राष्ट्र का पैसा
गाँधी जी उन दिनों अपने भाषण के बाद हरिजन फण्ड के लिए चन्दा इकट्ठा किया करते थे। लोग उनकी ओर चल रहे थे और हाथ में पैसे देते जाते थे। गाँधी जी के हाथ से एक पैसा गिर गया वे उसे खोजने लगे। धक्का मुक्की में वह मिल नहीं रहा था। लोगों ने उन्हें परेशान देखकर कहा- बापू! एक पैसे के लिए इतनी चिन्ता न करें। उसकी क्षति पूर्ति हम कर देंगे। पर गाँधी जी उस पैसे को ढूँढ़ते ही रहे और कहा- आप और दें यह अलग बात है पर जो दिया गया है उसे सुरक्षित रखना मेरा कर्तव्य है। यह पैसा मेरा नहीं राष्ट्र का था और जो अमानत मुझे सौंपी गई उसकी सँभाल रखना मेरा कर्तव्य है।
जो लोग सार्वजनिक पैसे की परवा अपने निजी पैसे से भी अधिकार कर सकते हैं वस्तुतः वे ही सार्वजनिक सेवा कर सकने के अधिकारी है।
विकट अवसर का धैर्य
दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह के लड़कों को अंग्रेजों ने सरेआम फाँसी दी और उनका सिर काटकर थाली में रखा गया और उस उसे अंग्रेजों द्वारा बादशाह के सामने पेश किया गया बहादुर शाह न तो अधीर हुए और न शोकाकुल। उनने लापरवाही के साथ कहा- ‘वीर पुरुष ऐसे ही दिन के लिए बच्चे पालते हैं।’
शोक और आघात के अवसर पर मनुष्य के धैर्य और विवेक को परीक्षा होती है। बहादुरशाह का धैर्य वीर पुरुष के ही योग्य था।
नियत कर्तव्यों का पालन
क्रान्तिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को जिस दिन फाँसी लगनी थी उस दिन सवेरे जल्दी उठकर वे व्यायाम कर रहे थे। जेल वार्डन ने पूछा आज तो आप को एक घंटे बाद फाँसी लगने वाली है फिर व्यायाम करने से क्या लाभ? उनने उत्तर दिया- जीवन आदर्शों और नियमों में बँधा हुआ है जब तक शरीर में साँस चलती है तब तक व्यवस्था में अन्तर आने देना उचित नहीं है।
थोड़ी सी अड़चन सामने आ जाने पर जो लोग अपनी दिनचर्या और कार्य व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देते हैं उनको बिस्मिल जी मरते मरते भी अपने आचरण द्वारा यह बता गये है कि समय का पालन, नियमितता एवं धैर्य ऐसे गुण हैं जिनका व्यक्तिक्रम प्राण जाने जैसी स्थिति आने पर भी नहीं करना चाहिए।
अपने सुख के लिए दूसरों के दुःख नहीं
सेवा ग्राम में गाँधी जी के पास एक कुष्ठ रोगी परचुरे शास्त्री रहते थे। उनके कुष्ठ रोग के लिए किसी ने दवा बताई कि- एक काला साँप लेकर हाँडी में बंद किया जाय फिर उस हाँडी को कई घंटे उपलों की आग में जलाया जाय। जब साँप की भस्म हो जाय तो उसे शहद में मिलाकर खाने से कुष्ठ अच्छा हो जायेगा। गाँधी जी ने पूछा- ‘क्या आप ऐसी दवा खाने को तैयार है?’ शास्त्री जी ने उत्तर दिया- बापू! यदि साँप की जगह मुझे ही हांडी में बन्द करके जला दिया जाय तो क्या हानि है? साँप ने क्या अपराध किया है कि उसे इस प्रकार जलाया जाय?
परचुरे शास्त्री की वाणी में उस दिन मानवता की आत्मा बोली थी। वे लोग जो पशु पक्षियों का माँस खाकर अपना माँस बढ़ाना चाहते हैं, इस मानवता की पुकार को यदि अपने बहरे कानों से सुन पाते तो कितना अच्छा होता।
उपकार का प्रत्युपकार
बेंजामिन फ्रेंकलिन ने एक अखबार निकाला। आर्थिक कठिनाई में पड़कर उसने अपने एक मित्र से बीस डालर लिये। जब उसकी स्थिति ठीक हो गई तो वह मित्र की वह रकम लौटाने लगा। मित्र ने कहा- वह रकम तो मैंने आपको सहायता में दी थी। फ्रेंकलिन ने कहा- सो ठीक है पर जब मैं लौटाने की स्थिति में हूँ तो आपकी सहायता का ऋणी क्यों बनूँ?
झगड़े का अन्त इस प्रकार हुआ कि मित्र ने वह रुपये फ्रेंकलिन के पास इस उद्देश्य से जमा किये कि जब कोई जरूरतमंद उधार माँगे तक इसे उसी शर्त पर देदें कि वह भी स्थिति ठीक होने पर उन रुपयों को अपने पास जमा रखेगा और फिर किसी जरूरतमंद को इसी प्रकार इसी शर्त पर दे देगा।
कहते हैं कि अमेरिका में वे 20 डालर आज भी किसी न किसी जरूरतमंद के पास इसी उद्देश्य से घूम रहे हैं।
आवश्यकता के समय दूसरों से सहायता ली जा सकती है पर यह ध्यान रखना चाहिए कि समर्थ होते ही वह सहायता किसी अन्य जरूरत मन्द को लौटा दी जाय। सहायता के साथ जो दान वृत्ति जुड़ी हुई है वह दुहरा कर्ज है। उसका चुकाना एक विशिष्ट नैतिक कर्तव्य है।
अद्भुत सहनशीलता
बंगाल के प्रसिद्ध विद्वान विश्वनाथ शास्त्री एक शास्त्रार्थ कर रहे थे। विरोधी पक्ष उनके प्रचण्ड वर्क और प्रमाणों के सामने लड़खड़ाने लगा और उसे अपनी हार होती दिखाई देने लगी।
विरोधियों ने शास्त्री जी को क्रोध दिलाकर झगड़ा खड़ा कर देने और शास्त्रार्थ को अंगर्णित रहने देने के लिए एक चाल चली। उनने सुँघनी तमाखू की एक मुठ्ठी शास्त्री जी ने मुँह पर फेंक मारी जिससे उन्हें बहुत छींक आई और परेशानी भी हुई।
शास्त्री जी बड़े धैर्यवान थे, उनने हाथ मुँह धोया। तमाखू का असर दूर किया और शान्त भाव से मुसकराते हुए कहा- हाँ, सज्जनों यह प्रसंग से बाहर की बात बीच में आ गई थी, अब आइए मूल विषय पर आवें और आगे का विचार विनिमय जारी रखो।
शास्त्री जी की इस अद्भुत सहनशीलता को देखकर विरोधी चकित रह गये। उनने अपनी हार स्वीकार कर ली।
मनुष्य का एक बहुत ही उच्चकोटि का गुण सहनशीलता है। जो दूसरों के द्वारा उत्तेजित किये जाने पर भी विक्षुब्ध नहीं होते और अपनी मनः स्थिति को संतुलित बनाये रखते हैं वस्तुतः वे ही महापुरुष है। ऐसे ही लोगों का विवेक निर्मल रहता है।
श्रम से अधिक वेतन
जार्ज बर्नार्डशॉ को अपने आरम्भिक जीवन में एक अच्छी नौकरी मिली। उस नौकरी में काम कम और वेतन अधिक था। शॉ ने यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि जितना पैसा मुझे मिलता है उतना काम मेरे पास नहीं है। यह एक आश्चर्यजनक त्यागपत्र था।
हरामखोरी करके भी श्रम से अधिक वेतन प्राप्त करने वाले इस घटना से कुछ सीख सकते हैं।
साधनहीन का साधन
श्रावस्ती नगरी में एक बार भारी अकाल पड़ा। सर्वत्र हाहाकार मच गया। लोग भूखों मरने लगे। भगवान बुद्ध उधर से निकले तो वहाँ की स्थिति देख कर उन्हें बहुत दुःख हुआ। उनने वहाँ के धनीमानी नागरिकों की एक सभा बुलाई कि भूखे मरने वाले लोगों को सुखी प्रदेश तक पहुँचाने के लिए मार्ग में खाने को कुछ अन्न की सहायता की जाय ताकि वे अन्यत्र जाकर अपनी प्राण रक्षा कर सकें।
सब श्रीमंत चुप थे। वे अपनी कोठी और तिजोरी खाली नहीं करना चाहते थे। चारों ओर सन्नाटा था, एक एक करके सब लोग खिसकने लगे। कोई सहयोग देने को तैयार न था।
इस सन्नाटे को चीरती हुई एक लड़की खड़ी हुई उसने कहा- ‘मैं सब भूखों को भोजन देने का जिम्मा अपने ऊपर लेती हूँ।’ उसकी बात सुनकर सब लोग अवाक् रह गये। जिस जिम्मेदारी को बड़े-बड़े लक्षाधीश अपने कंधे पर उठाने को तैयार नहीं, उसे यह लड़की कहाँ से पूरा करेगी? लड़की ने कहा मैं कल से घर-घर जाकर भीख मागूँगी और उससे जो मिलेगा उसे ही भूखों को बाटूँगी।
उसने वैसा ही किया उसे प्रचुर अन्न मिलने लगा और उससे अगणित दुर्भिक्ष पीड़ित लोगों की प्राण रक्षा हुई।
अपने पास साधन न होने पर भी मनोबल के आधार पर मनस्वी लोग जन सहयोग के आधार पर प्रचुर साधन जुटा सकते है और उससे संसार का भला कर सकते हैं।
शत्रु से भी मनुष्यता का व्यवहार
बाजीराव पेशवा और हैदराबाद के नवाब में लड़ाई हो रही थी। मराठे जीत रहे थे। हारते हुए निजाम की फौज किले में अपनी प्राण रक्षा करने घुसी बैठी थी। धीरे धीरे उसकी रसद खत्म होने लगी। यहाँ तक कि एक दिन अन्न का स्टॉक बिल्कुल समाप्त हो गया।
निजाम ने अन्न की याचना पेशवा से की मंत्रियों ने सलाह दी कि यही मौका दुश्मन पर चढ़ाई करने का है। भूखी फौज को आसानी से जीता जा सकता है। पर पेशवा को यह बात नहीं रुची। उनने कहा- भूखों को मारना कायरता है। उनने तुरन्त बहुत सा अन्न निजाम के किले में पहुँचवा दिया। निजाम इस महानता के आगे नतमस्तक हो गये। उनने पेशवा से संधि कर ली।
युद्ध और शत्रुता में साधारणतः नैतिक नियमों की परवा नहीं की जाती पर भारतीय आदर्श इन विषम परिस्थितियों में भी अपनी अग्नि परीक्षा देकर विश्व भर में अपनी महानता सिद्ध करते रहे है।
ऋण मुक्ति का आदर्श
भारत के प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता चितरंजन दास के पिता दस लाख रुपया कर्ज छोड़कर मरे थे। नवयुवक दास ने निश्चय किया कि वे सब का कर्ज चुकायेंगे। कर्ज रिश्तेदारों का था। सभी आसूदा थे इसलिए लड़के की परेशानी को देखते हुए कर्ज वापिस लेना नहीं चाहते थे। पर दास बाबू भी किसी का ऋण रखना अपनी बेइज्जती समझते थे वे जो कमाते गये, अदालत में जमा करते गये। उनने विज्ञापन प्रकाशित कराया कि जिनका कर्ज हो वह अपना पैसा ले जायें। बहुत दिन वह पैसा जमा रहा जब उनने ढूँढ़ ढूँढ़कर कर्जदारों का पता लगाया, उनका हिसाब चुकता किया।
किसी व्यक्ति की बेइज्जती यह है कि वह अनिवार्य आपत्ति के अवसर को छोड़कर अपना खर्च बढ़ाकर उसके लिए कर्ज ले। और उससे भी बड़ी बेइज्जती यह है कि होते हुए भी ऋण चुकाने में अपना कानी करें। चितरंजन दास ने अपने लिए निर्धनता निमंत्रित करके भी ऋण मुक्त होना अपना कर्तव्य समझा। यही आदर्श हर ईमानदार व्यक्ति का होना चाहिए।
समाज सेवी की योग्यता
भगवान बुद्ध के एक शिष्य ने कहा- मैं धर्मोपदेश के लिए देश भ्रमण करना चाहता हूँ, आज्ञा दीजिए। इस पर बुद्ध ने कहा- धर्मप्रचार की पुनीत सेवा को भी अधर्मी और ईर्ष्यालु सहन नहीं कर पाते। वे तरह-तरह के मिथ्या लांछन लगाते हैं, बदनाम करते तथा सताते हैं। तुम्हें उनका सामना करना पड़ेगा तो अपना मानसिक सन्तुलन किस प्रकार ठीक रख पाओगे?
शिष्य ने कहा- मैं किसी के अपकारों के प्रति मन में दुर्भाव न रखूँगा। जो मुझे गालियाँ देगा समझूँगा इसने मारा नहीं इतनी दया की। जो कोई मारेगा तो समझूँगा इसने जीवित छोड़कर उदारता दिखाई। यदि कोई मार भी डालेगा तो समझूँगा इस भव बंधन (संसार) में अधिक कष्ट भोगने से छुटकारा दिलाकर इसने उपकार ही किया।
परैतु मृत्युरमृतं न एतु -अथर्व
हम अमृत प्राप्त करें, मृत्यु हमसे दूर रहे।
ज्ञान ही अमृत और अज्ञान ही मृत्यु हैं।
मनुज की देह मुक्ति का द्वार,मिलेगी क्या यह बारम्बार !
भूलता क्यों तू अपना रूप-बिछुड़कर जग में आ अनजान।
नहीं क्या करता लघु-सा बीज-विटप-वट का विशाल निर्माण॥
सत्य ही इस जीवन का सार, शेष सब क्षणभंगुर निःसार !
स्वार्थ से पूरित जग का स्नेह-मोह है बन्धन मधुर अनूप।
किया करती माया पथ भ्रष्ट-दिखाकर अपना रम्य स्वरूप॥
आत्म-बल का करके विस्तार, सहज ही हो भवसागर पार !
गहन तम, अन्तर का कर दूर-ज्योति बन हो जा उसमें लीन।
मिटाकर सरिताएँ अस्तित्व-जलधि में हो जाती ज्यों लीन॥
काल का चलता चक्र निहार,चेत कर जीवन का श्रृंगार !
-रामस्वरूप स्तरे साहित्यरत्न
जिन्दगी जीना भी एक महत्वपूर्ण विद्या हैं। इसके अभाव में असंख्य लोग रोते-झींकते मौत के दिन तो पूरे कर लेते है पर वह लाभ प्राप्त नहीं कर पाते जिसके लिए यह बहुमूल्य जीवन उपलब्ध हुआ है।
अनाड़ी ड्राइवर के हाथ में कीमती मोटर दे दी जाय तो उसकी दुर्गति ही होगी। जिन्दगी एक मोटर है, उसे ठीक प्रकार चलाने के लिए उसका चलाना जानना आवश्यक है। संसार में जितने भी महत्वपूर्ण कार्य है उन्हें आरम्भ करने से पूर्व तत्सम्बन्धी ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। कारखानों में, उद्योगों में, सरकारी नौकरियों में हर जगह ट्रेन्ड आदमियों की ही नियुक्ति होती है। खेद है कि जिन्दगी जीने जैसे महान उत्तरदायित्व को हाथ में लेने वाले उस की ट्रेनिंग आवश्यक नहीं समझते।
हम सब किसी प्रकार जिन्दगी काटते तो है पर उसमें अव्यवस्था ही भरी होती है। कहते है कि बेताल नाम का पिशाच अपने बालों को बुरी तरह बिखेरे रहता है जिससे उसकी भयंकरता और भी बढ़ जाती है। बहुधा हमारा जीवन क्रम भी बेताल के बालों की तरह फूहड़पन के साथ अस्त-व्यस्त तथा बिखरा होता है। फलस्वरूप न जीने वाले को आनन्द आता है और न उससे संबंधित लोगों को कोई प्रसन्नता होती है।
प्राचीन काल में हमारे पूर्वज मनीषियों ने जीवन लक्ष्य की पूर्ति के महान विज्ञान का आविष्कार करते हुए इस बात पर बहुत जोर दिया था कि व्यक्ति का लौकिक जीवन पूर्ण रीति से सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत हो। आत्म कल्याण का मार्ग यही आरम्भ होता है। यदि मनुष्य अपने सामान्य जीवन क्रम को सन्तोषजनक रीति से चला न सका तो आध्यात्मिक जीवन में भी, परलोक में भी उसको सफलता अनिश्चित ही रहेगी।
इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए चार आश्रम की क्रमबद्ध व्यवस्था की गई थी। आरंभिक जीवन में शक्ति संचय, मध्य जीवन में कुटुम्ब और समाज की प्रयोगशाला में अपने गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार, ढलते जीवन में लोकहित के लिए परमार्थ की तैयारी और अन्त में जब सर्वतोमुखी प्रतिभा एवं महानता विकसित हो जाय तो उसका लाभ समस्त संसार को देने के लिए विश्व आत्म परम आत्मा, समष्टि जगत् को आत्म समर्पण करना। यही ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास की प्रक्रिया है।
लौकिक जीवन में अपनी प्रतिभा का परिचय दिये बिना ही लोग पारलौकिक जीवन की कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहते है। यह तो स्कूल का बहिष्कार करके सीधे एम. ए. की उत्तीर्ण का आग्रह करने जैसी बात हुई। इस प्रकार व्यतिक्रम से ही आज लाखों साधु संन्यासी समाज के लिए भार बने हुए है। वे लक्ष्य की प्राप्ति क्या करेंगे, शान्ति और संतोष तक से वंचित रहते है। इधर की असफलता उन्हें उधर भी असफल ही रखती है।
यह संसार एक कर्म भूमि है, व्यायामशाला है, विद्यालय है जिसमें प्रविष्ट होकर प्राणी अपनी आन्तरिक प्रतिभा को विकसित करता है और यह विकास ही अन्ततः आत्म कल्याण के रूप में परिणत हो जाता है। यह दुनियाँ भव बन्धन भी है, माया पाश भी है, नरक भी है, पर है उन्हीं के लिए जिनकी मनोभूमि अस्त-व्यस्त है जिनको जिन्दगी जीने की कला का ज्ञान नहीं है। सब के लिए यह दुनियाँ कुरूप नहीं है। दर्पण की तरह यह केवल उन्हें ही कुरूप दिखाई देती है जिनका अपना चेहरा बिगड़ा हुआ है।
महात्मा इमर्सन कहा करते थे, “मुझे नरक में भेज दो, मैं अपने लिए वही स्वर्ग बना लूँगा।” वे जानते थे कि दुनियाँ में चाहे कितनी ही बुराई और कमी क्यों न हो यदि मनुष्य स्वयं अपने आपको सुसंस्कृत बना ले तो उन बुराइयों की प्रतिक्रिया से बच सकता है। मोटर की कमानी-स्प्रिंग-बढ़िया हो तो सड़क के खड्डे उसको बहुत दचके नहीं देते। कमानी के आधार पर वह उन खड्डों की प्रतिक्रिया को पचा जाता है। सज्जनता में भी ऐसी ही विशेषता है, वह दुर्जनों को नंगे रूप में प्रकट होने का अवसर बहुत कम ही आने देती है। गीली लकड़ी को एक छोटा अंगारा जला नहीं पाता वरन् बुझ जाता है, दुष्टता भी सज्जनता के सामने जाकर हार जाती है।
फिर सज्जनता में एक दूसरा गुण भी तो है कि कोई परेशानी आ ही जाय तो उसे बिना सन्तुलन खोये, एक तुच्छ सी बात मानकर हँसते खेलते सहन कर लिया जाता है। इन विशेषताओं से जिसने अपने आपको अलंकृत कर लिया है उसका यह दावा करना उचित ही है कि “मुझे नरक में भेज दो मैं अपने लिए वही स्वर्ग बना लूँगा।” सज्जनता अपने प्रभाव से दुर्जनों पर भी सज्जनता की छाप छोड़ती ही है।
लोग धन कमाने में लगे है अपनी क्षमता के अनुरूप कमाते और खर्चते भी है। पर यह भूलते रहते है कि अन्य मूल्यवान वस्तुऐं, जो धन से भी अधिक उपयोगी है, उपार्जित की जा रही है या नहीं? स्वास्थ्य का मूल्य क्या धन से कम है? ज्ञान वृद्धि क्या व्यर्थ की चीज है? आमोद प्रमोद का क्या जीवन में कोई स्थान नहीं है? पूजा उपासना क्या निरुपयोगी ही है? स्त्री बच्चों को व्यक्तिगत दिलचस्पी से दूर रखकर क्या उन्हें रोटी कपड़ा देते रहना ही पर्याप्त है? जिस समाज में हम जन्मते और पलते है क्या उसके प्रति हमारे कोई कर्तव्य नहीं है?
