प्रभु-दर्शन (कविता)

अंतिसंतं न जहाति अन्ति संत न पश्यति।

देवस्य पश्य काव्यं न जीर्यति।।

यद्यपि परम निकट है तो भी, उसे न लख पाता संसार।

और निकटतम होने से ही, उसे न लख पाता संसार।।

कहीं नयन भी कर सकते हैं निज पुतली का अवलोकन?

शक्ति ओजप्रद परम तत्व का कैसे आत्मा ले दर्शन?

हे मन! यदि तू करना चाहे परमेश्वर के शुभ दर्शन।

तो कर उसके चिर नूतन इस, विश्व काव्य का अवलोकन।।

मानव कृत नाटक पड़ जाता शीघ्र पुराना देखे बाद।

बार बार सम्मुख आने पर पैदा करत और विषाद।।

जीर्ण न होता, अंत न पाता, अजर-अमर प्रभु कृत यह काव्य।

क्षण-क्षण नूतनता दर्शाता, रस सरसाता नव सम्भाव्य।।

क्षण-क्षण पल-पल इसे निरखना प्रभुलीला में हो तन्मय।

हे मन! चेतन रहकर दर्शन, करता जह उसका मधुमय।।

-यज्ञदत्त अक्षय


आप भला तो जग भला

जीवन अनेकों समस्याओं के साथ उलझा हुआ है। उन उलझनों को सुलझाने में, प्रगति पथ पर उपस्थित रोड़ों को हटाने में पहुँचा हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा भाग व्यतीत होता रहता है, फिर भी कुछ ही समस्याओं का का हल हो पाता है, अधिकांश तो उलझी ही रह जाती हैं। उस अपूर्णता का कारण यह है कि हम हर समस्या का हल अपने से बाहर ढूँढ़ते हैं जब कि वस्तुत: यह हमारे भीतर ही छिपा रहता है।

जब जी में जो कुछ आता है, जो रूचता है, जो जाँचता है, उसके अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त करने की अभिलाषा होती है। पर वैसी परिस्थितियाँ मिल ही जाँय इसका कोई ठिकाना नहीं। इनका मिलना केवल इस बात पर निर्भर नहीं है कि हम उनकी इच्छा करते हैं, वरन् योग्यता, परिश्रम, अवसर, सहयोग, साधन एवं प्रारब्ध आदि अनेक बातों के मिलने से ही किसी वस्तु या परिस्थिति के मिलने का- अभीष्ट मनोरथ से सफल होने का अवसर मिलता है। पर आकांक्षा करते समय इतनी बातों का ध्यान कौन रखता है ? जिस प्रकार अमुक व्यक्ति यह मनोरथ प्राप्त कर सका उसी प्रकार हमें भी ऐसा सुयोग क्यों नहीं मिलना चाहिए, बस इतने पर ही अपनी इच्छा की बेल चल पड़ती है। बिना बन्दूक के कारतूस चलाने के समान उनका लक्षबेध अधूरा रह जाता है। इस प्रकार अगणित व्यक्तियों की असंख्यों आकांक्षाएँ अधूरी ही रह जाती है और वे इससे खिन्न भी रहते हैं।

यदि हम कोई आकांक्षाएँ करने के पूर्व, अपनी सामर्थ्य और परिस्थितियों का अनुमान लगालें और इसी के अनुसार चाहना करें तो उनका पूर्णा होना विशेष कठिन नहीं है। एक बार के प्रयत्न में न सही, सोची हुई अवधि में न सही, पूर्ण अंश में न सही, आगे पीछे न्यूनाधिक सफलता इतनी मात्रा में तो मिल ही जाती है कि काम चलाऊ सन्तोए प्राप्त किया जा सके। पर यदि आकांक्षा के साथ-साथ अपनी क्षमता और स्थिति का ठीक अन्दाजा न करके बहुत बड़ा-बड़ा लक्ष रखा गया है तो उसकी सिद्धि कठिन ही है। पर यदि अपने स्वभाव में आगा पीछा सोचना, परिस्थिति के अनुसार मन चलाने की दूरदर्शिता हो तो उस खिन्नता से बचा जा सकता है और साधारण रीति से जो उपलब्ध हो सकता है उतनी ही आकांक्षा करके शान्तिपूर्वक जीवनयापन किया जा सकता है।

