एक भी आँसू न क कर बेकार -
जाने कब समन्दर मांगने आजाय !
पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है,
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है;
और जिसके पास देने को न कुछ भी -
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है ।
कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार -
जाने देवता को कौन - सा भा जाय ?
चोट खा कर टूटते हैं सिर्फ दर्पण,
किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं;
आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ-
हर समस्याएँ कभी रूठी नहीं हैं ।
हर छलकते अश्रु को कर प्यार -
जाने आत्मा को कौन नहला जाय ?
व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की,
काम अपने पांव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा -
जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नजर में ।
हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाय ?
-रामावतार त्यागी
धर्म एवं लोक हित के नाम पर अनेक निकम्मे व्यक्ति भोले-भाले लोगों का शोषण करते हैं, उससे स्वयं बचना चाहिए और दूसरों को बचाना चाहिए। आज अनेक व्यक्तियों ने स्वार्थ सिद्धि के लिए सेवा को भी एक व्यवसाय बना लिया है। कोई न कोई आडम्बर रच कर, लोक हित या धर्म वृद्धि की बात कहकर लोगों को ठगते और अपना स्वार्थ साधते रहते हैं। राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में ऐसे लोग भरे पड़े हैं। इन कुपात्रों के जाल में फँस जाना अपनी सेवा भावना का दुरुपयोग होने देना है। उदार हृदय व्यक्तियों को जहाँ परमार्थ के लिए तत्पर रहने की आवश्यकता है, वहाँ इन धूर्तताओं से सहज रहने की भी आवश्यकता है।
सेवा में किये गये प्रयत्न का सत्परिणाम निकले इसके, लिए सत्पात्र का ध्यान रखना आवश्यक है। धन एवं श्रम से आपत्तिग्रस्त उत्कर्ष अभियानों की सहायता हो सकती है। पर सबसे बड़ी और सबसे अस्थायी सेवा किसी को अधिक उत्कृष्ट मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने में ही है। मनुष्य में अनन्त सामर्थ्य भरी हुई है। उसके पास ही बहुत कुछ है। यदि वह अपने सामर्थ्य को पहचान कर उसका सदप्रयोग करने लगे तो वह न केवल अपनी समस्याओं को सुलझा सकता है वरन उन्नतिशील जीवन व्यतीत करता हुआ अन्य अनेकों के लिए भी प्रकाश प्रदान कर सकता है। किसी की सच्ची सेवा इसी में है कि उसकी निज की क्षमता को समझ सकने एवं उसका सदप्रयोग करने के लिए आवश्यक ज्ञान, साहस एवं उत्साह उत्पन्न कर दिया जाय.।
इस ज्ञान दान की महान सेवा की तुलना अन्न, वस्त्र, जल स्थान आदि देने जैसी तुच्छ सहायताओं से नहीं हो सकती। क्योंकि उनका लाभ क्षणिक एवं तात्कालिक है। वे वस्तुऐं समाप्त होती है और व्यक्ति फिर पूर्ववत् अभावग्रस्त हो जाता है। पर जिसकी अन्तःशक्ति जागृति हो गई है वह अपने भीतर भरे हुए खजाने से परिचित हो जाने पर सदा के लिए सम्पन्न बन जाता है।
नारदजी ने डाकू वाल्मीकि को आत्म बोध कराया। उसने लूट, डकैती, हत्या छोड़कर इससे अनेकों व्यक्ति लुटने से, सताये जाने से, मारे जाने से बचें। यदि बाल्मीकि डाकू ही बने रहे तो हर व्यक्ति उनके द्वारा संत्रस्त होते। नारद को उन पीड़ितों को उनकी खोई वस्तुऐं अपने पास से दान करने पर, ज्यों का त्यों कर देने पर जो पुण्य मिलता, उतना ही पुण्य एक डाकू का स्वभाव बदल देने से भी मिल गया। डाकू को नरक जाना पड़ता। उसे उस त्रास से बचा देने का पुण्य भी नारदजी को मिला। उस आत्मबोध के कारण बाल्मीकि का परिवर्तन होने पर वे महान ऋषि बने, इतने बड़े ऋषि कि उनके संरक्षण में भगवान राम ने अपने स्त्री बच्चा की सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा। यह कोई साधारण स्थिति नहीं थी।
एक अन्त्यज कुल में उत्पन्न, डाकू का व्यवसाय अपनाये हुए घृणित व्यक्ति का महर्षि बाल्मीकि के रूप में परिवर्तन कर देना आत्मबोध द्वारा ही संभव हो सका। वह डाकू जब तक जीवित रहता संसार में भारी पीड़ा और अशान्ति उत्पन्न करता रहता, पर जब वह महर्षि बन गया तो न जाने कितने और महर्षि उसकी प्रेरणा और शिक्षा से बन गये होंगे। उनकी बनाई बाल्मीकि रामायण ने कितने मनुष्यों को श्रेष्ठ मनुष्य बना दिया होगा इसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है।
आत्मबोध का ऐसा ही महत्व है। इसे प्राप्त कर मनुष्य बदलता है। और इस परिवर्तन के कारण वह तुच्छ से महान बन जाता है। इसलिए ज्ञान-दान को संसार का सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है। जो ब्राह्मण के पूज्य माना जाने का कारण उसका यह आत्मबोध कराने में संलग्न रहने का सेवा व्रत ही था। ज्ञान के
परिमाग्ने दुश्चरितद्वाघस्वा मा सुचरिते भज। उदायुषादस्थाममृतां अनु।। यजु॰ ४।२८)
“हे अग्ने (ईश्वर) मेरे पाप को सब ओर से रोकिये। मैं कभी बुरे कर्मों में प्रवृत्त न होऊँ। मुझे(सच्चरित्रता) में प्रतिष्ठित करो। श्रेष्ठ और दीर्घ जीवन (अमृतत्व) का अनुसरण करता हुआ मैं उत्थान करूँ।
चरित्र ही जीवन की आधारशिला है। मनुष्य संसार में जो कुछ सफलता, सौभाग्य, सुख प्राप्त करता है उसके मूल में उसके चरित्र की उच्चता ही रहती है। निर्बल चरित्र वाले अथवा चरित्रहीन व्यक्ति का जीवन निस्सार और महाशून्य है। चाहे वह साँसारिक दृष्टि से थोड़ा या अधिक धन प्राप्त करके आराम का जीवन व्यतीत करता हो, पर अन्य लोगों की दृष्टि में वह कभी प्रतिष्ठा या सम्मान का पात्र नहीं हो सकता।
अधिकांश मनुष्य भगवान से या अन्य देवी-देवताओं से धन और संतान आदि की प्रार्थना किया करते हैं, पर वास्तव में मनुष्य को सबसे पहले सच्चरित्रता की प्रार्थना करनी चाहिए। क्योंकि चरित्र ही स्थायी धन है, सोना, चाँदी, हीरा-जवाहरात तो बिलकुल अस्थायी या क्षणिक धन है, जो जरा सी देर में छीना जा सकता है या नष्ट हो सकता है। आज जो आदमी बड़ी शान से कोठी में रहता है, गाड़ी और मोटर पर चढ़ता है, मेवा और मिठाई खाता है, वह किसी भी घटनावश दूसरे ही दिन बिलकुल कंगाल और दूसरों का मुंहताज हो सकता है। पर चरित्र रूपी धन ऐसा स्थायी और नष्ट न होने वाला है कि न उसे चोर चुरा सकता है, न डाकू लूट सकता है, न आग जला सकती है और न राजा छीन सकता है। चरित्रवान् व्यक्ति किसी भी स्थान या देश में चला जाय वह सदा सम्मान युक्त जीवन व्यतीत करेगा।
वैसे भगवान ने हमको जन्म से ही ऐसी शक्ति दी है कि सच्चरित्रता को प्राप्त कर सकना कठिन नहीं है, वरन् वह एक स्वाभाविक बात है। मनुष्य जन्म से कभी पापी, दुष्ट या नीच नहीं होता। वरन् एक साधारण मनुष्य में भी यह शक्ति होती है कि ज्यों-ही वह कुमार्ग पर पैर रखता है, नीचता के कार्यों में प्रवृत्त होता है, वैसे ही उसकी अंतरात्मा उसे रोकती है, चेतावनी देती है, सावधान करती हैं समाज भी ऐसे कार्यों पर किसी न किसी रूप में प्रतिबन्ध रखता है और उसके विपरीत चलने वालों को घृणा की दृष्टि से देखता है। पर फिर भी बहुसंख्यक मनुष्य कुसंग में पड़ कर या पाप कर्मों की ऊपरी चमक-दमक से आकर्षित होकर, कुमार्गगामी होकर चरित्र को खो देता है। इसलिए अपनी भलाई चाहने वाले मनुष्य का कर्तव्य है कि चरित्र के विषय में सदैव सावधान रहे और परमात्मा से यही प्रार्थना करता रहे कि वह उसे सुमार्ग पर चलाता हुआ सच्चरित्रता में स्थिर रखे। यदि उसका चरित्र निर्मल और उच्च रहेगा तो वह संसार में कभी असफल नहीं हो सकता, चरित्र की शक्ति से वह जहाँ कहीं जायेगा या रहेगा सफलता और सम्मान का जीवन ही व्यतीत करेगा।
वेद मन्त्र में यह भी कहा है कि "मैं श्रेष्ठ और उच्च जीवन द्वारा अमरता को प्राप्त करूँ। "मानव जीवन का सर्वोच्च लाभ अमरता ही है अस्थायी और क्षणिक धन और सुख की और तो मूर्ख लोग ही दौड़ते है, बुद्धिमान व्यक्ति बातों के लिए प्रयत्न करेगा जो सदैव स्थिर रहने वाली, टिकाऊ है। इस दृष्टि से विचार किया जाय तो सभी सांसारिक वस्तुएँ क्षणभंगुर हैं और आध्यात्मिक और दैवी गुण स्थायी अथवा - अमर हैं। इसको संदेष में हम यो भी कह सकते है कि यह संसार नाशवान है और भगवान अमर है। जो व्यक्ति संसार से मोह रखेगा, उसके पदार्थों को हि बढि़या समझ कर उनकी तरफ दौडे़गा वह स्वयं भी अस्थायी और नाशवान बन जायगा। इसके विपरीत जो कोई परमात्मा-भगवान से प्रीति रखेगा, उसके गुणों का चिन्तन करेगा, उससे सच्चरित्रता की, पाप-रहित मार्ग पर चलाने की प्रार्थना करता रहेगा, वह अमर जीवन की और अग्रसर होगा। ऐसा जीवन प्राप्त करने के लिए सच्चरित्रता सबसे पहली शर्त है, क्योंकि भगवान के दरबार में दुश्चरित्र व्यक्ति का प्रवेश नहीं हो सकता। वह तो पापों की ओर ही प्रेरित होगा और परिणाम स्वरूप नाश को प्राप्त होगा।
अमर जीवन का एक और आशय यह भी है कि मनुष्य समाज और देश में रहकर ऐसे कार्य करे जिनसे अन्य लोगों की भलाई हो, उनके सुख, सुविधा की वृद्धि हो, जिससे वे उसकी प्रशंसा करे, उसके प्रति कृतज्ञ हों और मृत्यु के पश्चात भी उसका गुण-गान करें। जैसा एक विद्वान ने कहा है कि दूसरों के लिए स्वार्थ त्याग और कष्ट सहन करने वाला मनुष्य संसार में यश-रूपी शरीर से सदैव जीवित रहता है, वास्तव में अमर-जीवन का तात्पर्य यही है कि मनुष्य की कीर्ति चिरकाल तक स्थयी रहे और उसके देशवासी तथा समाज के लोग श्रद्धा पूर्वक उसकी चर्चा करते रहें। भगवान की उपासना करना, शुद्ध जीवन व्यतीत करना, जप-तप-ध्यान करना भी बहुत श्रेष्ट और सराहनीय गुण हैं, पर इनका संबंध प्रायः व्यक्तिगत जीवन से ही होता है। बहुसंसयक मनुष्य ऐसे देखने में आते है कि जिनका रहन-सहन आचरण सब प्रकार से शुद्ध और त्यागमय है, पर दुनियाँ के लोग उनके विषय में कुछ भी नहीं जानते। इसलिए अमर-जीवन के अभिलाषी मनुष्य का परोपकारी और समाज सेवक होना परमावश्यक है। दुनियाँ हमको तभी याद करेगी, सर्व साधारण हमको तभी श्रद्धा की दृष्टि से देखेंगे जब हमारा जीवन और कार्य उनके लिए लाभदायक, कल्याणकारी प्रतीत होंगे। इसलिए वेद के उपदेशानुसार मनुष्य को सदैव सत्कृत्य और दूसरों की भलाई करते हुए जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न करना चाहिए।
संसार में सभी मनुष्य स्वभायतः अमर-जीवन अथवा दीर्घ जीवन की इच्छा करते है। पूर्णतः वृद्ध, अशक्त हो जाने पर भी लिग जीवित रहने के लिए लालायित रहते हैं और उसके लिए तरह-तरह के प्रयत्न करते रहते है। पर उपयुक्त वेद मन्त्र से हमको यह प्रतीत होत है की दीर्घ जीवन तभी अच्छा है जब हम सच्छरित्र बन जायें और अपने साधनों तथा शक्तियों का समाज सेवा के लिये उपयोग करे। अगर हमारा चरित्र उथ नहीं है, हमारा मन पाप कर्मों की ओर ही दौड़ता है तो हम जितना अधिक जीवित रहेंगे उतना ही अधिक पापों की गठरी इकट्टा करेंगे। इसीलिए मंत्र-दृष्टा व्यपि ने सच्चरित्रता(सुचरिते) और दीर्घ जीवन या अमरता (अमृतान) का एक साथ ही जिक्र किया है। इसका तात्पर्य स्पष्ट रूप से यही है कि दीर्घ जीवन पुण्यात्मा का ही अच्छा है, पापी बनकर अधिक समय जीना तो और भी दुर्भाग्य की घात है। इसलिए मनुष्य मात्र का कर्तव्य है कि वे सदैव परमात्मा से वही प्रार्थना करें कि वह उनको सच्चरित्र परोपकारी, समाज सेवक बना कर सुमार्ग चलने की शक्ति दे।
(श्री विद्यालंकार वर्मा एम. ए.)
