आ देवानाम भवः केतुरग्ने। -ऋग्. 3।1।17
केवल श्रेष्ठ व्यक्ति ही जनता के नेता बनें।
चरित्रहीन लोगों के हाथों में नेतृत्व न पहुँचने दो।
ॐ कदु प्रचेतसे महे वचो देवाय शस्यते। सामवेद पू० ३.१.४.२
सत्येश्वर की स्वल्प भक्ति भी, देती सुफल महान।
तन्मय होकर अत: करें हम, प्रतिपल उसका ध्यान ।।
भक्ति हमारी लघु हो लेकिन, वह आराध्य महान ।
चेतन घन सद ज्ञान मूल है, गुण गौरव की खान।।
जीवन उन्नत करना उसका, क्षण भर का भी ध्यान।
तन मन रोमांचित कर देता, स्मृति सरिता मे स्नान ।।
उसकी करुणा निर्भर के कण, करते रस संचार।
करती विपुल विभव की वर्षा, उसकी दया अपार।।
उसकी आशीष पयस्विनी में, अवगाहन सुख सार।
उसकी विमल ज्ञान की धारा है, संजीवन आधार ।।
उसकी वरदा सुख वर्षा की, स्नेह सुधामय धार।
तन,मन,आत्मा शीतल करती, भरती शांति अपार ।।
उसकी विमल भक्ति में कुछ भी, कमी न पलभर ध्यान बँटे।
उसके नियमित आराधन से, मन न हटे, इच्छा न घटे।।
बढ़े विवेक, विनय, मद्विघा, शक्ति, प्रीति, नय, नीति बढ़े।
सत्यभक्त के यत्न सफल हो, अक्षय सद्गति सुमति बढे।।
यज्ञदत्त 'अक्षय'
खुशामद बड़े-बड़ों को ले डूबती है!
भगवान कृष्ण के समय में चरणाद्रि चुनाव में पोंएड्रक नाम राजा शासन करता था। उसके दरबारी बड़े खुशामदी थे। वे कहते थे-आप का साक्षात भगवान वासुदेव हैं। आपने भूमार उतारने को अवतार लिया है। हम सब का धन्य भाग है जो आपका नित्य दर्शन करते हैं।” इस प्रकार की चिकनी चुपड़ी बातें कहकर वे उस मूर्ख बनाया करते थे। उन लोगों की बातें सुनते-सुनते वह वास्तव में अपने का भगवान का अवतार समझने लगा। उसने अपने दो नकली हाथ भी लगवा लिये और वह चारों हाथों में भगवान विष्णु के तरह शंख, चक्र, गदा और पद्य धारण किये रहता था। धीरे-धीरे उसका अहंकार इतना बढ़ गया कि उसने अपना एक दूत द्वारिकापुरी को भेजा और श्रीकृष्ण से कहलवाया कि “तुम भी अपने को वासुदेव कहते हो और विष्णु का असली अवतार तो मैं ही हूँ। अब तुम इन सब चिह्नों को त्याग दो अन्यथा मैं युद्ध में तुम्हारा नाश कर डालूँगा।” पौण्ड्रके के संदेश को सुनकर राज्य-सभा के सदस्य हँसने लगे और कृष्ण भगवान ने दूत थे कहा कि “पौण्ड्रक से कहना कि मैं चरणाद्रि आता है और वहाँ आकर युद्ध में इन चिह्नों को त्याग दूँगा।”
जब श्रीकृष्ण पौण्ड्रक की राजधानी के पास अकेले ही रथ पर चढ़ कर पहुँचे तो वह एक अक्षौहिणी सेना लेकर उनसे युद्ध करने निकला। पर उस समस्त सेना को भगवान ने थोड़ी सी देर में ही अपने दैवी अस्त्रों द्वारा नष्ट कर दिया। तब उन्होंने पोण्ड्रक से कहा कि “तुमने जिन चिह्नों का छोड़ने को कहलवाया था अब उनका मैं छोड़ रहा हूँ, तुम सँभाल लेना।” यह कहकर उन्होंने गदा फेंकी जिसके प्रकार से पौण्ड्रक रथ चूर-चूर हो गया। वह कूद कर पृथ्वी पर खड़ा हुआ तो सुदर्शन चक्र ने उसका मस्तक उड़ दिया। उस समय खुशामद करने वालों का पता भी नहीं लगा कि वे कहाँ गये।
(श्री जाह्नवीचरण वानप्रस्थी)
पदार्थ अपने बाह्य स्वरूप में बहुत ही तुच्छ होता है, मोटी दृष्टि से देखने में वह एक छोटा-बड़ा उपयोगी निरुपयोगी तथा अपनी विशेषताओं युक्त एक साधारण सा कलेवर मात्र प्रतीत होता है। कला का उद्देश्य इस कलेवर के अन्तराल में छिपे हुए सौंदर्य को प्रकट करना है। समस्त कलाएँ इसी उद्देश्य की पूर्ति में लगी हुई हैं। मनुष्य प्रकृति के जिस गुह्य सौंदर्य का अपनी मोटी दृष्टि से नहीं देख पाता उसके लिए यह संभव करती है कि गुहा को देख और समझ सके। कला की खरीद पर खरीदा गई हर वस्तु चमकती है, अपना अन्तः सौंदर्य सब के सामने प्रकट कर सकने में समर्थ होती है। इसीलिए कला का इतना मान और महत्व है। कला रहित को पुच्छविषाण हीन पशु इसीलिए कहा गया है कि उसे पदार्थों में अन्तर्हित दिव्य सत्ता का मान न हो सका केवल उसने वस्तुओं का बाहरी रूप ही देखा, जैसा कि मन्द बुद्धि के पशु देखते हैं।
संसार में अनेक कलाएँ और उनकी सहायता से प्रकृति के गर्भ में पग-पग पर दिये हुए सौंदर्य का उद्घाटन होता है। उसकी अनुभूति से मनुष्य की आत्मा आनन्द विभोर हो उठती है, उसका उल्लास थिरकने लगता है। इसे काले कुरूप, दुःख दैन्य में भरे भवसागर कहे जाने वाले संसार के कण-कण को सुरम्य पुष्पोद्यान की तरह मनोरम अनुभव कराने की शक्ति कला में ही है इसलिए कला का उपासक ही इस संसार के मनोरम सौंदर्य का रसास्वादन कर पाता है। कला विहीन के लिए यहाँ जो कुछ भी है वह कहा कचरा, बन्धन और विद्रूप ही है।
अध्यात्म। आध्यात्मिक अनुभूतियों के जागरण से प्रकृति के सौंदर्य को, पदार्थों में छिपे लालित्य को समझ सकना संभव होता है। किसी चित्र की सुन्दरता को देखकर प्रसन्नता प्राप्त कर सकना तभी संभव है जब आँखों में ज्योति हो। यदि ज्योति ही नहीं तो अन्धी आँखें उस सुन्दर चित्र में से क्या प्राप्त करेंगी? कलाकारों के मधुर कंठ और सुन्दर वाद्य का रस तभी मिलेगा जब कान के पर्दे ठीक काम करते है। बहरा व्यक्ति न उस गान का रस प्राप्त कर सकेगा और न वाद्य का। इसी प्रकार अध्यात्म के आधार पर विकसित हुआ अन्तःकरण की इस संसार के विभिन्न पदार्थों में सौंदर्य देख सकता है, वही विभिन्न प्राणियों और पौधों में अपने समान आत्मा देखकर उन्हें कुटुम्बी की दृष्टि से देखता हुआ प्रसन्न हो सकता है और वही मनुष्य के अन्दर भरी हुई महानता को अनुभव करके उसे ईश्वर का निकटतम प्रतिनिधि मानकर श्रद्धा से उसके आगे अपना मस्तक झुका सकता है।
बेशक मनुष्य स्वार्थी है, दुष्ट है, अनेक दुर्गुणों और कुसंस्कारों से भरा है, इतने पर भी ईश्वर की दिव्य सत्ता उसके अन्दर जगमगाती है और कितना ही गया बीता होने पर भी इतने अधिक सद्गुण और दिव्य तत्त्व उसके अन्दर शेष रहते हैं कि उनके आगे उन दुर्गुणों की तुलना उतनी ही है जितनी सिर के सुन्दर केशों में जुएँ की। गुलाब के खिले हुए सुगन्धित पुष्प में काँटे भी होते हैं पर उन काँटों के रहते हुए भी गुलाब प्रशंसनीय ही माना जाता है। मनुष्य में चाहे कितने ही दोष दुर्गुण क्यों ने हों वे सब मिलकर भी उसकी शाश्वत श्रेष्ठता से बढ़कर कर सकते। पर इस तथ्य की अनुभूति हो? इसे ही अपना उस श्रेष्ठता को देख सकना सम्भव न होगा। सोई हुई अन्तरात्मा तो केवल बाह्य कलेवर को ही देख सकेगी। हमारी अपनी संकीर्णता, कुरूपता और गंदगी, दूसरों में अपने सरीखे दोषों को ही ढूँढ़ निकालेगी। गुबरीला कीड़ा नंदन बन में छोड़ा जाय तो वहाँ भी गोबर और गंदगी ही ढूँढ़ निकालेगा। गुलाब की गंध ढूँढ़ने के लिए भ्रमर जैसी नाक होनी चाहिए। फूलों में से मधु संचय करने के लिए मधु जैसी कुशलता होनी चाहिए।
मानव प्राणी की आत्मा में अनन्त सौंदर्य भरा पड़ा है, उसके अन्दर सात्विकता की एक भारी मात्रा मौजूद है। समस्त ऋषियों और देवताओं की सत्ता इस मानव पिण्ड में मौजूद है पर उस देख कौन? देखने वाले हमारे यंत्र टूटे पड़े हैं। पशु जिस प्रकार संसार में प्रकृति के सर्वत्र बिखरे हुए सौंदर्य को नहीं समझ पाते उसी प्रकार मनुष्य भी विभिन्न आत्माओं में भरे पड़े दिव्य सौंदर्य को भी कहाँ देख पाता है? अध्यात्म के अभाव में उसकी स्थिति एक प्रकार के अन्धे के समान हो रही है।
दूसरों की बात जाने दीजिए हम अपने आपको भी कहाँ देख और समझ पाते है ? अपने स्त्री बच्चों में, स्वजन संबंधियों में, जो अनेकों सद्गुण, अनेक सद् वृत्तियों, अनेकों सद्भावनाएँ, तथा विशेषताएँ भरी पड़ी हैं उन्हें देखने समझने की क्षमता हममें कहाँ है? इस अभाव के कारण वे हमें केवल रूखे, फूहड़, कुरूप, एवं भार स्वरूप मालूम पड़ने हैं क्या वस्तुतः वे ऐसे ही हैं ? क्या सचमुच उनमें कोई ऐसी विशेषता नहीं है जो हमें उल्लास एवं आह्लाद प्रदान कर सकें ? क्या वे केवल भार भूत ही पैदा हुए हैं? क्या उनमें ईश्वर ने ऐसा कुछ परिश्रम नहीं किया है जिसकी अनुभूति से हम आनन्द लाभ कर सकें?
हमारी दृष्टि में सौंदर्य भावना का न होना ही संसार में कल्पना दीखने का एकमात्र कारण है। बेचारा अन्धा किसी मनोरम दृश्य से क्या अनुभूति ग्रहण करेगा? वस्तुतः इस संसार में सर्वत्र सौंदर्य ही सौंदर्य बिखरा पड़ा है, सर्वत्र रस ही रस टपक रहा है। उल्लास और आह्लाद प्रदान करने वाले तत्त्व हर वस्तु में हर प्राणी में, हर व्यक्ति में भरी पड़े है। उसे ढूँढ़ सकने, समझ सकने और अनुभूति में उतार सकने की आध्यात्मिक क्षमता की कला कहते हैं। कला कोई विग या कारीगरी नहीं है। संगीत, कविता, नृत्य, वाद्य, गायन, सज्जा चित्रकारी, मूर्ति निर्माण आदि तो उसे विकसित करने के माध्यम मात्र हैं। कला का प्राण है- आध्यात्म। वह दृष्टिकोण जिसके द्वारा पदार्थों के बीच छिपे हुए सृष्टा के सौंदर्य को खोज निकालने में हम सफल होते हैं।
कला में जो रस है वह ईश्वर दर्शन के आनंद की एक हलकी सी झाँकी है। कला का उद्देश्य यही है कि मनुष्य अपने चारों और बिखरे हुए-जड़ चेतन में ओत प्रोत अनन्त सौंदर्य को, सत्य और शिव की झाँकी करें। इसी लिए कला को जीवन दर्शन का उद्गम कहा गया है और जो कला रहित हैं उन्हें सींग पूछ रहित पशु कहा गया है।
-जिनके हृदय में दया धर्म बसते हैं, जो अमृतवाणी बोलते है और जिनके नेत्र नम्रता वश नीचे रहते हैं असल में वे ही ऊँचे है।
-मलूकदास
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-जिसमें सत्य और सेवा पूर्ण रूप से प्रकट हो, वह संसार के हृदयों का साम्राज्य अवश्य भिगोया और अपनी मनोभिलाषा पूर्ण करेगा।
-महात्मा गाँधी
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-जो उपकार जताने का इच्छुक है उसे द्वार खटखटाना पड़ता है, पर जिसमें प्रेम है उसके लिये द्वार खुला है।
-रवीन्द्रनाथ
गायत्री मंत्र के द्वारा जिस प्राण विद्या की साधना की जाती है। वह ब्रह्म विद्या ही है। जप अनुष्ठान और पुरश्चरणों के द्वारा मनोभूमि को शुद्ध किया जाता है। जिस प्रकार किसान अपनी कृषि भूमि को हल चलाकर जोतता है और उसे इसे योग्य बनाता है कि बीज भली प्रकार उगे वैसे ही आत्म कल्याण का पथिक भी अपनी मनोभूमि को माला रूपी हल के आधार पर कुसंस्कारों से परिमार्जित करके इस योग्य बनाता है कि उसमें उपासना के बीज भली प्रकार उग सकें। प्राण ही वह बीज है जो आगे चलकर साधक के सामने शक्ति एवं सिद्धि के रूप में प्रकट होता है। गायत्री उपासक के लिए जप की प्रथम कक्षा पूर्ण कर लेने के बाद दूसरी कक्षा प्राण साधना को ही है। गायत्री शब्द का अर्थ ही-प्राण का उत्कर्ष करने वाली प्रक्रिया है।
गायत्री उपासक जिस प्राण विद्या का साधन करता है वह परब्रह्म सत्ता की प्रचण्ड आध्यात्मिक शक्ति है। इसे ही ब्रह्म ऊष्मा (लेटेन्ट हीट) भी कहते हैं। उपासना के द्वारा साधक अपनी अन्तरात्मा में इस शक्ति जितना मात्रा में अपने अन्दर धारण कर लेता है उतना ही वह प्राणवान- आत्मबल सम्पन्न बनता जाता है।
मूर्ति में प्राण को प्रत्यक्ष ब्रह्म मानकर उसका अभिनन्दन किया गया है-
बायोत्वं प्रत्यक्ष ब्रहासि -ऋग्
“हे प्राण वायु आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं।”
प््राणयनमो यस्य सर्व मिंद वशे,
“उस प्राण को नमस्कार है जिसके वश में सब कुछ है, जो सब का स्वामी है, जिसमें सब समाये हुए हैं।”
प्राण को ही ऋषि माना गया है। मन्त्र दृष्टों ऋषियों का ऋषित्व उनके शरीर पर नहीं वरन् प्राण पर अवलम्बित है। इसलिए विभिन्न ऋषियों के नाम से उसका ही उल्लेख हुआ है। इन्द्रियों के नियंत्रण को कहते हैं गृत्स’। कामदेव को कहते है ‘मद’ । यह दोनों ही काय प्राण शक्ति के द्वारा सम्पन्न होते है इसलिए उसे ‘गृत्समद’ कहते हैं। ‘विश्वं मित्र’ यस्य असौ विश्वामित्र । प्राण का यह समस्त विश्व अवलम्बन होने से मित्र है, इसलिए उसे विश्वामित्र कहा गया है। बननीय, भजनीय, सेवनीय और श्रेष्ठ होने के कारण उस ही वाम वे कहा गया। ‘सर्वे पाप्मनोडबायत इति आत्रिः’। सब को पाप से बचाता है इसलिए वही अत्रि है। इस बाज रूप शरीर का भरण करने से भरद्वाज भी वही है। विश्व में, सबसे श्रेष्ठ विशिष्ट होने से वशिष्ठ भी वही हुआ। इसी प्रकार प्राण के अनेक नाम ऋषि बोधक हैं।
प्राण वा ऋषयः। इमौ एव गौतम भरद्वाजौ। अयमेय गौतमः अयं भरद्वाजः। इमौ एव विक्ष्वामित्र जमदग्न॥ अयमेव विश्वामित्रः अयं जमदग्निः। इमौ एव वशिष्ठ कश्यपौ। अयमेव वशिष्ठः अयं कश्यपः। वागवात्रिः।
सत प्राण ही सात ऋषि हैं। दो कान गौतम और भरद्वाज हैं। दो आँखें विश्वामित्र और जमदग्नि हैं। दो नासिका छिद्र वशिष्ठ और कश्यप हैं वाक् अत्रि है।
अर्वग् विलश्चमस ऊर्ध्ववुध्न
स्तस्मिन्यशो निहितं विश्व रुपम्।
तस्या सत ऋषयः सप्त तारे
वागष्टमी ब्राह्मणा संविदाना।
-वृहदारण्यक 2।2।3
ऊपर पैर और नीचे मुँह वाला चम्मच यह शिर ही है। इस में प्राण रूप में विश्व यज्ञ रखा हुआ है। इसके किनारों पर सातों ऋषि निवास करते हैं। और आठवीं संयनस वाक् ब्रह्म के साथ निवास करती है।
गायत्री के द्वारा जिस प्राण शक्ति की उपासना की जाती है, वह ही देख तत्त्व का केन्द्र हैं इस उपलब्ध करके मनुष्य देवत्व का-देव सत्ता का प्रत्यक्ष दर्शन अपने भीतर करता है। शिर में सहस्र दल कमल के स्थान पर जो सहस्र देवताओं का कोष है वह प्राण मन और अन्न के द्वारा ही आवृत हो जा रहा है। अभक्ष्य अन्न का त्याग कर मन का संयम करते हुए जो प्राण साधना की जाती है उससे वे सहस्र दल वाले देवतत्व जागृत होते और साधक पर शान्ति का वरदान बरसाते है।
तद्वा अथर्वणः शिरों देवकोशः समुब्जितः।
-अथर्व 10।2।27
यह शिर ही बन्द किया हुआ देवताओं का कोश है। प्राण, मन और अन्न इसकी रचा करते हैं।
प्रज्ञापतिश्चरति गर्भे त्वमेव प्रति जायसे। तुम्हें प्राण प्रजास्त्वि मा वर्लि हरन्ति यः प्राणैः प्रति निष्ठिता
-प्रश्नोपनिषद् 2।7
हे प्राण, आप ही प्रजापति हैं, आप ही गर्भ में विचरण करते है आप ही माता पिता के अनुरूप हो कर जन्म लेते है, यह सब प्राणी आप को ही आत्म समर्पण करते हैं। वह प्राणों के साथ ही प्रतिष्ठित हो रहा है।