अपने स्वभाव की खुटियों का निरीक्षण करके उनमें आवश्यक सुधार करने के लिए यदि हम तैयार हो जाँय तो जीवन को तीन चौथाई से अधिक समस्याओं का हल तुरन्त ही हो जाता है। सफलता के बड़े-बड़े स्वप्न देखने की अपेक्षा हम सोच समझ कर कोई सुनिश्चित मार्ग अपनावें और उस पर पूर्ण दृढ़ता एवं मनोयोग के साथ कर्त्तव्य समझ कर चलते रहें तो मस्तिष्क शान्त रहेगा उसकी पूरी शक्तियाँ लक्ष को पूरा करने में लगेंगी और मंजिल तेजी से पार होती चली जायगी। समय-समय पर थोड़ी-थोड़ी जो सफलता मिलती चली जायगी इस प्रकार लक्ष की ओर अपने कदम एक व्यवस्थित गति के अनुसार बढ़ते चले जाँयगे।

इसके विपरीत यदि हमारा मन बहुत कल्पनाशील है, बड़े-बड़े मंसूवे गाँठता और बड़ी-बड़ी सफलताओं के सुनहरे महल बनाता रहता है, जल्दी से जल्दी बड़ी से बड़ी सफलता के लिए आतुर रहता है तो मंजिल काफी कठिन हो जायगी। जो मनोयोग, कार्य की गतिविधि को सुसंचालित रखने में लगना चाहिए या वह शेखचिल्लि के सपने देखने में उलझा रहता है। उन सपनों को इतनी जल्दी साकार देखने की उतावली होती है कि जितना भ्रम और समय उसके लिए अपेक्षित है, वह उसे भार रूप प्रतीत होता है। ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं त्यों-त्यों बेचैनी बढ़ती जाती है और यह स्पष्ट है कि बेचैन आदमी न तो किसी बात को ठीक तरह सोच सकता है और न ठीक तरह कुछ कर ही सकता है। उसकी गति विधि अधूरी, अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित हो जाती है ऐसी दशा में सफलता की मंजिल अधिक कठिन एवं अधिक संदिग्ध होती जाती है। उतावला आदमी सफलता के अवसरों को बहुंधा हाथ से गँवा ही देता है।

जिसके मस्तिष्क में हर घड़ी सफलता के रंगीन सपने सँजोये रहते है उसे यदि असफलता का सामना करना पड़ा तो भारी आघात लगता है, भारी निराशा आती है, दिल टूट जाता है और आगे के लिये कोई बड़ा कदम उठाने का साहस जाता रहता है। कई बार तो वह असफलता का आघात इतना बड़ा होता है कि व्यक्ति आत्महत्या तक कर बैठता है। परीक्षा में असफल हुये कुछ छात्र हर साल आत्महत्या कर बैठते हैं। यद्यपि बात बहुत मामूली सी है। सौ में से ३०-३५ छात्रों के उत्तीर्ण होने का परिणाम जहाँ रहता हो यहाँ ६५-७२ फीसदी को फेल होना ही है। जब इतने अनुत्तीर्ण छात्र किसी प्रकार संतोष कर अगले वर्ष के लिए फिर तैयारी में लग जाते हैं तो उन आत्महत्या करने वालों के लिये ही कोई ऐसा विशेष कारण नहीं है कि वे इतने खिन्न होकर ऐसा अनर्थ कर डालें। पर भावुकता तो आखिर भावुकता ही है। जिसने सफलता के इतने रंगहीन सपने देखे और असफलता को इतना भयङ्कर समझा उनकी समझ के लिये आत्महत्या भी कोई बड़ी बात नहीं है।

यदि मनुष्य सफलता और असफलता को दो समानान्तर रेखाऐं मानकर चले और यह भली भाँति समझले कि किसी भी क्षेत्र में सफलता इतनी सरल नहीं है कि उसे सुनिश्चित ही मान लिया जाय और यह समझ लिया जाय कि इतना लाभ इतने समय में अवश्य ही हो जायगा। जिन लोगों ने सफलताएँ प्राप्त की हैं उसने सपने कम देखे हैं और प्रयत्न अधिक किये हैं असफलताओं और बाधाओं को अप्रत्याशित नहीं माना है वरन् यही समझा है कि अनेक बार असफलता को परास्त करके ही जब कोई अपनी दृढ़ता का परिचय देता है तब सफलता की विजय माला उसके गले में पड़ती है। वे पहले ही से यह सोचकर चलते हैं कि हमें बार-बार असफलता का मुकाबिला करते हुये भी आगे बढ़ते चलना है और धैर्य पूर्वक सफलता प्राप्त होने के दिन तक अविचल भाव से प्रयत्न एवं पुरूषार्थ करने में लगा रहना है।