मनुष्य को संसार-बन्धन में जकड़ने वाला मुख्य कारण विषय-वासना में आसक्ति है। इस विषय वासना की वृद्धि जिस प्रकार शारीरिक इन्द्रियों से होती है उसी प्रकार उसका उच्छेद भी मानव देह द्वारा ही किया जा सकता है। इसका उपाय यह है कि अपने रूप, यौवन की ममता को त्याग कर इस मन्त्र का जप करें कि “मैं देह नहीं हूँ जब तक यह भावना श्वांस-प्रश्वास में न समा जाये और जब तक यह जीवन का महाव्रत न बन जाये, तब तक इसका अभ्यास करना आवश्यक है। क्योंकि विषय-वासना को नष्ट करने का उपाय उसके ऊपर आत्म बल द्वारा प्रहार करना है। मनुष्य की विषय-वासना का रूप यही होता है कि या तो वह देह के रूप और यौवन का स्वामी बनाना चाहता है या अपने नव-यौवन की शक्ति का अहंकार करता है यदि मनुष्य इस प्रकार की भावना को त्याग दे तो फिर यह देह ही विषय-वासना को मिटाने का साधन बन सकती है। देह से ही आसक्ति होती है और इसी से उसे त्यागा भी जा सकता है। आप विचार करेंगे तो मालूम हो जायेगा कि जो अपनी देह में आसक्ति रखता है उसे दूसरे की देहों के साथ भी आसक्ति रहना पड़ता है और जो अपनी देह के प्रति आसक्ति का का त्याग कर देता है वह फिर संसार की किसी देह में आसक्ति नहीं हो सकता। तुम जिस दृष्टिकोण से अपनी देह से बर्ताव करोगे तुम्हारी प्रकृति तुमसे सारे संसार के साथ वैसा ही बर्ताव कराके छोड़ेगी।
जो मनुष्य अपने रूप, यौवनादि को स्थायी करना चाहते हैं उन्हें देह रचना सम्बन्धी प्राकृतिक रहस्य का ज्ञान नहीं है उनकी धारणा तो यही होती है कि दूसरों को अपने रूप यौवन के बन्धन में फँसाने और स्वयं उनके रूप रस आदि को भोगे। इस प्रकार व अपनी चावल की खिचड़ी अलग पकाना चाहते हैं, पर वास्तविकता यह है कि मनुष्य रूप यौवन आदि की उपेक्षा करने से ही अच्छा मनुष्य बनता है। इसी उपाय से समाज व्यवस्था में पवित्रता और संसार में शान्ति रहती है। यदि हम कहे कि भगवान ने रूप और यौवन को मनुष्य की परीक्षा लेने और सच्चा प्रमाणित करने को ही बनाया है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। मनुष्य की विषय-वासना दो काम किया करती है - एक तो वह मनुष्य की रूप-यौवनादि की उपेक्षा नहीं करने देती और दूसरे आत्मा में स्थित “सत्य”के दर्शन से वंचित रखती है। अतः जो व्यक्ति सदा सचेत और जागृत रहता है वही मनुष्य नाम का अधिकारी होता है। विषय-वासना या कामना मानव जीवन रूपी जंगल में पैदा होने वाला वह कूड़ा करकट है जिसे ज्ञान की आग में फूँक देना चाहिये। इससे मनुष्य में ब्रह्म की भावना का उदय होता है। इसके विपरीत जिस व्यक्ति का अशुद्ध मन विषय वासना के कीचड़ में लिप्त रहता है वह मनुष्यता का अधिकारी नहीं माना जा सकता है और वास्तविक दृष्टि से वह मृतक तुल्य है। मनुष्य को जानना चाहिये की उसे रूप यौवन आदि किस लिए दिये गये हैं? वे उसे सत्य-दर्शन कराने के लिए दिये गये हैं। इसलिए जिस व्यक्ति का मन शुद्ध रहेगा वह विषय-वासना में न फँस कर अपने जीवन को धन्य मानेगा और अशुद्ध मन वाला काम विकार आदि में फँस कर नारकीय जीवन बितायेगा।
जब मनुष्य बाल्यकाल बिताकर समर्थ आयु में प्रवेश करता है तब उसके सामने अपना जीवन मार्ग चुनने की समस्या उपस्थित होती है। उस समय मनुष्य को समयानुकूल या असमयानुकूल जीवन बिताने का निर्णय कर लेना पड़ता है। जीवन मार्ग चुनने का यह अवसर प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आता है। परन्तु यह आता एक ही बार है जो दो बालक एक साथ और एक ढंग में पाले-पोसे गये है, वे इसी निर्णायक-दिवस के पश्चात दो विभिन्न विशाओं में चलने लग जाते हैं। जीवन में केवल एक बार आया अवसर ही या तो मनुष्य के उत्थान या पतन का कारण बन जाता है। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपने जीवन को चाहे जैसा बनाना मनुष्य स्वतन्त्र छोड़ दिया जाता है कि वह चाहे तो इस अवसर को सच्चे लक्ष्य-भ्रष्ट होकर अशुभ बन जाने दे।
मनुष्य जैसे अपने माता-पिता के यहाँ जन्म लेकर स्वाभाविक ममता के बन्धन में बँधता है और अपने भौतिक शरीर के पालन-पोसने और बढाज्ञे का अवस पाता है, वैसे ही इस बन्धन में रहता हुआ इससे मुक्त होने का भी अवसर पा सकता है। यह पात गहुत कुछ घरों के वातावरण पवित्र हो तो मनुष्य देह के बन्धन में रहते हुये भी, इस देह में रहकर, विदेह, अमर बनने का अवसर पा सकता है।
यह कैसे स्म्भव होता है सो सुनिये कर्तव्य परायण माता-पिता संतान को गोद में पाकर अंधे नही हो जाते, वरन्, एसा समय आते ही उनके ज्ञान नेत्र खुल जाते है। वे सन्तान को गोद में पाते ही अपने आपको उसके भूठे मोह से पृथक रखने का निश्चय कर लेते है और सन्तान को भी अपने मोह बन्धन में फँसने नहीं देते। वे अपने कर्तव्य परायण जीवन द्वारा सन्तान को एसी शिक्षा देते ऐ कि उनकी सन्तान इस मायायुक्त संसार के मोह से अपने को मुक्त कर लेती है। पर यदि माता-पिता ही मूर्खता करें और संतानों को अपने मोह से न छुडा़यें तो उनकी सन्तान को संसार-मोह से छोटने की फला का ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकेगा? फिर यह बात भी स्पष्ट है कि संतान के लिये संसार-मोह से छूटने की शिक्षा देने वाला माता-पिता से अच्छा शिक्षक भी दूसरा नहीं मिल सकता। अवस्था बढज्ञे के साथ-साथ जब संतान के मन में माता-पिता के अतिरिक्त अन्य मानवीय शरीरों के सम्बन्ध जोडज्ञे की भावना उत्पन्न होती है तो वही, यौवन-लालसां की उत्पत्ति का अवसर होता है। उस समय जो कर्तव्य परायण मनुष्य अपनी दूषित इच्छाओं को संयत करके माता-पिता के पवित्र बन्धन को परम-पिता परमेश्वर तथा जगत माता आध्याशक्ति से जोड़ लेता है, वही रूप और यौवन के विकार से बचकर धर्मानुसार जीवन व्यतीत कर सकता है। ऐसा ही मनुष्य घरमें या एकान्त में रहकर "वैराग्य" की भावना से श्रेष्ठ मार्ग का पथिक बन सकता है।
मनुष्य के स्वरूप में अनन्त गुण भरे पढे़ है। दूर्भाग्य से मनुष्य अपनी इस अमूल्य गुणराशि से लाभ नहीं उठाता और भोग-लालसा पर मोहित हो जाता है। इस भोग लालसा को उत्पन्न होते ही मिटा डालने की दिव्य शक्ति मनुष्य के स्वभाव में है। शास्त्रों के आदेशानुसार तो भोगेच्छा का अन्त कर डालना ही मनुष्य की बुद्धि का स्वाभाविक कार्य है और विषयों की कामना को पोषण करना स्वभाव विरुद्ध कर्म है। मनुष्य तब ही सच्चा मनुष्य बनता है, जब वह इस लालसा का अंत करता है। इसका सरल मार्ग यही है कि सबसे पहले अपने शरीर की भोगेच्छा से लडे़ और त्याग दे। भोग में भी एक प्रकार की मिठास है, परन्तु वह ऐसी मूढ़ मिठास है कि मनुष्य को मनुष्यता से पतित करके उसे पशु बना देती है। उसकी यही भोगेच्छा उसे महापुरूष नहीं बनने देती। मनुष्य को जानना चहिये कि संसार में जो शरीर दिखलाई पड़ते है उनको धारण करने वाली विश्वव्यापी सत्त एक ही है। उसने करोड़ बार अपने स्वरूप का दिव्य अनुभव लेने के लिये ही ये अनन्त देह धारण किये है। मनुष्य के पीछे चिपटी हुई इस विषय-वासना का अन्त उसी दिन होता है जिस दिन वह इस विश्वव्यापी विराट देही के असंख्य देह धारण करने के अभिप्राय को जान लेता है और अपने सच्चे लक्ष्य को समक्त कर अपनी देह और मन का सदुपयोग करता है।
(संत विनोबा के एक प्रवचन का साराँश)
मनुष्य के हृदय में कितनी शक्ति पड़ी है, इसका भान हमें रोज की प्रार्थना से होता है। यह एक बड़ी शक्ति है। अपने खुद पर काबू रखने की शक्ति से बढ़कर दुनियाँ में दूसरी कोई शक्ति नहीं है। दुनियाँ को जीतने वाले बड़े बहादुर कहलाये, लेकिन अपनी इन्द्रिय तथा मन को जीतने वाले, उनको वश में करने वाले वीर नहीं, महावीर कहलाये। आज दुनिया के देशों के बीच परस्पर सम्बन्ध इतना दृढ़ हो गया है कि किसी देश के मनुष्य की अच्छी कृति सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देश देश में फैल जायेगी और अगर हम अपने पर काबू नहीं रख सकेंगे, कुछ गलत काम कर लेंगे तो वह गलती और वह पाप भी सीमित नहीं रहेगा, व्याप्त हो जायेगा ऐसी हालत में इन्द्रिय निग्रह और मनः संयम का महत्व बहुत बढ़ गया है और हरेक देश के नागरिकों और ग्रामीणों पर व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर बड़ी भारी जिम्मेदारी आती है।
जब मैं शाँति की बात कहता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि समाज में इतने दुख होते हुए भी सहन करते चला जाना, गरीबों के प्रति सहानुभूति नहीं रखना, अड़ोसी-पड़ोसी की परवाह नहीं करना और समस्याओं के हल करने का उपाय नहीं ढूँढ़ना।
यह असम्भव वस्तु है कि समाज में अनेक प्रकार के दुख और विषमता मौजूद होते हुये भी उसके लिए कोई प्रयत्न न करें तो भी समाज में शाँति रहेगी। अगर ऐसा संभव हुआ और बुरी हालत में भी समाज शान्त रहा तो मैं उसे तमोगुणी समाज, जड़ समाज, मानवता से गिरा हुआ समाज कहूँगा। सच्चा देहाती वही है जो खुद शाँत रह कर सारे समाज के दुख निवारण के लिए सतत् प्रयत्न करता रहता है। जो सचमुच में आत्मानुभवी पुरुष होता है वह तो निरन्तर कृति करता रहता है “कहा गया है “वसन्तवल्लोकहितं चरन्तः” वह बसंत ऋतु के समान लोकहित के लिए सतत् कर्म करता रहता है। अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता है। सेवा करने में ही समाधान चाहता है। काल की आकांक्षा नहीं रखता है और सब लोगों के दुख निवारण में मातृवत् वात्सल्य से लगा रहता है। ऐसा जो निरंतर सेवक है, वही निवृत्तमार्गी है, देहाती है। आज हिन्दुस्तान में निवृत्ति का जो गलत अर्थ किया जाता है कि ये सारे सुख-दुख मिथ्या हैं, इसलिए उनकी परवाह क्यों करते हो? हमेशा शाँत रहना चाहिए। यह तो आत्मवंचना है या प्रवंचना निवृत्ति मार्ग के शिरोमणि शंकराचार्य हिन्दुस्तान भर घूमते रहे। गाँव-गाँव और घर-घर जाकर लोगों में ज्ञान बाँटते रहे। इस तरह निरन्तर परिश्रम करके बत्तीस साल की उम्र में वे चले गये।
जहाँ समस्यायें मौजूद हैं ओर उन समस्याओं के निवारण के लिए कोशिश की जा रही है, वहीं पर शाँति की कीमत है। अगर शाँति का अर्थ यह हो कि वर्तमान ढाँचे को रखना, आज के जैसे समाज को कायम रखना तो वह शाँति बिलकुल निकम्मी है। हिन्दुस्तान में इतनी समस्यायें, दुख और विषमताएँ मौजूद हैं, तब भी मैं आपको शाँति रखने के लिए कहता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि आप दुख सहन करते रहें बल्कि उसका अर्थ यह है कि आपको वीर पुरुष के समान उसका मुकाबला करना चाहिये। उन समस्याओं का निवारण शान्ति के तरीके से करना चाहिए और यह दिखा देना चाहिये कि शाँति में शक्ति पड़ी है और उससे समस्यायें हल हो सकती हैं। आज तक तो लोगों ने यही मान रखा है कि अगर शाँति है तो समस्यायें जारी रहती हैं। हल नहीं होतीं और अगर उन्हें हल करने की कोशिश होती है तो खून की नदियों बहती हैं। यह मानना बिलकुल गलत है।
समस्या निवारण के साथ शांति होनी चाहिये, शांति के तरीकों से समस्याओं का हम कहेंगे कि शांति आक्रमण कारी होनी चाहिये। यानी वह शांति किसी एक ह्र्दय के अन्दर छिपी हुई नहीं रहना चाहिए। मेरे नजदिक बैठे हुए किसी मनुष्य को बिच्छू ने काटा और मैं वैसे ही बैठे रहा, मुझे कुछ करने की प्रेरणा नहीं हुई तो वह कोई शांति नही है। यह तो करूणा का अभाव है, निष्ठुरता है, जरा सोचने पर कहेंगे कि यह स्वार्थ है, आलस्य है और आगे बढ़कर मैं कहूँगा कि यह दम्भ है। मुझे दुखियों की सेवा में में दौडज्ञा चाहिए और दौड़ते हुए भी मन में शांति रखनी चाहिए। यही सच्ची शांति होगी।
शांति के तरिके से दुख निवारण की कोशिश करेंगे, समस्यायें हल करेंगे तो हम शांति की शक्ति को प्रकट करेंगे, तप शांति नही है-ऐसी बात नहीं, परन्तु शांति स्वामिनी नहीं है, वह दासी है। आज की समाज रचना में भी कुछ सेवा का काम चलता है, लेकिन बिलकुल गौण रूप से चलता है। इधर लडा़-इर्था चलती है और उधर सेवा शुश्रषा करने वाला दल भी जाता है। उसमेझं दया है, सेवा है लिकिन उस पया में शक्ति नहीं है। यह दया युद्ध-निवारण नहीं कर सकती। वह तो युद्ध का अंग ही है। इस तरह दासी के तौर पर आज भी शांति का, दया का, सेवा का कुछ-काम चलता है। परन्तु हम चाहते है कि शांति, सेवा और दया स्वामिनी के सदृश काम करें, उनका राज्य हो।
बुद्ध भगवान की चालीस उपवास के बाद दर्शन हुआ और उन्होनें देखा कि आसमान में परमेश्वर की करूण फैली हुई है। यह आसमान चुप नहीं बैठता। दिखता तो है बडा़ शांत, लेकिन हमारे लिए पानी बरसाता है, सूरज की किरणें भेऊता है, हवा को इधर से उधर दौडा़ता है। अगर वह यह सब नहीं करता तो हमारी क्या हालत होती? इसलिए इस आकाश को हम परमात्मा का चिन्ह समझेंगे क्योंकि वहों पर अत्यन्त व्यापक करूण फैली है। बुद्ध भगवान को यह दर्शन हुआ। वे निकल पदे़ गाँव-गाँव जाकर वे लोगों की सेवा करते थे, उन्हे उपदेश देते थे।
समाज की समस्यायें अगर शांति से हल होती है तो समाज ऊपर उठता है। समाज को ब्रह्म-दर्शन होता है। फिर समाज में चोरियों और अनेक प्रकार के दुराचार नहीं होते। चोरी और पाप को दूर करने के लिये उपदेश की किताबों कि जरूरत है कि हम अपने को समाज का अंश समझे और अपने में सारे समाज को देखें। जिनकी बुद्धि आत्म विचार में स्थिर हो गैइ है और शरीर निरन्तर सेवा का कार्य करता रहता है, ऐसे व्यक्तियों के कार्य के परिणाम स्वरूप शांति में शक्ति आवेगी और उस शांति से समाज की समस्यायें हल होगी। तो फिर हमें भी मुक्ति मिलेगी और समाज को भी मिक्ति प्राप्त होगी। दुनियाँ में-दूसरे देशों में, अशांति की शक्तियाँ, बढ़ रहि है। एट्म ओर हाइड्रोजनबम धन रहे है लिकिन अशांति की शक्ति, एक दूसरे को अशांत ही बनाती है। दोनों आग जलायें तो दोनों की आग से पानी नही पैदा होता, बल्कि आग बढ़ती है। इसलिए अब दुनियाँ के उन लोगों के मन में भी शङ्का पैदा हो रही है, जो कि अशांति में विश्वास रखते थे। अब वे कहने लगे है कि शन्त्र छोडज्ञे चहिए, शांति की जरूरत है। परन्तु दोनों कहते है कि सामने वाला छोडे़गा तो हम छोडे़गें। अब तक वे ऐसी बाते भी नहीं बोलते थे, लिकिन अब कम से कम आमने-सामने बैठकर बातें तो करते जा रहे हैं, फिर भी हम उन्हें दोष नहीं देते।
आज हम बहुत कमजोर है। फिर भी हम देखते है कि हमारी प्रार्थनायें हररोज सब लोग पाँच मिनट मौन रखते है। यही हमारे देश की शक्ति है, जिसको हम विकसित करना चाहते है, प्रकाशित करना चाहते, उसे बाहर कार्य रूप में लाना चाहते हैं|
(महापण्डित अश्वघोष कृत संस्कृत काव्य ‘बुद्ध चरितम्’ के आधार पर)
राजकुमार बुद्ध एक दिन वन-विहार की इच्छा प्रकट करते हैं। राजा शुद्धोधन इसके लिए व्यवस्था कर देते हैं। राजकुमार भावुक थे। उनके कोमल हृदय पर किसी प्रकार का आघात न लगे इस विचार से राजमार्ग पर से पीड़ितों, रोगियों, वृद्धों और दीन-दुखियों को हटा दिया जाता है। यात्रा की आवश्यक तैयारी शीघ्र ही पूरी हो जाती है।
स्वर्ण मंडित रथ, जिसमें चार शिक्षित घोड़े जुते थे और बलवान, चतुर सारथी था। राजकुमार के लिए लाया गया। वे उस पर बैठ कर यात्रा के लिए चले।
मार्ग में एक वृद्ध पुरुष को राजकुमार ने ध्यानपूर्वक देखा और सारथी से पूछा,
“हे सारथी, यह कौन पुरुष आया? इसके केश सफेद हैं, हाथ में लाठी है, भौहों से आँखें ढकी हुई हैं, अंग ढीले और झुके हुए हैं। क्या यह कोई रोग है? क्या यह इसका स्वभाव है? क्या यह कोई आकस्मिक संयोग है?”
सारथी ने कहा - रूप की हत्या करने वाली, बल की विपत्ति, शोक को उत्पन्न करने वाली, आनन्द की मृत्यु, स्मृति का नाश करने वाली, इन्द्रियों की घातक यह वृद्धावस्था है, जिसने इस वृद्ध को तोड़ डाला है।
बचपन में इसने भी दूध पिया। फिर रेंगना, खड़ा होना और चलना सीखा। तब सुन्दर युवक बना, तरुण हुआ और यथाक्रम अब वह वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ।
ऐसा कहे जाने पर विचलित होकर राजकुमार ने सारथी से पूछा - क्या यह दोष मुझ में भी होगा?
सारथी ने उत्तर दिया - आप आयुष्मान् को भी समयानुसार निस्संदेह यह वृद्धावस्था प्राप्त होगी।
यह सुनकर राजकुमार बहुत खिन्न हुआ। लम्बी साँस लेकर सिर हिलाते हुए वृद्ध की ओर फिर देखा और उद्विग्न होकर कहा - स्मृति, रूप और पराक्रम की हत्या करने वाली वृद्धावस्था को प्रत्यक्ष देखते हुए भी लोग क्यों उसके सम्बन्ध में चिन्तित नहीं होते?
