अरमान

जल हूँ छलकूँगा जी भर, गागर की परवाह करूँ क्या ?

गागर फूट गई तो प्यासे अधरों पर ही रूक जाऊँगा ।

बन जाता है नीर भँवर का जिससे नहीं बहा जाता है ।

भय से प्रेरित होकर रूकना संयम नहीं कहा जाता है ।

स्वर हूँ मैं गूँजूगा जी भर, वंशी की परवाह करूँ क्या -

वंशी टूट गई तो वाणी के रन्ध्रों पर झुक जाऊँग ।

एकाकी को नहीं जरूरत जो मुझ को आवाज लगाए;

बस इतना काफी है जब-तब यह सूनेपन से घबराए;

मन हूँ मैं विचरूँगा घर-घर, तन की मैं परवाह करूँ क्या-

तन न रहेगा तो धरती का ऋण हूँ आखिर चुक जाऊँगा।

जिस में गंध अधिक होती है उसको पहले तोडा़ जाता;

जिस में रस ज्यादा होता है - उसको और निचोडा़ जाता;

सौरभ हूँ महकूँगा जी भर, उपवन की परवाह करूँ क्या-

उपवन रूठ गया तो सब के, दरवाजों से टकराऊँगा।

-रामावत्तार त्यागी


हम अपनी ही सेवा क्यों न करें ?

सेवा मानव- जीवन का एक आवश्यक अंग है। आत्म- सन्तोष उसी के आधार पर मिलता है। सेवा से रहित जीवन एक निकृष्ट कोटि का स्वार्थी और संकीर्ण जीवन है। उसमें न लोक सधता है न परलोक। जो तुच्छ भौतिक सुखों, तृष्णाओं और वासनाओं की पूर्ति में लगा रहता है उसे नर- पशु ही कहना चाहिए।अपने से पिछड़े हुओं को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने समान बनाने का प्रयत्न 'सेवा' कहा जाता है। हर व्यक्ति की एक मर्यादा है और वह उतनी ही सेवा कर सकता है। अपने से छोटे, समीपवर्ती, सम्बद्ध और विश्वरत लोग ही सेवा के पात्र हो सकते हैं। इस मर्यादा से बाहर सेवा कर सकना किसी के लिये भी सम्भव नहीं फिर चाहे वह कितना ही उदार और परोपकारी क्यों न हो। समस्त विश्व की सेवा करके सबको सुखी बनाने की भावना तो रखी जा सकती है पर सेवा का क्षेत्र सारे संसार को, समस्त मानव समाज को नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि वें हमारी सेवा- सीमा से बाहर होते ।मान लीजिए आप विश्व- सेवक है और अफ्रीका निवासियों के दु:ख दूर करना चाहते हैं, उन्हें अपनी सेवा का लाभ देने के इच्छुक हैं, पर वे आपसे इतनी दूर हैं, आपकी पहुँच से इतने बाहर हैं कि वहाँ तक पहुँचना, उनकी भाषा समझ सकना, उनके वातावरण में रह सकना, उनकी परिस्थिति को समझ सकना आपके लिए कठिन है, फिर आप किस प्रकार उनकी सेवा करेंगे ?मान लीजिए आप आज की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में अमुक प्रकार का परिवर्तन चाहते हैं। इसके लिये आपके कुछ विचार भी हैं। आप सरकार के कर्णधारों, राजनीतिज्ञों, नेताओं, अग्रणी पुरूषों से अपने विचारों के अनुसार कार्य कराना चाहते हैं। उनसे लिखित या मौखिक अनुरोध भी करते हैं, पर वे आपका, आपके विचारों का महत्त्व स्वीकार नहीं करते। आपकी इच्छा और सलाह को पागलपन मात्र मान कर उपेक्षा कर देते हैं। फिर अपना क्या वश रह जाता है ?? देश के उच्च साहित्यकार केवल युग निर्माण की रचनाएँ लिखें, कवि जागरण के गीत बनावें, अध्यापक प्राचीन जैसे आदर्श गुरू बन जावें, धार्मिक नेता ऋषियों जैसा जीवन यापन करें- आप इन आकांक्षाओं के लिए उन्हें प्रेरणा भी करते हैं पर वे लोग आपको तुच्छ समझकर इन बातों को उपहास में डाल देते हैं। अब आप क्या करेंगे ?आप चाहते हैं कि मुसलमान, सिख, नागा, द्रविड़, आदिवासी, अछूत, सभी लोग अपने को भारत माता की संतान और एक ही रक्त से अनुप्राणित एक ही वृत के डाली, पत्ते समझें और राष्ट्रीय एकता का परिचय दें। भाषा, सम्प्रदाय, जातिवाद की अपनी संकुचित वृत्ति को छोड़े। पर जिन वर्गों में आपका अधिक प्रवेश ही नहीं है जो आपको अपने से बाहर का, अपने स्वार्थों का विरोधी माने बैठे है, वे आपकी बात क्यों सुनेंगे, वे समझेंगे ये अपने हिंदूवाद की लाभ की बातें कर रहा है हमारा दुश्मन है। वह आपकी बात का तिरस्कार ही नहीं विरोध भी करेंगे, आप कैसे उन्हें समझा पावेंगे?कोई व्यक्ति आपको धूर्त, ढोंगी, चालाक, वाचाल, बेईमान, विरोधी मान बैठा है, आपके प्रति घृणा, ईर्ष्या, द्वेष के भाव उसके मन में भरे हुए है, तब आप उसे कैसी ही उत्तम सलाह क्यों न दें, कैसा ही हितकर मार्ग क्यों न बतावें, वह उस पर ध्यान ही नहीं देगा और इस शिक्षा में भी कोई चाल या छिपा हुआ रहस्य ढूँढ़ेगा और ऐसा सोचेगा कि मुझे किसी चाल में फँसाने के लिए ऐसी मीठी बातें बनायी जा रही है। आपका सारा प्रयत्न निष्फल चला जाएगा।कहने का तात्पर्य है कि अपने से अधिक ऊँची स्थिति के, दूरवर्ती, असम्बद्ध और अविश्वासी लोगों की कोई व्यक्ति चाहते हुए भी कुछ सेवा नहीं कर सकता। उसका क्षेत्र तो अपने से छोटे, पिछड़े हुए, समीपवर्ती- परिचित जाति धर्म, भाषा व्यवसाय, मित्रता रिश्तेदार आदि किन्हीं आधारों पर संबंधित तथा वे ही लोग हो सकते है जो उसे भला आदमी मानते है, उसे योग्य चरित्रवान और विश्वासी मानते है। हर सेवा परायण व्यक्ति का अपनी सेवा भावना जहाँ तहाँ बिखेरने की अपेक्षा इसी दायरे में सीमित करनी पड़ती है। आकस्मिक विपत्ति की बात दूसरी है, चोट, दुर्घटना, भूकंप, अग्निकांड आदि से पीड़ित व्यक्तियों की तात्कालिक सेवा के अचानक अवसर कभी भी आ सकते है। उनके लिए योजनाबद्ध सेवा वाली बात नहीं लागू होती है।संसार में अनेक प्रकार की व्याधि दिखाई देती है। लोग नाना प्रकार के शोक संतापों से व्यथित है। इनके दुःख मिटाने के लिए सहृदय के मन में करुणा उत्पन्न होनी चाहिए और उसके लिए उसे प्रयत्न और त्याग भी करना चाहिए। किंतु इससे पूर्व सेवा भावी को यह जानना भी होगा कि विश्वव्यापी शोक संतापों, व्याधि- व्याधियों और द्वेष क्लेशों का कारण है? कारण को जानने के बाद ही उसका उचित उपचार हो सकता है। निदान हो जाने पर ही रोग की सही हो सकती है।विश्वव्यापी समस्त दुःखों का कारण है अज्ञान और पाप, स्वार्थ और मोह, तृष्णा और वासना। इन महाव्याधियों को हटाये बिना, दुखों को दूर करने के समस्त प्रयत्न ऐसे ही है जैसे रक्त- विकार की फुंसियों पर मरहम लगाना। इससे व्याधि का समाधान नहीं होता। तात्कालिक कष्टों से तथा सामयिक अभावों से पीड़ित मनुष्यों की सहायता करना कर्तव्य है पर उतने मात्र से न तो मानव जाति के कष्ट दूर हो सकते है और न समस्याएँ सुलझ सकती है।धन देकर हुई सेवा सबसे साधारण मानी जाती है। उससे मनुष्यों की कुछ समस्याएँ थोड़ी देर के लिए सरल होती है। किसी को शरीर सुख पहुँचाकर की हुई सेवा भी कुछ समय तक ही दुःख दूर करती है। तन और धन की सेवा नहीं करनी चाहिए, यह प्रयोजन नहीं है, वह तो उदार हृदय व्यक्ति समय- समय पर करता ही रहेगा, उन्हें तो करनी ही चाहिए, पर किसी का जीवन क्रम जब तक न सुधरेगा तब तक इन तन और धन की सहायताओं से भी उसका काम न चलेगा। आज तो सर्वत्र अशान्ति क्लेश और पीड़ा का साम्राज्य छाया हुआ है उसका कारण धन या तन के सुखों की कमी नहीं है। ये तो समयानुसार दिन- दिन बढ़ते ही जाते है, फिर भी जो क्लेश बढ़ रहे है उसका कारण व्यक्ति और समाज का आंतरिक स्तर, चरित्र एवं आदतों का गिर जाना ही है। इसे उठाने की जो सेवा उसी से विश्वव्यापी समस्याएँ सुलझेंगी। अन्यथा कुआँ बनवाने या प्याऊ लगाने से, दवाखाने और धर्मशाला बनवाने से भी क्या काम चलने वाला है। जब लोगों का चरित्र चोरी, बेईमानी, झूठ, दगाबाजी, लूट, शोषण, अपहरण, विलासिता, फिजूलखर्ची, व्यसन व्यभिचार आदि अनैतिक दशाओं में और तेजी से अग्रसर हो रहा तो इन कुकृत्यों से जो दुष्परिणाम और दु:ख उत्पन्न होंगे उन्हें देखते हुए प्याऊ लगवाने, गौ को चारा डाल देने या चिड़ियों को चुगाने का पुण्य जलते तवे पर दो- चार बूँद पानी डालने के समान ही होगा।जैसे एक व्यभिचार अनेकों अपनी बुराई में सान लेता है, जैसे एक नशेबाज अपनी लत कई औरों को भी सिखा देता है उसी प्रकार एक भले गुण कर्म स्वभाव का व्यक्ति भी अपने प्रभाव से कुछ न कुछ व्यक्तियों को अवश्य ही अपने समान बना सकता है, सुधार सकता है। यदि उसका मनोबल और चरित्र उच्चकोटि का है तब तो उसका सूक्ष्म प्रभाव इतना प्रचण्ड भी हो सकता है कि असंख्यों व्यक्तियों को कुछ से कुछ बना दे। भगवान बुद्ध, महात्मा गाँधी आदि महापुरूषों ने अपने आत्मबल से कितने लोगों को क्या से क्या बना दिया यह उदाहरण हमारे सामने हैं। पूर्वकाल में भी, सारे संसार में यही प्रक्रिया काम करती रहा है। चरित्रवान और आत्मबल सम्पन्न लोगों ने अकेले ही विश्व को, मानव- जाति को ऊपर उठाने का इतना अधिक कार्य किया है जितना कि आत्मबल से रहित हजारों उपदेशक गला फाड़- फाड़ कर जीवन भर चिल्लाते रहने से भी नहीं कर सकते।यदि अपने पास गोली बारूद पर्याप्त हो, उत्कृष्ट हो तो अनेक शत्रुओं को मार गिराया जा सकता है। पर यदि लकड़ी की तलवार लेकर युद्ध के मोर्चे पर हुङ्कार मचावेंगे तो विजय की माला पहनने का लाभ नहीं मिलेगा। संसार के कष्टों को मिटाने के लिये जन समाज का नैतिक और मानसिक स्तर ऊँचा उठाना आवश्यक है। इस प्रकार की सेवा तभी हो सकती है जब अपनी निज की स्थिति भी वह सब कर सकने के लिये शक्तिशाली एवं उपयुक्त हो। पटरी से नीचे उतर कर नीचे गिरी हुई रेलगाड़ी के डिब्बों को उठाकर खड़ा करने के लिए मजबूत क्रेन मशीन की जरुरत पड़ती है। यदि वह क्रेन कमजोर हो, नकली हो, टूटी- फूटी हो, बेकार हो तो कितना ही प्रयत्न और प्रदर्शन करने पर भी गिरी हुई रेल के डिब्बे न उठेंगे। यही बात आज के व्यक्ति और समाज को ऊँचा उठाने के सम्बन्ध में है। उसे साधारण प्रचार के बल पर नहीं उठाया जा सकता ।। उसके लिए मजबूत क्रेन मशीन की ही आवश्यकता है। अपने आपको फौलादी निर्माण करके क्रेन की आवश्यकता स्वयं पूरी करेंगे तभी वह सभी सेवा की योग्यता होगी। इसी से विश्व का कल्याण और सच्ची मानव सेवा हो सकेगी।किसी बर्तन का एक भाग आग पर रखा जाय तो वह सारा बर्तन गरम हो जाता है और उसके भीतर रखी हुई चीजें पकने लगती हैं। आग केवल बर्तन के पेंदे को छूती थी पर गरमी केवल पेंदे तक ही सीमित न रही वरन सारे बर्तन में फैल गई। विश्व सेवा का आरम्भ हम अपने आपकी सेवा करके कर सकते हैं। व्यक्ति अकेला नहीं है। सारे समाज के साथ, सारे विश्व के साथ उसकी श्रृंखला जुड़ी हुई है। सुधार कार्य, सेवा कार्य किसी भी व्यक्ति से आरम्भ किया जाय उसका परिणाम निश्चित रूप से पूरे समाज पर होता है। यदि हम अपनी सेवा कर लें, अपने को सुधार लें तो सारी मनुष्य जाती की सेवा उससे हो सकती है।किसी को सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा देकर ही उसके कष्टों और चिन्ताओं का समाधान हो सकता है। यह कार्य उपदेशों से नहीं, अपना आदर्श उपस्थित करके ही किया जा सकना सम्भव है। हम अपने को सुधार कर न केवल अपनी समस्याओं को हल करते हैं वरन औरों के लिए आदर्श उपस्थित करके उनको ऐसी ठोस शिक्षा देते हैं जिससे ये भी हमारी तरह शान्ति प्राप्त कर सकें। सेवा का यही सच्चा मार्ग है। आत्म सुधार के आत्म सेवा के प्रयत्न में ही स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय है।


जीवन में अध्यात्मिकता को भी स्थान मिले

(श्री जयप्रकाश नारायण)

भारत की एक पुरानी सभ्यता रही है, एक ऊँची सभ्यता रही है। परिश्रम में आज भौतिक सुख के साधनों की जो प्रचुरता हम देख रहे है उसके मुकाबले भले ही हम पिछड़े हुए हों, लेकिन आज भी हम इस देश में दुनियाँ को सबक सिखाने वाले रामकृष्ण और अरविन्द जैसे महात्मा पैदा होते है।

