कुछ आवश्यक सूचनाएँ

(1) इस अंक के साथ अधिकांश पाठकों का चन्दा समाप्त हो जाता है। अखण्ड ज्योति’ की वी पी बिना मंगाई नहीं भेजी जाती। क्योंकि इसमें बिलकुल स्वयं ॥) पोस्टेज अधिक देना है। 3) के स्थान पर 3॥) लगते हैं। इस लिए वार्षिक चन्दा 3) मनी आर्डर से ही भेजना उचित है।

(2) बहुत देर से चन्दा भेजने पर पिछले अंक समाप्त हो जाते हैं तब अधूरी फाइलें ही पाठकों की रह जाती है। इसलिये ध्यानपूर्वक अपना चन्दा दिसम्बर में ही भेज देना चाहिये।

(3) जो सज्जन किसी बीच के अंक से ग्राहक बने हैं, वे सन् 62 के शेष महीनों का चन्दा।) प्रति अंक के हिसाब से और भेजकर अगले वर्ष का हिसाब चुकता कर लें। जनवरी से दिसम्बर तक का हिसाब दिखने में ही सुविधा रहती है।

(4) मनी आर्डर कूपन पर अपना पूरा पता स्पष्ट अक्षरों में लिखना चाहिये। पुराने ग्राहक अपना ग्राहक नम्बर लिख दिया करें और जो नये हों वे ‘नये ग्राहक’ शब्द कूपन पर लिख देने की कृपा किया करें।

(5) अखण्ड ज्योति’ हर महीने पहली तारीख को दो बार जाँच कर भेजी जाती है। यदि डाक की गड़बड़ी से कोई अंक गुम हो जाये तो उसी महीने सूचना देकर दुबारा माँग लेना चाहिये। कई महीने बाद सूचना देने से पुराने अंक समाप्त हो जाने पर उन्हें दुबारा भेज सकना संभव नहीं रहता। पता बदलना हो तो केवल नया पता लिख देने मात्र से काम नहीं चल सकता। पुराना पता और नया पता दोनों ही लिखने चाहिये और ग्राहक नम्बर भी लिख देना चाहिये।

(6) अखण्ड ज्योति के मिशन का अधिकाधिक प्रसार उनकी ग्राहक संख्या बढ़ने पर है। पत्रिका की उपयोगिता पर ड़ड़ड़ड़ जो सच्चे मन से उसे प्रेम करते हों ड़ड़ड़ड़ है कि इसकी ग्राहक संख्या बढ़ाने का ड़ड़ड़ड़ एक-दो ग्राहक बढ़ा देना किसी भी व्यक्ति के लिये कुछ कठिन कार्य नहीं है।

साधना सम्बन्धी-

(7) ता0 1 से 9 फरवरी तक ड़ड़ड़ड़-योग के समाधान के लिये सभी परिजन कुछ न कुछ विशेष उपासना करने का कार्यक्रम बनावें। जिनसे बन पड़े वे उन दिनों 24 हजार का एक अनुष्ठान करें जहाँ संभव हो सके वहाँ उन दिनों सामूहिक जप-अनुष्ठान भी किये जायें।

(8) अक्टूबर अंक में प्रस्तुत पंचसूत्री-साधना पूरे या अधूरे रूप में जिनमें आरम्भ की हो वे उसकी सूचना दे देंगे तो उनके मार्ग-दर्शन का विशेष रूप से ध्यान रखा जायेगा। शक्ति ड़ड़ड़ड़ साधना में जिनकी अभिरुचि हो वे उसके लिये पत्र-व्यवहार करें

(9) साधना संबंधी पत्रोत्तर के लिये जवाबी पत्र भेजना चाहिये और अपना पूरा पता स्पष्ट अक्षरों में लिखना चाहिये।

(10) जिन्हें कुछ परामर्श के उद्देश्य से मथुरा आना हो वे अपने आने की तिथियों के संबन्ध में पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने के बाद ही आवें, क्योंकि अब तपोभूमि में एक समय में 10 से अधिक व्यक्तियों को नहीं आने दिया जाता, जिससे ड़ड़ड़ड़ में समुचित समय न मिलने की कठिनाई न हो दूसरे हमें भी कभी-कभी बाहर जाना पड़ता है, जिससे आगन्तुकों को निराश लौटना पड़ता है। इस लिये आने से पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर लेना उचित है।


हृदय की विशुद्धता

दुनियाँ में पैदा हुए विद्वानों में से चाहे हमारी बुद्धि सबसे प्रखर क्यों न हों फिर भी हम ईश्वर तक नहीं पहुँच सकते। बुद्धिमान होकर भी मनुष्य दस गुना अधिक स्वार्थी बन सकता है। हृदय का संस्कार हुए बिना उच्चतम बौद्धिक शिक्षा पाकर भी मनुष्य और घमंडी हो जाते हैं। यदि हृदय और बुद्धि में विरोध उत्पन्न हो तो तुम हृदय का अनुसरण करो। क्योंकि बुद्धि केवल आलोक के क्षेत्र में काम कर सकती है। वह उसके परे नहीं जा सकती। वह केवल हृदय ही है जो हमें उच्चतम भूमिका में आरुढ़ करता है। वहाँ तक बुद्धि कभी नहीं पहुँच सकती। बुद्धि से कभी अन्तः स्फूर्ति नहीं प्राप्त हो सकती। अन्तः स्फूर्ति का कारण केवल ज्ञानोदभासित हृदय ही है। केवल बुद्धि प्रधान किन्तु हृदय शून्य मनुष्य कभी स्फूर्तिमान नहीं हो सकता। प्रेममय पुरुष की समस्त क्रियायें उसके हृदय से ही अनुप्राणित होती हैं। एक शिक्षित व्यक्ति एक साथ ही बुद्धिमान और शैतान हो सकता है किन्तु जिसके हृदय में वह शैतान कभी कभी नहीं घुस सके वही वन्दनीय है चाहे वह अनपढ़ किसान ही क्यों न हो।

-स्वामी विवेकानन्द


चलते समय (कविता)

-दुर्गाप्रसाद विशारद

इस जीवन के चौराहे पर, कितनों से मेल मिलाप हुआ।

कितनों से हुआ विवशता में, कितनों से अपने आप हुआ।।

कितनों से मिलकर हर्ष हुआ, कितनों से मिल सन्ताप हुआ।

कितनों से मिल वरदान मिला, कितनों से मिलना पाप हुआ।

जिससे मिलना था, मिला नहीं, मैं मिला उसे जो मिला नहीं।

विकसित सुमनों को चुना, चुना उसको न अभी जो खिला नहीं।।

अधखिला खिला खिलकर सूखा, सूखे को क्या परिताप हुआ।

इस जीवन के चौराहे पर कितनों से मेल मिलाप हुआ।।

कर सका न मैं निर्णय इसका, है कौन बुरा है कौन भला।

यह क्षण भर का था मिलन हुआ, मैं खड़ा रहा वह गया चला।।

किससे मिलकर उल्लास मिला? किससे मिलना अभिशाप हुआ?

इस जीवन के चौराहे पर कितनों से मेल मिलाप हुआ।।

मिल सका, मगर कह सका न कुछ रह गये अधूरे ही सपने।

अब अपनी मंजिल जाता हूँ, बन चले विराने ये अपने।।

बहुतों को छोड़ चला हँसता, बहुतों को शोक विलाप हुआ।

इस जीवन के चौराहे पर, कितनों से मेल मिलाप हुआ।।


हमारा आन्तरिक महाभारत

मनुष्य के अन्तःकरण में दो प्रवृत्तियाँ रहती हैं जिन्हें आसुरी एवं दैवी प्रकृति कहते हैं। इन दोनों में सदा परस्पर संघर्ष चलता रहता है। गीता में जिस महाभारत का वर्णन है और अर्जुन को जिसमें लड़ाया गया है वह वस्तुतः आध्यात्मिक युद्ध ही है। आसुरी प्रवृत्तियाँ बड़ी प्रबल है। कौरवों के रूप में उनकी बहुत बड़ी संख्या है, सेना भी उनकी बड़ी है। पाण्डव पाँच ही है उनके सहायक एवं सैनिक भी थोड़े ही हैं। फिर भी भगवान ने युद्ध की आवश्यकता समझी और अर्जुन से कहा-लड़ने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। तामसिक आसुरी प्रकृति का दमन किये बिना सतोगुणी दैवी प्रकृति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। इसलिये लड़ना जरूरी है। अर्जुन पहले तो झंझट में पड़ने से कतराये पर भगवान ने जब युद्ध को अनिवार्य बताया तो उसे लड़ने के लिये कटिबद्ध होना पड़ा। इस लड़ाई को इतिहासकार ‘महाभारत’ के नाम से पुकारते हैं। अध्यात्म की भाषा में इसे साधन-समर कहते हैं।

देवासुर संग्राम की अनेक कथाओं में इसी साधन-समर का अलंकारित निरूपण हैं। असुर प्रबल होते हैं, देवता उनसे दुःख पाते हैं, अन्त में दोनों पक्ष लड़ते है, देवता अपने को हारता-सा अनुभव करते हैं, वे भगवान के पास जाते हैं। प्रार्थना करते हैं। भगवान उनकी सहायता करते हैं। अन्त में असुर मारे जाते हैं, देवता विजयी होते है। देवासुर संग्राम के अगणित पौराणिक उपाख्यानों की पृष्ठभूमि यही है।

हमारा अन्तः प्रदेश ही वह धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र है जिसमें महाभारत होता रहता है। असुर मायावी हैं। तमोगुण का असर हमें माया में फँसाये रहता है। इन्द्रिय सुखों का लालच देकर वह अपना जाल फेंकता है और अपने माया पाश में जीव को बाँध लेता है। उस असुर के और भी कितने ही अस्त्र-शस्त्र है जिनसे जीव को अपने दूरवर्ती करके पददलित करने में वह सफल होता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह छः ऐसे ही सम्मोहन अस्त्र हैं, जिनमें मूर्छित होकर जीव बंध जाता है और वह मूर्छा ऐसी होती है कि उससे निकलने की इच्छा भी नहीं होती है। वरन् उसी स्थिति में पड़े रहने को जी चाहता रहता हैं।

अर्जुन भीख माँग कर खाने और ऐसे ही किसी तरह जीवन कट लेने को तैयार है। जो दुष्प्रवृत्तियाँ एक ही घर में-एक ही कुटुम्ब में-अपने ही शरीर में पैदा हुई तथा पली हैं वे उसे स्वजन जैसी लगती है। उन्हें मारने में दुःख लगता है। जो दुर्गुण, दुर्भाग्य, दुःस्वप्न, कुविचार और कुसंस्कार अपने मनः क्षेत्र में चिरकाल से साथी बने हुए हैं उन्हें हटाने के लिये जीव की प्रवृत्ति भी नहीं होती। किन्तु यह अवसाद आत्मा के लिये अहितकर ही है इसलिये भगवान अपने भक्त के इस अवसाद को हटाने का प्रयत्न करते हैं। अर्जुन को युद्ध में लड़ना ही पड़ता है।

आत्मा का कल्याण उस तम प्रवृत्ति में पड़े रहने से नहीं हो सकता जिसमें माया मोहित अगणित जीव पाशबद्ध स्थिति में पड़े रहते हैं। इन बन्धनों को काटे बिना कल्याण का और कोई मार्ग नहीं। इस बुरी स्थिति को यदि रोका, हटाया या सुधारा न जाय तो उसकी भयंकरता एवं विभीषिका में दिन दिन वृद्धि ही होती जायेगी और नारकीय यंत्रणाओं के अधिकांश प्राणी इसी स्थिति में पड़े-पड़े नाना प्रकार के त्रास सहते रहते हैं। भव बन्धनों में बंधे हुए बिगड़ते और बिलखते रहते हैं। इस मार्ग से यदि विरत न हुआ जाय तो पाप, पतन, एवं पीड़ा के चक्र में गला फँसा कर झूलते रहना पड़ता है।

आत्मा की पुकार ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की है। वह अन्धकार से प्रकाश की ओर जाना चाहता है। तम ही अन्धकार और सत ही प्रकाश है। यह अन्धकार को त्यागने और प्रकाश को धारण करने का प्रयत्न ही ‘साधना’ है। साधना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। तम की दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा केवल इस एक ही उपाय से हो सकता है। सच्ची शान्ति और प्रगति का मार्ग भी यही है।

अन्तरात्मा में निरन्तर चलने वाले देवासुर संग्राम में तामसिकता का पक्ष भौतिक सुख साधन इकट्ठे करते रहने और सात्विकता का पक्ष आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होने का है। जब दोनों में से कोई एक पक्ष प्रबल हो उठता है तो संग्राम में तेजी दिखाई देने लगती है। यदि असुरता प्रबल हुई तो दुष्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होकर पतन का नारकीय परिपाक सामने आ जाता है और सुर पक्ष प्रबल हुआ तो सत्प्रवृत्तियों का उभार आता है और मनुष्य, सत्पुरुष, महामानव, ऋषि एवं देवदूत बनकर पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये द्रुत गति से आगे बढ़ता है।

एक बीच की स्थिति ही, रजोगुण ही अवसाद भूमिका कहलाती है। इसमें तम और सत दोनों मिले रहते हैं। लड़ाई बंद हो जाती है और काम चलाऊ समझौता-सा करके दैवी और आसुरी तंत्र एक ही घर में रहने लगते हैं। भले और बुरे दोनों ही तरह के मनुष्य करता रहता है। पाप के प्रति घृणा न रहने से आत्मिक प्रगति की ओर कोई विशेष उत्साह न रहने से दिन काटने की वैसी ही स्थिति बन जाती है, जैसी मंद विष पीकर मूर्छित हुए अर्द्धमृत प्राणी की होती है। मानव-जीवन जैसा अलभ्य अवसर प्राप्त होने पर इस प्रकार का अवसाद भी चिन्ताजनक ही है।

भगवान कृष्ण ने बार-बार उकसा कर अर्जुन को युद्ध के मैदान में खड़ा कर दिया था। गाण्डीव उठाकर शत्रुओं पर शर सन्धान करने के लिये उसे तत्पर ही होना पड़ा था। हमारा भगवान-अन्तरात्मा-भी हमसे यही कराना चाहता है। उसकी गीता निरन्तर हमारे अन्तःकरण में-कुरुक्षेत्र में-कही जाती रहती है। पर हम उसे सुनते नहीं, मूर्छा छोड़ते नहीं, गाण्डीव को छूते नहीं, हमारा कृष्ण हमें झकझोरते-झकझोरते हार चला, पर हम चेतना शून्य ही बने बैठे हैं।

इस अवसाद की स्थिति का अन्त करना ही उचित है। देवासुर-संग्राम में अपने देव पक्ष को विजयी बनाना ही श्रेयस्कर है। तम को छोड़ें और सत का प्रकाश ग्रहण करें इसी में हमारा हित है। साधना में ही मनुष्य का सच्चा स्वार्थ सन्निहित है।


Quotation

"स्वयं अपना पूर्ण परिचय प्राप्त करना ही अन्तर्ज्ञान है, जिससे हमें पता चल जाता है कि हम क्या हैं और हमें क्या होना चाहिये, जिससे हम इस संसार में सुखपूर्वक और उपयोगी रूप से तथा परलोक में शान्ति तथा आनन्द से रह सकें"

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“पूर्णता प्राप्त करने के लिये हमें, या तो मित्रों की आलोचना से या शत्रुओं के कटु वाक्यों से, अपनी त्रुटियों का ज्ञान हो जाना चाहिये।”

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“दोष को धिक्कारे पर उसके कर्ता को नहीं”


ईश्वरोपासना के सत्परिणाम

श्रृण्वे वृष्टेरिव स्वनः पवमानस्य शुप्मिणः।

चरन्ति विद्युतो दिवि।।(ऋ॰ ९-४१-३)

“बलवान सोम के तेज अभिषेक किये जाते समय विद्युत के समान घूमते और चमकते है और सोम का शब्द वर्षा के शब्द के समान ही सुनाई पड़ता है।”

ईश्वर की स्तुति और उपासना मनुष्य के कल्याणार्थ आवश्यक मानी गई है। प्राचीन काल के जितने भी धर्म और मतमतान्तरों हे उन सब में कोई न कोई विधान पाया जाता है। चाहे ईश्वर को निराकार मानने वालों को देखिये ओर चाहे साकार वालों को, स्तुति और प्रार्थना की उपयोगिता सब स्वीकार करते है। भारतवर्ष में सैकड़ों ही नहीं हजारों विभिन्न संप्रदाय पाये जाते है, जिनके सिद्धान्तों में जमीन आसमान का सा अन्तर है, पर एक बात सब में समान रूप से मिलेगी और वह यही है कि वे किसी न किसी रुपं में ईश्वर का गुणगान अवश्य करते हैं और उससे अपने कल्याण की प्रार्थना करते है। थोड़े से अर्द्धमृतक लोग वान का नाम लेकर इस बात को विरोध करने को तैयार हो सकते है, पर सत्य बात यह है कि उन्होंने न विज्ञान के मर्म को समझा है और न अध्यात्म क्षेत्र में कदम रखा है। ऐसे लोग प्रायः इधर-उधर की दो-चार बातों को सुन कर मिथ्यावादी हो जाते हैं और उसी धन में अपने से कहीं अधिक अनुभवी और ज्ञान-सागर में प्रविष्ट महापुरुषों के विरुद्ध निरर्थक बकवाद किया करते है।

पर उपासना और साधना के लिये एक आवश्यकीय शर्त यह है कि वह सच्चे भाव से चित्त लगाकर की जाय। आज कल जिस प्रकार बहुसंख्यक ‘धार्मिक’ कहलाने वाले व्यक्ति दुनिया को दिखाने के लिये अथवा एक रस्म पूरा करने के लिये मंदिर में जाकर दर्शन कर लेते है और नियम को पूरा कर लेने के लिए एकाध माला भी जप लेते है, उससे किसी बड़े सुफल की आशा नहीं की जा सकती। उपासना और साधना तो तभी सच्ची मानी जा सकती है जब कि मनुष्य उस समय समस्त साँसारिक विषयों और आसपास की बातों को भूलकर प्रभु के ध्यान में निमग्न हो जाय। जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता से अपने इष्टदेव की उपासना करता है, तभी वह आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह देवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता हैं इसी तथ्य को समझाने के लिये इस मन्त्र में बतलाया गया है जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिषेक (परमात्मा की उपासना) करता है तब उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते है और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ मेह की तरह बरसती जान पड़ती है।

संसार में जीवन निर्वाह करते हुये एक साधारण मनुष्य को नेक विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता है, विपरीत परिस्थितियों में होकर गुजरना पड़ता है, विरोधियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है और लोगों की भली बुरी सब प्रकार की आलोचना को सहन करना पड़ता है। इससे उसके जीवन में स्वभावतः उद्वेग अशान्ति, भय, क्रोध, आदि के अवसर आते है तिनका उस पर न्यूनाधिक परिणाम में प्रभाव पड़ता है। और वह जीवन में मानसिक अशान्ति-कष्ट का अनुभव करने लगता है। ऐसा मनुष्य अपने कष्टों के निवारणार्थ और मन तथा आत्मा की शांति के लिए परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है, मन, वचन और कर्म से उसकी उपासना में संलग्न होता है, तो उसकी अवस्था में परिवर्तन होने लगता है। जब साधना में अग्रसर होकर वह अपने चारों ओर परमात्म-शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और यह समझने लगता है कि संसार जो कुछ हो रहा है वह उस प्रभु की प्रेरणा और इच्छा का भी फल है तब वह जो कुछ करता है उसका अन्तिम परिणाम जीव के लिये शुभ ही होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशान्ति दूर होने लगती है और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु से व्यथित, श्रान्ति, क्लान्त व्यक्ति को शीतल और शान्तिदायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गई। मनुष्यों ने अपनी भिन्न-भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिये तरह-तरह की साधनायें निकाली है। धन, संतान, वैभव, सम्मान, प्रभाव, विद्या, बुद्धि आदि की प्राप्ति के लिए लोग भाँति-भाँति के उपायों का सहारा लेते रहते है, निकसे उनको अपनी योग्यतानुसार कम या अधिक परिणाम में सफलता भी प्राप्त होती है। पर आत्मिक शांति, प्राप्त करने, साँसारिक तापों के छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय यही हे कि मनुष्य भिन्न-भिन्न कामनाओं का मोह त्याग कर सच्चे-हृदय से परमात्मा का आश्रय ले और शुद्ध भाव से उसकी स्तुति और प्रार्थना करे। हमें स्मरण रखना चाहिये कि सब प्रकार की कामनाओं को पूरा करने वाला भी वास्तव में भगवान ही है। इसलिये अगर हम उसकी कृपा प्राप्त करके आत्मिक शांति प्राप्त कर लेंगे तो हमारी अन्य उचित कामनायें और आवश्यकतायें अपने आप में पूरी हो जायेंगी।

कितने ही मनुष्य इस विवेचन से यह निष्कर्ष निकालेंगे कि परमात्मा के ध्यान में लीन होने से मनुष्य की कामनायें शान्त हो जायेंगी, उसमें संसार के प्रति विरक्ति के भाव का उदय हो जायेगा और इस प्रकार वह आत्म-संतोष का भाव प्राप्त कर लेगा। इस विचार में कुछ सचाई होने पर भी यह खयाल करना कि परमात्मा की उपासना का साँसारिक कामनाओं की पूर्ति से काई सम्बन्ध नहीं, ठीक नहीं है। एक अन्य वेद मंत्र में कहा गया है कि-अपमिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावतम्।” ‘भगवान का धन कभी न रुकने वाला और सदा स्थिर रहने वाला हैं वह उसके उपासकों को इस प्रकार प्राप्त होता है जिस प्रकार नीचे की ओर बहता हुआ जल।’ वर्तमान समय में अनेकों ऐसे व्यक्ति हो चुके है जो बहुत साधारण विद्या-बुद्धि के होते हुए भी परमात्मा के भरोसे सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते है और जो अपने दूसरों के बड़े-बड़े कार्यों को सहज में ही पूरा कर देते है। हम अपने प्राचीन ग्रन्थों में संतों, तपस्वियों ओर भक्तों के जिन चमत्कारों का वर्णन पढ़ते है उनसे तो यह बात स्पष्ट दिखलाई पड़ती हे कि ईश्वर की सच्चे हृदय से उपासना करने वालों को किसी साँसारिक सम्पदा का अभाव नहीं रहता।