मनुष्य की काया में जो कुछ है वह प्राण का हो खेल है। प्राण निकल जाने पर वह देह तुरन्त सड़कर गलने लगती है, तब उसे प्रियजन भी अपने पास नहीं रहने देते, जल्दी से जल्दी अन्त्येष्टि करने का प्रयत्न करते हैं। प्राण के बिना यह कंचर सी भूत सी डरावनी दीखती है। इस प्राण को शरीर का राजा और सर्वस्व माना गया है। इस विश्व में जो कुछ जीवन दृष्टि गोचर हो रहा है सब प्राण को ही विभूति है। शास्त्र ने कहा हैं -
काया नगर मध्ये तु मारुतः क्षितिपालक
काया नगरी में प्राण वायु ही राजा है।
प्राण देवा अनु प्राणन्ति। मनुष्याः पशरवचमे।
-तैत्तिरीय 2।3
देवता मनुष्य पशु और समस्त प्राणी प्राण से ही अनुप्राणित है। प्राण ही जीवन है। इसी से उसे आयु कहते है। यह ज्ञान कर जो प्राण स्वरूप ब्रह्म की उपासना करता है वह निश्चय ही सम्पूर्ण आयु को प्राप्त कर लेता हैं
सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवा
-छाँदोग्य 1।11।5
यह सब प्राणी, प्राण में से ही उत्पन्न होते हैं और प्राण में ही लीन हो जाते हैं।
प््राणाद्वये खस्विमनि भूतानि जायन्ते
-तैत्तरीय
प्राण से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं और जन्मने के बाद प्राण से ही जीवित रहते हैं।
यावद्धयास्मिन् शरीरे प्राणोवसति तापवदायुः
-कौषीताकि उपनिषद्
जब तब इस शरीर में प्राण है तभी तक जीवन है।
प्राणो वे सुशमोसुप्रतिष्ठानः
-शतपथ 4।4।1।14
प्राण ही इस शरीर रूपी नौका की सुप्रतिष्ठा है।
तेन संसार चक्रेस्मिन भ्रमतीत्वेव सर्वदा।
-गोरक्ष
प्राण की ही शक्ति से जीवधारी इस संसार में गतिवान् रहते हैं। प्राण से ही योगी लोग दीर्घ जीवन प्राप्त करते हैं। प्राण के कारण ही इन्द्रियाँ सशक्त और निरोग रहती हैं। प्राण के अभ्यास से ही नाड़ियाँ शुद्धि होती है और तभी कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती हैं।
इसलिये जीव कामना करता है कि हे प्राण आप हम से सदा अविच्छिन्न रहें।
संक्रामतं मा जहीतं शरीरं,
हे प्राण हे अपान, इस देह को तुम मत छोड़ना। मिल जुलकर इसी में रहना। तभी यह देह शतायु होगा।
इस प्राण शक्ति का एक अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण विज्ञान है। योग साधना से इस विज्ञान को प्रत्यक्ष किया जाता है। गायत्री की साधना से इस प्राण को ही जगाया जाता है। जिसने अपने सोते हुये प्राण को जगा लिया उसके लिये चारों ओर जागृति ही जागृति हैं, सब दिशाओं में प्रकाश ही प्रकाश है। सोता वही है जिसका प्राण सोता हैं, जिसकी प्राण शक्ति जग गई इस संसार में उसे ही जागृत माना जाता है। उसी के सामने इस विश्व का वह रहस्य प्रकट होता है जो सर्व साधारण के लिये छिपा हुआ ही है।
तदाहुः कोऽस्वप्नुमर्हति, यद्वाव
-ताण्डय. 10/4/4
कौन सोता है? कौन जागता हैं-जिसका प्राण जागता है वस्तुतः वही जागता है।
य एवं विद्वान्प्रणं वेद रहास्य प्रजा
-प्रश्नोपनिषद् 3/11
जो विद्वान् इस प्रण के रहस्य को जानता है उस की संतति कभी नष्ट नहीं होती। वह अमर हो जाता है।
इस रहस्यमय प्राण विद्या को जानना प्रत्येक अध्यात्म प्रेमी का कर्तव्य हैं। क्योंकि इसी से उसकी परम्परा अविच्छिन्न रहती हैं, सन्तति नष्ट नहीं होती और इसी विद्या के कारण वह अमर पद को प्राप्त करता है।
आस्तिकता का स्वरूप
आस्तिकता का अर्थ है विश्वास। अविश्वासी ही मस्तिष्क कहा जा सकता है। संसार चक्र को नियमबद्ध नियंत्रण में रखकर चलाने वाली परम सत्ता पर विश्वास करना आस्तिकता का चिह्न है। कर्म फल सुनिश्चित है, जो किया है वह भोगना पड़ेगा यह मानना आस्तिकता का ही स्वरूप है। सब प्राणियों का अंततः कल्याण ही होगा, सब एक दिन विकास की मंजिल पूरी करते हुए परम मंगल को प्राप्त करेंगे यह मान्यता भी आस्तिकता के अनुरूप हैं।
यह विश्व परमात्मा से ही ओत-प्रोत है। यह उसी का एक प्रत्यक्ष रूप है। जो कुछ हमें दिखाई पड़ता है वह उसी प्रभु के एक अंश का दर्शन है। उसकी न तो उपेक्षा की जानी चाहिए और न घृणा। यह घृणा या उपेक्षा वस्तुतः परमात्मा के एक अंश के प्रति व्यक्त की हुई मानी जाएगी।
मनुष्य जाति के गौरव
संसार में ऐसे मनुष्यों की बड़ी आवश्यकता है जो ईमानदारी हो। जो भय या लोभ के कारण अपनी अन्तरात्मा को बेचते न हों। जो मचाई पर कायम रहने के लिए अपने प्राणों तक को भी उत्सर्ग कर सकें। जिन्होंने बनावट से घृणा करना और सचाई से प्यार करना सीखा है वस्तुतः वे ही ज्ञानी है।
कुतुबनुमा (दिशा सूचक यंत्र) की सुई जिस तरह सदा उत्तर दिशा में ही रहती है उसी तरह जिनकी अन्तरात्मा सदा सत्य की ओर उन्मुख रहती है वे ही मनुष्य जाति के गौरव है। ऐसे ही लोगों से मानवता धन्य होती है और उन्हीं से संसार की सुख शान्ति बढ़ती है। महान् व्यक्तियों की विशेषता यही होती है कि वे अपने चरित्र से विचलित नहीं होते। प्रलोभनों और आपत्तियों के बीच भी वे चट्टान की तरह अविचल बन रहते है।
प्रेम और ब्रह्म
प्रेम ब्रह्म रस की ही अनुभूति है। वह एक आत्मा दूसरे के प्रति करती है और मिलन से उत्पन्न होने वाला दिव्य आनन्द की अनुभूति होती है। किन्तु जब यह प्रेम शरीर से सम्बन्धित हो जाता है तो काम या मोह बन जाता हैं मोह तुच्छ है उसमें सुख क्षणिक और दुःख बहुत है।
ब्रह्म एक से अनेक हुआ। इसलिए कि अनेक से एक होने में जो आनन्द है उसका अनुभव करें। एक से उद्भूत हुए अनेक जीव, पुनः अनेक से एक होने के लिए प्रयत्नशील हैं। इस प्रयत्न में उन्हें जो आनन्द आता है उसे प्रेम कहते हैं। उस एक से मिलने के प्रयत्न में अनेक जीव आपस में भी मिलाते रहते है। जीव के ब्रह्म से पूर्ण मिलन को परमानन्द कहते है, उसी का आँशिक रूप आँशिक मिलन में अनुभव होता हे। एक आत्मा जब सच्चे हृदय से दूसरी आत्मा को प्यार करती है, मिलने को अग्रसर होती है तो उसे परमानन्द की एक झलक देखने का-प्रेम रख के आस्वादन का आनन्द मिलता है। इस संसार में यही सबसे बड़ा आनन्द है।
ब्रह्म एक से अनेक हुआ। इसलिए कि अनेक से एक होने में जो आनन्द है उसका अनुभव करें। एक से उद्भूत हुए अनेक जीव, पुनः अनेक से एक होने के लिए प्रयत्नशील हैं। इस प्रयत्न में उन्हें जो आनन्द आता है उसे प्रेम कहते हैं। उस एक से मिलने के प्रयत्न में अनेक जीव आपस में भी मिलाते रहते है। जीव के ब्रह्म से पूर्ण मिलन को परमानन्द कहते हैं, उसी का आँशिक रूप आँशिक मिलन में अनुभव होता हे। एक आत्मा जब सच्चे हृदय से दूसरी आत्मा को प्यार करती है, मिलने को अग्रसर होती है तो उसे परमानन्द की एक झलक देखने का-प्रेम रख के आस्वादन का आनन्द मिलता है। इस संसार में यही सबसे बड़ा आनन्द है।
नियत मार्ग की मर्यादा
आकाश में ग्रह और नक्षत्र तूफानी चाल से अपनपी राह चलते हैं। एक सेकेण्ड में हजारों मील की यात्रा पार करते हैं पर चलते अपने नियत मार्ग पर ही हैं। यदि कोई तारा जरा सा भी भटक जाय तो वह दूसरे तारों से टकराकर सृष्टि में भारी उथल पुथल पैदा कर सकता है। हर एक तारा अपने निर्धारित मार्ग पर पूर्ण नियम बद्ध होकर चलता है तभी यह दुनियाँ अपनी जगह पर ठहरी हुई है। यदि मर्यादाओं का पालन छोड़ दिया जाय तो समाज की सारी शृंखला बिखर जाएगी और साथ ही मनुष्य जाति सुख शान्ति से भी वंचित हो जाएगी।
यदि मनुष्य अपनी बुद्धि की थोड़ी अधिक खींच तान करे तो वह बुरी और गलत से गलत बातों को उचित ठहराने के लिए तर्क और प्रमाण ढूँढ़ सकता है। विश्वासों और भावनाओं को पुष्टि करना बुद्धि का काम है। मस्तिष्क को हृदय का वकील कहा जा सकता है। भीतर से जो आकांक्षा और अभिरुचि उठती है उसी को पुष्ट करने और मार्ग ढूँढ़ने में मस्तिष्क लगे जाता है। चोर के लिए वह चोरी की कला में प्रवीणता प्राप्त करने और उसके लिए अवसर ढूँढ़ देने का काम करता है और साधु के लिए पुण्य परमार्थ के अवसर तथा साधन जुटाने में सफल प्रयत्न करता है।
इसलिए बुद्धि के चमत्कार से प्रभावित होने की जरूरत नहीं है और न बुद्धि को बहुत मान देने की आवश्यकता है। वह तो एक वेश्या के समान है जो प्रलोभन की ओर फिसलती रहती है। प्रभावित होने योग्य तो केवल एक ही वस्तु हैं, उदारता मिश्रित सचाई। भले ही कोई मूर्ख गिना जाय पर जिसमें उदारता और सच्चाई है वह हजार बुद्धिमानों से अच्छा है।
बालू के कण
सीपी के पेट में बालू का एक कण घुस जाता है। उस कण के ऊपर सीपी के शरीर का रस लिपटता जाता है और वह बढ़ते-बढ़ते एक चमकते हुये कीमती मोती के रूप में प्रस्तुत हो जाता है। यो बालू के एक कण की कुछ कीमत नहीं, पर सीपी जब उसे अपने उदर में धारण कर अपने जीवन रस से सींचने लगती हैं तो वह तुच्छ रज कण एक मूल्यवान पदार्थ बनता है। उच्च नैतिक आदर्श भी ऐसे ही बालू के कण हैं जो यदि मनुष्य के हृदय में गहराई तक प्रवेश कर जाये तो एक तुच्छ व्यक्ति को महापुरुष, ऋषि और देवता के रुपये प्रस्तुत कर सकते है।
छोटा और तुच्छ काम
काम वे छोटे गिने जाते है जो फूहड़पन और बेसलीके से किये जाते हैं। यदि सावधानी, सतर्कता और खूबसूरती के साथ, व्यवस्था पूर्वक कोई काम किया जाय तो वही अच्छा, बढ़ा और प्रशंसनीय बन जाता है। चरखा कातना कुछ समय पूर्व विधवाओं और बुढ़ियाओं का काम समझा जाता था, उसे करने में सधवायें और युवतियाँ सकुचाती थी। पर गाँधी जी ने जब चरखा कातना एक आदर्शवाद के रूप में उपस्थित किया और वे उसे स्वयं कातने लगे तो वही छोटा समझा जाने वाला काम प्रतिष्ठित बन गया। चरखा कातने वाले स्त्री पुरुषों को देश भक्त और आदर्शवादी माना जाने लगा।
संसार में कोई काम छोटा नहीं। हर काम का अपना महत्व है। पर उसे ही जब लापरवाही और फूहड़पन के साथ किया जाता है तो छोटा माना जाता है और उसके करने वाला भी छोटा गिना जाता है।
गृहस्थ जीवन की सफलता
गृहस्थ जीवन की सफलता के लिये, अनेक कठिनाइयाँ होते हुये भी दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाये रहने के लिये इस बात की आवश्यकता है कि पति-पत्नि में प्रगाढ़ प्रेम और अटूट विश्वास हो। इसी प्रकार जिस कार्य में मनुष्य सफलता प्राप्त करना चाहता है उसमें पूरा प्रेम होना और उस कार्य के गौरव को समझना आवश्यक है। जो कार्यक्रम अपनाया गया है उसे हलका, ओछा, तुच्छ व्यर्थ और साधारण नहीं वरन् विश्व का एक अत्यन्त आवश्यक और उपयोगी कार्य मानना चाहिये। उसे करते हुये गर्व और गौरव अनुभव किया जाना चाहिये दाम्पत्य प्रेम की तरह हमें अपने कार्यक्रम में भी पूरी निष्ठा, ममता अभिरुचि और श्रेष्ठता भी रखनी चाहिये। यह भावनायें जितनी ही गहरी होगी, कार्यक्रम की सफलता में उतनी ही आशा बढ़ती जायेगी।
संसार के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिये एक विशेष योग्यता और शक्ति की आवश्यकता होती है। अनेक व्यक्ति कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य करने की आकांक्षा तो करते हैं पर उनकी पूर्ण करने के लिये जिस क्षमता एवं शक्ति की आवश्यकता है उसे सम्पादित नहीं करते, फलस्वरूप उन्हें सफलता से भी वंचित ही रहना पड़ता है। जिनने भी कोई बड़ा पुरुषार्थ किया हैं, बड़ी विजय प्राप्त की है उनने तात्कालिक परिस्थितियों से ही सब कुछ नहीं कर लिया होता वरन् उनकी पूर्ण तैयारी ही उस सफलता का मूल कारण रही होती है।
आसुरी प्रकृति से बढ़ने और फैलने की शक्ति, दैवी प्रकृति में अधिक हैं। कुविचारों और कुकर्मों की ओर मन जितनी आसानी से आकर्षित होता है उतना सद्विचारों और सत्कर्मों की ओर नहीं। बुराइयों में उठे हुये अपने प्रत्यक्ष आचरण द्वारा बुराइयों को बढ़ाने और फैलाने वाले व्यक्ति संख्या और सक्रियता की दृष्टि से अग्रगामी रहते हैं। इसके विपरीत अच्छाइयों से परिपूर्ण, उच्च मनोभूमि वाले ऐसे व्यक्ति बहुत ही कम होते हैं जो अपने साथी बनाने और बढ़ाने के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहें। परिणाम यह होता है कि संसार में धीरे-धीरे बुराइयाँ बढ़ती रहती हैं, अच्छाइयों की तुलना में उनकी मात्रा बहुत अधिक हो जाती है। तब नाना प्रकार के क्लेश, कलह, और शोक संताप बढ़ते है और सर्वत्र दुःख दरिद्र की अधिव्याधि की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती है। इन्हें देख कर सहृदय सत्पुरुष द्रवित होते हैं और उस विषय परिस्थितियों का समाधान करने का प्रयत्न करते है।
ऋषि, मुनि, संत महात्मा नेता, सुधारक, देवदूत, लोक सेवी प्रकृति के मनुष्य सदा यही प्रयत्न करते हैं कि संसार में बुराइयाँ घटे और उनके पर अच्छाइयों की अभिवृद्धि हो, ऐसे प्रयत्न सफल भी होते है और उनके सत्प्रयत्नों से काफी समय तक के लिये शान्तिमय सतोगुणी वातावरण उत्पन्न हो जाता है। आनंद और उल्लास का सभी को अनुभव होता हैं।
जन मानस में से दुष्प्रवृत्तियों को हटा कर उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों की स्थापना करना अत्यंत ही उच्च कोटि का, अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण कार्य हैं। इसकी तुलना में और सभी सत्कार्य तुच्छ बैठते है। विवेकशील उच्च आत्माएँ समय-समय पर इस आवश्यकता को अनुभव करती हैं और वे लोक मानस में सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने के लिये प्राणपण से प्रयत्न करती रहती है। यह कार्य जितना ही महान् है उतनी ही महान् क्षमता और शक्ति भी इसके लिये अपेक्षित होती है। यदि उसका अभाव रहा तो इस प्रकार की कामना और भावना रहते हुये भी कुछ विशेष सफलता नहीं मिलती।
आज का वातावरण बहुत हद तक दूषित ही चला है। उसमें आसुरी तत्त्व एक बड़ी मात्रा में उत्पन्न हो गये हैं। अनीति, अन्याय, अधर्म और अकर्म का चारों ओर बोलबाला हैं। स्वार्थ, पाप, वासना, तृष्णा, ममता और अहंकार की तूती बोल रही है। एक दूसरे को शोषण करके, सताकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने में कटिबद्ध हो रहे है। प्रेम की, उदारता, सहृदयता, सेवा और सज्जनता की मात्रा दिन-दिन घटती जा रही है, फलस्वरूप ऐसी घटनाओं की बाढ़ आ रही है जिनमें चीत्कार एवं हाहाकार की भरमार रहती है। लगता है कि यह प्रवृत्तियाँ बढ़ती रही तो मानव सभ्यता ही खतरे में पड़ जायेगी। विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में विनाश की भी एक बड़ी शक्ति दे दी है। एटम शक्ति के आधार पर किसी सिर फिरे का एक छोटा-सा पागलपन कुछ ही क्षणों में सारे संसार के लिये तबाही उत्पन्न कर सकता है। ऐसे जमाने में इस बात की अत्याधिक आवश्यकता है कि लोग सज्जनता और मानवता के आवश्यक गुणों से सम्पन्न हों अन्यथा विज्ञान से प्राप्त हुई शक्ति के सहारे दुर्गुणों से ग्रसित मानव शाक संताप के गहन गर्व में आसानी से पाने की बात में डूब मरने की परिस्थिति पैदा कर लेगा।