ऐसी ऊँची सभ्यता के बावजूद भारत की आँखों में आज परिश्रम की भौतिक सभ्यता की चमक-दमक से चकाचौंध पैदा हो रही है और हम एक दोराहे पर खड़े है। हम यह निश्चय नहीं कर पा रहे है कि हमें किधर जाना है, किस दिशा में जाना है? एक तरफ हमारे सामने अमेरिका, यूरोप और रूस का रास्ता है। यह रूस भी हमारे लिए पश्चिम ही है। बुनियादी तौर पर अमेरिका, यूरोप और रूस की सभ्यताओं में कोई फर्क नहीं है। पूँजीवादी और साम्यवादी जीवन में वस्तुतः कोई भेद नहीं है। दोनों की संस्कृति, शुद्ध भौतिक संस्कृति है।

तो एक तरफ यह पश्चिम की भौतिक सभ्यता का रास्ता हमारे सामने है, दूसरी तरफ एक अपना रास्ता है- भारत की आध्यात्मिक सभ्यता का रास्ता, जिसके द्वारा हम जीवन का संतुलित विकास, जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों की प्रतिष्ठा और मानवीय तथा नैतिक मूल्यों की स्थापना कर सकते है। मनुष्य ‘मनुष्य’ कितना है, उसमें भावना कितनी है, इस मापदण्ड से जीवन का स्तर मानने वाली सभ्यता का वह रास्ता है।

आज ये दो रास्ते हमारे सामने है। यह दूसरी बात है कि हम पश्चिम के रास्ते पर कितनी दूर चल सकते है। हमारी परिस्थिति अमेरिका, यूरोप और रूस की परिस्थिति से भिन्न है। फिर भी हमारे प्रधानमंत्री नेहरू उन्हीं देशों से विशेषज्ञ बुला रहे हैं और नए भारत के निर्माण की योजना बनवा रहे हैं।

जो भूखे हैं, उनके लिए रोटी ही सब कुछ है। इसलिए सम्भव है, वे इसी रास्ते पर दौड़ेंगे। भारत में भूखे लोग ही अधिक है। हम मध्यम वर्ग वाले भी एक भूखी जमात है और इस देश में ऐसे भी लोग है जो किसी भी शर्त पर भौतिक उन्नति चाहते है। उनका विचार हैं कि जब हमारे भौतिक जीवन का स्तर ऊँचा उठ जाएगा, तब फिर आध्यात्मिक स्तर उठाने की चिंता हम करेंगे। यह एक घातक विचार है।

प्रतिकूल परिस्थिति में एक यह विचार भी यहाँ चल रहा है कि हम मानवता को ऊपर उठायेंगे, अपना आध्यात्मिक स्तर ऊँचा करेंगे, चाहे हमारा भौतिक स्तर नीचा ही क्यों न रहें। जो भूखे है, उन्हें भी हम समझाएँगे और रोटी के लिए अपना आध्यात्मिक स्तर नहीं गिरने देंगे। हमें एक नया समाज बनाना है, एक नयी सभ्यता का निर्माण करना है। हमें कृषि एवं उद्योग का भी विकास करना है। लेकिन हमारे समाजिक प्रयोग और सामाजिक प्रयास का मुख्य लक्ष्य हमारा आध्यात्मिक उत्कर्ष तथा एक मानवीय समाज, एक मानवीय सभ्यता का निर्माण करना ही रहेगा।

पश्चिम का रास्ता वस्तुओं के विकास का रास्ता है। यूरोप के लोगों की आकांक्षाएँ आज 'टेलीफोन' वाशिंग मशिन', और 'रेफ्रीजरेटर' जैसे भौतिक सुख के साधनों पर केन्द्रित है। इंगलैंड में अभी हाल में चुनाव लड़ा गया, उसमें कंजर्बेटिव पार्टी और लेबर पार्टी दोनों ने भौतिक वाद को खूब उछाला। कंजर्वेटिव पार्टी ने ज्यादा उछाला । उसने जनता की उपयुक्त आकांक्षाएँ पूरी करने का अश्वासन दिया और उसकी विजय हुई।

पश्चिम में भी इस भौतिकवादी प्रवृत्ति के विरूद्ध चिल्लाने वाले लोग हैं लेकिन उनकी संख्या बहुत थोड़ी है। वहाँ के जीवन की मुख्य धारा भौतिकवादी है। वहाँ के चिन्तन में आणविक अस्त्रों और क्षेपास्त्रों से भय अवश्य पैदा हुआ है। लोग यह समझने लगे कि लड़ाई होगी तो सर्वनाश होगा पर उनको यह विश्वास हो रहा है कि रूस और अमेरिका नहीं लड़ेंगे, यानी बड़ी लड़ाई नहीं होगी। छोटी लड़ाई हो सकती है लेकिन आणविक युद्ध नहीं होगा- इस विश्वास के बावजूद उसके जीवन मुख्य धारा आज भी भौतिकवादी है। वह यह नहीं समझते कि बड़ी या छोटी लड़ाई के बीज भौतिकवादी विचार में ही निहित है।

अब देखना यह है कि भारत की जनता क्या करती है क्या उसे अमेरिका और युरोप जैसा विकास चाहिए ? अगर उसके दिल की यही आवाज है तो उसे कोई दूसरी दिशा में नहीं लेजा सकता । भारत का निर्माण भारत की जनता को करना है, इसीलिए यह वही निश्चय करेगी कि वह किस दिशा में जाय।

हमें अपना पेट अवश्य भरना है और तन भी ढकना है, हमारी जो प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं उनकी पूर्ति अवश्य हो। रोटी कपड़े के अलावा साफ-सुथरा हवादार मकान भी हमें मिले, आलीशान इमारत न हो तो कोई बात नहीं। अगर इतना हो जाता है तो फिर बाकी ध्यान हम दूसरी तरफ, जीवन के विकास, चिन्तन, शोध, संस्कृति के विकास आदि में लगायें।

हमारे देश में हजारों वर्ष जीवन का चिन्तन हुआ फिर भी आज हम उलझन में पड़े हैं और निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि किस दिशा में कदम बढ़ायें। तो सर्व प्रथम भारत की जनता को यह निश्चय करना है कि वह किधर जाय, उसका क्या आदर्श हो। हमारे देश में जो चुने हुए लोग है, जो समाज का नेतृत्व करते हैं, उन पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। आज दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता जैसे नगरों में जो आदर्श वे स्थापित कर रहे हैं, जो शान-शौकन की जिन्दगी का नमूना वे पेश कर रहे हैं, वह हमारा आदर्श नहीं हो सकता।

उद्योगीकरण से सम्भव है, वह भौतिक शक्ति हमें न प्राप्त हो सके, जो आज अमेरिका और यूरोप को प्राप्त है। अगर हम यह निश्चय कर लेते हैं कि हमारी सभ्यता का अधार वस्तु नहीं, मनुष्य होगा, तो फिर हमें पाश्चात्य ढंग के उद्योगीकरण का मोह छोड़ना पड़ेगा और जिस मानवीय सभ्यता का हम निर्माण करना चाहते हैं, उसकी तरफ अपने ढंग से कदम बढ़ाना होगा।


विविधता में एकता का दर्शन

(श्री भीष्मलाल जवेरभाई देसाई)

मानव जीवन की तीन अवस्थायें है, अर्थात् तीन भूमिकाएँ हैं। इन तीनों में ही वह व्यक्तिगत अथवा एकदेशीय न होकर समष्टिगत है, बहुता के साथ मिलकर एक हैं। मानव जीवन को इस सार्वभौम सत्ता को अपनी संकीर्णता, क्षुद्रता से खण्ड-खण्ड करके देखना ही अज्ञान एवं अविवेक हैं। यही संसार में सारी कलह, अशान्ति एवं द्वेष की जड़ हैं। आज इस सत्य को भूल जाने के कारण ही विश्व पर विनाश के काले बादल मँडरा रहे हैं। मानव -जाति खण्ड-खण्ड होकर जाति, रंग वाद, पूर्व, पश्चिम, समाज, भाषा, प्रांतीयता आदि को लेकर परस्पर संघर्ष कर रही हैं। इसका एक मात्र कारण मानव की उस सार्वभौम सत्ता के प्रति आस्था न होना ही प्रमुख है और इन सबका हल भी एक मात्र इसी कमी को पूरा होने से होना सम्भव हैं। इस सब को अनुभूति प्राप्त करके दृश्य जगत में तदनुकूल आचरण करना ही आत्मज्ञान, साक्षात्कार, विराट दर्शन मुक्ति आदि है। अपने खण्ड माने हुए जीवन की भूमिका से उठकर उसे विश्वगत, सार्वभौम जीवन सत्ता से अपने आपको जोड़ देना ही सफल जीवन की प्रधान शर्त है।

मानव-जीवन की प्रथम अवस्था है पृथ्वी पर उसका निवास अर्थात् दृश्य जगत् से उसका सम्बन्ध। शीत प्रधान, उत्त्प्रत, बालू पूर्ण मरुभूमि, दुर्गम पहाड़ और समतल भूमि सभी जगह मनुष्य का निवास है। मनुष्य के लिए पृथ्वी का कोई भाग दुर्गम नहीं हैं। पृथ्वी माता ने अपने बच्चों को खेलने एवं सुखी-जीवन बिताने के लिए अपना वक्षस्थल ही खोलकर रख दिया है। इतना ही नहीं वह सभी तरह की सामग्री उत्सुक होकर लुटा रही हैं। वह उदार भाव से सबको ही धारण किए हुए हैं व्यक्ति अथवा समाज या जाति विशेष के लिए कोई प्रतिबन्ध अथवा छूट नहीं हैं। पृथ्वी पर निवास का अधिकार व्यक्तिगत नहीं, समष्टिगत हैं। अज्ञान से एवं संकीर्णता से मनुष्य पृथ्वी पर अपने सार्वभौमिक मानव-जीवन को खण्ड-खण्ड करके मानते है और साथ ही अपने वास-स्थान अलग अलग बना लेता है। अमेरिकनों का अमेरिका, रूसियों का रूस, भारतवासियों का भारत आदि भेद-विभेद पैदा कर लेता है। वह अपने जीवन को व्यक्तिगत मानव जीवन का अंग नहीं मानता और न यह सोचता है कि सभी मनुष्यों के साथ मेरा निवास पृथ्वी पर हैं, यही संकीर्णता का बन्धन हैं अल्पता हैं और दीन-हीनता हैं। यही दुखों का कारण हैं।

दूसरी अवस्था में मनुष्य का सम्बन्ध उस स्मृति लोक से है जहाँ उसने अतीतकाल से पूर्व पुरुषों के अनुभवों, अन्वेषणों से लाभ उठाकर विकास प्राप्त किया है, और काल का नीड़ तैयार किया है। यह नीड़ स्मृति द्वारा निर्मित और ग्रथित हैं। मनुष्य जाति ने जो विकास प्राप्त किया है वह समस्त मानव जाति की कमाई के परिणामस्वरूप ही हैं। यह किसी एक जाति अथवा समाज की चीज नहीं है। स्मृति लोक में समस्त मानव जाति का एकत्व निहित है, यह धरती एक देशीय एवं व्यष्टिगत नहीं वरन समष्टिगत हैं, विश्व- मानव की है। आज के विज्ञान युग के विकास की नींव में न मालूम कितने समय से असंख्यों का योग- दान रहा है।

मनुष्य की तीसरी अवस्था में वह आत्मलोक से सम्बन्धित हैं जिसका क्षेत्र उक्त दोनों अवस्थाओं से अधिक विस्तृत एवं व्यापक है, जहाँ मानव की विराट सत्ता एवं शक्ति निहित है। इसे सर्व मानव चित्त का महादेश भी कहा जा सकता है। समस्त मानव जाति के अंतर में यह आत्म- लोक स्थित है। इतना ही नहीं सम्पूर्ण चराचर जगत में एकमेव यही रस व्याप्त है। इस आत्म- तत्व में सभी चेतन समुदाय ''सूत्रे मणिगणाइव'' बँधा हुआ है। यह भी व्यक्तिगत एवं एकाकी नहीं वरन विश्वगत है। परिच्छत्र नहीं सर्वदेशीय है। एक देशीय नहीं।

बहुतों के बीच एकत्व होना ही सृष्टि का नियम है। प्रयोजनवश परस्पर पृथक होते हुए भी सारी सृष्टि, समष्टि, मानवता एक ही है। मनुष्य जाति के हिसाब से हम एक हैं जब हम व्यक्ति विशेष हैं तभी पृथक हैं। पुरुष होने पर स्त्री से भिन्न हैं, मनुष्य होने से अन्य जीव- जन्तुओं से अलग हैं किंतु प्राणी होने के नाते सभी स्त्री- पुरुष जीव- जन्तु प्राणिमात्र एक हैं। इसी प्रकार एक ही आत्मसत्ता में स्थित दृश्य जगत में पृथक-पृथक होते हुए भी मनुष्य का विराट विश्व के साथ एकत्व है। कृष्ण ने अर्जुन को, उसके व्यक्तिगत दृष्टिकोण एवं एकाकी, पृथक- मान्यताओं की विचार धारा को बदल कर इस विराट सत्ता की अनुभूति कराई थी, यही अर्जुन का भगवान के विराट स्वरूप का दर्शन करना था। इस आत्म- तत्व की अनुभूति प्राप्त करके जीवन में उतार लेना ही आत्म- दर्शन, साक्षात्कार मुक्ति आदि है। इस विश्वगत आत्म सत्ता, चेतन से सम्बन्ध स्थापित करके मनुष्य महामानव बन जाता है और उतना ही शक्तिशाली, विभु, महान बन जाता है। उस सर्व मानव चित्त के महादेश में पहुँच कर वह अपनी आत्मा का दर्शन करता है और कोटि- कोटि जन्मों से चली आ रही लम्बी जीवन- यात्रा से मंजिल पार करता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सम्पूर्ण मानव- जाति ही नहीं वरन सम्पूर्ण चराचर जगत ही एकत्वमय है। जीव- चेतना विकसित होकर ज्यों- ज्यों अपनी आत्म- स्थिति को उस विश्वगत, सर्व व्यापक, एक रम आत्म- चेतना में स्थित देखती है, स्वयं को उसी शृंखला की एक कड़ी अनुभव करती है। तभी वह विभु, परमात्मा बन जाती है। यही जीवन का रहस्य है।

विश्वगत अखण्ड गतिमान जीवन ही अपने आप में परम सत्य है। दु:ख द्वन्द, समस्यायें, कठिनाइयाँ इसलिए हैं कि हम वस्तु को जीवन को, उसकी समस्याओं को द्वन्दों में, खण्ड में देखते हैं ।। साथ ही उस खण्डता या उसके किसी अंश को मानकर ही समग्र मानव सत्य का मूल्यांकन करते हैं ।। किन्तु खण्ड के द्वारा, विविधता के माध्यम से समग्र का, परम सत्य का आंकलन सम्भव नहीं ।। जीवन को, इस जगत को, अपने सारे भयों, द्वन्दों क्रिया- कलापों को, समग्र जीवन, जो विश्वगत है उसके प्रकाश में देखने पर कुछ भी शेष नहीं रहता, क्योंकि समग्र ही, परम सत्य ही अपने आप में परिपूर्ण है। हर व्यक्ति की समस्या समग्र मानवता की समस्या है, हर मनुष्य का मन समग्र मानवता का मन है, इन सबका हल एक मात्र समष्टिगत मानवता, समग्र जीवन की अखण्ड अनुभूति और इस महासत्य के दर्शन में ही है। समग्र को पाते ही हमारा जीवन एक दम निर्द्वन्द्व, निर्विकल्प, शान्त हो जायगा ।।