मंत्र में यह भी कहा है कि परमात्मा के उपासक को उसके तेज के भी दर्शन होते है। विचार किया जाय तो वास्तव में यही उपासना के सत्य होने की कसौटी है। जो कोई भी एकाग्र चित्त से और तल्लीन होकर परमात्मा का ध्यान करेगा उसे कुछ समय उपरान्त उसके तेज का अनुभव होना अवश्यम्भावी है। यह तेज ही साधक के अन्तर को प्रकाशित करके उसकी भ्रांतियों को दूर कर देता है और उसे जीवन के सच्चे मार्ग को दिखलाता है। इसी प्रकार से मनुष्य सच्चे ज्ञान का अधिकारी बनता है और सब प्रकार की भव बाधाओं को सहज में पार कर सकने की समर्थ प्राप्त करता है।


Quotation

“प्रत्येक मनुष्य के भीतर जो एक आदेश देने वाली शक्ति होती है, जिसके शासन से सारे जीवन की लीला नियंत्रित एवं संगठित होती रहती है, वही विवेचना शक्ति जीवन का देवता है।”


सुखद और सरल तो सत्य ही है

निस्संदेह सत्य का मार्ग उतना कठिन नहीं है जितना दीखता है। जो वस्तु व्यवहार में नहीं आती जिससे हम दूर रहते है, वह अजनबी, विचित्र तथा कष्टसाध्य लगती है पर जब वह समीप आती है और व्यवहार में चल पड़ती है तो वह स्वाभाविक एवं सरल बन जाती है। चूँकि हमारे जीवन में झूठ बोलने की आदत ने गहराइयों तक अपनी जड़ जमा ली है। बात-बात में झूठ बोलते है। बच्चों से , हँसी दिल्लगी में, शेखी बघार के लिए, लोगों को आश्चर्य में डालने के लिए, अक्सर अतिरंजित बातें कही जाती हैं। इनसे कुछ विशेष लाभ होता हो या कोई महत्त्वपूर्ण स्वार्थ सधता हो, सो बात भी नहीं है, पर यह सब आदत में सम्मिलित हो गया है इसलिए अनजाने ही हमारे मुँह से झूठ निकलता रहता है।

वेदों में स्थान-स्थान पर सत्य की महत्ता को समझाया गया है और सत्यवादी तथा सत्यनिष्ठ बनने के लिए प्रेरणा दी गई है।

ऋग्वेद1।46।11 की एक श्रुति है -

अभूदु पारमेतवे पन्थ ऋत्स्य साधु

“सत्य का मार्ग चलने में सरल है। यह मार्ग संसार सागर से तैरने के लिए बनाया गया है। यही मार्ग द्युलोक तक गया है।”

स्वार्थ के लिए आर्थिक लाभ के लिए, व्यापार में झूठ बोलना तो आज उचित ही नहीं एक आवश्यक बात भी समझी जाने लगी है। ग्राहक को भाव बताने में अक्सर दुकानदार झूठ बोलते है, घटिया को बढ़िया बताते है, चीज के दोषों को छिपाते है और गुणों को अतिरंजित करके बताते है जिससे भोला ग्राहक धोखे में आकर सस्ती और घटिया चीज को बढ़िया समझ कर अधिक पैसे में खरीद ले। दुकानदार की इस आम प्रवृत्ति को ग्राहक भी समझने लगे है। और वे नहीं मन दुकानदार को झूठा ठग तथा अविश्वस्त मानते है। उसकी बात पर जरा भी विश्वास नहीं करते। अपनी निज की समझ का उपयोग करते है, दुकानदार की सलाह को ठुकरा देते है, दस जगह घूमकर भाव-ताव मालूम करते है, चीजों का मुकाबला करते है, तब अनत में वस्तु को खरीदते है। यह व्यापारी के लिए एक बड़ी लज्जा की बात है कि उसे आमतौर से झूठा ओर बेईमान समझा जाय, उसकी प्रत्येक बात को अविश्वास और संदेह की दृष्टि से देखा जाय। ऐसे लोग भले ही लाभ कमाते है, पर वस्तुतः मानवता के मूल्यांकन में वे बहुत ही निर्धन निम्न स्तर के तथा घटिया लोग है। जिसे अविश्वस्त समझा जाय, जिनकी नीयत पर संदेह किया जाय, जिसे ठग, धोखेबाज और बहकाने वाला माना जाय वह निस्संदेह अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खो चुका। इतनी कीमती वस्तु खोकर यदि किसी ने धन कमा भी लिया तो इसमें न कोई गौरव की बात हे और न प्रसन्नता की। अपना सामाजिक सम्मान खोकर कई लोग धन कमा लेते है। वेश्याएँ खूब धन कमाती है और ऐश आराम का जीवन बिताती है। लुच्चे, लफंगे, जेबकट और लुटेरे भी अपनी उन्मादी से बहुत पैसे बनाते है और मौज की छानते हैं कोई-कोई भिखमंगे भी संत महन्त, पंडा पुजारी, कोढ़ी कलंकी आदि का रूप बनाकर लोगों की दया ओर धर्म वृत्ति का शोषण करने में खूब सफल होते है और ढेरों दौलत जमाकर लेते है। क्या इनकी प्रशंसा की जाएगी? क्या इनका कोई सराहनीय सामाजिक स्तर गिना जाएगा? नहीं, विचारशील क्षेत्रों में इन्हें निम्न कोटि का इनसानियत से गिरा हुआ व्यक्ति ही गिना जाएगा ऐसी कमाई, जिससे मनुष्य घृणास्पद बनता हो, अपना आत्म सम्मान खोता हो, धिक्कार के ही योग्य है। असत्यता-चाहे वह अपनी चालाकी से किसी क्षेत्र में कितनी ही सफलता क्यों न प्राप्त कर सका हो धिक्कार के योग्य ही माना जायेगा।

लोग सोचते है, असत्य व्यवहार से लोगों को उल्लू बना लेना और अधिक धन उपार्जन कर सकना सरल है। इसलिए वे अपने कारोबार में नकलीपन की भरमार कर डालते है। कई बचकाने लोग अपनी हैसियत बहुत बड़ी बनाने के लिए, खूब फैशन बनाते है और अनाप-शनाप खर्च करते है ताकि लोग यह अनुमान करके कि यह कोई बहुत बड़ा आदमी है उसका आवश्यकता से अधिक सम्मान करने लगे। पर वे यह भूल जाते है कि काठ की हाँडी एक ही बार चढ़ती है, किसी को एक ही बार धोखा दिया जा सकता है। बात आखिर खुलती है, झूठ कितने दिन तक छिप सकती है? जब पोल खुलती है तो सारा गुड़ गोबर हो जाता है। बदनाम व्यापारी का काम अन्त में ऐसा ठप्प होता है कि रोने को मजूर नहीं मिलते। इसी प्रकार औकात से अधिक शेखी बनाने वालों को अन्ततः उपहासास्पद ही बनना पड़ता है। बड़प्पन की छाप किसी पर छोड़ने की अपेक्षा वे औरों की दृष्टि में ओछे एवं ज़लील ही साबित होते है।

विदेशों में जहाँ व्यापार पनपा हे वहाँ उन्होंने सचाई को प्रथम स्थान दिया है। वस्तुओं का मूल्य भले ही महंगा रखा हो, पर भावों में धोखेबाजी नहीं करते और न कुछ बताकर कुछ देते है। समुन्नत योरोपीय देशों में दूध में पानी मिलाकर कोई नहीं बेचेगा । ऐसा कदम कोई करे तो उसे ऐसा ही ज़लील और नीच माना जायेगा जैसा यहाँ बच्चों को उड़ा ले जाने या धतूरा मिला प्रसाद बाँटकर लोगों की पोटली उठा ले जाने वालों को घृणित मानते है। इसी प्रकार वस्तुओं की क्वालिटी तथा कीमत के बारे में भी कोई दुकानदार धोखा न देगा जो वस्तु जैसी है जितने दाम की है उसे एक ही साँस में कह देगा। न ग्राहक का समय नष्ट होगा न दुकानदार का । दुकानदार को न ग्राहक की चापलूसी करनी पड़ती है और न ग्राहक को दस जगह मोल भाव करने तथा चीजों के असली नकली होने का पता लगाने को मारा-मारा फिरना पड़ता है। इसमें दोनों को सुभीता है, दोनों का ही लाभ है।

ईमानदारी में लाभ ही लाभ है। बढ़िया घड़ियाँ बनाने वाली वेस्ट एण्ड वाॅच कम्पनी हर वर्ष करोड़ों रुपया कमाती हे और सस्ती घटिया निकम्मी घड़ी बनाने के अनेकों कारखाने हर साल खुलते और बन्द होते रहते है। फोर्ड मोटर अपने ईमानदार कारखाने को प्रतिदिन करोड़ों रुपया कमा कर देती है जब कि जैसे-तैसे तो जोड़कर निकम्मी मोटरों के कारखाने घाटे का ही रोना रोते रहते है। दूध में पानी, घी में बेजीटेबिल, शहद महंगा भी बिकता है, लाभ भी देता है और साथ ही विक्रेता की प्रतिष्ठा में भी चार चाँद लगाता हैं सचाई का मूल्य कम नहीं है। वह कामधेनु गौ के समान हे यदि पुर्जों उसकी ठीक तरह सेवा कर ले तो पालने वाले को मालामाल कर देती है।

जो बात व्यापार के संबंध में कही गई है वही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू होती है। पारिवारिक जीवन में यदि घर के सब सदस्य परस्पर सचाई का व्यवहार करें तो कलह और वैमनस्य की नौबत ही न आवे। पति-पत्नी के बीच सच्चा प्रेम तभी स्थापित हो सकता है जब दोनों एक दूसरे से किसी प्रकार का दुराव न रखें छल, कपट, चालाकी, चोरी की बात जहाँ शुरू हुई कि प्रेम में अन्तर आया नहीं भाई भाइयों में, पिता पुत्र में यही विष, फूट और द्वेष के बीज बोता है। यदि परिवार के सब लोगों का अन्तःकरण शुद्ध हो, व्यवहार में सौजन्य एवं सत्य का समावेश हो तो वह कुटुम्ब देव परिवार बन सकते है। वहाँ प्रेम और आनन्द की निर्झरिणी सदा प्रवाहित होती रह सकती है।


‘बहुत’ नहीं ‘उत्कृष्ट’ चाहिए

भौतिकता का परिणाम है ‘विस्तार’ और आध्यात्मिकता का प्रतिफल है ‘उत्कृष्ट’। लोभी मनोवृत्ति अनगिनत चीजों की ओर हमारा मन डोलती है। इस संसार की सभी वस्तुएँ नीरस हैं, पर हम उनमें रस चाहते हैं। बहुत प्रयत्न करने पर उनमें उतना ही रस मिलता है जितना कुत्ते को सूखी हड्डी चबाते समय अपना जबड़ा छिल जाने पर उससे टपकने वाले खून का स्वाद आता है। अपना मन जितना जिस वस्तु पर आकर्षित होता है वह उतना ही प्रिय या सुन्दर लगने लगती है, मन हटा नहीं कि वह अप्रिय एवं कुरूप लगी नहीं। वस्तुतः अपनी मनोवृत्ति, अपनी आन्तरिक अभिरुचि ही बाहर के पदार्थों में सरसता एवं सुन्दरता के रूप में झलकती है। अपनी उस आन्तरिक स्थिति में हेर-फेर होते ही प्रिय पदार्थ अप्रिय बन जाते हैं और सुन्दर कुरूप दीखने लगते हैं।

हम इस रहस्य से अपरिचित रहते हैं फल-स्वरूप एक के बाद दूसरे पदार्थ में प्रसन्नता, सरसता ढूँढ़ने के लिए मृगतृष्णा में भटकते रहते हैं। भौंरा और तितली का यही गोरखधन्धा रहता है। वे एक फूल से दूसरे पर दूसरे से तीसरे पर रस की खोज में मँडराते रहते हैं। पुराना नीरस लगने लगा तो दूसरे में अधिक रस की आशा दिखाई दी उड़कर उस पर जा पहुँचे। वह भी कुछ क्षण में नीरस लगना ही था अब और पर जा पहुँचे। इस प्रकार वे दिन भर भटकते रहते हैं पर जिस वस्तु की चाह थी वह मिलती कहाँ है? वस्तुतः रस तो भीतर था बेचारे तितली भौंरे उसे बाहर तलाश करते फिरते हैं। जो चीज जहाँ है ही नहीं वह वहाँ मिले कैसे? जड़ पदार्थ जिनमें कोई जीवन नहीं है किसी को क्या रस दे सकते हैं? भौंरे और तितलियाँ सदा अतृप्त ही रहते हैं। उनके भाग्य में निराशा और असफलता ही बदी है।

हम भी भौंरे और तितली के अनुचर हैं। एक के बाद दूसरे सरस पदार्थ की खोज हमें निरन्तर बनी रहती है। खाद्य पदार्थों के अनगिनत प्रकार बनते चले जा रहे हैं। थाली की शोभा इस बात में मानी जाती है कि उसमें अनेकों प्रकार के व्यंजन परोसे गये हैं। जरा-जरा सा स्वाद सब का चखने को मिले। देर तक खाते रहने पर तो पदार्थ की नीरसता का पता चल जायेगा इसलिए भौंरे और तितली की तरह हर कटोरी में से थोड़ा-थोड़ा चखा जाय तो ठीक रहे यही सोचकर लोग भोजन करते समय बहुत तरह के खाद्य पदार्थ एकत्रित करते हैं।

वस्त्रों की भी यही बात है जिनके पास थोड़ी सुविधा है वे तरह-तरह के कपड़ों से बनी अनेक जोड़ें पोशाक जमा रखते हैं और कभी किसी को, कभी किसी को, पहिन कर अपने सुन्दर दीखने की लालसा पूरी करते रहते हैं। वैसे लगती कोई भी पोशाक सुन्दर नहीं है। यदि लगती होती तो उसे ही सदा पहना जाता। बार-बार बदलने की नौबत क्यों आती? इतने जोड़ी, इतने प्रकार के, कपड़े इकट्ठे क्यों किये जाते?

धन से, सन्तान से, मकान से, जायदाद से, सवारी से, गहने से, कपड़े से, किसी को सन्तोष नहीं होता। उनकी तादाद बढ़ाते रहने की धुन हर एक को लगी रहती है। जिनके पास हजार रुपये हैं वह लाख कमाने की धुन में लगा है। वैभव से, विलासिता से, मनोरंजन से, सैर सपाटे से किसी को तृप्ति नहीं। और अधिक-और अधिक-और अधिक यह एक ही हवस दिन रात मनुष्य को बेचैन किये रहती है। नाम के लिए, यश के लिए, मान के लिए, कितने ही लोग निरन्तर व्याकुल रहते हैं। उन्हें किसी ‘अमुक’ के मिल जाने पर सन्तोष हो जाएगा, इसकी किसी को आशा नहीं करनी चाहिए।

आध्यात्मिकता का अर्थ है-उत्कृष्टता जिसने विस्तार की आकांक्षा छोड़कर उत्कृष्टता को अपना लक्ष्य बनाया है वस्तुतः वही आध्यात्मिक व्यक्ति है। अनेकों सन्तान पैदा करते जाना और उनकी शिक्षा संस्कृति पर कुछ भी ध्यान न देकर एक फूहड़ फौज खड़ी कर देना क्या कोई प्रशंसा की बात है? घटिया दृष्टि के लोग भले ही यह सोचें कि हमारी इतनी सन्तान हैं, हम इतने भाग्यवान हैं, पर यह गर्व वस्तुतः सर्वथा मिथ्या है।

कोई बड़ा मकान जो सर्वत्र गंदगी एवं अस्त-व्यस्त व्यवस्था से भरा पड़ा हो क्या किसी साफ सुथरी झोपड़ी से बढ़ कर आनन्ददायक हो सकता है? मैले कुचैले कई कपड़े और कितने ही जेवर लाद लेने की अपेक्षा शरीर पर थोड़ा ही परिधान सुशोभित हो सकता है, बशर्ते वह स्वच्छता और सादगी से सुसज्जित हो। शरीर पर जल के दो लोटे लुढ़का कर जमे हुये मैल को और भी दुर्गन्धित करने वाले चार बार के स्नान से वह एक बार का स्नान अधिक उत्तम है जिसमें देह की रगड़-रगड़ कर अच्छी तरह सफाई की गई हो और सारा मैल पसीना छुड़ा दिया गया हो।

किसी भी रीति से लाख आदमी हमें जान जायें ऐसी नामवरी कमाने की अपेक्षा दस आदमियों के हृदय में अपने लिए सच्ची श्रद्धा पैदा कर लेना अधिक कठिन है। दस देवताओं को पूजने की अपेक्षा एक ही इष्टदेव में तन्मय हो जाना श्रेयस्कर है। हजार तीर्थों में अन्यमनस्क होकर भ्रमण करने की अपेक्षा सच्ची श्रद्धा से पाँच तीर्थों की यात्रा का पुण्य अधिक है। हजार कुपात्रों को भोजन कराने की अपेक्षा एक सत्पात्र का ब्रह्म-भोज अधिक फलप्रद है। पाँच घण्टे अन्यमनस्क होकर भजन करते रहने की अपेक्षा भावनापूर्ण भजन आध घण्टे का भी बहुत है।

किसी प्रकार सौ वर्ष तक जीवित रहना क्या उस अल्पायु पुरुषार्थी से अधिक श्रेष्ठ है जिसने अपनी थोड़ी जिन्दगी में ही बहुत कुछ कर दिखाया। जगत्-गुरु शंकराचार्य केवल बत्तीस वर्ष ही जीवित रहे थे, स्वामी रामतीर्थ ने भी अल्पायु में ही जीवन पूर्ण कर लिया था। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अनगिनत वीर सेनानी उगती जवानी में ही सीने पर गोलियाँ और गले में फन्दा लगा कर शहीद हो गये। क्या उन्हें अल्पायु कहा जायेगा? गुरु गोविन्द सिंह के बच्चों ने क्या थोड़ी ही आयु में लम्बी जिन्दगी का पूरा लाभ प्राप्त नहीं कर लिया था? दुनियाँ में धन-कुबेर की कब कमी रही है पर राणा प्रताप को अपनी सारी पूँजी को समर्पण करने वाले भामा-शाह और बापू के दत्तक पुत्र बनकर अपनी कमाई उन्हें सौंपते रहने वाले सेठ जमनालाल बजाज अपनी साधारण पूँजी से ही इतिहास के पृष्ठों पर अमर हो गये। विद्वानों की, गुणियों की, चतुर और प्रतिभा वालों की इस संसार में क्या कमी है? पग-पग पर एक से एक बड़ा सुयोग्य व्यक्ति मौजूद है, पर यदि उस योग्यता का उत्कृष्ट उपयोग न हुआ, केवल उस व्यक्ति के अपने ही सुख साधन बढ़ाने में उसका अन्त हो गया तो इसमें क्या बढ़ाई की बात है? उसमें सन्तोष और गर्व करने के लिये धरा ही क्या है? पेट पालने और मौज करने की कला में सुअर जैसा निकृष्ट प्राणी भी चतुर और सफल माना जा सकता है पर उसमें श्रेष्ठता क्या है? गौरव की बात क्या है?

आध्यात्मिकता का आदर्श है-उत्कृष्टता उसे विस्तार में कोई रुचि नहीं होती। संयोगवश उसके कार्यक्षेत्र का विस्तार हो जाय यह बात दूसरी है पर उसमें उसे अभिरुचि जरा भी नहीं होती। काम थोड़ा हो पर हो उत्कृष्ट यही सही दृष्टिकोण है। पर यह आदर्श जमता तभी है जब मनुष्य बहिर्मुखी न होकर अन्तर्मुखी बने। दूसरों के मुँह से अपनी प्रशंसा सुनने का इच्छुक न होकर आत्म सन्तोष में ही प्रसन्नता अनुभव करने लगे।

हमें बहिर्मुखी नहीं अन्तर्मुखी होना चाहिए। “लोग क्या कहते हैं?” इस आधार को छोड़कर ‘सत्य क्या है?’ इसी कसौटी पर अपनी गतिविधियों को कसना चाहिए। विस्तार की नहीं हमें ‘उत्कृष्टता’ की आकांक्षा करनी चाहिए। अधिक-अधिक-अधिक वह वह भृंग तृष्णा निरर्थक है हमें उत्कृष्ट- उत्कृष्ट-उत्कृष्ट की आकांक्षा करनी चाहिए। यही हमारा आदर्श होना चाहिए। जीवन की किसी समस्या पर हम बाह्य दृष्टि से विचार न करें। बाहर के किसी पदार्थ में न तो सुख है और न रस। जो कुछ भी श्रेष्ठता जो कुछ भी सौन्दर्य जो कुछ भी सुख इस संसार में बाहर कहीं दीखता है वह अपने भीतरी स्थिति का ही प्रतिबिम्ब है। यदि हम अपने अन्तस् को उत्कृष्ट बनायें, अन्तर्मुखी होकर आत्म-शोधन और आत्म-निर्माण में लग जायें तो हमारी भीतरी उत्कृष्टता निरन्तर बढ़ेगी और उसकी आभा संसार में बाहर के हर पदार्थ पर छिटक पड़ेगी हर वस्तु सुन्दर, सुसज्जित, मधुर और आनन्ददायक दीख पड़ेगी पतिव्रता को अपना कुरूप पति प्यारा लगता है उसमें उसकी आस्था ही मुख्य कारण है। यह आस्था हम आज खो चुके हैं। इसे प्राप्त किये बिना मानव-जीवन निरर्थक और नीरस ही रहेगा। यदि संसार में सरसता का आस्वादन करना हो तो विस्तार की बहिर्मुखी दृष्टि का परित्याग कर हमें उत्कृष्टता का आध्यात्मिक दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा। जीवन की सफलता और असफलता का प्रमुख आधार यह आध्यात्मिक आस्था ही है। इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही श्रेयस्कर है।


सुखों की ही भाँति दुःख को भी सहन कीजिए

सुखों के समान दुःख भी जीवन में आते ही हैं। दुःखों से सर्वथा रहित होना किसी के लिए भी संभव नहीं। सुख के उपभोग के लिए मन पहले से ही तैयार रहता है। कोई सुख मिले, सफलता प्राप्त हो, लाभ हो, यश और वैभव बढ़े तो इन सम्पदाओं को स्वीकार करने में किसी को कोई अड़चन नहीं होती। जब भी जिस समय भी यह मिलें उसी समय इन्हें प्रसन्नतापूर्वक शिरोधार्य कर लिया जाता है। पर यह बात दुःख के संबंध में नहीं होती। दुःख की बात सुनते ही घबराहट होती है, डर लगता है, कष्ट होता है और वैसा अप्रिय अवसर सामने आते ही मानसिक सन्तुलन बिगड़ने लगता है। कई बार तो यह हड़बड़ी इतनी अधिक होती है कि विचार शक्ति ही कुंठित हो जाती है। क्या करें-क्या न करें यह सूझ नहीं पड़ता। ऐसी स्थिति में कई बार मनुष्य ऐसे निर्णय या काम कर बैठता है जो आपत्ति को और भी बढ़ा देते हैं तथा जिनके लिए पीछे बहुत पश्चाताप करना पड़ता है।