इस ओर विवेकशील लोगों का ध्यान गया हैं। वे लोक सुधार के लिये अपने-अपने ढंग से काम भी कर रहे है। प्रवचन और लेख द्वारा यह कार्य सरल हो सकता है। उस विचार से अनेकों उपदेश प्रवचनकर्ता, लेखक, पत्रकार बहुत प्रयत्न कर रहे है। अनेकों सभा साँसाइटियाँ इसी उद्देश्य के लिये विविध-विधि मनोरंजक आयोजनों की व्यवस्था करती रहती हैं। सरकारें भी इसके लिये सनेष्ट है। राजनैतिक कर्ण धार जनता को सज्जनता अपनाने की अपील करते रहते हैं। उनके प्रचार साधन, रेडियो, चलचित्र, बुलेटिन विज्ञप्ति, पत्रिकाएँ आदि कार्य भी इसी उद्देश्य के लिये बहुत व्यय और प्रयत्न करते हैं। किन्तु जब विचारपूर्वक इन सब कार्यों के परिणामों को देखा जाता है तो भारी निराशा होती हैं। लगता है कि प्रयत्न की तुलना में परिणाम की मात्रा बहुत ही नगण्य है। बुराइयाँ जितनी तेजी से बड़ रही है और सुधार के प्रयत्न जिस प्रकार निष्फल से सिद्ध हो रहे हैं उसे देखते हुये हर विचारशील व्यक्ति के मन में व्यथा होना स्वाभाविक है।
यह प्रश्न बहुत ही महत्त्वपूर्ण है कि लोक मानस में से दुष्प्रवृत्तियों को हटा कर उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को स्थापित करने का वास्तविक उपाय क्या है? इसके उत्तर ढूँढ़ने के लिये हमें इतिहास के पृष्ठ उलटने पड़ेंगे और यह देखना पड़ेगा कि जिन महापुरुषों ने इस प्रकार की विषम परिस्थितियों से अपने समय में जन मानस को सुधारा था उनमें क्या विशेषता थी जिसके कारण वे स्वल्प साधनों से ही चमत्कार उत्पन्न कर सके, जब कि हमारे आज के सुधारक विविध विधि साधनों से सम्पन्न होने पर भी कुछ कर नहीं पा रहे है।
पूर्व काल में लाखों करोड़ों वर्षों तक सतयुग की सुख शान्ति भरी परिस्थितियाँ इस संसार में बनी रही है। इसका कारण एक ही रहा है कि इस समय के लोक नायक, मार्ग दर्शक आत्म शक्ति से सम्पन्न रहे और वाणी से नहीं अपनी आन्तरिक महानता की किरणें फेंक कर जन मानस को प्रभावित करते रहे। मस्तिष्क की वाणी मस्तिष्क तक पहुँचती है और आत्मा की आत्मा तक। कोई सुशिक्षित व्यक्ति अपनी ज्ञान शक्ति का लाभ सुनने वालों की जानकारी बढ़ाने के लिये दे सकता है पर अन्तःकरण में जमी हुई आस्था में हेर फेर करने का कार्य ज्ञान से नहीं आत्मिक शक्ति से ही सम्पन्न होना संभव है। प्राचीन काल के लोक नायक ऋषि मुनि इस तथ्य को भली-भाँति जानते थे इसलिये वे दूसरों के उपदेश देने में उनकी बाह्य सेवा करने में जितना समय खर्च करते थे उससे कहीं अधिक प्रयत्न वे अपना आत्म बल बढ़ाने के लिये तप करने में लगाते थे। तप से ही वह आत्म शक्ति प्राप्त होती है जिसकी प्रेरणा से किसी के मन पर जमे हुए बुराइयों के आकर्षक कुसंस्कारों को हटा कर अच्छाइयों के कष्टसाध्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जा सके।
उस समय में जब कि लोकनायकों ने जनता के विचारों और कार्यों को उच्च स्तर पर स्थिर रखने में वास्तविक सफलता प्राप्त की थी, तप साधना का महत्व भली प्रकार समझा जाता था। प्रत्येक ऋषि इस ओर दत्त चित्त रहता था। वह जानते थे कि यदि तप के अभाव में हमारी आत्मा दुर्बल रही तो प्रवचन मात्र से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। आज के उपदेशक जिस प्रकार अपनी चतुरता, योजना, दौड़-धूप संगठन शक्ति या भाषण शैली पर विश्वास करके उन्हीं के सहारे सब कुछ कर लेने की बातें सोचते हैं और स्वतः विलासी जीवन बिताते हुये जनता को अन्धी भेड़ों की तरह चाहे जिधर हाँक ले जाने की बात सोचता हैं। प्राचीन काल में कोई उस तरह नहीं सोचता था। जो कोई भी नेता बनने की महान् जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेने की बात सोचता था वह सबसे पहले अपने आपको तपस्या से तपा डालने की तैयारी करता था। इस माध्यम से वह अपने की जितना ही पवित्र करता चलता था उतना ही कदम लोक सेवा के लिये मानस को उत्कृष्ट बनाने के लिये उठाता था।
प्राचीन काल के इतिहास पुराणों में यह तथ्य बिलकुल स्पष्ट है। पिछले दो हजार वर्षों में भी इसी आधार पर जन मानस का सुधार एवं परिवर्तन करना संभव होता रहा है। भगवान बुद्ध के मन में अपने तथा संसार के दुखों का निवारण करने की आकांक्षा जगी इसके लिये वे 25 वर्ष की आयु में घर से निकल पड़े और 20 साल तक निरन्तर विभिन्न स्थानों पर आत्म निर्माण एवं तप साधना में संलग्न रहे। 41 वर्ष की आयु में उनने अपने अन्दर परिपक्वता अनुभव की तो दूसरों को शिक्षा देने के कार्य में हाथ लगाया। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन चौथाई भाग तप में और एक चौथाई भाग धर्मोपदेश में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेश उतने नहीं दिये जितने आज के मामूली उपदेशक दे लेते हैं। फिर भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक चौथाई जनता उनकी शिक्षाओं पर आस्था रखती है।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने उत्तराखण्ड में जोशीमठ स्थान पर उग्र तप किया था। वे बत्तीस वर्ष की आयु लेकर आये थे। विद्या पढ़ने के बाद लगभग 11 वर्ष उनके जीवन में काम करने के लिये शेष थे इसमें से भी आधा समय उनने तप में लगाया और शेष 6-8 वर्षों में ही अपनी आत्म शक्ति के बल पर वैदिक धर्म के उद्धार के लिये अत्यन्त प्रभावशाली कार्य कर डाला। गुरु नानक की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। गुरु गोविन्दसिंह ने हिमालय में लोकपत स्थान पर जहाँ घोर तप किया था वह स्थान आज की सिख धर्मानुयायियों का तीर्थ बना हुआ है। यदि इन गुरुओं के पास तप की पूँजी न रही होती तो वे दुर्धैर्य यवन काल में हिन्दू धर्मं की रक्षा के लिये इतना अछूत कार्य कर सकने में कदापि समर्थ न हो सके होते।
समर्थ गुरु रामदास ने छत्रपति शिवाजी सरीखे कितने ही महापुरुष तैयार किये थे। इतिहास के पृष्ठों पर उनमें से अकेले शिवाजी ही चमके पर उस तरह के सैकड़ों धर्म सैनिक उनने बना कर दिये थे। इस निर्माण में उनकी आत्मा का प्रभाव ही प्रधान रूप से काम करता था। स्वामी दयानन्द 19 वर्ष की आयु में घर से निकले और 42 वर्ष की आयु में अपने आपको धर्म प्रसार के योग्य बना सके। संवत् 1924 के कुंभ में हरिद्वार में उनने पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई और धर्मोपदेश दिये पर उनका कुछ विशेष प्रभाव न पड़ा। इसका कारण, उनने अपने आत्मबल की न्यूनता समझा और तीन वर्ष के लिये पुनः तप करने उत्तराखण्ड के अज्ञात स्थानों को चले गये। गंगोत्री के पास कराली की गुफाओं में रह कर उनने तपस्या की और जब अन्दर प्रकाश देखा तो कार्य क्षेत्र में उतरे। उस समय उनकी वाणी में दैवी तेज था। उसी के बल पर वे अकेले ही इतना कार्य कर गये जितना अनेकों संगठित सभाएँ मिलकर भी आज नहीं कर पा रही हैं।
रामकृष्ण परमहंस 49 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हुये 40 वर्ष की आयु तक वे विशुद्ध रूप से साधना रत रहे। एक दिन उन्हें लगा कि उन्हें शिष्य प्राप्त होने वाले हैं। एक वर्ष वे शिष्यों की प्रतीक्षा करते रहे। अन्त में उन्हें ब्रहाँनंद, शिवानन्द और विवेकानन्द जैसे थोड़े से प्रतिभा सम्पन्न शिष्य घर बैठे प्राप्त हुये और उन्हीं के सहारे उनकी आत्मा ने संसार को हिन्दू संस्कृति का महान् संदेश दिया। स्वामी विवेकानंद का धर्म प्रचार कार्य प्रसिद्ध है पर उससे पहले उनने भी रामकृष्ण परमहंस के बताये अनुसार कई वर्ष तपश्चर्या करके आत्मा को तपाया था।
योगी अरविन्द घोष, महर्षि रमण, स्वामी रामतीर्थ की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। वैष्णव आचार्यों में से रामानुजाचार्य, निम्बाकाचार्य, माधवाचार्य, प्रभृति आचार्यों ने जितना ज्ञान संचय किया था उतनी ही तप साधना भी की थी।
संसार के अन्य वे महापुरुष जिनने लोगों की आत्मा को उच्च भूमिका की ओर बढ़ाया निश्चित रूप से तपस्वी थे। महात्मा ईसा के जीवन में 27 वर्ष तपश्चर्या में लगे। मुहम्मद ने 25 साल की आयु में साधना की ओर कदम बढ़ाया और 40 साल तक वे उसी में संलग्न रहे। 65 वर्ष की आयु में उनने धर्मोपदेश और इस्लाम की स्थापना का कार्य आरंभ किया। यहूदी धर्म के संस्थापक यहोवा और पारसी धर्म के देवदूत जरदुश्त की दीर्घकालीन कठोर तपश्चर्याएँ प्रसिद्ध है।
इसी प्रकार संसार में आदि काल से लेकर अब तक एक ही तथ्य समय-समय पर स्पष्ट होता रहा है कि तपश्चर्या द्वारा आत्मबल सम्पादित करने वाली आत्मायें ही संसार का सच्चा मार्ग दर्शन करने और जन मानस को शुद्ध करने में समर्थ हो सकती हैं।
आज का लोक मानस निम्न से निरन्तर स्तर की ओर तेजी से गिरता जा रहा है। उसे संभालने और सुधारने की नितान्त आवश्यकता है। पर यह कार्य आत्मबल से रहित, तपश्चर्या से विहीन व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकता भले ही वे सभा सुसाइटियों के द्वारा, भाषणों, लेखों योजनाओं प्रदर्शनों के द्वारा इसके लिये सिर तोड़ प्रयत्न करते रहें। यह महान् कार्य महान्
गुरु पूर्णिमा का पुण्य-पर्व
ऋषि ऋण चुकाने के तकाजे के रूप में हर वर्ष गुरु पूर्णिमा पर्व आता है। इस अवसर पर गुरुजनों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने की परम्परा है, साथ ही ऋषियों द्वारा प्रस्तुत आत्म ज्ञान का अधिकाधिक विस्तार करना भी ऋषि ऋण चुकाने की दृष्टि से आवश्यक हैं।
इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 27 जुलाई को पड़ती हैं। उस दिन हम उपरोक्त दोनों कर्तव्यों का स्मरण रखें और अपनी स्थिति के अनुरूप इन पुण्य कर्तव्यों का पालन करें।
ज्ञान प्रधान इस पुण्य पर्व पर “अखण्ड ज्योति” के सदस्य बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना इस सब के लिये उचित और आवश्यक है।
आत्माएँ ही कर सकेंगी और महान् आत्माओं के अनेक गुणों में एक तपश्चर्या भी है। जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
अतीत इतिहास के पृष्ठ हमें इसी ओर निर्देश करते है। युग निर्माण होना है पर उसका प्राण वाचालों के नहीं तपस्वियों के कंधे पर रहेगा युग की आवश्यकता आज ऐसे ही तपस्वियों की कर रही हैं।
वचन का पालन
दरभंगा में एक शंकर मिश्र नामक विद्वान् हो गये हैं। वे छोटे थे तब उनकी माँ को दूध नहीं उतरता था तो गाय रखनी पड़ी। दाई ने माता के समान प्रेम से बालक को अपना दूध पिलाया। शंकर मिश्र की माता दाई से कहा करती थी कि बच्चा जो पहली कमाई लावेगा सो तेरी होगी।
बालक बड़ा होने पर किशोर अवस्था में ही संस्कृत का उद्भत विद्वान् हो गया। राजा ने उसकी प्रशंसा सुनकर दरबार में बुलाया और उसकी काव्य रचना पर प्रसन्न होकर अत्यन्त मूल्यवान हार उपहार में दिया।
शंकर मिश्र हार लेकर माता के पास पहुँचे। माता ने उसे तुरन्त ही दाई को दे दिया। दाई ने उसका मूल्य जँचवाया तो वह लाखों रुपए का था। इतनी कीमती चीज लेकर वह क्या करती? लौटाने आई। पर शंकर मिश्र और उसकी माता अपने वचन से लौटने का तैयार न हुए। पहली कमाई के लिए जब दाई को वचन दिया जा चुका था तो फिर उसे पलटने में उनका गौरव जाता था।
बहुत दिन देने लौटाने का झंझट पड़ा रहा। अन्त में दाई ने उस धन से एक बड़ा तालाब बनवा दिया जो दरभंगा में “दाई का तालाब” नाम से अब भी मौजूद हैं।
वचन का पालन करने वाले शंकर मिश्र और बिना परिश्रम के धन को न छूने वाली दाई दोनों ही प्रशंसनीय हैं।
सम्मान पद में नहीं, मनुष्यता में है
एकबार सिकन्दर ने अपने एक सेनापति से रुष्ट होकर उसे छोटा सूबेदार बना दिया। कुछ समय बाद उसे सिकन्दर ने बुलाकर पूछा-तुम पहले के समान ही प्रसन्न हो, इसका कारण सूबेदार ने कहा-श्रीमान् पहले तो सेना के छोटे अधिकारी और सैनिक मुझसे डरते थे इस लिये संकोचवश बात करना क्या मिलना भी उनके लिये कठिन था। अब बात-बात में वे मेरी सम्मति लेते और मेरा सम्मान करते हैं। मानवता की सेवा का अवसर तो मुझे अब मिला है।’ सिकन्दर ने पूछा-तुम्हें पदच्युत होने का दुःख या अपमान प्रतीत नहीं होता?’ सूबेदार बोला-सम्मान पद में नहीं, मानवता में है। उच्च पद पाकर भी अन्य को सताना, गर्व करना, घूस लेना निन्दनीय और अपमानजनक हैं, परंतु मनुष्यता पूर्वक सेवा, कर्तव्य पालन, नम्र व्यवहार गौरव की बात है, चाहे वह एक छोटा सा चौकीदार ही क्यों न हो।’ सिकन्दर उससे बड़ा प्रभावित हुआ और वह पुनः सेनापति बना दिया गया।
वेश की लाज
एक बहरूपिया राजा के दरबार में वेश बदल-बदल कर कई बार गया, परन्तु राजा ने उसे हर बार पहचान लिया और कहा कि जब तक तुम हमें ऐसा रूप न दिखाएँगे जो पहचानने में न आवे तब तक इनाम न मिलेगा। यह सुन वह चला गया और कुछ समय पश्चात् साधु का रूप बन, महल के पास ही धूनी रमा दी। न खाना, न पीना, भेंट की ओर देखना भी नहीं। राजा ने भी उस महात्मा की प्रशंसा सुनी तो वह भी भेंट लेकर उपस्थित हुआ। उसने भेंट के सच्चे मोती आग में झोंक दिये। राजा उसकी त्याग वृत्ति देख भक्ति भाव से प्रशंसा करते हुए चले गये। दूसरे दिन बहरूपिया राज सभा में उपस्थित हुआ और अपने साधु बनकर राजा को धोखा देने की चर्चा करते हुए अपना इनाम माँगा। राजा ने प्रसन्न हो, इनाम दिया और पूछा-तुमने वे मोती, जो इनाम के मूल्य से भी अधिक मूल्यवान थे, आग में क्यों झोंक दिये। यदि उन्हें ही लेकर चले जाते तो बहुत लाभ में रहते? उसने उत्तर दिया-यदि मैं ऐसा करता तो इससे साधु-वेश कलंकित होता। साधुवेश को कलंकित करके धन लेने का अनैतिक कार्य कोई आस्तिक भला कैसे कर सकता हैं?”