अपने आप पर तो विश्वास कीजिए

(श्री जाह्नवी चरण उपाध्याय शास्त्री)

किसी कार्य की सिद्धि में विश्वास नहीं है तो असफलता भी सम्भावित नहीं होगी। इसलिए आरम्भ से पूर्व उसके हिताहित पर विचार कर जाना चाहिए। यदि विश्वास हो जाए की यह कार्य न्यायोचित है और किसी को हानि पहुँचाने वाला नहीं हैं तो उसके पूर्ण होने तक प्रयत्न करना चाहिए।

कार्य को आरम्भ कर देने पर अनेक विघ्न-बाधाएँ दिखाई पड़ती है। परन्तु विघ्नों से डर कर कार्य को अधूरा छोड़ना भीरु प्रकृति का परिचायक हैं। जो लोग कार्य को बीच में ही छोड़ देते हैं, उनके जीवन में निराशा बढ़ जाती हैं और वे फिर किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते।

कार्य करते समय यदि विचार उत्पन्न हो कि उसका फल उतना उत्तम नहीं होगा, जितना की पहले सोचा था और इसी भय से उसे मार्ग में ही छोड़ दिया जाए तो वह भी कोई बुद्धिमानी नहीं होगी। किसी भी कार्य का फल उत्तम, मध्यम और निम्न हो सकता हैं, परन्तु उसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। घोर परिश्रम के कारण कार्य का फल भी उत्तम हो सकता है और परिश्रम न करने की अवस्था में निम्नतम भी।

हमें कार्य करना चाहिए, उसके फल की कामना नहीं करनी चाहिए। ईश्वर ने हमें कर्म करने का ही अधिकार दिया है, फल तो स्वयं उसी हाथ में हैं। यदि मनुष्य के इच्छानुसार फल मिलने लगता तो दुःख, संताप, पश्चाताप और असफलता जैसे शब्द संसार में सुनाई ही नहीं पड़ते। तब न किसी को धन की चिंता रहती न ही मान सम्मान की। सभी कुछ मानवी इच्छा के बल पर प्राप्त हो जाता।

मनुष्य वह है जो बाधा रूपी चट्टानों को तोड़ कर गिरा देता है। संकटों से डर कर हट जाने से कभी कोई काम नहीं बनता। जिन कार्य के पूर्ण होने में बाधाएँ नहीं आती, वह कार्य भी कुछ उल्लेखनीय हो सकता है? कार्य तो वह है, जिसमें बाधाएँ आवें और कर्मवान वह है जो ऐसे ही काम को करें जिसमें बाधाएँ आ-आकर उसे सफलता के द्वार की ओर दृढ़ता से ढकेल दें। इसलिए बाधाओं का स्वागत करिये, वे आपको सफलता का रहस्य समझाएँगी

तुम जिस कार्य को कर रहे हो, वह यदि दूसरों की दृष्टि में तुच्छ भी हों तो तुम उसे उच्च समझने की चेष्टा करो। अपने मन में विश्वास बैठा लो कि वह कार्य तुच्छ नहीं हैं। छोटा कार्य करना कोई लज्जा का विषय नहीं है, यदि वह सच्चाई से किया जाए। लज्जा तो चोरी और व्यभिचार आदि दुष्कर्मों में होनी चाहिए। कार्य में कोई छोटाई नहीं है। पाश्चात्य देशों में तो छोटा-छोटा कार्य करने वाले भी आज कोषाधीश हो गए हैं।

विश्वास कीजिए कि अपने छोटे कार्य में भी सफल होने पर आपको अत्यन्त हर्ष होगा। अपने मन में उत्साह की मात्रा को बढ़ाते रहिये, अपने आत्मविश्वास को नहीं तोड़िए, आप अवश्य ही सफल होंगे।

कार्य की सफलता के लिए योग्यता तो होनी ही चाहिए उसके बिना आपका कार्य नहीं बन सकता, यदि आप योग्य नहीं है तो पहले योग्यता प्राप्त कीजिए, फिर उस कार्य में हाथ डालिए। अयोग्य व्यक्ति की सफलता अवश्य ही संदेहास्पद होती हैं।

मनुष्यों का स्वभाव है कि वे प्रत्येक कार्य में अपनी टाँग अड़ाना चाहते हैं। वे सत्पुरुषों के उत्कर्ष को भी नहीं देख सकते और निम्न व्यक्तियों की छोटी वृत्ति पर भी टीका टिप्पणी करना अपना कर्तव्य समझते है, परन्तु आप अपने विषय में दूसरों की सम्मति की कोई चिन्ता मत कीजिए, उसे सुनिये ही मत। केवल अपने कार्य में लगे रहिए। कोई आपके कार्य को पुरा बतावे तो उससे द्वेष मत मानिये और कोई अच्छा बतावे तो प्रशंसा से फूलिए मत, अन्यथा आपके मन में विकार उत्पन्न हो जायगा और अहंकार वृद्धि के कारण चलते हुए कार्य में शिथिलता आ जाएगी।

मनुष्य के गुणों का अनुमान उसके कार्यों की सफलता से ही नहीं लगाया जाता, बल्कि उसके कार्य का अदम्य उत्साह से ही पता चलता है। जो व्यक्ति कांटों पर चढ़ कर फल तोड़ता है, वह उससे अधिक साहसी है जो किसी वस्तु के सहारे से ही उसे तोड़ लेना चाहता है, अथवा कोई सहारा न मिले तो फल तोड़े बिना ही घर लौट जाता है। जो लोग निर्भय होकर कांटों पर चढ़े चले गए, उनकी प्रारम्भ में चाहे कितनी ही टीका टिप्पणी क्यों न हुई हो, सफल होने पर सभी ने प्रशंसा की। इस लोकोक्ति में कुछ असत्य नहीं है कि ''धैर्य का फल मीठा होता है।'

इसका यह अर्थ नहीं है कि ईश्वर पर विश्वास रखने वाले भक्तों को सफलता शीघ्र मिल जाती है, बल्कि जो व्यक्ति ईश्वर को सहायक मानता हुआ अपने लक्ष्य की ओर सपरिश्रम बढ़ता चला जाता है, वही उसमें सफलता प्राप्त करता है।

जो व्यक्ति अपने आत्म- बल पर भरोसा नहीं करते और साधनों को सर्वोपरि मानते हैं, वे संसार में कुछ कर सकेंगे इस पर विश्वास नहीं होता। साधनों का आश्रय हमारे उत्थान में बाधक है। जो व्यक्ति आत्म- विश्वासी होते हैं, वे जीवन- पथ में बढ़े चले जाते हैं, वे किसी का सहारा नहीं टटोलते।

सीता हरण के पश्चात यदि भगवान राम चाहते तो अयोध्या और मिथिला की सेनाएँ बुलवा सकते थे और तब खोज में भी इतना समय नहीं लगता और राक्षसराज भी शीघ्र वश में आ जाता ।। परन्तु राम को अपने बल पर भरोसा था, उनके हृदय में आत्म- विश्वास भरा था और उन्हें अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों पर पूर्ण भरोसा था, क्योंकि वे अत्यन्त वीर, चरित्रवान् और धैर्यवान् थे सच्चरित व्यक्तियों को बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं होती और यदि आवश्यकता होती भी है तो सहायता मिलने में कुछ कठिनाई नहीं होती।

जिन्हें अपने बल पर भरोसा है, उन्हें असफलता का सामान्य नहीं करना पड़ता। वे जब वह विश्वास कर लेते हैं कि अमुक कार्य होना ही है तो वह होकर ही रहता है। परन्तु यह विश्वास अपने मन पर निरन्तर अंकुश रखने से प्रकट होता है।

मन पर नियन्त्रण रखने से अपनी सोयी हुई शक्तियों का ज्ञान होने लगता है और तब यह अनुभव होता है कि अमुक कार्य हो सकेगा, अमुक नहीं हो सकेगा। यदि भाग्य के आधीन कार्यों को छोड़ दिया जाय तो कोई कार्य नहीं बन पाता ।। बहुत से विद्वानों का तो विश्वास है कि भाग्य हमारा निर्माता नहीं, हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं है। इसलिए उचित है कि हम अपनी शक्तियों को पहचान कर उन्हें कार्य रूप में परिणित करें।

हम किसी कार्य को दूसरों के बल पर करना चाहें तो यदि वह कार्य हो जाय, तो भी हमारे मन में आनन्द और स्फूर्ति का अनुभव नहीं हो पाता। वैसे किसी से सहायता लेना बुरी बात नहीं है, फिर भी अनेक कार्य ऐसे हैं जो दूसरों के द्वारा अपने मन के अनुसार नहीं हो पाते और कुछ कार्यों में दूसरे व्यक्ति उपेक्षा दिखा कर उन्हें बिगाड़ देते है।

इस सम्बन्ध में एक उदाहरण लीजिए -एक व्यक्ति को दूसरा व्यक्ति पीड़ित करता है। जो पीड़ित होता है वह स्वयं उसका सामना करने में समर्थ नहीं है तो वह किसी दूसरे की सहायता लेता है। दूसरा व्यक्ति सोचता है कि मैं क्यों व्यर्थ ही उससे शत्रुता लूँ अत: वह उसे टालता रहता है, तो बाह्य सहायता का यह रूप कितना भ्रमपूर्ण रहा?

यदि उसने आत्मबल से काम लिया होता तो पीड़ित को अवश्य झुकना पड़ता और उसे किसी प्रकार निराश नहीं होना पड़ता।

आत्म-शक्ति का उत्कर्ष होने पर मनुष्य में इतना बल आ जाता है कि वह संसार भर को हिला सकता है। दूसरे का मुख देखने वाले व्यक्तियों को पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति अपने भाग्य को दोष देते हुए निराश बैठे रहते हैं और वह अपमान, दुर्व्यवहार आदि के शिकार होते रहते है।

मनुष्य जब अपनी कार्य क्षमता को जानने लगता हैं, तभी उसमें आत्म-विश्वास की भावना जागृत होती हैं। जरा सोचिए कि तूँबे के सहारे तैरने वाला व्यक्ति कभी अच्छा तैराक हो सकता है? नकल करने वाला लेखक क्या सचमुच में लेखक हैं? यदि आत्म-बल नहीं हैं तो शक्ति होते हुए भी पर्वत की चोटी पर कैसे चढ़ेगा?

कुछ ऐसे अवसर आते है, जबकि अपने निर्णित कार्य को करते हुए उस पर पुनर्विचार करना होता हैं। ऐसा करना कोई बुरी बात नहीं है, क्योंकि शीघ्रता करने से भी कार्य बिगड़ जाते हैं? परन्तु बिना कारण किसी कार्य को लापरवाही में डाल देना और कार्य काल को व्यर्थ बढ़ाना भी हानिकारक सिद्ध होता है। कार्य के आरम्भ में दो बार, तीन बार भी सोचा जाए तो भी निर्णय शीघ्र करना चाहिए।

कभी-कभी किसी कार्य में सोचने-विचारने का अवसर ही नहीं मिलता और क्षणभर में ही जो कार्य-प्रणाली निश्चित हो जाय, उसी के अनुसार तुरंत कार्य करना होता है। ऐसे कार्य की बागडोर आत्मविश्वासी ही संभाल सकते है। न जाने कब, किस मनुष्य के सामने कोई ऐसी गम्भीर समस्या उत्पन्न हो जाय, इसलिए भलाई इसी में हैं कि हम अपने मन को नियन्त्रित और गम्भीर रखें।

आत्म-विश्वासी पुरुष शारीरिक कष्टों से नहीं डरते और वे कठिन कामों में जुट जाते हैं, यद्यपि यह आवश्यक नहीं कि उन्हें प्रत्येक कार्य में सफलता ही मिलती जाय, फिर भी विश्वास पूर्वक कार्यों में जुटे रहने पर वह सफल हो ही जाते हैं।

कुछ व्यक्तियों में विचार शक्ति तो होती ही हैं। परन्तु निर्णय करने के पश्चात् वह उसमें शंका करने लगते हैं। उस समय सही निर्णय न हो सकने से या तो कार्य का समय निकल जाता है अथवा बनता हुआ कार्य अपनी ही बहक के कारण नहीं बनता।

मनुष्य जीवन में प्रायः नवीन उलटफेरों की सम्भावना रही आती हैं। जब कोई कठिन विषय सामने आता हैं तो निर्बल विचार शक्ति वाले मनुष्य उनसे घबराते हैं, परन्तु जिन पुरुषों में आत्म-बल होता है, वे ऐसे अवसरों पर अधिक उत्साहित होते हैं क्योंकि वह किसी भी भीषण परिस्थिति से सामना करने को सदा कटिबद्ध रहते हैं।

संसार के सभी कार्यों में थोड़े-बहुत आत्म-बल की आवश्यकता होती ही हैं। परन्तु विवेकी पुरुष वही है जो छोटे कार्य को भी बड़े कार्य के समान सावधानी से करें। कभी-कभी असावधानी के फलस्वरूप छोटे काम भी बिगड़ जाते हैं। इस सम्बन्ध में किसी वकील को देखिये- उसे कानून की धाराएँ याद रहती हैं। फिर भी कभी-कभी ऐसे प्रश्न सामने आते हैं, जिनका उत्तर तत्काल देना होता हैं। उसमें उनकी स्मरण शक्ति जितना कार्य करती हैं, उससे अधिक कार्य आत्म-बल को करना होता हैं।

इसलिए कुतर्क का त्याग कीजिए, संशयों को छोड़िये और भगवान् श्री कृष्ण के वचन ‘संशयमा विनश्यति’ पर भले का ध्यान दीजिए। इससे आपके मनोबल की वृद्धि होगी, आपका आत्म-विश्वास सुदृढ़ होगा, आपका चरित्र उज्ज्वल होगा। फिर आपकी सफलता में कोई संदेह नहीं रहेगा।


लक्ष्मी कहाँ निवास करती हैं

एक बार इन्द्र कहीं जा रहे थे, उन्हें लक्ष्मी रास्ते में बैठी दिखाई दी। तब इन्द्र ने पूछा- लक्ष्मी, आजकल कहाँ रहती हो? लक्ष्मी ने कहा- आजकल का प्रश्न ही क्यों? मैं जहाँ रहती हूँ, वही रहती हूँ, मैं ऐसी भगोड़ी नहीं कि कभी कहीं और कभी कहीं रहूँ। तो हमेशा रहने की जगह पूछो तो बतला दूँ। इन्द्र ने मुस्करा कर कहा- यह तो और भी अच्छी बात हैं बतला दीजिए। तब लक्ष्मी ने कहा-