इसलिए मनोभूमि की स्वस्थता इसी में मानी गई है कि मनुष्य दुःखों के लिए भी वैसे ही कटि-बद्ध रहे जैसे सुखों के लिए तैयार रहता है। इसका अर्थ यह नहीं कि जानबूझ कर दुःखों को बुलाया जाय, या उन्हें हटाने का प्रयत्न न किया जाए। ऐसा तो करना ही होता है। यह मनुष्य का स्वभाव है, इसके लिए किसी शिक्षा की जरूरत नहीं है। आपत्ति से बचने और दुखों का हटाने के लिए कीट पतंग तक प्रयत्न करते हैं फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है? वह पूरी चतुरता के साथ इस दिशा में काम करता ही है और अपनी बुद्धिमत्ता से अनेकों आपत्तियों को हटा भी लेता है। इतना होते हुए भी यह किसी के लिए भी संभव नहीं है कि वह पूर्णरूप से दुःखों से बचा रहे। लाख प्रयत्न करने पर भी उसके प्रयत्नों में अपूर्णता रहेगी ही, क्योंकि व्यक्ति अपूर्ण है। इस अपूर्णता के कारण दुखों को हटाने का प्रयत्न भी पूर्णतया सफल न होगा, उसमें कहीं न कहीं त्रुटि रह ही जायेगी और अभावों एवं कष्टों का किसी न किसी मात्रा में सामना करना ही पड़ेगा।

पूर्व संचित प्रारब्ध कर्मों का फल, तथा मानव-जाति के सामूहिक उत्तरदायित्व के कारण भी ऐसी आकस्मिक आपत्तियाँ सामने आती रहती हैं जिनको नियंत्रित कर सकना मनुष्य के काबू से बाहर होता है। भूकम्प, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, युद्ध, तूफान, ड़ड़ड़ड़, आततायियों का आक्रमण, अग्निकाण्ड, चोरी, बीमारी, विश्वासघात, मृत्यु, बिछोह, घाटा, दुर्घटना आदि अनेकों कारण ऐसे हो सकते हैं जिनसे आकस्मिक आघात लगे और व्यक्ति पूरी बुद्धिमानी के साथ अपनी सुरक्षा का प्रयत्न करते हुए भी आपत्ति को न टाल सके और संकटग्रस्त स्थिति में पड़ जाय। ऐसी दशा में यदि उसने अपनी मनोभूमि को पहले ही दुःखों से लड़ने, उन्हें सहन करने तथा सन्तुलन बिगड़ने न देने का अभ्यास नहीं किया हुआ हो तो कठिनाई के समय उसे बहुत परेशानी होगी।

सुख के दिनों प्रसन्न और दुःख के दिनों में अप्रसन्न रहने से जीवन का आनन्द और उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। आज सुखी कल दुखी यह भी कोई जिन्दगी है? परिस्थितियों के हाथ में अपनी प्रसन्नता बिकती रहे, कठपुतली की तरह परिस्थितियों से विवश होकर हँसना या रोना पड़े यह ऐसी स्थिति नहीं है जिस पर कोई मनुष्य गर्व कर सके। भगवान ने हमें ऐसा पराधीन बना कर नहीं भेजा है कि संसार की स्थितियाँ ही हमारे आनन्द की स्वामिनी बनी बैठी रहें और वे जब चाहें तब हँसा या रुलाया करें। आत्मा अपने आनन्द का स्वयं स्वामी है। इसके लिए उसे किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। उसे वह प्रतिभा योग्यता एवं कला उपलब्ध है, जिसके आधार पर मनुष्य चाहे तो दुखों की स्थिति में भी उसी प्रसन्नता पूर्वक अपना जीवन क्रम चलाता रह सकता है, जैसा कि वह सुख के समय चलाता है।

ऐसे अनेक लोग हैं जो उन परिस्थितियों में पड़े हुए मजे में अपना जीवन क्रम चला रहे हैं, जिन्हें देखते ही एक कमजोर तबियत का आदमी घबराने और काँपने लगता है। एक व्यक्ति लखपति है उसे व्यापार में बहुत घाटा हुआ। उसकी अधिकांश पूँजी चली गई। अब सिर्फ उसके पास एक रहने का मकान, स्त्रियों के आभूषण, थोड़ा-सा धनमान शेष रह गया। वह अपनी पूर्व स्थिति से इस स्थिति की तुलना करता है तो उसे अपार दुःख होता है। नींद नहीं आती, अपने दुर्भाग्य को दिन रात कोसता है और भविष्य को अन्धकारमय देखकर निराशा के गर्त में डूबा रहता है। पर यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो अभी भी जो कुछ उसके पास बचा है वह कम नहीं है। रहने को घर का मकान है स्त्रियों के आभूषण तथा जो थोड़ा-सा धन है उसे मिलाकर छोटा कारोबार अभी भी चल सकता है। दो जवान लड़के हैं वे व्यापार करना जानते हैं। अपना भी अनुभव काफी है, इस सब के बल पर वह आज भी भूखा नहीं मर सकता और परिश्रम करके कुछ ही दिनों में अपनी स्थिति को पुनः सुधार सकता है। उसकी जो स्थिति आज है उसके लिए भी असंख्य लोग तरसते हैं। संसार में ऐसे असंख्यों मनुष्य भरे पड़े हैं जिनको रोज कमाना और रोज खाने का क्रम चलाना पड़ता है। जिनके पास पूँजी के नाम पर कुछ भी नहीं, शरीर के द्वारा मजदूरी करके गुजर चलाने के अतिरिक्त उनके पास और कोई उन्नति का साधन भी नहीं हैं। इतने पर भी हँसते खेलते अपनी जिन्दगी के दिन व्यतीत करते हैं। उनकी तुलना में वह घाटा उठाने वाला लखपति व्यक्ति आज भी काफी अच्छी स्थिति में है फिर उसे इतना निराश एवं दुखी क्यों होना चाहिए?

एक व्यक्ति शरीर से कमजोर है और दुर्बलता से दुखी रहता है। पर ऐसे भी अनेकों व्यक्ति हैं जिन्हें कई बीमारियाँ सताती रहती हैं फिर भी वे शान्तिपूर्वक दिन काटते हैं। एक व्यक्ति का एक पुत्र मर गया सिर्फ दो ही और बच्चे उसके पास हैं। वह बहुत शोक करता है। पर ऐसे भी कई लोग हैं जिनके इकलौते बेटे चले गये या एक भी बालक का सुख नहीं देखा। इस प्रकार यदि दृष्टि पसार कर देखा जाये तो ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल सकते हैं जिनमें अपने से बहुत ही गिरी और विचित्र परिस्थिति में पड़े हुए व्यक्ति भी अपने दिन हँसी खुशी से काट रहे हैं। फिर उनसे कहीं अच्छी स्थिति में रहते हुए भी हम दुखी हैं तो इसका कारण वे साँसारिक परिस्थितियाँ नहीं वरन् अपनी आन्तरिक दुर्बलता ही है जिसके कारण हम काम चलाऊ स्थिति में होते हुए भी अपने को विपत्तिग्रस्त मान बैठे हैं।

निःसंदेह इस संसार में कष्ट बहुत हैं। उनके आने से मनुष्य अप्रसन्न भी होता है। पर उन कष्टों का प्रभाव इतना तीव्र नहीं है जितना कि दुर्बल मनोभूमि के लोग अनुभव करते हैं। ऐसा कोई कष्ट इस धरती पर नहीं है जिसे धैर्यवान् व्यक्ति बिना दुःख मनाये सहन न कर सके। लोगों ने मृत्यु को हँसते-हँसते आलिंगन किया है। फाँसी के तख्त पर गीत गाते हुए झूले हैं, गोलियों और किन्हीं से अपने सीने छिदवाये हैं, तेल के खौलते कढ़ाई में कूदें हैं, अपने बच्चों को दीवार में अपनी आँखों के आगे चुने जाते देखा है। और भी न जाने कितनी-कितनी विकट वेदनाएँ लोगों ने धैर्य और साहस के साथ हँसते-हँसते सही हैं। फिर यदि छोटे-मोटे कारण आने पर, जिनमें कोई प्राण संकट जैसा खतरा भी नहीं है घबराहट होती है, मानसिक संतुलन बिगड़ता है तो इसे मन की दुर्बलता ही कहा जायेगा।

दुखों को जीवन से सर्वथा हटाया जा सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। हाँ समझदारी और सद्गुणों के द्वारा उन्हें कम किया जा सकता है फिर भी वे किसी न किसी रूप में है कि उस पर दुखों का प्रभाव न पड़े तो जीवन निरानन्द पूर्ण ही रहेगा और आये दिन कोई न कोई व्यथा वेदना सताती रहेगी। इसलिए विज्ञजनों ने यही उपयुक्त समझा है कि मनोभूमि को ऐसी बना लिया जाय, जिस पर विपरीत परिस्थितियों के आघातों का कुछ विशेष प्रभाव न पड़े। इस प्रक्रिया का नाम है-तितिक्षा

कष्ट सहिष्णुता का नाम ‘तितिक्षा’ है। दुखों से डरने की अपेक्षा यदि हम उन्हें अपना सहचर बनायें तो वह डर आसानी से निकल जायेगा जिसके कारण हम बहुधा व्यथित हो जाते हैं। योग साधन एवं तपस्या में ऐसे नियम पालन करने पड़ते हैं, ऐसे व्रत लेने पड़ते हैं जिनमें शरीर तथा मन को कष्ट सहना पड़े। शरीर और मन स्वभावतः सुविधाजनक स्थिति में रहना, आराम के साधनों के साथ रहना चाहते हैं, इसके विपरीत जब कष्ट साध्य जीवन-यापन करना पड़ता है तो असुविधा एवं अप्रसन्नता अनुभव होती है। यही वह कमजोरी है जिसे यदि निकाल दिया जाये तो आये दिन सामने आते रहने वाले दुखों का कष्ट सहज ही समाप्त हो सकता है। अध्यात्म साधनाओं में तितिक्षा का महत्व इसीलिए रखा गया है।


Quotation

“चाहे शरीर में शस्त्रों का घाव लगता हो और चाहे प्रिय युवती का स्पर्श होता हो, पर दोनों अवस्थाओं में जिसे किसी प्रकार का विकार नहीं होता, उसी धैर्यशाली पुरुष को परम पद में स्थित समझना चाहिये ।”

-योगवाशिष्ठ


क्या आत्म कल्याण के लिए गृह त्याग आवश्यक है?

साधनावस्था के सामान्य कार्यक्रम परिवार के सान्निध्य में-ब्रह्मचर्य गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रमों में रहते हुए पूरे किये जाते हैं। आन्तरिक दोषों के समाधान के लिए यही स्थिति उचित भी है, क्योंकि साँसारिक जीवन में ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के अवसर आते हैं। उनसे लड़ना और निपटना इन्हीं परिस्थितियों में रहकर संभव है। तैरना उसी को आयेगा जो जल में घुसेगा । बेशक उसमें डुबकी लगने का खतरा भी है, पर तैरना सीखना हो तो यह जोखिम भी उठानी ही पड़ेगी। जो डुबकी लगने के डर से पानी से दूर ही रहे वह तैरना क्या सीखेगा ?

जो लोग यह सोचते हैं कि साँसारिक जीवन में अनेक दोष हो सकते हैं, इसलिए जंगल में, एकान्त में, विरक्त बनकर रहना चाहिए, उनका रास्ता सुगम तो अवश्य है, कारण कि एकाकी जीवन में बुरी परिस्थितियों के कारण बुराई बन पड़ने का अवसर कम है। पर साथ ही यह जोखिम भी है कि मनोभूमि दुर्बल रह जाती है। प्रलोभन का अवसर आने पर ऐसे एकान्तवासी ही आसानी से फिसल सकते हैं, क्योंकि उन्हें बुराई से लड़ने का और उस पर विजय प्राप्त करने का अवसर ही नहीं मिला। जिसने युद्धक्षेत्र देखा ही न हो ऐसा सैनिक आसानी से हटाया जा सकता है, पर जो आये दिन लड़ता ही रहता है वह शत्रु की चाल को और उसकी काट को भली प्रकार जानता है ऐसा अनुभवी सैनिक आसानी से नहीं हटाया जा सकता। प्रशस्त अनुभवी सैनिक है । विरक्त तो परीक्षा से डरकर अपनी जान छिपाये बैठा है। वह कठिन प्रसंग आने पर उत्तीर्ण हो जायेगा, इसकी आशा कैसे की जाय?

भारतीय अध्यात्मविद्या की यही परम्परा है कि आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास का सारा कार्यक्रम परिवार के साथ रहकर सात्विक आजीविका कमाते हुए पूर्ण किया जाय। इसके बाद यदि किसी की ऐसी परिस्थिति हो कि अपनी पूर्णता का लाभ जनता को मार्ग दर्शन कराते हुए दे सके तो उसे परिव्राजक या संन्यासी हो जाना चाहिए।

शास्त्र में ज्ञान-वृद्ध ब्राह्मण को ही संन्यास लेने का अधिकारी माना गया है। यह दोनों शर्तें मनुष्य की पूर्णता का प्रमाण हैं। ज्ञान वृद्ध वह व्यक्ति होता है जो उच्च शिक्षा, विशाल स्वाध्याय, चिन्तन, मनन, तत्त्व दर्शन और आत्म ज्ञान द्वारा अपने अंतः करण का पूर्ण समाधान कर चुका हो। अपने संशय, भ्रम, मोह, अज्ञान का पूर्णतया निवारण कर चुका हो तथा अन्य व्यक्तियों की आन्तरिक एवं साँसारिक जीवन की समस्या को धार्मिक एवं व्यवहारिक समन्वय के आधार पर हल करने की क्षमता जिसने प्राप्त कर ली हो तो ऐसा ही व्यक्ति संसार के मार्ग दर्शन के लिए धर्मोपदेश के लिए अधिकारी कहा जा सकता है, उसे ही परिव्राजक बनना चाहिये, उसे ही संन्यास लेना चाहिए।

संन्यास ग्रहण करने की दूसरी शर्त है ब्राह्मण होना। यहाँ ब्राह्मणत्व का तात्पर्य जाति या कुल से नहीं, गुण, कर्म स्वभाव से है। ब्रह्म परायण, वासनाओं और तृष्णाओं के विजयी, काम, क्रोध, लोभ, मोह से विरत, उदारमना, अपरिग्रही, लोकसेवी सत्कर्म परायण व्यक्ति ब्राह्मण कहलाते हैं। ऐसे ही लोग किसी को उपदेश या ज्ञान देने के अधिकारी भी हैं। जिनका आन्तरिक और बाह्य जीवन अपने आप में ही अपूर्ण एवं कलुषित है वे किस मुँह से संसार को धार्मिक नेतृत्व कर सकते हैं। इसलिए ऐसे लोगों को- ब्राह्मण वर्ग वालों को संन्यास लेने का अनाधिकारी बताया गया है।

जो लोग साधना के लिए आत्म उद्धार के मार्ग पर बढ़ने के लिए संन्यास लेते हैं वे भारी भूल करते हैं। यह कार्य तो उन्हें पारिवारिक जीवन में रहते हुए करने का है। जब पूर्ण परिपक्व स्थिति प्राप्त हो जावे, अपने में किसी प्रकार की कोई कच्चा या त्रुटि दिखाई न पड़े और अन्तरात्मा यह स्वीकार करे कि हमें अब अपने लिए कुछ करना शेष नहीं रहा है, धर्म, प्रवचन एवं ज्ञानदान के योग्य पूर्ण परिपक्वता प्राप्त हो चुकी है तो ऐसे व्यक्ति संन्यास ग्रहण करके परिव्राजक बन सकते हैं। परिव्राजक बनने के लिए आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर चुकने के अतिरिक्त दो साँसारिक प्रतिबन्ध भी हैं। एक यह कि स्वास्थ्य भ्रमण के योग्य हो। के कारण अस्त-व्यस्त रहने वाले आहार-विहार को सहन कर सके। दूसरे धर्मपत्नी की आन्तरिक स्वीकृति प्राप्त हो। उसे भी अपने साथ-साथ वानप्रस्थ में रहकर इस मनोभूमि की बना लेना आवश्यक है कि पति के कार्य के महत्व को समझते हुए मोह निवृत्त मन से उसे स्वीकृति दे। यह स्वास्थ्य संबंधी तथा पत्नी की स्वीकृति संबन्ध समस्या हल न हो तो भी जो लोग आवेश में संन्यास ले लेते हैं उनका लक्ष्य पूरा नहीं होता। यह दोनों बातें अभिशाप की तरह उनके पीछे पड़कर मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती हैं।

संन्यास की स्थिति मानव जीवन की सर्वांगीण पूर्णता की घोषणा है और इसका प्रमाण है कि इस व्यक्ति ने सभी गुत्थियाँ शान्ति और मर्यादापूर्ण सुलझाती है। अब यह इस स्थिति में है कि औरों का मार्ग दर्शन कर सके। इतनी बड़ी सफलता प्राप्त करने वाले व्यक्ति के गुणों में जन-समाज सच्चे हृदय से मस्तक झुकाता है। उन्हें देव श्रेणी में गिना जाता है। ऐसे दस-बीस भी संन्यासी जिस देश में होते थे उसकी कीर्ति चारों ओर फैल जाती थी। संन्यासी का आतिथ्य करने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए हर कोई लालायित रहता था। संन्यासी के दर्शन मात्र को लोग भारी पुण्य मानते थे, क्योंकि वह जीवन की सर्वांगीण पूर्णता का प्रतीक जो था।

साधना करने के लिए अपरिपक्व मन बुद्धि के लोगों का भगवा कपड़ा पहन कर संन्यासी हो जाना और अपनी अपूर्णताओं से वेष को कलंकित करते फिरना, संन्यास धर्म के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार है। ऐसे व्यक्ति अपराधियों की श्रेणी में रखने योग्य हैं। ईश्वर प्राप्ति तो उन्हें होनी ही कहाँ है?

आज साधु संन्यासियों का समाज इतना बढ़ जाना और उनका स्तर इतना गिर जाना, प्रत्येक धर्म प्रेमी के लिए एक बड़ी चिन्ता एवं वेदना का विषय है। उनमें से जो थोड़े से सच्चे साधु भी हैं वे भी इस भिखमंगे की भीड़ में अपना प्रभाव खोते चले जा रहे हैं। पूर्वकालीन में साधु महात्मा को देखकर स्वभावतः ही हर व्यक्ति में उनके त्याग के प्रति श्रद्धा का संचार होता था पर आज ठीक उसके विपरीत स्थिति है। त्याग, साधना और भावना ऊँची होते हुए भी वेष देखकर तो पहले लोग नाक भौं ही चढ़ाते हैं पीछे अधिक व्यक्तिगत परिचय होने पर भले ही कोई सम्मान करे। अब भिक्षा भी कोई ससम्मान प्राप्त नहीं कर सकता और न ऐसा सात्विक अन्न ही उपलब्ध है जिसे भिक्षा में लेकर खाने वाले की बुद्धि सात्विक बनी रहे। जंगल वन भी कट गये, जहाँ कंदमूल फल पैदा होते थे तथा जहाँ गायें पाल कर दूध भी उपलब्ध हो सकता था। अब तो वे ही जंगल किसी प्रकार बच रहे हैं जो सब प्रकार साधनहीन हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए इन बातों की भी अब खैर नहीं ।

इन परिस्थितियों को देखते हुए अध्यात्म मार्ग के पथिक के लिए गृहत्यागी या संन्यास धारण करने की बात नहीं सोचनी चाहिये। उसके लिए यही उचित है कि अपनी सात्विक जीविका कमाते हुए अपने परिजनों के कारण पोषण का पुनीत कर्तव्य पालन करते हुए, अपने दोष, दुर्गुणों के शमन करने एवं ईश्वर उपासना में लगने का प्रयत्न करे। यही मार्ग सीधा सरल और सुगम है।


धर्म-पुराणों की सत्यकथा

शिक्षा का आचरण

गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को पढ़ाया सत्यं-वद् और कहा इसे कल अच्छी तरह याद करके लाना। और सब लड़के तो उस चार अक्षर के पाठ को दूसरे दिन याद कर लाये, पर युधिष्ठिर ने कहा भगवान मुझे याद नहीं हुआ। गुरु ने कहा-अच्छा कल याद कर लाना। और विद्यार्थियों को उनसे अगला पाठ पढ़ा दिया। युधिष्ठिर से दूसरे दिन भी वह पाठ याद न हुआ। इस प्रकार कई दिन तक वे यही करते रहे। पाठ बहुत मुश्किल है, ठीक तरह याद नहीं होता। इस पर एक दिन गुरु जी ने उन्हें धमकाया कि इतने दिन हो गये, चार अक्षर का पाठ याद नहीं होता-क्या कारण है? युधिष्ठिर ने कहा-लिखने और पढ़ने की दृष्टि से वह पाठ जरा-सा था। दो मिनट में उसे याद किया जा सकता था पर इतने में क्या बनेगा? वह जीवन व्यवहार में आ जाय तभी उसका पढ़ना सार्थक है। मैं ‘सत्यं वद्-सत्य बोलो-की शिक्षा को अपने व्यवहार में ढाल रहा हूँ। पुरानी आदतों के कारण वह अभ्यास में नहीं आ पाता, इसी से देर हो रही है।

गुरु द्रोणाचार्य ऐसे कर्मठ शिष्य को पाकर बढ़े प्रसन्न हुए। युधिष्ठिर ने सत्यं वद् का पाठ पढ़ा ओर ऐसा पढ़ा कि जीवन भर निभाता रहा।

ब्रह्मचर्य की शक्ति

ब्रह्मचारी भीष्म पितामह युद्ध में बुरी तरह घायल हुए, उनका सारा शरीर तीर से बिदा हुआ था। उस समय सूर्य दक्षिणायन थे। वे उत्तरायण सूर्य में देह त्यागना चाहते थे इसलिए अभीष्ट समय आने की प्रतीक्षा में उन्होंने अपने प्राणों को रोक लिया । शरीर की दृष्टि से वे उतने घायल थे कि तुरन्त ही प्राण निकल जाना चाहिए था पर वे अपनी इच्छा शक्ति के बल पर तब तक शरीर धारण किये रहे जब तक कि उत्तरायण सूर्य का शुभ मुहूर्त न आ गया।