बीज बोने से लेकर अंकुर पैदा होने, पौधे के बड़े होने, बढ़कर पूरा वृक्ष होने और अंत में फलने- फूलने में समय लगता है, प्रयत्न भी करना पड़ता है पर जो वृक्ष अभी बीज लेकर आज ही उसमें से अंकुर होते ही उसे पेड़ बनने और परसों ही फल-फूल से लदा देखने की आशा करते हैं, उनका उत्साह देर तक नहीं ठहरता। पहले ही दिन वे बीच में दस बार पानी, दसबार खाद लगाते हैं, पर जब अंकुर और वृक्ष सामने ही नहीं आता तो दूसरे ही दिन निराश होकर उस प्रयत्न को छोड़ देते हैं और अपना मन छोटा कर लेते हैं। उन बालकों की सी ही मनोभूति बहुत से व्यक्तियों की होती है। वे अधीरता पूर्वक बड़े-बड़े सत्परिणामों की आशाएँ बाँधते हैं और उसके लिए जितना भ्रम और समय चाहिए उतना लगाने को तैयार नहीं होते । सब कुछ उन्हें तुर्त-फुर्त ही चाहिये। ऐसी बाल बुद्धि रखकर यदि किसी बड़ी सफलता का आनन्द प्राप्त करने की आशा की ज्ञात तो वह दुराशा मात्र ही सिद्ध होगी । इसमें दोष किसी का नहीं अपनी उतावली का ही है। यदि हम अपनी बाल चपलता को हटाकर पुरुषार्थी लोगों द्वारा अपनाये जाने वाले धर्य और साहस को काम में लावें तो निराश होने का कोई कारण शेष न रह जायेगा। सफलता मिलनी ही चाहिए और ऐसे लोगों को मिलती भी है।

गीता के कर्मयोग का तात्पर्य यही है कि हम अपनी प्रसन्नता को कर्तव्य परायणता एवं प्रयत्नशीलता पर अवलम्बित रखें। जो कुछ करें उच्च आदर्शो से प्रेरित होकर करें और इस बात में संतोष आने कि एक ईमानदार एवं पुरूषार्थी व्यक्ति को जो कुछ करना चाहिये था यह हमने पूरे मनोयोग के साथ किया। अभीष्ट वस्तु न भी मिले, किया हुआ प्रयत्न सफल न भी हो तो भी इसमें दु:ख मानने, लजित होने या मन छोटा करने की कोई बात नहीं है, क्योंकि सफलता मनुष्य के हाथ में नहीं है। अनेकों कर्तव्यपरायण व्यक्तियों परिस्थितियों की विपरीतता के कारण असफल होते हैं, पर इसके लिए उन्हें कोई दोष नहीं दे सकता। यदि अपने मन की असफलता की चिन्ता किये बिना अपने कर्तव्य पालन में ही जो संतुष्ट रहने लगे तो समझना चाहिए कि अपना दृष्टिकोण सही हो गया, अपनी प्रसन्नता अपनी मुट्ठी में आ गयी। कर्तव्य पालन पूर्णातया अपने हाथ में है इसे कोई नहीं रोक सकता। यदि प्रसन्नता को कर्तव्य परायणता पर आधारित कर लिया गया है तो अपनी प्रसन्नता भी अपनी मुट्ठी में है और वह डायनुमा से उत्पन्न होती रहने वाली बिजली की तरह कर्तव्य पालन के साथ-साथ स्वयमेव उत्पन्न होकर चित्त को आनन्द, उत्साह और संतोष से भरे रह सकती है।

अपनी प्रसन्नता को जब अपनी मुट्ठी में रखा जा सकता है और हर घड़ी आनंदित रहने का मुसखा मालूम है तो क्यों न उसी का प्रयोग किया जाय ? फिर क्यों इस बात निर्भर रहा जाय कि जब कभी सफलता मिलेगी, अभीष्ट वस्तु प्राप्त होगी तब कहीं प्रसन्न होंगे ? इस प्रतीक्षा में मुद्दतें गुजर सकती हैं और यह भी हो सकता है कि सफलता न मिलेने पर यह प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा जीवन भर हाथ रहे । इसलिये गीताकार ने यह सहज नुसखा हमें बताया है कि फल की प्रतीक्षा मत करो, उस पर बहुत ध्यान भी मत दो, न तो सफलता के लिए आतुरता दिखाओं और न असफलता मिलने पर परेशान होओ। चित्त को शान्त और स्वस्थ रखकर अपने कर्तव्य को एक पुरूषार्थी व्यक्ति की तरह ठीक तरह पालन करो। ऐसा करने से तुम्हें लोक में भी शान्ति मिलेगी और परलोक भी सुधरेगा।