ऐश्वर्य का अभिमान निरर्थक
एक धनिक ने एक संन्यासी को निमन्त्रण दिया। संन्यासी आये तो धनिक ज्ञान चर्चा करना तो भूल गया, उन्हें बैठा कर अपने वैभव की बात कहने लगा-मेरे इतने मकान हैं, बम्बई में मैंने एक विशाल भवन और धर्मशाला बनवाई हैं, शीघ्र ही तुम्हारे जैसे भूखों के लिए अन्न क्षेत्र खोलने वाला हूँ, अब भी आधे सेर खिचड़ी तो हर भिखारी को मेरे घर से मिल जाती है। मेरे लड़के विलायत घूमने जा रहे है।’ संन्यासी उसकी सभी बात चुपचाप सुनते रहे। जब वह चुप हो गया तो दीवार पर टँगे एक नक्शे को देखकर बोले-यह कहाँ का नक्शा हैं?’ धनिक ने कहा-दुनिया का?’ संन्यासी बोले-इसमें हिन्दुस्तान कहाँ हैं?’ धनिक ने उँगली रख कर बताया तो उन्होंने फिर पूछा-और बम्बई?’ धनिक ने उँगली रखकर बम्बई भी बता दी। संन्यासी बोले-इसमें तेरा भवन और धर्मशाला कहाँ हैं?” धनिक बोला-संसार के नक्शे में यह सब चीजें कहाँ से आतीं?’ संन्यासी ने कहा-जब संसार के नक्शे में तुम्हारे वैभव का नाम निशान भी नहीं तो उसका अभिमान ही क्या करना? धनिक ने सिर झुका लिया और अभिमान की बातें सदा को त्याग दीं।
पर-निंदा का परिणाम
दो संस्कृतज्ञ विद्वान् एक गृहस्थ के यहाँ अतिथि बने। गृहस्थ ने उनका बड़ा सत्कार किया। जब एक विद्वान् स्नान घर में गए, तब गृहस्थ ने दूसरे विद्वान् से स्नान करने को गये हुए विद्वान् के संबंध में पूछा। उसने उत्तर दिया कि ‘वह मूर्ख बैल हैं।’ जब वह स्नान करके आया तो दूसरा स्नान करने गया। गृहस्थ ने स्नान करके आए हुए विद्वान् से दूसरे विद्वान् के संबंध में पूछा तो वह बोला-यह क्या जानता है-पूरा गधा है।’ जब भोजन का समय हुआ तो गृहस्थ ने एक गट्ठर घास और एक डलिया भूसा उनके सामने ला रखा और बोला-लीजिये महाराज! बैल के लिए भूसा और गधे के लिए घास उपस्थित है। यह देख सुनकर दोनों ही बड़े लज्जित हुए। विद्वान् होकर भी दूसरों के प्रति ईर्ष्या द्वेष के भाव रखना बड़ी घृणित प्रवृत्ति है। ऐसा विद्वान् भी निःसन्देह पशु श्रेणी में रखे जाने योग्य है।
“जो लोग अन्य लोगों से अपने विचारों की पुष्टि और समर्थन करा चुके हैं, वे प्रायः ऐसे ही लोग हुए हैं जिन्होंने स्वयं स्वतन्त्र विचार करने का साहस किया था।”
“केवल मूर्ख और मृतक, ये दो ही अपने विचारों को कभी नहीं बदलते।”
भगवान तो परोपकार से प्रसन्न होते हैं
एकबार एकनाथ जी अन्य सन्तों के साथ प्रयाग से गंगाजी का जल काँवर में लेकर रामेश्वर जा रहे थे। रास्ते में एक रेतीला मैदान आया। गधा प्यास के मारे छटपटा रहा था। एकनाथ जी ने तुरन्त काँवर से लेकर गंगा जल गधे के मुख में डाला। गधा प्यास से तृप्त, स्वस्थ होकर वहाँ से चल दिया। एकनाथ के साथी संत प्रयाग के गंगाजल का इस प्रकार उपयोग होते देख क्रुद्ध हुए। एकनाथ ने उन्हें समझाया, “अरे सज्जनवृन्द! आप लोगों ने तो बार-बार सुना है कि भगवान् घट-घट-वासी है। तब भी ऐसे भोले बनते हो। जो वस्तु या ज्ञान समय पर काम न आवे वह व्यर्थ है। काँवर का जो जल गधे ने पिया, वह सीधे श्रीरामेश्वर पर चढ़ गया।’
(सन्त विनोबा)
ईसा ने कहा, दुश्मन को प्यार करो। एक भाई ने विनोद में कहा था कि ये गाँधी के चेले दुश्मन को ही प्यार करते हैं, लेकिन मित्र को प्यार नहीं करते! बिल्कुल ठीक है। अगर प्यार करने में पक्षपात करना हो, तो दुश्मन पर ही पक्षपात करूँगा, क्योंकि मित्र पर सहज प्यार है ही। मित्र के लिये खास ध्यान न रहा और परवाह न रही, तो भी उनके लिये तो सहज प्यार होता ही है। इसीलिये दुश्मन पर सविशेष प्यार करूँगा। यह हमारी प्रतिज्ञा है कि जो हमको सकारण दूर मानते हैं, उन पर प्यार करना हमारा फर्ज हैं। निष्पक्ष प्यार के लिये यह आवश्यक शर्त है कि शत्रु के लिये पक्षपात हो।
मित्रों पर प्यार करो, यह फिजूल आज्ञा है। जैसे पानी को कहा जाय कि नीचे की तरफ बहे, तो यह व्यर्थ आज्ञा होगी। नीचे की तरफ बहना उसका सहल धर्मं हैं, वैसे ही मित्र का प्यार तो सहज प्राप्त है, दुश्मन पर प्यार सहज प्राप्त नहीं होता है, बल्कि दुःख की बात हे कि दुश्मन के लिये सहज प्राप्त द्वेष ही है। इस हालत में उनके बारे में प्रेम का प्रकाश ज्यादा ही होना चाहिये, यह अहिंसा का एक विशेष दर्शन है। इसलिये जो निष्पक्ष अहिंसक हैं, वह दूसरों पर ज्यादा अनुराग रखेगा।
मेरी माँ का एक किस्सा याद आता है। मेरे पिताजी हमारे घर में हमेशा बाहर के कोई-न-कोई एक लड़के को रख लेते थे और उस लड़के को ठीक घर के जैसे ही रखा जाता था, उसी प्रकार खाना-पीना अध्ययन आदि उसका चलता था। पिताजी को तो उसमें पुण्य-प्राप्ति होती थी, लेकिन सारी सेवा माँ को करनी पड़ती थी। घर में कभी-कभी रोटी बच जाती थी, पहले तो माँ ही दोपहर की उस ठंडी रोटी को खा लेती थी, लेकिन उसके खाने के बाद भी बची, तो वह मुझको देती थी। उस लड़के को तो ताजी रोटी ही मिलती थी। उसको कभी ठंडी रोटी नहीं दी जाती थी। तो मैं कभी-कभी माँ के साथ विनोद कर लेता था, क्योंकि वही एक मेरे विनोद का म्यान थी। मैं उसको विनोद में कहता था कि अभी तेरा भेदभाव मिटा नहीं, मुझको दोपहर की रोटी देती है और उस लड़के को ताजी रोटी खिलाती हो। तिस पर उसने जवाब दिया था, क्या जवाब दिया था? वाह रे वाह! डसने कहा कि “वह मुझे भगवत् स्वरूप दीखता है और तू मुझे पुत्र-स्वरूप दीखता है। तुझमें मेरी आसक्ति पड़ी है तेरे लिये मेरे दिल में पक्षपात है ही, तू भी मुझे जब भगवत् स्वरूप दिखेगा, तब यह भेदभाव नहीं करूँगी।
रामदास ने भगवान के बारे लिखते हुये कहा है कि वह दयादक्ष, दया करने में प्रवीण है। वह सब के लिये समान हैं, फिर भी वह दुखियों का पक्षपात करता है। वह साक्षी होते हुये भी पक्षपात करता है। यह पक्षपात जो भगवान में रहता हे, वह समत्व होते हुये भी रहता है। हम उसका अनुकरण करना चाहेंगे, तो यही होगा कि जो लोग हमसे भिन्न हैं, उसके लिये ज्यादा अनुराग हमारे दिल में रहेगा।
संत तुकाराम जबरदस्त प्रतिभावान कवि थे। उनके वाक्य चुभ जाते है। उनके वाक्य दिल को नहीं, लेकिन दिमाग को चुभ जाते है। उसने लिखा है कि अपनी देह और अपनी देह से संबंधियों की निन्दा करनी चाहिये और दूसरे जो हैं, उनकी वन्दना करनी चाहिये। श्वान-शूकर की भी वंदना करनी चाहिये।
जीव ईश्वर का ही अंश है
जीव ईश्वर का अंश है तो ईश्वर के समान शक्ति उसमें क्यों नहीं हैं? यह प्रश्न एक शिष्य ने गुरु से पूछा। गुरु ने विस्तार पूर्वक उत्तर दिया पर शिष्य की समझ में न आया शंका बनी ही रही।
एक दिन गुरु और शिष्य गंगा स्नान के लिये गये। शिष्य से कहा-एक लोटा गंगा जल भर लो। उसने भर लिया। घर आकर गुरु ने कहा-बेटा इस गंगा जल में नाव चलाओ। शिष्य ने कहा-नाव तो गंगाजी के बहुत जल में चलती हैं, इतने थोड़े जल में कैसे चल सकती हैं? गुरु ने कहा-यही बात जीव और ईश्वर के संबंध में है। जीव अल्प है। इसलिये उसमें शक्ति भी थोड़ी है। ईश्वर विभु है उसमें अनन्त शक्ति है। इसलिये दोनों की शक्ति और कार्य क्षमता न्यूनाधिक है। वैसे लोटे का जल भी गंगाजल ही था, इसी प्रकार जीव अल्प होते हुये भी ईश्वर का अंश ही है।
जीव अपने को जब ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त कर उसी में निमग्न हो जाता है तो उसमें भी ईश्वर जैसी शक्ति आ जाती है।
अविचल धैर्य की महिमा
एक बार एक तपस्वी जंगल में तप कर रहा था। नारद जी उधर से निकले तो उसने साष्टांग प्रणाम किया और पूछा-मुनिवर कहाँ जा रहे हैं? नारदजी ने कहा-विष्णुलोक को भगवान के दर्शन करने जा रहे हैं। तपस्वी ने कहा-एक प्रश्न मेरा भी पूछते आइए कि-मुझे उनके दर्शन कब तक होंगे?
नारद जी विष्णुलोक पहुँचे तो उनने उस तपस्वी का भी प्रश्न पूछा-भगवान ने कहा-84 लाख योनियों में अभी 18 बार उसे और चक्कर लगाने पड़ेंगे तब कही मेरे दर्शन होंगे। वापिस लौटने पर नारदजी ने यही उत्तर उस तपस्वी को सुना दिया।
तपस्वी अधीर नहीं हुआ। समय की उसे जल्दी न थी। इतना आश्वासन उसे पर्याप्त लगा कि भगवान के दर्शन देर सबेर में उसे होंगे अवश्य! इससे उसे बड़ी प्रसन्नता हुईं और दूने उत्साह के साथ अपनी तपस्या में लग गया। उसकी इस अविचल निष्ठा और धैर्य को देखकर भगवान बड़े प्रसन्न हुये और उनने तुरन्त ही उस तपस्वी को दर्शन दे दिये।
कुछ दिन बाद नारद जी उधर से फिर निकले तो भक्त ने कहा-मुझे तो आपके जाने के दूसरे दिन ही दर्शन हो गये थे। इस पर नारद जी बहुत दुखी हुये और विष्णु भगवान के पास जाकर शिकायत की कि आपने मुझसे कहा इनको लंबी अवधि में दर्शन होंगे और आपने तुरन्त ही दर्शन देकर मुझे झूठा बनाया।
भगवान ने कहा-नारद जिसकी निष्ठा अविचल है जिसमें असीम धैर्य है उसके तो मैं सदा ही समीप हूँ। देर तो उन्हें लगती है तो सघन पल में उतावली करते है। उस भक्त के प्रश्न में उतावली का आभास देखकर मैंने लंबी अवधि बताई थी पर जब देखा कि वह तो बहुत ही धैर्य वान है तो उतना विलंब लगाने की आवश्यकता न समझ और तुरन्त दर्शन दे दिये।
ईश्वर प्राप्ति की मनोदशा
एक जिज्ञासु ने किसी महात्मा से पूछा-ईश्वर किन को मिल सकता है? महात्मा ने कुछ उत्तर न दिया। कई दिन वही प्रश्न पूछने पर एक दिन महात्मा उसे नदी में स्नान कराने ले गये और उस जिज्ञासु को साथ लेकर गले तक पानी में घुस गये। यहाँ पहुँचकर उनने उस व्यक्ति की गरदन पकड़ ली और जोर से पानी में दबोच दिया। कई मिनट बाद उसे छोड़ा तो वह साँस घुटने से बुरी तरह हाँफ रहा था।
महात्मा ने पूछा जब तुम्हें पानी में डुबाया गया तो उस समय तुम्हारी मनोदशा क्या थी? उसमें उत्तर दिया में केवल यह सोचता था कि किसी प्रकार मेरे प्राण बचें और बाहर निकले, इसके अतिरिक्त और कोई विचार मेरे मन में नहीं उठ रहा था। महात्मा ने कहा-जैसी तुम्हारी मनोदशा पानी में डूबे रहते थी, वैसी ही व्याकुलता और एक मात्र इच्छा यदि परमात्मा के प्राप्त करने के लिये किसी की हो जाय तो उसे अविलम्ब परमात्मा मिल सकता है।
परमात्मा को प्राप्त करने के लिये जिसमें तीव्र लगन और सच्ची आकांक्षा है उसको प्रभु की प्राप्ति में बहुत विलम्ब नहीं लगता।
साधुता की कसौटी
एकबार एक धनी व्यक्ति ने एक ऊँची बली पर रत्न जटित कीमती कमण्डल टाँग दिया और घोषणा की कि जो कोई साधु इस बल्ली पर सीधा चढ़कर कमण्डल उतार लेगा उसे यह कीमती पात्र ही नहीं बहुत दक्षिणा भी दूँगा। बहुत से त्यागी और विद्वान् साधुओं ने भी प्रयत्न किया पर किसी को सफलता न मिली। अन्त में कश्यप नामक नट विद्या में बहुत सा जीवन बिताकर साधु बने एक बौद्ध भिक्षु ने उस बल्ली पर चढ़कर कमण्डलु उतार लिया। उसकी बहुत प्रशंसा हुई और धन भी मिला।
जब यह समाचार भगवान बुद्ध के पास पहुँचा तो वे बहुत दुःखी हुये। उनने सब शिष्यों को बुलाकर कहा-भविष्य तुम में से कोई भिक्षु इस प्रकार का चमत्कार न दिखाये और न उन लोगों से भिक्षा ग्रहण करे जो साधु का आचार नहीं चमत्कार देखकर उसे बड़ा मानते हों।
चमत्कार नहीं चरित्र और ज्ञान ही साधुता की कसौटी है।
भक्ति में भावना की प्रधानता
चैतन्य महाप्रभु जब जगन्नाथ पुरी से दक्षिण की यात्रा पर जा रहे थे तो उन्होंने एक सरोवर के किनारे कोई ब्राह्मण गीता पाठ करता हुआ देखा वह संस्कृत नहीं जानता था और श्लोक अशुद्ध बोलता था। चैतन्य महाप्रभु वहाँ ठहर गये कि उसकी अशुद्धि के लिये टोके। पर देखा कि भक्ति में विह्वल होने से उसकी आँखों से अश्रु बह रहे हैं।
चैतन्य महाप्रभु ने आश्चर्य से पूछा-आप संस्कृत तो जानते नहीं, फिर श्लोकों का अर्थ क्या समझ में आता होगा और बिना अर्थ जाने आप इतने भाव विभोर कैसे हो पाते है। उस व्यक्ति ने उत्तर दिया आपको यह कथन सर्वथा सत्य है।
कि मैं न तो संस्कृत जानता हूँ और न श्लोकों का अर्थ समझता हूँ। फिर भी जब मैं पाठ करता हूँ तो लगता है मानों कुरुक्षेत्र में खड़े हुये भगवान अमृतमय वाणी बोल रहे हैं और मैं उस वाणी को दुहरा रहा है। इस भावना से मेरा आत्म आनन्द विभोर हो जाता है।
चैतन्य महाप्रभु उस भक्त के चरणों पर गिर पड़े और उनने कहा तुम हजार विद्वानों से बढ़कर हो, तुम्हारा गीता पाठ धन्य है।
भक्ति में भावना ही प्रधान हैं, कर्मकाण्ड तो उसका कलेवर मात्र हैं। जिसकी भावना श्रेष्ठ है उसका कर्मकाण्ड अशुद्ध होने पर भी वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। केवल भावना हीन व्यक्ति शुद्ध कर्मकाण्ड होने पर भी कोई बड़ी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
“हमें ईश्वर का सच्चा साक्षात्कार तभी होता हैं, जब हम उसके सामने अपनी वाचनाएँ लेकर नहीं, किन्तु अपनी भेंट लेकर जाते हैं।”
-रवीन्द्र
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“यदि कोई चाहे कि वह दुनिया में अपना स्वार्थ साधन भी करे और ईश्वर को भी प्राप्त कर ले, तो यह असंभव है।”
