका घर न हो वह दिशा मुझे बता दीजिए ताकि मैं उधर ही पैर कर लूँ। इस पर वे धमकाने वाले मुसलमान निरुत्तर हो गये।
(श्री विद्या ब्रह्मचारी)
यह सब कुछ अपूर्ण हैं विश्व का कण-कण अपूर्णता से पूर्णता की ओर चल रहा है। प्रकृति अपूर्ण है इसलिए उसके परमाणु गतिशील चंचल होकर पूर्णता की खोज से दौड़ रहे है। मानव समाज अपूर्ण है। उसे जो कुछ मिला है उससे उसे अपना काम चलता नहीं दीखता, उसमें उसे सन्तोष नहीं। अपूर्णता में संतोष हो भी कैसे सकता है? इसलिए वह अधिक मात्रा में, अधिक उत्कृष्ट वस्तुएँ, परिस्थितियाँ प्राप्त करने के लिए सचेष्ट है। आत्मा अपूर्ण है। वह परमात्मा का एक अणु मात्र ही तो है। इतने भर से उसे सन्तोष कैसे हो? वह अन्य सजातियों के साथ मिलकर एक बड़ी इयत्ता बनना चाहता है इसलिए दूसरों को प्रेम करना है। प्रेम के, आत्मीयता के आधार पर ही दूसरों को अपने में मिलाकर अधिक विस्तार की अनुभूति हो सकती है। आत्मा की भूख निरन्तर प्रेम की है। वह प्रेम चाहता है, अधिक विस्तार में, अधिक उच्चकोटि का प्रेम उपलब्ध किस प्रकार हो यही प्यास उसे निरन्तर लगी रहती है। और इस तृष्णा को बुझाने के लिए उससे जो कुछ बन पड़ता है वह निरन्तर करता रहता हैं।
उपनिषदों में परमात्मा को तीन भागों में विभक्त बताया है। एक जगत में, एक मानव समाज में, एक आत्मा में। उसे शान्तम्, शिवम्, अद्वैतम् कहा गया है। इसे प्राप्त करने के लिए ही विश्वव्यापी प्रक्रिया चल रही हैं जगत में जो अशान्ति है चंचलता है, गतिशीलता है वह इसलिए है कि इस मंजिल को पार करे शान्ति रूपी प्रकाश उपलब्ध हो। सूर्य चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र, अणु, परमाणु इसी तेजी से दौड़ लगा रहे है। यह कहाँ जाना चाहते है? इनकी यात्रा का लक्ष्य क्या है? निश्चय ही यह अशान्ति-शान्ति की तलाश में चल रही है, जब सृष्टि का लक्ष्य पूर्ण हो जाता है तो प्रत्येक अणु पिण्ड शान्त होकर परब्रह्म में लीन होकर अनंत शान्ति का अनुभव करने लगता हैं। प्रलय काल में यह जगत ऐसी ही शान्ति का अनुभव करता है।
मानव समाज का लक्ष्य विश्व है। शिव अर्थात् कल्याण। मानव समाज का-मानव मनोभूमि का गठन इस प्रकार का है कि इसमें अनेक अभाव, दोष, अमंगल, कष्ट एवं दुःख भरे दीखते है। हर मनुष्य अपनी किसी न किसी समस्या को लेकर दुखी और असन्तुष्ट हैं इन अभावों और असन्तोषी की निवृत्ति के लिए ही वह अपनी मति के अनुसार नाना प्रकार के प्रयत्न करता है। उसे सुख चाहिए अधिक मात्रा में अधिक अच्छा, अधिक टिकाऊ सुख की उपलब्धि के लिए समाज में असाधारण हलचल होती रहती है। उत्पादन, उपभोग, वितरण और विनाश की समस्यायें उलझी रहती है, उन्हें सुलझाने के लिए प्रिय और अप्रिय कर्म और अकर्म होते रहते हैं शिव के रूप में, कल्याण के रूप में, ईश्वरीय प्रकाश समाज में मौजूद है। उसे जब उपलब्ध कर लिया जाता हे तब स्वर्गीय परिस्थितियों का भान होता है, उन्हें पाकर मनुष्य अपने आपको देवता के रूप में अनुभव करता है।
आत्मा के लिए जो प्रकाश प्राप्त करने योग्य है वह है एकता का अद्वैत का। जो आत्मा जितना ही अपने पराये मेरे तेरे के फेर में है, दूसरों को अपने से जितना ही भिन्न मानता है वह उतना ही दुखी हैं उसे उतना ही दूसरों के प्रति भय और संदेह बना रहता है प्रेम का मिलन जितना-जितना बढ़ता जाता है उतने ही वह द्वैत समाप्त होने लगता है, जो अनेक प्रकार की आशंकाओं और उद्वेगों का मूल है। माँ और बेटे में जब आत्मीयता पैदा हो जाती है तो दोनों में से किसी को भय नहीं रहना कि दूसरा मेरा कोई अनिष्ट करेगा। वरन् एक का दुःख दूर कर दूसरे को प्रसन्नता होती है, हिम्मत बँधती है, सन्तोष और सुख प्राप्त होता है। पति यदि अपनी जेब में छुरी या पिस्तौल रखे हुए हो तो उसकी प्रेमिका को उससे जरा भी भय नहीं लगता। कसाई दिनभर जीवों की हत्या करते है पर उनके बच्चे हाथ में छुरा लिए रहने पर भी नहीं डरते। क्योंकि प्रेम का प्रकाश जहाँ फैलता है, वहाँ अविश्वास और भय का अन्धकार ठहर ही कहाँ सकता है।
प्रेम का नाम ही अद्वैत है। इसे ही भक्ति कहते है। ईश्वर को अवलम्ब बनाकर जो भक्ति की जाती है। वह उस ईश्वर तक सीमित नहीं रह सकती जो उपासना की सुविधा के लिए एक प्रतिमा या प्रतीक के रूप में कल्पित की गई थी। पहलवान मुगदर की सहायता से अपनी भुजाओं का बल बढ़ाता है। वह भुज बल जीवन के विस्तृत क्षेत्र में अनेकों प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होता है। ऐसा नहीं है कि वह भुज बल केवल उठाने तक ही सीमित रहे। यदि कोई पहलवान भारी मुगदर तो उठा लेता हो पर उसकी भुजाएँ और कुछ पराक्रम करने में असमर्थ हों तो लोग उसे पहलवान नहीं कहेंगे वरन कोई जादूगर समझकर उस मुगदर उठाने वाले की क्रिया में कोई चालाकी होने का सन्देह करने लगेंगे। यही बात प्रेम के संबन्ध में भी है। ईश्वर भक्त अपने प्रेम भाव को बढ़ाने के अभ्यास के रूप में भक्ति की साधना करता है। इसमें जितनी ही सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात से आत्मा का प्रेम प्रकाश प्राणि मात्र के ऊपर फैलना आरंभ हो जाता है। उसे सब कोई अपने प्रेमी ही दीखते है, प्रेमी ही नहीं-आत्मीय भी लगते है, फिर उसे सब कुछ अपना ही, अपने में ओत-प्रोत ही दीखने लगता है। यही अद्वैत भाव है वेदान्त सिद्धान्त में आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि के आधार पर इसी आत्मीयता और एकता का शिक्षण किया गया हैं, मुक्ति का यही उपाय है। तुच्छता के संकीर्णता के, अनुदारता के, वासना और तृष्णा के, लोभ और मोह के, बन्धन जितने ही शिथिल होते जायेंगे उतनी ही मुक्ति समीप आती जायेगी द्वैत में ही बन्धन और अद्वैत में ही मुक्ति है प्रेम को परमात्मा कहा गया है- रसो वै सः। वह परमात्मा प्रेम स्वरूप है, अपने अन्तःकरण को यदि आत्मा स्वार्थ और मोह से ऊपर उठकर सच्चे प्रेम को अपना ले तो उसके लिए परमात्मा प्रत्यक्ष ही है। उसकी मुक्ति उसके साथ ही है।
जिस प्रकार द्वैत को घटा या मिटाकर आत्मा अद्वैत तत्त्व की प्रेमास्पद परमात्मा की-समीपता का असीम आनन्द इसी जीवन में अनुभव कर सकता है, और जीवन मुक्ति के सुख को प्रत्यक्ष कर सकता है, उसी प्रकार मनुष्य के लिए यह भी यह सरल हे कि वह स्वर्गीय भूमिका में विचरण करने वाले देवत्व से अपने आपको ओत-प्रोत अनुभव करे। दुःखों और अभावों से उत्पन्न होने वाली खिन्नता पर विजय प्राप्त करके ही जीवनयापन क्रम की परेशानी एवं नीरसता को हटाया जा सकता है।
हमें यह मानकर चलना होगा कि दुःख भी मानव जीवन का एक तथ्य है, उससे रहित होकर जी सकना किसी के लिए सम्भव नहीं वह अनिवार्य ही नहीं उपयोगी एवं आवश्यक भी है। सुख की ही तरह वह भी जीवन के विकास क्रम में सहायक होता है। केवल सुख ही सुख प्राप्त हो, तो वह उसकी उपयोगिता भी न समझ सकेगा और वह एक भार मात्र बनकर रह जायेगा पकवान एवं मिष्ठान का आनंद उसे आता हे जिसे रूखी-सूखी रोटियों से भी पाला पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति सदा मिठाई और पकवान ही खाता रहे तो उसके लिए उनमें क्या रस हो सकता है? गरीबी की अनुभूति के साथ धन लाभ का सुख सम्बन्धित है। यदि कोई बालक ऐसे घर में जन्मे जहाँ सोना चाँदी के ढेर जमा रहते हो तो उसे थोड़ा और धन लाभ होने पर क्या प्रसन्नता होगी? यदि धन प्राप्ति के सुख का आस्वादन करना हो तो गरीबी की परिस्थितियों में से गुजरना आवश्यक है।
सफलता में, विजय में, उन्नति में आनंद उपलब्ध हो सके, इसके लिए असफलता, पराजय, अवनति के झकझोरे आवश्यक है। स्वास्थ्य भी परमात्मा को कोई देन है इसे रोगी होने पर ही कोई व्यक्ति भली प्रकार समझ सकता है, अन्यथा एक बलवान आदमी तो अपने निरोग शरीर का कोई मूल्य क्या समझेगा? उसके लिए तो वह एक साधारण सी अनायास प्राप्त हुई तुच्छ सी चीज है। दुःख एक कसौटी है जिस पर कस कर सुखों के मूल्य को समझ सकना सम्भव होता है।
यदि हमारे हाथ में दुःख का पात्र न होता तो परमात्मा की दया भिक्षा हम किस में प्राप्त करते? अपूर्णता यदि न होती, अभाव यदि न रहते तो पराक्रम ओर पुरुषार्थ के जागृत होने का अवसर ही न आता और उसके बिना जीव की उन्नति का क्रम ही रुक जाता। इस विश्व में स्वर्गीय पदार्थों एवं परिस्थितियों की कमी नहीं पर वे प्राप्त उन्हीं को होती है जो उनका मूल्य कष्ट सहन करके चुकाने को तैयार होते है। साधना के द्वारा-तपस्या के द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया जाता है। विद्या पढ़ने, धन कमाने, बलवान बनने, सुसंस्कृत होने के लिए हर किसी को कष्टसाध्य उपायों का अवलम्बन करना होता है, जो इससे बचना चाहते है वे अपनी पात्रता को सिद्ध नहीं कर पाते और उन दिव्य उपहारों से वंचित रह जाते है जो केवल पराक्रमी विजेताओं के लिए ही सुरक्षित रखे रहते हैं।
अभावों और कष्टों को एक प्रेरक शक्ति एवं उद्दीपन अग्नि के रूप में अपने पुरुषार्थ के लिए उपस्थित हुई चुनौती के रूप में स्वीकार करने की अपेक्षा जो लोग निराश, खिन्न एवं व्यग्र हो जाते है, मानसिक सन्तुलन खो बैठते है और अपने आपको अभागा मानने लगते है वे दुःख के देवता का अपमान करते है। सुख बुखार के दैत्य की तरह है, जो जब उतरता है तो देह थकी माँदी-सी लगती हैं पर दुःख उस राजा की तरह है जो जहाँ ठहरता है वही कुछ न कुछ उपहार देकर जाता हैं संसार के जितने भी महापुरुष हुए है, जिनने भी इतिहास के पृष्ठों पर अपना नाम छोड़ा है, उनमें से हर एक की दुखों की अग्नि में तपना पड़ा है। योगी जन इसे स्वेच्छापूर्वक अंगीकार करते है। अपरिग्रह, तितीक्षा और तपस्या की अग्नि में वे अपने को तपा-तपाकर अधिक उज्ज्वल और प्रकाशवान बनाते चलते है। यदि वे इस मार्ग पर न चलें, विलासी और ऐश आराम का जीवन व्यतीत करें तो निश्चय ही उन्हें उन आध्यात्मिक लाभों से वंचित रहना पड़ेगा जो तपस्वी और योगियों को प्राप्त होते है।
ईश्वरीय प्रकाश की तीनों दिशाओं में हमें ग्रहण करना होगा। अद्वैत भावन का-प्रेम तत्त्व का विस्तार करके आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति होगी। समाज व्यापी अभावों और दुखों को, पराजयों और असफलताओं को, हानि लाभ, मान अपमान, राग द्वेष आदि द्वन्द्वों को एक कटु आवश्यकता के रूप में स्वीकार करना चाहिए उनसे खिन्न होने की अपेक्षा अपने मानसिक एवं बाह्य क्षेत्र में अधिक सावधान होने की प्रेरणा प्राप्त करनी चाहिए। यदि हम दुखों को भी सुख के समान ही जीवन का एक आवश्यक एवं उपयोगी तत्त्व मान लें और उससे मन को गिरने देने की भूल न करें तो हमारा सामाजिक जीवन स्वर्गीय आनंद से परिपूर्ण हो सकता है।
प्रकृति का प्रत्येक पदार्थ अपनी अपूर्णता दूर करके पूर्णता प्राप्त करने के लिए तीर की तरह दौड़ा जाता है। ऐसी दशा में किसी पदार्थ की, यहाँ तक कि शरीर की भी एक स्थिति में एक आधिपत्य में रहने की आशा कैसे की जा सकती है? यह सभी कुछ दौड़ रहा है, यह सभी कुछ चंचल है। लक्ष्मी को चंचल कहा गया है। रूप, विवेक, धन, यश, ऐश्वर्य, सत्ता, बुद्धि, चातुर्य यह सभी चंचल लक्ष्मी के अंग है। परिवार में परिजन, मित्र और कुटुम्बी, स्त्री और पुत्र, स्वजन और संबंधी इनमें से किसका शरीर, किसका मन कब तक अपने को प्रिय लगने की, स्थिर रहने की स्थिति में रहेगा इसका कोई ठिकाना नहीं। फिर इस दौड़ती हुई रेल के पीछे गले में रस्सी बाँधकर घिसटते चलने से क्या लाभ?