आगे मार्ग में एक रोगग्रस्त मनुष्य दिखाई दिया। राजकुमार ने करुणापूर्ण दृष्टि से उसे देखा और सारथी से पूछा-
‘यह कौन मनुष्य है? इसका पेट फूला हुआ है, लम्बी साँसें चलने से शरीर काँप रहा है, हाथ ढीले पड़ गये हैं, शरीर सूख गया है, त्वचा पीली पड़ गई है, दूसरे का सहारा लिए करुणा पूर्वक अम्मा-अम्मा कहता हुआ कराह रहा है”
सारथी ने कहा - हे सौम्य धातु प्रकोप से रोग उत्पन्न होते हैं, उसी ने एक समय के बलवान इस व्यक्ति को भी ऐसा दुर्दशाग्रस्त कर दिया हे।
राजकुमार ने दुखी होकर सारथी से फिर पूछा - रोग केवल इसी को हुआ है यह भय अन्य मनुष्यों को भी होता है?
सारथी बोला - हे कुमार यह दोष साधारण है। यह सारा संसार ही इस प्रकार रोगों से पीड़ित होता रहता है।
कुमार का चित्त काँपने लगा। उसने लम्बी साँस खींचते हुए कहा - रोगियों की रोग रूप विपत्ति देखते हुए भी लोग कैसे इस संसार में निश्चिन्त रहते हैं? अहा कितना विशाल अज्ञान है इन मनुष्यों का, जो रोग भय से ग्रसित होने पर भी हँसते रहते हैं।
मार्ग में आगे एक मृत व्यक्ति दीखा, जिसे कंधे पर रख कार श्मशान में ले जाया जा रहा था।
तब उस राजकुमार ने सारथी से पूछा - यह कौन है? जिसे चार पुरुष कंधे पर रख कर ले जा रहे हैं। और कितने ही लिग दुःखी हिकर इसके पीछे रोते जा रहे हैं।
सारथि ने उत्तर दिया यह कोई मृतक है। जिसकी बुद्धि, इन्द्रियाँ, प्राण, गुण सदा के लिये सो गये हैं। जो तृण एवं काष्ठ के समान संज्ञा हीन हो गया है। प्रयत्नपूर्वक सेवा और संरक्षण करने वाले प्रिय जन भी अब इसका परित्याग करने जा रहे हैं।
यह सुनकर उनका मन बहुत संक्षुच्छ हुआ और फिर पूछाक्या ऐसा परिणाम केवल इसी मनुष्य का हुआ है? या और लोगों का भी ऐसा ही अन्त होता है?
सारथि ने कहा सभी मनुषों का यही अंतिम कर्म है। धनी, निर्धन, मूर्ख , ज्ञानी संसार में सभी का विनाश नियत है।
मृत्यु की बात सुनकर राजकुमर काँपने लगा। उसने रूँधे कण्ठ से गम्भीर होकर कहा-लोगों का यह विनाश नियत है और संसार उस विनाश का भय छोड़ कर असावधानी कर रहा है। मनुष्यों के मन कितने कठोर हैं कि मृत्यु के मार्ग में इस प्रकार पडे़ होने पर भी निश्चित हैं।
हे सारथि, हमारे रथ को लौटाइये। विहार यात्रा करने का यह देशकाल नहीं है। अपना विनाश देखता हुआ भी कोई बुद्धिमान इस संकट काल में में कैसे असावधान रह सकता है!
राजकुमार को आमोद-प्रम्प्द करने के लिए एक सुरम्य उपवन में भेजा जाता है। वहाँ तरूणी वेश्याओ का नृत्य तथा याद्य का आयोजन किया जाता है। राजा द्वारा नियुक्त कर्मचारी इस प्रमोद में भाग लेने के लिये राजकुमार को बहुत उकसाते है। पर वह उनकी व्यर्थता को प्रकट करते हुए इन विनोद संयोजकों से कहते है:-
"मैं विपयों की अवज्ञा नहीं कर रहा हूँ। संसार उन्हीं में रत है यह भी मैं जानता हूँ। पर जगत कोन नाशवान देख कर मेरा मन इनमें नहीं रम रहा है"।
"यदि जरा, व्यधि और मृत्यु ये तीनों न होते तो इन रन को लुभाने वाले विषयों में मुझे भी आनन्द आता"।
"यदि इन स्त्रियों का यही रूप सदा बना रहने वाला होता तो इन दोपयुक्त विषयों में मेरा मन भी अवश्य ढगता"।
"इनका यौवन, जरा द्वारा खाया जा रहा है। शीघ्र ही इनके शरीर वृद्ध और घृणित हो जायँगे। कोई मोहग्रस्त ही ऐसे नाशवान शरीर में आनन्द ले सकता है"।
मृत्यु व्याधि और जरा के आधीन रहने वाला मनुष्य यदि इन्हीं विकारों से प्रसित दूसरे शरीरों में रमण करने पर भी विरक्त और भयभीत नहीं होता तो वह पशु-पक्षियों के समान ही ज्ञान-रहित है।
"अहो!" तुम लोगों का मन अति कठोर है जो इअ चंचल कामोपभोगों में भी सार देखते हो। अति तीव्र भय रहते हुए भी, मृत्यु मार्ग पर लोगों का जाते हुए देख कर भी तुम विषयों में आसक्त हो"।
"और मैं, जरा, व्याधि और मृत्यु की चिन्ता करता हुआ भयभित और विकाल हो रहा हूँ। आग से मानों जलते हुए जगत को देख कर न शान्ति पाता हूँ, नवैर्य! आनन्द तो पाऊँगा ही कहाँ से? "
"मृत्यु अवश्यंभावी है, यह जानते हुए भी जिस मनुष्य के हृदय में काम पैदा होता है, जो इस महासंकट के समय में भी निश्चित है, मिर्भय है, उसकी बुद्धि को मैं लोहे की बनी समझता हूँ।"
राजकुमार बुद्ध आत्म ज्ञान की खोज में बा चाहते है। तप करना चाहते हैं। राजा शुद्धोदन उन्हें रोकते है। अनेक प्रकार से समझते हैं। वे उन्हें उत्तर देते हैं-
"हे राजन् ! आप मेरे लिये चार प्रबंध कर दीजिये तो मैं तप करने न जाऊँगा।"
"मेरा जीवन मृत्यु को प्राप्त न हो। रोग मेरे स्वास्थ्य का हरण न करे जरा मेरे यौवन को न छीने। "और न कभी कोई विपत्ति मेरे वैभव का अपहरण करे।
यदि यह सम्भव नहीं है तो मुझे न रोकिये। क्योंकि आग से जलते घर से निकलने की इच्छा रखने वाले को पकड़ना उचित नहीं।
“जब जगत का वियोग ध्रुव है, तब धर्म के लिए स्वयं पृथक् हो जाना भी क्या बुरा है? तृष्णाओं की पूर्ति हो जाने से पूर्व ही मुझे विवशतापूर्वक मृत्यु घसीट ले जायेगी और तब अपने आप भी वियोग ही हो जायेगा।”
वन पहुँच कर साथ में आए हुए छन्दक नामक सेवक को घोड़े समेत लौटाते हुए उसके द्वारा अपने पिता के लिए राजकुमार संदेश भेजते हैं-
“हे छन्दक राजा! राजा को बार-बार मेरा प्रणाम कहना और उनके सन्ताप को दूर करने के लिए मेरा यह निवेदन करना -
‘जरा, व्याधि और मरण का नाश करने के लिए मैंने तपोवन में प्रवेश किया है। स्वर्ग की तृष्णा से नहीं। स्नेह के अभाव से नहीं। क्रोध से भी नहीं।”
“अतः इस तरह निकले हुए के लिए आपको शोक नहीं करना चाहिये। क्योंकि संयोग भी चिरकाल तक नहीं रहता। अन्त में वियोग निश्चित है। इसलिए मुझे वह प्रयत्न करने को है जिससे फिर स्वजनों से वियोग न हो।”
“मुझ शोक का अन्त करने के लिए निकले हुए के लिए शोक करना उचित नहीं। शोक को उत्पन्न करने वाले काम-भोगों में आसक्त अज्ञानी लोगों के लिए ही शोक करना उचित है।
“यदि वे कहें कि राजकुमार असमय बन गया - तो कहना कि जीवन चंचल होने के कारण धर्म के लिए कोई समय, असमय नहीं है।”
छन्दक विदा होते समय दुखी होता है तब उसे राजकुमार समझाते हैं,
“मेरे वियोग के प्रति हे छन्दक! संताप छोड़ो। देहधारियों का पृथक् होना नियत है। मृत्यु के बाद पृथक् हो ही जाते हैं।
“यदि स्नेह के कारण स्वजनों को मैं नहीं भी छोड़ें तो भी मृत्यु हम विवश हो कर एक दूसरे का वियोग करा ही देगी।”
जिस प्रकार बाँस के वृक्ष पर समागम होने के पश्चात् पक्षी पृथक् पृथक् दिशाओं में चले जाते हैं अक्सर ही उसी प्रकार प्राणियों के संयोग का अन्त वियोग से होता है।”
“जिस प्रकार बादल एकत्रित होकर फिर अलग हो जाते हैं उसी प्रकार प्राणियों के संयोग-वियोग को भी मानना चाहिए।”
“साथ पैदा होने वाली डाली से पौधों का वियोग होता है, फिर क्या हम लोगों का वियोग न होगा?
“कपिल वस्तु में मेरी प्रतीक्षा करने वाले लोगों से कहना - उसके प्रति मोह छोड़िए, उसके निश्चय को सुनिए-
“या तो वह जन्म और मृत्यु का क्षय करके लौटेगा या प्रयत्नहीन और असफल होकर मृत्यु को प्राप्त करेगा।”
राजकुमार को खोजते हुए पुरोहित और मंत्रीगण वन प्रदेश में पहुँचते हैं। उन्हें घर लौट चलने के लिए अनेक प्रकार से समझाते हैं। पिता, पत्नी एवं अन्य परिजनों के शोक संतप्त होने की चर्चा करते हैं उन सबको उत्तर देते हुए बुद्ध ने कहा-
“मेरे कारण राजा को शोक हो रहा है यह जो आप लोगों ने कहा सो मुझे प्रिय नहीं लगा। क्योंकि संयोग स्वप्न सदृश होने और वियोग अवश्यम्भावी होने पर भी वे संताप करते हैं।
"जगत की विचित्र गति समझ कर आप लोग ऐसा सोचिए कि संताप का कारण न पुत्र है न पिता, शोक का निमित्त तो अज्ञान ही है।"
"पथिकोंके समान इस सम्सारमें अत्पन्न हुए लोगों का वियोग नियत है। अतः स्वजन समझे जाने वाले लोगों का वियोग होने पर भी ज्ञानी जन शोक क्यों करें?"
"पूर्व जन्मों के स्वजनों को छोड़ कर मनुष्य यहाँ आता है और फिर यहाँ से भी स्वजनों को ठग कर अन्यत्र चला जाता है; इस प्रकार परित्याग धर्म वाले मनुष्यों में आसक्ति क्यों की जाय?"
"जब गर्भ से लेकर सब अवस्थओं में मृत्यु, मारने के लिये, तैयार है तो पिताजी क्यों कहते हैं कि मैं असमय में बन का आश्रय ले रहा हूँ?"
"विषय सेवन के लोये काल नियत है, धन उपार्जन का भी समय होता है किन्तु मृत्यु तो संसार में समय-कु समय कुछ नहीं देखती, फिर कल्याण मार्ग के लिए समय की प्रतिक्षा कैसी?"
"मुझे सिंहासन पर बिठाने के लिये पिताजी राज्य छोडज्ञा चाहते हैं सो उनकी उदारता है, पर मेरे लिये उसे ग्रहण करना, रोगी के लोभवश अन्न ग्रहण करने के समान अनुपयुक्त ही है।"
"सोने के जलते महल के समान, विपुयुक्त मधुर भोजन के समान, घडियालों से भरे कमलयुक्त सरोवर के समान, राज्य सुख रमणीय तो है, पर विपत्तियों का आश्रय भी है।"
"राज्य से न सुख होता है न धर्म। यह अनुभव होने पर पूर्व काल में राजा लोग वृद्धावस्था में राज्य छोड़ कर वन को जाते रहे हैं।"
"यदि शान्ति में प्रीति हो तो राज्य शिथिल होगा। यदि राज्य में मति हो तो शान्ति नष्ट होगी। दोनों का आपस में वैसे ही मेल नहीं जैसे शीतल जल और अष्ण अग्नि में एकता नहीं होती।"
(अपूर्ण)
(डा. रामचरण महेन्द्र, एम. ए., पी. एच. डी.)
आप किसी व्यथा से पीड़ित हैं कोई दुख पूर्ण घटना, कोई भयंकर वेदना, कोई धन जन की हानि, कोई व्यापारिक नुकसान, कोई अशाँत द्वेषपूर्ण मनः स्थिति आपको उद्विग्न किये हुए है। आप चारों ओर से निराश, निरुपाय हो चुके हैं और घोर मानसिक अन्धकार में मार्ग टटोल रहे हैं।
आपके चारों ओर गहन अन्धकार छाया है, आपकी स्थिति उस अन्धे जैसी है जिसे हाथ से हाथ नहीं सूझता। कुछ भी मार्ग नहीं दिखाई देता। आप आँखें फाड़ फाड़कर मार्ग तलाश कर रहे हैं पर अँधेरे की निविड़ता में कुछ नजर नहीं आता। सर्वत्र निराश का अँधेरा है, गुप
और आप हैं एकदम अशाँत, बुरी तरह उद्विग्न और व्यथित।
इस घने अन्धकार में आपको डर लग रहा है आप भय, आशंका और चिन्ता से अभिभूत हैं निराशा की यह धुन्ध, बेबसी की यह कालिमा, असफलता का यह निविड़ अन्धकार, विरोध की ये भीमकाय काली घटाएँ अपने अंतराल में चिन्ता का तूफान छिपाये हैं।
प्रकाश की इन किरणों को पकड़िये
बस, आशा और आत्म विश्वास की असंख्य किरणें आपके गुप्त मन में भी छिपी पड़ी हैं इन प्रकाश की किरणों को मजबूती और पूरे आत्मविश्वास से पकड़िये। निराशा तो एक प्रकार की नास्तिकता है। एक मानसिक अपराध है, आशा और आत्म विश्वास के बढ़ते ही निराशा का अन्धकार कम हो जायेगा। आपका अशाँत चित्त स्थिर और संयत होगा। भय, चिन्ता और हानि की आशंका दूर हो जायेगी, नई आशा बँधेगी। निश्चय जानिये, इस आत्म-विश्वास को खोलकर आप स्वस्थ बनेंगे, संतुलित रहेंगे।
अन्धकार के साथ चित्त की व्याकुलता, भय, चिन्ता और आशंकाएँ जुड़ी हुई हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य की निराशा का अन्धकार भी ऐसा ही विषैला और हानिकारक है। निराशा के काले वातावरण में जब आशा की एक पतली सी रेखा चमकती है, तो मनुष्य के गुप्त मन में एक नया आत्मविश्वास एक नई हिम्मत आती है और नया रस उल्लास भर जाता है। आशा की नई किरणों के सहारे मनुष्य जीवन का एक नया आधार पाता है।
ये आत्म हत्याएँ
आज हमारे देश में प्रतिदिन आत्म-हत्याओं के दुःखद लोमहर्षक और हृदय विदारक समाचार छपते रहते हैं। आये दिन असंख्य व्यक्ति किसी न किसी साधारण से कारण से निराश होकर प्राणों का त्याग कर देते हैं, खुद अपने ही आपसे घृणा करने लगते हैं। मानसिक भार से चिन्तित हो उठते हैं। मानसिक उत्तेजना या गुप्त अंतर्द्वंद्वों में फँसकर नैतिक बुद्धि के प्रतिकूल कार्य कर बैठते हैं। उन्हें अकारण चिन्ताएँ और निराधार भय सताने लगते हैं। कुछ व्यक्ति पुराने पापों के लिए आत्म भर्त्सना करते रहते हैं। आज जो असंख्य व्यक्ति आत्म-हत्या करते हैं, उन सब की बुद्धि-चेतना की सतह के निचे निराशा की पिशाचिनी ही छिपी हुई है। उसी इकट्ठि हुई आन्तरिक कालिमा की दूषित प्रतिक्रिया आत्म-हत्या तथा मानसिक क्लेश के रूप में प्रकट होती है तथा बढ़ कर कमजोर संकल्प वाले मनुष्य के प्राण तक ले बैठती है।
आत्म-हत्या करने वालों में विद्यार्थी वर्ग बडी़ संख्या में है, क्या आप विद्यार्थी हैं और इम्तहान में फेल होकर आत्म-ह्त्या की बात सोचा करते हैं?
यह विचार सदा के लिये मन से निकाल दिजिए। इतने निराश क्यों होते है? आत्म-हत्या की बात क्यों सोचते हैं?
देश में प्रति वर्ष विभिन्न परिक्षाओं में असंख्य विद्यार्थी बैठते हैं और असफल होते हैं। न जाने कितने आधी परिक्षाओं में से उठ आते हैं, कितने ही अनुचित साधन इस्तेमाल करते हुए बीच से ही निकाल दिगे जाते हैं। पर सोच कर देखिये, क्या ये सब लोग आत्म-हत्या की बात ही सोचते हैं?