इन बातों पर यदि विचार किया जाय तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि धन कमाने की तरह यह सब बातें भी उतनी ही आवश्यक है। केवल एक ही काम में सारा समय और मनोयोग खर्च कर देना उचित नहीं वरन् सर्वतोमुखी उत्कर्ष की आवश्यकता है। जिस प्रकार केवल घी खाने से ही स्वास्थ्य नहीं सध सकता, उसके लिए अन्न, शाक, लवण आदि से सम्मिश्रित सन्तुलित भोजन चाहिए इसी प्रकार हमारे उपार्जन भी सर्वतोमुखी-सन्तुलित होने चाहिए। जीवन विद्या का यह पहला पाठ है।
कितने लोग है जिनने यह पाठ पढ़ा है और व्यवहारिक जीवन में उतारा है? जो इस शिक्षा से विमुख रहे वे भले ही धन या जो अभीष्ट है वह एक वस्तु अधिक मात्रा में कमा लें पर इतने मात्र से उन्हें जीवन का सर्वतोमुखी आनन्द कदापि प्राप्त न हो सकेगा।
गौरव की, प्रतिष्ठा की, बड़प्पन की, सम्मान की सब कोई इच्छा करते है। पर कितने लोग हैं, जिनने यह सीखा हो कि अपना आदर्श एवं दृष्टिकोण महान रखने पर ही सच्ची और स्थिर प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। जो भी काम करें उसमें अपने व्यक्तित्व की महानता की छाप छोड़ी जाय जिसके परिणाम में हमें सच्चा गौरव प्राप्त हो, इस बात को कौन सोचता है? आज तो लोग फैशन, श्रृंगार, अकड़, शान और शौकत, शेखी, अपव्यय, बहुसंचय, कोठी, मोटर, दावत, पार्टी जैसी बनावटों के आधार पर बड़े बनने की कोशिश कर रहे हैं। काश, उन्हें कोई यह समझा देता कि यह बाल-क्रीड़ाऐं व्यर्थ हैं। जो भी काम करो उसे आदर्श, स्वच्छ, उत्कृष्ट, पूरा, खरा, तथा शानदार करो। अपनी ईमानदारी और दिलचस्पी को पूरी तरह उसमें जोड़ दो, इस प्रकार किये हुए उत्कृष्ट कार्य ही तुम्हारे गौरव का सच्चा प्रतिष्ठान कर सकने में समर्थ होंगे। अधूरे, अस्त-व्यस्त फूहड़, निकम्मे, गन्दे, नकली, मिलावटी, झूठे और कच्चे काम, किसी भी मनुष्य का सबसे बड़ा तिरस्कार हो सकते है, यह बात वही जानेगा जिसे जीवन विद्या के तथ्यों का पता होगा।
अपनी आदतों का सुधार, स्वभाव का निर्माण, दृष्टिकोण का परिष्कार करना जीवन विद्या का आवश्यक अंग है। ओछी आदतें, कमीने स्वभाव, और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला कोई व्यक्ति सभ्य नहीं गिना जा सकता। उसे किसी का सच्चा प्रेम और गहरा विश्वास प्राप्त नहीं हो सकता। कोई बड़ी सफलता उसे कभी न मिल सकेगी। कहते है कि बड़े आदमी सदा चौड़े दिल और ऊँचे दिमाग के होते है।” यहाँ लम्बाई चौड़ाई से मतलब नहीं वरन् दृष्टिकोण की ऊँचाई का ही अभिप्राय है। जिसे जीवन से प्रेम है वह अपने आपको सुधारता है, अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करता है। फलस्वरूप उसके सोचने और काम करने के तरीके ऐसे हो जाते है जिनके आधार पर महानता दिन-दिन समीप आती जाती है।
वचन का पालन, समय की पाबन्दी, नियमित दिनचर्या, शिष्टाचार, आहार विहार की नियमितता, सफाई व्यवस्था आदि कितनी ही बातें ऐसी है जो सामान्य प्रतीत होते हुए भी जीवन की सुव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पाश्चात्य देशों में इन छोटी बातों पर बहुत ध्यान दिया जाता है, फलस्वरूप भौतिक उन्नति के रूप में उन्हें उसका लाभ भी प्रत्यक्ष मिल रहा है। स्वास्थ्य, समृद्धि और ज्ञान की दृष्टि से पाश्चात्य देशों ने जो उन्नति की है उसमें इन छोटी बातों का बड़ा योग है। इन बातों के साथ-साथ यदि आध्यात्मिक सद्गुणों का समन्वय भी हो जाय तो फिर सोना और सुगन्धि वाली कहावत ही चरितार्थ हो जाती है।
ऊपर की पंक्तियों में जीवन विद्या के कुछ पहलुओं की थोड़ी चर्चा की गई है। ऐसे कितने ही कोणों से मिलकर एक सन्तुलित जीवन बनता है। यह सन्तुलित जीवन व्यक्ति को स्वस्थ विकास की ओर ले जाता है। और ऐसे ही सुविकसित व्यक्तियों का समाज किसी राष्ट्र को गौरवशाली बनाता है।
आज चारों ओर अगणित कठिनाइयाँ, परेशानियाँ और उलझने दिखाई पड़ती है उनका कारण एक ही है- अनैतिक, असंस्कृत जीवन। समस्याओं को ऊपर-ऊपर से सुलझाने से काम न चलेगा वरन् भूल कारण का समाधान करना पड़ेगा मनुष्य के जीवन दिव्य देवालयों की तरह पवित्र, ऊँचे और शानदार हों तभी क्लेश और कलह से, शोक और संताप से, अभाव और आपत्ति से छुटकारा मिलेगा। व्यक्ति यदि भगवान के दिव्य वरदान मानव जीवन का समुचित लाभ उठाना चाहता हो तो उसे जिन्दगी जीने की समस्याओं पर विचार करना होगा और सुलझे हुए दृष्टिकोण से अपनी गति विधियों का निर्माण करना होगा।
मनुष्य-जीवन का अधिकांश भाग यही विचारते-विचारते निकल जाता है कि मैं अब जीवन को नाश से बचाऊँगा। फलतः जीवन नष्ट हो जाता है और हम जीवित रहने के उपक्रम में ही व्यस्त रह जाते है।
-इमर्सन
“जीवन सब कलाओं से ऊपर है जो व्यक्तिगत जीवन में पूर्णता लाने का प्रयास करता है वह एक महान कलाकार है।
-महात्मा गाँधी
(महायोगी अरविन्द)
मनुष्य के भीतर की जो प्रवृत्ति अध्यात्म मार्ग में प्रधान रूप से बाधक होती है, वह है “अहंकार”। संसार में हमारे जो तरह-तरह के सम्बन्ध है उनके कारण हम अनेक बन्धनों में बँध जाते है। उनके घात-प्रतिघात से हमारे मन में सदैव द्वन्द्व की भावनायें उत्पन्न होती रहती हैं और उन्हीं के परिणाम स्वरूप हमको हर्ष-शोक सुख-दुःख स्तुति-निन्दा हानि-लाभ आदि के विचार उत्पन्न होकर अस्थिर बनाते रहते है।
इस प्रकार अहंकार तीन प्रकार का बतलाया गया है- सात्विक, राजसिक और तामसिक। अधिकांश मनुष्यों में राजसिक अहंकार की ही प्रधानता होती है, क्योंकि यह विषय वासना के फल से उत्पन्न होता है। इसी के चक्कर में पड़कर हम दिखावटी धर्म-कर्म के चक्कर में फँस जाते है। यदि हमको ऐसे बन्धन से छुटकारा पाना है तो गीता के “मा कर्मफल हेतुर्भूः” वचन को सदैव स्मरण रखना चाहिये। इसके अनुसार यदि हम अपने समस्त धर्म-कर्म का फल भगवान के चरणों में अर्पित कर देंगे तो हमारा अहंकार स्वयं ही जाता रहेगा।
तामसिक प्रवृत्ति मानसिक दुर्बलता की उत्पत्ति होती है। इसके प्रभाव से हम सदैव आलसी, सुस्त, अकर्मण्य बने रहते है, हमारा तेज क्षीण हो जाता है, और निराशा की भावना हमारे मानसिक क्षेत्र को ढक लेती है। किसी कार्य के लिये दिल में उत्साह नहीं होता। छोटे-छोटे कामों में भी भय लगता है और यही इच्छा होती है कि हम बिना कुछ उद्योग और परिश्रम के बैठे-बैठे मौज उड़ाते रहें। ऐसे लोगों में किसी उत्तम कार्य के लिये स्फूर्ति नहीं देखी जाती और वे समझते हैं कि हम में ऐसे कार्यों के लिये शक्ति और योग्यता ही नहीं है। यह अवस्था बड़ी भयंकर और पतन मार्ग पर ले जाने वाली है। ऐसी ही अवस्था वालों के लिये गीता में “मा ते संगोऽत्सव कर्मणि” और “योगस्थः कुरु कर्माणि” आदि वाक्य लिखे गये हैं। इनका आशय यही है कि अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को अपने भीतर कभी अकर्मण्यता की भावना को टिकने नहीं देना चाहिये और योग युक्त होकर कर्म करते रहना चाहिये। अर्थात् प्रत्येक काम को अपना ईश्वर-प्रेरित कर्तव्य समझ कर करे, उससे क्या लाभ और क्या हानि होगी इसकी चिन्ता सर्वथा त्याग दे। केवल ‘संगत्यक्त्वा’ के उपदेश को अपना मूल-मंत्र बनाकर मोह और आसक्ति रहित भाव से कार्य करता चला जाय। भगवान की यही आज्ञा है कि कर्म करो पर उसमें आसक्त मत हो जाओ। जब तुम यह समझ लोगे कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह भगवान की प्रेरणा से करते हैं, तो फिर हजारों विघ्न-बाधाओं के सम्मुख आने पर भी तुम घबराओगे नहीं।
सात्विक अहंकार को दूर कर सकना बड़ा कठिन होता है, क्योंकि उसका सम्बन्ध ज्ञान और आनन्द से होता है और उसकी बुराई मनुष्य को किसी प्रकार दिखलाई नहीं देती। उदाहरण के लिये अर्जुन जब शस्त्रास्त्रों से सजकर युद्ध के लिये संग्राम भूमि में आये तो अपने सम्बन्धियों, आचार्य, पितामह, भाई, भतीजों आदि को लड़ने के लिये सामने खड़े देखकर व्याकुल हो उठे और धनुष बाण को हाथ से रखकर भगवान कृष्णा से कहने लगे-
गुरुन हत्वाहि महानुभावान्,
श्रेयोभोक्तूं भैक्ष्यमपीह लोके।
हस्वार्थ कामास्तु गुरुनिहैव,
भुँजाय भोगान्न् रुधिर प्रदिग्धान्॥
अर्थात्- “अपने गुरुजनों, पितामह आदि श्रेष्ठजनों की हत्या करने से तो यही अच्छा है कि भिक्षा माँगकर पेट भर लिया जाय। यदि हम इन महान पुरुषों को मारेंगे तो इसका अर्थ यह होगा कि हम उनके रक्त में सने भोगों का उपयोग कर रहे है।’ अर्जुन के इस कथन को कोई साँसारिक मनुष्य अनुचित नहीं कह सकता, वरन् इससे उसके हृदय की उदार भावना ही प्रकट होती है। आगे चल कर उसने यहाँ तक कह दिया-
यदि मामप्रतीकारमशस्त्र शस्त्र पाणयः।
धार्तराष्ट्राः राणे हन्युस्तन्में क्षेमकरम् भवेत्॥
अर्थात्- अगर मुझे युद्ध से उदासीन और निःशस्त्र देख कर दुर्योधन के पक्ष वाले आक्रमण करके मार डालें तो भी इस युद्ध से मैं उसे अपने लिये आत्म कल्याणकारी ही मानूँगा।” अर्जुन की यह भावना परम उद्धान्त होने पर भी सात्विक अहंकार थी। वह समझता था कि मेरे जैसे ज्ञान सम्पन्न और कर्तव्य परायण व्यक्ति के लिये इस स्वार्थ-प्रधान कार्य को करना बड़ा वर्हिति और अपयश करने वाला होगा। उसे इस बात का ज्ञान नहीं था कि भगवान की लीला बड़ी विचित्र होती है जिसका रहस्य बड़े से बड़े ज्ञानी भी नहीं समझ सकते। वे किसी समय मनुष्य से जान बूझ कर ऐसा कार्य भी करा डालते है जो प्रत्यक्ष में बड़ा पाप पूर्ण जान पड़ता हो। इसी लिये अन्त में भगवान को दिव्य चक्षु प्रदान करके अर्जुन का मोह और सात्विक अहंकार दूर करना पड़ा उन्होंने उसे समझा दिया कि पाप-पुण्य धर्म-अधर्म की धारणा साधारण मनुष्यों के लिये है, जो कामना या स्वार्थ की दृष्टि से कार्य करते हैं। अपने को भगवान के हाथ में देकर निष्काम भाव से कर्म करने पर पाप-पुण्य का प्रश्न ही नहीं रह जाता। भगवान और उनके सच्चे भक्त सब प्रकार के द्वन्द्वों से परे रहते है।
जिन लोगों ने अभी अध्यात्म-मार्ग पर पैर रखा है, और आत्म-समर्पण का केवल संकल्प ही किया है, उनमें इन तीनों में से कोई एक तरह का अहंकार पाया जाता है, और वही उनकी प्रगति के मार्ग में बाधक बन जाता है। जिस साधक में रजोगुण की प्रधानता होती है, वह सोचने लगता है- “हम साधक हैं- हम ने जप, तप, योग के मार्ग को अपनाया है। अन्य लोग सांसारिक माया में ही फँसे पड़े है, हम इतना आगे बढ़ जाये। हम भगवान के हाथ के एक यंत्र हो रहे है।” इस तरह के अनेक मनोभाव साधक को अहंकारी बना देते है। इसका परिणाम होता है कि जो धर्म उसकी वासना और कामना से उत्पन्न होता है उसे वह भगवान का बतलाकर उस पर आचरण करता है और बारबार असफल होकर निराश होता है। तो भी उसके मन में यह धारणा उठती है कि हम धर्माचरण कर रहे हैं और धर्म का मार्ग बाधा, विपत्ति और कंटकाकीर्ण होता ही है, इससे हमको सब कुछ सहन करते हुये परिश्रम से काम करना चाहिये। इस भाव से प्रेरित होकर वह और भी तल्लीनता से काम करने लगाता है। वह जब काम करने लगता है तब सोचता है कि हमारे हृदय में प्रविष्ट होकर भगवान ही यह काम करा रहे है, हमारा इसमें कोई हाथ नहीं पर ये सब उसके ऊपरी मन की बातें होती है। उसके भीतरी मन से उस काम को पूर्ण करने का अनुराग बहुत अधिक रहता है और उसके पूर्ण न होने से उसे बड़ा दुःख भी होता है। इस लिये अध्यात्म और योग के पथिक को अपने मन में सदैव यही भाव धारण करना होगा कि भगवान सब के हृदय में विराजमान है और समस्त अभिलाषाओं को त्याग कर उनकी लीला पर लक्ष्य रखना ही हमारा ध्येय है। जब तक भगवान स्वयं ज्ञान-दीप को जला कर अर्न्तहृदय के सम्पूर्ण तम का नाश न करेंगे तब तक साधक के मोह रूपी अंधकार में फँस जाने की पूर्ण संभावना है।
जिस साधक में तमोगुण की प्रधानता रहती है उसे अन्य प्रकार की विपत्तियों में फँसना पड़ता है। सबसे पहले साधक के हृदय में ऐसा विचार उठता है कि - “मैं दुर्बल, पापी, घृणित, अज्ञानी, अकर्मण्य हूँ। मैं जिस किसी को देखता हूँ वह सभी मुझ से ऊँचे जान पड़ते हैं। मैं सबसे नीच हूँ। भगवान को हमारे जैसों की आवश्यकता नहीं भगवान मुझे शरण में लेकर क्या करेंगे” आदि आदि। पर कुछ साधन भजन करने से उसे कुछ शांति मिल गई तो वह सोचने लगता है- “चलो सारा झंझट मिट गया, मुझे शांति तो प्राप्त हो गई, अब इससे ज्यादा क्या करना है।” इस प्रकार विचार करके वह सब तरह के कर्मों से मुँह मोड़ कर आनन्द करना ही अपना लक्ष्य बना लेता है। ऐसे साधक को यह समझना चाहिये कि वह भी परब्रह्म का अंश है और आदि शक्ति ही उसके हृदय में अवस्थान करके समस्त कार्यों का संचालन करती है। सर्वशक्तिमान भगवान की लीला तरह-तरह की होती है। किसी एक लीला को ही सब कुछ समझकर उदासीन होकर बैठ जाना साधक के लिये प्रशंसनीय नहीं है। उसे भगवान के इस वचन पर ध्यान देना चाहिये-
न मे पार्थोऽस्ति कर्तव्यं त्रिषुलोकेषु किंचन।
नानावाप्तमवाप्तव्यं वर्त्त एं च कर्मणि॥
अर्थात्- “मुझे इस संसार में कोई वस्तु या कार्य अप्राप्त नहीं है तो भी मैं सदा काम में लगा रहता हूँ।” क्योंकि साधारण लोगों को उचित मार्ग दिखलाने के लिये वैसा करना परमावश्यक है।
सात्विक अहंकार वाला साधक अपनी बुद्धि के अनुसार किसी एक तरफ झुक पड़ता है। वह किसी एक निर्दिष्ट साधन पद्धति को अंगीकार करके उसकी सिद्धि में तन्मय हो जाता है। दया या परोपकार आदि किसी एक सिद्धि के मार्ग को ग्रहण करके अपने चित्त की प्रवृत्ति के अनुसार उसकी साधना में जो संतोष उसे मिलता है उसी से वह संतुष्ट रहने लगता है। साधक का सात्विक-अहंकार जिसे श्रेयस्कर बतलाता है उसी को वह ग्रहण करता है और दूसरी तरफ निगाह उठाकर भी नहीं देखता।
हमको सदा यह बात मन में समझते रहना चाहिये कि साधन का अभिप्राय अपने व्यक्तिगत जीवन को लाभ पहुँचाना नहीं है। ये वस्तुएँ यद्यपि सिद्धि के अंग है, तथापि से पूर्ण सिद्धि नहीं है। पूर्ण योग का साधक पहले से ही अपने मन में यह निश्चय कर लेता है कि मैं किसी वस्तु के लिये भगवान से प्रार्थना नहीं करूँगा जो कुछ वह देगा उसे ही हृदय में बिना किसी प्रकार का दुर्भाव लाये स्वीकार कर लूँगा। यदि आप आनन्द की बात पूछे, तो मैं कहता हूँ कि इससे बढ़कर आनन्ददायक बात और कौन सी हो सकती है कि हमने अपना सर्वस्व भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया है। जब हम इस बात को स्वीकार करते है कि भगवान की प्रत्येक लीला आनन्दयुक्त है, तो हमको आधार बनाकर वह जो लीला करता है उसी में हमें आनन्द मानना चाहिये।
सात्विक अहंकार के रहते हुए भी साधना पूर्ण नहीं हो सकती। इसलिये योगों को पूर्णता प्राप्त करने के निमित्त उसका भी परित्याग करना होगा। सब धर्मों में मुक्ति, निर्वाण आदि को साधना का अन्तिम लक्ष्य बतलाया है, पर पूर्ण योग के साधक को इस लक्ष्य को भी त्याग देना होगा। साधक को बिना किसी भी भली बुरी अभिलाषा के केवल भगवान के रूप और उसकी लीला का ही ध्यान करना होगा इसी से वह सच्चे आनन्द का अधिकारी बन सकता है।
परिश्रम हीनता का द्योतक नहीं