इन तीनों तथ्यों को यदि समझ लिया जाए तो जगत में अशान्त-चंचल स्वभाव से परिचित होकर मोह बन्धनों से छूट सकना हमारे लिए सम्भव हो सकता है। दुखों के डर से जो नारकीय यातनाएँ उठानी पड़ती हैं उन्हें स्वर्गीय परिस्थिति में बदला जा सकता है। द्वैत भावना से उत्पन्न परायेपन कर अज्ञान जो जीव को ईर्ष्या, द्वेष एवं पाप, ताप से जलता रहता है उससे भी निवृत्ति हो सकती हैं।
ईश्वरीय प्रकाश शान्त, शिवम् और अद्वैत है। यदि हम चाहें तो उसे प्राप्त कर सकते हैं और मानव जीवन को धन्य बना सकते है
(श्री. भगवान सहाय वाशिष्ठ)
मानव एक सामाजिक प्राणी है उसका सम्बन्ध विस्तृत मानव समाज से होता है। इतना ही नहीं भूमण्डल के व्याप्त व वातावरण से उसका सम्बन्ध होता है ज्यों-ज्यों व्यक्तित्व का विकास होता जाता है उसके साथ-साथ ही यह सम्बन्ध सूत्र भी विस्तृत होना जाता है। समाज और व्यक्ति दोनों पर परस्पर एक दूसरे का प्रभाव पड़ता है। दोनों के उत्थान, पतन, सफलता आदि का भी उतना ही प्रभाव पड़ता है। व्यवहार कुशलता इन दोनों को मिलाकर प्रगति-पथ एवं सफलता की और अग्रसर करती है। तात्पर्य यह है कि व्यवहार कुशलता से व्यक्ति स्वयं तो उन्नत एवं सफल होता ही है किन्तु साथ ही साथ समाज पर भी इसका काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है। अतः सभी संस्कृतियों ने व्यवहार कुश-लता एवं उसके लिए आवश्यक गुणों को मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है।
व्यवहार कुशल बनकर सफल एवं आदर्श जीवन का निर्माण करने के लिये निम्न बातों का पालन करना आवश्यक है।
1-गुण ग्राहकता एवं सद्गुण अवलोकन-मानव प्रकृति की यह कमजोरी है कि अधिकांश मनुष्यों में कुछ न कुछ कमजोरियाँ बुराइयाँ एवं दोष आदि रहते हैं, इसके साथ-साथ अनेकों गुण भी। सर्वथा दोष मुक्त अथवा निर्बलता युक्त व्यक्ति मिलना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य ही है, इसी प्रकार सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति भी। किन्तु श्रेष्ठता इसी में है कि दूसरों के अवगुणों दोषों की उपेक्षा कर उनके गुणों को देखा जाय और उन्हें ग्रहण किया जाय, दूसरों के सद्गुणों को जाने और उन्हें दाद दें उनकी प्रशंसा करें। दूसरों का दोष दर्शन अथवा उनमें बुराइयाँ निकालकर सरल कार्य हैं। साथ ही यह एक घटिया मानसिक रोग है, जो व्यक्ति को तुच्छता एवं पतन की और ले जाता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में सफल एवं उन्नत नहीं हो सकता न उसे किसी का सहयोग अथवा सहायता मिल सकती है। अतः दूसरों में सद्गुणों, श्रेष्ठता आदि का दर्शन कीजिए। उनकी विशेषताओं को समझकर उनकी प्रशंसा कीजिए। और अपने जीवन में उन्हें उतारिये भी। इससे आदर्श एवं उन्नति शील जीवन का निर्माण, होगा दूसरों का आपको सहयोग मिलेगा और आपको सच्चे मित्र प्राप्त होंगे स्वभाव वश किसी की बुराई भी ध्यान में आये तो उसे भुलाकर उसके सद्गुणों पर विचार कीजिए। इससे अपना दृष्टिकोण परिमार्जित बनेगा।
2-सहिष्णुता- व्यवहार कुशल बनने के लिये दूसरी आवश्यकता है सहिष्णु बनने का है- है नेक व्यवहार में सहनशील बनिए आपमें जितनी सहनशीलता होगी उतना ही आप सफल जीवन का निर्माण कर सकेंगे मानव जीवन में भिन्न-2 परिस्थितियाँ, वातावरण उतार-चढ़ाव संयोग-वियोग आते रहते है तरह-तरह के व्यक्तियों से सम्पर्क होता है, क्रोधी, उत्तेजित, झगड़ालू, विरोधी, दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों से लेकर अच्छे भले व्यक्तियों से आपका पाला पड़ता है, घर, से बाहर एवं समाज में आपको अव्यवस्था नजर आती है, लोग आपकी आलोचना करते है, गम्भीर समस्यायें आपको रुकावट डालती हैं। किन्तु इन सबको अपने विस्तृत हृदय में दृढ़ता और साहस में, क्षमाशील में, मानसिक गंभीरता में समा लीजिए, सहनशीलता में परिणित कर दीजिए, इनसे उत्तेजित न हूजिये। चिड़चिड़ाहट न लाइए। उक्त विषय आपकी शान्ति, आत्मनिर्भरता, गंभीरता दृढ़ता एवं सहनशीलता को विचलित न कर सकें इसके लिए पूरा-पूरा ध्यान रखें। आप देखेंगे कि यह सहिष्णुता, सहनशीलता आपके उज्ज्वल भविष्य का मार्ग खोल देती है। परिस्थितियों, समस्याओं के वातावरण संयोग वियोग आदि में विचलित हो जाना, उनके प्रवाह से अपने आपको विचलित कर देना मानसिक कमजोरी है, जो सफलता से दूर रखते है। अतः इसे छोड़िये। प्रत्येक वस्तु प्रत्येक परिस्थिति, प्रत्येक वातावरण में अपने आप का ढालने की क्षमता रखिये। आप देखेंगे की शुरू से अन्त तक आपकी स्थिति, प्रगति प्रवाह की और बढ़ती रहेगी। सारी विपरीतता विरोध, परिस्थितियाँ अन्धकार के गर्त में समाप्त हो जायेगी और आप सफल जीवन की उच्च मंजिल को पार कर लेंगे।
3-निरहंकारवृत्ति - के लिए निरहंकारिता का होना भी आवश्यक है। मनुष्य की यह एक मानसिक कमजोर है। कि वह अपने शरीर, स्वरूप, धन वैभव, विद्या, सम्पन्नता, कीर्ति आदि का गर्व करके अपने बड़प्पन और अहंकार के समक्ष दूसरों को तुच्छता की दृष्टि से देखता है। यह अव्यावहारिक एवं तुच्छता का चिह्न माना गया है। संसार में एक से एक बढ़ा हुआ धनी, मानी, सम्पन्न विद्वान योग्य बैठे हुये है। फिर किस बात की अहंमन्यता! इस प्रकार की अहंकारिता प्रगतिशील के मार्ग का अवरुद्ध कर देती है ओर मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देती। साथ ही इस प्रकार का अहंकार समाज में सम्मानास्पद न माना जाएगा उसके कारण दूसरे असंतुष्ट होंगे और उदास होकर असहयोग करने लगेंगे इस लिए मिथ्या अहंकार का त्याग कीजिए। अपनी योग्यता, सम्पन्नता आदि को छोटा मानकर और वृद्धि के लिए प्रयत्न कीजिए। अहंकार शून्य होकर दूसरों को बड़प्पन, महत्व, प्रदान कीजिए। इसी में आपका भी बड़प्पन एवं महत्व है।
निरहंकारिता के लिए आवश्यक है दूसरों के दृष्टिकोण का आदर एवं सम्मान करना सीखा जाय। कोई उत्तम बात कहे उसे तो स्वीकार करना ही चाहिए किन्तु अन्य कोई व्यक्ति अपनी हठधर्मी एवं अहमन्यता वश अपने गलत दृष्टिकोण पर भी जोर दे रहा हों तो उस समय उसका भी सम्मान कीजिए और सद्भावना प्रकट कीजिए फिर एकान्त में उससे मिलाकर विचार परामर्श कीजिए वह अपने गलत दृष्टिकोण को वापस लेकर आपका सहयोगी बन जाएगा अतः दूसरों के दृष्टिकोण का आदर कीजिए।
बरबस, जबरन अपना सही दृष्टिकोण भी किसी पर थोपने की चेष्टा न कीजिए। यह भी अहंकार वृत्ति का सूचक है। आप केवल नम्रता भरे शब्दों में अपना सुझाव एवं राय दे सकते हैं। उस पर आप भी व्यक्तिगत कोई जोर न दें। दूसरे व्यक्तियों को तर्क से आपके विषय अथवा सुझाव को मानने दीजिए। इस प्रकार की वृत्ति सफल जीवन एवं दूसरों के सहयोग और मित्रता की वृद्धि करती है।
अनावश्यक उपदेश देने का प्रयत्न भी मत करिये समाज आपसे जबरन उपदेश ग्रहण नहीं करेगा न उसका आदर ही करेगा। आप अपना सुझाव और विचार पेश कीजिए जनता को तर्क एवं विचार बल से उस पर अमल करने दीजिए।
दूसरों के साथ अनधिकार चेष्टा करना भी अहंकार में ही सम्मिलित है। बिना मतलब, अपनी योग्यता का प्रदर्शन करने के लिये या दूसरों को अपने कार्य में अयोग्य समझते हुए अनावश्यक हस्तक्षेप मत कीजिए। इसे प्रतिपक्षी लोग कभी अच्छा न समझेंगे और आपके प्रति उनके विचार अच्छे न होंगे।
आवश्यकता से अधिक न बोलिये। ज्यादा बोलना मूर्खता एवं घमण्ड का प्रदर्शन करना है। बातूनी, शेखीखोरी, टीपटाप लगाकर बोलने वाला व्यक्ति घटिया दर्जे का मना जाता है ऐसा व्यक्ति काम भी कम करता है। अतः इतना बोलिये जो आवश्यक हो, जिससे आपका तथा दूसरों का कुछ हित साधन हो सकें। बेकार बकवास करने से आपके व्यक्तित्व का मूल्य घट जाएगा और आपकी शक्तियों का क्षय होगा।
4- त्रुटि को स्वीकार करना और उसका प्रायश्चित-यह स्वाभाविक ही है कि प्रयत्न करने पर भी कभी-कभी व्यवहार कुशलता में मनुष्य चूक जाता है और कुछ न कुछ गलती कर बैठता है। किन्तु इसके लिये अपने दोष और गलतियों को विनम्र भाव से स्वीकार कर लेना आवश्यक है। जिसके साथ अपने कुछ अव्यावहारिकता की हो उसके पास जाकर आप अपनी धृष्टता को स्वीकार करते हुये उसके लिये क्षमा याचना कीजिए। इससे लोग आपके हो जाएँगे। अपनी गलती को स्वीकार कर लेने में कभी संकोच नहीं करना चाहिये। न किसी तरह का भय ही।
अपनी अव्यावहारिकता के लिये, त्रुटि के लिये न केवल स्वीकार अथवा क्षमा याचना करके ही रह जाना चाहिये वरन् भविष्य में उस प्रकार की हरकत न करने की प्रतिज्ञा करनी चाहिये तथा उसके प्रायश्चित के लिये स्वयं को कुछ न कुछ दण्ड भी देना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसा ने हो।
5-सबसे प्रेम का व्यवहारः- अपने स्वभाव, विचार मन में स्थित ईर्ष्या द्वेष एवं तत्सम्बन्धी भावनाओं को निकालकर प्रेम का स्त्रोत बढ़ाइये। मानव भी निस्वार्थ हो। उनसे आत्मा सम्बन्ध कायम करके एक दूसरे के दुःख दर्द में, आवश्यक पड़ने पर काम आइए। परस्पर प्रेम, सहानुभूति, सहायता, विनम्रता सेवा के पवित्र सूत्रों से सम्बन्ध बनाइए। इस संसार रूपी नाव में हम सब यात्रा कर रहे हैं। अपने-अपने गन्तव्य स्थान पर सब उतर जायेंगे कोई कुछ भी एक दूसरे का छीनकर नहीं ले जायेगा, अतः फिर क्यों खींचातानी, ईर्ष्या द्वेष, डाह, जलन कुढ़न हो?