विचारणीय बात यही है कि जब हम अपनी जीवन समस्याओं में से अधिकांश को, अपना भीतरी सुधार करके, अपनी विचार शैली में थोड़ा परिवर्तन करके हल कर सकते है तो फिर उलझन भरो जीवन क्यों व्यतीत करें ? मनुष्य बहुत चतुर है, विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण चातुर्य का परिचय देता है, उसकी बुद्धिमत्ता की जितनी सराहना की जाय उतना ही कम है। पर इतना होते हुए भी जब वह अपने दृष्टिकोण को सुधारने की आवश्यकता को नहीं समझ पाता और उस पर समुचित ध्यान नहीं दे पाता तो उसकी बुद्धिमत्ता पर संदेह होने लगता है। यह प्रयत्न पूर्वक बड़े-बड़े काम सम्पादन करता है, अपने शरीर और मस्तिष्क से बड़े-बड़े महान् कार्य पूरे करता है तब यह बात उसके लिए क्यों कठिन होनी चाहिये कि अपनी मनोरात, भावनागत त्रुटियों पर विचार करे और उन्हें सुधारने के लिए तैयार हो जाय।

आत्मचिन्तन, आत्मशोधन एवं आत्मनिर्माण का कार्य उतना ही सरल है जितना शरीर को सर्वांगासन, मयुरासन, शीर्षासन आदि आसनों के लिए अभ्यस्त कर लेना। आरम्भ में इस झंझट में पड़ने से मन आनाकानी करता है, पुराने अभ्यास को छोड़कर नया अभ्यास डालना अखरता है, कुछ कठिनाई एवं परेशानी भी होती है, यदि अभ्यासी इन बातों से डर कर अभ्यास न करें या छोड़ दे तो आसनों के द्वारा होने वाले सत्परिणामों से लाभान्वित होना संभव न होगा। इसी प्रकार यदि आत्म-निरीक्षण करने में, अपने दोष ढूँढ़ने में उत्साह न हो, जो कुछ हम करते या सोचते हैं सो सब ठीक है, ऐसा दुराग्रह हो तो फिर न तो अपनी गलतियाँ सूझ पड़ेगी और न उन्हें छोड़ने को उत्साह होगा। वरन् साधारण व्यक्तियों की तरह अपनी बुरी आदतों का भी समर्थन करने के लिये दिमाग कुछ तर्क और कारण ढूँढ़ता रहेगा जिससे दोषी होते हुए भी अपनी निर्दोषिता प्रमाणित की जा सके।

अधिकांश मनुष्यों की मानसिक बनावट ऐसी होती है कि वे अपने आपको हर बात में निर्दोष मानते हैं। अपनी बुराइयाँ उसी प्रकार सूझ नहीं पड़ती जिस प्रकार अपनी आँख में लगा हुआ काजल दिखाई नहीं देता। कोई दूसरा व्यक्ति यदि अपनी गलती सुझाये भी तो मन इस बात के लिए तैयार नहीं होता कि उसे स्वीकार करे। हर आदमी दूसरे के दोष ढूँढ़ने में बड़ा चतुर और सूक्ष्मदर्शी होता है, उसकी आलोचना शक्ति देखते ही बनती है, पर जब अपना नम्बर आता है तो वह सारी चतुरता सारी आलोचना शक्ति न जाने कहाँ गायब हो जाती है। जैसे खोटा व्यापारी खरीदने और बेचने के बाँट तोल में घटे बढ़े बना कर अलग-अलग रखता है और बेचने के समय घटे बाँट को और खरीदने के समय बढ़े बाँट को काम में लाता है, उसी प्रकार दूसरों की बुराइयाँ ढूँढ़ने में हमारी दृष्टि अलग तरीके से और अपनी बात आने पर और तरीके से काम करती है। यदि यह दोष हटा दिया जाय और दूसरों की भाँति अपनी बुराई भी देखने लग जायें, दूसरों को सुधारने की चिन्ता करने की भाँति यदि अपने सुधारने की भी चिन्ता करने लगें तो इतना बड़ा काम हो सकता है जितना सारी दुनियाँ को सुधार लेने पर ही हो सकता है जितना सारी दुनियाँ को सुधार लेने पर ही हो सकना संभव है। ।