अमरीका के स्वाधीनता संग्राम के समय की बात है कि कुछ सैनिक एक किले के ऊपर एक भारी लकड़ी को चढ़ाने का प्रयत्न कर रहे थे। पर लकड़ी भारी होने के कारण उनसे चढ़ाई नहीं जा रही थी। इतने में एक सज्जन व्यक्ति घोड़े पर सवार होकर उधर से निकले और इस दृश्य को देखकर उन सिपाहियों के नायक से, जो पास ही खड़ा हुआ था, कहने लगे कि अगर आप भी हाथ लगा दें तो लकड़ी उठ सकती है। इस पर वह बोला- “मैं तो नायक हूँ।” उन सज्जन ने बिना कुछ कहे अपनी टोपी और कोट उतार कर अलग रख दिये और कमीज की बांहें चढ़ा उन मजदूरों के साथ लकड़ी को उठवाने लगे। लकड़ी सुविधापूर्वक ऊपर पहुँच गई। चलते समय उन्होंने नायक से कहा- “जब कभी आपको ऐसे किसी काम के लिये आवश्यकता पड़े तो आप अपने प्रधान सेनापति जार्ज वाशिंगटन के पास संदेश भेज दिया कीजिये, मैं आ जाया करूँगा।
प्रत्येक वेद मन्त्र का एक देवता होता है जिसकी शक्ति से ही वह मंत्र सिद्ध एवं फलित होता है। गायत्री महामंत्र का देवता ‘सविता’ है। ‘तत् सवितुः’ इस आरम्भिक पद में उस सविता का उल्लेख करते हुए आगे उसी का ध्यान और धारणा करने का निर्देश दिया गया है। गायत्री की शक्ति इस सविता देवता पर ही अवलम्बित है।
सविता कहते हैं “सूर्य” को। गायत्री को एक प्रकार से सूर्य का मंत्र भी कहा जाता है। ‘पुनातु माम् तत्सवितुर्वरेण्यं इस अन्तिम पद वाले स्तोत्र में सूर्य देवता का ही स्तवन किया गया है। इसलिए कितने ही उपासक सूर्य की आराधना के लिए गायत्री का उपयोग करते हैं। गायत्री को माता रूप में मानने वाले साधक भी उसका रूप “सूर्य” मण्डल मध्यस्था’ सूर्य मण्डल के बीच में अवस्थित स्वरूप का, मातृदेवी के रूप में ही ध्यान करते हैं। किसी भी रूप में गायत्री मंत्र की उपासना की जाय ‘सूर्य’ का उसे अविच्छिन्न सम्बन्ध अनिवार्य रूप से रखना होगा। गायत्री का देवता ही सूर्य है तो उसका स्वरूप भी साथ में होना स्वाभाविक ही है।
स्थूल विज्ञान की दृष्टि से सूर्य एक अग्नि पिण्ड है। जो आकाश में अवस्थित अनंत आकाश गंगाओं में से ‘स्थाइरल’ नामक एक आकाश गंगा के परिवार के लगभग डेढ़ खरब तारों में से एक छोटा सा तारा मात्र है। इसका व्यास करीब 9 लाख मील अर्थात् पृथ्वी की अपेक्षा 110 गुना बड़ा है। उसके परिवार में 9 ग्रह हैं तथा प्रत्येक ग्रह के अनेक उपग्रह हैं। बुध, शुक्र और पृथ्वी का एक-एक चन्द्रमा है। मंगल के दो, बृहस्पति के बारह, शनि के नौ, वरुण के पाँच, हरिग्रह के दो और पीत ग्रह (प्लूटो) ?। इनके अतिरिक्त हजारों छोटे ग्रह तथा ग्रहिकाऐं एवं अगणित धूमकेतु, पुच्छल तारे इस सौर परिवार में सम्मिलित हैं। यह सब सूर्य की प्रबल आकर्षण शक्ति में जकड़े हुए उसकी परिक्रमा करते रहते हैं। अपने इस सारे परिवार को लेकर सूर्य ‘स्याइरल’ आकाश गंगा की परिक्रमा करता है। इस एक परिक्रमा में उसे 25 करोड़ वर्ष लग जाते हैं। ज्योतिषियों का अनुमान है कि जब से सूर्य पैदा हुआ है तक से अब तक वह 16 ऐसी परिक्रमाएं कर चुका है।
स्थूल पदार्थ विज्ञान अभी तक सूर्य के सम्बन्ध में ऐसी ही जानकारियाँ एकत्रित कर सका है। तथा उसकी किरणों से सप्त रंग, विद्युत प्रवाह, एवं आणविक विकिरण का कुछ हद तक पता लगा सका है। इस दिशा में और भी जानकारी एकत्रित की जा रही है पर यह सूर्य के स्थूल रूप का ही परिचय है। जैसे मनुष्य की सत्ता का विश्लेषण करने के लिए उसके शरीर सम्बन्धी जानकारी प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं माना जा सकता, उसकी विद्या, बुद्धि, गुण, कर्म, स्वभाव, प्रवृत्ति, भावना, चेतना एवं आत्मा का पता लगाना भी आवश्यक होता है। इसके बिना केवल शरीर विश्लेषण के आधार पर जो परिचय प्राप्त किया जाएगा वह अधूरा ही रहेगा। इसी प्रकार सूर्य की आत्मा को भी जानना आवश्यक है। इसके बिना गायत्री मंत्र का साधक इस अग्नि पिण्ड सूर्य के जान लेने मात्र से अपना प्रयोजन पूर्ण नहीं कर सकता।
इस अनन्त चैतन्य, जीवन एवं शक्ति का समुद्र इस विश्व में लहरा रहा है। जड़ प्रकृति का परमाणु संकुल, उस चेतन सत्ता की तरंगों से ही तरंगित होकर गतिवान हो रहा है। जड़ पदार्थों में अपनी निज की कोई शक्ति या चेतना नहीं है। जब प्रलय होती है तो वह सब राख के ढेर के समान निष्प्राण, गतिहीन हो जाता है। संसार में जो कुछ हलचल हो रही दीखती है उसके मूल में यह चेतना का महा भाण्डागार ही काम कर रही है। जैसे देह के निर्जीव कलेवर में आत्मा का ही संसार गतिशील रहता है वैसे ही जड़ प्रकृति में चेतना होती दिखाई पड़ती है उसका कारण वह चेतना सागर ही है जिसके लिए गायत्री मंत्र में ‘सविता’ शब्द का प्रयोग हुआ है, यह प्रकाश पिण्ड सूर्य उस सविता का एक बाह्य शरीर स्थूल कलेवर मात्र है।
सूर्य की गर्मी और रोशनी हर किसी को दीखती है, यह उसकी स्थूल शक्ति है। इसके भीतर एक और भी सूक्ष्म सत्ता उसके अन्तर में मौजूद है वह है- जीवनी शक्ति। प्राणियों को उत्पन्न करने, पोषण और अभिवर्धन करने का विश्व व्यापी कार्यक्रम उस सूर्य की आत्मा पर ही आधारित है। रोशनी और गर्मी मशीनों से भी पैदा की जा सकती है, पर उनसे जीवन नहीं मिल सकता। वैज्ञानिक जानते हैं कि यदि सूर्य न होगा तो पृथ्वी पर जीवन का भी कोई चिन्ह शेष न रहेगा।
श्रुति में सूर्य को संसार की आत्मा” बताया गया है। आँखों से आकाश में दौड़ने वाले सूर्य के बाह्य कलेवर को गर्मी और रोशनी का पिण्ड कह सकते हैं, उसकी आत्मा जगत का जीवन है । इस जीवनी शक्ति का दूसरा नाम प्राण शक्ति भी है। सूर्य की आत्मा को ही महाप्राण कहा गया है। उस महाप्राण की बूँदें विभिन्न प्राणियों में अल्प प्राण के रूप में दृष्टिगोचर होती है।
गय कहते हैं प्राण को। त्री कहते है- उद्धार, उत्थान करने वाली को। प्राणशक्ति का उत्थान करने वाली विद्या गायत्री महामंत्र में अभिहित होती है और उसी का एक अंश अपने में धारण करके गायत्री उपासक अपने आपको धन्य बनाता है।
सूर्य के माध्यम से प्रस्फुटित होने वाला महाप्राण परब्रह्म परमात्मा का वह अंश है जिससे इस विश्व ब्रह्माण्ड का संचालन होता है। एक से अनेक बनने का ब्रह्म संकल्प ही महाप्राण बनकर फूट पड़ा है। यह निर्झर जिस दिन तक बह रहा है उसी दिन तक सृष्टि है। जिस दिन परम प्रभु उस संकल्प को समेट लेंगे उसी दिन महाप्राण शान्त हो जाएगा और फिर महाशून्य के अतिरिक्त और कुछ भी शेष न रहेगा। यह ब्रह्म संकल्प-महाप्राण परब्रह्म की सत्ता से भिन्न कोई बाहरी पदार्थ नहीं वरन उसी का एक अविच्छिन्न अंग है। परमात्मा अनन्त है उसकी सत्ता असीम है। उस अनन्त, असीम, अचिन्त्य का एक भाग जो सृष्टि के संचालन में, उसकी समस्त प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित रखने में लगा हुआ है। उस महाप्राण को ही सूर्य की आत्मा- सविता देवता समझना चाहिए। प्राणी का, जीवधारी का सीधा सम्बन्ध इसी से है।
जीवन की एक बाह्य और आन्तरिक सुव्यवस्था के लिए प्रगति और शान्ति के लिए परब्रह्म की महाप्राण सत्ता को अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करना प्राणी के लिए अभीष्ट होता है। इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए गायत्री महामन्त्र द्वारा सविता देवता की उपासना की जाती है।
यह भ्रम नहीं रहना चाहिए कि गायत्री महामंत्र की शक्ति इस अग्नि पिण्ड सूर्य पर अवलम्बित है। यह तो रोशनी और गर्मी मात्र देता है। यह सब तो बिजली की मशीनों से भी प्राप्त किया जा सकता है। इतने मात्र के लिए किसी उपासना की क्या आवश्यकता थी? गायत्री सूर्य की आत्मा सविता शक्ति के साथ उपासक को सम्बन्धित करती है जिसके द्वारा वह परब्रह्म का महाप्राण अपने शरीर और अन्तःकरण में आवश्यक मात्रा में धारण करके लौकिक सुख एवं आत्मिक शान्ति को अनुभव करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
यह महाप्राण जब शरीर क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो आरोग्य, आयुष्य, तेज, ओज, बल, उत्साह, स्फूर्ति, पुरुषार्थ, इन्द्रिय, शक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होता है जब वह मनः क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो उत्साह, स्फूर्ति, प्रफुल्लता, साहस, एकाग्रता, स्थिरता, धैर्य संयम आदि सद्गुणों के रूप में देखा जा सकता है। जब उसका अवतरण आध्यात्मिक क्षेत्र में होता है तो त्याग तप, श्रद्धा, विश्वास, दया, उपकार, प्रेम, विवेक, आदि के रूप में दिखाई देता है। तीनों ही क्षेत्र उस महाप्राण से जैसे जैसे भरते जाते हैं वैसे ही मनुष्य अपूर्ण तो उसे पूर्णता की ओर, लघुता से विभुता की ओर, तुच्छता से महानता की ओर बढ़ने लगता है। आत्मकल्याण का लक्ष्य प्राप्ति का यह मार्ग है। गायत्री के द्वारा सविता देवता को - महाप्राण को उपलब्ध करने का प्रयोजन भी यही है।
सविता देवता यद्यपि सूर्य का ही दूसरा नाम है। पर यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि जो अन्तर शरीर और आत्मा का है वही सूर्य और सविता का है। गायत्री महामंत्र का देवता सूर्य वही महाप्राण है। उसका स्पष्टीकरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर विस्तार पूर्वक किया गया है।
योऽसावदित्वे पुरुषः सोऽहम्।
मैत्रेयी उपनिषद् 6।35
“सूर्य है सो ही मैं हूँ।”
प्राणो वै अर्कः- शतपथ 10। 4। 7।23
“प्राण ही सूर्य है।”
सएव वैश्वानरो विश्व रुपः प्राणोऽग्निरुदयते
-प्रश्नोपनिषद् 1। 7
“सूर्य के उदय होने पर सारे विश्व में प्राणाग्नि का संचार होने लगता है।”
सहस्त्ररश्मिः शतघा वर्तमानः
प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः।
-शतः 6। 7। 1 । 20
“प्राण ही सहस्त्र रश्मियों वाला, सैकड़ों प्रकार से वर्तमान प्रजा को उत्पन्न करने वाला सूर्य है।”
योऽसौ तपन्न्देति ससर्वेषां भूतानां प्राणाना दायो देति।
-श्रुति
इस सूर्य से ही सब प्राणियों को प्राण प्राप्त होता है।
सएष वैश्वानरो विश्व रुपः प्राणाऽग्नि रुदयति।
“यह प्राण ही सर्वव्यापी अग्नि के रूप में प्रकट होता है।”
आदित्यो वै बाह्रामण उदयत्येषत्द्ये
न चाक्ष्ज्ञुव प्राणमनुगृह्णीते।
- प्रश्नोपनिषद् 1। 7
बाह्य जगत में यह प्राण आदित्य रूप होकर दसों दिशाओं में विद्यमान है।”
विश्व रुपं हरिणं जात वेदसं
परायण ज्योतिरेकं तपन्तरम्।
सहस्त्र रश्मिः शतवा वर्तमानः
प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः
-प्रश्नोपनिषद् 1 । 8
“विश्वरूप, व्यापक, सर्वाधार, प्रकाशवान, तप्त किरणों वाला यह सूर्य समस्त जीवों का प्राण होकर उदय होता है।”
सूर्याद् भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु।
सूर्ये लयं प्राप्तुवन्तियः सूर्यः सोऽहयेव च ॥
-सूर्योपनिषद्
सूर्य से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उसी से उनका पालन होता है, उसी में वे लय हो जाते हैं जो सूर्य है सो ही मैं हूँ।
गायत्री का देवता सविता-सूर्य विश्व के जीवन का, ज्ञान और विज्ञान का केन्द्र है। अन्य समस्त देव शक्तियों का केन्द्र भी वही हैं। चारों वेदों में जो कुछ है वह सब भी इस सविता शक्ति का विवेचन मात्र है। तप, श्रद्धा और साधना के द्वारा योगीजन इसे ही प्राप्त करने में संलग्न रहते हैं। नाम रूप सुविधानुसार कोई भी माना जाय पर वस्तुतः वह सविता देवता ही सब का उपास्य है। उसी को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक साधक को प्रयत्नशील होना पड़ता है। देखिए :-
उद्यन्तं वादित्य मग्निरनु समारोहति
सुषुन्नः सूर्य रश्मिः चन्द्रमा गर्न्धवः।
-श्रुति
“इस सूर्य के अंतर्गत ही अग्नि, सुषुम्न, चन्द्र, गन्धर्व आदि हैं।”
ऋग्भिः पूर्वाह्रेदिषि देव ईयते,
यजुर्वेदेतिष्ठति मध्यअग्रः।
सामवेदनास्तमये महीयते,
वेदैरसन्यस्त्रिभिरेति सूर्यः॥
-श्रुति
“ यह सूर्य प्रातः ऋक् से, मध्याह्न को यजु से और सायं काल साम से युक्त होता है।”
ऋचेऽस्य मण्डलं सामान्यस्य मूतिर्याजूणिच।
त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्प कलकृदविभुः॥
-सूर्य सिद्धान्त
“ऋक् सूर्य का मण्डल और यजुः तथा साम उसकी मूर्ति है। वही काल रूप भगवान है।
“नत्वा सूर्य परंघाम ऋ्ग यजुः साम रूपिणाम्।
-सूर्य पुराण
“ऋक् यजु साम रूपी परंघाम सूर्य को नमस्कार है।”
ए एष वैश्वानरों विश्व रुपं प्राणोअग्नि रुदयते।
तदेतद्वचान्युक्तम।
-प्रश्नोपनिषद् 1 । 7
“यह उदय होने वाला सूर्य ही वैश्वानर (जठराग्नि) और विश्व रूप प्राण है। यही ऋचाओं में कहा गया है।”
अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मा नमन्विष्यादित्यभभिः जयन्ते एतद्वे प्राणनामायतन-मेतदभृतन मयमेतत्परायण मेतस्यान्न पुनरावर्तन्त इतयेषनिरोधः।
तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा तथा विद्या द्वारा जो आत्मा की खोजकर उस आदित्य को प्राप्त करते हैं वे पुनः जन्म नहीं लेते, हय आदित्य ही प्राणों का आश्रय है। वही मोक्ष है, वही पद है, जीव को उसी से परम आश्रय मिलता है।
भदृभत भविष्यं च जंगमंस्थावरं चयत्।
अस्यैकं सूर्यमैवैकं प्रभवं प्रलयविदुः।
असत्श्च सतश्रैव योनिरेषा प्रजापतिः।
तदक्षरं चाव्ययं च यच्चैतद् ब्रह्राशाश्वतम्।
कृत्वैवहि त्रिधान्माननेषु लोकेषुतिष्ठति।
देदान् यथायथं सर्वान् निवेश्य स्वेषु रश्मिषु।
-सूर्योपनिषद्
“जो जड़ चेतन पदार्थ इस संसार में अब मौजूद हैं, भूत काल में थे या भविष्य में होंगे वे सभी सूर्य से उत्पन्न हुए और उसी में तीन होते है। यह सूर्य ही प्रजापति है। यह सत् और असत् की योनि है। अक्षर अव्यय शाश्वत ब्रह्म यही हैं। यही तीनों लोकों में व्याप्त है। समस्त देवता इसी की किरणें हैं।
आदित्येह्मादि भूतस्वात् प्रसूत्या सूर्य उच्यते।
परंज्योतिः तमः पारे सूर्यऽयं सवितेति च॥
-सूर्य सिद्धान्त
“वह समस्त जगत का आदि कारण है इसलिए उसे आदित्य कहते है। सबको उत्पन्न करता है इसलिए सविता कहते हैं। अन्धकार को दूर करता है इससे उसे सूर्य कहा जाता है।
अथादित्य उदयन्यत्प्राचीदिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणाम् रश्मिषु संनिधतें। यदक्षिणाँ यत् प्रतीची यदुदीची यदधी यदर्द्वथ यदन्तरा दिशो यत्सर्वे प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषुसनिधत्तें
-प्रश्नोपनिषद् 1। 6
“पूर्व में उदय होता हुआ सूर्य अपनी किरणों से पूर्व पच्छिम उत्तर दक्षिण, नीचे ऊपर तथा उनके कोणों की सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है। उसकी किरणों में समस्त जगत का प्राण धारण किया जाता है।
अपश्चं गोपायमतिपद्यमान
माच पराच पथिमिश्चरन्तम्।
स सध्रीचीः स विषूचीर्वचान
आनरीवर्ति भुवनेष्वन्तः॥
-ऐतरेय
“मैंने प्राण को देखा है। (साक्षात्कार किया है। यह प्राण सब इन्द्रियों का रक्षक है। यह कभी नष्ट नहीं होता। यह नाड़ियों द्वारा शरीर में दौड़ता रहता है। मुख और नासिका द्वारा यह आता और जाता है। यह शरीर में वायु रूप है पर ब्रह्माण्ड में सूर्य रूप है।
इस कविता की उपासना में संलग्न ऋषि मुनि योग के द्वारा अपनी आत्मा को उस तेज पुँज, महाप्राण, परब्रह्म में प्रविष्ट करते है। शुकदेव जी अपनी साधना को पूर्ण करते हुए जिस स्थिति में प्रविष्ट हुए उसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार मिलता है :-
तस्माद् योग समास्यायत्यक्त्वागृहकलेवरम्।
वायुभूतः प्रवेक्ष्यामि तेजोराशिं दिवाररम्।।
-महा.