इन दूषित तत्त्वों को निकाल फेंकिये। आपका जीवन शुद्ध प्रेम से सराबोर हो। आप देखेंगे कि हिंसक प्राणी भी आपके सहायक हो जायेंगे सारी विपरीतता अनुकूलता में परिणित हो जाएगी। आपके कदम प्रगति सफलता एवं विकास की और अग्रसर हो उठेंगे। आप जीवन में सफलता प्राप्त करेंगे। वह सब कुछ जिसके लिए आपका अवतरण माँ वसुन्धरा के पवित्र अंग में हुआ है।
(प्रो. मोहनलाल वर्मा एम ए एल. एल. बी.)
“शतं जीव शरदो वर्धमानः।”
-अथर्ववेद 3।11।14
संसार के मनुष्यों जीवन शक्ति को इस प्रकार व्यय करो कि सौ वर्ष जीवित रह सको। सौ वर्ष तक उन्नतिशील जीवन व्यतीत करना चाहिए।
कुछ दीर्घ जीवियों के अद्भुत उदाहरण
सन् 1958 में सोवियत पत्रों में एक गाँव से मनाये गये एक अजीब विवाह का समाचार प्रकाशित हुआ था। यह विवाह रजत या स्वर्ण, यहाँ तक कि हीरक जयन्ती भी नहीं था, पति का नाम मद अदामोव और उनकी पत्नी मन्ना अलीएवा ने अपने दाम्पत्य का सौवाँ बसन्त मनाया था, जिसका अभी तक कोई नाम नहीं रखा गया है।
158 वर्षीय कृषक मखमूद इवाजोव, जिन्होंने सोवियत संघ की कृषि प्रदर्शिनी में भाग लिया था, सोवियत संघ में विख्यात है। उनके कार्य की प्रशंसा में 1857 में सोवियत सरकार ने उन्हें आर्डर आफ रेड बैनर आफ लेबर (श्रम के लाल झण्डे) के पदक से विभूषित किया।
इसी प्रकार वहाँ की औसेनिया वासी महिला तेपो आबजीब ने वास्तव में दीर्घजीवी होने का उच्च स्तर कायम किया है। हाल में ही 180 वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ था। फिर भी लोग गलती से यह मान लेते हैं कि दीर्घायु पर रहने वाले काकेशियाई जनतन्त्रों के निवासियों का ही सौभाग्य है। इसके विपरीत आँकड़ों के अनुसार वृद्ध लोगों की बहु संख्या सोवियत संघ में है, वहाँ दो लाख से अधिक वृद्ध नामाँकित किए गये हैं। और देश के विभिन्न भागों में बसते हैं, मास्को, लेनिन ग्रण्ड़ यूक्रेन तथा वेली इत्यादि भागों में दीर्घ जीव रुमियों की संख्या अधिक है।
काकेशस की तुलना में साइबेरिया में सौ साल की दीर्घ वालों की संख्या तिगुनी है, जब वियाकूतिया के कठोर जलवायु में उनकी संख्या अब खाजिया के समृद्ध जिलों की तुलना में कहीं अधिक हैं
ऊपर लिखे उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि आज की इस बीसवीं सदी में भी दीर्घजीवी होने साधारण सी बात है। हम मनुष्य के जीवन सीमा सौ वर्ष ही मानते हुए आश्चर्य करते है। कुछ तो पचास वर्ष को पार करने पर ही निराश हो वो जैसा अनुभव करने लगते है। अपना दैनिक का छोड़ शिथिल हो मौत का रास्ता देखा करते हैं। उनके मन में एक ऐसी जहरीली मनः स्थिति का निर्माण हो जाता है, जो बरबस वृद्धावस्था घेर लाती है।
रूसी मनोवैज्ञानिक अब इस नतीजे पर पहुँचे कि प्राकृतिक वृद्धावस्था में और समय से पहले आने वाली वृद्धावस्था में अन्तर है और समय से बुढ़ापे के लिए स्वयं मनुष्य ही दोषी है। जीव के मुख्य कार्य स्पष्ट रूप में केन्द्रीय स्नायु-तन्त्र स्थिति और मस्तिष्क वाहक पर निर्भर करते हैं, हमारे जीवाँगों में होने वाली संश्लिष्ट और प्रमुख प्रक्रियाओं में मस्तिष्क-वाहक सक्रिय भाग लेते हैं। उन्हीं में आयु बढ़ाने की प्रक्रिया निहित है। अब यह साबित हो चुका है कि ब्लड प्रेशर, धमनियों की कठोरता और कैंसर जैसे अच्छे स्वास्थ्य के शत्रु केन्द्रीय स्नायु-तन्त्र में लम्बी गड़बड़ी के कारण पनपते हैं। यह भी विदित होता जा रहा है कि तम्बाकू तथा शराब में पाये जाने वाले विष हमारे स्नायु तन्त्र और रक्त धमनियों के लिए छिपे हुए घातक विष हैं और शरीर को बहुत नुकसान पहुँचाते हैं।
समय से पहले आने वाली वृद्धावस्था को रोकिये
रूसी वैज्ञानिक इस राय पर आये हैं कि यौवन और शक्ति को बढ़ायें रखने वाला तत्व काम, (कार्य शीलता) है। अधिक काम करने से चिंताऐं भी कम सताती हैं और शरीर एक शिकंजे में कसा रहता हैं। उसमें आलस्य का ढीलापन नहीं आने पाता। कुछ उम्र बढ़ जाने पर अनेक लोग यह गलती करते हैं कि वे अपना चलना, फिरना, खेत जोतना, बोना, टहलना, घूमना या शरीर के अन्य अंगों से श्रम करना छोड़ देते हैं। काम में न आने से अनेक अंग जंग लग कर अपनी स्वाभाविक कार्य शक्ति छोड़ने लगते हैं। उन्हें निष्क्रिय रहने की ही आदत पड़ने लगती है। फलतः कार्य विहीन होकर वे अव्यवस्थित और बेकार होने लगते हैं।
रूसी शरीर विज्ञान-शास्त्री अकादमिशियन पावतोव के शब्दों में “प्रत्येक शरीर एक चलता फिरता जीव है। अपने जीवन काल में ही यह एक निश्चित गति अथवा ढर्रा बना लेता है। जितने दिनों तक उसे उसका यह सौंपा हुआ कार्य दिया जाता रहता है, उतने दिन तक तो वह बराबर चलता रहता है। पर ज्यों-ज्यों वह कार्य कम होने लगता है, त्यों-त्यों उसमें पाचन विकार होने लगता है, रक्त कम बनता है फलतः कर्म शक्ति के साथ-साथ शरीर शक्ति भी कम होती जाती है। यदि इसी ढर्रे पर उसे चलते रहने दिया जाय, या जबरदस्ती उससे यह शारीरिक कार्य लिया जाय, तो निश्चित ही वह कुछ वर्षों के लिए युवक बना रह सकता है।
बैठे ठाले रहने का दूषित प्रभाव
रूसी लेखक इवान पन्नोविच पावलाव कहा करते थे, “एक क्लर्क अपना काम करते हुए जो बहुत ज्यादा कठिन नहीं होता, 70 वर्षों तक ठीक चलता रहता है, परन्तु ज्यों ही वह उसे छोड़कर अवकाश ग्रहण करता है और फलतः रोज का सक्रिय ढर्रा छोड़ देता है, तो शनैःशनैः उसके शरीर के अवयव ढीले होकर काम करने में असमर्थ हो जाते हैं और वह 75-80 का होते-होते मर जाता है। बढ़ती आयु में शारीरिक या मानसिक कार्य छोड़ देने वालों में से बहुतों का आमतौर पर यही बुरा हाल होता है। हमें ऐसे अनेक मामलों का पता है, जिनमें अपेक्षाकृत स्फूर्तिवान, प्रसन्नचित्त तथा हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति पेंशन अथवा अवकाश ग्रहण करते ही सहसा निर्बल हो गए और बीमार पड़ गये। यही कारण है कि अवकाश ग्रहण करने के बाद व्यक्ति को कदापि काम-काज करना पूरी तरह नहीं छोड़ना चाहिए। उसे कुछ हलके काम, बागवानी जैसे शौकिया कार्य यहाँ तक कि टहलना, घूमना, गौ सेवा, घर की सफाई, स्वयं अपने मैले वस्त्र धोना और संभव हो तो व्यायाम और मालिश भी करना चाहिए। शरीर को अधिक से अधिक सक्रिय और गत्यात्मक बनाये रखना चाहिए। इसी से वह अधिक दिनों आगे तक चलता रहता है। किसानों और चरवाहों का जीवन इस अधिक घूमने-फिरने के कारण ही बहुत लम्बी आयु तक सक्रिय रहता है।
अतएव दीर्घायु की प्रमुख सबसे बड़ी दवाई काम है। खूब काम कीजिए। शरीर को अधिक चलाइये श्रम, करते रहिये। काम करते रहने से आपका शरीर अभी बहुत दिन चल सकता है। कार्य से ही मनुष्य की सृष्टि हुई है तथा यह क्रियाशीलता ही अन्त तक उसे स्वस्थ बनाये रखने वाली है।
(श्री रामखेलावन चौधरी)
मनुष्यों के विचारों की उच्चता अधिकाधिक इस बात पर निर्भर है कि वह कहाँ तक अपना जीवन सादगी से व्यतीत करता है। सादगी क्या है, इस बात का पता सुकरात के जीवन से लग सकता है, कहते हैं कि जब वह एथेंस की सड़कों पर चला करता था, साधारण जनों का प्रवृत्त के बिल्कुल विपरीत सुन्दर वस्तुओं से सजी हुई दुकान को देख कर सोचा करता था। कि इन वस्तुओं के “बिन” में कैसे जीवन निर्वाह कर सकता हूँ “यदि कोई वस्तुएँ उसको अपने लिये अत्यन्त आवश्यक जान पड़ता था उन्हें लेने के लिये उसका मन ललचाता, तो वे इस पर विचार करता और इस बात का प्रयत्न करता कि उन्हें बिना लिये हुए वह अपना काम चला लें। इस उद्धरण से जीवन की सादगी का कुछ अनुमान लग सकता है। सुकरात की बात बहुत पुरानी है। कुछ लोग कह सकते है कि उस काल में जीवन इतना जटिल न था, आज की तरह उपयोगी वस्तुओं का निर्माण ही नहीं हुआ था; लोग वैसा जीवन व्यतीत करने के आदी थे और आज मशीनों ने हमको इतनी वस्तुएँ दे दी हैं कि हम उनका प्रयोग कर सकते हैं और करना चाहिए। इस दृष्टि से आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक डा. आइन्स्टीन के जीवनचर्या का उल्लेख हम कर रहें हैं। यह महान वैज्ञानिक जिसने अणु शक्ति की खोज की और नये युग का सूत्र पात किया अत्यन्त सादगी से जीवन व्यतीत करता था। वह अपने बालों को सँवारने, कपड़ों को तहाने या उन पर इस्त्री करने की ओर ध्यान भी नहीं देता था। वास्तविकता यह है कि सादगी महान पुरुषों के जीवन का अभिन्न अंग है।
भौतिकतावाद के इस जमाने में अर्थशास्त्री जीवन की आवश्यकताओं को बढ़ाने पर जोर देते है उनका विचार है कि आवश्यकता मनुष्य को क्रियाशील बनाती है और उसे काम करने की प्रेरणा देती है। नाना प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन अधिक मात्रा में तभी संभव है, जब लोगों की आवश्यकताएँ बढ़ें। मान लीजिए सभी लोग गेहूँ उबाल कर खाने लगे और उनका अन्य प्रकार के स्वादों का आनन्द लेने की आवश्यकता न रह जाय, तो मसालेदार चटपटे भोज्य पदार्थ जिनके सहारे अनेक व्यवसाय चल रहे है अपने आप नष्ट हो जायेंगे। जब लोगों की आवश्यकताएँ बहुत कम होगी, तो वे अधिक धनार्जन की ओर भी ध्यान न देंगे। इन आर्थिक सिद्धान्तों को लेकर मनुष्य अपनी आवश्यकताएँ बढ़ाता जा रहा है।, जहाँ इसका यह परिणाम हुआ कि मशीनों का जन्म हुआ और अनेक प्रकार का उत्पादन होने तथा, वहाँ एक परिणाम यह भी हुआ कि मनुष्य का जीवन अत्यधिक दुखी, चिंताग्रस्त और असन्तोषपूर्ण बन गया। कारण यह है कि आवश्यकताओं का बढ़ा लेना सरल है। मनुष्य के चारों ओर नाना प्रकार की सुख-सुविधा देने वाली असंख्य वस्तुएँ है। उनका प्रयोग करके आनन्द लेने की आदत डाल लेने में देर नहीं लगती। परन्तु बढ़ी हुई आवश्यकताओं को पूरा करने की सामर्थ्य बढ़ाना इतना सरल नहीं है।
मान लीजिए आप 15 रु0 के किराये के छोटे से मकान में रहते हैं। 50 रु0 के मकान में आपको अधिक सुख-सुविधा होगी और उसमें रहने की आवश्यकता का अनुभव करना सरल है परन्तु 50 रु0 किराया अदा करने की आर्थिक क्षमता बढ़ाना कठिन हैं। यदि आप 500) प्रतिमास के स्तर से रह रहे हैं, तो दो दिन बाद 1000 रु0 प्रतिमास के स्तर पर रहने की आवश्यकता अनुभव करना सरल है परन्तु दो दिन में 1000 रु0 की आय कर लेना असंभव है। और ज्यों ही आप अपनी आवश्यकता बढ़ा लेते हैं, आप अपने लिए दुःख का बीज बो लेते हैं। वास्तव में आज के संसार में आवश्यकता बढ़ा लेने की कोई सीमा नहीं है परन्तु धनार्जन की सीमा है। आवश्यकता के बढ़ने से एक परिणाम यह होता है कि उनकी पूर्ति के लिए मनुष्य अनुचित उपाय अपनाता है। आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार, जो कर्तव्यहीनता और घूसखोरी के रूप में बढ़ रहा है, आवश्यकता-वृद्धि का परिणाम हैं। हर एक मनुष्य अपनी बढ़ी हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए घूस लेता है। यदि वह सुकरात की भाँति कम से कम वस्तुओं से जीवन निर्वाह करने लगे तो घूस लेना ही न पड़े।