ब्रह्मचर्य की शक्ति महान् है उसके बल पर प्राण भी वश में रह सकते हैं।

साधु का चरित्र अत्यन्त निर्मल रहे

शंख और लिखित दो साधु भाई-भाई थे। दोनों अलग -अलग जगह रहते थे। एक दिन लिखित अपने भाई शंख के आश्रम में गये। वे भूखे थे इसलिए उस वाटिका के फल तोड़कर खाने लगे। इतने में शंख आये उन्होंने भाई को कहा-हम लोग साधु हैं, हमारा चरित्र साधारण लोगों की अपेक्षा अधिक ऊँचा होना चाहिए। मैं तुम्हारा भाई हूँ सो ठीक है पर बिना पूछे भाई की चीज लेना भी चोरी ही है। इसका प्रायश्चित करना आवश्यक है। शंख को अपनी भूल का पता चला। वे इसका दंड लेने राजा के पास गये। उन दिनों चोरी की सजा हाथ काटना थी। लिखित ने खुशी-खुशी अपने हाथ कटवा लिये।

सत्पुरुषों का अनुकरण दूसरे लोग करते हैं इसलिए उन्हें अपने चरित्र की ओर साधारण लोगों की अपेक्षा अधिक ध्यान रखना और अधिक उज्ज्वल बनना आवश्यक है।

ब्राह्मणत्व का पतन

एकबार एक ब्राह्मण, युधिष्ठिर तथा श्रीकृष्ण जी तीनों बैठे चुपचाप आँसू बहा रहे थे। इतने में अर्जुन आये, उन्होंने तीनों के इस प्रकार रोने का कारण पूछा, तो सब के मन को जानने वाले श्रीकृष्णचन्द्र जी ने उस मूक प्रसंग का कारण बताते हुए कहा-आज युधिष्ठिर ने इस ब्राह्मण को निमन्त्रण दिया था। ब्राह्मण संकोच वश उस निमन्त्रण को अस्वीकार भी नहीं कर पा रहा है और मन ही मन दुखी भी है कि राजा का कुदान खाकर मुझे अपना तप क्षीण करना पड़ेगा। युधिष्ठिर भी ब्राह्मण के मन की जानते हैं और इस कारण दुखी हैं। कि यदि मैं अपने हाथ पैर से सात्विक अन्न कमा कर ब्राह्मण को खिला सका होता कैसा अच्छा होता। मैं इसलिए दुखी हूँ कि आज तो खाने वाले ब्राह्मण में यह विवेक मौजूद हैं कि किसके यहाँ खाऊँ तथा यजमान में यह विवेक मौजूद है कि पुण्य केवल सात्विक कमाई के पैसे से ही होता है। आगे जाकर दोनों में से यह विवेक चला जायेगा और खाने के लिए ब्राह्मण अभक्ष्य के लिए भी दौड़ेंगे और खिलाने वाले अनीति उपार्जित धन से भी पुण्य की आशा करेंगे। मैं उसी बुरे भविष्य की कल्पना करके दुखी हो रहा हूँ।

दान की आजीविका बनाने वाले लालची ब्राह्मण सब प्रकार शोचनीय हैं।

भूमिगत संस्कार

जब महाभारत युद्ध होने का निश्चय हो गया तो उसके लिये जमीन तलाश की जाने लगी। श्रीकृष्ण जी बढ़ी हुई असुरता से ग्रसित व्यक्तियों को उस युद्ध के द्वारा नष्ट कराना चाहते थे। पर भय यह था कि यह भाई-भाइयों का, गुरु शिष्य का, सम्बन्धी कुटुम्बियों का युद्ध है। एक दूसरे को मरते देखकर कहीं सन्धि न कर बैठें इसलिए ऐसी भूमि युद्ध के लिए चुननी चाहिए जहाँ क्रोध और द्वेष के संस्कार पर्याप्त मात्रा में हों। उन्होंने अनेकों दूत अनेकों दिशाओं में भेजे कि वहाँ की घटनाओं का वर्णन आकर उन्हें सुनायें।

एक दूत ने सुनाया कि अमुक जगह बड़े भाई ने छोटे भाई को खेत की मेंड़ से बहते हुए वर्षा के पानी को रोकने के लिए कहा। पर उसने स्पष्ट इनकार कर दिया और उलाहना देते हुए कहा-तू ही क्यों न बन्द कर आवे? मैं कोई तेरा गुलाम हूँ। इस पर बड़ा भाई आग बबूला हो गया। उसने छोटे भाई को छुरे से गोद डाला और उसकी लाश को पैर पकड़कर घसीटता हुआ उस मेंड़ के पास ले गया और जहाँ से पानी निकल रहा था वहाँ उस लाश को पैर से कुचल कर लगा दिया।

इस नृशंसता को सुनकर श्रीकृष्ण ने निश्चय किया यह भूमि भाई-भाई के युद्ध के लिए उपयुक्त है। यहाँ पहुँचने पर उनके मस्तिष्क पर जो प्रभाव पड़ेगा उससे परस्पर प्रेम उत्पन्न होने या सन्धि चर्चा चलने की सम्भावना न रहेगी। वह स्थान कुरुक्षेत्र था वहीं युद्ध रचा गया।

श्रवणकुमार के माता-पिता अंधे थे। वे उनकी सेवा पूरी तत्परता से करते, किसी प्रकार का कष्ट न होने देते। एक बार माता-पिता ने तीर्थ यात्रा की इच्छा की। श्रवण कुमार ने काँवर बनाकर दोनों को उसमें बिठाया और उन्हें लेकर तीर्थ यात्रा को चल दिया। बहुत से तीर्थ करा लेने पर एक दिन अचानक उसके मन में यह भाव आये कि पिता-माता को पैदल क्यों न चलाया जाय? उसने काँवर जमीन पर रख दी और उन्हें पैदल चलने को कहा। वे चलने तो लगे पर उन्होंने साथ ही यह भी कहा-इस भूमि को जितनी जल्दी हो सके पार कर लेना चाहिए। वे तेजी से चलने लगे जब वह भूमि निकल गई तो श्रवणकुमार को माता-पिता की अवज्ञा करने का बड़ा पश्चाताप हुआ और उसने पैरों पड़ कर क्षमा माँगी तथा फिर काँवर में बिठा लिया।

उसके पिता ने कहा-पुत्र इसमें तुम्हारा दोष नहीं। उस भूमि पर किसी समय मय नामक एक असुर रहता था उसने जन्मते ही अपने ही पिता-माता को मार डाला था, उसी के संस्कार उस भूमि में अभी तक बने हुए हैं इसी से उस क्षेत्र में गुजरते हुए तुम्हें ऐसी बुद्धि उपजी।

शुभ और अशुभ विचारों एवं कर्मों के संस्कार भूमि में देर तक समाये रहते हैं। इसीलिए ऐसी भूमि में ही निवास करना चाहिए जहाँ शुभ विचारों और शुभ कार्यों का समावेश रहा हो।

भगवान की दृष्टि में जाति का मूल्य

दण्डकारण्य वन में शबरी नाम की एक भीलनी अपनी कुटी बनाकर रहती और प्रेमपूर्वक साधना करती थी। वह भजन के साथ-साथ ऋषियों की कुछ सेवा भी करना चाहती थी पर ऋषि उसे अछूत कह कर उसकी सेवा भी स्वीकार न करते थे। निदान शबरी ने ऋषियों के रास्तों को झाड़ बुहार कर साफ करने और ईंधन इकट्ठा करके आश्रमों के आगे जमा कर देने की सेवा करना यह सोचकर आरम्भ कर दिया कि इसमें तो उन्हें आपत्ति होगी ही नहीं। किन्तु यह भी अभिमानी ब्राह्मणों को बुरा लगा। वे उसे पकड़कर मातंग ऋषि के आश्रम ले गये।

मातंग दयालु थे। उन्होंने उसे छुड़ा दिया। इतना ही नहीं उसकी वृद्धावस्था को देखते हुए अपने विशाल आश्रम के एक कोने में उसे भी रहने की आज्ञा दे दी। यह बात अन्य ब्राह्मणों को बहुत लगी, उन्होंने मातंग का भी बहिष्कार कर दिया।

एक दिन शबरी कहीं जा रही थी। सामने से स्नान करके आते हुए किसी ब्राह्मण का शरीर छू गया। उस पर वे बहुत क्रुद्ध हुये

भगवान राम जब दंड कारण अपने वनवास काल में आये तब सबसे पहले वे शबरी के ही आश्रम में गये। शबरी आचार व्यवहार में प्रवीण न थी। उसने इकट्ठे किये हुए बेरों को चख-चख कर मीठे-मीठे रामचन्द्रजी को खिलाये। उन्होंने लक्ष्मण समेत उन बेरों को बड़े प्रेमपूर्वक खाया।

ऋषियों ने सरोवर में कीड़े पड़ने और उसका जल रुधिर होने की बात कही तो लक्ष्मण ने कहा-मतंग ऋषि के बहिष्कार और शबरी के अपमान का यही फल है । अब शबरी यदि उस जल को स्पर्श करे तो वह जल शुद्ध हो। शबरी ने उस तालाब में प्रवेश किया और वह फिर पूर्ववत् शुद्ध हो गया।

भगवान की दृष्टि में जाति का नहीं भावना का मूल्य है।

भाइयों की सहायता

जब पाण्डव द्वैत वन में रह रहे थे, तब दुर्योधन कुटिल उद्देश्य से वहाँ पहुँचा। वह पाण्डवों का अनिष्ट करना चाहता था। रास्ते में जब वह एक सरोवर में स्नान के लिए घुसा तो वहाँ के निवासी गन्धर्वों ने युद्ध करके उसे रानियों समेत बन्दी बना लिया।

युधिष्ठिर को जब यह समाचार मिला तो उन्होंने अपने भाइयों से कहा-तुम सब जाकर गन्धर्वों से दुर्योधन को छुड़ाए यद्यपि वह दुष्ट उद्देश्य से वहाँ आया था फिर भी इस समय वह विपत्ति में पड़ा हुआ है। आखिर है तो अपना भाई ही। दूसरों के हाथों उसकी दुर्गति होते देखना हमारे लिए अशोभनीय है। दुर्योधन के उपकारों को भुलाकर हमें अपनी सहज उदारता से उसके साथ उपकार करना ही उचित है।

युधिष्ठिर की आज्ञानुसार अर्जुन ने गन्धर्वों से लड़कर दुर्योधन को रानियों सहित बन्धन मुक्त करा दिया।

आपत्तिजनक होने पर भी अपकार करने वालों की सहायता करना सज्जनों का कर्तव्य है।

धैर्य की परीक्षा

हैहयवंशी श्रतभिधान के पुत्र राजा शंख को भगवान के दर्शनों की इच्छा उत्पन्न हुई और वे तप करने लगे। जब बहुत दिन बीत गये और दर्शन नहीं हुए तो उन्हें अपने तप की शुद्धता में शंका होने लगी। तब उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि अभी एक हजार वर्ष की देर है, तब दर्शन होंगे। इतनी प्रतीक्षा कर सकता हो तो तप कर। शंख इससे बहुत आश्वस्त हुए और धैर्यपूर्वक नारायण गिरि पर्वत पर और भी कठिन साधना करने चले गये। भगवान ने उनके धैर्य की परीक्षा लेने के लिए एक हजार वर्ष बाद फिर आकाशवाणी की कि तेरी साधना में अभी कमी है इसलिए एक हजार वर्ष और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इस प्रकार तीन बार वह अवधि टली। तो भी राजा अधीर नहीं हुआ उस अवधि को साधारण मानता रहा। अन्त में भगवान ने उसके धैर्य को परिपक्व परख कर दर्शन दिये।

भगवान को धैर्यवान् प्रिय है। अधीर की निष्ठा तो बड़ी अच्छी होती है इसलिए वह भगवान की दृष्टि में तुच्छ ही रहता है।


मानवता के सच्चे उपासक-श्री जगद्बन्धु

भारतवर्ष में साधु-सन्तों त्यागी-तपस्वियों और अन्य अनेक प्रकार के धर्म प्रचारकों की कमी नहीं है। इतना ही क्यों, अगर हम कहें कि यहाँ पर ऐसे गृहत्यागी धर्म का ही धंधा करने वालों लोगों की संख्या इतनी अधिक है जितनी आज शेष समस्त संसार में मिल कर भी नहीं है, तो भी यह अतिशयोक्ति न होगी। बड़े नगरों और तीर्थों की बात तो छोड़ दीजिये, उनमें कोई ऐसा न होगा जहाँ ऐसे दो एक ‘बाबाजी’ स्थान या मन्दिर आदि बनाकर न टिके हुये हों। लाखों-लाख गृहस्थियों को रहने के लिए झोपड़ी भी न मिले और परिश्रम करने पर भी उनको भूखा रहना पड़ता हो, पर इन ‘महात्माओं’ के लिये भगवान कहीं न कहीं से इच्छा-भोजन भेज ही देते हैं। रहने के लिये बड़े-बड़े मन्दिर या आश्रम खाली पड़े रहते हैं। इस परिस्थिति को देखकर प्रायः रामायण की यह चौपाई याद आ जाती है- “तपसी, धनवन्त, दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कहीं।”

ऐसी परिस्थिति में जब हम किसी साधु नामधारी को वास्तव में त्याग और तपस्या के साथ परोपकार का जीवन व्यतीत करते देखते हैं तो एक प्रकार का आन्तरिक संतोष होता है। जो व्यक्ति योग्यता और सामर्थ्य रखने पर भी उसे अपनी साँसारिक उन्नति और स्वार्थ की पूर्ति में न लगाकर अन्य लोगों के हितार्थ परिश्रम करते हैं, कष्ट सहते हैं और फिर भी किसी के ऊपर अहसान नहीं जताते, वे वास्तव में प्रशंसा के पात्र हैं।

प्रभु जगद्बन्धु (जन्म 1870) एक ऐसे ही साधु थे। बाल्यावस्था से ही उनकी रुचि वैराग्य और भगवत् भजन की तरफ थी। उनके पिता फरीदपुर (पूर्व बंगाल) के एक अच्छे पंडित थे। घर के अन्य व्यक्ति भी विद्यानुराग तथा धार्मिक स्वभाव के थे। इसलिये वे इनको भी भली प्रकार शिक्षित बनाना चाहते थे, पर संसार से जन्मजात वैराग्य होने के कारण ये स्कूल में दसवें दर्जे (मैट्रिक) से अधिक अध्ययन न कर सके। उस बीच में भी ये चाहे जब घर को छोड़कर जंगल को चल देते थे और वहाँ ध्यान में डूबे रहते थे। इसका एक कारण यह भी हुआ कि जब ये चौदह मास के थे तब इनकी माता का और सात वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो गया और इनको प्रायः एक स्थान से दूसरे स्थान में आते जाते रहना पड़ा। इससे इनकी शिक्षा अनियमित रूप से हुई और बुद्धिमान तथा उच्च मेधावृद्धि के छात्र होने पर भी वे अपनी पढ़ाई को विशेष रूप से अग्रसर न कर सके।

पर समाज सेवा और लोकोपकार की प्रवृत्ति उनमें विद्यार्थी जीवन में ही प्रस्फुटित होने लग गई थी। पन्द्रह वर्ष की आयु में ही वे अनुभव करने लगे कि उनका जीवन दूसरों की सेवा के लिये ही है। उन्होंने सबसे पहले अपने सहपाठी विद्यार्थियों के सुधार की तरफ ही ध्यान दिया। वर्तमान समय के स्कूली जीवन में छोटे-बड़े विद्यार्थियों में जो दोष उत्पन्न हो जाते हैं वे किसी से छिपे नहीं हैं। जगद्बन्धु का व्यक्तित्व और सौंदर्य ऐसा आकर्षक था कि विद्यार्थी उनको घेरे रहते थे। वे उनको मुख्यतः दो बातों का उपदेश देने लगे-ब्रह्मचर्य का पालन करो और हरिभक्त से प्रेम रखो।” वे भली प्रकार समझते थे कि ये विद्यार्थी ही कुछ समय पश्चात् समाज और देश के आधार बनेंगे। यदि वे नैतिक दृष्टि से उन्नति नहीं करेंगे, यदि उनका चरित्र उच्च नहीं बनेगा, तो भविष्य के लिये क्या आशा की जा सकती है? साथ ही इनका यह भी विश्वास था कि नैतिकता और चरित्र की नींव धर्म पर ही स्थापित की जा सकती है। वे प्रायः विद्यार्थियों से कहा करते थे-

“चैतन्य बनो, नैष्ठिक बनो, धर्म में स्थिर रहो। आत्म संयम ही आत्म-रक्षा है। पवित्रता और निष्ठा का सदैव पूर्ण ध्यान रखो। निष्ठा ही आरोग्य और शक्ति है तथा अनिष्ट ही रोग और मृत्यु है। जो नैष्ठिक होगा उसके मार्ग में कोई बाधा नहीं डाल सकता। व्यर्थ की बातें मत करो। अपने को बड़ा मत समझो नहीं तो कुछ भी नहीं कर सकोगे। शरीर, मन और प्राण से धर्म की रक्षा करना उचित है। धर्म की रक्षा करते-करते कैसी भी विपत्ति आ जाय, मृत्यु का सामना भी करना पड़े तो भी कोई हानि नहीं है, क्योंकि धर्म ही भगवान है।”

जगद्बन्धु के उपदेशों का प्रभाव बालकों पर बहुत अच्छा पड़ता था और उनमें से अनेक बुरी आदतों को त्याग कर संयम और धार्मिकता का पालन करने लग गये। पर इस कारण उन लड़कों के माता-पिता तथा सम्बन्धी इनसे द्वेष करने लगे। वे समझने लगे कि इससे लड़कों का ध्यान पढ़ने-लिखने से हट जायेगा और वे संसारी बनने के बजाय बैरागी बनना पसन्द करने लगेंगे। इस कारण वे इनको धमकाने लगे और जब इन्होंने अपना कार्य जारी रखा तो उन्होंने इनको एक - दो बार अकेले में पकड़कर खूब मारा-पिटा भी। जब यह खबर उनके गाँव के पास रहने वाले एक भगवत् प्रेमी जमींदार वनमाली को लगी तो वे इनको अपने यहाँ ले गये। कुछ समय पश्चात् वे उनके साथ वृन्दावन गये और छः महीने तक कृष्णा-भक्ति में डूबे रहे। इसके पश्चात् उनका वास्तविक जीवन कार्य आरम्भ हुआ। वृन्दावन में एक भक्त ने उनके लिए निवास स्थान बनवा देने को कहा और वहाँ रहकर भजन करने का आग्रह किया। पर उन्होंने उत्तर दिया कि-सच्चे वैष्णव का धर्म पतितों की सेवा करना है, और मैंने उसी के लिए जन्म लिया है।”

वृन्दावन से लौटने के कुछ समय पश्चात् जगद्बन्धु ने कीर्तन का प्रचार करना आरम्भ किया और इसके लिये अच्छे कीर्तन करने वालों को एकत्रित करने लगे। सन् 1890 के कार्तिक मास में उन्होंने एक बड़ा कीर्तन करने की घोषणा की। इसके लिये कलकत्ता से बहुत से करताल, घण्टा, शंख, बिगुल आदि मंगाया गये। अगहन के प्रथम दिन वे एक विशाल कीर्तन-दल को लेकर फरीदपुर नगर की तरफ चले और बाजारों तथा हरिनाम का अमृत पिलाने लगे। अग्रसर होते-होते वे ‘बूना पाड़ा’ में पहुँचे जहाँ ‘बागदी’ नाम की अस्पृश्य जाति वालों की बस्ती थी। ये लोग अत्यन्त कुसंस्काराच्छत्र, मद्यपान का व्यवहार करने वाले थे। इनके स्त्री-पुरुषों का चरित्र भी अत्यन्त दूषित था। उस समय हावर्ट साहब फरीदपुर के मजिस्ट्रेट थे। उनकी सलाह से ईसाई पादरी ने इन बागों को ईसाई धर्म में दीक्षित कर लेने की योजना बनाई थी और उसकी तारीख भी नियत हो गई थी। आज जगद्बन्धु को अपने बीच में पाकर वे लोग धन्य हो गये। उनका नेता रजनी पाषा, जो तन्त्र-विद्या में बड़ा निपुण था, प्रभु के मोहक स्वरूप को देखकर मुग्ध हो गया। इस घटना के सम्बन्ध में बंगाल के सुप्रसिद्ध ‘भारतवर्ष’ मासिक पत्र में एक लेखक ने लिखा था-

“बूना पाड़ा अष्लील नाचगान, व्यभिचार और शराब पीने के लिये प्रसिद्ध था। अकस्मात् एक-दिन नीरव साधक जगद्बन्धु घृणित बूना लोगों के मोहल्ले में पहुँच गये। उस ब्रह्मचर्य के अद्भुत तेज को देखकर वे विस्मित हो गये। उस अपूर्व सौंदर्य को देखकर उनके प्राण मोहित हो गये। फरीदपुर के अनाचारी बूना शुद्धचारी होकर हरिनाम में लीन हो गये।”

इसके कुछ समय बाद वे देश भ्रमण को गये और अनेक स्थानों में दीन जनों पर कृपा करते हुये कलकत्ते की डोम बस्ती (राम बागान) में आकर ठहर गये। ‘बागदी’ जाति की तरह यह भी एक अस्पृश्य जाति थी और कलकत्ते के ईसाई इनको हिन्दू-धर्म से च्युत करके ईसाई बनाने की योजना कर रहे थे। पर जब प्रभु जगदबन्धु उनकी बस्ती में रहने लगे तो वह स्थान एक-तीर्थ बन गया। बड़े-बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति राजा, जमींदार और शिक्षित लोग वहाँ पहुँचकर धूल में बैठे। और भी सैकड़ों स्त्री पुरुष दर्शनों के लिये वहाँ आया करते थे। प्रभु का उद्देश्य डोम लोगों का सुधार करना था और इसकी पूर्ति के लिये उन्होंने इन लोगों में हरि-कीर्तन का प्रचार आरम्भ किया। ये लोग पहले से ही मृदंग बजाने में सिद्धहस्त थे। अब प्रभु जगद्बन्धु की प्रेरणा से वे ऐसे ऊँचे दर्जे के कीर्तनकार बन गये कि देश में उनकी तुलना के अन्य कीर्तन करने वाले कठिन थे। उनका सरदार हरिदास था, जिसके लिये प्रभु प्रायः कहा करते थे-जिस नाम संकीर्तन में हरिदास न हो वह वृथा है, वह नाम कीर्तन ही नहीं।” से डोमों की स्त्रियों की तुलना ब्रज की गोपियों से करते थे। जिन साधकों को वे किसी के घर का भोजन ग्रहण न करके अपने हाथ से बनाकर खाने का आदेश दे चुके थे उनको भी डोम स्त्रियों के हाथ की मधुकरी माँगकर खाने की आज्ञा दे दी। वे स्वयं भी उनके दिये भोजन को निस्संकोच ग्रहण करते थे। इस प्रकार उन्होंने समाज में डोमों की स्थिति को पूर्वापेक्षा बहुत सुधार दिया और हरि कीर्तन के कारण उच्च जाति के ब्राह्मण भी उनको आदर की दृष्टि से देखने लगे। इसी समय के आस-पास (सन् 1898) कलकत्ते में प्लेग का प्रकोप हुआ जिससे शहर की दशा बड़ी भयंकर हो गई और अधिकांश लोग वहाँ से भागने लगे। तब इनकी प्रेरणा से एक विशाल हरिनाम संकीर्तन का आयोजन किया गया, जिसका नेतृत्व इन डोम लोगों ने ही किया।