नहीं, ऐसा नहीं होता। ये दुबारा दुगुनी तैयारी से परिक्षा में बैठते है और दूसरी बात तो अवश्य ही पास होते हैं। विद्यार्थी जीवन में आवेश होता है। विवेक पर निराअशा का पर्दा छा जाता है। इसलिए कुछ आदूरदर्शी विद्यार्थी ही आत्महत्या कर बैठते हैं।
आपको यह डरपोक नीति नहीं अपनानि चाहिए। आप कायर नहीं है। इस बार, केवल एक बार अच्छी तरह फिर तैयारी किजिये। निश्चय जानिये इस बार आप अवश्य सफल हो जायेंगे, डिविजन में उत्तिर्ण होंगे। अनेक विद्यार्थी एक बार फेल होकर आगे बहुत चनके हैं।
* * * आप दुःख भरे स्वर में प्रायः कहा करते हैं - "मुझे मनोवाञ्छित सुन्दर पत्नी नहि मिली। मेरा विवाह तो मेरी प्रेमिका, जो अत्यन्त सुन्दरी है, से ही होना चाहिए था! उफ! मेरी प्रेमिका का विवाह किसी दूसरे व्यक्ति के साथ क्यों होगया? मैं बिन्न सुन्दरी पत्नी के जीवित नहीं रह सकूँगा मैं आत्म-हत्या कर लूँगा।" कैसी मूर्खता की बातें हैं आपकी। तनिक गहराई से सोच कर देखिये। क्या सुन्दरता ही दाम्पत्य जीवन की सफलता का आधार है? फिर तनिक सोच कर देखिये कि किसी स्त्री के साथ दो-बार साल व्यतीत किए बिना आप कैसे कह सकते हैं कि यही स्त्री आपके अनुकूल बैठेगी? हमने असंख्य प्रेम विवाहों को बुरी तरह तरह असफल होते देखा है। माँ-बाप का चुनाव आपके चुनाव से बेहतर रहत है। विवाह तो एक जुअ है, जिसमें सर्वत्र अनिश्चितता है। पति को पता नहीं पत्नी कैसी निकलेगी। इसी प्रकार पत्नी नहीं जानती कि पति के क्या गुण-अवगुण हैं? कितनी ही बार सुन्दर पत्नियाँ दुश्चरित्र, कट्टु, क्रूर, स्वार्थी और कामचोर निकल जाती हैं, पर दिखने में काली और कूरूप पत्नियाँ मृदु और सुशील निकलती हैं। अतः आपकी नीराशा बेकार है। सुन्दर और असुन्दर का भेद तो क्षणिक है। कुछ काल साथ रहने से सुन्दर भी साधारण ही लगने लगती है। विवाह से पूर्व प्रेम करना, जिस किसी आकर्षक युवती को देखा उसी पर, दिल फेंकना, उथले और क्षुद्र मनचले दुर्जनों की गन्दि आदत है। जिसे वे लोग प्रेम कहते हैं, वह केवल वासना और पशुता का ताण्डव मात्र है। यह वासना-रोग ऐसा घृणित रोग है कि आपको शिष्ट समाज में बुरी तरह तरह लज्जित करायेगा। इस तथाकथिक दुष्ट प्रेम-व्याधि से सावधान! मान लीजिये, आपको इस वर्ष व्यापार में बडी़ हानि हुई है। बाजार के भाव यकायक बहुत नीचे आ गये हैं। वर्षों की संचित पूँजी यकायक आपके हाथ से निकल गई है। बाजार में आपकी साख जाती रही है। कोई आप पर अब चार पैसे का भी विश्वास नहीं करता। उधर परिवार वाले उसी प्रकार अपने खर्चे बढ़ाये हुए हैं और आपकी आमदनी बिलकुल ठप्प है। आप सोचते हैं, इससे तो यही अच्छा है कि आप जीवन का अन्त कर दें।
बिलकुल थोथी दलीलें हैं आपकी।
मैं पूछता हूँ जब बच्चा संसार में जन्म लेता है, तो उस बेचारे के पास कौन सी पूँजी रहती है? वह अपनी मुट्ठियों में क्या दबा कर लाता है? कुछ भी नहीं। वह तो धीरे -धीरे शिक्षित होकर स्वयं ही इस संसार में पूँजी एकत्र करता है और फिर यहीं सब कुछ छोड़ जाता है। फिर आप व्यर्थ ही निराश क्यों होते हैं?
चिन्ताएँ व्यर्थ हैं
गुजराती के कविवर श्री महादेव देसाई की एक मार्मिक कविता है, जो चिन्तित रहने वालों की वैराग्य भावना दूर करने के लिए अमोघ शक्ति रखती है। इसकी विचारधारा इस प्रकार है -
“माना कि तुम्हारे अपने प्रियजन तुम्हें छोड़ कर चले जायेंगे, पर इसके लिए चिन्ता करने से तो काम नहीं चलेगा।”
“भले ही तुम्हारी आशा लता टूट पड़े, उससे फल तुम्हें भले ही न प्राप्त हों, लेकिन इसके लिए चिन्ता करने से तो काम नहीं चलेगा।”
“यह ठीक है कि तुम्हारी करुण वाणी सुनकर वन के प्राणी तुम्हारे पास सहानुभूति जताने आयेंगे और तब भी तुम्हारे अपने घर के पत्थर नहीं पिघलेंगे। घर का कोई व्यक्ति तुमसे कोई सहानुभूति नहीं दिखायेगा। लेकिन इसके लिए चिन्ता करने से तो काम नहीं चलेगा।”
इन शब्दों में नई प्रेरणा के लिए पर्याप्त सामग्री है। कवि का भाव यह है कि जब आपत्ति सर पर आकर पड़ ही गई है तो घबराने से क्या बनेगा? मनुष्य की चिन्ता का सीधा सम्बन्ध उसके अंतर्जगत् से है। एक सी ही परिस्थितियों में एक व्यक्ति घबरा कर गड़बड़ा जाता है जबकि दूसरा व्यक्ति उस विषम परिस्थिति को सम्हाल लेता है। कारण, दूसरा व्यक्ति जानता है कि चिन्ता की बजाय उद्योग करने से लाभ होगा। चिन्ता का कारण जानकर उसे दूर करना ज्यादा अच्छा मार्ग है।
चिन्ता मन की दुर्बल स्थिति की द्योतक है
मनोवैज्ञानिकों का मत है कि चिन्ता मनुष्य के मन की कमजोरी की सूचक है। कमजोर मन वाले अनेक अकारण भयों में लिप्त रहते हैं। कुछ न कुछ अनिष्ट ही सोचा करते हैं और अपनी छोटी- छोटी कठिनाइयों को भी बढ़ा-चढ़ा कर डरा करते हैं। ये अकारण भय मन के मन में ही सागर की तरंगों की भाँति उठते और गिरते रहते हैं। बहुत सी ऐसी कुकल्पनाएँ हमारी चिन्ताओं का कारण बन जाती हैं। मान लीजिए आप मन की ढीली-ढाली अवस्था में हैं। इच्छा शक्ति मजबूत नहीं है। इस अवस्था में यदि कोई अनिष्ट का विचार मन में बैठ जाये तो वह अपनी अँधेरी छाया सर्वत्र फैला देता है और मनुष्य मुरझा जाता है। अतः मन को ढीली अवस्था में न छोड़कर भविष्य के लिए आशावादी विचार रखना चाहिए।
कोई रचनात्मक कार्य कीजिए
जिन बातों से चिन्ता उत्पन्न हो रही है, उन्हें छोड़कर बिलकुल नया रचनात्मक कार्य प्रारम्भ कीजिए। नये कार्य करने से मन और शरीर के नये अवयव काम में आते हैं। उधर ही मन बँट जाता है। पुरानी जिस समस्या पर मस्तिष्क कार्य कर रहा था, उधर से शक्ति बचकर नई ओर लगने लगती है। सृजनात्मक कार्यों में मन लगाने से चिन्ता दूर हो जाती है। ऐसे कार्य स्वयं ही अपनी रुचि के अनुसार चुनने चाहिए। खेलना, टहलना, गो सेवा, बागवानी, घर की सफाई, वस्त्रों की धुलाई, रेडियो सुनना, स्वयं भजन इत्यादि गायन, मित्रों से वार्तालाप, नई पुस्तकों का अध्ययन, छोटे जानवर पालना, बढ़ईगिरी आदि और बहुत से उपयोगी रचनात्मक कार्य करके चिन्ता दूर की जा सकती है।
(‘कोई एक’)
इस झोंपड़ी के चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ है। प्रकृति स्तब्ध। सुनसान का सूनापन अखर रहा था दिन बीता, रात आईं अनभ्यस्त वातावरण के कारण नींद नहीं आ रही थी। हिंस्र पशु, चोर, साँप, भूत आदि तो नहीं पर अकेलापन डरा रहा था। शरीर के लिए करवटें बदलने के अतिरिक्त कुछ काम न था। मस्तिष्क खाली था, चिन्तन की पुरानी आदत सक्रिय हो उठीं सोचने लगा - अकेलेपन का डर क्यों लगता है?
भीतर से समाधान उपजा - मनुष्य समष्टि का अंग है। उसका पोषण समष्टि द्वारा ही हुआ है। जल तत्व से ओत-प्रोत मछली का शरीर जैसे जल में ही जीवित रहता है वैसे ही समष्टि का एक अंग, समाज का एक घटक, व्यापक चेतना का एक स्फुल्लिंग होने के कारण उसे समूह में ही आनन्द आता है। अकेलेपन में उस व्यापक समूह चेतना से असंबद्ध हो जाने के कारण आन्तरिक पोषण बन्द हो जाता है, इस अभाव की बेचैनी ही सूनेपन का डर हो सकता है।
कल्पना ने और आगे दौड़ लगाई। स्थापित मान्यता की पुष्टि में उसने जीवन के अनेक संस्मरण ढूँढ़ निकाले। सूनेपन के अकेले विचरण करने के अनेक प्रसंग याद आये, उनमें आनन्द नहीं था, समय ही काटा गया था। स्वाधीनता संग्राम में जल यात्रा के उन दिनों की याद आई जब काल कोठरी में बन्द रहना पड़ा था। वैसे उस कोठरी में कोई कष्ट न था पर सूनेपन का मानसिक दबाव बहुत पड़ा था। एक महीने बाद जब कोठरी से छुटकारा मिला तो शरीर पके आम की तरह पीला पड़ गया था। खड़े होने में आँखों तले अँधेरा आता था।
चूँकि सूनापन बुरा लग रहा था, इसलिए मस्तिष्क के सारे कलपुर्जे उसकी बुराई साबित करने में जी जीन से लगे हुये थे। मस्तिष्क एक जानदार नौकर के समान ही तो ठहरा। अन्तस् की भावना और मान्यता जैसी होती है उसी के अनुरूप वह विचारों का, तर्कों, प्रमाणों, कारणों और उदाहरणों का पहाड़ जमा कर देता है। बात सही है या गलत यह निर्णय करना विवेक बुद्धि का काम है। मस्तिष्क की जिम्मेदारी तो इतनी भर है कि अभिरुचि जिधर भी चले उसके समर्थन के लिए, औचित्य सिद्ध करने के लिए आवश्यक विचार सामग्री उपस्थित कर दें अपना मन भी इस समय वही कर रहा था।
मस्तिष्क ने अब दार्शनिक ढंग से सोचना आरम्भ कर किया - स्वार्थी लोग अपने आपको अकेला मानते हैं, अकेले के लाभ हानि की ही बात सोचते हैं, उन्हें अपना कोई नहीं दीखता, इसलिए वे सामूहिकता के आनन्द को वंचित रहते हैं। उनका अन्तस् सूने मरघट की तरह साँय - साँय करता रहता है। ऐसे अनेकों परिचित व्यक्तियों के जीवन चित्र सामने आ खड़े हुये जिन्हें धन वैभव की, श्री समृद्धि की कमी नहीं, पर स्वार्थ सीमित होने के कारण सभी उन्हें पराये लगते हैं, सभी की उन्हें शिकायत और कष्ट है।
विचार प्रवाह अपनी दिशा में तीव्र गति से दौड़ा चला जा रहा था। लगता था वह सूनेपन को अनुपयुक्त ही नहीं हानिकर और कष्टदायक भी सिद्ध करके छोड़ेगा। तब अभिरुचि अपना प्रस्ताव उपस्थित करेगी - इस मूर्खता में पड़े रहने से क्या लाभ? अकेले में रहने की अपेक्षा जन-समूह में रह कर ही जो काम्य है, वह सब क्यों न प्राप्त किया जाय?
विवेक ने मन की गलत दौड़ को पहिचाना और कहा - यदि सूनापन ऐसा ही अनुपयुक्त होता तो ऋषि और मुनि, साधक और सिद्ध, विचारक और वैज्ञानिक क्यों उसे खोजते? क्यों उस वातावरण में रहते? यदि एकान्त में कोई महत्व न होता, तो समाधि-सुख और आत्म-दर्शन के लिये उसकी तलाश क्यों होती? स्वाध्याय और चिन्तन के लिए, तप और ध्यान के लिये क्यों सूनापन ढूँढा़ जाता? दूरदर्शी महापुरूषों का मूल्यवान समय क्यों उस असुखकर श्रकेज्ञेपन में व्यतीत होता?
लगाम खिंचने पर जैसे घोडा़ रूक जाता है उसी प्रकार वह सूनेपन को कष्टकर सिद्ध करने वाला चिचार प्रवाह भी रूक गया। निष्ठा ने कहाएकान्त साधना की आत्म-प्रेरणा असन नहीं हो सकती। निष्ठा ने कहा- जो शक्ति इस मार्ग पर खींच लाई है वह गलत मार्ग-दर्शन नहीं कर सकती। भावना ने कहा जीव अकेला आता है, अकेला जाता है, अकेला ही अपनी शरीर रूपी कोठरी में बैठा रहता है, क्या इस निर्धारित एकान्त विधान में उसे कुछ असुखकर प्रतीत होता है? सूर्य अकेला चलता है, चन्द्रमा अकेला उदय होता है, वायु अकेला बहता है। इसमें उन्हें कुछ कष्ट है?
