गति ही जीवन प्राण

जीवन रख, गतिमान, साथी,

रुका न निर्झर, रुकी न धारा,

तूफानों को कैसी कारा?

खुद को तू पहचान, साथी,

जीवन को रख गतिमान, साथी।

बादल स्थिर कभी न रहते,

सदा पवन नौका में बहते,

इससे उनका मान, साथी,

जीवन रख गतिमान, साथी।

पत्थर स्वयं नहीं चलता है,

इससे ठोकर भी, सहता है,

होता है अपमान, साथी,

जीवन रख गतिमान, साथी।

श्वाँस के चलने में जीवन,

बिना श्वास हो जाता शव तन,

गति ही जीवन प्राण, साथी,

जीवन रख गतिमान, साथी।

(रचियता-त्रिलोकीनाथ ‘ब्रजवाल’)


साधन आवश्यक है, अनिवार्य है।

(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य की अनेक विशेषताओं में एक विशेषता यह भी है कि उसे जिस ढाँचे में ढाला जाय उसमें वह ढल सकता है। अन्य प्राणियों में यह विशेषता नहीं है। सियार, अजगर, बाज़ आदि हिंसक प्राणी अहिंसक नहीं बन सकते। गाय, हिरन, कबूतर, तितली आदि प्राणी अपनी अहिंसक प्रकृति को नहीं बदल सकते। अन्य सभी जीव जन्तु अपनी एक निश्चित प्रकृति लेकर आते हैं और साधारणतः उसी स्थिति में जीवन यापन करते हैं। किन्तु मनुष्य पर यह बात लागू नहीं होती। वातावरण परिस्थिति और प्रयत्न से उसकी प्रकृति बनती और बिगड़ती है। एक मनुष्य से दूसरा मनुष्य शारीरिक दृष्टि से सूरत शकल से तो बहुत कुछ मिलता जुलता है पर प्रकृति, योग्यता, क्षमता, गुण, स्वभाव, दृष्टिकोण आदि मानसिक परिस्थितियों में भारी अंतर देखा जाता है। एक का जीवन देवता जैसा है तो दूसरे का दानव जैसा। एक उन्नति के शिखर पर तेजी से चढ़ता चला जा रहा है तो दूसरा वतन के गर्त में द्रुत गति से गिर रहा है। एक ने पुरुषार्थ का मार्ग अपना कर अपनी शक्तियों को विकसित करके आश्चर्यजनक प्रगति की है तो दूसरा आलस्य और प्रमाद में पड़ा हुआ दीन-हीन बन रहा है।

प्रगति और पतन के अनेक क्षेत्र हैं। परिस्थितियों के आधार पर मनुष्य उनमें से किसी भी ओर अग्रसर होता है और जिस दिशा में कदम बढ़े थे उसी के अनुरूप बनता और ढलता चला जाता है। प्रयत्नों के द्वारा मनुष्य को ढाला जा सकता है, ढल सकता है। इस ढलने और ढालने की क्रिया को ‘साधना’ कहते हैं। व्यक्ति के निर्माण की विद्या को साधना कहा जाता है। इसे ही संस्कृति भी कहते हैं। ऐसा मनुष्य भी एक पशु ही है, उसमें भी सब पाशविक दुर्गुण मौजूद हैं पर साधना द्वारा संस्कृति के आधार पर उस पर संस्कार डाले जाते हैं। तभी वह संस्कृत एवं सभ्य कहलाने का अधिकारी बनता है। इसी प्रयत्न से उसकी प्रसुप्ति स्थिति में पड़ी हुई महान् विशेषताएँ विकसित होती हैं।

जैसे तैसे जीवित रहने और दिन काटने की स्थिति तो साधारण रीति से भी प्राप्त हो जाती है पर यदि किसी दिशा में प्रगति करनी हो तो प्रयत्न पूर्वक साधना का मार्ग ही अपनाना पड़ता है। ढालने और ढलने की प्रक्रिया को अपनाना पड़ता है। शारीरिक दृष्टि से उन्नति करने के इच्छुक व्यायाम की साधना करते हैं और स्थिर चित्त एवं उत्साह के साथ दीर्घकाल तक उसी ओर लगे रहे तो एक दिन अच्छे खिलाड़ी-अच्छे पहलवान, अच्छे नट और सुंदर सुडौल निरोग दीर्घायु बनने में सफल होते हैं। शिक्षा की दृष्टि से उन्नति करने के इच्छुक शिक्षालयों में प्रविष्ट होते हैं, शिक्षकों का मार्ग दर्शन ध्यान पूर्वक ग्रहण करते हैं। पाठ्यक्रम को हृदयंगम करने के लिए दिन रात पढ़ते हैं, इस प्रकार प्रयत्न करते करते वे एक दिन विद्वान् बन जाते हैं। आर्थिक क्षेत्र में प्रगति करने वाले व्यापार आदि के साधन जुटाते हैं, उनकी बारीकियों को समझने के लिए आवश्यक शिक्षण प्राप्त करते हैं, ग्राहकों को आकर्षित करने की व्यवस्था सीखते हैं। भारी दौड़ धूप करते हैं, प्रतिस्पर्धा में टिके रहने की कुशलता बरतते हैं, अपव्यय को रोकते हैं तब कहीं इस अर्थ साधना से धनवान् बनने की सिद्धि प्राप्त करते हैं।

इंजीनियर, डाक्टर, शिल्पी, मेकेनिक, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ, गायक, नर्तक, कलाकार, कवि, लेखक आदि की विशेषताएँ अनायास ही किसी को प्राप्त नहीं हो जाती, वरन इसके लिए चिरकाल तक, निरन्तर प्रयत्न करते रहना पड़ता है, तब कहीं यह सफलताएँ उपलब्ध होती हैं यदि यह प्रयत्न एवं साधन न जुटें तो इन विशेषताओं को प्राप्त कर सकना भला किसी के लिए कैसे संभव हो सकता है ?

जिस प्रकार मनुष्यों में शारीरिक दृष्टि से साधारण सा ही अंतर होता है। इसी प्रकार मानसिक दृष्टि से भी थोड़ा-सा ही अंतर है। यदि हम किसी को पतनोन्मुख देखते हैं तो इसका कारण उसकी साधना एवं साधन ही हैं। व्यक्ति गीली मिट्टी के समान है निश्चय ही वह साधनों के आधार पर, साधनाओं के आधार पर ढाला जाता है, ढलता है।

उपरोक्त भौतिक क्षेत्रों में जिस प्रकार साधना एवं साधनों की आवश्यकता होती है उसी प्रकार गुण, स्वभाव आदत, चरित्र, आचरण, आदर्श, विश्वास, भावना, दृष्टिकोण आदि मानसिक विशेषताओं के निर्माण में भी साधना एवं साधन ही प्रधान कारण है। यदि उनकी ओर उपेक्षा रखी जाय तो असंस्कृत स्थिति ही बनी रहेगी। जिनकी मनोभूमि का सावधानी पूर्वक निर्माण नहीं हुआ है, वे अपने प्रयत्नों से किसी भौतिक सफलताओं में सफल भले ही हो गये हों, आन्तरिक दृष्टि से हीन दशा में ही पड़े रहेंगे और यह हीनता उन्हें कभी भी महान् पुरुष की, सभ्य नागरिक की, श्रेष्ठ मानव की स्थिति में न पहुँचने देगी। यह अभाव मानव जीवन का सबसे बड़ा अभाव है।

साधन मानव जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है। व्यक्तित्व को किसी दिशा में ढालने का कार्य साधना द्वारा ही सम्पन्न होता है। कमाऊ और सन्देहास्पद कार्यों में ही नहीं चोरी, डकैती, जेबकट, ठगी जैसी बुराइयों में भी मंदिर बनने के लिए उन कार्यों का अनुभव एवं शिक्षण प्राप्त करना होता है, उनके लिए भी साधना ही अभीष्ट है। दिन काटने की हीन स्थिति से आगे बढ़कर किसी ने यदि भली या बुरी दिशा में कुछ प्रगति की है तो उसे उस दिशा में साधना अवश्य करनी पड़ी है। साधना ही वह कल्पवृक्ष है जिसकी छाया में मनुष्य के विविध मनोरथ पूरे होते हैं।

सुख प्राप्त करने के लिए अनेक उपकरण जुटाने में लोग व्यस्त हैं, उनके लिए साधनाएँ भी प्राप्त कर रहे हैं और सफलताएँ भी प्राप्त कर रहे हैं इससे एक क्षण के लिए लगता है कि बुद्धिमत्ता की मात्रा इन दिनों काफी बढ़ी है। पर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की ओर जन साधारण की ओर उपेक्षा देखकर दूसरे ही क्षण ऐसा लगता है मानों दूर दर्शिता का, सूक्ष्म दृष्टि का दिवाला ही निकल गया हो। मनुष्य का वास्तविक विकास उसके सद्गुणों, उच्च विचारों, श्रेष्ठ विचारों और सुदृढ़ आदर्शों पर निर्भर रहता है। यदि यह निर्माण न हुआ तो धन, पद, स्वास्थ्य, योग्यता आदि की दृष्टि से कोई व्यक्ति कितना ही बढ़ा चढ़ा क्यों न दिखे अपने आपमें सदा असंतुष्ट रहेगा और उसके संपर्क में आने वाले लोक खिन्न एवं क्रुद्ध ही रहेंगे। दुर्गुणी दुर्भावना युक्त, दुश्चरित्र, आदर्शहीन, स्वार्थी, अशिष्ट, अहंकारी, बुरी आदतों में ग्रसित, दुर्व्यसनों आलसी, प्रमादी लोग अपनी भौतिक योग्यताओं आधार पर बाहर से सफल भले ही दिखें वस्तुतः वे नितान्त असफल ही होती हैं। न तो उनका कोई सच्चा मित्र होता है और न उन्हें किसी का स्नेह सहजभाव ही प्राप्त होता है। अपने दुर्गुण उन्हीं भीतर ही भीतर बुरी तरह जलाते रहते हैं। कभी भी उन्हीं शांति और संतोष के सौभाग्य पूर्ण स्वर्गं का दर्शन नहीं होता है। उनकी अन्तः स्थिति श्मशान की तरह दुर्गन्धित धुएँ से भी भरी और सुलगती सी बनी रहती है। ऐसे लोग यदि बाहरी दृष्टि से कुछ सफल भी हों तो वह सफलता किस काम की ?

आन्तरिक क्षेत्र का असंस्कृत, अव्यवस्थित पड़ा रहना, उनमें दुर्भावनाओं और पतित आदर्शों के झाड़ झंखाड़ उपज पड़ना सब दृष्टियों से दुर्भाग्य पूर्ण है, इन परिस्थितियों में पड़ा हुआ मनुष्य व्यक्तिगत से कभी भी सुख शांति, आनन्द, उल्लास एवं संतोष का अनुभव नहीं कर सकता। इस अभाव के रहते हुए उनकी सारी सफलताएँ और उपार्जित सम्पदायें एक प्रकार से व्यर्थ ही रहती हैं।

सामाजिक दृष्टि से विचार किया जाए तो भी अविकसित, असंस्कृत एवं पतित मनोभूमि के लोग समाज के लिए कलंक, मानवजाति के अभिशाप और राष्ट्र के लिए भार रूप ही हैं। किसी भी देश और समाज की वास्तविक सम्पदा उसके सभ्य नागरिक एवं उच्च आदर्श वाले महापुरुष ही होते हैं। उन्हीं से किसी देश का इतिहास बनता और गौरव बढ़ता है। शांति और सुव्यवस्था भी ऐसे ही लोगों से स्थिर रहती है। पर यदि समाज में बेईमान, निकम्मे, भ्रष्टाचारी, स्वार्थी लोगों की भरमार हो जाय तो फिर उसकी दुर्गति होना निश्चित ही है। कानून और शासन के द्वारा व्यक्ति की आन्तरिक दृष्टता पर अंकुश कहाँ तक लगेगा? न्याय और शासन का कार्य भी तो वे असंस्कृत मनोभूमि के लोग ही जब चलाने वाले हैं तो उनके द्वारा भी कब, कुछ बचने वाला है। सामाजिक पतन को कानूनों के बल पर प्रजातन्त्र व्यवस्था में नहीं रोका जा सकता। निरंकुश अधिनायकवाद में अत्यंत कठोर दंड व्यवस्था का आतंक स्थापित करके भले ही उन हीन मनोभूमि के लोगों को किसी हद तक काबू में रखा जा सके पर स्वाभाविक सद्भावना का पुण्य प्रसाद तो तब भी परिलक्षित न होगा।

वैयक्तिक और सामूहिक सुख शांति की सच्ची स्थापना सदाचार से ही संभव है और वह सदाचार स्वभावतः तो किसी विरले को ही प्राप्त होता है। साधना और साधनों से ही उसे उत्पन्न करना पड़ता है। प्राचीन काल में इस ओर अत्यधिक ध्यान दिया जाता था। उस समय यह भली भाँति समझा जाता था कि सद्गुणों और उच्च आदर्शों की मनोभूमि बने बिना कोई व्यक्ति न तो अपने आपमें सुखी रह सकता है और न समाज की सुव्यवस्था में कोई योग दे सकता है, इसलिए सबसे पहले सबसे आवश्यक कार्य यह समझा जाता था कि व्यक्ति को आन्तरिक दृष्टि से सुसंस्कृत बनाया जाय, उसकी मनोभूमि को श्रेष्ठ संस्कारों में संस्कारित किया जाए। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए आस्तिकता और धार्मिकता के दो माध्यम प्रयुक्त किये जाते थे। भारत के प्रत्येक नागरिक को धार्मिक एवं आस्तिक बनने के लिए साधना करनी पड़ती थी। आत्म निर्माण के लिए साधना करनी पड़ती थी। आत्म निर्माण की यह साधना जीवन का सर्वश्रेष्ठ, सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य माना जाता था। जब तक यहाँ प्रक्रिया भारतवर्ष में चलती रही यह प्रत्येक क्षेत्र में महानता का, उत्कृष्टता का, समृद्धि और सफलता का बोल बाला रहा। अब उस दिशा में जितनी ही उपेक्षा होती है, उतनी ही अशान्ति और अव्यवस्था बढ़ती जा रही है। प्राचीन गौरव की तुलना में हम दिन दिन नीचे उतर रहे हैं।

मनुष्य की शारीरिक भूख इन्द्रिय विषयों से, सत्ता, प्रद, धन, अहंकार, शृंगार, विलासिता आदि के आधार पर पूर्ण हो सकती है, पर इन सबसे जो सुख मिलेगा वह ऊपरी ही रहेगा। कुछ ही समय ठहरेगा आत्मिक भूख की तृप्ति उन विचारों और कार्यों से ही संभव है जो आत्म संतोष देने वाले हैं। सद्विचारों, सद् भावों, सद्गुणों, सत्कर्मों की मात्रा जितनी अधिक होगी उतना ही आत्म संतोष बढ़ेगा। आत्म तृप्ति के लिए किये गये यह प्रयत्न ब्रह्म जीवन में भी एक अद्भुत सरसता का संचार करते हैं। सत् प्रवृत्तियों से मनुष्य का व्यवहार आर आचरण दूसरों के लिए सुखदायक होता है। सद्गुणी व्यक्ति अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य की भाँति ही बाहर के सब लोगों के साथ भी सौजन्य पूर्ण व्यवहार करता है। उसकी प्रतिक्रिया स्वभावतः लोगों के प्रेम, सद् भाव एवं सम्मान के रूप में उपलब्ध होती है। लोग उसके आचरण से प्रभावित होकर अनायास ही सद् भाव रखने लगते हैं और उसे अपने चारों ओर प्रेम एवं सौजन्य का समुद्र लहराता दीखता है। यही अनुभव यही लाभ जीवन का सर्वश्रेष्ठ अध्यात्मिक लाभ है। उसके बिना जीवन सर्वथा नीरस ही रहता है।

परस्पर स्नेह, सद् भाव, सौहार्द्र और सहयोग होने पर जीवन में जो रस, आनन्द और उल्लास रहता है वह इनका अभाव होने पर अपार वैभव द्वारा भी नहीं मिल सकता। इस वस्तुस्थिति की समझ कर हमारे पूर्वज सदा व्यक्ति के सद्गुणों और उच्च आदर्शों को पुष्ट करने पर जोर देते रहे। इसी के लिए आध्यात्मिकता का, धार्मिकता का विशाल ढाँचा खड़ा किया था। गुरुकुलों में छात्रों का जो शिक्षण होता था उससे सत्प्रवृत्तियों के विकास एवं पोषण की ही साधना उनसे कराई जाती थी। वर्णाश्रम धर्म, षोडश संस्कार, व्रत, पर्व, त्यौहार, तीर्थ, कथा, कीर्तन, अनुष्ठान, तप, संयम आदि की पृष्ठ भूमि, व्यक्ति की मनोभूमि को उच्च स्तर की ओर अग्रसर करती ही हैं।

खेद की बात है कि जहाँ भौतिक विकास के लिए इतने प्रयत्न हो रहे हैं वहाँ मनुष्य की अन्तः भूमि के परिष्कार की दिशा में सर्वत्र उदासीनता और उपेक्षा दिखाई देती है। इस अवस्था के रहते उन्नति के लिए प्रयत्न असफल ही रहेंगे। धन और शिक्षा की दृष्टि से यदि लोग सम्पन्न भी हुए तो उनसे आन्तरिक दुर्गुणों के रहते कोई सत्परिणाम निकलने की संभावना नहीं है। सम्पन्नता मिलने पर तो दुर्गुणी के दुर्गुण और भी अधिक बढ़ते हैं और वह अपेक्षाकृत और भी अधिक विपत्ति में फँस जाता है।

मनुष्य की आत्मा में अनन्त सत तत्त्व सन्निहित हैं। उसको कुरेदना और बढ़ाया जाना चाहिए। सम्पन्नता की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्न हो रहे हैं वे सराहनीय हैं पर साथ ही मानवीय महानता के उत्थान को भी ध्यान में खा जाना चाहिए। यह आत्म निर्माण की साधना का कार्य अत्यन्त ही उपयोगी एवं आवश्यक है। शुष्क उपदेशों के द्वारा तो यह कार्य बनने वाला नहीं है। इसके लिए साधना का मार्ग उसी प्रकार अपनाना पड़ेगा जिस प्रकार धन, स्वास्थ्य, विद्या, यश आदि की प्राप्ति के लिए सुनिश्चित प्रयास करना पड़ता है।

साधना के नाम पर आज देवी देवताओं की पूजा पाठ का कर्मकाण्ड शेष रह गया है। यह अपूर्ण है। देवान् भी आत्म साधना का एक अंग है पर वही सब कुछ नहीं हैं। दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा कर अपने अंदर की असुरता को समाप्त करने और सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण करके अन्तः भूमिका में देवताओं जैसे स्वर्गं सोपान की स्थापना करने का वैज्ञानिक प्रयास ही साधना का वास्तविक उद्देश्य है। ऐसी ही साधना प्राचीनकाल में होती थी आज भी आत्म निर्माण की दृष्टि से, वैयक्तिक ओर सामूहिक सुख-शान्ति की दृष्टि से ऐसी ही साधना की आवश्यकता है। साधना के साथ ही हर क्षेत्र की सफलता जुड़ी हुई है। आत्म निर्माण की सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी हमें साधना का ही मार्ग अपना पड़ेगा। जीवन लक्षण की सफलता अभीष्ट हो तो साधना आवश्यक है, अनिवार्य है, यह तथ्य स्वीकार करना ही होगा।


साधना की महानता

आध्यात्मिक साधनाओं का मूल उद्देश्य आत्म निर्माण है। जीवन की सारी समस्याओं का उलझना-सुलझना बहुत कुछ मनुष्य की आन्तरिक स्थिति पर निर्भर रहता है। यों कभी-कभी कठिन प्रारब्ध भोग भी मार्ग में विघ्न बाधा बनकर अड़ जाते हैं और हटते-हटते बहुत परेशान कर लेते हैं, पर आमतौर से जीवन की गति विधि व्यक्ति की अपनी निजी मनोभूमि पर आधारित रहती है।