शुकदेव जी ने कहा- मैं योग से स्थित होकर इस देह का त्यागकर तेजो राशि सूर्य में वायुभूत होकर प्रवेश करता हूँ। और अधिक बढ़ाया जाय। जो अपना जख्म लेकर मरहम की आशा से आया है क्या हमारा यही कर्तव्य है कि उसके घावों पर नमक छिड़कें?
साँप, और बिच्छू, छिपकली और छछूँदर जहर फैलाने के लिए इस दुनियाँ में बहुत बड़ी तादाद में मौजूद है। मनुष्य उनके काम को अपने जिम्मे न ले तो क्या हर्ज है? प्रेम और सान्त्वना, सहयोग और उदारता, सज्जनता और सौजन्य के साथ उसे पैदा किया गया है। क्या वह भी अपने इन स्वाभाविक गुणों में से एक टुकड़ा दूसरों को नहीं दे सकता? यह कोई खर्चीली बात नहीं है, पर यदि सहानुभूति हमारे अन्दर हो और उसका थोड़ा उपयोग पीड़ितों के लिए करे तो इसमें केवल उनकी ही भलाई नहीं है, अपना भी कल्याण सन्निहित है।
(पं. धर्मकुमार त्रिपाठी साहित्यरत्न)
हमारी आध्यात्मिक साधना का चरम लक्ष्य क्या है? उपनिषद् के निम्न वाक्य से स्पष्ट होता है :-
“ते सर्वगं सर्वतः प्राप्त धीरा युक्तात्मांन सर्वमत्म विशान्ति”। “धीर गण सर्वव्यापी को सकल दिशाओं से प्राप्त कर युक्तात्मा होकर सर्वत्र ही प्रवेश करते है।” सर्व में प्रवेश करना युक्तात्मा होना, उस विश्वात्मा की अनुभूति प्राप्त करना ही हमारी साधना का लक्ष है। आत्मा द्वारा विश्वात्मा में प्रवेश करना ही आध्यात्मिक साधना की कसौटी है।
साधारण स्थिति में अथवा प्रारम्भिक अवस्था में मनुष्य एक सीमित आवरण में आवृत्त होकर पृथ्वी पर विचरण करता है। जिस प्रकार एक अण्डे में स्थित पक्षी का बच्चा पृथ्वी पर जन्म लेता है किंतु अंडे के आवरण से लिप्त हुआ जीवन लाभ भी नहीं करता, ठीक इसी प्रकार साधारण स्थिति में मनुष्य एक अस्फुट चेतना के अंडे में आवृत्त होता है। इस समय वह अपनी उस क्षुद्र इकाई को नहीं देख पाता है जहाँ संकीर्णता होती है, खण्डता होती है, विभिन्नता होती है। जिस प्रकार जन्मान्ध व्यक्ति विस्तृत संसार की जानकारी नहीं कर पाता, वह सोचता है शायद विश्व में और कुछ भी नहीं है सर्वत्र अंधकार ही है किन्तु यदि उसकी आँख ठीक हो जाय अथवा विशेष उपकरणों के उपयोग से उसे दिखाई देने लगे तो विस्तृत विश्व को झाँका, संसार के क्रिया कलापों को वह देख सकता है विश्व भुवन के वैचित्र्य को, जिसकी उसे अन्धेपन अवस्था में जरा भी जानकारी न थी उसे देखकर वह सोचने लगता है मैं इतने दिन तो इसी प्रकार कुछ नहीं समझते हुए घूमता रहा आज मुझे इस संसार का दर्शन हुआ है। ठीक इसी प्रकार आत्मदृष्टि प्राप्त कर लेने पर होता है।
मनुष्य अपने आवरण में अस्फुट चेतना के अण्डे से खण्डता, अनेकता के रंगीन चश्मे के परदे से जब अपने आपको निरावृत्त कर आत्मा द्वारा विश्वात्मा में प्रवेश कर लेता है तब वह अपने विराट एवं सर्वव्यापी स्वरूप को सकल दिशाओं में प्राप्त कर मुक्तात्मा बन जाता है। सर्वत्र प्राप्त करने की क्षमता प्राप्त करता है। परमात्मा की परम सत्ता में प्रविष्ट होकर ही आध्यात्मिक साधन का चरम लक्ष्य प्राप्त होता है। आत्मा विश्वात्मा में मिल कर ही अपनी अनेकों जन्मों की यात्रा पूरी करती है, यही मोक्ष, जीवन मुक्ति, प्रभु दर्शन, आत्म साक्षात्कार का वास्तविक स्वरूप है? जीव चैतन्य और विश्व चैतन्य की एकता, एकरसता प्राप्त कर लेना अध्यात्म जीवन की कसौटी है।
वह विश्व चैतन्य, विश्वात्मा क्या है? इस पर उसकी अनुभूति प्राप्त करने वाले-देखने वाले उपनिषदकार कहते है।
“वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक स्तेनेदं पूर्ण पूरुषेण सवम्” “वृक्ष की भाँति आकाश में स्तब्ध हुए विराज रहे है वही एक। उस पुरुष में उस परिपूर्ण में यह समस्त ही पूर्ण है।
यथा सौभ्यं वयांसि वासो वृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते।
एव हावै तत् सर्व पर आत्मति सम्प्रतिष्ठते॥
है सौम्य! जिस प्रकार वास वृक्ष में पक्षी आकर स्थित होते है, निवास करते है वैसे ही यह जो कुछ है समस्त ही परमात्मा में प्रतिष्ठित हुआ रहता है।
परमात्मा की विराट सत्ता ही सर्वत्र व्याप्त है। यह सारा दृश्य जगत उसी में स्थित है। जब आत्मा उस विश्वात्मा की अनुभूति प्राप्त कर उसी में लीन हो जाती है जब जीव चैतन्य और विश्व चैतन्य में एकाकार स्थापित हो जाता है तभी अनिवर्चनीय आनन्द की प्राप्ति होती है। उस प्राप्ति से ही जीवन का सौन्दर्य है, शांति है, मंगल है, अमृत है। उस विश्वात्मा की, जो सर्वत्र ही व्याप्त है अनुभूति प्राप्त कर मनुष्य सर्वत्र निर्भय होकर विचरण करता है। सर्वत्र उसी के दर्शन करता है तब उसे दूसरा कुछ और दिखाई ही नहीं देता।
हम जीवन को तथा विश्वात्मा के विराट स्वरूप को खण्ड करके देखते है। हम आत्म दृष्टि से न देख कर स्थूल दृष्टि से देखते है और खण्डता विभिन्नता को प्रधानता देते है। मनुष्य को हम आत्मा द्वारा न देख कर इन्द्रियों द्वारा, युक्तियों द्वारा, स्वार्थ, संस्कार और संसार द्वारा देखते है। अमुक वकील है, डाक्टर है, सन्त है, दुष्ट है, नीच है, दयालु है, कुरूप है, सुन्दर है आदि निर्णय दे हम मनुष्य को विशेष प्रयोजन युक्त अथवा विशेष श्रेणीमुक्त के आकार में देखते हैं। यहाँ भी हमारी परिचय शक्ति रुक जाती है इस संकीर्ण आवरण के कारण हम आगे प्रविष्ट नहीं होते। इस खण्डता, विभिन्नता में ही हम अपने को रक्षित समझते है हमारे विषय प्रबल हो उठते है, धन मान, पद प्रतिष्ठा हमें तरह-तरह से नाच नचाते है। हम दिन रात ईंट, काठ, लोहा सोना इकट्ठा करने में लगे रहते है, द्रव्य सामग्री संग्रह करने का अन्त नहीं होता। जीवन में शेष दिन परस्पर की छीना झपटी मारकाट अपने प्रतिवेशियों के साथ निरन्तर प्रतियोगिता में बीतते है। इस खण्ड खण्डता में दुःख, अशान्ति, क्लेश, उद्वेग, नारकीय यातनाओं का भारी बोझ लादे हुए जीवन पथ पर चलना पड़ता है। और इनका तब तक अन्त नहीं होता जब तक हमारी दृष्टि इन नानात्व से हट कर सर्वात्मा की ओर नहीं लगती। कहा भी है :-
“मृत्यों च मृत्यु माप्नोति य इह नानेव पश्यति” जो उसे नाना करके, खण्ड खण्ड करके देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है।
येनाहं नामृता स्यां किमह तेन कुर्याम्-
आध्यात्म पथिक कहता है “जिसके द्वारा मुझे अमृत की प्राप्ति न हो उसे लेकर मैं क्या करूँगा?” जो बँटा है, विच्छिन्न है, खण्ड खंड है वही मृत्यु के द्वारा आक्रान्त है अतः इसका त्याग आवश्यक है और उस विश्वात्मा की अनुभूति उस परम पुरुष, परम सत्ता जिससे परिपूर्ण यह समस्त ही पूर्ण है उसे वरण करना आत्मा का, जीवन चैतन्य का प्रधान धर्म है। यही परम गति है-
एसास्य परमागतिः एसास्य परमा सम्पद्।
ऐसोऽस्य परमो लोक, ऐसोऽस्य परम आनन्दः॥
वह परमात्मा ही जीवों की परम गति है, परम सम्पद् है वह ही जीवों का परम लोक एवं परम आनन्द है।”
एस सर्वेश्वर एस भूताधिपतिरेस भूतपाल
एस सेतुविधरणा एसां लोकानाम् सम्मेदाय
“यह परमात्मा ही सबका ईश्वर है समस्त जीवों का अधिपति है और समस्त जीवों का पालनकर्ता है। वह विश्वात्मा ही सेतु स्वरूप होकर समस्त लोक को धारण करके ध्वंस से उसकी रक्षा करता है।
आध्यात्म साधना, मानव जीवन का परम लक्ष्य अपने दृष्टिकोण को खंड-खंडता विभिन्नता, संकीर्णता से हटाकर सर्वत्र उस विश्वात्मा, परमात्मा की विराट सत्ता का दर्शन और उसकी अनुभूति प्राप्त करना मनुष्य के लिए यही सत्य और सनातन राजमार्ग है। जब जाति, गुण, कर्म, स्वभाव संस्कार आदि समाप्त हो जाते है। मानव मात्र में आत्म-दृष्टि से देखने पर सर्वत्र उस विश्वात्मा की प्रतिष्ठापना के दर्शन होते है। इतना ही नहीं प्राणी मात्र वृक्ष, वनस्पतियाँ, जड़ चैतन्य में उसी परम शक्ति का क्रिया कलाप दिखाई देता है और तभी अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति होगी उसी क्षण समस्त पाप, ताप, अभ्यास जनित संस्कार आचरणों का अन्त हो जाएगा और “अमृत यद्विभाति” अमृत रूप में जो सब में प्रकाशित है उसी अमृत में आत्मा का प्रवेश होगा। फिर सर्वत्र अनन्त आनन्द रूपी अमृत के ही दर्शन होंगे। हमारी आत्मा में भूमा स्थित का दिव्य प्रकाश मुखरित हो उठेगा।
प्रेम की कसौटी
नारदजी को अभिमान हो गाया कि मैं भगवान को बहुत प्यार करता हूँ। भगवान ने इस बात को जाना और अभिमान के निवारण का प्रयत्न किया क्योंकि अभिमान ही अध्यात्म मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।
भगवान नारद को साथ लेकर भ्रमण को चल दिये। चलते-चलते एक तपस्वी ब्राह्मण मिला जो सूखे पत्ते खाकर तप कर रहा था। शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था। फिर भी कमर में तलवार लटकाए था।
भगवान साधारण वेश में थे। उनने तपस्वी से पूछा “आपके पत्ते खाने और तलवार धारण करने का क्या कारण है?”
तपस्वी ने कहा- पत्ते इसलिए खाता हूँ कि मेरे भगवान की प्रजा को अन्न दूध आदि वस्तुऐं पर्याप्त मात्रा में मिले। मेरे खाने के कारण किसी जीव के आहार में कमी न पड़े, और तलवार इसलिए बाँधे हुए हूँ कि संसार में तीन भक्ति को कलंकित करने वाले है, ये कभी मिल जायें तो इस तलवार से उनका सिर काट दूँ।
नरवेशधारी भगवान ने पूछा- भक्ति को कलंकित करने वाले तीन भला वे कौन-कौन है? तपस्वी ने कहा-एक अर्जुन जिसने मेरे भगवान से अपने स्वार्थ के लिए रथ हँकवाया; दूसरी, द्रौपदी जिसके चीर को बढ़ाने के लिए भगवान को नंगे पैरों दौड़ना पड़ा; तीसरा, नारद जिसे आत्मज्ञान पर संतोष नहीं, कभी कुछ कभी कुछ पूछकर मेरे भगवान का सिर खाता रहता है।
दोनों तपस्वी को प्रणाम करके चल दिए। नारद की समझ में अब आया कि उच्च कोटि के प्रेम का क्या लक्षण है? अपने प्रेमी को ही नहीं उसके प्रिय जनों को भी अपने कारण कुछ कष्ट न पहुँचने देना और अपने सुख के लिये किसी प्रकार की भी प्रेमी से याचना न करना।
नारद ने अपने प्रेम की तुलना उस तपस्वी के प्रेम से की तो उनका अभिमान चूर हो गया।
व्यवहारिक ज्ञान भी चाहिए।
एक पण्डित जी को नाव से नदी पार करनी थी। कोई और यात्री था नहीं। अकेले पण्डित जी को लेकर चलने में मल्लाह तैयार नहीं हो रहा था। पंडित जी का जाना आवश्यक था। मल्लाह ने कहा- कुछ अतिरिक्त मजदूरी मिले तो चलूँ। पंडित जी ने कहा- उतराई के पैसों के अतिरिक्त तुम्हें बड़े सुन्दर ज्ञान भरे उपदेश भी दूँगा। मल्लाह ने बैठे से बेगार भली वाली बात सोचकर नाव खोली और पंडित जी को उस पर ले चला।
रास्ते में पंडित जी उपदेश करने लगे। उन्होंने मल्लाह से पूछा- तुम कुछ पूजा पाठ जानते हो? उसने उत्तर दिया, "नहीं महाराज"। पंडित जी बोले- तब तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग व्यर्थ चला गया। पंडित ने फिर पूछा- कुछ पढ़ना लिखना जानते हो? मल्लाह ने कहा- नहीं महाराज। पंडित जी ने कहा- तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग और व्यर्थ चला गया। अब दो तिहाई जीवन व्यर्थ गँवा देने के बाद एक तिहाई ही शेष है, उसका सदुपयोग करो।
पंडित जी का उपदेश चल ही रहा था कि नाव एक चट्टान से टकराकर टूट गई और पंडित जी पानी में डूबने लगे। उन्हें पकड़ते हुए मल्लाह ने पूछा- महाराज तैरना जानते हो? उनने कहा- नहीं मल्लाह उन्हें पीठ पर रखकर पार लगाने लगा और बोला- महाराज! तैरना न जानने के कारण आपका तो पूरा ही जीवन व्यर्थ चला गया होता। उपदेश करना सीखने के साथ-साथ कुछ हाथ पैर चलाना भी सीखना चाहिए था।
केवल दार्शनिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, मनुष्य को जीवन समस्याओं को सुलझाने की व्यवहारिक योग्यता भी प्राप्त करनी चाहिए।
ज्ञानी की पहचान
एक धार्मिक व्यक्ति को गुरु दीक्षा लेने की आवश्यकता पड़ी उसने सुन रखा था कि ज्ञानी गुरु से ही दीक्षा लेनी चाहिए। गुरु बनने के लिए तो अनेकों साधु पंडित तैयार थे पर उस व्यक्ति को यह निश्चय न होता था कि यह ज्ञानी है या नहीं? इसी संदेह में वह चिन्तित रहने लगा।
एक दिन उसकी पत्नी ने चिन्ता का कारण पूछा तो उसने सब बात बता दी। पत्नी हँसी उसने कहा इसकी परीक्षा बहुत सरल है। तुम गुरु बनने को जो तैयार हो उसे घर ले आया करो मैं बता दूँगी कि यह ज्ञानी है या नहीं। पति बहुत प्रसन्न हुआ और प्रतिदिन एक एक गुरू बनने वाले को लाने लगा।
स्त्री ने पिंजड़े में एक कौआ बन्द कर रखा था। जो महात्मा आता उसी से पूछती महात्माजी यह कबूतर ही है न? उत्तर में कई महात्मा हंस पड़ते, कई उसे मूर्ख बताते, कई झिड़कते कि यह तो कौआ है। इस पर वह स्त्री नाराज होती और अपनी बात पर अड़ जाती, नहीं महाराज यह तो कबूतर है। उसके इस दुराग्रह को सुन कर आने वाले महात्मा क्रुद्ध होकर उसकी मूर्खता को निन्दा करते हुए चले जाते।
एक दिन एक महात्मा ऐसे आये जो कौए को कबूतर कहने पर नाराज नहीं हुये वरन् शान्तिपूर्वक बड़े स्नेह के साथ समझाने लगे देखो बेटी कौए में यह लक्षण और कबूतर में यह लक्षण होते है, अब तुम स्वयं ही विचार लो कि यह कौन है? यदि समझ में न आवे तो मैं तुम्हें कौए और कबूतर का अन्तर उन पक्षियों के झुण्ड में ले जाकर या अन्य बुद्धिमान मनुष्यों की साक्षी से समझाने का प्रयत्न करूँगा स्त्री न मानी तो भी उनने क्रोध न किया अपनी बातें बड़े सौम्य भाव से करते रहे।
अपने पति से स्त्री ने कहा- यही महात्मा ज्ञानी है। इन्हें ही गुरू बना लो। ज्ञानी की पहचान यही है कि उन्हें क्रोध नहीं आता।
कर्मकाण्ड ही सब कुछ नहीं है
एक धनी व्यक्ति ने सुन रखा था कि भागवत पुराण सुनने से मुक्ति हो जाती है। राजा परीक्षित को इसी से मुक्ति हुई थी। उसने एक पंडित जी को भगवान की कथा सुनाने को कहा। कथा पूरी हो गई पर उस व्यक्ति के मुक्ति के कोई लक्षण नजर न आये। उसने पंडित जी से इसका कारण पूछा- पंडित जी ने लालच वश उत्तर दिया। यह कलियुग है इसमें चौथाई पुण्य होता है। चार बार कथा सुनो तो एक कथा की बराबर पुण्य होगा। धनी ने तीन कथा की दक्षिणा पेशगी दे दी और कथाऐं आरम्भ करने को कहा। वे तीनों भी पूरी हो गई पर मुक्ति का कोई लक्षण तो भी प्रतीत न हुआ। इस पर कथा कहने और सुनने वाले में कहासुनी होने लगी।
विवाद एक उच्च कोटि के महात्मा के पास पहुँचा। उसने दोनों को समझाया कि केवल बाह्य क्रिया से नहीं आन्तरिक स्थिति के आधार पर पुण्य फल मिलता है। राजा परीक्षित मृत्यु को निश्चित जान संसार से वैराग्य लेकर आत्म कल्याण में मन लगाकर कथा सुन रहा था। वीतराग शुकदेव जी भी पूर्ण निर्लोभ होकर परमार्थ की दृष्टि से कथा सुना रहे थे। दोनों की अन्तःस्थिति ऊँची थी इसलिए उन्हें वैसा ही फल मिला। तुम दोनों लोभ मोह में डूबे हो। जैसे कथा कहने वाले वैसे सुनने वाले, इसलिए तुम लोगों को पुण्य तो मिलेगा पर वह थोड़ा ही होगा। परीक्षित जैसी स्थिति न होने के कारण वैसे फल की भी तुम्हें आशा नहीं करनी चाहिए।
आत्म कल्याण के लिए बाह्य कर्मकाण्ड से ही काम नहीं चलता। उसके लिए उच्च भावनायें होना भी आवश्यक है।
क्रोध पर अक्रोध की विजय