गुरवो यत्र पूज्यते वाणी यत्र सुसंकृता। अदन्त कलहो यज्ञ तत्र शक्र वासाम्यहम्॥

बड़ी सुन्दर बात कही हैं, बात क्या हैं संसार के लिए एक महान आदर्श हैं। वास्तव में लक्ष्मी ने अपनी ठीक जगह बतला दी हैं, लक्ष्मी कहती हैं-इन्द्र मैं वहाँ रहती हूँ, जहाँ और जिस परिवार एवं समाज में आपस में कलह नहीं हैं, मैं उन लोगों के पास रहती हूँ, जिनके दाँत नहीं बजते- जो दाँत नहीं मिसमिसाते, जो लोग प्रेमपूर्वक मिल जुलकर काम करते हैं, एक दूसरे को सहकारी बनकर लोग अपनी जीवन यात्रा करते हैं। जहाँ संगठन हैं और जो एक दूसरे के लिए अपनी स्वार्थ को न्यौछावर कर देने को तैयार रहते हैं और अपनी इच्छाओं को भी कुचलने के लिए तैयार रहते हैं, जहाँ प्रेम की जीवनदायिनी धाराएँ बहती रहती हैं, जहाँ कलह घृणा और द्वेष नहीं हैं, मैं उसी जगह रहती हूँ।”

लक्ष्मी के इस कथन में अनन्त काल के प्रश्न हल कर दिये गये हैं। बड़े- बड़े परिवारों को देखा वहाँ लक्ष्मी के ठाठ लगे रहते थे, किन्तु जब उन परिवारों में मन मुटाव आया, क्रोध की आग जलने लगी और बैर भाव पैदा हो गया, तो वह वैभव आनन्द आनन्द बना नहीं रहा, धीरे- धीरे वह क्षीण होने लगा और लक्ष्मी रूठ कर चल दी।


आहार-शुद्धि और आध्यात्मिकता

मानव देह के निर्माण, पोषण और वृद्धि का मुख्य आधार आहार है। यद्यपि वायु और जल भी मनुष्य के लिए अत्यावश्यक आहार हैं, पर चूँकि ये प्राय: अनायास या अल्प आयास से ही प्राप्त होते रहते हैं, इसलिए हम अन्न या अन्य खाद्य पदार्थ को ही आहार की संज्ञा देते हैं। मनुष्य जिस क्षण से पृथ्वी पर आता है तभी से उसे किसी न किसी रूप में आहार को आवश्यकता होती है, और जब तक उसकी देह पुन: पंचत्व में नहीं मिल जाती तब तक अपना अस्तित्व स्थिर रखने के लिए उसे आहार सम्बन्धी चिन्ता लगी रहती है। यदि विश्लेषण करके देखा जाय तो संसार में बहुसंख्यक व्यक्तियों के लिए तो भोजन था आहार ही जीवन का सर्वप्रधान उद्देश्य और कार्य है, वे इसी के लिये जीते और मरते हैं। आज सभ्य समाज में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जिनका ध्यान सदैव भोजन के प्रश्न पर ही केन्द्रित रहता है और जो सबेरे उठते ही यह हिसाब लगाया करते हैं कि आज किस समय क्या- क्या भोज्य सामग्रियाँ बनाई जायेंगी ? ऐसे भी असंख्यों लोग पाये जाते हैं जो भोजन के लिए अपने स्वास्थ्य, आरोग्य, पदवी, प्रतिष्ठ तक का बलिदान कर डालते हैं और केवल भोजन सम्बन्धी स्वाद के लिये प्राण उत्सर्ग कर देते हैं ।

पर यदि हम ऐसे 'पेटू' या 'स्वाद- प्रिय' लोगों की बात छोड़ भी दें तो संसार में कोई भी विद्वान, बुद्धिमान, विचारक, पण्डित, सन्त, महात्मा ऐसा नहीं मिलेगा, जिसको आहार की आवश्यकता न हो और जिसे इस संबंध में थोड़ी बहुत चिन्ता न करनी पड़ती हो। कारण यही है कि शरीर के अस्तित्व का आधार आहार ही है और इसी के द्वारा हमको वह शक्ति प्राप्त होती है जिससे हम जीवन के विविध व्यापारों को सम्पन्न कर सकते हैं। मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य अध्यात्मिक उन्नति बतलाया गया है और उसे प्राप्त करने के लिये मनुष्य को भौतिक जगत का ध्यान कम करके परमात्मा का ध्यान, भजन, साधना करने की आवश्यकता होती हैं। पर यदि आहार का अभाव हो जाय तो यह भजन और ध्यान दो- चार दिन भी नहीं हो सकता ।। इसी तथ्य को समझ कर कोई अनुभवी कह गया है- ''मुखे भजन न होय गुपाला, यह ले लो अपनी कण्ठी माला।''

आहार के इतना महत्त्वपूर्ण विषय होने पर भी; मानव- जीवन के साथ उसका ऐसा घनिष्ठ और अविच्छेद्य सम्बन्ध होने पर भी, हम देखते हैं कि उसकी उपयोगिता और महत्त्व पर लोग बहुत कम ध्यान देते हैं और उसका एकमात्र उद्देश्य और विधि यही समझते हैं कि किसी प्रकार रुचि के अनुकूल पदार्थों से पेट को भर लिया जाय ।। कुछ अधिक बुद्धिमान और समझदार हुये तो भोजन का निर्णय करते समय स्वास्थ्य का भी ध्यान रख लेते हैं और केवल जीभ के स्वाद को महत्त्व न देकर अपनी शारीरिक प्रकृति के अनुकूल पौष्टिक और सुपाच्य पदार्थों का चुनाव करते हैं पर इससे आगे बढ़कर इस बात पर विचार करने का कष्ट शायद लाख में से एक व्यक्ति भी नहीं उठाता कि शरीर के अतिरिक्त भोजन का हमारे मन से भी सम्बन्ध है और फिर उसका प्रभाव बुद्धि तक भी पहुँचता है। मन और बुद्धि ही मनुष्य की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रगति के मुख्य आधार हैं और जो मनुष्य इस क्षेत्र में अग्रसर होने की चेष्टा नहीं करता उसका मानव- जीवन ही व्यर्थ है। इसलिए जो व्यक्ति वास्तव में अपना कल्याण चाहता है और इस नर जन्म को सफल बनाने की इच्छा रखता हैं उसे आहार-शुद्धि पर अवश्य ध्यान देना चाहिए।

हम यह स्वीकार करते हैं कि हिन्दू समाज के एक वर्ग में आहार-शुद्धि का नियम अभी तक पाया जाता हैं। हमारे कितने ही प्राचीन प्रणाली के भाई चौक-चूल्हे के नियमों का बड़ी कट्टरता से पालन करते हैं और ऐसे भी लोग पाए जाते हैं जो बाहरी व्यक्ति का हाथ लग जाना तो दूर, उनकी छाया पड़ जाने से भोजन को अशुद्ध और त्याज्य मान लेते हैं। ऐसे व्यक्तियों और घरों की बातें भी हमने सुनी हैं जो भोजन के प्रत्येक पदार्थ को, यहाँ तक कि लकड़ी और कोयलों को भी धोकर ही चौके के भीतर ले जाते हैं। हम इन बातों की उपेक्षा नहीं करते और न इनके महत्व को न्यून करना चाहते हैं। भोजन की सामग्री को संग्रह करने और पकाने में सफाई और शुद्धता का जितना भी अधिक ख्याल रखा जाए उतना ही अच्छा हैं। पर इतना हम अवश्य कहेंगे कि यह सफाई वास्तविक होनी चाहिए केवल दिखावटी और नाम मात्र की नहीं। हमने देखा है कि लोग अपने चौके को किसी को भी छूने नहीं देते और लकड़ियों पर भी गंगा और जमना जल के छींटे मार देते हैं वे ही चौकी के भीतर ऐसा कपड़ा पहिन कर जाते हैं जो गंदगी की खान होता हैं। अथवा यदि उनके बर्तनों की परीक्षा की जाए तो उनकी किनारों तथा भीतरी भागों में महीनों पुरानी गंदगी मिल सकती हैं। उन बर्तनों को मुकाबला यदि किसी अंग्रेज के, जो खाने से धर्म और पाप पुण्य का सम्बन्ध नहीं जोड़ता, चीनी मिट्टी और काँच के चमचमाते बर्तनों से किया जाय तो हमको अपनी ‘शुद्धता’ पर कभी गर्व करने का अवसर नहीं मिल सकता हैं।

पर यह शुद्धता भी बाहरी ही हैं। अनपढ़ लोग भले ही चौका-चूल्हे में पाप-पुण्य समझा करें पर हमारे पूर्वजों ने इन नियमों को सफाई और स्वास्थ्य की दृष्टि से ही जारी किया है। यह सच है कि प्रत्येक मनुष्य के आचार और विचारों में एक प्रकार की शक्ति होती हैं जिसका प्रभाव आसपास के पदार्थों और वातावरण पर पड़ता हैं। कुछ लोगों के विचार तो स्वभावतः ऐसे प्रबल होते है कि उनकी दृष्टि जिस किसी वस्तु या पदार्थ, खास कर उत्तम भोज्य पदार्थ, सुंदर वस्त्राभूषण, आकर्षक बालक बालिका पर पड़ती हैं, वह उससे प्रभावित हो जाता हैं। यदि ऐसा व्यक्ति नीच और दुष्टायुक्त विचारों का हुआ तो उससे हानि होना भी अवश्यम्भावी होता हैं। हम पुराने विचारों के घरों में जो ‘नजर’ लगने की बात प्रायः सुना करते है उसका यही रहस्य हैं। इसलिए भोजन को बाहरी व्यक्तियों के संपर्क से पृथक् रखना और शुद्धता पूर्वक एकांत स्थान में ग्रहण करना किसी दृष्टि से बुरा या निरर्थक नहीं कहा जा सकता, बल्कि वह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभदायक ही हैं।

पर इस बाह्य शुद्धि की अपेक्षा भी आहार की आन्तरिक शुद्धि अधिक ध्यान देने योग्य हैं। बाह्य शुद्धि में कुछ त्रुटि होने से उसका स्वास्थ्य पर जो कुप्रभाव पड़ता हैं उसका निवारण आगे चलकर संयम, उपवास, औषधि द्वारा हो सकता हैं। पर हमारा आहार जिस स्त्रोत या साधन से हमको उपलब्ध होता हैं वही यदि अशुद्ध हैं-दूषित अथवा पापयुक्त हैं तो उसका जो बुरा प्रभाव मन, बुद्धि और आत्मा पर पड़ेगा उससे छुटकारा पा सकना वैसे सहज नहीं है। उदाहरणार्थ जो धन चोरी, डाका या किसी की हत्या करके लाया गया हो, उससे शारीरिक पुष्टि भले ही प्राप्त हो जाय, पर मन और आत्मा की तुष्टि उससे कभी भी नहीं हो सकती। आप इतने बड़े-बड़े डाकुओं और प्रसिद्ध चोरों का नाम सुनते हैं, वे लोग सदैव हजारों और लाखों रुपया प्राप्त करके मौज-मजा करते रहते हैं, पर उनमें से कभी कोई सुखी, शांत और संतुष्ट देखने में नहीं आया। वे चाहे पकड़े जायें और चाहे कानून के चंगुल से बच भी जायें पर उनका सुख, मौज- मजा क्षणस्थायी ही होता है। अपने मन में तो वे सदा तरह- तरह के अनुतापों और भयों का अनुभव करते ही रहते हैं, पर कुछ ही समय में उनको पापों का फल प्रत्यक्ष रूप से भोगते हुए भी देखा जा सकता है। यही बात अन्य व्यवसायों के विषय में भी कही जा सकती है।

लोग समझते हैं कि व्यापार, नौकरी, लेन- देन आदि में चालाकी से रुपया कमाने में कोई दोष नहीं हो सकता। पर हम बताना चाहते हैं कि बेईमानी और कपट का व्यवहार किसी भी रूप में और किसी भी क्षेत्र में क्यों न किया जाय वह बुरा ही है और उसका फल सदैव हानिकारक ही होगा। कौन कह सकता है कि आपकी जेब को काट कर सौ रुपया निकाल लेने वाला गिरहकट तो पापी है और विश्वास रखने वाले ग्राहकों को एक सेर 'शुद्ध' घी में पांव भर डालडा मिलाकर बेचने वाला और इस प्रकार प्रतिमास सौ दो सौ, या अधिक रुपया बेईमानी से कमाने वाला दुकानदार उससे अधिक पापी नहीं है ?? जो पुलिस वाला सौ रुपया के वेतन के अलावा दो- डेढ़ सौ रुपया मासिक अपराधियों को छोड़कर प्राप्त करता है, या जो अदालत का पेशकार या मजिस्ट्रेट मुकदमे वालों से हजारों रुपया रिश्वत लेकर झूठ को सच करते रहते हैं, निरपराधी व्यक्तियों को दण्डित करते हैं, क्या ऐसे भ्रष्टाचारी पापी नहीं हैं? आप कैसे आशा कर सकते हैं कि जो रुपया इस प्रकार लोगों पर अन्याय करके, उनकी आत्मा जो दुखी करके प्राप्त किया गया है, जिसमें अनेक लोगों की 'हाय' का असर समाया हुआ है, उसके द्वारा प्राप्त किया गया भोजन अपने शरीर, मन और आत्मा के लिये वैसा ही उपयोगी और दु:ख दायक सिद्ध होगा, जैसा कि दिन भर तन तोड़कर मजदूरी द्वारा अथवा ईमानदारी और परिश्रम के साथ नौकरी करके प्राप्त किया हुआ भोजन होता है ?? प्रकट में चाहे बेईमानी करने वाला व्यक्ति दूध- मलाई, हलुआ- पूरी खाय और ईमानदार व्यक्ति रोटी- दाल जैसे साधारण भोजन से ही पेट भर ले, पर दोनों प्रकार के व्यक्तियों के आन्तरिक जीवन पर दृष्टि डाली जायगी तो पहले की अपेक्षा दूसरे प्रकार का व्यक्ति अधिक सुखी और सन्तुष्ट प्रतीत होगा।

जिस आधार पर औसत उपायों द्वारा कमाये गये धन द्वारा प्राप्त भोजन त्याज्य माना गया हैं, वह बात मांस- भोजन आदि पर लागू होती है। जिस व्यक्ति को आत्म- जगत का कुछ ज्ञान है, वह भली प्रकार जानता है कि आध्यात्मिक दृष्टि से समस्त संसार में एक ही तत्व व्याप्त है और जीव- मात्र एक ही परमात्मा के अंश स्वरूप हैं। इस समय चाहे मनुष्य अधिक चैतन्य, ज्ञान और बुद्धि से युक्त जान पड़ता हो, पर भौतिक उपादान और आत्म- शक्ति की दृष्टि से उसमें उसके कारण और आर्त भाव अवश्य लिपटे रहेंगे और वे उसे भोजन के रूप में ग्रहण करने वालों की मानसिक स्थिति पर अवश्य विपरीत प्रभाव डालेंगे। जिन देशों के निवासी प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण विवश होकर माँस -मछली का भोजन करते हैं वे क्षम्य माने जा सकते हैं, पर यह निश्चित है कि वे आध्यात्मिक प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकते। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही यह भारत भूमि देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानी गई थी, क्योंकि यहाँ फल- मूल की अधिकता होने से आहार- शुद्धि अधिक सम्भव है, और आध्यात्मिक प्रगति के अन्य साधन भी सुलभ हैं।

आहार और आध्यात्मिकता का सम्बन्ध ऐसा अकाट्य है कि आत्म- कल्याण की कामना रखने वाले व्यक्ति को उसमें सदैव सावधान रहना आवश्यक है, आहार की बाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार का शुद्धि परमावश्यक है। बाह्य शुद्धि का तो बहुत कुछ सम्बन्ध मनुष्य के स्वास्थ्य से भी है इस लिए सभी समझदार आदमी न्यूनाधिक परिमाण में उसका ध्यान रखते हैं। पर आन्तरिक शुद्धि अथवा आहार को प्राप्त करने के लिये साधनों की शुद्धि सूक्ष्म विषय है और उसकी सचाई- झुठाई बाहर सिद्ध करने की अपेक्षा अपने मन में ही विचारने की बात है। हम चाहें अन्य लोगों के सामने अपने खोटे कामों का भी औचित्य तर्क द्वारा क्यों न सिद्ध कर दें, पर अपने मन और अंतरात्मा को हम धोखा नहीं दे सकते। भीतर ही भीतर हम अपनी कमजोरी घोर पाप का अनुभव करते ही रहते हैं। इस लिये यदि हम वास्तव में कल्याण के इच्छुक हैं तो हमको अपने आहार में सब प्रकार की शुद्धता का सदैव ध्यान रखना चाहिए। तभी हमारा मानव- जन्म सार्थक हो सकता है और तभी हम ईश्वरीय आदेश के पालन में समर्थ हो सकते हैं।


आप कितना मानसिक आघात सहन करते है

( डा. रामचन्द्र महेन्द्र, एम.ए.,पी.एच.डी.)