आवश्यकताओं के विषय में इतना इसलिए लिखना पड़ा है कि कम से कम आवश्यकताएँ रखना सादगी है और अधिक से अधिक आवश्यकताएँ बढ़ाना सादगी से दूर हटना है। जिस मनुष्य की कम आवश्यकताएँ है उसे उन्हें पूरा करने में उत्पादन में लगाने का अवसर मिलेगा। आज हम जब अपने चारों और आँख उठाकर देखते है, तो पता चलता है कि क्या निर्धन, क्या धनी सभी दिन रात दौड़ धूप करते नजर आते हैं दिन भर दफ्तर में काम करने के बाद यदि क्लर्क को टाइप करना आता है तो वह घर पर आते ही व्यक्तिगत टाइप का व्यवसाय करने लगता है, जिससे उसे धन मिले, आय बढ़े ओर उसकी चाय पानी और सिनेमा देखने की आवश्यकताएँ पूरी हो जाएँ। घर की स्त्रियों को भी नौकरी करने के लिए भेजने के पीछे यही भावना है। फल यह हो रहा है कि मनुष्य को पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं मिलता। लोग पढ़ने-लिखने में रुचि नहीं लेते। एक ओर अधिक से अधिक संख्या में लोग शिक्षित होते जा रहे है परन्तु दूसरी ओर उनकी शिक्षा बेकार चली जाती है क्योंकि चिन्तन मनन की ओर कोई ध्यान नहीं देता। शिक्षित जन केवल साधारण अख़बार, सस्ते विचारों से पूर्ण लेखादि या कहानी उपन्यास पढ़ते है, जिनका उनके चरित्र पर उत्तम प्रभाव नहीं पड़ता। उच्चकोटि का साहित्य, दर्शन, अर्थशास्त्र और नैतिक शास्त्र इसलिए नहीं पढ़ा जाता कि उनके पढ़ने में मानसिक श्रम करना पड़ता है, जब कि अधिकांश शिक्षित जन केवल मनोरंजन के लिए पढ़ते है। बहुत से लोग सैर-सपाटे और शृंगार की सामग्री पर धन व्यय कर देते है परन्तु अपने मानसिक विकास के लिए साल में दस-बारह रुपये भी साहित्य खरीदने में नहीं खर्च करते।
पशु की अपेक्षा मनुष्य इसीलिए श्रेष्ठ माना गया है कि वह स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ की ओर अधिक ध्यान देता है। पशु का क्रिया-कलाप केवल भोजन प्राप्त करने तक सीमित है; उसका जीवन ऐंद्रिक स्तर पर है। इसके विपरीत मनुष्य अपनी इंद्रियों के वशीभूत न होकर आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ना चाहता है। इन्द्रियों के सुख को पाने में समर्थ होने पर भी, वह उन सुखों का त्याग करता है। यदि वह आध्यात्मिकता का परित्याग करके भौतिक सुखों की मृगतृष्णा के पीछे दिन रात दौड़ता फिरता है तो वह पशु ही कहलाने का अधिकारी है। आडम्बरपूर्ण तथा विलासिता के वातावरण से घिरा जीवन पशु का जीवन है और सादा जीवन आध्यात्मिक जीवन का प्रवेश-द्वार है। सादगी को अपनाये बिना आध्यात्मिकता आ ही नहीं सकती। ईसा ने अपने भक्तों को उपदेश देते हुए कहा था कि - ऐ सज्जनों, तुम भगवान और धन के देवता की एक साथ पूजा नहीं करते।” तात्पर्य है कि धन और तद्जन्य विलासिता का त्याग किये बिना भगवान तक, जो विचारों की दुनियाँ में रहता है, पहुँच सकना असम्भव है। सादगी केवल वैरागियों, साधु-सन्तों पादरियों, मौलवियों या कुछ वर्गों के लिए ही आवश्यक नहीं है। सादगी मनुष्य मात्र का प्रथम और प्रमुख गुण है। सच तो यह है कि सादगी मनुष्यता का चरम विकास है जैसा कि हम पहले कह चुके है। यदि आज हम सादगी को अपना लें, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन शुद्ध हो सकता है, वरन उससे समाज और राष्ट्र का अपरिमित लाभ होगा। शायद इसी तथ्य को समझकर राष्ट्रपिता गाँधी ने अपने जीवन को सादगी के साँचे में ढाल कर हम भारतीयों के आगे एक अनुपम आदर्श प्रस्तुत किया था। क्या हम उन का अनुकरण करने को तैयार है?
(श्री. भारतीय योगी)
हमारे शास्त्रों में मानव-जीवन का सबसे उच्च उद्देश्य आत्मज्ञान बतलाया है। खाना-पीना सोना-जागना जीना-मरना तो सभी प्राणियों में स्वभावतः पाया जाता है। मनुष्य की विशेषतः यही है कि वह इस प्राकृतिक-जीवन में रहते हुये अन्तर-जीवन को भी विकसित करे। इसी के लिए भजन-पूजन साधन-उपासना आदि की अनेक प्रणालियाँ निकाली गई हैं, जिन के द्वारा मनुष्य को भौतिक जगत की संचालिका आत्मा शक्ति का ज्ञान हो सकता है और वह साधारण साँसारिक भोगों के संकीर्ण जीवन से ऊपर उठकर एक विशाल और उच्च जीवन-क्षेत्र में प्रवेश करने में समर्थ होता है।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए महापुरुषों ने विभिन्न प्रकार की बहुसंख्यक साधन प्रणालियाँ निर्धारित की है। इनमें सबसे प्रसिद्ध योग-साध नहीं बतलाया गया है, पर ‘योग’ की भी सोलह शाखायें हो गई हैं जो एक दूसरे से बहुत भिन्न जान पड़ती है। इनमें से कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग का नाम तो सर्वत्र प्रसिद्ध है, और गीता में भी इनका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया है। एक ही स्थान पर तीन प्रकार की प्रणालियों का उपदेश होता देखकर अनेक व्यक्ति विवाद करने लगते हैं कि इनमें से किसको अधिक उत्तम अथवा उपयुक्त माना जाय? पर जो मनुष्य इस प्रकार के वादविवाद में न पड़कर सच्चे हृदय से किसी भी प्रणाली का अनुसरण करके उसे अपने जीवन में कार्य रूप में स्थान देने लगता है, उसे कुछ ही समय में अनुभव हो जाता है कि ये सब भेदभाव बाहरी हैं ओर समस्त प्रणालियों का वास्तविक लक्ष्य एक ही है। इसी तथ्य को दृष्टिगोचर रखकर गीताकार ने कहा है-
कर्मणर्यकर्म यः प्श्येदकर्मणि चकर्म यः। स बुद्धिमान् मनुस्येषु सयुक्तः कृलन क्रमंकृत्॥4॥1॥
अर्थात् ‘जो कर्म में अकर्म (अर्थात् विश्रान्ति या शान्ति) का अनुभव करता है और अकर्म (अर्थात् शान्ति) में कर्म परायण बना रहता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वही योगी है और उसी ने सब कर्म किये हैं।”
पिछले सौ वर्षों में हमारे देश में जिन अनेक उच्चकोटि के महात्माओं का आविर्भाव हुआ है उनमें पौहारी बाबा इसी श्रेणी में थे। उन्होंने किसी विशेष प्रणाली का आग्रह न रखकर साधारण भाव से आत्म-साधन को ही अपना लक्ष्य बनाया। सबसे पहले उनके चाचा लक्ष्मी नारायण ही उनके गुरु बने और वे उनके आश्रम में रहकर विद्याभ्यास और धार्मिक नियमों का पालन करने लगे। फिर जहाँ सुविधा मिली शासकों का अध्ययन करते रहे और पन्द्रह-सोलह वर्ष की अवस्था में इन विषयों के विद्वान हो गये।
इसी समय सन्// 1913 में उनके चाचा का देहान्त हो गया, और उसके स्थान पर इनको मन्दिर और आश्रम की देख-भाल और पूजा-पाठ का भार ग्रहण करना पड़ा। वे कुछ समय तक इस कार्य को करते रहे, पर इससे आध्यात्म-मार्ग में विशेष प्रगति न होते देखकर उनका चित्त अशान्त रहने लगा। इससे एक वर्ष बाद वे अपने एक गुरु भाई को मन्दिर का भार देकर देश भ्रमण के लिये चल दिये। अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हुये जब वे गिरनार पर्वत पर पहुँचे तो वहाँ एक सिद्ध योगी से इनकी भेंट हो गई। उसने इन्हें शिष्य बनाकर योग की शिक्षा दी। वहाँ से ये दक्षिण भारत के तीर्थों की यात्रा करके दो-तीन वर्ष बाद पुनः अपने आश्रम में वापस आ गये।
अब उनका साधन-कार्य विधिवत् होने लगा। सुबह से लेकर दस बजे तक का समय वे स्नान, संध्या और पूजा-पाठ में लगाते। जब वे गंगा के जल में खड़े होकर हाथ जोड़कर स्तोत्र पढ़ते तो यही जान पड़ता कि मानों देवगण अभी उनके सामने खड़े हो जायेंगे पूजा समाप्त करके योगाभ्यास में प्रवृत्त होते और चार-पाँच घंटा तक योग की विभिन्न क्रियाएँ करते रहते। इसके पश्चात् वे स्वयं रसोई बनाकर रामचन्द्र जी की मूर्ति के सम्मुख भोग लगाते। वे पाक विद्या में निपुण थे और योग के लिए उत्तमोत्तम पदार्थ बनाते थे, पर उन सब पदार्थों को स्वयं न खाकर दीनजनों को या परिचित व्यक्तियों को बाँट देते थे और स्वयं बहुत साधारण भोजन बनाकर खाते थे। इस प्रकार कई वर्ष तक करने के पश्चात् उनको विचार आया कि इस प्रकार कई घंटे रसोई बनाने में व्यर्थ चले जाते हैं, इसलिए वह नियम धीरे-धीरे कम करना चाहिए। तब वे चाहे जब भोजन न बनाकर थोड़े से विल्वपत्र दूध के साथ उबाल कर खा जाते। या पचास-साठ मिर्च पीसकर पानी के साथ पी जाते। किसी दिन पूर्ण उपवास ही कर डालते। इस प्रकार उनका भोजन घटते-घटते नाम मात्र को रह गया।
कुछ समय पश्चात् उन्होंने आश्रम में एक गुफा बनवाई और उसमें बैठकर समाधि-योग करने लगे। अब वे कई-कई दिन तक गुफा से बाहर नहीं निकलते थे और न किसी तरह का भोजन लेते थे। इससे लोगों में उनका नाम ‘पौहारी बाबा’ (पवन का आहार करने वाला) प्रसिद्ध हो गया। उन्होंने अपनी कुटी से भी बाहर निकलना बंद कर दिया था। बाहर के स्थानों से जो स्त्री-पुरुष उनके दर्शनों के लिये आते उनके एकादशी का दिन नियत कर दिया था। इस प्रकार वे साँसारिक कार्यों से यथा संभव दूर रहकर अपना समय साधना में ही व्यतीत करने लगे।
पर इसका यह अर्थ नहीं कि पौहारी बाबा प्राचीन ढंग के एक भजनानन्दी साधु ही थे और उनको लोक कल्याण, समाज-सेवा आदि विषयों का कोई ज्ञान न था। सुप्रसिद्ध देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद जी इन पौहारी बाबा के निकट कई महीने तक रहे थे, और उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर अमरीका में भाषण देते हुये यह कहा था कि मैंने भारतवर्ष में गुरुदेव राम कृष्ण परमहंस के पश्चात् किसी अन्य महापुरुष में महान आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान के दर्शन किये तो वे पौहारी बाबा ही थे।” पर उन्होंने लोक सेवा का कोई बढ़ा कार्य सार्वजनिक रूप से नहीं उठाया तो इसका कारण यही था कि वे नम्रतावश अपने का उस योग्य नहीं मानते थे। एकबार बातचीत करते हुये स्वामी विवेकानन्द ने उनसे कहा कि “आप संसार को धर्म मार्ग दिखलाने के लिये अपनी गुफा से बाहर क्यों नहीं निकलते?” इस पर उन्होंने उस दुष्ट मनुष्य का दृष्टान्त सुनाया जिसने अपनी नाक काटे जाने पर उसी को साधना का अंग बतलाया था और धीरे-धीरे एक नकटा-सम्प्रदाय की स्थापना ही कर दी थी! उन्होंने हँसने हुये स्वामी जी से कहा कि क्या आप चाहते है कि मैं भी ऐसा ही कोई नकटा-सम्प्रदाय स्थापित कर जाऊँ? पर जब इसके बाद भी स्वामी जी उनसे सार्वजनिक जीवन में भाग लेने का आग्रह करते रहे तो उन्होंने गम्भीरता पूर्वक कहा-तुम्हारी क्या ऐसी धारण है कि केवल स्थूल शरीर द्वारा ही दूसरों की सहायता की जा सकती है? क्या शरीर के क्रियाशील हुए बिना केवल मन से दूसरे लोगों की सहायता नहीं की जा सकती?”