एकबार सन्त तुकाराम अपने खेत से गन्ने का गट्ठा लेकर घर आ रहे थे। रास्ते में उनकी उदारता से परिचित बच्चे उनसे गन्ने माँगते तो उन्हें एक-एक बाँटते घर पहुँचे। तब केवल एक ही गन्ना उनके हाथ में था। उनकी स्त्री बड़ी क्रोधी स्वभाव की थी। उसने पूछा शेष गट्ठा कहाँ गया? उत्तर मिला बच्चों को बाँट दिया। इस पर वह और भी क्रुद्ध हुई और उस गन्ने को तुकाराम की पीठ पर जोर से दे मारा। गन्ने के दो टुकड़े हो गये। बहुत चोट लगी। फिर भी वे क्रुद्ध न हुए और हँसते हुए बड़े स्नेह से बोले- तुमने अच्छा किया, टुकड़े करने का मेरा श्रम बचा दिया। लो एक टुकड़ा तुम खाओ, एक मैं लिये लेता हूँ। उनकी इस सहनशीलता को देखकर स्त्री पानी-पानी हो गई और चरणों पर गिर कर अपने अपराध के लिए क्षमा माँगने लगी।
ईश्वर भक्त सब में अपनी ही आत्मा देखते है, इसलिये वे किसी पर क्रोध नहीं करते अपनी सज्जनता के प्रभाव से दूसरों के हृदय परिवर्तन का कार्य करते रहते है।
पराया धन, धूलि समान
भक्त राँका बाँका अपनी स्त्री समेत भगवत् उपासना में लगे रहते है। वे दोनों जंगल से लकड़ी काट-काट अपना गुजारा करते है और भक्ति भावना में तल्लीन रहते हैं। अपने परिश्रम पर ही गुजर करना उनका व्रत था। दान या पराये धन को वे भक्ति मार्ग में बाधक मानते थे। रास्ते में मुहरों की थैली पड़ी मिली। वे पैर से उस पर मिट्टी डालने लगे। इतने में पीछे से उनकी स्त्री आ गई। उसने पूछा थैली को दबा क्यों रहे हैं? उनने उत्तर दिया मैंने सोचा तुम पीछे आ रही हो कही पराई चीज के प्रति तुम्हें लोभ न आ जाय इसलिये उसे दाब रहा था। स्त्री ने कहा- मेरे मन में सोने और मिट्टी में कोई अन्तर नहीं आप व्यर्थ ही यह कष्ट कर रहे थे। उस दिन सूखी लकड़ी न मिलने से उन्हें भूखा रहना पड़ा तो भी उनका मन पराई चीज पर विचलित न हुआ।
पराये धन को धूलि समान समझने वाले, अपने ही श्रम पर निर्भर करने वाले साधारण दीखने वाले भक्त भी उन लोगों से अनेक गुने श्रेष्ठ है जो सन्त महन्त का आडम्बर बनाकर पराये परिश्रम के धन से गुलछर्रे उड़ाते हैं।
कोढ़ी का अभ्युत्थान
बंगाल के राजमहल जिले के रूप और सनातन नामक दो भगवद् भक्त हुए है। सनातन को कोढ़ था। चैतन्य महाप्रभु से सनातन की भेंट हुई, उन्हें मालूम हुआ कि यह भगवद् भक्त है तो उन्होंने यह जानते हुए भी कि यह कोढ़ी है, उठा कर छाती से लग लिया। कोढ़ का मवाद उनके शरीर पर लग गया तो भी उनने उससे किसी प्रकार की घृणा न की। उन्होंने सनातन को पढ़ाया भी। उस शिक्षा के आधार पर सनातन ने भक्ति रस के कई ग्रन्थ भी लिखे। कोढ़ी होते हुए भी वे महान भगवद् भक्त बन सके।
पतित और तुच्छ दीखने वाले में भी कितनी ही ऐसी आत्माऐं होती है जिन्हें उत्कर्ष का अवसर मिले तो वे महान बन सकती है।
परोपकारी विसाोबा
महाराष्ट्र के ओढिया नागनाथ नामक ग्राम में विसोवा नामक एक सज्जन रहते थे। वे सोने चाँदी का काम करते थे। धनी भी थे और भगवान के भक्त भी। उस क्षेत्र में दुर्भिक्ष पड़ता है। विसोबा के पास जो कुछ था उसे वे अकाल पीड़ितों को खिला देते हैं। फिर भी लोग भूख से प्राण त्यागते ही जाते है। विसोबा सोचते है मेरी साख है, क्यों न ऋण लेकर भूखों का पेट भरूँ? जब दुर्भिक्ष समाप्त हो जाएगा तब मैं ऋण चुका दूँगा। अपनी पत्नी से सलाह करते है उसे भी यह बात पसंद आ जाती है। और सब तो निर्धन हो चुके थे, एक निर्दय पठान ही धनी था उसी के यहाँ अन्न भी था। विसोबा उसे ऋण लेकर भूखे भरती को अन्न बाँटने लगे। चुगलखोरों ने पठान से विसोबा के दिवालिया होने की बात कह दी। पठान ने अपना ऋण तुरन्त लौटाने का तकाजा किया, मुसलमानी राज्य में पठानों की तूती बोलती थी। कुछ न्याय भाव था नहीं, वे चाहे जिसका जो कर डाल सकते थे, उसने मुश्किल से सात दिन की मोहलत दी। विसोबा ऋण कहाँ से चुकाते उनके पास कुछ भी न था।
जब ऋण चुकाने का कोई प्रबन्ध न हो सका तो पठान बिसोवा को अत्यन्त क्रूरता पूर्वक यातनाऐं देने लगे और अपमानित करने लगे फिर भी बिसोवा क्षुब्ध न हुए बराबर यही कहते रहे मैंने आपका ऋण अवश्य लिया है और जिस दिन भी मेरे पास व्यवस्था हो जाएगी आपको अवश्य चुका दूँगा। आप चाहे तो मुझे और मेरे परिवार को ऋण के बदले में पशु की तरह खरीद कर अपने यहाँ जन्म भर के लिए गुलाम भी रख सकते है।
बिसोबा का मुनीम अपने स्वामी को इस दुर्दशा को न देख सका उसने अपनी सारी संचित पूँजी पठान को देकर अपने परोपकारी स्वामी का उद्धष्ट कराया। इसके बद वह मुनीम भी विसोबा के साथ पूर्ण श्रद्धा के साथ ईश्वर भक्ति एवं परोपकार में लग गया।
ईश्वर भक्ति जिसके हृदय में आती है उसके साथ ही करुणा दिया और परोपकार की भावना भी अवश्य उपजती है। जो भक्त तो बने, पर निष्ठुर और कंजूस हो उसकी भक्ति ढोंग मात्र है।
कुत्ते में भगवान्
पढरपुर में कातिकी का मेला लगा। भक्त नामदेव भी वहाँ पधारे वे भोजन बना रहे थे कि एक कुत्ता उनकी रोटियाँ उठाकर भागा। नामदेव उसके पीछे-पीछे घी की कटोरी भी लेकर भागे कि- भगवान्, रूखी रोटी मत खाओ मेरे पास यह घी बचा है इससे उन्हें चुपड़ भी लो, कुत्ता रुका, नामदेव ने उसकी रोटियाँ चुपड़ दी और उसने उन्हें प्रेम पूर्वक खाया। भक्तों ने अपने दिव्य चक्षुओं से स्पष्ट देखा कि कुत्ते के रूप में भगवान पढरीनाथ ही विराजमान थे। सच्चा भक्त वह है जो प्राणिमात्र में भगवान् का दर्शन करे।
वेश्या से तपस्विनी
अम्वपानी नामक एक वेश्या भगवान् बुद्ध को भोजन का निमन्त्रण देने गई। उनने स्वीकार कर लिया, थोड़ी देर बाद वैशाली राजवंश के लिच्छवि राजकुमार आये और उनने राजमहल में चलकर भोजन करने के लिए प्रार्थना की तो उनने कहा- मैं अम्वपानी के यहाँ भोजन की स्वीकृति दे चुका हूँ। उनने मीठे चावल और रोटी की भिक्षा प्रेम पूर्वक ग्रहण की। कुछ समय बाद वह वेश्या भी बुद्ध भगवान् के उपदेशों से प्रभावित होकर बौद्ध भिक्षुणी बन गई
पाप से घृणा करते हुए भी पापी से प्यार करके उसे सुधारा जा सकता है।
मान बड़ाई का परित्याग
स्वामी रामतीर्थ की विद्वत्ता तथा ओजस्वी वाणी से प्रभावित होकर अमेरिका की 18 युनिवर्सिटियों ने मिलकर उन्हें एल. एल. डी. की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा। जिस उन्होंने सधन्यवाद अस्वीकार करते हुए कहा स्वामी और ‘एम. ए.’ ये दो कलंक पहले ही नाम के आगे पीछे लगे हुए है अब तीसरे कलंक को कहाँ रखूँगा?
यश कीर्ति, लोकेषणा, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, पूजा, मान बड़ाई के फेर में पड़कर सत्ता और लोक सेवियों का अहंकार उभरता है। इसलिए सच्चे सत मान बड़ाई से सदा बचते रहते है।
अध्यात्म का उपदेश
प्रसन्नता, अप्रसन्नता, आत्मरक्षा, संघर्ष, जिज्ञासा, प्रेम, सामूहिकता, संग्रह, शरीर पोषण, क्रीड़ा, महत्व प्रदर्शन, भोगेच्छा यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ है। शरीर और मन परिस्थितियों के अनुसार इन परिस्थितियों के क्षेत्र में विचरण करते रहते है। उसकी एक अध्यात्मिक विशेषता भी है जिसे महानता, धार्मिकता, आस्तिकता, दैवी सम्पदा आदि नामों से पुकारते है। उसके द्वारा मनुष्य दूसरों को सुखी बनाने के लिए अपने आपको कष्ट में डाल कर भी प्रसन्नता अनुभव करता है। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख मानता है। जिस प्रकार अपने सुख को बढ़ाकर और दुःख को घटाकर प्रसन्नता का अनुभव होता है इसी प्रकार दूसरों में आत्मीयता का आरोपण करके उनके हित साधन में भी संतोष और सुख का अनुभव होता है।
यह उदारता एवं सेवा की वृत्ति तभी प्रस्फुटित होती है जब मनुष्य अपने आपको संयमित करता है। अपने लिए सीमित लाभ में संतोष करने से ही दूसरों के प्रति कुछ उदारता प्रदर्शित करना संभव होता है। इसलिए इस सर्वतोमुखी संयम को नैतिकता या धर्म के नाम से पुकारा जाता है। इसी का अभ्यास करने के लिए नाना प्रकार के जप, तप, व्रत अनुष्ठान किये जाते है। शास्त्र श्रवण, स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य भी इन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित करना है। चरित्र निर्माण और नैतिकता भी इसी प्रक्रिया का नाम है। पुण्य, परमार्थ भी इसी को कहते है और स्वर्ग तथा मुक्ति इसके फल माने गये है। ईश्वर उपासना के महात्म्य से यह आत्म-निर्माण का कार्य अधिक सरलता से पूर्ण होता है।
सरलता और सान्त्वना चाहिए।
दुखियों को तुम्हारी सान्त्वना भी आवश्यकता है। परेशान और पीड़ित मनुष्य दूसरों से यह आशा करता है कि उसके कष्ट में कमी करने के लिए कोई सहायक व्यक्ति उससे साधनों से न सही कम से कम वचन और भावना द्वारा उसे आश्वासन प्रदान करेंगे।
जिन भूलों के कारण उसे दुःख उठाना पड़ा, इनको व्यंग भरे छेदने वाले शब्दों से कहना, ताना देना, उपहास उड़ाना असज्जनता भरा अमानवीय कार्य है। दुःख देने के लिए उसकी परिस्थितियाँ ही पर्याप्त है, कटु शब्दों के डंक मार कर उसकी व्यथा और बढ़ाकर हम उसका क्या उपकार करते है?
कोई परेशान व्यक्ति आपके पास इसलिए नहीं आता कि उसके कष्ट को मर्मभेदी वचन कह कर
हृदय का संस्कार।
बुद्धि का संस्कार करना उचित है। पर हृदय का संस्कार करना तो नितान्त आवश्यक है। बुद्धिमान और विद्वान बनने से मनुष्य अपने लिए धन और मान प्राप्त कर सकता है। पर नैतिक दृष्टि से वह पहले दर्जे का पतित भी हो सकता है। आत्मा को ऊँचा उठाना और मानवता के आदर्शों पर चलने के लिए प्रकाश प्राप्त करना हृदय के विकास पर ही निर्भर है। बुद्धि हमें तर्क करना सिखाती है और आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन खोजती है। जैसी आकाँक्षा और मान्यता होती है उसके अनुरूप दलील खोज निकालना भी उसका काम है पर धर्म कर्तव्यों की ओर चलने की प्रेरणा हृदय से ही प्राप्त होती है।
जब कभी बुद्धि और हृदय में मतभेद हो, दोनों अलग अलग मार्ग सुझाते हो तो हमें सदा हृदय का सम्मान और बुद्धि का तिरस्कार करना चाहिए। बुद्धि धोखा दे सकता है पर हृदय के दिशासूचक यंत्र (कुतुबनुमा) की सुई सदा ठीक ही दिशा के लिए मार्ग दर्शन करेगी।
गलतियाँ और उनके सुधार
तैरना सीखने वाला डूब जाने के सिवाय और सब गलतियाँ कर सकता है। तब वह अचानक किसी दिन देखता है कि उसे तैरना आ गया। इसलिए गलतियाँ होती है तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जिस तरह बिना गलतियाँ किये तैरना नहीं आता उसी तरह गलतियों के बिना जिन्दगी जीना भी नहीं सीखा जाता।
मनुष्य अपूर्ण है इसलिए उसके कार्यों में गलती हो सकती है। इसमें शर्म की कोई बात नहीं है शर्म की बात यह है कि गलती को सही साबित करने और उस पर अड़े रहने की कोशिश की जाय। गलती को ढूँढ़ना मानना और सुधारना किसी मनुष्य के बड़प्पन का कारण हो सकता है। जो सीखने और सुधारने में लगा हुआ है वही एक दिन उस स्थिति को पहुँचेगा जिसमें त्रुटियों और बुराइयों से छुटकारा मिलता है।
दुर्भावनाओं का स्वास्थ्य पर प्रभाव
अस्वस्थ मन वाले व्यक्ति का शरीर स्वस्थ नहीं रह सकता। जिसका मन चिन्ता, भय, शोक, क्रोध, द्वेष, घृणा आदि से भरा रहता है उसके वे अवयव विकृत होने लगते है जिनके ऊपर स्वास्थ्य की आधार शिला रखी हुई है। हृदय, आमाशय, जिगर, आँतें, गुर्दे तथा मस्तिष्क पर मानसिक अस्वस्थता का सीधा असर पड़ता है। निष्क्रियता आती है उनके कार्य की गति मंद हो जाती है, अन्न पाचन एवं शोधन, जीवन कोषों का पोषण ठीक प्रकार न होने से शिथिलता का साम्राज्य छा जाता है। पोषण के अभाव से सारा शरीर निस्तेज और थका मादा सा रहने लगता है। जो विकार और विष शरीर में हर घड़ी पैदा होते रहते है, उनकी सफाई ठीक प्रकार न होने से वे भीतर ही जमा होने लगते है। इनकी मात्रा बढ़ने से रक्त में, माँस पेशियों में और नाडियों में विष जमा होने लगता है जो अवसर पाकर नाना प्रकार के रोगों के रूप में फूटता रहता है। ऐसे लोग आये दिन किसी न किसी बीमारी से पीड़ित रहते देखे जाते है। एक रोग अच्छा नहीं होता कि दूसरा नया खड़ा होता है।
दुश्चिंताऐं जीवन शक्ति को खा जाती है। शरीर के अंदर एक विद्युत शक्ति काम करती है, उसी की मात्रा पर विभिन्न अवयवों की स्फूर्ति एवं सक्रियता निर्भर रहती है। इस विद्युत शक्ति का जितना ह्रास मानसिक उद्वेगों से होता है उतना और किसी कारण से नहीं होता। पन्द्रह दिन लंघन में जितनी जितनी शक्ति नष्ट होती है उससे कही अधिक हानि एक दिन के क्रोध या चिन्ता के कारण हो जाती है। जिसका मन किसी न किसी कारण परेशान बना रहता है, जिसे अप्रसन्नता, आशंका तथा निराशा घेरे रहती है उसका शरीर इन्हीं अग्नियों से भीतर ही भीतर घुलकर खोखला होता रहेगा। चिन्ता को चिन्ता की उपमा दी गई है वह अकारण नहीं है। वह एक तथ्य है। चिन्तित रहने वाला व्यक्ति घुल घुलकर अपनी जीवन लीला को समय से बहुत पूर्व ही समाप्त कर लेता है।
उदारता और कठोरता।
दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार केवल वे कर सकते है जो अपने प्रति कठोर होते है। जो अपने साथ रियायत चाहते है उन्हें दूसरों के साथ कठोर बनना पड़ता है। तराजू का एक पलड़ा ही झुक सकता है और वह भी तब, जब दूसरा ऊपर उठता है। यदि मनुष्य अपने लिए अधिक सुविधायें चाहेगा तो स्वभावतः उसे दूसरों की उपेक्षा करनी पड़ेगी दूसरों के प्रति जितनी अधिक ममता और करुणा होगी उतनी ही अपनी जरूरतें घटाकर, अपनी सुविधाएँ हटा कर उन्हें जरूरतमन्दों के लिए लगाने का भाव जागेगा उदार हृदय व्यक्ति अन्ततः बिल्कुल खाली हाथ और निरन्तर सेवा परायण हो जाता है। इसलिए उसकी महानता है।
जब तक आक्रमण की, प्रतिहिंसा की, बदला लेने की या किसी को चोट पहुँचाकर सन्तुष्ट होने की इच्छा जीवित है तब तक हमारे अन्दर असुरता एवं दुष्टता विद्यमान है यह मानना होगा। जब इस दिशा में उत्पन्न होने वाला उत्साह उपेक्षा में बदलने लगे तो समझना चाहिये वह दुष्टता शांत होती जाती है। जब दूसरों की भूलों के प्रति क्षमा का, दूसरों के प्रति करुणा का, और दूसरों के अभावों के प्रति सहानुभूति का भाव उदय होने लगे तो समझना चाहिए कि मानवता विकसित हो रही है। यह विकास इस सीमा तक पहुँच जाय कि हानि पहुँचाने और शत्रुता रखने वालों को भी सुख पहुँचाने का प्रयत्न किया जाय तो समझना चाहिए कि साधुता प्रकट होने लगी।
जीवन एक समझौता है।
जीवन एक समझौता है, सिर उठाकर चलने में सिर कटने का खतरा है। जो पेड़ अकड़े खड़े रहते हैं वे ही आँधी से उखड़ते देखे गये हैं। बेंत की बेल जो सदा झुकी रहती है हर आँधी तूफान से बच जाती है। धरती पर उगी हुई घास को देखो वह आँधी से टकराती नहीं वरन हवा चलने पर उसी दिशा में मुझ जाती है जिधर को हवा का रुख होता है। इस परिस्थिति का परखने वाली घास का कोई आँधी तूफान कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
नवकर चलो। मत कहो कि हमीं सही है और हमारी बात सब को माननी चाहिए। मत समझो कि तुम्हीं सबसे श्रेष्ठ निर्दोष और बुद्धिमान हो। दूसरे लोग भी अपने दृष्टिकोण के अनुसार सही हो सकते है और हो सकता है जिन परिस्थितियों में वे रहे है उनमें उनके लिए वैसा ही सोचना, बनना, करना भी स्वाभाविक हो। इसलिए दूसरों को समझने की कोशिश करो। उनके दृष्टि कोण की, उनकी परिस्थितियों की भिन्नता को स्वीकार करो। इस दुनियाँ का सारा कारोबार एक दूसरे को समझने और सहन करने की नींव पर ठहरा हुआ है। समझौता ही जीवन का प्रधान आधार है। यदि तुम अड़ियल और जिद्दी बनकर अपने ही मत की श्रेष्ठता प्रतिपादन करते रहोगे तो कुछ ही दिन में अपने को अकेला पड़ा हुआ और असफलता के गर्त में गिरता हुआ पाओगे।
मरने से डरना क्या?