इस प्रकार जिस समय बंगाल के उच्चवर्ग के लोगों में से हिन्दू धर्म की निष्ठा का ह्रास हो रहा था और वे ब्रह्मसमाज अथवा ईसाई बनते जाते थे, जब आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों में विदेशियों की नकल करने का भाव बड़े वेग से बढ़ रहा था, जब वर्णाश्रम धर्म का झण्डा लेकर चलने वाले सनातनी पंडित जात-पाँत सम्बन्धी रूढ़ियों में फँसे थे, उस समय सच्चे ब्राह्मण प्रभु जगदबन्धु ने डोम और बूना जैसी अस्पृश्य और पतित जातियों के बीच में जाकर यह सिद्ध कर दिखाया कि सत्संग और भगवत् भजन से पतित और घृणित जन भी श्रेष्ठ बन सकते हैं।

श्री जगद्बन्धु में दूसरों को प्रभावित कर सकने की शक्ति प्रकृतिगत थी। कहा जाता है कि उनकी देह से एक प्रकार का प्रकाश निकलता दिखाई देता था। इस लिये वे यथा संभव सदैव अपने शरीर को वस्त्रों से ढँका रखते थे। जिस समय वे वृन्दावन में रहते थे उस समय वे अपने मुँह को भी प्रायः ढक लेते थे, जिससे यहाँ की सामान्य जनता में उनका नाम “घूँघटवाली” प्रसिद्ध हो गया था। ऐसे ही वेश के कारण एक बार हुगली की पुलिस ने उनको कोई भागा हुआ अपराधी समझकर पकड़ लिया था। जब कोई आवश्यक कार्य होता तभी आप अपना दर्शन किसी को अच्छी तरह करने देते थे। आगे चलकर जब यह तेज इतना अधिक बढ़ गया कि उसको देखकर लोग मूर्छित होने लग गये तो प्रभु जगद्बन्धु ने अपने लिए एक कुटी बनवाली और मौन धारण करके सत्रह वर्ष तक उसके भीतर बन्द रहे। सन् 1918 में वे कुटी से बाहर आये और सितम्बर 1921 तक आस-पास के स्थानों में भ्रमण करके लोगों को मानव धर्म पर चलकर संसार में सुख-शांति की स्थापना का उपदेश करते रहे। कभी-कभी वे अकस्मात् गर्जकर कहने लगते “समाज को नहीं रहने देंगे-समाज को नहीं रहने देंगे -समाज को तोड़ देंगे।” कहना नहीं होगा कि उनका उद्देश्य हिन्दू-जाति में फैली हुई ऊँच नीच की महा विषम अवस्था और निर्बलों के प्रति होने वाले सामाजिक अन्यायों से ही था। अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक वे इसी के लिये सचेष्ट रहे और आज भी उनके लगाये मानवता के वृक्ष के नीचे लाखों पतित समझे जाने वाले मनुष्य सुख शांति का अनुभव कर रहे हैं।


क्रोध मत किया कीजिए

धम्मपद में भगवान बुद्ध ने क्रोध को अक्रोध से-क्षमा से जीतने की शिक्षा दी है। उनमें से कुछ वचन नीचे देखिए-

क्रोध जह्यात् विप्र जह्यात् मानम।

क्रोध छोड़े, अभिमान छोड़े, वासनाओं के बन्धनों से छूटे, नाम रूप की आसक्ति से बचकर कर्म करें। अपरिग्रही रहे, ऐसा मनुष्य दुखों से पार हो जाता है।

यो वै उत्पतितं क्रोधं, रथं

जो बढ़े हुए क्रोध को रथ की तरह रोक ले वही सच्चा सारथी है और तो लगाम पकड़ने वाले ही हैं।

अक्रोधेन जयेत्क्रोधम्

क्षमा से क्रोध को जीते। भलाई से बुराई को जीते। कृपण को उदारता से जीते और असत्यवादियों को सत्य से जीते।

सत्यं वदेत् न क्रुध्येत्

सत्य ही बोलें। क्रोध न करें। याचक को विमुख न करें। इन कार्यों से मनुष्य देव श्रेणी में पहुँचता है।

अक्रोषीत् मां अवधीत् मां,

मुझसे कटु वचन कहे, मुझे सताया, मुझे नीचा दिखाया, मुझे हानि पहुँचाई, इन बातों को सोच-सोचकर जो बैर बढ़ाते रहते हैं उनका द्वेष कभी शान्त नहीं होता।

नहि ड़ड़ड़ड़, शाम्यन्तीह कदाचन।

द्वेष से द्वेष की कभी शान्ति नहीं होती। बैर छोड़ने से ही बैर शान्त होता है। यही सनातन धर्म है।

क्षमा खडगः करे यस्य, दुर्जनः किं करिष्यति।

जिसके हाथ में क्षमा रूपी तलवार है उसका दुर्जन क्या बिगाड़ सकता है। आग पर यदि ईंधन न पड़े तो वह स्वयं ही बुझ जाती है।

मूढानामेव भवति क्रोधों ज्ञानवतां कुतः

-विष्णु पुराण 1/1/17

क्रोध मूर्खों को ही आता है। ज्ञानियों को नहीं।

क्रोधमेव तु यो हन्ति तेन सर्वे द्विषो हताः

जिसने क्रोध को मार लिया उसने अपने सब शत्रु मार लिए।

विकार हेतौ सति विक्रियन्ते येषां न

विकार का कारण उत्पन्न होने पर भी जिसका चित्त विकारग्रस्त नहीं होता वही धीर है।

सेलो यथा एकघनो वातेन न समीरति।

इट्ठाधम्मा अनिट्ठा च न पवेधन्ति तादिनो।

- अगुत्तर निकाय 3/52

जिस प्रकार पर्वत भयंकर तूफानों और प्रचण्ड अन्धकार से भी डगमगाते नहीं, अपने स्थान पर जमे रहते हैं उसी प्रकार साँसारिक विषयों और विपत्तियों से शान्त चित्त वाले निर्वाण प्राप्त व्यक्ति

क्षुब्ध नहीं होते। इन बाधाओं से भी उनकी शान्ति अक्षुणता बनी रहती है।

मानं हित्वाप्रियो भवति

-महाभारत

जो अपना अहंकार छोड़ देता है वह सब का प्यारा हो जाता है।

पराभवस्य हैतन्मुखं यद्तिमानः।

-शतपथ 5/1/1/1

अभिमान ही पतन का द्वार है।

वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं

-महाभारत शान्ति 299/14

जो अपने वाणी के आवेश को, मन के आवेश को, क्रोध के वेग को, काम के वेग को, उदर और उपस्था के वेग को रोकता है, उसी को मैं ब्राह्मण और मुनि मानता हूँ।

अज्ञान प्रभवो मन्युरहंमानोपवृंहितः।

-श्रीमद्भागवद् 19/13

क्रोध अज्ञान के कारण उत्पन्न होता है और अहंकार से बढ़ता है।


महान प्रेरक-वालटेयर

वालटेयर 84 वर्ष की आयु में-30 मई सन् 1778 को मरा तो उसका अन्त्येष्टि संस्कार कराने के लिए पेरिस का कोई पादरी तैयार नहीं हुआ। इसलिए उसकी लाश को नगर से बाहर एक छोटे गाँव में दफनाना पड़ा। पादरी उसे धर्मद्रोही कहते थे। क्योंकि उसने जीवन भर धर्म के नाम पर चल रहे पाखण्डों का विरोध किया यद्यपि वह अधार्मिक नहीं था-वास्तविक धर्म के प्रति उसकी गहरी आस्था थी, तो भी वह धर्म के नाम पर चल रहे अनाचार को सहन न कर सका, और उसने उसका जीवन भर विरोध किया।

वालटेयर को अपने लक्ष के लिए यात्रा करते रहने में कठिन जीवन बिताना पड़ा, और कितनी ही आपत्तियों का सामना करना पड़ा फिर भी वह विचलित नहीं हुआ और अपने मार्ग पर धैर्यपूर्वक जीवन के अन्त तक चलता रहा।

उसका असली नाम फ्राँकई मारी आरुई था। सन् 1694 में जब वह जन्मा तो जन्मते ही उसकी माता की मृत्यु हो गई। माता का दूध न मिलने और जन्मजात अस्वस्थता से ग्रसित होने के कारण कोई यह आशा न करता था कि यह बच सकेगा। पर वह मौत से भी लड़ा और किसी प्रकार जीवित रहने लायक स्वास्थ्य को बनाये रहा। अस्वस्थ रहने पर भी ज्ञानार्जन के लिए उसकी प्रचण्ड अभिलाषा थी। इसलिए चारपाई पर पड़े-पड़े भी उसने पढ़ना न छोड़ा और 17 वर्ष की आयु में इस योग्य हो गया कि साहित्य सेवा को जीविकोपार्जन का साधन बना सके। उसके पिता चाहते थे कि वह रोटी कमाने के लिए कोई उपयुक्त धन्धा तलाश करे। वे उसे कानून पढ़ाना चाहते थे। उन दिनों साहित्य सेवा से भर पेट रोटी मिलना कठिन था। इसलिए वे लड़के की साहित्यिक चेष्टाएँ को नापसंद करते थे और उससे रुष्ट थे। एकबार तो उनने घर से निकाल देने तक की धमकी दी और कहा अपनी जिद पर अड़ा रहा तो उसे भूखों मरना पड़ेगा। वालटेयर के जीवन का एक लक्ष्य था। वे समाज को नया जीवन, नई विचारधारा देने आये थे। इस के लिए भूखों मरना पड़े या किसी और तरह मरना पड़े इसकी उन्हें चिन्ता न थी। पिता की बात से वे सहमत न हो सके और धार्मिकता की एक महिमापूर्ण सेवा करने का प्रयत्न किया।

उन्होंने अपने जीवन में लगभग एक सौ महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे। उन सभी में उन्होंने धर्म के वास्तविक स्वरूप का प्रतिपादन किया और धर्म के नाम पर प्रचलित भ्रान्तियों और अनीतियों का खण्डन किया। भारत में जो कार्य विवेकानन्द, दयानन्द, गाँधी, राममोहन राय आदि ने किया वही कार्य वालटेयर ने फ्राँस में किया। इस प्रकार का कठिन कार्य अपने जिम्मे लेने वाले प्रत्येक सुधारक को निहित स्वार्थों तथा रूढ़िवादिता को विरोध का सामना करना पड़ता है। वालटेयर को भी वह आपत्तियाँ सहनी पड़ी।

एक पुस्तक लिखने में उन्हें जेल की सजा मिली। छूटकर आये और अन्य पुस्तकें लिखी तो वह भी जब्त हो गई। उनके लिखे हुए नाटकों को दिखाने में कानूनी प्रतिबन्ध लगाये गये। उन पर आरोप लगाया गया कि वे जनता को नीति भ्रष्ट करते हैं। उन दिनों राज शासन या प्रचलित परम्पराओं की आलोचना करना-नीति भ्रष्टता मानी जाती थी। इतने प्रतिबन्ध होते हुए भी उनकी पुस्तकों में जो तथ्य होता था, उससे जनता बहुत प्रभावित थी। लुक छिप कर उनकी पुस्तकें खूब पढ़ी जाती थीं और जब तक प्रतिबंध नहीं लगता था तब तक उनके लिखे नाटकों को देखने के लिए लोग टूट-टूट पड़ते थे।

उनके एक भाषण से अप्रसन्न होकर लोगों ने उनकी पिटाई की और राजकीय सहायता से उन्हें जेल भिजवा दिया। आखिर उन्हें इस शर्त पर जेल से छोड़ा गया कि वे तुरन्त ही फ्राँस छोड़कर अन्यत्र चले जाये। वे इंग्लैण्ड में कई वर्ष भटकते रहे। बड़े प्रयत्न से स्वदेश लौटने की अनुमति मिली पर थोड़े ही दिनों में उनके विरुद्ध फिर वातावरण गरम हो गया। फ्राँस की पार्लियामेण्ट ने उनकी पुस्तकें सरेआम जला डालने का आदेश दिया। उन्हें फिर देश छोड़कर भागना पड़ा। सन् 1750 में जर्मन सम्राट फ्रैडरिक ने उन्हें आमन्त्रण दिया पर वहाँ भी वे राजा की आलोचना करने लगे इस पर उन्हें जर्मनी भी छोड़ना पड़ा। स्विट्जरलैंड जाकर वे खेती करने लगे और वहाँ भी कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकें लिखी जिनके कारण वहाँ भी उनका तीव्र विरोध होने लगा और तरह-तरह से उन्हें सताया गया। अर्धमृतक अवस्था में उनकी इच्छा अपनी जन्मभूमि देखने और वहीं मरने की हुई तो पेरिस में उनकी लाश का संस्कार कराने तक को कोई पादरी तैयार न हुआ।

जीवन के आदि से लेकर अन्त तक उसे अनगिनत आपत्तियों का सामना करना पड़ा। पर उसने वह सब कुछ हँसते-हँसते सहन किया। उसे अनेकों बार बड़े-बड़े प्रलोभन दिये गये कि अपना विरोध कार्य बन्द कर दे पर वह उससे भी विचलित न हुआ। उनकी लेखनी में व्यंग और कटाक्ष भरा रहता था। नीत्से ने उन्हें हँसता हुआ सिंह कहा है। उनका हँसना इस युग के अनाचारों के लिए एक साँघातिक वज्र प्रहार के समान था। उनकी लेखनी ने न केवल धार्मिक वरन् राजनैतिक और आर्थिक क्रान्ति के लिए भूमि तैयार की जिसके फलस्वरूप निहित स्वार्थों का आसन ही डगमगा गया और फ्राँस ही नहीं सारे योरोप की जनता में स्वतंत्र विचारों की एक महिमापूर्ण शक्ति का उदय हुआ।

विक्टर ह्यूगो ने लिखा है-वालटेयर का नाम लेते ही अठारहवीं सदी में जो कुछ श्रेष्ठता है वह मूर्तिमान् होकर हमारी आँखों के सामने आ खड़ी होती है। जान्स वेले ने लिखा है-भगवान ने उन्हें एक बौद्धिक चिकित्सक के रूप में भेजा जो क्षतिग्रस्त और गलित स्थिति में पड़े हुए युग की जीवन भर चिकित्सा करते रहे। वे एक अथक सैनिक थे जो अनवरत रूप से बुराइयों के विरुद्ध लड़ते रहे। मानसिक दासता और आदर्शों की दुर्बलता को मिटाने के लिए वे एक साहित्यिक विद्रोही के रूप में डडडड हुए और इस संग्राम में जूझते हुए ही उन्होंने वीर गति प्राप्त की। वे मानव मन को अन्ध-विश्वासों और कुसंस्कारों से विरत करना चाहते थे, जो उन्होंने चाहा उसके लिए असीम बलिदान और असाधारण त्याग और अथक श्रम किया।

वालटेयर घोर परिश्रमी थे। उन्होंने अपने जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दिया। वे कहा करते थे-आलसी को छोड़कर दुनियाँ के और सब लोग अच्छे हैं। कुछ काम न करना और मृतक होना एक ही बात है। मेरी आयु ज्यों-ज्यों बढ़ती जा रही है त्यों-त्यों जीवन के शेष थोड़े से क्षणों का और भी अधिक सदुपयोग करने का मैं प्रयत्न करता हूँ। कर्मनिष्ठा का अभ्यास होने पर वह स्वयं एक आनन्द बन जाती है। जो आत्म-हत्या नहीं करना चाहता उसके लिए यही उचित है कि निरन्तर कार्य संलग्न रहे। उन्होंने अपने इन आदर्शों को कार्य रूप में परिणत किया फलस्वरूप वे मानव-जीवन का वास्तविक लाभ प्राप्त कर सके।

मरते समय उन्होंने कहा-मैं ईश्वर की उपासना करते हुए, मित्रों से प्रेम करते हुए, शत्रुता रखने वालों के प्रति किसी प्रकार की घृणा न करते हुए, अन्ध-विश्वासों को घृणित समझते हुए शान्ति और सन्तोष के साथ मृत्यु का वर्णन करता हूँ।

सभी महापुरुषों की भाँति वालटेयर का महत्व उसके जीवनकाल में नहीं समझा गया। लोग उसका विरोध और तिरस्कार ही करते रहें। पर एक समय ऐसा भी आया जब उसका महत्व स्वीकार किया गया। फ्राँस की राज्य क्राँति जब हो गई तो क्रान्तिकारी दल ने वालटेयर की मरी मिट्टी को 13 वर्ष बाद कब्र में से निकाला और एक विराट जुलूस के रूप में उसे राजसी सम्मान के साथ नगर में घुमाया गया। उसकी शव यात्रा में 6लाख नर-नारी सम्मिलित थे। उनकी अर्थी पर मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था-वह वालटेयर जिसने-हमारे मन को बड़ा बल और साहस प्रदान किया, जिसने हमें स्वाधीनता संग्राम के लिए उकसाया।”


अनमोल-बोल


ऐसी वाणी बोलिए, मनका आता खोय (kavita)

ऐसी वाणी बोलिए, मनका आता खोय।

बोली तो अनमोल है, जो कोइ जानै बोल।

कुटिल वचन सबसे बुरा, जार करे तर छार।

खोद खाद धरती सहै, कूट काट बनराय।

वाद विवादे विष घना, बोले बहुत उपाध।

जहाँ दया तहिं धर्म है,जहाँ लोभ तहिं पाप॥

जबहिं नाम हिरदै धरयौ, भयो पापको नास।

रूखा सूखा खाय कर, ठंडा पानी पीय।


विचारणीय और माननीय

अपनी ओर भी देखो

एक राजा के बहुत से नौकर थे। राजा उनके साथ कुटुम्बियों जैसा व्यवहार करता था। आवश्यकता पड़ने पर वह उन्हें धन उधार भी देता। एक राज-कर्मचारी पर एक हजार रुपया बहुत दिन से शेष था। कोश के कर्मचारियों ने उसे पकड़ कर राजा के समक्ष उपस्थित किया। राजा को उसकी दशा देखकर दया आई और उसने उसका ऋण माफ कर दिया। उसी कर्मचारी का कुछ रुपया एक दूसरे मनुष्य पर शेष था, वह उस पर तकाजा करने गया तो उसने अपनी शोचनीय दशा तथा गृहिणी की बीमारी की बात कहते हुए एक सप्ताह में रुपये देने की बात कही। परन्तु वह कर्मचारी न माना और उसने उसके साथ मारपीट कर डाली और बोला कि ‘अभी रुपए लूँगा।’ कर्जदार ने राजा से रक्षा के लिए निवेदन किया तो कर्मचारी की पेशी हुई। राजा ने सब कारण जानकर कर्मचारी से कहा कि ‘विपत्ति सब पर आती है। अभी, उस दिन मैंने तेरी बुरी दशा देखकर ही तो राजकोष का एक हजार रुपया माफ किया था। तू इस व्यक्ति के प्रति किंचित् भी दया नहीं कर सका? मैंने तुझे माफी दी थी, इसलिए कि किसी की आत्मा को कष्ट न पहुँचे। परन्तु, तू इसके योग्य नहीं है अतः राज्य का बकाया लाकर इसी समय दे।’

परमात्मा कितनी उदारता के साथ हमें अनगिनत वस्तुएँ दे रहा है, पर हम उस प्राप्त सम्पदा में से थोड़ा भी दूसरों को देने में कितनी संकीर्ण ता दिखाते हैं। इसी प्रकार परमात्मा हम से निरन्तर होने वाली भूलों का विचार न करके सदा कृपा बनाये रहता है पर हम दूसरों की थोड़ी-सी गलती को क्षमा करने की उदारता नहीं दिखाते। हमारी ही तरह यदि परमात्मा भी निष्ठुर और संकीर्ण दृष्टि बनाये तो हमारी क्या दुर्गति हो कभी इस बात पर भी विचार किया है?