महात्मा इमर्सन कहा करते थे कि “मुझे नरक में भेज दो, मैं वहाँ भी अपने लिये स्वर्ग बना लूँगा।” उनका यह दावा इसी आधार पर था कि अपनी निज की अन्तःभूमि परिष्कृत कर लेने पर व्यक्ति में ऐसी सूझ-बूझ की, गुण कर्म स्वभाव की उत्पत्ति हो जाती है जिससे बुरे व्यक्तियों को भी अपनी सज्जनता से प्रभावित करने एवं उनकी बुराइयों का अपने ऊपर प्रभाव न पड़ने देने की विशेष क्षमता सिद्ध हो सके। यदि ऐसी विशेषता कोई व्यक्ति अपने में पैदा कर ले तो यही माना जाएगा कि उसने सारे संसार को सुधार लिया। यों सबका सुधार हो सकता असंभव है पर जब अपने दृष्टिकोण एवं स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन करके ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली गई कि बुरे आदमी भी अपना कुछ न बिगाड़ सकें तो यही मानना पड़ेगा कि अपने लिये तो संसार सुधर ही गया। भले ही वह तत्व ज्यों का त्यों बना रहे। ।

जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये भी सबसे प्रथम अनिवार्य रूप से आत्म निरिक्षण और आत्म सुधार ही करना पड़ता है। भगवान का नाम स्मरण करने, जप तप, पूजा-पाठ के अनुष्ठान करने का उद्देश्य भी यही है कि मनुष्य भगवान को सर्वव्यापी एवं न्यायकारी होने की मान्यता को अधिक गहराई तक हृदय में जमा ले ताकि दुष्कर्मों से डरे और सत्कर्मों में रुचि ले। ईश्वर उसी से प्रसन्न होता है जिसका अन्त करण शुद्ध है, उसकी पूजा एवं प्रार्थना को वह सुनता और स्वीकार करता है। आत्मा पर चढ़े हुए मल आवरणों का हटाने के प्रयत्न का नाम ही तप साधन है उसे निर्मल निर्विकार बनाने में जितनी । सफलता मिलती जाती है उतना ही देवत्व अन्दर बढ़ता जाता है और परमात्मा की समीपता निकट आती जाती है। विकारों से पोर्णा निर्मल हो जाने पर ही आत्मा जीवनमुक्त होकर परमात्मा स्वरूप बन जाता है। आत्मोन्नति की यही एकमात्र प्रकृया है जिसे विभिन्न धर्म शास्त्रों ने, विभिन्न मार्ग दर्शकों ने देश काल पात्र के अनुसार विभिन्न रूपों में उपस्थित किया है।

अपने आपको सुधारने का प्रयत्न करना, अपने दृष्टिकोण में गहराई तक समाई हुई भ्रान्तियों का निराकरण करना मानव जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। इन्हें यह करना ही चाहिए। वरन् सबसे पहले सबसे अधिक इसी पर ध्यान देना चाहिए। अपना सुधार करके न केवल हम अपनी सुख-शांति को चिरस्थायी बनाते हैं वरन एक प्रकाश स्तम्भ बन कर दूसरों के लिये भी अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित करते हैं। इस प्रयत्न को किसी भी बड़े पुण्य परमार्थ से किसी भी जप से कम महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।।


प्रेम साधना के पथ पर

कुछ सूक्ष्म दृष्टि से एवं जीवन की निम्न भूमिका के ऊपर उठकर देखने पर पता चलता है कि सारा विश्व एवं इसके सम्पूर्ण पदार्थ एक ही नियम के अंतर्गत दिखाई देते हैं। ऊर्ध्वगामी, दिव्य जीवन की पवित्र भूमिका में पहुँचने पर तो यह नियम प्रत्यक्ष दिखाई देता है। उस एक ही नियम के कारण जीव और निर्जीव दोनों अपने पर्यायों को बदलते रहते हैं। वे कायम और सुरक्षित रहते हैं और विकास को प्राप्त करते हैं। वह नियम है प्रेम का नियम। प्रेम जीवन के लिए एक आवश्यक तत्व ही नहीं वस्तुतः वह जीवन का एकमात्र नियम है। प्रेम ही जीवन है ऐसा कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। इसलिए जीवन साधना के साधक प्रेम की साधना को ही अपनाते हैं और इसी से अन्त में प्रेम के इस अनन्त सागर में विलीन होकर स्वयं प्रेम स्वरूप बन जोत हैं जैसे एक पानी की बूँद समुद्र में मिल कर समुद्र बन जाती है। फिर वहाँ प्रेम का साम्राज्य होता है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।