एक दूसरे अवसर पर जब उनसे प्रश्न किया गया कि “श्रेष्ठ ज्ञानी और सिद्ध योगी होते हुये भी आप मूर्ति पूजा ओर होम आदि क्यों करते हैं? ये कर्म तो साधना के आरम्भिक अंग ही माने जाते हैं।” तब उन्होंने कहा-क्या प्रत्येक कर्म अपने कल्याण की दृष्टि से ही किया जाता है? ज्ञानी मनुष्य भी बहुत से साधारण कृत्य दूसरों को उपदेश देने और उन्हें धर्म-मार्ग पर स्थिर रखने के उद्देश्य से किया करते है।”
इस प्रकार पौहारी बाबा अपने ढंग पर लोकोपकार और सेवाधर्म के पथिक थे। आश्रम के कार्यों की कुछ देख-रेख और बुद्धि करते हुये भी उससे पूर्णतः निस्पृह रहते थे और उनमें उसके प्रति किसी प्रकार की ममता-मोह का भाव न था। एक बार एक एक वैष्णव साधू उनके पास आकर उनकी भर्त्सना करने लगा कि ‘तुम साधू और त्यागी होकर भी आश्रम की माया में क्यों फँसे हुये हो? तुमने वैराग्य धारण करके इतनी बड़ी सम्पत्ति और सामग्री क्यों इकट्ठी कर रखी है? इस सबको मुझे देकर तुम अज्ञात रूप से कहीं चले जाओ।” पौहारी बाबा ने उसकी बात को तुरन्त स्वीकार कर लिया और अपनी कुटी की ताली चुपचाप उसे देकर रात के समय वहाँ से चल दिये। प्रातः काल जब शिष्यों तथा अन्य आश्रम वासियों ने बाबा को वहाँ न पाया तो बड़ा कोलाहल मचा ओर इस घटना का कारण उस साधू को समझकर उसे मारने-पीटने लगे। पर पौहारी बाबा का कहीं पता नहीं लगा। कई महीने बाद किसी जानकर व्यक्ति से उनकी खबर मिली और तब उनको बड़ी कठिनाई से समझा कर आश्रम में फिर से लाये।
एक बार कोई चोर उनके आश्रम में चोरी करने आया और जो कुछ मिला उसे गठरी में बाँध लिया। इतने में पौहारी बाबा जाग गये और यह देखकर चोर गठरी छोड़कर भागने लगा। ये भी गठरी लेकर चोर के पीछे दौड़े और बहुत दूर जाकर उससे क्षमा माँगी कि वे जग जाने से उसके काम में बाधक बने। वे बार-बार उससे यही प्रार्थना करते रहे कि “तुम इस सामान को ले जाओ ; यह तुम्हारा ही है।”
अपने जीवन के अन्तिम दस वर्षों में वे प्रायः एकान्त में ही रहे और इस बीच में शायद ही किसी ने उनको देख पाया हो। उनकी गुफा में दरवाजे के पीछे एक ठाक में थोड़ा आलू और मक्खन रख दिया जाता था और जब वे समाधि से उठकर ऊपर वाले कमरे में आते तो इन चीजों को ले लेते थे। कभी वे पाँच-पाँच सात-सात दिन तक गुफा से बाहर नहीं निकलते थे और भोजन सामग्री जैसे की तैसी ही रखी रहती थी। वे प्रायः रात के समय ही गुफा से निकलते थे और उसी समय आवश्यकतानुसार गंगा के उस पार जाकर कुछ योग-क्रिया भी किया करते थे। एकबार अकस्मात् किसी के आ जाने से इस क्रिया में विघ्न पड़ गया जिससे उनकी तबियत बिगड़ गई। लोगों ने अनेक बार जानना चाहा कि उनको क्या कष्ट है पर उन्होंने कुछ बतलाया नहीं। वे जीवनमुक्त स्थिति में पहुँच जाने के कारण शरीर के रहने या न रहने का कोई महत्व नहीं समझते थे और इसके लिये स्वयं चिन्ता करना या किसी अन्य को कष्ट देना उन्हें स्वीकार न था। अन्त में संवत् 1955 के ज्येष्ठ मास की सामग्री को उन्होंने अपनी कुटी के भीतर हवन कुण्ड को प्रज्ज्वलित करके अन्य सामग्री के साथ अपनी देह की आहुति भी दे दी। कितने ही लोगों के देखते-देखते उनका प्रमाण ब्रह्मरंध्र को फोड़कर बाहर निकल गया। सर्वसाधारण ने इस घटना के विषय में तरह-तरह के अनुमान लगाये और कुछ ने इस कार्य को अनुचित भी बतलाया, पर उनके सुपरिचित स्वामी विवेकानन्द ने यही कहा कि “जब पौहारी बाबा ने यह जान लिया कि उनके जीवन का अन्तिम क्षण समीप आ गया है, तो उनकी मृत्यु के पश्चात् भी उनके कारण किसी को कष्ट न हो, इसलिए उन्होंने स्वस्थ शरीर और मन से आर्योचित रीति से अपना अन्तिम संस्कार भी स्वयं ही कर लिया।”
वास्तव में महापुरुषों के चरित्र की अनेक घटनाएँ गूढ़ अर्थ रखती है और उनका रहस्य न समझ सकने के कारण सामान्य जन उनकी विपरीत आलोचना करने लगते हैं। पौहारी बाबा ने आजन्म अपना यह सिद्धान्त रखा कि दूसरों की यथाशक्ति अधिक अधिक सेवा और भलाई करते रहना, पर अपने किसी प्रकार की सेवा किसी से न करना अपने आरम्भिक जीवन में उन्होंने पर्याप्त परिश्रम करके आश्रम को उन्नति करके उसे इस योग्य बनाया कि उससे अतिथियों और आस पास वाली की सेवा की जा सके, और इसके बाद धीरे-धीरे उसकी व्यवस्था दूसरों को देकर स्वयं पृथक् होते चले गये। अंत में पूर्ण निष्क्रम भाव का उदाहरण उपस्थित करते हुये वे आश्रम या उसकी सम्पत्ति के संबंध में एक शब्द भी बोल बिना विश्व-सत्ता में लीन हो गये।
(श्री.के. कुरियाँ)
सन् 1962 की 3 फरवरी की संध्या के 5॥ बजे प्रकाश स्थिति आठ ग्रहों का मकर राशि में योग होने वाला है, जो दो दिन तक उसी प्रकार बना रहेगा। जब इतने अधिक ग्रह अपना प्रभाव एक ही क्षेत्र पर सम्मिलित रूप से डालने लगते हैं, तो इसके परिणाम स्वरूप वहाँ अनेकों ऐसी घटनायें होती हैं जो समाज, राष्ट्र और व्यक्तियों के लिए नाशकारी अथवा कष्टदायक सिद्ध होती हैं।
सन् 1961 में अगस्त की 16 तारीख (बुधवार) को दोपहर के समय (ग्रीनविच टाइम से) सूर्य सिंह राशि में प्रवेश करेगा। उस समय बुद्ध, हर्शल, राहु और प्लूटो कन्या राशि में एकत्रित होने मंगल की उन पर क्रूर दृष्टि होगी। इसके पश्चात् ही यह आठ राशियों वाला योग 3 फरवरी, 1962 को होगा। 5 फरवरी को एक खग्रास सूर्य ग्रहण भी मकर राशि में होगा जो पृथ्वी के दक्षिण भाग, जैसे फिजी आस्ट्रेलिया आदि में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। दूसरा सूर्य ग्रहण 31 जुलाई को कर्क राशि में होगा।
ज्योतिष विद्या के ग्रंथों में बतलाया गया है कि राशि-चक्र के किसी एक भाग में इस प्रकार बहुत से ग्रहों का इकट्ठा हो जाना, अथवा ग्रहण के अवसर पर उनका हानिकारक प्रभाव पड़ना मानव-जीवन के लिए अशुभ होता हैं। चूँकि मनुष्यों का संबंध घनिष्ठ रूप से समाज और राष्ट्र से रहता है इसलिए इस प्रकार की ग्रहस्थिति का प्रभाव संसार की राजनैतिक अवस्था पर अनिवार्य रूप से पड़ता है। सन्निकट में जो भी वस्तु वर्तमान है उसका कुछ भविष्य भी अवश्य होता है और ज्योतिष द्वारा हम उसको जानने का प्रयत्न करते हैं।
क्योंकि मैं निश्चित रूप से “वेदाँग ज्योति” में विश्वास रखता हूँ, इस लिए मैं राजनैतिक और व्यक्तिगत मामलों के लिए दो विभिन्न विधियों से विचार करने के पक्ष में नहीं हूँ। ‘वेदाँग ज्योतिष” के अनुसार प्रत्येक भौगोलिक प्रदेश में एक निश्चित राशि होनी है और उसी के अनुसार उसका फलाफल होता हैं ये नियम हजारों वर्ष पहले निश्चित कर दिये गये थे। मैंने भी पिछले बीस-तीस वर्षों में उनकी बारम्बार परीक्षा की है और उनको पूर्ण रूप से सत्य पाया है।
मेष राशि मुख्य रूप से इंग्लैण्ड और उसके समीप स्थित यूरोपियन देशों की शासक है। यहाँ कारण है कि महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय मामलों का नेतृत्व समय-समय पर उसी देश के व्यक्तियों द्वारा किया जाता है और जब तक पृथ्वी की धुरी में परिवर्तन होकर इंग्लैण्ड की राशि बदल नहीं जायेगी तब तक ऐसी ही स्थिति बनी रहेगी। जब कभी मेष राशि पर आघात होता है तो इंग्लैण्ड वाले लड़खड़ा जाते है, गिर पड़ते हैं, पर फिर शीघ्र ही खड़े होते है। यही बात रूस की है। आज कल पूँजीपति श्रेणी के लोग प्रायः यह कल्पना किया करते हैं कि जहाँ मित्र राष्ट्रों ने एक बम गिराया कि कम्यूनिज्म का अन्त हुआ। पर ज्योतिष का मत इसके विपरीत है। अभी सूर्य उसी कुम्भ राशि में चल रहा है, जो रूस की शासनकर्ता है। उसके प्रभाव से वे अभी दो हजार वर्ष तक वर्तमान प्रमुख पद पर स्थिर रहेगा इसके बाद सूर्य मकर राशि में आ जायेगा जो कि उत्तर भारत की शासिका मानी जाती है। सूर्य का प्रभाव अन्य ग्रहों के साथ में अशुभ हो जाता है, इस लिए रूस में घरेलू भगोड़ों के कारण समय-समय पर प्राण हानि होती रहेगी और बाहर वाले भी उसे यातनाऐं देंगे, तो भी उसकी वृद्धि होती रहेगी ओर उनकी शासन प्रणाली संसार के अनेक भागों में प्रचलित हो जायेगी।
अमेरिका की राशि मिथुन है। मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि वहाँ के लोग आगामी छः सौ वर्ष तक अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में नेतृत्व करेंगे
मनुष्य ओर मनुष्य अथवा राष्ट्र और राष्ट्र के बीच युद्ध होना प्राकृतिक नियम है और वही नक्षत्रों और ग्रहों द्वारा प्रकट होता है। यह कहना या समझना भूल है कि ग्रहों के कारण युद्ध या अन्य देवी उत्पाद होते है। अगर मनुष्य वैज्ञानिक प्रगति द्वारा प्रकृति पर विजय प्राप्त करता है तो प्रकृति युद्ध के द्वारा मनुष्य पर विजय प्राप्त करती है। जब तक संसार के सब मनुष्य मिलकर एक परिवार के रूप में संगठित न हो जायेंगे तब तक किसी भी प्रकार की उन्नति स्थायी नहीं हो सकती। मेरा मन यह है कि आकाशस्थितः ग्रहों की विभिन्नता के होते हुये भी मनुष्य का लक्ष्य संसार को एक के सूत्र में बाँधना होना चाहिए।
सन् 1961 की तीसरी तिमाही में सिंह राशि में कई क्रूर यहाँ का योग होने वाला है। यह राशि भूमध्य सागर के प्रदेश की शासनकर्ता है और इस के कारण वहाँ पर तनाव ओर अशान्ति का वातावरण उत्पन्न होगा। इंडियन नेशनल काँग्रेस की कुंडली में राहु छठे घर में है। राजनैतिक कुंडलियों में राहु को वामपन्थी अथवा कम्यूनिस्ट माना जाता है। राहु स्वभावतः क्रूरग्रह है और जब छठे घर में हो तो शत्रु बनाने उन्हें नष्ट करने, कर्जदार बनाने में समर्थ होता है। काँग्रेस वालों को इस क्रूरग्रह का प्रभाव इस प्रकार अनुभव होगा जैसे कपड़ों के भीतर कोई काटने वाला कीड़ा चल रहा हो। भूमध्य सागर की स्थिति परिणाम में भारतवर्ष के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकती है। यह घटना मिथुन राशि के तीसरे घर में होगी, इससे अमरीका को चिन्ताजनक इंग्लैण्ड की प्रतिष्ठा को घटाने वाली होगी। सिंह राशि ओर उसके स्वामी सूर्य का संबंध सुवर्ण से भी है। इस लिये हम ग्रह दशा का प्रभाव सोने ओर उससे संबंधित व्यक्तियों पर भी हानिकारक पड़ सकता है। जब हर्बल सिंह राशि में होकर मकर में जाने लगेगा तो उसका अशुभ प्रभाव भारत की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ेगा और इस संबंध में कठिनाइयों में होकर गुजरना पड़ेगा। इस समय से पाना की बिजली का स्थान एटम और सूर्य द्वारा उत्पादित बिजली लेने लगेगी और इससे उद्योग धन्धा का बहुत रूपान्तर होगा।