-अज्ञात
(श्री. विद्यावागाँश ब्रह्मचारी)
लोहे के एक टुकड़े को लेकर एक कम योग्यता का लुहार मामूली भी हलकी फाल, खुरपी, गँडासा या दूसरी चीजें बना देता है। एक दूसरा लुहार उसी लोहे को अच्छी तरह पकाकर चतुराई से ढालकर बन्दूक की नाल बनाता है। तीसरा लुहार लोहे से किन्हीं बढ़िया घड़ियों के कीमती पुर्जे बनाता है। लोहे का टुकड़ा एक ही दाम का था और लुहारों को समय एवं श्रम भी लगभग समान ही लगाना पड़ा पर बनी हुई चीजों की महत्ता एवं कीमत में भारी अन्तर है। हल की फाल एक दो रुपये की बिकी। बन्दूक की नाल चार सौ की बनी और घड़ियों के पुर्जे हजारों रुपये के बिके।
इस अन्तर का कारण लुहारों की क्षमता का अन्तर है। शारीरिक दृष्टि से ये तीनों लुहार देखने में एक से लगेंगे, पर अन्तर उनकी मानसिक योग्यता का है। एक को लोहे का मामूली उपयोग आता है वह साधारण सी मोटी मोटी चीजें बना सकता हैं, उसने अपने उस्ताद से जितना सीखा था उसे ही याद रखा, इससे आगे उस कला में प्रवेश करने की, उसकी बारीकियाँ जानने की और अपने आपको अधिक किया कुशल बनाने की कोशिश नहीं की। फलस्वरूप वह जैसा मामूली लुहार बचपन में था, लगभग जीवन भर वैसा ही बना रहा।
बन्दूक की नाल ढालने वाले और घड़ी के पुर्जे बनाने वाले लुहार भी आरम्भ में उस मामूली लुहार की भाँति ही छोटा काम सीखें होंगे, प्रारम्भिक दिन तीनों के ही एक से रहे होंगे। पर आगे चलकर जिनने अपने मस्तिष्क पर अधिक जोर दिया, अधिक जानने और अधिक प्रवीण बनने की इच्छा की उन्हें आगे बढ़ने के साधन भी मिलते गये। और आज वे अपने पिछड़े हुये साथी की अपेक्षा कई गुना कमाते हैं और सम्मान प्राप्त करते हैं।
लुहारों का तो उदाहरण मात्र हैं। सारे समाज में यही क्रम चल रहा। जिनका मन आगे बढ़ने के लिये उल्लसित नहीं होता, जो बारीकियों को ढूँढ़ने उन्हें पकड़ने और आज की अपेक्षा कल अधिक उत्कृष्ट निर्माण करने की साथ में रहते हैं, निश्चय ही उन्हें अपनी क्षमता बढ़ाने का अवसर मिलता है कई लोग यह शिकायत करते रहते हैं कि हमें आगे बढ़ने का अवसर ही नहीं मिला, उन्नति करने के साधन उपलब्ध नहीं हुये। उनका ऐसा सोचना अपनी काहिली और हीन मनोदशा को छिपाने का एक बहाना मात्र हे। उसमें सार की बात अधिक नहीं है। यह ठीक है कि यदि अच्छे अवसर का साधन अनायास ही प्रचुर मात्रा से मिल शीघ्र उन्नति हो सकती हैं, किन्तु यदि मानसिक काहिली घेरे हुये हो तो साधन भी उसकी कुछ सहायता नहीं कर सकते।
अनेकों अमीरों और उन्नतिशील लोगों के लड़के अपने बुजुर्गों की अपेक्षा अधिक उन्नति के अवसर प्राप्त होते हुये भी गिरी हुई दशा में पड़े रहते हैं, इतना ही नहीं ऐश, आराम की आदत पड़ जाने पर पूर्वजों की संचित सम्पत्ति और प्रतिष्ठा को खो भी देते हैं। पर ऐसे अगणित मनुष्य है जो गरीब और साधन हीन परिवार में पैदा होकर भी अपनी आन्तरिक स्फूर्ति, लगन, धर्मशीलता तथा बारीकी से देखने की दृष्टि होने के कारण उन्नतिशील हुये हैं, उनने आगे बढ़ने के साधन खोजे हैं और वे उन्हें मिली भी हैं। इस सृष्टि का यह मनातन नित्य रहा है कि सत्पात्रों को उनकी आवश्यक वस्तुएँ तब परिस्थितियाँ देर सवेर में अवश्य मिल जाती है साधनों के अभाव में आज तक किसी को भी गिरी अवस्था में पड़े नहीं रहना पड़ा है।
जिन्हें बुद्धिमान कहा जाता है वस्तुतः उनमें भी साधारण लोगों में जितनी बुद्धि होती है पर अन्तर केवल इतना ही रहता है कि वे हर चीज को बारीकी से देखते हैं, उसमें गहराई तक जाने की कोशिश करते हैं, ढूँढ़ने में उन्हें आनन्द मिलता हैं, वे अपने क्षेत्र में उदासीनता की नहीं वरन् दिलचस्पी की दृष्टि फेंकते है फलस्वरूप उन्हें वह बहुत कुछ मिल जाता है।
एक आदमी नदी के किनारे बैठा-बैठा ठण्डी हवा लेता रहता है किन्तु दूसरा मनुष्य लकड़ी में रस्सी बाँधकर मछली पकड़ना आरम्भ कर देता है। हवा खाने वाला शाम को खाली हाथ जाता है पर वह उद्योगी मनुष्य मछलियों से टोकरी भर ले जाता है। यही बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है।
मन्द बुद्धि का अर्थ मस्तिष्क के किसी भाग का दुर्बल होना नहीं है वरन् यह है कि वह व्यक्ति अपने क्षेत्र में दिलचस्पी नहीं लेता, आधे मन से बातों को सोचता है और आधी दिलचस्पी से अपने कार्यों को करता है। यदि खोजने की, सीखने की अधिक उत्कृष्टता उपलब्ध करने की आकांक्षा हो तो मस्तिष्क के कल पुर्जे अपने आप ही बहुत काम करते हैं, उनमें यदि कुछ कमी भी हो तो इस प्रकार की उल्लसित मनोभावना के कारण उसकी पूर्ति जल्दी ही हो जाती है। मन्द बुद्धि समझे जाने वाले लोग यदि इस प्रक्रिया को अपना ले तो वे निश्चित रूप से थोड़े ही दिनों में बुद्धिमान कहलाने लगेंगे।
निर्जीव मशीन को जिस ढर्रे पर चला दिया जाय सदा उसी पर चलती रहती है। कुछ लोग मशीन की तरह ही एक ढर्रे पर काम करते रहते हैं किन्तु कुछ लोग ऐसे ही होते हैं जो हाथ में आये हुये काम को, अधिक सुन्दर और उत्कृष्ट बनाने का रास्ता मालूम करने के लिये बेचैन रहते हैं। सजीव का यही चिह्न है। यह गुण जिसमें होगा वह आज की परिस्थिति में कदापि न पड़ा रहेगा। खोजने वाले को मिलता है। उसकी कृतियाँ उत्कृष्ट बनती हैं। उसके सीखने और खोजने की वृत्ति का पता जब लोगों को लगता है तो वे उसका आदर करने ही है। हीरा अधिक देर तक जौहरी की आँखों से बचा नहीं रहता उसकी परख होती ही है और अन्त में उसे सम्मान नींव स्थान पर रखा ही जाता है। खोजने और सीखने का गुरु मंत्र जिसने भली प्रकार हृदयंगम कर लिया उसे उन्नतिशील होने की सिद्धि मिलकर ही रहती है।
मंदबुद्धि का एक लक्षण यह है कि आधे मन से, उदासीनता पूर्वक किसी काम को एक ढर्रे की तरह पूरा करते रहा जाय उसमें कोई नवीनता खोजा ने एवं उत्कृष्टता पैदा करने का प्रयत्न न किया जाय। दूसरा लक्षण यह है कि पर्याप्त परिश्रम न करना, थोड़े ही प्रयत्न से संतुष्ट हो जाना और बहुत जल्दी सफलता की आशा करना, छिछोरे आदमी प्रायः ऐसे ही होते है। वे बड़ी-बड़ी कामनायें तो करते हैं पर इसके लिये जितनी तन्मयता तत्परता और प्रयत्नशीलता की आवश्यकता है वह उनसे नहीं बन पड़ती। थोड़े ही प्रयत्न को बहुत बड़ा मान लेते हैं और यह सोचने लगते हैं जो कुछ कर लिया अब इससे ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। इस प्रकार ये समय के बारे में अधीर होते हैं। इतने दिन प्रयत्न करते हुये हो गये, अभी तक सफलता न मिली तो आगे क्या मिलेगी? यह सोचकर वे निराशा में डूब जाते हैं और प्रयत्न करना छोड़कर भाग्य को कोसने लगते हैं।
यदि हमें बुद्धिमान बनना हो, उन्नतिशील लोगों की श्रेणी में सम्मिलित होना हो तो यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिये कि जीवन भर तक विद्यार्थी बने रहने की आदत डालनी होगी। जितना हम जानते हैं वह बहुत है, ऐसा मिथ्या अभिमान जिस किसी को आ जाता है उसी दिन उसकी उन्नति के द्वार बन्द हो जाते है। यह अभिमान प्रगति का सबसे बड़ा शत्रु है इससे सर्प और सिंह के समान बचना चाहिये। जितना अब तक हम जानते है।
संभव है वह कई पिछड़े हुए लोगों को अपेक्षा अधिक हो, परन्तु जो लोग आगे हैं। उनकी अपेक्षा निश्चय ही हम बहुत पिछड़े हुए है। ऐसी दशा में अभामन किस बिरते पर किया जाय? यदि कोई सर्वोत्कृष्ट ज्ञानवान हो जाय तो भी उसे यही समझना चाहिए कि अभी ज्ञान विज्ञान का क्षेत्र अनन्त है और जितना जान लिया गया है भविष्य में उससे और अधिक जानने की संभावना मौजूद है। जो लोग स्वल्प ज्ञान रखते हुए भी अपने को बड़ा जानकर मानते हैं और घमंड से ऐंठते हैं उनकी मूर्खता सचमुच उपहास के योग्य है।
ज्ञान अनन्त है। किसी छोटे से छोटे विषय की अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए एक जन्म का समय बहुत थोड़ा है इसके लिए कई जन्म चाहिए। अतएव जिस दिशा में अपनी अभिरुचि हो उसका विनम्र विद्यार्थी ही बना रहना चाहिए और जितना जान लिया गया है उसे अपर्याप्त मानकर आगे और अधिक जानने के लिए सचेष्ट रहना चाहिए।
गिरीन्करोति मृत्पिडान,
श्रेष्ठ आत्माओं का संकल्प मिट्टी के ढेले को पहाड़ बना सकता है। समुद्र का पुल बाँध सकता है। आकाश को भुजाओं से तर सकता है। तात्पर्य कोई कार्य ऐसा नहीं जो संकल्प शक्ति के आधार पर पूर्ण न हो सके।
सोत्साह त्यास्ति लोकेपुन क्रिंचिदपि दुर्लभक्
-बाल्मीकि0 किष्क0 1122
उत्साही पुरुषों के लिये इस संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
वछि समुद्रवति निर्मथनेन काष्ठा
काष्ठ को रगड़ते रहने से अग्नि पैदा हो जाती है, भूमि को खोदते रहने से जल निकल आता है, चलते रहने में दूर यात्रा पूर्ण होती है, कार्य में संलग्न मनुष्य क्या नहीं कर लेता?
यो समर्थ प्रार्थयते तदर्थ चेहते क्रमात्
-योगवाशिष्ठ
जिस वस्तु की इच्छा की जाय और तदर्थ प्रयत्न किया जाय तो उसकी प्राप्ति अवश्य ही होती है यदि प्रयत्न को बीच में ही छोड़ न दे तो।
प्राध्यापदं न व्यथते कदाचि-दुधोगमन्विच्छति चा प्रभातः।
जो आपत्ति पड़ने पर भी अधीर नहीं होता वरन् विवेक और उद्योग का सहारा लेकर उसे सहन करते हुये पार होता है। ऐसे व्यक्ति के विघ्नों को परास्त हुआ ही जानो।
साहसे खलु श्रीः वसति।
-चाणक्य सूत्र 2150
निश्चय ही साहस में लक्ष्मी का निवास है।
यथा वशान्ति देवा स्तथेदसत्।
-ऋग्वेद 8/28/4
श्रेष्ठ पुरुष जैसा चाहते हैं वैसा होता है।
आरभे तैव कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः,
-मनु 9130
बार-बार थक जाने पर भी बार-बार प्रबल करे। कार्य में लगे रहने पर अन्त में विजय श्री मिलती ही है।
प्राप्तये किं यशः शुभ्रमनंगी कृत्य साहसम्।
साहस को अपनाये बिना शुभ यश किसको मिला है?
दधति धु्रवं क्रमश एव न तु,
तेजस्वी लोग भी धीरे-धीरे ही उन्नति कर पाते है। सहसा नहीं”।
मनस्वी कार्यार्थी गणयसि दुःखं न च सुखम्।
-भर्तृहरि
मनस्वी कर्तव्य परायण लोग सुख दुःख की परवाह नहीं करते।
आशया हि किमिव न क्रियते।
आशा के सहारे क्या नहीं किया जा सकता?
आलस्य कि मनुष्याणाँ शरीरस्थो महान् रिपुः।
-भृतंहरि
मनुष्य शरीर में आलस्य ही महान् शत्रु है। उद्यम के समान कोई मित्र नहीं। उद्यमी दुखी नहीं रहता।
आलस्यं यदि न भवेष्जगत्यनर्थः
-योगवाशिष्ठ 2/5/30
इस संसार में यदि आलस्य रूपी अनर्थ न होता तो कौन विज्ञान और धनी न हो जाता? आलस्य के कारण ही वह सारी पृथ्वी दरिद्री और नर पशुओं से भरी पड़ी है।
न ऋते भं्रान्तस्य सख्याय देवाः
-ऋग्वेद 4/33/11
परिश्रमी को छोड़कर और किसी की देवता सहायता नहीं करते।
उत्साह सम्पन्नमदौर्ध सूत्र क्रियाविधिज्ञं व्यसनेध्वसक्तम। शूब्कृतज्ञ दृढसौहदं च लक्ष्मीः स्वयं वाच्छति वास हेतोः।
उत्साही, निरालस्य, व्यवहार कुशल, मिर्त्यसनी, साहसी, कृतज्ञ और दृढ़ मित्रता करने वाले व्यक्ति पर लक्ष्मी स्वयं कृपा करती है।
सत्जनानां हि शैलीयं सक्रमारम्भशालिता
बुद्धिमानों की नीति अपने कार्यक्रमों का धीरे-धीरे क्रमिक विकास करने की रहती है।
अप्रिया न भविष्यन्ति प्रियोमेन भविष्यति।
अहं च न भविष्यमि सर्वच न भविष्यति-बोधिचर्यायतारः
अप्रिय लगने वाले भी न रहेंगे, प्रिय लगने वाले भी कुछ दिन बाद न रहेंगे। मैं भी कहाँ रहूँगा? यह सब जो दीखता है कुछ भी न रहेगा?
तुगत्वमितरानाद्रौनेदं सिन्धावगाघता।
पर्वतों में ऊँचाई होती है गहराई नहीं, समुद्र में गहराई है ऊँचाई नहीं पर मनस्वी लोगों में यह दोनों ही बातें होती हैं।
आरम्भतेऽल्पमेवाज्ञाः कामं व्यप्राभवन्ति च।
क्षुद्र लोग काम तो करते हैं छोटा पर घबराते हैं बहुत। किन्तु महान् लोग महान् कार्य अपने कंधे पर लेकर भी अधीर नहीं होते।
दैवमाश्वासना मात्रं दुःखेपेलब बुद्धिपु
-योगवाशिष्ठ 2/8/15
भाग्य की कल्पना कम बुद्धि वालों को दुःख के समय सान्त्वना देने के लिये है। सान्त्वना के अतिरिक्त वस्तुतः भाग्य कोई वस्तु नहीं है।
मूढैः प्रकल्पितं दैवं तत्परास्ते क्षयं गताः।
-योगवाशिष्ठ 2/8/16
मूर्ख लोग भाग्य की कल्पना करके उसी के भरोसे बैठे रहते है और नष्ट हो जाते हैं। बुद्धिमान लोग पुरुषार्थ करके उन्नति करते हैं और अच्छी स्थिति को प्राप्त करते है।
पुरुषार्थ फल प्राप्ति र्देशकाल वशादिह।
-योगवाशिष्ठ 2/7/21
किये हुये पुरुषार्थ का देश काल परिस्थिति के अनुसार जो देर सवेर में फल प्राप्त होता है उसी का नाम भाग्य है।
यथा यथा प्रयत्नः स्याद्ववेदाषु फलं तथा।
-योगवाशिष्ठ 216
जैसा प्रयत्न किया जाता है वैसा ही फल प्राप्त होता है। पुरुषार्थ ही सत्य है, उसी को भाग्य भी कहते हैं।
ये शूरा ये च विक्रान्ता ये प्राज्ञा ये च पंडिताः।
तैस्तैः क्रिमिवा लोकेऽस्मिन्वद दैर्व प्रतीच्यते।
-योगवाशिष्ठ
जो शूर हैं, उन्नतिशील हैं, ज्ञानी हैं, पंडित हैं उनमें से कौन भाग्य भरोसे बैठा रहता है, जरा बताओ तो सही?