पढ़ने के साथ गुण भी

एक दुकानदार व्यवहार शास्त्र की पुस्तक पढ़ रहा था। उसी समय एक सीधे-सीधे व्यक्ति ने आकर कौतूहल वश पूछा-क्या पढ़ रहे हो भाई?’ इस पर दुकानदार ने झुँझलाते हुए कहा-तुम जैसे मूर्ख इस ग्रन्थ को क्या समझ सकते हैं।’ उस व्यक्ति ने हँसकर कहा-मैं समझ गया, तुम ज्योतिष का कोई ग्रन्थ पढ़ रहे हो, तभी तो समझ गए कि मैं मूर्ख हूँ।’ दुकानदार ने कहा-ज्योतिष नहीं, व्यवहार-शास्त्र की पुस्तक है।’ उसने चुटकी ली-तभी तो तुम्हारा व्यवहार इतना सुन्दर है।’ दूसरों को अपमानित करने वालों को स्वयं अपमानित होना पड़ता है। पढ़ने का लाभ तभी है जब उसे व्यवहार में लाया जाय।

कठोर वाणी से विनाश

युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ के अवसर पर मय दानव द्वारा अत्यन्त सुन्दर सभा-भवन बनवाया। उसके कौशल से जल के स्थान और स्थल के स्थान पर जल दिखाई देने लगा। दुर्योधन उस रचना से भ्रम में पड़ गया और स्थल पर पानी होने का भ्रम होने से कपड़े ऊँचे करके चला तथा पानी को स्थल समझ उसमें गिरकर भीग गया। द्रौपदी ने यह देख उसे ‘अन्धे का अन्धा बताया।’ यही कठोर वाणी महाभारत युद्ध की जड़ थी। फिर द्रौपदी का चीर खींचते समय दुर्योधन ने भीम को देखकर कहा था-कौए तुझमें शक्ति हो तो इसकी सहायता कर।’ इस कठोर वचन के कारण भीम ने दुर्योधन के रुधिर से द्रौपदी के बाल सींचने की प्रतिज्ञा की। कठोर वचनों से ऐसे ही अनिष्ट परिणाम होते हैं।

चमार की सभा

महाराज जनक की राज्य सभा में अष्टावक्र जी पधारे। उनके शरीर के बेढंगापन को देखकर सब हंस पढ़े। इस पर अष्टावक्र ने भी हँसते हुए कहा-जिस सभा में केवल चर्म और हड्डियों की परख की जाय उसे चमार की सभा के अतिरिक्त क्या कहा जाय?’ यह सुनकर पूरी सभा स्तब्ध थी। सचमुच ही उनके शब्दों में गूढ़ तत्त्वज्ञान छुपा था।

“मनुष्य की परीक्षा और उसका सम्मान वेशभूषा तथा ऊपरी ठाटबाट से करने के बजाय उसके गुणों से ही करना चाहिये।”

अन्याय का धन टिकता नहीं

एक ग्वालिन बढ़िया दूध बेचती थी, इससे उसके ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी। ग्वालिन के पास इतना दूध न था कि सब की माँग पूरा करती, अतः वह पानी मिलाने लगी। एक दिन बिक्री का धन पोटली में बाँधकर नदी किनारे रखा और बर्तन माँजने लगी। तभी एक चील उस पोटली को लेकर उड़ गई, परन्तु गाँठ खुल गई और कुछ धन किनारे पर तथा कुछ धन उछल कर नदी में जा गिरा। यह देख ग्वालिन रोते-रोते किनारे के पैसों को समेटने लगी। तभी एक संत उधर आ निकले और ग्वालिन के रोने का कारण जानकर बोले कि दूध का पैसा किनारे पर है और पानी का पानी में। अधर्म से अधिक लिया था, वह चला गया। ग्वालिन ने पैसे गिने तो उतने ही थे जितने का असली दूध होना चाहिए था। अन्याय का धन ठहरता नहीं।

छोटे के साथ सहयोग

सेना का एक अधिकारी सैनिकों से एक बड़ा शहतीर उठवा रहा था और बार-बार आदेश दे रहा था-जल्दी करो, जोर लगाओ मुर्दों की तरह हाथ मत चलाओ।’ उसी समय एक भद्र पुरुष ने आकर बड़ी विनम्रता से अधिकारी से कहा-यदि आप भी इनके साथ हाथ लगाने का कष्ट करें तो यह कार्य शीघ्र ही पूर्ण हो जायेगा। अधिकारी ने भद्र पुरुष को घूरते हुए उत्तेजनापूर्ण कहा-मैं इनका अधिकारी हूँ मेरा काम आज्ञा देना है।’ यह सुन वह पुरुष चुपचाप सैनिकों को शहतीर उठाने में सहायता देने लगा और थोड़ी देर में ही कार्य पूर्ण हो गया। तब भद्र पुरुष ने अधिकारी से क्षमा-याचना करते हुए कहा-महोदय भविष्य में जब कभी कोई कठिनाई आ जाये तो मुझे सहर्ष सूचना देकर बुला लिया करे।’ अधिकारी ने अकड़ और लापरवाही से उनका नाम धाम पूछा। भद्र पुरुष बोले-श्रीमान् मुझे जार्ज वाशिंगटन कहते हैं। राष्ट्रपति के पते पर सूचना मुझे मिल जायेगी।’ अधिकारी यह सुनते ही परेशानी और शर्म से गढ़ गया और उनसे क्षमा माँगते हुए भविष्य में अपने साथियों के साथ स्वयं भी काम करने की प्रतिज्ञा की।

साधु के लक्षण

एक त्यागी से शाह इब्राहिम ने पूछा कि ‘सच्चे साधु के लक्षण क्या हैं?’ त्यागी ने कहा कि ‘मिले तो खालें, न मिले तो संतोष करे।’ इब्राहिम ने कहा कि यह लक्षण तो कुत्ते का भी है। त्यागी ने कहा तो आप ही बताइए। शाह ने कहा-मिले तो मालिक की राह में लुटा दे और न मिले तो मालिक को धन्यवाद दे।’

बड़े होने का अर्थ

इंग्लैण्ड के सम्राट एडवर्ड सप्तम की धर्मपत्नी एलेग्जेन्ड्रा बचपन से ही बड़ी परिश्रमी और दयालु थीं। उनका नित्य नियम था कि अपने हाथ से कम से कम एक कपड़ा सीकर गरीबों को बाँटना। वे कहा करती थीं कि बड़े होने का अर्थ आलसी और विलासी बनना नहीं वरन् छोटों की सहायता के लिए और भी अधिक उत्साह से काम करना है।


बेचारा-बेंजामिन फ्रेंकलिन

अमेरिका के राष्ट्र निर्माता बेंजामिन फ्रेंकलिन एक अत्यन्त निर्धन घर में पैदा हुए थे। उनके पिता मोमबत्ती और साबुन बनाने का कुछ काम जानते थे, उसी के आधार पर उन्हें अपने विशाल कुटुम्ब का जिसमें 17 तो केवल बच्चे ही थे पालन करना पड़ता था। पूरे कुटुम्ब को रोटी के लाले पड़े रहते थे। बेजामिकन पन्द्रहवें बच्चे थे। वे दस वर्ष के हो पाये थे कि उन्हें रोटी कमाने के लिए कुछ करने को मजबूर होना पड़ा। इस उद्देश्य के लिए वे लुहारों, ठठेरों, मोचियों, भटियारों, रंगरेजों की दुकानों पर मुद्दतों धक्के खाते रहे। फिर एक प्रेस में छोटा काम उन्हें मिला। उस कार्य को भी वे अधिक दिन न कर सके और कुछ काम तलाश करने फिलाडेल्फिया चल पड़े। रास्ता कठिन था, जब खाली थी। नाव में इस शर्त पर वे बैठ सके कि रास्ते भर नाव में घुसने वाले पानी को उछालते चलेंगे। जब फिलाडेल्फिया पहुँचे तो उनने भूख शान्त करने के लिए तीन आने की रोटी भठियारा से खरीदी। रास्ता चलते हुए एक रोटी खाते जाते थे दो दोनों बगलें में दबी हुई थी। कपड़े भी फटे टूटे थे। इस फूहड़ लड़के को देखकर अपने दरवाजे पर खड़ा एक सुन्दर लड़की खूब हँसी। ऐसा फूहड़ लड़का उसने कभी देखा न था। बेंजामिन तब भी झेंप नहीं, न निराश हुए। अपने भाग्य का निर्माण करने के लिए वे अटूट चट्टान की तरह आगे ही बढ़ते गये।

इन परिस्थितियों में कोई दूसरा व्यक्ति होता तो हताश हो जाता। भविष्य में कुछ बन सकने की क्या आशा उसे होती? उसके पास कुछ साधन नहीं, कोई सहायक नहीं, कुछ भी योग्यता नहीं, ऐसा आदमी आमतौर से निराश ही रहता है और किसी प्रकार जिन्दगी के दिन पूरे करने की ही बात सोचता है। पर बेंजामिन दूसरी ही धातु के बने थे। उन्होंने बचपन से ही यह जान लिया था कि मनुष्य के भीतर एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण शक्ति भरी हुई है, उसका वह ठीक प्रकार उपयोग करता रहे तो प्रगति की मंजिल को दूर तक पार कर सकता है। वे यह भी जानते थे कि धैर्य एक बहुत बड़ी चीज है। अधीरता और उतावली से उन्नति नहीं होती और न रोने झींकते से, दूसरों पर दोषारोपण करने से कुछ प्रयोजन सिद्ध होता है। कोई दूसरा किसी दूसरे को न आगे बढ़ा सकता है न पीछे हटा सकता है। जो दूसरों के कंधे पर खड़े है वे कभी भी गिर सकते है इसलिए अपने पाँवों को मजबूत करना और उन्हीं के बल पर आगे बढ़ना उचित है।

इन सिद्धान्तों को अपनाने से बेंजामिन का पौरुष चमका। उनके हाथ में आरम्भ में छोटे-छोटे काम आये पर उन्हें, उनने ऐसे लगाव और खूबसूरती से पूरा किया कि काम कराने वालों की आँखों में उनकी कीमत चढ़ती ही गई। अपने गुणों के कारण जो व्यक्ति दूसरों की नजर में चढ़ा है वह उसकी सद्भावना और सहायता का भी सहज अधिकारी बन जाता है बेंजामिन जहाँ भी गये वहाँ के लोगों के दिलों में अपने लिए जगह बनाये बिना पीछे न हटे।

वे धीरे-धीरे उन्नति करते गये। एक अख़बार निकाला, प्रेस खोला, पुस्तकें छापी, शिक्षा संस्थाएँ स्थापित की, उन्हें बढ़ाया, सरकारी नौकरी में गये, संगीत सीखा, आविष्कार किये, स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी, अन्त में राष्ट्र निर्माता बने। और चौरासी वर्ष की आयु तक अथक रूप से प्रगति की मंजिलें एक-एक करके पार करते गये। रास्ता चलते रोटी खाते देखकर जो सुन्दर लड़की उस फूहड़ युवक पर तिरस्कार से खिल-खिलाकर हँसी थी। उस घटना के सात वर्ष बाद उस रूप की देवी डिबाराहरीड ने उसी बेंजामिन के असाधारण गणों पर मुग्ध होकर विवाह प्रस्ताव किया और जब वह स्वीकार कर लिया गया तो उसने अपने को धन्य माना।

बेंजामिन बड़ी जीवट के नर रत्न थे। ज्ञान प्राप्ति को जीवन का सबसे बड़ा लाभ समझते थे। आधे पेट रोटी खाकर भी वे पैसे बचाते और पुस्तकें खरीदते। उन दिनों पुस्तकों का बड़ा अभाव था। इसलिए उन्होंने एक ऐसी गोष्ठी भी संगठित की कि जिनके पास कोई पुस्तकें हो, वे सप्ताह में एक दिन एक जगह जमा कर दिया करें और फिर एक दूसरे से माँगकर पढ़ने ले जाया करें। अमेरिका में पुस्तकालय-वाचनालय का यही श्रीगणेश था। वे कहा करते थे कि-मुझे इस संसार से प्यार है और जिस दुनियाँ में मैं जीता हूँ, जीने के साधन उपलब्ध करता हूँ, उसके बारे में मुझे अधिक से अधिक जानना चाहिये। इसी ज्ञान पिपासा ने स्कूली साधनों के अभाव में भी विद्या के उच्चस्तर पर उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया।

बेंजामिन संगठन-के एकता के मंत्र का महत्व जानते थे। स्वाधीनता युद्ध के दिनों में जब कि साथियों में फूट पड़ने लगी तो उन्होंने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा-हमें मिलकर एक जान हो जाना चाहिए नहीं तो हम सबकी अलग-अलग जान जायेगी।” वे उदारता, सामाजिक न्याय ओर मानवता के प्रबल समर्थक थे। जब अमेरिका स्वतन्त्र हो गया तो उन्होंने काँग्रेस पर इसके लिए बहुत जोर डाला कि दासता का उन्मूलन किया जाय। मूल निवासियों को भी मानवोचित स्वाधीनता का लाभ उठाने दिया जाय। उनके वे प्रयत्न एक दिन सफल होकर ही रहे।

बेंजामिन फ्रेंकलिन आज दुनिया में नहीं है। आज से 170 वर्ष पूर्व सन् 1790 में वे स्वर्गवासी हो गये, पर उनका बोलता हुआ जीवन अभी तक हर किसी को यह उपदेश करता है कि मनु परिस्थितियों का गुलाम नहीं साधनों के अभाव तथा विपरीत परिस्थितियों के बीच भी वह आगे बढ़ सकता है और अपने गुणों के अनुरूप आगे तक पहुँच सकता है।


Quotation

“दैवी विधान का चक्र निर्मम भाव से घूमता रहता है। जो इस विधान के अनुकूल चलता है, वह इस पर सवारी करता है। पर जो अपनी इच्छा को इस विधान के विरोध में अकड़ता है, वह अवश्य ही कुचला जाता है।”

“त्याग और ज्ञात एक ही वस्तु है। जो ज्ञान त्याग कर पर्यायवाची है वह सत्य ज्ञान है, वास्तविक आत्मा का ज्ञान है, तुम्हारे वास्तविक स्वरूप का ज्ञान है।”

“त्याग तो आपको सर्वोत्तम स्थिति में रखता है। यह आपको उत्कर्ष की स्थिति में पहुँचा देता है, आपकी शक्तियों को कई गुना कर देता है, आपके पराक्रम को दृढ़ कर देता है, वह आपकी चिंताओं तथा भय को हर लेता है और इस प्रकार आप निर्भय तथा आनन्दमय हो जाते है।”

“परमानन्द का अनुभव करने के लिये -भाव लाने की भी आवश्यकता है अर्थात् देश के हेतु प्राण न्यौछावर करने के लिये प्रतिक्षण तत्पर रहा जाय।”

“किसी देश में उस समय तक एकता और प्रेम नहीं हो सकता जब तक लोग एक दूसरे के दोषों पर जोर देते रहेंगे। -


सौराष्ट्र की लोकोपकारी सन्त महिलायें

भारतवर्ष की आध्यात्मिक साधना के क्षेत्र में पुरुषों के समान स्त्रियों का भी पूर्ण अधिकार माना गया है। वैदिक-काल से ही यहाँ स्त्रियों के सब प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों ओर क्रिया काण्डों में प्रमुख रूप से भाग लेने; शास्त्रों के अध्ययन और मनन में संलग्न रहने, ऊँची से ऊँची साधना, तपस्या और उपासना करने के उदाहरण मिलते है। यह सत्य है कि स्त्री का प्रधान कार्य-क्षेत्र घर-गृहस्थी ही मानी गई है। गृहस्थ आश्रम के पश्चात् पत्नी भी पति के साथ वानप्रस्थ आश्रम में रह कर ईश्वरोपासना करती थी और उसके संन्यासी हो जाने पर वह भी उसी प्रकार का त्यागमय जीवन व्यतीत करती थी। इस प्रकार धार्मिक दृष्टि से इस देश की स्त्रियों का दर्जा कभी हीन अथवा निकृष्ट नहीं समझा गया।

यद्यपि मुसलमानी शासनकाल में स्त्रियों की स्थिति अपेक्षाकृत अरक्षित हो जाने से उनकी स्वाधीनता का अनेक अंशों में ह्रास हो गया था और घर के भीतर बन्द रहने के कारण वे सार्वजनिक जीवन से बहुत कुछ पृथक् हो गई थी, फिर भी प्राचीन परम्परा के प्रभाव से कितनी ही आत्मज्ञानी महिलायें घर और परिवार के संकीर्ण क्षेत्र से आगे बढ़कर लोकोपकार और सेवा के क्षेत्र में भाग लेती रही है। इस लेख में हम पाठकों को सौराष्ट्र की ऐसी ही कुछ महिला-सन्तों की जीवन गाथा सुनाना चाहते है।

सन्त ड़ड़ड़ड़

सौराष्ट्र के महिला सन्त मंडल में लोयण सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध है। उसका जन्म चौदहवीं शताब्दी में खंभालिया गाँव के एक पाँचाल(लुहार) के घर में हुआ था। उसके माता-पिता का देहान्त उसकी बाल्यावस्था में ही हो गया, जिससे उसे आरम्भ से ही स्वतन्त्र रहकर जीवन व्यतीत करना पड़ा। वह अत्यन्त रूपवती थी, जिससे आस-पास के अनेक व्यक्तियों का ध्यान उसकी तरफ आकर्षित होता रहता था, पर उसके स्वच्छ हार्दिक भाव और निर्भयता के कारण किसी का साहस उससे अनुचित व्यवहार या वार्तालाप करने का नहीं होता था वैसे वह लाखा नाम के एक अहीर युवक को, जो उसी के समान रूपवान् और बीर पुरुष था, हृदय से प्रेम करती थी, पर उन दोनों ने यह निश्चय कर लिया था कि जब तक प्रत्यक्ष रूप से विवाह सम्बन्ध न हो जाय तब तक शारीरिक सम्बन्ध कदापि नहीं करेंगे।

पर इन दोनों के विवाह में एक बड़ी बाधा जातिवाद की थी। दो भिन्न जातियों के होने के कारण वे अपने घर और गाँव में रह कर ऐसा सम्बन्ध नहीं कर सकते थे। लोयण तो अपने घर में अकेली थी, पर लाखा का परिवार बड़ा था और अपनी जाति में उसका काफी नाम था। यदि वह जाति-प्रथा को तोड़कर इस विवाह को कर लेता तो उसे जाति च्युत होकर रहना पड़ता। इससे बचने का अगर कोई उपाय था तो यही कि लाखा अपनी जाति के सब व्यक्तियों को दण्ड के रूप में एक बड़ा भोज दे और उनसे इस विवाह की स्वीकृति ले ले। इस कार्य में बहुत अधिक धन व्यय करने की आवश्यकता थी और एक दिन लाखा इसी धन की व्यवस्था करने परदेश को चला गया।

इधर कुछ समय पश्चात् सेलसणी नाम के एक सन्त गाँव में पधारे, जो वेदान्त सिद्धान्त का प्रचार करके हिन्दू-समाज की भेदभाव की भावना को मिटाने का प्रयत्न करते थे। लोयण ने उनके उपदेशों को सुना तो उसके भीतर आत्म-भाव जाग्रत हो गया और वह उनकी शिष्य होकर समाज-सेवा के कार्य में प्रवृत्त हो गई। वह बड़ा सुन्दर गाती थी और अब भावनायुक्त भजन भी बनाने लग गई थी, इसलिए थोड़े ही समय में जनता की आदर और श्रद्धा की पात्र बन गई।

जब लाखा लौटकर आया और उसने विवाह का प्रस्ताव किया तो लोयण ने स्पष्ट कह दिया कि “मैं तुमको प्रेम अवश्य करती हूँ, पर अब मैं भगवत्-कार्य को छोड़कर साँसारिक विवाह-बन्धन में नहीं बंध सकती। अगर तुमको आवश्यकता हो तो अपनी जाति की अन्य कन्या से विवाह कर लो।” जब बहुत समझाने पर भी लोयण न झुकी तो लाखा बल प्रयोग करने पर उतारू हुआ, पर उसकी आत्म शक्ति के सम्मुख उसकी वीरता की कुछ न चल सकी।

इस घटना के पश्चात् लाखा को कुष्ठ रोग हो गया और वह संता पके कारण घर के भीतर ही पड़ा रहने लगा। लोयण अब भी उसके पास आकर उसे सान्त्वना देती रहती थी। बारह वर्ष बाद वे ही महात्मा पुनः खम्भालिया पधारे। लोयण ने उनसे लाखा की दुर्दशा की बात कह कर उसका कष्ट मिटाने की प्रार्थना की। सन्त के आदेश से लोयण ने लाखा की देह को स्पर्श किया जिससे उसका रोग जाता रहा। फिर लोयण और लाखा दोनों आजीवन पीड़ित जनता की सेवा में ही लगे रहे।

रामबाई

रामबाई बाँटा निवासी माणसुर पटेल की पुत्री थी। उसका घर धन-जन से सम्पन्न था और उसका लालन-पालन सब प्रकार से सुख में हुआ था। पर उसमें किसी प्रकार का अहंकार न था और वह स्वभाव से ही दीन-दुखियों के प्रति दया का व्यवहार किया करती थी।

संवत् 1869 में सौराष्ट्र में भयंकर अकाल पड़ा। अनावृष्टि, अतिवृष्टि, पाला, टीड़ी आदि किसी न किसी कारण से फसल खराब होती चली गई। उधर राज्यों की अव्यवस्था के कारण डाकू, लुटेरों का जोर बढ़ गया और हजारों गाँव उजाड़ हो गये। इसके फल से लाखों व्यक्ति भूख और रोग के शिकार होकर काल के गाल में समा गये। इस प्रकार मरने वालों के अनेक छोटे-छोटे बालक अनाथ होकर इधर-उधर मारे-मारे फिरने लगे। जब इस प्रकार के दस-बीस बालकों का समूह किसी गाँव में जा पहुँचता तो वहाँ के निवासी उनको मार-मार कर निकाल देते। लोगों के पास अपने खाने को नहीं था, इन अकाल के मारो को खाने के लिये कौन देता?