राजा परीक्षित को भागवत सुनाते हुए जब शुकदेव जी को छै दिन बीत गये और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया तब भी राजा का शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर वह क्षुब्ध हो रहा था।
शुकदेव जी ने परीक्षित को एक कथा सुनाई-राजन् बहुत समय पहले की बात है एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई। वर्षा पड़ने लगी। सिंह व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूर पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बीमार बहेलिये की झोपड़ी देखी। वह चल फिर नहीं जा सकता था इसलिए झोपड़ी में ही एक ओर उसने मल मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिए जानवरों का माँस उसने झोपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अँधेरी और दुर्गन्ध युक्त वह कोठरी थी। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठका, पर पीछे उसने और कोई आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी कोठरी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।
बहेलिये ने कहा- आश्रय के लोभी राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते है और मैं उन्हें ठहरा लेता हूँ तो दूसरे दिन जाते समय बहुत झंझट करते है। इस झोपड़ी की गन्ध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर उसे छोड़ना ही नहीं चाहते, इसी में रहने की कोशिश करते है और अपना कब्जा जमाते है। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ। अब किसी को नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूँगा। राजा ने प्रतिज्ञा की-कसम खाई कि वह दूसरे दिन इस झोपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश ही आया है। सिर्फ एक रात ही काटनी है।
बहेलिये ने अन्यमनस्क होकर राजा को झोपड़ी के कोने में ठहर जाने दिया, पर दूसरे दिन प्रातःकाल ही बिना झंझट किये झोपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दुहरा दिया। रजा एक कोने में पड़ा रहा। रात भर सोया। सोने में झोपड़ी की दुर्गन्ध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सबेरे उठा तो उसे वही सब परमप्रिय लगने लगा। राज काज की बात भूल गया और वही निवास करने की बात सोचने लगा।
प्रातःकाल जब राजा और ठहरने के लिए आग्रह करने लगा तो बहेलिए ने लाल पीली आँखें निकाली और झंझट शुरू हो गया। झंझट बढ़ा उपद्रव और कलह कर रूप धारण कर लिया। राजा मरने मारने पर उतारू हो गया। उसे छोड़ने में भारी कष्ट और शोक अनुभव करने लगा।
शुकदेव जी ने पूछा- परीक्षित बताओ, उस राजा के लिए क्या यह झंझट उचित था? परीक्षित ने कहा- भगवान वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइए। वह तो बड़ा मूर्ख मालूम पड़ता है कि ऐसी गन्दी कोठरी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर राजकाज छोड़कर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता था। उसकी मूर्खता पर तो मुझे भी क्रोध आता है।
शुकदेव जी ने कहा- परीक्षित! वह मूर्ख तू ही है। इस मल मूत्र की गठरी देह में जितने समय तेरी आत्मा को रहना आवश्यक था वह अवधि पूरी हो गई। अब उस लोक को जाना है जहाँ से आया था। इस पर भी तू झंझट फैला रहा है। मरना नहीं चाहता, मरने का शोक कर रहा है। क्या यह तेरी मूर्खता नहीं है?
माता पिता की सेवा से सिद्धि प्राप्ति
महर्षि पिप्पल बड़े ज्ञानी और तपस्वी थे। उन की कीर्ति दूर दूर तक फैली हुई थीं एक दिन सारस और सारसी दोनों जल में खड़े आपस में बातें कर रहे थे कि पिप्पल को जितना बड़प्पन मिला हुआ है उससे भी अधिक महिमा सुकर्मा की है, पर उसे लोग जानते नहीं
पिप्पल ने सारस सारसी के इस वार्तालाप को सुन लिया। वे सुकर्मा को तलाश करते हुए उसके घर पहुँचें। सुकर्मा साधारण गृहस्थ था पर उसने बिना पूछे ही पिप्पल का मनोरथ कह सुनाया। तब उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह एक साधारण गृहस्थ जो योग तथा अध्यात्म के तत्वज्ञान से अपरिचित है, किस प्रकार इतनी आत्मोन्नति कर सका?
सुकर्मा से उन्होंने जब अपनी शंका उपस्थिति की तो उसने बताया कि पिता माता को साक्षात भगवान का अवतार मानकर सच्चे मन से मैं उनकी सेवा करता हूँ। यही मेरी साधना है और उसी के बल पर मैं जो कुछ बन सका हूँ सो आप की जानकारी में है ही।
पत्नी त्याग - महापाप
उत्तानपाद के पुत्र और तपस्वी ध्रुव के छोटे भाई का नाम उत्तम था। यद्यपि वह धर्मात्मा राजा था फिर भी उसने एक बार अपनी पत्नी से अप्रसन्न होकर उसे घर से निकाल दिया और अकेला ही घर में रहने लगा।
एक दिन एक ब्राह्मण राजा उत्तम के पास आया और कहा- मेरी पत्नी को कोई चुरा ले गया है। यद्यपि वह स्वभाव की बड़ी क्रूर वाणी से कठोर, कुरूप और अनेक कुलक्षणों से भरी हुई थी, पर मुझे अपनी पत्नी की रक्षा, सेवा और सहायता करनी ही उचित है। राजा ने ब्राह्मण को दूसरी पत्नी दिला देने की बात कही पर उसने कहा- पत्नी के प्रति पति को वैसा ही सहृदय और धर्म परायण होना चाहिए जैसा कि पतिव्रता स्त्रियाँ होती है।
राजा ब्राह्मण की पत्नी को ढूँढ़ने के लिए चल दिया। चलते -चलते वह एक वन में पहुँचा जहाँ एक तपस्वी महात्मा तप कर रहे थे। राजा का अपना अतिथि ज्ञान ऋषि ने अपने शिष्य को अर्घ्य, मधुपर्क आदि स्वागत का समान लाने को कहा। पर शिष्य ने उनके कान में एक गुप्त बात कही तो ऋषि चुप हो गये और उनने बिना स्वागत उपचार किये साधारण रीति से ही राजा से वार्ता की।
राजा का इस पर आश्चर्य हुआ। उनने स्वागत का कार्य स्थगित कर देने का कारण बड़े दुःख, विनय और संकोच के साथ पूछा। ऋषि ने उत्तर दिया-राजन् आप ने पत्नी का त्याग कर वही पाप किया है। जो स्त्रियाँ किसी कारण से अपने पति का त्याग कर करती हैं। चाहे स्त्री दुष्ट स्वभाव की ही क्यों न हो पर उसका पालन और संरक्षण करना ही धर्म तथा कर्तव्य है। आप इस कर्तव्य से विमुख होने के कारण निन्दा और तिरस्कार के पात्र हैं। आपके पत्नी त्याग का पाप मालूम होने पर आपका स्वागत स्थगित करना पड़ा।
राजा को अपने कृत्य पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने ब्राह्मण की स्त्री के साथ ही अपनी स्त्री को भी ढूँढ़ा और उनको सत्कार पूर्वक राजा तथा ब्राह्मण ने अपने अपने घर में रखा।
देवताओं की साक्षी में पाणिग्रहण की हुई पत्नी में अनेक दोष होने पर भी उसका परित्याग नहीं करना चाहिए। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने सद् व्यवहार से दुर्गुणी पति को सुधारती है वैसे ही हर पुरुष को पत्नीव्रती होना चाहिए और प्रेम तथा सद् व्यवहार से उसे सुधारता चाहिए। त्याग करना तो कर्तव्यघात है।
जिज्ञासु के लक्षण-श्रद्धा और नम्रता
एक बार राजा जातश्रुति के राजमहल की छत पर हंस आकर बैठे और आपस में बात करने लगे। एक हंस ने कहा जिसके राजमहल पर हम बैठे है, वह बड़ा धर्मात्मा और दानी है। इसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई है। इस पर दूसरे हंस ने कहा- गाड़ीवान रैक्य की तुलना में यह न तो ज्ञानी है और न दानी।
इस वार्ता को जातश्रुति सुन रहे थे। उन्हें गाड़ीवान रैक्य से भेंट करने की इच्छा हुई। उनने चारों दिशाओं में दूत भेजे। पर वे निराश होकर लौटे। उनने कहा-राजन् हमने सभी नगर, मन्दिर, मठ ढूँढ़ डाले पर वे कही नहीं मिले। तब राजा ने विचार किया ब्रह्मज्ञानी पुरुषों का विषयी लोगों के बीच रहना कैसे हो सकता है। अवश्य ही वे कही साधना के उपयुक्त एकान्त स्थान में होंगे वही उन्हें तलाश कराना चाहिए।
अब की बार दूत फिर भेजे गये तो वे एक निर्जन प्रदेश में अपनी गाड़ी के नीचे बैठे मिल गये। यही उनका घर था। राजा उनके पास बहुत धन, आभूषण, गाऐं, रथ आदि लेकर पहुँचा। उसका विचार था कि रैक्य इस वैभव को देखकर प्रसन्न होंगे और मुझे ब्रह्मज्ञान का उपदेश देंगे। पर परिणाम वैसा नहीं हुआ। रैक्य ने कहा-अरे शूद्र! यह धन वैभव तू मेरे लिए व्यर्थ ही लाया है। इन्हें अपने पास ही रख।” ऋषि को क्रुद्ध देखकर राजा निराश वापिस लौट आया और सोचता रहा कि किस वस्तु से उन्हें प्रसन्न करूँ। सोचते-सोचते उसे सूझा कि विनय और श्रद्धा से ही सत्पुरूष प्रसन्न होते है। तब वह हाथ में समिधाएं लेकर, राजसी ठाठ-बाठ छोड़कर एक विनीत जिज्ञासु के रूप में उनके पास पहुँचा। रैक्य ने राजा में जिज्ञासु के लक्षण देखे तो वे गदगद हो उठे। उनने जातश्रुति को हृदय से लगा लिया और प्रेम पूर्वक ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया।
सब अपने की समान
एक दिन गुरु द्रोणाचार्य जी युधिष्ठिर से कहा कि एक दुर्जन खोजकर लाओ। वे दूर दूर तक घूमने गये पर उन्हें कोई दुर्जन न मिला। हर किसी में सज्जनता और ईश्वर की झाँकी उन्हें दिखाई देती रही। लौटकर आये तो उन्होंने असफलता स्वीकार करते हुए कहा- ‘मुझे कोई दुर्जन दिखाई नहीं पड़ता।
तब गुरुजी ने दुर्योधन को कहा कि- एक सज्जन खोजकर लाओ। वे भी दूर दूर तक गये पर हर किसी में उन्हें दुर्जनता और दुष्टता ही दिखाई दी। एक भी आदमी संसार में उन्हें भला न दीखा। वे भी लौटकर आये और गुरु के सामने सज्जन न ढूँढ़ सकने की अपनी असफलता स्वीकार कर ली।
इस संसार में दुर्जनों और सज्जनों की कमी नहीं। सभी तरह के मनुष्य मौजूद है पर जो व्यक्ति जैसा होता है उसे अपने समान ही सब दीखते है।
अन्न का प्रभाव
शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह मृत्यु से पूर्व आवश्यक उपदेश पाण्डवों को दे रहे थे। उन्हें इस प्रकार धर्मोपदेश देते देखकर द्रौपदी के मन में आया कि जब दुर्योधन मेरी इज्जत उतार रहा था तब इनने उसे कुछ उपदेश नहीं किया और आज धर्म की इतनी लम्बी-चौड़ी बातें कर रहे है। द्रौपदी इन मनोभावों के साथ हंस पड़ी।
द्रौपदी के मनोभाव भीष्म ने जान लिये। उनने कहा-बेटी उस समय मेरे शरीर में कौरवों का अन्न भरा हुआ था जिसके कारण मेरी बुद्धि वैसी ही अधर्मयुक्त हो रही थी। अब युद्ध में वह रक्त निकल गया, कई दिन से मैंने भोजन भी नहीं किये इससे मेरे पेट में कोई अन्न न होने से मेरे विचार शुद्ध है और अब मैं धर्मोपदेश देने की स्थिति में होने के कारण उत्तम शिक्षाऐं आप लोगों को दे रहा हूँ।
दुष्टों का अन्न खाने से सत्पुरुषों की भी बुद्धि दूषित हो जाती है अन्न का मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।
(श्री भारतीय योगी)
हिन्दू धर्म में अनेक प्रकार की साधन-प्रणालियाँ प्रचलित है, जिनका उद्देश्य आत्मा की उन्नति के पथ पर अग्रसर होते हुए जीवनमुक्ति की स्थिति को प्राप्त करना बतलाया गया है। अगर विभिन्न सम्प्रदायों और पंथों की दृष्टि से विचार किया जाय तो इन प्रणालियों की संख्या सैंकड़ों तक गिनी जा सकती है, पर जिन प्रणालियों को सब प्रकार के विचारों के विद्वानों ने सर्व सम्मति से श्रेष्ठ और प्रभावशाली स्वीकार किया है वे तीन है- कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग। कर्म योग का अर्थ है निष्काम भाव से परोपकार और सेवा के कार्य करना। परमात्मा के प्रति एकान्त भाव से भक्तिभाव रखते हुये परमार्थ करना भक्तियोग है। ज्ञान मूलक कर्म द्वारा भगवान प्राप्ति का प्रयत्न करना ज्ञान योग हे। इस प्रकार बाह्य दृष्टि ये तीन पृथक् पृथक् मार्ग है, पर वास्तव में सबका उद्देश्य लोक सेवा और परपीडा निवारण ही माना गया है। अब तक के उदाहरणों पर विचार करने से हमको तो यही दिखलाई देता है कि जिन साम्प्रदायिक विद्वानों अथवा आचार्यों ने इन तीनों की विभिन्नता और किसी एक मार्ग की श्रेष्ठता का आग्रह किया है, उन्होंने विवाद के अतिरिक्त वास्तव में लोकोपकार का कोई कार्य नहीं किया, जब कि वास्तविक कार्य करने वाले महापुरुषों ने कभी इस बात पर विचार ही नहीं किया कि इनमें से कौन मार्ग श्रेष्ठ और कौन साधारण है, अथवा हम किसका अनुसरण करें?