प्रेम में सुरक्षित रहने की शक्ति है। प्रेम का आधार पाकर विश्व भवन खड़ा है। प्रेम के समाप्त होते ही तत्क्षण इसका विनाश निश्चित है। प्रेम के कारण ही विश्व में जीवन कायम है। जब व्यक्ति प्रेम के नियम का उल्लंघन करके प्रतिद्वन्द्वी बन जाते हैं तो वहीं से दोनों के विनाश की लीला प्रारम्भ हो जाती है। आज विश्व मुख्यतया दो गुटों में बँटा हुआ है। इन दोनों गुटों में जब तनाव, उत्तेजनात्मक वातावरण बन जाता है तो विश्व के शुभ चिन्तक चिन्तित हो जाते हैं। परस्पर प्रेम में ही सुरक्षा समृद्धि और विकास निहित हैं इसके विपरीत विनाश ही हो सकता है। मनुष्य हृदय में जब तक पूर्ण प्रेम नहीं होता उसमें द्वेष, घृणा का निवास होता है तभी वह संसार के नियम को कठोर समझता है किन्तु जब ये दूषित तत्व समाप्त हो जाते हैं तो उसका हृदय दया और प्रेम से द्रवित हो उठता है, और वह संसार के नियम में असीम दयालुता और प्रेम पाता है। जब मनुष्य प्रेम के नियम को उल्लंघन करता है तभी तो दुखों, हानियों एवं परेशानियों से पड़ जाता है। जीवन भार बन जाता है।

प्रेम ही सम्पूर्ण सुखों का आधार है। आज प्रत्येक व्यक्ति सुखी जीवन के लिए तरह-तरह के साधन जुटाता है। सुख के लिये हर क्षण प्रयत्न भी करता है किन्तु फिर भी अधिकांश लोग दुखी एवं क्लान्त दिखाई देते हैं। इसका एकमात्र कारण है वे प्रेम को छोड़कर अन्यत्र सुख की खोज करते हैं जो बालू में से तेल निकालने जैसा प्रयत्न है। सुख भोगने के लिए प्रेम को जीवन में उतारना होगा। इसी की साधना करनी होगी।

निस्वार्थ सच्चा प्रेम ज्ञान भी है, शक्ति भी। जो प्रेम की प्रेरणा से कार्य करता है उसे न कोई कठिनाई आती और न कोई उसका साथ छोड़ते हैं। यदि कोई कठिनाई आवे तो भी साथियों की मद्द और प्रेम के वातावरण में उसका कोई महत्व नहीं रहता । जिसने प्रेम करना सीख लिया उसने अपनी असफलता को सफलता में, प्रतिकूल को अनुकूल में, प्रत्येक घटनाओं और परिस्थितियों को सुख एवं सुन्दरता में ढालना सीख लिया । वस्तुत: मनुष्य के ज्ञान एवं शक्ति का विकाश प्रेम में ही निहित है अन्यत्र नहीं।

प्रेम मनुष्य को अजेय बनाता है, अभय करता है। प्रेम का सन्देश ही यह है कि समस्त विश्व में ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो हानिकारक हो । स्वयं पाप, विकार, असुरता, जिन्हें जन -साधारण शक्तिशाली और दुर्जय समझते हैं वे भी प्रेम के समक्ष निर्बल और नाशवान ठहरते हैं, प्रेम के समक्ष इनका अस्तित्व इसी प्रकार समाप्त हो जाता है जैसे प्रकाश के समय अन्धकार । प्रेम में हिंसा नहीं है वस्तुत: अहिंसा ही प्रेम का दूसरा नाम है। प्रेम पथ का पथिक जब दूसरों की हिंसा करने के विचारों , इच्छाओं को ही नष्ट कर देता है, तो सब ओर से उसके रक्षक और हितैषी मिल जाते हैं। तब वह अपने को अजेय समझता है। प्रेम दण्ड नहीं देता। दण्ड का विधान मनुष्य की अपनी ही द्वेष बुद्धि एवं संसार के प्रेम नियम के उल्लंघन में ही है। प्रेम को भूल कर जब मनुष्य अपने आपको ही देखता है वहीं दु:खों का प्रारम्भ हो जाता है और फिर उसका बनाया हुआ दण्ड विधान लागू होता है। प्रेम दण्ड से नहीं वरन प्रेम से शासन करता है, जहाँ न परतन्त्रता होती है न कोई अभाव।