सिंह राशि राजवंशी शासकों पर भी आधिपत्य रखनी है, इस लिये जब उससे क्रूर ग्रहों का प्रवेश होता है तो उनका अशुभ परिणाम ऐसे मुकुट धारियों पर विशेष रूप से पड़ता है। इसी प्रकार जो ग्रहण क ग्रहों के साथ होता है उसका प्रभाव भी प्रायः देशों के बजाय उसके शासकों पर पड़ता है। इसलिये इस समय में कितने ही राजाओं ओर राजवंशी शासकों का अन्त हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
मकर राशि ‘जलचर तत्वम्’ पर अधिकार रखती है। क्योंकि शनि और मंगल कुम्भ राशि के 12 वें और मिथुन राशि के 8 वें घर में हैं, इसलिये सम्भवतः अमरीका को किसी मछली के आकार के विशालकाय अस्त्र का सामना करना पड़ेगा जो कि ऐटोमिक शक्ति से चलता होगा। अमरीका के गुप्तचर इस अस्त्र का भेद जानने का प्रयत्न करेंगे
जो भौगोलिक प्रदेश मकर राशि द्वारा शासित है, जैसे भारतवर्ष, उनमें बहुत उपद्रव और गतिरोध होगा। इस राशि चिह्न का आधा भाग तो पृथ्वी से संबंधित है और शेष आधा नदियों, झीलों, दलदलों आदि से संबंध रखता है। इसलिए इस अवसर पर पृथ्वी के स्तरों में भूकम्प आदि के द्वारा उलटफेर होने का सम्भावना है। भारत के धर्म की प्रभावना बढ़ेगी और संसार के अन्य देशवासियों से आध्यात्मिक संबंध में वृद्धि होगी। बुद्ध मकर राशि में बृहस्पति से 25 अंश के अन्तर पर रहेगा। इससे यहाँ किसी प्राचीन बहुत महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ के प्राप्त होने की सम्भावना है।
फरवरी और जुलाई के ग्रहण अशुभ फल वाले है। इसलिए मकर और कर्क राशि द्वारा शासित देशों के प्रमुख शासन कर्ताओं की मृत्यु का भय है।
मकर राशि पेड़ों के तने की सी या सिलैण्डर की आकृति की वस्तुओं का संकेत करना है। उसमें शनि, मंगल और केतु की उपस्थिति उसका धातु या प्लास्टिक से बना हुआ होना प्रकट करती है। पृष्टादय केतु बन्दूक या कारखाने की चिमनी से निकलने वाले धुएँ की सूचना करता है। क्योंकि केतु, बृहस्पति और शुक्र के बची में अवस्थित होगा इसलिए धुएँ का रंग लालिमा और नीलापन लिये होगा। इन सब बातों से इस अवसर पर एटम बम राकेटों का प्रयोग होने का पूरा भय है, जिसे निराधार नहीं कहा जा सकता।
(कोई एक)
विश्व समाज की सदस्यता
नित्य की तरह आज भी तीसरे पहर उस सुरम्य बनश्री के अवलोकन के लिए निकला। भ्रमण में जहाँ स्वास्थ्य संतुलन की, व्यायाम की दृष्टि रहती है वहाँ सूनेपन के सहचरों से, इस निर्जन में निवास करने वाले परिजनों से कुशल क्षेम पूछने ओर उनसे मिलकर आनन्द लाभ करने की भावना भी रहती है। अपने आपको मात्र मनुष्य जाति का सदस्य मानने की संकुचित दृष्टि जब विस्तीर्ण होने लगी, तो वृक्ष, वनस्पति, पशु, पक्षी, कटी पतंगों के प्रति भी ममता और आत्मीयता उमड़ी ये परिजन मनुष्य की बोली नहीं बोलते और न उनकी सामाजिक प्रक्रिया ही मनुष्य जैसी है, फिर भी अपनी विचित्रताओं और विशेषताओं के कारण इन मनुष्येत्तर प्राणियों की दुनियाँ भी अपने स्थान पर बहु ही महत्त्वपूर्ण है। जिस प्रकार धर्म, जाति, रंग प्रान्त, देश भाषा, भेष आदि के आधार पर मनुष्यों-मनुष्यों के बीच संकुचित साम्प्रदायिकता फैली हुई है, वैसे ही एक संकीर्णता यह भी है कि आत्मा अपने आपको केवल मनुष्य जाति का सदस्य माने। अन्य प्राणियों को अपने से भिन्न जाति का समझे या उन्हें अपने उपयोग की, शोषण की वस्तु समझे। प्रकृति के अगणित पुत्रों में से मनुष्य भी एक है। माना कि उसमें कुछ अपने ढंग से विशेषताएँ है पर अन्य प्रकार की अगणित विशेषताएँ सृष्टि के अन्य जीव जन्तुओं में भी मौजूद हैं और वे भी इतनी बड़ी है कि मनुष्य उन्हें देखते हुये अपने आपको पिछड़ा हुआ ही मानेगा।
आज भ्रमण करते समय यही विचार मन में उठ रहे थे। आरम्भ में इस निर्जन के जो सदस्य जीव जन्तु और वृक्ष वनस्पति तुच्छ लगते थे, महत्त्वहीन प्रतीत होते थे, अब ध्यान पूर्वक देखने से वे भी महान लगने लगे और ऐसा प्रतीत होने लगा कि भले ही मनुष्य को प्रकृति के बुद्धि अधिक दे दी हो पर अन्य अनेकों उपहार उसने अपने इन निर्बुद्धि माने जाने वाले पुत्रों को भी दिये हैं। उन उपहारों को पाकर वे चाहें तो मनुष्य की अपेक्षा अपने आप पर कहीं अधिक गर्व कर सकते हैं।
इस प्रदेश में कितनी ही प्रकार की चिड़ियाँ हैं, जो प्रसन्नता पूर्वक दूर-दूर देशों तक उड़कर जाती है। पर्वतों को लाँघती है। ऋतुओं के अनुसार अपने प्रदेश पंखों से उड़कर ही बदल लेती हैं। क्या मनुष्य को यह उड़ने की विभूति प्राप्त हो सकी है? हवाई जहाज बनाकर उसने एक भौंड़ा-सा प्रयत्न किया तो है पर चिड़ियों के पंखों से उसकी क्या तुलना हो सकती है? अपने आपको सुन्दर बनाने के लिए सजावट की रंग-बिरंगी वस्तुऐं उसने आविष्कृत की हैं पर चित्र विचित्र पंखों वाली, स्वर्ग की अप्सराओं जैसी चिड़ियों ओर तितलियों जैसी रूप सज्जा उसे कहाँ प्राप्त हुई है?
सर्दी से बचने के लिए लोग कितनी तरह के वस्त्रों का उपयोग करते हैं पर रोज ही आँखों के सामने से गुजरने वाले बरड (जंगली भेड़) और रीछों के शरीर पर जमे हुए बालों जैसे गरम ऊनी कीट शायद अब तक किसी मनुष्य की उपलब्ध नहीं हुए। हर छिद्र से हर घड़ी दुर्गन्ध निकालने वाले मनुष्य की हर घड़ी अपने पुष्पों से सुगन्धि बिखरने वाले, लाल-गुलाबों की क्या तुलना हो सकती है? साठ-सत्तर वर्ष में जीर्ण-शीर्ण होकर मर-खप करने वाले मनुष्य की इन अजगरों से क्या तुलना की जाए जो चार सौ वर्ष की आयु को हँसी-खुशी पूरा कर लेते हैं। वट और पीपल के कुछ वृक्ष तो एक हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं।
कस्तूरी मृग जो सामने वाले पठार पर छलाँग मानते रहते हैं, किसी भी मनुष्य को दौड़ में परास्त कर सकते हैं। भूरे बाघों के मल युद्ध में क्या कोई मनुष्य जीत सकता है? चींटे की तरह अधिक परिश्रम करने की सामर्थ्य भला आदमी में होगी। शहद की मक्खी की तरह फूलों में से कोन मधु संचय कर सकता है, बिल्ला की तरह रात के घोर अन्धकार में देख सकने वाली दृष्टि किसे प्राप्त है? कुत्तों की तरह घूर शक्ति आधार पर बहुत कुछ पहचान लेने की क्षमता भला किस की होगी? मछली की तरह निरन्तर जल में कौन रह सकता है? हंस के समान नीर-क्षीर विवेक किसे होगा? इन विशेषताओं युक्त प्राणियों को देखते हुये मनुष्य की यह गर्व करना मिथ्या मालूम पड़ता है कि वही संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।
आज के भ्रमण में रही विचार मन में घूमते रहे कि मनुष्य ही सब कुछ नहीं है, सर्वश्रेष्ठ भी नहीं है, सब को नेता भी नहीं है। उसे बुद्धि बल मिला, सही। उसके आधार पर उसने अपने सुख साधन बढ़ाये यह भी सही है। पर साथ ही यह भी सही है कि उसे पाकर उसने अनर्थ ही किया। सृष्टि के अन्य प्राणी जो उसके भाई ही थे, वह धरती, उनकी भी उनकी माता ही थी, उस पर जीवित रहने, फलने फूलने और स्वाधीन रहने का उन्हें भी अधिकार था ; पर मनुष्य ने सब को पराधीन बना डाला, सब का शोषण किया, सब की सुविधा और स्वतंत्रता को बुरी तरह पददलित कर डाला। पशुओं को जंजीरों से कसकर उससे अत्याधिक श्रम लेने के लिए पैशाचिक उत्पीड़न किया, उनके बच्चों के हक का दूध छीनकर स्वयं पीने लगा, निर्दयता पूर्वक वध करने उनका माँस खाने लगा। पक्षियों और जलचरों के जीवन को भी उसने अपनी स्वाद प्रियता और विलासिता के लिए बुरी तरह नष्ट किया। साँस के लिए, दवाओं के लिए, फैशन के लिए, विनोद के लिए उनके साथ कैसा नृशंस व्यवहार किया है। उस पर विचार करने से दंभी मनुष्य की सारी नैतिकता मिथ्या ही प्रतीत होती है।
जिस प्रदेश में अपनी निर्जन कुटिया है, उसमें पेड़ पौधों के अतिरिक्त, जलचर, थलचर, नभचर जीव जन्तुओं की भी बहुतायत है। जब भ्रमण को निकलते हैं तो अनायास ही उनसे भेंट करने का अवसर मिलता है। आरम्भ के दिनों में वे डरते थे पर अब तो पहचान गये हैं। मुझे अपने कुटुम्ब का ही एक सदस्य मान लिया है। अब न वे मुझ से डरते हैं और न अपने को ही उनसे डर लगता है। दिन-दिन वह समीपता और घनिष्ठता बढ़ती जाती है। लगता है कि इस पृथ्वी पर हर एक महान विश्व मौजूद है। उस विश्व में प्रेम करुणा, मैत्री, सहयोग, सौजन्य, सौन्दर्य शान्ति मनुष्य दूर है। उसने अपनी एक छोटी सी दुनियाँ अलग बना रखी है-मनुष्यों की दुनिया। इस अहंकारी ओर दुष्ट प्राणी ने ज्ञान-विज्ञान की लम्बी-चौड़ी बातें बहुत की हैं। महानता और श्रेष्ठता के धर्म और नैतिकता के लम्बे चौड़े विवेचन किये हैं। पर सृष्टि के अन्य प्राणियों के साथ उसने जो दुर्व्यवहार किया है उससे उस सारे पाखण्ड का पर्दाफाश हो जाता है जो वह अपनी श्रेष्ठता अपने समाज और सदाचार की श्रेष्ठता अपने समाज और सदाचार की श्रेष्ठता बनवाते हुए प्रतिपादित किया करता है।
आज विचार बहुत गहरे उतर गये, रास्ता भूल गया, कितने ही पशु पक्षियों को आँखें भर-भर कर देर तक देखता रहा। वे भी खड़े होकर मेरी विचारधारा का समर्थन करते रहे। मनुष्य ही इस कारण सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी नहीं माना जा सकता कि उसके पास दूसरों की अपेक्षा बुद्धि बल अधिक है। यदि बल की बड़प्पन क चिह्न हो तो दस्यु, सामन्त, असुर, दानव, पिशाच, बेताल, ब्रह्म राक्षस आदि की श्रेष्ठता को मस्तक नवाना पड़ेगा। श्रेष्ठता के चिह्न हैं सत्य, प्रेम, न्याय, शील, संयम, उदारता, त्याग, सौजन्य, विवेक, सौहार्द्र यदि इनका अभाव रहा तो बुद्धि का शस्त्र धारण किये हुए नर-पशु-उन विकराल नख और दाँतों वाले हिंस्र पशुओं से कहीं अधिक भयंकर है। हिंस्र पशु भूखे होने पर ही आक्रमण करते हैं पर यह बुद्धि धारी नर पशु तो तृष्णा और अहंकार के लिये ही भारी दुष्टता और क्रूरता निरन्तर अभियान करता रहा है।
देर बहुत हो गई थी। कुटी पर लौटते-लौटते अँधेरा हो गया। उस अंधेरे में बहुत रात गये तक सोचता रहा कि-मनुष्य की ही भलाई की, उसी की सेना की, उसी के सान्निध्य की, उसी की उन्नति की, बात जो हम सोचते रहते हैं क्या इसमें जातिगत पक्षपात भरा नहीं है, क्या यह संकुचित दृष्टिकोण नहीं है? सद्गुणों की अपेक्षा से मनुष्य को श्रेष्ठ माना जा सकता है, अन्यथा वह अन्य जीव धारियों की तुलना में अधिक दुष्ट ही है। हमारा दृष्टिकोण मनुष्य की समस्याओं तक ही क्यों सीमित रहे? हमारा विवेक मनुष्येत्तर प्राणियों के प्रति आत्मीयता बढ़ाने,उनके सुख दुःख में सम्मिलित होने के लिए अग्रसर क्यों न हो? हम अपने को मानव समाज की अपेक्षा विश्व समाज का एक सदस्य क्यों न मानें?