सर्वाच निरतिः भवतु या श्रमरति
-अशोक
श्रम से प्रेम करना, मनोरंजनों से सबसे श्रेष्ठ ह
(डा. रामचरण महेन्द्र एच ए, पी.एच.डी.)
जब आप किसी सुन्दर मधुसिक्त डाली पर विहँसते किलकते सुवासित पुष्प को देखते हैं तो मन ही मन आपके हृदय में यह इच्छा उठती है कि “क्या ही अच्छा होता, यदि हम भी ऐसे ही सरल सुन्दर और आकर्षक रहे होते! हममें भी ऐसा ही रंग होता ऐसी ही गुणों की सुवास होती, हम भी ऐसे ही सरल और होते। हम भी ऐसा ही निश्चिन्त आडम्बर रहित जीवन व्यतीत करते।”
जब आप मयूर के पंखों की चटकीली रंगीनी देखते हैं, या उस नृत्य में आत्म-विभोर देखते हैं, तो आपकी अनायास ही यह इच्छा होती है कि “काश, हम भी ऐसा ही विमोहक नित्य कर पाते, मस्ती से दूसरों को आकर्षित कर पाते। हमारे पाँवों की थिरकन हमारे हृदय की भावनाओं की गहरी और सच्ची अभिव्यंजना कर पाती। हमारे मुख से निकले हुये गीतों में से हमारा हर्ष विषाद, घृणा-प्रेम आशा-निराशा इत्यादि गुम्फित हो जाता।”
जब हम किसी भक्त कवि या कवियित्री की रसस्निग्ध वाणी पढ़ती हैं, या भजन सुनते हैं, तो अनायास ही हमारी इच्छा होती है कि “हम भी हृदय स्पर्शी भजन लिखते, और मधुर गीत गाते। अपने भीतर उठने वाले द्वन्द्वों को भक्ति-पूर्ण वाणी में प्रकट करते। भक्ति तथा काव्य के सम्मिश्रण से हमें विशुद्ध आनन्द प्राप्त होता और आत्म श्रद्धा के योग से हमारा जीवन मंगलमय और शान्तिमय होता। लोगों को हमारी वाणी में साँस्कृतिक चेतना का स्फुरण मिलता।”
जब आप प्रहलाद, ध्रुव आदि की धर्मवृत्ति, मूर्तियों के सत् धर्म, दधीचि का देवत्व की रक्षा के लिये बलिदान देश के गुलामी से मुक्त करने वाले शहीदों की ओजस्वी कहानियाँ, वीर हककतराय की दृढ़ता और साहस, गुरु गोविन्दसिंह के पुत्रों की निर्भयता और वीरता की प्रेरक घटनाएँ सुनते हैं, तो मन ही मन हमारे अन्दर यह इच्छा जागृत होती है कि “काश, ये सब उत्तम गुण, ये चारित्रिक विशेषताएँ, यह उच्च भावनाएँ हम भी अपने जीवन में प्रकट कर पाते। स्वतन्त्रता की वेदी पर हम भी अपने प्राण न्यौछावर कर देते।”
जहाँ कही किसी व्यक्ति में हम उत्तम गुण, उच्च चरित्र, स्वास्थ्य, सौंदर्य या कोई प्रशस्त कला देखते हैं, हमारे अन्दर कहीं से चुपचाप एक उच्च भाव पैदा होता है कि “काश, हम भी यही उच्च दैवी भाव या भव्य शक्तियाँ प्रदर्शित कर पाते।”
प्रत्येक अच्छाई हममें एक जागृति पैदा करती हैं। हमारी सोयी हुई आत्म-शक्ति को जगाती हैं तथा हमें श्रेष्ठता की ओर बढ़ने का गुप्त संकेत करती हैं। श्रेष्ठता और अच्छाई की ओर हमारा उत्साह और रुचि पैदा करने वाली हमारी गुप्त आत्मशक्ति ही है। दूसरों के अच्छे और सद्गुणों के प्रति हमारे हृदय में ललक और अनुकरण की इच्छा इस गुप्त आत्मशक्ति के भण्डार के ही कारण होती है। दूसरी भर एक ओर विचारधारा है।
आप जब किसी पागल को प्रलाप करते हुये चिथड़े लपेटे भद्दे रूप में अटपटे वाक्य बोलते सुनते हैं, तो आपकी यह इच्छा कभी नहीं होती कि हम भी इस व्यक्ति की तरह मूड, उन्मत्त या असंतुलित बन जाय। जब आप किसी चोर, डाकू या हत्यारे को सजा पाते या समाज में बहिष्कृत होते देखते है। तो हमारी यह इच्छा कदापि नहीं होती कि हम भी चोर, डाकू या हत्यारे बन जाये। जब हम किसी कोढ़ी, अपाहिज, रोगी, दुर्बल, दीन, दरिद्र बहिष्कृत, सजावार को देखते हैं, तो हमारा कभी यह नहीं कहता कि हमें भी ऐसे ही बन जाये। कुरूप को देखकर हम स्वयं बदसूरत होने की कामना नहीं करते। रोगी को देखकर हम स्वयं कभी रोगी होने की इच्छा नहीं करते।
हम प्रजा पीड़क कंस जैसे नहीं बनना चाहते। सीता जी का हरण करने और अत्याचार की और प्रवृत्त रावण के प्रति हमारी कोई सहानुभूति नहीं होती। भाइयों को सताने और असंख्य व्यक्तियों का संहार कराने वाले दुष्ट दुर्योधन के प्रति हमारा ममत्व नहीं जागता। हम दुष्टों, दुश्चरित्रों, प्रजा-पीड़ा के अत्याचारियों, पर संहाराके, शोषकों, शराबियों, जुआरियों या व्यभिचारियों का घृणा करते हैं। हम इनमें से कुछ भी नहीं बनना चाहते। इधर हमारी रुचि नहीं होती। ये तमाम दुष्प्रवृत्तियाँ हमारी आत्मा के विपरीत पड़ती है। हमारी नैसर्गिक प्रवृत्ति कभी इनकी ओर नहीं होती।
हम केवल सत् मार्ग और प्रवृत्तियाँ, ऊँची कलाओं और देवत्व के दिव्य गुणों की ही ओर अग्रसर होते है। प्रत्येक दिव्य गुण का अमृत-कुण्ड हमारी आत्मा है। वह ऐसा दिव्य केन्द्र है, जिसमें से हमारी उच्च प्रवृत्तियाँ अग्नि से चिनगारियों की भाँति फैला करती है। जहाँ पृथ्वी में जल छिपा हुआ होता है, वहाँ हरे भरे वृक्ष लहलहाते दृष्टिगोचर होते है। इसी प्रकार जहाँ मनुष्य का आत्मा-तत्त्व जागरूक होता है, वहाँ हमारी प्रवृत्ति आत्मा के दिव्य गुणों की ही ओर होती है। वह देवत्व की ओर अग्रसर होती है। अच्छाई से प्रेम करता है। संसार और समाज की सब श्रेष्ठताओं के रूप में हमारा आत्म-तत्त्व ही बह रहा है। श्रेष्ठता और सौंदर्य का मूल केन्द्र हमारी सत् चित्त आनन्द स्वरूप वह आत्मा ही है।
सत्य को मजबूती से पकड़ो
भगवान बुद्ध जब मरने लगे तब उनने अपने शिष्यों को बुलाकर अन्तिम उपदेश दिया “तुम लोग अपने-अपने ऊपर निर्भर रहो। किसी दूसरे की सहायता की आशा न करो। अपने भीतर से ही अपने लिये प्रकाश उत्पन्न करो। सत्य की ही शरण में जाओ और उसे मजबूत हाथों से पकड़े रहो।”
गलत परम्परा न डालूँगा
सुकरात को प्राण दण्ड की आज्ञा सुनाई गई। वे जेल में बन्द थे। उनके परम शिष्य क्रीटो ने जेल इसे भाग निकलने का सारा प्रबन्ध कर दिया और कहा गुरुदेव अब यहाँ से चुपचाप भाग चलिये और अपना जीवन बचाइए। सुकरात ने ऐसा करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। उनने कहा-राजकीय कानूनों का पालन करना प्रजा का धर्म है। यदि मैं इस प्रकार कानून की अवज्ञा करके अपने प्राण बचाने के लिये भाग चलूँ तो प्रजा में एक गलत परम्परा का जनम होगा।
उत्कृष्टता का आत्मगौरव
एक लुहार बढ़िया हथौड़े बनाने के लिये प्रसिद्ध था। एक व्यक्ति उसके पास गया और कहा-जैसे हथौड़े आप बनाते हैं उससे भी अच्छा मेरे लिये बना दें, मैं उसकी अधिक कीमत देने को तैयार हूँ। लुहार ने उत्तर दिया-मान्यवर मैं उससे और अच्छा हथौड़ा नहीं बना सकता। यदि बना सकता होता तो पहले ही बना दिया होता। मैं हथौड़ों की उत्कृष्टता को अपनी उत्कृष्टता मानता हूँ और उसमें किसी प्रकार की कमी रहने देना पसन्द नहीं करता।
मनुष्य की पहचान
स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका की एक सड़क पर से गुजर रहे थे तो उनकी विचित्र वेशभूषा को देखकर लोग उन्हें मूर्ख समझने और मजाक बनाने लगे। अपने पीछे आती हुई भीड़ के सम्मुख स्वामी जी रुके और उनने पीछे मुड़कर कहा-सज्जनों मेरी वेषभूषा को देखकर आश्चर्य मत करो। आपके देश में सभ्यता की कसौटी पोशाक है। पर मैं जिस देश से आया हूँ वहाँ कपड़ों से नहीं मनुष्य की पहचान उसके चरित्र से होती है।
सारी दुनियाँ ही स्कूल है
स्वामी रामतीर्थ जब छोटे थे, पड़ोस के गाँव के स्कूल में पढ़ने जाया करते थे। वे रास्ते में भी पुस्तकें पड़ते जाते थे। एक दिन एक किसान ने कहा-बेटा यहाँ खेतों में कोई स्कूल थोड़े ही है जो यहाँ भी पढ़ते हो। रामतीर्थ ने उत्तर दिया-काका जी मेरे लिये तो सारी दुनियाँ ही स्कूल है।
गरजो मत-बरसो
विद्वान् कार्लाइल ने अपने आत्म चरित्र में लिखा है वर्षा के दिनों में एक दिन अचानक हमारे पड़ोस में दुर्घटना पूर्ण मृत्यु हुई। लोग उस मौसम को कोस रहे थे। मैंने अनुमान लगाया कि उस आदमी की मौत बादलों के गर्जन से हुई। पर जब मैं बड़ा हुआ तब समझा कि मौत गर्जन से नहीं बिजली गिरने से होती है। तब से मैंने गरजना बन्द कर दिया और चमकने की तरकीब ढूँढ़ने लगा।
हिम्मत से काम करो
तूफान में जब नाव डगमगाने लगी तो मल्लाह घबराये। उसमें सवार सीजर ने कहा-घबराओ मत, हिम्मत से काम करो। तुम्हारी नाव के साथ सीजर और उसका भाग्य भी सवार है, वह आसानी से नहीं डूब सकती।
(श्री. पं. तोतारामजी एम. एस. सी.)
पुराणादि ग्रंथों में अनेक देवियों और देवताओं के जो वर्णन पढ़ने को मिलते हैं उन पर मनन करने से निष्कर्ष निकलता है कि इनका विशेष आध्यात्मिक रहस्य है और ये मानव जीवन के किसी उच्च आदर्श के प्रतीक हैं। विभिन्न कवियों ने अपनी-अपनी योग्यता और भावना के अनुसार इनके वर्णन किये हैं। इन सभी वर्णनों को विशेष ध्यान से पढ़ने पर प्रतीत होता है कि आदि काल से दो भिन्न प्रकार के ‘आदर्श’ मनुष्य को आकर्षित करते रहे है। इन्हीं दो प्रकार के आदर्शों में से एक के प्रतीक शिव और दूसरे के विष्णु हैं। शिव उस आदर्श के प्रलक जो केवल ज्ञान से ही मनुष्य का परम कल्याण संभव समझता है। इसके विपरीत विष्णु उस दूसरे प्रकार के आदर्श के प्रतीक प्रतीत होते हैं जो केवल कर्म द्वारा, विशेष कर याज्ञिक अनुष्ठानों द्वारा, पूर्ण कल्याण संभव मानता है।
जीवन के शैव आदर्श और वैष्णव आदर्श का एक भेद यह भी है कि जहाँ शैव आदर्श भौतिक संपत्ति को हेय मानता है और इसलिये पूर्ण वैराग्य को प्रश्रय देता हैं, वहाँ वैष्णव आदर्श भौतिक (लक्ष्मी) को श्रेय (श्री) मानता है। इसीलिये शिव का निवास श्मशान में और विष्णु का क्षीर सागर में बताया गया है। श्मशान में जीवन के भौतिक भाग (शरीर) का अन्त होता है और वहाँ लोगों को वैराग्य के प्रति आकर्षित होते देखा जाता है। इसी के साथ-साथ देखा जाता है कि जहाँ विष्णु की मूर्ति मनुष्य के आकार की और अनेक प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित होती हैं, वहाँ शिव की मूर्ति आकार और अलंकार विहीन होती है। शिव की गोल मटोल पिंडी आत्मा के निराधार होने का प्रतीक हैं। और इसका यही संकेत हैं कि ज्ञानी की दृष्टि साकार संसार से परे उसके आधार आत्मा पर रहती है। शिव के स्वरूप, अलंकार और जीवन संबंधी घटनाओं का जो वर्णन किया गया हैं उसको ध्यान पूर्वक पढ़ने से प्रतीत होता है कि वे सारी बातें एक पूर्ण ज्ञानी और सिद्ध योगी में घटती है। संक्षेप में इन वर्णनों का सार इस प्रकार है।
शिव का स्वरूप
शिव के स्वरूप के बारे में दो बातें विचारणीय है।
(क) माथे पर चन्द्रमा - यहाँ चन्द्रमा शब्द का सामान्य प्रचलित अर्थ न लेकर उसका धार्त्वथ, चित-आहादे मुदित मन करने से स्पष्ट होगा कि शिव के मस्तिष्क में चंद्रमा के निवास का आशय यह है कि पूर्णज्ञानी और सिद्ध योगी का मन सदा मुदित रहता है और संसार की विषमताओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
(ख) नीलकंठ - पौराणिक कथाओं के अनुसार शिव के कंठ के नीला हो जाने का कारण अमृत मंथन के समय समुद्र से निकले विष पात्र को पीने तथा उसे कंठ में ही रोके रखना है। यह प्रसंग भी सिद्ध योगी की उस शक्ति का उदाहरण है जिसके कारण योगी के शरीर को भी सामान्य विष विशेष हानि नहीं पहुँचा सकते। सिद्ध योगी का अपने स्थूल और सूक्ष्म शरीर पर पूर्ण अधिकार होने से वह अपने शरीर को विष आदि के कुप्रभाव से सुरक्षित रखने में समर्थ होता है।
(ग) वस्त्रादि अलंकारों से रहित अंग में राख (भभूत) लपेटी हुई-अंग में राख या रेत रमाने का अर्थ यह है कि योगी ने अपने वीर्य को अपने शरीर में ही रमा लिया है और उसके फलस्वरूप वह इतना स्वस्थ और सुन्दर है कि उसे बाह्य अलंकारों द्वारा विकृत करने की आवश्यकता ही नहीं। शिव के स्वरूप का यह भाग मानव जीवन के उस आदर्श का प्रतीक समझना चाहिये जिसे इन शब्दों में कहा जा सकता है। ‘समस्त सुख और सौंदर्य का सार स्वस्थ शरीर है। और स्वास्थ्य का आधार संयमी जीवन है।’
(2) शिव के जीवन सम्बन्धी कुछ घटनाएँ-
(क) शिव द्वारा गंगावतरण- पौराणिक कथा के अनुसार गंगा विष्णु का वह पादोदक है जिसे स्वर्ग में ब्रह्म ने वामन रूपी विष्णु के चरण धोकर अपने कमंडल में भर लिया था और जिसे भागीरथ के व्यापित पुरखाओ में भर लिया था और जिसे भागीरथ के व्यापित पुरखाओं को आप में मुक्त करने के लिए शिव द्वारा इस मर्त्यलोक में भेजा। इस प्रसंग के अनुसार गंगावतरण भागीरथ के शापित पुरखों के कल्याण के निमित्त हुआ था। भागीरथ के पुरखों उन मनुष्यों के प्रतीक है जो अपने दूषित संस्कारों के कारण इतने पतित हो चुके है कि उन्हें अपनी इस पतितावस्था से उठाने के लिए भागीरथ प्रयत्न आवश्यक हुआ। पतितावस्था से उठाने के लिए पहली आवश्यकता यह है कि उसको अपनी अवस्था का बोध हो और इसके लिए पश्चाताप भी हो। प्रायः यह देखा जाता है कि पतित अपने अहंकार में इतना डूबा होता है कि वह अपने आपको सर्वथा निर्दोष ही समझता है। कहावत है कि ऐसे को ब्रह्मा भी नहीं समझ सकते। यह ‘ब्रह्मा’ शब्द ऐसे विद्वानों का वाची है जिन्हें वेदादि शास्त्र कंठस्थ है और केवल शाब्दिक उपदेश दे सकते है। ब्रह्मा के कमंडल में सुरक्षित गंगा इस शाब्दिक ज्ञान का प्रतीत है जो सीधा सीधा छोड़ा हुआ लोक कल्याण कर सकने में असमर्थ है। परन्तु जो किसी सिद्ध योगी द्वारा लोक कल्याण करने में समर्थ हो सकता है। संसार में जितने युग प्रवर्तक संत महात्मा हुए है उन्होंने वे ही बातें कही है जो पहिले से जानी हुई थी और विद्वानों के मस्तिष्कों में सुरक्षित चली आती थी, परन्तु उनके द्वारा कहे जाने पर लोगों पर जो प्रभाव पड़ा है वह पंडितों द्वारा कहे जाने पर नहीं पड़ा। बुद्ध, ईसा, मुहम्मद, स्वा0 दयानन्द और महात्मा गाँधी का जो भी प्रभाव जनता पर पड़ा, वह उनकी अपनी आत्मशक्ति के कारण पड़ा। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ज्ञान की गंगा का अवतरण शिवों द्वारा प्रायः होता रहा है और होता रहेगा।