हमारे सामने मानसिक आघात से मृत्यु के दो उदाहरण हैं, जो बार-बार स्मृति में हरे हो आते हैं। हमारे एक विवाहित शिष्य की मृत्यु बड़ी रहस्यमय हुई। उनकी पत्नि बीमार हुई। तीन-चार बच्चों के पिता थे। यथेष्ट चिकित्सा के बाद भी स्त्री चल बसी। पति महाशय असीम हार्दिक वेदना में वशीभूत हो गए। लोग छाती फाड़-फाड़ कर चिल्लाते हैं, सिर पीट लेते हैं, डूब मरते हैं, उनके आँसू नहीं सूखते, पर इन महाशय ने ऐसा कोई रुदन स्पष्ट नहीं किया। पत्नि का दाह कर्म करके वे गुमसुम से हो गए। हम लोग गमी करने भी गए, फिर भी वे सुस्त-गुमसुम ही बैठे रहे, बाहर आना-जाना भी न हुआ। मित्रों के साथ भी उनका दिल हलका न हुआ। कई नए रिश्ते भी आए, मित्र दुबारा उनसे विवाह का आग्रह करते रहे। पर वह गुमसुम, निष्क्रिय! उनका चेहरा पीला पड़ता गया रक्त कम होता गया। और पत्नि की मृत्यु के कोई आठ दिन बाद, जब पत्नि की मृत्यु भोज की तैयारियाँ हो रही थी, हमने बड़े दुःख से उनकी मृत्यु का समाचार सुना। सन्न रह गये! वे पत्नि की मृत्यु से हुए मानसिक आघात को सहन नहीं कर पाए थे। प्रबल मानसिक आघात ने उनके अचेतन जगत् पर ऐसा हानिकारक प्रभाव डाला कि उन्हें निराशा और वेदना (मेलेन्कालिया) का रोग हो गया। उनका हँसना, उठना, बैठना, खाना-पीना और मिलना-जुलना सब कुछ जैसे बन्द हो गया था। नींद की तो भारी कमी हो गयी थी। रोने-पीटने से जो शोक की मात्रा कम हो जाती है, उसके अभाव में वह चल बसें।

मानसिक आघात से आत्म-हत्या

दूसरा उदाहरण एक नवीन आत्म-हत्या का है। एक चालीस वर्षीय गृह-पत्नि जिनकी कन्या एम. ए. के पास हैं, वस्त्रों में मिट्टी का तेल छिड़क आग लगा कर जल गई। सर्वत्र तहलका मच गया। पुलिस आई, मालूम हुआ कि उनके पति दफ्तर गए हुए थे और कन्याएँ स्कूल में थी। तहकीकात करने से मालूम हुआ कि यह बड़ी अमीर की पत्नि थी। प्रारम्भिक जीवन बड़े ऐश-आराम में व्यतीत हुआ था। दुर्भाग्य से पति को सट्टे की कुटेव लगी। उसमें सब कुछ धन हार गए और सेठ के यहाँ लगी हुई पुरानी नौकरी भी छूट गयी। गरीबी के अभाव पूर्ण दिन आ गए। पति पर भी भयंकर मानसिक आघात लगा, पर वे तो उसे किसी भी प्रकार सहन कर गए। उसकी पत्नि रह-रहकर अपनी पुरानी अमीरी और वैभव का जीवन याद किया करती थी और आठ-आठ आँसू बहाया करती थी। उन्हें बड़ी ही निराशा और पति के प्रति क्रोध की अनुभूति हुई। जीवन नीरस हो गया। चलना फिरना और बोलना-चालना बन्द सा हो गया। उनके दिमाग में तरह तरह के ऊल-जलूल विचार उत्पन्न होने लगे। वे अपनी नई गरीबी की बदली हुई परिस्थिति से समझौता नहीं कर पाई। पति-पत्नी की अनबन चलती रही। एक दिन पति की अनुपस्थिति में प्रबल आवेग के फलस्वरूप वे आत्म-हत्या कर बैठी। मूल में उनकी मृत्यु का कारण अपने मानसिक आपत्ति को सहन न कर पाना था।

मानसिक आघात सहन करने की शक्ति

हमारे जीवन में मानसिक आघात दिन रात आते रहते हैं। ये छोटे और बड़े सभी तरह के हो सकते हैं। प्रायः देखा जाता है कि कुछ व्यक्ति तो इसे आसानी से सह लेते हैं, पर दूसरे उन्हीं में पागल और निराश तक हो उठते हैं। अंधापन, पेट के रोग, पेचिश, दस्त और क्षय रोग आदि शारीरिक व्याधियों के शिकार हो जाते है, खाना- पीना सोना तक छोड़ देते हैं, जीर्ण सिरदर्द के रोगी हो जाते हैं, कभी- कभी हिस्टीरिया पागलपन मूर्छा के रोगी हो जाते हैं।

इन मानसिक आघातों को सहन करने की सबकी शक्ति अलग- अलग है। कभी- कभी देखा जाता है कि बड़ी उम्र के व्यक्ति छोटी- छोटी बातों पर मानसिक दु:ख का अनुभव करते हैं। उसी से परेशान हो उठते हैं। अपने जीवन को शून्य बना लेते हैं।

मनुष्य के गुप्त मन में जो मानसिक ग्रन्थियाँ होती हैं, उनके कारण अनेक घटनाओं का तो बहुत शीघ्र प्रभाव पड़ता है, जबकि दूसरों का मामूली- सा आघात को बढ़ाने या घटाने में महत्त्वपूर्ण कार्य करता रहता है। जब दु:ख और रोने- पीटने का वातावरण होता है, तो जिसके यहाँ गर्मी हुई है, उसका मानसिक आवेग बहुत बढ़ जाता है। साधारण चीजें को भी यह बहुत बढ़ा- चढ़ा कर महसूस करता है। हमारे यहाँ गमी मनाने और सहानुभूति प्रदर्शित करने जो व्यक्ति आते हैं, गमगीन व्यक्ति के गुप्त मानसिक घावों को कुरेद कर वास्तव में दु:ख पहुँचाते हैं। वेदना को बहुत बढ़ा देते हैं। इस प्रकार अनजान में ही वे आपके भागी बनते हैं और रोगी के अनेक गुप्त मनोजनित रोगों को बढ़ा देते हैं। बेचारा रोगी इन देखने वालों के गुप्त संकेतों पर निर्भर रहता है। वे क्षुद्र बातें ही चुपचाप उस पर अधिकार कर लेती हैं। निर्बल मन पर इन अनर्थकारी संकेतों का दूषित प्रभाव पड़ता रहता है। जब मानसिक भार बहुत एकत्रित हो जाता है, तो यह किसी भयंकर मानसिक रोग के रूप में फूट पड़ता है। यह मन की अधोगामी अवस्था का सूचक है।

मानसिक आघात लगने पर साधारण मन वाले या दुर्बल इच्छा शक्ति वाले आदमी निराशा, शोक घबराहट, क्रोध, कायरता, भय या चिन्ता आदि के विषादात्मक आवेशों से ग्रस्त हो जाते हैं। यह भी मनुष्य की एक कमजोरी है। इस उद्वेग में फँसकर मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है, और वह अनिष्टकारी अशुभ परिस्थितियाँ स्वयं पैदा कर लेता है।

एक विद्वान का कथन है कि विषादोद्वेगों वह क्षेत्र बहुत बड़ा है। अधिकांश मनुष्यों को काल्पनिक विवाद ही घेरे रहते हैं और वे उनके कारण निरन्तर परेशान रहते हैं। चिन्ता -भय, शोक, घबराहट, बेचैनी, अस्थिरता, निराशा, आशंका, हीनता, कायरता आदि के विषादात्मक विचार जब किसी के मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं, तो वह एक प्रकार से आधा पागल हो उठता है। उसे सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें, क्या न करे ?? धैर्य, साहस, विवेक इन चारों बातों से वह हाथ धो बैठता है। यह मानसिक स्थिति स्वयं इतनी खतरनाक है कि बाहरी घटनाएँ और परिस्थितियाँ जितनी हानि पहुँचा सकती हैं, उनकी अपेक्षा अनेक गुना अनिष्ट इस आन्तरिक उद्विग्नता से हो जाता है। शोक की अधिकता से नेत्रों की ज्योति कम होकर गठिया, बहुमूत्र, पथरी रोग तक होते देखे गए हैं ।। पागलपन के तो सैकड़ों केस देखे जाते है।

मानसिक आघात एक तूफान की तरह आता है। जोर की आँधी आने पर जिस तरह साधारण पेड़ पौधे घास या मामूली घर टूट- फूट जाते हैं, घरों की छतें उड़ जाती हैं, उसी प्रकार विषाद की अवस्था में सैकड़ों अपना विवेक त्याग कर अर्द्ध- विक्षिप्त से बन जाते हैं। इसका कारण मन की कमजोरी है।

आघातों को सहन करने की शक्ति बढ़ाइये-

यह संसार कठोरताओं और कटुताओं की पाठ- शाला है। यहाँ पग- पग पर विरोध और विपत्ति से जूझना पड़ता है; पाशविक वृत्तियों से निपटना पड़ता है। न जाने किस- किस रूप में हमारे शत्रु भरे पड़े हैं, न जाने कितने प्रकार की हानियाँ (( धन, जन, यश, प्रतिष्ठा आदि) सहन करनी पड़ती हैं। साँसारिक जीवन में प्रतिदिन हम अनेक प्रकार के क्लेशों से पीड़ित रहते हैं।

परन्तु फिर भी धैर्य और साहस से नब्बे प्रतिशत कठिनाइयाँ हल हो सकती है। मन बड़ दगाबाज है। ढीला छोड़ने पर निर्बल बनता है, शरीर को निर्जीव-सा कर देता है किन्तु यदि तना हुआ अपने वश में रखा जाए, साहस, धैर्य, प्रयत्न और पुरुषार्थ से परिपूर्ण रखा जाए, तो यही मन हमारी बड़ी सहायता करता है। आघात को सहन करने की अद्भुत ताकत भी उत्पन्न कर देता है। अतः आपको जब यह लगे की आप मानसिक आघात के पंजे में आ रहे है, तो तुरंत सावधान हो जाइए। मन का ढीलापन दूर कीजिए और अपने पुरुषार्थ को तीव्रता से उद्दीप्त कीजिए।

आप मन में यह सोचिए कि “ जो उत्पत्ति यकायक मुझ पर आ गई है, मैं उस से पराजित या परास्त नहीं हूंगा। एक खिलाड़ी की तरह खेल खेलूँगा। हार गया तो कोई परवाह नहीं करूँगा मैं जानता हूँ की आपत्तियाँ इसी प्रकार आती रहती है, किंतु मुझ जैसे पुरुषार्थी उनके सामने विचलित नहीं होते हैं। मैं कायर नहीं हूँ मैं साहसी हूँ, वीर हूँ। पुरुषार्थी हूँ। इस मानसिक आघात का मुझ पर कोई भी दूषित या हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ सकता। मैं तो कर्म मार्गी हूँ। कर्म करना मेरे हाथ में हैं, हार-जीत ईश्वराधीन है। अतः मैं प्रत्येक स्थिति में आनन्द का अनुभव करता हूँ और कड़ुवा और मीठा जैसा भी होता है, रस लेता हूँ।”

गुप्त मन को मजबूत कीजिए-

शरीर में नाना दुःखों एवं कमजोरियों की प्रतीति हमें अपनी गुप्त मन की सूक्ष्म क्रियाओं और उनकी छिपी हुई प्रतिक्रियाओं से होती है। अस्थिर और कमजोर मन वाला व्यक्ति पीड़ा से कान्त हो उठता है, दूसरा मन वाला व्यक्ति उसी कठिनाई को साधारण से झटके की तरह सहन कर लेता है। श्री रामचन्द्र के वन गमन पर दुर्बल हृदय महाराज दशरथ पुत्र-वियोग में ही मृत्यु को प्राप्त हुए थे, पर दृढ़ हृदय कौशल्या ने उसी पुत्र-वियोग को और चौदह वर्ष के लम्बे युग को सहन कर लिया था। कौशल्या जी निश्चय ही दृढ़ और सहनशील मन वाली वीर रमणी थी। कुछ व्यक्ति कड़वी औषधि शरबत की तरह गट-गट पी जाते है, तो कमजोर मन वाले उसी कुनैन को पीकर घण्टों उल्टा सीधा मुँह बनाया करते है। कुछ दुर्बल हृदय शहरी स्त्रियाँ प्रसव की काल्पनिक पीड़ा से भयभीत होकर सोच ही सोच में दुर्बल हो जाती है, दूसरी ओर दृढ़ मन वाली ग्रामीण स्त्रियाँ खेतों पर परिश्रम करते-करते प्रसव करती है और स्वस्थ रहती है। कुछ सर्दियों में ठण्डे पानी से स्नान करते है, तो कुछ ऐसे डरते है जैसे प्रत्यक्ष काल हो गया हो। इसका कारण मन की दृढ़ता या कमजोरी है।

आप मन में जिस दुःख को जैसा मान लें, वैसी ही कठिनाई एवं आन्तरिक दुःख का बोध होता है। सुख दुःख तो आपके मन की दो स्थितियाँ मात्र है। आप जिस स्थिति को मन में देर तक रखना चाहे, अपने दृढ़ आग्रह से रख सकते है। मन के क्लेश का निर्माण स्वयं आपके मन के गलत प्रयोग द्वारा ही होता है।