जिसे क्रोध आता है उसे सब कोई अपने प्रति पक्षी, दुष्ट और झगड़ालू दीखते हैं। जिसके मन में ईर्ष्या और द्वेष के प्रबलता है उसे सर्वत्र शत्रु और दुष्ट ही दिखलाई पड़ते हैं। आलसी को सब कार्य कठिन और सफलता के मार्ग में चारों ओर भारी विघ्न उपस्थित लगते हैं। विषय विकारों से जिसकी दृष्टि दूषित हो रही हैं उसे हर कोई व्यभिचारी लगता है। जिनकी प्रकृति अविश्वासी और छिद्रान्वेषी बन गई है उन्हें हर कोई संदिग्ध, धूर्त और दोषी प्रतीत होता है। डरपोक को चारों ओर से अपने ऊपर आपत्तियाँ मंडराती लगती रहती है। पतित दृष्टिकोण के लोगों को इस संसार में केवल पाप, पतन, छल, शोषण आदि दुष्प्रवृत्तियों का बोलबाला दृष्टिगोचर होता है। माना कि संसार में अनेक बुराइयाँ मौजूद हैं और उनकी मात्रा भी बहुत है पर इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि यहाँ बुराई के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। निश्चित रूप से इस धरती पर बुराई की अपेक्षा भलाई कहीं अधिक है। पाप की अपेक्षा पुण्य की मात्रा ज्यादा है, कठिनाइयों से सुविधाएँ अधिक हैं, दृष्टता से सज्जनता बढ़ी चढ़ी है। यदि ऐसा न होता तो यह दुनिया इस योग्य न रहती कि परमात्मा का पुत्र आत्मा यहाँ अवतार लेता और मृत्यु की अपेक्षा जीवन को अधिक प्यार करता।

प्याज खा लेने पर मुँह से बदबू आती है, नशा पी लेने पर पागलपन छा जाता है, सनाय खा लेने पर दस्त होने लगते हैं। विषपान करने वाले के सामने मृत्यु की विभीषिका उपस्थित हो जाती है। इसी प्रकार जिनकी मनोभूमि असंस्कृत, पतनोन्मुख निम्न स्तर की एवं उलझन भरी है उनका ब्रह्म जीवन निश्चित रूप से अस्त व्यस्त रहेगा। जितनी कुछ साधन सामग्री प्राप्त है वह सभी अपर्याप्त और दोष पूर्ण लगेगी। जितने व्यक्ति अपने साथ में किसी संबंध सूत्र में बँधे हैं वे सभी बुराइयों और बदमाशियों से भरे लगेंगे। जो भी परिस्थिति प्राप्त है वे सभी दुर्भाग्य पूर्ण प्रतीत होंगी। इस प्रकार का अनुभव करते रहने वाला न तो कभी सुखी रह सकता है और न सन्तुष्ट, उसे खिन्नता झुँझलाहट परेशानी और जलन ही घेरे रहेगी।

स्वार्थी दृष्टिकोण वाला व्यक्ति सदा अपना ही मतलब प्रधान रखेगा। दूसरों के न्यायोचित स्वार्थों को भी धक्का पहुँचा कर अपना स्वार्थ सिद्ध करेगा। ऐसे लोगों के प्रति भला किसके मन में श्रद्धा और सम्मान के भाव उठेंगे। जिसने दूसरों के प्रति कभी सेवा और सहयोग का व्यवहार नहीं किया उसे अपने प्रति किसी उपकार की क्या आशा करना चाहिए? कृतघ्न व्यक्ति जो दूसरों के उपकार और अहसान को तुरंत भुला देते हैं किसी में सज्जनता की झाँकी किस प्रकार कर सकेगा? कृतज्ञता और प्रत्युपकार की उच्च भावनाएँ उसके मन में कैसे उठेंगी? निष्ठुर, निर्दय ओर क्रूर व्यक्ति दया और करुणा की स्वर्गीय अनुभूति कहाँ कर पायेगा? अहंकार में जो डूबा रहता है, उसे नम्रता, विनय, शिष्ट और सभ्य व्यवहार करने की मधुरता का अनुभव क्या होगा? खुदगर्ज व्यक्ति के लिए निस्वार्थता का दिव्य रस आस्वादन कर सकना प्रायः असम्भव ही है।

जिसने अपनी मनोभूमि को सुसंस्कृत बनाने की साधना नहीं की, जिसके मन में केवल पाशविक संस्कार ही भरे पड़े हैं उसके लिए परमात्मा की पुनीत वृत्ति यह दुनियाँ-दुर्गन्धि भरे जलते हुए श्मशान के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हो सकता है ऐसे लोगों को पूर्व पुण्यों से, चतुरता और पुरुषार्थ से भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त हुआ हो, पर क्या इतने मात्र से सुख-शान्ति प्राप्त हो सकती है? भौतिक सम्पदाएँ केवल झंझट बढ़ा सकती हैं, जिम्मेदारियों और चिन्ताओं के बोझ से लाद सकती हैं, थकान और झुँझलाहट दे सकती हैं पर शांति और संतोष में इनसे कण भर भी वृद्धि न होगा। आन्तरिक स्थिति का, मनोभूमि का परिष्कार ही एक मात्र वह उपाय है जिससे बाहर की हर वस्तु और हर परिस्थिति अनुकूल बन सकती है। बेशक, इस दुनिया में ऊबड़ खाबड़ भी बहुत है पर जिसने अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित और सुसंस्कृत बना लिया है। उसके लिए अवांछनीय तत्त्वों की अशुभ प्रतिक्रिया से अपने को बचाये रखना बहुत हद तक संभव है। जिसको सोचने का तरीका सही है, जिसके विचार और आदर्श उच्चस्तर के हैं वह अनायास ही इस संसार के दिव्य तत्त्वों को, सज्जनता को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है और इसके सहयोग से लाभान्वित होकर मानव जीवन की सरसता का बहुत कुछ अनुभव कर सकता है।

जीवन में उपस्थित अधिकांश कठिनाइयाँ ऐसी होती हैं जिनमें समाज या दूसरे व्यक्तियों द्वारा उपस्थिति कठिनाइयों की अपेक्षा अपनी निज की भूल एवं अशुद्ध दृष्टि ही प्रमुख कारण होती है। स्वास्थ्य बिगड़ रहा है-क्या इसमें अपना आहार बिहार की मर्यादाओं का उल्लंघन एवं असंयम का कोई कारण नहीं रहा है? निश्चय ही यदि स्वास्थ्य के नियमों पर दृढ़ता पूर्वक चला गया होना तो अस्वस्थता का जो दुःख आज भोगना पड़ रहा है, न भोगना पड़ता।

आर्थिक तंगी परेशान कर रही है-क्या इसमें अपनी फिजूल खर्ची और उपार्जन में उपेक्षा कारण नहीं है? चूँकि दूसरे अधिक आमदनी वाले लोग अधिक खर्च करते हैं तो हमें भी उनकी नकल करके वैसे ही शान बनायें, इस प्रकार से सोचना और अपनी हैसियत से अधिक खर्च करना कहाँ तक उचित है? जब कि हमसे कम कमाने वाले गरीब लोग भी अपनी हैसियत के अनुरूप बजट बनाते और उसी में संतोष तथा व्यवस्था पूर्वक कार्य चलाते हैं तो हम वैसा क्यों नहीं कर सकते? जब अन्य लोग हमारी अपेक्षा अधिक परिश्रम अधिक दौड़ धूप करके, शान और शेखी की परवा न करके हलके समझे जाने वाले काम भी प्रसन्नता पूर्वक करते हैं और अपने उचित खर्चों के लायक कमा लेते हैं तो हम आलस और शान शेखी की आड़ लेकर बढ़िया अवसर की प्रतीक्षा में क्यों बैठे रहें? यदि हमारा आर्थिक दृष्टि कोण सही हो, उपार्जन और व्यय के संबंध में समुचित सावधानी रहे तो ऋणी होने का आर्थिक तंगी पड़ने का कोई कारण नहीं रह जाता। यह तंगी हम अपनी ही दुर्बलताओं के कारण पैदा करते हैं और उनमें सुधार भी तभी होता है जब हमारी अपनी आदतें सुधारती है।

कोई सच्च मित्र नहीं दीखता, शत्रुओं की संख्या बढ़ती जाती है-क्या इसमें अपनी असहिष्णुता, कृतघ्नता, स्वार्थ परता, अशिष्टता, रूखापन आदि का कोई दोष नहीं है? जो लोग दूसरों से मित्र भाव रखते हैं वे हमारे प्रति शत्रुता क्यों बरतते हैं, इस पर यदि कोई गंभीरता से विचार करे और बारीकी से आत्म निरीक्षण करे तो सहज ही यह पता चल जाएगा कि अपने अंदर भी कुछ ऐसे दोष हैं जो लोगों की दुष्टता को उभारने में बहुत हद तक सहायक होते हैं। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में मधुरता की आवश्यक मात्रा का समावेश कर रखा है वे दुर्जनों में भी रहने वाली थोड़ी सज्जनता को उभार लेते हैं और उन से भी बहुत कुछ ऐसे लाभ उठा लेते हैं जैसे मित्रों से प्राप्त होते हैं। यह तथ्य यदि समझ में आ जाए और मनुष्य अपने स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन कर ले तो मित्रों की कभी और शत्रुओं की अधिकता वाली कठिनाई बहुत हद तक हल हो सकती है।

घर में क्लेश रहता है, स्त्री, पुत्र कहना नहीं मानते, द्वेष और दुर्भाव बढ़ रहा है-क्या इसमें अपना अनावश्यक मोह, अनुचित नियंत्रण, डाँट डपट कटु भाषण प्यार से समझाने की उपेक्षा, आवश्यक प्रेम की कमी, न्यायोचित व्यवस्था की कमी, गुणों की प्रशंसा करने में कंजूसी आदि हमारा कोई दोष कारण नहीं है? हो सकता है कि हमारे परिवार के लोग अपेक्षाकृत कुछ अधिक असंस्कृत हों और उनकी बुराइयों औरों से अधिक बढ़ी चढ़ी हों। पर इसमें गृह संचालक का भी कुछ न कुछ दोष अवश्य रहता है। यदि आरंभ से ही उसने अपने में गृह संचालक के उपयुक्त आवश्यक गुण उत्पन्न कर लिये होते तो परिस्थिति उस सीमा तक न बढ़ती जितनी कि आज प्रतीत होती है। आज भी इन परिस्थितियों में भी यदि अपनी कुछ आदतों और दृष्टि दोषों को सुधार लें तो अभी भी बहुत कुछ सुधार हो सकता है और गृह क्लेश की समस्या अपने विकराल रूप से सिमट कर बहुत छोटी रह सकती है।

ऊपर की पंक्तियों में कुछ थोड़ से प्रश्नों पर विचार किया गया है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ऐसी अगणित समस्याएँ हैं जिनसे घिरा हुआ मनुष्य सदा अशान्ति एवं असंतोष का अनुभव करता रहता है। प्रयत्न यह होता है कि परिस्थितियाँ बदल जाये पर कोई यह नहीं सोचता कि इन प्रतिकूलताओं की जड़ अपने अंदर है। आवश्यक हेर फेर करने का वही स्थान है। उसे संभाला जाय और सुधारा जाय तो बाहर की गुत्थियाँ सुलझे। अपने को निर्दोष और दूसरों को दोषी मानने की प्रवृत्ति अब हर व्यक्ति में बहुत बढ़ चली है। सारा दोष दूसरों के मत्थे मढ़कर अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए हर कोई तत्पर दीखता है। आत्म निरीक्षण व्यर्थ लगता है। कोई दूसरा अपने दोष बताता है तो उस पर झुँझलाहट आती है। ऐसी स्थिति के रहते भला यह कैसे आशा की जा सकती है कि कोई समस्या स्थायी रूप से हल हो जाय। दूसरों को सुधारना, अपनी मन मर्जी का बना लेना कठिन है, सब प्रतिकूलताएँ अपनी अनुकूल हो जाय यह भी असंभव है। प्रयत्न करने से व्यक्तियों, वस्तुओं और परिस्थितियों में थोड़ा सुधार हो सकता है पर अधिक सुधार तो अपने दृष्टिकोण एवं स्वभाव में ही करना पड़ेगा। बाहरी समस्याओं की कुँजी अपने अंदर है। ताली से ही ताला खुलता है, अपने सुधार से ही संसार सुधरता है। दुनियाँ भर में बिखरे हुए काँटे हटा देना कठिन है पर पैरों में जूते पहनकर उनसे अपनी रक्षा सुगमता पूर्वक की जा सकती है।

वैयक्तिक जीवन की अगणित समस्याओं का हल मनुष्य को अपनी विचारधारा, भावना, आदर्शवादिता, स्वभाव, आदत एवं अभिरुचि के संबंधित हैं। सामाजिक समस्याएँ भी व्यक्तिगत समस्याओं का ही सम्मिलित रूप है। जिस समाज में जिस मनोभूमि के व्यक्तियों का बाहुल्य होता है वह समाज भी उसी रूप में दिखाई पड़ता है। हमारे समाज में आज अनेकों बुराइयाँ, दृष्टिगोचर होती हैं, बाल-विवाह वृद्ध विवाह, कन्या विक्रय, वर विक्रय, नशेबाजी, माँसाहार, छुआछूत, मृत्युभोज, भूत पलीत आदि कितनी ही कुरीतियाँ प्रचलित हैं। जुआ, चोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, शोषण, आक्रमण आदि अनैतिकताऐं भी पनप रही हैं। देखने में यह सामाजिक दोष मालूम पड़ते हैं। पर वस्तुतः यह भी व्यक्तिगत दुर्बलताओं की ही प्रतिक्रिया हैं। फूट, विसंगठन, कायरता, सामूहिकता का अभाव, देश भक्ति एवं राष्ट्र भक्ति की कमी के कारण हमारा धर्म समाज एवं राष्ट्र कमजोर होता जाता है। इन बुराइयों के लिए भी व्यक्ति ही दोषी है राष्ट्र या समाज कोई अलग चीज नहीं, वह तो व्यक्तियों की सामूहिक स्थिति ही है। व्यक्तियों का आन्तरिक स्तर यदि सुव्यवस्थित हो तो राष्ट्रीय चरित्र एवं सामाजिक गठन स्वयमेव उत्कृष्ट रहेगा। जो लोग सामाजिक उत्थान एवं राष्ट्र निर्माण की बात सोचते हैं उन्हें यह बात भली प्रकार हृदयंगम कर लेनी चाहिए कि देश के नागरिकों के स्वभाव चरित्र और दृष्टि कोण को बदलना ही इसका एक मात्र उपाय है। इस तथ्य की उपेक्षा करके अन्य उपाय, चाहे वे कितने ही व्यवहार्य एवं विशाल क्यों न हो कदापि अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति न कर सकेंगे।

व्यक्ति निर्माण का कार्य क्या भाषणों और लेखों द्वारा सम्पन्न हो सकेगा? यह एक विचारणीय प्रश्न है। आज हर काम के लिए यही दो उपाय काम लाये जाते हैं। सामान्य जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से लेखों और भाषणों की भी एक सीमा तक आवश्यकता हो सकती है, पर इतने से ही काम न चलेगा इसके लिए रचनात्मक उपाय अपनाने पड़ेंगे। धार्मिकता और आस्तिकता का अन्तःकरण में प्रवेश होने से ही उन आदर्शों के प्रति निष्ठा बढ़ सकती है जो व्यक्ति की पाशविक दुष्प्रवृत्तियों का समाधान और दैवी सत्प्रवृत्तियों का उत्थान कर सकें। यही साधना है। साधना, मानव जीवन की प्रत्येक गुत्थी को सुलझाने वाली, प्रत्येक कठिनाई को समाधान करने वाली मानी जाती है। यह मान्यता असत्य नहीं है। आत्मा पर छाये हुए मल विक्षेपों को जो साधना हटा सकती है वह सुख शांति की प्रगति और उन्नति के द्वारा भी खिल सकती है। आत्म निर्माण की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था ही साधना के नाम से पुकारी जाती है। आत्म निर्माण कार्य किसी विशाल कार्यालय या कारखाने के निर्माण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस महान् कार्य को सम्पन्न करने वाली पद्धति साधना की महानता स्वल्प नहीं महान् ही है।


आत्म-निर्माण का पुण्य-पथ

आज साधना का अर्थ केवल भजन-पूजन समझा जाता है और किसी देवी देवता से कुछ सिद्धि वरदान प्राप्त करना या परलोक में मुक्ति का अधिकारी बनना उसका उद्देश्य माना जाता है। साधना के अंतर्गत यह बात भी आती है, पर उसका क्षेत्र इतना ही नहीं-इससे कहीं अधिक विस्तृत है। भौतिक और आध्यात्मिक ही है।

साधना से हमारे अन्तःप्रदेश का ऐसा शोधन ,परिष्कार एवं अभिवर्धन होता है जिसके फलस्वरूप सर्वतोमुखी उन्नति का स्वर्गं द्वार खुले और जो विघ्न बाधाएँ प्रगति का मार्ग रोकते हैं उन्हें हटाया जा सकें? पिछले पृष्ठों पर लौकिक समस्याओं के सुलझाने में साधना किस प्रकार सहायक होती है इस तथ्य पर कुछ प्रकाश डाला गया है।

स्वाध्याय और सत्संग, चिंतन और मनन यह चार उपाय अपनी अन्तःभूमि के निरीक्षण, परीक्षण करने, त्रुटियों एवं दोषों को समझने तथा कुविचारों को त्याग कर सत्प्रवृत्तियों अपनाने के है। यह चार उपाय भी साधना के ही अंग हैं। जीवन समस्याओं को सुलझाने में सहायक सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना हर विचारशील धर्मप्रेमी व्यक्ति का एक दैनिक नित्यकर्म होना चाहिए। आज किन्हीं पौराणिक कथा ग्रन्थों या आज हजारों लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति के अनुरूप मार्ग दर्शन करने वाले संस्कृत ग्रन्थों का बार-बार पढ़ना ही स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है। आज हमें ऐसी पुस्तकों के स्वाध्याय की आवश्यकता है जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकें। प्रत्येक युग में सामयिक ऋषि उत्पन्न होते हैं ओर वे देश काल पात्र के अनुरूप जन शिक्षण करते हैं। आज के युग में गाँधी, विनोबा, दयानंद, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, तुकाराम, कबीर आदि संतों का साहित्य जीवन निर्माण की दिशा में बहुत सहायक हो सकता है। आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास का जो विवेचनात्मक सत्साहित्य मिल सके हमें नित्य नियमित रूप से पढ़ते रहना चाहिए। स्वाध्याय की दैनिक आदत इतनी आवश्यक है कि उसकी उपेक्षा करने से आत्मिक प्रगति के मार्ग में प्रायः अवरोध ही पैदा हो जाता है।

सत्संग का अर्थ है सम्भ्रान्त, आदर्श चरित्र तत्त्वदर्शी मनीषियों की संगति सान्निध्य और शिक्षा का अवगाहन। ऐसे मनीषी आज बहुत ही कम हैं। जो हैं वे कार्य व्यस्त रहने के कारण व्यक्तिगत सत्संग के लिए समय नहीं दे पाते। ऐसी दशा में आत्म निर्माण संबंधी प्रवचनों की जहाँ व्यवस्था हो वहाँ पहुँचा जा सकता है। महापुरुषों के ग्रन्थ भी सत्संग का काम दे सकते हैं। वे मनीषी भले ही हमसे दूर हों या स्वर्गवासी हो चुके हों तो भी उनके विचार उनके लिखे ग्रन्थों में सदा प्रस्तुत मिलेंगे और वे हमें सत्संग का लाभ देते रहेंगे। आज सत्संग के नाम पर निराशावादी, भाग्यवादी, पलायनवादी, अतिवादी विचारधारा देने वाले साधु, बाबाजी बहुत हैं, इन विचारों से भ्रम जंजाल ही बढ़ता है। और उसके प्रभाव से व्यक्ति एक प्रकार से निकम्मा ही बन जाता है। इसलिए ऐसे सत्संग को कुसंग मानकर उससे बचते रहना ही उचित है।