शारीरिक दृष्टि से महात्मा गाँधी वजन में ९६ पौंड हड्डियों का ढाँचा मात्र थे। न कोई रूप का आकर्षण था न कोई कला। फिर भी उनके मनमें जो विचार आया उसको पूर्ण करने के लिए अनेकों व्यक्ति तैयार हो गये । लाखों उनकी अँगुली के इशारे पर तैयार थे। मुँह से जो बात निकलती सारा जन समाज उसे पालन करने को कटिबद्ध हो जाता। जिधर उनके कदम बढ़ते उधर अनेकों कदम चल पड़ते। जिधर दृष्टि पड़ती उधर अनेकों नेत्र लग जाते ? यह शक्ति कहाँ से आई ? उनके प्रेम से प्रेम में अकूतं शक्ति भण्डार सन्निहित है ? जो मनुष्य प्रेम को ईश्वर का आदेश मानकर जीवन का सम्बल बनाता है, प्रेम के नियम में अपनी तुच्छ इच्छा को दखल नहीं देने देता उसमें दैवी शक्ति जाग्रत हो जाती है और उससे महान कार्य होते हैं। प्रेम से विवेक जाग्रत होता है। बुद्धि प्रकाशित हो उठती है प्रेम के बिना वह अन्धी और निर्जीव रहती है। जो कार्य बुद्धि द्वारा नहीं होते प्रेम उसे कर दिखाता है। प्रेम उन बातों को जान लेता है जिन्हें बुद्धि नहीं जान सकती ?

प्रेम से ही अमर शान्ति की प्राप्ति होती है। जिसके हृदय में प्रेम है वहाँ अशान्ति, उद्वेग पहुँच नहीं सकते। यदि अपना दाव चलाते हैं तो स्वयं ही नि:शेष हो जाते हैं। प्रेम के साधक के मस्तिष्क और हृदय में शान्ति रहती है। प्रेम के सहारे चलकर ही एक दिन मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है। ईश्वरीय सत्ता का साम्राज्य प्राप्त कर लेता है।

जहाँ प्रेम में इतनी शक्ति और ज्ञान निहित है वहाँ प्रेम साधना भी कुछ कम कठिन नहीं है। बिरले ही इसकी अन्तिम मञ्जिल तक पहुँचते हैं। प्रेमोपासना के कुछ नियम अवश्य हैं जिन्हें पूरा किये बिना उद्देश्य में सफलता नहीं मिलती हैं ?

प्रेम सदैव त्याग पर अवलम्बित रहता है। बिना दिए प्रेम जीवित ही नहीं रहता । जो जिससे प्रेम करेगा उसके लिये कुछ उत्सर्ग करके ही शान्त होगा। मीरा ने प्रेम किया था गिरधर गोपाल से, वह सर्वस्व त्याग कर वृन्दावन की ओर चल पड़ी थी। महात्मा गांधी का देश प्रेम व ईश्वर प्रेम प्रसिद्ध है जिससे उन्होंने अपने जीवन को सम्पूर्ण रूप से अपने प्रेमपात्रों को अर्पण कर दिया । वस्तुत: मनुष्य जब प्रेम करता है तो अपनी ही हानि करता है लौकिक दृष्टि से, जिसे त्याग भी कहा जाता है। कि वास्तव में यह प्रेम की एक आन्तरिक दशा हे देने को बाध्य करती है, अपना स्वयं का ख्याल नहीं करती। उत्सर्ग पर ही, त्याग पर ही प्रेम जीवित रहता है। प्रेम साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए त्याग को जीवन में अपनाना आवश्यक है। ज्यों-ज्यों त्याग वृत्ति बढ़ेगी प्रेम का पौधा भी उसी क्रम में बढ़ता जायेगा और सम पर जब फलित और पुष्पित होगा तो सारा वातावरण उसकी मधुर गंध से महक उठेगा, जहाँ मनुष्य को अपार शक्ति, आनन्द, सन्तोष, प्रसन्नता प्राप्त होगी।