यदि आप मान लें कि अमुक बात से हमें बहुत कष्ट होगा, तो निश्चय ही उससे आपको बहुत कष्ट मालूम होगा। यदि हम मानें कि ऐसे-ऐसे कष्टों का हमारे ऊपर कोई असर नहीं होगा” तो निश्चय जानिए आप अनेक मानसिक आघातों को सहज ही सहन कर जायेंगे। अपने मन को मजबूत बनाने के लिए सदा दृढ़ मानसिक संकेत देते रहे।

उच्च स्वर से कहे, “ मैं वीर और साहसी हूँ। ईश्वरीय शक्ति से युक्त हूँ। साधारण झटकों को मेरे ऊपर कोई दूषित प्रभाव नहीं पड़ता। मुझे अनुभव हो चुका है कि मुझ से इन मानसिक आघातों को सहन करने की आत्म -शक्ति है। मैं अपने मन को इन तूफानों से विचलित नहीं होने देता। मैं शुद्ध हूँ। तेजस्वी हूँ। आनन्दमय हूँ। परम प्रकाशवान आत्म स्वरूप हूँ।'' इन संकेतों में विश्वास करें।

स्मरण रखिए, आपकी सहनशक्ति स्वयं आपके मन के भीतर है। कहीं बाहर नहीं है। जितनी दृढ़ता मन में आती जायगी। मन की सहन- शीलता के अनुपात में ही शरीर कमजोर या मजबूत बनता है। सारे दु:ख मानसिक हैं। मन का बल ही हमें धैर्यवान या अधीर बनाने वाला है। जहाँ मन सबल है, वहाँ मनुष्य मानसिक आघातों का भी स्वामी है।

जब कभी आपको मानसिक आघात हो, तो कुछ शारीरिक कार्य करें; टहलने जायँ; स्थान परिवर्तन करें; मित्रों के साथ गपशप करें, ठण्डे जल ने स्नान करें; संगीत या भजनों का गान करें। आपके घर में यदि बच्चे हों तो उनसे खेलें या कोई घरेलू कार्य ही करें। अनेक महापुरुषों ने बागवानी द्वारा अपने मानसिक आघातों को सहन किया है। स्मरण रखिए-

''मात्र तिष्ठ: पराङ मना:'' -अर्थर्ववेद ८।१।९ शिथिलता और अनुत्साह ठीक नहीं है। अकर्मण्यता और निराशा एक प्रकार की नास्तिकता है।


नेता नहीं, नागरिक चाहिए

(श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’)

सन् उन्नीस सौ बीस-इक्कीस के जमाने में एक विज्ञापन पढ़ था, “ क्या आप स्वराज्य चाहते है? तो लेक्चर देना सीखिये।”

इश्तहार छपवाने वाला कोई पुस्तक विक्रेता था, जो इस विज्ञापन के जरिये अपनी किसी किताब की बिक्री बताना चाहता था और गालिबन, किताब से नेताओं के भाषणों का ही संकलन भी थे।

तब से इस देश में व्याख्यानों की भी ऐसी झड़ी रही है जैसी झड़ी अब मेघ की भी नहीं लगती है। पिछले वर्षों में अपने देश में व्याख्यान लगातार बरसते रहे है और वृष्टि करने वाले नेताओं की तादाद भी बेशुमार रही है। आजादी के लड़ाई के दिनों में देश के सामने ले देकर एक ही सवाल था कि विदेशी शासन कैसे हटा जाए। मगर, यह सवाल जरा टेढ़ा पड़ता था, क्योंकि हुकूमत से लड़ने का अर्थ अपनी जान और माल पर संकट को निमंत्रण देना था। इसलिए, जो लोग भी अपनी थोड़ी या बहुत कुरबानी देने को आगे आये, उन्हें जनता ने नेता कह कर पुकारा। जनता के पास और था ही क्या जिसे लेकर वह कुरबानी की इज्जत करती।

नेताओं से भरा देश

लेकिन आजादी के बाद जब देश के सारे काम नेताओं के हाथ में आ गये तब उन्हें पता चला कि अभी तक इस देश ने नेता ही पैदा किये है, नागरिक नहीं। व्याख्यान सुनते-सुनते इस देश ने व्याख्यान देने की आदत सी डाल ली है। जहाँ तक व्याख्यान के मजमून पर अमल करने का सवाल है, वह परिपाटी स्वतन्त्रता के आगमन के साथ ही समाप्त हो गई। अब यहाँ के लोग कर्म को कम, वाणी को अधिक महत्व देते है। हर किसी की यही अभिलाषा है कि वह दूसरों को कुछ उपदेश दे, मगर खुद किसी भी उपदेश पर अमल करने को वह तैयार नहीं है। यों, देश के नवनिर्माण के ज्यादा काम ठप पड़े है, क्योंकि जो सचमुच, देश के नेता है वे काम नहीं करना जानते और जो काम करना जानते है उन्हें हाथ व पाँव हिलाने की अपेक्षा जीभ की कैंची चलाने में ही अधिक आनन्द आता है। नेता बनने की धुन का यह पहला असर है जिसे हिन्दुस्तान आज बुरी तरह भोग रहा है।

फिर भी यह सच है कि देश के नेता, देश के शिक्षा विशेषज्ञ और बच्चों के माता पिता, सभी चाहते है कि स्कूलों और कालेजों में पढ़ने वाले हमारे सभी बच्चे और नौजवान किसी न किसी क्षेत्र में नेता बनने की तैयारी करें। लेकिन क्या किसी ने यह भी कभी सोचा है कि अगर सारा समाज नेता बनने की तैयारी में लग गया तो नेताओं की पीछे चलने वाले लोग कौन रह जायेंगे? और क्या नेताओं से भरा हुआ देश कोई अच्छा देश होता है?

कल्पना कीजिए कि देश का एक एक आदमी जवाहरलाल हो गया है। तो फिर यहाँ का एक-एक आदमी सोचेगा, योजना बनाएगा और बहस करेगा। लेकिन, तब इन चालीस करोड़ जवाहरलालों को भोजन कौन देगा? उनके लिए कपड़े कौन बुनेगा? और मुश्किल तो यह है कि उनकी मोटरें कौन चलाएगा। जवाहरलाल बनने में और तो सब ठीक है, कठिनाई सिर्फ इतनी है कि जवाहरलाल कुदाल नहीं चला सकता, हथौड़ा नहीं उठा सकता और ज्यादातर वह अपनी मोटर भी आप नहीं हाँकता है।

“बड़ों की बात सुनो, उनकी नकल मत करे। यह कहावत किसी भारी अकलमन्द ने कही होगी लेकिन अब तो बड़ा और छोटा, यह भेद सुनते ही लोगों को गुस्सा आ जाता है। जिस जमाने का एक ही नारा हो कि सब लोग समान हैं, बस जमाने में एक या दस को बड़ा और बाकी को छोटा बताना तङग-नजरी नहीं तो और क्या है? हर आदमी सिर्फ बराबरी के असूल पर आगे बढ़ने को बेकरार है। नतीजा यह है कि जो जहाँ है, वहीं कुढ़ रहा है, वह वहीं जल रहा है।

छलाँग मारने की मनोवृत्ति

''सब लोग आपस में बराबर हैं'' इस बात का लोगों ने गलत अर्थ लिया है। इस सूक्ति का मामूली अर्थ यह है कि सबको विकास का समान अवसर मिलना चाहिये, यह नहीं कि अवसर की प्रतीक्षा किये बिना, चाहे जहाँ इच्छा मात्र से पहुँच जाय। अवसर कोई ऐसी चीज नहीं है जो रोटी दाल की तरह सबके सामने परोसी जा सके। उसे पाने के लिए भी अपने गुणों का विकास करना होता है, तत्परता, मुस्तैदी और वीरता भी सीखनी होती है, और उम्र तथा तजुर्बों का भी इन्तजार करना पड़ता है। मगर नेतागिरी का चस्का लग जाने के कारण लोगों की इन्तजारी की लियाकत घट गई है और जिस जगह पर आदमी धीरे- धीरे और बड़ी कोशिशों के बाद पहुँचता है, उस जगह पर अब लोग छलाँग मार पहुँच जाना चाहते हैं।

मगर लोग जो छलांग मार कर आगे बढ़ना चाहते हैं, उसका कारण क्या है ? कुछ तो यह कि कभी- कभी दूसरों को उन्होंने छलांग मारकर आगे बढ़ते देखा है और ज्यादातर यह कि वे काम करना नहीं हुक्म चलाना चाहते हैं।

योजना बनाने और आदेश भेजने की सही जिम्मेदारी को वही निभा सकता है जो इन सभी कामों के तजुर्बे हासिल कर आराम की जगह पर पहुँचने के लिये बेचैनी ही इस बात का सबूत है कि यह अपने संगठन का अच्छा नेता नहीं बन सकता। जिसके चरित्र में धीरता नहीं, उससे बड़े दायित्व को योग्यता पूर्वक निबाहने की आशा नहीं की जा सकती। चूँकि कुछ अधीर लोग भी संगठनों के नेता बन गये हैं। इससे अधीरता नेतृत्व का गुण नहीं बन जाती ।। उल्टे इन तथाकथित नेताओं के आचरण से यही शिक्षा निकलती है कि जो समय से पूर्व नेता बन जाने को बेचैन है, उसे नेता की जगह पर कमी मत आने दो।

नेतागिरी का लोभ एक दूसरी दृष्टि से भी मनुष्य को पवित्र बनाता है। जीवन की विशाल कर्मभूमि की ओर जरा नजर दौड़ाइये। सारा संसार नेतृत्व की अभिलाषा का शिकार हो रहा है। जो व्यापार में हैं, वे मुनाफाखोरी और घोरबाजारी करके धन में सबसे आगे निकल जाना चाहते हैं, जो नौकरी में हैं, अपने ऊपर वाले अफसर को ढकेल कर आगे आने को बेचैन हैं और जो सामाजिक या राजनैतिक क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, वे भी ऊपर के नेताओं को हटा कर खुद उनकी जगह ले जाना चाहते हैं। भाषण गर्जन, तिकड़म और छद्म झूठे वादे और धोखे की कसम से सारा सार्वजनिक जीवन कोलाहल से पूर्ण है। ये सबके सब नेतृत्व की अभिलाषा के दोष है। जब मनुष्य यह ठान लेता है कि अपने क्षेत्र में मुझे सबसे आगे बढ़ना है, तब साध्य का आकर्षण उसके भीतर प्रबल हो उठता है और साधन की महत्ता गौण हो जाती है। साधन की महिमा समझने वाला आदमी गलत राह से चलकर आगे आना नहीं चाहेगा, और नेतृत्व का लोभ साधन की महिमा को कम करता है, इसमें संदेह नहीं।

अपनी रेखा को बड़ी करने के बदले, दूसरे की रेखा को छोटी बनाने की कुत्सित भावना भी नेतृत्व की आकांक्षा से जन्म लेती है। प्रतिद्वन्दिता की भावना मनुष्य के स्वभाव में दाखिल है, क्योंकि यह हमारी पशु या जीवधारी प्रवृत्ति से निकलती है। लेकिन, पशुओं के समान मनुष्य में केवल जीवन की ही प्रवृत्ति नहीं होती, दिमाग का मालिक होने के कारण वह सोच भी सकता है और हृदय तथा आत्मा रखने के कारण वह अपने विचार को निर्मल भी बना सकता है। क्या उसे इसका ज्ञान नहीं हो सकता कि केवल पशु-प्रवृत्ति के समीप होता जा रहा है? जो भी मनुष्य मानवीय आनन्द में वृद्धि करना चाहता है, उसे चाहिए कि वह मनुष्यों में जो गुण है उनकी प्रशंसा में वृद्धि करे और जहाँ भी ईर्ष्या और द्वेष की लपटें उठ रही हैं उन लपटों को नीचे लाये। व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है, यह न तो अस्वाभाविक है, और न निन्दनीय। सिर्फ उसे यह देखते चलना है कि खुद को आगे बढ़ाने की कोशिश में कहीं वह उन मूल्यों को तो नहीं कुचल रहा है जो एक मनुष्य के वैयक्तिक विकास से कई गुना अधिक मूल्यवान है।

व्यक्ति का सुधार सर्वप्रथम

लोगों के भीतर दिन रात नेतृत्व की आकांक्षा जगाते फिरना खतरनाक काम है और नेता बनने की कोशिश में लगे रहने से हर आदमी नेता बन भी नहीं सकता। बात कड़वी हो या मीठी, लेकिन आदमी वहीं तक जाता है, जहाँ तक जाने की उसमें मौलिक शक्ति होती है। ऐसा भी हुआ है कि इस नियम को तोड़कर लोग नेता के पद पर जा पहुँचे हैं। लेकिन ऐसे अपवादों के नतीजे अच्छे नहीं हुए, क्योंकि या तो वे बहुत जल्दी लुढ़क कर नीचे आ गये अथवा उनका नेता बना रहना इंसानियत के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ है।

समाज का असली सुधार उसमें रहने वाले व्यक्ति का सुधार है। व्यक्तियों के ही बुरे या भले होने से हम समाज को बुरा या भला कहते हैं। मुख्य बात यह नहीं कि हम दूसरों को सुधारने का उपदेश दें, बल्कि यह कि सुधार की जो भी बातें हमारे मन में उठती हो, पहले हम उन्हें अपने चरित्र और स्वभाव पर लागू करे समाज की सुन्दरता दो चार नेताओं पर नहीं बल्कि वहाँ के व्यक्तियों के सुधार पर निर्भर करती है और नेता होता कौन है? अक्सर वह मनुष्य जो उन मूल्यों को अपने चरित्र और व्यक्तित्व में व्यावहारिक रूप देता है जिन मूल्यों की समाज को जरूरत होती है। सभ्यता के मूल्य में परिवर्तन करने वाले लोग पहले उन मूल्यों को स्वयं बरतते है। और जो ऐसा नहीं करते उन्हें समाज का हार्दिक सम्मान भी प्राप्त नहीं होता है। इसलिए वाजिब यही है कि समाज की जिन कुरीतियों से हमारी नाराजी है, उन्हें सबसे पहले हम छोड़ दे और जिन मूल्यों को हम समाज में लाना चाहते हैं उन्हें भी अपने वैयक्तिक जीवन में सबसे पहले हम ही बरतना शुरू करे समाज को योग्य नागरिकों की जरूरत है, नेताओं की नहीं।

वाणी का संयम

व्यास जो बोलते गये और गणेश जी लिखते गये। इस प्रकार जब महाभारत पूरा हो गया तो व्यास जी ने गणेश जी से कहा-मैंने चौबीस लाख शब्द बोले पर आप उस समय से सर्वथा मौन रहे। एक शब्द भी न कहा। गणेश जी ने कहा-बादरायण सभी प्राणियों में सीमित प्राण शक्ति है। जो उसे संयम पूर्वक व्यय करते हैं वे ही उसका समुचित लाभ उठा पाते हैं। संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है और संयम की प्रथम सीढ़ी है-वाचोमुक्ति अर्थात् वाणी का संयम।

खाली पात्र

दो मिट्टी के बर्तन आँगन में रखे थे। एक का मुँह ऊपर था दूसरे का नीचे। वर्षा हुई। जिसका मुँह ऊपर था वह बर्तन पानी से भर गया। जिसका नीचे था वह खाली रह गया। खाली पात्र साथी को भरा देखकर ईर्ष्या से कुलबुलाया और उससे लड़ने लगा। वर्षा फिर आई लड़ने वाले से कहा-प्रिय लड़ो मत, अपना मुँह ऊपर कर लो, तुम्हारा पेट भी वैसे ही भर दूँगी जैसा साथी का भरा है।


आखिर अहंकार किस बात का?