विचार से विचार कटते हैं, इस मनः शास्त्र के सिद्धान्त ने अपना पूरा काम लिया। आधी घडी़ पूर्व जो विचार अपनी पूर्णता अनुभव कर रहे थे। अब वे कटे वृक्ष की तरह गिर पडे़। प्रतिरोधी विचारों ने उन्हिं परास्त कर दिया। आत्मवेत्ता इसी लिए अशुभ विचारों को शुभ विचारों से काटने का महत्व बताते हैं। बुरे से बुरे विचार चाहे वे कितने प्रबल क्यों न हों, उत्तम प्रतिपक्षी विचारों से काटे जा सकते हैं। अशुद्ध मान्यताओं को शुद्ध मान्यताओं के अनुरूप कैसे बनाया जा सकता है, यह उस सूनी रात में करवतें बदलते हुये मैने प्रत्यक्ष देखा। अब मस्तिष्क एकांत की उपयोगिता, आवश्यकता और महत्त पर विचार करने लगा।
* * * *
रात धीरे-धीरे बितने लगी। अनिद्रा से ऊठकर कुटिया से बाहर निकला तो देखा कि गङ्गा की धारा अपने प्रियतम की भाँति तीव्र गति से दौडी़ चली जा रही थी। रास्ते में पडे़ हुए पत्थर उसका मार्ग अवरूद्ध करने का भव्य करते पर वह उनके रोके रूक नहीं पा रही थी। अनेकों पाषाण खण्डों की चोट मे उसके अङ्गप्रत्यङ्ग चायल हो रहे थे तो भी वह न किसी की शिकायत करती थी और न निराश होती थी। इनबचाओं का उसे ध्यान भी नथा, अँधेरे का सुनसन का उसे भय न था। अपने हृदयेश्वर के मिलनकी व्याकुलता उसे इन सब बातों का ध्यान भी न आने देती थी। प्रिय के ध्यान मंन निमग्न 'हर-हर फल-फल' का तिलांजलि दे कर चलने से ही लौ लगाए हुए थी।
चन्द्रमा सिर के ऊपर आ पहुँचा था। गङ्गा की लहरों में उसके अनेकों प्रतिबिम्ब चमक रहे थे। मानों एक ही ब्रह्म अनेक शरीरों में प्रविष्ट होकर एक से अनेक होने की अपनी माया दृष्य रूप से समझ रहा हो। दृश्य बडा़ सुहावना था। कुटिया से निकल कर गङ्गातट के एक बडे़ शिलाखण्ड पर जा बैठा और निर्निमेष होकर उस सुन्दर दृश्य को देखने लगा।थोडी़ देर में झपकी लगी और उस शीतल शिला खण्ड पर ही नींद आ गई।
लगा कि वह जल धारा कमल पुष्प सी सुन्दर एक देव कन्या के रूप मे परिणित होती है। वह अलौकिक शांति, समुद्र सी सौम्य मुद्रा में ऐसी लगती थी मानो इस पृथ्वी की सारी पवित्रता एकत्रित होकर मानुषी शरीर में अवतरित हो रही हो। वह रूकी नहीं, समीप ही उस शिलाखण्ड पर आ कर विराजमान हो गई। लगा-मानो जागृत अवस्था में ही यह सब देखा जा रहा हो।
उस देव कन्या ने धीरे-धीरे अत्यन्त शांत भाव से मधुरवाणी में कुछ कहना आरम्भ किया। मैं मन्त्र मोहित की तरह एकचित्त होकर सुनने लगा। वह बोली-नर तनु धारी आत्मा, तू अपने को इस निर्जन वन में अकेला मत मान। दृष्टि पसार कर देख चारों ओर तू ही तू बिखरा पडा़ है। मनुष्य तक अपने को सीमित मत मान। इस विशाल सृष्टि में मनुष्य भी एक छोटा-सा प्राणी है। उसका भी एक स्थान है, पर सब कुछ वही नहीं है। जहाँ मनुष्य नहीं वहाँ सूना है ऐसा क्यों माना जाय? अन्य जड़ चेतन माने जाने वाले जीव भी विश्वात्मा के वैसे ही प्रिय पुत्र हैं जैसा मनुष्य। तू उन्हें क्या अपना सहोदर नहीं मानता? उनमें क्यों अपनी आत्मा नहीं देखता? उन्हें क्यों अपना सहचर नहीं समझता? इस निर्जन में मनुष्य नहीं है, पर अन्य अगणित जीवधारी मौजूद हैं। पशु- पक्षियों की, कीट-पतंगों की, वृक्ष वनस्पतियों की अनेक योनियाँ इस गिरि कानन में निवास करती हैं। सभी में आत्मा है सभी में भावना है। यदि तू इन अचेतन समझे जाने वाले चेतनों की आत्मा से अपनी आत्मा को मिला सके तो ऐ पथिक! तू अपनी खंड-आत्मा को समग्र-आत्मा के रूप में देख सकेगा”
धरती पर अवतरित हुई वह दिव्य सौंदर्य की अद्भुत प्रतिमा देव कन्या बिना रुके कहती ही जा रही थी - “मनुष्य को भगवान ने बुद्धि दी, पर वह अभागा उसका सुख कहाँ ले सका? तृष्णा और वासना में उसने इस दैवी वरदान का दुरुपयोग किया और जो आनन्द मिल सकता था। उससे वंचित हो गया। वह प्रशंसा के योग्य प्राणी, करुणा का पात्र है। पर सृष्टि के अन्य जीव इस प्रकार की मूर्खता नहीं करते। उनमें चेतन की मात्रा न्यून भले ही हो पर भावना की न्यूनता नहीं है। तू अपनी भावना को उनकी भावना के साथ मिला कर तो देख। अकेलापन यहाँ कहाँ है, सभी ही तेरे सहचर हैं। सभी तो तेरे बन्धु बान्धव हैं।”
करवट बदलते ही नींद की झपकी खुल गई। हड़बड़ा कर उठ बैठा। चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो वह अमृत-पी सुन्दर सन्देश सुनाने वाली देव कन्या वहाँ न थी। लगा मानों वह इसी सरिता में समा गई हो। मानुषी रूप छोड़कर जलधारा में परिणत हो गई हो। वे मनुष्य की भाषा में कहे गये शब्द सुनाई नहीं पड़ते थे, पर हर - हर कल-कल की ध्वनि में भाव वे ही गूँज रहे थे, संदेश वहीं मौजूद था। ये चमड़े वाले कान उसे सुन तो नहीं पा रहे थे पर कानों की आत्मा उसे अब भी समझ रही थी, ग्रहण कर रही थी।
यह जागृत था या स्वप्न? सत्य था या भ्रम? मेरे अपने विचार थे या दिव्य संदेश? कुछ समझ नहीं पा रहा था। आँखें मलीं सिर पर हाथ फिराया। जो सुना, देखा था, उसे ढूँढ़ने का पुनः प्रयत्न किया पर कुछ मिल नहीं पा रहा था, कुछ समाधान हो नहीं पा रहा था।
इतने में देखा कि उछलती हुई लहरों पर थिरकते हुये अनेक चन्द्र प्रतिबिम्ब एक रूप होकर चारों ओर से इकट्ठे हो रहे हैं और मुस्कराते हुए कुछ कह रहे हैं। इनकी बात सुनने की चेष्टा की तो नन्हे बालकों जैसे वे प्रतिबिम्ब कहने लगे - हम इतने चन्द्र तुम्हारे साथ खेलने के लिए, हँसने-मुस्कराने के लिए मौजूद हैं। क्या तुम हमें अपना सहचर न मानोगे? क्या हम अच्छे साथी नहीं हैं? मनुष्य! तुम अपनी स्वार्थी दुनियाँ में से आये हो, जहाँ जिससे जिसकी ममता होती है, जिससे जिसका स्वार्थ सधता है वही उसको प्रिय लगता है। जिससे स्वार्थ सधा वह प्रिय, वह अपना। जिससे स्वार्थ न सधा वह पराया, वह बिराना। यही तुम्हारी दुनियाँ का दस्तूर है न! उसे छोड़ो हमारी दुनियाँ का दस्तूर सीखो। यहाँ संकीर्णता नहीं, यहाँ ममता नहीं, यहाँ स्वार्थ नहीं, यहाँ सभी अपने हैं। सब में अपनी ही आत्मा है ऐसा सोचा जाता है। तुम भी इसी प्रकार सोचो। फिर हम इतने चन्द्र बिम्बों के सहचर रहते तुम्हें सूनापन प्रतीत ही न होगा।
तुम तो यहाँ कुछ साधन करने आये हो न! साधना करने वाली इस गंगा को देखते नहीं, प्रियतम के प्रेम में तल्लीन होकर उससे मिलने के लिए कितनी तल्लीनता और आतुरता से चली जा रही है। रास्ते के विघ्न उसे कहाँ रोक पाते हैं? अन्धकार और अकेलेपन को वह कहाँ देखती हैं? लक्ष की यात्रा से एक क्षण के लिए भी उसका मन कहाँ विरत होता है? यह साधना का पथ अपनाना है तो तुम्हें भी यही आदर्श अपनाना होगा जब विषयम को पाने के लिए तुम्हारी आत्मा भी गंगा की धारा की तरह द्रघगामी होगी तो कहाँ भीड़ में आकर्षण लगेगा और कहाँ सूनेपन में भय लगेगा? गङ्गा तट पर निवास करना है तो गङ्गा की प्रेम साधना भी सीखो साधक!
शीतल लहरों के साथ अनेक चन्द्र बालक नाच रहे थे। मानों अपनी मथुरा में कभी हुआरास, नृत्य प्रत्यक्ष हो रहा हो। लहरे गोपियाँ घनीं, चन्द्र ने कृष्ण का रूप धारण किया, हर गोपी के साथ एक कृष्ण! कैसा अदभुत रास-नृत्य यह आँखें देख रही थी। मन आनन्द से विभोर हो रहा था। ऋतम्भरा कह रही थी। देख, देख अपने प्रियतम की मांफी देख। हर काया में एक आत्मा उसी तरहनाच रही है जैसे गङ्गा की शुभ लहरों के साथ एकडी़ चन्द्रमा के अनेक बिम्ब नृत्य कर रहे हैं।
सारी रात बीत गई। ऊषा की अरूणिमा प्राचि से प्रकट होने लगी। जो देखा वह अदभुत था। सूनेपन का भय चला गया। कुटी की ओर पैर धीरे-धीरे लौट रहे थे। सूनेपन का प्रश्न अब भी मस्तिष्क में मौजूद था।
(श्री भारतीय योगी)
पतंजलि योग दर्शन में बतलाया गया है कि योग कि दिव्य विभूतियों को प्राप्त करने के कई मार्ग हैं। जिस प्रकार षट्चक्रों का बेध करने से, पंचकोशों की साधना करके चेतना के उच्च स्तर पर आरुढ होने से ज्ञानयोग का अभ्यास करके अपने को परमात्मा-स्वरूप अनुभव कर लेने से मनुष्य योग की चमत्कारी सिद्धियों का स्वामी बन सकता है, उसी प्रकार शक्तिशाली जड़ी-बूटियों और औषधियों का प्रयोग करके भी इस कार्य में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
भारत के “प्राचीन रस वैद्यों ने पारद के सम्बन्ध में बड़ी खोजबीन की थी। जिस प्रकार आजकल के वैज्ञानिकों ने ‘यूरेनियम’ धातु के प्रयोग से उस ‘अणु शक्ति’ को प्राप्त कर लिया है, जिससे आप चाहे तो संसार की प्रलय कर दें और चाहे इस पृथ्वी को सुवर्ण मंडित बनाकर मनुष्यों को देवताओं के समान अजर-अमर बना दें, उसी प्रकार प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों ने भी पारद के ऊपर प्रयोग करके ऐसी विधियाँ निकाली थीं, जिससे ताँबे का सोना बनाना तो संभव था ही साथ ही मनुष्य अपने भौतिक शरीर को पूर्णतः नहीं तो अधिकाँश में अमर भी बना सकता था। “सत्य हरिश्चन्द्र” नाटक में तंत्र-विद्या के साधक कापालिक ने महाराज हरिश्चन्द्र को “पारद गुटिका” का प्रयोग करने की सम्मति देते हुये कहा था -
याही के पराभव सी, अमर देव सम होय।
योगीराज विहरें सदा, मेरु शिखर भय खोय।।
सिद्ध नागार्जुन भारत वर्ष का इसी श्रेणी का एक महान वैज्ञानिक था। वैसे वह सन् 1055 में सौराष्ट्रार्न्तगत “ढाक” नामक समृद्धिशाली नगर का अधिपति था, पर उसकी रुचि राज्य-शासन की अपेक्षा ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन और खोज की तरफ विशेष रूप से की थी। उसने संसार की कायापलट कर देने के लिए “अमृत” ओर “पारस” की खोज करने का निश्चय किया और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक बड़ी प्रयोगशाला बनाकर जड़ी-बूटियों द्वारा पारद-सम्बन्धी परीक्षण आरम्भ किये। साथ ही देश के विख्यात “रस वैज्ञानिकों” और साधकों को बुलाकर उनका सहयोग भी इस कार्य में प्राप्त किया। अपनी आँतरिक लगन और कठोर साधना के कारण उसे शीघ्र ही आश्चर्यजनक सफलता मिली और किसी घटिया धातु को सोने के रूप में बदल देना उसके लिए साधारण सी बात हो गई। मानवीय देह को अमर बनाने के प्रयत्न में भी वह बहुत कुछ सफल हुआ। उसकी इन महान् वैज्ञानिक खोजों का प्रमाण उसके बनाये “रसोद्वार तन्त्र” नामक ग्रन्थ में मिलता है, जिसे आज भी आयुर्वेद जगत् में अद्वितीय माना जाता है। पर परिस्थितियों वश नागार्जुन को अपने कार्य को पूर्ण करने का अवसर नहीं मिल सका और दस वर्ष तक ढाँक का राज्याधिकारी रहने के बाद ही उसका अंत हो गया।
ऊपर कहा जा चुका है कि नागार्जुन ने अपनी समस्त शक्ति और समय ‘अमृत’ की खोज में लगा दिया था। इस कारण वह राज्य-कार्य की उपेक्षा करने लगा और देश में अव्यवस्था उत्पन्न होने लगी। यह देखकर राज्य के हितैषी मन्त्रियों ने सामूहिक रूप से उसके पास जाकर प्रार्थना की कि उसकी विज्ञान रुचि के कारण राज्य की क्षति हो रही है, प्रादेशिक सामन्त स्वेच्छाचारी बनकर कर देना बन्द कर रहे हैं, उपद्रवी तत्त्व बढ़ने लगे हैं और विदेशियों के आक्रमण का पूरा भय उत्पन्न हो गया है।
मन्त्रियों की बात सुनकर नागार्जुन ने कहा - “मित्रो! तुम्हारा यह कहना ठीक है कि मैं अमृत की खोज में लगा हुआ हूँ और इससे राज्य कार्य की उपेक्षा हो रही है पर जिन दो विपत्तियों का भय तुमने प्रदशित किया, उनकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। अगर सामन्तों से कर मिलना बन्द हो जाय तब भी मेरा खजाना सुवर्ण से भरा रह सकता है और यदि कोई विदेशी मेरे राज्य पर आक्रमण करने का साहस करेगा, तो मैं सेना के बजाय थोडी़-सी औषधि से ही उसको नष्ट करने की सामर्थ रखना हूँ। याद रखो कि अमृत की खोज 'मृत्यु' की खोज स्वयं होती चली जाती है। वैसे मेरा उद्देश्य किसी का वनाश करना नहीं है, वरन मैं तो मनुष्य मात्र को अर्थाभाव और मृत्यु के भय के भय से से मुक्त करने के लिए ही इस साधनों में प्रवृत्त हुआ हूँ।
पर जब मन्त्रियों ने विशेष आग्रह किया और आंतरिक उपद्रवों का भय बतलाया तो नागार्जुन ने कहा- "राष्ट्र के हितेच्छु मन्त्रियो! अगर राज्य को सँभालने का आपका ऐसा ही आग्रह है तो युवराज को बुलाओ और मैं आज ही अपना राज मुकुट उसके शिक्षा देकर राज्य-संचालन की उचित व्यवस्था करे। मैं तो जब तक अमृत की खोज में पूर्ण सफलता प्राप्त न करलूँ तब तक अन्य किसी बात पर ध्यान नहीं दे सकता।"
मन्त्रीगण महाराज नागार्जुन की धून और दृढ़ निश्चय को जानते थे। उन्होंने उसी दिन एक बडी़ सभा करके उक्त निर्णय उसमें प्रकट किया और युवराज को गद्दी पर बैठाकर सर्वत्र पूर्ण रूप से करादी। नागार्जुन भी निश्चिन्त होकर पूर्ण रूप से अपने परिक्षणों में दत्तचित्त हुआ।
नागार्जुन ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए दूर-दूर देशों और पर्वतों से तरह-तरह को नई जडी़-बुटियाँ इकट्ठी करनी आरम्भ की और अपनी प्रयोगशाला में उनके द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रयोग करने लगा। सुवर्ण बनाने के लिये तो औषधियों का प्रयोग तांवा आदि धातुओं पर किया जाता था, पर अब अमृत की खोज करने के लिये तो उनका प्रयाग मानव देह पर ही किया जाना आवश्यक था। पर अज्ञात जडी़-बूटियों का सेवन करके उनके प्रभाव की जाँच करना खतरे से खाली न था और कोई व्यक्ति इसके लिए अपने प्राण संकट में डालने के लिए प्रस्तुत नहीं हो सकता था। इस लिए नागार्जुन उनका प्रयोग अपनी ही देह पर करने लगा। इस कारण अनेक बार उसे कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था, पर जिस प्रकार कोई तपस्वी अभिष्ट कार्य की सिद्धि के लिये तप आरम्भ करने पर प्राणों के मोह को सर्वथा त्याग देता है और अपनी समस्त शक्तियों तथा भावनाओं को एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित कर देता है, उसी प्रकार नागार्जुन अमृत की खोज के कार्य में एक सच्चे साधक के समान संलग्न हो गया। उसे न सुख-दुःख की चिंता थी; न खाने-पीने की फिकर थी और न परिश्रम, बाधाओं और विघ्नों से भयभीत था। अब वह एक राजा के बचाय एक कठोर व्रतधारी योगी या त्यागी का जीवन व्यतीत कर रहा था।