जिस दिन रामबाई गौना होकर अपनी ससुराल जाने वाली थी, उस दिन उसके गाँव में अकस्मात् ऐसे ही बालकों का एक झुण्ड आ गया। गाँव के युवक उनको मार-मार कर भगा रहे थे और वे गरीब ‘हाय मा, हाय बाप’ कहते हुये इधर-उधर दौड़ रहे थे। कई के सिर और हाथ-पैरों से खून भी निकल रहा था। रामबाई ने कुँए पर पानी भरे हुये जो यह दृश्य देखा तो उससे न रहा गया और वह दौड़कर उन अनाथ बालकों तथा मारने वाले युवकों के बीच खड़ी हो गई और डाँट कर बोली-खबरदार अब जो इन मरे हुओं को मारने के लिये हाथ उठाया। ऐसे बिना माँ-बाप के जीते जागते फलों को कुचलते हुये तुमको शर्म नहीं आती।” इसके पश्चात् वह उन बालकों को लेकर गाँव में गई और अपने पिता-मा तथा ससुराल वालों से, जो उसे लेने आये थे, कहा कि मुझसे इन अनाथों की दुर्दशा नहीं देखी जाती। इस तरह के सैकड़ों बालक हर रोज मारे-मारे फिर रहे है और उनमें से नित्य दस-बीस मर जाते है। भगवान की प्रेरणा से मैंने सर्वस्व त्यागकर इन अनाथों के साथ रहकर उनकी रक्षा और सेवा करने का निश्चय कर लिया है। आप मुझे विवाह-बन्धन से मुक्त करके इस पुण्य-कार्य में लगने की आज्ञा दें।” सगे सम्बन्धियों ने उसे रोकने की बहुत चेष्टा की पर वह उसी समय उन सब बालकों को लेकर गाँव स निकल पड़ी। रास्ते में उसको हर जगह ऐसे ही बालक मिलते चले गये और शाम तक उनकी संख्या सौ से ऊपर पहुँच गई।

रामबाई इन बालकों को लेकर भजन गाती हुई घर-घर उनके लिये भिक्षा माँगने लगी। जब लोगों को उसके त्याग की बात मालूम हुई तो वे मुक्तहस्त होकर सहायता करने लगे। तीन-चार दिन पश्चात् वह बावणिया बन्दर में पहुँच गई जहाँ कि एक बड़ी मण्डी थी। जब वहाँ के बड़े व्यापारियों को खबर मिली कि एक युवती अहीर कन्या भूखे मरते हुये बच्चों की अनाथ-माता बन गई है, तो वे उसकी सहायता के लिये ढेरों अन्न, वस्त्र भेजने लगे। कुछ ही समय में रामबाई का अनाथ-आश्रम बनकर तैयार हो गया और उसमें गरीबों के लिये सदावर्त स्थापित कर दिया गया। रामबाई की कीर्ति सौराष्ट्र से बढ़कर दूर-दूर के स्थानों तक फैल गई।

एक दिन कोई साधू आश्रम में आकर ठहरा और लोगों के कहने पर भी उसने भोजन नहीं किया। रामबाई ने उससे प्रार्थना की कि महाराज! यह आश्रम केवल सेवा-भावना से ही स्थापित किया गया है इसमें मेरा कुछ भी नहीं है जो कुछ है वह दीन-दुखी और संत-महात्माओं के लिये ही है। इसलिये जो कुछ आप चाहे ले सकते है। साधू ने जब अपनी असद् भावना प्रकट की तो रामबाई ने उसे भगवान की लीला समझकर स्वीकार कर लिया। पर जब वह साधू एकान्त में रामबाई के पास पहुँचा तो उसने देखा कि पलंग पर एक सिंहनी बैठी हुई है। वह भय के मारे चिल्लाकर बेसुध हो गया। बाद में रामबाई को माता कह कर और उससे बारम्बार क्षमा माँग कर वह चला गया। इस प्रकार आजन्म दीनों की सेवा करती हुई रामबाई संवत् 1934 में परलोकगत हुई। उसका आश्रम अब भी सेवा-कार्य का स्थल बना हुआ है।

तोरल

सौराष्ट्र के लोक गीतों में तोरल-जेसल का बड़ा नाम है। इस तोरल का विवाह सासतिया नामक क्षत्रिय युवक से हुआ था, जिसके पास इसी नाम की एक घोड़ी और एक तलवार थी। ये दोनों पति पत्नी सच्चे ईश्वर भक्त और परोपकारी थे और पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। उस समय कच्छ के अंजार स्थान में जेसल नामक एक क्षत्रिय युवक लूटमार का धंधा करता था। वह बड़ा ही साहसी और वीर था और सब लोग उसके नाम से दहशत खाते रहते थे। जब जेसल ने सासलिया की “तीन तोरलों’ की प्रशंसा सुनि तो वह उनको छीनने के लिये उसके गाँव में आ पहुँचा। सन्ध्या के समय जब घर के सब लोग अन्य साधकों के साथ भगवत् कीर्तन कर रहे थे जेसल सासलिया की घुड़साल में घुस गया। तोरल घोड़ी उसे देख हिनहिनाने लगी जिससे वह घास के ढेर के नीचे छिप गया। जब तोरल घोड़ी को देखने वहाँ आई तो उसने घोड़ी को बाँधने के लिए उसी स्थान पर एक कील गाढ़ दी जहाँ जेसल छुपा हुआ था। संयोग से वह जेसल की हथेली के आरपार हो गई, पर उसने मुँह से एक आह तक नहीं निकाली। कुछ देर बाद सासलिया भी भीतर गया और उसका पैर जेसल से टकरा गया। तब सब लोगों ने उसे बाहर निकाला। पकड़े जाने पर जेसल तनिक भी नहीं डरा, और उसने कहा कि चाहे आज मैं तोरल को ले जाने में सफल न हो सकूँ पर मैं कभी न कभी उसे प्राप्त करके ही रहूँगा।

तोरल बहुत पहले से जेसल के लूटमार और जनात पर उसके आतंक के किस्सों को सुन चुकी थी। आज उसे इस स्थिति में अपने सम्मुख पाकर उसके मन में आया कि यदि किसी प्रकार इसको अनुचित मार्ग से हटाकर सुमार्ग पर लाया जा सके तो सैकड़ों लोगों के जान-माल की रक्षा हो सकती है और इस प्रदेश की जनता इसके आतंक से छुटकारा पा सकती है। उसने अपनी मनोभावना सासलिया के सामने प्रकट की। वह भी भगवान का पक्का भक्त था। उसने जेसल से कह दिया कि यदि तुम्हारा ऐसा ही अटल निश्चय है, तो तुम खुशी से तीनों ‘तोरलों’ को ले जा सकते हो।

जब जेसल तोरल, को साथ लेकर अंजार जाने के लिए जहाज में सवार हुआ तो रास्ते में अकस्मात् तूफान आ गया जिससे जहाज के डूबने का भय होने लगा। जेसल को तूफान से भयभीत होते देखकर तोरल ने कहा-तुम तो इतने बड़े बीर हो, न मालूम कितने व्यक्तियों को तुमने लूट-मार कर मौत के घाट उतार दिया है, तो अब मौत को सामने देखकर क्यों डरते हो।” जेसल से कुछ उत्तर देते न बना। तब तोरल ने कहा कि तु अब भी अपने पापों को स्वीकार करके उनका प्रायश्चित करने का निश्चय करो और भविष्य में किसी भी प्रकार का पाप न करने की प्रतिज्ञा करके भगवान से क्षमा माँगों तो रक्षा हो सकती है। जेसल के सच्चे हृदय से पश्चाताप करने पर तूफान सचमुच शान्त हो गया और जहाज किनारे पर लग गया।

इस घटना के फल स्वरूप जेसल का जीवन ही बदल गया। उसने तलवार फेंक दी, भाले को भूल गया और बन्दूक के दो टुकड़े कर दिये। तोरल के उपदेश से वह माला लेकर हरिनाम लेने लगा और पहले जिस प्रकार उसका समय लोगों को लूटने, मारने और सताने में जाता था, अब वह उसी प्रकार लोगों की सेवा और परोपकार में जीवन व्यतीत करने लगा। तोरल ने सब प्रकार से परीक्षा लेकर उसके हृदय की सचाई और शुद्धता की जाँच कर ली, और इस बात का विश्वास कर लिया कि अब उसका जीवन सर्वथा बदल गया है। एक आततायी और निर्दय व्यक्ति को परोपकारी सन्त के रूप में बदला हुआ देखकर उसने अपने यहाँ आने को सार्थक समझा। इसके पश्चात् उन दोनों ने संसार के मोह-माया का पूर्णतः त्याग करके अपना समस्त जीवन दीन-दुखियों की सेवा और परोपकारी में ही व्यतीत कर दिया।


ज्ञान से ही बन्धन टूटते हैं

अज्ञान ही सबसे बड़ा बन्धन है, इसी के पाश में जीव बंधा हुआ है। माया और अविद्या एक ही वस्तु के दो नाम है। जिस माया के वशीभूत होकर प्राणी कुकर्म करता और निविड़ बन्धनों में जकड़ा हुआ भवसागर में डूबता उतरता रहता है वह और कुछ नहीं अज्ञान एवं भ्रम मात्र ही है।

अपने स्वरूप के सम्बन्ध में अपने अस्तित्व के सम्बन्ध में हम सबको भारी भ्रम हैं कहने को शरीर और आत्मा को भिन्न माना जाता है पर व्यवहार में शरीर की आत्मा-शरीर ही सर्वस्व बना रहता है और जीव शरीर के लिए अपने आपको भयानक अन्धकारमय भविष्य में डाल लेता है। यदि वस्तुस्थिति का ज्ञान हमें हो जाय और शरीर को आत्मा के एक तुच्छ उपकरण की तरह प्रयोग करें तो जीवनोद्देश्य की प्राप्ति का मार्ग सहज ही खुल सकता है।

कुविचारों, कुसंस्कारों, वासनाओं और तृष्णाओं में मनुष्य इसलिए ग्रसित रहता है कि वह उनकी तुच्छता और व्यर्थता को ठीक प्रकार न समझ कर उन्हीं को प्रिय मान लेता है और उन्हें अपने स्वभाव का एक अंग बना लेता हैं। बाहर से वह उन्हें बुरा भला भी कहता है पर भीतर गहराई तक जो जड़े जमी हुई है उन्हें काटने का प्रयत्न नहीं करता। फल स्वरूप अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को जानते हुए भी मनुष्य उनके निवारण के लिए कुछ कर नहीं पाता।

ज्ञान ही एक मात्र वह प्रकाश है जिसके आधार पर जीव को अपने वास्तविक स्वरूप का, हित-अनहित का, लाभ-हानि का, बुद्धिमत्ता मूर्खता की वास्तविक जानकारी हो सकती है और वह उन तुच्छ बातों की उपेक्षा करके महान् हित साधन में संलग्न हो सकता है।

‘ज्ञान’ की इस महान् उपयोगिता एवं अनिवार्य आवश्यकता को देखते हुए शास्त्रकारों ने प्रत्येक श्रेयार्थी को ज्ञान की साधना सर् प्रािम करने का आदेश दिया हैं। स्वाध्याय और सत्संग को आत्मकल्याण का सर्वोपरि मार्ग बताया है। ज्ञान की महत्ता के सम्बन्ध में शास्त्र का अभिमत देखिये-

नास्ति विद्या समं चक्षुर्नास्ति सत्य समं तपः

-महाभारत

ज्ञान के समान नेत्र नहीं, सत्य के समान तप नहीं, राग के समान दुःख नहीं, और त्याग के समान कोई सुख नहीं।

गीताकार का भी यह अभिमत है।

सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परि समाप्ते।

4।38

सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में ही समाप्त होते है।

नहिज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

4।38

ज्ञान के सामान पवित्र इस संसार में और कुछ नहीं है।

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।

4।37

हे अर्जुन, जैसे जलती हुई अग्नि ईधन को भस्म कर देती है वैसे ही ज्ञानाग्निः से सम्पूर्ण कर्म भस्म होते है।

इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए सबसे प्रथम साधन है स्वाध्याय। सद्ग्रन्थों के माध्यम से सत्पुरुषों की, मनीषियों और ऋषियों की आत्मा हर घड़ी सत्संग करने को प्रस्तुत रहती है। जो महापुरुष स्वर्गवासी हो चुके है, दूरस्थ है, या जिनके पास समय का अभाव रहता है उससे प्रत्यक्ष सत्संग नहीं हो सकता पर ग्रन्थों द्वारा उनका सत्संग कितनी ही देर तक किसी भी समय किया जा सकता है। सभी सद्ग्रन्थ, जिनमें जीवन की समस्याएँ को सतोगुणी दृष्टिकोण के साथ सुलझाया गया है, शास्त्र है। शास्त्र किसी भी भाषा या लिपि में हो सकते है। वे संस्कृत में ही हों यह कोई आवश्यक नहीं ऐसा भी नहीं कि जो कुछ हैं संस्कृत शास्त्र ही है। शास्त्र का अर्थ है सत्साहित्य। वह पुस्तकें जो आत्मा को सत् की ओर अग्रसर होने के लिये प्रेरणा देती है, ऐसे ग्रन्थों का अध्ययन शास्त्रार्थ कहलाता है। उन्हीं को स्वाध्याय के निमित्त पढ़ने का मनीषियों ने आदेश किया है।

योगवाशिष्ठ में शास्त्र अध्ययन को प्राथमिकता दी गई है।

पूर्वं राघव शास्त्रेण वैराग्येण परेण च।

-योगवाशिष्ठ 6।5।14

हे राम, सबसे प्रथम शास्त्राध्ययन सज्जनों की संगति और वैराग्य से कन को पवित्र करो

शास्त्र सज्जन सत्कार्य संगे नोपहतैनसाम्।

-योगवाशिष्ठ 5।6।5

शास्त्र पढ़ने, सज्जनों की संगति करने और सत्कार्य करने से मन के पाप दूर हो जाते है और बुद्धि दीपक के समान प्रकाशवान होती है जिससे सार और असार दिखाई पड़ता है।

शास्त्र सज्जन सर्म्पकः प्रज्ञामादौ विवर्धयेत्।

-योगवाशिष्ठ 6।120।1

शास्त्रों का अध्ययन और सज्जनों का सम्पर्क करके प्रज्ञा को बढ़ाना। योगियों ने इसी को प्रथम साधना बताया है।


गाँधी का स्वराज्य स्वप्न-न जाने कब पूरा होगा?

(गाँधी विचार दोहन’ से)

-रामराज्य स्वराज्य का आदर्श है। इसका अर्थ है-धर्म का राज्य, अथवा न्याय और प्रेम का राज्य अथवा अहिंसक स्वराज्य या जनता का स्वराज्य।

-रामराज्य में एक ओर अथाह सम्पत्ति और दूसरी ओर करुणाजनक फाकेकशी नहीं हो सकती। उसमें कोई भूखा मरने वाला नहीं हो सकता। उस राज्य का आधार पशुबल न होगा। बल्कि वह लोगों के प्रेम और समझ बूझकर और बिना डर दिये हुए सहयोग पर अवलम्बित रहेगा।

-रामराज्य में लोग केवल लिख पढ़ सकने वाले ही न होंगे बल्कि सच्चे होंगे, अर्थात् उन्हें ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिये जो मुक्ति देने वाली और मुक्ति में स्थिर रखने वाली हो।

-हिन्दुओं की धार्मिक दृष्टि के सन्तोष ही नहीं, हिन्दुस्तान की आर्थिक दृष्टि से भी गो वध की मनाही होनी चाहिए।

-माँसाहार की मनुष्य को कोई आवश्यकता नहीं है। यह माने का कोई कारण नहीं है कि माँसाहार न करने वाली जनता शरीर से काफी सशक्त, निरोग और बहादुर नहीं हो सकती।

-’सा विद्या या विमुक्तये’ जो मुक्ति के योग्य बनाये वह विद्या, बाकी सब अविद्या है। अतः जो चित्त की शुद्धि न करे, मन और इन्द्रियों को वश में रखना न सिखाये, निर्भयता और स्वावलम्बन पैदा न करे, निर्वाह का साधन न बताये और गुलामी से छूटकर आजाद रहने का हौंसला एवं सामर्थ्य न उपजाये उस शिक्षा में चाहे जितनी जानकारी का खजाना, तार्किक कुशलता और भाषा पाण्डित्य मौजूद हो, व शिक्षा नहीं है या अधूरी शिक्षा।

-धार्मिक शिक्षा से रहित शिक्षा, शिक्षा नाम की अधिकारिणी ही नहीं समझी जा सकती। प्रत्येक बालक को जिस धर्म में वह जन्मा हो उस धर्म के मुख्य ग्रन्थों, महापुरुषों और सन्तों तथा उस धर्म के मन्तव्य का श्रद्धा पूर्वक ज्ञान करा देना चाहिए।

-उच्च से उच्च शिक्षा तक के लिए स्वभाषा ही शिक्षा का माध्यम होनी चाहिए। अंग्रेजी जैसी अति विजातीय भाषा की शिक्षा का माध्यम बना देने से शिक्षा के लिए किया गया और किया जाने वाला बहुतेरा श्रम व्यर्थ गया और जा रहा है। अंग्रेजी ज्ञान के बिना उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं की जा सकती यह मान्यता दयनीय और लज्जाजनक है।

-छात्रावास को सादगी मितव्ययिता और संस्कार का नमूना होना चाहिए। छात्रावास में जाकर विद्यार्थी अधिक छल छबीला; खर्चीला और उच्छृंखल हो जाय तो कहना चाहिए कि वह छात्रावास सफल नहीं हो रहा है।

-शिक्षा का बहुत खर्चीला हो जाना यह बताता है कि शिक्षा की दिशा गलत है।

-रामराज्य के विधान में जिसे मुख्य अधिकारी की जगह मिली हो वह प्रजा के प्रेम से वहाँ टिकेगा और उसके कल्याण के लिए ही प्रयत्न करता रहेगा। वह जनता के धन पर गुलछर्रे नहीं उड़ायेंगे और अधिकार बल से लोगों को सताएगा नहीं किन्तु राजा का ‘तत्सदृश्य’ कहलाते हुए भी फकीर के मानिंद रहेगा।

-संगीत, कथा-वार्ता चित्रकला, नृत्य, नाटक सिनेमा और ललित कलाएँ यदि उचित सीमा में रहे तो वे जन-समाज में निर्दोष मनोरंजन, ज्ञान प्राप्ति तथा भावना विकास के साधन हो सकती है। मर्यादा के बाहर चली जाय तो शराब अफीम जैसे हानिकारक व्यसन बन जाती है। ऐसी कलाओं का शौक अमर्यादित अनीति की ओर ले जाने वाला तथा हानिकारक न हो जाय इसके लिए ऐसे प्रदर्शनों और जलसों पर नियंत्रण और देख-रेख रहनी चाहिए।

विगत 22 वर्ष का अखण्ड-ज्योति का जीवन बहुत ही संतोषजनक एवं शानदार रहा है। जिस मिशन को लेकर यह संस्था जन्मी थी उसी पूर्ति में इतने स्वल्प समय में इतनी अधिक सफलता मिलेगी ऐसी आशा नहीं थी। आज अगणित पत्र पत्रिकाएँ और पुस्तकें छपती रहती है, उन्हें लोग खरीदते बेचते भी हैं; उनमें से कितने में धर्म, ईश्वर, सदाचार आदि की बातें भी रहती हैं पर उसका कोई विशेष प्रभाव पाठकों पर नहीं पड़ता। ‘अखण्ड ज्योति’ का इतिहास इससे सर्वथा भिन्न है, उसके लाखों आदमियों के विचारों में क्राँति उपस्थित की है, अगणितों की जीवन-दशा को मोड़ा है और सहस्रों ऐसे है जिनका आन्तरिक कायाकल्प ही हो गया हैं इस भू पर सस्वर अवतरित करने की साध को लेकर ‘अखण्ड ज्योति’ जन्मी थी। वह साध सर्वथा निष्फल नहीं हुई। अपने परिवार के असंख्य व्यक्ति यह अनुभव करते हे कि स्वर्ग कोई कल्पना नहीं वरन् तथ्य है और वह दूर नहीं वरन् हमारे पास मौजूद है, जिसके आनन्द का अनुभव हम हर घड़ी करते रहते है। अखण्ड ज्योति अपने मिशन को एक सीमा तक सार्थक हुआ देख कर अपने विगत 22 वर्ष के जीवन पर सन्तोष एवं गर्व अनुभव करती है।

हम अव तक लोगों के मस्तिष्कों में दिव्य विचारधारा प्रभावित करने की चेष्टा करते रहे है। धर्मप्रचार हमारा प्रधान कार्यक्रम रहा है। ‘अखण्ड ज्योति में भी इसी प्रकार की पाठ्य सामग्री छपती रहती हैं ‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम ओर अपने व्यक्तिगत प्रयत्नों से हम परिजनों की आन्तरिक महत् को विकसित करने का प्रयत्न करते रहे है। फलस्वरूप एक विशाल जनसमूह आत्मकल्याण और युगनिर्माण के महान् लक्ष्य को पूरा करने के लिए सुस्थिर और सुव्यवस्थित रीति से आगे बढ़ता चला जा रहा है। सभी सद्ग्रन्थों की भाँति हम भी अपने विशाल परिवार के परिजनों के प्रति उनकी प्रत्यक्ष सेवा सहायता करने का उत्तरदायित्व पूरा करने में भी संलग्न रहे है। सभी पिता-माता अपने बच्चों को सुखी समृद्ध और सन्तुष्ट बनाने के लिए अपनी शक्ति भर चेष्टा करता है। हमारे पास कुछ तप-साधना की पूँजी रही है तो उससे स्वजनों की सुख शान्ति बढ़ाने के लिए कुछ उठा नहीं रखा है। रोते हुए बच्चों को हँसने के उपकरण प्रस्तुत करते हुए किसी भी माता-पिता को जिस प्रकार सन्तोष होता है उसी प्रकार अखण्ड-ज्योति की आत्मा भी आज अपने प्रयत्नों पर प्रसन्नता अनुभव करती है।

अज्ञातवास से लौटने के बाद हम हमारे कार्यक्रम का दूसरा अध्याय शुरू होता है साथ ही अखण्ड-ज्योति का भी। हमारी प्रत्यक्ष गति विधि अब दस वर्ष तक सीमित है। इस अवधि में हम यह प्रयत्न करेंगे कि जागृत आत्माओं को अपना निज का प्राण बल देकर उनके आन्तरिक स्तर को ऊँचा-अधिक ऊँचा-बहुत ऊँचा-उठाने की चेष्टा करें। जिन लोगों में अपनी निजी आत्मिक निष्ठा पहले से ही मौजूद है उन्हें यदि बाहर से थोड़ी-सी भी सहायता मिल जाय तो उतने से ही उन्हें बहुत कुछ लाभ मिल जाता है। डूबते को तिनके का सहारा बहुत होता है। पौधे को बाहर से थोड़ा-सा खाद पानी मिलता रहे तो उतने से ही उसके विकास की समस्या हल हो सकती है। हम अपने आपको खाद पानी के रूप में अगणित निष्ठावान् पौधों में घुला देना चाहते है। इसके बाद हम भले ही न रहें पर हमारी संचित पूँजी अगणित स्वजनों के जीवन में हरियाली बनकर फूटे तो यह एक अच्छी परिणित होगी। अपने इस ढलते और गलते हुए जीवन को स्वजनों के जीवन में नवीन उल्लास के साथ उपजता, लहराता और फला-फूला देखते हुए जाने की इच्छा शेष है, सो उसी के लिये अज्ञातवास से लौटते ही प्रयत्न आरम्भ कर दिया है।

गत अक्टूबर अंक में दस वर्षीय पंच सूत्री कार्यक्रम छपा है। यह पहले वर्ष का कार्यक्रम है। अगले 9 वर्षों में भी इसी प्रकार आगे के पाठ्य-क्रम प्रस्तुत होते रहेंगे। पर इतने मात्र से ही यह आशा नहीं की जा सकती कि उन्हें पढ़कर ही आत्मोत्थान का महान् लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकेगा। इस मार्ग पर चलने वाले, इस कार्यक्रम को अपनाने वाले प्रत्येक सहचर को व्यक्तिगत रूप से उतनी सामर्थ्य और अन्तः प्रेरणा देने का हम प्रयत्न करेंगे जिससे उसका मार्ग अवरुद्ध न होने पाये, प्रगति कठिन न होने पावे। इसके बाद जब हमारा वर्तमान कार्यक्रम पूर्ण हो तब शीश महल के दर्पणों में अपने ही असंख्य चेहरे देखकर प्रसन्नता करने वाले दर्शक की तरह हमें भी अनेक अपने आत्म-स्वरूप पीछे छोड़ जाने की आकांक्षा है। एक दीपक बुझने से पूर्व यदि हजारों दीपक जलाता जाय तो बुझना भी सार्थक ही होगा।