इन्हीं विचारों में रात बहुत बीत गई। विचारों के तीव्र दबाव में नींद बार-बार लगती खुलती रही। सपने बहुत दिखे। हर स्वप्न में विभिन्न जीवन-जन्तुओं के साथ क्रीड़ा, विनोद, स्नेह संलाप करने के हस्त दिखाई देते रहे। उन सबके निष्कर्ष यही थे कि अपनी चेतना विभिन्न प्राणियों के साथ स्वजन संबंधियों जैसी घनिष्ठता अनुभव कर रही है। आज के सपने बड़े ही आनन्ददायक थे। लगता रहा जैसे एक छोटे क्षेत्र में आगे बढ़कर आत्मा विशाल विस्तृत क्षेत्र में अपना क्रीड़ांगण बनाने के लिए अग्रसर हो रही है। कुछ दिन पहले इस प्रदेश का सुनसान अखरता था पर अब तो सुन-सान जैसी कोई जगह दिखाई ही नहीं पड़ती। सभी जगह तो विनोद करने वाले सहचर मौजूद हैं। वे मनुष्य की तरह भले ही न बोलते हों, उनका परम्पराएँ मानव समाज जैसी भले ही न हों पर इन सदाचारों की भावनाएँ मनुष्य की अपेक्षा हर दृष्टि से उत्कृष्ट ही है। ऐसे क्षेत्र में रहते हुए जी ऊबने का अब कोई कारण प्रतीत नहीं होता।
लक्ष पूर्ति की प्रतीक्षा-
आहार हलका हो जाने से नींद भी कम हो जाती है। फल तो अब दुर्लभ हैं पर शाकों से भी फलों वाली सात्विकता प्राप्त हो सकती है। यदि शाकाहार पर रहा जाए तो साधक के लिए चार पाँच घंटे की नींद पर्याप्त हो जाती है।
जाड़े की रात लम्बी होती है। नींद जल्दी ही पूरी हो गई। आज चित्त कुछ चंचल था। यह साधना कब तक पूरी होगी? पक्ष कब तक प्राप्त होगा? सफलता कब तक मिलेगी? ऐसे-ऐसे विचार उठ रहे थे। विचारों की उलझन भी कैसे विचित्र है, जब उनका जंजाल उमड़ पड़ता है तो शान्ति की नाव डगमगाने लगती है। इस विचार प्रवाह में उन भजन बन पड़ रहा था, न ध्यान लग रहा था। चित्त ऊबने लगा। इस ऊब को मिटाने के लिये कुटिया से निकला और बाहर टहलने लगा। आगे बढ़ने की इच्छा हुई। पैर चल पड़े। शीत तो अधिक था, पर गंगा माता की गोद में बैठने का आकर्षण भी कौन कम मधुर है, जिसके सामने शीत पर रवा हो? तट से लगी हुई एक विशाल शिला जलधारा में काफी भीतर तक घुसी पड़ी थी। अपने बैठने का वही प्रिय स्थल था। कम्बल ओढ़ कर सी पर जा बैठा। आकाश की और देखा तो तारों ने बताया कि अभी दो बजे हैं।
देर तक बैठे रहा तो झपकी आने लगी। गंगा का ‘कलकल हरहर’ शब्द भी मन का एकाग्र करने के लिये ऐसा ही है जैसे शरीर के लिए झूला-पालना बच्चे को झूला पालने में डाल दिया जाए तो शरीर के साथ ही उसे नींद आने लगती है। जिस प्रदेश में इन दिनों यह शरीर है वहाँ का वातावरण इतना सौम्य है कि यह जलधारा का दिव्य कलरव ऐसा लगता है मानों वात्सल्यमयी माता लोरी सुना रही हो। चित्त एकाग्र होने के लिये, यह ध्वनि लहरी, कलरव नादानुसंधान से किसी भी प्रकार कम नहीं है। मन को विश्राम मिला। चित शान्त हो गया। झपकी आने लगी। लेटने को जी चाहा। पेट में घुटने लगाये। कम्बल ने ओढ़ने बिछाने के दोनों काम साध दिये। नींद के हलके हलके झोंके आने आरम्भ हो गये।
लगा कि नीचे पड़ी शिला की आत्मा बोल रही है। उसकी वाणी कम्बल को चीरती हुई, कानों से लेकर हृदय तक प्रवेश करने लगी। मन तंद्रित अवस्था में भी उसे ध्यानपूर्वक सुनने लगा।
शिला की आत्मा बोलो-साधक क्या तुझे आत्मा में रस नहीं आता, जो सिद्धि की बात सोचता है? भगवान के दर्शन से क्या शक्ति भावना में कम रस है? लक्ष प्राप्ति से क्या यात्रा की मंजिल कम आनन्द दायक है? फल से क्या कम का माधुर्य फीका है? मिलने से क्या विरह में कम गुदगुदी है? तू इस तथ्य को समझ। भगवान तो भक्त से श्रोत-प्रोत ही है। उसे मिलने में देरी हो क्या है? जीव को साधना का आनन्द लूटने का अवसर देने के लिए ही उसने अपने को पर्दे में छिपा लिया है और झाँक-झाँक कर देखता रहता है कि मेरा भक्त, भक्ति के आनन्द में सरोवर हो पा रहा है या नहीं? जब वह उस रस में निमग्न हो जाता है तो भगवान भी आकर उसके साथ रास नृत्य करने लगता है। सिद्धि वह है जब भक्त कहता है-मुझे सिद्धि नहीं भक्ति चाहिए। मुझे मिलन की नहीं विरह की अभिलाषा हैं। मुझे सफलता में नहीं कर्म में आनन्द है। मुझे वस्तु नहीं भाव चाहिए।”
शिला की आत्मा आगे भी कहती ही गई। उसने और भी कहा-साधक सामने देख, गंगा अपने प्रियतम से मिलने के लिए कितनी आतुरता पूर्वक दौड़ा जा रही है। उसे इस दौड़ में आनन्द है। समुद्र से मिलने तो उसका कब का हो चुका, पर उसमें उसने रस कहाँ पाया? जो आनन्द प्रयत्न में हैं? भावना में है, आकुलता में है वह मिलन में कहाँ हैं? गंगा उस मिलन से तृप्त नहीं हुई, उसने मिलन प्रयत्न को अनन्त काल तक जारी रखने का व्रत लिया हुआ है। फिर अधीर साधक, तू ही क्या उतावली करता करता है। तेरे लक्ष महान है। महान उद्देश्य के लिए महान् धैर्य चाहिए। बालकों जैसी उतावली का यहाँ क्या प्रयोजन? सिद्धि कब तक मिलेगी यह सोचने में मन लगाने से क्या लाभ?”
शिला की आत्मा बिना रुके कहती ही रही। उसने आत्मा विश्वास पूर्वक कहा-मुझे देख। मैं भी अपनी हस्ती को उस बड़ी हस्ती में मिला देने के लिये यहाँ पड़ी हूँ। अपने इस स्थूल शरीर को-विशाल शिलाखंड को-सूक्ष्म अन्न बनाकर उस महासागर में मिला देने की साधना कर रही हूँ। जल की प्रत्येक लहर से टकरा कर मेरे शरीर के कुछ कण टूटते हैं और वे रजकण बनकर समुद्र की और बह जाते हैं। इस तरह मिलन का बूँद-बूँद स्वाद ले रही हूँ, तिल तिल अपने को घिस रही हूँ। इस प्रकार प्रेमी के प्रति आत्मदान का आनंद कितने अधिक दिन तक लेने का रस ले रही हूँ। यदि उतावले अन्य पत्थरों की तरह बीच जलधारा में पड़कर लुढ़कने लगती तो संभवतः कब की में लक्ष तक पहुँच जाती। पर फिर यह तिल-तिल अपने ही प्रेमी के लिए घिसने का जो आनन्द है उससे तो वंचित ही रह गई होती?”
पाप का फल भोगना पड़ता है।
प्रसिद्ध चीनी यात्री फाहियान जब बालक था तो उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक बौद्ध मठ में भेज दिया। मठ में धर्म-शिक्षा के साथ खेती भी की जानी थी और उसका कार्य मठ के निवासी हो करते थे। एक दिन फाहियान अन्य बालकों के साथ एक धान के खेत को काटने के लिए भेजा गया। जब वे धान को काट रहे थे तो कुछ चोर बल पूर्वक वहाँ घुस आये और उन्होंने बालकों को डरा कर वहाँ से भगा दिया। पर फाहियान वहाँ से नहीं हटा, थोड़ी दूर पर खड़ा होकर कुछ सोचने लगा। चोरों ने सोचा कि वह अकेला क्या कर सकता है, अतः उसकी तरफ ध्यान न देकर उन्होंने तमाम फसल काट डाली और गट्ठर बाँध कर ले जाने को तैयार हुये। यह देखकर फाहियान बोला-भाइयों आपकी आधी से अधिक अवस्था समाप्त हो चुकी है। इस प्रकार का पाप कर्म करने से परलोक से आपको क्या गति होगी? पिछले जन्म में जो पाप किये थे उनके फल से आज दरिद्रावस्था से पड़े हो। अब फिर वैसे ही कर्म करके अपने लिए विष वृक्ष क्यों बो रहे हो?” फाहियान इतना कह कर मठ की तरफ चल दिया, पर उस छोटे बालक की बातों का चोरों के मन पर इतना असर हुआ कि वे कटे हुए धान को वहीं छोड़ गये और सदा के लिए चोरी को त्याग दिया।
वीरता का सम्मान।
दक्षिण भारत में एक छोटा सा राज्य बल्लारी नाम का था। एक बार महाराज शिवाजी की सेना ने उस पर आक्रमण किया। बल्लारी के सैनिक जी जान के लड़े, पर अल्प-संख्या में होने के कारण उनकी पराजय हुई। शेष सैनिक बन्दी कर लिये गये और उन्हीं में वह की शासिका रानी मलबाई थी। वीरता का आदर करने वाले महाराज शिवाजी ने उसको सम्मान पूर्वक ला ने की आज्ञा दी। पर मलबाई को बन्दिनी दशा में यह सम्मान बुरा लगा ओर उसने शिवाजी से कहा कि-मैं तो इस सम्मान के व्यवहार को अपमान की तरह समझती हूँ। आप मुझे एक हारे हुए शत्रु के नाते मृत्यु दण्ड दें।” शिवाजी महाराज ने सिंहासन से उतर कर स्वयं उसका अभिवादन किया और कहा-आप जैसी वीर रमणियों का मैं अपमान नहीं कर सकता मेरी माता जीजाबाई का हाल ही से देहावसान हो गया है। मैं उन्हीं की वीर-प्रकृति का दर्शन आपसे कर रहा हूँ ओर अब से मैं सदैव आपको माता के समान ही मानूँगा।” मलबाई के नेत्र स्नेह वश मर आये उसने कहा-तुम वास्तव में छत्रपति हो, तुमसे अवश्य ही धर्म और देश की रक्षा होगी।”
आदर्श चरित्र बल
बुन्देलखण्ड के महाराज छत्रसाल बड़े प्रजापालक थे। वे स्वयं नगर में घूमकर प्रजाजनों से उनके सुख दुःख की बात पूछते रहते थे और यथाशक्ति सब प्रकार से उनको सुखा करने की चेष्टा करते थे। एक दिन उनकी सुन्दर और तेजस्वी मूर्ति को देखकर एक नारी मोहित हो गई और उसने उनके पास जाकर कहा-महाराज मैं बड़ी दुखी हूँ।”
महाराज के आश्वासन देने पर उसने कहा-मैं सन्तान हीन हूँ और चाहती हूँ कि मेरे आप जैसा ही पुत्र हो।”
उसके वासनात्मक कथन का सुनकर थोड़ी देर के लिए तो छत्रसाल स्तब्ध रह गये। फिर विचार कर कहने लगे-आपको मेरे समान पुत्र चाहिये, तो मैं इसके लिये प्रस्तुत हूँ। आज से आप मेरी माता हुई और मैं सदा आपका इसी प्रकार सम्मान करूँगा
कर्तव्यपालन का अपूर्व उदाहरण
भारत के अन्तिम हिन्दू-सम्राट पृथ्वीराज युद्ध क्षेत्र से घायल होकर पड़े थे। उनको इतने अधिक घाव लगे थे कि वे न तो उठ सकते थे और न खिसक सकते थे। उस समय वे मूर्छितावस्था में पड़े थे। उसी दशा में कुछ गिद्ध उनका मुर्दा समझ कर खाने के लिये आगे बड़े। महाराज के एक प्रधान सामन्त सयमराज भी पास ही घायल अवस्था में पड़े थे वे भी घावों के कारण उठ नहीं सकते थे, पर वे होश हवास में थे, जब उन्होंने गिद्ध को पृथ्वीराज की तरफ आते देखा तो उनका स्वामिनिष्ठा का भाव उमड़ पड़ा और कोई उपाय न देखकर उन्होंने अपने बगल में पड़ी तलवार उठा ली और अपना माँस काटकर गिद्धों की तरफ फेंकने लगे। गिद्ध पृथ्वीराज को छोड़कर उन्हीं टुकड़ों को खाने में लग गये। इतने में पृथ्वीराज के बचे-खुचे सैनिक उनको ढूँढ़ते हुये वहाँ आ पहुँचे। उस समय तक सयमराज मरणासन्न हो गये थे और कुछ ही क्षणों में उनके प्राण पखेरू उड़ गये। पर कर्तव्य पालन के लिए उन्होंने जो अपूर्व आत्मबलिदान किया उससे उनका नाम आज तक अमर है।
कर्तव्यनिष्ठा का पुरस्कार
बादशाह अब्बास अपने एक पदाधिकारी के यहाँ दावत में गये। वहाँ उन्होंने और सब साथियों ने इतनी मदिरा पीली कि किसी के होश हवास दुरुस्त नहीं रहे। नशे की झौंक में बादशाह खड़ा हो गया और उस पदाधिकारी के अन्नपुर की और जाने लगा। पर दरवाजे पर उस पदाधिकारी का नौकर इस प्रकार खड़ा था कि उसे हटाये बिना बादशाह भीतर नहीं घुस सकते थे। उन्होंने नौकर से कहा-अभी यहाँ से हट जा वरना मैं तलवार से मेरा सिर उड़ा दूँगा।”