धीरे-धीरे नागार्जुन को अपने कार्य में सफलता प्राप्त होने लगी। अमृत की प्राप्ति के पहले ही उसने अपने शरीर को साधना द्वारा इस योग्य बना लिया कि वह सब प्रकार के परिक्षणों के भले-बुरे प्रभाव को निःशंक होकर सहन कर सके। उसने अपनी दैहिक स्थिति को इतना सुदृढ़ बना लिया कि न तो उस पर किसी प्रकार शस्त्र आदि का प्रभाव पड़ सकता था और न किसी प्रकार के विष आदि से उसको हानि पहुँचाई जा सकती थी। उसकी सहनशक्ति चरम सीमा तक पहुँच गई थी और वह निरन्तर अपने मक्ष्य की तरफ अग्रसर होता जाता था।
एक दिन युवराज महाराज नागार्जुन की प्रयोगशाला में उनके दर्शनार्थ आया। महाराज ने पुत्र को आशीर्वाद देकर अपनी प्रयोगशाला के विभिन्न को दिखलाया और कहा- "बेटा, अब मैं थोडे़ दिन में ही संसार से मृत्यु के भय को हटाने में समर्थ हो जाऊँगा। भगवान धन्वन्तरि की कृपा से अमर बनाने वाली समस्त औषधियाँ मिल गैइ हैं और अब केवल उचित मात्रा में विधिपूर्वक उनका योग करना ही शेष रह गया है। जो कार्य प्राचीन समय में अश्विनीकुमार, लंकेश्वर रावण और आयुर्वेद के जनक चरकाचार्य से पूर्ण नहीं हो सका था, उसकी विधि मेरी समझ में आ गैइ है। भगवान ने चाहा तो संसार में शीघ्र ही ऐसे युग का भाविर्भाव होगा जब कि दरिद्रता अय्र मृत्यु के भय से लोग मुक्त हो जायेंगे और पृथ्वी पर स्वर्ग का दृश्य दिखलाई पडज्ञे लगेगा।"
अपने पिता की महान सफलता को देख कर युवराज बडा़ प्रभावित हुआ, साथ ही उसे यह भय भी हुआ कि कहीं इस कार्य की समाप्ति हो जाने पर नागार्जुन फिर राज्य-सत्ता को लेने का विचार न करे। पर उस समय वह बिना कुछ कहे-सुने अपने महलों को लौट गया।
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कहते हैं कि इसके बाद राजकुमार ने जब अपने इस भय की चर्चा अपने घनिष्ट इष्ट-मित्रों से की तो उनमें कुछ ने, जो गुप्त रूप से नागार्जुन के विरोधी थे, उसे इस 'भय' से छूटकारा पाने की सलाह दी। उन्होंने राजकुमार को इस सम्बन्ध में बहुत भड़काया और वहकाया। अन्त में सबने पड़यन्त्र रचकर ऐसी योजना बनाई जिससे छलपूर्वक नागार्जुन अपनी प्रयोगशाला सहित विनष्ट हो गया।
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इस प्रकार यद्यपि नागार्जुन का 'अमृत' बनाने का स्वप्न साकार न हो सका, पर उसके प्रयत्नों ने पारद-विज्ञान और रसशास्त्र की इतनी अधिक उन्नति करदी कि उसके द्वारा भारतीय चिकित्सा-शास्त्र की बडी़ प्रगति हुई। विभिन्न धातुओं की भस्मों द्वारा कठिन से कठिन रोग पूर्बापेक्षा अधिक शीघ्रता से दूर किवे जाने लगे। जो लोग पारद की भस्म बनाने में सफल हुये, वे उसके प्रयोग से अमर नही तो दीर्घ-जीवन की प्राप्ति में समर्थ हो सके। उसने जो साधारण धातुओं को सुवर्ण में परिवर्तित करने की विधि निकाली उसके भी कुछ चिह वर्तमान समय के कीमियागरों में पाये जाते है। आजकल भी कुछ विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा रासायनिक सुवर्ण बनाने के समाचार सुनने और पढ़ने में आठे रहते हैं, चाहे उनका बनाया सुवर्ण कुछ हलकी जाठि का ही क्यों न हो।
इस प्रकार नागार्जुन अपने आविष्कारों द्वारा लोक-कल्याण का एक ऐसा मार्ग खोल गया जिस पर चल कर ज्ञान-विज्ञान के अभ्यासी उल्लेखनीय सफलतायें प्राप्त कर सकते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि 'पारस' और 'अमृत' अति प्राचिन काल से अत्यन्त आकर्षक विषय रहे हैं भारतवर्ष ही नहीं अन्य देशों में भी अनगिनती लोग कीमियामरी के पीछे पागल होकर घूमते रहे हैं। योरोप के कितने ही देशों में तो प्राचीन काल में कीमियागरों की प्राणदण्ड देने का नियम बना दिया गया था, क्योंकि ऐसे काम को वहाँ 'जादू' समझ जाता था और यह ईसाई धर्म के सिद्धान्तों के विरूद्ध था। पर कुछ भी हो इन्ही कीमियगरों के उल्टे सीधे परीक्षणों के फलस्वरूप रसायन-विज्ञान की बहुत बातें मालूम हो गई जिनकी नीव पर ही आधुनिक रसायन-विज्ञान का भवन खडा़ किया गया है। उन प्राचीन कीमियागरों के लिए यह बात भी कम गौरवास्पद नहीं है कि आज उन्ही के उत्तराधिकारी वैज्ञानिकों के प्रयत्न स्वरूप सोना बना सकना कोई असम्भव बात नहीं रह गैइ है। वैज्ञानिक लोग अपनी प्रयोगशालाओं में सीसे के छोटे कणों को सोने में परिवर्तित करने में सफल हो चुके हैं, यह बात दूसरी है कि अभी उसमें बहुत अधिक व्यय करना पड़ता है। पर वह दिन अधिक दूर नहीं है कि यदि विज्ञान की वर्तमान प्रगति कायम रही तो सोना संसार में एक साधारण वस्तु हो जायगा।
(श्री सत्यनारायण रामचन्द्र शास्त्री)
भारतवर्ष की आध्यात्मिक-साधन प्रणाली का मूल-मन्त्र परोपकार है। यद्यपि योगशास्त्र में एकान्त में बैठकर धारणा, ध्यान, समाधि के अभ्यास को साधन का स्वरूप बतलाया है ओर वेदान्त वाले जगत के प्रपंच का मिथ्या समझ कर उससे पूर्णतः निर्लिप्त रहने को सर्वश्रेष्ठ साधन बतलाते हैं, पर जब उनके भीतर घुसकर सार मर्म को खोजा जाता है तो सबका तात्पर्य लोक-सेवा और लोक-कल्याण ही सिद्ध होता है। अविकसित मनोभूमि वाले साधक भले ही बाह्य क्रियाओं अथवा अकेले जप, ध्यान आदि को अपना एक मात्र लक्ष्य समझते रहें पर वास्तविक ज्ञान से भेंट होने पर वे समझ जाते हैं कि इस संसार में अगर कुछ सार है तो परोपकार ही है, और जितना भी भजन-साधन किया जाता है उसका उद्देश्य अपने का परोपकार के योग्य बनाना ही है। इसी बात को लक्ष्य में रखकर गुजरात के भक्त नरसी महता ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है-
“वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाने रे।’’
यद्यपि आज भगवान की भक्ति का रूप बहुत कुछ व्यक्तिगत पूजा, भजन, उपासना बन गया है और अधिकाँश लोग घर में या मन्दिर में भगवान की स्तुति, प्रार्थना, कीर्तन, भजन कर लेने को ही ईश्वर-भक्ति का मार्ग समझने लगे हैं, पर इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि यदि इन कार्यों के फलस्वरूप हमारे हृदय में भूत दया, दुखियों के साथ करुणा और आपत्तिग्रस्तों की सहायता का भाव उदय नहीं होता तो वह सब भजन, पूजा बिलकुल दिखावटी अथवा मूढ़ता है और उससे हमारा आत्मकल्याण कभी नहीं हो सकता। प्राचीन समय में जो प्रसिद्ध भक्त, संत और त्यागी-तपस्वी हुए हैं वे सब लोक-सेवक और लोक-शिक्षक ही थे, यह दूसरी बात है आज सैकड़ों वर्ष का समय बीत जाने से और अपनी त्रुटिपूर्ण मनोभावना के कारण उनके चरित्रों को हमने केवल भजन-पूजा और कुछ अलौकिक चमत्कारों तक ही सीमित कर दिया है।
तुकाराम जी महाराष्ट्र प्राँत के एक प्रमुख संत हुए हैं जिन्होंने विट्ठल प्रभु की भक्ति का उस प्रदेश में बहुत अधिक प्रचार किया था। वहाँ के साधारण लोग आज भी उनके रचे “अभंगों” को गाकर भगवत् भक्ति की प्रेरणा लेते रहते और उनके पद-चिह्नों पर चलकर आत्म-कल्याण का प्रयत्न करते रहते हैं। तुकाराम के चरित्र की एक मुख्य विशेषता यह है कि वे जन्म से ही हीन वर्ण के थे, उनका आविर्भाव कुनवी जाति में हुआ, जिसका मुख्य पेशा खेती किसानी है और जिसकी गणना शूद्रों में की जाती है। वैसे इनके घर में बहुत पीढ़ियों से लेन-देन और व्यवसाय का कार्य होता आया था, तो भी ब्राह्मणों की दृष्टि में वे हीन वंश के और शूद्र ही थे। तुकाराम ने भी स्वयं कभी जातीय उच्चता अथवा पवित्रता का दावा नहीं किया, पर उनके प्रभाव से महाराष्ट्र के निम्न वर्ग में आत्मानुभूति की भावना उत्पन्न हो गई और वे यह अनुभव करने लगे कि हमारा जन्म पतित और दलित अवस्था में रहकर ही जीवन समाप्त कर देने को नहीं हुआ है, वरन् हम भी उस जीवन को अतिवाहित कर सकते हैं जो वास्तव में उच्च, शुद्ध और पवित्र है, चाहे अभिमानी और अहंकारी लोग उसे स्वीकार न करे। इस प्रकार तुकाराम के आत्मत्याग और निस्वार्थ सेवा-भावना से सर्वसाधारण में उस आत्म-चेतना का आविर्भाव हुआ जो जातियों और राष्ट्रों के उत्थान का एक परमावश्यक अंग हैं।
जैसा हमने ऊपर बतलाया है तुकाराम का मुख्य कार्य विट्ठल-भक्ति की वृद्धि करना ही था और उनकी लाभ की चिन्ता छोड़कर परोपकार को ही प्रथम स्थान दिया और इसके फल से जो कुछ कठिनाइयाँ आईं उन सबको सहर्ष सहन किया। इसका वर्णन करते हुए वे एक अभंग में कहते हैं-
“भगवान अच्छा हुआ जो मेरा दिवाला निकल गया। अकाल पड़ा यह भी अच्छा ही हुआ। कष्ट पड़ने से ही तेरा ध्यान आया और संसार घृणित जान पड़ने लगा। स्त्री मर गई यह भी अच्छा हुआ और अब जो दुर्दशा भोग रहा हूँ वह भी ठीक ही है। संसार में अपमानित हुआ, गाय, बैल, द्रव्य सब नष्ट हो गया यह भी अच्छा हुआ। लोक लाज नहीं रही यह भी ठीक हुआ, क्योंकि इन्हीं बातों से अन्त में मैं तुम्हारी शरण में आ सका।”
इस प्रकार तुकाराम ने अपना सब कुछ अन्तःकरण से ईश्वरार्पण कर दिया था और इसका परिणाम यह हुआ कि अपने सेवाकार्य में चाहे कैसी भी हानि या विपत्ति उठानी पड़ी उनकी कभी उसका दुःख या चिन्ता न हुई। पर आजकल हम देखते हैं कि लोग लोककल्याण और सेवा की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं, पर इस मार्ग में जैसे ही उनके स्वार्थ पर आघात लगता है, कष्ट सहन करने पड़ते हैं वैसे ही वे भाग खड़े होते हैं। पर तुकाराम ने प्रत्येक बात को ईश्वरीय इच्छा समझ लिया था और उसमें किसी प्रकार का दोष या बुराई समझना एक ‘पाप’ कार्य था। इसी आधार पर खड़े रहने का यह परिणाम था कि वे कष्टों और विरोधों का प्रसन्नता पूर्वक सामना करते रहे और उनके चित्त में कभी किसी प्रकार की कमजोरी या क्रोध की भावना नहीं आई।
पर सच्चे भक्त को यह सब स्वार्थ त्याग और कष्ट सहन करते हुए भी अपने मन का भाव ऐसा रखना पड़ता है कि मन में अहंकार का उदय न हो जाये। मनुष्य का मन बड़ा मायावी और छलिया है। यह एक नहीं तो दूसरे प्रकार से अपने फन्दे में फँसाने की कोशिश करता है। किसी उपाय से स्वार्थी संसार के फन्दे से छूटे तो यह हृदय में त्याग और तपस्या का अभिमान उत्पन्न कराके ही नीचे गिराने का प्रयत्न करता है। इसलिए तुकाराम बीच-बीच में आत्म निरीक्षण भी करते रहते थे। जिससे अहंकार को अपना जाल फेंकने का मौका न मिले? वे कहते हैं-
“मैं अपने मन में ही चतुर बना बैठा हूँ, पर हृदय में कोई भाव नहीं है, केवल यह अहंकार हो गया है कि मैं भक्त हूँ। अब यही बाकी रह गया है कि नष्ट हो जाऊँ, क्योंकि काम क्रोध भीतर आसन जमाये बैठे ही हैं, मेरे अन्दर प्रेम भाव का पता ही नहीं लगता कि कहाँ है। इससे तो अच्छा यही है कि लोगों में मेरी बदनामी हो, साधु कह कर जो लोग मेरी सेवा करते हैं वे सब निन्दा करते हुये मेरा तिरस्कार करे, क्योंकि ऐसा होने से मैं तुम्हारी सेवा एकाग्र मन से कर सकूँगा।”
आगे चलकर तुकाराम ने व्यंग का सहारा लेकर भगवान को खरी खोटी सुनाते हुए अपने दोषों को वर्णन किया है। वे कहते हैं-
“भगवान, तुम बड़े हो या मैं बड़ा हूँ, जरा इस पर भी विचार करें मैं पतित हूँ यह बात तो बनी बनाई है, पर तुम पतित-पावन हो यह तुमने अभी तक सिद्ध करके नहीं दिखाया। मैं भेदभाव को अपने प्राणों से लिपटाये बैठा हूँ पर तुमसे उसका निराकरण नहीं होता। मेरे दोष इतने बलवान हैं कि उनके सामने तुम्हारी भी कुछ नहीं चलती अब तुम कहो कि तुम बड़े हो या मैं बड़ा?”
इस प्रकार तुकाराम आजीवन मन-वचन कर्म से साधारण जनता में भक्ति प्रचार के रूप में आत्मोत्कर्ष की भावना भरते रहे, उनको यह समझाते रहे कि सच्चा भक्त वही है जो अपने दुःख सुख और हानि लाभ का विचार छोड़कर सदैव भगवान विभूति स्वरूप सब प्राणियों के हित के लिए दत्तचित्त रहे और सब के कल्याण में ही अपना कल्याण और अपनी मुक्ति का अनुभव करे।
*समाप्त*
शारीरिक, परिवारिक और सांसारिक सुखों को प्राप्त करने के लिये सभी मनुष्य प्रयत्नरत रहते हैं। जितना जिसका पुरूषार्थ, ज्ञान एवं प्रारब्द होता है उसके अनुसार उपलब्द भी करते हैं। पर इतने मात्र से ही किसी का आत्मा सन्तुष्ट नहीं रह सकता। अन्तरात्मा में से पुण्य की, परमार्थ की आकांक्षा भी उठती रहती है। उसकी उपेक्षा की जाय, अतृप्त रखा जाय तो जीवन में किसी बडी़ कमी एवं अपूर्णता का अनुभव होता रहता है। भीतर-ही-भीतर अशांति बनी रहती है।
सेवा मानव-जिवन का एक आवश्यक अंग है। आत्म-सन्तोष उसी के आधार पर मिलता है। अपने से पिछडे़ हुओं को अपने समान बनाने का प्रयत्न सेवा कहलाता है। परमार्थ का वास्तविक स्वरूप यही है। हर विवेकशील व्यक्ति अपनी शरीर यात्रा के साथ-साथ सेवा एवं परोपकार के लिए भी प्रयत्नशील रहता है। इसी में दूर-दर्शिता भी है। लोक के साथ-साथ परलोक का भी ध्यान रखा ही जाना चाहिये।
सत्पात्र की सेवा ही सफल मानी जाति है। कुपात्रों को दिया हुआ सहयोग या दान, देने वाले को उलटा नरक में ले जाता है, क्योंकि वह कुपात्र उस उपलब्द हुई सहायता का दुरूपयोग करके अवांछनीय कृत्य ही करता है। इससे उसका तथा अन्य व्यक्तियों का अपकार ही होता है। इसलिये सेवा एवं परोपकार करने वाले को पहले सत्पात्र की तलाश करनी पड़ती है।
आकस्मिक आपत्ति के समय धन, अन्न, वस्त्र आदि से किसी की तात्कालिक सहायता की जा सकती है। उससे उस समय की विपत्ति से उसकी रक्षा हो जाती है। महामारी, भूकम्प, अग्निकाण्ड, दुर्भिक्ष, दुर्घटना, चोरी, आक्रमण आदि कारणों से मनुष्य कई बार अचान्क ही आपत्तियों में फँस जाता है। उस समय उसे दूसरे की सहायता की आवश्यकता होती है। अपने बल-बूते, अपने पावों पर खडे़ हो सकना उस समय उसके लिये कठिन होता है। ठिकर खाकर गिरे हुए को उठ कर खडे़ होने, सम्भलने और चलने की स्थिति में होने तक की सहायता आवश्यक होती है। जब भी ऐसा कोई अवसर सामने आवे, हर उदार हृदय व्यक्ति का सामर्थ्य के अनुसार सहायता करे, सेवा करे।
अपङ्ग, अपाहिज, अनाथ बालक, असमर्थ्य वृद्ध, कई छोटे बच्चों वाली असहाय महिलायें आदि को भी दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है। इस वर्ग के लिए भी अपना श्रम, धन एवं सहयोग देने के लिये तत्पर रहना मानवता का आवश्यक धर्म है।
ज्ञान वृद्धि, सामूहिक उत्कर्ष, दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन जैसे शुभ कायों में संग्न व्यक्तियों तथा संस्थाओं का पोषण करना भी श्रेष्ठ सत्कर्म हैं। इनमें सहयोग देना सेवा धर्म का उचित मार्ग है।