पंचसूत्री साधना को अखण्ड-ज्योति के अगणित पाठकों ने अपनाया है। पर हमें इतने से ही सन्तोष नहीं है। उसे प्रत्येक पाठक अपनाये, एक भी ऐसा न बचे जो उसकी उपेक्षा करे, तब हमें सन्तोष होगा। अनेक जन्मों में प्रयत्नों से हम सब आज इस स्तर पर पहुँच सके है कि आध्यात्मिकता के रुके विषयों में रुचि लें और उस दिशा में अभिमुख हों। अरबों नर तन धारियों में से इस स्थिति तक पहुँचने का सुअवसर कितनी स्वल्प आत्माओं को मिलता है? आज हमें जो सुअवसर मिला हुआ है उसे आलस में क्यों गँवाया जाय? यह साधन-क्रम अति सरल हैं। यह पाठ्य-क्रम उन लोगों को दृष्टि में रखकर बनाया गया है जो गृहस्थ के उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते हुए, अपनी आजीविका स्वयं कमाते हुए जीवनयापन करेंगे और नियमित साधना में दो घण्टे से अधिक समय न लगा सकेंगे। आगामी दश वर्षों में इस बात का ध्यान रखकर ही पाठ्यक्रम बनेंगे और उन्हें निबाहना हर गृहस्थ के लिये सुगम ही होगा। गृह त्यागी योगी यती अपनी एकान्त साधना में जो ऋद्धि-सिद्ध प्राप्त कर लेता है वे इस पंच-सूची साधना क्रम में संलग्न गृहस्थों को भले ही न मिल सकें पर आत्मकल्याण के लक्ष्य को वे भी उसी प्रकार प्राप्त कर सकेंगे जिस प्रकार त्यागी और बैरागी प्राप्त करते है।

इस वर्ष में पंच सूत्री साधना में (1) रविवार को अस्वाद व्रत (2) मनन और चिन्तन के साथ नित्य स्वाध्याय (3)प्राणाकर्षण प्राणायाम (4) सोकर उठते ही अपने उपकारियों का मानसिक अभिवन्दन, पृथ्वी पर पैर धरते ही धरती माता को प्रणाम, माता, पिता, पति, गुरुजनों के चरणस्पर्श, उनके अभाव में चरणों की प्रतिमूर्ति को नमन एवं रात को सोते समय दिन भर के उपकारियों का स्मरण (5) जप के साथ अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में मानते हुए माता की गोदी में खेलने एवं उसका स्तन पान का ध्यान यह सब कार्य न तो अधिक समय साध्य है ओर न श्रमसाध्य। थोड़ी सी इच्छा, श्रद्धा और निष्ठा हो तो इनके लिए अवकाश भी हर किसी से सकते है। गायत्री, उपासना जिनकी अब तक बिलकुल नहीं चलती, वे इस आधार पर थोड़ी-सी से ही आरम्भ कर सकते है। जिनकी चलती है वे ध्यान के द्वारा उसे और परि-पुष्ट कर सकते है।

ऐसा भी हो सकता हे कि जिन्हें इतना अवकाश न हो, इनमें से कुछ कम नियमों को-दो या तीन या चार को अपना सकते है। पर वह भी होना निष्ठापूर्वक ही चाहिये। बीच में छोड़ देने, आलस्य दिखाने से काम नहीं चलेगा। आध्यात्मिक हो या भौतिक किसी की महान् कार्य की सफलता के लिए दृढ़ संकल्प बल तो चाहिये ही। शक्ति संचार का लाभ भी इस मार्ग पर चलने वाले ही उठा सकते है। रविवार को सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व उठकर पंचसूत्री उपासना में संलग्न साधक यदि उस योजना के अंतर्गत शक्ति ग्रहण करने लगे तो उन्हें अपने भीतर एक नया तंतु प्रवेश करता हुआ अनुभव हो सकता हैं इस माध्यम से उन्हें हमारा व्यक्तिगत प्रतिदान उसी तरह प्राप्त हो सकता है जैसे पास बैठे हुए दो व्यक्ति आपस में कुछ आदान प्रदान कर सकते है। इस प्रकार हम लोगों के बीच शरीरों की दूरी रहते हुए भी वस्तुतः अत्यन्त समीपता और एकता की स्थिति बनी रहेगी। इस शक्ति संचार साधना का विधान सब के लिए नहीं है, उसकी उपयोगिता केवल संलग्न साधकों के लिए ही है। इसलिए उसका विधान उन्हें ही बता दिया जाता है जो उसकी आकांक्षा व्यक्त करते है।

परिजनों की दशवर्षीय योजना अक्टूबर अंक में मौजूद है। हमारी दशवर्षीय योजना उन नैष्ठिक व्यक्तियों को अपनी प्राण शक्ति देकर प्राणवान बना देने की है जिनमें दृढ़ता और श्रद्धा समुचित मात्रा में मौजूद है। आत्म-कल्याण के लक्ष की अपेक्षा जिन्हें भौतिक स्वार्थ की ही चिन्ता है वे देर तक गहरे मन से इस कार्यक्रम को न अपना सकेंगे। उनकी मंजिल रास्ते में ही छूटेगी, फिर भी उन्हें ‘न कुछ’ की अपेक्षा ‘कुछ’ तो लाभ होगा ही। इस लिए हमारी आकांक्षा है कि अखण्ड-ज्योति के परिजन पूरी या अधूरी इस दशवर्षीय साधना को किसी-न-किसी रूप में अपनावें और अपनी आध्यात्मिक सेवा करने का जीवन के इस अन्तिम अध्याय में हमें एक और अवसर प्रदान करें।

यह प्रश्न हो सकता है कि क्या धर्म प्रचार का कार्य अब बन्द किया जा रहा है और हमारा कार्य क्या चन्द साधकों को साधनात्मक प्रेरणा देने तक ही सीमित हो जायेगा? नहीं, बात ऐसी नहीं है। चारों का महत्व कभी कम नहीं माना जा सकता। आत्म-निर्माण के लिए, युग-निर्माण के लिए, सद्विचारों का अधिकाधिक प्रसार होना अत्यन्त आवश्यक है। कुविचारों के विस्तार ने आज मानव प्राणी को कुकर्म करने के लिए-कुमार्ग पर चलने के लिए विवश कर दिया है और मानव सभ्यता को सर्वनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस स्थिति में परिवर्तन का एकमात्र उपाय है सद्विचारों का विस्तार। अविद्या का अन्धकार केवल सद्ज्ञान के प्रकाश से ही दूर होगा। कुमार्ग पर भटकने वाला मानव आत्मज्ञान के प्रकाश में ही अपना सच्चा पथ प्राप्त कर सकेगा। कुविचार फैलाने वाले साधन कितने अधिक है। सिनेमा, साहित्य, गीत-वाद्य सभी तो प्रत्यक्ष ओर परोक्ष रूप से अनीति मूलक प्रेरणा के देने में व्यस्त है। कुकर्मी मनुष्य अपने आचरण से भी कुकर्मों का शिक्षण जन-साधारण को करते है, कहने की अपेक्षा कर दिखाने का और भी अधिक असर होता है। चोर जुआरी, व्यसनी, बेईमान, व्यभिचारी अपनी वाणी से ही नहीं क्रियाओं से भी दूसरों को प्रभावित करते अपना अनुयायी बनाने में लगे हुए है। फलस्वरूप कुविचारों का कुकर्मों का दौर बढ़ता जाता है। उसका प्रतिरोध सज्जनों द्वारा सद्विचारों एवं सत्कर्मों के प्रचार करने के अतिरिक्त भला ओर किस प्रकार हो सकता है?

सृष्टि के आदि काल से लेकर अब तक प्रत्येक युग-दृष्टा ने यह प्रयत्न किया है कि सद्विचारों के विस्तार के लिए अधिकाधिक साधन जुटें अधिकाधिक प्रयत्न हो। फिर उस महान् कार्य का अखण्ड-ज्योति कैसे बन्द कर देगी? वह तो चलना ही चाहिए। वरन् अष्टग्रही योग के प्रभाव से आगामी दश वर्षं तक जो अवांछनीय स्थिति रहने वाली है उसमें समाधान के लिए तो यह कार्य और भी अधिक तीव्र गति से होना चाहिए। उस कार्य को परिवार के अन्य सब सज्जन करेंगे। हमने दूसरा अधिक महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व कंधों पर लिया है, इसका अर्थ यह नहीं कि जो हम अब तक करते रहे हैं वह बन्द हो जाय। वरन यह है कि उस भार को हमारे स्वजन अपने कंधों पर उठावें, जिनकी अधिक ठोस सेवा करने के लिए हमने अपने स्थूल ही नहीं, सूक्ष्म को भी पूरी तरह खपा देने का निश्चय किया है। यदि वे अपना उत्तर दायित्व अनुभव न करें, युग निर्माण के लिए आरम्भ किए हुए ज्ञान यज्ञ का अपनी निष्क्रियता के कारण दुःखद अन्त अभी ही हो जाने दे तो उनके लिए शोभा की नहीं शर्म की ही बात हो सकती है।

सद्ज्ञान प्रसार के लिए कोई बड़ी योजना आज अपने सामने नहीं है, पर इतना भी क्या कम है कि अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर जो हम अपनी आत्मा को निचोड़ कर रखते हैं उस दर्द को अधिक लोगों के सीने में चुभाने के लिए कुछ प्रयत्न किया जाय। अखंड-ज्योति जिनके पास पहुँचती है वे उसे सरसरी नजर से न पढ़कर गम्भीरतापूर्वक स्वाध्याय की दृष्टि से मनन और चिन्तन के साथ पढ़ा करें तो उनकी आत्मा से हमारी आत्मा का स्पर्श होने लगे। इसका और भी विस्तार इस प्रकार हो सकता है कि अखंड-ज्योति के पाठक पत्रिका में प्रस्तुत विचारों को, कथाओं, प्रसंगों, दृष्टान्तों उदाहरणों को अपने घर तथा बाहर के लोगों को स्वयं सुनाया करें, अपनी पत्रिका कई-कई व्यक्तियों को पढ़ने देने स्वयं जाया करें, उनसे प्रस्तुत लेखों के संबन्ध में चर्चा किया करें। छपे हुए कागज के टुकड़े युग निर्माण नहीं कर सकते। अखंड-ज्योति में हम कुछ भी क्यों न लिखते रहें उसका प्रभाव और विस्तार तब तक नहीं हो सकता जब तक कि आप स्वजनों का त्यक्त्वा मिलकर ही गायन और वाद का जोड़ा बन सकता है। बिना बाजे के गाना और बिना गाने का बाजा अपूर्ण रह जाता है, इसी प्रकार हमारे विचारों का समुचित प्रभाव तभी हो सकता है जब उनके प्रसार में आपका व्यक्तिगत उत्साह, उल्लास एवं श्रम सम्मिलित हो।

युग निर्माण की इस पुण्य वेला में हम और आप मिलकर अपना कर्तव्य पालन करें इसी में शुभ है, इसी में श्रेय है, प्रभु की इच्छा भी ऐसी दीखती है। आत्म-निर्माण की महान प्रक्रिया की और हमें अब बिना आलस के संलग्न होना चाहिए दश वर्षीय साधना क्रम को पूरे या अधूरे रूप में अपना कर हमें आत्मिक प्रगति की ओर सक्रिय कदम बढ़ाना ही चाहिए। जितना आत्मबल बढ़ेगा उतनी ही आन्तरिक शान्ति बढ़ेगी और जन सेवा की शक्ति भी उतनी ही बढ़ेगी । साथ लोक सेवा को भी उपेक्षा नहीं करनी है। केवल भजन या आत्म-निर्माण तक ही सीमित हो जाने और अपने चारों ओर से आँख बन्द कर लेने से काम नहीं चल सकता। सबको साथ लेकर ही सच्ची प्रगति संभव है। चारों ओर नरक फैला रहे तो एक घर में स्वर्ग कब तक ठहरेगी ? इसलिए सद्विचारों का, सद्भावनाओं का अधिकाधिक विस्तार करने का ज्ञान-यज्ञ भी हमें प्रज्वलित रखना ही है। जप के साथ हवन आवश्यक है। इसी प्रकार आत्म- कल्याण के साथ युग-निर्माण की प्रक्रिया का चलना भी अनिवार्य है।

हममें से प्रत्येक को अपने आस-पास क्षेत्र में धर्म प्रचार का एक क्षेत्र विनिर्मित करना है। कम से कम पाँच आदमी ऐसे ढूँढ़ने है। जिनमें कुछ धार्मिक संस्कारों की पूर्व संचित छाया मौजूद हो। उन्हें अपनी अखंड-ज्योति पढ़ानी चाहिए, उनके घर जाना चाहिए, संबन्ध बढ़ाने चाहिए और पत्रिका में प्रस्तुत विषयों पर विचार विनिमय करना चाहिए। इस प्रकार हमारे विचार और आपका व्यक्तित्व मिलकर वाद्य और गान मिलकर सुन्दर संगीत प्रवाह बहने लगने जैसी प्रक्रिया बन पड़ेगी। पाँच व्यक्तियों को अध्यात्म की शिक्षा देने के लिए यदि अखंड-ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य कटिबद्ध हो जाय तो इस अध्यात्मिक विश्व विद्यालय में हजारों अध्यापक और लाखों विद्यार्थी इसी वर्ष से बन सकते हैं। और यह पुण्य प्रक्रिया इसी प्रकार बढ़ती रहेगी। करोड़ों जनता तक देखते-देखते युग निर्माण का संदेश पहुँच सकता है। परिवार में, पड़ोस में, स्वजन संबंधियों में हम कुछ व्यक्ति जरूर ऐसे ढूँढ़ सकते हैं जो हमारी बात को सुनने को तैयार हो जाय। उनको अखंड-ज्योति में प्रस्तुत विचारधारा समझने, लेखों को पढ़कर सुनाने, छपी हुई कथा-कहानियों को सरस ढंग से कहने में यदि प्रतिदिन एक घंटा खर्च किया जाता रहे तो धीरे-धीरे उन पर प्रभाव पड़ेगा ही। उनकी प्रसुप्त आत्म चेतना जाग्रत होगी ही। अपनी अखंड-ज्योति को एक चलती-फिरती पुस्तक के रूप में दस-पाँच व्यक्तियों को हर महीने पढ़ा देना किसी भी उत्साही धर्म-प्रेमी के लिए कुछ भी कठिन कार्य नहीं है। कितने ही उत्साही व्यक्तियों ने अक्टूबर के अंक अधिक मात्रा में मंगाकर अपने पास-पड़ोस में वितरण किया है और पंचसूत्री-साधन में अनेकों नये साधकों को लगाया है। इसमें उत्साह ही एकमात्र निमित्त है। यदि वह हो तो इतना कर सकना किसी के लिए भी कुछ कठिन नहीं है।

गत 22 वर्षों से हम और आप साथ-साथ चलते रहे है। जीवन का एक बड़ा भाग इस प्रकार बिता चुके अब कुछ समय और भी साथ-साथ चल कर देख लें शायद कुछ अच्छा निष्कर्ष निकले। आप अब तक कुछ साधना न भी करते रहे हो तो अब अक्टूबर अंक में बतलाये हुए साधन-क्रम का अपना लें। आप श्रम करें हम आवश्यक प्रेरणा देंगे। दोनों के सहयोग से कुछ परिणाम अवश्य निकलेगा। आप आप की अपेक्षा कल निश्चित रूप से ऊँचे उठे होंगे।

ज्ञान-यज्ञ ही इतना ही महत्वपूर्ण है। सद्विचारों का विस्तार करना इस संसार का सबसे बड़ा परमार्थ है। इसमें भी हम और आप मिल-जुलकर आहुतियाँ देते रहें। ‘अखंड ज्योति’ विचार सामग्री प्रस्तुत करेगी आव उसे फैलाने , में अपना व्यक्तिगत श्रम एवं सहयोग प्रदान कीजिए। कार्य छोटा है पर इसकी सम्भावनाऐं महान है । लाखों करोड़ों मनुष्यों के मन और मस्तिष्क को बदल देना-उन्हें असत से सत की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर अग्रसर कर देना कठिन नहीं सरल है। हम लोग सच्चे मन से मिलकर इस श्रेय मार्ग पर चले तो बहुत कुछ संभव है, सब कुछ संभव है। यह संभावनाएँ सामने प्रस्तुत हैं और आपके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा कर रही है।


1962 का अष्टग्रही-योग

(श्री शरद माझरकर)

यहाँ पर कुछ ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किये जाते है जब पंच-ग्रह से लगा सप्त-ग्रह-योग हमें देखने को मिले। सितंबर 1861 में सिंह-राशि में छह ग्रह एक साथ थे। सिंह-राशि युद्ध व पौरुष की सूचक है। फलस्वरूप अमेरिका का चार साला तथा इटली का युद्ध सामने आया। 20-12-1901 को धनु-राशि में पंच-ग्रह-योग उपस्थित था जिसके कारण विक्टोरिया का राज्य-काल समाप्ति पर आया। नवम्बर 1910 के प्रथम सप्ताह में हमने सप्त-ग्रहयोग तुला-राशि में पाया। 1921 के अक्टूबर माह में कन्या-राशि में एक होने वाले छह ग्रहों के कारण हमने गाँधी का अवज्ञा-आंदोलन भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक पाया। अन्त में, 15 अगस्त 1941 को कर्क-राशि में पंच-ग्रह-योग उपस्थित था जिसके प्रभाव से हमने भरत में विदेशी-शासन का अन्त तथा स्वतः-भारत और पाकिस्तान को जन्म में लेते पाया। ग्रहों की संख्या मात्र से फलादेश करना उचित नहीं, अन्य बातें भी हैं जिन पर विचार करना आवश्यक होता है। कर्क और मकर विशिष्ट संक्रान्ति राशि होने से उनमें होने वाले योग असाधारण महत्व रखते हैं।

आइए अब हम 1962 के योग पर विचार करें। यह योग चन्द्रमा के मकर-राशि में प्रवेश करते ही 3-2-1962 तक अष्टग्रही रहेगा उसके बाद क्रम से सप्त, षष्ठ और पंचग्रही होता जायेगा। 5-2-1962 को प्रातः 5-40 के करीब सूर्य-ग्रहण है। उस समय पर सभी ग्रहों की स्थिति निम्न रहेगी-रवि और चन्द्र 293.51’ मंगल-280.30’ बुध-295.-4’ गुरु 296.45’ शुक्र 295.-55’ शनि 281.57 राहू-116.-18’ और केतू-296.-81’।

वारहमिहिर के अनुसार योग पाँच प्रकार के हैं-1. समाज 2. कोश 3. सन्निपात 4. समागम 5. समावर्त । जब 4 या 5 ग्रह एक ही राशि में मिलते हैं तब समावर्त होता है इसी में जब राहू या केतू मिलता है तो वह संमोह बन जाता है। चूँकि उपर्युक्त योग में शनि-गुरु भी शामिल हैं अतः वह कोश भी हैं। संमोह और कोश साधारण के लिये हानिकारक समझे जाते है। (संमोह कोशौ भयद्रौप्रजानाम्)। इस योग द्वारा प्रभावित दो नक्षत्र हैं-श्रवण और घनिष्ठा। चूँकि सूर्यग्रहण मकर-राशि में है अतः मछलियों का विनाश, मंत्रीगण एवं उनके परिवार की हानि और सैनिक एवं शुद्ध लोगों का नाश सम्भावित है। जहाँ तक मौसम का प्रश्न है इस योग के कारण इंग्लैंड तथा अन्य पश्चिमीय यूरोपीय देशों में बेहद ठंड पड़ेगी। उसी प्रकार अफ्रीकी के दक्षिणी देशों तथा भारत में असाधारण गर्मी पड़ेगी।

सभी विद्वानों के अनुसार हमें चीन एवं उसके आक्रमणों से अत्यन्त सतर्क रहने की आवश्यकता है। कारण हिमालय की ओर से भारत पर आक्रमण की बहुत संभावना है। इस प्रकार चीन की धमकियाँ सत्य में बदलेंगी। अतः हमें हमारी शक्ति एवं सेना को मजबूत बनाने की अत्यन्त आवश्यकता है। उसी प्रकार नेहरूजी की कुण्डली के मारक स्थान पर यह ग्रह-योग उपस्थित हो रहा है जो कि एक अच्छा संकेत नहीं है। नेहरूजी को अपने स्वास्थ्य एवं शारीरिक बचाव के बारे में अत्यन्त ही सतर्क रहने की आवश्यकता है। ये ऐसे संकेत हैं जिनकी अवहेलना करना राष्ट्र-हित में लाभदायक सिद्ध न होगा। खेद है कि योग प्रभाव से हमारे ड़ड़ड़ड़ के नेता, मंत्री, कर्णधारों में आपस में ही अधिक भेदभाव उपस्थित होगा। वे अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के आगे देश-हित को भूल बैठेंगे। विश्व की बदलती हुई राजनैतिक परिस्थितियों के कारण ऐसी निश्चित आशंका हैं कि देश में चुनाव आगे के लिये स्थगित करना पड़ेगा। और यदि चुनाव संभव हो ही गये तो काँग्रेस का विजयी होना निश्चित है। उसी समय देश में आकस्मिक राष्ट्रीय-संकट का उपस्थित होना हर हालत में निश्चित है। चूँकि यह ग्रहयोग हमारे देश की कुण्डली के पाँचवें स्थान पर हैं और पाँचवाँ घर ज्योतिष में बुद्धिमत्ता, ज्ञान आदि का द्योतक हैं, अतः ऐसी अपेक्षा की जाती है कि हमारे नेता जनसाधारण के हितों का बुद्धिमानी पूर्वक ख्याल रखेंगे। यह भी परिलक्षित होता है कि देश के कुछ वयस्क कर्णधार अपनी जगह पर नए खून को आने का अवसर प्रदान करेंगे।

अमेरिका को एक धमकी का डर उपस्थित होगा। दूसरी ओर चीन प्रगति के पथ पर बढ़ेगा। अमेरिका के आखिरी पूर्व और पश्चिमी छोर सबसे अधिक प्रभावित दिखते हैं। लेटिन अमेरिका में सैन्य एकत्रीकरण होगा। अमेरिका व चीन के तथा अमेरिका और क्यूबा के संबन्ध गिर कर बुरे होंगे। उसी प्रकार इंग्लैंड, स्पेन, बेलजियम, अलजीरिया, सौदी अरेबिया आदि भी विभिन्न प्रकार की हलचलों का सामना करेंगे। मध्यपूर्व देशों में प्राकृतिक-कोप एवं सैनिक-क्राँति होगी। काँगों और अन्य अफ्रीकी देशों में भी आन्तरिक।

*समाप्त*