चिन्तन और मनन बिना पुस्तक बिना साथी का स्वाध्याय सत्संग ही है। अपने आप अपनी स्थिति पर, अपना त्रुटियों और दुर्बलताओं पर विचार करके, बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को बढ़ाने के लिए अकेले में सोच विचार करना चिंतन है और उत्थान पथ पर अग्रसर करने वाली सत् शिक्षा के महत्व एवं महात्म्य पर विस्तार पूर्वक सोचना एवं उसी ढाँचे में अपने को ढालने की योजना बनाना मनन है। चिंतन और मनन करते रहने वाला व्यक्ति अपनी बौद्धिक, चरित्र एवं लौकिक दुर्बलताओं को आत्म निरीक्षण एवं आत्म आलोचना के आधार पर भली प्रकार जान सकता है और जिस प्रकार रोग का निदान होने पर चिकित्सा सरल हो जाती है उसी प्रकार अपनी त्रुटियों को जानने वाला उन्हें सुधारने का उपाय भी ढूँढ़

ही निकालता है।रात्रि को सोते समय दिन भर के भले बुरे विचारों और कार्यों का लेखा जोखा लेना चाहिए। जीवन की वास्तविक सम्पत्ति समय ही है। नियमित कार्यक्रम बनाकर अपने बहुमूल्य समय का सदुपयोग करने की कला जिसे आ गई उसने सफलता का रहस्य समझ लिया। रात को सोते समय दिन भर के विचारों और कार्यों की भलाई बुराई का विश्लेषण करके यह देखना कि आज दिन का कितना सदुपयोग, अपव्यय एवं दुरुपयोग हुआ। इसी प्रकार प्रातःकाल उठते समय दिन भर का कार्यक्रम बनाना तथा पिछले दिन की बात को स्मरण रखते हुए जीवन के अपव्यय एवं दुर्व्यय को बचाकर अधिकाधिक सदुपयोग की योजना बनाई जाए। नित्य डायरी रखकर भी इस प्रकार आत्म निरीक्षण एवं आत्म निर्माण का आयोजन करते रहा जा सकता है। जो दुर्गुण अपने में हो उन्हें दिन में कई बार ध्यान करके उनकी पुनरावृत्ति न होने देना एक उत्तम अभ्यास है। जिन सद्गुणों को और भी विकसित करना है उनका भी दिन में कई बार स्मरण किया जाना चाहिए और उनको बढ़ाने के लिए जो भी अवसर प्राप्त होते रहें उन्हें हाथ से न जाने देना चाहिए।

महात्मा गाँधी के साबरमती आश्रम में रहने वाले प्रत्येक आश्रमवासियों को अपनी डायरी रखनी पड़ती थी जिसमें उनके विचारों और कार्यों का विवरण रहता था। गाँधीजी के सामने वे सभी डायरियां प्रस्तुत की जाती थी और वे उन्हें ध्यान पूर्वक पढ़कर सभी को आवश्यक परामर्श एवं मार्ग दर्शन प्रदान करते थे। यह पद्धति उत्तम है। परिवार की व्यवस्था संबंधी समस्याओं पर विचार करने के लिए घर के सब सदस्य मिलकर विचार कर लिया करें और उलझनों को सुलझाने का उपाय सोचा करें तो कितनी ही कठिनाइयाँ तथा समस्याएँ आसानी से हल हो सकती है।

मन में उठने वाले कुविचारों की हानि भयंकरता तथा व्यर्थता पर विचार करना तथा उनके प्रतिपक्षी सद्विचारों को मन में स्थान देना, आत्म सुधार के लिए एक अच्छा मार्ग है। विचारों को विचारों से ही काटा जाता है। सद्विचारों की प्रबलता एवं प्रतिष्ठा बढ़ाने और कुविचारों का तिरस्कार एवं बहिष्कार करने से ही उनका अन्त हो सकता है। आत्म निर्माण के लिए इस मार्ग का अवलम्बन करना आवश्यक है।

जिस प्रकार साँसारिक कला कौशल एवं ज्ञान विज्ञान की शिक्षा के लिए व्यवहारिक मार्ग दर्शन करने वाले शिक्षक की आवश्यकता होती है उसी प्रकार आत्म निर्माण के लिए भी एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है जिसे आत्म निर्माण का व्यक्तिगत अनुभव हो। गुरु की आवश्यकता पर आध्यात्म ग्रन्थों में बहुत जोर दिया गया है, कारण कि अकेले अपने आपको अपने दोष ढूँढ़ने में बहुत कठिनाई होती है। अपने आप अपने दुर्गुण दिखाई नहीं देते और न अपनी प्रगति का ठीक प्रकार पता चल पाता है। जिस प्रकार छात्रों के ज्ञान और श्रम का अंदाज परीक्षक ही ठीक प्रकार लगा सकते हैं इसी प्रकार साधन की आन्तरिक स्थिति का पता भी अनुभवी मार्ग दर्शक ही लगा सकते हैं। रोगी अपने आप अपने रोग का निदान और चिकित्सा ठीक प्रकार नहीं कर पाता उसी प्रकार अपनी प्रगति और अवनति को ठीक प्रकार समझना और आगे का मार्ग ढूँढ़ना भी हर किसी के लिए सरल नहीं होता।

इसमें उपयुक्त मार्ग दर्शक की अपेक्षा होती है। प्राचीनकाल में आत्म निर्माण की महान् शिक्षा हर व्यक्ति के लिए एक नितान्त अनिवार्य आवश्यकता मानी जाती थी और तब गुरु वरण भी एक आवश्यक धर्म कृत्य था। आज की और प्राचीन काल की अनेक परिस्थितियों और आवश्यकताओं में यद्यपि भारी अंतर हो गया है फिर भी आत्म निर्माण के लिए उपयुक्त मार्ग दर्शक की आवश्यकता ज्यों की त्यों बनी हुई हैं जिसने यह आवश्यकता पूर्ण कर ली उसने इस संग्राम का एक बड़ा मोर्चा फतह कर लिया ऐसी ही मानना चाहिए।

किस व्यक्ति में क्या दुष्प्रवृत्तियाँ हैं और उनका निवारण किन विचारों से, किस स्वाध्याय से किस मनन से किस चिन्तन से किस साधन अभ्यास से किया जाए, इसकी विवेचना यहाँ नहीं हो सकती। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को मनोभूमि में दूसरों की अपेक्षा कुछ भिन्नता होती है और उस भिन्नता को ध्यान में रखकर ही व्यक्ति की अन्तःभूमिका को शुद्ध करने का मार्ग दर्शन संभव हो सकता है। इसी प्रकार किस व्यक्ति में कौन-सी सत्प्रवृत्तियाँ विकासोन्मुख हैं और उनका अभिवर्धन करने के लिए किस प्रकार का स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान, संकल्प एवं अभ्यास आवश्यक है इनका विवेचन भी लेख रूप में नहीं हो सकता क्योंकि व्यक्ति की मनोभूमि का स्तर पहचान कर ही उनका भी निर्णय हो सकना संभव है।

साधना का उद्देश्य है-मनोभूमि का परिष्कार। आत्मा के गुह्य गह्वर में बहुत कुछ ही नहीं सब कुछ भी भरा हुआ है। परमात्मा की सारी सत्ता एवं शक्ति उसके पुत्र आत्मा को स्वभावतः प्राप्त है। मनुष्य ही ईश्वर का उत्तराधिकारी युवराज है। उसकी संभावनाएँ महान् हैं। वह महान् पुरुष, नर रत्न, ऋषि महर्षि, सिद्ध समर्थ, देव अवतार सब कुछ है। उसकी सारी शक्तियों को जिन दुष्प्रवृत्तियों ने दबा कर एक निम्न स्तर के प्राणी की स्थिति में डाल रखा है, उन दुष्प्रवृत्तियों को हटाना एक महान् पुरुषार्थ है। इसी से सारे भव बंधन टूटते हैं। इसी से तुच्छता का महानता में परिवर्तन होता हे। इसी से आत्मा की परमात्मा में परिणति होती है। इस प्रकार की सफलता प्राप्त कर सकना अपार धन, बड़ा पद, विस्तृत यश, विपुल बल और अनन्त ऐश्वर्य प्राप्त करने से भी बढ़कर है। क्योंकि यह वस्तुएँ तो जीवन काल तक ही सुख पहुँच सकने में समर्थ हैं पर दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा प्राप्त जीवनमुक्त आत्मा तो सदा के लिए अनन्त आनंद का अधिकारी हो जाता है।

आत्म शुद्धि की साधना, भौतिक दृष्टि से, लौकिक उन्नति और सुख सुविधा की दृष्टि से बहुत उपयोगी है। इस पथ पर चलने वाला पथिक दिन-दिन इस संसार में अधिकाधिक आनंद दायक परिस्थितियाँ उपलब्ध करता जाता है। उसकी प्रगति के द्वार तेजी से खुलते जाते हैं। पारलौकिक दृष्टि से तो यह आत्म शुद्धि की साधना महान् पुरुषार्थ ही है। जीवन लक्ष की पूर्ति इसी में है। मुक्ति और स्वर्गं का एक मात्र मार्ग भी यही है।


Quotation

‘जब तक हम स्वयं अपने छोटे-छोटे दीपकों को न जलाये, तब तक आकाश-दीप जलाना व्यर्थ है। इसी प्रकार जब तक हम स्वयं अपनी तैयारियाँ न करें तब तक संसार की तैयारियों की सारी निधि भी उसी तरह प्रतीक्षा करती रहती है, जैसी वीणा अंगुली के स्पृश् की राह देखती है।

-रवीन्द्रनाथ ठाकुर

कर्म करने वाले पुरुष को ही इस जगत में श्री अर्थात् ऐश्वर्य मिलता है।

-महाभारत


साधना और उसका स्वरूप

साधना के दो भेद हैं (1) भावात्मक (2) क्रियात्मक। स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन, मनन यह चार कार्य भावात्मक साधना के अंतर्गत आते हैं। इनसे विचारों की, दृष्टिकोण की भावना की शुद्धि होती है। क्रियात्मक साधना से संस्कारों का संशोधन एवं पोषण होता है। जो अशुभ संस्कार मनोभूमि में गहराई से जमे हैं उन्हें उखाड़ने का कार्य क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है। शुभ संस्कारों का बीजारोपण तथा उनका परिपोषण भी क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है।

भावात्मक साधना के संबंध में कुछ प्रकाश पिछले पृष्ठों में डाला जा चुका है। क्रियात्मक साधना के अनेक उपक्रम हैं जिनका उपयोग साधक की निष्ठा अभिरुचि एवं परिस्थिति के अनुरूप किया जाता है।

गायत्री महामन्त्र के जप का क्रियात्मक साधना में सर्वप्रथम स्थान है। इसे अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है। धर्म शास्त्रों में ऐसी व्यवस्था मिलती है कि भोजन से पूर्व कम से कम एक माला गायत्री का जप प्रत्येक धर्मप्रेमी को करना चाहिए। जो इसकी उपेक्षा करें उन्हें शूद्र कहकर तिरस्कृत किया गया है। प्राचीनकाल में सम्भवतः नित्य गायत्री जप की उपेक्षा करने वाले लोग शूद्र रहकर तिरस्कृत किये गये होंगे ओर पीछे उनकी स्वतंत्र जाति ही बन गई होगी।

मस्तिष्क और हृदय दोनों ही क्षेत्रों पर गायत्री जप का गंभीर प्रभाव पड़ता है। स्मरण शक्ति, बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, सूझबूझ, परिमार्जित कल्पना, अनुत्तेजित एवं सन्तुलित मनःस्थिति यह मस्तिष्क के गुण हैं। गायत्री उपासना से इन सभी गुणों का साधके प्रयत्न अनुरूप विकास होता है। निष्ठा, श्रद्धा, दृढ़ता, साहस, धैर्य, उत्साह, श्रेष्ठता, आदर्शवादिता, एवं संकल्प शक्ति हृदयगत गुण हैं। गायत्री जप से इनका भी अभिवर्धन होता है। गायत्री बुद्धि एवं भावना की देवी है। जहाँ उसकी प्रतिष्ठा होगी वहाँ सद्ज्ञान एवं सद्भाव का विकास स्वयमेव होता चलेगा। अन्तः भूमि का स्वस्थ विकास स्वयमेव होता चलेगा। अन्तः भूमि का स्वस्थ विकास इन्हीं दो तत्त्वों पर निर्भर है। गायत्री उपासना निस्सन्देह मनुष्य की अपूर्णताओं की खाई पाटती हुई उसे पूर्णता के परम लक्ष तक पहुँचा देने में समर्थ होती है।

जिन्हें अपने हृदय एवं मस्तिष्क के विकास में अभिरुचि हो उन्हें गायत्री उपासना एक रामबाण अमोघ औषधि के रूप में अपनानी चाहिए। आत्मिक उन्नति की दिशा में जिनका उत्साह अधिक है, जो गुप् आध्यात्मिक शक्तियों को विकसित करके अपने आपको सामान्य स्थिति से ऊँचा उठाकर असामान्य स्थिति में ले जाना चाहते हैं उनके लिए गायत्री के अनुष्ठान, पुरश्चरण एवं तपश्चर्यात्मक अनेक विधान हैं। लौकिक आकांक्षाओं की पूर्ति एवं उपस्थित आपत्तियों के समाधान में भी गायत्री उपासना की अनेक विधियाँ बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है। आत्मा को परमात्मा तक पहुँचाने की लक्ष्यपूर्ति के लिए भी गायत्री से अधिक सरल एवं शीघ्र सफल होने वाला साधन और कोई नहीं है।

गायत्री उपासना कैसे की जाय, इस संबंध में कितने ही ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। फिर भी समय-समय पर अपनी मनोभूमि का परीक्षण कराते हुए उसके अनुरूप साधनाओं में परिवर्तन करते रहना चाहिए। जिस प्रकार कक्षाएँ उत्तीर्ण करता हुआ छात्र, अगली कक्षा में अपने पाठ्यक्रम को बदलता है उसी प्रकार साधना पथ पर अग्रसर साधक को भी अपने क्रमिक विकास के अनुरूप समय-समय पर अपने साधन विधान में हेर-फेर करना आवश्यक होता है। रोग के लक्षणों में हेर फेर होने और बीमारी घटने-बढ़ने पर कुशल वैद्य चिकित्सा, व्यवस्था, परिचर्या एवं पथ्य में परिवर्तन करते हैं। इसी प्रकार अन्तः स्थिति के उतार चढ़ाव के अनुसार साधन विधानों में भी हेर फेर की अपेक्षा रहती है। अनुभवी और विश्वासी मार्गदर्शक की सहायता से ही इस प्रकार का परिवर्तन ठीक प्रकार बन पड़ता है।

जप के अतिरिक्त प्राण शक्ति की साधना तथा ध्यान योग द्वारा मनोबल की दो कक्षाएँ आती हैं। जप को प्राथमिक पाठशाला मानें तो प्राण साधना को हाई स्कूल और ध्यान को कालेज मानना पड़ेगा। प्राणायामों के अनेक भेद हैं। आठ इनमें से प्रधान हैं। 84 प्राणायामों का परिचय, साधना ग्रन्थों में मिलता है। शारीरिक स्वास्थ्य सुधारने में, मनोबल बढ़ाने में, चित्त की चंचलता रोकने में, विकार वृत्तियों पर नियंत्रण करने में, प्राणायामों का विशेष महत्व है। अखिल विश्व में व्याप्त सूक्ष्म प्राण तत्त्व को अमुक साधना विधानों के आधार पर आकर्षित करके अपने में धारण करना तथा अपने को प्राण शक्ति सम्पन्न बनाना भी प्राणायाम विद्या का ही कार्य है। षट्चक्रों का सेवन, कुण्डलिनी जागरण, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की सिद्धि, स्वर योग तत्त्व साधना, सोऽहम् तत्त्व, अजपा गायत्री प्रभृति अनेकों चमत्कारी एवं दिव्य शक्ति सम्पन्न साधन प्राण विद्या से ही संबंधित हैं।

ध्यान योग की साधनाएँ भी अनेक प्रकार की है। भक्तियोग, ध्यान साधना का ही एक अंग है। अमुक देवताओं या अवतारों की मूर्तियों की पूजा तथा उनकी छवि का स्मरण करते हुए ईश्वरीय प्रेम का जागरण करना ध्यान योग का ही एक विशेष विधान है। निराकार उपासक ज्योति का धारा प्रवाह चिंतन करते हैं। नाद योग भी इसी के अंतर्गत आता है। सूक्ष्म जगत में जो नाना प्रकार की ध्वनियाँ होती रहती हैं उन्हें एकाग्रता पूर्वक सुनना और उनके आधार पर अदृश्य क्षेत्र में हो रही हलचलों का पता लगाना नाद योग का काम है। यह साधना भी ध्यान की एकाग्रता से ही संभव है। देव दर्शन, ईश्वर प्रणिधान, आत्म साक्षात्कार, समाधि आदि की उच्च आध्यात्मिक सफलताएँ भी ध्यान योग के विधि विधानों से ही सम्बन्धित हैं।

तप साधना का उद्देश्य शरीर और मन में भरे हुए कुसंस्कारों का परिमार्जन करना है। जिस प्रकार स्वर्ण की अशुद्धता अग्नि में तपाने से नष्ट होती हैं उसी प्रकार आत्मा पर चढ़े हुए मल विक्षेप भी तपश्चर्या की अग्नि में जल जाते हैं। पापों का प्रायश्चित्त भी कष्ट साध्य तपों द्वारा ही होता है। चांद्रायण, कृच्छ चांद्रायण आदि कठोर व्रत उपवास इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हैं। एक महीने तक एक-एक आस प्रतिदिन घटाने बढ़ाने के क्रम से आहार लेना और पंचतत्व (गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोबर) ग्रहण करना चांद्रायण व्रत का एक अंग है। हर महीने कई-कई व्रत उपवासों के पर्व रहते हैं, इनके आधार पर जिह्वा इन्द्रिय, कामेन्द्रिय तथा अन्य इन्द्रियों को वश में करना सरल होता है। कार्तिक माघ, बैसाख आदि के स्नान-तप भी इसी प्रकार के हैं। पैदल तीर्थ यात्रा भी इसी उद्देश्य के लिए की जाती है। सुसंस्कारी सात्विक अन्न ही ग्रहण करने के कष्ट साध्य प्रतिबंधों का पालन करना भी इसी श्रेणी में आता है। मन वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य पालन करना भी तप है। मौन को भी तप ही कहा गया है। अपने शरीर की सेवायें स्वयं ही करना, भूमि शयन स्वल्प वस्त्र, जूते, निद्रा, हजामत, शृंगार आदि का सीमित या पूर्ण त्याग भी तप ही प्रयोग हैं। हठ योग की नेति धोति, वस्ति, वज्रोली, कपालभाति आदि क्रियाऐं भी तपश्चर्या ही कहीं जाती हैं। प्रत्येक मास की संक्रान्ति के दिन अथवा प्रत्येक सोमवती अमावस्या आदि पर्व आने पर कोई विशेष तप जप दान का नियम लेना और उसे एक वर्ष या अमुक समय तक निर्वाण कर अन्त में पूर्णता के लिए विशेष आयोजन, उद्यापन करना भी तपश्चर्या के ही हलक प्रयोग है। सत्कार्य के लिए दान पुण्य करके अपने सुख साधनों में खुशी-खुशी कमी कर लेना त्याग का उत्तम स्वरूप है। यह भी तप ही कहा जाएगा। यज्ञ भी तप का ही एक अंग है।

पूर्व जन्मों के संगृहीत कुसंस्कार तथा इस जन्म में किये हुए पाप कर्मों का प्रायश्चित्त हो जाने से साधना मार्ग की अनेकों बाधाएँ तथा कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं और आत्मिक प्रगति में बड़ी सुविधा रहती है। शरीर शोधन के लिए कल्प चिकित्सा करने वालों को पहले वमन, विरेचन, स्वेद आदि के द्वारा भीतर भरे हुए मलों का निष्कासन करना पड़ता है और तब कोष्ठ शुद्धि होने पर औषधि सेवन का विधान चलता है। इसी प्रकार आन्तरिक दुखों का परिशोधन करने के लिए विविध तपश्चर्याएँ करनी पड़ती हैं। किस व्यक्ति के लिए कैसी तपश्चर्या अनुकूल पड़ेगी, किस दुरित का समाधान करने के लिए किस तपश्चर्या का विधान है यह भी विज्ञ मार्ग दर्शकों के परामर्श से निश्चय किया जा सकता है।