(ख) शिव के तृतीय नेत्र को खोलते ही काम का दहन- शिव का तृतीय नेत्र वह मानव मेधा है जिसकी सहायता से हम संसार के पदार्थों का वह स्वरूप देख सकते है जिसका सम्बन्ध हमारे शारीरिक जीवन से न होकर आध्यात्मिक जीवन से है। हमारी समस्त कामनाओं का सम्बन्ध प्रत्यक्ष के परोक्ष रूप से शरीर से है। जिस काम का दहन शिव के तीसरे नेत्र के खुलने से होता है वह हमारी स्वादेन्द्रिय है जिसके वशीभूत हो हम ऐसे अनेक व्यवहार करने का बाध्य होते रहते है जो हमारे जीवन की अनेक प्रकार की व्याधियों के कारण है। महात्मा गाँधी ने ‘अस्वाद’ को एक महाव्रत इसीलिए कहा है कि इसके धारण करने से हमारे समस्त शारीरिक और अधिकांश सामाजिक रोग दूर हो सकते है। अपनी विवेक बुद्धि (तृतीय नेत्र) से ही हम रुचिकर और हितकर अथवा प्रेय और श्रेय में भेद कर हितकर या श्रेय को अपना कर अपने और समाज के जीवन को निरापद कर सकते है और इस प्रकार उस काम या प्रेम को परास्त कर सकते है जो अनेक प्रकार से हमें त्रस्त कर रहा है।
शिव के इस तृतीय नेत्र को वैज्ञानिक दृष्टि भी कहा जा सकता है। क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टि भी हमें उपयोगी-अनुपयोगी या हितकर-अहितकर में पहचान कराने में समर्थ होती है। इसका एक उदाहरण पदार्थों का मूल्यांकन है। आदिकाल से हम सुवर्ण आदि उत्तम धातुओं और हीरा; मोती आदि रत्नों को लोहे और कोयले से अधिक मूल्यवान समझते रहे है। परन्तु विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि सोने की अपेक्षा लोहा कही अधिक उपयोगी है। सोने के प्रति इतना आकर्षण ही मनुष्य को पारस की खोज में पागल बनाता रहा है और आज भी भारतीय सबसे अधिक पागल प्रतीत हो रहे है। क्योंकि भारत में सोने का मूल्य सबसे अधिक है। साथ ही विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि हीरा और कोयला एक ही मूलतत्त्व कार्बन के भेद मात्र है।
आज से हम यदि अपने तृतीय शिवनेत्र को खोलकर संसार के पदार्थों और समाज में प्रचलित परम्पराओं का मूल्यांकन करना सीख लें तो निःसंदेह हमारा शारीरिक और सामाजिक जीवन अधिकाधिक निरापद होता चला जाएगा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिव मानव जीवन की उस विशेषता के प्रतीक है जिसके बिना मनुष्य पशु बन जाता है। मनुष्य का यह धर्म उसकी विवेक बुद्धि है जिसके सहारे वह पशुओं से मनुष्य और मनुष्य से देव या महादेव बनने में समर्थ होता है। ऐसे ही मेधावी मनुष्यों को हंस या परमहंस कहा जाता रहा है। हंस पक्षी के जब मुख्य लक्षण कहे जाते है वे तीनों पूर्ण ज्ञानी और सिद्ध योगी शिव में घटते है। हंस में नीर-क्षीर को अलग अलग कर देने की क्षमता है। यह ज्ञानी योगी की सदामद्-विवेक की क्षमता का प्रतीक है। हंस मान सरोवर पर ही रहता है, इसका आशय यह है कि ज्ञानी योगी की प्रत्येक कार्य मनन शीतलता या विचार से निश्चित होता है, भावनाओं या परंपराओं से नहीं। उसका तीसरा लक्षण उसका मुक्ता चुनना है, कहावत प्रसिद्ध है- ‘कै हंसा मोती चुगे कै लघंन कर जाय।’ ज्ञानी योगी के जीवन का लक्ष भी मुक्ति या अनासक्ति है। उसे जो आनन्द प्यार में, व्रत या उपवास में आता है वह भोग में नहीं आता। इस प्रकार शिव मानवीय जीवन के उच्चतम आदर्श के प्रतीक है जिसकी प्राप्ति के लिए पूर्ण निभ्राँत ज्ञान, योग की उच्चतम सिद्धि और तप की आवश्यकता है।
हम अपने भाग्य के आप मालिक है। अपने प्रारब्ध के रचयिता हमीं है।
-भगवान बुद्ध
प्राप्ति के आनन्द की अपेक्षा प्रयत्न का आनन्द श्रेष्ठ है।
-विनोबा भावे
द्वेष बुद्धि का दुष्परिणाम
वसिष्ठ और विश्वामित्र प्राचीन युग के सुप्रसिद्ध ऋषि थे। ये दोनों ही परम ज्ञानी और विद्या बुद्धि के भंडार थे, पर इनमें ऐसी शत्रुता का भाव उत्पन्न हो गया था कि एक दूसरे को देखते ही अपशब्द कहने लगते थे। एक बार वशिष्ठ इन्द्र के यज्ञ में जाने के लिए जैसे ही आश्रम से बाहर निकले कि उनका विश्वामित्र से सामना हो गया। दोनों एक दूसरे पर अपशब्दों की बौछार करने लगे और अन्त में वशिष्ठ ने विश्वामित्र ने भी आप देकर उनको ‘आडी’ नाम का पक्षी बना दिया। वे दोनों ही एक सरोवर के तट पर घोंसला बना कर रहने लगे और पूर्व बैर को स्मरण करके नित्य प्रति युद्ध करने लगे। उनके जो बच्चे और सम्बन्धी थे वे भी लड़ाई में भाग लेने लगे। यह युद्ध बहुत वर्षों तक चलता रहा जिसके कारण वह रमणीक सरोवर और आस पास का दर्शनीय प्रदेश घृणित रूप में परिवर्तित हो गया। इस दुर्दशा को देखकर पितामह ब्रह्मा वहाँ पधारे और उन्होंने वशिष्ठ तथा विश्वामित्र दोनों को शाप मुक्त करके बहुत डाँटा- फटकारा कि तुम ज्ञानी और तपस्वी होकर यह कैसा मूर्खों का सा कार्य कर रहे हो जिससे असंख्यों व्यक्ति दुःख पा रहे हैं और निन्दा कर रहे हैं। उन्होंने दोनों को खूब समझा दिया कि इस प्रकार की द्वेष बुद्धि रखना बड़ी अधर्मता की बात है। ज्ञानी तो दूसरे की दो अनुचित बातें भी सहन कर लेता है और क्षमा वृत्ति से काम लेता है। ब्रह्मा जी का आदेश को मानकर वे दोनों प्रेम पूर्वक मिले और भविष्य में कभी ऐसे निर्बुद्धिता का कार्य न करने की प्रतिज्ञा की।
महाराज सगर की न्यायशीलता
सूर्य वंश में महा सगर बड़े प्रतापी और विख्यात नरेश हो गये है। संतान के लिए उन्होंने अनेक साधु सन्तों की सेवा की तो उनको संतान की प्राप्ति हुई। पर भाग्यवश उनका बड़ा पुत्र बड़े दुष्ट स्वभाव का निकला। वह बालकों को पकड़कर अकारण ही सरयू नदी में डुबा देता था। जब प्रजा ने इस बात की शिकायत राजा से की तो उन्होंने राजपुत्र को न्यायालय के समक्ष बुलाया। यद्यपि मंत्रियों ने उसे पागल बताकर क्षमा करने का आग्रह किया, पर राजा ने उसे दोषी पाकर अपने राज्य से निकाल दिये जाने का दण्ड दिया। साथ ही उन्होंने यह भी आज्ञा दे दी कि “जो कोई उसे ठहरा कर उसकी किसी प्रकार की सहायता करेगा वह भी दण्डनीय होगा।” राजा की दूसरी रानी से और भी बहुत से पुत्र हुये थे पर वे कपिल मुनि से दुर्व्यवहार करने के कारण भस्म किये जा चुके थे। रानियों ने इस पुत्र को क्षमा करने के लिए बहुत कहा पर सगर न्याय पथ से विचलित न हुए उनने पुत्र को देश निकाला दे ही दिया। राजा सगर ने असमंजस के पुत्र अंशुमान् को बुलाकर अपने पराये का विचार न करते हुए उसे अच्छी तरह शिक्षा दी और राज्य सिंहासन का उत्तराधिकारी नियत किया। अन्याय मूलक काम चाहे अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा ही क्यों न किया जाय, उसे सहन करना अन्याय को प्रोत्साहन देना है।
अतिथि सत्कार की महिमा
दुर्दान्त नाम का व्याध एक दिन जंगल में शिकार को गया। अनेक व्यक्तियों को मार कर तथा कुछ को पकड़कर वह संध्या समय घर वापस जाने लगा तो अचानक बड़े जोर का तूफान आया और ओलों की वर्षा होने लगी। इस विपत्ति का देखकर वह भागा और बहुत कष्ट सहकर एक पेड़ के नीचे जाकर गिर गया। उसकी दुर्दशा देखकर पेड़ के ऊपर रहने वाले एक कबूतर को तरस आया। उसकी कबूतरी को पहले ही व्याद्या ने पकड़ रखा था। फिर भी कबूतर ने अतिथि धर्म को स्मरण करके उसको ठंड से बचाने के लिए इधर उधर से आग लाकर उसे जला दिया। फिर यह देखकर कि वह भूखा भी है कबूतर और कबूतरी दोनों यह कहकर अग्नि में गिर गये कि आप इस समय हमारे अतिथि हो हम आपकी और कोई सेवा तो कर नहीं सकते, पर आप हमारे शरीर को ग्रहण करके अपनी क्षुधा निवारण करो। उनके इस अपूर्व त्याग के प्रभाव से देवताओं का आसन हिल गया और स्वर्ग से एक विमान उनको ले जाने को उतरा। इस घटना को देखकर व्याध भी चकित रह गया और उन दोनों से अपने उद्धार का मार्ग पूछने लगा। कबूतर से कहा अब तुम निर्दयता के कार्ये को त्याग भगवान की आराधना करो और सदैव यथाशक्ति अतिथि सत्कार का ध्यान रखो। जो निःस्वार्थ बुद्धि से अतिथि सेवा में संलग्न रहता है वह अवश्य ही भव सागर से पार होता है।
अध्ययन की महिमा
देवरात का पुत्र ब्रह्रारात बाल्यावस्था से ही बड़ा मेधावी, कुशाग्र बुद्धि और कर्मशील था। उसकी माता ने उसे विद्याध्ययन के लिए अपने भाई वैशम्पायन ऋषि के पास भेज दिया था। वहाँ कुछ ही समय में उसने समस्त शिक्षा प्राप्त कर ली और गुरु की सेवा भी इतनी संलग्नता के साथ की कि वे उस पर बड़े प्रसन्न रहने लगे। एक दिन घटना वंश गुरु जी को ऋषि सभा में जाने में देर हो गई और जब वे जल्दी जल्दी जाने लगे तो भूल से एक छोटे शिशु पर पैर पड़ जाने से वह मर गया। इस पाप का प्रायश्चित करने की आज्ञा उन्होंने शिष्यों को दी। ब्रह्रारात ने प्रार्थना की कि ये शिष्य असमर्थ है अगर आज्ञा हो तो मैं अकेला ही प्रायश्चित को पूर्ण कर दूँ। उसकी बात को अभिमान पूर्ण समझ कर वैशम्पायन बड़े क्रोध में आये और बोले कि तुझमें ऐसी ही सामर्थ्य है तो मेरी पढ़ाई यजुर्वेद विद्या को वापस कर दे। ब्रह्रारात ने उसे वमन कर दिया जिसे अन्य शिष्य तीतर बनकर चुग गये जिससे उसका नाम ‘तैत्तिरीय’ शाखा पड़ गया। तत्पश्चात ब्रह्ररात ने मानव गुरुओं से विरक्त होकर सूर्य की उपासना से स्वयं ही वेद विद्या को प्राप्त किया और उसका नाम माध्यन्दिनी शाखा रखा। उस समय से ब्रह्रारात का नाम याज्ञवल्क्य हो गया और वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ वेदवेदान्त और ब्रह्मविद्या के ज्ञाता माने गये। बाद में श्रेष्ठ ज्ञानी राजा जनक ने उनको अपना गुरु बनाया। उन्होंने अपने उदाहरण से दिखला दिया कि जो व्यक्ति अध्ययन और मनन में निरन्तर संलग्न रहेगा, वह सब प्रकार के ज्ञान को निश्चय ही प्राप्त कर सकता है।
मोह का दुष्परिणाम
विद्याधर नाम के पंडित के तीन पुत्रों में से धर्म शर्मा सबसे छोटा था। घर में सब प्रकार से सुख पूर्वक रहने के कारण उसका मन विद्याध्ययन में नहीं लगता था और अवसर आने पर भी वह पढ़ने के लिए गुरुकुल में प्रविष्ट नहीं हुआ। इस पर उसके पिता ने उस की बहुत भर्त्सना की और आस-पास के लोग भी उसकी बुराई करने लगे। तब उसने साधु सेवा का व्रत लिया और उन्हीं की सत्संगति से उसे शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान हो गया। कहाँ तो वह मूर्ख माना जाता था और कहाँ अब बहुसंख्यक व्यक्ति उससे शिक्षा प्राप्त करने आने लगे। एक दिन एक व्याध एक तोते के बच्चे को लेकर उसके पास आया। बच्चा उसे बड़ा सुन्दर लगा और उसने उसे खरीद लिया। तोता ऐसा चतुर था कि वह शीघ्र ही स्पष्ट रूप से मानव भाषा बोलने लगा और तरह तरह से वार्तालाप करके धर्म शर्मा को प्रसन्न रखने लगा। धीरे-धीरे धर्म शर्मा को तोते से ऐसा प्रेम हो गया कि उससे बढ़कर संसार में उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। एक दिन जब वह स्नान को गया अकस्मात् किसी प्रकार पिंजड़े के खुल जाने से एक बिलाव तोते को पकड़ ले गया और खा डाला। इस घटना से धर्मशर्मा को इतना खेद हुआ कि उस तोते के लिए शोक करते करते ही उसने प्राण त्याग दिये, और परिणाम स्वरूप दूसरे जन्म में उसका जन्म तोते की योनि में ही हुआ। अति मोह किसी का भी अच्छा नहीं होता और बुद्धिमानों को उससे बचकर ही रहना चाहिए।
उपकार का बदला चुकाना
च्यवन ऋषि बहुत बड़े तपस्वी थे और वर्षों तक एक ही स्थान पर ध्यान में बैठे रहने के कारण उनका शरीर मिट्टी से ढक गया था। एक बार अयोध्या के राजा शर्याति अपनी कन्या को जिसका नाम सुकन्या था, लेकर उसी स्थान में भ्रमण करते हुए पहुँच गये। जिस समय सुकन्या घूमते हुए उस मिट्टी के ढेर के पास जा पहुँची, जिसमें दबे हुए च्यवन ऋषि ध्यानमग्न थे। उनके नेत्रों को मिट्टी के भीतर से चमकते देखकर सुकन्या को कौतूहल हुआ और उसने अज्ञानवश परीक्षा करने के अभिप्राय से उनमें काँटे चुभा दिये। जब राजा को इस दुर्घटना का समाचार मिला तो वे बड़े दुखी हुए और ऋषि से क्षमा माँगने लगे। अज्ञान में किये गये अपराध के कारण ऋषि ने क्षमा तो कर दिया पर अन्धे हो जाने के कारण अपनी सेवा के लिए सुकन्या को माँग लिया। सुकन्या ने भी अपना अपराध समझ कर इसमें किसी प्रकार की आपत्ति न की और उसका विवाह च्यवन के साथ कर दिया गया । कुछ काल पश्चात् देवताओं के वैध अश्विनी कुमार च्यवन ऋषि के आश्रम में आये और दिव्य औषधियों के प्रभाव से उन्होंने उनके नेत्र ही ठीक न कर दिये वरन उनका कायाकल्प करके उनको सर्वथा नवयुवक बना दिया। इससे प्रसन्न होकर च्यवन ने उनसे कुछ माँगने का आग्रह किया तो उन्होंने कहा कि हमको वैद्य का धन्धा करने के कारण यज्ञ के समय देवताओं के साथ सोमपान करने से रोका जाता है, इस निषेधाज्ञा को आप दूर करा दें। च्यवन ने इसका वचन दिया और कुछ समय पश्चात् अपने श्वसुर शर्याति नरेश द्वारा आयोजित एक बृहत यज्ञ में उन्होंने अश्विनी कुमारों को सोमपान कराया। इस अवसर पर इन्द्र ने उस नई परम्परा का घोर विरोध किया और च्यवन के मारने को वज्र फेंका पर शिवाजी के प्रताप से अन्त उसी की पराजय हुई। इस विषम परिस्थिति को देखकर देवगुरु बृहस्पति ने दोनों पक्षी में समझौता करा दिया और अश्विनी कुमारों को यज्ञ में सोमपान का अधिकार स्थायी रूप से प्राप्त हो गया। इस प्रकार च्यवन ने अपने ऊपर किये हुए उपकार का बदला चुकाने के लिए प्राणों को जोखिम में डालकर भी अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति की।
(पं. लम्बोदर मिश्र केखडीह)