नौकर ने सिर झुकाकर कहा-हुजूर मेरे देश के स्वामी है, इस लिये मैं आप पर हाथ तो उठा नहीं सकता। पर यह निश्चय है कि आप मेरी लाश पर पैर रखकर ही भीतर जा सकेंगे। पर याद रखिये कि भीतर जाने पर बेग में तलवार लेकर आपक्त मुकाबला करेगा, क्योंकि जब उनकी अज्जत पर हमला किया जायेगा तो वे अपना बचाव जरूर करेगी।”
बादशाह का नशा सेवक की खरी बातों को सुन कर ठण्डा पड़ गया ओर वे वापस चले गये। दूसरे दिन उस पदाधिकारी ने बादशाह से कहा-मेरे जिस नौकर ने कल आपके सामने बेअदबी की थी, उसे मैंने दण्ड स्वरूप अपने यहाँ से निकाल दिया है।
बादशाह ने कहा-यह तो बहुत अच्छा हुआ। मैं उसे आपसे भाग कर अपने अंगरक्षकों का सरदार बनाना चाहता था। बस अब आप उसे बुलाकर मेरे पास भेज दीजिये।” सच्चे व्यक्ति की कदर सभी जगह होती है।
न्याय रक्षा।
ईरान का बादशाह नौशेरवाँ एक दिन शिकार खेलते हुये दूर निकल गया। दोपहर का समय हो जाने से एक गाँव के पास डेरा डालकर भोजन की व्यवस्था की गई। अकस्मात् मालूम हुआ कि नमक नहीं है। इस पर सेवक पास के घर में जाकर थोड़ा सा नमक ले आया। बादशाह ने उसे देखकर पूछा “नमक के दाम दे आये?” उसने उत्तर दिया-इतने से नमक के दाम क्या दिया जाय?” नौशेरवाँ ने फौरन कहा-अब से आगे कभी ऐसा काम मत करना ओर इस नमक की कीमत इसी समय जाकर दे आओ। तुम नहीं समझते कि अगर बादशाह किसी के बाग से बिना दाम दिये एक फल ले लें तो उसके कर्मचारी बाग को ही उजाड़कर खा जायेंगे नौशेरवाँ की इसी न्याय शीलता ने उसके राज्य की जड़ जमा दी और आज भी शासकों के लिए उसका आचरण आदर्श स्वरूप माना जाता है।
साधना की सफलता का मार्ग
वैराग्य होने के पश्चात् गौतम बुद्ध ने कई वर्ष तक जंगल में रहकर बड़ा कठोर तप किया। वहाँ उनका आहार लग-भग बन्द ही हो गया था। इससे शरीर सूखकर अस्थि-चर्म मात्र रह गया था। पर इतने पर भी आत्मज्ञान नहीं हुआ और इससे उनका चित्त भ्रमित रहता था।
एक दिन गौतम के तपस्या स्थान के पास होकर नगर की कुछ गायिकाएँ निकली। वे मार्ग में एक गीत गाती हुई चली जा रही थी, जिसका आशय यह था कि-वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो, अन्यथा उनसे मधुर स्वर नहीं निकलेगा। पर उनको इतना खींचो भी मत कि वे टूट जाय।”
इस गीत की ध्वनि गौतम के कान में पड़ी तो अकस्मात उनको अपनी भूल का पता लग गया। सुफल प्राप्त करने के लिये अत्यधिक कष्टपूर्ण तपस्या उचित नहीं, वरन् संयमित आहार, विश्राम, निद्रा आदि का जीवनयापन करने से ही साधना पूरी हो सकना सम्भव है। चाहे साँसारिक लक्ष्य हो और चाहें आध्यात्मिक सफलता के लिये मध्यम मार्ग का अनुसरण करना उचित है।
श्रेष्ठ शासक की कसौटी।
सम्राट अशोक ने अपने जन्म दिवस के उत्सव के दिन घोषणा की कि “आज उस प्रांतीय शासक को पुरस्कृत किया जायेगा। जिसको गत वर्ष का शासन कार्य सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगा।”
उत्तरीय प्रान्त के शासन के कहा-मैंने अपने प्रदेश के आय को पूर्व शिक्षा तिगुना कर दिया है।” दक्षिण विभाग के शासन कर्ता ने बतलाया-पहले वर्षों की अपेक्षा मैंने दुगुना सुवर्ण राज्य कोष में जमा करने को भेजा है” पूर्व वाले अधिकारी ने निवेदन किया-मैंने अपने प्रदेश के उपद्रवकारियों का भली प्रकार से दमन करके वहाँ के शासन को सुदृढ़ बना दिया है।” पश्चिम वाले कहने लगे-मैंने प्रजा से प्राप्त होने वालों कर में वृद्धि की है, शासन व्यय को घटाया है और राजस्व को बढ़ाने की सब प्रकार से चेष्टा की है।”
अन्त में मध्य देश के अधिकारी ने उठकर कहा-महाराज मैं तो राजस्व को बिलकुल नहीं बढ़ा सका वरन् गतवर्ष पहले की अपेक्षा बचत कम रही है। पर इस बीच में प्रजा की सुविधा के लिए अनेक चिकित्सालय, धर्मशालाएँ, विद्यालय, जलाशय आदि का निर्माण कराया गया है और कुछ कष्टदायक कार्यों को भी कम कर दिया गया है।”
अशोक ने अंतिम शासनाधिकारी के कर्तव्य से प्रसन्न होकर उसे पुरस्कृत किया ओर अन्य लोगों को समझाया कि केवल आय को बढ़ाने का ध्यान रखना ही पर्याप्त नहीं है। प्रजा के सुख-समृद्धि की वृद्धि करना शासनकर्ता का सर्व प्रथम कर्तव्य है। इसी मार्ग का अनुसरण करने से हमारा राज्य स्थायी हो सकता है।
अद्वैत का अर्थ है निर्भयता
भारतीय संस्कृति के सर्वत्र अद्वैत की ध्वनि गूँज रही है। भारतीय संस्कृति में से ही अद्वैत की मंगलकारी सुगन्ध आ रही है। भारत के उत्तर में जिस प्रकार गौरी शंकर का उच्च शिखर स्थित है उसी प्रकार यहाँ की संस्कृति के पीछे भी उच्च और भव्य अद्वैत-दर्शन है। कैलाश शिखर पर बैठकर ज्ञानमय भगवान शंकर अनादि काल से अद्वैत का डमरू बजा रहे है। शिव के पास ही शक्ति रहेगी, सत्य के पास ही सामर्थ्य रहेगी, प्रेम के पास ही पराक्रम रहेगा अद्वैत का अर्थ है निर्भयता। अद्वैत का संदेश ही इस संसार के सुख सागर का निर्माण कर सकेगा। भारतीय ऋषियों ने ही संसार को अद्वैत का मन्त्र दिया है। इस मन्त्र के बराबर पवित्र अन्य कोई दूसरा नहीं है। संसार में परायापन होने का ही अर्थ है दुःख होना और समभाव होने का ही मतलब है सुख होना। सुख के लिये प्रयत्नशील मानव को अद्वैत का पल्ला पकड़े बिना और कोई पार हो सकने का उपाय नहीं है। -”भारतीय संस्कृति”
आत्मशक्ति और सफलता
आत्मशक्ति की दृढ़ता एवं सबलता सब जगह सफलता देती है। आत्मविश्वास के बिना मनुष्य में स्वावलम्बन की प्रवृत्ति ही नहीं उठती और बिना स्वावलम्बन के वह अपने को उठाने में असमर्थ रहता है। महत्त्वाकाँक्षी व्यक्ति को आत्मसत्ता में सर्वाधिक विश्वास करना चाहिए। उससे यह विश्वास होना चाहिए कि उसका जीवन निरर्थक नहीं है। उसमें कुछ विशेष शक्तियाँ है और तभी ईश्वर ने उसको मानव शरीर दिया हैं वह तुच्छ होता तो मनुष्य का शरीर न पाकर खटमल या झींगुर का शरीर पाता। यदि आँख से देखने पर हमको अपना शरीर मनुष्य जैसा दिखलाई पड़ता
12. सौन्दर्य बढ़ाने
13. पंचतत्वों से सम्पूर्ण रोगी का निवारण
14. उपवास के चमत्कार
15. कब्ज की सरल चिकित्सा
16. स्त्री रोगों की चिकित्सा
17. बाल रोगों की चिकित्सा
18. नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा
19. घरेलू चिकित्सा विज्ञान
20. सूर्य चिकित्सा विज्ञान
21. प्राण चिकित्सा विज्ञान
22. स्वप्नदोष की चिकित्सा
23. भोग का योग,
24. पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि
25. मन चाही सन्तान
26. वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ
सरल चिकित्सा विज्ञान-मू. 2
प्रमुख रोगों का रक्तदान, लक्षण, चिकित्सा, पथ्य आदि का एक अनुभवी चिकित्सक द्वारा बड़ी ही सरल रीति से यह संग्रह किया गया है।
स्वास्थ्य, सौंदर्य, दीर्घजीवन ओर
आनन्द की पथ प्रदर्शक पुस्तकें
1. स्वस्थ बनने की विद्या
2. परकाया प्रवेश
3. दीर्घजीवन के रहस्य
4. उन्नति का मूलमंत्र ब्रह्मचर्यं
5. जिन्दगी कैसे जिएँ?
6. आसन ओर प्राणायाम
7. जीव जन्तुओं की भाषा है
8. क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें?
9. दूध का आश्चर्यजनक शक्ति
10. तुलसी के अमृतोपम गुण
11. हस्तरेखा विज्ञान
12. हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?
13 मरने के बाद हमारा क्या होता है?
14. आकृति देखकर मनुष्य की पहिचान
15. आकृति पारस ओर कल्पवृक्ष की प्राप्ति
16. धन वान बनने के गुप्त रहस्य
17. मित्र भाव बढ़ाने की कला
18. चिंताओं से छूटने का मार्ग
19. दम्पत्ति जीवन का स्वर्ग
20. जीवन की महान जागरण
21. तुम तुच्छ नहीं-महान हो
22. हमारी पारिवारिक समस्यायें कैसे सुलझें?
23. हम वक्ता कैसे बनें?
24. लेखक बनने की कला
25. हिन्दू धर्म का प्रधान आधार-यज्ञोपवीत
26. मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार
कल्प चिकित्सा-मू.
दूध, कल्प, छाछ कल्प, फल कल्प, शाक आदि के द्वारा शरीर में संचित पुराने रोगों की जड़ काट देने वाली चिकित्सा पद्धति का इस ग्रन्थ में बड़ा ही खोजपूर्ण वर्णन है।
श्री, समृद्धि, सफलता और
सिद्धिदायक अलभ्य साहित्य
1. मैं क्या हूँ?
2. बिना औषधि के कायाकल्प
3. मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा
4. स्वर योग से दिव्य ज्ञान
5. ज्ञानयोग कर्मयोग भक्तियोग
6. वशीकरण की सच्ची सिद्धि
7. जीव जन्तुओं की भाषा
8. ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा?
9. क्या धर्म? क्या अधर्म?
10. गृहस्थ योग
11. यौवन चिरस्थायी कैसे हो?
12. सौन्दर्य बढ़ाने के ठोस उपाय
13. पंचतत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण
14. उपवास के चमत्कार
15. कब्ज की सरल चिकित्सा
16. स्त्री रोगों की चिकित्सा
17. बाल रोगों की चिकित्सा
18. नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा
19. घरेलू चिकित्सा विज्ञान
20. सूर्य चिकित्सा विज्ञान
21. प्राण चिकित्सा विज्ञान
22. स्वप्नदोष की चिकित्सा
23. भोग का योग
24. पुत्र की पुत्री उत्पन्न करने की विधि
25. मन चाही सन्तान
26. वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ
सरल चिकित्सा विज्ञान-मू. 2)
प्रमुख रोगों का निदान, लक्षण, चिकित्सा, पथ आदि का एक अनुभवी चिकित्सक द्वारा बड़ी ही सरल रीति से संग्रह किया गया है।
सत्य की शुभ ज्योति में कब
जब करेगा आत्म-दर्शन
विश्व में कब मुक्त-वाणी का मनोहर गान होगा,
कर स्वेच्छाचारिता की रात का अवसान होगा,
हास बिखरेगा धरा पर, मंजु स्वर्ग विहान होगा,
नन्दनोपम मोदमय उजड़ा हुआ उद्यान होगा,
खिल उठेंगे दिव्य द्यूति से
मानवों के ये मलिन मन?
कब अशान्त वसुन्धरा पर शान्ति का अवतार होगा,
अस्थिओं के जाल में फिर रक्त का संचार होगा,
दीप्तिमान विशुद्ध हेम समान यह संसार होगा,
बीच धारा में फँसा बेड़ा मनुज का पार होगा।
लोल-तन कल्लोलकारी
कब बनेगा रुद्ध जीवन?
आँसुओं की धारा में घुल-धुल न अपने दिन भरेंगे,
काँपते थर-थर न नंगे ओर भिखमंगे फिरेंगे,
भूख में बेबस पड़ कर ही न यों मानव मरेंगे,
यों न भाई भाइयों के रक्त का शोषण करेंगे।
टूट बिखरेंगे गलित हो
विश्व के ये विषम बन्धन?
सत्य की शुभ-ज्योति में कब
जग करेगा आत्म-दर्शन
-महावीर प्रसाद विद्यार्थी एम.ए., साहित्यरत्न,
*समाप्त*