जप, तप, प्राण प्रक्रिया एवं ध्यान योग के अंतर्गत क्रियात्मक साधना के अनेक भेद सन्निहित हैं। तंत्र साधना का अपना अलग ही विज्ञान है जिसमें अमुक संस्कार में संस्कारित वस्तुओं की सहायता से, विभीषिका युक्त तपश्चर्या का माध्यम अपना कर प्रकृति की किन्हीं शक्तियों का माध्यम अपना कर प्रकृति की किन्हीं शक्तियों को यशस्वी किया जाता है। शव साधन, यक्षिणी विजय, अधिकार प्रयोजन, पक्का मकर, भैरवी चक्र, अघोर कृत्य आदि कितने ही ऐसे साधन वाम मार्गी तन्त्र ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं। उस मार्ग के साधक गुरु परम्परा से प्राप्त गुप्त विधानों की गोपनीयता नष्ट नहीं होने देते और उन्हें केवल परीक्षित शिष्यों को ही बताते हैं। तन्त्र साधना भौतिक लाभों एवं चमत्कारों की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है पर आत्म कल्याण की दृष्टि से उसका कुछ भी उपयोग नहीं है। वरन् उलटी बाधक सिद्ध होती है।

वेदोक्त दक्षिणमार्गी क्रियात्मक साधनाएँ सरल हैं। उन्हें गृहस्थ जीवन-यापन करते हुए कोई भी व्यक्ति आसानी से कर सकता है। मन मर्जी से बिना विधि-विधान के करने पर उनका अभीष्ट लाभ नहीं मिलता किन्तु यदि सही मार्ग दर्शन उपलब्ध हो जाए तो उनसे बड़ा लाभ होता है। भौतिक जीवन की अनेक समस्याएँ सुलझती हैं और पारलौकिक, अध्यात्मिक जीवन की सुख शांति का द्वारा खुलना आरंभ हो जाता है। संन्यासी और विरक्तों के लिए योगाभ्यास की कुछ विशेष साधनाएँ भी हैं पर साधना शास्त्र का अधिकांश भाग गृहस्थ नर-नारियों के लिए ही है। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, गुरु व्यवस्था, शरीर रक्षा आदि कार्यों के लिए नियमित समय लगाया जाता है उसी प्रकार यदि एक दो घंटे भी साधना कार्य के लिए दृढ़ निश्चय के साथ नियम कर लिये जाय तो उतने में ही बहुत प्रगति हो सकती है। आत्मिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और आत्म बल की अभिवृद्धि साधना पर ही निर्भर है।

जिन्हें शरीर की तुलना में आत्मा का महत्व कम प्रतीत नहीं होता, जो क्षणिक भौतिक लाभों की तुलना में अनन्त काल तक स्थिर रहने वाले आत्मिक लाभों को तुच्छ नहीं मानते उन्हें यह भी जानना चाहिए कि शरीर सुख और धन उपार्जन की तुलना में साधना कार्य में लगा हुआ समय किसी भी प्रकार कम उपयोगी-कम लाभदायक नहीं है। प्राचीन काल में प्रत्येक नर-नारी की, बाल वृद्ध की दिनचर्या में साधना के लिए अनिवार्य रूप से स्थान रहता था। फलस्वरूप उन्हें आत्म निर्माण का महान् लाभ प्राप्त होता था और उसके फलस्वरूप भौतिक उन्नति एवं सुविधाओं का द्वार सहज ही प्रशस्त रहता था और वे लोक और परलोक दोनों को ही सफल बनाते हुए मानव जीवन के अलभ्य अवसर का पूरा सत्परिणाम प्राप्त कर लेते थे। आज साधना पथ का परित्याग करके हम आध्यात्मिक उन्नति से वंचित हो रहे हैं, साथ ही आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण भौतिक जीवन की कठिनाइयों और असफलताएँ भी बढ़ती जाती हैं।

उच्च आध्यात्मिकं स्तर की साधनाएँ करने के लिए घर छोड़कर किन्हीं पवित्र वातावरण के स्थानों में रहने की आवश्यकता हो सकती है। जीवन के अंतिम भाग में वानप्रस्थ जैसा विरक्त जीवन भी इस दृष्टि से उपयोग हो सकता है पर साधारण साधना के लिए घर या व्यवसाय छोड़ने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। गृहस्थ योग अपने आप में एक सर्वांग पूर्ण योग है। उसे यदि साधनात्मक दृष्टि से ग्रहण किया जाय तो पूर्णता प्राप्ति के लिए वह भी एक सर्वांगीण सुंदर साधन हो सकता है। कितनी ही साधनाएँ तो ऐसी हैं जो हर किसी के लिए सुगम और सुविधाजनक है। जैसे सूर्य नमस्कार एवं आसनों की सरल व्यायाम पद्धति बूढ़े से लेकर बच्चे तक सभी के उपयोग की हैं। उनसे शरीर की ही नहीं मनोबल की भी पुष्टि होती है। गर्भिणी और दुर्बल प्रकृति की महिलाएँ भी कुछ आसनों से अपनी स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों को स्वयं हल कर सकती हैं। कितने ही रोग आसन और प्राणायामों के, बन्ध और मुद्राओं के सरल साधनों से दूर हो सकते हैं। बंध्यापन, उन्माद, अनिद्रा, रक्तचाप, मधुमेह, हृदय दौर्बल्य आदि कितने ही असाध्य समझ जाने वाले रोग ऐसे हैं जो योग चिकित्सा के आधार पर स्थायी रूप से अच्छे हो सकते हैं। शारीरिक और मानसिक रोगों के दूर करने में किसी भी चिकित्सा पद्धति की अपेक्षा तुलना में योग चिकित्सा ही अधिक उत्कृष्ट सिद्ध होती है। यह योग चिकित्सा भी साधना विज्ञान का ही एक अभिन्न अंग है।

साधना की उपयोगिता महान् है। उसकी उपेक्षा करना न तो बुद्धिमत्ता है और न दूरदर्शिता। यदि थोड़ी गंभीरता से सोचा जाए तो यह सहज ही जाना जा सकता है कि जीवन के महान् अवसर से समुचित लाभ उठाने के लिए साधना नितांत आवश्यक है।


पूजा और प्यार

पूजा और प्यार

मृत्यु के बाद एक साधू स्वर्ग पहुँचे। स्वर्ग के द्वार पर भगवान चित्रगुप्त खाता लिए बैठे थे। उन्होंने साधु का नाम ठिकाना सब कुछ पूछा। साधु ने कहा ‘मुझे नहीं जानते, मैं तो धरती का प्रसिद्ध संत हूँ। मैं यौवन में राग में डूबा रहा, किन्तु बाद में अखंड साधना की।’

चित्रगुप्त ने खाता खोला। शुरू से ही पृष्ठ पलटने आरंभ किये तो साधु ने कहा - शुरू में क्या रखा है? मेरे पुण्य देखने हैं तो वृद्धावस्था का हिसाब देखो।’

चित्रगुप्त ने आरंभ के पृष्ठ देखने छोड़ दिए उन्होंने पूरा अंतिम भाग पलटा, पर उन्हें पुण्य के नाम की एक पंक्ति भी नहीं मिली।

साधु चकित रह गये। यह क्या हुआ ? अवश्य चित्रगुप्त के हिसाब में भूल है। बोले-यह कैसा हिसाब है ?

चित्रगुप्त कुछ नहीं बोले। इत्मीनान से पृष्ठ पलटते गये। साधु ने आश्चर्य से देखा-यौवनावस्था में तो उसके पुण्यों की भरमार है।

‘गलत है आपका यह हिसाब। यौवन में तो मैं केवल प्रेम प्रणय में लीन रहा।’

चित्रगुप्त सुनकर हँसे बोले-साधु जी जिसे, प्रेम कहा जाता है, उसी को तो हम लोग पूजा कहते हैं।’


Quotation

‘आत्मा तो हमारा आध्यात्मिक जीवन है हमारा अमरत्व अपने में छिपाये हुए है।’

-महात्मा गाँधी

‘प्राप्ति में जो आनन्द है उसकी अपेक्षा प्रयत्न का आनन्द श्रेष्ठ है।

-विनोबा भावे


वानप्रस्थ से तेजस्वी जीवन

(सन्त विनोबा)

वानप्रस्थ एक आध्यात्मिक शक्ति है, जब कि पेंशनर एक साँसारिक अवस्था है। दोनों को मैं एक करना चाहता हूँ। मैंने अपने जीवन में वान-पस्थाश्रम को उत्तेजना देने के लिए काफी कोशिश की है। एक उम्र में विषय-वासना से मुक्त होकर समाज की निष्काम सेवा में लग जाय, इसकी एक व्याख्या मैंने आश्रम की दृष्टि से की है। पहली बात देहासक्ति छोड़े, विषयासक्ति से मुक्त हो, गृहासक्ति छोड़े और निष्काम सेवा में लग जाय यह विचार मैं सतत करता आया हूँ। कुछ साथी आश्रम में वानप्रस्थ के बतौर रहने के लिए आये थे। उन्होंने उत्तम मिसाल पेश की। तुलसीदासजी ने रामायण में स्वयंभू मनु की कथा दी है। जीवन के चौथे चरण में यह विषयासक्त था। तब तुलसीदासजी को कहना पड़ा। ‘बरबस गमन वन कीन्ह बलात् वन में गमन करना पड़ा। स्वयंभू मनु आदि मनु थे, किन्तु विषय-वासना सहज भाव से मुक्त नहीं हुई थी, उसको काटना पड़ा।

विषय वासना से अगर एक उम्र में ऊपर नहीं उठते हैं, तो जीवन दुखी बनता है और पुरुषार्थहीन बनता है। पूर्वजों ने एक सुंदर रचना की थी, जो सारी दुनिया के लिए अनुकरणीय है। एक उम्र के बाद गृह-मुक्ति विषय-मुक्ति हासिल करना चाहिए।

शुरुआत में फल का छिलका कड़ा होता है और अंदर का बीच कच्चा होता है। किन्तु धीरे-धीरे ऊपर का हिस्सा ढीला बनता है, जैसे-जैसे ऊपर का ढीला बनता है, वैसे-वैसे अंदर का बीज कड़ा होता जाता है। अंत में जब फल सड़ जाता है तब बीज सख्त और ठोस रहता है। इसी प्रकार मनुष्य ज्यों-ज्यों वृद्ध होगा, आकार जीर्ण-शीर्ण तो होगा ही, किन्तु उसका अन्तस्तल, बुद्धि उत्तरोत्तर मजबूत होनी चाहिए। मरने की तैयारी है, किन्तु बुद्धि अत्यन्त मजबूत है।

सत्य यह है कि देहासक्ति, विषयासक्ति, गृहासक्ति कम हो। भाई, बच्चे सब काम देख लेंगे। उनको जरा मौका मिलेगा और हमें मुक्ति मिलेगी। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो व्यर्थ का संघर्ष होगा और आदमी जीवन से ऊब जाएगा। वानप्रस्थ जीवन से आयु की वृद्धि होगी, यह नहीं कह सकते। ईश्वर जितनी आयु देगा, उतनी आयु होगी। किन्तु जितनी भी आयु रहेगी, वह तेजस्वी होगी। यह हमारी धर्म-रचना की खूबी है। धर्म-शास्त्रों ने देखा कि मनुष्य सुखासीन होने लगा है, उसको तुरन्त वहाँ से हटाया। बच्चा कुछ बड़ा हुआ और घर के वातावरण में माता-पिता का प्यार मिला और सुखपूर्वक रहने लगा, पर शास्त्र का आदेश है कि गुरु के घर भेजो। माता-पिता को छोड़कर गुरु के घर जाना पड़ता है। आश्रम के नियम का पालन करने की जिम्मेदारी आती है। यद्यपि गुरु उसको बड़े प्रेम से पालते-पोषते हैं यद्यपि घर का आनन्द नहीं मिलता है, फिर भी जैसे-तैसे वह गुरुकुल के वातावरण में समरस, एकरस हो जाता है और वह इस स्थान को आनन्द का स्थान बना लेता है, तो उसको वहाँ से हटाकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की जिम्मेदारी दी जाती है। नई जिम्मेदारी आने पर शुरू में काफी तकलीफ होती है और सब काम ठीक से चलने लगता है, तो उसे यह आदेश दिया जाता है कि घर छोड़कर वानप्रस्थ-जीवन में आये। यहाँ फिर नया जीवन होता है। लोगों की सतत सेवा करने की जिम्मेदारी आती है, कुछ तकलीफ तो होती है, किन्तु धीरे-धीरे इससे अनेकों का प्यार मिलता है और बाद में लोग उसकी सब प्रकार की व्यवस्था कर देते हैं। शास्त्रकार कहता है कि यह भी अब सब छोड़ो और निरन्तर घूमो। आज तो उलटा होता है। मनुष्य वृद्ध हो गया है, इसलिए उसको एक जगह घर पर रहना चाहिए। किन्तु शास्त्रकार कहता है, सतत घूम, रोज नई-नई तकलीफें आती हैं नई-नई तकलीफों से आनन्द भी आता है और इससे तप होता है। अगर इसी काम को जबरन लादा जाता, तो ताप होता। इसलिए यह व्यवस्था की गई है कि आदमी को घर में हरगिज नहीं मरना चाहिए। सारांश यह है कि मनुष्य फीका और निस्तेज न बने। आराम और सुख की इच्छा उसको तेजहीन बना देती है। मैं अक्सर देखता हूँ, जिनको बचपन में खूब कष्ट उठाना पड़ता है, तो वे अपने बच्चों को तकलीफ और कठिनाई से बचा लेते हैं। परिणाम क्या होता है? जो पुरुषार्थ वे कर पाये, उसका अवसर बच्चों को नहीं मिलता और जीवन में तेजस्विता नहीं आती है। इसलिए कभी-कभी मैं कहता हूँ कि ये पिता वस्तुतः पिछले जन्म के दुश्मन हैं। क्योंकि वे देखते है कि बच्चों का जीवन सुखमय कैसे बने। तेजस्वी बने, यह परवाह नहीं करते हैं। कहने का मतलब यह है कि पराक्रमी का पुत्र ज्यादा पराक्रमी बनना चाहिए और जीवन का सत्व, तेजस्विता बढ़ती रहनी चाहिए।

घर में बीमार पड़ कर सड़ते रहना, इसमें जीवन का कोई रस नहीं है, कोई सार नहीं, कोई आनन्द नहीं। इसलिए विषयासक्ति से मुक्त होना चाहिए। यहाँ मैं एक शब्द भी ज्यादा नहीं बोल रहा हूँ। विषयासक्ति काटे बिना नहीं कटती है। ययाति की कहानी है कि जब वह बूढ़ा हो गया तो उसने अपने चार-पाँच लड़कों से जवानी माँगी। सबने इंकार किया, किन्तु कुरु ने पितृभक्ति के लिए उसको अपनी जवानी दे दी। पिता जवान हो गया, पुत्र बूढ़ा हो गया, किन्तु ययाति को दुबारा बुढ़ापा आया तो वह अत्यन्त पश्चातापदग्ध होकर एक श्लोक बोला जो ‘ययातेर्गाथा’ के नाम से मशहूर है-कामोपभोग काम से शान्त नहीं होते हैं। जैसे घी से अग्नि शांत नहीं होती है, बल्कि बढ़ती है, वैसे ही काम से काम बढ़ता है।

वानप्रस्थ जीवन में वृत्ति-विकास को प्रथम स्थान देना चाहिए। थोड़ी देर के लिए जितनी आवश्यक हो, उतनी सेवा भी करेंगे लेकिन वानप्रस्थ वृत्ति-प्रधान होगा। उसके जीवन में बाह्य कर्म प्रधान नहीं होगा। अपनी आत्मा में स्थित रहने की वह कोशिश करेगा।


Quotation

‘मेरा विश्वास है कि सदाचार चिथड़ों-गुदड़ों में भी उसी प्रकार मिलता है जैसे कि बहुमूल्य सुंदर वस्त्रों में। अर्थात् सदाचारी अमीर और गरीब दोनों में ही मिल सकते है।’

‘परिस्थितियों के प्रति किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया का नाम ही चरित्र है। चरित्र कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसकी कोई सीमा हो या जिसमें पूर्णता हो। अवस्था के अनुसार उसकी बुद्धि होती है और हमारे प्रत्येक कार्य से वह चमक उठता है।’

‘मनुष्य का सारा भविष्य उसी के ऊपर निर्भर है। उसका चरित्र ही भावी सफलता या विफलता का निर्णायक है।’

‘जब तक तुम घमंड को छोड़कर बच्चों की तरह सरल नहीं हो जाते तब तक तुम दैवी जगत में प्रवेश नहीं पा सकते।’


विचारणीय और माननीय

भविष्य की तैयारी

एक राज्य का यह नियम आज्ञा कि जो राजा गद्दी पर बैठे उसे दस वर्ष बाद ऐसे निविड़ वन में छोड़ दिया जाय जहाँ अन्न-जल उपलब्ध न हो और वहाँ वह भूखा प्यासा तड़प-तड़प कर मर जाए। कितने ही राजा इसी प्रकार अपने प्राण गँवा चुके थे और राज्य के दिनों में भी भविष्य की चिन्ता से दुखी रहते थे।

एक बार एक बुद्धिमान राजा गद्दी पर बैठा। उसे भविष्य का ध्यान था। उसने उस निविड़ वन को देख और वहाँ खेती कराने, जलाशय बनाने, पेड़ लगाने तथा प्रजा बसाने का कार्य आरंभ कर दिया। दस वर्ष में वह भयावना प्रदेश अत्यंत रमणीक और आनन्द दायक बन गया। राजा अपनी अवधि समाप्त होते ही वहाँ गया और शेष जीवन सुख पूर्वक व्यतीत किया।

जीवन कुछ दिन का राज है, इसके बाद चौरासी लाख योनियों का कुचक्र फिर तैयार है। जो इस नर तन को पाकर सुकर्मों द्वारा अपना परलोक बना लेते हैं वे ही इस बुद्धिमान राजा की तरह दूरदर्शी होते हैं।

सत्य भावना पर निर्भर

एक बार एक अपराधी पकड़ा गया। उसे फाँसी की सजा मिली। फाँसी की कोठरी में जाने से पूर्व वह राजा को बुरी-बुरी गाली और दुर्वचन कहने लगा। वह था विदेशी, उसकी भाषा को सभा के एक दो सरदार ही जानते थे। राजा ने विदेशी भाषा जानने वाले एक सरदार से पूछा-यह अपराधी क्या कह रहा है ? उसने उत्तर दिया-आपकी प्रशंसा करते हुए अपनी दीनता बताता हुआ यह दया की प्रार्थना कर रहा है।

इतने में एक दूसरा सरदार उठ खड़ा हुआ उसने कहा- नहीं सरकार, यह झूठ बोलता है। अपराधी ने आपको गाली दी है और दुर्वचन बोले हैं।

राजा तो विदेशी भाषा जानता न था और भी कोई तीसरा आदमी फैसला करने वाला न था। अब वास्तविकता कैसे मालूम हो? सत्य का पता कैसे चले? राजा ने स्वयं विचार किया और पहले सरदार को ही सत्यवादी कहा तथा अपराधी की सजा कम कर दी। दूसरे सरदार को उसने कहा चाहे तुम्हारी बात ठीक भले ही हो, पर उसका परिणाम दूसरों को कष्ट मिलना तथा हमारा क्रोध बढ़ाना है। इसलिए वह सत्य होते हुए भी असत्य जैसी है। और इस पहले सरदार ने चाहे असत्य ही कहा हो, पर उसके फलस्वरूप एक व्यक्ति की जीवन रक्षा होती तथा हमारे हृदय में दया उपजती है इसलिए वह सत्य के ही समान है।

दया-यज्ञ

एक गृहस्थ ने तीन यज्ञ किये जिनमें उसका सब धन खर्च हो गया। गरीबी से छूटने के लिए एक विद्वान् ने बताया कि तुम अपना यज्ञों का पुण्य अमुक सेठ को बेच दो, वह तुम्हें धन दे देंगे।

वह व्यक्ति पुण्य बेचने चल दिया। रास्ते में एक जगह भोजन करने बैठा तो एक भूखी कुतिया वहाँ। बैठी मिली, जो बीमार भी थी चल फिर भी नहीं सकती थी। उसकी दशा देख कर गृहस्थ को दया और उसने अपनी रोटी कुतिया को खिला दी और खुद भूखा ही आगे चल दिया।

धर्मराज के यहाँ पहुँचा तो उनने कहा-तुम्हारे चार यज्ञ जमा है। जिसका पुण्य बेचना चाहते हो? गृहस्थ ने कहा-मैंने तो तीन ही यज्ञ किये थे, यह चौथा यज्ञ कैसा? धर्मराज ने कहा-यह दया-यज्ञ है। इसका पुण्य उन तीनों से बढ़कर है।

गृहस्थ ने एक यज्ञ का पुण्य बेचा। उसमें जो धन मिला उससे दया-यज्ञ करने लगा। पीड़ितों की सहायता ही उसका प्रधान लक्ष बन गया। इसके पुण्य फल से उसने अपने लोक-परलोक दोनों सुधारे।

दया और उदारता से प्रेरित होकर किया हुआ परोपकार साधारण धर्म प्रक्रियाओं की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ हैं।

भावना का मूल्य

एक बार यमराज के सामने दो महिलाएँ उपस्थित की गई। एक थी पतिव्रता दूसरी वेश्या। यमराज ने चित्रगुप्त को बुलाकर उनके पाप पुण्य मालूम किये और पतिव्रता को नीचे वाला स्वर्ग तथा वेश्या को ऊपर वाला स्वर्ग प्रदान किया। इस पर पतिव्रता बहुत क्रुद्ध हुई। उसने कहा मैंने अष्टावक्र जैसे कुरूप और सब प्रकार से दीन-हीन पति की जीवन भर कष्ट पूर्वक सेवा करके पतिव्रत धर्म निबाहा तब भी मुझे नीचे का स्वर्ग और इस विलासिनी कुलटा को ऊपर का स्वर्ग! यह तो सरासर अन्याय है!!