(श्रीमती ज्ञानवती देवी जी)

अहंकार एक मानसिक शत्रु है जो मन रूपी पुष्प को नष्ट कर डालता है। यह प्रत्येक प्रयत्न के फूल में विनाशकारी कीट की भाँति है। यह आत्मा के उपवन को तुषारापात की भाँति नष्ट कर डालने वाला है।

सबसे खतरनाक बुद्धिमत्ता का अहंकार है, क्योंकि यह परिपक्व और सुविकसित मन में पाया जाता है। यह अत्यन्त चतुर और धोखेबाज भी है। स्त्री और पुरुष अपनी उच्च शिक्षा, योग्यता और विचारशीलता के कारण अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगते है। उनके मन में इस भाव के उत्पन्न होते ही दूसरों को हेय समझने का भाव उठ खड़ा होता है। मैंने बहुधा ऐसे लोगों को इस प्रकार कहते हुए सुना है, ‘इनका स्तर मेरे स्तर से नीचा है।’

कुछ अहंकारी लोग इस प्रकार के भाव को ‘दया’ कह कर पुकारते हैं। यहाँ तक कि जो लोग उनके समान विचार नहीं रखते उन्हें अपना “कमजोर भाई” कह कर पुकारने में संकोच नहीं करते।

इस प्रकार का अहंकार अनेकों आधुनिक सुधारों का अभिशाप बन गया है। ऐसे सुधारकों को कौन नहीं जानता जो अपने प्रति असीम उत्साह और उन लोगों के प्रति जो उनके विचारों से सहमत नहीं है, दया दिखलाते हैं। यह दया यहीं तक सीमित नहीं रहती, प्रत्युत वर्तमान तथा प्राचीन काल के उन महान स्त्री पुरुषों के प्रति भी दिखाई जाती है जिन्होंने उनके सुधारों को अंगीकार नहीं किया। जब ऐसे लोग अपने कार्य को स्वयं निन्दनीय बना देते हैं तब विपत्तियों के विरोध का सामना करना पड़ता है तथा उन पर अनेक लाँछन लगाए जाते हैं जब वे तुरन्त अपने उद्देश्य के लिए शहीद हो जाते हैं। वे इस बात को भूल जाते हैं कि यह सब उन्हीं के विचारों का परिणाम है। उन्होंने जो कुछ बोया था उसी को काट रहे हैं।

एक बार मैंने सुना कि एक जोशीले नवयुवक ने एक वृद्ध तथा गम्भीर दार्शनिक से, जो उसके विचारों से सहमत नहीं था, का, “मैं ईमानदारी और पूरे उत्साह के साथ इस सत्य की रक्षा करूँगा

इस बात का उत्तर उस दार्शनिक ने गम्भीरता पूर्वक दिया-हे नवयुवक, सत्य की अथवा सत्य के सम्बन्ध में अपनी राय की रक्षा करने के लिए तुम इतने उत्साहित हो?”

जब लोग सत्य को जान लेते हैं तब वे उसकी रक्षा के लिए कभी चिन्तित नहीं रहते। सत्य तो अपनी रक्षा स्वयं है, उसे किसी की रक्षा की आवश्यकता नहीं। जिन्होंने किसी सुन्दर बात को खोज निकाला है वे कभी इस सम्बन्ध में ढिंढोरा नहीं पीटते। वह सुन्दरता चुपचाप उस व्यक्ति के जीवन और चरित्र से आप ही आप व्यक्त होती रहती है। जीवन और चरित्र का महत्ता से कोई इंकार नहीं कर सकता।

बातें और वाद विवाद बालू पर लिखे अक्षरों के समान हैं जो कभी भी मिटाये जा सकते हैं।

कर्म और चरित्र जीवन रूपी चट्टान पर खुदे हुए स्पष्ट अक्षर हैं।

यह तो बुद्धिमत्ता के अहंकार की बात हुई जिसके कारण स्त्री और पुरुष अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं। जब ऐसे लोग अपने को उन लोगों की अपेक्षा, जो उनके विचार से सहमत नहीं हैं, उच्च स्तर पर समझने लगते हैं, तब यह अहंकार अत्यन्त आपत्तिजनक रूप धारण कर लेता है।

परन्तु इससे भी भयानक आध्यात्मिक अहंकार है। क्योंकि यह बुद्धिमत्ता के अहंकार से अधिक चतुर है और अत्यन्त सरलता से अपने शिकार को धोखा देने में सफल हो जाता है।

इस आध्यात्मिक अहंकार के कारण ही लोग ऐसे लोगों को जो उनके विचारों से सहमत नहीं, ''अरक्षित'' समझते हैं।

आध्यात्मिक अहंकार के कारण ही लोग इस प्रकार कह उठते हैं, ''संसार में सभी बातें गलत हो रही हैं, सभी उल्टी हो रही हैं। और संसार को सही रास्ते पर लाना हम लोगों के ही वश की बात है। हम लोगों के ही पास आध्यात्मिक उन्नति की कुञ्जी है।''

कभी- कभी लोग आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि किस प्रकार यह संसार इतने हजार वर्षों तक चलता रहा जब कि इन लोगों का तथा इनके धर्म का कहीं नाम निशान तक न था।

यह आध्यात्मिक आदेश है ''प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अपेक्षा दूसरों का अधिक सम्मान करना चाहिए ।'' परन्तु यह स्पष्ट है कि इस आदेश का पालन करना अत्यन्त कठिन है।

मनुष्य में आपस में भेदभाव उत्पन्न करने वाले इस आध्यात्मिक अहंकार से दूर रहिए।

सभी धर्म अच्छे हैं। सभी धर्म अच्छाई, पवित्रता और सद्गुणों रूपी एकमात्र मार्ग उस ईश्वर तक पहुँचने का बतलाते हैं।

सब लोग उस महान प्रकाश की खोज में हैं और जितना कुछ उस महान प्रकाश का अंश उन्हें प्राप्त हो गया है, उसी के अनुसार अपनी जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

''महापुरूष को अपने को सब प्राणियों का सेवक समझना चाहिए।''

उन बातों को सोचना जिनका ज्ञान हमें नहीं है, बुद्धिमत्ता के अहंकार को जीतने का सबसे अच्छा उपाय है। उस विस्तृत ज्ञान के समुद्र के विषय में विचार कीजिए जिसके विस्तार का हमें कुछ भी ज्ञान नहीं है। जब आईजक न्युटन जैसे परम ज्ञानी ने विषय में इस प्रकार कहा था, तो हम लोगों के लिए तो कुछ कहना ही नहीं-

''मैं विस्तृत ज्ञान रूपी समुद्र के किनारे खेलता हुआ एक शिशु हूँ। विस्तृत ज्ञान रूपी समुद्र मेरे सामने फैला हुआ है जिसके बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता।''

हमारी शिक्षा और ज्ञान की सीमा कुछ भी हो, भले ही हम दूसरों की अपेक्षा कुछ अधिक जानते हों, पर शिशु के समान ही हैं। यदि हम आज दो तीन अक्षरों वाले शब्दों का उच्चारण कर लेते हैं तो हमें यह न भूलना चाहिए कि कल हम भी क, ख, ग सीख रहे थे।

यदि हमें आध्यात्मिक अहंकार के उत्पन्न होने का भय हो अथवा यह अहंकार उत्पन्न हो गया हो तो हमें पवित्रता, अच्छाई, पूर्णता और शक्ति के उस स्तर तक अभी हम नहीं पहुँच सके हैं और न इस छोटे से जीवन में पहुँचने की आशा करने का साहस ही कर सकते हैं। और

''जो खड़ा है उसे इस बात से सावधान रहना चाहिए कि कहीं वह गिर न पड़े।''


मर्यादाओं का पालन कीजिए

(श्री बाबूलाल टीकम दास कदवाने)

मर्यादा शब्द से ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण हो आता है। मर्यादा शब्द तो केवल साढ़े तीन अक्षर का है, किन्तु मर्यादा पालना उतना सरल नहीं। सती सीता को भी मर्यादा पालना अर्थात् मर्यादा की रेखा को उल्लंघन करते ही रावण उन्हें उठा ले गया और फलतः उन्हें (सीता) को अशोकवाटिका में बन्दी रहना पड़ा। इससे स्पष्ट है कि मर्यादा-पालन कितना कठिन है और न पालने से कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं।

प्राकृतिक नियमानुसार हर चीज की मर्यादा होती है और जहाँ मर्यादा की अवहेलना हुई कि मनुष्य संकटों का शिकार हुआ। इसीलिए विद्वानों ने कहा है कि “अति सर्वत्र वर्जयेत्।” अर्थात् किसी भी कार्य में अति नहीं होना चाहिए। प्रायः देखा गया है कि हम तनिक भी मर्यादा के बाहर गये कि हमें संकट का सामना करना पड़ता है। उदाहरणार्थ यदि किसी व्यक्ति की खुराक आधा सेर है और वह स्वादिष्ट भोजन के लोभवश कुछ अधिक खा जावे तो यह निर्विवाद है कि उसे अपच आदि किसी-न-किसी दुःख को सहन करना ही पड़ता है। उक्त नियम केवल मनुष्य या प्राणिमात्र के लिए नहीं, किन्तु संसार को हर वस्तु के लिए है। हम आएँ दिन खबरें सुनते तथा पढ़ते हैं कि आज अमुक स्थान पर रेल की पटरी से गाड़ी उतर जाने या मोटर गलत बाजू से जाने से वहाँ दुर्घटना हो गई और फलस्वरूप इतने व्यक्ति मरे व इतने घायल हुए तथा इतने रुपया की हानि हुई। यह सब क्यों होता है? इसका एक ही उत्तर दें-मर्यादा का उल्लंघन।

यदि कोई व्यक्ति अपनी आमदनी से अधिक खर्च करता है तो उसे अधिक संकट भोगना पड़ता है और इसीलिए यह कहावत है कि “कमावे धेला खेर्चे उसकी दुर्गति देखे कौन?” तात्पर्य यह कि हर व्यक्ति को अपनी आमदनी की मर्यादानुसार ही खर्च करना चाहिए अन्यथा मनुष्य मुश्किल में आ गिरता है। यदि हमने अपना बिस्तर देखकर पैर न फैलाये तो बिस्तर के बाहर अवश्य जावेंगे। इसीलिए मर्यादा का पालन करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि किसी सुन्दर भवन के स्तम्भ या कोई अन्य भाग मर्यादा एवं सूत या लाइन में नहीं है कि उस भवन का जीवनकाल शीघ्र ही समाप्त हो जावेगा। यदि मनुष्य अपने जीवन को मर्यादित बना लेता है तो उसका जीवनकाल भी मर्यादित हो जाता है। वह चिरंजीवी होकर सुख-शान्ति का अनुभव करता है।

मानव शास्त्र में मनुष्य जीवन के जो चार विभाग किए हैं, उनमें प्रथम विभाग ब्रह्मचर्य का है, यह बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है, इसे मनुष्य जीवन का आधार स्तम्भ कहे तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। जिस किसी ने मानव जीवन शास्त्र के इस नियम के अनुसार ब्रह्मचर्य पाला है और गृहस्थाश्रम जीवनकाल में भी जो साँसारिक वासना में लिप्त न होकर मर्यादा का पलता है वह सदा सुखी और शान्तिमय जीवन व्यतीत करता है, अन्यथा उक्त मर्यादा का उल्लंघन करने वाला सदा दुःखी और अस्वस्थ नजर आता है तथा अपने जीवन को शीघ्र ही पालन करना कितना आवश्यक है और न पालने से कितने भयंकर कष्टों का सामना पड़ता है, यह इससे ज्ञात हो जाता है।

मनुष्य ज्ञानवान् प्राणी है, ईश्वर ने उस पर कृपा कर उसे ज्ञान दिया है और इसी कारण वह सर्वश्रेष्ठ प्राणी गिना जाता है, अन्यथा “ज्ञानेन” हीना पशुभि: समाना।'' वाली कहावत के अनुसार उसमें और पशु में कोई व्यक्ति ज्ञानहीन (( मूर्खतापूर्ण) कार्य कर बैठता है तो, उसे अन्य व्यक्ति तुम जानवर हो क्या ?? यह प्रश्न कर देते हैं। किन्तु वास्तव में देखा जाय तो ऐसे व्यक्ति को जानवर की उपाधि देना उस जानवर के साथ भी अन्याय करना होगा, क्योंकि जानवर स्वल्प बुद्धि होते हुए भी अपनी मर्यादाओं का पालन करता है और ज्ञानवान मनुष्य यदि अज्ञान मूलक, मर्यादा से विपरीत कार्य करे तो उसे पशु से भी निम्न स्तर का समझना चाहिए।

यह भी देखा गया है कि जिस परिवार में मर्यादा नहीं अर्थात पिता, पुत्र, पति, पत्नी, सास, बहु व भाई- भाई के आपसी व्यवहार में भी यदि मर्यादा का अभाव है तो उस परिवार में कभी भी आपसी वैमनस्य उत्पन्न हो जाता है। फलत: उसका संयुक्त रहना मुश्किल ही नहीं किन्तु असम्भव- सा हो जाता है और वह विभाजित होकर विनाश ग्रस्त हो जाता है।

यह तो सम्भवत: सभी पाठक जानते ही होंगे कि हाल ही में अमेरिका के एक विमान यू- २ ने अपनी मर्यादा का उल्लंघन किया तो उसे रूसी उल्का (राकेट) द्वारा नष्ट कर दिया गया और परिणाम स्वरूप शीर्ष सम्मेलन, जिसकी ओर संसार के शान्ति प्रिय सभी देश बड़ी आतुरता से अपनी दृष्टि जमाये बैठे थे, विफल हो जाने के कारण उनकी आशा एवं अभिलाषा पर भी पानी फिर गया! संसार में जो शान्ति स्थापित होने की आशा थी वह चकनाचूर हो गयी और इतना ही नहीं विश्व व्यापी युद्ध की भी आशंका होने लगी। मर्यादा उल्लंघन के ऐसे ही दुष्परिणाम होते हैं।


सुनसान के सहचर

(‘कोई एक’)

मनुष्य की यह एक अद्भुत विशेषता है कि वह जिन परिस्थितियों में रहने लगता है उनका अभ्यस्त भी हो जाता है। जब मैंने इस निर्जन वन की सुनसान कुटिया में प्रवेश किया ता सब ओर सूना ही सूना लगता था। अन्तर का सूनापन ही दीखता था। पर अब जबकि अन्तर की लघुता धीरे-धीरे विस्तृत होती जा रही है। चारों ओर अपने ही अपने हँसते-बोलते नजर आते हैं। अब सूनापन कहाँ? अब अँधेरे में डर किसका?