स्वामी विवेकानन्द एक ऐसे ही महापुरुष थे। उनका जीवन आरम्भ से ही आध्यात्मिक नहीं था और एक समय था जब कि वे ईश्वर के अस्तित्व में भी संदेह प्रकट किया करते थे, पर तब भी उनमें निष्कामभाव से सेवाकार्य की भावना मौजूद थी। स्कूल और कालेज में पढ़ते समय से ही वे आवश्यकता पड़ने पर अपने सभी साथियों की हर प्रकार से सहायता करने में दत्तचित्त रहते थे। इसके पश्चात् जब श्रीरामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आये तब भी उन्होंने अपने समस्त गुरुभाइयों की सेवा करनी और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये स्वयं अधिक से अधिक परिश्रम और प्रयत्न करना ही अपना लक्ष्य रखा। परमहंस देव के इहलीला संवरण करने के पश्चात् जब परिव्राजक बनकर उन्होंने देश भ्रमण किया तो मार्ग में अलवर, खेतड़ी, लिम्बडी, मैसूर, रामनद आदि अनेक राज्यों के शासक उनके भक्त बन गये और उन सबने उनसे अपने यहाँ सुख पूर्वक रहकर साधन भजन करने का अनुरोध किया। पर उन्होंने उत्तर में सदैव यही कहा कि “मैं नहीं मानता कि इस प्रकार एकान्त में बैठकर साधन करने से मनुष्य की मुक्ति हो सकती है। इस प्रकार के लाखों साधु संन्यासी लोगों के लिये क्या कर रहे है? तत्वज्ञान का उपदेश? पर यह तो पागलपन या ढोंग है। भगवान रामकृष्ण का यह कथन पूर्णतः सत्य है कि ‘भूखे मरते को धर्म का उपदेश व्यर्थ है। जहाँ लाखों लोगों को खाने को नहीं मिलता। वहाँ वे धार्मिक कैसे बन सकते है? इस लिये सबसे पहले देश वासियों को पेट की समस्या हो हल करने लायक उपयोगी शिक्षा देनी चाहिये। इस कार्य के लिये पहले तो कार्यकर्ता चाहिये। इस कार्य के लिये पहले तो कार्यकर्ता चाहिये। फिर धन की आवश्यकता है। यह कार्य मेरे जैसे भिखारी संन्यासी के लिये कठिन अवश्य है, पर गुरू की कृपा से मैं इस कार्य को पूर्ण करके रहूँगा। भारत के एक एक शहर से ऐसे व्यक्ति इकट्ठे होंगे। जिनका हृदय देशबन्धुओं की दशा सुधारने के लिये जल रहा है और जो इस कार्य के लिये जीवन अर्पण करने को तैयार है। पर पैसा! मैं देश भर में रंक से लेकर राजाओं के पास तक घूम चुका हूँ, इस लिये मैं कंगाल हिन्दुस्तान में किसी का सहारा न लेकर समुद्र पार करके पश्चिम के देशों में जाऊँगा, वहाँ से अपनी बुद्धि के प्रभाव से धन प्राप्त करके देशोद्धार की योजना को पूर्ण करूँगा या इसी प्रयत्न में प्राण उत्सर्ग कर दूँगा।”
यह है एक सच्चे कर्म योगी की भावना। इसका अर्थ यह नहीं कि स्वामी विवेकानन्द को भगवान का ध्यान नहीं था अथवा वे ज्ञान और मुक्ति के मार्ग से अनजान थे। नहीं वे तो पहले ही श्रीरामकृष्ण की कृपा से भगवान का साक्षात्कार प्राप्त कर चुके थे और अब भगवान के आदेश से ही उन्होंने भारतवर्ष की दुर्दशा को मिटाने का प्राण किया था। वे जानते थे कि निस्वार्थ भाव से सेवा करना ही आत्मा को अपने लक्ष तक पहुँचाने का सर्वोत्तम मार्ग है। जो व्यक्ति अन्य प्राणियों को कष्टों और आवश्यकताओं के प्रति उपेक्षा का भाव रखता है, वह अध्यात्मिक मार्ग में कभी उन्नति नहीं कर सकता।
अपनी इस भावना को कार्य रूप में परिणित करने के लिये स्वामी जी सन् 1893 में, जब कि उन की आयु केवल 30 वर्ष की थी, और बहुत थोड़े साधन उनको प्राप्त थे, अमरीका जा पहुँचे। वहाँ कुछ ही दिनों में हजारों व्यक्तियों को हिन्दू-धर्म का प्रेमी बना दिया और सैंकड़ों ही उनके पास रह कर भारतीय साधन प्रणाली का अनुसरण करके आध्यात्मिक प्रगति में दत्तचित्त हो गये। स्वामी जी लगातार कई वर्ष तक अमरीका में और इंग्लैण्ड में धर्म-प्रचार करते रहे और फिर अपने निश्चय के अनुसार वहाँ के अनेक सुयोग्य तथा साधन सम्पन्न व्यक्तियों को लेकर भारतवर्ष वापस आये। पहले उन्होंने देश भर का दौरा करके जनता को जागृति का सन्देश सुनाया, मुक्ति का मार्ग दिखलाया और फिर अपने गुरु के नाम पर राम कृष्ण मिशन’ की स्थापना की जिसका एकमात्र लक्ष स्वामी जी की भावना के अनुसार भारतीय जनता की हर प्रकार से सहायता और उन्नति का प्रयत्न करना था।
स्वामी जी संकीर्णता की भावना से भी बहुत परे थे और वास्तव जिस किसी को धर्म के सत्य स्वरूप के दर्शन हुये है, वह चाहे किसी भी महत्व का अनुयायी क्यों न हो उसमें सब के प्रति सहिष्णुता, उदारता, प्रेम की भावना अवश्य पाई जाएगी। अमरीका की ‘सर्वधर्म महासभा’ में स्वामी जी ने सबसे पहले दिन जो संक्षिप्त भाषण दिया उसमें उन्होंने अपनी इस भावना को पूर्ण रूप से व्यक्त कर दिया। उन्होंने कहा कि “मुझे यह कहते गर्व होता है कि मैं जिस सनातन हिन्दू धर्म का अनुयायी हूँ उसने जगत को उदारता और विश्व को अपना समझने की उच्च भावना सिखाई है। इतना ही नहीं हम सब धर्मों को सच्चा मानते है और हमने प्राचीन काल में यहूदी और पारसी जैसे भिन्न धर्म वालों को भी अपने यहाँ आश्रय दिया था। मैं छोटेपन से नित्य कुछ श्लोकों का पाठ करता रहा हूँ और अन्य लाखों हिन्दू भी उनका पाठ करते है। उनका आशय यही है कि- “जिस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानों से उत्पन्न होने वाली नदियाँ अन्त में एक ही समुद्र में इकट्ठी हो जाती है, इसी प्रकार हे प्रभु! मनुष्य अपनी भिन्न-भिन्न प्रकृति के अनुकूल पृथक्-पृथक् धर्म-मार्गों से अन्त में तेरे ही पास पहुँचते है” इसी प्रकार गीता में भी भगवान ने यही कहा है कि “मेरे पास कोई भी व्यक्ति चाहे जिस तरह का आये, तो भी मैं उसे मिलता हूँ। लोग जिन भिन्न-भिन्न मार्गों से अग्रसर होने का प्रयत्न करते है, वे सब रास्ते अन्त में मुझ में ही मिल जाते है।” पंथ-द्वेष धर्मान्धता और इनसे उत्पन्न क्रूरतापूर्ण पागलपन के जोश ने इस सुन्दर धरती को दीर्घकाल से नष्ट कर रखा है; बार-बार भूमि को मानव रक्त से तर कर दिया है, और संस्कृति को छार-छार कर दिया है। पर अब इन बातों का समय पूरा हो चुका है और मैं आशा करता हूँ कि आज प्रातः इस सभा को आरम्भ करने का जो घण्टा बजाया गया था वह सब प्रकार की अनुदारता, संकीर्णता और तलवार तथा कलम द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों का अन्त करने वाला ‘मृत्यु घण्टा’ सिद्ध होगा।” स्वामी जी यद्यपि एक बहुत बड़े योगी थे और उन्होंने राजयोग की शिक्षा के लिए अमरीका में जो विद्यालय खोला था, उसमें शिक्षा पाकर कितने ही व्यक्ति प्रसिद्ध योगी बन गये हैं, पर उन्होंने कभी योग की सिद्धियों या अद्भुत शक्तियों की तरफ ध्यान नहीं दिया। उनकी सबसे बड़ी सिद्धि यही थी कि उन्होंने भिक्षुक के रूप में रहते हुए जिस सेवा संस्था का संकल्प किया उस राम-कृष्ण मिशन’ की शाखाऐं आज देश भर में फैली हैं और उसकी तरफ से सैंकड़ों बड़े-बड़े अस्पताल, स्कूल और अन्य सेवा कार्य संचालित हो रहे है। इसी प्रकार जब ये अमरीका की सर्वधर्म महासभा में भाग लेने पहुँचे तो न तो उनके पास प्रतिनिधि का टिकिट था, और न कहीं ठहरने का ठिकाना था। एक दिन तो उनको स्टेशन के बाहर पड़े खाली बक्स में घुसकर रात व्यतीत करनी पड़ी पर उनको एक एक करके अपने आप सहायता मिलती गई और वे सभा में व्याख्यान देने को पहुँच गये। उस समय तक अव्यवस्थित दशा रहने के कारण उन्होंने अपने भाषण की कुछ भी तैयारी नहीं की थी और न उस सम्बन्ध में कुछ विचार ही किया था, जब कि अन्य धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि महीनों से अपने भाषणों को तैयार करके और उनमें बहुत कुछ सुधार करके रट चुके थे। इसलिए अध्यक्ष के बार-बार कहने पर बहुत याद व्याख्यान मंच पर गये और विचार करने लगे कि ऐसी संसार प्रसिद्ध सभा के सामने क्या कहूँ। पर जैसे ही वे भाषण देने के स्थान पर खड़े हुए कि उनको अनुभव हुआ कि गुरुदेव श्रीराम कृष्ण पीछे खड़े उनको आशीर्वाद दे रहे है। बस उनका आत्मतेज जागृत हो उठा और उनका भाषण संसार के चुने हुए उन समस्त विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ माना गया।
इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द का लक्ष्य सदैव व्यवहारिक रूप में दीन जनों की सेवा उनका उद्धार रहा और इसी को उन्होंने सबसे बड़ा योग तथा परमात्मा का ध्यान जप, तप, माना। कलकत्ते में सन 1898 में जौन प्लेग का प्रकोप हुआ और सब जनता घबड़ा कर वहाँ से भागने को उद्यत हो गई, तो स्वामी जी ने नोटिस बँटवाकर लोगों को आश्वासन दिया और अपनी तरफ से सेवा योजना तैयार की। कई गुरु भाइयों ने शंका की कि इसके लिए धन कहाँ से आयेगा? स्वामी जी ने तुरन्त उत्तर दिया कि ‘यदि आवश्यकता होगी तो हमने अपने मठ के लिए जो स्थान खरीदा है उसे बेच देंगे। जब संन्यास लिया है तो हमें सदैव भिक्षा माँगकर खाने और पेड़ के नीचे रहने को तैयार रहना ही चाहिए।”
स्वामीजी का जीवन अन्त तक कर्ममय रहा। उनको बहुत अस्वस्थ देखकर एक दिन नाग महाशय ने विश्राम करने की सलाह दी तो उन्होंने कहा कि “गुरु महाराज मेरे भीतर जो शक्ति स्थापन कर गये हैं वह मुझे शान्त बैठने ही नहीं देती, निरन्तर कर्म के लिए ही प्रेरित करती रहती है। “यही कारण था कि जीवन के अन्तिम दिन (4 जुलाई 1902) को भी उन्होंने वेदान्त कालेज की योजना बनाकर उसे स्वामी प्रेमानन्द को समझाया। उस दिन उन्होंने अस्वस्थता का ध्यान न करके सब कार्य अपने हाथ से बड़े मनोयोग के साथ किया। पूजा मंदिर का दरवाजा बन्द करके तीन घण्टा तक वह ध्यान में बैठे रहे। उसमें सम्भवतः उनको अपने गुरुदेव और जगज्जननी का साक्षात्कार हुआ क्योंकि ध्यान से उठकर वे धीरे धीरे एक गीत गुनगुनाने लगे ‘चल मन निज निकेतन’ उसी रात्रि को लगभग नौ बजे उन्होंने एकान्त कमरे में लेटकर योग विधि से ब्रह्माण्ड को भेदकर प्राण त्याग दिया।
मनुष्य जो कुछ मन से ध्यान करता है वही वाणी में प्रकट करता है, वही कर्म में परिणित करता है और जो कुछ कर्म करता है उसी को प्राप्त होता है।
-यजुर्वेद
प्रेम और वासनाओं में उतना ही अन्तर है जितना कंचन और काँच में।
प्रेमचंद्र
(श्री रामखिलावन चौधरी)
आज चारों ओर चारित्रिक और सामाजिक दृष्टि से क्षोभ और निराशा का वातावरण दिखाई देता है। हम और आप सभी इस वातावरण को बदलना चाहते हैं। परन्तु इस कार्य में अपने को असमर्थ पाते हैं। इन समस्त दुःखद परिस्थितियों के लिए हम सरकार को समाज को और अन्य जनों को दोष देते हैं, हम भूलकर भी अपने दिल को नहीं खोजते। हम कभी भी यह नहीं सोचते कि इन दूषित परिस्थितियों को उत्पन्न करने में हमारा क्या योग हैं। यदि एक बार आप अपने विचारों और कार्यों का मूल्यांकन करने लगें, तो आपकी समझ में तुरन्त आ जाएगा कि दूसरों को दोष देना व्यर्थ है। स्वयं अपने में कुछ दोष हैं और उन्हें यदि निकाल दिया जाय तो अपन बहुत कुछ कर सकते हैं। यदि आप अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने लगें, तो आप एक सही दिशा की ओर चलने लगेंगे। यह न सोचें कि ‘अकेला चना क्या भाड़ छोड़ेगा' बहुत से लोग अपना काम इसलिए ठीक से नहीं करते कि वे अन्य कर्तव्यहीन जनों के कृत्यों को देखकर सोचते हैं कि जब सभी लोग ईमानदारी से काम नहीं करते, तो हमारी ईमानदारी से क्या लाभ होगा?
आप यह निश्चित रूप से जान लेंगे कि आपकी अकेली ईमानदारी में बहुत बड़ा बल है। हाँ, वह ईमानदारी पत्थर की चट्टान की तरह दृढ़ और अभेद्य होनी चाहिए। एक व्यक्ति में कितनी शक्ति होती है, इसे समझना है तो राम कृष्ण गौतम, ईसा, मोहम्मद और गाँधी जी की शक्ति को देखिए। अपने चारों ओर की प्रतिकूल परिस्थितियों की परवा न करके यह लोग अकेले ईमानदारी के साथ परायण हुए फल स्वरूप उनका अनुगमन करने वाले अनेक बन गये सारी दुनियाँ बदल गयी। तालाब के निश्चल जल में एक ही कंकड़ फेंका जाता हैं परन्तु उसके प्रभाव से उठने वाली असंख्य तरंगें जल की सतह पर उठने लगती है। उसी प्रकार अकेले आपके ईमानदार होने से, घर में पास पड़ोस में, व्यवसाय में और सभी क्षेत्रों में जहाँ आप प्रवेश करते हैं वही, कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य होता है।
आप अपने घर के एक सदस्य हैं। यदि परिवार में आप सबसे बड़े हैं, तो आप बहुत कुछ कर सकते हैं अपने आश्रित जनों के साथ निष्पक्ष और निष्कपट व्यवहार करके आप सबका जीवन सुखी बना सकते है। सबके लिए उचित साधन जुटाकर सबको उन्नति करने का समान अवसर दे सकते हैं। बच्चों और युवकों को (जो आपके परिवार के हैं) उनकी शिक्षा के विषय में उचित परामर्श और मार्गदर्शन दे सकते हैं। परिवार एक प्रकार की नर्सरी है। जैसे नर्सरी में फूलों के पौधे उगाये जाते हैं और बड़े होने पर वही पौधे बंगलों और उद्यानों की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार परिवार में जो बच्चे जन्म लेते है, पलते है और शिक्षा पाकर बड़े होते है, वही आगे चलकर देश के उत्तम नागरिक बनते हैं जिनकी कार्य कुशलता ईमानदारी और कर्तव्यपालन परदेश का भाग्य निर्भर होता है सच पूछिए तो आप इस प्रकार राष्ट्र की शानदार इमारत की नींव तैयार करते हैं।
आज हमारे परिवारों की दशा बहुत गिरी हुई है। गरीबी ओर उत्तम साँस्कृतिक वातावरण की कमी के कारण, पारिवारिक जीवन दूषित होता चला जा रहा है, उसी के कारण मनुष्य में स्वार्थपरता, व्यक्तिगत सुख की होड़ के भाव प्रबल हो जाते है, जिससे सामाजिक जीवन को क्षति पहुँचती है। इन दूषित प्रवृत्तियों को नष्ट करने के लिए कानून नहीं बनाये जार सकते और यदि बनाये भी जायें, तो इससे कोई लाभ नहीं होगा। हम देखते है कि हमारे देश में कानून बनते हैं परन्तु उनसे जो सुधार होने चाहिए, नहीं हो पाते। एक ओर कानून बनता है। और दूसरी ओर कानून का उल्लंघन करने के उपाय लोग निकाल लेते है। राष्ट्रीय चरित्र कानूनी की सहायता से नहीं सुधारा जा सकता। उसका बनाना हमारे आपके हाथ में है। यदि हर एक व्यक्ति अपना सुधार कर ले तो सारा देश अपने आप सुधर जायेगा।
सामाजिक जीवन आदान- प्रदान की नींव पर खड़ा होता है। हमको दूसरों से सुख सुविधाऐं मिलती है और हम दूसरों को सुख सुविधाऐं पहुँचाते हैं। तभी सामाजिक जीवन कायदे से चलता है और सुख की वृद्धि होती है। सामाजिक जीवन के क्रम को भंग न होने देना हमारे हाथ की बात है। इस समय एक बहुत बड़ी कठिनाई यह उपस्थित है कि हम और आप तमाम सुख सुविधाऐं पाना चाहते हैं परन्तु दूसरों को अपनी ओर से सुख सुविधाऐं देना नहीं चाहते। हम ‘आदान’ चाहते हैं परन्तु प्रदान नहीं। जहाँ प्रदान नहीं होता, वहाँ आदान केवल थोड़े दिन चलता है। अपनी ओर से प्रदान का क्रम भंग होते ही, दूसरे लोगों से आदान नहीं प्राप्त होगा। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक जीवन की विकास और विनाश की कुँजी आपके ही हाथ में है। आप उसका प्रयोग करके बहुत कुछ समाज का उपकार कर सकते हैं। समाज के प्रति आपका जो भी ‘देय’ है, निष्ठा पूर्वक दीजिए, आपका जो भी उत्तरदायित्व है, उसे पूरा करिए-
इसी प्रकार समाज में व्याप्त अनेक दोषों को आप नष्ट कर सकते है। होता यह है कि आप अनेक सामाजिक बुराइयों को या तो स्वार्थ वश दूर नहीं करते या कायरता से उनकी ओर से उदासीन रहते हैं। आपके पास-पड़ोस में कोई दुष्ट तथा अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति रहता है। आप साहस पूर्वक उसका विरोध नहीं करते और कभी कभी तो स्वार्थवश उसके साथ सहयोग करने लगते है। ऐसी दशा में अपराध का उन्मूलन नहीं हो सकता। वास्तव में अपराधों के बढ़ाने में आप सहायक होते है। आपके पास पड़ोस में यदि गंदगी है, छूत की बीमारियाँ फैलती है, फिर भी आप सफाई की ओर न तो स्वयं ध्यान देते है और न दूसरों का ध्यान आकर्षित करते है। हमारे देश में अभी काफी अज्ञानता हैं। पास पड़ोस में यदि आप पढ़े लिखे हैं, तो निरक्षर जनों तक कुछ ज्ञान का प्रकाश फैलाइये। मोहल्लों में सबेरे म्यूनिसिपलिटी के कर्मचारी गलियों की सफाई कर जाते है, नालियों में मल मूत्र त्याग कराते हैं, घर का तमाम कूड़ा- कचरा बाहर गली में ढेर कर देते हैं। आपके पास में सार्वजनिक नल लगा हे। वह खुला पड़ा रहता है और पानी नष्ट करता है। राष्ट्रीय घन का अपव्यय होता साथ ही नमी फैलती है। यह सब छोटी छोटी बातें बड़े महत्व की है। केवल इन छोटी मोटी बातों की ओर ध्यान न देने से राष्ट्र के अपार धन की क्षति होती है।
अब आप अपने व्यवसाय की बात लीजिए। हमारे देश में प्रायः व्यवसाय के प्रति लोगों का दृष्टिकोण स्वस्थ नहीं है। आप चाहे नौकरी करें, या मजदूरी या दुकानदारी, उसमें अधिक से अधिक लाभ उठाने की चेष्टा करते है। आप यह भूल जाते है कि अनुचित मुनाफागिरी के कारण आपके व्यवसाय से लाभ उठाने वाले उपभोक्ताओं पर क्या प्रभाव पड़ता है। हम सभी युद्धकालीन ‘काला बाज़ार से परिचित है। व्यापारी वर्ग अपनी वस्तुओं को बेचकर उचित नफा उठाने के साथ-साथ और भी अधिक अनुचित लाभ लेना चाहता है। व्यापार को अपने परिश्रम का उचित लाभ उठाने का हक है। परन्तु दूसरों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी उसका कर्तव्य है।