यमराज ने पतिव्रता को सांत्वना देते हुए कहा-बेटी हमारे यहाँ केवल क्रिया ही नहीं भावना भी देखी जाती है। तुम दोनों का घर आमने-सामने था। जब इस वेश्या के यहाँ छैल-छबीले लोग आते थे तब खिड़की में से झाँक कर तुम्हारी आँख उन्हें देखने और मन उन पर ललचाने में फिरा करती था। पर यह वेश्या जब तुम्हें पति-सेवा करते देखती थी तो तुम्हें साक्षात् देवी मानते हुए, तुम्हारे जैसे धन्य जीवन प्राप्त करने की परमेश्वर से सदा प्रार्थना किया करती थी।

तुम दोनों के शरीरों ने जो किया उसकी अपेक्षा तुम्हारे मनों में जो भावना रही उसकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

धर्म में भावना की ही प्रधानता होती है। बाहर से दीखने वाला धर्म भीतर से अधर्म भी हो सकता है और बाहर से दीखने वाले अधर्म का वस्तुतः धर्म होना भी संभव है। संसार कुछ भी समझे भगवान मनुष्य की भावना को परख कर ही उसके भले-बुरे होने का निर्णय करते है।

अन्न का मन पर प्रभाव

एक बार एक बड़े त्यागी महात्मा कहीं धर्मोपदेश करने लगे और वहाँ से एक सोने का हार चुरा लाये। तीसरे दिन वे बड़े दुखी मन से वहाँ पहुँचे और हार लौटाते हुए क्षमा माँगी। गृहस्थ को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी त्यागी और विद्वान् होते हुए भी क्यों उन्होंने हार चुराया और क्यों लौटाने आये?

महात्मा जी ने बताया कि उस दिन उनने जिस व्यक्ति के यहाँ से भिक्षा ली थी वह चोर था, उसका अन्न भी चोरी से ही लाया हुआ था। उसे खाने से मेरी बुद्धि में चोरी के संस्कार पैदा हुए। इसके बाद दस्त शुरू हो गये और अन्न पेट से बाहर निकल गया तब सुबुद्धि लौटी और आपके हार लौटाने आया।

अन्न से ही मन बनता है, इसलिए कुधान्य से सदा बचना चाहिए।

शरीर रूपी रत्न भंडार

एक मनुष्य किसी महात्मा के पास पहुँचा और कहा- मैं बहुत गरीब हूँ। भगवान की मुझ पर अकृपा, उसने औरों को बहुत धन दिया है पर मेरे पास कुछ भी नहीं है। आप ऐसी कृपा कर दीजिए जिससे मुझे भी धन मिल जाय।

महात्मा ने कहा- जो कुछ तेरे पास है उसे बेच दे तुझे बहुत धन मिल जाएगा। उसने कहा मेरे पास कुछ भी नहीं है, ईश्वर ने ऐसा भी मुझे कुछ नहीं दिया जिसे बेच कर मैं अपना काम चला लेता।

महात्मा ने कहा-अपनी एक आँख बेच दे मैं तुझे दस हजार रुपया दिला दूँगा। इस पर वह तैयार न हुआ। फिर क्रमशः हाथ, टाँग, नाक, जीभ आदि बेचने के लिए कहा और प्रत्येक चीज के लिए दस-दस हजार रुपया कीमत बताई। वह व्यक्ति इनमें से किसी भी चीज को बेचने को तैयार न हुआ । तब महात्मा ने कहा-दस-दस हजार मूल्य की दस चीजें तो मैं से माँगी। एक लाख रुपए कीमत की यही सम्पत्ति तेरे पास मौजूद है फिर अपने को गरीब क्यों बताया है? जा, ईश्वर ने जो प्रचुर सम्पत्ति का भंडार शरीर तुझे दिया है इसे काम में ला। परिश्रम कर और जो पूँजी ईश्वर ने दी है उसके द्वारा उपार्जन करके अपना काम चला और प्रसन्न रह।

कुछ आपत्ति ग्रस्तों को छोड़कर इस संसार में निर्धन कोई नहीं। शरीर से उचित पुरुषार्थ करके हर कोई अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने लायक कमा सकता है। भगवान ने शरीर रूपी बहुमूल्य रत्न भंडार हर किसी को दिया है। इसका ठीक तरह उपयोग करने वाला कभी दरिद्र नहीं रह सकता।

कलह से दरिद्रता

एक बहुत धनवान् व्यक्ति के यहाँ चार बेटों की चार बहुएँ आई। वे बड़े उग्र और असहिष्णु स्वभाव की थीं, आपस में रोज ही लड़ती। दिन-रात गृह-कलह ही मचा रहता। इससे खिन्न होकर लक्ष्मी जी ने वहाँ से चले जाने की ठानी। रात को लक्ष्मी ने उस सेठ को स्वप्न दिया कि अब मैं जा रही हूँ। यह कलह मुझसे नहीं देखा जाता। जहाँ ऐसे लड़ने झगड़ने वाले लोग रहते हैं वहाँ मैं नहीं रह सकती।

सेठ बहुत गिड़गिड़ाकर रोने लगा, लक्ष्मी के पैरों से लिपट गया और कहा मैं आपका अनन्य भक्त रहा हूँ। मुझे छोड़कर आप जावे नहीं। लक्ष्मी को उस पर दया आई और कहा-कलह के स्थान पर मेरा ठहर सकना तो संभव नहीं। ऐसी स्थिति में अब मैं तेरे घर तो किसी भी प्रकार न रहूँगी पर और कुछ तुझे माँगना हो तो एक वरदान मुझ से माँग ले।

धनिक ने कहा-अच्छा माँ यही सही। आप यह वरदान दें कि मेरे घर के सब लोगों में प्रेम और एकता बनी रहे। लक्ष्मी ने ‘एवमस्तु’ कह कर वही वरदान दे दिया और वहाँ से चली गई। दूसरे दिन से ही सब लोग प्रेम पूर्वक रहने लगे और मिल-जुल कर सब काम करने लगे।

एक दिन धनिक ने स्वप्न में देखा कि लक्ष्मी जी घर में फिर वापिस आ गई हैं। उसने उन्हें प्रणाम किया और पुनः पधारने के लिए धन्यवाद दिया। लक्ष्मी ने कहा-इसमें धन्यवाद की कोई बात नहीं है। मेरा उसमें कुछ अनुग्रह भी नहीं है। जहाँ एकता होती है और प्रेम रहता हूँ वहाँ तो मैं बिना बुलाये ही जा पहुँचती हूँ।

जो लोग दरिद्रता से बचना चाहते हैं और घर से लक्ष्मी को नहीं जाने देना चाहते उन्हें अपने घर में कलह की परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं होने देनी चाहिए।

शारीरिक सौंदर्य का आधार

एक कन्या बड़ी रूपवती थी। उस पर एक राजकुमार आसक्त हो गया और उसे प्राप्त करने के लिए दुखी रहने लगा। युवती ने उसके विचार बदलने की सोची उसने दस्त कराने की दवा ली और उसे कई दिन तक पचास-पचास दस्त होते रहे। मल के पात्र को उसने फेंका नहीं वरन कपड़े से ढक दिया। एक सप्ताह में उसका रूप कुरूपता में बदल गया।

अब उसने राजकुमार को बुलाकर चौकी पर बिठाया। राजकुमार ने देखा कि कुछ दिन पूर्व रूपवती दीखने वाली लड़की बड़ी कुरूप दीख रही है, उसके शरीर में बदबू आ रही है। सभी अंग घृणास्पद हो रहे हैं। उसका मन उससे उचक गया साथ ही उसने पूछा-तुम्हारा इतना सुंदर रूप जो पहले मैंने देखा था वह कहाँ गया? लड़की ने उस मल-पात्र की ओर इशारा करके बताया कि उसमें रखा हुआ है।

राजकुमार ने कपड़े को हटाकर मल भरे पात्र को देखा तो उसे और भी घृणा हुई। राजकुमार के विचार बदल गये। उसने उस युवती को उसी दिन अपनी धर्म बहिन माना और अपनी गलतियों के लिए क्षमा माँगी।


धर्म पुराणों की सत् कथाएँ

कर्तव्य पालन की साधना।

कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर नीचे गिर पड़ी। ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया।

दूसरे दिन वह एक सद् गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहिणी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा-भगवान थोड़ी देर ठहरें अभी आपको भिक्षा दूँगी। इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति सेवा को अधिक महत्व दे रही है। गृह स्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा-क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूँगी।

ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई? ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिला पुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे।

भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा। वह तौल नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया ओर कहा-तपोधन कौशिक देव! आपको उस सद्गृहस्थ गृह स्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लू तब आपकी सेवा करूँगा कृपया थोड़ी देर बैठिये। ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना? थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफ़ा लेकर अच्छी चीजें लोकहित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजात चाण्डाल के पास जाइए।

कौशिक मगध चल दिया और चाण्डाल के यहाँ पहुँचा। वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टांग प्रणाम किया और कहा-भगवान आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुए यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लू, तब आपसे बात करूँगा तब तक आप विश्राम कीजिए।

चाण्डाल जब सेवा वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्तव्य कर्मों में निरंतर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।

तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्तव्य कर्म निष्ठा पूर्व करते रहने से भी आध्यात्मिक लक्ष’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।

सत्संग की शक्ति।

एक बार वशिष्ठ जी विश्वामित्र ऋषि के आश्रम में गये। उनने बड़ा स्वागत सरकार और आतिथ्य किया। कुछ दिन उन्हें बड़े आदरपूर्वक अपने पास रखा। जब वशिष्ठ जी चलने लगे तो विश्वामित्र ने उन्हें एक हजार वर्ष की अपनी तपस्या का पुण्य फल उपहार स्वरूप दिया। बहुत दिन बाद संयोगवश विश्वामित्र भी वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। उनका भी वैसा ही स्वागत सत्कार हुआ। जब विश्वामित्र चलने लगे तो वशिष्ठ जी ने एक दिन के सत्संग का पुण्य फल उन्हें भेंट किया।

विश्वामित्र मन ही मन बहुत खिन्न हुए। वशिष्ठ को एक हजार वर्ष की तपस्या का पुण्य भेंट किया था। वैसा ही मूल्यवान उपहार न देकर वशिष्ठ जी ने केवल एक दिन के सत्संग का तुच्छ फल दिया। इसका कारण उनकी अनुदारता और मेरे प्रति तुच्छता की भावना का होना ही हो सकता है। यह दोनों ही बातें अनुचित हैं।

वशिष्ठ जी विश्वामित्र के मनोभाव को ताड़ गए और उनका समाधान करने के लिए विश्वामित्र को साथ लेकर विश्व भ्रमण के लिए चल दिये। चलते चलते दोनों वहाँ पहुँचे जहाँ शेष जी अपने फन पर पृथ्वी का बोझ लादे हुए बैठे थे। दोनों ऋषियों ने उन्हें प्रणाम किया और उनके समीप ठहर गये।

अवकाश का समय देखकर वशिष्ठ जी ने शेष जी से पूछा-भगवन् एक हजार वर्ष का तप अधिक मूल्यवान है या एक दिन का सत्संग? शेष जी ने कहा-इसका समाधान केवल वाणी से करने की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव से करना ही ठीक होगा। मैं सिर पर पृथ्वी का इतना भार लिए बैठा हूँ। जिसके पास तप बल है वह थोड़ी देर के लिए इस बोझ को अपने ऊपर ले लें। विश्वामित्र को तप बल पर गर्व था। उनने अपनी संचित एक हजार वर्ष की तपस्या के बल को एकत्रित करके उसके द्वारा पृथ्वी का बोझ अपने ऊपर लेने का प्रयत्न किया पर वह जरा भी नहीं उठी। अब वशिष्ठ जी को कहा गया कि वे एक दिन के सत्संग बल से पृथ्वी उठावें। वशिष्ठ जी ने प्रयत्न किया और पृथ्वी को आसानी से अपने ऊपर उठा लिया।

शेष जी ने कहा- ‘तप बल की महत्ता बहुत है। सारा विश्व उसी की शक्ति से गतिमान है। परंतु उसकी प्रेरणा और प्रगति का स्त्रोत सत्संग ही है। इसलिए उसकी महत्ता भी तप से भी बड़ी है।’

विश्वमित्र का समाधान हो गया और उनने अनुभव किया कि वशिष्ठ जी ने न तो कम मूल्य की वस्तु भेंट की थी और न उनका तिरस्कार किया था।

सत्संग से ही तप की प्रेरणा मिलती है। इसलिए तप का पिता होने के कारण सत्संग को अधिक प्रशंसनीय माना गया है। यों शक्ति का उद्भव तो तप से ही होता है।

द्वेष का कुचक्र

द्रोणाचार्य और द्रुपद एक साथ ही गुरुकुल में पढ़ते थे। द्रुपद बड़े होकर राजा हो गये। एक बार किसी प्रयोजन की आवश्यकता पड़ी। वे उनसे मिलने गये। राज सभा में पहुँचकर द्रोणाचार्य ने बड़े प्रेम से उन्हें सखा कहकर संबोधन किया। पर द्रुपद ने उपेक्षा ही नहीं दिखाई तिरस्कार भी किया। उनने कहा-जो राजा नहीं वह राजा का सखा नहीं हो सकता। बचपन की बातों का बड़े होने पर कोई मूल्य नहीं उनका स्मरण करके आप मेरे सखा बनने की अनधिकार चेष्टा करते हैं।

द्रोणाचार्य को इस तिरस्कार का बड़ा दुःख हुआ। उनने इसका बदला लेने का निश्चय किया। वे हस्तिनापुर जाकर पाँडवों और कौरव बालकों को अस्त्र विद्या सिखाने लगे। जब शिक्षा पूर्ण हो गई और शिष्यों ने गुरु से दक्षिणा माँगने की प्रार्थना की तो पाँडवों से उनने यही माँग, कि राजा द्रुपद को जीतकर उन्हें बाँधकर मेरे सामने उपस्थित करो। भीम और अर्जुन ने यही किया, उसने द्रुपद को बाँधकर द्रोणाचार्य के सामने उपस्थित कर दिया।

द्वेष का कुचक्र टूटता नहीं। द्रुपद के मन में द्रोणाचार्य के लिए प्रतिशोध की भावना बनी रही। उसने भी द्रोणाचार्य को नीचा दिखाने की ठानी और बाज़ ऋषि को प्रसन्न करके मन्त्र शक्ति से एक ऐसा पुत्र प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की जो द्रोणाचार्य को मार सके। उस पुत्र का नाम धृष्टद्युम्नः रखा गया। बड़े होने पर महाभारत में उसी ने द्रोणाचार्य को मारा।

भीष्म की पितृ-भक्ति ।

राजा शान्तनु एक रूपवती निषाद कन्या सत्यवती से विवाह करना चाहते थे। उसने निषाद के आने पर प्रस्ताव रखा तो उसने उत्तर दिया कि यदि मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न बालक को ही आप राज आदि देने का वचन दें तो मैं यह प्रस्ताव स्वीकार कर सकता हूँ। शान्तनु असमंजस में पड़े। क्योंकि उनकी पहली रानी गंगा का पुत्र भीष्म मौजूद था और वही राज्याधिकारी भी था। शान्तनु लौट आये पर वे मन ही मन दुखी रहने लगे।

भीष्म को जब यह पता चला तो उसने पिता को संतुष्ट करना अपना कर्तव्य समझा और निषाद के सामने जाकर प्रतिज्ञा की कि मैं अपना राज्याधिकारी छोड़ता हूँ। सत्यवती का पुत्र ही राज्याधिकारी होगा। इतना ही नहीं मैं आजीवन अविवाहित भी रहूँगा ताकि मेरी संतान कहीं उस गद्दी पर अपना अधिकार न जमाने लगे। इस प्रतिज्ञा से निषाद संतुष्ट हुआ और उसने अपनी कन्या का विवाह शान्तनु के साथ कर दिया।

पिता के दोष को न देखकर उनकी प्रसन्नता के लिए स्वयं बड़ा त्याग करना भीष्म को आदर्श पितृभक्ति है।

आत्म ज्ञान की प्राप्ति।

महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नी थीं। एक मैत्रेयी दूसरी कात्यायनी। महर्षि जब संन्यास लेने लगे तब उसने दोनों को बुलाकर कहा मेरे पास जो सम्पत्ति है उसे आधा-आधा बाँट दूँ, ताकि तुम दोनों सुख पूर्वक रह सको।

मैत्रेयी ने सोचा कि मनुष्य अधिक सुख के लिए ही स्वल्प सुख का त्याग कर सकता है। महर्षि जब भोग को छोड़कर त्याग अपना रहे हैं तो अवश्य ही उसमें कुछ अधिक सुख होना चाहिए। इसलिए उसने कहा-भगवान जिनसे मेरा मरना जीना न छूटे उसे लेकर मैं क्या करूँगी? आप तो मुझे ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दीजिए।

सम्पत्ति से ज्ञान का मूल्य अधिक है। सम्पत्ति तो समय के प्रभाव से नष्ट हो सकती है पर अविनाशी ज्ञान से लोक और परलोक दोनों का ही साधन होता है।

श्रद्धा द्वारा पोषित मिट्टी का गुरु

गुरु द्रोणाचार्य से पाण्डव धनुर्विद्या सीखने बन में गये हुए थे। उनका कुत्ता लौटा तो देखा कि किसी ने उसके होठों को बाणों से सी दिया है। इस आश्चर्यजनक कला को देखकर पाण्डव दंग रह गये कि सामने से इस प्रकार तीर चलाये गये कि वह कहीं अन्यत्र न लग कर केवल होठों में ही लगे जिससे कुत्ता मरे तो नहीं पर उसका भौंकना बंद हो जाए। कुत्ते को लेकर पाण्डव द्रोणाचार्य के पास पहुँचे कि यह कला हमें सिखाइये। गुरु ने कहा-यह तो हमें भी नहीं आती। तब यही उचित समझा गया कि जिसने यह तीर चलाये हैं उसी की तलाश की जाय। कुत्ते के मुँह से टपकते हुए खून के चिह्नों पर गुरु को साथ लेकर पाण्डव उस व्यक्ति की तलाश में चले। अन्त में वहाँ जा पहुँचे जहाँ कि भील बालक अकेला ही बाण चलाने का अभ्यास कर रहा था। पूछने पर मालूम हुआ कि कुत्ते को तीर उसी ने मारे थे। अब अधिक पूछताछ शुरू हुई। यह विद्या किससे सीखी ? कौन तुम्हारा गुरु है? उसने कहा-द्रोणाचार्य मेरे गुरु हैं उन्हीं से यह विद्या मैंने सीखी है। द्रोणाचार्य आश्चर्य में पड़ गये। उनने कहा मैं तो तुम्हें जानता तक नहीं फिर बाण विद्या मैंने कैसे सिखाई?