धर्म एवं लोक हित के नाम पर अनेक निकम्मे व्यक्ति भोले-भाले लोगों का शोषण करते हैं, उससे स्वयं बचना चाहिए और दूसरों को बचाना चाहिए। आज अनेक व्यक्तियों ने स्वार्थ सिद्धि के लिए सेवा को भी एक व्यवसाय बना लिया है। कोई न कोई आडम्बर रच कर, लोक हित या धर्म वृद्धि की बात कहकर लोगों को ठगते और अपना स्वार्थ साधते रहते हैं। राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में ऐसे लोग भरे पड़े हैं। इन कुपात्रों के जाल में फँस जाना अपनी सेवा भावना का दुरुपयोग होने देना है। उदार हृदय व्यक्तियों को जहाँ परमार्थ के लिए तत्पर रहने की आवश्यकता है, वहाँ इन धूर्तताओं से सहज रहने की भी आवश्यकता है।
सेवा में किये गये प्रयत्न का सत्परिणाम निकले इसके, लिए सत्पात्र का ध्यान रखना आवश्यक है। धन एवं श्रम से आपत्तिग्रस्त उत्कर्ष अभियानों की सहायता हो सकती है। पर सबसे बड़ी और सबसे अस्थायी सेवा किसी को अधिक उत्कृष्ट मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने में ही है। मनुष्य में अनन्त सामर्थ्य भरी हुई है। उसके पास ही बहुत कुछ है। यदि वह अपने सामर्थ्य को पहचान कर उसका सदप्रयोग करने लगे तो वह न केवल अपनी समस्याओं को सुलझा सकता है वरन उन्नतिशील जीवन व्यतीत करता हुआ अन्य अनेकों के लिए भी प्रकाश प्रदान कर सकता है। किसी की सच्ची सेवा इसी में है कि उसकी निज की क्षमता को समझ सकने एवं उसका सदप्रयोग करने के लिए आवश्यक ज्ञान, साहस एवं उत्साह उत्पन्न कर दिया जाय.।
इस ज्ञान दान की महान सेवा की तुलना अन्न, वस्त्र, जल स्थान आदि देने जैसी तुच्छ सहायताओं से नहीं हो सकती। क्योंकि उनका लाभ क्षणिक एवं तात्कालिक है। वे वस्तुऐं समाप्त होती है और व्यक्ति फिर पूर्ववत् अभावग्रस्त हो जाता है। पर जिसकी अन्तःशक्ति जागृति हो गई है वह अपने भीतर भरे हुए खजाने से परिचित हो जाने पर सदा के लिए सम्पन्न बन जाता है।
नारदजी ने डाकू वाल्मीकि को आत्म बोध कराया। उसने लूट, डकैती, हत्या छोड़कर इससे अनेकों व्यक्ति लुटने से, सताये जाने से, मारे जाने से बचें। यदि बाल्मीकि डाकू ही बने रहे तो हर व्यक्ति उनके द्वारा संत्रस्त होते। नारद को उन पीड़ितों को उनकी खोई वस्तुऐं अपने पास से दान करने पर, ज्यों का त्यों कर देने पर जो पुण्य मिलता, उतना ही पुण्य एक डाकू का स्वभाव बदल देने से भी मिल गया। डाकू को नरक जाना पड़ता। उसे उस त्रास से बचा देने का पुण्य भी नारदजी को मिला। उस आत्मबोध के कारण बाल्मीकि का परिवर्तन होने पर वे महान ऋषि बने, इतने बड़े ऋषि कि उनके संरक्षण में भगवान राम ने अपने स्त्री बच्चा की सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा। यह कोई साधारण स्थिति नहीं थी। एक अन्त्यज कुल में उत्पन्न, डाकू का व्यवसाय अपनाये हुए घृणित व्यक्ति का महर्षि बाल्मीकि के रूप में परिवर्तन कर देना आत्मबोध द्वारा ही संभव हो सका। वह डाकू जब तक जीवित रहता संसार में भारी पीड़ा और अशान्ति उत्पन्न करता रहता, पर जब वह महर्षि बन गया तो न जाने कितने और महर्षि उसकी प्रेरणा और शिक्षा से बन गये होंगे। उनकी बनाई बाल्मीकि रामायण ने कितने मनुष्यों को श्रेष्ठ मनुष्य बना दिया होगा इसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। आत्मबोध का ऐसा ही महत्व है। इसे प्राप्त कर मनुष्य बदलता है। और इस परिवर्तन के कारण वह तुच्छ से महान बन जाता है। इसलिए ज्ञान-दान को संसार का सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है। जो ब्राह्मण इस पुण्य कार्य में संलग्न रहते थे उन्हें अत्यधिक आदर की दृष्टि में देखा जाता था । ब्राह्मण के पूज्य माना जाने का कारण उसका यह आत्मबोध कराने में संलग्न रहने का सेवा व्रत ही था। ज्ञान का ज्ञान, स्वर्ण एवं रत्न दान से भी बढ़ कर माना गया है।
आत्म-बोध या ज्ञान-दान सामूहिक अथवा सामुदायिक रूप में भी किया जा सकता है और उसका महत्व भी कम नहीं है। व्यक्तिगत सेवा या उपकार में किन्हीं अंशों में पारस्परिक सम्बन्ध की महत्ता की सम्भावना भी रहती है, पर सामुदायिक सेवा प्रायः स्वार्थ विहीन होकर ही की जाती है। इसमें एक विशेषता यह भी होता है कि ज्ञान प्रसार का कार्य जब सामूहिक रूपसे करते हैं तो सब नहीं तो कुछ व्यक्ति, जो उपयुक्त पात्र होते है, इससे लाभ उठा ही सकते हैं। इस प्रकार की सेवा अनुप्रह अथवा प्रत्युपकार की भावना को भी विशेष अवसर नहीं रहता और उपकार ग्रहण करने वाले के चत्त पर हीनता का कोई प्रभाव नही पड़ता। इसलिये यदि सामर्थ्य हो तो मनुष्य को अपनी सेवा का दायरा बढा़कर सार्वजनिक रूप से भी ज्ञान-दान के महान धर्म की पूर्ति करना चाहिये।
सेवा कर्म की महत्त समझने वाले और उसमें प्रवृत्ति रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को आत्मबोध की उत्कृष्ट सेवा के लिये तत्पर होने और उसके लिये सत्पात्र तलाश करने का प्रयत्न करना चाहिये। सत्पात्र के साथ किया हुआ श्रम ही सफल होता है। कुपात्रों को दिया दान सर्प को दूध पिलाने की तरह विष उत्पन्न करता है। उन्हे यदि धन दिया जाय तो उसका कुकर्मों में दुरूपयोग करते है और यदि शिक्षा दी जाय तो उसका उपहास करते है। अहंकार वश वे अपने को, अपनी स्थिति को बड़प्पन से भरा हुआ मानते है। सुधार के लिये उछ कहा जाय तो इसे अपना अपमान मानते है।
फिर दूसरों को उपदेश करने का अधिकार भी हर किसी का नहीं है। जिसने अपने आपको चिर काल तक आदर्शपूर्ण परिस्थितियों में रहकर ज्ञान, अनुभव और तप के आधार पर अपने को नारद के समान विशिष्ट बना लिया हो वहि उपदेश देने को अधिकारी भी है और उसी का प्रभाव भी पड़ता है। जो अपने अन्दर अनेक दुर्बलताएँ धारण किए हुए है, जिसने उन आदर्शों को अपने जीवन में भली प्रकार उतार नहीं लिया है वह यदि दूसरों को शिक्षा दे भी, तो उसका उपहास न भी उडा़या जाय तो भी यह निश्चित है किसी पर कोई विशेष प्रभाव न पडे़गा।
ऐसी दशा में क्या आत्मबोध की, ज्ञान-दान की महान सेवा से हमें वंचित ही रहना पडे़गा? क्या उस उत्कृष्ट पुण्य का लाभ हमें साधारण महत्व की, अन्न-जल आदि की सेवाओं तक ही सीमित रहना पडे़गा? नही ऐसी बात नहीं है। हमारे लिये भी वैसा अवसर मौजूद है। हमारा अपना मन, हमारे सबसे अधिक आज्ञानुवर्ती और अधिक निकट होने के कारण ऐसा सत्पात्र हो सकता है जिसकी आत्मबोध द्वारा सेवा की जा सके। इसे आज की डाकू की स्थिति में से बदल कर यदि महर्षि बना सके तो, हम भी नारद के समान ज्ञान-दान की महान सेवा का पुण्य फल प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है और आत्म निर्माण द्वारा परमार्थ के साथ-साथ अत्यन्त उस कोटि का स्वार्थ भी सिद्ध कर सकते है। -क्रमशः
"तुम जैसा करोगे वैसा फल पाओगे। कोई बाह्य शक्ति तुम्हें सुख-दुख या अच्छा बुरा फल नहीं देती। किन्तु कर्म का फल समय आने तुमको अपने आप भोगना पड़ता है। जब कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा विचार करता है तो आस-पास परमाणु खिंच कर उसके पास आते है और वे उसकी आत्मा पर पर्दा डाल देते है- उसे अच्छा- दित कर देते है। इसे ही कर्म कहते है। इसलिए सदा शुभ विचार और शुभ आचरण करो जिससे कर्म तुम्हारी आत्मा को मलिन न कर सके। बद्ध कर्मो का नाश करके आत्मा ही परमात्मा हो जाता है नर से नारायण बन जाता है।"
-महात्मा महावीर
नारायण दो बात को, दिजै सदा बिसार।
फरी बुराई और ने, आप कियो उपकार।।
दो बातन को भूल मत, जो चाहे कल्यान।
नारायण इक मौत को, दूजे श्री भगवान।।
तज पर-अवगुण नीरको, क्षीर गुणन सों प्रीत।
हंस संत की सर्वदा, नारायण यह रीत।।
तनक मान मन में नहीं, सबसों राखत प्यार।
नारायण ता संत पै, बार बार बलिहार।।
अति कृपालु संतोप वृत्ति, जुगल चरण में प्रित।
नारायण ते संत बर, कोमल वचन विनीत।।
मगन रहैं नित भजन में, चलत न चाल कुचाल।
नारायण ते जानिये, ये लालन के लाल।।
पर हित प्रित उदार हित,विगत दंभ मग रोप।
नारायण दुख में लखै, निज कर्मन कै दोप।
संत जगत में सो सुखी, मैं मेरी को त्याग।।
नारायण गोविन्द पद, दृढ़ राखत अनुराग।
जिनके पूरण भक्ति है, ते सबसों आधीन ।
नारायण तज मान मग, ध्यान सलिज्ञ के मीन।।
नारायण हर भक्ति की, प्रथम यही पहचान।
आप अमानी है रहे, देत और को मान।।
कपट गाँठ मन में नहीं, सबसों सरल सुभाव।
नारायण ता भक्त की, लगी किनारे नाब।।
जिनको मन हरि पद कमल, निसिदिन भ्रमर समान।
नारायण तिनसों मिले, कबहुँ न होवें हान ।।
नारायण हरि कृपा की, तकत रहै नित बाट।
जानहार जिमिपार को, निरखत नौका घाट।।
चाह मिटी चिंता गई, मनुवा बेपरवाह।
जाको कछू न चाहिये, सोई साहनसाह।।
नारायण होवै भले, जो कछु होवनहार।
हरिसों प्रीत लगायकै, अब कहा सोच-विचार।।
नारायण अति कठिन है, हरि मिलिवे की बाट।
या मारग तब पग घरैं, प्रथम शीश दै काट।।
(श्री दत्तात्रेय पुण्डरीक आप्टे)
कितने ही व्यक्ति अपनी वर्तमान परिस्थितियों से बहुत खिञ और परेशान रहते हैं।अपना वर्तमान उन्हें असन्तोपपूर्ण और भविष्य निराशामय दीखता है। वसुओं की कमी और परिस्थितियों की प्रतिकूलता के कारण जितना कष्ट होता है उससे कहीं अधिक कष्ट उन्हेण अपनी असंतुलित मनोभूमि के कारण होता है। मानसिक संतुलन ठिक न रहने से वे परिस्थितियों को सुधारने, अभावों को मिटाने का मार्ग भी नहीं सिच पाते, फलतः उनकी चिन्ता इस असन्तोपपूर्ण मनोस्थिति के कारण सुधरने की अपेक्षा दिन दिन बिगड़ती ही जाती है।एक व्यक्ति कम आमदनी के कारण, बहुत आर्थिक कष्ट अनुभव करता है और इसलिये अपने को अभावप्रस्त, भाग्यहीन तथा दीन दूखी अनुभव करता है। पर दूसरा व्यक्ति उन्हीं परिस्थितियों में रह कर, उतनी ही आमदानी से अपना काम चलाता है और बडे़ आनन्द तथा सन्तोष के साथ दिन काटता है। कई बार तो उससे भी गईबीती आर्थिक परिस्थिति के लोग अपेक्षाकृत और भी अधिक प्रसन्न और सन्तुष्ट देखे जाते हैं। अदि धन की मात्रा ही सुख दुःख का कारण रही होती तो उसी आचार पर उसकी न्यूनाधिकता दृष्टिगोचर होनी चाहिए थी। पर देखा इसके विपरीत जाता है। बडे़-बडे़ धनपति और श्रीमन्त लोग प्रचुर मात्रा में धन होते हुए भी दुखी, असंतुष्ट और चिन्तित देखे जाते हैं और अनेकों निर्धनों की झोपडि़याँ स्वर्गीय सुख शान्ति को अपने अन्दर धारण किये होती हैं।इसी प्रकार यश, कीर्ति, सफलता, स्वास्थ्य, विद्या, बुद्धि, कला-कौशल, चातुर्य, देश, जाति, आयु, रूप यौवन आदि विभूतियों के आधार पर भी सुख दुख निर्भर नहीं है। इनमें से जिस वस्तु का भी अभाव होता है उसी को लिग अपने दुख का कारण मान लेते हैं और अपने को निर्दोष समझ कर उन अभावों का ही रोना रोया करते हैं। वे सोचते हैं कि हमारा अमुक अभाव दूर हो जाय तो फिर प्रसन्नता और संतुष्टि उपलब्द हो सकती है। प्रयत्न करने पर वह अभाव दूर भी हो जाते हैं फिर भी देखा गया है कि प्रसन्नता दूर ही हटती चली जाती है। उस अभाव के पूर्ण होते ही दूसरा अभाव अखरने लगता है। कोई न कोई अभाव तो बना रहेगा। सारे अभावों का दूर हो जाना, समस्त कामनाओं का पूर्ण हो जाना सम्भव नहीं है। इसलिये उनके लिये सुख-शान्ति भी एक असम्भव तथ्य बनी रहती हैं। रोते, झींकते, खिन्नता और चिन्ताओं में प्रसित रहते हुए ही उन्हें जीवन के बहुमूल्य क्षण समाप्त करने होते हैं। आज अधिकांश व्यक्तियों की आन्तरिक स्थिति यही है। ये जीते तो हैं पर उसमें कोई आनन्द या सन्तोष अनुभव नहीं करते।क्या इस स्थिति का बदला जाना सम्भव नहीं है? सुख का आस्वादन करते हुए प्रसन्नतापूर्ण जीवनयापन कर सकना अपने हाथ की घात नहीं है? इस समस्या पर गम्भीरता पूर्वक विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवन को सन्तोष और आनन्दपूर्ण परिस्थिति में व्यतीत कर सकना निश्चय ही मनुष्य के अपने हाथ की घात है। यह ठिक है कि अनुकूल परिस्थितियों में मनुष्य अधिक सुविधा अनुभव करता है पर यह भी गलत नहीं है कि स्वल्प साधनों एवं सामान्य परिस्थितियों को भी प्रसन्नता की उतनी मात्रा उपलब्द हो सकती है कि व्यक्ति अपने जीवन को असफल एवं दुर्भाग्य- ग्रस्त न माने। जब अन्य असंख्यों व्यक्ति हम से गई गुजरी परिस्थिति में रह कर संतोष पूर्वक रह सकते हैं तो हम उनसे कहीं अधिक सुविधाएँ प्राप्त होते हुए भी दुखी रहें इसका कोई कारण नहीं है।प्रसन्नता और अप्रसन्नता की गुत्थी बाहरी पदार्थों की संख्या, मात्रा या उत्कृष्टता के आधार पर सुलझाई नहीं जा सकती। क्योंकि जो कुछ हम चाहते हैं वह साधन जिन्हें उपलब्ध हैं वे ही कहाँ सन्तुष्ट हैं? जो परिस्थितियाँ आज हम चाहते हैं, उनके प्राप्त हो जाने पर वे भी स्वल्प लगेगी ओर उससे अधिक उत्कृष्टता की, अधिक मात्रा की आवश्यकता अनुभव होगी, फिर वही अभाव खटकने लगेगा इस कुचक्र का कहीं अंत नहीं। इस संसार की सारी साधन सामग्री मिलकर भी एक व्यक्ति की तृष्णा को तृप्त नहीं कर सकती। सुरसा राक्षसी की तरह उसका मुँह फटता ही जाता है। इसमें से बच निकलने का एक ही उपाय है, अपने को छोटा बनाना। हनुमान जी ने इसी युक्ति से अपना पिण्ड छुड़ाया था। सुरसा वस्तुतः तृष्णा ही है, हमारा आकार कितना ही बढ़े उस का मुँह और भी अधिक फटता जायेगा। राजा और रंक, श्रीमन्त और श्रमिक सभी उसकी दाढ़ों के नीचे कुचले जाते और अपने - अपने ढंग से दुर्भाग्य का रोना रोते हुए चीखते चिल्लाते रहते हैं।हम सिर्फ अभावों और कठिनाइयों के बारे में सोचते रहे हैं और विशेष जो कुछ उपलब्ध है उसकी महत् और प्रचुरता पर ध्यान नहीं देते। यदि हम अपने से नीचे वालों के साथ अपनी तुलना करने लगें तो प्रतीत होगा कि कितने ही प्राणी हमें अपनी तुलना में उतना ही साधन सम्पन्न समझते होंगे जितना कि हम अपनी तुलना में देवताओं को समझते हैं। यदि हम उन बेचारों की परिस्थिति में होते और उस समय कोई देवता आकर वह परिस्थिति प्रदान करता जो हमें आज उपलब्ध है तो निश्चय ही वह परिवर्तन एक वरदान ही माना जाता। संसार में लाखों अन्धे हैं यदि उन्हें हमारी तरह देख सकने वाली आँखें मिल जाये तो वे आनन्द से फूले न समायेगें। इसी प्रकार कितने ही लँगड़े, लूले, बहरे, अपाहिज, पागल, रोगग्रस्त, जराजीर्ण मनुष्य ऐसे हैं जो और कुछ न सही केवल शारीरिक स्थिति ही हमारे जैसी मिल जाये तो उसे एक दैवी वरदान ही मानेंगे। पर हमें अपनी उस सम्पन्नता का कभी अनुभव भी नहीं होता। जो कुछ हमें प्राप्त हे उसकी उत्कृष्टता पर यदि हम विचार करें तो प्रतीत होगा कि ईश्वर ने जो कुछ दिया है वह भी इतना है कि उस पर संतोष और गर्व किया जा सकता है। जो प्राप्त है उससे सन्तुष्ट रहना और अधिक के लिए प्रयत्न करना यही प्रगति का निर्दोष क्रम है। विवेकवान इसी रास्ते उन्नति की मंजिल पर बढ़ते हैं।