प्रेम सहिष्णु होता है वह सब कुछ सहता है यही तो सच्चे प्रेम की पहिचान है। ईश्वर प्रेम के पीछे लोग कितने दुःख और परेशानियाँ सहन करते हैं। मीरा ने जहर का प्याला पिया, दयानन्द को सत्रह बार जहर खाना पड़ा और अपमान सहन करना पड़ा। कितने ही देवभक्तों ने देश प्रेम के लिए अपने बलिदान किए, भयंकर यातनाएँ सहन कीं। मासूम बच्चे दीवारों में चुनना दिये गये किन्तु यह सब किस लिए? प्रेम के लिए। प्रेम भरपूर सहनशीलता चाहता है। क्रोध अथवा झुँझलाहट उसके पास नहीं फटकते। आपत्तिकाल को भी प्रेम सहिष्णुता के माध्यम से सुखमय बना लेता है। प्रेम शिकायत नहीं करता जो कुछ आये उसे सहन करने को तैयार रहता है तभी तो प्रेम साधना की सुदीर्घ मंजिल प्राप्त होती है। प्रेमी सभी परिस्थितियों का सहर्ष स्वागत करता है। जिससे भी प्रेम का नाता जोड़ लिया है उसके लिये सब कुछ सहन करना, अपने प्रेम सम्बन्ध को ही प्रमुख मान अन्य परिस्थितिजन्य झंझावातों से, कठिनाइयों से विचलित न होना, उन्हें सहर्ष सहन करना ही सच्चे प्रेम के लिए अभीष्ट है।

निस्वार्थता प्रेम का मूलाधार है। जो प्रेम किया जाय वह निस्वार्थ हो। स्वार्थ ही गन्दी बू प्रेम में पैदा हो जाती है तो वह प्रेम नहीं रहता प्रत्युत पाप बन जाता है, यह स्वार्थ भले ही कैसा भी हो, प्रेम पथ के पथिक के लिये सर्वथा त्याज्य है। स्वार्थ मय प्रेम संकुचित होता है इसलिए वह दुखदायी और भार स्वरूप होता है। थोड़ा और बहुत स्वार्थ भी प्रेम को कलंकित करता है।

प्रेम ही जीवन है, जीवन ही प्रेम है। प्रेम साधना ही जीवन साधना है। प्रेम साधना के पथ पर अग्रसर होकर अपने सारे भेद भावों, विकारों को निकालकर सब से प्रेम करना शुरू कीजिये। उस परमपिता परमात्मा से प्रेम कीजिए। उसके बताए हुए विश्व से, मानव जाति से, पशु-पक्षियों से सब से प्रेम कीजिए। प्रेम से ही जीवन को सराबोर कीजिए। अनन्त जीवन धार की एक कड़ी रूप में ही यह हमारा भौतिक जीवन हे। प्रकृति के विधान के अनुसार यह शरीर और अनन्य जगत समय पर नष्ट हो जाता है किन्तु जीवन धारा अगाध गति से चलती रहती है। वही सत्य है सत्य के लिये समग्र के लिए ही प्रेम कीजिए। प्रेम, प्रेम सर्वत्र प्रेम ही के दर्शन कीजिए। चार दिन की जिन्दगी के लिये तुच्छ स्वार्थ, अहंकार, संग्रह के लिए जीवन को नष्ट करना, जीवन के साथ विश्वासघात है, ईश्वर के प्रति विश्वासघात है। प्रेम-स्वरूप यह सृष्टि और हमारा जीवन प्रेममय होने के लिए ही है।

(श्री शारदा कान्त त्रिवेदी)


श्रम-यज्ञ

सन् 1919 की रूस की राज्य-क्रान्ति के अवसर पर मास्को के पास कही एक महत्त्वपूर्ण रेलवेलाइन टूटी पड़ी थी। वहाँ के बहुत से मजदूरों ने अपना शनिवार की छुट्टी का समय अवैतनिक रूप से देकर इस लाइन की मरम्मत करने का निश्चय किया। रूस के कर्ता धरता लेनिन घायल होने पर भी इस कार्य में भाग ले रहे थे और दिन भर लट्ठों को अपने कंधे पर ढोते थे। वर्ष भर पूरा हो जाने पर मजदूरों ने इस श्रम-यज्ञ की वर्षगाँठ मनाई। उस अवसर पर भाषण करते हुए लेनिन ने कहा-साम्यवादियों का श्रम समाज-कल्याण के लिये होता है। वह किसी इनाम या आर्थिक लाभ के लिये नहीं वरन ‘बहुजन हिताय’ अर्पित किया जाता है।”