द्रोणाचार्य को साक्षात सामने खड़ा देखकर बालक ने उनके चरणों पर मस्तक रखा और कहा मैंने मन ही मन आपको गुरु माना और आपकी मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसी के सामने अपने आप अभ्यास आरंभ कर दिया।

गुरु भाव सच्चा और दृढ़ होने पर गुरु की मिट्टी की मूर्ति भी इतनी शिक्षा दे सकती है जितनी कि वह गुरु शरीर भी नहीं दे सकता। श्रद्धा का महत्व अत्यधिक है।


शुभ काम दिखावे के लिए न करें

(श्री अगरचन्दजी नाहटा)

प्राचीन काल की अपेक्षा वर्तमान में शुभ कार्यों की प्रवृत्ति ही कम होती जा रही है। जो थोड़ी सी शुभ प्रवृत्तियाँ होती हैं, उनमें भी एक बड़ी खराबी घुस गई है। दिखावे की। मनुष्य काम थोड़ा करता है पर दिखावा ज्यादा करता है जिससे लोग उसकी प्रशंसा करें। हृदय की प्रेरणा वहाँ काम नहीं करती नजर अपनी, इससे उसके फल में कमी होना स्वाभाविक है, जीवन दिनों दिन नकली-सा बनता जा रहा है, अंदर कुछ है तो बाहर बोलना व आचरण करना उससे भिन्न प्रकार का है। भावना शून्य, धर्माचरण का फल हो भी क्या सकता है? पर आजकल धर्माचरण प्रायः दिखावे के लिए ही किया जाता है अतः वास्तव में वह धर्माचरण नहीं होकर ढोंग या मायाचार है।

धर्म ऋजुता अर्थात् सरलता में है। मन वचन, काया की एकता के साथ जो कुछ भी काम किया जाता है उसका फल बहुत अच्छा मिलता है। पर जब बिना परिश्रम किये ही बाहरी दिखावे से वाह! वाह!! मिल जाती है तो मनुष्य उसकी ओर आकर्षित होता रहता ले बाहर में अच्छा लगे या लोग उसे अच्छा कहें, इसी उद्देश्य से जो शुभ प्रवृत्ति की जाती है उसका फल तो उतना ही मिलेगा कि लोग उसकी प्रशंसा कर दें और उसे अच्छा समझने लग जाय आत्मकल्याण उस प्रवृत्ति से कुछ भी नहीं हो सकता। अपितु ढोंग या मायाचार के कारण आध्यात्मिक पतन ही होता है। जिस प्रवृत्ति से महान् लाभ मिलने का शास्त्रं में उल्लेख है उन प्रवृत्तियों को करते हुए हमें उसका इच्छित परिणाम क्यों नहीं मिलता? इस पर यदि विचार करें तो हमें स्पष्ट रूप से अपनी कमी नजर आयेगी। फल तो भावना के अनुसार ही मिलता है। दिखावे के लिए की जाने वाली क्रियाओं का फल, शास्त्रं में वर्णित महान् लाभ जितना कैसे मिल सकता है? बाह्य आडम्बरों से आन्तरिक शुद्धि हो ही नहीं सकती।

गीता का कर्मयोग तो यह शिक्षा देता है कि जब तक शरीर आदि से संबंध है तब तक कुछ न कुछ प्रवृत्तियाँ तो करनी ही पड़ेगी, पर इसमें कृतित्व का अभिमान और फल की आसक्ति न रखी जाए। पर हमारी प्रत्येक प्रवृत्ति फल की कामना से ही होती है। थोड़ा-सा काम करके अधिक लाभ मिले, यही सभी की इच्छा रहती है। काम और यश की कामना तो वर्तमान में बहुत ही बढ़ गई है। दान को ही लीजिए। जहाँ मनुष्य का थोड़ा-सा नाम या यश होता हो उसके लिये तो लंबी रकम देने में भी मनुष्य संकोच नहीं करता पर ऐसे किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए आज चन्दा मिलना मुश्किल हो गया है जिसमें व्यक्ति का नाम या यश न होता हो। गुप्त दान आज कितने लोग करते हैं ? यह हम से छिपा नहीं है। जो कोई गुप्त दान करते हैं वे भी बहुत बार तो मन ही मन कीर्ति की कामना करते नजर आते है। करुणा, वृत्ति, उदारता एवं अन्तः प्रेरणा पूर्वक थोड़ा भी किया हुआ दान, महान् लाभ का कारण होता है। पर आज का अधिकांश दान, कार्य की महत्ता पर विचार न करते हुए दूसरों के दबाव से दिखावे के लिए ही किया जाता है।

हमारे साधारण व्यवहार में भी इस दिखावे या नकलीपन का बहुत अधिक प्रभाव दिखाई देता है। आत्मीयता का गहरा प्रेम संबंध, जैसा पुराने व्यक्तियों में देखने को मिलता था, आज स्वप्न-सा हो गया है। दो आदमी मिलते है तो केवल शिष्टाचार के नाते एक दूसरे से नमस्कार आदि का व्यवहार करते हैं। मित्रता व प्रेम की लंबी चौड़ी बातें की जाती है, पर वह हैं सब दिखावे मात्र की, अन्त आत्मा को टटोलेंगे तो यही मालूम देगा। जिन व्यक्तियों के पास कुछ पूँजी नहीं है वे भी बाहरी टीपटाप द्वारा अपने को बहुत धनवान् दिखाने का प्रयत्न करते हैं। कपड़ों की सफाई तो बहुत अधिक दिखाई देती है पर मन में तो मैल भरा पड़ा है। बातों में शूर वीरता है पर हृदय में कायरता है। लंबे, तिलक, हाथ में माला और मुख में राम जपते जपते हुए भक्त या धर्मात्मा होने का दिखावा किया जाता है पर हृदय में भक्ति और धर्म नहीं होता। इसलिए आजकल लोगों की भक्ति, धर्म के प्रति श्रद्धा कम होती चली जा रही है।

आत्मोत्थान के लिए सबसे पहली और जरूरी बात है कि कपट रूप कलुष को दूर किया जाय। सरलता और सादगी को अपनाया जाय। अपने दोषों को छिपाने का प्रयत्न न हो, गुणों का प्रदर्शन न किया जाय। हम जिस स्थिति में हैं तदनुसार हमारा बाहर और भीतर एक सा हो। केवल दिखावे के लिए कुछ न कर अन्तः प्रेरणा से ही किया जाए। आज हमारे जीवन में जो नकलीपन बढ़ रहा है उसे रोका जाय। हम जो भी काम करें वह हृदय या अन्त-प्रेरणा से ही करें, दिखावे के लिए नहीं दिखावटीपन तो धोखे की टट्टी है, भोले भाले लोग उसके चक्कर में फँस जाते है। जैसे पैसे का प्रेम बनावटी दिखाऊ होता है। वैसे ही हम धार्मिक एवं व्यवहारिक वृत्तियाँ दूसरे को ठगने या अच्छी लगने के लिए करते हैं इससे चित्त शुद्धि नहीं होती अपितु चित्त दूषित और मलिन होता है, अतः उसका परिणाम शुभ नहीं हो सकता। व्यवहार में शिष्टाचार का पालन करना पड़ता है वह अलग बात है पर परमार्थिक वृत्तियाँ केवल दिखाने के लिए नहीं करनी चाहिए।


कहा तो उनने था सुनें हम भी

सच्ची मित्रता की प्यास।

दार्शनिक शोपनहार कुछ अच्छे मित्र चाहते थे। जिनके सहारे जिंदगी आनन्दमय बन सके। पर ऐसे मित्र जीवन भर में उन्हें एक भी न मिला, जो मिले धूर्त और खुदगर्ज। अन्त में उन्हें एकाकी मित्र विहीन जीवन बिताने का विवश होना पड़ा। उनका एक ही सच्चा मित्र रहा, वह था उनका कुत्ता जिसे वे आत्मा नाम से पुकारते थे।

शोपनहार ने अपने मित्र विहीन एकाकी जीवन की व्यथा को बड़े मार्मिक शब्दों में कहा है, इस अभाव ने उन्हें कितना मर्माहत किया था यह उन्हें के शब्दों में सुनिए-मेरा सारा जीवन एकाकी-मित्र विहीन-बीत गया। इस अभाव का जब मैं चिंतन करता हूँ तो अनायास ही मेरा मन व्याकुल हो उठता है। मैं भगवान से एक ही प्रार्थना करता रहा-प्रभो मुझे एक मित्र दो, पर उनने मेरी विनति सुनी नहीं। इसमें मेरा ही दोष है यह मैं नहीं मानता। जिस व्यक्ति में मुझे मानवता की जरा भी छाया दिखाई दी, उससे लिपटने की मैंने कोशिश की, कभी उसे अपने से दूर हटाना नहीं चाहा। पर जब कि मेरा अन्त समय निकट आ पहुँचा है मैं कहना चाहता हूँ कि किसी को मैं अपना नहीं बना सका।

अहिंसा और हिंसा

सन् 23 में पक्का महल में एक साम्प्रदायिक दंगा हुआ अत्याचार पीड़ित कुछ हिन्दू गाँधीजी के पास साबरमती पहुँचे और उनने मुसलमानों के अत्याचारों का रोमांचकारी वर्णन किया। बापू को बहुत दुःख हुआ। उनने पूछा तो आप लोगों ने मुकाबला करने के लिए क्या किया? उन लोगों ने कहा करते क्या आपकी अहिंसा ने तो हमारे हाथ पाँव बाँध रखे हैं। इसी से हमें अत्याचार सहने पढ़े।

गाँधीजी क्षुब्ध हो गये और बोले-मेरी अहिंसा ऐसे समय पर मर मिटने का आदेश देती है। आप में यदि वैसा साहस नहीं था तो अपने ढंग से अपने विश्वास के अनुसार हिंसा से भी मुकाबला करते। आपने मेरे मन को समझा नहीं और अपने मन पर चलने का साहस न कर सके।

शक्ति का दुरुपयोग

जब अणु शक्ति के उपयोग से बम बनाने और मानव को संहार करने की तैयारी होने लगी तो अणु शक्ति के रहस्योद्घाटन विज्ञानाचार्य अलबर्ट आइंस्टीन की आत्मशक्ति के इस दुरुपयोग को देखकर रो पड़ी। उनने रुद्ध कंठ से कहा-यदि मुझे नये सिरे से जीवन जीने का अवसर मिले तो मेरा विज्ञान के साथ तनिक भी संबंध न रहेगा। अणु बम बनाने वाले वैज्ञानिक की अपेक्षा में बढ़ई, लुहार, चमार, या चपरासी का काम करना अधिक पसंद करूँगा

जीवन की खेती।

मेहता कालूराम अपने पुत्र नानक को खेती करने का आदेश देते हैं। नानक कहते हैं-मैंने अपने लिए एक नई खेती बोई है और वह अच्छी लगी है। इस पर उनके पिता पूछते हैं-इस शरीर रूपी खेत में सत्कर्मों का हल चला कर परमात्मा के भजन रूपी बीज को मैंने बोया है। साधु संगति का इसमें पानी देता रहता हूँ और संतोष रूपी खाद लगाता हूँ। वह घर धन्य है जहाँ ऐसी खेती होती है।’

सब के लिए एक ही मार्ग

सिकन्दरियों के राजा टालेमी को शिक्षा शास्त्री यूक्लिड रेखागणित पड़ा रहे थे। टालेभी ने कहा क्या इसके सीखने का कोई सरल मार्ग नहीं है? यूक्लिड ने उत्तर दिया- यह ठीक है कि राजा के लिए सुंदर राजमार्ग होते हैं, किन्तु शिक्षा के लिए सबको एक ही मार्ग से गुजरना पड़ता है।

जाति और पानी।

एक बार भगवान बुद्ध कहीं जा रहे थे। रास्ते में प्यास लगी। कुँए पर चाण्डाल कन्या पानी भर रही थी। उसने पानी माँगा तो कन्या ने कहा- मैं तो चाँडाल हूँ। बुद्ध ने कहा-देवी मैं कुल जाति नहीं पूछता पानी माँगता हूँ। कुल जाति और पानी का क्या संबंध है? कन्या ने पानी दे दिया।

विवाह का पछतावा

एक व्यक्ति ने सुकरात से पूछा-मैं विवाह करूँ या न करूँ? सुकरात ने उत्तर दिया-करो या न करो, दोनों ही हालत में तुम्हें पछताना पड़ेगा।

परमेश्वर सब कुछ देखता है।

मंगोलिया में चागंशेन नाम का एक न्यायशील अफसर रहता था। वह अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करता पर किसी से रिश्वत न लेता था। एक दिन उसके एक धनी मित्र ने उससे अपने पक्ष में कुछ काम कराने के लिए अशर्फियों की थैली भेंट की और कहा-हमारे आपके सिवाय इस बात को तीसरा न जान सकेगा। इस थैली को रखिए और मेरा काम कर दीजिए। चागंशेन ने कहा-मित्र यह मत कहो कि कोई नहीं देखता। यह धरती देखते है, आकाश देखता है और सबका मालिक परमेश्वर देखता है।

दाम्पत्य जीवन की दुर्दशा।

प्रसिद्ध उपन्यास लेखिका मेरी कुरली से किसी ने पूछा-आप विवाह क्यों नहीं करती? उनने उत्तर दिया-मैंने तीन जानवर पाल रखे हैं जो मिलकर पति का काम कर देते हैं। एक कुत्ता पाला है जो सबेरे गुर्राता है। एक तोता है जो शाम को बड़ी-बड़ी कसमें खाने और सब्जबाग दिखाने की बोली सीख गया है। एक बिलाव पाला है जो इधर उधर भटकता हुआ रात को देर में घर पहुँचता है। यही तो आज कल के पति भी करते हैं।

विद्वान् का निरहंकार।

गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त के आविष्कर्ता सर आईजक न्यूटन कहा करते थे कि लोग मुझे ज्ञानवान समझते हैं, पर जब मैं अपने उपलब्ध ज्ञान की ओर विश्व में फैली हुई महान् ज्ञान गरिमा की तुलना करता हूँ तो लगता है कि समुद्र के किनारे पर बैठकर घोंघे और सीपी बीनने वाले बालक की तरह ही मेरा तुच्छ प्रयास है।

पछतावा क्यों ?

जर्मनी का नाजी नेता गायेरिंग द्वितीय महायुद्ध के असफल होने पर पकड़ा गया और जेल में डाल दिया गया। इस पर भी उसकी जिन्दादिली न गई। जेल अधिकारियों से उसने कहा-जेलों को नये सिरे से निर्माण करने वाले सेनापति को ऐसी सड़ी गली जेल में डाल रखना आपके लिए उचित नहीं। मेरे जैसे आदमी को जेल में भी साफ और खुली हवा की जरूरत है।

मृत्यु दंड सुनकर गोवरिंग ने सहज मुद्रा में पुकारते हुए कहा-युद्ध में हारने वालों को मौत ही मिलती हैं इसमें पछताने की क्या बात है?


Quotation

बड़े-बड़े अपराधों का आरंभ छोटों-छोटों से होता है। ऐसा कभी नहीं देखा गया है कि भीरु, निर्दोष, मनुष्य एकदम पहले सिरे का दुराचारी बन गया।’

कभी-कभी मनुष्य की यह मूर्खतापूर्ण इच्छा होती है कि जिनको हम स्नेह की दृष्टि से देखते है, उन्हें अन्य लोग भी उसी तरह प्यार करें।’

‘प्रशिक्षित होने की अपेक्षा जन्म न लेना अधिक अच्छा है, क्योंकि अज्ञान ही दुर्गति की जड़ है।’


बुद्धिमान यह किया करते हैं

अग्रुभ्यश्च महदभ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलोदरः

सर्वतः सारमादधात् पुष्पेभ्य इव षटपढ़ःबुद्धिमान मनुष्य छोटे और बड़े सब शास्त्रों का सार ग्रहण करें जैसा भौंरा फूलों का रस ग्रहण करता है।

सर्वनाशे समुत्पन्नेऽर्घत्यजति पंडितः

सर्वनाश दिखाई पड़ने पर बुद्धिमान लोग आधा छोड़ देते हैं।

तस्मात् सत्यं बढ़ेत्प्राज्ञों यत्पर प्रीति कारणाम।

सत्यं यत्पर दुखाय तदा मोन परो भवेत्विष्णु पुराण ३।१२।४३सत्य वही बोले जिससे दूसरों की प्रसन्नता बड़े। जिसके कारण दूसरों का दुःख बढ़ता हो उस सत्य बोलने से तो मौन रहना अच्छा।

धनं च धमैंक फलं यतो मैं ज्ञानं सविज्ञान मनु प्रशान्ति-श्रीमदभा

११।५।२०धन का एक ही सदुपयोग है-धर्म जिससे ज्ञान, विज्ञान और शांति मिले।

अक्लेशन शरीरस्य कुवीतघन संचयम्-मनु 3/3

उतना धन संचय करें जिसके लिए शरीर को बहुत कष्ट न उठाना पड़े।

ब्राह्में मुहर्तें दुष्यत धर्मार्थी नानुचिन्त येन्-मनु 4/260

प्रातःकाल उठकर धर्म और अर्थ की चिंता करे।

योऽसाधुभ्योऽर्य मादाय साधुभ्यः संप्रयच्छन्ति।

सकृत्वा प्लवमात्मानं सन्तारयति तावुऔ-मनु 11/19जो दुष्टों का धनापहरण कर सत्पात्र को दे देता है वह अपने को नाव बनाकर दोनों को पार करता है।

अघोऽघः पश्यतः कस्य, महिमा नोपचीयते।

उपर्युपरि पश्यन्तः सर्व दरिद्रति।अपने से नीचे वालों को देखने से मनुष्य अपने को महान् अनुभव कर सकता है। पर यदि ऊपर वालों को देखेगा तो अपने को दीन दुखी ही समझेगा।

अक्रोधेन जयेत् क्रोध मसाधु साधुना जयेत्

जनेत कदर्य दानेन जयेत सत्येन चानृतम-विदूर नीति 7/72 क्रोध को शांति से जीते, दुष्टता को सज्जनता से जीते, लोभी को देकर जीते, और असत्य को सत्य से जीते।

श्रीरामश्रितमुदकं क्षीरमेव भवति।

चाणक्य सूत्र 2/77दूध का आश्रय लेने वाला पानी भी दूध के समान ही हो जाता है।

पूर्वे वयसि तत् कुर्वाद येत वृद्धसुखं बसेत्

पात्रीवेन तत कुर्पाद् येन प्रेत्यं सुखं बसेत्-विदूर नीति 3/68 चढ़ती आयु में यह काम करे जिससे बुढ़ापा सुख पूर्वक बीते। और जीवन भर वह काम करें जिससे मृत्यु के उपरान्त भी सुख मिले।

संगच्छष्ठां संबदध्वं, संवोमनाँसि जानताम्-ऋग्वेद 10/191/2

साथ-साथ बोलो, साथ-साथ चलो। एक दूसरे को दुःख सुख को जानो।

न दुरुक्ताय स्पृहवेत-ऋग्वेद 1/41/9

अपशब्द का अवसर नहीं आने देना चाहिए।

अःकुश्यमानों नाक्रोशेन्मन्युरेवतितिक्षतः

आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति-विदूर नीति 4/5कटुवचन कहने वाले से भी कटुवचन न कहे। क्रोध को भी सहे इससे विपक्षी नष्ट होगा और उसके पुण्य क्षीण हो जायेंगे।

वस्तुःदोष मनादृत्व गुणान् चिन्वन्ति तद्विदः।

अपि कंटकिनः पुष्पेगंधं जिघ्रन्दिष्टपदाः॥किसी वस्तु के दोष का ध्यान न करते हुए बुद्धिमान उसे गुणों को ही ग्रहण करते हैं। गौंरा काँटे वाले पौधों में से भी गन्ध ग्रहण कर लेता है।

युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं बालकादपि।

अन्यतृणमिव त्याजमयमप्युक्तं पद्यजन्मना॥अपि पौरुष मादेयं शास्त्रंचेघु क्तिबोधकम्।

अन्यत्त णमिव त्याज्यं भ्ज्ञाव्यंन्यायैक सेविना-योगवशिष्ठबालक की भी युक्तियुक्त बात को मान लें और यदि अयुक्त बात ब्रह्म कहें तो भी न मानें। युक्तियुक्त लेख चाहे साधारण लेखक का हो तो भी माननीय है। अयुक्तियुक्त शास्त्र, चाहे वह किसी ऋषि का ही बनाया क्यों न हो घृणा के समान फेंक देना चाहिए।

दौ भागौं पूरयेदन्नैस्तोयेनेकं प्रपूरयेत।

वायोः संचरणार्थाय चतुर्यमवशेषयेत्॥पेट का आधा भाग भोजन करे, चौथाई पानी से भरे और एक चौथाई वायु के आवागमन के लिए खाली रहने दे।

परश्चेदेन मतिवादवाणैभृशं

विद्वयेच्छम एवेह कार्यः।संरोध्यमाणः प्रतिहज्यति यस आदत्ते सुकृतं वै परस्य-महाभारतप्रतिपक्षी यदि कुवाक्य बोले तो भी धीर पुरुष शांत ही रहते हैं। शत्रु के क्रोध दिलाने पर भी जो क्रोधित नहीं होता वह धैर्यवान् व्यक्ति शत्रु के पुण्य का हरण कर लेते है।

यशो रक्षन्ति प्राणान् पापद्विभ्यतिन द्विषः

अन्विष्यन्रयर्थिनो नार्थान् निसर्गोऽयंमहात्मनाम्यश की रक्षा करते हैं प्राणों को नहीं। पाप से डरते है शत्रु से नहीं। याचकों को ढूँढ़ते हैं धन को नहीं। यही महात्माओं का स्वभाव है।

सज्जनाएव साधूनां प्रयवन्तिगुणोत्करम।

पुष्पाणाँ सौरभं प्रायस्तन्वते दिक्षुमासताः॥सज्जनों के पक्ष का सज्जन ही प्रसार करते हैं। पुष्पों के सौरभ को वायुदेव ही सब दिशाओं में फैलाते हैं।

न मीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः।

विशुद्धत्य हि में मृत्युः पुत्र जन्म समकिल-मृच्छकटिकमरने का भय नहीं। भय केवल यह है कि यश दूषित न हो जाय। यदि यश देने वाली मृत्यु हो तो वह पुत्र जन्म के समान आनन्द दायक है।

यशस्तु रक्षं परतो यशोधनैः

यशस्वी लोग अपने महान् धन-यश की रक्षा करते हैं।

कीर्तिहि पुरुषं लोके संजीवयति मातृवत

अकीर्जि जीवितं हन्ति जीवितोऽपि शारीरिणः-महाभारतकीर्ति का भाव माता की तरह जीवन दायक है। अपयश तो जीवित को भी मृतक बना देने वाला है।

यदा मानं लभते माननार्ह-स्तदा सवै जीवति जीवलोके।

यदावमानं लभते महान्तंतदा जीवन्मृत इत्युच्यते सः-महाजब तक सम्माननीय व्यक्ति मान पूर्वक संसार में जीवित है तभी तक वह जीवित है। जब उसका तिरस्कार होने लगा तो वह जीवित ही मृतक के समान है।


बिखरे विचार

क्या सत्य के ठेकेदार हम ही हैं ?

सत्य वही नहीं है जिसे हम सत्य मानते हैं। वह उससे कहीं अधिक विस्तृत है। दूसरे लोग जो हमसे भिन्न विचार रखते हुए भी अपनी मान्यता को सत्य मानते हैं फिर उसे असत्य कैसे कहा जाएगा? यदि मान्यता ही सत्य की कसौटी है तो किसकी मान्यता असत्य है। इसका निर्णय कैसे होगा? यदि मान्यता ही सत्य का आधार होती तो सबकी मान्यताएँ एक जैसी होनी चाहिए थी, क्योंकि सत्य एक ही हो सकता है, अनेक नहीं। फिर जब मान्यतायें विभिन्न हैं तो इन्हें सत्य मानना-सत्य को अनेक होना मानने के समान होगा। ऐसी दशा में वह परस्पर विरोधी अनेक रूप वाला सत्य वास्तविक सत्य कैसे माना जा सकेगा?

इसलिए यह मानना पड़ता है कि हममें से पूर्ण सत्य के दर्शन बहुत कम को हो पाते है। हमें उसके एक अंग का आँशिक दर्शन ही होता है। जिस प्रकार चींटी की छोटी आंखें, हाथी के विशाल शरीर की सब ओर से दर्शन नहीं कर पाती, उसके शरीर का केवल एक छोटा अंग ही उसे दीखता है। पर दूसरी चींटी जो हाथ के दूसरे शरीर के समीप है यदि भिन्न आकार देखती है तो उसकी दृष्टि को भी असत्य नहीं कहा जा सकता।

यह मानना कि जो कुछ हम जानते हैं, जो कुछ हम मानते हैं वह सत्य ही है एक बहुत बड़ा भ्रम है। जानकारी प्राप्त करने और मान्यताएँ बनाने की हमारी मर्यादाएँ बहुत सीमित एवं अपूर्ण हैं। जो कुछ सोचा गया, समझा गया है वह सत्य ही है यह मानने का कोई ठोस कारण नहीं है। एक समय जो बात सत्य एक उचित प्रतीत होती है, दूसरे समय, दूसरे कारण उपस्थित हो जाने पर वह पूर्व मान्यता असत्य एवं अनुचित सिद्ध हो जाती है, ऐसी दशा में अपने को ही सत्यवादी कहना अनुपयुक्त ही है।

अन्त में सत्य की ही विजय होगी ?

चरित्र का धन इकट्ठा करके गरीबी में भी अमीरी का आनन्द लिया जा सकता है। चोरी से कोई धनवान् नहीं बन सकता और न दान शीलं को कभी भूखे मरते देखा गया है। यदि हम सचाई के मार्ग पर चलें तो सारी दुनियाँ हमारी सहायता करेगी। हो सकता है कि आरंभ में सच्चे आदमी झूठे लोगों के बीच तिरस्कृत हों और मनाये जाय पर यह स्थिति देर तक नहीं रह सकती। सत्य का मूल्य एक दिन समझ ही जाएगा और उसका पालन करने वाला अपना महानता का समुचित प्रतिफल प्राप्त करेगा।

जीवन की सार्थकता।

मनुष्य जन्म लेना उसी का सफल है जिसके द्वारा मानव जाति का कुछ हित साधन हुआ हो। जिसने गिरे हुओं को उठाने के लिए कुछ नहीं किया, जिसने अपने ज्ञान और शरीर के द्वारा किसी को प्रकाश नहीं दिया, जिससे किसी को प्रेरणा प्राप्त नहीं हुई। जिसने किसी के सुख साधनों को नहीं बढ़ाया तो ऐसा जीवन व्यर्थ ही गया समझना चाहिए।

जीवन की सार्थकता इसी में है कि उसका उपयोग परोपकार के लिए हो। जिसने अपना ही सुख देखा, अपना ही पेट भरा, अपना ही लाभ सोचा उस तुच्छ व्यक्ति की कौन प्रशंसा करेगा? उसे किस आदर्श के लिए दुनिया याद रखेंगे? पेट पाल लेना और स्वार्थ साथ लेना कोई बड़ी बात नहीं है। इसमें तो पशु पक्षी भी चतुर होते है। मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि यह आदर्श बने ओर अपने पीछे वालों के लिए कुछ अनुकरणीय आदर्श छोड़ जाय।

खाँसी से मृत्यु

डाक्टरों का अभिमत है कि जितने व्यक्ति शारीरिक क्षति एवं दुर्बलता से मरते हैं उससे कहीं अधिक की मृत्यु मानसिक आघात और मस्तिष्कीय दुर्बलता से भी हो जाती हैं। यदि कोई बीमार यह मान बैठे कि इस बीमारी से वह अच्छा नहीं हो सकेगा तो फिर उसका किसी भी इलाज से बच सकता कठिन है। इसके विपरीत यदि उसकी इच्छा प्रबल है तो कठिन रोगों को भी परास्त कर सकता उसके लिए संभव है। जिनके संबंध में डाक्टर निराश हो चुके हैं।

अमेरिका के जंगली रेड इण्डियन मामूली खाँसी बुखार से मर जाते हैं। उनका विश्वास है कि यदि बुखार के साथ खाँसी हो जाय तो मृत्यु निश्चित है। किसी बुखार के रोगी को यदि खाँसी आने लगे तो वे उसका उपचार बंद कर देते हैं और मृत्यु की तैयारी करने लगते हैं। वह रोगी भी खाँसी को मृत्यु के रूप में ही देखता है और मरने के दिन गिनने लगता है। इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव यही होता है कि वह रोगी कुछ ही दिन में निश्चित रूप से मर जाता है। जिस खाँसी को सभ्य समाज में एक मामूली सा मर्ज माना जाता है वही रेड इण्डियन के लिए यमदूत के रुपं में आवे, इसमें आश्चर्य तो लगता है पर जो संकल्प शक्ति एवं गाढ़ विश्वास के परिणामों को जानते हैं उनके लिए खाँसी से मृत्यु हो जाने में आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है।

मिलना ही सत्य है

मिलना इस सृष्टि का स्वाभाविक गुण है। हर पदार्थ अपने सजातियों के साथ मिलने के लिए प्रयत्न कर रहा है। जड़ जगत में यह प्रक्रिया निर्बाध रूप से काम कर रही है। टकराना तो एक दुर्घटना मात्र है। सहर्ष कदाचित और कभी-कभी ही होता है, सो भी तब जब कोई विकृतियाँ अनावश्यक मात्रा में इकट्ठी हो जाती है। संसार का सारा क्रम मिलन धर्म पर अवलम्बित है। मिलन से ही पोषण, विकास और अभिवर्धन का कार्य होता है। उल्लास और आनन्द का माध्यम भी मिलन ही है। सहर्ष को असत्य और मिलन को सत्य कहा गया है। हमें मिलन की ही बात सोचनी चाहिए और उसी के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

प्रतिभा को बिखेरिये मत

अपनी प्रतिभा को बहुमुखी करके चारों ओर बखेर देना एक बड़ी भूल है। अनेकों दिशाओं में मन घुमाने और रोज नये काम ढूँढ़ने की अपेक्षा यह अच्छा है कि काफी समझ सोच के कोई मार्ग ग्रहण किया जाय और फिर मजबूती से उसे पकड़े रहकर उसी दिशा में प्रगति करते रहा जाय। जो व्यक्ति एक चीज ढूँढ़ता है वह उसे पा लेता है और जो बहुत कुछ चाहता है, सब कुछ ढूँढ़ता है उसे कभी नहीं मिल पाता। लगातार एक जगह गिरने वाली बूँदें पत्थर में भी छेद कर सकती हैं, पर लंबी दौड़ में उछलते फिरने वाला नाले का पानी धड़धड़ाता हुआ क्षण भर में निकल जाता हे पीछे उसका पता भी नहीं चलता कि कहाँ गया? एक स्थान पर घनिष्ठ होकर जमे रहकर कम योग्यता और कम शक्ति के आदमी भी कुछ न कुछ सफलता प्राप्त कर सकते हैं। पर अनेक दिशाओं में चित्त को डुलाने वाले किसी काम पर न जमने वाले शक्ति सम्पन्न और बुद्धिमान लोग भी कुछ महत्व पूर्ण कार्य कर सकने में असफल ही रहते हैं।

चरित्र बल की महत्ता

चरित्र के बल पर ही मनुष्य दूसरों का विश्वास सम्पादन करता है और उसी के आधार पर उसके मित्र बढ़ते हैं। हँसी मजाक और यारबाजी के सीमित खुदगर्ज मित्र हर किसी को चाहे जहाँ मिल सकते हैं पर ऐसे सच्चे मित्र जो मुसीबत की घड़ी में काम आ सकें, भटकने पर सही रास्ता बता सकें और प्रगति के मार्ग में सहायक हो सकें, सिर्फ चरित्रवान लोगों को ही मिलते हैं। दुनियाँ में चरित्रबल अभी बाकी है पर वह सिर्फ उनके लिए सुरक्षित है जो स्वयं चरित्रवान है। कोई झूठा और धूर्त व्यक्ति यह आशा करें कि दूसरे लोग उसके साथ भी भलाई का व्यवहार करेंगे तो यह उसकी भूल है। उसे दूसरों से वैसी ही धूर्तता की आशा अपने लिये करनी चाहिए जैसी कि उसने दूसरों के साथ की है।

निन्दक का बुरा क्यों मानें ?

यदि कोई हमारे दोष बताता है तो उसका यह उत्तर नहीं है कि वह दोष उस बताने वाले में भी हैं या अन्य लोगों में भी है। ऐसा उत्तर देने का अर्थ है उसके दोष बताने का बुरा मानना, उलाहना देना और विरोध करना। यह आत्म शुद्धि का मार्ग नहीं है। बताने वाला यदि सदोषं है या अन्य लोग भी उस दोष में ग्रस्त हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें भी उस दोष को अपनाये रहना चाहिए।

दीपक द्वारा फैलाये हुए प्रकाश का क्या इसीलिए बहिष्कार किया जाना उचित है कि वह अपने नीचे अंधकार क्यों छिपाये हुए हैं ? ठीक है, यदि दीपक अपने नीचे का अंधकार भी दूर कर सका होता तो उसे सर्वांगपूर्ण कहा जाता। पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके फैलाये हुए प्रकाश का लाभ उठाने से हम वंचित रहें इसका कोई कारण नहीं है। यह भी कोई कारण नहीं है कि दीपक सब जगह का अँधेरा दूर क्यों नहीं करता। यदि वह सुयोग से हमारे घर में जल रहा है तो इसे सौभाग्य ही मानना चाहिए।

दोष बताने वाला यदि स्वयं निर्दोष रहा होता तो उसकी महानता असाधारण होती, पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके इस उपकार को हमें मानना ही चाहिए कि उसने हमारे दोष बताये और उनकी हानि समझने एवं छोड़ने के लिए हमें उकसाया। ऐसा उपकार यदि कड़ुवे शब्दों में किया गया है तो भी इससे रुष्ट होने की कोई बात नहीं है। गिलोय कड़वी होती है पर उसके अन्य गुण मूल्यवान होने के कारण उसे त्याज्य नहीं माना जाता। हमारे दोष यदि कड़ुवे शब्दों में-निंदा या आक्षेप के रूप में बताये हैं तो भी उचित यही है कि उन पर बारीकी से ध्यान दिया जाए, और उस निंदा में जितना भी अंश सच हो उस बुराई को छोड़ने का प्रयत्न किया जाय।

छिपी हुई अन्तःशक्ति

पानी के विशाल जलाशय भरे पड़े रहते हैं उसकी शक्ति का किसी को पता भी न था। पर जब भाप बना कर पिस्टन रोड पर उसे केन्द्रित किया गया तो उससे बड़ी-बड़ी मशीनें और रेलें चलने लगीं। असंख्यों मनुष्य ऐसे हैं जिनमें प्रचंड शक्ति छिपी पड़ी हैं किंतु उसे जागृत और केन्द्रित नहीं किया जाता। यदि यह जागरण और केन्द्रीकरण होने लगे तो बड़े-बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य उस शक्ति के द्वारा सम्पन्न हो सकते हैं।

देश की सच्ची सम्पत्ति

किसी देश के महापुरुष ही उसकी सच्ची संपत्ति हैं। उन्हीं के द्वारा वहाँ की जनता प्रेरणा ओर प्रकाश ग्रहण करती है। धन दौलत, सेना, विज्ञान, कला, शिक्षा स्वास्थ्य आदि से सम्पन्न होने पर भी यदि किसी देश का इतिहास महापुरुषों से रहित है और वर्तमान काल में भी श्रेष्ठ पुरुषों की कमी हे। तो वह सारी सम्पन्नता व्यर्थ है। उस सम्पन्नता से न तो उसका गौरव बढ़ेगा और न भविष्य बनेगा।

वर्क, ग्लेडटन, पिट, मिल्टन और शेक्सपियर को हटा देने पर इंग्लैंड के पास क्या रह जाता है ? विक्टर ह्गो, इसासाँत, नेपोलियन के बिना फ्राँस में क्या रखा है? सीजर, सिसरो और मार्क्स आरेलियस को हटा देने पर रोम गरीब हो जाएगा। डेमास्थनीज, फीडियस, सुकरात, प्लेटो के बिना ग्रीस की क्या कीमत रहेगी? भारत में से यदि राम, कृष्ण, हरिश्चन्द्र, दधीचि, व्यास, वशिष्ठ, बुद्ध, गाँधी आदि को हटा दें तो इसका मूल्य क्या रहेगा?


प्रेम के द्वारा सर्वांगीण कल्याण की साधना

आज का युग अपने पराये के भाव को अधिक प्रोत्साहन दे रहा है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी और अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रयत्नशील है। पारस्परिक प्रेम-भाव नष्ट हो रहा है। अपने ही परिवार में भी प्राथमिकता अपने व्यक्तित्व को ही देने का यत्न किया जाता है। मान लीजिए कि एक परिवार में आठ व्यक्ति हैं, उन पर दो सौ रुपया मासिक व्यय होता है और गृहस्वामी इतना ही कम पाता है, तो प्रायः यह प्रवृत्ति रही है कि गृह स्वामी को अच्छा भोजन, अच्छा कपड़ा प्राप्त करने की इच्छा होगी, उसके कारण चाहे स्त्री-बालकों को घटिया दर्जे का भोजन, कपड़ा ही क्यों न मिले। वे समान रूप से सब का एक-सा खान-पान रख सकते हैं। इससे पारस्परिक प्रेम भी बढ़ सकता है। क्योंकि अपने लिए अधिक सुख-प्राप्ति के यत्न से दूसरों के मन में जो दुर्भावना उत्पन्न होती है, वह समान-भाव रखने से नहीं होनी।

परायेपन के भाव से संसार में पागलपन और मानसिक चिन्ताएँ बढ़ती जा रही हैं। दुर्भावना और कलह को बोलबाला है। हत्याएँ और आत्म हत्याएँ भी दिन पर दिन बढ़ रही है। इन सब में अपना-परायापन ही कारण रूप से विद्यमान् है। यदि मनुष्य सर्वोत्तम-भाव को अपना ले-सभी को अपना मानने लगे तो ऐसी घटनाओं में बहुत कुछ कमी हो सकती है।

इन बुराइयों को दूर करने के लिए प्रेम-पूर्ण वातावरण चाहिए यदि आप अपने प्रति अथवा ईश्वर के प्रति प्रेम करते हैं तो उसकी मात्रा में बुद्धि कीजिए ओर दूसरों के प्रति भी प्रेम करने का स्वभाव बनाइए प्रेम का यह कार्य पहले घर से ही आरंभ कीजिए। पत्नी, पुत्र, भाई, बहिन, माता, पिता आदि से प्रेम कीजिए। जब आप स्वयं विश्वास कर लें कि इनके प्रति प्रेम करने में सफल हो गये हैं, तब घर से बाहर निकल प्रेम की सरिता बह दीजिए।

आपका प्रेम दूसरों के प्रति जैसे-जैसे बढ़ेगा, वैसे-वैसे ही आपकी शक्ति सर्वत्र बढ़ती जाएगी। उस समय अधिक से अधिक व्यक्ति आपसे प्रेम करते पायें जायेंगे। अधिक से अधिक आपसे प्रेम करते पाये जायेंगे। अधिक से अधिक लोग आपसे मिलने लगेंगे। यदि आप बुरे व्यक्ति पर भी दया और प्रेम प्रदर्शित करेंगे तो संभव है कि वह आपके प्रभाव से अपनी बुराइयों को धीरे-धीरे छोड़ दें।