अमावस्या की अँधेरी रात, बादल घिरे हुए, छोटी-छोटी बूँदें, ठण्डी वायु का कम्बल को पार कर भीतर घुसने का प्रयत्न। छोटी-सी कुटिया में पत्तों की चटाई पर पड़ा हुआ यह शरीर आज फिर असुखकर अनभ्यस्तता अनुभव करने लगा। नींद आज फिर उचट गई। विचारों का प्रवाह फिर चल पड़ा स्वजन सहचरों से भरे, सुविधाओं से सम्पन्न घर और इस सघन तमिस्रा की चादर लपेटे वायु के झोंकों से थर-थर काँपती हुई, जल से भीग कर टपकती पर्ण कुटी की तुलना होने लगी दोनों के गुण दोष गिने जाने लगे।

शरीर असुविधा अनुभव कर रहा था। मन भी उसी का सहचर ठहरा। वहीं क्यों इस असुविधा में प्रसन्न होता? दोनों की मिली भगत जो है आत्मा के विरुद्ध ये दोनों एक हो जाते है। मस्तिष्क तो इनका खरीदा हुआ वकील है। जिसमें इनकी रुचि होती है हुआ वकील है। जिसमें इनकी रुचि होती है उसी का समर्थन करते रहना इसने अपना व्यवसाय बनाया हुआ है। राजा के दरबारी जिस प्रकार हवा का रुख देखकर बात करने की कला में निपुण होते थे, राजा को प्रसन्न रखने, उसकी हाँ में हाँ मिलाने में दक्षता प्राप्त किये रहते थे, वैसा ही यह मस्तिष्क भी है। मन की रुचि देखकर उसी के अनुकूल यह विचार प्रवाह का छोड़ देता है। समर्थन में अगणित कारण, हेतु, प्रयोजन और प्रमाण उपस्थित कर देना इसके बाएँ हाथ का खेल है। सुविधाजनक घर के गुण और इस कष्टकारक निर्जन के दोष बताने में वह बैरिस्टरों के कान काटने लगा। सनसनाती हुई की तरह उसका अभिभाषण भी जोरों से चल रहा था।

इतने में सिरहाने की ओर छोटे-से छेद में बैठे हुए झींगुर ने अपना मधुर संगीत गान आरंभ कर दिया। एक से प्रोत्साहन पाकर दूसरा बोला। दूसरे की आवाज सुनकर तीसरा, फिर उससे चौथा, इस प्रकार उसी कुटी में अपने-अपने छेदों में बैठे कितने ही झींगुर एक-साथ गाने लगे। उनका गायन यों उपेक्षा बुद्धि से तो अनेकों बार सुना था। उसे कर्कश व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण समझा था, पर आज मनके लिए कुछ और काम न था। वह ध्यान पूर्वक इस गायन के उतार चढ़ावा को परखने लगा। निर्जन की निन्दा करते-करते वह थक भी गया था। इस चंचल बन्दर को हर घड़ी नये-नये प्रकार के काम जो चाहिए। झींगुर की गान-सभा का समा बँधा तो उसी में रस लेने लगा।

झींगुर ने बडा़ मधुर गान गाया। उसका गीत मनुष्य की भाषा में न था पर भाव वैसे ही मौजूद जैसे मनुष्य सोचता है। उसने गाया "हम असीम क्यों न बनें ?? असीमता का आनन्द क्यों न में ?? सीमा ही बन्धन है, असीमता में मुक्ति का तत्व भरा है। जिसका इन्द्रियों में ही सुख सीमित है, जो कुछ चीजें और कुछ व्यक्तियों को ही अपना मानता है, जिसका स्वार्थ थोडी़ सी कामनाओं तक ही सीमित है, वह बेचारा क्षुद्र प्राणी, इस असीम परमात्मा के असीम विश्व में भरे हुए असीम आनन्द का भला कैसे अनुभव कर सकेगा ?? जीव तू असीम हो, आत्मा का असीम विस्तार कर, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द बिखरा पडा़ है। उसे अनुभव कर और अमर हो जा।"

इकतारे पर जैसे वीतराग ज्ञानियों की मण्डली मिल- जुल कर कोई निर्वाण पद गा रही हो वैसे ही यह झींगुर अपना गान निर्विघ्न होकर गा रहे थे। किसी को सुनाने के लिए नहीं। स्वान्तः सुखाय ही उनका यह प्रयास चल रहा था। मैं भी उसी में विभोर हो गया। वर्षा के कारण क्षतिग्रस्त कुटिया से उत्पन्न असुविधा गाने वाले सहचरों ने उदासीनता को हटा कर उल्लास का वातावरण उत्पन्न कर दिया।

पुरानी आदतें छूटने लगीं। मनुष्यों तक सीमित आत्मीयता ने बढ़ कर प्राणिमात्र तक विस्तृत होने का प्रयत्न किया तो अपनी दुनियाँ बहुत चौडी़ हो गई। मनुष्य के सहवास में सुख की अनुभूति ने बढ़ कर अन्य प्राणियों के साथ भी वैसी ही सुखानुभूति करने की प्रक्रिया सीख ली। अब इस निर्जन बन में भी कहीं सूनापन दिखाई नहीं देता।

आज कुटिया से बाहर निकल कर इधर- उधर भ्रमण करने लगा तो चारों ओर सहचर दिखाई देने लगे। विशाल वृक्ष पिता और पितामह जैसे दीखने लगे। कषाय वल्कल धारी भोज- पत्र के पेड़ ऐसे लगते थे मानों गेरूआ कपडे़ पहने कोई तपस्वी महात्मा खड़े होकर रहे हो। देवदारु और चीड़ के लम्बे- लम्बे पेड़ प्रहरी की तरह सावधान खड़े थे मानों मनुष्य जाति में प्रचलित दुर्बुद्धि को अपने समाज में न आने देने के लिए कटिबद्ध रहने का व्रत उनने लिया हुआ हो।

छोटे- छोटे लता- गुल्म, नन्हे मुन्ने बच्चे- बच्चियों की तरह पंक्ति बना कर बैठे थे। पुष्पों में उनके अपने सिर सुशोभित थे। वायु के झोकों के साथ हिलते हुए ऐसे लगते थे। मानों प्रारम्भिक पाठशाला के छोटे छात्र सिर हिला हिला कर पहाड़े याद कर रहे हों। पल्लवों पर बैठे हुए पक्षी मधुर स्वर में ऐसे चहक रहे थे, मानों यक्ष गन्धर्वों की आत्माएँ खिलौने जैसे सुन्दर आकार धारण करके इस वनश्री का गुणगान और अभिनन्दन करने के लिए ही स्वर्ग से उतरी हों। किशोर बालकों की तरह हिरन उछल कूद मचा रहे थे। जंगली भेडे़ (बरड़) ऐसी निश्चित होकर धूम रही थी मानों इस प्रदेश की गृह लक्ष्मी यही हो। मन बहलाने के लिए चाभीदार कीमती खिलौनों की तरह छोटे- छोटे कीडे़ पृथ्वी पर चल रहे हैं। उनका रंग रूप, चाल ढाल सभी कुछ देखने योग्य था उड़ते हुए पतंग, फूलों से अपने सौन्दर्य की प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। हममें से कौन अधिक सुन्दर, कौन अधिक असुन्दर है इसकी होड़ उनमें लगी हुई थी।

नव यौवन का भार जिससे सम्भलने में न आ रहा हो ऐसी इतराती हुई पर्वतीय नदी बगल में ही बह रही थी। उसकी चंचलता और उच्छृंखलता का दर्प देखते ही बनता था। गंगा में और भी नदी आकर मिलती हैं। मिलन के संगम पर ऐसा लगता था मानों दो सहोदर बहिनें सुसराल जाते समय गले मिल रही हों, लिपट रही हों। पर्वत राज हिमालय ने अपने सहस्त्र पुत्रियों (नदियों) का विवाह समुद्र के साथ किया है। सुसराल जाते समय में बहिनें कैसी आत्मीयता से मिलती है, संगम पर खड़े खड़े इस दृश्य को देखते-देखते जी नहीं अघाता। लगता है हर घड़ी इसे देखते ही रहें।

वयोवृद्ध राज पुरुषों और लोक नायकों की तरह पर्वत शिखर दूर-दूर तक ऐसे बैठे थे मानों किसी गम्भीर समस्याओं को सुलझाने में दत्त-चित्त होकर संलग्न हों। हिमाच्छादित चोटियाँ उनके श्वेत केशों की झाँकी करा रही थी। उन पर उड़ते हुए छोटे बादल ऐसे लगते थे मानो ठंड से बचाने के लिए कई रुई का बढ़िया टोपा उन्हें पहनाया जा रहा है। कीमती शाल-दुशालों में उनके नग्न शरीर को लपेटा जा रहा हो।

जिधर भी दृष्टि उठती उधर एक विशाल कुटुम्ब अपने चारों ओर बैठा हुआ नजर आता था। उनके जबान न थी, वे बोलते न थे पर उनकी आत्मा में रहने वाला चेतन बिना शब्दों के ही बहुत कुछ कहता था। जो कहता था हृदय से कहता था और करके दिखाता था। ऐसी बिना शब्दों की किन्तु अत्यन्त मार्मिक वाणी इससे पहले सुनने को नहीं मिली थी। उनके शब्द सीधे आत्मा तक प्रवेश करते और रोम-रोम को झंकृत किये देते थे। अब सूना पन कहाँ? अब भय किसका? सब ओर सहचर ही सहचर जो बैठे थे।

सुनहरी धूप ऊँचे पर्वत शिखरों से उतर कर पृथ्वी पर कुछ देर के लिए आ गई थी। मानों अविद्याग्रस्त हृदय में सत्संग वश स्वल्प स्थायी ज्ञान उदय हो गया। ऊँचे पहाड़ों की आड में सूरज इधर उधर ही छिपा रहता है केवल मध्याह्न को ही कुछ घण्टों के लिये उनके दर्शन होते हैं। उनकी किरणें सभी सिकुड़ते हुए जीवों में चेतना की एक लहर दौड़ा देती है। सभी में गतिशीलता और प्रसन्नता उमड़ने लगती है। आत्म ज्ञान का सूर्य भी प्रायः वासना और तृष्णा की चोटियों के पीछे छिपा रहता है पर जब कभी जहाँ कहीं वह उदय होगा वहीं उसकी सुनहरी रश्मियाँ एक दिव्य हलचल उत्पन्न करती हुई अवश्य दिखाई देगी।

अपना शरीर भी स्वर्णिम रश्मियों का आनन्द लेने के लिए कुटिया से बाहर निकला और मखमल के कालीन सी बिछी हरी घास पर टहलने के दृष्टि से एक ओर चल पड़ा कुछ ही दूर रंग बिरंगे फूलों का एक बड़ा पठार था। आँखें उधर ही आकर्षित हुई और पैर उसी दिशा में उठ चले।

छोटे बच्चे अपने सिर पर रंगीन टोपे पहने हुए पास-पास बैठ कर किसी खेल की योजना बनाने में व्यस्त हो ऐसे लगते थे वे पुष्प सज्जित पौधे मैं उन्हीं के बीच जाकर बैठ गया। लगा जैसे मैं भी एक फूल हूँ। यदि ये पौधे मुझे भी अपना साथी बना लें तो मुझे भी अपने खोये बचपन पाने का पुण्य अवसर मिल जाय।

भावना आगे बढ़ी जब अन्तराल हुलसता है तो तर्कवादी कुतर्की विचार भी ठण्डे पड़ जाते हैं। मनुष्य भावों में प्रबल रचना शक्ति है वे अपनी दुनियां आप बसा लेते हैं। काल्पनिक ही नहीं शक्तिशाली भी सजीव भी। ईश्वर और देवताओं तक की रचना उसने अपनी भावना के बल पर की है और उनमें अपनी श्रद्धा को पिरो कर उन्हें इतना महान बनाया है जितना कि वह स्वयं है। अपने भाव फूल बनने को मचले तो वैसा ही बनने में देर न थी। लगा कि इन पंक्ति बना कर बैठे हुए पुष्प बालकों ने मुझे भी सहचर मान कर मुझे भी अपने खेल में भाग लेने के लिए सम्मिलित कर लिया है।

जिसके पास मैं बैठा था वह बड़े से पीले फूल वाला पौधा बड़ा हँसोड़ तथा वाचाल था। अपनी भाषा में उसने कहा-दोस्त तुम मनुष्यों में व्यर्थ जा जन्मे। उनकी भी कोई जिन्दगी है, हर समय चिन्ता, हर समय उधेड़बुन, हर समय तनाव, हर समय कुढ़ना। अब की बार तुम पौधे बनना, हमारे साथ रहना। देखते नहीं हम सब कितने प्रसन्न हैं, कितने खिलते हैं, जीवन को खेल मान कर जीने में कितनी शान्ति है, यह हम लोग जानते हैं, देखते नहीं हमारे भीतर आन्तरिक उल्लास सुगन्ध के रूप में बाहर निकल रहा है। हमारी हँसी फूलों के रूप में बिखरी पड़ रहीं है। सभी हमे प्यार करते हैं, सभी को हम प्रसन्नता प्रदान करते हैं। आनन्द से जीते हैं और जो पास आता है उसी को आनन्दित कर देते हैं। जीवन जीने की यही कला है। मनुष्य बुद्धिमानी का गर्व करता है पर किस काम की वह बुद्धिमानी जिससे जीवन की साधारण कला, हँस खेल कर जीने की प्रकृया भी हाथ न आये।"

फूल ने कहा- "मित्र, तुम्हें ताना मारने के लिए नहीं, अपनी बडा़ई करने के लिए भी नहीं, यह मैंने एक तथ्य ही कहा है ?? अच्छा बताओं जब हम धनी, विद्वान, गुणी, सम्पन्न वीर और बलवान न होते हुए भी अपने जीवन को हँसते हुए तथा सुगंध फैलाते हुए जी सकते हैं तो मनुष्य वैसा क्यों नहीं कर सकता ?? हमारी अपेक्षा असंख्य गुने साधन उपलब्ध होने पर भी यदी वह चिन्तित और असंतुष्ट रहता है तो क्या इसका कारण उसकी बुद्धिहीनता न मानी जायगी ?"

"प्रिय, तुम बुद्धिमान हो जो उन बुद्धिहीनों को छोड़कर कुछ समय हमारे साथ हँसने खेलने चले आये। चाहो तो हम अकिंचनों से भी जीवन विद्या का एक महत्वपूर्ण तथ्य सीख सकते हो।"

मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो गया- "पुष्प मित्र, तुम धन्य हो। स्वल्प साधन होते हुए भी तुमने जीवन कैसे जीना चाहिये यह जानते हो। एक हम हैं- जो उपलब्ध सौभाग्य को कुढन में ही व्यक्तीत करते रहते हैं। मित्र, सच्चे उपदेशक हो, वाणी से सीखने आया हूँ तो तुमसे बहुत सीख सकूंगा। सच्चे साथी की तरह सिखाने में संकोच न करना।"

हँसोड़ पीला पौदा खिलखिला कर हँस पडा़ सिर हिला- हिला कर वह स्वीकृत दे रहा था। और कहने लगे- "सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग- पग पर शिक्षक मौजूद हैं। पर आज सीखना कौन चाहता है। सभी तो अपनी अपूर्णता के अहंकार के मद में ऐंठे- ऐंठे से फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाय तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा, सच्ची शिक्षा स्वयमेव हमारे हृदय में प्रवेश करने लगे।"

*समाप्त*