यदि आप सरकारी कर्मचारी हैं तो आपको अपने पद के अनुकूल कर्तव्य का निर्वाह करना है अधिकारी और कर्मचारी वर्ग की भी अपने पेशे में ईमानदारी नहीं रहे। मुनाफाखोरी करने वालों को प्रलोभनों से उन्हें बचना चाहिए। अधिकारी होने के नाते, वे उपभोक्ता जनता के संरक्षक है। स्वार्थ के लिये न्याय की हत्या करके किन्हीं को अनुचित अवसर प्रदान करना उनके लिए निश्चित रूप से लज्जास्पद है। मजदूर वर्ग को भी अपने पेशे में ईमानदार रहना चाहिए। यदि आप मजदूर है, तो आप जिस कारखाने में काम करते है, वहाँ अपने काम की उत्तमता बढ़ाने, उत्पादन की मात्रा बढ़ायें। ऐसा करने से ही राष्ट्रीय आय बढ़ेगी और आपकी भी आय साथ में बढ़ेगी।
उपर्युक्त कुछ उदाहरणों से स्पष्ट है कि देश और समाज का भविष्य हमारे आपके हाथों में है। हम अनेक बुराइयों को दूर करने का बोझ स्वयं स्वीकार करें और सरकार का मुँह न ताकें। तभी उन्नति की दिशा में हम अग्रसर हो सकते है।
बालकों के निर्माण में सब से बड़ा हाथ माता का है क्योंकि उसी के रक्त माँस से बालक का शरीर बनता है। नौ महीने पेट में रखकर तथा अपने शरीर का रस-दूध पिलाकर उसका पोषण करती है। कई वर्ष का होने तक वह अधिकांश समय माता के सान्निध्य में रहता है और उसी के साथ सोता है। इसलिए स्वभावतः उसके ऊपर सबसे बड़ा प्रभाव माता का होता है। माता के जैसे विचार और संस्कार होते है बालक प्रायः उसी ढाँचे में ढलते है।
यों पिता के बिन्दु का भी थोड़ा महत्व है और बड़े होने पर शिक्षक का तथा बाह्य परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है पर यह सब मिल कर भी उतना नहीं हो पाता जितना कि माता का प्रभाव पड़ता है। माता यदि विदुषी है, सुसंस्कार युक्त और उच्च अन्तः भूमि की है तो उसकी छाया सन्तान पर भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होगी। संसार में जितने महापुरुष हुए है उनके निर्माण में माता का बहुत बड़ा हाथ रहा है।
सुभद्रा ने बालक अभिमन्यु का निर्माण तब किया जब वह गर्भ अवस्था में था। वह चाहती थी कि उसका पुत्र भी अपने पिता अर्जुन के समान की पराक्रमी एवं धनुर्धर हो। शिक्षा का सबसे उत्तम काल वह है जब बालक गर्भ में रहता है। उसे मालूम था कि आधी पढ़ाई बालक माता के गर्भ में पढ़ लेता है। फिर शेष जन्म भर में आधी शिक्षा पूरी कर पाता है। इसलिए सुभद्रा ने अर्जुन से कहा गर्भस्थ बालक पर वीरता के तथा शख प्रवरीणता के संस्कार देने के लिए आप मुझे नित्य उन विषयों की शिक्षा दिया कीजिए। माता के शरीर में ही गर्भस्थ बालक का शरीर और माता के मन में ही उनका मन बनता है सो आप इन दिनों मुझे जो भी उपदेश करेंगे उन सबको बालक ग्रहण कर लेगा।
अर्जुन को सुभद्रा की बात सर्वथा उचित लगी वह नित्य वीरता एवं शस्त्र विद्या सम्बन्धी शिक्षा उसे देने लगा। बालक अभिमन्यु ने उस सारे ज्ञान को अपने अन्तः करक में धारण किया। चक्र व्यूह भेदन की विद्या भी उसने उसी अवस्था में अपने पिता से सीखी। चक्रव्यूह से युद्ध में सात चक्र भेदने पड़ते है। अभिमन्यु ने छः चक्रों का बेधन सीख पाया था इसलिये महाभारत में उन्होंने छः चक्र तो आसानी से वैध दिये पर जब सातवें के भेदने का समय आया तो उसकी जानकारी न होने से लड़खड़ा गये और वहीं मारे गये। सातवें चक्र वेधन की शिक्षा गर्भ में ही उन्हें कम मिली थी क्योंकि अर्जुन जब चक्रव्यूह वेधन का उपदेश कर रहे थे तब छः चक्रों तक का विवरण सुनने के बाद सुभद्रा को नींद आ गई। अर्जुन ने भी कहना बंद कर दिया। इसके बाद अर्जुन अन्य आवश्यक कार्यों में लग जाने के कारण सातवें चक्र का भेदन बताना भूल गये। सुभद्रा भी फिर न पूछ सकी। इस प्रकार वह प्रकरण अधूरा ही रह गया और उस जानकारी के अभाव में अभिमन्यु मारे गये।
राजा दुष्यन्त जब वन में धूम रहे थे तो उनने देखा कि एक बालक सिंहनी के दो बच्चे अपनी दोनों बगलों में दबाये हुए है। जब सिंहनी अपने बच्चों को छुड़ाने के लिए बालक पर गुर्राती है तो वह एक छड़ी लेकर उस सिंहनी को कुतिया की तरह पीट देता है और वह विवश होकर पीछे हट जाती है। इस प्रकार सिंहनी को बार-बार अपने बच्चों को छुड़ाने के लिए आगे बढ़ना और बालक का बार-बार उसे छड़ी से पीटकर उसे पीछे हटा देना एक मनोरंजक दृश्य था। दुष्यन्त को उस बालक का मनोबल देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई। पूछने पर मालूम हुआ कि यह शकुन्तला पुत्र भरत है। कण्व ऋषि के आश्रम में पालन होने से शकुन्तला ने अपने में आत्मबल एकत्रित किया और पति पति परित्यक्ता होने पर उसने पुनः कण्व आश्रम में ही निवास किया। उस वातावरण में रहने का प्रभाव माता पर पड़ा था। पुत्र ने माता और आश्रम का दुहरा लाभ उठाया। ऐसी दशा में यदि वह बालक सिंह शावकों में खेलने वाला बना तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं।
चित्तौड़ के राजकुमार अरिसिंह एक बार शिकार खेलने गये थे तो एक जंगली सुअर के पीछे घोड़ा दौड़ाया। दौड़ते दौड़ते शाम हो गई। घायल सुअर थककर एक झाड़ी में छुप रहा। राजकुमार भी बहुत थके हुए थे, वे झाड़ी के पास पहुँचे और चाहते थे कि किसी प्रकार सुअर को बाहर निकाला जाय पर घायल सुअर द्वारा आक्रमण करने का पूरा पूरा खतरा था इसलिए साथियों में से किसी की हिम्मत आगे बढ़ने को न पड़ रही थी।
इस दृश्य को एक किसान लड़की अपने खेत की रखवाली करती हुई देख रही थी। वह आई उसने उन सब शिकारियों को एक ओर हटा दिया और एक लकड़ी हाथ में लेकर झाड़ी में घुस गई तथा सुअर को पीटती हुई निकाल लाई। राजकुमार इस कृषक लड़की के पराक्रम से बहुत प्रभावित हुए और उसकी प्रशंसा करते हुए घर लौट आये।
कुछ दिन बाद राजकुमार फिर उधर से निकले। देखा तो वह लड़की सिर पर दो घड़े पानी रखे और दोनों हाथों में दो बड़े बड़े थैलों के रस्से पकड़े जा रही है। राजकुमार को उससे कुछ छेड़खानी करने की सूझी। घोड़े को उससे सटाकर निकालने लगे ताकि उसके सिर पर रखी मटकी गिर जाय। कृषक लड़की राजकुमार की गुस्ताखी समझ गई। उसने बैल वाली एक रस्सी इस तरह फंदा बनाकर फेंकी कि घोड़े का पैर ही उसमें फँस गया और राजकुमार घोड़े समेत नीचे गिर पड़े। लड़की की वीरता पर मुग्ध होकर राजकुमार ने उसी से विवाह किया और उस लड़की के गर्भ से वीर हम्मीर का जन्म हुआ जिनकी गाथा इतिहास में प्रसिद्ध है।
कुन्ती ने अपने पुत्रों को तप बल से उत्पन्न किया था। फलस्वरूप उनमें असाधारण दैवी शक्तियाँ मौजूद थी। कर्ण को सूर्य की शक्ति से, अर्जुन को इन्द्र की शक्ति से, युधिष्ठिर को धर्म की शक्ति से और भीम को पवन देवता की शक्ति से उत्पन्न किया था। फलस्वरूप उनमें तप तेज की कमी नहीं थी। शक्ति भले ही किसी देवता की रही हो पर उसका आकर्षण एवं धारण कुन्ती द्वारा ही हो सका। यदि वह वैसी तपस्विनी न होती तो कदापि ऐसे बालक उत्पन्न न होते। वे देवता कुन्ती से पहले भी थे और अब भी हैं पर वैसी धारणा शक्ति की नारियाँ न होने से उस प्रकार के बालक भी उत्पन्न नहीं हो पा रहे हैं।
देवी अंजना ने वायु देवता को अभिमंत्रित करके पवन पुत्र हनुमान को जन्म दिया था। उनका पराक्रम सभी को विदित है। कौशल्या ने पिछले जन्म में तप करके अपने गर्भ से भगवान के जन्म लेने का वरदान प्राप्त किया था। उनके उच्च गुणों के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम में वे गुण आये।
इस प्रकार के अगणित उदाहरण प्राचीन काल के हैं। आधुनिक काल में भी ऐसे अनेक महापुरुष हुए है जिनकी महानता का बहुत कुछ श्रेय उनकी माताओं को ही है।
सन्त विनोबा अपनी आत्मिक प्रगति का कारण अपनी माता को मानते है। माता की चर्चा करते हुए उनने एक बार बताया था कि-
“मेरी माँ कहती थी, मैं अगर पुरुष होती, तो दिखाती कि वैराग्य कैसा होता है। उसके दिल में छटपटाहट थी। लेकिन उसकी दिक्कत यह थी कि वह स्त्री थी। वह यह महसूस करती थी। फिर भी मैंने देखा कि वह भक्त थी। उसकी मुझ पर बहुत श्रद्धा थी। हर चीज में वह ‘विन्या’ का शब्द ‘प्रामाण्य’ मानती थी। मुझे महसूस होता है कि आज भी वह मेरे साथ चल रही है। अगर मुझे मुक्ति मिलेगी, तो उसे भी मुक्ति मिलेगी। अगर मैं वापस दुनिया में आऊँगा, तो वह भी मेरे साथ आयेगी। मैं जहाँ भी जाऊँगा, वह मेरे साथ आयेगी।”
गाँधी जी की माता परम साध्वी और धर्म निष्ठ महिला थी। वे प्रतिदिन मंदिर जाती और बिना भजन पूजा के जल तक ग्रहण न करती थी। कठिन से कठिन व्रत रखती थी। चातुर्मास का व्रत तो उनने आजन्म निबाहा। लोकमान्य तिलक की माता बड़ी तपस्विनी थी। व्रत उपवासों से उनने अपना शरीर सुखा डाला था। जिन दिनों बाल तिलक गर्भ में थे उन दिनों उनने बड़े कठिन अनुष्ठान किये थे। वे कहा करती थी कि मैंने सूर्य देवता की साधना करके इस बालक को प्राप्त किया है? यह सूर्य के समान की तेजस्वी होगा। माता की बात सच निकली, लोकमान्य तिलक की प्रतिभा और महानता सचमुच सूर्य जैसी ही प्रकाशवान थी।
भारत भूमि को फिर नर रत्नों की खान बनाना है तो नारी को वर्तमान दुर्दशाग्रस्त स्थिति से निकालकर उसे महान् बनाना होगा। महान् नारी से ही महापुरुष उत्पन्न हो सकते है ।
सद्भाव रखने में ही सुख है।
कपिलवस्तु और कोलिय नगरों के बीच रोहिणी नदी रहती थी। दोनों स्थानों के व्यक्ति खेती के लिए उसके जल का उपयोग करते थे। एकबार अवर्षा के कारण सर्वत्र जल का अभाव हो गया। रोहिणी की धारा भी क्षीण हो गई। यह देखकर दोनों नगरों के लोगों ने बाँध द्वारा उसके पानी को अपने ही नगर में ले आने का विचार किया। इस पर दोनों में विवाद होने लगा और अन्त में वे शस्त्र लेकर मरने-मारने को उद्यत हो गये। उस समय भगवान् बुद्ध रोहिणी के तट पर ही बिहार कर रहे थे। उन्होंने युद्ध की तैयारी देखकर कारण पूछा और सब हाल सुनकर दोनों तरफ के सरदारों से पूछा-श्रीमानो पानी का क्या मूल्य होता है?”
सरदार-पानी का कोई मूल्य नहीं होता वह सर्वत्र बिना मूल्य ही मिल जाता है?”
“क्षत्रियों का क्या मूल्य है?”
सरदार-क्षत्रियों का मोल लगाना सम्भव नहीं है। वे राष्ट्र की अनमोल सम्पत्ति है। बुद्ध-फिर भी आप लोग अनमोल क्षत्रियों के खून को बिना मोल के पानी के लिये बहाने को तैयार हो गये, क्या यह उचित है,”
दोनों पक्षों के सरदारों ने अपनी भूल स्वीकार करके भगवान् बुद्ध की वन्दना की। भगवान ने उनको समझाया कि-शत्रुओं में अशत्रु बनकर और बैरियों में अबैरी रहकर जीने में ही सुख है।”
“धर्म की उन्नति से अन्यान्य विषयों में उन्नति अवश्यम्भावी है। यदि रक्त साफ और ताजा रहे तो देह में रोग का कोई कीटाणु (जर्म) प्रवेश नहीं कर सकता। धर्म ही हम लोगों का रक्त है। यदि इस रक्त-प्रवाह में कोई बाधा न पहुँचे और वह शुद्ध तथा ताजा रहे तो सभी बातों में कल्याण होगा। यदि यह रक्त शुद्ध हो तो राजनैतिक, सामाजिक अथवा कोई भी बाहरी दोष हो इतना ही नहीं, हमारे देश की घोर दरिद्रता भी दूर हो जायेंगे। जब तक शरीर अपने में रोग के जीवाणु को प्रवेश नहीं करने देता जब तक देह की जीवनी शक्ति क्षीण होकर रोग के जीवाणु को प्रवेश करने और बढ़ने नहीं देती, तब तक संसार के किसी रोग जीवाणु में शक्ति नहीं कि वह शरीर में रोग उत्पादन कर सके। सामाजिक जीवन को विषय में भी यही बात है। जिस समय जातीय-शरीर दुर्बल हो जाता है उस समय जगत के राजनैतिक, सामाजिक, मानसिक और शिक्षा सम्बन्धी विषयों में सब प्रकार के रोगाणु प्रवेश करते है और रोग उत्पन्न करते है। उस समय एक मात्र कर्तव्य होगा लोगों में शक्ति का संचार, रक्त का शुद्ध करना, शरीर को तेज युक्त करना जिससे वह सब तरह के बाहरी विषों को देह में प्रवेश करने से रोके और भीतरी विष को निकाल दे। हमारा धर्म ही हमारे तेज, वीर्य, और यही क्यों जातीय-जीवन की भी मूल भित्ति है।”
-स्वामी विवेकानन्द
“परमात्मा ने हमें बुद्धि दी है सोचने के लिये; इन्द्रियाँ दी है निरीक्षण के लिये। हमें भली प्रकार निरीक्षण कर वस्तुओं के गुण-दोष समझकर तर्क द्वारा ही सच्चाई की खोज करनी चाहिये। यही हमारा ब्रह्मास्त्र है। देशकाल के अनुसार परिस्थितियाँ बदल जाती है, नई बातें पुरानी हो जाती है। कोई बात नई या पुरानी होने से लाभदायक नहीं होती, बुद्धि से सिद्ध किया हुआ उसका उपयोग ही उसे व्यवहार के योग्य बनाता है।”
-सन्त सुकरात
“जो ब्रह्मचारी बनने की कोशिश कर रहा है उसके लिये अनेक बन्धनों (नियमों) की जरूरत है। आम के छोटे पेड़ को सुरक्षित रखने के लिये उसके चारों तरफ बाड़ लगानी पड़ती है। छोटा बच्चा पहले माँ की गोद में सोता है, फिर पालने में और फिर चालन-गाड़ी लेकर चलता है। जब बड़ा होकर खुद चलने लगता है तब सब सहारा छोड़ देता है। ब्रह्मचर्य पर भी यही चीज लागू होती हैं। ब्रह्मचर्य एकादश व्रतों में से एक व्रत बतलाया गया है। इस पर से यह कहा जा सकता है कि ब्रह्मचर्य की मर्यादा या रक्षा करने वाली बाड़ एकादश व्रतों का पालन है। वास्तव में ब्रह्मचर्य मन की स्थिति है। बाहरी आचार या व्यवहार उसकी निशानी है। जिस पुरुष के मन में जरा भी विषय-वासना नहीं रही है, वह कभी विकार के वश में नहीं होगा। वह किसी स्त्री को चाहे जिस हालत में देखे, चाहे जिस रूप-रंग में देखे, तो भी उसके मन में विकार उत्पन्न नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मचारी को अपनी मर्यादा स्वयं ही बना लेनी चाहिये। उद्देश्य यही है कि हम सच्चे ब्रह्मचर्य को पहिचानें, उसकी कीमत जान लें और ऐसे कीमती ब्रह्मचर्य का पालन करें।”
-महात्मा गाँधी
“संसार में विवाह की भिन्न-भिन्न जितनी प्रथाऐं प्रचलित हैं, उनमें वैदिक पद्धति सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। वैदिक पद्धति की विशेषता यह है कि इस पद्धति में अन्य पद्धतियों की तरह विवाह कोई व्यापारिक समझौता (कांट्रैक्ट) नहीं है, किन्तु ही एक पवित्र आत्मिक सम्बन्ध है, जो पति-पत्नी के बीच इसलिए होता है कि वे दोनों मिलकर संसार को यथा सम्भव पहले से अधिक सुखी बनाने का यत्न करें। उपनिषद् में एक जगह अलंकार के एंगल से गृहस्थ शरीर को उतना ही बतलाया है जितना स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर होते हैं। जब उसके दो भाग किये गये तो पति और पत्नी हुए। इसका स्पष्ट भाव यह है कि जिस प्रकार एक दाने के दो दल (दालें) अथवा एक सीप के दो अर्द्ध भाग बराबर-बराबर होते हैं, उसी प्रकार पति और पत्नी में समता होनी चाहिए, तभी वे गृहस्थाश्रम को अच्छा और गृहस्थ जीवन को श्रेष्ठ बना सकते है।”
-नारायण स्वामी
“ इस संसार के निवासी तूफान में फँसे हुए जहाज के उन यात्रियों के समान हैं, जिनके पास भोजन की सामग्री बहुत कम रह गई है। ईश्वर या प्रकृति ने हमको ऐसी स्थिति में डाल दिया है कि आपत्ति से बचने के लिए कम से कम भोजन करना और निरन्तर उद्योग करते रहना हमारे लिए अनिवार्य हो गया है। यदि हम में से कोई व्यक्ति ऐसा न करें और दूसरे के उस श्रम का उपभोग कर लें, जो सामान्य हित के लिए आवश्यक नहीं हैं, तो यह हमारे तथा हमारे महकारियों दोनों के लिए नाशकारी है। अपने आपको स्वाभाविक और न्यायोचित श्रम से बचाकर और उस का भार दूसरों के कन्धों पर लाद कर भी हम अपने को क्यों चोर और धोखेबाज नहीं समझते?”
-टालस्टाय
“स्वार्थी और धनी आदमियों की समझ में न आने वाली एक सबसे रहस्यमयी गुत्थी यह है कि जहाँ उन्होंने सुख पाने की आशा की थी, वहाँ उन्हें सुख क्यों नहीं मिला? धन-दौलत पैदा कर लेने वाले लोगों के सामने जो सबसे बड़ी निराशा आई हैं, वह यह है कि अपनी दौलत से उन्हें जिस सुख की आशा थी, वह या उससे मिलती -जुलती चीज भी उन्हें नहीं मिली। वे देखते है कि भौतिक वस्तुओं से भावनाओं की संतुष्टि नहीं होती, और बड़ी से बड़ी सुख सामग्री के बीच भी हृदय भूखा रहता है। वे देखते है कि धन बहुत से कार्य कर सकता है, पर हृदय की लालसा और हृदय की भूख को तृप्त करने की इसमें कुछ भी शक्ति नहीं हैं। मैं अपनी मेहनत से ऊँचे उठे हुए एक आदमी को जानता हूँ जिसने बड़ी दौलत कमाई थी। उसने मुझे बताया कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी पहेली और निराश यह है कि यद्यपि मैंने लाखों कमाये, पर मैं सुखी नहीं हूँ। वास्तव में कोई भी स्वार्थी जीवन कभी सुखी नहीं हो सकता।”
-स्वेट मार्डन
“प्रेम करने का अर्थ है विश्व के सब जीवों और वस्तुओं से आत्मीयता, बन्धुत्व और एकता का अनुभव करना, और इतना गहरा अनुभव करना कि अपने आस-पास के सब लोगों पर उसका प्रभाव पड़े ओर उन्हें अधिक सुरक्षा और एकता की प्रतीति हो। प्रेम से सब के कल्याण और उन्नति की भावना उत्पन्न होती है। प्रेम से निर्भीकता, स्पष्टता, स्वतंत्रता और सत्यता बढ़ती है। प्रत्येक माता जानती है कि प्रेम देश और काल से सीमित नहीं होता। प्रेम से हमें अपनी अनन्तता और असीमता का अनुभव होने में सहायता मिलती है। प्रेम द्वारा ऐसी भावना बनाने से घृणायुक्त व्यक्ति में भी अच्छाई और प्रेम का जीवन भरा जा सकता है। प्रेम में महान उत्पादक शक्ति है। इसका परिणाम प्रारम्भ में चाहे धीरे-धीरे हो किन्तु स्थायी होता है। यह प्रभाव जिस व्यक्ति से प्रेम या विश्वास किया जाता है, उसके हृदय और चरित्र में बैठ जाता है।”
बी-ग्रेग
*समाप्त*