जो लोग आपसे द्वेष करते हैं, उनके प्रति भी द्वेष-भाव मत रखिए और सदा उनके कल्याण की कामना करिए जो आपके निन्दक, पीड़क और शत्रु हैं, उनको भी बुरी दृष्टि से मत देखिए। एक लोकोक्ति भी है- ‘जो तोकू काँटे बोबे, वाकूँ वो तू फूल।’ जिस व्यक्ति में प्रेम के गुण का अभाव है, उसके प्रति प्रेम कीजिए। अपने आचरण से उसे प्रेम करना सिखाइये।

बुद्ध, दयानन्द, शंकराचार्य, गाँधी आदि सबने जन-जन में जाकर अपना प्रेममय संदेश दिया। वे सबसे प्रेम करते और लोगों के दुःख को अपना ही दुःख समझते थे। ईसा के अनुयायी एवं प्रचार करते थे। उन्होंने धर्म प्रचार के लिए अनेक छोटे काम करने में भी अपने को हीन नहीं माना। उन्होंने अपने लिए कभी किसी प्रकार के प्रत्युपकार की माँग नहीं की। उनका उद्देश्य केवल सेवा और प्रेम था। उसके विरोधी उनकी हिंसा में लगे थे, परंतु उन्होंने प्रेम के बल पर ही अपने विरोधियों पर विजय प्राप्त की थी।

सबकी मंगल कामना करो, इससे आपका भी मंगल होगा। उन लोगों की हित की बात सोचो, जिनके हित की बात कोई नहीं सोचता। जो लोग भयभीत, अपाहिज, वृद्ध, रोगी तथा पतित है। उनकी भी कल्याण-कामना करो। जहाँ कहीं किसी के दुःख की बात-सुनो उसकी सहायता के लिए यत्न कीजिए। किसी का मृत्यु-समाचार सुनकर उसके प्रति सम्वेदना प्रकट करते हुए ईश्वर से उसकी सद्गति के लिए प्रार्थना कीजिए। ऐसी प्रार्थना बिना किसी को बताये ही की जा सकती है ओर यह आवश्यक नहीं कि मृत व्यक्ति अपना परिचित ही हो। अपरिचित व्यक्तियों के लिए प्रार्थना करना चाहिए। इससे मृत व्यक्ति को कुछ लाभ हो या न हो, परंतु आपकी आत्मा का अवश्य लाभ होगा। आपके मन में सब प्राणियों के लिए कल्याणकारी भाव जाग्रत होंगे।

आप जब किसी व्यक्ति को अधिक बुरा पावें, तब इस बात पर विचार कीजिए कि क्या वह संभ्रांत नागरिक बन सकता है? तो आपका हृदय ही यह उत्तर देगा कि गुण-अवगुण के भाव सभी में होते हैं, परंतु जिसका जो भाव जाग्रत हो जाता है, उसी के अनुसार मनुष्य कार्य करने लगता है। तो क्यों न उसके मन में सद्गुणों को चैतन्य किया जाय? यदि उसके साथ प्रेम का व्यवहार किया जाय तो वह अवश्य ही सुधर सकता है।

यदि आप सचमुच ही दूसरों की भलाई के लिए कटिबद्ध है तो आपको मानसिक और शारीरिक बल की उत्तरोत्तर प्राप्ति होती जायेगी और आपकी प्रार्थना में भी वह प्रभाव होगा कि जो कार्य शारीरिक श्रम से साध्य न हो, वह उससे सिद्ध हो जाएगा।

सच्चा प्रेम एकांगी नहीं होता, वह सबके लिए हितकर होता है। संसार में उसकी विद्यमानता कल्याणकारिणी होती है। यदि हम कोई कार्य अपने लिए ही करते हैं तो उससे हमारी आत्मा संकुचित हो जाती है। परंतु दूसरों के हित में किया गया कार्य हमारे विचारों को प्रशस्त करते हैं और उनके द्वारा अपने अभीष्ट पुण्य को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं।

सबसे प्रेम करने वाले व्यक्ति बिना भेदभाव ओर पक्षपात के सभी मनुष्यों से मिलने का प्रयास करते हैं। उनके मन में अपने पराये का भेद नहीं होता। क्योंकि वे संकीर्ण विचारों के क्षेत्र से ऊपर उठकर विशाल विश्व में पहुँचते हैं। उस समय वह किसी परिवार विशेष के सदस्य नहीं होते, बल्कि विश्व भर के सब प्राणी उनके पारिवारिक सदस्य होते हैं। उनकी ऐसी भावना ही संसार में प्रेम के भावों को जाग्रत करती है।

मनुष्य की वासनाएँ जितनी बढ़ती हैं, उनके अनुसार ही उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती जाती है। यह आवश्यकताएँ ही मानव-प्रेम में भीषण बाधा के समान उपस्थित होती है। इसीलिए ज्ञानी जन सबसे पहले अपनी आवश्यकताओं में कमी करते हैं। मानसिक चिन्ताओं को भी कम करने का यही एक सरल मार्ग है। मानसिक चिन्ताओं की कमी, आवश्यकताओं की कमी और वासनाओं की कमी, इस दिशा में प्रयत्न करते-करते मनुष्य एक दिन विकार रहित हो जाता है ओर जब उसके विकार मिट जाते हैं तभी वह सच्चा प्रेमी बनता है, इससे पूर्व कदापि नहीं बन सकता।

जो मनुष्य अन्य मनुष्यों की और विशेष कर मनुष्येत्तर प्राणियों की भी सेवा में लगा रहता है, वह निस्सन्देह दूसरों के लिए ही जीवित रहता है। उसे अपने दुःख दूर करने में आनन्द नहीं आता, बल्कि स्वयं दुःख पाकर भी वह दूसरों को सुखी करने में सुख मानता है। ऐसे मनुष्यों को स्वर्ग की भी कामना नहीं होती। बल्कि, सच मानिए-उनके लिए तो पृथिवी पर ही स्वर्ग है।


गायत्री-परिवार संबंधी स्पष्टीकरण

‘अखण्ड ज्योति’ के गत अंक में गायत्री परिवार के संबंध में, कुछ सूचनाएँ छपी थी। उनके संबंध में और भी अधिक स्पष्टीकरण किया जा रहा हे।

(1) गायत्री विद्या की जानकारी अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना और आकर्षित करने का कार्य एक सीमा तक पूर्ण हो गया। इसलिए प्रचारात्मक कार्यों से आगे के कदम उठाये जा रहे हैं।

(2) अब गायत्री परिवार नैष्ठिक उपासकों का एक संघ हो गया। जिन्हें आत्म कल्याण की लगन है एवं जिनकी श्रद्धा सुदृढ़ हो गई है वे ही उसके सदस्य रहेंगे। टब तक के अगणित गायत्री उपासकों में से कितनों को श्रद्धा दुर्बल हो गई होगी। अभी भी जिनकी निष्ठा स्थिर है ओर जो दृढ़ विश्वासों के साथ इस मार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं उनका समुचित मार्ग दर्शन करने एवं अधिक सहयोग देने की दृष्टि से ही गायत्री परिवार के सदस्यों की नई सूची बनाई जा रही है। पुराने रजिस्टर रद्द कर दिये गये हैं।

(3) परिवार का सदस्य जिन्हें रहने हो वे पुनः अपना (1) पूरा नाम (2) पूरा पता, (3) आयु, (4) शिक्षा (5) व्यवसाय (6) जन्म तिथि (यदि जन्म कुंडली हो तो वह भी) (7) अब तक की कुल साधना का विवरण तथा (8) इन दिनों जा साधना क्रम चल रहा हो उसका परिचय लिख कर भेजें। इस विवरण के आधार पर ही उनका नाम सूची में सम्मिलित किया जाएगा।

(4) इन दिनों जो शाखाएँ सजीव हैं उनके मंत्रियों से निवेदन है कि अपने यहाँ के जिनकी साधनायें निष्ठा पूर्वक चल रहा हो, उन सदस्यों की सूची बनाकर भेज दें, तथा साथ ही यह भी लिख दें कि उनमें से कौन साधक अपनी निज की साधना तक ही सीमित हैं और कौन ऐसे हैं जो दूसरों को प्रेरणा देन, सामूहिक व्यवस्था में भाग लेने एवं धर्म सेवा में अभिरुचि लेते हैं। ऐसी सेवा भावी साधकों को सक्रिय सदस्या माना जाएगा।

(5) प्रत्येक सक्रिय सदस्य अब एक स्वतंत्र शास्त्र माना जाएगा। उसके कंधे पर कम से कम पाँच उपासकों को प्रेरणा देते रहने का उत्तरदायित्व भी रहेगा।

(6) अब शाखा के पदाधिकारियों के चुनाव न हुआ करेंगे। इससे ईर्ष्या, द्वेष अहंकार एवं पद लोलुपता आदि बुराइयाँ बढ़ती हैं। सब सदस्य कुटुम्ब भावना से मिल जुलकर विशुद्ध परमार्थ बुद्धि से कार्य किया करें। नाम के लिए काम करने का प्रवृत्ति के निरुत्साहित किया जाना चाहिए। शाखा का एक व्यवस्था-संयोजक कार्य संचालन हिसाब, किताब, पत्र व्यवहार एवं शाखा की वस्तुएँ सुरक्षित रखने की दृष्टि से नियुक्त किया जाया करेगा। यह नियुक्ति मथुरा से होगी और कोई विशेष कारण होने पर ही इस नियुक्ति में परिवर्तन होगा।

पदाधिकारियों के चुनाव अब न होंगे। इससे ईर्ष्या, द्वेष, पदलोलुपता आदि बुराइयाँ बढ़ती है। सब सद्भाव से मिलकर विशुद्ध कर्तव्य बुद्धि एवं धर्म भावना से अपने यहाँ का कार्य चलाये नाम और यश की कामना छोड़कर ही काम करना चाहिए।

(8) शाखाएँ साप्ताहिक सत्संगों का कमजोरी रखें। दोनों नवरात्रियों में सामूहिक अनुष्ठान आयोजन होते रहें। साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का, बुराइयाँ त्यागने एवं अच्छाइयाँ बढ़ाने का बीस सूत्री कार्य चलता रहे।

(9) सक्रिय सदस्य अपने-अपने संरक्षण में नये गायत्री उपासक सदस्य बनाते और बढ़ाते रहें। उनके नाम वे अपने पास ही नोट रखे मथुरा इनकी सूचना तभी भेजी जाय जब उनकी साधना कम से कम छः महीने नियमित रूप से चल चुके और उत्साह क्षणिक बुद्धि मात्र न रहकर निष्ठा में परिणित होता दिखाई दे। ऐसे ही नैष्ठिक उपासकों का मार्ग दर्शन यहाँ से किया जा सकेगा।

(10) अब सदस्यता पत्र भरने और बदले में प्रमाण पत्र भेजे जाने की प्रथा बंद कर दी गई है। नैष्ठिक सदस्य जो अपना परिचय और विवरण अपने हाथ से लिखकर भेजेंगे उसे ही सदस्यता पत्र माना जाएगा। उत्तर में उन्हें आवश्यक नियमों के साथ सदस्यता की स्वीकृति मिलेगी। जिन्हें हमारे सहयोग एवं सेवा की आवश्यकता प्रतीत हो केवल वे ही अपने नाम सदस्यता के लिए भेजें।

(11) प्रत्येक सदस्य को अपनी त्रुटियों को सुधारने, अपने में आवश्यक सद्गुण बढ़ाने एवं आत्मबल संग्रह करने की साधनाओं में संलग्न होना है। इसीलिए अपनी अपूर्णता दूर होगी और इसी से देश, जाति, समाज एवं विश्व की सच्ची सेवा भी बन पड़ेगी।

(10) सभी सदस्यों को अपनी साधना, मनोभूमि तथा परिस्थितियों की सूचना प्रत्येक छमाही पर मथुरा भेजी चाहिए। चैत्र सुदी 15 तथा आश्विनी सुदी 15 इसके लिए नियत है। अब मासिक रिपोर्ट भेजने की आवश्यकता नहीं रही।

(13) ‘अखण्ड ज्योति’ अब साधना पथ के पथिकों का मार्ग दर्शन कार्य ही प्रधान रूप से करेगी। सदस्य उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा करें। सदस्यों और तपोभूमि के बीच के संबंध सूत्र का प्रधान माध्यम यह पत्रिका ही है। जो इसे नहीं पढ़ते वे उस मार्ग दर्शन से वंचित ही रहेंगे जो उपासकों को मिलना आवश्यक है। लेख भी अब उसमें विशिष्ट उद्देश्य के ही रहेंगे। बिना माँगे कोई सज्जन लेख न भेजें।

(15) साधना पथ के पथिकों के लिए प्रवचनों की उतनी आवश्यकता नहीं होती जितनी परमार्थ की। इसलिए आने वालों को परामर्श के लिए उचित समय मिल सके इस दृष्टि से यह उचित समझा गया है कि यहाँ अधिक भीड़ इकट्ठी न होने दी जाय और उतने ही लोग आवें जिनके साथ खुले मन से विचार विनिमय का अवसर रहे। जिन्हें कभी तपोभूमि पधारना हो वे अपने आने की पूर्व सूचना देकर एवं स्वीकृति प्राप्त करके ही आवें। इसी से सीमित संख्या वाली बात निभ सकेगी।

(16) पत्र व्यवहार करते समय सदस्य जवाबी पत्र भेजने की कृपा क्रिया करें। गायत्री परिवार का कोई शुल्क नहीं है। इसलिए पत्र व्यवहार का व्यय भार उस पर पड़ना उचित नहीं। हर पत्र में अपना पूरा पता अवश्य लिखना चाहिए।

(17) हमारी अज्ञातवास साधना के अनुभव अनेक स्वजनों से पूछे हैं। वे सर्व साधारण के समक्ष प्रकट करने के नहीं है। साधना गोपनीय रखने की परम्परा भी है। जितना अंश सर्व साधारण के लिए उपयोगी था वह छप चुका है। कोई और भी बात बताने योग्य होगी तो आगे छप जाएगी। अब तो इतना ही जानना पर्याप्त होगा कि हम स्वस्थ और सानन्द लौटे हैं और साधना की आवश्यकता एवं उपयोगिता का महत्व हमारी दृष्टि में और भी अधिक बढ़ा है। अभी फिलहाल मथुरा से बाहर चले जाने का हमारा कार्यक्रम नहीं है।

-श्रीराम शर्मा आचार्य


Quotation

“शरीर और कीर्ति दोनों नाशवान् है और मृत्यु भी सदा निकट रहती है,

इस कारण धर्म संग्रह करना उचित है-चाणक्य“धर्म की क्षति जिस अनुपात से होती है, उसी अनुपात से आडम्बर की वृद्धि होती है।”

‘वास्तविक धर्म यह है कि जिस बात को मनुष्य अपने लिए उचित नहीं समझता,

दूसरों के साथ वैसी बात हरगिज न करे।-भीष्म पितामह


चारों वेदों का सरल हिन्दी भाष्य

अत्यन्त सुंदर सुसज्जित संस्करण प्रकाशित

वेद ज्ञान और विज्ञान का अनादि भंडार है। सृष्टि के आदि काल में मानवी प्राणी को लौकिक और पारलौकिक सुख-शांति के लिए जो ईश्वरीय मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ, वह बीज रूप से वेदों में सन्निहित है। उस ज्ञान को अपनाकर हम अपने जीवन को सच्चे अर्थों में सफल बना सकते है। वेद हिन्दू धर्म का मूल-भूत धर्मग्रन्थ हैं। भारतीय संस्कृति का उद्गम वेद ही है। वेद मंत्रों में सन्निहित रहस्यों को सुलभ बनाने के लिए उनकी व्याख्या के रूप में उपनिषदों, स्मृतियों, पुराणों एवं अन्य ग्रंथों की रचना की गई है। भारत किसी समय जिस ज्ञान और विज्ञान के कारण सर्वोच्च स्थान पर अवस्थित था, जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक और श्री, समृद्धि का स्वामी बना हुआ था, जिस तत्त्वज्ञान का साक्षात्कार कर ऋषियों ने सब कुछ पाया था और संसार भर में सुख शांति की स्थापना की थी, इस भारतभूमि को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाया था, वह सारी ज्ञान सम्पदा वेदों में सन्निहित है।

खेद की बात है कि पिछला अज्ञानान्धकार युग में हमने बहुत खोया और आज मणि हीन सर्प की भाँति निस्तेज बने अस्त-व्यस्त भटक रहे हैं। इन खोई हुई वस्तुओं में सबसे बहूमूल्य वेद-विद्या है। विदेशी लोग इस वेद-ज्ञान को अपना यहाँ ले गये और उसके आधार पर उन्होंने अपनी प्रगति के लिए बहुत कुछ प्राप्त किया, किन्तु हमारे यहाँ उसकी ओर से उपेक्षा ही हो रही है। इस उपेक्षा के कारण वेद-विद्या धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है और आज वेदों के अध्यात्मपरक एवं विज्ञान परक अर्थों के ज्ञाता ढूँढ़े नहीं मिलते और उनमें सन्निहित महान् रहस्यों के जानने क इच्छुक जिज्ञासुओं को निराश ही रहना पड़ता है।

संसार में कोई भी मुसलमान ऐसा न होगा जिसने कुरान कभी पढ़ा-सुना या देखा न हो। ऐसा ईसाई भी शायद ही कोई हो जिसने बाइबिल के दर्शन तक न किए हों, पर करोड़ों हिन्दू ऐसे हैं, जिन्होंने वेद पढ़ा, सुना तो क्या देखा तक नहीं हैं। अपने धर्म के आदि ग्रन्थ के प्रति हमारी इतनी उपेक्षा निश्चय ही बड़ी चिंताजनक एवं शोचनीय है।

इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए गायत्री तपोभूमि द्वारा चारों वेदों का अत्यन्त सस्ता बढ़िया ग्लेज कागज पर नये टाइप में कपड़े की मजबूत जिल्द में सुसज्जित संस्करण प्रकाशित किया गया है। प्राचीन सम्भाषण के आधार पर परमपूज्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्यजी के द्वारा यह हिन्दू संकरण सम्पादित हुआ है। मूल वेद मन्त्रों के साथ-साथ सरल हिन्दी में अनुवाद बड़े सुयोग्य ढंग से प्रस्तुत किया गया है जिसे साधारण पढ़े लिखे लोग भी आसानी से समझ सकते है।

ऋग्वेद की तीन जिल्दें हैं प्रत्येक जिल्द का मूल्य ७।७ होने से ऋग्वेद का मूल्य 21/ है। अथर्ववेद की 2 जिल्दें हैं। प्रत्येक का मूल्य 6/6 होने से दोनों का मूल्य 12 है। यजुर्वेद एक जिल्द में पूरा हुआ है मूल्य 6, सामवेद भी एक जिल्द में है मूल्य 5। चारों वेदों का कुल मूल्य 44 होता है। किन्तु अखण्ड ज्योति के ग्राहकों को 35 में ही दिया जाएगा। डाक से मंगाने पर 5 और रेल से मंगाने 2 भाड़ा इसके अतिरिक्त लगेगा। आर्डर के साथ 5 पेशगी भेजना आवश्यक है।


नव शृंगार करो

सोच मनुज-जीवन क्षण भंगुर, सबसे प्यार करो!

समझ प्रर्त्य, मत डरो मृत्यु से, पर-उपकार करो!!

देख यहाँ तू सुरा सुन्दरी,

निज संयम मत तोड़।

व्यर्थ बिता मत दुर्लभ जीवन,

चेत, व्यसन सब छोड़॥

कमल पत्र की भाँति विश्व में रह, व्यवहार करो!

बिता संयमित सुंदर जीवन, जग का भार हरो !!

मानव वही, हरे पर पीड़ा,

अपना सुख सब त्याग।

भूले भटके व्यथित जनों से,

करता जो अनुराग।।

छोड़ मोह, निष्काम-भाव से तुम उद्धार करो!

बनो स्वावलंबी कथनी तज, श्रम-सत्कार करो!!

कर्म भूमि यह, कर्म करो शुभ,

हो नव-युग-निर्माण।

पाकर अनुज-देह कर साधन,

हो जिससे निर्वाण।।

सत्य-प्रेम के सुमन चयन कर नव-उपहार करो!

नये रूप से तुम वसुधा का नव शृंगार करो!!

-राम स्वरूप खरे’साहित्य रत्न’