उपवास का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में बड़ा महत्व है। पेट के पाचन यंत्रों को उपवास से विश्राम मिलता है, फलस्वरूप वे शक्ति संचय करके और भी अधिक उत्साह से काम करने लगते है। कर्मचारियों को साप्ताहिक छुट्टी मिलती है, नगरों के बाज़ार भी सप्ताह में एक दिन बन्द रहते है। इससे घाटा किसी को नहीं वरन् सभी को लाभ है। एक दिन छुट्टी मिलने से छः दिन की थकान मिटाने और अगले छः दिन तक उत्साह पूर्वक काम करने के लिए शक्ति संचय का अवसर मिल जाता है। दिन में ठीक प्रकार काम तभी हो सकता है जब रात में सोने की छुट्टी मिले। यदि कोई लोभी इस छुट्टी से हानि की संभावना समझ कर दिन रात काम ही करता रहे तो इससे उसका कल्पित अतिरिक्त लाभ तो मिलेगा नहीं, शक्ति के समाप्त हो जानो से उलटी हानि ही होगी।
पेट को विश्राम देने की समस्या भी ठीक इसी प्रकार की है। इससे पेट की कमजोरी दूर होती है, जो अपच आमाशय एवं आँतों में जमा है वह इस विश्राम के दिन पच जाता है। दफ्तर के जिन बाबुओं के पास बहुत काम रहता है और कागज रोज नहीं निपट पाते वे उस पिछड़े हुए काम को छुट्टी के दिन पूरा कर लेते है। पेट के बारे में भी यही बात है। यदि पिछला अपच जमा है तो उसे वह उपवास के दिन पचाकर शरीर को उदर व्याधि से ग्रस्त होने से बचा लेता है। सारी बीमारियों की जड़ अपच है। यदि पेट को विश्राम देते रह कर अपच से बचे रहा जाये तो बीमारियों से आसानी के साथ छुटकारा प्राप्त हो सकता है। रोग ग्रस्त होकर लोग बहुत कष्ट पाते है और धन व्यय करते है। दुर्बलता के कारण उनका उपार्जन कार्य एवं इन्द्रिय बल घट जाता है, इससे दरिद्रता और निराशा की चिन्ताजनक परिस्थितियों में पड़ना पड़ता है। उपवास में कुछ विशेष कष्ट नहीं है पर लाभ बहुत है।
मानसिक चिन्ताओं दुर्गुणों और कुविचारों का समाधान करने में भी उपवास का विशेष महत्व है। पापों के प्रायश्चित में उपवास कराया जाता है। इसे आत्म दंड भी माना जाता है पर वास्तविकता यह है कि अन्न दोष के कारण जो विक्षेप मन में उठते रहते है वे उपवास के समय नहीं उठते और आत्मा के सतोगुण को विकसित होने का अवसर मिल जाता है। यह अनुभव की बात है कि जिस दिन उपवास रखा जाता है उस दिन कुविचार बहुत कम आते है, कुसंस्कार दबे रहते है और पाप कर्मों की ओर सहज की अरुचि होती है। बारबार उपवास करते रहने से यह सत् प्रवृत्तियाँ अभ्यस्त होती जाती है और दिन-दिन मनुष्य अधिक सतोगुणी बनता जाता है। आत्म उत्कर्ष और मानसिक सुधार के लिए उपवास का इतना अधिक लाभ है कि उसे धर्म व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
अखण्ड ज्योति परिवार में साप्ताहिक उपवास रविवार को किया जाता है। गायत्री का देवता सविता है। सविता अर्थात् सूर्य। सूर्य का दिन रविवार है। इस दिन का कुछ विशेष वैज्ञानिक महत्व है। उपवास करने वाले व्यक्ति की आत्मा सविता देवता से विकीर्ण होने वाली सूक्ष्म आध्यात्मिक तरंगों को अधिक मात्रा में ग्रहण करती है फलस्वरूप उसे शारीरिक और मानसिक ही नहीं, कुछ विशेष आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त होते है। इस दृष्टि से अन्य दिनों की अपेक्षा रविवार के दिन उपवास रखने को और भी अधिक महत्व है। शास्त्रकारों का भी ऐसा का कथन है। सूर्य पुराण में रविवार के दिन उपवास रखने का महात्म्य इस प्रकार वर्णन किया गया है-
उस समय शौनक ऋषि के आश्रम में अति बुद्धिमान सूतजी ने आगमन किया उस समय शौनक अनेक ऋषियों के सहित स्वयं वहाँ विराजमान् थे। शौनक ने सूतजी को आते देख सम्पूर्ण शिष्यों के सहित पृथ्वी पर गिरकर साष्टांग आसन देकर र्स्वथ सम्पूर्ण मुनियों सहित स्वस्थान में विराजे । मुनियों की श्रद्धा को देखकर सूतजी ने कहा- हे मुनियों ? मैं आप लोगों के समझ रविवार के व्रत को सविस्तार वर्णन करता हूँ उसे आप लोग पूर्वक सुने। एक समय नारद ऋषि घूमते हुए पृथ्वी के अग्निकोणस्थित कोणर्क नामक पवित्र स्थान में पहुँचे। वह स्थान लवण समुद्र के समीप एक पवित्र भूमि है वहाँ श्रीकृष्णाजीर्योत्पन्न जाम्ववती के पुत्र साम्व को कुष्ठ रोग से पीड़ित देख उन्होंने पूछा- हे साम्व आपका इस प्रकार कुरूप क्यों हुआ, उसे आप सविस्तार वर्णन करें।
नारद ने उपर्युक्त वचन को सुनकर भक्ति पूर्वक साम्ब ने प्रणाम कर कहा- हे प्रभु आग तो सर्वज्ञ है अतः आपको सर्वविदित ही है मैं और क्या कहूँ जो आप मुझे पूछ रहे है। आपके आदेश पालन हेतु मैं बता रहा हूँ। हे मुनि! किसी कारण से पिता ने मुझ पर क्रोधित होकर कष्ट रोगी होओ कह कर आप दिया। हे गुरुदेव! मुझे इससे मुक्ति का कोई उपाय बताये, मैं आपसे इतनी बिनती करता हूँ।
ऋषि श्रेष्ठ नारद साम्ब का वचन सुनकर बोले हे साम्ब इस रोग से मुक्ति पाने के लिए आप रविवार का व्रत करें जिसे ब्रह्मादि देवताओं ने करके सद्गति प्राप्त की एवं सर्वजनों का मनोरथ पूरक यह व्रत है। इस व्रत को करने वाला अंचल सम्पत्ति प्राप्त कर सम्पूर्ण रोगों से मुक्ति प्राप्त करता है। इसी रविवार व्रत के करने से ब्रह्मा ने रचना शक्ति प्राप्त की। तथा इन्द्र देव इसी के प्रभाव से हजारों लोक में विचरण कर सहस्राक्षः कहलाए। कुबेर इस व्रत को कर धनवान् बने; यम ने भी प्राणी हस्या से मुक्ति प्राप्त की, अग्नि ने सर्व भक्षण किया पर उनको इसके प्रभाव से एक भी दोष न लगा। अनेक युग तक राक्षस राज सुकेश भी इसके वरदान से जीवित रहा। सप्तद्वीप विख्यात नल राजा ने इस व्रत को करके पुनः स्वाराज्य तथा पत्नी को प्राप्त किया। कृपालु प्रभु रामचन्द्र ने इसी के प्रभाव से रावण का वध किया। धर्मपुत्र युधिष्ठिर महाभारत युद्ध में कौरव दल को जीतकर समस्त पृथ्वी के राजा हुए। इन्हीं का ध्यान कर देवताओं का वास स्थान स्वर्ग में हुआ। मैं भी उन्हीं सूर्य की कृपा से श्वासत परब्रह्म होकर सर्व स्थान का दर्शन कर रहा हूँ। अतः आप भी इस महिमामयी व्रत को कर सवेदा शुभ फल की अभिलाषा करें।
नारद के मुख से साम्ब ने श्रद्धापूर्वक रविवार व्रत का महात्म्य सुना और वह संकल्प पूर्वक व्रत करके पितृ आप से मुक्ति पाकर संपत्ति युक्त हुए। एवं इस लोक में ऐश्वर्यशाली होकर अन्तकाल में बैकुण्ठ धाम को प्राप्त हुए। यह रविवार व्रत उसी दिन से इस मंडल में विख्यात हुआ।
उपरोक्त पौराणिक उपाख्यान में अलंकारित दृष्टि से कुछ अत्युक्ति हो सकती है पर इतना निश्चित है कि उपवास से लाभ होता है और उपवास के लिए रविवार का दिन अधिक श्रेष्ठ है।
“उपवास एक प्रकार का प्रायश्चित है। इससे पतित अपने दोषों का मान और अनुमान होता है। इससे मन हलका और शांत होता है।
-नारायण
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“ग्लानि और दुःख के समय तथा आत्मशुद्धि और चित्त की एकाग्रता के लिये उपवास बहुत सहायक होता है।”
-महात्मा गाँधी
“इच्छाओं के त्याग का अर्थ संसार को त्याग देना नहीं है। जीवन का ऐसा किसी प्रकार का निषेध मनुष्य को मनुष्यत्वशून्य बनाता है। ईश्वरत्व, मनुष्यत्व से रहित नहीं है। आध्यात्मिक का परमावश्यक कर्तव्य मनुष्य को अधिक मनुष्यत्व युक्त बनाना है। मनुष्य में जो सौंदर्य है, महानता तथा सात्विकता है, उन्हें मुक्त तथा व्यक्त करने का नाम आध्यात्मिक है। वाह्य-जगत में जो कुछ भी भव्य तथा सुन्दर है, उसे भी वह विकसित रहती है। साँसारिक कार्यों में बाह्य त्याग तथा कर्तव्य और उत्तरदायित्व की उपेक्षा को वह आवश्यक नहीं मानती। वह केवल यही कहती है कि व्यक्ति के जो कार्य और उत्तरदायित्व है, उनका सम्पादन करते समय, उसकी आत्मा इच्छाओं के बोझ से मुक्त रहे। द्वैत के बन्धनों से मुक्त रहना ही पूर्णता है। बन्धनों के भय से जीवन से दूर भागने से यह मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। बन्धनों से बचने के प्रयत्न का अर्थ है जीवन से भयभीत होना। किंतु आध्यात्मिकता का अर्थ है ‘परस्पर विरोधों के वशीभूत हुए बिना जीवन का ठीक और पूर्ण ढंग से सामना करना।”
-मेहरबाबा
“इतिहास से जाना जाता है कि पृथ्वी से बहुतेरी प्राचीन जातियाँ लुप्त हो गई। ये प्राचीन सभ्यताएँ बहुत उन्नत थी ऐसे प्रमाण भी मिलते है। पर आज उन सभ्यताओं चिह्न भी शेष नहीं है। किंतु भारत की सभ्यता का निकास भारत में और विकास भी भारत में हुआ है और भारतवासी सदा उसी के आदर्श पर जीवन बिताते आये है। काल चक्र के कारण, घटना प्रभाव से भारत का धर्म और समाज नाना शाखाओं में विभक्त तो हो गया है, पर वे सब सनातन आर्यधर्म के भिन्न-भिन्न फल ही है। शंकर, रामानुज, चैतन्य आदि कितने ही मनीषियों ने इस भारत भूमि में धर्मप्रचार किया- सम्प्रदाय गठन किया, किन्तु सब ने ही वेद के तत्त्व की भिन्न-भिन्न भाव से व्याख्या मात्र की। अनन्त शाखा प्रशाखाओं में परिणित होकर भी आर्य धर्म सार्वजनिक और सर्ववाद सम्मत हुआ। पृथ्वी के प्रचारित सब धर्मों की नीति नाना भाव से सनातन आर्य धर्म की अंगीभूत बन गईं”
-नीलकंठदास
“स्पष्ट है कि जो भी धर्म अथवा दर्शन आधुनिक विज्ञान के प्रतिकूल होगा वह पाखण्ड और दम्भ बनकर रह जाएगा। यदि हम मानव प्रगति को दृढ़ आधार पर सुरक्षित रखना चाहते है तो विज्ञान और धर्म तथा राजनीति और धर्म के बीच पाई जाने वाली समस्त विसंगति का अन्त किया जाना चाहिये। जिससे समन्वित विचार और भावनाओं की प्रतिष्ठा हो सके। भारत में एक धर्म मूलक दर्शन प्रस्तुत है जो स्वयं सभ्यता के समान पुरातन है। वह विज्ञान के असाधारण अनुकूल है, यद्यपि विदेशियों को यह दावा विलक्षण प्रतीत हो सकता है। उस धर्म मूलक दर्शन से एक नीतिशास्त्र विकसित हुआ है, जो अधिक न्यायपूर्ण सामाजिक तथा आर्थिक संगठन का दृढ़ आध्यात्मिक आधार बनने योग्य है। यह एक असाधारण बात है कि विकास के सिद्धान्त का और नियम के शासन का- जिस रूप में उसे वैज्ञानिक जानते है- निरूपण हिन्दू धर्म में पहले ही कर दिया गया है। वेदान्त का परमात्मा मनुष्य की कल्पना द्वारा उत्पन्न और मानव-रूप-आरोपित परमात्मा नहीं है। गीता में ईश्वर के प्रभुत्व की व्याख्या ऐसी भाषा में की गई है, जिसमें आधुनिक विज्ञान द्वारा धार्मिक विश्वोत्पत्ति शास्त्र के विरुद्ध उठाई गई आपत्तियों का अनुमान और समाधान निहित है।”
-राजगोपालचार्य
(1) परिस्थितियों और आवश्यकताओं के कारण गायत्री परिवार की गतिविधियों में कुछ हेर फेर करने पड़ रहे हैं। सदस्य गण इन्हें नोट कर लें
(2) गायत्री परिवार की कुछ समय पहले बहुत शाखायें थीं और बहुत सदस्य थे। पर उनमें से अब अनेकों शिथिल हो गये हैं। अनेकों की कोई सूचना नहीं मिल रही है। इसलिए पुराने शाखा तथा सदस्य रजिस्टर रद्द किये जा रहे हैं। जो सक्रिय है उनका नये सिरे से संगठन किया जा रहा हैं।
(3) सदस्य दो प्रकार के होंगे (1) उपासक (2)सक्रिय। ‘उपासक सदस्य’ वे होंगे जिनका कार्यक्रम अपनी निज की उपासना तक ही सीमित है। ‘सक्रिय सदस्य’ वे होंगे जो अपनी निज कि साधना के अतिरिक्त दूसरों को धर्म प्रेरणा देते रहने का उत्तरदायित्व भी निभाएँगे। इस समय जहाँ शाखाएँ सजीव हैं वे अपने सदस्यों से उनकी वर्तमान भावनाओं और गतिविधियों का पता लगावें और तदनुसार उपासकों और सक्रिय सदस्यों के पूरे पते समेत सूची भेज दे। इसी सूची के आधार पर शाखाओं के तथा सदस्यों के नये रजिस्टर बनाये जावेंगे।
(4) भविष्य में गायत्री परिवारों के पदाधिकारियों के चुनाव नहीं हुआ करेंगे। सक्रिय सदस्य और उपासक मिल जुलकर सत्संगों तथा स्थानीय आयोजनों की व्यवस्था किया करेंगे। प्रत्येक सक्रिय सदस्य एक स्वतंत्र शाखा माना जाएगा। साथ ही उसका कर्तव्य यह भी होगा कि अन्य सक्रिय सदस्यों के साथ मिल जुलकर कार्य करे और संगठन को मजबूत करे। चुनाव में पद प्राप्ति के कारण जो रागद्वेष बढ़ता है उसका अन्त करना आवश्यक है।
(5) सक्रिय सदस्य कम से कम पाँच उपासकों को प्रेरणा देते रहने का उत्तरदायित्व अपने कंधे पर लेंगे। और अपनी तथा अपने से सम्बन्धित पाँच उपासकों की साधना का पूरा विवरण छः-छः महीने बाद भेजा करेंगे। चैत्र सुदी 15 तथा आश्विन सुदी 15 को यह छमाही रिपोर्ट मथुरा भेजनी चाहिए। मासिक रिपोर्ट न भेजी जाय।
(6) प्रत्येक सदस्य को (1) आत्म सुधार (2) आत्म निर्माण (3) आत्म विकास इन तीन संग्रह किये बिना न अपना भला हो सकता है और न दूसरों की सेवा।
(7) जब हमारा निज का आगामी कार्यक्रम कठोर साधनात्मक है। भाषणों के लिए कही जाना हमारे लिए शक्स न होगा। इसके लिए कोई आग्रह न किया जाय।
(8) तपोभूमि में अब प्रचारात्मक नहीं, साधनात्मक वातावरण रहेगा। साधना की दृष्टि से ही लोग यहाँ आया करेंगे। आत्म निर्माण की व्यवहारिक शिक्षा व्यवस्था का भी प्रबन्ध रहेगा।
(9) जिन्हें कभी तपोभूमि पधारना हो वे अपने आने और जाने की पूर्व सूचना देकर स्वीकृति प्राप्त करके ही आवे। सीमित संख्या में ही लोगों से भली प्रकार खुले मन से विचार विनियम संभव होता है। इसलिए अधिक भीड़ एक समय इकट्ठी न होने देने की दृष्टि से ही यह व्यवस्था बनाई गई है।
(10) चारों आत्मदानी तपोभूमि से चले गये है। वे अपना-अपना स्वतंत्र कार्य करेंगे। -श्रीराम शर्मा आचार्य,
(श्री. नरेन्द्र शर्मा)
बस्ती खंडहर हुई बन गई नगरी जंगल - गैल!
गठरी बनी कही पर ठठरी, कहीं अस्थि के फूल!
गिरने को उठती दीवारें शिखर पताका केतु!
है उपयोगी अनन प्राण मन ज्ञान और विज्ञान,
भ्रम के बिना करे श्रम कोई क्यों, जब सब कुछ व्यर्थ?
पूर्ण काम वह, जो निष्काम कर्म करता अनिवार,
आओ, हम अनेक जन मिल कर करे एक का ध्यान!
स्रष्टा एक अनेक बना है, केन्द्र बना है वृत्त,
पूर्ण अंश से परे नहीं है परे पूर्ण से अंश!
*समाप्त*