इस संसार में मनोवाँछित परिस्थितियाँ किसी को भी प्राप्त नहीं। हर एक को कोई न कोई अभाव रहता ही है। यदि इसी कारण लोग असन्तुष्ट रहने लगें तो फिर सारी दुनिया में एक भी व्यक्ति सुखी न मिलेगा। पर बात ऐसी नहीं है, अनेकों निर्धन तथा कठिनाइयों में ग्रस्त मनुष्य भी ऐसे मौजूद हैं जो प्रयत्नशील तो हैं पर वर्तमान में जो कुछ सामने है उससे खिन्न नहीं होते। हँसते खेलते उसे ईश्वर की अनुकम्पा मान कर अपना मन प्रसन्न रखते हैं और संतोष की साँस लेते हुए जीवन के दिन पार करते हैं।कई लोग सोचते हैं कि संतोष कर लेने से प्रगति शिथिल हो जायेगी, उन्नति के प्रयत्न ढीले हो जायेंगे, जो कुछ है सब ठीक है यह मान लेने की आदत पड़ जायेगी और फिर विकास के लिए उत्साह न रहेगा। यह आशंका उन अस्थिर मति वाले क्षणिक बुद्धि लोगों के लिए ही की जाती है जो आवेश में या नशा पीकर ही कुछ कर सकते हैं। विवेकशील लोग अपने जीवन को एक क्रमबद्ध व्यवस्था के रूप में विनिर्मित करते हैं वे जानते हैं कि असंतुलित खिन्न और उद्विग्न मन होना एक प्रकार की रूम्ण अवस्था है जिसमें कुछ कर सकना तो दूर, ठिक तरह सोच सकना भी कठिन होता है। झूंझलाइट, खीज, परेशानी और उद्वेग की स्थिति में मस्तिष्क उलटे ही विचार करता है, उतावला होता विपत्ति को बढा़-बढा़ कर सोचता है, दूसरों पर भविष्य में भयंकर विपत्ति की आशङ्का करता है, और सब छोड़कर कहीं भाग जाने या आत्महत्या करने जैसी ऊटपटांग बातें सोचता है। कभी-कभी वह अपने भयङ्कर कल्पना चित्रों का दोष किसी दूसरे पर मढ़ कर उस पर ऐसे आक्रमण कर बैठता है जिसके लिये पिछे पश्चाताप ही हाथ रहे।असन्तोष बढ़ कर इन उपरोक्त परिस्थितियों में ही जा पहुँचता है और शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह नष्ट कर देता है। वह एक मानसिक रोग है, आन्तरिक उत्पात है, इससे बचने में ही कल्याण है। जो लोग सोचते हैं कि असन्तोष से प्रगति की आकांक्षा जागृत होती है वे भूल करते हैं।प्रगति तो स्वस्थ्य आत्मा का स्वाभाविक चिन्ह है। शान्त और संतुलित मस्तिष्क सदा प्रगति की बात सोचेगा ओर उसके लिये वह गतिविधि भी अपनायेगा जो सफलता कि मंजिल पार करने में समर्थ होती है।हमें सन्तुष्ट रहना चाहिए। सन्तोष में ही शांति है। आज जो उपलब्द है उसके लिए ईश्वर को अनेक धन्यवाद देना और उसके लिए पूर्ण रूप से प्रसन्न रहना ही हर विवेकशील के लिए उचित है। जिन्हें इनसे कम मिला है, उनकी तुलना में अधूरे साधन एवं घटिया वस्तुओं के होते हुए भी हम भाग्यशाली हैं। इस अपने सौभाग्य पर हमें क्यों प्रसन्न नहीं होना चाहिये? क्यों सन्तोष नहीं करना चाहिए? यदि सुखि रहने की इच्छा है तो सन्तोष को अपने स्वभाव में सम्मिलित करना ही पडे़गा। और भी अधिक उत्कृष्ट स्थिति प्राप्त करने के लिये इस प्रयत्न करें, वह उचित है, पर इसके लिये खिन्न या असंतुष्ट होने की अवश्यकता नहीं है, वह कार्य तो सन्तुष्ट और प्रसन्न मन में ही सुविधापूर्वक हो सकता है।
(चीन के सन्त कनफ्यूमियस के विचार)
मनुष्य-स्वभाव से सज्जन ही होता है और उसकी नैसर्गिक प्रवृत्ति भलाई की ओर होतीहै। सज्जनता की परायण तो सन्तों में ही हो सकती है, पर निष्काम भाव से ईमानदारी और तत्परता के साथ कर्तव्य पालन करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। मनुष्य एक सामाजिक जीव है; वह समाज में रहता है, पनपता है तथा अन्त में समाप्त हो जाता है। आजीवन समाज के साथ उसका घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। अतः समाज की उन्नति में ही उसकी उन्नति हो सकती है। इसलिये समाज के प्रत्येक प्राणी के साथ सदव्यवहार करना ही उसका प्रधान धर्म है।
आपत्ति के समय ही मनुष्य के गुणों की परत्व होती है। जब शीतकाल आता है तो सब वृक्षीं के बाद चीड और देवदारू अपने पत्तों को त्यागते हैं होना भी ऐसा ही चाहिए क्योंकि वे सब वृक्षों में बडे़ और श्रेष्ठ भी हैं।
सर्व धर्म का लक्षण यह है कि जब तुम बाहर निकलो तो प्रत्येक से ऐसा मनोभाव रख कर मिलो; मानो वह तुम्हारा बडा़ अतिथि है। किसी के साथ ऐसा वर्ताय मत करो जो तुमको अपने लिये बुरा जान पड़ता है। समाज में कोई दुःखी होकर तुम्हारी निन्दा न करे और घर में भी कोई तुम्हारि विरोध में न कहुनहावे।
शिक्षा की अवश्यकता मनुष्यमात्र को है। इसी के द्वारा वह समाज के लिये उपयोगी वन सब्यता है। एक शिष्य ने पूजा "मान्यवर! सामाजिक गुण क्या हैं।" उत्तर मिला- "दूसरे से प्रेम करना।" दूसरे शिष्य ने प्रश्न किया'भगवान! क्या कोई ऐसा निवन है किसका पालन जीवन पर्यंत करना चाहिये।' उन्होने कहा 'दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार कभी मत करो जिसे तुम दूसरों से अपने प्रति नहीं चाहते।'
प्राणियों का पालनकर्ता मनुष्य नहीं है
शिवाजी महाराज सामनगढ़ किले का निर्माण करा रहे थे। हजारों मजदूर वहाँ पर काम कर रहे मन में यह भाव आया कि इस समय इतने प्राणियों का जीवन निर्वाह मेरे द्वारा हो रहा है।
शिवाजी के गुरू समर्थ रामदास भी उसी समय वहाँ आ पहुँचे। वे अन्तर्यामी थे, शिवाजी के मनोभाव को देख कर उन्होंने समझ कि इस प्रकार का अहङ्कार अन्त में हानिकारक ही होगा। इसलिये उन्होंने कहा"वाह शिवा! तुमने तो इतना बडा़ काम आरम्भ कर दिया है कि जिससे इतने व्यक्तियों का उदर निर्वाह हो रहा है।" शिवाजी ने हाथ जोड़ कर कहा" महाराज! सब आपकी कृपा है।" इतने में समर्थ की निगाह पत्थर की एक शिला पर पडी़। उन्होंने शिवाजी से कहा कि यह शिला बेकार पडी़ है, इसे तुड़वाकर द्प टुकडे़ करा दो। मजदूरों ने आकर बडे़ परिश्रम से उसे तोड़ दिया तो दिखाई पडा़ की उसके बीच में एक ओकली के बराबर गडढा है, उसमें पानी भरा है और उसमें एक मेडक भी है। रामदास ने कहा"वाह शिवा वाह! तुम्ने इस शिला के भीतर पानी भरसाकर मेढ़क के जीवित रहने की व्यवस्था भी करादी है।" बस शिवाजी अपने अहंकार की निस्सारता को समझ गये। उनको मालूम हो गया कि "इन सब प्राणियों का पेट भरने वाला मैं नहीं हूँ वरन कोई अन्य ही शक्ति है।" उन्होंने समर्थ के चरणों पर मस्तक रख कर अपनी गलती के लिये क्षमा प्रार्थना की।
मानवता का महत्व
फ्रांस के शासक नेपोलियन ने आन्द्रिया पर आक्रमण किया और जगह-जगह उसको सेनाओं को हराता हुआ राजधानी विएना नगर पर जा पहुँचा। उसने संधि का झण्डा देकर राजदूत को नगर में भेजा, पर नागरिकों ने रोप में आकर उसे मार डाला। इससे नेपोलियन बडा़ क्रूद्ध हुआ और उसने अपनी तोपों को नगर पर गोलावारी करने की आज्ञा दी। वहाँ के अनगिनती विशाल भवन तोपों की मार से टूट-फूट गये। एकाएक नगर का द्वार खुला और उसमें से दूत संधि का झण्डा लिये। बाहर निकला। नेपोलियन ने दूत का सम्मान करके संदेश पूछा। दूत ने कहा कि नगर में आपकी तोपों के गोले जहाँ गिर रहे हैं, वहाँ से समीप ही सम्राट की प्यारी पुत्री बीमार पड़ी है। अगर तोपें इसी प्रकार चलती रहीं तो विवश होकर सम्राट को अपनी पुत्री को अकेले छोड़कर चला जाना पड़ेगा।” नेपोलियन के सेनापतियों के मत से तोपों से गोलाबारी करना आवश्यक था, पर नेपोलियन ने कहा कि “युद्ध नीति की निगाह से तो आपकी बात ठीक है, पर मानवता की दृष्टि से एक रोगी राजकुमारी पर दया करना उससे भी अधिक महत्व की बात है।” तोपें वहाँ से हटा ली गईं।
माता की आज्ञा माननीय है
भारत के गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने एक बार प्रसंगवश बंगाल के प्रसिद्ध विद्वान् और हाईकोर्ट के जज श्री आशुतोष मुखर्जी को विलायत जाने की सम्मति दी।
श्री आशुतोष स्वयं भी विलायत-यात्रा की इच्छा रखते थे और उनके मित्र भी उनको इसकी सम्मति दिया करते थे, पर उनकी प्राचीन परम्परा को मानने वाली बूढ़ी माँ समुद्र यात्रा को शास्त्र विरुद्ध मान कर उनको रोकती थीं। इसलिए आशुतोष ने लार्ड कर्जन से कहा कि - “मेरी माता विलायत जाने का विरोध करती हैं, इसलिए मैं नहीं जा सकता।”
लार्ड कर्जन ने कुछ सत्ता का भाव प्रकट करते हुये कहा कि आप अपनी माता से कहियेगा कि - “भारत के गवर्नर जनरल मुझे विलायत जाने की आज्ञा दे रहे हैं।”
श्री आशुतोष ने उत्तर दिया - “अगर आपका ऐसा ख्याल है तो मैं आपको अभी यह बतलाये देता हूँ कि आशुतोष मुखर्जी अपनी माता की आज्ञा किसी दशा में भंग नहीं कर सकता, चाहे भारत का गवर्नर जनरल या उससे भी कोई बड़ा उसके लिए आज्ञा क्यों न दे।”
वीरता का आदर्श
बाजीराव ने सन् 1728 में हैदराबाद के निजामुलमुल्क के ऊपर चढ़ाई करके गोदावरी के तट पर उससे युद्ध किया। निजाम की सेना हारकर पीछे हट गई। इतने में कोई मुसलमानी त्यौहार आ गया, पर उस समय निजाम की सेना में भोजन सामग्री का अभाव था। तब निजाम ने बाजीराव के पास सन्देश भेजा कि “हमारी सेना में भोजन सामग्री की बड़ी कमी आ गई है, इसलिए अनाज और किराना भेजो” पेशवा ने इस पत्र पर विचार करने के लिए सेनाध्यक्षों को बुलाया तो सबने यही सम्मति दी कि इस अवसर पर आक्रमण करके निजाम की शक्ति को पूर्णतः ध्वस्त कर दिया जाय। पर बाजीराव ने कहा कि “विपत्ति में फँसे हुए शत्रु को मारना वीरता की दृष्टि से प्रशंसनीय नहीं है। इस समय तो हमको नवाब की सहायता ही करनी चाहिए।” यह कहकर उन्होंने पाँच हजार बैलों पर लादकर सब प्रकार की सामग्री उसके लिए भेज दी। बाजीराव के सद्व्यवहार का निजाम पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि शीघ्र ही दोनों पक्षों में सुलह होकर मेल हो गया।
दान नम्रता के साथ दिया जाना चाहिये
श्री भूदेव मुखोपाध्याय ने अपने पिता विश्वनाथ तर्कभूषण की स्मृति में एक फण्ड कायम किया था जिसका उद्देश्य प्राचीन शास्त्रों के अध्ययन में संलग्न सदाचारी और त्यागी ब्राह्मणों को सहायता देना था। इसकी तरफ से जिन विद्वानों को सत्पात्र समझा जाता था उनके पास वर्ष में पचास रुपये की रकम मनीआर्डर द्वारा भेज दी जाती थी। इसके लिए न तो उनको किसी से प्रार्थना करनी पड़ती थी और न कार्यालय में जाना पड़ता था। इस फण्ड में से जिन लोगों को प्रथम वर्ष में सहायता दी गई उनकी सूची "एजुकेशन गजट” में प्रकाशित की गई। जिस कर्मचारी ने सूची तैयार की थी उसने आरम्भ में लिखा "इस वर्ष जिन आध्यापकों तथा विद्वानों को "विश्वनाथ-वृत्ति" दी गैइ उनकी नामावली।" जब भूदेव वायू ने उस सूची को देखा तो उन्होंने इस प्रकार लिखने को गलत बता कर कहा कि यहाँ इस तरह लिखना चाहिये कि "इस वर्ष जिन अध्यापकों तथा विद्वानों ने " विश्वनाथ-वृत्ति" स्वीकार करने की कृपा की उनकी नामावली।" सच है दान की शोभा नम्रता पूर्वक देने में ही है।
प्रेम और दया का व्यवहार ही भगवान को मान्य है।
बेलगाँव में चिक्षम्बर दीक्षित नामक एक महापुरुष रहते थे जो परोपकार के लिये प्रसिद्ध थे। एक दिन एक स्त्री सन्तान प्राप्त होने का उपाय पूछने उनके पास गैइ। वह उसके लिये बहुत समय से व्रत-उपवास आदि करती रहती थी, पर उसका हृदय प्रेम-दया आदि सदगुणों से शून्य था। चिदम्बर ने उसे दो मुट्ठी चने देकर थोडे़ समय तक अलग बैठी रहने को कहा। वह धीरे धीरे चना चबाने लगी। यह देख कर दो-चार छोटे-छोटे बालक भी उसके पास आकर खडे़ हो गये और उसके मुँह की तरफ देखने लगे। दो-एक ने हाथ भी पसारा। पर उसने अपने मन में कहा-'अगर मैं दो-एक को चना दूँगी तो फिर सभी को देना पडे़गा।' इससे उसने किसी को एक दाना भी नहीं दिया, सब चना खुद ही खा गई। तब चिदम्बर ने उससे कहा- "जब मुफ्त के चनों में से भी दो-चार चने तुम से बालकों को नहीं दिये गये तो तुम भगवान से हाड़-माँस का बालक पाने की आशा कैसे रख सकती हो? केवल बाह्य धर्माचरण से काम नहीं चलता, हृदय में सदभाव और उदारता को होना भी आवश्यक है।"
व्यापार का सच्चा आदर्श
रायचन्द्र भाई सौराष्ट्र के बडे़ विद्वान और सन्त पूरुष थे। वे आजन्म गृहस्थ आश्रम में ही रहे पर उनका आचरण बडे़-बडे़ सन्तों से भी उच्च था। महात्मा गँधी उनको गुरुतुल्य मानते थे। वे बम्बई में जवाहरात का काम करते थे। एक बार उन्होंने किसी व्यापारी से जवाहरात का सौदा किया कि एक माँने बाद वह इतने जवाहरात उनके हाथ इस भाव पर बेचेगा। संयोगवश जवाहरात का दाम चढज्ञे लगा और एक महीने में इतना अधिक हो गया कि अगर वह व्यापारी उस सौदे के अनुसार जवाहरात देता तो उसका सौदे के अनुसार जवाहरात देता तो उसका दिवाला निकल जाता, मकान भीविक जाता। जवाहरात का भाव चढज्ञे की बात सुनकर रायचन्द्र भाई उस व्यापारी की दुकान परमये। इनका देख कर उसने कुछ चिन्तित होकर कहा कि "आपके सौदे के विषय में मुझे स्वयं चिन्ता है। कुछ भी हो दो-तीन दीन में रूपये की व्यवस्था करके आपका देना चुकाऊँगा।"
रायचन्द्र ने कहा-"इस सादे के बारे में जैसी चिन्त तुमको है वैसी मुझको भी है और इस चिन्ता का कारण इसकी यह लिखापढी़ है। अगर इसे खत्मकर दिया जाय तो दोनों की चिन्ता का अन्त हो सकता है।
व्यापारी ने कहा-"आप ऐसा चिचार न करें। मैं दो दिन के भीतर आपका रूपया अवश्य दे दूँगा।"
रायचन्द्र भाई ने उसके सामने ही सौदे की लिखा पढी़ के कागज को फाड़ कर फेंक दिया और कहा-"मै जानता हूँ कि इस समय जयाहरात का दाम बड़ जाने से तुम पर मेरा चालिस-पचास हजार रूलेना हो गया है। पर मैं यह भी जानता हूँ कि इतना रूपया देने से तुम्हारी क्या हालत हो जायगी। रायचन्द्र दूध पी सकता है खून नहीं पी सकता।
रायचन्द्र भाई की अयाचित उदारता को देख कर वह व्यापरी उनके पैरों पर मस्तक नवाने लगा की -"आप तो मनुष्य नहीं सचमुच देवता हैं।" रायचन्द्र भाई ने व्यापार का सच्चा आदर्श उदाहरण देवर समझ दिया।"